पियरे जोसेफ प्रूधों : प्रखर समाजवादी चिंतक

लेखकनामा

इस शृंखला में हमने अभी तक मार्टिन लूथर, काल्विन, मूर, वाल्तेयर, रूसो, संत साइमन, एडम स्मिथ आदि विद्वानों, अर्थशास्त्रियों और समाज सुधारकों के विचारों का अवगाहन किया. उनके जीवनसंघर्ष के बारे में जाना. मानवेतिहास पर उनके विचारों द्वारा पड़ने वाले प्रभाव की संक्षिप्त समीक्षा की. इस बहाने उनके युग की मुख्य प्रवृत्तियों के बारे में भी संक्षिप्त जानकारी प्राप्त की. इन महापुरुषों के बारे में जानना इसलिए आवश्यक है कि इन सभी ने अपने समय की प्रचलित धारा के विरुद्ध जाकर कार्य किया. उसके लिए विरोधियों की प्रताड़नाएं भी सहीं. जेल गए, फांसी चढ़े, अपने सुख और संसाधनों का बलिदान किया, किंतु अपने विचारों पर अडिग रहे. सत्य की स्थापना के लिए संघर्ष को निरंतर आगे बढ़ाते रहे. अपने वैचारिक अवदान एवं जीवनसंघर्ष द्वारा उन्होंने समाज को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की. अंततः लोगों ने भी उनके विचारों और भावनाओं को समझा और उनको अपना प्रेरक मानकर वास्तविक सम्मान दिया. वस्तुतः वौद्धिक समाज का निर्माण कोई एक दिन की परिघटना नहीं है. न परिवर्तन एकाएक, एक ही झटके में संभव हो सका था. बल्कि परिवर्तन की यह शंृखला एक एकांतर-क्रम में बहुत धीरे-धीरे हुई. बीच-बीच में व्यतिक्रम भी आते रहे हैं.

दरअसल मनुष्यता के संघर्ष का प्रारंभ मुक्त कबिलाई जीवन से हुआ है. निश्चित रूप से उससे पहले भी आदिम मनुष्य को जीने के लिए संघर्ष करना पड़ा होगा. लेकिन वह अकेले प्राणी का संघर्ष था. कबिलाई जीवन का उद्भव सभ्यता के उदय की आरंभिक घटना थी. समाज की स्थापना से पहले तक मनुष्य का जीवन पशुओं की भांति था. उसकी आवश्यकताएं जैविक थीं, जो वन्य जीवन के दौरान कदम-कदम पर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाले आदिम मनुष्य द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी थीं. सभ्यता-परिष्करण के दौरान परिवार, राज्य आदि विभिन्न संस्थाओं का जन्म हुआ. राज्य और समाज को व्यवस्थित करने के लिए कानून बनाए गए. फिर उन कानूनों के पालन के लिए समाज एवं राज्य द्वारा कुछ लोगों को विशिष्ट अधिकार, कर्तव्य आदि सौंपे गए. व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह भी आवश्यक था. वह प्रशासन की सरलतम व्यवस्था थी, किंतु सरल से जटिल स्थितियों की ओर बढ़ना एक प्राकृतिक सिद्धांत है.

तो हुआ यह कि शीर्ष पर बैठे लोगों ने, उन लोगों ने जिन्हें व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त रूप से अधिकार संपन्न बनाया गया था, अपनी स्थिति का लाभ क्षुद्र स्वाथों के लिए उठाना आरंभ कर दिया. यह कार्य धर्म, समाज एवं राजनीति समेत अनेक स्तरों पर हुआ. सामाजिक स्तर पर वर्ग और जाति बनाकर. उन्हीं के आधार पर समाज का स्तरीकरण किया गया तो राजनीतिक स्तर पर राजा को अतिरिक्त रूप से अधिकार संपन्न बनाया गया. आदिमानव, ने शिकार-अभियान के दौरान अपना नेतृत्व सौंपकर जिसे अपने समूह का अस्थायी नेता-कर्ता आदि स्वीकार किया था, निहित स्वार्थों के लिए वह धीरे-धीरे अपना स्थान पक्का करता चला गया. प्रारंभ में शीर्ष पर बने रहने के पीछे नेतृत्वकर्ता के अपने गुणों का भी योगदान होता था, किंतु कालांतर में व्यक्तिगत गुणों के आधार पर चयन की प्रक्रिया का स्थान विशिष्ट वर्ग को मिली सुविधाओं ने ले लिया. समाज में विशिष्ट सुविधाओं और अधिकारों से संपन्न वर्ग बनने लगे, जिन्होंने धीरे-धीरे स्थितियों को अपने पक्ष में करना प्रारंभ कर दिया. इनमें से कुछ वर्गों के पीठ पर धर्मसत्ता का हाथ था तो कुछ को राजनीति तथा कुछ को अपनी स्थिति का लाभ उठाकर अतिरिक्त रूप से जुटाए गए आर्थिक संसाधनों द्वारा ताकत मिलती रही.

भारतीय समाज के जातीय स्तरीकरण का लाभ उठाते हुए यहां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि जाति आधारित समूह बने तो धार्मिक विभाजन के आधार पर पंडित, मौलवी, पादरी आदि ने अपने-अपने अनुयायियों को अपने संकेतों पर नाचने को मजबूर कर दिया. इन सभी ने अपने वर्गीय स्वार्थों के लिए सुख-सुविधाओं पर अपना विशेषाधिकार बनाए रखने के लिए सामाजिक नियमों में संशोधन करना प्रारंभ कर दिया. तो भी प्रारंभ में जातीय और सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप काफी लचीला था. जैसे कि वैदिक भारत में जाति केवल वर्गीय विभाजन तक सीमित थी. और ये वर्ग भी खुले हुए थे. कोई व्यक्ति अपनी रुचि, कार्यक्षमता और योग्यता के अनुसार अपने वर्ग में परिवर्तन कर सकता था. धीरे-धीरे यह स्थिति बदलती चली गई. वर्ग जातियों में बदले और जातियां उपजातियों में बंटती चली र्गईं. विशेषाधिकार बनाए रखने के लिए जातीय और धार्मिक आधार पर शोषण की घटनाएं आम होने लगीं. आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग ने पहले जाति को जन्मगत किया, तत्पश्चात उसके अनुसार समाज को विभाजित करना प्रारंभ कर दिया. जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी देशों में निकृष्ट और अमानवीय दासप्रथा का जन्म हुआ तो भारत आदि एशियाई देशों में वही स्थितियां जातिप्रथा के रूप में सामने आने लगीं. धीरे-धीरे समाज का विभाजन दो वर्गों में होता चला गया. उनमें एक वर्ग उत्पीड़कों का था, जिनके पास सत्ता, सुख और संसाधनों की भरमार थी. उनमें वे लोग थे जो अपने धार्मिक और राजनीतिक संपर्कों तथा उच्च आर्थिक हैसियत के आधार पर अपनी स्थिति और उत्पीड़न को नैसर्गिक आधार देने पर तुले था, ताकि उनकी आलोचना का कोई आधार ही न रहे. यह कार्य कभी जातिगत भिन्नताओं के आधार पर तो कभी पूर्वजन्मों के संस्कार, भाग्यलेख आदि के बहाने से किया जा रहा था.

ऐसा नहीं है कि उत्पीड़ित वर्ग हमेशा चुपचाप रहकर उत्पीड़न सहता रहा. अपनी स्थिति से उबरने का उसने कभी प्रयास ही नहीं किया. प्रत्येक देश और समाज में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब उत्पीड़ितों ने सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक अनाचार का संगठित विरोध कर समाज के शीर्षस्थ वर्ग के आगे गंभीर चुनौती पेश की. कई बार तो उसको सफलता भी हाथ लगी. दासप्रथा के विरोध में आदिविद्रोही स्पार्टकस के विरोध को भुला पाना आसान नहीं है. रोम के इस दास-योद्धा (ग्लेडिएटर) ने पहली बार दासों को संगठित करके विशाल रोमन साम्राज्य के विरुद्ध संघर्ष का आवाह्न किया था. उस समय के सर्वाधिक संपन्न और शक्तिशाली रोमन साम्राज्य के विरुद्ध, ईसा के जन्म से लगभग तिहत्तर वर्ष पहले, मात्र चैहत्तर गुलाम साथियों के साथ शुरू किया गया, वह पहला स्वाधीनता युद्ध जब अपने शिखर पर पहुंचा तो एक लाख से ऊपर गुलाम सैनिक स्पार्टकस के साथ युद्धभूमि में अपनी आजादी के लिए लोहा लेने को तैयार खड़े थे. इतिहास का वह संभवतः सबसे पहला मुक्ति संग्राम था, जब उन बहादुर दास सैनिकों ने किसी राजा या सामंत के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी आजादी और मान-सम्मान के लिए, स्वेच्छा से हथियार उठाए थे. संभवतः वह पहला अवसर था, जब इतनी बड़ी संख्या में दास ग्लेडियेटरों ने सम्राट और सामंतों के मनोरंजन के लिए शस्त्र न उठाकर, अपनी स्वाधीनता की रक्षा के लिए मृत्यु के वरण का संकल्प लिया था.

उस बहादुर दास सेना ने दो बड़े युद्धों में रोम की अजेय समझी जाने वाली सेना को हार का मुंह देखने को विवश कर दिया. अंत में संगठित सेना के जबरदस्त प्रहार और अपने ही साथियों के षड्यंत्र के कारण स्पार्टकस को युद्धभूमि में पराजय मिली. गुलाम बनाए गए लगभग साढ़े बारह हजार सैनिकों के साथ वह युद्धभूमि पर शहीद हुआ. पराजय के पश्चात पकड़े गए छह हजार से ऊपर दासों को जिंदा सूली पर टंगवा दिया. बाकी गुलामों को अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए, मदांध रोम साम्राज्य ने रोम से कपुआ तक के लगभग दो सौ किलोमीटर के रास्ते पर गाढ़ी गई छह हजार से अधिक सूलियों पर विद्रोही दास सैनिकों को जीवित ही लटकवा दिया गया. कई दिनों तक उनकी घायल कराहें, मर्मांतक चीत्कार हवा में गूंजते रहे. मनुष्यता के इतिहास की उस सर्वाधिक निर्लज्ज घटना में, एक ओर रोम के भ्रष्ट सम्राट और सामंत अपना विजय उत्सव मना रहे थे, दूसरी ओर चील-कव्वे बहादुर घायल सैनिकों के जीवित शरीरों से मांस नोंच-नोंच कर खा रहे थे. कई शवों से मरने से पहले ही आंखें नोंच ली गई थीं.

दिल हिला देने वाली यह घटना हालांकि स्पार्टकस और उसके साथियों की पराजय के रूप में इतिहास में दर्ज है, किंतु क्या यह सचमुच उनकी पराजय थी. धर्म और राजसत्ता के ऐसे ही अनाचारों ने आगे चलकर उन्हें ईसा मसीह को पैगंबर बनाने में मदद की थी. मनुष्यता की इस कराह की परिणति रोम की तबाही के रूप में हुई. जबकि स्पार्टकस मरकर भी अमर रहा. उसकी बहादुरी और इंसानियत के लिए छेडे़ गए युद्ध के कारण शताब्दियों बाद भी वह अपने जैसे उत्पीड़ितों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहा. आखिर मनुष्यता के समर्थक एवं स्वाधीनता के चहेतों ने अठारहवीं शताब्दी में स्पार्टकस के महत्त्व को पहचाना और उसके प्रति अपनी सच्ची ऋद्धांजलि प्रस्तुत करते हुए उसके संघर्ष को इतिहास में ससम्मान प्रतिष्ठापित किया.

धार्मिक-राजनीतिक वर्चस्व के विरुद्ध लोक-अस्मिता के संघर्ष का आगाज केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है. भारत में तो वर्चस्व से मुक्ति के लिए संघर्ष की शुरुआत रोम के उस युद्ध से पांच शताब्दी पहले ही हो चुकी थी, जब वैदिक संस्कृति के नाम पर फैलाए जा रहे धार्मिक आडंबरवाद, बलिप्रथा, जातीय भेद और कर्मकांडों के विरोध में गौतम बुद्ध ने श्रमण संस्कृति का आवाह्न किया. उन्हीं के साथ-साथ महावीर स्वामी ने भी जैन दर्शन के माध्यम से ब्राह्मणवाद और उसके द्वारा फैलाए जा रहे कर्मकांडों, आडंबरवाद को कारगर चुनौती प्रस्तुत की थी, जिसने शताब्दियों तक ब्राह्मणवाद को अपदस्थ रखा.

इस तरह प्रत्येक समाज और संस्कृति में अपने अंर्तद्वंद्व तथा संघर्ष रहे हैं. साथ ही ऐसे संकटों से उबरने के लिए संघर्ष के अनेक उदाहरण भी इतिहास में मौजूद हैं. मनुष्यता को राजनीतिक उत्पीड़न और धार्मिक आडंबरवाद से मुक्त कराने के संघर्ष तो हर शताब्दी कर काल, परिवेश में होते रहे हैं. लेकिन उसके लिए वास्तविक संघर्ष पंद्रहवीं और सोहलवीं शताब्दी में ही शुरू हो सका. औद्योगिकीकरण एवं वैज्ञानिक खोजों ने उसे तार्किक आधार दिया था. जिससे चर्च समेत दुनिया की सभी धार्मिक संस्थाओं को, जहां धर्म सांगठनिक सत्ता के रूप में अपनी निर्णायक उपस्थिति बनाए हुए था, सुधारवादियों की ओर से चुनौती मिलने लगी. भारत में यह कार्य भक्त कवियों द्वारा तथा यूरोप में मार्टिन लूथर, का॓ल्विन जैसे उदारवादियों द्वारा संभव हो सका.

लोकतंत्र, सहकारिता, सर्वोदय और समाजवाद जैसी आधुनिक और अपेक्षाकृत मानवीय दिखने वाली किसी भी विचारधारा से यदि आज हम प्रभावित हैं, तो इसलिए कि उसके पीछे महापुरुषों की कई पीढ़ियों का दर्शन और संघर्ष छिपा हुआ है. ऐसा नहीं है कि प्रत्येक महापुरुष ने अपने समय में, समाज में व्याप्त सभी कुरीतियों का एक साथ विरोध किया हो. यह सबकुछ देशकाल, परिस्थितियों तथा व्यक्ति-विशेष की अभिरुचियों पर निर्भर रहा है. अरस्तु जैसा विद्वान दास प्रथा के समर्थकों में से था. जबकि सत्य और अहिंसा के सिद्धांत के आधार पर अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी जातिप्रथा के समर्थकों में बने रहे. मानवाधिकार, व्यक्ति-स्वातंत्रय तथा स्त्री-पुरुष समानता का अठारहवीं शताब्दी का सबसे बड़ा पैरोकार रूसो अपनी पत्नी और बच्चों की उपेक्षा करता रहा. सचाई यह है कि किसी भी विचार को स्थापित होने से पहले अनेक स्थितियों, परिक्षाओं से गुजरना पड़ता है. मानव सभ्यता का इतिहास दरअसल विभिन्न सामाजिक अंतर्द्वंद्वों और उनके आधार पर विकसित विचार सरणियों का भी इतिहास है. इन विद्वानों के जीवन-संघर्ष तथा उनकी वैचारिक दृढ़ता से इस तथ्य को आसानी से समझा जा सकता है.

इस शृंखला की अगली के कड़ी के रूप में हम पियरे जोसेफ प्रूधों के जीवनचरित की झलक दे रहे हैं. जिससे मार्क्स ने बहुत कुछ ग्रहण किया.— ओमप्रकाश कश्यप

पीयरे जोसेफ प्रूधों (Pierre-Joseph Proudhon), जनवरी 15, 1809 से जनवरी 19, 1865 तक, का नाम उनीसवीं शताब्दी के अग्रणी समाजवादी चिंतकों, अर्थशास्त्रियों के बीच अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है. वह पहला आदमी था जो सही मायने में समाजवादी था, लेकिन जिसने स्वयं को अराजकतावादी ऐलान करते हुए जोर देकर कहा था कि ‘व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है.’ अपने विचारों की व्याख्या करते हुए प्रूधों ने एक पुस्तक भी लिखी—What is Property? An Inquiry into the Principle of Right and of Government. इस पुस्तक ने प्रूधों ने प्रचलित मान्यताओं को खंड-खंड तोड़ते हुए एक ऐसे समाज की संकल्पना की थी, जहां पर पूरा समुदाय एक परिवार की तरह रहे. संपत्ति पर लोगों का सामूहिक अधिकार हो, मनुष्य को पूरी आजादी मिले, सरकार या किसी अन्य किसी भी प्रकार की सत्ता का हस्तक्षेप कम से कम रहे. लोगों में अधिकार चेतना हो, ताकि वह अपने हक के लिए संघर्ष कर सकें.

ध्यातव्य है कि कुछ इसी प्रकार का सपना प्रूधों का समकालीन राबर्ट ओवेन भी देख रहा था. यही नहीं ओवेन तो समाजवाद और सहकार को लेकर अपने प्रयोग आरंभ भी कर चुका था, और इस कारण खासी चर्चा में भी था. मगर कुल मिलाकर ओवेन था एक व्यापारी ही. उसके प्रयासों के पीछे कहीं न कहीं उसकी लाभ कमाने की चाहत छिपी थी. अपनी फैक्ट्रियों में कार्य करने वाले कारीगरों, मजदूरों के लिए उसने एक गर्वोक्ति भी की थी कि—

‘लोग मेरी दया पर निर्भर, मेरे गुलाम हैं.

अपने समकालीन दूसरे समाजवादियों की अपेक्षा प्रूधों सवार्धिक मुखर एवं अपने प्रयासों में पूर्णतः ईमानदार था. स्वयं को अराजकतावादी घोषित करके उसने ने एक प्रकार से छद्म समाजवादियों को चुनौती दी थी. देखा जाए तो यह भी एक प्रकार से आलोचना एवं विरोध प्रदर्शन का शालीन तरीका था. उन लोगों से जिनकी कथनी और करनी में कोई तालमेल नहीं था. प्रूधों का अराजकतावाद(Anarchism) इसकी प्रचलित अवधारणा से एकदम भिन्न है. सामान्यतः अराजकतावाद का अभिप्राय कुशासन और अव्यवस्था से लिया जाता है. जबकि प्रूधों के अनुसार अराजकतावाद राजनीति की वह उच्चतम स्थिति है, जहां कानून का हस्तक्षेप कम से कम हो. लोग अपने दायित्वों के निर्वहन के प्रति स्वयं सजग हों.

प्रूधों की चर्चा उसकी एक सुप्रचलित उक्ति ‘संपत्ति चोरी है—संपत्तिशाली व्यक्ति चोर है’ के कारण भी की जाती है. प्रूधों की पुस्तक ‘सपत्ति क्या है?’ की विद्वानों द्वारा भरपूर सराहना की गई, जिसने उसे अल्प समय में ही पूरे यूरोप में चर्चित कर दिया था. मार्क्स ने उससे प्रभावित होकर एक पत्र लिखा था. आगे चलकर वे दोनों परस्पर अच्छे दोस्त बन गए तथा आजीवन एक-दूसरे से प्रेरणा लेते रहे. हालांकि दोनों के बीच पूर्ण वैचारिक सहमति कभी नहीं बन पाई.

प्रूधों का जन्म फ्रांस के बेसांकों(Besançon) नामक स्थान पर 15 जनवरी 1809 को हुआ था. उसके पिता एक साधारण लुहार थे, वे शराब के पीपे बनाने का काम करते थे. निर्धन परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन से ही प्रूधों को कठिन परिश्रम करना पड़ा. जीवन-संघर्ष की शुरुआत उसने गाय चराने और घर के काम-काज से की. कुछ समझदार हुआ तो पढ़ने की लालसा उत्पन्न हुई, मगर परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी न थी कि वह पढ़ाई-लिखाई संभव हो सके. मां कैथरीन सिमोनिन दूरदर्शी महिला थीं. उन्हीं की जिद थी कि उनका बेटा कुछ पढ़े. बावजूद इसके वर्षों तक वह पढ़ाई से दूर ही रहा. अंततः सोलह साल की अवस्था में, मां के ही प्रयासों से उसने जैसे-तैसे एक स्थानीय स्कूल में प्रवेश ले लिया. इसके बावजूद राह अभी आसान न थी. पिता के एक संबंध के कारण प्रूधों को फीस माफी की सुविधा मिल गई. प्रूधों खुश था, उसको विश्वास था कि आगे से उसकी पढ़ाई की राह आसान हो जाएगी. लेकिन प्रवेश लेना एक बात है और अध्ययन जारी रख पाना दूसरी बात. गरीब प्रूधों के पास पुस्तकें खरीदने के लिए भी पैसे न थे. स्कूल में पुस्तक साथ न ला पाने के कारण उसको बार-बार सजा मिलती. साथी छात्रों के बीच वह उपहास का पात्र बनता. परंतु जहां चाह, वहां राह…जहां संकल्प वहां विकल्प—जैसी कहावतें सच होती रहीं या कहें कि जीवट का धनी प्रूधों अपने संघर्ष से उन्हें हकीकत में बदलता रहा.

प्रूधों ने स्कूल की फीस भरने के लिए समय निकालकर मेहनत-मजदूरी करनी शुरू कर दी. जैसे-तैसे मेहनत-मजदूरी करके वह फीस का प्रबंध तो कर लेता, लेकिन पुस्तकों के लिए उसको दूसरे छात्रों के आगे हाथ फैलाना पड़ता था. दूसरे छात्रों से पुस्तक मांगकर जैसे-तैसे उसकी नकल तैयार करके वह अपना काम चलाता. मगर कभी-कभी ऐसा होता कि छात्रें को स्वयं भी पुस्तकों की आवश्यकता पड़ती. इसके लिए उसने एक रास्ता निकाल लिया. अब वह ऐसे समय में अपनी पढ़ाई करता, जिस समय दूसरे विद्यार्थी आराम कर रहे होते. जाहिर है कि ऐसा समय रात को ही मिल पाता, जिस समय बाकी विद्यार्थी सो रहे होते. प्रूधों उनके सोने से पहले उनसे पुस्तकें मांग लाता और प्रातःकाल उनके जागने से पहले पुस्तकें लौटा देता.

इतने संघर्ष के बाद भी स्कूल-स्तर से उसकी पढ़ाई आगे न बढ़ सकी. उम्र के उनीसवे वर्ष से ही प्रूधों को नौकरी पर जाना पड़ा. एक छापाखाने में उसे कंपोजिटर की नौकरी मिल गई. इस धंधे ने यूरोप में अनेक अराजकतावादियों को जन्म दिया था, लेकिन खुद को अराजकतावादी(Anarchist) कहने वाला सबसे पहला आदमी प्रूधों ही था. हालांकि उसकी अराजकतावाद(Anarchism) की परिभाषा उसकी प्रचलित परिभाषा से भिन्न है. बहरहाल, उसको कंपोजीटर की नौकरी भी आसानी से नहीं मिली थी. अठारह-उनीस वर्ष के अनुभवहीन किशोर को सिवाय घरेलू नौकर के कोई और सम्मानित काम देने को कोई तैयार न था. इसलिए नौकरी की खोज में प्रूधों को फ्रांस में इस शहर से उस शहर के बीच दौड़ लगानी पड़ी थी, जिससे वह लोगों के संपर्क में आया और उसको अपने समाज को करीब से देखने-समझने का अवसर मिला. उसने पाया कि भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद सभी जगह गरीबी है, उसके कारण भी एक ही जैसे हैं. लोगों की समस्याओं में भी साम्य है. प्रशासन की बदइंतजामी भी सभी जगह एक जैसी है.

तभी एक दुर्घटना ने प्रूधों को आहत कर दिया. उसका एक भाई सेना भर्ती था. 1833 में प्रूधों को एक दुर्घटना में अपने भाई की मृत्यु होने का दुःखद संदेश प्राप्त हुआ, जिसने उसको हिलाकर रख दिया. उस दुर्घटना से जुड़ा एक और समाचार ज्यादा दुःखदायी और आक्रोश पैदा करनेवाला था. प्रूधों को बताया गया कि उसके भाई ने सेना में अपने वरिष्ठ द्वारा सेना के फंड के दुरुपयोग के विरुद्ध आवाज उठाई थी. उसके बाद ही वह दुर्घटना घटी थी. इससे प्रूधों के मन में व्यवस्था के प्रति गुस्सा फूटने लगा. उसे लगा कि तंत्र न केवल स्वार्थी और आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, बल्कि वह निष्ठुर, क्रूर, आततायी और निर्लज्ज भी है. इस घटना के बाद आमजन के प्रति उसकी सहानुभूति बढ़ती गई और वह व्यवस्था में आमूल परिवर्तन का समर्थक बन गया.

प्रूधों का दिमाग जितनी तेजी से सोच रहा था, उतनी ही समाज को जानने-समझने की उसकी भूख बढ़ती जा रही थी. पढ़ाई बीच ही में छूट जाने के कारण वह पुस्तकों से एकाएक दूर हो चुका था. नौकरी की व्यस्तता के चलते लोगों से संपर्क भी घटा था. उसकी भरपाई के लिए उसको ऐसी पुस्तकों की जरूरत थी जो उसकी मानसिक खुराक के लिए उचित सामग्री का प्रदान कर सकें. पुस्तकें खरीदने लायक उसकी स्थिति अब भी नहीं थी. लेकिन नियति उसपर मेहरबान थी. वह इतिहास में प्रूधों की भूमिका निर्धारित कर चुकी थी. आगे की इबारत प्रिटिंग प्रेस में नौकरी करते हुए ही लिखी जानी थी.

जिस छापेखाने में पूधों को नौकरी मिली थी, वहां पर फ्यूरियरवाद और सामाजिक क्रांति का समर्थन करने वाला साहित्य छपने के लिए आता था. मेधावी प्रूधों कंपोजिग करते हुए ही उसे पढ़ जाता था. पूरी दूनिया में क्रांति के प्रति समर्थन बढ़ता जा रहा था. रूस में जारशाही के प्रति सशस्त्र आंदोलनों की भूमिका गढ़ी जा रही थी. उस प्रेस में लेनिन की पुस्तकें भी प्रकाशन के लिए आती थीं. प्रूधों पर फ्यूरियर और लेनिन के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा. कुछ ही वर्षों में उसने खुद को लेनिन के साहित्य का विशेषज्ञ सिद्ध कर दिया. इसका लाभ उसे नौकरी के दौरान भी मिला. तरक्की करते हुए वह प्रूफ रीडर और कुछ दिनों बाद ही संपादक के पद तक पहुंच गया. प्रेस में काम करते हुए उसने हिब्रू सीखी, जिसके माध्यम से उसने राजनीति, दर्शन और अध्यात्म पर लिखी सभी महत्त्वपूर्ण पुस्तकें चाट डालीं. यही नहीं उसने उसी काम पर रहते हुए ग्रीक, लैटिन तथा फ्रेंच भाषाओं पर भी अधिकार प्राप्त कर लिया, जो उसके उन भाषाओं में उपलब्ध साहित्य को पढ़ने में बहुत काम आईं. इसके कुछ ही दिनों बाद उसने हिब्रू, ग्रीक और लैटिन आदि भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया.

यह प्रूधों की जन्मजात प्रतिभा का पहला चमत्कार था. चारों भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर प्रूधों ने उनके सामान्य व्याकरण पर आधारित अपना पहला निबंध लिखा. चूंकि प्रूधों को भाषा-विज्ञान का खास ज्ञान नहीं था, इसलिए उसके निबंध को भाषाविज्ञानियों द्वारा नकार दिया गया. इसके बावजूद वह लेख उसकी प्रारंभिक प्रसिद्धि का कारण बना. उस लेख में उसके अराजकतावादी विचारों की झलक थी. उस लेख को एक प्रतियोगिता में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था. पुरस्कार लेने पहुंचे प्रूधों को आयोजकों की ओर से चेतावनी भी मिली कि वह भविष्य में ऐसे अराजकतावादी विचारों से बाज आए. लेकिन बजाए कम होने के कारण सामाजिक परिवर्तन के प्रति प्रूधों का आग्रह बढ़ता ही गया. प्रूधों ने आर्थिक-सामाजिक असमानता के प्रति आक्रोश के बीज संस्कार के रूप में अपने नाना टोर्नंसी सिमोंइन(Tornesi Simonin) से प्राप्त किए थे, जो स्वयं छोटे किसानों और गरीब मजदूरों का नेता और प्रवक्ता था तथा उनके आपसी झगड़े निपटाने का कार्य करता था.

1832 में प्रूधों को फ्यूरियरवादियों द्वारा प्रकाशित समाचारपत्र का संपादन बनने का निमंत्रण मिला. उसमें कार्य करते हुए प्रूधों का पिछला अनुभव बहुत काम आया. इस बीच उसको अपने समय के जाने-माने विद्वानों से संपर्क करने का अवसर मिला था. उसको थोड़ी-थोड़ी प्रसिद्धि भी मिलने लगी थी. परिणाम यह हुआ कि उसको अपना अध्ययन आगे बढ़ाने के लिए बेसांको विश्वविद्यालय की ओर से छात्रवृति मिल गई. बिना किसी अकादमिक योग्यता के छात्रवृत्ति का मिलना प्रूधों के लिए बड़ी कामयाबी थी, सपने के सच होने जैसी, महान और चामत्कारिक. यह एक तरह से उसकी विलक्षण मेधा का विश्वविद्यालय द्वारा किया गया सम्मान था. इससे प्रूधों के आत्मविश्वास को बल मिला. उसके अगले कुछ वर्ष पेरिस तथा बेसांकों के बीच यात्र करते हुए बीते.

कुछ साल के संघर्ष के पश्चात अपने दो मित्रें के सहयोग से वह अपना छापाखाना लगाने में कामयाब हो गया. उसके माध्यम से प्रूधों ने अपने एवं अपने मित्रें के कृतित्व का प्रकाशन आरंभ कर दिया. उसकी अपनी पहली महत्त्वपूर्ण कृति ‘संपत्ति क्या है’ थी, जिसको सन 1840 में किसी और प्रेस द्वारा छापा गया था. यह पुस्तक उसने बेसांकों विश्वविद्यालय को, जिसने उसको स्का॓लरशिप प्रदान की थी, समर्पित की थी. पुस्तक में प्रूधों के उग्र तेवर थे. उसके बाजार में आते ही बौद्धिक जगत में खलबली व्याप गई. कुछ विद्वानों को प्रूधों के विचारों में नएपन का एहसास हुआ, जबकि कुछ ने पुस्तक को समाजविरोधी मानते हुए उसपर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की थी.

पुस्तक में प्रूधों ने बड़ी बेबाकी के साथ अपने विचारों को अभिव्यक्त किया था. उसने सामाजिक असमानता एवं आर्थिक शोषण के लिए समाज के अनुत्पादक वर्ग को जिम्मेदार माना था. इस पुस्तक में:

‘उन व्यक्तियों की जमकर आलोचना की गई थी जो ऐसी संपत्ति का उपयोग करते हैं, जो बिना किसी परिश्रम के, केवल दूसरों के शोषण के आधार पर जुटाई गई हो; अथवा ब्याज या किराये या फिर अनुत्पादक वर्ग को समाज के उत्पादक वर्ग के ऊपर आरोपित करके अर्जित की गई हो. प्रूधों ने हालांकि जीवनयापन के लिए संपत्ति और अन्य आवश्यक संसाधनों पर मनुष्य के अधिकार का पक्ष लिया है, उनके उपयोग को उचित ठहराया है. उसने कम्युनिस्टों की आलोचना भी की थी, जो इस व्यवस्था इस व्यवस्था के विरोधी और इसको नष्ट कर देने पर तुले थे. परंतु उसका मानना था कि संपत्ति पर मनुष्य का अधिकार व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होना चाहिए. ताकि उनका लाभ अधिक से अधिक व्यक्तियों को प्राप्त हो सके.’

प्रूधों के विचारों को समझने के लिए ‘कब्जे’ तथा संपत्ति के अंतर को समझना होगा. इस अंतर को उसने पति और प्रेमी के उदाहरण द्वारा समझाने की कोशिश की है. उसके अनुसार प्रेमी महज एक कब्जाधारक है तथा पति संपत्ति का वास्तविक स्वामी. प्रूधों के लिए संपत्ति एक कानूनी अधिकारपत्र है. जबकि संपत्ति पर कब्जा एक वास्तविक स्थिति. प्रूधों के अनुसार एक पूंजीपति संपत्ति का कब्जाधारक मात्र हो सकता है, उसका स्वामी नहीं. क्योंकि वह संपत्ति उसके द्वारा अर्जित नहीं है, बल्कि श्रमिकों-शिल्पकारों के श्रम-कौशल पर कब्जा जमाने के बाद कमाई गई है. प्रूधों के अनुसार दूसरे के श्रम से कमाई अथवा किसी और अनुत्पादक तरीके से हथियाई गई संपत्ति पर अधिकार अनैतिक है.

प्रूधों के संपत्ति-संबंधी विचार अपने समकालीन विद्वानों से अलग, नैतिकता एवं सामाजिक न्याय की भावना से ओतप्रोत थे. जिन दिनों प्रूधों की उपर्युक्त पुस्तक छपकर आई, फ्रांस में वैचारिक क्रांति का माहौल था, परिवर्तनकारी राजनीतिक गतिविधियां अपने चरम पर थीं. प्रूधों उन दिनों पेरिस में था. सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन करते हुए उसने फ्रांस के पहले आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था. उन दिनों उसकी प्रतिष्ठा अपने चरम पर थी, यहां तक कि कार्ल मार्क्स जिसको कि आगे चलकर साम्यवाद का संस्थापक माना गया, की प्रतिष्ठा भी प्रूधों के आगे नगण्य थी. फ्रांस की क्रांति की सफलता के लिए उसने पत्रकारिता के माध्यम से जनचेतना लाने के लिए काफी प्रयास किए. 1848 में उसने राष्ट्रीय असेंबली की सदस्यता के लिए चुनाव में हिस्सा लिया, जिसमें उसकी प्रसिद्धि के कारण सम्मानजनक जीत हासिल हुई.

प्रूधों के समाचारपत्र के प्रमुख ग्राहकों में अधिकांश मजदूर वर्ग से थे, जिनपर उसकी पत्रकारिता का गहरा प्रभाव पड़ा था. उनके लिए उधार और मुद्रा विनिमय को सरल बनाने के लिए प्रूधों ने एक अगले ही वर्ष, 1849 में जनता बैंक(Banque du Peuple) के नाम से एक बैंक की स्थापना की थी, जिसका मजदूरों की ओर से भरपूर स्वागत किया गया. कुछ ही समय में बैंक के ग्राहकों की संख्या तेरह हजार को पार कर गई. लेकिन बैंक को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल सकी. कारण साफ था कि सरकार और पूंजीपतियों में उस बैंक को लेकर कोई उत्साह नहीं था. दूसरी ओर उसके मजदूर ग्राहकों के पास उतनी पूंजी नहीं थी, जिससे एक बैंक का सफल संचालन किया जा सके. घाटे के कारण बैंक को असमय ही बंद करना पड़ा. प्रूधों को बैंक के द्वारा काफी घाटा उठाना पड़ा था.

बैंक की नाकामी के पीछे एक कारण यह भी था कि प्रूधों द्वारा समाचारपत्र में निरंतर छापी जा रही उग्र टिप्पणियों के कारण सरकार आलोचनाओं के घेरे में आ चुकी थी. औद्योगिकीकरण के कारण तेजी से उभर रहा पूंजीपति वर्ग उससे नाराज था. इसलिए 1849 में उसको गिरफ्तार कर लिया गया. सन 1853 तक वह सरकार की कैद में, पुलिस और प्रशासन के अनाचार के बीच रहा. कारावास में भी अपनी वैचारिक निष्ठा के कारण वह पुलिस और प्रशासन के आतंक का शिकार बनाया जाता रहा. 1853 में जब उसकी रिहाई हुई तो मजदूरों ने उसको हाथोंहाथ लिया. गिरफ्तारी के बावजूद फ्रांस के क्रांतिकारी आंदोलन को उसका समर्थन ज्यों का त्यों बना रहा.

लोगों में समाजवादी विचारों के प्रति जागरूकता लाने के लिए प्रूधों ने चार-चार समाचारपत्र एक साथ निकाले. उनके कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ी. 1863 में उसने अपनी पुस्तक का दूसरा भाग पूरा किया. पहले खंड की भांति उसको भी अत्यंत सराहना मिली. विद्वानों ने उसको हाथों-हाथ लिया. उसकी दूसरी पुस्तक का नाम था—Theory of Property . अपनी नई पुस्तक में भी उसने नए, समानताधारित समाज का सपना देखा था. पुस्तक में व्यक्त विचारों के प्रसार से फ्रांस की क्रांति को प्रोत्साहन मिला. व्यक्तिगत संपत्ति अपनी अवधारणा को लेकर प्रूधों ने और भी कई पुस्तकों की रचना की, जिनमें The Philosophy of Poverty प्रमुख है.

1842 में प्रूधों की पुस्तक ‘संपत्ति क्या है’ से प्रभावित होकर कार्ल मार्क्स ने निजी संपत्ति की समाप्ति का सिद्धांत गढ़ा था. वह उन दिनों युवा था और प्रूधों की ख्याति के समक्ष उसकी कोई हैसियत नहीं थी. बावजूद इसके उसने अपने वैचरिक विरोधों को दर्शाते हुए प्रूधों की पुस्तक दि ‘फिलासफी आ॓फ पा॓वर्टी’ की प्रतिक्रिया में एक पुस्तक ‘दि पावर्टी आ॓फ फिला॓सफी’ की रचना की थी. उस पुस्तक में मार्क्स ने प्रूधों के विचारों की आलोचना की थी. इससे समाजवादी आंदोलन को झटका लगा. वह दो हिस्सों में बंट गया. निःसंदेह उसके एक छोर पर मार्क्स और उसके समर्थक थे, तो दूसरे छोर पर प्रूधों द्वारा प्रणीत ‘अराजकतावाद’ को मानने वाले. प्रूधों के साथ अपने वैचारिक मतभेदों के बावजूद मार्क्स ने उसकी विलक्षण प्रतिभा की सराहना की है, अपने निबंध ‘दि होली फैमिली’ में प्रूधों को याद करते हुए उसने लिखा है कि—

‘सर्वहारा के कल्याण के लिए चलाए जा रहे प्रगतिशील आंदोलन के पक्ष में प्रूधों ने न केवल खुलकर लिखा, बल्कि वह स्वयं भी उस समय के अग्रणी सर्वहारा वर्ग से संबंधित था. उसके द्वारा किया गया कार्य फ्रांस के प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास का एक वैज्ञानिक दस्तावेज है.’

प्रूधों एक निर्भीक आलोचक था. उसने परंपरावादियों के साथ-साथ अपने समय के समाजवादियों की कमजोरियों के बारे में खुलकर लिखा. वह अपने विचारों पर आजीवन डटा रहा, उनके लिए सक्रिय संघर्ष किया. कारावास भुगता. एकदम गरीब परिवार से उठकर उसने समाज के विद्वत वर्ग में अपने लिए स्थान बनाया तथा अपनी मेधा के द्वारा सभी को चमत्कृत किया. उसका विश्वास था कि केवल राजनीति के द्वारा सामाजिक क्रांति लाना संभव नहीं है. उस अवस्था में सामाजिक क्रांति का उद्देश्य अधूरा ही रहता है. धर्म को लेकर भी उसके विचार आधुनिक और वैज्ञानिकता से भरपूर थे. धर्म की अवधारणा को लेकर भी उसका अपने समकालीन विचारकों से तीखा मतभेद था. उसने लुइस ब्लैंक जैसे समाजवादी चिंतकों की अतिधर्मपारायणता की आलोचना की है. एक अवसर पर ब्लैंक से एक बहस के दौरान प्रूधों ने उसको उकसाते हुए कहा था—

‘मि. ब्लैंक! तुम्हारी इच्छा न तो ईसाइयत की स्थापना है, न ही सुशासन अथवा लोगों का मान-सम्मान कायम करने की. बस तुम्हें एक ईश्वर चाहिए, तुम्हारा एक धर्म है, जिसमें तानाशाही है, सेंसरशिप है…तुम्हारे समाज में ऊंच-नीच का पद, वर्गभेद है. इसलिए मैं तुम्हारे ईश्वर, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारे तथाकथित न्याय-आधारित समाज, तुम्हारी स्वयंभूतता एवं तुम्हारे सभी भ्रमों को अस्वीकार करता हूं.’

वैचारिक मतभेदों के बावजूद मार्क्स आदि समाजवादी विचारकों ने प्रूधों से प्रेरणा लेकर अपने साम्यवादी चिंतन को आगे बढ़ाने का काम किया था. 19 जनवरी सन 1865 को जब प्रूधों की मृत्यु हुई, मार्क्स एक मामूली विचारक के रूप में ख्यात था, जबकि प्रूधों के संपत्ति संबंधी विचार पूरी दुनिया पर छाये हुए थे. लगभग तीन दशकों तक उसने फ्रांस के बुद्धिजीवी समाज को प्रभावित किया और अपने बाद इतना मौलिक साहित्य छोड़कर गया, जो आने वाले कई दशकों तक परिवर्तनवादियों के लिए प्रेरक का काम करता रहा. यदि हम वर्तमान समय दुनिया के विभिन्न समाजों में व्याप्त असमानता और असंतोष के कारण और उनके निवारण पर विचार करें तो लगेगा कि प्रूधों के विचारों की प्रासंगिकता आज ज्यों की त्यों बनी हुई है.

वैचारिकी

प्रूधों को हम मौलिक विचारक, स्पष्ट वक्ता, ईमानदार और उत्कृष्ट समाजवादी मान सकते हैं. वह खरा और संवेदनशील इंसान था. एक गरीब परिवार से उठकर वह प्रतिष्ठा के शिखर तक पहुंचा. अपने अध्यवसाय और मौलिक चिंतन से उसने सभी को प्रभावित किया. वह अपने विचारों के प्रति दुराग्रह की सीमा तक जा सकता था. उसकी इसी वैचारिक उग्रता के कारण उसे, अराजकतावादियों की कोटि में रखा गया है. किंतु यह हम पहले ही लिख चुके हैं कि प्रूधों के विचारों में कहीं भी उग्रता अथवा विद्रोह की भावना नहीं है. उसने कभी भी समाज-विरोधी या अमर्यादित वक्तव्य नहीं दिया. हां अपने विचारों पर वह हमेश अडिग रहा. उसने जो भी कहा, इतने स्पष्ट और खरे ढंग से कहा था, जितना कि सामान्यतः हमें सुनने का अभ्यास नहीं है. प्रूधों के कथन में कड़वी हकीकत थी. इसलिए उसके वक्तव्य गुस्सा नहीं आक्रोश को जन्म देते थे. वह स्वतंत्रता को उसकी संपूर्णता में पाना तथा सभी के लिए अपनाना चाहता था.

प्रूधों के चिंतन की मौलिकता के दर्शन उसके संपत्ति संबंधी विचारों में होते हैं. संभवतः वह पहला विचारक था, जिसने पूर्ण समाजवाद का सपना देखा था और उसके लिए उसने प्रचलित विचारधारों, पूर्वाग्रहों को एक किनारे पर कर दिया था. संपत्ति-संबंधी विचारों को लेकर मार्क्स एवं प्रूधों में तीव्र मतभेद थे. मार्क्स ने प्रूधों की पुस्तक की प्रतिक्रिया में एक पुस्तक भी लिखी थी. बावजूद इसके प्रूधों की कई अवधाराणाओं से मार्क्स की सहमति थी. उसकी पुस्तक ‘व्हा॓ट इज प्रापर्टी’ से प्रेरणा लेकर माक्र्स ने भी जोर देकर कहा था कि निजी संपत्ति और उसकी अवधारणा का निषेध होना ही चाहिए. वह सच्चा ‘एक्टीविस्ट’ था. गुडविन के समान प्रूधों का संपत्ति संबंधी चिंतन, सामाजिक न्याय की भावना से प्रेरित है. वह एक ऐसे समाज की कल्पना करता था जहां सभी को विकास के एक जैसे अवसर उपलब्ध हों, जिसमें लिंग, धर्म, संप्रदाय आदि को लेकर कोई भेद न हों. मनुष्य को उसकी योग्यता के अनुसार काम और काम के अनुसार पारिश्रमिक की प्राप्ति हो.

प्रूधों की समाज में प्रतिष्ठा उसके अराजकतावादी विचारों के कारण है. हालांकि इस संबंध में उसकी अवधाराणा अराजकतावाद के प्रति लोगों के प्रचलित सोच के एकदम विपरीत है. अराजकतावाद को लेकर सामान्यतः ऐसी स्थिति की कल्पना की जाती है, जिसमें पूरी तरह अव्यवस्था हो. प्रशासन पर सरकार की पकड़ शून्य हो. अनुशासन और कानून के स्थान पर आतंक और अनाचार पलता हो. सरकार अपना औचित्य खो चुकी हो. कुछ लोग अराजकतावाद को ऐसा सिद्धांत मानते हैं, जो अपनी मर्जी के अनुसार आचरण करने को वैद्यता प्रदान करता है, जबकि कुछ विद्वानों के मतानुसार अराजकतावाद का अभिप्राय कानून की पूर्णतः अनुपस्थिति है. कुछ लोग अराजकतावाद को एक सपने की भांति देखते और समझते हैं, उनके लिए अराजकतावाद एक सपनों का सिद्धांत है, जो व्यक्ति को मुक्त करता है. कुछ के लिए यह शब्द एक दिन को अपनी तरह से सुखपूर्वक बिता लेना है. इन सबसे अलग प्रूधों अराजकतावाद को एक सोचा-समझा वैज्ञानिक सिद्धांत मानता था. अराजकता उसके शब्दों में ‘संपूर्ण आजादी’ अर्थात स्वशासन(Self-Government) का पर्याय है. ‘अराजकता’(Anarchy) शब्द से प्रूधों का अभिप्राय राजनीतिक विकास की चरम अवस्था से था, जो एक संपूर्ण विवेकशील समाज में ही संभव हो सकती है—

‘अराजकता से मेरा आशय राजनीतिक विकास की उच्चतम अवस्था से है. यह सरकार अथवा संविधान द्वारा सुशासन की ऐसी कारगर पद्धति है, जिसमें निजी क्षेत्र एवं लोक की समन्वित चेतना, विज्ञान एवं कानून की प्रगति के आधार पर सतत विकासमान रहती है तथा संपूर्ण स्वाधीनता एवं कानून-व्यवस्था के उच्चतम स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त सिद्ध होती है…जिसमें पुलिस, सेना, कराधन, भारी-भरकम नौकरशाही तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर गढ़ी गई अन्य संस्थाओं की भागीदारी न्यूनतम हो जाती हैं. राजशाही, कुलीनतंत्र तथा केंद्रीयकरण की समर्थक संस्थाओं का लोप हो जाता है; तथा उनका स्थान संघीय जनतांत्रिक प्रशासन एवं सहजीवन पर आधरित संस्थाएं ले लेती हैं.’

प्रूधों ने सरकार को दो वर्गों में विभाजित किया है, इनमें पहला है, सत्ता का शासन तथा दूसरा है—स्वाधीनता का शासन. ध्यातव्य है कि उसने अनार्की यानी स्वशासन तथा लोकतंत्र को एक ही वर्ग में स्थान दिया है. सत्ता का शासन तथा स्वाधीनता का शासन को उसने पुनः नीचे दर्शाए दो वर्गों में विभाजित किया गया है—

क. सत्ता का शासन

1. एक द्वारा सभी पर शासन : राजतंत्र

2. सब के द्वारा सब पर शासन : साम्यवाद

ख. स्वाधीनता का शासन

1. प्रत्येक द्वारा सब की सरकार : लोकतंत्र

2. प्रत्येक द्वारा प्रत्येक की सरकार : अनार्की या स्वशासन

प्रूधों ने राबर्ट ओवेन तथा फ्यूरियर की भांति सहजीवन पर आधारित आश्रम बनाने विरोध किया है. उसके मन में इन प्रणालियों की सफलता में संदेह था. संभवतः वह जानता था कि दूसरों की दया अथवा उनके अनुराग पर पलने वाली संस्थाओं अथवा आश्रमों से मनुष्यता के सुदीर्घ कल्याण की अपेक्षा नहीं की जा सकती. प्रूधों का मानना था कि बिना किसी बड़े उद्देश्य के संगठन एक भ्रम है, एक मिथक है. वह अन्योन्याश्रितता अथवा सहोपकारितावाद(Mutualism) पर आधारित संगठन बनाने के पक्ष में था, जिसके अंतर्गत वह ऐसी व्यवस्था चाहता था जिसके द्वारा छोटे-छोटे अन्योन्याश्रित निकाय, परस्पर कल्याण की भावना से, अपने विकास को लेकर योजनाएं बना सकें. वह सर्वकल्याण के विचार से प्रभावित था और उसको पूंजीवाद एवं लोकतंत्र के विकल्प के रूप में देखता था. वह चाहता था कि बडे़ उद्यमों को सहोपकारिता के दायरे में लाया जाए. अपनी पुस्तक The Principle of Federation में वह लिखता है—

‘अर्थव्यवस्था से संबंधित विगत पचीस वर्षों में विकसित मेरे विचारों का निचोड़ केवल एक तथ्य अर्थात कृषि एवं उद्योगों के कारगर गठबंधन पर टिका है. जबकि राजनीति से संबंधित मेरे समस्त मात्र विचार एक बिंदु पर आकर सिमट जाते हैं, वह है— राजनीतिक संघ अर्थात संसाधनों का संपूर्ण विकेंद्रीकरण.’

कहा जा सकता है कि प्रूधों अपने लेखन के माध्यम से आर्थिक-सामाजिकीकरण के क्षेत्र में समानता लाने का सपना देख रहा था. उसने हालांकि संपत्ति के अधिकार के विचार का विरोध किया है, तथापि छोटे उद्योगों को वह निजी स्वामित्व के दायरे में लाने के पक्ष में था. वह अन्योन्यश्रितता को विशेष योजना बनाने के प्रति भी असहमत था. बड़े उद्यमों तथा कृषि फार्मस् आदि को लेकर उसका विचार था कि उन्हें वर्तमान म्यूचुअल एड समितियों की देखरेख में लाया जाना चाहिए तथा उनके माध्यम से उनका नियंत्रण स्वयंसेवी मजदूर सहकारी समितियों के हाथों में होना चाहिए. उनका प्रचालन पूर्णतः लोकतांत्रिक पद्धति के आधार पर किया जाना चाहिए. अन्यथा, उसे डर था और यह डर अकारण भी नहीं कि लोकतांत्रिकता के अभाव में वे उद्यम दूसरे पूंजीवादी उद्यमों की भांति कार्य करने लगेंगे. उसका कहना था कि—

‘केवल वही संघीय निकाय हमारे लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं, जिनकी आस्था राज्य की अपेक्षा अपने नागरिकों को अधिकतम अधिकार-संपन्न बनाने तथा केंद्र के बजाए लोक निकायों एवं स्थानीय प्राधिकरणों को अधिक से अधिक शक्ति-संपन्न बनाने के प्रति हो.’

साफ है कि प्रूधों का सपना एक ऐसे समाज की स्थापना से जुड़ा था; जिसमें कानून का हस्तक्षेप न्यूनतम हो, व्यवस्था एवं कानून से जुड़े मुद्दों पर फैसला लेने के अधिकतम अधिकार नागरिकों के पास सुरक्षित हों. वह स्वशासन को मानवीय सुशासन की सर्वोत्तम व्यवस्था मानता था. उसका कहना था कि “उस स्थिति तक पहुंचने में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं, मगर हमारे सारे विधान, समस्त प्रयास उस दिशा में पहुंचने में सहायक होने चाहिए. तभी हम संघीय सुशासन के मूल स्वरूप को प्राप्त कर सकेंगे.” प्रूधों के अनुसार स्वशासन…बहुत कुछ ऐसी अवस्था है; जिसमें सरकार के सभी अवशेष एवं उसकी सत्ताओं का लोप हो चुका हो.

कतिपय कारणों से प्रूधों का अराजकतावाद का सिद्धांत आगे नहीं बढ़ सका. विद्वानों के मन में उसको लेकर संदेह बना रहा. संभवतः वे इस शब्द को इसकी लोकप्रचलित व्याख्या के बाहर देख ही नहीं पा रहे थे. अथवा उन्हें यह डर था कि अराजतावाद की नई व्याख्या आमजन के गले ही नहीं उतर पाएगी. यहां तक कि प्रूधों की पूंजी-संबंधी मान्यता को लेकर उसकी सराहना करने वाले मार्क्स ने ही अराजकतावाद को ‘एक भद्दा बुर्जुआ विचार’ कहते हुए उसकी कठोर आलोचना की थी. इसलिए प्रूधों की मृत्यु के पंद्रह-बीस साल बाद ही उसका अराजकतावाद कर सिद्धांत हवा हो गया. मगर उसकी संपत्ति-संबंधी अवधारणा ने बाद के समाजवादी चिंतकों को खूब प्रेरणा दी. विशेषकर मार्क्सवादी चिंतकों को, जिन्होंने पहले फ्रांस और फिर आगे चलकर रूस में संपूर्ण क्रांति का सपना सच कर दिखाया था.

प्रूधों के अनुसार संपत्ति तथा समाज में परस्पर तुलना संभव नहीं है. न समाज में रहते हुए संपत्ति मनुष्य का अधिकार हो सकती है. वह केवल समाज से परे मनुष्य का अधिकार हो सकती है. उसने स्पष्ट किया कि हम समाज में स्वाधीनता, समानता एवं सुरक्षा के नाम पर संगठित होते हैं, संपत्ति के आधार पर नहीं. ऐसे में यदि संपत्ति को नैसर्गिक अधिकार माना जाए तो वह अधिकार सामाजिक न होकर गैरसामाजिक होगा. समाज और संपत्ति दोनों परस्पर विरोधी अवधाराणाएं हैं. इन दोनों का एक होना वैसे ही असंभव है जैसे चुंबक के दो विपरीत ध्रुवों का एक साथ चिपकना. दोनों को एक करने के प्रयास में या तो समाज का नाश हो जाएगा अथवा वह संपत्ति को नष्ट कर देगा.

व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी का धन बताते हुए प्रूधों ने उसपर व्यक्ति-विशेष के अधिकार को अनैतिक बताया है. प्रूधों ने जोर देकर कहा कि—

‘वे सभी मालिक, उद्योगपति जो बिना किसी श्रम अथवा कौशल के उत्पादन कार्य में हिस्सा लेते हैं अथवा दूसरों के साथ उत्पादों की अदला-बदली करते हैं, वे परजीवी हैं या फिर चोर.’

मालिक और कब्जाधारक के अंतर को पति और प्रेमी के अंतर से तुलना करते हुए प्रूधों ने कहा था कि संपत्ति का स्वामी होना मात्र एक कानूनी स्थिति है, जबकि कब्जाधारक होना वास्तविकता है. उसने तर्कशास्त्र के आधार पर सिद्ध किया था कि यदि जीने का अधिकार एक सचाई है, तो जीने के लिए आवश्यक संसाधनों पर अधिकारिता भी मान्य होनी चाहिए. उसने स्पष्ट किया है कि—

‘मनुष्य को जीने के लिए श्रम करना पड़ता है. तदनुसार उसको औजारों तथा कच्चे माल वगैरह की जरूरत पड़ती है, जिनके द्वारा वह कार्य कर सके अर्थात उत्पादक होना उसके लिए एक अनिवार्यता है और उसका अधिकार भी. मनुष्य के इस अधिकार को उसके साथियों-समकालीनों द्वारा मान्यता भी मिलती है, जिनके साथ उसका भी उसी तरह का समझौता होता है.’

प्रूधों का मानना था कि समाज का गठन संपत्ति की सुरक्षा के लिए न होकर, उत्पादन के अधिकार और उसके साधनों की सुरक्षा के लिए हुआ है. इस तरह उसने संपत्ति पर व्यक्ति-विशेष के अधिकार को अनैतिक और अवैद्य ठहराया था. उसकी विचारधारा के मूल में मनुष्यमात्र की समता, स्वाधीनता एवं आधिकारिता का भाव निहित है. प्रूधों ने स्वाधीनता के अतिरिक्त सुरक्षा और समानता को भी मनुष्य के मूल अधिकारों में सम्मिलित किया है. उसका मानना था कि समाज के निर्माण तथा उसके विकास के लिए समानता अत्यावश्यक है. उसने लिखा है कि—

‘स्वाधीनता मनुष्य का मूल अधिकार है, यह मनुष्य के ऊपर होना चाहिए कि वह अपनी सीमाएं स्वयं निर्धारित करे, जाने कि उसके लिए क्या गम्य है और क्या अगम्य. समानता मनुष्य का मूल अधिकार है, क्योंकि बिना समानता के समाज बन ही नहीं सकता. इसी प्रकार सुरक्षा मनुष्य का मूल अधिकार है, क्योंकि हर आदमी के लिए उसका अपना जीवन और दूसरे की अपेक्षा कीमती है. स्वधीनता, समानता तथा सुरक्षा, मनुष्य के ये तीन मूल अधिकार हैं. ये स्थायी हैं, इन्हें न बढ़ाया जा सकता है, न ही कम किया जा सकता है. इसलिए कि जीवन हो या मृत्यु, प्रत्येक मनुष्य समाज से जो प्राप्त करता है, वही लौटाता है, स्वाधीनता के बदले स्वाधीनता, समानता के बदले समानता, सुरक्षा के बदले सुरक्षा, शरीर के बदले शरीर, आत्मा के बदले आत्मा.’

प्रूधों को विश्वास था कि इस संसार में मानवीय सदगुणों का आधार केवल श्रम हो सकता है, लेकिन यह विडंबना ही है कि श्रम को कोई भी संपत्ति का अधिकार देने को तैयार नहीं है. क्योंकि श्रमिक ऐसे किसी पदार्थ की रचना नहीं कर सकता जिससे किसी उत्पाद को गढ़ा जा सके…उत्पादन-व्यवस्था पर मुट्ठी-भर लोगों का अधिकार है, बाकी सब तो इस उत्पादन व्यवस्था से पूरी तरह उपेक्षित, अलग-थलग पड़े हैं अथवा उसके वेतनभोगी नौकर के समान हैं, जो किसी तरह बस जीवनयापन कर रहे हैं. स्का॓टिश अर्थशास्त्री था॓मस रीड के हवाले से उसने कहा है कि—

‘जीने के अधिकार से ही अर्जन के अधिकार की पुष्टि होती है. न्याय का वह नियम जो यह मांग करता है कि किसी भले आदमी के जीवन को पूरा सम्मान मिले, यह भी मांग करता है कि व्यक्तिमात्र के अर्जन का अधिकार भी सुरक्षित रहना चाहिए. ये दोनों अधिकार समानरूप से पवित्र हैं. किसी को मजदूरी करने से रोकना अथवा किसी जरूरतमंद को उसके रोजगार से वंचित कर देना, उसी प्रकार का अपराध है, जैसे किसी को जंजीर में बांधकर सलाखों के पीछे कैद कर देना, जिसपर नाराज होना स्वाभाविक ही है.’

हम देख सकते हैं कि संपत्ति को लेकर प्रूधों के विचार अतिरेक की सीमा तक जाते हैं. इसके पीछे उसकी मानसिकता को समझना भी जरूरी है. वुडकाक के अनुसार संपत्ति के संबंध में प्रूधों की मान्यताएं मुख्यतः किसान, छोटे दुकानदारों और मजदूरों के दृष्टिकोण के आधार पर विकसित हुई थीं. उसको अपने समय के औद्योगिक परिवेश का उतना ज्ञान नहीं था. प्रूधों की पुस्तक ‘संपत्ति क्या है’ ने उसको प्रसिद्धि के शिखर तक पहुंचा दिया था, उसके पश्चात वह वर्षों तक परिवर्तनकारी राजनीति का मुख्य नीतिकार बना रहा. 1848 में स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान वह फ्रांस के सर्वाधिक प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से था. उसकी प्रतिष्ठा को विधायिका के चुनावों में मिली पराजय के बाद धक्का अवश्य लगा, बावजूद इसके वह अपने विचारों पर अडिग बना रहा, और अपनी कलम के माध्यम से लगातार अपने विचारों को गति देता रहा. रूस की क्रांति से बहुत पहले, 1842 में उसने मजदूरों का आवाह्न करते हुए लिखा था—

‘मजदूरो, कामगारो…और मेरे मेहनतकश भाइयो. परिवर्तन की समस्त सौगातें तुम्हारे लिए हैं…नए समाजवादी आंदोलन का सूत्रपात कारखानों से रास्ते ही होगा.’

प्रूधों ने पूरी ईमानदारी और निर्भीकता के साथ अपने विचारों को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है. कई स्थान पर उसके विचार अतिरेक की सीमा तक जाते हुए दिखाई पड़ते हैं, तो अनेक जगह पर वे अस्पष्ट और बिखरे-बिखरे भी हैं. इसके बावजूद उनकी महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता. प्रूधों आमूल परिवर्तनवादी था और समाज को एक ऐसी इकाई में परिवर्तित करने का सपना देखता था जिसमें पूंजी-आधारित स्तरीकरण समाप्त हो चुका हो. इसके लिए वह सामाजिक परिवर्तन को आवश्यक मानता था. राजनीतिक संदर्भों में उसने अराजकतावाद का समर्थन किया है जो प्रूधों के अनुसार स्वशासन की आदर्श पद्धति है. दूसरे शब्दों में वह व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के लिए राजनीतिक परिवर्तन के बजाए सामाजिक परिवर्तन को अधिक महत्त्व देता था. इस संबंध में प्रूधों के विचारों को उसके जीवनीकार जार्ज वुडकाक ने P J Proudhon में उल्लेख किया है—

‘सामाजिक क्रांति का आगमन यदि राजनीतिक क्रांति के माध्यम से हुआ तो उसके उसके परिणाम भी निश्चित रूप से समझौतापस्त होंगे.’

ध्यान रहे कि उन दिनों तक साम्यवादी आंदोलन अपनी शैशवास्था में था अथवा हम कह सकते हैं कि वह इस बीच वह प्रूधों से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहा था. प्रूधों ने व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी कहा है, लगभग उन्हीं दिनों उसने स्वाधीनता पर दिए गए अपने वक्तव्य को पूरा किया था. स्वाधीनता के बारे में उसका विचार था कि, ‘स्वाधीनता मनुष्य की मूल अवस्था है. मनुष्य से उसकी स्वतंत्रता छीनने का आशय है उससे उसकी मनुष्यता छीन लेना.’

प्रूधों ने यह भी कहा था कि संपत्ति, समाज का आकस्मिक सृजन है. उसकी आवश्यकता मनुष्य की तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पड़ती है. इसलिए संपत्ति को मनुष्यता का पर्याय नहीं माना जा सकता. मजदूर आंदोलन के प्रति प्रूधों का समर्पण था. उसने अपने समय के मजदूर आंदोलन को नैतिक समर्थन देने के साथ-साथ उसको वैचारिक रूप से समृद्ध करने का काम भी किया था. मार्क्स ने यद्यपि अपने कई लेखों में प्रूधों की आलोचना की है. अपने एक लेख ने मार्क्स ने उसे ‘एक साधारण मध्यवर्गी अर्नाकिस्ट’(Petty bourgeois anarchist) कहकर उसके योगदान को हल्का करने का प्रयास किया था. बावजूद इसके यह भी सत्य है कि मार्क्स ने जिन अवधारणाओं को विकसित कर कामयाबी और प्रसिद्धि के शिखर को छुआ, उसका मूल प्रूधों के चिंतन में निहित है. विशेषकर प्रूधों की संपत्ति संबंधी अवधारणाओं का तो मार्क्स पर गहरा प्रभाव था. प्रूधों ने अपनी मुक्त आवाज के माध्यम से मजदूरों की समस्याओं पर खुलकर अपने विचार व्यक्त किए तथा अपनी सैद्धांतिक निष्ठा के कारण अपने समय के सामाजिक विचारकों में ऊंचा स्थान ग्रहण किया था. इतिहास में इतने बड़े योगदान के बावजूद उसने विनम्रता पूर्वक कहा था कि—

‘मैंने कोई नया काम नहीं किया, केवल कुछ लोगों के विशेषाधिकार की व्यवस्था को खत्म करने, दासप्रथा का समापन करने, सभी को समान अधिकार प्रदान करने तथा एक विधिसम्मत न्याय-आधारित समाज की स्थापना करने का आग्रह-भर किया है. मेरे चिंतन का यही सारतत्व है.’

राजनीति, समाजविज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में प्रूधों के योगदान को डायना वार्ड के शब्दों के माध्यम से रेखांकित किया जा सकता है:

‘प्रूधों के विचारों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे शुरू से अंत तक स्थिर रहे हैं. उसने समाजवादी आंदोलन की कमजोरियों को रेखांकित करते हुए, उससे प्रेरित राजनीतिक क्रांति की आलोचना की है…केंद्रीय शासन चाहे वह किसी भी कारण से अपनाया गया हो को उसने एक बुराई की संज्ञा दी थी, जिसको विकेंद्रीकृत शासन तथा सह-उपकारी अर्थव्यवस्था द्वारा दूर किया जा सकता है. उसने संघवाद को वरीयता दी है, किंतु उसका संघवाद का सिद्धांत विकासशील देशों में पनप रही केंद्रीयकरण की दुष्प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक था.’

प्रूधों एक उदार और प्रतिबद्ध विचारक था. वह एक सामान्य परिवार से उठकर आया था. इसलिए आम लोगों की समस्याओं से भली-भांति परिचित था. जीवन के अनुभवों ने उसे सरकार और प्रशासन की दुर्बलताओं से परिचित कराया था, जिसने उसको मुखरता प्रदान की. वह एक ऐसे उत्तरदायी शासन के पक्ष में था, जिसपर न केवल समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों का नियंत्रण हो, बल्कि उसका आमआदमी के जीवन में कम से कम हस्तक्षेप भी हो. इसके लिए उसने कल्याण पर आधारित स्वशासन के विचार पर जोर दिया. उसका यह विचार बहुत आगे नहीं बढ़ सका तो इसका मुख्य कारण यह था कि अशिक्षित और विपन्न समाज में जहां लोगों के समक्ष आजीविका का संकट प्रधान हो, नैतिक हो या सैद्धांतिक प्रतिबद्धताएं और अनुशासन लंबे समय तक टिक नहीं पाते. अशिक्षा और पर्याप्त नैतिक चेतना के अभाव में लोगों को बहकते देर नहीं लगती. भूख के आगे विचार अक्सर कमजोर पड़ते रहे हैं. उस अवस्था में परिवर्तनकामी लोगों में भी निराशा पनपने लगती है. दूसरी ओर यथास्थितिवाद की पोषक शक्तियों की बन आती है. वे अपने प्रभाव और संसाधनों का प्रयोग समाज में अपनी उच्च स्थिति को बनाए रखने के लिए करने लगते हैं. किंतु इससे उन लोगों का योगदान कम नहीं हो जाता जो परिवर्तन की कामना के साथ संघर्ष को अपनाते हैं तथा अपने जीवन, सुख-साधनों का बड़ा हिस्सा अपने लक्ष्य को पाने के लिए समर्पित कर देते हैं.

प्रूधों ने केंद्रीयकृत शासनप्रणाली, संसाधनों के एक ही स्थान पर सिमट जाने के तथा संपत्ति की व्यक्तिगत आधिकारिता के विरोध में इतना कुछ लिखा था कि लोगो के मन में बड़े सरमायेदारों के प्रति आक्रोश पनपने लगा था. इसी आक्रोश को आगे चलकर मार्क्स और फ्रैड्रिक ऐंग्लस जैसे समाजवादियों ने हवा दी, परिणामतः फ्रांस, रूस समेत अनेक देशों में जहां केंद्रीय शासन गैरजिम्मेदाराना ढंग से कार्य कर रहा था, विद्रोह हुआ जिससे वैश्विक राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव आया. प्रूधों के विचारों से मार्क्सवादी विचारधारा समृद्ध हुई. हालांकि वह स्वयं मार्क्सवाद से प्रभावित नहीं था. बल्कि मार्क्सवाद की आलोचना करते हुए उसने लिखा है कि—

‘साम्यवाद एक बुराई और दासता है…साम्यवाद में असमानता है, लेकिन उतनी और उस प्रकार से नहीं जैसे कि संपत्ति के मामले में. संपत्ति ताकतवर द्वारा कमजोर का तथा साम्यवाद कमजोर द्वारा ताकतवार का सतत उत्पीड़न है.’

प्रूधों के जीवनसंघर्ष तथा उसके रचनात्मक आंदोलन ने फ्रांस समेत पूरे यूरोप में समाजवादी आंदोलन को हवा दी, जिसने पूंजीवाद पर अंकुश लगाने का कार्य किया. दुनिया के कई देशों में समाजवादी व्यवस्था के अनुरूप सरकारें बनीं और जनांदोलनों ने सर्वोदय और सहकारिता जैसे सर्वकल्याण के समर्थक विचारों को जन्म दिया.

© ओमप्रकाश कश्यप

संत साइमन काम्टे : प्रथम समाजवादी

[दुनिया का पहला समाजवादी था संत साइमन. सिर्फ पूंजी के दम पर, बिना कोई श्रम किए व्यवसाय में मुनाफे का अधिकतम हिस्सा हड़प जाने वाले पूंजीपतियों को उसने परजीवी वर्ग माना. इसी वर्ग को वह समाज में गरीबी का मूल कारण मानता था. 1802 में जिनेवा में हुए एक सम्मेलन के दौरान उसने जोर देकर कहा था कि ‘हर व्यक्ति को काम करना चाहिए’(all men ought to work). उसने कहा कि क्या हो अगर फ्रांस में केवल कामरेड ही रहने लग जाएं? फिर खुद ही उत्तर देते हुए उसने आगे कहा था कि तब फ्रांस में अकाल का साम्राज्य होगा.
फ्रांसिसी क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों का साथ देते हुए साइमन ने कहा कि श्रमिक वर्ग का संघर्ष केवल संभ्रांत वर्ग और पूंजीपतियों के पिट्ठु बुर्जुआ वर्ग से नहीं है, बल्कि उनकी लड़ाई उस परजीवी वर्ग के भी विरुद्ध थी] जो बैठे-ठाले दूसरों के श्रम पर मजे उड़ाता है. साइमन राजनीतिशास्त्र को उत्पादकता का विज्ञान मानता था. संत साइमन की यही समानतावादी विचारधारा उन्हें पहला समाजवादी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है.— ओमप्रकाश कश्यप]

संत साइमन (अक्टूबर 17, 1760—मई 19, 1825) को फ्रांसिसी क्रांति की खोज कहा जा सकता है. एक संपन्न परिवार में जन्मे संत साइमन ने आगे चलकर फ्रांस के सामाजिक बदलाव का न केवल सपना देखा, बल्कि उसके लिए सक्रिय रूप से कार्य भी किया. अपना धन, पैत्रिक संपत्ति एवं अपना सारा उद्यम उसने अपने उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया. संत साइमन का पूरा नाम क्लाउड हेनरी दि रिवेरो, काम्टे दि संत-साइमन (Claude Henri de Rouvroy, Comte de Saint-Simon) था. वह मौलिक विचारक तो नहीं था, किंतु अपनी निष्ठा एवं समर्पण के कारण उसने फ्रांसिसी क्रांति को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था. एडम स्मिथ, बैंथम, जेम्स मिल, डेविड रिकार्डो की भांति वह भी उपयोगितावाद का समर्थक था तथा सुख की प्राप्ति को मानव जीवन लक्ष्य मानता था. परंतु वह था एक नियतिवादी विचारक, जिसका मानना था कि समाज और प्रकृति दोनों ही में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसको कानून के माध्यम से नियंत्रित और संचालित न किया जा सके. साइमन का मानना था कि जीवन में अनुशासन और नैतिकता आवश्यक हैं, उन्हीं से मनुष्यता की पहचान बनती है.
अपने समय के पूंजीवादी व्यवस्था के विरोधी एवं सक्रिय विचारकों में संत-साइमन सर्वाधिक मुखर था. उसने समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया. अपने विचारों पर वह आजीवन अडिग भी रहा. कार्ल मार्क्स तक ने अपने लेखों में फ्रांसिसी समाज की पुनर्रचना के लिए मुक्त भाव से संत साइमन के सहयोग की सराहना की है. अपना समस्त धन उसने अपने विचारों को मान्यता दिलाने तथा उन्हें कार्यरूप देने में खर्च कर दिया. संत साइमन के प्रयासों से ही आगे चलकर सहकारी आंदोलन की नींव रखी जा सकी.
संत साइमन का जन्म 17 अक्टूबर 1760 ई. को पेरिस के एक अभिजात्य परिवार में हुआ, जिसके पास संसाधनों की बहुलता थी. बचपन से ही वह बहुत महत्त्वाकांक्षी था. उसने यह दावा किया है कि उसने सुप्रसिद्ध फ्रांसिसी विद्वान, गणितज्ञ और वैज्ञानिक दि’ लेंबर्ट(D’-lembert) से शिक्षा प्राप्त की थी, हालांकि इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है. सुनने में यह कितना ही बचकाना क्यों न लगे, परंतु अपनी किशोरावस्था के दिनों में साइमन ने अपने निजी सेवक को आदेश दिया था कि वह प्रतिदिन, प्रातःकाल उसको यह कहते हुए जगाए कि—
‘जागिए महाशय काम्टे! स्मरण रखिए कि आपको संसार में महान कार्य संपन्न करने हैं.’
जाहिर है कि संत साइमन के परिवार का माहौल बहुत ही औपचारिक किस्म का था, जिसका उसके व्यक्तित्व पर अनपेक्षित प्रभाव पड़ा. संभवतः, बचपन के बनावटी परिवेश के ही उसके मन में संपन्नता के प्रति अरुचि उत्पन्न हुई और थोड़ा-सा सनकीपन भी उसके स्वभाव का हिस्सा बन गया. तो भी जीवन में कुछ बनने, कुछ नया करने की छटपटाहट उसके अंतर्मन में सदैव बनी रही. इसीलिए उसने नए-नए प्रयोग किए, जिसके लिए उसको अनेक बार खतरा भी उठाना पड़ा. कुछ नया करने, सबसे अलग दिखने की लालसा तथा स्वयं को वैचारिक रूप से समृद्ध करने के लिए उसने विविध विषयों से संबंधित अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया. खुद को खास सिद्ध करने, जिसकी लालसा उसके मन में शुरू से ही थी, के लिए उसने अजीबोगरीब प्रयोग करने आरंभ कर दिए थे, जिनमें से एक था, आर्ट गैलरी की स्थापना के लिए बिना-सोचे समझे विवाह का फैसला. चालीस वर्ष की आयु में एलेक्सजेंड्राइन दि केंपग्रांड (Alexandrine de Champgrand) के साथ किया गया विवाह मात्र एक वर्ष ही चल सका. बाद में पति-पत्नी पारस्परिक सहमति से एक-दूसरे से अलग हो गए. इन लगातार चलने वाले प्रयोगों का परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में उसकी पैत्रिक और अर्जित संपत्ति समाप्त हो गई तथा बाकी जीवन के लिए उन्हें भीषण दरिद्रता में बिताना पड़ा.
इसके बावजूद नएपन की खोज की उसकी सनक कम नहीं हुई थी. अजीबोगरीब प्रयोगों के कारण लोगों ने उसे सनकी बूढ़ा कहकर मजाक उड़ाया. मगर संत साइमन के लिए यह बेहद मामूली बात थी. संभवतः बचपन की प्रेरणाओं का ही असर था कि केवल उनीस साल की वय में वह अमेरिकी कालोनियों में वहां के लोगों की स्वतंत्रता के लिए कार्य करने लगा था. यह प्रयास केवल बौद्धिक और विचारधारात्मक स्तर पर ही नहीं थे. बल्कि एक कुशल इंजीनियर और वैज्ञानिक की भांति उसने राष्ट्र को समृद्ध बनाने के लिए सरंचनात्मक स्तर पर भी योजनाबद्ध तरीके से प्रयास किया. साइमन की रुचि विज्ञान और इंजीनियरिंग में विशेषरूप से थी. उसकी आरंभिक योजनाओं में अटलांटिक और प्रशांत महासागर को परस्पर एक नहर के माध्यम से जोड़ना था. उसकी एक और महत्त्वाकांक्षी दूसरी योजना मैड्रिड तथा समुद्र के बीच एक नहर बनाने की थी.
अमेरिका में रहते हुए साइमन ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता के लिए जूझ रहे नागरिकों का एक सैनिक की भांति साथ दिया. स्वयं सेना में भर्ती होकर उसने अमेरिका के लिए युद्ध किया तथा उन सैनिकों का भरसक साथ दिया जो अमेरिकी स्वतंत्रता के लिए युद्ध कर रहे थे. उस युद्ध में स्वाधीनता प्रेमियों को पराजय मिली. बाकी सैनिकों के साथ संत साइमन को भी बंदी बना लिया गया. युद्धबंदी के रूप में उसको जमैका द्वीप पर भेज दिया गया. वहां कारावास बिताने के बाद उसने एक और अभियान से स्वयं को जोड़ दिया, जिसके अंतर्गत उसने यूरोपीय मूल के अनेक देशों का दौरा किया. जहां वह अनेक लोगों के सपंर्क में आया. साइमन ने मैक्सिको के गवर्नर से से मिलकर उसको पनामा नहर बनाने का सुझाव भी दिया.
उन दिनों फ्रांस में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी था. साइमन ने फ्रांसिसी क्रांति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. परिणामतः उसको एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बार उसकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई, जो उसने इतने वर्षों में बड़े यत्नपूर्वक अर्जित की थी. जेल में साइमन को स्वाध्याय और चिंतन का अवसर मिला, जहां वह समाज के निचले वर्ग के लोगों के संपर्क में आया, उनकी स्थितियों और समस्याओं को समझने का उसको अवसर मिला. वहीं उसके कायाकल्प की मनोभूमि विकसित हुई. सजा समाप्त होते ही उसने स्वयं को दुबारा संघर्ष के हवाले कर दिया. मगर इस बार संघर्ष का स्वरूप बदला हुआ था. वह सशस्त्र न होकर वैचारिक था. जिसकी पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी. उस समय के अनेक क्रांतिकारी विचारकों के साथ-साथ साइमन भी व्यवस्था में बदलाव का पक्षधर था. ऐसे बदलाव के समर्थन में था, जो विकेद्रीकृत सत्ता का पक्षधर हो. इसके लिए लोगों में जागरूकता लाने के लिए साइमन ने कई प्रयोग किए; जिनमें उनका बहुत-सा धन समाप्त हो गया.
दरिद्रता के दौरान साइमन का जीवन के असली स्वरूप से साक्षात हुआ. वह आमलोगों की जिंदगी के करीब आया, उनके संघर्षों और अभावों को समझने का उसको अवसर मिला. संत साइमन का मानना था कि समाज के विकास के लिए वैज्ञानिक, इंजीनियर तथा उद्योगपति को मिलकर कार्य करना चाहिए. उन्होंने उद्योगों में श्रमिक कल्याण के कार्यक्रमों के विकास पर जोर दिया और विकास के लिए हरेक उद्यमी से अपील की कि वह मजदूरों के प्रति नैतिकता से भरपूर आचरण करें. कारावास से मुक्त होते ही उसने स्वयं को फिर संघर्ष में झोंक दिया. इस बार सरोकार पहले से अधिक व्यापक और समाज के अपेक्षाकृत बड़े वर्ग के कल्याण को समर्पित थे. अपने सिद्धांतों को उसने लेखों के माध्यम से अभिव्यक्त करना प्रारंभ कर दिया. साइमन का प्रारंभिक लेखन हालांकि राजनीति एवं विज्ञान से शुरू हुआ था, मगर उसको प्रतिष्ठा मिली उसकी दो पुस्तकों ‘ला॓ इंडस्ट्री’ तथा ‘ला॓ आर्गेनजर’ में प्रकाशित उसके समाजवादी विचारों के प्रसार के बाद. उसका मानना था कि राजनीति उत्पादन का विज्ञान है. उसकी पूर्ण सफलता इसी में है कि बगैर किसी भेदभाव के, व्यक्ति को उसकी कार्यक्षमता के अनुसार कार्य मिले तथा किए गए कार्य की गुणवत्ता के अनुसार उसका वेतन. उसके विचारों को विद्वानों का समर्थन मिलने लगा. जिससे उसकी प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ने लगी थी. किंतु आर्थिक विपन्नता ने उसका साथ नहीं छोड़ा. भीषण अभावों से भरे दिनों में संत साइमन को मात्र चालीस पाउंड प्रतिवर्ष के वेतन और नौ-दस घंटे प्रतिदिन कार्य करने की शर्त पर नौकरी करनी पड़ी. उस समय उसकी आयु साठ वर्ष से ऊपर थी. तंगहाली के दिनों में वह एक किसान घर एक गंदे, छोटे-से कमरे में रहने लगा, जिसको उसने अपने नौकर के रहने के लिए बनवाया था.
मृत्यु पर्यंत वह लिखता ही रहा. उसके द्वारा लिखित साम्रगी बेशुमार है. जीवन के प्रारंभिक वर्षों में साइमन नास्तिक विचारधारा का समर्थक था. उसने एक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया; जिससे उनके आस्थावादी विचारों की पुष्टि होती है. अपने विचित्र जीवन के कारण वह अपने जीवनकाल में बहुत प्रसिद्धि प्राप्त नहीं कर सका. लोग उसका मजाक उड़ाते रहे, लेकिन सन 1828 में साइमन की मृत्यु के तीन वर्ष पश्चात संत एमंड बैजार्ड (Saint Amand Bazard) ने साइमन के योगदान एवं विचारों को लेकर पेरिस में एक लेक्चर दिया. एमंड ने साइमन के ही एक और प्रशंसक इनफेंटिन के साथ मिलकर साइमन के विचारों को संग्रहित करने का काम भी किया, जिससे आगे चलकर उसके अवदान का मूल्यांकन संभव हो सका. उसी के आधार पर आगे चलकर उसको फ्रांस में समाजवादी आंदोलन का जनक माना गया.
उपर्युक्त के अतिरिक्त कार्ल मार्क्स, आ॓स्टिन थिरे, आ॓गस्त काउंट आदि ने भी संत साइमन की विचारधारा एवं फ्रांसिसी क्रांति में उसके योगदान की समीक्षा करते हुए उसकी पुस्तकों पर टीकाएं लिखीं. संत साइमन मौलिक विचारक एवं कार्यकर्ता था. विज्ञान, दर्शन, अर्थशास्त्र, राजनीति और समाज विज्ञान के विद्वान संत साइमन ने अपनी युवावस्था से ही सामाजिक बदलाव के कार्यों में योगदान देना शुरू कर दिया था. इस कारण धीरे-धीरे उनके साथियों एवं सहयोगियों की संख्या बढ़ती चली गई. संत साइमन के जीवन की भांति उनके विचारों में भी एकरूपता का अभाव है. विद्वान उसके विचारों में अस्थिरता का आरोप भी लगाते रहे हैं. बावजूद इसके उसके विचारों में पर्याप्त नवीनता का प्राचुर्य है. अपने बारे में संत साइमन का कहना था कि—
‘मैं लिखता हूं, क्योंकि मेरे पास लिखने के लिए नवीन बाते हैं, मैं अपने विचार वैसे ही लिखता हूं जैसे कि मेरी आत्मा निर्देश देती हैं. उनको व्यवस्थित रूप देने का काम पेशेवर लेखकों का है.’
अपने मौलिक विचारों तथा चिंतन की जनपक्षधरता के कारण संत साइमन ने अपने अनेक समर्थक और अनुयायी पैदा किए, जिनमें से एक साइमन का सचिव और सहयोगी आगस्ट काम्टे (Auguste Comte: January 17, 1798 – September 5, 1857) भी था. हालांकि काम्टे कालांतर में अपने मतभेदों के कारण संत साइमन से अलग हो गया था. तथापि उसने संत साइमन के विचारों के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था.

वैचारिकी

संत साइमन का पूरा जीवन अस्थिरता एवं संघर्ष से भरा था. इसलिए उसके विचारों में एकरूपता का अभाव दिखता है. बावजूद इसके उनकी महत्ता से इंकार कर पाना संभव नहीं है. साइमन के विचारों की एक विशेषता उनका सरल और सर्वग्राह्य होना है. चूंकि विचारक होने के साथ-साथ वह एक सक्रिय कार्यकर्ता, वैज्ञानिक, अभियंता और दर्शनशास्त्री भी था, इसलिए उसने आसान शब्दों में अपनी बात रखी. उसकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था. अमेरिका के मूल निवासियों के स्वाधीनता संघर्ष में उसने न केवल उनका समर्थन किया, बल्कि उनके हक के लिए संघर्ष में सशस्त्र हिस्सेदारी भी थी. बैंथम और जेम्स मिल की भांति साइमन भी सुखवाद विचारधारा का समर्थक था और मानता था कि सुख की लालसा ही मनुष्य के कार्य-व्यवहार को नियंत्रित करती है. उसका विश्वास था कि समाज में नैतिकता की स्थापना एवं उसकी पुनर्रचना के लिए समाज के प्रत्येक सदस्य का योगदान अनिवार्य है.
समाज के विकास के लिए साइमन ने मानवी ऐषणाओं को मूल प्रेरणाशक्ति माना है. मनुष्य के मूल स्वभाव की समीक्षा करते हुए उसने विकास के लिए मनुष्य की मूलभूत इच्छाओं, यहां तक कि लालच की भूमिका को भी स्वीकार किया है. उसका कहना था कि मनुष्य की कामनाओं का अंत नहीं है. संघर्ष उसकी प्रवृत्ति है. स्वाभाविक रूप से प्रत्येक मनुष्य की लालसा होती है कि वह शिखर तक पहुंचे. सामाजिक दृष्टि से वह शिखर अच्छा है या बुरा, यदि कोशिशों में दम है तो, सामान्यतः वह इसे जानने-समझने का प्रयास ही नहीं करता. बस उसका एक ही लक्ष्य होता है, शिखर पर पहुंचकर अपने लिए किसी न किसी बहाने समस्त सुविधाएं, जिन्हें वह अपने सुख के लिए अनिवार्य मानता है, जुटा लेना. इस प्रकार सुख मनुष्य की सबसे बड़ी नियंत्रक सत्ता है. उसके योगदान को नकार पाना संभव नहीं है. साइमन के इन विचारों को फ्रांस में क्रांति के लिए संघर्षरत शक्तियों, यहां तक कि कुलीनतावाद के समर्थकों का भी समर्थन मिला था.
साइमन ने समाज में बढ़ रही निषेधात्मकता एवं आत्मघाती स्वच्छंदता (Destructive Liberalism) से विरोध जताते हुए उसके स्थान पर समाज में सकारात्मक जीवन-मूल्यों की स्थापना पर जोर दिया था. उसका मानना था कि समाज की स्थापना का उद्देश्य गरीब और उत्पीड़ित वर्ग की सहायता करना है. यह तभी संभव है कि समाज की सारी शक्तियां एकजुट होकर सामाजिक कल्याण के लिए कार्य करें. हालांकि वह स्वयं एक अभिजात्य परिवार में जन्मा था, मगर वहां के क्रत्रिम परिवेश से वह पूरी तरह उकता चुका था. कुलीनतावाद (Feudalism) तथा सैनिक शासन का विरोध करते हुए उसने आश्चर्यजनक रूप से एक व्यवस्था दी थी कि एक मजबूत और संपन्न समाज की स्थापना के लिए वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों को आगे आकर व्यवस्था संभालनी चाहिए. कोई भी ऐसा व्यक्ति जो समाज को एक उत्पादक शक्ति के रूप में संगठित करने का सामथ्र्य रखता है, वह उसपर शासन करने के भी योग्य है. इस संदर्भ में उसका कहना था कि—
‘समाज के नेतृत्व की बागडोर, मध्ययुगीन चर्च के स्थान पर, किसी वैज्ञानिक को सौंप देनी चाहिए. ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो समाज को उत्पादक शक्ति के रूप में एकजुट करने की योग्यता रखता हो, उसको शेष समाज पर शासन करने का भी अधिकार है, जो उसको सहज ही मिल जाना चाहिए.’
ऐसा कहते समय साइमन राजशाही, सामंतवाद, कुलीनतावाद आदि के साथ तत्कालीन चर्च को भी चुनौती दे रहा था. ध्यातव्य है कि पूंजी और श्रम के अंत: द्वंद्व जो आगे चलकर समाजवाद की प्रमुख पहचान माने जाने लगे थे और जिनपर मार्क्स और लेनिन का पूरा संघर्ष आधारित रहा, संत साइमन के समय में उतने प्रभावकारी नहीं थे. लेकिन अपनी सीमाओं और समय को देखते हुए साइमन ने जो स्थापनाएं कीं, वही आगे चलकर एक बड़े आंदोलन की नींव बनी, जिन्होंने परंपरा से चले आ रहे समाज को बदलने का कार्य किया. उसने कुलीनतावाद एवं सैनिक शासन का भी विरोध किया. आमजन के प्रति अपनी सच्ची निष्ठा को दर्शाते हुए उसने कहा कि पूंजी का विकेंद्रीकृत स्वरूप हमारी अनेक समस्याओं का हल है. लोक के प्रति अपनी इसी निष्ठा के कारण उसने फ्रांसिसी क्रांति में सक्रिय हिस्सेदारी की थी. जीड एवं राइट के अनुसार—
‘उन्हें (साइमन को) न केवल समाजवाद का जनक होने का गौरव मिला, बल्कि दर्शन में विधेयात्मकवाद का प्रथम प्रयोक्ता होने का श्रेय भी उन्हीं को प्राप्त है.’
संत साइमन ने श्रम को विकास का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण माना है. उसके अनुसार जीवन में श्रम विकास की अनिवार्यता है. उसका मानना था कि हरेक व्यक्ति कम से कम इतना कार्य करे, जिससे वह अपनी जीविका का निर्वाह कर सके. श्रम के प्रति साइमन की निष्ठा कोरी लफ्फाजी नहीं थी. बल्कि उसने स्वयं भी अपनी आजीविका के लिए श्रम को अपनाया था. साठ वर्ष ऊपर की अवस्था में नियमित लेखन और प्रतिदिन आठ-नौ घंटे परिश्रम करना, यह साइमन की अपने विचारों के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता को दर्शाता है. सामाजिक समानता के समर्थक के रूप में उसकी कामना थी कि समाज के सभी सदस्य ऊंच-नीच की भावना से परे, परस्पर समानतापूर्ण आचरण करें. सभी को अपने विकास के समुचित अवसर प्राप्त होने चाहिए. संत साइमन का मानना था कि समाज का मुख्य वर्ग, उत्पादक वर्ग है जो श्रम करता है, धन अर्जित करता है, मगर उसके पास कोई विशेष संपत्ति नहीं है, ना ही उसे समाज में कोई उच्च सम्मानजनक स्थान प्राप्त है. दूसरा वर्ग पहले के श्रम पर पलने वाला परजीवी संप्रदाय है. विडंबना यह कि समस्त उत्पादन के सभी संसाधनों पर इसी परजीवी वर्ग का अधिकार है.
अपने लेखन के प्रारंभिक दिनों में संत साइमन की धार्मिक मान्यताओं में पूरी आस्था थी. लेकिन विज्ञान में रुचि बढ़ने के साथ ही धर्म के प्रति उसका मन शंकालु होता चला गया. विज्ञान के प्रति अपनी आस्था के ही कारण वह किसी भी प्रकार की जड़ता के विरुद्ध था. उसका मानना था कि धर्म को किसी भी प्रकार से दुराग्रह और जड़ता से परे, व्यावहारिक होना चाहिए. ताकि उसके आधार पर लिए गए निर्णयों में स्वाभाविकता बनी रहे. परंतु यह विडंबना ही है कि सामाजिक मुद्दों पर अंतिम निर्णय का अधिकार शासकों, सामंतों एवं पूंजीपतियों के पास सुरक्षित रहता है, जो किसी न किसी प्रकार स्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने में सफल रहते हैं. इसके कारण गरीबों और अभावग्रस्त लोगों को न्याय नहीं मिल पाता और वे विकास के मामले में उत्तरोत्तर पिछड़ते जाते हैं. जबकि होना यह चाहिए कि—
‘समाज को चाहिए कि वह अपने सर्वाधिक गरीब एवं अभावग्रस्त लोगों के नैतिक एवं भौतिक उत्थान के लिए संगठित होकर, समर्पण भाव से कार्य करे. वह स्वयं को भी इस प्रकार से व्यवस्थित करे, ताकि जनकल्याण एवं विकास के निर्धरित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके.’
साइमन वर्तमान व्यवस्था से बुरी तरह खिन्न था. यहां तक कि ईसाइयत की कमजोरियां भी उनसे छिपी न थीं. इसलिए वह धर्म और राजनीति समेत वर्तमान व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की कामना करता था. उसका मानना था कि इंजीनियर, वैज्ञानिक, डा॓क्टर तथा अन्य वुद्धिजीवी लोग, संगठित होकर समाज के नवनिर्माण के लिए कार्य करें, ताकि नए सिरे से, वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुरूप समाज का पुनर्गठन संभव हो सके. इसका आशय यह नहीं है कि समाज के पुनर्निर्माण में आम आदमी की भूमिका नगण्य है. साइमन जोर देकर परिवर्तन में जनसामान्य की भूमिका को रेखांकित करता है. बल्कि आमजन की भागीदारिता के प्रति उसका विश्वास इसका सघन है, कि वे उसके समक्ष समाज के बाकी सभी वर्ग को उपेक्षित और नगण्य मानते चले जाते है. उसका यह भी मानना था कि दार्शनिकों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों आदि समाज के कथित संभ्रांत वर्ग के नेतृत्व में समाज शांतिपूर्वक औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ सकता है. पारंपरिक धर्मो कें आधार पर एक अपेक्षाकृत अधिक उदारवादी एवं मानवीय व्यवस्था का विकास भी संभव है. परंतु समाज में स्थायित्व और परंपराओं के सातत्य के लिए आम आदमी ही जिम्मेदार है. अतः समाज में उसकी भूमिका समाज के किसी भी अन्य वर्ग जितनी ही है.
इस संबंध में साइमन की एक प्रसिद्ध बोधकथा है, जिसमें उसके सोच की तरलता की झलक मिलती है. इस बोधकथा ने राबर्ट ओवेन समेत तात्कालिक विचारकों को बहुत गहराई तक प्रभावित किया था—
‘कल्पना कीजिए कि फ्रांस में इस समय पचास प्रथम श्रेणी के चिकित्सक, पचास मूर्धन्य रसायनज्ञ, भौतिक विज्ञानी, उतने ही नौकर, दो सौ कुशल व्यापारी, छह सौ बड़े किसान, पांच सौ योग्य लुहार, बढ़ई, मोची इत्यादि समाप्त हो जाते हैं. ऐसा होते ही पूरा देश धराशायी हो जाएगा. उसका प्रभुत्व और समृद्धि तत्काल समाप्त हो जाएगी. किंतु इसके विपरीत यह मान लीजिए कि यह सब तो सुरक्षित रहता है— परंतु राजपरिवार के सभी सदस्य, दरबारी, समस्त अधिकारीगण, मंत्री, पुरोहित, न्यायाधीश, भूमि-स्वामी आदि नष्ट हो जाएं तब देश को दुःख तो होगा, शोक भी होगा, क्योंकि फ्रांस एक भावुक देश है, परंतु इससे देश का कोई वास्तविक अहित नहीं होगा.’
इस बोधकथा ने काल मार्क्स जैसे साम्यवादियों को भी प्रभावित किया था. यही प्रकारांतर में वर्ग-संघर्ष की प्रेरणा बन सकी. इस बोधकथा के माध्यम से साइमन यह समझाने में सफल रहे थे कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति राजपरिवार अथवा उसके विभिन्न ओहदेदारों तक ही सीमित नहीं होती; बल्कि उसकी शक्ति के सच्चे स्रोत सामान्यजन, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डा॓क्टर, अध्यापक और अन्य कर्मचारीगण होते हैं; जो उत्पादन या किसी ऐसे ही उत्पादक कर्म से किसी न किसी प्रकार संबद्ध हों. इस तरह साइमन ने समाज के उत्पादक एवं अनुत्पादक वर्ग की उपयोगिता के बीच एक स्पष्ट सीमांकन किया था. साइमन का मानना था कि सरकार का कर्तव्य अनुत्पादक वर्ग की वर्चस्वकारी नीतियों से उत्पादक वर्ग के हितों की रक्षा करना है.
साइमन के विचारों ने फ्रांस में समाजवादी विचारधारा को मजबूत करने का कार्य किया. उसकी प्रेरणा से ही उसके सचिव समाजविज्ञानी आ॓गस्ट काम्टे ने सोशियोला॓जी(Sociology) जैसा शब्द ईजाद किया, जिससे समाज के विधिवत अध्ययन की प्रेरणा मिली. हालांकि प्रारंभ में उसका अर्थ समाज भौतिकी (Social Physics) तक सीमित था. कार्ल मार्क्स के सहयोगी समाजविज्ञानी फ्रैड्रिक ऐंग्लस ने भी संत साइमन के लंबे योगदान की सराहना करते हुए एक आलेख में लिखा है कि—
‘संत साइमन महान फ्रांसिसी क्रांति की देन था, जबकि उस समय वह पूरे तीस साल का भी नहीं था. वह क्रांति वस्तुतः तीसरे राज्यों की, पारंपरिक सामंतवादी, निकम्मे प्रशासकों, अभिजात्यवर्ग तथा पुजारियों पर, ऐसे राष्ट्र की, उसकी जनता की जीत थी जिसका अधिकांश औद्योगिक उत्पादन में संलग्न था. किंतु बहुत जल्दी यह दिखने लगा कि तीसरे राज्य की विजय बहुत शीघ्र उस राज्य के एक छोटे से हिस्से की विजय में बदल गई….’
संत साइमन का मानना था कि विज्ञान और उद्योग, अपनी धार्मिक एवं नैतिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर संगठित होकर नई धार्मिक-आर्थिक संरचनाओं को जन्म देंगे तथा उन धार्मिक नैतिकताओं की पुन:स्थापना करेंगे जो इस दौरान किसी कारणवश लुप्त हो चुकी है. उसका मानना था कि समाज की संचालक शक्तियों, जिनमें उत्पादनकर्ता, व्यवसायी, बैंकर आदि बुर्जुआ शामिल हैं, को लोकसेवक के रूप में कार्य करना होगा तथा स्वयं को सामाजिक संपत्ति का केवल ट्रस्टी समझना होगा. फ्रांसिसी क्रांति के बारे में साइमन का विचार था कि वह केवल अभिजात्य और बुर्जुआ वर्ग के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि वह अभिजात्यवर्ग, बुर्जुआओं एवं सर्वहारा के बीच का संघर्ष था. सन 1816 में उसने घोषणा की थी कि राजनीति उत्पादन का विज्ञान है और अर्थशास्त्र राजनीति को सदैव आत्मसात करता रहा है. यह एकदम नई स्थापना थी, जिसका आधार व्यावहारिक था.
साइमन के विचारों में अनेक स्थान पर विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं, किंतु उसकी नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता. बावजूद इसके यह साफ है कि उसकी प्रतिबद्धताएं समाज के जिस वर्ग के प्रति थीं, वह सदैव उपेक्षित एवं तिरस्कृत रहा है. परिवार और लैंगिक संबंधों को लेकर भी उसके विचार उदारता से भरपूर, आधुनिक और किसी भी प्रकार की जड़ता, पूर्वाग्रह आदि से मुक्त थे.
‘पारिवारिक और लैंगिक संबंधों के मामले में संत साइमन ने स्त्री के लिए संपूर्ण आधिकारिता तथा पुरुष के साथ उसकी पूर्ण समानता का पक्ष लिया है. उसने स्त्री-पुरुष में से प्रत्येक को ‘सामाजिक इकाई स्वीकार किया है, जो समाज, परिवार और राज्य द्वारा निर्देशित कर्तव्यों के संपादन के लिए परस्पर एकजुट होते हैं.’
संत साइमन का मानना था कि विज्ञान और उद्योग, परस्पर धार्मिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर संगठित होकर नई धार्मिक-आर्थिक संरचनाओं को जन्म देंगे तथा उन घार्मिक नैतिकताओं की पुन:स्थापना करेंगे जो इस दौरान किसी कारणवश लुप्त हो चुकी हैं. उसका मानना था कि समाज की संचालक शक्तियों, जिनमें उत्पादनकर्ता, व्यवसायी, बैंकर आदि बुर्जुआ शामिल हैं, को लोकसेवक के रूप में कार्य करना होगा तथा स्वयं को सामाजिक संपत्ति का केवल ट्रस्टी समझना होगा. फ्रांसिसी क्रांति के बारे में साइमन का विचार था कि वह केवल अभिजात्य और बुर्जुआ वर्ग के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि वह अभिजात्यवर्ग, बुर्जुआओं एवं सर्वहारा के बीच का संघर्ष था. सन 1816 में उसने घोषणा की थी कि राजनीति उत्पादन का विज्ञान है और अर्थशास्त्र राजनीति को सदैव आत्मसात करता रहा है. यह एकदम नई स्थापना थी, जिसका आधार व्यावहारिक था.
साइमन के विचारों में अनेक स्थान पर विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं. बावजूद इसके यह साफ है कि उसकी प्रतिबद्धताएं समाज के जिस वर्ग के प्रति थीं, वह सदैव उपेक्षित एवे तिरस्कृत रहा है. साइमन ने उस वर्ग के पक्ष में न केवल अपनी आवाज बुलंद रखी, साथ ही वह उसके लिए आजीवन संघर्ष भी करता रहा. यहां तक कि अपनी समस्त पूंजी अपने प्रयोगों और विचारों को कार्यरूप देने के नाम पर खर्च कर दी. उसकी महानता का अनुमान मात्र इसी से लगाया जा सकता है कि जिन दिनों उसका अपना अभिजात्य वर्ग, जिसमें वह जन्मा था, लोगों का तरह-तरह से शोषण कर रहा था, साइमन ने बिना किसी वर्गीय पूर्वाग्रह के न्याय, समानता और विवेक के आधार पर नए समाज की रचना का सपना देखा था.
संत साइमन ने धर्म, राजनीति और अर्थव्यवस्था को समाज के वंचित और सर्वहारा वर्ग के कल्याण के लिए उत्तरदायी ठहराकर एक तरह से उस परंपरा को ठोस समर्थन दिया था, जो उससे लगभग साढे़ तीन सौ वर्ष पहले मार्टिन लूथर द्वारा प्रारंभ की गई थी. वह थी समाज को परंपराओं और रूढ़ियों से निकालकर युगीन चेतना से जोड़ना. समाज और सत्ता के साथ व्यक्तिमात्र को भी अहमियत देना. उसकी अस्मिता का सम्मान करना. औद्योगिक प्रगति तथा नवीनतम तकनीक का लाभ जन-जन तक पहुंचाते हुए विकास के अवसरों में जनसाधारण की साझीदारी सुनिश्चित करना. उल्लेखनीय है कि जनसामान्य के लिए समानता और न्याय की मांग करने वाला साइमन पहला और अकेला विचारक नहीं था. बल्कि उसका सपना तो हेनरी मूर अपनी पूस्तक ‘यूटोपिया’ में वर्षों पहले देख चुका था. वाल्तेयर और रूसो अपनी लोकवादी विचारधारा को साइमन से भी पहले और उससे कहीं अधिक सुसंगत ढंग से प्रस्तुत कर चुके थे. साइमन की विशेषता यह है कि उसने अभिजात्य वर्ग में जन्म लेकर भी जनसाधारण के आत्मसम्मान के संघर्ष को समर्थन दिया और उसके लिए सक्रिय संघर्ष में भी हिस्सेदारी भी की. उससे पहले ये प्रयास केवल सामाजिक एवं वैचारिक स्तर पर ही संपन्न हुए थे.
समाज के उपेक्षित एवं वंचित वर्ग के सम्मान एवं प्रतिष्ठा के लिए साइमन ने न केवल सीधे संघर्ष में हिस्सा लिया, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी उसके लिए निरंतर आवाज उठाता रहा. इसी कारण आगे चलकर उसे संत की गरिमा से विभूषित किया गया. उसके विचारों से प्रेरणा लेकर आ॓गस्ट काम्टे (Auguste Comte)] आ॓लिंडे रोड्रिग्स (Olinde Rodrigues)] एमंड बेजार्ड (Amand Bazard)] पीयरे लेरा॓क्स (Pierre Leroux)] इन्फेंटिन (Barthélemy Prosper Enfantin), था॓मस कारॅले, माइकल केविलियर आदि ने फ्रांसिसी समाजवाद की धारा और अधिक समृद्ध बनाने का कार्य किया. उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जा॓न स्टुअर्ट मिल आदि व्यक्ति-स्वातंत्रय के पक्षधर विद्वानों ने जिस वैचारिक क्रांति का उद्घोष किया, उसके बीजतत्व मुख्यतः संत साइमन के लेखन में मौजूद हैं. यहां तक कि मार्क्स और फ्रैड्रिक एंग्लस की विचारधारा भी कहीं-कहीं संत साइमन से प्रेरणा लेती नजर आती है.
© ओमप्रकाश कश्यप

सुरंजन: आंखों में तैरती कविता

मुझे अच्छी तरह से याद है. खूब अच्छी तरह से. मानो मानस-शिला पर कढ़ी गहरी लकीर हो…अमिट और अविस्मरणीय…अदृश्य मगर सघन अनुभूतियों से आच्छादित…जैसे पलकें पुतली के एहसास से भरी-भरी रहती हैं. गांव की मिट्टी अपनेपन की गंध से…कलियां मधुर सुवास से…मानस-झील मीठे-सुनहले सपनों से और जैसे संचेतना रसी-पगी रहती है, कोमल अनुभूतियों से. काल के अंतहीन प्रवाह से बेअसर. उद्दाम सलिला की तरह ऊर्जस्वित. हां, मुझे याद है, ठीक-ठीक याद है कि वर्षों पहले मैंने ही कहीं लिखा था, सुरंजन और उनकी कविता, दोनों के अंतःसंबंध के बारे में. यह कि दोनों में भेद करने की जरूरत नहीं. सुरंजन को समझना है तो उसकी कविताओं में उतरो. रूखा, सूखा, भावुक, संवेदनशील, कुंठित, यहां तक कि स्वार्थी और परपीड़क, मीठा-कड़वा और किरकिरा भी. सुरंजन का प्रत्येक रूप, उनका अनूठा व्यक्तित्व, उसकी प्रत्येक छवि, खामियां-खूबियां उनकी कविताओं में कैद है. एकदम पारदर्शी और स्पष्ट.
तब तक सुरंजन के साथ गहरा परिचय नहीं बन पाया था. अनौपचारिक तो बिलकुल नहीं था. इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि मैंने सुरंजन को सबसे पहले उनकी कविताओं के माध्यम से जाना. लेकिन इसलिए नहीं कि मेरी कविता पर गहरी पकड़ है. उसके संकेतों, प्रतीकों तथा भाव-रचनाओं में निहित संदेशों तक जाने की मुझमें अनोखी योग्यता है. बल्कि इसलिए कि सुरंजन और उनकी कविता की अंतर्संबद्धता इतनी पारदर्शी और मुखर है कि साहित्य का सामान्य पाठक भी उस तक पहुंच सकता है. बाद में सुरंजन ने ही बताया था कि किसी और ने भी उनकी कविता पर कुछ इसी प्रकार की टिप्पणी की थी. सुनकर मुझे अच्छा लगा था. सुरंजन को कैसा लगा था, वही जानें. मगर, यह बात तो किसी भी कवि, लेखक, साहित्यकार के बारे में कही जा सकती है. लेखन का उत्स यदि मन की गहराई में है तो वहां जो उपस्थित है, वह तो रचना में आएगा ही. लिखने वाला यदि दुःखी और अवसादग्रस्त है तो शब्द सेमल-फूल से कुम्हलाए, जीवन की निस्सारता के गीत गाते हुए सुनाई देंगे. परंतु मन में यदि खुशी और उमंग, उत्साह एवं संचेतना हैं, तो वे खील-मखानों की तरह उछलते-मचलते, नीलांबर में मुक्त उड़ान भरते हुए दिखाई देंगे. ‘स्टाइल इज द मेन हिमशेल्फ’—मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी अभिव्यक्ति में रचा-बसा रहता है. रचनाकार वही है, जैसा वह अपनी रचना में दिखाई देता है, यह सच है, सुरंजन को लेकर तो सोलहों आना सच है. इसलिए कि वह मुखौटे लगाने की कला में पारंगत नहीं हैं. शायद उनकी बौद्धिक सीमाएं उन्हें बहुत-सी चालाकियांे से बचाए रखती हैं. वह बहुत-पढ़ा लिखे भी नहीं हैं. इसलिए महानगरों के अकादमिक चालढाल वाले लेखकों-साहित्यकारों के बीच उन्हें अक्सर अनफिट मान लिया जाता है. व्यावहारिकता में भी वह अक्सर गच्चा खा जाते हैं. किंतु हमेशा नहीं.
सुरंजन ने यूं तो कहानी और उपन्यास भी लिखे हैं, किंतु उनकी पहचान एक कवि की है. स्वयं सुरंजन भी खुद को कवि मानते हैं. लेकिन कवि वे रूमानियत के हैं. इसका कारण संभवतः यह भी हो सकता है कि उनके भीतर कविता का पल्लवन किसी सामाजिक या नैतिक प्रतिबद्धता, अथवा बौद्धिकता के तीव्र आवेग के कारण नहीं हुआ. न ही वे बहुत पढ़ते-लिखते सृजनात्मकता के दबाव के कारण कवि बने हैं. कविता उसके मन में मुकेश के दर्द-भरे गीतों और लता के स्वर-माधुर्य से जन्मी है. फिल्मी गीत-संगीत किसी को कवि-साहित्यकार बना सकता है, इसपर आप शायद ही विश्वास करें. इससे पहले मुझे भी नहीं होता था. सुरंजन को देखकर जाना कि ऐसा भी संभव है. हालांकि अतिशय भावुकता की जो सीमाएं हैं, वही सुरंजन के कवि की भी हैं. आप उनकी बहुत-सी कविताओं को नकार सकते हैं. मगर जिन कविताओं में उनकी संवेदना सारे तटबंध तोड़कर बही है, उनपर आप व्यक्तिवादिता का आरोप तो लगा सकते हैं, नकार नहीं सकते. बिना किसी बौद्धिक अहमन्यता के सुरंजन आज भी मुकेश को अपना गुरु मानते हैं. और प्रेरणास्रोत भी.
सुरंजन और उनकी कविता की अंतरंगता को लेकर जो मैंने वर्षों पहले कहा था, आज भी उसी पर कायम हूं. जबकि इस बीच धरती सूरज की हजारों परिक्रमाएं कर चुकी है. हिंडन और यमुना जैसी कभी की सदानीरा, मगर आज प्रदूषण की मार से अभिशप्त नदियां लाखों टन कचरा बहा चुकी हैं. खुद सुरंजन के भी उजड़ने और बसने सिलसिला चला है. मकान, दुकान सबकुछ बेच-बाचकर वे गया लौटे, यह कहकर कि गया की मिट्टी उन्हें बुला रही है. उनका भोला मन समझ ही नहीं पाया था कि वर्षों पहले गया से पलायन करने से लेकर अब तक फलगु नदी में अथाह पानी बह चुका है. इसलिए पत्नी और बच्चों के साथ जब गया पहुंचे तो परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी थीं. दुबारा जड़ जमाने की कोशिश में साहित्यरथ की शुरुआत की- पुस्तकों की चलती-फिरती दुकान. ग्राहकों को लुभाने के लिए ‘हनुमान चालीसा’ की प्रतियां मुफ्त बांटीं. पर हालात विपरीत थे. इसलिए नए अरमान, नए सपनों, नई उम्मीदों के साथ दुबारा दिल्ली की राह पकड़नी पड़ी. सनातन संघर्ष के साथ भारी उतार-चढ़ाव, अंतहीन आस-निराश के बीच सुरंजन का जीवन आज भी वैसा ही है, जैसा बीस वर्ष पहले था. इस लंबे अंतराल में सुरंजन को लेकर मेरी राय ज्यों की त्यों है. इसलिए नहीं कि मेरी अवधारणाएं जड़ता और यथास्थितिवाद की शिकार हैं. समीक्षा-पुनरीक्षा का दौर उनमें आया ही नहीं है. मेरी चिंता तो इसलिए है कि सुरंजन आज भी अपनी जिदों और दुराग्रहों से उबर नहीं पाए हैं. उनकी कुंठाएं आज भी जस की तस हैं. बल्कि इस बीच उनकी काम-कुंठाओं ने तो और भी विकल उड़ानें भरी हैं. इसके बावजूद जो नहीं बदला, वह है सुरंजन की तीव्र भावुकता, जो उनके कवित्व की आत्मा, जिदों का अवलंबन है.
इस बीच हमारे बीच परिचय और अपरिचय के सिलसिले में निरंतरता रही है. अपरिचय का दौर हालांकि छोटा है, लेकिन मेरे लिए महत्त्वपूर्ण भी वही है. शायद इसके पीछे मेरा यह सोच है कि खालिस परिचय से हम किसी को पूरी तरह नहीं जान पाते. व्यक्ति के अनछुए पहलुओं तक पहुंचने, उन्हें समझने, विवेचित-विरेचित करने के लिए अपरिचय के अंतराल की जरूरत पड़ती ही है. यानी मुझे इतना समय मिला है कि मैं सुरंजन के प्रति अपनी धारणा की पुनरीक्षा कर सकूं. उनके प्रति मन में जो अनुराग जमा है, जो द्वैष जड़ जमाए हुए हैं, उनपर पुनर्विचार कर सकूं. और ऐसा मैंने किया भी है. अपने अपरिचय के दम पर ही मैं यह दावा कर सकता हूं कि मेरी टिप्पणियों में सच की पर्याप्त संभावनाएं हैं. सुरंजन को लेकर मैं यदि खासा निर्मम हो सका हूं तो इस अपरिचय के कारण ही.
मानसिक धरातल की दूरियां, यानी अपरिचय की अवस्था संभवतः सुरंजन के साथ भी है. जब भी उन्हें मेरे प्रति निर्मम होने का अवसर मिला, उन्होंने बिना चूके उसका इस्तेमाल किया. यह स्थिति आई तो वे आगे भी नहीं चूकंेगे. बिना लाग-लपेट खरी-खरी कहेंगे. बल्कि ऐसे मौके तो वह निकालते ही रहते हैं. कभी सीधे, संवाद के माध्यम से, कभी कविता के बहाने. अगर वह नाराज हांे तो उग्रता सवाई हो जाती है. कुछ वर्ष पहले उसकी नाराजगी से वास्ता पड़ा था. यहां मैं नाराजगी के कारणों की तह मंे नहीं जाऊंगा. इस लेख का यह उद्देश्य भी नहीं है. उन दिनों सुरंजन ने मुझपर एक कविता लिखी थी. कविता क्या थी, कैसी थी, नहीं मालूम. न तो वह सुरंजन ने कभी मुझे सुनाई, न मैंने उनसे आग्रह ही किया. शायद इसलिए कि अपने बारे में कड़वी-खरी बातें सुनने का साहस विरलों में ही होता है, उसका मुझमें अभाव था. या शायद यह सोचकर कि उस कविता में जानने लायक कुछ था ही नहीं. जिस मनःस्थिति में सुरंजन ने वह कविता मेरे ऊपर लिखी थी, अथवा मुझे लेकर जिस भाव की अभिव्यक्ति वह अपनी कविता के माध्यम से चाहते थे, उसमें व्यंजना रचना को कलात्मक ऊंचाई देने में सहायक होती. लेकिन व्यंग्य में सुरंजन का हाथ तंग है. ऐसे में कविता दिल की भड़ास अथवा कुंठा के आवेग के अतिरिक्त शायद ही और कुछ हो. कम से कम मुझे तो यही लगा था.
कुछ दिनों बाद जैसा कि सुरंजन ने स्वयं ही बताया, कविता का शीर्षक उन्होंने मेरे ही व्यंग्य उपन्यास ‘जुग-जुग जीवौ भ्रष्टाचार’ से लिया था. नाराजगी के दौर में वह कविता उन्होंने हमारे कई दोस्तों को सुनाई थी. परंतु मैं उसका आस्वादन कभी न कर सका. संभव में मन में अप्रिय स्थिति से बचने की लालसा रही हो. इसीलिए मैंने न तो सुरंजन से कविता सुनाने का अनुरोध किया, न उन मित्रों के कविता के बारे में जानने में रुचि दिखाई, जो उसे सुन चुके थे. वह कविता सुरंजन की बाकी सैकड़ों अनछपी कविताओं के बीच आज भी धूल चाट रही होगी. स्थिति को फेस करने का यह भी एक तरीका है, जिसका मैं जब-तब उपयोग करता रहता हूं. सुरंजन भी इस बारे में कुछ कमजोर नहीं हैं. जिन दिनों की यह बात है, उन दिनों हर मुलाकात के समय एक जुमला उनकी जुबान पर होता था—‘दिल मिलें न मिलें, हाथ मिलाते रहिए.’
ऊपर मैंने अपरिचय का जिक्र किया है. महत्त्वपूर्ण यह भी है कि सुरंजन के साथ परिचय के क्षण जब भी गहराते नजर आए, एक दूरी सदैव मेरे मन में बनी रही. मन के किसी कोने में अवस्थित कोई सदैव यह चेताता रहा कि सावधान यहां से आगे वर्जित क्षेत्र है. यही तुम्हारी लक्ष्मणरेखा है. संभव है इसका कारण मेरी कोई कुंठा या कमजोरी रही हो. कि बचपन के संस्कार…संबंधों के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखने की प्रवृत्ति, जो अब जाने-अनजाने मेरे स्वभाव का हिस्सा बन चुकी है. सुरंजन ने भी अपने लिए इस प्रकार की लक्ष्मणरेखाएं खींच रखी हैं, पता नहीं. लेकिन इतना तय है कि उनके और उनकी लक्ष्मणरेखाओं के बीच निश्चित रूप से अधिक फासला है. जो उन्हें अपने परिचितों से अंतरंग होने का अपेक्षाकृत ज्यादा अवसर प्रदान करता है. मुझे लेकर सुरंजन के मन में कितने फासले हैं इससे तो परिचय नहीं, लेकिन एक बात मैं जोर देकर कह सकता हूं कि इतने वर्षों में शायद ही कोई ऐसा अवसर आया हो, जब कोई इतनी ऊंची दीवार हमारे बीच बनी हो, जिसको लांघ पाना नामुमकिन हो. अपरिचय को दौर में भी परिचय को कायम करने की ललक कमोबेश दोनों तरफ बनी रही. इस तरह यह अबूछ-अवांछित अपरिचय ही है, जिसने हमारे परिचय की निरंतरता को बनाए रखने में मदद की है.
सुरंजन एक साहित्यकार हैं. कविता-कहानी-उपन्यास-बालसाहित्य सबकुछ लिखा है उन्होंने. कविता हो या गद्य, उन्होंने उन्हीं विषयों पर कलमघसीटी की है, जिन्हें स्वयं भोगा या अनुभूत किया है. उनमें एक मोटा उपन्यास ‘मंडी हाउस: यह मैं हूं मैं’ भी है. अनुभूति अत्यंत तीव्र, सघन और धारदार हो तो कविता. कुछ उथली, उखड़ी-उखड़ी-सी हो तो कहानी या उपन्यास. हालांकि भूमिका के दौरान सुभाष चंदर ने ‘मंडी हाउस…’ की प्रशंसा की है. मगर मुझे उनके उपन्यास प्रिय नहीं लगते. मेरा मानना है कि सुरंजन मूलतः कवि हैं, इसलिए उनकी कहानी-उपन्यासों में कथानक का पर्याप्त विकास हो ही नहीं पाता. ऊपर से अनुभूति की प्रामाणिकता को, निजी अनुभूतियों को ज्यों का त्यों बनाए रखने का दबाव भी रचना को बोझिल और अपठनीय बनाता है. स्वानुभूति के दबाव का शिकार उनकी कविताएं भी हैं. सुरंजन छिपाना नहीं जानते. शायद यह छल उन्होंने सीखा ही नहीं है. उनके कवि का दर्द, पूरे जमाने का दर्द है, वे अक्सर यही दिखाते रहते हैं. एक रचनाकार के रूप में सुरंजन की पूरी दुनिया दो खानों में सिमटी है. पहले खाने में वे हैं, जिन्हें वे अपना मानते हैं, जिनसे वे प्यार करते हैं. दूसरे में वे हैं जिनके प्रति उनके मन में आक्रोश भरा रहता है. अतएव उनकी रचनाओं में अक्सर वही पात्र आते हैं, जिन्हें वह अपने जीवन में तात्कालिक रूप से स्वीकार्य अथवा अस्वीकार्य पाते हैं. अनुभूति की सघनता लेखन के लिए दबाव बनाती है, जिससे वे निरंतर कुछ न कुछ रचते रहते हैं. किंतु निजता के अत्यधिक दबाव में उनकी रचनाएं निजी आक्रोश, कुंठा या खुन्नस की अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती हैं.
सुरंजन का गद्य भी कविताई लिए होता है. इससे उनकी रचनाओं में लालित्य स्वाभाविक रूप से उभर आता है. मगर कभी-कभी इससे कथानक की गत्यात्मकता शिथिल पड़ने लगती है, जो पठनीयता के लिए उतनी ही जरूरी शर्त है. इसी कारण सुरंजन को गद्य से अधिक शोहरत उनकी कविताओं से मिली है. इससे सुरंजन भी संतुष्ट ही हैं. वैसे उनके उपन्यास ‘मंडी हाउस: यह मैं हूं मैं’ का शीर्षक मुझे इसके कथानक से अधिक प्यारा लगा. हालांकि जैसा मैंने पहले बताया, यह सुरंजन की स्वानुभूति का ही खेला है. सीधा-सादा आत्मकथात्मक उपन्यास, जिसमें उन्होंने जैसा देखा-भोगा वह आया है. वही नारीपात्र हैं जो जिनसे सुरंजन की भावनाओं की दुनिया बसी है. उपन्यास में यथार्थ, सेक्स, संवेदनाएं आदि सबकुछ हैं. लेकिन आत्मकथात्मक रचनाएं जिस तटस्थता और निर्मम आत्मविश्लेषण की मांग करती हैं, वह इस उपन्यास में कहीं नहीं है. वस्तुतः यह सुरंजन की सीमा भी है. अतिसंवेदनशीलता का लक्षण होता है कि वह दिमाग को एक दायरे से बाहर नहीं जाने देती. ऐसी स्थिति में आत्मश्लाघा भी आ जुड़े तो कृति का साहित्य-तत्व संकट में पड़ जाता है. आत्मश्लाघा का शिकार मनुष्य दुनिया को दो हिस्सों में बांटकर देखता है. एक जो उसके काम की है. उसकी स्वार्थपूर्ति में सहायक है. दूसरी जिससे सिर्फ दूसरों का हितसाधन संभव है. चूंकि संवेदनाएं मन के तीव्र आवेग होती हैं, इसलिए वे क्षण-क्षण परिवर्तशील भी होते हैं. ऐसी अवस्था में दोस्तों और दुश्मनी के दायरे भी एकजैसे नहीं रह पाते. वे भी अपनी धुरियां बदलते रहते हैं. यानी एक क्षण विशेष में मित्र रहा व्यक्ति क्षण-विशेष में दुश्मनी के दायरे में भी आ सकता है. और दुश्मनों की कतार में शामिल व्यक्ति किसी भी पल दोस्त भी बन सकता है. अतिसंवेदनशीलता व्यक्ति को आत्मकेंद्रित और कभी-कभी क्रूर भी बना देती है, जिसका खामियाजा उस व्यक्ति के निकटवर्तियों को उठाना पड़ता है.
सुरंजन का उपन्यास ‘मंडी हाउस…’ मुझे इस देश के लोकतंत्र की ताकत का रूपक जान पड़ता है. मंडी हाउस और उसके आसपास का इलाका राजधानी के संस्कृतिकर्मियों का सबसे पसंदीदा ठिकाना है. यहां राजधानी और बाहर से आए संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों का जमाबड़ा लगा ही रहता है. इसलिए इस परिक्षेत्र को दिल्ली की सांस्कृतिक राजधानी कहकर पुकारना कतई अतिश्योक्ति नहीं लगता. मैं बता दूं कि इस उपन्यास को सुरंजन ने मंडी हाउस की केंटीन, यहां के पार्कों में बैठे-अधलेटे होकर लिखा है. उन दिनों जो उनके कठितम संघर्ष के दिन थे. घर से खाली पेट निकलना, मंडी हाउस पहुंचकर वहां शाम तक मित्रों के साथ गपियाते रहना, फुर्सत के क्षणों में लिखना. भूख लगे तो जो मिले खा लेना. अपने एकाकी जीवन के तीव्र संत्रासों को रफ्ता-रफ्ता लेखनी के जरिये कागज पर उतारना. मुझे लगता है कि सुदूर बिहार के साधारण कस्बे से आया एक विपन्न, साधनविहीन, अल्पशिक्षित और भावुक कलमकार को, जो बिना किसी गाॅडफादर के सिर्फ अपनी कलम द्वारा, उन सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों को चुनौती देना चाहता था, जो चंद चाटुकारों तथा अवसरवादियों के बूते, नौकरशाहों और भ्रष्टाचारियों का अड्डा बन चुके हैं. जिनके लिए साहित्य और संस्कृति महज मंडी में पहुंचे हुआ ‘माल’ हैं. साधारण उत्पाद, जिनकी उपयोगिता धन कमाने तक सीमित है. उन्हें बेचकर अधिकाधिक मुनाफा कमाना उनके लिए मानवीय सरोकारों के किसी भी प्रश्न से अधिक अहम है. उन जड़ प्रतिष्ठानों को सुरंजन इस उपन्यास के शीर्षक द्वारा मानो एक चुनौती देते हैं. कह सकते हैं कि यह आधुनिक स्वार्थी और व्यक्तिकेंद्रित सत्ताकेंद्रों को एक स्वाभिमानी, संघर्षशील और आत्मविश्वास से लबरेज साहित्यकार की ओर से एक चुनौती है. एक ललकार है, संवेदनशील कलमकार की ओर से.
कई मामलों में सुरंजन खासे निर्मम भी हैं. यह निर्ममता जितनी दूसरों के लिए अपने लिए भी कुछ कम नहीं है. खासकर मामला जब लेखन का हो. कभी-कभी तो खरी और बेलाग बातें भी वे इतनी मासूमियत से कह जाते हैं कि उनका दुश्मन भी गुस्सा पी जाता है. हालांकि आक्रोश से सुरंजन को ही नुकसान पहुंचा है. इससे उनकी रचनात्मकता बाधित हुई है. गुस्से में व्यक्ति अपने श्रेष्ठतम को नहीं दे पाता. उनकी अधिकांश कविताएं अकेलेपन की कहानी कहतीं, खुद को बार-बार दोहराती हैं. उनमें से अधिकांश तब लिखी गईं, जब वह घर-परिवार से दूर, अपने कमरे में सिमटे, एकाकी, खुद को भुलाने की जद्दोजहद से गुजर रहे होते थे. सुरंजन की बेहतरीन कविताएं भी वही हैं, जो उनके घने नैराश्यबोध और पीड़ाओं से जन्मी हैं. दिन-भर की हताशा से लगभग टूटकर, जिन्हें उन्होंने अपने ही भीतर डूबते-उतराते हुए रचा है. उनमें जिंदगी से भाग जाने का उतावलापन है तो उसके प्रति बेहद लगाव भी. आंतरिक संघर्ष की यही स्थिति सुरंजन की कविताओं में झीनी दार्शनिकता के साथ उपस्थित हुई है. जो अस्तित्ववाद के करीब से गुजरती है.
पीड़ा के साथ सुरंजन के कवि का संगमन किसी फैशन के तहत नहीं हुआ है, जैसा कि हमारे अधिकांश कवि करते रहते हैं. सुरंजन की कविताओं में छलछलाती पीड़ा उनके अस्मिताबोध की देना है. इसलिए जब वह कहते हंै कि सुरंजन कविता को पहनता, ओढ़ता-बिछाता है तो इसमें कुछ भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं लगता. दूसरे कवियों की तरह सुरंजन बड़ा कवि होने का दावा करने के बजाय अपनी सर्जना में लीन होने, उसके प्रति एकात्म हो जाने में ही अपना बड़प्पन मानते हैं. एक कलमकार का अपनी विधा में विसर्जन का भाव, दूसरे शब्दों में उस उस विधा का आत्मसातीकरण कर लेना है. यह किसी भी समर्पित कलमकार का ध्येय हो सकता है. सुरंजन इस लक्ष्य को पा सके हैं, यह उनके व्यवहार से भी सिद्ध होता है. उनकी कुछ भावोद्दीपक कविताओं को पढ़ते हुए मुझे अंग्रेजी के कवि पी बी शैली के याद आ जाती है.

सुरंजन के कुछ संघर्षों का मैं साक्षी रहा हूं. जिंदगी जमाने के लिए बहुत-से पापड़ उन्होंने बेले हैं. प्रकाशन से लेकर दुकानदारी तक. साहित्यरथ से लेकर स्वप्न रथ…और फिर एक के बाद एक नौकरी, प्रूफ रीडिंग, इन दिनों कथासंसार से जुड़े हैं. वक्त काटने एक दुकान भी है. वही उनका प्रकाशन है, वही प्रिटिंग हाउस. और कहें तो स्टेशनरी की फुटकर दुकान भी है. पर बेचैनी अब भी ज्यों की त्यों है. दरअसल किसी व्यवसाय को जमाने के लिए हुनर चाहिए वह सुरंजन में नदारद है. वह सपने देखते हैं, परंतु उन्हें कारोबार में बदलने के हुनर से अनभिज्ञ हैं. आज जब हर क्षेत्र में स्पर्धा है, लोग सपने नहीं परिणाम की मांग करते हैं, सपने देखना एक रीतिकालीन शौक ही कहा जा सकता है. कथासंसार के माध्यम से मुझे सुरंजन के कई नए पहलुओं की जानकारी भी मुझे मिली है. उन्हें अगर छेड़ दूं तो बात खिंचती चली जाएगी. कुछेक प्रसंग कागज पर उतरने को जरूर उतावले हैं. शायद पाठकों की भी उनमें रुचि हो. सुरंजन की मनमानी का कुछ हिस्सा तो इन प्रसंगों के जरिए बाहर आएगा ही.
कथासंसार के प्रारंभिक अंकों के प्रकाशन से मैं भी जुड़ा रहा हूं. मेरी इच्छा थी, और शायद नया-नया उत्साह भी, जिसका व्यावहारिकता के धरातल से, उस हकीकत से जिससे पत्रिका चलाने के लिए उसके प्रकाशक और संपादक को रोज दो-चार होना पड़ता है, कोई संबंध नहीं होता. तो मेरी इच्छा थी कि पत्रिका अपना स्वतंत्र चरित्र विकसित करे. प्रारंभ के कुछ अंकों में ऐसा प्रयास भी किया गया. खुद सुरंजन में भी भरपूर उत्साह था. इसलिए उन्होंने कुछ ऐसी रचनाएं लेख ढूंढ निकाले जो पूर्व प्रकाशित होने के बावजूद समसामयिकता की कसौटी पर खरे उतरते थे. प्रकाशन के बाद उनपर खूब चर्चा भी हुई थी. उन दिनों सुरंजन जिस कठिन संघर्ष से गुजर रहे थे, उनके लिए रोजी-रोटी का सवाल सबसे अहम् था. जिसे वह कथासंसार के माध्यम से हल करने का ख्बाब देख रहे थे. संपादक और लेखक भी इंसान होते हैं और उनकी कुछ जरूरतें भी होती हैं, यह देखते हुए इसमें कुछ भी गलत नहीं था. पेट की भूख में नैतिकता के सवाल अकसर दब जाया करते हैं. तो भी मुझे भरोसा था कि कविमन सुरंजन अपने धैर्य को चुकने नहीं देंगे. वे रोजी-रोटी के बाकी रास्तों को आजमाने के बाद पत्रिका के क्षेत्र में आए थे. वह उन्हें बहुत आसान भी लगा था. शायद समय भी उनके साथ था. इसलिए ‘कथासंसार’ शीर्षक पंजीकृत भी हो गया. साहित्यिक पत्रिका के क्षेत्र में स्पर्धा थी तो श्रेष्ठतर काम करने पर सफलता की संभावनाएं भी कम नहीं थीं. मुझे भी लगता था कि यदि प्रतिबद्धता के साथ पत्रिका निकाली जाए तो वह पाठकों के मन में धीरे-धीरे अपनी पैठ बना ही लेगी. जो प्रकारांतर में अपने चरित्र के अनुरूप नया पाठकवर्ग गढ़ने में सक्षम होगी. जाहिर है कि मेरा यह थोड़ा-बहुत आदर्शात्मक सोच था, जिसका वास्तविकता से कोई नाता ही नहीं था. जीवन की दैनंदिन की समस्याएं मुझे उतना नहीं कचोटती थीं, जितनी कि वे सुरंजन कोे विचलित रखती थीं. पत्रिका निकली मगर कुछ तो जरूरतें, और कुछ वे दुराग्रह जो सुरंजन की आत्मशलाघा की उपज थे, इन सबने कथासंसार को उस पटरी से उतार दिया, जिसपर दौड़ाने की बात उसे आरंभ करते समय सोची गई थी. बहरहाल कथासंसार सुरंजन की पत्रिका है, और उसको वही होना होगा, जैसा कि वे चाहेंगे.
कथासंसार आरंभ करने से पहले मुझे लगता था कि सुरंजन में व्यावसायिक कुशलता का अभाव है. पत्रिका निकालने के आरंभिक दौर में उन्होंने जो एक के बाद एक कदम उठाए थे, उनमें मिली असफलता देखकर मेरी यह धारणा बनी थी. उनका मगध प्रकाशन भी प्रायः ठप्प-सा था. दुकानदारी वे कर नहीं सकते थे. और साहित्यरथ को बेच-बाचकर वापस गया लौटना पड़ा था. ये असफलताएं दर्शाती थीं कि वे व्यावसायिक निपुणता, कम से कम वाणिज्यिक कौशल से परे हैं. परंतु कथासंसार के माध्यम से बाकी लोगों की तरह मेरा भी भ्रम टूटा. संपादक के रूप में सुरंजन की चतुराई…किसी घाघ संपादक जैसी ही थी. यह व्यावहारिकता का ही अतिरेक था कि स्त्री सामार्थ्य के प्रति बिना किसी निष्ठा या प्रतिबद्धता के कथासंसार के ‘स्त्रीशक्ति विशेषांक’ की घोषणा कर दी जाए. उसी अंक में एक विवादित टिप्पणी, कि स्त्री को तो पुरुष के नीचे ही रहना है,’ भी संपाकदीय का हिस्सा बनकर आए. इस वक्तव्य पर जिन्हें चुभन होती है, होती रहे, किसी का जी दुखता है तो दुखे, सुरंजन को इसकी चिंता नहीं. उनकी प्रवृत्ति आग लगाकर मजा लेनेवाली तो नहीं है, मगर उस घटना में ऐसा ही हुआ था. पत्रिका की भारी आचोचना भी हुई. लेकिन कुछ छपास प्रेमी लेखिकाओं के साथ आ जाने से सुरंजन पर कोई खास फरक नहीं पड़ा.
यही क्यों करगिल युद्ध के दौरान उभरी राष्ट्रवादी भावनाओं में आए उबाल को वह बाजार की अन्य शक्तियों की भांति, पत्रिका के युद्ध विशेषांक के जरिये भुनाना चाहते थे. उन्हीं दिनों अरुंधति राय के नाम लैनान पुरस्कार की घोषणा हुई. अमेरिका के फोर्ड फाउंडेशन की ओर से मिले इस पुरस्कार को अरुंधति सामाजिक संगठनों और विभिन्न पत्रिकाओं में बांट देती हैं. खबर मिलते ही सुरंजन के लिए वह ‘दुनिया की सबसे अच्छी लड़की’ बन जाती है. चूंकि दुनिया की सबसे अच्छी लड़की सुरंजन की कविता पुस्तक का शीर्षक भी है. एक पंथ दो काज, सुरंजन अरुंधति को खुश करने की कोशिश के साथ अपनी कविता पुस्तक को भी चर्चा में ले आते हैं. स्त्री विशेषांक के संपादकीय में वह स्त्री-अस्मिता के विरुद्ध और भी तल्ख टिप्पणियां देते हैं. और अपनी बात के समर्थन में ऐसे ऐसे तर्क कि आप बस सिर धुनते रह जाएं.
सुरंजन की मुखरता, बेलाग बातों का मैं प्रशंसक रहा हूं. कथासंसार का वह संपादकीय अपने आप में विरोधाभासी का बहुसूत्रीय सिलसिला था. पर इसके माध्यम से सार्थक(या निरर्थक) विमर्श आरंभ करने के बजाय सुरांजन की कोेशिश इस बहाने पत्रिका को विवादों में ले आने की थी. प्रकाशनार्थ आई सामग्री से भी वह अपेक्षा करते कि उसमें कुछ चैंकाने वाला हो. लेखकों से मुलाकात या रचना के लिए आग्रह के समय तो वह ऐसा अक्सर कहते ही थे. विवाद के माध्यम से लोगों का ध्यानाकर्षण करने और धनलाभ का सपना देखने वालों में सुरंजन अकेले नहीं हैं. हिंदी में ऐसे बहुत से संपादक-साहित्यकार हैं, जो भीड़ में पत्थर उछालकर खलबली मचाकर उसका मजा लूटते रहते हैं. सुरंजन भी उन्हीं में से एक हैं. पर इस मामले में वे दूसरों से जरा अनाड़ी किस्म के. शायद इसलिए कि वह बड़ा गेम नहीं खेल पाते. इस खेल के चतुर सुजान खिलाड़ी उनकी पहुंच से बाहर हैं. छोटी-छोटी खुशियों के समान छोटी-छोटी चालाकियों से ही वे संतुष्ट हो लेते हैं. छोटी-छोटी चीजों से बहल जाना, यह अकेले सुरंजन की नहीं, बल्कि हर भावुक कवि-लेखक की आदत होती है.
मैं यह कह चुका हूं कि सुरंजन मूल रूप से कवि हैं. और मैं उनकी कविता का पाठक, घनघोर भावुकता का प्रशंसक भी रहा हूं. मगर भावुकता वैचारिक तारतम्यता को पनपने नहीं देती. ऐसे में सुरंजन की साफगोई उनके लिए ढाल का काम करती है. हम उनकी राय से सहमत-असहमत हो सकते हैं. पर इस बात के लिए सुरंजन की तारीफ करनी होगी कि हम जैसे लोग जो कई-कई मुखौटों के साथ लोगों से पेश आते हैं, ऐसे में सुरंजन के पास हमारी अपेक्षा बहुत कम मुखौटे हैं. जितने हैं उनका भी वह बहुत समझदारी या कहें कि चतुराईपूर्वक उपयोग नहीं कर पाते. सुरंजन की स्पष्टवादिता उन्हें हमारी अपेक्षा निर्मेल्य सिद्ध करती है. जिस संघर्ष के दौर से वह गुजरे हैं, उसको देखते हुए यह कोई विचित्र या अस्वाभाविक स्थिति भी नहीं है.
अपनी जिद और सनक के कारण सुरंजन ने नुकसान भी कम नहीं उठाया है. बार-बार उजड़ने और बसने के पीछे उनकी सनकों का ही हाथ रहा है. इसी कारण वह नौकरी पाने और छोड़ने का खेल भी खेलते रहते हैं. शायद इसी कारण उनका जीवन-संघर्ष इतना लंबा खिंचता गया. आज भी जो उनके पास है, जिस कथासंसार ने उन्हें पुनःस्थापित करने में मदद की है, उनकी लोकप्रियता में इजाफा किया है, उसे भी ठुकराकर वह कब किसी नए संसार की रचना में लग जाएंगे, कोई नहीं जानता. खुद सुरंजन भी को यह कहां मालूम है. उनके इसी स्वभाव को परखते हुए वरिष्ठ लघुकथाकार जगदीश कश्यप ने सुरंजन को फीनिक्स पक्षी की उपमा दी थी. यूनानी लोककथाओं का यह मिथकीय पात्र अपनी ही चिता की राख से पुनः जीवन पाता रहा है. भारतीय आख्यानों में इसके समानांतर रक्तबीज जैसे मिथक रहे हैं. सुरंजन के व्यक्तित्व के अनुरूप इससे सटीक उपमा मेरी निगाह में तो और हो नहीं सकती.
सुरंजन को लेकर कहने के लिए बहुत-सी बातें हैं. आठ-दस वर्षों के अंतराल में साथ-साथ भोगे गए कई महत्त्वपूर्ण, यादगार क्षण हैं. बहुत कुछ सीखने को मिला है मुझे उनसे. खासकर वर्तनी की समझ. उन दिनों लिखते समय बेशुमार गलतियां करता था मैं. हालांकि मैं दर्शनशास्त्र में परास्नातक था और वह बामुश्किल सात-आठ जमात पास. इसके बावजूद मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि साहित्य और लेखन संबंधी समझ सुरंजन के पास मुझसे कहीं अधिक थी. उनसे सूत्र रूप में अनेक वे बातें जानने को मिलीं जो आज भी बहुत काम आ रही हैं. आज साहित्य जगत मंे पांव टिकाने लायक यदि मैं जगह बना पाया हूं तो उसके पीछे सुरंजन जैसे मित्रों का योगदान कम नहीं है.
इस आलेख के अंतिम हिस्से में मैं सुरंजन के उस हिस्से पर टिप्पणी करना चाहूंगा जिसके कारण वह जब तब विवादों को आमंत्रित करते रहते हैं. साथ-साथ बातचीत में उन्होंने अपने जीवन-संघर्ष से टुकड़े-टुकड़े परिचय कराया है. जानता हूं कि जितना मुझे बताया है, उससे कई गुना उन्होंने भोगा है. जितना उसने मुझसे कहा है, उसमें अतिश्योक्ति की मात्रा कम से कम है. शायद आटे में नमक जितनी. सुरंजन की खूबी है कि ऐसे मामलों में वह आश्चर्यजनक रूप से ईमानदारी से पेश आते हैं, तो भी उनके जीवन के गई गूढ़ प्रश्न ऐसे हैं, जिनके बारे में मेरे मन में सदैव जिज्ञासा रही है. परंतु उन्हें लेकर सुरंजन से बातचीत करने की कभी हिम्मत ही न पड़ी. पर मैं जानता हूं कि उन प्रश्नों पर जब भी चर्चा होगी, उनकी ईमानदारी हमारे बीच रहेगी.
सुरंजन की चर्चा हो और सेक्स पर बात न हो, यह असंभव है. उसके व्यक्तित्व का यही ऐसा पहलू है, जिसके बारे में कमोबेश सभी जानते हैं. उसके साथी भी और आलोचक भी. इस मामले में सबकी राय लगभग एक जैसी है. खुद सुरंजन इस बारे में कभी कुछ नहीं छिपाते. संभवत इस मुद्दे पर वे सबसे अधिक मुखर होते हैं. बगैर किसी की परवाह किए. अक्सर मैं सोचता हूं कि सुरंजन के मानस में कोई ऐसी कुटिल ग्रंथि है. वही उन्हें अचानक उकसाकर आड़ी-तिरछी चाल चलने को विवश कर देती है. वह ग्रंथि कब, कौन-सी चाल चलने को मजबूर कर दे, इसका आकलन उनके खास मित्र हितैषी भी नहीं कर पाते. मुझे लगता है कि बूंद, एक लंबा-सा सांप, सृष्टि जैसी उनकी कविताएं, सामान्य कवि मानस की सृजनाएं नहीं हैं. वे इसी उकासाव ग्रंथि की देन हैं, जिसकी ओर मैंने ऊपर संकेत किया है.
ये विकृत कामकुंठाओं की भी उपज हैं जो सुरंजन के मानस में गहरे कहीं बहुत गहराई तक समाई हुई हैं. जिनकी थाह पाना मुझ जैसे साधारण कलमकार के बस में नहीं. लेकिन ये कुंठाएं किसी एक दिन में विकसित नहीं हुई हैं. न ही ये उनके मानस में आदि रोपित हो सकती हैं. बल्कि ये उस कठिन संघर्ष का परिणाम हैं जो सुरंजन ने घर-परिवार से बरसों दूर, एकाकी रहकर भोगा है. ये उन परिस्थितियों का कुफल हैं, जो कठिन संघर्ष के दिनों में उनका हर पल इम्तिहान लेती रही हैं, और उनके व्यक्तित्व से चिपक-सी गई हैं. मगर इनके कारण उन्हें कोई नफरत से देखे या ओछेपन का आरोप लगाए, यह सुरंजन तो सुरंजन मुझे भी अच्छा नहीं लगेगा. बल्कि इनके कारण सुरंजन हम सब की सहानुभूति अनायास ही बटोर ले जाते हैं. क्योंकि उन्होंने जो भोगा वह असाधारण है.
सुरंजन की कुंठाओं, जो उनकी कविताओं में अश्लीलता की हद तक व्यक्त हुई हैं, के अंतःस्थलों की पड़ताल करना मुझे एक चुनौती सामान लगता है. कभी कभी मुझे लगता है कि काम-विकारों के अध्ययनकर्ताओं के लिए सुरंजन एक बेहतरीन केस हो सकते हैं. जिसके अध्ययन के जरिए मानवमन की कुछ नई अंतःरचनाओं तक पहुंचा जा सकता है. जिसके गढ़न में सुरंजन के एकाकी भटकाव और अंतहीन संघर्ष की भूमिका रही है.
कल्पना कीजिए कि एक युवा कुछ वर्ष का सफल दांपत्य जीने के बाद अचानक खुद को अकेला पाता है. वह युवा जिसका मन रूमानियत से भरा है. मुकेश और लता के दर्द-भरे नगमों में जिसको अपनी दुनिया नजर आती है. और जो जिंदगी को उसी रूमानियत के साथ जीना चाहता है. ऐसा भावुक इंसान अपने अकेलेपन, भूख, बेकारी, गरीबी और साधनहीनता के साथ अकेला जूझता है. बचपन की त्रासद अनुभूतियों के सिवाय जिसका कोई अतीत नहीं है. महानगर में जिसका कोई अपना नहीं. जिसके पास पूंजी है तो सिर्फ अपनी भावुकता और संवेदनाओं की. उसी के माध्यम से अपने पैरों के नीचे की जमीन तलाशता हुआ वह सुदूर बिहार से देश की राजधानी पहुंचता है. अपनी आंखों में अनगिनत सपने लेकर. कुछ असफल प्रेम कहानियों के साथ. उनकी स्मृति में डूबता-उतराता, कंक्रीट के जंगल में भी उसके लिए चैन कहां. गगनचुंबी इमारतें ऐसे बेचारों को छाया तो देती नहीं. उल्टे उसके बौनेपन का एहसास कराने लगती हैं. राजधानी पहुंचकर भी उसका अंतहीन संघर्ष विराम नहीं मिलता. ऐसे हारे-थके व्यक्ति को किसी के सहारे की जरूरत पड़ती है, स्त्री का साथ ऐसे ही पलों में अमृतवर्षा करता. परिस्थितियों से जूझने का सामथ्र्य और नवजीवन देता. मगर उसे तो वह पहले ही गंवा चुका है.
दैनिक आवश्यकताओं को उसने शराब और भांग के नशे के नीचे दबाने की कोशिश की. पर क्या ऐसा संभव था. फिर एक-दो दिन की बात हो तो ठीक. वहां तो महीना-दर-महीना वर्ष-दर-वर्ष एकाकी कमरे का वही सूनापन था. जो घड़ी-घड़ी देह को कचोटता. पल-पल डंक मारता. ताने-उलाहने देता. ऐसी जोड़ी बाहों से दूसरी जोड़ी बाहों तक जाने में सुरंजन को चैदह बरस लगे. राम के वनवास में तो सीता उनके साथ थीं. उनके न होने पर उनका वीरत्व कितना परवान चढ़ता कौन कह सकता है. इतने लंबे अंतराल में कामनाएं विकृत न हों तो कैसे? दूसरी बार बाहांे का सहारा तो मिला, पर मन का विश्वास नहीं. इसलिए यह कम नहीं कि ऐसे विकट झंझावातों से दिन-रात जूझने के बावजूद सुरंजन टूटे नहीं. कविता रूपी संजीवनी ने उन्हें बिखरने से बचाए रखा.
एक कवि जो बेहद भावुक है. सतत कामनाओं में जीता है. चलते-चलते सपने देखता है. जिसके पास कविता की दौलत है. और जो एक के बाद एक कई असफल प्रेमकथाओं से गुजर कर भी निराश नहीं हुआ है. यानी जो सपनों में नित नए प्यार को परवान चढ़ते हुए देखता है. उसके लिए सपनों का टूटना और बिखरना कितना महत्त्च रखता है. हम लोग जो साधारण बंधा-बंधाया सा जीवन जीते हैं. उस जीवन की भयावहता के बारे में हरगिज नहीं सोच सकते. और यदि कल्पना भी करने लगें तो दिमाग की सारी नसें फटने को हो आती हैं. परंतु सुरंजन ने इन्हें अपने ऊपर झेला है. एक दो दिन नहीं, वर्षों, वर्ष अकेले-अकेले. हर दिन तिल-तिल जलते-बुझते. आज जिस सुरंजन को हम जानते हैं, वह लंबे संघर्ष और भावनाओं की लपटों में तपकर निकला है. उसके भीतर अनगढ़पन तो है, इसलिए जब भी हम सुरंजन को अलग से जानने की कोशिश करेंगे, उनका जीवन मानवीय समझ को कुछ न कुछ विस्तार ही देगा.
सुरंजन की पिछली कविताओं में उनके लंबे संघर्ष और हताशाओं का विवरण है. जिनमें विषाद और करुणा की सहज प्रस्तुति है. वे कविताएं उन्हें नैसर्गिक प्रतिभायुक्त कवि सिद्ध करने को पर्याप्त हैं. किंतु उसकी हाल की कविताएं खासतौर पर संपादक सुरंजन की कविताओं में आवेगात्मक प्रेम का स्थान फूहड़पन और अश्लीलता ने ले लिया है. नारी पात्र पहले उनकी कविताओं में प्रेरणास्रोत का धर्म निभाते थे. परंतु अब उनके वर्णन में अश्लीलता साफ झलकने लगी है. दुनिया की सबसे अच्छी लड़की को पाने की सनातनी कामना तो उनके मन में आज भी है. पर जिस स्त्री को वह अपनी पत्नी कहते हैं, उसको अंकशायिनी बनाने के बावजूद उसके प्रति मन में सैकड़ों शंकाएं पाले रहते हैं. जिन कविताओं में नारी पात्रों के प्रति सहज प्रेम झलका करता था, अब उनमें पत्नी के प्रति नाराजगी और शिकायत का भाव रहता है. जो कविताएं पहले कोमल भावनाओं को बड़ी सौम्यतापूर्वक सहेजे रखती थीं, आजकल उनमें फूहड़पन और अश्लीलता है.
उनकी आजकल की कविताओं पढ़कर कभी-कभी दिमाग में ख्याल आता है कि काश, मैं कोई ऐसा आदमकद दर्पण का इंतजाम कर पाता, जिसमें से इंसान के अंतर्मन की झलक साफ-साफ दिखाई दे. उस दर्पण को मैं सुरंजन की आंखों के सामने रखता. उस समय जब वह अपनी पत्नी के प्रति बेवजह गुस्सा दिखाते हैं. या उनपर तरह-तरह के आरोप लगाते हैं. उस समय मैं उनकी आंखों को घूर-घूर कर पढ़ने का प्रयास करता, जब वे विकास और पंचम को साथ-साथ देख रही होतीं. उस समय सुरंजन दें तो मैं एक सवाल अवश्य करता कि पंचम को देखकर नेह से बरस-बरस पड़ने वाली आंखें विकास के प्रति उपेक्षा से क्यों भरी होती हैं? दोनों में जमीन-आसमान का अंतर क्यों है? पूछता कि अपनी कविता में पंचम को बार-बार याद करने वाले सुरंजन, उसकी जिंदगी की बेहतरी के लिए दिन-रात जूझने वाले तथा उसके भविष्य के प्रति हर पल चिंतित रहने वाले, सुहृदय और आदर्श पिता सुरंजन, अपनी दूसरी और बड़ी संतान से मुंह क्यों फेरे हुए है. पंचम के लिए एक मोमदिल पिता विकास के लिए पत्थर समान कठोर क्यों हो जाता है.
मैं मानता हूं कि ये व्यक्तिगत आरोप हैं. दूसरे के जीवन में नाहक हस्तक्षेप की कोशिश हैं. साहित्य इतना व्यक्तिगत होने की अनुमति देता. हम मान लेते हैं कि हर व्यक्ति की निजी जिंदगी होती है, और साहित्यकार भी इसके अपवाद नहीं हैं. व्यक्ति की निजता में अवांछित ताकझांक करना अशिष्ट ही नहीं, पाप जैसा है. सच मानिए यह सब लिखते हुए मैं परछिंद्रान्वेषण का लुत्फ उठाने का कोई इरादा नहीं रखता. ये शब्द मेरे लिए भी कम पीड़ादायी नहीं हैं. परंतु इससे भी अधिक पीड़ा मुझे उन कविताओं को लेकर होती है, जिनमें वे अपने घर-परिवार को जबरन ले आते हैं. चूंकि सुरंजन ने अपनी निजता का सार्वजनीकरण स्वयं ही करते हैं, और गर्व के साथ करते हैं, खुद को पाठकों के बीच लाकर उनकी संवेदना लूटना चाहते हैं, तो उन्हें उससे उठने वाले प्रश्नों के लिए भी उन्हें तैयार रखना चाहिए. यह सोचते हुए कि उनको तो अभिव्यक्ति का वरदान प्राप्त है. वे अपनी पीड़ा को कागज पर उतार सकते हैं. उतारते रहते हैं. परंतु इस आदान-प्रदान में दूसरा पक्ष तो पूरी तरह मौन है. इसलिए एक साहित्यकार होने के नाते, उस पक्ष को न्याय और पूर्ण अभिव्यक्ति देने का काम भी सुरंजन का ही है. यदि वह ऐसा नहीं करते तो निजी पीड़ाओं के बाजारीकरण और दूसरों की सहानुभूति-संवेदनाओं के मोल बेचने का आरोप उनपर लगते ही रहेंगे. लोग आमने-सामने नहीं तो पीठ पीछे कहेंगे. चुप वही रहेंगे जो महज तमाशबीन होंगे.
चलते-चलते सुरंजन की सपनीली पारदर्शी आंखों का उल्लेख छोड़ दूं तो मन में कुछ करकता सा रहेगा. मुझे उनमें हजार-हजार सपने हर पल तैरते हुए नजर आते हैं. चूंकि सुरंजन के पास बेशुमार सपने हैं, उसकी कल्पना की केसर-क्यारी हर पल महकती रहती है, इसलिए मन में कोई बांध नहीं रख पाता. अपनी समस्त पीड़ा, कुंठा, कलुश और बदकार सोच को कागज पर उतारकर वह निमैल्य हो जाते हैं. यही उनके अनगढ़ व्यक्तित्व की विशेषता है. यही वह वरदान है, जो कविता के साथ-साथ सुरंजन को प्रकृति की ओर से प्राप्त हुआ है. और शायद यही वह कारण है सुरंजन अगर सामने हांे तो मन उनके प्रति नापसंदगी का इजहार करता है, परंतु जब वह दूर हो तो यादों के दरवाजे पर बार-बार सिर पटककर बेचैन किए रखते हैं.
ओमप्रकाश कश्यप

डेविड रिकार्डो

[आधुनिक अर्थशास्त्र के निमार्ताओं में डेविड रिकार्डो का नाम अग्रणी है. एडम स्मिथ के विचारों को विस्तार देते हुए उसने सघन उत्पादन प्रणाली का समर्थन किया. रिकार्डो की प्रसिद्धि उसके मौलिक जनसंख्या सिद्धांत के कारण भी है. माल्थस से गहरी मैत्री के बावजूद उसके जनसंख्या वृद्धि के सिद्धांत जिसमे उसने जनसंख्या को विकास का प्रमुख अवरोधक माना है चुनौती देते हुए उसने उसके बहाने अपने दायित्वों से मुंह मोड़ने वाले बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं को उसने चुनौती दी. रिकार्डो की महत्ता इसमें भी है कि उसने अपने विचारों को बिना गणितीय पद्धति का सहारा लिए सरल शब्दों में व्यक्त किया है. ओमप्रकाश कश्यप]

डेविड रिकार्डो(अप्रैल 18, 1772 सितंबर 11, 1823) उन लोगों में से था, जो अपने ध्येय के प्रति निष्ठावान रहकर, जीवन के आरंभिक वर्षो में ही चामत्कारिक प्रसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, जो न केवल अपनी विलक्षण प्रतिभा के लिए समाज में सम्मान पाते हैं, साथ ही निरंतर अध्ययनमनन से बौद्धिकता के सतत सोपान चढ़ते हुए सफलता के शिखर तक जा पहुंचते हैं, जिनकी दृष्टि दूर तक देखने का सामर्थ्य रखती है, और जिनमें यह साहस होता है कि अपने सिद्धांतों के लिए अड़े रहकर, विरोधियों के समक्ष अपने दावे के पक्ष में अकाट्य तर्क प्रस्तुत कर सकें अथवा स्थितियों के अनुकूल होने तक प्रतीक्षा कर सकें, जो आवश्यकता पड़ने पर मनुष्यता के दूरगामी हितों को देखते हुए उनके लिए निःस्वार्थ संघर्ष छेड़ सकते हैं, जिनमें प्रवाह के विरुद्ध आगे बढ़ने तथा विरोधियों की परवाह किए बिना नए सिद्धांत गढ़ने लायक आत्मविश्वास होता है. ऐसे ही लोग कुछ नया कर पाते, गढ़ पाते हैं. मानवी मेधा ऐसी ही प्रतिभाओं से स्वयं को सम्मानितगौरवान्वित अनुभव करती है.

अर्थशास्त्र के आधुनिक सिद्धांतकारों में अग्रणी माने जाने वाले डेविड रिकार्डो (David Ricardo) का जन्म 18 अप्रैल 1772 (कुछ विद्वान रिकार्डो की जन्मतिथि 19 अप्रैल, 1772 मानते हैं) को लंदन में हुआ था. कुल सतरह भाईबहनों में रिकार्डो तीसरी संतान थे, परिवार पुर्तगाल के संपन्न यहूदियों में से था, जो रिकार्डो के जन्म से ठीक पहले नीदरलैंड से स्थानांतरित होकर इंग्लैंड पहुंचा था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा हालेंड में हुई. उसके तुरंत पश्चात, केवल चैदह वर्ष की अवस्था में रिकार्डो अपने पिता के साथ काम में जुट गया. उसके पिता लंदन स्टाॅक एक्सचेंज में काम करते थे. पिता के साथ कार्य करते हुए रिकार्डो ने व्यवसाय की बारीकियों को समझा. पूंजी की ताकत को पहचाना और उसे कमाने के लिए जरूरी जद्दोजहद का सामान्य ज्ञान प्राप्त किया. आगे चलकर जीवन का वह प्रारंभिक अनुभव रिकार्डो के बहुत काम आया. उसी ने उसके भीतर अर्थशास्त्र के प्रति जिज्ञासा पैदा की. इस दौरान रिकार्डो को बाजार और पूंजी के अंतरंग संबंधों को समझने में मदद मिली, जिससे उसका आत्मविश्वास भी बढ़ा. उसी के परिणामस्वरूप भविष्य में वह स्वयं को कुशल, दूरदृष्टा व्यवसायी और अच्छा वित्तीय प्रबंधक सिद्ध कर सका. भारतीय माइथा॓लाजी से यदि उदाहरण लिया जाए तो अपने जीवन में रिकार्डो की गिनती उन कामयाब महापुरुषों की जा सकती है, जिनपर लक्ष्मी के साथसाथ प्रज्ञा की देवी सरस्वती भी मेहरबान होती है.

यह सबकुछ इतना आसान भी नहीं था. रिकार्डो की कामयाबी के पीछे थी उनकी अलग विचारधारा, ज्ञान के प्रति ललक, खतरे उठाने की जिजीविषा, संकटकाल में धैर्यवान बने रहने एवं अपने विश्वासों पर दृढ़ रहने का गुण, जो उसमें युवावस्था से ही लक्षित होने लगा था. युवा रिकार्डो की धार्मिक मान्यताओं में खास आस्था नहीं थी. इकीसवें वर्ष में वह प्रिसिला एनी विलकिंसन(Priscilla -anne Wilkinson) के संपर्क में आया. प्रिसिला धार्मिक प्रचारक मंडली की सदस्य थी, उसकी मंडली का लक्ष्य शांति एवं अहिंसा का प्रचार करना था. ऐसी महिला से प्रेमसंबंध बढ़ाना, तत्कालीन धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध था. रिकार्डो का अपने परिवार के भीतर भी जबरदस्त विरोध हुआ. यहां तक कि उसको पैत्रिक संपत्ति के अलग कर दिया गया. रिकार्डो की मां तो इस फैसले पर उससे हमेशा नाराज रही. बावजूद इसके रिकार्डो अपने निर्णय पर अटल रहा. अपने परिवार से अलग होकर वह प्रिसिला के साथ रहने लगा. मां और बेटे में उसके बाद कभी बातचीत नहीं हो सकी.

उस समय तक रिकार्डो व्यवसाय के बारे में अच्छा अनुभव बटोर चुका था. उसने स्वतंत्र रूप से स्टा॓क ब्रोकर के रूप में कार्य करना आरंभ किया. कुछ ही वर्षों में अपनी प्रतिभा एवं लगन के दम पर वह अपने व्यवसाय को मजबूत स्थिति में ले आया. उसकी व्यावसायिक सूझबूझ और सफलता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि शूण्य से प्रारंभ करने वाले रिकार्डो की, मृत्यु के समय कुल संपत्ति, आज की कीमतों में सौ मिलियन डा॓लर से ऊपर थी. लगभग सताइस वर्ष की अवस्था (1799) में रिकार्डो के जीवन में परिवर्तनकारी मोड़ उस समय आया जब उसने एडम स्मिथ की चर्चित पुस्तक The Wealth of Nations का अध्ययन किया. उस समय वह बाथ के समुद्री तट पर पिकनिक मनाने के लिए गया हुआ था. पुस्तक ने उसको बेहद प्रभावित किया. उसको लगा कि उसको नया जीवन मिला हो. उस घटना के बाद उसकी अर्थशास्त्र में रुचि बढ़ने लगी. अगले दस वर्ष उसने अपने व्यवसाय की देखभाल के साथसाथ अर्थशास्त्र का गहन अध्ययनमनन करते हुए बिताए.

बैंथम और जेम्स मिल उसके गहरे मित्रों में से थे. वह अपनी अर्थशास्त्र विषयक जिज्ञासाओं के बारे में उन दोनों से विचारविमर्श करता रहता था. उनकी सुखवादी विचारधारा ने भी रिकार्डो को प्रभावित किया. बावजूद इसके अर्थशास्त्र पर अपना पहला आलेख उसने ठीक दस वर्ष पश्चात, लगभग 37 वर्ष की अवस्था में लिखा. इतना लंबा अंतराल दर्शाता है कि अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय पर लिखने से पहले उसने उसका विधिवत अध्ययन किया था. मौलिक सूझबूझ एवं विचारों की स्पष्टता के कारण कुछ ही वर्षों में रिकार्डो की गिनती सुखवादी विचारधारा के प्रमुख हस्ताक्षरों में होने लगी.

इस बीच स्टा॓क मार्केट में काम करते हुए रिकार्डो ने काफी संपत्ति एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी. अध्ययन में रुचि के कारण उसका अपने समय के चर्चित बुद्धिजीवियों से संपर्क भी बना हुआ था. जिनमें जेम्स मिल प्रमुख था. मिल के साथ वह अपने विचारों का आदानप्रदान भी करता था, बल्कि उसके आग्रह पर ही रिकार्डो ने अपनी पहली पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की थी. सन 1810 में रिकार्डो के एक लेख ने उसको अचानक चर्चा के केंद्र में ला दिया. उस लेख में रिकार्डो ने ‘स्वर्णमुद्रा संबंधी विवाद’ Bullionist Controversy को अपने विश्लेषण का विषय बनाया था. उस लेख को अप्रत्याशित चर्चा मिली, जिससे रिकार्डो को विद्वानों के बीच एक उदीयमान अर्थशास्त्री के रूप में मान्यता मिलने लगी.

किंचित विषयांतर का जोखिम उठाते हुए हम अपने पाठकों को बता दें कि ‘स्वर्ण मुद्रासंबंधी विवाद’ अथवा Bullionist Controversy के रूप में चर्चित विवाद का उदय, लंदन में उनीसवीं शताब्दी के बिलकुल प्रारंभिक वर्षों की घटना है. अठारहवीं शताब्दी तक इंग्लैंड के बैंकों में बैंकनोट्स के क्लीयरिंग की जो व्यवस्था थी, उसके अनुसार प्रत्येक बैंकनोट पर लिखा होता था कि वह नोट के बदले में संबंधित बैंक उसपर अंकित मूल्य के बराबर स्वर्ण देने की गारंटी देता है. यह लगभग ऐसी ही आश्वस्ति थी जैसी कि आजकल हम करेंसी नोटों पर लिखी हुई देखते हैं. मगर उन दिनों मुद्रा पर अंकित मूल्य का अभिप्राय उसपर उसके बदले में मिलने वाले स्वर्ण की मात्रा से था. तदनुसार उन दिनों के कानून के अनुसार पांच पाउंड के नोट को बैंक में जमा करके बदले में पांच पाउंड स्वर्ण प्राप्त किया जा सकता था.

स्का॓टलेंड बैंक इससे में किंचित बदली हुई व्यवस्था थी. वहां बैंकनोट्स पर कभीकभी यह भी लिखा होता था कि बैंक को कुछ खास परिस्थितियों में विनिमय को स्थगित करने का अधिकार होगा. इसके पीछे जो कारण थे उन्हें जानने के लिए अभी जरा धैर्य रखना होगा. खैर, स्का॓टलेंड की देखादेखी दूसरे बैंक भी वैसी ही व्यवस्था अपनाने के बारे में सोचने लगे थे. हालांकि बैंक कानूनी रूप से अंकित द्रव्यमान के तुल्य स्वर्ण का भुगतान करने को बाध्य थे, मगर वे अस्थायी रूप से भुगतान को स्थगित करने का अधिकार अपने हाथों में रखते थे; और जरूरी पड़ने पर उसका उपयोग भी करते थे.

परिस्थितियों को देखते हुए यह आवश्यक भी था. भारी मात्रा में अचानक स्वर्ण निकासी से बैंकों के दीवालिया घोषित होने के आसार बन जाते थे. ऐसी स्थिति से स्वयं को बचाने के लिए स्का॓टिश बैंक द्वारा स्वर्णभुगतान को लंबित करने का प्रावधान किया गया था. इसके पीछे बैंक का एक तर्क तो यह था कि संकटकाल में दुश्मन देश इस व्यवस्था के कारण कोई भी अंदरूनी संकट पैदा कर सकता है. दूसरे तर्क के अनुसार यह नियम अन्य प्रतिस्पर्धी बैंकों की निर्दयी चालों से बचाव के लिए बनाया गया था. उदाहरण के लिए मान लीजिए कि कोई बैंक अपने खजाने से कुछ बैंकनोट्स जारी करता है. दूसरे बैंक एक दुरनीति के अंतर्गत उन बैंकनोटों को, बैंक में तत्काल प्रस्तुत करने के बजाय उनको केवल जमा करते चले जाएं. फिर एक दिन अचानक सारे के सारे प्रतिस्पर्धी बैंक मिलकर, उस बैंक एक द्वारा जारी किए गए सारे के सारे नोट्स एक साथ भुगतान के लिए प्रस्तुत कर दें. उस समय यदि वह बैंक किसी कारणवश उन सभी नोट्स, पर अंकित मूल्य के तुल्य स्वर्णद्रव्यमान अदा करने में असमर्थ रहता है, तो उसको कानूनी रूप से दोषी माना जा सकता है. मामला कानून के चंगुल में फंसकर मामला और भी पेचीदा हो जाता था. उस अवस्था में बैंक के दिवालिया होने के साथसाथ देश की शांति एवं सुरक्षा को संकट पैदा हो सकता है. इसलिए कानून न होने के बावजूद स्का॓टिश बैंक द्वारा भुगतान स्थगित करने के नियम को सरकार की ओर से अनौपचारिक स्वीकृति प्राप्त थी. ऐसी घटनाएं कम ही सही, किंतु होती ही रहती थीं.

सन 1797 में अचानक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसने पूरे इंग्लैड की बैंकिंग व्यवस्था को चरमरा दिया. यही नहीं उस घटना के पश्चात स्वर्णमुद्रा में भुगतान की व्यवस्था पर भी उंगलियां उठने लगीं. उन दिनों फ्रांस एवं इंग्लैंड के बीच युद्ध जारी था. धनाभाव के कारण सरकार के सामने अचानक कोई मुश्किल न आए, इसलिए सरकार ने बैंकों से नकदी, विशेषकर स्वर्णमुद्रा के निकास पर रोक लगा दी. कागजी मुद्रा की कमी को रोकने के लिए सरकार ने नए नोट छापकर बाजार में उतारना प्रारंभ कर दिया. परिणामतः मुद्रा प्रसार बढ़ने लगा. तभी अचानक यह अफवाह फैल गई कि फ्रांसिसी सेनाएं इंग्लैंड पर हमला करने वाली हैं. इस अप्रत्याशित आपदा की सूचना से जनता में अफरातफरी मच गई. लोग नोटों के बदले में स्वर्ण लेने के लिए बैंकों की ओर दौड़ पड़े. अचानक हुई निकासी से बैंकों के सामने भुगतान की समस्या खड़ी हो गई. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने ‘बैंक आ॓फ इंग्लैंड’ द्वारा जारी नोटों के भुगतान के अल्पकालिक स्थगन के आदेश दे दिए.

चूंकि फ्रांसिसियों के हमले की बात महज एक अफवाह थी, अतः कुछ ही दिनों में उसका असर जाता रहा. बावजूद इसके सरकार ने बैंकनोटों के बदले स्वर्ण विनिमय की अनुमति नहीं दी. इसी के साथ स्वर्णमुद्रा में भुगतान की व्यवस्था भी विवादों के घेरे में आ गई. अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग उस व्यवस्था के विरोध में था, जबकि दूसरा वर्ग उसको यथावत बनाए रखने पर जोर दे रहा था. लोग इस पर भी दबाव डाल रहे थे कि यदि सरकार बैंकनोट्स के बदले स्वर्णविनिमय को तैयार नहीं है, तो उसे क्षतिपूर्ति के लिए नोट्स के बदले मिलने वाले स्वर्ण के मूल्य से अधिक के नोट्स उनके प्रदाताओं को देने चाहिए. आर्थिक संकट में फंसी हुई सरकार इसके लिए भी सहमत नहीं थी. क्योंकि इससे बाजार में मुद्रा प्रसार जरूरत से अधिक हो जाने का खतरा था, जिसका परिणाम गंभीर मुद्रासंकट के रूप में होता. पूरे मामले पर बुद्धिजीवियों में बहस चल रही थी. जा॓न व्हीटले तथा रिकार्डो जैसे अर्थशास्त्रियों का मानना था कि मुद्रा अवमूल्यन से बचाव के लिए सरकार को बैंकिग नोट्स के बदले स्वर्णभुगतान की नीति को दुबारा लागू कर देना चाहिए. जबकि दूसरा वर्ग उस तरह के संकट से दुबारा गुजरने को हरगिज तैयार न था.

इंग्लैंड में आए वित्तीय संकट की समीक्षा करते हुए रिकार्डो ने लिखा था कि वह वित्तीय संकट जिसके कारण देश को मुद्रा अवमूल्यन के कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है, ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों की देन है. उसने साफसाफ लिखा कि वह सरकार की अदूरदर्शिता थी, जिसके कारण वह संकट उत्पन्न हुआ और सरकार उसका सामना कर पाने में असमर्थ रही है. रिकार्डो का लेख The High Price of Bullion: Proof of the Depreciation of Bank Note सन 1809 में उस समय के चर्चित पत्र Morning Chronicle में प्रकाशित हुआ. अंत में स्थिति पर विचार करने के लिए इंग्लैंड की संसद ‘हाउस आफ का॓मंस’ ने 1819 में एक समिति का गठन किया गया, जिसने रिकार्डो के विचारों को ध्यान में रखते हुए बैंकों पर से प्रतिबंध उठा लेने की अनुशंसा की. विश्वस्तर पर चर्चित इस घटना ने रिकार्डो को एक विद्वान अर्थशास्त्री के रूप में प्रतिष्ठित करने का कार्य किया.

रिकार्डो के इन विचारों ने उसे चर्चा में ला दिया. सरकार की ओर से उसको संसद की सदस्यता देकर सम्मानित किया गया. ध्यातव्य है कि रिकार्डो ने राजनीति में प्रवेश अपने मित्र और समर्थक जेम्स मिल के आग्रह पर किया था. संसद सदस्य के रूप में तो वह बहुत सक्रिय नहीं रह पाया, लेकिन एक अर्थशास्त्री के रूप में उसकी प्रसिद्धि उत्तरोत्तर बढ़ती चली गई. लगभग उन्हीं दिनों प्रकाशित एक और आलेख ने रिकार्डो की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने का कार्य किया. किंतु रिकार्डो को एक विचारक अर्थविज्ञानी के रूप में प्रसिद्धि दिलाने वाला लेख थाEssay on the Influence of a Low Price of Corn on the Profits of Stock इस लेख में उसने कुछ मौलिक स्थापनाएं की थीं, जिनमें उसने तर्क देते हुए स्पष्ट किया था कि अनाज के आयात पर लगाया गया अतिरिक्त शुल्क ही उसकी अप्रत्याशित मूल्यवृद्धि का जनक है. इस मूल्यवृद्धि का परिणाम बड़े किसानों को लाभ पहुंचाना और समाज में वर्गीय अंतर को बढ़ावा देने वाला है. लेख में रिकार्डो ने तुलनात्मक मूल्य(Comparative Costs) की अवधारणा को जन्म दिया था.

आधुनिक अर्थविज्ञानियों के बीच उसके सिद्धांत को तुलनात्मक लाभ (Comparative -dvantage के नाम से जाना जाता है. अपने लेख में रिकार्डो ने उन अर्थशास्त्रियों का तर्कपूर्ण विरोध किया था जो अनाज के आयात पर प्रतिबंध का समर्थन कर रहे थे. उसने जोर देकर कहा था कि यदि कोई उत्पाद विदेश में कम मूल्य पर उपलब्ध है तो उसका अपने देश में निर्माण करने के बजाय, आयात करना ही लाभप्रद होगा. क्योंकि उस अवस्था में बचे हुए संसाधनों का उपयोग अन्य उत्पादक कार्यों के लिए किया जा सकता है. अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उसने कई तर्क भी दिए. रिकार्डो का यही सिद्धांत आधुनिक मुक्त व्यापार की विचारधारा का जनक सिद्ध हुआ है.

अपने तुलनात्मक मूल्यों के सिद्धांत’ को रिकार्डो ने एक उदाहरण द्वारा समझाने का प्रयास किया है

उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान किसी एक स्थायी संसाधन के साथ जितने अधिक संसाधन जुड़ते जाते हैं, लाभांश में उतना ही ह्नास होता जाता है.’

आज के जमाने में सामान्य दिखने वाला यह सिद्धांत अठारहवीं और उनीसवीं शताब्दियों में पूंजीवाद का समर्थक सिद्धांत बना. उसके बाद तो रिकार्डो की गिनती देश के चोटी के अर्थशास्त्रियों में होने लगी थी.

रिकार्डो मुक्त व्यापार का समर्थक था. उसने उन अर्थशास्त्रियों का विरोध किया था जो अनाज के आयात पर प्रतिबंध का समर्थन कर रहे थे. अपने तुलनात्मक मूल्यों के सिद्धांत’ को रिकार्डो ने एक उदाहरण द्वारा समझाने का प्रयास किया है

मान लीजिए कि किसी पिछड़े हुए देश के कारीगरों को एक बोतल सिरका बनाने के लिए पांच घंटे श्रम करना पड़ता है. जिसके लिए उन्हें प्रत्येक दस घंटे में डबल रोटी का एक पैकेट चाहिए. दूसरी ओर संपन्न देश के कारीगर अपेक्षाकृत अधिक उत्पादनसामथ्र्य रखते हैं. वे एक बोतल सिरका बनाने में मात्र तीन श्रमघंटे लगाते हैं. लेकिन उन्हें इसके लिए हर घंटे डबलरोटी के एक पैकेट की जरूरत पड़ती है. सरसरी निगाह डालने पर तो आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि संपन्न देश के कारीगर चूंकि एक बोतल सिरका बनाने में अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम समय लेते हैं, इसीलिए उनका उत्पादन समार्थ्य अधिक है.

लेकिन जरा सोचिएसंपन्न देश के कारीगर हालांकि एक बोतल सिरका बनाने में तुलनात्मक रूप से कम समय लेते हैं. उनके मुकाबले पिछडे़ हुए देश के कारीगर अधिक श्रमघंटे लगाते हैं. लेकिन प्रति बोतल डबल रोटी की खपत के हिसाब से देखा जाए तो एक बोतल सिरका के निर्माण के लिए वे केवल आधी पैकेट डबलरोटी से काम चला लेते हैं. जबकि उनके प्रतिस्पर्धी यानी संपन्न देश के कारीगरों को उतना ही सिरका बनाने के लिए कम से कम तीन पैकेट डबलरोटी चाहिए. साफ है कि पिछड़े देश में एक बोतल सिरका बनाने में आई लागत, श्रमघंटों के आधार पर, संपन्न देश की अपेक्षा महंगी है. मगर उत्पादन लागत के आधार पर वह संपन्न देश के मुकाबले एक तिहाई है. पिछड़े देश में एक पैकेट डवलरोटी के खर्च पर दो बोतल सिरके का निर्माण किया जा सकता है. दूसरी और संपन्न देश में एक बोतल सिरका बनाने में तीन पैकेट डवलरोटी खर्च होती है. इस आधार पर पिछड़े देश में सिरका बनाना संपन्न देश के सापेक्ष सस्ता पड़ेगा और वहां पर उद्यम लगाना संपन्न देश के सापेक्ष लाभ की स्थिति में रहेगा.

यदि एक पैकेट डबलरोटी के बदले एक बोतल सिरके का आदानप्रदान करने की नीति पर अमल किया जाए तो संपन्न देश को जहां एक तिहाई खर्च पर सिरके की बोतल प्राप्त हो सकेगी वहीं पिछड़े देश को भी तीन गुनी मजदूरी की आमद होगी. यदि इसी प्रयोग को लंबे समय तक चलाया जाए तो संपन्न देश डबलरोटी बनाने के काम में पारंगत हो जाएंगे तो दूसरी ओर पिछड़ा देश सिरका बनाने में. लगातार काम करते हुए यह भी संभव है कि वे अपने यहां की स्थितियों के अनुकूल और भी परिष्कृत तकनीक का विकास करने में सफल हो जाएं. इस तरह संपन्न देश तथा पिछड़ा हुआ देश दोनों ही लाभ में रहेगे. भले ही वे आपस में अपनेअपने उत्पाद का पारस्पिरिक व्यापार ना करें. क्योंकि पिछड़ा देश एक बोतल सिरका बनाकर एक डवलरोटी का पैकेट जुटा सकता है. इसलिए अपनी बाकी श्रमशक्ति को वह दूसरे कमाऊ कार्यो में लगा सकता है. इसी प्रकार संपन्न देश भी अपनी श्रमशक्ति का उपयोग अन्य कमाऊ कार्यों के लिए करके अपनी आर्थिक स्थिति को और अधिक सुदृढ़ बना सकता है. अथवा अतिरिक्त व्यापार का प्रयोग अपनी आर्थिक संपन्नता को संपन्न बनाने के लिए कर सकता है. साफ है कि इससे जहां संपन्न देश को अतिरिक्त मात्र में सिरका मिलने की आश्वस्ति होगी, अतः गरीब पिछड़ा हुए देश भी अधिक सिरका का निर्माण कर मुनाफा कमा सकता है.’

यह पद्धति रिकार्डो का निष्कर्ष कही जा सकती है. आधुनिक उदारवादी विचारक के रूप में रिकार्डो का मत आज सबसे अथिक उपयोगी सिद्ध हो रहा है. मुक्त अर्थव्यवस्था की आधारभूत मान्यताओं पर रिकार्डो के विचार आज भी खरे हंै. बचत करना भी एक सरकारी योजना का अनुपालन करना है. लेकिन बचत करना भी एक प्रकार से लाभ में वृद्धि करना है. अतः इस नीति के अंतर्गत परस्पर व्यापार करने का लाभ दोनों ही पक्ष उठाते सकते हैं.

वैचारिकी

रिकार्डो आधुनिक अर्थशास्त्रियों में सबसे अग्रणी स्थान रखते हैं. उन्होंने श्रम के वर्गीकरण एवं उसके ट्रांसफर को आधार मानकर अपने आर्थिक सिद्धांत विकसित किए हैं. उसका ज्ञान व्यावहारिक स्रोतों से विकसित हुआ था. अतः वह प्रयोगों एवं तर्कों की कसौटी पर अधिक विश्वसनीय माना गया. तभी तो रिकार्डो की अर्थशास्त्र के क्षेत्र में की गई स्थापनाएं अधिक विश्वसनीय तथा प्रामाणिक मानी जाती हैं. यहां एक और बेहद महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि रिकार्डो ने अपने सिद्धांतों को प्रस्तुत करते समय, जटिल गणितीय फार्मूलों का प्रयोग कम से कम किया है. जेम्स मिल जो स्वयं रिकार्डो के परिवार में किरायेदार था, रिकार्डो की विचारधारा से बेहद प्रभावित था. रिकार्डो के साहित्य की महत्ता एवं कार्य को लेकर की गई डेविड फ्राइडमेन की टिप्पणी बहुत ही सटीक बन पड़ी है. वह लिखता है कि

रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों को पढ़ते हुए आधुनिक इतिहासकार स्वयं को एक ऐसी टीम का सदस्य अनुभव करता है, जो ऐवरेस्ट पहाड़ पर चढ़ी जा रही हो. और जिसने पहाड़ की चोटी को छूने से पहले जबरदस्त बादलों का सामना मात्र एक टीशर्ट और टेनिस के जूते पहनकर किया हो.’

यह टिप्पणी अपने आप में एक रिकार्डो के चिंतन की व्यावहारिकता तथा उसके अनुभवों की प्रामाणिकता को दर्शाने के लिए पर्याप्त है. जटिल सिद्धांतों की व्याख्या बिना गणितीय जटिलता के करना एक सराहनीय काम था. जिसके लिए आधुनिक सिद्धांतकारों ने उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की है.

अपने प्रेरणास्रोत एडम स्मिथ की भांति रिकार्डो भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि उत्पादों पर नियंत्रण के विरोधी थे. वह मुक्त आयातनिर्यात की नीति के समर्थक थे. रिकार्डो का कहना था कि कृषि उत्पादों पर कर लगने से कम उपजाऊ भूमि पर खेती करने की प्रवृत्ति बढ़ती है. दूसरी आय कम होने से सरकार और जमींदार लगान में वृद्धि करते जाते हैं. जिससे जमींदारों तथा भूस्वामियों के लाभ में निरंतर वृद्धि होती जाती है. विडंबना यह है कि जमींदारों तथा भूस्वामियों की आय का बड़ा हिस्सा उपयोगी निवेश के स्थान पर विलासिता के कार्यों में प्रयुक्त होता है. इससे ना तो राष्ट्र को लाभ होता है ना ही समाज के उस वर्ग को अपने केवल श्रम के माध्यम से जीवनयापन करता है.

1817 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘दि प्रंसिपिल्स आ॓फ पा॓लिटिकल इका॓नामी एंड टेक्सेसन’ में रिकार्डो ने किसानों, जमींदारों, मजदूरों एवं पूंजीपतियों के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर विश्लेषण प्रस्तुत किया है. उसने स्पष्ट किया कि आवश्यक वस्तुओं की कीमत उनके निर्माण में लगने वाले श्रम और उत्पादन लागत में जुड़ने वाले ऊपरी खर्चों द्वारा निर्धारित होती है. व्यावसायिक लाभ आमतौर पर मजदूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है. मजदूरी में बढ़ोत्तरी लाभ को नकारात्मक गति प्रदान करती है. जैसेजैसे कृषि लागत में वृद्धि होती है, लगान भी उसी अनुपात में बढ़ता चला जाता है. लगान में वृद्धि जनसंख्या वृद्धि के अनुक्रमानुपाती होती है. जनसंख्या वृद्धि कृषि लागत में वृद्धि को आमंत्रित करती है. प्रकारांतर में उसी अनुपात में कृषि उपकरण एवं उसके दूसरे खर्चों में इजाफा होने लगता है.

आसान शब्दों एवं जटिल गणितीय आकलनों का कम से कम सहारा लेकर रिकार्डो ने सटीक एवं विश्वसनीय सिद्धांत दिए. इसलिए कि उसका ज्ञान व्यावहारिक स्रोतों से जन्मा था. उन्होंने श्रम के वर्गीकरण एवं उसके स्थानांतरण को आधार मानकर अपने आर्थिक सिद्धांतों को जन्म दिया. इसी आधार पर उनके विचारों को प्रयोगों एवं तर्कों की कसौटी पर अधिक विश्वसनीय माना गया. तभी तो रिकार्डो की अर्थशास्त्र के क्षेत्र में की गई स्थापनाएं अधिक विश्वसनीय तथा प्रामाणिक मानी जाती हैं. जेम्स मिल जो स्वयं रिकार्डो के परिवार में किरायेदार था, रिकार्डो की विचारधारा से बेहद प्रभावित था. जटिल अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की व्याख्या बिना गणितीय जटिलता के करना एक दुरूह, किंतु सराहनीय काम था. रिकार्डो ने इस कार्य को पूरी उत्कृष्टता के साथ संभव कर दिखाया पूरा किया था, जिसके लिए आधुनिक सिद्धांतकारों ने उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की है.

अपने प्रेरणास्रोत एडम स्मिथ की भांति रिकार्डो भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि उत्पादों पर नियंत्रण के विरोधी थे. वह मुक्त आयातनिर्यात की नीति के समर्थक थे. उसका कहना था कि कृषि उत्पादों पर कर लगने से कम उपजाऊ भूमि पर खेती करने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है. दूसरी ओर आय कम होने से सरकार और जमींदार लगान में लगातार वृद्धि करते चले जाते हैं. परिणामतः जमींदारों तथा भूस्वामियों के लाभ में निरंतर वृद्धि होती जाती है. इस विषमताजनक अर्जन की विडंबना यह है कि जमींदारों तथा भूस्वामियों की आय का बड़ा हिस्सा उपयोगी निवेश के स्थान पर विलासिता के कार्यों में प्रयुक्त होता है. इससे न तो राष्ट्र को लाभ होता है, न ही समाज के उस वर्ग को अपने केवल श्रम के माध्यम से जीवनयापन करता है.

बिना कि किसी गणितीय समीकरण के स्थापित, रिकार्डो के जिन सिद्धांतों को सर्वाधिक ख्याति मिली, उनमें से एक लगान का सिद्धांत भी है. यहां वह हालांकि मा॓ल्थस से पे्ररित दिखाई पड़ते हैं. दरअसल रिकार्डो मा॓ल्थस की स्थापना से नाटकीय रूप से जु़ड़े थे. रिकार्डो ने सिद्ध किया कि जैसेजैसे कृषियोग्य भूमि का विस्तार होता है, लगान पर खेती करने वाले किसान उपजाऊ भूमि की अपेक्षा कम उपजाऊ भूमि को जोतना पसंद करते जाते हैं. हालांकि दोनों ही प्रकार की भूमि से उपजे अनाज का मूल्य एकसमान होता है. सिवाय इसके कि उन्हें उपजाऊ जमीन पर कम उपजाऊ जमीन की अपेक्षा अधिक लगान देना पड़ता है; यानी मामूली लालच के कारण वे अधिक उपजाऊ जमीन से होने वाले लाभों से वंचित रह जाते है. ठोस तर्कों के माध्यम से रिकार्डो ने सिद्ध किया कि पैदावार के समय कम लगान देने वाले किसानों की अपेक्षा अधिक लगान वाली जमीन वाले किसान तथा लगान पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानों की अपेक्षा जमींदार अथवा भूस्वामी अधिक लाभ की स्थिति में रहता है.

रिकार्डो की इस स्थापना का उपयोग करते हुए आधुनिक अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि कृषि उत्पादों के मूल्य निर्धारण एवं अन्य नीतिगत मामलों के नाम पर किसानों को दी जाने वाली अनुदान सहायता छोटे किसानों की अपेक्षा बड़े किसानों और जमींदारों को लिए अधिक लाभदायक होती है. श्रम से संबंधी रिकार्डो के विचार ‘मूल्य का श्रमसिद्धांत’(Labor Theory of Value) नाम से जाना जाता है. उसका मानना था कि अर्थव्यवस्था सामान्यतः ठहराव की ओर अग्रसर होती है. स्मरणीय है कि रिकार्डो का अर्थशास्त्र की ओर रुझान एडम स्मिथ की पुस्तक ‘दि वेल्थ आ॓फ नेशनस’ पढ़ने के पश्चात पैदा हुआ था. इस पुस्तक के प्रभाव का अनुमान केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके पहले पाठ के तुरंत पश्चात रिकार्डो ने अपने मित्र जेम्स मिल से कहा था कि इस विषय पर वह भी कुछ लिखना चाहता है. मिल की प्रेरणा पर ही उसने अपना पहला निबंध लिखा था; जिसे अपनी मौलिक स्थापनाओं के कारण विद्वानों का भरपूर समर्थन हासिल हुआ.

एडम स्मिथ सुखवादी विचारधारा का समर्थक था. रिकार्डो पर इन बातों का प्रभाव पड़ना भी स्वाभाविक ही था. लेकिन रिकार्डो एवं था॓मस माल्थस में आर्थिक मसलों पर विचारवैभिन्न्य हमेशा बना रहा. रिकार्डो हालांकि मा॓ल्थस की प्रतिभा का सम्मान करता था, किंतु वह उसकी विचारधारा से कभी सहमत न हो सका. इस कारण दोनों में आलोचनाप्रत्यालोचनाओं से भरा पत्रव्यवहार चलता रहा. रिकार्डो माल्थस के आर्थिक विचारों को अव्यावहारिक मानता था. बावजूद इसके उनके निजी जीवन में इस वैचारिक मतभेद का कोई असर नहीं पड़ा था. माल्थस से गहरी मैत्री के बावजूद दोनों के सैद्धांतिक मतभेद जगहजगह स्पष्ट होते हैं. माल्थस ने जनसंख्या वृद्धि को विकास के प्रमुख अवरोधक के रूप में व्यक्त किया था. जनसंख्या के दबाव को विकास के लिए चुनौती मानते हुए रिकार्डो माल्थस की भांति निराश नहीं होते. बल्कि तर्कपूर्ण ढंग से समझाते हैं कि

गणनाओं द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि किसी भी देश की जनसंख्या अनुकूल स्थितियां पाकर पचीस वर्षों में प्रायः दुगुनी हो जाती है. परंतु इस बात की भी प्रबल संभावना है कि वैसी ही अनुकूल परिस्थितियों मिलने पर उस देश की कुल पूंजी उससे अपेक्षाकृत कम अवधि में ही दुगुनी हो जाए. वैसी परिस्थितियों में मजदूरी की दर में सतत वृद्धि बनी रहती है. क्योंकि मजदूरों की मांग उनकी सप्लाई की अपेक्षा किंचित अधिक तेजी से बढ़ती है.’

व्यावहारिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में रिकार्डो का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान श्रम और मूल्य के अंतर्संबंधों की अधिक मानवीय पड़ताल है. एडम स्मिथ के विचारों को नया विस्तार देते हुए रिकार्डो ने लिखा है कि

वस्तुओं के वास्तविक आनुपातिक मूल्य उनमें लगने वाले श्रम द्वारा निर्धरित होते हैं. किसी वस्तु के उत्पादन पर होने वाला लाभ उसके निर्माण में लगी मजदूरी के अनुरूप घट जाता है. हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि किसी वस्तु के वास्तविक समानुपातिक मूल्य और उसमें लगने वाले श्रम में परस्पर अनुक्रमानुपाती संबंध होते हैं.’

रिकार्डो की यह विचारधारा ही आगे चलकर संत साइमन और रावर्ट ओवेन जैसे सहकारिता के प्रमुख सिद्धांतकारों के लिए बहुत उपयोगी एवं प्रेरणादायक सिद्ध हुई. प्रकारांतर में इसी के आधार पर सहकारिता के विचार को कार्यकारी रूप दिया गया. हालांकि पूंजी और श्रम के संबंधों की व्याख्या से जुडे़ कुछ प्रश्नों को रिकार्डो भी जटिल मानते थे. उसने स्वीकार किया था कि भिन्नभिन्न उद्योगों में विभिन्न परिमाण में श्रमबल प्रयुक्त होता है, जिनकी अलगअलग व्याख्या अथवा तुलनात्मक स्वरूप निर्धारित कर पाना आसान नही है. उनमें प्रयुक्त श्रम की मात्रत्मक भिन्नता के कारण ही उनके लाभांश में भी भिन्नता रहती है. हालांकि उसने माना कि मजदूरी संबंधी सिद्धांत तभी सही मायने में लागू किया जा सकता है, जब सभी उद्योगों में पूंजी प्रयुक्तता एक समान हो.

श्रम और पूंजी को समानरूप से सम्मानेय बनाने के लिए रिकार्डो ने दो सुझाव दिए थे. पहला यह कि लाभानुपात को एकसमान बनाए रखने की शर्त पर पूंजीनिवेश मौटे तौर पर उसी अनुपात में किया जाए, जिस अनुपात में श्रम का निवेश किसी भी वस्तु के उत्पादन के लिए आवश्यक है. इससे उत्पादों के वास्तविक मूल्य का सहज आकलन संभव हो सकेगा. दूसरा उपाय उसने यह बताया कि किसी ऐसे उत्पाद को श्रम विवेचना का आधार बनाया जाए, जिसमें प्रति कामगार औसत पूंजी निवेश हो. उस वस्तु के मूल्य को आधार मानकर बाकी वस्तुओं के वास्तविक मूल्य का आकलन किया जाना चाहिए. रिकार्डो का मानना था कि यदि हम ऐसे किसी मानक उत्पाद का पता लगाने में सफल होते हैं तो बाकी कार्य बहुत आसान हो जाएगा. अपने इस सिद्धांत में रिकार्डो का पूरा भरोसा था. इसलिए जीवन के बाकी वर्ष वे ऐसे ही मानक उत्पाद की खोज में लगे रहे, जिसके आधार पर बाकी वस्तुओं के श्रम और पूंजी के मानवीय संबंधों की सामान्य अवधारणा विकसित की जा सके. इक्यावन वर्ष की अल्पावस्था में जब रिकार्डो की मृत्यु हुई तो उसकी मेज पर एक अधूरा आलेख ‘मूल्य के अपरिवर्तनीय मानक’(The Invariable Standard of Value) मिला, जिसमें ऐसी ही कोशिश की गई थी. कार्ल मार्क्स जैसे विचारक को भी रिकार्डो की इस संकल्पना में पूरा भरोसा था. लेकिन वह भी समस्या का सर्वमान्य हल सुझाने में असमर्थ रहे.

रिकार्डो के विचारों की स्थूल जानकारी रखने वाले व्यक्ति को प्रथम द्रष्टया लग सकता है कि उसकी समस्त विचारधारा पूंजीपतियों और ठेकेदारों की पक्षधर है. उसकी विचारों पर अमल करके गरीब देशों की अपेक्षा अमीर देश अधिक लाभ उठा सकते हैं. लेकिन यदि हम ध्यान से देखें तो रिकार्डो के विचार समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए समान उपयोग जान पड़ते हैं. फिर चाहे वह लगान का सिद्धांत हो या सघन उत्पादन की नीति का समर्थन, रिकार्डो बिना किसी भेदभाव के देश और समाज के विकास के उपाय सुझाते नजर आते हैं. हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रिकार्डो एक अर्थविज्ञानी थे, कोई राजनेता या समाजविज्ञानी नहीं. उनका समस्त चिंतन कम पूंजीनिवेश द्वारा, न्यूनतम समय में अधिकतम लाभ संभावना के अर्थशास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार है.

रिकार्डो का मानना था कि केवल तकनीक के विकास से समाज का विकास संभव नहीं है. उसका कहना था कि प्रौद्योगिकी का विकास अंततः ऐसी मशीनों को बढ़ावा देता है जिनसे श्रमिकों की संख्या घटाई जा सके. जिनका मूल्य और स्थापना लागत अत्यधिक लागत होती है. परिणामतः मजदूरी के लिए सरकारी कोष में कमी आ जाती है. ऐसी अवस्था में दो ही उपाय होते हैं कि या तो मजदूरी को न्यूनतम तक ले जाया जाए अथवा कामगारों को निकाल बाहर किया जाए. बेरोजगार हुए कामगारों में कुछ हालांकि बेहतर लाभ वाली कंपनियों से जुड़ सकते हैं. लेकिन उनमें से अधिकांश की स्थिति डांवाडोल ही रहती है तथा वे निम्नतर एवं दयनीय परिस्थितियों में जीवनयापन को विवश रहते हैं.

रिकार्डो का विश्वास था कि किसी वस्तु का मूल्य उसके निर्माण में आई लागत को ही दर्शाता है, जो अंततः वस्तुओं के वास्तविक मूल्य की ओर संकेत करता है. दूसरे शब्दों में किसी वस्तु के निर्माण में लगे श्रम का वास्तविक मूल्य अर्थात श्रम के प्रबंधनपोषण में आई लागत ही उसका वास्तविक मूल्य(Natrual price) है. इसलिए यदि मजदूरी किसी वस्तु की असली कीमत तो उसका स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिससे वह श्रमिकों, कामगारों का अच्छी तरह भरणपोषण कर सके. किसी भी विकासमान अर्थव्यवस्था में मजदूरी का स्तर सामान्य से अधिक ही होना चाहिए; ताकि उसके बचे हिस्से का उत्पादक कार्यों में निवेश किया जा सके.

रिकार्डो का कहना था कि

मजदूरी स्वाभाविक रूप से किसी वस्तु के वास्तविक मूल्य को निर्धरित करती है, यह उसके बाजार मूल्य को भी निर्धारित कर सकती है, तथापि किसी विकासशील समाज में लंबे समय तक, अधिकतम उत्पादनप्रोत्साहन के लिए इसे वस्तुओं के वास्तविक मूल्य से अधिक होना ही चाहिए. जिससे बढ़ी हुई पूंजी श्रमिकों की नई इच्छाओं को जन्म दे सके, उन्हें अनुशासित बना सके, और भविष्य में भी पूंजी का विस्तार और उससे होने वाले लाभ इसी प्रकार लगातार मिलते रहें. पूंजी की वृद्धि यदि इसी अनुपात में और सतत रूप से होती रहे तो वह श्रमिकों की न केवल मांगों और जरूरतों को पूरा करने, उन्हें और अधिक प्रोत्साहित करने में सक्षम होगी, बल्कि विकास के लाभ को समाज के बाकी लोगों तक पहुंचाने का काम भी करेगी.’

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि रिकार्डो का चिंतन सामाजिक सरोकारों से एकदम परे नहीं था. बल्कि कई स्थान पर उसका चिंतन समाजवादी विचारधारा के अनुरूप है. लाभांश की प्रवृत्ति पर लिखे गए एक निबंध में रिकार्डो ने व्यक्त किया है कि जैसेजैसे वास्तविक मजदूरी में वृद्धि होती है, वास्तविक लाभ सतत रूप से कम होता जाता है. क्योंकि उस अवस्था में वस्तु की बिक्री से हुई पूंजी की कुल आमद लाभ एवं मजदूरी में बंटती जाती है. लाभ के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए वह लिखता है कि

लाभ की मात्र अधिक अथवा कम मजदूरी पर निर्भर करती है, मजदूरी आवश्यकताओं के प्रभावी मूल्य पर एवं आवश्यकताएं मुख्यतः भोजन के वास्तविक मूल्य पर निर्भर होती हैं.’

तय है कि रिकार्दॊ के विचार समकालीन विचारकों से न केवल हटकर थे, साथ ही उसकी प्रतिबद्धताएं भी अलग थीं. उसकी विलक्षण प्रतिभा एवं मौलिक सोच के कारण सर्वत्र सफलता प्राप्त हुई. चाहे वह लेखक का क्षेत्र हो अथवा व्यवसाय का. परिवार से अलग होकर उसने स्वतंत्र रूप से व्यवसाय प्रारंभ किया था. जिसमें उसकी प्रतिभा और परिश्रम के कारण उसे अपेक्षित सफलता भी प्राप्त हुई. उसने पर्याप्त धनार्जन कर एक सम्मानजनक जीवन जिया. बावजूद इसके व्यवस्था के प्रति विद्रोह की उसकी प्रवृत्ति जो कि प्रिसिला एनी विलकिंसन से विवाह के समय देखी गई थी, आगे भी सतत रूप से बनी रही. वह अपने साथसाथ सबको सुखी देखना चाहता था. यह बात 1815 में अपने मित्र जेम्स मिल को लिखे गए एक पत्र से भी स्पष्ट हो जाती है. पत्र में वह अपना उल्लेख एक आत्मतुष्ट एवं सुखी व्यक्ति के रूप में करता हैµ

अपनी सभी इच्छाओं तथा मित्रों की जरूरी इच्छाओं को पूरा करने में समर्थ, पर्याप्त रूप से धनी एवं संतुष्ट व्यक्ति.’

रिकार्डो के विचारों से प्रेरित होकर ही राबर्ट ओवेन, फूरिये, विलियम किंग जैसे अर्थशात्री विचारकों ने सहकार के विचार को कार्यकारी रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास किया था. जिसे रोशडेल पायनियर्स के स्वयंसिद्ध एवं कर्मठ सहयोगियों ने व्यावहारिक रूप में संभव कर दिखाया. माक्र्स ने रिकार्डो के विचारों से प्रेरणा लेकर ही अपनी वैचारिकी का आधार तैयार किया था. लेकिन यह भी विडंबना ही है कि रिकार्डो के सिद्धांतों से प्रेरित होकर ही आधुनिक बाजारवाद अथवा जिसको आमतौर पर उदारवाद की नींव रखी गई थी.

ओमप्रकाश कश्यप

जेम्स मिल : उपयोगितावादी विचारक और अर्थशास्त्री

मन से दार्शनिक कर्म से इतिहासकार-अर्थशास्त्री जेम्स मिल भारत के बारे में अपनी औपनिवेशिक सोच के लिए कुख्यात है. ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी करते हुए उसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ नामक बृहद ग्रंथ लिखा, जो खासा विवादित हुआ. पुस्तक में मिल ने यह दर्शाने की कोशिश की थी कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में राजनीतिक अराजकता की स्थिति थी. अंग्रेजों ने भारत का नागरीकरण करने के साथ-साथ यहां के नागरिकों को ‘सभ्य’ बनाने में भी मदद की. मिल की भारती विरोधी टिप्पणियों को नजरंदाज कर दिया जाए तो वह एक बेहतर इंसान था. अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर उसने गरीब परिवार से उठकर समाज अपना स्थान बनाया. उसने अपने गुरु बैंथम के विचारों को स्वीकृति दिलाने का भी काम किया. उसको इतिहास से ज्यादा प्रसिद्धि अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मिली. कुल मिलाकर वह अपने समय का महान विचारक, शिक्षाशास्त्री और दार्शनिक था. भारत के बारे में उसने वही लिखा, जो कंपनी उससे लिखवाना चाहती थी. हम इसे उसका वैचारिक विचलन या पद और प्रतिष्ठा के लिए किया गया समझौता कह सकते हैं. इतिहास ऐसे समझौतों, विचलनों से भरा पड़ा है. —ओमप्रकाश कश्यप

स्का॓टिश इतिहासकार, अर्थशास्त्री एवं दर्शनशास्त्र के परम विद्वान जेम्स मिल का जन्म 6 अप्रैल 1773 को नार्थवाटर ब्रिज, स्का॓टलेंड में हुआ था. उसके पिता का नाम भी जेम्स मिल ही था. उसका परिवार गरीब था. पिता मोची का काम करते थे. जबकि मां इसबेल फेंटन का संबंध एक संपन्न किसान परिवार से था. वह स्वयं भी विदुषी एवं दूरदर्शी महिला थीं. बालक जेम्स को मां के ही संस्कार अधिक मिले. परिणाम यह हुआ कि उसकी बचपन में अच्छी शिक्षा-दीक्षा हुई. मां की पहल पर ही आगे की शिक्षा कि लिए जेम्स को चर्च द्वारा संचालित धार्मिक पाठशाला में भर्ती करा दिया गया. वहां से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वह मेंट्रोस चला गया; जहां से उसने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. उच्चशिक्षा के लिए लगभग सतरह वर्ष की अवस्था, यानी 1790 में जेम्स एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में भर्ती हो गया. दाखिले के समय जेम्स को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा. कारण विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए अधिकतम आयु तेरह-चौदह वर्ष तक सीमित थी. जेम्स को दाखिला दिलाने में सर जा॓न स्टुअर्ट की प्रेरणा और प्रयास दोनों ही काम आए. इस कारण वह उनका सदैव ऋणी बना रहा. यहां तक कि उसने अपने पुत्र का नामकरण भी सर जा॓न स्टुअर्ट की प्रेरणा पर, उने प्रति अपना स्नेह और सम्मान को व्यक्त करने के लिए जा॓न स्टुअर्ट मिल रखा.

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान जेम्स ने स्वयं को मेधावी विद्यार्थी सिद्ध करते हुए ग्रीक साहित्य का उच्च अध्ययन किया. विशेषरूप से प्लेटो के दर्शन का. एडिनबर्ग में रहते हुए वह उस समय के प्रख्यात दार्शनिक डुगा॓ल्ड स्टीवर्ट (Dugald Stewart) के संपर्क में आया जो उस समय स्का॓टिश पुनर्जागरण के आंदोलन के बेहतरीन व्याख्याकार थे. इसी दौरान उसने बैंथम की पुस्तकों का भी अध्ययन किया. उस समय उसको लगा कि उसका मानसिक प्रस्फुटन हो रहा है. बैंथम के विचारों ने उसको बहुत प्रभावित किया. विशेषकर उसकी सुखवादी विचारधारा, जिसका प्रभाव जेम्स के आगामी लेखन पर भी बना रहा.

अध्ययन के पश्चात जीविका का प्रश्न खड़ा हुआ तो जेम्स को नौकरी की तलाश में जुटना पड़ा. सन 1790 से 1802 तक वह संघर्ष करता रहा. इस बीच चर्च की मामूली नौकरी तथा बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए उसने 1794 में परास्नातक की डिग्री प्राप्त की. निरंतर अध्ययन में रहते हुए उसने दर्शन, इतिहास तथा राजनीति का ज्ञान प्राप्त कर लिया. इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा, साथ ही सुप्त महत्त्वाकांक्षाएं भी. उसके पश्चात जेम्स को लगा कि स्का॓टलेंड में तरक्की के भरपूर अवसर नहीं हैं, तो वह 1802 में वह सर जाॅन स्टुअर्ट के साथ लंदन के लिए रवाना हो गया. जहां जेम्स को उसका पसंदीदा काम भी मिल गया. सन 1803 में वह एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका Literary Journal का संपादक नियुक्त हो गया, जिसपर रहते हुए उसने अनेक शोधपरक आलेख लिखे. परिणामतः पूरे यूरोप में उसकी विद्वता की धाक जमने लगी. इस पत्रिका की शुरुआत 1803 में हुई थी. जेम्स के नेतृत्व में पत्रिका की प्रतिष्ठा में खूब वृद्धि हुई. किंतु 1806 में पत्रिका के अचानक बंद होने से जेम्स के आगे पुनः जीविका का संकट पैदा हो गया. मगर तब तक वह पर्याप्त आत्मविश्वास अर्जित कर चुका था. इस कारण उसने भविष्य में केवल लेखन के सहारे जीने का निर्णय लिया.

सन 1805 में मिल ने एक विधवा स्त्री की बेटी हैरिएट बुरा॓ से विवाह किया. जिससे अगले ही वर्ष उसके पुत्र जा॓न स्टुअर्ट मिल का जन्म हुआ. लगभग उसी वर्ष मिल ने अपनी महत्त्वाकांक्षी पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ पर काम करना प्रारंभ किया जिसे पूरा होने में बारह वर्ष लगे. 1808 में वह बैंथम और डेविड रिकार्डों के संपर्क में आया. दोनों ने ही उसे गहरे तक प्रभावित किया. कुछ ही समय में तीनों गाढ़े मित्र गए. रिकार्डो ने मिल का परिचय अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों से कराया. मिल अभी तक बैंथम के सामाजिक दर्शन से प्रभावित था. लेकिन रिकार्डो के संपर्क में आने के बाद उसकी अर्थशास्त्रीय लेखन में भी रुचि बढ़ने लगी. आश्चर्यजनक रूप में मानवीय ज्ञान की ये दोनों ही धाराएं, उसके मस्तिष्क में अपनी स्वतंत्र सत्ता को बनाए रहीं. बैंथम और रिकार्डो से प्रभावित होने के बावजूद मिल का अपना स्वतंत्र चिंतन भी था. अपने किंचित मतभेदों के कारण, वह न तो बैंथम के सुखवाद का अर्थशास्त्र से तालमेल बिठा पाया, न ही वह सुखवादियों के मूलमंत्र ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख’ के आधार पर सरकार की मुद्रा एवं कराधान संबंधी नीतियों की समीक्षा कर पाने में असमर्थ रहा.

जो भी हो, मिल को बैंथम की विचारधारा ने बेहद प्रभावित किया था. इसका परिणाम यह हुआ कि आगे कई वर्षों तक वह बैंथम का सहयोगी और समर्थक बना रहा. उसने अपनी सर्जनात्मक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बैंथम के विचारों को प्रचारित कराने में लगा दिया. मिल की रचनात्मकता का अगला चरण 1811 में देखने को मिलता है, जब उसने विलियम एलेन के सहयोग से एक पत्रिका ‘फिलिंथ्रोपिस्ट’ का प्रकाशन शुरू कर दिया. पत्रिका में मिल ने शिक्षा, प्रेस की स्वाधीनता, मानव-कल्याण तथा कैदियों की समस्याओं तथा उनकी अनुशासनात्मकता को लेकर कई महत्त्वपूर्ण लेख लिखे. मिल से पहले बैंथम भी कैदियों की समस्याओं पर विचार तथा कारागार की अमानवीय परिस्थितियों की आलोचना कर चुका था. कह सकते हैं कि जेलों को अधिकाधिक मानवीय बनाने के पीछे मिल पर बैंथम का ही प्रभाव था. इस दौरान उसे सुखवाद के विचार को लेकर भी कई आलेख पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखे. आगे चलकर वे निबंध ‘ब्रिटैनिका एन्साक्लोपीडिया’ के पांचवे खंड में भी प्रकाशित हुए. जिससे जनमानस के बीच मिल की छवि सुखवाद के व्याख्याकार के रूप में बनती चली गई.

सन 1818 में ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ पुस्तक के प्रकाशित होने के साथ ही मिल की गिनती अपने समय के प्रमुख विद्वानों में होने लगी. इस पुस्तक को भारी सफलता प्राप्त हुई. हालांकि इसके कारण उसकी आलोचना भी खूब हुई. इसलिए कि भारत को लेकर मिल का सारा ज्ञान केवल पुस्तकों, अखबारी समाचारों तथा उन अंग्रेज अधिकारियों की टिप्पणियों तक सीमित था, जो या तो भारत में ब्रिटिश सरकार के लिए कार्य कर चुके थे, अथवा किसी न किसी रूप में उससे संबद्ध थे. जाहिर है कि भारत को लेकर उनके विवरण पूर्वाग्रह से भरे और एकपक्षीय थे. इस लिए मिल ने अपनी पुस्तक में एक तरह से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार का बचाव ही किया था. उन दिनों ब्रिटिश सरकार अपनी उपनिवेशवादी नीतियों के कारण लोगों की आलोचना झेल रही थी. मिल की पुस्तक उसके उपनिवेशवादी सोच को मान्यता प्रदान करती थी. इसलिए मिल को उसका लाभ भी मिला. पुस्तक लिखने के साथ ही मिल को इंडिया हाउस में नियुक्ति मिल गई. आगे भी विभिन्न राजनीतिक पदों पर रहते हुए उसे उसने खूब प्रतिष्ठा एवं मान-सम्मान अर्जित किया.

जैसा कि ऊपर कहा गया है, मिल बैंथम के साथ-साथ रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी चिंतन से भी प्रभावित था. अर्थशास्त्र से उसकी पहली असली मुठभेड़ ‘कार्न ला॓’(Corn Laws) के औचित्य को लेकर लिए गए एक लेख के दौरान हुई. थोड़ा विषयांतर में जाते हुए हम बता दें कि ‘कार्न ला॓’ की व्यवस्था यूरोप में यद्यपि बारहवीं शताब्दी के दौरान की गई थी. इसका विकट रूप सन 1815 में नेपोलियन युद्ध के पश्चात उस समय देखने को मिला जब कृषि-क्षेत्र को घाटे से उबारने के लिए अनाज के आयात पर रोक लगा दी गई. इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को मंदी की मार से बचाना था. माॅल्थस जैसा प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री कार्न ला॓ के पक्ष में था. अनाज पर लगाया गया प्रतिबंध एक सीमा तक तो कारगर सिद्ध हुआ. इसने किसानों को मंदी की मार से उबारने में बड़ी मदद की, किंतु जैसे-जैसे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरती गई, इससे होने वाली समस्याओं में भी सतत वृद्धि होने लगी. कारण, कानून के प्रभाव से किसानों की आय बढ़ी थी, साथ ही उनका प्रभाव भी. अब वे इस अवस्था में पहुंच चुके थे कि अनाज का मनमाना भाव तय करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकें अथवा अनुकूल समय आने पर उसको महंगे दामों पर बेच सकें. इसका समाज पर विपरीत प्रभाव पड़ा. दाम बढ़ने से गरीबों की मुश्किलें बढ़ने लगीं. दूसरी ओर चीजों के मूल्य में भी उसी अनुपात में तेजी आई. परिणामतः अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी और ‘कार्न ला॓’ के विरुद्ध माहौल बनने लगा.

1804 में ‘का॓र्न ला॓’ की आलोचना करते हुए जेम्स मिल ने अनाज के आयात पर लगे सभी प्रतिबंध हटा लेने की जनता की मांग का समर्थन किया. उसने पर्याप्त तर्क देते हुए मा॓ल्थस की आलोचना भी की जो उस कानून के पक्ष में था. उससे अगले ही लेख में उसने का॓बेट तथा स्पेंस(Cobbett & Spence) के उस आलेख की पर्याप्त तर्क सहित आलोचना की, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि भूमि, न कि उद्योग, ही वास्तविक राष्ट्रीय संपत्ति है. कि राष्ट्रों के बीच व्यापारिक संबंध घाटे के सौदे रहे हैं. कि कारण जनता की जमाराशि राष्ट्र पर किसी प्रकार का भार नहीं है और लगाए गए कर उत्पादकता में बढ़ोत्तरी करते हैं. यह भी कि संकट का वास्तविक कारण जमाखोरों की देन है. मिल का यह भी कहना था कि किसी भी राष्ट्र की कुल सालाना बिक्री और सालाना खरीद में सदैव अंतर होता है. अतः व्यापार में स्थायित्व के लिए किसी भी वस्तु की अतिरिक्त आपूर्ति को आवश्यक रूप से अन्य किसी वस्तु की अतिरिक्त मांग द्वारा संतुलित रखना चाहिए.

सन 1808 में अपनी पत्रिका Commerce Defended के एक लेख में उसने साफ किया कि—

‘किसी भी राष्ट्र के पास कोई एक वस्तु उसकी आवश्यकता से बहुत अधिक हो सकती है, यद्यपि वह अपनी विश्व-भर में कुल मांग से अधिक कभी नहीं हो सकती. ऐसी वस्तु की अतिरिक्त मात्र को जरूरत के स्थान पर आसानी-से ले जाना संभव है, किंतु ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं कि वहां से कोई और आवश्यक वस्तु उचित मात्र में उपलब्ध न हो सके. अतः सवाल उठता है कि उस समय क्या किया जाए जाए जब बाजार में कोई वस्तु अतिरिक्त मात्रा में मौजूद हो…उस अवस्था में उस वस्तु के उत्पादन में लगे संसाधनों का उपयोग, संतुलन की अवस्था तक, उस वस्तु के निर्माण के लिए करना उचित होगा, जिसका कि अभाव बना हुआ है. संतुलन की स्थिति में बाजार में न तो कोई वस्तु अपनी मांग से अधिक उपलब्ध होगी, न ही किसी वस्तु का अभाव हो सकेगा.’

मिल ने रिकार्डो को उसकी अर्थशास्त्र संबंधी टिप्पणियों को प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया. जिसके कारण आगे चलकर उसे ब्रिटिश संसद की सदस्यता से सम्मानित किया गया. 1821 में उसने लंदन में ‘पा॓लिटिकल इकाना॓मी क्लब’ की स्थापना में मदद की जो आगे चलकर रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी विचारों तथा बैंथम के सुधारवाद का प्रमुख विमर्श-स्थल सिद्ध हुआ. इसी वर्ष मिल की एक और विशिष्ट कृति Elements of Political Economy प्रकाशित हुई, जिसमें उसने रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी विचारों की विस्तार सहित विवेचना की गई है. यह पुस्तक कुछ ही समय में रिकार्डो के विचारों को समझने का मुख्य माध्यम बन गई. इस पुस्तक को प्र्रकाशन के साथ ही खूब लोकप्रियता मिली. केवल तीन सालों में पुस्तक का तीसरा संस्करण बाजार में आ गया. सन 1831 से 1833 तक ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रवक्ता के पद पर रहते हुए मिल ने कई कानूनी मामलों में कंपनी की मदद की. 1834 में ‘लंदन रिव्यू’ में उसने चर्च के विधान में सुधार की संभावनाओं पर केंद्रित एक लेख लिखा, जिसने खूब चर्चा प्राप्त की. जिससे उसकी गिनती उस समय के प्रसिद्ध सुधारवादियों में होने लगी.

1836 में निधन होने तक वह लगातार लेखन करता रहा. हालांकि उस समय तक उसके दोनों फेफड़े क्षतिग्रस्त हो चुके थे. 23 जून 1836 को लंबी बीमारी के पश्चात उसका निधन हो गया. उसका लेखन विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मामलों पर मौलिक विचारात्मक टिप्पणियों से भरा पड़ा है, जिससे उसकी विलक्षणता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है. मिल की अंतिम पुस्तक Fragment on Mackintosh मृत्यु से मात्र एक वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी. हालांकि उसे उसकी बाकी पुस्तकों जितनी प्रशंसा नहीं मिल सकी. लेकिन वह अपने विचारों से आने वाले विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा, जिनमें कार्ल मार्क्स, जान स्टुअर्ट मिल आदि शामिल थे.

वैचारिकी

एक बेहद साधारण परिवार में जन्मे, कठिनाइयों में पले, बचपन से ही मेधावी मिल अपने अध्वसाय से जो ख्याति अर्जित की, उसके कारण उसकी गिनती विश्व के उन महान दार्शनिकों में होती है, जो मानवमात्र के सुख की चिंता करते थे. जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन रचनात्मक लेखन को समर्पित किया था. जो मात्र अपनी प्रतिभा के बल पर एक सामान्य परिवार से आगे बढ़कर समाज में अपना खास स्थान हासिल कर सके और जिनके कारण समाज में सत्य एवं नैतिकता अपना सुरक्षित स्थान बनाए रख सके हैं. जेम्स मिल ने भी अपनी अद्वितीय मेधा के दम पर बौद्धिक जगत में अपने लिए विशिष्ट स्थान बनाया.

विलक्षण प्रतिभा के धनी मिल ने दर्शनशास्त्र के अध्ययन की शुरुआत प्लेटो के दर्शन से की. उसने विद्यार्थीकाल में प्लेटो की दर्शन की समालोचना करने वाले अनेक निबंध लिखे. जिसके कारण उसको प्लटो के दर्शन का आधिकारिक विद्वान माना गया. यही नहीं उसने अध्ययन के दौरान ही ग्रीक तथा लैटिन भाषाओं का स्तरीय ज्ञान प्राप्त किया तथा उनमें सृजनात्मक लेखन की छाप छोड़ी. अपनी युवा अवस्था के दिनों में वह बैंथम के विचारों के संपर्क में आया और उसके सुखवाद से प्रेरणा लेकर उसके विचार को आगे विस्तार दिया. मिल उच्च कोटि का विद्वान, इतिहासकार, साहित्यकार, राजनेता एवं दार्शनिक था. उसका सारा साहित्य मौलिकता की श्रेणी में आता है. रिर्काडो तथा बैंथम से प्रेरणा लेते हुए उसने सुखवाद के विचार को मान्यता दी तथा उसके प्रचार के लिए अनेक पुस्तकें तथा लेख आदि लिखे, जिन्हें विद्वानांे की भरपूर सराहना प्राप्त हुई. उसका लेखन अर्थशास्त्र, राजनीति, इतिहास, दर्शनशास्त्र आदि क्षेत्रें में फैला हुआ है. कुछ विद्वानों को उसके विचारों में यत्र-तत्र विरोधाभास भी नजर आता है, किंतु यह कोई अनोखी बात नहीं है. इस प्रकार के विरोधाभास तो प्रायः सभी विलक्षण प्रतिभा-संपन्नों के साथ होते रहे हैं.

इंग्लैंड की उपनिवेशवादी राजनीति को स्थिर बनाने एवं उसको वैचारिक-बौद्धिक समर्थन देने में जितना अधिक योगदान जेम्स मिल का रहा, उतना शायद ही किसी और विद्वान लेखक-साहित्यकार का रहा हो. इसका उसको लाभ भी मिला. ब्रिटिश सरकार ने उसको उच्च पद एवं विविध सम्मान से उपकृत किया. हालांकि ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों का समर्थन करने के लिए उसको आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था. उसके आलोचकों की बात में दम भी है. क्योंकि कई स्थान पर वह ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों का मूक समर्थक नजर आता है. जिससे उसके आलोचकों को उसकी निष्ठा पर संदेह होने लगता है.

मिल ने भारत को लेकर अपनी पुस्तक में एक स्थान पर चैंका देने वाला उल्लेख किया कि—

‘‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को सभ्य बनाने, उसका नागरीकरण करने में मदद की थी… अंग्रेजों के आने से पहले भारत एक बर्बर युग से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था.’ हालांकि बाद में मिल ने अपने ही कथन का उलट करते हुए भारत में ब्रिटिश राज को ‘समाज के संपन्न तबके के लिए बाहरी मदद उपलब्ध कराने वाला व्यापक तंत्र’’ कहकर ब्रिटिश राज्य की वास्तविक खामियों की ओर इशारा भी किया था.

एक ओर व्यक्ति-स्वातंत्रय और जनवादी विचारधारा का पक्ष लेना तथा दूसरी ओर एक औपनिवेशिक सत्ता के समर्थन में भारी-भरकम तर्क गढ़ना, ये जेम्स मिल के जीवन के अंतर्विरोध हैं. लेकिन ऐसे अंतर्विरोधों से शायद ही कोई बच पाया हो. ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ नामक ग्रंथ से जेम्स मिल की इतिहास में रुचि जाहिर होती है. किंतु उसका योगदान केवल ऐतिहासिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है. सच में तो मिल का लेखन मानवीय स्वतंत्रता एवं समानता के लिए समर्पित था. उसने अपने लेखों तथा व्यक्तिगत प्रयासों से उदारवादी राजनेताओं को प्रभावित किया, जिसका फ्रांसिसी क्रांति पर व्यापक प्रभाव पड़ा. मिल की पुस्तक Elements of Political Economy(1821)’ में उसके उदारवादी विचारों की झलक देखी जा सकती है.

जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है, इतिहास मिल का प्रिय विषय था. मगर उसकी प्रतिभा बहुमुखी थी. राजनीति और अर्थशास्त्र को लेकर उसने जो लेख लिखे उनकी भरपूर सराहना हुई. कई विश्वविद्यालयों ने उसको अपने पाठ्यक्रम में शामिल भी कर लिया था. पुस्तक में सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता, उसके लक्ष्य और समस्याओं की गंभीर विवेचना की गई थी. उसमें मिल ने दर्शाने का प्रयास किया है कि जनसंख्या वृद्धि विकास की प्रमुख समस्याओं में से एक है. क्योंकि जिस अनुपात में जनसंख्या वृद्धि होती है, उस अनुपात में संसाधनों का विकास नहीं हो पाता. उसने संसाधनों के अनियमित बंटवारे को भी विकास की समस्याओं से जोड़ा तथा माना कि किसी वस्तु की वास्तविक कीमत उसमें लगे श्रम के आधार पर आंकी जानी चाहिए, न कि उसके निर्माण में प्रयुक्त कच्चेमाल अथवा किसी ओर कारण से. पुस्तक में वस्तुतः डेविड रिकार्डो के विचारों को ही विस्तार दिया गया था. मिल ने उसमें राजनीति पर दिए गए अपने वक्तव्य संकलित किए गए हैं, जिनमें से एक लेख में जेम्स मिल ने जनसंख्या-वृद्धि और संसाधनों के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया है. लेख में उसने एक स्थान पर लिखा है कि—

‘सामान्यतः, यदि बाकी सब लक्षण अपरिवर्तित हों और पूंजी एवं जनसंख्या वृद्धि का अनुपात एकसमान रहे तो मजदूरी में प्रभावी वृद्धि भी अपरिवर्तनीय बनी रहती हैं. यदि जनसंख्या की अपेक्षा पूंजीनिवेश में अध्कि वृद्धि हो तो मजदूर वर्ग की आय पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. परिणामतः औसत मजदूरी बढ़ने लगती है. यदि ये दोनों ही स्थितियां न हों और यदि पूंजीनिवेश अनुपात में वृद्धि होती है, तब मजदूरी में भी आनुपातिक वृद्धि होगी. लेकिन इसके विपरीत यदि जनसंख्या वृद्धि के सापेक्ष पूंजी अनुपात में गतिरोध है, यानी पूंजीनिवेश की मात्रा में ठहराव बना रहे तो निश्चित रूप से इसका असर मजदूरी पर पड़ेगा और वह तेजी से गिरने लगेगी.’

जेम्स मिल की कमी थी कि उसने अपने राजनीतिक दर्शन तथा आर्थिक विचारों में कभी समन्वय स्थापित करने की नहीं सोची. इतिहास में रुचि के कारण उसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ लिखा, जिसमें उसने निहित पूर्वग्रहों के कारण औपनिवेशिक ब्रिटिश राजनीति का समर्थन किया. तथापि समानांतर रूप से वह अर्थशास्त्र एवं एक अर्थविज्ञानी के रूप में कार्य करता रहा. निश्चित रूप से इसके पीछे रिकार्डो के साथ मैत्री एवं बैंथम की प्रेरणाएं भी थीं. दरअसल मिल का अर्थदर्शन रिकार्डो तथा सामाजिक दर्शन बैंथम के चिंतन का ही विस्तार है. वस्तुतः मिल अर्थशास्त्र के क्षेत्र में रिकार्डो का अनुयायी था. किंतु यह मिल ही था जिसने रिकार्डो को उसकी अर्थशास्त्र की पहली पुस्तक के प्रकाशन के लिए प्रेरित किया था. यही नहीं, मिल के प्रयासों से ही रिकार्डो को ब्रिटिश संसद के लिए चुना गया था. बैंथम, जेम्स मिल तथा रिकार्डोे की तिकड़ी के संबंध के बारे में माना जाता है कि—

‘बैंथम मिल का नैतिक गुरु तथा मिल रिकार्डो का नैतिक गुरु था.’

आगे चलकर रिकार्डो ने भी ‘सुखवाद’ के सिद्धांत की अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से व्याख्या की. मिल का मानना था कि सरकार को जनजीवन में हस्तक्षेप की नीति से बचना चाहिए. उसके बदले उसको जनता के बीच से ही संसाधन जुटाकर उनपर कार्य होना चाहिए. इसके ठीक विपरीत अपने राजनीतिक चिंतन में वह आर्थिक रूप से विपन्नों को सरकारी संरक्षण दिए जाने की नीति का समर्थक था और मानता था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को संरक्षण प्रदान करने के लिए सरकार को अधिक से अधिक मदद करनी चाहिए.

जेम्स मिल ने भले ही कोई नया सिद्धांत नहीं गढ़ा हो, मगर बैंथम तथा रिकार्डो के विचारों को तार्किक ढंग से आगे ले जाने और उनकी आसान शब्दों में व्याख्या करने में उसका योगदान अविस्मरणीय है. उसका विश्वास था कि जब हम लोगों के समूह के साथ मिलकर कुछ करना चाहते हैं तो उस अवस्था में समूह के हित उसके अधिकांश सदस्यों की अधिकतम संतुष्टि के बराबर होते हैं. दूसरे शब्दों में एक लोकतांत्रिक संगठन में समूह के हितों के साथ-साथ उसके सदस्यों के हित भी समानरूप से सधते चले जाते हैं. एक कल्याणकारी समूह ऐसा ही सपना अपने सदस्यों को लेकर देखता है कि उसके किसी भी कर्तव्य से अधिक से अधिक सदस्य इकाइयों का भला हो सके. इस तरह मिल ने सामूहिक जीवन की विशिष्टताओं का पक्ष लेकर उसके माध्यम से समतावादी समाज की संकल्पना का ही विस्तार किया था.

अपने ग्रंथ ‘एलीमेंट्स आ॓फ पा॓लिटिकल इका॓नामी’ में रिकार्डो के तुलनात्मक लाभों के सिद्धांत का उपयोग करते हुए उसने गणितीय उदाहरण जुटाने की अपेक्षा तर्क का सहारा लिया है. उसका मानना था कि श्रमिक के ग्रहण करने की मात्र केवल उतनी होती है, जितनी वह पूंजी की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी करता है. जबकि पूंजीपति का लाभ उसके द्वारा भूमि आदि संसाधनों में किए गए निवेश का आनुपातिक होता है. इन दोनों के अतिरिक्त भूस्वामियों का एक तीसरा भी वर्ग है जो केवल अपना हित देखता है और अपना ही स्वार्थ-साधन चाहता है. मिल की निगाह में असली मुनाफाखोर भी यही है.

मिल ने बैंथम के सुखवाद के विचार का समर्थन किया था, किंतु उसके बहाने वह अनिमित उपभोग को अनुमति देने के विरोध में था. हालांकि सर्वांगीण सामाजिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसने उपभोग को नियंत्रित करने की सलाह दी थी. अपनी पुस्तक ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मूलतत्व’ (Elements of Political Economy) में उपभोग को व्याख्यायित करते हुए मिल लिखता है कि—

’उपभोग के दो चेहरे होते हैं: उत्पादक एवं अनुत्पादक. उत्पादक उपभोग से उसका अभिप्राय ऐसे उपभोग से था जो मूलतः उत्पादक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निवेश के रूप में किया जाता है. इसमें वह सब आ जाता है जो किसी उद्यमी द्वारा, किसी वस्तु के उत्पादन को कार्यरूप देने के लिए किया जाता है. इसमें श्रम, मशीनरी, औजार, कच्चा माल और भवन, जहां पर उत्पादन कार्य संपन्न किया जाना है, यहां तक कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उत्पादकता को बढ़ाने में शामिल मवेशी भी सम्मिलित हैं. इनके अतिरिक्त कच्चे माल भी इनमें उत्पादक उपभोग का ही हिस्सा है.’

दूसरी ओर अनुत्पादक उपभोग में मजदूरी तथा अन्य ऐसे सभी उपभोग सम्मिलित हैं जिनका उत्पादकता से कोई संबंध नहीं है. साफ है कि पूंजीपति द्वारा किया जाने वाला निवेश बहुआयामी होता है, उसके लिए उद्यमी को अधिक खतरा भी उठाना पड़ता है. इस कारण उसका लाभ भी अधिक, उसके द्वारा लगाई गई पूंजी के अनुपात में बढ़ता चला जाता है. मजदूर द्वारा किया गया निवेश जिसमें सामान्यतः उसका श्रम ही शामिल है, इसलिए अनुत्पादक वर्ग में सम्मिलित है, क्योंकि उसमें सिवाय श्रम कौशल के और कुछ नहीं है.

जेम्स मिल का मानना था कि वितरण तथा विनिमय माध्यमिक क्रियाएं हैं; जिनके द्वारा उत्पाद को उसके उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता है. विनिमय अपने आप में लक्ष्य नहीं है, उसका कर्तव्य उत्पाद-विशेष को, समय रहते उपभोक्ता को उपलब्ध पहुंचाना है. ताकि सतत उपभोग के द्वारा वह अपनी मांग को बनाए रख सके. उपभोक्ता को उत्पाद का सीधा संबंध उसके उपभोग से होता है. कोई भी व्यक्ति किसी वस्तु का निर्माण या अर्जन इसलिए करता है, क्योंकि वह उसकी कामना करता है. जैसे ही वस्तु विशेष के प्रति उसकी कामनाएं तृप्त हो जाती हैं; फिर उस वस्तु के निर्माण का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता. बावजूद इसके यदि कोई व्यक्ति अपनी अपेक्षा से अधिक वस्तु का उत्पादन करने में सफल है और वैसी कामना भी रखता है, तो इसका सीधा-सा अभिप्राय है कि वह कुछ अन्य वस्तुओं की कामना करता हैं जिन्हें वह अपने उत्पाद के बदले प्राप्त करना चाहता है. यदि वह किसी ऐसी वस्तु का उत्पादन करता है जो उसकी निजी कामनाओं से बाहर है अथवा जिसकी तात्कालिक आवश्यकता उसको अपेक्षाकृत कम है, तो इसका आशय होगा कि वह ऐच्छिक वस्तु की अपेक्षा उस वस्तु का उत्पादन एवं विपणन अधिक सफलतापूर्वक कर सकता है.

जेम्स मिल की पुस्तक ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मूलतत्व’ एक तरह से रिकार्डो की विचारधारा का ही विस्तार थी. इस पुस्तक में मिल ने जहां एक ओर बैंथम के सुखवाद की नई व्याख्या करते हुए उसे लोकप्रिय बनाने में सफलता प्राप्त ही, वहीं रिकार्डो की उत्पादकता संबंधी विचारधारा को भी आगे बढ़ाने का काम किया. यह पुस्तक एक तरह से इन दोनों के सिद्धांतों का ही प्रस्तुतीकरण है. यह बताना भी शायद अप्रासंगिक न हो कि जेम्स मिल व्यक्तिगत रूप से बैंथम के अपेक्षाकृत अधिक निकट था. मिल और उसका परिवार वर्षों तक बैंथम के किरायेदार रह चुके थे. यही नहीं बैंथम ने जेम्स मिल के पुत्र जान स्टुअर्ट मिल की शिक्षा का भी प्रबंध किया था.

बैंथम की विचारधारा से प्रभावित होकर मिल ने ‘वेस्टमिनिस्टिर रिव्यू’ नामक अंगे्रजी पत्रिका में कई लेख लेख लिखे. मिल का सबसे मौलिक काम लोकतंत्र तथा नागरिक अधिकारों को लेकर लिखे गए उसके लेखों में देखने को मिलता है. उसका मानना था कि नागरिकों को राजनीतिक गतिविधियों में अधिक से अधिक हिस्सा लेना चाहिए, ताकि उनमें अपने अधिकारों को लेकर अधिक जागरूकता आए. 1820 में लिखे गए अपने एक लेख में मिल ने नागरिक अधिकारों का पक्ष लेते हुए उन्हें न केवल प्राकृतिक अधिकारों के निकट बताया, बल्कि उल्लेख किया कि मानवमात्र के कल्याण तथा उससे अधिकतम सुख पहुंचाने के लिए भी लोकतंत्र एवं जनआधिकारिता अनिवार्य है.

यह बात भी ध्यान में रखने की है कि मिल आर्थिक मामलों में सरकार के कम से कम दखल का पक्षधर था. शिक्षा के प्रसार-प्रसार की अनिवार्यता को लेकर लिखे गए अपने लेखों में मिल ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार को सरकार के अतिमहत्त्वपूर्ण दायित्व के रूप में स्वीकार किया. वह शिक्षा को बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए सुलभ बनाना चाहता था. वा॓ल्स के अनुसार मिल ने एक यादगार और विशिष्ट लेख लिखा था, जिसमें उसने शिक्षा पर जोर देते हुए लिखा था कि—

‘शिक्षा केवल पादरियों के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए पूरी तरह सुलभ होनी चाहिए.’

जनसंख्या के सवाल पर भी उसके विचार बड़े स्पष्ट थे. उसका मानना था कि विकास में नैरंतर्य बनाए रखने के लिए जनसंख्या के साथ संसाधनों में आनुपातिक वृद्धि भी अनिवार्य है, अन्यथा यह लोगों की आय पर नकारात्मक असर डालती है. संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जेम्स मिल ने अपने विचारों को बड़ी ईमानदारी से अभिव्यक्त किया है. वह राजनीति और अर्थव्यवस्था के कल्याणकारी रूप का समर्थक था. उसने अनावश्यक कराधान के लिए सरकार की आलोचना की है.

मिल के अनुसार सरकार को चाहिए कि वह कराधान, विशेषकर भूमि और श्रमसंबधी नियम बनाते समय, जनसामान्य की कठिनाइयों और क्षमताओं का ध्यान रखे. इस तरह उसने कल्याणकारी अर्थनीति का समर्थन किया है. मिल का सारा लेखन इसी मान्यता के लिए समर्पित है. उसने शिक्षा, लोकतंत्र, उद्योगनीति, जनअधिकारिता को आगे ले जाने का महत्त्वपूर्ण दायित्व वहन किया था.  इन्हीं कारणों से मिल की गिनती अपने समय के सबसे मेधावी एवं मौलिक विचारकों में होती है.

जेम्स मिल के विचारों को आगे चलकर उसके पुत्र जा॓न स्टुअर्ट मिल ने विस्तार दिया. हालांकि उसके आलोचकों में यह मानने वाले भी कम नहीं हैं, जिनके अनुसार मिल ने अपनी ओर से कोई नया सिद्धांत प्रस्तुत नहीं किया. उसका समस्त चिंतन बैंथम और रिकार्डो की विचारों का ही विस्तार है. यह भी मिल की प्रतिभा का ही परिणाम था का कि एक बेहद साधारण लोगों के बीच से उठकर उसने इंग्लैड की तात्कालिक राजनीति और बुद्धिजीवियों में अपने लिए सम्मानित स्थान बनाने में सफलता प्राप्त की थी.

© ओमप्रकाश कश्यप

जैरेमी बैंथम : सुखवादी विचारक

[सुख न तो पाप है, न अभिशाप. न सुख की कामना करना अपराधकर्म की श्रेणी में आता है. जनसाधारण से लेकर योगी और तपस्वी तक सभी सुख की कामना करते हैं. लेकिन कुछ लोग हैं कि वांछा अधिकतम सुख की करते हैं, मगर सीधेसीधे उसका पक्ष लेते हुए कतराते हैं. उनक्स द्वारा यह धारणा जनसाधारण के दिलोदिमाग में भर दी जाती है कि सुख माया का प्रपंच है. वे आत्मा को इस असार संसार में उलझाए रखते हैं. मुक्ति यदि चाहिए तो मनुष्य को सांसारिक सुखों से तौबा कर लेनी चाहिए. इस विचार के चलते कुछ लोग इस संसार से भागते रहते हैं. ऐसा प्रायः हर समाज, हरेक धर्म में हैं. कुछ ऐसे संप्रदाय भी हुए हैं, जो जानबूझकर इस शरीर को इसलिए कष्ट देते थे, ताकि मृत्यु के बाद अंतहीन सुख प्राप्त कर सकें. संसार से भागने, स्वर्ग का सपना देखने वालों, सुख के प्रति अपराधबोध रखने वालों को मृत्यु पश्चात सुख मिला या नहीं कौन जाने, मगर वे लोग इसके बहाने आमजन को भरमाते जरूर रहे. बैंथम ने सुख और उसकी कामना को नैतिककर्म माना और उसको लेकर सहस्राब्दियों से मानवमन में पलने वाली कुंठाओं को दूर छिटकने की बात कही. इसलिए सुखवादी विचारकों में उसका स्थान अग्रणी है. —ओमप्रकाश कश्यप ]

ह अपने समय का महान विद्वान, सुखवादी विचारधारा का प्रवर्तक दार्शनिक, मौलिक विचारक तथा उपयोगितावाद का समर्थक राजनीतिज्ञ था. कानून का प्रतिभाशाली विद्यार्थी होते हुए भी उसने कभी वकालत नहीं की. न्यायालय में व्याप्त भ्रष्टाचार को देख उसका मन वहां से ऐसा उचटा कि फिर कभी उस ओर झांका तक नहीं. सिर्फ अपनी कलम पर भरोसा किया और उसी के बल पर जीता रहा. उसने अपना अधिकांश समय प्रचलित राजनीतिक विचारधारा तथा कानून की आलोचनासमीक्षा करने में लगाया. उसने विपुल मात्रा में लेखन किया, किंतु उसके मन में प्रकाशन के प्रति सतत उदासीनता बनी रही. इसीलिए महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद उसके विचारों को उसके जीवन में वह मान्यता नहीं मिल सकी, जिसका वह अधिकारी था. लेकिन उसके विचारों की मौलिकता और स्पष्टवदिता ने लोगों को प्रभावित किया और समय आने पर उसको व्यापक प्रतिष्ठा भी मिली. बैंथम को विद्वानों ने उसको नैतिक दर्शनशास्त्र का महान व्याख्याता स्वीकार किया. तथापि उसके विचार केवल सैद्धांतिक बहसों तक सीमित नहीं थे. तत्कालीन धार्मिकसामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध उसने सुख की कामना को मनुष्य के नैतिक कर्तव्यों में शुमार किया. इसपर धार्मिक आडंबरवादी उसके पीछे पड़ गए. अपने विचारों के लिए बैंथम को जोरदार आलोचना का सामना करना पड़ा. बिना घबराए वह डटा रहा. धीरेधीरे लोगों पर उसके विचारों का असर पड़ने लगा. आज दुनियाभर के अनेक विद्वान, शोधार्थी उसके आर्थिक सिद्धांतों के विश्लेषण में लगे हुए हैं. यदि किसी विद्वान के विचारों की प्रासंगिकता शताब्दियों बाद भी बनी रहे तो मानना चाहिए कि वह अद्वितीय था, यह निःसंदेह उसकी महानता का प्रतीक है. उसने विद्वानों की पीढ़ियों को न केवल प्रभावित किया, बल्कि उनकी कई पीढ़ियां भी तैयार की हैं. बैंथम की विलक्षणता का भी कोई ठिकाना नहीं. वह मरा तो दसियों हजार पृष्ठों की हस्तलिखित सामग्री छोड़कर, जिसमें उसकी महत्त्वपूर्ण विवेचनाएं, दर्शनचिंतन और ज्ञान भरा हुआ था.

जैरेमी बैंथम नाम के उस महान विचारक और दार्शनिक का जन्म 15, फरवरी सन 1748 को लंदन के हाऊंडिच(Houndsditch) नामक स्थान पर हुआ था. पश्चिमी देशों के इतिहास में वह समय बहुत ही क्रांतिकारी था. अठारहवीं शताब्दी के मध्याह्न में, उन दिनों जब पूरे यूरोप में वैचारिक क्रांति का माहौल था. पूरा समाज परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था, जा॓न ला॓क, डेविड ह्यूम, रेने देकार्ते, रूसो, जोसेफ प्रस्टीले तथा एडम स्मिथ, लियोनार्दो दा विंसी जैसे विद्वानों की मेधा से पूरापूरा यूरोप आभामंडित था. तकनीकी क्रांति और तज्जनित औद्योगिक विकास के कारण समाज में मध्यवर्ग का उदय उस जमाने की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, जिसने समाज में आर्थिक विषमता की खाई को और भी चैड़ा किया था. औद्योगिकीकरण के कारण समाज में व्यापक बदलाव आए थे. उसने एक और तो शिल्पकारों को परंपरागत आधार पर वर्षों से समाज की सेवा करते आए थे, बेघरबेरोजगार बनाने जैसा धतकर्म किया था. दूसरी ओर उसने समाज में एक ऐसे वर्ग को भी जन्म दिया था, जो अपने बुद्धिसामथ्र्य उपयोग करते हुए तेजी से अपनी पहचान बनाने को उन्मुख था. वह पूंजीपतियों और आमजनता के बीच एक कड़ी था. उस मध्यवर्ग की आंखों में सपने थे. मध्यवर्गियों का एक अंश पूंजीपति संस्थानों के समर्थन में लगे रहकर उनका अधिक से अधिक लाभ उठा लेना चाहता था, जबकि उनका दूसरा हिस्सा कतिपय बुद्धिजीवियों एवं आंदोलनकारियों का था, जिन्हें वैचारिक क्रांति की हवा ने पहली बार आत्मनिर्णय एवं अभिव्यक्ति का अवसर दिया था. वही वर्ग व्यवस्था में बदलाव की आकांक्षा के साथ एकजुट होकर आंदोलनरत था. बैंथम के पिता ब्रिटिश संसद के सदस्य थे. अपनी प्रारंभिक शिक्षा उसने इंग्लैंड के वेस्टमिनिस्टर स्कूल से की. बाल्यावस्था में ही पिता को बेटे के मेधावी होने की झलक उस समय देखने को मिली जब उन्होंने बालक बैंथम को इंग्लैंड के इतिहास के भारीभारी ग्रंथों में डूबे हुए देखा. मात्र तीन वर्ष की अवस्था में बैंथम की शिक्षा आरंभ हो गई. बारह वर्ष की अवस्था में उसको आगे की शिक्षा के लिए आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय भेज दिया गया, जहां से उसने 1763 ईस्वी में विधिस्नातक एवं 1766 ईस्वी में उसने परास्नातक की उपाधि प्राप्त की. 1772 ईस्वी में बैंथम को उच्च न्यायालय में वकालत करने का निमंत्रण मिला. बैंथम उस अवसर का लाभ उठाने के लिए पहुंच गया. लेकिन तभी एक घटना ऐसी हो गई, जिसने बैंथम को न्यायालय में पलने वाले भ्रष्टाचार से परिचित करा दिया. हुआ यह था कि बैंथम को उच्च न्यायाधीश की ओर से एक निमंत्रण प्राप्त हुआ. बैंथम मिलने पहुंचा तो उसने अनेक प्रकार की अड़चनों से गुजरना पड़ा, जिसका तरुण बैंथम पर बहुत अनुचित प्रभाव पड़ा. उसने इंग्लैंड के न्यायिक तंत्र से नफरत हो गई. उसी के पश्चात बैंथम ने भविष्य में कभी वकालत न करने की प्रतिज्ञा ले ली तथा अपने जीवन के शेष वर्ष उसने केवल अध्ययन और लेखन के सहारे बिताने का निश्चय किया. बैंथम के लंबे जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मोड़ उस समय आया, जब वे जेम्स मिल से मिलने के लिए पहुंचा. उससे मिलकर बैंथम उससे बहुत प्रभावित हुआ. मिल से घंटों बतियाने उसने उसने समाजवाद, स्त्री समानता, चर्च तथा राज्य के प्रथक्कीकरण, तलाक, मुक्त व्यापार, गुलामी प्रथा के उन्मूलन आदि खासमखास मुद्दों पर अपने विचार रखे. विचारों की नवीनता एवं मौलिकता के कारण समाज में उसे पर्याप्त ख्याति मिली. हालांकि अपने जीवन में बैंथम को पर्याप्त लोकप्रियता हासिल नहीं हो सकी, तथापि यह भी सच है कि हमेशा कागजकलम के साथ जीने वाले जैरेमी बैंथम नामक उस अनोखे प्रतिभावान शख्स ने, शब्दों और विचारों की दुनिया के अलावा किसी और संसार की कभी कामना ही नहीं की थी. जबकि उसके बाद के विद्वानों में से एकाध को छोड़कर सभी ने भौतिक सुखों को जीवन का ध्येय मानते हुए अपनी विचारणा को उसी पर केंद्रित रखा. मृत्यु के करीब पौने दो सौ वर्ष पश्चात भी बैंथम के कार्य का विधिवत विश्लेषणमूल्यांकन नहीं हो पाने का एक खासमखास कारण यह भी है. इसके बावजूद बैंथम के विचारों को जितनी मान्यता एवं प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी उसके पीछे, उसके समर्थक विद्वान जाॅन स्टुअर्ट मिल तथा उसके सहयोगियों मानवेतिहास में अपना नाम लिखा चुके हैं. उन्हीं के कारण यह संभव हो पाया है. ध्यातव्य है कि जान स्टुअर्ट मिल, जा॓न आ॓स्टिन आदि ने बैंथम को अपना गुरु मानते हुए उसके चिंतन एवं दार्शनिकसाहित्यिक स्थापनाओं की नए सिरे से व्याख्या की है. यहां तक कि बैंथम को मानसम्मान दिलाने के पीछे भी उन दोनों स्पष्ट भूमिका रही है. बैंथम की मां धार्मिक विचारों की महिला थीं और पिता अपना काम दिमाग से संभालते थे. इस प्रकार बैंथम का पिता के तर्कों और मां के भक्तिभाव से भरे वातावरण में बीता. उसने अपनी पढ़ाई लैटिन से प्रारंभ की. जिन दिनों बैंथम का जन्म हुआ, उसके परिवार पर खुशहाली का साम्राज्य था. 1760 में बैंथम ने क्वीनस् कालिज, आ॓क्सफोर्ड में प्रवेश लिया. वहां से 1763 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात उसने आगे कानून की पढ़ाई के लिए लिंकनइन विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त कर लिया. अध्ययनकाल से ही बैंथम की प्रतिभा का प्रस्फुटन होने लगा था. उसी दौरान उसने पत्रपत्रिकाओं में कई लेख लिखे, जिन्होंने विद्वानों का ध्यान अपनी ओर खींचा. सन 1766 में कानून की स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद बैंथम ने लिखनापढ़ना प्रारंभ कर दिया. लेखन कार्य को आगे बढाने के लिए बैंथम ने कभी किसी की परवाह न की. उसपर लेखन का जैसे जूनून सवार रहता था. करीब दसबारह घंटे रोज नियमित रूप से लिखना और पढ़ना. उसने विपुल मात्रा में लिखा, महत्त्वपूर्ण लिखा, बावजूद इसके यह भी सचाई है कि उसने अपने लिखे को प्रकाशित कराने पर बहुत कम ध्यान दिया. उसके द्वारा लिखे गए कागजों का ढेर लगता गया. उसकी कृतियां मृत्यु के पश्चात ही प्रकाशित हो सकीं. बैंथम को जो सम्मान आज प्राप्त है वह जेम्स मिल जैसे मित्र और जा॓न स्टुअर्ट मिल जैसे उसके शिष्यों के कारण ही संभव हो सका है. बैंथम की विश्लेषण क्षमता बेजोड़ थी. उसका अधिकांश कार्य कानून और राजनीति के विवेचना के क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. जिसमें उसमें मनुष्य के कल्याण के राज्य और कानून को अधिकतम नैतिक बनाने के लिए अनेक सुझाव दिए हैं. उसकी निर्णय लेने की शक्ति का भी अपने समय मे कोई मुकाबला नहीं है. सन 1781 के बाद वह और अर्ल मिलकर काम करने लगे. इसी बीच उनका संपर्क कई समकालीन विद्वानों तथा दार्शनिकों से हुआ. सन 1785 में वह रूस चला गया जहां उसका भाई काम करता था. वहां उसने अपने लेखन संबंधी कार्य को और अघिक तत्परता से करना प्रारंभ कर दिया. रूस में उसने अपने कुछ साथियों के साथ कारागार का अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया. उसका मानना था कि कैदियों को खुले स्थान पर रखा जाए. उनपर अदृश्य पेहरा बैठाया जाए. प्रकट रूप में वे अपने ही अनुशासन में हों जिससे उन्हें आत्मवलोकन का अवसर मिल सके. इससे वे अपने कार्य के अच्छेबुरे पर विचार कर सकेंगे. बैंथम के इस प्रयास की लोगों ने हंसी भी उड़ाई थी. कुछ ने उसको सनकी कहा तो कुछ ने पागल बताया. तो भी आलोचनाओं से प्रभावित हुए बगैर वह निरंतर अपना कार्य करता रहा. 1788 में वह वापस इंग्लैड लौट आया और स्वयं को पूरी तरह अध्ययन और लेखन में डुबो दिया. उसने लंदन विश्वविद्यालय की स्थापना में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया. 1826 में जब लंदन विश्वविद्यालय का॓लेज [University College London (UCL)] की स्थापना हुई उस समय वह 78 वर्ष का वृद्ध हो चुका था. उससे पहले जा॓न स्टुअर्ट मिल के साथ मिलकर 1823 में वह साप्ताहिक ‘दि वेस्टमिनिस्टिन रिव्यू’ की शुरुआत कर चुका था. इस साप्ताहिक ने इंग्लैंड और फ्रांस के वौद्धिक हलकों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने में कामयाबी प्राप्त की थी. बैंथम की तुलना विलियम गुडविन से की जाती है. दोनों को परस्पर पूरक माना जाता है. दोनों ने अहिंसक सामाजिक क्रांति पर जोर दिया. लेकिन दोनों की कार्यपद्धति में अंतर था. बैंथम ने क्रांति के लिए वैधानिक सुधारों पर जोर दिया है तो गुडविन तर्क के आधार पर क्रांति के औचित्य को सिद्ध करना चाहता था. अपनी सन 1776 में प्रकाशित पुस्तक ‘सरकार की रहस्यनीति पर कुछ विचार’(Fragment on Government) में बैंथम ने ब्लैकस्टोन की पुस्तक ‘का॓मेंट्रीस आ॓न ला॓ आ॓फ इंग्लैंड’(Commentaries on the Laws of England) की प्राकृतिक अधिकार की अवधारणा संबंधी समर्थननीति की आलोचना की है. मगर बैंथम की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक जिसने उसको मौलिक विचारकों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है, 1780 में प्रकाशित होने वाली उसकी पुस्तक ‘नैतिकता एवं विधान के सिद्धांत: एक परिचय’(Principles of Morals and Legislation) थी, जिसने उसको सहसा प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया. इस पुस्तक में उसने प्राणिमात्र को सुख पहुंचाना मानव जीवन का नैतिक उद्देश्य माना है. पुस्तक में बैंथम लिखता है कि प्रकृति ने मनुष्यता को दो स्वयंभू स्वामियों के नियंत्रण में सौंपा हुआ है. ये हैंपीड़ा और आनंद. यह हमारे ऊपर है कि हम इन दोनों में से किसका चयन करते है; या हमें इनमें से किसका चयन करना चाहिए. हमारे एक ओर सही और गलत के मानक हैं; तो दूसरी ओर कारणों और कारकों को परस्पर जकड़े हुए एक लंबी शृंखला है. वे हमारे प्रत्येक कार्य पर, हमारे कहन पर, हमारे सोचविचार पर, यहां तक कि इस अधीनता को उखाड़ फेंकने के लिए हम जो भी प्रयास करते हैं, उनपर भी नियंत्रण रखे हुए हैं. हमारे कार्य और आचरण इसी को और पुख्ता तथा ताकतवर बनाते हैं.’

बैंथम ने नैतिकता को सुख के साथ जोड़ा गया है. इसी पुस्तक में बैंथम के चिंतन का मूल सिद्धांत ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख’ लोगों के सामने आया जिसने बैंथम को सुखवादी विचारकों में अग्रणी बना दिया. उसने अपने लेखन द्वारा सभी प्रकार के अतिवादियों का विरोध किया है. जीवन के अंतिम वर्षों में उसने लंदन विश्वविद्यालय की स्थापना की. सन 1832 में ही राजनीतिक सुधार की कामना कोे लेकर दो बिल संसद में प्रस्तुत किए गए थे. जिनपर बैंथम के चिंतन की छाप थी. 1832 में 6 जून को बैंथम का निधन हो गया. मृत्यु के समय उसने लगभग पचास लाख शब्दों की लिखित पांडुलिपियां छोड़ी थीं. बैंथम की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उसकी देह को लकड़ी के एक ताबूत में लंदन विश्वविद्यालय में सुरक्षित रखा गया है. जिस समय बैंथम के शरीर को संरक्षित करने का काम चल रहा था, उसका सिर बुरी तरह क्षतविक्षत हो गया था. उसके स्थान पर विशेष रूप से निर्मित प्लास्टिक से बने सिर के साथ उसकी देह को परिषद की बैठक या अन्य महत्त्वपूर्ण अवसरों पर प्रदर्शन के लिए बाहर लाया जाता है. बैठक में बैंथम की प्रतीकात्मक उपस्थिति मानी जाती है, जो, ‘मौजूद है मगर मतदान में हिस्सा नहीं लेता.’ कुछ दिनों तक कृत्रिम सिर के साथसाथ असली सिर को भी प्रदर्शन के लिए लाया जाता रहा. लेकिन विद्यार्थियों की लगातार छेड़छाड़ के कारण बाद में उसको वहां से हटाकर सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया. विचारधारा बैंथम पर वाल्तेयर, डेविड ह्यूम, डिडोराट, हेलिवियस के अतिरिक्त जा॓न ला॓क, जेम्स मिल तथा रूसो के विचारों का भी प्रभाव पड़ा था. वह पहला संभवतः सबसे बड़ा तत्ववादी दार्शनिक था, जिसका मानना था कि मनुष्य का पहला लक्ष्य सुख प्राप्त करना है और सुख की कामना करना कहीं भी अनैतिक व्यवहार नहीं हैं. बैंथम के इस विचार की गइराई के लिए हम प्राचीन दर्शनपरंपरा को देख सकते हैं. भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों की परंपरा में त्याग और बलिदान को श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों में सम्मिलित किया गया है. प्राचीन यूनान में पाइथागोरेस के अनुयायी मोक्ष की कामना में शरीर को कष्ट देते रहते थे. आज भी भारत में नाथ संप्रदाय की कुछ प्रवृत्तियां ऐसी हैं, जो सुख के निषेध पर जोर देती हैं. त्याग और तपश्चर्य उनकी दृष्टि में मुक्ति के प्रथम सोपान हैं. ईसाई धर्म भी त्याग और संयम को जीवन मोक्ष की अनिवार्यता मानता है. आलोचना की परवाह न करते हुए बैंथम ने सुख को मानव जीवन का लक्ष्य मानते हुए उसको मनुष्य के प्राथमिक कर्तव्यों में शामिल करने की अनुशंसा की थी. उसके सुखवाद (Utilitarianism) के विचार को आगे चलकर जा॓न स्टुअर्ट मिल ने विस्तार दिया. सुखवाद की अवधारणा के अनुसार किसी भी कार्य का औचित्य इस तथ्य से आंका जा सकता है कि वह कितने व्यक्तियों को अधिक से अधिक कितना सुख प्रदान कर सकता है. उसका विचार था कि मनुष्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही स्तर पर सुख की कामना करते हुए दुःख के प्रभाव से बचना चाहता है. इसलिए नैतिक कर्तव्य वही है जो अधिक से अधिक लोगों को अधिकतम सुखी बना सके, उनकी आकांक्षाओं का मूर्तिकरण कर सके और उनकी कामनाओं को तृप्ति प्रदान कर सके. बैंथम ने कानून को मानवीय एवं सुलभ बनाने पर भी जोर दिया है. उसका मानना था कि कानून को लिंग एवं हैसियत से परे रहकर समतावादी आचरण करना चाहिए. वह कानून को बल एवं प्रतिष्ठा का प्रतीक बनाने के बजाए उसके मानवीय पक्ष को उभारने के प्रति आग्रहशील था. उसने स्वतंत्रता को व्यापक संदर्भों में देखा है. यहां तक कि उसने समलिंगी कामसंबंधों को भी अनुमेय बनाने पर जोर दिया है. अपने लेख Offences against One’s Self: Paederasty में बैंथम समलिंगी कामसंबंधों की ऐतिहासिकता की ओर इशारा करते हुए उन्हें कानूनी मान्यता दिए जाने की मांग की थी. हालांकि बैंथम के जीवनकाल में विरोध की संभावना को देखते हुए कोई भी व्यक्ति इस लेख को छापने के लिए तैयार नहीं हुआ था. पहली बार यह लेख 1978 में ‘जनरल आ॓फ होमोसेक्युअल्टी’ में प्रकाशित हो सका. बैंथम जीवन में नैतिकता एवं उच्चतम मानवीय मूल्यों के प्रति बहुत समर्पित था. उसकी संवेदनशीलता केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं थी. उसने पशुओं के प्रति करुणा दर्शाने का विचार रखा. उसको पशुओं के अधिकारों के सबसे पहले समर्थकों में से माना जाता है. प्राणियों के प्रति दया एवं करुणा की मांग करते हुए उसने तर्क दिया था कि प्रताड़ित किए जाने पर उन्हें भी उसी दर्द की अनुभूति होती है, जैसी कि हम मनुष्यों को. उसने जोर देकर कहा कि—

एक ऐसा दिन भी आ सकता है जब दुनिया के सारे पशु जमा होकर अपने अधिकारों की मांग करेंगे, जो आगे फिर कभी पद या कानून के दुरुपयोग, बलप्रयोग द्वारा उनसे वापस नहीं लिए जा सकेंगे.’

बैंथम का कहना था कि दूसरों को होने वाली परेशानी न कि उसके कारण, ही उनके प्रति हमारे व्यवहार को तय करने का मानदंड होना चाहिए. यदि केवल वस्तुनिष्ठता ही हमारे फैसलों के मापदंड बनी तो कमजोर प्राणियों यहां तक कि विकलांग और मासूम बच्चों के साथ भी, निर्जीव वस्तुओं की भांति आचरण किया जाने लगेगा. सभी के प्रति समता भरा आचरण, यहां तक कि पशुओं के प्रति भी करुणाशील होना जनसामान्य की आकांक्षाओं के बहुत अनुकूल पड़ता है. बैंथम ने अर्थशास्त्रीय गवेषणाओं को लेकर अलग से तो कोई पुस्तक नहीं लिखी. लेकिन वह अपने समय में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में हो रहे कार्य के प्रति चैतन्य था. एडम स्मिथ की चर्चित कृति ‘वैल्थ आ॓फ नेशनस्’ का प्रकाशन बैंथम के जीवनकाल में हो चुका था. उसका मानना था कि पूंजी का उपयोग इस तरह किया जाना चाहिए कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार देकर उनकी सुखवृद्धि में सहायक बन सके. सरकार के कर्तव्यों की व्याख्या करते हुए उसने लिखा कि

सरकार का कर्तव्य दंड और पुरस्कार की व्यवस्था के सहारे समाज के सुख में निरंतर वृद्धि करते रहना है.’

ध्यान रहे कि बैंथम की सुख की अवधारणा केवल भोग तक सीमित नहीं थी, न वह सुख को विशिष्ट वर्गों तक सीमित रखना चाहता था. सुख को नैतिक कर्तव्य मानते हुए वह उसकी सबके लिए उपलब्धता चाहता था. मनुष्य की यह स्वाभाविक कमजोरी होती है कि वह उन सभी चीजों को अपनी प्रस्तावित योजनाओं में समेट लेना चाहता है, जिन्हें वह अपनी सुखसमृद्धि और बेहतर भविष्य के लिए अनिवार्य मानता है. मनुष्य की सुख की वांछा उसकी सामाजिक स्थिति से नियंत्रित होती है. लेकिन भूख पर वैसा कोई अनुशासन लागू नहीं होता. वह सबसे पहले नैतिकता को ही दबोचती है. इसलिए नैतिक बने रहने के लिए भूख से दोचार होना मानवजीवन की कड़वी सचाई है. अपने उपयोगिता के सिद्धांत के माध्यम से बैंथम ने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि

उपयोगिता से वह सिद्धांत अभिप्रेत है जो किसी कार्य को इस आधार पर स्वीकार अथवा अस्वीकार करता है, कि उसके माध्यम से परिवीक्षाधीन व्यक्ति की प्रसन्नता में कितनी वृद्धि अथवा कमी हुई है. दूसरे शब्दों में वह मनुष्य के सुख में कितना विकास अथवा हृास लाता है.’

बैंथम का कहना था कि किसी वस्तु का उपयोगी होना ही उसका श्रेष्ठ होना है. उपयोग का आशय किसी वस्तु आदि की प्राप्ति पर मिलने वाले सुख से है. दूसरे शब्दों में श्रेष्ठ कार्य वह है जो अधिकतम व्यक्तियों के लिए अधिकतम सुख का सृजन करता हो, इस संबंध में बैंथम ने सूत्रवाक्य दिया थाअधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख, जो चलकर सुखवादी विचारकों के लिए मूलमंत्र बना. इसी सिद्धांत के आधार पर बैंथम ने नैतिकता को परिभाषित करने का प्रयास किया है. बैंथम के अनुसार:नैतिकता का अभिप्राय उस कला से है जो मनुष्य की गतिविधियों को इस प्रकार निर्देशित करती है, ताकि उससे अधिक से अधिक मात्रा में सुख की व्युत्पत्ति हो सके.’ बहुमुखी प्रतिभा के धनी बैंथम ने अपना पूरा जीवन लेखन को समर्पित कर दिया था. उसने बेशुमार साहित्य लिखा, जिसकी मौलिकता असंद्धिग्ध है. उसने न केवल कानूनी तथा सामाजिक सुधारों का समर्थन किया, बल्कि निरंतर एक समर्थ एवं कर्मठ कार्यकर्ता की भांति उसके प्रसार में लगा रहा, भले ही उसे अपने समय में वह मानसम्मान एवं प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी जिसका कि वह अधिकारी था. और बाद के वर्षों में भी उसके विचारों में मौलिकता के अभाव का आरोप विद्वतसमाज द्वारा लगाया जाता रहा. तथापि उसकी उपयोगिता एवं प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता. अगर तात्कालिक समय के अनुसार बैंथम का आकलन करें तो उसको निर्विवाद उसको एक क्रांतिकारी विचारक पाते हैं. उस समय तक समाज पर सामंतवादी संस्कार हावी थे तथा यह माना जाता था कि समाज किसी भी व्यक्ति से ऊपर है, बैंथम ने सभी के कल्याण एवं सुख की कामना को दर्शन के क्षेत्र में लाकर उसको अमूर्तन से मूर्त बनाने का कार्य किया. धार्मिक और नैतिकतावादियों की परवाह किए बगैर उसने जोर देकर कहा कि सुख प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है और समाज के प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य यह है कि वह अपने कर्तव्यों का निर्धारण दूसरे व्यक्ति के सुख को आधार मानकर करे. बैंथम ने माना—

चार अलगअलग स्रोत हैं जहां से सुख और दुःख की सतत आवृत्ति होती है. इन स्रोतों को भौतिक, राजनीतिक, धर्मिक एवं नैतिक वर्ग में बांटा जा सकता है. बावजूद इसके सुख एवं दुःख (प्रसन्नता एवं कष्ट) दो ऐसे प्रमुख कारक हैं, जो इन चारों ही से संबंधित हैं तथा किसी भी नियम को प्रभावित करने का पूरापूरा सामर्थ्य रखते हैं.’

बैंथम ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसका सुखवाद का सिद्धांत पूरी तरह मौलिक नहीं था. इस संबंध में वह जोसेफ प्रस्टीले जो सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक था, से प्रभावित था. सुखवाद का मूल विचार वस्तुतः इटली के दार्शनिक, विद्वान केसर मार्किव्स आ॓फ बकारिया(Cesare, Marquis of Beccaria or the Marchese de Beccaria-Bonesana) का था. इस संबंध में बैंथम ने स्वयं भी लिखा है कि

प्रस्टीले वह पहला इंसान था जिसने मेरे होठों को इस पवित्र शब्द को पुकारना सिखाया: कि अधिकतम मनुष्यों का अधिकतम सुख ही न्याय एवं नैतिकता की सच्ची आधारशिला है.’

मुद्रा से संबंधित बैंथम के विचार अपने समय के अर्थशास्त्रियों से काफी अलग थे. सुख और उपभोग को प्रधानता देने के बावजूद बैंथम मुद्रा के प्रसार की नीति का समर्थक था. उसका मानना था कि इससे रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा. वह बचत को भी आवश्यक मानता था तथा बचत तथा निवेश के अंर्तसंबंध की जानकारी भी उसको थी. इस संबंध में अपने विचारों का विस्तृत विवेचन उसने अपने निबंधों एवं पुस्तकों में किया है. स्पीगेल के अनुसार बैंथम ने लिखा है कि—

आनंद एवं पीड़ा का स्तरीकरणः उनकी मूल्यवत्ता या विस्तार माने उनके आवेग, स्थायित्व, अवधि के आधार पर किया जा सकता है. उसका अभिप्राय आनंद अथवा पीड़ा की अधिकता और न्यूनता से था, उसके अनुसार उपभोक्ता आर्थिकी को आगे बढ़ाने लिए तथा कल्याण अर्थशास्त्र के विचार को नया स्वरूप देने के लिए यही दोनों जिम्मेदार हैं.’

बैंथम के चिंतन की महानता इससे भी जाहिर होती है कि आज से दो शताब्दी से भी पहले उसने स्त्री स्वतंत्रता एवं बच्चों के अधिकार के पक्ष में आवाज उठाई थी. स्त्री आधिकारिता का पक्ष लेते हुए उसने तलाक एवं पुनर्विवाह का समर्थन किया है. वह दासता की समाप्ति के भी पक्ष में था तथा व्यापार को मुक्त करने का हामी. यहां तक कि उस समय जब लोकतंत्र का पर्याप्त विस्तार नहीं हो पाया था बैंथम का समलैंगिकता के समर्थन में उतर आना हैरान कर देता है. बैंथम के अन्य कार्यों में कैदियों को अधिक आजादी तथा जेल में उनके साथ किए जाने वाले व्यवहार के मानवीय पहलुओं को लेकर है. उसका मानना था कि कैदियों को खुले स्थान में रखा जाए तथा उनपर अदृश्य नजर रखी जानी चाहिए, ताकि उन्हें अपने कार्यों पर जिसके लिए वे सजा पा रहे हैं एकांत में विचार करने का अवसर मिल सके. उसका मानना था कि

समाज का गठन अच्छाई की उम्मीद की वजह से न होकर, बुराई के आतंक के कारण हुआ है.’

शिक्षा को लेकर बैंथम के विचार भी आधुनिक विचारधारा से मेल खाते हैं. उसका मानना था कि शिक्षा की व्यावहारिक हो तथा उसकी उपलब्धता आमजन तक होनी चाहिए. भले ही उनकी धार्मिक मान्यता कुछ भी हो. सन 1826 में जब लंदन विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, उसकी आयु 78 वर्ष थी. बैंथम के प्रभाव के कारण ही लंदन विश्वविद्यालय विश्व का पहला ऐसा संस्थान बना जहां प्रवेश पाने के लिए विद्यार्थी के धर्म, जाति अथवा राजनीतिक विचारधारा का कोई महत्त्व न था. बैंथम का सुखवाद कोरे भौतिक सुखों तक सीमित नहीं था. बल्कि उसके सुख की परिभाषा में समस्त मानवता समाहित थी. ध्यान रहे कि बैंथम के विचार ऐसे समय में आए जब चर्च समेत समस्त धार्मिक संस्थान सांसारिक सुखों की उपेक्षा का दिखावा करते हुए जनता को पारलौकिक सुखों के प्रलोभन के आधार पर लूट रहे थे. अज्ञान और अशिक्षा में डूबे लोग उन्हीं के इशारे पर एक पलायनवादी जीवन जीते आ रहे थे. ऐसे ही लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए बैंथम ने शिक्षा और समानता पर जोर दिया. समाज में व्याप्त असंतोष को देखते हुए उसने कहा कि

सामन्जस्य की भावना मनुष्य का दुर्लभ गुण है.’

हालांकि बैंथम के उपयोगितावाद की काफी आलोचना भी हुई. अपने जीवनकाल में बैंथम को पर्याप्त महत्त्व नहीं मिल पाया. बैंथम की मृत्यु के पश्चात उसके शिष्य जाॅन स्टुअर्ट मिल ने उसके सुखवाद को नए सिरे से परिभाषित किया. परिणामतः बैंथम के विचारों को भी स्वीकार्यता मिली. बैंथम के बारे में मिल ने अपने एक आलेख ‘बैंथम’ में लिखा है कि

किसी भी कसौटी अथवा मूल्यांकन के माध्यम से, यदि हमने अपना कार्य पूरी ईमानदारी एवं न्यायभावना के साथ किया है, तो हम निर्विवाद रूप से पाएंगे कि बैंथम का स्थान दुनिया के महानतम बुद्धिजीवियों एवं उद्धारकों में सर्वथा सुरक्षित है. उसका लेखन विश्व के श्रेष्ठतम व्यावहारिक चितकों की शिक्षा एवं सोच का बेहतरीन और अविभाज्य हिस्सा है. अतः हमें उसके विचारों का एक संग्रह प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाना चाहिए. ताकि वह उसके समय को जान सके अथवा उसके लाभकारी हिस्से को किसी भी रूप में अपने काम में ला सके.’

निश्चित रूप से आधुनिक विचारकों में बैंथम का स्थान बहुत ऊंचा है. उसके प्रभावस्वरूप जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने का चलन शुरू हुआ. राबर्ट ओवेन, जेम्स मिल आदि विचारकों ने बैंथम के विचारों से प्रेरणा लेकर अपने सिद्धांत गढ़े जिससे एक नई विचारधारा का प्रादुर्भाव हुआ और मानवीय चिंतन को ऐसी दिशा मिली जो कल्याण का बहुस्तरीय बंटवारा करने की पक्षधर थी.

ओमप्रकाश कश्यप

एडम स्मिथ: आधुनिक अर्थशास्त्र का निर्माता

[आधुनिक उत्पादनव्यवस्था का मंत्र ‘लेजे फेयर’ एडम स्मिथ का मौलिक विचार नहीं था, उसने तो सिर्फ इसका समर्थन किया था. यह जानने के बावजूद आर्थिक उदारीकरण और बाजारवाद के आलोचक उसको वर्तमान पूंजीवादी अराजकता के लिए जिम्मेदार मानते हैं. कतिपय यह सही भी है. लेकिन वे भूल जाते हैं कि स्मिथ ने लोगों को यह कहकर सावधान भी किया था कि पूंजीपति उत्पादन प्रक्रिया में किसी कल्याणभावना से नहीं, विशुद्ध स्वार्थपरता के कारण हिस्सा लेता है. इसलिए उसपर नजर रखने की जरूरत है. मगर अधिकांश देशों की सरकारें पूंजीपतियों पर नजर रखना तो दूर, उल्टे उनके हाथों की कठपुतली की तरह काम करती हैं. विद्वान आलोचक वस्तुस्थिति को समझे बिना ही एडम स्मिथ को कठघरे में लाने का बहाना ढूंढते रहते हैं.ओमप्रकाश कश्यप]

धुनिक अर्थशास्त्र के निर्माताओं में एडम स्मिथ (जून 5, 1723—जुलाई 17, 1790) का नाम सबसे पहले आता है. उनकी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा(The Wealth of Nations) ने अठारहवीं शताब्दी के इतिहासकारों एवं अर्थशास्त्रियों को बेहद प्रभावित किया है. कार्ल मार्क्स से लेकर डेविड रिकार्डो तक अनेक ख्यातिलब्ध अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और राजनेता एडम स्मिथ से प्रेरणा लेते रहे हैं. बीसवीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों में, जिन्होंने एडम स्मिथ के विचारों से प्रेरणा ली है, उनमें मार्क्स, एंगेल्स, माल्थस, मिल, केंस(Keynes) तथा फ्राइडमेन(Friedman) के नाम उल्लेखनीय हैं. स्वयं एडम स्मिथ पर अरस्तु, जा॓न ला॓क, हा॓ब्स, मेंडविले, फ्रांसिस हचसन, ह्यूम आदि विद्वानों का प्रभाव था. स्मिथ ने अर्थशास्त्र, राजनीति दर्शन तथा नीतिशास्त्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया. किंतु उसको विशेष मान्यता अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ही मिली. आधुनिक बाजारवाद को भी एडम स्मिथ के विचारों को मिली मान्यता के रूप में देखा जा सकता है.

एडम स्मिथ के जन्म की तिथि सुनिश्चित नहीं है. कुछ विद्वान उसका जन्म पांच जून 1723 को तथा कुछ उसी वर्ष की 16 जून को मानते हैं. जो हो उसका जन्म स्काटलैंड के एक गांव किर्काल्दी(Kirkaldy, Fife, Scotland) में हुआ था. एडम के पिता कस्टम विभाग में इंचार्ज रह चुके थे. किंतु उनका निधन स्मिथ के जन्म से लगभग छह महीने पहले ही हो चुका था. एडम अपने मातापिता की संभवतः अकेली संतान था. वह अभी केवल चार ही वर्ष का था कि आघात का सामना करना पड़ा. जिप्सियों के एक संगठन द्वारा एडम का अपहरण कर लिया गया. उस समय उसके चाचा ने उसकी मां की सहायता की. फलस्वरूप एडम को सुरक्षित प्राप्त कर लिया गया. पिता की मृत्यु के पश्चात स्मिथ को उसकी मां ने ग्लासगो विश्वविद्यालय में पढ़ने भेज दिया. उस समय स्मिथ की अवस्था केवल चौदह वर्ष थी. प्रखर बुद्धि होने के कारण उसने स्कूल स्तर की पढ़ाई अच्छे अंकों के साथ पूरी की, जिससे उसको छात्रवृत्ति मिलने लगी. जिससे आगे के अध्ययन के लिए आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय जाने का रास्ता खुल गया. वहां उसने प्राचीन यूरोपीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया. उस समय तक यह तय नहीं हो पाया था कि भाषा विज्ञान का वह विद्यार्थी आगे चलकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में न केवल नाम कमाएगा, बल्कि अपनी मौलिक स्थापनाओं के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में युगपरिवर्तनकारी योगदान भी देगा.

सन 1738 में स्मिथ ने सुप्रसिद्ध विद्वानदार्शनिक फ्रांसिस हचीसन के नेतृत्व में नैतिक दर्शनशास्त्र में स्नातक की परीक्षा पास की. वह फ्रांसिस की मेधा से अत्यंत प्रभावित था तथा उसको एवं उसके अध्यापन में बिताए गए दिनों को, अविस्मरणीय मानता था. अत्यंत मेधावी होने के कारण स्मिथ की प्रतिभा का॓लेज स्तर से ही पहचानी जाने लगी थी. इसलिए अध्ययन पूरा करने के पश्चात युवा स्मिथ जब वापस अपने पैत्रिक नगर स्काटलेंड पहुंचा, तब तक वह अनेक महत्त्वपूर्ण लेक्चर दे चुका था, जिससे उसकी ख्याति फैलने लगी थी. वहीं रहते हुए 1740 में उसने डेविड ह्यूम की चर्चित कृति A Treatise of Human Nature का अध्ययन किया, जिससे वह अत्यंत प्रभावित हुआ. डेविड ह्यूम उसके आदर्श व्यक्तियों में से था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. स्वयं ह्यूम रूसो की प्रतिभा से बेहद प्रभावित थे. दोनों की दोस्ती के पीछे एक घटना का उल्लेख मिलता है. जिसके अनुसार ह्यूम ने एक बार रूसो की निजी डायरी उठाकर देखी तो उसमें धर्म, समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई थीं. उस घटना के बाद दोनों में गहरी मित्रता हो गई. ह्यूम एडम स्मिथ से लगभग दस वर्ष बड़ा था. डेविड् हयूम के अतिरिक्त एडम स्मिथ के प्रमुख दोस्तों में जा॓न होम, ह्यूज ब्लेयर, लार्ड हैलिस, तथा प्रंसिपल राबर्टसन आदि के नाम नाम उल्लेखनीय हैं.

अपनी मेहनत एवं प्रतिभा का पहला प्रसाद उसको जल्दी मिल गया. सन 1751 में स्मिथ को ग्लासगा॓ विश्वविद्यालय में तर्कशास्त्र के प्रवक्ता के पद पर नौकरी मिल गई. उससे अगले ही वर्ष उसको नैतिक दर्शनशास्त्र का विभागाध्यक्ष बना दिया गया. स्मिथ का लेखन और अध्यापन का कार्य सतत रूप से चल रहा था. सन 1759 में उसने अपनी पुस्तक नैतिक अनुभूतियों का सिद्धांत’ (Theory of Moral Sentiments) पूरी की. यह पुस्तक अपने प्रकाशन के साथ ही चर्चा का विषय बन गई. उसके अंग्रेजी के अलावा जर्मनी और फ्रांसिसी संस्करण हाथोंहाथ बिकने लगे. पुस्तक व्यक्ति और समाज के अंतःसंबंधों एवं नैतिक आचरण के बारे में थी. उस समय तक स्मिथ का रुझान राजनीति दर्शन एवं नीतिशास्त्र तक सीमित था. धीरेधीरे स्मिथ विश्वविद्यालयों के नीरस और एकरस वातावरण से ऊबने लगा. उसे लगने लगा कि जो वह करना चाहता है वह का॓लेज के वातावरण में रहकर कर पाना संभव नहीं है.

इस बीच उसका रुझान अर्थशास्त्र के प्रति बढ़ा था. विशेषकर राजनीतिक दर्शन पर अध्यापन के दौरान दिए गए लेक्चरर्स में आर्थिक पहलुओं पर भी विचार किया गया था. उसके विचारों को उसी के एक विद्यार्थी ने संकलित किया, जिन्हें आगे चलकर एडविन केनन ने संपादित किया. उन लेखों में ही ‘वैल्थ आ॓फ नेशनस्’ के बीजतत्व सुरक्षित थे. करीब बारह वर्ष अध्यापन के क्षेत्र में बिताने के पश्चात स्मिथ ने का॓लेज की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और जीविकोपार्जन के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगा. इसी दौर में उसने फ्रांस तथा यूरोपीय देशों की यात्राएं कीं तथा समकालीन विद्वानों डेविड ह्यूम, वाल्तेयर, रूसो, फ्रांसिस क्वेसने (François Quesnay), एनी राबर्ट जेकुइस टुरगोट(Anne-Robert-Jacques Turgot) आदि से मिला. इस बीच उसने कई शोध निबंध भी लिखे, जिनके कारण उसकी प्रष्तिठा बढ़ी. कुछ वर्ष पश्चात वह वह किर्काल्दी वापस लौट आया.

अपने पैत्रिक गांव में रहते हुए स्मिथ ने अपनी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक The Wealth of Nations पूरी की, जो राजनीतिविज्ञान और अर्थशास्त्र पर अनूठी पुस्तक है. 1776 में पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही एडम स्मिथ की गणना अपने समय के मूर्धन्य विद्वानों में होने लगी. इस पुस्तक पर दर्शनशास्त्र का प्रभाव है. जो लोग स्मिथ के जीवन से परिचित नहीं हैं, उन्हें यह जानकर और भी आश्चर्य होगा कि स्मिथ ने इस पुस्तक की रचना एक दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक होने के नाते अपने अध्यापन कार्य के संबंध में की थी. उन दिनों विश्वविद्यालयों में इतिहास और दर्शनशास्त्र की पुस्तकें ही अधिक पढ़ाई जाती थीं, उनमें एक विषय विधिवैज्ञानिक अध्ययन भी था. विधिशास्त्र के अध्ययन का सीधा सा तात्पर्य है, स्वाभाविक रूप से न्यायप्रणालियों का विस्तृत अध्ययन. प्रकारांतर में सरकार और फिर राजनीति अर्थव्यवस्था का चिंतन. इस तरह यह साफ है कि अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में स्मिथ ने आर्थिक सिद्धांतों की दार्शनिक विवेचनाएं की हैं. विषय की नवीनता एवं प्रस्तुतीकरण का मौलिक अंदाज उस पुस्तक की मुख्य विशेषताएं हैं.

स्मिथ पढ़ाकू किस्म का इंसान था. उसके पास एक समृद्ध पुस्तकालय था, जिसमें सैंकड़ों दुर्लभ ग्रंथ मौजूद थे. रहने के लिए उसको शांत एवं एकांत वातावरण पसंद था, जहां कोई उसके जीवन में बाधा न डाले. स्मिथ आजीवन कुंवारा ही रहा. जीवन में सुख का अभाव एवं अशांति की मौजूदगी से कार्य आहत न हों, इसलिए उसका कहना था कि समाज का गठन मनुष्यों की उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए, जैसे कि व्यापारी समूह गठित किए जाते हैं; ना कि आपसी लगाव या किसी और भावनात्मक आधार पर.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में एडम स्मिथ की ख्याति उसके सुप्रसिद्ध सिद्धांत ‘लेजे फेयर (laissez-faire) के कारण है, जो आगे चलकर उदार आर्थिक नीतियों का प्रवर्तक सिद्धांत बना. लेजे फेयर का अभिप्राय था, ‘कार्य करने की स्वतंत्रता’ अर्थात आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्र में सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप. आधुनिक औद्योगिक पूंजीवाद के समर्थक और उत्पादन व्यवस्था में क्रांति ला देने वाले इस नारे के वास्तविक उदगम के बारे में सहीसही जानकारी का दावा तो नहीं किया जाता. किंतु इस संबंध में एक बहुप्रचलित कथा है, जिसके अनुसार इस उक्ति का जन्म 1680 में, तत्कालीन प्रभावशाली फ्रांसिसी वित्त मंत्री जीनबेपटिस्ट कोलबार्ट की अपने ही देश के व्यापरियों के साथ बैठक के दौरान हुआ था. व्यापारियों के दल का नेतृत्व एम. ली. जेंड्री कर रहे थे. व्यापारियों का दल कोलबार्ट के पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचा था. उन दिनों व्यापारीगण एक ओर तो उत्पादनव्यवस्था में निरंतर बढ़ती स्पर्धा का सामना कर रहे थे, दूसरी ओर सरकारी कानून उन्हें बाध्यकारी लगते थे. उनकी बात सुनने के बाद कोलबार्ट ने किंचित नाराजगी दर्शाते हुए कहा—

इसमें सरकार व्यापारियों की भला क्या मदद कर सकती है?’ इसपर ली. जेंड्री ने सादगीभरे स्वर में तत्काल उत्तर दिया—‘लीजेजनाउज फेयर [Laissez-nous faire (Leave us be, Let us do)].’ उनका आशय था, ‘आप हमें हमारे हमारे हाल पर छोड़ दें, हमें सिर्फ अपना काम करने दें.’ इस सिद्धांत की लोकप्रियता बढ़ने के साथसाथ, एडम स्मिथ को एक अर्थशास्त्री के रूप में पहचान मिलती चली गई. उस समय एडम स्मिथ ने नहीं जानता था कि वह ऐसे अर्थशास्त्रीय सिद्धांत का निरूपण कर रहा है, जो एक दिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी सिद्ध होगा.

राष्ट्रों की संपदा’ नामक पुस्तक के प्रकाशन के दो वर्ष बाद ही स्मिथ को कस्टम विभाग में आयुक्त की नौकरी मिल गई. उसी साल उसे धक्का लगा जब उसके घनिष्ट मित्र और अपने समय के जानेमाने दार्शनिक डेविड ह्यूम की मृत्यु का समाचार उसको मिला. कस्टम आयुक्त का पद स्मिथ के लिए चुनौतीभरा सिद्ध हुआ. उस पद पर रहते हुए उसे तस्करी की समस्या से निपटना था; जिसे उसने अपने ग्रंथ राष्ट्रों की संपदा में ‘अप्राकृतिक विधान के चेहरे के पीछे सर्वमान्य कर्म’ (Legitimate activity in the face of ‘unnatural’ legislation) के रूप में स्थापित किया था. 1783 में एडिनवर्ग रा॓यल सोसाइटी की स्थापना हुई तो स्मिथ को उसका संस्थापक सदस्य मनोनीत किया गया. अर्थशास्त्र एवं राजनीति के क्षेत्र में स्मिथ की विशेष सेवाओं के लिए उसको ग्ला॓स्ग विश्वविद्यालय का मानद रेक्टर मनोनीत किया गया. वह आजीवन अविवाहित रहा. रातदिन अध्ययनअध्यापन में व्यस्त रहने के कारण उसका स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगा था. अंततः 19 जुलाई 1790 को, मात्र सढ़सठ वर्ष की अवस्था में एडिनबर्ग में उसकी मृत्यु हो गई.


वैचारिकी


एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थव्यवस्था के निर्माताओं में से माना जाता है. उसके विचारों से प्रेरणा लेकर जहां कार्ल मार्क्स, एंगेल्स, मिल, रिकार्डो जैसे समाजवादी चिंतकों ने अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाया, वहीं अत्याधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीजतत्व भी स्मिथ के विचारों में निहित हैं. स्मिथ का आर्थिक सामाजिक चिंतन उसकी दो पुस्तकों में निहित है. पहली पुस्तक का शीर्षक है— नैतिक अनुभूतियों के सिद्धांत’ जिसमें उसने मानवीय व्यवहार की समीक्षा करने का प्रयास किया है. पुस्तक पर स्मिथ के अध्यापक फ्रांसिस हचसन का प्रभाव है. पुस्तक में नैतिक दर्शन को चार वर्गों—नैतिकता, सदगुण, व्यक्तिगत अधिकार की भावना एवं स्वाधीनता में बांटते हुए उनकी विवेचना की गई है. इस पुस्तक में स्मिथ ने मनुष्य के संपूर्ण नैतिक आचरण को निम्नलिखित दो हिस्सों में वर्गीकृत किया है—

1. नैतिकता की प्रकृति (Nature of morality)

२. नैतिकता का लक्ष्य (Motive of morality)

नैतिकता की प्रकृति में स्मिथ ने संपत्ति, कामनाओं आदि को सम्मिलित किया है. जबकि दूसरे वर्ग में स्मिथ ने मानवीय संवेदनाओं, स्वार्थ, लालसा आदि की समीक्षा की है. स्मिथ की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है—‘राष्ट्रों की संपदा की प्रकृति एवं उसके कारणों की विवेचना’ यह अद्वितीय ग्रंथ पांच खंडों में है. पुस्तक में राजनीतिविज्ञान, अर्थशास्त्र, मानव व्यवहार आदि विविध विषयों पर विचार किया गया है, किंतु उसमें मुख्य रूप से स्मिथ के आर्थिक विचारों का विश्लेषण है. स्मिथ ने मुक्त अर्थव्यवस्था का समर्थन करते हुए दर्शाया है कि ऐसे दौर में अपने हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है, किस तरह तकनीक का अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है, किस प्रकार एक कल्याणकारी राज्य को धर्मिकता की कसौटी पर कसा जा सकता है और कैसे व्यावसायिक स्पर्धा से समाज को विकास के रास्ते पर ले जाया जा सकाता है. स्मिथ की विचारधारा इसी का विश्लेषण बड़े वस्तुनिष्ठ ढंग से प्रस्तुत करती है. इस पुस्तक के कारण स्मिथ पर व्यक्तिवादी होने के आरोप भी लगते रहे हैं. लेकिन जो विद्वान स्मिथ को निरा व्यक्तिवादी मानते हैं, उन्हें यह तथ्य चौंका सकता है कि उसका अधिकांश कार्य मानवीय नैतिकता को प्रोत्साहित करने वाला तथा जनकल्याण पर केंद्रित है. अपनी दूसरी पुस्तक ‘नैतिक अनुभूतियों का सिद्धांत’ में स्मिथ लिखता है—

पूर्णतः स्वार्थी व्यक्ति की संकल्पना भला कैसे की जा सकती है. प्रकृति के निश्चित ही कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जो उसको दूसरों के हितों से जोड़कर उनकी खुशियों को उसके लिए अनिवार्य बना देते हैं, जिससे उसे उन्हें सुखीसंपन्न देखने के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं होता.’

स्मिथ के अनुसार स्वार्थी और अनिश्चितता का शिकार व्यक्ति सोच सकता है कि प्रकृति के सचमुच कुछ ऐसे नियम हैं जो दूसरे के भाग्य में भी उसके लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं तथा उसके लिए खुशी का कारण बन सकते हैं. जबकि यह उसका सरासर भ्रम ही है. उसको सिवाय ऐसा सोचने के कुछ और हाथ नहीं लग पाता. मानव व्यवहार की एकांगिकता और सीमाओं का उल्लेख करते हुए एक स्थान पर स्मिथ ने लिखा है कि—

हमें इस बात का प्रामाणिक अनुभव नहीं है कि दूसरा व्यक्ति क्या सोचता है. ना ही हमें इस बात का कोई ज्ञान है कि वह वास्तव में किन बातों से प्रभावित होता है. सिवाय इसके कि हम स्वयं को उन परिस्थितियों में होने की कल्पना कर कुछ अनुमान लगा सकें. छज्जे पर खडे़ अपने भाई को देखकर हम निश्चिंत भी रह सकते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि उसपर क्या बीत रही है. हमारी अनुभूतियां उसकी स्थिति के बारे में प्रसुप्त बनी रहती हैं. वे हमारे ‘हम’ से परे न तो जाती हैं, न ही जा सकती हैं; अर्थात उसकी वास्तविक स्थिति के बारे में हम केवल अनुमान ही लगा पाते हैं. न उसकी चेतना में ही वह शक्ति है जो हमें उसकी परेशानी और मनःस्थिति का वास्तविक बोध करा सके, उस समय तक जब तक कि हम स्वयं को उसकी परिस्थितियों में रखकर नहीं सोचते. मगर हमारा अपना सोच केवल हमारा सोच और संकल्पना है, न कि उसका. कल्पना के माध्यम से हम उसकी स्थिति का केवल अनुमान लगाने में कामयाब हो पाते हैं.’

उपर्युक्त उद्धरण द्वारा स्मिथ ने यथार्थ स्थिति बयान की है. हमारा रोजमर्रा का बहुतसा व्यवहार केवल अनुमान और कल्पना के सहारे ही संपन्न होता है.

भावुकता एवं नैतिकता के अनपेक्षित दबावों से बचते हुए स्मिथ ने व्यक्तिगत सुखलाभ का पक्ष भी बिना किसी झिझक के लिया है. उसके अनुसार खुद से प्यार करना, अपनी सुखसुविधाओं का खयाल रखना तथा उनके लिए आवश्यक प्रयास करना किसी भी दृष्टि से अकल्याणकारी अथवा अनैतिक नहीं है. उसका कहना था कि जीवन बहुत कठिन हो जाएगा यदि हमारी कोमल संवेदनाएं और प्यार, जो हमारी मूल भावना है, हर समय हमारे व्यवहार को नियंत्रित करने लगे, और उसमें दूसरों के कल्याण की कोई कामना ही न हो; या वह अपने अहं की रक्षा को ही सर्वस्व मानने लगे, और दूसरों की उपेक्षा ही उसका धर्म बन जाए. सहानुभूति तथा व्यक्तिगत लाभ एक दूसरे के विरोधी न होकर परस्पर पूरक होते हैं. दूसरों की मदद के सतत अवसर मनुष्य को मिलते ही रहते हैं.

स्मिथ ‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक ग्रंथ में परोपकार और कल्याण की व्याख्या बड़े ही वस्तुनिष्ट ढंग से करता है. स्मिथ के अनुसार अभ्यास की कमी के कारण हमारा मानस एकाएक ऐसी मान्यताओं को स्वीकारने को तैयार नहीं होता, हालांकि हमारा आचरण निरंतर उसी ओर इंगित करता रहता है. हमारे अंतर्मन में मौजूद द्वंद्व हमें निरंतर मथते रहते हैं. एक स्थान पर वह लिखता है कि केवल धर्म अथवा परोपकार के बल पर आवश्यकताओं की पूर्ति असंभव है. उसके लिए व्यक्तिगत हितों की उपस्थिति भी अनिवार्य है. वह लिखता है—

हमारा भोजन किसी कसाई, शराब खींचनेवाले या तंदूरवाले की दयालुता की सौगात नहीं है. यह उनके निहित लाभ के लिए, स्वयं के लिए किए गए कार्य का प्रतिफल है.’

स्मिथ के अनुसार यदि कोई आदमी धनार्जन के लिए परिश्रम करता है तो यह उसका अपने सुख के लिए किया गया कार्य है. लेकिन उसका प्रभाव स्वयं उस तक ही सीमित नहीं रहता. धनार्जन की प्रक्रिया में वह किसी ने किसी प्रकार दूसरों से जुड़ता है. उनका सहयोग लेता है तथा अपने उत्पाद के माध्यम से अपने साथसाथ अपने समाज की आवश्यकताएं पूरी करता है. स्पर्धा के बीच कुछ कमाने के लिए उसे दूसरों से अलग, कुछ न कुछ उत्पादन करना ही पड़ता है. उत्पादन तथा उत्पादन के लिए प्रयुक्त तकनीक की विशिष्टता का अनुपात ही उसकी सफलता तय करता है. ‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक ग्रंथ में स्मिथ लिखता है कि—

प्रत्येक उद्यमी निरंतर इस प्रयास में रहता है कि वह अपनी निवेश राशि पर अधिक से अधिक लाभ अर्जित कर सके. यह कार्य वह अपने लिए, केवल अपने भले की कामना के साथ करता है, न कि समाज के कल्याण की खातिर. यह भी सच है कि अपने भले के लिए ही वह अपने व्यवसाय को अधिक से अधिक आगे ले जाने, उत्पादन और रोजगार के अवसरों को ज्यादा से ज्यादा विस्तार देने का प्रयास करता है. किंतु इस प्रक्रिया में देरसवेर समाज का भी हितसाधन होता है.’

पांच खंडों में लिखी गई पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में स्मिथ किसी राष्ट्र की समृद्धि के कारणों और उनकी प्रकृति को स्पष्ट करने का प्रयास भी किया है. किंतु उसका आग्रह अर्थव्यवस्था पर कम से कम नियंत्रण के प्रति रहा है. स्मिथ के अनुसार समृद्धि का पहला कारण श्रम का अनुकूल विभाजन है. यहां अनुकूलता का आशय किसी भी व्यक्ति की कार्यकुशलता का सदुपयोग करते हुए उसे अधिकतम उत्पादक बनाने से है. इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए स्मिथ का एक उदाहरण बहुत ही चर्चित रहा है—

कल्पना करें कि दस कारीगर मिलकर एक दिन में अड़तालीस हजार पिन बना सकते हैं, बशर्ते उनकी उत्पादन प्रक्रिया को अलगअलग हिस्सों में बांटकर उनमें से हर एक को उत्पादन प्रक्रिया का कोई खास कार्य सौंप दिया जाए. किसी दिन उनमें से एक भी कारीगर यदि अनुपस्थित रहता है तो; उनमें से एक कारीगर दिनभर में एक पिन बनाने में भी शायद ही कामयाब हो सके. इसलिए कि किसी कारीगर विशेष की कार्यकुशलता उत्पादन प्रक्रिया के किसी एक चरण को पूरा कर पाने की कुशलता है.’

स्मिथ मुक्त व्यापार के पक्ष में था. उसका कहना था कि सरकारों को वे सभी कानून उठा लेने चाहिए जो उत्पादकता के विकास के आड़े आकर उत्पादकों को हताश करने का कार्य करते हैं. उसने परंपरा से चले आ रहे व्यापारसंबंधी कानूनों का विरोध करते हुए कहा कि इस तरह के कानून उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं. उसने आयात के नाम पर लगाए जाने वाले करों एवं उसका समर्थन करने वाले कानूनों का भी विरोध किया है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उसका सिद्धांत ‘लैसे फेयर’ के नाम से जाना जाता है. जिसका अभिप्रायः है—उन्हें स्वेच्छापूर्वक कार्य करने दो (let them do). दूसरे शब्दों में स्मिथ उत्पादन की प्रक्रिया की निर्बाधता के लिए उसकी नियंत्रणमुक्ति चाहता था. वह उत्पादनक्षेत्र के विस्तार के स्थान पर उत्पादन के विशिष्टीकरण के पक्ष में था, ताकि मशीनी कौशल एवं मानवीय श्रम का अधिक से अधिक लाभ उठाया जाए. उत्पादन सस्ता हो और वह अधिकतम तक पहुंच सके. उसका कहना था कि—

किसी वस्तु को यदि कोई देश हमारे देश में आई उत्पादन लागत से सस्ती देने को तैयार है तो यह हमारा कर्तव्य है कि उसको वहीं से खरीदें. तथा अपने देश के श्रम एवं संसाधनों का नियोजन इस प्रकार करें कि वह अधिकाधिक कारगर हो सकें तथा हम उसका उपयुक्त लाभ उठा सकें.’

स्मिथ का कहना था कि समाज का गठन विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों, अनेक सौदागरों के बीच से होना चाहिए. बगैर किसी पारस्पिरिक लाभ अथवा कामना के होना चाहिए. उत्पादन की इच्छा ही उद्यमिता की मूल प्रेरणाशक्ति है. लेकिन उत्पादन के साथ लाभ की संभावना न हो, यदि कानून मदद करने के बजाय उसके रास्ते में अवरोधक बनकर खड़ा हो जाए, तो उसकी इच्छा मर भी सकती है. उस स्थिति में उस व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का ही नुकसान है. स्मिथ के अनुसार—

उपभोग का प्रत्यक्ष संबंध उत्पादन से है. कोई भी व्यक्ति इसलिए उत्पादन करता करता है, क्योंकि वह उत्पादन की इच्छा रखता है. इच्छा पूरी होने पर वह उत्पादन की प्रक्रिया से किनारा कर सकता है अथवा कुछ समय के लिए उत्पादन की प्रक्रिया को स्थगित भी कर सकता है. जिस समय कोई व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर लेता है, उस समय अतिरिक्त उत्पादन को लेकर उसकी यही कामना होती है कि उसके द्वारा वह किसी अन्य व्यक्ति से, किसी और वस्तु की फेरबदल कर सके. यदि कोई व्यक्ति कामना तो किसी वस्तु की करता है तथा बनाता कुछ और है, तब उत्पादन को लेकर उसकी यही इच्छा हो सकती है कि वह उसका उन वस्तुओं के साथ विनिमय कर सके, जिनकी वह कामना करता है और उन्हें उससे भी अच्छी प्रकार से प्राप्त कर सके, जैसा वह उन्हें स्वयं बना सकता था.’

स्मिथ ने कार्यविभाजन को पूर्णतः प्राकृतिक मानते हुआ उसका मुक्त स्वर में समर्थन किया है. यह उसकी वैज्ञानिक दृष्टि एवं दूरदर्शिता को दर्शाता है. उसके विचारों के आधार पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने मुक्त अर्थव्यवस्था को अपनाया. शताब्दियों बाद भी उसके विचारों की प्रासंगिकता यथावत बनी हुई है. औद्योगिक स्पर्धा में बने रहने के लिए चीन और रूस जैसे कट्टर साम्यवादी देश भी मुक्त अर्थव्यवस्था के समर्थक बने हुए हैं. उत्पादन के भिन्नभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करते हुए स्मिथ ने कहा कि उद्योगों की सफलता में मजदूर और कारीगर का योगदान भी कम नहीं होता. वे अपना श्रमकौशल निवेश करके उत्पादन में सहायक बनते हैं.

स्मिथ का यह भी लिखा है ऐसे स्थान पर जहां उत्पादन की प्रवृत्ति को समझना कठिन हो, वहां पर मजदूरी की दरें सामान्य से अधिक हो सकती हैं. इसलिए कि लोग, जब तक कि उन्हें अतिरिक्त रूप से कोई लाभ न हो, सीखना पसंद ही नहीं करेंगे. अतिरिक्त मजदूरी अथवा सामान्य से अधिक अर्जन की संभावना उन्हें नई प्रविधि अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं. इस प्रकार स्मिथ ने सहज मानववृत्ति के विशिष्ट लक्षणों की ओर संकेत किया है. इसी प्रकार ऐसे कार्य जहां व्यक्ति को स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल स्थितियों में कार्य करना पड़े अथवा असुरक्षित स्थानों पर चल रहे कारखानों में मजदूरी की दरें सामान्य से अधिक रखनी पड़ेंगी. नहीं तो लोग सुरक्षित और पसंदीदा ठिकानों की ओर मजदूरी के लिए भागते रहेंगे और वैसे कारखानों में प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव बना रहेगा.

स्मिथ ने तथ्यों का प्रत्येक स्थान पर बहुत ही संतुलित तथा तर्कसंगत ढंग से उपयोग किया है. अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में वह स्पष्ट करता है कि कार्य की प्रवृत्ति के अंतर को वेतन के अंतर से संतुलित किया जा सकता है. उसके लेखन की एक विशेषता यह भी है कि वह बात को समझाने के लिए लंबेलंबे वर्णन के बजाए तथ्यों एवं तर्कों का सहारा लेता है. उत्पादनव्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण को लेकर भी स्मिथ के विचार आधुनिक अर्थचिंतन की कसौटी पर खरे उतरते हैं. इस संबंध में उसका मत था कि—

यदि कोई विदेशी मुल्क हमें किसी उपभोक्ता सामग्री को अपेक्षाकृत सस्ता उपलब्ध कराने को तैयार है तो उसे वहीं से मंगवाना उचित होगा. क्योंकि उसी के माध्यम से हमारे देश की कुछ उत्पादक शक्ति ऐसे कार्यों को संपन्न करने के काम आएगी जो कतिपय अधिक महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी हैं. इस व्यवस्था से अंततोगत्वा हमें लाभ ही होगा.’

विश्लेषण के दौरान स्मिथ की स्थापनाएं केवल पिनों की उत्पादन तकनीक के वर्णन अथवा एक कसाई तथा रिक्शाचालक के वेतन के अंतर को दर्शाने मात्र तक सीमित नहीं रहतीं. बल्कि उसके बहाने से वह राष्ट्रों के जटिल राजनीतिक मुद्दों को सुलझाने का भी काम करता है. अर्थसंबंधों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय रणनीति बनाने का चलन आजकल आम हो चला है. संपन्न औद्योगिक देश यह कार्य बड़ी कुशलता के साथ करते हैं. मगर उसके बीजतत्व स्मिथ के चिंतन में अठारहवीं शताब्दी से ही मौजूद हैं.

राष्ट्रों की संपदा’ शृंखला की चैथी पुस्तक में सन 1776 में स्मिथ ने ब्रिटिश सरकार से साफसाफ कह दिया था कि उसकी अमेरिकन कालोनियों पर किया जाने व्यय, उनके अपने मूल्य से अधिक है. इसका कारण स्पष्ट करते हुए उसने कहा था कि ब्रिटिश राजशाही बहुत खर्चीली व्यवस्था है. उसने आंकड़ों के आधार पर यह सिद्ध किया था कि राजनीतिक नियंत्रण के स्थान पर एक साफसुथरी अर्थनीति, नियंत्रण के लिए अधिक कारगर व्यवस्था हो सकती है. वह आर्थिक मसलों से सरकार को दूर रखने का पक्षधर था. इस मामले में स्मिथ कतिपय आधुनिक अर्थनीतिकारों से कहीं आगे था. लेकिन यदि सबकुछ अर्थिक नीतियों के माध्यम से पूंजीपतियों अथवा उनके सहयोग से बनाई गई व्यवस्था द्वारा ही संपन्न होना है तब सरकार का क्या दायित्व है? अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए वह क्या कर सकती है?

इस संबंध में स्मिथ का एकदम स्पष्ट मत था कि सरकार पेटेंट कानून, कांट्रेक्ट, लाइसेंस एवं का॓पीराइट जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से अपना नियंत्रण बनाए रख सकती है. यही नहीं सरकार सार्वजनिक महत्त्व के कार्यों जैसे कि पुल, सड़क, विश्रामालय आदि बनाने का कार्य अपने नियंत्रण में रखकर जहां राष्ट्र की समृद्धि का लाभ जनजन पहुंचा सकती है. प्राथमिकता के क्षेत्रों में, ऐसे क्षेत्रों में जहां उद्यमियों की काम करने की रुचि कम हो, विकास की गति बनाए रखकर सरकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकती है. पूंजीगत व्यवस्था के समर्थन में स्मिथ के विचार कई स्थान पर व्यावहारिक हैं तो कई बार वे अतिरेक की सीमाओं को पार करते हुए नजर आते हैं. वह सरकार को एक स्वयंभू सत्ता के बजाय एक पूरक व्यवस्था में बदल देने का समर्थक था. जिसका कार्य उत्पादकता में यथासंभव मदद करना है. उसका यह भी विचार था कि नागरिकों को सुविधाओं के उपयोग के अनुपात में निर्धारित शुल्क का भुगतान भी करना चाहिए. लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि स्मिथ सरकारों को अपने नागरिकों के कल्याण की जिम्मेदारी से पूर्णतः मुक्त कर देना चाहता था. उसका मानना था कि—

कोई भी समाज उस समय तक सुखी एवं समृद्ध नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके सदस्यों का अधिकांश, गरीब, दुखी एवं अवसादग्रस्त हो.’

व्यापार और उत्पादन तकनीक के मामले में स्मिथ मुक्त स्पर्धा का समर्थक था. उसका मानना था कि अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में स्पर्धा का आगमन ‘प्राकृतिक नियम’ के अनुरूप होगा. स्मिथ का प्राकृतिक नियम निश्चित रूप से जंगल के उस कानून का ही विस्तार है, जिसमें जीवन की जिजीविषा संघर्ष को अनिवार्य बना देती है. स्मिथ के समय में सहकारिता की अवधारणा का जन्म नहीं हुआ था, समाजवाद का विचार भी लोकचेतना के विकास के गर्भ में ही था. उसने एक ओर तो उत्पादन को स्पर्धा से जोड़कर उसको अधिक से अधिक लाभकारी बनाने पर जोर दिया. दूसरी ओर उत्पादन और नैतिकता को परस्पर संबद्ध कर उत्पादनव्यवस्था के चेहरे को मानवीय बनाए रखने का रास्ता दिखाया. हालांकि अधिकतम मुनाफे को ही अपना अभीष्ठ मानने वाला पूंजीपति बिना किसी स्वार्थ के नैतिकता का पालन क्यों करे, उसकी ऐसी बाध्यता क्योंकर हो? इस ओर उसने कोई संकेत नहीं किया है. तो भी स्मिथ के विचार अपने समय में सर्वाधिक मौलिक और प्रभावशाली रहे हैं.

स्मिथ ने आग्रहपूर्वक कहा था कि—

किसी भी सभ्य समाज में मनुष्य को दूसरों के समर्थन एवं सहयोग की आवश्यकता प्रतिक्षण पड़ती है. जबकि चंद मित्र बनाने के लिए मनुष्य को एक जीवन भी अपर्याप्त रह जाता है. प्राणियों में वयस्कता की ओर बढ़ता हुआ कोई जीव आमतौर पर अकेला और स्वतंत्र रहने का अभ्यस्त हो चुका होता है. दूसरों की मदद करना उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं होता. किंतु मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. उसको अपने स्वार्थ के लिए हर समय अपने भाइयों एवं सगेसंबंधियों के कल्याण की चिंता लगी रहती है. जाहिर है मनुष्य अपने लिए भी यही अपेक्षा रखता है. क्योंकि उसके लिए केवर्ल शुभकामनाओं से काम चलाना असंभव ही है. वह अपने संबंधों को और भी प्रगाढ़ बनाने का कार्य करेगा, यदि वह उनकी सुखलालसाओं में अपने लिए स्थान बना सके. वह यह भी जताने का प्रयास करेगा कि यह उनके अपने भी हित में है कि वे उन सभी कार्यों को अच्छी तरह अंजाम दें, जिनकी वह उनसे अपेक्षा रखता है. मनुष्य दूसरों के प्रति जो भी कर्तव्य निष्पादित करता है, वह एक तरह की सौदेबाजी ही हैयानी तुम मुझको वह दो जिसको मैं चाहता हूं, बदले में तुम्हें वह सब मिलेगा जिसकी तुम कामना करते हो. किसी को कुछ देने का यही सिद्धांत है, यही एक रास्ता है, जिससे हमारे सामाजिक संबंध विस्तार पाते हैं और जिनके सहारे यह संसार चलता है. हमारा भोजन किसी कसाई, शराब खींचनेवाले या तंदूरवाले की दयालुता की सौगात नहीं है. यह उनके निहित लाभ के लिए, स्वयं के लिए किए गए कार्य का प्रतिफल है.’

इस प्रकार हम देखते हैं कि एडम स्मिथ के अर्थनीति संबंधी विचार न केवल व्यावहारिक, मौलिक और दूरदर्शितापूर्ण हैं; बल्कि आज भी अपनी प्रासंकगिता को पूर्ववत बनाए हुए हैं. शायद यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि वे पहले की अपेक्षा आज कहीं अधिक प्रासंगिक हैं. उसकी विचारधारा में हमें कहीं भी विचारों के भटकाव अथवा असंमजस के भाव नहीं दिखते. स्मिथ को भी मान्यताओं पर पूरा विश्वास था, यही कारण है कि वह अपने तर्क के समर्थन में अनेक तथ्य जुटा सका. यही कारण है कि आगे आने वाले अर्थशास्त्रियों को जितना प्रभावित स्मिथ ने किया; उस दौर का कोई अन्य अर्थशास्त्री वैसा नहीं कर पाया.

हालांकि अपने विचारों के लिए एडम स्मिथ को लोगों की आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा. कुछ विद्वानों का विचार है कि उसके विचार एंडरर्स चांडिनिअस(Anders Chydenius) की पुस्तक ‘दि नेशनल गेन (The National Gain, 1765) तथा डेविड ह्यूम आदि से प्रभावित हैं. कुछ विद्वानों ने उसपर अराजक पूंजीवाद को बढ़ावा देने के आरोप भी लगाए हैं. मगर किसी भी विद्वान के विचारों का आकलन उसकी समग्रता में करना ही न्यायसंगत होता है. स्मिथ के विचारों का आकलन करने वाले विद्वान अकसर औद्योगिक उत्पादन संबंधी विचारों तक ही सिमटकर रह जाते हैं, वे भूल जाते हैं कि स्मिथ की उत्पादन संबंधी विचारों में सरकार और नागरिकों के कर्तव्य भी सम्मिलित हैं. जो भी हो, उसकी वैचारिक प्रखरता का प्रशंसा उसके तीव्र विरोधियों ने भी की है. दुनिया के अनेक विद्वान, शोधार्थी आज भी उसके आर्थिक सिद्धांतों का विश्लेषण करने में लगे हैं. एक विद्वान के विचारों की प्रासंगिकता यदि शताब्दियों बाद भी बनी रहे तो यह निश्चय ही उसकी महानता का प्रतीक है. जबकि स्मिथ ने तो विद्वानों की पीढ़ियों को न केवल प्रभावित किया, बल्कि अर्थशास्त्रियों की कई पीढ़ियां तैयार भी की हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

जीन-जैकुइस रूसो

यदि हम आधुनिक समाज की किसी एक विशेषता के बारे में सवाल करें, तो लोग सामान्यतः लोकतंत्र अथवा मानवाधिकार का नाम लेंगे. हां, कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो भावुकतावश धर्म या फिर संस्कृति को यह सम्मान देना चाहेंगे. यह उनकी व्यक्तिगत आस्था या फिर जानकारी हो सकती है. मगर यह तो वे भी मानेंगे ही कि धर्म एक तो आधुनिक अवधारणा नहीं है, दूसरे दुनिया के प्रायः सभी धर्मों का अतीत इतना भ्रामक, अंतर्विरोधी, अनिश्चित, रूढ़िवादी और खूनखराबे वाला रहा है कि उनमें मानवाधिकार के नाम पर सिवाय सुबहशाम की आरतीनमाज अथवा कुछ तयशुदा कर्मकांडोंदानदक्षिणा आदि के, शायद ही कुछ और उल्लेखनीय, स्मरणीय जान पड़े. इसके बावजूद उनके अनुयायियों में अपनेअपने धर्म के प्रति लगभग अंधआस्था जैसी होती है, और उनकी अपेक्षा भी होती है कि उनकी मान्यताओं को संदेह से परे रखकर परखा जाना चाहिए. निहित स्वार्थों के कारण धर्म के प्रचारप्रसार में लगे धर्माचार्य, पंडितमौलवीपादरी आदि इस अंधऋद्धा को निरंतर पोषित करते रहते हैं. इस कारण उनके निष्कर्षों में वस्तुनिष्ठता नहीं आ पाती. न वे तर्क की कसौटी पर खरे उतर पाते हैं.

धर्म के प्रशंसक सामान्यत: यह दावा करते हैं कि धर्म की समाज में मौजूदगी उसमें नैतिकता के स्तर को बनाए रखने के लिए जरूरी है, वे यह डर भी दिखाते हैं कि धर्मरहित होते ही समाज में नैतिकता का स्तर जमीन छूने लगेगा, इतना कि उसके वर्तमान ढांचे को बनाए रखना असंभव होगा. लेकिन यह भी उनके सोचेसमझे षडयंत्र का नमूना है. बात इसके पूरी तरह उलट है. नैतिकता अपने आप में संपूर्ण है, उसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता है. जिसे हम सामान्यतः मनुष्यता के नाम से जानते हैं, वह दरअसल नैतिकता का ही पर्याय है. यही कारण है कि विभिन्न धर्मों की अध्यात्मसंबंधी मान्यताएं अलगअलग होने के बावजूद उनकी सामाजिक आचारसंहिता में एकरूपता होती है, जो नैतिकता की लोकमान्य अवधारणाओं से विनिर्मित होती है.

धर्म की उत्पत्ति मनुष्य की पारलौकिक जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए की गई थी. उसी कार्य को धर्म अर्से से, बल्कि आज भी करता आ रहो है. इस बीच में धर्म से संबंधित मान्यताएं और रीतिरिवाज भी बदले हैं. मगर उनके परंपरागत स्वरूप में अभी तक कोई खास परिवर्तन नहीं हो पाया है. हालांकि इस बीच मनुष्य ने ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियों के नएनए कीर्तिमान गढ़े हैं. धर्म ने ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में हुए आविष्कारों का लाभ तो उठाया, किंतु अपने कर्मकांडों को पुख्ता करने और गाहेबगाहे उन्हें विज्ञानसम्मत दिखाने के लिए. हालांकि ऐसा करने से धर्म की अपनी कमजोरियां ही जाहिर होती थीं. यह बात अलग है कि वैज्ञानिक उपकरणों और सिद्धांतों के सहारा लेकर धर्म ने जनसाधारण को लुभाने में कामयाबी हासिल की थी. लेकिन उनके उपयोग से अपना परिष्कार कर पाने में असमर्थ रहा है. यही धर्म की सीमा है, जो दोनों के मूल स्वभाव से प्रेरित है.

धर्म और विज्ञान में फर्क भी यही है कि विज्ञान जहां संदेह को ही सबकुछ मानकर चलता है. वैज्ञानिक तर्कसम्मत एवं पुष्ट होने तक अपनी प्रत्येक परिकल्पना को संदेह की दृष्टि से देखता है और परिकल्पना के नियम बनने तक उसपर परीक्षणअन्वेषण का सतत प्रयोग करता रहता है. नियम बन जाने के बाद भी वैज्ञानिक अपनी खोज को लेकर पूर्णतः संतुष्ट नहीं हो जाता, बल्कि उसकी नजर उन स्थितियों पर लगी रहती है, जिनमें उस नियम या सिद्धांत की असफलता सिद्ध होती हो. निश्चय ही इसके पीछे सत्य तक पहुंचने की लालसा ही होती है. सत्य की खोज तथा उस तक पहुंचने के लिए धर्म भी प्रयासरत रहता है, किंतु वह अपनी शुरुआत ही विश्वास से करता है. वह यह मानकर चलता है कि परमसत्य उसके परिचय और पहुंच के दायरे में जिसके लिए धर्माचरण का पालन करना अत्यावश्यक है. संदेह की कम से कम गुंजाइश होने के कारण धार्मिक मामलों में नएपन के लिए अवसर कम से कम होते हैं.

धर्म मानव समाज की विवेकशीलता की प्रारंभिक पहचान है. सभ्यता की और शनैशनै बढ़ते प्राचीन मानव ने प्रारंभ में अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए ही धार्मिक प्रतीकों की कल्पना की होगी. धर्म की इसी ताकत एवं पहुंच का लाभ उठाने के लिए दुनिया के मनीषियों ने उसको समाजसंस्कृति, नैतिकता की परंपरा एवं लोकाचार से जोड़ा; जिससे अर्से तक सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी धर्म के कंधों पर बनी रही. कतिपय अर्थों में वह आज भी है. धर्म की व्यापकता और सर्वमान्यता ने इसे और भी आक्रामक एवं ताकतवर बनाया; जिससे वह मनुष्य के जीवन में ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ करता चला गया. दूसरी ओर उसका तेजी से सांस्थानिकीकरण हुआ है. धर्म और राजनीति अथवा पूंजी और धर्म के गठजोड़ के परिणाम आज हम देख ही रहे हैं. हम कह सकते हैं कि इसी के साथ धर्म में वैचारिक जड़त्व की शुरुआत हुई है, जिसने भारतीय मानस को इतने जोर से पकड़ा हुआ है कि भारतीय समाज के संदर्भ में धर्म का वास्तविक अर्थ लगभग भुला ही दिया गया है.

सांस्थानिकृत होने के बाद से ही धर्म का विधायी स्वरूप अपना प्रभाव खोता चला गया. उसके स्थान पर अज्ञान, रूढ़िवादिता, अवैज्ञानिकता और गुरुडम जैसी कुरूतियां स्थान पाती चली गईं. दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला धर्म खुद नैतिकता से परे छिटकता चला गया. इसलिए सामाजिक परिवर्तन की चाहत रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने धर्म और धार्मिक जड़ता का जमकर विरोध किया. यह भी सच है कि उसको पहली चुनौती स्वार्थी धार्मिक संस्थाओं की ओर से ही मिली. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि लंबे समय से धर्म की जनमानस पर गहरी पकड़ ने इसे ताकतवर एवं उपयोगी बनाया है, लेकिन वह वर्ग जिसको धर्म के कर्मकांड के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, इसमें हुए परिवर्तनों को अपने हितों पर हमले के रूप में देखता है, इसीलिए किसी भी प्रकार के परिवर्तनों का निषेध करता है. यही कारण है कि आमूल परिवर्तन के करीबकरीब हर समर्थक को धार्मिक संस्थाओं, व्यक्तियों के विरोध से भी गुजरना पड़ा है.

दुनिया के प्रायः सभी धर्म इन अंतर्विरोधों के शिकार हैं. प्रकट में वे यही ऐलान करते हैं कि उनकी भांति दूसरों को भी परमसत्य की पहचान है. इसीलिए वे एक हैं, एक जैसी नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, उनमें आपसी मतभेद जरा भी नहीं हैं; किंतु सचाई इसके ठीक उलट है. यथार्थ में वहां सिवाय आत्मव्यामोह एवं मतभेद के कुछ भी नहीं है. विशिष्टता के नाम पर वे अपने दायरे को निरंतर संकीर्ण बनाते चले जाते हैं. वहां वैचारिकता कम, अंधानुसरण ज्यादा होता है. इससे ज्ञान की परंपरा के अवरुद्ध होने या अपने लक्ष्य से भटक जाने का खतरा सदैव बना रहता है, जो समय के साथसाथ निरंतर बढ़ता ही जाता है. धर्म की इन्हीं कमजोरियों के कारण आधुनिक समाज की विशेषताओं में उसका स्थान कहीं नजर नहीं आता. हालांकि वह समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले कारकों में से एक है. अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए धर्म स्वयं को नैतिकता के वाहक के रूप में दर्शाने की कोशिश करता रहा है. धार्मिकों द्वारा दर्शन और नीतिशास्त्र को मिलाकर सिद्धांत गढ़े गए. आज भी नीतिशास्त्र को दर्शनशास्त्र के साथ एक विषय के रूप में पढ़ाए जाने का रिवाज है. मेरी दृष्टि में नीतिशास्त्र का जितना संबंध मानवव्यवहारशास्त्र से है, उतना धर्म से नहीं है. खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए नैतिकता का सहारा लेना धर्म की विवशता भी है. परंपरा भी धर्म और नीति को एक ही विषय के धर्म की इसी जकड़बंदी से प्रभावित होकर रूसो को यह कहना पड़ा था किः

मनुष्य आजाद जन्मा हैफिर भी वह हर कहीं शृंखलाओं में कैद है. हरेक मनुष्य स्वयं को दूसरों का मालिक/मास्टर मानता है. जबकि वह गुलामी के पहले से घने दलदल में फंसता जा रहा है.’

जीन जैकुइस रूसो (Jean-Jacques Rousseau) का जन्म 28 जून 1712 को जिनेवा में हुआ था. इसे विडंबना कहें कि संघर्ष की शुरुआत, प्रसव के समय आए बुखार के कारण उसकी मां सुजान बनार्ड रूसो का निधन हो गया. शिशु रूसो उस समय केवल नौ दिन का था. पिता इसाक मामूली घड़ीसाज था. ऊपर से पत्नी की मृत्यु ने उसे गहरी हताशा में डुबो दिया था. उन्हीं दिनों की बात है कि रूसो के पिता का एक फ्रांसिसी कप्तान से झगड़ा हो गया. इससे वह घबरा गया. गिरफ्तारी के भय से उसने हमेशा के लिए जिनेवा छोड़ दिया. मां थी नहीं, पिता भगोड़ा बना गया. ऐसे में बालक रूसो का पालनपोषण किया उसकी मामा और मामी ने. लेकिन मामी निष्ठुरमना स्त्री थी. वह बालक रूसो को हर समय प्रताड़ित करती रहती. बचपन के इन आघातों का रूसो पर गहरा असर पड़ा. मातापिता के प्यार से वंचित रूसो नीरस और उदंड बन गया. सूखा, नीरस, बातबात पर झगड़ पड़ना उसकी आदत, अस्थिरता उसके स्वभाव का हिस्सा बन गई. सामाजिकता के साथ सामंजस्य वह आगे भी कभी नहीं बैठा सका.

विलक्षण प्रतिभा के लक्षण रूसो में बचपन से ही दिखने लगे थे. प्रारंभिक शिक्षा के दौरान उसने कल्विन तथा प्लूटार्क का अध्ययन किया था. सोलह वर्ष की अवस्था में उसने जिनेवा छोड़ दिया और रोजगार एवं जीवन में स्थायित्व की खोज के लिए यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा पर निकल पड़ा. जीविका के लिए उसने कई काम किए. संगीत में उसकी रुचि थी. इसलिए उसने संगीत सीखने का काम भी प्रारंभ कर दिया. फ्रांस पहुंचकर रूसो के जीवन में कुछ ठहराव आया. इसी बीच वह एक धनी स्त्री के संपर्क में आया, जिसका नाम था—फ्रांसकोइस लुइस दि वार्न (Louise de Warens). वार्न आयु में रूसो से बारह वर्ष बड़ी थी. बावजूद इसके दोनों परस्पर प्यार के बंधन में बंध गए. उसके संपर्क में आने के पश्चात रूसो की आस्था परंपरागत धर्म के प्रति बढ़ी और वह स्वयं को कैथोलिक मानने लगा. 1725 में उसने जीविकोपार्जन के लिए लकड़ी पर नक्काशी करने का कार्य शुरू किया, जिसे वह लंबे समय तक न साथ सका. उसके जिनेवा छोड़ते ही सारे कार्य छूटते चले गए. जीवन का भटकाव उसे अनुभव की दृष्टि से समृद्ध बना रहा था. इसी अनुभव ने उसको जीवन को समझने की मौलिक दृष्टि दी. इसके तीन ही वर्ष के पश्चात अनेक देशों की यात्राएं उसने कीं.

सन 1741 रूसो के जीवन का महत्त्वपूर्ण वर्ष सिद्ध हुआ; जब वह पेरिस की यात्रा पर निकला. उन दिनों फ्रांस में बौद्धिक नवजागरण की हवा बह रही थी. अनेक जानेमाने दार्शनिक पेरिस में रह रहे थे, जिनके तर्कों से नए विचारों एवं ज्ञान की की आंधीसी आई हुई थी. पेरिस में रूसो वाल्तेयर, देकार्ते आदि अपने जमाने के प्रतिष्ठित दार्शनिकों से मिला. लेकिन अपनी पहली भेंट के दौरान रूसो उन्हें प्रभावित कर पाने में असफल रहा. इस बीच रूसो की संगीत में रुचि पैदा हुई और उसने संगीत देने और सिखाने का कार्य प्रारंभ कर दिया.

संगीत के अध्ययनअध्यापन के दौरान रूसो ने कुछ नए प्रयोग भी किए थे, जिन्हें वह लोगों के बीच लाना चाहता था. पेरिस यात्रा का उसका उद्देश्य अपने आविष्कार को विज्ञान अकादमी के सेमीनार में प्रस्तुत करना भी था. रूसो ने उस सेमीनार में हिस्सा लिया था, किंतु विड़बना देखिए कि वह वहां भी विद्वानों को प्रभावित कर पाने में वह असमर्थ ही रहा. विद्धानों ने उसके आविष्कार को खारिज कर दिया. रूसो इससे निराश हुआ, किंतु वह आगे प्रयास करता रहा. कुछ ही अर्सा बाद फ्रांस की यात्रा उसके लिए लाभदायक होने लगी. 1743 में रूसो वेनिस पहुंचा तथा वहां के राजदूत के सचिव के रूप में काम करने लगा. एक वर्ष बाद ही वह वापस पेरिस आ गया और इस बार वह थेरेसा लेवाशियर(Thérèse Lavasseur) नामक स्त्री से प्रेम करने लगा. थेरेसा एक नौकरानी थी. दोनों के पांच बच्चे हुए. उन बच्चों के पालनपोषण के लिए रूसो ने उनको चर्च के अनाथालय में भर्ती करा दिया.

आगे के वर्षों में रूसो ने संगीत के क्षेत्र में कई मौलिक कार्य किए. उसने बालमनोविज्ञान को लेकर भी कुछ लेख लिखे, जिनकी वाल्तेयर ने कटु आलोचना की. भरसक प्रयास के बावजूद वह संगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना पाने में असफल ही रहा. परंतु रूसो जैसे प्रतिभाशाली को बहुत दिनों तक इंतजार नहीं करना पड़ा. वह दार्शनिकों एवं बुद्धिजीवियों के संपर्क में आया, जिससे कई विद्वानों तथा दर्शनशास्त्रियों से उसकी दोस्ती हो गई. सन 1749 में रूसो डिर्डाट (Diderot) से मिलने के लिए विंसेनिस की यात्रा पर था. उसी दौरान उसको डिजान एकादमी द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता की सूचना मिली. प्रतियोगिता का विषय था—‘विज्ञान एवं कला की प्रगति क्या सामाजिक शुचिता को निखारती है अथवा यह नैतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है?’ विषय बहुत ही मौलिक किस्म का था और कतिपय जटिल भी. लेकिन रूसो की प्रतिभा को प्रस्फुटन के लिए मानो इसी अवसरी की प्रतीक्षा थी; या फिर सौभाग्य उसके दरवाजे पर खुद आकर दस्तक देने में लगा था. प्रतियोगिता की सूचना मिलते ही वह उछल पड़ा.

उस क्षण की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के बारे में रूसो ने स्वयं लिखा है—

उस समय मैंने अनुभव किया कि हजारों स्फुर्लिंग में भीतर सहसा दमक उठे हों, मस्तिष्क में तरहतरह के विचारों का उद्दाम आवेग उमड़ने लगा. कुछ समय के लिए उसने मेरे दिमाग को भ्रांति के गर्त में ढकेल दिया, जिससे मेरे लिए कोई भी फैसला कर पाना नामुमकिन था. भ्रांति ने मुझे अव्यक्त, अंतहीन तनाव की आग में झोंक दिया था. मुझे लगा कि मेरा दिमाग घूम रहा है और मैं अचेतावस्था के भंवर में बहुत तेजी से धंसता चला जा रहा हूं.’

रूसो ने तत्काल अपना निबंध लिख भेजा. उसके द्वारा लिए गए आलेख का शीर्षक थाµ‘कला एवं विज्ञान पर विमर्श.’ अपने चिंतन को नया रंग देते हुए रूसो ने विषय के नकारात्मक पहलुओं को अपने लेख में उभारा था. अप्रत्याशित रूप से रूसो के उस आलेख को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ, लेख को लेकर खूब वादविवाद हुए. निबंध में रूसो ने तर्क देते हुए अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान की विकास करने की क्षमता पर सवाल उठाए थे. जिन्हें पढ़कर प्रगतिशील नाराज भी हुए. कुछ लोगों को वह लेख विज्ञान और तकनीक के विरुद्ध भी जान पड़ा, तो कुछ लोग तो विज्ञान विरोधी तथा संस्कृति, धर्म, परंपरा आदि के नाम पर यथास्थिति बनाए रखना चाहते है, उन्हें वह लेख अपनी भावनाओं के अनुकूल जान पड़ा. इस बहस के बीच रूसो की ओर विद्वानों का ध्यान जाना स्वाभाविक ही था. वही हुआ, कुछ ही दिनों में उसकी ख्याति पूरे यूरोप में फैल गई.

इससे पहले तक रूसो केवल संगीतशिक्षा के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करना चाहता था. उस लेख से रूसो को एक नई दिशा अनायास ही मिल गई. रूसो देकार्ते से प्रभावित था. उससे अपनी प्रथम मुलाकात का वर्णन करते हुए रूसो ने लिखा है कि जैसे ही उसने देकार्त के कमरे में प्रवेश किया, उसे एक दिव्यानुभूति हुई. देकार्त द्वारा दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में किए गए कार्य को वह अपने समय का सबसे मौलिक अवदान मानता था. तो भी, यहां तक कि देकार्त से वह भेंट रूसो की संगीत के प्रति दीवानगी को कम नहीं कर सकी. विलक्षण प्रतिभा के धनी रूसो ने एक ओर संगीत के क्षे़त्र में नएनए प्रयोग किए, वहीं गंभीर वैचारिक क्षेत्र में भी अपनी मौलिक सोच से समाज को नई दिशा दी.

सम्राट पंद्रहवें लुईस के आग्रह पर सन 1752 में रूसो ने एक नाटक की रचना की, जिसे खूब चर्चा मिली. उसके ठीक दो वर्ष पश्चात यानी 1754 में रूसो पुनः जिनेवा लौट गया. इस बीच बौद्धिक विमर्श के प्रति उसके रवैया में भी बदलाव आया था. इस बार उसका इरादा अपने वैचारिक लेखन को आगे बढ़ाने का था. जिनेवा पहुंचकर उसने दुबारा मार्टिन लूथर के आर्थिक विचारों तथा काल्विनिज्म का गहन अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया तथा वहां की नागरिकता प्राप्त कर ली.

देखा जाए तो यह उसका कायाकल्प था. अगले ही साल उसने एक और महत्त्वपूर्ण कार्य को अंजाम दिया. अपनी नई पुस्तक में रूसो ने समाज में व्याप्त असमानता और उसके कारणों को अपने विवेचनविश्लेषण का आधार बनाया था. पुस्तक का शीर्षक था— ‘सामाजिक असमानता का उद्भव एवं आधार: एक विमर्श. इस निबंध से बौद्धिक जगत में खलबली व्याप गई. फ्रांस सरकार को भी वह आलेख आपत्तिजनक लगा था. 1750 के आसपास ही उसकी पुस्तक ‘फर्स्ट डिस्कोर्स’ (First Discourse) प्रकाशित हुई. यह पुस्तक प्रकाशन के साथ ही चर्चा में आ गई. अभी तक जो लोग रूसो की प्रतिभा को हल्का करके आंक रहे थे, उनकी विचारधारा बदलने लगी. रूसो स्वयं कलाकार था. संगीत का उसको स्तरीय ज्ञान था. बावजूद इसके उसने अपनी पहली पुस्तक में कला एवं विज्ञान के उपयोग की आलोचना की थी. इससे समाजविज्ञानी और प्रगतिशील दोनों ही रूसो के दुश्मन बन बैठे. मगर रूसो की अक्खड़ छवि के कारण स्थिति बिगड़तेबिगड़ते रह गई. रूसो ने स्वयं भी स्वीकार किया था कि—

मैं विज्ञान को दोष नहीं दे रहामैं तो केवल मनुष्यता के पक्ष में सदगुणों की सुरक्षा कर रहा हूं.’

उसी साल अपने अनूठे स्वभाव का परिचय देते हुए रूसो ने मांटमोरेंसी के घने जंगलों में अपना अस्थायी ठिकाना बना लिया तथा एक झोंपड़ी डालकर उसमें अकेला रहने लगा. एकांतवास के दौरान रूसो ने दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की, ये हैं—दि सोशल कांट्रेक्ट [The Social Contract (Du Contrat Social)], तथा ‘एमाइल’ या ‘आन एजुकेशन (Émile, or On Education). आन एजुकेशन में रूसो ने बच्चों के जीवन में आदर्श शिक्षा की उपयोगिता का वर्णन किया था, जबकि ‘दि सोशल कांट्रेक्ट’ के सरोकार व्यापक एवं मानवीय थे. उसमें सामाजिक विमर्श को आगे बढ़ाने का काम किया गया. दोनों ही पुस्तकें रूसो के गहन अध्ययन का परिणाम थीं, उनमें धार्मिक संस्थानों एवं यथास्थितिवाद की पोषक शक्तियों की आलोचना की गई थी. एमाइल में बच्चों की शिक्षा की अपरिहार्यता को दर्शाते हुए वर्तमान परिवेश की आलोचना भी की थी. सोशल कांट्रेक्ट में रूसो की प्रतिभा अपने चरम पर रही होगी. इस पुस्तक के प्रारंभ ही उसने लिखा था कि—

मनुष्य मुक्त जन्मा जरूर है, मगर हर जगह वह बेड़ियों में कैद है.’

इस पुस्तक को बेहद लोकप्रियता मिली. दोनों ही पुस्तकों के बाद रूसो सरकार की आंखों की किरकिरी बन गया. बल्कि बाद की पुस्तकों से तो पूरे समाज में खलबलीसी मच गई. फ्रांस तथा जिनेवा की सरकार दोनों पुस्तकों पर पाबंदी थोप दी. रूसो को इसका लाभ तो अवश्य हुआ, उसकी पुस्तकें धड़ाधड़ बिकने लगीं. इस पुस्तक के आने पर प्रगतिशील के साथसाथ परंपरागत सोच वाले व्यक्ति भी रूसो से नाराज हो गए. लेकिन परिस्थितियों से बिना घबराए, दबावों से डरे बिना ही रूसो ने एक और महत्त्वपूर्ण पुस्तक Profession of Faith of the Savoyard Vicar की रचना की. इस पुस्तक में उसने धर्म के अतार्किक और रूढ़िवादी स्वरूप की आलोचना करते हुए उसको कठघरे में खड़ा किया गया था. जाहिर है कि इससे उन लोगों पर असर पड़ना स्वाभाविक ही था, जो निहित स्वार्थों के लिए धर्म का दुरुपयोग करते आ रहे थे. इस पुस्तक के विरोध में कट्टरपंथी एकजुट होने लगे. उनके दबाव में रूसो को कैद कर लिया गया. उसपर स्विटजरलेंड के बर्न तथा मोंटियार नामक क्षेत्रों में घुसने पर पाबंदी लगा दी गई. यही नहीं गुस्से से बलबला रहे उग्रवादियों ने उसके घर को आग लगा दी.

स्विटजरलेंड में भारी दबाव झेलते हुए रूसो वहां से तंग आ गया था. इससे उसका लिखना बाधित हुआ था. एक दिन उसने जिनेवा फिर छोड़ दिया. वहां से वह इंग्लेंड पहुंचा तथा अपने मित्र डेविड ह्यूम से जाकर मिला. सुप्रसिद्ध दार्शनिक डेविड ह्यूम से रूसो की दोस्ती थी. यह सब होते हुए भी उसने ह्यूम के घर जाकर ही नौकरी की. वहां वह करीब अठारह महीने लगातार रहा. उसी प्रवास के दौरान रूसो ने अपनी एक और चर्चित पुस्तक Constitutional Project for Corsica (Projet de Constitution pour la Corse) नामक पुस्तक की रचना की. इस पुस्तक में भी उसने धर्म को निशाना बनाया था. एक बार फिर प्रगतिशील रूसो के विरुद्ध मोर्चा साधने में लग गए.

करीब चार वर्ष से अधिक एक स्थान से दूसरे स्थान, एक देश से दूसरे देश तक घूमने से वह बोर हो गया था. इससे उसका लेखन भी बाधित हुआ था. अतः जिंदगी को एक पटरी पर लाने के लिए रूसो जिनेवा वापस लौट आया. इसी दौरान उसने थेरेसा से विवाह भी किया. 1770 में रूसो को पेरिस में आने की सशर्त अनुमति मिल गई. जिसके अनुसार उसके लेखन पर पाबंदी लगा दी गई थी. तो भी उसने 1772 में ‘कन्फेशन’ नामक एक पुस्तक पूरी की, लेकिन यह पुस्तक सन 1782 में, रूसो की मृत्यु के बाद ही प्रकाशित हो सकी. 1772 में एक अच्छा अवसर तब आया जब पौलेंड की सरकार ने उसे अपना नया संविधान लिखने के लिए आमंत्रित किया. रूसो का वह राजनीति पर अंतिम कार्य था. लगातार पड़ने वाले सरकारी दबाव तथा लिखने पर पाबंदी ने रूसो को तोड़ कर दिया था. वह हताश और परेशान रहने लगा. लगातार तनाव के कारण वह काफी कमजोरी का अनुभव करने लगा था.

अंततः 3 जुलाई 1778 का वह दिन भी आ गया, जब उस मनुष्यता के सबसे बड़े समर्थक ने अंतिम सांस ली. उस दिन वह प्रातःकाल घूमने के लिए निकला हुआ था कि दिमाग की नसें फटने से उसकी मृत्यु हो गई, रह गया राजनीति और समाजशास्त्र के क्षेत्र में किया गया उसका अनूठा काम जिसने उनीसवीं शताब्दी में पूरी दुनिया को प्रभावित किया.





विचार

एक लेखक और विचारक के रूप में रूसो के वैचारिक अवदान की तुलना माक्र्स तथा फ्रायड से की जा सकती है. वह अठारहवीं शताब्दी का अकेला ऐसा विचारक है जिसने कठिन जीवनसंघर्ष से निकलकर, अपनी प्रतिभा एवं संघर्ष के दम पर अपनी पहचान स्थापित की. वैचारिक ईमानदारी की रक्षा करते हुए उसने जैसा उसको बौद्धिक रूप से जंचा, वैसा ही लिखा. निर्भीक अभिव्यक्ति के कारण अनेक बार कठिनाइयों का सामना किया, उसके लिए निर्वासन और कारावास दोनों ही भोगे, किंतु वह अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहा. उसने जीवन में नैतिकता को सर्वोपरि माना और अपने मौलिक विचारों के दम पर अठारहवीं शताब्दी में मनुष्यता के सबसे बड़े विचारक और प्रचारक के रूप में उभरा. जिसके विचारों से प्रेरणा लेकर उनीसवीं शताब्दी में जनतंत्र और मानवाधिकार आंदोलनों को बढ़ावा मिला.

व्यक्तिवादी चिंतन को बढ़ावा देते हुए रूसो ने मानवाधिकारों के सरंक्षण पर जोर दिया. हालांकि व्यक्तिवादी चिंतन का प्रवत्र्तक वह अकेला और पहला विद्वान नहीं था. उससे पहले जान लाक एवं थामस हाब्स भी व्यक्तिवादी विचारधारा का समर्थन कर चुके थे. हालांकि उन दोनों के विचारों में किंचित भिन्नता थी. हाब्स का कहना था कि मानव स्वभाव विशुद्ध रूप से स्वार्थ से नियंत्रित होता है. इसलिए वह सबसे पहले अपने सुख को महत्त्व देता है. सुख की सुनिश्चतता के लिए उसको समाज में रह रहे अन्य प्राणियों के साथ सतत संघर्ष करना पड़ता है. इस तरह समाज में प्राकृतिक न्याय को अधिमान्यता मिलती है, जिसका आशय है ताकतवर की विजय. हाब्स का विचार मानवतावादी विचारकों को स्वीकार्य नहीं हो सका. विशेषकर उन लोगों को मानवीय संवेदनाओं को ही सबकुछ मानते रहे हैं.

हाब्स की भांति जान लाक भी व्यक्तिवादी विचारधारा का समर्थक था. उसका मानना था कि सभ्यता के बढ़ते क्रम में मनुष्य अपने सुख के लिए सहअस्तित्व को महत्त्व देता है. यह अस्तित्व से यहां आशय है, दूसरों के जीने के अधिकार, उनके फैसला करने के अधिकार, निजी संपत्ति रखने के अधिकार आदि सम्मिलित हैं. रूसो ने हाब्स के ‘आत्मरक्षा हेतु सतत संघर्ष’ के विचार का निषेध किया, किंतु उसने माना कि आत्मरक्षा की भावना मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व एवं उसके व्यवहार को नियंत्रित करने का कार्य करती है. लेकिन उसने यह भी कहा कि बौद्धिक प्राणी होने के नाते मनुष्य पशुवत व्यवहार नहीं कर सकता. समाज को नियंत्रित करने के लिए रूसो ने नैतिकता को आवश्यक और सर्वोपरि माना है.

रूसो ने जान लाक के सहअस्तित्व के सिद्धांत का भी समर्थन किया था. व्यक्तिवादी चिंतन में विज्ञान और कलाओं के महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता. जीवन में विज्ञान और कलाओं की उपयोगिता प्रासंगिकता को लेकर रूसो ने कई सवाल खड़े किए थे. उसने विज्ञान समेत सभी कलाओं यहां तक कि ज्योतिष को भी समाज में असमानता के लिए जिम्मेदार माना था. जिससे परंपरावादी नाराज हो गए.

रूसो राजनीति मानवाधिकार को लेकर गंभीर चिंतन किया है. उसके विचार ‘विज्ञान एवं कला संबंधी विमर्श’ जिसे रूसो का समाजविज्ञान को लेकर पहला गंभीर कार्य माना जाता है, में मौजूद हैं. पहली बार यह पुस्तक सन 1750 में प्रकाशित हुई थी, जिसमें रूसो ने विज्ञान एवं कलाओं को सामाजिक असमानता का कारक मानते हुए जीवन में उनकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए थे. आगे चलकर उसने ‘सामाजिक असमानताः उद्भव एवं मूल स्थापनाओं पर विमर्श’ नामक एक लंबा निबंध लिखा जिसको उसने उसी दुजोन संस्था द्वारा आयोजित प्रतियोगिता को भेजा, जिसने उसके पिछले लेख को पुरस्कृत किया था. उस लेख की काफी चर्चा हुई थी. किंतु इस बार रूसो को निराश होना पड़ा. अपने दूसरे आलेख में रूसो ने सामाजिक असमानता के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक कारणों का विवेचन करते हुए, एक समरस समाज की संकल्पना की थी.

रूसो का आग्रह सहजप्राकृतिक जीवन को अपनाने पर था. उसका आग्रह था कि मनुष्य अपनी आत्मसत्ता को पहचाने तथा दूसरों की जीवन एवं सम्मान की रक्षा करते हुए नैतिक आचरण पर जोर दे. जीवन में नैतिकता एवं मानवमूल्यों की स्थापना के लिए वह व्यक्तित्व की शुभता को निखारने पर बहुत जोर देता था. रूसो की प्रसिद्ध कृति ‘सोशल कांट्रेक्ट’ में उसके धर्म, राजनीति संबंधी विचार आए हैं. उसकी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘दि एमाइल’ (Émile, or On Education) अथवा शिक्षा है. जिसमें उसने स्त्री शिक्षा एवं समानता बच्चों की शिक्षा आदि समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक विषयों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है.

गौरतलब है कि अठारहवीं शताब्दी के दौरान यूरोपीय समाज में स्त्री की अवस्था अत्यंत दयनीय थी. हालांकि औद्योगिकीकरण, नई शिक्षा एवं वैचारिक चेतना के चलते समाज में समाजवादी विचारों का आगमन हो चुका था. व्यक्तिस्वातंत्रय एवं नैतिकता आदि विषयों पर गंभीर काम हो रहा था. बावजूद इसके समाज में सामंती विचारधारा के अवशेष बाकी थे. ‘दि एमाइल’ में रूसो ने स्त्री आधिकारिता पर विचार किया. इसी पुस्तक में उसने बच्चों की शिक्षा तथा उनके अधिकारों के संरक्षण पर जोर दिया है. बालसंरक्षण संबंधी विचारों को लेकर रूसो के सिद्धांत एवं व्यवहार के बीच मौजूद विरोधाभास भी सामने आते हैं. जैसे कि एक ओर तो उसने बच्चों के अधिकार एवं उनकी विधिवत शिक्षा पर काफी जोर दिया है. मगर दूसरी ओर विसंगति देखिए कि अपने ही पांच बच्चों को उसने एक बालगृह के हवाले कर दिया था. हालांकि कथनी और करनी के बीच का यह अंतर अकेला नहीं है. दुनिया के अनेक महापुरुष ऐसे हुए हैं, जिनका आचरण उनके अपने ही सिद्धांतों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता.

रूसो की मनुष्यता में गहरी आस्था थी. उसका मानना था कि मनुष्य अपनी मूल प्रकृति से अच्छा होता है. लेकिन परिस्थितियां कभीकभी उसे विवश कर देती हैं कि वह ऐसा कार्य भी करे जो वह सामान्य स्थितियों में बिलकुल भी करना नहीं चाहता. मानव समाज को लेकर रूसो का मानना था कि सभ्यता के पहले मनुष्य एक विनम्र जंगली के समान था. मगर सामाजिकीकरण की प्रक्रिया ने मनुष्य को चतुराई से काम लेना, दूसरों को धोखा देकर अपना काम निकालना सिखाया है. मानवेच्छाओं का वर्गीकरण करते हुए उसने लिखा है कि—

सबकी इच्छा तथा सामान्य इच्छा में सामान्यतः अंतर होता है. सामान्य इच्छा आमतौर पर समूह के सदस्यों की सामान्य अभिरुचि अथवा अभिरुचियों को दर्शाती है. जबकि सबकी इच्छा से ताकत और दबाव के संकेत उभरते हैं.’

रूसो के इस कथन से लोकतंत्र के प्रति उसकी आस्था के संकेत मिलते हैं. संभवतः सामाजिक असमानता एवं विपन्नता के शिकार व्यक्तियों को देखकर ही रूसो ने कहा था कि—

मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन उसके लिए बंधन प्रत्येक स्थान पर हैं.’

आगे चलकर मानवमूल्यों के पक्षधर विद्वानों के लिए रूसो का यही वाक्य प्रेरक एवं मागदर्शक बना, जिसने उनीसवीं शताब्दी के मानवतावादी आंदोलनों के लिए सूत्रवाक्य का कार्य किया.

विज्ञान और कलाओं की जीवन में उपयोगिता को लेकर रूसो का मानना था कि केवल विज्ञान तथा कलाओं के विकास द्वारा मनुष्य के स्वभाव तथा उसके नैतिक चरित्र में कोई सुधार नहीं लाया जा सकता. मानवीय आचरण में सुधार लाने के बजाय वे असमानता, सुस्ती तथा विलासिता को बढ़ावा देता है. जिससे धन का केंद्रण समाज के एक ही स्थान होने लगता है. धन का एक ही स्थान पर ठहराव सामाजिक असमानता का कारण बनता है, यह स्थिति आगे आने वाले दिनों में वर्गविभाजन को प्रश्रय देती है. विज्ञान की आलोचना करते हुए एक स्थान पर रूसो ने यहां तक लिखा है कि—

यदि विज्ञान सचमुच कुछ अच्छा करने में सक्षम होता है, यदि वह मनुष्य को अपने देश की आजादी के लिए खून बहाना सिखाता है, यदि वह उनके साहस को ऊंचाइयों तक ले जाता है, तब तो प्रौद्योगिकी संपन्न देशों के लोगों को बुद्धिमान, साहसी तथा चिंतामुक्