बहुजन साहित्य : सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध मोर्चा

मिलावट बुरी बात है. ज्ञान की खूबी है कि वह हर मिलावट का पर्दाफाश कर देता है. इसलिए इस देश में ज्ञानी को हमेशा सिर-माथे लिया गया है. सैंकड़ों ग्रंथ उनके अवदान और प्रशस्तियों से भरे पड़े हैं. बावजूद इसके ज्ञान ही है, जिसमें सर्वाधिक मिलावट पाई जाती है. धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्रीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ ज्ञानियों ने इस क्षेत्र में इतना घोटाला किया है कि झूठ और सच का पता लगाना चुनौती बन जाता है. खासकर उसके लिए जो ज्ञान पर मानव-मात्र के अधिकार का समर्थक है; तथा उसे मनुष्यता के हक में इस्तेमाल करना चाहता है.

लेख का शीर्षक सैकड़ों सवाल उठाने वाला है. प्रतिक्रियावादियों के लिए एक और मौकाᅳ‘अरे! दलित साहित्य तो था ही, अब ओबीसी साहित्य भी! आखिर क्यों? कौन हैं ये लोग जो देश और समाज को बांटने पर तुले हैं! उन्हें पता होना चाहिए कि साहित्य और साहित्यकार की कोई जाति नहीं होती! संपूर्ण मनुष्यता उनकी जद में होती है! उसपर ये सिरफिरे हैं कि साहित्य को बांटने की जिद ठाने हैं. जातिवाद फैला रहे हैं! छिः!! ये प्रतिक्रियाएं उनकी होंगी जो वर्षों से जाति की मलाई मारते आए हैं. जिन्हें सुधार के नाम से ही चिढ़ है. जातिवाद जिनकी रग-रग में भरा है. उसपर पर्दा डालने के लिए कभी धर्म का सहारा लेते हैं, कभी राष्ट्रवाद का. जो खुद को दूसरों से बहुत-बहुत ऊपर मानते हैं. जिनके मन में समाज को हजार-दो हजार वर्ष पीछे ले जाने का षड्यंत्र हमेशा चलता रहता है. उसके लिए उन्हें चाहे जो करना पड़े. संयोग से इन दिनों माहौल उनके अनुकूल है. इसलिए इस बार उनके तेवर कुछ अलग हो सकते हैं.

आलोचना पूरी तरह हवा में हो यह बात भी नहीं है. ठीक है, बहुजन में समाजार्थिक रूप से पिछड़ी और दलित जातियां आती हैं. यह भी कि देश में उनका कोई एक स्वरूप नहीं है. उनकी सूची प्रदेशानुसार बदलती रहती है. सरकारी योजनाओं की बात अलग है, परंतु साहित्य में जिसका रूप ही समावेशी होता हैᅳयह कैसे माना जा सकता है कि किसी एक प्रदेश में जाति-विशेष के साहित्यकार को ओबीसी की श्रेणी में लिया जाए और दूसरे प्रदेश में उसी जाति के साहित्यकार को छोड़ दिया जाए? अगर ऐसा हुआ तो जाति का प्रश्न और गहराएगा. उस समय साहित्य के नाम पर जातिवाद फैलाने के आरोप से कैसे बच पाएंगे? विशेषकर तब जब जातिवाद के विरुद्ध जंग, साहित्य और साहित्यकार दोनों का पहला संकल्प हो. लेकिन प्रदेशवार जातियों के बदलने की समस्या तो दलित साहित्य के साथ भी है. वहां इस तरह के सवाल नहीं उठते. क्यों? इसलिए कि ‘दलित साहित्य’ जाति के बजाय उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों की बात करता है. वर्ग के रूप में ही वह करोड़ों लोगों की अस्मिता और अधिकारों के संघर्ष को विमर्श के केंद्र में ले लाता है. ‘ओबीसी’ स्वयं एक वर्ग है. लेकिन इस वर्ग में आने वाले लोगों के जातीय पूर्वाग्रह इतने प्रबल रहे हैं कि खुद को वर्ग के रूप में देखने की प्रवृत्ति बन ही नहीं पाई. जबकि वर्ग-भेद का दंश पिछड़ों ने उतना ही झेला है, जितना दलितों ने. ब्राह्मण ग्रंथों में जो प्रतिबंध अंतज्यों पर लगाए गए हैं, लगभग वही शूद्र के लिए भी हैं. केवल पेशे के कारण दोनों में वर्ग-भेद पैदा किया गया है.

ओबीसी सरकार द्वारा घोषित श्रेणी है. इस शब्द में वैसी कशिश नहीं है, जैसी इसके समानधर्मा ‘दलित’ में है. ‘दलित’ संबोधन के साथ-साथ दमित तथा दमनकारी जातियों, वर्गों की याद बरबस आ जाती है. तब क्या ओबीसी साहित्य का विचार छोड़ देना चाहिए? परंतु यह तो देश की आधी से अधिक जनता के हितों को लेकर विमर्श की जो संभावना बन रही है, उसपर पानी फेर देने जैसा काम होगा. काम इतना आसान भी नहीं है. चुनौती शून्य को सागर का विस्तार देने की है. सिर्फ साहित्यकारों द्वारा यह संभव नहीं. ‘ओबीसी साहित्य’ के विचार को सफल बनाना है तो उसके अंदर सम्मिलित जातियों में वैसी चेतना भी पैदा करनी होगी जिससे वे स्वयं को वर्ग के रूप में देख और महसूस कर सकें. यानी कुछ ऐसा हो कि ‘ओबीसी साहित्य’ का नाम आते ही वर्गीय शोषण, उत्पीड़न, दैन्य के साथ-साथ उनके कारणों तथा उन संघर्षों की तस्वीर भी आंखों में तैर जाए जो उन्होंने खुद को दैन्य और दुर्दशा से बाहर लाने हेतु किए हैं. न केवल उन लोगों की आंखों में जो जाने-अनजाने उनके पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार रहे हैं, बल्कि उन लोगों की आंखों में भी जो ‘पिछड़ेपन’ को अपना भूत-भविष्य-वर्तमान मानकर हिम्मत हार चुके हैं. अपनी तरह से साहित्य भी यह काम कर सकता है. करेगा ही. यही इस विमर्श का उद्देश्य है. परंतु इसके लिए उसे आंतरिक और बाह्यः चुनौतियों से साथ-साथ गुजरना पड़ेगा.

भारत में दलित आंदोलन की लंबी परंपरा है. पूरी संत-परंपरा एक तरह से उनका समर्थन करती है. उन आंदोलनों का संबंध सामाजिक आधार पर पिछड़े वर्गों में से भी था. लेकिन अशिक्षा और वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़े उनसे कम ही प्रभावित हुए. दोष पिछड़ी जातियों का भी है. उन्होंने स्वयं यह भुला दिया कि जिन्हें आज पिछड़ा माना जाता है, उन्होंने प्राचीनकाल में अनेकानेक अगड़े चिंतक इस देश और समाज को दिए हैं. रैक्व, पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल, सति, कौत्स, अजित केशकंबलि, महीदास, उपालि, महामोग्गलायन जैसे पिछड़े वर्ग के चिंतकों की लंबी शृंखला है. कमी ज्ञान को सहेजने तथा उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वालों की रही. नतीजा यह हुआ है कि हम पुरावैदिक काल से बुद्धकाल तक के अनेक विचारकों के अवदान, यहां तक कि उनके नाम से भी अपरिचित हैं. सत्ता और धर्म के गठजोड़ ने उस ज्ञान को जो उनकी परंपरा और संस्कृति के प्रति विरोध दर्ज कराता था, हर तरह से मिटाने की कोशिश की है. उनका छिटपुट उल्लेख बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में है; जो स्वयं ब्राह्मण धर्म के विरोध में जन्मे थे. चूंकि उनके प्रवर्त्तक क्षत्रिय कुलोद्भव थे, इसलिए स्वयं ब्राह्मणों ने उनके दर्शन को सहेजने के लिए समर्पित कर दिया. इसके पीछे उनके वर्गीय स्वार्थ भी थे. ब्राह्मणों लेखकों ने बौद्ध धर्म के तेज को कम करने, उसका ब्राह्मणीकरण करने का षड्यंत्र किया. ‘दीघनिकाय’ में बुद्ध जादू-टोने, सम्मोहन आदि का विरोध करते हैं. परंतु उत्तरवर्ती बौद्ध-ग्रंथों में वे स्वयं जादू-टोना करते दिखाई पड़ते हैं. षड्यंत्र के चलते ही बुद्ध को विष्णु के अवतारों में जगह दी गई.

वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़ों ने दलितों के साथ ठीक वही व्यवहार किया जैसा सवर्ण उनके साथ करते आए थे. इसका नुकसान दलितों को कम, पिछड़ों को अधिक हुआ. परिवर्तन के दौर में दलित बहुत जल्दी यह समझ गए कि उनके उद्धार के लिए कोई मसीहा आसमान से उतरने वाला नहीं है. ‘अप्प दीपो भव’ᅳकी भावना के अनुरूप उन्होंने ठान लिया कि जो करना है, स्वयं करना होगा. दासता ग्रंथि से ग्रसित पिछड़े देर तक अगड़ों से उम्मीद पाले रहे. बहुसंख्यक होने के बावजूद उन्होंने अपनी शक्तियां जातीय मतभेदों में फंसकर गंवा दीं. ओबीसी साहित्य को विमर्श का विषय बनाते समय सबसे पहली चुनौती लेखकों, साहित्यकारों और पाठकों के मन में यह विश्वास जगाने की होगी कि ‘ओबीसी’ केवल जातीय समूह न होकर एक वर्ग है. उन शिल्पकारों, कर्मकारों और मेहनतकशों का वर्ग जिसने अपने श्रम-कौशल द्वारा शुरू से आजतक मानवीय सभ्यता को संवारने का काम किया है. इसके लिए उन्हें अपने  सुख और सम्मान दोनों की बलि चढ़ानी पड़ी है. ब्राह्मणवाद के जितने शिकार वे हैं, उनसे कहीं अधिक दुख-दर्द दलितों को झेलना पड़ा है, इसलिए जाति और वर्चस्ववाद के विरुद्ध संघर्ष में दलित उनके वास्तविक सहयोगी हैं.

 पूंजीवाद की आलोचना में प्रायः कहा जाता है कि वह श्रमिक से उसके श्रम और शिल्पकार से शिल्पकर्म के मूल्य-निर्धारण का काम छीन लेता है. अपनी ओर से उसकी न्यूनतम कीमत तय कर, मजदूरों और शिल्पकर्मियों का शोषण करता है. उस समय मान लिया जाता है कि शिल्पकारों और श्रमिकों का शोषण आधुनिक या उदार अर्थव्यवस्था की देन है. जबकि प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में अल्प ही सही, इन वर्गों को अपने श्रम के मूल्य को लेकर मोल-भाव करने के अधिकार रहता है. देर-सवेर विकल्प भी मौजूद होते हैं. अन्याय के विरोध में न्यायालयों और अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. भारतीय संदर्भ में श्रमिक से उसके श्रम के मूल्यांकन का अधिकार छीन लेना केवल, पूंजीवाद की करतूत नहीं है. यहां यह काम बहुत पहले श्रम-विभाजन के नाम पर जातिप्रथा के माध्यम से शुरू हो चुका था. विराट पुरुष का रूपक अपने आप में इसका गवाह है. वह शारीरिक श्रम की तुलना में बौद्धिक श्रम को वरीयता देता है. रूपक के माध्यम से बताया यह जाता है कि शिखर पर मौजूद लोग अपने ज्ञानानुभव का उपयोग लोक-कल्याण के लिए करेंगे. लगभग ऐसी ही कामना है, जैसी प्लेटो ने दार्शनिक राज्य के रूप में ‘रिपब्लिक’ में की थी. वहां अरस्तु जैसा जागरूक विद्धान था. वह नैतिकता को श्रेष्ठ शासन की अनिवार्य शर्त मानता था. इसलिए अपने गुरु के प्रति संपूर्ण मान-सम्मान के बावजूद उसने दार्शनिक राज्य के सुझाव को अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था. भारतीय मनीषियों को अपनी दर्शन-परंपरा पर गर्व रहा है. परंतु यहां दर्शन को या तो पुस्तकों तक सीमित रखा गया, अथवा वानप्रस्थी आश्रम के लिए छोड़ दिया. बाकी सब जगह धर्म ही हावी रहा है. यहां जो बौद्धिक सत्ता थी, असल में वह धर्मसत्ता ही थी. निहित स्वार्थ के लिए यहां आस्था पर जोर दिया गया. परिणामस्वरूप धर्म की आलोचना करना, उसके ऊपर सवाल खड़े करना असंभव-सा हो गया. जिन लोगों ने ऐसा करने की कोशिश की, उन्हें शूद्र और धर्म-विरोधी कहकर नकार दिया गया. चुनौती के अभाव में शिखरस्थ ब्राह्मण अपने बुद्धि-विवेक का उपयोग केवल स्वार्थ-सिद्धि हेतु करने लगे. इसके लिए उन्होंने हर कानून, हर सिद्धांत की मनमानी व्याख्याएं कीं; यहां तक कि अपने ही रचे शास्त्रों को खूब तोड़ा-मरोड़ा. पुरोहितों का जनता पर प्रभाव था. वे जनता को कभी भी राज्य के विरुद्ध उकसा सकते थे. इसलिए राजाओं की हिम्मत न थी कि उनका विरोध कर सकें.

जनता पर पकड़ के चलते पुरोहित वर्ग को प्रसन्न रखना राजा के लिए जरूरी हो गया. इसका अंदाज उसे मिलने वाले वेतन और दूसरी सुविधाओं से लगाया जा सकता है. पुरोहितों और ब्राह्मणों को गांव के गांव दान में देने की परंपरा थी. मौर्य शासन के दौरान उसे राज्य के खजाने से सेनापति और अमात्य के बराबर 48000 पण मासिक वेतन मिलता था. जबकि कुशल शिल्पकार का मासिक वेतन मात्र 120 पण था. इससे उस कालखंड में शिल्पकारों जिन्हें वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्रों में स्थान मिला हैᅳकी दुर्दशा का अनुमान लगाया जाता है. यह तब है जब राज्य की आर्थिक समृद्धि का भार पूरी तरह से श्रमिकों और शिल्पकारों के कंधों पर था. जाहिर है शारीरिक श्रम की अनदेखी करना या उसे बौद्धिक श्रम से कमतर आंकना प्राचीनकाल से ही आरंभ हो चुका था. चाणक्य के अर्थशास्त्र और मनुस्मृति में इस बात की व्यवस्था की गई थी कि वर्ण-व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर रखे गए लोग कभी आर्थिक रूप से स्वावलंबी न होने पाएं. यदि वे आर्थिक स्तर पर आत्मनिर्भर हो जाएंगे तो ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए भोजन या नाम मात्र की वृत्तिका पर रात-दिन मेहनत करने वाले लगभग मुफ्त के सेवक कहां से आएंगे! मनुस्मृति तो ब्राह्मणों को यहां तक अधिकार देती है कि वे शूद्र के पास धन इकट्ठा न होने दे. यदि किसी तरह से शूद्र धन अर्जित कर ले तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया था कि उसपर बलात् कब्जा कर ले. इसके लिए अर्थशास्त्र में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को परस्पर मिलकर काम करने की सलाह दी गई. कहा गया कि दोनों के हित परस्पर जुड़े हैंᅳ‘ब्राह्मण की सहायता के बिना क्षत्रिय आगे नहीं बढ़ता और क्षत्रिय की मदद के बगैर ब्राह्मण की उन्नति असंभव है. दोनों मिल-जुलकर रहें तभी लोक-परलोक में सुख प्राप्त कर सकते हैं’(नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्मवर्धते. ब्रह्मक्षत्रं च संप्रक्तंमिह चामुत्र वर्धतेमनुस्मृति 9/322). शिखर पर बने रहने के लिए एक दूसरे को समर्थन देने, पारस्परिक हितों की रक्षा करने की नीति आगे चलकर मिथ का रूप ले लेती है. जिसमें तीन प्रमुख देवता इस तरह एक-दूसरे महिमा-मंडन करते रहते हैं कि व्यक्ति भ्रम से बाहर आ ही नहीं पाता. इसी तरह स्वार्थ के आधार पर संगठित तीन शीर्षस्थ वर्ग असंगठित जनसमाज को परस्पर उलझाए रखते हैं.

ब्राह्मण ग्रंथों में शूद्र को विपन्न बनाने, उन्हें आर्थिक-सामाजिक रूप से पराश्रित बनाए रखने की अचूक प्रावधान किए गए हैं. लेकिन आवश्यकतानुसार इस नियम में संशोधन भी होता रहा है. कौटिल्य पूर्व भारत में ब्राह्मण ग्रंथ शूद्रों को शस्त्र उठाने की अनुमति नहीं देते. माना जाता था कि ब्राह्मण सर्वाधिक तेजवंत होता है. तेज की प्रधानता के अनुसार सेना में शूद्र के बजाय वैश्य को, वैश्य के बजाय क्षत्रिय को और क्षत्रिय के बजाय ब्राह्मण को भर्ती किया जाना चाहिए(अर्थशास्त्र, 9/2/21). चाणक्य का यह सोच अपने पूर्ववर्ती ब्राह्मण आचार्यों जैसा ही था. परंतु परिस्थितियां उसके साथ नहीं थीं. मौर्यकाल में देश पर यवनों के आक्रमण होने लगे थे. अकेले क्षत्रियों से जिनकी अधिकांश ऊर्जा और शक्ति आपस के युद्धों में क्षीण होती रहती थी, देश की सुरक्षा असंभव थी. पुरोहिताई करते-करते ब्राह्मण सत्ता-सुख के अभ्यस्त होने लगे थे. चुनौतियों के बीच शूद्र के युद्ध में भाग लेने संबंधी नियम में संशोधन आवश्यक हो जाता है. ब्राह्मण को युद्ध क्षेत्र से दूर रखने के लिए कौटिल्य अजीब-सा तर्क देता है, जिसे पढ़कर हंसी आने लगती है. उसके अनुसार ब्राह्मण स्वाभावतः उदार होता है, इसलिए ‘शत्रु दंडवत कर युद्धभूमि में उसे पटा लेगा.’(प्राणिप्रातेन ब्राह्मणबलं पराऽभिहारयेत, अर्थशास्त्र 9/2/23). परंपरा अनुमति देती तो कौटिल्य कदाचित कहता कि युद्ध करना ब्राह्मण का धर्म ही नहीं है. चूंकि वह पुरोहिताई में रम चुके ब्राह्मणों की कमजोरी से भली-भांति परिचित था, इसलिए बजाए ‘तेजवंत’ ब्राह्मणों के आपत्काल के नाम पर शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट देता है. इसके लिए उसके तर्क चतुराई-भरे हैंᅳ‘विनयशील ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों की सेना श्रेयस्कर है. संख्याबल में अधिक होने के कारण वैश्य-शूद्रों को सेना में भर्ती किया जाना चाहिए’(प्रहरण विद्याविनीतं तु क्षत्रियबलं श्रेयः बहुलसारं वा वैश्यशूद्रबलंमिति, अर्थशास्त्र 9/2/24). वेदादि ग्रंथ ब्राह्मणों के युद्ध-प्रेम तथा युद्ध के दौरान उनके द्वारा बरती गई क्रूरता के उदाहरणों से भरे पड़े हैं. परशुराम जैसे ब्राह्मण का भी महिमामंडन है जिसके बारे में बताया गया है कि वह पृथ्वी को कही बार क्षत्रीय-विहीन कर चुका था. इन सब शौर्यगाथाओं(!) के बावजूद वह ब्राह्मणों को युद्ध क्षेत्र से दूर रखना चाहता है तो इसकी दो संभावनाएं हो सकती हैं. पहली, सत्ता-सुख में लिप्त, पुरोहिताई में रमे ब्राह्मण अपना युद्ध-कौशल गंवा चुके थे. दूसरी, उसे लगता था कि प्रशीक्षित यवन-सेना के मुकाबले ब्राह्मणों को खतरे में डालने से उचित था, शूद्रों को उनके आगे झोंक दिया जाए. कौटिल्य की ब्राह्मणों को युद्धक्षेत्र से दूर रखने की सलाह को ‘अर्थशास्त्र’ के पांचवे अध्याय की एक व्यवस्था से जोड़कर देखा जाए तो उसकी नीयत साफ नजर आने लगती है. उसमें वह राजा को सलाह देता हैᅳ‘कोष की कमी होने पर पाषंडसंघों(संभवतः बौद्ध संघों) के द्रव्य को, श्रोत्रिय के उपयोग में न आने वाले देवमंदिर के धन को एक जगह बटोरकर राजकोष में हथिया लेना चाहिए’(अर्थशास्त्र 5/2/38, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, डॉ. रामविलास शर्मा, पृष्ठ-195). आगे वह कहता है, ‘देवताध्यक्ष दुर्ग और राष्ट्र के धन के देवमंदिरों का धन एकत्रित करेगा फिर उनका अपहरण करेगा’(वही). वह जानता था कि ब्राह्मण देवमंदिरों और बौद्ध संघों में जमा धन के अपहरण हेतु एकाएक तैयार न होंगे. अतः ऐसे अलोकप्रिय कार्य के लिए वह शूद्रों और वैश्यों की सेना बनाने की सलाह देता है. ताकि ब्राह्मणों को क्षमा, धृतिशील और विनम्रता की प्रतिमूर्ति सिद्ध किया जा सके. कहने की आवश्यकता नहीं कि कौटिल्य द्वारा गढ़ी गई ब्राह्मणों की यह छवि आगे चलकर सत्ता से निकटता बनाए रखने में बहुत सहायक सिद्ध हुई.

कौटिल्य मजबूत केंद्र का समर्थक था. राज्य की मजबूती के लिए वह शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट तक देता है. राजकोष में किसी प्रकार की कमी न हो, इसलिए धर्मालयों में आए चढ़ावे को राज-कल्याण के नाम पर उपयोग करने का नियम बनाता है. मनु वर्णाश्रम धर्म को लेकर इतना उदार नहीं था. शूद्रों और वैश्यों को लेकर जो डर कौटिल्य को था, मनु का डर उससे कहीं ज्यादा बड़ा था. डर यह कि यदि शूद्रों को युद्ध में जाने का अवसर मिला, तो युद्ध-कौशल में प्रवीण शूद्र अपने संख्याबल के आधार पर, क्षत्रियों और ब्राह्मणों के मुकाबले बड़ी आसानी से युद्ध जीत सकते हैं. इसलिए वह वर्णाश्रम व्यवस्था के कड़े नियम बनाकर समस्त संभावनाओं का पटाक्षेप कर देता है. इसका असर शताब्दियों तक रहता है.

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि शूद्रों ने मनु की व्यवस्था को ज्यों का त्यों मान लिया था और वर्णाश्रम व्यवस्था का कोई विरोध था ही नहीं. ब्राह्मण ग्रंथों में विरोध का कोई उल्लेख नहीं है. उन्हें पढ़कर लगता है कि शूद्रों उस व्यवस्था के प्रति पूर्णतः समर्पित थे और उनकी ओर से विरोध जैसी कोई बात न थी. वास्तविकता यह है कि उस समय भी समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवाद के प्रतिकार में खड़ा था. बल्कि यह कहना अथिक सार्थक होगा कि ब्राह्मण धर्म का प्रभाव सीमित लोगों तक था. ‘ब्रह्मजालसुत्त’ में बुद्ध ने अपने समकालीन 62 दार्शनिक सिद्धांतों के बारे में बताया है. उनमें कम से कम चार नास्तिक परंपरा के दर्शन हैं. दूसरी ओर जैन प्राकृत ग्रंथ ‘सूत्रकृतांगसुत्त’ के आधार पर बनाई गई सूची में 363 विभिन्न प्रकार के दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है. उनमें 183 नास्तिक परंपरा के, 84 अक्रियावादी, 67 संशयवादी तथा 32 वैनायिकः(आजीवक) सम्मिलित हैं. बाकी 180 को क्रियावादी कहा गया है(अर्ली बुद्धिस्ट थ्योरी ऑफ नॉलिज, कुलित्स नंद जयतिलके, पृष्ठ 116). इससे सिद्ध होता है कि लोगों में श्रमण-परंपरा के दर्शनों पर ज्यादा विश्वास था. समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवादी विचारधारा की पकड़ से बाहर था. आगे चलकर लोकायत, चार्वाक, आजीवक, श्रमण, बौद्ध और जैन दर्शनों को मिली ख्याति इसी का परिणाम थी. ‘शांतिपर्व’(59/97) में पर्वतों और वनों में रहनेवाले निषादों और मलेच्छों का वर्णन है, जो तत्कालीन वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों के लिए चुनौती बने हुए थे. बेशम के अनुसार गंगातट के सभी प्रमुख नगरों में आजीवकों की बस्तियां थीं. आजीवक धर्म का प्रभाव समाज के सभी वर्गों, विशेषरूप से उन्नतिशील व्यापारी समुदाय के बीच था.’(बेशम, हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रीन ऑफ आजीवक्स, पृष्ठ 133-134). पोलसपुरवासी सदलपुत्त नाम के एक कुम्हार का उल्लेख जैन ग्रंथों में मिलता है. वह 500 कुम्हार परिवारों का मुखिया था. उसके अधीन नावों का बेड़ा था, जो पूरी गंगा तट पर फैला हुआ था. जैन और बौद्ध ग्रंथों में कांपिल्यपुरवासी करोड़पति महाश्रेष्ठि कुंदकोल्यि का भी उल्लेख है. उसके पास अकूत स्वर्ण-संपदा और पशुधन था. वह आजीवकों का समर्थक था. इस तरह के और भी कई प्रमाण है जो दिखाते हैं कि ब्राह्मणधर्म के विकास के आरंभिक चरण में अधिकांश शूद्र अनीश्वरवाद में भरोसा रखते थे. कालांतर में उन्हीं का एक हिस्सा बौद्ध और जैन धर्मों की ओर आकृष्ट हुआ था.

‘पंचविश ब्राह्मण’ पूर्ववर्ती ब्राह्मण ग्रंथों में से है. उसके अनुसार शूद्र का जन्म उस समाज में हुआ जहां ईश्वर का अस्तित्व नहीं माना जाता था. वहां यज्ञ का आयोजन भी नहीं होता था. परंतु उनके पास बहुत-से मवेशी रहते थे.’(पंचविश ब्राह्मण 6,1,2). बेशम ने ऐसे कुंभकार परिवार का उल्लेख किया, जो मालिक की ज्यादतियों के विरोध में उठ खड़ा होता है. उन दिनों शूद्र कामगारों के विरोध का सबसे प्रचलित तरीका था, काम छोड़कर चले जाना. एक जातक के अनुसार लकड़कारों की एक बस्ती को काम करने के लिए पहले ही भुगतान कर दिया गया था. किसी कारणवश वह समय पर काम पूरा नहीं कर सका. जब उसपर बहुत ज्यादा दबाव डाला गया तो लकड़हारे ने अपने परिवार के साथ मिलकर चुपचाप एक नाव बनाई और पूरा परिवार रातों-रात बस्ती खाली कर वहां से कूंच कर गया. वे लोग गंगा नदी के साथ-साथ चलते हुए समुद्र तक पहुंचे. समुद्र के भीतर भी उस समय तक चलते रहे जब तक उन्हें उपजाऊ द्वीप नहीं मिल गया.(शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा, पृष्ठ 130). मनु ने बौद्धों तथा वर्णाश्रम व्यवस्था का विरोध करने वाले आजीवकों को वृषल (शूद्र) की संज्ञा दी है. बेशम के अनुसार वायुपुराण जो गुप्तकाल का ग्रंथ है, के आसपास आजीवकों को शूद्र मान लिया गया था. ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि ब्राह्मणों ने हर उस व्यक्ति या समुदाय के सदस्य को शूद्र मान लिया था, जो उनके धर्म तथा श्रेष्ठत्व को चुनौती देता था.

मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी कि वह केवल उन्हीं बातों को गंभीरता से लेता है जिनका सत्ता से निकट-संबंध हो. ब्राह्मणों को इसी का लाभ मिला. बुद्ध और महावीर भी भली-भांति समझते थे कि प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है. इसलिए अपने धर्म-दर्शन को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने सत्ता का भली-भांति इस्तेमाल किया. बुद्ध ने जाति-आधारित असमानता का विरोध किया था. लेकिन जाति और वर्ग संबंधी ऊंच-नीच, दासप्रथा से उन्हें बहुत अधिक शिकायत न थी. उनके सारे प्रवचन या तो किसी सम्राट की पहल पर होते थे अथवा श्रेष्ठि के उपवन में. अपने विशेषाधिकारों के साथ ब्राह्मण भी सदैव सत्ता के निकट बने रहे. जितना उनसे बन पड़ा, उन्होंने ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सत्ता से दूर रखने की भरपूर कोशिश की. सीता की ‘अग्निपरीक्षा’ का उल्लेख रामायण में है. वर्षों पूर्व मध्यभारत के किसी ऐसे तालाब के बारे में कहीं पढ़ा था, जिसे नए ग्रंथों की परख के लिए इस्तेमाल किया जाता था. उसके लिए पांडुलिपि को बजाय उसके अध्ययन के ‘पवित्र तालाब’ के सुपुर्द कर दिया जाता था. जो पोथी डूब जाती, उसे व्यर्थ मान लिया जाता था. लेख में बताया गया था तैर न पाने के कारण लगभग पांच हजार पांडुलिपियां उस तालाब में समाई हुई थीं. बाद में तालाब को मिट्टी से पाटकर उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया गया. यह पुरोहित वर्ग की मौलिक ज्ञान के प्रति असहिष्णुता का उदाहरण है. पुराणों और महाकाव्यों में उसने बातों का जो बबंडर खड़ा किया है, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए हीगेल ने कहा थाᅳ

‘भारतीयों के पास राजाओं की कतार है, असंख्य देवी-देवता हैं, लेकिन उनमें से कोई भी संदेह से परे नहीं है.’

ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सदैव ही राष्ट्र से बढ़कर माना है. कोई भी सम्राट जो प्रजा की दृष्टि में भले ही अनर्थकारी हो, यदि वह ब्राह्मणों के अधिकारों और हिंदुओं के बीच उनके शिखरत्व का समर्थन करता था, तो उन्हें उसकी सत्ता से कोई आपत्ति न थी. हिंदू समाज का मस्तिष्क कहे जाने वाले ब्राह्मणों की इस दुर्बलता का लाभ प्रायः सभी विदेशी आक्रांताओं ने उठाया. मुस्लिम आक्रामक केवल इस्लाम का परचम लहराने भारत आए थे. यह देश उन्हें इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने यहीं बसने का मन बना लिया. उस समय समाज का मस्तिष्क होने का दावा करने वाले ब्राह्मणों ने आक्रमणकारियों का मुकाबला करने के लिए देश को तैयार करने के बजाय अपने शीर्ष स्थान की सुरक्षा करना उचित समझा. औरंगजेब ने जब सख्ती बरती तो वे भड़क गए और पुनः देश की आत्मा को जगाने के बजाय ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों द्वारा बंगाल के राजा पर विजय का स्वागत किया. इसी अवसरवादी दृष्टिकोण के चलते वे लंबे समय तक भारतीय समाज के शिखर पर बने रहे. उनकी सत्ता को पहली चुनौती मैकाले की ओर से मिली. 1861 में सभी भारतीयों के लिए एक समान दंड संहिता बनाकर उसने ब्राह्मणों के शताब्दियों से चले आए रहे वर्चस्व का अंत कर दिया. इसीलिए मैकाले उनकी निगाहों में सबसे बड़ा खलनायक है.

अप्रासंगिक से लगने वाले इस विवेचन का उद्देश्य मात्र यह दर्शाना है कि ओबीसी साहित्य का मुख्य संघर्ष सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से बाहर आने का है. संस्कृति की लड़ाई राजनीतिक लड़ाई से बड़ी और महत्त्वपूर्ण है. आज देश में लोकतंत्र है. संख्याबल के आधार पर पिछड़े राजनीति में अगड़ों के लिए चुनौती बने हुए हैं. इसलिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचकर लोगों को भरमाने में लगे रहते हैं. इसलिए यह समझना और समझाना बेहद जरूरी है कि बगैर सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकले सामाजिक परिवर्तन का लक्ष्य असंभव है. इन दिनों समाज में जातिबंधन शिथिल पड़े हैं. बावजूद इसके समाज में ऐसे लोगों की अच्छी-खासी संख्या है जो आज भी दो हजार वर्ष पुरानी मानसिकता में जीते हैं. जिन्हें मनु का वर्ण-विधान आदर्श लगता है. कुछ दबावों के चलते वे प्रकट में भले ही कुछ न कह पाएं, परंतु उनका सोच और हर प्रयास इस देश और समाज को हजार-दो-हजार वर्ष पीछे ले जाने के लिए होता है. चूंकि ऐसे लोग अपने मनसूबों को छिपाए रखने में माहिर हैं, इस कारण उनकी पहचान करना और निपटना आसान नहीं हैं. इसलिए ओबीसी साहित्यकारों की चुनौतियां बड़ी और लंबे समय तक चलने वाली होंगी. उन्हें एक ओर तो अपने ही साथियों को साहित्य की इस नई धारा से जुड़ने के लिए तैयार करना होगा. साथ ही साहित्य के मानवतावादी स्वरूप को बनाए रखने के लिए उन्हें उन स्थितियों से भी जूझना पड़ेगा जो उनके पिछड़ेपन का कारण बनती आई हैं. इनमें जाति के अलावा धर्म भी सम्मिलित है.

उन्हें समझना होगा कि हिंदू धर्म और जाति का नाभि-नाल का संबंध है. दोनों एक दूसरे का पोषण करते हैं. जानना होगा कि धर्म ब्राह्मण के लिए ठीक ऐसे ही धंधा है जैसे मोची के लिए जूते गांठना, ग्वाला के लिए दूध दुहना, गड़हरिया के लिए पशु चराना. उन सबका ज्ञान अनुभव के साथ निखरता जाता है. पुरोहिताई के साथ ऐसा नहीं है. यह कहते हुए कि जो पुराना है, वही सत्य-सनातन है, उसमें फेरबदल की सोचना भी पाप हैᅳब्राह्मण बार-बार अतीत की ओर लौटता रहा है. धर्म में सिवाय डर के कुछ भी मौलिक नहीं है. इस डर को स्थायी बनाने, पुरातन को सनातन सिद्ध करने के लिए ब्राह्मण अपने धंधे के साथ चतुराईपूर्वक पवित्रता का मिथ जोड़ देता है. अतः इस धारणा ने कि ज्ञान पर केवल ब्राह्मणों का एकाधिकार है. एकमात्र वही वास्तविक चिंतक और पथ-प्रदर्शक हैᅳइंसानियत का काफी नुकसान किया है. इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब केवल और केवल ब्राह्मण ज्ञान-संपदा के इकलौते स्वामी और संवर्धक रहे हों. हालांकि ब्राह्मणों की ओर से यह दावा हमेशा बना रहा.

आज जिसे हिंदी साहित्य के नाम से जाना जाता है, वह मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के हितों की सुरक्षा के लिए रचा गया साहित्य है. अपवाद रूप में कुछ भले लोगों को छोड़ दिया जाए तो वे पक्के जातिवादी हैं. कदम-कदम पर जातिवाद परोसते आए हैं. अगर ओबीसी साहित्यकार ऐसे लोगों से अपनी जातीय पहचान के साथ संवाद करेगा तो वे कभी उसे गंभीरता से नहीं लेंगे, क्योंकि ब्राह्मणवादी नजरिया उसके बारे में शूद्र से बढ़कर सोचने को तैयार न होगा. लेकिन यदि वह देश की आधी से अधिक जनता के प्रतिनिधि के रूप में संवाद करेगा तथा उसके सपनों और संघर्षों को साहित्य में लेकर आएगा तो देर-सवेर उन्हें साहित्य की इस नई धारा को गंभीरता से लेना ही पड़ेगा. परंतु यह कह देना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन है. समस्या यह नहीं है कि शताब्दियों से हिंदी साहित्य पर कुछ खास जातियों का कब्जा रहा है; और तीन-चौथाई लोग उसी को वास्तविक साहित्य मानते आए हैं. समस्या यह है कि शोषण सहते-सहते तीन-चौथाई लोगों मे से अधिकांश को शोषक की भूमिका में आने में ही अपनी मुक्ति नजर आती है. इससे बचाव का एकमात्र रास्ता यही है कि ओबीसी साहित्यकार अपने लेखन में, व्यवहार में लोकतांत्रिक हो.

‘ओबीसी साहित्य’ की मांग फिलहाल भले ही अवधारणा तक सीमित हो, इसकी संकल्पना नई नहीं है. न ही वह शून्य से उपजेगा. सभ्यता और संस्कृति के विकासकाल से ही उसका अस्तित्व रहा है. इसलिए ओबीसी साहित्य को रचने से बड़ी चुनौती परंपरा से अर्जित साहित्य को सहेजने तथा ओबीसी हितों के अनुरूप उसकी पुनर्व्याख्या की होगी. कुछ सवाल इस बीच उठेंगे ही. मसलन ओबीसी साहित्य का आधार क्या है? उसके सौंदर्यबोध की परख की कसौटी क्या होगी? क्या दलित साहित्य की तरह ओबीसी साहित्य का दायरा भी गैर ओबीसी के लिए बंद होगा? भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ परंपरा में से अनुकूल को चुनने तथा तथा अप्रासंगिक को छांट देने की उसकी कसौटी क्या होगी? ओबीसी साहित्यकार को इन सब सवालों का हल खोजना होगा. जिन कुरीतियों से साहित्य संघर्ष करता आया है उनमें से एक जातिवाद भी है. इसलिए अच्छा तो यही है कि साहित्य का जातिवाद के नाम पर विभाजन न हो? इन सबसे ज्यादा यह महत्त्वपूर्ण है कि समाज का जाति के आधार पर विभाजन न हो? यह नहीं हो सकता कि समाज में जाति रहे और साहित्य से जाति का जनाजा पूरी तरह उठ जाए. ओबीसी साहित्य पर जातिवादी होने का आरोप लगाने वालों के लिए एक उत्तर यह भी हो सकता है कि जातियों का विधान ओबीसी(शूद्र) ने नहीं रचा. उसकी कोशिश तो इस जंजाल से हमेशा पीछा छुड़ाने की रही है. ओबीसी साहित्य के साथ वही चल सकता है जो इस जंजाल से मुक्ति की सौगंध उठा चुका हो, जिसका भरोसा जाति और धर्म से ज्यादा इंसानियत में हो.

आप चाहें तो इसे सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध एक और मोर्चे का नाम भी दे सकते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

डॉ. आंबेडकर का आर्थिक चिंतन

अर्थशास्त्री के रूप में डॉ. आंबेडकर के योगदान की ओर बहुत कम विद्वानों का ध्यान गया है. प्रायः लोग उन्हें संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं. यह भी जानते हैं कि दलितों के उद्धार के लिए उन्होंने अनथक संघर्ष किया. उसके लिए अनेक समकालीन नेताओं की आलोचनाएं सहीं. वे अपने समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मगर विवादित नेताओं में रहे. उनकी विद्वता विरोधियों को पस्त करने वाली थी. वस्तुतः राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान इतना महान एवं युगांतरकारी है कि उनके जीवन के बाकी पहलुओं तक लोगों की नजर जा ही नहीं पाती. यहां तक कि दलित विद्वानों का लेखन भी उनके सामाजिकराजनीतिक क्षेत्रों में योगदान तक सिमटा रहा है. अर्थशास्त्री के रूप में आंबेडकर के योगदान को केवल एक लेख या लेखांश से आंकना असंभव है. अपने एक व्याख्यान में प्रख्यात अर्थशास्त्री श्रीनिवास अंबीराजन ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र से राजनीति और कानून के क्षेत्र में अंतरण को अर्थशास्त्र की भारी क्षति बताया था. उनके अनुसार अगर वे राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में नहीं आते तो दुनियाभर में दिग्गज अर्थशास्त्री के रूप में स्थान पाते. इस बात में काफी सचाई भी है. 1947 आतेआते राजनीतिक क्षेत्र में उनकी व्यस्तता काफी बढ़ चुकी थी. लेकिन उन दिनों भी उनका मन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में छूटे हुए काम को आगे बढ़ाने का था. उसी वर्ष ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी’ के संशोधित संस्करण की भूमिका में उन्होंने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में 1923 के बाद हुए बदलावों को लेकर पुस्तक का दूसरा खंड यथाशीघ्र तैयार करने का आश्वासन दिया था. मगर आजादी के बाद राजनीतिक जिम्मेदारियां बढ़ने की वजह से वे छूटे हुए कार्य को पूरा नहीं कर सके.

अर्थशास्त्र आंबेडकर का सर्वाधिक प्रिय विषय था. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय उनके पास कुल 29 विषय ऐसे थे, जिनका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से था. वहां से उन्होंने ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ विषय में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. आगे चलकर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से उन्होंने ‘प्राब्लम ऑफ रुपया : इट्स ओरिजिन एंड इट्स सोल्यूशन’ विषय पर डीएससी की डिग्री हेतु शोध प्रबंध लिखा. उस ग्रंथ की भूमिका महान अर्थशास्त्री एडविन केनन ने लिखी थी. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनकी विद्वता का अनुमान लगाने के लिए अमर्त्यसेन की टिप्पणी भी मददगार सिद्ध हो सकती है. 2007 में दिए गए एक व्याख्यान में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर की गुरुता को स्वीकारते हुए हमारे समय के इस महान अर्थशास्त्री ने कहा था—

आंबेडकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मेरे जनक हैं. वे दलितोंशोषितों के सच्चे और जानेमाने महानायक हैं. उन्हें आजतक जो भी मानसम्मान मिला है वे उससे कहीं ज्यादा के अधिकारी हैं. भारत में वे अत्यधिक विवादित हैं. हालांकि उनके जीवन और व्यक्तित्व में विवाद योग्य कुछ भी नहीं है. जो उनकी आलोचना में कहा जाता है, वह वास्तविकता के एकदम परे है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद शानदार है. उसके लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा.’1

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान की चर्चा करने से पहले इस विषय में उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाने वाली एक और घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा. 1930 का दशक पूरे विश्व बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था. ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं, खासकर उपनिवेशों में जहां आजादी की मांग जोड़ पकड़ती जा रही थी, वहां औपनिवेशिक सरकार की पकड़ को बनाए रखने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान आवश्यक था. समस्याओं के मूल में कुछ वैश्विक मंदी का हाथ था और कुछ स्थानीय रोजगारों के उजड़ जाने से उत्पन्न मंदी का. इसलिए अगस्त 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था. इस आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जिन 40 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था, उनमें आंबेडकर भी थे. वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं. बात यहीं खत्म नहीं होती. उस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1926 में प्रकाशित की थी. उसकी अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई. इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राब्लम ऑफ रुपया’ पर आधारित है. उस समय तक उनका मुख्य लेखन अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय को लेकर ही था. मात्र 27 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंबई के एक कॉलिज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी मिल चुकी थी. अध्यापन के अलावा वे विषय से संबंधित सैकड़ों लेख और व्याख्यान दे चुके थे. एक सभा में विद्यार्थियों के बीच पढ़े गए उनके लेख ‘रेस्पांसिबिल्टी ऑफ रेसपांसिबिल गवर्नमेंट’ की प्रशंसा उस समय के महान राजनीतिक विज्ञानी, चिंतक हेराल्ड लॉस्की ने भी की थी. लॉस्की का कहना था कि ‘लेख में आए आंबेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप’ के हैं.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान को और गहराई से समझने के लिए प्राचीन भारत की मुद्रा विनिमय प्रणाली के बारे में जानना आवश्यक है. 1893 तक भारत में केवल चांदी के सिक्कों का प्रयोग किया जाता था. 1841 में स्वर्ण मुद्रा का उपयोग भी होने लगा था. चांदी के सिक्के का मूल्य उसमें उपलब्ध चांदी के द्रव्यमान से आंका जाता था. इस तरह एक स्वर्णमुद्रा का मूल्य 15 चांदी के सिक्कों के बराबर था. 1853 में आस्ट्रेलिया और अमेरिका में स्वर्णभंडार मिलने से सोने की आमद बढ़ी. उसके बाद स्वर्णमुद्राओं में विनिमय का प्रचलन बढ़ने लगा. हालांकि उसका विधिवत चलन 1873 के बाद की संभव हो पाया. लगभग उसी समय चांदी के नए भंडार मिलने से उसकी आमद भी बढ़ने लगी, परंतु भारत में स्वर्ण उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई थी. परिणामस्वरूप स्वर्णमुद्रा के मुकाबले भारतीय रजतमुद्रा का निरंतर अवमूल्यन होने लगा. उस खाई को पाटने के लिए अधिक मात्रा में रजतमुद्राएं ढाली जाने लगीं. लेकिन वह समस्या का अस्थायी समाधान था. दूसरे उससे उन व्यक्तियों के लेनदेन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था जो केवल रजत मुद्रा का इस्तेमाल करते थे. जनसामान्य के लिए वह प्रतिकूल स्थिति थी. मुद्रा का अवमूल्यन होने से महंगाई में वृद्धि हुई थी. जबकि आय ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आंतरिक स्तर पर उससे प्रत्येक वर्ग को घाटा हो रहा था. 1872 से लेकर 1893 तक यही हालात बने रहे. आखिर 1893 में सरकार ने रजतमुद्रा ढालने का काम अपने नियंत्रण में ले लिया.

उस समय तक मुद्राओं का मूल्यांकन उनमें उपलब्ध धातु की मात्रा से आंका जाता था. 1899 में सरकार ने एक समिति का गठन किया, जिसने स्वर्णस्टेंडर्ड के स्थान पर स्वर्णमुद्रा के उपयोग की सलाह दी थी. तदनुसार मुद्रा का मूल्यांकन उसमें उपलब्ध धातुमूल्य के बजाए सरकार द्वारा अधिकृत मूल्य जितना आंका जाने लगा. सरकार ने रजतमुद्रा का मूल्य 1 शिलिंग, 4 पेंस के बराबर कर दिया. नए नियम के अनुसार स्वर्णमुद्रा का मूल्य लगभग स्थिर था. उसके मूल्यांकन का अधिकार सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन था, जबकि रजतमुद्रा के मूल्यनियंत्रण के लिए उस समय तक कोई व्यवस्था न थी. मुद्राओं के मूल्यांकन को लेकर आंबेडकर का दृष्टिकोण मानवीय था. कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों से मिलता हुआ. उनका कहना था लोगों के लिए मुद्रा का वास्तविक मूल्य उसके बदले मिलने वाली आवश्यक वस्तुओं से तय होता है. सोना बेशकीमती हो सकता है. लेकिन वह आदमी की सामान्य जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. वह न तो किसी भूखे का पेट भर सकता है, न ही उससे किसी नंगे तन को ढका जा सकता है. यदि एक रजत मुद्रा से उन्हें जरूरत की सभी चीजें प्राप्त हो जाती हैं, तो उन्हें स्वर्णमुद्रा की दरकार न होगी. इसके लिए मुद्रा का भरोसेमंद होने के साथसाथ विनिमय प्रणाली में स्थायित्व भी जरूरी है. मुद्रा के प्रति जनता का अविश्वास तथा उसकी मूल्यअस्थिरता आर्थिक संकट को जन्म देती है. रजतमुद्रा के उतारचढ़ाव को देखते हुए आंबेडकर ने स्वर्णमुद्रा को अपनाने का सुझाव दिया; तथा एक रजतमुद्रा का मूल्य एक शिलिंग तथा छह पैंस रखने की सलाह दी. उनकी अधिकांश अनुशंसाओं को सरकार ने ज्यों की त्यों अपना लिया था. उन्हीं के आधार पर आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक की मूलभूत सैद्धांतिकी का विकास हुआ.

अपने अर्थशास्त्र संबंधी ज्ञान के आधार पर आंबेडकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे क्लासिकल अर्थशास्त्रियों की कतार में खड़े नजर आते हैं. आगे चलकर राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया, उसके आधार पर हम उनके अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों की तुलना इटली के विचारक विलफर्ड परेतो से कर हैं. परेतो ने यूरोपीय समाज में व्याप्त असमानताओं का गहरा अध्ययन किया था. उसका मानना था कि शीर्ष पर मौजूद अल्पसंख्यक अभिजन समूह अपने बुद्धिचातुर्य द्वारा बहुसंख्यक समूह को छोटेछोटे समूहों में बांटे रखता है. इस तरह संगठित अल्पसंख्यक अभिजन के आगे असंगठित बहुजन की शक्ति नगण्य हो जाती है. ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ के क्षेत्र में ‘परेतो दक्षता तुल्यांक’ की चर्चा लगभग सभी आधुनिक अर्थशास्त्री करते आए हैं. परेतो को स्पर्धात्मक उत्पादन प्रणाली से कोई शिकायत न थी. लेकिन वह चाहता था कि सरकार समाजार्थिक समानता की स्थापना के दायित्व को समझे तथा उसके लिए समयानुसार आवश्यक कदम उठाती रहे. उसके अनुसार स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में लाभार्जन की दर संतोषजनक बनी रहती है. न्यायभावना के साथ काम करने वाली सरकार उस लाभ का एक हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचाकर असमानता की खाई को पाटते रहने का काम कर सकती है. परेतो के शब्दों में—‘समाज में किसी एक नागरिक के साथ निकृष्टतम किए बिना, कम से कम किसी एक नागरिक के साथ श्रेष्ठतम किया जा सकता है.’ आंबेडकर को भी मशीनों और स्पर्धात्मक उत्पादन व्यवस्था से कोई शिकायत न थे. लेकिन वे चाहते थे कि सभी प्रमुख और आधारभूत उद्योग सरकार के अधीन हों. वे मानते थे कि आर्थिक सुधार की कोई भी योजना बिना भूमि सुधार के असंभव है. इसके लिए उन्होंने बड़े भूस्वामियों की आय को आयकर के दायरे में लाने का सुझाव दिया था. 1946 में अखिल भारतीय स्तर पर भूमि सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि भूमि वितरण में असमानता के कारण समाज के बड़े हिस्से को बहुत छोटी जोतों से काम चलाना पड़ता है. परिणामस्वरूप एक ओर जहां श्रमशक्ति का दुरुपयोग होता है, वहीं बहुतसी श्रमशक्ति निष्क्रिय पड़ी रहती है. आवश्यकता से कई गुना भूमि के स्वामी बने जमींदार अपनी श्रमशक्ति का उपयोग इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें जरूरत से कई गुना श्रमशक्ति बेगार या मामूली मजदूरी पर उपलब्ध हो जाती है. यानी समाज का एक वर्ग संसाधनों के अभाव में अपनी श्रमशक्ति के लाभों से वंचित रह जाता है; जबकि दूसरा आवश्यकता से कहीं अधिक संसाधनों पर काबिज होने के कारण दूसरे के श्रम को कम मूल्य पर खरीदने में सफल हो जाता है. इस तरह न केवल श्रम का अवमूल्यन होता है, बल्कि समाज की बहुतसी श्रमशक्ति व्यर्थ चली जाती है. इसके लिए आंबेडकर कृषि, उद्योग, बीमा, बैंकादि का संपूर्ण राष्ट्रीयकरण चाहते थे. वे व्यापक भूमिसुधार के समर्थक थे. चाहते थे कि सरकार समस्त कृषियोग्य भूमि का अधिग्रहण कर उसे उचित आकार के फार्मों में विभाजित करे और उत्पाद का समुचित अनुपात में समाज के सभी सदस्यों के बीच संवितरण हो. समाजार्थिक समानता की स्थापना के लिए आंबेडकर का यह क्रांतिकारी सोच था.

आंबेडकर की विचारों पर हम समाजवादी चिंतन की छाया देख सकते हैं. लेकिन भारत में समाजवादी आंदोलन का जो स्वरूप रहा है, उस अर्थ में वे कतई समाजवादी न थे. हम उन्हें आमूल परिवर्तनवादी कह सकते हैं. चूंकि वे सामाजिक समानता के लक्ष्य को दलितों की वर्गीय चेतना, शैक्षणिकसामाजिक उन्नयन तथा लोकतांत्रिक परिवर्तन द्वारा प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए उन्हें गणतांत्रिक समाजवादी कहना भी उपयुक्त होगा. वस्तुतः जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, उसके कल्याण हेतु आर्थिक समरसता का विचार पर्याप्त न था. लाहौर में ‘जातपात तोड़क मंडल’ के वार्षिक अधिवेशन के लिए लिखे गए अपने लंबे भाषण ‘जाति का उन्मूलन’ में उन्होंने कई उदाहरण देकर बताया था कि आर्थिक समाधान कभी भी सामाजिक समाधान का विकल्प नहीं बन सकते. एक उदाहरण उन्होंने गुजरात के गांव का दिया था. वहां अछूत स्त्रियां घाट से पानी लाने के लिए मिट्टी के घड़ों का उपयोग करती थीं. जानूं गांव की खातेपीते दलित परिवारों की कुछ स्त्रियों ने पानी लाने के लिए पीतल के घड़ों का उपयोग करना चाहा तो सवर्ण लोगों की त्योरियां चढ़ गईं. उन्होंने विरोध किया. पूरे भारत में यही हालात थे. जयपुर रियासत के चकवारा की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि एक रईस अछूत तीर्थ यात्रा पर गया. लौटा तो परंपरानुसार उसने मित्रोंरिश्तेदारों को भोज देने का फैसला किया. तय किया कि भोज के लिए सभी व्यंजन देशी घी में बनाए जाएंगे. सवर्णों को पता चला तो उबलने लगे. अछूत देशी घी से बने व्यंजनों का भोज दे, यह उन्हें सहन न हुआ. सो ऐन भोज के समय दर्जनों दबंग समारोह स्थल पर जा धमके. पलभर में सारा भोजन तहसनहस कर दिया. समाजवाद मुख्यतः आर्थिक समानता को अपना लक्ष्य मानता है. यही कारण है कि भारत में समाजवादी राजनीति कभी भी दलितों की मददगार नहीं बनी. न ही संसाधनों के संवितरण की न्यायपूर्ण मांग रखने वाले आंबेडकर को किसी ने समाजवादी विचारक के रूप में मान्यता दी.

आंबेडकर मार्क्स की आलोचना करते हुए बुद्ध को अपनाया था. अपने विचारों के कारण लगभग आधी दुनिया पर छाए रहने वाली विश्वइतिहास की इन महानतम हस्तियों में आपस में कोई स्पर्धा नहीं है. तो भी आंबेडकर के लिए बुद्ध इसलिए महत्त्वपूर्ण थे कि उन्होंने जाति पर सवालिया निशान लगाते हुए समानता आधारित समाज का सपना देखा था. साम्यवाद के रूप में समानता आधारित समाज का सपना मार्क्स का भी था. लेकिन मार्क्स की सीमा थी कि वे समानता को जीवन के आर्थिक पक्ष से आगे बढ़कर नहीं देख पाए थे. भारत के बारे में उन्होंने काफी लिखा था, तथापि वह जानकारी राजनीतिक और अखबारी सूचनाओं पर केंद्रित थी. जाति की भयावहता जिससे आंबेडकर का सीधा परिचय था और जिसकी विकृति को ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे बुद्ध भी समझते थे, मार्क्स उतनी गहराई से नहीं समझ पाए थे. आंबेडकर मार्क्स की वर्गभेद की अवधारणा से सहमत थे. परंतु इस संशोधन के साथ कि भारतीय समाज में वर्गभेद मुख्यतः सामाजिकसांस्कृतिक रहा है. उनका मानना था कि जाति की समस्या के समाधान के बिना भारत में किसी भी सुधारवादी आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध होगी. समाजार्थिक परिवर्तन के लक्ष्य को वे दलितों के प्रबोधीकरण द्वारा प्राप्त करना चाहते थे. इस रूप में वे अपने समय के किसी भी समाजवादी से बड़े और प्रतिबद्ध समाजवादी थे. भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की यह विडंबना रही उसने आंबेडकर को मात्र दलितों का नेता मानकर उपेक्षित रखा. इसके लिए आंबेडकर को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. परंतु जाति के सवालों की ओर से मुंह मोड़े रहने के कारण भारत का समाजवादी आंदोलन लगातार अपनी प्रासंगिकता खोता रहा.

आंबेडकर का पूरा जीवन एक महागाथा है. एक लेख या पुस्तक में उनके जीवनकर्म को नहीं समेटा जा सकता. वे अपने मानक आप हैं. इसलिए लेख का समापन हम उन्हीं की बात से करना चाहेंगे. यह दरअसल में एक चेतावनी है जो भारतीय संविधान को लोकार्पित करते हुए उन्होंने हम सबको दी थी. संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत उन्होंने ‘हम भारत के लोग’ से की है. इसकी व्याख्या उनके भाषण में भी मिलती है —

‘‘मुझे याद है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय हिंदुस्तानी ‘भारत के लोग’ कहने की अपेक्षा ‘भारतीय राष्ट्र’ कहना अधिक पसंद करते थे. मेरा विचार है कि ‘हम एक राष्ट्र हैं’ ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं हैं, इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. तभी हम राष्ट्र बनने कि जरूरत को बेहतर समझ पाएंगे तथा इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों और साधनों के बारे में बेहतर पाएंगे. (जातिप्रथा के रहते) इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है….जातियां राष्ट्रविरोधी हैं. पहला कारण तो ये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं. दूसरे वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को ले आती हैं. अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन सब मुश्किलों से मुक्ति पानी होगी. असली भाईचारा तभी कायम हो सकता है, जब राष्ट्र मौजूद हो—लेकिन बगैर बंधुत्व के समानता, स्वाधीनता और राष्ट्रीयता महज दिखावा ही होंगी.’’

ओमप्रकाश कश्यप

1. Ambedkar is my Father in Economics. He is true celebrated champion of the underprivileged. He deserves more than what he has achieved today. However he was highly controversial figure in his home country, though it was not the reality. His contribution in the field of economics is marvelous and will be remembered forever..!”

ऋग्वेदकालीन भौतिकवादी चिंतन

अनीश्वरवादी चिंतन की भारतीय परंपरा―दो

हम भारतीय कालिदास को आदिकवि मानते हैं तथा ‘रामायण’ को आदिकाव्य. जबकि आदिग्रंथ होने का गौरव ‘ऋग्वेद’ को देते आए हैं. तो क्या ऋग्वेद की ऋचाएं काव्यरचनाएं नहीं हैं? ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में हमें संकोच क्यों होना चाहिए? उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण है, इस तथ्य को कोई नहीं नकारता. फिर भी लोग ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में संकोच करते हैं. यह कहकर कि वेदों के रचियता ‘मंत्रसृष्टा’ न होकर ‘मंत्रदृष्टा’ कवि थेउन्हें आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकालकर ‘आप्तग्रंथ’ घोषित कर दिया जाता है. कुछ ऐसा ही मुसलमान ‘कुरआन’ के बारे में दावा करते हैं. धर्मग्रंथों को दैवी ग्रंथ सिद्ध कर श्रद्धा का पात्र बना देने की परंपरा लगभग हर धर्म में रही है. अनुयायियों को लगता है कि धर्मग्रंथ को मानवीकृत कहने से उसका महत्त्व घट जाएगा. जबकि दैवीय कह देने से लोग उसके प्रति ऋद्धा के साथ पेश आएंगे. उनमें लिखी बातों का तन्मयता के साथ पालन करेंगे. धर्मग्रंथों के साथ ऐसा हमेशा होता आया है. ऐसा मान लेने से न केवल वह कृति आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकल जाती है, बल्कि उसके मौलिक विस्तार की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं. ऋग्वेद यदि आदि ग्रंथ है. उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण हैं तो स्वाभाविक रूप से उसके रचनाकार इस देश और अपनी भाषा के प्राचीनतम कवि भी हैं. साहित्यिक कृति के रूप में ऋग्वेद की सामग्री का मूल्यांकन न करने का नुकसान यह भी होता है कि वैदिक परंपरा के नाम पर रचे गए कथानकों में आए पात्रों, घटनाओं, चरित्रों आदि का मिथकीकरण करने का अवसर परंपरावादियों को मिल जाता है. ऋग्वेद इसी का शिकार होता आया है. बाद में लिखे गए तीनों वेद किसी न किसी रूप में ऋग्वेद के कर्मकांडीकरण की कोशिश है. कालांतर में यही प्रवृत्ति भारतीय मनीषा का संस्कार बनकर उभरती है, जिसमें बिना प्रतीकों और मिथकों का सहारा लिए विमर्श करना मुश्किल हो जाता है. वेदों को आप्तग्रंथ का गौरव भले ही मिला. परंतु ब्राह्मण मनीषियों के लिए वैदिक परंपरा वेदों से अधिक महत्त्वपूर्ण थी. इसलिए वेदों तथा वेदादि ग्रंथों के पाठ में उनके भाष्यकार के हिसाब से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं. परंतु मूलभूत परंपरा में कोई अंतर नजर नहीं आता.

ब्राह्मणवादी दर्शनपरंपराएं वेदों से उपजी थीं. आरंभ में वे श्रुति की अवस्था में थीं. तथापि ब्राह्मणमनीषियों को उनपर इतना गुमान था कि उनके कारण खुद को विश्वसभ्यता में श्रेष्ठतम होने की दावेदारी करते थे. वेदों में सूत्र रूप में उपस्थित दार्शनिक विचारों को विस्तार देने से अधिक चिंता उन्हें उनके संरक्षण की थी. उसके लिए तरहतरह के आयोजन किए जा रहे थे. गैरब्राह्मणवादी विचारधाराएं आजीवक, लोकायत आदि जिन्हें भौतिकवादी चिंतनधारा भी कहा जा सकता हैके बारे में माना जाता है कि वे ब्राह्मणवादी दर्शनों के विरोध में जन्मीं, तथा उसके बहुत बाद की हैं. वैदिक परंपरा के समर्थक वेदों को भारतीय दर्शनचिंतन का आदिस्रोत तथा वैदिक युग को भारतीय दर्शन परंपरा का आदिचरण मानते हैं. इसे हम उनका पूर्वाग्रह कह सकते हैं. समकालीन दर्शनों को नकारने की प्रवृत्ति भी इसका कारण हो सकती है. सच तो यह है कि वेदों में जो प्रच्छन्न दार्शनिक सूत्र हैं, उनपर प्रकृतिवादी दर्शनों की गहरी छाया है. प्राचीन यायावर मनस्वियों के अनुभवों से उपजीं वे विचारधाराएं वेदों की रचना से बहुत पहले से समाज में निश्चय ही विद्यमान रही होंगी. वैदिक युग से भारतीय चिंतन परंपरा में क्रांतिक बदलाव की शुरुआत होती है. वह ऐसा मोड़ है जहां से अध्यात्मचिंतन में मिथक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं. मौलिक चिंतन में गुरुडम की घुसपैठ होने लगती है. जीवन संबंधी सहजसामान्य दर्शन पर मिथक सवार हो जाते हैं. सत्तासमर्थन के सहारे ब्राह्मण ऋषियों का समूह बिना व्यक्तिगत यशलाभ की कामना के, उस परंपरा को इस तरह आगे बढ़ाता है कि उसमें परंपरामोह निर्णायक रूप ले लेता है. मौलिक चिंतन की महत्ता घटने लगती है. परिणामस्वरूप समकालीन चिंतनधाराएं, विशेषकर वे जो उस परंपरा के लिए चुनौती थींगौण मान ली जाती हैं. ज्ञान के कर्मकांडीकरण की वह परंपरा धीरेधीरे अपने समय के समूचे ज्ञानानुराग एवं सामाजिक विवेक को अपनी गिरफ्त में ले लेती है.

दर्शन की सर्वमान्य कसौटी है कि उसमें स्थायी विश्वास या निष्कर्ष जैसी कोई चीज नहीं होती. दार्शनिक सत्य शाश्वत न होकर चिर नूतन होता है. इसलिए उसकी खोज भी चिर नवीन बनी रहती है. जैसे ही कोई नया विचार सामने आता है, उसका प्रतिविचार तथा मिलेजुले विचारों की शृंखला साथ ही जन्म ले लेती है. विचारों के संलयन एवं विश्लेषण द्वारा पुनः नए विचारों की उत्पत्ति होती है. कल्पना का महत्त्व दर्शन के क्षेत्र में भी होता है. परंतु दार्शनिक कल्पना साहित्यकार की कल्पना से हटकर वैज्ञानिक परिकल्पना के निकट होती है. साहित्यिक कल्पना का वितान अंतहीन होता है. उसके लिए मानवीय मूल्य महत्त्वपूर्ण होते हैं, जबकि दर्शन में महत्त्व केवल और केवल सत्य का होता है. इसका आशय यह नहीं है कि दर्शन जीवनमूल्यों से निरपेक्ष होता है. साहित्य की भांति दर्शन का ध्येय भी जीवन को श्रेष्ठतम की ओर गतिमान रखना है. दर्शन स्वयं शुभत्व की शाश्वत खोज का सिलसिला है. साहित्यकार अपनी कल्पना को लोकपरलोक में कहीं भी लाले जा सकता है. दार्शनिक के लिए उसकी कल्पना सत्य की खोज को समर्पित होती है. इसलिए ज्ञात सत्य अथवा स्थापित तर्कपद्धति ही उसका आधार बनती है. कुल मिलाकर दार्शनिक परिकल्पना वैज्ञानिक परिकल्पना जैसी ही होती है. अंतर केवल इतना है कि दार्शनिक परिकल्पना का विषय मूर्त्तअमूर्त्त कुछ भी हो सकता है. जबकि वैज्ञानिक परिकल्पना किसी न किसी मूर्त्त विषय यानी ऐसे विषयों जिनका भौतिक आधार पर परीक्षणअवलोकन, सत्यापन आदि किया जा सकेसे संबद्ध रहती है. जब तक किसी परिकल्पना का पर्याप्त आधार न हो, दर्शन के क्षेत्र में उसका महत्त्व सहज प्रतीति जितना ही होता है. तर्क की कसौटी पर कमजोर परिकल्पना साहित्य का आधारस्रोत हो सकती है, दर्शन का नहीं.

वेदों में आर्यों का प्रच्छन्न इतिहास है. छिटपुट दर्शन भी है. परंतु उनमें प्रमुख हैयज्ञ संस्कृति. पुरोहितवाद. जिसके प्रभाव में प्रच्छन्न इतिहास मिथकीय रूप में सामने आता है. दार्शनिक अवधारणाओं पर भी मिथकों का प्रभाव है. अग्नि, सूर्य, उषा, इंद्र, सोम, मित्रवरुण, मरुत, द्यावा, पृथ्वी, अश्विन आदि देवता हैं. उनका सीधा संबंध प्रकृति से है. ‘विश्वदेव’ की भी परिकल्पना है जो विभिन्न देवताओं का सूत्रीकरण कर एकेश्वरवाद की ओर इशारा करता है. कुछ स्थानों पर भावनाओं और संवेगों को भी देवताओं में शामिल किया गया है, जैसे वाक्, ज्ञानम्, मनस्, काम इत्यादि. प्रत्येक देवता किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का स्वामी है. सवाल है कि अग्नि, आकाश, पृथ्वी, वायु आदि जीवनदायिनी प्राकृतिक शक्तियों को सीधेसीधे उनके भौतिक रूप में देवता मानने के बजाए, उनके नामानुरूप मिथकीकरण क्यों किया गया? क्यों उनके लिए सातवें आसमान के पार कथित स्वर्ग में मौजूद शक्तियों की कल्पना की गई? हमारा मानना है कि केवल सहूलियत के लिए. ऐसा करना मनुष्य को आसान लगा. हो सकता है आरंभ में केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण ही प्रभावी रहा हो. क्योंकि अनुभवों के सामान्यीकरण के लिए उन्हें किस्सेकहानियों में ढालना जरूरी था. उसके फलस्वरूप पृथ्वी, सूरज, चंद्रमा, जल, आकाश आदि का पहले मानवीकरण किया गया. फिर वे विभिन्न प्रतीकों के रूप में संस्कृति का हिस्सा बनने लगे. वही प्रतीक कालांतर में पुरोहितवाद के हत्थे चढ़, देवता के रूप में पहचाने जाने लगे. जिन्हें वेद कहा जाता है, उनकी अधिकांश सामग्री काल्पनिक प्रतीकों के महिमामंडन तथा उनके नाम पर हुए कर्मकांडीकरण का परिणाम है. आप्त ग्रंथ बताकर कल्पना को प्रामाणिक बनाने की कोशिश ब्राह्मण ग्रंथों में लगातार दिखाई पड़ती है. वेदों को ‘आप्त ग्रंथ’ मानना धर्म की निगाह में महत्त्वपूर्ण हो सकता है. दर्शन की निगाह में यह तर्कबुद्धि को एक खूंटे से बांध देने जैसा विचारहीन कृत्य है. विडंबना यह कि कालांतर में निहित स्वार्थवश इसी को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाने लगा. वेदों को धर्मग्रंथ मान लेने का परिणाम यह हुआ कि दर्शन की बाकी शाखाएं यानी न्याय और वैशेषिक जैसे दर्शन जो केवल तत्व चिंतन को प्राथमिकता देते हैं, लगातार उपेक्षित होते गए. जबकि इन्हीं दर्शनों से कुछ तत्व उधार लेकर कालांतर में जैन और बौद्ध दर्शन ने समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करने का काम किया.

वेदों को श्रुति कहा गया है. वे किसी एक कालखंड की रचना नहीं हैं. इसलिए उनमें विचार के अनेक रूप विद्यमान हैं. जिन मनीषियों के नाम से ऋचाओं का उल्लेख मिलता है, उनके जीवन के बारे हमारे पास नगण्य सूचनाएं हैं. कदाचित इसीलिए उनके रचियताओं के बारे में भिन्न स्रोतों से अलगअलग जानकारी प्राप्त होती है. ‘दीघनिकाय’ के ‘तेविज्जसुत्त’ में बुद्ध ने ब्राह्मण लेखकों तथा मूल वैदिक कवियों का वर्गीकरण किया है. उनके अनुसार वेदों के आदि रचियता ऋषियों की संख्या मात्र दस है―अट्टक, वामक, वामदेव, यमदग्नि, विश्वामित्र, कश्यप, भरद्वाज, भृगु, अंगिरस तथा वशिष्ट. आगे चलकर इस सूची में बदलाव होता है. मनुस्मृति(1/35) में जो नाम गिनाए गए हैं, वे हैं―भृगु, नारद, वशिष्ट, क्रतु, अत्री, अंगीरस, पुलत्स्य, पुलह, प्रचेतस और मैत्रेयी. कुछ जगह केवल ‘सप्त ऋषियों’ को ही वेदों का आदि रचियता होने का गौरव प्राप्त हैं. मनुस्मृति द्वारा गिनाए गए नाम वास्तविक हैं अथवा कुलपरंपरा? इस बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ‘नारदपुराण’ को विद्वान मात्र 1000 वर्ष पुरानी कृति मानते हैं. ब्राह्मण लेखकों की विशेषता यह रही कि उन्होंने व्यक्तिगत श्रेय के बजाय परंपरा को अधिक महत्त्व दिया है. महत्त्वपूर्ण ग्रंथलेखकों ने बिना यशनाम की चिंता किए, अपने मौलिक ग्रंथ केवल परंपरा को समर्पित कर दिए हैं. वेदों में जिन ऋषियों का नामोल्लेख है, वे महाकाव्यों और पुराणों में उपस्थिति बनाए हुए हैं. जबकि उनके रचनाकाल में शताब्दियों का अंतराल है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मनुस्मृति’ में दी गई सूची की तुलना करने पर एक सच यह भी सामने आता है कि ‘मनुस्मृति’ में दर्शाए गए ऋषिगण बौद्धिक विमर्श से अधिक जोर कर्मकांड पर देते आए हैं. इससे यह निष्कर्ष भी सामने आता है कि मनु के लिए वेदों का कर्मकांडपक्ष उनके तात्विक चिंतन से अधिक महत्त्वपूर्ण था. उनके नेतृत्व में दार्शनिक विवेचन का कर्मकांडीकरण होना स्वाभाविक ही था. जनसाधारण वैदिक ऋषियों की कमजोरी को भलीभांति समझता था. इसलिए आजीविका के मामले में स्वतंत्र व्यक्ति ब्राह्मणवादी दर्शनों से दूर रहने में ही भलाई समझते थे.

ऋग्वेद के लिपिबद्ध होने से पहले ही पुरोहितवर्ग समाज में प्रभावशाली भूमिका प्राप्त कर चुका था. तत्कालीन बौद्धिक वर्ग का समर्थन उसे बिना किसी शर्त प्राप्त था. वेदों में या तो पुरोहित वर्ग का वर्णन है अथवा इंद्रादि देवताओं का जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं. श्रमिक वर्ग और शिल्पकार वर्ग वेदों से नदारद है. स्त्रीचरित्र भी गिनेचुने हैं. इससे उन्हें तत्कालीन अभिजन समाज का प्रतिनिधि ग्रंथ भी कहा जा सकता है. इस कारण ब्राह्मणों ने न केवल उनकी सुरक्षा और विस्तार के लिए खुद को समर्पित किया, बल्कि स्वार्थ के हिसाब से लगातार उनकी स्वार्थानुरूप व्याख्याएं और फेरबदल करते रहे. ऐसा नहीं है कि उस समय वेदों और ब्राह्मणवादी परंपरा के आलोचक न थे. ब्राह्मणों तथा उनके कर्मकांडों की आलोचना करने वाले तब भी अधिसंख्यक समाज का हिस्सा थे. लेकिन ब्राह्मणों के ही हाथ लगी. वर्णव्यवस्था के सहारे वे समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहे. उनके द्वारा गढ़े गए मिथ किस्सेकहानियों और संस्कृति का हिस्सा बनकर लोकमेधा का अटूट हिस्सा मान लिए गए. आज भी भारतीय धर्मदर्शन का ककहरा न जानने वाला साधारण से साधारण व्यक्ति अग्नि, वरुण, आकाश, उषा, तमस, अनल पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा आदि की जीवनप्रदायिनी शक्ति के बारे में जानता है. रोजमर्रा के जीवन में प्रत्येक मनुष्य उन्हें उसी रूप में देखतासमझता; और इस तरह अपने बुद्धिविवेक के अनुसार दार्शनिक मान्यताएं गढ़ता है. अनुभवआधारित निष्कर्षों में पर्याप्त गतिशीलता होती है. परंतु जैसे ही व्यक्ति के धार्मिक आग्रह प्रबल होते हैं, उसकी वैचारिक गत्यात्मकता थमने लगती है. धारणा खूंटे से बंध जाती है. अपने ही विवेक पर उसका नियंत्रण नहीं रहता. स्थितियों का आकलन बंधेबंधाए ढर्रे के अनुसार करने लगता है. ब्राह्मण ग्रंथों की रचना कथित रूप से वेदों को सर्वग्राही बनाने के लिए की गई है. लेकिन ये ग्रंथ वेदों में अंतर्निहित दार्शनिक सूत्रों की न तो मौलिक गवेष्णा करते हैं, न ही कोई नया दर्शन प्रस्तावित करते हैं. वे केवल वेदों के कर्मकांड पक्ष पर सविस्तार टिप्पणी करते हैं, जिससे आगे चलकर पुरोहितवाद को बढ़ावा मिला.

वेदों और उत्तरवर्ती ग्रंथों में सृष्टि की प्रत्येक जीवनदायिनी शक्ति के लिए अधिष्ठाता शक्ति की कल्पना की गई है. निहित स्वार्थ हेतु पुरोहित कल्पना के मूर्त्तिकरण को वैध ठहराता है. उसपर संदेह करना उचित नहीं माना जाता. प्रकारांतर में वह संस्कृति पर सवार होकर पूरे समाज के आचारव्यवहार का अनिवार्य हिस्सा मान लिया है. इससे मौलिक सोच का हृस होने लगता है. यहीं से सत्य के मिथकीकरण की प्रक्रिया आरंभ होती है. स्वयं वेदादि ग्रंथ समकालीन बोध के मिथकीकरण का परिणाम हैं. वेदों को आप्त ग्रंथ मानना भी उन्हें मिथ मान लेने जैसा है. हालांकि वेदों में यत्रतत्र दार्शनिक प्रश्न भी आए हैं. समय के हिसाब से उनमें पर्याप्त मौलिकता भी है. लेकिन ऐसी ऋचाएं संख्या में नगण्य हैं. प्राकृतिक शक्तियों को सीधे जाननेसमझने के बजाय अधिकांश ऋचाएं उनके नाम पर गढ़े गए देवताओं का महिमामंडन करती हैं. इसे ‘अनुभवों का मिथकीकरण’ कहें अथवा ‘ज्ञान एवं कौतूहल का कर्मकांडीकरण’ जैसा नाम देंवैदिक मनीषियों के लिए वही ‘धर्म’ रहा है. ऋग्वेद भी इससे अछूता नहीं है

प्रज्वलित तपस्या से यज्ञ और सत्य उत्पन्न हुए. अनंतर दिन और रात उत्पन्न हुए. इसके अनंतर जल से पूर्ण समुद्र की उत्पत्ति हुई. जलपूर्ण समुद्र से संवत्सर उत्पन्न हुआ. ईश्वर दिनरात्रि को बनाते हैं. निमिष आदि वाले सारे संसार के वे स्वामी हैं. पूर्वकाल के अनुसार ही ईश्वर ने सूर्य, चंद्र, आनंददायी स्वर्ग, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष का निर्माण किया.’ऋग्वेद, 10/190/1-3.

उपर्युक्त ऋचाओं के उद्गाता कवि अघमर्षण हैं. तीन ऋचाओं में पहली दो ऋचाएं सृष्टि के जन्म को लेकर दार्शनिक समस्याओं से दो चार होती हैं. इसमें समय की उत्पत्ति को लेकर भारतीय दृष्टिकोण को समझा जा सकता है. हालांकि उसमें काफी लोच है. इस उल्लेख में समय स्वतंत्र नहीं है. वह ईश्वर से जुड़ा है. यह बात अलग है कि ईश्वर अपने कृत्यों के लिए खुद समय से बंधा है. प्रत्येक वर्णन के बीच में ईश्वर को घसीट लाने की प्रवृत्ति, न केवल वेदों, बल्कि बाद के भारतीय विद्वानों यहां तक कि आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञों में भी दिखाई पड़ती है. समय को लेकर चर्चा ऋग्वेद में अन्यत्र भी है. तैतीरीय ब्राह्मण में प्रजापति को संवत्सर कहा गया है. माना गया है कि वही संपूर्ण जीवजगत का निर्माता है(संवत्सरो वे प्रजापतिः. संवत्सरेणैवास्मे प्रजाः प्राजनयत.―तैतीरीय ब्राह्मण, 1.6.2.2). उससे आगे बढ़कर शतपथ ब्राह्मण(10/4/2/2) में प्रजापति और संवत्सर को एक माना गया है. उसके अनुसार प्रजापति चरअचर सहित समस्त वस्तुजगत का निर्माता है. यहां तक कि ईश्वर को भी प्रजापति/संवत्सर की रचना कहा गया है. इस आधार पर विचार किया जाए तो समय ही समस्त वस्तुजगत, देवताओं और चरअचर का निर्माता है. ‘अथर्ववेद’ में संवत्सर को लेकर परिपक्व चिंतन मिलता है. वहां समय या संवत्सर को काल के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उसके अनुसार काल अंतहीन और चिरंतन है. अर्थववेद के अनुसार, ‘जगमगाता सूर्य ही समय के रूप में उपस्थित है. इसलिए सूर्य ही समय है. वह हजार आंखों का क्षरणविहीन है. वह सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर निकलता है.’ ऋग्वेद के दशम् मंडल में महाविस्फोट को ‘ब्रह्मणस्फति’ का नाम दिया गया है. देवताओं की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि उनका जन्म सृष्टि के बाद हुआ. सर्वप्रथम अविद्यमान यानी ‘असत्’ से ‘सत्’ की उत्पत्ति हुई, ‘ब्रह्मणस्फित ने कर्मकार के देवताओं को उत्पन्न किया. देवोत्पत्ति से पूर्व समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. इसके अनंतर दिशाएं बनीं. दिशाओं से अनंतर वृक्ष उत्पन्न हुए….अदिति से दक्ष उत्पन्न हुए और दक्ष से अदिति. अदिति ने देवताओं को जन्म दिया. फिर वह अपने सात पुत्रों को लेकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गई तथा जन्म और मृत्यु के लिए सूर्य को आसमान में रख दिया.’(10/72). अगली ऋचा में इंद्र के जन्म का उल्लेख मिलता है.

चूंकि ईश्वर का विचार अपने आप में संदिग्ध है. उसे बीच में लाने के बाद विश्वास गड़बड़ाने लगता है. अनेक प्रश्न पैदा हो जाते हैं. यदि ईश्वर ही एकमात्र कर्त्ता और परम शक्ति है तो उसे तपस्या की आवश्यकता क्यों पड़ी? कहा गया है कि तपस्या से ही सृष्टि बनी.(ऋग्वेद, 10/129-3). सवाल है कि ‘तप’ से ही क्यों? ‘तप’ के माध्यम से ईश्वर किसे प्रसन्न करना चाहता था? सृष्टि की रचना के लिए उसने एक कर्मकांड को ही माध्यम क्यों बनाया? पृथ्वी, सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों का निर्माण भी क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुआ था? ईश्वरीय समय यानी शून्य से सृष्टि निर्माण की अवधि क्या समयहीनता का अंतराल था? क्या सृष्टिध्वंस के साथ ही समयध्वंस भी हो जाता है? उपर्युक्त ऋचा के अनुसार ईश्वर के अस्तित्व को मान लिया जाए तो क्या ईश्वर की भांति काल भी सृष्टि का साक्षी होता है? क्या समय सीमित और काल असीमित है? क्या ब्रह्मांड का निर्माण और ध्वंस अंतहीन काल में तथा उसकी समस्त गतियां चलायमान समय में होती हैं? इस तरह के अनेक प्रश्न उपर्युक्त ऋचा को लेकर हो सकते हैं. दर्शन का जन्म ऐसी ही आशंकाओं से होता है. लेकिन शंका के लिए ‘स्पेस’ की आवश्यकता पड़ती है. यदि उसपर अंध आस्था और जड़ विश्वास का पर्दा डाल दिया जाए तो दर्शन का विकास थम जाता है. वैदिक मनीषा इसका शिकार होती आई है. जिज्ञासा और कौतूहल का आकस्मिक ठहराव कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है. उदाहरण के लिए यदि तपस्या और तप से ही यज्ञ की उत्पत्ति हुई तो तपस्या की क्रिया क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुई थी? तपस्या करने वाला क्या स्वयं ईश्वर था? यदि ईश्वर था तो वह किसकी तपस्या कर रहा था? यदि ‘तप’ यहां सूर्य का स्थानापन्न है तो आलंकारिकता को छोड़ क्यों न सीधा और स्पष्ट शब्द ‘सूर्य’ को उसका स्थानापन्न कर दिया जाए? प्रश्नों का सिलसिला अंतहीन है. लेकिन तप को यदि उष्मा का पर्याय मान लिया जाए जो कदाचित सही भी है, तो उपर्युक्त ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर आए विचार तत्संबंधी वैज्ञानिक परिकल्पना से मेल खाने लगते हैं. आधुनिक वैज्ञानिकों का बड़ा वर्ग सृष्टि का विकास ‘महाविस्फोट’ की घटना से मानता है. उसके अनुसार आंतरिक दबाव के कारण परम संपीडित ब्रह्मांड में महाविस्फोट हुआ और वह टुकड़ों में बदल गया. एक टुकड़ा सूरज बना. छोटेछोटे टुकड़े ग्रहादि बने. गुरुत्वबल के कारण छोटे पिंड बड़े ग्रहों का चक्कर लगाने लगे. धरती धीरेधीरे ठंडी हुई. गैंसे जमकर तरल में बदलने लगीं. उन्हीं से पानी बना. और जल से जीवन की उत्पत्ति हुई. अघमर्षण जहां तप यानी उष्म से सृष्टि की रचना मानते हैं, वहीं एक और दार्शनिक परमश्रेष्ठि ने जल को ‘तपस’ की संज्ञा देते हुए उसे सृष्टि का मूलाधार माना है,सृष्टि से पहले केवल अंधकार था. अंधकार ही अंधकार को ढांपे था. सभी अज्ञात और सभी जलमय था….तपस्या के प्रभाव से वहीं एक तत्व उत्पन्न हुआ’(ऋग्वेद 10/129/3). परमेष्ठि कदाचित पहला ऐसा भारतीय बुद्धिवादी चिंतक था, जिसने मानवीय मेधा को सूर्य की उपाधि दी. उसके अनुसार ‘काम’ विश्व की उत्प्रेरक शक्ति है. वही मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करता है. वही सूर्य है, ‘जिसकी आंखें इस विश्व को नियंत्रित रखती हैं. वह इससे देखा जा सकता है कि सृष्टि निर्माण को लेकर भौतिक विचारधारा और वेदों के दर्शन में खास अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि वेद बीच में ईश्वर या परमात्मा को ले आते हैं. भौतिकवादी विचारक ऐसी किसी भी शक्ति की उपस्थिति को नकारते आए हैं.

स्पष्ट है कि दर्शन का विकास भौतिकवाद से प्रत्ययवाद की ओर रहा है. आरंभ में ईश्वर या केंद्रीय शक्ति की कल्पना अलगअलग दिखने वाली विचारधाराओं में समन्वय की कोशिश का परिणाम थी. जिसे पुरोहितों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कर्मकांडों तक सीमित कर दिया. देवताकरण के जरिये ब्राह्मणवादी परंपरा के चिंतकों ने उन शक्तियों को अधिभौतिक मान लिया. इससे ज्ञान के वायवीकृत रूप को मान्यता मिलने लगी. निहित स्वार्थ के आधार पर प्राकृतिक शक्तियों के ईश्वरीकरण की प्रवृत्ति ब्राह्मणों के लिए इतनी फूलीफली कि कालांतर में उसी को दर्शन की मुख्य धारा का श्रेय दिया जाने लगा. आज भी यही स्थिति है. बौद्ध धर्म के उदय से पहले दर्शन की ये धाराएं समानांतर रूप में विद्यमान थीं. बुद्ध ने दोनों के बीच का रास्ता अपनाया. चूंकि प्रकृतिवादी विचारधाराएं सृष्टि के विकास को लेकर भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती थीं, इसलिए पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल को भौतिकवादी धाराओं के प्रवर्त्तक मानना अधिक उचित होगा. भौतिकवादी धारा सृष्टि निर्माण के पीछे किसी भी अदृश्य शक्ति के योगदान को नकारती हैं. अधिभौतिक अथवा ईश्वर को महत्त्व देने वाली विचारधाराएं ईश्वर या परमात्मा को सर्वेसर्वा मानने के कारण ईश्वरवादी कहलाती हैं. ध्यातव्य है कि विगत ढाई हजार वर्षों में ब्राह्मण कभी खुशीखुशी सत्ता के हस्तांतरण को तैयार नहीं हुआ. सतयुग ब्राह्मण के लिए इसलिए आदर्श है, क्योंकि उसमें उसे चुनौती देने वाला कोई न था. जनसमाज कबीलों में बंटा था. उसके अपने रीतिरिवाज, परंपराएं और दर्शन थे. ब्राह्मणों के कर्मकांड से उसे उसे कोई लेनादेना न था. अर्थव्यवस्था पशुआधारित थी. इसलिए भूमिअधिकार का विचार पनपा ही नहीं था. राज्य छोटेछोटे थे, एकदम कबीलाई रूप था उनका. इसलिए सतयुग में केवल ब्राह्मण ही ब्राह्मण थे. वही शासक थे, वही नियम बनाने वाले. चारों ओर केवल उन्हीं की दुंदभि बजती थी. त्रेता में उन्हें क्षत्रियों साथ सत्ता का समझौता करना पड़ा. मनुस्मृति ने क्षत्रियों और ब्राह्मणों के बीच जो समझौता कराया था, त्रेता के रूप में उसी की अभिकल्पना की गई थी. द्वापर में थोड़ा और पतन हुआ. सतयुग में आर्यों के आक्रमण से पराजित शूद्रों ने खुद को संगठित कर लिया था. मजबूर होकर उन्हें शूद्र कृष्ण को अवतार स्वीकारना पड़ा. कलयुग में उनका नैतिक, राजनीतिक पराभव हो चुका है. केवल दंभ बाकी है.

अथर्ववेद की एक ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति का कारण ‘तपस’(उष्म) को बताया गया है. वह सूर्य का पर्याय भी है. सूर्य को सृष्टिकर्ता मानने का विचार अन्य धर्मों में भी है. जापान खुद को ‘उगते सूर्य का देश’ बताता है. चीनी भी सूर्य को आदि देवता मानने की परंपरा रही है. चीनी लोककथा1 वहां के सूर्य पूजक समाज के बारे में बताती है. भगवतशरण उपाध्याय ने मिस्र के सूर्यपूजक राजा अखनातून को आदि धर्मप्रवर्त्तक माना है.(सांस्कृतिक निबंध, प्राचीन मिस्र का शंकर अखनातून). ऋग्वेद(7/6-1) में भी सूर्य को समस्त चराचर का स्वामी बताया गया है. सूर्य को सृष्टि का स्रोत मानने का विचार भिन्नभिन्न संस्कृतियों में रहा है. वेदों में उसे समय का जनक माना गया है. हालांकि इससे इतर निष्पत्तियां भी हैं. एक ऋचा के अनुसार सूर्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा जल से सृष्टि का विकास हुआ. तदनुसार ईश्वर को सृष्टि के निर्माण की इच्छा के साथ ईश्वर ने जल का सृजन किया. उससे तेजस बना. फिर उससे ग्रहनक्षत्र, सूर्य, चंद्रादि अस्तित्व में आए. ऋग्वेद को भारतीय दर्शन का आधारग्रंथ माना जाता है. कुछ संकेतों को छोड़ दिया जाए तो ऋग्वेद का भारतीय दर्शनपरंपरा से उतना गहरा संबंध नहीं है, जितना माना जाता है. सच तो यह है कि उसमें जो दार्शनिक तत्व हैं, जिन्हें प्रायः बहुदेववाद के नाम से जाना जाता है, असल में प्राकृतिक उसमें जो विचार सूत्र रूप में मौजूद हैं, उनके आधार पर वह भौतिकवादी दर्शन के अधिक निकट है. कल्पना के अतिरिक को देखते हुए उसे हम भारतीय मनीषा की कविता कह सकते हैं. वेद का नाम उन्हें बाद में दिया गया. आगे चलकर उसी के आधार पर औपनिषिदक दर्शन का विकास हुआ. भौतिकवादी विचारक मानवीय कौतूहल, संदेह और आशंकाओं को बचाए रखकर दार्शनिक गवेष्णाओं के लिए बड़ा मैदान तैयार कर रहे थे. उनका दर्शन मानवमात्र के रोजमर्रा के अनुभवों और जिज्ञासाओं पर टिका था. वे जानते थे कि प्रकृति की विशालता, विचित्रता और अनिश्चितता ने मनुष्य को उसके सामने श्रद्धावनत होने को विवश किया है. प्रकृति की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसको समझना आवश्यक है. इसलिए उन्होंने अपने संदेह और उसके बहाने अनेकानेक संभावनाओं को बनाए रखा.

अपने समय में भी इस तरह का विचार रखने वाले वे अकेले न थे. जीवन में सहायक, उसे संभव बनाने वाली, प्राणदायिनी शक्तियों के प्रति सम्मान, समर्पण और श्रद्धावनत होने की संस्कृति प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में रही हैं. यही जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण है. वेद भी इससे अछूते नहीं हैं. ऋग्वेद में अनेक स्थान पर ‘काम’ का महिमामंडन है. एक ऋचा(10/191/1) में अग्नि को ‘कामवर्षक’ कहते हुए उसे प्राणिमात्र का गुण बताया गया है. कामोद्दीपन के लिए सोमपान का आवाह्न है. उसके लिए रात्रि और उषा(सूर्य) का मानवीकरण करते हुए उन्हें यज्ञस्थल पर आमंत्रित किया गया है(ऋग्वेद 10/13/7). एक स्थान पर उषा को रात्रि की बहन बताया गया है. उषा को साधारण लड़कियों की भांति सजनेसंवरने का शौक है‘एक ही रंग के वस्त्र पहन, नर्तकी की भांति उपस्थित होती है. जैसे गाय दूध देती है. वह अपने स्थान तक पहुंचती है. और अपना उजला वक्ष खोल देती है. इसी के साथ अंधेरा छंट जाता है. रात्रि जो उसकी बहन है, भाग खड़ी होती है. एक अन्य ऋचा में लिखा है कि जैसे कोई खिलाड़ी पासा फेंकता है, उषा दिन का पासा फेंकती है. वह स्वर्ग की पुत्री है. उसके आगमन के साथ ही निशा भाग खड़ी होती है.’ वेदांत में शंकर ने संसार को माया कहा है. संसार को नकारा है. उनके अनुसार भोग आत्मा की मुक्ति की राह का रोड़ा है. वेदों से ऐसा प्रतीत नहीं होता. आर्यगण जीवन को संपूर्णता के साथ जीने के समर्थक थे. खुशी के क्षणों में वे सोम का पान करते थे. एक लड़ाकू जाति का इस तरह सुखामोद में लिप्त होना अनपेक्षित भी नहीं माना जा सकता. यह भी हो सकता है कि सुखामोद में जीने का स्वभाव उन्होंने प्राचीन जातियों से सीखा हो. कुल मिलाकर आर्य ऐसे हरगिज नहीं थे, जैसा शंकर ने कहा है. तैतीरीय उपनिषद में लिखा है कि प्राचीन आर्यजन वर्ष में तीन बार विशेष आयोजन के लिए एकत्र होते थे. उस अवसर पर युवतियां शृंगार कर आती थीं. पुरुष सोमपान करते थे. तत्कालीन समाज में प्रजनन दर को बनाए रखने के लिए ऐसे उत्सवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. दरअसल ये उस दौर की ओर इशारा करती हैं, जब काम सामूहिकता का उत्सव हुआ करता था. प्राकृतिक जीवन कठिन था. चुनौतियों के बीच प्रजनन दर को बनाए रखना बहुत कठिन था. कामोद्दीपन के लिए विशेष अवसरों का सृजन प्रायः हर सभ्यता में किया गया. तैतरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि देवता और मनुष्य वर्ष में तीन बार विशेष अवसर पर मिलते हैं. वसंतोत्सव जैसे त्योहारों की हर सभ्यता में उपस्थिति भी इसी ओर संकेत करती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे.

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं.