जेम्स मिल : उपयोगितावादी विचारक और अर्थशास्त्री

मन से दार्शनिक कर्म से इतिहासकार-अर्थशास्त्री जेम्स मिल भारत के बारे में अपनी औपनिवेशिक सोच के लिए कुख्यात है. ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी करते हुए उसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ नामक बृहद ग्रंथ लिखा, जो खासा विवादित हुआ. पुस्तक में मिल ने यह दर्शाने की कोशिश की थी कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में राजनीतिक अराजकता की स्थिति थी. अंग्रेजों ने भारत का नागरीकरण करने के साथ-साथ यहां के नागरिकों को ‘सभ्य’ बनाने में भी मदद की. मिल की भारती विरोधी टिप्पणियों को नजरंदाज कर दिया जाए तो वह एक बेहतर इंसान था. अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर उसने गरीब परिवार से उठकर समाज अपना स्थान बनाया. उसने अपने गुरु बैंथम के विचारों को स्वीकृति दिलाने का भी काम किया. उसको इतिहास से ज्यादा प्रसिद्धि अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मिली. कुल मिलाकर वह अपने समय का महान विचारक, शिक्षाशास्त्री और दार्शनिक था. भारत के बारे में उसने वही लिखा, जो कंपनी उससे लिखवाना चाहती थी. हम इसे उसका वैचारिक विचलन या पद और प्रतिष्ठा के लिए किया गया समझौता कह सकते हैं. इतिहास ऐसे समझौतों, विचलनों से भरा पड़ा है. —ओमप्रकाश कश्यप

स्का॓टिश इतिहासकार, अर्थशास्त्री एवं दर्शनशास्त्र के परम विद्वान जेम्स मिल का जन्म 6 अप्रैल 1773 को नार्थवाटर ब्रिज, स्का॓टलेंड में हुआ था. उसके पिता का नाम भी जेम्स मिल ही था. उसका परिवार गरीब था. पिता मोची का काम करते थे. जबकि मां इसबेल फेंटन का संबंध एक संपन्न किसान परिवार से था. वह स्वयं भी विदुषी एवं दूरदर्शी महिला थीं. बालक जेम्स को मां के ही संस्कार अधिक मिले. परिणाम यह हुआ कि उसकी बचपन में अच्छी शिक्षा-दीक्षा हुई. मां की पहल पर ही आगे की शिक्षा कि लिए जेम्स को चर्च द्वारा संचालित धार्मिक पाठशाला में भर्ती करा दिया गया. वहां से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वह मेंट्रोस चला गया; जहां से उसने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. उच्चशिक्षा के लिए लगभग सतरह वर्ष की अवस्था, यानी 1790 में जेम्स एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में भर्ती हो गया. दाखिले के समय जेम्स को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा. कारण विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए अधिकतम आयु तेरह-चौदह वर्ष तक सीमित थी. जेम्स को दाखिला दिलाने में सर जा॓न स्टुअर्ट की प्रेरणा और प्रयास दोनों ही काम आए. इस कारण वह उनका सदैव ऋणी बना रहा. यहां तक कि उसने अपने पुत्र का नामकरण भी सर जा॓न स्टुअर्ट की प्रेरणा पर, उने प्रति अपना स्नेह और सम्मान को व्यक्त करने के लिए जा॓न स्टुअर्ट मिल रखा.

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान जेम्स ने स्वयं को मेधावी विद्यार्थी सिद्ध करते हुए ग्रीक साहित्य का उच्च अध्ययन किया. विशेषरूप से प्लेटो के दर्शन का. एडिनबर्ग में रहते हुए वह उस समय के प्रख्यात दार्शनिक डुगा॓ल्ड स्टीवर्ट (Dugald Stewart) के संपर्क में आया जो उस समय स्का॓टिश पुनर्जागरण के आंदोलन के बेहतरीन व्याख्याकार थे. इसी दौरान उसने बैंथम की पुस्तकों का भी अध्ययन किया. उस समय उसको लगा कि उसका मानसिक प्रस्फुटन हो रहा है. बैंथम के विचारों ने उसको बहुत प्रभावित किया. विशेषकर उसकी सुखवादी विचारधारा, जिसका प्रभाव जेम्स के आगामी लेखन पर भी बना रहा.

अध्ययन के पश्चात जीविका का प्रश्न खड़ा हुआ तो जेम्स को नौकरी की तलाश में जुटना पड़ा. सन 1790 से 1802 तक वह संघर्ष करता रहा. इस बीच चर्च की मामूली नौकरी तथा बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए उसने 1794 में परास्नातक की डिग्री प्राप्त की. निरंतर अध्ययन में रहते हुए उसने दर्शन, इतिहास तथा राजनीति का ज्ञान प्राप्त कर लिया. इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा, साथ ही सुप्त महत्त्वाकांक्षाएं भी. उसके पश्चात जेम्स को लगा कि स्का॓टलेंड में तरक्की के भरपूर अवसर नहीं हैं, तो वह 1802 में वह सर जाॅन स्टुअर्ट के साथ लंदन के लिए रवाना हो गया. जहां जेम्स को उसका पसंदीदा काम भी मिल गया. सन 1803 में वह एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका Literary Journal का संपादक नियुक्त हो गया, जिसपर रहते हुए उसने अनेक शोधपरक आलेख लिखे. परिणामतः पूरे यूरोप में उसकी विद्वता की धाक जमने लगी. इस पत्रिका की शुरुआत 1803 में हुई थी. जेम्स के नेतृत्व में पत्रिका की प्रतिष्ठा में खूब वृद्धि हुई. किंतु 1806 में पत्रिका के अचानक बंद होने से जेम्स के आगे पुनः जीविका का संकट पैदा हो गया. मगर तब तक वह पर्याप्त आत्मविश्वास अर्जित कर चुका था. इस कारण उसने भविष्य में केवल लेखन के सहारे जीने का निर्णय लिया.

सन 1805 में मिल ने एक विधवा स्त्री की बेटी हैरिएट बुरा॓ से विवाह किया. जिससे अगले ही वर्ष उसके पुत्र जा॓न स्टुअर्ट मिल का जन्म हुआ. लगभग उसी वर्ष मिल ने अपनी महत्त्वाकांक्षी पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ पर काम करना प्रारंभ किया जिसे पूरा होने में बारह वर्ष लगे. 1808 में वह बैंथम और डेविड रिकार्डों के संपर्क में आया. दोनों ने ही उसे गहरे तक प्रभावित किया. कुछ ही समय में तीनों गाढ़े मित्र गए. रिकार्डो ने मिल का परिचय अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों से कराया. मिल अभी तक बैंथम के सामाजिक दर्शन से प्रभावित था. लेकिन रिकार्डो के संपर्क में आने के बाद उसकी अर्थशास्त्रीय लेखन में भी रुचि बढ़ने लगी. आश्चर्यजनक रूप में मानवीय ज्ञान की ये दोनों ही धाराएं, उसके मस्तिष्क में अपनी स्वतंत्र सत्ता को बनाए रहीं. बैंथम और रिकार्डो से प्रभावित होने के बावजूद मिल का अपना स्वतंत्र चिंतन भी था. अपने किंचित मतभेदों के कारण, वह न तो बैंथम के सुखवाद का अर्थशास्त्र से तालमेल बिठा पाया, न ही वह सुखवादियों के मूलमंत्र ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख’ के आधार पर सरकार की मुद्रा एवं कराधान संबंधी नीतियों की समीक्षा कर पाने में असमर्थ रहा.

जो भी हो, मिल को बैंथम की विचारधारा ने बेहद प्रभावित किया था. इसका परिणाम यह हुआ कि आगे कई वर्षों तक वह बैंथम का सहयोगी और समर्थक बना रहा. उसने अपनी सर्जनात्मक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बैंथम के विचारों को प्रचारित कराने में लगा दिया. मिल की रचनात्मकता का अगला चरण 1811 में देखने को मिलता है, जब उसने विलियम एलेन के सहयोग से एक पत्रिका ‘फिलिंथ्रोपिस्ट’ का प्रकाशन शुरू कर दिया. पत्रिका में मिल ने शिक्षा, प्रेस की स्वाधीनता, मानव-कल्याण तथा कैदियों की समस्याओं तथा उनकी अनुशासनात्मकता को लेकर कई महत्त्वपूर्ण लेख लिखे. मिल से पहले बैंथम भी कैदियों की समस्याओं पर विचार तथा कारागार की अमानवीय परिस्थितियों की आलोचना कर चुका था. कह सकते हैं कि जेलों को अधिकाधिक मानवीय बनाने के पीछे मिल पर बैंथम का ही प्रभाव था. इस दौरान उसे सुखवाद के विचार को लेकर भी कई आलेख पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखे. आगे चलकर वे निबंध ‘ब्रिटैनिका एन्साक्लोपीडिया’ के पांचवे खंड में भी प्रकाशित हुए. जिससे जनमानस के बीच मिल की छवि सुखवाद के व्याख्याकार के रूप में बनती चली गई.

सन 1818 में ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ पुस्तक के प्रकाशित होने के साथ ही मिल की गिनती अपने समय के प्रमुख विद्वानों में होने लगी. इस पुस्तक को भारी सफलता प्राप्त हुई. हालांकि इसके कारण उसकी आलोचना भी खूब हुई. इसलिए कि भारत को लेकर मिल का सारा ज्ञान केवल पुस्तकों, अखबारी समाचारों तथा उन अंग्रेज अधिकारियों की टिप्पणियों तक सीमित था, जो या तो भारत में ब्रिटिश सरकार के लिए कार्य कर चुके थे, अथवा किसी न किसी रूप में उससे संबद्ध थे. जाहिर है कि भारत को लेकर उनके विवरण पूर्वाग्रह से भरे और एकपक्षीय थे. इस लिए मिल ने अपनी पुस्तक में एक तरह से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार का बचाव ही किया था. उन दिनों ब्रिटिश सरकार अपनी उपनिवेशवादी नीतियों के कारण लोगों की आलोचना झेल रही थी. मिल की पुस्तक उसके उपनिवेशवादी सोच को मान्यता प्रदान करती थी. इसलिए मिल को उसका लाभ भी मिला. पुस्तक लिखने के साथ ही मिल को इंडिया हाउस में नियुक्ति मिल गई. आगे भी विभिन्न राजनीतिक पदों पर रहते हुए उसे उसने खूब प्रतिष्ठा एवं मान-सम्मान अर्जित किया.

जैसा कि ऊपर कहा गया है, मिल बैंथम के साथ-साथ रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी चिंतन से भी प्रभावित था. अर्थशास्त्र से उसकी पहली असली मुठभेड़ ‘कार्न ला॓’(Corn Laws) के औचित्य को लेकर लिए गए एक लेख के दौरान हुई. थोड़ा विषयांतर में जाते हुए हम बता दें कि ‘कार्न ला॓’ की व्यवस्था यूरोप में यद्यपि बारहवीं शताब्दी के दौरान की गई थी. इसका विकट रूप सन 1815 में नेपोलियन युद्ध के पश्चात उस समय देखने को मिला जब कृषि-क्षेत्र को घाटे से उबारने के लिए अनाज के आयात पर रोक लगा दी गई. इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को मंदी की मार से बचाना था. माॅल्थस जैसा प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री कार्न ला॓ के पक्ष में था. अनाज पर लगाया गया प्रतिबंध एक सीमा तक तो कारगर सिद्ध हुआ. इसने किसानों को मंदी की मार से उबारने में बड़ी मदद की, किंतु जैसे-जैसे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरती गई, इससे होने वाली समस्याओं में भी सतत वृद्धि होने लगी. कारण, कानून के प्रभाव से किसानों की आय बढ़ी थी, साथ ही उनका प्रभाव भी. अब वे इस अवस्था में पहुंच चुके थे कि अनाज का मनमाना भाव तय करने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकें अथवा अनुकूल समय आने पर उसको महंगे दामों पर बेच सकें. इसका समाज पर विपरीत प्रभाव पड़ा. दाम बढ़ने से गरीबों की मुश्किलें बढ़ने लगीं. दूसरी ओर चीजों के मूल्य में भी उसी अनुपात में तेजी आई. परिणामतः अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी और ‘कार्न ला॓’ के विरुद्ध माहौल बनने लगा.

1804 में ‘का॓र्न ला॓’ की आलोचना करते हुए जेम्स मिल ने अनाज के आयात पर लगे सभी प्रतिबंध हटा लेने की जनता की मांग का समर्थन किया. उसने पर्याप्त तर्क देते हुए मा॓ल्थस की आलोचना भी की जो उस कानून के पक्ष में था. उससे अगले ही लेख में उसने का॓बेट तथा स्पेंस(Cobbett & Spence) के उस आलेख की पर्याप्त तर्क सहित आलोचना की, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि भूमि, न कि उद्योग, ही वास्तविक राष्ट्रीय संपत्ति है. कि राष्ट्रों के बीच व्यापारिक संबंध घाटे के सौदे रहे हैं. कि कारण जनता की जमाराशि राष्ट्र पर किसी प्रकार का भार नहीं है और लगाए गए कर उत्पादकता में बढ़ोत्तरी करते हैं. यह भी कि संकट का वास्तविक कारण जमाखोरों की देन है. मिल का यह भी कहना था कि किसी भी राष्ट्र की कुल सालाना बिक्री और सालाना खरीद में सदैव अंतर होता है. अतः व्यापार में स्थायित्व के लिए किसी भी वस्तु की अतिरिक्त आपूर्ति को आवश्यक रूप से अन्य किसी वस्तु की अतिरिक्त मांग द्वारा संतुलित रखना चाहिए.

सन 1808 में अपनी पत्रिका Commerce Defended के एक लेख में उसने साफ किया कि—

‘किसी भी राष्ट्र के पास कोई एक वस्तु उसकी आवश्यकता से बहुत अधिक हो सकती है, यद्यपि वह अपनी विश्व-भर में कुल मांग से अधिक कभी नहीं हो सकती. ऐसी वस्तु की अतिरिक्त मात्र को जरूरत के स्थान पर आसानी-से ले जाना संभव है, किंतु ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं कि वहां से कोई और आवश्यक वस्तु उचित मात्र में उपलब्ध न हो सके. अतः सवाल उठता है कि उस समय क्या किया जाए जाए जब बाजार में कोई वस्तु अतिरिक्त मात्रा में मौजूद हो…उस अवस्था में उस वस्तु के उत्पादन में लगे संसाधनों का उपयोग, संतुलन की अवस्था तक, उस वस्तु के निर्माण के लिए करना उचित होगा, जिसका कि अभाव बना हुआ है. संतुलन की स्थिति में बाजार में न तो कोई वस्तु अपनी मांग से अधिक उपलब्ध होगी, न ही किसी वस्तु का अभाव हो सकेगा.’

मिल ने रिकार्डो को उसकी अर्थशास्त्र संबंधी टिप्पणियों को प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया. जिसके कारण आगे चलकर उसे ब्रिटिश संसद की सदस्यता से सम्मानित किया गया. 1821 में उसने लंदन में ‘पा॓लिटिकल इकाना॓मी क्लब’ की स्थापना में मदद की जो आगे चलकर रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी विचारों तथा बैंथम के सुधारवाद का प्रमुख विमर्श-स्थल सिद्ध हुआ. इसी वर्ष मिल की एक और विशिष्ट कृति Elements of Political Economy प्रकाशित हुई, जिसमें उसने रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी विचारों की विस्तार सहित विवेचना की गई है. यह पुस्तक कुछ ही समय में रिकार्डो के विचारों को समझने का मुख्य माध्यम बन गई. इस पुस्तक को प्र्रकाशन के साथ ही खूब लोकप्रियता मिली. केवल तीन सालों में पुस्तक का तीसरा संस्करण बाजार में आ गया. सन 1831 से 1833 तक ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रवक्ता के पद पर रहते हुए मिल ने कई कानूनी मामलों में कंपनी की मदद की. 1834 में ‘लंदन रिव्यू’ में उसने चर्च के विधान में सुधार की संभावनाओं पर केंद्रित एक लेख लिखा, जिसने खूब चर्चा प्राप्त की. जिससे उसकी गिनती उस समय के प्रसिद्ध सुधारवादियों में होने लगी.

1836 में निधन होने तक वह लगातार लेखन करता रहा. हालांकि उस समय तक उसके दोनों फेफड़े क्षतिग्रस्त हो चुके थे. 23 जून 1836 को लंबी बीमारी के पश्चात उसका निधन हो गया. उसका लेखन विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मामलों पर मौलिक विचारात्मक टिप्पणियों से भरा पड़ा है, जिससे उसकी विलक्षणता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है. मिल की अंतिम पुस्तक Fragment on Mackintosh मृत्यु से मात्र एक वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी. हालांकि उसे उसकी बाकी पुस्तकों जितनी प्रशंसा नहीं मिल सकी. लेकिन वह अपने विचारों से आने वाले विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा, जिनमें कार्ल मार्क्स, जान स्टुअर्ट मिल आदि शामिल थे.

वैचारिकी

एक बेहद साधारण परिवार में जन्मे, कठिनाइयों में पले, बचपन से ही मेधावी मिल अपने अध्वसाय से जो ख्याति अर्जित की, उसके कारण उसकी गिनती विश्व के उन महान दार्शनिकों में होती है, जो मानवमात्र के सुख की चिंता करते थे. जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन रचनात्मक लेखन को समर्पित किया था. जो मात्र अपनी प्रतिभा के बल पर एक सामान्य परिवार से आगे बढ़कर समाज में अपना खास स्थान हासिल कर सके और जिनके कारण समाज में सत्य एवं नैतिकता अपना सुरक्षित स्थान बनाए रख सके हैं. जेम्स मिल ने भी अपनी अद्वितीय मेधा के दम पर बौद्धिक जगत में अपने लिए विशिष्ट स्थान बनाया.

विलक्षण प्रतिभा के धनी मिल ने दर्शनशास्त्र के अध्ययन की शुरुआत प्लेटो के दर्शन से की. उसने विद्यार्थीकाल में प्लेटो की दर्शन की समालोचना करने वाले अनेक निबंध लिखे. जिसके कारण उसको प्लटो के दर्शन का आधिकारिक विद्वान माना गया. यही नहीं उसने अध्ययन के दौरान ही ग्रीक तथा लैटिन भाषाओं का स्तरीय ज्ञान प्राप्त किया तथा उनमें सृजनात्मक लेखन की छाप छोड़ी. अपनी युवा अवस्था के दिनों में वह बैंथम के विचारों के संपर्क में आया और उसके सुखवाद से प्रेरणा लेकर उसके विचार को आगे विस्तार दिया. मिल उच्च कोटि का विद्वान, इतिहासकार, साहित्यकार, राजनेता एवं दार्शनिक था. उसका सारा साहित्य मौलिकता की श्रेणी में आता है. रिर्काडो तथा बैंथम से प्रेरणा लेते हुए उसने सुखवाद के विचार को मान्यता दी तथा उसके प्रचार के लिए अनेक पुस्तकें तथा लेख आदि लिखे, जिन्हें विद्वानांे की भरपूर सराहना प्राप्त हुई. उसका लेखन अर्थशास्त्र, राजनीति, इतिहास, दर्शनशास्त्र आदि क्षेत्रें में फैला हुआ है. कुछ विद्वानों को उसके विचारों में यत्र-तत्र विरोधाभास भी नजर आता है, किंतु यह कोई अनोखी बात नहीं है. इस प्रकार के विरोधाभास तो प्रायः सभी विलक्षण प्रतिभा-संपन्नों के साथ होते रहे हैं.

इंग्लैंड की उपनिवेशवादी राजनीति को स्थिर बनाने एवं उसको वैचारिक-बौद्धिक समर्थन देने में जितना अधिक योगदान जेम्स मिल का रहा, उतना शायद ही किसी और विद्वान लेखक-साहित्यकार का रहा हो. इसका उसको लाभ भी मिला. ब्रिटिश सरकार ने उसको उच्च पद एवं विविध सम्मान से उपकृत किया. हालांकि ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों का समर्थन करने के लिए उसको आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था. उसके आलोचकों की बात में दम भी है. क्योंकि कई स्थान पर वह ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों का मूक समर्थक नजर आता है. जिससे उसके आलोचकों को उसकी निष्ठा पर संदेह होने लगता है.

मिल ने भारत को लेकर अपनी पुस्तक में एक स्थान पर चैंका देने वाला उल्लेख किया कि—

‘‘ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को सभ्य बनाने, उसका नागरीकरण करने में मदद की थी… अंग्रेजों के आने से पहले भारत एक बर्बर युग से बाहर आने के लिए छटपटा रहा था.’ हालांकि बाद में मिल ने अपने ही कथन का उलट करते हुए भारत में ब्रिटिश राज को ‘समाज के संपन्न तबके के लिए बाहरी मदद उपलब्ध कराने वाला व्यापक तंत्र’’ कहकर ब्रिटिश राज्य की वास्तविक खामियों की ओर इशारा भी किया था.

एक ओर व्यक्ति-स्वातंत्रय और जनवादी विचारधारा का पक्ष लेना तथा दूसरी ओर एक औपनिवेशिक सत्ता के समर्थन में भारी-भरकम तर्क गढ़ना, ये जेम्स मिल के जीवन के अंतर्विरोध हैं. लेकिन ऐसे अंतर्विरोधों से शायद ही कोई बच पाया हो. ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ नामक ग्रंथ से जेम्स मिल की इतिहास में रुचि जाहिर होती है. किंतु उसका योगदान केवल ऐतिहासिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है. सच में तो मिल का लेखन मानवीय स्वतंत्रता एवं समानता के लिए समर्पित था. उसने अपने लेखों तथा व्यक्तिगत प्रयासों से उदारवादी राजनेताओं को प्रभावित किया, जिसका फ्रांसिसी क्रांति पर व्यापक प्रभाव पड़ा. मिल की पुस्तक Elements of Political Economy(1821)’ में उसके उदारवादी विचारों की झलक देखी जा सकती है.

जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है, इतिहास मिल का प्रिय विषय था. मगर उसकी प्रतिभा बहुमुखी थी. राजनीति और अर्थशास्त्र को लेकर उसने जो लेख लिखे उनकी भरपूर सराहना हुई. कई विश्वविद्यालयों ने उसको अपने पाठ्यक्रम में शामिल भी कर लिया था. पुस्तक में सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता, उसके लक्ष्य और समस्याओं की गंभीर विवेचना की गई थी. उसमें मिल ने दर्शाने का प्रयास किया है कि जनसंख्या वृद्धि विकास की प्रमुख समस्याओं में से एक है. क्योंकि जिस अनुपात में जनसंख्या वृद्धि होती है, उस अनुपात में संसाधनों का विकास नहीं हो पाता. उसने संसाधनों के अनियमित बंटवारे को भी विकास की समस्याओं से जोड़ा तथा माना कि किसी वस्तु की वास्तविक कीमत उसमें लगे श्रम के आधार पर आंकी जानी चाहिए, न कि उसके निर्माण में प्रयुक्त कच्चेमाल अथवा किसी ओर कारण से. पुस्तक में वस्तुतः डेविड रिकार्डो के विचारों को ही विस्तार दिया गया था. मिल ने उसमें राजनीति पर दिए गए अपने वक्तव्य संकलित किए गए हैं, जिनमें से एक लेख में जेम्स मिल ने जनसंख्या-वृद्धि और संसाधनों के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया है. लेख में उसने एक स्थान पर लिखा है कि—

‘सामान्यतः, यदि बाकी सब लक्षण अपरिवर्तित हों और पूंजी एवं जनसंख्या वृद्धि का अनुपात एकसमान रहे तो मजदूरी में प्रभावी वृद्धि भी अपरिवर्तनीय बनी रहती हैं. यदि जनसंख्या की अपेक्षा पूंजीनिवेश में अध्कि वृद्धि हो तो मजदूर वर्ग की आय पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. परिणामतः औसत मजदूरी बढ़ने लगती है. यदि ये दोनों ही स्थितियां न हों और यदि पूंजीनिवेश अनुपात में वृद्धि होती है, तब मजदूरी में भी आनुपातिक वृद्धि होगी. लेकिन इसके विपरीत यदि जनसंख्या वृद्धि के सापेक्ष पूंजी अनुपात में गतिरोध है, यानी पूंजीनिवेश की मात्रा में ठहराव बना रहे तो निश्चित रूप से इसका असर मजदूरी पर पड़ेगा और वह तेजी से गिरने लगेगी.’

जेम्स मिल की कमी थी कि उसने अपने राजनीतिक दर्शन तथा आर्थिक विचारों में कभी समन्वय स्थापित करने की नहीं सोची. इतिहास में रुचि के कारण उसने ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ लिखा, जिसमें उसने निहित पूर्वग्रहों के कारण औपनिवेशिक ब्रिटिश राजनीति का समर्थन किया. तथापि समानांतर रूप से वह अर्थशास्त्र एवं एक अर्थविज्ञानी के रूप में कार्य करता रहा. निश्चित रूप से इसके पीछे रिकार्डो के साथ मैत्री एवं बैंथम की प्रेरणाएं भी थीं. दरअसल मिल का अर्थदर्शन रिकार्डो तथा सामाजिक दर्शन बैंथम के चिंतन का ही विस्तार है. वस्तुतः मिल अर्थशास्त्र के क्षेत्र में रिकार्डो का अनुयायी था. किंतु यह मिल ही था जिसने रिकार्डो को उसकी अर्थशास्त्र की पहली पुस्तक के प्रकाशन के लिए प्रेरित किया था. यही नहीं, मिल के प्रयासों से ही रिकार्डो को ब्रिटिश संसद के लिए चुना गया था. बैंथम, जेम्स मिल तथा रिकार्डोे की तिकड़ी के संबंध के बारे में माना जाता है कि—

‘बैंथम मिल का नैतिक गुरु तथा मिल रिकार्डो का नैतिक गुरु था.’

आगे चलकर रिकार्डो ने भी ‘सुखवाद’ के सिद्धांत की अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से व्याख्या की. मिल का मानना था कि सरकार को जनजीवन में हस्तक्षेप की नीति से बचना चाहिए. उसके बदले उसको जनता के बीच से ही संसाधन जुटाकर उनपर कार्य होना चाहिए. इसके ठीक विपरीत अपने राजनीतिक चिंतन में वह आर्थिक रूप से विपन्नों को सरकारी संरक्षण दिए जाने की नीति का समर्थक था और मानता था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को संरक्षण प्रदान करने के लिए सरकार को अधिक से अधिक मदद करनी चाहिए.

जेम्स मिल ने भले ही कोई नया सिद्धांत नहीं गढ़ा हो, मगर बैंथम तथा रिकार्डो के विचारों को तार्किक ढंग से आगे ले जाने और उनकी आसान शब्दों में व्याख्या करने में उसका योगदान अविस्मरणीय है. उसका विश्वास था कि जब हम लोगों के समूह के साथ मिलकर कुछ करना चाहते हैं तो उस अवस्था में समूह के हित उसके अधिकांश सदस्यों की अधिकतम संतुष्टि के बराबर होते हैं. दूसरे शब्दों में एक लोकतांत्रिक संगठन में समूह के हितों के साथ-साथ उसके सदस्यों के हित भी समानरूप से सधते चले जाते हैं. एक कल्याणकारी समूह ऐसा ही सपना अपने सदस्यों को लेकर देखता है कि उसके किसी भी कर्तव्य से अधिक से अधिक सदस्य इकाइयों का भला हो सके. इस तरह मिल ने सामूहिक जीवन की विशिष्टताओं का पक्ष लेकर उसके माध्यम से समतावादी समाज की संकल्पना का ही विस्तार किया था.

अपने ग्रंथ ‘एलीमेंट्स आ॓फ पा॓लिटिकल इका॓नामी’ में रिकार्डो के तुलनात्मक लाभों के सिद्धांत का उपयोग करते हुए उसने गणितीय उदाहरण जुटाने की अपेक्षा तर्क का सहारा लिया है. उसका मानना था कि श्रमिक के ग्रहण करने की मात्र केवल उतनी होती है, जितनी वह पूंजी की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी करता है. जबकि पूंजीपति का लाभ उसके द्वारा भूमि आदि संसाधनों में किए गए निवेश का आनुपातिक होता है. इन दोनों के अतिरिक्त भूस्वामियों का एक तीसरा भी वर्ग है जो केवल अपना हित देखता है और अपना ही स्वार्थ-साधन चाहता है. मिल की निगाह में असली मुनाफाखोर भी यही है.

मिल ने बैंथम के सुखवाद के विचार का समर्थन किया था, किंतु उसके बहाने वह अनिमित उपभोग को अनुमति देने के विरोध में था. हालांकि सर्वांगीण सामाजिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसने उपभोग को नियंत्रित करने की सलाह दी थी. अपनी पुस्तक ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मूलतत्व’ (Elements of Political Economy) में उपभोग को व्याख्यायित करते हुए मिल लिखता है कि—

’उपभोग के दो चेहरे होते हैं: उत्पादक एवं अनुत्पादक. उत्पादक उपभोग से उसका अभिप्राय ऐसे उपभोग से था जो मूलतः उत्पादक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निवेश के रूप में किया जाता है. इसमें वह सब आ जाता है जो किसी उद्यमी द्वारा, किसी वस्तु के उत्पादन को कार्यरूप देने के लिए किया जाता है. इसमें श्रम, मशीनरी, औजार, कच्चा माल और भवन, जहां पर उत्पादन कार्य संपन्न किया जाना है, यहां तक कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उत्पादकता को बढ़ाने में शामिल मवेशी भी सम्मिलित हैं. इनके अतिरिक्त कच्चे माल भी इनमें उत्पादक उपभोग का ही हिस्सा है.’

दूसरी ओर अनुत्पादक उपभोग में मजदूरी तथा अन्य ऐसे सभी उपभोग सम्मिलित हैं जिनका उत्पादकता से कोई संबंध नहीं है. साफ है कि पूंजीपति द्वारा किया जाने वाला निवेश बहुआयामी होता है, उसके लिए उद्यमी को अधिक खतरा भी उठाना पड़ता है. इस कारण उसका लाभ भी अधिक, उसके द्वारा लगाई गई पूंजी के अनुपात में बढ़ता चला जाता है. मजदूर द्वारा किया गया निवेश जिसमें सामान्यतः उसका श्रम ही शामिल है, इसलिए अनुत्पादक वर्ग में सम्मिलित है, क्योंकि उसमें सिवाय श्रम कौशल के और कुछ नहीं है.

जेम्स मिल का मानना था कि वितरण तथा विनिमय माध्यमिक क्रियाएं हैं; जिनके द्वारा उत्पाद को उसके उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता है. विनिमय अपने आप में लक्ष्य नहीं है, उसका कर्तव्य उत्पाद-विशेष को, समय रहते उपभोक्ता को उपलब्ध पहुंचाना है. ताकि सतत उपभोग के द्वारा वह अपनी मांग को बनाए रख सके. उपभोक्ता को उत्पाद का सीधा संबंध उसके उपभोग से होता है. कोई भी व्यक्ति किसी वस्तु का निर्माण या अर्जन इसलिए करता है, क्योंकि वह उसकी कामना करता है. जैसे ही वस्तु विशेष के प्रति उसकी कामनाएं तृप्त हो जाती हैं; फिर उस वस्तु के निर्माण का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता. बावजूद इसके यदि कोई व्यक्ति अपनी अपेक्षा से अधिक वस्तु का उत्पादन करने में सफल है और वैसी कामना भी रखता है, तो इसका सीधा-सा अभिप्राय है कि वह कुछ अन्य वस्तुओं की कामना करता हैं जिन्हें वह अपने उत्पाद के बदले प्राप्त करना चाहता है. यदि वह किसी ऐसी वस्तु का उत्पादन करता है जो उसकी निजी कामनाओं से बाहर है अथवा जिसकी तात्कालिक आवश्यकता उसको अपेक्षाकृत कम है, तो इसका आशय होगा कि वह ऐच्छिक वस्तु की अपेक्षा उस वस्तु का उत्पादन एवं विपणन अधिक सफलतापूर्वक कर सकता है.

जेम्स मिल की पुस्तक ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मूलतत्व’ एक तरह से रिकार्डो की विचारधारा का ही विस्तार थी. इस पुस्तक में मिल ने जहां एक ओर बैंथम के सुखवाद की नई व्याख्या करते हुए उसे लोकप्रिय बनाने में सफलता प्राप्त ही, वहीं रिकार्डो की उत्पादकता संबंधी विचारधारा को भी आगे बढ़ाने का काम किया. यह पुस्तक एक तरह से इन दोनों के सिद्धांतों का ही प्रस्तुतीकरण है. यह बताना भी शायद अप्रासंगिक न हो कि जेम्स मिल व्यक्तिगत रूप से बैंथम के अपेक्षाकृत अधिक निकट था. मिल और उसका परिवार वर्षों तक बैंथम के किरायेदार रह चुके थे. यही नहीं बैंथम ने जेम्स मिल के पुत्र जान स्टुअर्ट मिल की शिक्षा का भी प्रबंध किया था.

बैंथम की विचारधारा से प्रभावित होकर मिल ने ‘वेस्टमिनिस्टिर रिव्यू’ नामक अंगे्रजी पत्रिका में कई लेख लेख लिखे. मिल का सबसे मौलिक काम लोकतंत्र तथा नागरिक अधिकारों को लेकर लिखे गए उसके लेखों में देखने को मिलता है. उसका मानना था कि नागरिकों को राजनीतिक गतिविधियों में अधिक से अधिक हिस्सा लेना चाहिए, ताकि उनमें अपने अधिकारों को लेकर अधिक जागरूकता आए. 1820 में लिखे गए अपने एक लेख में मिल ने नागरिक अधिकारों का पक्ष लेते हुए उन्हें न केवल प्राकृतिक अधिकारों के निकट बताया, बल्कि उल्लेख किया कि मानवमात्र के कल्याण तथा उससे अधिकतम सुख पहुंचाने के लिए भी लोकतंत्र एवं जनआधिकारिता अनिवार्य है.

यह बात भी ध्यान में रखने की है कि मिल आर्थिक मामलों में सरकार के कम से कम दखल का पक्षधर था. शिक्षा के प्रसार-प्रसार की अनिवार्यता को लेकर लिखे गए अपने लेखों में मिल ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार को सरकार के अतिमहत्त्वपूर्ण दायित्व के रूप में स्वीकार किया. वह शिक्षा को बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए सुलभ बनाना चाहता था. वा॓ल्स के अनुसार मिल ने एक यादगार और विशिष्ट लेख लिखा था, जिसमें उसने शिक्षा पर जोर देते हुए लिखा था कि—

‘शिक्षा केवल पादरियों के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए पूरी तरह सुलभ होनी चाहिए.’

जनसंख्या के सवाल पर भी उसके विचार बड़े स्पष्ट थे. उसका मानना था कि विकास में नैरंतर्य बनाए रखने के लिए जनसंख्या के साथ संसाधनों में आनुपातिक वृद्धि भी अनिवार्य है, अन्यथा यह लोगों की आय पर नकारात्मक असर डालती है. संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जेम्स मिल ने अपने विचारों को बड़ी ईमानदारी से अभिव्यक्त किया है. वह राजनीति और अर्थव्यवस्था के कल्याणकारी रूप का समर्थक था. उसने अनावश्यक कराधान के लिए सरकार की आलोचना की है.

मिल के अनुसार सरकार को चाहिए कि वह कराधान, विशेषकर भूमि और श्रमसंबधी नियम बनाते समय, जनसामान्य की कठिनाइयों और क्षमताओं का ध्यान रखे. इस तरह उसने कल्याणकारी अर्थनीति का समर्थन किया है. मिल का सारा लेखन इसी मान्यता के लिए समर्पित है. उसने शिक्षा, लोकतंत्र, उद्योगनीति, जनअधिकारिता को आगे ले जाने का महत्त्वपूर्ण दायित्व वहन किया था.  इन्हीं कारणों से मिल की गिनती अपने समय के सबसे मेधावी एवं मौलिक विचारकों में होती है.

जेम्स मिल के विचारों को आगे चलकर उसके पुत्र जा॓न स्टुअर्ट मिल ने विस्तार दिया. हालांकि उसके आलोचकों में यह मानने वाले भी कम नहीं हैं, जिनके अनुसार मिल ने अपनी ओर से कोई नया सिद्धांत प्रस्तुत नहीं किया. उसका समस्त चिंतन बैंथम और रिकार्डो की विचारों का ही विस्तार है. यह भी मिल की प्रतिभा का ही परिणाम था का कि एक बेहद साधारण लोगों के बीच से उठकर उसने इंग्लैड की तात्कालिक राजनीति और बुद्धिजीवियों में अपने लिए सम्मानित स्थान बनाने में सफलता प्राप्त की थी.

© ओमप्रकाश कश्यप

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Filed under जेम्स मिल : उपयोगितावादी विचारक और अर्थशास्त्री

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