सभ्यता का विकास और कहानी

मनुष्य और किस्सागोई के नजदीकी संबंध के तीसचालीस हजार वर्ष पुराने पुख्ता प्रमाण आज मौजूद हैं. बावजूद इसके कहानी कला के उद्गम की खोज के लिए यह अवधि बहुत नई है. हिमयुग की दहलीज पर ही मनुष्य समय बिताने, अनुभव साझा करने तथा संघर्षपूर्ण जीवन में मनोरंजन की भरपाई के लिए किस्सेकहानियों का सहारा लेने लगा था. तब तक वह अक्षरज्ञान से अनभिज्ञ था. बाकी कलाएं भी अल्पविकास की अवस्था में थीं. खेती करना तक उसे नहीं आता था. पूरी तरह प्रकृतिआधारित जीवन में भोजन जुटाने का एकमात्र रास्ता थाशिकार करना. किसी कारण उसमें सफलता न मिले तो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध भोजन यथा कंदमूलफल आदि पर निर्भर रहना. प्राकृतिक आपदाओं, वनैले जीवों से भरपूर घने जंगलों में जैसे भी संभव हो, अपनी सांगठनिक एकता एवं संघर्ष के बल पर खुद की रक्षा करना. अपने संगठनसामथ्र्य एवं परिस्थितिकीय सामंजस्य के हुनर के दम पर प्राचीन मनुष्य उन चुनौतियों से जूझता था. कभी सफल होता था, कभी असफल. प्राचीन वनाधारित यायावरी जीवन की वे सामान्य विशेषताएं थीं. उसमें जीतहार लगी ही रहती थी. जीवन का हर नया अनुभव उसे रोमांचित करता. यदाकदा हताशा के क्षण भी आते, किंतु मानवीय जिजीविषा के आगे उनका लंबे समय तक ठहर पाना संभव न था. या यूं कहो कि बुरे सपने की तरह उन्हें भुलाकर वह यायावर कर्मयोगी तुरंत आगे बढ़ जाता था. कठोर संघर्षमय जीवन तथा अनूठेपन से भरपूर अनिश्चितसी स्थितियां मानवीय कल्पनाओं के नित नए वितान तैयार करती थीं. उन्हें सहेजकर दूसरों तक पहुंचाने, उनके माध्यम से समूह का मनोरंजन करने की चाहत ने किस्सेकहानियों को जन्म दिया.

उस समय तक मनुष्य का स्थिर ठिकाना तो बना नहीं था. धरती का खुला अंचल और प्रकृति की हरियाली गोद उसे शरण देने को पर्याप्त थी. जंगल में शिकार का पीछा करते हुए आखेटी दल का यदाकदा दूर निकल जाना; अथवा लौटते समय रास्ता भटककर जंगलों में खो जाना बहुत सामान्य बात रही होगी. फिर भी आखेट के लिए गए लोगों के वापस लौटने तक उनके वे परिजन जो बीमारी, वृद्धावस्था अथवा किसी अन्य कारण से आखेट पर न जा पाए हों, उनकी प्रतीक्षा में परेशान रहते होंगे. आकुल मनस्थितियों में समय बिताने के लिए समूह के सदस्यों के साथ अनुभव बांटना, धीरेधीरे एक लोकप्रिय चलन बनता गया. मनोरंजन की उत्कट चाहत, जो उस संघर्षशील जीवन की अनिवार्यता थी, उत्पे्ररक का काम करती थी. आखेटी दल के लौटने पर समूह के बीच हर बार नए अनुभवों के साथ कुछ नए किस्से भी जुड़ जाते थे. अभियान सफल हो या असफल, आखेट से लौटे सदस्यों के पास अपने परिजनों को सुनाने के लिए भरपूर मसाला होता था. उनमें से कुछ वर्णन निश्चय ही दुख और हताशा से भरे होते होंगे, जिन्हें सुनकर समूह के सदस्यों की आंखें नम हो आती होंगी. फिर भी वे उनके यायावर जीवन का जरूरी हिस्सा थे और परिवार नामक संस्था के अभाव में, उन्हें एक होने की प्रतीति कराते थे. इसलिए शाम को भोजन के बाद अथवा फुर्सत के समय दिनभर के रोमांचक अनुभवों का पिटारा समूह के सदस्यों के आगे खोल दिया जाता. उन्हें सुनने के लिए बूढ़ोंबच्चों सभी में होड़ मच जाती होगी.

सुनाने के लिए शुरूशुरू में सीधेसपाट वर्णन का सहारा लिया जाता होगा. जैसेजैसे अनुभव बढ़ा, घटना को रोमांचक एवं मनोरंजनपूर्ण बनाने के लिए कल्पना का सहारा लिया जाने लगा. जो व्यक्ति घटनाओं को लुभावने अंदाज में सुनाने में सिद्ध होता, समूह उसकी बातें सुनने को उत्सुक रहता. उसको विशिष्ट सम्मान देता था. लंबे संघर्षपूर्ण जीवन के पश्चात, वृद्धावस्था को प्राप्त लोगों के लिए भी अपने पिछले जीवन के शौर्यपूर्ण किस्से सुनाना समय बिताने का एकमात्र जरिया रहा होगा. किस्सागोई की नींव ऐसे ही अनुभवसिद्ध लोगों द्वारा रखी गई. मनोरंजन की जरूरत के चलते लोग उनके पास आते. चूंकि उनके पास अनुभवों का विशाल खजाना होता था, इसलिए वे उनके साथ ससम्मान पेश आते थे. उस समय तक मनुष्य का जीवन स्वेच्छाचारी था. समाज का विधिवत गठन अभी नहीं हो पाया था. लेकिन किस्सेकहानी तथा दूसरी विकासमान कलाओं के प्रभाव में रागात्मक संबंध स्थायी रूप लेने लगे थे. इससे समूह की, बाद में जब समूह के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी तो परिवार की संकल्पना ने जन्म लिया. स्पष्ट है कि किस्सेकहानियां मनुष्य के समाजीकरण के न केवल साक्षी, बल्कि उत्पे्ररक और सहायक भी बने थे. फिर जैसेजैसे समाज बढ़ा, वैसेवैसे किस्सेकहानियों के रूपकलेवर में भी बदलाव आता गया. आरंभिक कहानियां व्यक्ति के रोजमर्रा के अनुभवों से उपजी सत्यकथाएं अथवा थोड़ीबहुत बढ़ाचढ़ाकर पेश की गईं कल्पकथाएं ही थीं. उनमें रहस्यरोमांच, हर्षविषाद, सुखदुख, करुणामैत्री, मिलनबिछोह, साहसउत्साह के साथसाथ मनुष्य की आदिम जिज्ञासाओं, प्रवृत्तियों, भावनाओं और कल्पनाशीलता की सहज और युगानुकूल अन्विति थी. कह सकते हैं कि कहानी कला दुनियाभर की उन आरंभिक कलाओं में से है जो सभ्यता के एकदम आदिम छोर पर, जीवन की धड़कनों के बीच स्वाभाविक तौर पर विकसी थीं. उसकी उत्पत्ति के मूल में यद्यपि मनोरंजन प्रमुख तत्व था, तथापि कहानी सहित विभिन्न कलाभिव्यक्तियों के विकास का एकमात्र वही अभिप्रेत नहीं था. उन कलारूपों के विकास के पीछे मनुष्य की ज्ञान की ललक, अपनी मौलिक कल्पना द्वारा उन्हें नए कलेवर में ढालकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा उनसे कुछ सीखने, सिखाने एवं स्वयं को दैनंदिन के समर हेतु तैयार रखने की कामना सन्निहित थी

उनका नृत्य, जिसमें संभवतः कुछ लोग टोटम पशु की नकल उतारते थे, कुछ शिकारियों की, एक धर्मानुष्ठान के साथसाथ, आखेट का अभ्यास भी था. वह एक प्रकार से आखेट विधि की कवायद ही थी. इसी से कई हजार वर्ष पश्चात नृत्यनाट्य(वले) और नाटक का विकास होने वाला था. हिमयुग में जंगली पशुओं के जो हुबहू चित्र तैयार किए गए थे(फ्रांस एवं स्पेन की गुफाओं में) उन्हें अब अनुपम कलाकृतियां समझा जाता है. परंतु मूलतः ये चित्रकला की विशेष भावना से तैयार नहीं किए गए थे. जहां दिन का उजाला नहीं पहुंच सकता, ऐसी अंधेरी गुफाओं में ये चित्र चरबी से जलने वाले मंद दीपों या मशालों की रोशनी में तैयार किए गए थे. उत्कृष्ट पशु प्रतिमाओं का इस्तेमाल, जैसा कि इनपर भालों और तीरों से बने हुए छेदों से पता चलता है, लक्ष्यभेद के आनुष्ठानिक अभ्यास के लिए होता था.’

प्राकृतिक घटनाओं में एक नैरंतर्य एवं तारतम्यता रहती है. आरंभिक कहानियां उसी से अनुप्रेत थीं. प्रकृति की भांति कहानी के भी कई रंग थे. सुख हो या दुख, कहानी जीवन में प्रत्येक क्षण मनुष्य के साथ थी. उथलपुथल भरे उसके जीवन में नए किस्सेकहानी का बानक बन ही जाता था. घने जंगल तथा मौसम की विकट परिस्थतियों में, लंबे आखेट के उपरांत ठिकाने पर सकुशल लौट आना भी कम उत्सवधर्मी घटना न थी. हर्ष अथवा शोक के ऐसे समविषम क्षणों में आखेटकुशल पूर्वजों की वीरता, साहस, विपत्ति एवं त्रासदियों के किस्से खासे लोकप्रिय होते होंगे. स्वाभाविक रूप से ऐसे किस्सों को बारबार सुनासुनाया जाता होगा. सुनाते समय प्रत्येक व्यक्ति उन्हें अपनी तरह से प्रस्तुत करता. प्रस्तुतीकरण के दौरान वह श्रौत कथानक में अपनी रुचि के अनुसार कुछ न कुछ जोड़ताघटाता रहता था. फलस्वरूप समय के साथ उनमें कल्पना का पुट बढ़ता गया. कल्पना को गति देने में वातावरण एवं प्रकृति का योगदान कम न था. खुले, तारों से भरे आसमान, तरहतरह की वनवनस्पतियों, जंगली जानवरों, नदियों, पहाड़ों, झरनों आदि से भरे भूमांचल में बहुतसी बातें मनुष्य को प्रभावित करती थीं. आरंभिक कहानियां सत्यकथाओं के करीब थीं. रोजमर्रा के अनुभवों में मनुष्य को जो भी विचित्र लगता, उसे सहेजने के लिए वह कहानीकिस्सों में ढाल लेता था. उसको धीरेधीरे एहसास हुआ होगा कि सीधेसपाट ढंग से कहने की अपेक्षा प्रतीकों के रूप में बयान की गई घटना अधिक संप्रेषणीय होती है. उसका प्रभाव दीर्घकालिक होता है. उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक समाज से दूसरे भिन्न परिस्थितियों में रह रहे समाज तक, पहुचाने में आसानी रहती है. पात्रों एवं घटनाओं का प्रतीकीकरण इसलिए भी आवश्यक था, क्योंकि सुनिश्चित ठिकाने के अभाव, मौसम की मार और भोजन की जरूरत के चलते उसके यायावरी जीवन में प्रायः परिवर्तन होता रहता था. अतएव ऐसे पात्रों और घटनाओं का समावेश जरूरी था, जिनकी विभिन्न परिस्थितियों तथा कबीलाई समूहों के बीच अधिकतम स्वीकार्यता हो. इसके लिए नए कल्पनालोक गढ़े गए, ताकि मनुष्य के भौतिक आवत्र्तनप्रत्यावर्तन का उसके द्वारा गढ़े गए किस्सेकहानियों, जो तब तक उसकी जीवनसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे, की विश्वसनीयता पर कोई संकट न पड़े. समाजीकरण के आरंभिक दौर में मनुष्य यह भी समझ चुका था कि समूह की एकता को बनाए रखने हेतु जीवनमूल्यों में स्थायित्व होना चाहिए. इसके लिए भी किस्सेकहानी मददगार बने. बढ़ते अनुभवों एवं कल्पनाशक्ति के फलस्वरूप मानवअभिव्यक्ति में प्रतीकात्मकता एवं गुणवत्ता में निखार आता गया. संघर्षपूर्ण जीवन में कल्पना और प्रतीकात्मकता से भरे किस्सों की अपनी उपयोगिता थी. प्रतीकों ने वर्णन को रोचक बनाया. उनके माध्यम से बात समझाना आसान था. एक कहानी के माध्यम से इसको आसानी से समझा जा सकता है

एक लकड़हारा था. बहुत ही चतुर और बुद्धिमान. उसके साथी उसकी अक्लमंदी का लोहा मानते थे. एक बार की बात लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने निकला. वहां एक सूखे पेड़ को देख उनकी बांछें खिल गईं. पेड़ बड़ा था. उसकी लकड़ी को अकेले घर ले जाना संभव न था. कुछ सोचकर उसने जंगल से ही कुछ मजदूर दिहाड़ी पर ले लिए. काम को जल्दी निपटाने के फेर में वह पेड़ पर चढ़ा और जल्दीजल्दी कुल्हाड़ी चलाने लगा. हड़बड़ी में कुल्हाड़ी का बेंट तने से टकराया और ‘खटाक्!’ कुल्हाड़ी हत्थे से अलग हो दूर जा गिरी.

उफ्!’ उसके मुंह से निकला, ‘काश! एक कुल्हाड़ी और ले आता.’ वह बड़बड़ाया. चेहरे पर परेशानी झलकने लगी

अब क्या करें उस्ताद?’ एक मजदूर ने इशारे में पूछा. लकड़हारा सोच में पड़ा था. वह खाली हाथ घर नहीं लौटना चाहता था. उपाय एक ही था, घर से नई कुल्हाड़ी मंगवाई जाए. कटी हुई लकड़ी को छोड़ वह खुद जाना न चाहता था. तब लकड़हारे ने निर्णय लिया कि किसी मजदूर को घर भेजकर कुल्हाड़ी मंगवा ली जाए. पर भेजा किसे जाए? नौकरों को उसकी भाषा आती न थी. और पत्नी थी अनपढ़. चैकाचूल्हे में रमी रहने वाली.

खूब सोचविचार के बाद उसने एक पत्थर मंगवाया. उसपर खडि़या मिट्टी से कुछ रेखाएं खींचीं और मजदूर को थमा दिया. मजदूर गया. लौटा तो उसके हाथ में नई कुल्हाड़ी थी. लकड़हारा तो काम में जुट गया. मगर साथ काम कर रहे मजदूरों की समझ में कुछ न आया. यह कैसे संभव हुआ कि लकड़हारे की पत्नी ने बिना कुछ पूछे नई कुल्हाड़ी उसके हाथ में थमा दी. जरूर वह कोई जादू जानता है. जबकि जादू जैसी कोई बात संभव ही नही है. लकड़हारे ने पत्थर पर कुल्हाड़ी का चित्र बनाकर मजदूर को दिया था. उस संकेत को समझकर उसकी पत्नी ने उसको कुल्हाड़ी थमा दी थी.

जाहिर है कि कहानीकला के विकास के साथ उसके स्थूल कथानक का महत्त्व घट रहा था. धीरेधीरे लोग यह समझने लगे थे कि कहानी के पात्रों और घटनाओं की महत्ता सामान्यतः मनोरंजन तत्व को विस्तार देने तक सीमित है, असली चीज वह संदेश है, जिसे लोककल्याण के वास्ते सहेजना जरूरी है. कालांतर में समाज में ऐसी कहानियों तथा प्रतीकों का महत्त्व बढ़ता ही गया. नएनए प्रतीकों को जोड़ने के लिए मनुष्य ने अपनी कहन की कला का विस्तार किया. मनुष्य की आदिम सहयोगी बनीं वे कहानियां इतनी उपयोगी और महत्त्वपूर्ण मानी गईं कि मनुष्य उन्हें न केवल सुनतासुनाता था, बल्कि उन्हें सहेजने का भी प्रयत्न करता था. फ्रांस और स्पेन की सीमा पर मौजूद लेस्काक्स की रहस्यमयी कंदराओं में बनीं अनूठी चित्रमालाओं से सिद्ध होता है कि अपने अनुभवों और कल्पनाओं को स्थायी बनाने के लिए प्राचीन मनुष्य कितना सजग था. उन चित्रमालाओं के अध्ययन से यह भी सामने आया है कि उन कलाभिव्यक्तियों का उद्देश्य केवल मनःरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका उपयोग नवांतुक पीढ़ी को जंगल की परिस्थितियों का बोध कराने तथा किशोर शिकारियों को आखेटकला में प्रवीण बनाने के लिए भी किया जाता था. जिन दीवारों पर ये चित्रमालाएं हैं, वहां कुछ निशान भी पाए गए हैं, जो तीर, भाले अथवा किसी नुकीले हथियार के हो सकते हैं. उनसे प्रतीत होता है कि आदिमानव समूह के सदस्य उनका उपयोग निशाना साधने के लिए भी करते थे. आदिमानव द्वारा वे चित्र गुफाओं में, चट्टानों तथा ऐसे सुरक्षित एवं बहुगंतव्य ठिकानों पर बनाए गए, जिधर आदिमसमूहों का निरंतर आनाजाना था. उद्देश्य यही था कि कबीले के सदस्य तथा नवांतुक कबीले वहां ठहरकर मनःरंजन के साथसाथ आखेटकला की भी एकांतसाधना कर सकें. वन्य जीवों से भरे जंगल में, जहां कदमकदम पर खतरनाक स्थितियां और जीवन की चुनौतियां हों, आखेट हेतु निर्विघ्न अभ्यास के लिए ऐसे सुरक्षा प्रबंध अपरिहार्य थे. लेस्काॅक्स और आसपास की पहाडि़यों में बने पांच सौ से अधिक चित्रों से पता चलता है कि कभी वहां पर अलगअलग कालखंड के दौरान प्राचीन मनुष्य की अनेक टुकडि़यों ने बसेरा किया था. आखेट के अभ्यास के अलावा वे भित्तिचित्र उनके मनोरंजन की कमी को भी पूरा करते होंगे. शोध के अनुसार इन चित्रावलियों की रचना अलगअलग समय में की गई. इसी प्रकार की चित्रावलियां मध्यप्रदेश के विंध्यांचल और सतपुड़ा की पहाडि़यों में भी मिलती हैं. इनमें सबसे उल्लेखनीय नाम भीमबैठका का है. भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भइयापुर गांव के आसपास मौजूद पहाडि़यां कभी आदिवासियों का ठिकाना थीं. यहां पहाडि़यों पर मनुष्य की प्राचीनतम कलाभिव्यक्तियों के निशान मौजूद हैं. इस विश्वधरोहर को दुनिया के सामने लाने का श्रेय विक्रम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विष्णु श्रीधर वाकणकर को जाता है. शोध बताते हैं कि प्रस्तर काल में यहां बड़ी संख्या में आदिम मनुष्यों का बसेरा था. एक पूरी बस्ती. लगभग 750 शैलआश्रयों में से 500 शैलआश्रयों में गेरुए, लाल, सफेद हरे, कहींकहीं पीले और हरे रंग में चिंत्रों की लंबी शृंखला है. जिनमें बाघ, शेर, घडि़याल, कुत्ते, हाथी, नीलगाय आदि जानवरों को चित्रित किया गया है. इन चित्रावलियों की सटीक उम्र का आकलन तो अभी बाकी है, किंतु अभी तक जो शोध हुए हैं, उनके अनुसार प्राचीन मनुष्य की अभिव्यक्ति कला के वे अवशेष 15000 से 35000 वर्ष तक पुराने हैं. भारत के अलावा फ्रांस, स्पेन, आस्ट्रेलिया आदि में भी इसी प्रकार के चित्र प्राप्त हुए हैं. ये सभ्यता के उभार के एकदम आरंभिक दौर को सामने लाते हैं, जब मनुष्य ने अपनी स्मृति और कलाओं को सहेजने के प्रयास संभवतः शुरू ही किए थे.

स्पष्ट है कि कहानीकला मनुष्य की प्राचीनतम खोज है. वह तब से मनुष्य के साथ है, जब तक मनुष्य किसी ज्ञात सभ्यता के प्रभाव से दूर था. वह मनुष्य के सभ्यताकरण की साक्षी, उसकी प्रेरक और अनुगामिनी रही है. कहानीकला को विस्तार देने, कहानियों को और अधिक रोचक एवं कल्पनाप्रधान बनाने की कोशिश में मनुष्य अपनी रचना के साथ नित नए प्रयोग करता गया. आरंभिक किस्सेकहानियों के पात्र मनुष्य के अनुभव जगत से सीधे जुड़े पशुपक्षी तथा वन्यप्राणी होते होंगे. उनमें भी ऐसे पशुपक्षियोंवन्य प्राणियों की संख्या अधिक रहती होगी, जो किसी न किसी प्रकार उनके सहयोगी थे अथवा जिनसे खतरे की संभावना होने के कारण बचाव की जरूरत थी. उस समय तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था. अतएव तत्कालीन भावाभिव्यक्तियों के स्वरूप का सटीक अनुमान लगा पाना तो असंभव है, तथापि भित्तिचित्रों तथा उस समय की अन्य कलाभिव्यक्तियों द्वारा हम आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वे सब विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत न हारने, चुनौतियों में साहस और धैर्य बनाए रखने, खुद पर भरोसा करने तथा सतत संघर्ष की प्रेरणा देने वाली रही होंगी. कुछ विद्वानों का मानना है कि अभिव्यक्ति के क्षेत्र में पद्य का आगमन गद्य की अपेक्षा पहले हुआ था. इसमें पूरी सचाई भले न हो, मगर एक बात पद्य के पक्ष में अवश्य जाती थी. जब तक लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था, भाषाभिव्यक्तियों को सहेजने के लिए स्मृति ही एकमात्र माध्यम थी. भारत में वेदादि ग्रंथों को श्रुति ग्रंथ इसीलिए कहा जाता है. चूंकि पद्य को गद्य की अपेक्षा आसानी से याद किया जा सकता था, वह सुननेसुनाने में भी प्रिय लगता था और उसमें दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता अधिक थी, अतएव कहानी का प्रथम सहेजा गया रूप पद्यात्मक हो सकता है. प्रख्यात अमेरिकी लेखिका रुथ साॅवयर इस बारे में सुनिश्चित हैं

कहानी गढ़ने का सर्वप्रथम प्रयास, आदिम समूहों द्वारा चक्की चलाते, किश्ती खेते, शिकार अथवा युद्ध के लिए हथियारों की धार चढ़ाते या पर्वउत्सव के बहाने समयसमय पर सामूहिक रूप से गएगुनगुनाए जा सकनेवाले गीतों के माध्यम से हुआ होगा. आदिगायक या किस्सागो अपनी अद्वितीय वीरता पर इतरानेवाला, आत्माभिमानी तथा विजयोल्लास में डूबकर स्वच्छंद आनंद मनानेवाला पहला इंसान रहा होगा. अपनी पुस्तक ‘दि वे आफ स्टोरीटेलिंग’ में सावयर ने कनाडा के तटीय क्षेत्र में बसने वाले आदिवासियों के एक प्राचीनतम गीत को उद्धृत किया है

मैं, कोको, मैने एक भालू का शिकार किया

होहोहो…..

बड़ा भालू….डरावना भालू

हेहेहे…..

उसको मैंने अपने बल से परास्त किया

हेहेहे….

मेरी बाजुओं में अपार शक्ति है

वे भाला फेंकने के लिए काफी मजबूत हैं

वे नाव खेने के लिए मजबूत हैं….मैं कोको

हे….हे….हे….हो….हो….हो.

यह कविता दर्शाती है कि प्रारंभिक अभिव्यक्तियां जीवन से जुड़ी थीं. उनमें कल्पना का योग कम से कम था. लेकिन इससे यह मान लेना कि आरंभिक अभिव्यक्तियां केवल पद्यात्मक रही होंगी, उचित न होगा. दिनभर जंगल की परिस्थितियों से जूझने के बाद शाम को घर लौटने वाले आदिम मनुष्य के लिए समूह के सदस्यों के साथ अपने अनुभव साझा करने के लिए यह संभव न था कि वह उन्हें पद्य में तत्काल अभिव्यक्त कर सके. क्योंकि अनुभवों के पद्य रूपांतरण के लिए ज्यादा समय और काव्यात्मक प्रतिभा की आवश्यक थी. दूसरे सीधेसरल गद्य का आनंद बच्चे भी ले सकते थे. इसलिए अधिकांश सदस्यों के लिए अनुभवों की सीधी गद्यात्मक प्रस्तुति आसान रहती होगी. उनमें वह आवश्यकतानुसार कल्पना का प्रयोग भी करता होगा. पद्य का विकास कदाचित फुर्सत और एकांत के क्षणों में, आगत की कल्पना, अनुभवों को सहेजने की लालसा अथवा समूह के सदस्यों का मनोरंजन करने की कामना के साथ हुआ होगा. आज इस बात के पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं कि मानवसभ्यता का विकास पृथ्वी के अलगअलग हिस्सों में हुआ. सिंधु घाटी, मेसोपोटामिया(इराक), मिस्र, चीन, बेबीलोन, आदि क्षेत्रों में लगभग एक ही समय में अलगअलग संस्कृतियां पनपीं. समय के साथसाथ वे एकदूसरे के संपर्क में आईं. उनमें आर्थिकसामाजिक लेनदेन बढ़ा. आपसी व्यापार में तेजी के फलस्वरूप उनमें सांस्कृतिक आदानप्रदान की भी शुरुआत हुई. फलस्वरूप कला और संस्कृति के दूसरे उपकरणों के आदानप्रदान में तेजी आई. इसलिए यह भी संभव है कि अपनी भावाभियक्तियों को सहेजने के लिए अलगअलग सभ्यताओं ने अलगअलग पद्धतियों को खोजकर उन्हें अपनाया हो. लिपि के आविष्कार का श्रेय बेबीलोनवासियों का जाता है. उससे पहले कलाभिव्यक्तियों को सहेजने का एकमात्र आधार स्मृति थी. यद्यपि चित्रलिपि और प्रस्तर कला का आविष्कार बहुत पहले, हिम युग में ही हो चुका था, लेकिन उसको दूसरे स्थान पर ले जाना संभव न था. इसलिए आरंभिक चित्र गुफाओं में, ऐसे सुरक्षित ठिकानों पर बनाए गए, जहां जीवन अधिक सुरक्षित था और जिधर से मानवसमूहों का आनाजाना लगा रहता था. लिपि का आविष्कार होने के पश्चात कलाभिव्यक्तियों को नए प्रारूप में सहेजना संभव हुआ. आरंभिक यायावरी जीवन में मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचरता रहता था. एकदूसरे से संपर्क के समय जहां संघर्ष की संभावना थी, वहीं व्यक्तिगत अनुभवों और कलारूपों को साझा करने के अवसर भी मिलते होंगे. इसलिए आरंभिक कलारूपों में वैविध्य के साथसाथ एक किस्म की एकरूपता भी नजर आती है.

भारतीय उपमहाद्वीप में कहानी लेखन की परंपरा बहुत पुरानी है. ऋग्वेद, जिसे संसार के सबसे पुराना ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है, में अनेक कहानियां आई हैं. प्रत्येक कहानी का कोई न कोई उद्देश्य है. उसके माध्यम से उद्गाता ऋषि पाठकोंश्रोताओं तक एक नैतिक संदेश पहुंचाना चाहता है. इससे उस समय कहानी कला के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है. महाभारत में तो छोटीछोटी हजारों कहानियां मिलकर बड़े ग्रंथ का रूप ले लेती हैं. उन्हीं कहानियों के बल पर वह जीवन और समाज का समग्र दस्तावेज बन जाता है. वे उसकी ‘जय’ से ‘विजय’ फिर ‘भारत’ और अंततः ‘महाभारत’ तक की यात्रा का बानक बनी हैं. वेदों के अलावा उपनिषद्, रामायण, कथासरित्सागर, जातक कथाओं आदि में भी सैकड़ों कहानियां संकलित हैं. उन सभी में गजब की एकरूपता है. इससे अनुमान लगा सकते हंै, कि उन ग्रंथों में पंक्तिबद्ध होने से पूर्व वे कहानियां लोकसाहित्य के रूप में समाज में बहुत पहले से विद्यमान रही होंगी. लोकसाहित्य के रूप में ही वे धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा करती रही हैं. विश्वसभ्यताओं में नागरीकरण की शुरुआत ईसा से सातआठ वर्ष हजार पहले हो चुकी थी. ईसापूर्व 3000 वर्ष पहले तक धरती के अलगअलग कोनों में विकसित संस्कृतियों के बीच व्यापारिक संबंध विकसित हो चुके थे. उनके बीच आर्थिक के साथसाथ सामाजिकसांस्कृतिक आदानप्रदान भी बढ़ा था. उनके आपसी संपर्क को प्रगाढ़ बनाने, संबंधों में आत्मीयता का विस्तार करने में इन कहानियों का बड़ा योगदान था. एक क्षेत्र की लोकप्रिय कहानियां दूसरे हिस्से में जाकर न केवल लोकप्रिय हुईं, बल्कि उनमें वहां के क्षेत्रवासियों ने अपनी रुचि एवं परिस्थितियांे के अनुसार आवश्यक परिवर्तन भी किया.

सभ्यताकरण की साक्षी रही कहानियों ने हर समाज, हर परिवेश में अपनी उपस्थिति बनाए रखी है. इसके बावजूद दुनिया के पहले किस्सागो और प्रथम कथालेखक का पता लगाना असंभव है. केवल यह कहा जा सकता है कि मनुष्य को जिन दिनों पहली बार भाषाज्ञान हुआ, जब उसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की कला आई, तभी से वह अपनी कहानियां भी एकदूसरे के साथ साझा करने लगा था. कहानियों के माध्यम से वह मनोरंजन और शिक्षा दोनों उद्देश्यों को साधता था. कहानी द्वारा मनोरंजन का पहला लिखित प्रमाण 2560 ईस्वीपूर्व का है. मिस्र की पहाडि़यों से प्राप्त दस्तावेज के अनुसार प्रसिद्ध पिरामिड निर्माता यूनानी सम्राट खुपु के तीन पुत्र अपने यशस्वी पिता के मनोरंजन के लिए बारीबारी से रोमांचभरी कहानियां सुनाते हैं. लेखनकला का आविष्कार बेवीलोनवासियों ने किया. प्रथम महाकाव्य के लेखन का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है. विश्व का पहला महाकाव्य होने का गौरव ‘गिलगमेश’ को प्राप्त है. विद्वानों के अनुसार गिलगमेश उरुक का राजा था, जिसने 3000 ईस्वीपूर्व दक्षिणी बाबुल पर राज किया था. उसी गिलगमेश की र्कीतिकथा इस महाकाव्य का आधार है. उसमें भरपूर कल्पना तत्व है. कथानायक गिलगमेश बहादुर सम्राट है. कहानी में मिट्टी और लार से बना अर्धमानव पशु एनकिडु है, जो कालांतर में गिलगमेश का दोस्त बन जाता है. इस कथा को लगभग 2000 वर्ष पहले कीलाक्षरों में लिपिबद्ध किया गया था. यह भी संभावना है कि लिपिबद्ध होने से पूर्व गिलगमेश की र्कीतिकथा भी शताब्दियों तक लोकसाहित्य में श्रुति रूप में प्रचलित रही हो. गिलगमेश की कहानी इतनी लोकप्रिय हुई कि बेबीलोन की कीलाक्षर लिपि जहांजहां भी गई, वहां यह कथा भी पहुंची. गिलगमेश वीररस से भरपूर कृति है, उसमें इतिहास और कल्पना दोनों का सम्मिश्रण हैं. यह कहानी दर्शाती है कि 5000 वर्ष पहले तक मनुष्य कल्पना के आधार पर पात्र गढ़ने लगा था. विशिष्ट वीरता का प्रदर्शन करने वाला व्यक्ति समूह के बीच सम्मान का पात्र माना जाता था.

आशय है कि ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी तक कहानीकला काफी विकसित हो चुकी थी. उससे पहले तक कहानी या तो ठेठ अनुभवाधारित होती थी, अथवा अनुभव और कल्पना का सम्मिश्रण. आगे की कुछ शताब्दियों में इसमें परिवर्तन आया, फलस्वरूप कल्पना के आधार पर नएनए कथानक गढ़े जाने लगे. कहानी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर प्रतिभाशाली किस्सागो इस क्षेत्र से जुड़े थे, जो श्रोताओं की रुचि को समझते हुए कहानियां गढ़ने में माहिर थे. उन्हीं के फलस्वरूप कहानी में कल्पना का अनुपात बढ़ता गया. विशुद्ध कल्पना पर केंद्रित कथानक और कहानी कला की कसौटी पर सही पाए जानेवाली मिस्र की पुरानी ‘राजकुमार और उसके तीन नसीब’ (दि प्रिंस एंड दि थ्री फेट) का उल्लेख प्रायः होता है. इस कहानी में जहां लोककथा के भरपूर तत्व हैं, वहीं इसमें कल्पना का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है. इस कहानी का 1500 वर्ष पुराना लिखित प्रारूप उपलब्ध है. इस बात की भी प्रबल संभावना है कि लिखित रूप में आने से पहले यह कहानी लोकसाहित्य का हिस्सा रही होगी. अनूठी परिकल्पना और कथातत्व के आधार पर हम इसे विश्व की आदि परीकथा भी कह सकते हैं. इसमें कांचघर, बड़ी समुद्र जैसी नाव की अनूठी कल्पना है. कुछ विद्वान इसे कल्पना पर आधारित पहली कहानी मानते हैं. जो अस्वीकार्य है, क्योंकि वेदों, उपनिषदों तथा यूनानी ग्रंथों के अनुसार कल्पनाआधारित कहानियों के सृजन की शुरुआत 3000 वर्ष पहले ही हो चुकी थी.

भारतीय परंपरा में ऋग्वेद में, जो विश्व की पहली कृति है, अनेक उपकथाएं भी आई हैं. वे कल्पना के द्रष्टिकोण से भी अत्यंत विलक्षण हैं. निरे मनोरंजन के बजाय वे विशेष उद्देश्य को लेकर गढ़ी गई हैं, इसलिए कथारस के साथसाथ उनमें लक्ष्य की प्रधानता है. वस्तुतः ऋग्वेद के मनस्वी विद्वानों का ध्येय कहानी लिखना न होकर जीवनमूल्यों से भरपूर धार्मिकआध्यामिक संदेश को आनेवाली पीढि़यों के लिए सहेजना था. केवल मनोरंजन के लिए लेखन उनकी वृत्ति नहीं थी. इसलिए वेदों में आई प्रत्येक उपकथा का विशिष्ट उद्देश्य है. वहां कथातत्व मुखर न होकर प्रच्छन्न रूप में आया है. यहां ऋग्वेद से दो उदाहरण देना प्रासंगिक होगा. दो इसलिए क्योंकि आगे चलकर कहानी की जो यात्रा चलती है, दोनों कथासूत्र उसके आदिप्रतिनिधि अथवा दिशावाहक कहे जा सकते हैं. इनमें पहली कहानी जुआरी की है. उल्लेखनीय है कि जुआ वैदिक काल में ही एक बुराई के रूप में पनप चुका था. जुए की बुराई और उसके जुआरी के परिवार पर पड़नेवाले दुष्प्रभाव को दर्शाता हुआ एक अत्यंत मार्मिक कथासंकेत ऋग्वेद में आया है. उसके दशम मंडल का 34वां सूक्त जुआरी की मनोदशा का वर्णन करता है. स्थितियां यथार्थपरक और दिल को छू लेनेवाली हैं. कहानी के अनुसार एक जुआरी है. वह बारबार जुआ न खेलने की शपथ लेता है. लेकिन पासों की ध्वनि उसकी व्याकुलता को बढ़ा देती हैं. वह उसकी ओर खिंचा चला जाता है. निकट संबंधी उसकी आलोचना करते हैं. जुआरी के पिता, माता और भाई उससे दूरी बनाए रखते हैं, ‘हम उसको नहीं जानते, जुआरियो इसे पकड़कर ले जाओकहकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं.’ एकमात्र जुआरी की पत्नी उसको प्यार करती है. जुआरी भी उसको भरपूर प्रेम करता है. लेकिन जुए के अपने शौक के कारण एक दिन वह पत्नी को ही दांव पर लगा देता है. अपनी भार्या को दूसरों की बांहों में देखकर वह विगलित हो जाता है. इस दुर्दशा पर उसके अपने उसको दुत्कारते हैं. संपत्तिविहीन होते ही उसके साथी जुआरी भी उसको त्याग देते हैं. अपनी प्रिय भार्या को जीते हुए जुआरियों के अधीन देखकर वह बिलख उठता है. इसके बावजूद जुए का चस्का अपनी जगह है. सबकुछ गंवा देने के बावजूद जो बाकी है, वह है जीत की संभावना. सबकुछ खोकर पुनः सबकुछ पा लेने की भ्रांति. यह उम्मीद कि अगला दांव शायद सबकुछ वापस दिला दे उसको बारबार जुआघर ले जाती है. वहां पहुंचते ही हार की संभावना उसको डराने लगती है. वह लौट आना चाहता है. परंतु पासों की आवाज सुनकर उसका हृदय मचलने लगता है. वह रुक नहीं पाता और ‘जारिणी की भांति’ द्यूतस्थल की ओर दौड़ पड़ता है. उद्गाता ऋषि द्वारा जुआरी की मनोदशा का वर्णन देखिए

जुआरी द्यूतस्थल पर पहुंचता है. सबकुछ गंवा देने के बाद मन शंकाकुल है. तन में आग लगी है. पूछता हैᅳ‘क्या मैं जीतूंगा?’ पासे उसकी कामनाओं को भड़काते हैं. खुद पर उसका बस नहीं चलता. अपना बचाकुचा धन वह दांव पर लगा देता है. लेकिन ‘अक्ष, धन आदि से संयुक्त पासे उसको धोखा देते हैं. तपाते हैं, संताप जनते हैं. जुआरी को पहले थोड़ी जीत से लुभाकर अंततः उसका सबकुछ हर लेते हैं. वे जुआरी के श्रेष्ठतम धन द्वारा स्वयं अभिसिक्त होते हैं….जादू के अंगारों की भांति ढाले जाते हुए वे स्वयं तो शीतल हैं, पर दर्शकों के हृदय को जलाकर क्षार कर जाते हैं.’

कहानी के समापन पर उद्गाता ऋषि उसके आगे समर्पण कर, अपना सबकुछ गंवा चुके जुआरी को समझाता है, छोड़ दे जुआ, न खेल जुआ. धरती की ओर देख, खेतों को जोत. परिश्रम से जो प्राप्त होता है, उसी को पर्याप्त समझकर संतोष कर. उसी में खुश रहना सीख. अपने पसीने से कमा….वे तेरी गौए हैं, वह तेरी भार्या है….’’

उपर्युक्त कहानी या दृष्टांत के माध्यम से वैदिक ऋषि जुए की बुराइयों को सामने लाकर उसको व्यक्ति के लिए एक अभिशाप सिद्ध करना चाहता था. इसमें वह कामयाब भी हुआ है. वेदों को मुख्यतः आध्यात्मिक ग्रंथ के रूप में देखा जाता है. इसलिए उनमें सामाजिक संदेश युक्त कहानियों को अपेक्षित लोकप्रियता नहीं मिल पाई. कहानी में जुए के दुष्प्रभाव पर जोर दिया गया है. ऋग्वेद का जुआरी अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगाकर खिन्न है. इस कथानक का वास्तविक प्रस्फुटन महाभारत में देखने को मिलता है. वहां जुआरी स्वयं युधिष्ठर हैं, ज्येष्ठ पांडव पुत्र धर्मराज, जो जुआ खेलने की अपनी लत के कारण अपना राजपाटपत्नी सबकुछ गंवा देता है. वहां कहानी कला और नाटकीयता के संयोग से जो कथा निखरकर आती है, उसका प्रभाव शताब्दियों तक पाठकोंश्रोताओं के दिलोदिमाग पर बना बना रहता है. कहानियों की यह धारा आचारविचार, आचरण की शुद्धता और सामाजिक नैतिकता का पाठ पढ़ाती थी. इस धारा का विस्तार रामायण, महाभारत, कथासरित्सागर की कहानियों में खुलकर सामने आया. ऋग्वेदकाल में ही कहानियों की दूसरी धारा, जो कदाचित पहली से भी पुरानी थी, जन्म ले चुकी थी. इस धारा में पात्रों की उपस्थिति प्रतीकात्मक होती थी. इस धारा का प्रमुख उद्देश्य था, पशुपक्षी अथवा काल्पनिक पात्रों के माध्यम से पाठकों तक नैतिक संदेश पहुंचाना. पात्रों की प्रतीकात्मक उपस्थिति होने के कारण कहानी के समापन पर मनोमस्तिष्क पर उनका प्रभाव गौण हो जाता था. रह जाता केवल वह नीतिसंदेश, जिसे रचनाकार अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता है. ऋग्वेद में ऐसे भी प्रसंग हैं जहां मानवेतर जीवों को मनुष्यता के लिए कल्याणकारी कर्म करते हुए दिखाया गया है. अवसर आने पर वे रूढि़यों पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूकते. सातवें अध्याय के 103वें सूक्त में तालाब में टर्राते हुए मेंढकों की तुलना वेदपाठ करते ब्राह्मणों से की गई है. दशम मंडल(108) में इंद्र की सरमा नामक कुतिया कृपण पणियों को उपदेश देती है. यह भी अपने आप में बहुत रोचक प्रसंग है

इंद्रगण, मैं इंद्र की दूत बनकर आई हूं. तुमने जो गौधन एकत्र किया है, उसको ग्रहण करने की मेरी बड़ी इच्छा है.’ पणि प्रत्युत्तर में सरमा को फुसलाते हैं

सरमा, जिस इंद्र की दूत बनकर तुम आई हो, वे कैसे हैं? उनका पराक्रम कितना है? उनकी सेना कैसी है? वे इंद्र आएं, हम उन्हें मित्र बनाने को तत्पर हैं….तुम स्वर्ग से चलकर आ रही हो. इतनी कठिन यात्रा के लिए तुम्हें जितनी गायें चाहिए, उतनी ले जा सकती हो. वरना बिना युद्ध के भला कौन गाय देता है!’

इसपर सरमा इंद्र के आयुधों की भीषण मारक क्षमता का बखान करती है. पणि सरमा से युद्ध का भय न दिखाने को कहते हैं

हमें डराओ मत, हमारे पास भी पर्याप्त सैन्यबल एवं तीक्ष्ण आयुध हैं.’ सरमा पुनः उन्हें इंद्र के बल से परचाने की कोशिश करती है

ये शरीर कहीं इंद्र के वाणों का लक्ष्य न हो जाएं. तुम्हारे यहां आने का जो मार्ग है, कहीं उसपर देवता लोग आक्रमण न कर बैंठंे! यदि तुम गाय नहीं दोगे तो आपदाएं सन्निकट हैं.’

सरमा, हमारी संपत्ति पर्वतों द्वारा रक्षित है. गायों, अश्वों तथा अन्यान्य धनों से परिपूर्ण है. रक्षाकार्य में समर्थ पणिसैनिक उसकी रखवाली करते हैं. गायों के शब्दों से अनुगूंजित इस स्थान पर तुम व्यर्थ ही चली आईं.’

सरमा पणियों को बारबार इंद्र के बल से परचाती है. उन्हें धमकी देती है. पणिगण सरमा को बहन मानकर उसका हिस्सा सौंपने का आश्वासन देते हैं. लेकिन सरमा इन्कार कर देती है. अंत में सरमा के साथ और भी आवाजें सम्मिलित हो जाती हैं. संदेश यह है कि गायें, अश्वादि पशु जिनपर पूरे समूह का जीवन निर्भर है, व्यापार की वस्तु नहीं है. देवगण पणियों से स्थान छोड़ जाने को कहते हैं.

वेदों को 35004000 वर्ष पुरानी रचना माना जाता है. उन्हें हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथ होने का सम्मान प्राप्त है. विद्वानों का यह भी मानना है कि वेदादि ग्रंथों में वर्णित छोटीछोटी कहानियां, द्रष्टांत उनके रचनाकाल से भी कई शताब्दी पुराने हैं. श्रुति के रूप में वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अंतरित होते रहे हैं. निरुक्त में यास्क ‘इत्यैतिहासकाः’ कहकर इंद्र और वृत्रासुर संग्राम को कथारूप में ढालते हैं. ऐतरेय ब्राह्मण(713) में कथा के साथ नीतिसंबंधी आख्यान भी समाहित हैं. उपनिषदों में तो न जाने कितने दृष्टांत हैं जिनकी कहानियां लोकजीवन में भी प्रचलित रही हैं. छांदोग्योपनिषद में एक अद्भुत कहानी आई है जो उस समय की परंपरा से हटकर है. इसलिए कि गंभीर मानी जानेवाली संस्कृत में व्यंग्य की छटा कम ही देखने को मिलती है. मगर वह कहानी व्यंग्य में लिखी गई है. उसमें कुत्ते भोजन के लिए अपना एक नेता चुन लेते हैं. कहानी को पढ़ते समय आधुनिक राजनीति में व्याप्त अवसरवाद सहसा याद आने लगता है. रैक्व, सत्यकाम पुत्र जाबाल की सुप्रसिद्ध कहानियां भी इसी उपनिषद में हैं. एक कथा में बैल, हंस और मद्गु(जलचर पक्षी) ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं. वैदिक कहानियों की खूबी उनकी प्रतीकात्मकता है. उनमें पशुपक्षियों को पात्र बनाकर बड़ी गंभीर बातें कही गई हैं. उनमें शेर, चूहा, बिल्ली, कबूतर, बैल, कुछआ आदि को पात्र बनाकर नैतिकता, आचारविचार एवं व्यवहार संबंधी संदेह दिया गया है. फलस्वरूप वे प्रत्येक वयस् के पाठक को उपयोगी जान पड़ती हैं. उनमें कथातत्व की अमूमन सभी विशेषताओं यथा कौतूहल, विनोद, हासपरिहास, रहस्य, उल्लासशोक आदि का उपयोग किया गया है. धर्म, नीति, सदाचार, व्यवहार, कूटनीति के प्रसंग उन कहानियांे में भरे पड़े हैं. जिससे वे कोरी कहानी न होकर दृष्टांत जान पड़ती हैं. इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उद्धरण की भांति उपयोग किया जाता रहा है.

महाभारत तक आतेआते भारत में कहानीकला काफी विकसित रूप ले चुकी थी. विशेषकर पशुपक्षी और प्रतीकों को केंद्र बनाकर कहानियां गढ़ने की कला. महाभारत में सोने के अंडे देने वाले पक्षी की कहानी है. धार्मिक बिल्ली की कहानी है जो चूहों को विश्वास दिलाकर उन्हें अपने काबू में कर लेती है. एक कथा चतुर शृगाल की है जो अपने मित्रों को भी धोखा देने से बाज नहीं आता. आदि पर्व में हाथी और कछुए की कथा, कुत्ते की कथा तथा वनपर्व में मनु और मत्स्य की कहानी है. तत्कालीन राजनीतिकव्यावहारिक दर्शन को समझाने के लिए शांतिपर्व में अनेक नीतिकथाएं हैंजो आगे चलकर भारतीय कथा साहित्य की प्रेरणा बनीं. कतिपय स्थलों पर यक्ष, गंदर्भ, अप्सरा, किन्नर जैसे विचित्र पात्र भी कहानियों में आए हैं, जो उस समय अभिव्यक्ति के क्षेत्र में नएनए काल्पनिक प्रयोगों की ओर इशारा करते हैं. यक्ष मनुष्य और देवता का मिलाजुला रूप हैं. पृथ्वी पर उनकी उपस्थिति कदाचित शापित देवता के रूप में है. गंदर्भ नृत्यगायनवादन आदि विभिन्न लोककलाओं में इतने प्रवीण थे कि सांस्कृतिक इतिहास में उनकी उपस्थिति चमत्कार के रूप में दर्ज है. महाभारत में यक्ष की परिकल्पना एवं संवाद जिसके माध्यम से वह युधिष्श्ठिर को लोकनीति एवं व्यवहार की सीख देता है, अज्ञातवास के दौरान भीम का असुर हिडिंब से युद्ध तथा उसकी बहन हिडिंबा से विवाह; लाक्षागृह, खांडव वन जैसी अनेक घटनाएं तथा महाप्रयाण के समय कुत्ते द्वारा पांडवों के साथ हिमालयारोहण करना, परीकथाओं जैसा अजूबापन और रोमांच लिए हुए हैं. ये सभ कथाएं प्राचीन मनुष्य के कल्पनासामथ्र्य को दर्शाती हैं.

महाभारत जहां भारतीय समाज, राजनीति और जनजीवन का विस्तृत लेखा है, वहीं रामायण में कथानक मुख्यतः राम के इर्दगिर्द पसरा हुआ है. वहां आस्थाभाव प्रबल है. फिर भी उसमें नीतिकथाओं का यत्रतत्र समावेश है. कहानियों की लोकप्रियता इससे भी आंकी जाती है कि गौतम बुद्ध जैसा दार्शनिक विचारक अपने संदेशों को जनजन तक पहुंचाने के लिए कहानीकला की शरण लेता है. जातक कथाओं में गौतम बुद्ध के जीवनप्रसंगों के माध्यम से बौद्ध धर्म का नीतिसंबंधी चिंतन भी समाया हुआ है. जातक कथाओं का संकलन आरंभ ईसा से चार शताब्दी पहले हो चुका था. उनमें पशुपक्षी संबंधी पात्रों का विशेष स्थान मिला. उनका ध्येय था, पशुपक्षी जैसे लोकप्रिय कथापात्रों के माध्यम से बोधिसत्व की शिक्षाओं को जनजन तक पहुंचाना. इनमें हाथी, वानर, मृग, हंस आदि को पात्र बनाकर कथाएं रची गई हैं. पतंजलि(150 ईसा पूर्व) ने ‘कथासूचक लोकोक्तियों, अजाकृपाणीय, काकतालीय आदि तथा जन्म शत्रुता के उदाहरण रूप में अहिनकुलम्, काकोलूकीयम् जैसी नीति कथाओं का उल्लेख किया है.’ महाभाष्य, पणिनि के सूत्र 2/1/3/, 2/4/9 तथा 5/3/106 आदि, संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास, डाॅ. कपिलदेव द्विवेदी, पृष्ठ 573. इन कथाओं की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चीनी विश्वकोश(668) में 200 से अधिक बौद्धग्रंथों से चुनकर नीतिकथाएं प्रकाशित की गईं. भरहुत में ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का बौद्धकालीन स्तूप प्राप्त हुआ है, उसपर उत्क्रीर्णित संदेश में पशुकथाओं का उल्लेख है. बौद्ध मतावलंबियों की देखादेखी जैन मतावलंबियों ने भी अपने संदेश को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए कहानीकला का सहारा लिया था. बौद्ध अनुयायियों की भांति उन्होंने भी पशुपक्षी को केंद्र बनाकर नीतिकथाएं रचीं. हरिषेण के बृहत्कथाकोश(992 ईस्वी) में जैन धर्मसंबंधी विचारों को नीतिकथाओं के माध्यम से समझाया गया है. गूढ़ विचारों की व्याख्या के लिए आवश्यकतानुसार एकाधिक नीतिकथाओं की भी सहायता ली गई है.

कहानी की ऐसी प्रतीकात्मकता, कथातत्व का ऐसा ही प्रस्फुटन परिवर्ती बौद्ध एवं जैन ग्रंथों, पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक आदि में और भी निखरकर सामने आता है. उपनिषदों में भी गूढ़ विषयों को समझाने के लिए यत्रतत्र दृष्टांत रूप में कहानियों का सहारा लिया गया है. चूंकि वेदादि ग्रंथों, कथासरित्सागर, जातक, पंचतंत्र आदि में संग्रहीत कहानियां व्यक्तिविशेष की रचना न होकर लोकसमाज में पहले से ही प्रचलित कहानियां थीं. इसलिए कहानी के इतिहास को वेदों या उनके परिवर्ती ग्रंथों के लेखनकाल से जोड़ना अनुचित होगा. तत्कालीन मनस्वियों ने जीवनमूल्य को आधार देने के लिए समाज से ही कथानकों को चुना था. इसके माध्यम से उसका उद्देश्य रहा होगा, लोकविश्वासों को शास्त्रीयता में ढालना, शब्द को मानवीयकरण का हथियार बना देना. ऐसी कोशिशें प्रायः सभी संस्कृतियों में थोड़ेबहुत परिवेशगत अंतर के साथ जारी थीं. पृथ्वी पर अलगअलग समूहों में विचरने वाले कबीलों ने अलगअलग क्षेत्रों में भिन्न संस्कृतियों को जन्म दिया था. उनकी भौगोलिक परिस्थितियों में अंतर था, तथापि मनुष्य की सामान्य जिजीविषा, परिस्थितियों से जूझने की चाहत, विकास की लालसा कमोबेश एकसमान थी. इसलिए आरंभिक अभिव्यक्तियों में आंतरिक समानता है. तत्कालीन जीवन प्रकृति के नियंत्रण में था. मनुष्य खेती करना सीख चुका था. चूंकि कृषिकर्म पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था, इसलिए प्रकृति और जीवन के बीच तालमेल बेहद आवश्यक था. चीन की एक लोककथा प्रकृति और मानवजीवन की अंतनिर्भरता और उनके संबंधों पर प्रकाश डालती है. कहानी शिकारी ‘ई’ की है

बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे. (सांस्कृतिक निबंध, भगवतशरण उपाध्याय से उद्धृत)

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं. यह कहानी जहां सृष्टि के विकास के बारे में एक चीनी मिथ को सामने रखती है, साथ में यह भी समझाती है कि गुस्सा महान व्यक्ति को भी चूक करने को बाध्य कर देता है. यह भी दर्शाती है कि उस समय तक विश्व के अनेक कोनों में कहानी कला का विस्तार हो चुका था. ग्रीक परंपरा में होमर प्रख्यात कथावाचक हैं. उसने महान ग्रंथ ‘इलियाड’ और ‘ओडिसी’ की रचना लोगों के बीच, उन्हें सुनाते हुए की थी. ईसा से आठ सौ वर्ष पहले जन्मा वह महाकवि लोकश्रुति के अनुसार जन्मांध था. वह लोगों को घूमघूम कर अपनी रची हुई कविताएं सुनाता था. जिसको होमर के प्रशंसक उसके शिष्य लिखते जाते थे. ईसा से ढाईतीन शताब्दी पहले जन्मे ईसप का नाम भी दुनिया के चर्चित किस्सागो में शामिल है. एक दास के रूप में जन्मा ईसप अपनी बोधकथाओं के माध्यम से चर्चित हुआ. उसके दृष्टांतों पर पंचतंत्र का प्रभाव साफ तौर पर नजर आता है. प्राचीन यूनान और भारत के बीच जिस प्रकार का अंतःसंबंध था, नियमित यात्राएं होती थीं, उसको देखते हुए लोककथाओं का सहजआदानप्रदान असंभव न था. यही कारण है कि यदि विश्व के अलगअलग देशों से वहां की बहुचर्चित लोककथाएं लेकर उनकी परस्पर तुलना की जाए तो पाएंगे कि उनके कथानक में असीमित समानता है. उनमें यदि कुछ अंतर है तो केवल परिवेश और भाषा का. लेकिन विचित्र पात्रों, काल्पनिक चरित्रों और कथानकों के आधार पर नीतिआख्यान गढ़ने में भारतीय मनीषियों का कोई सानी नहीं था. इस मामले में बाकी दुनिया के अपने समकालीन आचार्यों से वे बहुत आगे थे. भारत में कहन की कला की लोकप्रियता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि यहां बड़ेबड़े महाकाव्यों का प्रणयन किस्सागोई के माध्यम से हुआ है, जिनमें एक मिथ दूसरे मिथ का जन्मदाता है. इससे कहानी में तारतम्यता बनी रहती है. रामायण की कहानी के बारे में कहा जाता है कि इसको पहले शिव ने पार्वती को सुनाया था. फिर शिव के आदेश पर काकभुसुंडि उसको वाल्मीकि को सुनाते हैं. महाभारत भी कहन की परंपरा का एक ग्रंथ है, जिसको व्यास ने सूतजी के मुख से कहलवाया है. उपनिषद का तो अर्थ ही है, गुरु के आगे बैठकर बैठकर चिंतनमनन, श्रवणादि करना. लोकसाहित्य की तो पूरी की पूरी परंपरा कहन पर टिकी हुई है. आज भी किसी को कोई बात समझानी हो तो लोग किसी कहानी या दृष्टांत का उद्धरण देने लगते हैं.

भारतीय वाङमय में पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर इतना ज्यादा साहित्य रचा गया है कि केवल इसी को आधार बनाकर उसका वर्गीकरण संभव है. पशुपक्षियों को केंद्र बनाकर रचे गए साहित्य में पंचतंत्र, हितोपदेश, शुकसप्तति आदि ग्रंथ हैं तो मनुष्य को पात्र बनाकर लिखे गए ग्रंथों में कथासरित्सागर, शिवदास कृत कथार्णव(1200 ईस्वी) जिसमें मूर्खों और चोरों की 35 कथाएं हैं, श्रीवीर कवि के ‘कथाकौतुक’(1451) तथा वल्लाल सेन के ‘भोजप्रबंध’(16वीं शती) का नाम लिया जा सकता है, जिनमें व्यवहार और नैतिकता के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए मनुष्य से नैतिक पथ पर बने रहने की अपेक्षा की गई है. इनके अतिरिक्त बड़ी संख्या ऐसे ग्रंथों की है जिनमें पशुओं और मनुष्यों को सम्मिलित पात्रों के रूप में प्रयुक्त किया गया था. ऐसे ग्रंथों में रामायण, महाभारत के अलावा जातक कथाएं, वैतालपचीसी, सिंहासन बतीसी आदि का नाम लिया जा सकता है. वैताल पचीसी और सिंहासन बतीसी में पुतलियों और वैताल को पात्र बनाकर कथानक में अद्भुत रस की सृष्टि की गई है. भारतीय समाज और परंपरा पर आधारित इन कहानियों की पठनीयता देखते ही बनती है. यह भी माना जाता रहा है कि विचित्र पात्रों की कल्पना का मुख्य ध्येय श्रोताओं का मनोरंजन करना था. लेकिन कहानियों की जैसी संरचना है, उससे स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य मनोरंजन के साथसाथ समाज की तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलित रखना भी था. इनमें सर्वाधिक लोकप्रियता पंचतंत्र, कथासरित्सागर और जातक कथाओं को मिली. शायद इसलिए कि उनकी रचनाओं के मूल कथासूत्र लोक से आए थे और रचनाकारों ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए ही, उन्हें अपनी विचारधारा के अनुरूप ग्रंथों में सम्मिलित किया था. इन कहानियों की एक अन्य खूबी उनकी किस्सागोई शैली है. शताब्दियों से सुनेसुनाए जाने के कारण इनके कथानक पाठक और श्रोता दोनों की जुबान पर चढ़े होते थे. ऐसे में किस्सागो द्वारा शैलीगत चमत्कार ही श्रोताओं के बीच उसकी लोकप्रियता और पैठ को बनाए रख सकता था. इसलिए प्रतिभाशाली किस्सागो प्रस्तुतीकरण के समय कथानक में आवश्यक फेरबदल करने के साथसाथ प्रस्तुति को आकर्षक बनाने का हरसंभव प्रयास करते थे. फलस्वरूप समाज में किस्सागो का महत्त्व बढ़ता गया. कालांतर में मनुष्य के आध्यात्मिक बोध में ठहराव आने लगा. जिज्ञासाएं विश्वास में ढलने लगीं. धर्म के प्रभाव के चलते ऐसे पात्रों और कथानकों की परिकल्पना की जाने लगी जो जीवन को सहजसरल बनाने में मददगार हों, या जिनके बारे में उसको भरोसा था कि आसन्न संकट की अवस्था में वे उसके मददगार सिद्ध हो सकते हैं. चूंकि साधारण पात्रों द्वारा असाधारण कार्य संभव न थे. अतएव असाधारण कार्यों के लिए असाधारण पात्रों और घटनाओं की परिकल्पना ने जोर पकड़ा. इस प्रवृत्ति का विस्तार हमें पौराणिक ग्रंथों में दिखाई पड़ता है.

परीकथाओं की संकल्पना तो बहुत बाद की उपज थी, किंतु जिस तरह के विचित्र पात्रों और चमत्कारी कथानकों के आधार पर परीकथाओं ने आगे चलकर लोकप्रियता के शिखर को छुआ, वैसी विचित्र परिकल्पनाएं इस दौर में होने लगी थीं. धार्मिक आस्था, विश्वास, कल्पना और मनोरंजन के दबाव में गढ़े गए ये अनूठे पात्र पहले लोककथाओं में स्थापित हुए, कालांतर में उन्हीं के एक हिस्से को जो कदाचित अधिक विचित्र, कल्पनाप्रधान और मनोरंजनपरक था, परीकथाओं के रूप में सहेजा जाने लगा. उस समय तक लेखन कला का विकास नहीं हुआ था. मानवीय बोध के आरंभ से लेकर उस समय तक जो रचा गया था, वह सब का सब श्रुति का हिस्सा था. इसलिए उस समय तक जो भी साहित्य रचा गया, सब लोक की धरोहर, लोकसाहित्य का हिस्सा था. उस समय तक परीकथाओं की श्रेणी तो नहीं बनी थी. जो साहित्य था, वह श्रुति के रूप में लोकसाहित्य का हिस्सा था. हम केवल इतना कह सकते हैं कि उस समय तक उस कालखंड तक कहानियों, रूपकों में वे पात्र कल्पित होने लगे थे, जो आगे चलकर परीकथाओं के रूप में पहचाने गए.

आधुनिक विद्वान पशुपक्षियों की कहानियों को भी परीकथाओं का हिस्सा मानते हैं. यह अन्यथा भी नहीं है. पशुपक्षी आदिकाल से ही मनुष्य के प्रथम सहयोगी रहे हैं. महाकाव्यों में ऐसे प्राणियों की परिकल्पना की गई है, जिनका शरीर ‘मनुष्य और पशु’ अथवा ‘मनुष्य एवं पक्षी’ का बना था. ये आदिम मनुष्य की प्रकृति से निकटता का प्रतीक है. प्राचीन मनुष्य ने जीवन में जो भी उसके आसपास था, उसे बिना किसी वरिष्ठताबोध, अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाया था. उसकी वह छोटीसी दुनिया थी. उसमें न ज्यादा लंदफंद था, न जीवन की भागमभाग. प्रकृति से भोजन जुटाना और पशुपक्षियों की भांति उनके साथ, सभी को प्रकृति का हिस्सा मानकर रहना….रोज सुबह की किरण के साथ जागना तथा रात को भोजनोपरांत लंबी नींद लेनायही उसका जीवन था. लंबे अनुभव के उपरांत वह समझ चुका था कि पशुपक्षियों में कौनकौन उसके मित्र, सहयोगी हैं ; तथा किनसे उसके जीवन को खतरा हो सकता है. किस्सेकहानी पशुपक्षियों के स्वभाव, चारित्रिक विशेषताओं, खानपान तथा रहनसहन की आदतों से परचाने में सहायक थे. आने वाली पीढ़ी को जीवन की वास्तविकता से परिचित कराने में किस्सेकहानी सहायक थे. पीढ़ीदरपीढ़ी सुनेसुनाए जाने के कारण उनमें निरंतर निखार आता गया.

© ओमप्रकाश कश्यप

विचारहीन राजनीति और परिवर्तन का स्वप्न

हम ऐसे दौर में हैं जब राजनीति को परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मान लिया गया है. सदियों से दमितशोषित रहे वर्ग अपनी पहचान पाने को आकुल हैं, लोकतांत्रिक निजाम में सब अपने लिए सुरक्षित स्थान चाहते हैं. इसके लिए वे राजनीति को परिवर्तनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन उसका उपयोग कैसे किया जाए? जिन सपनों को राजनीति के माध्यम से साकार करना है, उन्हें लोकस्वीकृति कैसे दिलाई जाए? इस बारे में किसी के पास कोई स्पष्ट दिशा नहीं है. जहां दृष्टि है, वहां प्रतिबद्धता का अभाव है. नतीजा, नए वर्गों के प्रवेश तथा आशाओं, अपेक्षाओं के बावजूद राजनीति का चेहरा ज्यों का त्यों है. आरक्षण, भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रीयता जैसे वही पुराने घिसेपिटे मुद्दे हैं. पिछले कुछ दशकों से देश की राजनीति इन्हीं के इर्दगिर्द चकराती रहती है. ये इतने लोकलुभावन और सदाबहार हैं कि कोई दल इन्हें छोड़ना नहीं चाहता. यह मान लिया गया है कि वैचारिक राजनीति के दिन लद चुके हैं. ‘समाजवाद’, ‘साम्यवाद’, ‘गांधीवाद’ आदि को लेकर जो बहसें बीसवीं शताब्दी में सुर्खियां बना करती थींउनसे किनारा कर लिया गया है. तात्कालिकता में विश्वास ऐसा बढ़ा है कि दीर्घकालिक हित के अलोकप्रिय मुद्दों को कोई छूना तक नहीं चाहता. लोकप्रियता की राजनीति, अपनी पूरी चमकदमक, टोनोंटोटकों के साथ लगातार हमें भरमाए रखती है. संविधान पर दिए गए अपने भाषण में डॉ. अंबेडकर ने जिस सामाजिक लोकतंत्र की कामना की थी, उसे पूरी तरह भुला दिया गया है. प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में, देश की राजनीति पर आरएसएस जैसे उन जड़संस्कृतिवादी संगठनों का दबदबा है, जो तर्क के बजाय आस्था से काम लेने का प्रचार करते हैं, संस्कृति की आड़ में संप्रदाय और वर्गविरोध की राजनीति करना जिनकी फितरत है. हालांकि बहुसंख्यक वर्ग ऐसे संगठनों को पसंद नहीं करता, लेकिन वे मीडिया और दूसरे माध्यम से विभेदकारी राजनीति को गरमाए रहते हैं. धर्मसत्ता, अर्थसत्ता और राजसत्ता की तिकड़ी के समर्थन से वे प्रायः कामयाब भी होते हैं.

धर्म केंद्रित संस्कृति के अलावा जातिवाद भारतीय समाज एवं राजनीति की बड़ी विकृति है. हिंदू धर्म जातिवाद को पोषता है. जाति समाज के छोटे से हिस्से के लिए विशेषाधिकारों का गुलदस्ता है, वहीं बहुसंख्यक वर्ग के लिए अपने विवेक, पसंदों, इच्छाओं, सपनों और तर्कशक्ति को दूसरों के हाथों में सौंपकर खुद धर्म और संस्कृति की कारा को घर समझ लेने वाली स्थिति है. उसमें हालात से अनुकूलित लोग चमत्कारों की आस में जीते हैं, जबकि उन्हीं की खूनपसीने की कमाई के सहारे शिखर पर विद्यमान अभिजन शेष जनसमाज को अपने चंगुल में फंसाए रखने के लिए निरंतर बरगलाते रहते हैं. परिवर्तन की वांछाओं के दमन के लिए वे धर्म और संस्कृति को आगे कर देते हैं. जो जाति सहित अन्यान्य विभेदकारी व्यवस्थाओं का सुरक्षाकवच है. राजनीति की अपेक्षा धर्म और संस्कृति की परिवर्तनदर बहुत धीमी, आनुपातिक रूप से नगण्य होती है. अतएव राजनीति के सहारे परिवर्तन का सपना देखने वाले लोग, धर्म को अपना हथियार बनाते हैं. धर्म और सामंतवाद में कोई खास अंतर नहीं है. दोनों के अधिकांश लक्षण एकदूसरे से मिलतेजुलते हैं. दोनों ही वर्चस्ववाद को प्रश्रय देते तथा मौलिकता से घबराते हैं. अंतर केवल इतना है कि धर्म पहले दिमाग पर कब्जा करता है, फिर शरीर पर कब्जे को आसान बनाता है, जबकि सामंतवाद का प्रथम प्रहार मनुष्य के शरीर पर होता है और वहां से दिलोदिमाग को जकड़ता चला जाता है. इसलिए जो लोग धर्म को बीच में लाकर अथवा उसके सहारे से राजनीति करना चाहते हैं, वे प्रकारांतर में दैवी सत्ता के नाम पर सामंती प्रतीकों को ही थोप रहे होते हैं. ऐसे लोग या तो मूर्खता की हद तक भोले और नेतृत्व के गुणों से शून्य हो सकते हैं; अथवा अत्यंत स्वार्थी. इसलिए उनकी राजनीति भी स्वार्थपरक होती है. इसी कारण परिवर्तनकामी लोग धर्म और धार्मिक विश्वासों को राजनीति से दूर रखते हैं. उन्हें निजी विश्वासों की सीमारेखा से भीतर नहीं आने देते.

भारत जैसे देशों में जहां धर्म जीवनसंस्कृति में गहरे तक रचाबसा हो तथा मानवीय विवेक जातिपाश से बाहर आने के बजाय उसी को अपनी नियति मान बैठा हो, वहां वास्तविक परिवर्तन लंबे समय तक महज सपना बना रहता है. भारत में जाति ऐसी सचाई है जो समाज के हर पढ़ेलिखे और अनपढ़ की समझ में तुरंत और एकसमान आती है. जाति का इतिहास जितना पुराना है, लगभग उतना ही लंबा इतिहास इससे मुक्ति की छटपटाहट का भी है. बावजूद इसके यह हर समय, हर समाज में किसी न किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है. हाल में तो यह मान लिया गया है कि जाति से एकाएक मुक्ति असंभव है. बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो जाति को भारतीय समाज की कड़वी हकीकत के रूप में स्वीकार कर चुका है. इसलिए वह जाति से मुक्ति के बजाय उसकी मदद से मुक्ति का सपना देखता है. जिसे समाज की विकृति माना जाता है, उसी के सहारे शताब्दियों से वंचना और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को एकजुट करने की कवायद की जा रही है. जाति के नाम पर सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाला दूसरा वर्ग राजनीतिज्ञों का है. उनके लिए जनसाधारण की कीमत एक अदद वोट तक सीमित होती है. उस ‘वोट’ को अपने पक्ष में करने के लिए वे तरहतरह के उपक्रम करते रहते हैं, जिनमें जाति भी एक है. धर्म और जाति के नाम पर मतदाताओं ध्रुवीकरण करना भारतीय राजनीतिज्ञों का सबसे पसंदीदा चलन है. आजादी से पहले और कुछ दशक बाद तक जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए जो आंदोलन चले थे, समरस और वर्गहीन समाज की स्थापना का जो लक्ष्य रखा गया थाउनका अब कोई जिक्र तक नहीं करता. इसका परिणाम यह हुआ है कि आजादी के संघर्ष के दौरान प्रभाव खोने वाली जातिव्यवस्था इन दिनों पुनः अपनी केंद्रीय भूमिका है. सवाल है कि जाति को औजार बनाने का समाज को क्या लाभ पहुंचा है? क्या इससे समाज में दलित और शोषित वर्ग के मानसम्मान और सुखसमृद्धि में बढ़ोत्तरी हुई है. और यदि सुखसमृद्धि में सचमुच कुछ वृद्धि हुई तो क्या वह जाति को अस्मिता संघर्ष का औजार बनाए बिना असंभव थी?

यह ठीक है कि पिछली कुछ शताब्दियों में समाज के दलितशोषित वर्गों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार आया है. यह सुधार इतना बड़ा है जिसकी आज से सौ वर्ष पहले इसकी कल्पना तक असंभव थी. इसके साथसाथ जाति को टूल बनाकर पोषने के दुष्परिणाम भी कम सामने नहीं आए हैं. इससे जातियों के बीच ही असमानताओं के छोटेबड़े ऐसे अनेकानेक टापू बनने लगे हैं, जो समाज में दूसरे कारण से व्याप्त असमानताओं से किसी भी भांति कम नहीं हैं. हालांकि उपजातियों की संख्या घटी है. लेकिन ऐसा किसी सामाजिक सुधारभावना के चलते संभव नहीं हुआ है. बल्कि लोकतंत्र की मजबूरियों के चलते छोटेछोटे जातिसमूह परस्पर एकजुट होने लगे हैं. जो जातियां ऐसा करने में सफल हुईं, उन्हें विकास के अपेक्षाकृत अधिक अवसर भी मिले हैं. मगर जिस समाजार्थिक समानता के ध्येय से परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों ने जाति को एक औजार की भांति स्वीकार करना आरंभ किया था, वह भीतर ही भीतर दूसरे घाव करने लगा है. उससे अविश्वास और वर्गभेद की अलंघ्य दीवारें खड़ी होने लगी हैं.

जाति स्वयं में नकारात्मक व्यवस्था है. मनुष्य की योग्यता और रुचियों का ध्यान रखे बिना यह उसके चयन के अधिकार को बाधित करती है. यह श्रम के विभिन्न रूपों में न केवल भेद करती है, बल्कि उन्हीं के आधार पर समाज में अलंघ्य दूरियां पैदा कर देती है. इसके चलते शिखरस्थ वर्ग के प्रतिनिधियों के उत्तराधिकारी बिना किसी योग्यता के शिखर पर बने रहते हैं. जबकि निम्नस्थ वर्ग के प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों को भी को अपनी योग्यता के सदुपयोग से वंचित कर दिया जाता है. इससे न केवल उस व्यक्ति बल्कि समाज की भी हानि होती है. वह मुट्ठीभर लोगों को जन्म के साथ ही शासकीय गुणों से संपन्न मानकर शेष जनता को शासित घोषित कर देती है. कुल मिलाकर देखा यही गया है कि लोकतंत्र में जाति लोगों को संगठित करने का औजार तो बन सकती है. बनती भी है, किंतु न्याय, समानता और समरस विकास जैसे जीवनमूल्य उसके सहारे संभव नहीं हैं. जाति सामाजिक अंतर्द्वंद्वों का बड़ा कारण है. जातीय अस्मिताओं का कड़ा संघर्ष विभिन्न जातिसमूहों को अनावश्यक स्पर्धा की ओर ले जाता है. इससे कथित जातीय पायदान के निचले स्तर पर मौजूद जातियों को, संख्या में अधिक होने के बावजूद परिवर्तनकारी शक्ति में ढालना कठिन हो जाता है.

लोकतंत्र में संख्याबल बहुत मायने रखता है. अतः उसके आधार पर खुद को निर्णायक शक्ति के रूप में ढालने में असमर्थ जातियां, ऐसे जातिसमूहों से गठजोड़ कर लेती हैं, जिनकी आर्थिकराजनीतिक ताकत अपेक्षाकृत अधिक है. हड़बड़ाहट में वे ऐसे दलों के समर्थन में उतर आती हैं, जिनपर सवर्णों का वर्चस्व है तथा जिनका न्याय, समानता, वर्गहीन समाज, विकास में साझेदारी जैसे मूल्यों पर कोई विश्वास नहीं है. जो जाति जैसी क्रूरतम और विभेदकारी संस्था को बनाने तथा उसे निरंतर पालनेपोसने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं. इससे उनकी समस्त जातीय चेतना निर्णायक शक्ति बनने के बजाय वर्चस्ववादी शक्तियों की पिछलग्गू बनकर रह जाती है. संवैधानिक व्यवस्था, सामाजिक आंदोलन के प्रभाव अथवा अन्यान्य परिस्थितियों के चलते भी, गैर सवर्ण नेता प्रायः संसद और विधायिकाओं में प्रवेश करते रहते हैं. किंतु अपने संस्कार, आत्मविश्वास की कमी, विशिष्ट मतदाता वर्ग की संसाधनों के लिए वर्चस्वकारी वर्गों पर निर्भरता तथा दलीय राजनीति के चलते वे विधायिकाओं में सार्थक भूमिका निभाने में असमर्थ रहते हैं. लोकतंत्र में संख्याबल का महत्त्व होता है, किंतु सदैव वही निर्णायक हो, यह आवश्यक नहीं है. बहुमत की आवश्यकता संसद में भी पड़ती है, जहां लोग दलीय आधार पर बंटे हो सकते हैं. कुल मिलाकर राजनीति में गैर सवर्णों के लिए सम्मानजनक अवसरों की कमी पहले भी थी. इन दिनों भी वे हाशिये पर हैं. वे राष्ट्रवाद को स्वतंत्रता, समानता और सामंजस्य जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों पर खतरे के रूप में देखते हैं. जबकि यथास्थितिवादी परिवर्तन की वांछाओं को कुचलने के लिए सामदामदंडभेद यानी हर तरह के उपाय आजमा रहे हैं. सांस्कृतिकरण के बहाने वे भारत की पुरानी वर्णाश्रमी व्यवस्था को नए रूप में लौटाना चाहते हैं. इसके लिए हिंसा भी उनके लिए वज्र्य नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में जातीय झगड़ों में जिस तेजी से इजाफा हुआ है और गैर सवर्णों पर हमले बढ़े हैं, उससे मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है.

जाति विचारहीन राजनीति को बढ़ावा देने वाले कारकों में प्रमुख है. वह विकास पर प्रतिकूल असर डालती है. थोपी गई जाति के प्रति मनुष्य का समर्पण दूसरी थोपी गई चीजों के प्रति अनुकूलन पैदा करता है. जैसे पिछले कुछ दशकों में तमाम कड़वे अनुभवों के बावजूद यह धारणा बन चुकी है कि विदेशी पूंजी होगी, तब विकास होगा. इसके चलते अंदरूनी संसाधनों के सदुपयोग से किनारा कर लिया गया है. जबकि सभी जानते हैं कि विदेशी पूंजी अतिरिक्त लाभ की सुनिश्चितता के बगैर न तो आती है, न ही उसके अभाव में ठहरती है. इस संबंध में पूंजीपति और चूहों में अधिक अंतर नहीं होता. बाढ़ के समय जैसे चूहे घर छोड़ने वालों में अग्रणी होते हैं, वैसे ही लाभ के अवसर कम होते देख विदेशी पूंजी भी पलायन करने लगती है. इसके बावजूद 2014 का चुनाव ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में लड़ा गया, जो विकास को विदेशी पूंजी की अनिवार्यता से जोड़ता है. सरकार बनने के पहले बीस महीनों में करीब तीस देशों की यात्राएं, उनके इसी विश्वास की पुष्टि करती हैं. चुनावों में मतदाताओं के बीच भाजपा समर्थक मीडिया और पूंजीपतियों ने विकास का ऐसा रुपहला सपना पेश किया था कि लोग गच्चा खा गए. विकास के अलावा उन चुनावों में जो दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक थी, वह थी जाति. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने खुद को बारबार पिछड़े वर्ग का बताकर अतिपिछड़ी जातियों के बीच ऐसी जगह बनाई कि वे वर्ग जो कांग्रेस से उम्मीदें खोकर बसपा और सपा के बीच गैंद की तरह ठोकर खाते रहते थे, एकमुश्त भाजपा के खाते में चले गए. भूल गए कि भाजपा की नीतियां संघ के कार्यालय में बनती हैं, जिसका ‘सामाजिक न्याय’ की वैचारिकी में कतई विश्वास नहीं है. वर्णाश्रम व्यवस्था आज भी उसके लिए आदर्श है.

भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की चाहत को शिखरस्थ वर्ग अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखते हैं. 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद उनके हौसले बुलंद हुए हैं. केंद्र में अपनी सरकार है, ऐसा मानकर वे आक्रामक मुद्रा अपनाए हुए हैं. सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने तथा परिवर्तन की इच्छाओं के दमन के लिए संस्कृति और राजनीति दोनों स्तर पर प्रयत्न किए जा रहे हैं. उनकी आक्रामकता देख परिवर्तन की चाहत रखने वाले वर्गों में यह विश्वास आम हो चला है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा समानता, स्वतंत्रता तथा समरसता जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों के परिवर्तनकारी उष्मा के क्षरण हेतु उछाला गया है. उसके पीछे वे लोग हैं जो वर्णव्यवस्था का लाभ उठाकर शताब्दियों से सत्तासुख भोगते आए हैं; और निहित स्वार्थ के लिए उसे बनाए रखना चाहते हैं. इसलिए भाजपा और उसके सहयोगी दल जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का राग अलापना आरंभ करते हैं, तो उन वर्गों के जो राजनीति को परिवर्तनकारी औजार के रूप में इस्तेमाल करने के पक्ष में हैंकान खड़े हो जाते हैं.

जातिव्यवस्था के प्रति यथास्थितिवादी दृष्टिकोण तथा विकास को लेकर दिशाहीनता केवल भाजपाई राजनीति का लक्षण नहीं है. परिवर्तन का संकल्प लेकर उतरने वाले सभी दलों की कमोबेश यही हालत है. 130 वर्ष पुरानी कांग्रेस स्वयं को देश के स्वाधीनता संग्राम से जोड़ती है. उस समय वह भूल जाती है कि स्वतंत्रता मिलने के साथ ही गांधी ने कांग्रेस को भंग करने की सिफारिश की थी. तब जवाहरलाल नेहरू सहित बाकी कांग्रेसी नेता, जो स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान का मानदेय सत्ता की सीढि़यां चढ़कर प्राप्त करना चाहते थे, उसके लिए तैयार नहीं थे. आरंभ में कांग्रेस स्वयं देश के अभिजनों की पार्टी थी. उसमें बदलाव गांधीजी के नेतृत्व के दौरान आया. स्वयं गांधीजी वर्णाश्रम धर्म को श्रेष्ठ मानते थे. उनकी ओर से ‘प्रथम सत्याग्रही’ के गौरव से नवाजे गए विनोबा आम मताधिकार के सख्त विरोधी थे. नेहरू और उनके खानसामा दोनों का एक ही वोट हो, यह सुनकर उन्हें बड़ा अजीब लगता था. कांग्रेस के अधिकांश नेता भी तथाकथित ऊंची जातियों से आए थे, जो गैर सवर्णों के शोषणउत्पीड़न का शिकार थे. आगे भी कांग्रेस का चरित्र छदम् सेकुलरवादी और छद्म समानतावादी बना रहा.

राजनीति की सफलता लोकहित में किए गए प्रयासों से आंकी जाती है. इस बात से आंकी जाती है कि न्याय को सामाजिक लक्ष्य बनाने के लिए उसने कितने कारगर प्रयास किए हैं. इस आधार पर शासन के लक्ष्यों दो वर्गों में बांटा जा सकता है. लघु आयामी, तथा दीर्घ आयामी. लघु आयामी लक्ष्य आमजन की दैनंदिन की समस्याओं, शांतिव्यस्वस्था और अनुशासन से जुड़ा होता है. यह सुनिश्चित करने से होता है कि लोककल्याण के लिए बनाई गई योजनाओं का कार्यावन नियमानुसार हो रहा है अथवा नहीं. इसके लिए सरकार कुछ नागरिक संस्थाओं का गठन करती है; और स्वयं मुख्य कार्यकारी संस्था की भूमिका निभाती है. उसका दायित्व लोगों की रोजमर्रा की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है. दीर्घायामी योजनाओं का निर्माण और कार्यान्वन इस बात पर निर्भर करता है, कि हम कैसा समाज चाहते हैं? उसके लिए संसाधनों की उपलब्धता, नागरिकों की अपेक्षा, बाहरी दबावों आदि को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाती हैं. देश और समाज के दूरगामी हितों को देखते हुए विकास के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं. लोकप्रिय राजनीति आज, अभी और स्थानीयता के बूते पनपती है. उनमें दीर्घायामी योजनाएं बनाने तथा उनका सफल संचालन हेतु आवश्यक धैर्य का अभाव होता है. जबकि लोकतंत्र में नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना सरकार की जिम्मेदारी होती है. इसे हम उनका कर्तव्य भी मान सकते हैं.

भारतीय राजनीति की विडंबना है कि यहां नेतागण लोकप्रिय राजनीति की सीढि़यां चढ़कर शिखर तक पहुंचते हैं. लोग उनसे उम्मीद करते हैं. शायद सबसे ज्यादा उम्मीद करते हैं. बावजूद इसके राजनेताओं के बारे में आम राय अच्छी नहीं है. साफ है कि लोग नेताओं को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता. जनता की इस मजबूरी का लाभ नेतागण अपनी तरह से उठाते हैं. वे सपना देखते हैं कि जनता उनकी अंधसमर्थक बनी रहे. लोग उन्हें हमेशा अपने कंधों पर उठाए रखें. हालात उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब राजशाही के दौर में कोई महत्त्वाकांक्षी सरदार या सामंत अपने नेतृत्व में सेना जुटाकर एकाध किला फतह कर लेता था. चूंकि उसके पास नया करने को कुछ नहीं होता था, इसलिए अपने आका की नएपन की चाहत को पूरा करने के लिए उसके चारणवृंद प्रशस्तिगायन के ऐसे आयोजन रचते रहते थे, जिनका जनता के विकास से कोई संबंध नहीं होता था. गणतंत्र में नीतियां लोगों के सपनों और जरूरतों के आधार पर बदलती हैं. लेकिन यहां बदलाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. चारों ओर विचारहीनता का आलम है. बस किसी तरह सत्ता प्राप्त कर लेना चाहते हैं. चूंकि परिवर्तनकारी सत्ता का स्वरूप कैसा हो, इसका खाका किसी के भी पास नहीं है, इसलिए वंचित समूह के प्रतिनिधि सत्ता में आते ही इसकी चकाचौंध में खो जाते हैं. उस समय उन्हें वह लक्ष्य बिलकुल याद नहीं रहता, जिसका वायदा कर वे सत्ता में आए हैं.

राजनीति के शिखर पर भले ही कुछ लोगों का अधिकार हो. पीढ़ीदरपीढ़ी सत्ता भोगने के बाद अब वे इसके अभ्यस्त हो चुके हों, फिर भी यह मान लिया गया है कि राजनीति अब इलीट कर्म नहीं रही. कम से कम वैसी तो नहीं जैसी पहले थी. यदि पिछले बीसतीस वर्षों के इतिहास की पड़ताल ही कर ली जाए तो इस दौरान उन क्षेत्रों के लोगों ने राजनीति में अपनी जगह पुख्ता की है, जो पहले इससे बहिष्कृत थे. हां, सक्रिय राजनीति में आने के बाद उनका तेज अवश्य घटा है. राजनीति का अतिरेक भी दिखाई पड़ता है. पहले जो काम सामाजिक संगठनों की मदद से हो जाते थे, अब उनके लिए भी राजनीति करनी पड़ती है. इसलिए गलीमुहल्लों में छुटभइये नेताओं की पूछ बनी रहती है. अवसर का लाभ उठाते हुए सामाजिक संगठन भी राजनीति से संपर्क बढ़ा रहे हैं. राजनीतिकरण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, उन दमितशोषितों पर जो सदियों से उत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार थे. लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर अब वे सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं. वे सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं.

आधुनिक राजनीति मोटे तौर पर दो लोकप्रिय मुहावरों के आसपास घूमती है. विकास और भ्रष्टाचार. बाजार का जादू लोगों के सिर पर इतना चढ़कर बोल रहा है कि लोग दन से विकास की मंजिलें पार कर लेना चाहते हैं. विकास का स्वरूप कैसा हो, उसके लिए संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे, यह कोई विचार नहीं करता. विकास हो, चाहे उधार से, या बाहर की पूंजी से. ‘जब तक जियो, सुख से जियो. कर्ज लेकर भी घी पियो.’जैसी भौतिकवादी विचारधारा के लिए चार्वाक पंथियों की खिल्ली उड़ाई जाती है. हालांकि संभावना इसी बात की है कि यह उक्ति चार्वाकपंथियों की आलोचना में, उनपर कटाक्ष करने की नीयत से गढ़ी गई हो. जो हो संस्कृति और सभ्यता के बीच चौड़ी खाई के चलते यह भुला दिया गया है कि विकास के मायने क्या हैं? इस बारे में कोई स्पष्ट सोच लोगों के पास नहीं है. यदि पिछले दोतीन दशकों के बारे में सोचा जाए तो लोगों के पास संसाधनों की रेलपेल हुई है. टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट ने दुनिया को एक कर दिया है. इनकी पहुंच से देश का कोई कोना, कोई घर नहीं बचा है. ध्यान करें, इन्हें विकास के प्रतीक के तौर पर ही परोसा गया था. जिन दिनों संचार क्रांति का गुब्बारा फूलने लगा था, उन दिनों उसका गुणगान किया जा रहा था. लेकिन आज उसकी पैठ केवल फेसबुक, वाटअप, ईमेल और चैटिंग तक सिमट गई है. इन संसाधनों ने लोगों का प्रबोधीकरण किया हो, उनका मानसिक स्तर ऊपर उठा हो यह बात इनका बड़े से बड़ा समर्थक भी कह सकता. फिर भी विकास और भ्रष्टाचार इतने बड़े मुद्दे हैं कि इनके सहारे सत्ता की अदलाबदली आसानी से की जा सकती है.

भ्रष्टाचार की परिभाषा अपने आप में सुस्पष्ट नहीं है. कमाई के अवैधानिक तरीकों को भ्रष्टाचार कहा जाता है. लेकिन यह परिभाषा केवल सरकारी निकायों तक सीमित है. निजी संस्थानों में अवैधानिक कमाई पर या तो ध्यान नहीं दिया जाता अथवा वित्तीय अनियमितता कहकर उनका प्रभाव हल्का कर दिया जाता है. लेकिन लोकप्रिय राजनीति में भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है. इतना बड़ा कि इसी को आधार बनाकर पिछले चुनावों में दिल्ली में आम ने 15 वर्षों से जमीजमाई कांग्रेस पार्टी को किनारे होने को मजबूर कर दिया. करीब सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी आज सत्ता में वापसी के लिए हांफ रही है. केंद्र में यह काम भाजपा के द्वारा हुआ. भ्रष्टाचार के साथसाथ विकास को मुद्दा बनाकर उसने दस वर्षों की जमी कांग्रेस सरकार को पटखनी दी. कांग्रेस को लगी चोट इतनी गहरी थी कि वह संसद में विपक्षी नेता का पद पाने में नाकाम रही. हाल में संपन्न हुआ बिहार का चुनाव भी विकास और जातिवाद के बीच फंसा था.

हमारी सरकारें भ्रष्टाचारभ्रष्टाचार इसलिए चिल्लाती हैं क्योंकि इससे वे प्रकारांतर में वे उन्हीं लोगों को कठघरे में खड़ा करने में कामयाब हो जाती हैं, जिनके सहयोग से वे सत्ता में पहुंचती हैं. क्या विकास और भ्रष्टाचार अलगअलग मुद्दे हैं? दिखने में दोनों परस्पर विपरीत नजर आते हैं. मगर असल में दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं. सरकारों की कमी है कि वे भ्रष्टाचार को आर्थिक अपराध मानकर विचार करती हैं. जबकि वह नैतिक मसला भी है. जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार करता है तो वह आर्थिक अपराध से पहले नैतिक पराभव का शिकार होता है. वह मान लेता है कि सुख और सुविधाएं बटोरने का एकमात्र माध्यम धन है. सेवाओं के आदानप्रदान में यदि धन का हस्तक्षेप कम कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है. वह सिक्का विचारहीनता का है. राजनीति में विचार न होने के कारण दोनों मुद्दे अकस्मात प्रभावी हो जाते हैं. हैरानी यह है कि दोनों ही मुद्दे आधुनिक विकासवादी अवधारणा की देन हैं. समस्या विचार के हाशिये पर पहुंच जाने की है.

विकास अपने आप में भ्रामक अवधारणा है. आवश्यक नहीं कि उसका असर मनुष्य और समाज के लिए सदैव सकारात्मक ही हो. परिवर्तन की दिशा जो भी हो, विकास की दिशा उसी ओर होती है. ‘कुविकास’ या ‘अविकास’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है. शरीर में यदि कूबड़ निकल आए तो वह भी विकास माना जाएगा. इसलिए अर्थक्षेत्र के पुरोधा इस भ्रामक अवधारणा को अपने और व्यापार के बीच में नहीं आने देते. इसके बजाए वे ‘प्रगति’ पर ध्यान देते हैं, जो वांछित दिशा में सप्रयास प्रयत्नों की उन्नति को दर्शाती है. कहा जा सकता है कि समाज ‘जटिल’ संरचना है. सरकार जो विकास योजनाएं बनाती है, उनका एक छोर जनता में उनकी स्वीकार्यता और संसाधनों की उपलब्धता आदि पर भी पड़ता है. पूंजीपति जिस तरह अपने श्रमिकों और अन्य कर्मचारियों से काम लेता है, सरकार वैसा नहीं कर सकती. इसलिए सामाजिक प्रगति को मापने के लिए कोई मीटर नहीं बनाया जा सकता. क्योंकि नागरिकगण न तो जड़ पदार्थ हैं, न ही मशीन कि उनसे जब, जैसा चाहे काम लिया जा सके. वे परंपरा और संस्कृति से भी प्रभावित होते हैं. अपने अधिकांश निर्णय परंपरा और संस्कृति को केंद्र में रखकर ही लेते हैं. ऊपर से प्रकृति भी अपना खेल खेलती है. इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि जैसे कारण, जिनसे विकास योजनाओं पर प्रतिकूल दबाव बना रहता है. इस कारण सरकार द्वारा आरंभ की गई योजनाओं के ठीक वही परिणाम नहीं निकलते जिन्हें ध्यान में रखकर उन्हें बनाया और लागू किया जाता है.

सरकारी तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं. लेकिन एक तरह से तो यह सरकार द्वारा अपनी ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कही जाएगी. दरअसल सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है. प्रायः सभी योजनाओं के मूल में सामाजिक विकास की भावना निहित होती है. एक उदाहरण लेते हैंमान लेते हैं एक पूंजीवादी उद्यम को शीतल पेय बनाने के लिए सरकार लाइसेंस देती है. उस समय उस उद्यम के पास अगले पांच से दस वर्ष तक अनुमानित प्रगति की रिपोर्ट होती है. लागू करने के बाद प्रायः हर वर्ष या त्रैमासिक आधार पर उसकी समीक्षा की जाती है. अपने आंकड़ों को लेकर कंपनी आश्वस्त होती है. कोई गड़बड़ न हो इसके लिए उनका निरंतर अवलोकनपुनरावलोकन किया जाता है. अनुमानित आंकड़े परियोजना प्रस्ताव का हिस्सा होते हैं, जिनकी एक प्रति, समयसमय पर प्रकाशित होने वाली प्रगति रिपोर्ट के अलावा सरकार को भी सौंपी जाती है.

कोई भी कारखाना केवल मशीनों के बल पर नहीं चलता. उसके लिए तकनीशियनों और कामगारों की जरूरत भी पड़ती है. जो जनता के बीच से ही आते हैं. सामान्य नागरिकों की भांति वे भी परंपरा, संस्कृति और प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होते हैं. उद्योग की परियोजना के समय इन सबका ध्यान भी रखा जाता है. कारखाना मालिक इस सबको ध्यान में रखकर ही अपनी अपनी प्रगति रिपोर्ट परिकल्पित करता है. सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? कहा जा सकता है कि सरकार, कल्याणकारी उपक्रम है. उसका ध्येय मुनाफा कमाना नहीं है. सरकार का यह सोच प्रकारांतर में पूंजीपति को निष्प्राण यंत्र की भांति उपयोग करने की अनुमति दे देता है. सरकार विकास को प्रगति के पर्याय के रूप में पेश करती है. लेकिन वह उस अनिश्चितता और दुष्परिणामों के बारे में नहीं बताती, जो विकास के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं. उदाहरण के लिए शीतल पेय का कारखाना लगाने से पारिस्थिकीय संबंधी संकट पैदा हो सकते हैं. उसके लिए भूजल का भारी मात्रा में दोहन करना पड़ता है. इससे जलस्तर में तीव्र गिरावट आती है. कारखाना मालिक अपनी प्रगति रिपोर्ट तो सार्वजनिक करता है, सरकार भी उसके आंकड़ों को उपयुक्त स्थान पर दर्शाती है, लेकिन कारखाने के कारण जो परिस्थितिकीय एवं पर्यावरण संबंधी संकट उस क्षेत्र में पैदा हो रहे हैं, उसपर न कारखाना मालिक ध्यान देता है, न ही सरकार. जबकि इसके लिए सरकार के पास पूरा अमला होता है. समयसमय पर वे अपनी रिपोर्ट भी देते हैं. लेकिन वह सार्वजनिक नहीं की जाती. सरकार विकास के साथ जुड़े उन नकारात्मक प्रभावों के अध्ययन से भी बच जाती है, जो बिना सोचेसमझे आरंभ की गई अनेकानेक योजनाओं से स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं.

एक अन्य उदाहरण सिगरेट के कारखाने का लिया जा सकता है. सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, सरकार इसे लेकर निरंतर प्रचार करती है. हर वर्ष करोड़ों रुपये के विज्ञापन इसके प्रचारप्रसार पर खर्च किए जाते हैं. लेकिन सिगरेट के कारखाने को अनुमति देते समय सरकार की दृष्टि मुट्ठीभर रोजगार और रिवेन्यु पर केंद्रित रहती है. सिगरेट का कारखाना लोगों के स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव डालता है, सरकार उसकी ओर से मुंह मोड़े रहती है. हम इस बात पर गर्व करते हैं कि प्रवासी भारतीय विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत हैं. प्रवासी भारतीयों ने अपने आपको सिद्ध भी किया है. पिछले वर्ष उन्होंने 72 अरब डालर की पूंजी मनीआर्डर के माध्यम से भारत में भेजी, जो दुनिया में सबसे अधिक है. मगर इसका दूसरा पहलू भी है. वह यह कि हम अपने आला दर्जे के दिमाग निर्यात कर देते हैं और दोयम दर्जे की प्रतिभाओं से काम चलाते हैं. देश की सत्ता अव्वल दर्जे के धूर्त राजनीतिज्ञों के हाथों में तथा कामकाज दोयम दर्जे की प्रतिभा के हाथों में रह जाता है.

विकास को लेकर वर्तमान सरकार और उसके मुखिया अनेकानेक अंतर्विरोधों के शिकार हैं. उनके अंतर्विरोध उनकी विचारधारा की देन हैं जो सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को अपना अभीष्ट मानती है. युवावस्था में संघ की विचारधारा को समर्पित कर देने, फिर कई दशकों तक उसके साथ जीने के क्रम में वे उसे पूरी तरह आत्मसात् कर चुके हैं. इसलिए जो राजनीति वे इन दिनों कर रहे हैं, वह खुद भी अंतर्विरोधों से भरी है. वे भारत का नवोन्मेष चाहते हैं. इसके लिए ‘डिजिटल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘अतुल्य भारत’ जैसे नारे उनके नेतृत्व में गढ़े गए हैं. वे चाहते हैं कि देश ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में आगे जाए. इसके लिए वे अमेरिका, रूस, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, यानी जहां से भी नवीनतम प्रौद्योगिकी खरीदने के प्रयास में हैं. दूसरी ओर ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों को महत्त्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया है, जो भारत को लेकर किसी न किसी किस्म के ‘नास्टेल्जिया’ के शिकार हैं और अपनी शक्ति या संसाधनों का उपयोग उस नास्टेल्जिया को साकार करने में लगाना चाहते हैं. इस कारण वे आरएसएस जो विशुद्ध जातिवादी संगठन है, के भी करीब हैं. बारहवीं पास स्मृति ईरानी को भारत सरकार के मानव संसाधन जैसा महत्त्वपूर्ण मंत्रालय सौंप देना, दीनानाथ बत्रा को एनसीईआटी, पी. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का प्रमुख(राव साहब पद पर वेतन की व्यवस्था न होने के कारण इस्तीफा दे चुके हैं) बना देते हैं, जिसका संबंध भारतीय समाज के विवेकीकरण से कम है. ये अंतर्विरोध तभी तक अंतर्विरोध कहे जा सकते हैं जब तक हम उनके बारे में लोकतांत्रिकसमानतावादी समाज की, जैसा भारतीय संविधान में संकल्पित है, विचार करते हैं. इसलिए संघ के नेताओं को संविधान से ही शिकायत है. अवसर मिलते की वे संविधान को ही बदल देना चाहते हैं. हालांकि इसकी संभावना न्यूनतम है.

यह अच्छी बात है कि हमारे प्रधानमंत्री समयसमय पर लोगों से संवाद करते हैं. अपने ‘मन की बात’ उन तक पहुंचाते हैं. लेकिन विकास के संदर्भ में देखा जाए तो वे सर्वाधिक संशयमना प्रधानमंत्री लगते हैं. संशय लंबा है. इसके बने रहने का मुख्य कारण यह भी है कि वे स्वयं उसके बारे में अनजान हैं. यह शायद उनकी प्रवृत्ति है. उनका मिजाज प्रचारक का रहा है. प्रचारक की विशेषता होती है कि वह अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाने को उत्सुक रहता है. कुशल सेल्समेन की भांति वह अपने उत्पाद की खूबियों को ग्राहक के सामने रखता है. उत्पाद की कमजोरियां क्या हैं, इसपर वह अधिक ध्यान नहीं देता. कई बार तो जानकर भी वह अनजान बना रहता है. यह उसके पेशे की मांग भी है. इसलिए उसकी सबसे अच्छी भूमिका तब होती है, जब वह अपने ‘प्राडक्ट’ के बारे में ग्राहकों से संवाद कर रहा होता है. सवाल है कि जिस विचारधारा के वे प्रचारक है, वैसे प्रचारक तो उनकी पार्टी के पास और भी बहुत हैं. फिर मोदी जी में ऐसा क्या है? इस सचाई के बारे में संभवतः मोदी जी भी अनजान हैं.

दरअसल भारत की जाति केंद्रित राजनीति में आरएसएस और भाजपा की विचारधारा का प्रचार करते, करते वे स्वयं कब ब्रांड मान लिए गए, इस बात से संभवतः वे स्वयं भी अनजान हैं. गुजरात के दंगों के दौरान उनकी छवि कटटर हिंदुत्ववादी नेता की बनी. लेकिन आम चुनावों में सफलता के लिए कट्टर हिंदुत्ववादी होना कारगर नहीं था. भारतीय राजनीति की यह विशेषता है कि यहां कट्टरता सीधेसीधे कामयाब नहीं हो सकती. भारतीय मतदाता को कट्टरता स्वीकार ही नहीं है. यहां अटलविहारी बाजपेयी को कामयाबी तब मिलती है जब वे उग्र हिंदूवाद चोला उतारकर समन्वयवादी का मुखौटा पहन लेते हैं. प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक लालकृष्ण अडवाणी नाकाम होते हैं, क्योंकि रथयात्रा के दौरान उन्होंने अपनी छवि उग्र हिंदुवादी की गढ़ ली थी. अयोध्या में मस्जिद के अवशेषों को गिराने का दाग उनपर लगा था. आगे चलकर इस दाग को मिटाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाकर इस दाग को मिटाने की कोशिश की. बस यहीं आरएसएस की निगाह में वे खलनायक मान लिए गए. इसलिए ऐसे चेहरे की तलाश की जाने लगी, जो संघ की विचारधारा का आंख मूंदकर समर्थन करता हो. दाग मोदी पर भी था. गुजरात दंगों का. लेकिन उनके मातृसंगठन के लिए यह उनकी विशेषता थी.

आरएसएस की निगाह में ‘ब्रांड’ मोदी का पिछड़ा होना उनकी बड़ी खूबी थी. इसलिए चुनावों के दौरान कई मिथक उस ब्रांड के साथ जोड़े गए. पहला मिथक विकास का था. मंदी की शिकार अर्थव्यवस्था में भारत का युवा चमत्कार की उम्मीद पाले हुए था. विकास का नारा उसे एक उम्मीद में बदल देता था. लेकिन केवल विकास के नाम पर बहुमत का जुगाड़ असंभव था. इसलिए कि कांग्रेस विकास के नाम पर ही राजनीति कर रही थी. उसके पास मनमोहन सिंह जैसा नेता था, जिसे आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा नक्काश माना जाता है. इसलिए विकास के साथसाथ मोदी जी के पिछड़े वर्ग से संबंधित होने ने उन्हें भारतीय राजनीति में स्वीकार्य चेहरा बना दिया. अपनी कुशल सेल्समेनी के बल पर मोदीजी अपनी छबि बनाने में कामयाब भी रहे.

कारपोरेट घरानों से निकटता, मीडिया के समर्पण, धार्मिक कट्टरपंथ, जातिवाद सांप्रदायिकता और पूंजीवाद के साथ मिलकर उन्होंने ऐसा कोलाज रचा कि धर्म और कट्टर राष्ट्रवाद को आसानी से खपा लिया गया. पूंजीवाद के नेतृत्व में धर्म, संस्कृति और राजनीति का ऐसा कोलाज शायद ही किसी और देश में रचा गया हो. धार्मिक धु्रवीकरण और पूंजीवादी संस्थाओं से अपनी निजता के आधार पर मोदी जी ने इतनी लोकप्रियता बटोरी कि केंद्रीय चुनावों में सफलता के लिए अपने चुनावी राजनीति के तहत हर प्रयोग को दोहरा चुकी भाजपा के लिए वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त उम्मीदवार सिद्ध हुए. उन्हें सबसे उपयुक्त और प्रभावी नेता मान लिए गए. राजनीति में ‘मोदीत्व’ को अपरिहार्य मानते हुए संघ की ओर से पार्टी के जमेजमाए नेताओं, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज भी किनारे करते देर नहीं लगी. चालीस वर्षों तक संघ के प्रचारक रहे मोदी को अपना उम्मीदवार बनाते देर नहीं की. और मोदी जी ने भी अपनी इस तरह मार्किटिंग की कि पूरा का पूरा विपक्ष भौंचक्का रह गया. जाति और वर्ग के धु्रवीकरण के बीच में उलझी भारतीय राजनीति इस तरह के मुखौटे का होना, संघ की नजरों में समय की मांग थी.

मुखौटे की विशेषता होती है कि वह अवसर विशेष के लिए बनाया जाता है. काम निकलते ही वह बोझ लगने लगता है. तो जिन लोगों ने मोदी जी को अपना नेता माना है, और उन्हें लोकतंत्रात्मक शक्तियां प्रदान की हैं, उनकी संस्कृति ऐसी नहीं है कि एक शूद्र को सत्ता सौंपकर उसके अधीन काम कर सकें. वे मनु महाराज को अपना आराध्य मानने वाले और शंबूक की हत्या करनेवाले लोग हैं. मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने का एक ही उनका मकसद है, येनकेनप्रकारेण वर्चस्वकारी संस्कृति को आगे बढ़ाना. जिन लोगों की दूरदर्शन धारावाहिकों में रुचि है, वे आसानी परख सकते हैं. हर सीरियल में हनुमान चालीसा का पाठ हो तो सेंसर बोर्ड अपने आंख, नाक और कान सब बंद कर लेता है. पिछले दिनों एक अच्छी बात अवश्य हुई है. विदेशी पूंजी की तरफ से निराश होकर सरकार ने नव उद्यमियों के प्रोत्साहन हेतु ‘स्टार्टअप’ योजना लागू करना. यदि ढंग से, इस देश की जनशक्ति में विश्वास करते हुए इस योजना का कार्यान्वन किया जाए तो गिरती अर्थव्यवस्था के दौर में चमत्कारी सिद्ध हो सकती है. प्रधानमंत्री यदि कुछ दिनों के लिए विदेशयात्राओं का मोह छोड़कर इसी योजना को आगे बढ़ाने के लिए काम करें तो विकास को सही मायने में ‘प्रगति’ से जोड़ा जा सकता है. लेकिन इसके लिए उन्हें अपने उन नेताओं पर नकेल कसनी होगी जो सांप्रदायिकता की राजनीति करते हैं, जाति के नाम पर लोगों को भड़काते हैं और किसी न किसी बहाने देश को एक हजारबारह सौ वर्ष पीछे ढकेल देना चाहते हैं. वे ऐसा करेंगे या कर पाएंगे, इसकी संभावना बहुत कम है.

© ओमप्रकाश कश्यप