समय का दर्शन-तीन

ज्ञान, ज्ञानार्जन की प्रक्रिया और चौथा आयाम

अक्सर कहा जाता है, ज्ञानी बनो. पुस्तकें ज्ञान का समंदर हैं. उन्हें पढ़ो. जितना संभव हो ज्ञान को समेट लो. समेटते जाओ. ज्ञार्नाजन को अपना लक्ष्य मानकर गुरु की शरण लो. उसकी कृपा से अपने अज्ञान के अंधेरे को दूर करो. लेकिन ज्ञान की ललक में दौड़ते, भागते. उसकी तलाश में भटकते, ठोकरें खाते कभी-कभी यह विचार भी मन में कौंध उठता है कि ज्ञान आखिर है क्या? हम कैसे जाने कि ज्ञान के लिए हमारी दौड़-भाग का जो परिणाम निकला, देर तक भटकने के बाद जिस लक्ष्य पर हम पहुंचे हैं—वह सचमुच ज्ञान है? ज्ञान और अज्ञान के बीच सीमारेखा कैसे खींची जाए? ज्ञान के कौन से लक्षण हैं जो उसको अज्ञान होने से बचाते हैं? साधारणजन के लिए यह उतनी बड़ी समस्या नहीं है. वह गुरुजनों पर विश्वास कर लेता है. धर्मग्रंथों में शताब्दियों पूर्व लिखी गई बातों से अपना काम चला लेता है. उसके लिए ज्ञान स्थायी, अपरिवर्तनशील, कभी न बदलने वाला, युगांतर सत्य है. तर्कबुद्धि को किनारे रखकर वह अपने आस्थावादी दिमाग से सोचता है. उसकी निगाह में गंगा शताब्दियों पहले जब प्रदूषण जैसी कोई समस्या नहीं थी जितनी पवित्र थी, आज भी उतनी ही पवित्र है. ऐसा व्यक्ति समाज की सामान्य समझ और रीति-रिवाजों से अनुशासित होता है. दूसरी ओर जिज्ञासु व्यक्ति मानता है कि ज्ञानार्जन की प्रक्रिया अंतहीन है. वह अपने संदेहों को सम्मान देता है. उसका विश्वास है कि ज्ञान सदैव अज्ञान की बांह पकड़कर चलता है. दोनों के बीच इतना बारीक अंतर है कि ज्ञान कब अज्ञान की सीमा तक पहुंच जाए, और अज्ञान यह कहकर कि वह कम से कम इतना तो जानता ही है कि उसको फलां का ज्ञान नहीं है—स्वयं को ज्ञानवान की परिधि में ले आता है. ऐसा व्यक्ति किसी बंधी-बंधाई लीक पर चलने के बजाय अपना लक्ष्य स्वयं तय करता है. उसका बोध निरंतर परिष्करण को उन्मुख रहता है. वह ज्ञान की चिरंतनता और सतत परिवर्तनशीलता पर अटूट विश्वास रखता है.

ऐसे जिज्ञासु के लिए ज्ञान का सामान्य-सा लक्ष्य है जानना, किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान अथवा विचार को, जैसा वह है—जो वह दिखता है, और उस दृश्यमान के पीछे जो अनदिखा सत्य निहित है, उसका संपूर्ण बोध….वस्तु के रूप, रंग, गंध, गुण, दोष, आंतरिक-बाह्यः संचरना आदि का सर्वांग-परिचय. बेहतर ज्ञान अर्थात बेहतर जानकारी. एक वस्तु का दूसरी वस्तु से, एक विचार का दूसरे विचार से, साम्य-वैषम्य का निष्पक्ष-निरपेक्ष तत्वातत्व विवेचन. लेकिन यह कहना जितना आसान है, उतना है नहीं. किसी वस्तु को समग्रता के साथ जानना-समझना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है ज्ञान को परिभाषित करना. किसी वस्तु, व्यक्ति का ज्ञान होना दर्शाता है कि हमें उसके व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक पक्ष की संपूर्ण जानकारी है. हालांकि उस समय भी ज्ञान के कई ऐसे पक्ष हो सकते हैं, जो अभी मानवी मेधा के लिए समस्या बने हुए हों, अथवा जिनकी ओर उसका अभी ध्यान ही नहीं गया हो. उस अवस्था में वस्तु के बारे में उपलब्ध जानकारी को ही तत्संबंधी ज्ञान मानकर संतोष कर लिया जाता है. लेकिन ज्ञान का ज्ञान कैसे संभव हो? हम सामान्यतः ज्ञान की बाह्यः उपस्थिति से संतुष्ट हो जाते हैं. ज्ञान स्वयं क्या है? इस ओर हमारी दृष्टि कम ही जा पाती है. यह समस्या हम साधारण लोगों की नहीं है. बड़े-बड़े दार्शनिक और विचारकों के लिए भी ज्ञान को परिभाषित करना कठिन रहा है. किसी वस्तु, व्यक्ति आदि के बारे में सामान्य सूचना को ही उसके बारे में ज्ञान मानकर संतोष कर लिया जाता है. ऐसे में कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं. ज्ञान क्या वस्तु में अवस्थित होता है अथवा जिज्ञासु के मानस में? वह स्थायी है अथवा परिवर्तनशील? यदि वह परिवर्तनशील है तो किसी काल-विशेष में ज्ञान की प्रामाणिकता का आधार क्या हो? ऐसे कुछ प्रश्न ज्ञान और ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से जुड़े हैं. किसी वस्तु के बारे में हमारे ज्ञान का स्तर इस बात पर निर्भर करता है, कि उसके बारे में हमें कितना बोध है? तथा उसको परखने में लगे हमारे उपकरण कितने निरपेक्ष, संवेदनशील, विश्वसनीय और सुग्राही हैं? इस तरह से देखा जाए तो ज्ञान एक पैमाना है, जिसके द्वारा हम किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति, विचार आदि के बारे में अपने अनुभवों को वैध तथा दूसरे के अनुभवों को परखने हेतु कसौटी तैयार करते हैं. जिससे स्वयं हमारे अपने विवेक की कसौटी तैयार होती है. ज्ञान स्वयं में भी ऐसी कसौटी है जिसपर खरा उतरने के बाद ही कोई तर्क कुतर्क कहलाने से बच पाता है.

ज्ञान की पूर्णता संदेहों को विराम देती, तर्कों को समापन की ओर ले जाती है. ज्ञान की संपूर्णता सदैव एक लक्ष्य होती है. जैसे ही किसी एक रहस्य से पर्दा हटता है, दूसरा आवरण चुनौती बनकर उपस्थित हो जाता है. यह सिलसिला निरंतर बना रहता है. व्यवहार में कहा जाता है कि जहां ज्ञान है, वहां शंकाओं के लिए कोई स्थान नहीं है. पर हकीकत है कि जहां शंकाएं हैं वहीं ज्ञान की खुली आमद है. भले किसी को यह विचित्र लगे, पर सच यही है कि हमारी शंकाएं हमारे ज्ञान के सफर को आगे बढ़ाती हैं. निरंतर बढ़ते रहने की प्रेरणा देती हैं. पीटर अबेलार्ड के मन में भी कुछ प्रेरणादायी शंकाएं रही होंगी, जब उसने ये शब्द कहे—‘संदेह हमें जांच-पड़ताल को प्रेरित करती है और जांच-पड़ताल हमें सत्य का रास्ता दिखा देती है.

ज्ञान इतना बहुआयामी होता है कि मनुष्य किसी वस्तु या विचार के एक समय में एक पक्ष को लेकर ही बात कर पाता है. किसी वस्तु या विचार को लेकर हमारी शंकाएं दर्शाती हैं कि हमारे भीतर उस वस्तु को जानने की अभिलाषा जन्म ले चुकी है. जब हम सवाल करते हैं कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा क्यों करती है? तो निश्चितरूप से हमें इसके पूर्व प्रश्न कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, का बोध होता है. पृथ्वी सूरज की परिक्रमा क्यों करती है? उसकी गति और कारण क्या है? उसके लिए ऊर्जा कहां से प्राप्त होती है? दूसरे ग्रहों, उपग्रहों की गति से उसका क्या संबंध है? ऐसे प्रश्नों की अंतहीन शृंखला किसी एक प्रश्न के साथ ही आरंभ हो जाती है. जरूरी नहीं कि सभी प्रश्न किसी एक व्यक्ति के दिमाग में एक ही बार में आ जाएं. परंतु आपसी चर्चा के दौरान, बहस के दौरान, चिंतन-मनन अथवा इतिहास के भिन्न-भिन्न दौर में, ये प्रश्न जन्मते ही रहते हैं. कह सकते हैं कि प्रश्न बीजमंत्र होते हैं. एक छिटका तो उसके बाद प्रश्नों की झड़ी लग जाती है. हमारे अबूझे प्रश्न हमें बताते हैं कि जानना सीमित एक पड़ाव-भर है. ज्ञानार्जन की कोशिश में लगे उपकरणों की भी सीमा है. इसके बावजूद ज्ञान के किसी एक चरण में ही हम उसके बारे में प्रश्नों की सुदीर्घ शृंखला से जुड़ जाते हैं. ज्ञानार्जन की अनवरत चलने वाली प्रक्रिया में कुछ के उत्तर हमें मिलते हैं, कुछ के नहीं भी मिलते. इसी प्रकार प्रथम और द्वितीयक चरणों में ज्ञान आगे बढ़ता है. यह परंपरा इतनी लंबी और सुदीर्घ होती है कि हमारे ज्ञान का स्तर हमेशा प्रथम पायदान पर होता है. जिज्ञासु के रूप में हम स्वयं को सदैव एक नए लक्ष्य के सामने पाते हैं, जो हमेशा लक्ष्य बना रहता है. रोजमर्रा के जीवन में शंका और संदेह को अच्छे मन से नहीं देखा जाता. शंका-युक्त ज्ञान को अज्ञान का दर्जा दे दिया जाता है. उसको अपूर्ण माना जाता है. लेकिन दर्शन ऐसा नहीं मानता. उसके लिए शंकाएं समाधान से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होतीं. वे ज्ञान को उसकी पूर्णता की ओर ले जाने का एक अनिवार्य माध्यम हैं. इस तरह हमारा ज्ञान हमारी अंतर्बाह्यः दुनिया के बारे में सांगोपांग बोध है. जिसके माध्यम से हम दृश्य-अदृश्य वस्तुओं, ब्रह्मांड, आचार-विचार आदि के बारे में अपनी तथा दूसरों की विवेकशीलता के स्तर का अनुमान लगा पाते हैं.

ज्ञानार्जन की प्रक्रिया

स्मृति मनुष्य का वह गुण है जो उसको मनुष्येत्तर प्राणियों से अलग और विशिष्ट ठहराता है. यह ज्ञानार्जन की प्रक्रिया का प्रथम उपकरण है. मनुष्य को जो अनुभव होते हैं, हमारी स्मृति उन्हें मानसिक छवियों में संग्रहित करती रहती है. दार्शनिक शब्दावली में ये छवियां प्रत्यय कहलाती हैं. अनुभव के साथ हमारी मानस-छवियों में भी वृद्धि होती रहती है. उनमें से कुछ कम महत्त्वपूर्ण पद विस्मृति के रूप में लगातार ओझल होते रहते हैं. हालांकि मस्तिष्क उनके प्रभाव को हमेशा के लिए कभी विस्मृत नहीं होने देता. अनुकूल अवसर देख वह उन्हें विस्मृति के गर्भ से बाहर ले आता है. प्रत्यय निर्माण की सामग्री हमारे मनस् में प्रायः दो प्रकार से आती है. हमारे निजी अनुभव जो सीधे हमारी इंद्रियों के माध्यम से हमारे मस्तिष्क तक पहुंचते हैं. जैसे मेज को देखने के साथ ही एक छवि हमारे मस्तिष्क में पैठ जाती है. भविष्य में जैसे ही हमारे सामने मेज जैसी संरचना आती है अथवा कोई उसका जिक्र भी करता है तो हम जान जाते हैं कि वह मेज के बारे में है. सीधे अनुभव के अलावा दूसरों के अनुभव भी हमारे प्रत्यय-निर्माण में मददगार होते हैं. वे बातचीत, किस्से-कहानी, पुस्तक, लोकसंवाद या ऐसे ही किसी अन्य माध्यम से हमारे संज्ञान में आते हैं. उनके बारे में पढ़ते-सुनते-देखते समय ही हम उनकी छवियां अपने मनस् में पैठा लेते हैं. प्रत्ययों को सहेजते समय हमारा मस्तिष्क लगातार क्रियाशील रहता है. नवांतुक प्रत्ययों की पूर्वस्थापित प्रत्ययों से तुलना करते हुए वह उनके आधार पर नई मानस-छवियां गढ़ता रहता है. फलस्वरूप अगली बार जब भी कोई नया प्रत्यय बनता है, उससे तुलना करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक संख्या में प्रत्यय पहले से ही मनस् में मौजूद रहते हैं. उनके सहयोग-टकराव से कुछ नए प्रत्यय बनते रहते हैं, जो हमारी मेधा को समृद्धि प्रदान करते हैं. हमारे मस्तिष्क में प्रत्ययों की एक स्वतंत्र दुनिया बसी होती है. हमारा बोध, हमारा ज्ञान कहीं न कहीं उन्हीं से निर्धारित होता है.

प्रत्यय निर्माण में वस्तु-विशेष के अस्तित्व का योगदान होता है. दूसरे शब्दों में अस्तित्व किसी वस्तु का वह गुण अथवा गुणों की अन्योन्याश्रित शृंखला है, जिससे वह पहचानी जाती है. जिसके आधार पर वह दूसरों से भिन्न सिद्ध होती है. यह वैभिन्न्य मानव-मस्तिष्क की रचना है, जो उसने दृश्य वस्तुओं के भौतिक-भाविक रूप को देखते हुए उनकी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने के लिए उन्हें दी है. आवश्यक नहीं कि वे भी स्वयं उस पहचान से परिचित हों. घड़ा और ईंट दोनों ही मिट्टी से व्युत्पन्न हैं. अपने रूपाकार में दोनों स्वतंत्र. इतने कि उन्हें एक-दूसरे से अस्तित्व से, गुणों से कोई वास्ता नहीं. पर आदमी को उनसे वास्ता है. घड़ा र्या इंट भले न जानते हों कि वे क्या हैं? मनुष्य उन्हें अलग-अलग पहचान लेता है. इसलिए कि ये संज्ञाएं उसी के द्वारा दी गई हैं. बचपन से ही बालक को उसके आसपास मौजूद विभिन्न वस्तुओं तथा उनके रूपाकारों के बारे में बताया जाता है. ये रूपाकार अलग-अलग छवियों के रूप हमारे मस्तिष्क में मौजूद रहते हैं. ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति वस्तु अथवा विचार विशेष तथा मस्तिष्क में मौजूद प्रत्ययों की तुलना द्वारा जान लेता है कि प्रेक्षित वस्तु क्या है. आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति के मनस् में सभी प्रत्यय मौजूद हों. उस अवस्था में व्यक्ति दूसरे के अनुभवों और छवियों से काम चला लेता है. इस तरह ज्ञान सामूहिक प्रक्रिया भी है.

प्रश्न है कि क्या गुण वस्तुओं की निजी विशेषता होते हैं? यदि हां, तो क्या हम वस्तुओं को उसी रूप में जान पाते हैं, जैसी वे हैं. आम को ‘आम’ संज्ञा मनुष्य द्वारा दी गई है. निर्जीव वस्तुएं नहीं जानतीं कि वे स्वयं क्या हैं? आप आम को ‘आम’ कहें या ‘इमली’, इससे आम को कोई फर्क नहीं पड़ता. आम यह भी नहीं जानता कि वह खट्टा है या मीठा. यह तय करना उसका काम नहीं है. खट्टा-मीठा स्वाद या अनुभूतियां हैं, जिनका नामकरण प्रकृति साहचर्य से गुजरते हुए मनुष्य द्वारा किया गया है. पृथ्वी के अलग-अलग प्रांतों में भटकते हुए मनुष्य को भिन्न-भिन्न अनुभव हुए. उसके फलस्वरूप अलग-अलग भाषाएं बनीं. सभ्यताओं के संपर्क के आधार पर भाषायी परिवर्तन-संबर्धन के दौर भी चलते रहे. कह सकते हैं कि ज्ञान प्रकृति के साहचर्य द्वारा अर्जित बौद्धिक-आनुभविक संपदा है. लेकिन उसके प्रमाणीकरण का आधार क्या हो? कैसे कहें कि हमें वस्तु का यथातथ्य ज्ञान है? ज्ञान के प्रमाणीकरण की सबसे बड़ी समस्या है कि सृष्टि में मनुष्य अकेला विवेकवान प्राणी है. ज्ञान उसके लिए वरदान है तो अभिशाप भी है. वरदान इसलिए कि बाकी प्राणियों की ओर से मनुष्य के श्रेष्ठत्व को कोई बड़ी चुनौती कभी दी नहीं जा सकी. अपने ज्ञान के बल पर मनुष्य पशु-पक्षियों से अपने स्वार्थानुकूल काम लेता आया है. बल्कि उसने सृष्टि के विभिन्न तत्वों की व्याख्या ही अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर की है. अभिशाप इसलिए कि अपनी खूबियों, खामियों, स्वाध्याय, साधना, अध्ययन और चिंतन द्वारा मनुष्य ने भाषा की जो कसौटियां बनाईं, उन्हें यदि मनुष्येत्तर प्राणियों की ओर से भी चुनौती मिल पाती तो निश्चय ही विमर्श का दायरा और उसकी परिधि में विस्तार होता.

प्रकृति द्वारा केवल मनुष्य को स्मृति का वरदान प्राप्त है. इसके माध्यम से वह अपने अनुभवों, ज्ञान आदि को आने वाली पीढ़ियों को सौंपता आया है. आज के मनुष्य के प्रबोधीकरण में उसकी सैकड़ों पीढ़ियों का योगदान है. जिसे हम ज्ञान कहते हैं, उसकी कसौटियां मनुष्य ने ही तैयार की हैं. इन कसौटियों में समय-समय पर संशोधन भी होता रहा है. कई बार मनुष्य को अपना ज्ञान अपर्याप्त लगने लगता है. उदाहरण के लिए भाषा का मुद्दा. जैसे ‘खट्टी’ कही जाने वाली दो वस्तुओं में से एक वस्तु कम खट्टी है, दूसरी अधिक खट्टी. भाषा की सीमा है कि वह अधिक से अधिक खट्टेपन के स्तर को ‘कम’ या अधिक’ के रूप में अभिव्यक्त कर सकती है. संभव है कुछ लोकभाषाओं में अधिक खट्टेपन और कम खट्टेपन को अभिव्यक्त करने के लिए अलग शब्द हों. फिर भी अधिक और कम के बीच खट्टेपन के जो भिन्न स्तर हो सकते हैं, उनकी सटीक अभिव्यक्ति में हमारे भाषायी उपकरण काम नहीं आते. कोई वस्तु ठीक-ठीक कितनी खट्टी है, यह बताने में भाषा असमर्थ रहती है. रसायन विज्ञान पदार्थ में मौजूद अम्लीयता को मापकर पीएच मूल्य के आधार पर खट्टेपन को अंकों में अभिव्यक्त कर सकता है. लेकिन उसके द्वारा हमारे मस्तिष्क में दर्ज सूचना आंकिक होगी. खट्टेपन के बोध से सर्वथा परे. दूसरे शब्दों में विज्ञान खट्टेपन को लेकर उसके कारण अम्लीयता का सटीक पीएच स्तर तो बता सकता है. लेकिन स्वाद का अंकीकरण, पीएच मूल्य का ज्ञान हमारे मन में खट्टेपन का बोध जाग्रत नहीं कर पाते. यह जानकारी हमें अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है. खट्टापन हमारी अनुभूति का विषय है. जबकि पीएच स्तर विशुद्ध बौद्धिक सूचना. इसे एक कथात्मक उदाहरण के माध्यम से भी समझा जा सकता है—

‘एक राजा था. प्रजा हित में उसे एक किसान के खेत की जरूरत पड़ी. खेत में था कटहल का पेड़. उसने मांग की कि उसको कटहल के पेड़ का भी मुआवजा दिया जाए. फरियाद लेकर वह राजा के दरबार में पहुंचा.
‘पेड़ का मुआवजा! ऐसा तो आज तक सुनने में नहीं आया….कितना मुआवजा चाहते हो?’
‘महाराज मेरा कटहल का पेड़ तीन हाथियों जितना ऊंचा है. हर साल वह इतने फल देता है कि तीन हाथियों का पेट भर सके. इसलिए मुझे उस पेड़ के बदले तीन हाथियों जितना मुआवजा दिया जाए?’
किसान ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी कि जो दरबारी पेड़ के मुआवजे की बात सुनकर हंसे थे, उसके पक्ष में हो गए. कटहल के एक पेड़ के बदले तीन हाथियों जितना मुआवजा, राजा एकाएक निर्णय न ले सका. अगले दिन निर्णय सुनाने को कहकर उसने किसान को वापस कर दिया. संयोगवश राजा अगले दिन ही चल बसा. कुछ दिनों बाद किसान भी दुनिया से कूंच कर गया. उसके बाद तो वर्षों बीते. समय बदला. निजाम बदला. राजशाही की जगह लोकतंत्र ने ले ली. अनपढ़ किसान के बेटे पढ़-लिखकर नौकरी करने लगे. सरकार को फिर उस जमीन की जरूरत पड़ी. कटहल का पेड़ पहले की भांति अब भी हर साल फलता था. जेठ-बैशाख में उसकी डालियां फलों से लद जातीं. किसान के बेटों ने भी कटहल के पेड़ का मुआवजा मांगा. सरकारी कर्मचारियों ने टाल-मटोल की तो उन्हांेने मुकदमा दायर कर दिया.
‘कितना मुआवजा चाहते हो?’ अदालत में पूछा गया.
‘श्रीमान पेड़ बड़ा ही होनहार है. हमारे पिता के जमाने से ही फल देता आ रहा है. दस-पंद्रह वर्ष और फल देगा. ऐसा कमाऊ पेड़ हमसे ले लिया गया तो हमारा लाखों का नुकसान हो जाएगा.’
‘कितने वर्ष और फल देगा, दस या पंद्रह. ठीक-ठीक बताओ?’
‘जी पंद्रह वर्ष!’
‘एक साल की फसल और पेड़ की लकड़ी की कीमत बताओ?’ किसान के बेटों ने बता दिया.
अदालत ने लकड़ी की कीमत के साथ एक साल के कटहल के बाजार-मूल्य का पंद्रह गुना जितना मुआवजा तय कर दिया. किसान के बेटों ने इसे अपनी जीत माना.

किसान और उसके बेटों में एक समानता है. दोनों ही अपने अधिकार के बारे में जानते थे. दोनों को लगता था कि कटहल के पेड़ का मुआवजा मिलना चाहिए. न मिलने पर आगे फरियाद की जा सकती है, यह भी उन्हें मालूम था. लेकिन कटहल के मुआवजे में रूप में किसान ने तीन हाथी मांगे थे. जबकि उसके बेटे लकड़ी और पंद्रह वर्ष की फसल मुआवजा लेकर संतुष्ट हो गए. इसलिए कि किसान से उसके बेटों तक आते-आते समय वातावरण बदल चुका था. इस आधार पर कह सकते हैं कि मनुष्य का बोध अनुभव सिद्ध होता है. परिवेश बदलने के साथ ही उसके ज्ञान का स्वरूप भी बदलता रहता है. किसान का जैसा अनुभव था, उसने उसके अनुसार मुआवजे की मांग की थी. उसके बेटों के अपने अनुभव के अनुसार. इसलिए यह कहना कि गुण केवल मनोजगत की रचना है उचित नहीं है. दूसरी ओर यह कहना भी सही न होगा कि गुण वस्तु में अवस्थित होते हैं. गुण यदि केवल वस्तु में स्थित होते तो प्रत्येक प्रेक्षक को उन्हें समान रूप से प्रभावित करना चाहिए. जबकि ऐसा नहीं होता. चार चित्रकारों को यदि एक मूर्ति के चारों ओर बिठाकर चित्र बनाने को कहा जाए तो उनके बनाए चित्र अलग-अलग होंगे. लेकिन यदि मूर्ति न हो और उन्हें कल्पना के आधार पर उसका चित्र बनाने को कहा जाए तो उसकी प्रस्तुति में और भी बड़ा अंतर होगा. फिर भी अवलोकन न तो कोई यांत्रिक क्रिया है, न ही ज्ञान के हमारे सारे के सारे पैमाने जड़ हैं. हमारा बोध न केवल स्वतंत्र है, बल्कि उसमें संशोधन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. लेकिन गुण केवल मनोरचना नहीं हो सकते. उनका मूलाधार वस्तुएं होती हैं, एक प्रेक्षक के रूप में मनुष्य उनसे अपनी सीमाओं के अनुसार ग्रहण करता है. भाषा एवं अभिव्यक्ति के अन्य उपकरणों के विकास की दर, आनुभविक जगत की विकासदर से बहुत कम होती है. किसी भी लेखक-साहित्यकार का सामथ्र्य नहीं है कि वह अपनी अनुभूतियों को सटीक अभिव्यक्ति दे सके. उस समय उसको तुलना द्वारा काम चलाना पड़ता है. मसलन बहुत खट्टे आम को ‘तेजाब की तरह खट्टा’ कह देना. अभिप्राय है कि किसी वस्तु के गुण भले ही उसकी अपनी विशेषता हों, लेकिन उन्हें अपनी अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य पर निर्भर करना पड़ता है. यह अलग है कि अभिव्यक्ति के उसके उपकरण अधूरे और अक्षम हों. वस्तु के बारे में उसके जो गुण हमारे लिए उपयोगी नहीं होते उसके अवगुण कहलाते हैं. यह विशेषण हैं जो मनुष्य ने अपनी सुविधा और हित के अनुसार निर्धारित किए हैं. गुण और अवगुण का भेद भी व्यक्तिपरक और परिस्थतिकीय हो सकता है. किसी भूखे व्यक्ति को करेले का कड़वा रस भी आम के रस की भांति अमृत तुल्य लगेगा. जबकि भरे पेट वाला व्यक्ति आम के रस के स्वाद का भी आनंद नहीं उठा पाएगा.

वस्तुओं को टिककर देखने-परखने की सम्यक दृष्टि के अभाव में हम सामान्यीकरण करने लग जाते हैं. मसलन आम चीनी तरह मीठा है. ‘इमली’ तेजाब जितनी खट्टी है. ऐसे उदाहरण हमारे प्रबोधीकरण में सहायक होते हैं. परंतु इनसे सारा जोर वस्तु के किसी एक गुण पर ही अटक जाता है. वस्तु के बाकी गुणों की ओर हमारी निगाह ही जा पाती. हर भाषा की एक सीमा होती है. कभी-कभी शब्द चुकने लगते हैं. कभी-कभी हम कहना कुछ चाहते हैं, कह कुछ और जाते हैं. घर नदी पर है, उसमें कहने और समझने वाले दोनों का वही अर्थ नहीं होता जो शब्दों की निष्पत्ति है. उस अवस्था में शब्दार्थ के बजाय लक्षणार्थ को प्रधानता दी जाती है. लक्षण की अभिकल्पना भाषायी दुर्बलता को दूर करने की कोशिश का ही रूप है. इस भाषायी दुर्बलता का कारण भी है, क्योंकि उसकी रचना जिस मानवी मेधा द्वारा हुई है, वह सीमित होती है. लेकिन बोध की सीमाओं और भाषायी अक्षमताओं के चलते इस प्रकार के तुलनात्मक प्रयास अनिवार्य होते हैं. इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अज्ञान ज्ञान का विलोम न होकर उसके अभाव की अवस्था है. कोई बात जो झूठ नहीं है, आवश्यक नहीं कि वह सच भी हो. ऐसे ही काला और सफेद रंग दो विभिन्न स्थितियां हैं. नदी के दो पाटों के समान. एक इस तरफ दूसरी उस तरफ. एक के हाथ में हजार रुपये आए. उसने वे तत्काल दूसरे को सौंप दिए. दूसरे के पास भी इतने ही रुपये आए. उसने अपनी गांठ में बांध लिए. यह तो अपना-अपना व्यवहार है; या कि व्यापार करने का अपना अलग ढंग. वस्तुतः विलोम की संकल्पना प्रतिकूल परिस्थितियों की सही ढंग से व्याख्या न कर पाने के वाली हमारी वौद्धिक अक्षमता की उपज है. यह हमारी वुद्धि और अभिव्यक्ति की सीमा भी है.

ज्ञान का स्वरूप

ज्ञान अनंत है. उसे हम परमसत्ता का प्रतीक भी कह सकते हैं. लेकिन वह है इसी प्रकृति और ब्रह्मांड का रूप. उससे बाहर कुछ नहीं. कुछ हो भी नहीं सकता. दोनों एक ही रूप हैं. अलग-अलग मानेंगे तो व्यवस्था संबंधी अनेक समस्याएं पैदा हो जाएंगी. एक अनंत में दूसरी अनंत सत्ता कैसे समा सकती है. समाएगी तो फिर उनमें से किसी को भी अनंत भला कैसे कहा जा सकता है. परमसत्य के इन सभी रूपों को जानना समझना संभव नहीं है. वैसे ही परमसत्ता को उसकी समग्रता के साथ समझ पाना असंभव है. सीमित सामथ्र्य वाली मानवेंद्रियांे की क्षमता से यह बिलकुल बाहर है. उन आंखों का हम कैसे भरोसा करें जो तस्वीर के दूसरे पक्ष की ओर एक समय में एक साथ कभी जाती ही नहीं. जबकि परमसत्ता को समझने के लिए कम से कम पंचविमीय दृष्टि चाहिए, जो आइंस्टाइन के चतुर्विमीय संसार के अलावा उसके भीतर झांकने में भी सामथ्र्यवान हो. घ्राण, स्पर्श, और श्रवणेद्रियों के अनुभवों को भी अंतिम और प्रामाण्य नहीं माना जा सकता.

ज्ञान वस्तुनिष्ठ होने के साथ-साथ व्यक्तिनिष्ठ भी होता है. देशकाल के अनुसार किसी वस्तु के बारे में प्रेक्षकों की धारणाएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं. आम के वृक्ष को देखकर कृषि विज्ञानी, चिकित्सक, भौतिकविज्ञानी और साधारण आदमी सभी देखने का दावा कर सकते हैं. लेकिन उनके अनुभव और अभिव्यक्तियां परस्पर शायद ही मेल खाएंगी. कृषिविज्ञानी संभव है फसल का अनुमान लगाते हुए उससे होने वाली आय के बारे में बताना चाहे. उसका आम संबंधी ज्ञान वृक्ष की प्रजाति औसत पैदावार, पत्तियों और तने की आंतरिक संरचना जैसी जानकारी से भरपूर होगा. कृषि-विज्ञानी आम के औषधीय गुणों की चिकित्सक जैसी जानकारी रखता हो, यह आवश्यक नहीं है. चिकित्सक के उम्मीद की जा सकती है कि वह आम के साथ उसके तने, पत्तियों, और बौर के औषधीय गुणों का भी ज्ञान रखे. इसी प्रकार भौतिक-विज्ञानी आम के वृक्ष के रूपाकार के बारे में ही बेहतर टिप्पणी कर सकता है. साधारण आदमी आम के पत्तों, लकड़ी, फल और बौर आदि के सांस्कृतिक उपयोग, उसके फल और उससे तैयार होने वाले व्यंजनों आदि के बारे में व्यावहारिक जानकारी दे सकता है. इन सभी का ज्ञान प्रामाण्य है. एक मनुष्य भले ही वह कितनी ही विलक्षण प्रतिभा का स्वामी हो, ब्रह्मांड से अपने हिस्से का केवल उतना ज्ञान समेट पाता है, जितना अरबों-खरबों वर्ष पुरानी प्रकृति के आगे उसके अपने जीवन के चंद दिन.

दर्शनशास्त्रीय स्थापनाएं ठोस एवं तर्कशास्त्रीय आधार होने के बावजूद काफी लचीलापन लिए होती हैं. वह किसी भी विचार को अंतिम मानकर नहीं चलता. जबकि विज्ञान में नियम बनाने के साथ ही धारणा विशेष को सर्वस्वीकृति मिल जाती है. उसके बाद नियमों का उपयोग वैज्ञानिक गवेष्णाओं में आप्तवचन की भांति, बिना किसी विवाद एवं संदेह के चलता रहता है. जब तक कि कोई बड़ी और क्रांतिकारी खोज उसके नियमों में आमूल-चूल परिवर्तन न कर दे. जैसे कि न्यूटन के गति के नियम जो आश्चर्यजनक रूप से बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक सर्वमान्य बने रहे, लेकिन आइंस्टाइन ने अपने अध्ययन के दौरान माना कि गति के समीकरण केवल साधारण वेगों के लिए सही हैं. अति उच्च यथा प्रकाशकीय वेगों के लिए गति के समीकरण अनफिट हैं. जाहिर है कि आइंस्टाइन की इन घोषणाओं से न्यूटन के गति नियमों की शाश्वता पर प्रश्नचिह्न लग चुका है. लेकिन उसका उपयोग साधारण वेगों के लिए आज भी पूर्ववत जारी है. कुछ ऐसा ही आइंस्टाइन के सिद्धांत के साथ हुआ. करीब एक शताब्दी तक वह वैज्ञानिकों के मानक सिद्धांत का काम करता रहा. आज स्टीफन हाकिंग जैसे कई वैज्ञानिक सापेक्षता के सिद्धांत में खामी तलाश चुके हैं. क्वांटम थ्योरी ने भौतिकी के परंपरागत सिद्धांतों को उलट-पलट दिया है.

दर्शनशास्त्र का कोई भी विचार संदेह से परे नहीं होता. विज्ञान की तरह वह भी इस बात को महत्त्व देता है कि संदेह से जांच पड़ताल पर पहुंचते हैं और जांच पड़ताल हमें निष्कर्ष तक ले जाती है. विज्ञान और दर्शन में आगे चलकर एक मूलभूत अंतर यह बना कि विज्ञान जहां संदेहों के निवारण के लिए सार्वभौमिक नियमों की ओर अग्रसर रहता है, वहीं दर्शनशास्त्र संदेहों, विरोधी विचारधाराओं को भी सम्मानजनक स्थान देते हुए सत्य की खोज की ओर अग्रसर रहता है. इस प्रकार दर्शनशास्त्र में प्रतिविचार का महत्त्व विचार जैसा ही होता है. जबकि विज्ञान की कोशिश प्रति विचार के उन्मूलन के बाद एक सामान्य-सर्वस्वीकार्य नियम बनाने की होती है, जिसको प्रयोगों पर कसा जा सके. जो प्रत्येक तर्क और परीक्षण की कसौटी पर खरा उतर सके. दर्शनशास्त्रीय संकल्पनाओं का ध्येय मात्र इतना होता है कि वे परमसत्य अथवा उसके किसी अंश की पहचान करने वाले विविध मार्गों में से किसी एक की ओर संकेत भर करती हैं. चूंकि ब्रह्मांड की कारण सत्ता का स्वरूप इतना विराट और अकल्पनीय रहा है, कि कोई विचार-विशेष जो परमसत्ता के एकांश का भी प्रदर्शन करता है, वह भी काफी महत्त्वपूर्ण मान लिया जाता है. यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि परमसत्ता का अभिप्राय किसी दैवीय या ईश्वरीय व्यवस्था से कदापि नहीं है, जैसी कि आस्था या अंधविश्वास के नाम पर अक्सर थोपी जाती रही है. परमसत्ता से हमारा आशय विराट प्रकृति से है जिसमें अखिल ब्रह्मांड और उसके आरपार भी यदि कुछ है तो वह सब समाया हुआ है. दर्शनशास्त्र विज्ञान न होकर भी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की सभी धाराओं से समानरूप में प्रेरणा ग्रहण करता है. इसके साथ ही यह समानांतर रूप में उनके निष्कर्षों को प्रभावित भी करता है.

विज्ञान सामान्यतः प्रमेय और यथार्थ विषयों या ऐसे विषयों को जिनका प्रकारांतर में अन्वीक्षण-विश्लेषण संभव हो सके, अपने अध्ययन की विषय वस्तु बनाता है. यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि अध्ययन के प्रारंभ में भी वे विषय प्रमेय और यथार्थ माने जाते रहे हों. वैज्ञानिक जिज्ञासाएं अक्सर अज्ञेय समझे जाने वाले विषयों को चुनौती देती हैं, अंततः वैज्ञानिक को अपने श्रम और संकल्प के बूते सफलता भी मिलने लगती है. इस प्रकार दार्शनिक विवेचन का मुद्दा रहे विषय वैज्ञानिकों की मेधा के सहयोग द्वारा विशुद्ध वैज्ञानिक विषयों में ढलने लगते हैं. यहां स्पष्ट करना भी जरूरी है कि दर्शन और विज्ञान के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा खींच पाना असंभव है. महज अनुमान या कल्पना के आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि फलां विषय विशुद्ध वैज्ञानिक है और फलां केवल दार्शनिक विवेचन की अपेक्षा रखता है. जीनोम की खोज, मास्तिष्क की संरचना, क्वांटम भौतिकी, बह्मांड और समय के बारे में नवीनतम आविष्कार कई ऐसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हैं, मानवी मेधा की जिनके कारण हमें सृष्टि की व्युत्पत्ति संबंधी अपनी धारणाओं में संशोधन करना पड़ा. परिणामतः इन खोजों का प्रभाव दर्शन और ज्ञान-विज्ञान की दूसरी शाखाओं पर भी पड़ा है.

कुछ विद्वान समय को भी चैथे तत्व के रूप में जोड़ने का आग्रह करते हैं. इनमें आधुनिक भौतिकविदों की संख्या अधिक है. वस्तुतः प्रेक्षक और प्रेक्षित वस्तु के बीच प्रेक्षण की घटना को संपन्न करने के लिए दोनों के बीच अंतःसंबंधों का विकसित होना अनिवार्य है. यदि प्रेक्षक वस्तु के सापेक्ष प्रकाश आवर्तन की दिशा में प्रकाशीय वेग से जा रहा हो. वस्तु से परावर्तित प्रकाश किरणें प्रेक्षक तक कभी नहीं पहुंच पाएंगी. परिणामतः उपर्युक्त तीनों तत्वों के उपस्थित रहने के बावजूद देखने की क्रिया कभी संभव नहीं हो पाएगी. ऐसी स्थिति में वस्तु संबंधी हमारा ज्ञान शून्य होगा. सत्य एवं तार्किक होने के बावजूद यह नितांत काल्पनिक स्थिति है. विज्ञान की दृष्टि में संभावनाएं भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं. प्रत्येक नियम अपने पूरक नियम को साथ रखता है. इसलिए कि वह अपने आप में संपूर्ण नहीं है. सच तो यह है कि खरबों वर्ष पुराने इस ब्रह्मांड और सहस्रों प्रकाशवर्ष में विस्तृत सृष्टि को जानने समझने के लिए हमारे पास जो अनुभव और भाषा है, वह मात्र कुछ हजार वर्ष पुरानी है. स्वयं हमारा अस्तित्व भी कुछ लाख वर्ष पुराना है. इसलिए ‘सर्वखाल्विदं ब्रह्म’ कहकर ज्ञानार्जन की कोशिश से कुछ देर के लिए विराम ले लेता था. हम चाहें स्वयं को जितना बड़ा ज्ञानी माने, सृष्टि-रहस्य को जानने-समझने का जितना दावा करें, हमारा ज्ञान अभी शैशवास्था में है. सृष्टि को जानने का हमारा दावा उस बच्चे की भांति है, जो चांद को पानी से भरे कटोरे में देखकर रोटी समझ लेता है. हमारा यह अहं होगा यदि हम अपने कामचलाऊ ज्ञान को प्रकृति के रहस्यों के अनावरण की संज्ञा से विभूषित करें.

तक क्या मनुष्य को हार मान लेनी चाहिए? छोड़ दे कोशिश प्रकृति को जानने-समझने की. इसके अबूझ रहस्यों से पर्दा हटाने का संकल्प भुला दे. नहीं….इस विराट ब्रह्मांड और अपनी समस्त ऐंद्रियक सीमाओं, विशिष्टताओं, दुबर्लताओं और खूबियों के साथ मनुष्य अभी तक जितना समेट पाया है, वह भी कुछ कम संतोष की बात नहीं है. क्योंकि अपनी उस बीहड़ ज्ञान-यात्रा में मनुष्य को कदम-कदम पर भीतरी और बाहरी संकटों से जूझना पड़ा है. और यह भी कि असंख्य जीवों और उनकी असंख्य प्रजातियों में केवल मनुष्य ही है जो प्रकृति को चुनौती देने का साहस कर पाया है. जिसने अवसर मिलते ही समय धारा के विपरीत चलने का साहस जुटाया है. इस दुस्साहसी संकल्पयात्रा के लिए मानवी जिजीविषा को नमन करने का मन हो आता है. इसी जिजीविषा के दम पर मानवी मेधा ने चुनौतियों को स्वीकारा है. मानवी संकल्प की विराटता को दर्शाने के लिए यह कम नहीं है कि खरबों प्रकाश वर्ष में फैले ब्रह्मांड को जानने का जो दावा करता है, उसकी अपनी कद-काठी केवल पांच-छह फुट की है. उसका जीवन क्षणभंगुर है. मगर यह मानवी मेधा की अदम्य ज्ञान लालसा ही है कि सत्य शोधन के पथ पर वह स्वयं को खुशी-खुशी बलिदान कर देता है. चाहे वह जहर का प्याला पीने वाले सुकरात हों या हंसते हुए मौत को गले लगा लेने वाला का॓परनिक्स. हमारा ज्ञान हमारी उपलब्धियां उन सबकी कर्जमंद हैं.

क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

समय का दर्शन-दो

कालसैद्धांतिकी

समय को लेकर उपर्युक्त दोनों मान्यताएं प्रेक्षक के सोच और उसकी मनोरचना पर निर्भर हैं. हमारी दृष्टि प्रायः अपने परिवेश की सामान्य गतिविधियों तक सीमित रहती है. समाज, संस्कृति अथवा रोजमर्रा के कार्यकलापों पर चर्चा के दौरान समय के प्रत्यय का जिक्र घटनाचक्र को सहेजने वाले उपकरण के रूप में किया जाता है. उस समय मान लिया जाता है कि रेलगाड़ी के डिब्बों की भांति वह भी प्रखंडों में प्रवाहमान है. सामान्य शब्दावलि इन प्रखंडों को भूत, वर्तमान और भविष्य के रूप में बांचती है, जबकि दर्शन इसे समय की कालसैद्धांतिकी(Tense Theory) कहता आया है. कालसैद्धांतिकी की संकल्पना मनुष्य की व्यावहारिक जरूरत है. यह प्रेक्षकसापेक्ष होती है. जैसे इतिहास के सामान्य अध्ययन के आधार पर हम कह सकते हैं कि 1857 का स्वाधीनता संग्राम तात्या टोपे के लिए उसका ‘वर्तमान’ था. हमारे लिए वह अतीत यानी ‘भूतकाल’ का हिस्सा है. जनसाधारण का समयबोध इसी आधार पर विकसित होता है. अधिकांश बुद्धिजीवी भी यही मानते हैं. लेकिन व्यवहार से परे कालसैद्धांतिकी की क्या प्रामाणिकता है? क्या भूत, वर्तमान और भविष्य की सत्ता वास्तविक है, यह असली प्रश्न है. दूसरे शब्दों में जिसे हम ‘वर्तमान’ कहकर संबोधित करते हैं, क्या वह सचमुच वर्तमान होता है? क्या हम घटनाओं को ठीक उसी क्षण ग्रहण कर पाते हैं, जब वे घटित होती हैं? प्रयोगों की बात करें तो ऐसा संभव नहीं है. घटनाओं के जन्म तथा उनके बोध में प्रयोगसिद्ध अंतर होता है. घटनाओं के प्रेक्षण की हमारी योग्यता ध्वनि, प्रकाश, स्पर्श आदि किसी न किसी माध्यम पर निर्भर होती है. किसी घटना का आकलन दो स्वतंत्र प्रेक्षकों में से एक यदि ध्वनि को आधार मानकर करे, दूसरा प्रकाश कोतो उन दोनों के निष्कर्षों में परस्पर इतना अंतर होगा कि उनपर विश्वास करना कठिन हो जाएगा. हालांकि अपनेअपने निष्कर्ष में दोनों ही सही होंगे. हम कह सकते हैं कि ध्वनि और समय के वेग के तुलनात्मक अध्ययन और गणना के समायोजन से घटना का वास्तविक कालबिंदू तय किया जा सकता है. परंतु क्या इतने भर से काम चल जाएगा? और उसके बाद जो निष्कर्ष प्राप्त होगा, क्या वह पूरी तरह सही होगा? शायद नहीं! इसलिए कि घटनाओं के सामान्य प्रेक्षण के दौरान तीसरे आयाम को प्रायः पूरी तरह भुला दिया जाता है. वह तीसरा आयाम प्रेक्षक का है. जो घटना को देखकर, छूकर अथवा सुनकर उसका अनुभव करता और तदनुसार निर्णय लेता है.

       जिसको हम वर्तमान कहते हैं, समय को लेकर क्या वह ठीक वैसा ही साक्ष्य है जैसा हमें प्रतीत होता है. जिसे हम साधारणतः मान भी लेते हैं? वर्तमान हमारी हालिया अनुभूति से गुजर रही घटनाएं हैं. वे प्रत्यक्ष भी हो सकती हैं और परोक्ष भी. का॓फी हाउस में चाय का आनंद ले रहे व्यक्ति के लिए वहां की अंदरूनी हलचलों के अलावा, वहां लगे टेलीविजन सेट पर राष्ट्रपति के अभिभाषण का सजीव प्रसारण वर्तमान है. मैं इस लेख को कंप्यूटर पर टाइप कर रहा हूं, यह मेरा वर्तमान है, और इसको लेकर संदेह की गुंजाइश नहीं है. समस्या वर्तमान के सटीक आकलन को लेकर है, जो वर्तमान के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर देती है. कदाचित आश्चर्यजनक मगर विज्ञानसम्मत तथ्य है कि वर्तमान जैसी कोई चीज नहीं होती. हम सदैव भूतकाल में वास करते हैं. मान लीजिए कि कोई व्यक्ति एक साथ अपने दाएं हाथ से अपनी कान एवं बाएं हाथ द्वारा पैर के अंगूठे का स्पर्श करता है. वह सामान्यतः यही दावा करेगा कि उसने दोनों कार्य एक साथ, एक ही क्षण में किए हैं. कान और पैर के अंगूठे दोनों को एक साथ छुआ है. उसकी गतिविधि पर नजर रख रहा पर्यवेक्षक इसकी पुष्टि आसानी से कर सकता है. संभव है उस व्यक्ति ने कान और पैर दोनों को सचमुच एक ही कालबिंदू पर छुआ हो. लेकिन छूने का बोध हमारे वास्तविक संवेदनतंत्र यानी मस्तिष्क की निर्णय प्रक्रिया पर निर्भर करता है. दोनों घटनाएं भले ही किसी एक क्षण में घटी होंलेकिन हमारा मस्तिष्क, यदि वह सूक्ष्मतम अंतराल को पकड़ लेने में सक्षम हो तो, उन्हें अलगअलग क्षणों में घटी घटना बताएगा. आखिर क्यों? इसलिए कि स्पर्श और उसकी अनुभूति दोनों भिन्न घटनाएं हैं. स्पर्श का संबंध हमारे हाथ अथवा शरीर के उस हिस्से से है, जो किसी वस्तु के संपर्क में आता है. जबकि अनुभूति उस स्पर्श की तरंगों के मस्तिष्क तक पहुंचने के बाद वहां हुई हलचल है. अतः उपर्युक्त घटना में प्रेक्षक को भले ही लगे कि दोनों हाथों द्वारा किया गया स्पर्श किसी क्षणविशेष में घटी घटनाएं हैं. इसके बावजूद मस्तिष्क जो निर्णय देगा वह वास्तविकता से परे होगा. इस कारण कि कान मस्तिष्क के निकट है. अतः उसके स्पर्श से बने संकेत को मस्तिष्क तक पहुंचने में पैर के स्पर्श से बने संकेत की अपेक्षा कम समय लगता है. इसलिए मस्तिष्क कान के स्पर्श को प्रारंभ में घटी घटना बताएगा. दोनों के बीच लगभग 80 मिली सैकिंड का अंतराल होगा. यह अंतराल प्रयोगों द्वारा प्रमाणित है. स्वतंत्र पर्यवेक्षक इन घटनाओं का अवलोकन प्रकाश के माध्यम से करेगा. उसकी अनुभूति घटनास्थल से उसकी भौतिक दूरी पर भी निर्भर करेगी.

       चूंकि प्रकाश एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में समय लेता है, इसलिए जिस समय घटना का संदेश प्रकाश के जरिये पर्यवेक्षक तक पहुंचेगा, घटना उससे कुछ क्षण पहले ही संपन्न हो चुकी होगी. घटनास्थल से अलगअलग दूरी पर खड़े दो पर्यवेक्षक यदि उसका अवलोकन करें तो दोनों द्वारा अभिव्यक्त घटना का ‘वर्तमान’ अलगअलग होगा. वह घटना के वास्तविक समय से पूरी तरह भिन्न होगा. चूंकि हम बहुत छोटे कालखंडों का हिसाबकिताब रखने में प्रवीण नहीं हैं, इसलिए प्रायः ऐसे अंतराल हमारे मस्तिष्क की पकड़ में नहीं आते. खासकर प्रकाश वेग जैसे उच्चतम वेग. परिणामस्वरूप हम उनकी अनजाने ही उपेक्षा करते जाते हैं. आम जीवन में इससे कुछ बिगड़ता भी नहीं है. पर यदि घटनास्थल और प्रेक्षक के बीच की बहुत लंबी दूरी हो, अरबोंखरबांे किलोमीटर का अंतराल हो तो वर्तमान की संद्धिग्धता एकदम साफ नजर आने लगती है. खगोल वैज्ञानिक बताते हैं जिन तारों को देखकर हम उनके अस्तित्व का आकलन करते हैं, संभव है वे आज जीवित ही न हों. सैकड़ोंहजारों वर्ष पहले ही नष्ट हो चुके हों. उस समय उनसे निकला प्रकाश हम तक पहुंचने में सैकड़ोंहजारों वर्ष बाद पहुंचा हो. इसलिए घटना के प्रेक्षण के लिए आइंस्टाइन ने समय को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार किया है, जिसके अनुसार वह घटनाओं के आकलन के लिए समय को ध्यान में रखने का सुझाव देता है. वही आइंस्टाइन मानते हैं कि वर्तमान जैसी कोई चीज नहीं होती. हम भूतकाल में जीते हैं. इसे यों भी कह सकते हैं कि जब तक वर्तमान का अनुभव करते हैं, वह भूतकाल में ढल चुका होता है. प्रेक्षण को अभिव्यक्ति की अवस्था तक आतेआते हमारे मस्तिष्क और उसकी निर्णय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. उस अवस्था में जिसे हम वर्तमान मानते हैं, वह भूत में बदल जाता है. जीवन और प्रकृति को लेकर यह अनिश्चितावादी द्रष्टिकोण ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी के दार्शनिक हेराक्लाइट्स के विचारों से मिलताजुलता है. वह पानी को परमतत्व मानता था. नदी के प्रवाह को देखकर जो अनुभूति उसके मनस में कौंधी, उसने माना कि संसार सबकुछ परिवर्तनशील है. कुछ भी निश्चित नहीं है. जल की भांति प्रवाहमान है. हम एक ही नदी में दूसरी वार पांव नहीं रख सकते. हेराक्लाटस तत्ववादी विचारक था, जिसने सृष्टि की विराटता से प्रभावित हुए बिना उसके सूक्ष्म रूप की चंचलता को पहचाना तथा उसके भीतर मौजूद अस्थिरता पर कटाक्ष किया था. आधुनिक विज्ञान की क्वांटम थ्योरी पदार्थ के इस अस्थिरतावादी गुण पर वैज्ञानिकता की मुहर लगाती है. उसके अनुसार परमाणु की कक्षा में दौड़ रहे इलेक्ट्रान का किसी एक क्षण में उसके सुनिश्चित ठिकाने का पता लगाना असंभव है, केवल उसके संभावित क्षेत्र का आकलन किया जा सकता है. यह संदेह समय के मापन से लेकर उसके अस्तित्व तक बना रहता है.

        प्रश्न उठता है कि जब वर्तमान की सत्ता नहीं है तो भविष्य और भूतकाल की सत्ता कैसे संभव है? उपर्युक्त विश्लेषण से एक सामान्य निष्कर्ष यह निकलता है कि हमारा समयबोध घटनाओं के प्रेक्षण से बनता है. जिन घटनाओं का अनुभव हम स्वयं नहीं कर पाते, उनके लिए दूसरों के अनुभव अथवा बोध का लाभ उठाते हैं. इतिहास जिसे हम विगत का दस्तावेज कहते हैं, वह दूसरों के समयबोध का संकलनमात्र है. पुस्तकें दूसरों के समयबोध से परचाने का बेहतरीन माध्यम हैं. अपने अनुभवअन्वीक्षण की सीमाओं के चलते हम किन्हीं घटनाओं के अंतराल को ही पकड़ पाते हैं. दो घटनाओं के बीच के अंतराल के मापन की प्रत्येक समाज की अपनी प्रविधियां और पैमाने होते हैं. घटनाओं की आवृति तथा उनके क्रम के निर्धारण हेतु अंतराल की परख अनिवार्य होती है. इस अंतराल का अंकन स्मृति एवं संदर्भों द्वारा घटनाओं को उनके सही क्रम में सहेजने के लिए किया जाता है. यह वस्तुतः दो स्वतंत्र घटनाओं के बीच की अवधि है. अपने चारों ओर घट रही दृश्यअदृश्य सहस्रों किस्म की घटनाओं के क्रम को पहचानने एवं उनके आकलन के लिए हम इसे भाषासंकेत भी कह सकते हैं. संक्षेप में दो घटनाओं के बीच का अंतराल ठीक ऐसी ही आभासी रचना है जैसे बाग में खड़े दो वृक्षों के बीच आकाश. जिसका महत्त्व केवल घटनाओं की स्वतंत्र पहचान तक सीमित है.

       अगर समय की सत्ता ही संद्धिग्ध है तो समयबोध क्या है? यह बोध जन्म कैसे लेता है? इसको समझने के लिए आप घटनाओं की शृंखला की कल्पना कीजिए. उनमें कुछ घटनाएं भूतकाल की होंगी, बहुत पीछे गुजर चुकी घटनाएं. कुछ हाल के भूतकाल की होंगी, जो अभीअभी गुजरी हैं. कुछ घटनाएं ऐसी होंगी जो वर्तमान में भी जारी हैं. परंतु उनका एक हिस्सा भूतकाल में प्रवेश कर चुका है. और दूसरा हिस्सा अभी भविष्य का गिरफ्त में है. ये सब घटनाएं हमारे ही अंतरिक्ष में घट रही हैं. उसी अंतरिक्ष में मौजूद हम उनके दृष्टा या भोक्ता हैं. जो घटना सुदूर अतीत में बीत चुकी है, वह हमारे मनस् पर सूचना अथवा स्मृतिप्रभाव के रूप में विद्यमान है. वे हमारे किसी पूर्वज अथवा पूर्वज के पूर्वजों के अनुभव का हिस्सा भी हो सकती है, जो संचरण के किसी मान्य तरीके से हम तक पहुंची हो. हमारा मस्तिष्क किसी भी प्रसंग, घटना, वस्तु या विचार के संपर्क में आने के साथ ही सक्रिय हो उठता है. स्वाभाविक रूप से वह उन्हें दूसरी घटनाओं, प्रसंगों आदि के साथ संयोजित करता है तथा उनके बीच संबंध सेतु बनाने की कोशिश करता है. आवश्यकता पड़ने पर वह उन्हें सुदूर अतीत, कुछ देर पहले अतीत और हाल के अतीत की घटनाओं के क्रम में लौटाता है. उससे हम जान जाते हैं कि कोई घटना किसी अन्य घटना से कितनी आगे अथवा पीछे घटी थी. यह बोध मन में समय नाम के काल्पनिक आकाश का निर्माण करता है, जिसमें विभिन्न घटनाएं विशिष्ट अनुक्रम से बंधी होती है. इस अनुक्रम को हम समयांतराल से बांटते हैं, वह विभिन्न घटनाओं, प्रसंगों के बीच वह रिक्त अंतराल है, जिसे मस्तिष्क उन घटनाओं, प्रसंगों को एक दूसरे से अलग, विशिष्ट और उनका क्रमानुक्रम दर्शाने के लिए बनाता है. भूतकाल के बारे में हम वहीं तक कल्पना कर पाते हैं, जहां तक हमारी स्मृति में घटनाओं का सिलसिला जाता है. दूसरे शब्दों में घटनाओं के अनुक्रम अथवा उनकी ऐतिहासिकता से परे हमारे लिए समय का कोई बोध नहीं होता. उदाहरण के लिए अंतरिक्ष विस्फोट, सृष्टि का विकास, मानव सभ्यता का जन्म आदि हमारे लिए केवल सूचनाओं का संकलन है. चूंकि हमारा मस्तिष्क उन घटनाओं से अब तक की अरबोंखरबों घटनाओं को याद रखने, उनकी विशेषताओं को सहेजने तथा उनके बीच तारतम्यता बनाने में अक्षम है, इसलिए इतनी बहुत लंबी अवधियों को लेकर हमारा समय(अथवा अंतराल)बोध शून्य होता है. इसके बरक्स किसी वस्तु या व्यक्ति का घंटे भर का अंतराल हमें भारी पड़ने लगता है. इसलिए कि प्रतीक्षा के दौरान हमारा मस्तिष्क आसपास के परिवेश एवं घटनाओं के प्रति तुलनात्मक रूप में अधिक सक्रिय होता है. इसलिए उसको लेकर हमारा समयबोध भी सघन होता है. इस तरह जिसको हम अतीत अथवा भूतकाल कहते हैं, वह हमारी स्मृति की व्यापकता और उसकी सीमाओं को दर्शाता है. तदनुसार समय स्वतंत्र सत्ता न होकर केवल हमारी मनोरचना है.

       समयबोध को समझने के लिए एक और उदाहरण देखते हैं. मान लीजिए एक व्यक्ति को नीचे तहखाने में एकसमान परिस्थितियों के बीच रखा गया है. बाहरी संसार से उसका संपर्क कटा हुआ है. कमरे में सदैव एक जैसी तीव्रता का प्रकाश बना रहता है. व्यक्ति की अपनी गतिविधियां भी शून्य हैं. आसपास का परिवेश भी आदर्श की अवस्था तक स्थिर है. इससे उसकी शारीरिक मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर जो नकारात्मक असर पड़ेगा, उसे हम भुलाए देते हैं. लेकिन एक जैसी परिस्थिति में रहने के बावजूद व्यक्ति का समयबोध सुरक्षित रहेगा. भले ही वह दिनरात का अनुमान लगा पाने में अक्षम हो. उस अवस्था में उसका समयबोध उसकी धड़कनों तथा उन शारीरिक क्रियाओं से निर्मित होगा, जिनसे उसका जीवन आबद्ध है. इस बारे में कम से एक बात तो विश्वास के साथ कही जा सकती है कि घटनाएं समय की प्रतीति का माध्यम हैं. उनके बिना समय की अनुभूति असंभव है. वैज्ञानिक समय को मापने के लिए घटनाओं के वेग को आधार बनाते हैं. अब जैसे गति के नियम को देखिए. उसके अनुसार किसी कालखंड विशेष में किसी वस्तु ने जो दूरी तय उसको उसके वेग से भाग कर दिया जाए तो समय आ जाता है. यह तो हुई वेगवान वस्तु के समय के आकलन के बारे में. परंतु यदि कोई वस्तु स्थिर है तो समय का आकलन उसके आसपास घट रही घटनाओं के वेग से निर्धारित होता है.

      हमने देखा कि सटीक वर्तमान एक संद्धिग्ध अवधारणा है, हम केवल भूतकाल में जीते हैं और भूतकाल वह प्रभाव है जिसे मानवस्मृति विभिन्न घटनाओं की प्रवृत्ति, आवृति तथा उनके अन्यान्य लक्षणों के आधार पर उन्हें मस्तिष्क में सहेजकर रखती है, ताकि उसमें दर्ज घटनाओं का क्रम और उनका अंतराल जाना जा सके. बीतने के बाद घटना स्मृति का हिस्सा बन जाती है. मगर जो घटना अभी तक घटी ही नहीं है, जो अभी अवतरित होनी है, यानी भविष्य उसके बारे केवल कल्पना ही की जा सकती है. सृष्टि में घटनाएं सामान्यतः चक्रीय क्रम में घटती हैं. जैसे सूरज का उदयअस्त होना, बीज का वृक्ष बनना और पुनः बीज बन जाना. ग्रहनक्षत्रों की यात्रावलियां. प्रत्येक घटना अपने आप को दोहराती है. पुनरावृत्ति के इस सिद्धांत की सहायता से हम भविष्य की घटनाओं का कल्पना सकते हैं, अनुभव के आधार पर उनके सच होने का दावा भी कर सकते हैं, लेकिन कोई घटना हमेशा पूर्वनिर्धारित क्रम में ही होगी, ऐसा दावा करना किसी भी घटना, किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव होगा. किसी घटना के सच होने की संभावना पर्याप्त हो सकती है. इसके बावजूद दावे के साथ यह कोई नहीं कह सकता कि भविष्य की घटना का वही रूप होगा, जैसा वह अब तक देखने में आया है. इस तरह भविष्य केवल हमारी कल्पना की चीज बनकर रह जाता है. हम भविष्य की कल्पना घटनाओं से सिलसिले से बाहर नहीं कर पाते. इसके प्रतिवाद में यह कहा जा सकता है कि सूर्य प्रतिदिन निकलता है, करोड़ों वर्ष से यही होता आ रहा है. इसलिए यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि निकट भविष्य में कुछ बदलने वाला नहीं है. कोई भी यह दावा कर सकता है कि सूरज अगले दिन भी पूर्व दिशा से ही निकलेगा. ठीक है यह दावा कुछ क्षण के लिए स्वीकारा जा सकता है, मगर ऐसा हमेशा, युगयुगांतर तक होता रहेगा, यह कहना मूर्खता ही होगी. किसान धान की लहलहाती हुई फसल को देखकर अनुमान लगाता है कि इतने महीने या दिन के बाद फसल पककर उसके खलिहान में होगी. उसका यह बोध उसके अनुभव के आधार पर बनता है. इसलिए भूतकाल यदि मस्तिष्क का अतीत में स्मृति वितान है तो भविष्य की परिकल्पना मनुष्य की कल्पनावीथि है. जिसके पीछे मनुष्य के अनुभवों का योगदान होता है.

       यदि समय का अस्तित्व ही संद्धिग्ध है तो समयबोध की अनुभूति का कारण? व्यवहार में हम देखते हैं कि रोज सूरज प्रातः एक ही क्रम में उपस्थित होकर दस्तक देता है. फूल एक अवधि के बाद खिल जाते हैं. रात होते ही तारे झिलमिलाने लगते हैं. यानी हम हम पल यह एहसास बना रहता है कि कुछ बीत रहा है. इस अनुभूति से हम कभी मुक्त नहीं हो पाते. यदि यह मान लंे कि कुछ है जो बीत रहा तो वह बीतने वाली चीज यदि समय नहीं तो क्या है? क्या वह महज हमारी मानस रचना है? यह एक जटिल सवाल है? यह प्रश्न तब जन्म लेता है जब हम स्वयं को प्रकृति से अलग मानकर स्वतंत्र प्रेक्षक की भांति उनका अवलोकन करते हैं. घटनाओं की शृंखला हमारी स्मृति पर जो अनुक्रम अंकित करती है, उसको हमारी बुद्धि अपने विवेक से अलगअलग संयोजित रखती है. अरस्तु का मानना था कि मनुष्य अपने परिवेश से निर्मित है. मनुष्य अपने वातावरण से जो सीखता है. जो वह देखताभोगता है वह स्मृति के माध्यम से उसके मस्तिष्क में सुरक्षित हो जाता है. मस्तिष्क इसी अनुभव सामग्री का संश्लेषण विश्लेषण कर मस्तिष्क निर्णय लेता है. कभीकभी कल्पनाएं भी अपना खेल खेलती हैं. तब मनुष्य अपने मस्तिष्क द्वारा घटनाओं की शृंखला अभिकल्पित करता है. घटनाओं का वेग, उनकी तारतम्यता, घटने के सिलसिले का अनुभव करते हुए हम जिस प्रभाव से गुजरते हैं, वह समय कहलाता है, जो पूरी तरह घटनाओं की स्मृति, उनके प्रभाव पर निर्भर करता है. यदि यह स्मृति न हो तो समयबोध बनने का आधार ही न रहे. लंबा जीवन जी चुके व्यक्ति को अपना बचपन कल की बात लगने लगती है, इसलिए कि जीवन के प्रवाह में वह उन अनेक घटनाओं को विस्मृत कर चुका होता है, जो उसके समयबोध का कारण थीं. अंतरिक्ष विस्फोट, पृथ्वी का जन्म, पुरापाषाण काल, प्रस्तर युग हमारे लिए केवल सूचनाएं हैं. इसलिए कि हमारी स्मृति इन घटनाओं के प्रभाव से अछूती है. सुप्तावस्था में हम समयबोध की जन्मदाता घटनाओं से कट जाते हैं. इसलिए शरद ऋतु की सुदीर्घ रात्रियां एक झटके में बीत जाने की अनुभूति देती हैं. लेकिन यदि हम किसी की व्यग्र प्रतीक्षा में तो समय का हर पल हमें छूकर जाता है. पलपल की घटनाओं पर हमारी नजर होती है. तब समय की अनुभूति हमारे लिए लंबी हो जाती है. यदि समय हमारी अनुभूति से बाहर की चीज है, यदि वह निरपेक्ष सत्ता है तो उसकी अनुभूति हमारे परिवेश से एकदम स्वतंत्र होनी चाहिए. घटनाओं को उनके स्वतंत्ररूप में पहचानने का सामथ्र्य पशुओं में भी होता है. परंतु उनकी स्मृति उतनी जोरदार नहीं होती कि वह घटनाओं को उनकी संपूर्ण विविधताओं के साथ अलगअलग, लंबे समय तक सहेजकर रख सके. इसलिए उनका समयबोध उनकी रोजमर्रा की चेतना से अधिक नहीं होता. टोगार्ट के अनुसार समय के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए घटनाओं से समय की प्रतीति होने के बजाय समय से घटनाओं की प्रतीति होना आवश्यक है. लेकिन समय से घटनाओं की प्रतीति का कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है. यदि हम यह माने कि घटनाएं समय की अनंतता में घटित होती हैं, तो हमें ब्रह्मांड के भीतर एक और ब्रह्मांड की असंभवसी परिकल्पना करनी होगी. समय और ब्रह्मांड दोनों के अस्तित्व को समान महत्त्व दिए जाने से कई बारे हमारे निष्कर्ष गड्डमड्ड हो जाते हैं. उस अवस्था में हमें एक अनंत के बीच दूसरे अनंत की कल्पना करती पड़ती है. लेकिन किस ‘अनंत’ में कौनसा ‘अनंत’ समाया हुआ है, कौन आगे है कौन पीछे, यह निर्णय हम कभी नहीं कर पाते. संक्षेप में समय की परिकल्पना उसकी प्रतीति की मूलाधार घटनाओं की परिकल्पना के बगैर असंभव है. इसलिए स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक समय का इतिहास लिखते समय दरअसल ब्रह्मांड का इतिहास ही बता रहे होते हैं.

क्रमश…..

© ओमप्रकाश कश्यप