धर्म : प्रासंगिकता से जुड़े कुछ सवाल

एक

कुछ लोगों के लिए धर्म के विकल्प के बारे में सोचना भी कुफ्र हो सकता है. कुछ कहेंगे—‘घोर कलयुग!’ धर्म न रहा तो धरा कैसे टिकेगी. ऐसा कहते समय वे विज्ञान के सारे सिद्धांतों को किनारे कर देंगे. दुनिया के सारे ‘आइंस्टाइन’ और ‘स्टीफन हॉकिंग’ उनके तर्कों के आगे पानी मांगते नजर आएंगे. उनके लिए यह असंभव स्थिति है. वे मानते हैं कि धरती धर्म पर टिकी है. सृष्टि का एकमात्र कर्ता, सर्जक, पालनहार परमात्मा है. वही प्राणिमात्र को जन्म देता तथा समय आने पर वापस बुला लेता है. जीवन परमात्मा की धरोहर है. मनुष्य चाहे भी तो धर्म के बाहर नहीं जा सकता. ऐसे अतिविश्वासियों के सामने आप लाख नास्तिक होने का दावा करें, वे नहीं मानेंगे. आपकी ‘नास्ति’ को ‘आस्ति’ में बदलने के लिए वे घिसेपिटे अनगिनत तर्क देंगे. आप माने या न माने पर वे मानकर रहेंगे कि उन्होंने आपका ‘अज्ञान’ दूर करने की भरसक कोशिश की है. ऐसा क्यों होता है? क्या धर्म सचमुच विकल्पहीन है? क्या ईश्वर के बगैर दुनिया का काम नहीं चल सकता? क्या धर्म मनुष्य की अज्ञानता की सीमा है? अगर सभी लोग एक साथ धर्म को मानने से इन्कार कर दे, तब ईश्वर क्या करेगा? क्या वह कुपित होकर सृष्टि को मेटने की ठान लेगा? या अपने लिए चापलूसों की नई दुनिया रचने में लग जाएगा?

आस्थावादी यहां कह सकता है कि आदमी की क्या बिसात जो ईश्वर या उसके विश्वास को मेट सके. ईश्वर की भक्ति तो भाग्यशालियों को प्राप्त होती है. ईश्वर जिन्हें चुनता है, वही लोग भक्ति में सिद्धि प्राप्त कर पाते हैं. भक्ति कितनी हो, भक्त को समर्पण हेतु कितना और कहां तक अवसर दिया जाए, यह अधिकार भी आराध्य का है. ऐसे ईश्वर के आगे आदमी का अस्तित्व अखिल ब्रह्मांड में राई जितना भी नहीं है. आप कहते रहें कि यह सामंती सोच है. राजा को, पुरोहित को सर्वेसर्वा माननेवाली दृष्टि ही ईश्वर को सर्वेसर्वा बनाती है, ताकि उसके बहाने सामंती शक्तियां अपनी मनोरथसिद्धि कर सकें. सत्ता से चिपके लोगों का स्वार्थ धर्म को बनाए रखने में है. इसके लिए वे हर संभव कोशिश करते हैं. अपने लक्ष्य में प्रायः कामयाब भी होते हैं. इन सब बातों पर चर्चा बाद में, पहले यह जान लें कि धर्म आखिर है क्या? उसकी शक्ति का स्रोत क्या है? उसकी शुरुआत कब हुई? और आज के जमाने में उसका औचित्य क्या है? क्या धर्म सचमुच विकल्पहीन है? यदि नहीं तो धर्म जो सहस्राब्दियों से जीवन और समाज को अनुशासित करता आया है, का विकल्प कौन हो सकता है? इसके लिए हमें धर्म की प्रचलित परिभाषाओं से हटकर बात करनी होगी. इसलिए कि उन परिभाषाओं में स्वयं इतना घालमेल है कि उनसे धर्म की निर्विवाद छवि बन ही नहीं पाती.

अपने अनुयायियों के लिए धर्म न्याय का ‘मारग’ है. ऐसा मार्ग जिसे वे स्वयं तय नहीं करते. स्वयं तय करने का उन्हें अधिकार है भी नहीं. तय करता है ईश्वर; अथवा वह पुजारी जो स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि बताकर भक्त और ईश्वर के बीच अपना स्थान सदैव सुरक्षित रखता है—ऐसा वे मानते हैं. ईश्वर यानी आध्यात्मिक शक्ति. जो लोग उसकी अधिसत्ता में विश्वास रखते हैं, उसके कथित आदेश को मानते हैं—वे ईश्वर के अनुयायी हैं. ईश्वर का प्रत्यय कब गढ़ा गया, कहना कठिन है. लेकिन उसपर ज्यादा जोर दोढाई हजार वर्ष पहले से दिया जाने लगा था. यह वह समय था जब बड़े राज्य बनने की शुरुआत हुई. अपने साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए राजाओं को ऐसे सैनिकों की जरूरत थी, जो उनके इशारे पर खून की नदियां बहा सकें. जो परलोक की चाहत में अपने और अपने बंधुवांधवों तक को दाव पर लगा सकें. इस तरह धर्म और राजनीति का संबंध विधिवत राजनीतिक दर्शनों के विकास से पहले का है. यह भी कह सकते हैं कि राजनीतिक दर्शन के उदय से पहले धर्म ही राजनीति की जिम्मेदारी संभालता था. हालांकि उससे भी लंबा समय ऐसा रहा है जब लोग स्वयं अपनी व्यवस्था चलाते थे. उसके लिए उन्हें न तो बाहरी शक्ति की आवश्यकता थी, न राज्य की और न ही धर्म की.1 धर्म ने जीवन में दस्तक दी तो कबीले का मुखिया बाकी जिम्मेदारियों के साथ पुरोहिताई भी संभालने लगा. यह स्थिति हजारों वर्ष तक विद्यमान रही.

धर्म को आधार बनाकर राज्यों के सांगठनीकरण की शुरुआत का इतिहास हमें 3300 वर्ष पहले तक ले जाता है. मिस्र के सम्राट अखनातून की गिनती धर्म चलाने वाले सबसे पहले राजाओं में की जाती है. मात्र 15 वर्ष की अवस्था में उसने पुराने देवताओं को हटाकर नए धर्म की शुरुआत की थी. वह बहुदेववाद का समय था. प्रत्येक सभ्यता में देवताओं की मानो कतार लगी होती थी. हर कबीले का अपना देवता था. अखनातून को यह अजीबसा लगा. आखिर ईश्वर इतना कम महत्त्वाकांक्षी कैसे हो सकता है कि छोटेछोटे कबीलों तक सिमटकर रह जाए. उसने सूर्य को एकमात्र देवता स्वीकार किया. और लोगों से कहा कि वे उसी को अपना देवता स्वीकार करें. कबीलावासियों से उनकी आस्था छीनने का काम इतना आसान न था. अखनातून का विरोध हुआ. उसने विरोधियों से निपटना शुरू किया. इससे राज में विद्रोह फैल गया. उसे कुचलने के लिए अखनातून ने पूरी ताकत झोंक दी. जीत विरोधियों हुई. अखनातून की खंजर घोंपकर हत्या कर दी गई. बहुदेववाद फिर जीत गया. सहस्राब्दियों पश्चात जब एकेश्वरवाद का जोर चला तो अखनातून को दुबारा प्रतिष्ठा मिली. उस समय उसको मसीहा मान लिया गया. जाहिर है धर्म ने हजारों वर्ष कबीलाई संस्कृति के हिस्से के रूप में गुजारे हैं, जब प्रत्येक कबीले का स्वतंत्र देवता था. आज की तरह सबका अलगअलग ईश्वर. अंतर बस इतना है कि अब कबीलों का आकार बढ़कर देश और समाज में ढल चुका है. ईश्वर को लेकर जिद वैसी ही है, जैसी अखनातून के समय में या उससे भी पहले रही होगी.

उस समय तक जीवन के कारण की एकदम आरंभिक खोज केवल प्राकृतिक उपादानों तक सीमित थी. फिर जब लगा कि जीव ही जीव को जन्म देता है तो जीवनोत्पत्ति में सहायक अंगों को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. लगभग 8000 वर्ष पुरानी मंदिरनुमा इमारत के अवशेष सीरिया बार्डर के उत्तर में, उफेरात नदी के किनारे, तुर्की में प्राप्त हुई है, जिसे ‘गोबेक्लि टेप’ नाम दिया है. तुर्की भाषा में इस शब्द युग्म का अभिप्रायः है—नाभिदार पहाड़ी. इमारत के भग्नावशेष में प्रस्तर स्तंभों पर उत्क्रीड़ित पशुआकृतियों के अलावा स्त्री और पुरुष की नग्न आदमकद मूर्तियां भी मिली हैं. उनमें पुरुष शिश्न को उत्तेजित अवस्था में दर्शाया गया है. सिंधु घाटी की सभ्यता से भी मातृदेवी की नग्न प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं. शिवलिंग की पूजा आज भी भारत सहित कई देशों में खूब लोकप्रिय है. कालांतर में यही प्रतीक धर्म के हिस्से के रूप में ढलते चले गए. इस अवधि में ऐसे हजारों दार्शनिकविचारकसंतमहात्मा हुए जिन्होंने धर्म को पुरोहितों का पाखंड बताते हुए उसका जोरदार विरोध किया. एक के बाद एक तर्क देते हुए उन्होंने ईश्वर तथा उसपर आधारित धर्म की सत्ता को चुनौती दी, उसे नकारा भी. लेकिन वे उसे पूरी तरह मेटने में असमर्थ ही रहे. क्योंकि तब तक धर्म अपने आप को पूरी तरह फैला चुका था. उत्पादन तंत्र पर उसका कब्जा था. राज्य उसे संरक्षण प्रदान करता था.

आस्थावादी खुद को बदलें या अपनी राह चलें—उनकी मर्जी. वे अपने विश्वास को बनाए रखना चाहते हैं तो रखें सहीसलामत. इतिहास बताता है कि मनुष्य की भांति ईश्वर भी नश्वर है. गत तीन हजार वर्षों में जब से ईश्वर ने मानवजीवन में हस्तक्षेप करना आरंभ किया तभी से, सामान्य जीवों की भांति ईश्वर भी मरतेखपते या रूप बदलते आए हैं. आदमी आमतौर पर साठसत्तर वर्ष जीता है. ईश्वर की उम्र छहसात सौ या हजार वर्ष तक खिंच पाती है. वेदों में जो देवता थे, पौराणिक काल तक उनमें से कुछ बिसरा दिए गए थे तो कुछ का रूप बदल चुका था. करीब डेढ़ सहस्राब्दी पहले के देवताओं में से अनेक इन दिनों गायब हैं. उनकी जगह नए देवताओं ने ले ली है. पुराने देवता या तो भुला दिए गए हैं; अथवा उन्हें अप्रासंगिक मान लिया गया है. अवतारवाद का मिथक लगातार मरतेखपते देवताओं के बीच की कड़ी, प्रकारांतर में उन्हें अमर घोषित करने की स्वार्थसाधना है. वैसे भी मानव सभ्यता के आगे ईश्वर की उम्र बहुत छोटी है. पृथ्वी पर मनुष्य का आगमन करीब दो लाख वर्ष पहले हुआ. जबकि ईश्वर और धर्म का विचार मात्र चारपांच हजार वर्ष पुराना है. वेदों तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में हालांकि देवताओं का नाम आता है. लेकिन वे देवता कहीं बाहर से नहीं आए थे. प्राचीन मनुष्य अपने प्राकृतिक जुड़ाव के चलते प्राकृतिक उपादानों को ही जीवन के कारण के रूप में देखता था. इसलिए जल, वायु, प्रकाश, धरती, आकाश, वनवनस्पति आदि के प्रति सम्मानभाव दर्शाने के लिए उसने अपने देवताओं का नामकरण उनके अनुसार किया था. निस्संदेह, उनके नेपथ्य में मनुष्य की स्मृति में पैठे उसके पूर्वजों की छवियां भी थीं. देवताओं की आपसी लड़ाई और उसमें जयपराजय के उल्लेख भी शास्त्रों में और प्रायः सभी संस्कृतियों में हैं. करीब दो हजार वर्ष पहले, जब से राजनीति और धर्म का गठजोड़ शुरू हुआ, उन छवियों का देवताकरण कर दिया गया था. परिणाम यह हुआ कि जो घटनाएं इस देश की, चलतेफिरते मनुष्यों के बीच घटी थीं, वे किसी दूसरे लोक की मान ली गईं.

पुरापाषाणकाल में आदि मानवों का ईश्वर कैसा रहा होगा, उसके बारे में अनुमान लगाने के लिए हमारे पास पर्याप्त पुरातात्विक साक्ष्य हैं. तत्कालीन सभ्यता के अवशेषों से ज्ञात होता है कि उनका ईश्वर कबीले के मुखिया जैसा था, अथवा वह पशु जिसपर पूरे कबीले का जीवन निर्भर था. इस कारण वह कबीले के सदस्यों को अपना सबकुछ प्रतीत होता था. सारे निर्णय ग्रामणी या कबीला प्रमुख पंचायत में बैठकर लेता था. जब तक पशुआधारित सभ्यता रही, तब तक उपयोगी पशुपक्षी भी दैवी शक्ति का प्रतीक माने जाते रहे. कालांतर में जब मनुष्य ने प्रकृति पर विजय प्राप्त की तो पशुपक्षियों की कमजोरियां सामने आने लगीं. मनुष्य और पशुओं की स्पर्धा में श्रेष्ठतम मानवमानवियों देवीदेवता का पद दिया जाने लगा. टोटम के रूप में समाज में पहले से ही पैठ बनाए पशुपक्षियों को नवसृजित देवताओं के साथ जोड़ दिया गया. नंदी के साथ शिव, चूहे के साथ गणेश, लक्ष्मी के साथ कमल, इंद्र के साथ वाजश्रवा, कार्तिकेय के साथ मोर आदि. यही स्थिति आज भी है. वैदिक देवता इंद्र प्राचीन आर्यों का नायक है. जिसे दक्ष योद्धा माना गया है. आगे चलकर विष्णु, ब्रह्मा, शिव और तदनंतर राम, कृष्ण आदि की कल्पना की गई तो परंपरा के अनुसरण में नए देवताओं को भी अस्त्रशस्त्र से सुसज्जित किया गया. यहां एक सवाल उठ सकता है—ईस्वी सन के बाद ईसाई धर्म और इस्लाम के जो पैगंबर आए, उनमें से एक के हाथ में भी हथियार नहीं है. भारत में भी सिख, आर्य समाज आदि कई ऐसे धर्म हैं, जिनके प्रवर्त्तक बिना किसी हथियार के अपनेअपने समाजों में पूज्य हैं. फिर हिंदू देवीदेवताओं को ही अस्त्रशस्त्र के साथ क्यों दिखाया जाता है. पहला कारण तो यही है कि हिंदू देवीदेवताओं ने अपनी मूल छवियां वैदिक साहित्य से ग्रहण की हैं, जो असल में आर्यों के विजयअभियान की स्मृतियां हैं. दूसरा कारण पराजयग्रंथि. छोटेछोटे जातिसमूहों में बंटा भारतीय समाज विदेशी आक्रामकों के आगे कमजोर सिद्ध हुआ है. ऐसे में रक्षा का मामला देवताओं भरोसे छोड़ना ही था. इसके लिए उन्हें हथियार थमाना भी जरूरी लगा होगा. हम भारतीय गर्व कर सकते हैं कि हमने अपनी प्रस्तरकालीन और कांस्ययुगीन संस्कृति यहां तक कि देवताओं को भी अभी तक जीवित रखा है. जबकि इसी युग में जन्मी अन्य संस्कृतियां यूनान, रोम, ईजिप्ट आदि या तो तबाह कर दी गईं; अथवा हमलावर का धर्म स्वीकारने के बाद वहां के लोगों की पुराने देवताओं की याद प्राचीन ग्रंथों और गाथाओं तक सिमट चुकी है. उस समय हम प्रायः भूल जाते हैं कि इस अतीतव्यामोह की कीमत हमें मौलिक ज्ञान की अपनी ही परंपरा से कटकर चुकानी पड़ी है.

वेदों में अनार्यों और आर्यों के बीच संघर्ष का उल्लेख मिलता है. पुराणों तक आतेआते आर्य और अनार्य क्रमशः देवता और दानव में बदल चुके थे. इस तरह के संघर्ष प्रायः सभी प्राचीन संस्कृतियों में हैं. संस्कृति को सुरअसुर, देवतादानव का युद्ध दिखाना केवल इतिहास का हिस्सा नहीं है, इसके पीछे संस्कृतियों का द्वंद्व भी सम्मिलित है. जिसमें आश्चर्यजनक समानता है—

हिंदुओं, यूनानियों और रोमनों के देव परिवार अधिकतर एक से थे. इंसान की तरह ही एक दूसरे से प्यारदुश्मनी करनेवाले, मरनेमारनेवाले. यही वजह है कि उनके देवता भी मनुष्यों की तरह ही आचरण करते हैं. लड़ाइयां हारते और जीतते, राज करते हैं. इस तरह के जनविश्वासों में विश्वास की गुंजाइश ज्यादा, अक्ल की कम थी. और देवताओं की कहानियों का एक संसार ही खड़ा हो गया, जिसे मामूली तौर पर हम पुराण कहते हैं’1

यही नहीं, प्राचीन मिस्र और पर्शिया की संस्कृति तथा भारतीय संस्कृति के बीच भी काफी समानता है. लेकिन जाति प्रथा एक ऐसी विशेषता है जो उसे बाकी संस्कृतियों से अलग करती थी.

इतिहास साक्षी है, धर्म का उदय भले ही आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण हुआ हो, परंतु धर्म का अनुसरण करने वालों का कोई स्वतंत्र आध्यात्मिक नजरिया नहीं होता. वे महज अनुसरणकर्ता होते हंै. बल्कि स्वतंत्र आध्यात्मिक बोध का अभाव ही उन्हें धर्म की शरण में ले जाता है. थे. परंपरा में भी जिन लोगों का स्वतंत्र आध्यात्मिक नजरिया था, वे मुनि या दार्शनिक के रूप में जाने जाते थे. राज्याश्रय में रहने वाले ऋषियों की अपेक्षा जंगलों में आश्रम बनाकर रहनेवाले इन श्रमण मुनियों का समाज में अधिक सम्मान था. यह धर्म पर अध्यात्म की, आस्था पर बौद्धिकता की जीत थी. राजा दशरथ दरबार में पधारे विश्वामित्र का प्रतिकार नहीं कर पाते. महाभारत में भी युधिष्ठिर सहित राज्याश्रय में रहने वाले पुरोहितों को दुर्वासा के आगे झुकते हुए दिखाया गया है. यह दिखाता है कि उस समय तक समाज में बौद्धकिता का मूल्य था. वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच शास्त्रार्थ आम बात थी. अपवादों को छोड़ दिया जाए तो धार्मिक अनुयायी अपनी आस्था और विश्वास के प्रति कट्टर हुआ करते थे. बावजूद इसके राज्य पर उनका प्रभाव था. राजसत्ता को भी ऐसे ही लोगों की जरूरत थी. इसलिए वे सिद्धांत से अधिक व्यवहार पर जोर देते थे. ऐसे लोग ही राज्य के प्रति भरोसमंद रह सकते थे. इससे समाज में सिद्धांत और व्यवहार के बीच दूरी बनने का सिलसिला आरंभ हुआ. श्रमविभाजन समाज की आवश्यकता थी. उसको समाज की विभिन्न जरूरतों के साथसाथ लोगों की रुचि एवं योग्यता के अनुसार लागू किया गया. सिद्धांत और व्यवहार में पनप रही दूरी का दुष्परिणाम यह हुआ कि सत्ता और सत्ताकेंद्र से जुड़े लोग बाकी जनसमुदाय के मन में यह धारणा पैदा करने में सफल रहे कि योग्यता और प्रतिभा जन्मजात होती हैं. पुरोहितों ने खास तौर पर समाज में शासक और शासित, विशेष और साधारण का भेद पैदा करना आरंभ किया. उससे यह धारणा भी बनने लगी कि विचार करना विशिष्ट लोगों का कर्म है. जनसाधारण का कर्तव्य धर्म का पालन, यदि वहां कोई राह दिखाई न दे तो महान लोगों का अनुसरण करना है—

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना, नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पंथा।। महाभारत, 3/313/117

जब तर्क से कोई न्याय संगत बात दिखाई न दे. श्रुतियां अलगअलग रास्ते बताती हों. ऋषिमुनियों के अलगअलग मत हों. धर्मतत्व अत्यंत गूढ़ हो, और उससे कोई मार्ग नजर न आए, ऐसे में जिस रास्ते सिद्ध पुरुष जाएं, वही उत्तम है.’ जाति आधारित व्यवस्था में इसका सामान्यीकरण बौद्धिक और शारीरिक कार्य के विभाजन के रूप में किया गया. लोगों के मानस मंे यह बात बिठा दी गई कि सोचनाविचार तथा व्यवस्था का नेतृत्व जैसे कार्य केवल ब्राह्मण कर सकते हैं. इस क्रम में शूद्रों का कार्य केवल शीर्षस्थ वर्गों की सेवा करना निर्धारित किया गया. इससे सामाजिक स्थायी विभाजन, विशेषकर इस धारणा को कि बौद्धिक श्रम, शारीरिक श्रम से श्रेष्ठ है—मजबूत आधार मिला. प्रकारांतर में उसने समाज में अनेक दरारें भी पैदा कीं. आगे चलकर समाज जैसेजैसे परिपक्व हुआ, राजनीति शक्ति की धुरी बनने लगी. राजा पहले अपने राज्य की सुरक्षा के लिए कर लेता था. प्रजाहित उसके प्रत्येक निर्णय की धुरी रहता था. केंद्र शक्तिशाली हुआ तो राज्य और उसके आसपास के लोग सत्ता को अपना विशेषाधिकार मानने लगे. कल्याण की परिभाषाएं जिन्हें लोकहित से तय होना था, वे राज्य की मर्जी से तय की जाने लगीं. विकास मुट्ठीभर अभिजात्यों तक सिमट गया. राजसत्ता का अभिप्राय सुखवैभव का जीवन जीना, प्रजा से कर उगाहनाभर रह गया. यह एक प्रकार से राजधर्म की अवहेलना ही थी. उस व्यवस्था का अपमान था जो धर्म के नैतिक पक्ष को आगे बढ़ाने का नारा देते हुए, सर्वकल्याण के लक्ष्य के साथ सत्ता में आई थी.

प्रजा का अब भी मानना था कि वह राजा को बना सकती है, वही उसे चुनती है. राजा भी प्रजा के विद्रोह से डरता था. ऐसे में प्रजा और राजा के बीच में कड़ी के रूप में उदय हुए पुरोहित वर्ग ने अपने जन्म के साथ ही राजा के दिल में यह बोध पैदा करना आरंभ कर दिया कि वह जनता से कर लेने को अधिकृत है. इसके लिए शास्त्रीय व्यवस्थाएं भी की गईं. मनुस्मृति में लिखा गया कि समस्त धनसंपदा तथा उसके अलावा पृथ्वी पर जितनी भी भोग्य वस्तुएं हैं, ब्राह्मण उन सभी का स्वामी है. राजा उस धनसंपदा का रक्षक है. इस तरह संपत्ति का अधिकार जनसाधारण के हाथों से खिसककर ब्राह्मणों के हाथों में चला गया. उस व्यवस्था के पीछे संभव है मनु का सोचना रहा हो कि ज्ञान के अर्जनउपार्जन में लीन ब्राह्मण अपरिग्रही, निर्लोभी और संतोषी सिद्ध होंगे. वे समाज की संपदा का उपयोग व्यापक लोककल्याण के निमित्त करेंगे. लेकिन जातिआधारित विभाजन ने सारे सोच का ही कबाड़ा कर दिया. उल्लेखनीय है कि श्रमविभाजन का विचार मनु का मौलिक विचार नहीं था. न ही यह केवल भारत तक सीमित था. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने भी लोगों को उनकी रुचि, योग्यता के अनुसार स्वर्ण, रजत और लौह वर्गों में बांटा था. लेकिन इसके साथसाथ उसने बालक की जन्मसंबंधी पहचान छिपाने की अनुशंसा भी की थी. उसने व्यवस्था की थी कि बालक का पालनपोषण राज्य के आश्रय में, मातापिता से दूर रखकर इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उनकी पैत्रिक पहचान छिपी रहे. जातीय आधारित विभाजन का विचार मनु का अपना था. उससे आगे चलकर सामाजिक विभाजन को मजबूत आधार दिया, ऐसा कि शूद्र वर्ग पीढ़ीदरपीढ़ी शीर्षस्थ वर्गों का दास बनता चला गया.

संपत्ति के उत्तराधिकार की भांति, ज्ञान के उत्तराधिकार को मान्यता देना उस समय के बुद्धिजीवी वर्ग की बहुत बड़ी भूल थी, जिसके पीछे उसके वर्गीय हित, सत्ता से चिपके रहने की लालसा और स्वार्थ छिपे थे. अजीब बात है कि एक ओर तो ब्राह्मण को समस्त मायावी प्रलोभनों से परे, ज्ञान साधना में रत दिखाया जाता था, वह घोषित अपरिग्रही था, दूसरी ओर उसे पृथ्वी की भोग्य वस्तुओं का स्वामित्व सौंपा गया था. यदि यह माना जाए कि ब्राह्मण को भोग्य वस्तुओं का स्वामी ब्रह्मा की ओर से बनाया गया था, तो ब्राह्मणों का यह दावा पूरी तरह अर्थहीन हो जाता है कि वे धरती के समस्त ज्ञान के एकमात्र प्रस्तोता, अन्वेषक और अधिकारी रहे हैं, यही उनका कार्य है. क्योंकि उन्हें तो ब्रह्मा की ओर से पृथ्वी की धनसंपदा जिसमें विलासिता की सभी वस्तुएं भी सम्मिलित हैं, की देखभाल की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है. संरक्षक संरक्षित सामग्री का उपभोग न करे, यह असंभव है. जातिवादी विभाजन का कलंक केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं था. देवता भी उससे लिसड़े हुए थे. जातिआधारित विभाजन का दुष्प्रभाव यह भी रहा कि देश में योग्य सैनिकों की कमी से हमेशा जूझता रहा है. ऊपर से आपस की फूट. खुद रकम खर्च करके पड़ोसी राजा को ठिकाने लगवाना. उससे भी बस न चले तो विदेशियों की मदद लेना, उस समय आम बात थी. जब अपनों पर भरोसा न हो, राज्यकर्मी षड्यंत्र में लगे रहते हों, तो सत्ता को बचाने के लिए किसी चमत्कार का ही सहारा था. सच तो यह है कि भारतीय समाज का प्रभुवर्ग समाजार्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के नाम पर खुद अभय लेकर शोषण के लिए बाकी प्रजा को आगे कर देता था. भारत पहुंचे हमलावर चाहे मंगोल रहे हों, चाहे तुर्क, डच या अंग्रेज, सभी का प्रथम उद्देश्य यहां कि अतुलनीय धनसंपदा को हड़पना था. जनविद्रोह की संभावना को टालने के लिए विदेशी शक्तियां इस देश के प्रभुवर्ग को आवश्यक सुविधाएं प्रदान कर, शताब्दियों तक राज करती रहीं. इससे जनता का मनोबल गिरना ही था.

धर्म के नाम पर ये सामाजिक विकृतियां शुरू से ही प्रभावी थीं. या यूं कहें कि सामाजिक विकृतियों से धर्म का नाता उसके जन्म से है. ऐसा इसलिए हुआ कि धर्म को उसके आरंभ से ही शक्तिकेंद्र और शक्ति प्रत्याशा के रूप में पहचाना जाने लगा था. उसका उदय चाहे जिन कारणों से हुआ हो, लेकिन उसके विकास, राजसत्ता द्वारा धर्म की महत्ता की स्वीकारने के पीछे मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासा जैसा कोई मानवोपयोगी ध्येय न होकर, राजसत्ता की मनमानियों को शास्त्रीय आधार देने की सोचीसमझी चाल थी. ऋषिमुनियों का कोप असल में इसी धर्मसत्ता का कोप था. जिसके बल पर वह अपने निरंकुश आचरण को वैध बता सकती थी. इसके उदाहरण पूरब और पश्चिम में अनगिनत हैं. प्राचीन यूनान में सोफिस्टों का धर्म, वैदिक धर्म की भांति दिखावे में विश्वास करता था. भारतीय पंडितों की भांति वे भी दिखावे की संस्कृति में विश्वास रखते थे. मानते थे कि शास्त्रार्थ में प्रतिद्विंद्वी को पराजित करना, अपनी वकृत्वकला से लोगों को बस में कर लेना ही बौद्धिकता का मूल उद्देश्य है. सोफिस्टों को चुनौती देने की पहल सुकरात की ओर से की गई थी. जबकि भारत में धर्म के नाम पर निरर्थक कर्मकांड और आडंबरों को चुनौती देने का कार्य कई दिशाओं से, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, मक्खलि घोषाल, अजित केशकंबली आदि के माध्यम से संपन्न हुआ था. उसमें सर्वाधिक सफलता गौतम बुद्ध को मिली. उन्होंने कर्मकांड, जाति प्रथा, बलि आदि पर रोक लगाते हुए मानव कल्याण को समर्पित समानता आधारित बौद्ध दर्शन की नींव रही. उसके प्रभाव में भारत में ब्राह्मण धर्म शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जिसे भारत का स्वर्ण काल माना है, वह असल में वही दौर था. जब धर्म का प्रभाव नैतिक मार्ग दर्शन के अलावा न्यूनतम था. राजनीति कल्याण नीति का पर्याय मानी जाती थी.

पश्चिम में धर्म को संगठित रूप मुख्यतः जीसस के बाद दिखाई पड़ता है. हालांकि जीसस के जीवनकाल में उस समय के सत्तानशीनों ने उनके विचारों का न केवल मजाक उड़ाया था, बल्कि उनकी अवहेलना और हत्या तक की गई थी. जीसस के विचारों में कोई विशेष दार्शनिक चिंतन नहीं था, मगर नैतिक मूल्य प्रबल थे. इसे हम अध्यात्म में नैतिकता का समायोजन कह सकते हैं. अपने उपदेशों में जीसस ने प्राणिमात्र के प्रति दया, करुणा, मैत्री और परोपकार पर जोर दिया था. दिखावे और कुलीनता की संस्कृति के बीच यही गुण उन्हें स्वीकार्य बनाते थे. जीसस ने धर्म और सामाजिकता के बीच की नैतिक दूरी को पाटने का काम किया था. भारतीय संतकवियों की भांति जीसस ने भी आर्थिक पक्ष को गौण माना था. नैतिकता को आर्थिक उपलब्धियों पर वरीयता देते हुए उन्होंने कहा था—‘हाथी सुई की नोक से गुजर सकता है. लेकिन धनपति स्वर्ग के दरवाजे से नहीं.’—वे धनपतियों को संदेश देना चाहते थे कि वे अपना धन कल्याणकारी कार्यों में लगाएं. दीनदुखी, अभावग्रस्त और जरूरतमंद लोगों की यथासंभव मदद करें. उनके उपदेशों का स्वर करुणामूलक था. जो समाज के उत्पीड़ित, दमित जन को इंसान के रूप में देखने की प्रेरणा देता था. इसलिए विपन्न, दास और अभावग्रस्त वर्ग के लोग, जिन्हें समाज में बहुत ज्यादा की कामना नहीं थी. जो विपन्नता और दासता को अपनी नियति मान चुके थे, जो अपने लिए केवल सहानुभूति की दरकार रखते थे, वे सब जीसस के आसपास जुटते गए. इस कारण उनके शिष्यों का दायरा लगातार बढ़ता गया.

जीसस की लोकप्रियता की बात तो समझ में आती है. लेकिन क्या कारण थे कि उनके जीवन काल में उनकी जान के दुश्मन, उन्हें तरहतरह से उत्पीड़ित करने और अंततः सूली पर चढ़ानेवाले तत्कालीन जमींदार और सामंतों ने आगे चलकर उन्हें पैगंबर के रूप में मान्यता दी? क्या यह उनका हृदय परिवर्तन था? क्या जीसस में सचमुच कोई दैवीय तत्व रहा होगा या कुछ ऐसे कारण भी थे जिनके कारण जीसस स्वर्ग के राज से अधिक इस लोक में सत्ता सुरक्षित करने में सहायक हो सकते थे? यदि दर्शन की दृष्टि से देखा जाए तो जीसस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, पाइथागोरेस, डेमोक्रिटिस, पेरामीनिडिस, जीनो आदि में से किसी के भी बराबर नहीं ठहरते. ये सब उनसे चारपांच शताब्दी पहले जन्मे थे. उन सभी को दरकिनार कर जीसस को पैगंबर माना गया गया. जबकि सत्य के लिए खुशीखुशी जहर पीने वाले सुकरात को केवल एक सनकी दार्शनिक होने से संतोष करना पड़ा. फिर क्या कारण है कि इतिहास के एक कालखंड में जो लोग जीसस के उपदेशों से चिढ़कर उन्हें सूली पर चढ़ा देते हैं, वही लोग डेढ़ शतादी पश्चात बाइबिल की आलोचना करने पर जियोदार्नो ब्रूनो को आग में जिंदा झोंक देते हैं. ध्यान से देखें तो जीसस को सूली पर चढ़ाने वाली तथा ब्रूनो को जिंदा जलाने वाली शक्तियां एक जैसी थीं. दोनों में कोई अंतर न था, सिवाय समय और परिस्थितियों के. ऐसा क्यों हुआ? इसे समझने के लिए केवल एक शताब्दी ईसा पूर्व के इतिहास की पर्तों में झांकना पड़ेगा. उस दास संघर्ष को याद करना होगा, जिसका सूत्रधार स्पार्टकस था. जिसके नेतृत्व में रोम की महाबली सेनाओं को मुंह की खानी पड़ी थी. यदि उस समय पर्शिया जैसे राज्यों की सेनाएं रोम की मदद को न आतीं तथा दासों को कुचलने के लिए यूरोप की पूरी अभिजात शक्तियां एकजुट न होतीं तो रोम नामक वह कथित महाबली साम्राज्य, एक दास योद्धा के हाथों पराजित हो चुका होता और दुनिया को दास प्रथा के खात्मे के लिए अब्राह्मम लिंकन की प्रतीक्षा न करनी पड़ती.

यह हमारे ज्ञात इतिहास का हिस्सा है कि रोम, पर्शिया, स्पार्टा सहित उस समय के सभी यूनानी राज्यों में दास प्रथा थी. कुलीन वर्ग दासों को आवश्यक मानते था. यहां तक कि सुकरात, प्लेटो, अरस्तु जैसे विचारकों ने भी दासप्रथा का समर्थन किया था. तब दासों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता था. उनकी जिंदगी उनके स्वामी की होती थी. मालिक यदि मारमार कर चमड़ी भी उधेड़ तो उस को किसी अदालत में मुकदमा करने का अधिकार न था. रोम का वैभव उतार पर था. अतीतमोह में जी रहे रोमनवासियों के लिए दासों का जानलेवा युद्ध मनोरंजक खेल में शुमार था. उसमें एक दास योद्धा को दूसरे योद्धा, जिसे ‘ग्लेडियेटर’ कहा जाता था, पर उस समय तक प्रहार करना होता था. जब तक दूसरा मर या पूरी तरह बेहोश न हो जाए. युद्ध में भाग लेने से इन्कार राज्यादेश की अवहेलना करना था. उसका एकमात्र दंड था, मृत्यु. उसके लिए उन्हें किसी राजाज्ञा की आवश्यकता न थी. स्वामी अधीन दासों को स्वयं दंडित कर सकता था.

महान दास योद्धा स्पार्टकस रोम के थ्रेशिया शहर में जनमा था. दास योद्धाओं को संगठित कर उसने न केवल उनके स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी, बल्कि अपने अद्भुत रणकौशल के बल पर वह रोम तथा उसकी सहायक सेनाओं को हार का मजा चखाने में भी कामयाब रहा था. आगे चलकर संगठित सेनाओं ने स्पार्टकस को हराकर फिर अपना वर्चस्व कायम कर लिया था. स्पार्टकस सहित उसके छह हजार दास योद्धाओं को एक साथ सूली पर चढ़ा दिया गया. उस घटना के बाद सत्ताधारी वर्ग के दिमाग में यह बात भलीभांति बैठ गई कि केवल ताकत के बल पर लोगों को दास बनाए रखना असंभव होगा. इसलिए अगले चरण के रूप में धार्मिक दासता की परिकल्पना की गई. अवसर ईसा मसीह के उपदेशों के प्रति जनसाधारण की आस्था के रूप में सहसा उनके हाथ आ लगा था. स्पार्टकस की सेनाओं की पराजय के साथ दासों की मुक्ति की उम्मीद टूट चुकी थी. वे पूरी तरह हताश हो चुके थे. उन्हें यह लगने लगा था कि इस जीवन में मुक्ति असंभव है. अतः स्पार्टकस के बलिदान के 70 वर्ष पश्चात जब जीसस ने उन्हें मोक्ष का सपना दिखाया तो वे उनके अनुयायी बनते गए. आगे चलकर जीसस को मसीहा के रूप में सम्मान मिला. स्वयं जीसस ने खुद को परमात्मा का पुत्र बताकर इस धारणा को पुष्ट बनाने में योगदान दिया. उन्होंने उन दासों को अपना मानकर गले लगाया, जो दुत्कार सहते आए थे. मामूलीसी बात पर जिनका स्वामी हंटर से खाल उधेड़ देता था. ऐसे ही पददलित इंसानों को जीसस गले लगा रहे थे. उनके लिए अमीरगरीब, दास और स्वामी सभी बराबर थे. उनका पूरा संघर्ष गरीब और सताए हुए लोगों के लिए था. इसलिए उनकी ओर दासवर्ग का आकृष्ट होना स्वाभाविक ही था. अस्मिता की लड़ाई हार चुके दास वर्ग का, हताशा से जन्मा समर्पण था, मगर था स्वाभाविक. फलस्वरूप जीसस का आभामंडल बढ़ता गया.

ईसा मसीह की शरण में दासों का आना उनकी अस्मिता की खोज से जुड़ा था. वहां आध्यात्म का मसला उतना बड़ा नहीं था. बाइबिल में वैसे दार्शनिक सवालजवाब भी नहीं हैं, जैसे भारतीय उपनिषदों में उठाए जाते रहे हैं. या ईसा से छहसात सौ वर्ष पहले से यूनानी दार्शनिक जिनपर विचार करते आए थे. उसमें सामान्य नैतिकता, आचरण की शुद्धता तथा गरीबपीड़ित जनों के प्रति करुणाभाव है. आरंभ में अभिजात वर्ग की निगाह में जीसस महज एक भेड़ चराने वाले गड़हरिया थे. वे उनसे ईष्र्या करते थे, उन्हें लगता था कि जीसस दासों को सिर चढ़ा रहे हैं. दासों का सहयोगी मानकर आरंभ में उनपर भी खूब अत्याचार किए गए. स्पार्टकस की पराजय के बाद उसके छह हजार सहयोगियों को एक साथ सूली पर चढ़ा देना उनके लिए शौर्य की बात थी. जीसस के विरोधियों ने सोचा था कि असहाय और विपन्न लोग जीसस की सूली को भी पचा जाएंगे. वे शायद नहीं जानते थे कि आजादी की पहली दस्तक, आजादी की घोषणा नहीं, उसका एहसास लेकर आता है. गुलाम जिस क्षण जान ले कि वह गुलाम है, तत्क्षण उसकी आजादी का अभियान शुरू हो जाता है. अपने अनुयायियों को जीसस ने बताया था कि वे भी इंसान हैं. और इंसान होने के नाते वे दूसरों के बराबर हैं. यह बड़ा सपना था. फलस्वरूप असहाय, अकुलीन और विपन्न वर्ग जीसस की ओर खिंचता चला गया. एक दिन वह इतना बढ़ गया कि उसके आगे सल्तनत का आकार घटने लगा. बुद्धिजीवियों, दार्शनिकों ने जब यह देखा कि एक अहिंसक, समर्पित भीड़ जीसस के चारों और जमा है जिसे न भूख की चिंता है, न ही प्यास की. जो अपनी सांसारिक इच्छाओं को मार चुकी है….पर यह सोचकर संतुष्ट है कि आने वाला जीवन उसकी मनोकांक्षाओं को पूरा करने वाला होगा. इस जन्म के कष्ट आनेवाले जीवन में उपहार बन जाएंगे. और जीसस के बोल उन्हें बीन की धुन जैसी सम्मोहन से बांध लेते हैं, तब उन्होंने धर्म को ही अपनी सत्ता का रक्षाकवच बनाने का निर्णय किया.

सत्ताशिखर पर विराजमान लोग धर्म की कमजोरियों और जनमानस पर उसके प्रभाव को समझते थे. जानते थे कि उसके नाम पर लोगों को आसानी से फुसलाया जा सकता है. उसके सपनों और आकांक्षाओं का इस तरह अनुकूलन किया जा सकता है कि उनका ध्यान वास्तविक जरूरतों से पूरी तरह से हट जाए. स्पार्टकस ने अपने गुलाम साथियों में हथियार उठाने का हौसला पैदा किया था. जीसस के अनुयायी निहत्थे थे. स्पार्टकस और उसके साथियों के लिए मुक्ति इसी जीवन का स्वप्न थी. ईसा के अनुयायी परमात्मा से मुक्ति की आस लगाए थे. अंततः हताशा में उमड़ी श्रद्धा मार्गदर्शक बनी. अंधसमर्पण को ही मुक्ति पथ मान लिया गया. धर्म के नाम से सम्मोहित, निहत्थे लोगों की वह भीड़ सत्तानशीनों के बहुत काम की थी. धर्म के नाम पर उस भीड़ से वे बेगार ले सकते थे. सिर्फ पेटभर रोटी देकर, गुलामी करा सकते हैं. युद्ध में दुश्मन के प्रारंभिक प्रहारों को झेलने के लिए भीड़, जिसमें मुख्यतः दास थे, को युद्ध के मोर्चे पर ठेला जा सकता था. रोजीरोटी के संघर्ष में करुणामय जीवन जीने वाले दासों के बहुत बड़े सपने भी नहीं थे. उनकी आंखों को बड़े सपने देखने का अभ्यास भी कहां था. सिवाय पारलौलिक सुख के बहाने, जिसके बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कह पाना असंभव था. इसके बावजूद धर्म का प्रलोभन इतना बड़ा था कि आदमी अपना सबकुछ लुटागंवाकर अपनी बंधुआसी जिंदगी को सिर्फ इस प्रत्याशा में बिता देता था कि इस जन्म में बोए गए कष्ट के बीज अगले जन्म में अक्षय सुखामोद की फसल के रूप में प्राप्त होंगे. कुल मिलाकर वह धर्म के बहाने आदमी के दिमाग को कैद करने का जानापहचाना षड्यंत्र था. अपने इसी गुण के कारण धर्म राजनीति का सबसे कारगर हथियार बना. धर्मसत्ता और राजसत्ता का गठजोड़ लगातार मजबूत होता गया. इस वर्ग ने हमेशा अपने स्वार्थ को आगे रखा. इसलिए जो राजनीति कभी जीसस से चिढ़ती थी, बदली परिस्थितियों में वह जीसस को ‘अपना’ मानकर उसके आलोचकों पर कहर ढा रही थी.

धर्म का गठन और उसकी संरचना पुरोहितों ने बड़ी चतुराईपूर्वक की थी. प्रकट में वह आमजन का हितैषी, उसका कल्याण करने वाला, समाज में मनुष्यता और स्नेह का संचार करने वाला माना जाता था. लेकिन दूसरी ओर धर्म ही था, जो सामाजिक ऊंचनीच का समर्थन कर उसको वैध ठहराता था. वह मुट्ठीभर लोगों को ‘विशेष’ बताकर बाकी को ‘सामान्य’ वर्ग में ढकेल देता था. हिंदू धर्म के सजेधजे, स्वर्णाभूषण मंडित, खिलेखिले, दिव्य चेहरों वाले देवीदेवता खासजन का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. जनसाधारण के भूख से पिचके, मेहनत से झुर्राये तथा निराशा से पथराए चेहरों को देखते हुए वे देवता के नाम पर मजाक लगते थे. वह भक्त और देवता के बीच स्पष्ट आर्थिकसामाजिक विभाजन को दर्शाते थे. इस तरह धर्म ने आर्थिक स्तरीकरण को वैधता प्रदान की. राजासामंतों को जो दूसरों के श्रम पर जीते थे, उन्हें देवता या देवप्रतिनिधि घोषित करने का काम पुरोहितोंपंडितों ने संभाला. नतीजा यह हुआ कि जनसाधारण ने समाजार्थिक विभाजन को अपनी नियति स्वीकार कर लिया. समाज का गरीब, उत्पीड़ित, असहाय, सुविधावंचित, मेहनतकश वर्ग आत्महीनता का शिकार होने लगा. हताशा इतनी बढ़ी कि उस वर्ग ने उत्पीड़न और विपन्नता को ही अपनी नियति मान लिया. इस जन्म में कोई उम्मीद न देख, समस्या के मूल कारणों की ओर से मुंह फेरकर वह काल्पनिक स्वर्ग की प्रत्याशा में जीने लगा.

जीवन में धर्म के प्रभाव को दो भागों में बांटा जा सकता है. एक वह जो संबंधित व्यक्ति के विश्वास और जीवन प्रक्रिया को तय करता है. दूसरा वह जो व्यक्ति और समाज के संबंधों का नियंत्रण कर उसके और समाज के बीच व्यवहार का हिस्सा बनता है. व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में धर्म आध्यात्मिक विश्वासों को व्यक्त करता है. बताता है कि व्यक्ति अथवा या समूह विशेष की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं कहां आकर ठहरी हुई हैं. धर्म की नींव जीवन के कारण की खोज के रूप में रखी जाती है. बावजूद इसके सामान्य व्यवहार में वह कुछ कर्मकांडों और प्रदर्शन तक सीमित होकर रह जाता है. वह जीवनयात्रा की सिद्धि उस रूप में देखने लगता है, जिसका उसके अपने या अपने समाज के वास्तविक कल्याण से कोई नाता नहीं होता. लेकिन यह करते हुए वह अपने दुख के कारणों से भी दूर निकल जाता है. स्वार्थी शक्तियां लगातार यह समझाने में लगी रहती हैं कि भौतिक सुख मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्यों की सिद्धि में बाधक तथा उसे परम लक्ष्य से भटकाने वाले हैं. दूसरी ओर यही धार्मिक शक्तियां पूंजीपतियों और धन्ना सेठों का महिमा मंडन करती हैं, जो लूट और काली कमाई का एक हिस्सा दान और जकात के बदले धर्म के नाम पर उन्हें लुटाते रहते हैं. निहित स्वार्थवश ऐसे लोगों को धर्मात्मा, महासेठ, महादानी जैसी उपाधियां लुटाई जाती हैं. यह न केवल उनकी लूट को, बल्कि बेहिसाब मुनाफे की प्रवृत्ति और उनके एकाधिकारवाद को स्वीकार्य एवं न्यायसंगत बनाता है, बल्कि दमित वर्ग को शोषक व्यवस्था के साथ अनुकूलन करने के लिए विवश करता है. विषमताओं में जीने का अभ्यास होते ही बदलाव की इच्छा घट जाती है. आदमी भविष्य की ओर से उदासीन होकर, केवल वर्तमान में जीने लगता है. प्रकारांतर में धर्म अकर्मण्यता और परजीविता को बढ़ावा देता है, जिससे एक वर्ग दूसरे की मेहनत पर जीवनयापन करने लगता है.

पराङमुखता किसी एक धर्म का लक्षण नहीं है. किसी न किसी रूप में यह सभी धर्मों की विशेषता है. यही समाजार्थिक विभाजन का असली कारण है. हिंदू धर्म की अतिरिक्त कमजोरी उसके समाज का जातिआधारित विभाजन है. हालांकि इसके लिए साधारणजन भी सर्वथा निर्दोष नहीं है. आम जन की कमजोरी है कि वह ज्ञान के उत्तराधिकार और संपत्ति के उत्तराधिकार में कोई फर्क नहीं कर पाता. जातिव्यवस्था से अनुकूलित व्यक्ति यह मान लेता है कि ब्राह्मण के बेटे में ब्राह्मण बनने का नैसर्गिक गुण है तथा राजमिस्त्री का बेटा केवल बेहतर राजमिस्त्री बन सकता है. इसलिए दोनों को एकदूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप से बचना चाहिए. ऐसे सोच से ही जातीय विभाजन को स्थायित्व प्राप्त होता है. हम जानते हैं कि ज्ञान का उत्तराधिकार संपत्ति के उत्तराधिकार जितना सरल और स्वाभाविक नहीं होता. ज्ञान के जातिअनुसार उत्तराधिकार की परंपरा में मूलभूत दोष यह है कि वह ज्ञान और भौतिक वस्तुओं के अंतरण में भेद नहीं कर पाती. मान लेती है कि केवल परिवार विशेष में जन्म ले लेने के कारण बाह्मण का बेटा अपने पिता की सभी खूबियों को प्राप्त करेगा और एक शूद्र की नियति केवल सेवाकर्म है. यह मनुष्य की नैसर्गिक विशेषताओं तथा उसकी मूलभूत स्वतंत्रता का निषेध करती है. व्यक्ति से चयन का अधिकार छीनकर यह उसे बौद्धिक अपंगता की ओर ले जाती है. परिणामस्वरूप व्यक्ति को अपनी रुचि के प्रतिकूल कार्यों में जुटना पड़ता है. ऐसे में वह अनमने भाव से सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करता है. जिसका नकारात्मक प्रभाव उसकी उत्पादकता पर पड़ता है. सांस्कृतिक आधार पर समाज के स्तरीकरण का लाभ उठाकर शीर्षस्थ पदों पर गैर प्रतिभाशाली लोग आरूढ़ होने लगते हैं. धर्मदर्शन के मामले में यही हुआ था. परिणामस्वरूप मौलिक ज्ञान के सृजन और प्रसारप्रचार में गिरावट आने लगी. नए ज्ञान के शोध और प्रसार की अपेक्षा अनुसरण को महत्त्व देने से समाज में बौद्धिक जड़ता का माहौल बना. सामाजिक मेधा मौलिक और लोकोपयोगी सृजन के बजाय राजा और सभासदों के कीर्तिगायन तथा दरबारी शोभा के बखान में खपने लगी. कालांतर में यह धारा इतनी क्षिप्र हुई कि शताब्दियां नए विचार के लिए तरसती रहीं. इसी से टीका संस्कृति का चलन बढ़ा. लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ था. इसके बीजतत्व वैदिक ज्ञान की उस परंपरा में निहित थे, जिसमें मौलिक सृजन से ज्यादा जोर कर्मकांडीकरण पर दिया जाता था. इस कारण इस देश में हजारों वर्ष पहले ही प्रदर्शनप्रिय संस्कृति जन्म ले चुकी थी.

लगभग 2200 से 3000 वर्ष पहले तक भारतीय मनीषियों की धाक विश्वपटल पर थी. बौद्ध और जैन धर्म के विस्तार ने भारतीय मेधा की श्रेष्ठता को दुनियाभर में स्थापित किया था. लेकिन बाद में उसमें ठहराव आने लगा. वस्तुतः वेदवेदांग की रचना से भारतीय मनीषी इतने आत्ममुग्ध हुए कि उपलब्ध ज्ञान की आलोचनाप्रत्यालोचना को विराम दे दिया गया. मान लिया कि जो ‘वेदों में नहीं, वह कहीं नहीं है.’ इस प्रवृत्ति ने ज्ञान के आदानप्रदान की संभावनाओं को निरंतर कमजोर किया. इसका नुकसान धर्मदर्शन को तो जो हुआ सो हुआ, उन ब्राह्मणपुरोहितों को भी खूब हुआ जो स्वयं को धर्मदर्शन का ठेकेदार मानते आए थे. चंद पृष्ठों की पोथी को बांचते हुए महापंडित होने का भ्रम पालना तथा अपने आगे किसी को कुछ न समझना, सिर्फ अपने संप्रदाय के ग्रंथों का पठनपाठन करना, और दूसरी विचारधारा से दूर रहना—इसी मानसिकता का परिणाम था. चूंकि धर्म का प्रभाव बहुत व्यापक होता है, इसलिए कह सकते हैं कि धीरेधीरे पूरा समाज बौद्धिक क्षरण की चपेट में चला गया. मौलिकता के अभाव में ज्ञान प्रदर्शन की चीज बनता गया. उसमें दोहरावतिहराव की घटनाएं बढ़ीं. ज्ञानार्जन और ज्ञानसंप्रेषण जैसे कार्य कुछ लोगों की बपौती होने तथा उस क्षेत्र में उनके लिए कोई चुनौती न होने के कारण मौलिक सृजन का स्तर निरंतर नीचे गिरता गया.

ऐसा नहीं है कि भारत में मौलिक ज्ञान और सामाजिक चेतना का सरासर अभाव रहा हो. समयसमय पर ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन भी पनपे. स्वयं ब्राह्मणों ने ज्ञान को कर्मकांड में ढलते देख आवाज उठाई. लेकिन धर्म सत्ता और राजसत्ता की वेगवती धारा के प्रवाह में समर्थन न मिलने से, वह सब सीपियों की तरह किनारे सिमटता गया. बौद्धिक जड़ता यहां तक बढ़ी कि सबकुछ शास्त्रों में सिमटता गया. जो शास्त्र सम्मत नहीं, वह धर्म सम्मत भी नहीं है, ऐसा माना जाने लगा. शास्त्रों को पढ़ने, उनकी व्याख्या करने का अधिकार समाज के जिस वर्ग को था, वह उनकी मनमानी व्याख्याएं करता था. कर्मकांड और दिखावे की संस्कृति के विरोध में बारहवीं शताब्दी के आरंभ में दक्षिण भारत से भक्ति आंदोलन का उद्भव हुआ, जिसने एकेश्वरवाद को नए सिरे से स्थापित करने का काम किया. भक्ति मार्ग के आरंभिक प्रवर्त्तक सामान्यतः वे संत थे, जिन्हें वर्णभेद के चलते वेदों के अध्ययन, अध्यापन अथवा उनपर टीकाटिप्पणी करने का अधिकार नहीं था. जिनके लिए मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना निषिद्ध था. समाज के शोषित, उत्पीड़ित जनों, जो जाति व्यवस्था में निचले स्तर पर थे, का उस आंदोलन को भरपूर समर्थन मिला. संत कवियों ने मूर्तिपूजा, कर्मकांड और जाति व्यवस्था को निशाना बनाया. जब तक वह आंदोलन अपनी शुरुआत में था, पुरोहितों की ओर से उसे दबाने के भरसक प्रयास किए गए. संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, कबीर, रैदास आदि को जो अद्वैतवादी विचारक संत थे, उस समय के दुष्ट ब्राह्मणों ने खूब परेशान किया था. लेकिन संत कवियों के नेतृत्व में जनसाधारण को, विशेषकर वर्णव्यवस्था में निचले स्तर पर मौजूद जातियों को एक विकल्प मिल चुका था. उनका संदेश पूर्णतः स्पष्ट था—

वे तुम्हें वेद पाठ से रोकते हैं. तुम स्वयं उनको महत्त्व मत दो. पोथी पढ़पढ़कर आज तक कोई पंडित नहीं बना. आचरण की शुद्धता ही वेद है. अपने पड़ोसी से प्यार करना ही सच्चा जीवनदर्शन. उन्होंने तुम्हारे लिए मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए हैं. तुम उस ओर झांकों मत. पत्थर पूजने से देवता कभी नहीं मिलते. उल्टे हृदय पत्थर का बन जाता है. तुम्हारा परमात्मा तुम्हारे भीतर, अंतःकरण की शुद्धता में है—उसे पहचानो.’

भक्ति आंदोलन का विकास एक तरह से धर्म में नैतिकता, जिसने उसे जीवन में प्रासंगिक बनाया था और जो कर्मकांड और निरर्थक वितंडा के दौर में कहीं खो चुकी थी—का पुनः प्रवेश था. इसलिए जनसाधारण ने उसे हाथोंहाथ लिया. व्यापक जनसमर्थन पाकर भक्ति आंदोलन का प्रभावक्षेत्र निरंतर बढ़ता ही गया. वह पुरोहित वर्ग के लिए बड़ी चुनौती थी.

कालांतर में भक्ति मार्ग को जब समाज के शीर्षस्थ वर्गों का समर्थन मिलने लगा तो चालबाज पुरोहित वर्ग ने उसे भी अपने स्वार्थ के अनुसार ढालना आरंभ कर दिया. फलस्वरूप निराकार आराध्य को साकार में बदलने की कोशिशें तेज हो गईं. अपने दुर्व्यसनों तथा चालाकियों के कारण समाज में खासे बदनाम हो चुके वैदिक देवता, नए रूपाकार में प्रकट होने लगे. अवतारवाद को बढ़ावा मिला. इस दौर में द्वैतअद्वैत, साकारनिराकार पर जमकर बहसें चलीं. अशिक्षित और गरीबी से ग्रस्त समाज में वरीयता साकार को मिली. कबीर, रैदास, संत तुकाराम आदि संत कवियों तक भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग की धारा में कोई विरोध नहीं था. उन्होंने धर्म के साथसाथ दर्शन की बातें भी आसान शब्दावली में कही थीं, ताकि जनसाधारण भी उन्हें आसानी से समझ सके. आगे चलकर साकार भक्ति के रूप में अवतारवाद को बढ़ावा मिला तो ज्ञान का मखौल उड़ाया जाने लगा. बौद्धिक दीनता को भक्ति की विशेषता मान लिया गया. सूरदास ने गोपियों के माध्यम से भक्ति की ज्ञानमार्गी शाखा का खूब कटाक्ष किए गए. जिस समाज के कविकलाकारमार्गदर्शक ज्ञान का उपहास उसे निस्तेज होना ही था. भारत में यह काम भक्ति के नाम, धर्म और ईश्वर के नाम पर, पूरी ठसक के साथ किया गया, जिसे लंबे समय तक पंडितों का समर्थन मिलता रहा. नतीजा यह हुआ कि निराकार भक्ति आंदोलन के माध्यम से जिस सामाजिक क्रांति का आगाज कबीर, रैदास आदि संत कवियों ने किया था, वह धीरेधीरे व्यक्ति पूजा में ढलने लगी. उससे सामंतवाद को बढ़ावा मिला.

निराकार भक्ति का प्रचारप्रसार निरा भक्ति आंदोलन नहीं था. वह प्राचीन मुनियों की ज्ञानाधारित परंपरा को वापस लाने की बौद्धिक छटपटाहट का नतीजा था. चूंकि भारत के संत कवि समाज के निमस्थ वर्ग से आए थे और उनकी अभिव्यक्ति की भाषा संस्कृत न होकर, जनसाधारण की सधुक्कड़ी भाषा थी, इसलिए तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने उसकी पूरी तरह उपेक्षा की. लेकिन साधारण बोलीबानी में कही गई वे बातें जनसाधारण के दिल में उतरती गईं. भक्तिकालीन कवियों को साकार और निराकार भक्ति के आधार पर वर्गीकृत करने का चलन रहा है. यह अमूर्त्त विभाजन है. इसकी जगह उचित होगा कि तत्कालीन कविता का अध्ययन संतकाव्य और भक्तिकाव्य के रूप में किया जाए. तब ज्ञानेश्वर, रैदास, कबीर आदि संत कवियों की श्रेणी में आएंगे. जबकि सूर, तुलसी, मीरा आदि की गिनती भक्त कवियों की जाएगी. समाज के कथित निचले वर्गों से आए संत कवि भक्ति और ज्ञान दोनों को साधे हुए थे. उनके चिंतन का दायरा व्यापक था. साधारण बोलीबानी में उन्होंने भारत की अध्यात्म परंपरा को उस वर्ग की पहुंच में लाने की कोशिश की थी, जिसे जातिआधारित विभाजन में उससे वंचित रखा गया था. जिस वर्ग से वे आए थे, वहां की बोलीबानी में वे भलीभांति पारंगत थे, इसलिए वे साधारण भाषा में लोककल्याण से जुड़ी असाधारण बातें बहुत आसानी से समझा सके थे. उनकी कविता में ऊंचाई और तत्वबोध दोनों ही थे. जिसकी तुलना हम प्राचीन यायावर मुनियों की कविता से कर सकते हैं.

भक्त कवि समाज के ऊंचे वर्गों से आए थे. अपने वर्गीय संस्कारों के साथ उन्होंने कविता को उसी रूप में ढाला. फलस्वरूप अवतारवाद और व्यक्ति पूजा को बल मिला. भक्त कवियों के लिए समाजार्थिक विभाजन महज विधि का विधान था. उसे केवल ‘ईश्वरीय अनुकंपा’ द्वारा ही मिटाया जा सकता था. संत कवियों ने मूर्तिपूजा और कर्मकांड का विरोध करते हुए चारित्रिक शुद्धता पर जोर दिया तथा असंतोष और लालच से दूर रहते हुए मिलजुलकर रहने का आवाह्न किया. एक समानता आधारित समाज के सपने को रैदास ‘बेगमपुरा’(बिना गम का शहर) के रूपक की तरह पेश करते हैं—

मैं बेगमपुर का वासी हूं. दुख, अंदेशे और शकसुबाह के लिए कोई स्थान नहीं है. वहां न तो मालगुजारी है, न लगान देने की चिंता. न कोई डर है, न ही किसी प्रकार की भूल या गलती का खौफ. मैंने ऐसा शहर पाया है, जहां सदैव खुशहाली छायी रहती है. वहां किसी को पतन का डर नहीं है. सभी बराबर हैं. बेगमपुरा की शासनव्यवस्था दृढ़ है और स्थायी है. वहां न कोई छोटा है, न बड़ा. सभी बराबर हैं. कोई दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक भी नहीं है. सभी के लिए रोजगार है. मेरा नगर सज्जन और धनीमानी लोगों से भरपूर है. सभी बंधनमुक्त और आजाद हैं. जिसका जहां मन करे, जा सकता है. इस शहर में रहनेवाला प्रत्येक नागरिक मेरा मीतसखा है.’2

यह एक लोकतांत्रिक कामना है. जिसपर किसी भी आदर्श समाज की नींव रखी जाती है. ‘बेगमपुरा’ केवल रैदास का स्वप्न हो, ऐसा नहीं है. कबीर का सपना भी कुछ ऐसे ही शहर का था. कबीर की कविता में व्यंजना की भरमार है, रैदास की कविता में गहराई. शायद इसलिए कबीर ने रैदास को अपने से बड़ा माना है. रैदास के बेगमपुरा से वे भी सहमत हैं—‘अवधू यह बेगम देश हमारा.’ वहां का सत्त ही धर्म है. यहां ‘सत्त’ संपूर्ण न्याय का प्रतीक है. कबीर ने ‘बेगमपुर’ को अमर पुर भी कहा है. उल्लेखनीय है कि अमरपुर या अमरावती देवताओं की नगरी भी है. मगर वहां केवल देवता यानी अभिजन ही आजा सकते हैं. कबीर की अमरपुरी में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है. शर्त यह है कि व्यक्ति अहंकार को त्याग चुका हो. फिर चाहे वह बादशाह हो या फकीर. कबीर के अमरपुर में बसेरा कर सकता है—‘राजारंकफकीरबादसा सबसे कहौ पुकारा/जो तुम चाहो परम पद को, बसिहो देस हमारा.’ कबीर और रैदास दोनों ही बनारस के थे. संस्कृति की नगरी बनारस. धर्म के आधार पर विकसित संस्कृति आदमीआदमी में फर्क करती है. वह ‘जपमायाछापातिलक’ को सब कुछ मान लेती है. वर्णाश्रम व्यवस्था के सताए संत कवि बारबार नकली संस्कृति का लबादा उतार फैंकने को कहते हैं. भक्त कवि तुलसी के साथ ऐसा नहीं था. वर्णाश्रम व्यवस्था के शीर्ष से आए तुलसी के लिए वह आदर्श व्यवस्था है. इसलिए वे धर्म और वर्णाश्रम का गुणगान करते हैं. तुलसी के लिए ‘रामराज्य’ इसलिए आदर्श है, क्योंकि वहां सभी वर्णाश्रम के अनुसार अनुशासित हैं—‘बरनाश्रम निजनिज धरम निरत वेद पथ लोग.’

लोकतंत्र और समाजवाद जैसी विचारधाराएं आधुनिक पश्चिमी समाज की देन मानी जाती हैं. एक तरह से वे हैं भी. समाजवाद में जिस आदर्श समाज की कल्पना की जाती है, वैसा आदर्श समाज का सपना सबसे पहले हेनरी मूर(1478—1535) ने अपने व्यंग्य उपन्यास ‘यूटोपिया’ में देखा था. उसी से पश्चिम में समाजवाद और लोकतंत्र जैसी आधुनिक विचारधाराओं को प्रेरणा मिली. रैदास का ‘बेगमपुरा’ यानी ‘बिना गम का शहर’ हेनरी मूर से भी लगभग एक शताब्दी पहले की ऐसी ही मनोहर कल्पना यानी ‘यूटोपिया’ था. ऐसे समाज का स्वप्न जहां सभी लोग सभी स्तर पर बराबर हों. मूर का ‘यूटोपिया’ एक कटाक्ष है. वहां समानता की अवधारणा पर व्यंग्य किया गया है. कालांतर में उस व्यंजना को ही आदर्श मान लिया गया. जबकि रैदास का ‘बेगमपुरा’ व्यवस्था से सताए लोगों का मानवीय सपना था. अच्छा होता कि रैदास के बेगमपुर की कल्पना को बाकी लेखकोंकवियों का साथ भी मिला होता. तब संभव है कि समाजवाद और लोकतंत्र जैसे आधुनिक विचार भारत की जमीन पर ही शताब्दियों पहले ही जन्म ले चुके होते. लेकिन जहां विचार करना, किसी खास वर्ग की बपौती माना जाता हो, वहां नए विचार को जमीन मिलना आसान नहीं होता. पीढ़ियों से सत्ता केंद्रों पर जड़ जमाए लोग उसे आसानी से टिकने ही नहीं देते. रैदास और कबीर के साथ भी ऐसा ही हुआ था. शताब्दियों बाद विवेकानंद, दयानंद सरस्वती आदि ने धार्मिक सुधार की भरपूर कोशिश की, लेकिन प्रतिक्रियावादी शक्तियां हर बार किएकराए पर पानी फेरने का काम करती रहीं हैं.

क्रमशः..

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. सांस्कृतिक निबंध, भगवतशरण उपाध्याय, 158.

2. बेगमपुरा सहर का नाऊँ, दुखु अन्दोह नहिं तिहि ठाऊँ.

ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफ न खता न तरसु जवालु.

अब मोहि खूब वतन गह पाई,

ऊहां खैरि सदा मेरे भाई

कायम दायम सदा पातिसाही, दोम न सेम एक सो आही.

आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहिं मामूर

तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै हरम महल न को अटकावै.

कहि रैदास खलास चमारा, जो हम सहरी सुमीतु हमारा.

समय : पारंपरिक दृष्टिकोण

समय का दर्शन : एक

समय सबसे बड़ा छलिया होता है. मेहरबान हो तो दुनियाभर की सल्तनत बख्श दे. रूठ जाए तो चौहद्दी के राजपाट समेत डुबा दे. इस जैसा न तो कोई दयालु, न बेहरम. न इससे असरदार कोई मरहम. न इससे धारदार कोई हथियार….

समयसा कोई महाज्ञानी नहीं!

समय से बड़ा बहरूपिया भी नहीं!

समय से कभी मत लड़ना!

समय को चुनौती मत देना!

समय पर कभी भरोसा न करना!

हर आदमी यही कहता है. चाहता है कि समय से बचकर रहे. उसे कभी अनदेखा न करे. बूढ़ी होती पीढ़ी कामना करती है कि उसका समय ज्यों का त्यों बना रहे….आने वाली पीढि़यों पर समय की सदा मेहरबानी रहे. समय पर सब काम पूरे हों. समय का सब लाभ उठाएं.

आने वाला समझता है कि जाने वाली पीढ़ी अपने हिस्से का समय इस्तेमाल कर चुकी. अब उसकी बारी है. जाने वाला सोचता है कि उसकी यादें और समय ज्यों का त्यों उसके बाद भी बना रहे.

समय को लेकर अनगिनत मुहावरे, अनगिनत किवदंतियां हैं. समय बदलता है…. समय खराब होता है, समय भला निकलता है. समय मेहरबानी दिखाता है. समय आंखें तरेरता है. समय करीब होता है. समय उड़नछू हो जाता है. समय का हर खेल निराला है. समय बादशाहों का बादशाह, सूरमाओं का सूरमा है. वह अपनी चाल चलता है. बहुत तेज भागता है. कभी वापस लौटकर नहीं आता. फिर भी दिन बहुरेंगे, यह सोचकर मन को तसल्ली दी जाती है. समय अबूझ पहेली बना रहता है.

बड़ेबड़े मनीषी कह गए हैं—समय को समझना आसान नहीं! भर्तृहरि जैसे ज्ञानी न समझ सके, हमारी तो बिसात क्या?

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः।

तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।।

कालो न यातं वयमेव याताः।

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।।

यानी सब कुछ नश्वर है. हम समय को नहीं जीते, समय हमें जीता है. कविता में नैराश्य झलकता है. लेकिन यह कोई नई बात नहीं है. संसार को मोहमाया से ग्रस्त और नश्वर दिखाने की प्रवृत्ति धार्मिक ग्रंथों का प्रमुख स्वर रही है. डर धर्म की धंधागिरी का प्रमुख आधार है. भविष्य के प्रति अनिश्चितता इसके लिए जिम्मेदार है. हालांकि हमेशा ऐसा नहीं होता. अनिश्चितता का गुण समय को मानवोपयोगी भी बनाता है. विशेषकर दुख और निराशा भरे दिनों में, यह विश्वास कि आनेवाला समय अपने साथ कुछ अच्छा ला सकता है, मनुष्य को भविष्य के प्रति आशावान बनाए रखता है.

समय के अनिश्चित स्वभाव के कारण ही मनुष्य उससे डरता, समय के साथ बढ़ता है. समय क्या है, कोई नहीं जानता. समय है यह सब मानते हैं. आदमी भगवान पर भरोसा भले कर ले, समय पर कभी विश्वास नहीं लाता. डरता है, वह जाने कब, किस ओर पलटनिया खा जाए. आदमी समय को अपना मानता है, मगर समय के लिए कोई खास नहीं होता. इस कारण आदमी तो क्या देवता तक समय के आगे झुकते आए हैं. समय सबका है, पर समय पर अधिकार किसी का नहीं….इसीलिए ज्ञानी लोग कहते आए हैं—समय को मनाओ, उससे टकराओ मत. वैज्ञानिक और वुद्धिजीवी कुछ भी दावा करें. समय को तीसराचौथा आयाम चाहे जो मानें, आम आदमी का उससे संबंध भावनात्मक ही होता है. उसमें उसका डर भी समाया होता है. उम्मीदें होती हैं, मगर डरीसहमी. इस तरह समय के कई रूप हो सकते हैं. वैज्ञानिकों के लिए समय एक विज्ञान है, ज्योतिषी के लिए भूतभविष्य और वर्तमान का लेखा, पुजारी के लिए धर्म और जनसाधारण के लिए वह कुछ भाग्यरेख जैसा है. दूसरे शब्दों में समय ऐसी झील है, जिसमें स्वच्छ, स्फटिकजैसी विपुल नील जलराशि भरी होती है. उसमें झांको तो अपनी ही छवि दिखाई पड़ती है.

समय को लेकर कुछ ऐसी ही अवधारणा, ऐसे ही विचार जनमानस में व्याप्त हैं. कुछ लोग समय को इतिहास मानकर संतुष्ट हो जाते हैं, कुछ के लिए वह निस्सीम विस्तार है. ग्रह, नक्षत्र, चांदसितारे, धरतीअंबर और न जाने कितने ब्रह्मांड उसमें समाए हुए हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो समय को बहती धारा मानते हैं. भूतवर्तमान और भविष्य की चिरतरंगिणी. अदृश्य प्रवाह जो ब्रह्मांड की समस्त हलचलों, ग्रहनक्षत्र, नीहारिकाओं, नदियों, महासागरों के साथसाथ गतिमान है. समय की प्रतीतियां अनंत हैं. किसी के लिए वह ब्रह्मांड के भीतर है. किसी के लिए बाहर. कोई समय को जलधार की भांति सतत प्रवाहमान मानता है, कोई ब्रह्मांड की भांति विस्तीर्ण. समय को परमात्मा स्वरूप भी माना गया है. ईश्वर का एक नाम ‘काल’ भी है. ‘काल’ यानी मौत का देवता. जब वह आता है तो माना जाता है कि प्राणी का समय पूरा हो गया. ‘काल’ के संबंध में समय का व्यक्ति सापेक्ष अर्थ है—मनुष्य का अपना समय. धार्मिक आधार पर यह माना जाता है कि प्रत्येक मनुष्य एक सुनिश्चित समय लेकर इस संसार में आता है. जैसे ही वह समय पूरा होता है, काल उसे लेने के लिए पुनः धरती पर अवतरित हो जाता है. समय को लेकर ये मान्यताएं बहुत पुरानी हैं और लगभग सभी समाजों में मिलतीजुलती हैं. विज्ञान भी उन्हें बदल नहीं पाया है. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो समय के रूप में हम केवल घटनाओं की स्थिति बयान कर रहे होते हैं. उनके घटने की दर, उनका स्वरूप, या उनके बारे में कोई नया आकलन. इसके बावजूद समय का प्रभाव इतना गहरा होता है कि घटनाओं के होने को ही उसकी प्रतीति मानने का साहस नहीं कर पाते. अथवा समय को जानने की कोशिश में हम दरअसल कुछ और जान रहे होते हैं. जैसेजैसे हम समय के बारे में आगे विचार करेंगे, ये रहस्य स्वतः अनावृत होते जाएंगे.

समय की अवधारणा कब जन्मी, यह ठीकठीक बता पाना संभव नहीं. सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि आदमी ने जब सूरज को समय पर उगते और डूबते देखा. तारामंडल की उदयअस्त होती कलाबाजियां देखीं. बालक को जन्मते, बड़ा होते, फिर बूढ़ा होकर मौत के गाल में समाते हुए पाया—तब उसने माना कि कुछ है जो कभी उसके साथ चलता है, तो कभी उसको पीछे ढकेल आगे निकल जाता है. जो अंतरिक्ष की तरह सर्वव्यापी, नदी की तरह पलपल प्रवाहमान है. जिसका कोई ओर है न छोर. जो घटनाओं को क्रम देता है. उन्हें एकदूसरे से संबद्ध करता है. कल, आज और कल की इस चिरतरंगिणी को मनुष्य ने ‘समय’ नाम दिया. यह संज्ञा इतनी मनोहारी थी कि आगे जो भी दार्शनिक और विचारक आए, सभी ने उसकी पुष्टि की. वैज्ञानिकों तक की हिम्मत न हुई कि समय की परिकल्पना तथा उससे जुड़े लोकविश्वासों को चुनौती दे सकें. मान्यता चाहे जैसी हो, समय भी उनके विचारों के विकास में सहायक बना रहा.

दार्शनिकों ने समय के बारे में तरहतरह की परिकल्पनाएं प्रस्तुत कीं. कुछ ने समय को घटनाओं और परिवर्तन के आधार पर परिभाषित किया तो कुछ घटनाओं को समय के परिप्रेक्ष्य में, उसके भीतर घटते हुए माना. कुछ विचारक समय को अनंत का प्रतिरूप, ब्रह्मांड के समानांतर मगर उससे स्वतंत्र सत्ता मानते रहे, तो कुछ ने उसको भूतवर्तमान और भविष्य के रूप में देखा. ‘टाइमस’ में प्लेटो ने समय को अनंत की संज्ञा दी है. उसके अनुसार, ‘समय अनंत की गत्यात्मकता को दर्शानेवाली अपरिमेय सत्ता है.’ घटअघट सबकुछ उसमें समाया रहता है. कुछ मामलों में समय ब्रह्मांड से भी विस्तीर्ण है. चूंकि ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना किसी न किसी अंतराल में घटित होती है; और स्वयं ब्रह्मांड भी घटनाओं की अपरिमित शृंखला में है—अतः कहा जा सकता है कि समय ब्रह्मांड से भी विस्तीर्ण है. दूसरे शब्दों में ब्रह्मांड का भी समय होता है. उसकी आयु है, उसके गर्भ में घटनेवाली तरहतरह की घटनाएं और गतियां हैं. इसलिए वह भी समय की पकड़ से दूर नहीं है. कुल मिलाकर प्लेटो के अनुसार समय ऐसी अपरिमेय रचना है, जिसमें सृष्टि की समस्त घटनाएं घटित होती हैं.

मनुष्य समय की सत्ता पर लगभग पिछले 2500 वर्ष से निरंतर विचार करता आया है. बौद्ध दर्शन से लेकर सुकरात, प्लेटो, अरस्तु आदि ने अपनीअपनी तरह से समय की विवेचना की है. इसके बावजूद समय की सत्ता को लेकर विद्वानों के बीच आज भी सहमति नहीं बन पाई है. अनेक प्रश्न आज भी उलझे हुए हैं. मसलन समय क्या है? यदि ब्रह्मांड न हो क्या तब भी समय रहेगा? क्या मानवमस्तिष्क का समय से कोई प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष संबंध है? भूत, वर्तमान और भविष्य क्या सचमुच घटनाओं से स्वतंत्र हैं, अथवा ये केवल भ्रांति और मानव मस्तिष्क की उपज हैं? कल, आज और कल क्या केवल समयबोध का प्रतीक हैं और समय वास्तव में कालरहित है? क्या कालरहित समय और समयरहित ब्रह्मांड की कल्पना की जा सकती है? ब्रह्मांड और समय दोनों की उत्पत्ति क्या एक साथ हुई? क्या ब्रह्मांड की भांति समय भी भौतिक नियमों से पूरी तरह अनुशासित होता है? ऐसे ही अनेक प्रश्न हैं, जो मानवमस्तिष्क को हजारों वर्षों से मथते आए हैं. मानवीय मेधा आज तक उनका सर्वसम्मत निदान नहीं खोज पाई है. न्यूटन, अरस्तु जैसे कई दार्शनिकों, वैज्ञानिकों ने समय की सत्ता को स्वीकारा है. समय के प्रत्यय का विज्ञान में भी भरपूर उपयोग होता है. प्लेटो समय को अनंत का पर्याय मानता है. उसके अनुसार—

प्राणीमात्र की प्राकृतिक क्षमताएं अपरिमेय थीं. यह संभव नहीं था वह उन क्षमताओं को ब्रह्मांड पर पूरी तरह न्योछावर कर दे, बजाय इसके उसने अपरिमेय की चलतीफिरती छवि बनाने का फैसला किया. उसने स्वर्ग से ऐसी अपरिमेय छवि बनाने का आदेश दिया तब स्वर्ग ने वह बनाया, जिसे आज हम समय कहते हैं. स्वर्ग यानी अनंत की अकेली अपरिमेय छवि, जो अनंत तक बनी रहेगी.’2

समय के बारे में प्लेटो के आदर्शवादी दृष्टिकोण की अपेक्षा अरस्तु व्यावहारिकता पर जोर देता है. मानव मस्तिष्क एवं समय की अंतर्निभरता पर टिप्पणी करते हुए वह लिखता है—

यदि मस्तिष्क अनुपस्थित है तब समय अनुपस्थित होगा या नहीं, ऐसा सवाल किया जा सकता है. मगर उसके बारे में जानना चाहिए कि यदि किसी के पास किसी के पास गिनने लायक कुछ नहीं है, वहां ऐसा कुछ नहीं होगा, जिसको गिना जा सके.’3

जाहिर है, अरस्तु की समयसंबंधी अवधारणा व्यावहारिक और जनसाधारण के सोच के करीब है. वह मानता है कि समय स्वतंत्र है, उसकी अपनी सत्ता है, गति है. सृष्टि की प्रत्येक घटना, परिवर्तन समय का आभास कराता है. तदनुसार जहां परिवर्तन है, वहां समय अथवा उसकी प्रतीति है. ‘समय भूत और भविष्य के संदर्भ में घटनाओं की आवृत्ति है.’ लेकिन समय केवल कल आज और कल नहीं हैं. भूत, वर्तमान और भविष्य केवल मनुष्य के समयबोध को दर्शाते हैं. वास्तविक समय इनसे अलग और स्वतंत्र है. अरस्तु का यह संबोधन समय को लेकर गहरे निहितार्थ रखता है. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो इस परिभाषा में अरस्तु ने जहां समयसंबंधी प्लेटो की मान्यताओं का सम्मान किया है, वहीं समय को गतिशीलता का लक्षण मानकर, मतवैभिन्नय भी बनाए रखा है. हालांकि समय को लेकर प्लेटो को योगदान भी संदेह से परे नहीं है. आगे चलकर समय के बारे में जो दो प्रमुख दृष्टिकोण बने, उनमें से एक के बीजतत्व प्लेटो के दर्शन में तथा दूसरे के अरस्तु के विचारों में दिखाई पड़ते हैं.

आधुनिक वैज्ञानिक ब्रह्मांड की कुल आयु को लेकर स्वयं कोई दावा नहीं करते, ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत जिसके अनुसार पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल रूपांतरित होता रहता है, कदाचित इसके आड़े आता है. लेकिन उनका मानना है कि एक न एक दिन, भले वह समय करोड़ों, अरबों वर्ष बाद हो—वर्तमान ब्रह्मांड और उसके साथ समय भी नए रूप को प्राप्त हो सकता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि समय का भी जन्म हुआ है. वे समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक साथ, एक ही घटना से मानते हैं. हाकिंग ब्रह्मांड के निर्माण के रहस्य की गुत्थी सुलझाने के लिए ‘समय का इतिहास’ को माध्यम बनाते हैं. एक वैज्ञानिक के लिए ब्रह्मांड एवं समय के उद्भवकाल को एक मानना सैद्धांतिक रूप से सही हो सकता है. मगर इससे ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति तक सीमित रह जाता है. समय की आयु भले न हो, परंतु ब्रह्मांड की आयु है, इसे निरंतर फैलता हुआ ब्रह्मांड भी सिद्ध करता है. वह दिखाता है कि ब्रह्मांड सतत परिवर्तनशील है. कल्पना कीजिए निरंतर फैलता हुआ ब्रह्मांड कुछ लाख या करोड़ वर्षों के बाद, किसी नई संरचना में ढल जाता है. अथवा अपने आंतरिक परिवर्तनों के चलते पुनः परमबिंदू में सिमट जाता है—तब समय का नया रूप क्या होगा. क्या समय या उसकी प्रतीति दुबारा नष्ट हो जाएगी. स्टीफन हाकिंग के विचार हमें इसी निष्कर्ष तक ले जाते हैं. मगर इसमें दृष्टि को ही सृष्टि मान लेने जैसा दोष है. इससे यह विचार कि सबकुछ समय के साथ घटता है, संदेह के दायरे में आ जाता है.

लोकव्यवहार में समय के दो रूप देखने को मिलते हैं. पहला दिनरात, वर्ष, ऋतु काल जिसमें जीवन की दैनंदिन घटनाएं संचालित होती हैं. दूसरा समय को सर्वव्यापी, अनंत, ब्रह्मांडनुमा रचना मानना जिसमें सृष्टि की प्रत्येक घटना घटित होती है. आस्थावान लोगों के लिए संभव नहीं होता कि वे समयसंबंधी किसी भी प्रतीति की उपेक्षा कर सकें. समय उनके लिए अनंत प्रवाह, देवता तुल्य और आराधनयोग्य है. सामान्यतः वे समय से डरते, उसका उपकार मानते हैं तथा उसे धर्म की भांति नियामक सत्ता मानकर, जीवन को उसके अनुसार ढालने के लिए प्रयत्नरत रहते हैं. लेखकों और कवियों ने समय को परमतत्व का विस्तार मानकर, उसका भांतिभांति से महिमा मंडन किया है. दार्शनिकों ने समय को केंद्र में रखकर जीवनरहस्यों की व्याख्या की. दूसरी ओर ऐसे भी कई भौतिकवादी विचारक हैं जिन्होंने समय की सत्ता पर खरेखरे सवाल उठाए हैं. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि व्यक्ति पर समय का प्रभाव उसकी मनःस्थिति और परिवेश के अनुसार पड़ता है. तदनुसार समय व्यक्तियों पर अलगअलग प्रभाव डालता है. इन परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच कुछ प्रश्न लगातार सिर उठाए रहे.कृ

समय: दार्शनिक पहेली

माना कि समय है, उसकी प्रतीति है. पर वह है क्या? कब उसका जन्म हुआ? ब्रह्मांड के साथ अथवा उससे पहले? यदि पहले तो कितना? समय क्या घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल की भांति आगे बढ़ने वाला प्रवाह है? अथवा ऐसी निस्सीम सत्ता जिसमें घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल, चांद, सितारे, सूरज, ग्रहउपग्रह जैसे ब्रह्मांड के कोटिक कोटि पिंड समाए हुए हैं? समय की प्रतीति घटनाओं के माध्यम से होती है, तो क्या वह घटनाओं की अन्वति मात्र है? घटनाएं समय में बीतती हैं या घटनाओं के साथ समय की उलटबांसी चलती है? अगर वह घटना नहीं है तो उसकी प्रतीति का आधार क्या है? क्या घटनाओं से बाहर समय की अनुभूति संभव है? समय और समयबोध में अंतर क्या है? क्या समय और समयबोध दोनों साथसाथ जन्मे? यदि नहीं तो उनके बीच अंतराल कितना है? दोनों में पहले कौन जन्मा? मानवमन में हजारों वर्ष पहले कौंधे ये प्रश्न आज भी उसी तरह बने हुए हैं. समय को लेकर जो चुनौतियां ईसा से चारपांच सौ वर्ष पहले थीं, वे किसी न किसी रूप में आज भी मुंह बाए खड़ी हैं. समय को लेकर महत्त्वपूर्ण चिंतन बौद्ध, न्याय, वैशेषिक आदि दर्शनों में हुआ है. मगर आधुनिक भारतीय विचारकों ने इस क्षेत्र को उपेक्षित ही रखा है. जबकि समय की दार्शनिक विवेचना एक प्रकार से इस विश्वसमाज की वस्तुनिष्ट विवेचना जैसी होगी. वह हमें धर्म के नाम पर चल रहे अनेकानेक पाखंडों और अज्ञानताओं से मुक्ति दिला सकती है. संतोष है तो बस इतना है कि प्रश्न का होना भी कम नहीं होता. समस्या हो तो मानवीय जिजीविषा उसका समाधान कभीकभी खोज ही लेती है.

समय की व्युत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिकों के अलगअलग विचार हैं. स्टीफन हाकिंग समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड के जन्म से जोड़ते हैं. ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में उन्होंने समय की व्युत्पत्ति महाविस्फोट की घटना से मानी है. हाकिंग के अनुसार, महाविस्फोट से पहले पूरा ब्रह्मांड अनंत संपीडित ‘परम बिंदू’;ैपदहनसंतपजलद्ध अथवा ‘परमएैक्य’ की अवस्था में था. लगभग 15 अरब वर्ष पहले निंरतर बढ़ता आंतरिक दाब ही ‘परम बिंदू’ के महाविस्फोट तथा ब्रह्मांड के जन्म का निमित्त बना था. हाॅकिंग के अनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय अथवा किसी वस्तु की कोई कल्पना संभव नहीं है. यहां हाकिंग अरस्तु और न्यूटन के विचारों से सहमत दिखाई पड़ते हैं, मगर एक उलझन है. न्यूटन और अरस्तु समय को ‘परमतत्व’ के तुल्य मानते हैं. उनके अनुसार समय की अपनी सत्ता है और वह भौतिक घटनाओं से स्वतंत्र है. समय घटनाओं पर नजर रखता तथा उनके होने के प्रभाव को दर्शाता है. स्टीफन हाकिंग सहित ये दोनों वैज्ञानिक भी समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड के जन्म से जोड़ते हैं. यह उनकी विवशता है. विज्ञान तर्क के सहारे चलता है. चूंकि ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय की सत्ता का प्रमाणन असंभव है. इसलिए उनकी वैज्ञानिक बुद्धि समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पीछे नहीं ले जा पाती. दार्शनिक के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती. उसके लिए विचार का तर्क सम्मत होना पर्याप्त है. जाहिर है, समय की व्युत्पत्ति की वैज्ञानिक व्याख्या एक दार्शनिक के लिए अनेक सवाल छोड़ जाती है. सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण प्रश्न तो यही है कि ब्रह्मांड और समय को एकदूसरे से संबद्ध करने का आधार क्या है? यदि दोनों को परस्पर जोड़ा जाता है तो माना जाएगा कि कि वे परस्पर अन्योन्याश्रित हैं, ऐसे में समय को ‘परम’ अथवा ‘स्वतंत्र’ मानना अनुचित होगा, जबकि प्लेटो, अरस्तु, न्यूटन से लेकर अनेक आधुनिक वैज्ञानिक समय को परिवर्तन निरपेक्ष और स्वतंत्र मानते आए हैं.

अरस्तु से लेकर हाकिंग तक इन समस्याओं पर कोई विचार नहीं करते. न ही किसी प्रकार का सवाल उठाते हैं. उनका यह अभीष्ट भी नहीं है. इसलिए कि हाकिंग हो या न्यूटन अथवा अरस्तु सभी का ध्येय सृष्टि के जन्म से जुड़ी जिज्ञासाओं के प्रति वैज्ञानिक नजरिया पेश करना था. उससे जुड़े दार्शनिक प्रश्नों का समाधान करना नहीं. अब यदि हाकिंग की स्थापना को सत्य मान लिया जाए, मान लिया जाए कि सृष्टि का जन्म महाविस्फोट से ही हुआ था, तब भी समय को लेकर कुछ सवाल हमेशा बने रहते हैं. जैसे कि पदार्थ को निरंतर संपीडित होतेहोते ‘परमबिंदू’ की अवस्था तक आने में कितना समय लगा था? वह परमबिंदू की अवस्था में कब तक रहा? यदि समय घटनाओं की अन्वति अथवा उनके परिवर्तन को दर्शाता है तो ‘परमशून्य बनने तथा उसके विखंडित होने के बीच की अवधि को भी समय क्यों न मान लिया जाए? क्या परम बिंदू बनने तथा ‘महाविस्फोट’ का क्षण दोनों एक हैं? क्या परमबिंदू से पहले भी सृष्टि का कोई स्वरूप था? यदि परमबिंदू बनना एक घटना है तो उसके बनने में लगने वाले समय की उपेक्षा हम कैसे कर सकते हैं? परम शून्य की अवस्था में आने से पहले ब्रह्मांड और समय का क्या संबंध था? हाकिंग इन सवालों को छोड़ आगे बढ़ जाते हैं. उनके अनुसार ब्रह्मांड से पहले समय की परिकल्पना का वैज्ञानिक आधार उन्हें नजर नहीं आता. हाकिंग का कहना सही हो सकता है, लेकिन दार्शनिक की दृष्टि से यह जल्दबाजी का निष्कर्ष है. विषय ही सीमा को सत्य की सीमा मान लेने के कारण प्रायः ऐसा होता रहता है. ध्यातव्य है कि हाकिंग का ध्येय ब्रह्मांड की उत्पत्ति जुड़ी वैज्ञानिक गुत्थियों को सुलझाना था. ऐसा नहीं है कि समय पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार नहीं किया जा सकता. न्यूटन के गति के नियमों से लेकर हाइंजवर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत तक सभी में समय का प्रयोग किया जाता है. आइंस्टाइन के विचार के अनुसार समय चौथा आयाम है. हाइंजवर्ग भी परमाणु के भीतर मूलकणों की वास्तविक उपस्थिति को जानने के लिए समय को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार करते हैं. लेकिन प्रकारांतर में वे दोनों ही किसी पिंड अथवा मूलकण की स्थिति को समझने के लिए चौथे आयाम के रूप में मानव मस्तिष्क द्वारा कल्पना के अतिरिक्त विस्तार, अधिक बौद्धिक श्रम की अपेक्षा कर रहे होते हैं.

दर्शन के विद्यार्थी के लिए समय की विवेचना से जुड़े प्रश्न बड़े प्रासंगिक हैं. एक वैज्ञानिक ब्रह्मांड के जन्म से समय की उत्पत्ति को मानकर संतुष्ट हो जाता है. क्योंकि उससे पहले किसी भी सत्ता की कल्पना उसके लिए असंभव है. असंभव कल्पना करना विज्ञान का क्षेत्र भी नहीं है. दर्शन तर्क की विचारभूमि पर विकसित होता है. दार्शनिक के लिए समय को लेकर सामान्यतः दो विकल्प होते हैं. समय को अनंत प्रवाह मानते हुए गहन सृष्टि के जन्म से पहले ‘परम बिंदू’ बनने से लेकर महाविस्फोट तथा उसके बाद की समस्त घटनाओं का,े उसके विभिन्न अंतरालों में घटी हुई घटनाएं माने. दूसरे समय और महाविस्फोट दोनों का जन्म एक साथ मानते हुए समय को घटनापरिवर्तन के साक्षी के रूप में देखे. लेकिन ब्रह्मांड एवं समय की व्युत्पत्ति को परस्पर असंबद्ध करना, दर्शन की दृष्टि से भी इतनी समस्याएं उत्पन्न करता है, जिनका समाधान असंभव है. यदि समय की व्युत्पत्ति को ब्रह्मांड से पहले मान लिया जाए, तब एक और ब्रह्मांड अथवा ऐसी रचना की परिकल्पना करनी होगी, जिसमें समय रह सके; अथवा जिसके साथ वह अपने ‘होने’ को दर्शा सके. उसके बाद सिलसिला अनंत तक चलता जाएगा. चूंकि समय की सत्ता की सिद्धि बगैर परिवर्तन के असंभव है और दृश्यमान जगत में परिवर्तन के लिए वस्तु जगत की मौजूदगी अपरिहार्य है, इसलिए समय के इतिहास के बहाने वैज्ञानिक दरअसल ब्रह्मांड अथवा ब्रह्मांडीय हलचलों का इतिहास ही बता रहे होते हैं; और किसी ठोस तर्क के अभाव में दार्शनिक भी समझौते की ओर बढ़ते नजर आते हैं. अधिकांश यह मान लेते हैं कि समय और ब्रह्मांड एक ही है. अथवा दोनों एक ही सत्ता की भिन्न प्रतीतियां हैं. यदि यह सही है तब समस्या होती है कि ब्रह्मांड की व्याख्या के लिए समय की अवधारणा क्यों जरूरी है?

दूसरे शब्दों में समय को घटनाओं की प्रतीति मानते हुए हम केवल समयबोध अथवा उसकी व्यावहारिक उपस्थिति को महत्त्व दें. जैसा अरस्तु और न्यूटन जैसे वैज्ञानिक भी मानते आए हैं, मान लें कि प्रत्येक परिवर्तन समय सापेक्ष होता है. इससे स्टीफन हाकिंग, न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों, जिनके लिए ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय की उपस्थिति असंभव है, की मान्यता अवधारणा को स्वीकृति मिलेगी. हालांकि उस अवस्था में समय की निरपेक्षता का प्रश्न आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत से संघर्ष करता हुआ नजर आएगा. विकल्प यह भी है कि समय को अनंत एवं निरपेक्ष सत्ता के रूप में पहचाना जाए, जिसमें समस्त घटनाएं, परिवर्तन आदि बनतेमिटते रहते हैं. मानें कि समय सभी का साक्षी, केवल दृष्टामात्र है. प्लेटो ने भी उसे अनंत के साथी और सहधर्मी के रूप में देखा है, यह भी हो सकता है कि समय के व्यावहारिक बोध जिसे हमारी स्मृति तय करती है, जो परिवर्तन को समझने के लिए जरूरी है, को मान्यता देते हुए समय की स्वतंत्रता जैसे सवालों से मुक्ति पा लें. आइंस्टाइन, स्टीफन हाकिंग आदि मानते हैं कि विशिष्ट परिस्थितियों में समय का आचरण वह नहीं रह जाता, जैसा सामान्य अवस्था में होता है. उनके अनुसार समय स्थिति सापेक्ष है. और यदि वह स्थिति सापेक्ष है, तब उसके संदर्भ में स्वतंत्रता, स्वायत्तता जैसे विशेषण बेमानी हो जाते हैं. क्योंकि समय को यदि परिवर्तन की दर अथवा घटनाओं की प्रतीति मात्र माना जाए तो प्रत्येक वस्तु अथवा घटना के लिए स्वतंत्र समय की परिकल्पना करनी होगी. अनंत घटनाओं के लिए समय के अनंत प्रारूपों की कल्पना करने से उचित होगा कि समय को वस्तुजगत से निरपेक्ष मान लिया जाए. मान लिया जाए कि ब्रह्मांड की भांति समय भी अनंत और अपरिमेय है, जो उसके समस्त परिवर्तनों का साक्षी है. तीसरी धारणा के समर्थक विचारक वे हैं जो समय की सत्ता को घटनाओं से परे मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं, जो समय की किसी भी प्रकार की उपस्थिति को नकारते हैं. जिनके अनुसार समय मनुष्य की कल्पना या भ्रांति जैसा कुछ है, जिसे वह घटनाओं के अनुक्रम की व्याख्या के लिए अपनाता है.

समय की सत्ता के नकार अनेक लोगों को चैंका सकता है. हजारों वर्षों से चली आ रही इस मान्यता का प्रतिकार उन्हें अनोखा लगेगा ही. लेकिन हमें जानना चाहिए कि समय की सामान्य प्रतीति घटनाओं से जुड़ी है. मनुष्य परिवर्तन की रफ्तार को समझने के लिए समयबोध का सहारा लेता है. घटनाशून्य ब्रह्मांड समय शून्य होगा, इसमें भी संदेह नहीं है. हाकिंग इसी आधार पर महाविस्फोट से पहले समयशून्यता की स्थिति स्वीकार करते हैं. तो समय क्या केवल अंतराल है? घटनाओं के बीच का शून्य? निरंतर परिवर्तनकारी जगत में मनुष्य होश संभालते ही स्वयं को घटनाओं के प्रवाह में स्वयं को पाता है. उन्हीं का अवलोकन करते, हिसाबकिताब रखते हुए समय का प्रत्यय उसके अवचेतन में अनायास पैठ जाता है. चूंकि मनुष्य घटनाओं का दृष्टा ही नहीं भोक्ता भी है. इसलिए उनका प्रभाव इतना गहरा और स्थायी होता है कि उसके प्रभावक्षेत्र से बाहर आ पाना जनसाधारण तो क्या अच्छेअच्छों के लिए संभव नहीं होता. हालांकि यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य के आसपास घटनेवाली सभी घटनाएं उसे समानरूप से प्रभावित करती हों. प्रायः दो प्रकार की घटनाएं मनुष्य के आसपास में अंतरिक्ष में घट सकती हैं. पहली वे जिनका मनुष्य से सीधा संबंध हो. दूसरी वे जिनका उससे कोई प्रत्यक्ष संबंध न हो. हालांकि यह आवश्यक नहीं कि केवल वही घटनाएं मनुष्य को प्रभावित करें, जिनका उससे प्रत्यक्ष संपर्क हो. अनेक ऐसी घटनाएं हो सकती हैं, जिनका मनुष्य से तात्कालिक रूप से कोई संबंध नहीं है, बावजूद इसके वे तात्कालिक रूप से, अथवा कुछ अंतराल के पश्चात मनुष्य को प्रभावित करती हैं. कह सकते हैं कि समय की प्रतीति प्राणी चेतना के आरंभिक बिंदू से जुड़कर अंत तक बनी रहती है. उल्लेखनीय है कि मानवमस्तिष्क घटनाओं के ही माध्यम से समय का आकलन करता है. रातदिन, ऋतुकाल, धूप, आकाश में चांदतारों की बदलती स्थितियां मस्तिक पर प्रभाव डालती हैं. उनमें से अनेक स्थितियां ऐसी होती हैं, जिनकी एक निश्चित अंतराल के बाद पुनरावृत्ति होती है. धीरेधीरे मानवमस्तिष्क उनकी तारतम्यता से अनुकूलित होने लगता है. यही अनुकूलन समयबोध के रूप मंे जाना जाता है.

समय के विवेचन का सामाजिकसांस्कृतिक पक्ष भी है. दरअसल समय के प्रत्यय का जीवन में इतने प्रकार से प्रयोग होता है कि वह सामाजिकसांस्कृतिक संबंधों के निर्धारण में प्रमुख नियामक शक्ति के रूप में नजर आता है. जन्म के साथ मनुष्य का अपने मातापिता; तथा उनके माध्यम से शेष समाज के साथ संबंध बनता है. उसी से मनुष्य के व्यक्तिगत समय की शुरुआत होती है. मृत्यु के साथ मान लिया जाता है कि संबंधित व्यक्ति का समय पूरा हो चुका है. प्राणिमात्र के संबंध में जीवन और मृत्यु यद्यपि जैविक घटनाएं हैं, जैसेजैसे मनुष्य का जीवन आगे बढ़ता है, वैसेवैसे अनेक घटनाएं उनके जीवन में घटती हैं. उनसे उसके बदलते जीवन और समय की प्रतीति होती है. वृद्धावस्था में समय जितनी तेजी से बीतता हुआ महसूस होता है, वैसा युवावस्था में नहीं हो पाता. कारण स्पष्ट है. वृद्धावस्था में मनुष्य जीवन के सूक्ष्म अवलोकन से कट जाता है. एक युवा लिए दिन का आशय सुबह व्यायाम, काॅलेज, खेल, पढ़ाई, दोस्तों से साथ मटरगश्ती, टेलीविजन, सिनेमा, पुस्तकालय आदि हो सकता है. अपने दिनभर के समय को वह इन्हीं कार्यों में बांटकर उन्हें टुकड़ेटुकड़े जीता है. वृद्धावस्था में बाहरी कार्यकलाप सिमट जाते हैं. जीवन बच्चों के साथ बातचीत, भोजन, पुरानी यादों और निद्रा में सिमट जाता है. इसलिए समय भागता हुआ महसूस होता है. यदि बीमारी हो तो बात भिन्न है. तब भी देह के बाहर समय की प्रतीति घट जाती है.

आशय है कि मनुष्य का समयबोध जीवन के व्यावहारिक पहलुओं से जुड़ा होता है. इस बीच अव्यावहारिक और अनावश्यक है उसे प्रायः छोड़ दिया जाता है. उदाहरण के लिए किसी मनुष्य की जीवनावधि जन्म से मृत्यु के क्षण तक मानी जाती है. चूंकि जन्म और मृत्यु साक्षात घटनाएं हैं, इसलिए उन्हें जीवन यात्रा के पहले और अंतिम पड़ाव के रूप में देखने की परंपरा, लगभग सभी समाजों में मिलती है. जबकि हम सभी जानते हैं कि प्राणीमात्र का जीवन गर्भाधान की प्रक्रिया संपन्न होने के साथ ही आरंभ हो जाता है. अनेक महामानव अपने विचारों और कर्म से दुनिया को अपनी मृत्यु के बाद भी प्रभावित करते हैं और इस तरह समाज में उनकी अभौतिक उपस्थिति बनी रहती है. इसके बावजूद गर्भस्थ भ्रूण की अवधि को हम मनुष्य की जीवनावधि का हिस्सा नहीं मानते. अनिश्चितता अथवा सामाजिक शुचिता के लिहाज से भी उसे मनुष्य की कुल जीवनावधि में जोड़ना उचित नहीं माना जाता.

समय को लेकर मानवमात्र की अनुभूति दो प्रकार की होती है. पहली उसके व्यक्तिगत जीवन और अनुभवों को लेकर. जिसमें वह सूरज को उदयअस्त होते देखता है. व्यक्ति की दिनचर्या सुबह के साथ आरंभ हो जाती है. दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर काम पर जाना, समयानुसार भोजन और दूसरे दायित्वों को निपटाना, फिर शाम होतेहोते घर लौटकर रात्रिविश्राम करना. इस तरह उसके दिमाग पर समय का जो प्रत्यय बनता है. उसको भौतिक समय कह सकते हैं. दूसरे शब्दों में व्यक्ति की पूरी दिनचर्या भौतिक समय के साथ एक संवाद है. उसे मनुष्य का व्यक्तिगत समय भी कह सकते हैं. लेकिन जब कोई मनुष्य समय के साथ व्यवहार करने के बजाय उसके बारे में सोचने लगता है. जब वह सोचता है कि न केवल उसका अपना जीवन बल्कि उसके साथियों, जड़चेतन सभी, जो जीवित हैं और जो नहीं हैं, वे भी जो हजारोंलाखों वर्ष पहले मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, साथ में धरती, ग्रहनक्षत्र, चरअचर, ब्रह्मांड सभी समय के भीतर आजा रहे हैं; यानी जब वह अपने अलावा दूसरों के समय के बारे में सोचता है तो उसे समय को लेकर कुछ और ही अनुभव होता है. तब उसके मन में अपरिमेय समय की छवि आकार लेने लगती है. समय की अपरिमेयता के बोध ने ही जीवन की नश्वरता के विचार को जन्म दिया है. उसी से आदमी ने माना कि कुछ है जिसमें सब कुछ बीत रहा है. यहां तक कि उसका जीवन भी. जो इतना शक्तिशाली है कि बड़े से बड़े पहलवान को एक ही झटके में धूल चटा दे. और इतना व्यापक भी कि ब्रह्मांड की एक भी घटना, एक भी प्राणी, चरअचर उससे बाहर नहीं.

समय की अनिश्चितता के बोध ने डर को जन्म दिया. डर ने अमरत्व की कल्पना को. जरामरण से घबराए इंसान ने समय को ताकतवर सत्ता मान लिया गया. समय की मेहरबानी बनी रहे इसके लिए मनौतियां मांगी जाने लगीं. भयभीत मनुष्य समय से दोस्ती गांठने, उसके साथ सातत्य बनाए रखने की कोशिश करने लगा. समय के साथ बने रहने की चाहत ने पुनर्जन्म की संकल्पना को जन्म दिया. मृत्यु के चंगुल से पार छिटक जाने की चाहत का नाम मोक्ष पड़ा. वह अमरत्व की ऐसी कल्पना थी, जिसपर समय की मार भी बेअसर थी. समय के साथ बने रहना. उसको दौड़ में मात दे देना पुरुषार्थ का लक्षण मान लिया गया. समय के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने वाले निस्प्रह पुरुषार्थी को कर्मयोगी कहा गया. चूंकि समय के संग दौड़ में बने रहना, सभी के लिए सदैव संभव नहीं होता. समय अच्छेअच्छों को छका देता है, कथित देवता भी उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हैं—अतएव स्वार्थी पंडाओं ने भाग्य, प्रारब्ध, कपालरेख, नियतिचक्र, कालचक्र, गति जैसी संज्ञाओं और विशेषणों की परिकल्पना की. फलित ज्योतिष का गूदा स्वयं खाकर गुठलियां वे जनसाधारण में बांटने लगे. निराशा से उबरने के आदमी जबतब उनकी शरण लेने लगा. भाग्य कर्महीनों की शरणस्थली बना, पुरुषार्थ कर्मयोगियों की पहचान.

मानव जीवन समय से अनुशासित है. तो क्या समय की संकल्पना मनुष्य की सामाजिकता का निकष् है? क्या अकेले व्यक्ति का भी कोई समय होता है? शायद नहीं; या शायद हां? अकेले व्यक्ति के लिए भी घटनाएं होंगी. उन्हें देखकर उसको अपने आसपास गतिशीलता का आभास होगा. इससे वह वर्तमान को अपने सामने से गुजरते हुए देखेगा. यानी जैसा हमने पीछे कहा, व्यक्तिगत रूप से मनुष्य भौतिक समय के संपर्क में रहता है. मगर नितांत अकेले, मानव समाज से कटे हुए मनुष्य का समयसंबंधी सोच ठीक वह नहीं होगा, जो समाज में रहनेवाले मनुष्य का है. उसे स्मृति की आवश्यकता शायद ही पड़ेगी. चूंकि अनुभवों को बांटने के लिए दूसरा कोई नहीं होगा, इसलिए मस्तिष्क और स्मृति का उपयोग भी धीरेधीरे घटता जाएगा. इस प्रकार अकेला, समाज से कट चुका मनुष्य, पशुपक्षियों की भांति घटनाओं की तारतम्यता, उनकी परिवर्तनशीलता का बारीक हिसाबकिताब शायद ही रख पाएगा. यदि रखेगा भी तो सबकुछ गड़बड़ा भी सकता है. इसलिए कि उसके निर्णय और बोध को चुनौती देने वाला कोई न होगा. दूसरे शब्दों में समाज से कटे व्यक्ति का समयबोध हुआ भी तो वह सामूहिक समयबोध से काफी भिन्न और सीमित होगा. वह कुछ ऐसा होगा जैसी पशुपक्षियों की अंतश्चेतना, जो अपनी जैविक आश्यकताओं के आधार पर सौर दिवस में प्रकृतिचक्र से तालमेल बनाए रखती है. प्रकृति के निरंतर साहचर्य में रहते हुए वे अपनी जैविक आवश्यकताओं और परिवेश के बीच सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं. दिन की पहली झलक के साथ उन्हें भोजन की चिंता सताने लगती है. अंबर से उतरता उजाला देखते ही चिडि़याओं में उड़ान भरने का हौसला आ जाता है. पशु अपनेअपने काम की ओर निकल जाते हैं. इससे मनुष्य की समयसंबंधी अवधारणा पर सामाजिकता के प्रभाव को आंका जा सकता है. दूसरे शब्दों में मनुष्य के समयसंबंधी जो भी विचार आज हमें उपलब्ध हैं, वे समाजसापेक्ष भी हैं.

स्मृति मनुष्य के लिए प्रकृति का अनोखा वरदान है. वह घटनाओं की आवृत्ति तथा उनका क्रमानुक्रम सहेजने में सहायक सिद्ध होती है. उसके अभाव में सूरज का उगना और अस्त होना महज प्राकृतिक घटनाएं होतीं. स्मृति घटनाओं को सहेजने का दायित्व निभाती है. मनुष्य के आसपास जो घटनाएं घटती हैं, स्मृति उन्हें एकएक कर दर्ज करती जाती है. वे स्मृतियां मस्तिष्क में अपने स्वरूप एवं क्रमानुक्रम के साथ दर्ज होती जाती हैं. दो घटनाओं का अंतराल समय की प्रतीतियों को जन्म देता है. कह सकते हैं कि परिवर्तन शून्यता ही समयशून्यता है. लेकिन घड़ी की सुइयों को रोकने से समय नहीं रुकता. इसलिए परिवर्तन शून्यता का अभिप्राय प्रेक्षक और प्रेक्षित दोनों की आंतरिक और बाह्य ठहराव से है. लेकिन मानवमस्तिष्क की सीमा है कि वह अति उच्च गति और अत्यंत निम्न गति के परिवर्तनों को पकड़ नहीं पाती. खासतौर पर अकेलेपन की अवस्था में. वैज्ञानिक प्रयोग इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं. यदि घटनाओं में बहुत तेजी से परिवर्तन हो तो वे मानवमस्तिष्क पकड़ से बाहर रह जाते हैं. सिनेमा और दूरदर्शन पर दिखनेवाले धारावाहिक, चलचित्र असल में अलगअलग चित्रों की शृंखला होते हैं. उन्हें आंखों के आगे इतनी तेजी से गुजारा जाता है कि वे उनमें सातत्य, एकदूसरे से परस्पर जुड़ाव नजर आने लगता है, जिसके कारण निर्जीव आकृतियां जीवंत दिखाई पड़ने लगती हैं. दूसरे शब्दों में जो दिखता है, और जो वास्तविक है, दोनों में मूलभूत अंतर होता है. अर्थात जो दृष्टि में है, आवश्यक नहीं कि वही सृष्टि में भी हो. कलकल बहती नदी एक धारा होने का आभास कराती है. इस कारण लोग उसको पूजते भी हैं. अगर हेराक्लाइट्स की माने तो नदी असल में नदी न होकर अनगिनत जलबिंदुओं से मिलकर बना एक प्रवाह है. अपरिमित जलबिंदू लघु धाराएं बनकर नदी होने का एहसास कराते हैं. इसलिए हेराक्लाइट्स कहना था—‘हम एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते.’ जब हम नदी में दुबारा प्रवेश करते हैं, पहले वाला जल कहीं आगे बढ़ चुका होता है. इससे एक धारा संदेहवाद की ओर भी जाती है. फलस्वरूप समय की सत्ता पर सवाल उठाने वालों को ठोस तार्किक आधार प्राप्त होता है. संदेहवादियों के अनुसार समय असल में अंतहीन घटनाओं से उत्पन्न प्रवाह, एक मानसिक संरचना है. ठीक वैसा ही जैसे अनेक छोटीछोटी धाराएं एवं अनंत जलकण मिलकर नदी के प्रत्यय को जन्म देती हैं. (और हिग्स बोसोन मिलकर द्रव्यमान को!)

समय का प्रत्यय व्यक्तिसापेक्ष भी होता है. यदि दो ऐसे प्रेक्षकों की कल्पना की जाए जिनमें एक पृथ्वी पर है, दूसरा पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर ऐसे ग्रह पर जिसका सौरचक्र पृथ्वी के सौरचक्र से पूरी तरह भिन्न है, तो दोनों के समयबोध में पर्याप्त अंतर होगा. आइंस्टाइन के अनुसार यदि दो प्रेक्षक एक दूसरे के सापेक्ष असंभव तीव्र गति से जा रहे हों तो दोनों के समयबोध में काफी अंतर होगा. उस अवस्था में यदि कोई अंतरिक्षयात्री पृथ्वी पर मौजूद प्रेक्षक से घड़ी मिलाकर अतितीव्र गति से यात्रा पर निकलता है तो, उसकी घड़ी, पृथ्वी पर मौजूद प्रेक्षक की घड़ी की अपेक्षा कम समय बताएगी. आइंस्टाइन इसे ‘समय का सिकुड़ना’ कहते हैं. आइंस्टाइन ने प्रकाश गति को व्यवहार में असंभव माना है. फिर भी यदि कल्पना की जाए कि दो प्रेक्षकों की सापेक्षिक गति प्रकाश वेग के बराबर हो तो उनका समयबोध शून्य होगा. कारण स्पष्ट है, प्रकाशवेग को सृष्टि का उच्चतम वेग माना गया है, कोई भी घटना उससे तेज गति से चल ही नहीं सकती. इसलिए प्रकाशगति से दौड़ रहे प्रेक्षक तक घटनासंबंधी सूचना पहुंच ही नहीं पाएगी. साफ है कि स्वतंत्र या स्वच्छंद समय जैसा कुछ नहीं होता. समय न केवल व्यक्तिसापेक्ष होता है, बल्कि परिस्थिति सापेक्ष भी होता है. चूंकि समय का आभास घटनाओं के माध्यम से होता है, उसकी सीधी अनुभूति का कोई माध्यम ही नहीं है, चूंकि प्रकाश गति से दौड़ने के कारण कोई घटना उस तक पहुंच ही नहीं पाएगी, इसलिए गतिमान प्रेक्षक के लिए शेष ब्रह्मांड की घटनाएं शून्य प्रतीत होंगी. तदनुसार समय उसको ठहरा हुआ नजर आएगा.

जिस प्रकार घनत्व, द्रव्यमान, आयतन आदि को पदार्थ से अलग करके देखना असंभव है, उसी प्रकार घटनाओं अथवा परिवर्तन को अवधि निरपेक्ष कर पाना असंभव है. एक सवाल यह भी किया जा सकता है कि क्या किसी मनुष्य को समयशून्य स्थिति में ले जाया जा सकता है. उत्तर ‘न’ में मिलेगा. चूंकि मनुष्य का परिवर्तनशून्य स्थिति में जाना संभव नहीं है, इसलिए समयशून्यता भी असंभव है. उदाहरण के लिए एक प्रेक्षक को अंधेरे बंद कमरे में कैद करके बाहरी जगत से उसका संपर्क बिलकुल काट दिया जाए. उस अवस्था में उसका व्यक्ति का व्यावहारिक समयबोध समाप्त हो जाएगा. किंतु शेष सृष्टि किसी न किसी रूप में उससे जुड़ी रहेगी. उसका शरीर उसकी क्रियाएं निंरतर चलती रहेंगी. व्यक्ति प्राकृतिक घटनाओं तथा उनसे जन्मे समयबोध की ओर से भले ही संवेदन शून्य हो जाए, विश्व के लिए वह समय का वैसा ही हिस्सा बना रहेगा. यह भी संभव है कि एक अवधि के बाद उसकी जैविक घड़ी रातदिन तथा भौतिक जगत की अन्य दृश्यमान घटनाओं से संचालित होने के बजाय, केवल भूखप्यास तथा अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं से नियंत्रित होने लगे. क्योंकि प्रकृति को देखकर समय का अनुमान लगाने वाली उसकी जैविक घड़ी भौतिक घटनाओं से कटते ही गड़बड़ा सकती है. लंबे समय तक प्रकृति से कटे रहने पर उसमें स्थायी व्यवधान भी आ सकता है. इसके बावजूद व्यक्ति के लिए समयशून्य स्थिति असंभव होगी. क्योंकि जीवन के रहते परिवर्तनशून्यता से मुक्ति असंभव है. दो घटनाओं अथवा परिवर्तन के अंतराल के रूप में समय का बोध लगातार बना रहेगा. दूसरे शब्दों में घटनाओं की क्रमानुक्रमता ही समयबोध के रूप में विकसित होती है. बातचीत के दौरान सामने वाला व्यक्ति उन घटनाओं को उसी क्रमानुक्रम में ग्रहण करता है. इसलिए घटना के साथ उनके अंतराल के रूप में उनसे संबद्ध समयबोध भी बड़ी आसानी से दूसरे के मनमस्तिष्क पर छा जाता है. अकेलेपन की अवस्था में ऐसा समयबोध अस्थायी होगा. तब व्यक्ति घटनाओं का प्रेक्षकभर होता. क्योंकि उपयोग न होने के कारण उसकी स्मृति शायद ही विकसित हो. इस उदाहरण से समय की निरपेक्षता का सवाल खटाई में पड़ने लगते हैं और वह स्वतंत्र सत्ता न होकर परिवर्तनों का प्रभाव उसी प्रकार जैसे घनत्व, द्रव्यमान, आयतन आदि हैं—नजर आने लगता है.

अनेक विद्वान भौतिक समय अथवा समय की प्रवाहशीलता के विचार से सहमत नहीं हैं. समय को मिनट, सैकिंड, पलअनुपल में बांटने का विचार उन्हें स्वीकार नहीं है. उनके अनुसार समय से ऐसा भौतिक आचरण अनपेक्षित है. समय उनके लिए अनुभूति का विषय है. उनके अनुसार समय ब्रह्मांडीय विस्तार जैसा ही निस्सीम और शाश्वत है, जिसमें सबकुछ घटता है. ऐसा कुछ भी नहीं जो समय की व्याप्ति से परे हो. ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल उसमें समाई है. इस मान्यता के अनुसार समय का आकलन संभव नहीं. मनुष्य उसकी निस्सीमता का मात्र अनुभव कर सकता है. घटनाएं उसके अनंत महासागरीय विस्तार में आतीजाती क्षुद्र डांेगियों के समान हैं. भूत, वर्तमान और भविष्य का कालविभाजन यद्यपि इस मान्यता में भी है. इसलिए नहीं कि वह समय की विशेषता है. बल्कि इसलिए कि वह मनुष्य की व्यावहारिक जरूरत है. सांत मानवेंद्रियों द्वारा अनंत समय से तालमेल बनाए रखने की चेष्ठा! इसलिए भूतवर्तमानभविष्य आदि समय के स्वतंत्र प्रखंड न होकर उसकी निस्सीमता में समाहित हैं. समय के प्रत्यय की तार्किक विवेचना के लिए ये निष्कर्ष बहुत काम के हैं. जिसपर हम आगे विचार करेंगे.

जो भी हो, समय अपने आप में रोचक पहेली है. प्राचीन मनीषियों ने मतवैभिन्न्य को बौद्धिकता के लक्षण के रूप में स्वीकार किया है—‘न एको मुनिस्र्य मर्तिभिन्ना.’—यानी ‘एक भी विचारक ऐसा नहीं है, जो अपनी स्वतंत्र राय न रखता हो.’ समय को लेकर भी ऐसे ही विभिन्न मतमतांतर हैं. जिनमें तीन प्रमुख हैं. पहला है घटनाओं को आगे रखकर समय का आकलन करना. जैसे एक लेख की तैयारी के लिए कल मैं पुस्तकालय गया था. आज मैं यह लेख लिख रहा हूं. लेख के प्रकाशित होने के बाद यह पाठकों के हाथ तक पहुंचेगा. ये घटनाएं आगेपीछे की हैं. समय इनके होने के और बीच के अंतराल को तय करता है. तदनुसार उसका भौतिक अस्तित्व है. दूसरी प्रविधि समय को केंद्र में रखकर घटनाओं को परखने की है—जैसे प्राचीन समय में आदिमानव आग जलाने के लिए पत्थर के टुकड़ों को रगड़ता था. गौतम बुद्ध ने गणिका आम्रपाली को धर्मोपदेश दिया था. गुरु नानक ने सिख धर्म की नींव रखी. भारत द्वारा छोड़ा गया यान मंगल की कक्षा में, उसकी परिक्रमा कर रहा है. यदि विश्वयुद्ध हुआ तो करोड़ों लोग तबाह हो सकते हैं. रात्रि के दस बजे हैं और मैं अपने लेख को पूरा करने के लिए कलम घसीट रहा हूं, अमेरिका में सुबह दस्तक दे चुकी है. चांदनी रात का आनंद लेने के लिए कुछ लोग इंडिया गेट पर घूम रहे हैं. समय की निस्सीमता में घट रहीं, घट चुकीं या घटनेवाली ये घटनाएं ऐसी हैं, जिनका कोई न कोई साक्षी है या होगा. इनमंे आगेपीछे की अनुभूति मानवमस्तिष्क तय करता है. तदनुसार समय ब्रह्मांडतुल्य रचना है. सृश्टि की समस्त हलचल को अपने भीतर समेटे हुए. इसमें सभी घटनाएं जो समय के विभिन्न कालखंडों में घटीं, उनके अलावा कोटिक अन्यान्य घटनाएं भी रही होंगी,कृस्वतः समाहित हैं. दूरदर्शन पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ में उद्घोषक हरीश भिमाणी की गूंजती हुई आवाज ‘मैं समय हूं’ समय की इसी निस्सीमता का बखान करती थी. इस सैद्धांतिकी में कालविभाजन अमान्य है. यह समय की चिंरतनवादी अवधारणा है. पहली ने इतिहास को जन्म दिया. दूसरी ने दार्शनिक चिंतना को. तीसरा दृष्टिकोण उन विद्वानों का है जो समय के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाते हैं. उनके अनुसार समय सिवाय मानसिक संरचना के कुछ नहीं है. वह केवल परिवर्तनशीलता का प्रभाव है. जैसे द्रव्यमान वस्तुओं का गुण है, वैसे ही समय परिवर्तनशीलता का लक्षण है. यह भौतिकवादी दृष्टिकोण है. इसके माननेवाले संख्या में कम हैं, लेकिन तार्किक आधार पर यह किसी भी जनोन्मुखी विचार से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है. इन सबके बावजूद समय आज भी अबूझ पहेली बना हुआ है.

समय के बारे में पहला वस्तुनिष्ठ चिंतन बौद्ध दर्शन में मिलता है. न्याय दर्शन में उसी को विस्तार दिया गया है. पश्चिम विचारकों में प्लेटो, अरस्तु, यूडीपियस, न्यूटन, जीनो, ह्यूम, बर्कले, कांट, हीगेल, हाकिंग आदि ने भी समय को लेकर स्वतंत्र रूप से विचार किया है. कुछ संदेहवादी दार्शनिक भी हुए हैं, जिन्होंने समय के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए है. लेकिन समय के बारे में पहली बार सुनिश्चित चिंतन बीसवीं शताब्दी में आरंभिक दशकों में आया. उसके पीछे आइंस्टाइन के सापेक्षिकतावाद की प्रेरणा थी. जैसा कि हम सभी जानते हैं आइंस्टाइन ने समय को चौथा आयाम मानते हुए उसकी शाश्वत सत्ता में विश्वास प्रकट किया था. समय की कुछ गांठों को पहचानने की कोशिश हम इस लेखमाला के अगले हिस्से के रूप में करेंगे.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. वैराग्य शतक, 12/1045 भर्तृहरि

2. The nature of living being was eternal, and it was not possible to bestow this attribute fully on the created universe; but he determined to make a moving image of eternity, and so when he ordered the heavens he made in that which we call time an eternal moving image of the eternity which remains for ever at one. Plato in Timaeus. trans by Desmond Lee.

3. Whether, if soul (mind) did not exist, time would exist or not, is a question that may fairly be asked; for if there cannot be someone to count there cannot be anything that can be counted…”Aristole, Physics, chapter 14.