प्रदूषण एवं पर्यावरण असंतुलन : एक अकथ कथा

इन दिनों पर्यावरण संरक्षण सबसे हॉट मसला है. धूम मची है इसकी. जिसे देखो वही पर्यावरण की चिंता में घुला जा रहा है. संख्या इतनी है कि सबके आंसुओं को जमा कर लो तो गंगायमुना में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाएं. नदियों, तालाबों, नहरों, नालों में जमा सारा कूड़ाकरकट उसमें बह जाए और नदीप्रदूषण की समस्या कदाचित रहे ही नहीं. इस बात को वे भी जानते हैं, इस कारण हमेशा अलगअलग, बारीबारी से, टुकड़ोंटुकड़ों में रोते हैं. पर्यावरण मित्र कहलवाने का शौक ठहरा. इसलिए बारबार नारे लगाते, लगवाते हैं. सबके अपनेअपने संगठन, अपनेअपने मंच, अपनेअपने और अपनेअपने ‘नेताजी’ हैं. जब जरूरत पड़े ये ‘नेताजी’ को याद करते हैं. वे फूनफान खटकाते हैं. उनके प्रताप से इधरउधर से चंदा जमा हो ही जाता है. ऐवज में कार्यक्रम के दिन नेता जी को अध्यक्ष पद पर बिठाकर थोड़ा सरकार और थोड़ा जनता को गरिया लेते हैं. उन्हें आपत्ति आधुनिकता से नहीं है. आधुनिक जीवनशैली से भी नहीं है….बस प्रदूषण से है. जैसे प्रदूषण का जिन्न किसी और लोक से उतरा हो और उसे बोतल में बंद करके हमेशाहमेशा के लिए छुट्टी पाई जा सकती है. पिछले दिनों एक ऐसे ही पर्यावरण मित्र मिल गए. शायद किसी मंच से भषिया कर लौट रहे थे. देखते ही गाड़ी रोक दी. भीतर बैठने का निमंत्रण दिया. नाराज न हों इसलिए मैं उनके बराबर में जा बैठा. बाहर की तपती गरमी से बेअसर गाड़ी एकदम ‘चिल्ड’ थी.ठंडा है न, ‘ऐसी’ बहुतई पॉवरफुल लगाएं हैं हम.’ मैं कुछ कहूं उससे पहले ही उन्होंने अपनी पीठ ठोकनी चाही. लेकिन ‘ऐसी’ का प्रयोग तो पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है. इससे क्लोरोफ्लोरोकार्बन, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन जैसी गैसें निकलती हैं, जो धरती की ओजोन छतरी को नुकसान पहुंचाती हैं.’रोज यही समझाते हैं. ससुरी जुबान तक दुखने लगी है. परंतु लोग हैं कि मानते ही नहीं. हम अकेले भी क्या करें! सड़कों पर गरमी और प्रदूषण इतना है कि बिना ‘ऐसी’ आप निकल ही नहीं सकते?’ तो आप अपने सुख और सेहत की खातिर धरती की सेहत बिगाड़ रहे हैं?’ हं….हं….हं….आप तो बात पकड़ लिए….’ वे अपनी बनारसी पान मार्का हंसी हंसे. फिर जब लगा कि वह सब बेअसर है तो तत्काल दूसरा दाव चल दिया, ‘चलिए कुछ खा लेते हैं. भूख लग रही होगी. निकम्मों ने पूरी और छोले बनवाए थे. अपने ‘सरमाजी’ आर्गनाइज कर रहे थे, तो जाना पड़ा. वरना अंगलोंकंगलों की बैठक में जाने से तो हम ‘टक’ से इन्कार कर देते हैं.’ ‘टक’ पर खास जोर देते हुए उन्होंने ड्राइवर को इशारा किया. उसने गाड़ी एक फास्ट फूड कार्नर के आगे रोक दी. ड्राइवर ने बर्गर और कुछ दूसरी चीजें लाकर उन्हें थमा दी. मैंने साथ देने से इन्कार कर दिया. उन्होंने कुछ नहीं कहा. चुपचाप बैठेबैठे खाने लगे. ड्राइवर भी साथ देने लगा. उसके बाद खाली पैकेट और बोतलों को सड़क पर लुढ़काकर ड्राइवर को चलने का आदेश दिया. गाड़ी भागने लगी. मंजिल आते ही मैंने गाड़ी रोकने को कहा.सुनिए….’ उनकी आवाज थी. मेरे पांव ठिठक गए.आजकल आप हर अखबार में छाए हुए हैं. एक ठो लेख हम पर भी लिखिए न! देखिए तो पर्यावरण की चिंता में कितने दुबलाय गए हैं.’ इस खोज में कि दुर्बलता उनपर किस कोने से सवार है, मैंने उन्हें गौर से देखा. गाड़ी की सीट के आधे से ज्यादा हिस्से पर अधलेटे वे अपनी बतीसी चमका रहे थे, ‘अच्छा हुआ दुबलाए गए. ठीकठाक होते तो ट्रक या बस से आनाजाना पड़ता.’ सोचकर मैं वहां से चलने लगा. सहसा पीछे से आवाज आईᅳ‘दीवाली आने वाली है. अपना पता तो लिखवा जाते.’

इस बार मैं रुका नहीं.

ऐसा नहीं है कि समस्या हो ही नहीं. पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण के नाम पर सैकड़ों, हजारों लोग यूं ही ‘चिंताय’ रहे हों. समस्या है और गंभीर समस्या है. यह न तो मजाक का विषय है, न व्यंग्य का. लेकिन प्रदूषण और पर्यावरण पर चिंता करते समय हम प्रायः उसके बाहरी पक्षों को ही देख पाते हैं. नदी में बाढ़….चिंता शुरू. तालाब उजाड़….चिंता शुरू. अतिवृष्टि, अनावृष्टि….चिंता शुरू. कम हरियाली….चिंता शुरू. ओलापाला….चिंता शुरू. यहां तक कि यदि कोई ज्योतिषी पचास वर्ष आगे की भविष्यवाणी कर दे, तो भी हम घबराकर चिंताना शुरू कर देते हैं. चिंता भी दिवाली के गिफ्ट पैक जैसी. एकदम मिलीजुलीनदियां प्रदूषित हैं, क्योंकि फैक्ट्रियों का गंदा पानी छोड़ा जाता है’….‘बाढ़ आती है, क्योंकि पेड़ अंधाधुंध काटे जाते हैं….‘नईनई बीमारियां पैदा हो रही हैं, क्योंकि हवा तक मिलावटी है….वगैरहवगैरह. तुरंता निष्कर्षों में पर्यावरण असंतुलन के लिए एक मत से आधुनिक जीवनशैली को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है. जैसे दुनिया में अकेले हम आधुनिक हुए हों! यूरोपीय देश जहां से आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति की हवा चली है, हमसे बहुत पीछे हों! हम भूल जाते हैं कि आधुनिकता में अमेरिका और यूरोप के कई देश हमसे कम से कम सौ वर्ष आगे हैं. वहां तनख्वाह हर सप्ताहांत मिलती है. ऐसे कर्मचारियों की संख्या वहां काफी है, जिनपर तन्ख्वाह मिलते ही उसे खर्च करने की धुन सवार हो जाती है. इसके बावजूद वहां पर्यावरण असंतुलन जैसी कोई समस्या नहीं है. उनकी नदियों, सागरों, बागतालाबों को देख लीजिए, सौंदर्य और रखरखाव में वे स्वप्ननगरी जैसे प्रतीत होते हैं. दूसरे शब्दों में पर्यावरण असंतुलन का कारण न तो अत्यधिक भोग है, न ही भौतिकवाद. असली समस्या मूल्यहीनता, असंतुलित विकास और तज्जनित जनाक्रोश की है, जिनका नकारात्मक असर समाज में नागरिकबोध की कमी के रूप में सामने आता है. यह कहना तो अतिरंजना होगी कि पश्चिमी समाजों ने अपनी सभी नागरिक समस्याओं का समाधान कर लिया है. फिर भी वहां नागरिक असंतोष में आपेक्षिक रूप से कमी आई है. उसके आधार पर कह सकते हैं कि पश्चिमी समाजों की आधुनिकता ओढ़ी हुई आधुनिकता नहीं है. उन्होंने परिवेशगत आधुनिकता और मूल्यगत आधुनिकता को साथसाथ धारण किया है. इसलिए आधुनिकता और पर्यावरण में जो तालमेल होना चाहिए, उसे वे समझने लगे हैं. पर्यावरण संरक्षण वहां नागरिक कर्तव्य है. जबकि हमारे यहां पर्यावरण के प्रति नागरिक दायित्व का सरासर अभाव है. इससे पूरे समाज में अविश्वास की स्थिति बनी रहती है. एडम स्मिथ ने एक बात जोर देकर कही थी. जब कही थी, उन दिनों यूरोपीय समाज की हालत भारतीय समाज जितनी ही पिछड़ी थी. उसका कहना था, ‘अगर यूरोप के किसी नागरिक को पता लग जाए कि अगले दिन उसकी उंगली नहीं बचेगी तो वह रातभर करवट बदलता रहेगा. सोएगा नहीं. लेकिन यदि उसे यह बताया जाए कि भूकंप में लाखों चीनी भाईबंधुओं की मौत हो गई है तो वह पूरी रात गहरी और खर्राटेदार नींद लेगा.’ भारत के मामले में चीन की जगह पाकिस्तान को रख सकते हैं. इस तरह के और भी कई मसले हमारी व्यर्थ हमारी उत्तेजना बढ़ाते रहते हैं. समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त विश्वासहीनता अपना खेल खेलते हुए, लोगों को सामाजिक सरोकारों की ओर से उदासीन बनाती है. इसी से पर्यावरण असंतुलन और उस जैसी अन्याय समस्याएं पैदा होती हैं.

पश्चिम में जिन देशों में पर्यावरण असंतुलन की समस्या नहीं है, या बहुत कम हैआवश्यक नहीं कि वे सभी धनाढ्य हों. इसके बावजूद नागरिकताबोध वहां समृद्ध है. सरकार हो, प्रशासन हो या आम नागरिक, हर कोई अपनीअपनी जिम्मेदारी संभालता है. इसलिए उनकी सड़कें गंदी नहीं होतीं. नदियां सदानीरा हैं. प्रदूषण की समस्या न्यूनतम है. हम ऐसा नहीं कर पाए. सामाजिक बोध की हमारे यहां कमी है, इसलिए वह हमारे लिए समस्या बना हुआ है. हमारे लिए वह समस्या इसलिए भी है, क्योंकि हम तय ही नहीं कर पाए हैं कि कब और कितनी आधुनिकता हमें चाहिए. जब हम विकास की बात सोचते हैं, तो जो कुछ अपने पास है, वह सब पुराना और घिसापिटा लगने लगता है. तब आयातित तकनीक की मदद से आधुनिकता के साथ कदम ताल करने के लिए हम विदेशी पूंजी को न्योतने, विश्वयात्रा पर निकल पड़ते हैं. जब हम संस्कृति और इतिहास के बारे में सोचते हैं, तो बाहर का सब कुछ उथला और त्याज्य मान बैठते हैं. विश्वगुरु होने का नकली अभिमान हमारे दिलोदिमाग को कब्जा लेता है. उस अवस्था में हम बाहरी ज्ञान को, वह हमारे लिए चाहे जितना उपयोगी क्यों न होएकाएक नकारने लगते हैं. आधुनिकता और संस्कृति प्रेम के बीच कठपुतली की तरह कभी इस ओर, तो कभी उस ओर डोलते रहते हैं. अपने देश और संस्कृति के प्रति अनुराग अनुचित नहीं है. विडंबना यह कि परंपरा और संस्कृति पर संवाद करते समय हम केवल और केवल भावनाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं. भावनाओं पर अंकुश रखने के लिए विवेक की आवश्यकता हमें महसूस ही नहीं होती. परिणाम यह होता है कि परंपरा और संस्कृति को भलीभांति समझने, आत्मसात् करने के बजाय हमारा बोध मिथकों और प्रतीकों तक सीमित रह जाता है, जिनमें बदलाव करना असंभवप्रायः होता है. उस अवस्था में हम पर्यावरण संकट जैसी विशुद्ध भौतिक समस्या का समाधान भी प्रतीकों और मिथकों के माध्यम से खोजने लगते हैं. चूंकि हम पर्यावरण संकट के मूल को समझने में नाकाम रहते हैं, इसलिए इन मुद्दों को लेकर हमारा सोच प्रायः प्रतिक्रियात्मक होता है. इस बीच समस्या बेखौफ, रातदिन लगातार बढ़ती चली जाती है.

इसका एक कारण पर्यावरण के बारे में व्यापक दृष्टिबोध का अभाव भी है. पर्यावरण सहित दूसरे मामलों को लेकर जहां अधिकाधिक प्रतिबद्धता की जरूरत हो, हम प्रायः ढुलमुल फैसलों और हल्केफुल्के कार्यक्रमों का शिकार होते रहते हैं. इसलिए सफाई की खातिर देश के प्रधानमंत्री का खुद झाड़ू लेकर सड़कों पर उतरना भी, अच्छेखासे राजनीतिक प्रहसन की भूमिका बन जाता है. हर बात को चलताऊ ढंग से लेने, घटनाओं को उत्सव में परिवर्तित कर देने से चुनौतियां महिमामंडित होती दिखाई पड़ती हैं. भूकंप, बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओले, पाले यानी हर प्राकृतिक घटना और आपदा के लिए प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराया जाता है. ठीक है, प्रदूषण परिस्थितिकीय असंतुलन के दिए दोषी है. उससे बाढ़, सूखा, भूकंप, महामारी जैसी विभीषिकाएं जन्मती रहती हैं. लेकिन प्रदूषण या परिस्थितिकीय असंतुलन की समस्या के मूल कारणों की पड़ताल करना इतना आसान भी नहीं है. वह कहीं न कहीं हमारे तंत्र की असफलता को भी दर्शाता भी है. उदाहरण के लिए 2013 की केदारनाथ त्रासदी को पर्यावरणविदों ने सीधेसीधे पर्यावरणअसंतुलन से जोड़ा था. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह त्रासदी पर्वतीय प्रदेश की पारिस्थतिकीय स्थिति में आए परिवर्तन का कुफल थी, जो अनियोजित विकास की देन था. आपदा की उस घड़ी में पर्यावरण असंतुलन पर खूब चर्चा हुई. कहीं समय पर मदद न पहुंचाने तथा कहींकहीं अपर्याप्त मदद पहुंचाने के लिए सरकार की खिंचाई भी की गई. लगभग सभी ने माना कि अनियोजित विकास पर्यावरण असंतुलन की समस्या है. मगर इसपर नियंत्रण कैसे किया जाए? सरकार, बुद्धिजीवी और नागरिक संस्थाएं किस तरह खुद को नियोजित करें कि विकास की विकृतियों से बचा जा सके, इसपर किसी का ध्यान नहीं गया. जबकि लोकतंत्र में जितनी जिम्मेदारी सरकार की होती है, उतनी ही नागरिक संस्थाओं की भी होती है. अतः नागरिक सरकार का कर्तव्य होना चाहिए कि वह संवेदनशील क्षेत्रों का विकास या तो अपने हाथ में रखे अथवा अपनी ठोस निगरानी में भरोसेमंद कंपनियों के माध्यम से कार्य कराए. वहीं नागरिक संस्थाओं का कर्तव्य है कि समाज के विभिन्न वर्गों को पारिस्थतिकीय असंतुलन से परचाने के लिए अभियान चलाकर सरकार की यथासंभव मदद करें. पर्याप्त जागरूकता के अभाव में केदारनाथ के आसपास के क्षेत्र में अंधाधुंध पहाड़ काटे गए. पेड़ों को हटाया गया तथा सरकार और नागरिक संस्थान मूक तमाशा देते रहें. ऐसे में समस्या को सिर्फ पारिस्थतिकीय असंतुलन बताकर सरकार और नागरिक संस्थाओं को उनकी जिम्मेदारी से बरी कर देना, गैर जिम्मेदराना और दोषी शक्तियों को अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित करने जैसा है. ऐसे हथकंडों से चुनौती घटने के बजाय निरंतर बढ़ती जाती है.

प्रदूषण का अर्थ प्रायः परिवेशगत गंदगी और अशुद्धता से लिया जाता है. मनुष्य और समाज के संदर्भ में प्रदूषण का दायरा बहुत बड़ा होता है. उसकी समस्या जितनी बाहरी यानी परिवेशगत है, उतनी भीतरी अर्थात मानसिक और वैचारिक भी है. वैचारिक स्तर पर प्रदूषण की स्थिति ही भौतिक स्तर के प्रदूषण को जटिल बनाती है. इस सत्य को समझे बगैर हम समस्या का समाधान प्रायः परिवेशगत उपचार द्वारा करना चाहते हैं. इसे विकट समस्या के समाधान की आधीअधूरी कोशिश कहा जा सकता है. सामान्य रूप से हममें से प्रत्येक व्यक्ति मानता है कि उसे छोड़कर बाकी हर इंसान पर्यावरण असंतुलन का दोषी है. किस तरह दोषी है? दोनों जीवनशैलियों में क्या भिन्नता है? अगर यह पूछा जाए तो उससे जवाब देते नहीं बनता. स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव पर्यावरण संरक्षण के कार्यक्रमों को प्रदर्शन और दिखावे की चीज बना देता है. शहर में बढ़ते प्रदूषण पर चर्चा करनी हैसौपचास आदमी जुटे, सेमीनारबैठकी जैसा कुछ किया, नाश्ता लिया, काम पूरा….हंसतेमुस्कराते चलते बने. नदी संरक्षण का मसला है तो दसपांच आदमी इकट्ठा हुए, होहल्ला किया. नारे लगाते हुए प्रशासन को प्रतिवेदन सौंप आए. हर आयोजन के बाद अखबारों में बयानबाजी, फेसबुक पर फोटोशोटो. दोचार दोस्तों के साथ दसपांच सेल्फियां….पार्टीशार्टी और अखबार में छपी खबरों का कटपेस्ट. सरकारी और गैरसरकारी मद के हजारों करोड़ रुपये, इसी तरह के कार्यक्रमों के ऊपर हर वर्ष खर्च ढेर होते जाते हैं. लेकिन प्रदूषण पर कोई अंतर नहीं पड़ता. वह सालोंसाल बढ़ता चला जाता है. आमतौर पर हमारा वास्ता नकली आंसू बहाने वाले पर्यावरण मित्रों से पड़ता है. उनसे पड़ता है जिनके स्वार्थ कर्तव्य पर भारी पड़ते हैं. वे इस काम को शासक और सत्ता से निकटता बनाए रखने के लिए करते हैं. इसलिए उनकी चिंताएं ऊपरऊपर असर करती हैं और प्रभाव बेअसर बना रहता है. इससे परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि व्यंग्य स्वतः उभर आता है.

चूंकि वे लोग जो पर्यावरण असंतुलन के वास्तविक दोषी हैं, अथवा जो वैसी परिस्थितियां उत्पन्न करने के लिए जाने जाते हैं, वे ऐसी लफ्फाजियों को पसंद करते हैं. वे चाहते हैं कि समाज की रचनात्मक ऊर्जा ऐसे ही गैर रचनात्मक कार्यों में उलझी रहे. इसलिए ऐसे कार्यक्रमों के लिए चंदेअनुदान की व्यवस्था करके रखते हैं. प्रकारांतर में पर्यावरण असंतुलन का सारा दोष जनसाधारण के मत्थे मढ़ दिया जाता है, जो पहले से ही अनेकानेक असफलताओ और आरोपों का बोझ ढो रहा होता है. जिसके पास जीवन की सामान्य सुविधाएं जुटाने के लिए भी समय नहीं होता. इसलिए वह अपने ऊपर लगनेवाले आरोपों की ओर से भी बेपरवाह बना रहता है. जीवन की अन्य चुनौतियों के सापेक्ष पर्यावरण असंतुलन जैसी समस्याएं उसके लिए बहुत छोटी और महत्त्वहीन होती हैं. उन्हें बड़े, खाएअघाए लोगों के चोंचले कहकर वह उनकी ओर लापरवाह बना रहता है. गरीब आदमी के समक्ष केवल दो रास्ते होते हैं, गरीबी और बेकारी के कारण तत्काल मृत्यु अथवा परिस्थितियों की मार झेलते हुए किंचित लंबा मगर बीमार जीवन. जिजीविषा उन्हें लंबे मगर बीमार जीवन चुनने के लिए बाध्य करती है. इससे प्रदूषण की समस्या भी टस से मस नहीं होती. इस बीच स्थिति में यदि अकस्मात कुछ सुधार हो जाए, या परिस्थितियां अनुकूल होने लगें तो श्रेय लेने वालों के बीच होड़ लग जाती है.

समस्या है कि ‘पर्यावरण मित्र’ और ‘पर्यावरण द्रोही’ की पहचान कैसे हो? कैसे लोग स्वयं स्फूत्र्त भाव से पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्सुक हों? इसका तुरंता निदान तो यही है कि जीवनशैली में सुधार हो. लोग अपने परिवेश से प्यार करना सीखें और उसके मूल स्वरूप को बचाए रखने में भरसक योगदान करें. यहां जीवनशैली का अभिप्रायः मनुष्य के वस्त्राभरण और सामान्य दिनचर्या तक सीमित नहीं है. बल्कि मनुष्य के विवेक, भावनाओं तथा अपने परिवेश के साथ उसकी संपूर्ण एकात्मता से है. देखा जाता है कि मनुष्य अपने जीवन में कुछ चीजें अनायास, बिना सोचेविचारे यूं ही अपना लेता है. उनके चयन में उसकी इच्छाअनिच्छा जैसा कुछ नहीं होता. इससे विचारहीनता फैलती है और वैचारिक प्रदूषण भी. उदाहरण के लिए हिंदुओं में सप्तपदी का चलन है. विवाह की वैदिक रीति में पंडित संस्कृत के मंत्र पढ़ता है. सप्तपदी के समय मौजूद लोगों में से शायद ही कोई उन मंत्रों का अर्थ जानता हो. कई बार तो पंडित भी उन्हें रटकर आता है या अपनी पत्रिका को जैसेतैसे बांचकर कर्मकांड पूरा कर देता है. कई बार पंडित उनका लोक भाषा में भावार्थ भी समझाता रहता है. लोग उसमें रुचि लेते हैं. जहां अर्थ समझ में न आए, वहां श्रद्धावनत होकर काम चला लेते हैं. यदि कुछ भी समझ न आए तब भी श्रद्धावनत होना पर्याप्त होता है. पंडित यज्ञ मंडप में सिर झुकाकर या उपस्थिति मात्र को आयोजन की सफलता मान लेता है. पूरा भक्ति शास्त्र यही सिखाता है. इसलिए परंपरानुगामी लोग, समझ न आए तो भी संस्कृत में मंत्रोच्चारण पर जोर देते हैं. ऐसे लोग सभी जगह हैं. ईसाई हिबू्र में लिखी ‘बाइबिल’ तथा मुस्लिम ‘अरबी’ भाषा के कुरआन को ‘असली’ मानते हैं. क्या भाषाएं भी पवित्र और अपवित्र होती हैं? क्या मंत्रों को तथाकथित शक्ति भाषा विशेष में लिखे जाने पर ही मिलती है? क्या उनका हिंदी या दूसरी भाषाओं में सार्थक अनुवाद असंभव है? विवाह और दूसरे कर्मकांडों के दौरान यदि हिंदी अनूदित मंत्र पढ़े जाएं तो क्या देवता अप्रसन्न हो जाएंगे? यदि ‘नहीं’ तो फिर हिंदी में ही मंत्र क्यों नही पढ़ दिए जाते? ताकि लोग उनका मंतव्य भलीभांति समझ सकें. मामला यहीं तक सीमित नहीं है. सरकारी कामकाज जनसाधारण की समझ में आए, दफ्तरों में पारदर्शिता रहे, इसके लिए हिंदी अथवा स्थानीय भाषाओं में सरकारी कामकाज की मांग बहुत पुरानी है. इसके औचित्य को समझा जा सकता है. लेकिन वे लोग जो दफ्तरों में पारदर्शिता के नाम पर स्थानीय भाषा में काम करने की मांग करते हैं, वही विवाह तथा अन्य कर्मकांडों के अवसर पर संस्कृत में मंत्रवाचन सुनकर कृतार्थ होते हैं. अर्थ समझे बिना ही गायत्री, महामृत्युंजय जैसे मंत्रों का जाप करते हैं. मानवजीवन के इन अंतर्विरोधों का पर्यावरण असंतुलन की समस्या से सीधे संबंध भले न दिखाई पड़े, किंतु मनुष्य की जीवनशैली को तय करने में इनकी बड़ी भूमिका होती है. पर्यावरण असंतुलन की समस्या का सीधा संबंध मानवव्यवहार से है. भाषा व्यक्ति का संस्कार करती है. देखा जाए तो बालक का प्रथम अध्यापक उसकी मातृभाषा ही होती है. भाषा के प्रति किसी भी प्रकार की लापरवाही, चीजों को समझने बिना ही समझने का नाटक करना या फिर ऊपरी व्याख्या से संतुष्ट हो जाना, मानवव्यवहार की शिथिलता को बढ़ाता है. उसे अपने परिवेश के प्रति अगंभीर बनाता है. फिर अभी तक किसी पर्यावरणविद् या भाषाविद् ने यह मांग क्यों नहीं रखी मंत्र और आरतियां स्थानीय भाषा में अनूदित की जाएं? विवाह, सगाई, गृहप्रवेश, नामकरण जैसे आयोजनों में पंडित स्थानीय भाषा में अनूदित मंत्रों का वाचन करे. संस्कृत के बजाय हिंदी और स्थानीय भाषाओं के पुरोहित तैयार किए जाएं? व्यक्ति और समाज के यही अंतर्विरोध आपसी विश्वासहीनता, कूपमंडूकता, भेड़चाल तथा व्यक्ति और उसके परिवेश के बीच की दूरी का कारण बनते हैं.

प्रदूषण या पर्यावरण असंतुलन की समस्या आरोपित समस्या नहीं है. न ही इसके पीछे कोई एक व्यक्ति, समूह है. समस्या व्यापक है और जैसे कि ऊपर संकेत दिए गए हैं, इसके बीजतत्व हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में भी छिपे हैं. यह समस्या सामाजिकता के हृास से पैदा होती है. उस स्वार्थपरता के कारण पैदा होती है जिसमें व्यक्ति अपने परिवेश से कटकर इतना आत्मलीन हो जाता है कि केवल उसे अपना स्वार्थ दिखता है. सिवाय अपने उसे कुछ भी नजर नहीं आता. सामाजिकता के हृास का प्रमुख कारण नागरिकताबोध का अभाव या भ्रष्ट नागरिकताबोध है. मनुष्य जब केवल अपने बारे में सोचने लगता है, तो शेष विश्व के बारे में उसका सोच एकाधिकारवादी हो जाता है. तब वह अपने आसपास की चीजों को दो हिस्सों में बांट लेता है. पहली वे जिनपर उनका सीधा अधिकार है. दूसरी वे जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर; यानी दूसरों के अधिकार में हैं. उसकी कोशिश होती है कि अपने नियंत्रण वाली वस्तुओं का दायरा बढ़ाया जाए. जब तक दूसरों के नियंत्रण बाली वस्तुएं उसे हासिल नहीं हो जातीं, तब तक उन्हें लेकर उसका रवैया उपेक्षापूर्ण बना रहता है. चूंकि ऐसा होना असंभव है, अतएव स्वार्थानुरूप आचरण करना, अपने परिवेश के साथ निष्ठुरता से पेश आना उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है. मनुष्य अपने परिवेश के बारे में संवेदनशील होगा तभी वह उसकी सुरक्षा करेगा. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था मनुष्य को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाती थी. बदले परिवेश में मनुष्य ने खुद को प्रकृति स्वतंत्र और उसका नियामक मानना शुरू किया तो नासमझी में अन्योन्याश्रितता का भाव भी जाता रहा. आपाधापी और स्वार्थपरता ने सामाजिक मूल्यों को संकट में डाल दिया. पर्यावरण असंतुलन भी उसी मूल्यहीनता की उपज है.

गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के अभियान में लगे पर्यावरणकर्मी अकसर यह बात उठाते हैं कि गंगा का साफ होना इसलिए जरूरी है, क्योंकि वह पवित्र नदी है. शास्त्रों में उसका गुणगान किया गया है. उनकी बात एक तरह से सही भी है. विश्व की सभी मुख्य सभ्यताएं किसी न किसी नदी के तट पर विकसित हुई हैं. हर सभ्यता ने अपनी नदी को पवित्र माना है. उसका गुणगान किया है. यहां तक कि उसकी पूजा भी की है. गंगा, यमुना, नर्मदा, सरयू आदि नदियां सब अपनीअपनी जगह पवित्र मानी जाती हैं. पवित्रता मनोगत धारणा है. कोई चीज इसलिए पवित्र होती है कि लोग ऐसा मानते हैं. जबकि पर्यावरण संरक्षण का अभीष्ट शुद्धता है. पहले चीजों को शुद्ध होना चाहिए. बाद में यदि कोई मानना चाहे तो पवित्र. चीजें अपने मूल रूप में हों, उनमें किसी भी प्रकार की मिलावट न हो. तभी वे शुद्ध मानी जा सकती हैं. प्रकृति जगत की नैसर्गिक शुद्धता को बनाए रखना, जहां प्रदूषण है वहां नैसर्गिक शुद्धता को लौटाना पर्यावरण आंदोलन का ध्येय है. लेकिन शुद्धता, जैसा कि ऊपर कहा गया है, पूरी तरह वस्तुगत है. पानी में जब तक किसी अतिरिक्त तत्व की मिलावट नहीं है तब तक वह शुद्ध माना जाएगा. दूसरी ओर, जैसा कि हमने पहले भी बताया, पवित्रता मनोगत होती है, पूर्व निष्पत्ति. जिसमें हम किसी वस्तु के बारे में पहले से ही धारणा बना लेते हैं कि वह पवित्र है या अपवित्र. यूं भी कह सकते हैं कि पवित्रता एक मिथ है. यह मिथ किस पर लागू होता है; अथवा पवित्र कौनकौन हैं? यह बोध हमें परंपरा से प्राप्त होता है. लोग गंगा को पवित्र इसलिए मानते हैं क्योंकि उनके पूर्वज भी उसे पवित्र मानते आए थे. दूसरी नदियों के बारे में भी यही सच है. आवश्यक नहीं कि परंपराओं पर सभी लोग साथसाथ ओर एक समान विश्वास करें, इसलिए वस्तुविशेष को लेकर पवित्रता का बोध भी बदलता रहता है.

मिथ की विशेषता होती है कि वे किसी भी प्रकार के तर्क से ऊपर होते हैं. उनकी जड़ें संस्कृति में बहुत गहरी होती हैं. तर्क के आधार पर आप मिथ के समर्थक अथवा अनुयायी को परास्त कर सकते हैं. लेकिन उसे मिटा नहीं सकते. मिथ को केवल मिथ के माध्यम से काटा जा सकता है. मिथों के संघर्ष की विशेषता है कि वह हमेशा ‘दो बांकों’ की लड़ाई साबित होता है. प्रतिद्विंद्वता अथवा पारस्परिक खंडनविखंडन के बावजूद उनमें से कोई भी मिथ मिटता नहीं है. अपनीअपनी भूमिका में दोनों ही बने रहते हैं. पवित्रता की भांति अपवित्रता भी एक मिथ है. विज्ञान की भाषा में कहें तो वह पवित्रता की ‘एंटीबॉडी’ है. पवित्रता का परंपरा सम्मत होना उसकी विशेषता है. मगर शुद्धता के लिए परंपरा कोई कसौटी नहीं है. शुद्धता का आकलन कोई भी कर सकता है. उसके स्तर को आंकड़ों में अभिव्यक्त किया जा सकता है. प्रयोग के माध्यम से उसे सिद्ध किया जा सकता है. पानी से भरे गिलास में गंदगी देख छोटा बालक भी कह देगा कि पानी अशुद्ध है. वस्तुगत होने के कारण शुद्धता को प्रभावित किया जा सकता है. स्वच्छ जल में थोड़ी मिट्टी डाल दीजिए….वह अशुद्ध हो जाएगा. अशुद्धता साफसाफ दिखती है. पवित्रता का आकलन करना, उसे प्रयोगरूप में दिखाना या किसी भी तरह से उसको प्रभावित करना, जब कि उसे कोई मिथकीय समर्थन न होआदमी के बस के बाहर होता है. ‘पवित्र’ कही जाने वाली वस्तु में उसके मूल स्वरूप की अपेक्षा चाहे जितने परिवर्तन दिखाई पड़ें, उसकी पवित्रता खंडित नहीं होती. पर्यावरणविद् गंगा नदी के प्रदूषण पर चिंतित हैं, उसे खतरनाक स्तर का बताया जा रहा है. सरकार गंगा के लिए स्वच्छता अभियान चला रही है. लेकिन श्रद्धालुओं के लिए, उनके लिए जो गंगा को पवित्र नदी मानते हैं, तमाम प्रदूषण और गंदगी के बावजूद वह उतनी ही पवित्र है जैसी पहले कभी रही होगी. ऐसा नहीं है कि पवित्रता कभी नष्ट नहीं होती. होती है, लेकिन तब खंडित होती है जब उसको प्रभावित करने वाले कारक मिथकीय हों तथा उसके धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक निहितार्थ हों. यदि वर्गीय हितों पर संकट हो तो शुद्धता पर आंच आए बिना ही चीजें पवित्र या अपवित्र घोषित कर दी जाती हैं. जैसे मंदिरों में दलितों का प्रवेश रोकने के लिए पाखंडी धर्माचार्य कह देते हैं कि उनके छूने से मूर्तियां अपवित्र हो जाएंगी; या कोई अस्पृश्यता समर्थक कहे कि दलित के साथ खाने या छू देने मात्र से उसकी पवित्रता नष्ट हो जाएगी. मूर्त्तियों को धोकर पवित्र करने की राजनीति के किस्से तो आम हैं. पवित्रता चूंकि मनोगत धारणा है कि इसलिए सभी मनुष्यों को विवश नहीं किया जा सकता कि वे वस्तुविशेष को पवित्र मानें. इस बारे में स्थिति एक दम विपरीत भी हो सकती है. यानी ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग किसी वस्तु को पवित्र मानें, और कुछ लोग उसी को अपवित्र होने का विशेषण थमा दें. कोई व्यक्ति किसी वस्तु को पवित्र मानता है या अपवित्र यह उसका व्यक्ति मामला है. क्योंकि कथित पवित्रता के नष्ट होने या न होने से वस्तु या व्यक्ति की शुद्धता पर कोई आंच नहीं आती अथवा वह उतनी ही प्रभावित होती है कि जितनी किसी सवर्ण व्यक्ति के स्पर्श करने से.

क्या ‘शुद्धता’ और ‘पवित्रता’ का कोई अंतःसंबंध है? यदि ‘हां’ तो पर्यावरण संतुलन के संबंध में उसके मायने क्या हैं? गंगा को अशुद्ध बनाने वाले कारक अनेक हैं. अन्य नदियों की भांति गंगा में भी कारखानों का गंदा पानी छोड़ा जाता है. जगहजगह गंदे नाले उसमें आकर मिलते हैं. स्थानस्थान पर लोग उसमें पशुओं को नहलाते दिखाई पड़ जाएंगे. इसके अलावा चिता की राख और न जाने क्याक्याये सब मिलकर गंगा के पानी को वैसा नहीं रहने देते, जैसा पहाड़ों से निकलते समय होता है. नदी जैसेजैसे आगे बढ़ती है, उसके जल की शुद्धता लगातार घटती जाती है. बावजूद इसके गंगाजल की पवित्रता का मिथ शुरुआत से अंत तक ज्यों का त्यों बना रहता है. यूं कोई कर्मकांडी ब्राह्मण कह देगा कि गंगा को अपवित्र किया जा रहा है. लेकिन प्रकारांतर में वही यह दावा करेगा कि गंगा और गंगाजल पवित्र हैं. इसलिए कि धर्म के अनेक कारोबार जो पुरोहितों की आय और प्रतिष्ठा के मुख्य साधन हैं, गंगा के पवित्रता संबंधी मिथक से जुड़े हैं. यदि यह मान लिया जाए कि गंगा प्रदूषित होने के साथ ही अपवित्र हो चुकी है तो उनके गंगा से जुड़े सारे कर्मकांड ठप्प हो जाएंगे और हजारों पूरोहितों के ऊपर बेरोजगारी की तलवार लटकने लगेगी. इसलिए चाहे जैसे भी हो वे गंगा की पवित्रता के मिथक को बनाए रखते हैं. यही कारण है कि लगातार प्रदूषित होने के बावजूद गंगा और गंगाजल के प्रति लोगों की श्रद्धा अक्षुण्ण रहती है. लोग चूंकि गंगा की पवित्रता की ओर से निश्चिंत होते हैं, इसलिए अपनीअपनी तरह से सब नदियों का प्रदूषित बढ़ाने में सहयोग करते हैं. इसका उन्हें बहुत मलाल भी नहीं होता. पर्यावरणकर्मी सफाई अभियान की शुरुआत के लिए यज्ञ नदी तट पर कराते हैं और यज्ञ के अवशिष्ट वहीं, नदी में बहा आते हैं. कारखानेदार अपना लाभ देखता है. फैक्ट्रियों के अवशिष्ट पदार्थ को नदी में बहाकर वह उनके शोधन पर होने वाले खर्च को बचा लेता है. ग्रामीण उसमें जानवर नहलाते हैं और पुजारी नहाने, कपड़े धोने से लेकर अंतिम क्रिया जैसे दर्जनों कर्मकांड नदी तट पर ही करता है.

पर्यावरण संतुलन का ध्येय पर्यावरण की नैसर्गिक शुद्धता के समर्थन में काम करना है. प्रकट रूप में उनका पवित्रता के मिथ से कोई मतलब नहीं होना चाहिए. लेकिन मिथ कोई अधर में नहीं जन्मते. इसलिए पवित्रता के मिथ को एकाएक किनारे करके गंगाशुद्धि का सपना देखना और भी मुश्किल है. प्रत्येक मिथ की सामाजिकसांस्कृतिक पृष्ठभूमि होती है. इसलिए देखना यह है कि पवित्रता के मिथ बनने की परिस्थितियां क्या थीं और यह मिथ पर्यावरण की नैसर्गिक शुद्धता लौटाने में हमारी कितनी मदद कर सकता है! आज से सहस्राब्दियों वर्ष पूर्व यदि हमारे पूर्वजों ने गंगा(या कोई और नदी) को पवित्र माना था, तो उस समय स्वच्छ रही होगी. इसलिए कि प्रदूषण के लिए जिम्मेदार स्थितियां जो आज भयावह रूप में मौजूद हैं, उनका पहले अभाव था. शुद्धता को उन्होंने पवित्रता से इसलिए जोड़ा ताकि जीवनदायिनी प्राकृतिक शक्तियों के प्रति अपना आभार प्रदर्शन कर सके. दूसरे शब्दों में हमारे पूर्वजों के लिए पवित्रता और शुद्धता में कोई विशेष अंतर नहीं था. जो भी जीवनदायिनी शक्ति या पदार्थ वस्तुगत आधार पर शुद्ध था, उसे अपनी संपूर्ण कृतज्ञता के साथ उन्होंने पवित्र मानकर अपनी आस्था से जोड़ लिया. कह सकते हैं कि शुद्धता का प्रत्यय ही मनस् पवित्रता के मिथ के रूप में सुरक्षित है. यह उस दौर की बात है जब लोगों की कथनी और करनी में अंतर नहीं था. वर्गभेद, सांप्रदायिकता आदि को कोई जानता तक नहीं था. लेकिन जैसेजैसे समाज में वर्गविभाजन गहरा हुआ, दिखावे की संस्कृति जोर पकड़ने लगी. पवित्रता के शुद्धता से अलग होकर मिथक में ढलने की शुरुआत भी इसी दौर में हुई. आज के विचारहीनता के दौर में वह अपने चरम पर है. पर्यावरण संतुलन के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों की सफलता के लिए लोगों को समझाना आवश्यक है कि व्यापक स्तर पर शुद्धता और पवित्रता में कोई अंतर नहीं है. यदि कोई चीज शुद्ध नहीं है तो वह पवित्र भी नहीं हो सकती. इसलिए पवित्रता को बचाने के लिए चीजों का शुद्धिकरण अनिवार्य है. दूसरे शब्दों में यदि पवित्रता का प्रत्यय व्यक्ति की अनुभूति या विवेक से उपजा हुआ नहीं है तो वह दिखावे की पवित्रता कही जाएगी.

कल्पना कीजिए, शुद्धता और पवित्रता अलगअलग न होकर एक ही चीज होते. या तो दोनों मिथ होते या यथार्थ. अगर गंदगी डालने से गंगा की पवित्रता भी नष्ट होती हुई मान ली जाती, तब क्या लोग उसमें गंदगी फैलाने का साहस कर पाते? संभव है उस समय नदी के प्रति उनकी श्रद्धा उतनी न होती, लेकिन नदी और उसके जल की शुद्धता के मायने वे भलीभांति समझ रहे होते. पर क्या यह इतना आसान है? सच तो यह है कि प्रदूषण हो या पर्यावरण असंतुलन. पहले उसकी शुरुआत मनस् से होती है. तो क्या वैचारिक प्रदूषण भी कोई चीज है? समाज में ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो बिल्ली के रास्ता काटने पर यात्रा स्थगित कर देते हैं. भले ही बिल्ली के रास्ता काटने पर कोई हादसा उसके या उसके किसी रिश्तेदार या परिचित के साथ कभी न घटा हो. अपशकुन एक तरह से सांस्कृतिक प्रदूषण का ही उत्पाद है. इस प्रकार की प्रदूषित धारणाएं प्रायः हमारे निर्णयों को प्रभावित करती हैं. आदमी के लिए संभव नहीं कि हर समय जरूरत पड़ने पर वह किताबी ज्ञान का सहारा ले. किताबों में सब कुछ एकाएक उपलब्ध हो जाए, यह भी संभव नहीं है. इसलिए जरूरत पड़ने पर वह अपने पूर्वजों के अनुभवों, परंपराओं, रीतिरिवाजों या पुराने जमाने से चली आ रही धारणाओं का सहारा लेता है. उनमें से कुछ प्रदूषित यानी अपशकुन जैसी भी हो सकती हैं. भारत जैसे परंपरापोषी समाजों में धारणा के शुद्धीकरण, परंपराओं के विवेकीकरण की रफ्तार बहुत धीमी रही है. कभीकभी तो सुधार में नकारात्मक गति भी देखी जाती है, जिसके अनुसार यदि हम चार कदम आगे चलते हैं तो कुछ अवधि बीत जाने के बाद उतना पीछे भी लौट आते हैं. इस पर विचारकर सुधार की गति को बढ़ाने के बजाय कई बार तो इतिहास को पिछली दिशा में मोड़ने के प्रयास भी चलते रहते हैं. उसको संस्कृति से जोड़कर महिमा मंडित किया जाता है. परिणामस्वरूप विवेकीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है. पर्यावरण असंतुलन को बनाए रखने में वैचारिक प्रदूषण का योगदान काफी है. दूसरे शब्दों में पर्यावरण असंतुलन का मसला, आरोपित पवित्रता को वास्तविक पवित्रता या शुद्धता मान लेने का मसला भी है.

पवित्रता की अनुभूति तभी संभव है, जब हम उसको गहराई से जानते हों. हमें उसकी शुद्धता पर पूरापूरा भरोसा हो. यदि हम ऐसा नहीं करते, तो केवल नाटक कर रहे होते हैं. यदि लोग मान लें कि गंगाजल की पवित्रता उसकी शुद्धता पर निर्भर है. अशुद्ध होते ही नदी अपवित्र भी हो जाती है, तो वे केवल खुद पर नियंत्रण रखेंगे, बल्कि दूसरों पर लगाम लगाने का काम करेंगे. यदि नदियों में शव बहानेवाले जान लें कि स्वर्गनर्क महज मिथ हैं और नदियों में शव जलाने से पितरों की मुक्ति की भ्रांत धारणा के कुछ नहीं मिलने वाला. तो वह नदी तट पर शव बहाने, चिता की राह प्रवाहित करने, मुंडन संस्कार आदि से प्रदूषण बढ़ाने से बच सकते हैं. संस्कृति प्रेमी कह सकते हैं कि मिथों पर प्रहार करने से क्या संस्कृति आहत नहीं होती? तो हमें यह मान लेना चाहिए कि सांस्कृतिक मिथ हमेशा एक जैसी भूमिका में कभी नहीं रहते. समय के साथ उनमें बदलाव आता रहता है. वेदों में इंद्र को जुझारू नेता, योग्य नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है. वह दौर कामसंबंधों में अपेक्षाकृत खुलेपन का था. इसलिए इंद्र की कामलोलुपता, सत्ता चले जाने का भय और उसे बचाए रखने के लिए किए जानेवाले अनाचार, वैदिक संस्कृति के अनुयायियों के लिए बहस या चिंता का मुद्दा नहीं थे. चिंता का मुद्दा वे तब बने जब पारिवारिक संस्था को मजबूत करने की बात चली और मुक्त भोग पर अंकुश लगाया जाने लगा. उसके फलस्वरूप इंद्र को शीर्ष स्थान से बेदखल होना पड़ा. उसका स्थान ऐसे देवता लेने लगे जो सयंमित कामसंबंधों का समर्थन करते थे.

पर्यावरण सामान्य नैतिकता का विषय है. नैतिकताओं के क्षरण से ही जन्मा है. यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण की प्राचीन संस्कृतियों को याद करते हुए हम प्रायः भावुक हो जाते हैं. दावा करने लगते हैं कि उस युग में आदर्श ही आदर्श था. उनके चलते यदि कोई यह सोचे कि पर्यावरण संरक्षण संस्कृति की दुहाई देने से हो सकता है, तो वह गलत है. मनुष्य का नैतिकताबोध राष्ट्रीयताबोध से अलग नहीं है. इसलिए यह राज्य का भी सवाल है. और यदि वह राज्य का सवाल है तो विधि का सवाल भी है. तदनुसार पर्यावरण असंतुलन की समस्या से निपटने के दो रास्ते हैं. पहला यह कि सरकार बेहद सख्त कानून बनाए और पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध ठोस कार्रवाही करे. यह कार्य सरकार को असीमित अधिकार देकर किया जा सकता है. मगर इससे सरकार के अत्यंत शक्तिशाली हो जाने का खतरा है. जबकि लोकतंत्र में एकमात्र जनता को शक्तिशाली नजर आना चाहिए. इसलिए दूसरा रास्ता लोकजागरण और समाज के विवेकीकरण का है. वह लंबा रास्ता है. उसके लिए संस्कृति, उत्पादन, राजनीतिक और समाज, यानी प्रत्येक स्तर पर लोगों को विश्वास दिलाना पड़ेगा कि पर्यावरण असंतुलन पूरी मनुष्यता के लिए चुनौती है. वर्तमान परिस्थितियों में आसान एक भी नहीं है. तो भी उदारमना लोग दूसरे रास्ते का ही चयन करेंगे. यही उचित भी है.

© ओमप्रकाश कश्यप

परीकथाएं : नींव की तलाश

पुराकथाओं के ईश्वर और देवता प्राचीन काव्य तक आतेआते अर्धदेवता (यक्ष) का रूप ले चुके थे. यही यक्ष कालांतर में पुनः रूपांतरित होकर शिशु कथाओं में मुख्य प्रेरणादायी चरित्र के रूप में वर्णित किए गए. — मैक्स मुलर.

भारतीय संस्कृति और साहित्य में परीकथा की स्वतंत्र अवधारणा नहीं है. ‘परी’ शब्द बाहर से आयातित है. इसकी ऐतिहासिकता और मूल की खोज के बारे में हम कुछ देर बाद विचार करेंगे. यहां इतना जान लेना पर्याप्त होगा कि जिन्हें परीकथाएं कहा जाता है, उनमें ‘परी’ नामक पात्र की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है. क्या आरंभ से ही ऐसा था? अथवा कालांतर में जब विद्वानों को लगा कि मनुष्य अपनी सहजस्वाभाविक वृत्ति से जड़वस्तुओं का मानवीयकरण करता रहता है; तथा ‘परी’ पशुपक्षियों के मानवीयकरण का ही रुपहला बिंब है? और पशुपक्षियों को पात्र बनाकर कहानी में वैसी ही संवेदना, वैसा ही न्यायबोध, वैसा ही उपकारी भाव, वैसा ही चामत्कारिक प्रभावजैसी परीकथा द्वारा अपेक्षा की जाती है, पाठक के मनस् में बहुत पहले से बनाया जाता रहा है. तब उन्होंने दोनों को एक माना. फलस्वरूप उन्हें ऐसे कथानकों को भी परीकथा में सम्मिलित करना पड़ा, जिनमें कल्पना के अतिरेक द्वारा मनुष्य तक एक नीतिपरक संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई हो. अथवा क्या इसका उल्टा हुआ था? यानी भारत और यूनान में सहस्राब्दियों से लिखी जा रही नीति और व्यवहार पर आधारित पशुपक्षियों की कथाएं समुद्रों, पहाड़ों, नदियों और रेगिस्तानों की हजारों किलोमीटर लंबी दूरी तय करने के उपरांत जब अरब देशों में पहुंची तो वहां के निवासियों ने उनमें पशुपक्षी जैसे ‘तुच्छ प्राणियों’ की जगह कल्पनानिर्मित सौंदर्यमूर्ति परियों को, जिनका आधा शरीर पक्षी का था और शेष मनुष्य का थास्थानापन्न कर लिया. परियों के साथ सरोवर, हंस, समुद्र, नदी, झरने, गीतसंगीत आदि की कल्पना स्वाभाविक रूप से की जाती रही है. तो क्या यह अरब और सहारा के रेगिस्तान में रहनेवाले, कठिन जीवन जीने वाले जांबाज कबीलों की मानसकल्पना थी, जिसके माध्यम से वे अपने जीवन के सबसे बड़े अभाव की, हरियाली और खुशहाली की, फंतासी के माध्यम से ही सहीपूर्ति कर लेना चाहते थे. बहरहाल, यदि ‘परीकथा’ जैसे इस विषय के लिए रूढ़ हो चुके शब्द को छोड़ दिया जाए तो जिस तरह की कहानियां इस श्रेणी के अंतर्गत लिखीपढ़ी या सुनीसुनाई जाती हैंउन्हें ‘अजरज कथा’, ‘कौतुक कथा’ अथवा ‘विचित्र कथा’ कहना भी अनुपयुक्त न होगा. ये अचरज कथाएं इसलिए कहलाईं क्योंकि इनमें तुच्छ, नाकुछसे पात्र सबकुछ करते हुए पाए जाते हैं. कई बार तो उनके कारनामे इतने विचित्र होते हैं कि सुननेपढ़ने वाले लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं. इनकी दूसरी विशेषता मानवीय संवेदना और मानवीय सरोकार हैं. वही इन्हें साहित्य का दर्जा प्रदान करते हैं. कुल मिलाकर कथासाहित्य का इतिहास बहुत पुराना और विविधताओं से भरा है.

प्राचीन कथासाहित्य को वर्गीकृत करते समय विद्वान उसे मुख्यतः चार श्रेणियों में रखते आए हैं

1. लोक कथा (Marchen)

2. पशुपक्षी कथा (Fables)

3. कल्पित कथा (Myths)

4. अद्भुत या अचरज कथा (Fairy Tales)

हमने ऊपर के विश्लेषण से देखा लोककथाओं की उपस्थिति तब से है, जब से मनुष्य ने बोलना सीखा. संवादन की कला उसे आई और भाषा नामक अभिव्यक्ति का प्रमुख हथियार उसके हाथ लगा. दूसरे शब्दों में लोककथा कहानियों का वह विशाल महासागर है, जिसमें पशुपक्षी कथा, कल्पित कथा, अद्भुत कथा या अचरज कथा सभी सम्मिलित हो सकती हैं. यह वहां तक लहराता है, जहां तक मानवसंस्कृति की सीमा है. यह वहांवहां जा सकता है जहां मानवकल्पना आजा सकती है. लोककथाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनका कोई रूप स्थिर नहीं होता. प्रत्येक समाज, अपनी आवश्यकता, रुचि, परिवेश यहां तक कि दक्ष किस्सागो भी अपनी मर्जी से इनमें इच्छानुसार फेरबदल कर लेता है. शर्त यह है कि ये समाज के साथ घुलीमिली होनी चाहिए. कोई भी विश्वास जो समाज की मान्यताओं से हटकर हो, उन्हें चुनौती देता हो, यदि किसी कहानी में आता है तो वह लोककथा के रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती. दूसरे शब्दों में समाज के सामूहिक विश्वास से टकराकर लोककथा बन ही नहीं सकती. इनकी सर्वस्वीकार्यता के आधार पर कभीकभी इन्हें लोककथाओं के साथसाथ ‘लोकप्रिय कथाएं’ भी कह दिया जाता है. यह विशेषण भी सर्वथा उचित है. लोककथाओं अथवा लोकप्रिय कथाओं की दूसरी शर्त मनोरंजन है. चूंकि लोककथाएं अकसर सुनीसुनाई होती हैं. हम उन्हें कईकई बार सुन चुके होते हैं. इसके बावजूद वे भरपूर मनोरंजन करने में कामयाब रहती हैं तो इसलिए कि उन्हें सुनानेवाला अवसर के अनुकूल कथानक में सुधार करने तथा उन्हें अपनी तरह से प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र होता है. इसी से उसकी प्रतिभा की पहचान होती है. अपने मनोरंजनसामर्थ्य के आधार पर ही ये एक कान से दूसरे कान तक निर्बाध यात्रा करती रहती हैं. इनकी तीसरी शर्त है भौगोलिक परिस्थितियों से अनुकूलन की क्षमता. एक दूरी के बाद समाज के रीतिरिवाज बदल जाते हैं. बोलीबानी, खानपान, जीवनशैली और आचारविचार में परिवर्तन आ जाता है. अच्छी लोककथा वह होती है जो बदली परिस्थिति के अनुरूप तत्काल खुद को ढाल ले. चतुर किस्सागो इसे कुशलतापूर्वक अंजाम देते हैं. उदाहरण के लिए एक लोककथा का नायक यदि पश्चिमी उत्तरप्रदेश में खीरपूरी की दावत पसंद करता है, तो वही लोककथा जब बंगाल में पहुंचेगी तो उसके नायक का खानपान भी बदल जाएगा. उसके प्राण खीरपूरी के बजाय मछलीभात में बसने लगेंगे. प्रत्येक चरअचर प्राणी, वस्तु या विचार जो लोक की कल्पना की विषयवस्तु है, वह लोककथा का पात्र भी बन सकती है.

पशुपक्षियों की कहानियों का निकास लोककथाओं से ही हुआ है. लेकिन लोककथाओं में जहां सामाजिक आचारविचार और व्यवहार की कहानियां भी सम्मिलित होती हैं, वहीं कथापात्र के रूप में पशुपक्षियों का उपयोग पाठकश्रोता तक विशेष नैतिकव्यावहारिक संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता है. मनुष्य समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ है. उससे अपेक्षा की जाती है कि अपने श्रेष्ठत्व को आदर्शों के अनुपालन तथा आचरण की पवित्रता से सिद्ध करे. इस काम में वह प्रायः चूक जाता है. मनुष्य को उसकी चूक की ओर ध्यान दिलाने, उसे उसका मनुष्यत्व लौटाने के लिए कहानियों की जरूरत पड़ती है. खूब सोचसमझकर विद्वानों ने पशुपक्षी की कहानियों को चुना है. संदेश यही था कि जब पशुपक्षी आदर्श और नैतिकता से भरा जीवन जी सकते हैं, मर्यादापूर्ण आचरण कर सकते हैं, स्वार्थ त्यागकर परहित में बलिदान कर सकते हैं, तो मनुष्य क्यों नहीं? फिर मानवीय पात्रों के माध्यम से उच्चादर्श की बात की जाए तो कदाचित वह अविश्वसनीय जान पड़ेगी. प्रतिक्रियास्वरूप लोग उसकी चारित्रिक कमजोरियां खोजने लगेंगे. पशुपक्षियों के मामले में इस तरह की बहसबाजी की गुंजाइश नहीं रहती. वे वैसे ही मनुष्य से कमतर माने जाते हैं. कहानी पूरी होतेहोते उसके पात्र नेपथ्य में चले जाते हैं. रह जाता है वह संदेश जिसके लिए लेखक ने उसे रचा है. पाठकोंश्रोताओं को आमंत्रित करता हुआ. पशुपक्षियों को कथापात्रों में ढालकर नीति संदेश का वाहक बनाने के पीछे यही दर्शन काम करता है. ऋग्वेद में सरमा नामक कुतिया पणियों को पशुधन का व्यापार न करने को कहती है. पणि उसे डराते हैं, प्रलोभन देते हैं, मगर वह अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटती. उपनिषदों में पशुपक्षी अध्यात्मचर्चा करते हुए पाए जाते हैं. कालांतर में पशुपक्षियों का उपयोग व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा देने हेतु भी किया जाने लगा. महाभारत में पशुओं की नीति और व्यवहार बोध दोनों ही प्रकार की कहानियों की बहुतायत है. जातक ग्रंथों में बोधिसत्व के पूर्वजन्मों की गाथा सुनाते समय जीवजंतु अनायास ही आ गए हैं. वे सभी किसी न किसी रूप में उच्च सामाजिक आदर्श हेतु काम करते हुए नजर आते हैं. इस मामले में ‘पंचतंत्र’ बेमिसाल है. उदंड राजकुमारों को व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए लिखी गई इन कहानियों ने शताब्दियों तक न केवल बच्चों, बल्कि बड़ों का भी मानसनिर्माण किया है.

जो सच नहीं है लेकिन मन उसको सच माने, उसके साथ सच होने जैसा व्यवहार करे और उसके सच होने की भ्रांति लगातार पाले रहेवह मिथक है. दूसरे शब्दों में मिथक समाज की ऐसी कल्पनाएं हैं, जिन्हें वह साथ लिए चलता है और जो उसकी चेतना को अभिव्यक्त करती हैं. विशुद्ध कल्पना यानी मिथ पर आधारित कहानियां किसी भी समाज की धार्मिकसामाजिक चेतना का आधार होती हैं. इनकी खूबी होती है कि विशुद्ध कल्पनामय होकर भी उन्हें परमयथार्थ या यथार्थ से ऊपर होने का सम्मान इन्हें मिलता है. समाज सामूहिक विवेक के साथसाथ सामूहिक विश्वास से भी चलता है. और सामूहिक विश्वास को बनाए रखने में मिथकों की बड़ी भूमिका होती है. इसलिए रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद्, स्मृति आदि ग्रंथों में मिथक पर आधारित आख्यान खूब आए हैं. मिथक का अस्तित्व भले न हो परंतु समाज उन्हें सही मानता है. उनके संदेश को आप्तआदेश की भांति लेता है. इसलिए जीवंत समाजों में, विशेषकर वहां जहां भारी समाजार्थिक असमानता हो, लोग उससे पूरी तरह अनुकूलन कर चुके हों, मिथकों का बड़ा महत्त्व होता है. पुष्पक विमान, वानरों द्वारा रावण सेना से युद्ध करना, कृष्ण का उंगली पर गिरिराज पर्वत को उठा लेना या दो मुट्ठी चावल के बदले मित्र सुदामा को दो लोकों का राज्य थमा देनासब मिथकीय आख्यान हैं. पशुपक्षियों की कहानियों और मिथकीय आख्यान के संदेश संप्रेषण में अंतर है. पशुपक्षियों की कहानियों में रचना समाप्त होते ही पात्र नेपथ्यगामी हो जाते हैं. पाठक के मनमस्तिष्क पर केवल उसका संदेश छाया रहता है. वही रचना का सारत्व है या जिसके लिए कोई कलमकार कलम उठाता है. वहां साधारण पात्रों के माध्यम से असाधारण संदेश सामने आता है. इसी में पशुपक्षी की कहानियों की महत्ता है. मिथकीय आख्यान में पात्र अवास्तविक होते हुए भी लोकविश्वास में जीवित होते हैं. लोकश्रद्धा ही उन्हें शक्तिशाली बनाती है, और लोकआस्था पर सवार होकर वे विराट रूप धारण कर लेते हैं. ऐसे में उनके माध्यम से जो संदेश दिया जाता है, लोक उसका आकलन विवेक के बजाय आस्था के आधार पर करता है. फलस्वरूप साधारण संदेश भी असाधारण प्रतीत होने लगता है. लोकश्रद्धा की संजीवनी मिथकों को मरने नहीं देती. किंतु मिथकों के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास के अतिरेक में कई बार वह वास्तविकता से परे चला जाता है. तो कई बार इसका लाभ उठाने के लिए ऐसी शक्तियां भी आगे आ जाती हैं, जिनका ध्येय मिथकों के माध्यम से अपने वर्गीय मनसूबे साधना होता है. वह मिथकों की लोकप्रियता का लाभ उठाकर उनके माध्यम से ऐसे विचार और कर्मकांड समाज पर थोपने में कामयाब हो जाती हैं, जिनसे समाज में वर्गविभाजन को मान्यता मिलती है. शीर्षस्थ धार्मिक शक्तियां लोकप्रिय धर्मग्रंथों में लोकप्रिय मिथकों को नएनए अवतार के रूप में पेश करती हैं. ऐसे मिथकों के माध्यम से रची गई कहानियां समाज में विवेक और नीति के बजाय लोकविश्वास को सींचने का ही काम करती हैं.

चौथी श्रेणी में आनेवाली अद्भुत कथा या अचरज कथाएं इस पुस्तक का प्रतिपाद्य विषय हैं. इनमें कल्पना पर कोई बंदिश नहीं होती. कल्पना के लिए दशों दिशाएं मिथक में भी खुली होती हैं. मगर वहां पाठक स्वयं उन्हें कल्पना मानने को तैयार नहीं होता. उनके प्रति गहरे विश्वास और आस्था के चलते वह मान लेता है कि वे सत्य हैं. भले ही उसने या किसी और ने उस सच को कभी देखापरखा न हो. इस तरह मिथक कथा में पाठक एक पूर्वाग्रह के साथ कहानी को ग्रहण करता है. परिणामस्वरूप वह साहित्य के प्रमुख कर्म; यानी पाठक के विवेकीकरण के लक्ष्य से दूर रह जाती है. अद्भुत कथा में वैसी कोई बाध्यता पाठक के समक्ष नहीं होती. वहां पाठकश्रोता भी लेखककिस्सागो के साथ कल्पना की उड़ान भरने को स्वतंत्र होते हैं. अचरज कथा में पशुपक्षियों, जड़ वस्तुओं को अविश्वसनीय आचरण करते हुए दिखाया जाता है, जिससे पाठक हैरान हो जाते हैं. उदाहरण के लिए पेड़पौधों और पत्थरों का बोलना, पहाड़ों का फिरना, पशुपक्षियों का मनुष्यवत आचरण करना आदि. वह कल्पना की दुनिया है, वास्तविकता से परे. इस कल्पना को साहित्य की गरिमा दिलाता है, साहित्यत्व अथवा वह संदेश जिसे कोई लेखक लोककल्याण की वांछा के साथ अपने पाठक तक पहुंचाना चाहता है. प्रत्येक साहित्यिक रचना के दो हिस्से होते हैं. पहला रचनात्मक पक्ष जो लेखक द्वारा संपन्न किया जाता है. दूसरा उस प्रभाव के रूप में, जो साहित्यिक रचना पाठक के मनमस्तिष्क पर मनोरंजन के सहउत्पाद के रूप में अंकित होकर उसका नवसंस्करण करने का प्रयास करता है. पाठकश्रोता सामान्यतः मनोरंजन की चाहत में कहानी के पास आते हैं. वे भलीभांति जानते हैं कि रचना के सभी पात्र और घटनाक्रम काल्पनिक हैं, उनका वास्तविकता से कोई निकट संबंध नहीं है. अब यह लेखक या किस्सागो पर निर्भर करता है कि पाठकीय मनोरंजन की इच्छा को पूरा करते हुए अपने श्रोतापाठकों को मनोरंजन से अतिरिक्त कुछ अन्य भी दे, जिसके आधार पर उसका साहित्यकर्म सध सके. पाठक और श्रोता को भी उससे मनोरंजन के अतिरिक्त भी कुछ प्राप्त होने की उम्मीद होती है. परियों, पशुपक्षियों, जादूटोने की कहानियां इसी श्रेणी में आती हैं.

यहां समझना होगा कि परीकथा या फेयरी टेल्स दोनों ही आयातित संज्ञाएं हैं; और जिन पंचतंत्र, हितोपदेश आदि की कहानियों के आधार पर पश्चिम के विद्वान भारत को परीकथाओं का आदिदेश होने का गौरव प्रदान करते हैं, स्वयं भारत में उन रचनाओं को ‘परीकथा’ अथवा ‘फेयरी टेल्स’ कहने की हिचक रही है. इसके बजाय भारतीय ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ की रचनाओं को ‘नीतिकथा’ अथवा ‘बोधकथा’ कहने में गौरवान्वित होते हैं. ‘पंचतंत्र’ की कहानियों को तो भारतीय विद्वानों का बड़ा वर्ग नीतिकथा ही मानता आया है. पंचतंत्र की तो रचना ही उद्दंड राजकुमारों को सही राह दिखाने के लिए की गई थी. ‘हितोपदेश’ के रूप में ‘पंचतंत्र’ की कहानियों का पुनःलेखन नारायण पंडित ने बंगाल के राजा धवलचंद्र के कहने पर किया था. उनका भी मानना था कि हितोपदेश में संकलित कहानियां बच्चों के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होंगी. हितोपदेश की प्रस्तावना में लिखा है कि इन बालोपयोगी रचनाओं में कथारूप में नीतिरहस्यों को समझाया गया है. जिन दिनों विश्वसमाज स्वतंत्र बालसाहित्य की अवधारणा से दूर था, बालक को बड़ों का लघुसंस्करण मानने की भ्रांति प्रायः हर देश और समाज में थी, उस समय केवल बच्चों को ध्यान में रखकर कथालेखन करना, बड़ा जीवट और दूरदर्शिताभरा कार्य था. भारतीय होने के नाते हम इसपर गर्व कर सकते हैं कि ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ दोनों ही के रचनाकारों की दृष्टि बालक पर थी. शायद तभी वे अपने समय की इन क्लासिक कृतियों का प्रणयन कर सके.

अब तक के वर्णन से स्पष्ट है कि अद्भुत कथापात्रों एवं कथानकों को लेकर कहानियां लिखने का समय तो पुरावैदिक काल से ही आरंभ हो चुका था, किंतु उससे पहले वे या तो किसी धर्मग्रंथ का हिस्सा थीं, अथवा किसी महाकाव्य का. उनका उपयोग एक दृष्टांत की भांति होता था. पंचतंत्रकार ने संभवतः पहली बार कहानी की महत्ता को उसी के स्तर पर स्वीकारा था. पहली बार ऐसी कहानियां लिखी गई थीं, जिनमें भरपूर कहानीपन था और संदेश उसके पीछे चुपकेचुपके, प्रच्छन्न रूप में आता था. इसलिए यदि भारत को परीकथाओं का मूलदेश माना जाए तो परीकथाओं के इतिहास को पंचतंत्र से आरंभ करना पड़ेगा. लेकिन भारतीय विद्वान इसके लिए शायद ही राजी होंगे. इसका कारण भी है. महाभारत, पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक कथाएं आदि जिन ग्रंथों के आधार पर पश्चिमी देश भारत को परीकथाओं का आदिदेश होने का श्रेय देते आए हैं, वे इस देश के संस्कृतिकरण के अनुप्रेरक एवं साक्षी रहे हैं. बहरहाल, इस बारे में कोई राय बनाने से पूर्व उचित होगा कि ‘परी’ और ‘फेयरी’ जैसे शब्दों पर भी विचार कर लिया जाए, जिनपर हमारा विमर्श टिका है.

परीकथाओं का उद्गम

पार्शियन शब्द ‘परी’ और अंग्रेजी शब्द ‘फेयरी’ परस्पर समानार्थी हैं. हम यहां दोनों पर क्रमानुसार चर्चा करेंगे. लेकिन शुरुआत ‘परी’ से करनी होगी. इसलिए कि ‘परी’ से ‘परीकथा’ तक की जो यात्रा है, लगभग वैसी ही यात्रा ‘परी’ से ‘फेयरी’ के बीच भी है. ‘परी’ शब्द ऐतिहासिकसांस्कृतिक संदर्भ लिए हुए है. समय के साथ ‘परी’ के निहितार्थ तथा उसके चरित्रांकन में बदलाव आया है. आरंभिक ग्रंथों में इस शब्द का जो रूप मिलता है, बाद के ग्रंथों में संदर्भ एकदम बदल जाते हैं. दरअसल ‘परी’ शब्द की जड़ें पर्शिया की संस्कृति में इतनी गहरी हैं कि केवल इसी विषय को लेकर स्वतंत्र ग्रंथ की रचना की जा सकती है. किसी साहित्यिक कृति में ‘परी’ शब्द की सबसे पहली दस्तक फिरदौसी के ‘शाहनामा’ में दिखाई पड़ती है. फिरदौसी इस शब्द का न केवल उपयोग करते हैं, बल्कि ‘परी’ को उसके ऐतिहासिक संदर्भों से काटकर नए चरित्र में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं. अपनी मौलिक कल्पना से वह इस कथापात्र के संदर्भ तक बदल देते हैं. फलस्वरूप परी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनता हुआ दिखाई पड़ता है. ‘शाहनामा’ राजाओं के राजा खेमुर(Keyumars) की कहानी है. ग्रंथ के आरंभ में ही पार्शियन ज्ञान की देवी शोरुश(Soursh, जो सरस्वती की समकक्ष है) दुनिया के पहले मनुष्य तथा अहुरमज्द के अनुयायी सम्राट ‘खेमुर’ तथा उसके बेटे के पास परी के रूप में उपस्थित होकर उन्हें असुरसम्राट ‘अहिरमान’ की ओर से सावधान करती है.

संदर्भ को जानने के लिए फारस के सांस्कृतिक इतिहास में झांकना पड़ेगा. प्राचीन पर्शियावासी छोटेछोटे गांवों में रहनेवाले सीधे और मेहनतकश लोग थे. जीवनयापन के लिए वे पशु पालते. आवश्यकता पड़ने पर संगठित होकर शिकार करते थे. उनका दिन अजरबेजान की ऊंचीनीची, घुमावदार पहाडि़यों पर बीतता था. सीधेसाधे लोग दिनभर की थकान के बाद जब एक स्थान पर होते तो आपस में तरहतरह की चर्चाएं करते. धूसर पहाडि़यों से धूप टकराती तो प्राकृतिक वैभव और भी निखर उठता था. पूरा इलाका सूरज की तेज गरमाहट से भरा रहता था. तेज धूप, प्रकाश और वातावरण प्राकृतिक संपदा से समृद्ध हो तो उस पर गर्व स्वाभाविक है. तो पार्शियावासियों को भी अपने देशधरती पर गर्व था. उन्हें विश्वास था कि उनपर परमात्मा की विशेष अनुकंपा है. वे मानते थे कि महान ईश्वर ने उन्हें अच्छे कार्यों के निमित्त पैदा किया है. जबकि पहाड़ के दूसरी ओर उत्तर दिशा में बसे लोगों के बारे में उनकी राय एकदम अलग थी. वे उन्हें मानवीय सभ्यता, सुख और शांति का दुश्मन मानते थे. उनका मानना था कि पहाड़ के दूसरी ओर बसनेवाली जातियां न केवल सभ्यता; बल्कि मानवीय सरोकारों के बारे में भी उनसे भिन्न विचार रखती हैं. उनका पक्ष अन्याय और अनाचार का पक्ष है. पहाड़ की उत्तर दिशा में बसने वाली जातियों का भी पार्शियावासियों के प्रति कुछ ऐसा ही विचार था. परिणामस्वरूप दोनों के बीच सांस्कृतिक श्रेष्ठता को लेकर स्पर्धा की भावना थी, जिससे संघर्ष की स्थितियां बनती ही रहती थीं. पहाड़ पर चरते हुए पशु यदि भूल से भी दूसरी ओर निकल जाते तो इसका दोष उस ओर के कबीले पर थोप दिया जाता था. कालांतर में सांस्कृतिक स्पर्धा और छोटेमोटे संघर्ष स्थायी दुश्मनी का रूप लेने लगे. वैदिक समाज जैसे सुर और असुर में बंटा हुआ था, वैसे पार्शियावासियों को भी लगता था कि उनका देश रोशनी का देश है और यह रोशनी उन्हें देवता अहुरमज्द(संस्कृत में असुरमेधा) से प्राप्त होती है. जहां प्रकाश है वहीं स्वर्ग है. वे स्वयं को महान देवता अहुरमज्द की संतान मानते थे, जिनकी सेवा में अनेक सहायक देवीदेवता और गणप्रतिनिधि हैं.

उनका विश्वास था कि अजरबेजान पर्वतमाला के दूसरी ओर जहां अंधियार की राजधानी है, वहां का सम्राट अहिरमान है. वह दुराचारी और मानवीय सभ्यता का दुश्मन तथा अपनी ही तरह की बुरी ताकतों से घिरा रहता है. पार्शियन संस्कृति में अहिरमान का उल्लेख ‘असुर सम्राट’ के रूप में हुआ है, जो वहां की दैवी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है. उसके अधीन दीव(दैत्य) और परियों की भारी सेना है. परियां दीव की अपेक्षा उदार हैं, किंतु अपनी जादुई ताकत से दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाने का सामथ्र्य रखती हैं. प्रकाश और अंधियार की प्रतीक सत्ताओं के बीच युद्ध होता रहता था. बहरहाल, सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए लगातार चलने वाले लंबेलंबे युद्धों के बाद अंततः अंधकार सम्राट की पराजय हुई. अहुरमज्द के नेतृत्व में प्राप्त जीत को शांति और खुशहाली के प्रतीक प्रकाशसम्राट की विजय माना गया. अन्याय पर न्याय की, असत्य पर सत्य की, अंधकार पर प्रकाश की जीत का गुणगान कविगण सदियों से करते आए हैं. पार्शियन इसका आदि उदाहरण अहुरमज्द की अहिरमान पर विजय को मानते थे. अहुरमज्द और अहिरमान यानी अच्छाई और बुराई का युद्ध ही परीकथाओं की आत्मा है. अपने मूल में परीकथाएं अच्छाई और बुराई के संघर्ष के बीच अच्छाई की जीत का भरोसा दिलाती हैं, जिन्हें आगे चलकर कवियों, कहानीकारों और इतिहासकारों ने अपनीअपनी प्रतिभा से संवारा है. परीकथाओं में राक्षस की मौजूदगी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना यह विश्वास कि उसे परास्त किया जा सकता है. कुछ विद्वान ‘पर्शिया’ से ‘परी’ का उद्गम मानते हैं; यानी वह जो अहुरमज्द की संतान हैं. जिनका रास्ता सचाई और नेकनीयती का है. परीकथाओं में उन्हें जिस प्रकार अच्छाई की समर्थक, नेकनीयत, उदार और जरूरतमंदों की मदद करते हुए दिखाया जाता है, उससे उनका दावा पुष्ट होता है. स्मरण दिला दें कि अंधकार पर प्रकाश की जीत की कामना केवल पार्शिया की संस्कृति की विशेषता नहीं थी. भारत में भी वेदों में ‘तमसो मा ज्योर्तिमय गमय’ की कामना की गई है.

कुछ विद्वान ‘परी’ शब्द की व्युत्पत्ति ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में जन्मे पर्शिया सम्राट अर्ताक्सरस की पत्नी ‘परीस्तिस’ से मानते हैं. वे इस शब्द का अनुवाद ‘परीजाद’ यानी ‘परी की संतान’ के रूप में करते हैं. लेकिन ‘अवेस्ता’ तथा अन्य आरंभिक ईरानी धर्मग्रंथों में ‘परी’ को बुरी ताकतों की सहायक, अंधियार की संगिनी आदि दर्शाया गया है. यह माना जाता है कि वे अकाल लाती हैं. पहले महिलाओं और बच्चों पर प्यार लुटाती हैं, फिर जादूगरनी के रूप में उन्हें छल लेती हैं. इसलिए परियों के स्वर्ग में प्रवेश की भी मनाही थी. इस विचार के समर्थकों के अनुसार परियां पहले अहिरमान के ही अधीन थी, जहां ‘दीव(दैत्य) का बोलबाला था. हालांकि ‘दीव’ तथा उस जैसी दूसरी बुरी ताकतों की अपेक्षा ‘परियां’ किंचित उदार स्वभाव वाली हैं. शायद इसीलिए ‘अहिरमान’ की सहायक बुरी ताकतें ‘दीव’ परी को परेशान करती हैं. वे उसे लोहे के पिंजड़े में कैद कर देती हैं. युद्ध में अहिरमान की पराजय तथा दीव के निरंतर उत्पीड़न से तंग आकर परियों का हृदयपरिवर्तन होता है. फलस्वरूप वे वहां से पलायन को विवश हो जाती हैं. बाकी इतिहास में वे अच्छाई का साथ देती हुई नजर आती हैं. फिरदौसी ने लिखा है कि परी खेमुर की सेना में सम्मिलित होकर अहिरमान के विरुद्ध युद्ध में उसकी मदद करती है. बुराई के विरुद्ध संघर्ष में वह अच्छाई की सहायक बनती है. कालांतर में परी को लेकर जनसमाज में जो नएनए किस्से गढ़े गए, उन सभी में परियों के बदले हुए रूप का प्रदर्शन था. ‘शाहनामा’ उनकी शुरुआत है. ‘शाहनामा’ में परी का उल्लेख कम से कम दो अन्य स्थानों पर भी हुआ है. ग्रंथ के ‘रुस्तम और शोहराब’ वाले खंड में घंूघट में रहने वाली रुस्तम की प्रेमिका तहमीना को ‘परी जैसे चेहरेवाली’ वाली बताया गया है. कह सकते हैं कि परी के अद्वितीय सौंदर्यशाली होने का मिथ जो आगे बना, उसकी शुरुआत भी ‘शाहनामा’ से हो चुकी थी. हालांकि वही परीकथाएं अधिक लोकप्रिय हुईं, जिनमें दैहिक सौंदर्य के साथ आंतरिक सौंदर्य और संवेदना पर बराबर जोर दिया गया हो. परीकथाओं की लोकप्रियता में उनकी आंतरिक एवं बाह्यः सुंदरता का बहुत बड़ा योगदान है.

शाहनामा का रचनाकाल 9771010 ईस्वी है. उस समय तक राजशाही पूरी दुनिया पर छा चुकी थी. बड़े साम्राज्य बनने का सिलसिला अर्से से जारी था, लेकिन अस्थायित्व बहुत ज्यादा था. समाज के संसाधनों पर शक्तिशाली सम्राट का अधिकार होता था. हर निर्णय राजा की मर्जी से निकलता और वहीं समाप्त हो जाता था. जनसाधारण शीर्ष पर बैठे लोगों का दबदबा देख मन ही मन उससे खिन्न था. लेकिन दिशाअभाव और आत्मविश्वास की कमी के कारण वह मुक्ति हेतु किसी चमत्कार की आस लगाए रहता था. आस्था से अनुप्रेत उनकी कल्पना मुक्ति के स्वागत हेतु नित नए बंदनवार सजाती थी. अपने मूल में परीकथाएं ऐसे ही असमानताकारी दौर की उपज हैं, जिनमें जनसाधारण का अपने शासकों से विश्वास क्षीण होने लगा था. जनता सामंतवादी अत्याचारों के आगे खुद को बेबस महसूस करती थी. परियां जनभावनाओं में दर्ज असंतोष, अन्याय के प्रतिकार की भावना को प्रतीक के रूप में अभिव्यक्त करती हैं. सत्ता की तमाम ज्यादतियों का विरोध, बुराई और अच्छाई का संघर्ष उनमें है, जिसमें परियों को अच्छाई की मदद करते, फलस्वरूप उसे जीतते हुए दिखाया गया है. कह सकते हैं कि परीकथाएं सामंतवादी अत्याचारों के प्रति जनसाधारण का पहला प्रतीकात्मक विद्रोह था. एक भावुक दार्शनिक, कवि के रूप में परी को नए संदर्भ के साथ बरास्ते ‘शाहनामा’ साहित्य में लाने के लिए फिरदौसी की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है. हालांकि धर्मग्रंथों और लोकश्रुति में ‘परी’ की आमद कम से कम दो सहस्राब्दी पहले हो चुकी थी.

परी’ शब्द के सजातीय अथवा समानार्थी के रूप में ‘पैरिका’( Pairika, Parikeh) नामक शब्द अवेस्ता के पुराने संस्करणों में शब्द आता है. उसका अर्थᅳ‘राक्षस, बुरी आत्मा, जादूगरनी, चुड़ैल, नाचगानेवाली’ आदि से लिया जाता है. इसके समानार्थी अथवा व्युत्पत्तित अन्य शब्द ‘परियां’(Paris) ‘पर’ (Parr) अथवा ‘पंख’, ‘परिंदा’(Parr) ‘परीरू’ (Pari-Ru) यानी ‘परी समान आंखें’ या ‘परीचेहरा’ (Pari-Chehreh) यानी ‘परी समान चेहरा’, पार्शियन भाषाओं और लोकसंस्कृति में आए हैं. ये सभी शब्द भारत में भी समानरूप से लोकप्रिय हैं. फ्रैड्रिक स्पीगेल ‘परी’ का उद्भव अवेस्ता से मानते हैं. वे अहिरमान की सेना का हिस्सा हैं. उनका काम अहिरमान को उकसाना, उसकी मिथ्या प्रशंसा करना है. ‘अवेस्ता’ में पैरिका अथवा परी को उनके दुराचरण के लिए कम से कम तीन बार दंडित करने का उल्लेख मिलता है. महमूद जाफरी देहाजी परियों की उत्पत्ति के लिए असुर सम्राट अहिरमान को जिम्मेदार ठहराते हैं. उनके अनुसार अहिरमान ने दुनिया पर कब्जे की लालसा से ‘काली ताकतों के योग से अनेक जादूगरनियां पैदा कीं.’ पंख होने के कारण वही परियां कहलाईं. अर्से तक उन्हीं की मदद से वह सम्राट अहुरमज्द से संघर्ष करता रहा. प्राचीन ईरानी ग्रंथों में परियों को सांप, चूहे, नागरानी आदि के रूप में जन्मता हुआ दिखाया गया है. सी. बाथला॓मी के हवाले से ‘पैरिका’ शब्द के मूल की ओर संकेत करते हुए सईदी पुनाय ताब्ताबई ने लिखा है कि Pairika शब्द Pariknaioi से निकला है. बाथला॓मी के अनुसार Pariknaioi पारसी लोगों के निकटवर्ती प्रदेश में रहनेवाले स्थानीय लोग थे, जिन्होंने पारसियों के युद्ध अभियानों में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. इन जनजातियों ने इरानियों के Parikane नामक शहर, जिसकी अपनी स्थानीयता संद्धिग्ध है, पर अधिकार में पार्शियन की मदद की थी. यदि इस परिकल्पना पर विश्वास कर लिया जाए तो ‘परी’ के बारे में पार्शियन का आरंभिक नकारात्मक सोच उस जनजाति के संपर्क में आने से पहले का, उनका पूर्वाग्रह हो सकता है, जो आत्मव्यामोह की शिकार बड़ी जाति, सभ्यता के स्तर पर पिछड़ी जनजाति से स्वाभाविक रूप से रखती है. बाद में जब Parikane नाम की जनजाति उनकी मदद के लिए आगे आती है, युद्ध में पर्शियावासियों के साथ मिलकर संघर्ष करती है, तो उसके प्रति मैत्रीभाव उमड़ना स्वाभाविक था.

इलिया गारशेविच ने अवेस्ता में वैदिक देवता ‘मित्र’ की स्तुति में आए पदों को ‘दि अवेस्तन हाइम्स टू मित्र’ में संकलित तथा अनूदित किया है. उसके दो मंत्रों के अनुसार देवता ‘मित्र’ को परियों की मदद करते हुए दिखाया गया है. उसके अनुसार मित्र ‘असुरों, दानवों, जादूगरनियों, उत्पातियों तथा वैदिक मंत्रों का सौदा करनेवालों के विरुद्ध संघर्ष में परियों की सहायता करते हैं.’ अवेस्ता के ‘एंदिदाद’ यानी ‘राक्षसों के विरुद्ध विधान’ नामक अध्याय में परियों के विरुद्ध युद्ध का आवाह्न किया गया है, क्योंकि वे ‘पृथ्वी, अग्नि, बैल, जल तथा वनस्पति’ की दुश्मन हैं.’ 1907 में अवेस्ता के कुछ हिस्सों का संस्कृत अनुवाद किया गया, जिसे अर्वद शैरार्जी दादाभाई भरुच ने संपादित किया था. उस अनुवाद में ‘पैरिका’ का अनुवाद ‘महाराक्षसी’ किया गया है. धार्मिक विश्वास हावी होने पर लेखन प्रायः पूर्वाग्रहों का शिकार हो जाता है. जो अपने मत का नहीं, उससे सम्मति की आस नहीं. इसलिए समझौते या संवाद की संभावना कम ही बनती है. यहां जो ‘सुर’ नहीं हैं, वे ‘असुर’ हैं. उनका असुर होना ही उन्हें सुरों का दुश्मन सिद्ध कर देता है. अतः उनसे सावधान रहने की, अवसर मिलते ही मिटा देने की जरूरत हैधर्म को संगठित शक्ति में ढालने की कोशिश में लगे प्राचीन आचार्यों का कुछ ऐसा ही विश्वास रहा है. ‘परी’ का अनुवाद ‘महाराक्षसी’ करने के पीछे उनकी संभवतः ऐसी ही भावना रही होगी. वरना प्राचीन पुराणों में जिन्हें पूर्वाग्रहग्रस्त होकर राक्षसी कहा गया है, को देखते हुए पार्शियन धर्मग्रंथों में परियों को लेकर जिस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं, भले ही कुछ स्थानों पर उन्हें अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महाव्याधि, सूखा, अकाल आदि का कारण बताया गया होवे भारतीय धर्मग्रंथों में वर्णित राक्षसियों के मुकाबले बहुत कम आतंकी हैं. अतः ‘पैरिका’ शब्द को ‘महाराक्षसी’ के रूप में अनूदित करना अनुचित है. परियों का सामान्य उल्लेख दूसरे ग्रह, नक्षत्र आदि से आए प्राणी के रूप में होता है. अपने पंखों के बल पर वे कहीं भी आजा सकती हैं. इसी को आधार मानकर ‘पैरिका’ शब्द का अनुवाद ‘दूसरे ग्रह से आई स्त्री’ के रूप में भी किया जाता है. अरबी में ‘पर’ को पंख का पर्याय माना गया है. इसी से पंखयुक्त प्राणी के रूप में परियों की कल्पना की गई है. अवेस्ता में अनेक शब्द संस्कृत से आए हैं. चूंकि भारतीय एवं ईरानी संस्कृति के बीच काफी साम्य है. दोनों के बीच आदानप्रदान का पुराना संबंध भी रहा है, अतएव कुछ विद्वान ‘परी’ शब्द को ‘परकाया’ से भी जोड़ते हैं, जो संस्कृत का शब्द है. जादुई ताकत से संपन्न परियां परकाया प्रवेश में दक्ष होती हैं. वे आसानी से रूप बदल सकती हैं. खुद को तत्क्षण दूसरों के रूपाकार में ढाल सकती है, इसलिए वह परी है. दारा शिकोह ने कुछ भारतीय उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था. चांद और नाइमी ने उनका संपादन किया है. उन्होंने भारतीय परंपरा में आए ‘यक्ष’ को, यह मानते हुए कि वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते, परियों की भांति उड़ सकते हैं, रूप बदल सकते हैंᅳ‘परी’ की श्रेणी में रखा है.

प्राचीन मनुष्य ज्ञान की सामग्री सीधे अपने परिवेश और प्रकृति से प्राप्त करता था. उसकी कल्पनाओं पर उसके नैमत्तिक अनुभवों का खासा योगदान रहता था. प्रकाश, जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु आदि उसके जीवन के सहायक थे. अतः कालांतर में जब प्रकृति की मूल शक्तियों के संरक्षकस्वामी के रूप में देवताओं की कल्पना की गई तो उनका नामकरण भी संबंधित प्राकृतिक शक्ति के नाम पर किया गया. तदनुसार सूर्य, चंद्र, वरुण, अग्नि, मरुत्, इंद्र आदि देवता कल्पित हुए. परी स्वयं एक ‘मिथ’ है. उसकी कल्पना में भी स्थानीय लोगों के प्राकृतिक अनुभवों के प्रभाव की पर्याप्त संभावना है. परीकथाओं में परी को सजासंवरा दिखाया जाता है. वे सामान्यतः श्वेत परिधान धारण करती हैं, बहुत कोमल होती हैं. उनकी ताकत शारीरिक बल में न होकर जादू में होती हैं. वे नाचगा भी सकती हैं. अपने पंखों के बल पर वे तितली की भांति उड़कर कहीं भी आजा सकती हैं. इस प्रेरणा का आधार ईरान, आर्मेनिया, तुर्की, इराक के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जानेवाली एक खूबसूरत तितली भी हो सकती है. ‘हिप्पार्शिया पेरिसतिस’ (Hipparchia parisatis) नाम की उस तितली का धड़ धूसर, रंग चट्टान से मेल खाता हुआ होता हैपंख झक सफेद, सुंदरता की पराकाष्ठा तक पहुंचे हुए. पर्वतों पर भेड़ चराने निकले पर्शियावासी इस तितली के अविकल सौंदर्य से प्रभावित थे. इसकी भी पर्याप्त संभावना है कि कालांतर में परी का जो रूपक बना अथवा धर्मग्रंथों से बाहर लाकर उसके उदार और कोमल रूपाकार की जैसी कल्पना की गई, उसके पीछे ‘हिप्पार्शिया पेरिसतिस’ नामक तितली के अविकल सौंदर्य की कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य रही होगी.

परीकथाओं का जन्मदाता होने का दावा अरब देश भी करते हैं. अच्छी और बुरी ताकत के रूप में पार्शियन सभ्यता में यदि ‘परी’ और ‘दैत्य’ लोकप्रचलित हैं तो अरब देशों में इन प्रकल्पित जीवों को क्रमशः ‘फरिश्ता’ और ‘जिन्न’ कहने की परंपरा है. अरब परीकथा साहित्य में जिनिस्थान का उल्लेख आता है. वह परियों तथा उनके सहायक ‘जिन’ अथवा ‘जिन्न’ यानी फरिश्तों का ठिकाना है. उनके अनुसार जिनिस्थान पृथ्वी से करीब 3200 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में अवस्थित है. उनका साम्राज्य छोटेछोटे अनेक राज्यों में बंटा हुआ है. उनके शहर सुंदर, आलीशान तथा बस्तियां सुखीसंपन्न और सजीसंवरी हैं. वहां खुशियों का ठिकाना है. जिनिस्थान की राजधानी जुहेरबाद(आभूषणों की नगरी) है. वहां शहद की नदियां हैं और हिल्लोर लेती खुशियां. जिन्न के अलावा ‘दीव’ भी परियों के समकक्ष अरबियन ‘मिथ’ है. एक मिथ के रूप में उसकी कल्पना अनेक धर्मग्रंथों एवं लोकश्रुति में प्राप्त होती है. कुछ स्थानों पर दोनों को एकदूसरे के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. ‘दीव’ को हम भूत अथवा प्रेत के समकक्ष भी मान सकते हैं. अरबी परंपरा के अनुसार दीव और परियों के बीच निरंतर युद्ध होता रहता है.

कुछ कहानियों में जिन्नों को बुरी आदतों के प्रतीक तथा मनुष्यता के दुश्मन के रूप में चित्रित किया गया है. अरबवासी मानते हैं कि किसी समय जिन्नों पर महान बादशाह सुलेमान का शासन था. उनकी बुरी आदत से तंग आकर परियों की मदद से प्रतापी सुलेमान ने उन्हें कैद कर लिया था. बाद में जिन्नों के दयायाचना करने तथा मदद का भरोसा दिलाने पर उनमें से उदार प्रवृत्ति के जिन्नों को आजाद कर दिया गया. परियों और ‘जिन्न’ के बीच संघर्ष का जिक्र लोकश्रुति में भी आता है. उसके अनुसार परियों ने जिन्नों को परास्त करने के बाद उन्हें वृक्षों पर टंगवा दिया था. इस मान्यता के अनुसार दुष्ट किस्म के जिन्न आज भी पिंजरे में बंद हैं. उन्हें दुर्गंध भाती है. खुशबू से वे दूर भागते हैं. एक मान्यता यह भी है कि सभी जिन्न बुरे नहीं होते. अच्छे और उदार प्रवृत्ति वाले जिन्नों को इस्लाम में ‘पिरी’(तुर्की में ‘परी’ या ‘पेरी’) कहा गया है. एक जगह परियों को ‘जिन्न’ के समान बताया गया है. ‘बिस्मिल्लाह’(अल्लाह के नाम पर) नामक अरब की एक प्रसिद्ध लोककथा है. उसमें बताया गया है कि जरथ्रुस्त द्वारा अवेस्ता का मंत्र उच्चारित करने से ‘पैरिका’ भाग जाती हैं. इस मान्यता में परी का प्राचीनतम चुड़ैल या जादूगरनी वाला रूप जिसे इस्लाम में ‘जिन्न’ कहा गया है, साफ नजर आता है. कुछ इस्लामी लोककथाओं में परियों को जादूगरनी और चुड़ैल बताया गया है. अरब में हातिमताई का किस्सा बहुत लोकप्रिय है. कहानी में जिस प्रकार चमत्कारों का सिलसिला है, उसके आधार पर यह एक लंबी और रोचक परीकथा है. इसके अलावा सिंदबाज जिहाजी, अरेबियन नाइट्स आदि ग्रंथ मोहक परीकथाओं से भरे पड़े हैं. आशय यही है कि परियों की लोकप्रियता को देखते हुए चतुर किस्सागो उनका उपयोग अपने रचनात्मक कौशल और लोकरुचि को देखते हुए, स्वतंत्रतापूर्वक करते रहे हैं.

प्रश्न उठता है कि ‘परी’ के मूल स्थान से लेकर पार्शियन और अरबवासियों में स्पद्र्धा हो तो उसकी प्रथम कल्पना का श्रेय किसे दिया जाए? लोकरुचि के अनुसार दोनों ही संस्कृतियों में परियों की एकसमान उपस्थिति है. लोककथाओं में भी लगभग बराबर का दखल है. दोनों ही जगह उन्हें अच्छाई और बुराई के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है. इसके बावजूद ध्यानपूर्वक देखा जाए तो परीकथाओं के मूलदेश की दावेदारी को लेकर बाजी पार्शियन के हाथ ही लगेगी. उनकी संस्कृति अरब संस्कृति से ज्यादा पुरानी है. था॓मस कीटले के अनुसार अरबवासियों की परीकथा संबंधी विचारधारा, उनपर सुदूर यहूदियों तथा पर्शियावासियों के तत्संबंधी विचारों के सम्मिलित प्रभाव से बनी थी, जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा और लगन के माध्यम से स्वतंत्र और मौलिक शैली का रूप दिया. कह सकते हैं कि परीकथाएं पहलेपहले पर्शियावासियों की कल्पना में उतरी थीं. चूंकि यह कल्पना अत्यंत चित्ताकर्षक, रुचिपूर्ण और मनोरंजक थी, इसलिए ईरान से जिनजिन देशों में वे कहानियां गईं, वहां लोगों ने अपनी रुचि एवं परिस्थितियों के अनुसार परियों को गढ़ा. यह भी संभव है कि आरंभ में ये सब कहानियां लोकसाहित्य का हिस्सा रही हों तथा कालांतर में परी नामक पात्र की उपस्थिति के आधार पर दूसरों से अलग, ‘परीकथा’ कही जाने लगी हो. फिर जब लगा कि एक सम्मोहक कल्पना से परे परी का कोई अस्तित्व नहीं है, और जिस अद्भुतरस की उत्पत्ति कहानी में परियों की उपस्थिति से संभव होती है, वैसी ही उत्पत्ति पशुपक्षियों के मानवीकरण द्वारा भी संभव है तो, भारत, यूनान, रोम आदि देशों में अर्से से लिखी जा रही पशुपक्षी कथाओं को भी परीकथाओं की श्रेणी में सम्मिलित कर लिया गया. इसके बावजूद ‘परी’ के उद्गम की खोज का सिलसिला यहीं नहीं थमता. दरअसल, भारत के साथसाथ दूसरी प्राचीनतम संस्कृतियों में भी परीकथाएं मौजूद हैं. उनको लेकर लोकसाहित्य रचा जाता रहा है. वह श्रुति के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अंतरित होता रहा है. यूनान की संस्कृति पर्शिया की संस्कृति जितनी ही पुरानी है. कुछ मामलों में उससे भी विकसित. ‘परी’ और ‘परीकथा’ को लेकर यूनानी लोगों का क्या सोचना था? क्या वहां भी परीकथाएं पढ़ीसुनी जाती हैं? यदि हां तो उनका स्वरूप कैसा है? अंतिम धारणा बनाने से पूर्व इन प्रश्नों पर विमर्श भी आवश्यक है.

यूनानी संस्कृति में ‘परी’ के पर्याय अथवा उनके समकक्ष ‘निंफ’ आती हैं. ग्रीक धर्मशास्त्र के अनुसार वे देवताओं के सम्राट जीयस की बेटियां हैं. वे पहाड़ों में जहां झरने फूटते हैं, घने जंगलों में तथा घाटियों में जहां प्राकृतिक वैभव बिखरा पड़ा होरहना पसंद करती हैं. निंफ के ठिकाने के अनुसार उन्हें पांच श्रेणियों में बांटा जा सकता हैआकाशचारी निंफ, जो पक्षियों की भांति विचरण करती रहती हैं. वृक्षों, लताओं पर घने जंगल में रहने वाली निंफ. फूलों की घाटियों में विचरण करने वाली निंफ. समुद्री वनस्पतियों के बीच जल में बसने वाली निंफ तथा अंडरवर्ल्ड निंफ, जो केवल अपने काम से काम रखती हैं. निंफ को ईश्वरीय प्रतिनिधि माना जाता है. परियों की भांति निंफ भी नृत्यगायन, संगीतादि में निपुण होती हैं. विशेषकर युवा निंफ नाच, गाना और जादू दिखाना पसंद करती हैं. लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि उन्हें उसकी आजादी हो. वे जरामरण से मुक्त हो सकती हैं. परियों की भांति ‘निंफ’ भी रूप बदलने की कला में निपुण होती हैं. वे अच्छी यानी मनुष्यता की हितरक्षक हो सकती हैं तथा बुरी भी. उन्हें अच्छाई से बुराई अथवा बुराई से अच्छाई की ओर प्रयाण करते हुए भी देखा जा सकता है. जल में बसने वाली निंफ को जलीय दैत्य कहकर उसकी पूजा भी की जाती है. वे वनवनस्पतियों की संरक्षक तथा पृथ्वी की उर्वराशक्ति की स्वामी कही जाती है. दयालु निंफ किसानों की मददगार बनकर उनकी उपज को बढ़ाती हैं. ‘ओडिसी’ में निंफ का उल्लेख ऐसी स्त्री के रूप में हुआ है, जिसका हाल में विवाह हुआ हो. ग्रीक परंपरा में ही ‘केरीबडिस’ तथा उसका प्रतिद्विंद्वी ‘साइला’ पहली ‘निंफ थीं, जो आगे चलकर राक्षस के रूप में अंतरित हुईं. ग्रीक धर्मशास्त्रों में निंफ को सामान्यतः परियों के समानार्थी के रूप में लिया जाता है, तथापि दोनों के बीच काफी अंतर है. परियां सामान्यतः देवदूत या राक्षस की संतति हैं. पंखों की मदद से उड़कर वे कहीं भी आजा सकती हैं. उनके विचार खतरनाक हो सकते हैं. इसके बावजूद वे राक्षस की अपेक्षा काफी उदार होती हैं. आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य की भरोसेमंद मददगार भी सिद्ध होती हैं. उत्तरी यूरोप के तथा आइरिश देशों के लोकसाहित्य और धर्मग्रंथों में परियों का जमकर उल्लेख हुआ है. कुछ विद्वानों के अनुसार निंफ तत्वविशेष से बनी होती हैं. जैसे पानी से बनी जलीय निंफ, प्रस्तर निंफ आदि.

प्राचीन ग्रीक परंपरा में ‘पैरिका’ अथवा ‘परी’ नहीं आता. लेकिन प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी अलोइस वाल्ड तथा जूलिस पोकोर्नी ‘पैरिका’ शब्द को ग्रीक शब्द ‘पैलेकिस’(Pallakis) अथवा ‘पैलेक्स’(Pallax) से जोड़ते हैं, जिनका अर्थ हैᅳ‘कुंवारी’ अथवा ‘युवती’ से है. पैरिका को ग्रीक शब्द ‘पेलास’ (Pallas) से भी जोड़ा जाता है, जो यूनान की ज्ञान की देवी एथेना का उपनाम है. ‘दि फाउंडेशन आ॓फ दि ईरानियन रिलीजन्स’ में लुइस हर्बट ग्रे ने पैरिका को ‘चारों ओर चक्कर काटकर लुभानेवाली’, ‘नाचनेगाने वाली जादूगरनी’ बताया है. संस्कृत में इस क्रिया को अभिसार कहा गया है. अप्सराएं इस कार्य में दक्ष मानी गई हैं. ‘निंफ’ का अभिप्राय कुंवारी युवतियों से भी लिया जाता है. जिस प्रकार अप्सराएं देवताओं के सान्निध्य में रहती हैं, ‘निंफ’ पैगंबर की सेवा करती हैं. यह शायद उस समय की परिकल्पना है जब वीर पुरुष द्वारा एकाधिक पत्नियां या उपपत्नियां रखना सम्मान की बात थी. अप्सराएं देवताओं का मनोरंजन करती थीं. निंफ की परिकल्पना भी उनसे मिलतीजुलती है. ग्रीक साहित्य में ‘निंफ’ हालांकि पुरानी संज्ञा है. लेकिन इसकी खूबी है कि आधुनिक समाज में भी निंफ की लोकप्रियता पूर्ववत कायम है. यह थियोडोर पी. जाइनाकुलिश द्वारा ‘फेयरी टेल्स आ॓फ मा॓डर्न ग्रीक’ के आरंभ में उठाए गए प्रश्न से स्पष्ट हो जाती है. पुस्तक के आरंभ में ही वे प्रश्न करते हैंᅳ‘क्या ग्रीक धर्मशास्त्रों का कोई अंश आज भी बचा हुआ है?’ अगले ही चरण में वे स्वयं इसका उत्तर सुना देते हैंᅳ‘बिलकुल है, और वह हैंनिंफ.’ वे आगे लिखते हैं कि ग्रीस के मैदानों, समुद्रों, पहाड़ों, नदियों और झरनों के बीच ईश्वर का जन्म हुआ था. वहीं उसका ठिकाना बना था. अब वहां परियां नांचतीगाती, खेलतीकूदती और हर प्रकार की खुशियां बिखेरती हैं. उनके अनुसार ‘परियां कुछ और नहीं, ग्रीक धर्मशास्त्रों में आए ड्रायड(वृक्षों पर रहनेवाली निंफ), नेआड, ओरीड, नेयाड्स(पर्वतशिखर पर रहनेवाली निंफ) आदि हैं. ये निंफ के ही उपनाम हैं. थियोडोर गायनाकुलिश के अनुसार यूनानी सभ्यता में परी की अवधारणा प्रकृति पूजा से जुड़ी है. स्थानीय प्रकृति में अंतर्निहित सौंदर्य ही यूनानी परीकथाओं में मौजूद सौंदर्यतत्व का आधार था. नदियों, महासागरों, सीपियों और मूंगों से भरे टापुओं और चांदी की खानों में रहनेवाले यूनानवासियों के लिए निंफ, नेआड, ड्रायड, ओरीड जैसी कल्पनाएं असंभव न थीं. कालांतर में पुराकथाओं के समान परीकथाएं भी मनोरंजन के वृहद उद्देश्य को साधने के साथसाथ, महानायकों की छविनिर्माण तथा उन्हें सहेजने में भी सहायक सिद्ध हुईं.

दरअसल अठारहवीं शताब्दी के बाद परीकथाओं की बढ़ती लोकप्रियता देख परंपरागत मिथकों को परियों की तरह पेश करने का चलन बढ़ा था, जिनमें परियों को नायक और खलनायक दोनों रूपों में पेश किया जाता था. किंतु समय बदल रहा था. साहित्य के स्वार्थानुकूल प्रयोग, उससे व्यापारिक और राजनीतिक हित साधने की प्रवृत्ति जोर पकड़ चुकी थी. औपनिवेशीकरण को गति देने के लिए अंगे्रज, जिनमें फ्रांसिसी, पुर्तगाली, डच आदि यूरोपीय देशों के व्यापारी भी सम्मिलित थे, नए बाजारों की खोज में अलगअलग देशों की ओर बढ़ चुके थे. लेकिन एशियाई, अफ्रीकी देशों में जहां उनके लिए पर्याप्त संभावनाएं थीभिन्न प्रजातियां निवास करती थीं. वहां नए लोगों के दिलों में जगह बनाने के लिए जरूरी था कि गोरी चमड़ी वाले अंगे्रज स्वयं को उदार, श्रेष्ठ, परोपकारी एवं न्यायप्रिय शासक के रूप में प्रस्तुत करें. संभवतः इसलिए गोरे रंगवाली सौंदर्यमूर्ति परियों के चरित्र में बदलाव का सिलसिला आरंभ हुआ. उससे पहले बुरे या अच्छे; अथवा अच्छे और बुरे दोनों रूप में परियों का चित्रण होता था. बाद में नकारात्मक चरित्र वाली परियों का उल्लेख घटने लगा. फलस्वरूप साहित्य में उदार, सहिष्णु, दयावान, मददगार एवं न्यायप्रिय परीकथाओं की संख्या बढ़ने लगी. जो काम बुरी परियां करा करती थीं, वह काले चमड़ी वाले जिन्न, राक्षस, असुर, दैत्यादि के नाम से कल्पित किया जाने लगा, ताकि गोरी चमड़ी का प्रतिनिधित्व करनेवाले अंगे्रज उन कहानियों के माध्यम से अपनी उदार एवं कानून के समर्थक शासक की छवि बना सकें. साथ में रंगभेदी, साम्राज्यवादी मंसूबों को छिपाते हुए ऐसी परियों की परिकल्पना भी की गई जो न केवल उदार और मददगार हों, बल्कि अपने आचरण से लोकतांत्रिक प्रतीत हों. जो ‘राजामहाराजा, साहूकारव्यापारी से लेकर मछुआरे, शिकारी, गड़ेरिया जैसे साधारण लोगों के साथ भी खेलखा सकें. उनके सौंदर्य को लेकर भी किस्से गढ़े जाने लगे, ताकि बड़ेबड़े खेतों में कार्यरत मजूदर, जिनकी संख्या औपनिवेशीकरण के साथ तेजी से बढ़ रही थी, उनके सहारे अपना मन बहला सकें. संभव है इसका उल्टा भी हुआ हो. अर्थात औद्योगिकीकरण की मार से अपने ठिकानों से उखड़े, घरपरिवार से दूर श्रमिकसर्वहाराओं ने, अपनी दमित यौनाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी तथा चामत्कारिक शक्तियों से संपन्न परियों की कहानियों को, चमत्कार की आस में सहज ही अपना लिया हो. यह रोमांटिसिज्म की नई धारा थी, जो राजमहलों और अपने चिरपरिचित अभिजात ठिकानों को छोड़कर खेतों, खलिहानों से लेकर मजदूरठिकानों की ओर प्रयाण कर रही थी. उससे पहले परीकथाओं के चरित्र मुख्यतः रानी, राजकुमार, महान योद्धा, चामत्कारिक शक्तियों से युक्त व्यक्ति हुआ करते थे. बदले परिवेश में परीकथाओं में किसान, मजदूर, नौकरानी जैसे पात्रों की संख्या बढ़ने लगी.

यूनान का इतिहास रणबांकुरे योद्धाओं का इतिहास भी है. वहां की संस्कृति में युद्ध निरंतर चलनेवाली घटना है. इसका प्रभाव वहां के साहित्य, जिसमें परीकथाएं भी सम्मिलित हैंपर, व्यापक रूप से पड़ा है. तदनुसार चर्चित यूनानी परीकथाओं पर वहां की योद्धासंस्कृति का प्रभाव साफ तौर पर नजर आता है. वहां ऐसे मिथकीय चरित्र गढे़ गए जो वीर और दुस्साहसी थे. राष्ट्रराज्य की आन के लिए प्राणों पर खेल जाना जिनका शौक था. ‘परसियस’, ‘आरगोना॓ट्स’, ‘थीसियस’, ‘का॓डमस, ‘हेराक्लीस’ यूनान के आरंभिक योद्धाओं के नाम हैं. ये सब ऐतिहासिक चरित्र थे, लेकिन बाद में जब वे लोककथाओं और किंवदंतियों का हिस्सा बने तो उनकी वीरता, रूपाकार आदि को लेकर तरहतरह के प्रयोग किए जाने लगे. उनके साथ कुछ ऐसे प्रसंग भी जोड़ दिए गए जिनका उनके जीवन से कोई संबंध न था. पुराकथाओं पर विश्वास करने तथा मिथकों के सहारे फैसला लेने वाले समाजों में यह अनहोनी घटना न थी. परिणामस्वरूप इतिहास के लोकप्रिय महानायक चलतेफिरते इंसान के बजाय मिथकीय पात्र में बदलने लगे. उनका बदला हुआ रूप मानवीय सीमाओं का अतिक्रमण करता था. इतिहास से अधिक वह पुराकथाओं एवं परीकथाओं के करीब था. बावजूद इसके यूनानी, भारतीय, मिस्री, पार्शियन आदि प्राचीन सभ्यताओं वाले समाज बिना यह जाने की उन गाथाओं में कितना सच है और कितना गल्प, उन्हें अपने गौरवशाली अतीत के निर्माताओं के रूप में याद करते हैं.

बहरहाल, यूनानी लोक विश्वास के अनुसार परियां साधारण इंसान से ऊपर होती हैं. उनपर प्रकृति के नियम वैसे लागू नहीं होते जैसे साधारण मनुष्यों पर होते हैं. बावजूद इसके वे न तो देवियां हैं न ही उनके पास असीमित शक्तियां होती हैं. उनका धैर्यपूर्वक सामना किया जा सकता है तथा आग और बंदूक से डराकर भगाया भी जा सकता है. वे खुशबुओं के थैले से घबराती हैं, अतः ऐसे व्यक्ति से वे दूर ही रहती हैं, जो खुशबुओं को अपने साथ रखता है. हालांकि बहुत से यूनानवासियों का मानना है कि परियों की नाक होती ही नहीं है. उनकी शक्तियां उनके कपड़ों, रूमाल, दुपट्टा आदि में सीमित होती हैं, यदि कोई मनुष्य उसकी निजी वस्तुओं पर कब्जा कर ले तो परियों को आसानी से बंदी बनाया जा जा सकता है. निंफ अथवा परियों को लेकर ये धारणाएं विरोधाभासी लग सकती हैं. लेकिन हमें याद रखना होगा कि ये धारणाएं अलगअलग समय में भिन्नभिन्न लोगों द्वारा गढ़ी गई हैं. इनमें से अनेक लोककथाओं की देन हैं, जो समाज के बीच रहकर लोकविश्वास या मनोरंजन की चाहत में अनाम लोगों द्वारा गढ़ी जाती रही हैं तथा लोकश्रुति के सहारे लंबी यात्रा के उपरांत समाज में स्थायी रूप ले चुकी हैं. बहरहाल, भौगोलिक परिवर्तन के साथ परियों के नाम और चरित्रादि में बदलाव आया था. हर संस्कृति ने उन्हें अपनी रुचि के अनुसार गढ़ा था. मगर अनेकानेक परिवर्तनों, मनमानी कल्पनाओं एवं प्रयोगों के बावजूद परीकथाओं का मूल चरित्र अर्थात अच्छाई और बुराई के संघर्ष में अच्छाई के समर्थन में उतरना, ज्यों का त्यों बना रहा. अपने इसी गुण के कारण परीकथाओं को चहुंदिश प्रशंसा मिली. जिनजिन देशों में वे गईं वहां के लोगों ने उन्हें खुलकर अपनाया. अपनी तरह से तराशा और जितना जरूरी लगा, उतना परिवर्तन भी किया.

स्थान परिवर्तन के बाद पार्शियन ‘परी’ या ‘पैरिका’ यूरोप पहुंचकर ‘फेयरी’ बन जाती है. भाषाशास्त्र की दृष्टि से ‘फेयरी’ शब्द की भिन्न व्याख्याएं संभव हैं. उसपर हम यथास्थान चर्चा करेंगे. यहां इतना उल्लेख पर्याप्त होगा कि यूरोपीय साहित्य में ‘परी’ शब्द भी यत्रतत्र मौजूद है. नवजागरण के दौर के यूरोपीय साहित्य में ‘परी’ शब्द हमें विलियम था॓मस वेकफोर्ड द्वारा फ्रांसिसी भाषा में लिखे उपन्यास ‘खलीफा वाथिक’ या ‘वाथिक(1782)’ में मिलता है. यह पार्शियन चरित्र को लेकर यूरोपीय भाषा में लिखा गया अत्यंत रोचक उपन्यास है. था॓मस मूर की ख्याति समाजवादी चिंतक के रूप में है. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘लालारूख’ में लंबी बहुप्रसिद्ध कविता का शीर्षक हैᅳ‘पेरेडाइज और परी’(1817). कविता में एक परी निरंतर तीन प्रयासों के उपरांत अंततः स्वर्ग में प्रवेश करने में सफल हो जाती है. इस कविता का विश्व की अनेक भाषाओं में रूपांतर हुआ है. उनीसवीं शताब्दी में परीकथाओं की लोकप्रियता तथा उनकी चामत्कारिक किस्सागोई को आधार बनाकर, गिल्बर्ट और सलीवन ने एक संगीतनाटिका लिखी थी, शीर्षक रखा थाᅳ‘लोलांथे: अमीर और परी’ (Lolanthe, The Peer and the Peri, 1882). इस व्यंग्यात्मक नाटिका के माध्यम से गिल्बर्ट ने नौकरशाही पर कटाक्ष किया था. इसके अलावा रूस, चीन, स्पेन, डेनमार्क, रोमानिया, जर्मन, अफ्रीका आदि देशों में भी ‘परी’ और परीकथाएं भिन्न नामों के साथ उपस्थित हैं. वहां उनका नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही प्रकार का चित्रण मिलता है. भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार परियों के कल्पित पहनावे और चरित्रचित्रण में थोड़ाबहुत अंतर भले हो, लेकिन उनमें लोकतत्व की मात्रा सभी देशों में प्रायः एक जैसी है. कारण स्पष्ट है. विश्वसभ्यताओं के सम्मिलन के दौरान ये कहानियां देशदेशांतर तक पहुंची और लोगों ने उनके कथानक में अपनी रुचि और परिस्थितियों के अनुसार मनचाहे बदलाव किए. लेकिन परियों का उदार, मानवीय चरित्र समाज को इतना भाया कि उसमें बदलाव की संभावना ही खत्म हो गई. बाद में गढ़ी जानेवाली परीकथाओं में उनके चरित्र का खूब उदात्तीकरण हुआ. फलस्वरूप उन्हें बालसाहित्य का अभिन्न हिस्सा मान लिया गया.

© ओमप्रकाश कश्यप

आधुनिकता और विकास के विभ्रम

यह मान लिया गया है̶कि विदेशी पूंजी होगी तभी विकास होगा. विकास को अपने भरोसे, अपने श्रमकौशल द्वारा, अपने ही संसाधनों के बल पर प्राप्त किया जा सकता है—यह संकल्पना अब लुप्त होती जा रही है. हालांकि इस बात के सहीसही बहुत कम उदाहरण हैं कि जिन देशों ने विकास किया है, उनमें विदेशी पूंजी का कितना बड़ा योगदान रहा है. यहां सिंगापुर जैसे कुछ छोटे देशों को, जिनकी अर्थव्यवस्था सैलानियों के बल पर चलती हैछोड़ा जा सकता है. हम औपनिवेशक दौर की बात भी नहीं कर रहे हैं, जब तीसरी दुनिया के देशों के संसाधनों को, ताकत या कूटनीति के बल पर अपने अधीन कर लिया जाता था. यूरोपीय देशों और अमेरिका, जो आज विकासशील देशों की सूची में हैं, की प्रगति की अगर विवेचना करें तो पता चलेगा कि उसमें उनके उपनिवेशों का बहुत बड़ा योगदान है. औद्योगिक क्रांति के दौर में नए बाजारों और संसाधनों की खोज के लिए यूरोप और अमेरिका की व्यापारी कंपनियां दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचीं. और जहां, जितना भी उनका बस चला, अपना उपनिवेश कायम किया. फिर उनके संसाधनों से तैयार माल उन्हीं को बेचकर सालोंसाल मुनाफा बटोरते रहीं. आज वैसी परिस्थितियां नहीं हैं. आर्थिक शोषण के लिए राजनीतिक उपनिवेश बनाना आवश्यक नहीं रह गया है. उपर्युक्त के आधार पर कहा जा सकता है कि विकासशील देशों में से अधिकांश ने अपनी समृद्धिगाथा, औपनिवेशिक संपदा यानी बाहर की पूंजी के आधार पर लिखी है. अंतर केवल इतना है कि वह पूंजी न तो आमंत्रित थी, न ही स्वयंस्फूत्र्त भाव से निवेश की गई. वह बलात् कब्जाई गई पूंजी थी, जिसका उपयोग उन लोगों के शोषण के लिए किया जा रहा था, जिनका उसपर नैसर्गिक अधिकार था. इसलिए यह सवाल कि क्या विकास के लिए विदेशी पूंजी अपरिहार्य है, विशेषकर भारत जैसे साधनसंपन्न देशों में—अब भी खड़ा है.

समय के साथ उपनिवेशों में सामाजिकराजनीतिक चेतना का विकास हुआ. लंबे आंदोलन के बाद वे एकएक कर स्वतंत्र होने लगे. लेकिन स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जिस परिवर्तन की अपेक्षा वहां के लोगों ने की थी, जो जनसाधारण का आजादी से जुड़ा स्वप्न था, उससे वे निरंतर दूर होते गए. ब्राजील के प्रखर शिक्षाशास्त्री पाऊलो फ्रेरा के अनुसार उत्पीड़ित अपनी मुक्ति उत्पीड़क की भूमिका में आ जाने में देखता है. यह शार्टकट रास्ता है, जिसमें व्यवस्था में आमूल परिवर्तन का लक्ष्य पीछे छूट जाता है. कई बार तो परिवर्तन चक्र ही उल्टा घूमने लगता है. वही हो रहा था. आजाद होते उपनिवेशों में जैसेजैसे विकास की मांग बढ़ी, अपनी मुक्ति के लिए वे उन्हीं रास्तों का अनुसरण करने लगे, जो उनकी दासता का सबब थे. आपाधापी में वे उन्हीं देशों के आगे मदद के लिए हाथ पसारने लगे, जिन्होंने उन्हें शताब्दियों तक गुलाम बनाए रखा था, तथा जिनके स्वार्थ, सामान्य नैतिकता मैत्रीभाव से कहीं ज्यादा प्रबल थे. इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज किया गया कि साम्राज्यवाद से मुक्ति का संघर्ष जितना राजनीतिक होता है, उतना ही आर्थिक एवं सांस्कृतिक भी होता है. यह भी कि सांस्कृतिक दासता राजनीतिक परतंत्रता की सदैव पश्चगामी होती है. वह देर से आती और राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद सामान्यतः देर तक बनी रहती है.

औपनिवेशीकरण का दौर वस्तुतः नए साम्राज्यवाद के उदय का दौर था. उसकी डोर पूंजीपति घरानों तथा उनके चहेते बुद्धिजीवियों और नौकरशाहों के अधीन थी. इस विचलन के कुछ कारण ऐतिहासिक भी थे. उपनिवेशों की स्वतंत्रता किसी बड़े संघर्ष के बजाय स्थानीय जनाक्रोश और लोकजागरण का सुफल थी. उसके पीछे तीव्र वैश्विक घटनाक्रम था, जिसने दुनिया को कई धड़ों में बांट दिया था. स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर उनके मूल में जिन जनांदोलनों और वैचारिक क्रांतियों का योगदान था, उनमें से अधिकांश पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध यूरोपीय देशों में जन्मी थीं. दूसरे शब्दों में औपनिवेशिक देशों को यूरोपीय दासता के विरुद्ध मुख्य औजार सीधे पश्चिम; अथवा वहां की वैचारिक प्रेरणाओं के माध्यम से प्राप्त हुए थे. यही कारण है कि आजाद होते उपनिवेशों के बुद्धिजीवियों में पश्चिम के प्रति खास आकर्षण था, जिसके दबाव में शताब्दियों पुरानी राजनीतिक दासता को बिसरा दिया गया था. पश्चिम के प्रति विशिष्ट आकर्षण का स्वरूप विभिन्न वर्गों के लिए अलगअलग था. जो लोग पहले से ही पश्चिमी संस्कृति के प्रति आकर्पित थे, वे स्वतंत्र होने के बाद भी उसे अपनी जीवनशैली के रूप में अपनाए हुए थे. पश्चिमी संस्कृति की विशेषताएं यथा भाषा, पहनावा, जीवनशैली आदि उनके लिए पराए नहीं रह गए थे. वे इन्हें अपनी विशिष्ट पहचान के रूप में, कई बार तो अपने ही देशवासियों से अलग दिखने के लिए अपनाए रहते थे. यह उनके लिए गर्व का विषय था. इस श्रेणी में मुख्यतः अभिजात लोग सम्मिलित थे, जिन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के निकट रहकर पर्याप्त सुखसुविधाएं भोगी थीं.

दूसरा वर्ग उन प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का था जो अपने देश और समाज के बौद्धिक नेतृत्व का दावा करते थे. किंतु अपनी वैचारिक प्रेरणाओं के लिए जबतब पश्चिम की ओर झांकते रहते थे. यह आकस्मिक नहीं था. मानवतावादी विचार तो प्रायः सभी धर्मों और संस्कृतियों में आए थे. और भिन्न भौगोलिक स्थितियों के बावजूद उनमें आश्चर्यजनक एकरूपता थी. लेकिन धर्मसंस्कृति को नैतिकता का आश्रय बताने वाले पारंपरिक विचारों की सीमा थी कि वे सामाजिक न्याय एवं मानवकल्याण को ईश्वर या उसकी समानधर्मा किसी तीसरी शक्ति की देन के रूप में देखते थे. यूरोपीय देशों की प्रौद्योगिकीय क्रांति ने परंपरागत विचारशैलियों को चुनौती दी थी. उनमें सबसे प्रमुख धर्मसंबंधी अवधारणा थी. ज्ञानविज्ञान, प्रौद्योगिकी और तार्किकता के कंधों पर सवार वे क्रांतियां धर्म को सीधे रूप में भले ही नुकसान न पहुंचा पाई हों, लेकिन लोगों के सोच को बदलने, बौद्धिक जड़ता को समाप्त करने में उनका बड़ा योगदान था. उसके फलस्वरूप समाज में धर्म और संस्कृति के प्रति वस्तुनिष्ठ चिंतन आरंभ हुआ, जिसने आगे चलकर पूरी दुनिया को प्रभावित किया था. परिणाम यह हुआ कि तीसरी शक्ति को बीच में लाए बगैर ही मानवकल्याण का स्वप्न देखा जाने लगा. इससे सुखवाद, उपयोगितावाद, व्यवहारवाद जैसी विचारधाराओं का जन्म हुआ, जो संसार को भौतिक इकाई मानती थीं.

जैसा पहले भी कहा जा चुका है, शताब्दियों लंबी दासता के दौरान ब्रिटिश साहित्य और संस्कृति ने दुनियाभर में अनेक देशों को प्रभावित किया था. उच्च और उच्चमध्यम वर्ग तो पश्चिमी संस्कृति को अपनी पहचान मान बैठा था. अपने पहनावे और भाषाविचार में वह पूरी तरह पश्चिमी नागरिक था. वह असल में शासकीय मनोवृत्ति थी, जिसके प्रभाव में अभिजात वर्ग खुद को शेष समाज से ऊपर समझता था. मानता था कि शासन करना उनका नैसर्गिक अधिकार है. इस संकल्पना का तीखा प्रतिकार यूरोपीय साहित्य में उपस्थित था. विभेदकारी शासक संस्कृति के विरोध में वहां शताब्दियों लंबे जनांदोलन भी चले थे, जिन्हें परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों का पूरापूरा समर्थन था. लेकिन सांस्कृतिक दासता से अनुकूलित अभिजात मानस विचार से ज्यादा व्यवहार में भरोसा करता था और समाजार्थिक असमानता के चलते जो विशेषाधिकार व्यावहारिक रूप से उसे प्राप्त थे—उन्हें वह किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहता था. इस वर्ग का हित यथास्थिति को बनाए रखने में था. चूंकि यह वर्ग अपनेअपने देश में प्रभावी भूमिका में था, इसलिए औपनिवेशिक गुलामी से बाहर आने के बावजूद संबंधित देशों में कुछ नहीं बदला था. यही कारण है कि आनेवाले समय में समाजवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराएं, जिन्हें आजाद होते उपनिवेशों ने अपने राजनीतिक दर्शन के रूप में चुना था, असंतुष्ट वर्गों के नारों में सिमटने लगीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग सामान्य विवेक को कुंठित करके उसे मुक्त उपभोक्ता में बदल देने के लिए किया जाने लगा. जनमानस आसानी से उसकी ओर झुकने लगा. नई सभ्यता में विकास की अवधारणा इस तथ्य पर निर्भर थी कि नई प्रौद्योगिकी ने अकेले मनुष्य को कितना आत्मनिर्भर और सुखी बनाया है. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी भी है. उसका वास्तविक हित सबको साथ लेकर चलने में है—इस सत्य को उपेक्षित रखा गया.

सांसारिक सुख जिसे अनेक धर्मदर्शनों में हेय बताया जाता था, मोहमाया, ममता, भ्रम, नश्वर आदि कहकर जिसका तिरस्कार किया जाता था, वह नई विचारधाराओं के केंद्रीय विषय के रूप में उभरा. बैंथम ने ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ कहते हुए उपयोगितावादी दर्शनों की नींव रखी. जिसे प्रौद्योगिकीय क्रांति से उभर रहे बाजारों ने हाथोंहाथ लिया, हालांकि लंबे समय तक समाज उनके वास्तविक लाभों से वंचित ही रहा. बैंथम के सूत्र, ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ में समानता और नैसर्गिक स्वतंत्रता का संदेश स्वतः अंतर्निहित था. उस समय तक भौतिक सुख केवल समाज के अभिजात वर्ग तक पहुंच पाते थे. समाज का निचला वर्ग उच्च वर्गों की सेवा के लिए जीता था. बदले में उसको इतना ही मिल पाता था कि वह शीर्षस्थ वर्गों की सेवा के लिए खुद को किसी न किसी तरह जीवित रख सके. अपने विकास के आरंभ में उपयोगितावाद मध्यवर्ग के हितों का दर्शन था. उस वर्ग का दर्शन था जिसने बिना किसी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के, सामान्य हितों के लिए एकजुट होना सीख लिया था. धीरेधीरे समाज में उसकी लोकप्रियता बढ़ती गई. कालांतर में यह ऐसे राष्ट्रीय समुदायों का जीवनदर्शन बना, जिनका लक्ष्य अपने समस्त वर्गों का हितरक्षण करना था. उपयोगितावादी विचारकों का मानना था कि शासन का आधार मानवी संविदा न होकर उपयोगिता है. राज्य का कर्तव्य है कि वह मनुष्य की सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करे. इससे अर्थशास्त्र पर मानवीय दृष्टिकोण से विचार करने की शुरुआत हुई. एडम स्मिथ, रिकार्डो, जेम्स मिल आदि अर्थशास्त्रियों ने मानव हितों को केंद्र में रखकर उत्पादन पर जोर दिया. बैंथम, जान स्टुअर्ट मिल आदि के लिए सुख का अभिप्राय केवल ऐंद्रियक सुख तक सीमित नहीं था. न ही वे बहुसंख्यक नागरिकों के शोषण की कीमत पर अल्पसंख्यक वर्ग के सुख का सरंक्षण चाहते थे. उनका सपना स्वस्थ नागरिक समाज की स्थापना करना था, जिसमें न्याय की व्याप्ति हो और मनुष्य अपनी अधिकतम स्वतंत्रता और सुख का भोग कर सके. ऐसा समाज जिसमें व्यक्ति बगैर किसी दबाव या बाधा के विकास के अवसरों का लाभ उठा सके.

जॉन स्टुअर्ट मिल बैंथम का परिवर्ती था. बैंथम से आगे बढ़ते हुए उसने सुख की नैतिकता का विचार प्रस्तुत किया. ऐसे समाज की परिकल्पना की जिसमें सुख को मिलबांटकर भोग करने और सभी के लिए न्याय एवं समानाधिकार पर जोर था. मिल का आर्थिक और सामाजिक चिंतन नैतिकता पर केंद्रित था. वह मनुष्य को अधिकतम स्वतंत्रता दिए जाने के पक्ष में था. राज्य का अभिभावकत्व उसे अस्वीकार्य था. वह मानता था कि शासनारूढ़ शक्तियां महत्त्वपूर्ण फैसले करते समय भी स्वार्थ को नहीं भूल पातीं. इस कारण उनके निर्णय अंततः बहुसंख्यक वर्ग के हितों के प्रतिकूल सिद्ध होते हैं. इसलिए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि शासन जो भी करेगा, खराब करेगा. ऐसी ही धारणा उसकी पूंजीवाद के प्रति थी. वह मानता था कि पूंजीवादी समाज, श्रम के उत्पाद का वितरण श्रम के योगदान के उल्टे अनुपात में करता है. इससे श्रम का लाभ श्रमिक के बजाय, कारखाना मालिक के खाते में चला जाता है. इसलिए उसने आर्थिक उपक्रमों पर व्यक्तिगत नियंत्रण का समर्थन किया था. उसका मानना था कि यदि समाज में नैतिकता होगी, तो वह शीर्ष पर स्वतः स्थापित होती जाएगी. और समाज में नैतिकता के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताएं आसानी से पूरी हों. उसको लगे कि राज्य उसके प्रति भी उतना ही ईमानदार है, जितना दूसरे नागरिकों को. यह ‘यथा राजा—तथा प्रजा’ की अवधारणा के ठीक उलट स्थिति थी. यह प्रकारांतर में विकास के लाभों को सर्वजन तक पहुंचाने के लिए जनसहभागिता की अनिवार्य को दर्शाता है. केवल स्वतंत्र और जागरूक समाज ही अपने वांछित लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है.

बैंथम का ‘उपयोगितावाद’ तथा जान स्टुअर्ट मिल का ‘व्यक्तिस्वातंत्र्य’ दोनों ही मानवअस्मिता को सुरक्षित रखने वाले विचार थे. मगर वे पूंजीवाद पर नियंत्रण रखने में सफल न हो सके. दरअसल नई विचारधाराओं के अनुकूल समाज को ढालने के लिए जिस शिक्षणप्रशिक्षण की आवश्कता थी, धर्म और संस्कृति के अनपेक्षित दबावों तथा क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के कारण उस दिशा में अपेक्षित प्रयास न हो सका. इसके विपरीत वर्चस्वकारी शक्तियों ने समाज के उपभोक्ता करण के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया. उससे पहले तक आधुनिकता का पैमाना संस्कृतिपरिष्करण और वैचारिक मौलिकता से तय होता था. अनुकूल सांस्कृतिक बदलाव अथवा नए विचार के आगमन को आधुनिक मान लिया जाता था. उपभोक्ताकरण के दौरान आधुनिकता के मापदंड बदल दिए गए. बदली मानसिकता में आधुनिक दिखने के लिए केवल नए और महंगे उत्पाद का उपयोग पर्याप्त था. उदारवादी माहौल में बाजार पाठकों के मनोविज्ञान को समझकर नीतियां बनाने लगा था. एक तरह से यह व्यक्ति के भीतर बाजार खोजने अथवा देह को ही उत्पाद बना देने की कोशिश थी. जिसके अनुसार प्रत्येक उपभोक्ता देह को साधन मान लिया गया था, जो विभिन्न वस्तुओं का उपयोग कर, मालिक के लिए मुनाफा कमाती है. व्यक्ति को देह तक सीमित कर देने के आवश्यक था कि मौलिक वैचारिकता को भटका दिया जाए. चूंकि वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन धीरेधीरे चलने वाली प्रक्रियाएं हैं, और वैचारिक परिवर्तन तो अपेक्षा कठिनसाध्य भी होता है, इसलिए नई पीढ़ी को लुभाने के लिए आधुनिकता का मिथक इतना कारगर सिद्ध हुआ कि वस्तु में वास्तविक सुधार न भी हो, पैकेजिंग अथवा रूपाकार में सामान्य परिवर्तन को ही आधुनिक कहा जाने लगा. इसका सीधा लाभ उन बौद्धिक प्रतिष्ठानों को मिला जो येनकेनप्रकारेण पूंजीवाद को पोसते आए थे; जिनका ध्येय अधिक से अधिक मुनाफा बटोरना था. उल्लेखनीय है कि नए अर्थशास्त्र में बाजार की खोज के लिए दूर जाना आवश्यक नहीं रह गया था. यह स्वीकार लिया गया था कि व्यक्तिमात्र की खपत बढ़ाकर भी बाजार की मदद की जा सकती है.

कुछ कारण ऐतिहासिक भी थे. बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न तक, विशेषकर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राजनीतिक शक्तियां हताश पड़ चुकी थीं. इससे पूंजीवाद को मनमाने पांव पसारने का अवसर मिला. नए बाजारवादी दर्शन की कोशिश व्यक्ति के विवेक को कुंठित कर, उसके दिमाग पर कब्जा जमाने की रही है. ताकि वह वही समझे, जो उसको बताया जाए. वह करे, जो उसको करने के लिए कहा जाए. यह न तो ‘उपयोगितावाद’ की सैद्धांतिकी के अनुकूल था, न ही ‘व्यक्तिस्वातंत्र्य’ की विचारधारा के. क्योंकि उपयोगितावाद जहां वस्तु के सामाजिक मूल्य को महत्त्व देता है, और इसके लिए वह मनुष्य के आंतरिक गुणों को निखारने का समर्थन करता है, वहीं व्यक्तिस्वातंत्र्य का अर्थ किसी अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता न होकर बहुसंख्यक की स्वतंत्रता में व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता के लक्ष्य को सुनिश्चित करना है. अपने मूल रूप में उपयोगितावादी दर्शन समानता एवं न्याय का पक्ष लेते हुए सुख पर अभिजात वर्ग के एकाधिकार की भावना पर चोट करता था. सुखवाद उस समय का क्रांतिकारी विचार इसलिए भी बना, क्योंकि वह सुखोपभोग के प्रति जनसाधारण के हेयभाव को अनावश्यक मानता था. बैंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे उदारवादी चिंतकों का संपूर्ण लेखन मानवकल्याण को समर्पित था. वे राज्य को नागरिकों का अभिभावक मानने को तैयार न थे. इसलिए वे उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व का समर्थन करते थे. उपयोगितावादी विचारकों की धारणा पूंजीवाद के प्रति भी बहुत अच्छी न थी, लेकिन बाजार के नीतिनिर्धारकों के लिए उनके द्वारा भौतिक सुखों का समर्थन करना, उसके प्रति ग्लानिबोध को अनावश्यक मानना ही पर्याप्त था. इसलिए राज्य के साथ मिलकर ‘सुखवाद’ एवं ‘व्यक्तिस्वातंत्र्य’ के विचारों को खूब प्रचारित किया गया. फिर उनका सहारा लेकर उपभोक्तावाद को अंतहीन भोग और स्पर्धा के रूप में समाज पर थोप दिया गया.

ताजा स्थिति यह है कि विकास के पश्चिमी मॉडल से प्रभावित देश, विदेशी पूंजी को आमंत्रित करने के लिए तरहतरह के तमाशे करते हुए दिखाई पड़ते हैं. इनमें भारत जैसे देश भी शामिल हैं, जिनकी समृद्ध संस्कृति है. जहां वैचारिकसांस्कृतिक चिंतन की सुदीर्घ परंपरा है. साथ ही जहां प्राकृतिक संसाधनों का भी प्राचुर्य है. ऐसे देशों में चूंकि परंपरा के दबाव भी असर दिखाते हैं, इसलिए वहां विकास की वर्तमान पूंजीवाद प्रेरित धाराओं को लेकर एक प्रकार की बेचैनी सदैव बनी रहती है. आधुनिकता और संस्कृति के द्वंद्व उन्हें सदैव उद्वेलित रखते हैं, जिससे वे ऊहापोह की स्थिति में रहने को बाध्य होते हैं. भारत में इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है. पूरे समाज में विरोधाभास की स्थिति व्याप्त है. हम एक ओर तो उत्पादन के स्तर पर वैश्विक हो जाना चाहते हैं. चाहते हैं कि नई से नई प्रौद्योगिकी हमारे यहां हो. हमारे कारखाने आधुनिकता की मिसाल बनें. इसके लिए हम नवीनतम प्रौद्योगिकी आयात करने को आतुर रहते हैं. जिन क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी आयात महंगा और कठिन लगे, वहां हम विदेशी पूंजी का आवाह्न करते हैं. ईस्ट इंडिया कंपनी नए बाजार और संसाधनों की चाहत में खुद भारत तक चलकर आई थी. हम उससे भी भारीभरकम कंपनियों को खुद न्योता देकर दुनिया जीतने का भ्रम पाले हुए हैं. ध्येय एक ही है—विकास और केवल विकास. पर क्या सचमुच हम अपने लक्ष्य में सफल हो पाए हैं. क्या हमारी सरकारें विकास के नाम पर ठीक वही कर रही हैं, जैसा लोग चाहते हैं; अथवा जिसकी उन्हें आवश्यकता है? सवाल यह भी है कि क्या हमारा लोकमानस सरकार की विकासनीति और उसकी दिशादशा को समझ पाता है; अथवा वह केवल विकास के विभ्रमों में जीने को बाध्य होता है?

भारत के संबंध में संस्कृति के दबाव भी महत्त्वपूर्ण हैं. पुराने ज्ञानविज्ञान के शोध के लिए आवाजें उठ रही हैं. कोई बुरी बात नहीं है. आज से बहुत पहले यह हो जाना चाहिए था. कहा जा रहा है कि आज जो भी ज्ञानविज्ञान है, वह हजारों वर्ष पहले से हमारे यहां मौजूद है, हमारे वेदशास्त्रों में भरा पड़ा है. अंग्रेज उसे यहां से ले गए और उसपर शोध करके खुद को मालामाल कर लिया! हम वैसा क्यों नहीं कर पाए? जो काम अंग्रेजों सौसवा सौ साल में किया, वह हमारे यहां शताब्दियों तक क्यों लटका रहा? ज्ञानसंपदा पर पूरे समाज का समानाधिकार होता है, फिर वे कौन लोग थे जो उसे अपनी बपौती मानकर पीढ़ीदरपीढ़ी बैठे रहे? यदि हमने अपने ज्ञानविज्ञान का समय रहते कुछ नहीं किया तथा उसे अपनों और बाहर वालों से छिपाए रहे, तो जिन लोगों ने उसमें संशोधनपरिवर्धन करके या करे बिना ही उसको समाजोपयोगी बनाया, उन्हें क्यों दोषी माना जाए? और अब यह मालूम होने के बाद कि वह सब निकल जाने के बाद भी हमारे धर्मग्रंथों में बहुत कुछ मौजूद है तो हम उसके शोधन के लिए क्या कर रहे हैं? कितने शोधार्थी हमने इस दिशा में लगाए हैं. इन सवालों पर जो भारतीय समाज की मूल समस्या हैं, हम काम क्यों नहीं कर रहे हैं? ये प्रश्न नए नहीं हैं. इनके उत्तर संस्कृतिसूरमाओं को बहुत पहले से ज्ञात है. भारत में ज्ञानविज्ञान की समृद्ध परंपरा रही है—यह बात उन विद्वानों ने भी स्वीकार की है, जिनपर हम उसकी चोरी का इल्जाम लगा रहे हैं. और जिस समय कही थी, उस समय हम उनके मुंह से सुनकर दांतोंतले उंगली दबा रहे थे. तो जिस बात पर कभी स्वयं हमें आश्चर्य था, आज उसपर हमारे विद्यार्थी विश्वास करें भी तो कैसे? क्योंकि जो बात हम उन्हें समझाना चाहते हैं, उसके लिए ज्ञानआधारित समाज का होना अपरिहार्य है. उसके लिए जरूरी है कि मनुष्य का विवेक स्वतंत्र और परिवेश मुक्त हो. जबकि हम आरंभ से बालक को धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर बांध देते हैं. बालक के ककहरा सीख लेने से हमें उतनी खुशी नहीं मिलती, जितनी छोटी अवस्था में मूर्ति के आगे हाथ जोड़ते देखकर होती है.

भारत कभी ज्ञानआधारित समाज रहा होगा. उपनिषद, गणित, ज्योतिष आयुर्वेद रसायन आदि क्षेत्रों में इस देश की उपलब्धियां कमाल की रही हैं. लेकिन पिछले आठनौ सौ वर्ष से हम ऐसा कुछ ऐसा नहीं कर पाए हैं जिसके आधार पर विश्वमेधा को चुनौती दे सकें. इस दौर में हमारी सारी चिंतना प्रतिक्रियात्मक रही है. विडंबना यह कि हम कब खुद की उपलब्धियों को बिसराकर दूसरे में ढल गए, कब हमारा समाज संकुचित होकर दायरे में सिमट गया—पता ही नहीं चला. ऐसा कोई साक्ष्य हम नहीं दिखा पा रहे हैं, जिससे हमारे दावे की तस्दीक होती हो. यदाकदा कुछ अतिउत्साही संस्कृति प्रेमी लोग वेदों में वायुयान जैसे शगूफे जरूर छोड़ देते हैं. मगर पर्याप्त प्रमाण के अभाव में वे कहीं टिक नहीं पाते. परिणामस्वरूप खूब जगहंसाई होती है. हाल ही में एक लेखक ने सिद्ध करने की कोशिश की है कि रसायनशास्त्री दिमित्री मेंडलीव(1834—1907) को आवर्त्त सारणी में 108 तत्व रखने की प्रेरणा भारत से मिली थी. यह पूर्णतः निराधार कल्पना है. 1869 में जब दिमित्री मेंडलीव ने पहली आवर्त्तसारणी तैयार की, ज्ञात तत्वों की संख्या 57 के आसपास थी. दो वर्ष पश्चात 1871 में उसने संशोधित आवर्त्त सारणी तैयार की. उस समय भी उसकी आवर्त्त सूची में लगभग साठ तत्व थे. आज यह संख्या लगभग 110 है. विद्यार्थी यह सब जानकारी विज्ञान की पुस्तकों में पढ़ता है. उसके लिए झूठ को पकड़ना मुश्किल नहीं है. हमारे युवा इंटरनेट, मोबाइल, वॉट्सअप, ब्लू ट्रूथ अपनी हथेली में दबाए रहते हैं. जानते हैं कि वह सब बाहर से आयातित है. जबकि भारत का परंपरागत ज्ञान कर्मकांडों के बाहर बहुत कम नजर आता है. मौलिक ज्ञान के प्रति अनास्था ऐसी कि हम 16 पृष्ठ की पुस्तिका झोले में डालकर चलने वाले पुरोहित को पंडित का दर्जा दे देते हैं. शायद इसलिए कि हम अपना आत्मविश्वास खो चुके हैं. हमें हर जगह कोई न कोई सहारा, कोई न कोई मध्यस्थ चाहिए, जो हमारी बात रख सके. हम ईश्वर को दयालु, करुणानिधान, अंतर्यामी आदि न जाने क्याक्या कहते हैं, लेकिन बिना दलाल के उसके सामने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. विमर्श के अभाव में दिमाग को कुंद कर देने वाली अंधश्रद्धा तो विद्यार्थियों में पैदा की जा सकती है, जिज्ञासु और वैज्ञानिक बोध से संपन्न पीढी तैयार करना संभव नहीं है. अतः अच्छा होगा कि मिथ्यागान से बचकर तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत किया जाए. जो हमारा है, जिसकी वैश्विक उपयोगिता है, उसको समकालीन बोध के साथ दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जाए.

एक और सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दंभ तो दूसरी ओर दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की स्पर्धा. व्यवस्था ऐसी है कि धर्म किसी न किसी रूप में केंद्रीय भूमिका में बना रहता है. इस समय दुनिया में तीन प्रमुख धर्म हैं—ईसाई(220 करोड़), इस्लाम(180 करोड़) तथा हिंदू(110 करोड़). इनमें ईसाई और इस्लाम दो परस्पर विपरीत धु्रव जैसे हैं. समय के साथ उनका विरोध बढ़ता ही जा रहा है. पश्चिमी देशों में राज्य के कार्यकलाप में धर्म का हस्तक्षेप उचित नहीं माना जाता. भौतिक सुखों के प्रति उनमें किसी भी प्रकार की कुंठा या तिरस्कार भाव नहीं है. वे कॉल्विनवाद के समर्थक हैं, जिसके अनुसार पृथ्वी पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जो मनुष्य के भोग के लिए वर्ज्य हो. ज्ञानविज्ञान ने उन्हें वस्तुनिष्ठ ढंग से सोचने के लिए परिपक्व किया है. पश्चिमी देशों की भोगलिप्सा की आलोचना की जाती है. बावजूद इसके मानवअस्मिता जितनी वहां सुरक्षित है, दुनिया के बाकी देशों में नहीं. दूसरे छोर पर मुस्लिम देश हैं, जो धर्म को राज्य की नियामक सत्ता मानते हैं. अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और सुखवादी दर्शन को वे अपने लिए खतरा मानते हैं. इसलिए उनसे दूर रहने के लिए समयसमय धर्मादेश भी जारी किए जाते हैं. भारत जैसे देश बीच की श्रेणी में आते हैं. जहां एक कदम संस्कृति में, दूसरा आधुनिकता में फंसा रहता है. पश्चिम हमें लालायित करता है, मगर संस्कृति के दबाव बारबार अतीत की ओर ले जाते हैं. भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं, बावजूद इसके लंबी दासता की स्मृति के कारण वे कहीं न कहीं भय का शिकार रहते हैं. यह डर उनके मन में विधर्मियों के प्रति अविश्वास को जन्म देता है. हिंदुत्व समर्थक चाहते हैं कि हिंदू भी अपने धर्म के प्रति दृढ़ हों. अपने अतीत को पहचानें. मगर इसके लिए जो नीति वे अपनाते हैं वह धार्मिक विद्वेष और कट्टरता को बढ़ावा देने वाली सिद्ध होती है. दूसरी ओर खुद को इस्लाम के अनुयायियों की अपेक्षा आधुनिक सिद्ध करने का दबाव उन्हें यूरोपीय भौतिकवाद के करीब ले जाता है. पीढियां इसी ऊहापोह के बीच जवान होती हैं. भारतीय युवा आधुनिक बने रहकर तकनीक प्रदत्त सभी सुखसुविधाओं को भोगना चाहते हैं. जबकि संस्कृति के दबाव उन्हें बारबार पीछे की ओर खींचते हैं. इससे वे न तो पूरी तरह आधुनिक बन पाते हैं, न ही संस्कृति के पोषक. जो सीखतेकरते हैं, आधाअधूरा बना रहता है. अनमन्यस्कता की स्थिति को बाजार न केवल समझता, बल्कि वह इसी को अपने लिए लाभकारी मानता है. आत्मविश्वास से रहित, वैचारिक स्तर पर डावांडोल युवा अपना संस्कृति प्रेम, परंपरा की लीक पीटते रहने में दर्शाते हैं, तो आधुनिकता की उनकी चाहत, तकनीक की शरण में जाने से पूरी होती है. भीड़ की मानसिकता हर क्षेत्र में अनावश्यक होड़ पैदा करती है. उससे उपभोकता वस्तुओं के प्रति ललक तो पैदा होती है, चयन का विवेक नहीं. ऐसे उपभोक्ता मानस की जरूरतों को समझते हुए बाजार तरहतरह के उत्पाद उतारता रहता है. सरकारें उन्हें तरहतरह के प्रलोभन देती हैं. वहां विकास चकाचैंध की तरह आता है और दूर से ही गुजर जाता है. उससे प्रभावित आदमी न तो तनकर खड़ा हो पाता है, न ही खुद से दूर भी देख पाता है.

कह सकते हैं कि प्रकृति को उपभोग्य मानने वाली दृष्टि ने ही आधुनिकता को दिशाहीन बनाया है. प्राचीन भारतीय जीवनशैली प्रकृति के साथ सहजीवन की थी. लोग घरपरिवार के साथ प्रकृति से भी अपनापा रखते थे. धीरेधीरे उसमें ठहराव आया और समाज में ऐसा वर्ग उमड़ता गया जो मनुष्यमनुष्य के बीच अंतर करता था. जो स्वयं को विशेषाधिकार संपन्न मानता था. उसने समाज के संसाधनों, नीतियों को अपने स्वार्थ के अनुरूप बदलना जारी रखा. जिससे असमानता फैली. उसमें समाज में एक वर्ग के पास इतना कुछ था कि भोग के लिए जीवन कम पड़ जाता था. दूसरे वर्ग को जीवन बचाने के लिए रोज खुद को दांव पर लगाना पड़ता था. जनसाधारण पर शीर्षस्थ वर्ग की ओर से अनेक निषेध लागू थे, ताकि उसके वैभवविलास में कोई कमी न रहने पाए. उपयोगितावादी दर्शन उन निषेधों की प्रतिक्रिया में जन्मा था, जो प्राचीन समाजों के वर्गीय विभाजन और सुखसंसाधनों के मुट्ठीभर लोगों तक सिमट जाने का परिणाम थे. आरंभिक उपयोगितावादी दर्शन प्रकृति को उपभोग्य मानता था. वह मनुष्य को स्वार्थी बना देता था. बाद के उदारवादी विचारकों ने इस कमजोरी को समझा. केवल अपने सुख के लिए संघर्ष करने के विचार को दूसरों के सुख में अपना सुख खोजने की चाहत से भर दिया. लेकिन किसी भी विचार की सफलता जनता के विवेक पर टिकी होती है. समाज अनुशासित तो शासन भी अनुशासित. जनता विवेकवान तो वैचारिक शुद्धता लंबे समय तक बनी रहती है. उसमें समयानुसार सुधार भी होते रहते हैं. इसलिए विरोधी विचार को कुचलने के लिए स्वार्थी शक्तियां जनता के विवेक को निशाना बनाती हैं. एकता को भंग कर उसे तरहतरह के प्रलोभन देकर भटकाती हैं. धर्म, मुक्ति की कामना, स्वर्गीय आनंद, जाति और वर्णभेद ऐसे ही प्रलोभन हैं. इनके कारण अच्छाखासा विचार अपनी प्रासंगिकता खोकर स्वार्थी लोगों के हाथों का हथियार बनता रहा है.

आधुनिकता की एक कसौटी विकास भी है. सामान्य परिभाषा में विकास एक निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है, जो व्यक्ति, समाज अथवा किसी वस्तुविशेष की परिवर्तनशीलता को दर्शाती है. उसके समानांतर प्रगति एक सदिश अवधारणा है. वह ऐसे विकास की निरंतरता को दर्शाती है जो मनुष्य और समाज को उच्चतर सुविधाओं और अवसरों की ओर ले जाता है. नागरिकों का सीधा भला समाज और राष्ट्र की बहुआयामी प्रगति में है. बावजूद इसके चुनावों में नेता विकासविकास चिल्लाते हैं. जबकि विकास के लिए आवश्यक नहीं कि वह हमेशा और संपूर्ण रूप से नागरिक कल्याण को समर्पित हो. किसी भी कारण, चाहेअनचाहे जो भी बदलाव हों, वे सब विकास के अंतर्गत आते हैं. समाजशास्त्र की भाषा में शरीर में कूबड़ निकल आना भी विकास है और उसका बढ़ते जाना भी. आशय है कि विकास दिशाहीन होता है. वह किसी अनपेक्षित दिशा में भी बढ़ सकता है. पूंजी नियंत्रित समाजों में प्रायोजित प्रक्रिया के तहत सरकार मान लेती है कि पूंजीपति जो अच्छे प्रबंधक होते हैं, वही विकास की राह आसान कर सकते हैं. इसलिए सरकार अपनी योजनाएं पूंजीपतियों के हाथों में सौंपकर निश्चिंत हो जाना चाहती है. कई बार तो योजनानिर्माण का कार्य पूरी तरह पूंजीवादी संस्थाओं पर छोड़ दिया जाता है. वे यह दिखाते हुए कि पूंजीवादी संस्थानों का विकास ही देश और समाज का विकास है, यदि ऊपर के स्तर पर समृद्धि होगी तो स्वाभाविक रूप से निचले वर्गों तक भी आएगी—योजनाओं को पूरी तरह अपने स्वार्थ के अनुकूल ढाल लेते हैं. विकास के अवांछित प्रभावों अथवा दुष्प्रभावों की समीक्षा का कार्य स्वयंसेवी किस्म की संस्थाओं पर छोड़ दिया जाता है. पूंजीपतियों द्वारा दिए गए अनुदान, सहायता आदि पर पलने वाली वे संस्थाएं प्रकट में जनता की हितैषी होने का दावा करती हैं, असल में पूंजीपतियों की हितसाधक सिद्ध होती हैं. जनाक्रोश को नियंत्रित करने में वे कारगर भूमिका निभाती हैं. वे बड़ी चतुराई के साथ विकासनीति की असफलताओं को जनता के ऊपर थोप देती हैं. इसके लिए बढ़ती जनसंख्या, आतंकवाद, जातिवाद, अशिक्षा, गरीबी आदि को जबजैसा अनुकूल हो, कारण बता दिया जाता है. जबकि असल में अधिकांश समस्याएं बेमेल विकास से, संसाधनों के खासवर्ग तक सिमट जाने से जन्म लेती हैं. वे उन विकासनीतियों की असफलताएं होती हैं, जिनमें न्याय और लोकतंत्र के नाम पर घोड़ों और मेमनों को एक ही स्पर्धा में जोतकर लोकतंत्र, न्याय और समानता नाटक किया जाता है. उनका जन्म शासनप्रशासन की असफलताओं से होता है.

पूंजीपतियों का धर्म केवल मुनाफा होता है. उनका कोई देश भी नहीं होता. जहां मुनाफा हो, वही उनका देश बन जाता है. जबकि राजनीति अपने देश और धरती के नारे लगाने से परवान चढ़ती है. हाल के वर्षों में राजनीति को भी ’न्यूनतम निवेशअधिकतम लाभ’ वाला व्यवसाय मान लिया गया है, इसलिए पूंजीपतियों से सांटगांठ रखनेवाले राजनीतिज्ञ बारबार जनता को विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि बिना विदेशी पूंजी के इस देश का विकास असंभव है. चूंकि विदेशी कंपनी द्वारा भारत में निवेश के लिए किसी भारतीय सहयोगी की तलाश जरूरी है, इसलिए सरकारी अभियान का सीधा लाभ, शिखर के राजनीतिज्ञों से सांटगांठ रखने वाले पूंजीपति घरानों को होता है. विदेशी पूंजी को आमंत्रित कर चहेते पूंजीपतियों को खुश करने की आपाधापी इतनी अधिक होती है कि उसकी राह के कांटे हटाने के लिए सरकारें जनता के ऊपर भारीभरकम बोझ डालने से भी नहीं चूकतीं. बड़ी निवेशक कंपनियों के आगे देश को प्रायः समझौता करना पड़ता है. यह सब इतने सलीके और चतुराई के साथ किया जाता है कि जनसाधारण सच को समझ ही नहीं पाता.

बदले में पूंजीपति कंपनियां राजनीति के प्रमुख चेहरों की ब्रांडिंग करती हैं. उसमें सरकारी खर्च पर छवि निर्माण का काम किया जाता है. ब्रांडीकरण आधुनिक बाजारनीति का हिस्सा है. पूंजीपतियों के लिए काम कर रही सरकारें, चाहेअनचाहे ब्रांडीकरण से बच नहीं पातीं. या यूं कहो कि बाजारवाद में भरोसा बनाए रखने के लिए पूंजीवादी शक्तियां राजनीति का भी ब्रांडीकरण कर देती हैं. पिछले कुछ दशकों में भारतीय राजनीति का भी तेजी से ब्रांडीकरण हुआ है. प्रतिनिधित्व की राजनीति चेहरों की राजनीति में बदल चुकी है, नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी आधुनिक भारतीय राजनीति के जानेपहचाने ‘आइकन’ हैं, जो जातिवादी राजनीति और मीडिया के गठजोड़ के आधार पर जनमानस में अपनी जगह बनाए हुए हैं. सालभर पहले तक कांग्रेस ने राहुल की ब्रांडिंग पर जबरदस्त पैसा खर्च किया था. मगर विरोधी मीडिया ने कांग्रेस शासन काल के भ्रष्टाचार को बहाना बनाकर ऐसी ‘डीमाकेंटिंग’ की कि राहुल गांधी नामक ‘ब्रांड’ राजनीति के बाजार में जमने से पहले ही उखड़ने लगा है. आखिर ऐसा क्यों हुआ? व्यक्तिकेंद्रित अथवा स्वार्थ के गठजोड़ की बुराइयां तो किसी से छिपी न थीं! बजाय बुराइयों के समाधान के हम क्यों एक और बुराई की ओर बढ़े जो लोकतंत्र के नाम पर धब्बा है. कारण किसी से छिपे नहीं हैं. राजनीति का ब्रांडीकरण प्रकारांतर में बाजार के ब्रांडीकरण को बाजार के ब्रांडीकरण को स्वीकार्य बनाता है. बाजार में एक ही उत्पाद की जानेमाने ब्रांड के अलावा दर्जनों किस्में मौजूद होती हैं. लेकिन गुमनाम. इसे बाजार का अभिजात चेहरा कह सकते हैं. उसमें जानेमाने ब्रांड को खरीदने की हैसियत आमतौर पर उन्हीं की होती है, जिनकी अपनी कोई हैसियत है. जिनकी बाजार में कोई हैसियत नहीं है, उनकी समाज में भी कोई हैसियत नहीं बन पाती. इसलिए सामाजिक समानता का एक रास्ता बाजार की समानता के रास्ते भी जाता है. वर्तमान परिस्थितियों में उस रास्ते की खोज बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है. हालांकि न्याय और लोकतंत्र के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वह अनिवार्य उद्यम होगा.

© ओमप्रकाश कश्यप