Tag Archives: Religion

इतिहास में घालमेल के बहाने

सामान्य
इतिहास केवल विजेता का होता है. दो संस्कृतियों के द्वंद्व में पराजित संस्कृति को मिटने के लिए बाध्य किया जाता है. विजेता इतिहास की पुस्तकों को इस प्रकार लिखता है जिसमें उसका गुणगान हो, और विजित को अपमानित किया गया हो. जैसा कि नेपोलियन ने एक बार कहा था, ‘इतिहास क्या है, महज एक दंतकथा, जिससे सब सहमत हों —डॉन ब्राउन.

 

इतिहास दीर्घकालीन राजनीति है. ऐतिहासिक घटनाएं प्रायः द्वंद्वात्मकता में घटती हैं. सत्ता उनकी दशा-दिशा तय करती है. हर नया विजेता सत्तासीन होते ही अपनी कीर्ति-कथा गढ़ने में जुट जाता है. इसके लिए वह क्रीत बुद्धिजीवियों की मदद लेता है. कला और संस्कृति के माध्यमों का इस्तेमाल करता है. खरीदे हुए बुद्धिजीवी स्थितियों की व्याख्या अपने तथा अपने आश्रयदाता के स्वार्थानुसार करने लगते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास से छेड़छाड़ भी करते हैं. उसका एकमात्र उद्देश्य होता है, विजित के दिलोदिमाग पर कब्जा कर लेना. भरोसा दिलाना कि उनकी भलाई आश्रित बने रहने में है. दरअसल बड़े से बड़ा शिखर-पुरुष अपने प्रतिद्विंद्वी से इतना नहीं डरता जितना वह जन-विद्रोह की संभावना से घबराता है. विद्रोह की न्यूनतम संभावना हेतु वह जनता का हर समय बेहद करीबी, भरोसेमंद तथा परम-हितैषी दिखना चाहता है. वाल्तेयर ने इतिहास को ‘सर्वमान्य झूठ का सिलसिला’ कहा है. इससे इतर जार्ज आरवेल की टिप्पणी इतिहास की महत्ता को रेखांकित करती है—

‘किसी समाज को नष्ट करने का सबसे कारगार तरीका है, उसके इतिहासबोध को दूषित और खारिज कर दिया जाए.’

जिस इतिहास की बात आरवेल करते हैं, उसे घटनाओं तथा उन्हें जन्म देने वाली स्थितियों का प्रामाणिक दस्तावेज होना चाहिए. इस कसौटी पर भारत के इतिहास को कैसे देखा जाए? इतिहास के नाम पर हमें जो पढ़ाया जा रहा है, क्या वह प्रामाणिक है? जो लोग निहित स्वार्थ हेतु ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलबाड़ कर रहे हैं, उनसे कैसे निपटा जाए? ऐसे कई प्रश्न हैं, जिनपर विचार करना आज की परिस्थितियों में आवश्यक हो जाता है. वैसे इतिहास से खिलबाड़ की समस्या आज की नहीं है. सहस्राब्दियों से यही होता आया है. आर्य यहां 1500 ईस्वी पूर्व में आए. उस समय सिंधु सभ्यता(3300 ईस्वी पूर्व—1750 ईस्वी पूर्व) पराभव की ओर अग्रसर थी. वे चाहते तो मरणासन्न सभ्यता को सहेजने की कोशिश कर सकते थे. पर इस बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं. उल्टे प्राकृतिक आपदा के शिकार दुर्ग और दुर्गवासियों पर आक्रमण कर अपनी वीरता दिखाते रहे. सहेजने से ज्यादा जोर उन्होंने मिटाने पर दिया. विलासी और विध्वंसक प्रवृत्ति के इंद्र को राजा माना. अनार्य जो समृद्ध सभ्यता के उत्तराधिकारी रह चुके थे, उन्हें असुर, असभ्य, क्षुद्र आदि कहकर अपमानित करते रहे. खुद घुमक्क्ड़ थे. उपलब्धि के नाम पर उनके पास कुछ था नहीं. जिनके पास था, उनका उल्लेख करके अपनी हेटी नहीं करना चाहते थे. झूठे आर्य(श्रेष्ठ)त्व की रक्षा हेतु उन्होंने मिथकों और कपोल-कल्पनाओं से भरे वेद-पुरान रचे. ऐसे ग्रंथ जिनमें सच खोजने चलो तो सबसे शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी भी नाकाम हो जाए. उनका ध्येय था, जैसे भी हो ब्राह्मणवाद का महिमामंडन करना. ब्राह्मण को सबसे ऊपर, अनुपम और परम-प्रज्ञाशील दिखाना.

मध्यकाल में इतिहास-लेखन की दृष्टि से कुछ जागरूकता आती है. उस दौर की रचनाओं में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का बखान है. कुछ तारीखें, घटनाएं तथा तथ्यों का उल्टा-सीधा विवरण है. मगर विरासत में मिले संस्कारों की वजह से इतिहासबोध गायब रहता है. उस समय के कवि-लेखक अपने आश्रयदाता की कीर्ति-कथा गढ़ने, उसे दूसरों से श्रेष्ठतर दिखाने को लालायित दिखते हैं. उसके लिए सत्य को मनचाहे ढंग से तोड़ते-मरोड़ते हैं. चारण, भाट, विदूषक कहलाकर भी गर्व का अनुभव करते हैं. उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक हालात ज्यों की त्यों बने रहते हैं. इसी दौर में पश्चिम में बौद्धिक क्रांति हुई. भारतीय संस्कृति की ओर योरोपीय विद्वानों का आकर्षण बढ़ने लगा. उनकी देखा-देखी भारतीयों में भी इतिहास चेतना उभरने लगी. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का असर भी उसपर पड़ा. उस संघर्ष में समाज के सभी वर्ग सहभागी थे. धर्मनिरपेक्षता अधिकांश के लिए सामाजिक मूल्य बन चुकी थी. ऐसे में जो इतिहास-दृष्टि विकसित हुई, उसका स्वरूप समन्वयवादी था.

भारतीय इतिहासकारों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जा सकता है—पहले वर्ग में वे इतिहासकार हैं जिनके लिए भारतीयता का मतलब हिंदू या ‘हिंदुत्व’ है. अतीतमोह उनकी कमजोरी होता है. मानते हैं कि साहित्य तथा अन्य कला-माध्यमों की सार्थकता विलुप्त भारतीयता की खोज में है. उनके लिए संस्कृति और इतिहास में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों में से चयन करना हो तो वे संस्कृति का पक्ष लेते हैं. इस नासमझी के कारण लाखों सैनिकों की बलि लेने वाला, छल-प्रपंच से भरा ‘महाभारत’ ‘धर्मयुद्ध’ घोषित कर दिया जाता है. दूसरा वर्ग आधुनिकता समर्थक लेखकों-इतिहासकारों का है. ऐसे इतिहासकार अतीत के नाम पर भविष्य कुर्बान नहीं करते. वे अतीत को सहेजते हैं ताकि भविष्य संवारा जा सकें. गंगा-जमुनी संस्कृति के समर्थक के तौर पर वे मानते हैं कि भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाने के लिए सभी वर्गों को साथ लेकर चलना आवश्यक है. आजादी के बाद से कमोबेश यही दृष्टि प्रभावी रही है. हालांकि संघीय विचारधारा के इतिहासविद् अपने लंगड़े इतिहासबोध द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर बीच-बीच में सांप्रदायिक प्रदूषण फैलाने की साजिश रचते आए हैं. कुछ ऐसा ही केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद शुरू हुआ है. 2014 में वह विकास के वायदे के साथ सत्ता में आई थी. मगर आने के साथ ही उसने दिखा दिया था कि उसकी असल मंशा कुछ और ही है. सरकार बनने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान की आधुनिक संस्थाएं उसके सीधे निशाने पर आ गईं. कला-संस्कृति के प्रमुख केंद्रों पर संघीय मानसिकता के लोगों को बिठाया जाने लगा. सरकार का सबसे पहला और विवादित कदम ‘भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद’ के अध्यक्ष की नियुक्ति थी. उसके लिए वाई. सुदर्शन राव को चुना गया था. पद-संबंधी सुदर्शन राव की योग्यता पर प्रख्यात इतिहासविद् रोमिला थापर की टिप्पणी थी—‘इतिहास के क्षेत्र में सुदर्शन राव का, मानक-रहित पत्रिकाओं में हिंदू धर्म के मिथकीय पात्रों पर लेख लिखने से बड़ा और कौन-सा योगदान है.’ दूसरे सचेत बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों ने भी सरकार के उस कदम की आलोचना की थी, किंतु सरकार अड़ी रही.

सुदर्शन राव रामायण और महाभारत के कथ्यों की ऐतिहासिकता को स्वीकारते हैं. उनका यह सोच भाजपा के पितृ संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ से मेल खाता है. आधुनिकता की कसौटी पर जाति प्रथा कलंक साबित हुई है. फिर भी संघ उसे किसी न किसी रूप में सहेजे रखना चाहता है. जाति-पृथा का महिमामंडन करते हुए अपने आलेख ‘भारतीय जातिपृथा: एक पुनर्मूल्यांकन’ में सुदर्शन राव लिखते हैं—‘अतीत में जातिप्रथा भली-भांति काम करती आई है. बीते जमाने में उसे लेकर कोई शिकायत प्राप्त नहीं होती. प्रायः उसे गलत ढंग से पेश किया जाता है. आरोप लगाया जाता है कि वह शासक वर्ग के समाजार्थिक स्वार्थों को कायम रखने के लिए गढ़ी गई थी. असल में वह धर्मशास्त्रों द्वारा समर्थित, सभ्यताकरण की अनिवार्यता है. सुदर्शन राव की ‘योग्यता’ के वास्तविक आकलन हेतु उचित होगा कि जाति-संबंधी उनके विचारों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गुरु गोलवरकर के जाति-संबंधित विचारों के समानांतर रखकर पढ़ लिया जाए.

2007 में ‘कर्मयोग’ शीर्षक से लिखी गई पुस्तक में मोदी जी ने मैला उठाने के काम को ‘वाल्मीकियों के लिए आध्यात्मिक अनुभव’ बताया था. वह जाति-व्यवस्था के महिमामंडन जैसा था, जिसका गुणगान संघ और उसके समर्थक करते ही रहते हैं. शब्दों के किंचित ऐर-फेर के साथ यही विचार गोलवरकर की पुस्तक ‘बंच आफ थाट्स’(भाग-दो, अध्याय दस) में भी देखे जा सकते हैं—‘जातिप्रथा प्राचीनकाल में भी मौजूद थी. यह हमारे राष्ट्रीय जीवन में हजारों वर्षों से निरंतर उपस्थित है….यह लोगों में संगठन तथा बंधुत्व की भावना पैदा करती है.’ भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखने में जाति-प्रथा का योगदान किसी से छिपा नहीं है. मगर गोलवरकर के विचार अलग हैं. उनका मानना है कि जाति-प्रथा थी, इसीलिए यह देश विदेशियों का कम गुलाम रहा. वरना दासता और लंबी खिंच सकती थी. गोलवरकर संभवतः अकेले विचारक हैं जो 800 वर्षों के दासताकाल को भी कम मानते हैं. बहरहाल, ऐसे समय में जब अधिकांश बुद्धिजीवी जाति प्रथा की आलोचना करते हों, सुदर्शन राव जैसे बुद्धिजीवी उसे अकादमिक संदर्भ देते रहते हैं. उन्हें पारितोषिक मिलना ही था.

राव अकेले उदाहरण नहीं हैं. ज्ञान-विज्ञान और कला संस्थाओं के शिखर पदों पर खास विचारधारा के लोगों को नियुक्त कर सरकार ने दिखा दिया था कि तर्क और आलोचनाएं उसे तयशुदा दिशा में काम करने से रोक नहीं सकतीं. केंद्र सरकार तथा भाजपा शासित राज्यों की सरकारों अगली वरीयता है, पाठ्य-पुस्तकों में बदलाव करना. महाराष्ट्र सरकार ने फैसला किया है कि विद्यार्थियों को शिवाजी के बारे में और अधिक पढ़ाया जाना चाहिए. बदले में कुछ मुगल शासकों को पाठ्यपुस्तकों से गायब कर दिया गया. राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में मुगल स्थापत्यकला को दर्शाती, ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक इमारतें हैं. उनमें कुतुबमीनार जैसी विश्वविख्यात निमिर्ति भी शामिल है. बदली नीति के तहत पाठ्यपुस्तकों से रजिया सुल्तान तथा मुहम्मद बिन तुगलक जैसे शासकों से संबंधित पाठ को हटा दिया गया है. जब महाराष्ट्र कर रहा है तो मध्यप्रदेश और राजस्थान क्यों पीछे रहते. करीब तीन वर्ष पहले राजस्थान के तीसरे स्तर के इतिहासकार ने फतवा जारी किया था कि अकबर की सेना के साथ हुए युद्ध में राणा प्रताप विजयी हुए थे. उन्हें पराजित दिखाना वामपंथी इतिहासकारों की चाल है. राज्य के शिक्षामंत्री वासुदेव देवनानी को मानो बैठे-बैठाए एक मुद्दा मिल गया. उन्होंने यह कहकर, ‘अकबर या प्रताप में से एक ही महान हो सकता है. हमारे लिए महान महाराणा प्रताप हैं’—इतिहास को अपने हिसाब से मोड़ने का निर्णय ले लिया है. पाठ्यक्रम में बदलाव से पहले सरकार मामले को ‘हिस्ट्री बोर्ड आफ स्टीज’ के पास भेजकर खानापूर्ति कर लेना चाहती है. मामला केवल निचली कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा. ‘फर्स्ट पोस्ट’ की एक रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान विश्वविद्यालय ने इतिहास की पुस्तकों में चंद्रशेखर शर्मा का एक लेख ‘राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप’ शामिल किया गया है. संघ के विचारक दीनानाथ बत्रा की पुस्तकों को उच्च अध्ययन के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में मान्यता देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

इतिहास के फेरबदल का मामला केवल पाठ्यपुस्तकों सीमित नहीं है. दूरदर्शन और फिल्में भी उसका निशाना बनती आई हैं. हालिया उदाहरण सुभाष घई की फिल्म है, जिसे वे फिल्म की नायिका ‘पदमावती’ के नाम से रिलीज करना चाहते थे. मगर फिल्म को देखे बिना ही करणी सेना बिदक गई. फिल्म में पदमावती को अलाउद्दीन खिलजी के आगे नाचते हुए दिखाना उसके नेताओं को राजपूती आन-बान-शान के विरुद्ध लगा. वे दल-बल सहित आंदोलन पर उतर आए. देखते ही देखते सिनेमाघर, बसें, गाड़ियां फूंक दी गईं. रेल को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी की गई. ‘पदमावत’ में जायसी ने नायिका को काल्पनिक माना है. निर्माताओं ने पदमावती को काल्पनिक चरित्र दर्शाना चाहा, पर उन्हें संतोष न हुआ. आंदोलन राजस्थान की सीमाएं पार कर दूसरे राज्यों तक फैलता गया. पुलिस, प्रशासन, सरकार और विपक्ष मौन तमाशबीन बने रहे. फिल्म का नाम ‘पदमावत’ करने और कुछ दृश्यों के संपादन के बाद समझौता हुआ. अचानक माहौल शांत हो गया. करणी सेना उसे लेकर देश-भर में उत्पात मचाए थी, एकाएक फिल्म के समर्थन में आ गई. सिर्फ इसलिए नहीं कि उसमें अंबानी का पैसा लगा है, बल्कि इसलिए भी कि सती-प्रथा पर सवाल उठाने तथा स्त्री-विरोधी सिद्ध करने के बजाय, फिल्म परोक्षतः उसका महिमा-मंडन करती है. जिसे कुछ लोग आज भी राजपूती शान से जोड़कर देखते हैं.

दूरदर्शन धारावाहिक भी इतिहास के साथ छेड़छाड़ का माध्यम बनते आए हैं. पहले यह काम मुख्यतः मनोरंजन के वास्ते, कभी-कभी कथानक में नाटकीयता पैदा करने के लिए किया जाता था. इन दिनों उनका इस्तेमाल हिंदुत्व के औजार के रूप में किया जा रहा है, इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों को मन मुताबिक बदला जा रहा है. उदाहरण के लिए धारावाहिक ‘सोमनाथ’ पर चर्चा कर सकते हैं. राष्ट्रीयता की प्रचलित अवधारणा पश्चिम से आयातित है. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता की भावना ने लोगों को परस्पर जोड़ा था. संस्कृत ग्रंथों में भी ‘राष्ट्र’ का उल्लेख है, परंतु उसका संदर्भ एकदम अलग है. ‘सोमनाथ’ में राष्ट्रीयता की प्राचीन अवधारणा को, आधुनिक संदर्भ में, सांप्रदायिक उन्माद के साथ प्रस्तुत किया गया है.

लगता है, स्वाधीनता संग्राम में किसी प्रकार का योगदान न होने की कमी को भाजपा और संघ इतिहास की मनमानी व्याख्या द्वारा पाट देना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद उनके हौसले और भी बुलंद हैं. इतिहास में दखलंदाजी का खेल मूर्ति-स्थापना के बहाने भी खेला जा रहा है. महाराष्ट्र में शिवाजी और गुजरात में पटेल की मूर्ति विराट मूर्तियां लगवाने का फैसला लिया जा चुका है. एक कम चर्चित मगर महत्त्वपूर्ण मामला लखनऊ से है. वहां मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने आंबेडकर पार्क में राजा सुहेलदेव(995-1060 ईस्वी) की प्रतिमा लगाने की मांग की थी. जिसे राजनीतिक कारणों से तत्काल मान लिया गया था. इतिहास में सुहेलदेव का वर्णन नहीं है. पर्शियन लेखक अब्दुर्र रहमान चिश्ती सतरहवीं शताब्दी में किस्सागोई से भरपूर कृति ‘मिरात-ए-मसूदी’ में उसकी चर्चा करते हैं. सालार मसूद गजनी के सुलतान का भतीजा था. उसको प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का दोषी माना जाता है. गुजरात से दिल्ली, मेरठ होता हुआ वह बहराइच की ओर रहा था कि सुहेलदेव ने उसे चुनौती थी. राजा सुहेलदेव ने पड़ोसी राजाओं के साथ मिलकर संगठित सेना तैयार की. एक महीने तक चली लड़ाई में दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ. अंततः सालार मसूद युद्ध में घायल हुआ और वहीं चल बसा. उसका मजार बहराइच में है. जहां उसे ‘गाजी मसूद’ नाम से जाना जाता है. ‘मीराते मसूदी’ में सुहेलदेव को भर-थरू जाति से माना जाता है, जो राजपूतों की उपजाति है. लेकिन 1980 के आसपास सुहेलदेव को पासी राजा कहा जाने लगा. वहीं राजभर समुदाय भी सुहेलदेव के नाम पर एकजुट होने लगा. कहानी में सांप्रदायिक रंग घोलते हुए सुहेलदेव को ‘गौ-रक्षक’ बताया गया. हिंदुत्ववादी सालार मसूद को सोमनाथ के सूर्यमंदिर की मूर्ति को ध्वस्त करने का दोषी मानते हैं. जबकि मुस्लिम संप्रदायवादी उसे गाजी और शहीद का दर्जा देते है. इनमें कौन-सा पक्ष सही है, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार यह बता पाना संभव नहीं है. बीच संघ सालार मसूद की मजार पर भी अपना दावा ठोक चुका है. उसके अनुसार जहां मजार है, वह कभी ऋषि बालकराम का आश्रम था. फिरोज तुगलक ने आश्रम के स्थान पर मंदिर बनवा लिया है. इतने सारे विवादों में सुहेलदेव के प्रामाणिक इतिहास को गुम होना था, सो हो चुका है.

चलते-चलते सामान्य-सी जिज्ञासा. आखिर वे इतिहास में अतिक्रमण करना क्यों चाहते हैं? इतिहास की पुस्तकों में उल्टा-सीधा कुछ भी जोड़ देने से वर्तमान तो बदल नहीं जाएगा? इसके लिए हमें संस्कृति-निर्माण में इतिहास की भूमिका को समझना पड़ेगा. राजनीतिक दासता ज्यादा से ज्यादा कुछ दशक या पचास-सौ वर्षों की हो सकती है. परंतु सांस्कृतिक दासता सैकड़ों, हजारों वर्षों तक खिंचती जाती है. उससे उबरना आसान नहीं होता. जैसे भारत में ब्राह्मणवाद. वे इतिहास पर कब्जा करना चाहते हैं. ताकि संस्कृति को काबू में रख सकें. इसलिए वाल्तेयर भले ही इतिहास को झूठ कहे, पर उसकी महत्ता है. इतिहास हर हाल में लिखा जाना चाहिए. जार्ज आरवेल के शब्दों में—‘जो इतिहास को नियंत्रण में रखता है, वह भविष्य को नियंत्रण में रखता है. जो वर्तमान को नियंत्रण में रखता है, वही इतिहास को नियंत्रण में रख सकता है.’ आज जो लोग सत्ता मैं हैं, वे इतिहास की उलटगामी को भली-भांति समझते हैं. इसलिए जब वे सत्ता-बाहर हों, तब भी झूठ-पुराण गढ़ते रहते हैं.

स्थितियां एक बार फिर उनके नियंत्रण में है. सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए वे इतिहास बदलने पर उतारू हैं. वे हमारे इस भ्रम को बनाए रखना चाहते हैं कि शासक होना उनका जन्मजात गुण है. एलफिंस्टिन का कथन कि ‘भारत का इतिहास सिकंदर के आक्रमण के बाद से आरंभ होता है और यही वह समय है जब भारत विदेशियों के संपर्क में आता है.’ उनके लिए अर्थहीन है. उन्हें झूठ का पहाड़ खडा करने में महारत हासिल है. मिथकों और गल्प-आख्यानों के माध्यम से वे काल्पनिक इतिहास को सिकंदर के आक्रमण से भी हजारों वर्ष पीछे तक ले जाते हैं. चूंकि उस समय उनकी उपलब्धियां नगण्य थीं, इसलिए हमारे मन-मस्तिष्क पर छाये रहने के लिए पुराणों और महाकाव्यों के माध्यम से पूरा मिथकीय भंडार हमारे आगे परोस देते हैं. फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे दोहराते चले जाते हैं. उस समय तक जब तक कि उनका गढ़ा गल्पशास्त्र हमें इतिहास जैसा दिखने न लगे. हम जानते हैं कि सिंधुवासियों को लिपि का बोध था. लेकिन उस दौर का ब्राह्मणों के लिखे के अलावा हमारे पास दूसरा कोई वाङ्मय नहीं है. कल्पना कीजिए आज से 3000-3500 वर्ष पहले, उस समय के आर्यों के चाल-चलन को देखते हुए, ऋग्वेद के उन गीतों को सुनकर जिनमें इंद्र से पुरों को ध्वस्त करने की प्रार्थना बार-बार की गई है, सिंधु-सभ्यता के तत्कालीन उत्तराधिकारियों की प्रतिक्रिया कैसी रही होगी. हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. आक्रामक आर्यों को लेकर वे शब्द कदाचित यही रहे होंगे—‘घोर आत्ममुग्ध, उज्जड़, और अहंकारी.’

लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है, अथवा जैसा इतिहास पढ़ाने के लिए वे जी-जान से जुटे हैं, वर्तमान परिस्थितियों में अपनी ओर से क्या हम इस तरह की प्रतिक्रिया की कल्पना कर सकते हैं?

ओमप्रकाश कश्यप

संस्कृति की लोकयात्रा : बरास्ता महिषासुर आंदोलन

सामान्य

संस्कृति’ शब्द ‘कृति’ के आगे ‘सम्’ उपसर्ग लगाने से बना है. ‘संस्कृति’ का अभिप्राय है, जिसे बनाने और आगे बढ़ाने में समाज के सभी वर्गों का योगदान बराबर हो. जिसमें सभी की समान सहभागिता हो. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में सभी बराबर हों तथा प्रत्येक को अपना पक्ष प्रस्तुत करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो. व्यक्ति की चारित्रिक विविधताओं का सम्मान करते हुए संस्कृति सदस्य इकाइयों के मन, विचार, रीतिरिवाज के सामंजस्यीकरण का काम करती है, ताकि आगंतुक पीढ़ियां समाज के आदर्श, रीतिरिवाज तथा ज्ञानानुभवों का लाभ उठा सकें. समाजशास्त्र की दृष्टि से ‘अनेकता में एकता’ की व्याप्ति समाज की उदारता का परिचायक होती है. वह समाजीकरण के उच्चतम स्तर की संकेतक है. उदार संस्कृति नैतिकता से सदैव सामंजस्य बनाए रखती है. दोनों के लक्ष्य में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. नैतिकता जिन कसौटियों का निर्माण करती है, संस्कृति विभिन्न प्रतीकों, परंपराओं एवं संस्कारों के माध्यम से समाज में उन्हें लोगों के आचरण का हिस्सा बनाने के लिए प्रयत्नरत रहती है. समानता और स्वतंत्रता ऐसी ही कसौटियां हैं, जो न केवल समाजीकरण का आधार, अपितु उसकी सभ्यता का मापदंड भी हैं. मनुष्य उनसे प्यार करता है, यथासंभव उन्हें सुरक्षित रखना चाहता है. उन पर कोई आंच न आए, उसके लिए वह अपनी स्वतंत्रता के थोड़ेसे हिस्से का बलिदान कर समाज के अनुशासन में बंधने को स्वीकार होता है. इस उम्मीद के साथ कि समाज उसके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करेगा. जिस सुख को वह अकेले प्राप्त करने में असमर्थ है, समाज में रहते हुए वह सुख आसानी से और लगातार प्राप्त होता रहेगा. समाज तथा उसे नियंत्रित करने वाले विधान, चाहे वह नैतिक हो या कानूनी—की चुनौती होती है कि वह मनुष्य की इन अपेक्षाओं पर खरा उतरकर उसके मानवीकरण के लिए उत्प्रेरक का काम करे.

अनेकता में एकता’ का दावा करने वाली भारतीय संस्कृति को इस कसौटी पर परखें तो बहुत उम्मीद नहीं बंधती. ऊपर से एक नजर आने या एक बताई जानी वाली इस संस्कृति के कई चेहरे, अनेक रंग तथा अनगिनत रूपविधान हैं. उनके बीच प्रतिद्विंद्वता बनी ही रहती है. कुछ ऐसे बिंदू भी हैं, जहां उसके दो मुख्य रूपाकारों को साथसाथ रखना, उनके अंतर्विरोधों पर पर्दा डालना न केवल कठिन, बल्कि असंभवसा हो जाता है. उस समय लगने लगता है कि सांस्कृतिक एकता का भारतीय रूपक मात्र एक छद्म, एक दिखावा है. सामाजिक असमानता, ऊंचनीच एवं भेदभाव को मान्यता देते हुए भारतीय संस्कृति समाज के मुट्ठीभर लोगों के हाथों में इतने अधिकार सौंप देती है, जिनसे वे बाकी जनसमूहों पर अपनी मर्जी लाद सकें. वे सदैव इस प्रयास में रहते हैं कि दमित वर्गों की सांस्कृतिक एकता का जो सूत्र उन वर्गों को सुदूर अतीत में जाकर जोड़ता तथा उनके बीच आत्मगौरव का संचार करता है, वह पूर्णतः छिन्नभिन्न हो जाए तथा अलगअलग टुकड़ों में बंटे या बांट दिए गए सामान्यजन, वर्चस्वकारी संस्कृति की अधीनता को चिरकाल तक स्वीकारने को विवश बने रहें. ‘अनेकता में एकता’ का नारा उनकी इसी प्रवृत्ति का परिचायक है. जाति और धर्म भारतीय संस्कृति के ऐसे ही औजार हैं. उनके दबाव में बहुसंख्यक लोग शोषण और असमानता को अपनी नियति मानने लगते हैं. ऐसे में ‘अनेकता में एकता की खोज’ का नारा उदात्त कल्पना से अधिक महत्त्व नहीं रखता. प्राकृतिक न्याय की भावना के विपरीत भारतीय संस्कृति कुछ लोगों को जन्म से विशेषाधिकार घोषित कर बाकी को उनका सेवादार बनाने का समर्थन करती है. मनुष्य की रुचि, स्वभाव, व्यक्तिगत योग्यता उसके लिए कोई महत्त्व नहीं रखती. अभिजन हितों के संरक्षण की सतत चाहत के दौरान स्वतंत्रता एवं समानता जैसे समाजीकरण के मूलभूत सिद्धांत बहुत पीछे छूट जाते हैं. चूंकि ब्राह्मण को धर्म और संस्कृति में शीर्ष स्थान पर रखा गया है, और नीतियां उसी की इच्छा और स्वार्थ के स्तर से तय होती हैं, इस कारण सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को उसके आलोचकों द्वारा ‘ब्राह्मणवाद’ की संज्ञा दी गई है, जो उचित ही है.

सवाल है कि सबकुछ जानतेबूझते हुए भी बहुसंख्यक वर्ग सांस्कृतिकसामाजिक अधीनता को स्वीकार क्यों करता है? क्यों वह वर्ग स्वयं को उस समाज का हिस्सा माने रहता है जो स्वतंत्रता एवं समानता जैसी समाजीकरण की मूलभूत शर्तों पर ही खरा नहीं उतरता. सुदूर अतीत में क्यों उसने मुट्ठीभर वर्चस्वकारियों को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर श्रेष्ठ मानकर अपने जीवन, यहां तक कि खानपान और रहनसहन जैसे रोजमर्रा के कार्यकलापों को भी उनके हवाले कर दिया था? क्या वह वर्ग बौद्धिक स्तर पर सचमुच इतना पिछड़ा हुआ था कि रोजमर्रा के सामान्य प्रश्नों का समाधान भी अपने बूते न खोज सके? असलियत ठीक इसके उलट है. दमित वर्गों में कमी न तो योग्यता की थी, न ही कार्यकौशल की. ये गुण तो उनमें भरपूर थे. समाज की समृद्धि तथा शिखर का वैभवविलास इन्हीं वर्गों के हुनरमंदों और मेहनतकशों के श्रमकौशल की देन था. कमी अपने बुद्धिचातुर्य और सृजनसामर्थ्य का उपयोग अपने और अपने जैसे दूसरे लोगों के लिए करने के बजाय, अपना निर्णयसामर्थ्य दूसरों के हक में बलिदान कर देने की थी. मेहनत को अपना धर्म और विपन्नता को नियति मान लेना उन्हें इतना महंगा पड़ा कि गुलामी का दौर पीढ़ीदरपीढ़ी चलता रहा.

यह सब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं किया था. बल्कि सब कुछ ब्राह्मणवादियों की सोचीसमझी कार्ययोजना का हिस्सा था. जब तक अर्थव्यवस्था पशुबल तथा जंगलों पर निर्भर थी, तब तक ब्राह्मणवाद को पनपने का अवसर नहीं मिल पाया था. अस्थिर जीवन में न तो स्थायी देवताओं के लिए गुंजाइश थी, न ही ईश्वर की. पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि में से जिससे भी सामूहिक मन मिल जाए, उसी को कबीला अपना ‘टोटम’ मान लेता था. सो जब तक यायावरी जीवन रहा, तब तक ‘टोटमवाद’ भी समाज में जगह बनाए रहा. कालांतर में समाज ने जैसे ही कृषिआधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम रखा, कार्यविभाजन के नाम पर ब्राह्मण को समस्त संसाधनों का स्वामी तथा क्षत्रिय को उनका संरक्षक घोषित कर दिया गया. कहा यह गया कि कार्यविभाजन पूरी तरह से योग्यता पर आधारित होगा. कुछ समय के लिए विभिन्न वर्गों के बीच आवागमन चला. ब्राह्मण की संतान ने क्षत्रिय और वैश्य का धंधा अपनाया तो उसका उल्टा भी देखने को मिला. मगर कोई भी आसानी से प्राप्त सुविधाओं को छोड़ने को तैयार न था. धीरेधीरे वर्णाश्रम व्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी. इसी के साथ समाज के कुल संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का अधिपत्य होने लगा. आजीविका के लिए दूसरे वर्गों पर निर्भरता ही बहुसंख्यक वर्ग की लंबी दासता तथा उत्पीड़न का कारण बनी. वर्चस्व को स्थायी बनाने के लिए अभिजात शीर्षस्थों ने हर वह काम किया, जिसे वे कर सकते थे. उत्पादकता पर समाज के बाकी वर्गों का दावा न रहे, इसके लिए नियति को बीच में लाया गया. इस कार्य में धर्म उनका मददगार बना. उसकी सहायता से लोगों के दिमाग में यह भर दिया गया कि उनकी दुर्दशा उनके पूर्वजन्म के कर्मों की देन है. यदि वे समाज द्वारा तय मर्यादा का पालन नहीं करते हैं तो कर्मफल के रूप में त्रासदी का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा.

आरंभ में सामाजिक विभाजन त्रिस्तरीय था. ब्राह्मण और क्षत्रिय के अलावा बाकी सब शूद्र थे. ढाई हजार वर्ष पहले बौद्ध धर्म के उद्भव के पश्चात, समाज में नए शिल्पकार वर्ग का उदय हुआ जो व्यापार के माध्यम से धनार्जन में निपुण था. धीरेधीरे अनुकूल अवसर मिलते ही वह वर्ग इतना सशक्त हो गया कि ऊपर के दोनों वर्गों द्वारा उनकी उपेक्षा करना संभव न रहा. तब त्रिस्तरीय वर्णाश्रम व्यवस्था के स्थान पर चातुर्वर्ण्य समाज को मान्यता देनी पड़ी. लोग असलियत को समझे बिना केवल परंपरापोषी तथा अनुगामी बने रहें, इसके लिए मनु के विधान में शिक्षा एवं संसाधनों पर कुछ वर्गों का विशेषाधिकार घोषित किया गया. ब्राह्मण व्यवस्था के शिखर पर था और समाजहित में सोचने तथा नियम बनाने का अधिकार केवल उसके पास था. उचित यही था कि वह समाज के विश्वास और सौंपे गए कर्तव्यों पर खरा उतरता. लेकिन संस्कृति के हर प्रतीक, रूपक, घटना और चरित्र की व्याख्या उसने केवल अपने स्वार्थ को केंद्र में रखकर की. बाकी दो वर्गों की मदद से उसने खुद को इतना शक्तिशाली बना लिया कि चौथा वर्ग जो संख्या में बाकी तीन वर्गों की कुल संख्या का कई गुना था, वह शक्ति एवं संसाधनों के मामले में निरंतर कमजोर पड़ता गया. धीरेधीरे लोग हालात से समझौता करने लगे. आज स्थिति यह है कि भारतीय संस्कृति में शोषित एवं शोषक दोनों के चेहरे एकदम साफ नजर आते हैं. पाखंडी पंडितों द्वारा दिया गया परलोक का प्रलोभन यथास्थितिवादियों के लिए इतना फला है कि लोग कल के मिथ्या सुख के बदले अपने आज का सुखचैन और कमाई खुशीखुशी अर्पण कर देते हैं.

अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ब्राह्मणवाद धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलोदिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़, केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. फासीवाद की उम्र अपेक्षाकृत कम होती है. वह व्यक्ति के दिलोदिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खरपतवार को समाप्त कर देती है. संस्कृति व्यक्ति को समाज का प्रदाय होती है और राजनीति उसका अपना वरण. सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य शेष सामाजिक इकाइयों के सहयोगसमर्थन से अपने लिए राजनीतिक दर्शन का चयन कर सकता है, अथवा वर्तमान स्वरूप में आवश्यक बदलाव प्रस्तावित कर सकता है, जिन्हें वह अपने लिए तात्कालिक रूप से आवश्यक मानता है. संस्कृति में त्वरित परिवर्तन संभव नहीं होते.

निर्ब्राह्मणीकरण : क्यों और कैसे

संस्कृति के निर्ब्राह्मणीकरण जरूरत पर चर्चा करने से पहले आवश्यक है कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को समझ लिया जाए. इसे तुलसी से बेहतर शायद हमें कोई नहीं समझा सकता. उनकी प्रमुख कृति ‘रामचरितमानस’ को साहित्य के रूप में पढ़नेपढ़ाने की परिपाटी रही है. विद्यालयों, महाविद्यालयों से लेकर शोध के उच्चतम स्तर तक उसे साहित्य के गौरव से नवाजा जाता है. लोकजीवन में भी ‘मानस’ की चौपाइयां रूढ़ि, परंपरा और भाग्यवाद से डरेसहमे लोगों के मार्गदर्शन के काम आती हैं. सवाल है कि क्या यह पुस्तक साहित्यकर्म को साधती हैं? क्या इसे ऐसी ही मंशा के साथ रचा गया था? क्या यह मनुष्य के मौलिक सोच को विस्तार देने, उसे प्रश्नाकुल बनाने का काम करती है? यदि धार्मिक आग्रहों से परे हटकर सोचा जाए तो क्या इस पुस्तक को साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है? हमारा आक्षेप तुलसी के काव्यसामर्थ्य पर नहीं है. उनमें भरपूर कवित्व रहा होगा. लेकिन वे कविधर्म को भी समझते थे, यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. यहां हम केवल उनकी काव्यरचना के मर्म तथा उद्देश्य पर विचार करने जा रहे हैं.

संस्कृत में साहित्य को परिभाषित करते हुए कहा गया है—‘सहितस्य भावः साहित्यम्.’ अर्थात जो सभी को साथ लेकर चले, जिसमें सभी के हितसाधन का भाव हो—वही ‘साहित्य’ है. साहित्य का विचारक्षेत्र न केवल संपूर्ण प्राणिजगत, अपितु जड़, चेतन और वह सबकुछ है, जिससे प्राणिमात्र का हित प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में जुड़ा है. लेकिन तुलसी जब कहते हैं—‘पूजिये विप्र ज्ञानगुन हीना. पूजिये न शूद्र ज्ञान परवीना.’(ज्ञानगुण विहीन ब्राह्मण भी पूजनीय है. ज्ञान और गुण की खान होने के बावजूद शूद्र की पूजा नहीं की जानी चाहिए); अथवा जब वह लिखते हैं—‘शापत ताड़त परुष कहंता. विप्र पूजि अस गावहिं संता.’(संतजन कहते हैं कि शाप देने वाला, प्रताड़ित करने वाला, अपशब्द कहने वाला ब्राह्मण भी पूजा के योग्य है)—उस समय वे स्वयं को लोककवि के बजाय ‘द्विजजनों का चारण’ सिद्ध कर रहे होते हैं. संवेदना साहित्य की पूंजी होती है. सर्वहित की भावना उसे निष्पक्ष बने रहने को प्रेरित करती है. तुलसी का यह लिखना—‘अधम जाति में विद्या पाए. भयहु यथा अहि दूध पिलाए.’(अधम जाति में जन्मे व्यक्ति को शिक्षा देना विषधर को दूध पिलाने जैसा अपकर्म है)—भी घोर आपत्तिजनक है. साहित्यकार का कर्तव्य ऐतिहासिक तथ्यों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना नहीं है. वस्तुनिष्ठ विवेचन इतिहासकार के लिए जरूरी हो सकता है. साहित्यकार का काम प्रत्येक घटना और चरित्र पर मानवतावादी दृष्टि से विचार करना तथा उन्हें इस तरह प्रस्तुत करना है, ताकि वे मनुष्यता का अधिकतम हित साध सकें. ‘रसेन सहितं साहित्यम्’—यानी साहित्य वह है जिसमें रागात्मकता और सर्वहित का भाव हो.’ साहित्यत्व की कसौटी पर न केवल ‘रामचरितमानस’ बल्कि तुलसी का बाकी साहित्य भी कहीं नहीं टिकता. शंबूक की हत्या का प्रसंग हो या स्त्री और शूद्रों को लेकर तुलसी की दृष्टि, इन सबसे वे ब्राह्मणवाद के सबसे मुखर कवि नजर आते हैं. ऐसी विभेदकारी व्यवस्थाओं के बावजूद ‘रामचरितमानस’ को पंचम वेद के रूप में समाज में प्रचलित करना ही साहित्य और संस्कृति दोनों का ब्राह्मणीकरण है.

जो काम तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ में किया, वही सूर तथा कृष्ण भक्ति परंपरा के अन्य कवियों ने कृष्ण को ब्राह्मणवादी परंपरा में ढालकर किया. ऋग्वेद के आठवें मंडल में इंद्रकृष्णासुर संग्राम का वर्णन है. ऋग्वैदिक कृष्ण यदु कबीले का मुखिया है. वह द्रुतगामी(तीव्रता से प्रयाण करने वाला), दस सहस्र सेनाओं का नायक, चतुर योद्धा, कुशल रणनीतिकार भी है जो अंशुमति (यमुना) नदी के तट पर दीप्तिमान होकर निर्भीक विचरण करता है(ऋग्वेद-8/96/13-15). ऋग्वेद में देवताओं के लिए ‘देव’ तथा ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन मिलते हैं. वहां असुर का अर्थ देवता और अनिष्ठ दूर करने वाला भी है. कुछ स्थानों पर ‘वरुण’ को भी ‘असुर’ कहा गया है. मित्र अर्थात सूर्य के लिए ‘सुर’ और ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन ऋग्वेद में प्राप्त होते हैं. इससे अनुमान लगाया जाता है कि आरंभिक ऋग्वैदिक काल में देवताओं के लिए ‘सुर’ संबोधन उतना रूढ़ नहीं हुआ था, जितना आगे चलकर देखने को मिला. ‘कृष्ण’ के प्रति ‘कृष्णासुर’ संबोधन को भी इसी रूप में लेना चाहिए. ऋग्वैदिक कृष्ण आर्यअनार्य संघर्ष में भील तथा दूसरी जनजातियों के साथ मिलकर इंद्र को टक्कर देता है. ऋग्वेद में ही दस गणराज्यों तथा सुदास के बीच घमासान युद्ध का भी उल्लेख है. उसमें सुदास देवताओं की मदद से विजयी होता है. सुदास आर्य सम्राट था. जबकि प्रतिपक्ष में आर्यअनार्य दोनों सम्मिलित थे. इससे संकेत मिलता है कि वर्चस्व की लड़ाई आर्य राजाओं के बीच भी थी. कृष्णासुरइंद्र संग्राम में भी आर्यों की विजय होती है. ये तथ्य ऋग्वैदिक कृष्ण को अनार्य नायक सिद्ध करते हैं.

कृष्ण का दैवीकरण उसके लगभग एक सहस्राब्दी बाद ही संभव हो सका. आर्यों से युद्ध में पराजित यदु, पुरू, यक्ष, अज आदि प्राचीन कबीले उत्तरपश्चिम की ओर प्रयाण कर जाते हैं. 1000-1500 ईसा पूर्व में गंगायमुना के दोआब में पुनः विकसित संस्कृति उभरती है. यदु कबीले के वंशजों ने मथुरा और उसके आसपास बड़े राज्यों की स्थापना की थी. उन्हें अब भी अपने महानायक कृष्ण में आस्था थी. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से ही भारत पर विदेशी आक्रमण होने लगे थे. तब ब्राह्मणवादी सत्ताओं को बड़े राज्य बनाने की सुध आई. यह कार्य यदुओं को, जो उस समय तक संगठित ताकत का रूप ले चुके थे, साथ लिए बिना संभव न था. सांस्कृतिक दूरियों को मिटाने के लिए यदुओं के आर्यकरण की शुरुआत हुई. उस समय तक वैदिक देवता इंद्र अपनी व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण काफी बदनाम हो चुका था, और उसके साथ यदुओं की अनेक कड़वी स्मृतियां जुड़ी थीं, इसलिए वह सम्मिलन इंद्र के प्रधान देवता पद पर रहते हुए असंभव था. अतः पुराने देवताओं विशेषकर इंद्र का मोह छोड़ते हुए आर्यों ने त्रिवेद(चौथे वर्ग की भांति चौथा वेद भी बहुत बाद में, ईस्वी संवत आरंभ होने के आसपास रचा गया) और त्रिवर्ण की युति के आधार पर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे नए देवताओं की कल्पना की. इस कल्पना में भी अनार्य जातियों को ब्राह्मणीकरण की परिसीमा में लाने के बंदोबस्त थे. देवत्रयी में ‘शिव’ शस्त्र संधान में पारंगत किरात, भील, यक्ष, शंबर आदि अनार्य जातियों के सर्वमान्य मुखिया और अजेय महानायक का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हें त्रिदेवों में ‘संहार का देवता’ घोषित किया गया है. ‘संहार का देवता’ ही क्यों? दरअसल देवत्रयी में शिव भारत की जिन आदिम जातियों का प्रतिनिधित्व करते थे, वे युद्धकला में निपुण थीं. शिव को नाराज करना संगठितशक्तिशालीयुद्धकला में पारंगत आदिमजातियों की शत्रुता मोल लेना था, जो विदेशी आक्रामकों का भय झेल रही सत्ताओं के लिए आसान नहीं था. यह तत्कालीन ब्राह्मणों के हृदय में आदिम जातियों के प्रति बैठे भय को भी दर्शाता है.

देवत्रयी में दूसरा स्थान विष्णु को मिला. उन्हें सृष्टि का पालक देवता कहा गया. इस कार्य के लिए वे अवतार भी लेते हैं. अवतारवाद किसी सम्राट द्वारा सीधे अथवा दैवी व्यक्तित्व के नेतृत्व में बड़े राज्य की स्थापना तथा उसमें नई(धार्मिक) व्यवस्था लागू करने का प्रतीक है. ‘कृष्ण’ को देवत्व से नवाजने के लिए उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया. ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता कहा गया. वह ब्राह्मण का प्रतीक था. चूंकि ब्राह्मण उत्पादकता से जुड़ा कोई कार्य नहीं करते इसलिए त्रिदेवों में सृष्टि रचना के बाद ब्रह्मा की भूमिका भी निष्क्रय रह जाती है. कृष्ण का आर्यकरण उनके चरित्र में आमूल परिवर्तन का वाहक बना. ‘महाभारत’ में कृष्ण का जो रूप मिलता है, वह लगभग एक ईस्वी पूर्व की ब्राह्मणवादी कल्पना है. चाणक्य बड़े राज्यों का समर्थक था. ‘अर्थशास्त्र’ में उसने गणराज्यों की आलोचना की. लिखा है कि गणराज्यों में युवा जुए के व्यसनी हो जाते हैं. कृष्ण की प्राचीन स्मृतियां गणराज्यों के मुखियापद से जोड़ती हैं. जबकि महाभारत में उसे चाणक्य की भांति ‘वृहद राष्ट्र्र’ का प्रबल समर्थक दर्शाया गया है. नए अवतार में कृष्ण से वह सब कराया जाता है, जिसके विरोध में उसने इंद्र से संघर्ष किया था. ‘महाभारत’ के युद्ध में भील योद्धा एकलव्य तथा असुर महायोद्धा बर्बरीक दोनों ही कौरवों के पक्ष में युद्ध करने को उद्धत थे. अवतरित कृष्ण एकलव्य की छलपूर्वक हत्या करता है, साथ ही अनार्य महायोद्धा बर्बरीक को भी आत्महत्या के लिए उकसाता है. कृष्ण का यह रूपांतरण यदुओं तथा अनार्य जातियों के बीच द्वेषभाव बढ़ाने के लिए आवश्यक था. आशय है कि यदुओं को कृष्ण के ब्राह्मणीकरण की कीमत चुकाने के लिए उन्हीं देवताओं की शरणागत होना पड़ा था, जिनके सेनापति इंद्र ने उनके पूर्वज कृष्णासुर की हत्या की थी; और जिसके कारण उन्हें अपने मूल स्थान को छोड़ उत्तरपश्चिम में प्रवजन करना पड़ा था.

कृष्ण का उदाहरण हमने ऊपर दिया. देखा कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया केवल घटनाओं के वर्गीय प्रस्तुतीकरण तक सीमित नहीं रहती. उसमें चरित्रों के साथ भी जमकर घालमेल किया जाता है. हर अच्छी बात का उत्स देवताओं को बताने की धुन में सत्य के साथ मनमाना व्यवहार किया जाता है. प्रायः दावा किया जाता है कि देवता सात्विक होते हैं. कि मनसावाचाकर्मणा सात्विकता के विभिन्न रूप देवताओं की प्रेरणा से ही बने हैं. कि शुभत्व का एकमात्र स्रोत देवगण हैं. सात्विकता देवताओं में है, इसी कारण वह संसार में भी है. ये बातें ऋग्वेद में वर्णित देवताओं के चरित्र तथा उत्तरवर्ती गं्रथों में देवसभा एवं अमरपुरी के वैभवपूर्ण उल्लेखों से मेल नहीं खाती. बावजूद इसके उदार एवं करुणामय मनुष्य को ‘देवता’ संबोधित करने की प्रथा प्राचीनकाल से चलती आई है. जबकि परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदमकदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंटपूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मनमाफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. क्या यह महज संयोग है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही लोकायत दर्शन के प्रणेता भी हैं? देवसभाओं में अप्सराओं का नृत्यगायन, देवताओं की मौजमस्ती तथा सोमपान, चार्वाकों की ‘खाओपीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. यह भी हो सकता है कि स्वयं देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी बने हों.

दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीतिशास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. देवविधान में दंड की मात्रा पूर्णतः दंडाधिकारी की मनमानी पर निर्भर करती है. जबकि दंडविधान में अपराध की समीक्षा की संभावना भी निहित रहती है. जाहिर है सभ्यता के इन क्षेत्रों में भी असुर आर्यजनों से काफी आगे थे. लंका पहुंचे हनुमान को वहां एक भी दास दिखाई नहीं पड़ता. जबकि अयोध्या, मिथिला आदि में दासदासियों की भरमार है. अनार्यों की समृद्ध सभ्यता के बारे में ऋग्वेद में पर्याप्त वर्णन हैं. वे अपनी बढ़ीचढ़ी सभ्यता के साथ दुर्गों में रहते थे. उनके दुर्ग लोहे(2/58/8) के, पत्थर(4/30/20) के, लंबेचौड़े गौओं से भरे हुए(8/6/23) थे. सौ खंबों वाले(शतभुजी 1/16/8, (7/15/14) दुर्ग का उल्लेख भी ऋग्वेद में है. ‘महाभारत’ की ख्याति प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन पर गंभीर विमर्श के कारण भी है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्सेकहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित उनमें से अनेक हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्र के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टापल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ऐसी उपलब्धियों के बावजूद असुरों को कामी, लोभी, लालची, व्यसनी और झगड़ालू दर्शाने वाले विवरण धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं. दुर्व्यसन के लिए ‘आसुरी वृत्ति’ लोकप्रचलित मुहावरा है. ‘सात्विक’ देवता चाहे जो दुराचरण करें, उनका देवत्व नष्ट नहीं होता. प्रायः उसे ‘लोककल्याण के निमित्त’, ‘धर्मसंस्थापनार्थायः’ मान लिया जाता है. असुर सम्राट जलंधर की भार्या वृंदा के साथ दुराचरण करने के बावजूद विष्णु का देवत्रयी में सम्मानजनक स्थान बना रहता है. ना ही ऋषिपत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार करने पर इंद्र का देवत्व संकट में पड़ता है. उल्टे अहिल्या को ही शिलाखंड जैसा जीवन जीना पड़ता है. भाषा का खेल भी खूब खेला जाता है. देवता नशा करें तो ‘सोमपान’ और असुर करें तो मदिरापान. सोमपान से देवताओं की सात्विकता पर संकट नहीं आता, परंतु मदिरापान से असुर बदचलन और तिरस्कारयोग्य मान लिए जाते हैं. कारण समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. समस्त धर्मग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनके अपने हित विभेदकारी व्यवस्था से जुड़े थे. इसलिए उनके द्वारा गढ़ी गई संस्कृति में समानता एवं सर्वसम्मति के अवसर बहुत कम हैं. जिधर देखो उधर उसका सर्वसत्तावादी रूप नजर आता है. यह सर्वसत्तावाद कदाचित अनार्य संस्कृति के अग्रपुरुषों को भी ललचाने लगा था. इसलिए जब आर्यों का आक्रमण हुआ तो अनेक अनार्य योद्धा भी उनके साथ मिल गए. सुदास और दस राजाओं का युद्ध आर्यों के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी. उसमें सुदास का नेतृत्व वशिष्ट तथा दसराज्ञों का नेतृत्व विश्वामित्र द्वारा किया गया था. मगर दस राजाओं में अज, शिब्रु, शिम्यु, यदु, यक्षु आदि अनार्य कबीले भी सम्मिलित थे. इस तरह भारत को आर्यवर्त्त बनाने में अनार्य योद्धाओं का भी भरपूर योगदान था. हिरण्यकश्यपु पुत्र प्रहलाद भी इन्हीं में आता है. उसने विष्णु को अपना ईष्ट मानकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह में ब्राह्मणवादियों का साथ दिया था. विभीषण, हनुमान, जटायु जैसे पात्र महाकाव्यीन लेखकों की कल्पना की उपज रहे होंगे. संभव है उनसे मिलतेजुलते पात्र समाज में सचमुच रहे हों, जिन्होंने आर्यसंस्कृति से प्रभावित होकर उनके साथ मिलना स्वीकार किया हो. आर्यों की श्रेष्ठता को दर्शाने के लिए ऐसे मिथकीय पात्रों की कल्पना आवश्यक थी. जिसमें उन्हें भरपूर सफलता भी मिली थी. ब्राह्मणीकरण की यह प्रक्रिया बहुत धीमे, युगों तक चली थी. इसके लिए आर्यों को अनगिनत युद्ध लड़ने पड़े और समझौते भी करने पड़े.

स्वाभाविकसा प्रश्न है कि असुर सभ्यता यदि इतनी ही विकसित थी, तो उसका पतन कैसे हुआ? इसका एक कारण यह जान पड़ता है कि आर्यों के आगमन के पूर्व विभिन्न कबीलों के बीच गणतांत्रिक व्यवस्था थी. भूक्षेत्र समृद्ध था. इसलिए सभी अपनेअपने प्रांत में सुखपूर्वक रहते थे. खेती में वे पारंगत थे. हड़प्पा सभ्यता में मिले भंडारगृहों से संभावना जगती है कि किलों का उपयोग सामरिक उद्देश्यों के बजाय, बचे हुए अनाज के भंडारण हेतु किया जाता था. खुद को सुरक्षित मान वे प्रायः निश्चिंत रहा करते थे. इसलिए जब आर्यों की ओर से आक्रमण हुआ तो वे एकाएक स्वयं को संभाल न सके. कालांतर में आर्यों के संपर्क में आकर उनमें भी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं. इसलिए आक्रामकों का एकजुट सामना करने के बजाए वे बंटकर अपने ही लोगों के विरुद्ध मोर्चा संभालने लगे. दुष्परिणाम यह हुआ कि उन्हें समृद्ध सिंधु प्रदेश छोड़, उत्तरपश्चिम और दक्षिण की ओर पलायन करना पड़ा. परास्त होकर या आर्यों के आक्रमण के भय से अनेक अनार्य जातियों ने समझौता कर लिया. धीरेधीरे वे ब्राह्मणीकरण के दायरे में सिमटने लगे. बावजूद इसके इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब सभी ने ब्राह्मणीकरण के आगे हथियार डाल दिए हों. न ही कभी ऐसा हुआ जब किसी युद्ध में सारे आर्य या अनार्य किसी एक पक्ष में रहे हों. रावण, महिषासुर, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, बालि, बलि जैसे कुछ स्वाभिमानी अनार्य सम्राटों की लंबी कतार है, जो अपने मानसम्मान की खातिर आर्यों से आजीवन संघर्ष करते रहे. यदि उस संघर्ष का निष्पक्ष भाव से दस्तावेजीकरण किया गया होता तो भारतीय संस्कृति का स्वरूप कदाचित उतना विभेदकारी नहीं होता, जितना कि आज है.

अनार्य संस्कृति के पराभव का मूल कारण उसके राजाओं की सैन्य दुर्बलता न होकर, अपनी संस्कृति और इतिहास के दस्तावेजीकरण की ओर से उदासीन हो जाना था. जबकि आर्यगण जिन दिनों तक लेखनकला का विकास नहीं हुआ था, उन दिनों भी स्मृतिभरोसे इस कर्तव्य को निभाते रहे. लेखनकला का विस्तार होने के पश्चात उन्होंने प्रत्येक ऐतिहासिक प्रसंग का वर्णन अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर किया. यहां तक कि असुरों की उपलब्धियों और खोजों को भी अपने नाम करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. उन्होंने संस्कृति को मूल माना और पीढ़ीदरपीढ़ी अनेकानेक प्रतिभाशाली लेखक अपने नाम से स्वतंत्र ग्रंथ रचने का मोह छोड़, बिना किसी यशलाभ की अपेक्षा के, पहले से उपलब्ध धर्मशास्त्रों में ही जोड़घटाव करते रहे. अनेक लोगों द्वारा, अलगअलग समय में लिखे जाने के कारण धर्मशास्त्रों में भारी दोहराव है. अंतर्विरोध और असंगतियां भी हैं. परंतु वे इन्हें कमजोरी नहीं मानते. तर्कशीलता के अभाव को ढांपने के लिए उन्होंने आस्था और विश्वास पर जोर दिया. धर्मशास्त्रों पर किसी भी प्रकार के अविश्वास को पाप मानते हुए वे शब्द के स्वयंप्रमाण होने की घोषणा करते रहे. इससे नए ज्ञान के अवसर कम हुए. मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता पर भी विराम लगा. लेकिन ब्राह्मणवाद या जिस सर्वसत्तावादी ध्येय के निमित्त उन शास्त्रों की रचना हुई थी, उसमें उन्हें भरपूर कामयाबी मिली.

ब्राह्मणवाद : वर्चस्व की सनातनी परंपरा

संस्कृति मनुष्य की सामाजिक संरचना का आधार होती है. समाज में मनुष्य की पहचान संस्कृति के अलावा शिक्षा, उत्पादन के साधनों आदि से भी होती है. बावजूद इसके समाज का बड़ा हिस्सा अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही वास्तविक पहचान माने रहता है. इसलिए वह सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए एकाएक तैयार नहीं होता. यहां तक कि सांस्कृतिक अंतर्विरोधों, असमानताओं के आगे, उन्हें स्वाभाविक मान समर्पण किए रहता है. परिवर्तन संस्कृति में भी होते हैं. लेकिन वे कभी भी उस सीमा तक नहीं जा पाते कि समाज का तानाबाना ही छिन्नभिन्न हो जाए. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीकों यहां तक कि विरोधाभासों, अंतर्विरोधों के प्रति भी मनुष्य का समर्पण स्वैच्छिक होता है, इसलिए सांस्कृतिक दासता राजनीतिक दासता की अपेक्षा कहीं अधिक टिकाऊ एवं प्रभावशाली होती है. लंबे समय तक केवल संस्कृतियां राज करती हैं. अतः दीर्घ काल तक राज करने की इच्छा रखनेवाला राजनीतिक हमलावर सबसे पहले विजित संस्कृति की उन विशेषताओं पर हमला बोलता है, जो उसे स्वतंत्र संस्कृति की मान्यता दे सकती हैं. यह कार्य आरंभ में बल प्रयोग द्वारा, बाद में सहमति तथा तरहतरह की कूटनीतिक चालों द्वारा किया जाता है. संस्कृति और मनुष्य का संबंध इतना गहरा होता है कि मनुष्य संस्कृति के अंतर्विरोधों को भी अपने व्यक्तित्व का हिस्सा मानकर आत्मसात कर लेता है. भारतीय संस्कृति का ब्राह्मणवाद के ढांचे में ढल जाना इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है.

हिंदुत्व ब्राह्मणवाद का रुपहला पर्याय है. शानदार खिड़की जिसके पीछे वह अपने कुटिल चेहरे को छिपाए रखता है. इस हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवनपद्धति भी माना है. दोष न्यायालय का नहीं है. लोकतंत्र में लोगों की इच्छा का महत्त्व होता है. यदि समाज का बहुसंख्यक वर्ग ब्राह्मणवाद की विभेदकारी व्यवस्थाओं के प्रति आंख मूंदकर, चाहेअनचाहे उसके रंग में रंगा हुआ है, तो न्यायालय इसमें क्या कर सकता है! उसका काम तो सिरों की गिनती करने से चल जाता है. अदालत के लिए वही सत्य होता है, जिसके पक्ष पर्याप्त साक्ष्य हों. गवाह बेमन से गवाही दे, या जानबूझकर गलतबयानी करे, चाहे सवाल को ढंग से समझे बिना सिर्फ हांहू करता जाए तो न्यायालय क्या करे! आदमी आलू भी खरीदने जाता है तो मंडी में चार जगह देखता है. मोलभाव और जांचपरख करता है. चाहे एक वक्त की खरीदारी हो या एक सप्ताह की—एकएक आलू को छांटकर खरीदता है. लेकिन धर्म जो उसके अपने और आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करता है, उसके बारे में कभी कोई सवालजवाब नहीं करता. सवाल करना भी पाप समझता है. बात आ पड़े तो बिना सवालजवाब किए ही मरनेमारने पर उतारू हो जाता है, क्यों? कदमकदम पर एकदूसरे की आलोचना करने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करने वाले धर्मों में एक मुद्दे पर कमाल की सहमति होती है. मुद्दा है जन्म के साथ ही मनुष्य का धर्म तय कर दिया जाना. हर धर्म अपने समर्थकों के सिर गिनता है. सिर में मस्तिष्क भी हो, और मस्तिष्क अपना काम भी करे, इस ओर वह कभी ध्यान नहीं देता. जानता है कि इस ओर ध्यान देना शुरू किया तो चार दिन में सारी दुकानदारी बैठ जाएगी. इसलिए पुरानी शराब की भांति हर धर्म नशे के सामर्थ्य और उसके बहाने अपने कारोबार को बढ़ाता चला जाता है.

बहरहाल, बात हिंदुत्व और उसे जीवनपद्धति बताए जाने की हो रही थी. हिंदुत्व यदि जीवनपद्धति है तो मनुष्य को जो आजादी अपनी जीवनपद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैरसनातनी, हिंदू परिवारों की सामान्य जीवनचर्या मिलीजुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. प्रत्येक घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबहशाम की आरती, पूजाबंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, घर के सदस्य विशेषकर स्त्रियां अन्नजल तक ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़ेतिरछे, भांतिभांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एकदो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि बाबा ‘सत्यनारायण’ कौन हैं? उनका खानदान क्या है? किस हिंदू धर्मशास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरीसहमी कुलललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरीचकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, मातापिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं. वही समाजीकरण का मुख्य आधार भी हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्तिपूजकों का हो या मूर्तिभंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूर्त्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीड़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. परंतु वह भूल जाता है कि शील और सदाचरण धर्म के बाहरी आवरण हैं. महज दिखावा, लोगों को प्रलोभन देने वाले. धर्म कोई भी हो. उसका मूल स्वरूप सामंतवादी होता है. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ नामक कथित ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रतउपवास रखने, पर्वत्योहार पर विधिसम्मत पूजनअर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

ब्राह्मणवाद’ को जीवित रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छलहत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनगिनत धत्तकर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ीदरपीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का शिकार होकर इससे मुक्ति की कामना करते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. उनका असली एजेंडा संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों की इजारेदारी को मजबूत करना तथा उसे किसी भी चुनौती से बचाए रखना है. इसके लिए तरहतरह के टोटम, जादूटोने, पूजापाखंड समाज में लागू किए जाते हैं. जाति के आधार पर तीनचौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य संसाधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रहबीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. धर्म आधारित वर्चस्वकारी संस्कृति तथा जातिभेद के प्रति निरक्षर जनता का निःशर्त समर्पण उन्हें दीर्घजीवी बनाता है.

वर्चस्वकारी संस्कृति का जिक्र हुआ तो बता दें कि वह समाज को दो तरह से अपनी जकड़ में लेती है. पहले बलप्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. उसके द्वारा पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल ढालने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धिचातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिकराजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धिविवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की मजबूरी बन जाता है. कभी हताशा तो कभी अज्ञान के चलते वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और मुक्तिदाता मानने लगता है. ऐसे में परिवर्तन उसी दिशा में होता है, जिसका वास्तविक लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थान उठा सकें. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सहीसही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका मार्गदर्शन कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के पुनरीक्षण की शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास, नानक जैसे संतकवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परमधन कहकर रूखीसूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. वह गरीबी का महिमामंडन, दैन्य को आभूषण मान लेने जैसी चूक थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना, मगर उसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना देखा था वह इतना हताश हो चुका था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानताआधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया. जबकि सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. कुछ दिनों बाद उन लोगों ने ही उसे भुला दिया, जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी.

शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथसाथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. उनमें कुछ उन दबंग जातियों में से भी थे, जो सामंती दौर में विप्र जातियों के ‘लठैत’ का काम करते आए थे. अपने ‘लट्ठपन’ पर उन्हें खूब भरोसा था. कदाचित यह गुमान भी था कि ‘बेलेट’ ने बात बिगाड़ी तो ‘लाठी’ से संभाल लेंगे. 1937 के चुनावों में कांग्रेस से मात त्रिवेणी संघ के पिछड़ी जाति के नेताओं ने यही तो कहा था—‘वोट से हार गए तो क्या हुआ. हमारी लाठी तो हमारे हाथ में है.’ इन्हीं कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेताबुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलगअलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषितउत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सहीसही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धिविवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्तापरिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भलीभांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशाहमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्चशिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

निर्ब्राह्मणीकरण : समानता आधारित समाज का सपना—बरास्ता महिषासुर आंदोलन

समानता और स्वतंत्रता के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति आवश्यक है. भारतीय समाज सामाजिकसांस्कृतिक स्तर पर बंटा हुआ है. अद्विज आज भी असमानता का दंश झेल रहे हैं. कारण किसी से छिपे नहीं है. ब्राह्मणवादी व्यवस्था मनुष्य को जन्म के साथ ही जाति और धर्म के खानों में बांट देती है. स्वतंत्र भारत में संवैधानिक प्रावधानों द्वारा इस अंतर को मेटने की कोशिश तो हुई, मगर सामाजिकसांस्कृतिक जकड़बंदी इतनी मजबूत है कि आजादी के 69 वर्ष बाद भी लोग उससे उबर नहीं पाए हैं. लोकतांत्रिक परिवेश ने उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों को इतना अवसर जरूर दिया है कि वे इतिहास को अपने ढंग से समझने के साथसाथ उन कारणों की भी समीक्षा कर सकें, जो उनके दमन और दासता के मूल में हैं. इस छटपटाहट से भारतीय संस्कृति के मुख्य प्रतीकों, घटनाओं, चरित्रों यहां तक कि मिथकों के विवेचन की शुरुआत हुई. धीरेधीरे ही सही मगर संस्कृति के विखंडनात्मक विवेचन की प्रक्रिया आगे बढ़ी है. उसके सूत्रधार दमितशोषित वर्गों में जन्मे वे बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें जाति या किसी और कारण से बौद्धिक विमर्श से बाहर रखा गया था. अवसर मिलते ही वे न केवल सवाल उठाने लगे थे. बल्कि उसके जवाब भी अपने बौद्धिक सामर्थ्य के आधार पर स्वयं खोजने को उद्धत थे. उन लोगों के लिए जो अभी तक समाज के बड़े हिस्से को अपनी कूटनीतिक चालों के आधार पर नचाते आए थे, यह बहुत बड़ी चुनौती थी. ‘महिषासुर दिवस’ का आयोजन उसी क्रम में हालिया आंदोलन की एक कड़ी है. वह हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया थाकृ‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखनेसमझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी और क्रांतिकारी शुरुआत है.

जो लोग ‘महिषासुर मर्दिनी’ कहकर देवी का गुणगान करते आए थे, बदले परिवेश में वे महिषासुर को मिथ बताने लगे हैं. जल्दबाजी में वे भूल जाते हैं कि महिषासुर को यदि मिथ मान लिया गया तो देवी दुर्गा भी मिथ ही सिद्ध होगी. साथसाथ उन देवीदेवताओं को भी मिथ मानना पड़ेगा, जिनके कंधों पर कथित देवसंस्कृति की इमारत खड़ी है. ऐसे में यदि कोई राम और दुर्गा के बहाने अपनी संस्कृति थोप सकता है, उनके माध्यम से वर्चस्वकारी सत्ता के शिखर पर टिका रह सकता है, तो उसकी मुक्ति के प्रतीक के रूप में शंबूक और महिषासुर को भी नायक बनाया जाता है. इतिहास की कमजोरी है कि वह बहुत भरोसे की चीज नहीं होता. वह हमेशा विजेता संस्कृति की इच्छाओं और कामनाओं के अनुसार ढाला जाता है. विवेकवान समाज ऐसे इतिहास की परवाह नहीं करता. जानता है कि सुविधानुसार नायक चुनने की जो आजादी अन्य वर्गों को है, उतनी आजादी उसे भी है. ऐतिहासिक भूलों से सीख लेते हुए वह अपने नायक स्वयं चुनता है. ‘महिषासुर’ ऐतिहासिक चरित्र है—इसके समर्थन में उतने ही तर्क जुटाए जा सकते हैं, जितने उनके पास ‘राम’ या ‘रावण’ को इतिहासपुरुष सिद्ध करने के हैं. पूरा मामला तार्किकता से जुड़ा है. इसमें प्रायः वे असफल होते हैं. उस समय वे आस्था का मामला बताकर लोगों के विवेक और इतिहासबोध को ही प्रभावित करने लगते हैं.

धर्मग्रंथों के जरिये एक बात जो प्रामाणिक रूप से सामने आती है, वह है संस्कृतियों का द्वंद्व. जिसमें महिषासुर की उपस्थिति जनसंस्कृति के प्रभावशाली मुखिया के रूप में है. वह श्रमसंस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशुचारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का महानायक था. वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागरमंथन में बरा बरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं. कार्य पूरा होने पर बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. इस आंदोलन का वे लोग विरोध कर रहे हैं जिनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. संस्कृति की पुनरीक्षा तथा उसके आधार पर न्याय की मांग को कुछ लोग देशद्रोह भी कह रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा लोगों को अपने शब्दजाल में उलझाए रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं.

देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्रयचेतना में बसता है. लाखोंकरोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिकसांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति, समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीनचौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार और उसके आसपास घूमने वाले मुट्ठीभर समूहों को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

महिषासुर आंदोलन’ का विरोध कर रहे लोग या तो इस देश के प्राचीन इतिहास से अनभिज्ञ हैं, अथवा जानबूझकर अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं. उनके मानस में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है. भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से वह देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटेछोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप उन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बारबार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चारपांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. दूसरे शब्दों में ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञबलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्वस्तर पर स्थापित किया था. हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उद्यत था. फलस्वरूप व्यापार बढ़ा तथा देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता चला गया.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. यह मनुष्य के विवेकीकरण को समर्पित, धर्म और संस्कृति की सनातनी व्याख्याओं के विरुद्ध विखंडनवादी चेतना है. जो अप्रासंगिक हो चुके विचार, धारणा, प्रतीक आदि को किनारे कर आगे निकल जाना चाहती है. इसमें पर्याप्त ऊर्जा और वैचारिक तेज है. जिसका डर सत्ताधारी अभिजन चेहरों पर पढ़ा जा सकता है. वे जानते हैं कि बहुजन दृष्टि से मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. आज पूरा विश्व एक परिवार सदृश है. उपेक्षित प्रतिभाएं देशविदेश में कहीं भी यशसम्मान अर्जित कर सकती हैं. ऊपर से राष्ट्रीयअंतरराष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकारवादी संगठन. ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. वे भलीभांति समझते हैं कि बहुत जल्दी दूसरे व्यक्तित्व, घटनाएं और मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियां लगी हैं.

महिषासुर दिवस का आयोजन मात्र पांच वर्ष पुरानी घटना है. मगर सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति के लिए उत्पीड़ित वर्ग के संघर्ष का सिलसिला नया नहीं है. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, नानक का नाम हमने ऊपर उद्धृत किया है. हालिया इतिहास में डॉ. अंबेडकर तथा फुले दंपति का नाम हमने ऊपर लिया. फुले ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है, भी श्रमसंस्कृति के उन्नयन को समर्पित था. धर्मिक आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन उसका केंद्र था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देशविदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थरतराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रमकौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था.

कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिलजुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबरबराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

दो गुना क्यों?’

इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबरबराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे कहीं ज्यादा बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध ने दोनों का पक्ष सुना और अंत में लाभ को बराबरबराबर बांटने की सलाह दी. बाइबिल में भी एक कहानी है, जिसमें एक किसान खेतों में काम करने आए मजदूरों को बराबर मजदूरी देने की बात करता है. कहानी आमदनी को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का समर्थन करती है. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को बुद्ध ने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है.

वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदमकदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. उस व्यवस्था में ब्राह्मण का शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवनयापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्णव्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. लेकिन बात जब लाभ के बंटवारे की आती है तो उसे मामूली मजदूरी देकर टरका दिया जाता है. आय का बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था को नकारा है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रमकौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्शोन्मुखी व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता के लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रहग्रस्त रहा है. उन्होंने इस देश की प्राचीनतम संस्कृति जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है—के दस्तावेजीकरण के प्रति पूर्ण उपेक्षा बरती. उसके मानवतावादी मूल्यों को नकारा, जिसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

जबकि नैतिक मूल्यों को यदि निकाल दिया जाए तो धर्म में मिथकीय किस्सागोई और कोरे कर्मकांडों के अलावा कुछ नहीं बचता. चूंकि बाजारवादी अर्थतंत्र में नैतिक मूल्य धराशायी हो चुके हैं, और किस्सागोई का काम संचार माध्यम संभालने लगे हैं, ऐसे में धर्म के हिस्से कर्मकांडों के रहस्यमय पिटारे के अलावा कुछ नहीं बचता. स्वयंभू भगवानों के जरिये यदि कहीं कुछ धार्मिक मिथ बारबार कहेसुने जाते हैं तो उसके पीछे भी बाजार का ही योगदान है, जिसके चलते धर्म सस्ते मगर सबसे कमाऊ धंधे में बदल चुका है. ऐसे धर्म तथा धर्म को ही सबकुछ मानने वाली संस्कृति का प्रतिकार आवश्यक है. अतः लोगों को बारबार याद दिलाया जाना चाहिए कि जीवन और समाज धर्म से नहीं, मानवीय मूल्यों से चलते हैं, चलने चाहिए. समाज बदलते हैं, धर्म बदलता है मगर जीवन के शाश्वत मूल्य वही रहते हैं. इसलिए मिथकों की पुनर्व्याख्या की कसौटी समानता, स्वतंत्रता, सौहार्द्र, प्रेम, संवेदना, सामंजस्यभाव आदि को बनाया जाना चाहिए.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलितबहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शीलपरीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. इस काम में बड़ी सावधानी की जरूरत है. ‘महिषासुर’ एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. केवल तेजी से कुलीनतंत्र की ओर बढ़ता कबीलाई गणतंत्र था. आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. ऐसे हमलों से बचाव के लिए वह हमारी ढाल भी बन सकता है—लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति का रचनात्मक विकल्प दे पाना संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथसाथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की भी है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षाकवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

संस्कृति की इमारत अनगिनत मिथों के सहारे खड़ी होती है. लेकिन मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. किसी मिथ को कारगर और लोकप्रभावी बनाने के लिए अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है. उनका समर्थन या विरोध करते हुए ही मिथ समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसरविशेष पर हमें राह दिखा सकता है. अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिकसांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एकदूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ तथा विखंडनवादी दृष्टिकोण चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों को भी विमर्श के दायरे में लाएं. मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. यह जितना कठिन कार्य है, उतनी ही अधिक उसकी आज हमें आवश्यकता है. जाहिर है यह एक चुनौती है. जिससे निपटने के लिए बहुजन समाज को लक्ष्यसमर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मानसम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं, जो उन्हें दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक सिद्ध करती है. परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमनेसामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घरपरिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी बाड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. लेकिन यह शुरुआतभर है. संघर्ष यात्रा बहुत लंबी चलने वाली है. इसमें जो धैर्यवान होगा, सजग होगा और विवेक से काम लेगा, प्रलोभन जिसे डिगाएंगे नहीं, वही और केवल वही लंबे समय तक टिका रहेगा. अंतिम जीत उसी के हाथ रहेगी. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

© ओमप्रकाश कश्यप

महिषासुर मूवमेंट : ‘डिब्रह्मनाइजिंग अ कल्चर’

सामान्य

परि​चर्चा

(कुछ महीने पहले एक पत्रिका की ओर से परि​चर्चा की गई थी. उसमें उठाए गए मुद्दों पर कुछ बातें)

 

  • फरवरी, 2016 में संसद के बजट सत्र में भारतीय जनता पार्टी की राजनेता व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने महिषासुर शहादत दिवस पर सवाल उठाकर इसे देशद्रोह से जोड़ दिया था. क्‍या ऐसा किया जाना उचित है? आपकी क्‍या राय है?

‘महिषासुर दिवस’ हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया था, अर्से तक जो आरोपित विचारधारा पर ही अपना ईमान कायम रखे था—‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखने-समझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी शुरुआत है. महिषासुर की ऐतिहासिकता पर बहस करना बेकार है. मिथ को इतिहास-सिद्ध करने की दावेदारी कोई कर भी नहीं सकता. राम और रावण भी मिथकीय पात्र हैं. संभव है सभ्यता के किसी दौर में उनसे मिलते-जुलते व्यक्ति सचमुच इस धरती पर रहे हों, लेकिन वे वैसे ही रहे होंगे जैसे महाकाव्यों तथा अन्य ग्रंथों में दर्शाए गए हैं—यह सप्रमाण नहीं कहा जा सकता. मूल कृति ‘पुलत्स्य वध’ से लेकर ‘रामायण’ और फिर ‘रामचरितमानस’ तक उसमें अनगिनत बदलाव हुए हैं. हर प्रस्तोता ने उसमें कुछ न कुछ जोड़ा-घटाया है. इसलिए उसके अनेकानेक पाठ तथा अनगिनत अंतर्विरोध हैं, जिन्हें वे आस्था और विश्वास की झीनी चादर से ढांपते आए हैं. यदि मान लें कि राम नामक राजा कभी इस धरती पर था, तो भी हम उसे अपना नायक क्यों मानें, जिसने शंबूक का वध केवल इसलिए किया था कि वह किसी खास पुस्तक को पढ़कर ज्ञान में हिस्सेदारी करना चाहता था. असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देने वाला ‘रामराज’ हमारा सपना भला कैसे बन सकता है! विवेकवान समाज अपने नायक स्वयं चुनता है. यदि उन्हें अपनी सुविधानुसार नायक चुनने की आजादी है तो वही आजादी बाकी समाज को भी है. ‘महिषासुर’ मिथ होकर भी हमारे लिए सम्मानेय है, क्योंकि वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागर-मंथन में बराबरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं, परंतु बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. ‘महिषासुर’ श्रम-संस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशु-चारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का प्रतीक नायक है.

सरकार और सरकार में बैठे जो लोग इसे देशद्रोह बता रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा हमें शब्दों के जाल में फंसाए रखना रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं. देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्र्य-चेतना में बसता है. लाखों-करोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही हमें स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के 1.3 अरब लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीन-चौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

  • भाजपा द्वारा संसद में इस बात को उठाये जाने के पहले से ही आरएसएस के अन्‍य अनुषांगिक संगठन जैसे विश्‍व हिंदू परिषद व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इसका विरोध करते रहे हैं। क्‍या आपको लगता है कि महिषासुर शहादत स्‍मृति दिवस जैसे सांस्‍कृतिक आंदोलन का विरोध ब्राह्मणवादी वर्चस्‍व को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है?

भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद ऐसे संगठन हैं जिन्हें धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. वे केवल राजनीति करते हैं, जिसमें लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है. उनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बार-बार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चार-पांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. कह सकते हैं कि ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञ-बलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्व-स्तर पर स्थापित किया था, इसलिए हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उत्सुक था. उसके फलस्वरूप व्यापार बढ़ा और देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता गया.

हिंदू राज्य के रूप में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों की निगाह में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है, जो भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटे-छोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप इन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वण्र्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. इसके लिए तत्कालीन लेखकों ने वैदिक चरित्रों को मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया. ऋग्वेद में कृष्ण यदु कबीले का वीर और बुद्धिमान नेता है, वह आर्य-संस्कृति का विरोधी है तथा आर्यों के विरुद्ध संग्राम में अपने कबीले का नेतृत्व कर युद्ध में इंद्र को परास्त करता है. ‘महाभारत’ के परिवर्धित संस्करण में उसे ब्राह्मणी व्यवस्था के समर्थक के रूप में पेश किया गया. इसके ऐवज में यदुओं को वर्ण-क्रम में ‘क्षत्रिय’ का दर्जा प्राप्त हुआ. इस दौर में दर्शन की मुक्त-धारा, धर्म की ताल-तलैयों में सिमटने लगी थी. बहुदेववाद जो वैदिक साहित्य की विशेषता था, जिसे बुद्ध के समकालीन आचार्यों ने उपनिषदों में एकेश्वरवाद में समेटने की कोशिश की थी—वह पुनः छोटे-छोटे संप्रदायों यथा शैव, कापालिक, तांत्रिक, वैष्णव, नाथपंथी, शाक्त आदि में बंट चुका था. उनके बीच बहुत गहरे मतभेद थे. भाजपा तथा उसके आनुषंगिक संगठन ब्राह्मण धर्म में उभरे उन मतभेदों को याद नहीं करते. वे जानते हैं कि लोकतंत्र के दौर में पुराना समय लौटकर नहीं आने वाला. इसलिए वे धर्म के नाम पर केवल राजनीति करते हैं. उनकी राजनीति भी पूरी तरह प्रतिक्रियावादी, मुस्लिम-विरोध से अनुप्रेत है. उनके लिए राष्ट्रवाद और फासीवाद में बहुत अधिक अंतर नहीं है. जबकि लोकतंत्र को सम्मानजनक स्थान न तो फासीवाद दे पाता है, न ही वह कट्टर राष्ट्रवाद के बीच सुरक्षित रह पाता है.

ब्राह्मणवादी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलो-दिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़ केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. लेकिन फासीवाद की उम्र कम होती है. वह व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खर-पतवार को समाप्त कर देती है.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. और यही डर इस सभ्यता के धार्मिक अभिजन ब्राह्मण को सता रहा है. वे जानते हैं कि बहुजन हितों के अनुसार मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी  परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. भाजपा, विश्व हिंदू परिषद जैसे ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. यह सच भी है कि सिलसिला केवल ‘महिषासुर’ के मिथ की पुनर्व्याख्या पर रुकने वाला नहीं है. रुकना भी नहीं चाहिए. उम्मीद है बहुत जल्दी दूसरे मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियाँ लगी हैं.

  • पिछले कुछ सालों में वर्चस्‍ववादी संस्‍कृति के बरक्‍स समतामूलक बहुजन पंरपरा बहुजन संस्‍कृति की बात उच्‍च शिक्षण संस्थानों में पहुंचे ओबीसी, आदिवासी और दलित विद्यार्थी करने लगे हैं. क्‍या आप मानते हैं कि इस तरह के आंदोलनों से समाज में जागृति आएगी? इस तरह के आंदोलनों का क्‍या लाभ आप देखते हैं?  

वर्चस्वकारी संस्कृति दो तरह से समाज को अपनी जकड़ में लेती है. पहले बल-प्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. वर्चस्वकारी संस्कृति बुद्धिजीवियों से लैस होती है. उसके पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल परिभाषित करने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को यह विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धि-विवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की विवशता बन जाता है. वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और शुभेच्छु मानने लगता है. ऐसे में यदि परिवर्तन होता भी है तो केवल सतही, दिखावे के लिए, जिसका लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थानों को जाता है. जनाक्रोश को शांत करने के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति प्रायः अपने आवरण में ऐर-फेर कर परिवर्तन का नाटक करती है. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सही-सही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका नेतृत्व कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास जैसे संत-कवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परम-धन कहकर रूखी-सूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना—जिसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना था वह इतना शोषित, उत्पीड़ित था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानता-आधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया गया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया.

सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथ-साथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. अपनी-अपनी कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेता-बुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलग-अलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषित-उत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सही-सही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धि-विवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता-परिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. वह यह भी जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भली-भांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशा-हमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्च-शिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

  • क्‍या इतिहास में हुए ऐसे किसी और आंदोलन के बारे आप कुछ बताना चाहेंगे, जिसमें बहुजनों के संस्‍कृति पक्ष पर बल दिया गया हो, और उसके सकारात्‍मक परिणाम सामने आएं हों?

कई आंदोलनों के नाम लिए जा सकते हैं. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, फुले आदि ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय भी श्रम-संस्कृति के उन्नयन को समर्पित था, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है. उसके केंद्र में धर्म के नाम पर आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देश-विदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थर-तराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रम-कौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था. ‘कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिल-जुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबर-बराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

‘मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

‘दो गुना क्यों?’

‘इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

‘हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबर-बराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

‘तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे अधिक बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध दोनों को बराबर-बराबर हिस्सा देने का फैसला करते हैं. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को उन्होंने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है. वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदम-कदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. ब्राह्मण जो शिखर पर रहता है, उसका शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवन-यापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्ण-व्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. फिर भी उसे समग्र आय का मामूली हिस्सा प्राप्त होता है. बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था का प्रतिकार किया है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्श व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रह-ग्रस्त रहा है. उन्होंने उस संस्कृति के दस्तावेजीकरण में पूरी तरह उपेक्षा बरती जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है. उसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

  • महिषासुर आंदोलन के बारे में आपके निजी विचार क्‍या हैं? पिछले दिनों विभिन्‍न समाचारपत्रों, टीवी चैनलों पर इसकी चर्चा रही. इनसे प्राप्‍त सूचनाओं के आधार पर आपका इस आंदोलन के प्रति क्‍या विचार बना? या फिर, इस संबंध में आप किसी अनछुए पहलू पर प्रकाश डालना चाहेंगे?

मन से इस आंदोलन से जुड़े सभी मित्रों को बधाई देते हुए मैं थोड़ा मतांतर रखता हूं. ‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘दुर्गा’ आदि की भांति ‘महिषासुर’ भी एक मिथ है और मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. इसके लिए उसको अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है, जिनका समर्थन या विरोध करते हुए वह समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसर-विशेष पर हमें राह दिखा सकता है. किंतु अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एक-दूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों की भी खोज करें. नए मिथकों की खोज करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है, उन मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति के लिए बहुजन को अपने लक्ष्य को समर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

महिषासुर मिथ की दूसरी कमजोरी यह है कि वह एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. जबकि आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ के प्रतीक के सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. या ऐसे ही हमलों के बीच वह हमारे लिए कारगर हथियार बन सकता है. लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति को रचनात्मक विकल्प संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथ-साथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षा-कवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

  • क्या आप मानते हैं कि संघ परिवार का महिषासुर शहादत दिवस का कटु हिंसक विरोध और आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने की उनकी मांग से दलित-बहुजनों को यह अहसास हो सकेगा कि हिंदुत्व एजेंडा ब्राह्मणवाद से अधिक कुछ नहीं है? क्या आप उनके असली चेहरे और एजेंडे का पर्दाफाश करने में सहयोग करना चाहेंगें?

हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवन-पद्धति माना है. परंतु विचार करके देखिए, क्या यह केवल जीवन-पद्धति ही है. मनुष्य को जो आजादी जीवन-पद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैर-सनातनी, एक हिंदू परिवार की सामान्य जीवन-चर्या मिली-जुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. हर घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबह-शाम की आरती, पूजा-बंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, स्त्रियां अन्न-जल ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़े-तिरछे, भांति-भांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एक-दो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि ‘सत्यनाराण की कथा’ क्या है? किस हिंदू धर्म-शास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरी-सहमी कुल-ललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरी-चकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, माता-पिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं और समाजीकरण का मुख्य आधार हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्ति-पूजकों का हो या मूर्ति-भंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूत्र्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो वे सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीढ़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ या ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रत-उपवास रखने, पर्व-त्योहार पर विधि-सम्मत पूजन-अर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

‘हिंदुत्व’ को बनाए रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छल-हत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनेकानेक धत्त्कर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न के शिकार होते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. हिंदुत्व का एजेंडा कहीं न कहीं संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों की इजारेदारी को भी मजबूत करता है. जाति के आधार पर तीन-चौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य साधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रह-बीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. अभी तक ऐसा ही होता आया है.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलित-बहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शील-परीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. आरक्षण दमित वर्गों को शिक्षा और स्वतंत्र सोच का अवसर प्रदान करता है. इसलिए वह उनके लिए असह् हैं. चाहे जिस आधार पर हो, हिंदुत्व को न्यायालय की स्वीकृति मिल चुकी है, इसलिए वर्चस्वकारी शक्तियां उनके बहाने दलित-बहुजन को फुसलाए रखने का सदियों पुराना खेल खेल रही हैं.

 

  • निस्संदेह आज जो बहुजन सवाल उठा रहा है, सांस्कृतिक प्रतीकों की पुनर्व्याख्या की जा रही है, उसका सीधा-सा आशय है कि समाज के निचले वर्गों में शिक्षास्तर में वृद्धि हुई है. उससे लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है. इसके पीछे आरक्षण का योगदान भी है. इसलिए वे चाहते हैं कि आरक्षण खत्म हो ताकि उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो और जैसे वे पिछले हजारों वर्ष से याद करते आए हैं, आगे भी इसी प्रकार चलता रहे.

ब्राह्मणवाद सांस्कृतिक ‘दैत्य’ है. यहां ‘दैत्य’ का अभिप्राय उसके परंपरागत अर्थ में ही लेना चाहिए. परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदम-कदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंट-पूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मन-माफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. यह अनायास नहीं है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही चार्वाक दर्शन के प्रणेता भी हैं. देव-सभाओं में अप्सराओं का नृत्य-गायन, देवताओं की मौज-मस्ती तथा सोम-पान, चार्वाकों की ‘खाओ-पीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. या फिर यह हो सकता है कि देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी हों. दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीति-शास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. ‘महाभारत’ की चर्चा प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन के लिए होती है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्से कहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित वे मिथ हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्राचार्य के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टा-पल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मान-सम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं. इसलिए एक सीमा से अधिक विरोध के लिए वे कभी आगे नहीं आए. स्वतंत्र भारत के संविधान में मिले अधिकारों के फलस्वरूप पहली बार दलितों और पिछड़ों को अवसर मिला कि वे ब्राह्मणवाद के किले में सैंध लगा सकें. आरक्षण ने इस प्रक्रिया को संभव बनाया, इसलिए वे वर्ग आरक्षण को अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं. पिछले कुछ वर्षों में हालात और भी बदले हैं. शिक्षा के क्षेत्र में मिले आरक्षण ने दलितों और पिछड़ों को अवसर दिया कि वे ब्राह्मणवाद की चतुराइयों को समझ सकें तथा जिन प्रतीकों एवं मिथों के माध्यम से वह अपने सर्वसत्तावादी स्वरूप को बनाए हुए है, उनकी अपने हितों के अनुरूप व्याख्या कर सकें. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों में उभरी इसी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं. इसलिए ब्राह्मणवाद के पैरोकारों की ओर से उनका विरोध स्वाभाविक है. अब वे चाहते हैं कि ‘कल्याण राज्य’ की अपेक्षाओं के चलते स्वाधीन भारत के संविधान में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को जो अधिकार दिए हैं, वे समाप्त हों, ताकि पुरानी व्यवस्था लौट सके. पूंजीवाद और राजनीतिक सत्ता आज भी उसके मददगार हैं.

परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमने-सामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घर-परिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी आड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. इससे ब्राह्मण बुद्धिजीवी खुद को असहज पा रहे हैं. आरक्षण का विरोध इसी विषम मनःस्थिति की उपज है. चलते-चलते एक बात मैं अवश्य जोड़ना चाहूंगा. आरक्षण एक व्यवस्था है. यह सामाजिक न्याय के दायरे में भी आता है. लेकिन यह प्राकृतिक न्याय का पर्याय नहीं है. इसलिए संविधान-सम्मत होने के बावजूद इसे हमेशा-हमेशा के लिए लागू नहीं रखा सकता. इसलिए बहुजन अस्मिता की चिंता करने वाले बुद्धिजीवियों, लेखकों और कलाकारों को अभी से खुद को तैयार रखना होगा. उसका एकमात्र उपाय है, वर्चस्वकारी संस्कृति के मुकाबले सामाजिक न्याय, तर्क, विवेक और आधुनिक जीवनमूल्यों से संपन्न जनसंस्कृति को खड़ा करना. विवेकवान बनना और समानधर्मा लोगों के विवेकीकरण में सहायता करना. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

 ओमप्रकाश कश्यप

 

अस्मिताओं का मूर्तिकरण

सामान्य
नदी तभी तक पवित्र रहती है, जब तक वह प्रवाह में रहती है. प्रवाह जितना तेज, नदी उतनी महान. यही स्थिति ज्ञान की है. ज्ञान तभी तक ज्ञान रहता है, जब तक वह विमर्श का हिस्सा है. ज्ञान का ठहराव रूढ़ि को, नदी का दलदल को जन्म देता है.

 

खबर है कि लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क में अभिजन नायकों की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी. महापुरुषों के संघर्ष और विचारों को मूर्तियों तक सीमित कर देना, विवेकशील समाज का लक्षण नहीं है. यह ठीक ऐसा है जैसे ‘दि कैपीटल’ की पूंजीवादी गवेषणा को समझने के बजाय मार्क्स के स्टेच्यू पर फूलमालाएं चढ़ाकर खुद को साम्यवादी घोषित कर देना. ज्ञान का कर्मकांडीकरण सामाजिक गतिशीलता में विक्षोभ उत्पन्न करता है. परिणामस्वरूप नागरिक समूहों का आचरण भीड़ के व्यवहार में ढल जाता है. भारत इसका अकेला उदाहरण नहीं है. पूरी दुनिया में यही होता आया है. प्रगतिकामी विचारों की प्रखरता को कम करने का सबसे आसान तरीका उसे मूर्तिर्यों में कैद कर, पवित्र घोषित कर देना है. इसीलिए चालबाज सत्ताएं, क्रांति-धर्मा नायकों को देवता घोषित करती आई हैं. वे जनसाधारण को लगातार यह विश्वास दिलाती रहती हैं कि पृथ्वी पर कुछ लोग जन्मजात शासक होते हैं. जो वैसे नहीं हैं, उन्हें दूसरों के भरोसे, उनकी अनुकंपा पर जीना पड़ता है. शासित से अपेक्षा की जाती है कि वह महापुरुषों के नाम पर बनी मूर्तियों तथा मठों का सम्मान करे. धर्म, संस्कृति और राजनीति के चौतरफा दबाव में जनसाधारण भी यह मान लेता है कि समस्याओं के समाधान हेतु कुछ लोगों का देवताकरण अपरिहार्य है. विचारों और संघर्षों का मूर्तिकरण सामाजिक असमानता और दमनात्मक स्थितियों को स्थायी बनाता है. लोग हालात से अनुकूलित हो, सवाल करना भूलने लगते हैं. इससे उत्पीड़क वर्ग के लिए शोषण की राह आसान हो जाती है.

भारत में मूर्ति-पूजा की परंपरा शताब्दियों से है. इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि समाज का बड़ा वर्ग मूर्ति को ही आराध्य माने रहता है. अपनी आस्था और विश्वास को दूसरों से विशिष्ट समझने की जिद बड़े-बड़े संघर्षों को जन्म देती आई है. मूर्ति को सबकुछ मानने वाला व्यक्ति अपने सहज विवेक से भी वंचित जाता है. वह अपने हित-अहित का निर्णय स्वयं नहीं ले पाता. वह दूसरों की इच्छा का दास होता है. मूर्तिपूजा उसे न केवल ज्ञान की प्राचीन, बल्कि अधुनातन परंपरा से भी काट देती है. इसलिए परिवर्तन की वांछा रखने वाले समूहों और बुद्धिजीवियों द्वारा उनका विरोध लाजिमी हो जाता है. ये स्थितियां सामाजिक अंतर्द्वंद्व को बढ़ावा देती हैं. विकासशील समाजों में ऐसे अंतर्द्वंद्वों को साफ-साफ देखा जा सकता है. अंतर्द्वंद्व हमेशा नकारात्मक नहीं होते. कई बार वे समाज को सकारात्मक परिवर्तनों की ओर भी ले जाते हैं. भारत में आधुनिक शिक्षा के फलस्वरूप दमित वर्गों में नई चेतना जगी है. वे शोषण के विभिन्न रूपों, उसके कारण तथा संगठन की ताकत को समझने लगे हैं. इससे शताब्दियों से दूसरों के श्रम-कौशल पर जीता आया वर्ग अपने भविष्य को लेकर आंदोलित है. मूर्ति-स्थापना की घोषणा परिवर्तन की चाल को अवमंदित करने और येन-केन-प्रकारेण यथास्थिति बनाए रखने का षड्यंत्र है.

उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को दलितों के काफी संख्या में; तथा अतिपिछड़ों के लगभग एकमुश्त वोट मिले थे. उसकी बंपर कही जा रही जीत दलितों-पिछड़ों की आपसी फूट का परिणाम थी. 2019 में जीत को आसान बनाने के लिए भाजपा की कोशिश मत-समीकरणों को पूर्वतः बनाए रखने की है. राजभर समुदाय को फुसलाए रखने के लिए राजा सुहेलदेव की मूर्ति लगवाने की भूमिका पिछले महीने उस समय बन चुकी थी, जब 14 मई 2017 को विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने सुहेलदेव को पासी राजा कह दिया था. राजभर समुदाय ने इसे अपनी अस्मिता पर हमला माना. तीन दिन बाद ही वह सड़क पर आ गया. जैसे सब कुछ पूर्वनियोजित हो. उसके कुछ दिन बाद मुख्यमंत्री ने आंबेडकर पार्क का निरीक्षण कर, वहां सुहेलदेव की प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान कर कर दिया. उत्तर प्रदेश सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर को भी लगा कि पार्टी हाईकमान को खुश करने का यह अच्छा अवसर है. सो बिना कोई पल गंवाए उन्होंने पार्क में राजा सुहेलदेव के अलावा महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे संघ के चहेते महापुरुषों की प्रतिमाएं लगवाने की घोषणा कर दी. वैसे भी पूर्वी उत्तरप्रदेश में 18 प्रतिशत की मत-संख्या वाले इस समुदाय को नाराज करना, राजनीतिक दृष्टि से आत्मघाती कदम होता. गौरतलब है कि अपनी चूक के लिए मुख्यमंत्री ने खेद व्यक्त नहीं किया. उससे पासी समाज नाराज हो सकता था. आजादी के बाद राजभर जाति का वोट विभिन्न राजनीतिक दलों में बंटता आया है. विगत उत्तर प्रदेश चुनावों में उन्होंने भाजपा के समर्थन में एकमुश्त मतदान किया था. यदि मूर्ति लगाने मात्र से प्रदेश के बड़े वोट बैंक को साधा जा सकता है तो राजनीतिक दृष्टि से यह बुरा सौदा नहीं था. आर्थिक दृष्टि से राजभर समुदाय समाज के सर्वाधिक विपन्न वर्गों में से है. उचित होता कि केंद्र और प्रदेश दोनों की सरकारें राजभरों की मूलभत समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक कदम उठातीं. लोकतांत्रिक विश्वास को इसी तरह कायम रखा जाता है. लेकिन जिस विचारधारा का भाजपा प्रतिनिधित्व करती है, उसमें लोकतांत्रिक शक्तिकरण से कहीं अधिक महत्त्व मनुष्य को बौद्धिक विपन्न बनाने वाले कर्मकांडों का है. इस बार भी उसने बिना किसी हिचक, वही किया.

सवाल है, राजा सुहेलदेव(995—1060 ईस्वी) ही क्यों? ग्यारहवीं शताब्दी के इस राजा के बारे भारतीय लेखकों ने बहुत कम लिखा है. उनकी उपेक्षा स्वतः प्रमाण है कि राजा सुहेलदेव शूद्र कुलोत्पन्न था. कदाचित इसीलिए वह 900 वर्षों तक भारतीय लेखकों की स्मृति से गायब रहा. जबकि पार्शियन लेखक अब्दुर्र रहमान चिश्ती 17वीं शताब्दी में ही, ‘मिरात-ए-मसूदी’ में राजा सुहेलदेव और सालार मसूद के बीच हुए युद्ध का वर्णन कर चुका था. सालार मसूद गजनी के सुलतान का भतीजा था. उसने 16 वर्ष की उम्र में भारत में हमलावर के रूप में प्रवेश किया था. यहां उसने इस्लाम की स्थापना के लिए कई युद्ध लड़े, जिससे उसे गाजी की उपाधि प्राप्त हुई. सालार मसूद को सोमनाथ मंदिर की प्रसिद्ध मूर्तियों को तोड़ने का दोषी भी माना जाता है. दिल्ली, मेरठ आदि ठिकानों को जीतता हुआ, वह बहराइच की ओर प्रस्थान कर गया. हमलावर को अपनी ओर बढ़ते देख श्रावस्ती के राजा सुहेलदेव ने दूरदर्शिता का परिचय दिया. उन्होंने पड़ोसी राजाओं के साथ संघ तैयार किया. एक महीने तक राजा सुहेलदेव के नेतृत्व में लड़ाई चली. जिसमें दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ. अंततः सालार मसूद युद्ध में घायल हुआ. वहीं उसकी मृत्यु हो गई. उसका मजार बहराइच में है, जहां उसको ‘गाजी मसूद’ के नाम से जाना जाता है. मुगल बादशाह जहांगीर के समकालीन चिश्ती के अनुसार, ‘सालार मसूद की ऐतिहासिकता, उसका भारत आना और यहां शहीद होना प्रामाणिक है. इस कहानी को अनेक तरह से कहा गया है, परंतु इतिहास की किसी भी प्रामाणिक पुस्तक में इसका उल्लेख नहीं है.’(हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियन : मोहम्मदियन पीरियड). बताया गया है कि पुस्तक की रचना से पहले लेखक ने सालार मसूद के बारे में काफी शोध किया था. आखिर उसे मुल्ला मुहम्मद गजनवी द्वारा लिखित पुस्तक मिली. मुल्ला मुहम्मद सुल्तान मुहम्मद सुबुक्तगीन का सेवादार था. उसने कुछ समय तक सालार साहू तथा सालार मसूद के बेटे के यहां भी नौकरी की थी.

एक तरह से यह भारत पर मुस्लिमों के आरंभिक आक्रमणों का किस्सा है. बावजूद इसके उस वर्ग में जिसका विद्वता के नाते शिखर पर बने रहने का दावा था, और जिसके उत्तराधिकारी आज हिंदुत्व के पैरोकार बने हैं—यह हिम्मत नहीं थी कि गाजी सालार मसूद को युद्ध में धूल चटाने वाले राजा सुहेलदेव के इतिहास को सहेज सके. भारतीय लेखकों को सुहेलदेव की याद बीसवीं शताब्दी में उस समय आई, जब स्वाधीनता करीब दिखने लगी थी. विभिन्न दलों में आजाद भारत की सत्ता पर काबिज होने की होड़ मची थी. उन्हीं दिनों कहानी को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई. सुहेलदेव को ‘गौ-रक्षक’ बताया गया. कहानी को सांप्रदायिक रंग देने के लिए कुछ प्रसंग गढ़े गए. उनमें से एक के अनुसार, यह सोचते हुए कि हिंदू सैनिक गायों पर हमला नहीं करेंगे, सालार मसूद ने अपनी छावनी के आगे गाएं बांध दीं. सुहेलदेव को पता चला तो परेशान हुए. दूरदर्शिता दिखाते हुए उन्होंने युद्ध आरंभ होने से पहले ही सालार मसूद के छावनी-स्थल पर धावा बोलकर गायों के रस्से काट डाले. उसके बाद जो युद्ध हुआ, उसमें सुहेलदेव ने सालार मसूद को करारी शिकस्त दी. इस कहानी का सिवाय लोक-साहित्य के कोई संदर्भ नहीं है. लेकिन कहानी का यही हिस्सा सुहेलदेव को आज के संदर्भों में प्रासंगिक बनाता है. आज हिंदुत्ववादी लोग सालार मसूद को सोमनाथ के सूर्यमंदिर की मूर्ति को ध्वस्त करने का दोषी मानते हैं. जबकि मुस्लिम संप्रदायवादी उसे गाजी और शहीद का दर्जा देते हैं. इन सबसे अलग एक वर्ग उन लोगों का है, जो आस्था और विश्वास से परे कुछ सोच ही नहीं पाते. ऐसे लोग सालार मसूद को पीर का दर्जा देकर उसकी मजार पर सदके करते हैं.

हम मिश्रित अस्मिताओं वाले समाज में रहते हैं. यदि किसी को महाराणा प्रताप में अपना आदर्श नजर आता है और वह चाहता है कि उनकी मूर्ति स्थापित हो तो ऐसी इच्छा करने और उसकी मांग करने का उसे पूरा अधिकार है. देश में महाराणा प्रताप की मूर्तियों की कमी नहीं है. कुछ दशकों से गांवों में प्रवेशद्वार बनवाने का चलन बढ़ा है. ठाकुर बहुल गांवों के प्रवेश-द्वार पर चेतक पर सवार महाराणा प्रताप की मूर्तियां प्रायः दिख जाती हैं. उनसे गांव के शक्ति-संतुलन का अनुमान लगाया जा सकता है. राजस्थान में महाराणा प्रताप का शौर्य गढ़ने के नाम पर इतिहास को नए सिरे से लिखे जाने की कवायद शुरू हो चुकी है. किसी-किसी गांव में दलित बस्ती में, उभरती अस्मिताओं की प्रतीक, आंबेडकर की प्रतिमा भी दिख जाती है. जिसके रूपाकार को देख वहां पसरी विपन्नता का अनुमान लगाया जा सकता है.

राजा सुहेलदेव की मूर्ति लगाने के लिए आंबेडकर पार्क ही क्यों? प्रशंसकों की निगाह में राणा प्रताप तथा राजा सुहेलदेव का संघर्ष उतना ही महान हो सकता है, जितना दलितों के लिए महात्मा फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर का. परंतु दोनों के संघर्ष में मूल-भूत अंतर है. यह अंतर परंपरा और आधुनिकता का भी है. फुले दंपति, डॉ. आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार, कांशीराम आदि का जीवन-संघर्ष सामाजिक न्याय को समर्पित, लोकतंत्र की भावना से ओतप्रोत था. उसके फलस्वरूप आधुनिक समाज गढ़ने में मदद मिली. जबकि महाराणा प्रताप, राजा सुहेलदेव, यहां तक कि शिवाजी भी राजशाही और सामंतवाद के पोषक-पालक हैं. उनकी महानता इतिहास के संदर्भ में आंकी जानी चाहिए. तदनुसार उनकी जीवनगाथाएं बच्चों को इतिहास की तरह पढ़ाई जा सकती हैं. मनुष्य उनसे प्रेरणा ले सकता है. न्याय और लोकतंत्र की समृद्धि हेतु आवश्यक है कि आगामी पीढ़ियां लोकतांत्रिक संघर्षों के विविध रूपों से परिचित हो. इसके लिए ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर के पार्श्व में महाराणा प्रताप की मूर्ति स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं है.

अपने फैसले के समर्थन में मुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश तर्क दे सकते हैं कि आंबेडकर पार्क में बहुजन नायकों के अगल-बगल राजा सुहेलदेव, महाराणा प्रताप आदि की मूर्तियां लगाने से समाज में बराबरी और एकता का संदेश जाएगा. फलस्वरूप देश में विभिन्न स्तरों पर जो अलगाव दिखाई पड़ता है, उसमें कमी आएगी. मुख्यमंत्री की घोषणा में नई मूर्तियों की धातु तथा उनके आकार का उल्लेख नहीं था. जबकि ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि सुहेलदेव की प्रतिमा मायावती की प्रतिमा से कम से कम पांच फुट ऊंची होगी. आप इस गणित में उलझे रहिए. सोचते रहिए कि मायावती(दलित) से राजा सुहेलदेव(शूद्र) की प्रतिमा पांच फुट बड़ी होगी तो क्षत्रिय महाराणा प्रताप की प्रतिमा को राजा सुहेलदेव की प्रतिमा से कितना ऊंचा रखा जाएगा? मंत्री महोदय इसका समाधान भले न खोज पाएं हों, सुहेलदेव के बहाने अपनी राजनीतिक गोटियां फेंटने सवर्ण इसे भली-भांति समझते हैं. यह कोई आज का किस्सा भी नहीं है. धर्मांतरण के दबावों से उबरने के लिए अतिपिछड़ी जातियों के संस्कृतिकरण की कोशिश आर्यसमाज के षुरुआती दिनों में ही आरंभ हो चुकी थी. भाजपा उस जकड़बंदी को मजबूत करना चाहती है.

वस्तुतः अभिजन वर्ग के नेतृत्व में बनी सरकारें परिवर्तन की मांग को उस समय तक उपेक्षित रखती हैं, जब तक संबंधित समूहों में परिवर्तन के प्रति अनिवार्य चेतना न हो. परिवर्तन की दिशा-दशा तय करने में विचारधाराओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रहती है. इसलिए शिखर पर मौजूद लोग परिवर्तन तथा परिवर्तन को हवा देने वाले विचार, दोनों से घबराते हैं. परिवर्तन की आंधी को रोकने, उसकी दिशा बदलने के लिए ऐसे मिथक गढ़े जाते हैं जो लोगों के परंपराबोध को जड़ और पश्चगामी बनाते हों. मूर्तिकरण जैसी प्रवृत्तियां उसमें सहायक बनती हैं. अकस्मात चर्चा में आए सुहेलदेव प्रसंग को इसी संदर्भ में देखना चाहिए. यह उन सपनों और संकल्पों से परे है जो आजादी के साक्षी बने थे. उनमें एक संकल्प यह भी था कि देश लोकतांत्रिक आदर्शों के साथ आगे बढ़ेगा. लेकिन आजादी के बाद से ही गांधी राजघाट में और संविधान की भावना संसद के शोरगुल में दबती आई है.

वैसे भी भाजपा शासित राज्यों में इन दिनों ऊंची से ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की होड़ मची है. गुजरात सरकार सरदार पटेल की 182 मीटर फुट ऊंची प्रतिमा लगाने जा रही है, वहीं महाराष्ट्र सरकार द्वारा 190 मीटर ऊंची शिवाजी की प्रतिमा लगाने का ऐलान किया गया है. इसके पीछे इतिहास को सहेजने से अधिक कोशिश राष्ट्रवाद को थोपने की है. एक तरह से सांस्कृतिक हमला. जिससे समाज में विक्षोभ उत्पन्न होने की संभावना है. मूर्तिकरण के खतरे और भी हैं. आंबेडकर पार्कों में मूर्तियों के सामान्य आकार से बड़ी मूर्तियां लगवाने की कोशिश शुरू हुई तो बहुजन समाज उसे अपनी संस्कृति पर हमले की तरह लेगा. वह उसे अपने महानायकों का अपमान समझेगा. उससे जातीय संघर्ष में वृद्धि होगी. बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है. सुश्री मायावती के शासनकाल में बने आंबेडकर पार्कों में उन बहुजन नायकों की मूर्तियां लगी हैं, जिन्होंने देश में व्याप्त धार्मिक-सामाजिक पाखंड के विरोध में लंबा संघर्ष किया था. जिन्होंने दलितों में आत्मचेतना जाग्रत की. भाग्य को ही सबकुछ मानते आए बहुजनों को अपने ऊपर विश्वास करने और अपने भरोसे जीना सिखाया. वर्तमान सरकार की कोशिश उन्हें फिर से मनुवाद के हवाले कर देने की है. वैसे इसके लिए न केवल सरकार दोषी है, न वे लोग जो देष और समाज को खास दिषा में ले जाना चाहते हैं. दोष जनता का भी है, जो रूढ़ियों और परंपराओं से चिपके रहने में ही जीवन की परमसिद्धि माने रहती है. जो नए ज्ञान का उस समय तक विरोध करती है, जब तक कि वह उसपर थोप न दिया जाए. ऐसी जनता को फुसलाना आसान होता है. मूल्यों और विचारों को मूर्तिकरण में सीमित कर देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

ओमप्रकाश कश्यप

 

धर्मनिरपेक्षता और जाति

सामान्य
  • कोई भी व्यक्ति इतना न्यायप्रिय नहीं होता, जितना पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति.—गिल्बर्ट कीथ चेटरसन

  • ‘‘मेरे विचार में भारत न हिंदू देश बन सकता है ना हिंदू धर्म भारत सरकार का धर्म बन सकता है. हमें याद रखना चाहिए कि हमारे देश में अल्पसंख्यक भी रहते हैं और हमारा यह कर्तव्य है कि उनकी सुरक्षा का प्रबंध करें. यह देश सबका देश है. चाहे कोई धर्म, कोई जाति हो. हम उस रास्ते पर नहीं चल सकते़ जिसपर पाकिस्तान चल रहा है. हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमारे धर्मनिरपेक्ष उद्देश्य सुरक्षित रहें. यहां हर मुसलमान, हर ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक वर्गों को यह विश्वास होना चाहिए कि वह सुरक्षित है और उसे भारतीय नागरिक की हैसियत से बराबर के अधिकार प्राप्त हैं. अगर हम उसे यह विश्वासदिलाने में नाकाम रहे तो यह हमारी विरासत और इस देश का घोर अपमान होगा.’’—सरदार वल्लभभाई पट

धर्मनिरपेक्षता का मामला आधुनिक राष्ट्रराज्य की न्यायचेतना से जुड़ा है. जबकि जाति इस देश के लिए कम से कम तीन हजार वर्ष पुरानी संस्था है. जाति का भारतीय, विशेषकर हिंदू समाज पर इतना गहरा प्रभाव है कि बिना इसके हिंदुओं को अपनी पहचान अधूरी लगती है. जबकि इसी की वजह से समाज के बड़े वर्ग को कदमकदम पर अपमानितलांछित होना पड़ता है. विभिन्न सभ्यताओं में कार्यविभाजन के लिए समाज को अलगअलग बांटने की संस्कृति रही है. वर्तमान में दुनियाभर में केवल भारत ऐसा देश है जहां आज भी जाति का बोलबाला है. जिसके चलते बच्चे के जन्म के साथ ही तय कर दिया जाता है कि वह समाज में कौनसा काम करने के लिए जन्मा है. इन दिनों परिस्थितियां बदली हैं. विशेषरूप से शहरों में. वहां जाति के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं. मगर यह सुगबुगाहट मुख्य रूप से जातिवादी अन्याय एवं शोषण का शिकार रहे वर्गों में देखने को मिलती है. जिन वर्गों को जातीय स्तरीकरण का लाभ मिलता आया है, वे मौका मिलते ही आज भी उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद ऐसा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. हाल ही में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का बयान देखा. उनके अनुसार जाति ठीक, जातिवाद बुरा है. उनके कहने का आशय है कि जाति भले बनी रहे, परंतु जातिवाद जाना चाहिए. यह ठीक ऐसा ही कामना है कि धर्म और धार्मिक दुराग्रह बने रहें और सांप्रदायिकता समाप्त हो जाए. लोकप्रिय राजनीति के दबाव भी जातिवाद को संरक्षित करने का काम करते हैं. हिंदुओं में जाति, सभ्यता और संस्कृति परस्पर अंतर्गुंफित हैं. इसलिए वे एकदूसरे के गुणदोष से भी प्रभावित होते हैं.

जातिवाद की तुलना में धर्मनिरपेक्षता आधुनिक अवधारणा है. कुछ विद्वान इसे मध्यकाल तक ले जाते हैं. अकबर आदि आरंभिक मुगल सम्राटों की यह कहकर प्रशंसा की जाती है कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. उनके राज्य में धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था. वे किसी सीमा तक सही भी हैं. लेकिन अकबर आदि की राजनीति धार्मिक उदारता अर्थात सर्वधर्म समभाव तक सीमित थी. वह स्वयं धार्मिक था और राज्य में अनेक पद धार्मिक आधार पर सुनिश्चित थे. उसे धार्मिक रूप से उदार सम्राट तो कहा जा सकता है, धर्मनिरपेक्ष नहीं. धर्मनिरपेक्षता के लिए राज्य का लोकतांत्रिक होना आवश्यक है. एक सिद्धांत के रूप में धर्मनिरपेक्षता यूरोपीय चिंतन की देन है. इस बारे में विचित्र बात यह है कि बहुधर्मिता जो कई बार सांप्रदायिकता के रंग में रंगकर भारत के लिए विकट स्थितियां पैदा कर देती है, जैसी कोई समस्या यूरोप में न थी. वहां धर्म का एकमात्र केंद्र चर्च था. उसके दो धड़े थे—कैथोलिक और प्रोस्टेंट. दोनों के बीच संघर्ष होता रहता था. वही दौर था जब वाल्तेयर, रूसो, हीगेल, फायरबाख, बूनो बायर, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन आदि ने धार्मिक पाखंड और उसके सहारे फलतेफूलते सामंतवाद का विश्लेषण करते हुए, तज्जनित बौद्धिक जड़ता, शोषण आदि की ओर इशारा किया था. वहीं जॉन लाक, हॉब्स, बैंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल, जेफरसन, थॉमस पेन जैसे विचारकों ने व्यक्ति स्वाधीनता और समानता की मांग को आगे बढ़ाते हुए विधिसम्मत राज्य की स्थापना पर जोर दिया था. उस समय तक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. उसे सफल बनाने का एकमात्र उपाय था, मानवमात्र की सामंतवाद से शारीरिकमानसिक मुक्ति.

धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्मदाता जार्ज जैकोब हॉलीयोक(1817—1906) को माना जाता है. विचारों से नास्तिक हॉलीयोक सहकारिता के पितामह कहे जाने वाले राबर्ट ओवेन से प्रभावित था. ओवेन ने इंग्लेंड एवं अमेरिका में सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना की थी. धर्मनिरपेक्षकता उसके उद्देश्य में व्यावहारिक जरूरत थी. सहकारिता और सहजीवन पर आधारित बस्तियों की सफलता के लिए आवश्यक था कि लोगों में धर्म आदि को लेकर मतभेद न्यूनतम हों. हॉलीयोक धर्मकेंद्रित समाज के स्थान पर ऐसे समाज का सपना देखता था, जिसमें लोग आपसी सहयोग और मैत्री द्वारा बंधे हों. ज्ञानविज्ञान और तर्क के आधार पर निर्णय लेते हों. मानते हों कि मानवतावादी लक्ष्यों की प्राप्ति में मनुष्य का अपना विवेक किसी भी देवता या पैगंबर से अधिक मददगार होता है. 1851 में धर्मनिरपेक्षता का विचार प्रस्तुत करते हुए हॉलीयोक ने ऐसे आदर्शोन्मुखी समाज की परिकल्पना पेश की थी, जिसमें लोग शारीरिक, मानसिक, नैतिक और बौद्धिक उठान के उच्चतम स्तर पर हों. जीवन अदृश्य शक्तियों की कृपा के बजाय ठोस, यथार्थ, सकारात्मक जीवनबोध और मानवविकास के उद्देश्य को समर्पित हो. जिनमें नैसर्गिक शुभता, सदगुण, चारित्रिक उदात्तता तथा वैचारिक गहनता हो; तथा लोग आस्था और वायवी विश्वासों के बजाय ठोस, दृश्यमान, चराचर जगत से प्रेरणाएं ग्रहण करते हों; और विशुद्ध मानवतावादी लक्ष्यों के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित हों. उसका मानना था कि मानवव्यवहार तथा उसके नैतिक प्रतिमानों का एकमात्र आधार लोककल्याण होना चाहिए. उसके लिए धर्म, आस्था, लोकपरलोक जैसी प्रगतिविरोधी मान्यताओं का बहिष्कार अत्यावश्यक है.

भारत में शासन के स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के अनुसरण की पहली विधिवत घोषणा 1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता के बाद हुई थी. उस समय दिल्ली सहित अनेक बड़े राज्यों पर मुस्लिमों का शासक था. दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता हिंदू थी. दोनों ही समुदाय धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़े थे. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के मूल में भी धार्मिक भावनाओं के आहत होने से जन्मा आक्रोश था. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन की बागडोर अपने हाथों में लेते हुए महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा. उसके तुरंत बाद देश में कानूनी सुधार के दौर की शुरुआत हुई. उसके फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप सामने आने लगा. भारतीय संविधान भी धर्मनिरपेक्षता की भावना से ओतप्रोत है. 1951 में हिंदू कोड बिल पर भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर ने जो कहा, उससे धर्मनिरपेक्षता को भलीभांति समझा जा सकता है. आंबेडकर के अनुसार—

धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं का ध्यान नहीं रखेगा. धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ केवल यह है कि यह संसद सारी जनता पर कोई एक विशेष धर्म नहीं थोप पाएगी.’

भारतीय संविधान में धमनिरपेक्षता को सिद्धांततः 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया. तो क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य का धर्म की ओर से महज तटस्थ हो जाना है? क्या यह केवल जनता के धार्मिक विश्वास एवं राज्य से जुड़ा विषय है? डॉ. आंबेडकर के उपर्युक्त कथन और संविधान संशोधन के समय सदस्यों की बहस पर विचार करें तो यही प्रतीत होता है. गांधी, नेहरू, पटेल, के. एम. मुंशी, लक्ष्मीकांत मेघ, के. एम. पणिक्कर, के. संथाराम, एच. आर. खन्ना, पी. वी. गजेंद्रड़कर आदि विद्वानों ने धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संदर्भ में ही परिभाषित करने की कोशिश की है. कुछ ऐसे नेता भी थे जिन्हें धर्मनिरपेक्षता का विचार ही अस्वीकार था. उनमें प्रमुख नाम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है. डॉ. राधाकृष्णन की ख्याति दार्शनिकविचारक के रूप में है. परंतु व्यक्ति के रूप में उन्हें उदार आस्थावादी ही कहा जा सकता है. वे धर्म को नैतिकता के आलंबन के रूप में देखते थे. उन्हें क्षोभ था कि ‘आधुनिक मनुष्य की मानस रचना रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट, मार्क्स की ‘दि कैपीटल’, डार्विन की ‘ऑन दि ओरीजिन्स ऑफ सोसाइटीज’ तथा स्पिंग्लर की ‘डिक्लाइन ऑफ वेस्ट’ के प्रभाव से हुई है.’ उनके अनुसार भारतीय राज्य की निष्पक्षता को धर्मनिरपेक्षता अथवा नास्तिकता के भ्रामक अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए. वे बिना धर्म के नैतिकता को असंभव मानते थे. इसलिए धर्मनिरेक्षता को उन्होंने अपने समय की सबसे बड़ी कमजोरी माना था(रिलीजन एंड सोसाइटी, पृष्ठ 20). इस तरह स्वयं डॉ. राधाकृष्ण भी धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संबंध में ही देखसमझ रहे थे. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज करते रहे कि समाज में अपनी प्रतिष्ठा, अपना स्थान सुरक्षित के लिए धर्म स्वयं नैतिकता का सहारा लेता है. हमारे युग की त्रासदी ही यही है कि यहां धर्म ने नैतिकता को हड़प लिया है.

बहुलतावादी भारतीय समाज में अनेक संस्कृतियां और उपसंस्कृतियां हैं. एक ही राष्ट्र की सीमा में यहां हिंदू, जैन, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि विभिन्न धर्मावलंबी रहते हैं. ऐसी स्थिति में धर्मनिरपेक्षता स्वयं एक मूल्य बन जाती है. ऐसा मूल्य जिसे समाज ने स्वयं हासिल किया है. सम्राट अकबर द्वारा सभी धर्मों के प्रति उदारता पूर्ण व्यवहार, महारानी विक्टोरिया द्वारा धर्मनिरपेक्षता की नीति लागू करना तथा संविधान में उसे एक मूल्य के रूप में शामिल करना इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारतीय जनता ऐसा चाहती थी. धर्म उसके लिए निजी आस्था और व्यवहार का विषय रहा है, राजनीति का नहीं. इसलिए यहां धर्म को लेकर कभी सीमारेखाएं नहीं बनीं. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए तो तत्कालीन भारतीय समाज को सामान्यतः दो हिस्सों में बंटा पाते हैं. एक ओर संभ्रात तबका, जिसमें जमींदार, नबाव, राजेमहाराजे, पुरोहितकाजी, सेठसाहूकार आदि सम्मिलित थे. उन्हें सत्तासंरक्षण प्राप्त था. बदले में वे सरकारी अमले को भेटसौगात आदि देकर प्रसन्न रखते थे. उनकी निगाह में शासन का अभिप्राय जनता से कर वसूली तक सीमित था. लगभग छह सौ रियासतें उस समय देश में थीं. जिनके कर्ताधर्ता अंग्रेजियत में ढले हुए थे.

दूसरा वर्ग किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों तथा उन छोटेछोटे व्यापारियों का था, जो अंग्रेजों तथा उनके मुंह लगे सामंतों के अत्याचारअनाचार का शिकार थे. अपने श्रमकौशल के भरोसे आजीविका कमाने वाला वह वर्ग अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति चाहता था. संभ्रांत तथा गैर संभ्रांत दोनों ही वर्गों में धर्म के आधार पर कोई विभाजन न था. दोनों में सभी प्रकार के धर्मावलंबी शामिल थे. आपसी लेनदेन था. हो सकता है शुद्धतावादियों का एक छोटासा तबका इधरउधर दोनों तरफ रहा हो. लेकिन उसकी जनसमाज में कोई पैठ न थी. आजादी के संघर्ष में यह वर्ग और भी करीब आया था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही यह तय हो चुका था कि स्वतंत्र भारत में सामंतों और पंडापुरोहितों के अधिकारों में भारी कटौती की दरकार होगी. नई व्यवस्था में धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम होगा. जनता मुख्य निर्णायक की भूमिका में रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान गर्मदल, नरम दल, क्रांतिकारी, अहिंसावादी आदि जितने भी समूह बने, उनमें धर्मनिरपेक्षता को लेकर लगभग आमसहमति थी. कह सकते हैं कि जातिविहीन समाज और धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता से जुड़े महत्त्वपूर्ण सर्वसम्मत संकल्प थे. जनमत के दबाव के चलते गांधी जैसे वर्णव्यवस्था समर्थक नेता को भी धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में आना पड़ा था. 1946 में ईसाई मिशनरी से संवाद करते हुए उन्होंने लिखा था—

यदि तानाशाह होता तो राज्य और धर्म को एकदूसरे से अलग कर देता. मैं अपने धर्म से बंधा हूं. उसके लिए अपनी जान भी दे सकता हूं. परंतु वह मेरा निजी मामला है. राज्य के साथ उसका कोई लेनादेना नहीं है. राज्य को स्वास्थ्य, लोककल्याण, संचार, विदेशनीति, मुद्रा जैसे धर्मनिरपेक्ष मामलों में फैसले लेने का पूरा अधिकार है; धर्मिक मामलों नहीं. धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी मसला है.’2

क्या धर्मनिरपेक्षता और शासन की प्रकृति में कोई अंतःसंबंध है? राजतंत्र हो या गणतंत्र धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर क्या दोनों ही खरे हैं? असल में ऐसा नहीं है. राजतंत्रात्मक शासन प्रणालियां किसी न किसी रूप में धर्म से अनुशासित और प्रेरित रही हैं. धर्म की भांति उनका ढांचा भी सर्वसत्तावादी होता है. इसलिए उनके लिए पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना, न केवल कठिन बल्कि असंभव होता है. उदार सम्राट अपने राज्य में विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच समानता का नियम लागू कर सकता है. वह धार्मिक भेदभाव से भी मुक्त हो सकता है. लेकिन धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए केवल इतना अपेक्षित नहीं होता. न ही उसका आशय सर्वधर्म समभाव तक सीमित होता है. राजतंत्र में सम्राट की हैसियत एकल संस्था की होती है. वह उदार हो या कठोर, सारे निर्णय उसकी के विवेककुविवेक से चलते हैं. राजा के कुछ सलाहकार भी होते हैं, परंतु दरबारियों की सलाह पर अमल करना सम्राट के लिए बाध्यकारी नहीं होता. सत्ताअंतरण में अनुवांशिक उत्तराधिकार का नियम राजा को और भी शक्तिशाली बनाता है. इस प्रकार उसकी हर इच्छा वैध मान ली जाती है. ऐसे राज्यों में धर्मनिरपेक्षता व्यक्तिगत निर्णय तक सिमटकर, प्रकारांतर में राजा या सम्राट की अनुकंपा के रूप में सामने आती है. राजा अपने निर्णय को इच्छानुसार कभी भी बदल सकता है. राजा के बाद, अथवा उसके विचारों में आए परिवर्तन के साथ ही धर्मनिरपेक्षता के आगे भी प्रश्नचिह्न लगने लगता है. उधर जो लोग राजा का गुणगान सभी धर्मों के प्रति उसकी उदारता और न्यायभावना के लिए करते आए थे, तत्काल उसे धर्मरक्षक, देवानामप्रिय, धर्मोद्धारक जैसी उपाधियों और अलंकारों से महिमामंडित करने लगते हैं. चूंकि राजतंत्र में राजा स्वयं एक संस्था होता है. इसलिए उसकी मर्जी राज्य की मर्जी भी मान ली जाती है. ऐसे में राजा की आस्था, राज्य की आस्था के रूप में प्रदर्शित होती रहती है. ऐसे राज्य में धर्मनिरपेक्षता न तो पूरी तरह फलित होती है, न ही लंबे समय तक टिकाऊ रह पाती है. आधुनिक राष्ट्रराज्य के लिए जो न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता जैसे मानवमूल्यों के आधार पर गठित होते हैं, वहां धर्मनिरपेक्षता राज्य की ‘कृपा’ के बजाय उसके संवैधानिक कर्तव्य के रूप में निरूपायित होती है. वह राज्य की विभिन्न धर्मावलंबी नागरिकों के प्रति निष्पक्षता एवं न्यायभावना को दर्शाती है.

श्रेष्ठ राज्य की नैतिकता उसके नागरिकों के आचरण में झलकनी चाहिए. धर्मनिरपेक्ष राज्य की अपेक्षा होती है कि नागरिकगण अपने धार्मिक विश्वासों के साथसाथ दूसरों के विश्वासों का भी समादर करें. धर्मनिरपेक्ष आचरण के लिए नागरिकों का धर्मविशेष के प्रति आस्थावान रहना आवश्यक नहीं है. मनुष्य धार्मिक आस्था के बिना भी धर्मनिरपेक्ष रह सकता है. राज्य की ओर से धर्मनिरपेक्ष आचरण दर्शाता है कि वह नागरिकभावनाओं के प्रति कितना उदार और संवेदनशील है. ऐसा राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है. यदि कहीं विवाद हों तो उनका समाधान विधिमान्य कसौटियों के अनुरूप खोजा जाता है. जाहिर है, धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म की उपेक्षा नहीं करता. न ही वह विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन कर उनकी कोटियां बनाता है. न ही यह निर्धारित करता है कि प्रचलित धर्मों में से कौनसा धर्म संवैधानिक मान्यताओं के अधिक करीब है. वह केवल धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर खुद को उसकी ओर से तटस्थ बना लेता है. चूंकि विभिन्न धर्मों के नैतिक सिद्धांतों में एक किस्म की एकता का भाव रहता है. इसलिए सुधी नागरिकगण धर्मनिरपेक्षता को गणतंत्र की अनिवार्यता के रूप में स्वीकारने लगते हैं. उन्हें यह विश्वास रहता है कि उनमें से कोई भी, धर्म को बीच में लाकर न तो किसी विशेष छूट का अधिकारी है न ही धर्म के आधार पर उसे उन अधिकारों और अवसरों से वंचित किया जा सकता है, जो नागरिक होने के नाते उसे सहज प्राप्त हैं.

जाति मुख्यतः हिंदू धर्म से जुड़ा मसला है. चूंकि जाति को हिंदुओं में धर्मसम्मत बताया जाता रहा है, इसलिए इसे हिंदू धर्म की मान्य संस्था भी कहा जा सकता है. कुछ विद्वान इसपर आपत्ति कर सकते हैं. कह सकते हैं कि धर्मग्रंथों में केवल वर्ण का उल्लेख है, जाति का नहीं. वे यह भी कह सकते हैं कि वर्णविभाजन की मिलीजुली परंपरा भारत के अलावा यूनान, अफ्रीका, यूरोप, मिस्र, पूर्वी एशिया, चीन, जापान आदि देशों में भी प्रचलित थी. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता. लेकिन कहीं भी वह उतनी रूढ़ नहीं रही, जैसी कि भारत में. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्तियों को उनके गुणों के आधार पर काम सांपने की अनुशंसा की है. उसने लोगों को उनकी प्रकृति के अनुसार बांटकर, स्वर्ण, रजत, कांस्य और लौह नामक श्रेणियां बनाई थीं. उसके पीछे प्लेटो की आदर्शवादी राज्य की संकल्पना थी. कार्यविभाजन को वंशानुगत न मान लिया जाए, इसके लिए सावधानी बरतते हुए उसने बच्चों का लालनपालन राज्य के संरक्षण में, उनकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने का सुझाव दिया था. भारत में हालात भिन्न थे. यहां मान लिया गया कि ज्ञान और अज्ञान दोनों उत्तराधिकार में अंतरित किए जा सकते हैं. इसलिए पंडित के बेटे को पंडित और शूद्र की संतान को शूद्र का दर्जा दिया जाता रहा. समय के साथ जैसेजैसे नए पेशे बढ़े, जातियों की संख्या में भी वृद्धि होती गई. पेशागत जरूरत को रक्तसंकरण का नाम दिया गया.

यदि सब एक विराट पुरुष की संतान हैं तो रक्तशुद्धता का विचार क्यों? ऐसा तो हो नहीं सकता कि मस्तिष्क में एक प्रकार का खून बहता हो, और पैरों में दूसरा? सवाल जायज है. सवाल उठा भी होगा. परंतु नियम साधारण लोगों के लिए होते हैं. शिखर पर विराजमान लोग स्वार्थसिद्धि हेतु कोई न कोई चोर दरवाजा निकाल ही लेते हैं. ब्राह्मणों ने चोरदरवाजा निकाला था, द्विजीकरण का. एक संस्कार, जिसे ‘दूसरा जन्म’ कहा गया. जातियों और वर्णों के कथित रक्तसंकरण से जो बच्चे जन्मे उन्हें नई जातियों के रूप में समायोजित किया गया. प्राचीन धर्मग्रंथों में जातियां बनने का विस्तारसहित विवरण है. उसका विरोध या आलोचना कहीं भी नहीं है. न ही शूद्रत्व के आधार पर समाज के बड़े वर्ग के शोषण और उत्पीड़न की कहीं आलोचना है. अभिजात हिंदुओं की निगाह में वह आदर्श व्यवस्था रही है. इसलिए दैविक बताकर उसका जगहजगह महिमामंडन किया गया है. रक्तसंकरण के बहाने से मनु, याज्ञवल्क्य, गौतम आदि ने जातियों के बनने का जो विधान रचा है उसका विस्तृत वर्णन पांडुरंग वामन काणे की पुस्तक ‘धर्मसूत्रों का इतिहास’ में दर्ज है. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि हिंदू धर्म केवल वर्णव्यवस्था को समर्थन देता है, जाति को नहीं. पौरोहित्य जातिवाद का संरक्षक रहा है. समाज में जैसेजैसे पुरोहितवाद का असर बढ़ा—न केवल जातियों की संख्या में वृद्धि हुई, बल्कि उनके बीच ऊेचनीच की भावना भी गहराती चली गई.

जातिव्यवस्था के कारण हिंदुओं को देशविदेश में इतनी बदनामी झेलनी पड़ी है कि सीधेसीधे उसके समर्थन में आने का कोई साहस कोई नहीं करता. प्रत्येक जाति के अपनेअपने मंच और संस्थाएं हैं. जिनके जरिये जातीय पहचान को बनाए रखने तथा संगठित शक्ति में बदलकर लोकतंत्र में दबावसमूह की तरह काम करने के प्रयास चलते ही रहते हैं. उच्चतम न्यायालय ‘हिंदुत्व को जीवनपद्धति’ बताना, प्रकारांतर में जातिआधारित समाज का समर्थन करना है. जातिव्यवस्था के समर्थक तर्क देते आए हैं कि मातापिता को काम करते देख संतान भी पैत्रिक व्यवसाय में दक्षता प्राप्त कर लेती है. इससे उनके आगे बेरोजगारी का संकट नहीं रहता. परंतु आजीविका की पहली शर्त उसका सम्मानजनक होना है. दूसरी मनुष्य को उससे इतनी आय होनी चाहिए कि वह अपने परिजनों की जरूरतों को पूरा करने के साथसाथ उन्हें बेहतर भविष्य दे सके. यदि व्यक्ति को लगता है कि उसकी वर्तमान आजीविका इन लक्ष्यों को पूरा करने में अक्षम है तो उसे अपने लिए उपयुक्त रोजगार चुनने का अधिकार होना चाहिए. जाति की अवधारणा इस मूलभूत सिद्धांत की उपेक्षा करती है. वह मनुष्य को अपने श्रम या सेवा के मूल्यांकन का अधिकार नहीं देती. धर्मसूत्रों और स्मृतियों में तो हर वह व्यवस्था की गई है जिससे शूद्र अपने दैन्य से कभी न उभर पाएं. ‘मनुस्मृति’ में शूद्र के पास संपत्ति जमा नहीं होने देने के स्पष्ट निर्देश हैं. यदि किसी कारण वह धन जमा करने में सफल हो जाए तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया है कि वह उसे बलात् छीन ले. गौतम धर्मसूत्र के अनुसार, ‘कन्या के विवाह का खर्च वहन करने के लिए और शास्त्रविहित किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए कोई व्यक्ति शूद्र से छल या बल का उपयोग करके धन ले सकता है.’(द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत). कह सकते हैं अपने आरंभ से ही यह व्यवस्था सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध काम करती आई है.

समाज में लोग अपनेअपने धार्मिक विश्वास के आधार पर और उसके बिना भी रह सकते हैं. इसपर न तो समाज को आपत्ति होती है, न ही राज्य को. बल्कि राज्य का तो ध्येय ही व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी विश्वासों की सुरक्षा के लिए किया जाता है. ऐसा वह तभी कर सकता है, जब वह स्वयं किसी आस्था, विश्वास आदि से बंधा न हो. उसकी प्रतिबद्धता केवल और केवल अपने संविधान के प्रति हो. यदि वह स्वयं धर्म, जाति या वर्ग के प्रति आग्रहशील होगा तो उसके लिए तटस्थ भाव से काम करना कठिन हो जाएगा. समाज पूरी तरह समावेशी न हो तो भी उसके सदस्यों के बीच इतना समझौता अवश्य होता है जिससे वह न्यूनतम शांतिव्यवस्था को बनाए रख सके. जाहिर है संवैधानिक प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरने हेतु राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण समय की मांग बन जाता है. बहुधार्मिकता वाले समाजों में राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण मात्र इसलिए अपेक्षित नहीं होता कि क्योंकि वहां अनेक धर्मावलंबी रहते हैं. वह इसलिए भी अपेक्षित होता है कि समानता, न्याय, स्वतंत्राता और निष्पक्षता के लिए राज्य को उन सभी विचारों और प्रतीकों से दूर रहना चाहिए, जिनके चयन में मानवीय विवेक की कोई भागीदारी न हो. जो व्यवस्था की मनमानी को दर्शाते हों. राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने नागरिकों के पक्ष में अधिकतम स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा. ऐसा वातावरण विनिर्मित करेगा, जिसमें लोग अपने विवेक और स्वतंत्रता का अधिकतम लाभ उठा सकें. उसके लिए थोपी गई किसी भी पहचान के आधार पर पक्षपात नहीं करेगा. धर्म के चयन में, जाति के चयन में मनुष्य की इच्छा या विवेक का कोई योगदान नहीं होता. ये जन्म के साथ ही उसपर थोप दी जाती हैं. धर्म के मामले में आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार धर्मांतरण की छूट तो होती है, परंतु वह काम भी सर्वथा आसान नहीं होता. वहां धर्मकेंद्रित सामाजिकता आड़े आ जाती है.

वस्तुतः धर्म, जाति, वर्ण जैसी प्रतिगामी संस्थाएं परस्पर इतनी अंतर्गुंफित हैं कि इनमें से कौनसी, किसे और कब संबल प्रदान करती हैं, इस पर निर्णय लेना प्रायः कठिन होता है. धर्मसम्मत विधान विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता, ऊंचनीच आदि को दैविक सिद्ध करने की कोशिश में जुटे रहते है. इससे उनकी दुर्दशा के वास्तविक कारणों की पड़ताल कठिन हो जाती है. प्रकारांतर में सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है; और राज्य अपने उद्देश्य में विफल सिद्ध होता है. अतः उचित यही है कि राज्य का संचालन सर्वसम्मत या बहुसम्मत विधान के माध्यम से हो, ताकि असमानता, अन्याय और अनाचार की हालत में जिम्मेदारी तय की जा सके. इस तरह धर्मनिरपेक्षता जहां लोकतंत्र का उदात्त लक्षण है, वहीं जाति सामंतवाद का ऐसा रूप है जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग को बहुसंख्यक वर्गों पर शासन का अधिकार केवल इसलिए मिल जाता है कि उनका जन्म किसी जातिविशेष में हुआ है. परिस्थितिवश यदि सुधार की मांग उठे तो उसे वर्णव्यवस्था के ढांचे के भीतर रखने की पुरजोर कोशिश की जाती है. ऐसे में शासन का यह कर्तव्य है कि नागरिकों को अधिकतम स्वतंत्रता और समानता के अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिक्रियावादी शक्तियों को आगे न आने दे.

वर्णाश्रम व्यवस्था विकास विरोधी भी है. शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के अनुक्रम में जो पहले स्थान पर है, उसे सर्वाधिक शारीरिक श्रम करना पड़ता है. जैसेजैसे आगे बढ़ते हैं, श्रम की मात्रा घटती चली जाती है. अंत में वह लगभग शून्य हो जाती है. ब्राह्मण का श्रम पूरी तरह अनुत्पादक है. जब वह भौतिक जगत एवं सुखसंसाधनों को मोहमाया, क्षणभंगुर आदि कहकर परंपरानुसार नकारता है, तो उत्पादकता का विरोधी बन जाता है. यह विधान ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए तो विशेष सहायक सिद्ध होता है, परंतु शूद्रों के हितों के, जो मुख्य उत्पादक हैं—प्रतिकूल असरकारी होता है. अतः जब भी धर्मनिरपेक्षता की बात चलती है, समाज के वे वर्ग जिन्हें वर्णक्रम में ऊपर रखा गया है, कम या ज्यादा उसके विरोध में उठ खड़े होते हैं.

हम लेख के केंद्रीय विषय तक आ चुके हैं. भारत हिंदू बहुल देश है. जाति उसकी शास्त्रसम्मत संस्था. सवाल है कि धर्मनिरपेक्षता और जाति के संबंधों को कैसे परिभाषित किया जाए? सामाजिक न्याय के लिए धर्मनिरपेक्षता के साथ क्या जातिनिरपेक्षता भी आवश्यक है? चूंकि जाति के आधार पर समाज का बड़ा वर्ग शोषण का शिकार रहा है, इसलिए उत्तर तो ‘हां’ में ही आएगा. प्रथम दृष्टया यह अनुचित भी नहीं लगता. यह सच है कि धर्मनिरपेक्षता के साथ जातिनिरपेक्ष होना भी कामयाब लोकतंत्र की जरूरत है. परंतु मामला इतना आसान नहीं है, क्योंकि इस तरह हम ‘धर्म’ और ‘जाति’ को एक समान मान रहे होते हैं. जबकि जाति धर्म की अपेक्षा कहीं अधिक रूढ़ है. धर्म में जाति से ज्यादा खुलापन रहता है. हिंदुओं में व्यक्ति कथित तैंतीस करोड़ देवताओं में से किसी को भी अपना आराध्य मान सकता है. या फिर उसकी मर्जी है कि समस्त देवताओं तथा उनसे जुड़े कर्मकांडों को पूरी तरह नकारकर नास्तिक होने की घोषणा कर दे. उस समय लोग थोड़ीबहुत आलोचना करेंगे. लेकिन पूजापाठ एवं देवताओं को अंगूठा दिखाने से हिंदू धर्म से उसके संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा. धर्म के नाम पर हिंदुओं में जितना खुलापन है, उतना शायद ही किसी दूसरे धर्म में हो. इसे उसकी विशेषता कहा जा सकता है. परंतु यह उसकी कमजोरी भी है. हिंदू धर्म अनेकास्थावादी धर्म है. इसमें साधक को इतनी छूट है कि वह अपने स्वतंत्र विश्वास के साथ हिंदू रह सकता है. जाति के साथ ऐसा नहीं है. वह जीवन के साथ जन्मती और जान के साथ जाती है. गांधी सहित इस देश के ऐसे असंख्य लोग हैं, जो धर्म के खुलेपन का समर्थन करते हैं, किंतु जाति और वर्ण के नाम पर कट्टर या परंपरापोषी देखे गए हैं. हिंदू समाज में जाति के आधार पर शोषण की शताब्दियों पुरानी रवायत है, जिसने समाज के बड़े वर्ग के जीवन को नर्क में बदल दिया था.

जाति के दो सामान्य पक्ष हैं. पहला व्यैक्तिक, दूसरा सामाजिक. समाज ने किसी जमाने में, सभ्यता के आदिचरण में तय किया कि व्यक्ति अपने पैत्रिक व्यवसाय को ही अपनाएगा. शुरूशुरू में लोगों ने भी मान लिया. उनके पास इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. रक्षा और पाठपूजन के अलावा बाकी सारे काम शूद्रों के हिस्से आते थे. उन्हें पढ़नेलिखने या शस्त्र विद्या की जानकारी लेने की मनाही थी. प्राचीन भारत में ब्राह्मण के लिए पाठशालाएं और विद्यालय थे. क्षत्रियों के शिक्षणप्रशिक्षण के व्यापक प्रबंध थे. लेकिन शिल्पकारों के लिए पढ़नेलिखने या शिल्प के निखार के लिए कोई व्यवस्था न थी. श्रमिकों और कारीगरों का विधिवत विकास हो, इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी जाती थी. लेकिन श्रम और शिल्पकर्म की मांग हर जगह थी. समाज में उनकी अबाध आपूर्ति रहे, इसके लिए नियम बनाया कि बेटा बाप के व्यवसाय को आगे बढ़ाएगा.

जब तक राज्य संस्था शक्तिशाली नहीं हुई थी, समाज में आवश्यक खुलापन था, शिल्पकारों ने भी उस व्यवस्था को सहज भाव से लिया होगा. आगे चलकर ब्राह्मणवाद ने लोगों के मनमस्तिष्क को जकड़ना शुरू किया. राजसत्ता के साथ मिलकर उन्होंने शिल्पकर्म और श्रम के मूल्यनिर्धारण का काम अपने हाथों में ले लिया. इस बीच बौद्धिक स्वातंत्रय का परिचय देते हुए, मेहनतकश वर्गों ने नए दार्शनिक सिद्धांतों की नींव भी रखी. फलस्वरूप आजीवक, चार्वाक, लोकायत, श्रमण, अक्रियावादी, वैनायिक3 जैसे अनीश्वरवादी दर्शन अस्तित्व में आए. शिल्पकर्म की मांग बढ़ी तो वे संगठन बनाकर दूरदराज के देशों तक व्यापार करने लगे. एक समय ऐसा आया जब उन्होंने धर्मसत्ता और राजसत्ता के समानांतर आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली. बौद्ध धर्म के उदय तक लगभग ठीकठाक चलता रहा. कदाचित बुद्ध पहले ऐसे विचारक हुए जिन्होंने धार्मिक आधार पर सांगठनीकरण का रास्ता दिखाया. उसके पहले ब्राह्मण पुरोहित आश्रमों में रहकर वहीं से अपना प्रभुत्व जमाए रहते थे; उनकी पहुंच केवल सत्ताकेंद्रों तक थी. शूद्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे. उन्होंने शूद्रों की उपेक्षा, उन्हें अपने धर्मदर्शन से दूर रखने का हरसंभव प्रयत्न किया था. आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर मिला तो शूद्र पूरे आत्मविश्वास के साथ नए दर्शनों की ओर मुखातिब होने लगे. ईसा से पांच सौ वर्ष पहले तक यही स्थिति बनी रही.

बौद्ध दर्शन का उभार ब्राह्मणों के लिए अप्रत्याशित था. उससे पहले भी विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय तथा शूद्र विद्वानों ने ब्राह्मणों को बौद्धिक क्षेत्र में चुनौती दी थी. लेकिन वे सब वर्णव्यवस्था के समर्थक थे. अवसर मिलते ही ब्राह्मणों ने उन्हें उच्च वर्ण देकर वर्णव्यवस्था को बचाए रखा था. बौद्ध दर्शन को मिली व्यापक लोकप्रियता ने ब्राह्मणों के आगे अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया था. बुद्ध ने न केवल जाति और वर्णव्यवस्था को चुनौती दी थी, बल्कि क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठतर भी माना था. इसलिए बुद्ध के रहते उनका ब्राह्मणीकरण आसान न था. असुरक्षाबोध के बीच पुरोहितों का एक वर्ग पनपा जिसने स्वयं को प्राचीन धर्मदर्शन का अनुयायी बताते हुए आमजन में भी अपनी पैठ बनाना आरंभ कर दिया. परंतु आजीवक संप्रदाय की लोकप्रियता तथा बौद्ध एवं जैन जैसे श्रमण परंपरा पर आधारित धर्मों की लोकप्रियता के चलते आरंभिक शताब्दियों में सफलता उनके लिए दूभर बनी रही. बुद्ध के बाद राजसत्ता और धर्मसत्ता में फैलाव के लिए मानो होड़सी मच गई. चूंकि राज्य को संगठित करने के लिए काफी धन की आवश्यकता थी, इसलिए नए शासकों ने शिल्पकारों से उनके शिल्प के मूल्य निर्धारण का काम छीन लिया. चाणक्य आर्थिक रूप से स्वावलंबी शिल्पकार संगठनों को संदेह की दृष्टि से देखता था. इसलिए उसने सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों को नियंत्रित करना आरंभ कर दिया. इस बीच पुरोहितवर्ग तेजी से पनपा. उसने तेजी से कर्मकांड आधारित धर्मों को फैलाना शुरू कर दिया. जातिव्यवस्था को रूढ़ बनाने तथा तत्संबंधी भेदभाव और ऊंचनीच की नींव रखी जाने लगी. यह भेदभाव आर्थिक स्तर पर कितना गहरा था, इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में मुख्य पुरोहित को प्रतिमाह 48000 पण वेतन मिलता था, जबकि प्रमुख शिल्पकार के लिए मात्रा 120 पण वृत्तिका ही निर्धारित थी.

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि जातीय विभाजन के नाम पर समाज के बड़े वर्ग को उसके मूलभूत अधिकारों से अलग कर देने में समाज के साथसाथ शासन का भी हाथ रहा है. यूं भी कह सकते हैं कि धर्मसत्ता और राजसत्ता के गठजोड़ ने समाज के बहुसंख्यक वर्गों के साथ अनाचार किया है. इसलिए राज्य की जिम्मेदारी केवल खुद को धर्म की ओर से तटस्थ बना लेने से पूरी नहीं होती. विशेषकर ऐसे राज्य के लिए जो लोकतांत्रिक और लोककल्याण को समर्पित होने का दावा करता है, उसका यह दायित्व है कि विकास की दौड़ में किसी भी कारण पिछड़ चुके अथवा पीछे ढकेल दिए गए लोगों के कल्याण के लिए विशिष्ट प्रबंध करे. भारतीय धर्मशास्त्रों में राज्य के लिए इस नैतिक दायित्व के बारे में अधिक नहीं मिलता. यहां धर्म को नैतिकता का पर्याय माना गया है. जबकि पश्चिम में नीतिशास्त्र सुकरात के जमाने से ही अध्ययन का विषय रहा है. ‘पॉलिटिक्स’ में अरस्तु ने न्यायस्थापना को राजनीति का प्रमुख उद्देश्य माना है—‘राजनीति का प्रमुख उद्देश्य है न्याय और न्याय का मूल ध्येय है—सर्वसाधारण का हित.’ इस काम के लिए निष्पक्षता अनिवार्य है. अरस्तु ने इसके लिए संवितरणात्मक न्याय का सिद्धांत प्रस्तुत किया है. उसके अनुसार राजनीति का प्रमुख लक्ष्य न्याय की स्थापना है. यह सभी को समान अवसर देने से पूरा नहीं हो जाता.

अरस्तु ने न्याय को वस्तु पक्ष और व्यक्ति पक्ष में बांटा है. राज्य की ओर से सभी को समान वस्तुएं और अवसर दिए जाने चाहिए. लेकिन इस बारे में कोई एक नियम हमेशा कारगर नहीं हो सकता. मान लीजिए दो व्यक्ति दौड़ में हैं. दोनों का लक्ष्य समान है. किंतु उनमें से एक व्यक्ति लक्ष्य से बेहद दूर, एकदम अंतिम छोर पर है, जबकि दूसरा उसके एकदम पास खड़ा है. ऐसे में उन्हें यदि एक साथ दौड़ने के लिए कहा जाए तो जीत जो लक्ष्य के एकदम पास खड़ा है, उसकी ही सुनिश्चित मानी जाएगी. वह दौड़ में आगे बना रहेगा. दूसरा व्यक्ति कभी उसके बराबर पहुंच ही नहीं पाएगा. यदि दोनों में से एक ताकतवर और दूसरा अत्यधिक कमजोर है, तब भी यही परिणाम होंगे. अतएव राज्य का कर्तव्य है कि जो लक्ष्य से बहुत दूर, विकास के अंतिम छोर पर है अथवा किसी कारणवश कमजोर है, उसे विशेष प्रोत्साहन देकर स्पर्धा हेतु सक्षम बनाए. आधुनिक विचारक इसे संवितरणात्मक न्याय कहकर राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित किया है. इसलिए धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर जातिनिरपेक्ष होना राज्य का आदर्श हो सकता है. परंतु जाति के आधार पर पिछड़ चुके वर्गों की दृष्टि में वह न्याय नहीं कहा जा सकता. धर्मनिरपेक्षता को फलनेफूलने के लिए आधुनिक संवैधानिक कसौटी पर खरे राज्य की आवश्यकता पड़ती है. साथ ही सैद्धांतिक स्तर पर जातिनिरपेक्ष रहते हुए, तज्जनित भेदभाव और अन्याय की भरपाई हेतु सामाजिक स्तर पर पिछड़ गए वर्गों को विशेष प्रोत्साहन द्वारा मुख्यधारा से जोड़ना—राज्य का विशिष्ट कर्तव्य माना गया है. दूसरे शब्दों में समानता और स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दमन का शिकार रही जातियों के लिए विशेष प्रोत्साहन देना उसका संवैधानिक कर्तव्य बन जाता है. इस दृष्टि से भारतीय संविधान को आदर्श कहा जा सकता है. यह बात अलग है कि भारतीय समाज स्वयं को संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप ढालने में अभी तक नाकाम सिद्ध हुआ है. लोकप्रियता की राजनीति इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधा है. उससे बचने के लिए समाज तथा उसकी अन्यान्य संस्थाओं का लोकतांत्रिकरण हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

अंत में कबीर को याद करते/कराते हुए—

सबही भूमि बनारसी, सब निर गंगा होय

ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रम

1. द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत.

2. If I were a , religion and state would 1be separate. I swear by my religion. I will die for it. But it is my personal affair. The state has nothing to do with it. The state would look after your secular welfare, health, communications, foreign relations, currency and so on, but not your or my religion. That is everybody’s personal concern!” ―Gandhi MK, Harijan, 22 September 1946.

3. विनायक गणेश का उपनाम है. गणेश शिवपुत्र जिन्हें आदि यानी अनार्यो का देवता माना जाता है. वे उस दौर के देवता हैं हैं जब देश कबीलों में बंटा था और उनका मुखिया ही सबकुछ होता था. वही सारे निर्णय लेता था. गणेश का वैनायिक को अनीश्वरवादी आजीवकों का ही एक संप्रदाय माना जाता है. इस तरह गणेश और शिव दोनों ही अनार्य अनीश्वरवादी देवता सिद्ध होते हैं. बाद में उन्हें अपने भीतर मिलाने के लिए जहां आर्यों ने अपनी बेटी का विवाह शिव से किया, वहीं गणेश को शामिल करने के लिए उन्हें प्रथम देवता का नाम देना पड़ा. लेकिन गणेश को देवता मानते ही उनके पद गणवेश के साथ खूब खिलबाड़ किया गया. गणेश की सूंड सभापति के स्थान पर बैठकर सबकी बात ध्यानपूर्वक सुनते व्यक्ति का विकृतीकरण है.


मुखौटे की त्रासदी

सामान्य

शासक वर्ग और शासित वर्ग में से प्रथम वर्ग में लोगों की संख्या कम होती है, परंतु समस्त राजनीतिक कामकाज को यही वर्ग अंजाम देता है. सारी सत्ता केवल उसी हाथों में केंद्रित होती है. वह सत्ता के लाभों को प्राप्त करने में रस लेता है. इसके विपरीत दूसरा वर्ग बहुसंख्यक है. यह पहले वर्ग द्वारा कभी कमोबेश वैधानिक तरीकों से, तो कभी कम या अधिक स्वेच्छाचारपूर्ण एवं हिंसक तरीकों से चालित-नियंत्रित होता है….अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक समाज पर केवल इसलिए राज कर पाता है, कि वह संगठित है.गायतानो मोस्का, दि रूलिंग क्लॉस.

2014 में भाजपा की जीत के नायक मोदी जी थे. जीत इतनी शानदार थी कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे पार्टी के दिग्गज नेता नेपथ्य में खिसका दिए गए. इसे परिणाम कहें कि दुष्परिणाम, जो सरकार पूरे देश की मानी जाती है, उसे ‘मोदी सरकार’ कहा जाने लगा. कुछ नेता जीतकर भी पराजित नजर आए. राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश में अति-पिछड़ी जातियां को पार्टी से जोड़कर बड़ा काम साधा था. जिससे भाजपा की जीत की असली इबारत लिखी गई—‘हर-हर मोदी—घर-घर मोदी’ के नारों के बीच वह भी फीका पड़ गया. पूरी भाजपा मोदीमय थी. नतीजा यह हुआ कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद जिन राजनाथ सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के बराबर का दावेदार माना जा रहा था, उन्हें दूसरे नंबर के पद से संतोष करना पड़ा. उसके बाद उपचुनाव हुए. भाजपा के लिए परिणाम आशा के विपरीत थे. बिहार, दिल्ली, केरल, पश्चिमी बंगाल जैसे प्रदेशों में वह कोई सफलता प्राप्त न कर सकी. सिवाय मीडिया के हर कोई मान चुका था कि मोदी का जादू उतार पर है. यहां तक कि पार्टी के भीतर से भी विरोधी स्वर उभरने लगे थे. कुछ नया करने की जरूरत थी. सो मीडिया को साधते हुए मोदीजी ने नोट-बंदी जैसा सबको हैरान-परेशान करने वाला कदम उठा लिया. चाहते तो फैसला लेकर रिजर्ब बैंक को आगे कर सकते थे. परंतु सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली. नोटबंदी की सफलता से अधिक असफलताएं सामने आईं. नोट बदलने के लिए कतार में लगे 130 लोगों को जान गंवानी पड़ी. नकदी के अभाव में बाजार सूने पड़ गए. शहरों में काम करने वाले लाखों मजदूर, कारीगर बेरोजगार होकर अपने ‘देस’ लौट गए. सरकार की खूब आलोचना हुई. मीडिया बचाव करता रहा. सरकार कदम-कदम पर संवेदनहीन नजर आई. मोदी और पार्टी नेता चुप्पी साधे रहे.

फिर एक समय ऐसा आया जब मोदी और मीडिया एक ओर थे, पूरा विपक्ष दूसरी ओर. यहां तक कि भाजपा के अपने ही लोग दबे स्वर में नोटबंदी के कदम को आत्मघाती बताने लगे थे. मानो सब कुछ सोची-समझी नीति के अनुसार हो. मोदी न केवल नोटबंदी को राष्ट्रहित में बताकर उसके लाभ गिनाते रहे, बल्कि विधानसभा चुनावों से ऐन पहले बेनामी संपत्ति का मसला उठाकर उन्होंने एक और धमाका कर दिया था. हर बार की भांति इस बार भी पूरा विपक्ष दो-फाड़ नजर आया. एक ओर मीडिया और मोदी. दूसरी ओर अपने आप से हैरान-परेशान विपक्ष जो सिवाय मोदी की आलोचना के बाकी सब मुद्दों पर विभाजित था. राजनीति के बड़े-बड़े पंडित समझ ही नहीं पाए कि नोटबंदी जैसे आत्मघाती कदम के तुरंत बाद बेनामी संपत्ति का मुद्दा उठाना मोदी तथा उनके सहयोगियों की चाल हो सकती है. मोदी यदि भ्रष्टाचार से सचमुच लड़ना चाहते तो सरकार के पास स्विस बैंक के खाताधारों की सूची तैयार थी. उनपर कार्रवाही करते; या फिर जांच एजेंसियों के माध्यम से भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाते; जैसा कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था. असल में वह आने वाले विधानसभा चुनावों में जनमत को ‘मोदी बनाम गैर-मोदी’ में बांट देने की कूटनीति थी, जिसमें वे कामयाब नजर आए. पूरा चुनाव मुद्दों के बजाय व्यक्तियों पर केंद्रित रहा. उसमें बाजी मोदी के हाथ लगनी थी, सो लगी.

लोकतंत्र में चुनावों का लोकहितकारी मुद्दों के बजाय कुछ चेहरों पर केंद्रित होकर रह जाना, अपने आपमें त्रासदी है. उसमें जनता के सवाल गौण हो जाते हैं. चूंकि चेहरों की स्पर्धा में मीडिया की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, इसलिए मीडिया से गठजोड़ से वास्तविक चेहरों के स्थान पर कठपुतलियां चुनावी समर में कब उतार दी जाती हैं, जनसाधारण को पता ही नहीं चलता. हाल के विधानसभा चुनावों में तो पक्ष-विपक्ष दोनों ही मुद्दों के साथ चुनावों में उतरने की हिम्मत खो चुके थे. भाजपा के लिए यह सबसे सुरक्षित मोर्चा था. उसे पूरा विश्वास था कि चुनाव को ‘मोदी बनाम अन्य’ कर देने से हिंदुत्व की सोच रखने वाला मतदाता, घुटनों के बल चलकर भी भाजपा को वोट देने आएगा. विरोधी मत जहां अलग-अलग हिस्से में बंट जाएंगे, वहीं समर्थन में इतने मत निकल आएंगे कि जीत का जश्न मनाया जा सके. इसी फार्मूले के तहत लड़े गए पिछले लोकसभा चुनाव में केवल 31 प्रतिशत मत पाने वाली भाजपा की जीत को धमाकेदार माना गया था, क्योंकि शेष 69 प्रतिशत मत अलग-अलग दलों में बंटकर बेअसर हो चुके थे.

यह समझना मुश्किल नहीं है कि जो भाजपा 2014 में विकास के मुद्दे के साथ आई थी, वह विधानसभा चुनावों को व्यक्तित्वों की लड़ाई में बदल देने को क्यों उत्सुक थी. दरअसल अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में सिवाय पुरानी योजनाओं को आधे-अधूरे मन से आगे बढ़ाने के सरकार कुछ खास नहीं कर पाई है. पार्टी नेता जानते थे कि बढ़ती बेरोजगारी, सकल उत्पादन और व्यापार में गिरावट, मुद्रा स्फीति जैसे कई विषय हैं, जिन्हें विपक्ष उठाने लगा तो जवाबदेही कठिन हो जाएगी. यही समस्या प्रांतीय सरकारों के साथ भी थी. इसलिए वही हुआ जो भाजपा चाहती थी. चुनाव अभियान के दौरान एक-दूसरे को खूब अपशब्द कहे गए. शालीनता की सीमाएं पक्ष-विपक्ष दोनों ओर से जमकर लांघी गईं. जुबानी लड़ाई में जीत प्रायः बड़बोले की होती है, वही इन चुनावों में हुआ.

उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत के कई कारण गिनाए जा सकते हैं. प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो भी भाजपा ने ये चुनाव ज्यादा सूझबूझ, कूटनीति, प्रबंधकीय कौशल तथा कार्यकर्त्ताओं के साथ बेहतर तालमेल से लड़े थे. जीत के लिए उसने हर वह पैंतरा आजमाया जिसे वह आजमा सकती थी. संघ समझता है कि भारत का आम मतदाता किसी भी प्रकार के अतिवाद को पसंद नहीं करता. उग्र हिंदूवाद समाज के एक वर्ग को पार्टी के पक्ष में संगठित रख सकता है, अपने दम पर सरकार नहीं बनवा सकता. अगर ऐसा होता तो लालकृष्ण अडवाणी पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते तथा अटलविहारी वाजपेयी को उनके पीछे कदम-से-कदम मिलाकर चलना पड़ता. उस समय संघ और पार्टी ने अटलविहारी वाजपेयी के नरमपंथी ‘मुखौटे’ के पीछे चुनाव लड़ा था. उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियों के मन में भाजपा को लेकर अविश्वास था. इसलिए सरकार बनाने के लिए अटलजी को दूसरे दलों की मदद लेनी पड़ी थी. पिछले कुछ दशकों में दलितों और पिछड़े वर्गों में फूट डालने के लिए जमकर चालें चली गईं. राजनीति में स्थायी दोस्ती-दुश्मनी नहीं होती. परंतु मीडिया ने मुलायम और माया को उनके मतभेदों के आधार पर इतना भड़काया कि दोनों उसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई मान बैठे. अतिपिछड़ों को पिछड़ों तथा महादलितों को दलितों से अलग कर देने की रणनीति 2014 में कामयाब रही. पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी को ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जिसकी हिंदुत्व के प्रति निष्ठा असंद्धिग्ध हो. मोदी की उग्र हिंदुवादी छवि तथा उनका घोषित रूप से पिछड़े वर्ग का होना उनकी दावेदारी को पुष्ट करता था. ध्यातव्य है कि मोदी की अपनी जाति हमेशा से पिछड़े वर्गों में शुमार नहीं थी. गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वयं मोदी ने उसे पिछड़ी जातियों में शामिल किया था. कदाचित सोची-समझी दूरगामी रणनीति के तहत. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी जी का यह पिछड़ावाद दशकों से चली आ रही दलित एवं पिछड़ी जातियों की राजनीति में हलचल पैदा कर, जमे-जमाए दलित-पिछड़े नेताओं को किनारे कर देगा.

रणनीति के तहत बड़बोले भाजपाई नेता प्रायः उकसावे वाले बयान देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश लगातार करते रहते हैं. परंतु इन चुनावों के दौरान पार्टी अपेक्षाकृत शांत थी. इसलिए भी कि पूरा विपक्ष, विशेषकर उत्तरप्रदेश में, उसका मददगार बना था. वहां जीत के दावेदार दो प्रमुख दलों के बीच मुस्लिम मतों के लिए अलग तरह का दंगल जारी था. समाजवादी पार्टी का मानना था कि प्रदेश में उसे छोड़कर मुस्लिम मतदाताओं के लिए दूसरा कोई विकल्प नहीं है. लगभग सौ मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर बसपा भी एकमुश्त मुस्लिम मतों की उम्मीद लगाए बैठी थी. मायावती अपनी सभाओं में शान से बताती थीं कि उनकी पार्टी ने सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव में उतारे हैं. ऐसे दल के लिए जिसका गठन ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को पुष्ट करने के पीठिका पर हुआ हो, क्या ऐसा करना उचित था? प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 18 प्रतिशत है. टिकट दिए गए 24 प्रतिशत को. मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में छह प्रतिशत की बढ़ोत्तरी अतिपिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व में कटौती के बाद ही संभव थी. कुछ ऐसा ही सपा ने भी किया था. जबकि समीकरण चाहे जो रहे हों, ये दोनों दल जब-जब सत्ता में आए हैं, जीत में अतिपिछड़ी कही जाने वाली जातियों का बड़ा योगदान रहा है. पहले यह वर्ग कांग्रेस का मतदाता था. आगे चलकर सपा और बसपा के बीच झूलने लगा. दोनों दलों की मूल वैचारिकी, जो केवल नारेबाजी तक शेष बची है—सामाजिक न्याय से जुड़ी है. एक बरास्ते फुले-अंबेडकरवाद तो दूसरी राममनोहर लोहिया के माध्यम से. इसलिए दोनों दल बहुजन हितों की नुमाइंदगी का दावा कर सकते हैं. इस बार दोनों अतिपिछड़ों की ओर से उदासीन थे. मायावती को अपनी जाति के एक-मुश्त वोटों का भरोसा क्या मिला, उन्होंने बाकी दलित एवं अतिपिछड़े वर्गों की उपेक्षा करनी शुरू कर दी. सोचती थीं कि मुसलमानों को साध लिया तो सब सधते चले जाएंगे. नतीजा यह हुआ कि गैर जाटव दलित और अतिपिछड़ी जातियां बसपा से छिटकने लगीं, जिसका लाभ सीधे भाजपा को मिला. इस तरह उत्तरप्रदेश में भाजपा को जीत सपा-बसपा ने थाली में सजाकर भेंट की है? जब ये तीनों पार्टियां प्रदेश के मुसलमानों को लुभाने के लिए एक किए थीं, भाजपा एक भी मुसलमान को टिकट न देकर, मतों के मौन धु्रवीकरण में लगी थी. जिन दिनों कांग्रेस के नेता प्रशांत किशोर के आगे दंडवत थे, संघ भाजपा के लिए प्रदेश में केसरिया कालीन बिछाने में लगा था. वैसे भी देश की सबसे बड़ी पार्टी का, उस पार्टी का जो स्वाधीनता समर से तपकर निकली हो, आंदोलन जिसका इतिहास रहा हो, वह अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से विश्वास खोकर चुनाव-प्रबंधकों की शरण में चली जाए, सीधे-सीधे उसके नेताओं के अपरिपक्व सोच और आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है.

भाजपा की जीत में सपा का योगदान भी कम नहीं हैं. मुलायम सिंह ने उसे अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के कारण गढ़ा था. लोहिया और समाजवाद का नाम पार्टी ठीक ऐसे ही इस्तेमाल करती है, जैसे कांग्रेस गांधी और गांधीवाद का. मुलायम सिंह के नेतृत्व में पार्टी में खूब परिवारवाद पनपा. आंतरिक कलह से जूझ रही समाजवादी पार्टी अपने परंपरागत वोटों के अलावा ब्राह्मणों और ठाकुरों को साधने में जुटी थी. यह कुछ ऐसा ही था जैसे अपने घर की रखवाली छोड़ दूसरे के घर में ताकझांक करना. उधर मीडिया प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में यह प्रचारित करने में जुटा था कि समाजवादी पार्टी के राज में केवल यादवों तथा बसपा के राज्य में सिर्फ जाटवों को लाभ पहुंचा है. अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए मीडिया के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था. सपा और बसपा दोनों इसका खंडन सकती थीं. परंतु एक ने भी प्रतिवाद नहीं किया. कदाचित एकमुश्त जातीय मतों के लालच में वे इस भ्रम(!) को बनाए रखना चाहते थे. इससे अतिपिछड़े वर्गों का भरोसा इन दलों से टूटा और लगभग बिना किसी शर्त के वे भाजपा से जुड़ते चले गए. यह जानते हुए भीकि भाजपा के पास उनके लिए न तो कोई नया विचार है, न ही योजना. जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का समर्थन वह करती है, उसमें शूद्रों के लिए कोई सम्मानजनक स्थान नहीं है. बल्कि लोकतंत्र के बल पर जो अधिकार और अवसर उन्होंने प्राप्त किए हैं, उनके भी छिन जाने की संभावना है.

संघ के लिए राजनीतिक परिवर्तन उतना आवश्यक नहीं है, जितना कि सांस्कृतिक परिवर्तन. राजनीति उसके लिए सिर्फ औजार है, जिससे वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और प्रकारांतर में हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करना चाहता है. उसकी सारी प्रेरणाएं और विमर्श वर्ण-व्यवस्था समर्थक वेदादि ग्रंथों, स्मृतियां और महाकाव्यों से आते हैं. उस व्यवस्था में खुद को पिछड़ी जाति का बताने वाले मोदी को प्रधानमंत्री पद देना ‘आपद्धर्म’ हैं; जबकि आदित्यनाथ के हाथों में सत्ता आना उनका स्वाभाविक कर्म. यह अनायास नहीं है कि विगत चार-पांच वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति में सर्वाधिक स्पेस घेरने वाले मोदी इन दिनों मीडिया के फोकस से बाहर हैं. आदित्यनाथ उनसे कहीं अधिक स्पेस घेर रहे हैं. 2019 के चुनावों की तैयारी पर आदित्यनाथ का बयान दर्शाता है कि आने वाले समय में बहुत कुछ बदलने वाला है. लगता है, संघ मान चुका है कि ‘मोदी मैजिक’ से जितना काम लेना था, लिया जा चुका है? कि यह इशारों या प्रतीकों के माध्यम से बात करने का नहीं, सीधी कार्रवाही का समय है. उसके लिए योगी आदित्यनाथ ज्यादा उपयोगी सिद्ध होंगे. हो सकता है, अमेरिका में टं्रप का उभार इसकी तात्कालिक प्रेरणा हो. तो क्या मोदी पार्टी के लिए महज मुखौटे थे? ठीक ऐसे ही जैसे कभी अटल पार्टी के मुखौटे कहे जाते थे? सच तो यही है कि हिंदुत्व के जिस सांस्कृतिक परिक्षेत्र के रूप में संघ और भाजपा भारत की परिकल्पना करते हैं, उसमें एक शूद्र की नियति इससे अधिक हो ही नहीं सकती. अगर माहौल अनुकूल रहा तो संघ की अगली कोशिश संविधान का हिंदूकरण करने की होगी. एक तरह से मनुवाद की वापसी. यह कार्य आसान नहीं है. किंतु पिछड़ों और दलितों का बिखराव तथा उनके नेताओं के अहं का टकराव इसी तरह रहा तो दूर-भविष्य में यह असंभव भी नहीं हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

 

 

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—तीन

सामान्य

‘रिपब्लिक’ के चौथे खंड में सूत्रधार की भूमिका ग्लाकॉन और एडीमेंटस संभालते हैं. पहले खंड में जहां न्याय क्या नहीं है, जानने का प्रयत्न किया गया है, चौथे खंड में प्लेटो ‘न्याय क्या है’ यह बताने की कोशिश करता है. शुरुआत करते हुए ग्लाकॉन ‘शुभत्व’ को तीन हिस्सों में परिभाषित करता है. आंतरिक, जैसे कि सुख, आनंद, वस्तुनिष्ठ जैसे कि सुख-सुविधा के संसाधन, धन जिससे सुख-समृद्धि बटोरी जा सकती है. तीसरा आंतरिक और वस्तुनिष्ठ जैसे कि स्वास्थ्य. तीनों में से एक का भी अभाव मनुष्य को अपूर्णता का एहसास कराता है. ग्लाकॉन द्वारा यह पूछने पर कि तीनों में से कौन-सा शुभत्व न्याय है, सुकरात तीसरे का समर्थन करता है. सुकरात मानता है कि उससे न्याय को समग्रता में परखा जाता है. लेकिन वह अपने निर्णय के समर्थन में पर्याप्त तर्क देने में असमर्थ रहता है. ग्लाकॉन न्याय संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहता है कि न्याय दूसरों को हानि पहुंचाने तथा जरूरतमंद की मदद के बीच संतुलन हेतु व्यक्तिमात्र की अपने प्रति प्रतिबद्धता है. ऐसा करते हुए वह स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने का काम करता है. स्वार्थपरकता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है. वह व्यक्ति को व्यक्ति और समाज दोनों के प्रति गैर-जिम्मेदार बनाती है. मानव की स्वाभाविक कमजोरियों लालच, स्वार्थ आदि को स्वीकारते हुए ग्लाकॉन न्याय को उनसे दूर रहने तथा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनाए रखने वाली प्रेरणाशक्ति के रूप में स्वीकारता है. उसके अनुसार न्यायशील व्यक्ति का अपने और समाज के प्रति ईमानदार रहना आवश्यक है. यदि ऐसा नहीं है. यदि कोई व्यक्ति यह भ्रम रखते हुए कि केवल वही न्याय के पथ पर है, दूसरों की आलोचना करता है तथा उनपर अपना स्वार्थ थोपने का प्रयास करता है. तो ऐसे कथित न्यायशील व्यक्ति की अपेक्षा अन्याय का समर्थन करना उचित है. उसके अनुसार न्याय की एकमात्र कसौटी वृहद सामाजिक हित में है.

ग्लाकॉन के अनुसार न्याय कृत्रिम चीज, रूढ़ियों की उपज है. इसके लिए उसके तर्क अपने साथियों से थोड़ा हटकर हैं. वह कहता है कि प्राकृतिक अवस्था में लोग अन्याय करते और सहते हैं. लेकिन अन्याय की मात्रा व्यक्ति की शक्ति पर निर्भर करती है. जो अधिक शक्तिशाली है, वह तदानुरूप अधिक अन्याय करने में सक्षम होता है. इसलिए जब कमजोर यह देखते हैं कि वे उतना अन्याय करने में अक्षम हैं, जितना उन्हें सहना पड़ता है, तब वे संगठन के विवश होते हैं. इस तरह न्याय सबल की नहीं, दुर्बल की आवश्यकता और इच्छा का परिणाम बन जाता है. उसके माध्यम से वह अपने से शक्तिशाली के व्यवहार को नियंत्रित करने का सपना देख सकता है. एक संविदा के तहत, जिसका आधार धर्म भी हो सकता है और संविधान भी, वे एक-दूसरे के प्रति अत्याचार न करने, न ही सहने के लिए वचनबद्ध होते हैं. धीरे-धीरे वह संविदा कानून का रूप ग्रहण कर लेती है. लेकिन मानव-प्रवृत्ति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जब उसको लगता है कि किसी कानून या बल के आधार पर उसे नियंत्रित करने की तैयारी हो रही है, तो वह विरोध पर उतर आता है. परिणामस्वरूप समाज में जिसका गठन सहअस्तित्व की भावना के साथ हुआ था, कुछ लोग बल की भाषा बोलने-समझने लगते हैं. इससे समाज के वर्ग के भीतर भय उमड़ने लगता है. उसी से न्याय की उत्पत्ति होती है. ग्लाकॉन के अनुसार, ‘न्याय सबसे अच्छे और सबसे बुरे के बीच का रास्ता, एक समझौता है. सर्वोत्तम यह है कि मनुष्य अन्याय से दूर रहे, ताकि दंड से बचा रहे और सबसे बुरा यह है कि अन्याय सहे और बदला न ले सके.’ निर्बल सबल से बदला कैसे ले सकता है? वह जानता है कि वह अकेला शक्तिशाली का सामना नहीं कर सकता. अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वह अपने ही जैसे लोगों के साथ समझौते को बाध्य होता है. चूंकि समाज में कमजोरों की संख्या अधिक होती है, इसलिए बहुसंख्यक वर्ग की सम्मिलित शक्ति अल्पसंख्यक शक्तिशाली वर्ग से अधिक हो जाती है. शक्तिशाली वर्ग इस सत्य को भली-भांति समझता है. इसलिए वह निरंतर इस प्रयास में रहता है कि शक्ति-विपन्न वर्गों में फूट डालकर उन्हें एकजुट होने से रोक सके. अल्पसंख्यक शक्तिशाली समूहों की बहुसंख्यक शक्ति-विपन्न समूहों पर शासन करने की योग्यता, प्रायः इस बात पर निर्भर करती है कि वह उन्हें बांटे रखने में कितना सफल हो पाता है. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग-भेद आदि ऐसे ही माध्यम हैं जो असल जिंदगी में अनुपयोगी होने के बावजूद बहुसंख्यक समाज को बांटे रखने में सहायक होते हैं.

थ्रेचाइमच्स ने ‘ताकतवर हमेशा सही’ कहते हुए न्याय को ‘शक्तिशाली का स्वार्थ’ माना है. जबकि गलाकॉन न्याय की उत्पत्ति भय से मानता है. दोनों न्याय तक पहुंचने के लिए धुर-विपरीत ध्रुवों से अपनी विचार-यात्रा की शुरुआत करते हैं. यह प्लेटो की विशिष्ट शैली है. इसके माध्यम से वह किसी दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अपने मंतव्य को प्रत्येक दृष्टिकोण से परख लेना चाहता है. ग्लाकॉन का विचार वृथा नहीं गया. मध्यकाल में हॉब्स जैसे विचारकों ने भी उसका समर्थन किया है. ग्लाकॉन के विचारों में हमें परंस्पर अंतर्विरोधी तत्व दिखाई पड़ते हैं. परंतु ये अंतर्विरोध अकेले  ग्लाकॉन के नहीं है. यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह आसन्न संकट पर विजय की क्षीण संभावनाएं देख समझौते पर उतर आता है. उसके लिए लिखित-अलिखित संविदा करता है. लेकिन धीरे-धीरे वह उस वातावरण से ऊबने लगता है. हालात अनुकूल देख के शक्तिशाली वर्गों की महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगती हैं. और वे उन शक्तियों की अवहेलना करने लगते हैं, जिन्होंने उनके अस्तित्व को संभव बनाया है. वे भी मानते हैं कि कि न्याय मनुष्य के अंतर्मन की वस्तु नहीं है. समाज उसका सृजन करता है और फिर राज्य-सत्ता के सहयोग द्वारा लागू करता है. समाज में न्यायी और अन्यायी दोनों प्रकार के लोग हो सकते हैं. लेकिन न्यायी और अन्यायी को तभी रेखांकित किया जा सकता है, जब समाज में बल-प्रयोग की शक्ति हो. ग्लाकॉन और हॉब्स दोनों इस तथ्य से करीब-करीब सहमत नजर आते हैं कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी होता है. साधारणतः वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, और यह मानते हुए कि दूसरे उसके जितने श्रेष्ठ नहीं हैं, उसे अपनी श्रेष्ठता पर खतरा दिखाई पड़ता है. यह अंतर्विरोध या कि आत्मसंघर्ष मनुष्य को दूसरों से सहयोग और समझौते के लिए प्रेरित करता है. स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठतर सिद्ध करने की प्रवृत्ति मनुष्य की यशलिप्सा के रूप में प्रकट होती है. जाहिर है समाज में रहते हुए व्यक्ति को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक संघर्ष से भी गुजरना पड़ता है. यही द्वंद्व समाज में न्याय को प्रासंगिक बनाता है.

केफलस, पॉलीमार्क्स, थ्रेचाइमच्स और ग्लाकॉन सब न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करते हैं. उसके लिए वे अलग-अलग तर्क देते हैं. सुकरात को बीच में लाकर प्लेटो उनकी मान्यता के कमजोर पक्षों की ओर इशारा करता है. अलग-अलग दिखने वाले उन विचारों में प्लेटो को जो सामान्य बात नजर आती है, वह यह है कि चारों न्याय को बाहरी चीज मानते हैं. उनके अनुसार न्याय चूंकि बाहर की चीज है इसलिए किसी न किसी रूप में वे सभी मनुष्य की क्षमताओं, उसकी प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर संदेह कर रहे होते हैं. चारों के दर्शन में प्लेटो को यही बात सर्वाधिक अखरती है. मन से कवि और विचारों से दार्शनिक प्लेटो मनुष्य और मनुष्यता में अपने विश्वास को कम नहीं होने देता. इसलिए वह यह सिद्ध करने में जुट जाता है कि न्याय बाहरी वस्तु न होकर मनुष्य के आंतरिक बल का परिचायक है. वह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय न तो बाहरी सौगात है, न ही रूढ़ि न ही किसी अदृश्य सत्ता की ओर से उपहार. असल में वह मनुष्य की अपनी महिमा, उसका आंतरिक बल, ओज और तेज है. वह बताता है कि उसके साथी न्याय पर समग्रता से विचार करने के बजाय, उसके परिस्थितिगत लक्षणों पर विचार कर रहे हें. इसलिए न्याय को लेकर उनके विचार अधूरे और अपर्याप्त हैं. उसके अनुसार न्याय मानव प्रकृति की उच्चतम अवस्था है. समाज का अपना व्यक्तित्व होता है. सीमित संदर्भों में जहां न्याय मानव-मात्र की आंतरिक शुभता का परिणाम हैं, वहीं व्यापक संदर्भों में वह समाज की आंतरिक शुभता को भी दर्शाता है. इसकी विवेचना हेतु प्लेटो पुस्तक का उदाहरण देता है. मान लीजिए एक व्यक्ति के पास किसी पुस्तक की दो प्रतियां हैं. उनमें से एक बड़े अक्षरों में टाइप होने के कारण काफी मोटी है, दूसरी छोटे अक्षरों में, आकार में अपेक्षाकृत छोटी है. हालांकि दोनों प्रतियों की विषय-वस्तु में कोई अंतर नहीं है. फिर यदि किसी व्यक्ति को उन्हें पढ़ने को दिया जाए तो वह बड़े फांट की पुस्तक को पढ़ना पसंद करेगा. यही उसके लिए आसान भी होगा. भले ही बड़े अक्षरों वाली पुस्तक को लाना-ले-जाना उसके लिए कठिन हो. प्लेटो के अनुसार व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय में यही अंतर है. दोनों मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसके सदाचार और सद्गुणों की उत्पत्ति होता है. समाज में जाकर उसका रूप बड़ा हो जाता है. वह व्यक्ति से अधिक समाज को समझने पर जोर देता है. अपने दायरे के कुछ लोगों को वह दूसरों से अधिक जान पाता है तो इसलिए कि वे उसकी सामाजिकता के दायरे में हैं. आदर्श समाज में किसी नागरिक को जानने और समाज को जानने में अंतर नहीं होता. न्याय की इस विशेषता को समाज के प्रति सकारात्मक सोच और वृहद संदर्भों में ही परखा जा सकता है. इसके लिए प्लेटो स्पष्ट करता है कि कोई राज्य अपनी धन-संपदा या शक्ति के बल पर आदर्श नहीं बनता. आदर्श राज्य अपने नागरिकों के श्रेष्ठतम चरित्र से आकार लेता है.

चर्चा के अगले चरण में एडीमेंटस विमर्श में शामिल हो जाता है. न्याय की उसकी व्याख्या सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित तथा आत्मपरक है. उसके अनुसार लोग अपने बच्चों को न्याय का समर्थन करना इसलिए नहीं सिखाते क्योंकि वह शुभता का प्रतीक है. बल्कि इसलिए सिखाते हैं कि बच्चे बड़े होकर उनका साथ दे सकें. प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि एडीमेंटस न्याय को पारिवारिक सुख तक सीमित रखकर, राज्य की उपेक्षा कर रहा है. लेकिन ऐडीमेंटस निरा परिवारवादी नहीं है. उसका समाज में भरोसा है. वह मानता है कि समाज कोई अमूर्त्त अवधारणा नहीं है. किसी भी व्यक्ति का समाज उसके आसपास के परिवेश से बनता है, जिसमें उसमें परिवार भी सम्मिलित होता है. इसलिए परिवार और परिवेश के प्रति निष्ठा प्रकारांतर में समाज के प्रति निष्ठा की परिचायक है. अतएव व्यक्ति को न्याय के प्रति अनुरक्त करने का सर्वात्तम रास्ता है कि उसके परिवेश में सुधार लाया जाए. ऐसे परिवेश का निर्माण किया जाए जिसमें उसे न्यूनतम अंतर्द्वंद्वों का सामना करना पड़े. समाज और सामाजिकता में विश्वास बनाए रखने का दायित्व व्यक्ति और समाज दोनों का है. ऐडीमेंटस आगे कहता है कि न्याय से लोगों को परचाने, उसके अनुपालन करने हेतु धार्मिक शिक्षा अपर्याप्त है. वह न्याय को राज्य एवं नागरिकों के बीच शुभता के आदान-प्रदान के रूप में प्रभावी करने के बजाए, उसे दैवीय बना देती है. धार्मिक व्यक्ति कहता है—यदि तुम दूसरों के साथ न्याय करोगे तो ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा, तुम्हें उसका पारितोषिक देगा. और यदि तुम अन्याय करोगे तो ईश्वर की निगाह में दंड के भागी बनोगे. स्वर्ग-नर्क की अवधारणा, मोक्ष आदि न्याय के ऐसे ही भ्रांत स्वरूप हैं. ऐसे में व्यक्ति जो करता है, वह या तो डर के कारण, अथवा दूसरों के विवेक से अनुशासित होकर. कर्तव्य एवं न्याय-भावना को भुलाकर पूजापाठ, दान-पुण्य आदि के बहाने वह ईश्वर को खुश करने की कवायद में जुट जाता है. चूंकि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए धार्मिक व्यक्ति का न्यायबोध सिवाय भ्रांति के कुछ नहीं होता. यह भ्रांति न केवल उसके अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है. इसके चलते ईश्वरीय न्याय को ही वास्तविक न्याय मानने का दावा करने वाले उसके नाम पर मनमानी करने में सफल हो जाते हैं. न्याय सामाजिक शुभता का दूसरा नाम है. अवास्तविक अथवा काल्पनिक पात्रों के सहारे समाज द्वारा उसकी सिद्धि असंभव है. न ही उसे भय फैलाकर प्राप्त किया जा सकता है. ईश्वर के नाम पर होने वाला न्याय पुरोहित तथा उसके चेले-चपाटों के बीच चढ़ावे की हिस्सेदारी में सिमटकर रह जाता है. धर्म को लेकर एंडीमेटस का दृष्टिकोण कई मायने में महत्त्वपूर्ण है. वह न्याय के बारे में आधुनिक विचारधाराओं से मेल खाता है. जान लॉक, रूसो, बैंथम, फायरबाख, कार्ल मार्क्स, से लेकर पीटर क्रोप्टोकिन तक सभी विचारक जीवन में धर्म के अतिरेकी विस्तार तथा उसे न्याय का पर्याय मानने वाली मानसिकता का विरोध करते आए हैं. इसी का प्रभाव है कि धर्म को आधुनिक राज्यों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया से अलग-थलग कर दिया गया है.

वैसे भी धर्म और न्याय का कोई अंतःसंबंध नहीं है. आरंभ से ही धर्म अभिजन-हितों का समर्थक-साधक रहा है. इसके अनगिनत उदाहरण रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. महाभारत-युद्ध को प्रायः धर्म-युद्ध कहकर प्रचारित किया जाता है. युद्ध के प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभाता हुआ कृष्ण अठारह अक्षौहिणी सेना, जो उस समय विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई थी, को एक-दूसरे से भिड़ाकर भगवान बन जाता है. उस युद्ध का प्राप्य क्या था? युधिष्ठिर को राज्य मिला. पर अठारह अक्षौहिणी सेना का हिस्सा बनकर लड़े सैनिकों या उनके परिजनों को क्या मिला? इसपर महाभारत या इतिहास की किसी पुस्तक में कोई उल्लेख नहीं है. आज भी इस पर कोई चर्चा नहीं करता. बस धर्म-युद्ध मानकर उसपर उठने वाले प्रत्येक सवाल पर पर्दा डाल दिया जाता है. युधिष्ठिर के धर्म-राज्य में प्रजा का क्या हाल था, पता नहीं. परंतु स्वयं महाभारत का संकेत है कि उस युद्ध ने एक परजीवी वर्ग को जन्म दिया था, जो इतना शक्तिशाली था कि नवनियुक्त सम्राट की आंखों के सामने किसी की भी हत्या कर सकता था. धर्मराज होने का दावा करने वाला युधिष्ठिर उसको देखकर भी चुप रहने को विवश था. यह उदाहरण महाभारत के शांतिपर्व से है—

‘कुरुक्षेत्र के महाभारत के बाद जब पांडव विजयी होकर लौटे तो प्रजा उनके स्वागत को उमड़ पड़ी थी. हजारों ब्राह्मण भी दान की अभिलाषा युधिष्ठिर को आशीर्वाद देने के नाम पर नगर-द्वार पर आ जुटे. जैसे ही युधिष्ठिर का रथ आता दिखाई पड़ा, प्रजा उसकी जय-जयकार करने लगी. नगर-द्वार पर जमा ब्राह्मण स्तुतिगान में लग गए. उस खुशनुमा माहौल में एक श्रमण साधुओं के बीच से अचानक निकला और युधिष्ठिर को देखकर कहने लगा—

‘हे युधिष्ठिर! तुमने अपने बंधुओं की हत्या की है. स्वजनों की हत्या और गुरुजनों का नरसंहार करके तुम्हें क्या मिला? तुम पापी हो. तुम्हें क्षोभ से मर जाना चाहिए.’

युधिष्ठिर स्तब्ध. लोगों को काटो तो खून नहीं. कुछ पलों के लिए ब्राह्मणों को भी मानो सांप सूंघ गया. अपराधबोध का मारा युधिष्ठिर सचमुच मर जाना चाहता था. अचानक ब्राह्मण दल को चेत हुआ. सारे के सारे ब्राह्मण एक-साथ चिल्लाने लगे—‘यह हमारा प्रतिनिधि नहीं है. हम ऐसा नहीं सोचते. यह पापी चार्वाक है. इस अधर्मी को जीने का कोई अधिकार नहीं है.’

यह कहकर सारे साधु उस श्रमण पर टूट पड़े. धर्मावतार युधिष्ठिर की आंखों के सामने उसे जीते-जी भस्म कर दिया गया.’

धर्म के नाम पर ऐसे ही अमानवीय न्याय का उदाहरण वेन की कहानी के रूप में आया है. पुराणों में वेन को विश्व का पहला निर्वाचित सम्राट बताया गया है. कहानी के अनुसार आर्यों ने जब कृषि की शुरुआत की और उसके लिए एक जगह टिककर रहना आरंभ किया तो सुरक्षा के लिए राजा चुनने का विचार सामने आया. ऐसा व्यक्ति जो जरूरत के समय उनका नेतृत्व कर सके. उस समय लोगों ने सर्वसम्मिति से वेन को अपना राजा निर्वाचित किया. वेन ने न्याय करते हुए जमीन का समुचित विभाजन किया. ब्राह्मण चूंकि शिक्षा का दायित्व संभाले हुए थे, उन्हें अनेक कर्मकांडों में लिप्त रहना पड़ता था, इसलिए उन्हें नदी किनारे की उपजाऊ जमीन दी गई. लोग खेती करने लगे. वेन के नेतृत्व में विश् तरक्की करने लगा. लेकिन खेती तो मौसम पर निर्भर थी. एक बार भयंकर अकाल पड़ा. पूरा विश् भूख की चपेट में आ गया. लोग तड़फ-तड़फकर मरने लगे. जब तक सुख देती थी, तब तक नई व्यवस्था लोगों को हितकारी लगती थी. मौसम की मार के साथ ही उसकी कमजोरी सामने आ गई. लोग वेन को दोष देने लगे. एक राजा का दायित्व निभाते हुए वेन ने विश् के लोगों की बैठक बुलाई. ब्राह्मणों को दी गई भूमि पर अब भी खेती हो रही थी. नदी किनारे होने का उसे लाभ मिला था. वेन उनसे आपद्धर्म के रूप में कृषि उपज को जरूरतमंदों के बीच बांटने का आग्रह किया. इसपर वे चिढ़ गए. लोगों को राजा के विरुद्ध भड़काने लगे. भूखे लोगों का दिलो-दिमाग सुन्न हो चुका था. आक्रोश जब सीमा पार कर गया तो भूखे से अकुलाए उग्र विश-वासियों ने राजा पर हमला कर दिया. इस तरह प्रथम निर्वाचत राजा अपने ही लोगों के हाथों मारा गया.

विमर्श के अगले चरण में प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्याय को उसकी लोकोन्मुखता तथा वृहद सामाजिक हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. न कि उन व्यक्तियों के व्यवहार से जो न्याय प्रक्रिया में सम्मिलित होने की दावेदारी करते हैं. न्याय-संबंधी विमर्श में अनेक लोगों को सम्मिलित कर वह तत्कालीन समाज में प्रचलित न्याय के परंपरावादी, उग्रवादी एवं व्यवहारवादी स्वरूपों की समीक्षा करता है. अंततः उसका संवेदनशील कवि हृदय उसको आदर्शवाद के समर्थन में ले जाता है. सुकरात के माध्यम से वह स्पष्ट करता है कि न्याय मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसका सदाचरण है—‘यदि कोई व्यक्ति अपने दायित्वों का समुचित वहन करता है, तो उसका आचरण ही उसकी न्याय-प्रियता का प्रमाण बन जाता है.’ वह मानता है कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है. मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का समयानुसार पालन करना ही न्याय है. जाहिर है प्लेटो के लिए न्याय कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर आचरण की वस्तु है. क्या न्याय की शिक्षा दी जा सकती है? इसी से जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या शिक्षा व्यक्ति को अधिक न्यायशील बनाती है. प्लेटो शिक्षा की उपयोगिता से इन्कार नहीं करता. व्यक्तित्व विकास हेतु शिक्षा अनिवार्य है. तथापि उसके अनुसार शिक्षा साध्य नहीं है. वह केवल साधनमात्र है. उसका महत्त्व व्यक्ति को राज्य का योग्यतम सदस्य बनाने में मदद करना है. शिक्षा के अलावा अधिकार चेतना, जिसमें अपने साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का बोध भी जरूरी है तथा कर्तव्य के प्रति जागरूकता और समर्पण का भाव व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करता है. ‘रिपब्लिक’ की शुरुआत वह व्यैक्तिक नैतिकता एवं न्याय-प्रिय व्यक्ति के न्याय-संगत जीवन की विशेषताओं से करता है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते स्थिति साफ होती जाती है. पता चलता है कि लेखक का उद्देश्य संपूर्ण समाज को न्याय एवं नैतिकता से बंधे हुए देखना है. वह मानता है कि न्याय समाज का विशिष्ट गुण है. यह गुण समाज में बाहर से नहीं आता. बल्कि उसके नागरिकगण अपने न्याय-संगत आचरण द्वारा उसे संभव बनाते हैं. न्याय तथा औचित्य अथवा अन्याय एवं अनौचित्य जिस प्रकार व्यक्ति के गुण-दोष हो सकते हैं, उसी प्रकार ये समाज के भी गुण-दोष हो सकते हैं. न्याय व्यक्ति एवं समाज को परस्पर अन्योन्याश्रित, पूरक एवं प्रेरक बनाता है.

आधुनिक विचारक जॉन रॉउल न्याय को सामाजिक संस्थाओं का विशेष लक्षण मानता है. उसके अनुसार—‘न्याय सामाजिक संस्थाओं का शुभत्व है. उसका वही महत्त्व है जो वैचारिक उद्यमों में सत्य का होता है.’8 प्लेटो के लिए न्याय एवं नैतिकता में कोई अंतर नहीं है. दोनों परस्पर पूरक और पर्याय हैं. आदर्श स्थिति वह है जब व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर न्याय में अंतर मिट जाता है. इसके लिए प्लेटो समाज को शासक, रक्षक और कृषक तीन हिस्सों में बांटता है. जैसे भारत में शूद्रों को वर्ण विभाजन में सबसे निचले स्तर पर रखा गया है और दासों को वर्ण विभाजन में स्थान ही नहीं दिया गया है, इसी प्रकार प्लेटो के आदर्श राज्य में भी दासों को कार्यविभाजन से बाहर रखा गया है. दोनों ही जगह उनकी स्थिति खरीदी गई वस्तु या संसाधन के समान है. बावजूद इसके दोनों में बड़ा अंतर है. प्लेटो का सिद्धांत पूरी तरह से सामाजिक जरूरतों और विकास के नजरिये पर आधारित है. वह किसी व्यक्ति को जन्म, लिंग अथवा उसकी पैत्रिक पहचान के आधार पर छोटा या बड़ा घोषित नहीं करता. व्यक्ति का चयन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर, विशुद्ध योग्यता के आधार पर हो—इसके लिए वह बच्चों का पालन-पोषण सात वर्ष का होते ही—माता-पिता से दूर, उसकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने की अनुशंसा करता है. ताकि बड़े होने पर उनमें जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न किया जा सके. भारत में कार्यविभाजन इससे भिन्न था. वेदों, स्मृतियों तथा धर्म-सूत्रों में कार्यविभाजन के नाम पर समाज को चार वर्गां में बांटने का विधान रचा गया है. हालांकि दावा यह किया गया है कि वह विशुद्ध गुणों पर आधारित विभाजन हे और कोई मनुष्य अपने गुण एवं प्रतिभा के आधार पर वर्ग-अंतरण कर सकता है. परंतु वास्तविकता इससे अलग है. कर्म-गुण के आधार पर भारतीय समाज में वर्ग-अंतरण के उदाहरण इतने विरल हैं कि उन्हें अपवाद मानकर छोड़ा जा सकता है. भारतीय विशेषकर हिंदू समाज में जाति-व्यवस्था दास प्रथा की अपेक्षा कहीं अधिक निकृष्ट और भयावह थी. अपने स्वामी की अनुकंपा अथवा तय मूल्य-राशि का भुगतान करने के पश्चात दास अपनी स्वतंत्रता खरीद सकता था. जातिप्रथा में दबे शूद्रों को इस प्रकार के अवसर उपलब्ध न थे. जाति जन्म के साथ जीवन में प्रवेश करती और मरण तक देह और मन से चिपकी रहती थी. ‘रिपब्लिक’ में कार्य-विभाजन नीति-सम्मत है. प्लेटो व्यक्ति के गुण-दोष के अनुसार उसे उपयुक्त जिम्मेदारी सौंपने की सिफारिश करता है, ताकि उसकी योग्यता का समाज-हित में भरपूर इस्तेमाल किया जा सके. भारतीय, विशेषकर हिंदु समाज में जातीय विभाजन धर्म-सम्मत व्यवस्था है. जाति-व्यवस्था के लिए व्यक्ति की रुचि एवं योग्यता कोई मूल्य नहीं है. वह सबकुछ जन्म के आधार पर, बिना व्यक्ति की रुचि अथवा योग्यता देखे, काम सौंपने में विश्वास रखती है. इसलिए उसमें बदलाव सरल नहीं है. दूसरी ओर प्लेटो का कार्य-विभाजन अधिक वैज्ञानिक, निष्पक्ष और राज्य-कल्याण की भावना से भरा है.

‘रिपब्लिक’ मानवीय मेधा की अमूल्य धरोहर है. उसकी प्रशंसा करते हुए बार्कर ने लिखा है—न्याय रिपब्लिक की आधारशिला है. और रिपब्लिक न्याय की मूल अवधारणा का संस्थागत रूप है.’ ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने कहा है कि समाज के तीनों वर्गों को बिना एक-दूसरे के कार्य में व्यवधान उत्पन्न किए, काम करते रहना चाहिए. सब अपना-अपना कार्य मनोयोग से करेंगे तो सामाजिक शांति और सद्भाव बना रहेगा. राज्य आत्मनिर्भर बनेगा. अंतर्द्वंद्व घटेंगे और उनके समाधान में खप रही ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग लोककल्याण के निमित्त संभव हो सकेगा. सेबाइन ने प्लेटो के न्याय-सिद्धांत को सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक माना है. उसके अनुसार—‘न्याय वह बंधन है जो मानव-समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है. यह उन व्यक्तियों के सहयोग और समन्वय का नाम है जो अपनी शिक्षा-दीक्षा, योग्यता एवं रुचि के अनुसार अपने कर्तव्य का चयन करते हैं और फिर अपनी संपूर्ण निष्ठा से उसके अनुपालन में लगे रहते हैं. अपनी निष्ठा एवं समर्पण भावना से वे समाज को संपूर्ण एवं आत्मनिर्भर बनाते हैं. ऐसा समाज जो संपूर्ण मानव-मनस् की रचना हो, जिसमें हर कोई अपना प्रतिबिंब देख सके. सामाजिक जीवन के ऐसे ही मूलभूत, उदात्त रूप को प्लेटो ने न्याय की संज्ञा दी है. आचरण की शुभता पर जोर देते हुए वह ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें मानव-व्यक्तित्व की उठान सामाजिक शुभता के परम-बिदु को छूने लगती हे. लक्ष्य आसान नहीं है. परंतु निजता को सर्वकल्याण को समर्पित करने के बाद मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है.

प्लेटो न्याय और ज्ञान को परस्पर पूरक मानता है. उसके अनुसार ज्ञान मनुष्य को न्याय की पहचान कराता है. ज्ञान ही एकमात्र ऐसा उपकरण है जिससे मनुष्य शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे का बोध कराता है. ज्ञान न्याय की पूर्वापेक्षा और अनिवार्यता है. इसलिए ज्ञान एकमात्र शुभ है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो द्वारा न्याय की खोज का सिलसिला आदर्श समाज की अवधारणा तक बढ़ जाता है. प्लेटो ने साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधाओं, नाटक, कविता आदि की आलोचना की थी. वह उन्हें लोकरंजन के माध्यम से अधिक मानने को तैयार न था. नाटक एवं कविता को तो वह मानव-चरित्र को दुर्बल बनाने वाली विधाएं मानता था. लेकिन उसके दर्शन में कवि मन की संवेदनशीलता साफ-साफ झलकती है. ‘रिपब्लिक’ में न्याय की खोज का सिलसिला, संवेदनशील मन की कविता जैसा है, जिसे उसकी विद्वता महत्त्वपूर्ण बना देती है. प्लेटो की न्याय-संबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ध्यातव्य है कि प्लेटो का संबंध एथेंस के शासक परिवार से था. वह स्वयं को एथेंस की सत्ता की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से एक मानता था. लेकिन सुकरात को मृत्युदंड दिए जाने के बाद से तत्कालीन राजनीति से उसका जी उचट गया था. प्लेटो से पहले यूनानी समाज में कोई खास कार्यविभाजन न था. न ही कार्य-विशेष के प्रति व्यक्ति की रुचि का कोई महत्त्व था. इसलिए माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी कार्य कर सकता है. इसी धारणा के चलते एथेंस में गणतांत्रिक पदों पर नियुक्तियां लॉटरी के माध्यम से की जाती थीं. इसके चलते कई बार कार्य-विशेष के लिए अयोग्य व्यक्ति चुन लिए जाते थे. इस अविवेकी व्यवस्था ने एथेंस का गणतंत्र अयोग्य हाथों की कठपुतली बना हुआ था. सुकरात ने उस पर चोट की थी. खुद को गणतंत्र का समर्थक मानने वाले एथेंस की यह सबसे बड़ी त्रासदी थी. प्लेटो की आदर्श राज्य की परिकल्पना उसकी इसी छटपटाहट का सुफल कही जा सकती है. न्याय की विवेचना के रूप में यही छटपटाहट आदर्श राज्य की कल्पना में भी दिखाई पड़ती है. वह ऐसे राज्य की कल्पना पेश करता है, जहां लोग बजाए स्वार्थ-भाव के सर्वोदय भाव से जुड़े हों. जिनमें पारस्परिक कल्याण के प्रति एका और विश्वास हो. वह स्पष्ट करता है कि न्याय आदर्शोन्मुखी समाज की सहज-स्वाभाविक उपलब्धि है. वह कृत्रिम अथवा बाहरी शक्ति द्वारा थोपी गई व्यवस्था नहीं है. किसी भी समाज में न्याय का संरक्षण किसी भय या दबाव में न होकर उसके स्वयं स्फूर्त्त प्रयासों के माध्यम से होता हे. वह इसलिए भी आवश्यक है कि न्याय का कोई दूसरा या तीसरा पक्ष नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसे केवल वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है. उसके लिए आवश्यक है कि समाज की इकाइयों में परस्पर सामंजस्य और एक-दूसरे के प्रति विश्वास का भाव हो.

‘रिपब्लिक’ के लिए प्लेटो को अपूर्व ख्याति प्राप्त हुई है. उसे ‘दार्शनिकों का दार्शनिक’ माना गया है. यह माना गया है कि जो प्लेटो के यहां नहीं है, दर्शन में वह कहीं भी नहीं है. बावजूद इसके प्लेटो को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है. कुछ विद्वानों ने उसके न्याय-संबंधी दर्शन को निष्क्रियता का दर्शन माना है. उनका कहना है कि प्लेटो का न्याय कल्पना की उड़ान, खूबसूरत सपने से अधिक कुछ नहीं है. न्याय को लेकर वह जो सपना देखता है, उसका सच हो पाना असंभव है. प्लेटो की भांति उसका न्याय भी इतना आत्मसंयमी और मर्यादित है कि उसे व्यवहार में उतार पाना बेहद कठिन है. बार्कर तो प्लेटो के न्याय को न्याय मानने के लिए ही तैयार नहीं है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय महज भावना या कवि मन की खूबसूरत परिकल्पना है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय-सिद्धांत एकतरफा है. वह केवल मनुष्य के कर्तव्यों को निर्धारित करता है और अधिकारों को तय करने का काम पूरी तरह समाज की मर्जी पर थोप देता है. यदि समाज सचमुच इतना ही उदार हो, जैसा कि प्लेटो सोचता है तो ऐसे समाज में न्याय का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. वस्तुतः ईसापूर्व चौथी-पांचवीं शताब्दी के जिस समाज का जिक्र प्लेटो के ग्रंथों में मिलता है, उन दिनों यूनानी समाज युद्ध प्रिय समाज था. वहां छोटे-छोटे नगर राज्य थे, जिनके बीच युद्ध अकसर होते रहते थे. एथेंस स्पार्टा के हाथों पराजित हो चुका था. वह पराजय भी एथेंसवासियों के लिए कुंठा का कारण बनी थी. एथेंस जहां अपने दार्शनिक विचारों, कवियों और सुंदरियों के लिए प्रसिद्ध था, उसके पड़ोसी नगर-राज्य स्पार्टा की प्रतिष्ठा वहां के बहादुर सैनिकों के कारण थी. एक युद्ध में स्पार्टा के हाथों भीषण पराजय के बाद एथेंसवासियों के मन में ‘उस जैसा’ बनने की बड़ी कामना थी. आदर्श गणराज्य के रूप में प्लेटो ऐसे ही गणतंत्र की कामना करता है. सेबाइन ने भी माना है कि प्लेटो की ‘न्याय-संबंधी कल्पना जड़, आत्मपरक, निष्क्रिय, ठहराव-युक्त, अव्यावहारिक एवं अविश्वसनीय है.’ ‘न्याय’ की बात करता हुआ प्लेटो कहीं-कहीं ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है; यदि यह मान लिया जाए कि व्यक्ति या समूह अपनी किसी खास प्रवृति का दास होता है तो भी उसे यह बताने की क्या आवश्यकता है कि प्रत्येक मनुष्य केवल एक ही कार्य करे. या केवल समाज द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को ही करे.

दरअसल न्याय की विवेचना करते हुए प्लेटो विषय को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभव-सा हो जाता है. इससे उसके विचारों में कहीं-कहीं असंगतियां और अंतर्विरोध भी दिखने लगता है. वह एक ओर तो दावा करता है कि आदर्श समाज में कोई व्यक्ति दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरी ओर राज्य को व्यक्ति के कर्तव्यों के निर्धारण का अधिकार देकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेता है. प्लेटो के अनुसार समाज में संरक्षक वर्ग का कर्तव्य अपने बुद्धि-विवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘संरक्षक’ या संरक्षक वर्ग से नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, जेसे दास, यदि ऐसा व्यक्ति बुद्धि-विवेक में ‘संरक्षक’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए? न्याय-भावना तो इसमें है कि ऐसे व्यक्ति को तत्काल संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी काबलियत का उपयोग लोक-हित में किया जाए. साथ ही संरक्षक वर्ग में सम्मिलित व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाज-हित के बजाय जो केवल स्वार्थ को वरीयता देते हैं तथा नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. समाज हित के लिए यह जरूरी भी है. प्लेटो उसकी कोई व्यवस्था नहीं करता. बजाए इसके वह दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है. चह दार्शनिक सम्राट को इतना अधिकार-संपन्न बना देता है कि वह निरंकुश नजर आने लगता है. कदाचित वह सोचता था कि जो ‘दार्शनिक सम्राट’ के लिए अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर चुके व्यक्ति मनुष्य की सामान्य कमजोरियों से मुक्त होंगे. जबकि मानवीय प्रवृत्ति परिवर्तनशील है. ध्यातव्य है कि दासप्रथा का समर्थन करने वाला प्लेटो अकेला विचारक नहीं है, सुकरात, अरस्तु, जेनोफीन जैसे उसके समकालीन विचारक भी उससे सहमत हैं. दूसरे प्लेटो के आदर्श राज्य में जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका कवि-हृदय सपने की तरह केवल आदर्श बुनता है. नैतिकता चूंकि स्वयं एक आदर्श है, इसलिए उसके सपने की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता.

प्लेटो ने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटे-बेटियां समाज के शेष वर्गां की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में वह ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया हो. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो. वह प्रश्न उठाता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए? वह कौन-सा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. ‘रिपब्लिक’ में उसने बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें माता-पिता अथवा उनकी संतान एक-दूसरे को कभी पहचान ही सकें. उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिनके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. काम-संबंधों में पर्याप्त खुलापन था. प्लेटो ने विवाह संस्था का निषेध किया है. इसके दो कारण थे. पहला उसे लगता था कि पारिवारिक संबंध व्यक्ति के उद्देश्यों को सीमित बनाते हैं. दूसरा स्त्री को पुरुष के बराबर दर्जा देना. प्लेटो ने दांपत्य संबंधों में साम्यवाद का समर्थन किया है. एक-दूसरे की इच्छा पर कोई भी युगल परस्पर सहवास कर सकता था. संतानोपत्ति का मुख्य ध्येय युद्धप्रिय राज्य को श्रेष्ठ योद्धा उपलब्ध कराना था. संरक्षक स्त्री-पुरुषों के लिए नियम और भी कठोर थे. ‘रिपब्लिक’ में उसने लिखा है—

‘संरक्षक वर्ग के स्त्री-पुरुषों में से कोई भी अपना घर-परिवार नहीं बसाएगा. कोई भी किसी के साथ व्यक्तिगत रूप से सहवास नहीं करेगा. शासक स्त्रियां शासक वर्ग के सभी पुरुषों की समान रूप से पत्नियां होंगी. उनकी संतानें भी समान रूप से सभी की होंगी. न तो माता-पिता अपनी वास्तविक संतान के बारे में जान पाएंगे न ही संतान अपने वास्तविक जन्मदाता को जान सकेगी.’

ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. परंतु वह भी आसान न था. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! चूंकि लोकहित के कार्यों को टाला नहीं जा सकता, बल्कि कुछ कार्य तो अत्यावश्यक, नैमत्तिक महत्त्व के होते हैं, स्पष्ट है कि ऐसे कार्यों के लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी.

प्लेटो स्वीकार करता है कि आदर्श राष्ट्र-राज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. परंतु कैसे? लोग अप्रीतिकर कार्यों को भी समाज के प्रति अपना दायित्व मानकर करें, यह प्लेटो के समक्ष बड़ी चुनौती थी. ऐसे कार्यों को करने के लिए कोई तो नियुक्त किया जाएगा. जिसे वे कार्य सौंपे जाएंगे, क्या वह उन्हें खुशी-खुशी करने को तैयार होगा? यदि नहीं जो जिसे वे कार्य बलपूर्वक सौंपे जाएंगे क्या वह उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? क्या उसे राज्य की मनमानी नहीं माना जाएगा? विकसित देशों में मशीनीकरण के बाद से अप्रीतिकर अथवा खतरे की अधिक संभावना वाले कार्यों को मशीनों से लिया जाने लगा है. लेकिन प्लेटो के समय में ऐसे कार्यों को करने के लिए केवल दास थे. उनकी उपस्थिति राज्य की सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक थी. परंतु जिनके अधिकारों की ओर किसी का ध्यान न था. उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था. राजनीति में उनकी कोई हिस्सेदारी न थी. दूसरी ओर एथेंस का हर वयस्क आम सभा का सदस्य होता था. बुद्धकालीन गणतंत्रों में भी एक समय ऐसा था, जब वहां का प्रत्येक नागरिक ‘मैं राजा हूं’, ‘मैं राजा हूं’ कहकर शासक होने का दावा करता था. सोफिस्टों के कार्यकाल में एथेंस का भी यही हाल था. ऐसे समाज में जहां प्रत्येक आदमी खुद को ‘मुखिया’ समझता हो, वहां नागरिकों को व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता के प्रचार द्वारा प्रेरित किया जा सकता था. उसके लिए प्लेटो की सारी उम्मीद दार्शनिक सम्राट पर टिकी थी. उसका मानना था कि दार्शनिक सम्राट किसी भी प्रकार के लालच से परे, परमबुद्धिमान, व्यवहारकुशल, परम-प्रज्ञावान, वीर, तेजस्वी और परिश्रमी होंगे. लोग स्वयं उससे प्रेरणा ले सकेंगे. लेकिन महामानव की खोज आसान नहीं थी. इस बात को प्लेटो भी समझता था. ऐसी अवस्था में उसने दार्शनिकों के समूह को राज्य की बागडोर सौंपने की अनुशंसा की है. मुश्किल यह है कि केवल विचार के बल पर समाज नहीं चलता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा? प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. न ही उसकी कल्पनाशीलता काम करती है. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन एथेंस की राजनीति से प्रभावित था. एथेंसवासियों को गर्व था कि वे एक विकसित गणतंत्र के संचालक हैं. जबकि असल में वह भीड़तंत्र द्वारा शासित राज्य था. उसमें तीन प्रमुख दोष थे. पहला यह कि राजनीतिक अनुभवहीनता और अपर्याप्त ज्ञान के बावजूद एथेंस का प्रत्येक नागरिक राजनीति में हिस्सा लेता था. उससे गलत फैसले होते थे. सुकरात को मृत्युदंड का निर्णय ऐसा ही अनुचित निर्णय था. उस घटना के बाद प्लेटो का लोकतंत्र से विश्वास उठ-सा गया था. दूसरा दोष यह था कि प्रत्येक नागरिक खुद की निगाह में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था. किसी का किसी में विश्वास न था. हर कोई अपने लिए अधिकतम सुख-सुविधाओं की अपेक्षा रखता था. भ्रष्टाचार और स्वार्थभाव चरम पर था. बिना इसकी चिंता किए कि उनके दुराचरण से राज्य का कितना अहित हो रहा है, एथेंस के नागरिक स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे. प्लेटो के आगे स्पार्टा का उदाहरण था, जहां के नागरिक राज्य को समर्पित थे. इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में राज्य को व्यक्ति से बढ़कर माना है. वह व्यक्ति का राज्य में विलय कर देने जैसा था. तीसरा और महत्त्वपूर्ण यह कि उस समय एथेंस की राजनीति में दो गुट बने हुए थे. उनके अपने-अपने समर्थक थे. दोनों हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर लगे रहते थे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो विभिन्न प्रतिद्विंद्वी समूहों को राज्य के प्रति समर्पित होने को कहता है. उसके अनुसार राज्य किसी एक व्यक्ति, समूह या वर्ग का नहीं होता—‘उसपर सभी वर्गों का समानाधिकार है. इसलिए प्रत्येक वर्ग का यह स्वयंसिद्ध कर्तव्य है कि वह राज्य की अखंडता तथा बल-वैभव को बनाए रखने के लिए समर्पित भाव के साथ काम करे.’ दार्शनिक सम्राट की अवधारणा भी प्लेटो का पूर्वाग्रह था. राजनीति को अनुभवहीन लोगों के हाथों से निकालकर परिपक्व हाथों को समर्पित करने की कोशिश. परंतु उसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल की टिप्पणी है—

‘उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब, जब सामना करीब-करीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चित रूप से, न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’9

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतार-चढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कवि-हृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्ति-सापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुख-सुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौन-सा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरित-प्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो—जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देकर उसे लोकोन्मुखी बनाती हों. समाज का हित है कि ऐसी पसंदों को प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान तथा कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इस तरह इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानव-स्वभाव से निरपेक्ष नहीं होता. प्लेटो का विश्वास था कि उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी. फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालन-पोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं भी अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. जबकि दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. इसी तरह भारतीय राष्ट्रवादी का सामान्य सोच होगा कि भारत दुनिया में अन्य सभी देशों में अग्रणी हो. अतिश्रद्धालु व्यक्ति अपने धर्म को पूरी दुनिया पर छाये हुए देखना चाहेगा. जबकि मानवतावादी सपना होगा कि विश्व के सभी देश बराबर हों. किसी का किसी पर अधिकार न हो. लोग अपने-अपने विश्वास, मान्यताओं और परंपरा के साथ सुरक्षित रहें. सुख में सभी की समान साझेदारी हो. ऐसे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले मनुष्य समाज में एक साथ होंगे तो उनके मतभेद उभरकर सामने आएंगे ही. फिर उनके बीच तालमेल कैसे संभव है? कैसे उन सभी की रचनात्मक क्षमताओं का इस्तेमाल समाज-हित में किया जाए? यह चुनौती प्लेटो के समय में थी. आज भी है. निजी स्वार्थ एवं मतभेदों के कारण वह एथेंस के गणतंत्र की दुर्दशा को देख चुका था. उसका मानना था कि व्यक्तिगत मतभेदों का समाहाहर केवल आदर्श समाज में संभव है. आदर्श समाज से उसका आशय था, ऐसा समाज जहां सभी को अपने-अपने कर्तव्य का एहसास हो और सभी उसके प्रति समर्पित होकर काम करें. बदले में राज्य बिना किसी पक्षपात के सभी को जीवनयापन के आवश्यक संसाधन उपलब्घ कराने की जिम्मेदारी ले.

अहं संवेदनाओं को कुचलता आया है. अहं के टकराव की समस्या प्लेटो के समय में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्ति-विशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनिया-भर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति, जो केवल किसी खास देश, धर्म अथवा संस्कृति को सबसे आगे निकलते देखने की इच्छा रखता है, पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. उसके बावजूद नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इस संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना उसी कोटि की है. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना अथवा उसे निरंकुश राज्य का समर्थक मानना—सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो बुद्ध ने न केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना था. जबकि श्रमण परंपरा को छोड़कर बुद्ध से पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन उन्हीं विषयों पर केंद्रित था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिक-सामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथों-हाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे. बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत समानता पर जोर देता था. उनके प्रभाव के चलते समाज में जातीय वैमनस्य में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष भी घटा था.

प्लेटो के अनुसार इच्छाओं का पूर्ण सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय संभव नहीं है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर विशेष झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. इसके लिए व्यक्ति में नैतिक साहस का होना जरूरी है. जहां नैतिक सहमति-असहमति आसान न हो, वहां बल-प्रयोग की संभावना बनी ही रहती है. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स जब यह कहता है कि ‘न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है,’ उस समय वह सुकरात सहित उन सभी साथियों से असहमति दर्शा रहा होता है, जो उसके मत के विरोध में हैं. न्याय को सबल का एकाधिकार कहने वाला थ्रेचाइमच्स अकेला व्यक्ति नहीं था. उसका मत न केवल सोफिस्ट विचारकों से प्रेरित था, बल्कि जनसाधारण के सामान्य सोच का भी प्रतिनिधित्व करता है. दुनिया में लगभग नब्बे प्रतिशत लोग आस्थावादी हैं. हर श्रद्धालु मानता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वही सच्चा न्यायकर्ता भी है. भारत में धर्म को, जिसका पूरा कारोबार ईश्वर और डर पर टिका है, न्याय के रूप में थोपा जाता रहा है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति दूसरों पर शासन करने का सपना देखता है; या अधिकांश लोग शासित होने को अपनी नियति माने रहते हैं. सच तो यह है कि सुख की कामना प्रत्येक व्यक्ति को होती है. सुख और सुरक्षा पर खतरा उसे प्रतिरोध के लिए उकसाता है. समाज को अंतर्द्वंद्वों और अनावश्यक विक्षोभों से बचाने के लिए आवश्यक है कि नागरिकों के बीच असमानता का स्तर न्यूनतम हो. उनमें यह भरोसा बना रहे कि राज्य न्याय के समर्थन और सुरक्षा में खड़ा है. इसलिए बात जब आदर्श समाज की होगी, तो लोकहित से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की मांग भी उठेगी. सच यह भी है कि अधिकांश समाज न्याय की वस्तुनिष्ठ समीक्षा और उसकी व्याप्ति की ओर से उदासीन रहते हैं. सरकारें सत्ताधारी वर्ग के जो संख्या में अल्प हैं, हित साधने में लगी रहती हैं. इस कारण ‘न्याय’ की वस्तुनिष्ठ समीक्षा, उसकी संकल्पना पर गंभीर विमर्श संभव नहीं हो पाता. कारण यह भी है कि अधिकांश लोग न्याय के वृहत्तर संदर्भों से अपरिचित होते हैं. वे उसे किसी अदालती ‘फैसले’ के रूप में लेते हैं, जिसमें दो पक्षों के बीच तीसरा पक्ष जो घटना से पूरी तरह अनजान है, निर्णायक पक्ष की भूमिका निभाता है. तीसरा पक्ष हालांकि राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. इसने भी न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. बहस को प्रभावित करने के बजाय वह केवल दर्शक के रूप में मौजूद है. वह देखता है कि सुकरात जैसे विद्वान की उपस्थिति के बावजूद बहस के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है.

फिर विमर्श का समापन कहां पर हो? ‘आदर्श पसंदों’ का विचार इसी की परिणति था. ‘आदर्श पसंदों’ से उसका अभिप्राय ऐसी पसंदों से था, जिनकी अधिकांश लोग कामना करते हों. परोक्ष रूप में यह भी बहुमत की दादागिरी हुई, जिसे न्याय की दृष्टि से निरापद नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र को ‘बहुमत की दादागिरी’ बताकर प्रायः उसकी आलोचना की जाती है. दादागिरी या निरंकुश आचरण किसी का भी हो सकता है. राजशाही में अकसर उस व्यक्ति की दावेदारी चलती थी, जिसके हाथों में राजमुद्रा हो. धर्म को लोककल्याणकारी बताया जाता है. परंतु वह भक्त और भगवान दोनों की अतियों पर निर्भर करता है. भक्त समर्पण की उच्चतम सीमा तक समर्पित होता है. ईश्वर उच्चतम सीमा तक निरंकुश और तानाशाह, परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर हुए धत्त्कर्म को जीवन के आदर्श की तरह थोपा जाता है. एक प्रकार से यह भी अति ही है. व्यावहारिक सोच यही है कि चयन जब ‘बहुमत की दादागिरी’ और ‘अल्पमत की दादागिरी’ के बीच हो तो न्याय को पहले के पक्ष में झुके हुए नजर आना चाहिए. आदर्शवादी प्लेटो को इस तरह का व्यावहारिक चलन नापसंद था. उसके अनुसार न्याय के लिए कोई बीच का रास्ता नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसके सामने अपने आदर्श नगर-राज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. लोकतंत्र की विकृतियों को वह देख-समझ सका था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

क्या न्याय को धर्म के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है? जो समाज ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर न्याय करने का दावा करते हैं, क्या उनकी वैचारिकी को आदर्श समाज की वैचारिकी के बराबर माना जा सकता है? प्लेटो इसपर विचार नहीं करता. एक सपाट-सी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. इससे समस्या सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. सब जानते हैं कि ईश्वर अपनी इच्छा के बारे में किसी से भी संवाद नहीं करता. उसका अपना अस्तित्व ही संद्धिग्ध है. वह अपने भक्तों के विश्वास से परे, जिसे वे अपना धर्म मानते हैं, कुछ भी नहीं है. बावजूद इसके धर्माचार्य दावा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो कथित ईश्वरेच्छा को अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. उनके अनुसार ईश्वर परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा भी रास्ता है, जिससे कथित ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? दूसरे जिसे ईश्वरेच्छा होने का दावा किया जाता है, उसके प्रमाणन का सही रास्ता क्या हो? कैसे तय किया जाए कि जिसे ईश्वरेच्छा बताया जा रहा है, वही श्रेष्ठतम विकल्प है. चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है. ईश्वरेच्छा अपने आप में अप्रामाणिक है. इसलिए उसके अनुयायी उसे आस्था का विषय बनाकर पेश करते हैं. सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहòाब्दियों से रचता आ रहा है. हो सकता है धर्मानुशासन से समाज का थोड़ा-बहुत भला होता हो. परंतु उसके माध्यम से होने वाला नुकसान उससे कहीं अधिक होता है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्ति-सापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ का प्रमुख लक्षण है, परंतु ‘सफेद’ कह देने-भर से वर्फ का बोध नहीं होता. बगुले का रंग भी सफेद होता है. यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिक-सामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है. सुकरातकालीन एथेंस की तीन लाख की आबादी में लगभग आधी दास और अर्धदास लोगों की थी, जिन्हें सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रखा गया था. प्लेटो की आलोचना का यह बड़ा आधार है. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. लेकिन प्लेटो के चिंतन का दायरा विशद है. उसकी आलोचना की जा सकती है. असहमत भी हुआ जा सकता है. स्वयं प्लेटो ने अपने साथियों के असमति के अधिकार की रक्षा की है. लेकिन उसके चिंतन को नकारा नहीं जा सकता. प्लेटो के दर्शन को लेकर थ्रेचाइमच्स की टिप्पणी सहस्राब्दियों बाद भी प्रासंगिक है. उसका कहना था—‘प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ इतना है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की कल्पना से कितने और कहां तक सहमत हैं? यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है.’

कुल मिलाकर प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता आया है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके माता-पिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालना-पोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला दार्शनिक था, जिसने ऐसे समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

9. The answer is rather humdrum. It will achieve success in wars against roughly equal populations, and it will secure a livelihood for a certain small number of people. It will almost certainly produce no art or science, because of its rigidity.-BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY, page 109.

 

धर्म और अभिजन संस्कृति : तीन

सामान्य

 धर्म : प्रासंगिकता का सवाल

धर्म शानदार प्रलोभन है, जो जनसाधारण का मुंह बंद रखने के काम आता है. यह वह वस्तु है जो गरीब को अमीर की हत्या करने से रोकती है.1 नेपोलियल बोनापार्ट

अभिजन संस्कृति के प्रमुख सूत्रधार धार्मिक अभिजन के उदय के बारे में चर्चा हमने इस लेख के आरंभिक हिस्से में की. हमने सामाजिक स्तरीकरण के क्षेत्र में धर्म की भूमिका को जाना. यह समझने की कोशिश की कि धर्म किस प्रकार समाज की अभिजन मानसिकता का विकास करने, उसे बनाए रखने तथा शेष समाज में उसके प्रति सहानुभूति पैदा करने का काम करता है. हमने यह भी देखा कि धर्म अभिजन समाज की वर्चस्वकारी नीतियों का न केवल अंधसमर्थन करता है, बल्कि समाज में उन्हें बनाए रखने, स्थायित्व देने तथा उनके माध्यम से समाज के बड़े वर्ग को सत्ता एवं संसाधनों से वंचित कर देने का खेल भी खेलता है. आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण के लिए जिम्मेदार इस खेल में धर्म की सीधे भूमिका यदि न हो, तो भी उसके नाम पर यह कौतुक प्रायः चलता जाता है. आखिर धर्म को यह ताकत कहां से मिलती कहां से है? जिस जिज्ञासा तत्व को विवेकवान मनुष्य का लक्षण कहा जाता है, वह धर्म और आस्था के नाम पर एकाएक निस्तेज कैसे हो जाता है? हमने देखा कि धर्म गाहेबगाहे मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता को दबाने का काम करता है. उसकी कोशिश मनुष्य को ज्ञान की समकालीन धाराओं से काटकर भीड़ में ढाल देने की होती है. इसके बावजूद उसकी लोकप्रियता अक्षुण्ण बनी रहती है. यह धर्म का जादू ही है कि गरीब हो या अमीरधर्म की डगर को छोड़ना कोई नहीं चाहता. हालांकि इसके कारण अलगअलग हैं. अभिजन धर्म को अपनाने का नाटक करता है, ताकि उसके माध्यम से वह सबकुछ पा सके, जिससे उसका वर्चस्व कायम रहे. साधारणजन के पास सिवाय धर्म के दूसरा कोई रास्ता, कोई विकल्प नहीं होता. इसलिए वह अपने इस जन्म के सपनों को अगले जन्म में सूद सहित लौटने के भ्रम में पुजारी के यहां गिरवी रख देता है. यदि कोई ऐसा न करना चाहे, इससे बाहर निकलना भी चाहे तो यह संभव नहीं. क्योंकि परिवार से लेकर समाज तक धर्म की व्याप्ति इतनी गहरी और विविधतापूर्ण है कि किसी न किसी अवसर पर धार्मिक मूल्यों, कर्मकांडों के साथ दिखना उसकी मजबूरी बन जाता है.

धर्म की सत्ता बहुमान्य भले हो, निर्विवाद कभी नहीं रही. तमाम लोकप्रियता एवं बहुस्वीकार्यता के बावजूद उसके आलोचक हमेशा, प्रत्येक युग में रहे हैं. आलोचना का सिलसिला वेदों के जमाने से चला आ रहा है. आजीवक, चार्वाक और लोकायतियों की विचारधारा में भले अंतर हो, ईश्वरीय सत्ता के बहाने निरर्थक वितंडा, धर्म के नाम पर व्याप्त टोटमवाद तथा कर्मकांड के सहारे फलतेफूलते पाखंड के वे सभी समान विरोधी थे. चार्वाकों ने तो वैदिक कर्मकांड की जमकर खिल्ली उड़ाई थी. परिपक्व बौद्धिकता एवं आत्मविश्वास का परिचय देते हुए उन्होंने मौलिक दर्शन की अभिकल्पना की. चार्वाक दर्शन को भारतीय षड्दर्शन के साथसाथ विश्वभर के भौतिकवादी दर्शनों में शीर्ष स्थान प्राप्त है. उसकी लोकप्रियता रही है. आस्तिक विचारधारा के समर्थकों में भी समयसमय पर ऐसे व्यक्ति उभरे जिन्होंने धर्म की आलोचना का जोखिम उठाया. विरोध सहा, नुकसान भी झेले. फिर लगातार संघर्ष के बल पर सफलता भी प्राप्त की. सच यह भी है कि पश्चिम के मुकाबले भारत में धर्म के सार्थक विरोध अथवा उसके विकल्प की तलाश के उदाहरण कम ही रहे हैं. पश्चिम में धार्मिक आडंबरवाद का विरोध करते हुए सुकरात ने जहर का प्याला पिया. ब्रूनों को जिंदा जला दिया गया. मूर को मृत्युदंड की सजा मिली. वाल्तेयर ने ईश्वर को ‘बंद घेरा’ कहा तो चरमपंथी उनसे नाराज हो गए. ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, मगर वह हर जगह बेड़ियों में है’ कहकर मनुष्य की धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता का पक्ष लेने वाले रूसो को जीवन के कई महत्त्वपूर्ण दिन कारावास में बिताने पड़े. धर्म के