लखनऊ : तहजीब-पसंदों का जिंदादिल शहर

यात्रा संस्मरण

दिल्ली-लखनऊ राजधानी का सफर. गाड़ी अपनी तेजी से भाग रही है. रात्रि-भर का सफर पूरा कर पड़ाव पर पहुंचने को उत्सुक. करीब डेढ़ घंटे बाद अपने गंतव्य पर होगी. करीब सवा सौ किलोमीटर का सफर बाकी. अंधियारा छंटने के साथ साथ ही हरियाले खेत और पेड़-पौधे नजर आने लगे हैं. सभी तेजी से पीछे की ओर भागते; या भागने का एहसास कराते हुए. धरती का हरियालापन ही वह गुण है जिससे यह देश दुनिया-भर में जाना जाता है. इससे आकर्षित होकर न जाने कितने हमलावर इस धरा की ओर आकर्पित हुए और जाति-धर्म के आधार पर बुरी तरह बंटे, अलसाए यहां के बाशिंदों को रौंदकर अपना प्रभुत्व स्थापित किया. आए लूटने के लिए थे लेकिन यहां कि उर्वरा धरती, हरी-भरी वादियां, नदियांे और तालाबों से अभिसिंचित धरा उन्हें इतनी पसंद आई कि यहीं के होकर रह गए. आर्यों से लेकर अंग्रेजों तक—यह देश सबका बना. यह भारत में नहीं दुनिया-भर के अनेक देशों में हुआ. जिन देशों की धरती उर्वरा थी, मगर नागरिक अनपढ़ या बंटे हुए, वहां यह लगभग स्थायी रूप में शताब्दियों तक कायम रहा. धरती का उर्वरा-सामर्थ्य और खनिज संपदा भी औपनिवेशीकरण का कारण बन सकती है, यह यूरोपीय देशों में औद्योगिकीकरण की सफलता के बाद पूरी दुनिया ने देखा. फिर भी अनेक देश खुद को पराधीनता से जल्दी ही मुक्त कराने में सफल हुए. लेकिन जाति-प्रथा के आधार पर बुरी तरह बंटा भारतीय समाज, कभी इसकी तो कभी उसकी अधीनता में जाता रहा.

अभी-अभी कोई छोटा-सा स्टेशन गुजरा है. नाम पढ़ नहीं पाया. पटरियों के बराबर आते-जाते लोग बता रहे हैं कि अपने शहर से चार सौ किलोमीटर दूर आ जाने पर भी बहुत-कुछ बदला नहीं है. और बदले भी क्यों? शहर के मुट्टी-भर बाशिंदों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश की रोजी-रोटी इस धरती की कोख से फलती है. यहां मुट्ठी-भर शहरियों से आशय उन चार-पांच प्रतिशत लोगों से है जो तीन-चार पीढ़ियों से शहर में रह रहे हैं और गांव से नाता टूटा हुआ है. वरना हम जैसों के जीवन का दो तिहाई हिस्सा शहर में बीतने के बावजूद मन में गांव ही बसता है. जहां आय का मुख्य साधन खेती है. मन हल-बैल, खेत-खलिहान और नदी-तालाब में बसता है. जब वही लोकगीत, वही हल-बैल, वही समस्याएं और वैसे ही एक समान सपने होंगे तो व्यवहार की समानता भी रहेगी ही.

मध्य रात्रि से उजाला होने तक अधिकांश समय अंधेरे में कटा. ट्रैन भागती रही और यात्री स्वयं को गाड़ी-हवाले कर वक्त गुजार देने की कोशिश में ऊंघने लगे. पहले सफर काटने का मुख्य जरिया पुस्तकें हुआ करती थीं. आजकल मोबाइल हैं. अधिकांश लोग मोबाइल पर व्यस्त हैं. पुस्तकें मनुष्य के बोध को समुन्नत करती थीं. मोबाइल पर जो साधन हैं, वे मनुष्य के स्वतंत्र चयन के अधिकार में हस्तक्षेप करने को उत्सुक रहते हैं. एक अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा मनुष्य कब विज्ञापन की भाषा बोलने लगता है, यह क्रिकेट का खेल देखनेवालों की आपसी बातचीत को सुन-देखकर समझा जा सकता है, जो मैच के स्कोर के साथ मोबाइल की खूबियां, उसमें प्रयुक्त तकनीक के कमाल पर भी लगतार चर्चा करते जाते हैं. ‘अपनी कमीज को पड़ोसी की कमीज से ज्यादा सफेद’ दिखाने की प्रतियोगिता ‘अपने मोबाइल को दूसरे के मोबाइल से ज्यादा एडवांस’ सिद्ध करने की प्रतियोगिता में ढल चुकी है. बहरहाल सफर में जो लोग निश्चिंत मन थे, उन्होंने रेलगाड़ी छूटने के थोड़ी देर बाद ही खुद को नींद के हवाले कर दिया था. बराबर से आती खर्राटों की तेज आवाज एकाग्रता भंग कर रही है. मैं उससे सहज हो लेना चाहता हूं. आखिर खर्राटे भी लोगों की सेहत तथा उनके मनोविज्ञान को समझने का एक जरिया है.

 मैं सोचता हूं. ये राजधानियां रात में ही क्यों चलती हैं? क्यों अपना अधिकांश सफर अंधियारे में पूरा करने का मन बनाए रहती हैं? इसके लिए यदि यह जान लिया जाए कि कौन लोग हैं जो इन गाड़ियों में सफर करते हैं, तो उत्तर समझना एकदम आसान हो जाएगा. तब हम इस देश के अभिजात की मानसिकता को भली-भांति परख सकेंगे. सरकारी खर्चे पर आने-जाने वालों के अलावा राजधानियों में प्रायः वही लोग सफर करते हैं, जिनका वास्ता एक राजधानी से दूसरी राजधानी या एक मुख्य शहर से दूसरे मुख्य शहर से होता है. यानी जो विभिन्न शक्ति-केंद्रों के बीत आते-जाते हैं. ये शक्ति-केंद्र धार्मिक अथवा राजनीतिक सत्ता के केंद्र हो सकते हैं. राजधानियों के चरित्र में खास अंतर नहीं होता. कुछ सांस्कृतिक विशेषताओं और इस तथ्य को कि राजधानियों में वे लोग रहते हैं, जितना काम शासन-प्रशासन चलाना होता है, जो इस देश के लिए नीतियां बनाते हैं—को यदि भुला दिया जाए तो एक वर्ग और भी राजधानी में रहता है. वही असल में संस्कृति से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था सभी का संचालक होता है. राजधानियों में सफर करनेवाले लोग या तो इस वर्ग के सीधे सदस्य होते हैं, अथवा किसी न किसी प्रकार उससे जुड़े, लाभान्वित होने वाले लोग. तो जो वर्ग अर्थव्यवस्था का वास्तविक संचालक होता है, वह नहीं चाहता कि उससे जुड़े लोगों के अपने देश और देशवासियों से, यहां की मिट्टी, उसकी उर्वरा शक्ति से किसी प्रकार के संबंध बनें. यदि संबंध पीछे से चले आए हैं तो यह वर्ग चाहता है कि उसके निकट आने से पहले कर्मचारी अपने अतीत को बिसरा दें. अपने अतीत को साथ लेकर चलनेवाले, विगत से अपनापा रखनेवाले लोग इसके लिए किसी काम के नहीं होते. ‘सर्वधर्मान परितत्यं मामेकं शरणं ब्रजः—कहकर भक्त को आमंत्रित करने वाले ईश्वर की तरह यह वर्ग भी चाहता है कि लोग उसे अपना भगवान मानें और इसके पास आने से पहले लोग अपनी संस्कृति और अतीत को बिसराकर मुनाफे की उस आचार संहिता को अपना लें, जिसमें पूंजीपति का लाभ ही मूल-मंत्र होता है. परिणामस्वरूप कर्मचारी के विवेक का आकलन उसके प्रयासों के सामाजिक लाभों से नहीं, बल्कि मालिक के मुनाफे की कसौटी द्वारा तय किया जाता है.

अंधेरे का सफर ‘सबकुछ छोड़कर आने में मददगार बनता है. चूंकि यह वर्ग बेहद महत्त्वाकांक्षी भी होता है इसलिए अपनी प्रसार-नीति के तहत इसे भूमि और दूसरे संसाधनों यानी पानी, सस्ता श्रम, धातु-अयस्क आदि की जरूरत भी पड़ती है. जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजी-स्वामी स्वयं कभी आगे नहीं आता. सरकार और समाज के प्रत्येक फैसले से वह पूर्णतः निर्लिप्त दिखाई पड़ता है. लेकिन पर्दे के पीछे का असली कर्ता-धर्ता वही होता है. अपनी योजनाओं को वह खरीदे गए राजनेताओं, बुद्धिजीवियांे, कर्मचारियों आदि के जरिए बनाता है. अब यदि आदमी उजाले में सफर करेगा तो वह रास्तों में पड़नेवाले जीवन की धड़कन को महसूस करेगा. उसकी भाव-प्रवणता संसाधनों के अधिग्रहण के समय पूंजीपति के हितों के विपरीत जा सकती है. कुछ धर्मों में मांस खाने की इजाजत इस शर्त पर दी जाती है कि जानवर की गर्दन एक झटके में कलम कर दी जाए. मनुष्य इस काम को यदि धीरे-धीरे, ज्यादा सोच-विचार कर करेगा तो निरीह जानवर की आंखों में समायी मौत उसको विचलित कर सकती है. दूसरे इससे जानवर को पीड़ा भी कम होती है. ‘राजधानी’ का सफर असल में ‘झटके’ का सफर है. आदमी को अपने आसपास को जानने-समझने का अवसर ही नहीं देता. इसलिए ‘राजधानी’ कही जानेवाली गाड़ियां इस देश के जीवन को समझने, सांस्कृतिक विविधताओं के आदान-प्रदान का वाहक बनने से ज्यादा व्यावसायिक उद्यम का हिस्सा बन जाती हैं. ‘राजधानियों’ के यात्रियों की आत्ममुग्धता, अपने आप में लिप्त रहने की कलाकारी, जिसमें तकनीक उनकी मददगार बनती है—से भी इसे समझा जा सकता है.

शहर की आहट आने लगी है. शुरुआत बागों से होती है. लखनऊ नवाबों की नगरी है. बाग उनके लिए आय और ताजा फल उपलब्ध कराने का माध्यम थे. इन बागों के रसीले फल जब बादशाह और उनकी बेगमों के हरम तक पहुंचते होंगे तो फलों की मिठास से अधिक खुशी उन्हें चापलूसी की मिठास में मिलती होगी. इसी से उन्हें और उनकी मनमानियों को अभयदान मिल जाता होगा. यही बाग नवाबों और जमींदारों की ऐशगाह भी रहें होंगे. जहां ऊंची से ऊंची चीख दम तोड़ लेती होगी. दिल्ली और उसके उपनगरों में ऐसे बाग नहीं दिखते. विकास की आंधी और आंतरिक उपनिवेशीकरण की पूंजीवादी जिद के कारण वे कभी का उजड़ चुके हैं. लखनऊ वाले अपनी पुरानी तहजीब के साथ इन बागों पर भी गर्व कर सकते हैं. पर ज्यादा दिनों तक नहीं…

बाग के किनारे-किनारे कुछ झाड़ियां दिखीं. फूलों से लदी हुईं. वसंत की आहट सुन मदन-रस से आतृप्त. बागवान को छोड़कर वे मनुष्य के लिए किसी काम की नहीं. फलदार वृक्षों से बचे खाद-पानी पर ये वैसे ही जिंदा रहती हैं, जैसे शहर में जूठन खाकर सड़क-छाप बच्चे, जिनपर कथित सभ्य लोग ‘आवारा’ का टैग चिपकाए रखते हैं. इन झाड़ियों के फूल भी उन ‘आवारा’ बच्चों की मुस्कान की भांति हैं, जिन्हें यह महानगर कभी अपना नहीं मानता. हालांकि वे उसके वजूद का अभिन्न हिस्सा होते हैं. जैसे वे ‘आवारा’ शहरवासियों के कचरे की सफाई कर उनकी बीमारियों को अपने ऊपर झेलते रहते हैं, उसी प्रकार ये झाड़ियां बाग में आने वाले हर अनावश्यक जीव को उससे दूर रखती हैं. कुपित पशुओं के सींग के वार अपने सीने पर सहती हैं. लेकिन बाग के पेड़ों की चर्चा के दौरान इन झाड़ियों को कहीं नहीं गिना जाता. आने वालों की उपेक्षा दृष्टि सहना ही इनकी नियति है.

लखनऊ के बारे में कहा जाता है कि इसे राम के भाई लक्ष्मण ने बसाया था. लेकिन रामायण के लक्ष्मण का भ्रातृ प्रेम तो दुनिया-भर में मशहूर है. न जाने कितनी कहानियां और गाथाएं उसके ऊपर लिखी गई हैं. बार-बार दावा किया जाता है कि लक्ष्मण अपने अस्तित्व की खोज के लिए भी राम की ओर देखने लगते थे. ऐसा भ्रातृ-वत्सल व्यक्ति अपने नाम से स्वतंत्र नगर बसाता? उन्हें यदि नगर बसाना ही होता तो उसका नाम ‘रामपुर’, ‘रामदुर्ग’ या ‘रामगढ़’ जैसा कोई नाम देते. तो क्या बड़े भाई को अयोध्या का सुख भोगते देख छोटे भाई का मन भी सत्ता-सुख के लिए ललचाने लगा था! सिवाय किंवदंतियों के लिए लखनऊ को ‘लक्ष्मणपुर’, ‘लाखनपुर’ अथवा ‘लखनावती’ से जोड़ने का कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है. यदि ध्वनि-साम्य के आधार पर नगर के इतिहास को खोजने की जिद हो तो लखनऊ को लवणासुर या ऐसे ही किसी मिलते-जुलते राक्षस-राज के नाम से भी जोड़ सकते हैं. परंतु ऐसा हो नहीं पाता. इससे विजेता संस्कृति की इतिहास की समझ का भी अंदाजा होता है. जो न केवल इतिहास के महत्त्व को समझती है, बल्कि उसका अपने हित में प्रयोग करना भी जानती है. इतिहास में बने रहने के लिए वह उसमें आवश्यक दखल भी देती है. विजेता संस्कृति के स्वार्थ विजेता पक्ष के लक्ष्मण से जुड़े थे, लवणासुर से नहीं. आज वही संस्कृतियां जीवित हैं, जिन्होंने अपने इतिहासबोध को बनाए रखा, बल्कि आवश्यकतानुसार उसको अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ा भी.

भारतियों में इतिहास दृष्टि का अभाव रहा है. इसके समानांतर उनकी धर्म-दृष्टि प्रबल थी. कुछ कम या ज्यादा, प्रत्येक धर्म अपने मूल में सामंती संस्कार लिए होता है, इसलिए यहां का समाज ऊंच-नीच के अनेक खानों में बंटता चला गया. बाद में जब समाजों में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ, तो धार्मिक चेतना के प्रभाव में बुरी तरह से बंट चुके समाज, राजनीतिक रास्ता का शिकार होते चले गए. चूंकि राजनीति शासन की भाषा बोलती है, वह लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार सोचने के लिए विवश कर सकती है, इसलिए धार्मिक चेतना के आधार पर संचालित लोगों को अपनी दासता में ढालते चले गए. इस कोशिश के चलते कभी शहर को रामायण से जोड़ा गया तो सत्ता परिवर्तन के साथ ही शहर का नाम बदलकर तत्कालीन शासकों की भाषा और रुचि के अनुकूल ढलता गया. कह सकते हैं कि कथित ‘लक्षमणपुर’ का ‘लखनऊ’ बनना ऐतिहासिक घटना न होकर, सांस्कृतिक त्रासदी है.

‘राजधानी’ यानी ‘निशाचारी’ रेलगाड़ियों की एक विशेषता यह भी है कि वे समय से चलती हैं. इसलिए गाड़ी ने जब लखनऊ स्टेशन से गलबहियां की तो आठ बजने में कुछ मिनट बाकी थे. बाहर निकले तो धूप कुछ ज्यादा ही चमकीली थी. संभव है यह केवल मेरी भ्रांति रही हो. राजधानी दिल्ली के उपनगरों की त्रासदी, जिनके लिए चटकीली धूप, शुद्ध हवा और स्वच्छ पानी बीते जमाने की बात हो चुकी है. प्रदूषण के मामले में लखनऊ देश की राजधानी और उसके उपनगरों के मुकाबले काफी पीछे है. दूसरा कारण शायद यह कि आपने यदि रात की स्याही को नजदीकी से भोगा हो तो दिन का उजियारा कुछ ज्यादा ही जादुई दिखाई पड़ता है. उस क्षण मुझे दूसरी बात ही सही लग रही थी. मेरे सहयात्री जहां भारी-भरकम खर्राटे लेने में मशरूफ थे, मैं अंधेरे में आंख बंद करके लेटा रहा था. ताकि अपने भीतर कुछ झांक सकूं. रात-भर जागने के कारण सुबह की धूप कुछ ज्यादा ही ताजा, कुछ ज्यादा ही ऊर्जावंत दिख रही थी. अपने मातृ प्रदेश की राजधानी में प्रवेश करते समय मैं जिस एहसास को अपने भीतर उभरते देखना चाहता था, ठीक वैसी ही अनुभूति मुझे हो रही थी.

जिस होटल में ठहराने की व्यवस्था की गई थी, वह स्टेशन के काफी करीब था. टहलते हुए वहां तक पहुंचा जा सकता था. पहुंचा भी. परंतु मन लखनऊ की सुबह की पड़ताल करने का था, सो जानबूझकर भीड़ का रास्ता चुना. लखनऊ की चिकन के अलावा जो चीज सर्वाधिक प्रसिद्ध है, वह है वहां की रेबड़ियां. सो जिधर से गुजरा उसके दोनों और रेबड़ियों और तिलगड्डों की दुकानें थीं. आवश्यकता न केवल अपना रास्ता स्वयं चुनती है, बल्कि दूसरों को भी उस रास्ते की ओर आने के लिए आमंत्रित करती है. लखनऊ यात्रा से लौटनेवाले लोगों को यादगार के तौर पर परिवार के लिए वहां की रेबड़ियां लेने का मन हो सकता है. इसी जरूरत ने उस बाजार को जन्म दिया था. रेबड़ियों की दुकानों के बीच-बीच में कुछ ठेले बिरयानी और नाश्ते की चीजों से लदे थे. वहां मजदूर, रिक्शाचालक किस्म के लोग गपशप करते हुए दिखाई पड़े. दिन भर की भागम-भाग और कमर-तोड़ स्पर्धा के बीच आदमियत के एहसास को बचाए रखने का यही समय होता है. जब वे लोग खुल कर हंस सकते हैं. अपने पलों को अपनी तरह जी सकते हैं. बाकी समय तो उन्हें मालिक का आदेश ही मानना होता है.

मैं एक चाय लेना चाहता था. होटल एकदम सामने था, फिर भी वहां जाने से पहले मैंने अपनी सुस्ती को अंगूठा दिखाने का फैसला किया. मैंने चायवाले को ‘अच्छी’ चाय बनाने का आग्रह किया. चाय पीकर चला तो निराश था. दरअसल चाय बनाना भी एक हुनर है. जबतक उसमें अपनेपन की गंध न हो, तब तक वह जुबान नहीं चढ़ती. चाय बेचने वाले के लिए चाय बनाना एक व्यवसाय है. और व्यवसाय मालिक के मुनाफे पर चलता है, जो अपनेपन की गंध के नाम पर अपने मुनाफे को कम नहीं करना चाहता. अब आप शायद उस गरीब चायवाले की व्यावसायिक दृष्टि को दोष देने लगें. लेकिन श्रीमान, उस गुमटी पर आठ रुपये की चाय पीकर जो निराशा हासिल हुई वैसी ही निराशा होटल की चाय पीने के बाद महसूस हुई जो शायद अस्सी रुपये या उससे भी महंगी थी. होटल की चाय इसलिए भी ज्यादा बेस्वाद नहीं लगी, क्यों की उसकी कीमत का भुगतान मुझे नहीं, संस्थान को करना था.

होटल खासा बड़ा था. घोषित रूप से ‘तीन तारे’ वाला. ‘स्वागत कक्ष’ पर नाम-पता आदि लिख देने के साथ ही मुझे ख्याल आया, उन लेखक बंधुओं से मिल लेने का, जिन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी प्रतिष्ठान ने बालसाहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित करने का फैसला किया था. इसलिए होटल पहुंच चुके साहित्यकारों के बारे में जाते ही पता चल गया. उनमें राजीव सक्सेना हमारे ही गृह जनपद में अधिकारी हैं. आदमी की आम कमजोरी. वह अवसर मिलते ही नीड़ की ओर लौटना चाहता है, अथवा उन वस्तुओं और प्राणियों से जुड़ना चाहता है, जो उसको नीड़ से निकटता की अनुभूति कराती हों. इस कमजोरी कोे मेरे बहनोई जंगपाल सिंह लोकोक्ति के माध्यम से स्पष्ट करते हैं. जब भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो, उनका सीधा कटाक्ष होता है—‘घुटने तो पेट को ही पचते हैं.’ यह शब्दों की ताकत है. जिस सत्य को बताने में बड़े-बड़े कलमबाजों को बडे़-बड़े वाक्य अथवा पैराग्राफ खर्च करने पड़ सकते हैं, उसे लोकोक्तियां सूत्र रूप में हमारे सामने ले आती हैं. शब्दों की इस ताकत को अच्छे और बुरे दोनों की किस्म के लोगों ने साधा है. पुरोहितों ने देवताओं का नख-शिख वर्णन को मंत्र का नाम दिया और उसे जादुई ताकत से संपन्न बताकर, लोगों को शताब्दी-दर-शताब्दी उल्लू बनाते रहे. भले ही व्यक्ति उनके भावार्थ से अपरिचित हो. यहां तक कि उन्हें देखा तक न हो और गले में ताबीज की तरह लटकाकर खुश होता हो.
कमरे में पहुंचकर बैग रखा और बगैर नहाए-धोए, शेव किए, राजीव सक्सेन से मिलने चला आया. उन्हीं के साथ साझा करते हुए चाय पी. पहली नजर में वे सहज-सरल इंसान लगे. कभी-कभार आत्ममुग्धता के शिकार भी. पर ऐसी आत्ममुग्धता तो हम सभी ढोते रहते हैं. राजीव विज्ञान की कहानियां लिखते हैं. पता चला कि करीब साढ़े पांच सौ विज्ञान कहानियां वे लिख चुके हैं. वह भी केवल दस वर्ष के विज्ञान लेखन काल में. ये कहानियां कथासम्राट प्रेमचंद की कहानियों की संख्या से लगभग दो गुनी हैं. सम्मान समारोह में उन्होंने अपनी विज्ञान फंतासी का पाठ किया था. मैं ‘विज्ञान कथा’ और ‘विज्ञान फंतासी’ को अलग-अलग करके देखता हूं. जो स्थितियां विज्ञान फंतासी में क्षम्य हो सकती हैं, उनसे विज्ञान कथा में बचा जाना चाहिए—ऐसा मेरा मानना है. बावजूद इसके अधिकांश लेखक ‘विज्ञान फंतासी’ और ‘विज्ञान कथा’ का अंतर नहीं समझ पाते. हालांकि कुछ पत्रिकाएं विज्ञान फंतासी को ‘विज्ञान गल्प’ अवश्य लिखती हैं, बाजवूद इसके तकनीक के स्तर पर दोनों के बीच जो अंतर है, वह कथा-प्रस्तुति के समय कहीं विलीन हो जाता है, परिणामस्वरूप ‘विज्ञान फंतासी’ को ‘विज्ञान कथा’ के रूप प्रस्तुत करने की गलती अकसर होती रहती है.

अच्छी विज्ञान कथा लिखने के लिए लेखक का विज्ञान प्रवीण होना आवश्यक नहीं है. एक साधारण पढ़ा-लिखा लेखक भी बेहतरीन विज्ञान लेखक बन सकता है, बशर्ते उसमें पर्याप्त विज्ञानबोध और इस क्षेत्र में होने वाले नवीनतम अनुसंधानों की सामान्य जानकारी हो. उन्नत तकनीक का वर्णन लेखक के अध्ययनशील और अपने आसपास की घटनाओं के प्रति जागरूक होने का प्रतीक हो सकता है, अच्छी विज्ञान कथा की कसौटी वह भी नहीं है. मेरी राय में अच्छे विज्ञान कथा लेखक की विशेषता उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान के प्रति संदेह भाव और उसकी सूक्ष्म अन्वीक्षण प्रवृत्ति हो सकती है. मैं पीटर अबेलार्ड के इन शब्दों को विज्ञानकथा लेखक के लिए आदर्श मानता हूं—‘संदेह से हम जांच-पड़ताल तक पहुंचते हैं, और जांच-पड़ताल हमें सत्य तक पहुंचाती है.’ दूसरे शब्दों में कहें तो जो आस्थावान हैं, जिसकी आस्था पौराणिक प्रतीकों में है, जिसकी दृष्टि ‘मिथक’ और ‘यथार्थ’ का भेद करने में अक्षम रहती है, वह अच्छा विज्ञान लेखक हो ही सकता. यह मेरी मान्यता है. हिंदी विज्ञान लेखकों की यही कमजोरी है. इसलिए वे आस्था और सत्य में अंतर नहीं कर पाते. चूंकि अधिकांश के लिए आस्था के सवाल ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं तकनीक, कल्पना और आस्था के मिश्रण से ‘चूं-चूं का मुरब्बा’ बनकर रह जाती हैं. उस हालात में वे बाजार का ‘हित-साधन’ तो कर सकती हैं, पाठक का नहीं. इसलिए पूरी विनम्रता के साथ मैं उन्हें साहित्य की श्रेणी से खारिज करना चाहता हूं.

इन्हीं बातों को लेकर होटल लौटने पर राजीव जी से बात हुई थी. अच्छा लगा कि वे संवाद को उत्सुक थे. उस बैठक में सुप्रतिष्ठित बालसाहित्यकार उषा यादव और संस्थान की ओर से सम्मानित होकर लौटीं उनकी लेखिका बेटी कामना सिंह भी थीं. बातचीत के दौर उषा यादव एक श्रेष्ठ श्रोता प्रतीत हो रही थीं, तो कामना सिंह की भूमिका बातचीत में सुधी हिस्सेदार और सजग मध्यस्थ की थी. जब भी बात-चीत में गर्माहट उभरती वे समन्वय की जलधारा से उसकी उष्णता को हर लेतीं. ऐसे अवसरों को सार्थक बनाने के लिए इस तरह के व्यक्तियों की उपस्थिति अत्यावश्यक है. वे प्रतिपक्षी वक्ताओं में धैर्य बनाए रखने, तथा एक-दूसरे के प्रति सौम्य बने रहने के लिए प्रेरित करते रहते हैं. यदि वे न हों तो प्रतिपक्षी वक्ता उठकर जा सकते हैं; और बातचीत का जो ध्येय है वह पीछे छूट सकता है.

आस्था-मंडित लेखकों की दुर्बलता है कि वे भारतीय परंपरा और संस्कृति को लेकर कुछ ज्यादा ही आत्ममुग्ध रहते हैं. जबकि विज्ञान लेखक के लिए इसे में कमजोरी मानता हूं. सृष्टि के उद्भव का प्रश्न जितना दार्शनिक है, उतना ही वैज्ञानिक भी. चूंकि इस सत्य को सीधे-सीधे दिखला पाना संभव नहीं है, इसलिए दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही अपनी बात को समझाने के लिए प्रतीकों और मिथकों का सहारा लेते हैं. मिथक यदि त्रिविमीय हों तो पाठक को तथ्य के बिंबांकन की सुविधा रहती है. ऐसे प्रतीकों का प्रभाव और भी असरकारी होता है. लेकिन रचना में मिथकों और प्रतीकों का योगदान रास्ते किनारे लगे दिशासूचक या मील के पत्थर जैसा होता है जो दूसरी को स्पष्ट करने के लिए नियत स्थान पर गढ़वा दिए जाता है. वे लक्ष्य न होकर केवल उसका संकेतक होते हैं. धार्मिक व्यक्ति चूंकि आस्थामंडित होता है, इसलिए वह मिथकों से आगे बढ़ ही नहीं पाता और उन्हीं को यात्रा मान लेने की चूक अकसर कर बैठता है. ‘शिव लिंग’, अपनी पूंछ को मुंह में दबाए सर्व की चक्राकार आकृति, शिव लिंग के सिर पर फन ताने नागराज असल में मिथक हैं. निराकार शिव ब्रह्मांड के प्रतीक और मिथक दोनों रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं. लेकिन जब कोई शिव का मानवीकरण अथवा दैवीकरण करता है, यह बताता है कि वे धरती पर अवतरित हुए थे और उन्होंने ही इस कोटिक कोटि किलोमीटर में व्याप्त ब्रह्मांड की रचना की थी, तब वह मिथक का वास्तवीकरण करने लगता है. ज्ञानार्जन की राह की यह सबसे बड़ी बाधा है. जनसाधारण के लिए यह उसकी आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन एक विज्ञान कथालेखक जब मिथक को वैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करता है तो मामला बहुत नाजुक हो जाता है. इससे न केवल मौलिक प्रतिभा का हृास होता है, बल्कि एक गलत तथ्य पाठक के समक्ष जाता है, जो जीवन-भर उसके सोच और व्यवहार पर प्रतिगामी असर डालता है. हो सकता है यह मेरा पूर्वाग्रह हो. हो सकता है जो राजीव समझाना चाहते थे, वह मैं न समझ सका हूं, लेकिन उस चर्चा के बाद मैं इस निष्कर्ष पहुंचा था कि यह अत्यंत ऊर्जावंत और बहु-लिख्खागो विज्ञान-कथाकार, मिथकों को ही वास्तविक तथ्य मानने की भूल कर बैठा है. इसलिए उसकी विज्ञान कथाओं में जहां जबरदस्त फंतासी होती है, आधुनिकतम तकनीक और विज्ञान की दुनिया का जिक्र भी किसी न किसी रूप में आता है, वहीं विज्ञानबोध के अभाव में वे कहानियां साहित्यत्व के उस शिखर को नहीं छू पातीं, जो किसी भी साहित्यकार का लक्ष्य होता है. वे एक अच्छे लेखक हैं, लेखक से साहित्यकार बनने की अपनी यात्रा पर आगे बढ़ें, यह मेरी कामना है और अपेक्षा भी.

यह बात भी ध्यान में रखनेवाली है कि ऐसे प्रतीक और मिथक प्रायः सभी संस्कृतियों में रहे हैं. आस्था-मंडित समाज दावा करता है कि एकमात्र उसी का विचार श्रेष्ठतम है. लिंग और योनि को सृष्टि के उद्भव का प्रतीक प्रायः प्रत्येक संस्कृति में माना गया है. तुर्की में गोबेक्ला टेप नामक टीले के उत्खनन के दौरान लगभग आठ हजार वर्ष पुरानी प्रस्तर रचनाएं प्राप्त हुई हैं, जो एक मंदिरनुमा स्थान पर स्थापित हैं. दोनों ही मूर्तियां नग्नावस्था में, आमने-सामने चित्रित की गई हैं, जिसमें पुरुष के जननांग को उत्तेजित अवस्था में, स्त्री की ओर तने दर्शाया गया है. ये मूर्तिशिल्प हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मातृदेवी की प्रतिमा से लगभग तीन हजार वर्ष पुराने हैं. दरअसल जिन दिनों ये मूर्तिशिल्प ढाले गए उन दिनों जीवन बहुत कठिन था. जनसंख्या स्तर बनाए रखना बड़ी चुनौती थी. मनुष्य के लिए आत्मरक्षा का मामला ही इतना बड़ा था कि काम-संबंधों के लिए रुचि और समय का अभाव बना ही रहता था. काम-संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उन्हें संस्कृति का हिस्सा बनाया गया. वसंतोत्सव, अग्नि के चारों और चक्कर लगाते हुए यौनिक संकेत करना जैसी प्रथाएं प्राचीन सभी समाजों में रही हैं. यदि जनजातियों में इस तरह प्रथाएं पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से आज भी विद्यमान हैं तो इसका कारण है कि औद्योगिकीकरण से दूर रहने के कारण उनके लिए जीवन की चुनौतियां आज भी कमोबेश वैसी ही हैं. शिवलिंग के प्रतीक को इसी रूप में देखा जाना चाहिए. न कि उसको ब्रह्मांड की उत्पत्ति का आधार बनाकर अपने विवेक को जड़ बना लेने में कोई श्रेय है.

बहरहाल, हमारी लंबी चर्चा यदा-कदा उत्तेजक मगर शालीन बनी रही. वैसे भी एकाध बार तीखी बात कह देने के बाद मैं सतर्क हो चुका था और खुद को बेहतरीन श्रोता सिद्ध करने में लगा रहा. इसका लाभ भी हुआ, चर्चा के बीच आधुनिक अंग्रेजी साहित्य के बारे में अच्छी जानकारी मिली. जो अन्यत्र दुर्लभ थी. राजीव उन अनेक विज्ञान लेखकों में से हैं जो ‘यूएफओ’ को वास्तविक मानते हैं. जिन्हें भरोसा है कि दूसरे ग्रहों पर अब भी जीवन है. हालांकि बारे में उनकी लेखकीय आस्था चाहे जो कहती हो, वैज्ञानिक प्रामाणिकता अब भी संदेह के घेरे में है. ऐसे तथ्य को जो अभी केवल एक संभावना है, विज्ञान कथाकार संभावना ही माने रहे, यह उनका विज्ञानबोध है. विज्ञान साहित्य में रुचि विज्ञानबोध का प्रतीक भले न हो, लेकिन एक विज्ञान लेखक में विज्ञानबोध का अक्षुण्ण रहना, मौलिकता को बनाए रखना है. बहरहाल, बैठक समाप्त हुई तो हम पहले की तरह सामान्य थे. वैसे ही संबंध अगले दिन भी बने रहे.

राजीव को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से श्रेष्ठ विज्ञान लेखन के लिए पुरस्कृत किया गया था. हमारी चर्चा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली तथा उसे जब-तब दर्शन की ओर मोड़ देने वाली कामना सिंह भी सम्मानित हुई थीं. समारोह की अध्यक्षता संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने की थी. उदय प्रताप जी कवि रह चुके हैं. एक समय में कवि सम्मेलनों और मुशायरों में उनकी उपस्थिति उसकी सफलता की गारंटी मान ली जाती थी. मुझे वे सहृदय और सच्चे इसान लगे, सांप्रदायिकता से कोसों दूर. उनके प्रभाव में संस्थान ने काफी तरक्की की है. कई रुकी हुई योजनाएं फिर से आरंभ हुई हैं. अधिकारीगण उनके रहते संस्थान की गतिविधियों के आगे बढ़ने के प्रति आशान्वित हैं. यही भरोसा था जो जाकिर अली रजनीश उन्हें बालसाहित्यकारों की ओर से एक प्रतिवेदन की तैयारी करने में अभिनंदन समारोह के दौरान भी लगे थे. लेकिन उदय प्रताप सिंह जी को कहीं जाना था. इसलिए उस दिन वह कार्य संपन्न न हो सका. हमने अगले दिन प्रतिवेदन सौंपने का निर्णय लेते हुए, एक-दूसरे से विदा ली थी.

अगला दिन वापसी का था. जाकिर प्रतिवेदन सौंपने की तैयारी में लगे थे. साहित्यकारों को जोड़ते हुए. कार्यालय की ओर से उदयप्रताप सिंह जी के कार्यालय पहुंचने का समय एक बजे बताया गया था. लेकिन यह सोचते हुए कि साहित्यकार बाहर से आए हैं और उनकी रेलगाड़ी का समय हो सकता है, वे आध घंटे पहले ही कार्यालय पहुंच चुके थे. मुलाकात बड़े ही सौहार्दपूर्ण परिवेश में हुई. एक साहित्यकार को जैसा मानवीय होना चाहिए, वैसे ही मानवीय और सहृदय वे सिद्ध थे. मुलाकात के दौरान धार्मिक कठमुल्लापन पर उन्होंने बाइबिल की एक कहानी का जिक्र भी किया. कहानी के अनुसार स्वर्ग से निष्कासित होने के पश्चात आदमी बहुत व्यथित था. अपराधबोध से ग्रसित और डरा-डरा वह परमात्मा के पास पहुंचा—

‘हे ईश्वर, आपसे दूर रहकर मैं कैसे जी पाऊंगा. वहां कौन मेरा मार्गदर्शन करेगा.’
एक आदर्श पिता की भांति परमात्मा ने आदमी की व्यथा को समझा. फिर उसने आदमी से अपनी हथेली आगे करने को कहा. आदमी ने वैसा ही किया. परमात्मा ने उसकी एक हथेली पर सामान्यबोध(कॉमनसेंस) को रखा और अच्छी तरह समझाया—
‘अपनी बुद्धि पर भरोसा करते हुए सभी काम ‘कॉमनसेंस’ से करना. अक्ल का साथ कभी मत छोड़ना.’ आदमी डरा हुआ था. सही मायने में तो वह स्वर्ग से जाना ही नहीं चाहता था. इसलिए उसने आगे कहा—
‘हे प्रभु, मैंने तो सुना है कि धरती बहुत बड़ी है. उसे समझने के लिए मेरा जीवन बहुत छोटा होगा. ऐसे में सामान्य-बोध से कैसे काम चलेगा?’ तब परमात्मा ने उससे दूसरी हथेली भी आगे करने को कहा और इस बार उसकी हथेली पर विश्वास(फेथ) को रखा और कहा—‘जब तुम्हारी बुद्धि कोई काम न करे, तब आस्था और विश्वास से काम चलाना और जो व्यक्ति तुम्हें सर्वाधिक भरोसेमंद दिखे, उसका कहा मानना. जरूरत पड़े तो उपयुक्त समय तक उसका अनुसरण भी करना.’ आदमी खुश होकर धरती की ओर चल दिया. थोड़ी देर पहले जो आदमी बहुत विचलित था, अब वह संतुष्ट नजर आ रहा था—
‘एक तरह से अच्छा ही हुआ. यहां स्वर्ग में तो पूरी तरह से ईश्वर के अधीन था. धरती पर जाने के बाद कम से कम अपने विवेक का इस्तेमाल तो कर सकूंगा. अब मैं स्वतंत्र हूं.’ खुशी के एहसास से वह इतना भर गया कि कब ‘आस्था’ और ‘सामान्य-बोध’ की हथेलियां बदल गईं, उसको पता ही नहीं चला. उस गफलत का दंड यह मिला कि अब वह आस्था और विश्वास को ही सबकुछ मानता है. उसी में मुक्ति की खोज करता है. और अपनी विवेक-बुद्धि का उपयोग बहुत कम अवसरों पर करता है. यही उसकी मुश्किलों की असली वजह है.

बातों-बातों में यह बात भी निकलकर आई कि बच्चों को धर्म की शिक्षा एक अवधि के बाद, उनकी बुद्धि परिपक्व होने के बाद दी जानी चाहिए. यदि प्रदेश सरकार में मुस्लिमों का अभी भी सबसे ज्यादा भरोसा है तो इसके पीछे उदयप्रताप सिंह जैसे साहित्यकारों का उससे जुड़ा होना भी है.

संस्थान द्वारा दिए गए सम्मानों में एक सम्मान ‘कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान’ भी था. मैं बालसाहित्य का अध्येता अपने आप को नहीं मानता. लेकिन जब-तब जितनी भी पुस्तकें आंखों के आगे से गुजरीं हैं, उनमें फड़के साहब के नाम पर नजर नहीं पड़ी. यह मेरी अल्पज्ञता हो सकती है; अथवा हिंदी प्रदेश की अपने दिवंगत बालसाहित्यकारों के जीवन और रचनाकर्म को समेटने के प्रति उदासीनता भी. ऐसे अनेक साहित्यकर्मी रहे होंगे जिन्होंने बालसाहित्य के आरंभिक दौर में इस विधा को समृद्ध किया. इनमें से कुछ लेखक तो शहरों में रहे होंगे और अनेक गांव में भी, जिनका नाम भी आज कोई न जानता हो. यह प्रत्येक समाज का कर्तव्य है कि वह अपने सर्जकों को, जो समाज के नवनिर्माण हेतु निरंतर प्रयासरत हैं और कुछ तो अपने अल्प संसाधनों को भी साहित्य-सेवा की भेंट चढ़ा देते हैं—याद रखे. एक कृतघ्न समाज ही अपने रचनाकारों को अतीत के अंधियारे में विलीन होते देख सकता है. ऐसा समाज स्वयं भी बहुत जल्दी अपने लक्ष्य से भटक जाता है.

कृष्ण विनायक फड़के के बारे में पता चला कि वे कानपुर के थे. बच्चों को पढ़ाते थे. बच्चे भी उन्हें बहुत प्यार करते थे. लेकिन उनके साहित्यिक अवदान, विशेष रूप से समीक्षा के क्षेत्र में उनके मौलिक अवदान पर जानकारी कहीं से भी प्राप्त नहीं हो सकी. बस कुछ छिटपुट संकेत प्राप्त होते हैं. उदाहरण के लिए अपनी पुस्तक ‘भारतीय प्रतिभाएं’ में डॉ. राष्ट्रबंधु, भगवती प्रसाद गुप्त के बारे में बताते हुए लिखते हैं कि गुप्तजी ने ‘बाल आंदोलन के जनक कृष्ण विनायक फड़के की कहानियों, कविताओं के कई संग्रह, ‘फड़के जी के कंपट’, ‘बच्चों का समाजवाद’ आदि पुस्तकें भी प्रकाशित कराईं’(पृष्ठ—180). एक जगह उल्लेख है कि अपनी अंतिम इच्छा के रूप में फड़के जी ने आग्रह किया था कि उनके मृत्योपरांत उनकी शवयात्रा में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी के बालगीत, ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ का गायन-वादन किया जाए. वे मानते थे कि अंतिम समय भी सांप्रदायिक एकता का संदेश दिया जाना चाहिए. अन्यत्र संकेत मिलता है कि फड़के साहब की बालनाटक के क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान था. फड़के जी के ऊपर एक जानकारी ‘शोध-गंगा’ में प्रकाशित एक लेख ‘दि रोड टू दि फाइनल विकट्री(1940—47)’ में भी मिलती है, जिसके अनुसार फड़के साहब मारबाड़ी इंटर कॉलिज, कानपुर के प्रधानाचार्य थे. बड़े ही सिद्धांत निष्ट और बच्चों से हित का ध्यान रखने वाले. एक बार एक टेंडर को लेकर उनकी कालेज प्रबंधन से अनबन हो गई. उन्हें कालेज से सस्पेंड कर दिया गया. कॉलिज के विद्यार्थी फड़के साहब के समर्थन में थे. उन्होंने अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का फैसला किया और 21 अगस्त 1941 को वे बेमियादी हड़ताल पर निकल पड़े. प्रबंधक मंडल ने पुलिस की मदद मांगी. पुलिस ने दबाव डाला. प्रबंधकों की ओर से भी खूब धमकियां मिलीं. अंततः पुलिस ने विद्यार्थियों और स्कूल प्रबंधक मंडल के बीच हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया. इसके फलस्वरूप प्रबंधक मंडल को निलंबन का आदेश वापस लेना पड़ा.

डॉ. राष्ट्रबंधु की पुस्तक और शोध-गंगा के आलेख दोनों मैं, एक ही फड़के साहब का उल्लेख हुआ है, यह मैं दावे के साथ नहीं कह सकता. हालांकि दोनों घटनाएं कानपुर से संबद्ध हैं. उपलब्ध जानकारी से यह अंदाजा नहीं होता कि फड़के साहब का बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में बालकल्याण के लिए लिखे गए छिटपुट आलेखों को छोड़कर, उल्लेखनीय योगदान था. पुरस्कार का नामकरण किसी भी महापुरुष के नाम पर किया जा सकता है. लेकिन जब विधागत पुरस्कार-सम्मानों की घोषणा होती है तो यह अपेक्षा की जाती है कि पुरस्कृत व्यक्ति ने अपने पूर्वपुरुष की परंपरा का निर्वाह और परिष्करण किया है. इस पुरस्कार के संदर्भ में परंपरा ही विलुप्त-प्रायः है. मुख्य अतिथि और संस्थान में पूर्वाधिकारी रह चुके विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’ ने अपने वक्तव्य में बताया कि फड़के साहब का बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में योगदान था, लेकिन बालसाहित्य के अधिकांश विद्वान बालसाहित्य समीक्षा की शुरुआत निरंकार देव सेवक द्वारा हिंदी बालकविता पर लिखे एक आलोचनात्मक लेख से मानते हैं. ऐसे में फड़के साहब का बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में क्या योगदान था, यह बताना उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की जिम्मेदारी है. यदि यह संभव नहीं है तो उचित होगा कि इस पुरस्कार का नामकरण डॉ. राष्ट्रबंधु, जो 37 वर्षों तक ‘बाल साहित्य समीक्षा’ निकालते रहे—के नाम पर कर दिया जाना चाहिए. डॉ. हरिकृष्ण देवसरे इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त पात्र हैं, जो हिंदी बालसाहित्य समीक्षा के प्रतिमान माने जाते हैं. तीसरा नाम डॉ. श्री प्रसाद का भी हो सकता है, जिन्होंने आलोचनात्मक और सर्जनात्मक दोनों ही प्रकार का भरपूर लेखन किया.

वस्तुतः आज से तीस-चालीस वर्ष पहले तक ऐसे साहित्य को बालोपयोगी माना जाता था, जो बच्चों को ‘अच्छे संस्कार’ देता हो. अच्छे संस्कार का आशय धार्मिक शिक्षा से था. इसलिए ऐसा साहित्य जो देवी-देवताओं की जानकारी देता हो, उपदेशात्मक हो वही आदर्श बालसाहित्य माना जाता था. लगभग दो शताब्दी पहले तक यही स्थिति यूरोपीय साहित्य में भी थी. वहां बाइबिल की शिक्षाओं से भरपूर साहित्य को बालोपयोगी मानते हुए संस्तुति की जाती थी. यूरोप में उनीसवीं शताब्दी के मध्य तक बालसाहित्य के प्रति समझ बदलने लगी थी. वहां मार्क ट्वेन, हैंस एंडरसन जैसे लेखक पैदा हुए. उन्होंने नए मूल्य बोध से भरपूर मौलिक रचनाएं लिखीं. कुछ ने परंपरागत कहानियों का बालमनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए रूपांतरण किया. इसका सुफल यह हुआ कि समर्पण, मूक आज्ञाकारिता, अतीतानुराग के स्थान पर बच्चों को ऐसा साहित्य पढ़ने को मिलना चाहिए जिससे वे साहसी, विवेकवान, तार्किक और नैतिक मूल्यों की प्रेरणा मिल सके. इसका लाभ उन्हें औद्योगिक क्रांति की सफलता के रूप में मिला. मेरी अत्यल्प जानकारी के अनुसार फड़के साहब आदर्श निर्भीक, निडर, सिद्धांतनिष्ट प्रधानाचार्य थे. लेकिन ऐसे तो अनेक अध्यापक और भी रहे होंगे. जहां तक समीक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान की बात है, उसके बारे में कोई जानकारी बालसाहित्य-मर्मज्ञों को नहीं है. इस बारे में पर्याप्त जानकारी समेटने के पश्चात उपयुक्त निर्णय लिया जाना चाहिए.

लखनऊ की इस यात्रा में जाकिर अली रजनीश मिले, बंधु कुशावर्ती से भेंट हुई. हेमंत कुमार के लेखन और नाटकों के क्षेत्र में किए गए कार्य के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती ही रहती थी. संस्थान ने उन्हें बालसाहित्य के क्षेत्र में नाटक विधा में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया है. मुलाकात संजीव जायसवाल ‘संजय’ से भी हुई जिन्हें बालकहानी के लिए पुरस्कृत किया गया है. जाकिर मुझे सबसे उत्साही बालसाहित्यकार लगे. बालसाहित्य सम्मानों के दुबारा आरंभ होने में जिन साहित्यकारों का योगदान है, उनमें से एक वे भी हैं. डॉ. हेमंत बहुत ही सरलवृत्ति के भले इंसान महसूस हुए.

सरकारी खर्च पर होने वाली यात्राओं की कमजोरी होती है कि आप वहां बहुत ज्यादा भ्रमण नहीं कर सकते. आपका जाना, रहना सब कुछ पहले से तय होता है. मार्च महीने में तो वैसे भी कार्यक्रम बहुत सीमित समय के बनाने पड़ते हैं. फिर भी इस यात्रा में संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदयप्रताप सिंह, संस्थान सचिव सुधाकर अदीब, ‘बालवाणी’ के संपादक अनिल मिश्र, से भेंट भी यादगार रही. परंतु लखनऊ अनदेखा ही रह गया. हर यात्रा की, चाहे वह बहुत लंबी हो या छोटी, यही नियति है. हर बार कुछ न कुछ छूट ही जाता है. यही जीवन के साथ होता है. आखिर वह भी तो एक यात्रा है. चरैवेति….चरैवेति…..

— ओमप्रकाश कश्यप

धर्म का सत्तापक्ष

धर्म और अभिजन संस्कृति16

धर्मो यो बाधते धर्मं न स धर्मो कुधर्म तत्।

अविरोधी यु तो धर्मः सः धर्मो मुनिसत्तम।।1

महाभारत

धर्म की सत्ता को लेकर दुनियाभर के अधिकांश लोग एकमत दिखाई देंगे. अधिकांश मानते हैं कि धर्म है. धर्म की जरूरत दुनिया को है. वे यह दावा भी करेंगे कि धर्म ही दुनिया को चलाता है….कि धर्मविहीन जीवन अर्थहीन है. लेकिन दुनिया में तो छोटेबड़े सैकड़ों धर्म और हजारों संस्कृतियां हैं. ऐसे में लोगों से यदि पूछा जाए कि वे किस धर्म के पक्ष में हैं, अथवा कौनसा धर्म उन्हें अपने विवेक और भावनाओं के अनुकूल लगता हैतो वे तत्क्षण अलगअलग खानों में बंट जाएंगे. उन खानों के अनेक उपखाने होंगे और उपखानों में भिन्नभिन्न श्रेणियां. अंतहीन स्तरीकरण के बावजूद जो एक बात उन सभी में समान होगी, वह यह कि उनमें से प्रत्येक अपनेअपने ईश्वर, अपनेअपने आचारविचार तथा अपनेअपने कर्मकांड की सर्वश्रेष्ठता का बखान करेगा. प्रत्येक का दावा अपने पंथ की सर्वोच्चता का होगा. यहां पंथ माने केवल धर्मविशेष का आराध्य तथा उसे प्रसन्न रखने के लिए किए जाने वाले कर्मकांड है. मानो धर्म सिर्फ आस्था और विश्वास का पर्याय हो. इस तरह वे अनजाने ही इस हकीकत को बयान कर जाते हैं कि विभिन्न धर्मों के बीच मुख्य अंतर सामाजिक आचरण अथवा व्यवहार का न होकर, उन मान्यताओं और विश्वासों का रहा है, जो उन्हें विशिष्ट आध्यात्मिक पहचान देते हैं. इसे किन्हीं दो धर्मों की तुलना द्वारा आसानी से समझा जा सकता है. हिंदू धर्म और इस्लाम की पूजा पद्धति में जमीनआसमान का अंतर है. हिंदू मूर्तियों को पूजते हैं. यहां तक कि जो हिंदू निराकार ईश्वर की मानता रखते हैं, उसे भी दूसरों को मूर्ति पूजा करते देख कोई कष्ट नहीं होता. वे इसे व्यक्तिगत मामला मानकर चुप रहते हैं. इसके विपरीत इस्लाम में मूर्ति पूजा धर्मविरुद्ध आचरण है. इस अंतर के आधार पर दोनों धर्मों के बीच सांप्रदायिक तनातनी की खबरें आती रहती हैं. उस समय वे मुद्दे पूरी तरह छिप जाते; अथवा छिपा दिए जाते हैं, जो न केवल इन दोनों धर्मों, बल्कि दुनिया के सभी धर्मों के बीच बुनियादी एकता की बात करते हैं. उदाहरण के लिए हिंदुओं के परमात्मा की भांति इस्लाम में भी अल्लाह को निराकार और सर्वेसर्वा माना गया है. अवतारवाद वहां पैगंबर या नवी के रूप में सामने आता है. इसी तरह लोकव्यवहार के समय सभी धर्म संकट में जरूरतमंद की मदद करने, आचरण की शुद्धता बनाए रखने तथा सत्य पर समानरूप से जोर देते हुए नजर आते हैं, किंतु कर्मकांड और पूजा पद्धति के आधार पर उनके अंतर्विरोध स्पष्ट रूप से सामने आ जाते हैं. धर्म की इस विशेषता को लावेंथल ने भलीभांति स्पष्ट किया था. उसका मानना था कि धर्म का मुख्य दायित्व मानवीकरण की गति को तेज करते हुए समाज को नैतिकता की ओर उन्मुख रखना है, तदनुसार धर्म का अभिप्रेत है

  1. भौतिक/परामानवीय सत्ता में विश्वास करना.

  2. सदाचरण को जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाना. सामाजिक सामंजस्य, सद्भाव, मैत्री एवं भाईचारे को बढ़ावा देते हुए अच्छे कार्य करना, बुराई से बचना और यथासंभव दूसरों की मदद करना.

  3. इस विचार में आस्था रखना कि सृष्टि का सिरजनहार ही नैतिकता और सद्गुणों का आधार है.

  4. धार्मिक आस्था एवं मर्यादाओं का प्रचारप्रसार बिना सामाजिक संस्थाओं के समर्थन के असंभव है. इसलिए सभी धर्म सामाजिक संस्थाओं पर निर्भर होते आए हैं. अतएव सामाजिक संस्थाओं की मर्यादा की रक्षा करना तथा अनुशासित जीवन की प्रेरणा जगाना भी धार्मिक जीवन की अपेक्षाओं में आता है.

उल्लेखनीय है कि श्रद्धा और विश्वास, जिन्हें धर्म का सामान्य प्रतीक माना जाता है, श्रद्धालु का अपना चयन बहुत कम होते हैं. वे या तो परंपरानुगत होते हैं अथवा पुरोहित वर्ग द्वारा थोप दिए जाते हैं. कुल मिलाकर यह एक विडंबना ही है कि मनुष्य के सामाजिक जीवन, उसकी जीवनचर्या, रहनसहन आदि को तय करने वाले धार्मिक प्रतीकों के चयन में व्यक्ति के अपने विवेक का कोई योगदान नहीं होेता. जनसाधारण धार्मिक चर्चा में भाग तो ले सकता है, किंतु उसमें गुणात्मक संवर्धन का उसे कोई अधिकार नहीं होता. उसकी नियति सभी प्रकार की प्रश्नाकुलता से मुक्त अनुयायी की होती है. वहां सवाल अथवा किसी प्रकार की शंका उत्पन्न करना अच्छा नहीं माना जाता. यह स्थिति आर्थिक रूप से पिछड़े और विकासशील देशों में अत्यंत चिंताजनक है. आलोचना विमर्श की कोई गुंजाइश न होने पर व्यक्ति थोपे अथवा मजबूरी में अपनाए गए कर्मकांडों का अनुसरण मशीनवत करता है. परिणामस्वरूप वह कर्मकांडों के पीछे की वैचारिकी को समझने में भी असमर्थ रहता है. बावजूद इसके धर्म को विशिष्ट पहचान देने, उसको खास सीमारेखा में बांधे रखने, यहां तक कि उसे प्रबल संगठनकारी शक्ति बनाने में भी इसी पक्ष का योगदान सर्वाधिक होता है. यथार्थ में, धर्म के इस पक्ष का मनुष्य के सामाजिक जीवन से कोई संबंध नहीं होता. न ही यह मानव जीवन में किसी प्रकार के सुख की वृद्धि करता हैं. इसलिए हम उन्हें धर्म का बाह्यावरण, उसका मुखौटा भी मान सकते हैं. चूंकि रूढि़यों और धार्मिक कर्मकांडों को मनुष्य अपने विवेक के विरुद्ध जाकर अपनाता है, इस कारण वह उनका विवश अनुसरणकर्ता बना रहता है.

धर्म की इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर पुरोहित वर्ग उसका स्वार्थानुरूप उपयोग करता है. वह स्थितियों की अपने हितों के अनुसार व्याख्या करता है, और धर्म के लोकव्यवहारी रूप के स्थान पर, उस रूप के जहां वह सामान्य नैतिकता का समर्थन करता हुआ नजर आता हैकेवल उसके आध्यात्मिक पहलू को महत्त्व देने लगता है. इससे धर्म का लोकप्रचलित रूप उन कर्मकांडों एवं रूढि़यों तक सिमट जाता है, जो मोक्ष की प्राप्ति अथवा तीसरी अज्ञात शक्ति को प्रसन्न रखने की कामना के साथ पुरोहित वर्ग द्वारा निहित स्वार्थवश थोप दिए जाते हैं. जिनकी आलोचना दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, के अलावा समयसमय पर सुधी धर्मवेत्ताओं द्वारा भी की जाती रही है. पुरोहित वर्ग के इस षड्यंत्र को समाज के शीर्षस्थ वर्गों का भी पूरा समर्थन होता है. उन्हीं के परोक्ष नेतृत्व में धर्म के नाम पर असमानताकारी व्यवस्था से अनुकूलीकरण का षड्यंत्र, पीढ़ीदरपीढ़ी चलता रहता है. पुरोहित वर्ग द्वारा की गई धार्मिक व्यवस्थाएं रूढ़ होती हैं, किंतु केवल साधारण जन के लिए. चूंकि शक्तिशाली यानी अभिजन समूह धर्म का उपयोग करता है, इसलिए सामाजिक संस्थाओं का जटिल अथवा सरल होना उसके लिए कोई मायने नहीं रखता. वे धर्म का समर्थन तभी तक करते हैं, जब तक वह उसकी स्वार्थसिद्धि के काम आता है. जैसे ही धर्म अथवा उसका कोई संस्कार शीर्षस्थ वर्ग के हितों के आडे़ आता है, वह तत्क्षण उसको तिलांजलि देकर मनमाने आचरण पर उतर आता है. उस समय वह पुरोहितवर्ग की चिंता नहीं करता. जो पुरोहित वर्ग धर्म की उपेक्षा या उसके द्वारा व्यवस्था में मामूली परिवर्तन को आपत्तिजनक मानता है, वह समाज के शक्तिशाली वर्ग द्वारा किए गए भारी फेरबदल को समरथ को नहिं दोष गुसाईंमानकर न केवल झेलता है, बल्कि अपनी व्याख्याओं में आवश्यकतानुसार संशोधन कर, खुद को सत्ता पक्ष के समर्थन में बनाए रखता है. साफ है, जनसाधारण धार्मिक निषेधों/व्यवस्थाओं का पालन करता है, जबकि पुरोहित समेत शक्तिशाली वर्ग उनका स्वार्थानुरूप उपयोग. इसके अनगिनत उदाहरण इतिहास से लेकर रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. एक उदाहरण औरंगजेब का है, जिसकी गिनती धर्मप्रवण बादशाहों में की जाती है. यह भी कहा जाता है कि उसने अपने जीवन को इस्लाम और शरीयत के आदर्शों के अनुरूप ढाल लिया था. उसी औरंगजेब द्वारा अपने गुरु मुल्ला साहे को लिखे गए एक पत्र का उल्लेख डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में कमला व्याख्यानके दौरान किया था. पत्र में औरंगजेब लिखता है

तुमने मेरे पिता शहंशाह से कहा था कि तुम मुझे दर्शन पढ़ाओगे. यह ठीक है, मुझे भलीभांति याद है कि तुमने अनेक वर्षों तक मुझे वस्तुओं के संबंध में ऐसे अनेक अव्यक्त प्रश्न समझाए, जिनसे मन को कोई संतोष नहीं होता और जिनका मानव समाज के लिए कोई उपयोग नहीं है. ऐसी थोथी धारणाएं और खोखली कल्पनाएं, जिनकी केवल यह विशेषता थी कि उन्हें समझ पाना बहुत कठिन था और भूल पाना बहुत सरल….क्या तुमने कभी मुझे यह सिखाने की चेष्टा की कि शहर पर घेरा कैसे डाला जाता है या सेना को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है? इन वस्तुओं के लिए मैं अन्य लोगों का आभारी हूं, तुम्हारा बिलकुल नहीं.’’2

स्पष्ट है, आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक मूल्यों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए, यह उसके अनुयायी की सामाजिक हैसियत पर निर्भर करता है. जनसाधारण धार्मिक शक्तियों के आगे कमजोर होता है. अपनी हैयिसत के अनुसार वह धार्मिक परिपाटियों को अपनाता है तथा जरूरत पड़ने पर उनके लिए अपने हितों का बलिदान भी देता है. जबकि शक्तिशाली धर्म का उपयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए करता है. जनसाधारण के बीच वह अपनी छवि उदार धर्मानुयायी की बनाए रखता है तथा अपने स्वार्थ के लिए धार्मिक स्थापनाओं को मनचाहा मोड़ देने में सफल हो जाता है. धर्म शक्तिशाली की ढाल और तलवार दोनों होता है. वह समाज को छोटेछोटे अनेक समूहों में बांट देता है, फिर उनके बीच व्याप्त असमानता को नियतिवादी तर्कों द्वारा सही सिद्ध करने की कोशिश करता है. उस व्यवस्था में लाभान्वित अभिजन तरहतरह से अपना बचाव करते हैं. चूंकि जनसाधारण धार्मिक व्यवस्थाओं को आस्थावादी दृष्टि से देखता है, इसलिए वह असमानता और अनाचार को पूर्वजन्मों के प्रसादके रूप में ग्रहण करता है. ऐसी व्यवस्था में कमजोर की नियति उसके प्रहार को सहने तथा जैसे भी हो, परिस्थितियों से सामंजस्य बनाए रखने की होती है. भले ही इसके लिए उसे कुछ भी क्यों न गंवाना पड़े. इस तरह धर्म की मूलभावना तथा उसके व्यवहार पक्ष में अनायास ही अंतर आ जाता है. क्योंकि जिस अधिष्ठाता शक्ति को, सर्वशक्तिमान और सर्वेसर्वा बताकर धर्म अपने कर्मकांडों के जरिये पोषित करता है, उसकी एकमात्र विशेषता अपनी ताकत के बल पर मनमाने फैसले थोपने की होती है. हर मामले में उसका निर्णय सर्वोपरि होता है. वैचारिक स्वतंत्रता अथवा संवाद का कोई अवसर उसके प्रतिवादी को नहीं मिल पाता. परोक्ष रूप में वह समाज के शासक वर्ग की मनोकामनाओं की निर्मिति होती है, जो शेष समाज पर छाये रखना चाहता है. स्वयं को सर्वशक्तिमानका प्रिय अथवा विशेष कृपापात्र घोषित करते हुए शीर्षस्थ वर्ग अपने हर निरंकुश आचरण को वैध ठहराने में लगा रहता है. इस काम में पुरोहित वर्ग उसकी मदद करता है. परिणामस्वरूप समाज में शासक और शासित का भेद स्थायी रूप ले लेता है.

धर्म का सकारात्मक पक्ष भी है. धर्माधारित समाजों में ऐसे अवसर प्रायः आते हैं, जब धर्म पराजित मन के संबल का काम करता है; अथवा हताशा में डूबे मनुष्य को प्राकृतिक न्याय का भरोसा देकर संसारसमर में डटे रहने की प्रेरणा देता है. लोकव्यवहार में धार्मिक नैतिकता प्रेरणादायी सिद्ध होती है. उससे अनेक प्रकार के कल्याण कार्यक्रम चलाए जाते हैं. अपने मूल, पारिभाषिक रूप में धर्म भी नैतिकता से आच्छादित होता है. फलस्वरूप वह सामाजिक जीवन का आदर्श बना रहता है. विवाह, सांस्कृतिक पर्व, त्योहार आदि के समय लोग एकदूसरे को अपना सहधर्मी मानते हुए एकजुटता दिखाते हैं. सामान्य लोकादर्शों का धारक, उनका समर्थक होने के कारण धर्म सामाजिकता की कसौटी के रूप में सामने आता है. धर्म का यही लक्षण उसके सामाजिक औचित्य की कसौटी बनता है. बताता है कि अधिकतम लोगों का अधिकतम हित साधने के लिए समाज को कैसा होना चाहिए. अपनी विशिष्ट संरचना के कारण धर्म यद्यपि वर्ग विभाजन की पुष्टि करता है. उसे बनाए रखने में मददगार होता है. बावजूद इसके वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह भरोसा दिलाता है कि धर्म के उच्चतम लक्ष्यों को मर्यादित आचरण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है. चूंकि प्रत्येक धर्म कर्मकांडों पर टिका होता है, इसलिए धार्मिक कर्मकांडों को इस प्रकार बनाया जाता है कि वे समाज के सभी वर्गों की पहुंच में बने रहें.

कुछ भौगोलिक एवं परिस्थितिगत प्रभावों को छोड़ दिया जाए तो दुनियाभर के मनुष्यों के स्वभाव में एकरूपता होती है. सभी समाजीकरण को महत्त्व देते हैं. सभी उसे बनाए रखने को तत्पर होते हैं तथा सभी आचरण की पवित्रता को महत्त्व देते हैं. इसलिए धर्म का वह पक्ष जो सामाजिक व्यवहार का नियमन करता है, लोगों कों सहयोग एवं सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाता है, सभी धर्मों में मिलताजुलता होता है. उसे धर्म का नियामक पक्ष भी कह सकते हैं, जिसे समाजीकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. हालांकि वास्तविकता पारिभाषिक आदर्श से पर्याप्त भिन्न होती है. जैसा पहले भी कहा गया है, सामाजिक उद्देश्यों को लेकर विभिन्न धर्मों में खास अंतर नहीं होता, लेकिन जैसे ही मामला आराध्य और उसे प्रसन्न रखने के लिए किए जाने वाले कर्मकांड पर आता हैतब विभिन्न धार्मिक समूह अपनीअपनी मान्यताओं के साथ अड़कर प्रतिद्वंद्वियों की भांति व्यवहार करने लगते हैं. उस समय वे बिसरा देते हैं कि जिस आध्यात्मिक विशिष्टता के नाम पर वे जिद ठाने हुए हैं, वह धार्मिक उपलब्धियों की आरंभिक स्थिति, उनका पहला चरण है. धर्म के भीतर उसके अनुयायियों में भी वर्ग के आधार पर स्तरीकरण पनपता है. धार्मिक कर्मकांड में लगे लोग स्तरीकरण को कम करने या उसके विरोध में आवाज उठाने के बजाय किसी न किसी रूप में उसका समर्थन करते रहते हैं. परिणामस्वरूप समाजार्थिक असमानता बढ़ती है. धर्म के उच्चतम स्तर पर हालांकि समस्त भेदों का समाहार हो जाता है, लेकिन उसे समझने के लिए जिस विवेक की आवश्यकता होती है, धर्म को अपना मार्गदर्शक मानकर जीने वाला, असल में रूढि़यों और कर्मकांडों के संजाल में फंसा आम आदमी, उस ऊंचाई तक पहुंच ही नहीं पाता है. न ही उसके प्रबोधीकरण की कोशिश की जाती है. विवेकीकरण के अभाव में धर्म केवल कर्मकांड में सिमटकर, भीड़ का आचरण बन जाता है.

आगे बढ़ने से पहले हम धर्म की कुछ मान्य परिभाषाओं की चर्चा करेंगे. विद्वान धर्म की उत्पत्ति धृधातु से मानते हैं. ऋग्वेद में इस शब्द का प्रयोग संज्ञाऔर विशेषणदोनों रूपों में किया गया है. जिसका आशय−‘धारण करना, ‘विश्वास लाना, ‘अपना लेना, ‘अंगीकार करना, ‘आलंबन देनाआदि से है. यहां धारण करनाव्यापक पद है. इसमें संस्कृति, विश्वास, आध्यात्मिक चेतना, कर्मकांडों की शृंखला, संस्कार आदि सभी समाहित हैं. धर्म का रूढ़ अर्थ, यानी केवल आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वासले आनाइससे सिद्ध नहीं होता. धर्म के अंग्रेजी पर्याय रिलीजनके साथ यह बात नहीं है. धर्म की अपेक्षा वह सीमित अर्थ में प्रयुक्त होता आया है. Religion शब्द लेटिन मूल के अनेकार्थी शब्द Religio से लिया गया, जिसे कभी ईश्वर के प्रति सम्मान दर्शानेतो कभी ईश्वर को याद करनेके लिए लिया जाता था. सिसरो ने Religio को मनन करने, ‘ध्यान धरने, ‘अनुकरण करनेके संदर्भ में लिया है. इस तरह आध्यात्मिक विश्वास और विश्वास के प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया रिलीजन. सामाजिक मर्यादा, आचारव्यवहार आदि का जैसा नियमन धर्म करता है, ‘रिलीजनसे वैसी अपेक्षा नहीं की जाती. लेकिन पारिभाषिक स्थिति जो भी हो, यथार्थ में धर्मऔर रिलीजनदोनों ही बदली भूमिकाओं में दिखाई पड़ते हैं. हम आगे देखेंगे कि रिलीजनसे प्रेरणा लेते हुए धर्म ने किस तरह अपने दायरे को निरंतर संकुचित किया है. किस तरह उसके आधुनिक व्याख्याकार धार्मिक आचारसंहिता को कर्मकांड और आडंबर तक सीमित करते रहे हैं. दूसरी ओर कांट और दुर्खीम जैसे विचारक हैं, जिन्होंने रिलीजनको उसकी पारंपरिक परिभाषा की कोटि से उठाकर जीवनादर्श के रूप में परिभाषित किया है.

फ्रांसिसी विचारक इमाइल दुर्खीम ने धर्म को पवित्र शक्ति से संबंधित विश्वास एवं लोकाचारों में एकीकृत आस्थाकी संज्ञा दी है. विलियम जेम्स, संत आगस्टाइन, फ्रैड्रिक फ्रेरे, पा॓ल तिलीच आदि की परिभाषाएं भी कहीं न कहीं दुर्खीम की परिभाषा से मेल खाती है. बावजूद इसके धर्म की सर्वमान्य परिभाषा की खोज विद्वानों के लिए आज भी चुनौती है. यह उलझन को जेम्स बिसेट प्रेट ने अपनी पुस्तक दि रिलीजियस कांसियसनेसके आरंभ में ही व्यक्त किया है−‘यह यत्किंचित बेतुका तथ्य प्रतीत होता है कि धर्म नामक लोक प्रचलित शब्द जो मानवजाति के होठों से बारबार निःसृत होता है; और जिससे मानवजीवन के सबसे पहले व्यापार का बोध होता है, इतना जटिल है कि इसे परिभाषित करना अत्यंत दुष्कर है.3 इस तथ्य से अधिकांश विद्वानों की सहमति हैं कि धर्म का व्यावहारिक योगदान मनुष्य की भौतिक एवं परामानवीय जिज्ञासाओं, इच्छाआकांक्षाओं और कर्तव्यों में तालमेल बनाए रखने में है. हाफडिंग यह कहकर कि मूल्यों के संरक्षण में विश्वास ही धर्म है, ‘रिलीजनको नैतिकता के समानांतर खड़ा कर देता है. हाॅफडिंग द्वारा दी गई परिभाषा धर्म की पारंपरिक परिभाषाओं से हटकर है. सामान्य प्रक्रिया के रूप में प्रत्येक धर्म खुद को नैतिकता के ढांचे में प्रस्तुत करने की चेष्ठा करता रहता है. यह बात अलग है कि व्यवहार में वह इतना जटिल और दिखावटी हो जाता है कि केवल आडंबर प्रतीत होने लगता है. उस अवस्था में वह केवल कर्मकांडों का पिष्ट प्रेषण बनकर रह जाता है.

इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मानव मन में आध्यात्मिक चेतना का उदय आदि जिज्ञासा से जुड़ा है. संभवतः हिम युग के तुरंत बाद. जब मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए पगपग पर संघर्ष कर रहा था. उस समय हवा, पानी, प्रकाश, पक्षी, जानवर यानी जो भी मनुष्य को जीवन में सहायक नजर आता, उसी को अपना ईष्ट मानकर खुश रखने में लग जाता था. चूंकि सूरज सबसे चमकीला गोला था, हिमाच्छादित धरा पर उसकी गरमी जीवनऊर्जा प्रदान करनेवाली थी, इसलिए अधिकांश आरंभिक सभ्यताओं में प्रकाश को जीवनस्रोत के रूप में मान्यता मिली और सूर्य को प्रथम देवता स्वीकारा गया. इखनातून ने भी प्रकाश को जीवन माना और सूर्य को समस्त सृष्टि का आधार. इस आधार पर वह पहला धर्म बना; या यूं कहें कि सत्ता का पहला धर्म. इससे सत्तासमर्थित धर्म की अवधारणा का विकास हुआ. बल या प्रभुत्व के आधार पर अपनी आस्थाएं दूसरों पर थोपने की कोशिश की जाने लगी. जैसेजैसे समाज में समाजार्थिक असमानता बढ़ती, उसमें सफलता का अनुपात भी बढ़ता गया.

इखनातून का विश्वास जड़ नहीं था. प्रकाश मनुष्य का मार्गदर्शन करता था. लोगों को एकदूसरे से जुड़े रहने का संस्कार देता था. प्रकाश प्रकृति के आंगन में मनुष्य की आरंभिक अनुभूति थी. वही रास्ता दिखाती थी. अपने दावे के अनुसार धर्म भी ऊहापोह के क्षणों में क्या करना चाहिए, क्या नहींका संस्कार देता है. इसलिए धर्म और प्रकाश दोनों को एकदूसरे का पर्याय मान लेना पूर्णतः अनुभवसिद्ध था. इखनातून से पहले धर्म आस्था का विषय था. तब तक उसका सांस्थानीकरण नहीं हुआ था. कालांतर में जैसेजैसे धर्म के सांस्थानीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी, दूसरों से अलग और विशिष्ट दिखने की होड़ में मनुष्य अपनी कल्पना के ईश्वर गढ़ता गया. धीरेधीरे धर्म उन शक्तियों में विश्वास का पर्याय बनता गया, जिनका अस्तित्व अप्रामाणिक और कदाचित असंभव भी था. ऐसा सृष्टि से इतर, उसके कारणों की खोज के कारण हुआ. परिणामस्वरूप लोगों की धर्मसंबंधी संकल्पना में अंतर आता गया. इसके पीछे पुरोहित वर्ग का योगदान भी कम न था, जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए मनुष्य के दिल में पैठे डर को धर्म के कवचकुंडल में प्रस्तुत कर रहा था.

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का आशय सामान्य नैतिकता, जीवन जीने के ढंग एवं उन मर्यादाओं के अनुपालन से है, जिन्हें समाज अपनी निरंतर गतिशीलता के लिए चुनता है. दूसरी ओर रिलीजनशब्द का अर्थ आध्यात्मिक सत्ता में विश्वास और उसके प्रस्तुतीकरण हेतु किए जानेवाले कर्मकांडों से जुड़ा है. लेकिन यह अंतर सैद्धांतिक है. व्यवहार में धर्मभी आस्था और कर्मकांड के पक्ष में तर्क देता हुआ नजर आता है. वैचारिकता से ढलाव उसे रिलीजनके बराबर में ले आता है. धर्म की आधुनिक व्याख्याएं तो रिलीजनसे ही अनुप्रेत दिखाई पड़ती हैं, हालांकि उनके बीजतत्व प्राचीन धर्मग्रंथों में भी देखे जा सकते हैं. काणे के अनुसार ऋग्वेद में धर्म का सामान्य उल्लेख धार्मिक विधियोंअथवा धार्मिक क्रिया संस्कारोंके रूप में किया गया है−‘ऋग्वेद में धर्म का प्रयोग अनेक स्थानों पर हुआ है. कुछ जगह पुर्लिंग के रूप में तो अधिकांश जगह यह नपुंसक लिंग की तरह. कई स्थानों पर उसका आशय व्यवहार के रूप में हुआ है. कुछ ऋचाओं में धर्म को निश्चित नियमया आचरण नियमतक सीमित दिया गया है.’4 ऐतरेय ब्राह्मण को छोड़कर बाकी सभी परिभाषाओं में धर्म विशिष्ट गुण है, जिसे मर्यादित आचरण, लोकोपकार, कर्मकांड तथा विभिन्न पूजा पद्वतियों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है. इन परिभाषाओं से धर्म या तो विशिष्ट पूजाप्रणाली सिद्ध होता है अथवा समाजअनुमन्य विशिष्ट व्यवहार. इसमें देवता का नाम कहीं भी नहीं आता. केवल जीवन की कारण शक्ति का उल्लेख होता है. हालांकि आराधक को अमूत्र्त देवता के स्थान पर मूत्र्त देवता लाने की पूरी छूट रहती है. वैदिक साहित्य का अवलोकन करें तो वहां हम बहुदेववाद को पाते हैं. जिनमें अनेक देवता है. उनको प्रसन्न करने के लिए अलगअलग मंत्र हैं, लेकिन पूजा पद्धति सामान्यतः एक समान है. यज्ञ में अपनाअपना हविष्य लेकर देवता संतुष्ट हो जाते हैं. बहुदेववाद के दौर में धर्म के साथ किसी एक देवता का नाम जुड़ना वैसे भी अव्यावहारिक था. इसलिए अर्थववेद में धर्म का आशय धार्मिक क्रियासंस्कार द्वारा अर्जित गुणसे लिया गया है. यहां क्रिया अथवा संस्कार धर्म नहीं है. उसके अनुसार धर्म ऐसा गुण है जिसकी सिद्धि धार्मिक क्रियाएं करने से होती है. ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म का आशय सकल कर्तव्यों से है. वैशेषिकसूत्रकार के अनुसार, ‘धर्म वही है जिससे निःश्रेयस और आनंद की सृष्टि हो.जाहिर है, धर्म का संबंध आरंभ में आचरण अथवा विशिष्ट सामाजिक व्यवहार से था. धार्मिक क्रियाएं समाजीकरण के आवश्यक अंग के रूप में पहचानी जाती थीं. जगतकल्याण की भावना उसका निहित उद्देश्य था. उपनिषदों तक आतेआते धर्म जीवन में गहरी पैठ बना चुका था. छांदोग्योपनिषद में धर्म का अभिप्राय गृहस्थ धर्म, तापस धर्म और ब्रह्मचारित्व अर्थात आचार्य के गृह में अंत तक रहना है. ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म के अर्थ को सीमित करते हुए उसे सकल धार्मिक प्रक्रियाओं का निष्पादनबताया गया है. लेकिन इसे अपवाद ही कहा जाना चाहिए. अधिकांश परिभाषाओं में धर्म विशिष्ट जीवन पद्धति है, जिसका मुख्य कर्तव्य लोकव्यवहार का नियमन करना है. तैत्तिरीयोपनिषद में भी सत्यं वदधर्मं चरकहकर धर्म को जीवनमर्यादित करने वाले उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उपनिषदों का प्रभाव गीता पर भी पड़ा है. गीता के कर्मयोग की चर्चा अकसर की जाती है, हालांकि वह मायावाद से प्रभावित है. स्वधर्म निधनं श्रेयःयानी अपने धर्म के पालन में ही श्रेष्ठत्वहैकहकर गीता भी धर्म को आश्रमधारणा से जोड़ देती है.

इस प्रकार की अस्पष्ट और उलझावभरी परिभाषाओं से साधारण व्यक्ति के लिए धर्म के बारे में सही निष्कर्ष निकालना भले कठिन हो, लेकिन उससे परिभाषाओं का महत्त्व कम नहीं हो जाता. प्रकारांतर में ये परिभाषाएं दर्शाती हैं कि धर्म का प्रमुख लक्ष्य मनुष्य के सामाजिक जीवन को मर्यादित करना है. इस रूप में धर्म समाजीकरण के उपकरण के रूप में काम करता है. वैसे भी धर्म के माध्यम से प्राचीन मनीषियों का मूल उद्देश्य सामाजिक अनुशासन और लोककल्याण दोनों को एक साथ साधने का रहा है. उन दिनों जब कानून नहीं था, राज्य की अवधारणा का जन्म तक नहीं हुआ था. अधिकांश लोग पढ़ेलिखे नहीं थेतब धर्म ही लोगों को नैतिकता और सामाजिकता का पाठ पढ़ाता था. वह जीवनप्रदाता शक्तियों के प्रति मनुष्य का आभार प्रदर्शन था. मानवीय चेतना के विकास के उस दौर में तत्कालीन जिज्ञासुओं को जीवन का जो कारणरूप नजर आया, उन्होंने उसी की अभ्यर्थना की. फलस्वरूप जल, वायु, आकाश, पृथ्वी, पर्जन्य, प्रकृति आदि समयसमय पर सृष्टि के कारण रूप में पहचाने गए. बौद्धिक चेतना के उभार के दौरान मनुष्य की समझ में आने लगा कि जीवन के लिए जल, वायु, आकाश, आदि सभी आवश्यक हैं. इनमें से किसी एक के बिना भी जीवन असंभव है. इससे समन्वय की प्रक्रिया पुनः आरंभ हुई. बहुदेववाद एकेश्वरवाद में ढलने लगा. ऐसे ईश्वर की परिकल्पना को बल मिला जो प्रकृति की अलगअलग शक्तियों के अधिष्ठाता देवताओं से ऊपर था. फलस्वरूप अग्नि, मित्र, वरुण, मरुत जैसे देवता जो बहुदेववाद के दिनों की कल्पना थे, और जिनका स्थान वैदिक युग में लगभग बराबर था, उनकी महत्ता घटने लगी. नए देवताओं के मुकाबले वे दूसरे या तीसरे स्थान पर खिसकने लगे. आस्थाओं के समन्वयीकरण ने सामाजिक समन्वय की प्रक्रिया को गति प्रदान की. विभिन्न आस्थाओं वाले कबीले जुड़कर बड़े समाज में ढलने लगे. कृषि और तकनीक के विकास ने भी बड़े समाजों के गठन को प्रोत्साहित किया. उत्तरवर्ती ग्रंथों में इस प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है. प्रबोधीकरण के दौरान सामाजिक गठन और नियमन के क्षेत्र में धर्म की भूमिका को सीमित हो जाना चाहिए था. मगर लंबे अंतराल में धर्म के आधार पर समाज में एक वर्ग ऐसा पनप चुका था जिसके स्वार्थ धर्म से बंधे थे. वह वर्ग शक्तिशाली था. उसके हित शीर्षस्थ शक्तियों से बंधे थे. निहित स्वार्थ के चलते वे शक्तियां एकदूसरे का समर्थन करती थीं. परिणामस्वरूप सामाजिक स्तरीकरण स्थायी रूप लेता गया.

धर्म को भले ही आस्था का पर्याय मान लिया गया हो, लेकिन बड़े समाजों में केवल आस्था के भरोसे काम चलने वाला नहीं था. समाज को संगठित एवं विकासोन्मुखी बनाए रखने के लिए ऐसी आचारसंहिता की आवश्यकता थी, जो मनुष्य और शेष समाज के बीच तालमेल कायम कर सके. इस जिम्मेदारी को धर्म ने संभाला. चूंकि धर्म के प्रचारप्रसार में लगी शक्तियों का रुझान सर्वसत्तावादी था, इसलिए कालांतर में धर्मआधारित समाजों में नियतिवाद में ढलने लगा. धर्म यह दावा भी करता है कि उसका नियमन स्वयं परमात्मा द्वारा किया गया है. परमात्मा जो उसकी निगाह में ज्ञानविज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर आसीन और परमविवेकी है, जो कथित रूप से सृष्टि की समस्त शुभताओं का आदिस्रोत है. माना जाता है कि वह जो है, जैसा है, वही सर्वोत्तम है. इसके लिए जो नैतिक नियम बने, उन्हें धर्म के माध्यम से समाज में प्रचलित किया जाने लगा. धर्म के प्रचारप्रसार में लगी शक्तियों ने परमात्मा को समस्त सदगुणों का आदिस्रोत घोषित किया. उन्होंने धर्म को इस तरह प्रस्तुत किया मानो समस्त नैतिकताएं उनसे ही उद्भूत हों. वस्तुस्थिति इसके ठीक विपरीत थी. अपनी परिभाषा में धर्म सामाजिक आचारविचार और कर्मकांडों का प्रतीक था. लेकिन उनकी कसौटी क्या हो? यह निश्चिंत नहीं था. धार्मिक आचारसंहिता पूरी तरह ईश्वर के नाम पर टिकी थी. जिसमें मोक्ष को अंतिम लक्ष्य माना जाता है. धर्म को अपने मकसद में कामयाबी भी मिली. मगर उसको शुभता का पर्याय मान लेने का परिणाम यह हुआ कि कालांतर में धर्म के नाम पर प्रभु वर्ग की समस्त चालाकियां, धूत्र्तताएं, विलासिता पूरी तरह सामने आने लगीं, लेकिन तब तक धर्म मनुष्य की पूरी जीवनचर्या को अपनी जकड़ में ले चुका था. विभिन्न धर्मानुयायी आज भी उसी लीक पर अड़े हैं. उल्लेखनीय है कि धर्म न केवल आदमी पर बाहरी असर डालता है, बल्कि भीतर से भी प्रभावित करता है. मनुष्य के आत्मविश्वास को हिलाने के लिए केवल इतना कहना पर्याप्त होता है कि धार्मिक दृष्टि से जो कार्य वह कर रहा है, या करना चाहता है वह भी असल में उसका अपना कार्य नहीं है. इससे जो आत्मविश्वास का क्षरण होता है, उसकी भरपाई होना आसान नहीं होता.

धर्म को जीवन के लिए अपरिहार्य माननेवालों की संख्या आज भी कम नहीं है. मैक्स मूलर धर्म को शक्ति मानता है. ऐसी शक्ति जो अजेय है. जिसको जीत पाना असंभव है−‘हम चाहे बौद्धिक विकास के नीचे से नीचे स्तर पर आ जाएं, चाहे आधुनिक अनुमान की ऊंची से ऊंची उड़ान लें. सब जगह हमें यह मिलता है कि धर्म एक शक्ति है, जिसने विजय प्राप्त की है. इतना ही नहीं धर्म ने उनपर भी विजय प्राप्त की है, जो सोचते हैं कि उन्होंने धर्म पर विजय प्राप्त की है.धर्म की प्रशस्ति करते हुए मैक्स मूलर इस तथ्य को बिसरा देता है कि धर्म उन संस्थाओं की भांति ही एक संस्था है, जो मनुष्य ने सामाजिक शांति, सद्भाव और विकास की निरंतरता के लिए गठित की है और संस्थाओं की प्रासंगिकता समय के अनुसार बदलती रहती है. अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रत्येक समाज समयसमय पर नई संस्थाएं गढ़ता है और पुरानी संस्थाओं से पीछा छुड़ाता जाता है. उदाहरण के लिए किसी जमाने में राजशाही स्वयं एक सत्ता थी. समय के साथ उसमें बदलाव हुआ. आज अधिकांश देश राजशाही से पीछा छुड़ा चुके हैं. जिन देशों में वह कायम वहां भी उसका स्वरूप पहले जैसा नहीं है.

वस्तुतः धर्म उस दौर की रचना है जब राजनीति, अर्थनीति, नीतिशास्त्र का जन्म ही नहीं हुआ था. धर्म के साथ शक्ति का जुड़ाव व्यक्ति की मानसिक दुर्बलता का संकेतक है. आधुनिक समाज में ऐसी कोई भी संस्था जो मनुष्य को कमजोर समझे, कमजोर बनाए या किसी भी तरह से उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाएउपयुक्त नहीं मानी जा सकती. हीगेल की एक प्रसिद्ध उक्ति है−‘यदि निर्भरता की भावना ही धर्म है तो कुत्ता सबसे अधिक धार्मिक है.’−

यदि धर्म अनुभूति केंद्रित है, तो उस अनुभूति का सिवाय परजीविता के कोई और आयाम नहीं हो सकताउस हालत में एक कुत्ता ज्यादा धार्मिक होगा….5

मैक्स मूलर इस हीगेल का मजाक कहकर इस कटाक्ष को हल्का आंकना चाहता है; या हल्केपन के साथ महसूस करना चाहता है. क्या हीगेल ने सचमुच मजाक किया था? इस पर फैसला करने से पहले हमें सोचना पड़ेगा कि हीगेल ने उक्त शब्द कहे किस संदर्भ में थे. हीगेल की उपर्युक्त टिप्पणी हरमन हेनरिख की 1822 में प्रकाशित एक पुस्तक Religion in the internal affairs to science की भूमिका में थी. अगर यह हीगेल का कटाक्षा था तो मानना पड़ेगा कि बहुत गहरा कटाक्ष था. उसका कोई न कोई आधार अवश्य होना चाहिए. धर्म जिस प्रकार मानवसंस्कारों में परजीविता का भाव पैदा करता है, बातबात में ईश्वर की दुहाई देने लगता है, उससे हीगेल की उक्ति पर विश्वास स्वतः होने लगता है. हीगेल यहीं नहीं रुकता, उसी भूमिका में वह लिखता है

एक कुत्ता भी उस समय निवृत्ति का अनुभव करने लगता है, जब उसकी आत्मा हड्डी को चूसने से तृप्त हो जाती है.5

 

हीगेल के अनुसार धर्म का अर्थ है या होना चाहिएपूर्ण स्वतंत्रता. जो धर्म किसी भी प्रकार से व्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात पहुंचता है, वह वस्तुतः अधर्म है. क्योंकि व्यक्ति किसी भी ऐसी वस्तु या विचार को मन से नहीं स्वीकार सकता, जो उसकी स्वतंत्रता को खतरे में डालता या उसे नुकसान पहुंचाता हो. धर्म के साथ शक्ति का जुड़ाव उसको सामंती संस्कार देता है. चूंकि व्यक्ति मूलतः स्वाधीनतापसंद होता है, वह ऐसी किसी शक्ति के अधीन नहीं रहना चाहता जो उसको कमजोर बनाती हो. अतः समाज में खुद को स्थापित करने के लिए धर्म लगातार यह दिखाता रहा कि उसकी शक्तियां मानवकल्याण के लिए है. इसके लिए उसने नैतिकता का आश्रय भी लिया. यहां शंका हो सकती है कि धर्म हमेशा तो दबाव की स्थिति में नहीं होता. बल्कि कई ऐसे विषय हैं जहां धर्म अपने लोकतांत्रिक चेहरे के साथ हासिल होता है. उदाहरण के लिए मंदिर के दरवाजे गरीबअमीर, सेठफकीर सभी के लिए खुले होते हैं. यह बात अलग है कि धर्म जिस प्रकार की संस्थाएं खड़ी करता है; अथवा जिन संस्थाओं को वह अपना समर्थन देता है, वे सर्वकल्याण का दावा भले ही करें, वास्तविक हितसाधन अल्पसंख्यक अभिजन का ही करती हैं.

यह ठीक है कि असुरक्षा की भावना ने समाज के गठन की नींव रखी होगी, इसलिए समाज अपने आप में बड़ी शक्ति है. सामाजिक संबंध वास्तविक होते हैं. इसलिए केवल शक्ति के लिए धर्म का वरण करना, मनुष्य के लिए आवश्यक न था. यह तभी संभव था जब धर्म सामाजिक नियमों की सर्वोच्चता को स्वीकार करते हुए खुद को उनके सहायक और प्रवत्र्तक के रूप में प्रस्तुत करे. यह कार्य शक्ति के बूते नहीं, बल्कि सहयोगात्मक तरीके से ही हो सकता था. इसके लिए धर्म ने नैतिकता का सहारा लिया और मानवीय आदर्शों से स्वयं को जोेड़ा. यह जुड़ाव इतना गहरा और करीबी बना कि अनेक धर्मों ने परलोक, आत्मा और परमात्मा जैसी धारणाओं से स्वयं को दूर रखा. यह बात अलग है कि धार्मिक संस्थानों पर कब्जा होने के बाद कुछ धार्मिक संस्थान स्वयं को धर्म से ऊपर मानते रहे. तथा समाज प्रदत्त शक्तियों का उपयोग समाज के दूसरे वर्गों को दबाने के लिए किया जाता रहा. ऐसे लोग हर युग, प्रत्येक समाज में रहे. स्थापित व्याख्याओं में अनुकूल फेरबदल कर, वे अपनी स्वार्थसिद्धि करते रहे. जबकि नैतिकता मानवीय विवेक और सामाजिकता का समन्वित रूप है. वह हमेशा एक लक्ष्य होती है. नैतिक मूल्यों का निर्धारण मनुष्यत्व के सर्वोच्च लक्ष्यों को ध्यान में रखकर कया जाता है. नैतिकता का एकमात्र लक्ष्य मानवकल्याण होता है. जबकि धर्म तीसरी शक्ति को बीच में लाए बिना सामाजिक आदर्श की बात कर ही नहीं पाता. ऐसे समाजों में वास्तविक मानवकल्याण का लक्ष्य हवाई हो जाता है. जैसे ही धर्म तीसरी शक्ति को बीच में लाता है, मानवीय अस्मिता अवमूल्यित होने जाती है. उस समय तीसरी शक्ति का निर्णय प्रत्येक मामले में अधिक महत्त्वपूर्ण मान लिया जाता है. इससे विवेकीकरण की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

नैतिकतावादी इमानुएल कांट की परिभाषा रिलीजनऔर धर्मदोनों की परंपरागत परिभाषाओं से हटकर है. उसने धर्म को सदाचार की संज्ञा दी है. काॅट के लिए नैतिकता के सवाल बड़े थे. उसके अनुसार धार्मिक सदाचार को तभी संपूर्ण सदगुण माना जा सकता है, जब नैतिकता को आगे रखकर उसका निरपेक्ष आकलन किया जाए. तभी मानवीय विश्वासों की सहीसही अन्वीक्षा संभव है. यानी धर्म प्रथमतः यह स्वीकार करे कि उसका ध्येय नैतिकता का पोषण करना है. आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास केवल उसका आलंबन है. लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं पाता. धर्म आस्था और चुनींदा कर्मकांडों तक सीमित होकर रह जाता है. कांट को धर्म के ऐसे रूप से आपत्ति है. इसलिए वह आदर्श के कारण रूप में किसी तीसरी शक्ति के अस्तित्व को स्वीकारने से इन्कार करता है. उसके अनुसार, ‘हम तभी तक धर्ममार्ग पर है, जब तक नैतिक कर्तव्यों को दैवी आज्ञा मानते हैं. जब तक हममें अपने कर्तव्य के प्रति स्वतः चेतनाभाव है.कर्तव्य के प्रति चेतनाभाव ही हमें नैतिकता से आबद्ध रखता है. यहां गीता के कर्मसिद्धांत का उल्लेख प्रासंगिक है. गीता भी कर्तव्यपरायणता पर जोर देती है. योग कर्मसु कौशलः’−कहते हुए वह निष्काम कर्म का संदेश दे जाती है. लेकिन वह पुराणों और स्मृतिग्रंथों की भांति मोक्ष के बहाने, काल्पनिक सुख का सपना दिखाकर मनुष्य को शेष समाज की ओर से उदासीन बना देती है. परिणामतःकथित निष्काम कर्म ठेठ स्वार्थवादी आयोजन बन जाता है. गीता का कर्ममार्ग इहलोक की सिद्धि नहीं है. उसके अनुसार मोक्ष जीवन का पवित्रतम लक्ष्य है. यदि वह धर्म त्याग द्वारा संभव हो तो, गीता के अनुसार उसमें भी कोई बुराई नहीं हैसर्व धर्मान परितज्यं मामेकं शरणम् ब्रज. कांट के लिए मनुष्य और मनुष्यता से जुड़े प्रश्न महत्त्वपूर्ण थे. अतएव धर्म उसके लिए तभी तक स्वीकार्य है, जब तक वह नैतिकता का पोषण करता हो.

कांट नैतिकता के दर्शन को धर्म से आगे ले जाता है. उसके अनुसार अपने कर्तव्य को ईश्वरार्पण कर देने अथवा उसका बताने से मनुष्य की क्षमताओं पर संदेह होने लगता है. अतिरिक्त रूप से उदार व्यक्ति अपनी इस उपलब्धि को ईश्वर के नाम किए रहता है. उसी के आधार पर वह लोक ऋण से मुक्त हो जाने का दावा करते हैंइस तरह कांट के लिए धर्म और नैतिकता केवल उस समय तक पर्यायवाची हैं, जब तक धर्म मानवमात्र के कल्याण को अपना ध्येय माने रहता है. ऐसा करने के लिए वह किसी तीसरी सत्ता को बीच में लाना जरूरी नहीं मानता. उसका माना है कि मनुष्य मूल रूप में अच्छा होता है, लेकिन उसे अपनी अच्छाई पर भरोसा नहीं होता. इसलिए वह अच्छाई के आलंबन के रूप में तीसरी शक्ति की कल्पना करता है. अंततः वह कल्पना को सही सबकुछ मान लेता है और जो वास्तविक है, जो उसके आसपास घट रहा है, जिसका उसके जीवन सीधा संबंध हैउसकी ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लेता है. कभीकभी तो काल्पनिक लक्ष्यों को ही सर्वस्व मानते हुए जीवन के वास्तविक लक्ष्यों की ओर से उदासीन हो जाता है. कांट के अनुसार तीसरी शक्ति के अस्तित्व को स्वीकारना मानवीय नैतिकता में अविश्वास और उसकी क्षमताओं पर संदेह कर लेना है.

धर्म को केवल आध्यामिक विश्वास तक सीमित कर देने की कोशिश की आलोचना भारतीय विचारकों ने भी की है. बुद्ध तो हर बात में ईश्वरऔर आत्माको कारण देखने से इतने क्षुब्ध थे कि उन्होंने उन प्रश्नों पर विचार करना ही निरर्थक माना था. चार्वाक, आजीवक, जैन, बौद्ध आदि दर्शन ईश्वरीय सत्ता का निषेध करते हैं. बुद्ध के समकालीन यूनानी विचारक हेराक्लीज के अनुसार धर्म एक बीमारी है. हालांकि वह बहुत पवित्र बीमारी है. इसके बावजूद अधिकांश धर्मानुयायी धर्म के नैतिकतावादी पक्ष को उपेक्षित कर, कर्मकांड तथा विभिन्न धर्माडंबरों को बढ़ाने में लगे रहते हैं. जिसके लिए धर्म की आलोचना होती रही है. कांट की भांति फिटशे भी धर्म को नैतिकता से ऊपर स्वीकारने को तैयार नहीं है. उसके अनुसार, मनुष्य धार्मिक होने के कारण नैतिक नहीं है, बल्कि वह नैतिक होने के कारण धार्मिक है. मनुष्य को उसका कर्तव्य समझाने, के लिए धर्म नहीं, नैतिकता की आवश्यकता पड़ती है. उसके अनुसार, ‘बीमार और भ्रष्ट समाज ही धर्म को नैतिकता का आलंबन मानकर उसके अनुसार व्यवस्थित होने का समर्थन करता है.अपनी आस्था के आधार पर वह धर्म को ऐसे गुरुडम में ढाल देता है कि मनुष्य के लिए बिना बिचैलिए की मदद के धर्म को उसे समझना मुश्किल हो जाता है. चूंकि नैतिकता सदैव एक लक्ष्य है. इसलिए सिरजनहार को यदि नैतिक स्तर पर सर्वोच्च दर्शाया जाए, तो वह मनुष्य के लिए प्रेरणादायी सिद्ध हो सकता है. मगर यह मान लेना कि सृष्टि का सिरजनहार ही नैतिक गुणों का एकमात्र आधार हैमनुष्य की आंतरिक अच्छाइयों पर संदेह करना है. यह मान लेना है कि मनुष्य की अंतिम नियति परावलंबन है. बावजूद इसके जब कोई आस्थावादी सिरजनहार का चरित्र गढ़ता है, तो अनचाहे ही उसके चरित्र को निरंकुशता से जोड़ देता है. उसके फैसलों और प्रावधानों पर सवाल खड़े करना, पाप मान लिया जाता है. व्यवहार में ऐसा नहीं हो पाता. आस्था के सहारे गढ़ा गए आराध्य के चरित्र में कब कब निरंकुशता प्र्रवेश कर जाती है. यह पता ही नहीं चलता. इससे बचने के लिए फिटशे नैतिकता को धर्म से ऊपर रखते हुए और ज्ञान को धर्म का लक्ष्य मानने का सुझाव देता है

धर्म कभी भी व्यावहारिक नहीं होता था. धर्म का उद्देश्य कभी यह नहीं था कि हमारे जीवन को प्रभावित करे. इसके लिए शुद्ध नैतिकता पर्याप्त है. एक भ्रष्ट समाज ही नैतिक कार्य के लिए धर्म की दुहाई देता है. ज्ञान ही धर्म हैऐसा सोच मनुष्य को स्पष्ट आत्म विवेचन का अवसर देता है. सामाजिक सामंजस्य को बढ़ाता है और मानस को पवित्र बनाए रखता है.6

धर्म की प्रमुख परिभाषाओं की कमजोरी है कि वे व्यक्ति को मुक्त करने के नाम पर बांधती है. इसी के चलते जो धर्म ऋग्वेद में महज धार्मिक क्रियाओं के समुच्चय अथवा उनके गुणत्व के रूप में देखा जाता था, उपनिषदों में वह आश्रम धर्म का रूप लेने लगा था. यदि हम वैदिक समाज को देखें तो वहां चातुवण्र्य विभाजन के संकेत तो हैं. स्वयं ऋग्वेद का पुरुष सूक्त इसका प्रमाण है. बावजूद इसके वहां जन्मना वर्ग भेद नहीं था. सत्यकाम जाबालि, विश्वामित्र आदि ऐसे कई वैदिक ऋषि हैं जो अपनी प्रतिभा के बल पर निचले वर्ग का उत्क्रमण कर शीर्ष वर्ग में मान लिए जाते हैं. लेकिन उपनिषद काल तक आतेआते यह छूट समाप्त हो जाती है. वर्णाश्रम धर्म लगभग स्थायी रूप ले लेता है. तदनंतर धर्म की संकल्पना में भी अनुकूल परिवर्तन स्वाभाविक था. धर्म और नैतिकता के संबंधों को लेकर पश्चिम में निरंतर बहसें चली हैं. हीगेल, बू्रनो बायर, फायरबाख, माक्र्स, फिटशे आदि अनेक ऐसे विचारक हैं, जिन्होंने धर्म को कठघरे में खड़ा रखा. धर्म और नैतिकता में से किसे वरीयता दी जाए, इसे लेकर कुछ बहसें आज भी जारी हैं. इन बहसों का इतना अंतर अवश्य पड़ा है कि नैतिकता के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकारा जाने लगा है. जबकि भारत में आज भी नैतिकता को धर्म के उपादान के रूप में देखने का चलन है. धर्माचार्य धर्म को समस्त नैतिकता का स्रोत मानते हैं, हालांकि उसके पक्ष में वे एक भी उपयुक्त तर्क देखने में असमर्थ रहते हैं.

पूर्व मीमांसाकार के लिए धर्म वेद विहित प्रेरकलक्षण है. इसी तरह महाभारत में कई स्थानों पर आया है कि नास्ति सत्यात्परो धर्मःयानी सत्य के अतिरिक्त कोई धर्म नहीं है. महाभारत में ही एक अन्य स्थान पर सत्य का पुनः महिमामंडन किया गया है. वहां सत्यानुशीलन के प्रताप को सहस्रों अश्वमेधों के सम्मिलित पुण्य से बड़ा माना गया है.हजार अश्वमेध यज्ञ और सत्य की यदि तुलना की जाए तो सत्यानुशीलन हजार अश्वमेध यज्ञों भी बढ़कर है. यहां किसी ईश्वर को सत्य से नहीं जोड़ा गया है. यदि सत्य को सदाचरण का पर्याय मान लें तो सत्य यहां भी व्यवहार की चीज है, भले ही उसका ध्येय किसी उच्चतर लक्ष्य की सिद्धि रहा हो. पुराणों मेें धर्म की परिभाषा में सदाचरण अथवा व्यवहार हो ईश्वर से स्थानापन्न करने की कोशिश दिखाई पड़ती है. इससे गांधी समेत कई आधुनिक लेखकविचारक प्रभावित हैं. किंतु हर चीज के पीछे ईश्वर खोजने वाली दृष्टि गांधी से सत्य ही ईश्वर हैकहलवाती है तो तिलक महोदय उपर्युक्त मंत्र की व्याख्या, ‘सत्य के सिवा और धर्म नहीं है, सत्य ही परंब्रह्म हैकहते हुए सत्य ही परंब्रह्म है8 अपनी ओर से जोड़ देते हैं. यह एक प्रकार से बौद्धिक दासता है तो व्यक्ति को धर्म के बहाने बांधे रखती है. देखा जाए तो यही नुकसान देह भी है, क्योंकि अपनी मूल परिभाषा में धर्म जहां आचरण का हिस्सा है, वहीं नए रूप में वह किसी तीसरी शक्ति की मौजूदगी का पर्याय अथवा उसका समर्थक बनकर रह जाता है.

जब तक धर्म व्यवहार का हिस्सा था, उस समय तक उसपर मुक्त विमर्श असंभव न रहा होगा. इसलिए कि धार्मिक क्रियाओं का आवश्यकता एवं परिस्थितियों के अनुसार फेरबदल किया जा सकता था. आधुनिक समाजों में भी दो व्यक्ति शायद ही ऐसे मिलेंगे, जिनकी धर्म को लेकर एक अवधारणा एकदम स्पष्ट हो. शायद इसीलिए धर्म और ईश्वर की व्याख्या को लेकर एक समान परिस्थितियों में रह रहे लोगों में से प्रत्येक का दावा होगा कि वह उन्हें सर्वाधिक जानता है. यहां मतवैभिन्नय को मनुष्य का स्वभाव माना जा सकता है−‘न एको मुर्निस्य मर्तिभिन्ना.लेकिन नैतिकता और सदाचार को लेकर उनमें कोई भेद नहीं होता. प्रत्येक व्यक्ति दूसरों की मदद करने को अच्छा मानता है. झूठ की सब आलोचना करते हैं. धर्म को यदि समाज का वरण मान लिया जाए तो एक सवाल स्वतः खड़ा हो जाता है कि कोई समाज आखिर ऐसी चीज या विचार को क्यों अपनाएगा जिसे लेकर उनमें गहरे मतभेद हों. जाहिर है धर्म को व्यापक रूप में अपनाने का एक मात्र कारण यही हो सकता है कि उससे समाज के अधिकतम लोगों की हितसिद्धि संभव हो. कुल मिलाकर अवधारणा के रूप में धर्म आरंभ से ही आलोचनाओं से घिरा रहा है. आलोचनाप्रत्यालोचना के दौर में धर्म को लेकर लोग मुख्यतः दो भागों में बंटे हुए नजर आएंगे. पहले वे जो धर्म और ईश्वर की सत्ता पर विश्वास रखते हैं. दूसरे वे जो नहीं देखते. जो ईश्वर पर विश्वास लेकिन आराध्य के रूप में सर्वशक्तिमानकी परिकल्पना परोक्ष में मनुष्य को अत्यंत दीन और कमजोर सिद्ध कर देती है. इसका प्रभाव समाज में जनऔर अभिजनके रूप में सामने आता है. एक बंटा हुआ बेमेल समाज. जो अभिजन हैं, माना जाता है कि उनपर पूर्व जन्म के संचित पुण्यों के चलते सर्वशक्तिमान की विशेष कृपा मानी जाती है. बाकी जन किसी न किसी गलती की सजा भोग रहे होते हैं.

यदि व्यावहारिक नैतिकता को तुलना का आधार बनाया जाए तो विशेष दार्शनिक पृष्ठभूमि न होने के बावजूद विश्व के दो बड़े यानी ईसाई और इस्लाम धर्म, हिंदू धर्म से आगे निकल जाते हैं. यही क्यों संगठन और सामाजिकता के आधार पर हिंदू धर्म के बीच से उभरा सिख धर्म भी आगे है. उनके प्रवत्र्तकों के लिए अपनेअपने समाज के मसले अधिक महत्त्वपूर्ण थे. धर्म के माध्यम से वे समाज में न्यूनतम नैतिकता को स्थापित करना चाहते थे. जहां हिंदू धर्म के मूल में देवताओं की भीड़ थे, वहीं इस्लाम, ईसाई, सिख जैसे धर्मों के प्रवत्र्तक साधारण इंसान के रूप में जन्मे थे. श्रेष्ठ कार्यों के बल पर वे समाज में पैगंबर या मसीहा के रूप में स्थापित हुए थे. मुहम्मद साहब ने हालांकि मक्का पर आक्रमण कर फतह हासिल की थी. लेकिन इस्लाम में उनकी वीरता का वैसा महत्त्व नहीं है, जैसा उनके उपदेशों का. उन्होंने कालांतर में आए कबीलों को संगठित होने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की. इसी प्रकार ईसाई धर्म में भी ईसा मसीह को नैतिक शक्ति और परमात्मा के दूत के रूप में याद करता है. जबकि भारत के देवताओं को नैतिकता के बजाय उनके अदुभुत रणकौशल अथवा शक्तियों के अधिष्ठाता देवता के रूप में पहचाना जाता है. अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश आदि जीवन के लिए जितनी भी अनिवार्य वस्तुएं हैं, देवता उनके अधिष्ठाता, स्वामी हैं. अपनी अनुकंपा द्वारा वे किसी को भी एक झटके में धनवान बना सकते हैं. शास्त्रों में इस प्रकार के अनेक प्रसंग हैं, जो असल मे देवताओं और ऋषिमुनियों के महिमामंडन के हेतु गढ़ लिए गए हैं. एक फंतासी अथवा कपोलकल्पना से आगे इनका महत्त्व शून्य है. कृष्णसुदामा की कहानी में कृष्ण का मैत्री प्रदर्शन सुदामा की गरीबी भले ही दूर करता हो, उसके चरित्र का उदात्तीकरण नहीं कर पाता. आर्थिक रूप से दीन सुदामा बौद्धिक दीन के रूप में भी सामने आता है. हालांकि उसकी सामाजिक हैसियत पर गरीबी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. द्वारकाधीश यदुवंशी कृष्ण ब्राह्मण सुदामा का पदप्रक्षालन करके धन्य होता है. साफ है कि धर्म जाति प्रथा को समर्थन देता है. समाजार्थिक विषमता को बढ़ाता है. बावजूद इसके वह आज भी सबसे बड़ी संगठक शक्ति है. दुनिया के लगभग दोतिहाई लोग आज भी किसी न किसी धर्म में विश्वास रखते हैं. हालांकि नास्तिकों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है. आंकड़े बताते हैं कि 2005 से अब तक यानी करीब एक दशक में आस्तिकों की संख्या दस प्रतिशत तक गिरी है.

धर्म स्वयं अध्यात्म की मू़र्त्तन अवस्था है. व्यक्ति जब अध्यात्म की प्रखरता को संभाल नहीं पाता, तभी वह धर्म की शरण में जाता है. जो मूत्र्त के आराधन का मार्ग सुझाता है. यहां कुछ विद्वान कह सकते हैं कि धर्म में भी निराकार, तत्ववादी, स्थापनाओं का अंतर है. होगा पर यह अंतर मूत्र्तन की सीमाओं से बाहर नहीं जा पाता. अध्यात्म की तह में जाने के लिए धर्म की यह सबसे बड़ी बाधा है. यही कारण है कि दर्शन ने जहां अनेकानेक धर्मों को जन्म दिया है, वहीं दुनियाभर में प्रचलित धर्मों से, सिवाय कर्मकांड और दिखावे की संस्कृति के और कुछ बेहतर निकाल ही नहीं पाया.

धर्म इन दिनों सबसे उत्तेजक मसला है. उससे जुड़ी बहसों को देखा जाए तो लोग सीधेसीधे दो हिस्सों में बंटे मिलेंगे. एक वे जो धर्म को अपनी पहचान से जोड़ते हैं, जिन्हें यह जीवन का जरूरी मसला नजर आता है. जो मानते हैं कि धर्म बेहद जरूरी है. दूसरे वे जिन्हें धर्म मनुष्य की दासता का कारण नजर आता है. पहले वर्ग के लोग जैसे ही धर्म के समर्थन में आवाज उठाते हैं. दूसरे वर्ग को अपनी अस्मिता पर संकट नजर आने लगता है. धर्म के प्रति आग्रह दुनिया के सभी समाजों में रहा है. आंकड़ों के अनुसार दुनिया की दोतिहाई जनसंख्या आज भी आस्थावान है, जो किसी न किसी रूप से धर्म में विश्वास रखती है. शेष लगभग 37 प्रतिशत लोग नास्तिक हैं. नास्तिकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है. आंकड़ों के अनुसार सन 2005 से अब तक आस्तिकों की संख्या में लगभग 10 प्रति की गिरावट दर्ज की गई है. बावजूद इसके धर्म के समर्थकों, उसके लिए काम करनेवाले वालों की संख्या आज भी कम नहीं है. धर्म आज भी सत्ता का प्रतीक है.

© ओमप्रकाश कश्यप

­संदर्भ

  1. जो धर्म दूसरे धर्म को बाधित करता है, वह धर्म नहीं है. कुधर्म है. सच्चा धर्म अविरोधी होता है….ऐसे ही धर्म मुनिगण हमें बताते आए हैं.महाभारत.

  2. A Treasury of the World’s Great Letters, cd. by M. Lincoln Schuster (1941), pp. 90-91, as quoted by Dr. S. Radhakrishan, in Society and Religion.

  3. It is a rather odd fact that a word so repeatedly on the lips of men and connoting, apparently, one of the most obvious phenomena of human life should be so notoriously difficult of definition as is the word Religion.-THE RELIGIOUS CONSCIOUSNESS: A PSYCHOLOGICAL STUDY by J. B. Pratt, Page 1.

  4. आ प्रा रजांसि विंध्यानि पार्थिवा श्लोकं देवः कृणुते स्वाय धर्मणे. ऋग्वेद5/53/3

  5. If religion in man is based only on a feeling, then such a feeling rightly has no further determination than to be the feeling of his dependence, and the dog would then be the best Christian…..the dog also has feeling of redemption, whenever his hunger is satisfied by a bone.- Hegal quoted from Schleiermacher on Religion and the Natural Order – Andrew Dole.

  6. मैक्स मूलर, ‘धर्म की उत्पत्ति एवं विकास, बृह्मदत्त दीक्षित ललामद्वारा अनूदित, पृष्ठ 16.

  7. सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है. गीता रहस्य, 32 इस उक्ति का सीधा सा अर्थ सत्य और मनुष्य के व्यवहार को सत्यानुसरण द्वारा मर्यादित करना है.

  8. अश्वमेधंसहस्र च सत्यं च तुलया धृतम्।

अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते।। महाभारतअध्याय 74/102

  1. गीता रहस्य, तिलक, पृष्ठ 32’

डॉ. राष्ट्रबंधु : बालसाहित्य का यायावर

बहुत कम लेखक होते हैं जो किसी एक विधा से आजीवन अनुराग बनाए रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो बच्चों के लिए लिखने के साथसाथ बालक जैसी निश्छलता रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना स्वयं लिखते हैं, उससे अधिक दूसरों से लिखवाते हैं : और बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना पढ़ते हैं, उससे कहीं अधिक समय साहित्य और साहित्यकारों को गुननेसमझने में खर्च करते रहते हैं. परंतु डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही थे : अपनी तरह के अकेले, विरल, निष्काम और वीतरागी, बालसाहित्य के संभवतः इकलौते यायावर. उन्होंने बालसाहित्य की बांह एक बार थामी तो कसकर थामे रहे. नौकरी की. परिवार चलाया. जीवन के लिए जरूरी सभी संघर्ष किए. साहित्य सृजन को समय भी दिया. परंतु इन सबसे कहीं ज्यादा समय उन्होंने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार और प्रोत्साहन में लगाया.

यह काम उन्होंने उस दौर में किया जब बालसाहित्य को एक विधा तक नहीं माना जाता था. लोग बच्चों के लेखन को बचकाना लेखन मानते थे. बालसाहित्यकार की हैसियत अदने लेखक जितनी ही थी. कुछ लोग तो बालसाहित्यकार को लेखक मानने तक को तैयार न थे. उस दौर में ‘डॉ. राष्ट्रबंधु’ आगे आए. निश्चय ही वे अकेले नहीं थे. मस्तराम कपूर, हरिकृष्ण देवसरे, श्रीप्रसाद जैसे साहित्यकार भी उनके साथ थे. सभी समान ऊर्जावान. जहूर बख्श, निरंकार देव सेवक, श्रीधर पाठक आदि पहले ही जमीन तैयार कर चुके थे. डॉ. राष्ट्रबंधु कानपुर में रहकर भी पूरे हिंदी प्रदेश में अपनी उपस्थिति बनाए रहे. बालसाहित्य की अस्मिता के संघर्ष में लेखकों को जोड़ने और तराशने का उनका प्रयास लगातार चलता रहा. इसके लिए उन्होंने ‘बालसाहित्य समीक्षा’ निकाली. श्रेष्ठ साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने हेतु ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ का गठन किया.

पत्रिका का मुख्य उद्देश्य बालसाहित्य समीक्षा की कमी को पूरा करना था. जबकि ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ बालसाहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिवर्ष पुरस्कार बांटता था. ये सब काम उन्होंने बिना किसी दिखावे के, पूरी सादगी, विनम्रता और निष्पृहभाव से किए. ऐसे समय में जब लेखक बंधु अपने लिखे से ज्यादा गर्व मिले या जुटाए गए सम्मानपत्रों पर करते हैं. फेसबुक पर ‘सेल्फी’ चिपकाने को सर्जनात्मकता मानते हैं : डॉ. राष्ट्रबंधु उन सबसे अलग, निष्पृह भाव से बालसाहित्य के प्रचारप्रसार के काम में लगे रहते थे. कुर्तापाजामा पहन, ठेठ देहाती बाने में, झोला उठाए वे कहीं भी निकल जाते. फक्कड़ फकीर की निश्चिंत और निर्मैल्य. न पाने की खुशी, न खोने का गम. न आगत की चिंता, न विगत का क्लेश.

उनसे पहला परिचय कब हुआ था, पता नहीं. शायद 2002 के आसपास. बस इतना याद है कि ‘बालसाहित्य समीक्षा’ में मैं अपनी कहानियां भेजता था. छप भी जाती थीं. पत्रिका नियमित घर आती तो बालसाहित्य की समीक्षा विषयक कुछ आलेख पढ़ने को मिल जाते थे. आज जब बालसाहित्य समीक्षा पर सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, सैकड़ों शोध प्रबंध लिखे जा चुके हों, तब ‘बालसाहित्य समीक्षा’ जैसी अखबारी कागज पर निकलने वाली पतलीसी पत्रिका के महत्त्व का आकलन करना शायद मुश्किल हो. करना चाहें तो शायद ही पूरी तरह कामयाब हो पाएं. लेकिन उन दिनों जब कोई बालसाहित्य को स्वतंत्र विधा मानने को तैयार न था, हिंदी में बाल साहित्य को लेकर समीक्षा दृष्टि का अभाव था. शोधपत्रों की संख्या दोचार से अधिक न थीं : तब साहित्य की किसी धारा को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने का स्वप्न देखना, फिर यह सोचकर कि बिना समीक्षा दृष्टि के यह असंभव होगा, बालसाहित्य की समीक्षा प्रधान पत्रिका निकालने का संकल्प लेना. उसे अकेले दम पर छतीससैंतीस वर्ष तक लगातार निकालते रहना. यह सब बगैर समर्पण, जिद्दी धुन और संकल्पसामथ्र्य के असंभव था.

पत्रिका निकली. कुछ उतारचढ़ाव भी आए. बावजूद इसके लगभग साढ़े तीन दशक तक वह बालसाहित्य समीक्षा को समर्पित इकलौती पत्रिका बनी रही. हालांकि पत्रिका के अंतिम वर्षाें में लेखों का स्तर घटा था. मैंने स्वयं रचनाएं भेजना बंद कर दिया था. इसमें डॉ. राष्ट्रबंधु का कोई दोष न था. तीनचौथाई शताब्दी जी चुका लेखक जैसेतैसे संसाधन उपलब्ध कराने के सिवाय और कर ही क्या सकता था! कमी हम लेखकों की थी, जो जहां से कुछ आमदनी न हो, वहां स्तरीय रचनाएं भेजने से कतराते हैं. बाजारवाद की आलोचना करतेकरते स्वयं बड़े व्यापारी बन जाते हैं.

सीधी मुलाकात गाजियाबाद में हुई थी. वे किसी कार्यक्रम में आए हुए थे. गाजियाबाद में पहली या शायद दूसरी मुलाकात में घर पर ठहराने का कार्यक्रम बना. यहां मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि किसी भी बाहरी व्यक्ति के साथ, मैं सहज नहीं हो पाता हूं. अपनी एकाग्रता में अनायास दखल मुझे स्वीकार्य नहीं. उस समय भी थोड़ा तनाव में था. पर रात को सोने से पहले बातचीत का जो सिलसिला चला, वह देर तक चलता रहा. वे मानते थे कि मैं लंबी बालकहानियां लिखता हूं. इसलिए वे उन्हें सामान्य बालकहानियों से हटकर देखते थे. चाहते थे कि उनपर उसी ‘लंबी कहानी’ मानकर विचार किया जाए. कुछ महीने पहले नेशनल बुक ट्रस्ट के कार्यक्रम में आए तब भी उन्होंने लंबी बालकहानियों की चर्चा छेड़ी थी. मुझसे ‘बालसाहित्य में लंबी बालकहानियां’ विषय पर एक लेख लिखने का आग्रह भी किया था. उनकी इस राय से मैं शायद ही इत्तफाक रखता था. मैं गलत हो सकता हूं. परंतु व्यक्तिगत रूप से मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं ‘लंबी बालकहानियां’ लिखता हूं. ऐसे अवसर पर मुझे अपना बचपन अकसर याद आ जाता है. नानाजी अच्छे किस्सागो थे. वे घर आते तो हम बच्चे उन्हें घेर कर बैठ जाते. न केवल मैं बल्कि हम सब भाईबहन. आंखों में भले ही नींद भरी हो, परंतु छोटी कहानी शायद ही किसी को पसंद आती थी. लंबी कहानी, भले ही हम ‘हंुकारा’ भरतेभरते सो जाएं, प्रायः पसंद की जाती थी.

उन दिनों जो कहानियां अकसर सुनने को मिलती थीं, उन्हें ज्यों का त्यों लिखने को बैठो तो दोतीन हजार शब्दों से कम शायद ही कोई कहानी बन पाए. मैं मानता था और आज भी मेरा मानना है कि बालसाहित्य के नाम पर अधिकांश जो कहानियां लिखी जाती हैं, वे पत्रपत्रिकाओं की मांग के अनुरूप होती हैं. पत्रपत्रिकाओं ने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार में में बड़ी भूमिका निभाई है. लेकिन नुकसान भी काफी किया है. इकीसवीं शताब्दी में भी अधिकांश संपादक मानते हैं कि बालक बड़ों का लघु संस्करण हैं. इसलिए वे बालक के व्यक्तित्व को छोटा मानकर बालसाहित्य को एक कोने से अधिक स्थान देने को तैयार नहीं होते. ‘बच्चों के लिए भी कुछ होना चाहिएइस नीयत के साथ वे बालसाहित्यकारों से लिखवाते हैं. लेखकों की मजबूरी हो जाती है कि वे उपलब्ध स्थान की सीमा को ध्यान में रखकर रचनाएं भेजें. चूंकि अखबारों में 1000-1500 से बड़ी बालकथा के लिए जगह नहीं होती, इसलिए यह धारणा बनी कि बालकहानी 1000-1500 शब्दों की होनी चाहिए. यही कारण है कि डॉ. राष्ट्रबंधु के दोतीन बार टोकने के बावजूद मैं उनके लिए लेख लिखने को तैयार न हो सका था.

बालसाहित्य समीक्षा’ की साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विशेषांक निकालने की परिपाटी बन चुकी थी. 2006 की घटना है. संभवतः मई या जून की. पत्रिका का अंक प्राप्त हुआ. उसमें कुछ विशेषांक निकालने की घोषणा थी. उनमें से एक विशेषांक ‘शिवकुमार गोयल’ के बालसाहित्य पर निकालने का प्रस्ताव था. घोषणा थी कि शिवकुमार गोयल के विशेषांक का संपादन ‘ओमप्रकाश कश्यप’ करेंगे. पढ़कर मैं बुरी तरह चैंका था. मैं बच्चों के लिए कहानीकविताएं लिख लेता था. हो सकता है इक्कादुक्का समीक्षात्मक लेख भी लिखा हो. बालकहानियां अवश्य छपी थीं, मगर ऐसा कुछ नहीं था कि मैं बालसाहित्य समीक्षा के विशेषांक का अतिथि संपादन कर सकूं. दूसरी समस्या शिवकुमार गोयल जी से अपरिचय की थी. हालांकि उनको पढ़ता अर्से से रहा था, मगर उनके बालसाहित्य से मेरा कोई परिचय नहीं था. तीसरी एक और समस्या थी. शिवकुमार जी की प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास में गहरी आस्था थी. उसी दृष्टि के साथ वे लेखन करते थे. जबकि मैं उसको संदेह की दृष्टि से देखता था. चैथे उम्र का अंतर. गोयल जी अग्रज पीढ़ी के रचनाकार थे. उनकी प्रतिष्ठा थी. ऐसे वरिष्ठ साहित्यकर्मी के बालसाहित्य पर मेरा जैसा अदना अनुभवहीन लेखक विशेषांक का संपादित करेयह उचित नहीं था. कोई संपादक ऐसा निर्णय कैसे ले सकता है? अवश्य कोई दूसरे ‘ओमप्रकाश कश्यप’ होंगे, यह सोचकर मैंने उस घोषणा को दिमागबाहर कर दिया था. लेकिन कुछ दिनों बाद ही डॉ. साहब का कानपुर से फोन आ गया. पता चला कि घंटी अपुन के गले में ही बांधी जानी है. बहरहाल मैंने उस विशेषांक का संपादन अपनी सोच के हिसाब से किया. राष्ट्रबंधु जी को लिख भी दिया कि वे जितना और जहां चाहें, संपादन कर सकते हैं. अंक आया और मैं देखकर हैरान था कि उसमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई थी.

अंक का विमोचन गोयल जी के आवास पर पिलखुवा में हुआ था. आयोजन में उपस्थित गणमान्यों की उपस्थिति में डॉ. राष्ट्रबंधु ने अपनी एक बालकविता सुनाई थी. ‘काले मेघा पानी दे. पानी दे गुड़धानी दे’ पूरी तरह डूबकर, मस्ती में खुले गले से गाई गई, लोकमन से उपजी इस कविता को सुनकर पूरी सभा स्तब्ध थी. बाद में श्रोताओं के आग्रह पर उन्होंने दूसरी कविता भी सुनाई थी. लेकिन मेरे मन पर पहली कविता की जो छाप पड़ी, उसका असर आज तक बाकी है. ऐसा नहीं है कि दूसरी कविता कमजोर थी. यदि साहित्यिक दृष्टिकोण से परखा जाए तो दूसरी कविता को शायद अधिक अंक दिए जाते. लेकिन पहली कविता की जो जमीन है, वहां जो मिट्टी की सौंधी गंध और अपनापन है, वह कहीं न कहीं डॉ. राष्ट्रबंधु की अपनी भी जमीन थी. इसलिए उस कविता में वे अपना पूरा व्यक्तित्व उंडेल पाए थे. एक श्रोता के रूप में वह मेरे जीवन की तो वह एकमात्र अविस्मरणीय बालकविता है ही.

उनका जन्म 1913 में हुआ था. साधारण परिवार में. पारिवारिक नाम था, कृष्णचंद्र तिवारी. बाद में पढ़ने से लेकर नौकरी करने तक संघर्ष की लंबी गाथा है. बताते हैं पेट भरने के लिए उन्होंने बूट पालिश और मजदूरी तक कह1960 से लेकर 1976 तक छतीसगढ़ के विद्यालयों में अंग्रेजी का अध्यापन किया. बच्चों के लिए दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं. इसके अलावा ‘बालसाहित्य समीक्षा’ का नियमित प्रकाशन. ‘बालसाहित्य कल्याण संस्थान’ द्वारा बालसाहित्य संवर्धन में निरंतर योगदान देते रहे. वे खूब यात्रापसंद थे. बालसाहित्य के लिए जीनेवाले उस चिर यायावर के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि उसकी अंतिम सांस भी उस समय निकले जब वह बालसाहित्य के संवर्धन के लिए सफर में हो. डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही विरले इंसान थे…..

ओमप्रकाश कश्यप

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