संत था॓मस मूर : पहला यूटोपियन

[हर संवेदनशील प्राणी अपने भीतर एक कल्पनालोक लिए चलता है, जिसमें वह एक ऐसे देश की कल्पना करता है जहां लोग उसकी भावनाओं को समझें, उनका सम्मान करें. जहां सब बराबर हों, जहां जाति, जाति, क्षेत्र, लिंग आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न होता हो. नागरिक स्वतंत्रतापूर्वक कहीं भी आ-जा सकते हों. ऐसा आदर्श कल्पनालोक, रूमानी संसार महज एक ‘यूटोपिया’ है, जो सिवाय सपनों के पूरी दुनिया कहीं भी नहीं है. था॓मस मूर ने सबसे पहले उसको पहचान दी थी. जीवन के अंतिम कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाए तो सत्ता के करीब, ऊंचे पदों पर रहने वाले मूर का पूरा जीवन शाही सुख-सुविधाओं के बीच शानो-शौकत के साथ बिताया था. सत्ता से नजदीकी का सुख भोगते उसने राजसत्ता के विरोधियों का मजाक उड़ाते हुए एक प्रहसन रचा था—‘यूटोपिया’ यानी कल्पनालोक. उस समय कौन जानता था कि अपनी राजभक्ति के कारण ‘यूटोपिया’ नाम से जो प्रहसन वह रच रहा है, वही उसकी वैश्विक ख्याति का कारण बनेगा. और उसकी जीवन-भर की सेवा, भक्ति-निष्ठा को भुलाकर राजसत्ता, बिना उसकी उम्र का खयाल किए, उसको राष्ट्रदोह के मुकदमे में फंसाकर मृत्युदंड का शिकार बना देगी. जो भी हो, अपनी पुस्तक को मूर ने जो नाम दिया, जो सपना उसने दिखाया, वही आगे चलकर परिवर्तनवादियों का गुरुमंत्र बन गया.
आखरमाला के गत दो अंकों में हमने मार्टिन लूथर किंग तथा जा॓न का॓ल्विन के बारे में लिख चुके हैं, इस बार पढ़िये आदि यूटोपियन था॓मस मूर के बारे में— ओमप्रकाश कश्यप.]

संत था॓मस मूर (7 फरवरी, 1478—06 जुलाई, 1535) की प्रसिद्धि मूलतः एक पुस्तक के कारण है, जिसमें उसने एक ऐसे राज्य की कल्पना की थी, जहां न कोई राजा होगा, ना ही प्रजा, न कोई छोटा होगा, न ही बड़ा. जहां धर्म अथवा क्षेत्रीयता के आधार पर कोई भेद नहीं होगा। जीवन में समरसता होगी और धार्मिक हस्तक्षेप नगण्य। कुल मिलाकर वह एक ऐसे समतावादी समाज की कल्पना थी, जिसमें सभी एकसमान होंगे। सुख-दुःख के समान साझीदार, जिसमें सभी साथ-साथ आगे बढ़ सकें। वह खुली आंखों का मनभावन सपना था, जिसे कोई भला और संवेदनशील इंसान, हर वह इंसान जो मानवीय अस्मिता को धन-दौलत तथा जमीन-जायदाद से कहीं ऊपर मानता हो, जिसके दिल में सभी के प्रति प्यार और सम्मान की भावना हो, देखता है—देखना चाहता है। था॓मस मूर ने ऐसा सपना न केवन स्वयं देखा, बल्कि अपनी पुस्तक ‘यूटोपिया’ के माध्यम से बाकी दुनिया के सामने भी रखा, जिसके आधार पर उस जैसे अनेक स्वप्नदृष्टा दार्शनिकों को, उन विद्वानों को जो दुनिया को बेहतर रूप में देखना चाहते थे, भविष्य निर्माण के लिए एक रास्ता मिला। यूटोपिया का महत्त्व तब और भी बढ़ जाता है, जब हम यह जानते हैं कि उसका लेखन पंद्रहवी शताब्दी में हुआ जब समाज धार्मिक और सामाजिक रूढ़ियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। राजनीति साम्राज्यवादियों और छोटे सामंतों के अधीन थी, जो अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए मनमाना व्यवहार करते थे।
था॓मस मूर का जन्म 7 फरवरी, 1478 को हुआ था। उसके पिता सम्राट के दरबार में प्रसिद्ध वकील थे। मूर की प्रारंभिक शिक्षा लंदन में ही हुई। बचपन से ही वह अत्यंत मेधावी था। उसकी प्रतिभा को देखकर उसके एक शिक्षक ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन वह विलक्षण महापुरुष बनेगा। आगे चलकर मूर ने आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय में तर्कशास्त्र तथा लेटिन भाषा का गहन अध्ययन किया था। उसके पश्चात वह लंदन चला गया, जहां उसने पिता की इच्छा के अनुपालन में वकालत की पढ़ाई करते हुए, 1501 में बेरिस्टर की उपाधि प्राप्त की। आगे चलकर वह एक कुशल लेखक, राजनयिक तथा कैथोलिक में विश्वास करने वाला नागरिक बना। लगातार तरक्की करता हुआ वह लार्ड चांसलर के पद तक पहुंच गया। इनसे उसको सुख और समृद्धि दोनों प्राप्त हुए। मार्टिन लूथर और जा॓न का॓ल्विन जैसे विद्वानों का, जो चर्च की व्यवस्था में सुधार चाहते थे, उसने हमेशा विरोध किया। कैथोलिकों का समर्थन करते हुए मूर ने लिखा कि परंपरागत व्यवस्था में सुधार से इंग्लैंड में सामाजिक एवं नैतिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उस समय तक मूर सम्राट के सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों में से एक था. उस समय कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि आगे चलकर उसी मूर पर राष्ट्रदोह का मुकदमा चलाया जाएगा, जिसमें उसको फांसी की सजा दी जाएगी.
सन 1501 में ही मूर बैरिस्टर के पद पर नियुक्त हो गया था, किंतु अपने पिता की मर्जी के विरुद्ध मूर की इच्छा चर्च में पुजारी बनने की थी। चार वर्षों तक लंदन के चार्टर्ड भवन में प्रवास के पश्चात उसने विवाह करने का निश्चय किया। सन 1505 में मूर ने जा॓न काल्ट नामक महिला से विवाह कर लिया, जिससे उसके चार बच्चे भी हुए। जा॓न का॓ल्ट अच्छी महिला थीं। दोनों का दांपत्य जीवन छोटा, मगर सुखमय रहा। बीमारी के कारण का॓ल्ट उसका लंबा साथ न दे सकी। सन 1511 में उसका निधन हो गया। उसके कुछ ही समय पश्चात मूर ने एलीस मिडिलेंटन(Alice Middleton) नामक एक धनी विधवा से विवाह कर लिया। एलीस की एक बेटी थी, जिसे मूर ने प्यार और सम्मान के साथ अपने परिवार में सम्मिलित कर लिया। इससे भी बड़ी बात यह है कि उसने एलीस की बेटी को उच्च शिक्षा ऐसे समय में दिलवाई, जबकि लड़कियों को पढ़ाने की समाज में परंपरा ही नहीं थी।
मूर और एलीस की कोई संतान नहीं हुई। कुछ ही दिनों में मूर आत्मसुख के प्रति उदासीन होने लगा। उसमें वैराग्य के लक्षण उमड़ने लगे। यही नहीं स्वयं को उत्पीड़ित करना उसका रोज का काम हो गया। वह बालों से बुनी कमीज पहनता तथा नियमितरूप से स्वयं को कोड़ों से सजा देता। आत्मसुख से बचने के लिए उसने भोजन में भी कमी कर दी। अपनी बाकी जिंदगी मूर ने इसी प्रकार कष्टों में रहकर, स्वयं को प्रताड़ित करते हुए बिताई।
सन 1510 से 1518 के बीच लंदन के एक अवर न्यायाधीश के साथ काम करते हुए मूर ने काफी ख्याति अर्जित की थी। परिणामतः सन 1517 में उसको सम्राट के सलाहकार के रूप में कार्य करने के लिए आमंत्रित किया गया। मूर की प्रतिभा और लगन से प्रभावित होकर उसको रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम के पास एक कूटनीतिक मिशन पर भेजा गया। मिशन की सफलता पर सम्राट हेनरी-अष्ठम ने उसको ‘सर’ की पदवी से विभूषित करते हुए शाही खजाने का दायित्व सौंप दिया। हेनरी अष्ठम के सलाहकार के रूप में कार्य करते हुए मूर, शासन पर अपनी पकड़ बना चुका था। सन 1523 में उसको ‘हाउस आ॓फ कामन’ का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। उससे दो वर्ष पश्चात ही मूर को उत्तरी इंग्लैंड का न्यायिक एवं प्रशासनिक दायित्व सौप दिया गया।
लगातार ऊंचे पदों पर रहते हुए मूर ने सम्राट के दरबार एवं समाज में खासी प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी। मगर उसकी प्रसिद्धि का मूल कारण बनी एक पुस्तक। लेटिन में लिखी गई इस पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद का नाम है— ‘आ॓न दि बेस्ट स्टेट आफ दि रिपब्लिक एंड आ॓न दि न्यू आइसलैंड आफ यूटोपिया।’ यह पुस्तक पूरी दुनिया में ‘यूटोपिया’ के नाम से ही जानी जाती है। पुस्तक की महत्ता एक नए शब्द यूटोपिया के कारण है। पुस्तक में फंतासी और किस्सागोई के माध्यम से एक ऐसे समाज की संकल्पना की गई है, जो आदर्श है। जहां ऊंच-नीच का भाव नहीं है और समाज में ऎक्य-भाव है। सब मिल-जुलकर बिना किसी द्वेषभाव के रहते हैं. जाहिर है कि ऐसा देश दुनिया में कहीं भी नहीं था.
ध्यातव्य है कि जिन दिनों इस पुस्तक की रचना की गई लगभग उन्हीं दिनों वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए आविष्कारों से पूरी दुनिया की अर्थव्यस्था के आधुनिकीकरण की शुरुआत हुई थी। परिणामतः समाज में एक नया वर्ग तेजी से पनपा, वह था पूंजीपति वर्ग। अपने लाभ के लिए इस वर्ग ने उत्पादन व्यवस्था का मशीनीकरण कर एक ओर जहां मानवीय श्रम एवं कौशल पर अपनी निर्भरता कम की थी, वहीं मन में पैठे डर तथा अपराधबोध के कारण, निवेश पर अपने लाभानुपात को पहले कहीं अधिक बढ़ा दिया था। बढ़े लाभांश को वह ‘निवेश पर लाभ’ की संज्ञा देता था तथा उसको अपने लिए आवश्यक मानता था। सुरक्षित भविष्य के नाम पर अधिक से अधिक लाभ कमाने की लालसा भी जोर पकड़ चुकी थी।
एक ओर यह वर्ग था जो संसाधनों तथा पूंजी के दम पर नई तकनीक एवं वैज्ञानिक आविष्कारों का लाभ उठा रहा था। दूसरी ओर समाज का गरीब तथा विपन्न वर्ग था, जो लगातार बढ़ती महंगाई एवं बेरोजगारी का शिकार था और किसी भी प्रकार उससे मुक्त होना चाहता था। चूंकि परिस्थितियां उसके विरुद्ध थीं, इसलिए बदलाव अधिकांशतः उसके सपनों तथा कल्पना की उड़ान के हिस्से ही आता था। इन दोनों के बीच एक मध्यवर्ग का विकास धीरे-धीरे हो रहा था, जो इस विपन्न वर्ग से ही उठकर आया था, बल्कि कह सकते हैं कि आर्थिक परिवर्तनों का लाभ उठाकर वह इस स्थिति तक पहुंचा था। वह वर्ग किसी न किसी प्रकार से पूंजीपतियों का सहायक बना हुआ था। स्वाभाविक रूप से इस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं इसे कुछ अलग करने के लिए उकसा रही थीं।
चूंकि समाज का लगभग सारा बौद्धिक नेतृत्व मध्यवर्ग के ही हाथों में था; यहां तक कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों को लाभप्रद स्थिति में बनाए रखने के लिए भी इसी वर्ग का योगदान सर्वाधिक था। अतः औरों से अलग दिखने और करने के लिए बौद्धिक आंदोलनों में हिस्सेदारी करना इस वर्ग स्वभाव जैसा बन चुका था। क्योंकि ऐसा करने से उसको शेष समाज की सहानुभूति और समर्थन मिलने की संभावना सर्वाधिक थी। दूसरे शब्दों में वह अपनी ही कुंठा से बाहर निकलना चाहता था, जो समाज के आर्थिक विभाजन की प्रक्रिया में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण जन्मी थी।
‘Utopia’ शब्द की व्युत्त्पत्ति ग्रीक शब्द ‘ou’ तथा ‘topos’ से हुई है; जिनका क्रमशः अर्थ है— ‘नहीं’ तथा ‘स्थान’। पुस्तक के शीर्षक से यह भी ध्वनित होता है कि था॓मस मूर ने अपनी पुस्तक के लिए संभवतः एक ऐसे द्वीप की कल्पना की थी, जो काल्पनिक है, दुनिया में जिसका कहीं अस्तित्व ही नहीं है। कुछ विद्वान Utopia के ‘u’ अक्षर को ‘eu’ का निकष् मानते हैं। ग्रीक भाषा में इस शब्द का एक अर्थ ‘श्रेष्ठ (Good)* भी है। इस प्रकार दोनों शब्दों का अभिप्राय हुआ—श्रेष्ठ स्थान। एक अन्य विचारधारा के अनुसार यूटोपिया शब्द का अर्थ ऐसे आदर्श एवं कल्याणकारी समाज से है, जिसका मनुष्य अक्सर सपना देखता है, जिसकी वह अपने लिए कामना करता है।
यूटोपिया के माध्यम से मूर ने ऐसे स्थान की संकल्पना की थी, जहां पर मनुष्य स्वेच्छा से नैतिक जीवन जीने के लिए आग्रहशील होता है। नैतिकता सदैव जीवन के मानक निर्धारण का कार्य करती है, वह मनुष्य के लिए सदैव एक लक्ष्य, एक आदर्श अथवा एक मनभावन सपने के समान होती है। इसलिए यूटोपिया में नैतिकता सदैव सम्मानीय बनी रहती है। यूटोपिया की संरचना के पीछे कल्पनाशील मध्यवर्ग का हाथ था। अतः आज वह एक कल्पनाशील, आदर्श, और सर्वसुखी, समरस समाज का प्रतीक बन चुका है।
थामस मूर के मन में इस शब्द का पहली बार विचार उस समय आया जब वह इरेस्मस के साथ ल्यूसियन की पुस्तक का ग्रीक से लेटिन में अनुवाद कर रहा था। उसका एक पात्र नाटककार मेनीप्पस है, जो अपराध जगत की हकीकत को जानने के लिए वहां वर्षों तक छिपकर रह रहा है। वह अपने रोज के अनुभवों को लिपिबद्ध करने का काम करता है। प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में भी ‘यूटोपिया’ शब्द का कई स्थान पर उल्लेख हुआ है।
सन 1515 में लिखी गई इस पुस्तक में मूर ने सम्राट हेनरी-अष्ठम के उस दावे का रचनात्मक विरोध किया था, जिसमें उसने स्वयं को इंग्लैंड के चर्च का सर्वेसर्वा बनाने का सपना देखा था। इस पर था॓मस मूर का भारी विरोध हुआ। उन दिनों तक मूर कैथोलिक था तथा सुधारवादियों की यह कहकर आलोचना करता था कि उनके विचारों को बढ़ावा देने से राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था को खतरा हो सकता है। अपनी मान्यता के पुष्ट करने के लिए चांसलर के पद पर कार्य करते हुए मूर ने अनेक पुस्तकों की रचना की, जिनमें उसने कैथोलिकों का बचाव करते हुए उनके विरोधियों की कड़ी आलोचना की थी। यही नहीं कैथोलिकों के समर्थन में मूर ने कई ऐसे निर्णय भी लिए, जो उसकी मुख्य पुस्तक ‘यूटोपिया’ में वर्णित विचारों के विरुद्ध थे।
उन फैसलों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मार्टिन लूथर के अनुयायी विलियम थिंडेल (William Tyndale), जो उन दिनों निर्वासित जीवन जी रहे था, के समर्थकों का सफाया था। थिंडेल ने बाईबिल का सुधारवादी दृष्टिकोण से अनुवाद किया था। उसकी पुस्तक ब्रिटेन में जोर-शोर से बांटी जा रही थी। अपनी राजभक्ति का परिचय देते हुए मूर ने थिंडेल के साथियों का न केवल पूरी तरह सफाया किया, साथ ही उसके चालीस से अधिक समर्थकों को कारावास में भेज दिया। अनेक सुधारवादियों का स्वयं मूर के घर में, उसकी देखरेख में पूछताछ के बहाने प्रताड़ित किया गया। निश्चय ही इससे सम्राट और कैथोलिक चर्च के अनुयायियों का समर्थन मूर को मिला तथा उसको सम्मानित भी किया गया।
सन 1513 से 1518 के दौरान मूर ने सम्राट रिचर्ड को लेकर ‘सम्राट रिचर्ड का इतिहास’ नामक पुस्तक पर काम किया, जो विलियम शेक्सपीयर के ‘रिचर्ड तृतीय’ से पूरी तरह प्रभावित थी। अभी तक मूर सम्राट हेनरी-अष्ठम का पूर्ण समर्थक और सहयोगी था। उसके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम तो अभी शुरू ही नहीं हुआ था; जिसमें चैंका देने वाली घटनाएं तथा हादसे थे। समस्या तब उत्पन्न हुई जब सन 1502 में बड़े भाई आर्थर, जो वाॅल्स का राजकुमार था, की मृत्यु के पश्चात हेनरी ब्रिटेन के ताज का उत्तराधिकारी बन गया। उसने अपने भाई की विधवा तथा स्पेन के राजा की पुत्री कैथरीन आ॓फ आ॓रगन से विवाह कर लिया। इस विवाह के पीछे हेनरी की कूटनीतिक मंशा स्पेन के साथ कूटनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाए रखना था। उसका यह कदम चर्च के अधिकारियों को नागवार गुजरा। इसलिए पादरी जूलियस द्वितीय ने कैथरीन तथा आर्थर के विवाह को ही बाईबिल की दृष्टि से अमान्य करार दे दिया। उस समय मूर ने हेनरी का ही साथ दिया, लेकिन करीब बीस साल तक साथ रहने के बावजूद कैथरीन हेनरी को उसका पुरुष उत्तराधिकारी देने में नाकाम रही।
इसी बीच हेनरी अन्ना बोलिन नाम की एक महिला जो उसकी पत्नी कैथरीन की दासी थी, के प्यार में पड़ गया। अब वह कैथरीन से विवाह-विच्छेद करना चाहता था। इसी मुद्दे पर पुनः विवाद हुआ, जिससे सम्राट हेनरी की पादरियों से ठन गई। इसी विवाद के दौरान उसने अपने सलाहकार कार्डिनल वा॓ल्स (Cardinal Wolsey) को हटाकर, सन 1529 में उसके स्थान पर मूर को नियुक्त कर लिया। इसके बाद हेनरी धार्मिक सुधारवादियों का यह कहकर समर्थन करने लगा कि पोप का अधिकार-क्षेत्र केवल रोम तक सीमित है और वह पूरी दुनिया के ईसाइयों के धर्मगुरु नहीं हैं।
इससे पहले तक मूर सम्राट हेनरी का समर्थक बना हुआ था। मगर जैसे ही सम्राट ने पोप की सर्वोच्चता पर सवाल खड़े करने शुरू किए, उसका सम्राट से मनमुटाव हो गया। उसने सम्राट से अस्वस्थता के आधार पर पदमुक्त करने का अनुरोध किया। सम्राट ने पहले तो इंकार किया, किंतु मूर की प्रार्थना पर कुछ दिनों बाद उसका त्यागपत्र स्वीकार कर लिया गया। राजसेवा से मुक्त होने के पश्चात मूर अध्ययन-लेखन में जुट गया। अच्छा ही होता अगर घटनाक्रम यहीं पर निपट गया होता और मूर को अपना बाकी समय लिखने-पढ़ने में बिताने का अवसर मिला होता। मगर मुख्य घटनाक्रम तो अभी शेष था, जिसमें मूर के जीवन की विडंबना छिपी हुई थी।
सन 1533 में मूर को सम्राट की ओर से एक निमंत्रण प्राप्त हुआ। समारोह में ऐनी बोलिन को इंग्लैंड की महारानी का ताज पहनाया जाना था। मूर ने उस समारोह मे जाने से इंकार कर दिया। इससे हेनरी उससे नाराज होे गया। उस घटना के कुछ ही दिन पश्चात मूर को गिरफ्तार कर लिया गया। उसपर रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए थे। आरोप मिथ्या थे, अतः समय बीतने पर वे खारिज हो गए। लेकिन मूर के विरोधी उसके पीछे पड़े हुए थे और वे सम्राट की नाराजगी का फायदा उठाकर, किसी न किसी प्रकार उसको दंडित करना चाहते थे।
सन 1534 में था॓मस मूर को एक बार फिर सम्राट के दरबार में अभियुक्त की तरह पेश होना पड़ा। इस बार उसपर ऐलिजाबेथ बार्टन नामक एक नन के साथ मिलकर सम्राट के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का आरोप था। बार्टन पर सम्राट के विवाह-विच्छेद के विरुद्ध भविष्यवाणी करने का भी आरोप था। इस बार मूर ने अपने पक्ष में एक पत्र का साक्ष्य दिया। वह पत्र उसने ऐलिजाबेथ बार्टन को लिखा था, जिसमें उसने उसको राज्य के मामलों में दखल न देने की सलाह दी थी। मूर का यह जबाव तर्कसंगत होते हुए भी अपर्याप्त माना गया।
उसी वर्ष 13 अप्रैल के दिन मूर को उत्तराधिकार अधिनियम के प्रति अपनी सहमति व्यक्त करने के लिए संसदीय आयोग के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश मिले। मूर मानता था कि संसद को उत्तराधिकार से संबंधित मामले निर्धारित करने का अधिकार है, मगर उसको लगा कि प्रस्तावित अधिनियम की कुछ शर्तें पोप के अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप करती हैं। अधिनियम के प्रति असहमति व्यक्त करने पर उसको कारावास के लिए भेज दिया गया। उसके लगभग साढे़ तीन महीने पश्चात 1 जुलाई, 1535 को मूर को एक आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसके सदस्यों में नए लार्ड चांसलर सर था॓मस आ॓डले के अतिरिक्त साम्राज्ञी ऐनी बोलिन के पिता, भाई तथा उसका एक चाचा भी शामिल थे। स्पष्ट है कि आयोग की सरंचना पक्षपातपूर्ण ढंग से मूर को दंडित करने के लिए ही की गई थी।
मूर आयोग के समक्ष उपस्थित तो हुआ, किंतु उसने आयोग द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने से इंकार कर दिया। तब था॓मस क्रामवैल ने जो उन दिनों सम्राट के सलाहकारों में सर्वाधिक शक्तिशाली था, सोलिस्टर जनरल रिचर्ड रिच को मूर पर लगे आरोप तय करने के लिए आमंत्रित किया। मुकदमे के गवाहों के सामने आयोग की नीयत साफ हो चुकी थी। उन्होंने यह कहकर कि उन्हें वह बाचचीत, जिसमें मूर ने सम्राट की सर्वोच्चता को चुनौती दी थी, ढंग से याद नहीं है, उसे बचाने का प्रयास किया। मगर आयोग तो मूर को दंडित करने का फैसला कर चुका था। एक पक्षपातपूर्ण एवं अमानवीय निर्णय लेते हुए आयोग ने मूर को मृत्युदंड की सजा सुना दी। सजा सुनाए जाने से पहले मूर ने साफ शब्दों में कहा कि मृत्यु प्रत्येक प्राणी की नियति है। कोई भी क्षणभंगुर व्यक्ति अमरता का स्वामित्व नहीं पा सकता।
मूर को मिली सजा सामान्य मृत्युदंड से भी कहीं अधिक भयानक थी। सजा में उसको फांसी के फंदे पर लटकाने, जलाने और काटने की सजा सुना दी गई। यह उन दिनों राष्ट्रदोहियों और विश्वासघातियों को दिया जाने वाला दंड था। जिसमें अपराधी को फांसी के फंदे पर लटकाने के बाद उसको मरने से पहले ही उतार लिया जाता था। उसके बाद उसकी आंखों के सामने उसके जननांगों एवं अंतड़ियांे को आग में जलाया जाता था। सजा के तीसरे चरण में सिर को धड़ से अलग कर, उसे लोगों की नुमाइश के लिए रख दिया जाता था। इस सजा को वीभत्स एवं अमानवीय मानते हुए 1870 में समाप्त कर दिया गया।
आलोचना से बचने के लिए सम्राट ने यहां एक कूटनीतिक चाल चली। जनसमर्थन हासिल करने के लिए उसनेमूर की सजा का स्वरूप बदलते हुए उसकी सजा को सिर कलम करने तक सीमित कर दिया। अंततः सम्राट के आज्ञा पर ही 6 जुलाई, 1535 को मूर को सजा के लिए फांसी के मचान तक ले जाया गया। फांसी लगने से पहले मूर के शब्द थे—
‘कोई भी आध्यात्मिक संत परमसत्ता का मुखिया नहीं बन सकता।’
मूर ने स्वयं को ‘सम्राट का अच्छा सेवक, जिसके लिए ईश्वर पहले है,’ बताया। उसकी लाश को आग के हवाले करने के पश्चात उसके सिर को ‘लंदन ब्रिज’ पर महीने-भर तक प्रदर्शन के लिए रखा गया। इससे पहले कि सिर को था॓मस नदी में बहा दिया जाए, मूर की बेटी माग्ररेट रोपर उसे वहां से ले जाने में सफल हो गई। जिसका उसने विधिवत संस्कार कर दिया।
इस मृत्युदंड के लिए सम्राट की चैतरफा आलोचना हुई। मूर के समर्थकों ने आगे चलकर उसके विचारों को फैलाने का काम किया। मूर के एक समर्थक कैथोलिक लेखक जी. के. केस्टरटन ने उसको ‘इंग्लैंड के इतिहास की एक महानतम विभूति’ के रूप में उल्लिखित किया है।

विचारधारा
थामस मूर की कैथोलिक धर्म में पूरी श्रद्धा थी, यह उसके जीवन से भी स्पष्ट हो जाता है। सम्राट हेनरी अष्ठम की सेवा में रहते हुए उसने धार्मिक सुधारवादियों का न केवल तीव्र विरोध किया, बल्कि उनके सफाये के लिए अभियान भी चलाए थे। यह विडंबना ही है कि जिस सम्राट के राज्य को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए मूर ने आजीवन प्रयास किया, उसी ने अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के चलते मूर को वीभत्स सजा का शिकार बना लिया। मूर के मित्र इरा॓समस् (Erasmus) का सुधारवादी आंदोलन से सीधा संबंध नहीं था, बावजूद इसके वह परंपरागत चर्च में सुधार चाहता था। इरा॓समस मूर का प्रशंसक था। मूर के मिले मृत्यृदंड के पश्चात उसकी पहली और सहज प्रतिक्रिया थी—
‘वह पवित्र था, वर्फ से भी अधिक पवित्र!’
इरा॓समस् मूर की प्रतिभा का कायल था। उसकी विद्वता को लेकर इरा॓समस् का मानना था कि—
‘इंग्लैंड में उसके जितना प्रतिभाशाली न तो कोई हुआ, न ही आगे होगा।’
इंग्लैंड में मूर के प्रशंसकों की कमी नहीं थी। मूर के जीवन और संघर्ष को लेकर 1592 में ‘सर था॓मस मूर’ शीर्षक से एक नाटक खेला गया था, जिसमें उसको इंग्लैंड का ‘एक ईमानदार और विद्वान राजनयिक’ (Wise and honest statesman) दर्शाया गया था। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं थी। अपनी योग्यता एवं प्रतिभा के बल पर ही मूर ने सम्राट के दरबार में अपनी जगह बनाई थी। यदि वह समझौतावादी होता तो राजदरबार से अपनी निकटता का लाभ उठाकर स्वयं को सत्ता में बनाए रख सकता था।
दरअसल था॓मस मूर का व्यक्तित्व विरोधाभासों से घिरा था। उसने एक ओर जहां परंपरावादियों का समर्थन करते हुए अनेक पुस्तकें लिखीं, वहीं यूटोपिया नामक पुस्तक लिखकर समाज को नई व्यवस्था का चेहरा भी दिखाया। कैथोलिक चर्च में अपनी आस्था के चलते मूर ने धार्मिक सुधारवादियों का विरोध करते हुए, राज्य की ताकत के बल पर उनके आंदोलन को कुचलने का भरसक प्रयत्न किया, वहीं दूसरी ओर अपनी पुस्तक में एक ऐसे समाज की संकल्पना भी की, जहां किसी भी प्रकार के धार्मिक दुराग्रह के लिए कोई स्थान नहीं होगा। जहां राजनीतिक और धार्मिक वर्चस्वता को चुनौती दी गई।
देखा जाए तो ‘यूटोपिया’ नामक पुस्तक के ही कारण मूर की ख्याति शताब्दियों बाद भी अक्षुण्ण रह सकी। अगर यह पुस्तक न लिखी गई होती तो उसकी कहानी भी अनेक सामान्य कहानियों के समान इतिहास की पुस्तकों में दबी रह जाती। मगर ‘यूटोपिया’ में उसने जिस संसार का सपना दुनिया के सामने रखा था, वह आने वाले दिनों में परिवर्तनवादियों के लिए एक लक्ष्य की तरह काम करता रहा। पुस्तक में एक शौकिया यात्री रा॓फेल एक ऐसे काल्पनिक राष्ट्र के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का वर्णन करता है; जहां निजी संपत्ति की अवधारणा ही नहीं है। वह धर्माडंबर में फंसे यूरोप के विवादित सामाजिक जीवन की खिल्ली उड़ाता है तथा एक ऐसे समाज की रूपरेखा सामने रखता है जो उससे कही अधिक व्यवस्थित, न्यायपूर्ण और विवेकवान है, जहां पूर्ण धार्मिक सहिष्णुता है तथा जीवन सामूहिक है। माक्र्सवादी विद्वान कार्ल (Karl Kautsky) ने अपनी पुस्तक ‘था॓मस मूर एंड हिज यूटोपिया’ में स्पष्ट किया है कि मूर की पुस्तक ‘यूटोपिया’ प्राचीन इंग्लेंड के आर्थिक एवं सामाजिक अंतर्विरोधों, विसंगतियों की विद्वतापूर्ण आलोचना है; तथा उसका स्थान समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले प्रारंभिक विद्वानों में सर्वोपरि है।
विद्वानों का मानना है कि शताब्दियों पश्चात कार्ल माक्र्स का एक आदर्श साम्यवादी राज्य का सपना मूर की पुस्तक यूटोपिया से ही प्रभावित था। यहां प्रश्न उठ सकता है कि प्रकट रूप में सत्ता का सुख लूटने वाला, सम्राट को खुश करने के लिए धार्मिक सुधारवादियों का विरोध करने वाला मूर अपनी कल्पना में उसके ठीक विपरीत राज्य का सपना क्यों देखता है? क्या उस समय वह स्वयं से भाग रहा था अथवा उसके राजसुख मानस और ईसाइयत में भीतर ही भीतर कोई अंतर्द्वंद्व चल रहा था? दरअसल इसी से मूर के वैचारिक अंतर्विरोधों को समझा जा सकता है; और यह अंतर्विरोध केवल मूर का ही नहीं है, इतिहास ऐसे अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है। ऐसे अनेक विद्वान हुए हैं, जिनके जीवन और विचारधारा में कोई साम्य नहीं था। बावजूद इसके उन्होंने विचारों के साम्राज्य में अपनी जगह बनाई। इंग्लैंड की तत्कालीन शासन व्यवस्था के घोर फा॓सीवादी चरित्र को देखते हुए ऐसा सोचना असंभव भी नहीं है। यह भी माना जाता है कि मूर ने अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए साहित्यिक माध्यम का सहारा लिया। जो भी हो यह एक बहस का विषय हो सकता है।
यह भी निर्विवाद सच है कि ‘यूटोपिया’ के माध्यम से मूर ने आधुनिक समाज की जो संकल्पना अपने राष्ट्र और समाज के सामने रखी, वह उसकी परिस्थितियों में अद्भुत थी। उसके इस सपने ने आगे आने वाली विद्वानों, दार्शनिकों की कई पीढ़ियों को प्रेरित करने का काम किया। लगभग साढ़े तीन सौ साल के बाद चर्च ने मूर के साथ हुए अत्याचार को स्वीकृति दी तथा एक लंबी बहस के पश्चात सन 1886 में पोप लियो-तेरहवें ने उसे सम्मानित करते हुए जा॓न फिशर के साथ ‘राजनीति का संरक्षक संत’ (Patron saint of politics) की पदवी से अलंकृत किया। सन 2000 में पोप जा॓न पा॓ल ने मूर को संत की उपाधि देते हुए उसे ‘राजनेताओं एवं राजनयिकों का स्वर्ग स्थित संरक्षक’ (Heavenly Patron of Statesmen and Politicians) की पदवी से अलंकृत कर चर्च को प्रायश्चित का एक और अवसर प्रदान किया।
मूर का समकालीन राबर्ट व्हिटिंटन उसके बारे में लिखता है—
‘मूर असामान्य रूप से बुद्धिमान, वाक्चातुर्य में देवदूत सरीखा था। मुझे उसके किसी साथी, समकालीन में जानकारी नहीं है, जो उसके समान भलमानसाहत और मनुष्यता की मिसाल हो। वह घोर संकट के समय मुस्करा सकता था, विपत्तिकाल में भी उसकी वाक्पटुता देखते ही बनती थी, तो किसी समय वह दुःखी भी हो सकता था। मूर वस्तुतः सदाबहार व्यक्ति था।’
मूर ने साम्राज्यवादी परिवेश में जन्म लिया, अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा उसी की सेवा को समर्पित कर दिया। लेकिन अपनी महान कृति ‘यूटोपिया’ के द्वारा वह समाज के वंचित और तिरस्कृत लोगों को नई उम्मीद के साथ, समानता और भाईचारे का जो संदेश देकर गया, उसने सतरहवीं और अठारहवीं शताब्दी के मानवतावादी आंदोलनों को नई प्रेरणा दी। इसलिए परिवर्तनवादियों में मूर का नाम सदा अविस्मरणीय रहेगा।

© ओमप्रकाश कश्यप

जान काल्विन: एक दुष्ट आत्मा, किंतु शानदार दिमाग

मनुष्यता  के इतिहास में सोलहवीं शताब्दी का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस शताब्दी में मनुष्य ने एक साथ कई मोर्चों पर काम की शुरुआत की। उनमें से अनेक में उसने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की थी। इसी शताब्दी में पहली सफल सामाजिकवैज्ञानिक क्रांति हुई, जिससे पहली बार मनुष्य ने धार्मिक जड़ता और रूढ़ियों के दायरे से बाहर आकर आमूल बदलाव का सपना देखा। यूरोप के कई देशों में जनशक्ति के उभार ने जनांदोलनों को जन्म दिया, जिसने अपने समय के महत्त्वपूर्ण बुद्धिजीवियों का ध्यान आकर्षित किया। मनुष्यता की इस विकास यात्रा में विज्ञान की निश्चय ही खासमखास भूमिका रही। वह इसमें कई रूपों में प्रेरक एवं सहायक बना रहा।

विज्ञान ने कई उपयोगी आविष्कार मनुष्यता को दिए, जिनके कारण सभ्यता के विकास को नई गति प्राप्त हुई। परंतु इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि नए चिंतन की शुरुआत भी इस शताब्दी में हुई। विज्ञान ने उत्पादन की नई तकनीक, विचारों को नई धार दी, जिनके आधार पर शताब्दियों से चली आ रही अनेक मान्यताएं धराशायी हो गईं। परंपराओं को लेकर नए सिरे से मंथन प्रारंभ हुआ। परिवर्तनवादियों को इसके लिए कई प्रकार के संकटों का सामना करना पड़ा। इससे उनका व्यक्तिगत जीवन भी तबाह हुआ। यहां तक कि कई को मृत्युदंड तो अनेक को निर्वासन का दंश झेलना पड़ा, किंतु उनके धेर्य और अनवरत संघर्ष ने अंततः परंपरावादियों को झुकने पर मजबूर कर ही दिया। प्रारंभ में असंभवसा दिखने वाला यह परिवर्तन स्वाभाविक ही था, क्योंकि मनुष्यता का इतिहास वर्तमान से असंतोष तथा अच्छाई के प्रति जिद ने लिखा है। इसलिए तमाम विरोधी वातावरण के वाबजूद परिवर्तन चक्र कभी रुकता नहीं है।

वैज्ञानिक शोधों ने मनुष्य को पहले से अधिक तार्किक और विवेकवान भी बनाया था। उसके हाथों में ज्ञान के ऐसे कारगर औजार उपलब्ध कराए थे, जिनके आधार पर वह अपने परंपरागत ज्ञान को परख सकता था; अर्थात उस समय, कुछ लोगों के लिए ही सही, अपने अनुभवों तथा परंपरा से प्राप्त ज्ञान को परखने के लिए वैज्ञानिकता एक महत्त्वपूर्ण कसौटी थी। उससे पहले तक मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करने, नई परंपराओं और आचारसंहिता को गढ़ने में धर्म की भूमिका बहुत मायने रखती थी। एक क्रूर सचाई यह है कि ज्ञान जब अपने परिष्कार की संभावना से दूर हो जाता है, जब वह केवल परंपरा मान लिया जाता है और जब यह मान लिया जाता है कि वह अपने आप में संपूर्णता का अंश है; तो वह मात्र एक रूढ़ि, एक ढकोसला, प्रदर्शनमात्र बन जाता है। यही खेल उन दिनों धर्म को लेकर हो रहा था। धर्म को लेकर यह स्थापित किया जा चुका था कि आदर्श जीवन पद्धति का वही एकमात्र सार है। उसके बिना नैतिकता का विस्तार संभव ही नहीं है। दूसरी ओर धर्म के नाम पर चारों ओर पाखंड की साम्राज्य था। चर्च और राज्यसत्ता ने सारी नियामक शक्तियां अपने हाथों में कैद कर ली थीं, इससे उनका लोगों के जीवन में हस्तक्षेप बढ़ा था। धार्मिक शक्तियों के हाथों में अधिक शक्ति आ जाने के कारण उसका दुरुपयोग भी होने लगा था।

ऐसे ही वातावरण में जाॅन काल्विन का जन्म हुआ। 10 जुलाई 1509 को फ्रांस के काॅविन, नियाॅन क्षेत्र में। उसके पिता का नाम थाµगेरार्ड काॅविन तथा मां थींµजिन्नी लेफ्रांस। पिता एटोर्नी के पद पर थे। सन 1517 में जब मार्टिन लूथर ने बाईबिल से चुने 95 सूक्तियों का पर्चा जारी कर सामाजिकधार्मिक क्रांति का सूत्रपात किया, का॓ल्विन केवल आठ वर्ष का था। वह जब मात्र चौदह वर्ष का था, जब उसके पिता ने कानून और मानवीयता की पढ़ाई के लिए उसको पेरिस विश्वविद्यालय में भर्ती करा दिया। सन 1532 में का॓ल्विन ने कानून में डा॓क्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की।

अध्ययन के दौरान ही उसकी विलक्षण प्रतिभा सामने आने लगी थी। उसकी रुचि धार्मिक और दार्शनिक विषयों में थी। छोटी अवस्था में ही उसने उपलब्ध धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर लिया था। का॓ल्विन ने पहली पुस्तक भी दर्शनशास्त्र पर लिखी। सन 1536 में वह जेनेवा चला गया। वहां रहते हुए उसका संपर्क विलियम फेरेल से हुआ, जो उन दिनों पुनरुत्थानवादियों में अग्रणी थे। फेरेल के आग्रह पर का॓ल्विन ने बैसेल की यात्रा की। सन 1538 से 1541 तक वह स्टेंसबर्ग में रहा। वहां से वापस जेनेवा में लौट आया; और बाकी जीवन वहीं रहकर बिताया।

का॓ल्विन का स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता था। कईकई बीमारियां उसे घेरे हुए थीं। पथरी के अलावा सिरदर्द और फेफड़ों की शिकायत भी उसको आजीवन बनी रही। इसीलिए उसने अपने एक मित्र से विवाह के लिए एक ऐसी लड़की की खोज करने को कहा था जो ‘विनम्र, आज्ञाकारी, अच्छी तरह से सेवा करने वाली, कम खर्च में परिवार चलाने वाली तथा सहनशील हो, किंतु घमंडी बिलकुल भी ना हो।’ सन 1536 में उसने इडेलिटा दि बउरे (Idelette de Bure) नाम की एक विधवा स्त्री से विवाह किया; जिसके अपने पहले पति से एक बेटा तथा एक बेटी थी। परंतु अपने साथ वह केवल अपनी बेटी को ले गई थी। 1542 में इडेलिटा ने का॓ल्विन के पुत्र को जन्म दिया जो मात्र दो सप्ताह जी सका। इससे का॓ल्विन को बहुत मानसिक आघात पहुंचा। वह दुःख में डूब गया। दुःख में उसको पत्नी से सहारे की उम्मीद थी; किंतु इडेलिटा भी अधिक दिनों तक उसका साथ न दे सकी। 1549 में उसका भी निधन हो गया। का॓ल्विन ने उसके बारे में लिखा है कि वह बहुत ही भावुक, स्नेहमयी और सहयोगी प्रवृत्ति की महान स्त्री थी; जिसने उसका हमेशा खयाल रखा। पत्नी के निधन का काॅल्विन पर बहुत बुरा असर पड़ा।

का॓ल्विन के एक उत्तराधिकारी थियोडोर बेजा के अनुसार खराब स्वास्थ्य के कारण वह वर्षों से दिनभर में केवल एक बार भोजन करता आ रहा था। केवल एक बार डा॓क्टर के परामर्श पर उसने एक अंडा तथा थोड़ीसी शराब ली थी। इतनी सावधानी और लगातार परहेज के बाद भी का॓ल्विन के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो सका। अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंतित मित्रों से उसने एक बार मजाक में कहा था—

क्या तुम चाहते हो कि ईश्वर जब मेरे पास आए तो मैं उसको भलाचंगा ही मिलूं?’

का॓ल्विन के मित्र और समर्थक उसको स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त देखना चाहते थे, जो कभी न हो सका। 27 मई 1564 को जेनेवा में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसको दिखावे से नफरत थी। वह चाहता था कि उसका अंतिम संस्कार बिना किसी दिखावे के चुपचाप कर दिया जाए। का॓ल्विन की इच्छा के अनुसार ही उसकी कब्र के लिए एकदम अनजानएकांत स्थल को चुना गया तथा पूरी सादगी के साथ उसे दफना दिया गया। उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए केवल उसकी कब्र पर केवल ‘जे. सी’ लिखवाया गया।विनम्रता का प्रदर्शन करते हुए का॓ल्विन ने तो स्वयं को लोगों से छिपाने की भरपूर कोशिश की परंतु उसके द्वारा किए गए सुधारॊं ने उसे लोगों का प्रिय बना दिया. लोग उसके नाम पर संगठित होने लगे, अमेरिका में आज भी का॓ल्विन के अनुयायियों की भारी संख्या है, जो स्वयं को का॓ल्विन का शिष्य कहलवाने में गर्व का अनुभव करते हैं.

विचारधारा

मार्टिन लूथर जब धार्मिकसामाजिक आंदोलन का आवाह्न कर रहा था, वे जा॓न का॓ल्विन के किशोरावस्था के दिन थे। ऐसे में का॓ल्विन का मार्टिन लूथर से प्रभावित स्वाभाविक ही था। मार्टिन के सुधारवादी आंदोलन से पे्ररणा लेते हुए उसने ईसाई धर्म का विधिवत अध्ययन किया। ईसा मसीह के विचारों से वह प्रभावित हुआ, किंतु उसने देखा कि चर्च में धर्मगुरुओं की कथानी और करनी में भारी असमानता है। का॓ल्विन का बाईबिल में विश्वास बढ़ता गया। बाईबिल को वह चर्च से ऊपर मानता था। उसका सुझाव था कि एक सरल एवं सात्विक जीवन बिताया जाए तथा उसके लिए कड़ी मेहनत की जानी चाहिए।

का॓ल्विन के विचार कहींकहीं भौतिकवाद की सीमाओं का स्पर्श करते हुए प्रतीत होते हैं। लेकिन इसके बावजूद वह मनुष्यता एवं नैतिकता को सर्वोपरि मानता था। उसका कहना था कि ईश्वर ने अपने परमानंद के लिए ही इस सृष्टि की रचना की है। इसलिए स्वर्ग की कल्पना व्यर्थ है। मनुष्य धरती पर रहकर ही स्वर्ग जैसी सुविधाएं जुटा सकता है। उसकी यह विचारधारा चर्च की तात्कालिक मान्यताओं के विरुद्ध थी। इसलिए का॓ल्विन को पादरियों तथा उनकी समर्थक राजसत्ता का कोपभाजन बनना बड़ा। इसकी परवाह न करते हुए उसने अपने सहयोगियों विलियम फेरेल तथा ऐंटोनी फ्रा॓मेंट के साथ मिलकर चर्च की व्यवस्था में सुधार की मांग की तथा उसके लिए पांच नियम भी बनाए। का॓ल्विन की इस मांग पर परंपरावादी बुरी तरह उखड़ गए। उसका चौतरफा विरोध होने लगा। स्थानीय नगरपरिषद ने का॓ल्विन और फेरेल को अपने चर्चविरोधी विचारों के लिए क्षमायाचना करने का निर्देश दिया। उसपर राजी न होने के कारण परिषद ने दोनों को जिनेवा से निष्काषित होने की सजा सुना दी। निष्काषन के पश्चात का॓ल्विन स्ट्रासबर्ग तथा फेरेल न्यूटा॓ल के लिए रवाना हो गए।

सरकारी दमन के बावजूद डटा रहा. बजाय झुकने के वह विचारों पर अडिग रहकर लगातार लेखन करता रहा। हालांकि उसने यह भी माना है कि खराब स्वास्थ्य के कारण वह अपने लेखन और अध्ययन पर अधिक ध्यान दे सका; जो कदाचित स्वास्थ्य के ठीक रहते हुए संभव न होता। अपने मित्र विलियम फेरेल के साथ मिलकर उसने नगरव्यवस्था में सुधारों की शुरुआत की, जिससे जनजीवन में उल्लेखनीय सुधार आया। उसका लाभ भी काॅल्विन को मिला तथा उसके समर्थकों की संख्या बढ़ती चली गई। हालांकि उसके विचारों पर निराशा की झलक बिलकुल साफ थी। स्ट्रासबर्ग में रहते हुए का॓ल्विन ने अध्यापन का कार्य किया। वहीं उसका महत्त्वपूर्ण लेखन संभव हो सका। कालांतर में उसके विचारों का असर हुआ और सन 1541 में उसे पुनः जिनेवा बुला लिया गया। अपने गृहनगर में लौटने के पश्चात का॓ल्विन ने चर्च की व्यवस्था में सुधारों के लिए काम किया, जिसमें उसको अपेक्षित सफलता प्राप्त हुई।

वह जीवन में धर्म के प्रभावों से परिचित था, साथ ही समझ चुका था कि समाज में आई कुरितियों के लिए धार्मिक संस्थान भी समानरूप से जिम्मेदार हैं. इसलिए वह धार्मिक सुधारों का पक्षधर था। उसका विश्वास था कि केवल आत्मज्ञान के सहारे ही ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है। उसका मानना था कि—

बिना आत्मज्ञान के ईश्वरीय ज्ञान असंभव है। हमारा ज्ञान भले ही यह कितना विश्वसनीय क्यों न जान पड़े, वास्तविक और यथार्थ ज्ञान से कापफी दूर है। वास्तविक ज्ञान मुख्यतः दो प्रकार का होता है पहला ईश्वरीय ज्ञान और दूसरा आत्मज्ञान यानी अपने बारे में जानना। ये दोनों परस्पर इतने सन्निकट और एकदूसरे के अंतरंग हैं कि दोनों में से कौन मुख्य है, कौन किसका जन्मदाता है, यह भेद कर पाना असंभव ही है।’

का॓ल्विन चर्च के मानवीय स्वरूप को बनाए रखना चाहता था। इसके लिए वह बाईबिल के आदर्शों का अनुपालन आवश्यक मानता था। लूथर की भांति का॓ल्विन का भी मानना था कि केवल बाइबिल, ना कि चर्च, मानवीय विश्वास तथा नैतिकता की कसौटी है। पापमुक्ति की संभावना स्पष्टतः व्यक्ति विशेष के भाग्य पर निर्भर करती है, न कि उसके द्वारा किए गए अच्छे कार्यों पर। मई 1959 में विलियम केसिल को लिखे गए एक पत्र में ईसामसीह के हवाले से उसने लिखा कि—

परमात्मा ने ईसामसीह के माध्यम से वचन दिया था कि समस्त साम्राज्ञियां चर्च की सेवा किया करेंगी।’

का॓ल्विन के विचारों का प्रभाव सबसे अधिक धर्मसंबंधी अवधारणाओं पर पड़ा। जिससे लोगों में अध्यात्म और धर्म के नाम पर किए जा रहे कर्मकांडों की समझ बढ़ी। परिणामतः धर्म के स्थान पर जनसरोकारों तथा मनुष्यता से जुड़े सवालों को महत्त्व दिया जाने लगा। उससे पहले तक भौतिकता के स्वाभाविक आग्रहों को हेय एवं सांसारिक कहकर नजरंदाज कर दिया जाता था। आनंद की कामना करना, दैहिक सुखों की ओर ध्यान देना, धार्मिक अपराध और चर्च के सिद्धांतों के विरुद्ध था। का॓ल्विन के प्रभाव से व्यक्तिगत सुख के प्रति लोगों का नजरिया बदला तथा उसको लेकर समाज की कुंठा में कमी आई, जिसने प्रकारांतर में भौतिक विकास को प्रोत्साहित करने का काम किया। इसका परिणाम नएनए आविष्कारों के रूप में सामने आने लगा। नतीजन सामाजिक विकास को गति मिली।

अपने विचारों के प्रचारप्रसार के लिए का॓ल्विन ने कई पुस्तकों की रचना की; जिनमें ‘इंस्टीटयूट्स आ॓फ क्रिश्चन रिलीजन’ प्रमुख है। यह पुस्तक उसने मात्र छबीस वर्ष की अवस्था में, लेटिन में 1536 में लिखी थी। पुस्तक छपने के साथ ही विद्धानों के बीच बेहद सराही गई। बाद में उसने स्वयं इस पुस्तक का फ्रेंच में अनुवाद किया। इस पुस्तक के अब तक अनगिनत संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। पुस्तक में वर्णित विचारों में आधुनिक उपभोक्तावाद के बीज देखे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त उसने धार्मिक महत्त्व की और भी अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उसका मानना था कि ‘बिना आत्मज्ञान के ईश्वरीय सत्य की पहचान असंभव है।

का॓ल्विन के चिंतन के आधार पर आगे चलकर उपयोगितावादी दर्शन का विकास हुआ। वह इस सृष्टि को मनुष्य की आनंदस्थली मानता था। उसका कथन कि, ‘इस संसार में घास का एक मामूली तिनका, सृष्टि का एक भी रंग ऐसा नहीं है, जिसका उद्देश्य मनुष्य का सुख पहुंचाना न हो।’

मार्टिन लूथर के सुधारवादी आंदोलन को उसने फ्रांस में विस्तार दिया। अमेरिका में जहां चर्च का प्रभाव उतना नहीं था, का॓ल्विन के समर्थकों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती चली गई। उसके विचारों के आधार पर बस्तियों की स्थापना हुई। वर्तमान पूंजीवाद को का॓ल्विन के सिद्धांतों का प्रसार ही माना जा सकता है। बाद में इसी को लेकर उसे अनेक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। वाल्तेयर ने का॓ल्विन के कार्यों की जहां भूरिभूरि प्रशंसा की है, वहीं उसने उसके धार्मिक विचारों की आलोचना करते हुए लिखा है कि ‘का॓ल्विन के पास एक दुष्ट आत्मा, किंतु शानदार दिमाग था।’ बावजूद इसके का॓ल्विन के विचारों की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। उसके अनुयायियों मे विलियम फेरेल तथा एंटोनी फ्रा॓मेंट  प्रमुख थे।

हिंदी बालसाहित्य : परंपरा एवं आधुनिक संदर्भ

तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो, लेकिन विचार नहीं. क्योंकि उनके पास अपने विचार होते हैं. तुम उनका शरीर बंद कर सकते हो, लेकिन उनकी आत्मा नहीं, क्योंकि उनकी आत्मा आने वाले कल में निवास करती है. उसे तुम नहीं देख सकते हो, सपनों में भी नहीं देख सकते हो, तुम उनकी तरह बनने का प्रयत्न कर सकते हो. लेकिन उन्हें अपने जैसा बनाने की इच्छा मत रखना. क्योंकि जीवन पीछे की ओर नहीं जाता और न ही बीते हुए कल के साथ रुकता ही है.’

बालमनोविज्ञान को उजागर करती, बच्चों में विश्वास दर्शाने वाली यह उक्ति खलील जिब्रान की है. कई शताब्दियों पहले कही कही गई यह बात आज भी उतनी ही सच एवं महत्त्वपूर्ण है जितनी कि उस जमाने में थी. मामूलीसी लगने वाली यह बात बालकों के मनोविज्ञान को पूरी तरह स्पष्ट करती है. यह उन साहित्यकारों पर एक असरकारक टिप्पणी है जो बच्चों को ‘निरा बच्चा’ मानते हैं तथा उन्हें जादूटोने या परीकथाओं जैसी अतार्किक रचनाओं द्वारा बहलाने का प्रयास करते हैं. उनके लिए भी जो यह सोचकर बच्चों के लिए नहीं लिखते कि इससे उनकी रचनात्मक मेधा को क्षुद्रतर समझा जाएगा या बालसाहित्यकार कहलाने से उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिल पाएगी जो कदाचित प्रौढ लेखन द्वारा संभव है. यह स्थिति कमोबेश हर भाषा में है. लेकिन हिंदी में संभवतः कुछ ज्यादा ही है. कुछ महीने पहले की एक घटना हैप्रतिष्ठित सरकारी संस्थान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में, कहानी प्रतियोगिता के अंतर्गत बच्चों को सम्मानित किया जाना था. वहां बच्चों तथा बड़ों में समान रूप से लोकप्रिय और एक ख्यातिलब्ध साहित्यकार से जब बोलने के लिए कहा गया तो उन्होंने जोर देकर कहा कि वे अपना हर आलेख पहले बड़ों के लिए लिखते हैं. बाद में उसी को बच्चों के लिए तैयार करते हैं. गोया उन्हें डर था कि एक बालपत्रिका के मंच से वक्तव्य प्रस्तुत करने के कारण उन्हें केवल बालसाहित्यकार न समझ लिया जाए. उन्हें लगा कि इससे उनकी प्रतिष्ठा घटेगी. एक अन्य वरिष्ठ साहित्यकार ने बालकहानियों की पुस्तक की भूमिका लिखने को केवल इसीलिए टाल दिया था कि कहीं पाठक उन्हें बालसाहित्यकार ही न मान लें. यह मानसिकता अधिकांश लेखकों की है. तथाकथित बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखने से प्रायः कतराते रहे हैं. कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने नाम का लाभ उठाते हुए बालसाहित्य के नाम पर अखबारों के लिए कुछ उल्टासीधा लिखा और कमाई की या उनके नाम का फायदा उठाते हुए प्रकाशकों ने उनका लिखा जो भी अल्लमगल्लम हाथ लगा उसे बालसाहित्य के नाम के साथ छाप दिया. जबकि बालसाहित्य लेखन उनके लिए ठलवार की चीज ही बना रहा. जिससे उनके बालसाहित्य में वैसी मौलिकता और ताजगी नहीं आ पाई जिनके कारण उनको साहित्यिक पहचान बनी थी. इन्हीं कुछ कारणों के चलते हिंदी में मौलिक बालसाहित्यलेखन की परंपरा विरल रही है.

ध्यातव्य है कि अन्य समाजों की तरह भारत में भी साहित्य श्रुति परंपरा से आया है. जिसमें बच्चों तथा बड़ों के साहित्य के बीच विशेष विभाजन नहीं था. सबसे पहले उसका स्वरूप लोकसाहित्य का था. वही उस दौर में लोगों के मनोरंजन का साधन बना. लोकगीतों मे जो सरस और सहज थे उन्हें लोरियों के रूप में बालमनोरंजन के लिए अपना लिया गया. कथासाहित्य के क्षेत्र में राजामहाराजाओं के जीवनचरित्र और पौराणिक विषयों को ही लंबे समय तक बालसाहित्य का पर्याय माना जाता रहा. आगे के वर्षों में भी यदि पंचतंत्र और हितोपदेश को छोड़ दिया जाए तो ऐसी कोई और कृति नहीं है जिसे विशुद्ध बालसाहित्य की कोटि में रखा जा सके. इनमें हितोपदेश तो पंचतंत्र की कहानियों का पुनप्र्रस्तुतिकरण ही है. हालांकि पंचतंत्र और हितोपदेश की कथाओं के आधार पर बालमनोविज्ञान के अनुरूप नईनई कहानियां सालोंसाल गढ़ी जाती रहीं हैं. आज भी न केवल हिंदी बल्कि दुनिया की अन्य भाषाओं के बालसाहित्य पर पंचतंत्र का असर देखा जा सकता है. मौलिक एवं बदलते समय की जरूरतों के आधार पर बालसाहित्य की रचना का कार्य हिंदी में अर्से तक नहीं हो सका. कारण साफ है. अशिक्षित तथा असमान आर्थिक वितरण वाले समाजों में जहां शीर्षस्थ वर्ग संसाधनों पर कुंडली मारे बैठा, भोग और लिप्साओं में आकंठ डूबा हो, समाज का बहुलांश घोर अभावग्रस्तता का जीवन जीने को विवश होता है. जिससे वहां कला एवं साहित्य की धाराएं पर्याप्त रूप में विकसित नहीं हो पातीं. ना ही उनके सरोकार पूरी तरह स्पष्ट हो पाते हैं. भारत में जहां का समाज करीबकरीब ऐसी ही स्थितियों का शिकार था, तार्किक सोच के अभाव का फायदा यथास्थिति की पक्षधर शक्तियों ने खुलकर उठाया और वे मौलिक बालसाहित्य के विकास में अवरोधक का कार्य करती रहीं. परिणामतः हिंदी बालसाहित्य में भूतप्रेत, भाग्यवाद, उपदेशात्मक कहानियों, राजारानी, जादूटोने, जैसे विषयों की भरमार रही. या फिर लोककथाओं की भोंडी प्रस्तुति को ही बालसाहित्य के नाम पर परोसा जाता रहा.

दरअसल, पंचतंत्र के समय से ही भारतीय बालसाहित्यकार इस मानसिकता के शिकार रहे हैं कि बच्चे नादाननासमझ हंै, उन्हें समझानेसुधारने की जिम्मेदारी सिर्फ उन्हीं पर है और अपनी रचनाओं के द्वारा वे इस दायित्व का निर्वहन करने में समर्थ हैं. याद कीजिए कि पंचतंत्र की पृष्ठभूमि में भी महिलारोप्य नामक वह राज्य है जहां का राजा बिगड़ैल राजकुमारों यानी अपने बेटों से परेशान है. जिन्हें सुधारने की उसकी सारी कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं. तब विष्णु शर्मा नाम का एक पंडित उन्हें सुधारने के दावे के साथ वहां पहुंचता है. निराश राजा अपने चारों पुत्रों को उनके हवाले कर देता है. विष्णु शर्मा उन्हें एकएक कर कई कहानियां सुनाते हैं. प्रत्येक कहानी में सबक, जीवन के लिए व्यावहारिक संदेश है. पुस्तक के अंत में चारों लड़कों के चतुरसुजान हो जाने का संकेत मिलता है. हालांकि आगे चलकर महिलारोप्य नामक राज्य का क्या हुआ, उन बेटों ने ऐसे कौनकौन से काम किए जिनसे उनकी विद्वता और समझदारी का संकेत मिल सके, इसका इतिहास में हमें कोई उल्लेख नहीं मिलता. हमें उन विष्णुशर्मा नामक महाशय की किसी और कृति के ना तो दर्शन होते हैं न ही उनके नाम से किसी अन्य कृति के होने का ऐतिहासिक उल्लेख है.

अगर हम पंचतंत्र के लेखनकाल को देखें जो हटेल के अनुसार लगभग दो सौ ई. पू. की रचना है, तो वह कालखंड भारतीय इतिहास में स्वर्णयुग के नाम से दर्ज है. उस समय भारत में समुद्रगुप्त का राज्य था. बौद्ध धर्म उससे तीन शताब्दियों पहले ही स्थापित हो चुका था और हीनयानमहायान से गुजरता हुआ वह अपनी दार्शनिक विचारधारा को परिपक्व करने में लगा था. उससे करीब दो शताब्दी पहले ही नागार्जुन शून्यवाद के माध्यम से बौद्ध दर्शन को तार्किक ऊंचाई प्रदान कर चुके थे. बौद्धों, जैनियों, वैदिक धर्माब्लंबियों तथा शैवों में परस्पर तर्कवितर्क होते रहते थे. एक प्रकार से वह महान बौद्धिक उपलब्धियों तथा राजनीतिक स्थिरता का समय था. जहां एक ओर चरक जैसे प्रखर आयुर्वेदाचार्य तथा वाराहमिहिर जैसे समर्थ खगोलविज्ञानी थे. वहीं दूसरी ओर कवि भास मुद्राराक्षस जैसी अमर कृति की रचना कर रहे थे. वैदिक साहित्य की परंपरा में भी कई महत्त्वपूर्ण उपनिषद् उस काल तक लिखे जा चुके थे. तर्कशास्त्र का निरंतर विकास होने से कपिल मुनि के न्याय और कणाद के वैशेषिक दर्शन की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी. अतएव बहुत संभव है कि ऐसे उच्च बौद्धिक वातावरण में पंचतंत्रकार ऐसी पुस्तक जिसके पात्र केवल जंगली जानवर हों और जो केवल बच्चों को ध्यान मे रहकर लिखी गई हो, को अपने नाम से सामने लाने की हिम्मत न जुटा पाए हों. तभी उन्होंने विष्णु शर्मा के छद्म(!) नाम से यह पुस्तक लिखी. उन्हें इस बात कदाचित आभास ही नहीं था कि एक दिन उनकी कृति दुनियाभर की चहेती पुस्तक बन जाएगी और उनका छद्म नाम ही सबकी जुबान पर होगा. चूंकि उस जमाने में स्वतंत्र बालसाहित्य की अवधारणा विकसित नहीं हो पाई थी. अतः कोई विलक्षण मेधा का धनी रचनाकार केवल बच्चों को ध्यान में रखकर लेखन करे, यह उस जमाने में मुश्किल रहा होगा.

किंतु इससे पंचतंत्र का महत्त्व कम नहीं हो जाता. युगांतरकारी कृतियां अक्सर देर से पहचानी जाती रही हैं. ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब किसी श्रेष्ठतम कृति का मूल्यांकन करने में वक्त लगा. वैसे भी प्रतीकों के माध्यम से संवादन की कला उस युग में प्रचलित नहीं हो पाई थी. वस्तुतः पंचतंत्र अपने समय से बहुतबहुत आगे की रचना थी. जिसका मूल्यांकन शताब्दियों के बाद किया जाना था. पंचतंत्रकार ने संभवतः अनजाने ही अपने मौलिक और सजर्नात्मक सोच से एक ऐसी कृति को जन्म दिया था जिसकी टक्कर की बालसाहित्य विषयक कृति दूसरी नहीं मिलती. इससे पहले साहित्यिक रचनाएं प्रायः देवताओं या राजामहाराजाओं को केंद्र में रखकर लिखी जाती थीं अथवा उनके पात्र समाज के उच्चवर्गीय और जानेपहचाने चरित्र होते थे. पचतंत्र के अनूठेपन के कारण ही देशविदेश की सभी भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ और इसके लेखक को जगतख्याति मिली. आगे चलकर यद्धपि कथासरित्सागर जैसी कृतियों ने इस कमी को पाटने का प्रयास किया. जिसको पर्याप्त सराहना और स्वीकृति भी मिली. किंतु उनकी रचना मूलतः प्रौढ़ पाठकों को ध्यान में रखकर की गई थी. चंूकि उन दिनों सारा का सारा बालसाहित्य मुख्यतः श्रुति परंपरा पर आधारित था. अतः कथासरित्सागर, जातक कथाएं, सिंहासन बतीसी, वैतालपचीसी, हितोपदेश, अकबरबीरबल के चुटुकले, तेनाली राम की कहानियां, गोपाल भांड के कारनामे, मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियां, ढोलामारूं, नलदमयंती के किस्से जैसी रचनाएं, श्रुति के माध्यम से ही वरिष्ठ पीढ़ी से बालपाठकों तक भी पहुंचती रहीं और बच्चेबूढ़े सभी उन्हें सुनतेगुनते रहे हैं.

बालमनोविज्ञान के अनुरूप सहज संप्रेषणीय एवं मौलिक साहित्य की संकल्पना, आधुनिक युग की ही देन है. यह बात भी ध्यान में रखने की है कि मध्यकालीन भारत यानी इतिहास का वह लंबा दौर जो विदेशी आक्रातांओं के हमलों, पराधीनता और भारी उथलपुथल का रहा है; उसमें बालसहित्य के क्षेत्र में बहुत कम काम हुआ है. यहां तक कि भारतेंदु तथा द्विवेदी युग में भी जब साहित्य की दूसरी विधाओं में नएनए प्रयोग हो रहे थे, बालसाहित्य के क्षेत्र में प्रायः जड़ता ही व्याप्त रही. जिन थोड़ेसे साहित्यकारों ने बालसाहित्य की धारा को नया मोड़ देने की कोशिश की, परंपरावादियों के वर्चस्व के कारण उनका प्रभाव बहुत सीमित रहा. इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि गुलाम मानसिकताएं प्रायः अपने भविष्य की ओर से मुंह मोड़े रहती हैं. उनमें अपने भविष्य निर्माण हेतु जरूरी चेतना का अभाव भी होता है.

ब्रिटिश उपनिवेश होने के कारण भारत में बौद्धिक जागरण की प्रक्रिया कतिपय विलंब से, उनीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में शुरू हुई. जिसमें परंपरा एवं संस्कृति की विशेषताओं को सहेजने के साथसाथ आधुनिक ज्ञानविज्ञान को अपनाने पर जोर दिया जाने लगा. विज्ञान के क्षेत्र में निरंतर हो रहे अधुनातन आविष्कारों ने उत्पादन प्रणाली को सरल और तीव्र बनाने में मदद की जिससे रोजगार के वैकल्पिक साधनों का विकास हुआ और लोगों की कृषि पर निर्भरता घटी. मगर तेजी से हो रहे नागरीकरण से बूढे और बच्चे अलगथलग पड़ने लगे. अभी तक वे एकदूसरे की मनोरंजन संबंधी जरूरतों को आपस में ही पूरा कर लेते थे. निरंतर बढ़ती व्यस्तता ने बच्चे और मातापिता के बीच की दूरियों में भी इजाफा किया. इस कारण बच्चों के अकेले पड़ते जाने का खतरा बढ़ता गया. चूंकि टेलीविजन उस समय तक अपने पांव पूरी तरह नहीं पसार पाया था. इसलिए मनोरंजन के नए माध्यम रूप में पुस्तकें समाज में अपना स्थान बनाने लगीं. मशीनीकरण के बाद जिन्हें छापना और पाठकों तक पहुंचाना पहले की अपेक्षा बहुत आसान था. इन सभी कारकों से बालसाहित्य के प्रचारप्रसार को बहुत बल मिला.

बालसाहित्य के विकास का दौर कहीं न कहीं गद्य के विकास से भी जुड़ा है. गद्य लेखन में बृद्धि और उसमें हो रहे नएनए प्रयोगों ने पद्य के शताब्दियों से चले आ रहे वर्चस्व को सार्थक चुनौती पेश की थी. चूंकि गद्य का संसार पद्य की अपेक्षा अधिक व्यापक और विविधतापूर्ण तो था ही, उसमें विचारों की स्पष्ट एवं त्वरित अभिव्यक्ति भी संभव थी. साथ ही गद्य लेखन के लिए पद्य जैसे अनुशासन की भी आवश्यकता भी नहीं थी. जिससे वैचारिक अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत व्यापक एवं सरल हुई. गवेश्षणात्मक लेखन और विचारों के सहज आदानप्रदान के लिए गद्य बदले समय की जरूरत बनकर लगातार लोकप्रिय होता चला गया. जिससे नए क्षेत्रों में काम करने का मार्ग प्रशस्त हुआ. पूर्वाग्रहयुक्त होकर इसका श्रेय हम भले ही अंग्रेजी भाषा को न दें परंतु सही मायनों में वह समय नए ज्ञान के उदय और तार्किकता के विस्तार का था. जिससे नए क्षेत्रों में काम की शुरुआत हुई. प्रकारांतर में उसका लाभ बालसाहित्य को भी मिला. उधर तेजी से सिकुड़ते जा रहे परिवारों मे बच्चे निरंतर महत्त्वपूर्ण होते जा रहे थे. अतः उनके मनोरंजन एवं मानसिक विकास के लिए ऐसे साहित्य की आवश्यकता थी जो केवल उन्हीं को ध्यान में रखकर गढ़ा गया हो. इसलिए केवल बच्चों को ध्यान में रखकर लिखने और छपने के काम को बढ़ावा मिला.

बदलते समय और संस्कृतियों के सम्मिलन के दौर में अन्य चीजों की तरह बालसाहित्य का भी आदानप्रदान हुआ. इसी दौर में साहित्य के आदानप्रदान की दर में भी तेजी आई. जिससे भारतीय रचनाएं विदेशों में फैलीं तो बाहर का बालसाहित्य भी हिंदुस्तान में आया. परिणामतः आलिफलैला, गुलीवर की रोमांचक कहानियां, ग्रिम बंधुओं की लोककथाओं और हेंस एंडरसन की परीकथाओं से भारतीय पाठकों का परिचय हुआ. शिशु, बालसखा, वानर जैसी कई स्तरीय बालपत्रिकाएं के अस्तित्व में आने से भारत में बालमनोविज्ञान के अनुरूप, बालसाहित्य लेखन को गति प्राप्त हुई. हिंदी बालकथा लेखन में मौलिकता की शुरुआत करने का श्रेय भी कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद को जाता है. प्रेमचंद के युग तक स्वतंत्र बालसाहित्य की संकल्पना पनपी ही नहीं थी. तो भी बालमनोविज्ञान को केंद्र में रखकर उनहोंने जिन थोड़ीसी कहानियों की रचना की है उनमें गुल्लीडंडा, बड़े भाईसाहब, ईदगाह, आत्माराम, पंचपरमेश्वर, पुरस्कार जैसी रचनाएं आज भी हिंदी बालसहित्य की बेजोड़ उपलब्धियां हैं. बालमनोविज्ञान की परख, कथानक की नवीनता और उसकी सहज प्रस्तुति द्वारा प्रेमचंद ने भारतीय बालसाहित्य को न केवल नई दिशा दी; बल्कि उसे समसामयिक जीवनमूल्यों से समृद्ध भी किया. पाठकों ने भी इन कहानियों को हाथोंहाथ लिया. हालांकि पे्रमचंद के समय और उनके बाद भी साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग लगातार ऐतिहासिक एवं पौराणिक कहानियों के प्रस्तुतीकरण की हिमायत करता रहा.

जहां तक हिंदी बालसाहित्य को स्वतंत्र पहचान मिलने का सवाल है उसकी शुरुआत आजादी के बाद और मुख्यतः छटे दशक से मानी जा सकती है. इस बीच हिंदी बालसाहित्य ने लंबी यात्रा तय की है. प्रकाशन संबंधी सुविधाओं, शिक्षा के प्रसार, वैज्ञानिक चेतना आदि के चलते आज बड़ी मात्रा में बालसाहित्य लिखा जा रहा है. इस बीच अनेक उत्कृष्ठ रचनाएं बालसाहित्य के नाम पर आई हैं. जिनपर हम गर्व कर सकते हैं. बालसाहित्य के प्रति परंपरागत सोच में भी बदलाव आया है. किंतु यह कहना आज भी बहुत मुश्किल है कि हिंदी बालसाहित्य खुद को अतीत के मोह से बाहर लाने में सफल रहा है. यहां अतीत के प्रति मोह से हमारा आशय परंपरा के प्रति दुराग्रहों और किसी भी प्रकार के बदलावों को नकारने की प्रवृति से है. आधुनिक बालसाहित्य में दो प्रकार की प्र्रवृतियां साफ नजर आती हैं. आज भी एक बड़ा वर्ग है जो परंपरा और संस्कृति के प्रति मोह से इतना अधिक ग्रस्त है कि उनमें किसी भी बदलाव की संभावना को नकारते हुए वह बारबार अतीत की ओर लौटने पर जोर देता रहा है. इस वर्ग के हिमायती साहित्यकार मानते हैं कि प्राचीन भारतीय वांड्मय में वह सबकुछ मौजूद है जो आज के बालक के मनोरंजन, शिक्षण तथा व्यक्तित्वविकास संबंधी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है और प्रायः राजारानी, जादूटोने, उपदेशात्मक बोधकथाओं, लोककथाओं की भोंडी प्रस्तुति और परीकथाओं के लेखन या पुनर्प्रस्तुति मात्र से ही वे अपने साहित्यिक कर्म की इतिश्री मान लेते हैं. इनसे भिन्न दूसरे वर्ग के साहित्यकार परंपरा से हटकर आधुनिक सोच और ज्ञानविज्ञान के उपकरणों से बालसाहित्य का मसौदा चुनते हैं और उपदेशात्मक लेखन के बजाए संवादात्मकता पर विश्वास रखते हैं.

दोनों ही वर्गो के लेखकों के अपनेअपने दुराग्रह हैं. लोकतांत्रिक तकाजे तथा ज्ञान के विस्तार की संभावना को देखते हुए मतांतरों का सम्मान भी किया जाना चाहिए. किंतु हैरानी तो तब होती है जब हम विद्वतजनों को अपनेअपने खेमे में बुरी तरह सिमटा हुआ पाते हैं. जिससे वे बाहर आना तो दूर वे पारस्परिक विमर्श के लिए भी तैयार नहीं होते. उनकी रचनाएं और अभिव्यक्तियां प्रायः दूसरे की आलोचनाप्रत्यालोचना तक सिमटी रह जाती हैं. दूसरे पक्ष की खूबियों को जानेसमझे बिना उसपर आरोपण का अंतहीन सिलसिला चलता रहता है. इससे उनका अपना भले ही कुछ अहित न होता हो लेकिन इससे साहित्य तथा समाज पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. एक तो इससे वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती. दूसरे मानवीय मेधा का क्षरण सामान्यतः गैररचनात्मक कार्यों में होता रहता है.

जादूटोने या परीकथाओं को लेकर हिंदी बालसाहित्य में बहस अर्से से चली आ रही है. बालसाहित्य में परीकथाओं के पक्षधर विद्वानों का तर्क है कि इनसे बालकों की कल्पनाशक्ति का विकास होता है. वे ये भी मानते हैं कि आधुनिक जीवनबोध से भरपूर परीकथाएं बच्चों की साहित्य संबंधी सभी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हैं. इसी प्रकार जादूटोने और नकारात्मक चरित्रों वाली कहानियों के द्वारा बालपाठकों को इस संसार की वास्तविक स्थितियों और पात्रों से परचाया जा सकता है. ताकि वे मानसिक रूप से खुद को परिस्थितियों से मुकाबले के लिए तैयार कर सकें. इस वर्ग का आरोप है कि यथार्थवादी दृष्टिकोण की कहानियां मनोरंजन के स्तर पर काफी कमजोर रह जाती हैं. वे बालकों के मन में नैराश्य की भावना उत्पन्न करती हैं. जिससे उनका स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होता है. उनका यह दृष्टिकोण भी एकांगी है. जादूटोने तथा अतिमानवीय शक्तियों का विस्तार आगे चलकर काॅमिक्स के रूप में सामने आया. जिससे हीमैन, स्पाइडर मैन जैसे अतिमानवीय चरित्रों को गढ़ा गया. भारत में शक्तिमान के नाम से भारतीय संस्करण तैयार किया गया. जिसका बच्चों ने भरपूर स्वागत किया. लेकिन ऐसे चरित्रों की लोकप्रियता के बावजूद यह माना जाता रहा कि ये बच्चों को यथार्थ से परे फंतासी की दुनिया में ले जाते हैं. जिनसे गुरजता हुआ बालक एक काल्पनिक दुनिया में रहने का आदी हो जाता है. यथार्थ के संपर्क में आकर उसका वायवी दुनिया का मिथक जब कभी टूटता है, जिसे कि स्वाभविक रूप से एक दिन टूटना ही है, तो बच्चे के दिल को भारी चोट पहुंचती है. ऐसी स्थितियां कभीकभी बहुत भयावह और मारक हो जाती हैं. इसलिए कामिक्स के आगमन के साथ ही उसकी आलोचनाएं होने लगी थीं. आज कामिक्स की बिक्री घटी जरूर है मगर कारण रचनात्मक साहित्य न होकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में कार्टून चैनलों की भरमार है. ऐसी अवस्था में वायवी कथानकों को बालसाहित्य का आधार बनाए जाने का कोई औचित्य नजर नहीं आता.

इसीलिए परीकथाओं के आलोचक मानते हैं कि ऐसे कथानक अंधविश्वास तथा रूढ़ियों को बढ़ावा देते हैं. बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा एवं तर्कशक्ति को कंुद कर उन्हें अविवेकी और रूढ परंपरावादी बनाते हैं. किंतु परीकथाओं के महत्त्व को एकाएक नकार पाना संभव नहीं है. निश्चय ही बच्चे बड़ों की अपेक्षा अधिक कल्पनाशील होते हैं. अतः स्वाभाविक रूप से वे उन कहानियों के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं जिनमें कल्पनाशक्ति का प्राचुर्य हो. बड़े होने पर यही गुण उन्हें प्रकृति के रहस्यों को जानने में सहायक सिद्ध होता है. साहित्य, कला ही नहीं यहां तक कि वैज्ञानिक आविष्कारों के लिए लिए भी कल्पनाशक्ति की आवश्यकता पड़ती है. कई वैज्ञानिक खोजें आदमी की कल्पना की उड़ान के दम पर ही संभव हो पाई हैं. लेकिन कल्पना या फंतासीयुक्त लेखन के लिए आवश्यक है कि कथानक के साथ विवेक और तार्किकता भी पर्याप्त रूप में जुडे़ हों. इनके अभाव में कल्पनाशीलता महज मायालोक ही गढ़ सकती है. जो बच्चों को सिवाय मतिभ्र्रम के और कुछ दे पाने में असमर्थ होगा. हैरी पा॓टर शृंखला की पुस्तकें इसका ताजातरीन उदाहरण हैं. ऊलजुलूल कथानक से भरपूर ये उपन्यास मनोरंजन की शर्त पर भले ही खरे उतरते हों किंतु अपने व्यापक प्रभाव में ये बच्चों को बरगलाने तथा उनके विवेक को कुंठित करने वाले हैं. इन्हें बाजारवाद की पोषक ताकतों द्वारा अपने शक्तिशाली प्रचारतंत्र की मदद से, विवेकहीन उपभोक्ताओं की पीढ़ी तैयार करने के लिए उतारा गया है. स्वस्थ बालसाहित्य के लिए मौलिकता एवं वैज्ञानिक दृष्टि जरूरी है. परीकथाओं के पक्षधर हिंदी साहित्यकार हैंस एंडरसन से प्रेरणा ले सकते हैं. जहां परीकथाएं आधुनिक जीवनबोध से हमेशा जुड़ी नजर आती हैं. और वे अपने समाज की खूबियों और खामियों से पाठकों को जोड़े रखती हैं.

इस बात में भी कोई दम नहीं है कि बच्चों के लिए लिखने के लिए पात्र अवास्तविक दुनिया से ही लिए जाएं. तभी बच्चे उसे रस लेकर पढ़ सकेंगे. बालक का कल्पनाशील दिमाग नएनए आसमान जरूर नापता रहता है. मगर उसकी सामान्य प्रेरणाएं अपने समाज से ही उपजती हैं. सूचनाक्रांति ने उसे पहले से कहीं अधिक तार्किक और चैतन्य बनाया है. वह अब स्कूली जीवन से ही समझने लगता है कि जादूगरी हाथ की सफाई से ज्यादा कुछ नहीं है. अतएव जादूटोने या परीकथाओं के रहस्यमय संसार से उस कुछ देर के लिए रोमाचित तो किया जा सकता है मगर उससे अधिक देर तक प्रभावित कर पाना संभव नहीं है. यदि जीवन की नकारात्मक स्थितियों से बालपाठकों को परिचित कराना जरूरी है तो उसके लिए पात्र वास्तविक जीवन से भी लिए जा सकते हैं. आधुनिक विज्ञान और बाजारवाद ने जहां जीवन को सुविधामय बनाया वहीं इसने अनेक विसंगतियों को भी जन्म दिया है. विज्ञान की दुनिया काल्पनिक होकर भी विश्वसनीयता के धरातल पर खड़ी होती है. उसके साथ संभाव्यता निहित होने के कारण वैज्ञानिक फंतासियों में आगत के प्रति एक तार्किक विश्वास भी जुड़ा होता है. अतः वैज्ञानिक खोजों को आधार बनाकर ऐसे साहित्य की रचना आसान तथा समीचीन भी है जो बालकों में कल्पनाशीलता को बढ़ावा दे. यही क्यों? विज्ञान के दुरुपयोग की आशंकाओं तथा तज्जनित त्रासदियों को लेकर भी बच्चों के लिए आधुनिक जीवनमूल्यों से भरपूर साहित्य की रचना की जा सकती है.

कभीकभी बच्चों को यथार्थ के नाम पर केवल मशीनी यहां तक कि आसपास के वातावरण की बोझिल कथानक वाली रचनाएं परोस दी जाती हैं. यानी उद्देश्यपरकता के नाम पर पठनीयता को दरकिनार कर दिया जाता है. ऐसे में ध्यान रखना जरूरी है कि साहित्य एवं तथ्यपरक लेखन में मूलभूत अंतर होता है. मनोरंजन साहित्य का प्रमुख उद्देश्य होता है. तथ्यपरकता के दबाव में कथ्य की रोचकता पर आंच आने पर साहित्य का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है. और यह भी जान लेना चाहिए कि तथ्यपरक लेखन के लिए दूसरे विषयों की भरमार है. उन्हीं से कुछ पल विश्राम पाने के लिए बालपाठक साहित्य की शरण में आता है. अतः यथार्थवादी लेखन के दबाव में कथानक इतना इतना नीरस भी न हो कि बालपाठकों को कहानी और स्कूल में पढ़ाए जाने वाले पाठयक्रम में कोई अंतर ही नजर न आए. ऐसी स्थिति में वह रचना से विमुख हो जाता है तथा पुस्तक से भागने लगता है. यदि किसी रचना को पढ़ पाना ही संभव न हो उसका उद्देश्य अपने आप बेकार चला जाता है. ऐसी रचनाएं ही बच्चों को कामिक्स तथा कार्टूनों के मायावी संसार में ले जाती हैं. जिनका वास्तविक दुनिया, उसकी समस्याओं और सवालों से कोई संबंध नहीं होता.

कुछ ऐसी ही बात लोककथाओं की बालसाहित्य में प्रस्तुति को लेकर कही जा सकती है. हिंदी ही क्यों दुनियाभर में लिखे जा रहे बालसाहित्य का अधिकांश हिस्सा लोककथाओं अथवा उनकी पुनर्प्रस्तुति से निसृत होता है. लोकसाहित्य किसी भी समाज की महत्त्वपूर्ण धरोहर होता है. लोकजीवन की विशेषताओं को अगली पीढ़ी तक ले जाने और उनके बीच सातत्य बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि बालक अपने समाज की परंपराओं तथा ज्ञान की विरासत से परिचित हों. ताकि सामाजिक अनुभवों का लाभ भावी पीढ़ियों को मिल सके. लोककथाएं पीढियों के बीच ज्ञान और अनुभव के संचरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं. अतः प्रारंभ से ही वे बालसाहित्य का जरूरी हिस्सा रही हैं. किंतु लोककथाओं के आधार पर बच्चों के लिए सृजन करते समय आवश्यक है कि विषयोंकथानकों का चयन बच्चों के आय वर्ग एवं रुचि के अनुसार ही किया जाए. भारत के संदर्भ में यही बात पौराणिक कथाओं की पुनर्प्रस्तुति के लिए भी की जा सकती है.

बच्चों के लिए लिखना आमतौर परकाया प्रवेश जैसा चुनौतीपूर्ण होता है. उसमें न केवल बालमनोविज्ञान को समझने जैसी चुनौती होती है बल्कि अपने से अधिक जिज्ञासु और ऊर्जावान मस्तिष्क की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होता है. ऐसा वही साहित्यकार कर पाते हैं जिनमें नया सोचने और उसको रोचक ढंग से प्रस्तुत कर की क्षमता होती है. जो अपने पूर्वाग्रहों को पीछे छोड़कर सृजनात्मकता बनाए रखते हैं. आज आवश्यकता मौलिक साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाने की है. यह काम परीकथाओं के माध्यम से भी हो सकता है, बशर्ते उन्हें आधुनिक संदर्भों से जोड़े रखा जाए. सृजनात्मक मेधा परीकथा, विज्ञान या अन्य किसी भी माध्यम का उपयोग अपनी मौलिक अभिव्यक्ति के लिए सफलता पूर्वक कर सकती है. जिनमें रचनात्मकता का अभाव है वे तो कंप्यूटर का उपयोग भी भविष्य जानने और जन्मपत्री बनाने के लिए करेंगे. यह अच्छी बात है कि हिंदी के कई बालसाहित्यकार ऐसे हैं जिन्होंने बालसाहित्य को रचनात्मक जड़ता से उबारने के लिए अपनी कलम का खूब इस्तेमाल किया. उन्होंने सृजनात्मक लेखन के साथसाथ भरपूर समीक्षात्मक लेखन भी किया; ताकि आने वाले साहित्यकारों किए एक कसौटी कर निर्माण हो सके. इनमें भूपनारायण दीक्षित, हरिकृष्ण तैलंग, हरिशंकर परसाई, मनहर चैहान, हरिकृष्ण देवसरे, जहूरबख्श, मस्तराम कपूर ‘उर्मिल, डा. प्रकाश मनु, रमेश तैलंग, देवेंद्र कुमार, शेरजंग गर्ग आदि के नाम उल्लेखनीय हैं.

आज आवश्यकता है कि हिंदी बालसाहित्य इन्हीं की परंपरा को निरंतर विस्तार दिया जाए. ताकि वे बच्चे जो टेलीविजन और इंटरनेट के कारण साहित्य से कट से गए हैं उन्हें वापस पुस्तकों की दुनिया में लाया जाए. यह जानते हुए कि पढ़ना एक चारित्रिक विशेषता है. जिसका अभ्यास धीरेधीरे तथा बचपन से किया जाता है, बच्चों के लिए ज्ञानविज्ञान और संवेदनशीलता से भरपूर मौलिक सामग्री उपलब्ध कराई जाए. इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा उपलब्ध करायी जा रही सामग्री बच्चों के ज्ञान और मनोरंजन संबंधी जरूरतों को तो निश्चय ही पूरा कर रही है. किंतु वह बच्चों को अपने समाज से काटकर उनमें एक खास दायरे में शामिल हो जाने की भूख भी पैदा कर रही है. वह दायरा है कामयाब उपभोक्ता का जिसमें अपने सुखसुविधा के लिए सभी कुछ खरीद लेने का सामथ्र्य है. घटती पठनीयता पर जारजार आंसू रोने वाले भी जानते हैं कि बालक के हाथों से पुस्तक का छूट जाना पूरी एक पीढ़ी को अपनी परंपरा तथा ज्ञान की धरोहर से वंचित हो जाने जैसी दुर्घटना है. अतः बालकों को ऐसा साहित्य उपलब्ध कराया जाए जो उन्हें परंपरा का अनुयायी बनाने की अपेक्षा उसका पोषक और अन्वेषक बनाए.

ओमप्रकाश कश्यप


मार्टिन लूथर : पाखंड के विरुद्ध पहला मोर्चा

 [अमेरिका के हालिया राष्ट्रपति चुनावों के दौरान मार्टिन लूथर किंग का नाम सुर्खियों में सामने आया. उनीसवीं शताब्दी के इस अश्वेत नेता ने एक अभूतपूर्व सपना देखा था. वह सपना था अमेरिका की रंगभेद की नीति को अंगूठा दिखाकर किसी अश्वेत के राष्ट्रपति बनने का. अश्वेत बराक ओबामा के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने और लूथर किंग का सपना पूरा होने में एक शताब्दी से अधिक समय लग गया. लेकिन मार्टिन लूथर किंग ने जिस सामाजिकराजनीतिक सपने की कामना की थी, वह उस अकेले का सपना नहीं था. उनसे भी लगभग चार शताब्दी पहले मार्टिन लूथर ने धार्मिकराजनीतिक वर्चस्ववाद से परे मानवमुक्ति का सपना देखा था. मार्टिन लूथर ने ही पहली बाद शब्दों की वास्तविक ताकत का अंदाजा कराया था, जैसी कि शायद उसको भी उम्मीद नहीं थी. तत्कालीन चर्च के धार्मिक पाखंड को सामने लाने के लिए मार्टिन लूथर ने बाईबिल के पिचानवें मूल संदेशों को छपवाकर जनता में वितरित कराया था. बस फिर क्या था, जनता के बीच एक ऐसा तूफान उठा, जिसने पुरानी जीर्णशीर्ण परंपराओं, पाखंडों और रूढ़ियों को जलाकर तारतार कर दिया. ऐसा नहीं है कि मार्टिन लूथर का विरोध न हुआ हो. यथास्थितिवादियों ने उसका जमकर विरोध किया, जनता को बरगलाने के आरोप भी लगाए. लेकिन वह अड़ा रहा. अंततः आखिर पाखंडियों को ही हार माननी पड़ी. मार्टिन लूथर सुधारवादी आंदोलन का अगुआ बन गया.

हम कोशिश करेंगे कि ‘आखरमाला’ के अगले कुछ अंकों में हम ऐसे ही कुछ विचारकों, सुधारवादियों के जीवनसंघर्ष और उनके विचारों की एक झलक अपने पाठकों को दिखा सकें, ताकि वे जान सकें कि तमाम बुराइयों और कमजोरियों के बावजूद आज हम पहले की अपेक्षा कितने बेहतर समय में रह रहे हैं. और यह भी कि जनकल्याण के लिए काम करने वालों को आरंभ में भले ही कितना विरोध सहना पड़े. लेकिन यदि उनकी इच्छाशक्ति मजबूत हो तो वे इतिहास को अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप बदलने में कामयाब हो ही जाते हैं. – ओमप्रकाश कश्यप ]

 

व्यवस्थाओं की प्रासंगिकता समय के साथसाथ घटतीबढ़ती रहती है। सृष्टि का संतुलन न बिगड़ पाए, इसके लिए नियति भी समयसमय पर नूतन व्यवस्थाएं अपनाती रहती है। यह व्यवस्था कभी तो अकस्मात हो जाती है, किसी चमत्कार के समान, तो कभी उसके लिए शताब्दियों तक प्रयास करने पड़ते हैं। मार्टिन लूथर का जन्म यूरोपीय समाज में ऐसी ही चामत्कारिक घटना थी। वह ऐसे समय में जन्मा जब पश्चिमी समाज में गरीबी, धार्मिक पाखंड एवं जोड़तोड़ का बोलबाला था। धर्म के नाम पर आडंबरों का साम्राज्य पसरा हुआ था, लोग चमत्कारों को पूजते थे। राजसत्ता विलासिताभरा जीवन जी रही थी, पादरी लोग जिनपर ईसाइयत को लागू करने की जिम्मेदारी थी, वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए धर्मिक रूढिवाद एवं पाखंड को विस्तार देने में लगे थे।

ऐसे विषम धार्मिक वातावरण में मार्टिन लूथर जन्मा, पला और बढ़ा। आगे चलकर उसने अपने समाज को सोये हुए समाज को जगाने का काम किया। उस समाज को जो धार्मिक पाखंडियों के जाल में बुरी तरह जकड़ा हुआ था, परिस्थितियां इतनी विषम थीं कि उसमें कोई भी सुधार असंभव दिखाई पड़ता था। लेकिन केवल दस वर्ष के अल्प समय में मार्टिन लूथर ने उस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया। वह सचमुच की क्रांति थी, जिसने लोगों को ऐसे जोश से भर दिया था कि चारों ओर धार्मिक आडंबरवाद के विरुद्ध आवाज उठने लगी। धार्मिकराजनीतिक जड़ व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में आक्रोश उभरने लगा। उस आक्रोश की चरम परिणति तब देखी गई जब एक जर्मन पुजारी ने हजारों वर्षों से राज करते आ रहे सम्राट के सीने में छुरा भोंक दिया। केवल दस साल में जर्मन समाज का ऐसा कायापलट हुआ, जिसके बारे में पहले से कल्पना कर पाना असंभव था।

पंद्रहवी शताब्दी के उत्तरार्ध में जन्मे लूथर को यूरोपीय नवजागरण का आदि पुरोधा माना जाता है। सोहलवीं शताब्दी में एक ओर तो पूरा यूरोप वैज्ञानिक क्रांति के दौर से गुजर रहा था। नएनए आविष्कारों ने उत्पादन व्यवस्था का पूरा चेहरा बदल दिया था। दूसरी ओर चर्च समेत सभी धर्मसंस्थानों का बुरा हाल था। जनता में बेहद गरीबी थी। लोग पोपलीलाओं के जाल में फंसकर अपना कर्तव्य भूले हुए थे। दूसरी ओर धर्म के नाम पर पादरी संपत्ति संचय मे जुटे रहते थे। चर्च तथा अन्य धर्मालय संपत्ति संचय के ठिकाने बन चुके थे। धर्म के नाम पर एक निकम्मा और परजीवी वर्ग समाज में पनप चुका था; जिसका काम लोगों को बरगलाकर अपना उल्लू सीधा करना था।

मार्टिन लूथर का जन्म 10 नबंवर 1483 को जर्मनी के आइसलेबेन नामक स्थान पर हुआ। उसके पिता का नाम था हैंस तथा मां थीं मादाम माग्रेट लूथर। पिता खेतीबाड़ी से घर चलाते थे। उनकी आमदनी कम थी। लूथर के जन्म के एक वर्ष बाद ही उसके परिवार को विस्थापन का दौर उस समय देखना पड़ा जब उसे आइसलेबेन को छोड़कर मेंसफील्ड में बसना पड़ा। वहां उसके पिता ने तांबे की खान में नौकरी कर ली। दिन बीतने लगे। गरीब हैंस अपने बेटे को लेकर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थे। वे चाहते थे कि लूथर एक वकील के रूप में काम करे, नाम कमाए। संयोगवश लूथर भी पढ़नेलिखने में तेज था। उसकी प्रारंभिक शिक्षा मेंसफील्ड में ही हुई। स्कूली शिक्षा के लिए वह मेडाबर्ग चला गया। उसके बाद उसने ऐरफुर्ट विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया। वहीं से उसने 1502 में स्नातक की परीक्षा पास की। परास्नातक की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करने के पश्चात लूथर अपने पिता की इच्छानुसार वकालत की पढ़ाई करने लगा। मगर नियति तो कुछ और ही तय कर चुकी थी उसके लिए। वक्त जो कुछ लूथर के माध्यम से कराना चाहता था, उसकी भूमिका स्वयं गढ़ चुका था। एक अनुभव ने उसकी सारी जिंदगी ही बदल दी।

उस घटना के बारे में लूथर ने स्वयं एक स्थान पर लिखा है कि

एक दिन जब वह का॓लेज से लौट रहा था तो अचानक बादल गड़गड़ाने लगे। वह कोई निर्णय ले पाए उससे पहले ही बादल जोर से गड़गड़ाएजैसे आसमान फट गया हो। सहसा तीर की तरह बिजली कड़की और लूथर की ओर तेजी से बढ़ी। वह बुरी तरह डर गया। घबराहट में उसके मुंह से चीख निकल पड़ी

बचाओ! संत अन्ना! मैं स्वयं को आपकी पूजा में रखूंगा।’1

अदृश्य को ही सर्वशक्तिमान मानकर लूथर ने तत्क्षण प्रतीज्ञा की। अंततः संकट टल गया। मन के सहज आवेग में लूथर ने जो वायदा किया था उसे वह भुला नहीं सका। मन में अध्यात्म के प्रति अनुराग उमड़ने लगा। वैराग्य के आगे किताबी ज्ञान छंूछा जान पड़ा। कुछ दिनों बाद ही उसने अपनी पुस्तकें बेच दीं। स्कूल छोड़ दिया, यहां तक कि परिवार और मित्रसंबंधियों का मोह भी त्याग दिया। सांसारिक जीवन से परे होकर लूथर ने स्वयं को चर्च की सेवा में पूर्णतः समर्पित कर दिया पूरी ईमानदारी, अंतर्निष्ठा, पूजापाठ, व्रतउपवास और श्रद्धासनातन के साथ! किंतु अध्यात्म के प्रति प्रगाढ़ अनुराग के बावजूद उसने अपनी तर्कशक्ति को कभी मंद नहीं पड़ने दिया। उसकी जिज्ञासा सदैव सच की पर्तों में झांकने का प्रयास करती रही। अध्यात्म के साथसाथ वैज्ञानिकता के प्रति लूथर का आग्रह बना रहा।

चर्च में आने के बाद लूथर ने वहां की असलियत को जानासमझा। इस बीच उसका पादरियों तथा अन्य धर्मगुरुओं से भी संपर्क हुआ। ईसाई धर्म में आस्था रखने वाले, प्रायश्चित की भावना के साथ चर्च में अनेक श्रद्धालु प्रतिदिन आते थे। लूथर का उनसे रोज ही संपर्क होता था। इससे उसे लोगों की मनोवृत्तियों को गहराई से समझने का अवसर मिला। वह लोगों की समस्याओं से गुजरता, फिर धर्मग्रंथों और धार्मिक परंपरा के आधार पर उनका हल निकालने का प्रयास करता। धीरेधीरे असलियत उसकी समझ में आने लगी। उसे प्रायश्चित का कर्मकांड महज एक नाटक, दिखावाभर लगने लगा। आखिर धर्मग्रंथ बाईबिल के गहन अध्ययन के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहंुचा कि गिरजाघरों में प्रभु ईसा मसीह और पापशमन के नाम जो हो रहा है, वह महज दिखावा है। उस कर्मकांड का बाईबिल की मूल शिक्षाओं ईसाइयत के आदर्शों से कुछ भी लेनादेना नहीं है, ना ही उससे मुक्ति के मानवीय लक्ष्य को प्र्राप्त कर पाना संभव है। चर्च में पादरी और बाकी लोग अपने स्वार्थ के लिए लोगों को बरगलाते रहते हैं। समाज का एक वर्ग जो कतिपय दूसरों से अधिक शक्तिशाली है, अपने स्वार्थ और लालच के कारण पाखंडी और चालाक पादरियों को अपनाए, सिर चढ़ाए रहता है।

कुछ दिनों बाद लूथर रोम की यात्रा पर निकल गया, जो उस समय पूरे यूरोप का सांस्कृतिक केंद्र माना जाता था। जहां की गौरवशाली परंपराओं से पूरा यूरोप स्वयं को कहीं न कहीं जुड़ा हुआ महसूस करता था। किंतु रोम पहुंचकर मार्टिन लूथर को और भी घनी निराशा हुई। उसने पाया कि कैथोलिक की राजधानी कहा जाने वाला रोम भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। इस घटना से बुरी तरह आहत लूथर को अपने ही धर्म के प्रति संदेह होने लगा। उसे लगने लगा कि इन परिस्थितियों में चर्च शायद ही किसी को मुक्ति प्रदान कर सके। घोर निराशा, मानसिक उद्वेलन, संघर्ष और चिंतनमनन के इन्हीं दिनों में लूथर अंततः बाईबिल के वास्तविक संदेश तक पहुंच ही गया। उसको लगा कि चर्च नहीं, यह मनुष्य का अपना ही विश्वास है जो उसको मुक्ति के मार्ग तक ले जा सकता है। आस्था यदि कमजोर है तो मुक्ति का मार्ग भी बहुत लंबा होना तय है।

इस आत्मबोध के पश्चात वह वापस लौट आया और धर्म को समझने के लिए फिर से बाईबिल के अध्ययन में जुट गया। कुछ ही समय बाद उसने बाईबिल की पिचानवें सूक्तियों का चयन किया; जिनमें वर्णित संदेश पूर्णतः स्पष्ट थे। उनका स्वरूप मानवीय एवं लोकोपकारी था। वे मनुष्यता को किसी भी प्रकार के कर्मकांड से ऊपर एवं महत्त्वपूर्ण ठहराते थे। लूथर ने उन सूक्तियों को एक कागज पर लिखा और उसकी प्रतियां लोगों के बीच वितरित करनी प्रारंभ कर दीं। उन सूक्तियों के प्रचार के साथ ही लूथर का नाम लोगों की जुबान पर आने लगा।

लूथर गरीब परिवार से आया था, इस कारण उसकी स्वाभाविक सहानुभूति जनसमाज के प्रति थी। धर्म के साथ व्यवहार करते समय वह पोप तथा चर्च के उस विधान की आलोचना करता था, जो जनता को धर्मभीरू तथा चमत्कार प्रिय बनाता था। तत्कालीन पोप की धन संचय की प्रवृत्ति को लक्ष्य करते हुए लूथर ने अपने संदेश में कहा भी थाµ

वह (पोप), सम्राट क्रोसस’ से भी अधिक धनवान है। उसके लिए उचित होगा कि उपदेश देने के बजाय, गिरजाघर को बेचकर उसका धन गरीब लोगों में बांट दे।’2

यह तत्कालिक धर्मसत्ता, जिसे राजसत्ता का अंधसमर्थन भी प्राप्त था, पर सीधा हमला था। इससे लूथर के अनेक दुश्मन पैदा हो गए, जिनके कारण उसको आगे चलकर अनेक परेशानियांे का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके वह अपने विचारों का अडिग बना रहा। धीरेधीरे उसके समर्थकों की संख्या बढ़ती चली गई। धर्म के नाम पर हो रहे शोषण और अनाचारों से खिन्न लोग उसके समर्थक बनते चले गए। मार्टिन लूथर का कहना था कि मन की पवित्रता बेहतर चीज है, लेकिन तभी तक जब वह हमारी सामाजिकता को पुष्ट करती हो, हमें अधिक नैतिक एवं संस्कारवान बनाती हो। ऐसी विचारधारा से निरंतर संपर्क बनाए रखने पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। उससे मुक्ति स्वाभाविक रूप से और भी निकट चली आती है।

लूथर एक क्रांतिकारी चिंतक था। उसकी प्रतिभा केवल ईसाई मान्यताओं को अधिक विवेकवान और तर्कसंगत बनाने तक ही सीमित नहीं है। वह अपने समय का श्रेष्ठतर वैज्ञानिक भी था। इस तथ्य को शायद ही कोई समझता हो कि छपाई मशीन का आविष्कार उसी ने किया था। यही नहीं अपनी आविष्कृत युक्ति का पहला प्रयोग करते हुए लूथर ने ही बाईबिल के पिचानवें संदेशों को छापने के लिए किया गया। लूथर द्वारा चुने गए संदेशों के साथ एक पर्चा पूरे यूरोप में एक घर से दूसरे घर, एक शहर से दूसरे शहर तथा एक देश से दूसरे देश तक फैलने लगा। जहां वह पर्चा समाप्त हो जाता, वहीं पर नए सिरे से छपवाया जाता। केवल तीन महीने में अपने क्रांतिकारी संदेश के साथ वह पर्चा यूरोप पर छा चुका था। अपनी कामयाबी पर टिप्पणी करते हुए लूथर ने एक स्थान पर लिखा है

मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि कागज का एक मामूली टुकड़ा रोम में इतने बड़े तूफान का कारण बन सकता है।’3

उन साधारण से लगने वाले संदेशों ने जर्मनी समेत पूरे यूरोपीय समाज में आग लगाने का कार्य किया। क्रांति की तीव्र लहर समाज में प्रवाहित होने लगी। लोग स्वार्थी पादरियों से नफरत करने लगे। लूथर को धर्म के नाम पर जनता को लूटनेवालों चालाक पादरियों, धार्मिक लोगों के कोप का सामना करना पड़ा, जो स्वाभाविक ही था। मगर स्थिति से समझौता कर, प्रतिरोधों के सामने झुक जाने के बजाय उसने संघर्ष का रास्ता अपनाया। धीरेधीरे उसे कामयाबी दिखने लगी। उसके प्रयासों से लोगों में तात्कालिक धर्मव्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश पनपने लगा। नए समाज की स्थापना के लिए पारंपरिक मान्यताओं में संशोधन की मांग की जाने लगी। परिणामतः सामाजिक परिवर्तन के पक्ष में एक तूफानसा उठ खड़ा हुआ। उस क्रांतिकारी दौर में लूथर ने बुद्धिमत्तापूर्वक अपने समाज का नेतृत्व किया। अंततः एक अपेक्षाकृत प्रगतिशील समाज की स्थापना में उसको सफलता भी मिली।

 

विचारधारा

मार्टिन लूथर एक क्रांतिकारी चिंतक, प्रखर बुद्धिमान और महान समाज सुधारक था। एक आकस्मिक घटना से प्रेरित होकर उसने स्वयं को चर्च की सेवा में समर्पित कर दिया था। वहां उसने पूरी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ काम भी किया। किंतु चर्च के निकट संपर्क में रहने के पश्चात उसे वहां पर व्याप्त भ्रष्टाचार और अनाचार की जानकारियां मिली थीं। उसे लगा कि जिस भावना से प्रेरित होकर वह चर्च की शरण में पहुंचा था, वहां के अंदरूनी हालात उसके ठीक विपरीत हैं। पादरियों की कथनी और करनी में भारी भेद है। सचाई, ईमानदारी, त्याग, समर्पण और नैतिकता जैसे सद्गुण केवल दिखावा हैं। पुजारी वर्ग विलासिता और पाखंड का जीवन जी रहा है, जबकि जनता भीषण गरीबी से मरी जा रही है। श्रद्धालुओं को धर्म के नाम पर अंधविश्वास तथा चमत्कारों की शिक्षा दी जाती है, जिससे समाज का अहित हो रहा है।

लूथर ने चर्च के संपर्क में रहकर वहां की कुरीतियों को समझा था। इस कारण उसके अनुभवों में सचाई थी। उसने हालात से समझौता करने के बजाय सुधार कार्यक्रमों को महत्ता दी। इससे उसका विरोध होना स्वभाविक ही था। लेकिन विरोध के दौरान भी वह अपने विचारों पर अडिग रहा। यहां तक कि जर्मन की धर्मसंसद के सम्मुख भी उसने, धार्मिक स्थलों पर पनप रहे भ्रष्टाचार और अनाचार के विरोध में बयान दिया। धीरेधीरे उसके विचार लोगों पर असर करने लगे। परिणामस्वरूप लूथर का प्रभाव भी बढ़ता चला गया।

ध्यातव्य है कि उन दिनों धार्मिक संस्थाएं अत्यंत अधिकारसंपन्न तथा शक्तिशाली थीं। निहित स्वार्थ के कारण राजसत्ता भी उनकी मूक समर्थक बनी रहती थी। धर्म की संकल्पना यद्यपि मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश का परिणाम थी, जिसे प्रासंगिक बनाए रखने के लिए नैतिकता से जोड़ दिया गया। कालांतर में धर्म और राजनीतिक करीब आते चले गए। राजसत्ता की देखादेखी धार्मिक शक्तियां भी संगठित होती चली गईं। मध्यकाल तक आतेआते उन्होंने अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली थी कि बाकी अन्य सामाजिक संस्थाएं, यहां तक कि राजसत्ता भी, उनके आगे बौनी और असहाय नजर आने लगी थी। यह स्थिति अकेले यूरोप में ही नहीं थी।

एशिया प्रांतर में भी धर्म अपने वास्तविक उद्देश्यों को भुलाकर लगभग आतंककारी भूमिका में आ चुका था। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए धर्म ने दर्शन से उसका रहस्यवाद तथा पारलौकिक जीवन से संबंधित कुछ मान्यताएं उधार लीं, तो औचित्य बनाए रखने के लिए उसने नैतिकता को अपना हथियार बनाया। प्रकारांतर में राजनीति एवं धर्म का गठबंधन मुक्त सामाजिकता के लिए एक चुनौती बनता चला गया। उत्पीड़क शक्तियों को धर्म के रूप में एक और हथियार मिल चुका था। स्वार्थी राजसत्ता के समर्थन के लिए धर्मगुरुओं ने पापपुण्य, स्वर्गनर्क जैसी भ्रामक संकल्पनाओं को जन्म दिया। इस गल्प के माध्यम से वे जनसाधारण का ध्यान असली मुद्दों से हटाकर उसे अंधविश्वासी और चमत्कार प्रिय बना सकें।

मार्टिन लूथर ने समाज को धार्मिक पोंगापंथ से उबारने के लिए सुधारवादी आंदोलन का नेतृत्व किया। स्वाभाविक रूप से इस कार्य में कुछ अड़चनें भी आईं, किंतु परिणाम सकारात्मक ही निकला। धार्मिक सुधार के लिए चलाया गया उसका आंदोलन प्रकारांतर में एक महान सामाजिक आंदोलन में ढल गया। लूथर के सर्मथकों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई। लेकिन विरोधियों की आंखों में लूथर कांटे की तरह गढ़ा हुआ था। वे उसके पर कतरना चाह रहे थे। उन्होंने धर्मसंसद के समक्ष लूथर की शिकायत कर दी। उसपर जनता के बरगलाने के आरोप लगाए गए थे। जर्मन इंपीरियल संसद ने लूथर को बुलाकर तत्काल बाज आने का निर्देश दिया। अमल न करने पर दंडित करने की धमकी भी दी। मगर लूथर पर तो मानो सुधारवाद जुनून सवार था। चर्च को संतुष्ट करने के बजाय आत्मविश्वास से भरपूर शब्दों में उसने कहा कि

मैं डरा हुआ नहीं हूं। भगवान की मर्जी तो होकर ही रहेगी, लेकिन एक नेक काम के लिए दुःख झेलकर मुझे बेहद प्रसन्नता होगी।’4

लूथर के उदारवादी विचारों का जादुई प्रभाव पड़ा, जिसने चर्च के हजारों वर्षों से चले आ रहे वर्चस्व को समाप्त कर दिया। धार्मिक सुधार केे लिए चलाया जाने वाला आंदोलन कुछ ही वर्षों में एक शक्तिशाली सामाजिक आंदोलन में ढल गया। मार्टिन लूथर का नाम परिवर्तन का पर्याय माध्यम बन गया। धार्मिक पाखंड के विरोध में चलाया गया उसका आंदोलन थोड़े ही वर्षों में जर्मनी की सीमाएं पार करता हुआ इंग्लैंड, स्विटजरलैंड, हालैंड, फ्रांस आदि अनेक देशों तक पहुंचा। इन देशों में का॓ल्विन तथा ना॓क्स ने लूथर के सिद्धांतों पर आधारित समितियों की स्थापना की तथा अपनेअपने देश में सुधारवादी आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिससे आगे चलकर पूरे यूरोप में सामाजिक क्रांति का सूत्रपात हुआ, वहां पर तर्काधारित एवं बौद्धिक रूप से चैतन्य समाज की स्थापना संभव हो सकी।

उधर इंग्लैंड में धार्मिक जड़तावादियों ने लूथर के सुधारवादी आंदोलन के विरुद्ध लंबा संघर्ष छेड़ दिया। सन 1524-25 . जर्मनी में कृषक विद्रोह अपने चरम पर पहुंच गया। लूथर की अभी तक की स्थापनाएं धार्मिक पाखंडियों के विरोध में थीं। चूंकि राजसत्ता और धर्मसत्ता एकदूसरे की पूरक और समर्थक बनी हुई थीं, इसलिए वर्षों से आंदोलनरत किसानों को लूथर द्वारा धर्मसत्ता का विरोध राजसत्ता का भी विरोध जान पड़ा। अतः उन्होंने अपना विद्रोह प्रदर्शन और तेज कर दिया। कुछ ही दिनों में विद्रोह की चिंगारी साबिया(Swabia) फ्रांसकोनिया(Franconia), तिरंजिया(Thuringia) आदि प्रांतों तक पहुंच गई। जर्मनी के असंतुष्ट राजनियकों का समर्थन भी मिलने लगा। परिणामस्वरूप वहां पर गृहयुद्ध जैसे हालात बन गए। उस समय लूथर ने राजसत्ता का पक्ष लेते हुए सरकार से जल्दी से जल्दी शांति स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को का अनुरोध किया। इससे उसकी चैतरफा आलोचना हुई। विद्रोही किसानों ने लूथर के इस कदम को विश्वासघात की संज्ञा दी।

1525 में जर्मन सरकार उस विद्रोह को दबाने में कामयाब हो गई। लेकिन लूथर ने सामाजिक पुनर्जागरण का जो आंदोलन शुरू किया था, वह कभी मंद न हो सका। कालांतर में आंदोलन की हवा अमेरिका तक जा पहुंची। वह उन दिनों नयानया बसा था, बल्कि बसने की प्रक्रिया में था। इंग्लैंड की अपेक्षा अमेरिका का समाज चर्च के वर्चस्व से दूर, अधिक उदार एवं खुला था। आधुनिकता से प्रेरित लूथर के विचार नए राज्य को प्रगति के पथ पर आगे ले जाने में सहायक थे। इसलिए वहां की जनता ने उनका जोरदार स्वागत किया। लूथर के विचारों के आधार पर अमेरिका में धार्मिक रूप से उदार गणतांत्रिक राज्य की स्थापना हुई।

उस समय लूथर जर्मनी में ही रह रहा था। वहीं पर उसने 13 जून 1525 की एक शाम कैथरीन वा॓न बोरा नामक स्त्री से विधिवत विवाह भी किया था। कैथरीन विवाह से पहले नन थीं और लूथर की प्रशंसक भी। लूथर ने ही चर्च से भाग आने में उसकी मदद की थी। कैथरीन से उसके संतान भी हुई, जिनमें तीन बेटे थे और इतनी ही बेटियां। लिखनेपढ़ने के अतिरिक्त लूथर को संगीत और बागवानी का भी शौक था। सन 1546 . में दिल के दौरे से उसकी मृत्यु हो गई, लेकिन उसकी वैचारिक चुनौतियां मृत्यु के बाद भी वर्षों तक हवा में गूंजती रहीं। खासकर उसका वह कथन, जिसमें उसने धार्मिक आडंबरवादियों को ललकारते हुए कहा था

मृत्यु के बाद मैं प्रेत बनना चाहूंगा, ताकि मैं वाचाल पादरियों, पुजारियों तथा पाखंडी साधुओं को सबक सिखा सकूं। उस समय तक और इतना तंग कर सकूं, जितना हजारों जीवित लूथर एक साथ मिलकर भी नहीं कर सकते।’5

लूथर ने पोप तथा उसके अनुयायियों से धर्म के नाम पर हो रहे अनाचार का विरोध करने का आवाहन किया। उसने कहा कि सहिष्णु होना अच्छा है। किंतु लोगों का शोषण एवं उत्पीड़न देखकर सहनशील बने रहना कायरता है। उसने कहा कि

ऐसी सहिष्णुताएं अत्यंत हानिकर हैं, जो यथास्थिति को बढ़ावा देने का कार्य करती हैं। क्योंकि वे अंततः मानवमुक्ति के अभियान को खतरे में डालने का कार्य करती हैं।’6

मार्टिन लूथर ने बाईबिल का जर्मन में अनुवाद किया। उसका अनुवाद सहज और आमआदमी के लिए उपयोगी था। इससे बाईबिल के संदेश घरघर तक पहुंचाने में काफी मदद मिली और उसको लेकर जो भ्रांत धारणाएं धर्मगुरुओं ने फैला रखीं थीं, उनमें कमी आई। अपने अध्यात्मिक विचारों को लेकर लूथर ने प्रश्नोत्तरी(Catechism) शैली में दो पुस्तकों की रचना की, जिनमें से लघु प्रश्नोत्तरी में उसने लिखा है कि

मेरा मानना है कि प्रभु ईसामसीह में मेरी आस्था, उसकी शरण में मेरा आना, किसी व्यक्तिगत कारण, श्रद्धा अथवा आंतरिक शक्ति से प्रेरित नहीं है, बल्कि स्वयं पैगंबर ने अपने आशीर्वाद से मेरे अंतर्मन में यह पवित्र प्रेरणा जाग्रत की है, महान देवदूत की वाणी ने मुझे स्वयं पुकारा है, अपने आशीर्वाद से मेरे अंतर्मन को पवित्र किया है और उसी ने मुझे सच्ची आस्था और विश्वास के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दी है।’7

मार्टिन लूथर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। आधुनिक युग की असली कहानी मार्टिन लूथर के बाद से ही प्रारंभ होती है। यह मानसिक गुलामी के अंत की शुरुआत की कहानी है। आधुनिक विकासवाद का वास्तविक नींव तभी रखी जा सकी, जब मार्टिन लूथर ने समाज को खोखले अध्यात्म से बाहर लाकर उसकी वस्तुनिष्ट विवेचना की। उसने आम आदमी के मन से उस भय को बाहर निकालने में भी सफलता प्राप्त की, जो उसको परलोक के काल्पनिक सुख के नाम पर उससे जीवन की सामान्य सुविधाएं भी छीन लेता था। अपने प्राणों की परवाह न करते हुए भी लूथर ने धार्मिक जड़ता के प्रतीक बन चुके तात्कालिक कैथोलिक चर्च के विरुद्ध लंबे संघर्ष का नेतृत्व किया। उसने आग्रहपूर्वक कहा भी कि

मानवीय आस्था एवं नैतिकता के संदर्भ में केवल बाईबिल ही परमसत्ता का प्रतीक है। चर्च के पादरीगण को यह श्रेय हरगिज नहीं दिया सकता। उस परमसत्ता की अनुकंपा केवल ईश्वर के आशीर्वाद से प्राप्त हो सकती है, न कि व्यक्ति विशेष के अच्छे कर्मों से।8

इस कथन में भाग्य, ईश्वरीय अनुकंपा एवं उसके आशीर्वाद पर बहुत जोर दिया गया है। इसके कारण मार्टिन लूथर पर आरोप लगाया जा सकता है कि पादरियों की भांति वह भी कहीं न कहीं रूढ़िवादी और परंपरा का पोषक था। इस आरोप में किंचित सच छिपा है। किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज से पांच शताब्दी पहले लूथर ने जिस प्रकार धार्मिक यथास्थितिवाद के विरुद्ध लंबा आंदोलन चलाया, वह अपने आप में अद्वितीय था। उसी के कारण आगे चलकर अमेरिका और ब्रिटेन आदि देशों में वैज्ञानिक समाज की स्थापना हो सकी।

मार्टिन लूथर का संघर्ष उस फासीवाद के पतन की शुरुआत की कहानी है, जिसने पूरे मध्ययुग को गहरे जकड़ा हुआ था। यह सच्चे अध्यात्म, मानवीय अस्मिता तथा वैचारिक स्वतंत्रता के सम्मान की कहानी भी है; और इन सबके साथसाथ लूथर की कहानी उस सपने की कहानी भी है, जो इकीसवीं शताब्दी का केंद्रीय विचार माना जाता है।

ओमप्रकाश कश्यप

 

 

1

  1.  

      He wrote, a lightning bolt struck near him as he was returning to school. Terrified, he cried out, “Help! St. Anna, I’ll become a monk.’ His life spared, he left law school, sold his books.’ – Martin Luther.

2

  1.  

      …he is richer than Croesus*, he would do better to sell St Peters and give the money to the poor people.- Martin Luther. (*A king (546 BC) of Lydia in Asia Minor, known for being very rich. People sometimes say that someone is ‘as rich as Croesus.’)

3

  1.  

      I would never have thought that such a storm would rise from Rome over one simple scrap of paper.- Martin Luther.

4

  1.  

      I am not afraid, for God’s Will will (sic) be done, and I rejoice to suffer in so noble a cause.”- Martin Luther.

5

  1.  

      When I die, I want to be a ghost…So I can continue to pester the bishops, priests and godless monks until that they have more trouble with a dead Luther than they could have had before with a thousand living ones. – Martin Luther, Small Catechism (St. Louis: Concordia Publishing House, 1943), 10.

6

  1.  

      …indulgences are most pernicious because they induce complacency and thereby imperil salvation.- Ibid.

7

    I believe that I can not by my own reason or strength, believe in Jesus Christ my Lord, or come to Him, but the Holy Ghost has called me by the Gospel, enlightened me with His gifts, sanctified and kept me in the true faith. – Martin Luther.

8

    That the Bible alone (not the church leadership) is the final authority for matters of faith and morals and that salvation is attained purely through grace without any contribution from the good works of the person in question. – Martin Luther.

 

संकट में दुकानदार

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देश का खुदरा बाजार इन दिनों हलचल में है. सफाई अभियान के नाम पर महानगरों में दुकानों को बंद किए जाने का सिलसिला पिछले दिनों लगभग हर रोज की चर्चा का विषय रहा. दिल्ली महानगर योजना-2001 के कार्यान्वन के तत्वावधान में आए अदालती फैसलों के आगे, सरकार और विपक्ष दोनों बाजार को बचाने के नाम पर बेनतीजा राजनीति करते रहे. सब के सब बिके हुए लोगकुछ अपने स्वार्थ के हाथों तो कुछ को विदेशी कंपनियों ने खरीद रखा है. इसके बावजूद बड़ेबड़े दावे, दरअसल अपने देश की राजनीति इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि नेताओं की बात पर न तो कोई विश्वास करता है, न मीडिया को छोड़कर कोई उनका नोटिस लेता है. जी हां, केवल नोटिस, उनकी बात को गंभीरता से अपना मीडिया भी नहीं लेता. नोटिस लेना उसकी मजबूरी है. अगर रोजीरोटी का सवाल न हो तो शायद वह उनकी ओर झांके तक नहीं.

 

इस बीच दिल्ली मास्टर प्लाॅन-2021 भी लागू किया गया. किंतु तस्वीर ज्यांे की त्योंनेताओं और सरकार की राजनीतिक रोआपीटी एक तरफ रही और प्रशासन दुकान बंद कराने का काम करता रहा. वर्षों से चले आ रहे भारीभरकम, सजीलेलजीले शोरूम एकाएक बंद कर दिए, किए जा रहे हैं. माॅल संस्कृति के विस्तार के आगे नत अपना मीडिया, चुप और निःसंवेद बना रहा, चूंकि खबरें दिखाना उसका पेशा है, इसलिए रेडियो, टेलीविजन इत्यादि पर खबरों का प्रदर्शन वस्तुनिष्ट ढंग से होता रहा. उसका सोच और संवेदना नई आर्थिक नीति के प्रतीक माॅल्स की पक्षधर ही बनी रही, क्योंकि उसको पूरेपूरे पेज के विज्ञापन केवल माॅल्स ही दे सकते हैं, गलीमुहल्ले में खुली दुकानें नहीं. नेतागण भी राजनीति के अवसर को छोड़कर चुप ही हैं. कारण साफ है, उनकी या तो किसी न किसी माॅल में प्रत्यक्ष या परोक्ष साझेदारी है अथवा उन्हें अपना भविष्य उधर ही नजर आता है. उन्हें धंधा भी चाहिए और चुनाव लड़ने के लिए चंदा भी. धंधे और चंदे को केंद्र में रखकर मतदाता को भरमाने का षड्यंत्रा अनेक रूपों मंे रचा जाता है. ऐसे सर्वभक्षी नेताओं को गलीमुहल्लों के दुकानदार सिवाय वोट के दे ही क्या सकते हैं. उस अदने से वोट के लिए भी दर्जनों पार्टियां हैं. कह नहीं सकते कि किसके हिस्से आए. तो माॅल्स को फायदा पहंुचाने के लिए जमेजमाए दुकानदारों को अपने स्थान से बेदखल करने के खेल की शुरुआत देश की राजधानी हुई. लेकिन माॅल्स और उनकी संभावनाएं केवल राजधानी तक सीमित नहीं हैं, इसीलिए मौके का फायदा उठाते हुए राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्रा में जितने भी विकास प्राधिकरण, नागरिक संस्थान हैं, तकरीबन सभी ने आवासीय इलाकों में खुली हुई दुकानों को बंद कराने का अभियान छेड़ा हुआ है.

 

आवासीय क्षेत्रों को व्यावसायिक गतिविधियों से बचाए रखना चाहिए, यह एकदम सही है. इसका कोई भी समझदार व्यक्ति समर्थन करेगा. किंतु इस समस्या के लिए अकेले वे दुकानदार ही दोषी नहीं हैं, जो आवासीय इलाकों में दुकान आदि खोलकर उनका कथित दुरुपयोग करने लगते हैं. हमारे विकास प्राधिकरणों की नीतियां तथा उनमें पल रहा भ्रष्टाचार भी इसके लिए कहीं न कहीं उत्तरदायी है. यह भी सच है कि आवास कालोनी बसाते समय सभी विकास प्राधिकरण स्वाभाविक रूप से दुकानों तथा अन्य जनसुविधाओं का प्रावधान रखते हैं, किंतु देखा यह गया है कि आवासीय कालोनी के विकास और उसके लिए सुव्यवस्थित बाजार के निर्माण के बीच दस से पंद्रह साल का अंतर होता है. अगर दुकानें बना भी दी जाएं तो उनके मालिक उस समय तक दुकान खोलने से कतराते हैं, जब तक कालोनी न्यूतम स्तर तक विकसित न हो जाए. इस अवधि में लोगों की जरूरतों को पहचानते हुए लोग आवासीय परिसरों का उपयोग दुकान आदि व्यावसायिक गतिविधियों हेतु करने लगते हैं. जाहिर है इनमें बड़ी संख्या बेरोजगारों, नौकरी से रिटायर्ड उन जरूरतमंद लोगांे की होती है, जो आजीविका के लिए या खाली समय में कुछ आय के बहाने कोई न कोई धंधा लेकर बैठ जाते हैं. जिनके पास इतनी पूंजी नहीं होती कि मान्य व्यावसायिक परिक्षेत्रों में दुकान आदि का प्रबंध कर सकें. चूंकि काॅलोनी के लोगांे की जरूरतें भी उनसे जुड़ी होती हैं, इस कारण प्रारंभ में सब उन्हें सहजता से ही लेते हैं. काॅलोनी विकासमान अवस्था में होती है, इसलिए प्रशासन अथवा स्थानीय संस्थाएं भी उसे नजरंदाज कर देती हैं. हालांकि इस बहाने इंजीनियर तथा अन्य प्रशासनिक कर्मचारी अपनी स्थिति का फायदा उठाते हुए लोगों को निरंतर लूटते रहते हैं.

 

परेशानी तब होती है जब बस्ती की जनसंख्या के साथसाथ वाहनों की भीड़ तथा दुकानोें की संख्या भी बढ़ती चली जाती है. जमीनों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. उस समय प्रशासन को वहां पर दुकाने अलाॅट करने या व्यावसायिक गतिविधियों के नाम पर खाली पड़ी जमीन की नीलामी से मोटी रकम कमाने की सुध आती है. स्पष्ट है कि इस बीच प्रशासन से साठगांठ कर कुछ नेता और दलाल भी आवासीय

 

कालोनियों में पनपने लगते हैं. उनकी निगाह कालोनी में खाली पड़ी महंगी व्यावसायिक जमीन पर होती है. मोटी रकम खर्च करके व्यावसायिक स्थल का प्रबंध करने वाले व्यवसायी चाहते हैं कि आवासीय परिसरों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियां बंद हों, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लाभ कमा सकें. उसको किसी न किसी प्रकार हथिया लेने के लिए वे शासनप्रशासन के साथ जोड़तोड़ करके कानून और नैतिकता के साथ खिलवाड़ करने लगते हैं.

 

आवासीय कालोनियां जो वक्त के साथसाथ अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहती हैं, उनको इस स्थिति तक लाने में कहीं न कहीं उन दुकानदारांे का भी योगदान होता है, जो प्रारंभ में भले ही अपने व्यावसायिक हित अथवा रोजगार की खातिर, दुकान के माध्यम से रोजमर्रा की वस्तुओं को उपलब्ध कराके, लोगों को वहां आकर बसने के लिए प्रेरित और आकर्षित करते हैं. यह दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रा में बसी उन कालोनियों के बारे में भी सच है, जो वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने को आतुर हैं. अगर प्रशासन आवासीय इमारतों के साथसाथ व्यावसायिक स्थल विकसित करने तथा उनका इस्तेमाल करने का समानरूप से प्रयास करे, तो आवासीय परिसरों में दुकान खोलने जैसी समस्या संभवतः जन्म ही न ले. वैसी स्थिति में लोगों की आवासीय परिसरों में दुकान खोलने की हिम्मत ही न पड़ेगी, क्योंकि वहां चल रही दुकानंे व्यवस्थित बाजारों से स्पर्धा कर पाने में असमर्थ रहेंगी तथा वहां पर दुकानदारी करना प्रायः घाटे का सौदा सिद्ध होगा. लेकिन सभी जानते हैं कि दक्ष व्यवसायी घाटे के सौदे से हमेशा बचते हैं. इसलिए नई कालोनियों में वे प्राधिकरण से दुकान खरीदकर भले ही डाल दें, उसको चलाने की जहमत वे तब तक नहीं उठाते, जब तक की एक तयशुदा लाभ की सुनिश्चितता न हो. जब काॅलोनी भर जाती है तो वही दुकानदार अपने धन और पैठ के कारण जड़ जमा चुके दुकानदारों को उखाड़ने पर उतारू हो जाते हैं. चूंकि कानून और प्रशासनिक फैसले उनके पक्ष में होते हैं, अतः उन्हें अपने लक्ष्य में कामयाबी भी मिलती है. एक तरह से तो यह कानून की ही जीत होती है, परंतु इस जीत के लिए अक्सर जमेजमाए लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ना पड़ जाता है. अच्छेभले घर तबाह हो जाते हैं. बेरोजगारी बढ़ती है. कर्ज से घबराकर लोग आत्महत्या करने लगते हैं, जो लोग बेरोजगारी का सामना करने में विफल रहते हैं, उन्हें परिस्थितियां कभीकभी अपराध की दुनिया मंे ढकेल देती हैं.

 

देखा जाए तो यह इकतरफासी लड़ाई जरूरतमंदों तथा बड़े दुकानदारों, सरमायेदारों के बीच है. बड़े दुकानदारों से आशय उन व्यवसायियों तथा वाणिज्यिक संस्थानों से है जिनके पास पूंजी का बफर स्टाॅक है, जो किसी उदीयमान कालोनी में दुकान खरीदकर उसके विकसित होने का इंतजार कर सकते हैं, जो व्यावसायिक स्थलों पर बड़े शोरूम खोलकर चल पूंजी को अपनी ओर खींचने तथा अपने उत्पादों के लिए नई जरूरतें क्रिएट करने का सामथ्र्य रखते हैं. हालफिलहाल यह संकट केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित था. कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले छोटेमोटे दुकानदार इसकी आंच से बाहर थे. किंतु अब स्थितियां बदल रही हैं. बहुत जल्दी गांव के दुकानदार भी इसकी चपेट में आने वाले हैं. दोनों के मूल में ताकतें एक जैसी ही हैं. इधर कुछ वर्षों से खुदरा बाजार में संगठित क्षेत्रा का आगमन हुआ है, इनमें बड़ीबड़ी कंपनियां हैं, जिनका व्यवसाय दुनिया के कई देशों तक फैला हुआ है. प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक किशन पटनायक के अनुसार राज्य में, राज्य की ही सत्तासामथ्र्य सर्वोपरि होने चाहिए. व्यवस्था के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए यह अत्यावश्यक है. जबकि अब तो भारत की कुछ ऐसी कंपनियां हैं जिनकी कुल हैसियत देश के कई राज्यांे की आर्थिक स्थिति से बढ़कर है. वालमार्ट का खुदरा व्यापार तो देश के कुल खुदरा व्यापार से भी अधिक है. अपनी ताकत और पहंुच के दम पर ऐसी कंपनियां सरकार और प्रशासन से मनमाने फैसले करा ले जाती हैं. राजनीतिक नेतृत्व ऐसी कंपनियों के आगे असहाय महसूस करता है. इसीलिए मजबूरी में वह या तो आर्थिक ताकतों के समर्थन में खड़ा होता है अथवा अपनी स्थिति का फायदा उठाने के लिए, किसी न किसी प्रकार से उनकी मदद करना चाहता है. छोटे दुकानदार भी समझ चुके हैं कि इन सुरसामुखी नेताओं तथा बड़े व्यापरियों के आगे उनकी हैसियत किसी भिनगे जैसी ही है, अतएव विस्थापन को अपनी नियति स्वीकार चुकने के बाद वे या तो अपनी दुकानों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की तैयारी कर चुके हैं अथवा सबकुछ औनेपोने भाव बेचकर किसी नए धंधे की तलाश में हैं. किंतु प्रौद्योगिकी एवं बाजार की घोर स्पर्धा के बीच नए स्थान पर धंधा जमाना अथवा नए व्यवसाय की शुरुआत करना रोज एक अग्निपरीक्षा से गुजरने के समान होता है. खासकर ऐसे व्यक्तियों के लिए जो एक ही स्थान पर काम करते हुए उम्र का बड़ा हिस्सा पार कर चुके हों, जिनके सिर पर जिम्मेदारियों का बोझ हो, संसाधनों की अत्यल्पता और समय का अभाव भी हो.

 

स्थितियां विस्तृत गवेषणा की मांग करती हैं. खुदरा व्यापार के क्षेत्रा में अनंत संभावनाएं देख रहे वाणिज्यिक प्रतिष्ठान, बड़ीबडी कंपनियां इस बार देश के ग्रामीण खुदरा बाजार पर धावा बोलने की होड़ में हैं. यह हमला नई भाषा और नएनए सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से किया जा रहा है. ‘ठंडे का तड़का’ के नाम पर कोका कोला का भोग, कुछ मीठा हो जाए के नाम पर चाॅकलेट का चस्का लगानागाय को सौंदर्य प्रतियोगिता तक घसीटते हुए सारी दुनिया को अपनी मुट्ठी में समेट लेने का इरादायह बाजार की नई भाषा और प्रतीक रचना है. आधुनिकीकरण के नाम पर इसी को सामाजिक यथार्थ में बदलने की तैयारी चल रही है. वालमार्ट, न्यूबीज, आदित्य बिड़ला ग्रुप, रिलायंस जैसी बड़ीबड़ी देशीविदेशी कंपनियों समेत करीब दर्जनभर संस्थान अवसर की ताक में हैं. सैन्सेक्स के रोजरोज चढ़ते ग्राफ को देखना, देश की

 

तरक्की के बारे में जगहजगह सुनना बड़ा ही खूबसूरत और नेक लगता है. लेकिन यह जानकर जोर का धक्का लगता है कि इस विकास का मायाजाल समाज के मुट्ठीभर लोगों के लिए इसी धरा पर स्वर्ग की सृष्टि करता है, तो संख्या में उससे कहीं बड़े वर्ग से, जीवन के मामूली संसाधन भी छीनकर उन्हें रोज नारकीय स्थितियों की ओर ढकेल रहा है. इस परिवेश में विकास के मुहावरे का प्रतीक सिवाय एक भ्रम के और कुछ भी नहीं है। इस प्रतीक रचना को ही सामाजिक यथार्थ में बदलने की तैयारी चल रही है.

 

जरा ध्यान दें तो समझ जाएंगे कि देश के खुदरा बाजार पर छा जाने को आकुल भीमकाय कंपनियों में से अधिकांश संचार के क्षेत्रा में साथसाथ काम कर चुकी हैं. कड़ी प्रतियोगिता में भी उन्होंने पंद्रह करोड़ से अधिक ग्राहक ‘कूट’ लिए हैं. देशभर में करीब ग्यारह करोड़ तो जीएसएम मोबाइल धारक ही हैं. बेसिक फोन तथा सीडीएम तकनीक पर आधारित फोन की संख्या भी लगभग पंद्रह करोड़ होगी. अभी तक उनका सारा जोर संचारक्रांति पर था. वहां अब खाली मैदान नहीं रहा. बाजार में टेलीफोन कंपनियां अपनेअपने हिस्से पर कब्जा जमाए हैं. भविष्य में ग्राहकों की जो आमद होगी वह उनमें बंटती चली जाएगी. थोड़ाबहुत इधरउधर करने के लिए सेटअप तैयार हो चुका है. बस उसकी देखभाल करने और बनाए रखने की आवष्यकता है. अब इन कंपनियांे ने ग्रामीण बाजार का दोहन करने का इरादा बनाया है तो यह समयानुकूल फैसला ही है. ध्यान रहे कि आज भी देश के खुदरा बाजार के पिचानवें प्रतिशत पर असंगठित क्षेत्रा के दुकानदारों का कब्जा है. यह स्थिति कब तक रहेगी, यह बता पाना सरल नहीं है. क्योकि बड़ी कंपनियां जहां भी जाएंगी, पूूरी तैयारी के साथ वहां के लोगांे की आकांक्षाओं को पहचानकर, उनके अनुरूप स्वयं को ढालते हुए जाएंगी. इसलिए किसी ठोस रणनीति के अभाव में उनका सामना करना आसान न होगा.

 

हम जानते हैं कि पिछले कुछ दिनों से चीन से होने वाले आयात ने हमारे लघु और कुटीर उद्योग क्षेत्रा की कमर तोड़कर रख दी है. आगे भी माल की खरीद के लिए चीन की कंपनियों से बातचीत की जा रही है. जो वस्तुएं भारतीय उत्पादक उन्हें सस्ती दे सकते हैं, उन्हें भारतीय उत्पादकों से ही खरीदा जाएगा. जैसे कि जीन की पेेंट बेचने के लिए डेनिम से ग्रामीण बाजारों के अनुकूल जीन बनाने के लिए बातचीत की जा रही है. रिलायंस बड़ेबड़े किसानों से आवश्यक फलों और सब्जियों की खरीद कर रही है. पिछले दिनों कंपनी द्वारा हिमाचल प्रदेश में सेव, गुजरात में आम के बाग खरीदे जाने के भी समाचार मिले हैं. आगे से कंपनी सब्जियों के लिए भी जमीन खरीदकर वहां पर सघन खेती को बढ़ावा दे सकती है. दूसरी कंपनियां भी ग्रामीण बाजार में खपत के लिए फिलहाल माल वहीं से खरीदेंगी जहां से सस्ता पड़ेगा. आगे चलकर जिन वस्तुआंेे की खपत देखेंगी वे उन्हें अपने यहां भी बना सकती हैं अथवा उनके उत्पादन में लगे कारखानों को खरीद सकती हैं या फिर लीज पर भी ले सकती हैं. अभी तक बड़ी कंपनियां ब्रांड पर एकाधिकार का सपना देखती थीं, अब उन्हें ब्रांड के साथसाथ बाजार पर एकाधिकार के सपने भी आने लगेंगे.

 

ध्यातव्य है कि चीन के साथ हमारे राजनीतिक संबंध कभी भी संदेह से परे नहीं रहे हैं. इस बात को ‘हिंदी चीनीµभाईभाई’ का नारा देने वाले हमारे राजनीतिज्ञ भले ही न जानते हों. मगर पूंजीपतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है. प्रतिकूल राजनीतिक स्थितियों में चीन से सस्ते माल की सप्लाई बाधित होने पर उनके व्यावसायिक हितों पर कोई आंच न आए, इसके लिए देश में ही चीन की तर्ज पर ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रा’ बसाए जाने की योजना पर बड़े जोरशोर से काम हो रहा है. जहां विशेष सुविधाएं देकर उद्यमियों को बसाने का काम, जनमत के भारी विरोध के बावजूद बेशर्मी से जारी है. जिस चीन की तर्ज पर विशेष आर्थिक क्षेत्रा विकसित किए जा रहे हैं, उसके अपने आर्थिक परिक्षेत्रों में कामगारों की हैसियत ठीक ऐसी ही है जैसी किसी भट्टी को जलाए रखने के लिए कोयले की होती हैै, जो अपना श्रम गलाकर उत्पादन प्रक्रिया को संपन्न करने का काम करता है. श्रम कानूनों की तो बात ही बेकार है. क्योंकि विशेष आर्थिक क्षेत्रा देश के मौजूदा श्रम कानूनों की पहुंच से परे हैं. इसी का लाभ उठाते हुए वहां एक मजदूर या तकनीशियन को बिना किसी ओवरटाइम के बारहबारह घंटे काम करना पड़ता है. विशेष आर्थिक क्षेत्रों को विकसित करने की जिम्मेदारी सरकार ने टाटा, सलेम समूह, रिलायंस, महिंदरा एंड महिंदरा जैसी कंपनियों पर डाल दी है. इनमें से कुछ स्वयं अथवा अपने किसी सहयोगी के साथ देश के खुदरा बाजार में हाथ आजमाने का सपना देख रही हैं. यह महज संयोग है अथवा साजिश, इसका खुलासा आने वाला समय ही करेगा.

 

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी रोजगार का एकमात्रा साधन हैµखेती. लेकिन वह भी अब बहुत फायदेमंद नहीं रही. बढ़ती जनसंख्या के साथ जोतों का आकार तेजी से सिमटा है. इस कारण कृषि उत्पादन में चिंताजनक स्थिति तक गिरावट आई है. ग्रामीण युवाओं के पास आजकल बहुत विकल्प भी नहीं हैं. क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन के साथ रोजगार सृजन का जो स्तर बढ़ा है या कि बढ़ा हुआ प्रतीत होता है, उसमें ग्रामीण युवाओं के लिए बहुत अवसर नहीं हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियां अक्सर ‘ए’ क्लास की प्रतिभाओं की तलाश में रहती हैं. हमारा ग्रामीणक्षेत्रा अभी इस योग्य नहीं हुआ कि प्रतिभासृजन के मामले में शहरी क्षेत्रों के साथ स्पर्धा कर सके. इसका कारण वहां प्रतिभाओं की नहीं, बल्कि संसाधनों की कमी है. आजादी के बाद स्थानीय स्तर पर रोजगार को बढ़ावा देने के लिए अनेक कार्यक्रम बनाए गए. लेकिन भ्रष्टाचार एवं अदूरदर्शिता के कारण

 

सारे सपने हवाहवाई होते चले गए. कारपोरेट जगत की नई कंपनियां ऊंची पगार पर ऐसे शहरी युवकों की भरती करती हैं, जो मोटी रकम खर्च कर के शिक्षा पूरी करके आए हैं तथा जल्दी से जल्दी अपने खर्च की भरपाई कर लेना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में जो उन शिक्षा संस्थानों की उपज है जो शिक्षा का व्यापार एक कामोडिटी की तरह करते हैं. वहां विद्यार्थियों को भी सिखाया जाता है कि प्राणिमात्रा एक कामोडिटी है. ऐसे संस्थानों से प्रश्षिक्षित होकर निकले हमारे युवा मनुष्य को मात्रा उपभोक्ता समझते हैं. उनका जीवनदर्शन पूजींवादी संस्थानों के अनुकूल होता है.

 

जो लोग अब भी इस खुशफहमी में हैं कि खुदरा बाजार के ग्रामीणीकरण से ग्रामोद्योगों तथा उन भारतीय उद्योगों को भी लाभ पहुंचेगा जो नए ग्राहकों की तलाश में हैं, तो उन्हें जितनी जल्दी से हो सके इस खुशफहमी से बाहर आ जाना चाहिए. नए खुदरा बाजारों के लिए माल वहीं से खरीदा जाएगा जहां से सस्ता मिलेगा. भले ही इसके लिए सरकार को अपनी आयातनीति में बदलाव के लिए बाध्य क्यों न किया जाए. अब जरा इसका भी हल्कासा जायजा लें कि ग्रामीण बाजार में कारपोरेट जगत के हस्तक्षेप के क्या परिणाम होने वाले हैं. देश में गांवों की कुल संख्या करीब छह लाख है. वहां के लोगों की आम जरूरतों की पूर्ति अभी तक छोटे दुकानदार करते आ रहे हैं. इन दुकानदारों की संख्या गांव की जनसंख्या के अनुसार घटतीबढ़ती है. यह बीस से लेकर पचास तक कुछ भी हो सकती है. दुकानदारी समाज के एक वर्ग का पैत्रिक व्यवसाय रही है. लेकिन आजादी के बाद जातीय समीकरण और उनके व्यवसायों में काफी बदलाव आया है. पढ़ेलिखे या साधारण प्रशिक्षित युवा भी नौकरी के अभाव में दुकान खोलकर बैठ जाते हैं. इनमें महिलाओं की संख्या भी काफी है. एक और कारण भी दुकानदारी के व्यवसाय से जुड़ने का यह रहा है कि जो लोग नौकरी के तनावों से बचना चाहते हैं, उन्हें भी दुकानदारी करना मुफीद लगता है. ध्यान रहे कि जब हम दुकानदारी कह रहे हैं तो हमारा आशय साधारण परचून और किराना दुकानदारी से लेकर हलवाई, नाई, धोबी, प्लंबर आदि ऐसे दुकानदारों से भी है, जिन्होंने अपनी पेशवर दक्षता के कारण उस व्यवसाय को अपनाया हुआ है. कारपोरेट सेक्टर केवल छोटे दुकानदारों पर ही हमलावर नहीं हैं, उनके निशाने पर वे सेवाकर्मी भी होंगे जो किसी न किसी रूप में परंपरागत सेवाओं से जुड़े हैं. ऐसे सभी दुकानदारों की कुल संख्या प्रति गांव यदि तीस भी मान ली जाए जो देशभर में लगभग एक करोड़ अस्सी लाख दुकानदार या पेशेवर केवल गांवों में हो सकते हैं. नगरों, महानगरों और कस्बों की संख्या भी कम नहीं हैं. वहां पर यह संख्या यदि डेढ़दो करोड़ भी हुई तो देश में दुकानों तथा परंपरागत सेवाकर्मियों की संख्या तीन से चार करोड़ तक संभव है. इन प्रकार देश के पंद्रहबीस करोड़ लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से दुकानदारी के पेशे से जुड़े हुए हैं.

 

आने वाले वर्ष उन्हीं के लिए खतरे की घंटी होंगे. हाल के वर्षों में अचल संपत्ति के मूल्यों में भारी उछाल आने से ग्रामीण लोगों के पास अतिरिक्त धन की आमद हुई है. अभी तक यह स्थिति केवल बड़े नगरों तक सीमित थी. किंतु अब गांव भी इससे अछूते नहीं हैं. शहरों के पास जिनकी जमीनें बिक रही हैं, उनमें से बहुत से किसान अपनी रकम का निवेश दूरदराज के गांवों में कर रहे हैं. जिससे वहां की जमीनों के भाव भी आसमान छूने लगे हैं. जमीन जाने से गांवों में रोजगार के साधन भी घट रहे हैं. ऐसे हालात में जिम्मेदारी तो सरकार की है कि वह इस अतिरिक्त धन को उत्पादक कार्य में लगाने के लिए योजना लाए. सरकार नहीं चेती, मगर लगता है कि पूंजीवादी संस्थानों ने अपनी गिद्धदृष्टि उसपर जमा दी है. वे बाजार के प्रलोभनों को पूरे जोरशोर से गांवों में उतारने की तैयारी कर रहे हैं.

 

यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार के साथसाथ उसके संस्कार भी गांव तक जाएंगे. ऐसा नहीं है कि हमारे गांव अभी तक इन संस्कारों से अछूते थे. लेकिन सीधे संपर्क के अभाव में बाजार अपना काईंयापन ग्रामीण क्षेत्रों पर थोप नहीं पाया था. संगठित बाजार के माध्यम से इन संस्कारों की घुसपैठ आगे और भी तेजी सेे होगी, जिसका निशाना भारतीय समाज की परंपरागत मान्यताएं होंगी, जिन्हें हम संस्कृति और संस्कार के नाम से जानते रहे हैं. इसके कुछ अच्छे परिणाम भी हो सकते हैं. संभव है कि शताब्दियों पुरानी जातीय संस्कारों की बेड़ियां, जिन्हें जनतंत्रा भी तोड़ने में असमर्थ रहा है, उसे बाजार के हाथों छिन्नभिन्न होते हुए हम देखें. लेकिन इसका परिणाम शुभ ही होगा, यह कहना कठिन है. क्योंकि बाजार बौद्धिक रूप से पस्त व्यक्तिवाद की कामना करता है. वह ऐसा समाज चाहता है, जिसमें बौद्धिक हलचलें, सिवाय बाजारवाद को प्रश्रय देने वाली बहसों के, कम से कम हों. बाजार की कोशिश प्रत्येक मानवीय संबंध का व्यावसायिक विकल्प खड़ा करने की रहती है. उस समय भी हालांकि मानवीय आवश्यकताएं समाज को आपस में जोडे़ रह सकती हैं. लेकिन वे उसी को उपलब्ध होंगी जो उनकी कीमत चुका सकता है. कीमत चुकाने में असमर्थ व्यक्ति उस अवस्था में एकाकी और निढ़ाल होता जाएगा. सामंतवाद में संसाधनों पर समाज के ताकतवर वर्ग का कब्जा होता. अपनी मर्जी और स्वार्थ को देखते हुए वही बाकी लोगांे को उनके जीने लायक साधन उपलब्ध कराता है. दूसरे शब्दों में सामंतवाद में समाज के दो वर्ग होते हैं, एक वह जो संसाधनों का भोग करता है. दूसरा वह जिसके बल पर संसाधनों का भोग किया जाता है. नई आर्थिक संरचना समाज को दुबारा इसी आधार पर विभाजित करने जा रही है.

 

बाजार के वर्चस्व के चलते राजनीति कमजोर पड़ी है. हम जरा याद करें तो समझ जाएंगे कि राजनीति के स्थापित आदर्श बाजार ने बड़ी तेजी से खंडित किए हैं. यानी जिन जीवनमूल्यों के दम पर राजनीति लोक में अपनी पैठ कायम करती थी, वे अब बेमानी होते जा रहे हैं. यह क्या

 

अनायास है कि करीब एक सौ पचीस करोड़ के देश पर शासनव्यवस्था का नेतृत्व करने वाली केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के पास एक भी ऐसा व्यक्तित्व नहीं है, जिसकी कुल देश के जनमानस मेें स्वीकार्यता हो. क्या इसीलिए स्वयं को भारतीय संस्कृति और परंपरा से जोड़ने वाली भारतीय जनता पार्टी को भी बारबार अटलविहारी की शरण में आना पड़ता है, जिनकी छवि मीडिया द्वारा बड़े जतन से तैयार की गई है और मीडिया के ही समर्थन पर टिकी हुई है? अटलविहारी वाजपेयी जैसी उदारवादी छवि भी मीडिया को इसलिए गढ़नी पड़ती है क्योंकि भारतीय मानस अभी भी अपनी परंपरा और संस्कृति से दूर नहीं आ पाया है. जिस दिन यह मजबूरी नहीं रहेगी उस दिन शैंपू, लोशन, कार, मोबाइल, कोक, चाॅकलेट यहां तक कि कंडोम्स और शैंपेन बेचने वाले नौटंकियों तक के नाम पर ही वोट मांगे जाएंगे.

 

हाल के वर्षों में मीडिया के प्रभाव के कारण तथा आधुनिकतावादी सोच के चलते बाजारवादी व्यवस्था के समर्थकों में भी बढ़ोत्तरी हुई है. संचारक्रांति की कामयाबी ने भी आधुनिक उदारवादी व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में सकारात्मक सोच विकसित किया है. बाजारवाद के समर्थक इस बात को भूल जाते हैंे कि इस तथाकथित उदारवादी व्यवस्था की कितनी बड़ी कीमत देश को अदा करनी पड़ी है. पिछले दशक में सरकार ने लोककल्याण के कार्यक्रमों के लिए धन खर्च करने से जितना हाथ खींचा है, उतना आजादी के बाद के वर्षों में कभी देखने में नहीं आया. शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकपरिवहन, बिजली आदि अनेक मामलों में सरकार ने अपनी जिम्मेदारी निजी संस्थानों को सौंपना शुरू कर दी है. शिक्षा को इंसानियत की अनिवार्यता के बजाय एक कामोडिटी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसको कीमत देकर खरीदा जा सकता है तथा समय आने पर जिसकी ऊंची कीमत वसूल भी की जा सकती है. इसका परिणाम यह हुआ है कि उत्कृष्ट प्रतिभाएं ऊंचे वेतन के लालच में विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्रा को छोड़कर प्रबंधन के क्षेत्रा की ओर पलायन कर रही हैं. हम कुछ नया गढ़ने के बजाय, केवल गढ़े हुए की सैल्समेनी कर रहे हंै.

 

व्यक्तित्व ध्वंस और हताशा के बीच उम्मीद की किरण के लिए जरूरी है कि समाज में नागरिकताबोध को विस्तार दिया जाए. ऐसी संस्थाएं खड़ी की जाएं जो स्वयं को बाजार के प्रलोभनों और उनके संसाधनों से दूर रखने का सामथ्र्य रखती हों. ऐसे ठोस सामाजिक आंदोलनों को बढ़ावा दिया जाए, जो बिखरे जनमानस को सही रास्ते पर ला सकें. उसकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने के लिए सहकारिता भी एक कारगर माध्यम बन सकती है. इतिहास भले ही पीछे न जाए, वक्त भले ही आगेआगे चलने के लिए जाना जाता हो, मगर परिस्थितियां बारबार लौटकर वापस आती हैं. उस अवस्था में पुराने औजारों को नई परिस्थितियों के अनुरूप तराशकर काम निकाला जा सकता है. बाजार को सहकार के सहारे नई दिशा देने का कार्य जरूरी नहीं पेशेवरों द्वारा ही किया जाए. यह कार्य उन छोटेछोटे दुकानदारों को जोड़ने से भी संभव है, जिन्हें नई बाजारव्यवस्था से खतरा है. वह उन मजदूरों और शिल्पकारों द्वारा संगठन बनाकर भी किया जा सकता है, जिनकी रोजीरोटी पर चीनी माल की घुसपैठ से संकट पैदा हो चुका है. देश के छोटे और मंझोले उद्योग भी इस अस्मिता की लड़ाई में आगे आ सकते हैं, जिनके लिए संगठित बाजार चुनौती बनता जा रहा है. प्राचीन भारत में छोटे कामगारों के बड़ेबड़े संगठन(श्रेणियां) जो अपने व्यवसाय के लिए दुनियाभर में जाने जाते थे, हमारी प्रेरणा के स्रोत हो सकते हैं. हम टोड लेन लंदन के उन बुनकरों और साधारण मजदूरों से भी प्रेरणा ले सकते हैं, जिन्होंने सबसे पहला सहकारी उपभोक्ता स्टोर खोलकर उस समय के बड़ेबड़े उद्योगपतियों के सामने चुनौती पेश की थी, जिन्होंने दिखा दिया कि व्यावसायिक कामयाबी के लिए झूठ और फरेब जरूरी नहीं हंै, बल्कि नैतिकता के आधार पर भी सफलतापूर्वक आगे बढ़ते हुए विकास के इच्छित लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है. इसी कारण उनके द्वारा चुना गया ‘रोशडेल पायनियर्स’ नाम वर्षों तक पूरी दुनिया के लिए प्रेरणादायी बना रहा, व्यावसायिक नैतिकता के पक्षधर उन्हें आज भी सम्मानपूर्वक याद करते हैं.

 

 

ओमप्रकाश  कश्यप

 

साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रायोजित विशेषांक : कितने साहित्यिक

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प्रकाशित सामग्री पर प्रतिक्रया आमतौर पर नहीं लिखता. ऐसा नहीं है कि पढ़ते समय चीजें मानस को उद्वेलित नहीं करतीं. करती हैं. बल्कि कभीकभी तो दिमाग में बिजलीसी कोंध जाती है, तत्काल प्रतिक्रिया लिखने का मन होता है. उंगलियां कलम उठाने के लिए कसमसा उठती हैं. लेकिन कभी एकांत की कमी तो कभी समय का अभाव, सहजस्वाभाविक समुद्वेलन को शब्द देना प्रत्येक बार संभव नहीं हो पाता. कई बार अंतर्विमर्श की प्रक्रिया ही इतनी धीमी और लंबी होती है कि उसको शब्दों में उतारने से पहले ही घटनाएं पुरानी पड़ने लगती हैं. ऐसी प्रतिक्रियाएं अपने लिखित स्वरूप में आतेआते प्रायः अपनी प्रासंगिकता खो बैठती हैं. नित्यप्रति पढ़े जाने वाले साहित्य या समाचारों में से सभी चीजें उद्वेलित कर सकें, यह आवश्यक नहीं है. मगर कुछ पत्रिकाएं और लेखक ऐसे जरूर हैं, जो अपनी रचनाओं के साथ अक्सर चैंकाते रहते हैं. यह चैंकाना स्वयंस्फूर्त भी हो सकता है और अनायास भी. कभीकभी यह इतना सुतीक्ष्ण होता है कि मन झनझना उठता है. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बस चैंकाने के लिए ही कलम उठाते हैं.

इधर कथासंसार का प्रेम विशेषांक हाथों में है. परंतु इसका शीर्षक मुझे चैंकाता नहीं है. जिसने भी सुरंजन को जाना, उनकी कविताओं को पढ़ा है, वे जानते हैं कि वे ऐसा ही कोई शीर्षक चुनते. उनकी अधिकांश कविताएं मांसल प्रेम और सेक्स के इर्दगिर्द घूमती हैं. उनमें स्त्री का आगमन तो होता है, बल्कि बारबार होता है. मगर स्त्री की आकांक्षाएं, उसका संघर्ष और उसकी आत्मा उनकी कविताओं से नदारद ही रहती है. यही हाल उनके बनाए कोलाज का है. वहां भी स्त्री की उपस्थिति है तो मात्र इसलिए कि उसके बिना मांसल प्रेम, जिसकी कि सुरंजन वकालत करते रहते हैं, संभव ही नहीं है. यूं सुरंजन ने कथासंसार के स्त्रीशक्ति विशेषांक भी निकाले हैं. मगर उनके पीछे किसी स्पष्ट दृष्टिबोध का अभाव रहा है. शायद इसके पीछे कोई मजबूरी रही हो. इसलिए उनमें वह भावना या विचार नहीं है, जिनके आधार पर आधुनिक स्त्री के संघर्ष और उसकी जद्दोजहद का रूपक खड़ा किया गया है. स्वयं सुरंजन अपने नारीशक्ति विशेषांक में कह चुके हैं कि औरत को तो मर्द के नीचे ही रहना है…! उनसे उसी समय पूछा जाना चाहिए था कि यदि स्त्री की नियति चैकेचूल्हे और बिस्तर तक ही सीमित है तो उसपर काहे का विशेषांक निकाला जाए? स्त्रीशक्ति और उसपर विमर्श आदि का औचित्य ही क्या है! लेकिन अपने हिंदी क्षेत्र में बहसें उस समय तक नहीं गर्मातीं जब तक कि उनमें राजनीति, भले ही साहित्य की, का मौका न हो. या बहस मंे हिस्सा लेेने वालों का कोई हितसाधन न होता हो.

कल्पना कीजिए कि यही बात यदि राजेंद्र यादव ने कही होती? मैं मानता हूं कि सुरंजन और राजेंद्र यादव में बहुत फर्क हैं, लेकिन क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि राजेंद यादव या ऐसे ही सूरमाओं को लेकर उठी बहसें अक्सर मंचीय राजनीति का हिस्सा बन जाती हैं, जिसके चलते वे लगभग बेअसर रहती हैं. कई बार निजी खुदंक निकालने के लिए भी लिख्खाड़ लोग मैदान में उतर आते हैं. ऐसी बहसें मंच से नीचे उतरते ही आमतौर पर पूरी तरह से भुला दी जाती हैं. इसके विपरीत सुरंजन के पाठक सामान्य हैं. वे साहित्य की राजनीति को प्रभावित करने का उतना सामथ्र्य नहीं रखते. हां, उससे प्रभावित जरूर होते हैं. उनका भावुक मन लिखे हुए शब्दों को आप्तवाक्य की तरह लेता है. जिस कविलेखक को वे पसंद करने लगें, वह उनके लिए भगवान की तरह होता है. उनमें से कुछ लिखने के अपने शौक को चर्चा में रखने के लिए छोटीमोटी साहित्यिक राजनीति भी कर लेते हैं. ऐसे लोगों को एक मंच की तलाश हमेशा रहती है. कथासंसार और दूसरी पत्रिकाएं उन्हें यह सुविधा उपलब्ध कराती हैं और इसके लिए उनका आर्थिक एवं भावनात्मक दोहन भी करती हैं. कई बार अभिव्यक्ति के मंच के छिन जाने का डर भी उन्हें संपादकीय नीति का सार्वजनिक विरोध करने से रोकता है. जो हो, सुरंजन ने उन शब्दों, उनकी चालाकी और रूढ़िवादिता पर जोरदार प्रहार होना चाहिए था. लेकिन मुझे याद है कि इक्कादुक्का पत्रों के अतिरिक्त इस मसले पर कोई गंभीर बहस का आयोजन नहीं हो पाया था. सुरंजन थोड़े और चालाक होते तो कलम उठाने से पहले ही प्रायोजित बहस के लिए ‘सूरमा’ तैयार कर लेते. ऐसे ‘दारूकुट्टों’ की हिंदी में कमी भी नहीं है.

पत्रिका के मूल्य के रूप में कवर पर छपी सहयोग राशि 50 रुपये भी नहीं चैंकाती. मैं यह नहीं कहूंगा कि यह वाजिब है. नकद चुकानी पड़ती तो फौरन कन्नी काट जाता. लेकिन सुरंजन को इसकी चिंता नहीं. चिंता हो भी क्यों? हिंदी में पत्रिका खरीदकर पढ़नेवाले पाठक तो रहे नहीं. जो हैं वे भला कथासंसार को क्यों खरीदेंगे. फिर भी पत्रिका यदि छपती है और लगातार निकल रही है, यदि पत्रिका के संरक्षक मंडल में ही सतरह सदस्य हैं, तो जाहिर है कि पत्रिका को चाहने वाले पाठक भले ही उनकी संख्या गिनीचुनी हो, पर हैं अवश्य. और यह नियति तो आज हिंदी की लगभग हर पत्रिका की है. लेकिन सुरंजन जिस तरह की सामग्री का चयन करते हैं, उससे कभीकभी आभास होता है कि कथासंसार एक ब्रांड का नाम है. जिसके लिए खास किस्म की रचनाएं तैयार की जाती हैं तथा जिन्हें खास सोच वाले पाठकवर्ग के लिए प्रस्तुत किया जाता है. किसी भी ऐसी पत्रिका के लिए जो साहित्य के नाम पर और बेहद सीमित प्रयासों द्वारा निकाली जा रही हो, इस तरह का ब्रांडीकरण बहुत उपयोगी नहीं रह पाता. क्योंकि ब्रांड की सफलता के लिए अपने उत्पाद की विशिष्टओं को विज्ञापित कर उपभोक्ताओं तक ले जाना, उन्हें पापुलर कल्चर का हिस्सा बना देना, बहुत ही चुनौतीभरा उपक्रम है, जो संसाधनों के अभाव में संभव नहीं हो पाता. यह बात सुरंजन को भी मालूम है, लेकिन चर्चा में बने रहने का मोह छूटता नहीं. इसलिए कभीकभी अपने पाठकों, जो निःसंदेह उनका लेखकवर्ग भी है, को संतुष्ट करने के लिए वे हर अंक में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य ले आते हैं, जो विवादित की श्रेणी में आता है.

अंदर के पृष्ठ पर एक विनम्र अनुरोध है, उदारमना पाठकों और रचनाकारों से. वह भी चैंकानेवाला नहीं है. निजी प्रयासों से चलने वाली पत्रिकाओं में इस प्रकार के संपादकीय निवेदन अक्सर छाए रहते हैं. और यह गैरवाजिब भी नहीं है. सुरंजन ने भी कथासंसार के पाठकों से अपील की है कि वे उदारदृष्टि अपनाएं. साहित्यिक दान के लिए आगे आएं. पत्रिका भेजी जा रही है, कीमत नकद भिजवाने की भी जरूरत नहीं है. मात्र पचास रुपये के डाक टिकट पर्याप्त होंगे, भिजवाने की कृपा करें. जाहिर है कि वे टिकट दूसरों को पत्रिका बिना एडवांस भिजवाने के काम आएंगे. पत्रिका में सदस्यता सहयोग के लिए ऐसी टिप्पणियां दूसरे संपादक भी करते हैं. लेकिन उनकी अपील में वैसी भावुकता का अभाव होता है, जिसे सुरंजन बड़ी ही सहजता से उंडेल देते हैं. आगे पंचम की कविताएं हैं. हिंदी मंे जीविका के विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए लोग हैं. बेरोजगार भी हैं, लेकिन साहित्य को अपनी आजीविका बनाने वाले लेखक उंगलियों पर गिने जा सकते हैं. शायद इसीलिए एक सामान्य हिंदी लेखक नहीं चाहता कि उसके बेटेबेटियां साहित्य के क्षेत्र में आएं. सुरंजन इस मामले में अलग हैं. यह भावुक कवि अपने बेटे को जिस तरह प्रोत्साहित करता है, वह इस बाजार और कठिन स्पर्धा के दौर में अनन्य है, यह उसके साहित्य के प्रति सच्चे समर्पण को दर्शाता है.

पत्रिका के आगे के पन्नों पर डाॅ. अनूप सिंह ने अपनी पीड़ा उंडेली है. पर यह केवल उन्हीं की पीड़ा नहीं. बल्कि हिंदी जगत के हर उस लेखकप्राणी की पीड़ा है. जो कम से कम समय में अधिक से अधिक चर्चा पा लेना चाहता है. इसके लिए वह कलम से अधिक भरोसा मंच और माइक पर करता है. मुश्किल तब होती है जब किसी कार्यक्रम में उसको अपने ही जैसे दर्जनों लोग मिल जाते हैं. ऐसे लोग जो आपाधापी में हैं. जिनमें धैर्य का अभाव है. और जिनके पास ऐसा कोई मौलिक विचार, मुद्दा भी नहीं जिसके सहारे वे अपने साहित्यिक अभियान को आ॑क्सीजन दे सकें. ऐसे कार्यक्रम का खर्च चूंकि आयोजक पक्ष के लोग वहन करते हैं, इसलिए ज्यादा लाभ भी वही उठाते हैं. सवाल है कि इस तरह की निजी पीड़ा को सार्वजनिक करने में साहित्य का अंश कुछ है कि नहीं. यदि वह मात्र व्यक्तिगत कुंठा का प्रदर्शन है, जो संपादक को चाहिए कि ऐसी टिप्पणियों को पत्रिका में स्थान न दें. क्योंकि यदि उनके पास कोई अच्छी बात है, और उसके प्रति उनकी निष्ठा सघन है, तो देरसवेर वह अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम खोज ही लेगी. इस तरह टेसुए बहाने, गिड़गिड़ाने से न तो साहित्य का भला हो सकता है, न ही साहित्यकार का. हां साहित्यिक राजनीति जरूर की जा सकती है, जो अंततः विमर्श की संभावनाओं को कमजोर करने का काम करती है.

पत्रिका में एक अपील भी है. नाम और छपास के लोभी साहित्यकारों से. जिन्हें लगता है कि वे हिंदी साहित्यजगत को अपना बहुमूल्य योगदान दे चुके हैं. पर यह समाज इतना नाशुक्रा है कि भाव ही नहीं देता. ऐसे समाज को बताने के लिए उनका पत्रिकाओं के एकल संकलन या विशेषांक के रूप में आना जरूरी है. सुरंजन की अपील ऐसे ही स्वनामधन्य साहित्यकारों के लिए है. उनके लिए महान बनने का अनूठा अवसर, कि आगे आएं. एक विशेषांक हेतु संपर्क करें. निवेश करें, नाम पाएं. पैसे लेकर एकल विशेषांक निकालना नई परंपरा नहीं है. सुरंजन ने जो किया है, वह बाकी संपादक भी करते हैं, कर रहे हैं. मगर थोड़ी नफासत से. दूसरों से छिपाकर, लटकेझटके के साथ. और उनसे ज्यादा रकम ऐंठ लेते हैं. कुछ ने तो महान बनाने की फैक्ट्रियां तक खोली हैं. जिनसे हर साल उपाधियां बांटी जाती हैं. जिसकी जेब में नामा हो वह नाम लेकर जाए. वहां नाम कमाया नहीं, खरीदा जाता है. उनके बनाए ‘महान’ अंधेरे से आते हैं और वहीं खो जाते हैं. फिर भी उनके धंधे पर आंच नहीं आती. सुरंजन यही खेल खुलेआम खेलते हैं. इसलिए बदनामियां ओढ़तेबिछाते हैं. यह बात अलग है कि ऐसी बदनामियां सुरंजन को हतोत्साहित नहीं करतीं. शराब की तरह ऐसी बदचलनियों के प्रति सुरंजन की प्यास गोया बढ़ती ही जाती है.

एकल विशेषांक के लिए सुरंजन का साहित्यकारों को आमंत्रित करना भी नहीं चैंकाता. जमाना ही खुद को प्रोमोट करने का है. आधुनिक सभ्यता ने जिन चीजों को पूरी तरह मिटाने का काम किया है, उनमें से एक आपसी विश्वास भी है. लोगों को अपने भाईबहन, मित्रहितैषी, सगेसंबंधी तक पर विश्वास नहीं रहा. कोई लिखकर भी दे दे तो यह कहकर उसकी हवा निकाल दी जाती है कि ऊपरी मन से लिखा होगा. इसलिए सारी धनुर्विद्या अपने ही कंधे से साधनी पड़ती है. हिंदी के ही एक कवि हैं, ढंग के कवि वे कभी बन नहीं पाए सो आजकल खुद को महाकवि लिखने लगे हैं. महानता के पंखों पर उड़ान भरते हैं. मंचों और चैनलों पर कविता का चक्र उठाए फिरते हैं. पिछले दिनों जब अभिताभ बच्चन की तूती बोलती थी तो उन्होंने सदी के कथित महानायक पर कविता लिखकर, उन्हें ही आग्रहपूर्वक सुना दी थी. हालांकि कौन नहीं जानता कि किसी जमाने का यह ‘गुस्सैल युवा’ (यंग्र एंग्रीमैन) साठ पार करतेकरते बुरी तरह से हांफने लगा है. घुटने टेक दिए हैं उसने. बहू का मंगलदोष उतारने के लिए वह मंदिरमंदिर माथा टेकता है. टोनेटोटके करवाता है.

इस अंक में सुरंजन के संपादकीय के कुछ अंश उपनी भावुक उदघोषणाओं के बावजूद प्रभावित करते हैं. हममें से कितनों में ऐसी खरीखरी कहने का साहस है. अपनी संपादकीय अभिव्यक्ति के लिए सुरंजन ने अपनी ही कविता पुस्तक ‘सूरज का सातवां जन्म’ के विमोचन कार्यक्रम को चुना है. हिंदी भवन, दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में सुरंजन को नामवर सिंह जैसे बड़े साहित्यकारों और अपने कुछ मित्रों के न पहुंचने का मलाल था. संपादकीय में उसी शिकायत की निर्मैल्य एवं भावुक अभिव्यक्ति है—

मुझ जैसे जिंदा साहित्य रचनेवाले भक्तों का एक विधाता तो होना ही चाहिए. पर राजेंद्र यादव जैसा महारथी नहीं. नामवर सिंह जैसा योद्धा नहीं. अशोक वाजपेयी जैसा सूरमा भी नहीं. यानी विधाता हो तो विधाता जैसी बात करे. हमारी सुने और हमारा मार्गदर्शन करे

लंबे संघर्ष से तपे सुरंजन की इस भावभरी अपील में उन जैसे दूसरे लेखकोंसंपादकों का दर्द भी छिपा हुआ है, जो आजीविका के संघर्ष से थोड़ाबहुत समय बचाकर अपने साहित्यिक लगाव को निभाए जाने का प्रयास करते रहते हैं. बावजूद इसके यह मुझे चैंका नहीं पाता. क्योंकि इस तरह की टिप्पणी या अपील साहित्य जगत में व्याप्त राजनीति और साहित्यकारों के वौद्धिक स्खलन की ओर इशारा करती है, जो केवल क्षोभ पैदा कर सकती हैं. वैसे आत्मव्यामोह से सुरंजन भी बचे नहीं हैं. अपने इसी संपादकीय में वे आगे लिखते हैं—

सच कहूं तो मेरा विधाता मेरा ‘मैं’ रहा है और आत्मा मेरी प्रेमिका. इन्हीं दोनों ने मुझे जैसे सातवीं तक पढ़े आधेअधूरे इंसान को कविलेखक; और न जाने क्याक्या मुझे बना दिया. मैं खुद ही खुद को आजतक समझ नहीं पाया.’ सुरंजन की एक दबीछिपी आकांक्षा यह भी है कि लोग उनके जीवनसंघर्ष को पुस्तक का कलेवर दें. उनका भोला विश्वास है कि उनके मित्रसंबंधी इस कार्य में आगे आएंगे. अपने व्यक्तित्व का कुछ समय के लिए दूसरे के व्यक्तित्व में लोप कर देना, उसके जीवन को स्मृतियों और अनुभव में जीना, फिर जीवंत शब्दांे में उतारना, यह काम आसान है क्या? ऊपर से सुरंजन का व्यक्तित्व ही इतना जटिल है कि उसको शब्दों में ढालना आसान काम नहीं. जीवनयात्रा के लिहाज से सुरंजन एक ऐसा ‘मास्टरपीस’ है, कि कोई मनोवैज्ञानिक उनके जीवनव्यवहार का अध्ययन कर एक शोधपत्र तैयार कर सकता है. साहित्यिक दृष्टि से भी उसमें इतना कुछ मौजूद है कि उसे लेकर एक वृहदकाय उपन्यास तो लिखा ही जा सकता है. लेकिन यह काम जल्दबाजी में नहीं होना चाहिए. आवारा मसीहा जैसी कृति को शब्द देने के लिए उसके लेखक को थोड़ाबहुत आवारापन तो चरित्र में उतारना ही पड़ेगा. इसलिए मुझे सुरंजन की इच्छा में दोष नजर नहीं आता. कमी हमारे समय और समाज की है, जहां किसी लेखक को लेखन से अधिक समय अपनी जीविकासंबंधी मामलों के लिए देना पड़ता है.

 

 

पत्रिका के कुल मिलाकर बारह पृष्ठ अपने साहित्यिक गुरु डा॑. शिवशंकर को समर्पित किए हैं. इन पृष्ठों पर डा॑. शिवशंकर के सात ‘कामायनी गीत’ हैं. तटबंध की भांति इन सभी बारह पृष्ठों पर जयभगवान गुप्त ‘राकेश’ के हाइकू हैं. मानों डा॑. शिवशंकर की भावकामायनी को बांधने की कोशिश की गई हो. लेकिन जैसे नदी तट पर पहुंचते ही सबका ध्यान उन्मुक्त बहती जलधारा पर होता है, किनारे प्रायः उपेक्षित ही रह जाते हैं, यही हाल इन गीतों के आजूबाजू दिए हाइकू का है. भावकामायनी को प्रस्तुत करते समय सुरंजन जानते थे कि यह विवादित हो सकती है, इसलिए उन्होंने इसे ‘गुरुदक्षिणा’ का नाम देकर इसकी प्रस्तुति से अपना पीछा छुटाने का नाकाम प्रयास किया है. इसके बाद भी डर नहीं गया तो पत्रिका के सहायक संपादक ने अपना सहायकधर्म निभाते हुए जिम्मेदारियों से भागने का प्रयास किया है. मेरी समझ में नहीं आता कि संपादक या सहायक संपादक को ऐसा करने की आवश्यकता ही क्या थी. क्यों उन्हें आरंभ में ही अपनी सफाई देने की जरूरत आ पड़ी. यह तो ठीक ऐसा हुआ जैसे मुंह फेरकर भीड़ पर पत्थर फेंकना और फिर जान बचाकर भाग लेना. सुरंजन का दावा है कि वे 22 वर्ष बाद अपने साहित्यिक गुरु को गुरुदक्षिणा के बतौर ये गीत ससम्मान छाप रहे हैं. उन्हें इस बात पर खुशी भी है. और चाहते हैं कि पत्रिका के पाठक उन गीतों का रसास्वादन करें. यानी उन्हें मालूम था कि वे क्या परोस रहे हैं और पाठक उन्हें किस अंदाज में लेंगे. लेकिन गीतों के बाद में सहायक संपादक की टिप्पणी क्या उनकी गुरुदक्षिणा पर सवाल खडे़ नहीं करती? क्या इससे यह जाहिर नहीं होता कि सुरंजन ने कथासंसार के रूप में जिस ‘साहित्यिक ब्रांड’ की स्थापना की है, डा॑. शिवशंकर की भावकामायनी उसी में स्वयंस्फूर्त भागीदारी है. कहें तो गुरुदक्षिणा के समानांतर गुरु का आशीर्वाद भी. यह प्रसंग गुरुचेले की एकसमान मानसिकता की ओर संकेत तो करता ही है, यह भी दर्शाता है कि सुरंजन किस ‘संस्थान’ की उपज हैं. डाॅ. शिवशंकर ने अपनी गुरुता सिद्ध भी की है.

भाव कामायनी के नायक के रूप में स्वयं गीतकार है. एक उसकी नायिका है. दोनों के प्रेम की मांसल अभिव्यक्ति है. नायिका विवाह के पश्चात ससुराल चली जाती है. किंतु नायक के प्रति अपने समर्पण के कारण वह अपने पति के संग अभिसार के क्षणों में उसका साथ नहीं दे पाती. लौटते ही वह फिर नायक पर लुट जाती है. यही सामान्यसा कथानक है, बेहद साधारण गीत रचना. जिसमें कोई छंदशास्त्री दर्जनों नुक्स निकाल सकता है. परंतु भाषाई जटिलता, संस्कृत, अरबी और फारसी के दुरूह शब्दों का प्रयोग इन गीतों को सहजग्राह्यः नहीं रहने देता. यदि थोड़ी और कल्पनाशीलता से काम लिया जाता तो एक बेहतर रचना बनने की गुंजाइश थी. गीतों को पढ़ते हुए साफ हो जाता है कि उनका रचियता कवि नहीं, एक कामुक प्रेमी है, जिसका अपनी कुंठाओं पर जराभी नियंत्रण नहीं है. काव्यधारा में कामप्रसंगों की प्रस्तुति गलत नहीं है. न डाॅ. शिवशंकर पहले कवि हैं जिन्होंने स्त्रीपुरुष अंतरंगता को कविता का विषय बनाया हो. विश्वसाहित्य और हिंदी में इस प्रकार की अनेक रचनाएं पढ़ने को मिल सकती हैं. ‘गीतगोविंद’ संस्कृत की है तो ‘कनुप्रिया’ हिंदी की. हिंदी के ही कवि नरेद्र शर्मा ने अनेक गीत प्रेम और अभिसार को केंद्र बनाकर लिखे हैं, जिनकी सराहना होती है. कारण यह है कि वहां अभिव्यक्ति संभ्रांतीय शालीनता की हदों में ही रहती है. उनका एक शंृगार गीत लगभग पचीस वर्ष पहले पढ़ा था, जिसकी गमक आज भी ज्यों की त्यों दिमाग में है. हां स्मृतिलोप के कारण गीत के कुछ शब्द इधरउधर जरूर हुए हैं. इसलिए क्षमायाचना के साथ प्रस्तुत है—

आज न सोने दूंगी बालम

आज विश्व से छीन तुम्हें मैं अपनी सांसों में भर लूंगी

मृदुलगोलगोरी बांहों में कंपित अंगों में कस लूंगी

फूलों से रस में भर लूंगी, अलि से रैननिदारे बालम

ऊपर ‘संभ्रांतीय शालीनता’ शब्दयुग्म का प्रयोग अनायास नहीं है. वस्तुतः हमारे समाज में सभ्यता, संस्कृति और अनुशासन के नाम पर अजीबसा दुरंगापन मौजूद रहा है. यहां शब्दों के ऐरफेर से रचना को श्लील और अश्लील ठहरा दिया जाता है. सत्ता का समर्थन मिले तो रमणी को नगरबवधू की गरिमा, राजकीय मानसम्मान, नहीं तो वेश्या के रूप में तिरष्कार, उपेक्षा और लांछनाएं— यह हमारे ही समाज की रीतिनीति रही हंै. यहां जो अभिजात्य के लिए, उसकी भाषा में है, वह सवालों के घेरे में उतना और उस तरह से नहीं आता, जितनी कि आम आदमी के लिए आमफहम भाषा में की गई सहज प्रस्तुतियां. जो संपन्न है, वही सुसंस्कृत भी है—ऐसा मान लेने की प्रवृत्ति लगभग हर समय, प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. भारतीय समाज भी इसका अपवाद नहीं है. अर्थात जो लोक और उसकी आमफहम भाषा में है, वह भदेस और गैरशास्त्रीय है. उसको सुनकर भारत का औसत वुद्धिजीवी नाकमुंह सिकोड़ने लगता है. चालू कहकर उसको खारिज करने का प्रयास करता है. कमोबेश यही बात साहित्यिक प्रवृत्तियों को लेकर है. पूरा रीतिकाल नायिकाभेद और कामसंबंधों की व्याख्या से भरा पड़ा है. बिहारी, मतिराम और विद्यापति जैसे कवियों की गिनती हिंदी के प्रमुख रीतिकालीन कवियों में की जाती है. यह लिखने की आवश्यकता नहीं है कि हिंदी के प्रमुख रीतिकालीन कवि किसी न किसी राजा के अधीनस्थ थे। उसके खजाने से वेतन प्राप्त करते थे. राजा के रंजन के लिए कविता गढ़तेपढ़ते थे. राजा प्रसन्न होता तो कविता श्रेष्ठ और कामयाब मान ली जाती. चूंकि कविता लेखन और उसकी प्रस्तुति का सारा आयोजन राजा की खुशी के लिए था, इसलिए उसकी निष्पक्ष आलोचना के बारे में सोचना ही कठिन था.

कुछ लोग कह सकते हैं कि ‘गीत गोविंद’ और ‘कनुप्रिया’ बड़ी रचनाएं हैंकि उनमें वर्णित प्रेम अलौकिक हैकि राधाकृष्ण के प्रेम की तुलना साधारण प्रेम से नहीं की जा सकती है. दरअसल इस प्रकार की आलोचनाएं कामसंबंधों को लेकर हमारी वर्जनाओं और कुंठाओं की उपज हैं. डाॅ. अनूप सिंह की टिप्पणी हमारे नकली मानस को ही इंगित करती है. वे लिखते हैं कि ‘मैं गीतों की शाब्दिक चित्रकारिता में निम्नवर्गीय भाषा का प्रयोग ठीक नहीं समझता.’ यह बात आहत करने वाली है. निम्नवर्गीय भाषा! आखिर क्या मायने हैं इसके? यह भाषाई उच्चवर्ग कौनसी बला है जनाब? आप यदि थोड़ासा पढ़लिख लिए तो, कथित उच्च जातिवर्ग में सम्मिलित हो गए तो, क्या इससे आपका सब कहाकरा मान्य हो गया? जो दूसरों के गाढ़े पसीने की कमाई पर मौज उड़ाते, उनकी अभिव्यक्ति पर लगाम डाले रहे, वे ऊंचे और महान! जिन्हें संसाधनों और अवसरों से वंचित रखा गया, पढ़नेलिखने नहीं दिया, अपने श्रमकौशल पर जो जैसेतैसे जीवित रहे, ऐसे मेहनतकश यदि अपनी बोलीबानी में अपनी बात कहें तो उनकी अभिव्यक्ति का कोई मोल ही नहीं. जिस कविता से पसीने की गंध आए, जो आमजन की मुश्किलों और संघर्षों का सच्चा बयान है, वह निकृष्ट और वह गंदी. उनकी तरह उनकी अभिव्यक्ति भी निम्नवर्गीय हुई, वाह! और जिन कविताओं में आश्रयदाता सम्राट की, उसके दरबारियों की चाटुकारिता, उनको हंसाने के लिए किया गया भाषाई मखौल, नायिका का नखशिख वर्णन है, वह श्रेष्ठ और उच्चवर्गीय! क्षोभ होता है, अमानवीयता की बू आती है इस गंदी स्थापना से.

आखिर भाषा अपने आप में क्या है? क्या उसका काम संवादवहन से इतर है? संस्कृत की गाली क्या गाली नहीं होती? अजीब छद्म है कि हम नंगे तो हों, लेकिन हमाम में. ऐसे कि हमारी नंगई सिर्फ हमीं को दिखाई दे. पर जिसके पास हमाम की सुविधा नहीं है; या जो आपके जैसी देवभाषा में पारंगत नहीं है. वह अपनी कामनाओंकल्पनाओं को अपनी भाषा में अभिव्यक्त करे तो वह पाप है, चारित्रिक स्खलन है! यह दृष्टिकोण सामंतवादी नहीं तो और क्या है? यह स्थिति दुनिया के प्रायः सभी देशों में रही है. इसी को लक्षित करते हुए मार्टिन लूथर ने कहा था कि—

मृत्यु के बाद मैं प्रेत बनना चाहूंगा, ताकि मैं वाचाल पादरियों, पुजारियों तथा पाखंडी साधुओं को सबक सिखा सकूं। उस समय तक और इतना तंग कर सकूं, जितना हजारों जीवित लूथर एक साथ मिलकर भी नहीं कर सकते।’

एक जमाना था जब समाज का एक वर्ग भोग और व्यभिचार में लिप्त रहता था तथा दूसरों के लिए उपदेश बांटता था. उसने अपने भोग और व्यभिचार के अलग मापदंड बनाए हुए थे. ‘गीतगोविंद’ जैसी रचनाएं संस्कृत में रची गईं, जो उस समय समाज के संभ्रांत वर्ग की भाषा थी. उसको आम आदमी समझ नहीं पाता था. इसलिए उसमें मुक्त कामाभियक्ति को भी स्थान मिला. बाद में जब समाज के दूसरे लोग भी संस्कृत समझने लगे तो सच पर पर्दा डालने के लिए उसमें आध्यात्मिक तत्वों की खोज की जाने लगी. कि कहीं हमारी महान संस्कृति को धब्बा न लग जाए. अश्लीलता को दर्शाने के दुहरे मापदंड गढ़े गए. उन दिनों काईंया बुद्धिजीवियों के प्रयास से समाज भाषाई आधार पर विभाजित था. यानी प्रभुवर्ग की भाषा अलग, दीनहीनों की अलग. प्रभुवर्ग की शास्त्रों में वुद्धिविचार के साथ भरपूर मनोरंजन भी. दीनहीनों की भाषा में त्याग और तपस्या का गुणगान, भक्तिमहात्म्य तथा उपदेश. साथ में आमजन को रूढ़िवादी बनाए रखने का बाकी सभी साजोसामान.

ऐसा नहीं है कि इस चालाकी को समझा नहीं गया. समझने के बाद उसका तोड़ निकाला गया. सेक्स यदि प्रकृति की भाषा है तो उसके द्वारा होने वाला मनःरंजन प्रभुवर्ग तक ही क्यों सीमित रहे. अतः जिसे शास्त्रों ने निषिद्ध माना गया, वह लोकसंस्कृति का हिस्सा बन गया. तभी तो पे्रम और सेक्स की वर्जनाओं का विरोध भारत की लोकसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. डाॅ. अनूप सिंह तो गांव के हैं. जानते होंगे कि विवाह वाले वाले घर में जब वर पक्ष के मर्द बारात में चले जाते हैं तो घर पर अकेली रह गई औरतें खोइया के रूप में क्या करती हैं. उस समय उनके गीतों के व्यंजार्थ की गहराई में जाने का प्रयास करें. समझ आएगा कि उनमें उन सभी वर्जनाओं का मखौल उड़ाया जाता है, जो औरत होने के नाते खासतौर पर उनपर लाद दी जाती हैं. अब तीज मनाना तो गुजरे जमाने की बात होती जा रही है. लेकिन डाॅ. अनूप सिंह को अगर याद हो, तीज खेलने गई कुंवारी ललनाएं ‘वरवरनी’ का नाटक करते हुए कौन से संवाद करती हैं? क्या उनमें युवा काम का उद्दीपन नहीं होता? क्या वह हमारे लोकसाहित्य और संस्कृति का हिस्सा नहीं है? पर उसे तो कोई निम्नवर्गीय नहीं मानता. वे कहेंगे कि साहित्य नहीं है वह. तो मेरा विनम्र प्रश्न है कि साहित्य क्या संस्कृति से भी बड़ी संरचना है. यदि संस्कृति साहित्य में प्रतिबिंत होती है तो इसमें बुरा क्या है!

इसका आशय यह नहीं है कि डा॑. शिवशंकर की भावकामायनी को प्रकाशन का अधिकार मिल जाता है. वस्तुतः हमें तय करना होगा कि किसी पत्रिका में रचनाओं के मापदंड की कसौटी क्या हो. ऐसी रचनाओं के छापने या आलोचना का आधार भाषा या उसके किसी खास गुण को नहीं बनाया जा सकता. किसी ऐसी पत्रिका में जिसका प्रकाशन साहित्य के नाम पर किया जा रहा है, रचना के चयन का आधार केवल और केवल उसमें मौजूद साहित्यिकता ही हो सकती है. इस आधार पर तो डाॅ. शिवशंकर की कविता पहली नजर में ही कूड़ेदान के हवाले कर देनी चाहिए थी, यही सच्ची गुरुदक्षिणा भी होती. क्योंकि उसमें साहित्यभाव का लेश भी नहीं है. वह आत्मरति की कविता है, जो किसी कामुक व्यक्ति को ही सुख पहुंचा सकती है. सुरंजन एक भावुक और अनुभवी संपादक है, आशा है आगे से रचना के चयन का आधार इस बात को बनाएंगे कि वह समाज को आखिर क्या दे सकती है. गुरुदक्षिणा के और कई रास्ते हैं. पत्रिका अपने आप में एक सार्वजनिक मंच होती है, उसका उपयोग निजी सुख या अनुकंपा के लिए नहीं किया जाना चाहिएपर सुरंजन माने तब ना!

वैसे यह वर्ष सुरंजन के लिए खास रहा है. उनकी बड़ी बहू का आगमन हुआ है. मेरी कामना है कि घर में जल्द ही किलकारी गूंजे और मैं उनके चेहरे पर दादा की मुस्कान देखूं

 

 

ओमप्रकाश कश्यप

बीमाः संकट में सहयोग

स्वातंत्रयोत्तर भारत में बात उन परिवर्तनों के जिक्र से शुरू की जा सकती है जो इन सतावन सालों में दृष्टिगत हुए हैं. जिन्होंने न केवल हमारी जीवन-शैली को बदल देने में कामयाबी हासिल की है, बल्कि कुछ ऐसी परंपराओं की नींव भी डाली है, जो इससे पूर्व अस्तित्व में ही नहीं थीं. आधुनिक तेज गति जीवन उन परंपराओं को पूरी तरह बदल चुका है, जिन्हें कभी भारतीय समाज-व्यवस्था का मूलाधार माना जाता था. पहले अस्सी प्रतिशत जनता ग्रामवासिनी थी. इधर के वर्षों में औद्योगीकरण और व्यावसायीकरण की तीव्र गति ने शहरीकरण को बढ़ावा दिया है. परिणामतः शहरी जनता का अनुपात करीब तीस प्रतिशत तक पहुंच चुका है. संचारक्रांति ने शहरों और गांवों के बीच पुल का निर्माण किया है. जिससे वहां भी शहरी संस्कृति का विकास हो रहा है. वहीं दूसरी और अतिआधुनिकता से उकताए लोग, शहरों में ग्राम्यः संस्कृति का टोटम रच रहे हैं. गांवों में भी-गरीबी की मार, बड़ी जोतों के सिकुड़ने, प्रतिभा पलायन से परंपरागत संयुक्त परिवार का ढांचा बिखरा है. वे बड़ी तेजी से एकल परिवारों में टूटते जा रहे हैं. अंधस्पर्धा, महंगाई, उपभोक्ता-संस्कृति का मोह आदि कुछ ऐसे कारक हैं, जो एकल परिवारों पर आर्थिक असंतुलन का दबाव बनाए रहते हैं. अतः परिवारों के अधिकाधिक वयस्क सदस्यों का आमदनी वाले कार्यों से जुड़ना, आधुनिक जीवन की आवश्यकता बनता जा रहा है.
अत्याधुनिक खोजों ने आदमी को अधिक सुविधासंपन्न बनाया है, वहीं खतरे की संभाव्यता में भी वृद्धि की है. आधुनिक जीवन की विसंगति यह भी है कि मनुष्य की जोखिमों को सहने की क्षमता निरंतर घटी है. कारण यह है कि एकल परिवारों में जोखिम सहने का सामथ्र्य, संयुक्त परिवारों की अपेक्षा कम होता है. पूरा परिवार एक या दो सदस्यों की आमदनी पर टिका रहता है. ऐसे में उनमें से किसी एक या उसके व्यवसाय को होने वाली हानि से पूरा परिवार तबाह हो जाता है. संयुक्त परिवारों में कमाऊ सदस्यों की संख्या तथा पारस्परिक लगाव का आधिक्य होने के कारण, उनमें से किसी एक को होने वाला नुकसान बाकी सदस्यों में बंट जाता है. जिससे परिवार बिखराव से बचा रहता है.
संयुक्त समाजों में, व्यावसायीकरण एवं औद्योगीकरण की नीति के चलते, संयुक्त परिवारों का बचे रहना संभव नहीं रहा है. ऐसे में एकल परिवारों को संकट के समय सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाएं की गई हैं. जीवनबीमा उन्हीं में से एक है. यह मनुष्य के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है. चूंकि जोखिम की आमद कभी और किसी भी रूप में हो सकती है, इसलिए बीमा भी वस्तु , व्यक्ति या व्यवसाय आधारित अनेक रूपों में पनपा है. कुछ इस तरह से कि यह हमारे आधुनिक जीवन की आवश्यकता बन चुका है. कल्याण सरकार में चूंकि नागरिकों के हितों की सुरक्षा का दायित्व सरकार का होता है. अतएव बीमा को आधुनिक सरकारों द्वारा भरपूर समर्थन दिया जाता है.
यह सच है कि बीमा की संकल्पना संकटकाल में आसन्न विपत्ति के रूप में सिर आ पड़ने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए की गई थी. किंतु आधुनिक काल में उसके विभिन्न रूप सामने आए हैं. शिक्षा , वृद्धावस्था, विकलांगता, मृत्यु जैसी परिस्थितियों में भी बीमा कंपनियां पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार की विश्वसनीय मददगार के रूप में साथ खड़ी होती हैं.
यह सच है कि दुनिया की सभी बीमा कंपनियां अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखकर काम करती हैं. किंतु उनके व्यवसाय की प्रकृति ही ऐसी होती हैे कि बीमित व्यक्ति के नुकसान की भरपाई करने के बावजूद वे मुनाफे की स्थिति में रहती है. यद्यपि यह लाभ केवल सामान्य अवस्था में ही संभव होता है. यदि किसी विशेष बीमित व्यक्ति के संदर्भ में देखा जाए तो लाभ की स्थिति केवल बीमित व्यक्ति के जोखिम से बचे रहने तक ही संभव होती है. वैसी अवस्था में बीमा कंपनी उस धनराशि को पचा जाती है जो बीमित व्यक्ति या संस्था ने प्रीमियम के रूप में जमा की थी, अथवा तय शर्तों के अनुसार उसे साधारण ब्याज के साथ लौटा दिया जाता है. मगर जैसे ही वह बीमित व्यक्ति जोेखिम की स्थिति में आता है, हालात एकदम बदल जाते हैं. तब बीमा कंपनी को प्रायः बीमित व्यक्ति या संस्था द्वारा जमा कराए गए प्रीमियम से ज्यादा धनराशि का भुगतान करना पड़ता है, और उस व्यक्ति या संस्था विशेष के संदर्भ में वह नुकसान की स्थिति में आ जाती है.
यह कोई जादुई या चमत्कारी बात नहीं है, बल्कि गणित के एक लोकप्रिय नियम पर आधारित है. बीमा कंपनियों का एक सीधा-सा अर्थशास्त्रा यह है कि जो बात किसी एक व्यक्ति के लिए महज एक संयोग है, अर्थात किसी प्रकरण विशेष में जिसका अनुमान लगा पाना संभव नही होता, वह समूह के लिए पूर्वानुमान-योग्य हो जाती है. इतनी कि उसके आधार पर सामान्य नियम बनाए जा सकते हैं. ठीक ऐसे ही जैसे कि 15, जून-2010 के दिन के तापमान के बारे में ठीक-ठीक कुछ भी बता पाना संभव नहीं है. वह बहुत कुछ उस दिन के मौसम पर निर्भर होगा. उस दिन तेज गर्मी से पारा 45 डिग्री सेलसियस को पार भी कर सकता है, अथवा धूप-बारिश-अंधड़ आदि के संयुक्त प्रभाव से तापमान तीस डिग्री से नीचेे भी गिर सकता है. परंतु जून-2010 के तापमान के बारे में, विगत वर्षों के अनुभव के आधार पर आप एक निश्चित-सा अनुमान लगा सकते हैं. हम कह सकते हैं कि उस दिन या महीने का औसत तापमान करीब 44 डिग्री सेलसियस होगा. इस अनुमान के आधार पर सामान्य नियम बनाए जा सकते हैं.
इसे एक और उदाहरण के द्वारा भी समझ सकते हैं. मान लीजिए अलादीन नाम का एक युवक है, जिसकी वर्तमान आयु तीस वर्ष है. अब इस बारे में कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह युवक आगे बीस सालों तक और जिएगा या नहीं. किंतु राजधानी में इस समय तीस वर्ष के यदि पांच लाख युवक हैं तो संभाव्यता के नियम के आधार पर यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि उनमें से पचास की अवस्था तक पहुंचने वाले युवक कितने प्र्रतिशत होंगे. सरकारी- गैरसरकारी सभी आकलन इसी आधार पर किए जाते हैं.
इसी सिद्धांत के आधार पर बीमा कंपनियां अपनी योजनाएं बनाती हैं. संभाव्यता का लोकजीवन में एक और उदाहरण जुआ है. यदि दो व्यक्ति जुआ खेेल रहे हों तो उनमें से प्रत्येक की जीत की संभावना केवल पचास प्रतिशत होगी. अब यहां एक सवाल पैदा हो जाता है कि एक ही नियम पर आधारित होने के बावजूद जुआ क्यों नुकसानदेह होता है. इसका सीधा-सा उत्तर यह है कि एक तो साथ-साथ जुआ खेल रहे व्यक्तियों की संख्या, बीमित व्यक्तियों की अपेक्षा बहुत कम यानी नगण्य होती है. दूसरे जोखिम की स्थिति में उसकी भरपाई के लिए उनके पास कोई वैकल्पिक सक्षम तंत्रा नहीं होता. जबकि बीमित व्यक्ति की पीठ पर बीमा कंपनी का हाथ होता है जो उसके नुकसान को उन शेष बीमित सदस्यों में बांट देता है जो जोखिम से दूर हैं. स्पष्ट है कि बीमा में जोखिम घट जाता है, साथ ही व्यक्ति को संकटकाल में मदद का भरोसा बना रहता है, जो उसको दूसरी अनेक चिंताओं से मुक्त रखता है.
जुआरी की भांति हालांकि बीमित व्यक्ति भी जमा की गई प्र्रीमियम की रकम को दांव पर लगाता है. तो भी, यह मानना गलत होगा कि वह जुआ खेलता है. सचाई यह है कि जो व्यक्ति बीमा नहीं कराता वह जुआ खेल रहा होता है. क्योंकि उस अवस्था में अपने नुकसान की भरपाई अकेले ही करनी पड़ती है. उदाहरण के लिए फैक्ट्री मालिक जिसके कारखाने में पचास लाख का माल भरा हो, बीमा की स्थिति में प्रीमियम के रूप में मामूली रकम जमा कराता है. यदि वह जोखिम से बचा रहता है तो उसके प्रीमियम की राशि या तो डूब जाएगी अथवा वह उसपर बहुत कम लार्भाजन कर पाएगा. लेकिन दुर्योग से यदि कारखाने में आग या किसी और आपदा से तबाही मच जाए तो गैरबीमित व्यक्ति बरबाद हो जाएगा. क्योंकि वैसी स्थिति में आपदा से हुई तबाही से उबरने के लिए कोई वैकल्पिक इंतजाम उसके पास नहीं होगा. अतएव जो व्यक्ति बीमा नहीं कराता , वह भी एक तरह से जुआ ही खेल रहा होता है.
अर्थशास्त्र का प्रसिद्ध ‘ह्रासमान का नियम’ भी बीमा के पक्ष में जाता है. जिसके अनुसार दांव जीतने से मिलने वाली संतुष्टि, दांव हारने में मिलने वाली असंतुष्टि की तुलना में प्र्रायः कम ही होती है. यही बात बीमा कंपनी के पक्ष में जाती है. इसलिए कि वहां दांव हारने की स्थिति में असंतुष्टि से बचाव के लिए बीमा कंपनी, बीमित व्यक्ति के साथ होती है. अर्थशास्त्रा का एक नियम यह भी है कि विभिन्न व्यक्तियों में उचित रूप से बांटी गई स्थिर आय, आर्थिक रूप से अस्थिर आय की अपेक्षा श्रेष्टतर होती है जो, उन भाग्यहीन व्यक्तियों के हिस्से में आती है जिनके पास नुकसान की भरपाई के लिए बेहतर विकल्प नहीं होते.
आधुनिक जीवन की जटिलताओं को देखते हुए जोखिम की संभावना को पूर्णतः टाल पाना संभव ही नहीं है. मगर ऐसे उपाय अवश्य किए जा सकते हैं जिनसे कम से कम आर्थिक नुकसान, की भरपाई संभव हो सके. आधुनिक भागमभाग भरे जीवन में बीमा इसीलिए अपरिहार्य होता जा रहा है.
भारत के ही संदर्भ में लें तो देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी ‘जीवन बीमा निगम’ की प्रगति का ग्र्र्राफ उत्तरोत्तर ऊपर की ओर चढ़ता जा रहा है. निगम द्वारा बीमित सदस्यों/संस्थाओं की संख्या करोड़ों में है. अकेले वर्ष 2002-2003 के दौरान निगम ने 2,45,29,946 पा॓लसियों में लगभग 1,79,811/- करोड़ रुपए का बीमा-व्यवसाय किया और पहली प्रीमियम आय के रूप में 9571.39 करोड़ रुपए जमा किए. निगम द्वार यह धनराशि सरकार द्वारा अनुमोदित विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में निवेश की जाती है. सहकारी चीनी मिलों, हाॅउसिंग, बिजली , सड़क परिवहन, सिंचाई , जल आपूर्ति एवं मल निकासी, उद्योगों आदि में निगम द्वारा वर्ष 2002-2003 तक 2,65,044.47 करोड़ रुपयों का निवेश किया जा चुका है, जो देश के किसी भी अकेले सार्वजनिक प्रतिष्ठान द्वारा सरकारी योजनाओं में किए गए निवेश से कहीं ज्यादा है. इस प्रकार बीमा के रूप में किया गया निवेश न केवल आपदा के समय बीमित व्यक्ति का मददगार बनता है बल्कि विभिन्न कल्याण कार्यक्रमों के रूप अप्रत्यक्ष सामाजिक लाभ भी देता है. फसल बीमा और पशु आधारित बीमा ने ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और खेतिहर मजदूरों के बीच नई चेतना का संचार किया है. यही कारण है बीमा के प्रति लोगों का आकर्षण निरंतर बढ़ता जा रहा है.
जीवनबीमा निगम के अलावा और भी कई सरकारी-गैरसरकारी बीमा कंपनियां इन दिनों बाजार में हैं. जिनके बीच स्पर्धा का हमेशा माहौल बना रहता है. भारतीय जीवनबीमा निगम को छोेड़कर बाकी सभी की पहुंच अभी तक केवल शहरों और बड़े कस्बों तक ही सीमित है. ग्रामीण जनता का भरोसा भी जीवनबीमा जैसी भारतीय मूल की सरकारी कंपनियों के साथ है, शायद इसलिए कि उन्हें सरकारी संरक्षण प्राप्त है और संभवतः इसलिए भी कि उनकी योजनाओं की रूपरेखा भारतीय परिवेश और कल्याण सरकार की अवधारणाओं के अनुकूल बनाई गई है.

राष्ट्रीय सूचना अधिकार आयोग पर नौकरशाही का दबदबा

अपने पहले ही दिन से सूचना अधिकार अधिनियम-2005 सरकार के गले की फांस बना हुआ है। इसलिए किसी न किसी बहाने इसपर हमला या इसकी धार कुंद करने के प्रयास होते ही रहते हैं. आमतौर पर राजनेता तो इस बावत चुप ही रहते हैं, वे जनता की सीधे-सीधे बुराई मोल नहीं ले सकते, परंतु नौकरशाह किसी न किसी बहाने से इस अधिनियम के पर कतरने के प्रयासों में लगे रहते हैं. कदाचित अपने आका राजनेताओं को खुश करने की चाहत में, समय-समय पर उनके ऐसे बयान आते ही रहते हैं, जो इस अधिनियम की मूलभावनाओं से कहीं मेल नहीं खाते। कुछ महीने पहले फाइल की नोटिंग को सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर रखने की मांग इन नौकरशाहों ने ही की थी। सरकार भी तैयार थी, अधिनियम की समीक्षा की बात कही गई. किंतु बदनामी के डर से सरकार ऐसा फैसला लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. ध्यातव्य है कि सरकार ने सूचना के अधिकार को सुलभ और सशक्त बनाने के लिए उच्चाधिकार संपन्न आयोग का गठन किया है, उसके मुख्य सूचना आयुक्त का दर्जा देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के समकक्ष है.
यह विडंबना ही है कि अपने गठन के लगभग साढ़े तीन वर्ष पूरे होने के बाद भी आयोग समाज के बीच अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ रहा है, बल्कि जितना इसका आरंभिक दबदबा था, वह भी नौकरशाही की प्रशासनिक जकड़बंदी के कारण धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. हाल ही में सरकार ने कुछ ऐसे नियम बनाए हैं, जो इस अधिनियम को कमजोर कर देने की सोची-समझी साजिश का नमूना हैं. हालांकि थोड़े ही वर्षों में ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ के पक्ष में अनेक उपलब्धियां दर्ज हो चुकी हैं, परंतु उनका श्रेय कुछ जागरूक नागरिकों तथा सूचना अधिकार अधिनियम के प्रचार-प्रसार में लगे स्वयंसेवी, संगठनों को जाता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि अभी तक लोगों ने इस अधिनियम का लाभ उठाने का प्रयास किया है, उनमें से अधिकांश राजधानी या शहरी परिक्षेत्र से जुडे़ हुए हैं. ग्रामीण लोगों तक इस अधिनियम की पहुंच अभी तक नहीं बन पाई है. चूंकि देश की दो-तिहाई जनसंख्या अभी तक गावों में रहती है. अतः देश के बहुसंख्यक वर्ग का इस अधिनियम के प्रावधानों के प्रति अनभिज्ञ होना, वह भी ऐसे समय जब शक्तिशाली सूचनातंत्र घर-घर तक अपनी पहुंच बनाए हुए है, यह इस कानून के प्रति सरकार की उदासीनता को दर्शाता है. यह इसलिए भी प्रमाणित है कि अक्टूबर-2005 से, जबसे सरकार ने यह अधियिम लागू किया है, इसके प्रचार-प्रसार पर होने वाला खर्च लभगभ शूण्य है. इस तथ्य को सूचना आयोग भी स्वीकार चुका है.
परेशानी तब और भी बढ़ जाती है जब वही लोग इस अधिनियम के परिसीमन की मांग करते लगते हैं, जिनके ऊपर इस अधिनियम के सफल कार्यान्वन की जिम्मेदारी है. क्या इसलिए कि वे स्वयं भी नौकरशाह हैं? लोगों को सिर उठाकर हवा में खुलकर सांस लेते देख लेने से ही उनका अहं फुफकारने लगता है? सूचना अधिकार का अधिनियम का विरोध करने वाले प्राय: यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र के सशक्तीकरण का सही रास्ता सूचना की सर्वसुलभता के रास्ते से ही जाता है. कुछ महीने पूर्व एक सूचना आयुक्त बार-बार इस इस बात पर सार्वजनिक रूप से दुःख प्रकट कर रहे थे कि सूचना अधिकार अधिनियम का ज्यादातर लाभ सरकारी कर्मचारी उठा रहे हैं…कि इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले प्रार्थनापत्रों में से अधिकांश नौकरी की समस्याओं या तरक्की से जुडे़ मामलों को लेकर होते हैं…
इसपर एक समाचारपत्र ने अपने त्वरित संपादकीय में सूचना आयुक्त महोदय के सुर में सुर मिलाते हुए इस बात को दुर्भाग्यपूर्ण बताया गया कि सरकारी कर्मचारी (केवल) अपने किसी हक के लिए इस अधिनियम का उपयोग करें…तरक्की के लिए सीढ़ी बनाएं…कि जैसे सरकारी कर्मचारी इस देश के नागरिक ही नहीं हैं…जैसे सरकारी कर्मचारियों के उपयोग मात्र से इस अधिनियम की चमक फीकी पड़ जाएगी. लगता है कि इस तरह की टिप्पणी करते समय संपादक महोदय यह भूल गए थे कि देश के सरकारी कार्यालयों में सीसीएस और सीसीए के अंतर्गत जो प्रशासनिक नियम-कानून सरकार ने लागू किए हुए हैं, उनका ढांचा लगभग वही है, जो अंग्रेजों के समय के सरकारी दफ्तरों का था, जिसमें अंग्रेज बहादुर सर्वेसर्वा होता था, जो अपने हितों की खातिर सारे कायदे-कानून ताक पर रख देता था.
मुट्ठी-भर अंग्रेजों ने इस देश पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उच्चस्तरीय नौकरशाहों को अतिरिक्त रूप से अधिकार-संपन्न बनाया था. क्योंकि उन पदों पर या तो स्वयं अंग्रेज नियुक्त होते थे अथवा उनके मुंहलगे, खुशामदी सामंतपुत्र. वही कानून आज भी उच्चस्तरीय नौकरशाहों को अतिरिक्तरूप से अधिकार संपन्न बनाते हैं. सरकारी कर्मचारी को भी शीर्षस्थ अधिकारियों के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. विद्वान संपादक एवं सूचना आयुक्त महोदय को इतना तो मालूम ही होगा कि उत्पीड़न या भ्रष्टाचार का शिकार अकेले जनता ही नहीं होती. अपने पद का दुरुपयोग कर कई बार ये बड़े अधिकारी अपने चहेतों को आगे ले आते हैं और जिनको तरक्की मिलनी चाहिए वे उससे वंचित रह जाते है. भाई-भतीजावाद के आरोप ऐसे ही तो नहीं लगाए जाते. सूचना अधिकार का अधिनियम यदि ऐसे उत्पीड़कों को अपनी बात उठाने का एक अवसर देता है तो इसमें बुराई ही क्या है.
यह अधिनियम आमजन और छोटे कर्मचारियों को सत्ता के तिलिस्म में सेंध लगाने का अधिकार देता है, जिससे कि वे सूचना को जनता के बीच ले जाकर उसे सच से रू-ब-रू करा सकें. उसपर सरकारी कर्मचारियों की संख्या है ही कितनी. भारत की कुल जनसंख्या के अनुपात से देखा जाए तो मुट्ठी-भर भी नहीं. आरोप लगाते समय जनाब सूचना आयुक्त यह भी भूल गए थे कि इस देश के आमजन का सशक्तीकरण कहीं न कहीं सरकारीतंत्र की पारदर्शिता से भी जुड़ा है; और नौकरशाही इसलिए भी बलवान है, क्योंकि इसमें अपनी कलम की ताकत का डर दिखाकर बड़े अधिकारी छोटों से मनमाने काम करा ले जाते हैं. सूचना अधिकार अधिनियम ने आम जनता के साथ साथ उन अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी ताकत दी है जो अपनी मेहनत और ईमानदारी के साथ काम करना चाहते हैं. इसलिए सरकारी कर्मचारियॊं को इस अधिनियम के लाभॊं से वंचित करना या किसी भी प्रकार से हतोत्साहित करना सरकारी मशीनरी में यथास्थिति बनाए रखने की साजिश जैसा होगा.
ऐसा नहीं है कि वर्तमान प्रशासनिक नियम छोटे सरकारी कर्मचारियों के एकदम विरुद्ध हैं. बल्कि जो कानून बड़े अधिकारियों के लिए उन्हीं के अंतर्गत छोटे कर्मचारियों को भी काम करना पड़ता है. लेकिन बड़े अधिकारियों को विवेक के इस्तेमाल की छूट उन्हें कभी-कभी उन्हें असीमित रूप से सामर्थ्यवान बना देती है. हालांकि वर्तमान नियमों में भी ऐसा प्रावधान है जिससे फाइल में दर्ज सूचनाएं मांगने पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं. लेकिन इस कानून की एक तो सीमाएं हैं। यह कि वह बात को कार्यालय से बाहर ले जाने की अनुमति नहीं देता और बिना उच्चाधिकारियों की अनुमति के यदि कोई ऐसा करनेका दुस्साहस करता है तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाही का अधिकार वर्तमान नियम उच्चाधिकारियों को देते हैं. वर्तमान नियमों की सरकारी गोपनीयता कानून के बहाने किसी भी सूचना को रोका जा सकता है. जबकि सूचना अधिकार अधिनियम की शर्तों के अनुसार मांगी गई सूचना को सार्वजनिक करना पड़ता है. परंपरागत सरकारी नियमों में तीसरी कमी है, स्पष्टता की और प्रार्थनापत्र के निस्तारण के लिए किसी समयसीमा का न होना, जिससे किसी भी अनचाहे प्रार्थनापत्र पर कार्रवाही अनंतकाल तक टाली जा सकती है. सूचना अधिकार अधिनियम में अंतर्गत एक ओर तो गोपनीयता कानून के आने वाली सूचनाओं की स्पष्ट व्याख्या की गई है, दूसरे इसमें हर स्तर पर कार्रवाही की समय सीमा तय गई है। तय सीमा के अंतर्गत सूचना प्राप्त न होने पर प्रार्थी ऊपर के स्तर पर अपील कर सकता है।
इतने सारे गुण मिलकर सूचना अधिकार अधिनियम को बाकी कानूनों से अलग एवं लोकोन्मुखी बनाने का काम करते हैं. इन्हीं के कारण यह कानून अनेक लोगों की आंखों की किरकिरी बना हुआ है. इसपर सूचना अधिकार अधिनियम के प्रचार-प्रसार में लगे मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल ने अंग्रेजी दैनिक ‘मिंट’ में लिखे लेख में मुख्य सूचन आयुक्त के कार्यालय में सूचना के अधिकार के कार्यान्वन में हो रही शिथिलता और लापरवाही को लेकर जो गंभीर आरोप लगाए थे, उनसे तो लगता है कि मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यालय ही सूचना के अधिकार का दुश्मन बना हुआ है. वे आरोप इतने गंभीर थे कि सच सिद्ध होने पर मुख्य सूचना आयुक्त का इस्तीफा भी इस दाग को शायद ही धो सके, क्योंकि यह सीधे-सीधे लोकतंत्र और जनता जनार्दन के प्रति विश्वासघात का मामला बन सकता है. तब अरविंद केजरीवाल ने उदाहरण देकर बताया था कि मुख्य सूचना आयुक्त के कार्यालय में बरती जा रही शिथिलता को देखकर दूसरे सरकारी कार्यालय भी अधिनियम को लेकर लापरवाही दिखाने लगे हैं.
ऐसे में जरूरी है कि मुख्य सूचना आयुक्त और उनके सहयोगी मिलकर अपने की कार्यालय की कार्यकुशलता को सुधारने के लिए काम करें, जहां हजारॊ की संख्या में मामले सुनवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कुछ क्षेत्र तो उनसे तत्काल कार्रवाही की मांग भी करते हैं, जिनसे इस अधिनियम की साख भी जुड़ी हुई है। जैसे कि अधिनियम के अंतर्गत मांगी गई सूचना का गलत या आधे-अधूरे रूप में मिलना। जवाब में वे कह सकते हैं कि इसके लिए अपील प्राधिकारी हैं; और यदि अपील प्राधिकारी भी गलत या आधी-अधूरी सूचना देकर पीछा छुड़ाना चाहता है तो उसके लिए सूचना आयुक्त हैं. लेकिन यह प्रश्न फिर भी रह जाता है कि कितने मामलों में जनता को बरगलाने वाले अधिकारियों को गलत या आधी-अधूरी सूचना के लिए दंडित किया गया है? आयोग यदि मानता है कि जनता के हक में बनाए गए इस अधिनियम का पूरा लाभ आमजन को नहीं मिल पा रहा है, तो मेरी समझ में आमजन को उसका हक दिलाने के लिए उसमें अधिनियम के प्रति जागरूकता लाना भी सूचना आयोग का काम है।
इसलिए सरकारी कर्मचारियों को इस अधिनियम का अपने हितों के लिए उपयोग करने के लिए दोषी ठहराने ज्यादा जरूरी है कि सरकार इसके प्रचार-प्रसार के लिए योजनाएं बनाए. वे योजनाएं सिर्फ कागजी ही न रह जाएं इस बात पर निरंतर नजर रखी जानी चाहिए. सरकारी कर्मचारियों को दोषी ठहराना तो आसान है, उसके बहाने से एकाध प्रेस रिलीज जारी करने जैसा रूटीन कार्य भी किया जा सकता है, किंतु सूचना के अधिकार को जन-जन तक ले जाकर उसे अधिकाधिक लोकोन्मुखी और व्यापक बनाने का काम बहुत ही चुनौती पूर्ण है. लेकिन टी. एन. शेषन जैसा नामचीन नौकरशाह बनने के लिए ऐसी ही चुनौतियों से गुजरना पड़ता है. ध्यान रहे कि शेषन साहब ने भ्रष्ट कही जाने वाली इसी नौकरशाही को एकदम पटरी पर लाकर निर्वाचन आयोग को दूसरों के लिए उदाहरण बनाने का कार्य किया था। उन्हीं की प्रेरणा थी जो उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग को शाबासी का हकदार पाया गया था.
इसलिए जनाब सूचना आयुक्त से अनुरोध है कि वर्तमान सूचना अधिनियम को परिसीमित करने के बजाय वे इसे और अधिक उपयोगी, सशक्त एवं प्रभावी बनाने का काम करें. तभी उनके कहने और होने की सार्थकता है. नहीं तो जाने कितने अधिकारी आए और गए. समय की छलनी में सिर्फ दो तरह के नाम ऊपर रह जाते हैं—एक वे जो समाज के भले के लिए काम करते हैं तथा दूसरे वे जो भलाई के काम में अडंगा लगाने का काम. यह इंसान के ऊपर है कि वह इनमें से कौन-सा रास्ता अपने लिए चुनता है. निश्चय ही सरकार तथा सूचना अधिनियम के कार्यान्वन से जुड़े कर्मचारियों तथा अधिकारियों पर यह जिम्मेदारी है कि वे न केवल इस अधिनियम कि ताकत एवं पवित्रता को बनाए रखेंगे, बल्कि अधिक से अधिक नागरिकों को इससे परचाकर, भारतीय जनतंत्र को और अधिक सफल एवं मजबूत बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान देंगे.
प्रस्तुति: विनायक

विश्वनाथ प्रताप सिंह : सामाजिक न्याय का मसीहा

भारत में सामाजिक न्याय और परिवर्तनकारी राजनीति की शुरुआत करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह गत 27 नबंवर 2008 को हमारे बीच नहीं रहे. लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ. जानलेवा बीमारी के बावजूद अपने जनसरोकारों के कारण चर्चा में बने रहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री की मौत को मुबंई पर आंतकवादी हमले की घटनाओं ने गुमनाम बना दिया था. चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि परिवर्तनकारी राजनीति की अनदेखी करने वाले मीडिया को उनकी उपेक्षा करने का बैठे-बैठाए एक मुद्दा मिल गया. लग तो वर्षों से रहा था कि वे मृत्यु के समानांतर यात्रा पर हैं, परंतु वे मौत को इतना टाल सकते हैं, यह किसी ने नहीं सोचा था. गंभीर बीमारी उन्हें बार-बार अस्पताल खींच ले जाती. हर बार वे मृत्यु को चकमा देकर घर लौट आते. अजातशत्रु की भांति. जी हां, अजातशत्रु की ही भांति. बरसों-बरस लंबी खिंचनेवाली बीमारी से जब बड़े-बड़ों के हौसले पस्त हो जाते हैं, वे उससे जूझते रहे. बड़ी बात यह है कि घनी बीमारी भी, उन्हें उनके राजनीतिक-सामाजिक सरोकारों से दूर नहीं कर पाई थी.

राजनीति से दूर रहकर भी वे राजनीति में बने रहे. न उसका कीचड़ उनकी संतई को दागदार कर सका, न कोई प्रलोभन ही उन्हें उनके सिद्धांतों से डिगा पाया. आज के बड़बोले नेताओं के पास भले ही मुद्दों का अकाल रहता हो. बड़े-बड़े विश्लेषक, समाजविज्ञानी राजनीति के मुद्दाविहीन हो जाने पर भले ही अफसोस जताते रहते हों, मगर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कभी मुद्दों का अकाल नहीं भोगा. बल्कि परिवर्तनकारी राजनीति के पैरोकार, उसके जोश-भरे कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, समाजकर्मी विकल्पों की खोज में विश्वनाथ प्रताप सिंह के आसपास सदैव जमा रहे. उम्मीद-भरी निगाहों से उनकी ओर ताकते रहे. सच्चे मन से कामना करते रहे कि वे आगे बढ़कर विकल्प की जमीन तैयार करें. संभव हो तो नेतृत्व की बागडोर अपने हाथों में संभालें. खूब जानते थे कि विश्वनाथ प्रताप सिंह का शरीर अब उनका साथ नहीं देगा. भीतर ही भीतर छीजती जा रही काया में सक्रिय राजनीति के धूप-ताप सहने का सामर्थ्य ख।  चुकी है. फिर भी वे उनके इर्द-गिर्द जुटे रहते. उनके लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह का होना, बदलाव की उम्मीद, विकल्प का बचे रहना जैसा था.

एक सच यह भी है निवर्तमान प्रधानमंत्रियों में अकेले विश्वनाथ प्रताप सिंह ही थे, जो सत्ता से दूर रहकर भी लगातार सक्रिय और चर्चा में बने रहे. इस तथ्य के बावजूद कि सवर्ण मानसिकता-युक्त मीडिया लगातार उनकी उपेक्षा करता रहा. वर्तमान राजनीति के मरुस्थल में वस्तुतः सिर्फ विश्वनाथ प्रताप सिंह ही थे, जितना नैतिक आभामंडल इतना प्रखर था कि वहां जाकर कुछ न कुछ लेकर लौटने का विश्वास सदैव बना रहता था. हालांकि देश के अधिकांश सवर्णों के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह एक खलनायक का नाम था. एक राक्षस जिसने मंडल के दबे-छिपे जिन्न को बाहर निकाला और सामाजिक न्याय की कसौटी पर अपनी सरकार कुर्बान कर दी. अगर मंडल कमीशन की रिपोर्ट को उच्चतम न्यायालय की अनुमति नहीं मिलती तो संभव है, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बहुत पहले राजनीतिक निर्वासन कर दिया जाता.

और भारतीय राजनीति के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह क्या थे! मुझे याद है कि एक बार दूरदर्शन पर दिए गए साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के वर्षों के बाद वे उसके असर का आकलन किस प्रकार कर रहे हैं? तब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक रूपक के माध्यम से अपनी बात कहने की कोशिश की थी. बड़ी मासूमियत से उन्होंने बताया था कि जो पहले रेल के महज डिब्बे हुआ करते थे, आजकल उसका इंजन बने हुए हैं. ऐसा कहते समय उनके मन में आत्मविश्वास था. वही जो उनकी कूँची के माध्यम से कैनवास पर उतर आता है. वही अनूठी सहजता थी जो उनकी कविताओं में सादगी बन समाई रहती है. वह केवल उसी इंसान के लिए सहज-सुलभ होती है, जो भीतर-बाहर एक जैसा, एकदम निर्मैल्य हो.

उन दिनों उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह और बिहार में संभवतः लालू प्रसाद यादव अथवा उनकी पत्नी राबड़ी देवी की सरकारें थीं. देश के अन्य राज्यों में भी पिछड़े वर्ग के मंत्री-मुख्यमंत्री सत्ता में थे. सभी पार्टियां जान चुकी थीं कि दलित और पिछड़ों की संगति-सहमति के बिना सत्ता-शिखर तक पहुंच पाना असंभव है. इसलिए कुछ पार्टियां सीधे-सीधे अपनी जिम्मेदारी उनके हाथों में सौंप चुकी थीं, जबकि कुछ ऐसे मुखोटों से काम चलाना चाहती थीं, जो जनता को भुलावे में रख सकें. ताकि उनपर दलित एवं पिछड़ा वर्ग हितैषी होने का आभास बना रहे और बाकी वर्ग भी प्रभामंडल में रमे रहें. विश्वनाथ प्रताप सिंह दलितों और पिछड़ों को एक मंच पर देखना चाहते थे. इसके लिए वे आजीवन प्रयास भी करते रहे. मगर इसको भारतीय राजनीति की अवसरवादिता कहें या उसका अनिश्चित चरित्र, या ऊंच-नीच की भावना-युक्त जातीय स्तरीकरण के लंबे दौर में, विभिन्न वर्गों के बीच पैदा हुई अविश्वास की मजबूत दीवार- दलित और पिछड़े एक मंच पर आना तो दूर, उनके अपने भीतर ही इतने टापू बनते चले गए, जिनसे सामाजिक न्याय का वह नारा ही अर्थहीन हो गया, जो कभी परिवर्तनकारी राजनीति का मूलमंत्र माना गया था.

वैसे विश्वनाथ प्रताप सिंह का अपना जीवन भी कम हलचल-भरा नहीं था. लोग उन्हें राजा मांडा भले कहा करते हों, मगर राजसत्ता को उन्होंने कभी अपने दिलोदिमाग पर सवार नहीं होने दिया. 25 जून, 1931 को दहिया रियासत के जमींदार परिवार में जन्मे विश्वनाथ प्रताप सिंह पिता राजबहादुर रामगोपाल सिंह के पांच पुत्रों में सबसे छोटे थे. परिवार गहरवार राजपूतों में से आता था. दहिया की पड़ोसी रियासत मांडा के तत्कालीन राजा भगवती प्रसाद सिंह की कोई संतान न होने के कारण 1936 में विश्वनाथ प्रताप सिंह को उन्होंने गोद ले लिया था. उसके बाद राजा भगवती प्रसाद सिंह तो केवल चार वर्ष जी सके. 1941 में दस वर्ष के दत्तक युवराज विश्वनाथ प्रताप सिंह को राजा मांडा की गद्दी सौंप दी गई. उंगली पकड़ने की उम्र में दूसरों पर शासन करना, नेतृत्व के नाम पर स्वार्थी परिजनों, सरदारों के हाथ की कठपुतली बने रहना, इसे राजशाही की शान माना जाता था.

विश्वनाथ प्रताप सिंह व्यवस्था के इस मखौल को समझ चुके थे. अबोध उम्र में राजा का ताज पहनना तो जरूरी था. मगर जैसे-जैसे होश आता गया, उनका विदेहत्व बढ़ता ही गया. उन दिनों पूरे देश में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध माहौल बना हुआ था. जमींदारी प्रथा उठने के कगार पर थी. गरीब किसान और मजदूर वर्ग अंग्रेज शासन के विरुद्ध निरंतर आंदोलनरत थे, जबकि कुछ को छोड़कर अधिकांश जमींदार यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे. इस परिवर्तनकारी दौर को किशोर विश्वनाथ ने काफी करीब से देखा था.

दत्तक होने का जो एहसास बचपन में जन्मा वह आजीवन बना रहा. जमींदार परिवार में जन्म लेना और तत्कालीन राजा मांडा द्वारा गोद लिया जाना विश्वनाथ प्रताप सिंह का अपना चुनाव नहीं था. जो प्राप्त हुआ है, उसके वे नैसर्गिक अधिकारी नहीं हैं, बल्कि किसी और के अभाव का लाभ उठा रहे है. दूसरे की अमानत को संभालने के एहसास ने ही उनके मन में नए वातावरण के प्रति परायेपन का बोध पैदा किया. वे खुद को उस माहौल के प्रति कभी सहज न कर सके. उन्होंने लिखा भी—

‘मैं उस परिवार में जाकर स्वयं को बहुत ही असुरक्षित अनुभव करता था. मेरी समस्या थी कि वहां के लोग मुझे कैसे स्वीकार करेंगे. मुझे कभी लगता कि मैं उनके परिवार का सदस्य बन चुका हूं. कभी लगता कि यह सब नकली है और इसके लिए मुझे बाकी दुनिया को जवाब देना होगा.’

सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुमित सरकार ने भी माना है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह का बचपन से किशोरावस्था तक का दौर, घोर जटिलताओं एवं परस्पर विरोधी चेतनाओं से भरपूर था. यही सच भी है. इसी ने उन्हें स्वभाव से अंतर्मुखी बनाया. बचपन के इन्हीं विरोधाभासों के साथ एक ओर तो वे सक्रिय राजनीति में विभिन्न पदों पर शोभायमान रहे. वहीं दूसरी ओर अपनी तुनकमिजाजी भी बनाए रखी. बचपन के संस्कार, राजा का पद उन्हें राजनीति में स्थापित होने का अवसर प्रदान करते रहे. और माहौल के प्रति परायेपन का एहसास, यह अनुभूति के वे दूसरे के अभाव का सुख भोग रहे हैं, उन्हें उस वातावरण से दूर भागने के लिए उकसाता रहा. बाहरी दुनिया से हारा, उकताया हुआ उनका मन अपने में लौटता तो कभी कविता बनकर फूटने लगता और कभी कूंची के माध्यम से कैनवास संवारने लगता. उनके लिए एक ओर तो अवसरों के दरवाजे हमेशा खुले रहे, दूसरी ओर जब भी अवसर मिला वे राजनीति और पद को ठुकराकर आगे बढ़ते गए. उस समय न तो पद की ऊंचाई उन्हें रोक पाई न ही घर-परिवार और शुभाकांक्षियों के आग्रह तथा अन्य जिम्मेदारियां. अपने मन, अपने नैतिकताबोध के सिवाय वे कभी किसी ओर के आगे कभी नमित नहीं हुए. उनके भीतर का असंतोष उनसे हमेशा कुछ न कुछ ऐसा कराता रहा, जो उस परिवेश में रहने वाले लोगों के सर्वथा नया एवं अनोखा था.

विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में उन्होंने न केवल सक्रिय हिस्सेदारी की, बल्कि अपनी दो सौ बीघा उपजाऊ जमीन एक झटके में दान कर दी. मांडा तक सड़क मार्ग बनाने के लिए श्रमदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. गरीबों और अभावग्रस्त बच्चों की शिक्षा के लिए कोरांव में एक स्कूल की स्थापना की, उसके लिए सिर पर ईंटें भी ढोयीं. आचार्य विनोबा भावे ने उनके स्कूल की नींव रखी थी. बाद में वे कई साल तक वहां बच्चों को पढ़ाते रहे.
जमींदार परिवार में जहां वे जन्मे थे, जमीन से अधिकार छोड़ देना एक पागलपन ही था, मगर उन्होंने जब जो जैसा उचित समझा, बिना किसी संकोच अथवा परवाह के उसपर अमल भी किया. जो किया पूरी निष्ठा और संपूर्ण समर्पण की भावना के साथ किया. फिर चाहे वह राजनीति हो अथवा कविता; या फिर चित्रकारी. राजनीति की तो उसके लंद-फंद से सदैव दूर रहे, लंबे राजनीतिक जीवन में एक भी धब्बा उनके चरित्र पर नजर नहीं आता. चित्रकारी और कविता के क्षेत्र में उतरे तो वहां भी एकाकी साधना को प्राथमिकता दी. कभी किसी तथाकथित ‘बड़े’ साहित्यकार अथवा चित्रकार से मान्यता की उम्मीद नहीं रखी.

यह उनके राजसी संस्कार ही थे, जिसने उन्हें नेतृत्व का गुण दिया. विद्यार्थी जीवन में ही उन्हें कालेज अध्यक्ष चुन लिया गया था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद उन्होंने पूना विश्वविद्यालय से वकालत की डिग्री प्राप्त की. राजनीति से जुडे़ और 1980 में देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे. उन्हें मुख्यमंत्री पद सौंपने वाली इंदिरा गांधी थीं. जिनका वे हमेशा ही सम्मान करते रहे. आगे चलकर राजीव गांधी और कांग्रेस के साथ उनके संबंध खराब हुए, मगर इंदिरा गांधी के प्रति उनके मन में सम्मान हमेशा ही बना रहा. जिन दिनों चुनावों में नेता कारों के काफिले के साथ चला करते थे, उनके आगे-पीछे अंगरक्षकों की फौज हुआ करती थी, विश्वनाथ प्रताप सिंह अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को साइकिल अथवा मोटरसाइकिल पर चलने की सलाह देते. वे खुद भी बस में सफर करते. उनकी राजनीतिक सहजता लुभावनकारी थी.

मुख्यमंत्री का पद उन्हें दो करीब दो वर्ष ही बांधकर रख सका. उन दिनों प्रदेश में डाकुओं का आतंक था. प्रदेश के मुखिया के रूप में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उसे अपराधमुक्त करने का बीड़ा उठाया. पुलिस को कामयाबी भी हाथ लगी. प्रतिक्रियास्वरूप डाकुओं ने एक गांव पर हमलाकर सोलह निर्दोष लोगों को गोली से उड़ा दिया. मारे गए लोगों में छह दलित थे. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसको अपनी असफलता माना और मर्माहत होकर मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. वह राजनीति का ऐसा दौर था, जब नेताओं में आत्मा नाम की चीज हुआ करती थी. राजनीति में मूल्य नाम की चीज बची हुई थी. तब असफलता की जिम्मेदारी ओढ़ना व्यक्तिगत कमजोरी न होकर नैतिकता का तकाजा माना जाता था.

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पद से इस्तीफा जरूर दिया, मगर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा था. दस्यु-समस्या समाज की सामाजिक-आर्थिक विषमताओं की उपज है, सिर्फ हथियार के दम पर उसका हल नहीं खोजा जा सकता— अपनी इस मान्यता के चलते वे इस समस्या के निदान के लिए आगे भी काम करते रहे. करीब साल-भर बाद उस समय उम्मीद की किरण नजर आने लगी, जब कई खतरनाक डाकुओं ने समाज की मुख्यधारा में लौटने की प्रतीज्ञा करते हुए, अपने हथियार उनके आगे डाल दिए. अंहिसा को एक बार फिर हिंसा पर जीत मिली. विश्वनाथ प्रताप सिंह को लोग एक सर्वोदयी नेता के रूप में पहचानने लगे.

भारतीय राजनीति में वह उथल-पुथल का दौर था. इंदिरा गांधी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को केंद्र में बुला लिया, जहां वे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे. वे संजय गांधी के पसंदीदा नेताओं में से थे. वही उन्हें केंद्र में लाने का माध्यम बने थे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी की सरकार बनी तब भी विश्वनाथ प्रताप सिंह पर कांग्रेस का भरोसा बना रहा. उन्होंने उन्हें अपने मंत्रीमंडल में वित्त मंत्री की जगह दी. युवा और स्वप्नदृष्टा प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी आर्थिक सुधारों को गति देना चाहते थे. अपने नेता की इच्छा का सम्मान करते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लाइसेंस राज को खत्म करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. सोने की तस्करी को रोकने के लिए उन्होंने उसके आयात पर कर-कटौती को प्राथमिकता दी.
तस्करी के सोने की बरामदगी दिखाने वाले पुलिसकर्मियों को उन्होंने बरामद सोने का एक हिस्सा पुरस्कार-स्वरूप देने की घोषणा की, जिसका अनुकूल असर हुआ. यही नहीं गैरकानूनी कर-वंचन पर अंकुश लगाने के लिए उन्होंने वित्त मंत्रालय के  प्रवर्त्तन निदेशालय को अतिरिक्त शक्तियां सौंप दीं. उनके वित्तमंत्रित्व काल में कर चोरी के आरोपियों पर आयकर के छापे पड़ने लगे. रसूख वाले लोगों को भी नहीं बख्शा गया. लेकिन धीरूभाई अंबानी और अमिताभ बच्चन पर आयकर की दबिश पड़ने से सरकार हिल उठी. ये कांग्रेस के करीबियों में माने जाते थे. राजीव गांधी पर दबाव पड़ने लगा. फिर जो हुआ वह हमारे सामने की राजनीति का हिस्सा है.

राजीव गांधी ने पहले तो उनका मंत्रालय बदला. विश्वनाथ प्रताप सिंह को यह अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा पर हमला महसूस हुआ. रक्षा मंत्री के पद पर रहते हुए भी उन्होंने विद्रोही तेवर बनाए रखे. नतीजा बोफोर्स और पनडुब्बी सौदों में दलाली के मामले सामने आए. प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधे दलाली में लिप्त होने के गंभीर आरोप लगे. क्षुब्ध होकर राजीव गांधी ने उनसे न केवल मंत्रीपद छीन लिया, बल्कि कांग्रेस से निकाल बाहर किया. इससे नुकसान राजीव गांधी का ही अधिक हुआ. उनकी मिस्टर क्लीन की छवि दागदार बन गई. विश्वनाथ प्रताप सिंह को जनता ने ईमानदार और नीतिवान नेता मान लिया. उससे कुछ साल पहले ही जनता पार्टी के रूप में कांग्रेस की वैकल्पिक सरकार देने का प्रयोग असफल हो चुका था. उसके घटक रहे वामपंथी और जनसंघी अब परस्पर विरोधी खेमे में थे.

राजीव सरकार के विरुद्ध बढ़ रहे जनाक्रोश का लाभ उठाने के लिए अवसरवादी राजनीति ने उन्हें दुबारा एक घोड़े का सवार बना दिया. पिछले परिवर्तन के नायक जयप्रकाश नारायण रहे थे. इस बार बागडोर विश्वनाथ प्रताप सिंह के हाथों में थी. उन्होंने देश-भर में जाकर सरकार और ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार को उजागर करना आरंभ कर दिया. आजाद भारत में यह अपने तरह की पहली घटना थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह की निष्ठा और साफगोई लोगों को जयप्रकाश नारायण की याद आने लगी. जनता ने उन्हें हाथों-हाथ लिया.

चुनाव परिणाम घोषित हुए तो विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाला जनता दल सरकार बनाने की स्थिति में था. सरकार कोई भी हो, मगर प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह न बन पाएं, यह सुनिश्चित करने के लिए पूंजीपतियों ने अपने घोड़े दौड़ा दिए. बताते हैं कि जिन दिनों देश के दसवें प्रधानमंत्री का चयन हो रहा था, देश का एक धनकुबेर दिल्ली के पांच सितारा होटल में अपनी थैली खोले बैठा था. कि किसी भी तरह नेताओं को खरीदकर उन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह के विरुद्ध ले जा सके. पहले जाट नेता देवीलाल को प्रधानमंत्री चुना गया. मगर उस वजुर्ग नेता के मन में कहीं न कहीं अपनी मिट्टी और जनादेश के प्रति लगाव बाकी था. जानते थे कि जनता ने प्रधानमंत्री के रूप में विश्वनाथ प्रताप सिंह को ही वोट दिया है. इसलिए वे विनम्रतापूर्वक पीछे हट गए. अवसरवादी नेताओं और उस धन्नासेठ के मंसूबों पर पानी फिर गया.

यह उस धन्ना सेठ की पूंजी की हार भले मानी जाए, मगर पूंजीपति वर्ग इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था. इसलिए चयन के साथ ही विश्वनाथ प्रताप सिंह को हटाने का खेल आरंभ हो चुका था. कश्मीर समस्या उन दिनों शिखर पर थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जगमोहन को वहां का राज्यपाल बनाकर भेजा. उन्हीं दिनों एक ऐसी घटना हुई, जिससे उनकी सरकार के ऊपर बदनामी का गहरा दाग लगा. जनता दल सरकार में गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद को अपहर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के बदले खूंखार आंतकवादियों की रिहाई राजनीतिक मंच पर उनके जी का जंजाल बन गई. इससे जनता दल के साथ स्वार्थवश आ जुड़े दक्षिणपंथी नेताओं को सत्ता प्राप्ति के अपने वर्षों पुराने स्वप्न को सच करने तथा लोगों को भड़काकर सरकार के विरुद्ध जनमत तैयार का मौका मिल गया. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस दाग को सख्त प्रशासक के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल बनाकर धोने की कोशिश की. उन्होंने कश्मीरी आतंकवाद पर अंकुश लगाने में कुछ हद तक कामयाबी भी प्राप्त की. लेकिन तब तक स्वार्थी पूंजीपति और राजनेता विश्वनाथ प्रताप सिंह के विरुद्ध लामबंद हो चुके थे. उनकी चुनौतियां बढ़ती ही जा रही थीं.
विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए चुनौतियों से गुजरना नई बात नहीं थी. अपने जीवन में वे चुनौतियों से ही तो खेलते आए थे. पिछड़ी जातियों को समानता एवं विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त किए मंडल आयोग की सिफारिशें अर्से से सरकारी अलमारियों में धूल चाट रही थीं. चुनौतियों के बीच सिर्फ अपने अंतर्मन की पुकार पर निर्णय लेने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन सिफारिशों को लागू करने की घोषणा कर, अपने सहयोगियों और विरोधियों को एक साथ चैंका दिया. मंडल आयोग की सिफारिशें पार्टी के सवर्ण नेताओं के जातीय हितों के प्रतिकूल थीं. मगर राजनीतिक कारणों से वे उसका विरोध भी नहीं कर पा रहे थे. पर्दे के पीछे इन्हीं नेताओं के उकसावे पर दिल्ली समेत देश के अनेक राज्यों में छात्र आंदोलन तेज हो गया. जगह-जगह से तोड़-फोड़ और आत्मदाह की खबरें आने लगीं. सवर्ण मानसिकता के शिकार मीडिया ने उन दिनों पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया. खबरों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने तथा स्थिति को और अधिक विस्फोटक बनाने में कई अखबारों ने कोई कोर-कसर न छोड़ी, जिसकी आंदोलन के बाद खूब भर्त्सना भी हुई.

भीषण राष्ट्रीय तनाव और उथल-पुथल के उस दौर में कोई दूसरा नेता होता तो कभी का पीछे हट जाता. अपने वक्तव्य की उल्टी-सीधी व्याख्या कर उसकी जिम्मेदारी से ही मुंह मोड़ लेता. शाहबानो प्रकरण में स्वयं राजीव गांधी ने कुछ ऐसा ही किया था. मगर विश्वनाथ प्रताप सिंह तो किसी और ही मिट्टी के बने थे. कदम पीछे लेना, जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना वे मानो जानते ही न थे. चैतरफा विरोध के बावजूद अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने संसद में ऐलान किया कि वे इन सिफारिशों के पक्ष में अपनी सरकार भी कुर्बान करने को तैयार हैं. वे अंत तक अपने वचन पर अड़े भी रहे. बाद में यह पूरी तरह साफ हो गया कि वह आंदोलन स्वयं-स्फूर्त नहीं था. बल्कि उसके पीछे कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञ अपनी गोटियां फेंक रहे थे. वे सवर्ण मतों का धु्रवीकरण करने तथा जनाक्रोश की लहर को अपने पक्ष में भुनाना चाहते थे. इसके लिए लालकृष्ण आडवाणी ने राममंदिर को बहाना बनाया और कमंडल यात्रा पर निकल पड़े थे.

देश का तेजी से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होने लगा. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक बार फिर दृढ़ता का प्रदर्शन किया. उनके संकेत पर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया. भारतीय जनता पार्टी ऐसे ही अवसर की प्रतीक्षा में थी. उसने तत्काल समर्थन वापस लेकर सरकार को अल्पमत में ला दिया. वामपंथियों ने सरकार को सहयोग दिया. मगर वे सरकार बचा पाने में नाकाम रहे. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखा. वे न रुके, न झुके. बाबरी मस्जिद पर सांप्रदायिक सोच वाले नेताओं को ललकारते हुए उन्होंने कहा भी था कि आखिर आप कैसा भारत चाहते हैं? ऐसा मजबूत भारत जिसमें विभिन्न धर्मों, मतालंबियों का सम्मान हो, उनमें आपसी समरसता और भाईचारा हो अथवा ऐसा कमजोर देश जो सांप्रदायिक दृष्टि से अलग-अलग खेमों, गुटों में बंटा हुआ हो? उनका सवाल सांप्रदायिक विखंडनवादियों के लिए एक खुली चुनौती जैसा था. सिद्धांतों के लिए सरकार को दाव पर लगा देने की वह घटना स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली थी. यह काम वही कर सकता था, जो सत्ता को अपनी चेरी समझता हो. जिसे अपने सिद्धांत कुर्सी से ज्यादा प्रिय हों. विश्वनाथ प्रताप सिंह तो ऐसा अनेक अवसरों पर सिद्ध कर चुके थे.

अपने सिद्धांतों के लिए बड़ी से बड़ी आलोचना को सह लेना, उसके बावजूद उनपर अडिग रहना, विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए ही संभव था. स्मरणीय है कि सरकार गिरने के बाद भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की आलोचनाएं थमी नहीं थीं. बल्कि एक के बाद एक राजनीतिक गोटियां फेंकी जा रही थीं. देश का मीडिया उनके ऊपर आग उगल रहा था, पूरे देश में हड़ताल और आगजनी का माहौल था, विद्यार्थी आत्मदाह कर रहे थे. विश्वनाथ प्रताप सिंह अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति महोदय को सौंप चुके थे, इसलिए उसके बाद की राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं के लिए वे कानूनी रूप से उत्तरदायी भी नहीं थे. बावजूद इसके चुनौतियों से पीठ फेर लेने के बजाय उन्होंने आगे आना उचित समझा.

नवंबर 1990 की यह एक सच्ची घटना है, जिसका बड़ा ही हृदयग्राही, आंखों देखा वर्णन वेंकटेश रामकृष्णन ने विश्वनाथ प्रताप सिंह पर लिखे एक ऋद्वांजलि लेख में किया है. उस समय तक उनकी सरकार को गिरे दो सप्ताह बीत चुके थे. एक जनसभा के दौरान आंदोलनरत उग्र विद्यार्थियों की एक भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—

‘इस मार-काट और खून-खराबे के बीच मैं तुम्हारी आंखों के सामने खड़ा हूं. यदि तुम मुझपर धावा बोलना चाहते हो तो रुको मत, आगे बढ़ो. तुम्हें इसकी अनुमति है. मुझपर वहां दूर से पत्थर फेंकने या जोर से चीखने-चिल्लाने, गालियां देने की भी जरूरत नहीं है. यहां मेरे करीब आओ, और वह सब खुलकर करो जो तुम सचमुच करना चाहते हो. मैं हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार हूं. मगर मुझे इस बात पर दृढ़ विश्वास है कि इस देश में समानता एवं सामाजिक न्याय के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मैं जो भी कर रहा हूं, वही उचित है.’

रामकृष्णन आगे लिखते हैं कि—’इन शब्दों के साथ ही विश्वनाथ प्रताप सिंह माइक की बगल से आगे बढ़ आए…वे दो कदम और आगे बढ़े. अब वे मंच पर, उग्र भीड़ के ठीक सामने थे. निर्भीक, अटल. अब वे प्रधानमंत्री भी नहीं रह गए थे, फिर भी उन्हें यूं अड़ा देखकर भीड़ स्तब्ध रह गई. उस असाधारण जनसभा के बीच घोर सन्नाटा व्याप गया. उससे पहले दलित-पिछड़े वर्गों द्वारा आपसी हितों पर चर्चा करने के लिए बुलाई गई उस जनसभा पर ईंट-पत्थरों की दनादन बौछार हो रही थी. उपद्रवी आसपास के मकानों की छतों पर छिपे हुए थे. ईंट-पत्थरों और बोतलों की मार से पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव और अजीत सिंह घायल हो चुके थे. उनके सिरों पर गंभीर चोटें आई थीं. इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा था. यही वह क्षण था जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने माइक संभाला और उपद्रवियों के ठीक सामने चले आए. उन्हें देखते ही भीड़ पर अंतहीन नीरवता व्याप गई. हमलावर जहां के तहां जड़ हो गए. वह एक अदभुत, अद्वितीय अवसर था. उसके बाद वह बैठक शांतिपूर्वक चली. विश्वनाथ प्रताप सिंह सहित सभी ने अपना भाषण पूरा किया.’

कुछ लोग कहते हैं कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करना, हाथों से दूर छिटकने जा रही सत्ता के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह बड़ा राजनीतिक दाव था, जो उन्होंने अपने प्रतिद्विंदियों को पटकनी देने के लिए चला था. मगर यह भ्रांत अवधारणा है. सत्ता विश्वनाथ प्रताप सिंह का अभीष्ट न तो थी, न आगे कभी बन पाई. उनका प्रत्येक निर्णय नैतिकता की कसौटी पर कसा हुआ होता था. हर बार किसी न किसी सैद्धांतिक कारण से उन्होंने ही सत्ता को ठुकराया था. आगे भी ऐसे कई अवसर आए जब वे दुबारा प्रधानमंत्री बन सकते थे. मगर एक बार जिस पद, जिस कुर्सी को उन्होंने छोड़ दिया, उसकी ओर फिर कभी दुबारा न देखा. सत्ता का कोई भी प्रलोभन उन्हें डिगा नहीं पाया. आजकल के नेताओं की कुर्सी के प्रति बढ़ती भूख को देखते हुए यह विलक्षण ही कहा सकता है. उनका सारा आग्रह समाज के वंचितों और शोषितों को सामाजिक न्याय के दायरे में लाना था. देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने पर जब एक संपादक ने उनसे अपनी राजनीतिक विचारधारा पर टिप्पणी करने को कहा गया तो बिना सकुचाए उन्होंने कहा भी कि—

‘इस राजनीति का सारा जोर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक शक्तियां, अधिकार एवं प्राधिकार उन वर्गों तक पहुंचाना है, जिन्हें उनसे शताब्दियों से दूर रखा गया है. वास्तव में इस राजनीति के माध्यम से जो वे चाहते हैं और जो प्राप्त कर रहे हैं, वे उसके सच्चे अधिकारी भी हैं. इसलिए इन वर्गों के नेता अथवा प्रतिनिधि जब भी सत्ता प्राप्त करते हैं, अथवा किसी भी तरह से उसमें सहभागिता करते हैं, तो इससे मेरा बहुइच्छित, ऐतिहासिक लक्ष्य भी पूरा होता है.’

यहां एक सवाल बड़ा ही प्रासंगिक हो सकता है कि आने वाले समय में लोग क्या विश्वनाथ प्रताप सिंह को याद रखेंगे. और याद रखेंगे भी तो उसका मूल स्वरूप क्या होगा. सवर्णों का एक तबका तो उन्हें खलनायक मान ही चुका है. जिस पिछड़े वर्ग के लिए उन्होंने अपनी सरकार दाव पर लगा दी, उसके अपने नेता आपस में बंटकर इतने दल बना चुके हैं कि लगता है बहुत जल्दी पिछड़े वोट अनगिनत हिस्सों में बंटकर अपनी असली ताकत ही खो बैठेंगे. सामाजिक न्याय के नाम पर विभिन्न राजनीतिक दलों के गठजोड़, उनकी आपसी स्पर्धा, उठा-पटक को वे भारतीय राजनीति की एक त्रासदी मानते थे. अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करने में उन्हें कभी संकोच नहीं होता था. कुछ साल पहले जब मायावती ने भाजपा के साथ गठजोड़ से उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी प्राप्त की तो विश्वनाथ प्रताप सिंह को बहुत आघात पहुंचा था. दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में उपचार के दौरान इस घटना पर एक पत्रकार से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि—

‘मायावती ने निश्चित ही दलितों में आत्मसम्मान की भावना का संचार किया है. हजारों वर्षों से दलितों की उपेक्षा होती रही है. अब उन्हें लगता है कि उनका नेतृत्व उनके अपने ही हाथों में है. उनका वोट-बैंक संगठित है. लेकिन मायावती की समस्या यह है कि वह भाजपा के साथ अपने संबंधों को लेकर स्पष्ट नहीं हैं. इस दुविधा से बाहर आते ही वह एक बड़ी ताकत बन सकती हैं.’

इसके बाद उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा था—

‘‘पिछली बार उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने पर वह मेरे पास आई थीं. तब मैंने कहा था—‘मैं तुम्हें तो अपना आशीर्वाद दे सकता हूं, तुम्हारी सरकार को नहीं.’’ मायावती के कारण पूछने पर वे बोले—‘तुमने भाजपा की मदद ली है. तुमने उन्हें अपना संरक्षक और चौकीदार नियुक्त किया है. पर ध्यान रहे, जिन्हें तुमने अपने घर की रखवाली के लिए नियुक्त किया है, वही तुम्हारी नींव को खोखला करने वाले सिद्ध होंगे. यदि तुम अपने राजनीतिक सफर को लंबा खींचना चाहती हो तो तुम्हें अपनी सरकार एवं जनाधार में से किसी एक को चुनना होगा…तुम सरकार बना सकती हो. उसको कुछ महीने चलाओ और अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर सरकार को दाव पर लगा दो. सत्ता का उपयोग हरी खाद की भांति करो. दलितों और अल्पसंख्यकों के सहयोग से सरकार की अगली फसल बंपर होगी.’

मायावती को वर्षों पहले उन्होंने जो दूरदर्शितापूर्ण सलाह दी थीं, आज वह अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रही है. वे बिना भाजपा के भी प्रदेश की बड़ी राजनीतिक ताकत हैं. इस सलाह से यह भी स्पष्ट होता है कि वे निरे भले भी न थे. उनमें पर्याप्त राजनीतिक कूटनीतिकता थी. यह आरोप लगाए जाने पर कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करके उन्होंने जातिगत भेदभाव को बढ़ावा दिया है, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कहा था कि—

‘मंडल से बहुत पहले, इंदिरा गांधी के समय से ही देश जातिवादी राजनीति का शिकार रहा है. इसके लिए पार्टी नेतृत्व अपने नेताओं पर भी भरोसा नहीं करता था. मतदाताओं का जातीय रुझान भांपने के लिए गुप्तचर दलों की सहायता ली जाती थी. आज स्थिति में सिर्फ इतना अंतर आया है कि पहले सवर्णों का अधिपत्य होता था. वे छोटी जातियों को मनमाने ढंग से हांकते थे. अब लाठी छोटी और पिछड़ी जातियों के हाथों में है; और वे सवर्णों को मनमाना नाच नचा रही हैं. उस समय कोई नहीं कहता था कि देश में जातिवाद है. अब जाति के नाम पर शताब्दियों से दूसरों का हक मारते आए लोग शोर मचा रहे हैं कि जातिवाद बढ़ रहा है.’

विश्वनाथ प्रताप सिंह के इस कथन में सचाई थी. भारतीय समाज की आंतरिक स्थिति के बारे में उनको गहनबोध था. सेना और देश की सुरक्षा एजेंसियों में व्याप्त भ्रष्टाचार को वे आतंकवाद से भी बड़ी समस्या मानते थे. उनका कहना था कि ‘आतंकवादी सिर्फ लोगों की हत्या कर सकते हैं, वे इस देश को बरबाद नहीं कर सकते, हां, सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार यह काम बड़ी आसानी से कर सकता है.’

सामाजिक न्याय के प्रति विश्वनाथ प्रताप सिंह के समर्पण का एक उदाहरण यह भी है कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही नवबौद्धों को आरक्षण के दायरे में लाया गया था. यही नहीं, आधुनिक भारत के वास्तुकार डा. आंबेडकर को ‘भारत रत्न का सम्मान भी उन्हीं की देन है. कुछ लोग इसे राजनीति भी कह सकते हैं, लेकिन अगर यह राजनीति थी, तो उसे सरोकार से भरपूर सामाजिक न्याय की राजनीति कहना होगा, जो किसी भी अच्छे समाज की पहचान होती है.

आज भी यह मानने वाले कम नहीं है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के एक पागलपन भरे निर्णय ने ‘योग्य सर्वणों के हाथों से हाथों से सताइस प्रतिशत नौकरियां एक झटके में छीन ली थीं.’ इस सोच के मानने वाले यह भूल जाते हैं कि मंडल आयोग ने मापदंडों में किसी भी प्रकार की ढील न करके पिछड़ों के लिए सिर्फ नौकरियों में कुछ स्थान आरक्षित किए थे. क्योंकि उनमें से अधिकांश योग्यता के बावजूद ऊपरी स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार अथवा भाई-भतीजावाद के चलते अवसरों से वंचित रह जाते थे. डा॓. आंबेडकर ने यह काम दलितों के लिए किया था. मगर वे स्वयं जातीय दंश सहकर ऊपर उठे थे. गरीबी और अभावों के बीच से भी उन्हें गुजरना पड़ा था. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने रियासत के राजकुमार की तरह जन्म लिया. घटनावश दूसरी रियायत के राजा भी बने. राजनीति में पांव जमाने के लिए उन्हें बहुत अधिक संघर्ष भी नहीं करना पड़ा.

विद्यार्थी जीवन से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक राजनीति खुद उनके स्वागत में मखमली कालीन बिछाती रही. सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया तो अपनी मर्जी और स्वास्थ्य-संबंधी कारणों से. लोकतंत्र के रास्ते राजनीति मंे आए तो उसकी गरिमा को कभी ठेस न आने दी. सहजता, सच्चरित्रता, सदाचरण, ईमानदारी और अपने मौलिक दृष्टिकोण के बल पर हमेशा दूसरों के लिए नवीनतम मानक गढ़ते गए. उनके संपर्क में आने वालों को कभी नहीं लगा कि वे राजा हैं. उनके आसपास राजनीतिक अवसरवाद खूब फला-फूला, मगर उन्होंने उसको कभी आड़े नहीं आने दिया. कोई प्रलोभन उन्हें अपने सिद्धांतों से डिगा नहीं पाया. लंबे राजनीति काल में उनपर कोई दाग नहीं मिलता. हालांकि बाद में उनके आंचल को दागदार करने की पूरी कोशिश कांग्रेस और दूसरे दलों ने की थी. पर वे हर परीक्षा से बेदाग होकर बाहर आए.

वरिष्ठ पत्रकार कांचा इलैया ने विश्वनाथ प्रताप सिंह की तुलना अब्राहम लिंकन से की है, जो बिलकुल सटीक है. गोरे अब्राहम लिंकन ने सदियों से रंगभेद के शिकार होते आए काले लोगों के सम्मान और समानाधिकार के लिए संघर्ष किया था. उतनी ही पुरानी दास प्रथा को समाप्त कर उसके स्थान पर एक समतावादी समाज की स्थापना की थी. लिंकन की मौत गोरों के जातीय विद्वेष का परिणाम थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे पिछड़े वर्ग के लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया. उन्हें बदनाम करने, राजनीति से अपदस्थ करने में अगड़ों के कोई कोर-कसर न छोड़ी. विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रति अगड़ों का व्यवहार देखकर मुझे थाॅमस मूर की याद आती है. सोलहवी शताब्दी के इस लेखक, विचारक और राजनयिक ने दुनिया को ‘यूटोपिया’ जैसा चमत्कारी शब्द दिया, जिसमें समानता-आधारित मानव समाज की झलक पहले-पहल दिखाई पड़ी थी.

सम्राट हेनरी अष्ठम का सर्वाधिक भरोसेमंद मूर दरबार में अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर रह चुका था. लेकिन अपनी पत्नी की दासी ऐलिजाबेथ बर्टन से विवाह रचाने की जिद में जब हेनरी ने खुद को, चर्च और उसके बनाए प्रत्येक कानून से ऊपर रखने का दावा किया तो मूर ने उसका विरोध किया. साफ कहा कि किसी परिवार अथवा सत्ता के शिखर पर विराजमान होने मात्र से किसी व्यक्ति विशेषाधिकार नहीं मिल जाते. धरती के विशाल आंगन और अनंत आसमान के नीचे कोई भी विशिष्ट और खास नहीं है. मूर को फांसी की सजा हुई. उसको तड़फाते हुए मार डाला गया. सच का समर्थन करने के बदले कुछ ऐसी ही तड़फ विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी आजीवन झेलनी पड़ी थी. सवर्ण मानसिकता से युक्त भारतीय मीडिया हमेशा उनपर प्रहार करता रहा. यहां तक कि उनकी मौत को गुमनाम बनाने में भी उसने कोई कोर-कसर न छोड़ी.

प्रश्न उठता है कि अब जब विश्वनाथ प्रताप सिंह नहीं है तो उनके राजनीतिक सिद्धांतों का क्या होगा. उस सामाजिक न्याय की भावना क्या होगा, जिसको वे आजीवन अभिसिंचित करते रहे. सांप्रदायिकता और जाति-भेद के शिकार रहे दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों की एकता का जो सपना उन्होंने देखा था, वह तो उनके जीवन में ही साकार नहीं हो पाया था. यहां तक कि दलितों और पिछड़ों में भी अलग-अलग खेमे बनते चले गए, जो आज भी बुरी तरह से बंटे हुए हैं.

तो क्या यह विश्वनाथ प्रताप सिंह की पराजय थी? मैं कहूंगा कि हरगिज नहीं. दरअसल शताब्दियों से रेंगते आए इन लोगों ने पीढ़ियों के बाद अपने बूते पर चलना सीखा है. अभी तक वे अपनी प्रेरणा और समस्त सपने समाज के उस वर्ग से उधार लेते रहे हैं, जिसने उनपर वर्षों तक पर राज किया है, उनका हक मारा है. जिस दिन यह उत्पीड़ित, सर्वहारा वर्ग अपने भीतर से प्रेरणाएं उधार लेने लगेगा, जैसे ही उसके सपनों में मौलिकता का प्रवाह बढ़ेगा, और उसकी आंतरिक चेतना ऊर्जस्वित होकर शताब्दियों के उत्पीड़न का हिसाब मांगने लगेगी, जिस दिन यह वर्ग मुक्ति की चाहत में आमूल परिवर्तन के लिए उठ खड़ा होगा, उस दिन से परिवर्तनकारी राजनीति के वास्तविक दौर की शुरुआत होगी. उसी दिन विश्वनाथ प्रताप सिंह का सामाजिक न्याय का सपना साकार हो सकेगा. आइए हम भी उस दिन की प्रतीक्षा करें…आमीन!

कालिख लगे दिन : समापन किश्त

नवंबर 5, 1984
हौले-हौले पटरी पर लौटती जिंदगी
प्रिय…!
परसों तक का हाल मैंने तुम्हें लिखा. जैसा देखा-सुना ठीक उसी को शब्द देने की कोशिश मैंने की. जहां कहीं हैवानियत का नंगा नांच, इंसान के पतन की पराकाष्ठा देख कलम को शर्म को आने लगी, वहां मैंने कड़वी हकीकत से मुंह मोड़ लिया. यह विचार भी मन में आया कि इन दागदार लम्हों को किसलिए संजोया जाए. क्यों तैयार किया जाए दर्द का दस्तावेज, कलंकों को इश्तिहारी जुबान क्यों दी जाए. तुम होतीं तो शायद कभी न लिखता- पर अपने अकेलेपन के बीच तो मेरी कलम ही सहचरी है. पीड़ा जब बहुत ज्यादा सघन हो जाती थी तो कलम ही सहारा बनती थी. डायरी के ये हिस्से भी शायद इसलिए लिखता गया कि वर्षों बाद जब सबकुछ ठीक-ठाक हो जाए, एकदम पहले जैसा दिखाई पड़ने लगे, लोग आपस में इतने हिल-मिल जाएं कि बड़े से बड़ा हादसा उन्हें बांट ही न सके, तब अतीत के इन काले-कुलिश लम्हों को इंसानियत की भयावह त्रासदी के रूप में याद किया जा सके.
शब्दों का इतना सामर्थ्य कहां कि कड़वी-कसैली हकीकत को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर सकें. सो थोड़े लिखे को बहुत समझना. कल का दिन काफी सामान्य था. दिन के समय कर्फ्यू में ढील दी गई. चार दिनों से घरों में बंद लोग काम पर निकले भी. जहांगीरपुरी मेहनतकश लोगों की कालोनी है. अधिकांश निवासियों के हालात रोज कमाने और खाने के हैं. ऐसे लोगों को चार-चार दिन घर में बंद रहना पड़े. पता नहीं कितनों को इस बीच फाके करने पड़े होंगे. कितनों ने अपने मासूम बच्चों को भूखा सुलाया होगा. इस बात को न वे समझ सकते हैं, जो धर्म के नाम पर देश का बंटवारा करना चाहते हैं, न ही लाशों की राजनीति करने वाले सफेदपोश नेता-हत्यारे.
कई दिन बाद मैं भी फैक्ट्री के लिए निकलना चाहता था. लेकिन तैयार होने के बाद याद आया कि आज तो साप्ताहिक अवकाश है. सो आजादपुर मंडी की ओर निकल गया. जहां से एक नवंबर की रात को गुजरा था. वहां जगह-जगह दुकानें खाक हुई पड़ी थीं. ट्रकों और बसों के जले हुए पिंजर, राख से काली पड़ी इमारतों को देख मन रो उठा. टूटे हुए मकान, भस्म हुए सिनेमाघर लुटी-पिटी दुकानें, सभी कुछ हैवानियत की भेंट चढ़ाया जा चुका था. सिर्फ सरदार मालिक होने के कारण मोतीनगर स्थित कैंपाकोला बनाने की फैक्ट्री को उपद्रवियों ने जलाकर खाक कर दिया. यह भी नहीं सोचा कि उसमें काम करने वाले सभी सरदार नहीं, हिंदू हैं और सैकड़ों के घर का चूल्हा उसकी कमाई से ही जलता है. फैक्ट्री जल जाने के बाद अब वे सबके सब बेरोजगार हो जाएंगे. करोड़ों की संपत्ति जो इन दंगों में नष्ट की गई. उसे जुटाने में तो दशकों लगेंगे ही, हजारों जान जाने से जो परिवार बरबाद होंगे उससे उबरने में ही शायद पूरा जीवन गुजर जाए. हो सकता है उनमें से कुछ भूख और बेकारी की मार से घबराकर आत्महत्या जैसा पाप कर बैंठे. ऐसे में उनका पाप किसको लगेगा. कोई धर्म है ऐसा जो इस पाप का प्रायश्चित करा सके.
इधर एक और दिल दहला देने वाली खबर मिली. पीछे कुछ जुनूनी लोगों ने मशहूर लेखक खुशवंत सिंह को भी नहीं छोड़ा था. उनके घर पर धावा बोल दिया. इस देश के साहित्य की विदेशों में जो प्रतिष्ठा है, उसमें खुशवंत सिंह का योगदान भी कम नहीं है. एक अरबपति पिता की संतान होने के बावजूद उन्होंने लेखन को चुना; और अपनी पूरी जिंदगी उसके नाम कर दी. इसमें उनका तो बड़प्पन है ही, साहित्य के लिए भी भला ही हुआ है. सिख खुशवंत सिंह ने अपने लेखन में सदा ही मनुष्यता को ऊपर रखा है, कभी अपने लेखन को धर्म, जाति या वर्ग के दायरे में कैद नहीं किया. लेकिन जिनके सिर पर खून सवार हो वे इतनी गहरी बात कहां सोच पाते हैं. सोच पाते तो दंगे जा धत्कर्म करते ही क्यों!
दंगायियों ने जब खुशवंत सिंह के घर को चारों ओर से घेर लिया तो उन्हें मदद के सरदार ज्ञानी जैल सिंह का नाम याद आया. तुम जानती हो न! हमारे महामहिम राष्ट्रपति. देश के प्रथम नागरिक. पर वहां से जो जवाब मिला उससे भी तुम इस देश की साझा संस्कृति की गहराई के बारे में अनुमान लगा सकती हो. सुनकर तुम्हें शायद हैरानी हो. गर्व तो होगा ही. महामहिम राष्ट्रपति चाहते तो सीधे पुलिस कमिश्नर को फोन करके मदद पहुंचा सकते थे. अपनी गाड़ी और कमांडो भेजकर खुशवंत सिंह को वहां से सुरक्षित निकलवा सकते थे. पर उन्होने उनसे सिर्फ इतना कहा, मात्र एक सलाह कि— ‘अपने किसी हिंदू मित्र के यहां छिप जाओ.’ कितनी ऊंची बात थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिन दंगों में सिर्फ दिल्ली में 2733 लोग मारे गए हों, वहां एक सिख राष्ट्रपति एक सिख लेखक को हिंदू मित्र से मदद मांगने की सलाह दे. इसकी गहराई को वही समझ सकता है, जिसने इस देश की साझा संस्कृति को समझा हो. इससे यह बात भी तय होती है कि इतने ऊंचे पद पर वही जा सकता है, जो दिल से भी बड़ा हो. राष्ट्रपति महोदय ने तो अपना बड़प्पन सिद्ध कर दिया, लेकिन अपने अनुभवहीन प्रधानमंत्री का बचकाना वक्तव्य कि ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिल जाती है.’ ऐसा वक्तव्य एक बेटे का तो हो सकता है, देश के प्रधानमंत्री का नहीं.
खुशवंत बच गए या मानो कि बचा लिए गए. बाद में नानावटी जांच आयोग के सामने उन्होंने जो बयान दिया उसमें देश के हर सिख, बल्कि सिख की क्यों हर उस संवेदनशील इंसान के दिल का समाया हुआ है, जो उन दंगों से गुजरा था, या उस त्रासदी को सच्चे दिल से अनुभव कर सकता है. अपनी थरथराती हुई आवाज में खुशवंत सिंह ने आयोग के सामने कहा था- ‘तब मुझे लगा था कि मैं इस देश में एक शरणार्थी की तरह हूं. दरअसल मैं नाजी जर्मनी में यहूदी की तरह हूं.’ उफ! तुम अंदाजा लगा सकती हो. यह कहते समय कलम का वह धनी इंसान कितनी पीड़ा से गुजरा होगा. हिंदू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई, या कोई भी अन्य समाज-समुदाय हो. जो अपने कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृति-कर्मियों का सम्मान नहीं करना जानता, उसको क्या हम सभ्य कह सकते हैं? हरगिज नहीं, वे तो मनुष्यता के कलंक ही कहे जाएंगे.
इस बीच कई अच्छी खबरें भी सुनने को मिलीं. ऎसी खबरें जिनसे इंसनियत पर भरोसा कायम हो. जो भारत की साझा संस्कृति की अनमोल मिसाल हैं. भीषण दंगॊं के बीच अनेक हिंदुओं ने अपनी जान पर खेलकर भी सिखों की जान बचाई. संकट की घड़ी में उनके लिए राशन-पानी से लेकर दवाओं और डा॓क्टरों का लगातार इंतजाम करते रहे. जिन लेखकॊं और पत्रकारों ने भीषण दंगॊं के बीच सरकार की सुस्ती और दंगायियों कॊ खूब लताड़ा उनमें अधिकांश हिंदू ही थे. जान की परवाह न कर अनेक हिंदू परिवार सिखों के पुनर्वास में लगे रहे. फिर भी इन चंद दिनों में यहां अकेले रहकर जो भोगा वह मेरे जीवन की सबसे दु:खद अनुभव है. जिसे चाहकर भी भुला पाना असंभव है.
अच्छा रहा कि दिल्ली आज शांत रही. कहीं से किसी अप्रिय घटना का समाचार नहीं मिला. गांव में अखबार तो जाते नहीं. ट्रांजिस्टर से खबरें छन-छन कर ही सही तुम तक जरूर पहुंच रही होंगी. आने वाला दिन और भी अच्छा होगा, इस उम्मीद के साथ मैं यही विराम लेता हूं. मिलने पर बाकी बातें तो होंगी ही. चलते-चलते एक प्रसंग याद आया. जिस बूढ़ी औरत का जिक्र मैंने ऊपर किया है, जब वह सरदार के क्षत-विक्षत शरीर को बाहर निकालने का प्रयास कर रही थी, तब उसके एक पड़ोसी ने उसे टोका था—
‘ऐ बुढ़िया मरने दे. तू कौन-सी ‘सिक्खनी’ है जो इसे बचाना चाहती है?’
‘सिक्खनी ना सही, पर मां तो हूं.’ बुढ़िया ने तपाक से उत्तर दिया.
‘जैसे मैं जानता नहीं. मां भी तो हिंदू की ही है.’
‘चुप नासपीटे, मां तो बस मां होती है. हिंदू और सिख दोनों मेरी ही कोख से जन्मे हैं. बड़ा बेटा गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाता है, छोटा मंदिर में जल चढ़ाता है.’
‘जिसे तू बड़ा बेटा कह रही है, उसी ने इंदिरा गांधी का कत्ल किया है. क्या वह मां नहीं थीं?’
‘जो मां का कत्ल करे वह कैसा बेटा, किसका बेटा!’
‘कहीं ऐसा ना हो कि सिक्खनी समझकर कोई तुझे भी…’
‘मार डालेगा तो मार डाले…कोई और मां आगे आकर इसे सहारा देगी…’ बुढ़िया बेखौफ ललकारती है.
ऐसी ही मांओं के कारण भारत है, भारत की महानता है, इंसानियत और नैतिकता हैं. मैं मन ही मन उस वृद्धा मां को नमन करता हूं. गुरुद्वारे से आती हुई आवाज घायल मन को सहलाने लगती हैं—
आदि सच, जुगादि सच, है भी सच, नानक होसी भी सच….
इसके साथ-साथ ऋग्वेद का मंत्र कानों में गूंजने लगता है-
स॒मा॒नी व॒ आकू॑तिः समा॒ना हृद॑यानि वः
स॒मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ व॒: सुसा॒हास॑ति
सुख-शांति-सदभाव की अंतहीन कामनाओं के साथ….

तुम्हारा प्रवासी…
-ओमप्रकाश कश्यप opkaashyap@gmail.com