समिष्टवाद : सर्वकल्याण को समर्पित समाजवादी दर्शन

समष्टिवाद यानी ‘कलेक्टविज्म(Collectivism)का इतिहास पुराना है. लगभग सभ्यता के आरंभ जितना ही. उन दिनों मनुष्य कबीलों में रहता था, शिकार करके अपना पेट भरता था. आवश्यकताएं सीमित थीं. तब वह स्वयं को समूह की एक इकाई मानता और सबके कल्याण के लिए साथसाथ जीवनसंघर्ष में हिस्सा लेता था. जब भी अतिरिक्त मात्रा में भोजन जमा होता तो वह पूरे समूह की थाती माना जाता. समूह का मुखिया इस बात का ध्यान रखता कि भोजन सामग्री के वितरण में किंचित अन्याय न हो. प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार भोजन मिले. उसके वितरण में किसी प्रकार का पक्षपात न हो. कालांतर में मनुष्य कृषिकर्म में पारंगत हुआ तो उसके पास अतिरिक्त भोजन जमा होने लगा. एक जगह टिके रहने से जीवन में कतिपय स्थायित्व आया. किंतु सहअस्तित्व और सामूहिक कल्याण का बोध कमोवेश वैसा ही बना रहा. समूह अतिरिक्त रूप से अर्जित अनाज को अपने वरिष्ठ सदस्य के पास जमा रखता था. आवश्यकता पड़ने पर उससे जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाती. जैसेजैसे संसाधन बढ़े, व्यक्ति की आय के स्रोत भी विस्तार लेते गए. इसी के साथ समाज पर व्यक्तिवाद हावी होने लगा. सर्वकल्याण का स्थान आत्मकल्याण लेने लगा. समष्टिवाद व्यक्तिवाद में समाता चला गया. आरंभ में अनाज के संचयन, वितरण का कार्य पूर्णतः सामूहिक कर्तव्यबोध के साथ किया जाता था. इस कार्य के लिए प्रायः वयोवृद्ध व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता था, जो अपने वार्धक्य के कारण किसी और कार्य में अपनी सक्रिय हिस्सेदारी निभा पाने में असमर्थ होते हों तथा जिनकी समूह में पर्याप्त लोकप्रियता भी हो. सामंतवादी युग में इस भावना को ठेस पहुंची. उस समय तक समाज के समस्त संसाधनों पर राजा के अधिकार को मान्यता मिल चुकी थी. अब यह राजा कि पर निर्भर था कि वह किसी व्यक्ति को कितना दे. बदले में कितना उससे काम ले. राजा प्रसन्न हो तो संपत्ति लुटा देता. वह नाराज हो तो उसके कोप के आगे जान के लाले पड़ जाते. इसने चापलूसी को बढ़ावा दिया, जिससे एक परजीवी जमात समाज में पैदा हुई. ब्राह्मणोंपुरोहितों की उस जमात ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए समाज को जाति और धर्म के नाम पर बांटना आरंभ कर दिया. उस समय भी सत्ता से दूर एक वर्ग ऐसा था, जिसे राजा और उसके दरबारियों के छलछदम् से कोई कुछ लेनादेना न था. उसके मनस् में सामूहिक कल्याण की पुरातन स्मृतियां शेष थीं. ग्रामदेहात में रहने वाला यह वर्ग सर्वकल्याण और सामूहिकताबोध के साथ मिलकर काम करता था. इस वर्ग को सामंतवर्ग से लगातर उत्पीड़न तथा अन्य चुनौतियां मिलती रहती थीं. ऐसे में सहअस्तित्व की भावना ही थी, जो लोगों को एक साथ रहते हुए परिस्थितियों से संघर्ष की प्रेरणा देती थी. इसी वर्ग की सहगामी चेतना का सुफल था जिससे समाज के ऐक्यभाव को मशीनीकरण से पहले कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली. सामूहिकताबोध और सर्वकल्याण की कामना ऋग्वेद की एक ऋचाओं में भी है. एक ऋचा में उद्गाता ऋषि प्रार्थना करता है कि

हम साथसाथ रहें, समवेत संभाषण करें, हम सबके मनस् एकसम, निकष् एक सम हों. सभी पितर, देवगण पधारें और अपना यथोचित हिस्सा ग्रहण कर लें.’

उपर्युक्त ऋचा में व्यक्तियों के साथसाथ देवताओं से भी सामूहिकता के अनुशासन में बंधने की कामना की गई है. यह सामूहिकताबोध, समष्टिकामना, मिलबांटकर खाने तथा साथसाथ रहने की भावना विश्व की प्रत्येक संस्कृति तथा सभ्यता में किसी न किसी रूप में उपस्थित रही है. हालांकि समयसमय पर मानवीय लालच तथा स्वार्थभावना ने इसमें विचलन भी पैदा किए हैं. स्वार्थप्रेरित कुछ व्यक्ति वृहद जनसमुदाय के कल्याण की उपेक्षा कर केवल अपने हितसाधन को ही पुरुषार्थ मानते रहे हैं, परंतु ऐसे अनैतिक विचार को समाज में की मुख्यधारा का सम्मान कभी प्राप्त नहीं हो सका. सामूहिकता का वह संकल्प, सर्वकल्याण की मानवतावादी कामना समाज की आचारसंहिता की उपज था, जो प्रकृति के मुक्त सान्न्ध्यि में साथसाथ रहते, संघर्ष करते हुए विकसित हुई थी. लेकिन राजनीति दर्शन के रूप में जिस समष्टिवाद पर यहां विचार किया जाना है, वह उनीसवीं शताब्दी की संकल्पना है. रूसो के लेखन में भी उसके बीजतत्व यत्रतत्र उपलब्ध हैं. अठारवीं शताब्दी के महान चिंतक रूसो ने अपनी प्रमुख कृति ‘सोशल कांट्रेक्ट’(1762) में शासक और शासित के बीच समन्वयात्मकता की आवश्यकता पर जोर दिया था. व्यक्तिस्वातंत्र्य के मुखर समर्थक रूसो का कहना था कि मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, लेकिन वह हर जगह बेड़ियों में है. ये बेड़ियां कहीं राज्य की ओर से पड़ती हैं, तो कभी धर्म अथवा समाज की ओर से. पुस्तक में उसने शासक और शासित दोनों के कर्तव्यों का विश्लेषण किया था. उससे अगली शताब्दी में जन्मे जर्मनी के महान दार्शनिक जार्ज विल्हेम फ्रैड्रिक हीगेल का मानना था कि राज्य किसी भी व्यक्ति से बढ़कर है. हीगेल की यह स्थापना अपने पूर्ववर्ती महान यूनानी दार्शनिकों सुकरात और प्लेटो की विचारधारा से प्रेरित थी. राज्य एवं व्यक्ति के कर्तव्यों की व्याख्या करते हुए हीगेल ने लिखा था—

राज्य को व्यक्ति की अपेक्षा उच्चतर अधिकार प्राप्त होते हैं. अतः व्यक्ति का सर्वप्रथम कर्तव्य है—स्वयं को राज्य का श्रेष्ठतर नागरिक सिद्ध करना.’

हीगेल व्यक्ति की राज्य के प्रति निष्ठा को सबसे बड़ी सामाजिक नैतिकता मानता था. उसकी द्वंद्ववादी विचारधारा से प्रभावित तथा उसका अपने राजनीतिक दर्शन में भौतिकवादी ढंग से उपयोग करने वाला कार्ल माक्र्स समाज के पुनर्गठन में सामूहिक प्रयासों का समर्थक था. बहरहाल जिस समष्ठिवाद का राजनीतिक दर्शन के रूप में विचार किया जाना है, वह समूह को व्यक्ति के बरक्स वरीयता देता है तथा व्यक्ति के हितों के सामान्यीकरण पर जोर देते हुए ऐसी विकास नीति बनाने का पक्ष लेता है, जिससे समाज के बहुसंख्यक वर्ग का कल्याण संभव हो. यह व्यक्तिवाद की निंदा करता है. मोयरा ग्रांट ने समष्ठिवाद को ऐसे राजनीतिक दर्शन अथवा के रूप में परिभाषित किया है जो किसी भी प्रकार के वर्ग यथा जाति, राष्ट्र, समाज, राज्य आदि, को व्यक्ति की अपेक्षा वरीयता देता है. यह ऐसा विचार अथवा व्यवहार है जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक मुद्दों पर विचार अथवा कार्रवाही करते हुए समाज के हितों को व्यक्ति के हितों से बढ़कर माना जाता है. समष्ठिवाद की एक सारगर्भित परिभाषा हमें बीसवीं शताब्दी की प्रसिद्ध उपन्यासकार अयन रेंड की ओर से प्राप्त होती है, हालांकि इस विचारधारा के प्रति अयन रेंड का नजरिया आलोचनात्मक रहा है—

समष्ठिवाद का अर्थ है—सामूहिक हितों के समक्ष व्यक्तिहितों का बलिदान, वह जाति, रंग, वर्ण, वर्ग अथवा राज्य चाहे जिस रूप में हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. समष्ठिवाद मानकर चलता है कि मनुष्य को सामूहिक गतिविधियों तथा विचारों के साथ ‘सामान्य शुभत्व’ की कामना के साथ सदैव आबद्ध रहना चाहिए.’

चूंकि समष्ठिवाद में सारी शक्तियां एवं अधिकार बहुसंख्यक के कल्याण को समर्पित सत्ता के अधीन रहते हैं, इसलिए वहां व्यक्तिमात्र से अपेक्षा की जाती है कि वह समूह के कल्याण के लिए निजी हितों का बलिदान करने को तत्पर रहे. यह व्यवस्था त्याग एवं समर्पण की कामना करती है. हीगेल तथा माक्र्स दोनों ही ने समष्ठिवाद को भौतिक, राजनीतिक अंतक्रियाओं तथा ऐतिहासिक परिवर्तनों की अनिवार्य परिणति स्वीकार किया था. समष्ठिवादियों की सैद्धांतिकी इस नैतिक विश्वास पर टिकी है कि मनुष्य अपना लक्ष्य स्वयं को नहीं बना सकता. उसका अपना लक्ष्य, व्यक्तिगत उपलब्धियां समाज से परे निरर्थक हैं. बल्कि वह दूसरों की सेवा करने का एक माध्यम मात्र है. मनुष्य की शारीरिक आवश्यकताएं मात्र भोजन एवं वस्त्र हैं. उनके लिए भी उसे समाज के अन्य व्यक्तियों, समूहों पर निर्भर होना पड़ता है. भोजन एवं वस्त्र के अलावा मनुष्य का सारा मानसिक कार्यकलाप समाज से उदभूत तथा उसी पर केंद्रित होता है. इसलिए नितांत व्यक्तिनिष्ठ और स्वार्थकेंद्रित हो जाना मनुष्य के स्वाभाविक चरित्र के विपरीत है. दूसरे शब्दों में समाज में रहने के लिए सहयोग का आदानप्रदान आवश्यक है. अतएव व्यक्ति को वही कार्य करना चाहिए जिसमें बहुसंख्यक का हित सन्निहित हो. व्यक्तिमात्र की नैतिकता को परखने का मापदंड भी यही है कि उसने दूसरों के कल्याण के लिए अपने हितों का कितना बलिदान दिया है! समष्ठिवादी समाज में उत्पादन, विपणन, अंतरण आदि व्यक्तिगत लाभ के लिए न होकर, संपूर्ण समाज के कल्याण की भावना के साथ किया जाता है. वहां व्यापार नहीं, नैतिकता सर्वोपरि होती है. समष्ठिवादी उत्पादन की आचार संहिता कहती है—

‘सर्वजन के लिए उत्पादन, न कि वर्गविशेष के लार्भाजन हेतु उत्पादन.’

समष्ठिवाद लोकतंत्र की आदर्शसंहिता भी यही है. बर्क रेंड ने इसी से मिलीजुली बात कही है. उसके अनुसार लोकतंत्र की आदर्श सहिंता ही समष्ठिवाद है, जो बहुसंख्यक के कल्याण के निमित्त अल्पसंख्यक के हितों का बलिदान का समर्थन करती है. समाज असल में नियमों की एक गतिशील व्यवस्था है, जिसको मानव समुदाय शांतिपूर्वक साथसाथ रहने की भावना के साथ गठित करता है. अतः समाज की आचारसंहिता का होना भी आवश्यक है. अयन रेंड एक प्रश्न उठाती हैं—‘समाज की शक्ति सीमित है अथवा असीमित?’ इसका वह व्यक्तिवादी और समष्ठिवादी नजरिये से उत्तर भी देती हैं. उपर्युक्त प्रश्न के सापेक्ष व्यक्तिवादी का उत्तर देगा—

‘‘समाज की शक्तियां सीमित हैं. इसलिए कि व्यक्ति के अपने भी कुछ अधिकार होते हैं, जिन्हें उससे अलग नहीं किया जा सकता. समाज को ऐसे नियम बनाने चाहिए जिनसे व्यक्ति के मूलभूत अधिकार बाधित न हों.’ इस उत्तर पर समष्ठिवादी की क्या प्रतिक्रिया होगी? रेंड इसका उल्लेख भी करती है—‘समाज की शक्तियां असीमित हैं. समाज को अधिकार है कि वृहद हितों के अनुसार नियम बनाए तथा किसी भी व्यक्ति को उनके अनुपालन के लिए बाध्य करे, जिस प्रकार वह कर सकता है.’’

अपनी तर्क के अनुरूप रेंड उदाहरण भी देती है, जिसमें वह समष्ठिवाद के दुर्बल पक्ष की ओर संकेत करती है, लेकिन समष्ठिवादियों के अनुसार वही उसकी विशेषता है. रेंड के अनुसार व्यक्तिवादी समाज में लाखों लोग भी मिलकर भी, अपने लाभ के लिए किसी एक व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा नहीं दे सकते. यदि वे ऐसा करते हैं तो कानून की नजर में अपराधी माने जाएंगे तथा दंड के पात्र भी. जबकि समष्ठिवाद अथवा सामूहिकतावाद में इतने सारे लोग अथवा कोई एक भी, उन सबका प्रतिनिधि होने का दावा करते हुए, किसी एक व्यक्ति को आसानी से मृत्युदंड जैसी सजा दे सकता है. वहां किसी एक व्यक्ति के जीवन की कोई कीमत नहीं होती. यह तर्क निश्चय ही समष्ठिवाद के कमजोर पक्ष की ओर इशारा करता है. लेकिन यह बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण को समर्पित किसी भी कल्याणकारी विचारधारा अथवा राजनीतिक दर्शन की विवशता भी हो सकती है, जिसके आधार पर वह व्यक्ति के आगे समूह को वरीयता देती है. लेकिन हमें मानना पड़ेगा कि सभ्यता के आरंभ से आज तक कोई भी राजनीतिक दर्शन सर्वथा दोषमुक्त नहीं रहा है. व्यक्तिहित और समाजहित में तालमेल बैठाए रखने की समस्या प्रत्येक दर्शन के समक्ष रही है. ऐसे में मनुष्य खराब तथा बहुत खराब व्यवस्थाओं के बीच से अपेक्षाकृत कम खराब व्यवस्था का चयन करता आया है. समष्ठिवाद की आलोचना के पीछे रेंड के कथन में सचाई हो सकती है, लेकिन मुटठीभर व्यक्तियों के स्वार्थ के लिए समाज के पूरे वर्ग का शोषण भी सभ्य समाज का प्रतीक नहीं हो सकता. यही कारण है कि अयन रंेड की आलोचना के बावजूद दुनिया में समष्ठिवाद के प्रशंसकों की भारी संख्या है. उसका स्वतंत्र राजनीतिक दर्शन है. उसके समर्थकों के अनुसार समष्ठिवाद साम्यवाद, समाजवाद आदि की तरह ही एक स्वतंत्र दर्शन है, जो समाज को पूंजीवाद के अभिशाप से मुक्त करने की वांछा रखता है. उन असमानताओं का समाधान करता है, जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में स्पर्धा के कारण जन्म लेती हैं. कार्ल माक्र्स ने समष्ठिवाद का समर्थन किया था. माक्र्सवादी सिद्धांतकारों के अनुसार सामूहिक कल्याण को समर्पित यह विचारधारा नियोजित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हुए, निजी अधिकारिता पर अंकुश लगाकर अपने सुदूर लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत होती है. सबसे बड़ी बात यह है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समष्ठिवाद सरकार अथवा तज्जनित संस्थाओं का सहारा नहीं लेता, बल्कि उनके समानांतर स्वयं को ऐसे स्वतंत्र, सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहता है कि राज्य और राज्याश्रित संस्थाओं की भूमिका गौण होकर रह जाए. इस प्रकार यह स्वयं को अराजकतावाद का समानधर्मा दर्शन सिद्ध करता है. वह साम्यवाद से इस मामले में एकमत है कि उत्पादकता के साधनों को निजी अधिकारिता के चंगुल से बाहर लाकर उन्हें ‘सामूहिक संपत्ति’ घोषित किया जाए. वह मानता है कि संपत्ति पर व्यक्ति के बजाय व्यक्तिसमूहों का अधिकार हो. जबकि साम्यवाद राज्य की अधिसत्ता का समर्थन करते हुए संसाधनों को उसकी अधिकारिता में रखना चाहता है. इस आधार पर समष्ठिवाद उससे भिन्न तथा अधिक जनोन्मुखी दर्शन है.

समष्ठिवाद का अर्थदर्शन

समष्ठिवाद की प्रमुख मान्यता यह है कि इसमें सदस्यगण सामूहिक कल्याण की भावना से स्वेच्छापूर्वक जुड़ते हैं. वे यह मान लेते हैं कि समूह के हित में ही उनका अपना हित शामिल है. इसलिए व्यक्तिवाद की प्रतीक सभी वस्तुएं, संसाधन, भूसंपदा आदि सामूहिक अधिकारक्षेत्र में चले आते हैं. समूह उनका उपयोग सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु, सर्वकल्याण की भावना के साथ करता है. एस. एच. स्क्वार्ज(1868—1936) के अनुसार सामूहिकतावादी समितियां व्यक्ति हित एवं निजी लालसाओं पर आधारित मांगों को न्यूनतम कर देती हैं. अतएव वे दूसरी समितियों की अपेक्षा अधिक सामंजस्यपूर्ण एवं स्थायी होती हैं. पूरे समूह का सामान्य वर्तमान और भविष्य होता है. समष्ठिवाद का मानना है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. समाज से परे उसका अस्तित्व संभव नहीं. जबकि समाज व्यक्ति विशेष के बिना भी बना रहता है. अतः वृहद सामाजिक हितों के समक्ष व्यक्तिहित को तिलांजलि दी जा सकती है. लेकिन समूह से जुड़ने तथा समष्ठिवादी बनने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य में पर्याप्त सामूहिकताबोध हो. साथ ही उसमें संसाधनों के साझा उपयोग का धैर्य और त्याग की भावना हो. पूंजीवादी उत्पादन लाभकेंद्रित होता है, इसलिए वह एकाधिकारवादी आचरण करता है. उसमें उत्पादक समकक्ष उत्पादों को बाजार से खदेड़ देना चाहता है. जबकि जमींदार की कोशिश होती है कि वह संपूर्ण कृषिभूमि पर अधिकार जमा ले. राज्य पेटेंट, का॓पीराइट, व्यापारिक गोपनीयता, बौद्धिक संपदा की सैद्धांतिकी के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था को प्रश्रय देता है. इसके लिए वह पूंजीपति से अधिक कर वसूलता है. हालांकि कराधान की व्यवस्था का प्रथम उद्देश्य व्यापक जनकल्याण तथा लोगों को अनिवार्य सुखसुविधाएं प्रदान करना बताया जाता है. पर असल में उसका लक्ष्य केवल और केवल शिखरस्थ शासकों तथा नौकरशाही के लिए विलासिता के साधन जुटाना होता है, जो कालांतर में आर्थिक विषमता को आगे बढ़ाता है. इससे समाज के विपन्न और शक्तिहीन वर्ग के शोषण, उत्पीड़न में और भी वृद्धि होती जाती है.

समष्ठिवाद की आर्थिकी को लेकर दो भिन्न विचारधाराएं सामने आती हैं. पहली विचारधारा पूरे समाज को एक इकाई मानते हुए समस्त संसाधनों पर लोगों के सम्मिलित अधिकार को मान्यता देती है. तदनुसार कुल उत्पादक संपत्ति पर पूरे समाज के सभी सदस्यों का संयुक्ताधिकार होता है. दूसरी विचारधारा संसाधनों के कार्यक्षम उपयोग के लिए उन्हें सक्रिय, चेतनशील, सुसंगठित तथा स्वतंत्र समूहों के अधिकार में रखने का समर्थन करती है. उसमें कुल संपत्ति पर स्वतंत्र, स्वैच्छिक समूहों का अधिकार होता है. इनमें प्रथम की विशेषताएं समाजवाद और साम्यवाद से मेल खाती हैं, जबकि दूसरी व्यवस्था समष्ठिवाद को सहकार एवं ‘श्रमिकसंघवाद’ के निकट ले आती है, जिसका उल्लेख पीछे किया गया है. यूं तो पूंजीवाद में भी उद्योग स्वामियों की संख्या एकाधिक हो सकती है. पूंजीवादी उद्यम दो प्रकार के हो सकते हैं. पहले वे जो सार्वजनिक अधिकारिता में हों तथा जिनमें राष्ट्र की पूंजी लगी हो; और जो सरकार अथवा उसके द्वारा गठित किसी कानून अथवा संस्थान के अंतर्गत कार्यरत हों. दूसरा वर्ग निजी संस्थानों का हो सकता है, जिनमें पूंजीपतियों द्वारा जनता से पूंजी आमंत्रित की गई हो. दोनों ही प्रकार के संस्थानों में स्वामियों की संख्या एकाधिक संभव है. इसके बावजूद उन्हें समष्ठिवादी नहीं कहा जा सकता, इसलिए कि ऐसे संस्थानों में उत्पादन का ध्येय विशुद्ध लाभार्जन होता है. खुद को बाजार में टिकाए रखने के लिए वे पूंजीवाद के प्रिय विचार ‘स्पर्धा’ का सहारा लेते हैं तथा प्रकारांतर में मनुष्य के साथ निर्जीव उपभोक्ता वस्तु की भांति आचरण करने लगते हैं.

समष्ठिवाद की आर्थिकी के अनुसार लोकोपयोगी वस्तुओं पर एकमात्र लोक का अधिकार होना चाहिए. उनका उपयोग भी जनकल्याण की पवित्र भावना के साथ किया जाना चाहिए. उत्पादन जब मुनाफे के बजाय लोगों की आवश्यकता के अनुसार किया जाएगा तथा प्रत्येक को लगेगा कि उत्पादन उसके अपने हित के लिए तो उससे निरर्थक मारामारी पर अंकुश लगेगा. स्पर्धा की समाप्ति होगी. चूंकि उत्पादन के पीछे लोकहित की भावना होगी, इसलिए कोई भी उत्पादक बाजार पर छाने का प्रयास नहीं करेगा. इससे एकाधिकार पर अंकुश लगेगा. यह असंभव भी नहीं है. अतीत में इस प्रकार का उत्पादन संभव होता आया है. यदि हम प्राचीन अर्थव्यवस्थाओं पर विचार करें तो दुनिया के अनेक देशों में छोटे उद्यमियों और व्यापारियों के अपने संगठन होते थे, जो सामूहिक कल्याण की भावना के साथ काम करते थे. उन्हें हम समष्ठिवाद का प्रारंभिक संस्करण मान सकते हैं. इसलिए कि समूह के बाहर के लोगों के साथ वे मंजे हुए व्यापारियों की भांति पेश आते थे. उनकी एक कमजोरी यह भी थी कि वे तत्कालीन एकाधिकारवादी राज्यप्रणालियों यथा राजशाही, कुलीनतंत्र और सामंतशाही का न केवल समर्थन करते थे, बल्कि राज्याश्रय पाने के लिए आकुल भी रहते थे. इस प्रकार वे राज्य और उसके एकाधिकार के समर्थक थे. प्राचीन राजशाही में सभी निधियां राजा की मानी जाती थीं. जनता के बीच उनका वितरण राजा की मर्जी के अनुसार किया जाता था. जबकि अराजकतावाद और श्रमिकसंघवाद की भांति समष्ठिवाद भी राज्य की उपस्थिति को समाज के व्यापक हितों के विरुद्ध मानता है. वह समस्त लोकोपयोगी निधियों को समाज के सामान्य अधिकार के दायरे में लाना चाहता है, ताकि सभी संसाधनों का लाभ सभी को प्राप्त हो सके. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में यूरोप के देशों में जनसाधारण को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए श्रम संगठनों तथा पेशेवरों ने मिलकर ‘सामूहिक उपचार निधि’ की स्थापना की थी. इसके बाद उन्होंने डाॅक्टरों तथा अस्पतालों से संपर्क कर, श्रमिकों को स्वास्थ्य सेवा तथा चिकित्सा भत्ता देने का प्रावधान किया था. योजना के संचालन हेतु धनराशि श्रमिकों तथा अन्य पेशेवरों से चंदे के रूप में जमा की जाती थी. इस योजना को आरंभिक सफलता प्राप्त हुई थी. समष्ठिवाद में संपत्ति के प्रबंधन को लेकर भी भिन्न प्रकार के विचार मिलते हैं. कुछ लोग इसके लिए राज्य को संपत्ति के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप सकते हैं. हालांकि इसका दूसरा रूप भी संभव है. जैसे निगमों की संपत्ति का प्रबंधन, बजाय उसके हिस्सेदारों के, प्रशिक्षित प्रबंधकों को सौंपा जा सकता है. यह अराजकतावाद और साम्यवाद की मूल स्थापनाओं के विपरीत है, जो राज्य का तत्काल विखंडन चाहते हैं. उनके अनुसार श्रम का सटीक मूल्यांकन असंभव है. इसलिए आवश्यक है कि श्रम का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ आधार पर न करके संवेदना के धरातल पर किया जाए, और श्रमिकों के श्रम के बीच अधिक अंतर न रखा जाए. इस विचारधारा के अनुसार व्यक्तिमात्र को अपनी आवश्यकता के अनुसार उपभोग की स्वतंत्रता होनी चाहिए.

विद्वानों ने समष्ठिवाद को दो वर्गों में बांटा है:

1. क्षैतिज समष्ठिवाद

2. उर्ध्व समष्ठिवाद

आगे हम इनपर विस्तार सहित चर्चा करेंगे—

1. क्षैतिज समष्ठिवाद

इसमें सदस्यों की आर्थिकसामाजिक समानता तथा संसाधनों के समन्वित उपयोग पर जोर दिया जाता है. क्षैतिज समष्ठिवाद उन स्थानों पर खूब फलताफूलता है जहां लोग परस्पर मिलजुलकर सहयोगात्मक तरीके से रहते हों. उनकी सामाजिक हैसियत में बहुत अधिक अंतर न हो. अक्सर गांवों, छोटे कस्बों में क्षैतिज समष्ठिवाद आसानी से पनप सकता है, इसलिए कि वहां आर्थिक विषमता अपेक्षाकृत कम होती है. लोगों की आर्थिक हैसियत में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. इसको सामूहिक साझेदारी भी कहा जाता है. छोटे गांवों, कबीलाई अथवा विशिष्ट पहचान से जुड़े समाजों में क्षैतिज समष्ठिवाद के अनेकानेक उदाहरण आरंभ से ही मिलते रहे हैं. यह आपसी विश्वास तथा सहयोग पर जोर देता है. चूंकि लोग आपस में जुड़े होते हैं, इसलिए इससे चोरी और अन्य नुकसान की संभावना बहुत घट जाती है. समूह भावना से जुड़े लोगों के बीच बराबरी एवं समानता का वातावरण बना रहता है. समूह के बाहर के लोगों के साथ बाहरी नागरिक जैसा ही व्यवहार किया जाता है. इससे समष्ठिवादी आंदोलन के विभिन्न उपकेंद्रों में बंट जाने का खतरा होता है. व्यक्ति के बजाय व्यक्ति समूह अहमियत पाने लगते हैं. इसलिए क्षैतिज समष्ठिवाद को क्षेत्रीय समष्ठिवाद भी कहा जा सकता है.

2. उर्ध्व समष्ठिवाद

उर्ध्व समष्ठिवाद में लोग अपने कर्तव्य एवं दायित्व के आधार पर अलगअलग समूह में बंटे होते हैं. आधिकारिक स्तरीकरण की भावना उन्हें छोटे तथा बड़े में बांटती है. दूसरे शब्दों में असमानताओं को नैसर्गिक लक्षण मानते हुए उर्ध्व समष्ठिवाद उन्हें बनाए रखने के प्रति सहमत होता है. क्षैतिज समष्ठिवाद आंशिकरूप से मनुष्य के स्वार्थभाव को वाजिब ठहराता है. तथा समाज में स्तरीकरण को मान्यता प्रदान करता है. क्षैतिज समष्ठिवाद सामान्यतः यह मान लेता है कि सभी व्यक्ति कमोबेश बराबर हैं. जबकि उर्ध्व समष्ठिवाद मानता है कि मनुष्य प्रकृतिक रूप से एकदूसरे से भिन्न होते हैं, इसलिए वह एक वर्ग पर दूसरे वर्ग के अनुशासन को मान्यता प्रदान करता है. क्षैतिज समष्ठिवाद की मान्यता होती है कि सभी व्यक्ति सामान्यरूप से एकसमान होते हैं. जबकि उर्ध्व समष्ठिवाद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की स्वभावगत भिन्नताएं होती हैं. सामान्यबोध के कारण क्षैतिज समष्ठिवाद में व्यक्ति दूसरों के साथ बराबरी का व्यवहार करना चाहता है, और वह वांछा रखता है कि बाकी लोग भी उसे उसी दृष्टि से देखें, यथा एक व्यक्ति—एक वोट. वह दूसरों के आगे समर्पण को आसानी से तैयार नहीं होता. जबकि उर्ध्व समष्ठिवाद में व्यक्ति अपने सामान्य हितों के लिए समूह से आबद्ध होता है, और वह उनके लिए समर्पण हेतु भी तत्पर होता है. यदि उसको लगे कि समूह द्वारा उठाया गया कोई कदम उसके व्यक्तिगत हितों के सर्वथा विपरीत है तो वह उसका विरोध भी करता है. मनोवैज्ञानिक ए. पी. फिस्के ने क्षैतिज समष्ठिवाद को ‘सामूहिक साझेदारी’ तथा उर्ध्व समष्ठिवाद को ‘आधिकारिक पदानुक्रम’ के रूप में वर्गीकृत किया है. एम. रोकीश ने राजनीतिक प्रणालियों के अध्ययन के लिए भी इसी मान्यता का समर्थन किया है—

वह राजनीतिक प्रणाली, जो व्यक्तिगत स्वाधीनता के बजाय समानता को महत्त्व देती है, क्षैतिज समष्ठिवाद के निकट है—यथा इजरायली किबुत्ज. दूसरी ओर ऐसी प्रणालियां जो समानता के बजाय स्वाधीनता पर जोर देती हैं, वे उर्ध्व व्यक्तिवाद की समानधर्मा हैं—जैसे स्पर्धात्मक पूंजीवाद, अमेरिका की बाजार आधारित अर्थव्यवस्था. उर्ध्व समष्ठिवादी समाजों की तुलना में जो समाज न तो समानता को महत्त्व देते हैं, न ही स्वतंत्रता को, उनमें फासीवादी तथा वे पारंपरिक समाज आते हैं जो अपने प्रभावशाली नेताओं के संरक्षण में सांप्रदायिकता को प्रश्रय देते हैं.’

क्षैतिज समष्ठिवाद के समर्थक अराजकतावादी समाजविज्ञानी अलेक्जेंडर बर्कमेन का मानना था कि समानता के लिए भी समूह के बीच सामान्य व्यक्तिबोध होना अनिवार्य है. समानता, बिना आत्मबोध के संभव ही नहीं है. अपने आप को समझकर ही व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों को भलीभांति समझ सकता है. इसलिए समूह की संपूर्ण एकता के लिए व्यक्तिबोध की उपस्थिति अपरिहार्य है. सभी नागरिकों को समान सुविधाएं तथा आगे बढ़ने के एक जैसे अवसर नागरिकों को अपनी कार्यक्षमता में बढ़ोत्तरी करने के अवसर भी दे सकते हैं. उसका मानना था कि समानता केवल आर्थिक समानता तक सीमित नहीं है. यह एक व्यापक पद है, जिसका आशय सामाजिक विषमता एवं उत्पीड़न की समस्त संभावनाओं को मेट देने से है. इसलिए व्यक्ति को स्वाधीन समाज में समानता और किसी कारागार में आरोपित समानता के बीच स्पष्ट अंतर करके देखना चाहिए. समानता का अभिप्राय यह हरगिज नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति एक जैसा भोजन करे, एक ही काम करे, एक जैसे वस्त्र धारण करे अथवा एक ही ढर्रे का जीवन जिए. सच्ची अराजकतावादी समानता स्वाधीनता में प्रश्रय लेती है. मनुष्य की स्वभावगत भिन्नताओं को एकसूत्र में पिरोकर समाज और व्यक्ति दोनों के हितों में समन्वयात्मकता एवं स्वाधीनता ही मानव समाज का अभीष्ठ हैं. विशिष्ट बनने, दूसरों से अधिक सुखसुविधाएं बटोरने की ललक प्रथम द्रष्टया असमानता की प्रतीक हैं, किंतु इनकी अंतिम परिणति एक वर्ग के अधीन दूसरे वर्ग की गुलामी से होती है.

क्षैतिज समष्ठिवादी तर्क देता है कि सामूहिक कल्याण अथवा ‘शुभत्व’ की खातिर व्यक्तिहितों के बलिदान की अवधारणा ही कठोरता की प्रतीक है. उसके अनुसार समूह कोई निर्जीव वस्तुओं का ढेर नहीं है. बल्कि उसके पीछे एकाधिक व्यक्ति होते हैं. इसलिए ‘व्यक्ति’ की उपेक्षा समूह के लक्ष्य को वायवी बना सकती है. समूह का कोई भी सदस्य स्वयं को उपेक्षित न समझे, इसके लिए क्षैतिज समष्ठिवादी निर्णय प्रक्रिया को अधिकतम लोकतांत्रिक बनाने पर जोर देता है. जबकि उर्ध्व समष्ठिवादी समूह की घनिष्ठता और एकता के प्रति आग्रहशील होता है. उसके अनुसार अधिक लोगों के कल्याण के लिए व्यक्ति विशेष के हितों की बलि दी जा सकती है. विकास की निरंतरता को बनाए रखने के लिए उर्ध्व समष्ठिवादी विभिन्न समूहों के बीच स्पर्धा को महत्त्व देता है. वहां व्यक्ति विशेष की अपेक्षा समूह अधिक महत्त्वपूर्ण होता है. समष्ठिवादी एक सीमा तक अराजकतावादियों से प्रभावित थे. पू्रधों तथा उसके अनुयायियों की भांति समिष्ठवादियों को भी लगता था कि पूंजीवाद का मुकाबला श्रम सहकारिताओं तथा सामूहिक बचत योजनाओं द्वारा किया जा सकता है. किंतु व्यवहार में बहुत जल्दी यह सिद्ध हो गया था कि सहकारी आंदोलन और कुछ नहीं, बल्कि बुर्जुआ वर्ग के नए संगठन खड़े करना है. यह भी देखा गया कि छोटी पूंजी तथा साधारण तकनीक से संपन्न सहकारिताएं, बड़ी पूंजीप्रधान और दक्ष प्रबंधन युक्त कंपनियों के समक्ष टिके रह पाना असंभव होगा. समष्ठिवाद के सुझाव सहकारिता के विकल्प के तौर पर उभरा था. यह माना गया था आर्थिक असमानता और पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए श्रमिक संगठनों के हाथों में उद्योगों की कमान सौंप दी जाए और श्रमिकसंघ उनका संचालन सार्वजनिक कल्याण को ध्यान में रखते हुए करें. यह एक प्रकार से उद्योग सहकारिताओं को सुदृढ़ करने का जैसा ही काम था. लेकिन उनसे श्रमाधिकारों के प्रति अपने संघर्ष को दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ाने की मांग की गई थी. 22 जून से 12 जुलाई, 1921 के बीच चलने वाली तीसरे इंटरनेशनल की बैठक में एक प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई थी जिनमें श्रमसहकारिताओं से अपेक्षा की गई थी कि वे संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए—

उत्पादन के सभी साधनों को पूंजीपतियों के हाथ से झटकते हुए उन्हें श्रमिकों के अपने हाथों में सौंप दें, जो उनके वास्तविक स्वामी हैं.’

इंटरनेशनल की बैठक के तुरंत बाद प्रूधों तथा उसके सहयोगियों ने आर्थिक संघों की रूपरेखा बनानी आरंभ कर दी थी. यह मानते हुए कि प्रत्येक व्यक्ति समाज पर निर्भर और एक तरह से उसका उत्पाद है, इसलिए उत्पादनकर्म किसी भी अन्य श्रम से महत्त्वपूर्ण है. इसलिए बजाय इसके कि राज्य अथवा बाजार उत्पादन की दिशा और उनके वितरण की शर्तों को तय करे, श्रमिकसंघों को आपसी तालमेल के द्वारा यह निर्णय स्वयं अपने हाथ में ले लेना चाहिए. इस समझौते पर सामूहिक बस्तियों द्वारा नजर रखी जानी चाहिए. उद्योग संघ इस बात का ध्यान रखें की श्रमिकों का शोषण न हो. बकुनाइन को डर था कि वस्तुओं का मूल्यरहित आदानप्रदान भी समाज में एकाधिकारवाद को बढ़ावा देगा. उसको डर था कि किसान और शिल्पकार जो अपने विशिष्ट श्रम से जीविका चलाते हैं, वे अवसर मिलते ही मनमानी करने लगेंगे. इसलिए उसने उत्तराधिकार कानून को भी समाप्त कर देने की मांग की थी. इसके बावजूद उसने उत्पादन संघों को पर्याप्त अधिकार देने की व्यवस्था की है. समष्ठिवादी विचारकों के अनुसार श्रमिक संघों का आंतरिक संचालन, काम की शर्तें, कार्यघंटे, दायित्वों का विभाजन, आयवितरण जैसे कार्य उनके सदस्यों को सौंप देने चाहिए. ये संगठन अपने कार्य के मामले में पूरी तरह स्वायत्त होगे. साम डोल्गा॓फ लिखते हैं—

प्रत्येक कार्यशाला, हर एक फैक्ट्री, अपने श्रमिकों के संघ के अधीन होगी, जो अपने कार्यनियोजन तथा कारखाने के उत्पादन की दिशा निर्धारित करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होंगे और वे अपने कर्तव्य का इस प्रकार निर्वहन करेंगे, जो उन्हें सर्वश्रेष्ठ लगे. लेकिन यह सर्वथा आवश्यक है कि प्रत्येक श्रमिक के अधिकारों की रक्षा हो तथा समानता और न्याय के सिद्धांतों का परिपालन.’

समष्ठिवाद का अर्थदर्शन व्यवस्थित नहीं है. वह श्रमिकों की स्वायत्तता पर जोर देता है. इसकी विशेषता है कि यह उत्पाद के मूल्यनिर्धारण का काम बाजार अथवा उपभोक्ता पर छोड़ देने के बजाय उसमें लगे श्रमघंटों के आधार पर तय करने का सुझाव देता है. इसके लिए वह ‘बैंक आ॓फ एक्सचेंज’ की स्थापना करने पर जोर देता है. ‘बैंक आ॓फ एक्सचेंज’ विनिमय के वे ठिकाने हैं जो किसी वस्तु विशेष में लगे श्रम के आधार वस्तुओं का श्रममूल्य निर्धारित करते हैं. इस कार्य के लिए श्रम सहकारिताओं से सहयोग की अपेक्षा की जाती है, जो वस्तु का श्रममूल्य तय करने के लिए वास्तविक आंकड़े उपलब्ध कराती हैं. ‘बैंक आ॓फ एक्सचेंज’ उत्पाद के निर्माण में लगे कार्यघंटों के आधार पर उसके श्रममूल्य का आकलन कर उत्पादक को एक बाउचर प्रदान करता है. बाउचर में उत्पाद में लगे श्रममूल्य का उल्लेख होता है. उत्पादक उन श्रमबाउचर के आधार पर दूसरी वस्तुओं का आदानप्रदान कर सकता है. ‘एक श्रमिक का जैसा काम, वैसा उसको दीजे दाम.’ इस सूत्रवाक्य द्वारा समष्ठिवाद की सैद्धांतिकी को समझा सकता है. उत्पाद के मूल्य निर्धारण से लेकर विपणन तक श्रम संगठनों की मदद ली जाती है. इसके लिए सरकार की उपस्थिति को अनपेक्षित माना जाता है. इस आधार पर समष्ठिवाद अराजकतावाद के करीब है. अराजकतावादी अर्थदर्शन को समष्ठिवाद का योगदान यह है उन समस्याओं के उन्मूलन के लिए प्रयत्नरत रहता है जो किसी अराजक समाज के राज्यविहीन माहौल में, खासकर उन दिनों जब कोई परंपरागत समाज एकाधिकारवादी समाजों में बदलता रहता है, जन्म लेती हैं. यही कारण है कि स्पेन की क्रांति के दौरान समष्ठिवाद खूब फलाफूला. आज भी कई ऐसे समाज हैं, जिन्हें समष्ठिवाद से प्रेरित माना जा सकता है. हालांकि यह एक विषय माना जाए कि समष्ठिवाद के दायरे में किसे माना जाए और किसे नहीं. समाजवाद की भांति समष्ठिवाद की परिभाषा का दायरा बहुत बड़ा है. उसके एक ओर साम्यवाद के आधार पर गठित राज्य हैं, जहां पर पर सामूहिक कल्याण की सैद्धांतिकी के आधार पर उत्पादन गतिविधियां नियंत्रित की जाती हैं. इजरायल के किबुत्ज, डेनमार्क की ‘फ्रीटाउन क्रिश्चनिया’ जैसी सामूहिक बस्तियां समष्ठिवादी परिकल्पना के काफी निकट हैं. इजरायल के किबुत्ज उर्ध्व समष्ठिवाद का उदाहरण हैं. जबकि क्षैतिज समष्ठिवाद का प्रतीक ‘फ्रीटाउन क्रिश्चनिया’, 85 एकड़ में बसी 850 नागरिकों की सामूहिक बस्ती है, जहां निजी संपत्ति के विरोध में कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं. ऊपर जिन समष्ठिवादी बस्तियों का उल्लेख किया गया है, वे सभी समाजवादी अवधारणा के निकट हैं. इनसे अलग फासिस्ट, स्टालिनवादी, नाजी भी स्वयं को सर्वकल्याणवादी घोषित करते रहे हैं. चूंकि इन व्यवस्थाओं में व्यक्ति की इच्छा का कोई महत्त्व नहीं होता, बल्कि उनकी नींव ही मानवाधिकारों के दमन पर रखी जाती है, इसलिए फासिस्टवादी, नाजी विचारधारा के आधार पर गठित समूहों, राज्यों को समष्ठिवादी नहीं माना जा सकता. समष्ठिवाद सर्वकल्याण का दर्शन है, जो समाज की सुखसमृद्धि तथा मानवीय चेतना के संरक्षणपोषण के बाद ही संभव है.

© ओमप्रकाश कश्यप

समाजवाद के आधुनिक विकल्प

अराजकतावाद(अनार्किज्म)

समाजवाद उदार मन की अपरिग्रही कामना है. यह समाजवाद का जादू ही है जिसने बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों को अपनी ओर आकर्षित किया है. उसके समर्थकों में बर्ट्रेंड रसेल, जॉन रस्किन, अल्बर्ट आइंस्टाइन, ग्राम्शी, जॉन स्टुअर्ट मिल, ज्यां पाल दि सार्त्र आदि विश्व की महानतम प्रतिभाएं सम्मिलित हैं. ये सभी कहीं न कहीं मार्क्स से प्रेरित हैं. परवर्ती विचारकों ने मार्क्स के दर्शन को अपने उठान बिंदु के रूप में लिया है. मार्क्स के अलावा मिल भी उन्हें प्रभावित करता है. अतः मार्क्स को यदि ‘समाजवाद का चैंपियन’ कहा जाता है, तो मिल ‘स्वाधीनता का चैंपियन’ स्वतः बन जाता है. हालांकि दोनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा खींच पाना संभव नहीं है. इसलिए कि मिल का ‘स्वाधीनतावाद’ ही अपने भीतर ‘समाजवाद’ की अनेक विशेषताओं को सहेजे हुए है.

मिल ने सुखवाद का प्रणयन किया और कहा कि व्यक्तिमात्र का सुख बिना उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा के असंभव है. यदि व्यक्तिमात्र को सुख पाने का अधिकार है तो यह व्यवस्था किसी एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं दे सकती. दूसरे शब्दों में मिल का ‘स्वाधीनतावाद’ समाजवाद का पूरकसंरक्षक एवं संसाधक है. किंतु व्यक्तिस्वातंत्र्य का समर्थक मिल कुछ भी ऊपर से थोपना नहीं चाहता. वह इसको चेतना की उठान के निक्ष के रूप में प्राप्त करना चाहता है. जबकि मार्क्स का मानना था कि सत्ताशिखर पर विराजमान लोग आसानी से कुछ भी छोड़ने को तैयार न होंगे. उनसे मुक्ति के लिए सर्वहारा का संगठित संघर्ष अपरिहार्य है. मार्क्स और मिल के समाजवाद में अंतर भी यही है. मार्क्स समाजवाद को समाज के लिए अपरिहार्य मानता है, जबकि मिल उसको मनुष्य की इच्छा पर सौंप देता है. उसके अनुसार यह लोगों की इच्छा से ही तय होना चाहिए कि वे ‘निजी संपत्ति’ अथवा ‘सामूहिक संपत्ति’ में से किसको वरीयता देते हैं. पूर्वग्रह की पराकाष्ठा में सामंजस्य की संभावना घट जाती है. फलतः व्यक्ति भीड़ के आचरण पर उतर आता है, जहां विचारधाएं तथा निजी पूर्वग्रह इतने गड्डमड्ड हो जाते हैं कि उनमें वास्तविक की पहचान करना असंभवसा हो जाता है. उल्लेखनीय है कि समाजवादी चिंतक ‘स्पर्धा’ को पूंजीवाद का औजार मानते रहे हैं. मिल सहकारिता का समर्थन करता है, लेकिन सीमित अर्थों में. वहां भी वह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहता है. औद्योगिक स्पर्धा की आलोचना करते समय थांपसन ने कहा था कि—

स्पर्धा, सहृदयता, सहकार एवं सदाचार की विचारधारा के सर्वथा प्रतिकूल है. स्पर्धा के बीच में सप्लाई को मांग के अनुसार इच्छुक व्यक्तियों में समविभाजित कर पाना अत्यंत कठिन होता है. श्रमिकगण मशीनरी के साथ बेमेल स्पर्धा से सदैव त्रस्त रहते हैं. स्पर्धा का स्वभाव ही है मनुष्य और मनुष्य के बीच ऊंची दीवार खींचकर, उन्हें एकदूसरे का दुश्मन बना देना.’

थांपसन की आलोचना करते हुए मिल ने कहा था कि यदि अत्यंत प्राचीन उत्पादन पद्धतियों को छोड़ दें तो स्पर्धा प्रत्येक समाज में उपस्थित रही है. उससे बच पाना मनुष्य के लिए सदैव कठिन रहा है. उसने कहा था कि यदि कोई समुदाय किसी एक वस्तु का उत्पादन करता है, तो उसी वस्तु का उत्पादन करने वाले दूसरे समाज अथवा औद्योगिक वर्गों से उसकी स्पर्धा रहेगी. फिर चाहे व्यापार का मामला हो अथवा उत्पादन का. इस आधार पर उसने बाजारआश्रित अर्थव्यवस्था का पक्ष लिया है. दरअसल व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता एवं सुख का समर्थक मिल मनुष्य पर किसी भी प्रकार के बाहरी प्रतिबंध को अनुचित मानता था. वह समाजवाद को राजनीतिक दर्शन मानते हुए उसका प्रचलित राजनीतिक दर्शनों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करता है. दूसरी ओर मार्क्स समाजवाद को विशुद्ध विज्ञान मानता था. उसका मानना था कि विज्ञान की उपयोगिता असंद्धिग्ध है. मिल समाज के हित में व्यक्तिहितों का बलिदान करने को सरासर अमानवीय मानता था. मिल का कहना था कि, ‘प्रायः सभी समाजों में पहले से ही व्यक्तिहित की सामूहिक हितों से तुलना करना लगातार बढ़ती बुराई है. साम्यवादी वातावरण में यह और भी अधिक हो सकती है, जबकि यह मनुष्य के हाथ में है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को इतनी छूट दे कि वह अपनी रुचि एवं स्वभाव के अनुकूल अपने कार्यक्षेत्र का निर्धारण करे.’

असल में मिल और मार्क्स दोनों ही समाजवाद के समर्थक हैं. केवल उसकी स्थापना के तौरतरीकों को लेकर दोनों में कुछ मतभेद हैं. बीसवीं शताब्दी में समाजवाद ने स्वयं को लोगों की आवश्यकता के अनुसार बदला है. हालांकि आज भी समाजवाद की परिभाषा को लेकर लोगों के बीच विचारवैभिन्न्य है. तो भी समाज की कुल पूंजी, भूसंपदा और संसाधनों पर समाज के गणतांत्रिक नियंत्रण को समाजवाद मान लिया गया है. जहां संपत्ति राज्याधिकार में हो परंतु गणतांत्रिक व्यवस्था का अभाव हो, उन्हें समाजवादी राज्य मानने में संकोच है. समाजवाद का समानधर्मा अराजकतावाद भी संपत्ति पर राज्याधिकार को मान्यता देता है. लेकिन अराजकतावाद में राज्य लोगों की चेतना में विस्तरित मानवतावादी अवधारणा है, जिसमें आधुनिक राज्य की अन्य सभी विशेषताओं यथा कानून, अदालत, पुलिस, वकील, न्यायाधीश आदि का अभाव होता है. अराजकतावाद राज्यसत्ता की संपूर्ण अनुपस्थिति की अवधारणा पर आधारित है. अराजकतावादी राज्य में संपत्ति स्वयंचेता और आत्मानुशासित नागरिक समूहों के अधिकार में होती है.

उनीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में समाजवाद शब्द के अतित्व में आने के पश्चात से आज तक इसकी अनेक व्याख्याएं हुई हैं. 1830 में अलेक्जेंडर विनेट द्वारा इस शब्द को पहली बार परिभाषित करने से लेकर आज तक इस शब्द को लेकर अनेक परिभाषाएं सामने आई हैं. विनेट ने सीधेसीधे कहा था कि ‘समाजवाद पूंजीवाद का विलोम है.’ जबकि इस शब्द को उछालने वाले राबर्ट ओवेन के अनुसार समाजवाद ‘नैतिकता की विषयवस्तु’ है. समाज का गठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वह अपने अधिकतम लोगों का अधिकतम हितसाधन का माध्यम बने. जबकि पियरे जोसेफ प्रूधों ने कहा था कि मनुष्य की प्रत्येक अभिलाषा जो सामाजिक उन्नति में योगदान दे—समाजवाद है.

समाजवाद की लगभग एक सर्वमान्य परिभाषा संत साइमन ने देने की कोशिश की थी. उसने कहा था—‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप.’ संत साइमन को समाजवादी चिंतकों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. उससे पहले हेनरी मूर अपनी पुस्तक ‘यूटोपिया’ में समानता पर आधारित समाज की झलक प्रस्तुत कर चुका था. मूर का ‘यूटोपिया’ हालांकि समानता के विचार का मजाक उड़ाते हुए लिखी गई पुस्तक थी. लेकिन अपने प्रकाशन के बाद ही यह पुस्तक परिवर्तनकामियों की आंखों पर ऐसी चढ़ी कि शताब्दियों तक इसका सम्मोहन बना रहा. साइमन के अनुसार समाजवादी तंत्र में उन सभी व्यवस्थाओं को मिटाने का भरसक प्रयत्न किया जाता है, जो आर्थिक असमानताओं को बनाए रखने में सहायक हों. संत साइमन के बाद रूसो ने व्यक्ति स्वातंत्रय का विचार सामने रखा, जो कालांतर में समाजवादी विचारधारा को संपुष्ट करने में मददगार बना. चाल्र्स फ्यूरियर, राबर्ट ओवेन, डेविड रिकार्डो ने अपनीअपनी तरह से आर्थिक असमानता की खाई को पाटने के लिए सुझाव दिए. पर समाजवाद को वास्तविक बल मिला, कार्ल मार्क्स से. उनीसवीं शताब्दी के इस विलक्षण प्रतिभाशाली और मेधावी विचारक ने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या करते हुए विकास एवं उत्पादन के साधनों को एकदूसरे का पूरक माना. प्रतीकात्मकता से बाहर आर्थिकसामाजिक तथ्यों की ठोस व्यावहारिक स्तर पर समीक्षा करते उसने वैज्ञानिक समाजवाद का नारा दिया.

मार्क्सवादी विचारधारा में समाजवाद सामाजार्थिक विकास की विशिष्ट स्थति है. मार्क्स ने कामना की थी कि सुरसामुखी पूंजीवाद बढ़तेबढ़ते एक दिन अपने चरम पर पहुंचेगा और वर्गसंघर्ष का शिकार बनेगा. उसने सर्वहारा वर्ग का आवाह्न भी किया था कि वह संगठित विद्रोह द्वारा अपनी परतंत्रता की बेड़ियों को काट फेंके. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’(1848) के लेखन के बाद से हालांकि स्वयं मार्क्स की विचारधारा में परिवर्तन दृष्टिगत हुए, इसके बावजूद उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, 1871 में पेरिस कम्यून की असफलता के बावजूद मार्क्सवाद एवं समाजवाद परस्पर पर्याय बने रहे. मार्क्स ने समाजवादी विचारधारा को धर्म की भांति अपने अनुयायियों के दिमाग में पैठाया, परिणाम यह हुआ कि मार्क्सवाद की शरण में आने वाले राजनीतिज्ञों, विचारकों की संख्या लगातार बढ़ती गई. मार्क्सवाद का प्रसार दुनियाभर में हुआ, लेकिन उसकी खूबी यह रही कि अलगअलग देशों के नेताओंविचारकों ने मार्क्सवाद का अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीयकरण किया गया. जिसके फलस्वरूप आज समाजवाद के दर्जनों रूप समाज में प्रचलित हैं. मार्क्सवादलेनिनिज्म, मार्क्सवादट्राट्सकिज्म’ वैज्ञानिक समाजवाद, समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, अराजकतावाद, सहजीवितावाद उनमें से हालांकि कुछ का प्रभाव निश्चय ही दूसरों से अधिक है, लेकिन आर्थिकसामाजिकराजनीतिक असमानता को मिटाने के लिए उनकी प्रतिबद्धता लगभग एकसमान है. बीसवीं शताब्दी में समाजवाद के कुछ नए रूप सामने आए हैं, उनमें ‘समष्ठिवाद’, ‘श्रमिकसंघवाद’, ‘अराजकतावाद’, ‘सहजीवितावाद’, ‘संघवाद’, सामूहिकतावाद आदि विभिन्न विचारधाराएं हैं. समाजवाद के विभिन्न वैश्विक रूपों को देखते हुए उन्हें दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.

इनमें पहला है, क्रांतिकारी समाजवाद. इस वर्ग में मार्क्सवाद और अराजकतावाद जैसी विचारधाराएं आती हैं, जो संगठित सर्वहारा शक्ति के बल पर उत्पादनतंत्र पर अधिकार जमा लेने का पक्ष लेती हैं. जिनके समर्थकों का विश्वास है कि पूंजीपति वर्ग स्वेच्छा से कुछ भी छोड़ने को तत्पर न होगा. इसके प्रवर्तक क्रमशः कार्ल मार्क्स एवं मिखाइल बकुनिन हैं. दूसरे वर्ग में श्रमिक संघवाद, सहजीवितावाद, सामूहिकतावाद, सहकारिता आदि विचार आते हैं, जो संगठित जनशक्ति का रचनात्मक उपयोग करने के समर्थक हैं तथा किसी न किसी प्रकार सहकारिता से प्रेरितप्रभावित हैं. मार्क्सवाद और अराजकतावाद जहां पूंजीवाद से सीधे टकराने के समर्थक हैं. इसी की समानधर्मा अन्य विचारधाराओं में लेनिनवाद, ट्राट्स्कीवाद, माओवाद, क्रांतिकारी मार्क्सवाद, सामाजिक अराजकतावाद, जैसी विचारधाराएं भी क्रांति के आधार पर बदलाव की समर्थक हैं. वहीं दूसरे वर्ग की विचारधाराएं पूंजीवाद के समानांतर स्वयं को शक्तिशाली और सर्वव्यापी बनाते हुए स्वयं को उसके विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहती हैं. इनमें सहकारिता का विचार सबसे पुराना है. इनके अतिरिक्त ‘अराजकश्रमसंघवाद’(अनार्कोसिंडीक्लिज्म) जैसे सम्मिलित विचार भी जन्मे, जिसमें कोई श्रमिकसंघ अथवा श्रमिक संगठन गणतांत्रिक पद्धति से सत्ता पर अधिकार जमा लेता है, तथा अर्थव्यवस्था का संचालन समाजवादी आदर्शों के अनुरूप करने लगता है. यहां हम इन विचारधाराओं का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करेंगे.

अराजकतावाद

अराजकतावाद यानी ‘anarchism’ ग्रीक मूल के शब्द ‘anarchos’ से जन्मा है, जिसके उपसर्ग ‘an-‘ का अर्थ है ‘बिना’(without), जबकि ‘archê’ का अभिप्राय राज्यसत्ता, सरकार अथवा कानून से है. इस प्रकार ‘अनार्किज्म’ का अर्थ हुआ—‘बिना सरकार का राज’. ऐसा राज्य जो नागरिकसंचेतना द्वारा अनुशासित हो. कानून के बजाय जहां मनुष्यता का अनुशासन चलता हो. यह थोपे हुए शासन का विरोध करता है. ‘अनार्किज्म’ के पर्यायवाची के रूप में कुछ विद्वान ‘लिब्रटेरियनिज्म’ यानी ‘स्वाधीनतावाद’ शब्द का उपयोग करते हैं, इसका भी अभिप्राय मनुष्य की अबाधगतिशील स्वाधीनता से है. यह माना गया है कि बाह्यः सत्ता द्वारा आरोपित कानून, पुलिस, न्यायिक संस्थाएं, सैन्य बल आदि मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं. इससे सत्ता शक्तिकेंद्र के रूप में ढलती जाती है और प्रकारांतर में वह मनुष्य के नैतिक उत्थान में अवरोधक बनती है. अपनी अधिसत्ता की सुरक्षा के लिए शिखरस्थ शक्तियां समाजिक स्तरीकरण की पोषक संस्थाओं का सहारा लेते हैं. कुछ विद्वान ‘अराजकतावाद’ के स्थान पर ‘लिबर्टेरियन सोशियलिज्म’ ‘स्वाधीनतावादी समाजवाद’ शब्दयुग्म का उपयोग भी करते हैं. विश्व में अराजकतावाद समर्थक दार्शनिकों की खासी संख्या रही है. ईसापूर्व पांचवीछठी शताब्दी में भारत, चीन और यूनान में अराजकतावाद के समर्थक दार्शनिक रहे हैं. चीन में ताओ के शिष्य लाओ जु, चुआंगजु, बाओ जिंग्यान राज्यसत्ता के आलोचक थे. चुआंग जु(369—286) ने किसी भी प्रकार की अधिकारिता को मनुष्यता पर अंकुश माना था. राज्यसत्ता में पलने वाले अन्याय का उल्लेख करते हुए उसने लिखा था कि वह प्रायः अन्यायी का पक्ष लेती है. साधारण व्यक्ति के लिए कानून अनगिनत निषेधाज्ञाओं और प्रतिबंधों का जखीरा खड़ा कर देता है, जबकि शक्तिशाली को मनमानी करने के लिए खुला छोड़ देता है. कानून का लाभ उठाकर सत्ताशीर्ष पर विराजमान लोग जनसाधारण का शोषण और उत्पीड़न करते रहते हैं. राज्य का झुकाव समृद्धिशाली वर्ग की ओर होता है, वह पहले से ही सुविधासंपन्न वर्ग को और अधिक सुखसुविधाएं बटोरने का अवसर प्रदान करता है, जबकि निर्धन उसकी दया पर जीने के लिए विवश होता है.

राज्य के असमानतापूर्ण आचरण के बारे में चुआंग जु ने लिखा था कि उसके बनाए कानून ने—‘मामूली चोर को जेल भेज दिया गया है, जबकि खूंखार डकैत राज्याधिपति बना हुआ है.’ जीवन में कृत्रिमता के विरुद्ध चुआंगजु का मानना था कि प्रत्येक प्राणी अपने आप में पूर्ण है. प्राकृतिक रूप से समृद्ध. सामान्य जीवन जीने के लिए प्राणी को किसी बाह्यः साधन की आवश्यकता ही नहीं है. वह उदाहरण देता है—

घोड़ों के खुर होते हैं, जिनसे वे बर्फीली, फिसलनयुक्त सतह पर चल सकें. बाल होते हैं जो उनकी तेज हवा और ठंड से रक्षा कर सकें. वे प्रकृति में सहज उपलब्ध घास खाते, पानी पीते तथा अपनी मजबूत ऐड़ियों के बल पर लंबी दौड़ भी लगाते हैं. यह घोड़ों का कुदरती लक्षण है. राजसी जीन उनके लिए व्यर्थ है.’

चुआंगजु के विचार सुनकर एक दिन पो लो नामक व्यक्ति उसके सामने पहुंचा और कहने लगा—‘घोड़ों की देखभाल कैसे की जाए, यह मैं भलीभांति जानता हूं.’

उसने घोड़ों पर निशान लगाया, उन्हें बांधा, उनके खुरों को अच्छी तरह से साफ किया, वे भागें नहीं इसलिए पैरों में रस्सा भी डाल दिया. उसके बाद उसने उनपर लगाम कसकर अश्वशाला में बांध दिया. लेकिन इस कोशिश में कुछ दिनों बाद दस में से दोतीन घोड़े मर गए. प्रशिक्षण देने के लिए उसने घोड़ों को भूखा और प्यासा रखा, उन्हें सरपट और दुलकी चाल से दौड़ाया. उनके बालों को तराशा. लगाम कसी. फिर एक दिन ऐसा भी आया जब उनमें से आधों ने दम तोड़ दिया.’

चुआंगजु का यह उदाहरण दर्शाता है कि कृत्रिमता जीवन को सुविधाजनक भले बनाए, किंतु वह अनेक व्यवधान भी खड़े करती है. मनुष्य को हालांकि सामाजिक प्राणी कहा जाता है, लेकिन सामाजिक होना केवल मनुष्य का लक्षण नहीं है. यह गुण अन्य जीवों में भी पाया जाता है. चींटियों, मधुमक्खियों तथा पक्षियों की सामाजिकता पर अनेक ग्रंथ रचे जा चुके हैं. मनुष्य ने लंबा जीवन प्रकृति के सान्न्ध्यि में बिताया है. अब भी प्रकृति पर उसकी निर्भरता कम नहीं हो पाई है. इसलिए उसकी सामाजिकता प्रकृति और नैसर्गिक नियमों से मुक्त नहीं हो सकती, जो जीवन में कृत्रिमता का निषेध करते हैं. जीवन की नैसर्गिकता को बचाए रखने की आवश्यकता के पक्ष में चुआंगजु एक के बाद एक कई तर्क देता है. वह लिखता है कि कुम्हार यह दावा करता है कि वह मामूली मिट्टी को मनमानी आकृति में ढाल सकता है, चाहे गोल हो या चौकोर, आयताकार हो अथवा वृताकार—उसके लिए कुछ भी कठिन या असंभव नहीं है. काष्ठकार यह गुमान करता है कि वह लकड़ी को जैसी चाहे वैसी आकृति देने में कुशल है. चाहे गोलाकार हो या घुमावदार. सीधी हो अथवा आड़ी—सब उसके लिए बाएं हाथ का खेल है. ऐसा ही दावा दूसरे शिल्पकर्मी भी कर सकते हैं. चुआंगजु के अनुसार उपर्युक्त उदाहरण में कुम्हार और काष्ठकार दोनों अपनीअपनी कला का बखान करते हैं. मिट्टी और लकड़ी स्वयं क्या चाहती हैं, उनकी अपनी खुशी किसमें है, यह उनमें से कोई नहीं जानना चाहता. जैसे पो लो ने घोड़ों से साथ वह किया जो वह चाहता था; या जो उसको सिखाया गया था. घोड़े स्वयं क्या पसंद करते हैं. किस कार्य में उन्हें सर्वाधिक खुशी हासिल होती है, यह उसने कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया था.

यही प्रवृत्ति शासक की होती है. हर शासक सत्ता पर सवार होते ही मनमानी पर उतर आता है. वह दावा करता है कि उसका शासन जनता के हक में, उसकी बेहतरी के लिए है. जनता स्वयं क्या चाहती है, यह जानने का वह कभी प्रयास तक नहीं करता. जनता के लिए ऐसा शासक अनपेक्षित और अनावश्यक है. राज्यसत्ता को अनावश्यक और अप्रासंगिक बताने वाला चुआंगजु पहला विद्वान नहीं था. उससे लगभग दो शताब्दी पहले जन्मे लाओजु ने साफ लिखा था कि सर्वोत्तम तो यह है कि सरकार हो नहीं. यदि सरकार बनाना अनिवार्य है, तो बुद्धिमानी इसमें है कि उसका स्वरूप एकदम सादा और सरल हो. वह कोई काम न करे. बस शांत बनी रहे. व्यक्तिमात्र को बदलने के लिए, उसको नागरिक धर्म सिखाने के लिए वे अपनी ओर से कौनसा कदम उठाना चाहेंगे, इस प्रश्न के उत्तर में लाओजु का कहना था—

मैं कोई कदम नहीं उठाऊंगा. लोग खुद अपने आप को बदलेंगे. मैं खामोशी का पक्ष लूंगा, लोग स्वयं अपनी मंजिल तय कर लेंगे. मैं कोई कार्रवाही नहीं करूंगा, अपने उत्थान के लिए लोग स्वयं आगे आएंगे….’

लाओजु का मानना था—

संसार में लोगों पर जितने अधिक प्रतिबंध और निषेध थोपे गए हैं, उतनी ही यहां दरिद्रता है….दुनिया में जितने अधिक नियम, कानूनादि होंगे, उतने ही अधिक चोरडकैतदुराचारी यहां होंगे.’

मानवसमूह की कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं. जैसे हर व्यक्ति अपना भोजन स्वयं कमानाकरना पसंद करता है. अपने कपड़े वह स्वयं पहनता है. अनौपचारिक वातावरण में ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं, जिन्हें मनुष्य को स्वयं करने से प्रसन्नता प्राप्त होती हो. कहा जा सकता है कि ये उसके जन्मजात लक्षण हैं. इन कार्यों के लिए किसी बाहरी उपकरण अथवा सहायता की आवश्यकता भी नहीं पड़ती. इस स्तर तक मनुष्य को शासन की भी आवश्यकता नहीं है. यह आदिम अवस्था है. परंतु जब कोई समाज विकास की ओर अग्रसर होता है, तो वह पाता है कि विकास के लिए आवश्यक मानी जाने वाली सभी वस्तुओं का उत्पादन प्रत्येक के लिए संभव नहीं है. अपनी रुचि, स्वभाव, सामथ्र्य के आधार पर व्यक्ति किसी कार्यविशेष में ही निपुण हो सकता है. इन स्थितियों में कार्यविभाजन समाज की आवश्यकता बन जाता है. पूंजीवादी व्यवस्था में कार्यविभाजन का आधार लाभ की वांछा से किया जाता है. उससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है, जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की दासता के लिए बाध्य करती है. इसलिए आवश्यक है कि कार्यविभाजन लार्भाजन के बजाय सामूहिक कल्याण की भावना से प्रेरित हो, ताकि मनुष्य की स्वतंत्रता किसी भी प्रकार से बाधित न हो.

यूनानी विचारकों में अराजकतावाद का प्रमुख व्याख्याकार हम क्रीटवासी जीनो को पाते हैं. ईसा पूर्व 342 ईस्वी में जन्मा यह प्रतिभाशाली यूनानी दार्शनिक स्टोइक दर्शन का जन्मदाता था. प्लेटो के आदर्श राज्य की परिकल्पना का विरोध करते हुए उसने मुक्त समाज की स्थापना पर जोर दिया था. उसने राज्य की संप्रभुता, शक्ति संपन्नता, नागरिकों के जीवन में हस्तक्षेप करने के उसके अधिकार, ताकत बटोरने हेतु सेनाएं खड़ी करने की प्रवृत्ति तथा साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का विरोध करते हुए व्यक्तिमात्र की नैतिकता तथा उसको संरक्षण प्रदान करने वाले नियमों का पक्ष लिया था. व्यक्ति की जटिल मनोरचना का विश्लेषण करते हुए जीनो ने लिखा था कि आत्मसंरक्षण और आत्मपरिर्वधन की प्रवृत्ति जहां मनुष्य को अहंवादी बनाती है, वहीं इसको संतुलित करने के लिए एक अन्य प्रवृत्ति भी मानव मन में सतत सक्रिय रहती है, वह है व्यक्तिमात्र में अंतनिर्हित उसका सामाजिकताबोध, जो विश्वभर के जनसमूहों में दूसरे जनसमूहों यानी मानवमात्र के बीच एकता का भाव पैदा करता है. दूसरों से मिलजुलकर रहने का स्वभाव मनुष्य को प्रकृति की ओर से प्राप्त है. मैत्री नैसर्गिक गुण है. इसलिए उसको न तो किसी कानून की आवश्यकता है, न पुलिस, न कोर्टकचहरी की. यहां तक कि उसे धर्म, धर्मालय, धनसंपदा, उपहार आदि की भी कोई आवश्यकता नहीं है. इसके लिए मनुष्य को चाहिए कि वह आवश्यकताओं को सीमित रखे, विलासिता के दुर्गुण को अपने मन में न पनपने दे. अपने अधिकार में ऐसी कोई वस्तु न रखे, जो समाज के दूसरे सदस्यों को सहज उपलब्ध न हो.

यह दुर्भाग्य ही है कि जीनो के अराजकतावादी विचारों को उन दिनों बहुत महत्त्व नहीं दिया जा सका. इसका कारण उसके समकालीन प्लेटो और अरस्तु की उच्चस्तरीय ख्याति थी, जिनके विचार सुकरात के दर्शन की छत्रछाया में विकसित हुए थे. उन दिनों राज्य छोटे थे और और वे आपस में युद्ध करते रहते थे. ऐसे में बिना राज्य के राज्य यानी ‘वैराज्य’ की परिकल्पना के लिए उन दिनों समाज में बहुत कम स्थान था. एक अन्य कारण जीनो की लिखी पुस्तकों का अनुपलब्ध होना है. उसके अराजकतावादी विचारों की झलक छिटपुट रूप से प्राप्त उसके वक्तव्यों में दर्ज है. भारत में बौद्ध धर्म का उदय राजसत्ता का प्रतीकात्मक विरोध था. ‘अप्प दीपोभव’ की चेतना के साथ गौतम बुद्ध ने मनुष्य से अपना मार्गदर्शक स्वयं बनने का आवाह्न किया. उन्होंने बाहरी अनुशासन के बजाय आंतरिक अनुशासन पर जोर दिया. बौद्ध विहारों की स्थापना की जहां जीवन सामूहिकता के नियम से अनुशासित होता था. महावीर स्वामी ने भी स्वयांनुशासित जीवन पर जोर दिया. उन्होंने अहिंसा को अपने दर्शन के केंद्र में रखा जो समाज और सहसंबंधों के स्थायित्व से लिए अपरिहार्य है.

मध्यकाल में अराजकतावादी दर्शन की झलक मार्को जिरोलमो वाइड के विचारों में देखने को मिलती है. अराजकतावाद और स्वाधीनतावाद के बारे में विस्तृत विमर्श हमें सोलहवीं शताब्दी के फ्रांस के दूरद्रष्टा कविदार्शनिक ला बूइटी(1530—1563) के साहित्य में भी प्राप्त होता है. उसने स्वाधीनतावाद के पक्ष में जोरदार तर्क दुनिया के सामने रखे. क्रीटवासी जीनो से प्रभावित बूइटी का विचार था कि तानाशाही चाहे वह बलपूर्वक स्थापित की गई हो, अथवा किसी अन्य माध्यम से, बड़े से बड़ा तानाशाह केवल उस समय तक सत्ता शिखर पर बना रह सकता है, जब तक कि जनता उसको वहां बनाए रखना चाहती है. ऐसे तानाशाह को बलपूर्वक खदेड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जनता यदि अपने दासताबोध से बाहर आ जाए तो तानाशाही स्वतः दम तोड़ लेती है. इसलिए आजादी की चाह रखने वाली जनता को सबसे पहले स्वयं दासताचक्र से बाहर निकालना चाहिए. बूइटी को हम सत्याग्रह आंदोलन का आदि प्रवत्र्तक भी मान सकते हैं. यह बात चैंका सकती है कि 1575 में धार्मिक सुधारवादी नेता ह्युजनोट द्वारा प्रकाशित एक पंपलेट में बूइटी ने—

कस्बों और शहर में रहने वाले लोगों से सिविल नाफरमानी का सहारा लेते हुए राज्य को दिए जाने वाला किसी भी प्रकार का टैक्स न चुकाने की अपील की थी.’

बूइटी असल में मानवतावादी विचारक था. उस समय तक भी अराजकतावाद अथवा उसके किसी पर्यायवाची शब्द का चलन नहीं हो पाया था. अंग्रेजी शब्दावली में ‘अनार्किस्ट’ शब्द 1642 में इंग्लेंड के गृहयुद्ध के दौरान उपयोग किया गया. उन दिनों इस शब्द का आशय आज से एकदम भिन्न था. तब यह शब्द उपहास और हेयताबोध दर्शाने के लिए प्रयुक्त किया गया था. प्रयोग करने वाले अंग्रेजी राजशाही के समर्थक थे. उन्होंने इस शब्द का गालीनुमा प्रयोग राजशाही के स्थान पर संसदीय राज्यप्रणाली की मांग कर रहे परिवर्तनवादियों के लिए किया था. 1793 में फ्रांसिसी क्रांति के दौरान साम्राज्यवादी जेकोबिन के विरुद्ध परिवर्तनवादी आंदोलनकारियों द्वारा भी इस शब्द का उपयोग किया था. हालांकि उस समय भी अराजकतावादी होना, उपहास और हंसी का पात्र माना जाता था. आंदोलनकारी भीड़ को संबोधित करते हुए फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार जेकुइस राॅक्स ने ‘आक्रोश का घोषणापत्र’ में समाज में व्याप्त असमानता पर प्रहार करते हुए कहा था कि ऐसे राज्य में जहां—

एक वर्ग शोषण द्वारा दूसरे वर्ग को भूखा मरने पर विवश कर दे, वहां आजादी सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जहां धनी अपने एकाधिकार और मनमानी द्वारा निर्धन व्यक्ति के जीवनमरण का फैसला करने लगे, वहां समानता सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जिस राज्य की तीनचैथाई जनता दिनोंदिन आसमान चढ़ती महंगाई से त्रस्त होकर रातदिन आंसू बहाती हो, वहां गणतंत्र सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है.’

अपने घोषणापत्र में रा॓क्स ने जनता से आततायी राजसत्ता को उखाड़ फेंकने का आवाह्न किया था. इस पर साम्राज्यवादियों द्वारा प्रतिक्रियावादी कहकर उसका मजाक उड़ाया गया था. अठारवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक व्यक्तिस्वातंत्रय की मांग विस्तार ले चुकी थी. उन्हीं दिनों इमानुएल जोसेफ सीयेस(1748—1836) ने क्रांतिकारी काम किया, जिसने इतिहास की धारा ही बदल दी. कुलीन मध्यवर्गी परिवार में जन्मे सीयेस ने अपनी शिक्षा धार्मिक माहौल में पूरी की थी. समय आने पर उसको एक चर्च में पादरी की नौकरी मिल गई. लेकिन वह पादरी के परंपरागत कार्य में रमे रहने के बजाय सुधारवादी कार्यक्रमों में प्रवृत्त हुआ. अपने क्रांतिधर्मी विचारों को लेकर सीयेस ने कई छोटेछोटे परिपत्र लिखे, जिन्होंने समाज में नई चेतना का प्रसार किया. उसके लिखे परिपत्रों में ‘तीसरी दुनिया क्या है?(व्हा॓ट इज थर्ड एस्टेट?)’ शीर्षक से लिखा गए परिपत्र में नए युग का संदेश निहित था. कालांतर में यही परिपत्र फ्रांसिसी क्रांति का प्रमुख उत्प्रेरक बना. राजशाही में जनता की हैसियत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए सीयेस ने लिखा था—

तीसरी दुनिया क्या है?’

सबकुछ.’

अभी तक राजतंत्र में तीसरी दुनिया की हैसियत कैसी है?’

तुच्छ, कुछ भी नहीं.’

इसकी हसरत क्या है?’

थोड़ेसे मानसम्मान की.’

किसी राष्ट्र की जीवंतता और समृद्धि के लिए क्या अनिवार्य है?’

व्यक्तिगत प्रयास एवं सामूहिक कर्तव्यपरायणता.’

सीयेस ने अस्सी प्रतिशत नागरिकों को अधिकार वंचित करने वाली व्यवस्था को चुनौती दी थी. उसके परिपत्र ने जादू का असर किया, इसके बावजूद उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘अनार्किज्म’ तथा उसके समर्थकों के प्रति लोगों का नकारात्मक रवैया बना रहा. अराजकतावाद को कोई भी गंभीरता से लेने को तैयार न था, किंतु उनीसवीं शताब्दी में यूरोपीय नवजागरण के दौर में, विशेषकर रूसो द्वारा व्यक्ति स्वातंत्रय के पक्ष में दिए गए जोरदार तर्कों के बाद अराजकतावाद के प्रति लोगों ने नए सिरे से सोचना आरंभ किया. उनीसवीं शताब्दी में पहली बार विलियम गुडविन(1756—1836) ने पहली बार अराजकतावाद का दर्शन सामने रखा, हालांकि अपने इस दर्शन को उसने कोई नया नाम नहीं दिया था. गुडविन के विचारों का प्रभाव एडमंड ब्रूक, बेंजामिन टुकर पर पड़ा. परंतु उसका श्रेय मिला अमेरिकी सुधारवादी विचारक जोसीह वारेन(1798—1874) को जिसने संभवतः पहली बार राज्य की उपयोगिता को नकारते हुए राज्यविहीन स्वावलंबी बस्तियों की स्थापना पर जोर दिया. राबर्ट ओवेन के सामूहिक आवास बस्तियों के विचार से प्रभावित वारेन के प्रस्तावित स्वावलंबी राज्य में सभी संपत्तियों तथा सेवाकार्यों को सामूहिक बस्तियों के अधिकार में रखा गया था. वारेन द्वारा स्थापित सामूहिक आवास बस्तियों में मानवजीवन पर बाहरी हस्तक्षेप कम से कम था. वे व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का समर्थन करती थीं, लेकिन निवासियों में सामूहिक जीवन के प्रति निष्ठा का अभाव, अनुभव की कमी के कारण उनका वही अंत हुआ जो राबर्ट ओवेन द्वारा स्थापित ‘न्यू हार्मोनी’ का हुआ था. उन दिनों सहकारिता आंदोलन उठान पर था. वारेन के प्रयासों को भी सहकारिता के उपांग के रूप में देखा गया. असफलता का एक कारण यह भी था कि वारेन ने सहजीवन का पक्ष तो लिया, किंतु राजशाही और साम्राज्यवाद की उतनी तीखी आलोचना नहीं की, जैसी फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार नेताओं ने की थी.

दर्शन के रूप में ‘अराजकतावाद’ भले ही ढाई हजार वर्ष अथवा उससे भी अधिक पुराना हो, परंतु एक परिपक्व राजनीतिक दर्शन के रूप में इस शब्द का सर्वप्रथम उपयोग 1890 में फ्रांस में पियरे जोसेफ प्रूधों द्वारा किया गया था. वह पहला विचारक था जिसने खुद को जोरदार शब्दों में अराजकतावादी कहते हुए व्यवस्था परिवर्तन की मांग की थी. निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती देते हुए उसने लिखा था—‘निजी संपत्ति चोरी है तथा संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है.’ प्रूधों सीयेस की तीसरे राज्य की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने बाइबिल से संदर्भ लेकर राजशाही की तीखी आलोचना की थी. अपने समय में प्रूधों की ख्याति मार्क्स से कहीं बढ़कर थी. प्रूधों जब व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी बता रहा था तो उसका आशय उसके कुछ हाथों तक सिमट जाने से था. राज्य चूंकि संपत्ति के केंद्रीयकरण को वैधता प्रदान करता है, इसलिए उसने राज्य की सत्ता को ही अवैध मानते हुए ऐसे राज्य की परिकल्पना की थी, जहां व्यक्ति कानून की अपेक्षा आत्मसंयम एवं आत्मानुशासन से बंधा हो.

अराजकतावाद की सैद्धांतिकी

अराजकतावाद ऐसा विचार अथवा सिद्धांत है जिसमें कोई समाज बिना सरकारी हस्तक्षेप अथवा मदद के आपसी भाईचारा, एकता और खुशहाली के लिए प्रयासरत रहता है. अराजकतावादी समाज में लोग स्वेच्छा और सहमति की भावना से एकदूसरे के साथ सहयोग करते हैं. वहां समर्पण की भावना किसी सत्ता के प्रति न होकर एकदूसरे के प्रति होती है. उत्पादन का कार्य तकनीक विशेषज्ञों, पेशेवरों, कामगारों के समूह द्वारा किया जाता है, जो लाभ के बजाय सामूहिक हितों के लिए स्वेच्छापूर्वक संगठित होते हैं. एम्मा गोल्डमेन ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए लिखा है—

अराजकतावाद—नव्य सामाजिक व्यवस्था का दर्शन है, जिसमें मानवीय स्वाधीनता को मनुष्यनिर्मित कानूनों द्वारा सुरक्षितसंरक्षित किया जाता है. इस दर्शन की मूल अवधारणा यह है कि सरकार के सभी रूप हिंसा पर टिके होते हैं, इसलिए वे अनुचित, अनावश्यक एवं हानिकारक हैं.’

अराजकतावाद मनुष्य की स्वाधीनता और समृद्धि दोनों की सुरक्षा चाहता है. वह दर्शाता है कि ‘समाजवाद के अभाव में स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अनाचार है, जबकि स्वाधीनता के अभाव में समाजवाद दासता और क्रूरता का प्रतीक है. अराजकतावाद के आधार पर अनुशासित समाज में स्वयंसेवी संस्थाएं, समितियां उत्पादन, विपणन, अंतरण, शिक्षा, व्यापार, चिकित्सा, यातायात सहित सभी आवश्यक क्षेत्रों तक विस्तृत होती हैं. आवश्यकता पड़ने पर वे सरकार के श्रेष्ठतर विकल्प के रूप में राजनीतिक निर्णय भी लेती हैं. वे उत्पादन, वितरण, संचार, सफाई, शिक्षा, उपचार, सुरक्षा, प्रबंधन, अंतरण, आवागमन आदि समाजोपयोगी कार्यों के लिए विभिन्न आकारप्रकार की स्थानीय, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर की सभी संस्थाओं, संगठनों, संघीय स्वरूपों को परस्पर जोड़े रखती हैं. साहित्य, कला, संस्कृति आदि मानवरुचि के विभिन्न क्षेत्रों में भी वे समाज के सक्रिय कार्यकत्र्ताओं, संगठनों, जनसमूहों के सहयोग द्वारा परस्पर संबंध बनाए रखती हैं. वे मनुष्य को यह संदेश देती हैं कि पारस्परिक सहयोग और सद्भाव मानवमात्र की आवश्यकता हैं तथा ऐसा कोई भी सुख और संतुष्टि नहीं है, जिसको इनके द्वारा प्राप्त कर पाना असंभव हो. और समाज के पास जो कुछ है, उसपर उसके प्रत्येक सदस्य का अधिकार है.

अराजकतावाद में चूंकि बाहरी सत्ता की पूरी तरह अनुपस्थिति होती है, इसलिए वहां सामाजिक अंर्तद्वंद्वों में खप रही ऊर्जा को अन्य उत्पादक कार्यों में लगा पाना संभव होता है, जिससे अपेक्षाकृत अधिक स्थायी सामाजिक संरचना जन्म लेती है तथा सामाजिक विकास को गति प्राप्त होती है. इस व्यवस्था में उत्पादन कार्य में लगे समूह, लोगों की रुचि एवं आवश्यकता को पहचानकर उत्पादन कर्म में हिस्सा लेते हैं, न कि लाभार्जन की वांछा से. उत्पादन प्रक्रिया में हिस्सा ले रहा व्यक्ति पूरे समाज के प्रति उत्तरदायी होता है, न कि किसी एक व्यक्ति के. एकाधिकारवाद और मनमानी के लिए अराजकतावादी समाज में कोई स्थान नहीं होता, इससे समाज पूंजीवादी समाज की बुराइयों से दूर बना रहता है. वहां उत्पादन के लाभ पर पूरे समूह का अधिकार होता है. चूंकि व्यक्तिमात्र स्वेच्छा और सहयोग भावना से उत्पादनकार्य में हिस्सा लेता है, इसलिए उसकी उत्पादकता अधिकतम होती है. उत्पादन समाज के निर्देशन और आवश्यकता के अनुरूप होने के कारण वहां स्पर्धा का लोप हो जाता है, इससे सामाजिक अंतद्र्वंद्वों में कमी आती है. व्यक्ति को कला, संस्कृति, नैतिकता, आदर्श आदि के मामले में विकास की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करने के अवसर प्राप्त होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति चूंकि नैतिकता और आत्मानुशासन की भावना से शेष समाज के प्रति कर्तव्यरत होता है, इसलिए वहां कानून, अदालत, पुलिस जैसी पूंजीवादी समाजों में सभ्यता का प्रतीक मानी जाने वाली व्यवस्थाएं अपनी प्रासंगिकता खोने लगती हैं. उनमें खप रही समाज की ऊर्जा एवं संपदा का उपयोग अन्य रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सकता है. नागरिकों का आपसी विश्वास बढ़ने से तीव्र सामाजिक विकास संभव होता है.

अराजकतावाद समाजवाद की पूरक विचारधारा है. उसकी आर्थिक नीतियां समाजवाद की आर्थिकी से मेल खाती है. भूसंपदा, संसाधनों पर निजी अधिकारिता तथा पूंजीवादी उत्पादन पद्धतियां अपने एकाधिकारवादी सोच के कारण सामाजिक न्याय की भावना के प्रतिकूल कार्य करती हैं. इससे समाज में विशेषाधिकार संपन्न वर्ग पनपने लगता है. परिणामस्वरूप नवीनतम तकनीक, शिक्षा एवं वैज्ञानिक शोधों का लाभ समाज के सीमित वर्गों तक सिमटकर रह जाता है. इससे धन का ऊपरी वर्गों की ओर संचरण होने लगता है. खुली स्पर्धा के अंतर्गत वे लाभ को अपने पक्ष में मोड़े रखते हैं. परिणामस्वरूप समाज में आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण बढ़ता है. अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि श्रम एवं मजदूरी की आधुनिक पद्धतियां तथा राज्य के संरक्षण में बने उत्पादन के पूंजीवादी तरीके, समाज के सर्वांगीण विकास में बाधक हैं. इसलिए शक्ति के दम पर टिकी राजसत्ता येनकेनप्रकारेण शक्तिशाली का ही पक्ष लेती है. इससे समाज में अन्याय की मात्रा बढ़ती है. वे यह भी मानते हैं कि राज्य अपने आरंभ से, अब तक भूमि पर सीमित व्यक्तियों के अधिकार को समर्थन देता रहा है. राज्य की अनुमति पर पूंजीवादी शक्तियां लाभ के बड़े हिस्से को पूंजी में बदलकर उसका उपयोग अपने लाभानुपात को और तीव्रता से बढ़ाने के लिए करती हैं. इसलिए भूमि और उत्पादन पर सीमित लोगों के अधिकार को समर्थन देने वाली सामंतवादीपूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथसाथ अराजकतावाद को राज्य से भी जूझना पड़ता है, जो सामाजिक असमानताओं को जन्म देने वाली व्यवस्थाओं का पोषणसंरक्षण करता है. अराजकतावाद के लिए इस बात से अधिक अंतर नहीं पड़ता कि सत्ता का स्वरूप कैसा है. तानाशाही अथवा गणतंत्र?

अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि सत्ताशिखर पर विद्यमान लोगों के चरित्र में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. राज्य का झुकाव केंद्र की ओर होता है. इसी विशेषता के चलते सुविधाभोगी अल्पसंख्यक लोगों के हाथों में असीमित अधिकार एवं शक्तियां सौंप देता है, जिसका उपयोग वे अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिए बहुसंख्यक वर्गों के अधिकार हनन के रूप में करते हैं. सत्ताशिखर पर विराजमान अल्पसंख्यक वर्ग कानून के समर्थन द्वारा उत्पादन, यातायात, खनन, भूमि, बीमा, विपणन, व्यापार समेत आय के समस्त स्रोतों पर अपना अधिकार जमा लेता है. राज्य के संरक्षण में पलने वाला पूंजीवाद नौकरशाही को बढ़ावा देता है, जिससे केंद्रीय सत्ता निरंतर ताकतवर होती जाती है. इससे मुक्ति का एक ही उपाय है, शक्ति और अधिकारों का विकेंद्रीकरण. अतः अराजकतावाद सत्ता, शक्ति एवं अधिकारों के संपूर्ण विकेंद्रीकरण का पक्ष लेता है, ताकि आमजन की शासन में सहभागिता सुनिश्चित की जा सके. यह कतिपय सर्वाधिक पुराना और अकेला राजनीतिक दर्शन है, जो मनुष्य को उसकी चेतना से जोड़ता है. उसके अनुसार ईश्वर, राज्य, समाज जैसे पारंपरिक विश्वास जो अभी तक सामाजिक चेतना को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक रहे हैं, असल में ये बाहर से थोपी गई यथास्थितिवाद की पोषकसमर्थक और अनावश्यक व्यवस्थाएं हैं. नई सामाजिक संरचना का जन्म मनुष्य के स्वेच्छिक और सहयोगात्मक संगठनों के द्वारा ही संभव है.

अराजकतावाद आज का दर्शन नहीं है. भले ही मानवेतिहास में लंबा दौर ऐसा रहा हो जब इसको हेय और निंदात्मक दृष्टि से देखने वालों की खासी संख्या रही हो. लेकिन लगभग प्रत्येक युग और कालखंड में राजसत्ता और धर्मसत्ता समेत किसी भी प्रकार की सत्ता पर प्रश्न उठाने वाले लोग समाज में हुए हैं. भारतीय धर्मग्रंथों में सतयुग भले ही मिथकीय कल्पना हो, लेकिन उसमें भी ‘राज्यविहीन समाज’ की परिकल्पना की गई है. ‘वैराज’ अर्थात ‘बिना राजा का राज्य’ यहां सम्मानित शास्त्रीय परिकल्पना का हिस्सा रहा है. ऋग्वेद में कहा गया था—‘मनुर्भव! ‘मनुष्य बनो!’ ‘रामराज्य’ की परिकल्पना में भले ही ब्राह्मणवादी दृष्टि रही हो, किंतु इसके मूल में समानताधारित समाज की स्थापना का सपना निहित है. महाभारत तक आतेआते साम्राज्यवाद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का रूप ले चुका था. लेकिन मनुष्य के प्रति आस्था उस समय में भी विद्यमान थी, तभी तो व्यास ने लिखा है—

इस सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’

अराजकतावाद यह शिक्षा देता है कि मनुष्य और समाज में इतना ही अंतर है जितना रक्त और धमनियों में. इमर्सन ने कहा था कि इस संसार में काम की एक ही चीज है. एक जीवंत आत्म, जो हर व्यक्ति में मौजूद होती है तथा हर वस्तु पर निगाह रखती है. आत्मरूप होने के कारण ही व्यक्तिमात्र महत्त्वपूर्ण है. अराजकतावाद संसार में एकता और अभिन्नता का संदेश देता है. चूंकि हर व्यक्ति आत्मरूप है, इसलिए सब एक हैं. सभी को समान अधिकार हैं. कोई छोटा है न बड़ा. इस कारण उनमें से किसी भी उपेक्षा संभव नहीं. अतएव आवश्यकता है कि प्रत्येक के कहे का सम्मान हो. प्रत्येक को अपने परिष्कार के बराबर अवसर प्राप्त हों. प्रत्येक के जीवन की महत्ता है. इसको तभी अक्षुण्ण रखा जा सकता है, जब कि उस पर समाज, राज्य, कानून आदि के न्यूनतम दबाव हों. रूसो ने कहा था—मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, पर हर जगह वह बेड़ियों में है. ये बेड़ियां मनुष्य ने कुछ अपने आप पैदा की हैं, कुछ उसी के स्वार्थी बंधुबांधवों द्वारा पैदा की गई हैं. कुछ प्रसिद्ध बेड़ियों के नाम धर्म, राज्य, संपत्ति आदि हैं, जो मनुष्य की गुलामी के कारक हैं—

इनमें धर्म मानवमस्तिष्क का उपनिवेश है. संपत्ति मानवीय आवश्यकताओं की उपनिवेश है. इसी प्रकार सरकार मानवीय व्यवहार की उपनिवेश है—ये सब मिलकर मानवीय दासता और उसके लिए अन्यान्य डरों का कारण बनते हैं. यहां एक प्रश्न सहज ही उपस्थित हो जाता है कि धर्म! आखिर किस प्रकार यह मानवमस्तिष्क को नियंत्रित करता है? किस तरह से यह आत्मा के उत्पीड़न तथा उसकी अवमानना का कारण बनता है? धर्म कहता है—जो भी है, ईश्वर है, मनुष्य कुछ भी नहीं.’ जबकि इसी ‘नाकुछसे इंसान’ के बल पर ईश्वर ने इस अनाचारी, निरंकुश, कठोर, निर्दयी, आतंककारी, अनमेल सृष्टि की रचना की है. सच तो यह है कि उदासी, आंसू और रक्त मिलकर इस संसार को तब से अनुशासित करते आए हैं, जब से ईश्वर का जन्म हुआ है.’

संपत्ति जो मानवीय आवश्यकताओं का उपनिवेश है, वह मनुष्य के असंतोष को विस्तार देती है. वह कुछ मनुष्यों को यह हौसला भी देती है कि वे दूसरों के सुख की कीमत पर अपने असंतोष का दायरा बढ़ाते रहें. यह हमेशा नहीं था. प्रारंभ में जब सभ्यता का इतना विकास नहीं हुआ था, मानव जीवन पूरी तरह प्रकृतिआश्रित था, तब वह संपत्ति और संसाधनों का भोग करते समय यह ध्यान रखता था कि वे उसके अपने न होकर प्रकृतिप्रदत्त हैं. इसलिए वह प्रकृति के प्रति एक सम्मानभाव से भरा रहता था. अपने साथ वह दूसरों की आवश्यकताओं की चिंता भी करता था. उल्लेखनीय है कि मानवमात्र की कुछ न कुछ आध्यात्मिक जिज्ञासा होती है. धर्म इसी विश्वास को जमीन देता है. सभी व्यक्ति कैसे एक ही आध्यात्मिक विश्वास की ओर प्रेरित हों, कैसे उस जमीन पर संगठित होकर खड़े रहें. इसके लिए धर्म को नैतिकता से जोड़ा गया. चूंकि विराट वसुंधरा पर मनुष्य की चिंताएं एक समान हैं, उनका संघर्ष, सपने और समस्याएं एक हैं, इसलिए विभिन्न धर्मों के आध्यात्मिक विश्वास चाहे जो हों, उनकी नैतिक मान्यताएं आपस में इतनी मेल खाती हैं कि इस आधार पर उनकी पहचान कर पाना अंसभवसा है. कालांतर में सत्ता और संसाधनों पर कब्जे की होड़ में मनुष्यों के अतिमहत्त्वाकांक्षी वर्ग ने प्रकृतिजन्य वस्तुओं पर भी अपना अधिकार जमाना आरंभ कर दिया. इससे अव्यवस्था फैली, जिसको नियंत्रित करने के लिए कानून, पुलिस, न्यायालय आदि बनाए गए. अराजकतावाद मनुष्य को वही नैसर्गिक परिवेश प्रदान करने के लिए संकल्पबद्ध है. यह मनुष्य की अपनी खोज है जो शताब्दियों लंबी सभ्यता की यात्रा में कहीं गुम हो चुकी है. यह मनुष्य द्वारा अपने व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान करने का प्रयास है.

अराजकतावाद का पक्ष लेते हुए एम्मा गोल्डमेन ने लिखा है कि संपूर्ण मानवीय व्यक्ति उसी समाज और राज्य में संभव है जो उसको अपने कार्य का चयन, उसकी परिस्थितियों का निर्धारण करने की खुली छूट देता हो. तभी व्यक्ति अपने काम का आनंद ले सकेगा. तभी उसकी अधिकतम उत्पादकता संभव है. यह मुमकिन है उस समय उसकी आर्थिक उपलब्धियां कम रह जाएं. पर उसके माध्यम से जो सामाजिक लाभ होंगे, उनके आगे मौद्रिक लाभ गौण पड़ जाएंगे. इसलिए कि सरकार और शासन मनुष्य को बांधते हैं. वहां व्यक्ति की आवश्यकताओं और भावनाओं को एक ही तराजू पर तौला जाता है; तथा मौद्रिक आमदनी के आधार पर मनुष्य के सुख के स्तर की परिकल्पना कर ली जाती है. ऐसी सुविधाओं और स्पर्धाओं से घिरा मनुष्य कितना एकाकी, निरीह और बेबस होता है, इसका आकलन करने अथवा इसपर अंकुश लगाने के लिए कोई कानून दुनिया के किसी भी देश में आज तक नहीं बन पाया है. निरंकुश व्यवहार हर शीर्षस्थ शक्ति का लक्षण है, शायद इसलिए इमर्सन ने कहा था—

सरकार चाहे किसी भी प्रकार की हो, मूलतः तानाशाही का प्रतीक होती है. यह सवाल पूरी तरह अर्थहीन है कि वह सरकार दैवीय अधिकार द्वारा संचालित है अथवा बहुमत के आधार पर. प्रत्येक परिस्थिति में उसका एक ही उद्देश्य होता है, व्यक्तिमात्र को पूरी तरह अपने अधीन बना लेना.’

आधुनिक युग में भी अराजकतावादी विचारकों की लंबी शृंखला रही है. हेनरी डेविड रूसो, बट्रेंड रसेल, पीटर क्रोप्टोकिन, थोरो, महात्मा गांधी जैसे विचारक राज्य की मनमानी से आहत होकर स्वतंत्र, विवेकवान, स्वअनुशासित समाज की स्थापना पर जोर देते रहे हैं. थोरो ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि प्राचीनकाल से आज तक सरकार सिर्फ अपनी समृद्धि, शक्तिसंपन्नता और सफलता पर जोर देती रही है. हर बार उसकी निष्ठा को संदेहजनक पाया गया है. नियम कभी भी मनुष्य को श्रेष्ठ नागरिक नहीं बनाता. कानून के प्रति सम्मान दर्शाता हुआ व्यक्ति अनायास ही अन्याय की ओर मुड़ जाता है. किसी विद्वान की उक्ति याद आती है. कानून की निस्सारता और उसकी असफलता के बारे में उसका कहना था—

दुनिया के सभी कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि बुरा आदमी उनसे सुधर नहीं पाता और भले को उसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती.’

यह मानते हुए कि सत्तामद में शीर्षस्थ शक्तियां सदैव अकसर अधिकारों का उल्लंघन करने लगती हैं, राज्य की आलोचना करने वाले विद्वानों की संख्या खासी रही है. लियो टॉल्सटाय जैसे महान लेखक, विचारक और महात्मा गांधी जैसे नेता अराजकतावाद के समर्थक रहे हैं. टॉल्सटाय द्वारा महात्मा गांधी को लिखित पत्र ‘लेटर टू ए हिंदू’, जिसने उन्हें सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया, पर फ्रांसिसी कवि ला बूइटी का प्रभाव था. उनीसवीं शताब्दी का महान अमेरिकी विचारकदार्शनिक हेनरी डेविड थोरो राज्यसत्ता के पर कतर देने के पक्ष में था. उसका मानना था—

सरकार वही सर्वोत्तम है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती.

थोरो का ‘सिविल नाफरमानी’ का विचार ही आगे चलकर ‘सत्याग्रह’ के रूप में विकसित हुआ था. महात्मा गांधी की ग्रामस्वराज्य की परिकल्पना भी राज्य की भूमिका को कमतर करने की कोशिश थी. हालांकि भारत में उसको अपेक्षित महत्त्व कभी मिल ही नहीं पाया.

कहा जा सकता है कि अराजकतावाद का लक्ष्य मस्तिष्क को धर्म की अधीनता से, शरीर को संपत्ति की गुलामी से तथा उसकी मानवस्वातंत्रय को सरकार की हड़कड़ियों, बेड़ियों और अन्यान्य बंधनों से मुक्त कराना है. इस लक्ष्य को पाने के लिए वह नागरिक चेतना का पक्ष लेता है. यह मनुष्य के स्वेच्छिक समूहों के गठन के प्रति आग्रहशील होता है, जो समाजकल्याण की व्यापक लक्ष्य के लिए समूहबद्ध होते हैं. यह मानते हुए कि मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है तथा उसको अपनी रुचि के अनुरूप सुखोभोग के सभी अधिकार प्राप्त हैं. इसलिए आवश्यक है कि उसपर न्यूनतम नियंत्रण हों. इसके लिए प्रूधों ने ‘सरकार रहित राज्य’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसके लिए उसने ‘अराजकता’ शब्द का उपयोग किया. उसने साम्यवाद का यह कहकर विरोध किया था कि उसमें वैचारिक दुराग्रह के चलते पूरे समाज को मठों और छावनियों में बदल दिया जाता है. वह राज्याश्रित समाजवाद का भी विरोधी था, जिसका समर्थन उसके समकालीन लुइस ब्लेंक जैसे विचारक कर रहे थे. ‘संपत्ति चोरी है’ उक्ति से प्रूधों का आशय था कि संपत्ति अधिकारिता से जुड़े रोमन कानून संपत्ति पर अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार को मान्यता देते आए हैं. यानी धर्म समाज में व्याप्त आर्थिक विभाजन को न केवल मान्यता देता है, बल्कि पापपुण्य, पुनर्जन्म की अपनी व्याख्याओं के आधार पर उसको तार्किक भी ठहराता है. लेकिन इससे मुक्ति कैसे संभव हो? कैसे धार्मिक पाखंड से समाज की रक्षा की जाए, अपने समकालीन विचारकों की भांति प्रूधों के समक्ष भी यह चुनौती थी. मार्क्स ने श्रमिक समूहों का आवाह्न किया कि वे संगठित विरोध द्वारा उत्पादनतंत्र को अपने अधिकार में ले लें. प्रूधों नहीं चाहता था कि जमींदारों, खान मालिकों, कारखानेदारों आदि को बेदखल करने के लिए हिंसा का उपयोग किया जाए. हिंसा किसी भी मुक्त समाज के लिए वरेण्य नहीं है, इसलिए उसने उस राज्यसत्ता की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए जो ऊंचनीच और आर्थिक विषमता को अधिमान्य ठहराती है. उसने संपत्ति पर सामूहिक अधिकारिता के विचार का समर्थन किया जो उन दिनों समाजवादियों की प्रमुख मांग थी.

समाज के संसाधनों को सामूहिक अधिकारिता की परिधि में कैसे लाया जा सकता है? संपत्ति को लाभ की अवधारणा से मुक्त करके यह संभव है—प्रूधों का सुझाव था. बैंकों में जो धनराशि हो, वह पूरी तरह ब्याजमुक्त रहे. अपना प्रशासनिक खर्च निकालने के लिए बैंक अधिक से अधिक एक प्रतिशत वार्षिक ब्याज ले सकते हैं. इससे बैंकों से ऋण प्राप्त करना सुविधाजनक होगा. इसके लिए उसने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का सुझाव देते हुए आपसी सहमति के सिद्धांत का पक्ष लिया था. यही व्यवस्था अन्य उद्योगों, कामधंधों के लिए भी संभव है. लाभ की कामना से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि उत्पादन में जुडे़ समूह अपने उत्पाद का विपणन न कर, आपसी समझौते के आधार पर आदानप्रदान की नीति को अपनाएं. जिसके पास जो वस्तु अपनी आवश्यकता से अधिक है, वह अपनी जरूरत की अन्य वस्तुओं के आधार पर उनका दूसरे उत्पादक समूहों के साथ आदानप्रदान करे. आदानप्रदान का स्वरूप तय करने के लिए प्रत्येक वस्तु में लगे श्रम को कार्यघंटों में बांट दिया जाए. उन्हीं श्रमघंटों के आधार पर लोग अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का लेनदेन करें. पारस्परिक सहमति की इस व्यवस्था में सभी सेवाओं को बराबर आंका जाएगा.

प्रूधों का विश्वास था कि समाज में धन को अत्यधिक महत्त्व मिलने से लोगों में उसको अतिरिक्तरूप से अर्जित करने की चाहत पैदा होती है. इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है तथा मुनाफाखोरी भी. धन को लाभ की वांछा से मुक्त कर दिए जाने से समाज में उसका महत्त्व घटेगा, जिससे आर्थिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना आसान होगा. इस आधार पर गठित समाज में राज्य की भूमिका गौण होगी. संबंध पारस्परिक सहयोग और सद्भावना पर आधारित होंगे. क्या ऐसा समाज विवादों और आपसी अंतद्र्वंद्वों से सर्वथा मुक्त होगा? प्रूधों का मानना था कि मानवीय कमजोरियां वहां भी होंगी. इसके समाधान हेतु उसका सुझाव था कि अराजकतावाद पर आधारित समाज में विवादों का निपटान आपसी समझौते के आधार पर किया जाएगा. परस्पर समर्पित, स्पर्धाविहीन समाज में पुलिस, कानून, न्यायालय आदि की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. अराजकतावाद के प्रति पू्रधों की निष्ठा उसकी पुस्तक ‘व्हा॓ट इज प्रापर्टी’ के इस संवाद से समझी जा सकती है—

क्यों, आप यह सवाल कैसे कर सकते हैं? आप तो गणतंत्रसमर्थक हैं.’

गणतंत्र समर्थक, ठीक है, लेकिन इस शब्द से कुछ साफ नहीं होता. ‘रिपब्लिक’ यानी ‘रेस पब्लिका’ के मायने हैं, जनता से संबंधित मुद्दा. ऐसा कोई मसला जिसका लोकहित से सचमुच संबंध हो, वह न तो इस शब्द की सीमा में आता है, न उस सरकार के जो स्वयं के ‘रिपब्लिकन’ होने का दावा करती है. इस शब्दार्थ के अनुसार तो एक तानाशाह सम्राट भी स्वयं को गणतंत्रवादी कह सकता है.’

समझ गया, तुम प्रजातंत्र समर्थक हो?’

नहीं.’

क्या! क्या तुम्हारा विश्वास राजशाही में है?’

यह भी नहीं.’

संविधानवादी हो?’

भगवान माफ करे!’

अच्छा! तब तुम जरूर कुलीनतंत्र में विश्वास करते होगे?

कतई नहीं.’

क्या तुम चाहते हो कि मिलीजुली बने?

इससे भी कम.’

तुम आखिर चाहते क्या हो?’

मैं अराजकतावादी हूं.’

अराजकतावादी! तुम अवश्य ही परिहास रहे हो. वरना यह तो सरकार पर प्रहार करने जैसा है.’

कदापि नहीं! मैंने बस वही कहा है जो मैं एक मनुष्य के रूप में सोचता रहा हूं. मैं अनुशासन का कट्टर समर्थक हूं, लेकिन कुल मिलाकर हूं एक अराजकतावादी ही.’

प्रूधों के बाद अराजकतावाद की सैद्धांतिकी को आगे बढ़ाने वाले विद्वानोंआंदोलनकारियों में महत्त्वपूर्ण नाम है—मिखाइल बकुनिन(30 मई, 1814—1 जुलाई, 1876) का. मार्क्स के समकालीन बकुनिन की उससे कई मुद्दों में गहरी असहमति थी. हालांकि दोनों ही पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से मुक्ति चाहते थे. दोनों का ही रुझान समाजवाद की ओर था. दोनों ने ही फ्रांस की समाजवादी क्रांति में हिस्सा लिया था. प्रथम इंटरनेशनल की बैठक के दौरान उनके मतभेद खुलकर सामने आए थे, जो प्रकारांतर में उसकी असफलता का कारण भी बने. मार्क्स जहां श्रमिक वर्ग की अधिसत्ता में विश्वास रखता था, वहीं बकुनिन किसी भी प्रकार की सत्ता को मनुष्यता के लिए घातक मानता था, इसलिए उसने अराजकतावाद का समर्थन किया, किंतु मार्क्स की बौद्धिक प्रतिष्ठा के आगे बकुनिन के विचार अपना अपेक्षित प्रभाव न छोड़ सके. अपने अतिसक्रिय जीवन में उसने श्रमिकों और दासों की मुक्ति के लिए एक गोपनीय संगठन ‘इंटरनेशनल ब्रदरहुड’ का गठन किया था, जिसमें फ्रांस, इटली, स्केंडनेविया, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, बेल्जियम, इंग्लेंड, स्पेन, पोलेंड, रूस आदि देशों के दास और श्रमिकसंगठन सम्मिलित थे. वह राजसत्ता की भांति धर्मसत्ता को भी मनुष्य की पराधीनता का कारण मानता था. अपने निबंध ‘केटकिज्म आफ ए रिवोल्युशनरी’ में उसने धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों का यह कहकर विरोध किया था कि—

किसी भी प्रकार की सत्ता के किसी भी रूप, जिसमें राज्य की सुविधा के नाम पर नागरिकों की स्वतंत्रता न्योछावर करा ली जाती है, का संपूर्ण निषेध.’

बकुनिन की आस्था समाजवाद में थी, किंतु समाजवाद की संरचना किसी गुलाम समाज में संभव नहीं, ऐसे समाज में भी वह असंभव है, जहां अभिव्यक्ति के अधिकार को बाधित किया जाता है. इसलिए बकुनिन स्वाधीनता के बगैर समाजवाद को दिवास्वप्न मानता था. उसका कहना था कि—

बगैर समाजवाद स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अन्याय है, जबकि समाजवाद के बिना स्वाधीनता दासता और पाशविकता.’

मिखाइल बकुनिन ने श्रमिकों का आवाह्न किया था कि वे अपने उत्पादन संगठन बनाएं तथा उत्पादन कार्य को अपने हाथ में ले लें. उत्पादन, शिक्षा, अर्जन, भोजन, आवास आदि के साधन सामूहिक होने चाहिए. प्रत्येक बालक को चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की, भोजन, वस्त्र, शिक्षा, आदि के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए. बड़ा होने पर उसको अपनी रुचि का व्यवसाय चुनने, सम्मानजनक ढंग से आजीविका कमाने का अवसर मिले, ताकि वह अपनी स्वाधीनता और श्रम का भरपूर आनंद ले सके. कुछ अराजकतावादी स्वाधीनता को समानता की अपेक्षा अधिक महत्त्व देते थे. यहां तक कि स्वाधीनता के पक्ष में वे समानता के लक्ष्य को टालने के भी समर्थक थे. बेंजामिन टुकर ने कहा था कि समानता हमें चाहिए—

यदि हम इसको प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन स्वाधीनता हमें किसी भी कीमत पर चाहिए.’

समानता सहकारिता का अभीष्ठ है. सहकारी समूह अपने सदस्यों के बीच हर तरह की समानता का पक्ष लेता है. स्वाधीनता के अभाव में स्वैच्छिक सहयोग असंभव है. इसलिए अजारकतावादी का सहकार एवं समाजवाद का समन्वित रूप था. मार्क्स के साम्यवाद से थोड़ा अलग. हालांकि दोनों का ही लक्ष्य राजनीति और अर्थव्यवस्था को समाजवादी भावना के अनुरूप ढालना था. उसके सिद्धांत को ‘सांगठनिक अराजकतावाद’ कहा जाता है.

अराजकतावाद के सिद्धांत के आधार पर किसी प्रथक राज्य का गठन तो नहीं हो सका, तो भी उनीसवीं शताब्दी के बाद से ही यह यह दर्शन परिवर्तनकामी विचारकों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को आकर्षित करता रहा है. विलियम थांपसन, मिखाइल बकुनिन, लियो टाल्सटाय, जॉन ग्रे, जे. एफ. फ्रे. जोसीह वारेन, एडवर्ड कारपेंटर, फ्रैड्रिक नीत्शे, जॉन स्टुअर्ट मिल, लार्ड गैरीसन, हेनरी डेविड थोरो, एम्मा गोल्डमेन, स्पेंसर, पीटर क्रोप्टकिन, नोम चामस्की, महात्मा गांधी, भगत सिंह आदि उनीसवींबीसवीं शताब्दी के अनेक महत्त्वपूर्ण विचारक, नेता, साहित्यकार अराजकतावाद का समर्थन करते आए हैं. अराजकतावाद का पूरक सिद्धांत ‘स्वाधीनतावाद’ तो बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण लेखकों, साहित्यकारों का सर्वाधिक पसंदीदा विषय रहा है.

इकीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में अराजकतावाद ने अपने पंख फैलाए हैं. इन दिनों विश्व का सबसे बड़ा अराजकतावादी आंदोलन स्पेन में चल रहा है. वहां ‘नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर’(1910) तथा ‘जनरल कन्फेडरेशन आफ लेबर(1979) नामक अराजकतावाद समर्थकों के दो बड़े संगठन हैं. इनमें नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 है, जबकि दूसरे संगठन की सदस्य संख्या 2003 में 1 लाख से ऊपर थी. इसके अलावा अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देशों में भी अराजकतावाद के समर्थक विचारकों, लेखकों, संगठनों की अच्छीखासी संख्या है. आदर्श के सर्वाधिक निकट होने के बावजूद अराजकतावाद विश्वसमाज में अपना सम्मानजनक स्थान बना पाने में असमर्थ रहा है. इसका कारण यह हो सकता है कि सहस्राब्दियों से राजशाही, सामंतवाद तथा अन्यान्य व्यवस्थाओं के अनुशासन में स्वयं को ढालने में अभ्यस्त हो चुका जनसमाज, बिना सत्ता के राज्य की कल्पना ही नहीं कर सकता. ऐसे लोगों के लिए अराजकता आज भी नकारात्मक स्थिति है. दूसरे धर्म के सामंती ढांचे में बंधे समाजों की मानसिकता समर्पण की होती है, जो आत्मचेतित समाज के राजदर्शन ‘अराजकतावाद’ के विरुद्ध जाती है. इसलिए अराजकतावाद को यदि जनमानस में अपनी व्यापक पैठ बनानी है तो उसको बड़े स्तर पर लोकप्रबोधीकरण का आंदोलन खड़ा करना होगा, जो मनुष्य के उपभोक्ताकरण जिसमें पूंजीवाद के प्राण बसते हैंके सर्वथा विरुद्ध है.

© ओमप्रकाश कश्यप