छोटा मंदिर—बड़ा मंदिर/पचीस लघुकथाएं

विशेष रुप से प्रदर्शित

1/छोटा मंदिरबड़ा मंदिर

एकांत देख बड़े मंदिर का ईश्वर अपने स्थान से उठा.

बैठेबैठे शरीर अकड़ा, पेट अफरा हुआ था. डकार लेतेलेते नजर सामने खड़ी कृषकाय आकृति पर नजर पड़ी. बड़े मंदिर का ईश्वर कुछ पूछे उससे पहले ही वह बोल पड़ी—

हम दोनों एक हैं.’

होंगे, मुझे क्या!’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने तपाक से कहा.

बस्ती में अकाल पड़ा है. लोगों के पा अपने पेट के लिए कुछ नहीं है तो मेरे लिए कहां से लाएंगे.’

इसमें मैं क्या कर सकता हूं.’

इस मंदिर में रोज अकूत चढ़ावाहै. मामूली हिस्सा भी मिल जाए तो हमारा काम चल जाएगा.’

चढ़ावे का हिसाब तो पुजारी रखता है.’

पुजारी तुम्हारा कहना नहीं टाल पाएगा.’

पर मैं उससे क्यों कहने लगा?’

इतनी रात गए कौन है?’ कहता हुआ पुजारी बाहर आया. छोटे मंदिर के ईश्वर को देख त्योरियां चढ़ गईं.

यह छोटे मंदिर का ईश्वर है. आपके पास मदद के लिए आया है.’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने बताया.

चल हटशहर में सैकड़ों मंदिर हैं. हर मंदिर का ईश्वर फरियादी बनकर आ गया तो मेरा क्या होगा?’ कहते हुए पुजारी ने धक्का देकर छोटे मंदिर के ईश्वर को बाहर निकाल दिया. बड़े मंदिर का ईश्वर चुपचाप अपनी मूर्ति में समा गया.

2/वयं ब्रह्माव

तानाशाह हंटर फटकारता है. लोग सहमकर जमीन पर बिछ जाते हैं. कुछ पल बाद उनमें से एक सोचता है—‘तानाशाही की उम्र थोड़ी है. जनता शाश्वत है.’ उसके मन का डर फीका पड़ने लगता है.

अहं ब्रह्मास्मिः!’ कहते हुए वह उठ जाता है. उसकी देखादेखी कुछ और लोग खड़े हो जाते हैं. सहसा एक नाद आसमान में गूंजता है

वयं ब्रह्माव.’ एकदूसरे की देखादेखी बाकी लोग भी खड़े हो जाते हैं. जनता को खड़े देख तानाशाह के हाथ से हंटर छूट जाता है. वह जमीन पर पसर जाता है.

3/तानाशाह

तानाशाह ने हंटर फटकारा —‘मैं पूरे राज्य में अमनचैन कायम करने की घोषणा करता हूं. कुछ दिन के बाद तानाशाह ने सबसे बड़े अधिकारी को बुलाकर पूछा—‘घोषणा पर कितना अमल हुआ?’

आपका इकबाल बुलंद है सर! पूरे राज्य में दंगाफसाद, चोरी चकारी, लूटमार पर लगाम लगी है. आपकी इच्छा के बिना लोग सांस तक लेना पसंद नहीं करते.’ तानाशाह खुश हुआ. उसने अधिकारी को ईनाम दिया. कुछ दिनों के बाद एक गुप्तचर ने तानाशाह को खबर दी—‘लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है सर!’

तानाशाह को एटमबम से इतना डर नहीं लगता था, जितना लोगों के सोचने से. परंतु डर सामने आ जाए तो तानाशाह कैसा—

आदमी हैं तो दिलोदिमाग दोनों होंगे.’ तानाशाह ने लापरवाही दिखाई. गुप्तचर के जाते ही तानाशाह ने अधिकारी को तलब किया—‘हमें खबर मिली है कि लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है. लोग जरूरत से ज्यादा सोचें, यह हमें हरगिज पसंद नहीं है.’

आदेश दें तो सबको जेल में डाल दूं. चार दिन भीतर रहेंगे तो अकल ठिकाने आ जाएगी.’

नहीं, तुम उनसे बस इतना करो कि जैसे हम हमेशा अपने बारे में सोचते हैं, वे भी केवल हमारे बारे में सोचें.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. कुछ दिन के बाद गुप्तचर फिर हाजिर हुआ.

सर! लोग कुछ ज्यादा ही सोचने लगे हैं.’

हमारे बारे में ही सोचते हैं न.’ तानाशाह हंसा. मानो गुप्तचर का मखौल उड़ा रहा हो.

जी, बस आप ही के बारे में सोचते हैं.’

उनके भाग्यविधाता जो ठहरे.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. गुप्तचर की आगे कुछ कहने की हिम्मत न हुई. वह चलने को हुआ. सहसा पीछे से तानाशाह ने टोक दिया—

जरा बताओ तो वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं?’

जीमैंने लोगों को कहते सुना है….’

रुक क्यों गए, जल्दी बताओ?’

सब यही कहते हैं कि तानाशाह बुरा आदमी है.’

तानाशाह का चेहरा सफेद पड़ गया. हंटर हाथ से छूट गया. सहसा वह चिल्लाया—‘हरामखोरों को जेल में डाल दो. मैंने कहा था, मुझे सोचनेसमझने वाले लोग नापसंद हैं. सबको जेल में डाल दो.’

आजकल वह पागलखाने में है.

4/समाधान

तानाशाह ने पुजारी को बुलाया—‘राज्य में सिर्फ हमारा दिमाग चलना चाहिए. हमें ज्यादा सोचने वाले लोग नापसंद हैं.’

एकदो हो तो ठीक, पूरी जनता के दिमाग में खलबली मची है सर!’ पुजारी बोला.

तब आप कुछ करते क्यों नहीं?’

मुझ अकेले से कुछ नहीं होगा.’

फिर….’ इसपर पुजारी ने तानाशाह के कान में कुछ कहा. तानाशाह ने पूंजीपति को बुलवाया. पूंजीपति का बाजार पर दबदबा था. अगले ही दिन से बाजार से चीजें गायब होने लगीं. बाजार में जरूरत की चीजों की किल्लत बढ़ी तो लोग परेशान होने लगे. रोजमर्रा की चीजों के लिए एकदूसरे से झगड़ने लगे. एकदूसरे पर अविश्वास बढ़ गया. समाज में आपाधापी, मारकाट और लूटखसोट बढ़ गई. मौका देख पुजारी सामने आया. लोगों को संबोधित कर बोला—

हमारी धरती सोना उगल रही है. कारखाने रातदिन चल रहे हैं. फिर भी लोग परेशान हैं, जरा सोचिए, क्यों?’

आप ही बताइए पुजारी जी….’

ईश्वर नाराज है. उसे मनाइए, सब ठीक हो जाएगा.’

जैसा सोचा था, वही हुआ. मंदिरों के आगे कतार बढ़ गई. कीर्तन मंडलियां संकट निवारण में जुट गईं.

तानाशाह खुश है. पुजारी और पूंजीपति दोनों मस्त हैं.

5/अच्छे दिन

चारों ओर बेचैनी थी. गर्म हवाएं उठ रही थीं. ऐसे में तानाशाह मंच पर चढ़ा. हवा में हाथ लहराता हुआ बोला—

भाइयो और बहनो! मैं कहता हूं….दिन है.’

भक्तगण चिल्लाए—‘दिन है.’

मैं कहता हूं….रात है.’

भक्तगण पूरे जोश के साथ चिल्लाए—‘रात है.’

हवा की बेचैनी बढ़ रही थी. बावजूद उसके तानाशाह का जोश कम न हुआ. हवा में हाथ को और ऊपर उठाकर उसने कहा—‘चांदनी खिली है. आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’

पूनम की रात है….आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’ भक्तों ने साथ दिया.

अच्छे दिन आ गए….’ भक्तगण तानाशाह के साथ थे. दुगुने जोश से चिल्लाए—

अच्छे दिन आ…’ यही वह बात थी, जिसपर हवा आपा खो बैठी. अनजान दिशा से तेज झंझावात उमड़ा और तानाशाह के तंबू को ले उड़ा.

6/संविधान

आखिर जनता ने ठान लिया कि वह अपनी आस्था का ग्रंथ स्वयं चुनेगी. सारे धर्मग्रंथ उस दिन की प्रतीक्षा करने लगे. हर किसी को अपने देवता, अपने मसीहा की श्रेष्ठता पर भरोसा था. उनमें से प्रत्येक को अपने देवता की सर्वोच्चता पर गुमान था—

मेरा देवता सबसे पवित्र है. वह सबको बराबर मानता है. सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है.’ एक धर्मग्रंथ बोला.

मेरा मसीहा करुणानिधान है. वह हमारे पिता जैसा है. हमेशा हमारे भले की सोचता है.’ दूसरे ने दावा किया.

मेरा देवता सर्वाधिक शक्तिशाली है. उसके पास दिव्य अस्त्रशस्त्रों की भरमार है. पलक झपकते नई दुनिया को बना सकता है और मिटा भी सकता है.

एकएक कर सभी धर्म ग्रंथ आए. इतने कि आदमी गिनती करना भूल गया. आखिर में उसकी निगाह एक पुस्तक पर पड़ी.

क्या तुम अपने देवता के बारे में नहीं बताओगे?’

मेरा कोई देवता नहीं है.’

यदि देवता नहीं है तो तुम धर्मग्रंथ कैसे हुए?’

लाखों लोग मुझमें विश्वास रखते हैं. उन्हीं में से कुछ मुझे अपना मार्गदर्शक भी मानते हैं.’

यदि देवता नहीं तो ताकत कहाँ से पाते हो.’

जनता से?’

आखिर तुम हो कौन?’

संविधान.’

संविधान के पीछे नैतिकता का बल, न्याय की चाहत और जनता का विश्वास था. इसलिए बाकी सब धर्म ग्रंथ कन्नी काटते हुए वहां से खिसक गए.

7/एंटीक

मंदिर में अपनी मूर्ति के बराबर एक और मूर्ति देख ईश्वर चौंका. पुजारी के आते ही पूछा—

यह किसलिए?’

छोड़िए, क्या करेंगे जानकर?’ पुजारी ने टालने की कोशिश की.

इस मंदिर का देवता मैं हूं. यहां क्या हो रहा है, उसके बारे में मुझे ही मालूम न हो, यह ठीक नहीं है.’

महाराज कंपटीशन का जमाना है….ग्राहक उस शोरूम में ज्यादा जाते हैं, जिसमें ज्यादा वैराइटीज हों.’

तुम मुझे ‘वेराइटी’ मानते हो?’ ईश्वर ने नाराजगी जताई.

मैंने तो बस हकीकत बयां की है. बराबर की बस्ती में बहुत बड़ा मंदिर बना है. एक ही छत के नीचे सैकड़ों देवताओं के दर्शन हो जाते हैं. हर किस्म का श्रद्धालु वहां जाता है. जबकि यहां आने वाले गिनती के हैं. हम दोनों की तरक्की के लिए यहां दोचार ईश्वर और आ जाएं तो क्या बुराई है?’

पुजारी ने लाख समझाया, लेकिन उस मंदिर का ईश्वर अपनी बगल में दूसरे देवता की मूर्ति रखने को तैयार न हुआ. पुजारी भुनभुनाता हुआ घर लौट गया. ईश्वर हमेशा की तरह आत्ममुग्धता में खो गया. लेकिन पुजारी तो पुजारी था. जो पत्थर को देवता बना सकता है, वह खुद को देवता समझने लगे पत्थर को उसकी औकात की याद भी दिला सकता है. अगले दिन पुजारी ने मंदिर में कीर्तन का ऐलान कर दिया. कीर्तन समाप्त हुआ तो उसके लिए आई मूर्तियां मंदिर की शोभा बढ़ाने लगीं. पुरानी मूर्ति नई मूर्तियों के पीछे दबसी गई.

अगले दिन श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना थी. नए श्रद्धालु तरहतरह का चढ़ावा लेकर आए थे. रात हुई. चढ़ावे को समेट पुजारी गुनगुनाते हुए, मग्नमन बाहर निकला. तभी पुराने ईश्वर ने उसे टोक दिया—‘बहुत निष्ठुर हो. मैंने बीसियों वर्ष तुम्हारा साथ दिया था. अपने ही मंदिर में किनारा करते हुए तुम्हें जरा भी नहीं सोचा!’

सुनकर पुजारी हंसा—‘भगवन! धर्म का धंधा सोचने से नहीं, सोच पर पर्दा डालने से चलता है. नई मूर्तियां चीन से आयातित हैं. निखालिस मूर्तियां. कुछ तो इतनी क्यूटकि भक्तजन उनके साथ सेल्फी लेते दिखे.’ कहकर वह आगे बढ़ा. फिर चलतेचलते पलटकर बोला—‘पर तुम चिंता मत करो. इस धंधे में ‘एंटीक’ की बड़ी महिमा है. जल्दी ही यहां भव्य मंदिर बनेगा. वहां आसन पर तुम मजे से लोट लगाना.’

ईश्वर निरुत्तर. पुजारी गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गया.

8/तानाशाहदो

बड़े तानाशाह के संरक्षण में छोटा तानाशाह पनपा. मौका देख उसने भी हंटर फटकारा—‘सूबे में वही होगा, जो मैं चाहूंगा. जो आदेश का उल्लंघन करेगा, उसे राष्ट्रद्रोह की सजा मिलेगी.’ हंटर की आवाज जहां तक गई, लोग सहम गए. छोटा तानाशाह खुश हुआ. उसने फौरन आदेश निकाला—‘गधा इस देश का राष्ट्रीय पशु है, उसे जो गधा कहेगा. उसे कठोर दंड दिया जाएगा.’

आदेश के बाद से सूबे में जितने भी गधे थे सब ‘गदर्भराज’ कहलाने लगे. उन्हें बांधकर रखने पर पाबंदी लगा दी गई. कुछ गधे तो फूल कर कुप्पा हो गए. वे मौकेबेमौके जहांतहां दुलत्ती मारने लगे. पूरे सूबे में अफरातफरी मच गई. कुछ दिनों के बाद छोटे तानाशाह ने एक भाषण में कहा—‘पिछली सरकारें, इतने वर्षों में कुछ नहीं कर पाई थीं. हमनें आने के साथ ही ‘गधा’ को ‘गदर्भराज’ बना दिया. इसे कहते हैं—‘सबका साथ—सबका विकास.’

भक्तगण जयजयकार करने लगे. ठीक उसी समय गधों का एक रेला आया. लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए. अकस्मात एक गधा मंच के पीछे से आया और छोटे तानाशाह को एक दुलत्ती जड़ दी. छोटा तानाशाह जमीन बुहारने लगा.

इसे समझा देना. हर गधा, ‘गधा’ नहीं होता. कहकर वह वहां से नौदो ग्यारह हो गया.

9/ ईश्वर का पलायन

ईश्वर को जिज्ञासा हुई. 140 करोड़ की आबादी वाला भारत देश जिस संविधान के भरोसे चलता है, उसमें अपने अस्तित्व को खोजा जाए. उसे ज्यादा पढ़नेलिखने का अभ्यास तो था नहीं. फिर भी आखरआखर पूरा संविधान बांच डाला. ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को देखते ही उसका माथा ठनका. पुरोहित आया तो ईश्वर ने उसे आड़े हाथों लिया—‘तुम तो कहते थे कि देश में सारा कामकाज धर्मभरोसे चलता है. यहां तो पूरी सरकार धर्मनिरपेक्ष रहने का दावा करती है.’

महाराज! वह गफलत में लिखी गई ‘किताब’ है, भक्तगण उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं.’

तो बदलते क्यों नहीं….’

इतना आसान नहीं है. लोग नाराज हो जाएंगे.’ ईश्वर ने झूठ पकड़ लिया—

यानी लोग चाहते हैं कि सरकार धर्म की ओर से तटस्थ रहे.’

पुरोहित चुप. ईश्वर को लगा कि वह गफलत में था. उसका मन ग्लानि से भर गया. उसी रात सारा तामझाम समेट वह मंदिरों से कूंच कर गया. उस दिन के बाद से भक्त लोगों को धर्मनिरपेक्ष शब्द से चिढ़ होने लगी है. ‘सेकुलर’ शब्द उन्हें गालीजैसा लगता है.

कुछ भी हो, जनता इससे खुश है….

10/सबसे बड़ा देवता

स्कूल में निरीक्षण पर निकले प्रधानाचार्य का बच्चों का टेस्ट लेने का मन हुआ तो बराबर की कक्षा में घुस गए. बच्चे सम्मान में खड़े हो गए. प्रधानाचार्य कभी विज्ञान पढ़ाया करते थे. पर थे पूरी तरह धार्मिक. कक्षा में बच्चों को पढ़ाते कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, घर जाकर शेषनाग को जल चढ़ाते—

बच्चो! हिंदू धर्म के तीन सबसे बड़े देवताओं के नाम कौन बताएगा?’

ब्रह्माविष्णुमहेश….सारे बच्चे एक साथ बुदबुदाने लगे. सिवाय एक बालक के जो कक्षा में सबसे पीछे, शांत बैठा था. मानो चोर पकड़ा गया हो. प्रधानाचार्य उसी की ओर इशारा करके बोले—‘ऐ तुम, हां तुम….हिंदुओं के तीन प्रमुख देवताओं के नाम बताओ?’

ब्राह्मण….!’ लड़के ने झट कहा. बच्चे उसके ‘अज्ञान’ पर हंसने लगे. कक्षाध्यापक की उंगलियां बैंत पर कस गईं. अपने धैर्य की छाप छोड़ने के लिए प्रधानाचार्य ने आराम से पूछा—‘कैसे?’

घर में मां सत्यनारायण की कथा कराती है. कथा शुरू करने से पहले पडिंज्जी देवताओं को बुलाते हैं. कथा समाप्त होते ही देवताओं को अपनेअपने घर भेज देते हैं. देवता उनके इशारे पर ऐसे नाचते हैं, जैसे मदारी के इशारे पर बंदर. फिर सबसे शक्तिशाली कौन हुआ. देवता या ब्राह्मण!.’

बच्चे तो बच्चे थे. फिर हंसने लगे. पर प्रधानाचार्य को कोई बोल न सूझा.

11 /राजा बदरंगा है

तानाशाह को नएनए वस्त्रों का शौक था. दिन में चारचार पोशाकें बदलता. एक दिन की बात. कोई भी पोशाक उसे भा नहीं रही थी. तुरंत दर्जी को तलब किया गया.

हमारे लिए ऐसी पोशाक बनाई जाए, जैसी दुनिया के किसी बादशाह ने, कभी न पहनी हो.’ तानाशाह ने दर्जी से कहा. दर्जी बराबर में रखे हंटर को देख पसीनापसीना था. हिम्मत बटोर जैसेतैसे बोला—

हुजूर, आप तो देशविदेश खूब घूमते हैं. कोई ऐसा देश नहीं, जहां आपके चरण न पड़े हों. वहां जो भी अच्छा लगा हो, बता दीजिए. ठीक वैसी ही पोशाक मैं आपके लिए सिल दूंगा.’

तानाशाह को जहां, जिस देश में, जो पोशाक पसंद आई थी, सब दर्जी को बता दीं. उन सबको मिलाकर दर्जी ने जो पोशाक तैयार की, तानाशाह ने उसे पहनकर एक ‘सेल्फी’ ली और सोशल मीडिया पर डाल दी.

पहली प्रतिक्रिया शायद किसी बच्चे की थी. लिखा था—‘राजा बदरंगा है.’

12/अछूत

ईश्वर पुजारी को रोज चढ़ावा समेटकर घर ले जाते हुए देखता. उसे आश्चर्य होता. दिनभर श्रद्धालुओं को त्याग और मोहममता से दूर रहने का उपदेश देने वाला पुजारी इतने सारे चढ़ावे का क्या करता होगा? एक दिन उसने टोक ही दिया—‘तुम रोज इतना चढ़ावा घर ले जाते हो. अच्छा है, उसे मंदिर के आगे खड़े गरीबों में बांट दिया करो. कितनी उम्मीद लगाए रहते हैं.’

रहने दो प्रभु. तुम क्या जानो इस दुनिया में कितने झंझट हैं. एक दिन मंदिर से बाहर जाकर देखो तब पता चले.’

ईश्वर को बात लग गई. उसने पुजारी से एक दिन मंदिर बंद रखने का आग्रह किया, ‘कल तुम्हें खुद कुछ नहीं करना पड़ेगा. मैं खुद इंतजाम करूंगा.’ पुरोहित सोच में पड़ गया. परंतु यह सोचकर कि लोग ईश्वर को मंदिर से निकलते देखेंगे तो अगले दिन दो गुना चढ़ावा आएगा, वह एक दिन कपाट बंद रखने को राजी हो गया. अगले दिन ईश्वर ने कमंडल उठाया. मंदिर की देहरी पर पहुंचा था कि भीतर से आवाज आई. आवाज में आदेश था. ईश्वर के पांव जहां के तहां जम गए—‘सुनो! सबसे पहले उत्तर दिशा में जाना. उस ओर सेठों की बस्ती है. जो भी नकदी मिले संभाल कर रखना. फिर पश्चिम दिशा में जाना. उस ओर क्षत्रियों की बस्ती है. वे दान देने में कंजूस होते हैं. उनसे धनधान्य जो भी मिले, मना मत करना. जब तक पूर्व दिशा में पहुंचोगे, गृहणियां भोजन की तैयारी कर चुकी होंगी. वहां से जो भी भोजन मिले, संभाल कर रख लेना.’ ईश्वर चलने को हुआ. पीछे से पुजारी ने फिर टोक दिया—‘सुनो! दक्षिण दिशा की ओर जाओ तो किसी को छूना मत. नकदी मिले तो दूर से लेना. भोजन मिले तो हाथ मत लगाना.’

क्यों!’

वे लोग अछूत हैं . किसी ने छू भी लिया तो अपवित्र हो जाओगे.’ ईश्वर को गुस्सा आया. उसने कमंडल फ़ेंक दिया. उसके बाद मंदिर से बाहर निकला तो कभी नहीं लौटा.

13/गैरजिम्मेदार

रात हुई तो बड़े मंदिर का ईश्वर टहलने के इरादे से बाहर निकला. उससे कुछ दूरी पर छोटा मंदिर भी था. बड़े मंदिर के ईश्वर को निकलते देख छोटे मंदिर के ईश्वर की भी टहलने की इच्छा हुई. उस समय तक रात हो चुकी थी. सड़कें सुनसान थीं. दोनों ईश्वर टहलतेटहलते दूर तक निकल गए. बड़े मंदिर का ईश्वर आगे था, छोटे मंदिर का ईश्वर पीछे. सहसा अंधेरे को चीरती चीख उभरी. बड़े मंदिर के ईश्वर के पांव ठिठके.

यह तो छोटे मंदिर के इलाके की स्त्री है.’ सोचते हुए बड़े मंदिर का ईश्वर तत्क्षण आगे बढ़ गया. पीछेपीछे चल रहे छोटे मंदिर के ईश्वर के पांव भी ठिठके.

सबसे ज्यादा चढ़ावा पाने के बावजूद जब वही कुछ नहीं कर रहा तो मैं चक्कर में क्यों पडूं!’ सोचते हुए छोटे मंदिर का ईश्वर भी आगे बढ़ गया. वहीं सड़क किनारे एक कुत्ता आराम कर रहा था. चीखें सुनकर उससे रहा नहीं गया. वह अपने परिवार के साथ उठा और लुटेरों पर टूट पड़ा. एकाएक आक्रमण से लुटेरों के औसान बिगड़ गए और वे वहां से भाग छूटे. उसके बाद कुत्ते की दृश्टि बड़े मंदिर और छोटे मंदिर के ईष्वरों पर पड़ी. वह उनपर भौंकने लगा. बड़े मंदिर के ईश्वर को इसपर हैरानी हुई—‘पहचाना नहीं, हम यहां से रोज गुजरते हैं.’

जानता हूं, पर असलियत आज ही समझ में आई है.’ कुत्ता पूरी ताकत लगाकर भौंकने लगा. दोनों ईष्वरों को धोती समेटकर भागना पड़ा.

14/भक्तगण

गाय और भैंस के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ चरतीं. साथसाथ उठतीबैठतीं. साथसाथ जुगाली करती थीं. अचानक भैंस ने गाय से दूरी बनाना शुरू कर दिया. गाय ने एकदो दिन देखा. कारण समझ न आया तो टोक दिया—‘बहन मुझसे कुछ भूल हुई है?’

ऐसा कुछ भी नहीं है.’ भैंस बोली. लेकिन उसके व्यवहार में परिवर्तन न आया. एक दिन की बात. चुगने के बाद दोनों नदी पर पहुंची. गाय पानी पीने लगी. भैंस भी उससे कुछ दूर हटकर पानी पीने लगी. जहां गाय थी, वहां की जमीन चिकनी थी. पानी गहरा. अचानक उसके पांव फिसले और वह नदी में गिरती चली गई. वहां गड्ढ़ा था. गाय बाहर आने को छटपटाने लगी. मगर जमीन चिकनी होने के कारण नाकाम रही. काफी परिश्रम के बावजूद सफलता न मिली तो वहीं, पसर गई.

भैंस ने गाय की हालत देखी तो रहा न गया. उसने इधरउधर गर्दन घुमाई. जब देखा कि आसपास कोई नहीं है, वह गाय के पास गई और उसके गले में पड़ी रस्सी को सींग में फंसा बाहर खींचने लगी. कठिन परिश्रम के बाद वह गाय को बाहर निकालने में सफल हो गई. भैंस बुरी तरह थक चुकी थी, इसलिए वहीं जमीन पर पसर गई—

तभी न जाने किधर से ‘भक्तों’ का रेला उमड़ा. सब हाथ में डंडे, बर्छी, भाले उठाए थे. उनमें से एक चिल्लाया—‘वो देखो! भैंस ने गाय को मार डाला.’ विवेकहीन भीड़ ‘मारोमारो’ के नारे लगाने लगी. इससे पहले कि गाय कुछ करे, अनगिनत लाठियां भैंस की पीठ पर एक साथ पड़ीं. उसने वहीं दम तोड़ लिया.

भक्तगण जिधर से आए थे—‘गौमाता की जय’ कहते हुए, वापस लौट गए.

15/ठूंठ

शिक्षा पूरी करने के बाद स्नातक भविष्य की योजना बनाता हुआ वापस लौट रहा था. रास्ते में एक साधु से टकरा गया.

क्या सोच रहे हो?’ साधु ने प्रश्न किया. अपने चारों ओर निहारते हुए स्नातक बोला—

यह दुनिया कितनी विविधवर्णी है. जिस रास्ते से मैं आया हूं उसपर नदीझरने, समंदरपहाड़, फूल, पत्तियां, लताएं, भांतिभांति के अनगिनत और विचित्र जीव दिखाई पड़े.’

सब देखा, पर जो देखना था, वह अनदेखा ही रहा.’

क्या?’ स्नातक ने पूछा.

तुमने जो देखा, वह तो नजर का धोखा है, माया है. काश! तुम उस महान रचनाकार को भी देख पाते?’

जिसका साक्षात अनुभव हुआ हो, उसे माया कैसे मान लूं? रचनाकार तो अपनी कृति से पहचाना जाता है, इसलिए मैंने जो देखा, मेरे लिए वही ईश्वर है.’

तुम्हारा ज्ञान अधूरा है. मेरे साथ कणकण में छिपे उस महान रचनाकार को पहचानने का प्रयत्न करो.’ साधु ने पेड़ की ओर इषारा किया—‘साधारण दृष्टि से फूल, पत्तियां, बीज, शाखाएं, तना, यानी जो दिख रहा है, वह वृक्ष है. उसके पीछे जो अदृश्य है, वही ईश्वर सृष्टि का वास्तविक कर्ताधर्ता है.’

जो अदृश्य केवल अनुमान पर आधारित है. आप उसपर विश्वास करें. मैं भी कर सकता हूं. लेकिन उसके लिए मैं जो दिखता है, उसे नहीं नकार सकता.’ साधु स्नातक के अज्ञान को दोष देने लगा. इसपर वह साधु को उस तने के पास ले गया, जो पत्ते झड़ जाने के बाद ठूंठ में बदल चुका था—‘कभी यह भी हराभरा रहा होगा. लेकिन इसके तने को गुमान था कि वही सबकुछ है. नाराज होकर एक दिन पत्तियों ने साथ छोड़ दिया. वे झड़ गईं. उसके बाद जो बचा वही यह ठूंठ है. प्रकृति में जो दिखता है, यदि उससे बाहर सच की खोज करोगे तो सिवाय ठूंठ के कुछ हाथ नहीं लगने वाला.’

साधु निरुत्तर हो गया.

16/ विद्रोही

तानाशाह का आदेश था, जिसकी मुस्कान एक इंच से अधिक होगी, उसे दंडित किया जाएगा. आदेश पाते ही तानाशाह के सैनिक पूरे राज्य में फैल गए. जो भी हंसता दिखाई पड़ता, उसे जेल के हवाले कर दिया जाता. कुछ ही दिनों में सारी जेलें भर गईं, लेकिन अपराधियों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी. एक दिन तानाशाह ने उन सबको दंड सुनाने का फैसला लियाण् सभी कैदियों को खुले स्थान पर लाया गयाण् मैदान खचाखच भर गयाण् दंड सुनाने के लिए तानाशाह मंच पर चढ़ा. लोग गर्दन झुकाए चुपचाप खड़े थे—

प्रत्येक को पचास कोड़े लगाए जाएं.’ तानाशाह ने आदेश दिया. सैनिक कोड़े लेकर जनसमूह की ओर बढ़े. अचानक एक बालक जोर.जोर से हंसने लगा.

कौन बदतमीज है. तानाशाह गुस्से से चिल्लाया. सैनिकों ने बालक को पकड़कर तानाशाह के सामने खड़ा कर दिया—

तुम हंसे क्यों?’

इन लोगों को देखकर, जो इतनी संख्या में और निर्दोष होने के बावजूद गर्दन झुकाए खड़े हैं.’

तुम्हें कोड़ों से डर नहीं लगता?’ तानाशाह ने पूछा.

मैं किसी से नहीं डरता .’

इसके इरादे खतरनाक हैं. इसे मैं अपने हाथों से दंड दूंगा.’ तानाशाह क्रोध से चिल्लाया. उसने बराबर में खड़े सैनिक से हंटर छीन लिया. जैसे लोगों के स्वाभिमान ने अंगड़ाई ली हो. सोयी आत्माएं एक साथ जागी हों. झुकी गर्दनें एकाएक तन गईं. तानाशाह का हंटर बालक की पीठ पर पड़े उससे पहले ही लोगों ने हल्ला बोल दिया.

कुछ देर बाद वहां न तानाशाह था, न उसके सैनिक.

17/ज्ञान

यह सोचते हुए कि दुनिया बदलने का समय आ चुका है, ईश्वर ने अपना पूरा शृंगार किया. गदाशंखचक्र, धनुषवाणकृपा….सारे हथियार संभाले और मृत्युलोक की ओर प्रयाण कर गया. पहली मुलाकात स्कूल जाते बच्चों से हुई—

बहरूपिया.’ ईश्वर की विचित्र भेषभूषा को देख एक बालक ने टिप्पणी की. उसके साथी हंसने लगे.

मूर्खो! मैं ईश्वर हूं.’ ईश्वर चिल्लाया. उसके हाथ धनुषवाण तक पहुंच गए.

तो यहां क्या क्या रहे हैं, जाकर मंदिर संभालिए.’ बालक के स्वर में कटाक्ष था.

मैं दुनिया बदलने निकला हूं.’

गुरुजी तो कहते हैं कि अच्छी दुनिया बनाने के लिए अच्छे विचार जरूरी हैं. देखो, इस पुस्तक में भी यही लिखा है.’ कहकर बालक ने पुस्तक आगे बढ़ा दी. ईश्वर ने दोचार पन्ने पलटे. कुछ समझ में नहीं आया तो पुस्तक को एक ओर फेंक दिया.

समझ गया, तुम सचमुच ईश्वर हो.’ बच्चे हंसने लगे, ‘ज्ञान का तिरष्कार करना तुम्हारी पुरानी आदत है.’

क्या बकते हो?’ ईश्वर का चेहरा तमतमा गया.

गुरुजी कहते हैं, तुमने निर्दोष शंबूक को मारा था….उस दिन शंबूक को मारने के बजाय यदि उससे ज्ञान लिया होता तो पुस्तक की ऐसी उपेक्षा न करते.’

ईश्वर पानीपानी हो गया.

18/बड़ा कौन?

बस्ती के लोग मुखिया के चयन को जमा हुए. उसी समय एक दार्शनिक उधर से गुजरे. उन्हें देख सभी के चेहरे खिल उठे—

आप गुणी इंसान हैं. आ ही गए हैं तो मुखिया चुनने में हमारी मदद कीजिए.’ लोगों ने प्रार्थना की.

मुखिया चुनने का अधिकार तो सिर्फ आपका है?’ दार्शनिक बोले. लोगों के जोर देने पर दार्शनिक ने उनसे एक प्रश्न किया—‘तानाशाह और ईश्वर, दोनों में बड़ा कौन है?’

सुनते ही लोगों की बुद्धि चकरा गई. भला यह भी कोई सवाल हुआ. सवाल हो भी तो इसका मुखिया के चुनाव से क्या संबंध? सुना है, दार्शनिक आधे पागल होते हैं. परंतु यह तो पूरा का पूरा पागल है.’

जो लोग तानाशाह को बड़ा मानते हैं, वे अपने हाथ उठा लें.’ कुछ देर बाद दार्शनिक ने पूछा. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

अब वे लोग हाथ ऊपर करें, जो ईश्वर को बड़ा मानते हैं?’ इसपर सारे लोगों ने हाथ खड़े कर दिए. किंतु एक आदमी शांत बैठा रहा.

तुम क्या फैसला है? ईश्वर या तानाशाह?’

दोनों एक जैसे हैं. जीहुजूरी तानाशाह को पसंद है, ईश्वर को भी. अपनी आलोचना न ईश्वर सुन पाता है, न ही तानाशाह. नाराज होने पर तानाशाह बंदूक तान देता है, और ईश्वर….उसके पास तो अनगिनत हथियार हैं. दोनों को मनमानी पसंद है. दूसरों पर अपना फैसला लादने में दोनों को खुशी मिलती है.’

इस आदमी में मुखिया बनने का आवश्यक गुण मौजूद है.’ दार्शनिक ने कहा और आगे बढ़ गया.

19/असलियत


रोज की तरह पुजारी मूर्ति साफ करने लगा. अचानक हाथ चूका. झाड़न ईश्वर की आंख में जा लगी. वह दर्द से तिलमिलाने लगा. सुबह से शाम तक एक जगह, एक ही मुद्रा में बैठे रहने से उसका धैर्य पहले ही जवाब दे चुका था. पुजारी की हरकत ने आग में घी डालने का काम किया—
देखकर हाथ नहीं चला सकते?’
क्षमा करें भगवन. भक्तों के आने का समय हो चुका है, जल्दीजल्दी में….’
केवल आज की बात नहीं है, तुम दिनोंदिन लापरवाह होते जा रहे हो. मत भूलो कि….’ ईश्वर क्रोध में था.
बसबस….अब तुम कहोगे—सतयुग में बस मैं ही मैं था. त्रेता में मैंने रावण को मारा था, द्वापर में पूरा महाभारत मुझ अकेले ने लड़ा था. इस अवतार में मैंने ये किया था, उस अवतार में मैंने वो किया था….’
इसमें झूठ क्या है?’ ईश्वर बोला.
छोड़िए भगवन! मंदिर में बैठेबैठे चार कहानियां क्या सुन लीं, खुद को पंडित समझने लगे….उनमें असलियत कितनी है, यह केवल मैं जानता हूं….मुंह मत खुलवाओ.’
हकीकत से ईश्वर भी वाकिफ था. इसलिए चुप्पी साध गया.

20/ सिफारिश

अनुचर ने भूतआत्माओं को देवता का संदेश सुनाया—‘जल्दी ही तुम्हें इधरउधर भटकने से मुक्ति मिलने वाली है.’ भूतआत्माएं आश्चर्य से अनुचर की ओर देखने लगीं.

देवता तुमपर प्रसन्न हैं. इस बार तुम्हें लड़की के रूप में मृत्यलोक भेजा जाएगा.’

अनुचर के प्रस्थान करने के बाद एक भूतआत्मा दूसरी से बोली—

सुना है, भारत खंड में हरियाणा नामक प्रदेश है. वहां ‘बेटी बचाओ—बेटी पढ़ाओ’ आंदोलन चल रहा है. उस प्रदेश में जन्म हुआ तो जीवन धन्य हो जाएगा.’

देवता हमारी बात मानेंगे?’

देवता खुशामदपसंद हैं. प्रार्थना करने पर मान ही जाएंगे.’ कहकर भूतआत्मा मुस्कराने लगी.

बुलावा आया तो दोनों भूतआत्माएं देवता से मिलने पहुंचीं. वहां अलगअलग प्रांत के कक्ष बने थे. सबसे अधिक भीड़ हरियाणा वाले कक्ष थी. अधिकांश लड़की के रूप में जन्म लेने वाली आत्माएं.

इतनी भीड़ में हमारा नंबर आएगा.’ भूतआत्माएं परेशान हो गईं. तभी वह अनुचर नजर आया. दोनों भूतआत्माएं लपककर उसके पास पहुंची—‘क्या तुम देवता से सिफारिश कर सकते हो कि वह हमें हरियाणा में भेजने की कृपा करें.’

उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी….तुम्हारा वहां जाना तय है.’ अनुचर ने हंसकर बताया.

क्यों?’

अब वहां कोई नहीं जाना चाहता.’ दोनों भूतआत्माओं की समझ में कुछ नहीं आया. तभी कुछ आत्माएं हाथ में दफ्ती लिए नजर आईं. उनपर नारे लिखे थे. भूतआत्माएं उन्हें पढ़ें उससे पहले ही एक स्क्रीन पर किसी नेता का भाषण दिखाया जाने लगा. पता चला कि हरियाणा का ही कोई नेता है. वह कह रहा था—‘हम आज भी कहते हैं—बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ. लेकिन सड़क चलती लड़की की इज्जत की गारंटी नहीं है. जिन लड़कियों को इज्जत प्यारी है, वे घर रहकर चौकाचूल्हा देखें.’

हम भूतआत्मा के रूप में ही भलीं.’ कहते हुए वे दोनों उन आत्माओं में शामिल हो गईं जो हरियाणा न जाने की जिद ठाने थीं.

21/ अवसर

तानाशाह ने सुना कि ईश्वर के पास असीम ताकत होती है. उससे वह कुछ भी कर सकता है. दिव्य अस्त्रशस्त्र होते हैं. उनसे वह दुश्मन को तबाह कर सकता है. उसी दिन से उसने सर्वशक्तिमान बनने की ठान ली. जिन कारखानों में मशीनें बनती थीं, उनमें टेंक बनने लगे. जिनसे वस्त्रों की आपूर्ति होती थी, वहां सैनिकों के लिए बुलेट प्रूफ जॉकटें बनने लगीं. जिस धनराशि से अस्पतालों की औषधियां खरीदी जाती थीं, उनसे गोलाबारूद खरीदे जाने लगे. उस साल अकाल पड़ा. फसल तबाह होने से किसान आत्महत्या करने लगे. बात तानाशाह तक पहुंची—

मजबूत देश बनाने के लिए कुर्बानियां जरूरी हैं.’ तानाशाह ने कहा.

देश की असली ताकत तो जनता में होती है. लोग ही तबाह हो जाएंगे तो देश मजबूत कैसे बनेगा?’ जिस लेखक ने यह लिखा. उसे राज्यद्रोही बनाकर कारावास में ढकेल दिया गया. कुछ दिनों बाद भूख महामारी में बदल गई.

मरने वालों में किस धर्म के ज्यादा हैं?’ नया मृत्यु संदेश लेकर आए मंत्री से तानाशाह ने पूछा—

बराबर हैं?’ तानाशाह चिंता में पड़ गया. थोड़ी देर बाद उसका चेहरा फिर सपाट था—

हमारी संख्या उनसे कहीं अधिक है. दोनों बराबर भी मरे तो ज्यादा नुकसान न होगा, पर देश को विधर्मियों से मुक्ति मिल जाएगी.’

22/नाटक

चमत्कार हुआ. तानाशाह ने घोषणा की—‘आज से तानाशाही खत्म. आगे जनता की मर्जी का राज चलेगा.’ सुनकर ‘भक्तों’ ने जयकारा लगाया. आलोचक मौन हो गए. अधिकारी जोरशोर से चुनाव की तैयारियों में जुट गए. चुनाव के दिन चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. मतदाताओं की सुविधा के लिए हर तरह का इंतजाम था. उत्साहित जनता मुंहअंधेरे मतदानकेंद्रों पर जा डटी.

चुनाव शुरू हुआ. पहला मतदाता भीतर गया; और शोर मचाते हुए तत्क्षण बाहर निकल आया—‘हर बटन पर तानाशाह की तस्वीर छपी है. यह कोई चुनाववुनाव नहीं है.’ लोग कुछ समझ पाएं उससे पहले ही सुरक्षाकर्मियों ने उसे दबोच लिया. वे उसे घसीटते हुए भीतर ले गए. कुछ देर बाद वोट पड़ने की आवाज आई.

चलिए अब आप भी मतदान कीजिए.’ पहले मतदाता को बाहर का रास्ता दिखाते हुए सुरक्षाकर्मियों ने कहा.

उस आदमी ने बताया, मशीन सारे वोट एक ही उम्मीदवार को दे रही है.’

खामोश!’ इंतजाम में लगा बड़ा अधिकारी चिल्लाया—‘तुम्हारा काम केवल वोट डालना है. मशीन ने कैसे वोट दिया, किसे वोट दिया, यह जानने का अधिकार तुम्हें नहीं हैये देखो, सरकार की ओर से भी यही लिखा है न!’ प्रमाण के लिए अधिकारी ने अखबार आगे कर दिया.

फिर हमारी क्या जरूरत है, तुम्हीं लोग काफी हो.’ इस बार कई लोग एक साथ बोल पड़े.

जनता लोकतंत्र चाहती है, तो हमने सोचा, यह नाटक भी सही.’ पीछे खड़ा तानाशाह, जो चुनाव का जायजा लेने निकला था, बोला.

23/ईश्वर की जात

ईश्वर विचारमग्न आगे बढ़ रहा था. चलतेचलते प्यास लगी. उसने इधरउधर देखा. तभी सामने से पुजारी आता दिखाई पड़ा. माथे पर चौड़ा तिलक. कंधे पर पोटली, दाएं हाथ में बड़ासा लोटा थामे. ईश्वर की उम्मीद बढ़ी—‘पानी मिलेगा?’

पुजारी ने ऊपर से नीचे तक देखा, ‘पहले जात बताओ?’

ईश्वर चकराया. देर तक कोई उत्तर न सूझा. प्यास गला जकड़ने लगी थी.

नाम क्या है?’ पुजारी ने अगला सवाल किया.

ईश्वर.’

ऊंह! आजकल नाम से कुछ पता नहीं चलता.’ पुजारी खुद पर झुंझलाया, ‘बाप का नाम?’

मेरा कोई पिता नहीं है.’

यह क्यों नहीं कहते कि वर्णसंकर यानी शूद्र हो!’

भूल गए, मैं वही ईश्वर हूं. जिसकी तुम सुबहशाम रोज आरती उतारते हो.’

चलो मान लिया कि तुम सचमुच के ईश्वर हो. फिर भी मैं तुम्हें पानी क्यों दूं. आज पानी मांग रहे हो, कल दूध, परसों दहीमक्खन, आगे चलकर चढ़ावे में हिस्सा भी मांगने लगोगे. मेरा काम तुम्हारी मूरत से चल जाता है. तुम अपना रास्ता नापो….’ ईश्वर को हटा पुजारी आगे बढ़ गया.

24/देवता का भय

भीषण दरिद्रता, भूखप्यास, गरीबी देखकर अकुलाए एक भलेमानुष ने दुनिया बचाने की ठान ली. समाधान की खोज में चलताचलता वह क्षीरसागर तक पहुंचा. आंखों के सामने दूध का समंदर लहराते देख उसके आनंद का पारावार न रहा—

यहां मेरी चिंताओं का समाधान संभव है?’ आदमी ने सोचा. तभी उसकी दृष्टी शेषनाग पर आंखें मूंदकर लेटी भव्य आकृति पर पड़ी. उसने विनीतभाव से कहा—

जहां से मैं आया हूं वहां भूख का तांडव मचा है. भरपेट भोजन न मिलने से बड़ों की अंतड़ियां सिकुड़ चुकी हैं. मासूम बच्चे माताओं के स्तन से चिपकेचिपके दम तोड़ रहे हैं. इस महासागर से थोड़ासा दूध मिल जाए तो लाखों मासूमों की जान बच सकती है.’

देवता के अधरों पर मुस्कान तैर गई. उसी को सहमति मान भलामानुष धरती की ओर दूध उलीचने लगा. अकस्मात कुछ पंडितजनों की टोली उधर से गुजरी. आदमी को क्षीरसागर के किनारे देख वे चौंक पड़े. उनमें से कई की भृकुटियां तन गईं—‘महाराज! जिस तेजी से यह दूध उलीच रहा है, उससे तो कुछ देर में क्षीरसागर भी खाली कर देगा.’

धरती की भूख मिटाने के लिए यह परमावश्यक है.’ शेषनाग पर लेटे देवता ने कहा.

सोच लीजिए भगवन्! लोग जब तक भूखेप्यासे हैं, तभी तक आपका नाम लेते हैं. भूख और गरीबी न रही तो तुम्हारे साथसाथ हमें भी कोई नहीं पूछेगा.’ देवता ने कुछ देर सोचा. अचानक उसने करवट बदली और मुंह दूसरी ओर कर लिया. भक्तों के लिए इतना इशारा काफी था. ‘असुरअसुर’ कहकर वे उस आदमी पर टूट पड़े.

उस दिन धर्म और भूख के रिश्ते से एक और पर्दा हटा.

25/गाय और ईश्वर

गाय जल्दी से जल्दी बस्ती से चूर निकल जाना चाहती थी. अचानक ईश्वर सामने आ गया—‘जंबूद्वीप में सब कुशल तो हैं?’ ईश्वर ने पूछा. उखड़ी सांसों पर काबू पाने का प्रयत्न करते हुए गाय ने उत्तर दिया—

कुछ भी ठीक नहीं है. लोग धर्म में शांति की खोज करते हैं, जो सर्वाधिक अशांत क्षेत्र है. ऐसी तकनीक के भरोसे बुद्धिमान होना चाहते हैं, जो उन्हें दिमागी तौर पर पंगु बनाने के लिए तैयार की गई है. चाहते सब हैं कि भ्रष्टाचार मिटे, परंतु हवस कोई छोड़ना नहीं चाहता.’

किसी महापुरुष ने कहा है—दुनिया से भागने से अच्छा है, उसे बदलो. वैसे भी भारतवासी तुम्हारी पूजा करते हैं. उन्हें छोड़कर जाना उचित न होगा.’ ईश्वर ने समझाया. गाय झुंझला पड़ी—

आदमी को मेरा दूध और चमड़ी चाहिए. इन दिनों हालात और भी बुरे हैं. हर दंगेफसाद में मेरा नाम घसीट लिया जाता है. जो कुछ नहीं कर पाता सकता, वह गौरक्षक बना फिरता है. मैं ऐसी जगह एक पल भी ठहरना नहीं चाहती.’

मुझसे कहतीं. मैं कभी का ठीक कर देता.’ ईश्वर बोला. गाय का गुस्सा भड़क उठा.

चुप रहो. सारे फसाद की जड़ केवल तुम हो. मंदिर में पड़ेपड़े रोटियां तोड़ते रहते हो. मेहनत न खुद करते हो न भक्तों से करने को कहते हो. तमाशबीन बनकर ईश्वर होने का दावा करने से तो अच्छाहै किसी कुआपोखर में डूब मरो. लोग कुछ दिन हैरानपरेशान रहेंगे. बाद में अपने भरोसे सबकुछ ठीकठाक कर लोगे.

ईश्वर स्तब्ध. वह कुछ उत्तर दे, उससे पहले गाय आगे बढ़ गई.

ओमप्रकाश कश्यप

कसौटी पर समय

 समय : सच या आभास

समय न तो गति के समरूप है, न ही उससे पूर्णतः स्वतंत्र. उसका कार्य दोनों के अंत:संबंध को दर्शाना है…..यहां एक प्रश्न जोड़ सकते हैं. जैसे जहां समय न हो, क्या वहां ‘पहले’ या ‘बाद में’ जैसा कुछ हो सकता है? या फिर जहां संपूर्ण गतिहीनता हो, क्या वहां समय की उपस्थिति की संभावना है? चूकि समय किसी गति से संबंधित संख्यामात्र है, अतएव यदि समय सार्वकालिक है तो गति को अनंत होना ही चाहिए—अरस्तु, फिजिक्स.

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समयप्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समयसंबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि बालक की जो समयसंबंधी प्रतीतियां हैं; समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समयप्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनीसुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठीसच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्मकिस्म के देवीदेवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथसाथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जराभी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समयसारणी बनाता है. अपने अध्ययनकार्य को छोटेछोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिकटिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडोंउपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं. नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोगसमर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समयसारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरेधीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समयसंबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभीकभी जीवनभर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो देवीदेवताओं से भी ऊपर, सीधे ईश्वर के अधीन है. जो एकमात्र ईश्वर का आदेश मानता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचतेपहुंचते बालक अंधश्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एकदूसरे में गड्डमड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि ईश्वर हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखनेसमझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है.

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइमटेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने मातापिता की भांति बालक भी समय के हिसाबकिताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटेछोटे टाइमपॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीचबीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष स्पर्धा है, से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसी भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनोमस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिकटिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में मातापिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्रहितैषी, सगेसंबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिकटिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना. उसका कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. उन अनेक घटनाओं में से एक, जो अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के मातापिता समय को परमनियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो ईश्वरीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्यनियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समयसंबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एकदूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूतवर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रातदिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्वभावना के आधार पर, छोटीछोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिनरात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिनरात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटतीबढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सततपरिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परमभौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधेसीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2

समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने मातापिता या दादादादी, नानानानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नितनवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तुविशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथसाथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तनशून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

उपर्युक्त उदाहरण में यदि मान लिया जाए कि प्रेक्षक अपने आंतरिक और बाह्य कार्यकलापों के प्रभाव से भी मुक्त है तो उस अवस्था में, उसका ध्यान केवल उस अकेली घटना पर केंद्रित रहेगा. चूंकि वह घटना नितांत शून्य में घट रही होंगी, इसलिए इस बात की पर्याप्त संभावना है कि वह केवल घटना के सातत्य को परखे और वह घटना ही उसे प्रकृति की सार्वभौम हलचल के रूप में नजर आए. स्थायित्व के अनुभव; तथा समानांतर घटनाओं के अभाव में वह एकल घटना की गति के साथ समय का संबंध जोड़ ही नहीं पाएगा. समयाभास की दृष्टि से वह लगभग गतिहीनता जैसा अनुभव होगा. उसका समयबोध करीबकरीब शून्य होगा. इससे एक सामान्य निष्कर्ष यह भी निकलता है कि समयबोध के समुचित विकास हेतु घटना बहुलता आवश्यक है. वैज्ञानिक दृष्टि से न केवल ब्रह्मांडहीनता असंभव कल्पना है, बल्कि ब्रह्मांड का पूरी तरह गतिविहीन हो जाना भी असंभव परिकल्पना है. समय वस्तु नहीं है. न ही ब्रह्मांडहीनता ही अवस्था में उसकी कल्पना की जा सकती है. कदाचित इसीलिए प्लेटो से लेकर स्टीफन हाकिंग तक समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति साथसाथ मानते हैं. प्लेटो का मानना था कि ब्रह्मांड की भांति समय की भी रचना हुई है. वह समय को स्वर्ग के समवयस्क मानता था. यह विश्लेषण दर्शाता है कि वस्तु समयाभास का केवल आधार है, उसका कारण नहीं है. किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा घटना से जुड़ी सापेक्षिक परिवर्तनशीलता ही समयाभास का कारण है.

दूसरे शब्दों में समय अथवा समयाभास घटना अथवा घटनाचक्र तथा उसकी अनुभूति से परे, कुछ भी नहीं है. समयाभास का लोप केवल परम स्थिरता अथवा परम वेग(प्रकाशवेग अथवा उससे अधिक कोई भी संभव वेग) की अवस्था में ही है. परम वेग की अवस्था में परिवर्तन इतनी तीव्र गति से होगा कि हम उसे परख ही नहीं पाएंगे. दूसरी अवस्था में वस्तुविशेष यदि पूर्णतः जड़ अवस्था में है तथा शेष ब्रह्मांड बदलाव की ओर अग्रसर हैं तो सापेक्षिक परिवर्तन बना रहेगा. उससे समयाभास की स्थिति भी कायम रहेगी. उदाहरण के लिए कृष्णविवर में अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी पदार्थ परमसंपीडित हो परमशून्य में ढल जाते हैं. परमसंपीडन की अवस्था में वहां समस्त गतियों का लोप हो जाता है, उस अवस्था में समय अथवा समयाभास की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है. वैज्ञानिक उस अवस्था को समयहीनता की अवस्था मानते हैं.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रहपिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूतवर्तमानभविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथसाथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तनशून्यता अथवा परमस्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.

उपर्युक्त धारणा के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परमविस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परमशून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परमविस्फोट से पहले ब्रह्मांड परमसंपीडन की अवस्था में था. वह परमस्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गतिशून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रहनक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

महाविस्फोट से लेकर आज तक, किसी न किसी रूप में सभी ग्रहनक्षत्र सतत परिवर्तनशीलता से गुजर रहे हैं. अपने स्वरूप और सापेक्षिक परिवर्तनशीलता के माध्यम से वे हमें अपने होने की प्रतीति कराते हैं. उनकी समस्त गतिविधियां अंतहीन समय का हिस्सा हैं, जो सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का दृष्टा है, मगर खुद अपरिवर्तनशील है. यहां सामान्यसा प्रश्न उठ खड़ा होता है. यदि समय निष्क्रिय दृष्टा है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को प्रभावित करने या प्रभावित होने का गुण यदि उसमें नहीं है, तो उसे चैतन्य अथवा कार्यकारी शक्ति कैसे माना जा सकता है? यहां से समय की समस्या विज्ञान के दायरे से बाहर निकलकर दार्शनिक हो जाती है.

समय को लेकर कुछ मिलीजुली जिज्ञासाएं और भी हैं. जैसे कि जो घटनाएं हमारे अनुभव या दृष्टि सीमा से बाहर रह जाती हैं, उनका क्या होता है? क्या उनका समय हमारे समय से अलग होता है? क्या समय सचमुच सार्वभौम सत्ता है? क्या समय को लेकर गढ़े गए मानक किसी दूसरे ग्रह पर भी खरे उतरेंगे? ऐसे प्रश्न किसी भी विचारशील मनुष्य को परेशान कर सकते हैं. इस पर बातचीत करने से पहले हमें जान लेना चाहिए कि किसी चीज के बारे में न जानना उतना बुरा नहीं होता, जितना उसे गलत ढंग से जानना. न जानने वाले के भीतर सीखने की ललक होती है. जबकि गलत जानकारी रखने वाला हमेशा गलतफहमी का शिकार बना रहता है. अज्ञानता के कारण यदि कभी चुनौती पेश हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वाग्रहों से काम चलाता है. मिथों की मदद लेता है. धर्म सहित अन्यान्य पूर्वाग्रहों में फंसी भारतीय मेधा इसी कमजोरी का शिकार होती आई है. हालांकि बौद्ध, सांख्य, वैशेषिक आदि दर्शनों में समय को लेकर कहींकहीं वस्तुनिष्ट चिंतन की झलक देखने को मिलती है. लेकिन अधिकांश जगह उसे नियति अथवा ईश्वरीय शक्ति के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. विज्ञान की बात की जाए तो समय को लेकर गढ़े गए मानक सामान्य परिस्थितियों तक ही प्रामाणिक हैं. यदि परिस्थितियां अत्यधिक असामान्य हों तो उसके मानक गड़बड़ाने लगते हैं.

उदाहरण के लिए आइंस्टाइन ने बताया है कि अत्यंत उच्च वेगों पर समय का वेग मद्धिम पड़ने लगता है. उसने इसे समय की सिकुड़न माना है. आइंस्टाइन के निष्कर्षों आज के अधिकांश वैज्ञानिक सहमत हैं. हालांकि उनसे असहमत विद्वानों की संख्या भी कम नहीं है. प्रसिद्ध दार्शनिक हेनरी बर्गसां समय को ‘अवधि’ के माध्यम से व्याख्यायित करते थे. इस संबंध में उनकी आइंस्टाइन के साथ हुई रोचक बहस का उल्लेख यहां अप्रासंगिक न होगा. 1922 में आइंस्टाइन के ‘सापेक्षिकता के सिद्धांत’ की आलोचना करते हुए बर्गसां ने कहा था कि सापेक्षिकता के सिद्धांत का, ‘संबंध केवल ज्ञानमीमांसा से है, न कि भौतिक विज्ञान से.’ बर्गसां की आलोचना से बौद्धिक जगत में एक बहस छिड़ गई. मगर आइंस्टाइन अपने विचार पर दृढ़ थे. अपने अपने सिद्धांत का बचाव करते हुए उन्होंने कहा था—‘दार्शनिकों की दृष्टि में समय केवल भ्रांति है.’

घटनाओं की सापेक्ष गति, यानी दो स्वतंत्र अंतरालों से हमारा समयबोध विकसित होता है. लेकिन ब्रह्मांड की भांति हमारा बोध सर्वव्यापी नहीं है. उसकी सीमा है. मनुष्य विराट ब्रह्मांड में पलप्रतिपल हो रही अनंत हलचलों में से क्षणविशेष में मात्र कुछ घटनाओं का ही अवलोकन कर पाता है. विराट ब्रह्मांड के जो ग्रहनक्षत्र हमारे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष अवलोकन से परे हैं, अरबोंखरबों प्रकाशवर्ष की दूरी पर हैं, उनसे संबंधित समय की, अपने अनुभव के आधार पर, हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. ठीकठीक कुछ नहीं बता सकते. चूंकि घटनाओं की गति पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल से भी प्रभावित होती है, इसलिए समान घटना के लिए पृथ्वी तथा दूसरे ग्रहों पर होने वाले हमारे अनुभवों में अंतर हो सकता है. पिंड का आकार, घटनाओं का वेग तथा उनकी दिशा हमारे समयाभास को प्रभावित करती है. समय संबंधी हमारा बोध हमारे अनुभवों तथा तर्कों पर आधारित होता है. उन्हीं के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि घटना और अंतराल का संबंध शाश्वत है. दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं. हमारा साक्षात घटनाविशेष तथा उसकी गत्यात्मकता से होता है. उनका होना ही हमारे समयाभास का कारण बनती है.

इसके बावजूद समय के भौतिक अस्तित्व को नकारने, उसे केवल मानसिक प्रबोधन का हिस्सा मानने वाले विचारकों की संख्या भी कम नहीं है. विगत दो शताब्दियों में समय संबंधी मौलिक चिंतन में तेजी आई है. अधिकांश विद्वान उसके भौतिक स्वरूप को स्वीकारते हैं, लेकिन घटनाओं से परे, उसकी स्वतंत्र सत्ता से इंकार करते हैं. लाइबिनिज ने समय के भौतिक स्वरूप को नकारा है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है. उसके अनुसार समय और अंतरिक्ष की अवधारणा वस्तुजगत के बारे में हमारे दृष्टिकोण को दर्शाती है. इमानुएल कांट लाइबिनिज के विचारों का समर्थन करता है. हालांकि वह उससे पूरी तरह सहमत नहीं है. वह लाइबिनिज की इस बात से तो सहमत है कि समय और अंतरिक्ष दोनों ही कल्पनाजन्य हैं. लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह लाइबिनिज का विचार है. कांट के अनुसार दोनों मानसिक अवधारणा हैं, इस तरह कि वे हमारे मस्तिष्क पर निर्भर हैं. उनमें से पहला वस्तुओं और स्थितियों को सहेजता है, दूसरा उनकी सापेक्षिक हलचलों को दर्शाने एवं दर्ज करने के काम आता है.

समय की अधिसत्ता को लेकर कुछ दिलचस्प बहसें विद्वानों के रही हैं. थाॅमस एक्वीनस ने समय को दो भागों में बांटा था, वास्तविक समय तथा काल्पनिक समय. मगर पेशे से गणितज्ञ इसाक बैरो को यह विभाजन स्वीकार न था. ज्यामितीय पर दिए गए अपने वक्तव्य में बैरो ने एक्वीनस की मान्यता, जो अरस्तु की समयसंबंधी विचारों पर केंद्रित थी, को सिरे से खारिज कर दिया था. एक सभा में अपने ही प्रश्न कि क्या समय सृष्टि रचना से पहले भी मौजूद था, का स्वयं उत्तर देते हुए उसने कहा था—‘विश्वोत्पत्ति से पहले और उसके बाद में, यहां तक कि ब्रह्मांड से परे भी समय था, समय है.’ अरस्तु की मान्यता है कि समय घटनाओं पर निर्भर है; तथा घटनाओं की आवृत्ति के अनुसार वह आगे बढ़ता रहता है. उसका आशय था कि समय घटनासापेक्ष है. बैरो ने उसका खंडन करते हुए कहा था—

‘‘बाकी चीजों की भांति समय की भी कुछ विशेषताएं हैं, उसका मौलिक और सार्वत्रिक गुण है कि वह अपने व्यवहार पर सदैव दृढ़ रहता है. चाहे वस्तुएं गतिमान रहें या ठहर जाएं, हम चाहे जागें या सोएं, वह अपनी निर्धारित गति से बहता रहता है. कल्पना कीजिए समस्त तारागण अपने जन्म के समय से ही स्थिर रहें, उनकी स्थिरता चाहे जितने समय तक कायम रहे, समय का उससे कुछ नहीं बिगड़ने वाला, वह अपनी गति से आगे बढ़ता जाएगा.’’

बैरो न्यूटन का गुरु रह चुका था. आकादमिक जगत में उसका सम्मान था. जबकि उससे तीन शताब्दी पहले जन्मे थाॅमस एक्वीनस की भी विद्वत जगत में नवअरस्तुवादी दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित था. प्रकृति से आध्यात्मिक बैरो न्यूटन से प्रभावित था. हालांकि समय को लेकर न्यूटन से उसके मतभेद थे. उसका विचार था कि समय अपने आप में स्वतंत्र है. वह सृष्टि की रचना से पहले भी मौजूद था. न्यूटन का विचार था कि वस्तुएं समय और अंतरिक्ष में दोनों में विस्तार पाती हैं. समय में उनकी व्याप्ति क्रमवार तथा अंतरिक्ष में स्थितिअनुसार रहती है. दूसरे शब्दों में न्यूटन समय को घटनाओं का प्रभाव मानता था. प्रकारांतर में समय को लेकर उसका दृष्टिकोण भौतिकवादी था. तदनुसार उसकी उत्पत्ति भी भौतिक जगत की उत्पत्ति से जुड़ी थी. उन दिनों धर्मसंस्थाएं बहुत शक्तिशाली थीं. राज्य पर चर्च की मजबूत पकड़ थी, जिसकी एकाएक उपेक्षा संभव न थी. उनके दबाव में अपने समय के महानतम वैज्ञानिक न्यूटन को संशोधित वक्तव्य के लिए मजबूर होना पड़ा. अंततः अपनी ही पुस्तक ‘प्रंसीपिया मैथेमेटिका’ में उसे जोड़ना पड़ा—‘ईश्वर अजरअमरअनंत है, उसने समय और अंतरिक्ष को इसलिए बनाया, ताकि वह हर जगह मौजूद रह सके.’

इनका विरोध किया था—फ्रांसिसी वैज्ञानिकचिंतक लाइबिनिज ने. लाइबिनिज ने अध्यात्म और विज्ञान को एकमेव करने का काम किया था. उसका मानना था कि ईश्वर सर्वथा, संपूर्ण और किसी भी प्रकार के विक्षोभ से परे है. परंतु यह अकेले ईश्वर का गुण नहीं है. सृष्ठि छोटेछोटे परमबिंदुओं से बनी है, जो अपने गुण में ईश्वर की तरह ही है. अंतर बस इतना है कि वे बिखरे हुए हैं. जबकि ईश्वर संपूर्ण एकजुट सत्ता है. इन परमबिंदुओं को उसने ‘मोनाड’ का नाम दिया था. लाइबिनिज के अनुसार मोनाड ईश्वर की रचना है, लेकिन समय और अंतरिक्ष दोनों से स्वतंत्र हैं. आगे चलकर न्यूटन और बैरो के साथ तीसरा व्यक्ति भी उस बहस में शमिल हो गया. वह व्यक्ति था, सेमुअल क्लार्क. क्लार्क न्यूटन का शिष्य था.

लाइबिनिज द्वारा समय को स्वतंत्र सत्ता न मानने पर क्लार्क की प्रतिक्रिया थी—‘यदि तुम समय को स्वतंत्र स्वयंभू सत्ता मानने को तैयार नहीं हो, तब तुम्हें यह दावा नहीं कर सकते कि विश्व का निर्माण हुआ था. क्योंकि यदि तुम यह कहना चाहो कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है तो तुम यह भी कह सकते हो कि ईश्वर ने दुनिया को उस क्षण से कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में रचा था. इसका सीधा मतलब तो यही हुआ कि ईश्वर ने सृष्टि को उस क्षण से कुछ न कुछ पहले रचा था, जिस क्षण उसने वास्तव में उसे रचा था. यदि समय सृष्टि से स्वतंत्र नहीं है तो सृष्टि रचना की घटना ही पहली घटना हुई.’

सेमुअल क्लार्क और लाइबिनिज के बीच इसी प्रकार से तर्कों का आदानप्रदान होता रहा. अपने अगले पत्र में लाइबिनिज ने क्लार्क और एक्वीनस के विचारों पर टिप्पणी करते हुए लिखा—‘एक्वीनस और क्लार्क बड़ी दुविधा में हैं. ऐसी दुविधा जो किसी भी छोर पर स्पष्ट नहीं है.’ लाइबिनिज का उत्तर बहुत हल्काफुल्का था. इसपर क्लार्क ने लाइबिनिज विरोधाभासी होने का आक्षेप लगाते हुए लिखा कि लाइबिनिज के अनुसार समय की उत्पत्ति उससे तत्संबंधी घटनाएं अस्थायी तौर पर किसी तीसरे द्वारा प्रेरित हैं. इसका अभिप्राय है कि समय की उत्पत्ति से भी पहले कुछ घटा था, जो पूरी तरह असंगत और अविश्वसनीय है. समय को लेकर इस प्रकार की दुबिधा और तर्कविर्तक आगे भी चलते रहे. और आज लगभग चार सौ वर्ष बाद भी समय की उपस्थिति को लेकर विद्वानों के बीच उतने ही मतभेद हैं, जितने उस समय के दार्शनिकों के बीच विद्यमान थे.

कांट के अनुसार अंतरिक्ष के संबंध में दिए जाने वाले तर्क समय पर भी यथावत लागू होते हैं. लाइबिनिज पर टिप्पणी करते हुए वह लिखता है—‘काल और दिक् का अपनाअपना अथवा संयुक्त रूप से कोई अस्तित्व नहीं है. कुछ अर्थों में वे हमारी अभिव्यक्ति तक सीमित, उसके समुत्पाद की तरह हैं. वे अपरिवर्तनीय हैं, उन अर्थों में नहीं जिनमें लाइबिनिज उन्हें बताता है. अंतरिक्ष का अस्तित्व मानवमस्तिष्क पर निर्भर है.’ अंतरिक्ष कि काल्पनिकता को स्वीकारते हुए वह लिखता है कि कल्पना वही श्रेष्ठतम है, जिसे कोई कल्पना मानने को तैयार न हो. जो वास्तविकता का आभास कराती हो. मानवीय कल्पना का जैसा परिपूर्ण उदाहरण अंतरिक्ष है, वैसा अन्य कोई नहीं. वह हमारी संवेदनपरकता की कसौटी है. कांट इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अंतरिक्ष बाहरी संवेदन का विषय नहीं है. बल्कि ऐसी अवधारणा है, जो बाकी वस्तुओं के रूपाकार एवं तत्संबंधी संवेदनपरकता पर निर्भर है. उसके अनुसार अनेक ऐसे तर्क जो अंतरिक्ष पर लागू होते हैं, वे समय पर भी लागू होते हैं.

कांट के अनुसार समय की सत्ता है, पर केवल इसलिए कि वह हमारी वास्तविक अंतश्चेतना का हिस्सा है. इसके बावजूद समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षासंस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवेंआठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाईतीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. भृर्तहरि, वैराग्य शतक, 12/1045.

2. “Whether, if soul (mind) did not exist, time would exist or not, is a question that may fairly be asked; for if there cannot be someone to count there cannot be anything that can be counted…” (Physics, chapter 14).

3. time is neither identical with nor entirely independent of movement, and it remains for us to determine the relation between them….We may here interject the question: how, when there is no time, can there be any “before” and “after”; or how, when there is nothing going on, can there be time? Since time is a number belonging to a process … then,if there always is time, movement must be eternal also.—St. Thomas Aquinas, Commentary on Aristotle’s “Physics,” R. J. Blackwell, trs. (New Haven: Yale University Press, 1963).

4. The ideality of space is its mind-dependence: it is only a condition of sensibility…. Kant concluded …”absolute space is not an object of outer sensation; it is rather a fundamental concept which first of all makes possible all such outer sensation.”…Much of the argumentation pertaining to space is applicable, mutatis mutandis, to time, so I will not rehearse the arguments. As space is the form of outer intuition, so time is the form of inner intuition….Kant claimed that time is real, it is “the real form of inner intuition.”