प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक

ज्ञानार्जन मनुष्य का स्वभाव है, जिज्ञासा उसका मूल लक्षण. पर प्राणीमात्र की प्रथम आवश्यकता है—भोजन. आदिम मनुष्य अपना भोजन वन्य जीवों का शिकार करके जुटाता था. कड़ी स्पर्धा एवं संघर्ष के बीच अपनी अदम्य जिजीविषा तथा अनूठी जिज्ञासा के कारण उसने सृष्टि के अन्यान्य जीवों पर वरीयता प्राप्त की थी. उसके सीखने की आरंभिक गति बहुत धीमी, करीब-करीब नगण्य थी. इस कारण परिवर्तन की गति वर्षों तक लगभग स्थिर बनी रही. विकास प्रक्रिया में लगभग बीस लाख वर्ष पहले जब आधुनिक मनुष्य का जन्म हुआ, तो उसके एवं पशु-जमात के बीच बहुत अंतर नहीं था. वह हिमयुग की बेला थी. अन्य जानवरों की भांति मनुष्य भी पेड़ों, गुफाओं में छिपकर रहता था. भोजन के लिए वह वन्य पशुओं का शिकार कर लेता था. तत्पश्चात विराट प्रकृति के आंचल में निर्द्वंद्व रात गुजारता था. भोजन जुटाने की कोशिश में स्वाभाविक रूप से उसको अपने कुछ साथी भी गंवाने पड़ते थे. उसके लिए यह जीवन-संघर्ष की अनिवार्यता थी. ऐसे में हर्ष-शोक उसको बहुत अधिक सताते भी नहीं थे. हिमयुग की समाप्ति के बाद वनस्पतियों ने धरती को हरियाना शुरू कर दिया था. सूरज की किरणें हरियाली को चूमने लगीं. आदिम मनुष्य के लिए वे दिन बड़े ही आह्लादकारी रहे होंगे. सपाट भूमि पर उसे भयानक हिम-तूफानों का खतरा नहीं था. मौसम उसके अनुकूल था. अतएव अपने प्रियजनों के साथ वह अधिक समय बिता सकता था. यह सबकुछ इतनी जल्दी भी नहीं हुआ था. परिवर्तन की गति अत्यंत धीमी थी. हिम युग की बेला से वन-वनस्पतियों के युग तक आते-आते दस-बारह लाख वर्ष और आदिम मनुष्य की लगभग तीस हजार पीढ़ियां दाव पर लग चुकी थीं. मानवीय संवेदनाएं उस समय विकासमान अवस्था में थीं. संज्ञा-सर्वनाम से परे के उस युग को सामाजिक संबंधों तक आने के लिए हजारों वर्ष की यात्रा तथा कई पड़ाव अभी और पार करने थे.
विराट प्रकृति के सान्निध्य में रहकर चुनौतियों का सामना करते हुए आदिमानव सहयोग और सहकार की महत्ता को समझने लगा था. इसलिए वह समूह में रहता, समूह में ही आक्रमण करता, आपसी बातचीत के लिए इशारों की भाषा का इस्तेमाल करता था. पाषाणयुग आते-आते उसने आग जलाना, पहिये का उपयोग तथा शिकार के लिए हथियारों की मदद लेना सीख लिया था. यह सब पीढ़ियों के अनुभव एवं ज्ञान के संचयन तथा उन्हें अगली पीढ़ी तक अंतरण बगैर संभव न था. इस क्षेत्र में आदिम मनुष्य गुणात्मक दर से प्रगति कर रहा था. संकेतों को स्थायी रूप देने के लिए उसने एक लिपि विकसित की थी, जिसका उपयोग वह शिलाखंडों, गुफाओं, तख्तीनुमा पत्थरों, पशुचर्म तथा वृक्ष की छाल आदि पर करता रहता था. लिपि के विकास से उसे अपने अनुभवों को सहेजने तथा उन्हें दूसरे समूहों, आगामी पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिली. स्मृति ने उसको अन्य प्राणियों के साथ स्पर्धा में आगे निकलने का रास्ता दिखाया. सभ्यता के आरंभिक दौर में ही मनुष्य ने जाना कि कि मृत्य जीवों की अपेक्षा जीवित प्राणी उसके लिए अधिक उपयोगी हैं. वन-वनपस्तियों को उजाड़ने के बजाय उनके साथ सहअतिस्तत्व एवं सामंजस्यपूर्ण जीवन बिताने पर वह अधिक सुखी और संपन्न रह सकता है. इस बोध के साथ ही उपयोगी पशुओं की पहचान करने तथा उन्हें पालतू बनाकर रखने का सिलसिला बना. स्थानीय उपलब्धता के आधार पर गाय, भैंस, बकरी, भेड़, याक, कुत्ता, बैल, घोड़ा, गधा आदि जानवर मानव-समाज का अभिन्न हिस्सा बनते चले गए. मनुष्य ने प्रकृति से सामंजस्य बनाकर रखना, उसको अपने अनुकूल ढालना आरंभ कर दिया. इसके बावजूद सभ्यता के सामान्य स्तर तक पहुंचते-पहुंचते आदिम मनुष्य की तीस हजार पीढ़ियां और खप गईं. मानव-विकास के इतिहास में यह अवधि भले ही बड़ी दिखाई दे, किंतु जैविक सृष्टि के विकासक्रम में यह बहुत छोटी अवधि थी.

जिसे हम सभ्यता कहते हैं उसकी शुरुआत लगभग 12000 वर्ष पुरानी है. यह मानव-सभ्यता के इतिहास का वह हिस्सा है, जब मनुष्य ने एक ही स्थान पर टिककर रहना आरंभ किया था. मानव-पीढ़ी की औसत आयु 35 वर्ष मान ली जाए तो मनुष्य के आदि पुरखे से आज तक लगभग 60,000 पीढ़ियां गुजर चुकी हैं. मनुष्य की पहली सभ्य पीढ़ी आज से मात्र 340-350वीं पुरानी पीढ़ी रही होगी. पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब वर्ष की अपेक्षा यह एकदम हाल की घटना है. सबसे पहले शैलीय जीव की उत्पत्ति लगभग 120 करोड़ वर्ष पहले हुई थी. उस एककोशीय जीव को मनुष्य के रूप में विकसित होने में करोड़ों वर्ष लगे. अनेक परिवर्तनों तथा विकास-चक्रों से उसको गुजरना पड़ा था. पृथ्वी के जन्म की अपेक्षा मनुष्यता का इतिहास कितनी हाल की घटना है, यह जानने के लिए ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स रिची ने अपने भाषण के दौरान एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत किया है—

‘मान लीजिए पृथ्वी पर सबसे पहला जीव 1.20 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आया था. इस 120 करोड़ वर्ष की अवधि को यदि 12 घंटे मान लिया जाए तो एक घंटा व्यतीत होने का अर्थ होगा कि हम अतीत में 10 करोड़ वर्ष की अवधि पार कर आए हैं. इस तरह एक मिनट की अवधि लगभग 17 लाख वर्ष के तुल्य होगी. इसको और विभाजित किया जाए तो एक सेंकिड बराबर होगा अतीत के करीब 28,000 वर्ष के. सृष्टिकत्र्ता प्रकृति ने यदि अब से 12 घंटे पूर्व समुद्री खरपतवार आदि प्रथम शैल जीवी बनाए तो प्रारंभिक वनस्पति के उद्भव तक पहुंचने में सुबह के 7 बज जाएंगे. तत्पश्चात सवेरे के सात बजे से लेकर 11 बजकर 15 मिनट के अंदर बिना रीढ़ वाले जीव जैसे मछली, कछुआ, उभयचर, केचुए तथा अन्य सर्पजातीय प्राणी, स्तनपायी जीव आदि एक-एककर जन्म लेते जाएंगे. मनुष्य की तरह के या मनुष्येत्तर जीव का आविर्भाव होगा सबसे हाल के एक मिनट के समय में. उसमें भी आधुनिक मनुष्य का जन्म होगा, केवल एक सैकिंड पहले. समय के इस आनुपातिक खंड में नवपाषाण युग से आगे की सभ्यता अपने को प्रकट करेगी मात्र एक तिहाई सैकिंड को.’

स्पष्ट है कि मानव सभ्यता का उद्भव जैविक सृष्टि के विकास की अपेक्षा एकदम हाल की घटना है. हालांकि इस छोटे-से कालखंड में ही मनुष्य ने निहित स्वार्थ के लिए प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से जो पारिस्थितिक समस्याएं पैदा की हैं, वे चिंता उत्पन्न करने वाली हैं. लेकिन यह इस पुस्तक का प्रतिपाद्य विषय नहीं है. नवपाषाण युग में मनुष्य को एक ही स्थान पर टिककर रहना रास आने लगा था. जीविका के लिए वह पशुओं, वन-वनस्पतियों और खेती पर निर्भर था. उसने अपने रहने के लिए आवास बना लिए थे. खेती और शिकार के लिए वह पत्थर के औजारों का प्रयोग करता था. सांस्कृतिक नैरंतर्य तथा सामूहिकता की अभिव्यक्ति के लिए उसने पर्व-त्योहार बना लिए थे, जिनके बहाने सामूहिक भोज की परंपरा की नींव रख चुकी थी. नवपाषाणीय मनुष्य कांसे का उपयोग करना सीख चुका था. हालांकि यह एक दुर्लभ धातु थी, समाज के चुनींदा लोग ही उसका उपयोग कर पाते थे. उस समय भी कई समूह ऐसे थे, जो यायावर जीवन जीते थे. वे प्राकृतिक परिवर्तनों के अनुसार अपना ठिकाना बदलते रहते थे. नए स्थानों की खोज में वे नए कबीलों के संपर्क में भी आते थे, जिससे अनुभवों का आदान-प्रदान होता, जो निश्चय ही उनके विकास में सहायक सिद्ध होता था. कई बार मतभेद के कारण उनके बीच संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी. मगर कुल मिलाकर उससे विकास को गति ही मिलती थी. वस्तुतः वह अन्न संग्रहण सभ्यता थी. भोजन मनुष्य की मुख्य आवश्यकता था. जीवन में स्थायित्व लाने के लिए आवश्यक था कि भोजन की प्रचुरता हो, ताकि वह आसानी से उपलब्ध हो सके. कृषि के विकास ने यह संभव कर दिखाया था. अतिरिक्त अनाज का उत्पादन संभव हुआ तो उसके संग्रहण और वितरण के लिए व्यवस्थाएं बनीं. बर्तन बनाने की कला का विकास सभ्यता के आदिकाल से जुड़ा है. अनाज के संग्रहण के साथ ही उसके न्यायिक वितरण के लिए भी व्यवस्थाओं का गठन हुआ. उस समय की परंपरा के अनुसार अतिरिक्त अनाज की मात्रा यदि कम हो तो उसको समूह की स्त्रियों को सौंप दिया जाता था, जो घर का प्रबंधन करती थीं. अधिक मात्रा में अनाज होने पर वह समूह के मुखिया की निगरानी में रखा जाता था, ताकि जरूरत पड़ने पर उसका समूह-हित में उपयोग किया जा सके.

कृषि और पशुपालन को महत्त्व दिए जाने से मनुष्य के जीवन में स्थायित्व तो बढ़ा था, किंतु एक स्थान पर टिककर रहने की समस्याएं कम नहीं थीं. इसे यूं भी कह सकते हैं कि नए परिवेश में ढला जीवन नई व्यवस्थाओं के गठन की मांग कर रहा था. साथ-साथ रहते हुए हितों में तालमेल और शांति बनाए रखना अत्यावश्यक था. वह तभी संभव था जब सभी सदस्यों की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति संभव हो. अपना भोजन जुटाने में असमर्थ सदस्यों, बच्चों और बूढ़ों की देखभाल की समुचित व्यवस्था हो. समूह के रूप रहते हुए मनुष्य ने यह सब अपने अनुभव से सीखा और जैसे-जैसे समस्याएं आती गईं, उनके समाधान के प्रयास भी होते रहे. बौद्धिक परिपक्वता प्राप्त कर चुके मनुष्य ने समूह के भीतर शांति-व्यवस्था एवं एकता बनाए रखने के लिए नियम-कानून बनाए. सामाजिक मर्यादाओं का सही-सही पालन हो, इसके लिए लोगों को जिम्मेदारी सौंपी गई. मनुष्य की जरूरतें बढ़ रही थीं, इसलिए औजारों और सम्मिलित शक्ति द्वारा उत्पादन को बढ़ाने के जतन भी चलते रहे. और जैसी कि उत्पादन की प्रवृत्ति है. व्यक्ति सामान्य स्थितियों में अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने में समर्थ होता है. इसलिए उत्पादन बढ़ा तो उसको ठिकाने लगाने के लिए व्यापारिक वर्ग का जन्म हुआ, नए बाजारों की खोज में व्यापारी वर्ग दूर-दराज की यात्राएं करने लगा. व्यापारिक यात्राओं के साथ-साथ संस्कृति और तकनीक का आवागमन भी बढ़ता गया. इससे विकास को गति मिली. मनुष्य का आत्मविश्वास बढ़ा. उससे पहले तक वह स्वयं को प्रकृति का आश्रित मानता आया था. प्रकृति उसके लिए अबूझ पहेली थी. वेदों-उपनिषदों में प्रकृति को सर्वेसर्वा मानकर उससे मदद की अपेक्षा की जाती थी. मगर कालांतर में कृषि के विकास तथा एक के बाद एक आविष्कारों से मनुष्य को लगने लगा था कि वह प्रकृति को अपने हितों के अनुसार ढाल सकता है. इसमें उसको चामत्कारिक सफलता भी मिली. कालांतर में उसने नए आत्मविश्वास के साथ सभ्यता और संस्कृति को अपने विचारों के अनुसार ढालने के प्रयत्न करने आरंभ कर दिए. इससे समाज में नए जीवनदर्शन और ज्ञान-विज्ञान के उदय को बल मिला, जिसका मुख्य गुण व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना तथा उसकी बौद्धिक जिज्ञासाओं का समाधान खोजना था.

मनुष्य कृषि-कर्म में उत्तरोत्तर पारंगत होता जा रहा था. उसने एक ही स्थान पर टिककर रहना आरंभ कर दिया था. बावजूद इसके जंगली जानवरों का डर अभी मिटा नहीं था, मानव-बस्ती पर समूह के रूप में हमला कर वे एक ही झटके में उसको तबाह कर सकते थे. इसलिए रहने के लिए आवास बस्तियों का निर्माण किया गया. निश्चित रूप से प्रारंभिक आवास सामूहिक ही रहे होंगे. उस समय भोजन की भांति मनुष्य का रहन-सहन भी साझा था. लोग समूहबद्ध होकर रहते थे. उनके परिवारों की संख्या सौ के आसपास होती होगी. लगभग पांच सौ की जनसंख्या वाले समूह के सदस्य एक-दूसरे को आमने-सामने से जानते होंगे. स्त्री का गर्भधारण करना उस समय मानवजीवन का सबसे बड़ा चमत्कार और उपलब्धि थी. प्राचीन मूर्तिशिल्पों में से कई मूर्तिशिल्प गर्भिणी स्त्री के हैं. उल्लेखनीय है कि उस समय के अधिकांश परिवार मातृसत्तात्मक थे. स्त्री परिवार की मुखिया मानी जाती थी. इसी युग में लेखनकला का विकास हुआ. मनुष्य ने प्रतीकों के माध्यम से अपने अनुभवों और विचारों को संग्रहित करना आरंभ कर दिया, जिससे एक पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होने लगा. परिणामस्वरूप न केवल समाज के विकास में तेजी आई. इसके साथ-साथ वर्चस्व की भावना का भी विकास हुआ. इस स्पर्धा में पुरुष बाजी मारने लगा. अपनी सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए धीरे-धीरे उसने समाज के नियमों को अपने स्वार्थानुकूल ढालना प्रारंभ कर दिया. इस काम में त्रधर्म नामक संस्था के उद्भव से काफी मदद मिली.

प्रकृति के निरंतर सान्निध्य में रहने वाला मनुष्य उसके विराट स्वरूप और क्षण-क्षण बदलते रूपाकारों के प्रति श्रद्धावनत था और सम्मोहित भी. उसकी मेधा नए-नए अनुभवों को दर्ज करती जाती थी. उसके सामने कुछ सामान्य समस्याएं भी थीं. उनमें कुछ मनोवैज्ञानिक थीं और कुछ सामाजिक. प्रकृति में कोई वस्तु उसको अच्छी लगती थी. उसका सान्न्ध्यि उसके लिए सुखकारी था. इसलिए उसकी पहली समस्या यह जानना था कि सुख क्या है? उसको कैसे प्राप्त किया जा सकता है? उसका òोत क्या है? सुख-प्राप्ति को स्थायी कैसे बनाया जाए? मानवीय सुख के सभी उपादान प्रकृति में मौजूद थे, मनुष्य उनका उपभोग भी करता था, किंतु वहां कुछ भी स्थायी नहीं था. अनिश्चितताओं के बीच झूलता जीवन स्थायित्व चाहता था. जीवन और प्रकृति का नाशवान होेना उसको डराता था. मनुष्य चूंकि विराट प्रकृति के संपर्क में रहता था जो उसके लिए अबूझ पहेली थी, प्रतिक्षण रूप बदलती हुई. अतएव मनुष्य की सरल बुद्धि ने कल्पना की कि प्रकृति की संचालक शक्ति भी होनी चाहिए. चूंकि प्रकृति अपने आप में विराट थी, इसलिए मनुष्य के लिए यह कल्पना कठिन न थी कि संचालक शक्ति को उससे भी अधिक शक्तिशाली और विलक्षण प्रतिभासंपन्न होना चाहिए. चूंकि प्राणीमात्र, वनस्पति आदि का जीवन धूप, वर्षा, धरा, आकाश और अग्नि से जुड़ा हुआ था, इसलिए जैसे-जैसे व्यक्ति की बौद्धिक चेतना का विकास हुआ, मनुष्य उन दैवी शक्तियों की कल्पना करने लगा, जो इन शक्तियों यानी प्रकाश, वायु, आकाश आदि की स्वामिनी थीं. यह सूची कालांतर में मनुष्य के विकास के साथ लगातार चैड़ी होती चली गई.

उल्लेखनीय है कि विश्व का हर दर्शन बहुदेववादी परिकल्पनाओं से शुरू हुआ है. चूंकि देवताओं की परिकल्पना जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुओं की अधिष्ठाता शक्ति के रूप में की गई थी, इसलिए भारत समेत दुनिया-भर की आरंभिक दार्शनिक कल्पनाएं और वांछाएं परस्पर एक-जैसी दिखती हैं. मिश्र, बेबीलोन, सिंधु घाटी की सभ्यताओं में यद्यपि पारिस्थितिक अंतर है, मगर उनकी स्थापना करने वालों के सोच में एक सुनिश्चित साम्य है, जो दर्शाता है कि मनुष्य की आरंभिक जिज्ञासाएं, सोच चाहे वह दुनिया के किसी भी क्षेत्र में जन्मा हो, एक जैसे रहे हैं. प्राचीन ग्रीक, बेबीलोन, मेसापोटामिया, मोह-जो-दारो की सभ्यताओं में परिस्थितिकीय अंतर होने के बावजूद एक साम्य है. इसका एक कारण यह भी है कि ये सभ्यताएं व्यापारिक दृष्टि से एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं और व्यापारिक काफिले अपने यहां उत्पादित वस्तुओं के साथ-साथ सांस्कृतिक-साहित्यिक उपादानों, ज्ञान-विज्ञान, अनुभव आदि का भी आदान-प्रदान करते रहते थे.

विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक यूनानी सभ्यता अपनी समकालीन सभ्यताओं से कई मायने में विशिष्ट थी. साहित्य, कला, विज्ञान, गणित, कीमियागिरी, दर्शन, खगोल विज्ञान आदि अनेक क्षेत्रों में यूनानवासियों ने उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की थीं. उन्हें अंकगणित के आविष्कार का श्रेय प्राप्त है. ऐसा नहीं है कि आज से लगभग 2600-2400 वर्ष पहले के जिस कालखंड पर हम विचार करने जा रहे हैं, उस अवधि में एकमात्र यूनान ही वैचारिक क्रांति का केंद्र था. देखा जाए तो ईसा से 300-600 वर्ष पहले का वह कालखंड अपनी दार्शनिक उपलब्धियों के कारण पूरी दुनिया में ही अलग महत्त्व रखता है. भारत में वेदों के संकलन का कार्य पूरा हो चुका था, अगले चक्र में उनकी टीकाओं और व्याख्याओं का दौर जारी था. वैदिक कर्मकांड और पशुबलि के विरोध में महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, अजित केशकंबलि क्रमशः जैन, बौद्ध एवं चार्वाक दर्शन की आधारशिला रख चुके थे. उनके समानांतर चीन में कन्फ्यूशियस अपने क्रांतिकारी विचारों के साथ दस्तक दे रहा था. राष्ट्र की संपदा के सदुपयोग और सुशासन के समर्थन में उसका कहना था—‘सुशासनयुक्त देश के लिए उसकी निर्धनता शर्म की बात हो सकती है. पर कुशासनयुक्त देश में संपन्नता का होना ही शर्म की बात है.’1 भारत में महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, चीन में कन्फ्यूशियस ज्ञान और तर्क पर आधारित समाज की रचना करना चाहते थे. उधर यूनान में पेरामेनीडिस, हेराक्लाइटस और सुकरात कुलीनता-समर्थक सोफिस्टों को लगातार चुनौती दे रहे थे. गुरु सुकरात से प्रभावित प्लेटो ने आदर्श राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में की थी. प्रसंगवश बता दें कि रोमन साम्राज्य जहां पर सुकरात और प्लूटो जैसे दार्शनिक जन्मे अपने समय का सर्वाधिक वैभवशाली, सुव्यवस्थित साम्राज्य था. उसके अधीन एक शक्तिशाली सेना थी, जो वीरता की अनेक कीर्तिकथाएं लिख चुकी थी. रोमन साम्राज्य की शान थे वहां के वैज्ञानिक, कीमियागर, खगोलशास्त्री, साहित्यकार और दार्शनिक, जिनका यश पूरी दुनिया में फैला हुआ था. वैभव की घृणित विद्रूपताओं और मनुष्यता के लिए शर्म के रूप में वहां मौजूद थी—दासप्रथा. रोम उस साम्राज्य की राजधानी और वहां का सबसे बड़ा, वैभवशाली नगर था. यद्यपि उसकी जनसंख्या मात्र 35000 थी, जो भारत के किसी भी कस्बे की जनसंख्या जितनी हो सकती है. किंतु आज से 3200 वर्ष पहले यह जनसंख्या बहुत मायने रखती थी, विशेषकर उस स्थिति में जब उस समय के अधिकांश गांवों की संख्या 400-500 तक सिमटी होती थी तथा 1000-1200 की जनसंख्या वाली, व्यावसायिक गतिविधियों से युक्त बस्ती को नगर मान लिया जाता था. रोम की संपन्नता के कई कारण थे, उसका पहला और बड़ा कारण थीं लूरियन स्थित चांदी की वे खानें जो सफेद-चमकीली तथा बेशकीमती धातु का बड़ा भंडार थीं. उसकी संपन्नता का दूसरा कारण था संपत्ति का असमान विभाजन. कुल जनसंख्या का एक-तिहाई हिस्सा दास थे, जिनको व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया था. उनकी गिनती किसी बेजान वस्तु की भांति की जाती और पशुओं की भांति हाट-बाजार में खरीदा-बेचा जा सकता था. रोम के व्यापारी-जमींदार उन्हीं के श्रम पर विलासितापूर्ण जीवन जीते थे. मानव समुदाय के साथ ऐसा व्यवहार एथेंस की गगनचुंबी आलीशान इमारतों, वहां की समृद्धि और खुशहाली, संगीत, कला, दर्शन, विज्ञान, साहित्य, राजनीति आदि क्षेत्रों में उन्नति पर खासा व्यंग्य था. विडंबना है कि वहां का बौद्धिक समाज भी जो अपनी प्रतिभा और वैचारिक मौलिकता के लिए पूरी दुनिया पर धाक जमाए था, घृणित दासप्रथा का समर्थक था. इनमें सुकरात, प्लेटो और अरस्तू जैसे विचारक भी थे, जिनकी गिनती दुनिया के महानतम दार्शनिकों में होती है.

सच तो यह है कि ईसा से चैथी-पांचवी शताब्दी पहले तक यूनान कबीलाई संस्कृति के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाया था. विभिन्न कबीले अपने रणकौशल तथा वीरता के दम पर दुश्मनों के लिए लगातार चुनौती पेश करते रहते थे. बच्चों को यह सोचकर पैदा किया जाता था कि वे यदि लड़के हुए तो आगे चलकर देश के लिए युद्ध करेगें और यदि लड़की हो तो वह बड़ी होकर युद्ध के लिए नए सैनिक पैदा करेगी. उनके राज्य की सीमा कुछ गांवों-शहरों तक सिमटी होती थी. नगर की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर मजबूत परकोटे का होना वहां की स्थापत्य-कला की श्रेष्ठता का मापदंड माना जाता था. जिस नगर-राज्य के आसपास प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता होती, वहां के शासक को अपनी समृद्धि और ताकत बढ़ाने का अतिरिक्त अवसर हाथ लग जाता. हालांकि उसकी प्रारंभिक परिणति वैभव-विलास की पराकाष्ठा तक पहुंचने की ही होती थी. प्रकारांतर में इससे राज्य कमजोर होता. कालांतर में उसे दूसरे राज्यों-कबीलों की अधीनता स्वीकारने के लिए बाध्य होना पड़ता था. प्लेटो ने यह सब अपनी आंखों से देखा था. वह राजशाही की कमजोरियों, उनके सम्राटों की सनकों से भी परिचित था. अच्छी बात यह थी कि वह निराशावादी नहीं था. मानता था कि शिक्षा के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था को सुधारा जा सकता है. उल्लेखनीय है कि तत्कालीन सोफिस्ट विचारक भी स्वयं को शिक्षक मानते थे, किंतु उनका ध्येय लोगों को तर्क-कुशल एवं व्यावहारिक बनाना था. प्लेटो ने जब अकादमी की स्थापना की तो वहां शिक्षा का उद्देश्य अपेक्षाकृत अधिक मानवीय और लोकोन्मुखी रखा गया था. वह प्लेटो ही था जिसने जोर देकर कहा था—‘सभी मनुष्य प्राकृतिक रूप से बराबर हैं. सभी एक मिट्टी से बने, एक ही परमात्मा की संतान है, बावजूद इसके हम स्वयं को यह कहकर धोखा देता है कि कोई छोटा है, कोई बड़ा. कोई गरीब है, कोई धनवान.’ कहना न होगा कि यह प्लेटो ही है, जिसने आने वाली सहòाब्दियों तक विचारकों को तरह-तरह से प्रभावित किया है.

सुकरात

प्लेटो को समझने के लिए सुकरात के बारे में जानना आवश्यक है; और सुकरात को समझने के लिए तत्कालीन रोम को समझना जरूरी है. रोमवासियों को अपनी सभ्यता तथा संस्कृति पर गर्व था. और गर्व हो भी क्यों न! युद्धकौशल, दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, कला, साहित्य, राजनीति विज्ञान आदि के क्षेत्र में उन्होंने जो चामत्कारिक उपलब्धियां अर्जित की थीं, वे चौंका देने वाली थीं. उसके चारों ओर खेती योग्य उपजाऊ जमीन थी. आसपास के क्षेत्रों में खनिज-संपदा की बहुतायत थी. किंतु उस सभ्यता और संस्कृति की विडंबना थी कि वह मुट्ठी-भर लोगों तक सीमित थी. राजपुरुषों और राजनयिकों के अलावा भू-स्वामी, व्यापारी, उच्च पदाधिकारी आदि थोड़े ही लोग थे, जिन्हें रोम की समृद्धि का सुख प्राप्त था. बाकी लोग साधारण किसान और मजदूर थे. सामंतों और व्यापारियों की समृद्धि का वास्तविक आधार थे वे दास जिनको कुछ मुद्राओं के बदले खरीदा-बेचा जा सकता था. वे उस समय तक अपने स्वामी की इच्छानुसार काम करने को विवश होते थे, जब तक उन्हें कोई दूसरा स्वामी खरीद नहीं लेता था, अथवा एक तयशुदा कीमत का भुगतान करने के बाद वे स्वयं को स्वतंत्र कराने में कामयाब नहीं हो जाते थे. वे दास खेतों में काम करते, हाट-बाजार में बोझा ढोते, जानलेवा हालात में खानों से चांदी, तांबे आदि धातुओं के अयस्क का दोहन करते थे. खतरे के जितने भी काम थे, और जिनके लिए कठिन परिश्रम की दरकार थी, वे सभी दासों द्वारा कराए जाते थे. इसके अलावा हर वह काम जिससे स्वामी को संतुष्टि मिलती हो, उसका हित-साधन होता हो, करना दास के कर्तव्य में शुमार था. स्वामी का हित दास का हित माना जाता था. इस व्यवस्था का अतिक्रमण करने वाले को दंडित करने का अधिकार स्वयं उसके स्वामी को होता था. खुद को दुनिया का सर्वाधिक सभ्य राज्य मानने वाले रोम में दासों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई अदालत, न्याय-व्यवस्था न थी. वे दोपाये के रूपाकार में चैपाये थे.

एक अनुमान के अनुसार 431 ईस्वी पूर्व एथेंस, जो प्राचीन यूनान सबसे बड़ा और सर्वाधिक समृद्ध नगर-राज्य था, की जनसंख्या लगभग 3,05,000 थी. उसमें 1,20,000 दास, 25,000 मुक्त दास तथा शेष 1,60,000 एथेंस के नागरिक थे. मुक्त दास अर्थोपार्जन के लिए मजदूरी और छोटे-मोटे काम करते थे. एक श्रेणी ऐसे श्रमिकों की थी, जिनकी स्थिति दासों एवं मुक्त दासों के बीच थी. दास की हर सांस उसके मालिक की गुलाम होती थी. मालिक अपने लाभ को ध्यान में रखकर दासों को मंडी में खरीदता-बेचता था. नाराज होने पर मालिक को अपने दास की चमड़ी उधेड़ लेने का अधिकार था. कई दिनों तक भोजन न देने की सजाएं तो आम थीं. उन दिनों रोम के खाए-पिए, अघाये वर्ग का एक और घृणित शौक था, अपने गुलाम लड़ाकों को दूसरे अमीर के गुलाम लड़ाकों से लड़वाना. यह लड़ाई शौकिया कुश्ती जैसी न थी. दोनों लड़ाकों को बरछी, भाले आदि हथियारों के साथ अखाड़े में उतरना पड़ता था. उसके चारों ओर तमाशबीन दर्शकों का हुजूम होता था. जोश में चीखते, चिल्लाते, हुंकार मारते हिंस्र दर्शक, जोश में पागल, उन्मादित भीड़ होश खोती नजर आती. घाव खाए लड़ाकों की देह से छलकता खून उनके जुनून को और बढ़ा देता. मैदान पर गुलाम लड़ाके एक-दूसरे को मरने-मारने पर उतारू होते. वह लड़ाई तभी समाप्त होती, जब विजयी लड़ाका दूसरे को मौत के हवाले कर चुका होता. गुलाम लड़ाकों को जिन्हें गिलेडियेटर कहा जाता था, की हार-जीत पर अमीर लोग दाव लगाते. उनके घावों की संख्या और गहराई पर जुआ खेला जाता था. लड़ाई में भाग लेने से इनकार करना, पीछे हटना संभव न था. आदेश का पालन न करना अपराध होता. आदेश का उल्लंघन करने वाले ग्लेडियेटर को मृत्युदंड देने का अधिकार उसके स्वामी के पास होता.

आपसी स्पर्धा और वर्चस्व भावना के चलते अक्सर युद्ध होते रहते थे. चूंकि राज्य छोटे होते थे, इसलिए सम्राट की निजी महत्त्वाकांक्षाओं और सनकों से भी वे प्रभावित होते थे. राजाओं के बीच युद्ध के कारण भी बहुत मामूली, किंतु उनसे होने वाली तबाही बहुत बड़ी होती थी. इतिहास विदित है कि रामायण और महाभारत के युद्ध स्त्री पर अधिकार की भावना को लेकर लड़े गए थे. इसी प्रकार ट्राय का प्रसिद्ध युद्ध भी एथेंस की राजकुमारी के लिए लड़ा गया था. इसलिए प्लेटो के जमाने से ही एक ऐसी राजनीतिक आचार संहिता की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी, जिससे राज्यों के बीच सामंजस्य की भावना को विस्तार दिया जा सके. प्लेटो ने राज्य के सुख एवं समृद्धि के लिए जहां दार्शनिक सम्राट की अभिकल्पना प्रस्तुत की, वहीं उसका शिष्य अरस्तु एक मजबूत साम्राज्यवादी केंद्र की स्थापना के पक्ष में था. भारत में भी अरस्तु का समकालीन ब्राह्मण चाणक्य, अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘अर्थशास्त्र’ में एक स्वयंप्रभुता संपन्न मजबूत केंद्र की वकालत करता है. वस्तुतः उन दिनों छोटे-छोटे कबीलाई समाजों को एक बड़े समाज में ढालना सचमुच एक बड़ी चुनौती थी. इस लक्ष्य को कुछ लोग धर्म के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे और कुछ राजनीति के.

जिस समाज का इतना विकट समाजार्थिक विभाजन हो, वहां ज्ञान-विज्ञान का संपन्न वर्ग के हाथों का खिलौना बन जाना सामान्य बात थी. सोफिस्ट अघाए हुए लोगों की जमात थी. ‘Sophism’ शब्द की उत्पत्ति ही ग्रीक शब्द ‘Sophisma(Sophizo)’ से हुई थी, जिसका अभिप्राय है—‘मैं बुद्धिमान हूं’ अथवा ऐसे व्यक्ति से है, जो ज्ञानार्जन के व्यवसाय से जुड़ा हो. सोफिस्ट लोग स्वयं को यूनान का बौद्धिक प्रतिनिधि मानते थे. बहुत गर्व था उन्हें अपनी सभ्यता और संस्कृति पर. इसके बावजूद यूनान में उन दिनों को सार्वजानिक स्कूल न था. शिक्षा निजी स्कूलों में प्रदान की जाती थी. इसलिए केवल संपन्न वर्ग ही शिक्षा ग्रहण कर पाता था. स्त्रियों को ऊंची शिक्षा देने का प्रावधान न था. वे बस घर-परिवार की देखभाल करती थीं. समाज में लैंगिक विभाजन था. नर संतान को जन्म देना गर्व की बात थी. सोफिस्टों का मानना था कि शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य लोगों को व्यवहार-कुशल बनाना है. विद्यार्थी को यह सिखाना है कि प्रतिष्ठित लोगों के आचार-विचार कैसे हों. उनके बीच होने पर व्यवहार कैसे किया जाए. कैसे अपनी बौद्धिकता की धाक दूसरों पर डाली जाए. वाक कला में निपुण कैसे बना जाए. इसके लिए वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहते थे. अध्यापन के लिए सोफिस्ट मोटी शुल्क वसूलते थे—अकसर वे किराये पर कमरा ले लेते थे, जहां वे अभिजात्य वर्ग की संतान, जो अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर चुके हों अथवा जिनकी वयस् 16 वर्ष से अधिक हो, को उच्च शिक्षा प्रदान करते थे. इसके बदले वे पर्याप्त शुल्क वसूलते थे…वे अनेक विषयों की शिक्षा देते थे. किंतु उनमें बातचीत के दौरान दूसरों को सम्मोहित कर देने की कला, ‘वक्तृत्व कला’ प्रमुख थी. ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में सोफिस्टों की धाक इतनी थी कि आदर्शराज्य की परिकल्पना करने वाला प्लेटो भी उनसे प्रभावित था. उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के बारे में प्लूटो ने अपनी संवाद पुस्तक ‘ज्योर्जिया’ में लिखा है कि—

‘यह ऐसी शक्ति है, जिसके द्वारा जज को अदालत में, सीनेटर को परिषद में, लोगों को विधायिकाओं में तथा नागरिक सभाओं में उपस्थित वृहद जनसमुदाय को प्रभावित किया जा सके.’

स्पष्ट है कि उस समय शिक्षा का उद्देश्य विशुद्ध भौतिक मूल्यों से प्रभावित था. अपने समय के महान सोफिस्ट प्रोटेगोरस का शिक्षा के बारे में मानना था—

‘मैं अपने विद्यार्थियों को व्यक्तिगत मामलों के विधिवत प्रबंधन के तरीके सिखाऊंगा, ताकि वे कर्मयोगी गृहस्थ और कुशल राजनयिक की भांति अपनी गृहस्थी की साज-संवार के साथ-साथ सरकार से जुड़े मामले भी भली-भांति संभाल सकें; तथा नगर की निर्णायक शक्ति बन सकें.’

ढाई हजार साल पहले के जिस समय के यूनान की बात हम कर रहे हैं, वहां सोफिस्ट अघाए हुए लोगों का परजीवी समाज था. दासों के रहते उन्हें स्वयं श्रम करने की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उनके पास सिवाय मौजमस्ती और वाक्-विलास के और कोई काम न था. उनकी तुलना हम भारत के पुरोहितवर्ग से कर सकते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि पुरोहितवर्ग अतींद्रिय सत्ता के नाम पर लोगों को छलते थे. धर्म का डर दिखाकर वे अपनी स्वार्थ-सिद्धि में लिप्त रहते थे. भौतिकवादी सोफिस्ट ऐंद्रियिक सुख को महत्त्व देते थे. उनका नारा था—‘खुद को जानो.’ उनका शुभ वस्तु में निहित था, प्राकृतिक उपादानों में निहित था. इसलिए वह ऐसी शिक्षा पर जोर देते थे जिससे मानवजीवन को सुख एवं समृद्ध बनाया जा सके. वे समाज की ऐसी मनोरचना के निर्माण में मदद करते थे, जो सामंतों और दास-व्यापारियों के हितानुकूल थी. उनका मानना था कि मनुष्य प्रकृति से ही एक-दूसरे से भिन्न है. वह कमजोर और शक्तिशाली वर्गों में बंटा है. शक्तिशाली वर्ग की जिम्मेदारी है कि वह कानून बनाए तथा उनके पालन की समुचित व्यवस्था भी करे. और जो कमजोर हैं, जिनमें शासन करने की योग्यता का अभाव है, उनका यह दायित्व है कि वे अपनी स्थिति को समझें और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में शक्तिशाली वर्ग की मदद करें. ज्ञान को वे सापेक्ष मानते थे. हालांकि इस बारे में उनमें स्वयं की इतने मतभेद थे कि बहसों का अंत अकसर अनिश्चितता में होता था. प्राचीन यूनानी मान्यता थी कि ‘अधिकार वही सम्मान्य हैं, जो न्यायाधारित सिद्धांतों द्वारा विकसित हों.’ और न्याय वह है जो राज्य को सुखी, समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाने में सहायक हो. सामंतों द्वारा दी गई सुख-सुविधाओं का लाभ उठाने वाले सोफिस्टों ने इसके आधार पर उन अधिकारों को मान्य ठहराया था, जिन्हें शक्तिशाली वर्ग न्याय की स्थापना के लिए अत्यावश्यक मानता है. सोफिस्टों में से कुछ विवेकवान और मौलिक प्रतिभाशाली विद्वान भी रहे. उन्होंने यूनानी समाज में गणतांत्रिक विचारधारा के पक्ष में आवाज उठाई, जिसका प्रभाव प्लेटो के लेखन पर भी पड़ा. यद्यपि उनका गणतंत्र आधुनिक लोकतंत्र से एकदम भिन्न, एक तरह का अधिनायकवाद ही था.

ऐसे ही वाक्-निपुण समाज में 469 ईस्वी पूर्व सुकरात का जन्म हुआ था. कुछ विद्वान सुकरात के जन्मवर्ष को 470 ईस्वी पूर्व मानते हैं. सुकरात के पिता सोफरोनिक्स्कस मूर्तिकार थे. मां फिनेरिट नर्स थीं. उसकी शिक्षा-दीक्षा के बारे में अत्यल्प सूचनाएं प्राप्त हैं. मगर उसके चिंतन से जो प्लेटो के लेखन में विस्तार लेता है, इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि वह साधारण पढ़ा-लिखा, मगर विलक्षण मेधा संपन्न विचारक था. प्राचीन यूनानी दर्शन का बोध उसके स्वाध्याय का सुफल था. अपने चिंतन से उसने पूरे यूनानी दर्शन को प्रेरित-प्रभावित करने का काम किया; और अपनी मौलिकता, बौद्धिक तेजस्विता की चमक में पूर्ववर्ती विचारधाराओं के प्रभाव को करीब-करीब धुंधला कर दिया. इस बात के भी संकेत हैं कि आजीविका के लिए उसने प्रारंभ में अपने पिता के पेशे को अपनाया. कम अवस्था में ही उसका विवाह जेनथिप्पी नामक स्त्री से हो गया. जेनथिप्पी उम्र में सुकरात से बहुत छोटी थी. सुकरात के तीन पुत्र हुए जिनका नाम था—लेंप्रोक्लिस, सोफरोनिक्स्कस तथा मेनीजीनस. मंझली संतान सोफरोनिक्स्कस का नामकरण अपने दादा के नाम किया गया था. परिवार की आर्थिक स्थिति खस्ता थी. पत्नी और परिजन चाहते थे कि सुकरात अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए परिवार के भरण-पोषण का दायित्व संभाले. किंतु सुकरात का मन दार्शनिक चिंतन में लगता था. सृष्टि के गूढ़ रहस्यों के उद्घाटन की कोशिश के समय उसकी मेधा चामत्कारिक रूप से बहुत ही उग्र होती थी. पारिवारिक दायित्वों से निरपेक्ष, अपनी गरीबी की परवाह किए बिना ही सुकरात ने स्वयं को दर्शनशास्त्र के अध्यापन के लिए समर्पित कर दिया था. ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि सुकरात की पत्नी जेनथिप्पी चिड़चिड़ी महिला थी. इस कारण उसकी आलोचना भी की जाती है. मगर हमें याद रखना चाहिए कि दार्शनिक के रूप में पूरी दुनिया में पहचाना जाने वाला सुकरात भी पति के रूप में आदर्श इंसान न था, जबकि जेनथिप्पी की मनोरचना साधारण गृहस्थन की थी, जो अपने परिवार के सुख में ही अपना सुख और शांति तलाशती थी. अतएव पति के व्यवहार से उसका खिन्न हो उठना स्वाभाविक ही था.
सुकरात की मेधा विलक्षण थी. उसका काम था सोचना, सोचना और सिर्फ सोचना. युवा होने पर वह सेना में भर्ती हो गया. एक वीर सैनिक के रूप में मेनटाइना के युद्ध में हिस्सा लेकर उसने अपने कमांडर अल्सीबियाड की प्राणरक्षा भी की थी. यह प्रशंसनीय कार्य था, किंतु सुकरात की नजर में यह कोई बड़ी बात न थी. वह स्वयं को शिक्षक मानता था. युद्ध में दर्शायी गई वीरता और देशभक्ति के लिए प्रशंसा किए जाने पर सुकरात की प्रतिक्रिया थी कि बजाय इसके वह युवकों को सिखाना पसंद करेगा, ताकि उनके व्यक्तित्व को संपूर्ण तथा कानून के प्रति आज्ञाकारी बनाया जा सके. वह चाहेगा कि युवकों की ऐसी पीढ़ी तैयार हो जो कानून पर दंभ करने के बजाय, उसके प्रति विनम्रतापूर्वक समर्पित हो तथा आवश्यकता पड़ने पर सच के लिए सर्वस्व बलिदान कर सके. सुकरात के इन विचारों से सोफिस्ट विचारकों को अधिक आपत्ति न थी, किंतु शिक्षक के रूप में सीधे संवाद करने का सुकरात का तरीका और उसके कटाक्ष उनको चुभते थे. सोफिस्टों की विलास-प्रियता के कारण एथेंस का लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल चुका था. सुकरात ऐसे गणतंत्र का तीव्र आलोचक था. उसकी आलोचना किताबी न थी. बल्कि सीधे जनता के बीच जाकर अपने विचार रखता था. परिणाम यह हुआ कि सुकरात के आलोचकों और दुश्मनों की संख्या लगातार बढ़ने लगी. दूसरी ओर समाज में ऐसे लोगों की संख्या भी पर्याप्त थी, जो सोफिस्टों के दंभी रवैये से खिन्न थे. जिन्हें शिक्षण के प्रति उनका व्यावसायिक दृष्टिकोण एकदम नापसंद था. सुकरात सोफिस्टों पर सीधा प्रहार करता था. उसके तर्क इतने पैने तथा कटाक्ष इतना तीखा होता था कि सामने वाला बगलें झांकने लगता था. सोफिस्टों के व्यवहार से खिन्न लोगों को उसकी व्यंग्योक्तियां भली लगती थीं. सुकरात का प्रभाव जनमानस पर बढ़ता ही जा रहा था. दूसरी ओर उसके आलोचक उसका मुंह बंद करने का बहाना खोजते रहते थे. आखिर सुकरात को दबाने के लिए एक न्यायिक मंडल का गठन किया गया. मेलीटस, एनीटस और लायकन उस मंडल के सदस्य थे. तीनों ही सुकरात से खार खाते थे. सुकरात पर आरोप लगाया गया कि वह प्रजा की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है, स्थापित दैवी सत्ताओं को अपदस्थ पर वह नई शक्तियों को आरोपित करना चाहता है. उसपर नवयुवकों को बिगाड़ने, उन्हें भ्रमित करने का आरोप भी लगाया गया.
दुनिया के उस सर्वाधिक चर्चित मुकदमे के दौरान सुकरात ने न केवल स्वयं का बचाव किया, बल्कि न्यायिक मंडल के तीनों सदस्यों को स्पष्ट शब्दों में सावधान किया कि वे अपनी अज्ञानता के कारण सचाई से मुंह मोड़ रहे हैं. और इस तरह वे स्वयं का ही उत्पीड़न कर रहे हैं. चूंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, इसलिए यह मानते हुए कि वे जो कर रहे हैं, उसमें उसका कोई योगदान नहीं है, सुकरात ने उन्हें क्षमा करने का भरोसा भी दिया था. उसने जोर देकर किया कि वह केवल अपनी आत्मा के आगे नत है, न कि किसी बादशाहत के. सुकरात के इस बयान को राष्ट्रद्रोह मानते हुए उसको क्षमायाचना करने का निर्देश दिया गया. जिसे सुकरात ने यह कहते हुए नकार दिया कि अनैतिक सत्ता के आगे झुकने के बजाय वह मृत्यु का वरण करना श्रेयस्कर समझेगा. सुकरात को मृत्युदंड सुनाया गया. मगर उसपर कार्यवाही को एक महीने तक, जब तक कि डेलोस की यात्रा पर गया पवित्र जहाज वापस नहीं लौट आता, टाल दिया गया. एथेंस की परंपरा थी कि अपनी सालाना यात्रा पर डेलोस गया जहाज जब तक लौट नहीं आता था, तब तक वहां किसी को मृत्युदंड नहीं दिया जाता था.

जहाज के लौटने तक, पूरा एक महीना सुकरात ने मृत्यु की तैयारी में बिताया था. प्लेटो अपने गुरु के अंतिम दिनों के एक-एक पल का साक्षी था. उस समय सुकरात उसको निडर महात्मा लगा था, जिसको मृत्यु का कोई भय नहीं था. जिसने अपनी सिद्धांतनिष्ठा को जीवन से अधिक महत्त्व दिया था. सुकरात को मृत्युदंड सुनाए जाने पर एथेंस की प्रजा भी क्षुब्ध थी. उसमें आक्रोश पनप रहा था. बढ़ते जनाक्रोश और चैतरफा आलोचनाओं से घबराकर एथेंस के शासकों ने सुकरात के आगे यह प्रस्ताव भी भेजा था कि यदि वह अब भी अपने शब्दों को वापस लेने तथा स्थापित मान्यताओं का सम्मान करने को तैयार हो तो उसको दी गई सजा में कमी की जा सकती है. इस प्रस्ताव को सुकरात ने सिरे से नकार दिया. सुकरात के शिष्य भी उसको कारावास से बाहर निकालने के लिए प्रयासरत थे. उसका एक शिष्य क्रीटो उसको कारावास से भगा लाने की योजना बनाकर उससे मिलने कारागार में पहुंचा था. मगर सुकरात ने यह कहकर वह अपने देश का कानून तोड़ने की जिम्मेदारी अपने सिर पर हरगिज नहीं ले सकता, क्रीटो को वापस लौटा दिया. अंतिम समय में जब सुकरात को जहर दिया जा रहा था तो अंतिम समय भी उसके चेहरे पर शांति और तेज था. ईसापूर्व 399 का वह वर्ष था. प्लेटो उस समय अपनी उम्र के अठाइसवें वर्ष में चल रहा था.

सुकरात की प्रवृत्ति तर्क करते हुए समाधान तक पहुंचने की थी. अपने शिष्यों और विरोधियों के साथ वह घंटों तक बहस कर सकता था. यह बहस दूसरों पर अपने बौद्धिक सामथ्र्य की छाप छोड़ने के लिए नहीं होती थी, बल्कि उसकी कोशिश होती थी कि लोगों के अंतर्मन में छिपे ज्ञान को बाहर खोज निकालने की. उसका मानना था कि ज्ञान शुभत्व के रूप में प्रत्येक आत्मा के साथ विराजमान रहता है. आवश्यकता उसको उदीप्त करने की होती है, ताकि वह बाहर आ सके. वार्तालाप को वह उदीपन का माध्यम समझता था. यद्यपि उसका लिखा हुआ सामने नहीं आता, मगर प्लेटो की पुस्तकों से उसके ज्ञान, तर्क-सामथ्र्य एवं विचारधारा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है. प्लेटो के अनुसार सुकरात का होना सोफिस्टों के लिए एक चुनौती थी. उन परंपरावादियों के लिए चुनौती थी, जो निहित स्वार्थ के लिए रूढ़ियों और अज्ञानताओं को ढोए जा रहे थे. सुकरात सोफिस्टों से एकदम भिन्न था. उन्हें जहां अपने ज्ञान पर गुमान था, वहीं सुकरात स्वयं को जिज्ञासु मानता था. वह अपनी सीमाओं से भली-भांति परिचित था. ज्ञान के विशाल सागर के समक्ष वह स्वयं को पिपासु की तरह समझता. वह सदैव ज्ञान की खोज में तत्पर रहता था. इसके विपरीत सोफिस्ट अपने अहम् से तने-तने रहते थे. उन्हें अपने ज्ञान से ज्यादा गुमान था. बातचीत के दौरान भी सुकरात खुद का अज्ञानी बताता. सदैव शांत बना रहता. अपनी प्रश्नाकुलता और धैर्य के साथ. फिर भी कुछ लोग उसकी प्रश्नाकुलता को नाटक मानते थे. उनके अनुसार सुकरात की जिज्ञासा बनावटी थी. वे न जानने का मिथ्या आडंबर रचते हैं—यह कहने वाले, सुकरात से ईष्र्या करने वाले भी कम न थे. वे इस बात से अनजान बने रहते थे कि सुकरात ज्ञान के नाम पर सूचना अथवा उसके किसी एक पहलू से संतुष्ट हो जाने वाला जीव नहीं है. वह प्रत्ययों को उनकी समग्रता के साथ जानना चाहता है. समस्या के प्रत्येक पहलू पर गंभीर विमर्श करना और संवाद के दौरान विनयशील बने रहना, सुकरात की अपनी शैली है. वे ज्ञान को उसकी समग्रता के साथ जानना चाहते हैं. परंतु अपनी सीमाओं से भी परिचित हैं. जानते हैं कि उम्र का आधा पड़ाव पार कर लेने के बाद भी उनका ज्ञान अभी अधूरा है. दुनिया में अनेकानेक ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में वे कुछ नहीं जानते. पर वे सचेत हैं. इसलिए हर पल कुछ सीखने को उत्सुक बने रहते हैं. यह बिना अपनी अल्पज्ञता को समझे संभव नहीं. इसलिए सुकरात का मानना था कि उन्हें अपने अज्ञान का ज्ञान है.

पर जिसे अपने अज्ञान का ज्ञान हो, उसके बारे में डेल्फी की भविष्यवक्ता यह कहे कि वह एथेंस का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है, यह तो चैंकाने वाली बात ही हुई न! सुकरात भी चैंके बिना नहीं रहे थे. उन्हें यह विश्वास ही नहीं था कि डेल्फी की भविष्यवक्ता उनके बारे में इस प्रकार की कोई टिप्पणी कर सकती है. पर यह दावा भविष्यवक्ता पाइथिया का ही था. सुकरात के मित्र केरिफोन के समक्ष किया हुआ. केरीफोन ने पाइथिया से प्रश्न किया था—

‘क्या एथेंस में सुकरात से बड़ा कोई ज्ञानी है?’

‘नहीं!’

पाइथिया का उत्तर था. एथेंस के सभी नागरिक पाइथिया पर भरोसा करते थे. उसको मानते थे. फिर वह भला झूठ क्यों बोलेगी. अगली बार केरीफोन जब सुकरात से मिला तो खुशी-खुशी उसको उस टिप्पणी के बारे में बताया. सुकरात स्तब्ध! यह कैसे संभव है कि एथेंस में उनसे बड़ा कोई ज्ञानी ही न हो. कोई दूसरा होता तो इस बात पर फूलकर कुप्पा हो जाता. नहीं तो ज्योतिषी की गल्पकथा मानकर उपेक्षित कर देता. पर सुकरात तो सुकरात. बिना परिक्षण के भरोसा कैसे करें. सोचा, इस बहाने क्यों न एथेंस के ज्ञानी कहे जाने वाले लोगों की परीक्षा ले ली जाए? सच अपने आप सामने आ जाएगा.

सबसे पहले वे एथेंस के बड़े राजनेता के पास पहुंचे. बड़ा नाज था उसे खुद पर. लोग भी उसको सर्वगुण-संपन्न मानते थे. उससे बातचीत के दौरान सुकरात जान गए कि उसे दूसरी बातों के बारे में तो दूर, राजनीति का भी ढंग का ज्ञान नहीं है. पर गुमान इतना करता है कि जैसे सबकुछ जानता हो. कि जितना वह जानता है, उतना दूसरा कोई जान भी नहीं सकता. जब सुकरात ने उसका उसके अज्ञान से परिचय कराया, बताया कि कितनी ही ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में उसका ज्ञान शून्य है—इसपर वह नाराज हो गया. उसने मन ही मन सुकरात को सबक सिखाने की ठान ली. सुकरात के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. मित्र कोई बने न बने, दुश्मन वे रोज बनाते थे. सुकरात को उस अज्ञानी नेता से भी सीखने को ही मिला. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि—‘इस राजनेता की तुलना में मैं अधिक ज्ञानी हूं, इस अर्थ में कि मैं कम से कम उसके बारे में तो जानता हूं, जो मैं नहीं जानता. जबकि यह राजनेता तो यह भी नहीं जानता कि यह कुछ भी नहीं जानता. अगले चरण में सुकरात ने कवियों से मुलाकात की. ज्ञान की परख के समय कवि महोदय भी बगलें झांकते हुए नजर आए. सुकरात को बड़ी निराशा हुई. उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि भावातिरेक में कविगण ऐसी रचना कर बैठते हैं, जिनके अर्थ के बारे में वे स्वयं भी कुछ नहीं जानते. ऊपर से हर पल अपने विशिष्टताबोध से दबे-दबे रहते हैं. अहंकार इतना करते हैं, मानो भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों पर नजर रखते हों. सुकरात ने जब उन्हें उनके अज्ञान का परिचय कराया तो वे भी नाराज हो गए. उनके दुश्मनों की संख्या में एक और बढ़ गया. अगली बार वे हस्तशिल्पियों से मिले. जिनके हुनर की चर्चा एथेंस के गली-कूंचों में होती थी. सुकरात को वहां अनेक बातें सीखने को मिलीं. अच्छा लगा. अभी तक के प्रयास में यह पहला अवसर था, जब उन्हें कुछ सीखने को मिला था. कुछ ऐसा जिसके बारे में वे उससे पहले कुछ नहीं जानते थे. पर बातचीत के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राजनेता और कवियों की तरह शिल्पियों को भी बहुत कुछ जानने का अहंकार है. वे क्या नहीं जानते, इस बारे में उनमें से कोई जानना ही नहीं चाहता. अपने कार्यक्षेत्र से बाहर उनकी जानकारी अत्यल्प है, पर यह बात उनमें से कोई जानना ही नहीं चाहता. अपने अज्ञान के बारे में जानना सबसे कठिन काम होता है. इस घटना के बाद भी उसने अपना शोध जारी रखा. आखिर में वे इस निर्णय पर पहुंचे कि एथेंस में उनसे बढ़कर सचमुच कोई ज्ञानी नहीं है—

‘लोग ठीक ही कहते हैं कि सुकरात सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है…क्योंकि उसको अपने अज्ञान का ज्ञान है.’
यह घटना स्वयं सुकरात द्वारा अपने मुकदमे की सुनवाई के दौरान बयान की थी. उसने बताया था कि वे सभी लोग जिन्हें उसने अपने उक्त घटना के समय परखा था, इस मुकदमें में प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं. ऐसे ही गुरु के बारे में प्लेटो का कहना था—‘मैं ग्रीक हुआ, गंवार नहीं हुआ. पुरुष हुआ स्त्री नहीं हुआ. स्वतंत्र हुआ, गुलाम नहीं हुआ. पर सबसे बढ़कर मेरा सौभाग्य है कि मैं सुकरात के युग में पैदा हुआ.’

सुकरात प्रसिद्ध पेलोपेनिशियन युद्ध में भी हिस्सा ले चुका था. उसकी बहादुरी बेमिसाल थी. एक बार तो जान पर खेलकर उसने अपने कप्तान की प्राणरक्षा भी की थी. उस युद्ध में एथेंस की पराजय हुई थी. किंतु युद्ध के पश्चात एक चर्चा के दौरान एक सैन्य अधिकारी ने कहा था कि यदि सभी सैनिक उतनी ही वीरता से लड़े होते जितनी सुकरात, तो एथेंस की पराजय को विजय में बदला जा सकता था. सुकरात को अपने मन-मस्तिष्क पर कमाल का नियंत्रण प्राप्त था. वह एक ही विषय पर घंटों तक एकाग्र रह सकता था. खड़े-खड़े, चलते-फिरते सोच सकता था. जो सुकरात के स्वभाव से परिचित थे, उनके लिए तो यह नई बात न थी. पर जो अनभिज्ञ थे, उन्हें यह देख बड़ा ही आश्चर्य होता था. सुकरात एक ही स्थान पर दत्तचित हो कब तक खड़े रह सकते हैं, यह देखने वाले उनके आसपास जुटने लगते. कुछ ही देर में भीड़ जुट जाती. कुछ लोग तो अपना बिस्तर उठाकर सुकरात के आसपास की बैठ जाते. धीरे-धीरे दिन ढलता, शाम होती और उसके साथ ही रात अपनी रंगत बिखेरने लगती. सुकरात को समाधिस्थ अवस्था में देखने वालों की भीड़ लगातार बढ़ती जाती. फिर सुबह होती. न जाने कब सुकरात समाधि से बाहर आते और किसी की ओर देखे बिना आगे बढ़ जाते.

एक घटना का उल्लेख प्लेटो के संवाद ‘सिंपोजियम’ में हुआ है. सुकरात एक बार नहा-धोकर घर से बाहर निकलते. एरिस्टोडोमस ने देखा तो चौंका. ऐसा कम ही होता था. वरना सुकरात तो अपने आप से हमेशा बेपरवाह नजर आते थे.

‘आज कहां चले?’ सुकरात को सजे-संवरे देख एरिस्टोडोमस ने पूछा.

पता चला कि सुकरात को एक मित्र ने दावत पर बुलाया है. उसके कहने पर एरिस्टोडोमस भी साथ हो लिया. दोनों चर्चा करते हुए गंतव्य की ओर बढ़ने लगे. मित्र के घर पहुंचने से कुछ ही पहले सुकरात ने एरिस्टोडोमस से आगे बढ़ जाने को कहा. उसने आज्ञा का पालन किया. भीतर जाकर एरिस्टोडोमस ने मेजबान को सुकरात के पहुंचने की सूचना दी. मित्र सुकरात की अगवानी के लिए बाहर आया तो देखा कि वह सड़क किनारे समाधिरत हैं. उन्हें देखने वाले हैरान रह गए. मेजबान कुछ देर वहीं खड़ा देखता रहा और जब सुकरात की समाधि अखंड रही तो भीतर जाकर मित्रों को भोजन कराने लगा. इस काम में ही शाम हो गई. सहसा सुकरात की समाधि भंग हुई. उन्हें याद आया कि वे तो मित्र के यहां भोजन पर आमंत्रित थे. लेकिन भीतर जाकर उन्हें पता चला कि दावत तो कभी की समाप्त हो चुकी है. सभी मेहमान लौट चुके हैं.
ऐसे मन से प्रबल जिज्ञासु और कर्म से घुमक्कड़ सुकरात का सान्न्ध्यि प्लेटो को मिला. मात्र बीस वर्ष की कल्पनाशील अवस्था में प्लेटो सुकरात के संपर्क में आया था. मनुष्य और समाज के बारे में सुकरात के आदर्श सोच, जीवन और सचाई के प्रति गंभीर निष्ठा तथा उसके मौलिक चिंतन से वह बेहद प्रभावित हुआ. सुकरात ने जोर देकर कहा था समाज की इकाई होने के बावजूद मनुष्य महत्त्वपूर्ण है. सुकरात की सिद्धांतनिष्ठा तथा उसके मानवतावादी सोच का असर प्लेटो के पूरे चिंतन पर छाया हुआ है. इतना गहरा कि स्वयं एक भी शब्द न लिखने वाला सुकरात ढाई हजार वर्षों से दुनिया के महानतम दार्शनिक और मानवता के शिक्षक के रूप में ख्यात है. प्लेटो की लगभग सभी पुस्तकों में उसकी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष उपस्थिति है.

प्लेटो का जन्म

यूनान के इतिहास में ईसापूर्व पांचवी शताब्दी का कालखंड बहुत ही हलचल-भरा था. उस दौर में सुकरात अपने मौलिक दर्शन के साथ विद्रोही मुद्रा में था. स्वयं को ज्ञान का भंडार मानने तथा शिक्षा का व्यापार करने वाले सोफिस्टों को वह कदम-कदम पर चुनौती दे रहा था. वह समय ही कुछ ऐसा था, जब दार्शनिक चेतना की लहर दुनिया के प्रत्येक कोने में छाई हुई थी. उसके लगभग डेढ़ शताब्दी पहले भारत में महावीर स्वामी (599 —527 ईस्वी पूर्व) का अवतरण हो चुका था. बौद्धधर्म के प्रणेता गौतम बुद्ध (550—480 ईस्वी पूर्व) यद्यपि उस समय तक निर्वाण प्राप्त कर चुके थे, किंतु उनके द्वारा चलाए गए धर्म ने संसार-भर का ध्यान आकर्षित किया था. भारत समेत विश्व-भर में उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी. भारत से यूनान आने वाले व्यापारी दलों में बौद्ध भिक्षु भी धर्मयात्राएं करते थे. गौतम बुद्ध तथा महावीर स्वामी दोनों का संबंध राजपरिवारों से था, किंतु साधारण राजा की भांति वैभव और विलासितापूर्ण जीवन जीने के बजाय उन्होंने ज्ञान और सत्य के अनुसंधान की राह चुनी. उसके माध्यम से उन्होंने धर्म और परंपरा के नाम पर थोपे जा रहे कर्मकांडों, पोंगापंथी रीति-रिवाजों का विरोध करते हुए, वैज्ञानिक चेतना और व्यावहारिक सोच को जीवन में उतारने पर जोर दिया. सुकरात और प्लेटो पर जैन तथा बौद्ध मान्यताओं का कितना प्रभाव पड़ा यह कहना तो कठिन है, परंतु सुकरात जैसा दार्शनिक भारत से आ रही नई से पूरी तरह अनभिज्ञ हो, यह असंभव है. दोनों के बीच इतनी समानता तो थी ही कि उन्होंने एक नई दार्शनिक दृष्टि से अपने-अपने समाज को परिचित कराया तथा एक न्यायाधारित व्यवस्था की स्थापना पर जोर दिया.

प्लेटो का जन्म बड़े ही हलचल-भरे समय में, 21 मई, 430 को ईसा पूर्व एथेंस में हुआ था. प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार अपोलोंडरस के अनुसार जन्म का वर्ष 428 ईसा पूर्व है. यूनान की प्राचीन समय गणना पद्धति के अनुसार वह थारगेलियन का महीना था, अठासीवें ओलंपियाड का पहला वर्ष. प्लेटो के जन्म स्थान को लेकर भी मतभेद है. कुछ विद्वान एथेंस को उसकी जन्मस्थली मानते हैं तो कुछ के अनुसार उसका जन्म एथेंस के निकटवर्ती टापू एजीना पर हुआ था. प्लेटो के परिवार की गिनती यूनान के प्रतिष्ठित परिवारों में होती थी. पिता ऐरिस्टोन एथेंस के सम्राट कोडरस के वंशज थे. उसकी मां का नाम पेरिक्टिओन था. तीन भाइयों में सबसे छोटे प्लेटो के एक बहन भी थी, नाम था—पोटोन. शेष दो भाइयों का नाम ग्लुकोन तथा एडीमेंटस था. उसके मामा चारमिंडस का संबंध भी अभिजात्य कुल से था. मां का संबंध भी एथेंस के जाने-माने परिवारों से था. प्लेटो का एक चाचा एथेंस की तीस सदस्यीय परिषद का सदस्य था.

स्पष्ट है कि राजनीति के तत्व प्लेटो को विरासत में मिले थे. उसका असली नाम अरिस्टोले था. प्लेटो उसके दादा का नाम था. उन्हीं के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करने के लिए अरिस्टोले ने अपना उपनाम ‘प्लेटो’ रख लिया. कुछ विद्वानों का मत है कि यह उपनाम, जिससे वह पूरे विश्व में जाना-माना जाना जाता है, प्लेटो के अध्यापक ने दिया था. वह अध्यापक प्लेटो को कुश्ती सिखाता था. प्लेटो की कद-काठी अच्छी थी. ‘प्लेटो’ का शब्दार्थ है—विशाल. इसलिए यह नाम उसके बड़े डील-डौल को देखते हुए खूब फबता था. कुछ विद्वानों का मत है कि प्लेटो का मस्तिष्क सामान्य से बड़ा था. हो सकता है इसी कारण उसको यह उपनाम दिया गया हो. प्लेटो के दो समाधिलेखों में से एक में उसका असली नाम अरिस्टोले ही खुदा है. मगर मानवेतिहास में वह प्लेटो के नाम से ही विख्यात है. प्लेटो के जन्म-वर्ष को यूनानी इतिहास में एक और भी कारण से याद किया जाता है. वस्तुतः जिस वर्ष उसका जन्म हुआ, एथेंस अपने महान योद्धा पेरीक्लीस के शोक में डूबा हुआ था, जिसकी मृत्यु कुछ ही दिन पहले हुई थी. पेरीक्लीस एक कुशल, दूरदृष्टा तथा लोकप्रिय सम्राट था. उसने एथेंस को शक्ति, समृद्धि एवं वैभव के शिखर तक पहुंचाने में महान योगदान दिया था. पेरीक्लीस का शासनकाल रोम के इतिहास का ‘स्वर्णकाल’ माना जाता है. पेरीक्लीस के निधन के साथ ही किंकर्तव्यविमूढ़ एथेंस साम्राज्य पतन की ओर बढ़ चला था. उसके कुछ कारण अंदरूनी भी थे. एथेंस के अधिकांश शासक अदूरदर्शी, विलासी और भ्रष्ट थे. शासकों ने जनता की ओर से मुहंमोड़ लिया था, जिसके कारण व्यापारी वर्ग को मनमानी करने का अवसर मिला था. परिणामस्वरूप जनता का अपने शासकों से विश्वास उठ चुका था. शासन के स्तर पर ढील होने के कारण वहां राजनीतिक अराजकता का माहौल था.

प्लेटो के जन्म को लेकर कुछ किवदंतियां भी प्रचलित हैं. तदनुसार प्लेटो को जन्म देते समय उसकी मां दैवीय शक्तियों के प्रभाव में थी. प्लेटो के पिता अरिस्टोन ने उसको सावधान करने का प्रयास किया. तब देवता अपोलो ने अरिस्टोन को सपने में दर्शन देकर उसको पेरिक्टोन के गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में बताया. उसके बाद अरिस्टोन ने अपनी पत्नी को सताना बंद कर दिया और दोनों अलग-अलग रहने लगे. बच्चे को जन्म देने के उपरांत ही पेरिक्टोन और अरिस्टोन ने पुनः साथ रहना आरंभ किया. एक अन्य दंतकथा के अनुसार प्लेटो को जन्म देने के बाद उसके माता-पिता ने उसको देवी मूस और देवता निम्फ को समर्पित कर दिया था. संस्कार के दौरान जिस समय वे शिशु प्लेटो को लेकर पर्वत शिखर पर पहुंचे, वहां विवाह के देवता हिमेटस मधुमक्खी का रूप धारण सदाबहार झाड़ियों से बाहर आए और वे निद्रानिमग्न शिशु प्लेटो के होठों पर बैठ गए. यह शिशु प्लेटो के लिए देवता हिमेटस का वरदान था. जिसके कारण उसके दर्शन में मिठास और गंभीरता दोनों का एकसमान समावेश है. दंतकथाओं और किवदंतियांे की बात जाने दें. किसी भी सफल व्यक्ति को लेकर इस तरह की कहानियां आमतौर पर गढ़ ली जाती हैं. कई बार ऐसी कहानियां जनता को भरमाए रखने के लिए जानबूझकर फैलाई जाती हैं. फिर प्लेटो जैसे बुद्धि-संपन्न और महान दार्शनिक के साथ इस तरह की दंतकथाओं का जुड़ जाना असामान्य नहीं है.

प्लेटो उन दिनों किशोर ही था जब उसके पिता की मृत्यु हुई. एथेंस के कानून के अनुसार स्त्री स्वतंत्र नहीं रह सकती थी. उसके लिए पुरुष का आश्रय लेना अत्यावश्यक था. अतएव प्लेटो की मां पेरिक्टेन ने पायरेलेंपिस से विवाह कर लिया, जो रिश्ते में उसका मामा लगता था. उल्लेखनीय है कि प्राचीन यूनान में चाचा, मामा अपनी भतीजी से विवाह कर सकते थे. ऐसे वैवाहिक संबंधों को वहां कानूनी मान्यता भी प्राप्त थी. अकसर रक्त-शुद्धता के नाम पर इन संबंधों को अनुमति दे दी जाती थी, किंतु इसके पीछे असली कारण पारिवारिक संपत्ति को विभाजित होने से रोकना था. उल्लेखनीय है कि उस समय व्यक्ति की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत उसकी संपत्ति के आधार पर तय होती थी. दास, शिल्पीवर्ग, मजदूर जैसे संपत्तिविहीन समुदायों को मताधिकार से वंचित रखा जाता था. न ही ऐसे लोगों को सक्रिय राजनीति में भाग लेने का अधिकार था. अपनी संवाद-पुस्तकों में प्लेटो ने पायरेलेंपिस को चारमेंडिस का चाचा बताया है. पायरेलंेपिस पहले से ही एक बेटे का पिता था. पेरिक्टेन से विवाह के बाद उसने उसके दूसरे बेटे को जन्म दिया. प्लेटो को अपने परिवार की प्रतिष्ठा पर गर्व था. अपनी संवाद पुस्तकों में उसने न केवल सुकरात के बारे में प्रमुखता से लिखा है, बल्कि यत्र-तत्र अपने परिवार का विवरण भी प्रस्तुत किया है, जो उसके मन में छिपी परिवार संस्था के प्रति आस्था को दर्शाता है. हालांकि प्रकट में उसने परिवार संस्था को गैर जरूरी माना है. उसने जिस आदर्शराज्य की परिकल्पना की है, उसके नागरिक सामूहिक आवासों में रहते हैं, एक ही रसोई का बना भोजन करते हैं. उनके परिवार, यहां तक कि पत्नियां और बच्चे भी साझे हैं. बच्चों का पालन-पोषण इस प्रकार किया जाता है कि माता-पिता अपनी संतान और संतान अपने वास्तविक जन्मदाताओं को कभी पहचान ही न सके. जहां रिश्ते व्यक्ति की वयस् के अनुसार तय होते हों. प्लेटो की यह विचारधारा आगे चलकर साम्यवादियों की प्रेरणास्रोत बनी थी.
क्रमश:….

ओमप्रकाश कश्यप