अहिंसा और इंसानियत के दो दावेदार

उन दोनों के देश अलग थे, धर्म अलग थे, भाषाएं और कार्यक्षेत्र अलगअलग थे. दोनों आमनेसामने कभी मिल भी न पाए थे. आपसी पत्रव्यवहार भी न के बराबर था. इसके बावजूद उनके मन में एकदूसरे के प्रति अगाध श्रद्धा थी. उनमें से एक विज्ञान के क्षेत्र की शिखरतम प्रतिभा था. नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर वह विश्व का विलक्षण मेधासंपन्न वैज्ञानिक माना गया. विज्ञान जगत उसकी अकूत मेधा और अद्वतीय कल्पनाशीलता से इतना अभिभूत था कि उसकी बौद्धिक विलक्षणता को समझने के लिए मरणोपरांत उसके मस्तिष्क को संरक्षित रखा गया. दूसरा पुरस्कारसम्मान से बहुत ऊपर था. इतना ऊपर कि हर सम्मान, पुरस्कार उसके नाम से जुड़कर सम्मानित होता था. दोनों ही विश्वशांति के समर्थक थे. एक के शोध को आधार बनाकर कुछ सिरफिरे वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का निर्माण किया, जो दूसरे विश्वयुद्ध में तबाही का कारण बना. दूसरे की कथनीकरनी में एकता थी. वह आजीवन सत्य और अहिंसा की बात करता और उस पथ पर चलता रहा. फिर भी उसकी मृत्यु एक सिरफिरे राष्ट्रवादी की गोली से हुई. एक को नवगठित देश का राष्ट्रपति बनने का न्योता मिला. तब उसने यह कहकर कि वह राजनीति के लिए नहीं बना है—प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक लौटा दिया. दूसरा बना ही राजनीति के लिए था. उसके लिए राजनीति समाजसेवा थी और समाजसेवा राजनीति. अतः आजादी के बाद जब उसके देश में अपनी सरकार बनी तो जनसेवा के प्रति अपनी संकल्पबद्धता दोहराकर वह सत्ता के प्रलोभन से हमेशा के लिए मुक्त हो गया. पहले की कल्पनाशक्ति जब मुक्ताकाश में डोलती तो उसमें हजारों ग्रहनक्षत्र और ब्रह्मांडीय स्फुर्लिंग ज्योतिवान हो उठते थे. दूसरा जिस दिशा में कदम बढ़ाता सैकड़ों लोग कतार बांधे उसका अनुसरण करने लगते. दोनों में अनेक समानताएं थीं और अंतर भी. उनमें से प्रत्येक ने अपने समय और समाज को गहराई से प्रभावित किया. बेशुमार ख्याति, मानसम्मान पाया. अपने जीवनआचरण में दोनों मनुष्यता के पक्षधर, पवित्रता, सादगी, नैतिकता की मिसाल और इंसानियत के दावेदार बने रहे.

 

इतने विवरण के बाद अपने समय की इन विरलतम प्रतिभाओं का नामोल्लेख आवश्यक नहीं है. पाठकगण जान चुके होंगे कि उनमें से एक का नाम था—मोहनदास करमचंद गांधी, दूसरे का—अल्बर्ट आइंस्टीन. आइंस्टीन का जन्म 1879 में हुआ था. गांधी के जन्म के दस वर्ष बाद. बचपन में दोनों ही संकोची थे. विद्यार्थी भी साधारण ही माने गए. आइंस्टीन को स्कूल में साथियों का उपहास सहना पड़ता था. गांधी पोरबंदर के दीवान के बेटे थे. इसलिए उनका वैसा उपहास तो नहीं होता था, मगर विद्यार्थी वे औसत ही थे. दोनों की शुरुआत साधारण थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद आइंस्टीन ने पेटेंट कार्यालय में नौकरी कर ली. लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे अवश्य, किंतु वकालत के लिए जरूरी लंदफंद से दूर रहने के कारण आरंभ में असफलता ही उनके हिस्से आई. दोनों ने अपनी दुर्बलताओं को हथियार बनाया. आइंस्टीन कल्पनाजगत में डूबे रहने वाले विद्यार्थी थे. औपचारिक पढ़ाईलिखाई में उनका मन कम ही लगता था. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज उनकी अद्वितीय कल्पनाशक्ति के बल पर संभव हो सकी थी. गांधी ने अपनी सहनशक्ति और त्याग को ताकत बनाया था. अपने आचरण से उन्होंने सिद्ध किया कि अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे विचार केवल कागजी नहीं हैं. पर्याप्त नैतिक सामथ्र्य हो तो उन्हें आचरण में भी उतारा जा सकता है. दोनों को अपने ऊपर अटूट विश्वास था. आइंस्टीन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना दुनिया के सामने रखी तो उनका खूब मजाक उड़ाया गया. अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि डॉप्लर प्रभाव जैसे ध्वनि पर असरकारक होता है, वैसे ही प्रकाश पर भी उसका असर पड़ता है. लेकिन आइंस्टीन अपनी धारणा पर अडिग रहे. खिल्ली उड़ाने वालों को उनका एक ही जवाब था—‘गलत सिद्ध करके दिखाओ?’ गांधी की अहिंसा को आलोचकों ने भीरूपन कहा था. मगर वे स्थिरमना अपने काम में लगे रहे. आखिर खुद को दुनिया की महाशक्ति समझने वाला ब्रिटिश साम्राज्य एक अधनंगे फकीर के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया. आइंस्टीन विलक्षण की सीमा तक अंतर्मुखी थे. उनका मस्तिष्क गणित की पहेलियों को हल करने में उलझा रहता था. गांधी अपने अनूठे प्रयोगों, कथनीकरनी की एकता तथा आचरण की पवित्रता के दम पर, लोगों के चहेते थे.

 

गांधी के अहिंसावादी दृष्टिकोण, जीवन की सादगी, सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, जनांदोलनों की गहरी समझ तथा लोगों के दिलों में पैठ बनाने के अकूत सामर्थ्य ने आइंस्टीन को प्रभावित किया था. संभवतः ऊर्जा के अजस्र, विराट स्रोत की खोज के रूप में दुनिया को परमाणु बम का आधारसिद्धांत देने वाला भावुक, संवेदनशील, मनुष्यता का हितचिंतक, नैतिकबोध से संपन्न सरलमना वैज्ञानिक अपने आविष्कार के दुरुपयोग की संभावनाओं की कल्पनामात्र से खुद को दोषी मान बैठा था. उल्लेखनीय है कि सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज के दौरान आइंस्टीन ने सिद्ध किया था कि ऊर्जा और पदार्थ परस्पर अंतपर्रिवर्तनीय हैं. इस प्रक्रिया में विपुल ऊर्जा उत्पन्न होती है. इसके बाद से ही परमाणु विखंडन द्वारा ऊर्जा के चिरंतन स्रोत को प्राप्त करने की कोशिशें तेज हो चली थीं. प्रथम विश्वयुद्ध में चोट खाए देश गुपचुप अपनी ताकत का विस्तार करने में लगे थे. राष्ट्रों के बीच हथियारों की अंधस्पर्धा तथा भीतर ही भीतर उमड़ता असंतोष, नए विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी कर रहा था. अपनी दूरद्रष्टि से आइंस्टीन ने शायद यह भांप लिया था कि कोई सिरफिरा वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा संबंधी उनके शोध का दुरुपयोग कर, मनुष्यता के समक्ष भयावह संकट प्रस्तुत कर सकता है. इसीलिए गांधी, जो दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर चुके थे और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करते समय भी अहिंसा पर पूर्णतः अडिग थे, का मानवतावादी द्रष्टिकोण उन्हें आकर्षित करता था. विश्वशांति की चाहत रखनेवाले आइंस्टीन निरस्त्रीकरण के सबसे मुखर समर्थकों में थे. उसके पीछे बर्ट्रेंड रसेल, रवींद्रनाथ ठाकुर के अलावा गांधी की प्रेरणा भी प्रमुख थी. विश्वशांति के प्रति आइंस्टीन की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण था—अनिवार्य सैन्यसेवा एवं युद्ध प्रशिक्षण के विरोध में जारी घोषणापत्र, जिसपर उनके और महात्मा गांधी के अलावा रवींद्रनाथ ठाकुर, सिगमंड फ्रायड, रोमन रोलेंड, एच. जी. वेल्स आदि के हस्ताक्षर थे.

 

आइंस्टीन का विज्ञान पर भरोसा था. वह मानते थे कि विज्ञान की मदद से विश्व की भीषण समस्याओं यथा गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा आदि का उपचार संभव है. अनियोजित मशीनीकरण की आलोचना करते हुए आइंस्टीन ने कहा था कि पूंजीवादी तंत्र के नेतृत्व में होने वाली प्रौद्योगिकीय क्रांति ने लोगों की गरीबी और अन्यान्य समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें बेरोजगारी की ओर ढकेला है. उसकी सबसे बड़ी बुराई है कि वह अपनी कीमत मनुष्य की कार्यक्षमता एवं कौशल से वसूलता है. अपने ही जैसे शोषितों, उत्पीड़ितों के साथ स्पर्धा और शोषणकारी स्थितियों से घिरा श्रमिक खुद को उनके आगे पंगु और लाचार अनुभव करता है. आपसी अविश्वास, कुंठा, हताशा, दैन्य और अवसाद जैसे अवगुण उसे घेर लेते हैं. पूंजीवादी समाज की ऐसी अनेकानेक नकारात्मक स्थितियों और संभावनाओं के बीच सर्वोदय, सादगी, अहिंसा, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा विश्वबंधुत्व को समर्पित गांधी के विचार, उनका समाज के प्रति सकारात्मक और नीतिसम्मत सोच आइंस्टीन को उम्मीद के ताजे झोंके की तरह लगता था.

 

आइंस्टीन के मन में गांधी के प्रति सम्मान भाव पहली बार जुलाई-1929 में ‘क्रिश्चन सेंच्युरी’ को दिए गए साक्षात्कार में प्रकट हुआ, जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा अहिंसापूर्ण ढंग से चलाए जा रहे आंदोलन की सराहना की थी. दोनों के बीच इकलौते पत्रव्यवहार की शुरुआत आइंस्टीन की ओर से होती है. घटना 1931 की है. गांधी उस दिनों गोलमेज यात्रा के सिलसिले में लंदन की यात्रा पर थे. आइंस्टीन तब बर्लिन में थे. वहीं, उनके आवास पर गांधी का शिष्य सुंदरम उनसे मिला. उसके माध्यम से आइंस्टीन ने एक पत्र गांधी को भेजा था. 27 सितंबर, 1931 को लिखे उस पत्र में उन्होंने गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा को बिना लागलपेट प्रस्तुत किया था—

 

परम आदरणीय गांधी जी,

इस पत्र को आप तक पहुंचाने के लिए मैंने आपके मित्र का सहारा लिया है, जो इस समय मेरे घर मेरे मेहमान हैं. अपने कार्यकलापों द्वारा आपने दिखा दिया कि उन सभी आदर्शों को जिनकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, हिंसा का सहारा लिए बिना भी प्राप्त किया जा सकता है और उन्हें जिनको हिंसा पर भरोसा है, अहिंसा के माध्यम से आसानी से जीता जा सकता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आपका संदेश आपके देश की सीमाओं के पार भी फैलेगा. उसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मतभेदों का स्थायी समाधान संभव होगा. यही एकमात्र रास्ता है जो वैश्विक शांति एवं खुशहाली की ओर जाता है, जिससे हम अपने मतभेदों को आसानी से सुलझा सकते हैं. पुनश्चः! आपके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा और सम्मानभाव के साथ मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत जल्दी हम आमनेसामने होंगे.’

 

पत्र में गांधी के अहिंसावादी द्रष्टिकोण के प्रति एक उदारमना वैज्ञानिक के उद्गार थे. गांधी विश्वशांति हेतु आइंस्टीन के कार्यकलापों से परिचित थे. उनके प्रति मन में अगाध श्रद्धा भी थी. इसलिए पत्र का त्वरित प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने 18 अक्टूबर को आइंस्टीन को लिखा—

 ‘सुंदरम के हाथों आपका खूबसूरत पत्र मुझे मिला. मुझे यह जानकर अत्यधिक संतोष है कि आप मेरे कार्यों का समर्थन करते हैं. मेरी उत्कट अभिलाषा है कि हमारी आमनेसामने की भेंट हो और आप भारत में मेरे आश्रम का आतिथ्य ग्रहण करें.’

 आइंस्टीन गांधी के आमंत्रण पर भारत भले न आ सके, मगर गांधीजी द्वारा भारत में किए जा रहे सत्य एवं अहिंसा के प्रयोगों से निरंतर प्रेरणा लेते रहे. वे मूलतः वैज्ञानिक थे. विज्ञान के उपयोग को लेकर उनका मत ‘पश्चिमी विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले दार्शनिक फ्रांसिस बेकन(1561—1626) से मेल खाता था. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति से उत्साहित बेकन का कहना था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके कल्याण की राह प्रशस्त करेंगी. बेकन के दिए ‘ज्ञान ही शक्ति है’ के नारे के साथ कालांतर में विज्ञान ने खूब तरक्की की. लेकिन उसके लोकोपकारी उपयोग को लेकर बेकन की भविष्यवाणी पूर्ण सच न हो सकी. खर्चीला उद्यम होने के नाते वैज्ञानिक शोधों की धारा उस दिशा में अग्रसर रही, जो केवल समाज के प्रभुवर्ग की स्वार्थानुरूप थी. इससे श्रमविरोधी मशीनों के विकास को बढ़ावा मिला. कालांतर में उससे समाजार्थिक स्तरीकरण और बेरोजगारी में वृद्धि हुई. पूंजी की मनमानी के फलस्वरूप हुए मशीनीकरण ने उन कारीगरों और शिल्पकर्मियों के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया था, जो परंपरागत अर्थव्यवस्था में, सामंतवादी दबावों के बावजूद अपने श्रम एवं कौशल के दम पर सम्मानित जीवन जीते आए थे. धीरेधीरे यह चुनौती और भी कठिन, कठिनतर होती गई. आगे चलकर इसी ने यूरोप के वैचारिक आंदोलनों के लिए नई जमीनें तैयार कीं.

 

गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्श के प्रति आइंस्टीन की अटूट श्रद्धा थी. उत्तरोत्तर बढ़ते वैश्विक तनाव तथा वैमनस्यकारी स्थितियों के बीच गांधी का रास्ता उनकी एकमात्र उम्मीद थी. बावजूद इस श्रद्धाभाव के कुछ मुद्दों को लेकर गांधी से उनका मतभेद था. ऐसा ही मुद्दा उत्पादन क्षेत्र में मशीनों के प्रयोग को लेकर है. पश्चिम के अनियोजित मशीनीकरण से क्षुब्ध गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा था—‘यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, मगर उसके अवगुणों पर मैं पूरी किताब लिख सकता हूं.’ यहां साफ कर दें कि मशीनों की आलोचना करने वाले गांधी पहले व्यक्ति न थे. उनसे पहले रूसो, थोरो, एडबर्ड कारपेंटर, इमर्सन आदि प्रख्यात विचारकों ने जीवन में मशीनों के बढ़ते दखल को गैरजरूरी माना था. लोकहित में गांधी चाहते थे कि ‘वे(जमींदार और राजामहाराजा) अपने लोभ और संपत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जाएं जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं. मजदूरों को भी यह समझना होगा कि मजदूरों का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी संपत्ति पर उससे भी कम है.’ (हरिजन सेवक 3 जून, 1939). गांधी पूंजीवाद की विकृतियों का समाधान संरक्षकता के सिद्धांत में खोजते थे. इसलिए उन्होंने पूंजीपतियों से अपील की थी वे खुद को संपत्ति का स्वामी मानने के बजाय उसका संरक्षक समझें और लोककल्याण के निमित्त उसका उपयोग करें. पूंजीपति अपनी संपत्ति स्वेच्छा से छोड़ने को तैयार हो जाएंगे, स्वयं गांधी को भी इसमें संदेह था. ऐसी स्थिति में वे व्यवस्था करते हैं—‘लोग स्वेच्छा से ट्रस्टियों की तरह व्यवहार करने लगें तो मुझे सचमुच बड़ी खुशी होगी. लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा ख्याल है कि हमें राज्य के द्वारा भरसक कम हिंसा का सहारा लेकर उनसे उनकी संपत्ति (मुआवजा देकर अथवा मुआवजा दिए बगैर, जहां जैसा उचित हो) अपने हाथ में कर लेनी चाहिए.’

 

आर्थिक समानता का प्रश्न आइंस्टीन के लिए भी बड़ा था. वे अहिंसक समाजवाद के समर्थक थे. मानते थे कि समाजवाद का लक्ष्य समाज को नैतिक सामाजिक लक्ष्य की ओर अग्रसर करना है. जबकि पूंजीवादी केवल और उद्योगस्वामी के लाभ की स्वार्थाकांक्षा से संचालित होता है. उसमें बड़ी मछली छोटी को निगलती जाती है. आइंस्टीन का विश्वास था कि केवल विज्ञान की सहायता से सामाजिक समस्याओं का निदान खोजना अतिरेकी कामना है. समाजवाद व्यक्ति एवं समाज दोनों को सामाजिकनैतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. जबकि पूंजीवाद अपने एकमात्र लक्ष्य पूंजीस्वामी के लाभ पर जोर देता है. जिसमें लाभार्थी वर्ग निरंतर सिकुड़ता जाता है. आइंस्टीन के अनुसार यह जानना बहुत जरूरी है कि केवल नियोजित अर्थव्यवस्था समाजवाद का उद्दिष्ट नहीं है. समाजवाद का वास्तविक लक्ष्य मानवमात्र की मुक्ति है. ऐसा कहते हुए वे विचारदर्शन में गांधीवाद के करीब चले आते हैं. लेकिन मशीनों के प्रयोग को लेकर दोनों में स्पष्ट मतवैभिन्नय था. ‘ग्राफिक सर्वे’ के लिए दिए 1935 के एक इंटरव्यू में आइंस्टीन के माध्यम से उद्धृत किया गया है—

मैं गांधी से अत्यधिक प्रभावित हूं. मगर उनके कार्यक्रम में दो कमजोरियां मुझे एकदम साफ नजरआती हैं. असहयोग हालांकि अपने विरोधियों से निपटने का बुद्धिमानीभरा रास्ता है. लेकिन यह केवल आदर्श स्थितियों में ही संभव है. यह भारत में अंगे्रजों के विरुद्ध उपयोगी हो सकता है, लेकिन जर्मनी में नाजियों के विरुद्ध इसका कारगर प्रयोग संभव नहीं है. गांधी उस समय भी गलत है, जब वे आधुनिक सभ्य समाज में मशीनों के बहिष्कार अथवा उनको न्यूनतम बनाए रखने पर जोर देते हैं. मशीनें समाज की जरूरत बन चुकी हैं, यह उन्हें स्वीकार लेना चाहिए.’

 

गांधी के प्रति अपनी सम्मानभाव के बावजूद उनकी आलोचना आइंस्टीन की वैचारिक दृढ़ता की ओर इशारा करती है. गांधी की भांति आइंस्टीन का चिंतन भी बहुआयामी था. गांधी चाहते थे कि ग्राम स्वावलंबी हों. वहां के लोग आत्मनिर्भर बनें. ताकि अपनी सीमित अर्थक्षमता से सम्मानित जीवन जी सकें. यह आवश्यक भी है. इससे अर्थव्यवस्था और प्रकारांतर में सत्ता के विकेंद्रीकरण का स्वप्न सच होता है. आइंस्टीन की खूबी है कि वे समाजवाद का समर्थन करते हैं, मनुष्यमात्र के विकास के लिए उसे अपरिहार्य मानते हैं, मगर इसके लिए किसी भी प्रकार की हिंसा उन्हें अस्वीकार्य है. इस लक्ष्य को वे लोकतांत्रिक परिवर्तनों के माध्यम से साधना चाहते हैं. समाजवाद, बरास्ते अहिंसा—उनका स्वप्न है. उनकी निगाह में मनुष्य सर्वोपरि है. अपनी इस धारणा पर वे अडिग हैं. गांधी के लेखों में समाजवाद का जिक्र आता है. मगर समाजवादी लक्ष्य को वे अहिंसा, धर्म और परंपरा की सीमाओं में जितना संभव हो, तय कर लेना चाहते हैं. ध्यातव्य है समाजवाद की जड़ों की खोज के लिए धर्म की शरण में चले जाने वाले दार्शनिक विचारकों में गांधी अकेले न थे. जार्ज बनार्ड शॉ, विलियम मॉरिस, जॉन रस्किन, इमर्सन, एडवर्ड कारपेंटर आदि विद्वानों की समाजवाद प्रेरणाएं बाइबिल तथा अन्य ईसाई धर्मग्रंथों से ही निकली थीं. गांधी संसाधनों और अवसरों के समान वितरण पर उतना जोर नहीं देते जितने कल्याण के संवितरण पर—‘यदि समाजवाद बिना किसी हिंसा के आए तो हम उसका स्वागत करेंगे. क्योंकि तब मनुष्य किसी भी तरह की संपत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्यथा नहीं. करोड़पति के पास उसके करोड़ रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा.’ इस लक्ष्य को पाने के लिए गांधी अहिंसा और मानवीय प्रेम की तरफदारी करते हैं—‘मैं घृणा से नहीं अपतिु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा.’

 

आइंस्टीन के लिए परंपरा का महत्त्व तभी तक है जब तक वह तर्कसम्मत हो और विज्ञान की कसौटी पर खरी उतर सके. क्या समाजवाद से मानव जीवन की समस्याओं का समाधान संभव है? आइंस्टीन इससे आश्वस्त हैं, ‘इन गंभीर बुराइयों से बचाव का एकमात्र रास्ता है, लोकोन्मुखी शिक्षा प्रणाली की स्थापना तथा अर्थव्यवस्था का समाजवादी नजरिये के अनुरूप निर्धारण, जिसमें उत्पादन के साधन समुदाय के अधीन हों. उत्पादन का स्वरूप लोगों की आवश्यकता के अनुसार तय होना चाहिए और काम का विभाजन इस तरह से हो कि स्त्रीपुरुष, बच्चे जो भी काम कर सकते हैं, उन्हें काम मिले और किसी के सामने आजीविका संबंधी संकट न हो.’ आइंस्टीन ने समाजवाद का पक्ष लिया था. परंतु उसके नाम पर समाज में जो हो रहा है, उसके प्रति वे बहुत आश्वस्त नहीं थे. वे मान रहे थे कि समाज में समाजवाद को लेकर अत्यधिक अस्पष्टता है. सबसे बड़ा संकट ईमानदार विमर्श का है. उन्हें लगता था कि समाजवाद के नाम पर प्रचलित विभिन्न परिभाषाओं, अवधारणाओं तथा अर्थहीन बहसों ने उसको बहुत नुकसान पहुंचाया है. जिससे समाजवादी राज्य का सपना एक टोटम में सिमट चुका है. आइंस्टीन का आशय उदार और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था से था, जिसमें राज्य की नियंत्रणकारी शक्तियां अधिक जिम्मेदार और लोकप्रतिबद्ध हों.

 

गांधी की भांति आइंस्टीन की करुणा भी मानव समाज तक सीमित न थी. उसमें प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव अंतर्निहित था. गांधी शाकाहार के समर्थक थे. इस संबंध में आइंस्टीन की भावनाएं गांधी से मेल खाती थीं. शाकाहार का समर्थन करते हुए उन्होंने लिखा था—‘मानवीय स्वास्थ्य एवं पृथ्वी पर जीवन की उत्तरजीविता के निमित्त कोई भी इतना सहायक नहीं है, जितना शाकाहार को बढ़ावा देना.’ इसलिए कि मनुष्यता की कसौटी वर्चस्व में न होकर सहयोगभावना में है. सबके साथ मिलजुलकर रहने में है. अपने साथसाथ दूसरे के अस्तित्व की रक्षा और मानसम्मान में है. न केवल मनुष्य, बल्कि प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना से भरपूर यह नैतिक संदेश प्रायः हर संस्कृति का मूल स्वर रहा है. ‘सर्वे सुखिन भवंतु, सर्वे संतु निरामया’—गांधी इस औपनिषदिक कामना को राष्ट्रराज्य की प्रमुख पहचान के रूप देखना चाहते हैं. यह भावना गांधी द्वारा शाकाहार के समर्थन से भी अभिव्यक्त होती है—‘किसी राष्ट्र की महानता उसके द्वारा पशुओं के प्रति किए गए व्यवहार से आंकी जा सकती है.’ जीवदया के प्रति धार्मिक द्रष्टिकोण इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना करुणा का संस्कार. करुणा का यही संस्कार गांधीवाद की आत्मा है. यही वह गुण है जो आइंस्टीन को बारबार गांधी की ओर खींच लाता था. गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान को आइंस्टीन ने कई अवसरों पर व्यक्त किया था. आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एस. राधाकृष्णन गांधी के सत्तरवें जन्मदिन पर एक पुस्तक संपादित करना चाहते थे. उन्होंने पत्र लिखकर आइंस्टीन से उसमें सहयोग देने को कहा. उस अवसर पर आइंस्टीन ने गांधी की प्रशस्ति में लिखा—

 राजनीतिक इतिहास के क्षेत्र में महात्मा गांधी का योगदान अन्यतम है. उन्होंने अपने देश के गरीब, वंचित एवं दमित लोगों की स्वतंत्रता हेतु एकदम नए और मानवीय औजार विकसित कर उनका प्रयोग अपनी संपूर्ण निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ किया है. दुनिया के आधुनिक सभ्य समाजों तथा उनके चिंतनधर्मा बुद्धिजीवियों पर उनका जो प्रभाव पड़ा है, वह तलवार के जोर पर की गई कार्रवाहियों की अपेक्षा कहीं अधिक गहरा और स्थायी है. इस कसौटी पर केवल उन्हीं राजनयिकों का योगदान सराहनीय हो सकता है जो शिक्षा, लोकचेतना तथा नैतिकता की स्थापना द्वारा अपने लोगों के लिए नैतिक राज्य की स्थापना कर सकते हैं. यह हम सभी के लिए अत्यंत प्रसन्नता और सम्मान का विषय है कि हम ऐसी महान, प्रतिभा संपन्न शख्सियत से सीधे संवाद करने में सक्षम हैं.’

 

गांधी की कथनी और करनी में अद्भुत एकता थी. उन्हें अपने ऊपर विश्वास था और खुद के निर्णयों पर वे इतने दृढ़ रहते थे कि उनके अपने ही साथी कभीकभी उन्हें हठी और दुराग्रही तक कह देते थे. अपवादस्वरूप ही सही परिस्थितियों के आगे गांधी को भी झुकना पड़ा और आइंस्टीन को भी. दूसरी ओर यह भी सच है कि जब भी इन महापुरुषों को समझौते के लिए बाध्य किया गया, उसका नुकसान पूरे समाज को झेलना पड़ा. गांधी देश के विभाजन के विरोधी थे. उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान का बंटवारा उनकी लाश से गुजरकर होगा. मगर तत्कालीन नेताओं के आगे उनकी एक न चली. जिन धनकुबेरों से वे उम्मीद रखते थे कि वे आजाद भारत में सरंक्षकतावाद के आदर्श को अपनाएंगे, खुद को संपत्ति का सरंक्षक मानकर व्यवहार करेंगे, वे अपने ही जैसे स्वार्थी नेताओं के संग मिलकर आजादी के बाद के माहौल को भुनाने में लग गए. इससे आजादी के बाद देश के वास्तविक निर्माण का जो सपना गांधी ने देखा था, और जिसकी कामना इस देश का आम नागरिक करता था, वह उत्तरोत्तर दूर होता चला गया. कुछ ऐसा ही आइंस्टीन के साथ हुआ. वे नहीं चाहते थे कि उनकी खोज का उपयोग परमाणु बम के लिए किया जाए. लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उन्हें उसके लिए अनुमति देनी ही पड़ी. दूसरे विश्वयुद्ध की आहट के बीच अमेरिकी भौतिक विज्ञानी लियो सिजलाॅर्ड तथा यूजीन विगनर राष्ट्रपति रूजवेल्ट का संदेश लेकर आइंस्टीन से मिले थे. वे परमाणु बम निर्माण के लिए आइंस्टीन की सहमति चाहते थे. उनसे कहा गया था कि बम दुनिया में शक्ति संतुलन कायम करने के काम आएगा. आइंस्टीन उसके लिए भी तैयार न थे. लेकिन जब उनसे कहा गया कि यदि अवसर चूके तो हिटलर अमेरिका से पहले परमाणु बम बनाने में सफल हो जाएगा, तो वे सोच में पड़ गए. तानाशाह के हाथों में अकूत ताकत आने का मतलब है, ’दुनिया की तबाही’—आइंस्टीन का कुछ ऐसा ही सोचना था. असल में यह उनका खुद को दिया गया भरोसा था. यह आभास उन्हें था कि यदि हस्ताक्षर न भी करेंगे तो भी युद्धोन्मत्त शक्तियां एक न एक दिन बम का आविष्कार कर ही लेंगी. इसलिए पत्र पर हस्ताक्षर कर लौटा दिया. रूजवेल्ट को लिखे पत्र के बाद अमेरिका में मेनहट्टन परियोजना में गति आई. उस समय उन्होंने शायद ही यह कल्पना की हो कि उनकी खोज हिरोशिमा और नागसाकी की भीषण तबाही, मनुष्यता के कलंक का कारण बनेगी. आइंस्टीन को यह अपराधबोध आजीवन बना रहा. इसी ने उन्हें गांधी के करीब लाने का काम किया. उन्हें लगता था कि युद्धोन्मत्त राजसत्ताओं के बीच गांधी का अहिंसा रास्ता ही श्रेय की ओर ले जा सकता है.

 

जापान में बमबारी के वर्षों बाद वहां के एक दैनिक ‘कैजो’ ने आइंस्टीन से परमाणु बम के प्रयोग पर टिप्पणी करने को कहा. प्रत्युत्तर में पत्र संपादक के नाम 1952 में आइंस्टीन ने जो पत्र लिखा, उसमें एक बार फिर गांधी के प्रति आस्था और विश्वास झलकता था. हालांकि उस समय तक गांधी की हत्या को तीन वर्ष बीत चुके थे—‘गांधी, हमारे समय के महानतम राजनीतिज्ञ प्रतिभा ने हम सत्य और अहिंसा के उस रास्ते से परचाया है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए. उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि एक व्यक्ति के मन में सत्य के लिए उत्सर्ग की भावना हो तथा रास्ता सही हो तो वह कुछ भी प्राप्त कर सकता है. भारतीय स्वाधीनता के लिए उनका कार्य इस बात का स्वतः प्रमाण है कि अदम्य विश्वास से युक्त मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति अजेय समझी जाने वाली सैन्य ताकतों से कहीं अधिक ताकतवर है.’

 

डरा हुआ आदमी दूसरों को सावधान रहने की सलाह देता है. आइंस्टीन का आविष्कार लोगों को डराता था. परंतु यह डर खुद आइंस्टीन का भी था. उनका डर अकारण भी नहीं था. अल्फ्रेड नोबेल का उदाहरण उनके आगे था. प्रसंगवश बता दें कि मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मा अल्फ्रेड नोबेल बड़ा होकर अपने समय का सबसे बड़ा हथियार उत्पादक बना. विस्फोटक ‘डायनामाइट’ के अलावा करीब 350 जानलेवा हथियारों के पेटेंट उसके हाथ में थे. परंतु एक घटना ने उसका ऐसा हृदयपरिवर्तन किया कि उसका मकसद ही बदल गया. 1888 में अल्फ्रेड नोबेल का भाई लुडविग नोबेल फ्रांस में केंस की यात्रा पर निकला. वहीं उसका देहांत हो गया. एक फ्रांसिसी समाचारपत्र ने बगैर जांचपड़ताल के ही मोटे हरफों में छापा—‘मौत के सौदागर की मौत.’ वह समाचारपत्र नोबेल के हाथों तक पहुंचा तो उसे जबरदस्त धक्का लगा. मृत्योपरांत अपनी प्रतिष्ठा और मानसम्मान को बचाए रखने तथा समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को अपने अधिकार में रखने के लिए उसने एक ट्रस्ट का गठन किया, उसके माध्यम से नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हुई. अल्फ्रेड नोबेल के साथ घटी इस घटना ने आइंस्टीन को भी प्रभावित किया. परमाणु शक्ति के आविष्कारक होने के कारण उनके आलोचक भी कम न थे. ऐसे लोग भी थे जो उनके शांति प्रस्तावों को दिखावा कहा करते थे. 1933 में मैकुले रेमंड ने उनका एक कार्टून बनाया था. जिसमें आइंस्टीन के हाथ में तलवार थी. और वे ताकत के मद में अपनी बांह चढ़ाते दिखाए गए हैं. वह आइंस्टीन के शांतिप्रस्तावों पर आलोचक की नजर थी. अपने आविष्कार के दुरुपयोग का डर उन्हें लगातार गांधी के करीब लाता रहा. उन्हें जब, जहां अवसर मिला, गांधी के प्रति अपने स्नेहसम्मान का मुक्तकंठी बयान किया. अपनी पुस्तक ‘आउट आ॓फ माई लेटर ईयर्स’ में गांधी पर प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है—

 

जनसाधारण का नेता, जिसको लगातार कमजोर पड़तीं औपनिवेशिक शक्तियों का समर्थन प्राप्त है. एक ऐसा जननेता जिसकी सफलता कूटनीति, राजनयिक चातुर्य अथवा दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए छिछले राजनीतिक दांवपेंच पर निर्भर नहीं है. उसके पास केवल सच को अभिव्यक्त करने की कला है, एक काया है जिनमें इंसानियत और ज्ञान दोनों साथसाथ विद्यमान हैं. उसके हथियार संवेदना और सहिष्णुता हैं, जो उसने अपने समाज को सुरक्षित और सुदृढ़ बनाने के लिए गढ़े हैं. ऐसा इंसान जो आमजन का प्रतीक है. जिसने यूरोपीय नृशंसता और क्रूरता का सामना किया है, और जो जनसाधारण का मसीहा है. इस तरह उसका प्रभाव अमिट है….पीढ़ियों के बाद इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करेगा कि इस प्रकार का सचमुच जीताजागता मनुष्य इस धरती पर था. इस तरह वह सार्वकालिक उदीयमान सितारा है.’

 गांधी नेता भी थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी. लोकमानस से जुड़े मुद्दों पर उनकी कितनी गहरी पकड़ थी, वैसी शायद ही किसी और नेता की रही हो. उन्होंने कुशल राजनयिक की भांति सरकार और जनता से संवाद किया और एक दक्ष समाजविज्ञानी की भांति लोकहित से जुड़े विषयों पर बोलते रहे. गांधी के व्यक्तित्व की भांति उनकी शैली भी सरल है. चाहे भाषण हों या पत्रकारिता, हर जगह उनका कुशल शैलीकार छाया रहता है. उनकी बनिस्पत आइंस्टीन लेखनशैली विवेचनापरक है. उसमें गंभीरता है. वाक्य अपेक्षाकृत लंबे हैं, भाषा जटिल. इसके बावजूद एक प्रवाह उनकी शैली में है, जिससे वे पठनीय बने रहते हैं. गांधी एक मृदुल प्रवाह और ओज से साथ अपने विचारों में बहा ले जाते हैं. आइंस्टीन को विज्ञान और धर्म के सहसंबंध से बड़ी उम्मीद थी. ईश्वर उनके लिए रूढ़ विश्वास न होकर, आध्यात्मिक विवेचना का विषय था, जिसे वे अपने लेख ‘धर्म और विज्ञान’ में विस्तार देते हैं. उन्हें गांधी का अहिंसापथ स्वीकार्य है, मगर अर्थदर्शन को लेकर वे बर्ट्रेंड रसेल के करीब हैं. रसेल की पुस्तक ‘ए रोड टू फ्रीडम’ में जिस लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकृत, समानताधारित और जनसहयोगात्मक अर्थव्यवस्था की ओर संकेत किया गया है, आइंस्टीन के लेखों में उसी चेतना का प्रवाह है. शांति और अहिंसा के अग्रदूत के रूप में गांधी उनके दिलोदिमाग पर कितने छाए हुए थे, इसका एक और उदाहरण नीचे दी गई टिप्पणी है. यूरोशलम की हिब्रू यूनीवर्सिटी के आइंस्टीन संग्रहालय से प्राप्त यह टिप्पणी जिस कागज पर है, उसके आधे से अधिक हिस्से पर वे गणित की पहेली को हल करने में जुटे हैं. निचले हिस्से पर एकदम अनौपचारिक और आकस्मिक ढंग से लिखी गई यह टिप्पणी है, मानो गणित में डूबा हुआ मन अचानक गांधी की ओर बढ़ चला हो. ऐसा तभी होता है, जब व्यक्ति अपने को आदर्श मान चुका हो. आइंस्टीन की गांधी के प्रति श्रद्धाभाव कुछ ऐसा ही था—

 

राजनीति के इतिहास में महात्मा गांधी की उपलब्धियां अद्वितीय हैं. उन्होंने एक पराधीन देश की स्वतंत्रता के लिए नए और इंसानियत से भरपूर रास्ते की खोज की. तथा उसपर अपनी निष्ठा और संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ बढ़ते गए. मानवता पर उनके विचारों का प्रभाव हमारी कल्पना से, जो अन्यायी की ताकत का बढ़चढ़कर आंकने की अभ्यस्त है, से कहीं अधिक चिरस्थायी है. क्योंकि अंत तो केवल उस राजनेता का होगा जिसने अपने लोगों को अपनी शिक्षा और नैतिक आचरण से ऊपर उठाने की कोशिश की है. हमें इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि उन्होंने जो नैतिक ऊंचाई हमें दी है, वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करेगी. उनके लिए आदर्श होगी.’

 

गांधी के प्रति आइंस्टीन का सम्मान इस मृत्युलेख से भी होता है, जो उन्होंने गांधी की हत्या के तीन सप्ताह बाद वाशिंगटन में आयोजित एक स्मृतिसभा के लिए लिखा था, ‘केवल सत्यानुयायी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्तान में समाजवाद फैला सकता है. जहां तक मैं जानता हूं, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो. मेरे बताये हुए साधनों के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है.’ आगे गांधी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए आइंस्टीन लिखते हैं—‘हर वह इंसान जो मनुष्यता की बेहतरी का सपना देखता है, उसको गांधी की असामयिक, त्रासद हत्या ने हिला दिया है. उन्होंने अपने आदर्शों के लिए, अहिंसा के पक्ष में मृत्यु का वरण किया है, इसलिए उन्हें मार डाला गया. इसलिए भी कि देश में अशांति और अव्यवस्था के वातावरण के बावजूद वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा लेने को तैयार न था. यह उसका अटूट विश्वास था कि ताकत का उपयोग अपने आप में ही बुराई है.’ आज न तो गांधी हैं न आइंस्टीन, परंतु आइंस्टीन की बौद्धिक प्रखरता और गांधी का सत्य को परखने और उसके लिए हर जोखिम उठाने का साहस हमें निरंतर कुछ नया सोचने, आगे बढ़ने और मनुष्यता में विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देता है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

 

गत्यात्मक जनसंस्कृति यानी समावेशी आधुनिकता

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—12

ऐसा चाहूं राज मैं यहां मिले सभन को अन्न
छोटे-बड्डे सभ सम्म बसें, रविदास रहे प्रसन्न
— संत रविदास

जनसंस्कृति का अभिप्राय आधुनिकता से पलायन नहीं है. न उन अतिरेकी मान्यताओं को महत्त्व देना है जिनके अनुसार जो पुराना तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है; अथवा जिसे बहुसंख्यक माने वही सर्वदा वरेण्य है. न यह दर्शाना है कि पिछला समय ही श्रेष्ठ था और अब यह पूरा समाज पतनशील अवस्था में, निरंतर सांस्कृतिक अपसंस्करण की ओर बढ़ रहा है. इससे भारतीय समाज के आगे जो अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर गर्व करता आया है, कोई बड़ा संकट खड़ा होने वाला है. सच तो यह है कि पिछली संस्कृतियों की भांति आधुनिक संस्कृति में भी बहुत कुछ श्रेष्ठ है. इसमें यदि कुछ कमियां हैं तो परंपरागत संस्कृतियां भी सर्वथा दोषमुक्त नहीं थीं. यह भी भ्रांति ही है कि भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठतम छटा गांवों में देखने को मिलती है; तथा वैज्ञानिक क्रांति एवं प्रौद्योगिकीय विकास के फलस्वरूप विकसित हुई आधुनिक नागरीय सभ्यता में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है. सच यह है कि गत चार-पांच हजार वर्षों से मानव-संस्कृतियां निरंतर विकासमान अवस्था में रही हैं. संभव है उन दिनों के समाजों में सकारात्मक तत्वों की उपस्थिति आनुपातिक रूप से ज्यादा हो. शायद इसलिए कि तत्कालीन जीवन आज जितना जटिल नहीं था. मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित थीं. उनके अनुपात में प्रकृति का प्रांगण बहुत विशाल था. इंसान संपत्ति-संग्रह की बुरी लत से भी दूर था. इसके बावजूद तत्कालीन समाजों की आपेक्षिक श्रेष्ठता को लेकर कोई भी बात सप्रमाण नहीं कही जा सकती. तब से आज तक राजनीतिक, सामाजिक विचारधाराओं के साथ उत्पादन-प्रविधियों में भी वैश्विक स्तर पर बदलाव आया है, जिसने लोगों की जीवन-शैली और सोच में व्यापक बदलाव किया है. तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद यह विकास की स्वाभाविक अवस्था है. विकास कभी इकहरा नहीं आता, अतः यदि प्राचीन संस्कृति और सभ्यता में कुछ अनुकरणीय था, तो सामंतवाद, निरंकुश साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद की शोषणकारी प्रवृत्तियों से निरंतर संघर्ष के उपरांत आधुनिक मनुष्य ने भी ऐसा बहुत-कुछ अर्जित किया है, जिसके आदर्शों पर नए समाज का ढांचा खड़ा किया जा सकता है. कमियां आधुनिक संस्कृति में भी हैं. वे मुख्यतः इसलिए हैं कि शिखर पर विराजमान शक्तियां सामाजिक-राष्ट्रीय हितों के आगे स्वार्थ को वरीयता देती रही हैं. व्यवस्था कोई रही हो, शिखरस्थ शक्तियों के वर्चस्वकारी चरित्र में बहुत कम बदलाव आया है. परिणामस्वरूप जनसाधारण को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों का लाभ उतना नहीं मिल पाया है, जितना अपेक्षित था. यह दोषपूर्ण समाजीकरण का परिणाम है, मगर इसकी पूरी जिम्मेदारी किसी एक वर्ग के कंधों पर डाल देना अनुचित होगा. यदि एक वर्ग को बहुसंख्यक के उत्पीड़न का अपराधी कहा जाए तो दूसरे वर्ग का दोष उस व्यवस्था से अनुकूलन कर लेना, अन्याय को सहते जाना है. उसमें यदि कभी कोई हलचल हुई भी तो उत्पीड़ित द्वारा उत्पीड़क की स्थिति में पहुंचने के लिए—समाज को बदलने के लिए नहीं.

समाजीकरण का उद्देश्य परंपराओं और जीवनमूल्यों को सहेजकर रखना तथा बदलती परिस्थितियों के अनुकूल आदर्शों का सृजन करना है. इस प्रक्रिया से गुजरते हुए मनुष्य अपने समाज की परंपराओं, सांस्कृतिक भाव-भूमियों, आदर्शों, जीवनमूल्यों को आत्मसात करता है. इस बीच समाज में अपनी उपयोगिता दर्शाने के लिए शिक्षा-दीक्षा, अनुभव आदि के माध्यम से वह अपनी कार्यक्षमताओं में भी निखार लाता रहता है. विकासमान अवस्था में पुराने जीवनमूल्य अप्रासंगिक होते जाते हैं. रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु नए जीवनमूल्य समयानुसार जन्मते रहते हैं. उनकी प्रतिष्ठा के लिए सामाजिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हो जाते हैं. समाजीकरण और मानवीकरण के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए अपेक्षित होता है कि समाज अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार करे. बिना किसी भेदभाव के अपनी सुविधाओं, संसाधनों और अवसरों को सभी के लिए खुला रखे. समाजीकरण की प्रक्रिया को आत्मसात करने, उसके अनुसार अपने विकास हेतु सामंजस्य बिठाने तथा आवश्यकतानुसार मोड़ देने की सभी को स्वतंत्रता हो. मगर मनुष्यता के ज्ञात इतिहास की हमेशा यह विडंबना रही है कि समाजीकरण की प्रक्रिया कुछेक वर्गों द्वारा नियंत्रित-निर्देशित होती है. उसका ढांचा ऐसा बना है कि शिखर पर विराजमान कुछ अतिसक्रिय, चालाक किस्म के लोग बहुसंख्यक जन के निर्णय-सामर्थ्य को प्रभावित करने तथा उसको अपने स्वार्थानुरूप दिशा देने में कामयाब हो जाते हैं. खासकर मानवीय विकास के क्षेत्रों में. चूंकि संसाधनों पर शीर्षस्थ अभिजन वर्ग का अधिकार होता है, अतएव उसके निर्णय को स्वीकार करना, अभिजनेत्तर वर्गों की विवशता होती है. उन्हें अपने आसपास विकास के चिह्न भले ही दिखाई न दें, लेकिन बार-बार आश्वासन दिए जाने पर वे शीर्षस्थ अभिजनों के झांसे में आ ही जाते हैं. विकल्पहीन अवस्था में उनकी बातों पर विश्वास करने के अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं होता.

लोक अमूर्त्तन और रूमानी अवधारणा है. उसका नाम लेते समय मनुष्यता का कोई खास चेहरा हमारे दिमाग में नहीं आता, न हमें ऊंच-नीच से ग्रस्त समाजों का सच तथा विरूपताएं नजर आती हैं. उस समय मानव-समाज का काल्पनिक, कुछ-कुछ ब्रह्मांड जैसा निरा काल्पनिक चित्र हमारे मस्तिष्क में बनता है. दूसरे शब्दों में केवल ‘लोक’ के माध्यम से हम वास्तविक जगत का आकलन करने में असमर्थ रहते हैं. दूसरी ओर समाजीकरण को मनमाफिक दिशा देने के लिए शीर्षस्थ शक्तियां जनसाधारण को निरंतर यह विश्वास दिलाती रहती हैं कि वे लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं और उनका प्रत्येक कार्य लोककल्याण की भावना से अनुप्रेत है. ऐसा वे जनसाधारण का विश्वास जीतने के लिए करती हैं. हालांकि उनकी परिकल्पना ‘जन’ का, जिसे ‘कल्याण’ की वास्तविक जरूरत है, जो जीवन-संघर्ष में बुरी तरह उलझा हुआ है, भूख और बेकारी जैसी व्याधियां जिसे सदैव त्रस्त रखती हैं—का वास्तविक हित साधना नहीं होता. इसलिए उनके नेतृत्व में आया विकास ‘जन’ को प्रभावित किए बगैर उसके ऊपर से गुजर जाता है. इस हकीकत को अभिजन शक्तियां भी समझती हैं, अतएव ‘जन’ को भरमाए रखने के लिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचती हैं. इससे उनके दिलों में पैठे डर का अनुमान लगाया जा सकता है. इसका अभिप्राय यह भी है कि अभिजन शक्तियों का शिखरत्व भले वे कितनी ही संगठित और ताकतवर हों, असंगठित अभिजनेत्तर वर्गों के सहयोग और समर्थन पर निर्भर होता है. कोई और विकल्प न देख जनसाधारण उनपर विश्वास कर भी लेता है. शीर्षस्थ शक्तियों का जादू हमेशा चले, लोग अमूर्त्तन विकास के फरेब पर हमेशा भरोसा किए रहें—यह अनिवार्य नहीं है. निरंतर छले जाने से जनसाधारण शीर्षस्थ अभिजन की धूर्त्तताओं को समझने लगता है. अभिजनेत्तर समूहों में चल रही हलचलों से अभिजन शक्तियां अनजान नहीं होतीं. अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए वे हर संभव-असंभव तरीका अपनाती हैं. तरह-तरह के षड्यंत्रों द्वारा वे अभिजनेत्तर वर्गों में फूट डालने में सफल हो जाती हैं. अभिजन शक्तियों की सफलता में अभिजनेत्तर समूहों की फूट तथा समान हितों के मुद्दों पर एकता का अभाव होता है. चूंकि समाज से भागना उसके परिवर्तन की संभावनाओं को कम करना है, अतएव समाज में रहते हुए उसकी विकृतियों को समझकर, उनका समाधान खोजना ही वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए अभिजन वर्ग की उस शब्दावली को समझना आवश्यक है, जिसके माध्यम से वह जनसाधारण को बरगलाने में सफल होता है. और परंपरा के दबावों के चलते, जिनमें अपनी समस्याओं के समाधान हेतु साधारणजन शासन-प्रशासन अथवा समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखता आया है—अभिजनेत्तर समूह पुनः शीर्षस्थ अभिजनों की शरण में लौटने लगते हैं. समाजीकरण की प्रक्रिया के ये अनपेक्षित विवर्तन, समाज में असमानता, अविश्वास एवं असुरक्षा की भावनाएं पनपाते हैं.

जनसंस्कृति को मैं आत्मविश्वास से भरे, आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर बहुसंख्यक अभिजनेत्तर समूहों की कार्यशैली कहना चाहूंगा, जिसमें वे अपने विकास हेतु शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखने के बजाय अपने ही बूते आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं. यह जनसाधारण की एकता और हितों को लेकर प्रतिबद्धता का नवगीत, मानवीकरण की चिर-परिचित शैली है. वर्तमान समाज में व्याप्त ऊंच-नीच समेत जो अनेकानेक विसंगतियां, विरूपताएं विद्यमान हैं, उनके पीछे समाजार्थिक विषमताओं का बहुत बड़ा योगदान है. शीर्षस्थ वर्ग जिसपर समाज के नेतृत्व और विकास की जिम्मेदारी होती है, वह अपने स्वार्थ से हटकर उसी समय सोचता है, जब उसे उससे भी बड़ी स्वार्थ-सिद्धि की संभावना हो. अतएव अपने विकास के लिए जनसाधारण को शीर्षस्थ अभिजन अथवा किसी दैवी सत्ता की अनुकंपा की प्रतीक्षा किए बिना अपने ही भरोसे प्रयास करना होगा. यह कार्य पूर्णतः आत्मनिर्भर, विकासमान और परस्पर सहयोगात्मक जनसंस्कृति के माध्यम द्वारा संभव है. उसकी सफलता के लिए ऐसी समावेशी आधुनिकता की आवश्यकता है जो नए-पुराने उच्चादर्शों तथा मानवीय संवेदनाओं पर टिकी हो. आदर्श जनसंस्कृति को खुला, परिवर्तनोन्मुखी और विकासमूलक किंतु जनसंख्या, राजनीति, अर्थव्यवस्था के तात्कालिक परिवर्तनों से मुक्त होना चाहिए. उसमें यह सामर्थ्य होना चाहिए कि इन स्वाभाविक बदलावों को बिना किसी विक्षोभ के झेल सके.

वर्तमान विश्व सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत खानों में बंटा है. उसमें धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीति, अर्थनीति आदि को लेकर अनेकानेक भेद और तज्जनित अंतर्द्वंद्व हैं. सही मायने में ये आधुनिक असमानताग्रस्त समाज और संस्कृति की विफलताएं भी हैं. सभ्यताकरण के दौर में मनुष्य नए और पुराने के बीच चयन को लेकर सदैव ऊहापोह का शिकार रहा है. परिणामस्वरूप परिवर्तनों की गति अनेक स्तरीय रही है. यह स्तरीकरण सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न उपादानों के बीच भी साफ नजर आता है. जनसंस्कृति में इन कृत्रिम परिवर्तनों से ऊपर उठकर एक समरस समाज की स्थापना का गुण होना चाहिए. उसे इतना व्यापक भी होना चाहिए कि हर सदस्य को लगे कि समाज के संचालन और दिशा-निर्धारण में उतना ही योगदान है, जितना दूसरों का. उसमें छोटे-छोटे जनसमूह मिलकर समाज की दीर्घजीविता एवं अधिकतम के कल्याण हेतु, स्थानीय मुद्दों को लेकर ऐसी संस्थाओं का गठन करेंगे, जिनकी कार्यशैली एवं रूपरेखा सामान्य सहमति के आधुनिकतम सिद्धांत के अनुसार स्वैच्छिक सहभागिता एवं सर्वांगीण विकास के आधार पर निर्धारित की जाएगी. उन संस्थाओं की सफलता का आधार ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम विकास’ की कसौटी होगी. इस तरह जनसंस्कृति का आशय जनसामान्य के आचार-विचार, रहन-सहन, जीवन-शैली, रीति-रिवाज, हितों की प्रतिबद्धता सहित उन सभी कृत्यों-व्यवहारों से है, जिन्हें वह समाज का सदस्य होने के नाते अपनाता तथा आवश्यक संशोधन, परिवर्धन अथवा उनके बगैर भी आगामी पीढ़ी को सौंपता चला जाता है. न्याय की सर्वसुलभता हेतु आमूल परिवर्तन यदि वर्तमान की जरूरत है तो उसका लक्ष्य ऐसी जनसंस्कृति की स्थापना हो सकता है, जिसमें आदर्श स्वतः समाहित हों, लोग स्वयं-स्फूर्त्त भाव से उन्हें अपनाएं और एक-दूसरे का साथ देते हुए सामान्य हितों की प्राप्ति हेतु सहर्ष तत्पर हों.

जनसमाज के बारे में सामान्य धारणा है कि वह प्रौद्योगिकी के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर भी पिछड़ा हुआ होता है, इस कारण बुद्धि के मामले में अग्रणी अभिजन आसानी से केंद्र में जगह बना लेते हैं. अभिजन अभिजनेत्तर से बुद्धि-विवेक में सदैव अग्रणी हों, यह आवश्यक नहीं है. मगर उस अवस्था में वे अपने संसाधनों के बल पर, समाज की विशिष्ट प्रतिभाओं को अपने साथ जोड़ लेते हैं तथा उनके सहयोग-समर्पण द्वारा अभिजनेत्तर समूहों से आगे निकलने में सफल हो जाते हैं. दूसरी ओर गैर अभिजन अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि, शिक्षा तथा संसाधनों के अभाव जैसे कारणों से आधुनिक उत्पादन प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान-विज्ञान के उपयोग में पिछड़ जाता है. बावजूद इसके सामाजिक सौहार्द, समानता, बंधुत्व, स्वैच्छिक सहयोग, सहअस्तित्व आदि अनेक जीवनमूल्य ऐसे हैं, जिनके अनुपालन में वह अपने समकालीन नागरीय समाजों से कहीं आगे होता है. इसकी भरपाई यानी अपनी सामाजिकता का प्रदर्शन करने हेतु नागरीय समाज विभिन्न प्रकार के औपचारिक संगठनों की मदद लेते हैं. उनमें किसी न किसी रूप में पूंजी का हस्तक्षेप होता है, जो समय के साथ-साथ बढ़ता ही जाता है. अभिजन शक्तियां उनपर अधिकार जमाकर उनका संचालन अपने स्वार्थानुरूप करने लगती हैं. इससे उनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. बहुत-से सदस्य पूंजीगत लाभ न देख संस्था के लक्ष्य की ओर से उदासीन होने लगते हैं. इस कारण वे संगठन एक न एक दिन अपने उद्देश्य से भटकने को अभिशप्त होते हैं.

सामान्य व्यवहार में प्रायः ग्रामीण संस्कृति को ही जनसंस्कृति का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि जनसमाज केवल गांवों तक सीमित नहीं होता. शहरों में भी ‘जन’ को जीवन-संघर्ष में उलझते तथा अभिजन हितों के लिए पसीना बहाते देखा जा सकता है. अपने जीवन में वह प्रायः अभिजन के पक्षपातपूर्ण निर्णयों का शिकार होता है, फिर भी वर्गीय चेतना के अभाव, संगठन की कमी, अपने अज्ञान एवं भ्रांतियों के चलते वह अभिजन का समर्थन करता है. दूसरे शब्दों में अभिजन के श्रेष्ठत्व पर भरोसा करके और यह जानते हुए कि उसकी विकास-दृष्टि स्वार्थ की सीमाएं लांघने में असमर्थ रहती है, ‘जन’ उसे खुशी-खुशी अपने ऊपर शासन करने का अधिकार सौंप देता है. ग्रामीण समाज भी, भले ही ऊपर से एक दिखे, भीतर से वह भी ‘जन’ और ‘अभिजन’ में बंटा होता है. यह भी देखने में आया है कि ग्रामीण अभिजन, शहरी अभिजन की अपेक्षा कहीं अधिक मुखर तथा आक्रामक होते हैं. उनका अभिजात्यबोध धर्म, जाति, कुल-गोत्र, वंशानुक्रम, भूमि-स्वामित्व, सामंती संस्कार जैसे परंपरागत प्रतीकों से प्रकट होता है. पुरोहित, जमींदार, सरकार तथा उसके शीर्षस्थ अधिकारी जो गांव में बसते अथवा उससे किसी भी प्रकार का संबंध रखते हों, ग्राम्यः समाज के अभिजन की श्रेणी में आते हैं. शहरी अभिजन की भांति वे भी निर्णयकारी भूमिका में होते हैं. अपनी पक्षपातपूर्ण कार्यशैली द्वारा वे ग्रामीण जीवन में असमानता और वर्चस्व की स्थापना करते हैं. ग्रामीण अभिजनेत्तर समाज में किसान, मजदूर, दस्तकार, साधारण नौकरीपेशा लोग आते हैं. उन्हें अभिजन के निर्देश अथवा उसकी इच्छा के अनुरूप अपनी जीवनशैली को साधना पड़ता है.

अभिजनेत्तर समाज में आर्थिक विकल्प बहुत सीमित होते हैं. उत्पादक के रूप में उसके सदस्य परंपरागत अथवा पिछड़ी उत्पादन प्रणाली से जुड़े होते हैं. जीविकोपार्जन हेतु उनमें से अधिकांश का सहारा या तो उनका श्रम होता है, अथवा हस्त-कौशल. इस कारण जनसंस्कृति हालांकि नागरिक संस्कृति की अपेक्षा सरल और कम उलझी हुई होती है, लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन के कारण उन्हें उत्पाद और समाज की दिशा-दशा तय करने के अवसर नहीं मिल पाते. शीर्ष पर विराजमान अभिजन अपनी स्थिति का फायदा उठाते हुए शासन-प्रशासन में मनमाना हस्तक्षेप करते रहते हैं. श्रम तथा अपने सामान्य उत्पादों की खपत के लिए भी जनसामान्य अभिजन अथवा अभिजन हित हेतु कार्य करने वाली संस्थाओं का अनुकरण करते हैं. संसाधनों के अभाव में वे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी का उपयोग भी ढंग से नहीं कर पाते. यद्यपि वे ऐसे उद्योगों और व्यवसायों से संबद्ध हो सकते हैं, जहां प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन के आधुनिकतम सिद्धांतों का उपयोग होता हो. मगर वहां उनकी उपस्थिति एक निर्जीव उपकरण जैसी होती है. निर्णयकारी अवस्था में न होने के कारण वे अपने प्रौद्योगिकीय कौशल का अपने हितों के अनुसार उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं. इस कारण उनके जीवन में अपेक्षाकृत ठहराव होता है. यद्यपि शिक्षण-प्रशिक्षण, व्यापारिक सूझबूझ जैसी विशिष्ट योग्यताओं के बल पर जनसामान्य के बीच से कुछ सदस्य अभिजन वर्ग में सम्मिलित होते रहते हैं, किंतु अभिजनेत्तर से अभिजन की ओर संचरण प्रायः बहुत धीमी गति से—श्रेणीबद्ध आधार पर होता है. सामान्य स्थिति में अभिजन तक पहुंचने के लिए ‘जन’ को ‘मध्यवर्ग’ अथवा ‘अर्ध-अभिजन’ के स्तर से गुजरना पड़ता है.

अर्ध-अभिजन अभिजनेत्तर वर्ग से निकले होते हैं, जो अपनी शिक्षा अथवा अन्य किसी विशिष्ट योग्यता के बल पर अभिजन को प्रभावित कर, समाज में विशिष्ट स्थान बना लेते हैं. उन्हें अपने मूल वर्ग यानी अभिजनेत्तर समूहों के विकास से ज्यादा खुद को जल्दी से जल्दी अभिजन की कतार में सम्मिलित करने का उतावलापन होता है. अतः अभिजन का विश्वास जीतने के लिए वे उसे यथासंभव सहयोग प्रदान करते हैं. अभिजन वर्ग के स्थायित्व तथा उनके अबाध विकास में इन अर्ध-अभिजन सदस्यों का बहुत योगदान होता है. अभिजनेत्तर समूह से अर्ध-अभिजन अथवा अभिजन के स्तर तक उठकर पहुंचे सदस्य, कायाकल्पन की त्वरित प्रक्रिया से गुजरकर अपने मूल समूह से अलंघ्य दूरी बना लेते हैं. प्रकारांतर में वे अभिजन संस्कृति के सच्चे उपासक सिद्ध होते हैं. इस तरह ‘जन’ से ‘अभिजन’ की श्रेणी तक पहुंचे सदस्यों की प्रतिभा का लाभ उनकी श्रेणी के लोगों को नहीं पाता. परिणामस्वरूप जनसमाजों में विकास की दर अभिजन समाजों की अपेक्षा कम होती है. कई बार अभिजन समाज के सदस्य भी परिस्थितियों से टकराकर अथवा दूसरे अभिजन समूहों द्वारा बहिष्कृत होकर निम्नस्थ समूहों में खिसक जाते हैं. इस तरह चाहे-अनचाहे ‘जन’ और ‘अभिजन’ के बीच अंतरण का सिलसिला बना रहता है. अंतरण की इस सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया में ‘जन’ और ‘अभिजन’ का अनुपात लगभग अपरिवर्तित रहता है. विल्फ्रेड परेतो अपनी पुस्तक ‘माइंड एंड सोसाइटी’ में इसे ‘दोनों स्तर, अर्थात अभिजन एवं अभिजनेत्तर व्यक्तियों के बीच संचरण’ की संज्ञा देता है. इसे वह समाज के विकास एवं स्थायित्व के लिए अत्यावश्यक मानता है. उसके अनुसार संचरण की प्रक्रिया में अवमंदन की अवस्था में समाज में विक्षोभ की संभावना बनी रहती हैं. यहां विक्षोभ का अभिप्राय समाज में परिवर्तन की उथल-पुथल से है. उससे समाज में वास्तविक परिवर्तन हों, यह आवश्यक नहीं है. इसका कारण है कि लंबे समय तक एक समान स्थितियों में रहने के कारण जनसाधारण अपनी स्थिति से अनुकूलित हो जाते हैं. वे अपना आत्मविश्वास खो देते हैं. मान लेते हैं कि वे केवल अभिजन के संरक्षण में ही सुख-समृद्धि-भरा जीवन जी सकते हैं. उस अवस्था में उन्हें परिवर्तन की संभावना से ही घबराहट होने लगती है. परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया में एक अभिजन समूह का स्थान दूसरा अभिजन समूह ले लेता है. परिणामस्वरूप समाज का ढांचा लगभग अपरिवर्तनीय बना रहता है. समाज में नए वर्गों के उदय एवं पुराने वर्गों के पराभव की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए परेतो लिखता है—

‘व्यक्ति के इस परिसंचार की मंदता के परिणामस्वरूप शीर्षस्थ वर्गों में विकृत तत्वों की भरमार हो सकती है. दूसरी ओर निरंतर शासित हो रहे वर्गों में श्रेष्ठतर तत्वों की वृद्धि हो सकती है. उस अवस्था में समाज में असंतोष की वृद्धि होती है और छोटा-सा आघात भी अवस्था में परिवर्तन में ला सकता है. एक देश के दूसरे देश पर प्रभुत्व अथवा आंतरिक क्रांति से भी सत्ता-शिखर पर उथल-पुथल हो सकती है, इससे जो शासक हैं, वे शासित होकर निम्नस्थ स्थिति में पहुंच सकते हैं, दूसरी और परिस्थितियों का साथ मिलने पर शासित स्वयं को शासक अभिजन के रूप में स्थापित कर सकते हैं.’ (दि सोश्लिष्ट सिस्टम, पृष्ठ 30).

कभी-कभी जनक्रांतियों के माध्यम से शीर्ष पर तीव्र बदलाव होते हैं. अवसर का लाभ उठाते हुए अभिजनेत्तर वर्गों के वास्तविक प्रतिनिधि सत्ता-शिखर पर आसीन हो जाते हैं. अपने अतीत से वे अभिजनेत्तर वर्गों से संबद्ध होते हैं. प्रायः अपने ही वर्गों का विश्वास जीतकर, उन्हें यह भरोसा दिलाते हुए कि सत्ता केंद्र पर कब्जा कर लेने के बाद वे अभिजन और अभिजनेत्तर समूहों के बीच की दूरी को पाटने का प्रयत्न करेंगे तथा सत्ता के अभिजनोन्मुखी चरित्र में आमूल बदलाव लाकर उसे जनोन्मुखी बनाएंगे—वे अपना शासकीय ‘कैरियर’ आरंभ करते हैं. किंतु जनमत के सीधे दबाव के अभाव में, शासनाधिकार प्राप्त होते ही वे अपने वचन और प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने लगते हैं. ऐसा हमेशा उनके स्वार्थवश नहीं होता. शक्ति केंद्रों का वर्चस्वकारी माहौल और उसमें अकेला पड़ जाने का डर उन्हें परिस्थितियों से सामन्जस्य बनाने के लिए बाध्य करता है. क्योंकि वहां पहले से ही विद्यमान अभिजन सदस्य अपने हितों को लेकर एकजुट होते हैं. सत्ताकेंद्रों पर प्रतिगामी शक्तियां हावी न हों, अभिजनेत्तर समूहों के निर्वाचित सदस्य निश्चिंत होकर कार्य कर सकें, इसके लिए उनकी अपने समूह के प्रति आस्था और विश्वास जरूरी है. वैकल्पिक जनसंस्कृति के माध्यम से अभिजन वर्गों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है. ऐसी संस्कृति जो न केवल अभिजन संस्कृति के दबावों से सर्वथा मुक्त रहे, बल्कि स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता एवं लोकतंत्र को अनुकूल विस्तार दे सके. ऊपर से इतनी गत्यात्मक भी हो कि समकालीन परिवर्तनों, ज्ञान-विज्ञान संबंधी अधुनातन खोजों, रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा लोकेषणाओं को आत्मसात कर उनका लाभ उठा सके. यह कार्य वर्तमान आभासी लोकतंत्र को वास्तविक जनतंत्र में बदलने तथा अभिजनेत्तर समूहों के जनशक्ति के सामर्थ्य से परचाने पर संभव है.

इस अनुच्छेद में हम समावेशी आधुनिकता की अवधारणा पर विचार करेंगे. आधुनिकता नवीनतम ज्ञान, विचार-शैलियों, उत्पादन पद्धतियों को अपनाते हुए निरंतर विकासमान रहने अथवा दिखने की अवस्था है. यह जीवन की गतिशीलता का पर्याय होती है. यह दर्शाती है कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों का शोधन-परिशोधन कर मनुष्य ने उन्हें अपने सुख-स्वार्थ के अनुरूप किस स्तर तक परिवर्तित, परिमार्जित किया है. यह जरूरी नहीं कि संसाधनों के शोधन-परिशोधन का लाभ समाज के सभी वर्गों को समानरूप से प्राप्त हो, किंतु लाभ की मात्र से ही आधुनिकता की कसौटी तय होती है. तदनुसार जो व्यक्ति वैज्ञानिक-तकनीकी आविष्कारों का जितना अधिक लाभ अपने स्वार्थ के लिए उठाता है, वह उतना ही आधुनिक मान लिया जाता है. आधुनिकता सामान्यतः दो प्रकार की हो सकती है. पहली विचारगत, दूसरी परिवेशगत. विचारगत आधुनिकता में नवीनतम ज्ञान तथा उसके अनुप्रयोग को सम्मिलित किया जा सकता है. उसका दायरा बड़ा होता है. विचारगत आधुनिकता व्यक्ति के विवेक, अनुभव, शिक्षा-दीक्षा तथा अन्यान्य स्थितियों पर निर्भर करती है. विचारगत आधुनिकता का दायरा विस्तृत होता है. आवश्यक नहीं कि अभिजन जिसके पास संसाधनों का प्राचुर्य है वह वैचारिक रूप से भी आधुनिक हो. कई बार तो संसाधनों का प्राचुर्य ही अभिजन को ज्ञानार्जन की ललक से दूर ले जाता है. पुराने नवाब, जमींदार, सामंत आदि पढ़ने-लिखने या ज्ञानार्जन की दूसरी गतिविधियों में स्वयं हिस्सा लेने से इसलिए बचते थे, क्योंकि वे मानते थे कि ज्ञानार्जन उनके मातहत वजीर, मंत्री, महामंत्री आदि का धर्म है, जिन्हें वे अपनी हैसियत के अनुसार आसानी से जुटा सकते हैं. वे मानते हैं कि केवल राज करने के लिए बने हैं और उनका यह अधिकार ही उनका गुण है. अपनी वेशभूषा, रहन-सहन आदि में आधुनिक दिखने वाले बहुत से लोग असल जीवन में बेहद कर्मकांडी, रूढ़िवादी और वैचारिक स्तर पर अत्यंत पिछड़े हो सकते हैं. इसके बावजूद विचारगत आधुनिकता यानी ज्ञानानुभव के आधुनिकतम साधनों का सर्वाधिक लाभ अभिजन समूह को प्राप्त होता है. क्योंकि अपने समय के ख्यात बुद्धिजीवी एवं दक्ष पेशेवर निहित स्वार्थ के लिए अभिजन की सेवा के लिए सहर्ष खिंचे चले आते हैं. अभिजनेत्तर समूहों के इन बुद्धिजीवियों की कोशिश अपने समूह के समग्र विकास हेतु आमूल परिवर्तन के बजाय येन-केन-प्रकारेण स्वयं को अभिजन अथवा अर्ध-अभिजन समूह में शामिल कर लेने की होती है. अभिजन शक्तियों की निकटता प्राप्त करने के लालच में वे जनसाधारण के हितों से समझौते करने लगते हैं. अवसर आने पर वे अपने ही वर्ग के बुद्धिजीवियों से स्पर्धा करने में पीछे नहीं रहते. शीर्षस्थ शक्तियों वे आर्थिक, राजनीतिक अथवा धार्मिक चाहे जो हों—की सफलता का रहस्य भी यही होता है कि अपने-अपने मकसद को लेकर वे ऊपर से चाहे जितनी भिन्न और परस्पर असंगत नजर आती हों, भीतर से पूर्णतः एकजुट तथा लक्ष्योन्मुखी होती हैं.

दूसरी ओर अभिजनेत्तर समाज अपनी शिक्षा, तकनीकी कौशल, धर्म, जाति आदि को लेकर छोटे-छोटे अनेक टुकड़ों में बंटा होता है. उदाहरण के लिए एक धर्माचार्य अपने धर्म के समर्थन में विधर्मी आचार्य की आलोचना करेगा, उसके धर्म और मान्यताओं में मीन-मेख निकालेगा. दोनों अपने विचारों के अनुसार समाज को अलग-अलग समूहों में बांटकर परस्पर प्रतिद्वंद्वी नजर आएंगे. उनपर विश्वास करके बहुसंख्यक वर्ग की कुल शक्तियां छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर प्रभावहीन हो जाती हैं. दूसरी ओर शिखर पर विराजमान धर्माचार्यों में उन्हीं मुद्दों को लेकर एक-दूसरे से न झगड़ने, सहयोगी रवैया अपनाए रखने तथा एक-दूसरे के अस्तित्व को समर्थन देने का आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित समझौता होता है. यही बात राजनीतिक, आर्थिक शक्तियों के बारे में कही जा सकती है. बाजार कब्जाने के लिए दो उद्योगपति आपस में गलाकाट स्पर्धा करते नजर आते हैं. विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च कर वे उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर छाने की हर-संभव कोशिश भी करते हैं. दोनों ही बार-बार यह दावा करते हैं कि उन्होंने उपभोक्ता के हितों तथा जरूरतों का ध्यान रखा है. लेकिन उनमें से एक भी न तो उपभोक्ता तक सस्ती वस्तु पहुंचाने के लिए अपने मुनाफे में कटौती करता है, न ही पूंजीगत लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ से संतुष्ट हो जाने का आश्वासन देता है. दोनों उपभोक्ता हितों के संरक्षक होने का दावा करते हुए लाभ को अधिकार मानकर उत्पादन गतिविधि में हिस्सा लेते हैं. अभिजन उत्पादक समूहों की ये चालाकियां उपभोक्ता आमतौर पर समझता है. इसके बावजूद संगठन अथवा सार्थक प्रतिरोध के तरीकों से अनजान होने के कारण वह चुपचाप सहता जाता है. परिर्वतनकामी आंदोलनों की सफलता अभिजनेत्तर समूहों की एकता पर निर्भर करती है. उसके लिए वर्गीय हितों की पहचान कर उनके बीच सामंजस्य बनाए रखना जरूरी है. इसके लिए उन्हें बौद्धिक समर्थन की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शब्दों में वैकल्पिक संस्कृति अथवा जनसंस्कृति की नींव ऐसी आधुनिकता पर निर्भर करती है, जो अभिजनेत्तर वर्गों को हितों की एकता तथा उनके लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती हो.

परिवेशगत आधुनिकता, आधुनिकता का प्रदर्शनकारी रूप है. उसमें नवीनतम ज्ञान, उत्पादन पद्धतियों तथा प्रौद्योगिकीय लाभों को सम्मिलित किया जा सकता है. यह अभिजन वर्ग के जीवन-स्तर, रुचियों, आपसी व्यवहार, सामाजिक, लाभाकांक्षा आदि से प्रकट होती है. अपनी त्वरा और सफलता के लिए यह भी आधुनिक ज्ञान पर निर्भर होती है. अतः इसकी निरंतरता को बनाए रखने के लिए अभिजन सदैव ज्ञान के नवीनतम स्रोतों की तलाश में रहते हैं. नया ज्ञान जहां भी, जैसे भी मिले, उसको अपने स्वार्थानुरूप प्रयुक्त करना—इसी पर उनकी सफलता निर्भर करती है. जनसाधारण के पिछड़ेपन का यह भी कारण है कि वह ज्ञान के आधुनिकतम प्रकल्पों का अपने वर्गीय हितों के अनुरूप इस्तेमाल करने में अक्षम होता है. इसलिए नहीं कि उसमें प्रतिभा की कमी होती है, बल्कि जैसा ऊपर भी संकेत किया गया है, अभिजन जो कार्य संपादित करता है, अथवा अपनी व्यावसायिक सफलता हेतु योजना-निर्माण से लेकर लार्भाजन तक वह जितने भी कार्यक्रम संचालित करता है, सभी के लिए आवश्यक प्रतिभाएं जनसामान्य के बीच से ही उभरती हैं. अभिजनेत्तर समूहों की कमी होती है कि वे अपने ज्ञान और अनुभव का अपने हितों के अनुरूप उपयोग करने से कतराते हैं. इसके प्रमुख कारणों में से एक संसाधनों की कमी भी है. अन्य कारण है आत्मविश्वास की कमी, जो निरंतर शासित होने, दमन और उत्पीड़न को सहते जाने, गरीबी, बेरोजगारी, संगठन की कमी तथा आपसी अविश्वास के चलते पैदा होता है. संसाधनों की कमी तथा संकट की स्थिति में मदद की अनिश्चितता अभिजनेत्तर वर्गों को खतरा उठाने से रोकती है. परिणामस्वरूप वह अपनी स्थिति से समझौता करने में ही अपनी भलाई समझने लगता है. वर्ग चेतना का अभाव भी अभिजनेत्तर समूहों की एकता में बाधा बनता है. जबकि संगठन एवं ठोस विचार-दृष्टि द्वारा संसाधनों की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है. उनीसवीं शताब्दी के मध्य में लंदन के रोशडेल कस्बे के 28 गरीब बुनकरों का उदाहरण हमारे सामने है. उन्होंने अपने उपभोक्ता भंडार की शुरुआत मात्र 28 पाउंड की पूंजी से की थी. गरीब बुनकरों को सदस्यता राशि के रूप में एक पाउंड जुटाने के लिए भी दो से तीन महीने तक अतिरिक्त श्रम करना पड़ा था. उसके बाद अपनी सामूहिक निष्ठा, संगठन सामर्थ्य और संकल्प के बल पर उन्होंने उपभोक्ता भंडार सहित अनेक सहयोगाधारित उद्यमों की शुरुआत कर बेमिसाल कामयाबी प्राप्त की. फलस्वरूप वे दुनिया-भर के सहकार-प्रेमियों की प्रेरणा बने. उनकी सफलता अधिलाभ की संकल्पना; यानी मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ को वरीयता देने पर निर्भर थी. ऐसा नहीं है कि रोशडेल पार्यनियर्स के उन सदस्यों को उपभोक्ता भंडार से कोई आर्थिक लाभ नहीं पहुंचा था. समिति के सदस्यों ने अपनी सदस्यता राशि से कई गुना मौद्रिक लाभ अर्जित किया था, किंतु सहकारी उपभोक्ता भंडार के माध्यम से लाभार्जन उनका ध्येय नहीं था, उनका मकसद गरीब बुनकरों, मजदूरों को बड़े दुकानदारों, पूंजीपतियों की मनमानी से छुटकारा दिलाना था, जो मिलावटी सामान को मनमाने दामों पर बेचते थे. उनकी सफलता से एक नए विचार की स्थापना हुई, जिसके अनुसार संगठन के दम पर वड़ी से वड़ी सत्ता को न केवल चुनौती दी जा सकती है, बल्कि उसको अपने हितों के अनुरूप बदला भी जा सकता है. इसके साथ-साथ सहकार संस्कृति को बल मिला जो प्राचीनतम समाजों की विशेषता थी, मगर कालांतर में साम्राज्यवाद, सामंतवाद और पूंजीवाद के वर्चस्वकारी दौर में यह नेपथ्य की ओर खिसकती गई.

दरअसल इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं, जब परिवर्तन की इच्छा को उत्सुक समाज के असंतुष्ट वर्ग अपनी दुर्दशा के कारणों को जानने को उत्सुक हो जाते हैं. इस कोशिश में वे परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझने तथा उनका लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. उस समय यदि सही नेतृत्व एवं परिवर्तनकामी विचारधारा का साथ मिले तो वे अपने हितानुकूल परिवर्तन लाने में कामयाब भी होते हैं. फ्रांस, रूस, चीन, क्यूबा, वियतनाम आदि देशों की जनक्रांतियां इसी जागरण का सुफल थीं. जनक्रांतियों की सफलता क्रांति के आवेग, नेतृत्व कुशलता, जनसमर्थन तथा तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करती है. किंतु क्रांति के बाद आए बदलावों को दीर्घकालिक और जनोन्मुखी बनाए रखना, पूरी तरह अभिजनेत्तर समूहों की बौद्धिक सक्रियता, एकता, क्रांति के लक्ष्य के प्रति निष्ठा तथा नेतृत्वकारी शक्तियों की सदेच्छाओं पर निर्भर करता है. उसके अभाव में क्रांति का प्रभाव धुंधला पड़ने लगता है. उसके फलस्वरूप सत्ता में आए लोग अभिजन समूहों में ढलने लगते हैं. इस बीच अभिजन भी शांत नहीं बैठता. क्रांति की संभावना को टालने के लिए शीर्षस्थ अभिजन योजनाबद्ध तरीके से काम लेते हैं. वे धर्म, मीडिया, राजनीति, शासन-प्रशासन सहित खरीदे गए बुद्धिजीवियों के सभी वैध-अवैध तरीकों का उपयोग करते हैं. जनसामान्य के हितों का सामान्यीकरण कर उसको एकजुट करने के बजाय वे उसे छोटे-छोटे अनगिनत समूहों में बांट देते हैं. उससे उनकी प्रभावी शक्ति छिन्न-भिन्न हो जाती है. समान परिस्थितियों में जी रहे समूह एक हों, इस संभावना को टालने के लिए अभिजन उनके बीच हितों की स्पर्धा पैदा करने का दुष्चक्र चलाता है. फलस्वरूप वे समूह आपस में ही टकराने लगते हैं. उसका सीधा असर उनके आत्मविश्वास पर पड़ता है. इसके चलते वे अपने विकास के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने अथवा समान परिस्थितियों में रह रहे अपने ही जैसे लोगों के साथ मिलकर समाधान हेतु संगठित प्रयास करने के बजाय सरकार अथवा समाज के शिखरस्थ वर्गों से मदद की उम्मीद करने लगता है. इस प्रवृत्ति को स्थायी रूप देने, व्यक्ति का स्वभाव बनाकर स्थितियों से अनुकूलन कराने में पूंजीवाद-पोषित-संरक्षित मीडिया का भी बड़ा योगदान होता है. किंचित विषयांतर का खतरा उठाते हुए, मीडिया के अभिजनोन्मुखी चरित्र की चर्चा, अभिजनेत्तर समूहों की चौतरफा जकड़बंदी को समझने के लिए जरूरी है.

उनीस सौ पचास-साठ के दशकों को याद करने की याद करने की कोशिश करें. पूरा देश आजादी के पश्चात देश के नवनिर्माण में जुटा था. गांधी के अधूरे सपनों को पूरा करने की आस लेकर विनोबा भूदान यात्रा पर निकल चुके थे. लोग उनकी बातों से प्रभावित होकर खुले दिल से भूदान आंदोलन को सफल बनाने में जुटे थे. भूदान की भावना घनीभूत होते-होते ‘ग्रामदान’ तक व्यापक हो चुकी थीं. मात्र एक दशक की यात्रा में विनोबा चालीस लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि भूमिहीनों के लिए जुटा चुके थे. यह पूरी दुनिया में किसी भी अहिंसक प्रयास के माध्यम से किया गया, अब तक सबसे बड़ा भू-अंतरण था. लेकिन गांव में सभी के पास तो जमीन न थी. विनोबा के आवाह्न पर यदि भू-स्वामी भूमिहीनों की सहायता के लिए आगे आ रहे थे, तो भूमिहीनों की भी इच्छा थी कि वह अपने गांव-ज्वार के विकास में अपना योगदान दे सकें. गरीब मजदूर, भूमिहीन किसान, जिनके पास उनकी एकमात्र पूंजी उनका श्रम था, अभी तक दूसरों के कहने पर पसीना बहाते आए थे. ऐसे लोगों का गांव के विकास के लिए स्वैच्छिक योगदान क्या हो? इसी से श्रमदान का विचार सामने आया. फिर क्या था, भूदान, ग्रामदान के साथ श्रमदान की लहर भी उठने लगी. इनमें श्रमदान सवार्धिक सुलभ था. इसलिए मेहनतकश लोग श्रमदान को निकल पड़े. धीरे-धीरे उनके साथ गांव के दूसरे स्त्री-पुरुष भी सम्मिलित होते गए. कालांतर में स्कूल के विद्यार्थियों को भी उससे जोड़ दिया, ताकि उनमें सामुदायिकता की भावना बलवती हो. यह कार्य गांवों में सातवें-आठवें दशक तक चलता रहा. मुझे याद है 80 के दशक में पॉलिटेक्नीक के अंतिम वर्ष में एक पर्चा रचनात्मक कार्य का होता था. जिसमें विद्यार्थियों को अपनी संकल्प-भावना विकेंद्रीकृत विकास के संदर्भ में दर्शानी पड़ती थी. 1980 में हमारे टीम भी एक गांव में पहुंची थी. दल का उद्देश्य ग्रामीण लोगों की समस्या जानने के अलावा उनके बीच ‘श्रमदान’ का प्रचार-प्रसार करना था, ताकि छोटे-छोटे कार्यों के लिए सरकार का मुंह देखने के बजाय अपने बूते उनका समाधान खोज सकें. गांव जाने के बाद जो देखने को मिला उसने हमें चौंकने को मजबूर कर दिया. जिस ‘श्रमदान’ के संदेश को हम ग्रामीणों तक पहुंचाना चाहते थे, गांववाले उससे भलीभांति परिचित थे, गांव में एक नाला श्रमदान के अंतर्गत परस्पर सहयोग के आधार पर बनाया जा रहा था. यह वह दौर था जब लोगों के मनोमस्तिष्क पर स्वाधीनता संग्राम के नैतिकतावादी आंदोलन का असर था और उसके आधार पर एक सहयोगात्मक, एक-दूसरे पर भरोसे का सम्मान करने तथा समस्याओं के बीच से ही समाधान खोज निकालनेवाली जनसंस्कृति पनप चुकी थी. कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों में अभिजन चरित्रों की भरमार थी, इसके बावजूद अभिजनेत्तर वर्गों का उनमें भरोसा था. लोग अपने नेता के आवाह्न पर कुछ भी त्याग करने को तैयार थे. गांधी और विनोबा को मिली अप्रत्याशित सफलता का रहस्य भी यही था कि दोनों ने अपने अभिजात्य चरित्र का परित्याग कर अभिजनेत्तर समूह के रहन-सहन और साधारण जीवन-शैली को अपनाया था. फलस्वरूप अभिजन और अभिजनेत्तर समूहों के बीच की दूरियां घटी थीं. जनता का आत्मविश्वास वापस लौटा था. जो लोग कभी ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ कहकर राजनीति से मुंह मोड़ लिया करते थे, वे निहत्थे ही दुनिया की महाशक्ति कहलाने वाले अंगे्रजों को ललकारने लगे थे.

उन दिनों समाचारपत्रों में भी देश समाज को अलग-अलग खंडों में बांटकर देखने की परंपरा न थी. उनके पूरे देश में एक अथवा अधिक से अधिक प्रांतवार संस्करण होते थे. मगर नव्वे के दशक में नई अर्थनीतियों के लागू होने के पश्चात उनका तेजी से स्थानीयकरण हुआ था. स्थानीयता पर जोर देते हुए एक शहर के कई-कई परिशिष्ट निकलने लगे. एक क्षेत्र की समस्या तथा उसके विरोध में चल रही हलचलों के बारे में दूसरे क्षेत्र के नागरिकों को भी जानकारी हो, यह अब अनिवार्य नहीं रह गया था. समाचारपत्रों द्वारा यह कार्य स्थानीय समस्याओं को प्रशासन की नजर में लाने के नाम पर किया गया था. इसका जनता को कितना लाभ हुआ, यह तो आकलन का विषय है, लेकिन समाचारपत्र मालिकों को इससे अवश्य दुहरा लाभ पहुंचा था. एक तो स्थानीय मुद्दों पर जोर देने से नए पाठक बनाना आसान था. इससे उनकी आय में जबरदस्त तेजी आई. अखबार निकालना जो कभी मिशन हुआ करता था, उसे इस दौर में लाभकारी उद्यम के रूप में देखा जाने लगा. लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में ख्यात पत्रकारिता उद्योग में ढलने लगी. अब उनका नियंत्रण संपादकों और पत्रकारों के हाथों से खिसककर बड़े पूंजीपतियों के हाथों में जा पहुंचा था, जिनका हित सरकार को चारों ओर से घेरकर राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखने में था, ताकि उसके माध्यम से सरकार और उनके नेताओं को ब्लेकमेल कर सकें. दूसरा लाभ उन नेताओं को हुआ जो किसी न किसी बहाने सत्ता प्राप्त करना चाहते थे. अखबारों में प्रोपेगेंडा कर वह अपनी राजनीति को चमका सकते थे. बहरहाल, स्थानीयता के आधार पर समस्या खंड-खंड में सामने आती थी. यदि दूसरे क्षेत्र में भी वैसी ही समस्या हो, तो भी उसके समाधान के लिए पूरे समाज के एकजुट होने की संभावना कम थी. यह अल्पसंख्यक अभिजन द्वारा बहुजन अभिजनेत्तर समूहों को टुकड़ों में बांट देने की रणनीति का नतीजा था. उल्लेखनीय है कि जनता की समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान दिलाना अनुचित न था. किंतु जलभराव, गंदगी, आपसी झगड़े, गुटबंदी, जातिगत भेदभाव आदि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो स्थानीय लोगों द्वारा बिना किसी बाहरी सहायता के, निजी संसाधनों, सहयोग आदि के आधार पर आसानी से दूर की जा सकती हैं. चूंकि संगठन-शक्ति का बोध जनसाधारण को आत्मविश्वास से भर देता है. प्रकारांतर में वह बड़े प्रतिरोधों की संभावनाओं को जन्म दे सकता है. यह डर अभिजन ताकतों को था. इसलिए उन्हीं के इशारे पर शीर्षस्थ ताकतों द्वारा समाचारपत्रों के माध्यम से अभिजनेत्तर समूहों को बांट देने की रणनीति सफल हुई. लोग उनके बहकावे में आकर स्थानीय समस्याओं का समाधान स्वयं तलाशने के बजाय उनके समाधान के लिए सरकार का मुंह ताकने लगे. अब एक जैसी समस्याओं के बावजूद उनके लिए सरकार के आगे फरियाद करने वाले अलग-अलग थे. इससे हितों की स्पर्धा तथा आपसी अविश्वास को बढ़ावा मिला. अपने ही समूहों पर संदेह करने की प्रवृत्ति बढ़ी, साथ ही संगठित प्रतिरोध की भावना उत्तरोत्तर कमजोर पड़ती गई. उन गांवों में भी जहां सामुदायिक भावना प्रबल थी, लोगों ने भूदान, श्रमदान जैसे जनांदोलनों में आगे बढ़कर सहर्ष हिस्सेदारी की थी, जो अपनी समस्याओं का समाधान मिल-जुलकर सामुदायिक भावना के साथ खोज लिया करते थे. खेतों की बुवाई, कटाई से लेकर त्योहारों, उत्सवों आदि में सहकार-भाव के प्रदर्शन से बड़े-बड़े कार्य अपने बूते साध लेते थे, वे भी छोटी और मामूली समस्याओं के समाधान हेतु सरकार की ओर देखने लगे. अखबार सहित बाकी संचार माध्यमों का दायित्व समाज में अच्छे विचारों की खेती करना भी था. लेकिन लोगों को उनके कर्तव्य की याद दिलाने के बजाय वे मामूली समस्याओं के लिए भी सरकार पर निर्भर होने तथा उसपर दबाव बनाए रखने को उकसाने लगते हैं. इसके पीछे पूजीपतियों की मंशा थी कि सरकार कमजोर और ढुलमुल नजर आए, ताकि उसकी अनमनस्यकता लाभ उठाकर उससे अपने स्वार्थानुकूल कानून बनवा सकें. आशय है कि जनसाधारण जिसे सहज-स्वाभाविक मान लेता है, वह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. उसे बनाए रखने के लिए वैसे ही सुविचारित, सुव्यवस्थित प्रबंध अभिजन वर्ग की ओर से किए जाते हैं, ताकि बहुसंख्यक अभिजनेत्तर वर्गों के श्रम-कौशल तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अभिजन वर्ग का एकाधिकार बना रहे तथा उसे कम से कम चुनौतियां मिलें.

इन धूर्त्तताओं के बावजूद अल्पसंख्यक अभिजन सत्ताकेंद्र पर छाया रहता है तो इसलिए नहीं कि बहुजन में नेतृत्व का अभाव होता है. नेतृत्व तो वह किसी न किसी रूप में करता ही रहता है. असल में खुद को वड़ी जिम्मेदारी के अयोग्य मानकर पीछे हटने लगता है. अपने भीतर छिपी प्रतिभा को परिष्करण का अवसर ही नहीं देता. वह अपने भविष्य के प्रति असावधान हो, नेतृत्व का दायित्व उस वर्ग को सौंप देता है, जिसकी निगाह में उसका मूल्य एक श्रम-इकाई अथवा उपभोक्ता से अधिक नहीं है. ज्ञान की परंपरा से कटकर या काट दिए जाने पर अभिजनेत्तर समूह अभिजन के हाथों का औजार बनकर रह जाते हैं. जिसका राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक अभिजन अपनी-अपनी तरह से दुरुपयोग करते हैं. धार्मिक अभिजन उसकी समस्याओं के समाधान हेतु दैवी-कृपा को अपरिहार्य बताकर समस्या के मूल कारणों से उसका ध्यान हटा देते हैं. आर्थिक अभिजन की दृष्टि में उसकी हैसियत एक श्रम-इकाई या उपभोक्ता की होती है. जबकि राजनीतिक अभिजन उसे खुद को सत्ता-शिखर तक पहुंचाने वाली सीढ़ी के एक पायदान से ज्यादा महत्त्व नहीं देते. उनकी निगाह शिखर की ओर होती है. जैसे ही एक पायदान चढ़ता है, छूट गए पायदानों को बिसरा देता है. सामाजिक अभिजन उसके समक्ष बार-बार संस्कृति तथा परंपरा का राग अलापते हैं. धर्म, संस्कृति, परंपरा, संस्कार आदि की प्राचीनता का हवाला देते हुए, वे उससे अनुकूलन की जिम्मेदारी निभाते हैं; और इस तरह समाज में यथास्थिति बनाए रखने में मददगार सिद्ध होते हैं. विडंबना है कि लोकतंत्र में भी, जिसे ‘जनता पर, जनता द्वारा जनता के लिए शासन’ जैसा गरिमामय पद दिया जाता है, कोई खास सुधार नहीं हो पाता. लोकतंत्र यह कमजोरी ऐसी भी नहीं है, जिसके बारे में पहले से सोचा न गया हो. प्लेटो के जमाने से लेकर आज तक जनप्रतिनिधियों का विचलन बुद्धिजीवियों को उसके सार्थक विकल्प की खोज के लिए प्रेरित करता आया है. लोकतंत्र की यह कमी संभवतः उसकी मूल अवधारणा में ही निहित है. लोक एक अमूर्त्तन संकल्पना है. समाज की भांति वह भी नियमों, विधानों का समुच्चय है. उसमें एक बार चुन लेने के पश्चात जनता का अपने प्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण नहीं रह जाता. निर्वाचन के समय जनता बहुमत में होती है. किंतु उस प्रक्रिया के गुजर जाने के बाद मतदाता अल्पसंख्यक बन जाता है तथा निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरे जनप्रतिनिधियों तथा अन्य शिखरस्थ शक्तियों के साथ मिलकर बहुमत का रूप ले लेते हैं. वे यदि किसी के प्रति जवाबदेही महसूस करते भी हैं, तो उन संस्थाओं के प्रति जिन्हें प्रत्यक्षतः अथवा परोक्ष रूप में विधायिका ने गढ़ा था. ऐसी अवस्था में कर्तव्यच्युत जनप्रतिनिधि को दोषी ठहरा पाना आसान नहीं होता. अतएव जिस ध्येय के लिए सरकार का गठन किया गया था, वह अधूरा रह जाता है. कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय की उम्मीद में जनसाधारण जिन संस्थाओं का चयन करता है, वे पर्याप्त निगरानी व्यवस्था के अभाव में वर्गीय हितों के पोषक-संवर्धक होकर रह जाती हैं. ऐसी व्यवस्था जिसमें सरकार बनाने वाली जनता को शासन के आगे दोयम दर्जे का समझा जाता हो, लोकतांत्रिक हो जी नहीं सकती. सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर मार्क्स, प्रूधों, परेतो तक सभी ने ऐसे लोकतंत्र की कटु आलोचना की है. परेतो ने तो उसे ‘फ्राड’ तक कहा है. जाहिर है, केवल लोकतंत्र सत्ता के चरित्र में परिवर्तन का एकमात्र विकल्प नहीं है. सत्ता के अधिकतम मानवीकरण हेतु लोकतंत्र को जनतंत्र में बदलना होगा, ताकि उसपर नागरिक संस्थाओं का प्रत्यक्ष नियंत्रण संभव हो सके. इसके लिए जनसंस्कृति के दायरे में विस्तार अपरिहार्य है. उसके दायरे में अभी तक सामाजिक लोकाचार, परंपरा, कला-साहित्य, रीति-रिवाज, मानवीय संबंध आदि आते हैं.

अभिजन प्रायः लोकलुभावन नारों और वायदों के साथ सत्ता में आते हैं. अभिजनेत्तर समूहों को विश्वास दिलाते हैं कि वे उनके सबसे बड़े और कदाचित एकमात्र हितैषी हैं. दर्शाते हैं कि उनकी छत्रछाया में वह अपने विकास की ओर से निश्चिंत हो सकता है. नेता जनसेवक होने का दावा करता है. संसद में प्रवेश करते समय वह प्रतिज्ञा करता है कि वह जनकल्याण के प्रति सत्यनिष्ठ भाव से कार्य करेगा. व्यापारी इस मामले में कुछ ज्यादा साफ होता है. वह अकसर कह देता है कि उसका सारा व्यापारिक लाव-लश्कर मुनाफे के लिए है. साथ में वह यह भी दावा करता है कि उसका मुनाफा बाकी समाज के भी हित में है. मगर वह कभी जाहिर नहीं होने देता कि उसका मुनाफा जिसे वह अपना अधिकार बताता है, सीधे जनता की जेब से आ रहा है. अपने लाभ के सामाजिक औचित्य को सिद्ध करने के लिए वह लाभ का एक हिस्सा सार्वजनिक कार्यों में लगाता है. इससे लाभार्जन के नाम पर की जा रही लूट के प्रति जनसहमति बनाने लगती है. यही बातें दूसरे अभिजन समूहों के बारे में भी सही है. सभी प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरूप में लोककल्याण के दावे के साथ अपने औचित्य को स्थापित करते रहते हैं, किंतु शिखर पर पहुंच जाने के बाद अपने वास्तविक उद्देश्य को बिसराकर स्वार्थसिद्धि में लिप्त हो जाते हैं. जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम रखने के लिए वे तरह-तरह के आडंबर रचते हैं. परिणाम यह होता है कि विकास का दस प्रतिशत हिस्सा साधारणजन के हिस्से आता है तथा 90 प्रतिशत अभिजन हड़प ले जाते हैं. उदाहरण के लिए 5000 रुपये मासिक वेतन पाने वाला औसत भारतीय वर्ष में 60000 रुपये जुटा लेता है. दूसरी ओर शिखरस्थ अभिजनों की आय करोड़ों में होती है. यदि इसे एक करोड़ रुपये मासिक भी मान लिया जाए तो वर्ष भर में उसकी कुल आय 12 करोड़ रुपये होगी. अब यदि दोनों की आय में 10 प्रतिशत वृद्धि होती है तो श्रमिक को वर्ष में मात्र 6000 रुपये वर्ष अतिरिक्त प्राप्त होंगे. दूसरी ओर उसी दूर से मुनाफा बढ़ने पर अभिजन को एक करोड़ बीस लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी होगी. श्रमिक से सीधे 2000 गुना अधिक. महंगाई और मुद्रास्फीति से भी प्रभावित होगा. किंतु वह अपनी अतिरिक्त आय को व्यापार में निवेश कर नए लाभ के अवसरों का सृजन कर सकेगा. जबकि श्रमिक की अतिरिक्त आय मुद्रास्फीति और महंगाई की भेंट चढ़ जाएगी.

समानतामूलक विकास के लिए आवश्यक है कि अभिजनेत्तर समूह इस भ्रांति से बाहर निकलें कि वे केवल शासित होने के लिए बने हैं. कि शासक और शासित प्रकृति ने निर्धारित किए हैं तथा राष्ट्र और समाज का भला कुशल शासक या सरकार पर निर्भर होता है. ऐसा ‘कुशल शासक’, जो लोगों के विवेक के बजाय भ्रांतियों या पूर्वाग्रहों द्वारा चुना गया हो, वह केवल राज्य के साम्राज्यवादी मनसूबों को पूरा कर सकता है. विकास को आंकड़ों की कारीगरी के रूप में दर्शा सकता है. समाज में व्याप्त ऊंच-नीच को मिटाने के बजाए उसे संरक्षण दे सकता है. स्वार्थ के लिए समाज को बांट सकता है और लोगों को बीच ऐसे मुद्दों को लेकर स्पर्धा करा सकता है, जिनका उनके विकास से कोई नाता न हो. अभी तक वह यही करता आया है. समाज में शासक की उपस्थिति और उसकी सर्वोच्चता के प्रति जनस्वीकृति सामाजिक विषमता और बहुआयामी स्तरीकरण का मूल कारण है. अभिजनेत्तर समूहों की शोषण से मुक्ति तभी संभव है जब वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सचेत हों. रूसो के अनुसार बहुजन को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह अल्पजन पर शासन करें. यानी जो सरकार बने उसके प्रति बहुजन की सहमति हो. समानता और बराबरी की राह में रूसो का यह संदेश बिसरा गया. जनांदोलनों के दबाव में लोकतंत्र को अपनाया गया, कितु वह प्रभावी हो, जनता लोकतंत्र की भावनाओं के अनुसार स्वयं को ढाल पाए उससे पहले ही जनचेतना को धर्म, जाति, संपद्राय, गोत्र और क्षेत्रीयता के छोटे-छोटे खानों में बांट दिया गया. संस्कृतिकरण के नाम पर गुरुडम परोसा गया, अध्यात्म की जगह लेने पहले धर्म आया, फिर उसकी जगह कर्मकांडों, रूढ़ियों, खोखले आदर्शों और पाखंड ने ले ली. जिंदगी की जद्दोजहद में डूबे साधारणजन के पास इस षड्यंत्र को समझने का समय ही नहीं था. जो समझते थे, वे भी किसी न किसी दबाव में आकर सहते जाने को विवश थे. जनता को नकारात्मक, प्रगति-विरोधी कार्यक्रमों में उलझाकर अभिजन अपनी स्थिति को निरंतर मजबूत करते गए.

इन हालात से बचने का एकमात्र रास्ता है—समांगीकृत विकास. लोक-संस्कृति को स्वस्थ्य, चैतन्य, आत्मनिर्भर, समानता और सद्भाव की पोषक जनसंस्कृति में बदलना. समाज को परंपरा के गैरजरूरी दबावों से बाहर लाकर उसमें न्याय, समानता, मानवाधिकार, सहयोग एवं साहचर्य जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों की स्थापना करना. मान लेना कि प्राकृतिक संसाधनों पर प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार है. आवश्यकता से अधिक पर किसी का, किसी भी वस्तु पर अधिकार अवैध और अनैतिक है. इसलिए जो है, जितना है, सभी उसका परस्पर भोग करें. विकास को लेकर पूरे समाज का एक सपना हो. उसके लिए सभी मिल-जुलकर प्रयत्न करें. जो समस्याएं आड़े आएं उनका मिल-बैठकर सर्वसम्मत समाधान खोजें. दूसरों से विकास की उम्मीद करते हुए सबकुछ उसके भरोसे छोड़ देंगे तो समाज के मुट्ठी-भर लोग खुद को ‘सबकुछ’ मानकर बाकी को ‘कुछ नहीं’ मानने लगेंगे. अभिजन संस्कृति का बोलबाला, ऊंच-नीच, छोटे-बड़े का बोध बना रहेगा. शिखर पर बैठे अभिजन मनमानी करते रहेंगे. कभी बौद्धिक संपदा, कभी धर्म, कभी राष्ट्रीयता तो कभी पैत्रिक-अधिकार के नाम पर वे उसकी पूरी कीमत वसूलेंगे. न्याय और कानून के नाम पर संस्थाओं का अंबार खड़ा करने से अच्छा है, समाज में न्याय की प्रतिष्ठा करना. निरंतर गतिमान जनसंस्कृति में लोगों के भरोसे को लौटाना. जनसाधारण के भीतर पैठे उस संशय और अविश्वास को समाप्त करना, जिससे वह निर्णय लेने में कतराता है. अपने जीवन की बागडोर दूसरे के हाथों में सौंपकर स्वयं नियति का दास बन जाता है. इसके लिए ऐसे समावेशी समाज का गठन करना होगा जिसमें कानून की अव्वल तो जरूरत ही नहीं पड़े. यदि कानून हों भी तो ऊपर से थोपे हुए नहीं. न ऐसे जिन्हें समझने के लिए विशेषज्ञों को दावत देनी पड़े. कानून ऐसे हों जिन्हें हर कोई आसानी से समझ सके. जिन्हें लोगों ने अपनी समझ और सुविधा से अपने समाज के भले के लिए बनाया हो. जिनका परिपालन आसान हो. जो निष्पक्ष हों और जिनमें सभी की आस्था हो. इसलिए उनसे डरने के बजाय लोग उनका पालन करने में गर्व की अनुभूति करें. ‘लोक’ की भांति ‘लोकतंत्र’ भी अमूर्त्तन है. उसमें जनता से मताधिकार पाए नेता सत्ताकेंद्र पर कब्जा जमा लेते हैं. उसके बाद वे सत्ता को अपनी बपौती मान लेते हैं. जनता का उनपर कोई दखल नहीं रह जाता. इसलिए वास्तविक न्याय के लिए ‘लोकतंत्र’ को ‘जनतंत्र’ में बदलना होगा. यह कार्य निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़ देने से संभव नहीं है. उसके लिए निचले यानी जनसाधारण के स्तर पर सक्रिय होना पड़ेगा. इस बात की पक्की व्यवस्था हो कि निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी मानें. ऐसी आधुनिकता जिसमें सभी की भागीदारी हो. जो भी निर्णय लें, मिल-जुलकर लें. लिए गए फैसलों के प्रति अधिकतम की सहमति हो.

अभी तक जनता यह मानकर चलती रही है कि उसके प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति जागरूक रहकर निष्ठापूर्वक उनका पालन करेंगे. किंतु व्यवहार में उसका उल्टा हुआ है. देखा यह गया है कि जनता के प्रतिनिधि संसद में जाकर अपना कर्तव्य बिसरा देते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद में जाकर वैसे नहीं रह जाते. वहां जाते ही उनपर अभिजन संस्कार हावी हो जाते हैं. स्वयं को जनता का सेवक बताकर चुनकर आए लोग खुद को उसका स्वामी मानने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद जाकर श्रेष्ठतम नहीं रह जाते. चूंकि अधिकांश मामलों में हमारे ‘श्रेष्ठतम’ साधारण या उससे भी कम, अर्थात ‘निकृष्टतम’ सिद्ध होते हैं. इसलिए जनता को समझना होगा कि श्रेष्ठतम प्रतिनिधि जैसी अवधारणा में ही खोट है. जनता को शासन का श्रेष्ठतम रूप चाहिए तो उसे स्वयं सक्रिय रहकर निगरानी की सर्वोत्तम व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी. ताकि तयशुदा लीक से हटने की किसी जनप्रतिनिधि की हिम्मत ही न पड़े. उसे जानना होगा कि जनतंत्र की सफलता श्रेष्ठतम प्रतिनिधियों को संसद भवन तक पहुंचा देना नहीं है. निर्वाचित प्रतिनिधि श्रेष्ठतम कार्य करें, तब जनतंत्र का उद्देश्य पूरा होगा. इसलिए अपने प्रतिनिधियों से श्रेष्ठतम काम लेना भी जनता का दायित्व है. जनप्रतिनिधि का रिपोर्ट-कार्ड तैयार करने का प्रथम अधिकार उसके निर्वाचकों को होना चाहिए, न कि सांसदों को अपनी ही पीठ थपथपाने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए. इसके लिए लोगों का अपने अधिकारों को जानना, समझना तथा आवश्यकता पड़ने पर उनके लिए संघर्ष को तैयार रखना भी जरूरी है. इसे यूं भी कह सकते हैं कि ‘श्रेष्ठतम प्रतिनिधि’ एक भ्रांत अवधारणा है. केवल श्रेष्ठतम जनता ही शासन को श्रेष्ठतम स्तर तक ले जाती है.

यहां एक पेंच है. आम जनता अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करे या शासन चलाए. किसान यदि अपना वक्त शासन-प्रशासन की देखभाल करेगा तो हल चलाने के लिए समय कैसे निकाल पाएगा! इसका उत्तर बहुत आसान है. यदि जनता इस सिद्धांत कि ‘श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—को भली-भांति समझ लें तो फिर कोई चुनौती रह ही नहीं जाती. अभी तक जनता शासन का अधिकार दूसरों के हाथों में सौंपी आई है. सभ्यता के आरंभ से आज तक वह संघवाद, राजशाही, सामंतवाद, तानाशाही, पूंजीवाद, लोकतंत्र, जैसी व्यवस्थाओं से अनुशासित होती है. इसके बावजूद उसकी समस्याएं आज भी जस की तस हैं. बल्कि हर बार उसके चारों और घेरा कसता ही रहा है. इससे मुक्ति हेतु ऐसी जनसंस्कृति की जरूरत इस देश को है जो केवल रीति-रिवाज, परंपरा, साहित्य, कला, सामाजिक आचार-व्यवहार तक सीमित न हो. जिसमें समानता, विकास, ज्ञान-विज्ञान, राजनीति, प्रशासन जैसे नए जीवनमूल्य भी सम्मिलित हों. जिसमें परपंरा और आधुनिकता का सुंदर समावेश हो. उनमें से प्रत्येक के श्रेष्ठतम जीवनमूल्य जिसमें समाहित हों. ऐसे समाज की जरूरत है जिसमें लोग समान हितों के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े हों तथा सम्मिलित कल्याण के लिए मिल-जुलकर काम करना जानते हों. यह ‘बिना राजा का राज’ या ‘बिना शासन के शासन’ जैसी अवधारणा है, जो नई न होकर भी वर्तमान परिस्थितियों में दूर की कौड़ी या फिर दिमागी शगल लग सकती है. इसलिए कि गत चार-पांच हजार वषों के बीच शासित होते-होते, हम अपने आपको, अपनी शक्ति और योग्यता को बिसरा चुके हैं. इतने वर्षों में हमने हर प्रकार की राज्य प्रणाली को आजमाया है. पहले कबीलाई शासन देखा, राजा आए, तदनंतर महाराजाधिराज और चक्रवर्तित्व का जमाना आया. उसके बाद बादशाहत देखी, फिर औपनिवेशिक शासन और अब लोकतंत्र. जनता को सभी ने, बार-बार छला है. इतने दबाव सहे हैं कि सिर उठाकर चलने की आदत ही छूट गई है. ऐसे में समाज में न्याय तभी संभव है, जब उसे दूसरों से मांगने की अपेक्षा जनता स्वयं समाज में उसकी प्रतिष्ठा करे. कुछ लोग इसे ‘कल्पनालोक’, ‘यूटोपिया’ यह निरा आदर्शवादी द्रष्टिकोण भी कह सकते हैं. मुझे इससे भी इन्कार नहीं है, किंतु मनुष्यता की मुक्ति का रास्ता इसी ओर से जाता है. वर्तमान परिस्थितियों में यह विकल्पहीन पथ है.

© ओमप्रकाश कश्यप

सद्य: प्रकाशित पुस्तक “समाजवादी चिंतन के विविध आयाम’” की भूमिका

एक समय था जब सभी स्वतंत्र थे. इतने स्वतंत्र कि स्वतंत्रता के कोई मायने ही नहीं थे. और इतने सुखी कि सुख क्या है, इसे शब्दों में शायद ही बता पाते. परिवार की भांति सब समूह-बद्ध होकर रहते. मिल-जुलकर शिकार करते. शिकार न मिलने पर प्रकृति-प्रदत्त कंद-मूल-फल से गुजारा कर लेते. मौसम सताता तो गुफाओं की शरण लेते. नहीं तो खुले अंचल में जीवन का उत्सव मनाते थे. प्रकृति की गोद में रहते हुए उन्होंने पृथ्वी की उर्वरा शक्ति को जाना. फलस्वरूप कृषि-योग्य ठिकानों पर बड़ी-बड़ी बस्तियां बसने लगीं. समय के साथ सभ्यता और सभ्यता के साथ समाज का दायरा बढ़ता चला गया. इसी के साथ उलझनें भी बढ़ी. सामाजिक जरूरतें आसानी से पूरी हों, इसके लिए श्रम-विभाजन को अपनाया गया. इस बीच अपनी स्थिति का लाभ उठाकर समाज का एक वर्ग संसाधनों पर अनैतिक अधिकार का दावा करते हुए मालिक बन बैठा. सभ्यता के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, धर्म, राष्ट्र और कुल-परंपरा के नाम पर इस वर्ग ने नियमों, कानूनों और आचार संहिताओं का ऐसा पहाड़ खड़ा किया कि वह वर्ग जिसने पूरे समाज के भले के लिए श्रम-संस्कृति को अपनाया था, जो अपना पसीना बहाकर दूसरों का पेट भरता, उनके सुख और विलासिता की वस्तुएं पैदा करता था, वह भृत्य और मजदूर कहलाने लगा. उसका अपने मन-मस्तिष्क तो दूर श्रम तक पर अधिकार न था. दूसरी ओर जिसने प्राकृतिक संसाधनों पर अनैतिक कब्जा किया हुआ था, जो दूसरों के श्रम पर जीने वाला, परजीवी और परावलंबी था—वह खुद को स्वामी बताकर दूसरों के श्रम का मूल्यांकन करने लगा. धर्म, राजनीति, अर्थतंत्र सब उसके अधिकार में आ गए. समय-समय पर इसके विरुद्ध आवाज भी उठी. हर युग में ऐसे उदारचेता विचारक हुए जिन्होंने समाज के अनैतिक स्तरीकरण को धिक्कारा. मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को अप्राकृतिक और अमानवीय कहकर उसकी भर्तस्ना की. महाभारतकार ने कहा, ‘न हि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किचिंत’—सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’ बौद्धकाल में सम्राट से अपेक्षा की जाती थी कि वह खुद प्रजा का योग्य पालनकर्ता, संरक्षक और निदेशक सिद्ध करे. उसका आचरण नियमों से आबद्ध हो. जातक कथा के अनुसार एक बार एक राजा की मुंह लगी पटरानी ने राजा से यह वर मांगा—

‘महाराज, मुझे राज्य पर अमर्यादित राज्य करने के अधिकार प्रदान किए जाएं.’ इसपर राजा ने महारानी को समझाया—
‘भद्रे राज्य के संपूर्ण निवासियों पर मेरा कोई भी अधिकार नहीं है. मैं उनका स्वामी नहीं हूं. मैं तो केवल उनका स्वामी हूं जो राजकीय कर्तव्यों का उल्लंघन करते हुए, न करने योग्य कार्य कर दूसरों के जीवन में व्यवधान खड़े करते हैं. अतः मैं तुम्हें राज्य के समस्त निवासियों पर स्वामित्व प्रदान करने में असमर्थ हूं.’

उस समय सारी संपत्ति राज्य की मानी जाती थी. राजा उसका एकमात्र कर्ता-धर्ता-स्वामी था, इसलिए उसे ‘भू-पति’, ‘भू-पालक’, ‘भूपेश’ आदि कहा जाता था. संपत्ति पर सामूहिक अधिकारिता का विचार, जो आरंभिक कबीलाई जीवन का गुण था, समाप्त हो चुका था. ऋषियों के आश्रम तक उनकी व्यक्तिगत संपदा कहे जाते थे. व्यक्तिगत संपत्ति का निषेध पहली बार बौद्ध दर्शन में देखने को मिलता है. बुद्ध ने जो बौद्ध विहार स्थापित किए, वे निजी अधिकारिता से बाहर थे. उन्होंने गणतांत्रिक पद्धति की भी सराहना की. हालांकि दुनिया के अन्यान्य हिस्सों की भांति, तत्कालीन भारतीय गणतंत्र एक प्रकार का कुलीनतंत्र ही था. उसमें केवल विशिष्ट लोग हिस्सा ले सकते थे. समाजवाद के बीजतत्व हमें प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ में दिखाई पड़ते हैं. आदर्श राज्य की कल्पना करते हुए उसने राज्य का कार्य-भार दार्शनिकों के निर्वाचित मंडल को सौंपने का सुझाव दिया था. प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना किताबी पन्नों से बाहर भले न आ सका, लेकिन परिवर्तन का सपना देखने वाले दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों को प्रभावित हमेशा करता रहा. सत्ता की तानाशाही के विरुद्ध आवाज चीन में भी उठी थी. कन्फ्युशियस के समकालीन ताओ जू को समाज के आंतरिक सामथ्र्य पर पूरा भरोसा था. उसका मानना था कि सरकार को सरलतम और न्यूनतम होना चाहिए. सामाजिक मर्यादा और अनुशासन के नाम पर बने कानून और आचारसंहिताओं की आलोचना करते हुए उसने कहा था कि उनकी संख्या ‘बैल के शरीर के बालों से भी अधिक हैं.’ चूंकि शिक्षा और उत्पादन के वैकल्पिक संसाधनों का अभाव था और अर्थव्यवस्था के एकमात्र स्रोत कृषि-भूमि पर सामंत वर्ग अधिकार जमाए था. अतः उसकी मनमानी के चलते मानवीय स्वतंत्रता, मान-सम्मान और गरिमा को महत्त्व देने वाले विचार पुस्तकों से बाहर अपना स्थायी प्रभाव न छोड़ सके. इसके लिए उन्हें अठारवीं शताब्दी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी जब औद्योगिक क्रांति ने बहुमुखी हस्तक्षेप द्वारा रोजगार के अवसर पैदा किए. फलस्वरूप हुनरमंद शिल्पकारों, पेशेवरों की मांग बढ़ी और वे सामंती चंगुल से बाहर आ सके. शिक्षा के विस्तार ने उनके भीतर आजादी की ललक पैदा की, जिसने परिवर्तनकामी आंदोलनों, विचारों को जन्म दिया.

साम्राज्यवादी परिवेश और सामंती सोच के दिनों में व्यक्ति का अस्तित्व गौण था. नए सोच में व्यक्ति-स्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा. थॉमस पेन ने लिखा कि मनुष्य ने समाज को अपने कल्याण के लिए चुना है. समाज की सर्वोच्चता तभी संभव है, जब निर्णय के समस्त अधिकार उसके अधीन हों. संसाधनों पर उसका कब्जा हो. हालांकि उसने माना कि समाज की संसाधनों पर अधिकारिता निःशर्त न होकर अनेक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के साथ आती है. संसाधनों का उपयोग करते समय समाज को समझना चाहिए कि वह प्राकृतिक सत्ता नहीं है, बल्कि मनुष्यों द्वारा मनुष्य के कल्याण हेतु गठित किया गया है. मनुष्य समाज में इसलिए सम्मिलित होता है कि वह अपने सुख में वृद्धि कर सके. यदि ऐसा नहीं होता, समाज का कोई नागरिक मूल-भूत सुविधाओं से वंचित रह जाता है, तो समाज के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. समाज का दायित्व है कि वह संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करे ताकि उनका लाभ समाज के प्रत्येक नागरिक को प्राप्त हो सके. प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो कि समाज उसकी इच्छाओं की पूर्ति करने में सक्षम है. जहां इच्छाओं का सर्वमान्य निर्धारण संभव न हो, वहां समाज इच्छाओं के सामान्यीकरण की नीति को अपना सकता है. इच्छाओं के चयन के लिए गणतांत्रिक प्रणाली उपयुक्त पाई जाती है, बशर्ते उसमें जन्म, भाषा, क्षेत्रीयता, धर्म, संप्रदाय आदि के नाम पर कोई विशेषाधिकार न हों. सर्वसम्मति के अभाव में समाज बहुमत के आधार पर इच्छाओं का सामान्यीकरण कर सकता है. उस समय भी यह ध्यान रखना होगा कि समाज में जन्म, वर्ण, रंग, कुल-परिवार, भाषा आदि के नाम पर किसी को विशेषाधिकार प्राप्त न हों. इच्छाओं के सामान्यीकरण अथवा सामान्य इच्छा के चयन के लिए गणतांत्रिक प्रणाली सर्वोपयुक्त पाई गई है. यह समाज या उसके किसी भी वर्ग को मनमानी का अधिकार नहीं देती. बल्कि निरंतर यह बोध कराती है कि उनमें से प्रत्येक के बस उतने ही अधिकार हैं जो समाज के किसी भी अन्य नागरिक को प्राप्त हैं. यह शीर्षस्थ सत्ताओं, को उनकी जिम्मेदारियों से आबद्ध करती है. उसकी सफलता के लिए आवश्यक है कि सदस्यों के बीच असहमति का साहस और सहमति का विवेक हो. लोग अपना पक्ष रखने और दूसरे की सुनने में जितने निपुण और धैर्यवान होंगे, उतने ही परिपक्व निर्णय ले पाएंगे.

समाजवादी के अनुसार राज्य सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति है. उसका कर्तव्य राज्य-संपदा की सुरक्षा एवं संवर्धन द्वारा समाज को विकास की ओर अग्रसर करना है. इसके बावजूद यह विडंबना ही कही जाएगी कि बीसवीं शताब्दी के पूवार्ध में समाजवाद ने जितनी तेजी से पांव पसारे था, उत्तरार्ध में वह उतनी ही तेजी से सिकुड़ने लगा था. सोवियत संघ के पतन के बाद तो हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. समाजवाद की चर्चा करना, सामान्य अर्थों में प्रतिक्रियावादी होना और दिवास्वप्नों में जीना रह गया है. आखिर क्यों? क्या कारण है कि साम्यवादी आदर्श, दर्जनों प्रभावकारी दर्शन और अपने समय के श्रेष्ठतम बुद्धिजीवियों के खुले समर्थन के बावजूद समाजवाद को पूंजीवाद से अपनी अधिकांश जंगे हारनी पड़ीं? दरअसल पूंजी-प्रेरित बाजार ने लोगों को ऐसी अंध-स्पर्धा की ओर ढकेल दिया है, जहां व्यक्ति अधिकाधिक अर्थोपार्जन से कुछ और सोच ही नहीं पाता. सामान्य नैतिकता केवल व्यावसायिक संबंधों तक सिमट जाती है. जनसाधारण में अपनी पैठ बनाने के लिए पूंजीवाद लोकप्रिय उपादानों का सहारा लेता है. फिर चाहे राजनीति हो या धर्म, वह सभी का सुविधानुसार उपयोग करता है. मानवाधिकार, व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे नारों के साथ वह व्यक्तिगत सुखाकांक्षाओं को इस विनियोजित करता है मानो मनुष्य कोई समाज-निरपेक्ष प्राणी हो. उसके प्रभाव में व्यक्ति को केवल अपने अधिकार याद रहते हैं. भूल जाता है कि समाज के साथ उसका अनुबंध एकतरफा नहीं है. यह सही है कि व्यक्ति अपने सुख के लिए समाज में शामिल होता है. मगर उसको यह भी समझना होता है कि उसका सुख समाज के सम्मिलित आनंद से परे नहीं है. इसलिए समाज की ओर से उसके अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य भी निर्धारित हैं. लोकप्रियता के आधार पर कामयाबी हथियाने की होड़ में पूंजीवादी मीडिया व्यक्ति को केवल उसके अधिकारों की याद दिलाता है, और उसकी दुरवस्था के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराता है. संचार माध्यमों की पीठ पर सवार पूंजीपति जनता को बड़ी आसानी से यह विश्वास दिला देते हैं कि उसे उसकी दुरावस्था और संकटों से बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है. सरकार का दायित्व है कि कराधान के रूप में जुटाई गई धनराशि का उपयोग लोककल्याण के कार्यों में करे. यदि असफल रहती है तो लोगों को गुस्सा करने का पूरा अधिकार है. इससे वह जनाक्रोश के निशाने पर आ जाती है. विभिन्न प्रकार के दबावों से घिरी, अस्थिर, बौखलाई हुई सरकार से पूंजीपति मनमाने निर्णय कराने में सफल रहते हैं. स्वार्थी और नाकारा तत्वों की कमी सरकार में भी नहीं होती, लेकिन पूंजीवादी मीडिया के दबाव के चलते वे येन-केन-प्रकारेण सरकार में बने रहते हैं. हालात में वास्तविक परिवर्तन शायद ही आता है.

विचार के क्षेत्र में लोकप्रियता की अपेक्षा दुराग्रहों की ओर ले जाती है और वैचारिक कठमुल्लापन अच्छे-खासे विचार को संकुचित कर देता है. कई बार अक्षम्य किस्म की गलतियां भी हो जाती हैं. उदाहरण के लिए एडम स्मिथ के मूल्यांकन को लें. अठारहवीं शताब्दी के इस प्रतिभाशाली अर्थशास्त्री को पूंजीवाद का आदि उत्प्रेरक माना जाता है. इसके लिए प्रायः ‘लेजेज फेयर’ के समर्थन का उदाहरण दिया जाता है. मंजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में स्मिथ ने वही कहा या लिखा था जो समाज के आर्थिक विकास को गति देने में सक्षम हो. उपलब्ध संसाधनों को अधिकतम उत्पादन सक्षम कैसे बनाया जाए, यह उसके चिंतन का विषय था. एक वैज्ञानिक की दृष्टि और दार्शनिक जैसी वस्तुनिष्ठता से उसने इसपर विचार किया. फिर जो उसको जंचा वही अभिव्यक्त किया. उसने माना कि प्रत्येक मनुष्य पहले अपना सुख देखता है, ‘हमारा भोजन कसाई या पावरोटी बनाने वाले की सौगात नहीं है. उनकी गर्ज थी जो उन्होंने मीट बेचने या रोटी बनाने का धंधा चुना.’ इस उक्ति से उसके द्रष्टिकोण की व्यावहारिकता का अनुमान लगाया जा सकता है.

उपलब्ध संसाधनों द्वारा अधिकतम उत्पादकता की वांछा समाजवाद के लिए भी निषिद्ध नहीं है. अंतर बस इतना है कि समाजवादी की निगाह में सामाजिक लाभ महत्त्वपूर्ण होते हैं. मौद्रिक लाभ की कीमत पर सामाजिक लाभों की उपेक्षा वह नहीं कर पाता. इसके बरक्स पूंजीवाद का सारा तामझाम उद्योग स्वामी के अधिकतम लाभ को समर्पित होता है. वहां शिखर की ओर जाते हुए लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. जबकि लाभ के विभाजन हेतु समाजवाद ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख’ की नीति अपनाता है. समस्त संपत्ति राज्य के अधीन होती है. ‘प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार काम, हरेक को उसकी जरूरत के बराबर दाम’—के अनुसार वह उसका उपयोग करता है. व्यक्तिगत संपत्ति के बारे में भी स्मिथ के विचार समाजवादी भावना के अनुरूप हैं—‘जैसे ही किसी राष्ट्र की भू-संपदा निजी संपत्ति ठहरा दी जाती है, भू-सामंत और सत्ता के अन्य ठेकेदार दूसरों की मेहनत की फसल काटने में जुट जाते हैं. स्वार्थ के वशीभूत हो वे प्राकृतिक संसाधनों को भी मंडी में उतार देते हैं.’ उत्पादन प्रविधियों की चर्चा के बाद वह उत्पादन प्रवृत्ति पर आता है. इस बारे में उसका सोच एकदम स्पष्ट है—‘यह सरासर अन्याय है कि पूरा का पूरा समाज उस दिशा में काम करने लग जाए, जिससे समाज के मुट्ठी-भर लोगों का भला होता है.’ उत्पादन का स्वरूप जनसाधारण की जरूरतों के अनुसार तय होना चाहिए. इसके लिए वह साफ शब्दों में कहता है—‘अनाज जरूरत है, चांदी विलासिता.’ उपयुक्त मूल्यांकन के अभाव में स्मिथ के अर्थदर्शन में अंतर्निहित नैतिकतावादी मूल्यों की उपेक्षा हुई. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पूंजी-केंद्रित अर्थतंत्र की नैतिक संभावनाओं की पड़ताल का काम भी पीछे छूट गया.

इसका मतलब यह नहीं कि पूंजीवाद सर्वथा निर्दोष प्रणाली है या वह समाजवाद जैसी ही कल्याणकारी व्यवस्था है. दरअसल विकासोन्मुखी एवं महत्त्वाकांक्षी समाजों में सरकार को लोगों की अपेक्षाओं पर जल्दी से जल्दी खरा उतरने के लिए त्वरित उत्पादन प्रणालियां अपनानी पड़ती हैं. नवीनतम प्रौद्योगिकी का लाभ समाज के अधिकांश लोगों तक कैसे पहुंचे? जिन लक्ष्यों को पूंजीवाद स्पर्धा के जरिये कैसे प्राप्त करता आया है, उन्हें सहयोग के आधार पर कैसे प्राप्त किया जाए? यानी पूंजीवादी उत्पादन त्वरा समाजवाद आदर्श के साथ कैसे संभव हो—बुद्धिजीवियों के समक्ष यह चुनौती हमेशा से रही है. उस दृष्टि से अपेक्षित काम न हो पाने का एक कारण तो पूंजीवाद पर मौलिक लेखन का अभाव है. बकौल अयन रेंड, ‘पूंजीवाद का कोई दार्शनिक आधार नहीं है.’ जबकि समाजवाद के समर्थन में लेखन गत दो शताब्दियों से निरंतर होता रहा है. हाल की शताब्दियों में मनुष्यता को किसी न किसी रूप में प्रभावित करने वाले जितने भी दार्शनिक, विचारक आदि हुए, उनमें से अधिकांश समाजवाद के समर्थक थे. दार्शनिकों के दुराव के कारण पूंजीवाद के समर्थन में जो लेखन मिलता है, वह समग्र अर्थदर्शन न होकर उत्पादन प्रविधियों का विश्लेषण है. उसका मूल विषय पूंजी के सफलतम उपयोग द्वारा अधिकतम उत्पादकता के लक्ष्य पर विचार करना है. चूंकि वह आर्थिक गतिविधियों की वस्तुनिष्ट व्याख्या करता है, इसलिए साधारणजन की हैसियत उसकी निगाह में उपभोक्ता तक सीमित रह जाती है. पूंजीवादी चाहता है कि उपभोक्ता उसका विनम्र अनुगामी बने. इसलिए वह जन-प्रबोधीकरण की राह में तरह-तरह के अवरोध, प्रलोभन आदि ले आता है. वह दिखावे के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है. मगर प्रकट में चाहता है कि वह जैसा चाहे लोग वैसा सोचें, जो सपने वह दिखाना चाहे वैसे सपने देखें. संबंध औपचारिकताओं में तक सिमट जाएं. लोग मित्रों-रिश्तेदारों और पड़ोसियों के रहते खुद को असुरक्षित महसूस करें. इससे उत्पन्न शून्य को भरने के निमित्त उसका सारा कारोबार चलता है. स्वार्थपरता के कारण पूंजीवादी समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महज छलावा बनकर रह जाती है. मुक्त सोच को न तो तानाशाही स्वीकार करती है, न पूंजीवाद.

पिछली कुछ शताब्दियों में पूंजीवाद को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. इसके बावजूद यदि वह फलता-फूलता रहा है तो इसका कारण है कि अपने अभिजात्य समर्थन के बल पर वह प्रतिरोधी गुटों को छोटे-छोटे वर्गों में बांट देता है और विभाजित समूहों की आपसी स्पर्धा और द्वंद्व के बीच अपना वर्चस्व बनाए रखता है. इसके बावजूद समाजवाद समर्थकों, उसके लिए संघर्ष करनेवालों तथा पूंजीवाद के आलोचकों की फेहरिष्त बहुत लंबी है. बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि पूंजीवाद जब-जब निरंकुश हुआ है, तब-तब उसे चुनौती देनेवाले पैदा हुए हैं. इटली का तानाशाह मुसोलिनी. अंतोनियो ग्राम्शी को कैद करके बहुत प्रसन्न था. उसे गुमान था कि उसने अपने सबसे बड़े विरोधी और प्रखरतम विचारक को काबू में कर लिया है. भरोसा था कि जेल की तंग कोठरी में ग्राम्शी का दिमाग भी बंधकर रह जाएगा. उसका दुनिया से कटना अपने आप से भी कट जाने जैसा होगा. परंतु हुआ एकदम उल्टा. जेल की अंधेरी दीवारों ने ग्राम्शी के दिलो-दिमाग को और भी रोशन कर दिया. उसकी सुतीक्ष्ण मेधा दमन के उन रूपों को भी देखने-समझने लगी, जो बाहर की भागम-भाग में संभव न थे. अंधेरे-बंद कमरों में भी उसने अपना लेखन जारी रखा. सरकार ने कागज-कलम पर नजर रखनी शुरू की तो वे चोरी-छिपे जेल में आने-जाने लगे. तानाशाह और उसके नौकरशाह उसके शब्दों से इतने घबराए कि सरकारी वकील को अदालत में अपील करनी पड़ी—‘हुजूर हमें इस आदमी के दिमाग पर बीस वर्ष के लिए रोक लगा देनी चाहिए.’

यह घटना 1928 की है. ग्राम्शी आगे बीस वर्ष जी न सका. क्योंकि जेल की सलाखों ने उसके स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाया था. परंतु जब तक जिया, तानाशाह की ताकत उसके दिमाग को कैद कर पाने में असमर्थ रही. जेल में रहकर उसने 2848 नोट्स लिखे. आगे चलकर वे साम्यवादी चिंतन के नए अध्याय सिद्ध हुए. लगे हाथ एक उदाहरण और. चे ग्वेरा का जन्म अर्जेंटाइना में हुआ था. प्रशिक्षित डाॅक्टर होने के नाते वह चाहता तो मजे की जिंदगी जी सकता था. मगर दक्षिण अमेरिकी देशों में पूंजी आधारित साम्राज्यवाद के कुरूप चेहरे से उसको ऐसी नफरत हुई कि उसने अपने जीवन का मकसद ही बदल दिया. अब उसका एकमात्र जुनून था, पूंजीवाद का समूल नाश. फिदेल कास्त्रो उसे पूंजीवाद के विरुद्ध लड़ाई में सर्वाधिक सशक्त नेता और योद्धा नजर आया तो वह उससे जुड़ गया. भले ही कास्त्रो की लड़ाई उनके अपने देश क्यूबा की आजादी के लिए थी. यह सोच कर कि एक भी देश यदि पूंजीवादी जबड़ों से बाहर निकलने में कामयाब हो जाता है तो वह समाजवाद की ही जीत होगी, उसने अपने देश से बाहर जाकर छापामार युद्ध का संचालन किया और क्यूबा की आजादी का सबसे जांबाज योद्धा बना. जीत के बाद कास्त्रो देश के नव-निर्माण में जुट गए. चे को भी मंत्रीपद सौंपा गया. मगर वह ठहरा समाजवादी योद्धा. पूंजी के साम्राज्य को उखाड़ फैंकने को उद्धत. सरकार में दूसरी स्थिति में होने के बावजूद एक दिन वह अचानक गायब हो गया. आखिर युद्ध-भूमि में उसने प्राण तजे.

ग्राम्शी ने साम्यवाद को अपना आदर्श माना था. मार्क्स से वह प्रभावित था, परंतु उसके विचारों को ज्यों का त्यों अपनाने के बजाय उसने उनकी नए सिरे से व्याख्या की. मार्क्स का कहना था कि पूंजीवादी समाजों में वर्ग-संघर्ष अपरिहार्य है. बीसवीं शताब्दी में विकसित देशों को पूंजीवाद के हाथों में खेलते देख मार्क्सवाद की यह आधारभूत अवधारणा गलत सिद्ध होने लगी थी. तो क्या मार्क्सवाद झूठ है? उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं? ग्राम्शी ने इसी तथ्य से आगे विचार करना आरंभ किया था. आखिर वह इस नतीजे पर पहुंचा कि पूंजीवाद समाज की आर्थिक संपदा को ही कब्जे में नहीं ले लेता, वह लोगों के दिलोदिमाग पर भी अधिकार जमा लेता है. वह सभ्यता और विकसित संस्कृति का सपना लोगों के दिमागों में रोपता है. इससे उत्पीड़ित वर्ग में उत्पीड़क स्थितियों को समाप्त करने के बजाय उत्पीड़क की स्थिति में आने की होड़ मच जाती है. ग्राम्शी ने इसको सांस्कृतिक आधिपत्य का नाम दिया. उसने जोर देकर कहा था—‘आदमी तो सभी बुद्धिमान हैं, किंतु समाज में सभी का व्यवहार बुद्धिमानों जैसा नहीं होता. कारण है कि सत्तासीन अभिजात जनसाधारण के मस्तिष्क का अपने हितों के अनुरूप अनुकूलन कर लेता है. विपुल जनशक्ति को वह छोटे-छोटे समूहों में इस तरह बांट देता है कि विरोधी जनसमूह सदैव अल्पमत में होता है. इसका निदान क्या हो? सर्वहारा वर्ग को सांस्कृतिक आधिपत्य के चंगुल से बाहर कैसे लाया जाए? इसके लिए ग्राम्शी ने सुझाव दिया कि यदि शोषित वर्ग सचमुच अपनी मुक्ति चाहता है तो पहले उसे बुर्जुआ के सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर आना होगा. समाज के शीर्षस्थ लोग जिनमें राजनेता, पुरोहित, व्यापारी और नवधनाढ्य बुर्जुआ वर्ग सम्मिलित है, परस्पर संगठित हो निजी हितों की सुरक्षा हेतु अभिजन संस्कृति को जन्म देते हैं. उसके प्रति सर्वजन का आकर्षण अंततः उसकी आर्थिक-सामाजिक पराधीनता का कारण बनता है. वर्चस्व से मुक्ति समांतर श्रमसंस्कृति के विकास के बाद ही संभव है.

कार्ल मार्क्स की भांति मिखाइल बकुनिन भी अपने समय का चर्चित श्रमिक नेता था. पेरिस क्रांति के दौरान दोनों एक साथ थे, मगर ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान उनके बीच वैचारिक दूरियां इतनी बढ़ीं कि रास्ते अलग करने पड़े. मार्क्स वर्ग-संघर्ष पर विश्वास करता था. उसका मानना था कि वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए सर्वहारा क्रांति आवश्यक है. प्रूधों से प्रभावित बकुनिन ऐसे राज्य का सपना देखता था, जिसमें सत्ता पूरी तरह विकेंद्रीकृत, लोग संगठित, जागरूक एवं आत्मानुशासित हों. साथ में इतने प्रबुद्ध और अनुशासित कि राज्य की आवश्यकता ही न रहे. अ-राजकता यानी ‘बिना राजा का राज्य’ जैसी अवधारणा नई न होकर भी लोगों को असंभव जान पड़ती थी. शताब्दियों से शासित होते आए, राज्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दमन के अनुरूप अनुकूलन कर चुके लोगों का ऐसा विश्वास नामुमकिन भी नहीं था. इसलिए अराजकतावादी विचारधारा की ओर जनसाधारण का रुझान कम रहा. फिर मार्क्स के समर्थन में उसका विपुल लेखन था. ‘दि कैपीटल’ में उसने पूंजीवादी के शोषणकारी चरित्र और उसकी जटिल प्रविधियों की गहन विवेचना की थी. उसकी प्रखर मेधा से उसके आलोचक भी अचंभित थे. उसके दम पर मार्क्स को बकुनिन से कहीं अधिक प्रतिष्ठा मिली. दुनिया-भर में साम्यवाद के प्रति जबरदस्त रुझान के बावजूद अपने उच्चादर्शी स्वप्न के बल पर अराजकतावाद बुद्धिजीवियों को लुभाता रहा. बीसवीं शताब्दी में लियोन ट्राट्स्की, पीटर क्रोप्टोकिन, एम्मा गोल्डमेन ने अपने प्रखर लेखन द्वारा इस विचारधारा को आगे लाते हुए उसको साम्यवाद का विकल्प सिद्ध करने की कोशिश की. समकालीन बुद्धिजीवियों में ना॓म चा॓मस्की इसके समर्थक विद्वान हैं. अराजकतावाद के अलावा समिष्टवाद, सहजीवितावाद, श्रमिकसंघवाद, संघवाद आदि दर्शन समाजवाद के विकल्प के रूप में आए. मार्क्सवाद की अपेक्षा इन्हें थोड़ा सकारात्मक माना जा सकता है तो इसलिए कि ये शिखर को कमजोर कर बराबरी करने का नहीं सोचते, बल्कि धरातल को इतनी सुदृद्धता और उठान देने का सपना पालते हैं कि बुर्जुआ सत्ताएं अपना तेज गंवा इतिहास की चीज बन जाएं.

बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न तक दुनिया में जो साम्यवादी-समाजवादी राज्य गठित हुए उनकी कमजोरी थी कि वह इच्छाओं के चयन की प्रणाली पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. एकदलीय व्यवस्था में वहां लोककल्याण के नाम पर अल्पमत की इच्छाओं को थोपा जाता रहा है. इसको दलीय तानाशाही भी कहा जा सकता है. ऐसी व्यवस्था नागरिकों के बहुमुखी विकास को अवरुद्ध करती है. पूंजीवाद जनसाधारण को उपभोक्ता मानकर उनकी उपेक्षा करता है, दलगत तानाशाही उसको श्रम-इकाई तक सीमित कर देती है. माओ के कथन, ‘सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है’—के पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य हो सकते हैं, किंतु इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि बलप्रयोग द्वारा समाज में वास्तविक परिवर्तन लाना सरासर असंभव है. उससे केवल मुखौटे बदले जा सकते हैं. एक को मारकर दूसरा गोलीबाज सत्ता पर सवार हो जाता है और समाज का ढांचा ज्यों का त्यों बना रहता है. ऐसे अतिकामी विचारों के महिमामंडन की चूक इतिहास भी करता आया है, इस कारण उसको ‘अभिजन वर्ग की कब्रगाह’ कहा गया है……

मेरा विश्वास है कि लेखन एक नैमत्तिक कर्म है. प्रत्येक लेखक अपने समाज और परिवेश से कच्चामाल उठाता है और अपनी कल्पना और सृजनात्मकता के साथ उसको रचना का रूप देकर वापस लौटा देता है. इस काम में उसे अपने मित्रों, परिजनों के अलावा उन लोगों से भी मदद मिलती है जिन्हें वह शायद जानता तक न हो….

आ नो भद्रा कृत्वो यन्तु विश्वतः!

ओमप्रकाश कश्यप
64वां गणतंत्र पर्व, 2013

‘समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि’ पुस्तक की भूमिका

लगभग पांच वर्ष पुरानी यह घटना दिमाग से उतरती नहीं. अपनी पुस्तक ‘सहकारिता आंदोलन: उद्भव एवं विकास’ के प्रकाशन को लेकर राजधानी के जाने-माने प्रकाशक से संपर्क साधा था. संस्थान स्वामी का छूटते ही कहना था—‘आजकल सहकारिता को कौन पढ़ता है!’ मैंने सहकारिता को लेकर कुछ छिटपुट आलेख 1997 से लिखने आरंभ किए थे. कहा जा सकता है कि 2007 में तैयार हुई वह पांडुलिपि लगभग 10 वर्ष के स्वाध्याय और परिश्रम की देन थी. जबकि प्रकाशक महोदय वे थे जिन्होंने पूंजीवाद विरोधी विचारधारा पर केंद्रित विदेशी पुस्तकों के अनुवाद प्रकाशित कर खूब वाहवाही बटोरी थी. रूस के क्रांतिकारी साहित्य के अनुवाद के अलावा मार्क्स, लेनिन, रोजा लेक्समबर्ग, चे ग्वेरा जैसे क्रांतिकारी समाजवादियों पर केंद्रित उनकी कई पुस्तकें बाजार में थीं. उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा उन्हीं की बिक्री से आता था. वे बाजारवाद के विरोध में चल रही बहसों से बने बाजार को तो कब्जाए रखना चाहते थे, परंतु उसके सबसे सार्थक विकल्प पर उन्हें भरोसा न था. जिस सहकारिता आंदोलन से विश्व के अस्सी करोड़ नागरिक जुड़े हों. भारत के बीस और अमेरिका जैसे महापूंजीवादी देश के चालीस प्रतिशत नागरिकों का जिससे आत्मीय संबंध हो—उसके बारे में हिंदी प्रकाशक का व्यंग्यात्मक लहजे में बातें करना, सिर्फ उसका दिमागी खोखलापन नहीं, हिंदी प्रकाशन-जगत की विडंबना भी है. इसको एक प्रकाशक की बौद्धिक अल्पज्ञता मानकर भुला पाना आसान भी नहीं है. खासकर तब जबकि उदारवाद, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, विनिवेशीकरण गत दो दशकों में सर्वाधिक चर्चित शब्द रहे हैं. इनके बनिस्पत सहकारिता, समाजवाद, सहजीवितावाद और समष्ठिवाद जैसे उपक्रमों, जो पूंजीवाद का सार्थक विकल्प रचने की क्षमता रखते हैं, की चर्चा मीडिया में ‘न’ के बराबर हुई है. सहकारिता का यदा-कदा उल्लेख होता भी है, तो उसके आधार पर गठित संगठनों में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर, उन्हें बदनाम करने के लिए. इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि हमारे अखबार, मीडियाकर्मी तथा उनके द्वारा पोषित, स्थापित बुद्धिजीवी सार्थक विकल्पों की चर्चा कम, प्याले में तूफान ज्यादा खड़ा करते हैं. इसलिए बाजारवाद, भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण जैसे शब्द तथा इनके बहाने होने वाले विमर्श महज प्रतिक्रियावादी सिद्ध होते हैं और सार्थक विकल्पों की खोज बार-बार पटरी से उतरती रहती है.

प्रस्तुत पुस्तक की रचना के दौरान भी कई अनुभव हुए. उन दिनों प्रसंगवश जिससे भी इसका जिक्र किया, एकाध को छोड़कर प्रायः सभी ने भारतीय वाङमय का अध्ययन करने का परामर्श दिया. किसी ने कहा—वेदों का प्रणयन करो, वे समाजवादी प्रेरणा के आदिस्रोत हैं. किसी ने जैन और बौद्ध दर्शन के विशिष्ट अध्ययन की सलाह दी. खासकर उनकी नैतिक व्यवहार संबंधी मान्यताओं को लेकर. एक मित्र से तो जब भी मिला, हर बार उनके दिमाग की घड़ी की सुई शंकराचार्य पर अटकी हुई मिली—‘वेदांत से परे समाजवाद क्या है?’ कोई उनकी इस स्थापना की गहराई में जाने की कोशिश करे, उससे पहले ही वे आगे बढ़ जाते. बार-बार वही धुन, वही टेक, वही लगन—‘जिस दर्शन ने मान लिया कि कण-कण में भगवान हैं, उससे परे सोचने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है….क्या बचा रह जाता है आगे सोचने को!’ वेदांत के प्रति इस सम्मोहन के शिकार वे अकेले नहीं हैं. परंपरा के प्रति जड़ आसक्ति ने भारत के मौलिक चिंतन को बहुत नुकसान पहुंचाया है. परिणामस्वरूप गत बारह सौ वर्षों में एक भी नया दर्शन नहीं जन्मा है. आखिर क्यों? इस पर उन्होंने शायद ही कभी विचार किया हो! अध्यात्म जैसे परम जिज्ञासु विषय को धर्म और परंपरा के नाम पर अतार्किक और कर्मकांडी बनाए रखने की स्वार्थपूर्ण कोशिश में ‘न्याय’ और ‘वैशेषिक’ जैसे दर्शन जो, ज्ञानार्जन को मोक्ष का माध्यम बताते थे, एक षड्यंत्र की भांति नेपथ्य में ढकेले जाते रहे. उस पर तुर्रा यह कि हम विश्वगुरु थे, विश्वगुरु हैं….मैं मानता हूं कि मित्र द्वारा भारतीय समाजवाद की मूल प्रेरणाओं की पड़ताल हेतु वेदों, उपनिषदों के अलावा जैन और बौद्ध साहित्य को पढ़ने की सलाह देना निस्संदेह सदाशयतापूर्ण था. मैंने उनकी सलाह के अनुसार बरतने की कोशिश भी है. भारतीय समाजवाद की पृष्ठभूमि पर केंद्रित पूरा एक खंड इस पुस्तकमाला में लाने की योजना है. हैरानी मात्र इस बात की है कि दो-ढाई वर्ष के अंतराल में जब तक इस पुस्तक की लेखन प्रक्रिया चली, किसी ने भी भारत के भक्ति आंदोलन की सामाजिकी के बारे में जानने की सलाह नहीं दी. किसी ने नहीं कहा कि समाजवादी आंदोलन को महज आर्थिक मुक्ति का आंदोलन समझ लेना भारी भूल होगी. समाजवाद मनुष्य की सर्वतोन्मुखी स्वाधीनता और समानता का संपूर्ण मानवतावादी दर्शन है. उसके साथ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई है. भारत में इसके स्वर पहली बार भक्त-कवियों की ओजपूर्ण वाणी में सुनाई पड़े थे.

पश्चिम में पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुए सुधारवादी आंदोलनों का लक्ष्य मनुष्य की राजनीतिक, सामाजिक आजादी को वापस लाना था. आर्थिक समानता का विचार उस समय तक अजन्मा था. धर्म को समस्त जीवनमूल्यों का आधार माना जाता था. उसका नियंत्रण उन शक्तियों के अधीन था, जो इस संसार और यहां उपलब्ध प्रत्येक सुख-सुविधा को मायाजाल बताकर जनसाधारण को पाप-पुण्य, लोक-परलोक की भ्रांत धारणाओं में उलझाए रखना चाहती थीं. उनमें अधिकांश बेहतर जीवन जीते थे और कुछ का जीवन तो अत्यंत विलासितापूर्ण था. निहित स्वार्थ के लिए धर्मसत्ता आततायी एवं विभेदकारी सामंती शक्तियों का समर्थन करती थी. इसलिए आरंभिक समानतावादी आंदोलनों का प्रमुख लक्ष्य मानवमात्र को पुरोहितवाद, आडंबरवाद और पोंगापंथी से मुक्ति दिलाना था. पश्चिम में उसकी शुरुआत मार्टिन लूथर द्वारा हुई, जिसे जॉन कॉल्विन, सरवाइंतिस, जियादार्नो ब्रूनो, संत साइमन, वाल्तेयर, रूसो आदि विचारकों ने गति दी. लगभग इसी कालखंड में धार्मिक सुधारवादी आंदोलन भारत में भी जन्मे, परंतु यहां की परिस्थितियों में वे उतने कारगर सिद्ध न हो सके. भारत में भक्ति आंदोलन का विकास एक क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में हुआ था. आरंभिक दिनों में उसको यथास्थितिवादियों से टकराना भी पड़ा. परंतु संत कवियों का नैतिक आभामंडल, उनका उच्च मानवीय सरोकार जैसे कुछ कारण थे, जिनसे लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती गई. वह सही मायने में सामाजिक आंदोलन था. उसमें ऐसे लोग सम्मिलित थे, जिन्हें परंपरागत धर्मायोजनों में भाग लेने की मनाही थी. जिनके लिए वेदाध्ययन पाप था. मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से जिन्हें रोक दिया जाता था. जो धर्म और जाति के नाम पर शताब्दियों से उत्पीड़न सहते आए थे.

भक्त कवियों ने धर्म के नाम पर व्याप्त कर्मकांड और बलिप्रथा को चुनौती दी. कहा कि परमात्मा निर्मल हृदय में निवास करता है. ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’. तब आदमी को मंदिर-मस्जिद जाने, तीरथ नहाने, दान-पुण्य का नाटक करने, व्यर्थ का चढ़ावा चढ़ाने के ढकोसलों की आवश्यकता ही क्या है! ‘एक नूर से सब जग उपज्या’ कहकर उन्होंने जाति के नाम पर भेदभाव करने वालों को ललकारा. उससे पहले जितने भी धर्म, संप्रदाय पनपे थे, सबके पीछे किसी न किसी राजा का समर्थन था. पुरोहितवर्ग सत्तावर्ग से हाथ मिलाए रहता था. आपद्कर्म के बहाने वह उनके हर धत्कर्म में न केवल सहयोगी बनता, बल्कि अपनी ऊल-जुलूल मान्यताओं, रूढ़ियों के आधार पर उसे बढ़ावा भी देता था. अकेले संतकवि ऐसे थे जो अपनी नैतिक सत्ता के बूते ‘कहा मोको सीकरी सौ काम’ कहकर बादशाह अकबर को भी ठेंगा दिखा सकते थे. बड़े-बड़े सरदारों, मुल्ला-मौलवी, पंडित ओझाओं को राजदरबार में सिर झुकाए देखने वाला जनसमाज संतकवियों के फक्कड़पन, वाणी के ओज, साफगोई भरी ललकार और सीधी-सरल भाषा में ज्ञान संप्रेषण की कला पर सम्मोहित था. उनकी बातें उलझाव से दूर, सीधी और व्यावहारिक होती थीं. आरंभिक भक्त कवि समाज की निचली जातियों से आए थे. वे निर्गुण के उपासक थे. मूर्तिपूजा, जातिभेद, कर्मकांड आदि का विरोध करते थे. भक्ति आंदोलन की उस आरंभिक सफलता ने काफी लोगों को आकर्षित किया. कबीर, दादू दयाल, रविदास, मलूका, पीपा जैसे संत कवियों की वाणियां घर-घर गूंजने लगीं. इन कवियों के लिए साहित्य जीवन का सार, लोकाचार का हिस्सा था. उनसे प्रभावित होकर दूसरे वर्ण के लोग भी भक्ति आंदोलन से जुड़ने लगे. वे अपने साथ अपने संस्कार भी लाए थे. परिणामस्वरूप निराकार अराधना साकार पूजा-पाठ में ढलने लगी. प्रकारांतर में उसने जातिवाद, धार्मिक आडंबरवाद के पोषण को बढ़ावा दिया. उसने भक्ति आंदोलन के समस्त क्रांतिकारी सोच पर पानी फेरने का काम किया, जिससे वह मठों और दरगाहों में सिमटने लगा. सतरहवीं-अठारवीं शताब्दी का वह समय जब पश्चिम में वाल्तेयर, रूसो, वोलेनी, मिल, बैंथम आदि जड़ रूढ़ियों और बंजर परंपराओं पर जमकर प्रहार कर रहे थे, भारतीय मेधा अपने पराभव के कदाचित अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी. इसलिए जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय शासकों की मदद से देश को धीरे-धीरे कब्जाना आरंभ किया तो उसकी चाल को भांप, उनके संगठित विरोध के लिए आवाज उठाने वाला एक भी सूरमा इस देश में नहीं था.

अभी तक समाज का सामान्यबोध धर्म से अनुशासित होता आया है. धर्म की नींव अध्यात्म पर आधारित होती है. जनसाधारण को अपने अनुभवों पर सर्वाधिक अविश्वास इसी क्षेत्र में होता है. यह उसकी दूसरों पर निर्भरता बढ़ाता है. चूंकि आध्यामिक प्रेरणाओं का कोई स्पष्ट रूप नहीं है, इसलिए इसके नाम पर आरंभ से खूब घालमेल होता रहा है. इस घालमेल को महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, अजित केशकंबलि आदि विचारकों ने समझा था. परंतु असली चुनौती मिली बौद्ध दर्शन की ओर से. उन्होंने धर्म और अध्यात्म के नाम पर यज्ञों के औचित्य पर सवाल उठाए. कर्मकांड, पशुबलि तथा पुरोहितवाद के रूप में समाज में व्याप्त एक वर्ग की मनमानी का विरोध करते हुए उन्होंने सबको साथ लेकर चलने की सलाह दी. गौतम बुद्ध ने मगध जैसे भारी-भरकम साम्राज्य के आगे वैशाली जैसे आकार में काफी छोटे राज्य को अजेय बताया. परिणाम यह हुआ था कि छोटे-छोटे व्यापारी, उद्यमी, दस्तकार और शिल्पी संगठित होकर देश-देशांतर तक व्यापार करने लगे. फलस्वरूप स्पर्धा के बजाय सहयोग और सहकार विकास के मूल-मंत्र बन गए. देश समृद्धि की ओर अग्रसर होने लगा. जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है, वह वही दौर था जब देश प्रपंची पुरोहितों तथा उनके द्वारा पोषित आडंबरवाद से मुक्त था. बाद में बौद्ध धर्म में भी वही विकृतियां आने लगीं, जो वैदिक धर्मों के पराभव का कारण बनी थीं. राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने से राज्यों का आकर भी सिकुड़ने लगा था. राजनीतिक स्वार्थपरता इतनी बढ़ी कि अपने प्रतिद्वंद्वी को सिर नीचा दिखाने या खुन्नस मिटाने के लिए राजा-सामंत विदेशी आक्रामकों को न्योतने लगे. इस प्रवृत्ति ने मुगलों को जमीन दी थी. इसी से ईस्ट इंडिया कंपनी को पांव जमाने का अवसर मिला.

आखिर क्या कारण है कि पश्चिम के सुधारवादी आंदोलन कामयाब हुए और अठारहवीं शताब्दी तक आते-आते उसने स्वयं को पूरी तरह बदल डाला. यहां तक कि वह अपनी सहस्राब्दियों पुरानी दास प्रथा के कलंक से भी छुटकारा पाने में सफल हुआ. इस बीच भारत मुगलों की झोली से छिटककर अंग्रेजों की पॉकिट में समा गया. दो-चार को छोड़कर अधिकांश राजे-रजबाड़े चांदी की थाली में सजाकर अपना-अपना राज्य उनके सुपुर्द करते गए. इसका एक कारण तो भारतीय समाज की विशिष्ट जातीय संरचना थी, जो समाज के बड़े वर्ग को शिक्षा, संसाधन और निर्णय-प्रक्रिया से काट देती थी. दूसरा कारण भी कम महत्त्वपूर्ण न था. यूरोप में धार्मिक सुधारवाद औद्योगिक क्रांति के कंधों पर सवार होकर आया था. वैज्ञानिक चेतना उसकी बांह में बांह डाले साथ चल रही थी. सोलहवीं शताब्दी के दार्शनिक-वैज्ञानिक फ्रांसिस बेकन ने यह कहकर कि ‘ज्ञान ही शक्ति है….मशीनें आने वाले समय में मनुष्यता की उद्धारक सिद्ध होंगी’—प्रौद्योगिकी पर आधारित नई समाज-व्यवस्था का सपना लोगों की आंखों में भरा था. इसके फलस्वरूप वहां वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा मिला. मशीनें न केवल कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का बेहतर विकल्प बनकर आई थीं, बल्कि उन्होंने कृषिक्षेत्र में भी अपनी महत्ता सिद्ध कर, श्रम पर लोगों की निर्भरता कम कर दी थी. हालांकि नई अर्थव्यवस्था की भी अपनी विसंगतियां थीं. उसके कारण समाज में बेरोजगारी बढ़ी थी. शिल्पकार वर्ग मशीनों के आने से पहले सम्मान का जीवन जीता आया था, उसको अब उद्योगपतियों की चाकरी करनी पड़ रही थी. सघन उत्पादन-क्षम मशीनों के आने के बाद उसके श्रम-कौशल की अवमानना का जो सिलसिला आरंभ हुआ था, वह बढ़ता ही जा रहा था. लेकिन नई अर्थव्यवस्था अपने साथ शिक्षा का उपहार लेकर आई थी. पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग हालांकि अधिकांश मामलों में पूंजीपतियों के साथ था. उनके हर निर्णय को आप्त-वचन मानकर शिरोधार्य कर लेता था. परंतु उनके बीच कुछ दूरंदेश ऐसे भी थे, जिन्होंने पूंजीवाद के कुटिल चेहरे को समय रहते पहचान लिया था. अपने गुस्से का इजहार वे विभिन्न मंचों से करते थे. सामंतकालीन अर्थव्यवस्था में लोगों को मुंह खोलने की आजादी न के बराबर थी. नई अर्थव्यस्था से श्रमिकों-कामगारों को संतुष्टि भले न हो, फिर भी उसमें ऐसा बहुत कुछ था, जो लोगों को उससे समझौता करने को प्रेरित करता था. चैतरफा आलोचनाओं से घिरे पूंजीवाद का आकर्षण इतना गहरा था कि मन से कोई भी पुराने दौर में लौटने को तैयार न था. हालांकि संघर्ष और परिवर्तन का सिलसिला निरंतर बना हुआ था.

सवाल उठता है कि समाजवाद ही क्यों? यह प्रश्न सोवियत संघ के पराभव के बाद से और जोर देकर उठाया जाने लगा है. हाल में चीन का नाम भी यह कहकर जोड़ दिया जाता है कि उसने भी अपनी साम्यवादी निष्ठाओं को त्याग, अपने दरवाजे पूंजीवादी उद्यमों के लिए खोल दिए हैं. इसका उत्तर आसान है. समाजवाद केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं है. उसका अभिप्राय सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बराबरी को बढ़ावा देने वाले पूरी तरह लोकतांत्रिक-समानतावादी तंत्र से है. आर्थिक संसाधन किसी एक के हाथों में रहें अथवा सरकार के, उनका लोकोपकारी उपयोग तब तक असंभव है, जब तक लोक का उनपर वास्तविक नियंत्रण न हो. बहुसंख्यक के हितों की सुरक्षा का दायित्व किसी एक को सौंप देने के अनेक खतरे हैं. ऐसी व्यवस्था लंबे समय तक निरापद नहीं हो सकती. इसलिए चालीस वर्ष की उम्र में दार्शनिक सम्राट का समर्थन करने वाला प्लेटो पैंसठ का होते-होते दार्शनिकों के समूह को सत्ता सौंपने का समर्थन करने लगता है. व्यावहारिक रूप में यह असंभव है कि सभी लोग सभी दायित्वों का निर्वहन कर सकें. अतएव दायित्व-विभाजन अपरिहार्य हो जाता है, जिसके अंतर्गत शासन-व्यवस्था चुने हुए प्रतिनिधियों को सौंपने की अनुशंसा की जाती है. ऐसे निर्वाचित तंत्र की सफलता तभी तक संभव है, जब तक लोक यह न भूले कि वह अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयं शासित है तथा उसके प्रतिनिधि हर समय उसकी इच्छानुसार आचरण करने को बाध्य हैं. लोक को यह भी समझना चाहिए कि लोगों की इच्छाएं अस्थिर और परिवर्तनशील होती हैं. बदलती परिस्थितियों में उनमें परिवर्तन अवश्यंभावी है. समाज में समरसता और विकास की निरंतरता को बनाए रखने के लिए लोगों की इच्छाओं के बीच तालमेल की आवश्यकता प्रत्येक समाज में हर समय होती है. यह तभी संभव है जब वह सदैव जागरूक एवं चैतन्य बना रहे.

इस पुस्तक में एडम स्मिथ की मौजूदगी कुछ पाठकों को चौंका सकती है. लेकिन यहां उसे काफी सोच-विचार के बाद सम्मिलित किया गया है. यह तय है कि आधुनिक पूंजीवाद स्मिथ के विचारों से प्रेरणा लेकर खड़ा हुआ है. तो भी उसको पूंजीवाद का समर्थक नहीं कहा जा सकता. इस शब्द को जन्म ही स्मिथ के बाद हुआ. कुछ विद्वानों ने स्मिथ को पूंजीवाद के शब्द-मंत्र Laissez-faire का जन्मदाता माना है. यह शब्द भी उसकी पुस्तकों में सर्वथा अनुपस्थित है. बाजार और उत्पादकता के संबंधों की व्याख्या के लिए वह नए पद ‘अदृश्य हाथ’(इन्वीजिविल हेंड) का प्रयोग करता है. उसका मानना था कि बाजार में स्वतः अनुशासन की क्षमता होती है. बाजार की परमस्वातंत्रय की अवस्था उसे परमसमानता की ओर अग्रसर करती है. डेविड वार्समेन के साथ एक साक्षात्कार में नाम चाॅमस्की बड़े काम की बात कहता है—‘वह(एडम स्मिथ) अठारवीं शताब्दी के प्रबोधनयुग का महत्त्वपूर्ण विचारक है. उस समय तक पूंजीवाद का जन्म ही नहीं हुआ था. जिसे आज हम पूंजीवाद कहते हैं, सही मायने में उसने उसका तिरष्कार ही किया था.’ नोम चॉमस्की के अनुसार, ‘लोग स्मिथ को लेकर स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली बातों को लेकर राय बना लेते हैं. हर कोई ‘दि वेल्थ आ॓फ नेशन्स्’ के आरंभिक पैराग्राफ को पढ़कर निष्कर्ष निकाल लेता है, जिसमें उसने श्रम विभाजन को चामत्कारिक रूप से लाभकारी बताया है. जबकि इसी पुस्तक में आगे वह श्रम-विभाजन के पूंजीवादी सिद्धांत की आलोचना करता है. वह लिखता है कि श्रम-विभाजन मनुष्यता के लिए नुकसानदेह है. वह लोगों को इतना ज्यादा मूर्ख और लापरवाह बना सकता है, जितने वे बन सकते हैं. इसलिए किसी भी सभ्य समाज में सरकार को श्रम-विभाजन को एक सीमा तक ही मान्यता देनी चाहिए.’

पूंजीवाद ने आरंभ से प्रत्येक उपलब्ध ज्ञान, उसके हरेक अनुशासन का उपयोग निहित स्वार्थ के हित किया है. कभी वह विरोधी विचारों को अपना बनाकर प्रस्तुत करता है, तो कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उनके समर्थन में उतर आता है. यह कार्य वह लोगों का व्यवस्था से अनुकूलन करने, उनके मन में यह विश्वास जाग्रत करने के लिए करता है कि वही सर्वाधिक हितैषी है. ध्यान रहे नियंत्रण-मुक्त उत्पादन अकेले पूंजीवादी उद्यमों की मांग नहीं है. सहकारी समितियां भी यही मांग करती रही हैं. छोटे से छोटा कारीगर भी उम्मीद करता है कि उसके काम में अड़चन न डाली जाए. उत्पादकता के हक में यह शर्त मान भी ली जाती है. फिर पूंजीवादी उत्पादन और समाजवादी उत्पादन तंत्र में क्या भेद है? अधिकतम लाभ के लिए पूंजीवादी उत्पादन श्रमिक से लेकर उपभोक्ता तक सभी का अवमूल्यन करता है. उसके लिए सामाजिक लाभ गौण होते हैं. दूसरी ओर समाजवादी संस्थान सामाजिक लाभों को भी पूंजीगत लाभ जितनी महत्ता देते हैं. उनके लिए उपभोक्ता की इच्छा का महत्त्व होता है, इसलिए उत्पाद और उत्पाद का चयन समाज की मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है.

एक अर्थशास्त्री के रूप में अधिकतम उत्पादकता के हक में स्मिथ ने जैसा सोचा, वैसा ही लिखा है. साथ में कार्य-विभाजन के खतरे भी गिनाए हैं. कुशल अर्थविज्ञानी की भांति वह उत्पादन तंत्र की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए सुझाव देता है. वह अर्थविज्ञानी है. न कि राजनयिक, जो सभी को संतुष्ट दिखने का नाटक रचा सके. अधिकतम उत्पादकता की अर्थ-वैज्ञानिकी का उपयोग जितना पूंजीवादी तंत्र के लिए जरूरी है, उतना समाजवादी उत्पादन तंत्र के लिए भी है. यह सरकार चलाने वालों की जिम्मेदारी है कि वे अधिकतम उत्पादकता और स्पर्धा के नाम पर उत्पादन एवं विपणन के क्षेत्र में एकाधिकार एवं अंध-स्पर्धा न पनपने दें. वे उत्पादकों को विवश करें कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल के शोधन के लिए अनुकूल तकनीक विकसित करें. लोगों की कार्यकुशलता में सुधार के लिए प्रशिक्षण दिलवाएं. जो सरकारें चलाते हैं, उनकी जिम्मेदारी दूसरों से कहीं बड़ी होती है. उनकी दायित्व है कि वे पूंजीपतियों से कहें कि वे कच्चेमाल, श्रम, तकनीक आदि का उपयोग ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ की कामना के साथ करें. सरकार चलाने वाले केवल—‘ज्ञान ही शक्ति है’ पर न ठहर जाएं.बेकन ने इसके अलावा जो कहा था उसपर भी ध्यान दें—‘ज्ञान-विज्ञान और तकनीक का उपयोग जनसाधारण के कल्याण, उसके कष्टों को दूर करने के लिए किया जाना चाहिए.’ सरकार को ब्लैंक का वह कथन भी याद रखना होगा, जिसके अनुसार सरकार का कर्तव्य है—‘हर व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुरूप काम ले और उसकी जरूरत के अनुसार भुगतान करे.’ इसलिए उसे चाहिए कि जीवन की सामान्य आवश्यकताओं तथा श्रम के बीच स्पर्धा हरगिज न पनपने दे. सरकार का यह भी कर्तव्य है कि वह जेफरसन और थामस पेन की सुने और मानवाधिकारों की रक्षा करे. कुछ ऐसा करें जिससे मनुष्य अपनी स्वतंत्रता में स्वच्छंदता का आनंद ले सके. शासन-प्रणाली को इतनी भारी-भरकम न बनाए कि वह मनुष्य के मूल-भूत अधिकारों का ही हनन करने लगे. यहां थोरो उसका मार्गदर्शक बन सकता है—‘सरकार वही भली है जो शासन बिलकुल न करे’.

लियोनार्दो दा विंसी को लेकर भी कुछ विद्वान आपत्ति कर सकते हैं, किंतु हमें याद रखना चाहिए कि समाजवादी विचारधारा का विकास एक साथ नहीं हुआ है. यदि सामंतकालीन व्यवस्थाओं की बात करें तो उसमें समाज के सुख-संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों का अधिकार होता था. शेष लोगों को भाग्य के भरोसे जीने के लिए विवश कर दिया जाता था. स्वयं सुख-संपन्नता में आकंठ डूबे मुट्ठी-भर लोग दूसरों को त्याग का उपदेश देते रहते थे. भौतिक सुखों को लेकर लोगों के मन में अजीब किस्म की कुंठा समाई होती थी. इसलिए सुधारवादी आंदोलनों का आरंभिक ध्येय था, धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से सर्वथा मुक्ति तथा सुख में साधारणजन की हिस्सेदारी बढ़ाते हुए उसको लेकर समाज में व्याप्त भ्रांत धारणाओं का समाधान करना था. लियोनार्दो ने यह कार्य एक कलाकार के रूप में किया. जिस समय कला का काम केवल देवालयों तथा राजदरबारों और सामंतों की हवेलियों की शोभा बनना था, लियोनार्दो ने ‘मोनालिसा’, दि बैपटिस्ट’ जैसे दर्जनों चित्र बनाए. उनमें अतिसाधारण चरित्रों को लाकर विंसी ने लोगों की इस भ्रांति को तोड़ा. आमजन के प्रति उसकी संवेदना उसकी रचनाओं से झलकती है, जो संख्या में कम होने के बावजूद महत्त्वपूर्ण हैं…..

अंत में बाबा चाणक्य के कथन को दोहराते हुए कि शास्त्र अनंत हैं, विद्याएं ढेरी सारी, समय अल्प और विघ्न हजार. ऐसे में जो सारभूत है वही वरेण्य है. जैसे हंस दूध को पानी से अलग करके पी जाता है.

अनन्तशास्त्रं, बहुलाश्च विद्याः, अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यद्सारभूतं तदुपासनीयम्, हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्।।

ओमप्रकाश कश्यप