आर्थिक आत्मनिर्भरता : भाषण नहीं लोकोन्मुखी बदलाव से आएगी

घर-वापसी के लिए निकले मजदूरों के प्रति सामान्य राय है कि वे रोज कमाने-खाने वाले लोग हैं। यह कोई नहीं पूछ रहा कि हमारे अर्थतंत्र में आखिर कौन-सी कमी है जो अपने मेहनतकश वर्ग को आपद्काल में दो-चार महीने के गुजारे लायक संपन्नता भी नहीं दे पाता? कारण कई हो सकते हैं। अलग-अलग हो सकते हैं। बड़ा कारण श्रम-मूल्यांकन की वर्तमान पद्धति है। पूंजीपति अपने उत्पाद का मूल्यांकन करते समय पूरी तरह स्वतंत्र होता है। लागत की गणना करते समय वह जमीन, इमारत, मशीनरी, कच्चा माल, परिवहन, मजदूरी, बिजली-पानी, मूल्यहृास, निवेश पर ब्याज, परामर्श शुल्क जैसे हर छोटे-बड़े खर्च का हिसाब रखता है। फिर अपना लाभ उसमें जोड़ता है। मजदूर को बस उतना दिया जाता है, जितने से वह जीवित रह सके। न्यूनतम मजदूरी की गणना में आटा, दाल, चावल जैसी मूल-भूत जरूरतों पर ध्यान रखा जाता है। वह भी इतनी कि एक दिन की मजदूरी में वह अपने और अपने छोटे-से परिवार का एक दिन गुजार सके। बाकी कल्याण योजनाएं नाम की होती हैं। इसलिए होती हैं, ताकि जनता का शासन-प्रशासन पर भरोसा बना रहे; पूंजीवादी संस्थानों को सस्ते मानव श्रम की आपूर्ति बाधित न हो। बाकी मूलभूत आवश्यकताओं, जैसे आवास, स्वास्थ्य सेवा और बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा के बारे में तो वह सोच ही नहीं पाता।

कमोबेश यही हालत किसान की है। मजदूर की तरह किसान को भी अपने उत्पाद के मूल्य तय करने का अधिकार नहीं मिल पाता। उस समय सरकार का ध्यान किसान की मेहनत, लागत और जरूरत के बजाय, अपनी खाद्य सुरक्षा, मनरेगा तथा न्यूनतम मजदूरी जैसी योजनाओं के संचालन पर होता है। सरकार जानती है कि यदि अनाज का खरीद मूल्य अधिक रखा गया तो उसका असर उसकी दूसरी योजनाओं पर भी पड़ेगा। इसलिए वह उतना ही मूल्य तय करती है जिससे भविष्य में उसके खजाने पर कम से कम असर पड़े। दूसरे शब्दों में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की कामयाबी के लिए किसानों तथा पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफे के लिए मजदूरों के हितों से समझौता किया जाता है। श्रमिकों में से दो-तिहाई हिस्सा बहुजन समाज से आता है। यह वर्ग शताब्दियों से सामाजिक एवं आर्थिक शोषण का शिकार होता आया है। अन्य संसाधनों के अभाव में वह अपने श्रम-कौशल पर निर्भर रहता है। सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों का सर्वाधिक नुकसान भी इसी वर्ग को होता है।

विकास की गारंटी नहीं है विदेशी निवेश

कुछ दशकों से विकास और विदेशी पूंजी को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया गया है। मान लिया गया है कि जब विदेशी निवेशक आएंगे, तभी देश का विकास होगा। जबकि विदेशी निवेश समुद्री लहरों जितना चंचल होता है। एक लहर आकर आपको नीचे से ऊपर तक समृद्धि से सराबोर कर सकती है। कुछ अंतराल के बाद पूंजी वापसी की लहर, आपसे आपकी सारी खुशियां छीन पुनः कंगाली की ओर ले जा सकती है। स्मरणीय है विदेशी निवेशक आपके लिए नहीं आते। यहां तक कि वे अपने देश के लिए भी नहीं आते। वे केवल अपने स्वार्थ के लिए आते हैं। लगाए गए धन पर पैनी नजर रखते हैं। विपरीत हवा की संभावना भी दिखे तो फौरन भाग छूटते हैं। इसलिए पूंजीवाद ने आज तक किसी देश का भला नहीं किया। उन देशों का भी जिन्हें उसकी प्रयोगशाला माना जाता है। इसलिए विदेशी पूंजी से निवेश की मात्रा तो बढ़ाई जा सकती है, वास्तविक समृद्धि उससे असंभव है।

वास्तविक समृद्धि क्या है

वास्तविक समृद्धि का सीधा-सा अभिप्राय है कि अर्थव्यवस्था के स्तर में जो सुधार नजर आ रहा है, वह आम आदमी के जीवन में भी नजर आए। उदाहरण के लिए यदि देश की सकल उत्पादकता में दस प्रतिशत की वृद्धि हुई है, तो मुद्रा-स्फीति के समायोजन के पश्चात, आनुपातिक रूप से उतनी ही वृद्धि नागरिक जीवन में भी नजर आनी चाहिए। प्रायः ऐसा हो नहीं पाता। लाभ की मात्रा, आमतौर पर सकल उत्पादकता में हिस्सेदारी के अनुसार तय होती है। परिणामस्वरूप बड़े औद्योगिक घराने, देश की सकल आय का बड़ा हिस्सा हड़प ले जाते हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए दस बड़े पूंजीपति घरानों का देश की सकल उत्पादकता में 65 प्रतिशत का योगदान हो तो वे आमतौर पर इतने ही लाभांश के अधिकारी माने जाएंगे। ऊपर से नीचे तक जैसे-जैसे उत्पादकता में हिस्सेदारी घटेगी, लाभानुपात भी उतना ही कम होता जाएगा।

सकल उत्पादकता में मजदूरों और किसानों का भी योगदान होता है। बल्कि उससे कहीं ज्यादा होता है, जितना बताया जाता है। मगर कृषि क्षेत्र की उत्पादकता को देखते हुए उसपर आश्रित लोगों की संख्या, आनुपातिक रूप से कहीं ज्यादा है। 2019 में भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र, उत्पादन क्षेत्र और सेवा क्षेत्र का कुल सकल संवर्धित मूल्य(ग्रोस वेल्यू एडिड) क्रमशः 15.87, 29.73 तथा 54.40% था। सकल संवर्धित मूल्य की गणना, सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) तथा उसके लिए दी गई छूटों के योग में से करों की कुल मात्रा घटाकर की जाती है(सकल संवर्धित मूल्य = सकल घरेलू उत्पाद + कुल छूट—उत्पादों पर लगने वाला कर)। विश्व बैंक की 1 मार्च 2020 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में मात्र 15.87% की हिस्सेदारी वाला कृषिक्षेत्र, 42% रोजगार उपलब्ध कराता है, जो बाकी सेक्टरों द्वारा दिए जाने वाले रोजगार से कहीं अधिक है। चीन में कुल रोजगारों का एक-चौथाई रोजगार कृषि क्षेत्र से आते हैं, जबकि वहां का कुल कृषिक्षेत्र(52.77 लाख वर्ग किलोमीटर), भारत के कुल कृषिक्षेत्र(15.97 लाख वर्ग किलोमीटर) के तीन गुने से भी ज्यादा है। रोजगार का कोई और विकल्प न होने के कारण, गांव लौटे अधिसंख्यक मजदूर कृषिक्षेत्र के ही आसरे होंगे, जो पहले से ही दबाव में है।

वास्तविक समृद्धि आए कैसे?

इसे समझने के लिए विकास की पहेली को समझना आवश्यक है। प्रत्येक सरकार विकास के नाम पर वोट मांगती है। किंतु उसका न्यायोचित लाभ उसी अनुपात में नागरिकों तक भी पहुंचे, इसे लेकर वह कभी गंभीर नहीं होती। स्वार्थपरक राजनीति के चलते चुनाव वास्तविक मुद्दों के बजाय, नकली मुद्दों पर लड़े जाते हैं। अतः मतदाताओं के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण हेतु भारी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में पूंजीपतिवर्ग उनका खेवनहार बनकर सामने आता है। वह राजनीतिक पार्टियों को धन तथा दूसरे संसाधन देकर उपकृत करता है। कुछ करों तथा सुविधाओं के बदले वह राज्य के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा करने लगता है। वह सरकारों को अपने स्वार्थ के अनुरूप योजनाएं बनाने के लिए बाध्य कर देता है। मजबूर सरकारें नागरिकों को विकास की पहेली में उलझाए रखती है। यह विकास की पहेली क्या है? जनसाधारण को उसमें उलझाकर रखने से सरकार का कौन-सा हित सधता है? विकास के नागरिक स्तर पर मापदंड के लिए उसको प्रगति के संदर्भ में देखना क्यों आवश्यक है?

विकास एवं प्रगति

विकास जीवन-स्तर में सुधार की, अपेक्षित दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्नत अवस्था तक पहुंचने की प्रक्रिया है। वह बहुआयामी होता है। किसी बांध परियोजना में यदि कुछ गांव डूब क्षेत्र में आकर, पारिस्थितिकीय संकट शिकार होते हैं, तो उसे विकास की स्वाभाविक परिणति के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। प्रगति अपेक्षित दिशा में सकारात्मक उपलब्धि है। वह दर्शाती है कि विकास के उद्देश्य से बनाई गई योजना, लक्ष्य की दिशा में कितनी फलदायक सिद्ध हुई है। इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते हैं। मान लीजिए, सरकार किसी इलाके में उर्वरक का कारखाना लगाने की अनुमति देती है। सब कुछ समयानुसार और योजनाबद्ध तरीके से होता है। उम्मीद के अनुसार इलाके के किसानों को भरपूर उर्वरक मिलने लगता है। जितना सोचा था, उतने रोजगार मिल जाते हैं। मालिक उम्मीद के अनुसार मुनाफा कमाने लगता है। माना जाएगा कि कारखाने से उम्मीद के अनुरूप विकास हुआ है। क्या प्रगति भी ठीक उतनी ही होगी, जितना विकास हुआ था? प्रथम दृष्टया तो इसका उत्तर ‘हां’ होना चाहिए। परंतु ऐसा होता नहीं है।

अब हम उन स्थितियों पर विचार करेंगे, जिन्हें सरकार अप्रिय मानकर, जान-बूझकर नजरंदाज करती जाती हैं; या फिर दिखावे की संस्थाओं के ऊपर छोड़ देती है। जैसे कि उर्वरक के कारखाने से इलाके में वायू प्रदूषण बढ़ेगा। उससे निकले अपशिष्ट पदार्थ भूजल को प्रदूषित करेंगे। बीमारियां बढ़ेंगीं। यह असंभव नहीं कि एक अर्से के बाद प्रदूषण से जन्मी बीमारियों के उपचार पर उतनी ही धनराशि खर्च होने लगे, जितनी कारखाना लगने से सरकार और स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि हुई है। उस अवस्था में विकास तो शत-प्रतिशत होगा, परंतु प्रगति की रफ्तार शून्य कही जाएगी। कारखाना उर्वरक के बजाय शराब बनाने का हो तो प्रगति नकारात्मक भी हो सकती है। ऐसा नहीं हैं कि सरकार द्वारा चलाई जाने वाली विकास योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता, उनके माध्यम से हुई प्रगति को मापने के लिए कोई संसाधन न हों। आमतौर पर हर सरकार का अपना सांख्यिकीय विभाग होता है, जिसका काम जमीनी स्तर से आंकड़े जुटाकर सरकार के सामने प्रस्तुत करना है। परंतु इन संस्थाओं द्वारा जुटाए गए ज्यादातर आंकड़े फर्जी और गैर-जिम्मेदराना होते हैं। अधिकांश पूंजीवादी योजनाएं पूंजीगत लाभ को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं। उस कसौटी पर खरा उतरने के साथ ही उन्हें सफल मान लिया जाता है। सरकार भी उसी को अपनी कामयाबी मानकर अपनी सफलता का ढिंढोरा पीटती जाती है।

विकास और प्रगति के अंतर को कैसे पाटा जाए

5 अक्टूबर, 1843 को चार्ल्स डिकेंस ने मानचेस्टर की मजदूर बस्तियों का निरीक्षण किया था। वे अपनी नई कृति के लिए जमीनी अनुभव बटोरना चाहते थे। मजदूर बस्तियों की दुर्दशा देख उनका दिल कराह उठा। उसी शाम मजदूरों को संबोधित भाषण में डिकेंस ने कहा था कि उन्हें उनकी दुर्दशा से उबारने के लिए कोई आगे नहीं आने वाला। जो भी करना है, स्वयं करना होगा। डिकेंस के आह्वान पर इंग्लेंड के रोशडेल नामक कस्बे के 28 बुनकर आगे आए। ‘रोशडेल पायनियर्स’ नाम से उन्होंने उपभोक्ता सहकारिता की शुरुआत की। आज हम सबसे बड़ी उपभोक्ता चेन के रूप में ‘अमेजन को जानते हैं, ‘अलीबाबा’ और फ्लिपकार्ट का नाम भी हमने सुना है। लेकिन अपने समय में ‘रोशडेल पायनियर्स’ दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता संस्थान था। अंतर बस इतना है कि उसका मुनाफा किसी जेफ बेजोस, जेक मा या बंसल बंधुओं की इजारेदारी न होकर, सदस्य बुनकरों में बंट जाता था। वह श्रमिकों द्वारा अपनी जरूरत के हिसाब से बनाई गई योजना थी। इसलिए उसके किसी नकारात्मक प्रभाव, जिसका विकास योजनाओं में प्रायः अंदेशा होता है—की कोई संभावना नहीं थी।

शहरों से लुट-लुटाकर गांव पहुंचे मजदूर क्या अपने स्तर पर इस तरह की योजनाएं बना सकते हैं? बिलकुल बना सकते हैं। गांव पहुंचे श्रमिकों में से कोई इलेक्ट्रीशियन के काम में दक्ष होगा तो किसी को सिलाई, कढ़ाई या राजमिस्त्री का काम आता होगा। वे सामान्य हितों को केंद्र में रखकर छोटे-छोटे संगठन बना सकते हैं। फिर उन संगठनों के बीच तालमेल रखने के लिए बड़ा संघ। यह आसान नहीं है। दरअसल, सहकार को समझना जितना सरल है, स्वभाव को सहकारी भाव के अनुरूप ढालना उतना ही मुश्किल है। श्रमिकों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या कोई और विकल्प है? कम से कम निकट भविष्य में तो नहीं। न सरकारें नए विकल्प के लिए काम कर रही हैं। पूंजीवाद की एक के बाद एक, निरंतर असफलताओं के बावजूद, सरकारें आज भी उसे निर्विकल्प मानती हैं। ऊपर से, इस उम्मीद में कि चीन से उकताई कंपनियां उनके यहां चली आएंगी, अनेक राज्य सरकारों ने श्रमिक कानूनों को बट्टे खाते में डाल दिया है। अब कारखाना मालिक मजदूरों से दिन में 12 घंटे काम ले सकते हैं। 12 घंटे काम और चार घंटे आना-जाना, प्रतिदिन 16 घंटे काम के लिए घर से बाहर रहना, ऊपर से कोई कानूनी संरक्षण न होना….इस अवस्था  में कोई भी मजदूर यह भूल सकता है कि वह इंसान है और किसी सभ्य देश में रहता है।

सरकार क्या कर सकती है

लोकतंत्र में राज्य अपने दायित्व से बच नहीं सकता। समाजार्थिक न्याय हेतु आवश्यक है कि सरकार ऐसी योजनाओं पर काम करे, जिनसे विकास और प्रगति के अंतर को न्यूनतम रखा सके। इसके लिए विकेंद्रीकृत उद्योगतंत्र चाहिए। ऐसा उद्योगतंत्र जिसमें स्थानीय संसाधनों के साथ, वहां की मेधा की भी अधिकतम भागीदारी हो। विडंबना यह है कि विगत तीन दशकों से हमने पूंजीवाद को अपरिहार्य मान लिया है। बीते वर्षों में पूंजी का निचले स्तर से ऊपर की ओर प्रवाह और भी तेज हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम तेजी से बेचे जा रहे हैं। पिछले छह वर्षों में रिकार्ड 23 सार्वजनिक संस्थानों का विनिवेशीकरण हो चुका है। प्राप्त धनराशि से सरकार ने लोकहित की किसी नई योजना की शुरुआत की हो, इसका भी कोई प्रमाण नहीं है। ऐसे में उचित होगा कि सरकार अव्यावहारिक लगने वाली योजनाओं की समीक्षा करे। स्मार्ट सिटी के स्थान पर 30,000-50,000 की आबादी को ध्यान में रखकर छोटे शहर बसाए जाएं, जिनमें उत्पादन, विपणन के अलावा शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। उनमें सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को उनकी स्थानीय आबादी के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था हो। एक स्मार्ट सिटी की लागत में कम से कम 50-100 छोटे शहर बसाए जा सकते हैं। पहले से ही मौजूद कस्बों और शहरों को स्थानीय व्यापार केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए सकेगा। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। न केवल शहरों की ओर पलायन रुकेगा, अपितु भारतीय गांव जो अभी तक सामंतवाद के गढ़ रहे हैं, अर्थव्यवस्था के स्वरूप में बदलाव के साथ, उनके चरित्र में भी बदलाव आएगा। चूंकि पलायन का शिकार प्राय: पिछड़ी और दलित जातियों को होना पड़ता है, इसलिए गांवों के चरित्र में बदलाव से सामाजिक न्याय के रास्ते भी प्रशस्त होंगे।

ओमप्रकाश कश्यप

गुलामगिरी : ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना का बीज-ग्रंथ

जहां न्याय की अवमानना होती है, जहां जहालत और गरीबी है, जहां कोई भी समुदाय यह महसूस करे कि समाज सिवाय उसके दमन, लूट तथा अवमानना के संगठित षड्यंत्र के सिवाय कुछ नहीं है—वहां न तो मनुष्य सुरक्षित रह सकते हैं, न ही संपत्ति.— फ्रैड्रिक डगलस

गुणीजन कहते आए हैं, जवाब से सवाल ज्यादा मुश्किल होता है. सवाल समझ में आ जाए तो जवाब खोजने में देर नहीं लगती. दो सौ साल पहले बहुजनों का सांस्कृतिक-सामाजिक शोषण आज के मुकाबले कहीं अधिक था. किंतु उसके विरोध में न कोई चेतना थी, न आवाज. न अपने हालात को लेकर सवाल उनके दिमाग में उठते थे. वे शोषण-उत्पीड़न के साथ जीना सीख चुके दीन, दलित, सर्वहारा थे. मानते थे कि वे वैसे ही हैं, जैसा उन्हें होना चाहिए था. उन्हें समाज से कोई शिकायत न थी. शिकायत थी तो ब्राह्मणों द्वारा थोपे गए ईश्वर से, जिसे वे भ्रमवश अपना मान बैठे थे. जीवन की तमाम हताशाओं के बीच ईश्वर नामक काल्पनिक सत्ता ही उनकी एकमात्र उम्मीद थी. वे इस बात से अनजान थे कि धर्म और ईश्वर उन्हें गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र हैं.

बावजूद इसके कि मेहनत-मशक्कत के सारे काम उनके जिम्मे थे, बदले में नकद मजदूरी तो दूर, मेहनत का पैसा तक नहीं मिलता था. अनेक को तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेगार करनी पड़ती थी. बावजूद इसके 1848 में मार्क्स ने ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जरिए जब यह आह्वान किया कि ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ’ तो भारत के शूद्रों-अतिशूद्रों, छूत-अछूत में उसकी कोई प्रतिक्रिया न हुई. उस समय उन्होंने मान लिया कि वे मजदूर थोड़े ही हैं. वे तो लुहार, बढ़ई, चमार, कुम्हार, तेली, तमोली, धोबी, मल्लाह बगैरह हैं. 11 वर्ष बाद, 1859 में जॉन स्टुअर्ट मिल ने ‘ऑन लिबर्टी’ लिखकर मनुष्य को उसकी स्वाधीनता का मोल समझाने की कोशिश की. उसने लिखा—‘राज्य-व्यवस्था चाहे जैसी क्यों न हो, जिस समाज और लोक समुदाय में स्वाधीनता का आदर नहीं है, उसे स्वाधीन नहीं कहा जा सकता.’ शूद्र-अतिशूद्र उस संदेश को समझने में भी नाकाम रहे.

फिर आए फुले. आरंभ में उन्हें लगा कि शूद्रों-अतिशूद्रों की असली समस्या उनकी अशिक्षा है. शिक्षा उन्हें अज्ञानता के गर्त से बाहर निकाल सकती है. मात्र 21 वर्ष की अवस्था में उन्होंने शूद्रों-अतिशूद्रों की शिक्षा के लिए अभियान छेड़ दिया. एक के बाद एक, मात्र 3 वर्षों में 18 स्कूल खड़े कर दिए. 1848 में पहला स्कूल खोलने से अगले 25 वर्षों तक शिक्षा के जरिये अज्ञान के अंधकार को मिटाने में लगे रहे. उन्होंने जातिवाद को संरक्षण देने, धर्म के नाम तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, पाखंड और पापाचार फैलाने के लिए ब्राह्मणों को धिक्कारा. कहा कि ‘नकली धर्मग्रंथों के माध्यम से ब्राह्मणों ने यह दिखाने की चेष्टा की है कि उन्हें प्राप्त विशेषाधिकार ईश्वरीय देन हैं.’ पुरोहित वर्ग के आडंबरों और प्रपंचों पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने ‘तृतीय रतन’(1855) नाटक लिखा. निचली जातियों में आत्मसम्मान का भाव पैदा करने के लिए ‘पंवाड़ा : छत्रपति शिवाजी भौंसले का’(1869) की रचना की. 1869 में ही ‘ब्राह्मणों की चालाकी’ तथा ‘पंवाड़ा : शिक्षा विभाग के अध्यापक का’ का प्रकाशन हुआ. पहली कृति ब्राह्मणवादी षड्यंत्रों पर मुक्त बयान जैसी थी. दूसरी पुस्तक में शूद्रों और अतिशूद्रों को पढ़ाने में ब्राह्मण अध्यापकों की आनाकानी तथा शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर प्रहार किया गया था. ये सभी कार्य महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद एक बड़े आंदोलन की पूर्वपीठिका जैसे थे.

1973 तक शूद्रों-अतिशूद्रों की शिक्षा के लिए शुरू किए गए अभियान को 25 वर्ष पूरे हो चुके थे. उनके स्कूलों से निकले शूद्र-अतिशूद्र विद्यार्थी सामाजिक जीवन में आने लगे थे. उस पीढ़ी के सदस्य तर्क करते थे. स्वतंत्र दिलो-दिमाग से काम लेते थे. अब फुले को लगने लगा था कि ब्राह्मणों के सांस्कृतिक प्रभुत्व के विरुद्ध बड़ा आंदोलन खड़ा करने का समय आ चुका है. जातिप्रथा के कलंक से मुक्ति के लिए शूद्रों-अतिशूद्रों को उनके प्राचीन अतीत के बारे में बताया जाना आवश्यक है. यह बताया जाना आवश्यक है कि पुराणों, महाकाव्यों और दूसरे धर्मग्रंथों के माध्यम से ब्राह्मणों ने उनके इतिहास और संस्कृति का विरूपण किया है. कि उनके पूर्वज भी एक गौरवशाली अतीत के स्वामी रहे हैं. उस एहसास को जीने के लिए ब्राह्मण संस्कृति के चंगुल से बाहर आना आवश्यक है. उन धर्म-ग्रंथों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रतीकों को नकारना आवश्यक है जो उन्हें दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक समझते हैं. बगैर उनके बौद्धिक-सांस्कृतिक अधिपत्य के बाहर आए, उनकी समाजार्थिक स्वतंत्रता असंभव है. ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ का विचार मार्क्स की ओर से आया था. उसे विस्तार दिया था—अंतोनियों ग्राम्शी ने. उसका कहना था कि मनुष्य को बौद्धिक दास बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों, मिथों आदि को जिस प्रकार मनुष्यता की संपूर्ण पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसकी काट समानांतर संस्कृति के निर्माण एवं विकास द्वारा ही संभव है.’ ‘गुलामगिरी’(1873) के माध्यम से फुले ने यही किया था. वह भी ग्राम्शी से करीब चार दशक पहले. अपने विचारों और कार्य को सशक्त आंदोलन का रूप देने के लिए, 1873 में ही उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी.

ब्राह्मणवादी धर्म की आड़ में : गुलामगिरी 

‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ की तरह ‘गुलामगिरी’ भी छोटी-सी पुस्तक है. इससे अनुमान लगाया जाता है कि दुनिया को बदलने के लिए भारी-भरकम महाकाव्यों की जरूरत नहीं पड़ती. नीयत अच्छी हो तो चंद शब्द भी असरकारी बन जाते हैं. ‘गुलामगिरी’ को उन्होंने ‘संयुक्त राष्ट्र के सदाचारी जनों, जिन्होंने गुलामों को दासता से मुक्त करने के कार्य में उदारता, निष्पक्षता और परोपकार वृत्ति का प्रदर्शन किया था, को सम्मानार्थ समर्पित’ किया था. भारत में ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ विरोधी संघर्ष के इतिहास में इस पुस्तक का ठीक वही स्थान है, जो दुनिया-भर के मजदूर आंदोलनों के इतिहास में ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ का है. मराठी में लिखी गई इस पुस्तक के प्रथम संस्करण का मूल्य 12 आना था. मगर निर्धनों तथा शूद्रातिशूद्रों को यह पुस्तक मात्र आधी कीमत पर उपलब्ध कराई जाती थी. इसके पीछे ज्योतिबा फुले की दूरदृष्टि थी. उद्देश्य था कि जो गरीब तथा शूद्र-अतिशूद्र ‘गुलामगिरी’ को पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए पैसे की कमी बाधा न बने.

देरिदा को ‘विखंडनवाद’ का आदि व्याख्याता माना जाता है. फुले इस पद्धति का प्रयोग ‘गुलामगिरी’ में देरिदा से लगभग एक शताब्दी पहले करते हैं. जिन पौराणिक आख्यानों को उस समय तक श्रद्धापूर्वक पढ़ने की परंपरा थी. जिनपर संदेह करना पाप समझा जाता था, फुले ने उनका पुनर्पाठ करते हुए, समानांतर इतिहास की पृष्ठभूमि तैयार की. ‘गुलामगिरी’ में ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताना फुले की मौलिक स्थापना नहीं थी. मैक्समूलर, विंसेंट स्मिथ, रिस डेविस जैसे विद्वानों का यही विचार था. और तो और तिलक जैसे दक्षिणपंथी लेखक भी यही मानते थे. फुले ने मत्स्य, वाराह, कच्छ, नरसिंह, परशुराम आदि अवतारों को आर्य-नायक के रूप में प्रस्तुत किया. हिरण्यगर्भ, हिरण्यकश्यप, बलि, वाणासुर जैसे अनार्य राजाओं जिन्हें पुराणों और धर्मग्रंथों में राक्षस, असुर, दैत्य, दानव जैसे नामों से संबोधित किया गया है, को उन्होंने वीर योद्धा और भारत का मूल शासक घोषित किया. बलि को उन्होंने आदर्श, न्यायशील और प्रतापी राजा के रूप में चित्रित किया है. बताया कि उनके अधीन आधुनिक महाराष्ट्र, कोंकण प्रदेश से लेकर अयोध्या और काशी के आसपास के क्षेत्र शामिल थे.

गौरतलब है कि ब्राह्मण भी देवताओं और राक्षसों के संघर्ष की वास्तविकता पर भरोसा करते हैं. लेकिन उनके वर्णन इतने ज्यादा वायवी हैं, कि वे किसी और दुनिया के जीव लगने लगते हैं. फुले मिथकीय आख्यानों में निहित आर्य-अनार्य संघर्ष का मानवीकरण करते हैं. चमत्कारों और मिथों पर टिकी प्राचीन भारतीय संस्कृति की आलोचना करते हुए वे पाठक को उस इतिहास की झलक दिखाने का प्रयत्न करते हैं, जिसकी कालावधि के बारे में ठोस जानकारी भले ही न हो, मगर वह सत्य के अपेक्षाकृत करीब है. इसे कांटे से कांटा निकालने की कोशिश भी कह सकते हैं, जो सच भले न हो, मगर अपने सरोकारों के आधार पर वह कहीं ज्यादा मानवीय और तर्कपूर्ण है. फुले के समय तक सिंधु सभ्यता के बारे में जानकारी उजागर नहीं हुई थी. 1930 में हुई उस खोज से पता चला कि आर्यों के भारत आगमन के हजारों वर्ष पहले से सिंधु घाटी की उपत्यकाओं में महान नागरी सभ्यता अस्तित्ववान थी. उस सभ्यता के प्रमुख नगरों में से एक राखीगढ़ी से प्राप्त हालिया सबूत, उसे अनार्य सभ्यता घोषित करते हैं.

‘गुलामगिरी’ संवाद शैली में लिखी गई पुस्तक है. यह उन दिनों की प्रचलित शैली थी. संवाद के एक छोर पर स्वयं लेखक है, दूसरे पर धोंडीराव. पुस्तक का आरंभ आरंभ उन्होंने महान ग्रीक कवि होमर की इस पंक्ति से किया था—‘मनुष्य जिस दिन गुलाम बनता है, वह अपने आधे सद्गुण खो देता है.’ हिंदु धर्मग्रंथों में दशावतार की संकल्पना के आधार पर फुले भारत के प्राचीन इतिहास की क्रमबद्ध रूपरेखा तैयार करते हैं. बीच-बीच में ब्राह्मण षड्यंत्रों, चालाकियों तथा उन वितंडाओं का वर्णन भी करते हैं, जिनका सत्य और वास्तविकता से कोई नाता नहीं है. उदाहरण के लिए मत्स्यावतार के जन्म की घटना. भागवत पुराण के अनुसार मत्स्यावतार का जन्म मछली के गर्भ से हुआ था. उस कथा पर कटाक्ष करते हुए पुस्तक के दूसरे परिच्छेद में फुले लिखते हैं कि मछली के—‘जिस अंडे में मत्स्य बालक था, उसको उसने पानी से बाहर निकालकर फोड़ा होगा, तब उस अंडे से उसने मत्स्य बालक को बाहर निकाला होगा. यदि यह कहा जाए तो उस मछली की जान पानी से बाहर कैसे बची होगी? शायद उसने पानी में ही उस अंडे को फोड़कर उस मत्स्य बालक को बाहर निकाला होगा. यदि यह मान लिया जाए तो उस मत्स्य जैसे बालक की जान पानी में कैसे बची होगी?’ ऐसा नहीं है कि हिंदू धर्मग्रंथों में व्याप्त ऐसे अनर्गल आख्यानों पर फुले से पहले किसी ने विचार नहीं किया था. प्राचीनकाल में आजीवक और चार्वाक विचारक ऐसी ही ऊल-जुलूल बातों के कारण ब्राह्मणग्रंथों का मजाक उड़ाते थे. लेकिन उन्हें पुस्तक के रूप में लेकर आना बड़े साहस का काम था.

पुस्तक का पहला अध्याय ब्रह्मा, सरस्वती और आर्यों पर केंद्रित है. मनुस्मृति तथा ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में ब्राह्मणों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है, जिसके अनुसार ब्राह्मणों का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ है. फुले के अनुसार ‘परमपुरुष’ यानी ब्रह्मा के मिथ की परिकल्पना ब्राह्मणों ने अपनी सर्वश्रेष्ठता और सर्वोच्चता को दर्शाने के लिए की थी—‘फिर मनु महाराज जैसे (ब्राह्मण)अधिकारी हुए….उसने ब्रह्मा के बारे में तरह-तरह की कल्पनाएं फैलाईं. फिर उसने इस तरह के विचार उन गुलामों के दिलो-दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भर दिए कि ये सब बातें ईश्वर की इच्छा से हुई हैं.’2 दूसरे अध्याय में मत्स्यावतार का उल्लेख है. उसके समानांतर वे अनार्य योद्धा शंखासुर को रखते हैं. फुले के अनुसार मत्स्य आर्य जत्थे का नायक था. उसका अनार्य क्षेत्रपति शंखासुर से युद्ध हुआ. जिसमें शंखासुर को पराजित करके उसने उसके राज्य पर कब्जा कर लिया. बाद में शंखासुर के उत्तराधिकारियों ने राज्य वापस लेने के लिए मत्स्य पर हमला किया. उस हमले में मत्स्य को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा. तीसरा परिच्छेद ‘कच्छ’ के बारे में है. मत्स्यावतार के बाद आर्यों के दूसरे कबीले ने भारत भूमि पर प्रवेश किया, उसका नायक ‘कच्छ’ था. कच्छ ने फिर शंखासुर के कबीले पर अपना कब्जा कर लिया. उसके बाद आर्यों के जिस कबीले ने भारत भूमि में प्रवेश किया, उसके मुखिया का नाम कश्यप था. कश्यप को पराजित भारत के मूल निवासियों का साथ मिला. कुछ अर्से तक कश्यप और कच्छ के बीच युद्ध चलता रहा. अगले परिच्छेदों में वाराह, हिरण्यगर्भ, नरसिंह, वामन आदि अवतारों की चर्चा करते हैं. फिर उनके समानांतर प्राचीन अनार्य योद्धाओं को रखते हैं. छठवें परिच्छेद में अनार्यों के प्रमुख सम्राट बलिराजा का वर्णन उन्होंने अतिरिक्त सम्मान के साथ किया है.

गुलामगिरी में जाति-विमर्श

सोलह परिच्छेदों में बंटी गुलामगिरी के सातवें परिच्छेद से फुले जातियों के निर्माण पर आते हैं. वे ‘महार’ जाति की व्युत्पत्ति ‘महाअरि’ से करते हैं. ‘बाद में परशुराम ने उन महाअरि क्षत्रियों को अतिशूद्र, महार, अछूत, मातंग और चांडाल आदि नामों से पुकारने की प्रथा प्रचलित की.’ महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि जातियों की उत्पत्ति संबंधी फुले के तर्क कितने स्वीकार्य हैं. महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि जिन मिथकीय आख्यानों के आधार पर ब्राह्मण अपनी सर्वोच्चता और सर्वश्रेष्ठता का दावा करते आए थे, उनके विवेचन से कोई सर्वस्वीकार्य निष्कर्ष संभव ही नहीं था. फुले ‘परमपुरुष’ की मिथकीय संकल्पना तथा चातुर्वर्ण्य सिद्धांत दोनों को नकारते हैं. तथ्यों की विवेचना के समय वे जगह-जगह उग्र और आशालीन नजर आते हैं. जिसके लिए विष्णुशास्त्री चिपलूनकर ने यह कहकर कि ‘उन्हें किसी ऐसे विषय में दखल देने की आवश्यकता नहीं है, जो भाषाविदों का क्षेत्र हो’—कहकर उनकी आलोचना भी की थी. क्या यह माना जाए कि ‘गुलामगिरी’ की रचना उन्होंने अधैर्य की अवस्था में की थी. यदि हम गुलामगिरी को फुले द्वारा समाज सुधार की दिशा में किए गए कार्यों के तत्वावधान में परखने की कोशिश करें तो उनके शब्दों में छिपी तलखाहट की वजह को पहचान हैं. कल्पना कीजिए, एक 21 वर्ष का युवक समाज को बदलने की चाहत में सार्वजनिक जीवन अपनाता है. अगले 25 वर्षों तक वह लगातार समाज सुधार की दिशा में काम करता है. उसके बावजूद पाता है कि शूद्रों की किसी को परवाह नहीं है. उनकी व्यथा ‘गुलामगिरी’ के आसपास रचे गए एक ‘अभंग’ देखी जा सकती है, जिसमें एक वे एक  किसान का वर्णन करते हैं—

‘उसके मैले-कुचैले कपड़े/नंगा-धड़ंगा वह बंब लंगोटी बहादुर/ चिथेड़ियाँ सर पर/ धुस्से भी….ज्वार की दलिया भरपेट/सुख कुछ भी नहीं मिलता हमारे किसानों को.’ 

आज के दौर में गुलामगिरी की क्या महत्त्व है, इस बारे में स्वयं फुले ने  ‘गुलामगिरी’ की भूमिका में लिखा था—

‘प्रत्येक व्यक्ति को आजाद होना चाहिए. यही उसकी बुनियादी आवश्यकता है. जब व्यक्ति आजाद होता है, तब उसे अपने विचारों को दूसरों के समक्ष स्पष्ट रूप से दूसरों के सामने अभिव्यक्त करने का अवसर मिलता है. लेकिन जब उसे आजादी नहीं होती तब वह उन्हीं महत्त्वपूर्ण विचारों को जनहित में आवश्यक होने के बावजूद दूसरों के सामने प्रकट नहीं कर पाता. समय गुजर जाने पर वे विचार लुप्त हो जाते हैं.’

ओमप्रकाश कश्यप

नोट : सभी उद्धरण ‘गुलामगिरी’, महात्मा फुले रचनावली, डॉ. एल.जी.मेश्राम ‘विमलकीर्ति’, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से.