ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर ऑफ ईस्ट

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

जिसने ईश्वर को गढ़ा वह मूर्ख था

जो ईश्वर की वकालत करता है, वह महाधूर्त्त है

जो ईश्वर की पूजा करता है, वह असभ्य है.

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

ईवी रामास्वामी पेरियार

भारत में जातीय शोषण में लगी शक्तियों की पैठ का आकलन इससे भी किया जा सकता है कि यहां सुधारवादी आंदोलनों की धारा बहुत प्रच्छन्न और अवमंदित रही है. ज्ञात इतिहास में ब्राह्मणवाद को पहली चुनौती बुद्ध की ओर से मिली. बुद्ध से भी पहले आजीवक और लोकायत जैसे प्रकृतिवादी दर्शन ब्राह्मणवाद के समानांतर अपनी उपस्थिति बनाए हुए थे. उस समय तक ब्राह्मणधर्म केवल आश्रमों तक सीमित था. वहीं से वह धीरेधीरे राजकुलों पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा था. किसानों, शिल्पकारों, श्रमिकों तथा दासवर्ग के लिए न तो ब्राह्मणधर्म में कोई जगह थी, न ही उन्हें उसकी विशेष चिंता थी. फिर जैसेजैसे राज्य संगठित होते गए, लोगों पर अपना अनुशासन बनाए रखने के लिए धर्म और राजनीति परस्पर जुड़ते चले गए. बुद्ध के समय तक ब्राह्मणपुरोहित राज्यों पर अपनी पकड़ बना चुके थे. इसके साथसाथ जनता पर भी उनका प्रभाव बढ़ा था, जिसने उन्हें अतिरिक्त रूप से शक्तिशाली बना दिया था. अब वे राजाओं के आगे मनमानी करने, मनचाही मांगे रखने तथा उन्हें अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश कर सकते थे. राजा उनकी मनमानी से खिन्न भी होते थे. यज्ञ और दानादि पर होने वाले विपुल खर्च से उनपर आर्थिक बोझ भी पड़ता था. इसलिए बुद्ध ने कर्मकांड और बलिप्रथा का विरोध करते हुए, कर्मकांड विरोधी, उदार और मध्यममार्गी धर्मदर्शन का विचार लोगों के सामने रखा तो तत्कालीन राजाओं द्वारा उसका खुले मन से स्वागत किया गया. उसके फलस्वरूप ब्राह्मणधर्म को आने वाली कई शताब्दियां निर्वासन में गुजारनी पड़ीं. बुद्ध को वर्णव्यवस्था से शिकायत न थी. उनका विरोध जातिआधारित भेदभाव, शोषण और थोपी गई असमानता से था. उनका असली हमला यज्ञ के बहाने दी जाने वाली निरर्थक बलियों, तंत्रमंत्र, पूजापाखंड तथा कर्मकांड पर हुआ, जो आदमीआदमी के बीच द्वेष और भेदभाव परोसते थे. शोषणकारी जातिव्यवस्था को दैवी ठहराते थे. जनसाधारण की आय का बड़ा हिस्सा उसके विकास में काम आने बजाए आडंबरों पर व्यर्थ चला जाता था. बुद्ध के नैतिक आभामंडल के आगे ब्राह्मणवादी शक्तियां लंबे समय तक निस्तेज रहीं.

ब्राह्मणधर्म को दूसरी चुनौती संत कवियों की ओर से मिली. आरंभिक संत कवि समाज के निचले वर्गों से आए थे. अन्य धर्मों में धर्मग्रंथों को पढ़नेपढ़ाने का काम पवित्र माना जाता है, भारत में वेदादि ग्रंथों का पाठ बहुसंख्यक वर्ग के लिए निषिद्ध था. शूद्र वेदाध्ययन की कोशिश करे तो उसके कानों में पिघला सीसा डालने का शास्त्रोक्त दंडविधान था. देवालयों में पूजनअर्चन तो दूर, उनकी सीढ़ियां चढ़ना भी उनके लिए निषिद्ध था. जातीय शोषण झेलते आए उन कवियों ने आडंबरों को धता बताते हुए, निराकार ईश्वर की अराधना पर जोर दिया. मंदिरप्रवेश पर पाबंदी को उन्होंने यह कहकर चुनौती दी कि ईश्वर मंदिरमस्जिद में नहीं, मनुष्य के हृदय में वास करता है. धर्म के नाम पर दिखावा करने वालों को ललकारा. मूर्ति पूजा के विरुद्ध विद्रोही तेवर अपनाते हुए कबीर ने कहा कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर प्राप्त होता है तो वे पहाड़ पूजने को तैयार हैं. रैदास ने समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. ऐसे ‘बेगमपुरा’ की कल्पना की थी, जहां ऊंचनीच, दुखक्लेश, कष्टशोकों का सर्वथा अभाव है. सभी स्वतंत्र हैं. आमजन ने संतकवियों के जीवनदर्शन को हृदयंगम किया. जातीय शोषण के शिकार लोग उनके अनुयायी बनने लगे. रैदास, कबीर, दादू आदि संतकवियों से प्रेरणा लेकर गुरु नानक ने सिख धर्म की स्थापना की. पूरी दुनिया को समानता का संदेश दिया. परंतु जाति की जकड़बंदी ऐसी कि बड़ेबड़े महात्माओं के प्रयत्न उसके आगे नाकाफी सिद्ध हुए.

जातीय उत्पीड़न के शिकार लोग विवश होकर धर्मांतरण की राह अपनाने लगे थे. कबीर के अनुयायियों में हिंदुमुसलमान दोनों थे. उनकी एकता से सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा मंडराने लगा. तात्कालिक समाधान यह था कि शूद्रों के हिंदू धर्म से पलायन को रोका जाए. जो दूर जा चुके हैं, उन्हें वापस लाया जाए. उधर संतत्व की लोकप्रियता देख उच्च जाति के कवियों ने भी ‘भक्ति’ का महिमामंडन शुरू कर दिया था. वे अपने संस्कार तथा देवता भी साथ लेकर आए थे. संत कवियों के नेतृत्व में चल रहे सुधारवादी आंदोलनों की धारा को कुंद करने के लिए उन्होंने वही किया जो दो हजार वर्ष पहले उनके पूर्वजों ने बौद्ध धर्म के साथ किया था—बुद्धत्व की प्रखरता कम करने के लिए तंत्रमंत्र तथा कर्मकांडों का बौद्ध धर्म में प्रक्षेपण. साथ में बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना. उसके परिणामस्वरूप ब्राह्मणधर्म के पूजापाखंड, तंत्रमंत्र और अन्यान्य आडंबरों को बौद्ध धर्म में प्रवेश मिला. गौतम बुद्ध ने मूर्ति पूजा का विरोध किया था, परंतु ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में उनकी मूर्तियां जगहजगह लगने लगीं.

भक्त कवियों ने निराकार को छोड़ साकार का गुणगान किया. उस समय तक वैदिक देवता अप्रासंगिक हो चुके थे. देवराज इंद्र के चारित्रिक विचलन को लेकर अनेक कहानियां प्रचलित थीं. उनके आधार पर ब्राह्मण धर्म को पुनः स्थापित करना असंभव था. अतएव तात्कालिक जरूरत को समझते हुए राम और कृष्ण जैसे नए देवीदेवता गढ़े गए. उनकी प्राचीनता स्थापित करने के लिए उन्हें मिथकों के सहारे, अनार्य देवता शिव और गणपति से जोड़ा गया. ध्यातव्य है कि गणपति कोई देवता न होकर प्राचीन जनसमाजों में प्रचलित गणतंत्र का प्रतीक हैं. लगभग 2300 वर्ष पहले बड़े राज्यों की स्थापना पर जोर दिया जाने लगा था. वह राजशाही और सर्वसत्तावाद का दौर था. समाज ब्राह्मण और गैरब्राह्मण में बंट चुका था. ब्राह्मण शक्ति और सम्मान का प्रतीक था. गैरब्राह्मण जिसमें बड़ी संख्या मेहनतकशों तथा शिल्पकार वर्ग की थी. उन लोगों की थी जो कभी सफल गणतंत्र के संचालक और अनुयायी रहे थे. उन्हें सत्ता, संसाधन तथा उनके लाभों से काटकर पूर्णतः पराश्रित बना दिया गया. सर्वसत्तावाद को वैध ठहराने के लिए गणतंत्र और उससे जुड़े प्रतीकों का जमकर विरूपण किया गया. सूर, तुलसी, मीरा, नरसी मेहता आदि ने ईश्वर के अवतारवाद को स्थापित करने में मदद की. राम वाल्मीकि रामायण के कथानायक थे. उसका मूल कथानक ऋग्वेद में वर्णित राजा सुदास और दस अनार्य कबीलों के युद्ध का पुनर्कथन था, जिसे किसी अज्ञात लेखक ने सबसे पहले ‘पुलत्स्यवध’ शीर्षक से रचा था. उसी कथानक को तुलसी ने नए कलेवर में ‘रामचरितमानस’ के रूप में लिखा, जिसमें उन्होंने राम को भगवान के रूप में प्रचारित किया. धर्म के नाम पर वर्गीय स्वार्थों का समर्थन करने वाली मिथ कथाओं की रचना के साथसाथ इतिहास और संस्कृति के विरुपण का दौर भी चलता रहा. वर्चस्ववादियों ने उनकी मनमाने ढंग से व्याख्या की. तथ्यों को जमकर तोड़ामरोड़ा. स्वार्थ के लिए नएनए झूठ गढ़े गए. झूठ को सच बनाया गया. ऐसी संस्कृति की रचना की गई, जिसमें जो जितना अधिक श्रम करता था, सही मायने में उत्पादक वर्ग था, सामाजिक पायदान पर उसे उतना ही कम मानसम्मान हासिल था. जो चालाक और अनुत्पादक होकर दूसरों के श्रम पर जीता था, उसे समस्त संसाधनों का स्वामी और कर्ताधर्ता घोषित कर दिया गया.

भारतीय संस्कृति के इतिहास में हम पढ़ते आए हैं कि हजारों वर्ष पहले आर्यों ने भारत भूमि में प्रवेश किया था. बालगंगाधर तिलक जैसे लेखकों का यही मानना था. भारत पहुंचने के बाद उनका यहां के शांतिप्रिय कबीलों के साथ संघर्ष हुआ. कुछ लड़ाइयों में आर्य विजयी रहे. जहां सीधे विजय असंभव थी, वहां संधियों से काम चलाया गया. उसके लिए जो भी समझौते आवश्यक थे, किए गए. ऋग्वेद के अनुसार शिव अनार्य देवता हैं. मूलनिवासियों की सुविचारित युद्धशैली और नायकप्रधान सेना थी. इसलिए आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. सीधी लड़ाई से बचने के लिए उन्होंने कदमकदम पर कूटनीति को अपनाया. असुरों के नायक शिव को अपने पक्ष में करने के लिए आर्य सम्राट हिमवंत की पुत्री गौरी का विवाह उनके साथ कराया गया. फलस्वरूप शिव को ‘महादेव’ का दर्जा प्राप्त हुआ. शिव के देवताओं के पक्ष में जाते ही असुर बिखरने लगे. प्रकारांतर में देवताओं की कूटनीति को समझे बिना ‘भोले’ शिव भारत की मूल संस्कृति की कीमत पर, आर्य संस्कृति के सबसे सशक्त संवाहक सिद्ध हुए.

दूसरा उदाहरण कृष्ण का है. उनका आदिउल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. तदनुसार उन्होंने अनार्य योद्धा और यदुओं के नायक के रूप में, दस सहò यदुसैनिकों के साथ इंद्र से टक्कर ली थी. इंद्र द्वारा छलपूर्वक पराजित यदु कबीला उत्तरपश्चिम की ओर विस्थापित हो गया. अगले 1500 वर्ष के अंतराल में उसके वंशज यमुना किनारे की उपजाऊ जमीन को खेती योग्य बनाकर खासी शक्ति और समृद्धि प्राप्त कर चुके थे. उनकी उपेक्षा करना संभव न था. इसलिए इंद्र के हाथों छलपूर्वक मारे गए कृष्ण को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया. ‘देवराज’ के माथे से कृष्णहत्या का कलंक मिटाने के लिए महाभारत सहित पौराणिक ग्रंथों में भील को कृष्ण का हत्यारा घोषित किया गया. उसके लिए कुछ कथाएं और उपकथाएं गढ़ी गईं. इससे दो उद्देश्य साधे गए. सुदास के विरुद्ध संग्राम में भीलों ने यदु कबीले का साथ दिया था. दोनों अनार्य जातियां थीं. भील कबीले के नायक द्वारा हत्या दिखाकर एक तो इंद्र को उस कलंक से मुक्ति दिलाई गई. दूसरे यदु कबीले और भीलों की एकता को हमेशाहमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया. राम और कृष्ण का देवत्व सिद्ध करने के लिए भक्त कवियों ने नएनए मिथ गढ़े. परिणामस्वरूप मंदिरों और धर्मालयों की खोई प्रतिष्ठा पुनः वापस लौटने लगी.

संतकाल के बाद सुधारवाद की अगली आहट उनीसवीं शताब्दी के साथ सुनाई पड़ती है. उसके पीछे पश्चिम से आए विचारों और नई शिक्षा की प्रेरणाएं थीं. उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारवादियों को हम दो वर्गों में बांट सकते हैं. पहला धार्मिक सुधारवादी. दूसरा सामाजिक सुधारवादी. पहले वर्ग के सुधारक समाज के उच्च वर्गों से आए थे. उनकी प्राथमिकता हिंदू धर्म को उन कुरीतियों से मुक्ति दिलाना था, जो दलितों और पिछड़ों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रही थीं. धार्मिक सुधारवादियों में महर्षि दयानंद, रामकृृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि के नाम लिए जा सकते हैं. उन्होंने सामाजिक भेदभाव पर सवाल उठाए. ऊंचनीच की भावना से मुक्ति का आवाह्न किया. लेकिन येनकेनप्रकारेण वे वर्णव्यवस्था के समर्थक बने रहे. जातियों को वैध ठहराने तथा शूद्रों को वैदिक संस्कृति से जोड़ने के लिए प्राचीन मिथकों का सहारा लिया गया. कुल मिलाकर जातिभेद को कम करने, ऊंचनीच की खाई को पाटने में वे सभी नाकाम रहे. जाति और धर्म के बीच शक्तिशाली गठजोड़ सामाजिक वैषम्य को प्राकृतिक बताया. जो भी हो, सुधारवादियों की असफलता ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारतीय समाज में जाति जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करती है. यहां तक कि आंदोलनों की सफलताअसफलता, उसकी दशादिशा पर भी उसके प्रवत्र्तकों की जाति का प्रभाव पड़ता है.

जाति के आधार पर सामाजिक सुधारवादियों को पुनः दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहले वे जो ऊंची जातियों से आए थे. उनका असली उददेश्य हिंदू धर्म के बिखराव को रोकना था. सुधार की उनकी संकल्पना धर्म और जाति की सीमा में, उनके मूलभूत ढांचे को चुनौती दिए बिना, केवल रूढ़ियों पर प्रहार तक सीमित थी. व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की न तो उनकी इच्छा थी, न कार्ययोजना, न ही उनकी वैचारिक चेतना में उसके लिए खास जगह थी. केशवचंद सेन(प्रार्थना समाज), डाॅ. आत्माराम पांडुरंग(ब्रह्म समाज), गोपाल भंडारकर, जस्टिस रानाडे(सर्वेंट्स आॅफ इंडिया सोसाइटी) आदि ने जातिप्रथा पर सवाल उठाते हुए उसके उन्मूलन की मांग की. परंतु उनके आंदोलन का मुख्य ध्येय छूआछूत और जातिआधारित भेदभाव को कम करने; तथा शूद्रों के प्रति थोड़ा नर्म रुख अपनाने तक सीमित था. शूद्रों के अधिकारहनन तथा उनपर होने वाले अत्याचारों की ओर से लगभग सभी मुंह मोड़े रहे. सच तो यह है कि शताब्दियों से प्राप्त सुखसुविधाओं तथा विशेषाधिकारों को पूरी तरह से छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार न था. इसलिए उनके आंदोलन बहुत कम प्रभावकारी सिद्ध हुए.

दूसरे वर्ग के समाज सुधारक समाज के निम्नस्थ वर्गों से आए थे. जाति आधारित भेदभाव और दमन के कड़वेकसैले अनुभव उन्हें पीढ़ियों से प्राप्त थे. नई शिक्षा और विचारचेतना ने उन्हें यह समझ दी थी कि वे शोषण के असली कारणों को समझ, उनका समाधान खोजते हुए समाज को उसके अनुरूप चेता सकें. उन्होंने जाति के साथसाथ उसको प्रश्रय देने वाले धर्म को भी अपना निशाना बनाया. यह मानते हुए कि अकेले धर्म, धार्मिक नैतिकता या नैतिकता के भरोसे सामाजिक न्याय को समर्पित आदर्श समाज की रचना असंभव है, डाॅ. आंबेडकर आदि विद्वानों विधिआधारित राज्य की आवश्यकता पर जोर दिया. ज्योतिराव फुले ने समाज को धार्मिक अंधविश्वासों से बाहर लाने के लिए शिक्षा और स्त्रीसमानता पर जोर दिया. उसके फलस्वरूप आधुनिक भारत की नींव रखी गई. यह आंदोलन जैसेजैसे आगे बढ़ा, ब्राह्मणवादी अभिजन संस्कृति के समानांतर जनसंस्कृति को बढ़ावा देने की मांग समाज में जोर पकड़ने लगी. ऐसी संस्कृति जिसमें सभी के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता हो. लोग समानता और सहभागिता के आधार पर जीवनयापन करते हों. जो किसी भी प्रकार के स्तरीकरण से सर्वथा मुक्त हो. वे कबीर और रैदास की परंपरा के लोग थे. इस श्रेणी के विचारकों में सबसे पहला नाम महात्मा ज्योतिराव फुले का आता है. फुले ने धार्मिक प्रतीकों और मिथकों की नई व्याख्या की. धर्म और संस्कृति के नाम पर प्रचलित आडंबरों का पर्दाफाश किया. अंग्रेजी शिक्षा पर जोर दिया. पत्नी सावित्रीबाई फुले और फातिमा बी के साथ मिलकर उन्होंने कई स्कूलों की शुरुआत की. फुले के सहयोगियों में गोपाल बाबा वालंग्कर(मृत्यु सन 1900), शिवराम जनबा कांबले(1875—1942) शामिल थे. फुले के प्रेरणास्रोतों में कबीर, रैदास आदि संत कवि तथा शिवाजी सम्मिलित थे. शिवाजी की जाति कुन्बी, पिछड़ी जातियों में गिनी जाती है. अपनी प्रतिभा, रणकौशल और जुझारूपन के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र साम्राज्य खड़ा किया था. परंतु स्थानीय ब्राह्मण एक शूद्र को राजपद सौंपने को तैयार न थे. इस काम को काशी के ब्राह्मणों की मदद से संपन्न कराया गया. फुले के बाद आंदोलन को गोपाल गणेश अगरकर, डाॅ. भीमराव आंबेडकर, ईवीएस रामास्वामी पेरियार ने विस्तार दिया. उसे शिवाजी के वंशज शाहू जी महाराज का संरक्षण तथा निचली जातियों का भरपूर समर्थन मिला. डाॅ. आंबेडकर अपने समय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों में से थे. उन्होंने वंचितों और उत्पीड़न के शिकार लोगों को संगठित करने, उनके अधिकारों की संरक्षा हेतु स्वतंत्र भारत के संविधान में युगांतरकारी व्यवस्था करने जैसे क्रांतिकारी कार्य किए.

वर्णव्यवस्था जिसे आर्यों की देन कहा जाता है, को वे अपने मूल प्रदेश से लेकर आए थे. इस तर्क के आधार पर ब्राह्मण जो वर्णव्यवस्था के शिखर पर हैं, मूलतः विदेशी सिद्ध हुए. इस विचार का प्रयोग अभी तक केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सीमित था. पहली बार फुले ने उसका उपयोग दलितों और पिछड़ों में जातीयचेतना जगाने के लिए किया. वेदों तथा अन्य धर्मशास्त्रों के उल्लेख से उन्होंने ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया तथा शूद्रों एवं दलितों को यहां का मूलनिवासी. फुले की यह सैद्धांतिकी उनकी पुस्तक ‘गुलामगिरी’(1873) में सामने आई. उसके आधार पर 1892 में ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ की स्थापना हुई. उसने जाति और वर्ण के आधार पर गैरब्राह्मणों के शोषण की ओर लोगों का ध्यान आकर्पित कराया. अस्पृश्यता को हिंदू समाज का कलंक मानते हुए उसे मिटाने का संकल्प लिया. संघ के नेताओं को उम्मीद थी कि गांधी के नेतृत्व में दक्षिण में तेजी से पांव पसार रही कांग्रेस सामाजिक न्याय के मुद्दे पर उनका साथ देगी. लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. अंततः संघ ने अपने बल पर जातिवाद, ब्राह्मण वर्चस्व और दलितों के साथ हो रहे अत्याचारअनाचार के विरुद्ध संघर्ष तेज किया. उसने वर्षों से उत्पीड़न का शिकार रही जातियों में असंतोष का संचार किया. कांग्रेस की भाांति ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ के भी ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ नामक दो वर्ग थे. ‘नरमदल’ वाले जनतंत्र में भरोसा रखते थे. उन्होंने आंदोलन का रास्ता अपनाया. गर्मदल वाले प्रांत में ब्राह्मण वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष छेड़े रहे. आगे चलकर उसके नेताओं ने ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन किया और जनता में व्याप्त असंतोष का लाभ उठाते हुए सत्ता हासिल की. वह राजनीतिक स्वतंत्रता से सामाजिक स्वाधीनता पर जोर देती थी. इस कारण अंग्रेजों के प्रति उसके नेताओं के मन में सहानुभूति थी. उसके समर्थकों में बड़ी संख्या तमिलनाडु की मध्यम और पिछड़ी जातियों की थी. उन्हें समाज के बड़े वर्गों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त था. सरकारी पदों पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को रोकने के लिए ‘जस्टिस पार्टी’ ने ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था की.

दर्जनों आंदोलनों तथा सैकड़ों महापुरुषों के अनथक योगदान के बावजूद स्वातं×यपूर्व भारत में अपेक्षित जातीय सुधार संभव न हो सके. दरअसल आमूल परिवर्तन की पहली और महत्त्वपूर्ण शर्त संबंधित वर्गों में उसके प्रति जागरूकता तथा उसकी स्वयंस्फूत्र्त कामना है. जिस समाज में परिवर्तन के प्रति सामान्य चेतना का अभाव हो वहां परिवर्तन, केवल दिखावे के लिए ऊपर से थोप दिए जाते हैं. उनकी रूपरेखा, लोकहित के बजाए शीर्ष पर मौजूद मुट्ठीभर लोगों की स्वार्थसिद्धि हेतु बनाई जाती है. इस कारण जनता भी उन आंदोलनों की ओर से उदासीन बनी रहती है. नतीजन वास्तविक परिवर्तन हमेशा अलभ्य बना रहता है. देखा यही गया है कि जो समाज में मसीहा बनकर आता है, वह अंततः मठाधीश बनकर रह जाता है. अनुयायी पत्थर को देवता में तब्दील कर देते हैं. इसलिए जागरूक जनता अपने विकास की जिम्मेदारी खुद संभालती है, किसी मसीहा का इंतजार नहीं करती. भारत स्वयं इसका उदाहरण है. फुले, आंबेडकर, पेरियार जैसे नेताओं ने लोगों को उनके इतिहास और सामथ्र्य का बोध कराया तो वे स्वतः संगठित होने लगे.

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर आॅफ ईस्ट

यूनेस्को ने पेरियार को ‘पूरब का सुकरात’ कहकर सम्मानित किया था. समर्थक उन्हें आधुनिक संत मानते हैं. भारतीय राजनीति में अपने विद्रोही तेवरों के साथ उन्होंने जिस तर्कशक्ति का आगाज किया, उसके लिए यह उपमा सही बैठती है. किंतु जिस निर्भीकता, साहस और बुद्धिमत्ता के साथ उन्होंने निरर्थक कर्मकांडों तथा जड़परंपराओं को चुनौती दी, धर्म के नाम पर गुरुडम फैलाने वालों को ललकारा, उनका योगदान उन्हें महान फ्रांसिसी चिंतक वाल्तेयर के समकक्ष ठहराता है. उन्होंने समाज में धर्म के आधार पर हो रहे शोषण को समझा. जाना कि धर्म किस प्रकार लोगों के दिलोदिमाग का बेमेलकारी सभ्यता एवं संस्कृति से अनुकूलन करता है. असमानता को नियति बताकर उन्हें बौद्धिक स्तर पर पंगु बनाता है. लोकप्रिय राजनीति में जबकि अधिकांश नेता ईश्वर या उसके नाम पर होने वाले कर्मकांडों में निजी अविश्वास के बावजूद खुद को नास्तिक कहने का साहस नहीं जुटा पाते—पेरियार ने स्वयं को न केवल ईश्वरविरोधी कहा, बल्कि धार्मिक रूढ़ियों, पाखंड और बौद्धिक जड़ताओं के विरुद्ध आवाज भी उठाई. लोकप्रियता के तमाम खतरे उठाते हुए उन्होंने जोरदार शब्दों में ईश्वरीय सत्ता को नकारा. साथ ही समानता, सहयोग और सामंजस्य पर आधारित समाज की संरचना पर बल दिया. छूआछूत जैसी घृणित पृथा के लिए उन्होंने ईश्वर में आस्था को दोषी माना. विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि समाज का बहुत छोटासा हिस्सा धर्म और जाति के नाम पर राज्य के अधिकांश संसाधनों और महत्त्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमाए रहता है. उसके लिए वर्गीय स्वार्थ ही सबकुछ हैं. अपने सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग वह अपने वर्गीय स्वार्थों की सिद्धि के लिए करता है. उनका इशारा ब्राह्मणों की ओेर था, जो मद्रास प्रेसीडेंसी की कुल जनसंख्या का मात्र 3.2 प्रतिशत होने के बावजूद प्रांत के 70 प्रतिशत संसाधनों और सरकारी पदों पर विराजमान थे. उसके परिणामस्वरूप बहुसंख्यक वर्ग घोर विपन्नता और दमनकारी हालात में जीने के लिए बाध्य था. छूआछूत जैसी निकृष्ट प्रथा के लिए उन्होंने भारतीयों की अंधश्रद्धा को दोषी माना. शूद्रों के मंदिर प्रवेश पर रोकथाम को लेकर उनका कहना था—

‘‘इस देश में जब तक ईश्वर का अस्तित्व रहेगा, तब तक छुआछूत भी कायम रहेगी. यह ऐसा घिनौना आविष्कार है, जिसकी मदद से अछूतों को जानवरों से भी बदतर माना जाता है. मंदिर बनाने की प्रक्रिया से लेकर मूर्ति स्थापना तक अस्पृश्यों के आगमन से न तो वह जगह अपवित्र होती है, न मूर्तियां. लेकिन मंदिर बनने के बाद, मूर्तियों में प्राणप्रतिष्ठा होते ही अछूतों के लिए वह स्थान निषिद्ध मान लिया जाता है.’’

उनका पूरा नाम इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर था. प्रशंसक उन्हें ईवी रामास्वामी पेरियार भी कहते हैं. ‘पेरियार’ उनकी उपाधि थी. उसका अर्थ है—श्रेष्ठतम; यानी महानअग्रज….दि ग्रेट मेन. 1923 में धर्म और जाति को तिलांजलि देते हुए यह संबोधन उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ा था. एक सभा में उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से आग्रह किया वे जातिसूचक शब्दों को त्याग दें. वे उम्र में फुले से 52 वर्ष कम तथा आंबेडकर से 12 वर्ष अधिक थे. उन्होंने लंबा तथा संघर्षपूर्ण जीवन जिया. पेरियार आंबेडकर की तरह उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं थे, किंतु अपने अनुभव एवं स्वाध्याय के बल पर उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया; उसके आधार पर जैसा आत्मविश्वास उनमें था, उसे देखते हुए वे समकालीन बुद्धिजीवियों में अग्रणी सिद्ध होते हैं. तर्कशक्ति और विवेचनसामर्थ्य में वे बेमिसाल थे. चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य उनके मित्र थे. लेकिन दोनों के बीच विचारवैभिन्न्य बहुत बड़ा था. उन्होंने अपने लाखों प्रशंसक और आलोचक तैयार किए. तर्क के समय वे अपने प्रतिद्वंद्वियों पर हमेषा भारी पड़ते थे. वैचारिक स्तर पर हम उन्हें आंबेडकर की अपेक्षा फुले के अधिक करीब पाते हैं. दोनों के बीच एक अंतर यह भी है कि आंबेडकर समाज सेवा में सफल होकर राजनीति में आए थे, उनके लिए राजनीति समाजसेवा ही थी. पेरियार पहले राजनीति में थे. सीमित समय में जितनी सफलता संभव थी, प्राप्त की. किंतु सक्रिय राजनीति उन्हें लंबे समय तक बांध कर न रख सकी. जल्दी ही वे उससे ऊब गए और समाजसेवा में लौट आए. लक्ष्य दोनों का एक ही था—समाज के विपन्न, उत्पीड़ित और असमानता के शिकार वर्गाें के अधिकारों के लिए संघर्ष करना. दोनों ने अपनेअपने क्षेत्र में युगांतरकारी कार्य किए और सामाजिक परिवर्तन के संवाहक बने.

पेरियार चाहते तो बाकी राजनीतिज्ञों की भांति मानसम्मान और पदप्रतिष्ठा से भरा जीवनयापन कर सकते थे. राजनीति उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मात्र थी. वहां भी उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना. जब लगा कि परंपरागत राजनीति से सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है, सक्रिय राजनीति से अविलंब नाता तोड़, वे सामाजिक आंदोलनों की डगर पर चल पड़े. आजीवन उन लोगों के लिए संघर्षरत रहे जो धर्म के नाम पर, जाति, वर्ण तथा लिंग के नाम पर असमानता, दैन्य और अपमान से भरपूर जीवन जीने को विवश थे. कबीर, रैदास, नारायण गुरु, फुले आदि से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का केंद्रीय मुद्दा बनाया. वैज्ञानिक चेतना से भरपूर, अकाट्य तर्कों के बल पर वे दलितपिछड़ी जातियों के अंतर्मन में छिपे आक्रोश को हवा देने में कामयाब हुए. उनके अस्मितावादी आंदोलनों को व्यापक जनसमर्थन हासिल हुआ. फलस्वरूप वहां सामाजिक परिवर्तन की बड़ी इबारत लिखी गई. अकेले पेरियार ने दक्षिण में वह कर दिखाया, जिससे आगे चलकर संपूर्ण भारत में सामाजिक न्याय का रास्ता प्रशस्त हुआ.

रामास्वामी का जन्म 17 सितंबर, 1879 को मद्रास प्रेसीडेंसी के कोयंबटूर जिले के इरोड नामक कस्बे में हुआ था. पिता का नाम था, वेंकटप्पा नायडु तथा माता थीं—चिन्ना थ्याम्मल. कुल चार भाईबहनों में बड़े भाई ई वी कृष्णास्वामी थे. बहनें पोन्नुथेई और कन्नामल रामास्वामी से छोटी थीं. रामास्वामी का परिवार कन्नड़ मूल का था. जाति बलीजा, जिसे वहां पिछड़े वर्ग में गिना जाता था. ‘नायकर’ उनका गौत्र नाम था. रामास्वामी के मातापिता पारंपरिक रीतिरिवाजों में विश्वास रखते थे. आगे चलकर स्वयं को ठेठ नास्तिक घोषित करने वाले रामास्वामी पेरियार आरंभ में अपने परिजनों की भांति आस्थावादी थे. उनका बचपन अनुभवसमृद्ध था. जन्म के समय उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी. पिता साधारण व्यापारी थे. नौ वर्ष की अवस्था तक उनका जीवन संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में बीता. धीरेधीरे हालात सुधरे. व्यापार जमने लगा. 1888 तक उनके पिता की गिनती इरोड के सबसे धनाढ्य व्यापारी के रूप में होने लगी थी. पिता चाहते थे कि रामास्वामी उनके व्यापार को आगे बढ़ाएं. लेकिन रामास्वामी के जीवन का लक्ष्य कुछ और ही था. इसके संकेत बचपन में ही मिलने लगे थे. उनकी स्कूली शिक्षा मात्र पांच वर्ष चल सकी. पहले तीन वर्ष उन्होंने एक नर्सरी स्कूल में बिताए. विद्रोही स्वभाव के कारण जातीय दंभ के शिकार लड़कों से उनका झगड़ा होता रहता था. इसलिए प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उनके पिता ने उन्हें ननिहाल पढ़ने के लिए भेज दिया था.

उन दिनों समाज जाति के आधार पर बुरी तरह से विभाजित था. स्कूलों में उच्च जाति के बच्चे निचली जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाए रखते थे. घर और स्कूल दोनों में उन्हें यही सिखाया जाता था. बालक रामास्वामी विद्रोही स्वभाव का था. उनके मित्रों में अगड़ीपिछड़ी सभी जातियों के बच्चे शामिल थे. पुराने मिजाज के मातापिता चाहते थे कि उनका बेटा सामाजिक मर्यादाओं का पालन करे. स्कूल और स्कूल से बाहर छोटी जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाकर रखे. मगर बालक रामास्वामी पर उनकी बातों का कोई असर न पड़ा. स्कूल के आसपास गरीब लोगों की बस्तियां थीं. मातापिता और अध्यापक के निर्देशों की परवाह किए बिना किशोर रामास्वामी उन बस्तियों में चला जाता, और वहां बच्चों के साथ खेलने लगता. बच्चों के बीच झगड़े भी होते. उस समय उसे डांट पड़ती. कभीकभी मार भी खानी पड़ती. एक बार बालक रामास्वामी अछूत बच्चों के साथ खेलते हुए पकड़ा गया. दंडस्वरूप उसके दोनों पैरों में लोहे की दो राॅडें बांध दी गईं. इसके बावजूद उसके आचरण में कोई सुधार नजर न आया तो पिता ने बेटे के और पढ़नेलिखने की उम्मीद छोड़ दी. विद्रोही मानसिकता के चलते वे औपचारिक पढ़ाई के क्षेत्र में कुछ खास हासिल न कर सके.

उस समय पेरियार की अवस्था मात्र ग्यारह वर्ष थी. वे पिता के साथ व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे. 1911 में पिता के निधन के बाद उन्होंने अपने पैत्रिक व्यवसाय को भलीभांति संभाल लिया. अगले बीस बर्ष उन्होंने व्यापार करते हुए बिताए. व्यापार करते हुए उन्होंने दुनियादारी सीखी. समाज में व्याप्त ऊंचनीच और उसके कारणों को समझा. अपने परिश्रम और बुद्धिबल के आधार पर पेरियार खुद को कुशल व्यापारी सिद्ध करने में कामयाब रहे. फलस्वरूप समाज और स्थानीय व्यापारियों में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उन्हीं दिनों उनका स्थानीय नेताओं से संपर्क बढ़ा. उन संपर्कों के बल पर राजनीति की राह आसान होती गई. उन दिनों मद्रास की राजनीति में परिवर्तन का दौर चल रहा था. पूरे भारत में स्वतंत्रता की मांग बढ़ती जा रही थी. उसने वंचित एवं उत्पीड़ित समुदायों के मन में अस्मितावादी चेतना का संचार किया था. अपने प्रवचनों में गांधी छूआछूत और जातीय भेदभाव का खंडन करते थे. प्रकट रूप में सभी बड़े कांग्रेसी नेता उनका समर्थन करते थे. इसलिए उस समय के सामान्य युवा की भांति पेरियार भी गांधी और कांग्रेस के आकर्षण में बंधते चले गए.

पेरियार का विवाह 19 वर्ष की अवस्था में विधिविधान के साथ, नागम्मई के साथ संपन्न हुआ. नागम्मई उनसे उम्र में पांच वर्ष छोटी थीं. उनका विवाह भी असाधारणसी घटना थी. उस समय की परंपरा थी कि किशोरावस्था पार करतेकरते लड़केलड़कियों के विवाह हो जाया करते थे. पेरियार के पिता ने अपने ही जैसे धनाढ्य व्यापारी की कन्या को उनके लिए चुना था. पेरियार तक बात पहुंची तो उन्होंने उस रिष्ते से इन्कार कर दिया. बजाय व्यापारी की बेटी के उन्होंने ननिहाल के पक्ष की दूर के रिश्तेदार की बेटी से विवाह करने की इच्छा जाहिर की, जिससे वे मिल चुके थे. लड़की के मातापिता की आर्थिक स्थिति उनके परिवार की अपेक्षा बहुत कमजोर थी. मगर पेरियार के पिता उस समय तक उनके दृढ़निश्चयी स्वभाव को समझ चुके थे. न चाहते हुए भी उन्होंने नागम्मई से विवाह की सहमति दे दी. विवाह के समय भी पेरियार ने उन परंपराओं का विरोध किया, जिनपर ब्राह्मणत्व की छाप थी. वे नहीं चाहते थे कि उनकी पत्नी सामान्य स्त्री की तरह फिजूल के पूजापाठ में समय बरबाद करे. लेकिन नागम्मई नियमित मंदिर जाने वाली आस्थावान स्त्री थीं. पेरियार ने उन्हें समझाने की कोशिश की. आरंभ में नागम्मई पर उनकी सलाह बेअसर रही. उसके बाद पेरियार ने वह किया, जो किसी को भी चैंका सकता है. जिस रास्ते से नागम्मई मंदिर के लिए निकलतीं, अपने कुछ साथियों के साथ पेरियार भी वहां खड़े हो जाते और अपनी ही पत्नी पर छींटाकशी करने लगते. तंग आकर उन्होंने मंदिर जाने की जिद छोड़ दी. पति के साथ रहते हुए नागम्मई का मन बिलकुल बदल गया. पति की सलाह पर उन्होंने अपने बहुमूल्य गहने तक त्याग दिए. आगे चलकर वे पेरियार के प्रत्येक आंदोलन में उनकी सच्ची सहधर्मिणी सिद्ध हुईं. वायकम आंदोलन में पेरियार को गिरफ्तार कर लिया तो नागम्मई संघर्ष में उतर आईं. विवाह के कुछ वर्ष पश्चात नागम्मई ने एक पुत्री का जन्म दिया. तब तक पेरियार खुद को समाजकल्याण के लिए समर्पित कर चुके थे. मात्र पांच महीने की थी, जब वह बच्ची बीमार पड़ी और देखभाल के अभाव में चल बसी. वह उनकी पहली और अंतिम संतान थी. 1933 में नागम्मई का भी निधन हो गया. आगे चलकर रामास्वामी पेरियार ने दूसरी शादी भी की परंतु उससे कोई संतान न हुई.

अभी तक रामास्वामी नायकर के बारे में जो चर्चा हुई है, वे साधारणसी बातें हैं. पेरियार सफल व्यापारी पिता की महत्त्वाकांक्षी संतान थे. लेकिन यदि वे केवल व्यापार तक सिमटे रहते तो उन हजारोंलाखों धनपशुओं में से एक होते जो ताजिंदगी धनार्जन में लिप्त रहकर अंततः उसी की कामना में दम तोड़ देते हैं. अथवा ज्यादा से ज्यादा उन लोगों में से होते, जिनका काम बातों के बल पर चाय के प्याले में तूफान उठाते रहना है. तब वे ‘पेरियार’ न बन पाते. ऐसे रामास्वामी के लिए भला हम भी क्यों कागज काले कर रहे होते! समय की जरूरतों ने आंबेडकर को अर्थशास्त्री से समाजविज्ञानी और विधिशास्त्री बना दिया था. सामाजिक दबावों ने ही पेरियार को उन रास्तों की ओर मोड़ दिया, जिस दिशा में बढ़ने की उससे पहले उन्होंने कभी कल्पना तक न की होगी.

पेरियार के नेतृत्व में उनका पैत्रिक व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा था. 1920 में ‘मद्रास पे्रसीडेंसी ऐसोशिएसन’ का गठन हुआ. पेरियार तब तक स्थानीय नेताओं से संपर्क बना चुके थे. जिस समाज से वे आए थे, उसमें सक्रिय राजनीति से जुड़ने की कोई परंपरा न थी. सवर्ण वर्चस्व वाली राजनीति में पिछड़े वर्गों को ऐसा अवसर मिल भी नहीं पाता था. परंतु पेरियार उन युवाओं में से न थे जो परिवेश और परिस्थितियों के दास बन जाते हैं. वे उन विरले लोगों में से थे जो तमाम चुनौतियों से टकराकर स्थितियों को अपने अनुसार मोड़ने का सामथ्र्य रखते हैं. युवावस्था में ही उनकी राजनीति में रुचि बढ़ने लगी थी. उन दिनों कांग्रेस राजनीति का प्रवेश द्वार थी. बड़ेबड़े नेता, जिन्होंने आगे चलकर कांग्रेस के साथ और उसके विरोध में अपनी राजनीति को चमकाया, कांग्रेस से ही निकले थे. युवा रामास्वामी को भी कांग्रेस से उम्मीदें थीं. इसलिए 1920 में उन्होंने कांगे्रस की सदस्यता ग्रहण कर ली. उसी वर्ष गांधी जी ने ‘असहयोग आंदोलन’ की शुरुआत की थी. पेरियार को कांग्रेस का उदारवादी रवैया, विशेषकर छूआछूत उन्मूलन के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम पसंद थे. इस कारण वे कांगे्रस और गांधीजी से प्रभावित भी थे. असहयोग आंदोलन के दौरान गांधीजी ने औपनिवेशिक सरकार के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग का आवाह्न किया. कांग्रेसजनों और आम जनता से अपील की कि वे उन सभी पदों और सुविधाओं का त्याग कर दें, जो किसी भी रूप में सरकार की ओर से प्राप्त हुए हैं. पेरियार के व्यवसाय का सरकार से कोई सीधा संबंध न था. तो भी गांधीजी के आवाह्न पर उन्होंने अपने जमेजमाए व्यापार को छोड़ दिया और पूरी तरह से असहयोग आंदोलन से जुड़ गए. अपने खजाने के दरवाजे भी आंदोलन के लिए खोल दिए. उनके नेतृत्व में मद्रास में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का सफल आंदोलन हुआ. विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई. खादी को प्रोत्साहन देने के लिए वे न केवल खुद मोटे खद्दर के कपड़े पहनने लगे, बल्कि अपने परिवार और परिजनों को भी उसके लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया. खादी के समर्थन में उनका कहना था—

यदि प्रत्येक व्यक्ति खादी को अपना ले तो देश में बेरोजगारी और भुखमरी की कोई समस्या न रहे’

कुशल प्रबंधन क्षमता, नेतृत्वकला और वक्तृत्वकौशल के बल पर वे तमिलनाडु की राजनीति में जगह बनाने में सफल हुए. उनकी निष्ठा और लगन को देखते हुए उन्हें कांग्रेस का प्रांतीय अध्यक्ष बना दिया गया. उस पद पर वे लगातार दो वर्षों तक बने रहे. उस समय तक वे वैचारिक स्तर पर परिपक्व हो चुके थे. उनकी प्रतिबद्धताएं भी सामने आने लगी थीं. कांग्रेस बुर्जुआ पार्टी थी. पेरियार के लिए वहां सबकुछ आसान न था. हालांकि एक नेता के रूप में कांग्रेस के भीतर उनकी प्रतिष्ठा, मानसम्मान और पैठ में निरंतर बढोत्तरी हो रही थी. पेरियार सामाजिक भेदभाव और जातिआधारित ऊंचनीच से आहत थे. राजनीति के माध्यम से वे उन जड़ताओं पर प्रहार करना चाहते थे. मगर कांग्रेसजनों का असहयोगी रवैया देख उन्हें लगता था कि जिस कार्य के लिए वे राजनीति से जुड़े हैं, उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं. कांग्रेस के नेता किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए तैयार ही नहीं हैं.

यह स्वाभाविक था. अपने गठन के समय से ही कांग्रेस अभिजनों की पार्टी थी. उसकी स्थापना कुछ अभिजात्यों द्वारा अपने वर्गीय हितों की सुरक्षा हेतु की गई थी. कांग्रेस के संस्थापक ह्यूम का विचार था कि इससे समाज के पढ़ेलिखे वर्गों में अंग्रेज सरकार के प्रति आक्रोश कम होगा. इससे 1857 जैसी क्रांति की संभावनाएं क्षीण होंगी. ह्यूम को तत्कालीन अंग्रेज शासकों का समर्थन प्राप्त था. लगभग पचास वर्षों तक कांग्रेसी नेता, अंगे्रज सरकार को बड़ी चुनौती दिए बिना, अपना उद्देश्य साधने में लगे रहे. गांधी ने उसका कायाकल्प करने की कोशिश की. उनके कार्यकाल में कांग्रेस और जनता के बीच की दूरी में कुछ कमी आई. फिर भी उसके अधिसंख्यक नेता अभिजन मानसिकता से बाहर न आ सके. परिणामस्वरूप दलितों और पिछड़ों को लेकर कांग्रेस का रवैया ज्यों का त्यों बना रहा. पेरियार चाहते थे कि सरकार पढ़ीलिखी अभिजात्य संतानों के लिए ब्रिटिश इंडिया की नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे. कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करते समय उन्हें विश्वास था कि जैसेजैसे कांग्रेस में वंचित और पिछड़े वर्ग के नेताओं की संख्या बढ़ेगी, उसके बड़े नेता देशहित में भेदभाव से ऊपर उठकर काम करने लगेंगे. अपने भाषणों में गांधीजी समेत कांग्रेस के सभी बड़े नेता यह आश्वासन भी देते थे. हकीकत इससे जुदा थी. कुछ ही अवधि में पेरियार को कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी का अंतर समझ आने लगा. उन्हें यह देखकर हैरानी होती कि सार्वजनिक मंचों पर समानता और समरसता की बात करने वाले कांग्रेस के बड़े नेता भी भीतर से घोर जातिवादी हैं. समाज में व्याप्त ऊंचनीच को कम करने की उनकी न तो कोई योजना है, न ही संकल्प. कांगे्रसी नेता भी पेरियार के विचारों और उनकी प्रतिबद्धता को लेकर सशंकित रहते थे. पेरियार के वकृत्व कौशल और जनता में उनकी पैठ के कारण वे भीतर ही भीतर उनसे डरते थे. तो भी उन्हें लगता था कि पद और प्र्रतिष्ठा का प्रलोभन उन्हें कांग्रेस से, जो उन दिनों देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी थी, जोड़े रखेगा.

1924 तक पेरियार राजनीति में पैर जमा चुके थे. इस अवधि में उन्होंने खुद को बौद्धिक स्तर पर परिपक्व किया था. समकालीन राजनीति को उन्होंने समाज और संस्कृति के संदर्भ में समझने की कोशिश की. वे चाहते थे कि कांग्रेस सामाजिक सुधार के लिए ऐसे रचनात्मक कार्योें को अपनाए जिनसे समाज के दमितउत्पीड़ित जन को जातीय शोषण से मुक्ति मिले. वे मानसम्मान से भरपूर जीवन जी सकें. उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो. परंतु उन्हें लग रहा था कि जिन सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति वे राजनीति के माध्यम से चाहते हैं, और स्वतंत्र भारत को लेकर जनसाधारण की जो उम्मीदें हैं, प्रचलित राजनीति के माध्यम से उनकी पूर्ति असंभव है. ब्राह्मणवाद जिसने समाज को शताब्दियों से जकड़ा हुआ है, और जिससे समाज के बड़े समूह की स्वतंत्रता आहत है, वही कांग्रेस की नीतियों का नियामक, वास्तविक कर्ताधर्ता है. बावजूद इसके पेरियार कांग्रेस के कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लेते रहे. उनकी इच्छा थी कि कांग्रेस समाजार्थिक आधार पर पिछड़े और धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों की शिक्षा एवं रोजगार की मांग को सरकार के सामने रखे. उन्होंने इस आशय का एक मसौदा तैयार किया था, जिसे वे कांग्रेस के 1920 में थिरुमलई में होने वाले प्रांतीय अधिवेशन में प्रस्तुत करना चाहते थे. उस सम्मेलन की अध्यक्षता एस. श्रीनिवास अयंगर कर रहे थे. उन्होंने पेरियार के प्रस्ताव पर यह कहते हुए विचार करने से इंकार कर दिया था कि उससे समाज में जातीय दुराग्रह तीव्र होंगे और सामाजिक विद्वेष बढ़ेगा. पेरियार के लिए यह निराशाजनक था. फिर भी उन्होंने उम्मीद बनाए रखी. उन्हें लगता था कि आज नहीं तो कल, कांग्रेस के नेता वृहद लोकहित में उनके प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार हो जाएंगे.

1922 में कांग्रेस के त्रिरुपुर अधिवेशन में उन्होेंने अपने प्रस्ताव को दुबारा पेश करने की कोशिश की. उस बार भी कांग्रेस के बड़े नेताओं के वर्गीय स्वार्थ आड़े आ गए. प्रस्ताव की उपेक्षा होते देख पेरियार उग्र हो गए. मुद्दे को लेकर उनकी वरिष्ठ नेताओं से जमकर बहस हुई. उच्च जातिवर्ण से आए नेता पुराणों और धर्मशास्त्रों की दुहाई देने लगे. हिंदू धर्म का कुटिल चेहरा एक बार फिर पेरियार के सामने था. क्षुब्ध होकर उन्होंने शोषणउत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार रहे लोगों के लिए, न्याय का समर्थन करने वाले नेताओं को एक मंच पर आने का आवाह्न किया. वर्णव्यवस्था के समर्थक ग्रंथों रामायण, मनुस्मृति आदि की होली जलाने का निश्चय कर लिया. अगले वर्ष 1923 में एक बार फिर उन्होंने प्रस्ताव पर विचार करने का अनुरोध किया. उससे उच्च जाति के नेता बिफर गए. एक बार फिर जोरदार बहस हुई. मगर चली उच्च जाति के नेताओं की ही. प्रस्ताव एक बार फिर ठुकरा दिया गया. यही दौर था जब गांधी से उनके मतभेद सामने आ चुके थे. पेरियार का कहना था कि कांग्रेस के शिखर पुरुष गांधी स्वयं वर्णभेद की मानसिकता से ग्रस्त हैं. राजनीतिक मजबूरियों के तहत उनके नेतृत्व में कांग्रेस कुछ रचनात्मक कार्यों को अपनाने के विवश हुई थी, लेकिन पहले से चली आ रही व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के लिए वह कदापि तैयार नहीं हैं. गांधी का सुधारवाद तात्कालिक उदारता के अलावा कुछ नहीं है.

पेरियार का सोच निराधार न था. तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मण मात्र 3.2 प्रतिशत थे. इतनी कम संख्या के बावजूद प्रांत के तीनचैथाई संसाधनों पर उन्हीं का अधिकार था. धर्मशास्त्रों में कृषिकर्म को वैश्य के लिए निर्दिष्ट किया गया था. ब्राह्मणों के लिए खेती निषिद्ध कर्म है. बावजूद इसके प्रांत के बड़े जमींदारों में अधिसंख्यक ब्राह्मण थे. लोग इसे लेकर सवाल न करें, इसके लिए बड़े जमींदारों ने शहरों में ठिकाना बनाया हुआ था. सरकारी पदों पर अधिसंख्यक ब्राह्मण काबिज थे. 1912 में 55 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर तथा 72.6 प्रतिशत जिला मुंसिफ ब्राह्मण ही थे. अनंतपुर में एक ऐसा ब्राह्मण परिवार था, जिसने सत्ता से अपनी निकटता का लाभ उठाते हुए समस्त सरकारी पदों को हथिया लिया था. यह देख स्थानीय लोगों में भारी असंतोष व्याप्त था. ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी रवैये के विरोध की बात नई न थी. इस बेईमानी के विरोध में 1896 में एक दर्जन से अधिक लोगों ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था. दूसरा उदाहरण नैल्लोर के एक ब्राह्मण परिवार का था. उसके पचास सदस्यों ने सरकारी नौकरियों पर कब्जा किया हुआ था. उसके विरोध में भी एक दर्जन से अधिक स्थानीय नागरिकों ने यूरोपीय अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत पेश की थी. यह तब था, जब स्थानीय कलेक्टर सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व देने की मांग उठा चुका था. इसे लेकर वहां जनमानस में गुस्सा था. दक्षिण में ब्राह्मणों के अलावा बाकी जातियों को भी प्रशासनिक नौकरियों में हिस्सेदारी की मांग वर्षों पुरानी थी. 1840 में यानी प्रथम स्वाधीनता संग्राम से भी बहुत पहले वहां ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने की मांग उठ चुकी थी. उस वर्ष तमिलनाडु के 32 पंचलारों ने मांग की थी कि सरकारी नौकरियों में समाज के बाकी वर्गांे को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए. ब्राह्मण एक ओर दावा करते थे कि सरकार उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्तियां देती है. दूसरी ओर शिक्षा और दूसरे मामलों में दलितों और पिछड़ों के साथ कदमकदम पर पक्षपात किया जाता था. उनके लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी. मिशनरियों के आने से दलितों को शिक्षा का अवसर मिला था. ब्राह्मण और अन्य सवर्ण उनका भी विरोध करते थे. पेरियार का विचार था कि सामाजिक समानता हेतु दलितों और पिछड़ों में आर्थिक आत्मनिर्भरता अत्यावश्यक है. उसके लिए जरूरी है कि सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी हो. इसलिए पेरियार की मांग थी कि कांगे्रस सरकार पर दबाव बनाए, ताकि बहुजन समाज के लोग सरकारी पदों तक पहुंच सकें. ब्राह्मण वर्चस्व को तोड़ने के लिए वे चाहते थे कि दलितों और पिछड़ों को उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाए. इसके लिए उन्होंने एक मसौदा तैयार किया था; जिसे वे औपनिवेशिक सरकार तक पहुंचाना चाहते थे. यह क्रांतिकारी विचार था. उसकी भनक लगते ही कांग्रेसी नेताओं में खलबली मच गई. पेरियार चाहते थे कि गांधी सहित प्रांत के बड़े कांग्रेसी नेता उनका साथ दें. लेकिन न तो गांधी ने उनकी मांग की ओर ध्यान दिया, न ही कांग्रेस का दूसरा कोई नेता उनके समर्थन में आया. उससे पेरियार का कांग्रेस के प्रति रहासहा मोह भी जाता रहा. यह मानते हुए कि कांग्रेस के साथ रहते हुए उद्देश्यपूर्ति असंभव है, उन्होंने तत्क्षण कांग्रेस से अलग होने का फैसला कर लिया.

पिछड़ों और दलितों की राजनीतिक सहभागिता को रोकने की चालें केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं थी. उत्तर भारत के नेता भी इसके शिकार थे. ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन पटना में तीन प्रमुख खेतिहर जातियों कुर्मी, कुशवाहा और यादव के नेताओं द्वारा 1934 में किया गया था. उन्हें भी उसी समस्या से जूझना पड़ा था जिनसे दक्षिण भारत पेरियार गुजर चुके थे. उसके संस्थापक नेता यदुनंदन प्रसाद मेहता ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में कांग्रेस के बारे में अपने अनुभवों को साझा किया है—‘पहले ऐलान किया गया कि योग्य व्यक्तियों को लिया जाएगा. जब इन बेचारों ने योग्य व्यक्तियों को ढूंढना शुरू किया तो कहा गया कि खद्दरधारी होना चाहिए. जब खद्दरधारी सामने लाए गए तो कहा गया कि जेल यात्रा कर चुका हो. जब ऐसे भी आने लगे तो कहा गया कि वहां क्या सागभंटा बोना है. किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी हैं? तो किसी को व्यंग्य मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमकतेल तौलना है.’ कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक तिलक के भी ठीक ऐसे ही विचार थे. यह तब है जब कांग्रेस पूरे देश और समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी. देश का प्रमुख दल होने के बावजूद कांग्रेस पर वर्गचरित्र हावी था. थोड़े ही समय में पेरियार ने समझ लिया कि कांग्रेस मुख्यतः सवर्ण हितों का सरंक्षण करती है. कोई उम्मीद न देख उन्होंने नवंबर 1925 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. इसी के साथ उन्होंने स्वयं को सक्रिय राजनीति से भी अलग कर लिया. पेरियार की ओर से वह सोचासमझा निर्णय था. उनका मानना था कि वर्तमान राजनीति का चरित्र सामाजिक न्याय भावना से कोसों परे है. यदि कांग्रेस नहीं तो क्या? इसपर पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का शुभारंभ किया. कुछ ही वर्षों में उस आंदोलन का असर पूरे प्रांत में दिखने लगा था. लोग तेजी से उसके साथ जुड़ रहे थे. पेरियार के लिए वह समय अपनी वैचारिकी के साथ आगे बढ़ने का था.

पेरियार की वैचारिकी के आधार पर हम उन्हें आंबेडकर और फुले का समिश्रण कह सकते हैं. फुले की भांति पेरियार ने भी धार्मिक जड़ताओं पर तीखे प्रहार किए. स्त्रीपुरुष समानता और शिक्षा पर जोर दिया. आंबेडकर से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने पिछड़ों और दलितों का अपने मानसम्मान एवं अधिकारों के लिए एकजुट होने का आवाह्न किया. यह मानते हुए कि भारतीय समाज में जाति विकास और सामाजिक समरसता की सबसे बड़ा अवरोधक है, उन्होंने न केवल जाति पर, बल्कि उसे आश्रय देने वाले धर्म पर भी तीखे प्रहार किए. यह उनका दुस्साहसी कदम था. धर्म का विरोध आंबेडकर ने भी किया था, लेकिन उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म के जातिवादी ढांचे पर था. ब्राह्मणवाद पर था, जिससे वह अनुशासित होता था. आलोचना से पहले उन्होंने हिंदू धर्म के साथसाथ दूसरे धर्मों का भी विशद् अध्ययन किया था. लंबे चिंतनमनन के उपरांत उन्होंने तुलनात्मक रूप से उदार, बौद्ध धर्म की राह ली थी. हालांकि उन जैसे मेधा के धनी और प्रकांड विद्वान के लिए धर्म किसी भी रूप में अनावश्यक था. दरअसल जिस समाज का वे नेतृत्व कर रहे थे, वह शताब्दियों से धर्म के प्रभावक्षेत्र में जीते हुए उसके साथ अनुकूलन कर चुका था. धर्मविहीन जीवन की कल्पना भी उसके लिए असंभव थी. इसलिए कदाचित एक तात्कालिक व्यवस्था के रूप में धर्मांतरण को अपनाया था. पेरियार जीवन में धर्म की जकड़बंदी को कहीं वृहद् संदर्भ में देख रहे थे. वे मानते थे कि धर्म व्यक्ति को न केवल बौद्धिक रूप से विपन्न करने के साथसाथ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को वैधता प्रदान करता है. वह बेमेलकारी सभ्यता को ईश्वरीय वरदान की तरह अपनाने के लिए प्रेरित करता है. वाल्तेयर ने धर्म को रस्सी और ईश्वर को खूंटे की संज्ञा दी थी. यह उक्ति भारत के संदर्भ में एकदम वह दार्शनिक था. पेरियार के लिए, खासकर भारत जैसे देश में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति के भरोसे टिका हो—ऐसा करना आसान नहीं था. बड़ेबड़े नेता, जिनका ईश्वरीय सत्ता में खास विश्वास नहीं रहा, लोकदिखावे के लिए, इस डर से कि भारतीय जनता नास्तिक को स्वीकार नहीं करेगी, आस्तिक होने का दिखावा करते आए हैं. बावजूद इसके पेरियार ने खुद को खुलेआम नास्तिक कहा और नीत्शे की भांति ईश्वर की अवधारणा पर तीखे सवाल उठाए. अपने राजनीतिक भविष्य को ताक पर रख, अपने भाषणों तथा कार्यक्रमों के जरिये आजीवन नास्तिकता का प्रचार करते रहे.

ओमप्रकाश कश्यप

अस्मिताओं का मूर्तिकरण

नदी तभी तक पवित्र रहती है, जब तक वह प्रवाह में रहती है. प्रवाह जितना तेज, नदी उतनी महान. यही स्थिति ज्ञान की है. ज्ञान तभी तक ज्ञान रहता है, जब तक वह विमर्श का हिस्सा है. ज्ञान का ठहराव रूढ़ि को, नदी का दलदल को जन्म देता है.

 

खबर है कि लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क में अभिजन नायकों की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी. महापुरुषों के संघर्ष और विचारों को मूर्तियों तक सीमित कर देना, विवेकशील समाज का लक्षण नहीं है. यह ठीक ऐसा है जैसे ‘दि कैपीटल’ की पूंजीवादी गवेषणा को समझने के बजाय मार्क्स के स्टेच्यू पर फूलमालाएं चढ़ाकर खुद को साम्यवादी घोषित कर देना. ज्ञान का कर्मकांडीकरण सामाजिक गतिशीलता में विक्षोभ उत्पन्न करता है. परिणामस्वरूप नागरिक समूहों का आचरण भीड़ के व्यवहार में ढल जाता है. भारत इसका अकेला उदाहरण नहीं है. पूरी दुनिया में यही होता आया है. प्रगतिकामी विचारों की प्रखरता को कम करने का सबसे आसान तरीका उसे मूर्तिर्यों में कैद कर, पवित्र घोषित कर देना है. इसीलिए चालबाज सत्ताएं, क्रांति-धर्मा नायकों को देवता घोषित करती आई हैं. वे जनसाधारण को लगातार यह विश्वास दिलाती रहती हैं कि पृथ्वी पर कुछ लोग जन्मजात शासक होते हैं. जो वैसे नहीं हैं, उन्हें दूसरों के भरोसे, उनकी अनुकंपा पर जीना पड़ता है. शासित से अपेक्षा की जाती है कि वह महापुरुषों के नाम पर बनी मूर्तियों तथा मठों का सम्मान करे. धर्म, संस्कृति और राजनीति के चौतरफा दबाव में जनसाधारण भी यह मान लेता है कि समस्याओं के समाधान हेतु कुछ लोगों का देवताकरण अपरिहार्य है. विचारों और संघर्षों का मूर्तिकरण सामाजिक असमानता और दमनात्मक स्थितियों को स्थायी बनाता है. लोग हालात से अनुकूलित हो, सवाल करना भूलने लगते हैं. इससे उत्पीड़क वर्ग के लिए शोषण की राह आसान हो जाती है.

भारत में मूर्ति-पूजा की परंपरा शताब्दियों से है. इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि समाज का बड़ा वर्ग मूर्ति को ही आराध्य माने रहता है. अपनी आस्था और विश्वास को दूसरों से विशिष्ट समझने की जिद बड़े-बड़े संघर्षों को जन्म देती आई है. मूर्ति को सबकुछ मानने वाला व्यक्ति अपने सहज विवेक से भी वंचित जाता है. वह अपने हित-अहित का निर्णय स्वयं नहीं ले पाता. वह दूसरों की इच्छा का दास होता है. मूर्तिपूजा उसे न केवल ज्ञान की प्राचीन, बल्कि अधुनातन परंपरा से भी काट देती है. इसलिए परिवर्तन की वांछा रखने वाले समूहों और बुद्धिजीवियों द्वारा उनका विरोध लाजिमी हो जाता है. ये स्थितियां सामाजिक अंतर्द्वंद्व को बढ़ावा देती हैं. विकासशील समाजों में ऐसे अंतर्द्वंद्वों को साफ-साफ देखा जा सकता है. अंतर्द्वंद्व हमेशा नकारात्मक नहीं होते. कई बार वे समाज को सकारात्मक परिवर्तनों की ओर भी ले जाते हैं. भारत में आधुनिक शिक्षा के फलस्वरूप दमित वर्गों में नई चेतना जगी है. वे शोषण के विभिन्न रूपों, उसके कारण तथा संगठन की ताकत को समझने लगे हैं. इससे शताब्दियों से दूसरों के श्रम-कौशल पर जीता आया वर्ग अपने भविष्य को लेकर आंदोलित है. मूर्ति-स्थापना की घोषणा परिवर्तन की चाल को अवमंदित करने और येन-केन-प्रकारेण यथास्थिति बनाए रखने का षड्यंत्र है.

उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को दलितों के काफी संख्या में; तथा अतिपिछड़ों के लगभग एकमुश्त वोट मिले थे. उसकी बंपर कही जा रही जीत दलितों-पिछड़ों की आपसी फूट का परिणाम थी. 2019 में जीत को आसान बनाने के लिए भाजपा की कोशिश मत-समीकरणों को पूर्वतः बनाए रखने की है. राजभर समुदाय को फुसलाए रखने के लिए राजा सुहेलदेव की मूर्ति लगवाने की भूमिका पिछले महीने उस समय बन चुकी थी, जब 14 मई 2017 को विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने सुहेलदेव को पासी राजा कह दिया था. राजभर समुदाय ने इसे अपनी अस्मिता पर हमला माना. तीन दिन बाद ही वह सड़क पर आ गया. जैसे सब कुछ पूर्वनियोजित हो. उसके कुछ दिन बाद मुख्यमंत्री ने आंबेडकर पार्क का निरीक्षण कर, वहां सुहेलदेव की प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान कर कर दिया. उत्तर प्रदेश सरकार में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर को भी लगा कि पार्टी हाईकमान को खुश करने का यह अच्छा अवसर है. सो बिना कोई पल गंवाए उन्होंने पार्क में राजा सुहेलदेव के अलावा महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे संघ के चहेते महापुरुषों की प्रतिमाएं लगवाने की घोषणा कर दी. वैसे भी पूर्वी उत्तरप्रदेश में 18 प्रतिशत की मत-संख्या वाले इस समुदाय को नाराज करना, राजनीतिक दृष्टि से आत्मघाती कदम होता. गौरतलब है कि अपनी चूक के लिए मुख्यमंत्री ने खेद व्यक्त नहीं किया. उससे पासी समाज नाराज हो सकता था. आजादी के बाद राजभर जाति का वोट विभिन्न राजनीतिक दलों में बंटता आया है. विगत उत्तर प्रदेश चुनावों में उन्होंने भाजपा के समर्थन में एकमुश्त मतदान किया था. यदि मूर्ति लगाने मात्र से प्रदेश के बड़े वोट बैंक को साधा जा सकता है तो राजनीतिक दृष्टि से यह बुरा सौदा नहीं था. आर्थिक दृष्टि से राजभर समुदाय समाज के सर्वाधिक विपन्न वर्गों में से है. उचित होता कि केंद्र और प्रदेश दोनों की सरकारें राजभरों की मूलभत समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक कदम उठातीं. लोकतांत्रिक विश्वास को इसी तरह कायम रखा जाता है. लेकिन जिस विचारधारा का भाजपा प्रतिनिधित्व करती है, उसमें लोकतांत्रिक शक्तिकरण से कहीं अधिक महत्त्व मनुष्य को बौद्धिक विपन्न बनाने वाले कर्मकांडों का है. इस बार भी उसने बिना किसी हिचक, वही किया.

सवाल है, राजा सुहेलदेव(995—1060 ईस्वी) ही क्यों? ग्यारहवीं शताब्दी के इस राजा के बारे भारतीय लेखकों ने बहुत कम लिखा है. उनकी उपेक्षा स्वतः प्रमाण है कि राजा सुहेलदेव शूद्र कुलोत्पन्न था. कदाचित इसीलिए वह 900 वर्षों तक भारतीय लेखकों की स्मृति से गायब रहा. जबकि पार्शियन लेखक अब्दुर्र रहमान चिश्ती 17वीं शताब्दी में ही, ‘मिरात-ए-मसूदी’ में राजा सुहेलदेव और सालार मसूद के बीच हुए युद्ध का वर्णन कर चुका था. सालार मसूद गजनी के सुलतान का भतीजा था. उसने 16 वर्ष की उम्र में भारत में हमलावर के रूप में प्रवेश किया था. यहां उसने इस्लाम की स्थापना के लिए कई युद्ध लड़े, जिससे उसे गाजी की उपाधि प्राप्त हुई. सालार मसूद को सोमनाथ मंदिर की प्रसिद्ध मूर्तियों को तोड़ने का दोषी भी माना जाता है. दिल्ली, मेरठ आदि ठिकानों को जीतता हुआ, वह बहराइच की ओर प्रस्थान कर गया. हमलावर को अपनी ओर बढ़ते देख श्रावस्ती के राजा सुहेलदेव ने दूरदर्शिता का परिचय दिया. उन्होंने पड़ोसी राजाओं के साथ संघ तैयार किया. एक महीने तक राजा सुहेलदेव के नेतृत्व में लड़ाई चली. जिसमें दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ. अंततः सालार मसूद युद्ध में घायल हुआ. वहीं उसकी मृत्यु हो गई. उसका मजार बहराइच में है, जहां उसको ‘गाजी मसूद’ के नाम से जाना जाता है. मुगल बादशाह जहांगीर के समकालीन चिश्ती के अनुसार, ‘सालार मसूद की ऐतिहासिकता, उसका भारत आना और यहां शहीद होना प्रामाणिक है. इस कहानी को अनेक तरह से कहा गया है, परंतु इतिहास की किसी भी प्रामाणिक पुस्तक में इसका उल्लेख नहीं है.’(हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाय इट्स ओन हिस्टोरियन : मोहम्मदियन पीरियड). बताया गया है कि पुस्तक की रचना से पहले लेखक ने सालार मसूद के बारे में काफी शोध किया था. आखिर उसे मुल्ला मुहम्मद गजनवी द्वारा लिखित पुस्तक मिली. मुल्ला मुहम्मद सुल्तान मुहम्मद सुबुक्तगीन का सेवादार था. उसने कुछ समय तक सालार साहू तथा सालार मसूद के बेटे के यहां भी नौकरी की थी.

एक तरह से यह भारत पर मुस्लिमों के आरंभिक आक्रमणों का किस्सा है. बावजूद इसके उस वर्ग में जिसका विद्वता के नाते शिखर पर बने रहने का दावा था, और जिसके उत्तराधिकारी आज हिंदुत्व के पैरोकार बने हैं—यह हिम्मत नहीं थी कि गाजी सालार मसूद को युद्ध में धूल चटाने वाले राजा सुहेलदेव के इतिहास को सहेज सके. भारतीय लेखकों को सुहेलदेव की याद बीसवीं शताब्दी में उस समय आई, जब स्वाधीनता करीब दिखने लगी थी. विभिन्न दलों में आजाद भारत की सत्ता पर काबिज होने की होड़ मची थी. उन्हीं दिनों कहानी को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई. सुहेलदेव को ‘गौ-रक्षक’ बताया गया. कहानी को सांप्रदायिक रंग देने के लिए कुछ प्रसंग गढ़े गए. उनमें से एक के अनुसार, यह सोचते हुए कि हिंदू सैनिक गायों पर हमला नहीं करेंगे, सालार मसूद ने अपनी छावनी के आगे गाएं बांध दीं. सुहेलदेव को पता चला तो परेशान हुए. दूरदर्शिता दिखाते हुए उन्होंने युद्ध आरंभ होने से पहले ही सालार मसूद के छावनी-स्थल पर धावा बोलकर गायों के रस्से काट डाले. उसके बाद जो युद्ध हुआ, उसमें सुहेलदेव ने सालार मसूद को करारी शिकस्त दी. इस कहानी का सिवाय लोक-साहित्य के कोई संदर्भ नहीं है. लेकिन कहानी का यही हिस्सा सुहेलदेव को आज के संदर्भों में प्रासंगिक बनाता है. आज हिंदुत्ववादी लोग सालार मसूद को सोमनाथ के सूर्यमंदिर की मूर्ति को ध्वस्त करने का दोषी मानते हैं. जबकि मुस्लिम संप्रदायवादी उसे गाजी और शहीद का दर्जा देते हैं. इन सबसे अलग एक वर्ग उन लोगों का है, जो आस्था और विश्वास से परे कुछ सोच ही नहीं पाते. ऐसे लोग सालार मसूद को पीर का दर्जा देकर उसकी मजार पर सदके करते हैं.

हम मिश्रित अस्मिताओं वाले समाज में रहते हैं. यदि किसी को महाराणा प्रताप में अपना आदर्श नजर आता है और वह चाहता है कि उनकी मूर्ति स्थापित हो तो ऐसी इच्छा करने और उसकी मांग करने का उसे पूरा अधिकार है. देश में महाराणा प्रताप की मूर्तियों की कमी नहीं है. कुछ दशकों से गांवों में प्रवेशद्वार बनवाने का चलन बढ़ा है. ठाकुर बहुल गांवों के प्रवेश-द्वार पर चेतक पर सवार महाराणा प्रताप की मूर्तियां प्रायः दिख जाती हैं. उनसे गांव के शक्ति-संतुलन का अनुमान लगाया जा सकता है. राजस्थान में महाराणा प्रताप का शौर्य गढ़ने के नाम पर इतिहास को नए सिरे से लिखे जाने की कवायद शुरू हो चुकी है. किसी-किसी गांव में दलित बस्ती में, उभरती अस्मिताओं की प्रतीक, आंबेडकर की प्रतिमा भी दिख जाती है. जिसके रूपाकार को देख वहां पसरी विपन्नता का अनुमान लगाया जा सकता है.

राजा सुहेलदेव की मूर्ति लगाने के लिए आंबेडकर पार्क ही क्यों? प्रशंसकों की निगाह में राणा प्रताप तथा राजा सुहेलदेव का संघर्ष उतना ही महान हो सकता है, जितना दलितों के लिए महात्मा फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर का. परंतु दोनों के संघर्ष में मूल-भूत अंतर है. यह अंतर परंपरा और आधुनिकता का भी है. फुले दंपति, डॉ. आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार, कांशीराम आदि का जीवन-संघर्ष सामाजिक न्याय को समर्पित, लोकतंत्र की भावना से ओतप्रोत था. उसके फलस्वरूप आधुनिक समाज गढ़ने में मदद मिली. जबकि महाराणा प्रताप, राजा सुहेलदेव, यहां तक कि शिवाजी भी राजशाही और सामंतवाद के पोषक-पालक हैं. उनकी महानता इतिहास के संदर्भ में आंकी जानी चाहिए. तदनुसार उनकी जीवनगाथाएं बच्चों को इतिहास की तरह पढ़ाई जा सकती हैं. मनुष्य उनसे प्रेरणा ले सकता है. न्याय और लोकतंत्र की समृद्धि हेतु आवश्यक है कि आगामी पीढ़ियां लोकतांत्रिक संघर्षों के विविध रूपों से परिचित हो. इसके लिए ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर के पार्श्व में महाराणा प्रताप की मूर्ति स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं है.

अपने फैसले के समर्थन में मुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश तर्क दे सकते हैं कि आंबेडकर पार्क में बहुजन नायकों के अगल-बगल राजा सुहेलदेव, महाराणा प्रताप आदि की मूर्तियां लगाने से समाज में बराबरी और एकता का संदेश जाएगा. फलस्वरूप देश में विभिन्न स्तरों पर जो अलगाव दिखाई पड़ता है, उसमें कमी आएगी. मुख्यमंत्री की घोषणा में नई मूर्तियों की धातु तथा उनके आकार का उल्लेख नहीं था. जबकि ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि सुहेलदेव की प्रतिमा मायावती की प्रतिमा से कम से कम पांच फुट ऊंची होगी. आप इस गणित में उलझे रहिए. सोचते रहिए कि मायावती(दलित) से राजा सुहेलदेव(शूद्र) की प्रतिमा पांच फुट बड़ी होगी तो क्षत्रिय महाराणा प्रताप की प्रतिमा को राजा सुहेलदेव की प्रतिमा से कितना ऊंचा रखा जाएगा? मंत्री महोदय इसका समाधान भले न खोज पाएं हों, सुहेलदेव के बहाने अपनी राजनीतिक गोटियां फेंटने सवर्ण इसे भली-भांति समझते हैं. यह कोई आज का किस्सा भी नहीं है. धर्मांतरण के दबावों से उबरने के लिए अतिपिछड़ी जातियों के संस्कृतिकरण की कोशिश आर्यसमाज के षुरुआती दिनों में ही आरंभ हो चुकी थी. भाजपा उस जकड़बंदी को मजबूत करना चाहती है.

वस्तुतः अभिजन वर्ग के नेतृत्व में बनी सरकारें परिवर्तन की मांग को उस समय तक उपेक्षित रखती हैं, जब तक संबंधित समूहों में परिवर्तन के प्रति अनिवार्य चेतना न हो. परिवर्तन की दिशा-दशा तय करने में विचारधाराओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रहती है. इसलिए शिखर पर मौजूद लोग परिवर्तन तथा परिवर्तन को हवा देने वाले विचार, दोनों से घबराते हैं. परिवर्तन की आंधी को रोकने, उसकी दिशा बदलने के लिए ऐसे मिथक गढ़े जाते हैं जो लोगों के परंपराबोध को जड़ और पश्चगामी बनाते हों. मूर्तिकरण जैसी प्रवृत्तियां उसमें सहायक बनती हैं. अकस्मात चर्चा में आए सुहेलदेव प्रसंग को इसी संदर्भ में देखना चाहिए. यह उन सपनों और संकल्पों से परे है जो आजादी के साक्षी बने थे. उनमें एक संकल्प यह भी था कि देश लोकतांत्रिक आदर्शों के साथ आगे बढ़ेगा. लेकिन आजादी के बाद से ही गांधी राजघाट में और संविधान की भावना संसद के शोरगुल में दबती आई है.

वैसे भी भाजपा शासित राज्यों में इन दिनों ऊंची से ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की होड़ मची है. गुजरात सरकार सरदार पटेल की 182 मीटर फुट ऊंची प्रतिमा लगाने जा रही है, वहीं महाराष्ट्र सरकार द्वारा 190 मीटर ऊंची शिवाजी की प्रतिमा लगाने का ऐलान किया गया है. इसके पीछे इतिहास को सहेजने से अधिक कोशिश राष्ट्रवाद को थोपने की है. एक तरह से सांस्कृतिक हमला. जिससे समाज में विक्षोभ उत्पन्न होने की संभावना है. मूर्तिकरण के खतरे और भी हैं. आंबेडकर पार्कों में मूर्तियों के सामान्य आकार से बड़ी मूर्तियां लगवाने की कोशिश शुरू हुई तो बहुजन समाज उसे अपनी संस्कृति पर हमले की तरह लेगा. वह उसे अपने महानायकों का अपमान समझेगा. उससे जातीय संघर्ष में वृद्धि होगी. बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है. सुश्री मायावती के शासनकाल में बने आंबेडकर पार्कों में उन बहुजन नायकों की मूर्तियां लगी हैं, जिन्होंने देश में व्याप्त धार्मिक-सामाजिक पाखंड के विरोध में लंबा संघर्ष किया था. जिन्होंने दलितों में आत्मचेतना जाग्रत की. भाग्य को ही सबकुछ मानते आए बहुजनों को अपने ऊपर विश्वास करने और अपने भरोसे जीना सिखाया. वर्तमान सरकार की कोशिश उन्हें फिर से मनुवाद के हवाले कर देने की है. वैसे इसके लिए न केवल सरकार दोषी है, न वे लोग जो देष और समाज को खास दिषा में ले जाना चाहते हैं. दोष जनता का भी है, जो रूढ़ियों और परंपराओं से चिपके रहने में ही जीवन की परमसिद्धि माने रहती है. जो नए ज्ञान का उस समय तक विरोध करती है, जब तक कि वह उसपर थोप न दिया जाए. ऐसी जनता को फुसलाना आसान होता है. मूल्यों और विचारों को मूर्तिकरण में सीमित कर देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

ओमप्रकाश कश्यप