उपन्यास की प्रासंगिकता और सरोकार

सर विद्याधर सूरज नायपाल की प्रतिष्ठा विदेशों में चाहे जिसके लिए हो परंतु भारत में उनकी चर्चा प्रायः उनके विवादित बयानों के कारण ही होती है. शायद इसलिए कि अपने साहित्य के माध्यम से वे आम पाठक के मन में वैसा स्थान नहीं बना पाए हैं जो किसी नोबल पुरस्कार प्राप्तकर्ता साहित्यकार के लिए अपेक्षित रहता है अथवा जिसकी वह उम्मीद बांधे रखता है. न ही उनकी किसी ऐसी कृति के बारे में सुनने को मिला है जिसने पुस्तक बाजार में बिक्री के कीर्तिमान कायम कर साहित्य के गंभीर पाठकों का ध्यान अपनी और आकर्षित किया हो. यह भी हो सकता कि उनके नाम पर होने वाले विवादों में उनका अपना योगदान जरा भी न हो और जिसकी की पर्याप्त संभावना है; मीडिया ही उनकी बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता रहा हो. किंतु मीडिया को मसाला तो वही उपल्ब्ध कराते होंगे. या उनकी रहस्यमय चुप्पी मीडिया के दुस्साहस को बढावा देने का काम करती होगी. स्वयं उनके लेखन में भी विद्वानों ने साम्राज्यवाद के पक्षधर तत्वों की खोज की थी. और अपना मीडिया भले ही अपनी जनपक्षधरता का चाहे जितना वास्ता दे, वह असल में है तो पूंजीवाद की जारज संतान ही.

एक बार उन्होंने विनोबा भावे को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी और उन्हें गांधी जी का भौंडा नकलची तक कह दिया था. हमारे इस आलेख का विषय भी उनकी एक फतवेबाजी ही है. उन्होंने एक बार कहा था कि उपन्यास अपना समय पूरा कर चुका है. केवल गैरऔपन्यासिक लेखन ही आज के यथार्थ को पकड़ सकता है. जो लेखक केवल कथासाहित्य लिखने में ही अपना समय बिताते हैं; वे एक दिन अपनी सामग्री को झुठलाते हुए नजर आएंगे. सर विदिया के बयान पर आगे चर्चा करने से पहले हम बता दें कि उपन्यास के अंत की घोषणा करने वाली साहित्य-जगत में यह पहली या अकेली फतवेबाजी नहीं है. विदेश को लें तो वहां उपन्यास की मौत का ऐलान सबसे पहले टी. एस. इलियट ने सन 1940 में किया था. लेकिन हुआ क्या? योरोप में ही एक के बाद एक इतने कालजयी उपन्यास सामने आए कि कुछ अर्से बाद ही इलियट साहब की घोषणा की निस्सारता सामने आने लगी थी. हिंदी में शायद सुधीश पचैरी कुछ साल पहले कविता के अंत की भविष्यवाणी के रूप में ऐसी ही बचकानी घोषणा की थी. उनकी फतवेबाजी भी कभी की टांय-टांय फिस्स हो चुकी है. इधर राजेन्द्र यादव आजकल कहने लगे हैं कि बड़े उपन्यासों का जमाना अब नहीं रहा. इस भागमभाग भरे समय में लोगों के पास इतना समय कहां कि वे भारी-भरकम उपन्यासों के लिए समय निकाल सकें. इन्हीं राजेन्द्र यादव ने कभी कहा था कि उपन्यास जनता का महाकाव्य होता है. जिन चरित्रों को महाकाव्यों में जगह नहीं मिल पाती उन्हें उपन्यास बड़े सम्मान के साथ संजोए रखता है. उनकी इस बात में पूरा दम भी था. हावर्ड फा॓स्ट का ‘आदि विद्रोही’, पर्ल बक का सुप्रसिद्ध चीनी उपन्यास ‘दि गुड अर्थ’, प्रेमचंद का ‘गोदान’, गौर्की का ‘मां’, रेणु का ‘मैला आंचल’, पन्नालाल पटेल का ‘जीवनः एक नाटक’, संजीव का बिहार के महान लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के जीवन पर लिखा गया उपन्यास जैसे उपन्यासों की लंबी शृंखला है; जिन्हें राजेन्द्र यादव जी के उपर्युक्त कथन के समर्थन में रखा जा सकता है. इन सबके बावजूद बड़े उपन्यासों को लेकर राजेन्द्र जी हताशा की वजह क्या हो सकती है यह तो वही जानें. हालांकि हिंदी में ही उपन्यासों के भविष्य को लेकर सवाल करने वाले वे अकेले नहीं हैं. इसी बात को लघुकथा लेखक कुछ अलग ढंग से उठाकर लघुकथा के पक्ष में तर्क गढ़ते रहे हैं.

सच यही है कि उपन्यास न कभी मरा था, ना उस तरह का कोई खतरा उसके सामने रहा है. गोपाल राय ने अपने जनसत्ता में छपे एक लेख में गार्जियन द्वारा कराए गए एक सर्वे का उल्लेख किया है जिसके अनुसार ‘विगत पचास वर्षों में उपन्यास की स्थिति और भी मजबूत हुई है. एक अन्य सूचना के अनुसार इंग्लैंड के 48 पाठक समूहों के बीच कई हफ्तों तक चली बहस का निष्कर्ष यह था कि विगत सौ वर्षों में प्रकाशित कालजयी उपन्यासों की सूची में निकट अतीत में प्रकाशित उपन्यास अधिक हैं. यही नहीं उपन्यास की लोकप्रियता जानने के बीते साठ सालों के नोबल पुरस्कारों की सूची को भी देखा जा सकता है.’ इसके बावजूद कभी बाजार का डर दिखाकर तो कभी समय की कमी के बहाने उपन्यास और बड़ी साहित्यिक रचनाओं पर संकट की घोषणा करना निठल्लों का षगल बन चुका है.

बहरहाल जिस साल राजेन्द्र यादव ने यह वक्तव्य दिया उसी वर्ष अमरकांत का ‘इन्हीं हथियारों से’, उससे थोड़ा पहले गिरिराज किषोर का ‘पहला गिरमिटिया’, चंद्रकिशोर जायसवाल के ‘चिरंजीव’ और पलटनिया, इनके थोड़े अर्से के बाद दूधनाथ सिंह का ‘आखिरी कलाम’ जैसे खासे सेहतमंद और चर्चित उपन्यास केवल हिंदी में आ चुके थे. मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ और कमलेष्वर का ‘कितने पाकिस्तान’ भी दुबले-पतले उपन्यास नहीं माने जा सकते. इस नाकुछ कलमकार का उपन्यास ढाई कदम भी चार सौ से अधिक पृष्ठों का था. गैर हिदी क्षेत्र के उपन्यासों में लें तो तकषी नारायण पिल्लै का ‘रस्सी’, गोपीनाथ मोहंती का ‘माटी-मटाल’, शिवाजी सावंत के दो उपन्यास ‘मृत्युंजय’ और ‘छावा’ पर्याप्त स्थूलकाय और सुचर्चित कृतियां हैं. जिनके नए-नए संस्करण आज भी निकलते रहते हैं. बिल्कुल नई रचना को ले तो भगवान दास मोरवाल का ‘बावल तेरे देश में’ और ‘रेत’छपे और दोनों ही खूब चर्चित भी रहे. यदि बाजार के लिहाज से देखें तो प्रकाशक खुले मन से स्वीकारते हैं कि उपन्यास की बिक्री, साहित्य की किसी भी अन्य विधा से अधिक होती है. खरीदते समय पाठक प्रायः उपन्यासकार और उपन्यास की विषयवस्तु को देखता है, उसके आकार को नहीं. और यदि किसी उपन्यास को खरीदने से खुद को रोके रखता है तो उसका कारण उपन्यास के मूल्य का उसकी पहंुच से बाहर होना होता है. सच तो यह है कि अच्छे उपन्यासों की मांग बाजार में हमेषा बनी रहती है. अब यदि दृष्टि-दुर्बलता के कारण राजेन्द्र यादव भारी-भरकम उपन्यास नहीं पढ़ पाते हैं अथवा रुचि की कमी, समय के अभाव या अन्य किसी कारण से सर विदिया उपन्यास-पाठन से परहेज रखते हैं, या उनका आनंद नहीं ले पाते तो यह उनकी या व्यक्ति विषेश की समस्या हो सकती है. इसे लेकर फतवेबाजी पर उतर आना अपनी स्थिति और मीडिया की ताकत का अनुचित इस्तेमाल करना है, जिससे बचा जाना चाहिए.

यह बताने की आवष्यकता तो नहीं ही है कि उपन्यास किसी भी समाज के अंतर्बाह्यः जगत का प्रामाणिक लेखा होता है. यह सच को उस रूप में प्रस्तुत करता है जिसमें प्रायः हम देख नहीं पाते अथवा समाज का शिखरस्थ वर्ग निहित स्वार्थ के कारण जिसे छिपाए रखना चाहता है. बीते समय में उपन्यास की लोकप्रियता का कारण ही यह रहा है कि पाठक इसमें न केवल अपने अनुभवों की झलक पा सकता है बल्कि अपने पात्रों के साथ उठ-बैठ और बतिया सकने तक का स्पेस उसके पास होता है. जिसके माध्यम से वह अपने परिचित-अपरिचित समाजों की विषेशताओं को पहचान सकता है. अतः उपन्यास के पक्ष में दिया गया यह बयान बिल्कुल सच लगता है कि वह काल्पनिक पात्रों के सहारे लिखा जाने वाला वास्तविक इतिहास होता है. उसमें वे पात्र भी स्थान पा लेते हैं जिन्हें इतिहास प्रायः दृष्टि-ओझल कर देता है अथवा जो इतिहास के तंग खांचे में फिट नहीं बैठ पाते अथवा जिन्हें संस्थान-विरोधी बताकर हाशिये से बाहर रखने की कोशिषें की जाती हैं. समाज के वास्तविक नायकांे को इतिहास-बहिष्कृत करने का खेल चंूकि सत्ता की केंद्रिकता से जुड़ा है; जिसका चरित्र प्रायः अपरिवर्तनषील होता है. अतः इतिहास के दायरे से वास्तविक नायकों को पीछे ढकेलने की प्रक्रिया, प्रकारांतर में थोडे़-बहुत बदलावों के बावजूद हरेक समाज में अनवरत रूप से चलती रहती है. जिसको स्वर देने के कारण उपन्यास और साहित्य की शेष विधाएं सदैव अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती हैं. हालांकि इसी दौर में उन्हें अपने परिमार्जन और परिवर्तन की प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ता है. जिसके द्वारा वे अभिव्यक्ति के युगानुकूल माध्यमों से स्वयं को समृद्ध करने का काम करती हैं.

इस तरह देखा जाए तो जीवन-जगत की वास्तविकता को परचाने के लिए उपन्यास से सशक्त दूसरा कोई माध्यम नहीं है. सच यह भी है कि उपन्यास का जन्म औद्योगिकरण के बाद की घटना है. मषीनों के आगमन के बाद छपाई कला में सुधार किया गया जिससे उन पुस्तकों को पढ़ना और लिखना संभव हुआ; जिन्हें परंपरागत श्रुति प्रथा के अंतर्गत पढ़ना और कंठस्थ करना संभव नहीं था. परिणामतः बड़ी औपन्यासिक कृतियां रची गईं….एक और बात जिसने उपन्यास लेखन को बढ़ावा दिया, वह है शिक्षा का तीव्र विस्तार. पश्चिम में सोलहवीं शताब्दी औद्योगिकरण की तीव्र गति के कारण शिक्षा की दर में तेजी से इजाफा हुआ. वैज्ञानिक षोधों के द्वारा सभ्यता और संस्कृति में तो बदलाव आए ही, समाज के बौद्धिक स्तर में भी अपेक्षानुरूप सुधार हुआ. जिससे तार्किकता बढ़ी. लोगों को प्रतीकात्मक ढंग से बात कहने का सलीका भी आया. इन सभी ने मिलकर उपन्यास को जन्म दिया. और जिस उम्मीद के साथ उपन्यास को साहित्य की केंद्रीय विधा के रूप में सामने लाया गया उसे उपन्यास ने, साहित्य की अन्य किसी भी विधा के समान, पूरी गंभीरता के साथ पूरा किया. दासप्रथा के विरुद्ध लिखे गए कनाडियन उपन्यास ‘टाम काका की कुटिया’ ने अपने समय में न केवल बाइबल के बाद दूसरे नंबर पर बिक्री का गौरव हासिल किया था, बल्कि दासप्रथा के विरोध में माहौल बनाने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. हावर्ड फा॓स्ट के कालजयी उपन्यास ‘आदि विद्रोही’ के महत्त्व को नकार पाना भी मुष्किल है. यह विलासी और आतंककारी सत्ता के विरुद्ध उत्पीड़ितजन के सार्थक विरोध का सवार्धिक प्रामाणिक दस्तावेज है. जो यह दर्शाता है कि सत्ता का स्वरूप चाहे जितना दमनकारी और ताकतवर क्यो न हो, संगठित विरोध के माध्यम से उसे निस्तेज किया जा सकता है. एकदम हाल की बात लें तो नाटकीयता के अतिरेक तथा कथानक में भटकाव के बावजूद ‘कितने पाकिस्तान’ ने सांप्रदायिकता से जूझने के साथ-साथ हिंदी-जगत में व्याप्त पाठकीय जड़ता को तोड़ने में जो कमाल हासिल किया था, उसे यूं ही नजरंदाज नहीं किया जा सकता. बताते हैं कि बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के सुदूर अंचलों में इस उपन्यास की छायाप्रतियां खूब बेची गईं. प्रकाशन के करीब दो साल में ही इसके पांच-छह संस्करण आ चुके थे. यह घटना इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर बिल्कुल हाल ही में घटित हुई है. उसके बाद यानी पिछले चार-पांच सालों में बाजारवाद के नाम पर ऐसा कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ा है कि उपन्यास के अस्तित्व का रोना रोया जाए. फिर वर्तमान में सामाजिक परिवर्तनों का जो रूप हम देख रहे हैं; उपन्यास का जन्म भी लगभग वैसे ही परिवेश में हुआ है. हालांकि बाजार तब इतना संगठित और वाचाल नहीं था.

अब जरा यह भी देख लिया जाए कि वे कौन लोग हैं जो उपन्यास के अंत की कल्पना कर रहे हैं और उनकी मंषा क्या है? सच यह भी है कि जबसे उपन्यास का जन्म हुआ तब से, इन तीन-चार शताब्दियों में दुनिया बहुत आगे आ चुकी है. संचार माध्यमों तीव्र विकास ने लोगों की जीवनषैली को आमूल बदलने में सफलता प्राप्त की है. जीवन-गति में तेजी आई है. ऐसे में ज्ञानविज्ञान के जो माध्यम सामाजिक संरचना एवं मानव-मन के अंतःप्रदेशों की कारगर यात्रा के लिए जाने जाते हैं, मनुष्य और समाज के संबंधों और उनके अंतद्वंद्वों को स्वर देते रहे हैं, उनका महत्त्व अपेक्षाकृत घटा है. इसके बावजूद ऐसा कोई कारण मुझे नजर नहीं आता जो उपन्यास के अंत का सूचक जान पड़े. अतः सर विदिया का यह बयान सीधे-सीधे बाजार से अनुप्रेरित और उसी के हक में दिया गया विशुद्ध व्यावसासिक वक्तव्य लगता है. कुछ इस प्रकार का वक्तव्य जैसा कि हमारे फिल्मी अभिनेता अपनी नई फिल्म को चर्चा में लाने के लिए उसके बाजार में आने से पहले अकसर देते रहते हैं.

शिक्षा, संस्कृति और कला के उपादानों का प्रयोग अपनी छवि निर्माण के लिए करना कोई आज की बात नहीं है. शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य विवेकीकरण को गति प्रदान करना है; जो ज्ञान की सामान्य स्थिति से ऊपर उठने की कला है. ताकि व्यक्ति अपने आस-पास की घटनाओं पर प्रबुद्धता पूर्ण निर्णय ले सके. यह स्थिति उन लोगों/संस्थाओं के भी प्रतिकूल जाती है जिनके हितों को विवेकीकरण की प्रकिया से चोट पहुंचती है. अतः शीर्षस्थ शक्तियां किसी न किसी माध्यम से विवेकीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने का कार्य करती रहती हैं. इस कार्य को वे इतनी चतुराई और सच कहें तो धूर्तता के साथ करती हैं, कि इससे उनकी लोकलुभावन छवि को कोई ठेस नहीं पहुंच पाती. स्वार्थी व्यवस्था के पक्ष में तर्क जुटाने के वे प्रायः समर्थक बुद्धिजीवियों को अपने साथ रखती हैं. प्रचारतंत्र या तो उनके प्रभामंडल में आ जाता है अन्यथा वे उसपर किसी न किसी प्रकार कब्जा जमा लेती हैं. कभी-कभी गुलाम मीडिया के माध्यम से केंद्रीय मनीषी के रूप में गैरप्रतिभाशाली बुद्धिजीवी भी थोप भी दिए जाते हैं. चूंकि ऐसे लोगों का कोई वैचारिक आधार नहीं होता, अतः ये सत्ताधीश वर्ग के लिए सबसे कभी चुनौती नहीं बन पाते. सत्ता से जुड़ने तथा सत्ताधीशों के करीब रहने का लालच और उनसे लाभ कमाने की छिछली प्रवृति भी, स्वार्थी कलमकारों को उससे जोड़े रखती है. अपनी आश्रयदाता शक्तियों के हितसाधन के लिए ये बुद्धिजीवी समय-समय पर फतवेबाजी करके जनता को भरमाते रहते हैं. उनका कुल उद्देष्य यथास्थिति को छेड़े बिना परिवर्तन की स्वयंस्फूर्त धाराओं को अपने पक्ष में मोडे़ रखना होता है. ताकि उनके शोषक, समाज के शीर्षस्थ वर्ग के हितों को किसी भी प्रकार की चोट न पहुंचे.

मीडिया द्वारा साहित्य की उपेक्षा तथा उपन्यास के अंत की हाल की घोषणा को बाजार के बढ़ते वर्चस्व से जोड़कर भी देखा जा सकता है. यह बाजार के हक में होता है कि वह उपभोक्ताओं की भीड़ पैदा करे ताकि माल की खपत के अधिकाधिक अवसर पैदा हों. मुनाफा बढ़े. चूंकि विवेकीकरण की प्रक्रिया उपभोग को संतुलित करने का काम करती है. यह उपभोग को जरूरी चीजों बनाम तात्कालिक रूप से गैरजरूरी चीजों में बांटकर रखती है. चूंकि समस्त उपभोक्ता क्रांति की सफलता गैरजरूरी चीजों को रहन-सहन और प्रतिष्ठा से जोड़कर उन्हें अनिवार्य बना देने में निहित है, अतः बाजारवादी शक्तियां सबसे पहले विवेकीकरण पर ही हमला करती हैं. ताकि मनुष्य बिना किसी व्यवधान के उपभोक्ता वस्तुओं को अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता रहे. हमें याद रहना चाहिए कि करीब दो दशक पहले बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए शिक्षा में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने की मांग बहुत जोर-शोर से की जा रही थी. बेकारी से निपटने के लिए यह आवश्यक भी था कि हमारे शिक्षालय केवल किताबी ज्ञान देने वाले संस्थान ही बनकर न रह जाएं. शिक्षा कम से कम इस लायक तो होनी ही चाहिए कि उससे व्यक्ति की जीविका का साधन हो सके. लेकिन शिक्षा का एक अन्य उद्देष्य जो उसके अन्य किसी भी लक्ष्य से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है, व्यक्तित्व का परिष्करण करना भी है. उसका यह उद्देष्य भी है कि वह विवेकीकरण की गति को बढ़ावा दे. बावजूद इसके बेरोजगारी का हव्वा दिखाकर व्यवसायमूलक शिक्षा के नाम पर देश के शिक्षासदनों को सीधे-सीधे बाजार के हवाले कर दिया गया. परिणाम आज हम सभी के सामने है. उच्चशिक्षा या कि जिसे व्यवसायमूलक शिक्षा का नाम दिया जा रहा है, आज इतनी महंगी हो चुकी है कि किसान या मजदूर की संतान उसके बारे सोच भी नहीं सकती. स्पर्धात्मक शिक्षा के नाम पर हमारे अघिकांश विद्यालय दोयम दर्जे की प्रतिभा के उत्पादक बनकर रह गए हैं. मैकाले ने जो काम ब्रिटिश हुकूमत को जमाने के लिए किया था वही काम आज हमारे व्यावसायिक शिक्षासदन बाजार की बेहतरी के लिए कर रहे हैं. बाजार द्वारा पोषित एवं संचालित हमारा तमाम मीडिया उच्चवर्ग की अमीरी तथा मध्यवर्ग के चेहरे पर आई चमक को देश की खुशहाली बताकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है. बाजारवादी शक्तियों के समर्थन पर टिकी सरकारें चूंकि बेरोजगारी की समस्या से अपना पल्ला झाड़ना चाहती हैं और उनमें बैठे लोग बाजार का फायदा उठाने के चक्कर में रहते हैं, अतः वह निजी शिक्षण संस्थाओं को बढ़-चढ़कर लाइसेंस दे रही है. शिक्षा जिसको कभी मानवीकरण का माध्यम और शिक्षण को पवित्र उद्देष्य माना जाता था, आज वह पूरी तरह खरीदफरोख्त की चीज बन चुकी हैं. स्वाभाविक है कि मोटी रकम के बदले डिग्री खरीदकर निकले हमारे युवा अपनी शिक्षा का जल्दी से जल्दी और अधिकतम मूल्य प्राप्त करने की कोशिश में रहते हैं. यह स्थिति बाजार के पक्ष में तो है लेकिन यह उस समाज के पक्ष में हरगिज नहीं कही जा सकती जहां पहले से भारी आर्थिक असमानताएं हैं. जहां एक तिहाई लोग आज भी भीषण गरीबी के साये में जी रहे हैं.

सवाल उठ सकता है कि इससे साहित्य या उपन्यास का क्या सरोकार है. अथवा उपन्यास या साहित्य के संकट को क्यों बाजार से जोड़कर देखना चाहिए. किसी भी साहित्यिक रचना अथवा पुस्तक की उपयोगिता उसकी विषयवस्तु या उसमें सन्निहित ज्ञान की मौलिकता से ही तय नहीं की जा सकती; बल्कि इस बात से भी देखी जाती है कि वह रचना पाठक के मस्तिष्क को कितना ऊर्जस्वित और उद्वेलित कर पाती है. दूसरे शब्दों में एक अच्छी पुस्तक अपने पाठक के मानस में भी विकसित होती रहती है. साथ-साथ वह पाठक को इस योग्य भी बनाती है कि वह स्थितियों का धैर्य पूर्वक, नीर-क्षीर विश्लेषण करते हुए बेहतर निर्णय ले सके. पुस्तकें पीढ़ियों के अनुभव का निचोड़ होती हैं. उनकी योग्यता किसी समस्या पर फैसला देने से नहीं आंकी जाती. बल्कि इस बात से आकलित की जानी चाहिए कि वे भिन्न-भिन्न परिस्थितियों रह रहे पाठकों की निर्णय लेने की क्षमता को किस हद तक बढा पाती हैं. किंतु यह तभी संभव है जब पाठक का मानस पुस्तक के मूलतत्व को ग्रहण करने में सामर्थवान हो. उपन्यास स्थितियों को बृहद परिप्रेक्ष्य में देखने की योग्यता प्रदान करता है. हालांकि साहित्य की दूसरी विधाएं भी पाठक के मानस को उद्वेलित करने का काम करती हैं. लेकिन उपन्यास में स्थितियों का बारीक चित्रण एवं अनुभवों की विशद्ता होती है जो निष्चय ही पाठक को एक विराट संसार से जोड़ने का कार्य करती है. जिससे परिस्थितियों की विवेचना के लिए उसके पास अपेक्षाकृत अधिक विकल्प होते हैं. इस तरह किसी भी साहित्यिक कृति का असली महत्त्व उस उद्वेलन से आंका जाना चाहिए जो पाठक के मानस में उमड़ता है तथा प्रकारांतर में जिसकी परिणति सार्थक सामाजिक परिवर्तन के रूप में होती है.

अब जरा इस बात पर भी विचार करके देखा जाए कि उपन्यास या साहित्य की भरपाई, क्या सामाजिक समस्याओं पर विद्वानों द्वारा लिखी गई आकादमिक पुस्तकों द्वारा संभव है. निष्चय ही आकादमिक ज्ञान के अपने लाभ होते हैं. साहित्यिक कृति जिस बात को घुमा-फिराकर, अपरोक्ष तथा प्रतीकात्मक ढंग से पाठकों को समझाने का प्रयास करती है, उसको सीधे-सीधे, अधिक प्रामाणिक ढंग से, कम समय तथा बहुत ही कम शब्दों में लेख अथवा पुस्तक के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जा सकता है. विज्ञान, प्रौद्योगिकी, आदि अनेक विषयों का ज्ञान हम प्रायः इसी तरह की आकादमिक पुस्तकों से प्राप्त करते हुए आ रहे हैं. इसी प्रकार समाज विज्ञान की पुस्तकों का कार्य व्यक्ति को अपने समाज की विषेशताओं से परिचित कराते हुए उसे अपनी संस्कृति तथा परंपरा के करीब बनाए रखना है. इसके बावजूद इस तरह की पुस्तकें उपन्यास या साहित्य जैसी अन्य संष्लेषणात्मक विधाओं का विकल्प नहीं बन सकतीं. जिस तरह व्यक्तित्व निर्माण की बाजार में मिलने वाली पुस्तकों से इस विषय से संबंधित सूचनाएं तो एकसाथ प्राप्त की जा सकती है. मगर उसके लिए जरूरी समझ और भीतरी आग्रह उन पुस्तकों द्वारा संभव नहीं है. चूंकि नएपन की हर खोज के साथ धैर्य अनिवार्य अपेक्षा की तरह जुड़ा होता है. साहित्य, संगीत तथा अन्य मानवीय कलाएं मस्तिष्क को धैर्य और वैचारिकी से समृद्ध करने का काम भी करती हैं. वे मानवीय संवेदनाओं और ज्ञान के बीच उचित तालमेल बनाए रखती है. जिससे सामाजिक परिवर्तनों को सकारात्मक दिशा तथा भरपूर गत्यात्मकता मिलती रहती हैं. आकादमिक पुस्तकें हमारी वौद्धिकता को तो परिपक्व बनाती में लेकिन वास्तविक विवेकीकरण की स्थिति तक नहीं ले जा पातीं. संक्षेप में साहित्य अथवा मानवीय कलाओं की भरपाई अकादमिक स्तर की पुस्तकों से नहीं की जा सकती. चूंकि एक श्रेष्ठ औपन्यासिक प्रस्तुति में गांभीर्य, विवेचनात्मकता, सूक्ष्मता के साथ-साथ संवेदनाशीलता भी सन्निहित होती है; जिससे उसकी भरपाई साहित्य की अन्य किसी भी विधा, आकादमिक ज्ञान की दूसरी किसी भी धारा द्वारा संभव नहीं है.

यहां एक और सवाल खड़ा हो जाता है कि साहित्य की इतनी अपरिहार्यता और उपयोगिता के बावजूद क्या कारण है कि लोग साहित्यिक पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं? शिक्षा के प्रतिशत में आए सुधार के बाद भी पठनीयता का संकट क्यों बरकरार है? हम फिर साफ कर दें कि घटती पठनीयता अथवा पाठकीय संकट का रचना के आकार से कोई संबंध नहीं है. रचना भले ही कितनी बड़ी हो यदि उसमें पठनीयता का स्तर बराबर बना रहे तो वह अपना पाठक वर्ग भी स्वयं खोज लेती है. अतः साहित्य का भला सोचने वालों की कोशिश घटती पठनीयता का स्तर सुधारने की होनी चाहिए. प्रत्येक बड़ा लेखक अपना पाठक वर्ग साथ लिए चलता है. साहित्यिक रचना अपने पाठक के अंतर्जगत में जितना स्पेस बना पाती है वह उतनी ही सफल मानी जाती है. साहित्य का पाठक प्रायः अंतर्मुखी किस्म का जीव होता है. तमाम विद्रोहप्रियता के बावजूद अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा को आगे ले जाने की जिम्मेदारी भी इसी वर्ग की होती है. जब हम यह मान लेते हैं कि समाज की विवेकशीलता पर खतरा है तो अप्रत्यक्ष रूप में हम इसी वर्ग के बौद्धिक ह्रास की ओर इषारा कर रहे होते हैं. और जब हम कहते हैं कि साहित्य और संस्कृति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं तो परोक्ष में हमारा उददेश्य इसी वर्ग की घटी संख्या पर चिंता व्यक्त करने का होता है. शिक्षा के तीव्र व्यवसायीकरण ने इसी वर्ग को नुकसान पहुचाने का कार्य किया है. समाज की उस संवेदनषीलता को भौंथरा करने का काम किया है जो उपभोक्तावाद तथा मशीनीकरण की मार से समाज को बचा सकती है. समाज के बड़े हिस्से में अपसंस्कृतिकरण के प्रति न तो पर्याप्त चिंता है न इस बारे में सोचकर वह अपना दिमाग खराब करना चाहता है. शायद इसी कारण शहरी क्षेत्र में विशेषकर उन स्थानों पर जहां व्यावसायिक शिक्षण संस्थान पर्याप्त रूप से पनप चुके हैं वहां आकादमिक विषयों के लिए पर्याप्त विद्यार्थी नहीं मिल पाते. एक और समस्या साहित्यिक पुस्तकों का नेटवर्क न होने की है. गांवों और कस्बों की तो बात ही रहने दें बड़े-बड़े शहरों में भी साहित्यिक पुस्तकों की कोई दुकान नहीं है. जहां सामान्य पाठक अपनी पसंद की पुस्तक खरीद सकें. जिस गति से छोटे शहरों और कस्बों से साहित्यिक पत्रिकाएं शुरू होती रहती हैं उस गति से साहित्यिक पुस्तकों की बिक्री के प्रबंध नहीं किए जाते. हर कोई सरकार और बाजार पर अपनी भड़ास निकालकर शांत हो जाता है. यह करीब-करीब मान लिया गया है कि साहित्य किसी को रोटी नहीं दे सकता. सहित्य-सृजन को तो पार्टटाइम जा॓ब माना ही जाता है. बड़े-बड़े साहित्यकार इसी कुंठा के शिकार हैं. इसी के कारण राजेन्द्र यादव जैसों को बड़े उपन्यासों पर संकट नजर आता है और सर विदिया जैसे नामचीन साहित्यकार उपन्यास के अंत की घोषणा करने लग जाते हैं.

विकास के चल रहे प्रयासों में मानवीय कलाओं और साहित्य की उपेक्षा का परिणाम आज हम देख ही रहे हैं कि व्यक्ति सुविधाओं का गुलाम बनता जा रहा है. यहां एक और बात साफ कर दी जाए कि साहित्य या अन्य कलाओं का सुविधाओं से वैर नहीं है. वे उनके चयन में विवेक की भूमिका तथा उनके न्यायिक बंटवारे पर जोर अवष्य देती हैं. अर्थात वे विकास को सामाजिकता के दायरे से बाहर जाने से रोकती हैं. यह मान लेना भी बेमानी होगा कि बढ़ती स्पर्धा और आपाधापी के वातावरण में लंबी रचनाओं के लिए पाठकों का सवर्था अकाल रहा है. अगर ऐसा होता तो औपन्यासिक कृतियां बिक्री के लिहाज से सबसे पीछे होतीं. जबकि हालात बिल्कुल विपरीत हैं. इस तर्क में तो दम हो सकता है कि व्यस्तता के चलते कुछ लोग बड़ी रचनाओं के लिए समय नहीं निकाल पाते. परंतु केवल पाठकों की संख्या द्वारा हम किसी विधा की उपयोगिता का आकलन नही कर सकते. विभिन्न विधाओं के पाठकों की संख्या अलग-अलग हो सकती है. अगर रचना का बड़ा आकार ही पाठकीय संकट का कारण होता तो आज की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा हाइकू, दोहा, सोरठा अथवा वैसी ही कोई छोटी विधा होती. जबकि स्थिति बहुत भिन्न है. अमेरिका जैसे अत्याधुनिक देश में भी जो हमसे कहीं ज्यादा आधुनिक और भौतिक परिवेश लिए हुए हैं, उपन्यास और साहित्य की लोकसत्ता में विश्वास किया है. गत सालों में वहां कई रोचक उपन्यासों का सृजन हुआ है. भारत में भी स्थिति संतोषजनक है तथा पूरा विश्वास है कि आगे भी बनी रहेगी. साहित्य हमेशा समाज का मार्गदर्शक रहा है. उपन्यास तो उसका वरद् पुत्र ठहरा. जिसके कंधों पर सर्वाधिक जिम्मेदारी है. इस जिम्मेदारी पर खरा उतरने के उसे वक्त के साथ-साथ जिन आवश्यक परिवर्तनों से गुजरना पड़ेगा उनसे निःसंकोच गुजरेगा. अतीत में भी वह समयानुसार साथ बदलता रहा है. ध्यान रहे कि इतिहास केवल राष्ट्रों-राज्यों का सगा होता है. वह केवल युद्धों, राजा-महाराजाओं, राष्ट्राध्यक्षों तथा उनकी छिनाल आदतों को जगह दे पाता है. मनुष्यता की स्मृतियों को लंबे समय तक संजोए रखने तथा पीढियों के बीच संवाद की स्थिति बनाए रखने का काम साहित्य और दूसरी मानवीय कलाओं का होता है. साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में उपन्यास ने हमेशा अपनी उपयोगिता सिद्ध की है. आज भी वह अपरिहार्य है; और बिलाशक आगे भी बना रहेगा. लेख का समापन हिंदी के समान रूप से लिखने वाले सुप्रसिद्ध दक्षिण भारतीय साहित्यकार वेणुगोपाल के वक्तव्य से वाक्य उधार लेकर करना चाहूंगा—

‘मनुष्य सोचता बिंबों अथवा चित्रों में है. इसीलिए दार्शनिकों को कथासाहित्य रचना पड़ा. वेद से काम नहीं चला तो पुराण रचे गए. और सिद्धांत-ग्रंथों से काम न चलने पर कहानी, उपन्यास.’

जाहिर है कि उपन्यास का आगमन सामाजिक विमर्श के एक जरूरी माध्यम के रूप में हुआ है. अतः जब तक मानवीय चेतना और मनुष्यता के लिए सोचने वाले लोग हैं तब तक उपन्यास के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है.

ओमप्रकाश कश्यप

रोशडेल पायनियर्स : सहकारिता आंदोलन के उन्नायक वे महान अठाइस बुनकर

इटली की एक कहावत है—जो धीरे चलते हैं, वे दूर तक जाते हैं. इस कहावत को सच कर दिखाया था, रोशडेल पायनियर्स ने. पूंजीवाद से उत्पीड़ित गरीब बुनकरों ने, जो संख्या में केवल अठाइस थे. उनका सपना था, मुक्ति का. उनका सपना था, अपनी राह अपने आप चुनने का. अपनी आधी से अधिक जिंदगी यूरोपीय पूंजीवाद को भेंट कर देने के बाद उनका सपना था, बाकी की जिंदगी में स्वाभिमान को बचाए रखने का. वे कोई बुद्धिजीवी नहीं थे, लेकिन अनुभव से तपे-तपाए थे. वे पूंजीपति भी नहीं थे, लेकिन ईमानदारी और समर्पण जैसी अमूल्य निधियां उनमें से हरेक के पास थीं. वे निर्धन थे, परंतु संकल्प के धनी थे. वे भविष्यदृष्टा नहीं थे, किंतु अपनी मेहनत और संकल्प के सुफल को देख लेने की दूरदृष्टि उनके पास थी. उन्हें संगठन चलाने का भी कोई अनुभव नहीं था, लेकिन दूसरों की सुनना और अपनी बात सलीके से रखना उन्हें अच्छी तरह से आता था.

पूंजीवाद ने उन्हें सताया, उनके पूर्वजों को घर से बेघर किया, लेकिन पूंजी से उन्हें कोई वैर नहीं था. उन्हें वैर था पूंजीवाद से, जो सुरसा के मुंह के समान लगातार फैलता ही जा रहा था, जो मनुष्य की अस्मिता, उसके संस्कार, सभ्यता, संस्कृति और यहां तक कि उसकी पहचान को भी लीलता जा रहा था. भेड़िये के समान जिसके खूनी पंजे इंसानियत को दबोचने को आतुर थे. वे समझ चुके थे कि उनमें से किसी भी एकल शक्ति उस दानव का मुकाबला करने लायक नहीं है. हां, वे मिलकर कोई न कोई हल जरूर खोज लेंगे. इसलिए उन्होंने सहकार को चुना. उसके द्वारा वे चाहते थे—
‘अपनी संगठित-शक्ति द्वारा उस भेड़िये को मनुष्यता की चारदीवारी से बाहर खदेड़ देना.’1
वे चाहते थे पूंजीवाद का हृदय-परिवर्तन. चाहते थे कि वह खुद को बदले, नख-दंत त्यागकर मनुष्य-मात्र की अस्मिता का सम्मान करे…सबके कल्याण की सोचे…धन को तिजोरियों में बंद करने के बजाय जन-जन के काम लाए, इंसानियत निभाए. वे पूंजीवाद का आदर्श विकल्प दुनिया के सामने रखना चाहते थे, जिसमें धन-वैभव, सुख और समृद्धि हो, किंतु पूंजीवाद की एक भी बुराई न हो. न हो दर्प, न ऊंच-नीच का बोध, न धन-संपदा का कोरा अभिमान. आत्मनिर्भर बनना बनना उनका लक्ष्य था, शायद वैसी मजबूरी भी रही हो, इसलिए अपनी समस्याओं से खुद ही जूझने का संकल्प साध बैठे थे. लगभग उन्हीं दिनों ने राबर्ट पील का कहा था, ‘अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाओ’2 वही उन्हें प्रेरित कर रहा था. उनमें से हर एक न केवल अपनी, बल्कि पूरे समूह की जिम्मेदारी उठाने को संकल्पबद्ध था या अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के दिए दूसरों की जिम्मेदारियों में सहभागी बनना चाहता था.
उद्यम की शुरुआत के पूंजी अनिवार्य थी. लेकिन वह आए कहां से? गरीब मजदूरों को कर्ज भी कौन देता? देता भी तो कौन उसका ब्याज चुकाता? उसपर असफलता की संभावना भी डराती थी. आखिर इसका हल भी उन्होंने सोच लिया. वह भी सहकार की भावना के शत-प्रतिशत अनुकूल. गोया उस समय उनकी यह धारणा रही हो कि सहकार की शुरुआत ही करनी है तो वह पहले ही कदम से हो. संकल्प पहली ही सांस के साथ साधा जाए. जैसा हल उन्होंने सोचा था, वह दर्शाता था कि वह दूसरों से जैसे नहीं…अलग हैं सबसे. नियमानुसार उनमें से प्रत्येक प्रति सप्ताह एक-एक पैंस बचाता. वह रकम सुरक्षित रख ली जाती थी. मानो वह कोई यज्ञ था, जिसके लिए हर कोई अपनी ओर से समिधा डालने की तैयारी कर रहा था. हां, वह यज्ञ ही तो था. आत्मसम्मान, समानता, आत्मनिर्भरता, आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिकता की सुरक्षा के लिए किया जाने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र यज्ञ.
हर एक की ओर से एक पाउंड, यानी कुल अठाइस पाउंड रकम जुटाने में दो महीने से भी ज्यादा गुजर गए. बीच में मुश्किलें भी आईं, निराशा और हताशा भी. कई बार लगा कि उनका सपना बीच ही मैं बिखर जाएगा. जो संकल्प वे साधना चाहते हैं, उनकी क्षमता से परे है. पर रास्ते निकलते रहे. उसी मामूली कही जा सकने वाली रकम से उन्होंने एक उपभोक्ता स्टोर की शुरुआत की थी. उस समय उन्होंने सोचा भी न होगा कि उनका मामूली-सा प्रयास, जिसकी कामयाबी में उनमें से अधिकांश को अंदेशा ही रहा होगा, एक दिन पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायक सिद्ध होगा और इतना विस्तार लेगा कि कोई भी दूसरा आर्थिक आंदोलन उसका मुकाबला कर पाने में असमर्थ सिद्ध हो.
हम जान लें कि रोशडेल पायनियर्स पहली सहकारी संस्था नहीं थी. रोशडेल पायनियर्स से पहले डा॓. विलियम किंग, राबर्ट ओवेन आदि कई लोग सहकारी समितियों का गठन कर चुके थे. लेकिन वे सभी प्रयास नाकाम रहे थे. रोशडेल पायनियर्स में से एक चार्ल्स हावर्थ स्वयं भी एक सहकारी समिति का गठन कर चुका था, जो असफल सिद्ध हुई थी. उन्हीं अनुभवों से सबक लेते हुए रोशडेल पायनियर्स ने, पिछली कमियों को दूर करते हुए एक सहकारी समिति का गठन किया था. इस बार कठिन अनुशासन और ईमानदारी के कारण उन्हें कामयाबी भी प्राप्त हुई. कामयाबी भी ऐसी कि वर्षों तक रोशडेल पायनियर्स दुनिया-भर में सहकारिता आंदोलन का पर्याय बना रहा. उस समिति की सफलताएं दूसरी समितियों के लिए प्रेरणाएं बनीं. उनके द्वारा बनाए गए नियमों पर आगे चलकर यह आंदोलन आगे बढ़ा और इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि पूरी दुनिया में वैकल्पिक अर्थनीति का प्रतीक बन गया.

रोशडेल
इंग्लेंड के सीमावर्ती प्रांत स्का॓टलेंड से एक पठार-शृंखला आरंभ होती है, जो पूरे देश को बीचों-बीच दो हिस्सों में बांट देती है. इस सुदीर्घ पठार-शृंखला का नाम है— पेनी(Pennines). इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण इंग्लेंडवासी इसे कभी-कभी ‘इंग्लेंड की रीढ़’ भी कहते हैं. इसी पठार-शृंखला से रोश(Rosh) नामक नदी निकलती है. रोश नदी के किनारे बसे होने के कारण ही उस कस्बे का नाम रोशडेल पड़ा था. वर्षों तक वह कस्बा ईसाइयों के प्राचीन धर्मस्थान के रूप में विख्यात रहा. प्राचीन रोशडेल महज एक गांव था, जहां पर किसान खेती किया करते थे. बाद में कोयले की खानों की खोज हुई तो बाहर से मजदूर वहां आने लगे, जिससे उसकी आबादी भी बढ़ने लगी.
रोशडेल के कायाकल्प की वास्तविक शुरुआत अठारहवीं शताब्दी से हुई, जब मशीनीकरण का लाभ उठाते हुए पूंजीपतियों ने वहां बड़ी-बड़ी कपड़ा मिलें लगानी प्रारंभ कर दीं. रोश नदी के किनारे-किनारे कपड़ा बुनने के कई कारखाने लगाए गए, जिससे वह कस्बा कुछ ही समय में कपड़ा उद्योग के केंद्रीय स्थान के रूप में विख्यात हो गया. बावजूद इसके उनीसवीं शताब्दी के पांचवे दशक तक रोशडेल इंग्लैंड का एक मामूली कस्बा बना रहा. 1840 की जनगणना के अनुसार रोशडेल की आबादी थी मात्र 24423; और वहां का प्रमुख उद्योग था—वस्त्र निर्माण!
मशीनीकरण से पहले रोशडेल में बेहतरीन बुनकर थे. एक से बढ़कर एक, हुनरमंद और बेमिसाल. कारीगर हाथ से महीन मलमल बुनते थे, जिसकी दूर-दूर तक मांग थी. जिंदगी ठीक-ठाक चल रही थी. मशीनें आईं तो सब चौपट होने लगा. वर्षों पुराने जमे-जमाए उद्योग उद्योग उजड़ने लगे. उनमें लगे कारीगर बेरोजगार होते चले गए. हाथ की दस्तकारी मशीनों की गुलाम बनने लगी. बेरोजगारी बढ़ी तो जीने की मुश्किलें भी पांव पसारने लगीं. यहां तक कि जीवन जीना कठिन हो गया. जब पेट भरने को ही कुछ न हो तो तन ढकने को कहां से आए! दूसरों के लिए कपड़ा बुनने वाले, उनका नंगापन ढकने वाले बुनकर स्वयं नंगे रहने लगे. मशीनें अपने मालिक की मनमानी भी साथ लाई थीं. जो अभी भी अपने धंधे को चलाने का संघर्ष कर रहे थे उनका हाल भी कम बुरा नहीं था. चारों ओर से मिलने वाली रिपोर्ट बताती थीं कि—
‘उनके (बुनकरों के) घर का सारा साज-सामान, फर्नीचर आदि बिक चुका था. पहनने को केवल चिथड़े नसीब होते थे. प्रतिदिन सोलह-सोलह घंटे लगातार मेहनत करने वाले कारीगरों का इतना बुरा हाल था कि उन्हें आलू, प्याज, शकरकंद, दलिया, शीरे जैसी चीजों के सहारे पेट भरना पड़ता था.3
मजदूर और कारीगर छोटे-छोटे गंदे और दड़बेनुमा घरों में रहते थे. उनकी बस्तियों में रहन-सहन बहुत शोचनीय था. सफाई व्यवस्था के अभाव में वे अनगिनत बीमारियों का ठिकाना बन चुकी थीं. गरीबी की मार, कारखाना मालिक उनसे दिन में सोलह से अठारह घंटे तक काम लेते थे—
‘कारखानों में न्यूनतम वेतन की कोई अवधारणा ही नहीं थी. इतने घंटे काम करने के बदले में उन्हें जो मजदूरी मिलती थी, उसे आज के हिसाब से देखा जाए तो प्रति सप्ताह मात्र दस पैंस.’4
दस पेंस में अठारह घंटे कार्य. कमरतोड़ परिश्रम. बिना किसी सुविधा, मान-सम्मान के. इतनी राशि उनके भोजन के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती थी. ऊपर से कारखानों में गंदगी इतनी अधिक थी कि मजदूरों को कोई न कोई रोग हर समय लगा रहता था. सफाई का न तो कोई इंतजाम था, न कारखाना मालिकों का उसकी ओर ध्यान ही जाता था. उनका जोर तो इस बात पर था कि कैसे ज्यादा से ज्यादा बचत करके मुनाफे को बढ़ाया जाए. उल्टे इस प्रकार के सवाल उठाने वालों को नौकरी से बेदखल कर दिया जाता था. इसके लिए मजदूरों का खुलेआम शोषण होता था.
अधिकांश फैक्ट्रियां बच्चों को काम में लगाए रखती थीं, जिन्हें बिना आराम के सोलह-सतरह घंटे लगातार काम करना पड़ता था. बीच-बीच में उन्हें मालिक की ओर से अक्सर चाय और सस्ते बिस्कुट मिलते. इसलिए नहीं कि भूख के कारण भोजन के रूप में वे उनकी जरूरत थे. महज इसलिए कि उन्हें खाकर उनकी कार्यक्षमता को किसी तरह बनाए रखा जाए. विशेष अवसरों पर जब काम की अधिकता होती तो मजदूरों को बिना आराम और अतिरिक्त मजदूरी के बीस-इकीस घंटे तक लगातार काम करना पड़ता था. और कभी-कभी तो रात-दिन काम में ही गुजार दिए जाते थे. कारखानों का वातावरण स्वास्थ्य के एकदम प्रतिकूल था, इस कारण मजदूरों को कोई न कोई रोग हमेशा घेरे रहता था. कई बार बिना उपचार के ही मजदूरों को जान से हाथ धोना पड़ता था—
‘ऊपर से प्रदूषण का बुरा हाल था. वह लगातार बढ़ता ही जा रहा था. सार्वजनिक सफाई व्यवस्था बेहद लचर थी. 1848 में रोशडेल की मजदूर बस्तियों में औसत आयु मात्र इकीस वर्ष थी, जो ब्रिटेन के उस समय के राष्ट्रीय औसत से छह वर्ष कम थी.5
यह कपड़ा मिलों में काम करने वाले उन मजदूरों का दुर्दशा थी, जिनके कारणा रोशडेल की मिलें पूरी दुनिया में अपनी उत्पादकता और अपने मालिकों के लाभ के लिए जानी जाती थीं. जिनके कारण पूरी दुनिया में इंग्लेंड की औद्योगिक प्रगति का डंका पिट रहा था. रोशडेल में स्त्रियों की अवस्था तो और भी दयनीय थी. पूरे मौसम उन्हें मात्र एक जोड़ी कपड़ों में रहना पड़ता था. कभी-कभी तो वे भी चिथड़े बनकर लटकने लगते. उनसे बदबू आती थी. खाली वक्त में स्त्रियां कपड़ों की जुएं बीनती या फिर चिथड़ों सींती रहतीं. विकट गरीबी के कारण अनेक औरतों को अधनंगे बदन ही रहना पड़ता था. हालत उस समय और भी दयनीय हो जाती थी, जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती थी. उस समय—
‘अपने एकमात्र वस्त्रों को गंदगी से बचाने के लिए औरतें, बच्चे को जन्म देते समय अपने दोनों हाथ ऊपर उठा, दो अन्य औरतों के कंधों का सहारा लेकर खड़ी हो जाती थीं. उसी अवस्था में वे बच्चे को जन्म देती थीं. वे बुनकर जो अपनी बेमिसाल कारीगरी के पूरी दुनिया में जाने जाते थे, जो अपना पूरा जीवन पूरे संसार के लिए कपड़ा और बिस्तर आदि बुनने में लगा देते थे, उनके अपने शरीर पर फटे चिथड़े और बिस्तर पर गंदे तौलिये पड़े होते थे.’6
वे एक-दूसरे से सटाकर बनाए गए, छोटे-छोटे झोपड़ीनुमा कमरों में रहते. ऐसे संकरे कि वहां हवा और धूप मुश्किल से जा पाती थीं. खुली नालियों में कीड़े गिजबिजाते रहते. मारे बदबू के वहां से गुजरना कठिन होता. ऐसी अवस्था में बचपन से ही रोग पाल लेना एकदम आम था. औरतों में जनन-संबंधी बीमारियां अक्सर रहतीं. प्रसूति के दौरान स्त्री का चल बसना साधारण बात थी. जन्म के समय बच्चे की जीवन संभाव्यता बहुत ही कम होती. अधिकांश जन्म लेते ही मर जाते. भरपाई के लिए स्त्रियां नए भ्रूण को गर्भ में ले आतीं. एक और मजदूर वर्ग की यह स्थिति थी, तो दूसरी ओर इंग्लैंड का सभ्रांत वर्ग अत्याधुनिक जीवनशैली का अभ्यस्त होता जा रहा था. उस वर्ग में विलासिता के प्रतीक, नए-नए शौक पनप रहे थे.
ऐसी अवस्था में यह संभव ही था कि लोगों में अपनी स्थिति के प्रति आक्रोश पैदा हो, वे उससे उबरने के बारे में विचार करें. ध्यातव्य है कि पूंजीवादी शोषण से उबरने की छटपटाहट और आक्रोश की निकृष्ट अवस्था उन्हें अपराध की दुनिया में भी ढकेल सकती थी. लेकिन टूटन और घोर अभावों से भरी जिंदगी में ऐसे अवसर कम ही आते थे, जब मन में पल रहा आक्रोश विद्रोही बनकर ललकारने लगता था. उनमें से अधिकांश ईमानदार, दिल के भले, स्वावालंबी, कानून और न्याय-व्यवस्था में विश्वास रखनेवाले लोग थे. यही बात उनके पक्ष में सर्वाधिक जाती थी. परिस्थितियां उनके विपरीत थीं. उनके पास हस्तशिल्प की समृद्ध परंपरा, संबंधों की गरमाहट, घनी सामाजिकता तथा सकारात्मक सोच था. वे अपनी स्वतंत्रता के प्रति सजग थे; दूसरों की आधिकारिता का सम्मान करना उनका स्वभाव बन चुका था. अपनी परंपराओं तथा सामाजिक तालमेल को बनाए रखने के लिए उनमें ईमानदार चाहत थी.
अपनी एकता तथा संगठन शक्ति के बल पर वे सहकारी समिति के गठन के बजाय कुछ और प्रयास भी कर सकते थे, जैसे कि राजनीतिक शक्तियों के साथ तालमेल करके अपनी स्थिति में बदलाव के लिए कारखाना मालिकों पर दबाव बनाना. या फिर संसदीय ला॓बी बनाकर सरकार और प्रशासन को बाध्य करना कि वे कंपनी कानूनों में आवश्यक बदलाव लाकर श्रमिक-कल्याण के कार्यक्रमों को लागू करें. उनके लिए यह भी आसान था कि धार्मिक नेताओं, संघों अथवा चर्च की शरण में जाकर अपने पक्ष में माहौल बनाएं, ताकि सरकार और फैक्ट्री मालिक मजदूरों के हितों की ओर ध्यान दें. सरकार श्रमिक अधिकारों के पक्ष में आवश्यक कानून बनाए. मालिक अपने मुनाफे का एक हिस्सा श्रमकल्याण कार्यक्रमों पर खर्च करें. वे चाहते तो श्रमिकों के असंतोष का लाभ उठाते हुए उन्हें लंबी हड़ताल के लिए भी तैयार कर सकते थे; और इस बात की भी पूरी-पूरी संभावना थी कि उन्हें अपने लक्ष्य में सफलता ही मिलती. लेकिन उन्होंने इनमें से किसी भी रास्ते पर चलना स्वीकार नहीं किया. बल्कि अपनी परंपरा और ठोस इरादों के आधार पर ठोस कार्य करने के लिए स्वयं को तैयार कर लिया.
इसका एक कारण यह भी है कि बदलाव के बाकी सभी उपायों को समय-समय पर आजमाया जा चुका था. शायद अठारहवीं शताब्दी की यह विशेषता भी थी वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नएपन और मौलिकता को आमंत्रित कर रही थी. ज्ञान के क्षेत्र में नए दर्शन का दर्शनों का उदय. विज्ञान के क्षेत्र में अधुनातन आविष्कार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नित-नए चमत्कार मानव सभ्यता को उस शताब्दी के ही उपहार थे. तर्काधारित सोच ने मनुष्य के पूरे जीवन-दर्शन को प्रभावित किया था. विलियम किंग, राबर्ट ओवेन, चार्ल्स फ्यूरियर उस विचारधारा को नई जमीन दे रहे थे. हालांकि उनके द्वारा प्रारंभ किए गए सहकारिता के सभी प्रयास असफल रहे थे. किंतु सहकार के सामार्थ्य और उसकी उपयोगिता पर उन सबका अखंड विश्वास बना हुआ था, बावजूद इसके कि उसको पूरी तरह आजमाया जाना बाकी था. समय उसकी रूपरेखा तैयार कर चुका था. उसके लिए जिस विवेक, धैर्य, समर्पण, दूरदर्शिता तथा आचारसंहिता की आवश्यकता थी, उसकी रही-सही भूमिका गढ़ी जानी बाकी थी. समय इन सबको एक बार फिर अपनी कसौटी पर परखने की तैयारी कर चुका था.
उन दिनों इंग्लैंड में संस्थाओं के पंजीकरण के लिए ‘फ्रैंड्स सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट-1829’ नामक अधिनियम प्रभाव में था, जिसमें सन 1834 में संशोधन भी हो चुका था. अधिनियम के अंतर्गत म्युचुअल फंड्स की स्थापना के लिए संस्था गठित करने का प्रावधान था. उस अधिनियम की घोषणा के समय इंग्लेंड सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई थी. क्योंकि सरकार की निगाह में सहयोगी संगठनों को बढ़ावा देने के लिए वह एक आदर्श व्यवस्था थी, जिसमें पहले से चले आ रहे प्रावधानों, परिवर्तनों तथा कानूनी सुधारों को भी सम्मिलित किया गया था. अठारह सौ उनतीस में जब वह अधिनियम मूल रूप में लागू हुआ था, उस समय तक समितियों का गठन प्रायः आर्थिक कार्यकलापों—यथा रकम उधार देने, जीवन बीमा, चिकित्सा बीमा आदि सामान्य कार्यों के लिए किया जाता था. उन दिनों लाभ का आशय केवल वित्तीय एवं मौद्रिक अर्जन तक सीमित था. सामाजिक लाभ जैसी कोई अवधारणा ही नहीं बन पाई थी. अतएव सामाजिक और रचनात्मक क्षेत्र में भी सहकारी समितियां उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं, इस प्रकार की कोई अभिकल्पना उस समय तक विद्वानों तथा प्रशासन के मानस में नहीं बन पाई थी.
सरकार पर बदलाव के लिए चौतरफा दबाव बना हुआ था. डा॓. विलियम किंग के समाचारपत्र ‘दि को-आ॓पेरटर’ का जनता पर प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. इस समाचारपत्र का पहला अंक 1 मई 1828 को निकला था और उसके बाद से लगातार यह लोगों में सहकारिता के प्रति चेतना जगाने का काम कर रहा था. उसी की प्रेरणा से इंग्लेंड में पहली सहकारी समिति की स्थापना हुई, सन 1830 में, नाम था—रोशडेल फ्रेंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी. चूंकि मजदूरों को वेतन मासिक या साप्ताहिक आधार पर मिलता था. अतएव समिति में सदस्यों को उनके दैनिक उपयोग की वस्तुएं उधार बेची जातीं थीं. नियम यह बनाया गया था कि वेतन मिलते ही मजदूर समिति का उधार लौटा कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा. मगर वक्त के साथ सबकुछ गड़बड़ाने लगा. कुछ मजबूरी के कारण तो कभी जानबूझकर, सदस्य लिया गया उधार लौटाने से आनाकानी करने लगे. आखिर भारी घाटे के कारण वह समिति बंद कर देनी पड़ी.
अठारह सौ चौंतीस में पहली बार व्यवस्था के स्तर पर क्रांतिकारी सुधार देखने में आया. यद्यपि उन सुधारों का पूरी तरह से लाभ उठाने के लिए जनमानस पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाया था. इस कारण नए सुधारों की उपयोगिता का पूर्णतः मूल्यांकन शायद उन दिनों संभव नहीं था. उन दिनों सरकार ने समिति पंजीकरण अधिनियम में एक और संशोधन किया था, जिसके आधार पर लाभ (Benefits) की परिभाषा को किसी भी प्रकार के अनुलाभों तक विस्तृत कर दिया गया था. नए अधिनियम के अंतर्गत किसी भी विधिमान्य लाभ की प्राप्ति के लिए समिति का गठन किया जा सकता था.7 अधिनियम में हुए कानूनी सुधार ने भी रोशडेल पायनियर्स को एक बार पुनः संगठित होकर उस अधिनियम का लाभ उठाने की प्रेरणा दी थी, जिसमें उन्हें आशातीत सफलता प्राप्त हुई.
सबसे पहले जो लोग समिति के रूप में आगे आए उनकी कुल संख्या अठाइस थी. वे सभी रोशडेल में काम करने वाले बुनकर परिवारों से संबद्ध साधारण मजदूर थे. उससे पहले भी मिल मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए आंदोलन कर चुके थे. उनमें उत्पे्ररक शक्ति की भूमिका निभाने वालों में प्रमुख थे—चार्ल्स हावर्थ, अब्राहम ग्रीनवुड, जा॓न हिल्टन, डेविड ब्रूक तथा विलियम कूपर.
सहकारिता आंदोलन के उन्नायक महान अठाइस  बुनकर
जेम्स स्मिथ               जा॓न स्क्रा॓क्राफ्ट
चार्ल्स हावर्थ               जा॓न हिल
विलियम कूपर          जा॓न हा॓ल्ट
डेविड ब्रूक                  जेम्स स्ट्रेंडिंग
जा॓न का॓लियर            जेम्स मनोक
सेम्युअल एस्वर्थ       जोसेफ स्मिथ
विलियम मलेल्यु       विलियम टेलर
जा॓र्ज हीले                    राबर्ट टेलर
मिल्स एस्वर्थ             बैजांमिन रूडमेन
जेम्स डेली                  जेम्स विलकिंसन
जेम्स ट्वीडले              जा॓न गार्सीड
सेम्युअल ट्वीडले        जा॓न बेंट
जा॓न केरसा॓                  एन ट्वीडले
जेम्स मेडन                जेम्स बेम्फोर्ड
( स्रोत : George Jacob Holyoake : The Rochdale Pioneers)
मिल्स असवर्थ को समिति का पहला अध्यक्ष बनाया गया, परंतु, समिति के गठन में चार्ल्स हावर्थ का योगदान अविस्मणरीय था. समिति के नियमों की अभिकल्पना में उसकी भूमिका मुख्य थी. उन सब के सम्मिलित प्रयासों से दि ‘रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’ (Rochdale Equitable Pioneers Society) की नींव रखी गई, जिसने आगे चलकर उपभोक्ता सहकारी आंदोलन के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान हासिल किए और सहकारी आंदोलन की मुख्य प्रेरक बनी. समिति के संस्थापक सदस्यों को आगे चलकर ‘ख्यातिलब्ध अठाइस’ (Famous twenty-eight) कहकर उनकी सहकार भावना का सम्मान किया जाता है.
चार्ल्स हावर्थ
चार्ल्स हावर्थ ‘दि रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’ के विधान का प्रमुख वास्तुकार था. उसी ने समिति के विधान की रूपरेखा गढ़ी थी. अतएव उसको हम टोडलेन में स्थापित पहली सहकारी समिति का प्रमुख नीतिकार, अभिकल्पक, विचारक, उत्प्रेरक आदि मान सकते हैं. पेशे से साधारण मजदूर हावर्थ कपड़ा बुनने के कारखाने में धागा डालने (Warper) का कार्य करता था. उसकी आस्था समाजवादी विचारों में थी. हावर्थ, राबर्ट ओवेन के विचारों से भी प्रभावित था. उसको विश्वास था कि ओवेन के विचारों पर चलकर एक नए समानता पर आधारित समाज का गठन संभव है. मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए चार्ल्स ने कई आंदोलनों में सहभागिता की थी.
उस समय तक कार्य के घंटे तय नहीं थे. कारखाना मालिक एक ही दिन में सोलह से अठारह घंटे तक काम लेते थे. हावर्थ ने इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाते हुए दैनिक कार्यघंटों को दस घंटे तक सीमित करने के लिए लाए गए ‘दस घंटा अधिनियम’ के पक्ष में कई सभाएं कीं. हालांकि उस समय बहुत से मिल मजदूर इस संशोधन विधेयक के पक्ष में नहीं थे और इसे मालिकों तथा कामगारों के बीच का मुद्दा मानते हुए किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे. बावजूद इसके हावर्थ उस बिल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लंदन भी गया था तथा हाउस आफ कामॅन में बिल पर चल रही बहस के दौरान उपस्थित भी रहा. उसका प्रशासन और सरकार पर असर पड़ा. ‘रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’ उसका पहला प्रयास नहीं था. ओवेन से प्रभावित होकर हावर्थ ने सन 1830 ईस्वी में एक समूह का गठन किया था, जिसका नेता वह स्वयं था.
हावर्थ का सपना था कि संगठित शक्ति के द्वारा सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जाए, जिससे लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावना बढ़े. अपने सपने को सच में परिणित करने के लिए हावर्थ ने रोशडेल के टोड लेन नामक स्थान पर किराये की दुकान का प्रबंध किया था. वस्तुतः वह पुराना गोदाम था, जो वर्षों से खाली पड़ा था. उसका पता था—टोड लेन, रोशडेल. दुकान का किराया 10 पाउंड वार्षिक तय किया गया. दुकान को उन्होंने ‘को-आ॓परेटिव शा॓प’ का नाम दिया था. सहकारी समिति के लाभ को लगाई गई पूंजी के अनुपात में सदस्यों के बीच बंटवाने का विचार सहकारिता को उसी की देन है. व्यवसाय को ढंग से चलाने के लिए हावर्थ ने कुछ नियम भी बनाए थे. उनके अनुसार सदस्य उस दुकान से उधार माल खरीद सकते थे. उधार का भुगतान एक सप्ताह के बीच किया जाना तय था. प्रारंभ में सदस्यों का उपने उस सहयोगी उपक्रम के प्रति विश्वास और उत्साह बने रहे. लेकिन धीरे-धीरे उस व्यवस्था की कमजोरियां सामने आने लगीं. क्योंकि बहुत से सदस्य निर्धारित तिथि पर भुगतान नहीं कर पाते थे. और इस तरह उधार धीरे-धीरे बढ़कर एक विशाल रकम का रूप ले चुका था. उसमें से बहुत-सी राशि डूबती भी जा रही थी. उस दौरान हावर्थ को अपनी एक और भूल का भी अनुभव हुआ. उसके द्वारा उस दुकान के लिए बनाए गए नियम मौखिक थे, उनका लिखित प्रारूप न होने के कारण समिति का उधार न चुकाने वाले सदस्यों को अदालत के जरिये चुनौती नहीं दी जा सकती थी. फिर जैसा की तय था, हावर्थ को उस प्रयास में भारी नुकसान का सामना करना पड़ा. पहली का-आ॓परेटिव शा॓प बामुश्किल दो वर्ष ही चल पाई. भारी घाटे के कारण उसे बंद कर देना पड़ा.
योजना असफल हो जाने के कारण लोगों ने हावर्थ का खूब मजाक बनाया था. दुकानदारों का कर्ज लौटाने में उसको काफी नुकसान भी हुआ था. ऐसे में कोई और होता तो उस प्रयास को दोहराने का शायद फिर कभी प्रयास ही न करता. भूलकर भी संगठन और सहकार का नाम न लेता. लेकिन हावर्थ तो संकल्प का धनी था. समाज को बदलने के लिए कृतसंकल्प! पहली का-आ॓पेरिटव शा॓प बंद हो जाने का उसे दुःख था; और गहरा क्षोभ भी. उधर रोजमर्रा की वस्तुओं में भारी मिलावटी से मजदूरों में अनेक बीमारियां बढ़ती जा रही थीं. सरकार पूंजीपतियों की समर्थक थी, इस कारण उससे किसी प्रकार की उम्मीद करना भी व्यर्थ था. ऐसे में एक ऐसे उपभोक्ता भंडार की अत्यंत आवश्यकता थी, जहां पर मजदूरों को खाने-पीने की वस्तुएं शुद्ध एवं उपयुक्त मूल्य पर प्राप्त हो सकें. उसका पिछला प्रयोग असफल हो चुका था. नई शुरुआत कैसे की जाए, वह रात-दिन इसी सोच में रहता. दुबारा घाटा सहने के लिए न तो वह तैयार था, न कोई उस अवस्था में साथ देने वाला था. मित्रगण भी तब तक साथ देने से बचते, जब तक लाभ की सुनिश्चितता न हो.
वह सोचता था कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे सदस्यों को उनके द्वारा खर्च किए गए धन के अनुपात में लाभ मिलता रहे. उसने यह भी फैसला किया कि पिछली गलतियों को दोहराने से बचेगा. लेकिन वह राह कैसी हो, दुबारा गलतियां न हों, इसके लिए कौन से उपाय किए जाएं, यह समस्या उसको रात-दिन मथती रहती थी. और फिर सचमुच स्वप्नदृष्टा हावर्थ को एक रात सपने से ही राह मिली. एक रात हावर्थ देर तक जागा. चिंता के कारण उसको नींद आ ही नहीं रही थी. वह सहकारी प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहता था. ‘दस घंटा अधिनियम’ के विरुद्ध आंदोलन करते समय कुछ नए साथी बने थे. वे उसका साथ देने को तैयार थे, किंतु दुबारा नुकसान की संभावना से ही वह व्यग्र हो जाता था. लाभ की सुनिश्चितता को बढ़ाने की कोई भी युक्ति उसकी समझ में नहीं आ रही थी. मगर उस रात जैसे कमाल हुआ. वह अचानक उठ कर बैठ गया. पत्नी बराबर में ही सो रही थी. उससे लगभग बेखबर, अपने ही एक पुरखे आर्कीमिडीज की भांति नए विचार के स्वागत में हावर्थ चिल्लाया—
‘मैंने ढूंढ लिया…मैंने हल ढूंढ लिया.’8
हावर्थ के सपने में उसके अठाइस साथी और सम्मिलित हो गए. प्रत्येक ने निर्णय लिया कि वे प्रति सप्ताह कम से कम दो पैंस की रकम जमा करेंगे. उन सभी का जीवन संघर्षशील था. इसलिए प्रति सप्ताह दो पैंस जुटा पाना भी उनके लिए आसान नहीं था. कुछ साथियों को उसकी पिछली असफलता याद थी. उन्हें लगता था कि यदि नया प्रयास भी असफल हुआ तो इससे उनकी मामूली जमापूंजी का नुकसान संभव है. इसीलिए हावर्थ को उनके प्रारंभिक विरोध और असहयोग का सामना करना पड़ा. ऐसे समय पर हावर्थ ने चतुराई और राजनीति का सहारा लिया. उसने दो पैंस प्रति सप्ताह अग्रिम राशि देने के लिए प्रबंधकों पर दबाव डालना प्रारंभ कर दिया, जिसके पूरा न होने पर उसने हड़ताल और काम छोड़कर जाने की धमकी देना शुरू कर दिया. दो पेंस एडवांस मामूली रकम थी. उसके लिए कारखाना मालिक हड़ताल को न्योता नहीं देना चाहते थे. परिणाम यह हुआ कि कई कारखाने कामगारों के समर्थन में आ गए. कहते हैं कि जहां चाह वहां राह. जहां संकल्प वहां सफलता. कुछ की दिनों में सामूहिक जमाराशि अठाइस पाउंड तक पहुंच गई. रकम बहुत ज्यादा नहीं थी. मगर इतनी थी कि उससे वे अपने एक और सपने में रंग भरने का प्रयास कर सकें.
चार्ल्स हावर्थ को अपने पिछले अनुभव की याद थी. साथ में पिछले सिस्टम की कमजोरियां भी. उसके अनुभव को देखते हुए सदस्यों की ओर से नई समिति की नियमावली तैयार करने की जिम्मेदारी उसी को सौंपी गई थी. हावर्थ ने उस दायित्व का भली-भांति निर्वहन किया. पिछले संगठन की कोई लिखित नियमावली न होने के कारण, सदस्यों को नियमों के पालन के लिए बाध्य कर पाना कठिन था. इस बार हावर्थ ने समिति के गठन से पूर्व ही एक विस्तृत नियमावली तैयार की थी, जिसको 24 अक्टूबर 1944 को पंजीयक फ्रैंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी के कार्यालय से पंजीकृत भी करा लिया गया. नई समिति का नाम रखा गया—‘रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी’.
पिछले अनुभवों के सबक लेते हुए हावर्थ ने समिति के उपभोक्ता भंडार से की गई खरीद के अनुपात में सदस्यों को नकद लाभांश देने का प्रावधान किया था, जिसे बाद में बनने वाली सभी सहकारी समितियों में एक आधारसिद्धांत के रूप में मान्यता मिली. उसके द्वारा समिति के विधान में की गई नई व्यवस्थाएं आगे चलकर सहकारिता आंदोलन की रीढ़ बनीं. हावर्थ के निकट सहयोगी, मित्र और समिति के महत्त्वपूर्ण सदस्य, विलियम कूपर ने भी माना कि सदस्यों के बीच लाभ के विभाजन का विचार हावर्थ की ही देन था. उसका जन्म सन 1814 में हुआ था. उसके मित्र प्यार से उसको ‘दि ला॓यर’ कहा करते थे. वह होलसेल कंज्यूमर सोसाइटी का आजन्म सदस्य भी था. उसकी सेवाओं को देखते हुए बाद में उसे इस समिति का अध्यक्ष भी बनाया गया. जो भी हो, हावर्थ का परिश्रम सफल रहा और रोशडेल पायनियर्स का काम चल निकला. 25 जून, 1868 को जब उसकी मृत्यु हुई, सहकारिता आंदोलन पूरे यूरोप में छाने लगा था. उसे हेवुड (Heywood) नामक स्थान पर दफनाया गया. हावर्थ की मृत्यु पर उसको श्रद्धांजलि देते हुए विलियम कूपर ने कहा था—
‘अपने जीवन में वह दूसरों के सदैव काम आनेवाला अतिसंवेदनशील नागरिक, धर्म के मामले में सर्वथा मुक्त विचारक, सामाजिक तथा राजनीतिक सरोकारों के समय सतत प्रगतिशील तथा लोककल्याण के लिए लगातार काम करने वाला एक महान समाज सुधारक था. वह एक अच्छा पति और पिता, सच्चा तथा हितैषी मित्र था.’9

जेम्स स्टेंड्रिंग
जेम्स स्टेंड्रिंग(James Standring) भी मलमल के कारखाने में बुनाई का कार्य करता था. वह प्रगतिशील विचारों को मानने वाला, एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता था. मजदूरों की आर्थिक सामाजिक दशा में सुधार के लिए वह सदैव समर्पित रहता था. राबर्ट ओवेन के कार्यों के प्रशंसक जेम्स का मानना था कि उसकी तरह दूसरे उद्यमियों को भी श्रमिक-कल्याण के कार्यों के लिए खुलकर सामने आना चाहिए. उसमें नेतृत्व की क्षमता थी और वह श्रमिकों को अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए सतत प्रेरित करता रहता था. रोशडेल में जब कारखानों में दैनिक कार्यघंटों में कमी लाने के लिए ‘दस घंटा अधिनियम’ के पक्ष में मजदूरों ने आंदोलन की शुरुआत की तो जेम्स ने न केवल उस आंदोलन का खुलकर समर्थन किया, बल्कि बल्कि सचिव के पद पर रहकर उसके आंदोलनकारियों के नेतृत्व में जोर-शोर से हिस्सा भी लिया. 1843-44 के बीच श्रमिकों ने अग्रिम वेतन के भुगतान के पक्ष में हड़ताल की तो वह एक बार फिर उनके समर्थन में उतर आया, हालांकि इस बार वह हड़ताल लगभग असफल सिद्ध हुई थी.
इसी बीच जेम्स को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम में सरकार द्वारा किए गए संशोधन की जानकारी मिली. उसने तत्काल फ्रैंडली सोसाइटी अधिनियम की प्रति मंगाकर उसका अध्ययन किया. उसको लगा कि मजदूरों को संगठित करने, उनके अधिकारों की रक्षा तथा उनके लिए कल्याण-कार्यक्रम प्रारंभ करने की दिशा में वह अधिनियम उपयोगी हो सकता है. रोशडेल इक्वीटे्वल पायनियर्स सोसाइटी के गठन के लिए मजदूरों को प्रेरित करने वालों में जेम्स स्टेंड्रिग सबसे आगे था. समिति का गठन हुआ तो जेम्स का नाम भी अठाइस संस्थापक सदस्यों में सम्मिलित था.

विलियम कूपर
समिति के संस्थापक सदस्यों में से एक विलियम कूपर का जन्म सन 1822 में हुआ था. समिति द्वारा उपभोक्ता भंडार प्रारंभ किया गया तो उसका खंजाची विलियम कूपर को ही बनाया गया. इसके अतिरिक्त उसका कार्य समिति के रिकार्ड की देखभाल करना था. समिति से जुड़ने से पहले वह हैंडलूम के कारखाने में बुनकर का काम करता था. समिति के सदस्य के रूप में उसको एकाउंटस तैयार करनेकी जिम्मेदारी सौंपी गई. जिसको उसने अच्छी तरह से निभाया. इसका उसको लाभ मिला. आगे चलकर जब कोआ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी आरंभ की गई तो कूपर को ही उसका अध्यक्ष चुना गया. कोआ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी का कार्य सहकारी स्तर पर चल रहे उपभोक्ता भंडारों को सामान उपलब्ध कराना था. यह समितियां सीधे उत्पादक से वस्तुएं खरीदकर उन्हें सहकारी उपभोक्ता भंडारों तक पहुंचाने का कार्य करती थीं. इससे जहां उत्पादकों को अपने उत्पादों के लिए बाजार के लिए भटकना नहीं पड़ता था, वहीं समिति के भंडारों को भी अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर माल उपलब्ध हो जाता था. राबर्ट ओवेन तथा विलियम किंग के विचारों से प्रभावित कूपर की सहकार के विचारों में बहुत आस्था थी. ग्रीनवुड की भांति कूपर की भी महत्त्वाकांक्षाएं थीं. वह भी मेहनती तथा अद्वितीय प्रतिभा का धनी था. सहकारिता और समाजवाद से जुड़े विचारों के प्रसार के लिए उसने कई स्तर पर काम किए. को-आ॓परेटिव होलसेल सोसाइटी के गठन के पीछे कूपर की काफी प्रेरणाएं थीं. उसके इस प्रयास से सहकारी समितियों के कार्य को संगठित करने की दिशा में मदद मिली. क्योंकि स्थान-स्थान पर तेजी से खुलते जा रहे उपभोक्ता भंडारों के लिए संभव न था कि वे सीधे उत्पादकों से माल मंगवा सकें. उनके इस कार्य को कोआ॓परेटिव होलसेल समितियां सुलभ बना देती थीं. इससे उत्पादकों में सहकारी संस्थाओं के प्रति आकर्षण पैदा हुआ. दूसरे बाजार की समस्या कम होने से उन छोटे उत्पादकों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिला जो अभी तक बड़े उत्पादकों के सामने बाजार में टिक नहीं पा रहे थे. दूसरे उत्पादित माल की खपत की सुनिश्चितता होने के पश्चात लोग सहकारी समूहों के माध्यम से उत्पादकता के क्षेत्र में भी आगे आने लगे थे, जो उससे पहले कदापि संभव नहीं हो पा रहा था. इसके अतिरिक्त कूपर ने सहकारी बीमा समिति के गठन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. साथ ही आगे चलकर सहकारी कामगार समिति(Co-operative Workers Society) की स्थापना में भी उसका बहुमूल्य योगदान रहा.
कूपर को सहकारिता के सैद्धांतिक पक्ष का भी पर्याप्त ज्ञान था. इस विषय पर अपनी पकड़ तथा अपने अनुभव का प्रदर्शन करते हुए उसने एक पुस्तक की रचना भी की. उस पुस्तक का शीर्षक है—हिस्ट्री आ॓फ दि रोशडेल डिस्ट्रिक्ट कोर्न मिल’. यह पुस्तक तत्कालीन इंग्लैंड के कारखानों में कामगारों की स्थिति को समझने का एक आदर्श माध्यम है. उससे यह भी पता चलता है कि औद्योगिकीकरण का वह दौर कितना अव्यवस्थित एवं श्रमिक-विरोधी था. विलियम कूपर का निधन 31 मार्च, 1868 को हुआ, उस समय उसकी आयु मात्र छियालिस वर्ष थी. विलियम कूपर को ऋद्धांजलि देते हुए सहकारिता के मुख्य समाचारपत्र ‘दि को-आ॓परेटर’ ने लिखा कि—
‘जैसी दिखाई देती थी, वह उसकी मौत नहीं थी. बल्कि वह पवित्र जीवन की ओर बहा ले जाने वाली दिव्य श्वांस थी. वह एक इंसान द्वारा देवताओं की महान नगरी में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश है, भले ही हम जैसे साधारण लोग उसको मौत का नाम देते रहते हैं.’10
छोटे से जीवन में बड़े कार्य कर जाने वाले दुनिया में जो गिने-चुने इंसान जन्में हैं, विलियम कूपर का उन्हीं आदरणीयों में से एक है. मिल्स एश्वर्थ व्यवसाय से बुनकर मिल्स एश्वर्थ (Miles Ashworth) की ओवेन एवं लुईस ब्लेंक के विचारों में पूरी आस्था थी. लेकिन राजनीतिक रूप से वह एक चार्टिस्ट था तथा संगठन के कार्य में उसको प्रवीणता प्राप्त थी. रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी का सदस्य बनने से पहले उसने कुछ दिनों तक एक कारखाने में चैकीदार की नौकरी भी की थी. समिति के गठन के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने वालों में वह सबसे आगे था. इसलिए समिति के गठन के समय पहला अध्यक्ष मिल्स एश्वर्थ को ही बनाया गया. उसने अपने दायित्व का विधिवत निर्वाह किया. समिति का ही एक और सदस्य सेमुअल एश्वर्थ, मिल्स का ही बेटा था. मिल्स एश्वर्थ की मृत्यु 13 अप्रैल, 1868 को हुई, उस समय उसकी आयु 76 वर्ष थी. मिल्स को रोशडेल पायनियर्स के कब्रिस्तान में दफनाया गया था. सहकारी क्षेत्र उसके योगदान को भुला पाना संभव नहीं है.
जेम्स स्मिथ
अपने साथियों की भांति जेम्स स्मिथ भी ऊन छांटने के कारखाने में नौकरी करता था. वह एक समाजवादी विचारक था, जिसकी आंखों में रात-दिन आमूल परिवर्तन का सपना कौंधता रहता था. बहुमुखी प्रतिभा का धनी स्मिथ मेहनती भी खूब था. रोशडेल पायनियर्स के गठन के दौरान सदस्यों को उससे जोड़ने, उनके दिमाग में साहचर्य के प्रति अनुराग पैदा करने वालों में स्मिथ सर्वोपरि था. इसलिए समिति के गठन के समय से ही उसको महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं सौंपी जाती रहीं. वह समिति के कार्य में रात-दिन जुटा रहता था. उसकी सेवाओं को देखते हुए उसको निदेशक, अध्यक्ष, महासचिव, ट्रस्टी जैसे महत्त्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी सौंपी जाती रही, जिसका उसने भली-भांति निर्वाह किया. सदस्यों के बीच सहकार की भावना जगाने और शांति एवं सौहार्द कायम करने के लिए सतत कार्यशील रहने वाले जेम्स स्मिथ की मृत्यु मात्र 50 वर्ष की अवस्था में, 27 मई, 1869 को हुई. उसको रोशडेल के कर्बिस्तान में दफनाया गया. रोशडेल के उपभोक्ता भंडार को अपनी स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में ही मिली अप्रत्याशित सफलता के पीछे जेम्स स्मिथ के परिश्रम का बहुत बड़ा योगदान था. विडंबना यह है कि जिस आंदोलन की नींव जमाने में स्मिथ का हाथ था, उसकी सफलता के बहुत कम आयाम वह अपने छोटे-से जीवन में देख सका. बावजूद इसके प्रारंभिक रोशडेल पायनियर्स के संस्थापक सदस्यों में उसका योगदान अविस्मरणीय था.

जा॓न स्क्राक्रा॓फ्ट
स्क्राक्रा॓फ्ट बहुत मामूली व्यक्ति था. फेरी लगाकर माल बेचने वाला. गरीब और सीधा-सादा. राजनीति में उसकी जरा भी रुचि नहीं थी. बावजूद इसके वह कुशल वक्ता था तथा लोगों को प्रभावित करने का गुर उसको आता था. उसका ज्ञान बहुआयामी था. लोग अक्सर उससे मिलने के लिए आते रहते थे. उस समय वे उससे स्थानीय मसलों के अलावा धर्म, राजनीति तथा सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करते थे. वह देर रात तक उनके बीच बैठकर बात-चीत करता रहता था. उसकी बतकही का जादू कि लोग अपनी भूख-प्यास सबकुछ भुला देते थे. एक मंजे हुए विद्वान की भांति स्क्राक्रा॓फ्ट अपने सानिध्य में बैठे लोगों की प्रत्येक जिज्ञासा का समाधान करने की कोशिश करता. कभी-कभी बात बहस तक भी पहुंच जाती थी. कई बार धार्मिक मान्यताओं पर चर्चा प्रारंभ हो जाती थी. स्क्राक्रा॓फ्ट के पास गंभीर आलोचकीय दृष्टि थी, जो धार्मिक चर्चाओं के दौरान अक्सर मुखर हो जाती थी. वह धर्म में आडंबरवाद का घोर विरोधी था. अतएव धार्मिक चर्चाओं के दौरान अक्सर वह चर्च के आडंबरवाद की बखिया उधेड़ने लगता था. उस समय वहां पर उपस्थित धार्मिक रूप से आस्थावान व्यक्ति लंबी-लंबी बहसों पर भी उतर आते थे. लेकिन स्क्राक्रा॓फ्ट का धर्म संबंधी ज्ञान दार्शनिकता से लबरेज था. वह अपने आलोचकों की हर बात का तार्किक उत्तर देने का प्रयास करता. इस तरह की बहसों में उसको हरा पाना असंभव था. वस्तुतः मानववादी होने के नाते स्क्राक्रा॓फ्ट की धर्म-संबंधी व्याख्याएं जनसामान्य के पक्ष में जाती थीं. जिन लोगों के बीच वह रह रहा था, उन्हें इसी प्रकार के जादुई नेतृत्व की आवश्यकता थी. वास्तव में उसकी विचारधारा मानवीयता के अनुकूल थी. इसलिए वह पास आए लोगों के साथ देर तक बहस कर सकता था.

जा॓न का॓लियर
प्रथम अठाइस के बीच जा॓न का॓लियर शायद सर्वाधिक सुशिक्षित सदस्य था. वह समाजवादी विचारधारा में आस्था रखने वाला एक प्रशिक्षित इंजीनियर था. का॓लियर के दादा, जा॓न का॓लियर(टिम बाबिन) स्वयं बहुत अच्छे लेखक थे. वे रोशडेल के निकटवर्ती स्थान मिलनरो के रहने वाला, लगभग बातूनी व्यक्ति थे. गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में उनका अच्छा दखल था. 1744 तथा 1750 के बीच उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी. उनकी शैली व्यंग्यात्मक थी. जिसका असर लंबा होता था. लोग उनकी ओर खिंचे चले आते थेµस्त्री और पुरुष दोनों. 1786 में उनकी मृत्यु हुई थी. उनके मजाकिया स्वभाव का अनुमान इस कविता से लगाया जा सकता है, जो उन्होंने अपनी मृत्यु के मात्र दस मिनट पहले लिखी थी. उनकी मृत्यु के उस कविता को उनके समाधिलेख के रूप में उनकी कब्र पर खुदवा दिया. कविता का आशय है—
‘यहां जा॓न अपनी नन्ही कविता के साथ लेटा हुआ है. उसके साथ गाल से गाल सटाए हुए. चैंकिए मत कि उनके बीच गहरा समझौता हो चुका है. अब न जा॓न को किसी शरबत की आवश्यकता है, न उसकी प्रेमिका को चाय की.’11
जा॓न का॓लियर पर अपने दादा की विचारधारा का असर पड़ा था. समाजवाद के प्रति अपनी आस्था के ही कारण वह रोशडेल पायनियर्स के संपर्क में आया. दादा की भांति जा॓न का॓लियर भी अद्भुत वक्तव्य कला का धनी था. रोशडेल पायनियर्स द्वारा उपभोक्ता भंडार की स्थापना से लेकर उसके आगे के प्रगति अभियानों में जा॓न का॓लियर का योगदान अत्यंत बहुमूल्य था. उसकी मृत्यु 24 नवंबर 1883 को हुई. उस समय उसकी आयु 75 वर्ष थी. उसको रोशडेल की कब्रगाह में ही दफनाया गया.

डेविड ब्रूक
डेविड ब्रूक पेशे से ब्ला॓क पेंटर तथा विचारधारा से चार्टिस्ट था. यहां हम बता दें कि इंग्लेंड में 1830 से लेकर 1840 के बीच राजनीतिक कार्यकर्ताओं का एक संगठन आंदोलनरत था. संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं की मांग आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप थीं. वे सत्ता में सभी की साझेदारी की मांग कर रहे थे. उनकी सबसे पहली मांग थी कि प्रत्येक नागरिक को वैद्य मतदान के आधार पर संसद में जाने का अधिकार होना चाहिए. प्रारंभ में सराकार को यह मांग बहुत नागवार गुजरी थी. परिणामस्वरूप अनेक चार्टिस्ट को सजा काटने के लिए आस्ट्रेलिया भेज दिया गया था. ‘चार्टिस्टस’ आंदोलनकारियों की मांग को आगे चलकर जान स्टुअर्ट मिल आदि व्यक्ति स्वातंत्रय के समर्थक विचारकों का समर्थन मिला, जिससे वह आंदोलन नए सिरे और नए नाम से आगे बढ़ सका.
डेविड ब्रूक ईमानदार तथा उत्साही कार्यकर्ता था. उसकी मेहनत एवं लगन को देखते हुए उसको समिति के उपभोक्ता भंडार के लिए सामान की खरीद का दायित्व सौंपा गया था. वह एक जिम्मेदारी का काम था. खासकर उन प्रारंभिक दिनों में जब उपभोक्ता भंडार को ‘बुनकरों की दुकान’ कहकर उससे जुड़े लोगों का मजाक उड़ाया जाता था. माल की खरीद के लिए ब्रूक को जगह-जगह जाना पड़ता था. वहां दुकानदार और उत्पादक आदि मिलकर बू्रक का मजाक उड़ाते, उसको हतोत्साहित करने का प्रयास करते थे. ब्रूक बिना आपा खोये धैर्यपूर्वक अपने काम में लगा रहता था. ब्रूक की आस्था समाजवादी विचारधारा में थी और वह चाहता था कि मजदूर वर्ग स्वावलंबी हो और बिना किसी की कृपा के, सिर्फ अपनी मेहनत द्वारा विकास करें.
वह अपनी ठीक-ठाक नौकरी छोड़कर समिति के साथ जुड़ा था और कहीं भी सात से आठ शिलिंग प्रतिदिन बहुत आसानी से कमा सकता था. लेकिन रोशडेल पायनियर्स का कार्य उसने केवल अपनी आत्मतुष्टि के लिए, यह कहकर स्वीकारा था कि जब तक समिति अपने प्रत्येक सदस्य को कम से कम तीन पेनी प्रतिघंटे की दर से वेतन देने में समर्थ नहीं हो जाती, तब तक वह बिना किसी मौद्रिक लाभ के अपनी सेवाएं प्रदान करता रहेगा. उसने कई वर्ष तक समिति की सेवा की. पांच वर्ष तक वह रोशडेल पायनियर्स के उपभोक्त भंडार में खरीद विभाग का कार्यालय अध्यक्ष बना रहा. उसने अपना सारा जीवन भीषण आर्थिक अभाव के बीच बिताया था. ब्रूक का निधन 79 वर्ष की अवस्था में, 24 नवंबर 1882 को हुआ. लेकिन उन सुंदर, सजीले और महकीले फूलों की भांति जो गुमनामी के अंधियारे में खो जाने को अभिशप्त होते हैं, बू्रक द्वारा समिति की कामयाबी तथा सदस्यों के बीच आपसी सौहार्द एवं सामाजिकता बनाए रखने के लिए किए गए कार्य को लगभग विस्मृत कर दिया गया.12

अब्राहम ग्रीनवुड
चार्ल्स हावर्थ की भांति अब्राहम ग्रीनवुड (Abraham Greenwood) भी बुनकर परिवार से संबद्ध था. उसका जन्म 1824 में हुआ था. पिता कंबल बनाने का कार्य करते थे. स्वयं ग्रीनवुड ने भी छबीस वर्षों तक ऊन की छंटाई का कार्य किया था. वह कई वर्षों तक चार्टर एसोसिएशन का सचिव रह चुका था. 1848 में रोशडेल पायनियर्स से जुड़ने से पहले वह ‘पीपुल्स इंस्टीट्यूट’ में पुस्कालयाध्यक्ष था. वह विलियम किंग तथा राबर्ट ओवेन के कार्य से प्रभावित था. उन्हीं के संपर्क में आने से सहकारी आंदोलन में उसकी आस्था जगी थी. इसलिए रोशडेल पायनियर्स से जुड़ने के साथ ही उसने सहकारिता के विस्तार के लिए पूरे मनोयोग से कार्य किया था. ग्रीनवुड की अध्यापन में रुचि थी, इसीलिए समिति द्वारा प्रदत्त दायित्वों के अतिरिक्त वह बाकी सदस्यों को पढ़ाने में भी रुचि लेता था. सप्ताह के अंत में एक दिन वह समिति के सदस्यों को पढ़ाने का काम करता था. राजनीति अर्थशास्त्र से उसका विशेष लगाव था.
अब्राहम ग्रीनवुड की मेधा एवं सहकार के प्रति उसके सक्रिय लगाव के कारण ही उसको रोशडेल सोसाइटी आफ इक्युटेविल पायनियर्स (Rochdale Society of Equitable Pioneers) के संस्थापक सदस्यों में शामिल किया गया था. समिति के सदस्य के रूप में ग्रीनवुड ने सौंपे गए दायित्वों का निर्वाह पूरी लग्न एवं ईमानदारी से किया. उसके माध्यम से समिति ने अपनी कई विस्तार योजनाओं को कामयाबी के साथ पूरा किया. इसलिए आगे चलकर जब कंज्युमर होलसेल सोसाइटी की स्थापना की गई तो उसकी अध्यक्षता के लिए ग्रीनवुड को ही चुना गया. वह रोशडेल कार्न मिल का संस्थापक और अध्यक्ष भी रहा. सन 1874 से 1898 के बीच उसने रोशडेल होलसेल सोसाइटी के कैशियर और प्रबंधक जैसे दायित्वों का भी वहन किया. इन सारी जिम्मेदारियों को संभालकर ग्रीनवुड ने सहकारिता के विचारों के प्रति निष्ठा के साथ अपनी प्रबंधन क्षमता का भी परिचय दिया था. इसीलिए समिति के भीतर उसको एक से बढ़कर एक, महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाती रहीं. आगे चलकर रोशडेल पायनियर्स ने जब बीमा व्यवसाय के क्षेत्र में प्रवेश किया तो सर्वसम्मिति से ग्रीनवुड को ही बीमा कंपनी की बागडोर सौंपी गई. उसको नवगठित बीमा कंपनी का अध्यक्ष बनाया गया.
सहकारिता के प्रचार-प्रसार उसके विचार एवं सिद्धांतों को आमजन तक ले जाने तथा लोगों को उसके प्रति प्रेरित करने के लिए उसने सहकारी समाचार नामक संचार सेवा की शुरुआत की थी. उसने को-आ॓परेटिव न्यूज सेवा के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला. वह पचीस वर्षों तक न्यूज पेपर सोसाइटी का अध्यक्ष भी रहा. उस पद पर रहते हुए भी उसने सहकारिता आंदोलन को आगे ले जाने का कार्य किया. ग्रीनवुड की समाजवादी विचारधारा में आस्था थी. लोककल्याण एवं समाजसेवा से जुड़े कार्यों में उसका मन लगता था. उसकी मृत्यु सन 1911 में हुई. सहकारिता आंदोलन विश्वपटल पर अगर अपनी पहचान बना पाया तो उसके पीछे ग्रीनवुड जैसे समर्पित को-आ॓परेटरों का भी भारी योगदान रहा है.

जा॓न हिल्टन
जा॓न हिल्टन, विलियम कूपर की भांति हालांकि रोशडेल पायनियर्स के संस्थापक सदस्यों में से नहीं था. परंतु समाजवादी-सुखवादी विचारधारा को लोकप्रिय बनाने वालों में उसका योगदान अविस्मरणीय है. उसका जन्म सन 1824 ईस्वी में हुआ था. वह एक प्रतिबद्ध विचारक तथा समाज में आमूल परिवर्तन का पक्षधर आंदोलनकर्मी था. मजदूरों पर उसका प्रभाव था. उनकी समस्याओं के निदान के लिए वह सतत प्रयासरत रहता था. इसीलिए 1864 में जब रोशडेल होलसेल को-आ॓परेटिव सोसाइटी प्रारंभ की गई तो जा॓न हिल्टन को उसकी सदस्यता के लिए आमंत्रित किया गया. जा॓न हिल्टन ने अपने दायित्व को खुशी-खुशी निभाया. वह मेडिल्टन एवं टांग सोसाइटी का भी संस्थापक सदस्य रहा. वह एक सफल लेखक था. वह पूंजीवाद के बढ़ते वर्चस्व को सामान्यजन के हितों के प्रतिकूल मानता था. विशेषकर उसकी पूंजीवाद की वह विचारधारा जिसके आधार पर वह मनुष्य को महज एक कामोडिटी मानकर आचरण करती है, जिसकी उपयोगिता दूसरी कामोडिटीज के सेवन की मात्र से तय होती है. अपने लेखों में हिल्टन इस पूंजीवादी प्रवृत्ति का जमकर विरोध किया था. उसकी विचारधारा मार्क्सवादियों से मेल खाती थी. 1899 में जब उसकी मृत्यु हुई तब तक सहकारिता का विचार बहुत आगे बढ़ चुका था.
सहकारी संस्था का गठन
सतरहवीं शताब्दी तक इंग्लेंड में पूंजीवाद अपनी जड़ जमा चुका था. उसके कारण वहां की अर्थव्यवस्था में तेज उछाल आया था. मगर साथ ही अनेक समस्याएं भी उत्पन्न होने लगी थीं. उनमें एक तो बेरोजगारी की समस्या थी. मशीनों ने गुणवंत शिल्पकारों से काम छीनकर उन्हें दर-दर भटकने को विवश कर दिया था. दूसरी बड़ी समस्या थी मजूदरों के शोषण की. मालिक लोग कम से कम मजदूरी के बदले जीतोड़ मेहनत कराना चाहते थे. उसके सभी कानूनों का एक ही मंतव्य था—शोषण, शोषण और शोषण, जनसामान्य का ज्यादा से ज्यादा शोषण. पूंजीवाद के दुष्प्रभावों से चिंतित डा॓. विलियम किंग ने उसको एक सामाजिक बुराई मानते हुए लिखा था—
‘इस व्याधि से बचा जा सकता है, उपचार हमारे हाथों में है, और वह उपचार है—सहकारिता.13
जब शोषण और अनाचार था तो उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक थी. विरोध के स्वर 1830 से उठने प्रारंभ हुए थे, किंतु पूंजीवाद का पहला संगठित विरोध चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की ओर से हुआ. चार्टिस्ट आंदोलनकारी वस्तुतः शिक्षित और नौकरीपेशा वर्ग से थे, जो तत्कालीन व्यवस्था में स्वयं को आहत एवं उपेक्षित अनुभव कर रहे थे. इस आंदोलन का नामकरण विलियम लोवेट(1800-1877) द्वारा 1838 में एक नागरिक अधिकारपत्र(People’s Charter) जारी करने के साथ हुआ था. चार्टिस्ट आंदोलनकारी आर्थिक-राजनीतिक समानता और लोकतंत्र के समर्थक थे. अपने नागरिक अधिकारपत्र में उन्होंने जनसामान्य को मतदान का अधिकार दिए जाने, मतदान क्षेत्रें के एकसमान बंटवारे, निर्वाचित सदन, व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन, उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम शिक्षा निर्धारित करने, सभी को चुनाव लड़ने का अधिकार देने जैसे कई मांगें की थीं. ओ’ कोनर (F. O’Connor) के नेतृत्व में देशव्यापी हड़तालों के माध्यम से आंदोलनकारियों ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने का असफल प्रयास किया था. तब सरकार दमन पर उतर आई. अनेक चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को आस्टेªलिया में कैद कर लिया गया. सरकार के विरुद्ध मुकदमों में भी चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा. अंततः 1848 में वह आंदोलन दम तोड़ने लगा.
सन 1830 में ही आर्थिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से जनसाधारण का सम्मान वापस लाने का प्रयास सहयोगी उद्यमों के माध्यम से हो चुका था. लेकिन अनुभव तथा जागरूकता के अभाव में हावर्थ तथा उसके सहयोगियों द्वारा 1830 में गठित पहली सहकारी समिति ‘रोशडेल फ्रेंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी’ को असफलता का मुंह देखना पड़ा. पहला अनुभव ही कड़वा रहा था. ऐसे में इस बात की संभावना कम ही थी कि दुबारा फिर उसी प्रकार का कदम उठाया जाता. लेकिन जैसा कि पहले की कहा जा चुका है, पूंजीवाद के दुष्प्रभावों के चलते मजदूरों की हालत बहुत खराब हो चली थी.
उत्तरोत्तर कठिन होते जाते जीवन में परेशानियों से मुक्ति का एक रास्ता यह भी हो सकता था कि समस्याओं के साथ जीवन से भी पलायन कर लिया जाए. अगर ऐसा होता तो समय उन लोगों को धिक्कारता. इतिहास उनीसवीं शताब्दी की संभवतः सबसे बड़ी उपलब्धि से वंचित रह जाता था. ऐसा सचमुच हो जाता तो जीवन में संभावनाओं की उपस्थिति और उनकी चामत्कारिक देन से लोगों का भरोसा ही उठ जाता. लेकिन आगे जो हुआ वह संभावनाओं से भी एकदम परे, अकल्पित और अप्रत्याशित था. इसके लिए उन्हें प्रेरणा देने, राह दिखाने और उनकी हिम्मत बढ़ाने के लिए मनुष्यता के इतिहास में बहुत कुछ था. अमेरिका के शेकर साहचर्यवादियों का एक गीत है—
‘जो भी सबसे ऊंचे शिखर तक पहुंचना चाहता है, उसको सर्वप्रथम सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति की ओर देखना चाहिए. और फिर सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति को साथ लेकर सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के लिए चढ़ाई प्रारंभ कर देनी चाहिए.’14
पहली समिति अपनी व्यवस्थागत कमजोरियों तथा कानूनी शिथिलताओं के कारण असफल हुई थी. इनमें प्रमुख कारण थे, उधार बिक्री का प्रावधान तथा नियमों की अस्पष्टता. मजदूरों की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए की गई व्यवस्था के अनुसार सदस्यों को समिति के उपभोक्ता भंडार से एक सप्ताह का उधार दिया जाता था. उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि सप्ताह के अंत में उधार की रकम का भुगतान कर देंगे. इस व्यवस्था के पीछे पर्याप्त तर्क भी थे. क्योंकि सदस्यों को सप्ताह के अंत में वेतन प्राप्त होता था. किंतु व्यावहारिक रूप में यह व्यवस्था बहुत दिनों तक नहीं चल पाई. परिस्थितियों के चलते सप्ताह के अंत में भुगतान की वापसी अपेक्षा से बहुत कम हो चली थी. नियमों की अस्पष्टता के कारण ऐसे मामलों में उधार न लौटाने के दोषी सदस्य को न्यायालय में चुनौती दे पाना भी लाभकर नहीं था. परिणाम यह हुआ कि समिति को व्यापार में घाटा होने लगा. उसका बहुत-सा धन उधार में डूब गया. हावर्थ को व्यक्तिगत रूप में बहुत नुकसान उठाना पड़ा. कुछ ही दिनों पश्चात वह समिति भंग हो गई.
उस समय तो किसी ने नहीं सोचा था कि इतना नुकसान उठाने के पश्चात हावर्थ या उसके साथी दुबारा वैसा ही प्रयास करने पर विचार करेंगे. लेकिन भीषण गरीबी तथा बाजार के माहौल ने उन्हें दुबारा वैसा सोचने पर विवश कर दिया. या कहें कि उनके सामने ‘करो या मरो’ की स्थिति थी. बाजार में एक और तो महंगाई बढ़ती जा रही थी, ऊपर से मिलावट. मजदूरों की दुर्दशा का कहीं अंत नहीं था. 1843 की गर्मियों की बात है. सुप्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकेन्स जो उन दिनों 31 वर्ष के सुदर्शन युवक थे, लंकाशायर की यात्र पर निकले. उद्देश्य था अनुभव बटोरना. देखना चाहते थे कि उत्तरी इंग्लेंड, जो उद्योग के क्षेत्र में विश्व-भर में नाम कमा रहा है, वहां पर आम जनजीवन कैसा है. उन्होंने मेनचेस्टर की मजदूर बस्तियों की यात्र की, यह जानने के लिए कि अपने मालिकों के लिए साल में करोड़ों पाउंड का मुनाफा कमाने वाली कपड़ा मिलों के मजदूर किन परिस्थितियों में रहते हैं.
डिकेन्स ने वहां जो देखा वह देह तो देह आत्मा तक को सुन्न कर देने वाला था. मजदूर बस्तियों में भूख एवं गरीबी के नंगे नांच ने डिकेन्स को हतप्रभ कर दिया. उन्होंने देखा कि औद्योगिक क्रांति का हृदय-प्रदेश माने जाने वाले उस क्षेत्र में जीवन कितना मुश्किल और अमानवीय है. मानो पूरे इंग्लेंड को दो हिस्सों में बांट दिया गया हो. उसके एक ओर तो बड़े-बड़े धन्नासेठों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और कमाऊ नौकरशाहों का इंग्लेंड है, तो दूसरे इंग्लेंड में भूखे, नंगे, विपन्न और बीमार स्त्री-पुरुषों का बसेरा है. अगले ही दिन अथेनयिम क्लब में नौकरशाहों तथा कारखाना मालिकों की उपस्थिति में उन्होंने वहां उपस्थित मजदूरों का आवाह्न करते हुए कहा कि उन्हें अपनी इस अज्ञानता और अपराध-ग्रंथि से बाहर आ जाना चाहिए कि वे गरीबी और अपराध के बेवस जन्मदाता हैं. उन्होंने नौकरशाहों और कारखाना मालिकों से भी अपील की थी कि श्रमिकों की हालत में सुधार लाने के लिए वे आपसी कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों का परस्पर आदान-प्रदान करें.
मजदूर बस्तियों में छायी गरीबी ने डिकेन्स को इतना व्यथित कर दिया था कि ट्रेन द्वारा लंदन वापस लौटते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दि क्रिसमस कैरोल’ की अभिकल्पना की. एक सप्ताह बाद ही उन्होंने वह पुस्तक लिखनी प्रारंभ कर दी. उसके लगभग छह महीने के बाद, दिसंबर 19, 1843 को वह पुस्तक प्रकाशित होकर आई, जिसने पूरे इंग्लेंड के बुद्धिजीवियों को झकझोर कर रख दिया. लोग मजदूरों की स्थिति के बारे में सोचने को विवश हो उठे—
‘क्रिसमस का उस जैसा उल्लास पहले कभी नहीं हुआ था’15
डेविड जे. थांपसन उस स्थिति के बारे में लिखते हैं. लंदन लौटने के बाद चार्ल्स डिकेन्स ने अपने आंख, नाक तथा कान यह जानने पर लगा दिए थे कि मेनचेस्टर और लंकाशायर की मजदूर बस्तियों के उत्थान के लिए पूंजीपति और सरकार कितने चिंतित हैं तथा मजदूर अपने शोषण एवं उत्पीड़न का कितना और किस तरह सकारात्मक विरोध कर पाते हैं. चार्ल्स डिकेन्स की पहली रचना ‘दि क्रिसमस कैरोल’ लगभग जीवनी थी. उसमें डिकेंस ने यह कल्पना कि थी एक पिता अपनी गरीबी से बेहद तंग आ चुका है. कर्ज न चुका पाने के कारण सजा काटते हुए भी वह अपने परिवार के प्रति चिंचित और परेशान है. उपन्यास का मुख्य पात्र बा॓ब क्रेस्टी (Bob Cratchit) नाम के अत्यंत गरीब मजदूर को बनाया गया था, जो अपने मालिक के लिए कमरतोड़ परिश्रम करता है, फिर भी वह अपने परिवार का भरण-पोषण कठिनाईपूर्वक ही कर पाता है. बा॓ब का एक बेटा नन्हा टिम है जो बहुत बीमार और चलने-फिरने से असमर्थ है. बा॓ब का मालिक धनी स्क्रूज(Scrooge) है, हद से ज्यादा कंजूस. उसके जीवन का मुख्य लक्ष्य अपने लिए अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना है. उसको उन भूखे-बीमार मजदूरों और उनके परिवारों की कतई फिक्र नहीं है, जिनके परिश्रम के दम पर उसके कारखाने सोना उगलते हैं.
पुस्तक के बहाने डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया रूपक तेजी से बदलते ब्रिटिश समाज पर तीखा कटाक्ष था, जिसका एक सिरा बेहद चमकदार और चकाचैंध से युक्त था, उसपर मुट्ठी-भर लोगों का अधिपत्य था. जबकि दूसरे सिरे पर हजारों-लाखों उत्पीड़ित-शोषित जन थे, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए तरसते हुए. कार्ल मार्क्स इसी वर्ग को सर्वहारा कहकर पुकारता था. कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें न भरपेट रोटी मिलती थी, न तन ढकने को कपड़ा. पुस्तक के बहाने लेखक ने मजदूर जीवन की विसंगतियों को पूरी दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें भरपूर कामयाबी प्राप्त हुई. डिकेन्स की यह पुस्तक आगे चलकर सामाजिक अध्ययन के लिए प्रमुख दस्तावेज बनी. उससे तेजी से उभरते औद्योगिक समाज की विसंगतियां लोगों के सामने आने लगीं. डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया पात्र बा॓ब क्रेस्टी समाज के गरीब, ऋणग्रस्त, उत्पीड़ित और शोषित मजदूर का प्रतीक बन गया तथा कुटिल स्क्रूज को कंजूसी का पर्याय मान लिया गया. जनमानस में स्क्रूज जैसे मालिकों के प्रति संचित आक्रोश को मुखर अभिव्यक्ति मिलने लगी. इसके साथ ही एक और मुख्य बात मजदूरों को यह समझ में आने लगी कि अपनी बेहाली और दुर्दशा के वे या उनका भाग्य जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उसकी जिम्मेदार वह व्यवस्था है, जो पूंजी को सीमित हाथों में कैद करने का अवसर देती है. वे समझने लगे कि इस अवस्था से उभरने के लिए उन्हें स्वयं ही प्रयास करने होंगे.
डिकेन्स के मेनचेस्टर दौरे से पहले ही बा॓ब क्रेस्टियों का एक समूह अपने परिजनों के साथ, वहां से मात्र सतरह किलोमीटर दूर रोशडेल में अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए निंरतर बैठकें करता आ रहा था. बैठकों में मजदूरों की समस्याओं तथा उनसे मुक्ति के बारे में विचार होता था. उसी बैठक में एक दिन जा॓न कार्सव ने सहकारी समिति के गठन का सुझाव दिया. उस सुझाव पर सभा की सहमति भी बन गई. यह 1843 की सर्दियों की बात है. बा॓ब के प्रस्ताव पर विचार के लिए एक और सभा का आयोजन किया गया, वह बैठक क्रिसमस से कुछ ही दिन पहले रोशडेल में टोड लेन के निकट बीवर्स आर्मस, चीतम स्ट्रीट, के पते पर वह बैठक आयोजित हुई. सभा में मौजूद सभी लोगों ने सर्वसम्मिति से निर्णय लिया कि कारखाना मालिकों की अनुकंपा की प्रतीक्षा में निरंतर दुःख सहने से अच्छा है, अपने ही विवेक एवं श्रम के आधार पर प्रयास शुरू किए जाएं. पूंजीपति मदद के लिए आगे आएंगे, मजदूरों का यह विश्वास तो कभी का टूट चुका था. उस सभा में सहकारी समिति बनाने के निर्णय को अनुमति मिल गई. जिसका मुख्य उद्देश्य बनाया गया ग्राहकों को शुद्ध, पवित्र पूरे माल की आपूर्ति. वह 15 अगस्त 1844 का दिन था. बाकी दिनों से कहीं अधिक पवित्र और उम्मीदों से भरा हुआ.
सहकारी समिति की बात करना, उसके विचार को आगे चलाना अलग बात थी, उसके लिए पूंजी का प्रबंध करना अलग बात. मगर जहां चाह वहां राह. मजदूरों ने बैठक के दौरान निर्णय किया कि प्रत्येक मजदूर को जो समिति का सदस्य बनना चाहता है, समिति के कोष में न्यूनतम एक डा॓लर का निवेश करना होगा. एक-एक पेनी के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मजदूरों के लिए डा॓लर की रकम बहुत बड़ी थी. तब यह सुझाव भी आया कि इसके लिए कारखाना मालिकों से उधार लिया जाए. जो उधार देने में आनाकानी करें, उन्हें हड़ताल या धरना-प्रदर्शन के माध्यम से एडवांस देने के लिए विवश किया जाए. उस समय जो सदस्यगण काम करें वे यह प्रयास भी करें कि हड़ताल पर गए सदस्यों के हिस्से के पैंस भी बचा सकें. हड़ताल की धमकी मिलने पर कुछ कारखाना मालिक एडवांस देने को सहमत हो गए. मगर कुछ ने एकदम इंकार कर दिया. इसपर मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष भी हुआ. इसपर कुछ मजदूर निराश होकर समिति के प्रस्ताव से पीछे हटने लगे. कुछ अभी भी उम्मीद बांधे रहे. प्रत्येक सप्ताह दो पैंस की रकम लक्ष्य को देखते हुए पर्याप्त नहीं थी. हालांकि कुछ कारखाना मालिक उतनी रकम एडवांस के रूप में देने को तैयार थे, जबकि कुछ इस मांग को पूरी तरह नकार चुके थे. आखिर मजदूरों तथा मालिकों के बीच यह समझौता हो सका कि उतनी रकम मालिकों की ओर से मजदूर संगठन को एडवांस के रूप दी जाएगी. जहां से सदस्य उस राशि को उधार के रूप में ग्रहण कर सकते हैं.16
दो पेंस की रकम उस समय अथिकतर कामगारों की लगभग दो सप्ताह की मजदूरी के बराबर थी. कह सकते हैं कि उन बुनकरों के लिए यह रकम भी मामूली न थी. इसे उगाहने के लिए तीन व्यक्ति नियुक्त किए गए, जो प्रत्येक सोमवार सदस्यों से रकम लाकर खजांची के पास जमा कर देते थे. हालात को देखते हुए एक पाउंड की शेयर निधि जुटाना भी कठिन प्रतीत हो रहा था. सदस्य प्रति सप्ताह दो पैंस जमा करने में भी नाकाम हो रहे थे. कई बार ऐसे भी अवसर आए जब सदस्यों पर निराशा हावी होने लगी थी. उस समय यह विचार भी आया कि समिति के गठन का विचार फिलहाल स्थगित कर दिया जाए तथा विकास के वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचा जाए. साथ ही अभी तक जमा की गई रकम, उसके सदस्यों को लौटा दी जाए. कुछ सदस्य तो हताश होकर उस समय तक जमा कराई गई शेयर-निधि वापस भी मांगने लगे थे.17
यह प्रतिकूल स्थिति थी. लेकिन उम्मीदों एवं घनी निराशाओं के बीच मजदूरों का संघर्ष चलता रहा. इस बीच चार्ल्स हावर्थ बिना समय खोए तेजी से समिति के लिए विधान की रचना में लगा था. विपरीत स्थितियों और आस-निराश के बीच डोलते उस छोटे से समूह के लिए पहला पड़ाव आया 24 अक्टूबर 1844 को, जब हावर्थ द्वारा बनाए गए नियमों को रजिस्ट्रार आ॓फ फैमिली सोसाइटीज द्वारा पंजीकृत कराके, नियमों की उस व्यवस्था को संसद के अधिनियम के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था की पहचान दी गई. इस प्रकार रोशडेल कोआपरेटिव इक्वीटेवल सोसाइटी की नींव रखी गई. जिसने इंग्लेंड में सहकारिता आंदोलन का सूत्रपात किया जो कुछ ही वर्षों में पूरी दुनिया में फैलता चला गया. आगे चलकर सहकारिता आंदोलन में नए सुधार हुए. नए-नए विचार भी आए. मगर उसकी मूल भावना वही रही, जो उन बुनकरों द्वारा पहली सहकारी समिति के गठन के समय दर्शायी गई थी.
और इस प्रकार दिसंबर तक रोशडेल पायनियर्स मिलकर प्रारंभिक 28 पाउंड की पूंजी जमा करने में कामयाब हो गए. उपभोक्ता भंडार के लिए समिति ने टोड लेन स्थित एक पुरानी मिल के मालिक मिस्टर डनलप से बात की. मिल हालांकि वर्षों पहले बंद होकर खंडहर में बदलने लगी थी. तथापि वह उसे किसी समिति को किराये पर देने को तैयार न थे. अंततः एक उपाय निकाला. समिति के ही एक स्थायी सदस्य के नाम पर उस गोदाम के भूतल स्थित 23 फुट चैड़े तथा 50 फुट लंबे स्थान को तीन वर्ष के लिए किराये पर लिखवा लिया गया. किराया रखा गया था—दस पाउंड प्रति वर्ष. आगे चलकर उस स्थान के अगले हिस्से, 23 फुट चैड़े तथा सतरह फुट गहरे स्थल, को दुकान के रूप में प्रयोग में लाया गया. शेष स्थान को भंडार तथा मीटिंग आदि के उपयोग के छोड़ दिया गया.
यहां प्रश्न हो सकता है कि सहकारिता, जिसने आगे चलकर अपनी उपयोगिता उद्योग, व्यापार, सेवा, संस्कृति, कल्याण आदि अनेक क्षेत्रें में प्रदर्शित की, उसकी पहली इकाई का आरंभ उपभोक्ता भंडार के माध्यम से ही क्योंे हुआ? उस समय मजदूरों की अन्य समस्याएं भी गंभीर थीं. सहकारिता आंदोलन के विस्तार एवं उसकी प्रवृत्ति के बारे में विशिष्ट चर्चा तो आगे की जाएगी. यहां यह बता देना ही पर्याप्त होगा कि विभिन्न देशों में सहकारिता का विस्तार उन देशों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थितियों के अनुसार ही हुआ. दूसरे शब्दों में एक बार उपयोगिता सिद्ध हो जाने के पश्चात विभिन्न देशों, समाजों ने सहकारिता का उपयोग अपनी तरह से, अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप ही किया. लेकिन थोड़े-बहुत परिवर्तन के बावजूद उनका विधान रोशडेल पायनियर्स से प्रेरित ही रहा. यह बात भी दृष्टव्य है कि स्वयं रोशडेल इक्वीटेविल पायनियर्स सोसाइटी की नियमावली का मुख्य ढांचा (Manchester Rational Sick and Burial Society) से प्रेरित-प्रभावित था.18 रोशडेल पायनियर्स द्वारा उसमें मामूली परिवर्तन किए गए थे. उत्पादकता सहकारिता आरंभ करने के पीछे मुख्य कारण तो यह था कि जनसाधारण दुकानदारों की मनमानी और उनके द्वारा खाद्यपदार्थों में की जाने वाली मिलावट से परेशान था. इसीलिए उपभोक्ता भंडार को मजदूरों में कामयाबी मिलने की संभावना अधिक थी. दूसरे सीमित पूंजी द्वारा वे उद्योगपतियों को चुनौती देने में समर्थ ही नहीं थे.
खरीदे गए सामान के अनुपात में लाभ का विभाजन हावर्थ का मौलिक विचार था. वही आगे चलकर सहकारिता के प्रसार में सहायक बना. इसलिए समिति के विधान में लाभ के न्यायिक बंटवारे का विशद् उल्लेख किया गया था. बावजूद इसके उपभोक्ता भंडार की शुरुआत के पीछे रोशडेल पायनियर्स की आर्थिक लाभ कमाने की इच्छा गौण ही थी. वस्तुतः गरीबी, कुपोषण और बेकारी के अतिरिक्त मजदूरों की मुख्य समस्या थी—घटिया, मिलावट-युक्त खाद्य साम्रगी की उपलब्धता, वह भी औने-पौने दामों में. स्पष्ट है कि रोशडेल के उन मजदूर बुनकरों ने अपनी रोजमर्रा की परेशानियों से मुक्ति के उपाय के रूप में सहकारिता को चुना था. समिति के माध्यम से—
‘उनका तात्कालिक लक्ष्य था—उचित मूल्य पर श्रेष्ठतर गुणवत्ता के भोज्य-पदार्थों की उपलब्ध्ता, साथ ही कुछ रोजगार तथा सहकारी प्रयासों द्वारा होने वाले लाभ के माध्यम से एक समुदायिक इकाई की स्थापना, जहां पर रहने और काम करने की स्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर हों. दूसरे शब्दों में वे एक शैतानी मिल के भीतर अपने लिए नए तीर्थ (येरोशलम) का निर्माण करना चाहते थे.’19
समिति के सदस्यों में चार्ल्स हावर्थ आदि कुछ तो पुरानी रोशडेल फ्रैंडली को-आ॓परेटिव समिति के सदस्य रह चुके थे, जबकि कुछ सदस्य डा॓. विलियम किंग के समाचार पत्र ‘दि को-आ॓परेटर’ के प्रभाव से उससे जुड़े थे. कुछ चार्टिस्ट आंदोलन से ही एक-दूसरे के साथ थे जबकि कुछ मद्यनिषेद्ध आंदोलनों के दौरान आपस में जुड़े थे. ये सभी अपनी परिवर्तनकारी निष्ठा के कारण समिति के संपर्क में आए थे. पेशे के अनुसार भी उनमें विभिन्न व्यवसायों से संबंधित, यथा—दर्जी, मोची, जा॓इनर, केबीनेट बनाने वाले, इंजीनियर आदि सम्मिलित थे. तथापि उनमें आधे से अधिक सदस्य कपड़ा उद्योग से जुड़े साधारण कारीगर थे. वे सभी लगभग एकसमान स्थितियों से गुजरे हुए, इसलिए उनकी समस्याएं भी एक जैसी ही थीं. इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन अठाइस सदस्यों में न केवल एकता एवं समर्पण का भाव था, बल्कि अपने लक्ष्य के लिए पूरी निष्ठा एवं त्याग के साथ जुटे रहने का साहस भी था. बावजूद इसके लोगों का समर्थन पाने के लिए उन्हें काफी दिनों तक अनेक कठिनाइयों से गुजरना पड़ा था.
उस महत्त्वपूर्ण अवसर को शब्दों में चित्रित करते हुए जार्ज हा॓लस्की, जो रोशडेल पायनियर्स की प्रारंभिक टीम का सदस्य रह चुका था, ने लिखा है—
‘सहकार को समर्पित कुछ व्यक्ति अंतिम निर्णय करने की चाहत में गोदाम के सीलन और उदासी भरे कक्ष में उत्साहपूर्वक मिले. कि जैसे कोई संसद के विरुद्ध जमा हो रहे षड्यंत्रकारी हों. वे अपनी तैयारी दिखाते हुए इस बात पर बहस कर रहे थे कि अंत में दुकान बंद करने की जिम्मेदारी कौन संभालेगा. उनमें से एक इस काम को पसंद नहीं करता था, तो दूसरे को दुकानदारी के काम से ही नफरत थी. लेकिन उनमें से किसी के पास भी आगे बढ़ने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं था. उनमें देर तक कड़वी बहसबाजी चलती रही. लेकिन कुछ देर बाद पूरी टोडलेन उनके ठहाकों से गूंज रही थी.’20
ध्यातव्य है कि उन मजदूरों की दुर्दशा का मुख्य कारण उनकी गरीबी थी. शिक्षा एवं सांस्कारिक प्रशिक्षण का भी उनमें अभाव था. तथापि यह भी सत्य है कि उस समूह को सहकारिता के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष की पूरी जानकारी थी. कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनके जुड़ाव के प्रमुख कारण आर्थिक न होकर नैतिक थे. प्रकारांतर में इसीलिए सहकार को सभी राष्ट्रों एवं धर्मालंबियों ने आंदोलन के रूप में अपनाने पर जोर दिया, क्योंकि उसमें नकार के स्थान पर समर्थन एवं सहयोग से काम लिया जाता था. उनका संगठन भूख के बजाय आदर्शवाद से प्रेरित था.21 सहकार उन्हें किसी एक व्यक्ति के कल्याण का न सोचकर पूरे समूह के कल्याण का आश्वासन देता था, इसलिए सामूहिकता की भावना को भी बढ़ाता था. हालांकि इसी तरह की नैतिक व्यवस्थाएं पूर्वी एवं पश्चिमी धार्मिक-नैतिक शास्त्रें में भी मौजूद रही हैं, परंतु पूंजीपतियों ने अपने प्रभाव एवं धन के दुरुपयोग द्वारा उन सभी नैतिक व्यवस्थाओं को शोषण के हथियार के रूप में प्रयुक्त करना आरंभ कर दिया था. सहकार चूंकि प्रत्येक व्यक्ति को सहभागिता के साथ संवाद का अवसर भी उपलब्ध कराता था, इसलिए सहकारिता को उन परिस्थितियों में आदर्श माना गया था.
ओमप्रकाश कश्यप

1.  ‘…certain working men in Rochdale have practiced the art of self-help, and of keeping the “wolf from the door.’— George Jacob Holyoake in History of The Rochdale Equitable Pioneers.
2.  ‘…taken their own affairs into their own hands.’— Robert Peel.
3.  ‘…from all around came reports of weavers clothed in rags, who had sold all their furniture, who worked 16 hours a day yet lived on a diet of oatmeal, potatoes, onion porridge and treacle’— E. P. Thompson, The Making of the English Working Class, (Penguin, Harmondsworth, 1968)— quoted in Johnston Birchall, Co-op: The People’s Business [Manchester University Press, Manchester, UK, 1994), p. 34].
4.  ‘No minimum wage existed and salaries were commonly below the equivalent of 10 pence per week in modern terms.’— Ibid
5.  ‘Moreover, pollution had increased and public sanitation system was both poor in quality and quantity. In fact, in 1848 the mean life expectancy in Rochdale was only 21 years, six years less than the English national average.’— Ibid, p. 35.
6.  ‘…to give birth standing up, their arms round two other women, because they had no change of bedclothing; the very people who had spent their lives weaving clothes and blankets for the world had come down to this, rags on their backs and no blankets on their beds.’ —Birchall, pp. 35-37.
7.  ‘Societies might be formed for the foregoing purpose ‘or for any other purpose which is not illegal.’— The Present Application of the Rochdale Principles of Co-operation (1937).
8.  ‘The idea of the ‘divi’ came to him one sleepless night – he disturbed his wife’s sleep too, with shouts of: “I’ve got, I’ve got it!’— web material published by Heywood Advertiser,
9.  ‘In life he was a useful citizen; a freethinker in religion; in political and social questions an advanced and consistent reformer; a good husband and father; a true, constant, and faithful friend.’— William Cooper’s last tribute quoted from web material by Rochdale Council, UK.
10.  There is no death: what seems so is transition;
This life of mortal breath
Is but the suburb to the life Elysian,
Whose portal we call death. — The Co-operator
11.   Here lies John, and with him Mary,
Cheek by jowl and never vary;
No wonder that they so agree,
John wants no punch, and Moll no tea.—

Quoted by George Jacob Holyoake in the History of the Rochdale Pioneers :
12.   ‘He never flinched from the post assigned to him, although the foreman of the works at which he was employed was a shopkeeper; yet he still served the Store with a fidelity rarely, if ever, surpassed by a true believer in the emancipation of the working classes by their own exertions. He frequently left his own employment, at which he could then earn 7s. to 8s. per day, to work for love of the cause, until the Society could afford to pay him something like 3d. per hour for his labour. For four to five years he was superintendent and purchaser. Although, like many a flower, ‘born to blush unseen,’ his services have never been acknowledged; or rather say, until the present panic, which almost annihilated the block printing business, brought the old boy so low in his finances that a notice was given that an application would be brought before the quarterly meeting to make him a present of ten pounds, to assist him to stave off his enemy, poverty; but a generous committee did better, they found him employment at one of the Branch Stores, where he was numbered among the servants of the Society, contented to serve where he once commanded.’— The History of the Rochdale Pioneers: by George Jacob Holyoake.
13.   ‘These evils may be cured: and the remedy is in our own hands. The remedy is CO-OPERATION.’ — Dr. William King (b.1786, d.1865) in The Co-operator.
14.   Whoever wants to be the highest, Must first come down to be the lowest;
And then ascend to be the highest, By keeping down to be the lowest.
(A songs (c. 1795) of Shaker commune formed by the New Light followers of Ann Lee an immigrant English factory worker and a Quaker in 1793, quoted from History of Work Cooperation in America by John Curl.)
15.   ‘Christmas has never been the same.’— by David J. Thompson wrote in The Nignt The Light Were Lit!
16.   ‘However, at twopence per week (240 pence=20 shillings=1 pound) the accumulation was slow, and members began to despair to such an extent that some suggested that the fund be dissolved and redistributed back to the contributors.’— G. J. Holyoake, The History of the Rochdale Pioneers, (Charles Scribner’s Sons, New York, 1918), 10th ed., p. 4/9.
17.   ‘While some employers made the required advances, many did not, and the effort failed. They then resolved to take the twopence that they were paying into the Weaver’s Union and collect it into their own fund.’— Johnston Birchall, Co-op: The People’s Business (Manchester University Press, Manchester, UK, 1994), pp.-41
18.   ‘From the Rational Sick and Burial Society’s laws, a Manchester communistic production, they borrowed all the features applicable to their project, and with alterations and additions their Society was registered….’— G. J. Holyoake,
19.   ‘Their immediate aim was to get better quality food at decent prices and give some of them jobs. Their ultimate goal was to use the co-op’s profits to create their own community where working and living conditions would be better. Amongst the “satanic mills” they would build their “New Jerusalem.”— The Night The Lights Were Lit, by David J. Thompson.
20.   ‘A few of the co-operators had clandestinely assembled to witness their denouement: and there they stood, in that dismal lower room of the warehouse, like the conspirators under Guy Fawkes in the Parliamentary cellars, debating on whom should devolve the temerity taking down the shutters, and displaying their humble preparations. One did not like to do it, and another did not like to be seen the shop when it was done: however, having gone so far there was no choice but to go farther, and at length one bold fellow, utterly reckless of consequences, rushed at the shutters, and in a few minutes Toad Lane was in a titter.’— G. J. Holyoake.
21.   ‘Hence the members of this new group had a significant amount of experience in cooperation and related reform-minded efforts, and, despite all the hardship described above, were probably driven more by idealism than by hunger’.— Johnston Birchall, Co-op: The People’s Business pp.-42

सामाजिक गतिशीलता एवं अंतर्विरोध

स्वाधीन भारत में हम अक्सर अपनी सार्वजनिक असफलताओं व भटकावों पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं. इन असफलताओं व भटकावों के पीछे जो कारण निहित हैं, उनमें से एक प्रमुख कारण यह है कि हम अपने अंतर्विरोधों को समाप्त कर, उनमें खप रही ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने में विफल सिद्ध हुए हैं. ज्ञातव्य है कि सामाजिक अंतर्विरोधों की जड़ें गहरी और परंपरा से पोषित होती हैं. इन्हें एकाएक दूर कर पाना संभव नहीं होता. अंतर्विरोधों क रूप से निष्प्रभावी कर दिया था. सामाजिक अंतर्विरोधों के जन्मदाता कारक धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, औपनिवेशिक आदि किसी भी प्रकार के हो सकते हैं. ये स्पष्ट भी हो सकते हैं और अस्पष्ट भी. ये स्वाभाविक रूप से उत्पन्न और/या प्रायोजित भी हो सकते हैं. मुल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी कभीकभी राज्य भी, सामाजिक अंतर्विरोधों को हवा देने लगता है. ज्योतिष शास्त्र को विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने तथा घटती सरकारी नौकरियों के बावजूद आरक्षण को चुनावी मुद्दा बनाना कुछ इसी प्रकार के मामले हैं.

भारतीय समाज, जैसा कि हम सभी जानते हैं, विविध संस्कृतियों का समुच्चय है. दूसरे समाजों की अपेक्षा हमारे समाज की संरचना कहीं अधिक जटिल व बहुआयामी है. ऐसे समाज में अंतर्विरोधों की उपस्थिति पूर्णतः स्वाभाविक है. उन पर नियंत्रण तथा उनमें खप रही ऊर्जा को सही दिशा देने का दायित्व केवल राज्य का नहीं है. यह, इस दिशा में कार्यरत सभी संस्थाओं और बुद्धिजीवियों की भी जिम्मेदारी है. विचारणीय यह भी है कि सत्ता एवं शक्ति के बल पर, अंतर्विरोधों से मुक्ति पाना प्रायः संभव नहीं होता. अंतर्विरोधों का शमन करने का एकमात्र रास्ता, परस्पर विरोधी शक्तियों को संवाद के स्तर तक लाकर, ऐसे संवादों की निरंतरता बनाए रखनरे में ही निहित होता है.

यह मान लेना कुछ विचित्रसा लगता है कि समाज तात्कालिकता के सिद्धांत के आधार पर विकसित होता है. यह कुछ वैसे ही संकल्पना है जैसी किसी गांव में बिजली आ जाने मात्र से ही उनके संपूर्ण कायापलट की कल्पना कर बैठना. चूँकि समाज संबंधों की बहुआयामी और जटिल संरचना है, इसलिए सामाजिक विकास की व्याख्या किसी अकेले सिद्धां के आधार पर नहीं की जा सकती दूसरे शब्दों में ऐसा कोई नियम नहीं है जो सामाजिक गतिशीलता के सभी पहलुओं को उनकी संपूर्णता के साथ परिभाषितव्याख्यायित कर सके. तात्कालिकता समाज की बृहद चेतना में स्फुरण मात्र ही उत्पन्न कर पाती है. सामाजिक परिवर्तन को नियंत्रित करने वाली शक्तियों में से कुछ तो इस स्फुरण को ऊर्जा प्रदान करने का कार्य करती हैं. जबकि कुछ उनके विरोध में खड़ी हो जाती हे. समर्थन और विरोध के सिलसिले के बीच ही सामाजिक परिवर्तन अपना स्वरूप ग्रहण करते हैं सामाजिक विकास की प्रवत्ति वर्तुलाकार स्प्रिंग जैसी होती है. जिसमें संस्कृति और परंपराएँ अतीत से जुड़े रहने का आग्रह करती हैं. जबकि प्रौद्योगिकी और अपने लिए अधिकतम सुखसुविधा जुटा लेने की आकांक्षा इसे आगे की ओर बल प्रदान करती है हर बार ऐसा लगता है कि विकास चक्र अपनी पुरानी स्थिति में लौट आया है, मगर यह सिर्फ भ्रम होता है. इस बीच परिस्थितियाँ बदल चुकी होती हैं. परिवर्तन चक्र आगे की ओर बढ़ चुका होता है. संस्कति या परम्पराओं को सामाजिक गतिशीलता का प्रतिद्वंद्वी मान लेना भी जल्दबाजी भरा निर्णय होगा. संस्कृति तथा परंपराएँ मात्रा परिवर्तनों के नियंत्रक एवं मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है. इसके बावजूद कि जो नए परिवर्तन समाज में होते हैं, वे संस्कृति और परंपराएँ मात्र परिवर्तनों के नियंत्रक व मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है. इसके बावजूद कि जो नए परिवर्तन समाज में होते हैं, वे संस्कृति और परंपराओं को भी पहले जैसा नहीं रहने देते. इस प्रकार विकास के साथसाथ, संस्कृति और परंपराओं के नवीकरण का दौर भी चलता रहता है. आगे हम समाज की गतिशीलता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों प्रौद्योगिकी, राजनीति, धर्म व जातीयता तथा उनके बीच पल रहे अंतर्विरोधों पर विचार करेंगे.

समाज की गतिशीलता को परखने का एक पैमाना उस समाज में प्रौद्योगिकी विकास की दर भी है. उत्पादन प्रणाली में प्रौद्योगिकी एवं अन्य कारणों से आई जटिलता, समानुपातिक रूप में अन्य सामाजिक जटिलताओं को भी जन्म देती है. प्रौद्योगिकी का अपरिष्कृत यानी कम जटिल रूप मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता था. अभी कुछ दशक पहले तक लुहारबढ़ई आदि ग्रामीण शिल्पकार, अपनी निम्न सामाजिक प्रस्थिति के बावजूद, ग्रामीण समाज व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माने जाते थे. प्रौद्योगिकी विकास का आरंभिक दौर उत्पादन प्रक्रिया में श्रम की लागत घटाने और उसे आरामदेय बनाने पर जोर देता थां उदाहरण के लिए हाथ से बान बंटनेवाले दस्तकारों ने जब गाँव के कारीगरों द्वारा ही बनी बानबटाई मशीन का उपयोग करना शुरू किया तो उत्पादन प्रक्रिया आरामदेय हुई. उत्पादन बढ़ा और कामगारों की उपयोगिता भी पूर्णतः बनी रही. यह छोटीसी मशीन मानवीय श्रम को पूरा सम्मान देती थी. उसके बुद्धि कौशल का मान रखती थी. परन्तु अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मानवीय श्रम को हीनदृष्टि से देखती है. यह मानवीकौशल की उपेक्षा और अवमानना करती है. स्वचालीकरण की अधुनातन खोजें उत्पादनप्रक्रिया का शतप्रतिशत मशीनीकरण करने पर उतारु हैं, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी पर टिके उद्यमों में कर्मचारी की उपयोगिता मशीन की भूल पर नजर रखने तथा भूल होने की स्थिति में उसकी सूचना विशेषज्ञ तक पहुँचाने तक सीमित होकर रह गई है. उत्तरआधुनिक प्रौद्योगिकी इसे भी समाप्त करने को कृतसंकल्प है. यह कर्मिकदक्षता का शून्यीकरण करने जैसी स्थिति है. विकास और संचारक्रांति के नाम पर देश के संरचनात्मक ढांचे को मजबूत किए बिना जो लगभग गैरजरूरी प्रौद्योगिकी समाज पर थोपी जा रही है, वह भी समाज के आधारभूत ढांचे को नुकसान पहुँचाने वाली है, यह बात किसी से छिपी नहीं है.

अत्याधुनिकी प्रौद्योगिकी सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करनेवाले कारणों में प्रमुख है. परन्तु नवीन आविष्कारों पर समाज के मुट्ठीभर लोगों का नियंत्रण तथा इससे होनेवाले लाभ का समाज के वर्गविशेष तक सीमित होकर रह जाना, कल्याणकारी राज्य की आधारमान्यताओं के सर्वथा विरुद्ध है. प्रौद्योगिकी विकास का संकुचित हितों में उपयोग सामाजिक असंतुलन और तदनंतर सामाजिक असंतोष को बढ़ाता है इससे समाज की विकासशीलता में पश्चगामी खिंचाव पैदा हो जाता है.

समाज की जीवंतता का एक लक्षण राजनीति भी है. किंतु हाल के वर्षों में राजनैतिक प्रश्न अचानक इतने महत्त्वपूर्ण हो चुके हैं कि उन्होंने समाज से जुड़े अन्य प्रश्नों को हाशिये पर पहुँचा दिया है. यह एक त्रासदीसा लगता है कि संस्कृतिप्रधान भारतीय समाज, राजनीति को ही सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र कारक मानकर, सत्ताप्रधान समाजों जैसा आचरण कर रहा है. चूँकि यह प्रवृत्ति हमारी संस्कृति के विरुद्ध है, हमारी परंपराएं इसका विरोध करती हैं, इसलिए इससे होने वाले परिवर्तनों को समाज का पूरा समर्थन नहीं मिल पाता. संक्षेप में कहें तो अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणालियों का अतिसंक्रेदित रूप अनियोजित विकास व सामाजिक अंतर्विरोधों को बढ़ावा देता है जो समस्याएँ आज हमें परेशान कर रही हैं, उनके मूल में यही कारण निहित हैं. इसके पीछे बहुतसा दोष हमारे संचार माध्यमों का भी है. ये जिस रूप में जनता के साथ संवाद करते हैं, उसमें से जनता के मूल मुद्दों की प्रतिध्वनि गायब कर दी जाती हे.

आज हम इस बात में खुशी का अनुभव करते हैं कि हमारा लोकतंत्र प्रबुद्ध हो रहा है इसके सीमित फायदे हैं, जिन्हें हम देख भी रहे हैं. परंतु किसी भी देशकाल में राजनैतिक चेतना के उदय को संपूर्ण सामाजिक चेतना के उदय का पर्याय नहीं माना जा सकता. स्वयं गाँधी जी सामाजिक चेतना के विकास को राजनैतिक चेतना से अलग और बढ़कर मानते थे इसलिए उन्होंने कांग्रेस से आजादी प्राप्त होते ही राजनीति छोड़कर सामाजिक उत्थान के लिए जुट जाने को कहा था.

राजनीति की भाँति धर्म भी सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाला मुख्य कारक है. धर्म यद्यपि व्यक्ति की निजी अभिधारणा मात्र होता है. मगर समूह के रूप में यह अक्सर आक्रामकता को प्रोत्साहित करने वाला ही सिद्ध होता है. प्रकट में प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय यही मानता और घोषणा करता है कि सभी धर्मों का मूल स्वरूप एक जैसा है. परम सत्ता एक है. विभिन्न धर्म उसी को पाने के लिए अपने विधिविधानों के अनुसार प्रयत्नशील रहते हैं. परन्तु वास्तविक दृष्टि इस समतावादी दष्टिकोण से भिन्न ही रहती है.

समूह के रूप में धर्म शक्ति का व्रत प्रतीक होता है. अतः शक्ति केन्द्र में सर्वोपरि स्थान पाने की लालसा प्रायः सभी धर्मावलंबियों में होती है. इसी कारण विधर्मी को उसकी इच्छा या अनिच्छा से अपने धर्म या संप्रदाय में खींच लेने की प्रवत्ति प्रायः हर धर्मावलंबी की होती है. धर्मांतरण को विकास का प्रतीक बताकर सामूहिक धर्मांतरण की कोशिशें प्राचीन काल से ही, दुनियाभर में होती रही हैं. परंतु आध्यात्मिक निष्ठा में परिवर्तन और तदनुरूप धर्मांतरण के मामले बहुत कम देखे जाते हैं. जो लोग हिंदू से मुसलमान या मुसलमान से हिंदू बनते हैं, वे इसलिए नहीं कि इस्लाम का भ्रातत्व और समतावादी दृष्टिकोण उन्हें लुभाता है. या हिंदुत्व की दार्शनिक गवेष्णाएँ उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती हैं यदि बाह्य दबाव न हो तो सत्ता केंद्र से जुड़ने या उसका संरक्षण पाने की लालसा ही धर्मांतरण का प्रमुख कारण बनती है. सत्ता से जुड़ा या उसमें रुचि रखने वाला व्यक्ति धर्मांतरण को सत्ता केंद्र के और अधिक निकट पहुँचानेवाले माध्यम के रूप में देखता है. जबकि जीवन की मामूली जरूरतों के लिए कठिन संघर्ष करने वाला व्यक्ति, यह सोचकर धर्मांतरण के लिए सहमत हो जाता है कि इससे उसके जीवनसंघर्ष में कुछ कमी आएगी और प्रकारांतर में वह एक सुखमय जीवन जी सकेगा. धर्मांतरण आमतौर पर स्वयंस्फूर्त नहीं होता. प्रायः यह बाह्यः उत्प्रेरणा के आधार पर ही संभव हो पाता है धर्म और राजनीति का गठजोड़ इस उत्प्रेरण को बढ़ावा देता है. सामाजिक गतिशीलता के भारतीय संदर्भों को समझने के लिए हमें अपने समाज के वर्गीय चरित्र को भी समझना होगा. सामाजिक अंरर्विरोधों को उभारने में इसकी अहम भूमिका रहती है. स्वाधीन भारत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का चयन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह समाज के सभी वर्गों को विकास के एकसमान अवसर उपलब्ध कराएगी. इससे सहअस्तित्व की भावना बढ़ेगी. लेकिन वर्गीय अंतर्द्वंद्वों को मिटाने के लिए कोई असरकारी प्रयास सरकार या राजनैतिक दलों द्वारा नहीं किया गया. संभवतः यह मान लिया था कि लोकतंत्र जो बहुजन की इच्छानुकूल सत्ता परिवर्तन का औजार है, वह समाज और सत्ता के वर्गीय चरित्र में बदलाव के लिए असरकारी सिद्ध होगा. अर्थात् एक राजनैतिक प्रणाली सामाजिक प्रणाली की जिम्मेदारी भी निभा लेगी. यही भूल हमारी वर्तमान समस्याओं के मूल में है. सत्ता परिवर्तन, समग्र सामाजिक परिवर्तन का पर्याय नहीं है, तो भी ऐसा मान लिया गया कि राजनीति के केंद्र में स्थापित होने के पश्चात, सामाजिक प्रस्थिति में भी व्यापक बदलाव संभव हो जाएगा. इसलिए प्रायः सभी सामाजिक संस्थाएँ जनाकांक्षाओं को सशक्त जनांदोलनों में परिवर्तित करने की कोशिश करने की बजाय, राजनीति से जुड़ने या उसका समर्थन पाने में ही अपनी ऊर्जा खपाती रहीं हैं.

भारतीय जनमानस के इसी वर्गीय चरित्र का लाभ उठाने के लिए विभिन्न पूँजीवादी एवं राजनैतिक शक्तियाँ, संस्कृति और अन्य सामाजिक प्रकल्पों की अपने स्वार्थानुकूल व्याख्या करती हैं. संचार माध्यमों का संकुचित सन्दर्भों में और कदाचित अनुचित भी, उपयोग करते हुए ये शक्तियाँ, दीर्घकालिक लाभों के लिए शुरू किए गए आंदोलनों को अल्पकालिक लाभों तक सीमित करने में, सफल हो जाती हैं. आरक्षण और फिर आरक्षण में से आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं को ऐसी कोशिशों के रूप में ही लिया जाना चाहिए. ऐसे अल्पकालिक लाभ, सामाजिक व्यवस्था में युगांतरकारी आमूलचूल परिवर्तन करने में सफल नहीं हो पाते. इसलिए ये सामाजिक अंतर्विरोधों को कम कर पाने में भी अक्षम सिद्ध होते हैं.

विडंबना यह है कि सत्ता शीर्षों पर विद्यमान शक्तियाँ इन अल्पकालिक परिवर्तनों को भी, अक्सर अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखती हैं. इसलिए वे इन प्रणालियों से जो इन परिवर्तनों को प्रोत्साहित करती हैं, या तो उदासीन हो जाती हैं अथवा उनका अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए उपयोग करने का प्रयत्न करती हैं जिससे उन प्रणालियों में और बाहर असंतोष पनपने लगते हैं. जिससे समाज की गतिशीलता बाधित होती है. यही कारण है कि आमचुनावों के दौरान जहाँ देश के अभिजात वर्ग में, मतदान के प्रति उदासीनता छाई रहती है, वहीं उत्पीड़ित और सत्ता से वंचित वर्ग में, इस लेकर उत्सव का जैसा माहौल रहता है. दक्षिणी दिल्ली की पाॅश कालोनियों और यमुनापार की झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों में, मतदान के प्रतिशत में भारी अंतर से, यह परिवर्तन साफ देखा जा सकता है. एक ओर तो प्रगतिशील शक्तियाँ देश को अंधविश्वास और समाज के वर्गीय चरित्र से छुटकारा दिलाने के लिए प्रयत्नशील हैं, तो दूसरी ओर जनतंत्रीय और वैज्ञानिक सोच को परंपरा और रुढ़ि में ढाल देने की कोशिश भी प्रतिरोधी शक्तियों द्वारा जारी है. सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित लोग, एक ओर अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लोगों को धार्मिक व जातीय आधार पर बाँटकर, उनके आंदोलन को निष्प्रभावी करने की कोशिशें भी बराबर चल रही हैं. सामाजिक गतिशीलता के भटकाव का सबसे बेहतर उदाहरण और क्या होगा कि कुछ वर्षों पूर्व, जब सरकारी और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कंप्यूटर का प्रयोग नाममात्र को होता था, तब भी महानगरों के अखबार, चौराहे और गलियाँ कंप्यूटर द्वारा जन्मपत्री बनाने के विज्ञापनों से भरे रहते थे विज्ञान की आधुनिक और चमत्कारी खोज का लाभ उपयोग कर, देश की आम जनता जिसका बहुलांश अनपढ़ है, को और अधिक रूढ़िवादी बनाया जा रहा था. क्या इसके पीछे सिर्फ व्यावसायिक कारण ही थे? और यदि इसके निहितार्थ कुछ और भी थे तब देश के बुद्धिमान समाजशास्त्री इसे चुपचाप क्यों देखते रहे? दरअसल व्यावसायिक शक्तियां सबसे पहले अपने समय के सोच को नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं, ताकि उनके विरोध की कम से कम संभावना हो, और यदि ऎसी स्थिति बने तो उसे आसानी से नियंत्रित किया जा सके. क्योंकि उस अवस्था में समाज का स्थापित बुद्धिजीवी वर्ग या तो मौन धारण कर लेता है, अथवा वह समर्थन और विरोध में इतना बंट जाता है कि परिवर्तन में उसकी भूमिका गौण हो जाती है.

अंत में सिर्फ इतना कि हमारा समाज इन दिनों अंतर्द्वंद्वों के एक दौर से गुजर रहा है जो इस देश में प्रबुद्ध होते जनतन्त्र का लक्षण है. अब तक की तमाम निराशाओं के बावजूद, भारतीय समाज में चल रही उथलपुथल यह विश्वास जगाती है कि हम कोई जड़ समाज नहीं हैं और जब तक समाज के उत्पीड़ित और वंचित वर्ग के मन में असंतोष तथा आँखों में सुनहरे कल का सपना शेष है, तब तक सामाजिक परिवर्तनों की धारा को, न तो कोई रोक पाएगा, न ही इनकी दिशा बदलने में कामयाब हो सकेगा.

ओमप्रकाश कश्यप

समकालीन दर्शन तथा उसकी प्रमुख समस्याएं

इस आलेख के शीर्षक के रूप में मैंने ‘समकालीन दर्शन तथा उसकी प्रमुख समस्याएं’ को चुना है. किंतु यह आरंभ में ही स्पष्ट करना उचित होगा कि इसमें समकालीन दर्शन के अधिकांश संदर्भ पाश्चात्य दर्शन से आएंगे. कुछ पाठकों को यह अरुचिकर लग सकता है. विशेषकर उन्हें जो भारत की समृद्ध चिंतनपरंपरा से परिचित हैं, मगर कदाचित अपने पूर्वग्रहों के कारण, गत एक हजार वर्षों से उसमंे उत्पन्न बौद्धिक ठहराव की स्थिति को वे या तो स्वीकारना नहीं चाहते अथवा उन्हें इसका बोध ही नहीं है. यह एक विडंबना ही है कि पांचवीछठी शताब्दी तक दुनिया को दर्शन का पाठ पढ़ाने वाले और इस आधार पर विश्वगुरु के पद पर दावेदारी गांठने वाले भारत में, शताब्दियों से कोई नया दार्शनिक विचारयानी ऐसा कोई विचार जिसको भारतीय दर्शन परंपरा का मौलिक विस्तार माना जा सके, पनप ही नहीं पाया. यहां तक कि जैन और बौद्ध दर्शन भी, जिन्होंने ईसा से पांचछह शताब्दी पहले से लेकर छठी शताब्दी बाद तक, न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय चिंतन को अभिनव पहचान एवं गरिमा प्रदान की थीµजिसके कारण वे देश भूभारती को आज भी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, बाद में धीरेधीरे अपनी स्वाभाविक चमक खोने लगे थे. उसके बाद का तो पूरा का पूरा युग वैचारिक जड़ता, निरर्थक बहसों, कर्मकांडों, धर्म के नाम पर थोपे गए ढकोसलों तथा सांप्रदायिक उन्मादों का है. इस संबंध में डा॓. हजारी प्रसाद द्विवेदी की टिप्पणी दृष्टव्य है. उन्होंने आठवीं शताब्दी बाद के युग को टीका युग की संज्ञा देते हुए, उसकी वास्तविक स्थिति पर बहुत यथार्थपरक ढंग से लिखा है

दसवीं शताब्दी के बाद, बल्कि आठवीं शताब्दी के बाद ही, हमारे देश में टीका युग चलने लगा. यानी कोई मौलिक चिंतन, नए सिरे से सोचना संभव नहीं, बल्कि पुराने ग्रंथों में जो कुछ कहा गया है, उसका हम भाष्य कर सकते हैं, टीका कर सकते हैं, टीका की टीका, उसकी भी टीका, सातसात पुश्तों तक टीकाएं चलती रहीं. टीकाओं का युग आ गया. ज्ञान की धारा अवरुद्ध हो गई. यह टीका वाली प्रवृत्ति, गुरु नानक का जिस समय आविर्भाव हुआ था, उस समय अपनी चरम अवस्था में पर आई हुई थी. नतीजा यह हुआ कि हिंदु शास्त्रों के विपुल भंडार में से केवल तीन ग्रंथ चुन लिए गएइनको प्रथानत्रयी कहते हैं. तीन ग्रंथ या ग्रंथ समूह. इनमें से एक है उपनिषद अथवा दस या ग्यारह उपनिषद, जिनपर आदि शंकराचार्य ने अपना भाष्य लिखा था; अद्वैत मत के प्रतिपादन के लिएदूसरी श्रीमद् भगवद्गीता, और तीसरा वेदांत सूत्रबादरायाण का लिखा हुआ वेदांत सूत्र.’1

स्मरणीय है कि वैदिक मुनियों से लेकर, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, यूनानी दार्शनिक थेल्स, सुकरात, प्लेटो और अरस्तु आदि के समक्ष प्रमुख दार्शनिक समस्याएं परमसत्ता, भ्रांति, ज्ञान, सद्गुण, सृष्टि, मनस् और इनके औचित्य आदि की व्याख्या को लेकर थीं. प्राचीन मनुष्य यह सोचकर कि मैं क्यों जन्मा? इस सृष्टिमात्र का औचित्य क्या हैआश्चर्य से भर जाता था. प्राचीन भारतीय मुनियों ने यद्यपि हिरण्यगर्भ सूक्त के माध्यम से सृष्टि की उत्पत्ति की व्याख्या करने का प्रयास अवश्य किया था. तथापि सृष्टि और जीवन की उत्पत्ति तथा इनके औचित्य से जुड़े अनगिनत प्रश्न मनीषियों को सहस्राब्दियों से उलझाते रहे हैं. प्राचीन भारतीय मुनियों से लेकर यूनानी और अरबी दार्शनिकों ने अपनेअपने अनुभव एवं बौद्धिक सीमाओं के अनुसर इस प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास भी किया, मगर एक भी विद्वान इस विराट सृष्टि से जुड़े अनगिनत प्रश्नों का सर्वमान्य उत्तर देने में समर्थ न हो सका. महात्मा बुद्ध ने तो आत्मा, परमात्मा संबंधी समस्याओं को ‘अव्यक्तअव्याख्येय’ कहकर इनसे जुड़े प्रश्नों को सतत टालते रहने का प्रयास भी किया. जबकि जैन दर्शन ने स्यादवाद् के माध्यम से समस्त संभावनाओं को सम्मिलित रूप से परखकर एक आमराय बनाते हुए, सत्य तक पहुंचने का सुझाव दिया. मृत्यु का भय मनुष्य को इस संसार से दूर भागने, अमरता की खोज के उकसाता रहा है. मृत्योपरांत के सत्य को जानने की अभिलाषा भी विभिन्न धार्मिकदार्शनिक विश्वासों के क्रमिक विकास का आधार बनी. उसी के आधार पर विभिन्न सांस्कृतिक प्रतीकों, कर्मकांडों, स्वर्गनर्क, अवतारवाद, पापपुण्य आदि की प्रासंगिकताएं गढ़ी गईं.

नवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में आदि शंकराचार्य(788-820) ने वेदों की नवीन व्याख्या करते हुए वैदिक दर्शन को नए सिरे से व्याख्यायित करने का युगपरिवर्तनकारी कार्य किया था. इसके लिए उन्होंने प्रायः सभी प्रमुख उपनिषदों, श्रीमद्भागवद् और बह्मसूत्रों का भाष्य लिखा. अद्वैत दर्शन की स्थापना के लिए उन्होंने उस समय के अनेक विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ में हिस्सा लिया, जिसमें उनका मंडन मिश्र के साथ हुआ शास्त्रार्थ जगत्प्रसिद्ध है. अपने मत के प्रतिपादन के लिए वे वस्तुतः अपने समकालीन मीमांसा दर्शन, जो उन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय दर्शन थाके प्रकांड विद्वान कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ करना चाहते थे. कुमारिल भट्ट मंडन मिश्र के शिष्य थे. मंडन मिश्र स्वयं वेदशास्त्र एवं कर्मकांड के ज्ञाता विद्वान थे. कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ की कामना लिए शंकराचार्य जिस समय उनसे मिलने प्रयाग पहुंचे, वे घोर प्रायश्चित भावना का शिकार होकर एक कंदरा में स्वयं को मद्धिम अग्नियुक्त चिता के आगे समर्पित कर चुके थे. वहां पहुंचकर शंकराचार्य को ज्ञात हुआ कि कुमारिल भट्ट ने बौद्ध दर्शन को समझने तथा तर्कशास्त्र के दौरान बौद्ध मतालंबियों को परास्त करने की कामना के साथ उसका अध्ययन किया था. किंतु वैदिक परंपरा में किसी एक गुरु के अनुशासन में रहते हुए, बिना उसकी अनुमति के विद्याध्ययन करना पाप की श्रेणी में आता है. जैसे ही कुमारिल भट्ट को इसका बोध हुआ, उनका मन आत्मग्लानि से भर गया. तीव्र पायश्चित भावना से ग्रसित होकर उन्होंने खुद को धीमी चिता के हवाले कर दिया. जिस समय शंकराचार्य उनसे मिलने पहुंचे, कुमारिल भट्ट स्वयं को अग्निसमर्पित कर चुके थे. उन्होंने शंकराचार्य को अपने गुरु मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने की सलाह दी. तब वे उनसे मिलने के लिए प्रस्थान कर गए जो उस समय महिष्मति(आजकल सहरसा, बिहार), में विहार कर रहे थे. बड़ेबड़े दिग्गज विद्वानों की उपस्थिति में शंकराचार्य और मंडनमिश्र का शास्त्रार्थ पंद्रह दिनों तक चलता रहा. अंततः मंडनमिश्र की पराजय हुई. इसपर उनकी पत्नी भारती मिश्र ने, जो उस शास्त्रार्थ में निर्णायक की भूमिका निभा रही थीं, यह कहकर कि अर्धांगिनी होने के नाते उनपर विजय पाए बिना उनके पति मंडन मिश्र को पराजित नहीं माना जा सकता, शंकराचार्य को पुनः बहस के लिए आमंत्रित किया. शास्त्रार्थ हुआ. अंततः भारती मिश्र को भी हार माननी पड़ी. शास्त्रार्थ की शर्तों के अनुसार मंडन मिश्र ने संन्यास ग्रहण कर लिया. वे सुरेश्वराचार्य के नाम से साधु बनकर वैदिक धर्म के प्रचारप्रसार में जुट गए.

अप्रासंगिक लगने वाली इस घटना का यहां उल्लेख तत्कालीन समाज में गुरु की हैसियत का अनुमान लगाने के लिए किया गया है, जो उन दिनों सत्ताकेंद्र का रूप ले चुका था. अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिए वह ज्ञान के आयोजनोंप्रयोजनों पर भी नियंत्रण रखने का काम करता था, जो एक तरह से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था. गुरुशिष्य परंपरा के कुछ लाभ थे, तो हानियां भी कम नहीं थीं. गुरु की अनुमति के बिना विद्याध्ययन पर अंकुश भी कालांतर में मुक्त चिंतन का अवरोधक तथा वैचारिक जड़ता की स्थिति का कारण बना, जिनके रहते ज्ञान का मौलिक अनुसंधान असंभव ही था. शंकराचार्य की अपनी प्रतिभा तो असंदिग्ध, बल्कि कालचेतना से भी आगे थी. अल्प आयु में ही वे वेदवेदांगों का विशद् अध्ययनमनन कर चुके थे. उनकी ज्ञानचेतना और बौद्धिक मेधा विराट थी, यही कारण है कि शास्त्रार्थ में बड़ेबड़े विद्वान उनके आगे टिक नहीं पाते थे. खुले शास्त्रार्थ में उद्भट विद्वानों को परास्त कर उन्होंने वैदिक धर्म की पुनःस्थापना करने का युगांतरकारी कार्य भी किया था. इसके लिए उन्हें मीमांसकों के अलावा सांख्य दर्शन के आचार्यों, वैशेषिकों और नैयायिकों से भी शास्त्रार्थ करना पड़ा था. शंकराचार्य ने रूढ़ियों और कर्मकांडों से ग्रस्त समाज में अद्वैत दर्शन के रूप में एकेश्वरवाद की स्थापना की और ज्ञानमार्गी धारा का समर्थन किया. उनके द्वारा देश के चारों कोनों में स्थापित मठ, आगे चलकर वेदांत दर्शन के प्रचारप्रसार में सहायक बने. मठों की स्थापना के पीछे उनका ध्येय था कि वे अध्ययनमनन का केंद्र बनकर वेदांत की परंपरा का उत्तरोत्तर विकास करने में सहायक सिद्ध होंगे. इससे धार्मिकदार्शनिक शोध को विस्तार मिलेगा. मगर कालांतर में वे मठ धर्मसत्ता के शक्तिशाली केंद्र के रूप में स्थापित होते चले गए. अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए वहां मौजूद पुजारी, मठाधिपति राजसत्ता, कुटिल नीति, ओछे हथकंडों, मिथ्याडंबरोंµयहां तक कि षड्यंत्रों का सहारा भी लेने लगे. इससे वहां वैचारिक जड़ता और अज्ञानता का प्रवेश स्वाभाविक ही था.

अद्वैत दर्शन की स्थापना के लिए शंकराचार्य ने उपनिषदों, बृह्मसूत्र एवं गीता पर सारगर्भित भाष्य लिए थे. उनका दर्शन वैदिक धर्मग्रंथों से उद्भूत था. तत्कालीन समाज में वेदांत की प्रासंगिकता एवं उपयोगिता का आकलन इससे भी किया जा सकता है कि उन दिनों प्रचलित अधिकांश दर्शन वैचारिक जड़ता और वितंडा का शिकार हो रहे थे. जनसाधारण की उनमें रुचि निरंतर घटती जा रही थी. यहां तक कि एक सहस्राब्दि से अधिक लोकमानस पर छाये रहे जैन और बौद्ध दर्शन की लोकप्रियता भी खतरे में थी. मींमासा दर्शन कर्मकांड प्रधान था, जबकि तर्क और विश्लेषण पर आधारित न्याय और वैशेषिक दर्शनों का प्रभाव समाज के प्रबुद्ध वर्ग तक सीमित था. जनसाधारण में उनकी कोई प्रतिष्ठा न थी. शंकराचार्य ने एक ओर तो शास्त्रार्थ के माध्यम से अपने विरोधियों को वेदांत अपनाने के लिए बाध्य किया, दूसरी ओर जनसाधारण को प्रभावित करने के लिए भक्ति को भी पर्याप्त महत्त्व दिया. उनके द्वारा लिखित पद ‘भज गोविंदम्, भज गोविंदम्, गोविंदम भज मूढ़मते’ आगे चलकर भक्ति परंपरा के विस्तार का मूल मंत्र तथा बौद्ध एवं जैन धर्म के प्रभाव के चलते वैदिक धर्मदर्शन की लुप्तप्रायः प्रतिष्ठा वापस दिलाने वाला सिद्ध हुआ. हालांकि प्रकारांतर में भक्ति आंदोलन के विस्तार, विशेषरूप से सगुण भक्ति के रूप में थोपे गए अवतारवाद के बढ़ते प्रभाव में वेदांत की चिंतनमनन और ज्ञानसाधना की प्रवृत्ति, वांछित विस्तार न ले सकी. उसके स्थान पर खोखले कर्मकांड और मिथ्याडंबर छाते चले गए. एक समृद्ध दर्शन विभिन्न पंथों, संप्रदायों में विभाजित होता गया. उसकी क्षतिपूर्ति के लिए कोई नया दार्शनिक विचार जन्म न ले सका. वेदांत के पश्चात नवींदसवीं शताब्दी से भारतीय दार्शनिक परंपरा में पसरा शूण्य अभी तक यथास्थति बनाए हुए है. यूं, इस बीच छुटपुट प्रयास अवश्य हुए, लेकिन वे एक प्रकार से पुराने मतों का ही विस्तार थे, जिसके लिए डा॓. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘टीकाकरण’ शब्द का उपयोग किया है.

बदलते सामाजिकराजनीतिक परिवेश में शंकराचार्य द्वारा स्थापित वैदिक धर्मदर्शन की परंपरा उसके विस्तार का कारण तो बनी, सत्ताकेंद्रों का समर्थन भी उसको मिला, जिससे बौद्धदर्शन के प्रभाव में आई प्रजा, पुनः वैदिक धर्म में दीक्षित होने लगी. चूंकि उस समय तक देश में बौद्धदर्शन की परंपरा लगभग चैदह सौ वर्ष पूरे कर चुकी थी, इसलिए उसकी काट एवं उसपर अपनी वरीयता दर्शाने के लिए मठाधीशों ने वैदिक परंपरा को सनातन कहना आरंभ कर दिया, वेदों को अपौरुषेय मान लिया गया. यह कदम वैदिक युग से चली आ रही नवान्वेषण की चिंतनधर्मी परंपरा के लिए घातक सिद्ध हुआ. इसके लिए अन्य कारण भी जिम्मेदार थे. उस समय देश का राजनीतिक वैभव उतार पर था. महाप्रतापी गुप्तवंश का पतन हो चुका था और भारत छोटेछोटे राज्यों में विभाजित था. उनके बीच सत्ता और वर्चस्व के लिए संघर्ष होते ही रहते थे. देश की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाने के लिए विदेशी आक्रामक अपनी गिद्धदृष्टि इसपर जमाए हुए थे. देश पर न केवल बाहरी आक्रमण आरंभ हो चुके थे, बल्कि देश के बड़े भूभाग पर विधर्मियों का कब्जा बढ़ता ही जा रहा था. भारतीय शासकों के विधर्मियों के साथ युद्ध में निरंतर परास्त होते जाने से जनसाधारण पर हताशा व्याप्त होने लगी थी. बाहर से आए आक्रामक सिंधु के इस पार रहने वाले भारतीयों को हिंदू कहते थे, अतएव वैदिक दर्शन के स्थान पर हिंदू दर्शन या हिंदू धर्म रूढ़ होता चला गया. जो अपनी जड़ें वैदिक दर्शन की परंपरा में खोजता था, लगभग भटका हुआ था. जिसके अनुयायी अपने ही देवताओं से लगभग हताश हो चुके थे. इसलिए त्राण की खोज में उन्हें पीरऔलियाओं की शरण में जाने से भी गुरेज नहीं था.

विचारशैथिल्य के उस दौर में मात्र एक टीका के आधार पर अलगअलग संप्रदाय बनने लगे. परिणाम यह हुआ कि समाज छोटेछोटे समूहों में बंटता चला गया. मामूली कर्मकांड यहां तक कि वृथा रूढ़ियों को लेकर भी बहसें होने लगीं. विवेक के स्थान पर टोनेटोटके प्रभावी होते गए. धर्म का वास्तविक उद्देश्य मानव समाज को जोड़े रखना, उसके नैतिक स्तर को ऊंचा उठाना तथा विभिन्न मतमतांतरों के बीच समन्वय की भावना का विस्तार करना हैआपसी मतभेदों, क्षुद्र स्वार्थपरता, निरर्थक वितंडावाद तथा वैचारिक जड़ता के बीच यह बात पूरी तरह भुला दी गई. यह मान लिया गया कि सृष्टि का सारा ज्ञान प्रथानत्रयी में सुरक्षित है. उससे बाहर कुछ नहीं. और तो और संप्रदाय के गठन का आधार ही मौलिक सोच न होकर टीका को बना दिया गया. द्विवेदी जी आगे लिखते हैं

‘…तो संप्रदाय वह होगा जिसके पास अपना एक भाष्य होगा. अपनी एक टीका जरूर होनी चाहिए और टीका के लिए टीका(तिलक) भी लगाने की जरूरत है. वह इसका सूचक है कि इसके पास एक टीका है. उसका अपना मंत्र होना चाहिए. उसका अपना ईष्टदेव होना चाहिए.’2

किसी प्राचीन ग्रंथ की टीका लिखकर और मात्र एकाध मंत्र की रचना से न केवल विद्वानों में नाम गिनाया जा सकता था, बल्कि नए संप्रदाय की नींव रखना भी संभव था. कहा जा सकता है कि अवतारवाद एवं आडंबरवाद के चलते उन दिनों नए संप्रदाय के गठन के लिए न तो स्वतंत्र विचारधारा की जरूरत रही थी, न स्वतंत्र दर्शन और न ही समस्याओं के तार्किकतात्विक विवेचन की. ऐसे में संप्रदायों के गठन के पीछे शक्तिसत्ता का प्रदर्शन होना स्वाभाविक ही था. यह सत्ता कहीं धर्मसत्ता का प्रतीक थी तो कहीं पर राजनीति समर्थित. इससे उन लोगों को भी अपना प्रभुत्व जमाने का अवसर मिलता था, जिनके लिए धर्मदर्शन का अभिप्राय महज सत्ता कब्जाना था. जाति के आधार पर बंटे समाज में, उसी के आधार पर जन्मना विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के मन में ऐसी महत्त्वाकांक्षाओं का पनपना अस्वाभाविक भी नहीं था. ‘मठाधीश’ होना प्रारंभ में भले ही सम्मान और बौद्धिक गरिमा का प्रतीक शब्द रहा हो, मगर आगे चलकर यह शब्द बौद्धिक जड़ता और सर्वसत्तावाद का पर्याय बनता चला गया. फलतः संप्रदाय और उनका गठन लोककल्याण अथवा ज्ञानचेतना की पवित्र भावना से प्रेरित न होकर, वर्चस्वभावना और ताकत का प्रतीक बनता चला गया. अक्सर यह भी होता था कि नए संप्रदाय के गठन का विचार पहले बनता, संप्रदाय तत्पश्चात गठित होता. शास्त्रीय मान्यता उसके भी बाद मिल पाती. कई बार ऐसा भी होता कि टीका या संप्रदायग्रंथ बाद में रचा जाता, संप्रदाय की रूपरेखा या उसकी अभिकल्पना पहले गढ़ ली जाती. ऐसे संप्रदायगठन के पीछे प्रायः धार्मिकसामाजिक सत्ता पर सवारी गांठने की प्रवृत्ति का हाथ होता था, जो पचास सौ नहीं बल्कि शताब्दियों तक लगातार उत्प्रेरक का काम करती रही. टीकाकरण, जिसे आज की भाषा में भावानुवाद भी कह सकते हैं, की प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हुए डा॓. हजारीप्रसाद द्विवेदी एक और ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हैं

‘‘यह सब कहते हैं कि वृंदावन में एक शास्त्रार्थ सभा हुई. चैतन्य देव बड़े भारी भक्त थे बंगाल के; और उनके शिष्यों ने बड़ा साहित्यिक कार्य भी किया है. भक्ति पर जितना अच्छा ग्रंथ उन्होंने लिखा है, उतना भारतवर्ष में कम लोगों ने लिखा। तो वृंदावन की एक सभा में उनसे पूछा गया कि तुम्हारा कोई संप्रदाय है? उन्होंने कहा‘है’, तो कहने लगे‘टीका कहां है तुम्हारे पास? किस ग्रंथ पर तुमने टीका लिखी है? कोई टीका नहीं है इसलिए तुम अलग हो जाओ.’ तो बलदेव विद्याभूषण ने एक दिन की मोहलत मांगी और रातोंरात किसी तरह अपने को जात में दाखिल किया.’’3

उपर्युक्त उद्धरण से आप अनुमान लगा सकते हैं कि आठवीं शताब्दी के बाद से बीसवीं शताब्दी तक भारत में नए दार्शनिकबोध के नाम पर शून्य पसरा हुआ है. दरअसल अपनी अद्वितीय प्रतिभा और तर्कसामथ्र्य के बल पर शंकराचार्य ने वेदांत को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया था, उनसे यह मान लिया गया कि वेदांत के आगे कुछ हो ही नहीं सकता. परंपराजीवी हिंदू मानस वैसे भी स्वयं को वेदों की छाया से बाहर नहीं लाना चाहता. इसलिए शताब्दियों बाद भी भारतीय मनीषा वहीं ठहरी हुई है, जहां लगभग एक हजार वर्ष पहले शंकराचार्य ने उसको छोड़ा था. अतएव भारतीय दर्शन में जब भी समकालीनता की चर्चा होती है, तो बात अधिक से अधिक उनीसवीं शताब्दी में चलने वाले चंद सुधारवादी आंदोलनों तथा स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविंद आदि के विचारों तक सीमित होकर रह जाती है. हालांकि हम सभी जानते हैं कि ये सभी विद्वान, समाजसुधारक अपने विचारों, संप्रदायों और हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें तो ‘टीकाकरण’ के माध्यम से वैदिक परंपरा का ही ‘अनुसंधान’ कर रहे थे. शताब्दियों तक विधर्मियों की दासता भोग चुके हताश भारतीयों के लिए अतीतोन्मुखी होकर अपनी स्मृतियों की तलहटी में छिप जाना अस्वाभाविक भी नहीं था.

बाद के महापुरुषों में सर्वपल्ली राधाकृष्णन, महात्मा गांधी, आचार्य रजनीश भी आते हैं. इनमें से प्रथम दो ने राजनीति के साथसाथ समाजकर्म को भी समानरूप से साधने में महारत हासिल कर ली थी, जिससे उन्हें व्यापक लोकसमर्थन हासिल हुआ. उसके बल पर वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार बने. गांधी जी ने अपने नाम से किसी स्वतंत्र विचार अथवा ‘वाद’ के प्रचलन का समर्थन कभी नहीं किया, बल्कि अपने जीवनकर्म ही को अपना संदेश माना. फिर भी कुछ विद्वान गांधीवाद का दार्शनिक सिद्धांत की तरह उल्लेख जरूर करते हैं, गांधी जी विचारों की परिधि बहुत व्यापक थी, उसमें समाजविज्ञान, आर्थिकी, मानविकी और राजनीति का पूर्ण समन्वय है. किंतु यदि हम उसमें किसी स्वतंत्र दार्शनिक विचार की खोज करें तो हमें संभवतः निराश रह जाना पड़ेगा. डा॓. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय दर्शन के प्रकांड अध्येता थे. इसका प्रमाण भारतीय दर्शन पर उनका विशाल ग्रंथ है, उनकी दृष्टि मानवतावादी और समन्वयकारी थी. उन्होंने वैदिक धर्मदर्शन की नैतिकतावादी व्याख्या पर जोर दिया, मगर वे किसी नए दार्शनिक विचार के प्रणयन का खतरा नहीं उठा सके. आशय है कि ये दोनों महापुरुष कहीं न कहीं वैदिक धर्म अथवा औपनिषदिक दार्शनिक परंपरा का ही विस्तार कर रहे थे.

यहां आचार्य रजनीश पर विशेष चर्चा प्रासंगिक है. बीसवीं शती के इस विलक्षण प्रतिभाशाली आघ्यात्मिक गुरु को अनेक विद्वान दार्शनिक की मान्यता देते हैं. स्वयं रजनीश अपने भक्तों के बीच खुद को ‘ओशो’ कहलवाकर प्रचार करते रहे. अधिकाधिक लोगों को अपने विचारों और वक्तृत्वकला से प्रभावित करने की महत्त्वाकांक्षी ललक ने ही उन्हें दुनिया के उन गिनेचुने प्रवाचकों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया था, जो समाज के बड़े वर्ग को अपना अनुयायी बना लेने में सफल होते हैं. अपने प्रवचनों में उन्होंने भारतीय धर्मदर्शन और सांस्कृतिक प्रतीकों की अधुनातन व्याख्याएं कीं और अपना अलग प्रशंसक वर्ग पैदा किया. अधिकांश विद्वानों का मत है कि लोकायतों की भांति रजनीश भी मुक्तभोग के समर्थक थे. जबकि मेरे विचार में वे भोग को नियंत्रण मुक्त करने के बजाय, उसको लेकर मानवमन में पलने वाली स्वाभाविक कुंठाओं से मुक्ति का आवाह्न कर रहे थे. ‘संभोग से समाधि तक’ शीर्षक के अंतर्गत दिया गया उनका लंबा प्रवचन वस्तुतः कामेच्छाओं के अनुचित शमन तथा उनको लेकर मनुष्य की स्वाभाविक कुंठाओं से मुक्ति की खोज का उद्यम है. लेकिन जैसा कि अक्सर देखा गया है, गलत हाथों में पड़कर क्रांतिकारी विचार अपनी ही जड़ें काटने लगते हैं. कालांतर में रजनीश दर्शन के नाम पर भी स्वच्छंदतावादी जीवनशैली उभरने लगी. उनके आश्रम की गतिविधियों को लेकर रहस्यमयी किवदंतियां बनने लगीं.

ठीक पांच सौ वर्ष पहले जन्मे जा॓न काल्विन नामक फ्रांसिसी विचारक का मानना था कि स्वर्ग की कल्पना व्यर्थ है। ईश्वर ने अपने परमानंद के लिए ही इस सृष्टि की रचना की है। मनुष्य धरती पर रहकर ही स्वर्ग जैसी सुविधाएं जुटा सकता है। काल्विन की यह विचारधारा चर्च की तात्कालिक मान्यताओं के विरुद्ध, सीधेसीधे उसकी सत्ता को चुनौती थी। अतः काल्विन का विरोध स्वाभाविक था। इसके लिए उसको जेनेवा से निष्कासन भी झेलना पड़ा था। बीसवीं शताब्दी में रजनीश भी कुछ इसी प्रकार का प्रस्ताव रख रहे थे. दोनों के बीच करीब साढ़े चार सौ वर्ष का अंतर था, लेकिन विरोध का सामना रजनीश को भी करना पड़ा. मेरी दृष्टि में रजनीश की विचारधारा और उनके द्वारा प्रस्तावित जीवनशैली का एक राजनीतिक पहलू भी था. उनकी धार्मिकदार्शनिक स्थापनाएं, जानेअनजाने समाजवादी विचारधारा के विरुद्ध जा रही थीं, जिसके लिए फ्रांस और रूस में दुनिया की दो महान क्रांतियां हो चुकी थीं. भारत भी उनके प्रभाव से अछूता नहीं था. दुनियाभर के करोड़ों लोग उसी के माध्यम से नए समानताधारित समाज का सपना देख रहे थे. रजनीश संन्यास और वैराग्य संबंधी परंपरागत मान्यताओं को चुनौती देते हुए संसार से पलायन के बजाय, सबके बीच रहकर चुनौतियों का सामना करने और उनसे सतत जूझने की प्रेरणा दे रहे थे, वह बाजार के लिए विशेष लाभकारी था. कभीकभी लगता है कि रजनीश धर्मदर्शन के फालूदे को पूंजीवाद की आइसक्रीम के साथ खपाने का प्रयास कर रहे थे. उस समय पूरी दुनिया परस्पर शीतयुद्ध में फंसे दो ध्रुवों में बंटी हुई थी, जिसके एक छोर पर साम्यवादी रूस था, दूसरे पर अमेरिका जहां पूंजीवाद अपनी जड़ें गहरी कर चुका था और उसकी निगाह भारत जैसे एशियाई देशों पर थी. इसलिए रजनीश जब अमेरिका गए तो वहां उनका जोरदार स्वागत किया गया. लेकिन धर्म का उच्छ्रंखलतावादी रूपजैसा कि रजनीश के प्रतिपक्ष के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, किसी भी समाज अथवा धर्म में स्वीकार नहीं था. धर्मदर्शन और पूंजीवाद की युति बाजार के दीर्घकालिक हितों के विरुद्ध होने के कारण स्वयं पूंजीपति उसके साथ बहुत दूर तक जाने को तैयार नहीं थे. शायद इसलिए कि धर्म की जड़ें अतीत में होती हैं और अतीत के प्रति सघन व्यामोह त्वरित सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों में, खासकर जैसा कि बाजारवादी शक्तियां चाहती हैं, अवमंदक का कार्य करता है.

रजनीश का प्रभाव प्रायः समाज के ऊपरी वर्गों तक सीमित था, जिनकी क्रय क्षमता पर्याप्त थी. इसलिए अमेरिकी प्रवास के आरंभिक दिनों में रजनीश के विचारों को वहां खूब मानसम्मान मिला. लेकिन अकेला उच्च आय वर्ग तो बाजार की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा कर नहीं सकता था. इसके लिए समाज के मध्यम और अल्पआयवर्ग का साथ भी अत्यावश्यक, जिनके बीच धर्म और उसके प्रतीकों, कर्मकांडों की पूरी पैठ थी. यही कारण है कि कालांतर में रजनीश की विचारधारा पूंजीवाद समर्थित धार्मिक यथास्थितिवादियों को खलने लगीं. पूंजीवादी शक्तियां भी तब तक संभवतः मान चुकी थीं कि रजनीशदर्शन के आधार पर उससे आगे की यात्रा असंभव, इसलिए उन्होंने धीरेधीरे अपने हाथ खींचने शुरू कर दिए. परिणामस्वरूप रजनीश को अमेरिका की धरती का मोह छोड़कर भारत लौटना पड़ा. यहां के परिवेश में रजनीश के विचार चैंका देने वाले जरूर थे. लेकिन दार्शनिक दृष्टि से उनके पास भी नया कुछ नहीं था. मुक्त भोग अथवा भोग को लेकर कुंठाओं से मुक्ति का जो आवाह्न रजनीश कर रहे थे, चार्वाकपंथी उनसे बहुत पहले तथा उनसे कहीं अधिक तार्किक रूप में सामने ला चुके थे. कहने का आशय है कि प्रकांड मेधा के धनी रजनीश ने अपने प्रवचनों द्वारा धार्मिकसांस्कृतिक प्रतीकों की अभिनव व्याख्याएं तो कीं, मगर वे ऐसा कोई विचार दे पाने में असमर्थ रहे, जो भारतीय दर्शन को मौलिक विस्तार देता हो.

पश्चिम में दर्शनशास्त्र के पर्याय के रूप में Phylosophy शब्द प्रचलित हुआ, जो दो शब्दों Philos तथा Sophia शब्दों से मिलकर बना है. इनमें Sophia का अर्थ क्रमशः प्रज्ञा अथवा बुद्धि एवं Philos का अभिप्राय प्रेम या अनुराग है. इस तरह Phylosophy का अर्थ हुआ प्रज्ञा अथवा बुद्धि के प्रति सहजानुराग. कुछेक अपवाद छोड़ दिए जाएं तो पाश्चात्य समाज में प्रज्ञावान मनुष्य को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था. प्लेटो ने तो यहां तक कहा था कि राज्य की बागडोर दार्शनिकों और विद्वतजनों के हाथों में होनी चाहिए. इसके समानांतर भारतीय परंपरा में दर्शन का अभिप्रायः जीवन के मूलभूत रहस्यों की खोज एवं परमसत्ता से साक्षात्कार की स्थिति से लिया जाता है. इसके लिए मन एवं आचरण की शुद्धता तथा सर्वकल्याणधर्मी चिंतन अनिवार्य है. भारतीय दर्शनों में योग को परमसत्ता से साक्षात्कार का एक सशक्त माध्यम बताया गया है. दूसरी ओर विज्ञान एवं बुद्धिविवेक के सहयोग के आधार पर इस सृष्टि के रहस्यों के बारे में अधिक से अधिक जान लेना या जान लेने की कोशिश करना ही पश्चिमी दर्शन की विशेषता है. बुद्धि और विज्ञान के प्रति सहज अनुराग से बंधे होने के कारण पश्चिमी दर्शनशास्त्री नए वैज्ञानिक आविष्कारों से तत्काल प्रेरणा लेते रहे हैं. विज्ञान जैसे ही कोई नई खोज करता है, तत्पे्रेरित दार्शनिक विचार भी समानांतर रूप में विकासमान होने लगता है. यही कारण है कि पंद्रहवी शताब्दी के बाद की वैज्ञानिक क्रांति पाश्चात्य दर्शन के क्षेत्र में भी समानरूप से क्रांति की वाहक सिद्ध होती है. समकालीन पाश्चात्य दर्शन के प्रमुख आधारस्तंभ, सुविख्यात दर्शनशास्त्री फ्रांसिस बेकन, डेविड ह्यूम, जा॓न ला॓क, देकात्र्त, स्पेंसर, बर्कले, लाइबिन्त्जि, स्पिनोजा, हीगेल, वाल्तेयर, कांट आदि पंद्रहवी शताब्दी के बाद की ही उपज हैं.

यह ध्यान देने की बात है कि आठवीं और विशेषरूप से दसवीं शताब्दी के बाद भारत में जहां टीकाकरण के माध्यम से महज परंपरापोषण किया जा रहा था, वहीं पश्चिम में उसके प्रति आलोचनात्मक रवैये की शुरुआत हो चुकी थी. पीटर अबेलार्ड (1079 1142) ने यह कहकर कि प्राचीनतम धर्मों और धर्मग्रंथों के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है, पूरे समाज में भूचाल ला दिया था. इसपर विशेषकर पादरीवर्ग जो ईसाई धर्म के श्रेष्ठतम होने का दावा कर रहा था, नाराज हो उठा. अबेलार्ड के विरुद्ध विरोध की लहर उठने लगी. उससे विचलित हुए बिना अबेलार्ड ने कहा कि वास्तविक धर्मग्रंथ तो सत्य है. उस तक पहुंचने के लिए किसी धर्म अथवा धर्माचार्य की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है. सत्य क्या है, इसका स्पष्टीकरण करने के बजाय उसने उसके बारे में लोगों को अपने विवेकानुसार स्वयं निर्णय लेने के लिए छोड़ दिया था. स्पष्ट है कि अबेलार्ड ने धार्मिक साक्षात्कार अथवा तत्संबंधी अनुभूतियों के लिए पादरी समेत दूसरे धर्माचार्यों की अनिवार्यता पर प्रश्न उठाए थे. वह चाहता था कि हर व्यक्ति जो सत्य को प्राप्त करना चाहता है, उसके लिए वह अपनी क्षमताओं के अनुरूप विचार करे. संदेह को जिज्ञासा और ज्ञान का मूलमंत्र मानते हुए अबेलार्ड ने एक मूलमंत्र दिया

संदेह हमें जांचपड़ताल के लिए प्रेरित करता है, जांचपड़ताल हमें सत्य तक ले जाती है.’4

पीटर अबेलार्ड ने सत्य को ही ईश्वर माना था. जैसे आगे चलकर गांधीजी ने स्वीकार किया. पर अबेलार्ड के विचार यहीं तक सीमित नहीं थे. उससे लगभग डेढ़ सह्स्राब्दि पहले जब सुकरात ने कहा था कि ‘उस(परमात्मा) को पहचानो’(Know thyself)] तब एक तरह से वह भी परमसत्य की ही प्रतिष्ठा कर रहा था. बल्कि सुकरात से भी हजारों वर्ष के मनुष्य की स्वाभाविक जिज्ञासा परमतत्व अथवा परमसत्ता की खोज में ही निहित थी, जिसके माध्यम से सृष्टि के मूल स्वरूप तथा उसके कारण की व्याख्या की जा सके. इस बीच कुछ भौतिकवादी विचारक भी आए, जिन्होंने परमात्मा की सत्ता को चुनौती दी. लेकिन कुल मिलाकर सारे विमर्श आत्मापरमात्मा और उनके जागतिक संबंधों की खोज तक सिमटे रहे. अबेलार्ड ने सुकरात की उक्ति में संशोधन करते हुए कहा, ‘खुद को पहचानो’(Know yourself) उसका मानना था कि सृष्टि के रहस्यों की खोज में स्वयं से परे जाने की जरूरत नहीं है. उसकी तलाश अपने ही भीतर, खुद की पहचान के साथ की जानी चाहिए. मनुष्य के मनमस्तिष्क को समझकर भी सृष्टि के रहस्यों का निदान संभव है. सत्य की खोज के लिए इतर से अंतर की यात्रा की चेष्टा पूर्व में भी प्रारंभ हो चुकी थी. ग्यारहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के निगुर्णाश्रयी भक्ति परंपरा के संतकवि भी परमात्मा को पाने के लिए अपने अंतर्मन में झांकने की अलख जगा रहे थे. योग दर्शन का तो आधार ही, अपने भीतर की शक्तियों को एकाग्र कर उन्हें आत्मबल एवं अभ्यास द्वारा इतना ऊंचा उठाना है कि आत्मा और परमात्मा के बीच जो द्वैत आभासमान है, वह तिरोहित हो और परमात्मा का साक्षात संभव हो सके. कबीर पढ़ेलिखे तो नहीं थे, लेकिन उन्होंने भी परमात्मा की खोज में इधरउधर भटकने, धर्मालयों में माथा टेकने, मालाजप करने वाले रूढ़िवादियों को लगभग ललकारते हुए कहा था कि ‘तेरा साईं तुज्झ में जागि सके तो जाग.’

अभिप्राय है कि धर्मदर्शन को लेकर पीटर अबेलार्ड से शुरू हुआ आलोचनात्मक विमर्श, आने वाली शताब्दियों में पश्चिमी दर्शन की प्रमुख विशेषताओं में शुमार होता चला गया. उनीसवीं शताब्दी तक आतेआते तो सुकरात और प्लेटो जैसे अध्यात्मवादियों की खुलेआम खिल्ली उड़ाई जाने लगी. जर्मन कविदार्शनिक नीत्शे ने सुकरात का उपहास करते हुए कहा था

सुकरात तो जोकर ठहरा, उसे कौन गंभीरता से लेता है.’5

सुकरात ही क्यों, नीत्शे तो ईश्वर को भी नहीं बख्शता था. ईश्वर की अवधारणा जोरदार शब्दों में खंडन करते हुए उसने कहा था‘ईश्वर मर चुका है, और हमने उसकी हत्या की है.’6 ज्ञान की परंपरा तथा नए आलोचनात्मक विमर्श का स्वागत करने में वाल्तेयर भी पीछे नहीं था. उसका कहना था कि

मनुष्यता की कल्याण के लिए अतीत की उपयोगिता यह जानने के लिए है कि पुराने जमाने के लोग कैसे सोचते थे, न कि यह पता लगाने में कि वे क्या करते, और कैसा खातेपीते थे.’7

वस्तुतः पंद्रहवी शताब्दी से पश्चिम में औद्योगिकवैज्ञानिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. जिसके प्रभाव के चलते वहां परंपरागत चिंतन को लेकर एक आलोचनात्मक युग का सूत्रपात हुआ था. धर्म, दर्शन, राजनीति, समाज, संस्कृति आदि कुछ भी उसकी पहंुच से बाहर नहीं था. काॅपरनिकस की पुस्तक ‘दि रिबोल्युशनिबस् आॅरबियम’ (De Revolutionibus Orbium, 1543) तथा न्यूटन की ‘प्रिंसीपिया मेथेमेटिका’ (Philosophie Naturalis Principia Mathematica, 1687) ने वहां वर्षों से चली आ रही अवैज्ञानिक धारणाओं को चुनौती देते हुए नए ज्ञानविज्ञान की ओर संकेत किया था. बेकन ने ‘ज्ञान ही शक्ति8 कहकर नई शोधों का खुले मन से स्वागत किया था. उसको विश्वास था कि कि मशीनें आनेवाले दिनों में मनुष्य की मुक्ति की वाहक सिद्ध होंगी, जिससे तत्कालीन समाज में नई तकनीक और मशीनीकरण को लेकर जो स्वाभाविक संकोच, डर आदि थे, वह कम होने लगे थे. इसी आधार पर बेकन को आधुनिक विज्ञान का पितामह माना जाता है, जिसके फलस्वरूप आगे चलकर समाज में नए ज्ञान और आविष्कारों को स्वीकार्यता मिलने लगी थी.

पंद्रहवीं शताब्दी से शुरू हुए बौद्धिक पुनर्जागरण के काल में जहांजहां तकनीक और विज्ञान गए, वहांवहां बौद्धिकसामाजिक आंदोलन चले, जिन्होंने यूरोप समेत पूरी दुनिया को प्रभावित करने और बदलने का काम किया. लेकिन भारत जैसे ब्रिटिश उपनिवेशों की स्थिति भिन्न थी. अंग्रेजी दासता से पीड़ित ये देश प्रौद्योगिकीय क्रांति और तज्जनित परिवर्तनों से न केवल अछूते थे, बल्कि घोर अतीतोन्मुखी वातावरण में जी रहे थे. उसकी मेधा हताश और पलायनोन्मुखी हो चुकी थी. परिणाम यह हुआ कि दर्शनचिंतन की धुरी भारत आदि एशियाई देशों से खिसककर फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे देशों में चली गई, जो उन दिनों पुनर्जागरण के प्रभाव में थे. वहां उसने एक के बाद एक धर्म, दर्शन, राजनीति, समाज, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि अनेक क्षेत्रों में कई मौलिक विचारों को जन्म दिया. पीटर अबेलार्ड की ज्ञानाश्रयी परंपरा को फ्रांसिस बेकन, डेविड ह्यूम, जाॅन लाॅक, देकात्र्त, स्पेंसर, लाइबिन्त्जि, बर्कले, स्पिनोजा, इमानुएल कांट, हीगेल आदि ने अपनीअपनी तरह से विस्तार दिया और पाश्चात्य दर्शन की परंपरा को समृद्ध करने में अपना योगदान दिया. इन दार्शनिकों का चिंतन कमोबेश परंपरा से पोषित था, मगर उनकी कसौटियां एकदम अलग थीं, जो नए वैज्ञानिक सिद्धांतों और आविष्कारों से अनुप्रेत थीं. बेकन ने वैज्ञानिक आविष्कारों को मानवमुक्ति से जोड़ते हुए उनका जोरदार ढंग से स्वागत किया था, तो लाइबिन्त्जि सृष्टि की उत्पत्ति एवं संचालन का कारण शुभ के संवाहक छोटेछोटे चिद्बिंदुओं को मानता था. स्मरणीय है कि लाइबिन्त्जि से सैकड़ों वर्ष पहले, वैशेषिक दर्शन के प्रणेता कणाद मुनि ने भी सृष्टि की उत्पत्ति का मूल अतिलघु कणों को माना था. बकर्ले ने ‘दृष्टि ही समष्टि है’ कहते हुए इस सृष्टि और उससे जुड़ी प्रत्येक विचारधारा को व्यक्ति सापेक्ष माना था. यह विचारधारा आगे चलकर अस्तित्ववादी दर्शन में अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत एवं नैतिकतावादी स्थापनाओं के रूप में विकसित हुई.

आधुनिक पश्चिमी दर्शन की बात करें तो वह मुख्यतः संदेहवाद(डेविड ह्यूम), अनुभववाद(जाॅन लाक), समीक्षावाद(इमानुएल कांट), अवयवीवाद(ह्नाइटहैड), विकासवाद(डार्विन, हर्बट स्पेंसर), सर्वेश्वरवाद (स्पिनोजा), यथार्थवाद(रसेल), चिद्बिंदुवाद या आध्यात्मिक बहुत्वाद (लाइबिनित्जि), अस्तित्ववाद(किर्कगाद, सार्त्र), व्यवहारवाद (विलियम जेम्स) आदि दर्जनों धाराओं में बंटा हुआ है. यदि गंभीरतापूर्वक विवेचन किया जाए तो परस्पर भिन्न नजर आती इन विचारधाराओं में से कई ऐसी हैं, जिनमें परस्पर सामन्जस्य एवं एकरूपता है. जैसे विकासवाद एवं नवविकासवाद, भौतिकवाद के ही नवविकसित रूप हैं. भौतिकवादी और विकासवाद के समर्थक स्पेंसर, डार्विन आदि इस सृष्टि को अपने आप में पूर्ण मानते हैं, उनकी निगाह में इसकी उत्पत्ति के पीछे आत्मा अथवा ईश्वर जैसी कोई पारलौकिक सत्ता नहीं है. न ऐसी किसी ऐसी सत्ता की कल्पना की जा सकती है, जिसको विज्ञान के द्वारा जानना असंभव हो. जैसेजैसे विज्ञान परिपक्व होता जाएगा, इस सृष्टि के रहस्यों से भी पर्दा हटता जाएगा. इन दार्शनिकों का मानना था कि आनेवाले वर्षों में विज्ञान न केवल सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम होगा, बल्कि उसके औचित्य से भी पर्दा हटा सकेगा, साथ ही उन प्रश्नों के उत्तर भी दे सकेगा, जो सहस्राब्दियों से मानवमस्तिष्क की समस्याएं बने हुए हैं.

भौतिकवादियों से अलग स्पिनोजा समस्त चराचर को परमसत्ता का विस्तार मानता था. उसके अनुसार समस्त सृष्टि शुभ का विस्तार है. यदि इसमें कोई अशुभ अथवा किसी भी प्रकार से जो विक्षोभ आभासित है, उसके लिए मानवीय कमजोरियां जिम्मेदार हैं. उसके अनुसार असीमित परमसत्ता को समझना और उसकी व्याख्या करना सीमित मानवेंद्रियां के सामथ्र्य से परे है. मनुष्य जब भी ऐसा करता है, उससे चूक होती है. अपनी दुर्बलताओं को समझने के बजाय वह इस सृष्टि जो परमात्मा की दोषमुक्त और महानतम रचना है, में खोट निकालने लगता है. इस संदर्भ में हीगेल भी स्पिनोजा का समर्थक था. उसका मानना था, कि अपरिमित परमसत्ता का साक्षात सीमित सामथ्र्ययुक्त मानवेंद्रियों की पहुंच से परे है. स्पिनोजा के सर्वेश्वरवाद के पीछे भारतीय उपनिषदों और सुकरात का अध्यात्मवाद है. वह इस समस्त चराचर सृष्टि को इस परमसत्ता का विस्तार मानता था. उपनिषदों में भी ‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म’ कहकर इस चराचर जगत को परमसत्ता का ही विस्तार माना गया है, जो निर्विकल्प, विकारहीन एवं सर्वथा संपूर्ण है. यदि कहीं अभाव है, यदि इसमें कहीं विकार अथवा विक्षोभ नजर आता है, तो उसका कारण मानवीय स्वभाव की कमजोरी अथवा उसकी अज्ञानता है. सर्वेश्वरवादियों की दृष्टि में मनुष्य की अज्ञानता ही उसकी समस्याओं की जननी है. भौतिकवादी विचारकों की भांति व्यवहारवादी दार्शनिक भी इस सृष्टि को वास्तविक और सत्य मानते हैं. उनके अनुसार जो प्रत्यक्ष है, अनुभूति का विषय और मनुष्य के लिए उपयोगी है, वही सत्य है. हीगेल और कांट जैसे अध्यात्मवादियों जो इस सृष्टि को पूर्ण मानते थे, का विरोध करते हुए प्रसिद्ध व्यवहारवादी विचारक विलियम जेम्स ने कहा था किµ‘इस सृष्टि को पूर्ण मानना सर्वथा प्रतिक्रियावादी विचार है, क्योंकि इससे विकास की समस्त संभानाएं समाप्त हो जाती हैं. ऐसे में मनुष्य को करने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता.’ व्यवहारवाद और उपयोगितावाद इस मामले में एकदूसरे के करीब हैं कि दोनों की सृष्टि को वास्तविक और ज्ञेय मानते हैं.

विकासवाद, व्यवहारवाद, उपयोगितावाद जैसी दर्शन की आधुनिक विचारधाराओं पर वैज्ञानिक शोधों का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है. उल्लेखनीय है कि दर्शनशास्त्र संबंधी भिन्न मतों, विचारधाराओं के बावजूद पूर्व और पश्चिम के प्राचीनतम दर्शनशास्त्रियों के समक्ष लगभग एकसमान समस्याएं रही हैं. जो सहज मानवीय जिज्ञासाओं का विस्तार थीं. पहली सृष्टि की उत्पत्ति और उसके पीछे निहित कारण और उसका औचित्य. दूसरी परमात्मा अथवा परमसत्ता का स्वरूप तथा उसको जानने अथवा प्राप्त करने के उपाय तथा आत्मा एवं परमात्मा के संबंधों की व्याख्या. तीसरी ज्ञान का आधार एवं उसका औचित्य, ज्ञानप्राप्ति के प्रमुख साधन, बुद्धि एवं ऐंद्रियानुभव की प्रामाणिकता. आदिकाल से ही दार्शनिक इन शाश्वत दार्शनिक प्रश्नों से जूझते आ रहे हैं. लेकिन तब तक विज्ञान का इतना विस्तार नहीं हुआ और मनुष्य अपने ज्ञान के लिए निजी अनुभवों और तपसाधना(अध्ययन) पर निर्भर था, वह इस सृष्टि का कारणस्वरूप परमात्मा को मानता था. विराट प्रकृति के आगे सृष्टि उसको एक जंजाल लगती थी, इसलिए मृत्यु भय से मुक्त होना, मोक्ष प्राप्त करना उसका प्रमुख आध्यात्मिक ध्येय हुआ करता था. मगर जैसेजैसे विज्ञान ने प्रकृति और मानवजीवन के गुत्थियों को सुलझाना आरंभ किया, अंतरिक्ष की यात्राओं, चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में आई क्रांति, भौतिकी के अभूतपूर्व आविष्कारों तथा जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान के चमत्कारों ने मनुष्य के सामने एक के बाद एक बौद्धिक ज्ञान के इतने सोपान खड़े कर दिए कि उसको यह भरोसा होना लगा कि सृष्टि की व्याख्या बिना किसी पारलौकिक अथवा काल्पनिक सत्ता की मदद से भी की जा सकती है. विज्ञान और उसके आविष्कारों, उपलब्धियों का दबाव इतना अधिक था कि दार्शनिकों को भी अपनी विचारधारा में तदनुरूप संशोधन करना पड़ा. फिर तो जैसेजैसे प्रयोगशालाओं में कृत्रिम जीवन की संभावनाएं बढ़ती गईं, दर्शनशास्त्रियों ने भी ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, पापपुण्य और स्वर्गनर्क जैसी मान्यताओं से किनारा करना आरंभ कर दिया है.

पश्चिम में आज की मौजूदा सर्वाधिक लोकप्रिय विचारधाराओं में तीन प्रमुख हैं—

1. व्यवहारवाद अथवा प्रागेमेटिज्म

2. विश्लेषणात्मक अथवा तर्कमूलक दर्शनशास्त्र

3. अस्तित्ववाद

व्यवहारवादी दार्शनिकों में अमेरिका के विलियम जेम्स प्रमुख हैं. अध्यात्मवाद प्रत्येक जागतिक कर्म तथा उसके लक्षणों, वस्तु आदि को पूर्वनियोजित मानता है. सृष्टि के केंद्र में परमात्मा को रखकर वह उसके रहस्यों को समझना चाहता है. वह परमात्मा को अपना सुदूर लक्ष्य मानता है तथा अपने और उसके बीच की जागतिक दूरी को पाटने के लिए वह सतत प्रयत्नशील रहता है. व्यवहारवादी दृश्यमान जगत से परे किसी भी सत्ता की उपस्थिति को पूरी तरह नकारते हैं. सृष्टि के केंद्र में मनुष्य को रखते हुए वे जागतिक सत्यों की वस्तुनिष्ठ व्याख्या करने का प्रयास करते हैं. जो वस्तु मनुष्य की दृष्टि से और पहुंच से परे है, उस वस्तु का मानवजीवन के लिए कोई उपयोग नहीं है. इसलिए प्रकृति, पुरुष, ब्रह्म, स्वर्गनर्क, पापपुण्य जैसी अवधारणाएं व्यवहारवादियों की निगाह में कोई मूल्य नहीं रखतीं. वे जगत को गतिशील मानते हैं. उनके अनुसार मनुष्य के कर्म पूर्वनिर्धारित न होकर उसके अपने विवेक एवं चयन पर निर्भर होते हैं. व्यवहारवादी के लिए किसी वस्तु का मूल्य उसकी जीवन में उपयोगिता से तय होता है. यदि कोई वस्तु जीवन में उपयोगी है, तो वह सत्य भी है. यह अध्यात्मवादियों की उस धारणा के विपरीत है जिसके अनुसार वे किसी वस्तु में अंतर्निहित सत्य को ही उसकी उपयोगिता का आधार मानते हैं. इस सत्य का आकलन परमसत्ता से उसकी निकटता के आधार पर किया जाता है. दूसरी ओर व्यवहारवादियों के लिए ‘उपयोगिता ही प्रामाणिकता’ है. चूंकि ईश्वर का ऐंद्रियक साक्ष्य संभव नहीं है, अतएव वह भी सत्य नहीं है, इसलिए वह ईश्वर के अस्तित्व को भी नकार देते हैं. हालांकि भौतिकवादियों की भांति व्यवहारवादी दार्शनिक ईश्वर की अवधारणा का सामान्यतः सीधेसीधे विरोध नहीं करते. बल्कि वे उसे जनसामान्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करने, उसके आचरण को नियंत्रित, मर्यादित बनाने के लिए जरूरी मानते हैंµऔर उसे उस समय तक स्वीकृति देने के पक्ष में हैं, जब तक कि मनुष्य का ज्ञानविज्ञान इस जीवन और सृष्टि से जुड़े सभी प्रश्नों की तार्किक व्याख्या देने में सफल नहीं हो जाता. अमेरिकी व्यवहारवाद वस्तुतः यूरोप के मानववाद (शिलर) से प्रेरित है, जो इस चराचर जगत को मनुष्य की कर्मशाला मानता है.

मानववादी भी इस सृष्टि की व्याख्या मनुष्य को केंद्र में रखकर करते हैं. उनके अनुसार मनुष्य इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ट प्राणी है. वह विवेक से काम लेता है. वह अपनी स्थिति में सुधार करने में सक्षम है. अतएव सृष्टि के सारे आयोजन मनुष्य के लिए हैं. उसके बिना या उससे परे वे प्रयोजनविहीन हैं. उनकी उपयोगिता मानवजीवन को अधिकाधिक सुखसुविधामय बनाने में है. मनुष्य अपने कार्यों के संपादन हेतु पूरी तरह स्वतंत्र तथा स्वायत्त है. यहां भारतीय मानववाद और पाश्चात्य मानववाद में एक गुणात्मक अंतर देखने में आता है. भारतीय मानववाद में व्यक्ति नैतिक आचरण को केंद्र में रखकर, समस्त जीव समुदाय के सुखों पर विचार करते हुए, तदनुसार निरपेक्ष कर्म करने में विश्वास रखता है. जबकि पश्चिमी दर्शन में सुख का अभिप्रायः अपेक्षाकृत स्थूल संदर्भों में, प्रायः भौतिक सुखों से लिया जाता है. पूर्व और पश्चिम के दार्शनिक रुझानों में एक बड़ा अंतर यह भी देखने को मिलता है, कि वहां मनुष्य और उसकी चिंताएं दार्शनिक विवेचना का मूल विषय हैं. इसके विपरीत भारतीय दर्शन में, चिंतन का मूल विषय ब्रह्म यानी परमसत्ता को बनाया गया है. इहलोक भारतीय दर्शन की समस्या नहीं है. क्योंकि वह तो माया है, अभासी है, इसमें मन को रमाए रखना माया के प्रभाव में आकर अपने वास्तविक लक्ष्य को बिसरा देना है. माया से परे जाने के लिए सतत आत्मपरिष्कार जरूरी है, जो दीर्घ तपश्चर्या, सतत साधना, चित्तवृति निरोध, अस्तेय, अपरिग्रह तथा योग जैसी नैतिक व्यवस्थाओं द्वारा संभव है.

विश्लेषणात्मक अथवा तर्कमूलक दर्शनशास्त्र के विचारक यथा बट्रैंड रसेल, जी ई मूर, ए एन व्हाइटहैड, इसे विज्ञान का विषय मानते हैं. उनके अनुसार दर्शनशास्त्र विज्ञानों का विज्ञान है, लेकिन केवल जटिल वैज्ञानिक सूत्रों अथवा प्रयोगशाला के उपकरणों से गूढ़ दार्शनिक स्थापनाओं की समीक्षा कर पाना असंभव है. इस आधार पर दर्शनशास्त्र विज्ञान होते हुए भी उससे आगे और विशिष्ट है. दरअसल दर्शनशास्त्र सर्वसत्ता का विज्ञान होने के कारण एक ओर तो उपलब्ध वैज्ञानिक खोजों और आविष्कारों से प्रेरणा लेता है, साथ ही उसके लिए निरंतर नई चुनौतियां भी पेश करता रहता है. वह ज्ञान की प्रविधियों, मनस्, आत्मन्, बुद्धि आदि की सीमाओं पर विचार करता है, ताकि उनके आधार पर प्राप्त वस्तुगत बोध को परखा; और जहां तक हो सके विस्तार किया जा सके. उसका उद्देश्य ज्ञान की विभिन्न प्रविधियों और उनकी प्रामाणिकता का तार्किक विश्लेषण करना है. एक परिभाषा में रसेल ने माना है कि ‘दर्शनशास्त्र, विज्ञान के आधारभूत सिद्धांतों का तार्किक अध्ययन है.’10

अपनी तार्किक पद्धति का अनुसरण करते हुए रसेल ने बर्कले की मान्यता कि ‘दृष्टि ही समष्टि है’ को चुनौती दी है. रसेल का मानना था कि इस तरह की पूर्वस्थापित धारणाएं न केवल मस्तिष्क और ऐंद्रियक बोध को सीमाओं में बांधकर वास्तविक ज्ञान के आड़े आती हंै, बल्कि वे ज्ञान की उन संभावनाओं को ही समाप्त कर देती हंै, जो एकाधिक व्यक्तियों अथवा एक ही व्यक्ति द्वारा किसी वस्तु को अलगअलग अवसरों, दृष्टियों से देखने पर प्राप्त होता है. यदि हम मेज का ही उदाहरण लें तो ऐंद्रियक बोध से उसके रंगरूप, आकार, ठोसपन, गंध आदि का बोध हो सकता है, लेकिन मेज के बारे में जानकारी अथवा उसमें सन्निहित ज्ञान केवल उसकी भौतिक संप्रतियों अथवा ऐंद्रियक बोध तक ही सीमित नहीं है. उसके बारे में संपूर्ण बोध के लिए मनुष्य को न केवल ज्ञान की अब तक उपलब्ध अवधारणाओं, शोधों के परे जाना पड़ सकता है, बल्कि उस अवस्था में भी उसकी पकड़ से बहुत कुछ छूटा रह सकता है. रसेल के अनुसार ‘दो और दो चार’ एक प्रचलित गणितीय सत्य हो सकता है, जिसको हम अपने जीवन में अकाट्य सत्य के प्रमाण के रूप प्रस्तुत करते रहते हैं. लेकिन आवश्यक नहीं है कि जो गणितीय सत्य हो, वही दार्शनिक सत्य भी हो, क्योंकि दार्शनिक सत्यों के वास्तविक बोध के लिए हमें प्रचलित ज्ञान के उपयोग के साथ अपनी कल्पनाशक्ति, समस्त इंद्रियबोध के साथ अंतहीन स्थितियों और तार्किक विश्लेषणों की शरण में जाना पड़ सकता है. व्यवहारवादी दार्शनिकों की भांति विश्लेषणवादी अथवा तर्कमूलक दार्शनिक भी निरीश्वरवादी हैं. वे ईश्वर के प्रत्यय को स्वीकारते तो हैं, मगर उसको बहुत महत्त्व नहीं देना चाहते, क्योंकि उसको तर्क के माध्यम से सिद्ध कर पाना असंभव है. अतः आत्मा और परमात्मा जैसी अंतहीन समस्याओं से उलझने के बजाय वे ज्ञान की प्रविधियों तथा उसकी प्रामाणिकता की खोज पर अधिक ध्यान देने लगे हैं, ताकि उसके माध्यम से मानवजीवन को सुखी एवं संपूर्ण बनाया जा सके.

विश्लेषणात्मक दर्शनशास्त्र की दो प्रमुख प्रवृत्तियां हैं— पहली कि यह सैद्धांतिक समस्याओं से जूझता है और उनसे बौद्धिक विमर्श करता हुआ निरंतर समृद्धि ओर अग्रसर रहता है. दूसरे अधिकांश विश्लेषणवादी अपनी दार्शनिक स्थापनाओं के लिए वैज्ञानिक ज्ञान की मदद तो लेते हैं, मगर वे उसको विज्ञान मानने के लिए सहमत नहीं हैं. उनके अनुसार यह भी आवश्यक नहीं है कि सभी दार्शनिक स्थापनाएं केवल मनुष्य के सकारात्मक बोध को विस्तार दें. विश्लेषणवाद चूंकि तर्क और ज्ञान की नए उपकरणों, प्रविधियों की खोज पर जोर देता है, इस कारण अधिकांश विश्लेषणवादी दार्शनिक अकादमिक क्षेत्रों से संबद्ध थे. रसेल के अलावा डेविडसन, आर्मस्ट्रांग, शीर्ले आदि ने तर्कमूलक दर्शनशास्त्र को आगे बढ़ाने में काफी योगदान दिया. मगर धीरेधीरे दर्शनचिंतन की यह धारा अपने आप अवरुद्ध होती चली गई.

विश्लेषणात्मक दर्शनशास्त्र तथा व्यवहारवाद की भांति अस्तित्ववाद भी ईश्वर की सत्ता को मानने के लिए तैयार नहीं है. अस्तित्ववादियों ने ईश्वर, सृष्टि, आत्मा, परमात्मा, अवतारवाद जैसी दर्शनशास्त्र की परंपरागत समस्याओं को महत्त्वहीन माना है. उनके अनुसार ये दर्शनशास्त्र की वास्तविक समस्याएं नहीं हैं. अस्तित्ववाद मनुष्य को महत्त्च देता है और मानता है कि दर्शनशास्त्र का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य, उसकी परिस्थितियों एवं तत्संबंधी असंगतियों पर विचार करना है. अस्तित्ववादियों के अनुसार मनुष्य का व्यक्तित्व अर्थात आत्मन् तथा बाह्यसत्ता दोनों अलगअलग हैं. उनके अनुसार प्रत्येक वस्तु के अंदर कोई न विशिष्ट गुण निहित होता है, जिसे बुद्धि के माध्यम से जाना और अभिव्यक्त किया जा सकता है. वस्तु का गुण ही उसे बाकी वस्तुओं से अलग और खास सिद्ध करता है. वही उसकी पहचान को सुनिश्चित करता है. यही उसकी स्वतंत्र सत्ता का प्रतीक है, यही आत्मन् को उसके बोध के लिए आकर्षित करता है. कहा जा सकता है कि किसी वस्तु का बुद्धिजन्य और वर्णनीय होना ही उसका सत्तावान होना है. किंतु आत्मन् को सीधेसीधे जानना असंभव है. न उसका वर्णन ही किया जा सकता है. न उसको देख पाना संभव है. इसलिए न तो वह बुद्धिजन्य है, न सत्तावान. फिर आत्मन् की प्रतीति कैसे होती है. जब उसे जाना ही नहीं जा सकता तो उसको बाकी वस्तुओं से अलग और विशिष्ट कैसे ठहराया जा सकता है. अस्तिववादी कहते हैं कि आत्मन् को बुद्धि के माध्यम से जानना असंभव है, किंतु उसको भावनाओं एवं अंतर्दृष्टि के माध्यम से अनुभव तथा विश्लेषित किया जा सकता है. बुद्धिजन्य होने के कारण वस्तुएं सत्तावान होती हैं, जबकि अनुभवजन्य होने के कारण आत्मन् अस्तित्ववान. इसी आधार पर इस दर्शन को अस्तित्ववाद की संज्ञा दी गई है.

अस्तित्ववादी विचारधारा में प्रत्येक व्यक्ति यानी आत्मन् का अपना विशिष्ट महत्त्व है, उसकी विलक्षणता को समझ पाना असंभव है. आध्यात्मवादी मानते हैं कि सीमित इंद्रियों द्वारा असीमित परमात्मा को जानना असंभव है, इसके समानांतर अस्तित्ववादी व्यक्ति को अज्ञेय और असत्तावान मानते हैं. उनके अनुसार इंद्रियां सत्ता को जानने का माध्यम हैं, जबकि मनुष्य अस्तित्ववान है. इसलिए ऐंद्रियसामथ्र्य द्वारा उसका बोध असंभव है. हां, आत्मन् को अनुभव किया जा सकता है. अस्तित्ववादी दार्शनिक पश्चिम में उनीसवीं शताब्दी में चले व्यक्ति स्वातंत्रय आंदोलनों से प्रभावित थे. उनका मानना था कि वर्तमान मशीनीकरण एवं पूंजीकेंद्रित सभ्यता मनुष्य के नैसर्गिक गुणों के उत्थान में बाधक हैं. सामंतवादी गुणों से विनिर्मित यह व्यवस्था समिष्ट के लिए व्यष्टि के बलिदान को उचित मानकर उसका महिमामंडन करती है. इसलिए यह व्यक्तिविरोधी है. मनोविज्ञान, समाजविज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, नीतिशास्त्र, व्यवहार विज्ञान आदि ज्ञान की लोकप्रचलित धाराओं में मनुष्य का उल्लेख एक साधारण इकाई की भांति किया जाता है. स्वार्थकेंद्रित व्यवस्थाएं जीवंत मानवीय इकाइयों का उपयोग साधारण उत्पाद की भांति करती हैं. इससे भावनात्मक शोषण को बढ़ावा मिलता है. आत्मन् का प्रमुख गुण उसका स्वातंत्रय और स्वतंत्र अस्मिता है. वर्तमान सभ्यता के प्रभाव में आत्मन् अपने वास्तविक स्वरूप को भूलती जा रही है. उसका मूल लक्षण अर्थात स्वातंत्रय और अस्मिताबोध उससे छिनता जा रहा है, जिसके लिए यह समाज और वे विषमतामूलक स्थितियां जिम्मेदार हैं, जो समाज के कुछ वर्गों द्वारा उनके स्वार्थ के लिए पैदा की गई हैं.

अस्तित्ववादियों का मानना है कि आधुनिक समाज, धर्म, राजनीति का गठन इस प्रकार किया गया है कि इसमें आत्मन् की विस्तार की सभावनाएं बहुत कम हैं. यही नहीं प्रत्येक विषय पर पहले से तैयार योजनाएं तथा बौद्धिक क्रियाएं आत्मन् से अपने विवेक के अनुसार चयन के अवसर छीन लेती हैं. दूसरे शब्दों में वे उसे लगातार परतंत्र बना रही हैं. अस्तित्ववादी मानता है कि वास्तविक जीवन, तथ्यों के बौद्धिक विवेचन में न होकर क्रियात्मक, भावनात्मक तथा अनुभवात्मक जीवन में है. भावनात्मक मूल्यों को महत्ता देने के कारण अस्तित्वादी दर्शन जनसाधारण से न केवल सीधे संबद्ध दिखाई पड़ता है, बल्कि उसके मूल अधिकारों के संरक्षण के लिए समर्थन भी देता है. यही कारण है कि अस्तित्ववादी विचारधारा को फ्रांस, इंग्लेंड आदि देशों के नागरिक आंदोलनों में खूब लोकप्रियता मिली. प्रकारांतर में यह नए वर्गों में भी सामाजिक चेतना का विस्तार करने में सहायक सिद्ध हुई. प्रसिद्ध अस्तित्ववादी दार्शनिक सात्र्र ने नोबल पुरस्कार को जब ‘आलू का बोरा’ कहकर लौटाया, तब परिवर्तनवादी शक्तियों द्वारा उनका जोरदार स्वागत किया गया. आगे चलकर हालांकि अस्तित्ववादी दर्शन दो धाराओं में बंट गया, जिनमें एक वर्ग आस्तिक और ईश्वर की सत्ता में विश्वास करने वाला था, जबकि दूसरा नास्तिक और ईश्वर की सत्ता से इंकार करता था. किर्कगाद आस्तिक था, जबकि सार्त्र नास्तिक. मगर दोनों ही वर्ग मानवीय स्वतंत्रता और उसके अस्मिताबोध को पर्याप्त महत्त्व देते हैं.

समकालीन पाश्चात्य दर्शनों के उपर्युक्त विहंगावलोकन से दो प्रमुख तथ्य उभर कर आते हैं. पहला तो यह कि आधुनिक दर्शन ज्ञान की प्रविधियों की खोज एवं उनके आकलन को अपने विवेचन का प्रमुख विषय मानता है. उसके अनुसार मनुष्यता का वास्तविक कल्याण ज्ञान के उत्तरोत्तर और नियमित विकास पर निर्भर है. दूसरा तथ्य यह कि ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, जीव, स्वर्गनर्क, कार्यकारण तथा पापपुण्य जैसी अवधारणाएं जो कभी दर्शनशास्त्र की प्रमुख चिंताओं में सम्मिलित थीं, उनको लेकर आधुनिक दर्शनशास्त्री बहुत व्यग्र नहीं हैं. वे मान चुके हैं कि इन अवधारणाओं को तर्क द्वारा सिद्ध कर पाना असंभव है, अतएव इन्हें अप्रामाणिकअव्याख्येय मानकर छोड़ देना अथवा इनकी ओर से तटस्थ बने रहना ही अच्छा है. आशय स्पष्ट है कि मनुष्य और उसकी मूल समस्याएं आधुनिक दर्शन की चिंताओं में सबसे पहले स्थान पर अवस्थित है. आधुनिक दर्शनशास्त्री विज्ञान को महत्त्व देते हुए उसे ज्ञानार्जन के प्रामाणिक स्रोत के रूप में मान्यता प्रदान करता है. उससे प्रेरणा लेता हुए वह उसके सर्वकल्याणकारी उपयोग पर जोर देता है. यही कारण है कि समकालीन पाश्चात्य दर्शन की अवधारणाओं और नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कारों के बीच गहरी अंतर्संबद्धता दिखाई पड़ती है. अपने उत्तरआधुनिक सोच, विज्ञान एवं तकनीक से कदमताल मिलाकर चलने के बावजूद पश्चिमी दर्शनों की समस्याएं भी कम नहीं हैं, बल्कि एक अजीबसी बेचैनी और अपने ही प्रति बौद्धिक अविश्वास वहां के चिंतनजगत में दिखाई पड़ता है. यह हालांकि न तो विशेष चिंता का विषय है, न ही अस्वाभाविक स्थिति. इसलिए कि मनुष्य का समस्त ज्ञान और उपलब्धियां उसके बौद्धिक असंतोष एवं वैचारिक छटपटाहट का सुफल रही हैं. किंतु इसी के कारण नई दार्शनिक प्रज्ञप्तियां अकादमिक क्षेत्रों में सिमटकर रह जाती हैं. लोकसमर्थन के अभाव में वे अल्पजीवी रह जाती हैं.

यह सर्वज्ञात तथ्य है कि धर्म और दर्शन प्रारंभ से ही अंतःसंबद्ध रहे हैं. दुनिया के प्रत्येक धर्म के गठन के पीछे किसी न किसी दार्शनिक विचार की भूमिका रही है. इसलिए दर्शन को धर्म का आधारस्तंभ, उसके आगे चलने वाली मशाल कहा जाता है. धर्म के रूप में दर्शन के आगे मनुष्य की साधारण जिज्ञासाएं और उसके विश्वास महत्त्वपूर्ण होते हैं. वह धर्म को भीड़ का आचरण बनने से बचाकर उसके नैतिक आधार को पुष्ट करने का काम करता है. गूढ़ दार्शनिक मान्यताओं के स्थायित्व के लिए लोकसमर्थन जरूरी शर्त है. दुनिया की विभिन्न दार्शनिक विचारधारों में वही लोकप्रिय और टिकाऊ सिद्ध हुई हैं, जिनके बौद्धिक और लौकिक आधार दोनों पुष्ट थे. धर्म, शुष्क बौद्धिक विवेचनाओं को जनसामान्य के स्तर तक लाने, उनका साधारणीकरण करने का कार्य नियमित रूप से करता रहता था. इससे उसका तार्किक पक्ष तो सधता ही था, धार्मिक प्रतीकों, मान्यताओं के पीछे छिपा गहन दार्शनिकबोध धर्म को रूढ़िग्रस्त होने से बचाता है. हालांकि भारत में भी सांख्य, वैशेषिक, न्याय, मीमांसा आदि ऐसेे दर्शन थे, जिनका प्रभाव प्रायः तत्वविज्ञानियों तक सिमटा हुआ था. शुष्क बौद्धिकता के कारण सामान्यजन इनकी ओर बहुत कम आकर्षित होते थे. दूसरी ओर जैन, बौद्ध, वेदांत आदि ऐसे दर्शन भी थे, जो बौद्धिकों के साथसाथ जनसामान्य में भी उतने ही लोकप्रिय थे. जन से गहरा जुड़ाव ही उनकी ताकत था. यही कारण है कि जैन और बौद्ध जैसे धर्म जब भारतीय सीमाओं से बाहर गए तो उनके पुष्ट दार्शनिक आधार के कारण वहां के नागरिकों ने उनका सहर्ष स्वागत किया और उनके अनुसार अपनी जीवनपद्धति को ढालने की कोशिश भी की.

समकालीन दर्शन की कमजोरी ही कही जाएगी कि उसको जनसमाज से जुड़ने और लोकमान्यताओं का हिस्सा बनने की कोई उत्सुकता नहीं है. दर्शन हमेशा से ही धार्मिक मान्यताओं का मार्गदर्शक रहा है. लेकिन समकालीन दर्शन है कि वह न तो धर्म से संवाद करता और न ही उसके परिष्कार के लिए प्रयासरत दिखाई पड़ता है. यही कारण है कि कथावाचक स्तर के अतिसाधारण पंडामौलवी आदि खुद को धर्मदर्शन का व्याख्याकार घोषित कर जनसाधारण का भावनात्मक शोषण करते रहते हैं. खुद को धर्मप्राण मानने वाले जनसामान्य की भी आधुनिक दार्शनिक स्थापनाओं में कोई रुचि नहीं है. धर्म को आस्था का विषय मानकर वह उसके विरुद्ध उठने वाले सभी प्रश्नों, शंकाओं को किनारे करता चला जाता है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि प्रत्येक धर्म लगातार रूढ़ और अतीतोन्मुखी बनता जा रहा है. दर्शनशास्त्री मानवकल्याण की कामना के साथ समस्त ज्ञानविज्ञान और मानवीय अनुभवों को तर्क की कसौटी पर कसता है, अतएव प्राचीनकाल में धर्म की स्थापना के पूर्व उसके दार्शनिक प्रत्यय की संकल्पना कर ली जाती थी. फिर जैसेजैसे कोई दार्शनिक विचार जनता में प्रतिष्ठा प्राप्त करता जाता, युगानुकूल नए प्रतीक एवं घटनाएं भी उससे जुड़ती चली जाती थीं. दर्शन और नीति का आधार नए धर्म के विकास का कारण बनता था. आधुनिक दर्शनशास्त्रियों को जितनी चिंता अपनी मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर खरा उतरने की होती है, उतनी लोक से जुड़ने या अपनी विचारधारा को समाज तक पहुंचाने की दिखाई नहीं पड़ती. इसलिए उसकी अवधारणाएं शुष्क बौद्धिक विवेचन से आगे नहीं बढ़ पातीं.

जन्ममृत्यु, पापपुण्य, स्वर्गनर्क किसी न किसी रूप में आमजन के मनस् में छाये रहते हैं. दुनिया में कुछेक अनीश्वरवादियों को छोड़कर जनसंख्या का अधिकांश ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों का है. अमरता की कामना, मनुष्य की एक ऐसी अलभ्य वांछा है, जो उसको जीवनभर भटकाती है. हालांकि विश्व का कोई भी धर्म अमरता की इच्छा नहीं जगाता. सभी मृत्योपरांत अनिवर्चनीय आनंद के नाम पर अपना धंधा जमाए रहते हैं. वैज्ञानिक आधार न होने के बावजूद लोग अमरता के नाम पर छलने को तैयार रहते हैं. यही निराधार इच्छा जनसाधारण के मन में धर्म की जरूरत पैदा करती है. इस सहज मानवीय दुर्बलता के कारण छुटभैये कथावाचक, पोंगा पंडित, भ्रष्ट पादरी, मुल्ला और मौलवी लोगों को अपने पक्ष में बरगलाने में कामयाब हो जाते हैं. ईश्वर है या नहीं, इनमें से एक भी बात दुनिया के बड़े से बड़े तर्क से सिद्ध नहीं की जा सकती. इसलिए महात्मा बुद्ध ने ऐसे प्रश्नों पर मौन की नीति अपनाई थी. लेकिन उनके अनुयायियों ने बुद्ध के मौन को भी लोक के स्तर पर लाकर उसकी अपनीअपनी तरह से व्याख्याएं की हैं. ईश्वर के बार में आधुनिक दर्शनशास्त्री क्या सोचते हैं, यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है. मुख्य बात यह है कि इन प्रश्नों को लेकर उनके और जनसाधारण के बीच किसी प्रकार का संवाद नहीं हो पाता. दार्शनिक अवधारणाएं अकादमिक अहमन्यता का शिकार होकर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रही हैं. इसलिए भी कि संसार में अधिकांश लोग ईश्वर की सत्ता पर विश्वास रखते हैं. धर्म और राजनीति के अलंबरदारों के स्वार्थ मनुष्य के इसी भ्रम पर टिके हैं. इसलिए वे इसे न केवल बनाए रखना चाहते हैं, बल्कि भिन्नभिन्न माध्यमों से उसको और अधिक पुष्ट भी करते रहते हैं. बौद्धिक बहसों में सिमटा आधुनिक दर्शन इस विचार पर जनसाधारण से सीधे संवाद करने से कतराता है. यह एक विडंबनाजन्य स्थिति है कि समकालीन दर्शनशास्त्रियों ने जनसाधारण के आध्यात्मिक विश्वासों को उसी के ऊपर छोड़ दिया है.

अकादमिक अहमन्यता की शिकार होकर दार्शनिक गवेषणाएं उत्तरोत्तर जटिल होती जा रही हैं. यदि हम भावना को भी मानवीय व्यक्तित्व का एक लक्षण माने तो उसके विश्वासों के आधार पर बनी ईश्वर की छवि अथवा उसकी प्रतीति को लेकर आधुनिक दर्शन के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं है. अस्तित्ववाद आत्मन् का महिमामंडन तो करता है, लेकिन महान आत्मन् अपनी वास्तविक स्थिति को क्यों भूला हुआ है, इसका उसके पास कोई ठोस उत्तर नहीं है. इसके लिए वह मनुष्य की बनाई हुई ठोस व्यवस्थाओं को दोषी ठहराता है, लेकिन एक जीवंत मनुष्य के रूप में तो वे भी अलगअलग ‘आत्मन्’ ही हैं, भले ही स्वार्थसमर्पित अथवा भटके हुए क्यों न हों. ‘उपयोगिता ही प्रामाणिकता’ के आधार पर व्यवहारवाद हर वस्तु का आकलन मनुष्य के लिए उसकी उपयोगिता के आधार पर करना चाहता है. परंतु इस सृष्टि में मनुष्य को आए मुश्किल से एकदो करोड़ वर्ष हुए हैं. जबकि इस ब्रह्मांड की वयस् अरबों वर्ष पुरानी है. तो क्या यह माना जाए कि करोड़ों वर्ष पहले जब इस सृष्टि पर मनुष्य का आगमन नहीं हुआ था, यह प्रयोजनविहीन थी. विकास के क्रम में यह भी हो सकता है कि भविष्य में मानव प्रजाति लुप्त हो जाए और उसके स्थान पर कुछ नई प्रजातियां जन्म ले लें. उस समय इस सृष्टि की उपयोगिता का क्या होगा, क्योंकि दर्शनशास्त्र के अध्ययनक्षेत्र में तो काल और कालातीत सभी विषय आते हैं, तभी उसको विज्ञानों का विज्ञान और शास्त्रों का शास्त्र कहा गया है. विज्ञानवादी तथा तर्कमूलक विश्लेषणवादी ईश्वर के प्रत्यय को कोई अहमियत नहीं देते. वे तर्क को सर्वोपरि मानते हुए उसी के माध्यम से सृष्टि की समस्याओं की तह तक जाना चाहते हैं, लेकिन मनुष्य कोई जड़ पदार्थ नहीं है. उसके मन में पलनेवाली, और पलपल अपना रूप बदलने वाली संवेदनाओं की सर्वमान्य तार्किक व्याख्या कैसे संभव है. और जो सर्वमान्य नहीं, वह तर्क की कसौटी पर खरा कैसे उतर सकता है.

जाहिर है कि आज भी ऐसी बहुतसी समस्याएं हैं जिनका उत्तर दर्शनशास्त्र के पास भी नहीं है. उसकी अधिकांश मान्यताएं एकदूसरे को काटती हैं और कभीकभी तो वे कोरा वाग्जाल ही महसूस होती हैं. बावजूद इसके दर्शनशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. बल्कि वर्तमान परिवेश में जब धर्म भी राजनीति और बाजार के हाथों में खेलने लगा है, वे उसका उपयोग अपनी जरूरत के अनुसार कभी महज खेल की भांति, तो कभी हथियार की तरह करते हैंµयह दर्शनशास्त्र ही है जो निरपेक्षभाव से मानवीय विवेक को परिपक्वपरिपुष्ट करने का धर्म निभाता है, अत इसका अध्ययन धार्मिक मान्यताओं के पीछे अंतनिर्हित सत्य को परखने, उसके नाम पर रचे जा रहे प्रपंचों से बचने तथा धार्मिक प्रतीकों का मौजूदा परिवेश में आकलन करने के लिए अत्यावश्यक है, भले ही मनुष्य की समस्त जिज्ञासाओं का समाधान अभी दर्शनशास्त्र के पास न हो. रसेल का मानना था कि मानवीय जिज्ञासाएं अनंत हो सकती हैं. इतनी कि उन सबका हल दर्शनशास्त्र के पास भी न हो. बावजूद इसके, वे दर्शनशास्त्र के अध्ययन को अनिवार्य मानते थे. उनका कहना था किµ

दर्शनशास्त्र का अध्ययन अत्यावश्यक है, न केवल मानवीय जिज्ञासाओं के सटीक समाधान के लिए, क्योंकि सभी प्रश्नों का कोई सर्वसुसंगत उत्तर हो ही नहीं सकता, सिद्धांततः भी ऐसा होना संभव नहीं है, दर्शनशास्त्र का अध्ययन अत्यावश्यक इसलिए है, कि इससे जुड़े प्रश्न हमारी धारणाओं को मौलिक विस्तार देते हैं, वे हमारे भीतर यह विश्वास जगाते हैं कि इस संसार में क्या संभव है, साथ ही ये हमारी कल्पनाशक्ति को प्रचुर उर्वर बनाते हुए, हमारे दृष्टिबोध और विवेक दोनों को कुंठित करते वाली हमारी जड़ और हठधर्मितापूर्ण मान्यताओं को फीका करते जाते हैं. दर्शनशास्त्र का अध्ययन इसलिए भी अनिवार्य है कि इस अनंत ब्रह्मांड पर विचार करते हुए हमारा मस्तिष्क उत्तरोत्तर विकासमान रहता है, जिससे हम उस परमसत्ता को पहचानने लगते हैं, जिसने जो इसमें अंतर्निहित परमशुभ की संरचना की है.’

दरअसल दर्शनशास्त्र की महत्ता इसमें नहीं है कि वह हमारी जिज्ञासाओं का समाधान लेकर आता है, उसकी महत्ता इसमें भी है कि वह हमें नएनए प्रश्न करने को प्रेरित करता है, और हममें इतना धैर्य पैदा करता है, कि हम दूसरों की बात गंभीरतापूर्वक सुन सकें, उनके साथ खुले मन से संवाद कर सकें, विशेषकर ऐसे समय में जब प्रत्येक धर्म सिर्फ अपनी सुनता और उसी के प्रति हठधर्मिता दिखाता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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    हजारी प्रसाद द्विवेदी का आलेख गुरुनानक: व्यक्तित्व और संदेश, भारतीय जनजीवन: चिंतन के दर्पण में, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, प्रष्ठ 11-12, अक्टूबर 1993.

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    वही

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    वही

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    …by doubting we come to inquiry; and through inquiry we perceive truth- Peter Abelard.

5

    Socrates was a buffoon who got himself taken seriously-Nietzsche.

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    God is dead and we have killed him- Nietzsche, the German poet-philosopher.

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    …it is better to know how men thought in former times than how they acted.- Voltaire

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    The Knowledge is Power.

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    The Philosophy is – ‘the logical study of the foundations of the sciences.’ Bertrand Russell

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    Thus…Philosophy is to be studied, not for the sake of any definite answers to its questions, since no definite answers can, as a rule, be known to be true, but rather for the sake of the questions themselves; because these questions enlarge our conception of what is possible, enrich our intellectual imagination and diminish the dogmatic assurance which closes the mind against speculation; but above all because, through the greatness of the universe which philosophy contemplates, the mind also is rendered great, and becomes capable of that union with the universe which constitutes its highest good. – The Problems of Philosophy, by Bertrand Russell.