प्लेटो का राजनीतिक दर्शन : परमशुभ की साधना

कहा जाता है कि आधुनिक समाज में दर्शन की जितनी भी चिंतनधाराएं हैं, सभी प्लेटो के विशद् लेखन की पादटिप्पणियां हैं. गुरु सुकरात ने प्लेटो के चिंतन को नूतन दिशा दी थी. उसी के विचारों का प्रभाव था कि अपनी सभी कविताओं, जिनमें वह पांडुलिपि भी थी, जो एक प्रतियोगिता के लिए तैयार की गई थी, को उसने सुकरात के मिलने के पश्चात आग के हवाले कर दिया था. सुकरात ने ही उसको समझाया था कि ‘शुभत्व’ दुनिया से, जीवन से बाहर की वस्तु नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति जो उसकी कामना करता है, वह उसको प्राप्त कर सकता है. उसका यह भी मानना था कि शुभत्व व्यक्तिमात्र का, लक्षण है. हर कोई शुभ की कामना करता है. ज्ञान और सत्याचरण शुभत्व को प्राप्त करने के साधन हैं. सुकरात से पहले प्राणी और परमात्मा के बीच अलंघ्य दूरी थी. दर्शन वादविवाद में बदल चुका था. दूसरों को शास्त्रार्थ में परास्त कर देना ही बुद्धिमानी का पर्याय था. सोफिस्ट विचारक तो इसी को अपने जीवन का ध्येय मानते थे. इसी प्रकार की शिक्षा देने में उन्हें प्रवीणता प्राप्त थी. किंतु सुकरात ने यह कहकर कि हर कोई शुभत्व की कामना करता है, परोक्षरूप में यह भी स्वीकारा था कि आत्मोत्थान की चाहत व्यक्तिमात्र का लक्षण है. तदनुसार सभी एकदूसरे के बराबर हैं. अंतर केवल बाहरी है. मनुष्य और ईश्वर यानी आत्मा और परमात्मा के बीच भी अलंघ्य दूरी नहीं है. मनुष्य चाहे तो स्वयं को नैतिकरूप से इतना ऊंचा उठा सकता है कि परमात्मा से सीधा संवाद कर सके. कह सकते हैं कि सुकरात की विचारधारा ईश्वर और इंसान के अंतर को मेटती, उन्हें परस्पर करीब लाती थी. उससे पहले यह संभव न था. ऐसा भी नहीं है कि सुकरात ने जो कहा वह सर्वथा अनूठा था. भारत में औपनिषदिक मुनि प्रायः यही कहते आए थे. गौतम बुद्ध ने तो नैतिक प्रश्नों को इतना अहम् माना था कि उनसे बाहर सोचने, इतर अभिकल्पना करने को भी अनावश्यक माना था. यूनान और भारत के बीच प्रगाढ़ व्यापारिक संबंध भी थे. व्यापारिक काफिले भौतिक वस्तुओं के अलावा विचारों एवं सांस्कृतिक उपादानों का भी आदानप्रदान करते हो. इसलिए यह असंभव नहीं कि यूनान और भारतीय मनीषा आपस में एकदूसरे को आरंभ से ही प्रभावित करते रहे हों.

प्लेटो के सामने समस्या थी कि शुभत्व की यात्रा को आसान कैसे बनाया जाए. चूंकि परमात्मा परमशुभ है, अतः उसको पाने, उसके जैसा बनने के लिए व्यक्ति को भी अपने स्तर से ऊपर उठना होगा. इसके लिए उसका चारित्रिक विकास अत्यावश्यक है. अतएव जरूरी है कि हर व्यक्ति ‘शुभत्व’ के लक्षणों को पहचाने. उन्हें प्यार करे. उनकी राह का राही बने तथा इस पुनीत कर्तव्य में दूसरों की भी यथासंभव सहायता करे. उसने आचरण की पवित्रता पर जोर दिया है. वह जानता था कि व्यक्ति की शांति में ही समाज की शांति और प्रगति निहित है. इसलिए उसने एक आदर्श समाज का सपना देखा था. उसके कल्पनालोक की झलक हमें उसकी महत्त्वाकांक्षी संवादपुस्तक ‘रिपब्लिक’ में दिखाई पड़ती है. दस अध्यायों में बंटे इस विशद् ग्रंथ में प्लेटो शिक्षा, समाज, न्याय, नैतिकता सहित विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों यथा कुलीनतावाद, राजशाही, साम्राज्यवाद, गणतंत्र, तानाशाही आदि पर विस्तृत चर्चा करता है. बट्रेंड रसेल के अनुसार विषय की दृष्टि से यह पुस्तक मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बंटी है. पहले खंड से लेकर चौथे खंड से समापन से कुछ पहले तक वह अपने आदर्श समाज की भूमिका बनाता है. किंतु न्याय की व्याख्या को वह इस हिस्से से अलग रखता है. स्पष्ट है कि रिपब्लिक’ के लेखन के दौरान ही प्लेटो के मन में न्याय को लेकर अलग से पुस्तक तैयार करने की भूमिका बन चुकी थी, जो आगे चलकर ‘ला॓ज’ में पूरी हुई. चैथे खंड के बाकी हिस्से से सातवें खंड तक वह ‘दार्शनिक’ सम्राट की अपनी परिकल्पना को विस्तार देता है, यह सिद्ध करने का प्रयत्न करता है कि केवल दार्शनिक ही आदर्श सम्राट हो सकते हैं. पुस्तक के आठवें से दसवें खंड इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं कि इनमें वह सभी प्रचलित शासन प्रणालियों यथा सामंतशाही, राजतंत्र, तानाशाही और गणतंत्र के गुणअवगुण पर विचार करता है. उस समय तक यूनान में आदर्श समाज की संकल्पना जन्म ले चुकी थी. ‘रिपब्लिक’ में यह कल्पनालोक अधिक व्यवस्थित रूप से मौजूद है. लेकिन यदि यहीं तक सीमित होता तो प्लेटो अन्य यूनानी विचारकों जितनी ख्याति से ही संतोष करना पड़ता. उसका योगदान इससे कहीं अधिक है. वह आदर्शवादी समाज की संकल्पना तथा उसको साकार बनाने के लिए व्यवस्थित चिंतन प्रस्तुत करता है. सुकरात और अपने समकालीन विचारकों के अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि सम्राट को दार्शनिक होना चाहिए, तभी वह समाज को निजी आकांक्षाओं एवं प्रलोभनों से परे रखकर विकासवादी दृष्टि से देख सकता है. व्यक्तिवादी दृष्टि राज्य को भी सीमाओं में कैद कर देती है. यदि व्यक्तिविशेष सोचे कि राज्य को कैसा होना चाहिए, तो राष्ट्र संबंधी उसकी अभिकल्पना भी पूर्णतः व्यक्तिवादी अभिकल्पना होगी. जबकि कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक है कि वह अपने अधिक से अधिक नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करे. प्लेटो ने इसके लिए राज्य के जिन सद्गुणों की बात कहता है, वे हैं—साहस, ज्ञान, सहिष्णुता तथा न्याय. न्याय की अधिकतम संभाव्यता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि राज्य में राजनीतिक दर्शन की प्रमुख शर्तों का पालन होता हो.

प्लेटो ने मानवसमाज के वर्गीकरण आधार उसकी नैसर्गिक प्रतिभा, शक्ति तथा साहस को माना है. जो विलक्षण प्रतिभाशाली नहीं हैं, न बहादुर हैं और न ही हृष्टपुष्ट हैं, वे प्रायः उत्पादक कार्यों, खेती, हाथ के दस्तकार के सर्वाधिक उपयुक्त माने जाते हैं. मगर जो सुंदरसजीले हैं, साथ में ताकतवर और साहसी भी हैं, उनको सुरक्षा और राजनीति के क्षेत्र में लिया जाना चाहिए. उनमें भी जो अतिरिक्तरूप से साहसी, विलक्षण प्रतिभाशाली और सद्गुण संपन्न हैं, वे राज्य को चलाने में स्वयं समर्थ होंगे. प्लेटो के आदर्श राज्य की परिकल्पना अभिजात वर्ग पर निर्भर है. यूनानी भाषा में जिसका अर्थ है, ‘सर्वोत्तम द्वारा सुशासन’. इस विश्लेषण से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि प्लेटो की शासन व्यवस्था में कम प्रतिभाशली अथवा जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका मानना है कि समाज का बहुसंख्यक वर्ग, यानी जनसाधारण जो न सामान्य स्तर का प्रतिभाशाली है, शरीर सौष्ठव और युद्धकला में भी उतना प्रवीण नहीं है, को समाज के शेष कार्यों का दायित्व सौंपा जाना चाहिए. इस वर्ग को उसने ‘उत्पादक’ वर्ग की संज्ञा दी है. प्लेटो के समय में यही वर्ग लौहमति, काष्ठकारी, बुनकर, रंगाई, कृषिकर्म, व्यापार आदि में लिप्त था. आर्थिक दृष्टि से इस वर्ग की आय सीमित थी, मगर संख्या की दृष्टि से यह अन्य सभी वर्गों से बड़ा था. उन दिनों यूनान में युवाओं का सेना में भर्ती होना गर्व और प्रतिष्ठा का विषय था. पुलिस और सैन्यबलों को ‘सुरक्षा दस्ता’ कहा जाता था. समाज और राज्य दोनों की बागडोर सर्वाधिक प्रतिभाशाली, वीर, साहसी, अतीव धैर्यवान नागरिकों के समूह को को सौंपी जाती थी, जिन्हें ‘गार्जियन’ यानी अभिभावक कहा जाता था. प्लेटो के आदर्श राज्य में ‘साहस’ को सुरक्षाकर्मियों तथा ‘बुद्धिमानी’ को अभिभावकों का लक्षण बताया गया है. उसके अनुसार राज्य के स्थायित्व के लिए आवश्यक है कि ‘उत्पादक’ यानी कृषक और शिल्पकर्मी, सुरक्षाकर्मियों के अनुशासन में हों और सुरक्षाबल पूरी तरह से अभिभावकों के नियंत्रण में रहें. इनमें ये यदि एक भी समूह अपने कर्तव्यपालन में चूक करता है, अनुशासन को भंग करता है, तो उससे राज्य की शांति भंग हो सकती है. समाज और सरकार के इन विभिन्न अंगों में कर्तव्यपरायणता की भावना स्वयंस्फूर्त होनी चाहिए, न कि किसी बाह्यः दबाव से अनुप्रेत. यदि अनुशासन के प्रति अंतःपे्ररणा का अभाव है तो उसके लिए सरकार को अतिरिक्त संसाधन खर्च करने होंगे, जिससे विकास की गति में गिरावट आ सकती है. इसलिए प्लेटो ने आत्मानुशासन एवं दायित्वभावना पर जोर दिया है.

प्लेटो का आदर्शलोक

प्लेटो पहला दार्शनिक था, जिसने न्यायाधारित समाज का सपना देखा था. उसका मानना था कि शिक्षा केवल शीर्षस्थ वर्ग सीमित न रहे. जबकि जनसाधारण को भी अपने बौद्धिक विकास के अवसर प्राप्त हों. उसकी बहुचर्चित पुस्तक ‘रिपब्लिक’ का प्रथम उद्देश्य ही न्याय को परिभाषित करना है. यद्धपि न्याय की उसकी परिकल्पना कानून, न्यायालय, वकील आदि की प्रचलित अवधारणा से भिन्न है. न्याय से उसका अभिप्राय नैतिकता और आत्मानुशासन की भावना से है. चूंकि किसी भी पदार्थ की गुणवत्ता का आकलन करना बड़े परिवेश में अपेक्षाकृत आसान होता है, इसलिए वह न्याय को पूरे समाज के संदर्भ में देखता है, न कि व्यक्तिविशेष की वस्तु मानकर. यह मानते हुए कि न्याय किसी भी आदर्श राज्य की पहली जरूरत हो सकता है, अतएव वह न्याय को उसकी संपूर्णता में स्थापित करना चाहता है. प्लेटो का समाजदर्शन वास्तव में वह कल्याणकारी सपना है, जो उसकी आंखों में आदर्शसमाज की स्थापना को लेकर था. प्लेटो सबसे पहला विचारक था जिसने नागरिकों को तीन समूहों में वर्गीकृत किया था, वे हैं—जनसाधारण, सिपाही या रक्षक तथा अभिभावक. समस्त राजकीय शक्तियां अभिभावक के अधीन होती हैं, जिनकी संख्या बाकी दो वर्गों के सापेक्ष बहुत कम होती है. अभिभावक कौन बन सकता है? वही जो बुद्धिमानी में अद्वितीय हो. जो सर्वाधिक धैर्यवान और विवेकसंपन्न हो. जो इतना शक्तिशाली भी हो कि आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के मैदान में सैनिकों का नेतृत्व कर सके. अभिभावक वर्ग के सदस्यों का चयन संवैधानिक नियमों के अनुसार किया जाता है. यूनान की तत्कालीन प्र्रथा के अनुसार अभिभावक वर्ग का चयन प्रायः वंशानुगत आधार पर किया जाता था. मगर कभीकभी किसी विलक्षण प्रतिभासंपन्न किशोर को भी भी वरिष्ठों की कतार में सम्मिलित कर लिया जाता था. अभिभावक नियुक्त किए जाने के बाद भी उसके कार्यों की समीक्षा की जाती थी. भ्रष्टाचार अथवा अकर्मण्यता के आरोपी को पदावनत कर वरिष्ठों की सभा से निष्कासित कर दिया जाता था. प्लेटो के सामने मुख्य समस्या थी वरिष्ठों को संविधान के प्रति जवाबदेह और समर्पित बनाए जाने की थी. चूंकि यह कार्य व्यक्तिगत नैतिकता, बुद्धिमानी और समर्पणभाव के साथ ही संभव है, अतएव अपने लक्ष्य को प्राप्त करने, समाज को मर्यादित बनाने के लिए वह आर्थिक, शैक्षिक, जैविक, धार्मिक, राजनीति आदि अनेक व्यवस्थाओं को अपनाने का सुझाव देता है. भारतीय वर्णव्यवस्था में ब्राह्मणों को मिले अतिरिक्त अधिकारों की भांति प्लेटो भी अभिभावक वर्ग के लिए अतिरिक्त अधिकारों की संस्तुति करता है, तथापि दोनों में अंतर है. भारतीय वाङमय में यह काम जहां धर्म आग्रह अथवा धर्म के निर्देशन में किया जाता है, प्लेटो पदाधिकारियों का चयन वस्तुनिष्ठ ढंग से, उनकी अपनी योग्यता और कार्यकुशलता के आधार पर करने का सुझाव देता है. उसकी सामाजिकराजनीतिक आचारसंहिता के कुछ प्रावधान केवल रक्षकों के लिए है. बावजूद इसके उसका विशेष आग्रह वरिष्ठों को जवाबदेह बनाने पर है, जो बिना शिक्षा के संभव नहीं.

प्लेटो जीवन में शिक्षा को कितना महत्त्व देता था, इसका परिचय उसके द्वारा स्थापित ‘अकादमी’ से भी मिलता है. वह शिक्षा को बहुआयामी बनाने का समर्थक था. अपने आदर्शलोक के लिए उसने शिक्षा को दो प्रमुख वर्गों में वर्गीकृत किया था, वे हैं—संगीत और शारीरिक व्यायाम. संगीत और व्यायाम दोनों को ही वह व्यापक संदर्भों में देखता था. उसके लिए संगीत का अभिप्राय था, हर वह चीज जो मानवसंतति के क्षेत्र में आती हो, जिससे मानवसमाज को उन्नत बनाया जा सके. इसमें राजनीति, कला, साहित्य, दर्शन, अर्थशास्त्र सभी में प्रवीणता ही व्यक्ति को जीवनक्षेत्र में सफल बना सकती है. इनमें से किसी एक विषय में भी अधूरे ज्ञान से जीवन की लय बिगड़ सकती है. इसी प्रकार व्यायाम का अभिप्राय था, हर वह वस्तु जो शारीरिक कसरत और प्रशिक्षण के क्षेत्र से संबद्ध हो, जिसके द्वारा शरीर के साथ मन को भी ऊर्जा मिले. इस तरह प्राचीन यूनानी शब्दावली में संगीत का अभिप्राय लगभग उतना ही व्यापक था, जितना आजकल संस्कृति का है. इसी प्रकार व्यायाम से अभिप्राय बौद्धिक और शारीरिक स्फूर्ति और ऊर्जा से था. प्लेटो का मानना था कि संस्कृति का काम व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से विनम्र एवं उदार बनाना है. ‘रिपब्लिक’ में यूनानी अभिजात वर्ग का जिस तरह चित्रण किया गया है, उससे जाहिर होता है कि वह धनवैभव और प्रतिष्ठा का तो भोग करता था, किंतु राजनीतिक एकाधिकारवाद से मुक्त था. राजनीति का वह उतना ही प्रयोग करता था, जितना कि पदप्रतिष्ठा और सामाजिक गरिमा को बनाए रखने के लिए अनिवार्य था. अभिभावक वर्ग के लिए राजनीतिक दायित्वपालन का माध्यम थी. वस्तुतः ईसा पूर्व चैथी शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी पूर्व तक भारत और यूनान समेत प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में बौद्धिक जागरण का वातावरण बना था. पुराने ज्ञान को लगातार चुनौती दी जा रही थी. समाज में नवबौद्धिक वर्ग की जो प्रतिष्ठा थी, उसके आगे राजनीतिक धनवैभव कोई मायने नहीं रखते थे. इसलिए उस समय के समाजों में हम देखते हैं कि राजा भी खुद को लेखक और दार्शनिक कहलवाने को उत्सुक दिखते हैं. महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध दोनों ने राजकुल में जन्मे थे, किंतु उन्होंने राजकीय प्रलोभनों को त्यागकर अपने लिए ज्ञानसाधना का मार्ग चुना था. जिन राजाओं में निजी प्रतिभा का अभाव होता वे अपने राज्य में दार्शनिकों, कवियों और वैज्ञानिकों को शरण देकर गौरव का अनुभव करते थे.

अभिजात वर्ग में शिक्षा पर पूरा जोर दिया जाता था. शिक्षा का उद्देश्य किसी खास विषय में बौद्धिक विशेषज्ञता प्राप्त कर लेने तक सीमित नहीं था, शिक्षण का वास्तविक ध्येय व्यक्तित्व निर्माण होता था. इसलिए धैर्य, सदाचरण, साहस, बुद्धिविवेक आदि कुछ ऐसे गुण थे, जिन्हें शिक्षा के माध्यम से उभारने पर जोर दिया था. स्पार्टा और एथेंस दोनों की राज्यों में जिस प्रकार लगातार युद्ध होते रहते थे, वहां सैन्य अभियानों के लिए मानवशक्ति की सदैव आवश्यकता पड़ती थी. युवाओं में आक्रामकता को पसंद किया जाता था. उसमें कोई कमी न आए, इसके लिए उन्हें रागात्मक गतिविधियों, विशेषकर प्रेम कविताओं से दूर रखा जाता था. स्मरणीय है कि प्लेटो ने अपने लेखन की शुरुआत एक कवि के रूप में की थी, किंतु बहुत जल्दी उसको सुकरात की गहन दार्शनिक विवेचनाओं के आगे कविताओं का क्षेत्र छोटा दिखने लगा. इसलिए लगभग बीस वर्ष की अवस्था में ही जब सबसे संवेदनशील और भावनाओं में बह जाने की उम्र होती है, उसने कविताओं से किनारा कर लिया था. माताओं और दाइयों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने बच्चों को केवल तयशुदा कहानियां ही सुनाएं. ऐसी कहानियां जिनमें साहस, सदाचरण, सहनशीलता और मानवीय व्यवहार की गाथाएं हों. यहां तक कि होमर और हेसीयोद जैसे प्राचीन कवियों की रचनाएं भी बच्चों के लिए वर्जित मानी जाती थीं. यह माना जाता था कि ये चीजें बच्चों को मृत्यु का भय दिखाती हैं, जबकि यूनानियों के लिए शिक्षा का प्रथम उद्देश्य था, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहना

हमारे बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि दासता मृत्यु से कहीं ज्यादा घृणित है. अतः इसके लिए उन्हें ऐसे किसी भले आदमी की कहानी नहीं सुनानी चाहिए जो, अपने घनिष्ट मित्रों की मृत्यु पर भी, रोता और विलाप करता हो.’

मानव व्यक्तित्व का एक गुण मर्यादा पूर्ण आचरण भी था, जिसके अनुसार सभा के बीच जोरजोर से हंसना असभ्य समझा जाता था. प्राचीन ग्रीक कविताएं जो व्रत, उपवास, ईश्वर के प्रति गहन निष्ठा दर्शातीं अथवा स्वर्ग का लालच देती थीं, उन्हें बच्चों के लिए वर्जित माना जाता था. प्लेटो के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्ति वह है, जो बुरे व्यक्ति का अनुसरण नहीं करता. कलाओं में नाटकों को भी बहुत प्रशंसा की दृष्टि से नहीं देखा जाता था. चूंकि अधिकांश नाटकों में खलनायक की उपस्थिति सामान्य थी. अतः प्लेटो का विचार था कि खलनायक का अभिनय करने वाले पात्र दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जिससे लोगों में, भले ही ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम हो, उसके प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है. यही क्यों स्त्रियों, दासों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्ग के लोगों को भी नाटक के पात्र भिन्नभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं; और उन्हें अपनी किसी न किसी रूप में यथास्थिति को बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं. उल्लेखनीय है कि प्राचीन यूनान में नाटकों में स्त्रियों का अभिनय पुरुष पात्रों द्वारा किया जाता था, वे प्रायः समाज के शीर्षस्थ वर्गों तथा दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोगों का ही चित्रण करते थे. यथार्थवादी नाटकों का उदय उस समय तक नहीं हो पाया था. शायद यही कारण है कि अपने आदर्शलोक में प्लेटो ने नगर से सभी नाटक मंडलियों के निष्कासन का सुझाव दिया था. यही नहीं उसने दुख एवं शैथिल्य का भाव जगाने वाले संगीत का भी बहिष्कार करने का सुझाव दिया था, जबकि साहस और धैर्य जगाने वाले संगीत पर किसी प्रकार का नियंत्रण न था. इसी प्रकार गीत भी वही स्वीकार्य थे, जो साहस और सहिष्णुता के भावों को जगाते हों. सहिष्णुता का अर्थ युद्धस्थल में वीरतापूर्ण ढंग से जूझते हुए अधिक से अधिक घाव सहने तथा उनकी परवाह न करते हुए भी युद्ध में डटे रहने से था. प्रेम और भावानुराग भरे गीतों और कविताओं के लिए प्लेटो के आदर्शलोक में कोई स्थान न था. शरीर को चुस्त और फुर्तीला बनाए रखने के लिए शारीरिक प्रशिक्षण पर पूरा जोर दिया जाता था. नागरिकों को भोगविलास से दूर रखने के लिए प्लेटो ने उनके खानपान पर भी नियंत्रण का सुझाव दिया है. किसी को भी बगैर अनुमति भुना मांस, मछली खाने की छूट न थी. भोजन में सीमित व्यंजन रखने का सुझाव दिया गया था. चटनी और मिठाई परोसने से परहेज था. प्लेटो ने सादे और पौष्टिक भोजन की अनुशंसा की है, ताकि डा॓क्टरों को दूर रखा जा सके. रोजमर्रा की बातचीत में भी अनुशासन और मर्यादा का ध्यान रखने के निर्देश ‘रिपब्लिक’ में हैं. युवाओं को गालीगलौंच वाली भाषा का उपयोग करने, भद्दा मजाक करने की मनाही थी. यद्यपि कुछ विशेष अवसरों पर उन्हें चीखनेचिल्लाने और मौजमस्ती की अनुमति सायास दी जाती थी. दुश्मन को डराने, उसके दिल में दहशत पैदा करने के लिए इस तरह का अभ्यास जरूरी माना गया था. युद्धकाल में किशोरों को युद्ध देखने के लिए प्रेरित किया जाता था, ताकि वे स्वयं को एक अच्छे योद्धा के रूप में तैयार कर सकें. हालांकि किशोरों को बिना अनुमति के युद्ध में हिस्सा लेना वर्जित था.

अपने आदर्शलोक में अर्थव्यवस्था के नियमन के लिए प्लेटो ने कुछ सुझाव दिए हैं. और हम हैरान होते हैं कि करीब 2400 वर्ष अर्थात मार्क्स से भी 2200 वर्ष पहले प्लेटो ने आर्थिक समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. विशेषकर अभिभावक वर्ग के लिए उसका सुझाव था कि उन्हें छोटे घरों में रहना चाहिए. साधारण भोजन करना चाहिए. उस वर्ग के लिए उसने सामूहिक आवास बनाए जाने का सुझाव था. उनका भोजन भी सामूहिक होता था. प्लेटो के आदर्शलोक में व्यवस्था थी कि अभिभावक वर्ग को निजी संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं होगा. उनके लिए सोने और चांदी के गहनों का उपयोग वर्जित था. चूंकि संपत्ति की कोई स्पर्धा नहीं थी. पूरे समाज के लिए एक जैसे कानून थे, अतएव ऐसा कोई कारण नहीं था, जो उन्हें दुख पहुंचाता हो. अत्यधिक संपन्नता और विपन्नता दोनों ही हानिकारक हैं, इस कारण प्लेटो के आदर्शलोक में इन्हें निषिद्ध माना गया था. उसने व्यक्ति के बजाय समाज के सुख को महत्त्व दिया जाता था. प्लेटो के कुछ आधुनिक अनुयायी उसके सहजीवन के विचार का विस्तार करते हुए उसे परिवार की सामूहिकता तक ले जाते हैं. उनके अनुसार मित्रों के बीच कोई भेद नहीं होता, न किसी पर्दे की दरकार होती है. अतः समाज में स्त्रियों और बच्चों समेत सबकुछ साझा होना चाहिए. आदर्श राज्य की परिकल्पना करते हुए प्लेटो ने सुझाव दिया है कि बच्चों को उनके मातापिता से जन्म के कुछ समय बाद ही अलग कर, राज्य के नेतृत्व में ले लेना चाहिए. लड़कियों और लड़कों की शिक्षा में समानता होनी चाहिए. यहां तक कि संगीत, व्यायाम, कलासाहित्य में भी लड़कों और लड़कियों की शिक्षा में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. स्त्री और पुरुष की मूल प्रवृत्तियां एकसमान होती हैं, इसलिए अच्छा अभिभावक बनने के लिए जो शिक्षा पुरुषों के लिए अनिवार्य है, वही लड़कियों के लिए भी जरूरी है. प्लेटो सेना और रक्षा सामग्री के खर्च को न्यूनतम करने के पक्ष में था. यूनानी समाज युद्ध प्रिय था. उनमें छोटेछोटे राज्य थे, जिनके बीच अकसर युद्ध होते रहते थे. इसके लिए राज्य को सेना और युद्ध साम्रगी पर अधिक खर्च करना पड़ता था. प्लेटो का मानना था कि युद्ध और सेना पर अत्यधिक खर्च करने से उचित है, जीत की सुनिश्चितता के लिए युद्धकाल में सहयोगियों को खरीद लेना. चूंकि उस समय राज्य छोटेछोटे भूक्षेत्रों तक सीमित थे, तथा वे परस्पर युद्धरत रहते थे, इसलिए सहयोगियों को खरीदना कठिन भी नहीं था. प्लेटो का यह विचार उसकी राजनीतिक कूटनीतिज्ञता का परिचायक है.

प्लेटो के आदर्शलोक में जिस बात पर पूरा जोर दिया गया था, वह थी—स्त्रीपुरुष की समानता. शिक्षा, समाज, राजनीति के स्तर पर स्त्रियों को पुरुष के समान अधिकार देना. वह कला, साहित्य, राजनीति के साथ युद्ध के बारे में भी लड़कियों को लड़कों जैसी शिक्षा दिलाने के पक्ष में था. उसका मानना था कि बच्चों के पालनपोषण से लेकर उनकी शिक्षादीक्षा तक का संपूर्ण दायित्व राज्य का होना चाहिए. बच्चे व्यक्तिविशेष की नहीं, समाज की जिम्मेदारी हैं. वे भावी नागरिक हैं, अतः उनके बीच स्पर्धा की भावना को समाप्त करने के लिए आवश्यक है कि उनका पालनपोषण इस प्रकार हो कि मातापिता अपनी संतान की पहचान भी न कर सकें. न ही किसी बच्चे को यह पहचान हो कि उसके जन्मदाता कौन हैं. इसके लिए उन्हें ऐसे रहस्यमय और एकांत स्थान पर रखा जाना चाहिए, जहां उनको रखा जा सकता है. बालक हृष्टपुष्ट, विवेकवान और होंइसके लिए आवश्यक है कि उनके मातापिता स्वस्थ एवं संतानोत्पत्ति में सक्षम हों. वे इतने वृद्ध भी न हों कि उनका स्वास्थ्य उनकी संतति को प्रभावित कर सके. प्लेटो के अनुसार बच्चे को जन्म देते समय मां की आयु बीस से चालीस वर्ष और पिता की अवस्था पचीस से पचपन के बीच होनी चाहिए. इससे ऊपर की अवस्था के स्त्रीपुरुष परस्पर संभोग तो कर सकते हैं, किंतु उनको संतानोत्पत्ति की अनुमति नहीं दी जा सकती. निर्धारित आयु सीमा के पश्चात स्त्रीपुरुष के संसर्ग से यदि गर्भ ठहरता है तो भ्रूणपात कराना अनिवार्य होगा.

प्लेटो के आदर्शलोक में समाज और राज्य को ऊंचे स्थान पर रखा गया था. राज्यहित सर्वोपरि था. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य था कि वह राज्य के लिए स्वस्थ्य और बुद्धिमान नागरिक तैयार करे. भावी संतति स्वस्थ एवं विवेक संपन्न हो, इसके लिए राज्य नागरिकों के कामसंबंध नियंत्रित करने का अधिकार था. वैवाहिक संबंध तय करने में भी राज्य की भूमिका सर्वोपरि होती थी. राज्य द्वारा तय किए गए विवाहसंबंधों के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार नागरिकों को भी नहीं था, उन्हें यह दायित्व राज्य के प्रति कर्तव्यपालन के निमित्त निभाना ही पड़ता था. वैवाहिक संबंधों को तय करने में प्यार और भावना कभी आड़े नहीं आते थे. चूंकि कोई बालक यह नहीं जान पाएगा कि उसका वास्तविक जन्मदाता कौन है, इसलिए व्यवस्था की गई थी कि पिता की वयस् के प्रत्येक व्यक्ति को वह ‘पिता’ से संबोधित करेगा. इसी तरह माता की वयस् की स्त्रियों को ‘माता’ और अपने समवयस्कों को भाई अथवा बहन कहकर पुकारेगा. ‘पिता’ और ‘पुत्री’ तथा ‘माता’ और ‘पुत्र’ के बीच वैवाहिक संबंधों का बहिष्कार किया जाता था, यद्यपि इसके लिए कोई ठोस नियम नहीं था. यहां प्लेटो के चिंतन की दुर्बलता साफ नजर आती है. तयशुदा व्यवस्था के अनुसार यदि कोई बालक या बालिका अपने वास्तविक जन्मदाताओं के नाम से पूर्णतः अनभिज्ञ रखा गया है, तो वह यह कैसे तय कर पाएगा कि उसका रक्तसंबंधी भाई अथवा बहन कौन है?

ऐसा लगता है कि प्लेटो ‘विवाह’ और ‘परिवार’ नामक संस्थाओं को लेकर अपने आप में स्पष्ट नहीं था. वह एक ओर तो बच्चों का पालनपोषण मातापिता से दूर राज्य के संरक्षण में इस तरह करने की सिफारिश करता है कि बच्चों को पता भी न चले कि उनके वास्तविक जन्मदाता कौन हैं, वह यह भी शर्त रखता है कि समवयस्क युवकयुवतियां परस्पर भाईबहन होंगे. दूसरे वह ‘भाई’ और ‘बहन’ के बीच विवाहसंबंधों को भी निषिद्ध ठहराता है. वह यह नहीं बताता कि मातापिता से दूर, एकांत में अपने हमउम्र बच्चों के बीच पले बच्चे कैसे अपने वास्तविक भाईबहन की पहचान कर सकेंगे. इससे इतना स्पष्ट है कि मातापिता, पुत्रपुत्री और भाईबहन को लेकर जिस तरह के भावनात्मक संबंध आज पाए जाते हैं, प्लेटो के दिमाग में भी उसी प्रकार के संबंधों की छवि मौजूद रही होगी. इस अवधारणा का आधार यह है कि प्लेटो के आदर्शलोक में कोई युवा अपने पिता की उम्र के व्यक्ति पर हाथ नहीं छोड़ सकता था. क्योंकि वह वृद्ध उसका जन्मदाता भी हो सकता है. कहा जा सकता है कि यत्किंचित राज्य की अधिनायकवादी सत्ता के समर्थक प्लेटो ने निजी अनुभूतियों, संवेदनाओं के सामान्यीकरण करने का प्रयास किया था. वृहद सामाजिक हितों के मद्देनजर उसको यह जरूरी जान पड़ा था. इससे समाज में न केवल निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती दी जा सकती थी, बल्कि व्यक्ति के हितों के सापेक्ष सामाजिक हितों को वरीयता देना भी अपेक्षाकृत सरल था. मानवीय रिश्तों का यह सामान्यीकरण युद्धप्रिय समाज में सैन्यबल की अबाध आपूर्ति के लिए भी जरूरी था.

प्लेटो एक ओर तो सामाजिक हितों को व्यक्ति के हितों से ऊपर रखता है. ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करता है, जिससे सामाजिक संपत्ति का लाभ उसके सभी सदस्यों को एकसमान प्राप्त हो सके; तथा लोग समाज और राष्ट्र के प्रति इस प्रकार आस्थावान हों कि निजत्व की अवधारणा ही न रहे. दूसरी ओर उसके चिंतन के विरोधाभास भी सामने आते हैं. सामाजिक स्तरीकरण को लेकर प्लेटो ने आश्चर्यजनक तर्क दिया है, जिसके अनुसार ईश्वर ने तीन प्रकार के मनुष्यों को पैदा किया है. स्वर्णनिर्मित, जो सर्वश्रेष्ठ हैं. रजतनिर्मित, ये दूसरे स्तर पर आते थे. इनके अलावा बाकी जनसमूह को उसने कांस्य और लौहविनिर्मित श्रेणियों में रखा था, जिनका दायित्व समाज के परिश्रमसाध्य कार्यों को निपटाना था. प्लेटो के अनुसार एकमात्र स्वर्णविनिर्मित अर्थात सर्वोत्तम श्रेणी के पुरुष ही समाज का संरक्षक बनने की योग्यता रखते हैं. रजतविनिर्मित पुरुष समाज की रक्षा करने योग्य होते हैं, जबकि लौह और कांस्य निर्मित मनुष्य केवल शारीरिक श्रमकौशल द्वारा अपना भरणपोषण करने में सक्षम होते हैं. जहां तक बच्चों की बात है, उनका वर्ग मातापिता के वर्ग द्वारा निर्धारित होगा, हालांकि इसका कोई सार्वकालिक नियम नहीं था. बच्चों को उनके मानसिकशारीरिक स्तर के अनुसार ऊंचे अथवा नीचे वर्ग में विस्थापित किया जा सकता था. प्लेटो को एहसास था कि संभवतः आरंभिक पीढ़ी इस प्रकार के विभाजन को एकाएक स्वीकार न करे. इसलिए उसने लिखा है कि लोगों को इसके लिए उपयुक्त शिक्षा दी जानी चाहिए. प्लेटो का मानना था कि किसी मिथक में विश्वास पैदा करने, समाज में उसको स्थापित करने के लिए न्यूनतम दो पीढ़ियों की जरूरत पड़ती है. उसका आकलन गलत भी नहीं था. जापानियों को बचपन से ही यह सिखाया था जाता था कि सम्राट मिकाडो सूर्य देवता के वंशज, उसके उत्तराधिकारी हैं तथा जापान का निर्माण संसार में सबसे पहले हुआ था. धीरेधीरे यह मिथक जापानी लोगों के मानस स्थापित होता गया. आज स्थिति यह है कि यदि बड़े से बड़ा विद्वान भी इस मिथक के विरुद्ध कोई टिप्पणी करे तो वह बेअसर सिद्ध होती है, बल्कि उसको जापानी सभ्यता एवं संस्कृति के विरुद्ध मान लिया जाता है. प्लेटो ने इस वास्तविकता पर कोई ध्यान नहीं दिया था कि इस प्रकार के मिथकीय अंधविश्वास दार्शनिक अवधाराणाओं से सर्वथा असंगत होते हैं. वे न तो विवेकसम्मत होते हैं, न ही तर्कसिद्ध, वास्तव में वे कुछ चालाक और स्वार्थी बुद्धिजीवियों के बौद्धिक शगल का परिणाम होते हैं, जिन्हें वे समाज में यथास्थिति बनाए रखने के लिए तरहतरह से जीवित रखने का प्रयास करते हैं. चूंकि समाज के अधिकांश संसाधनों तथा उत्पादनतंत्र पर इसी वर्ग का अधिकार होता है, अतएव जनसाधारण की विवशता होती है कि वह इनकी सत्ता को स्वीकार कर उनके द्वारा स्थापित मान्यताओं के प्रति सहमति व्यक्त करता रहे. प्लेटो ने इस समस्या पर विचार अवश्य किया था, किंतु कहीं न कहीं वह भी यूनानी श्रेष्ठता के प्राचीन मिथक के प्रति अंधभक्त था. इसलिए एक ओर जहां वह सामान्य नागरिकों से राष्ट्रराज्य के प्रति सर्वस्व समर्पण की अपेक्षा रखता था, इसके लिए उसने अपनी संवादपुस्तक ‘रिपब्लिक’ में प्रावधान भी किया था, वहीं वह समाज के संरक्षक वर्ग को अतिरिक्त छूट दिए जाने के पक्ष में था. यह बहुत कुछ भारत के वर्णविभाजन से मिलताजुलता था, जिसमें ब्राह्मणों को अतिरिक्त अधिकार प्रदान किए गए थे, जिसके दुष्परिणामस्वरूप इस देश में धर्म और जाति के नाम पर अकर्मण्य और परजीवी समाज का जन्म हुआ, जो अंततः शताब्दियों लंबी दासता और देश के पिछड़ेपन का कारण बना. यूरोप इससे जल्दी उभर पाया तो इसलिए कि वहां सामाजिक विभाजन को धमसत्ता के हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया था, जबकि भारतीय धर्मशास्त्रों में वर्णविभाजन बृह्मा की सर्जना है.

रिपब्लिक’ के चौथे खंड में ‘न्याय’ की अवधारणा पर विचार किया गया है. जिस गंभीरता के साथ प्लेटो इस विषय पर विचार करता है, उससे स्पष्ट होता है कि गणतंत्र अथवा राजनीति के बजाय ‘न्याय’ ही पुस्तक का प्रधान विषय है. न्याय की पर्तदरपर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी ईमानदारी से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्व का निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. यदि सभी नागरिक अपनेअपने कर्तव्यपालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं पाता. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. प्रसंगवश यह जान लेना उचित होगा कि यूनानी परंपरा में न्याय की अवधारणा उसकी आधुनिक अवधारणा से काफी भिन्न है. एनेक्जमेंडर के अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. इस संदर्भ में वह किसी भी पराभौतिक शक्ति के अनुशासन से मुक्त होती है. उसके अनुसार परसत्ता स्वयं भी अनुशासन से मुक्त नहीं है. वह उसी प्रकार अपने कर्तव्य से आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. पराभौतिक शक्तियों पर भी यह बात उतनी ही गंभीरता से लागू होती है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. शक्ति के उन्माद और घमंड में डूबा हुआ व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होने लगता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतद्र्वंद्व पैदा होते हैं. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. क्योंकि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प ही मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा दूसरों के कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ की अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘कर्तव्यबोध तथा कर्तव्यपालन.

आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में न्याय को अक्सर समानता के पर्याय के रूप में लिया जाता है. प्लेटो की अवधारणा इससे भिन्न थी. उसके अनुसार दूसरों के उधार को चुकाना भी मनुष्य का कर्तव्य है, अतएव वह भी न्याय का पर्याय है. ‘रिपब्लिक’ के आरंभ में ‘न्याय’ के बारे में कुछ ऐसी ही स्थापना है

न्याय आखिर क्या है? सदा सच बोलना और समय पर उधार लौटाना! इससे आगे क्या न्याय कुछ नहीं है? क्या यही मान लेने के अलावा हमारे सामने कोई अन्य विकल्प नहीं है?’

न्यायसंबंधी अपनी ही प्रारंभिक संकल्पना में प्लेटो एक के बाद एक सुधार करता जाता है. इसके लिए वह सुकरात को माध्यम बनाता है. प्लेटो की न्यायसंबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है, जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ‘न्याय’ की बात करता हुआ वह ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है. दरअसल वह न्याय की परिभाषा को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभवसा हो जाता है. प्लेटो के समाज में ‘गार्जियन’ का कर्तव्य अपने बुद्धिविवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘गार्जियन’ नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, बुद्धिविवेक में ‘गार्जियन’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए. न्याय तो इसी में है कि उस व्यक्ति को संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी बौद्धिक क्षमताओं का उपयोग समाजहित में किया जाए. दूसरी और संरक्षक वर्ग में सम्मिलित वे व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाजहित के बजाय स्वार्थ को महत्ता देते हैं, जो नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. प्लेटो बजाए इसके दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है.

प्लेटो द्वारा स्थापित इस व्यवस्था की तुलना अगर भारतीय वर्णव्यवस्था से की जाए तो दोनों में काफी समानता नजर आती है. प्राचीन यूनान की तरह भारत में भी समाज का विभाजन तीन प्रमुख वर्गांे, ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय के बीच था. जो मनुष्य इन तीन वर्गों से बाहर थे, उन्हें शूद्र कहा गया है, जिनका कार्य दूसरे वर्गों की सेवा करना है. आरंभ में भारतीय वर्णव्यवस्था में वर्गांतरण संभव था. व्यक्ति अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आजा सकता था. कालांतर में यह विभाजन रूढ़ होता चला गया.वर्ण जातियों में ढल गए और जातियां उपजातियों में विस्तार पाती रहीं. भारत में जो स्थान शूद्रों के लिए तय था, यूनानी समाज में वही स्थिति ‘दास’ की थी. तय है कि सामाजिक न्याय के बारे हैं सिवाय इसके कि प्लेटो ने सामाजिकविभाजन की अपनी पद्धति में वर्गांतरण को सीमित मान्यता दी है, कोई नयापन नहीं है. उसने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटेबेटियां समाज के शेष वर्गों की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में प्लेटो ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया है. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो.

प्रश्न उठता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए. वह कौनसा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ीदरपीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कोई सवाल नहीं खड़ा होता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. उसने बच्चों का पालनपोषण मातापिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें मातापिता अथवा उनकी संतान कभी एकदूसरे की पहचान न कर सकें. दूसरे शब्दों में उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिसके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! स्पष्ट है कि इसके लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी. आदर्श राष्ट्रराज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. दार्शनिक सम्राट की संकल्पना के पीछे एक कारण यह भी था. प्लेटो का मानना था कि एक दार्शनिक सम्राट ही ऐसा करने में सक्षम हो सकता है. मगर सिर्फ विचार से तो समाज को नहीं चलाया जा सकता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा, प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है. यहां प्लेटो की कल्पनाशीलता कोई नया आयाम नहीं गढ़ती. दार्शनिक सम्राट की अवधारणा वास्तव में प्लेटो का पूर्वग्रह था, जिसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक आलोचक की टिप्पणी है—

उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब जब सामना करीबकरीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चितरूप से न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतारचढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कविहृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्तिसापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. पर अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुखसुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौनसा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरितप्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो. जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देती हों, उन्हें प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान और कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानवस्वभाव से निरपेक्ष होगा? उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी, फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालनपोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. पर कोई दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति कर सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. यह समस्या प्लेटो के दिमाग में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्तिविशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनियाभर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति पर, जो केवल जर्मनवासियों के प्रसन्न होने की इच्छा रखता है, मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. लेकिन नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसकी महामानव की संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना भी समाज की बेहतरी को ध्यान में रखकर की थी. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो महात्मा बुद्ध ने केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना, जिनपर उनसे पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन निर्भर था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिकसामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथोंहाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे.

इच्छाओं का सर्वथा निरपेक्ष सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय तक असंभव है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर अपना झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. नैतिक असहमति के संभव नहीं है. जहां नैतिक सहमतिअसहमति आसान न हो, वहां बलप्रयोग भी संभावना भी बनी रहती है. संभवतः इसी भावना से प्रेरित होकर ‘रिपब्लिक’ का एक पात्र थरसाइमचस, जो प्लेटो ने वास्तविक जीवन से उठाया था, न्याय पर चर्चा करते हुए उग्र हो जाता है—

न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है.’

हालांकि सुकरात ने इस तर्क का विरोध किया था, लेकिन वहां भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाता. सच तो यह है कि ‘न्याय’ की संकल्पना पर कभी गंभीरतापूर्ण विचार संभव ही नहीं हुआ. इसने न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. लेकिन संवाद के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है. इसलिए उसने ‘आदर्श पसंदों’ का अपना विचार भी सामने रखा. ‘आदर्श पसंदों’ का अभिप्राय था, जिन्हें अधिकतम लोग पसंद करते हों या जिनसे अधिकांश की सहमति हो. लेकिन परोक्ष में तो यह बहुमत की दादागिरी ही हुई. प्लेटो यह समझता था, मगर उसके सामने अपने आदर्श नगरराज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

धर्म भी न्याय को परिभाषित करने का प्रयास करता है, किंतु एक सपाटसी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. अतः हर वह व्यक्ति जो ईश्वेच्छा को सहर्ष स्वीकार लेता है, उसको अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. धर्माचार्य दावा करते हैं कि ईश्वर परमशुभ, शुभ की आश्रयस्थली है. उनके अनुसार ईश्वर चूंकि परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है, जिससे ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? जिसको ईश्वरेच्छा बताकर आरोपित किया जाता है, उसके प्रमाणन का रास्ता क्या हो? चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है, अतएव उसके अनुयायी इसको आस्था का विषय बनाकर आरोपित करने का प्रयास करते हैं.

सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहस्राब्दियों से रचता आ रहा है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्तिसापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ की मूल पहचान है, परंतु यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. उससे तुलना के आधार पर कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है, जिसके कारण लाखों लोगों को गुलाम के रूप में जिंदगी बसर करनी पड़ती है. प्लेटो उस प्रथा का समर्थन करता है. अतः ऐसे अनेक बुद्धिजीवी होंगे जिन्हें प्लेटो की यह स्थापना अस्वीकार्य होगी. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. उनका उत्तर प्लेटो के समकालीन और ‘रिपब्लिक’ के एक पात्र थरसाइमचस ने दिया था. उसका कहना था कि प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ यह है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की स्थापना से कितने और कहां तक सहमत हैं. यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है. आशय है कि प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता रहा है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके मातापिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालनापोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला साम्यवादी था, जिसने एक ऐसे समाज का सपना देखा था, जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

प्लेटो: स्वप्नद्रष्टा दार्शनिक – तीन

प्लेटो के समय यूनान की राजनीतिक-सामाजिक अवस्था

पाषाणयुग तक मनुष्य कृषिकर्म में पारंगत हो चुका था. अब उसके पास भोजन की प्रचुरता थी. अतिरिक्त भोजन के संग्रह के लिए वह मिट्टी और बांस द्वारा से बने बरतनों का उपयोग करता था. लेकिन खेती उतने भरोसे की न थी. कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि, प्रकृति-आधारित जीवन की समस्याएं अंतहीन थीं. ऐसे में भोजन की आवश्यकता के लिए उसको परंपरागत स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ता था. इस कारण पुरापाषाणकाल में बस्तियां प्रायः उन्हीं स्थानों पर विकसित हुईं, जो नदियों और महासागरों से सटे थे. इससे यह भी संकेत मिलता है कि कृषि में दक्षता प्राप्त कर लेने के बावजूद मनुष्य की अन्न संग्रहण की प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई थी. यद्यपि उसके जीवन में स्थायित्व अवश्य आया था, जो उसके आत्मविश्वास के साथ विकास का प्रेरक बना. कृषि के विकास के साथ सभ्यता मैदानी क्षेत्रों में विस्तार लेने लगी. कृषि-भूमि की प्रचुरता थी, इस कारण कालांतर में अन्न उत्पादनकर्ता समूहों में ऐसे व्यक्ति पनपने लगे, जिनके पास अतिरिक्त अनाज की विपुल मात्रा थी. साथ में वे संसाधन भी थे, जिनके माध्यम से वे और अधिक अन्न उत्पादन कर सकते थे. अतिरिक्त अन्न के प्रबंधन, रख-रखाव हेतु श्रमिकों की आवश्यकता थी. इसलिए समूह में से ही कुछ आदमियों को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई. बदले में उन्हें अतिरिक्त अनाज में से कुछ हिस्सा दिया जाता हो. चूंकि खेती प्रकृति-आश्रित थी और उससे अनिश्चितता भी जुड़ी थी, इसलिए श्रमिकों में जिनके पास कृषि-योग्य भूमि का अभाव था और जो बाकी बची भूमि का उपयोग करने से स्वयं को असमर्थ पाते थे, उन्हें अन्न उत्पादक बनने के बजाय अन्न-संग्राहक बनना अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद लगा होगा. इसके फलस्वरूप पूरा समाज दो वर्गों में बंटता चला गया. एक समूह जिसके पास अनाज की विपुल मात्रा थी तथा जो संसाधनों का स्वामी होने का दावा करता था. इस वर्ग के लोगों में वर्चस्व भी भावना कूट-कूट कर भरी थी. दूसरा वर्ग उन लोगों का जो किसी उस समय भी अन्न-संग्रहण की प्रवृत्ति को अपनाए हुए था. यूं तो दोनों समूह अन्योन्याश्रित थे. परंतु पहले के स्वामित्व में कृषि-भूमि तथा अन्य संसाधन थे. इस वर्ग का श्रम से सीधा संबंध न था, मगर उत्पादन पर उसका अधिकार था. जबकि दूसरा वर्ग अपने श्रम के बल पर उत्पादन को संभव बनाता था, किंतु वह स्वयं को उत्पादक कहने के अधिकार से वंचित था. उसके श्रम का मूल्य अनुत्पादक वर्ग द्वारा तय किया जाता था. उत्पादन के बदले में जिसको निष्क्रिय अन्न संग्रहकर्ता, जो खुद को अन्न उत्पादक मानता था और जिसके लिए उसको सामाजिक स्वीकृति भी मिल चुकी थी, की ओर से अनाज की एक पूर्वनिश्चित मात्रा प्राप्त होती थी.

पशुपालक समाज में भोजन मनुष्य की प्रमुख आवश्यकता था. मौसम की मार से बचने के लिए प्रारंभ में पशुओं की खाल और वृक्षों की छाल, पत्तों आदि से काम चलाता था. सभ्यता के विकासक्रम में कपड़ा, आवास आदि भी मनुष्य की मूल आवश्यकताओं में शुमार होने लगे थे. इसलिए इन कार्यों में लगे कारीगरों की समाज में जरूरत बढ़ी. चूंकि ये शिल्पी अपनी सेवा शिल्पगत व्यवसाय के रूप में देते थे, और कृषिकर्म में सीधी भागीदारी उनके लिए असंभव थी, अतएव अपनी अनाज-संबंधी आवश्यकता के लिए उन्हें भू-स्वामियों पर निर्भर रहना पड़ता था. प्रारंभ में यह कार्य आपसी भाई-चारे के आधार पर हो जाता था. यानी जब तक समाज में अन्न उत्पादक और अन्न संग्रहकर्ता का भेद नहीं था, तब तक उत्पादन पर पूरे समूह का कब्जा होता था. समूह के सभी सदस्य उसमें से अपना-अपना हिस्सा प्राप्त करते थे. वितरण का यह कार्य सर्वसम्मिति से चुने गए मुखिया जिसको उस समय ‘ग्रामणी’ कहा जाता था, की देखरेख में होता था. कालांतर में भू-स्वामित्व एवं अन्न-उत्पादन का कार्य कुछ हाथों तक सिमटने से शिल्पकार वर्ग को भी धक्का लगा. वह वस्तुओं के बदले दूसरे समूहों से अपनी आवश्यकता की चीजें लेने के लिए मोलभाव करने लगा. प्रारंभिक लेन-देन प्रायः अनाज अथवा वस्तु-विनिमय प्रणाली के आधार पर होता था जो काफी जटिल कार्य था और हमेशा संभव भी नहीं था. इसलिए मुद्रा का प्रचलन आरंभ हुआ. मुद्रा के आदान-प्रदान की व्यवस्था के रूप में नियम बनाए गए, जिससे समाज में श्रेष्ठि वर्ग को पनपने का अवसर मिला.

उस समय तक प्रमुख अन्न-संग्रहकर्ता वर्ग, जिनके पास अपनी आवश्यकता से कहीं अधिक अनाज था, अपने धन-संपदा की सुरक्षा के लिए हथियारबंद रक्षकों को नियुक्त करने लगे थे. आगे चलकर इस मानवशक्ति का उपयोग जो जंगली जानवरों, अनाज तथा अन्य संसाधनों की रक्षा करने में निपुण मानी जाती थी, भूमि तथा अन्य संसाधनों को बढ़ाने के लिए किया जाने लगा. विकास की निरंतरता को बनाए रखने के लिए और जमीन, जानवर तथा धातुओं की आवश्यकता थी. इसका अपेक्षाकृत सुगम तरीका था, दूसरे समूहों पर हमला कर उनके संसाधनों को कब्जा लेना. इस प्रयास में जो सैनिक कैद होते वे दासों की पूर्ति के काम आते. वे सामंतवर्ग के विकास के दिन थे. यह वर्ग संपत्ति पर निजी-स्वामित्व को मान्यता मिलने के बाद से, लगातार समृद्धि प्राप्त कर रहा था. इस वर्ग का उदय दुनिया की हर सभ्यता में हुआ. अपनी अन्न-संपदा, धातु आदि को सुरक्षित करने के लिए उसने बड़े-बड़े आगार बनाने आरंभ कर दिए. कालांतर में यही आगार अभेद्य दुर्गों के रूप में शक्तिकेंद्रों में ढलते गए. सामंतवाद की पराकाष्ठा के दौर में एक स्थिति ऐसी भी आई जब समाज के बहुसंख्यक वर्ग को संसाधनों से बहिष्कृत कर उनपर चुनींदा मानव-समूहों का कब्जा होने लगा. अपने कब्जे को स्थायित्व देने के लिए इस वर्ग द्वारा मनमाने कानून बनाए गए. जिसके माध्यम से वह लोगों पर राज कर सकता था. स्थिति का लाभ उठाते हुए वह समाज के बड़े वर्ग को अपने अधीन कर उनके जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने लगा था, जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक संबंधों का उदय हुआ. लेकिन तब तक समृद्ध वर्ग इतना शक्तिशाली हो चुका था कि न केवल राजनीतिक संस्थाओं पर अपना अधिकार जमा सकता था, बल्कि उन्हें मनचाहा मोड़ भी दे सकता था. अनुकूल राजनीतिक व्यवस्था का गठन इस वर्ग की आवश्यकता भी थी, क्योंकि उसी के माध्यम से वह अपनी स्थिति को कानूनी रूप देकर सामाजिक-राजनीतिक समर्थन प्राप्त कर सकता था. इसी वर्ग के प्रभाव में दासप्रथा को तत्कालीन विचारकों और अपनी समकालीन राजनीति का समर्थन मिला. स्पष्ट है कि दासवर्ग का उदय अनियोजित विकास द्वारा प्रेरित घटना थी, जो उन परिस्थितियों में सहज-स्वाभाविक थी. इस सभ्यता को स्थायी रूप देने तथा लोगों के विद्रोह की भावना को दबाए रखने के लिए धर्म जैसी संस्थाओं का सहारा लिया गया.

एशियाई प्रदेशों में जहां धरती उर्वरा थी तथा बिना किसी की मदद अथवा अधीनता के भी अन्न संग्रहकर्ता के स्वरूप को बनाए रखना आसान था, ऐसे प्रकृति-आश्रित अल्पसंख्यक समूह भी पनपे जो खुद को सृष्टि के रहस्यों की खोज में लगाए रखते थे. चूंकि यह वर्ग जीवन-जगत से जुड़ी मनुष्य की अनेक समस्याओं का समाधान देता था, शंकाओं के निवारण हेतु उपाय करता था, अतएव ऐसे मनीषियों का समाज में सम्मान था. लोग उनकी बात मानते थे. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उन्हें घर आमंत्रित करते थे. कहना चाहिए कि समाज के वे वर्ग जो अन्न-संबंधी आवश्यकताओं के लिए सामंतों, जमींदारों पर निर्भर थे, अपने अधिभौतिक प्रश्नों के समाधान के लिए उन्हें इन्हीं वनचारी मनीषियों पर निर्भर रहना पड़ता था. दूसरे शब्दों में साधारणजन का मन उन यायावरों के साथ था, जो प्रकृति के सान्न्ध्यि में रहकर स्वयं को जीवन-रहस्यों की खोज में लगाए रखते थे. जिन्हें अपने भोजनादि की कोई चिंता न थी. मगर शारीरिक रूप से उन्हें जमींदारों और सामंतों का आदेश मानना पड़ता था, जो उन्हें उनके श्रम के बदले अनाज उपलब्ध कराते थे तथा समाज के अधिकांश संसाधनों का स्वामी होने का दावा करते थे. समाज को व्यवस्थित रखने के नाम पर इस वर्ग ने कानून भी बनाए थे, जो उसके स्वामित्व को वैद्य घोषित करते थे.

जनसाधारण की धर्म-संबंधी जिज्ञासा, यह कहीं न कहीं उनकी दुर्बलता का भी प्रतीक थी, को समझते हुए सामंतवर्ग ने उन लोगों को प्रश्रय देना आरंभ कर दिया जो यायावर वनचारी साधकों जैसे प्रतिभाशाली तो न थे, किंतु किसी भी तरह सुख-सुविधाओं के चिपके रहना चाहते थे. ये थे तो साधारण प्रतिभायुक्त मगर वाक्-चातुर्य तथा बुद्धिकौशल उनकी निधि था. उन्होंने यायावर मुनियों के गूढ़ दर्शन को जनसाधारण की भाषा में समझाना शुरू किया. रोग, महामारी, प्राकृतिक आपदाओं आदि के कारण जीवन की अनिश्चिता से डरे-सहमे लोगों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया. जिससे समाज पर उनका प्रभाव बढ़ने लगा. धर्म की प्रभावकारी शक्ति को पहचानते हुए इस वर्ग के अंदर महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगीं. कालांतर में यह वर्ग जनसाधारण की धार्मिक-दार्शनिक जिज्ञासाओं को प्रतीकों एवं कर्मकांडों में बांधने लगा. परिणामस्वरूप दर्शन अपने रूढ़ स्वरूप यानी धर्म के रूप में पहचान बनाने लगा. लोग उस पुरोहित वर्ग के बहकावे में आने लगे जो खुद को ईश्वर का करीबी मानकर उसको जानने का दावा करता था, जिसे यह भ्रांति थी कि इस कार्य में वह दूसरों का नेतृत्व भी कर सकता है. हालांकि यह भ्रांति शीघ्र ही लोक-आस्था का रूप लेने लगी. उल्लेखनीय है कि परमसत्ता का विचार दार्शनिकों की सहज परिकल्पना थी, उसका ईश्वर के रूप में अवनतिकरण करना, पुनः सामंतों-सम्राटों को पृथ्वी पर उनका प्रतिनिधि घोषित करना, इसी चालबाज पुरोहित वर्ग का प्रपंच था, जो बिना किसी परिश्रम के सुविधाओं को भोगना चाहता था. समाज के बड़े वर्ग, जो उस समय तक सर्वहारा का रूप ले चुका था, को बहकावे में रखने के लिए यह जरूरी भी था. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि विश्व की प्रत्येक सभ्यता में शोषक और शोषित वर्ग पनपे. उनके रीति-रिवाज, वेशभूषा, खान-पान वगैरह भले ही भिन्न हों, मगर उनके शोषण के तरीके पूरी दुनिया में लगभग एक थे, उनका लक्ष्य भी एकसमान था, किसी भी तरह अपने वर्चस्व को बनाए रखना. इसके लिए उन्होंने धर्म, राजनीति, ज्ञान-विज्ञान, भू-संपदा आदि का, जैसा भी उनका बस चला—जमकर दुरुपयोग किया. इस कार्य में धर्म ने उनकी सर्वाधिक मदद की. मानव-सभ्यताएं दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में पनपीं. परस्पर हजारों किलोमीटर दूर होने के बावजूद उनमें काफी समानताएं थीं. इसलिए कि लगभग दुनिया में प्रत्येक कोने मंे जन्मे मनुष्य का मनोविज्ञान, लालच, अधिपत्य-भावना, स्वार्थपरता, हर्ष, शोक, डर आदि के कारक लगभग एक जैसे थे.

आज से लगभग 12000 वर्ष पूर्व, इतिहास में जिसे कांस्ययुग के नाम से जाना जाता है, ऐसी ही एक उन्नत सभ्यता नील नदी की घाटियों में पनपी थी. यह सभ्यता पृथ्वी के उस भू-भाग पर विकसी थी, जिसे आजकल तुर्की और पहले अनातोलिया अथवा एशिया माइनर के नाम से जाना जाता था. उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और उर्वरा कृषि भूमि के कारण यह सभ्यता अपनी समकालीन सभ्यताओं से कहीं अधिक तेजी से विकसित हुई. वहां के निवासी कृषि-कर्म में पर्याप्त दक्षता अर्जित कर चुके थे. वे एक ओर जहां भेड़, बकरी, कुत्ते, सुअर आदि जानवर पालते थे, वहीं उन्हें खेती में भी पर्याप्त दक्षता प्राप्त थी. वह सुखी और संपन्न सभ्यता थी. अपनी समकालीन सभ्यताओं से तेजी से विकासमान. लेकिन इंसान की महत्त्वाकांक्षाओं का अंत नहीं. समय के साथ वे भी निरंतर विस्तार ले रही थीं. तीव्र विकास के लिए उसको अधिक उर्वरा भूमि की आवश्यकता थी, जहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो. साथ ही खेती के औजारों के लिए अच्छी धातु और अनुकूल जलवायु की भी हो. नए कृषि-क्षेत्रों तथा खनिज पदार्थों की खोज में उन्हीं का एक दल विशाल भूमध्य सागर का सीना चीरता हुआ यूनान की ओर बढ़ चुका था. वह अपने साथ पालतु पशु, खेती के बीज तथा औजार भी लेकर गया था. उस समूह के सदस्य एशिया माइनर से लेकर भू-मध्य सागर तथा काला सागर के टापुओं तथा तटवर्ती भू-भागों पर जहां जिसको ठिकाना मिला, बसते चले गए. 5000 ईस्वी पहले तक ये जनसमूह क्रीट के दक्षिणवर्ती टापुओं पर अपनी बस्तियां जमा चुके थे. चूंकि उन प्रदेशों की जलवायु खेती के अनुकूल थी, भोजन तथा खनिज संपदा की भी कोई कमी नहीं थी, इसलिए वे तेजी से विकास की ओर बढ़ते गए. कुछ ही शताब्दियों के अंतराल में वहां उन्होंने अपने नगर बसा लिए. उनमें समृद्धि की प्रतीक बड़ी-बड़ी इमारतें चमचमाने लगीं. विकास के साथ-साथ मनुष्य की आवश्यकताएं बढ़ीं तो उनका लाभ भी समुद्री टापुओं पर बसी उन बस्तियों को मिला. भारत और ईरान की ओर से आने आने वाले व्यापारिक काफिले वहीं से होकर यूनान के अन्य शहरों में प्रवेश करते थे. इससे उनकी आय बढ़ी तथा कमाई के अवसर भी. इसके फलस्वरूप छोटे-छोटे टापुओं पर एक समृद्ध सभ्यता पनपने लगी. 2800 ईस्वी पूर्व तक क्रीट में एक उन्नत सभ्यता जन्म ले चुकी थी. वहां के निवासियों के भवन पत्थरों के बने थे. नगर में जल-निकासी की लिए पक्की नालियों का प्रावधान था. भवन की सज्जा के लिए दीवारों पर आकर्षक चित्रकारी की जाती थी. वैभव-प्रदर्शन के लिए पहरेदार अपने हाथों में कांसे के चमचमाते औजार रखते थे.

क्रीट की समृद्धि का एक कारण यह भी था कि उसे बाहरी दुश्मनों से कम खतरा था. टापु पर स्थित होने के कारण पूरा नगर चारों ओर से समुद्र से घिरा था. उसकी सुरक्षा का दायित्व उन नौसैनिकों पर था, जो दिन-रात समुद्र की लहरों पर गश्त लगाते रहते थे. अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण क्रीट अपेक्षाकृत सुरक्षित नगर-राज्य था, इसलिए उसको चारदीवारी की भी आवश्यकता न थी. अतः कुछ ही समयावधि में वह यूनान का सबसे बड़ा और प्रमुख शहर बन गया. जब संसाधनों की विपुलता हो तो विकास की गति अपने आप बढ़ जाती है. साथ में मानवाकांक्षाएं भी. अपनी सभ्यता पर गर्वीले क्रीटवासी आसपास के टापुओं पर तेजी से कब्जा जमा रहे थे. जिसके फलस्वरूप 2000 ईस्वी पूर्व तक क्रीटवासियों ने आसपास के कई टापुओं पर कब्जा जमा लिया. शताब्दियों के इस अंतराल में डेल्फी, स्पार्टा, एथेंस, थ्रेस, मेकाडोनिया, ग्रीक आदि नगर-राज्य वीरान टापुओं पर विकसित हुए. वैभव की प्रतीक आलीशान बस्तियां बसने लगीं. इतने बड़े साम्राज्य को दुश्मनों के हमले से बचाने के लिए मजबूत सुरक्षा-व्यवस्था की आवश्यकता थी. इसलिए उन्होंने बड़े यत्न से पूरे भू-भाग को चारदीवारी से घेर लिया. बाहरी शत्रुओं से अपनी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम कर क्रीटवासी निश्चिंत थे, मगर प्राकृतिक आपदाओं को तो कोई रोक-टोक नहीं. उनके निमित्त तो प्रतिक्षण अनगिनत रास्ते खुलते जाते हैं. प्रकृति-प्रदत्त आपदाओं से जूझना मनुष्य के लिए नया न था. अपने जन्म के साथ ही वह अन्यान्य प्राकृतिक संकटों, आपदाओं से आंख-मिचैली खेलता आया था. मगर लगता है कि लंबे सुखोपभोग एवं वैभव-विलास के अतिरेक में उसको प्रकृति-कोप के प्रति कुछ पल के लिए असावधान कर दिया था. 1500 ईस्वी पूर्व के आसपास क्रीटवासियों को भयानक भूकंपों और विस्फोटक ज्वालामुखियों का सामना करना पड़ा. परिणामस्वरूप उनके विशालकाय भवन ढहने लगे. जो बचे उनमें दरारें पड़ गईं. हजारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. हालांकि मानव-सभ्यता के भविष्य की सोचें तो यह अच्छा ही हुआ. प्राकृतिक कोप से डरे द्वीपवासी अपनी बची-कुची निधियों को समेट समतल मैदानों की ओर पलायन करने लगे. इसके फलस्वरूप क्रीट दक्षिण की ओर विस्तार लेता गया. भौगोलिक स्थिति में बदलाव का प्रभाव राजनीति पर भी पड़ा. शासन-व्यवस्था जो पहले क्रीट से संचालित होती थी, वह उसके दक्षिण स्थित नगरों द्वारा, जो भौगोलिक दृष्टि से अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे, नियंत्रित होने लगी. अगली दो-तीन शताब्दियों में क्रीट की सभ्यता मैदानी क्षेत्र पर भी कब्जा जमा चुकी थी. एथेंस, स्पार्टा, डेल्फी, मेकाडोनिया जैसे कई नगर-राज्य जन्म ले चुके थे, जो अपने वैभव एवं समृद्धि में क्रीट से भी कहीं आगे थे.

मैदानी इलाके भौगोलिक दृष्टि से भले सुरक्षित हों, किंतु वहां दूसरे दुश्मनों की कमी न थी. उनमें अधिकांश वे कबीले थे जो पहले मैदानी भू-भाग पर रहते और क्रीट के वैभव-संपदा को ललचाई दृष्टि से देखते थे. उस सभ्यता के मैदानी क्षेत्रों में विस्तार से उन साम्राज्यवादियों, कबीलाई सरदारों को अवसर मिला, जो उस समय तक लोहे के हथियार बनाने में दक्षता प्राप्त कर चुके थे. वे मैदानी कबीले कहीं अधिक जुझारू और युद्धप्रिय थे. उनका सामरिक अनुभव भी अधिक था. ईस्वी पूर्व 1200 के आसपास कबीलाई सरदारों ने दलबल से लैस होकर भूमध्यसागर के दक्षिणवर्ती टापुओं पर फैली क्रीट बस्तियों पर हमला करना आरंभ कर दिया, जो अपने श्रम-कौशल के बल पर दुबारा समृद्धि प्राप्त कर चुकी थीं. उनका हमला दो तरफा था. दुश्मन-सेनाओं ने क्रीट को समुद्री और मैदानी दोनों दिशाओं से घेर लिया गया. मैदानी कबीले कहीं अधिक जुझारू और युद्धप्रिय थे. उनका सामरिक अनुभव भी अपेक्षाकृत अधिक था. अतः कांसे के औजारों से लैस क्रीट के सैनिक लोहे के औजारवाले कबीलों से अपनी रक्षा न कर सके. परिणाम पराजय के रूप में सामने आया, इससे दक्षिणी यूनान का बहुत बड़ा भू-भाग कबीलों के अधिपत्य में चला गया गया. यूनानी साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर होने लगा. आने वाली शताब्दियों में उस परिक्षेत्र को अनेक कृषक विद्रोहों तथा अंदरूनी लड़ाइयों का सामना करना पड़ा. इससे समृद्धि के मूलाधार, व्यापार और उद्योग-धंधे चैपट होने लगे. राजनीतिक संकट के अलावा अकाल और महामारी जैसे प्राकृतिक संकट भी आए. जिनमें हजारों नागरिकों की मौत हुई. आने वाली दो शताब्दियों तक वह क्षेत्र अंधकार में फंसा रहा. लगभग 900 ईस्वी पूर्व में वहां विकास की लहर दुबारा लौटी. उस समय तक वहां के व्यापारियों ने भूमध्य सागर की तलहटियों में बसी अन्य सभ्यताओं से मजबूत संबंध बना लिए थे. सभ्यता और संस्कृति का आदान-प्रदान आगे बढ़ा, इसी क्रम में ग्रीकवासियों ने लिपि विकसित की. फलस्वरूप लेखनकला का विकास हुआ, जिसकी सहायता से अनुभवों और विचारों को सुरक्षित रख पाना आसान था. इस कारण समाज को पिछले अनुभवों का लाभ मिलने लगा. उसका बौद्धिक सामथ्र्य बढ़ा. लेखन कला के विकास के फलस्वरूप सहòाब्दियों से इस कान से उस कान तक सुनाई जाने वाली लोककथाएं, जिनमें प्राचीन योद्धाओं की वीरगाथाएं भी सम्मिलित थीं, कहानियों और कविताओं के रूप में लिपिबद्ध होने लगीं. लगभग 800 ईस्वी पूर्व जन्मे होमर ने अपनी अनूठी कल्पनाशक्ति तथा लोकगाथाओं में छिपे इतिहास को के सम्मिलन से कई महानकृतियों की रचना की. ‘ओडिसी’ तथा ‘इलियाड’ के माध्यम से उसने यूनान के प्राचीन इतिहास और किवदंतियों को मिलाकर एक ऐसा अनूठा रूपक खड़ा किया, जो लोगों की जुबान पर चढ़ गया. ट्राय के महान युद्ध की गाथाएं घर-घर में गाई जाने लगीं. इससे यूनानी धर्म और संस्कृति को मजबूत आधार मिला और वह आसपास के क्षेत्रों पर भी अपना असर जमाने लगा. इसने यूनानी दर्शन और विज्ञान के विकास की पृष्ठभूमि भी तैयार की. क्योंकि लिपि के विकास के उपरांत ज्ञान को सहेजकर रखना, उसपर तर्क कर पाना आसान था.

लिपि के विकास का असर राजनीति पर भी देखने को मिला. उस समय तक यूनानी सभ्यता और संस्कृति का केंद्र क्रीट से खिसकर एथेंस आ पहंुचा था, जो व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से अधिक अनुकूल था. धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उस नगर-राज्य ने अनुपम प्रगति प्राप्त की थी. एथेंसवासियों का विश्वास था कि उनके नगर को ज्ञान की देवी ‘एथेंस’ का आशीर्वाद प्राप्त है. यह सोच निराधार भी नहीं था. शासन-व्यवस्था को जिम्मेदार बनाने के लिए एथेंस में लिखित संविधान था. उसका दुरुपयोग रोकने के लिए नियम-कानूनों के साथ-साथ नागरिक अधिकारों, कर्तव्यों की भी लिखित व्यवस्था की गई थी. किंतु समाज के अभिजात्य वर्ग द्वारा अपनी सुविधा और हितों को ध्यान में रखकर लिखा गया वह संविधान प्रकारांतर में एकपक्षीय और सामाजिक ऊंच-नीच को बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ. उसने एथेंस में गरीब-अमीर की खाई को और चैड़ा करने का काम किया था—
‘नगर(एथेंस) का पहला संविधान पूर्णतः धनाढ्य भूस्वामियों के पक्ष में था, जिसके परिणामस्वरूप अनेक किसान कर्ज में दबकर अपनी जमीन गंवा चुके थे. अपराध चाहे छोटा हो अथवा बड़ा उसके लिए मृत्युदंड का प्रावधान था. इसलिए एथेंस की पहली कानूनी संहिता को ‘खूनी आचारसंहिता’ बताकर उसकी आलोचना भी की जाती है.’
जब शोषण और अनाचार की प्रमुखता हो और राजसत्ता उसका समर्थन करती हो तब जनसाधारण के सामने एकजुट विरोध के अलावा कोई रास्ता रह ही नहीं जाता. शोषण के प्रतिकारस्वरूप 590 ईस्वीपूर्व में एथेंस में जबरदस्त कृषक विद्रोह हुआ, जिसके फलस्वरूप सत्ता कृषक नेता सोलोन के अधिकार में आ गई. सोलोन ने तीस वर्ष पहले लिखे गए संविधान को अमान्य कर नया संविधान लागू किया जो पहले की अपेक्षा उदार एवं मानवीय था. नए संविधान द्वारा अभिजात्यों और शक्ति-संपन्न वर्गों के अधिकारों में कटौती की गई थी. उदारता का परिचय देते हुए सोलोन ने छोटे किसानों का लगान और व्यापारियों के सभी ऋण माफ कर दिए. किसानों को भारी लगान से मुक्त कर उन्हें जीवनदान दिया. गणतांत्रिक शासन-प्रणाली को अपनाते हुए नागरिकों को अपने प्रशासक चुनने का अधिकार दिया गया. यही नहीं अपनी आर्थिक समृद्धि को बढ़ाने के लिए उसने नागरिकों को पर्याप्त अधिकार दिए थे. दूरदृष्टा सोलोन अच्छा प्रशासक, लेखक और कवि भी था. उसकी एक सुप्रसिद्ध कविता जिसमें एथेंस के प्राचीन गौरव के बखान के साथ श्रेष्ठ और निकृष्ठ संविधान के फलस्वरूप समाज पर पड़ने प्रभाव को दर्शाया गया है, का भावार्थ है—

‘हम वाग्देवी एथेना के प्रताप से संरक्षित हैं. दुरात्माओं की ओछी मंशा के बावजूद हमारा यह नगर कभी नष्ट नहीं होगा. हालांकि स्वयं एथेंसवासियों ने ही, उन एथेंसवासियों ने जो अपनी धनलोलुपता के कारण भटके हुए हैं, अपने अविवेकी और स्वार्थपूर्ण सोच से इस महान नगर को भ्रष्ट करने की साजिश रची है. वे न तो अपने लालच को नियंत्रित करना जानते हैं, न ही अपने भोग-विलास में कमी लाने की उनकी मंशा है, इसलिए अपने नेताओं, धर्मगुरुओं की क्षुद्र योजनाओं द्वारा प्रेरित-संचालित, उनका अहंकार ही अंततः उनके लिए संकट का कारण बनने वाला है…. मेरी आत्मा मुझे यह कहने का निर्देश दे रही है कि त्रुटिपूर्ण संविधान जनाक्रोश को आमंत्रित करता है, जबकि श्रेष्ठ संविधान समाज को न्याय, अनुशासन तथा मजबूती की ओर ले जाता है. यह अपराधियों को दंडित करता है तथा त्रुटियों एवं अंतद्र्वंद्वों का शमन कर समाज में आपसी विश्वास एवं सामंजस्य की भावना पैदा करता है. अच्छा संविधान इंसानी लालच पर नजर रखता है, क्लेशों को घटाता है तथा कर्तव्यपरायणता को बढ़ावा देता है. विषम परिस्थितियों में ठोस निर्णय लेकर यह दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों पर अंकुश लगाता है. साथ ही दोषियों को सही रास्ते पर लाता है. यह हिंसात्मक गतिविधियों तथा उनके दुष्परिणामों पर अंकुश लगाता है. इस तरह एक श्रेष्ठ संविधान के अधीन पूरा समाज मनुष्यता के प्रति समर्पित हो, शुद्ध बुद्धि एवं विवेक के अनुसार कार्य करने लगता है.’

निष्पक्ष और सुलभ न्याय के लिए सोलोन ने अदालतों तथा नागरिक संस्थाओं को सरकार के नियंत्रित से बाहर रहने का प्रावधान किया था. एथेंस का संविधान गणतांत्रिक प्रणाली के अनुसार काम करता था, जिसमें सभी निर्णय संसद के द्वारा लिए जाते थे. मगर उस संविधान में स्त्रियों और गैरअभिजात वर्ग यानी दास और शिल्पकर्मियों को राजनीति और नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया था, तथापि वह एक अच्छी शुरुआत थी. विश्व-इतिहास में वह संभवतः पहला अवसर था जब किसी एक के शासन को समूह के शासन द्वारा स्थानापन्न किया गया था. संसद का गठन हजारों पुरुष नागरिकों के मतदान द्वारा किया जाता था. हालांकि आगे चलकर प्लेटो ने उसे ‘असमान लोगों की समानता’ कहते हुए तीखी आलोचना की. बावजूद इसके अगली कुछ शताब्दियों तक सोलोन द्वारा निर्मित संविधान की भावना के अनुसार सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा. इस व्यवस्था से सामंत और जमींदार लोग सोलोन द्वारा स्थापित शासन-प्रणाली से खार खाए हुए थे. वे चोरी-छिपे विदेशी शत्रुओं तक सूचनाएं पहुंचाते तथा उनकी आर्थिक मदद करते थे. वे अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा में थे. उनका प्रयास था किसी भी प्रकार दुबारा सत्ता में लौटकर अपना वर्चस्व स्थापित करना. धीरे-धीरे ही सही वे अपने षड्यंत्र में सफल भी होते जा रहे थे.शांति-स्थापना के बाद एथेंस की अर्थव्यवस्था में दासों का महत्त्व बढ़ा था. गरीब और अकुशल मजदूर भी वहां आजादी से सांस ले सकता था. एथेंस के इतिहास में वे कला एवं संस्कृति के विस्तार के दिन थे. इतिहास के लंबे दौर में एथेंस को निरंकुश तानाशाह भी झेलने पड़े. बावजूद इसके अपनी सुदृढ़ नौसेना, व्यापारिक जलयानों, उपलब्ध खनिज संपदा के बल पर वह उत्तरोत्तर प्रगति करता जा रहा था. उसमें धनाढ्यों की संख्या बढ़ रही थी. साथ ही उनकी विलासिता और फैशन भी. एथेंस को अपने चारों ओर फैले दुश्मनों से खतरा था, खासकर पार्सिन सेनाओं से, जो पश्चिमी तट पर फैली उसकी कई कालोनियों पर अधिकार कर चुकी थीं. एथेंस के शासक कूटनीतिपूर्वक अपनी आर्थिक समृद्धि की रफ्तार और राजनीतिक संबंधों की सहजता को बनाए हुए थे. अन्य यूनानी राज्यों के बीच उनकी ख्याति ज्ञान की देवी एथेंना के कारण भी थी. उसी के प्रभावस्वरूप आसपास के जिज्ञासुओं, ज्ञानसाधकों का अनुराग एथेंस के साथ था और वे उसकी ओर बरबस खिंचे चले आते थे.

ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में आरंभ तक एथेंस प्राचीन यूनान की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक राजधानी बन चुका था. धर्म, दर्शन, विज्ञान, कला, वाणिज्य, खगोल विज्ञान, राजनीति दर्शन आदि का तेजी से विकास हो रहा था. एथेंस का भौतिक प्रगति को समर्पित समाज, हस्तकौशल एवं व्यावहारिक दक्षता को दार्शनिक प्रश्नों से अधिक महत्त्वपूर्ण मानता था. उस समय के विचारकों में अधिकांश सोफिस्ट विचारधारा के समर्थक थे. सोफिस्ट दार्शनिकों का मानना था कि परमसत्ता नितांत गूढ़ एवं रहस्यमय है. बृह्मांड की रहस्यपूर्ण गतिविधियों को समझ पाना मानव-बुद्धि एवं विवेक से परे है. इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप यह धारणा भी जन्म ले रही थी कि मनुष्य अपने बुद्धि-विवेक में पूर्णतः स्वतंत्र है. उसकी परख के लिए कोई कसौटी ऐसी नहीं जो मानवीय सीमाओं से परे हो. सामाजिक औचित्य-अनौचित्य का निर्णय मनुष्यता की अपनी कसौटियों से होता है. किसी मानवेत्तर सत्ता को उसके लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता. सोफिस्ट विचारकों का मानना था कि मानवीय व्यवहार की कसौटी समाज के अभिजात और सफल माने गए व्यक्तियों के आचरण द्वारा विनिर्मित होती है. वही सामाजिक परिवर्तनों के लिए वास्तविक जिम्मेदार होते हंै. बाकी लोग जिनमें दास और शिल्पकर्मी सम्मिलित हैं, का कर्तव्य है कि वे राज्य द्वारा निर्दिष्ट नियमों का अनुसरण करें.

’यह विचारधारा समाज के संपन्न वर्ग के हितों के अनुकूल थी. विद्यालयों में पढ़ाया जाता था कि मानव जीवन का वास्तविक लक्ष्य भौतिक उन्नति एवं व्यक्तिगत प्रतिष्ठा में श्रीवृद्धि करना है. दूसरों को प्रभावित करने की कला को ज्ञान का वास्तविक परिचायक मान लिया गया था. विद्यालयों में गुरुजन छात्रों को दूसरों को प्रभावित करने की कला और व्यावहारिक प्रवीणता के तरीके समझाते थे. सोफिस्ट विचारधारा समाज में अभिजात्य संस्कारों को विस्तार देने में लगी थी. उन संस्कारों के आधार पर बंटे समाज के एक छोर पर साधन-संपन्न अभिजात नागरिक थे, जिन्हें राजनीति में हिस्सा लेने, उसकी दिशा को निर्धारित करने के अधिकार प्राप्त थे. उसके दूसरे छोर पर वे विपन्न, साधनविहीन लोग थे, जिनका काम अभिजात वर्ग की सेवा करना था. उन्हें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित रखा गया था. उनका पूरा जीवन अभिजात वर्ग की अनुकंपा से तय होता था. ज्ञान की देवी के नाम पर स्थापित होने के बावजूद उन दिनों एथेंस में कोई सार्वजनिक स्कूल नहीं था. अध्यापन का जिम्मा सोफिस्ट आचार्यों का था. वे अपने निजी विद्यालयों में अभिजात वर्ग के विद्यार्थियों को शिक्षा देते, बदले में मोटी फीस वसूलते थे. शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य था विद्यार्थी को वक्तृत्व कला में पारंगत बनाना, उसको भीड़ को अनुशासित करने के उपाय सुझाना, नेतृत्वकला का विकास करना. अधिकांश विद्यालय तो ऐसे थे जहां यह सिखाया जाता था कि निजी महत्त्वाकांक्षाएं सामाजिक हित की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं और मनुष्य का लक्ष्य उनकी पूर्ति करना है. पाठशालाओं में दी जाने वाली, राजनीति, कानून, वाणिज्य की व्यावहारिक शिक्षा का लक्ष्य विद्यार्थी की कार्यकुशलता में निखार लाना न होकर उन्हें आक्रामक और वक्तृत्व कला में प्रवीण बनाना था, ताकि वे दूसरों को अपने विचारों के अनुसार हांक सकें. कुछ विद्यालय तो यहां तक सिखाते थे कि समाजकल्याण की अपेक्षा निजी महत्त्वाकांक्षाएं कहीं श्रेष्ठतर हैं.’

प्लेटो की बौद्धिक उड़ान के स्रोतों को समग्रता से जानने के लिए अब जरा प्राचीन यूनान के दूसरे दूसरे महत्त्वपूर्ण नगर स्पार्टा की चर्चा करते हैं, जिसका उल्लेख होमर के महाकाव्यों में प्रमुखता से हुआ है. यद्यपि एथेंसवासियों में देशभक्ति और बहादुरी की कोई कमी न थी, किंतु स्पार्टा ने वर्षों तक चलने वाले युद्ध में कूटनीति के रास्ते उसको पराजित किया था. भरपूर वीरता के प्रदर्शन के बावजूद एथेंस को उस छलयुद्ध में मात खानी पड़ी थी. स्पार्टावासी भौतिक प्रगति में एथेंस से बढ़कर थे. उनके पास वैभवशाली अतीत भी था, जिससे न केवल प्राचीन यूनान बल्कि आधुनिक पश्चिमी दर्शन भी प्रभाव ग्रहण करता रहा है. ईसा के बाद पहली शताब्दी में जन्मे प्लूटार्क ने यूनान के महानायकों के जीवन तथा लोक-किवदंतियों को आधार बनाकर विपुल साहित्य की रचना की. उसकी एक पुस्तक है—‘लाइफ आ॓फ लाइकराग्स’. लाइकराग्स को प्राचीन स्पार्टा के प्रमुख विधिवेत्ता के रूप में जाना जाता है, उसके विचारों ने रूसो, नीत्शे आदि विद्वानों को प्रभावित किया था. लायकराग्स द्वारा विनिर्मित विधि-व्यवस्था एवं पुनःनिर्माण योजनाओं में सैन्यबलों को महत्ता दी गई थी. इसका संभवतः सबसे अधिक प्रभाव ग्रहण किया था, स्पार्टा ने. लाइकराग्स विधि-व्यवस्था प्राचीन यूनान के तीन मूल्यों पर आधारित थी—समानता, कठिन अनुशासन तथा स्वास्थ्य की अच्छी देखभाल. सैन्य अनुशासन में ढला स्पार्टा साम्राज्यवादी भावनाओं से ओत-प्रोत था. साम्राज्य के विस्तार के निमित्त वहां के तत्कालीन शासक निकटवर्ती राज्यों से युद्ध करते ही रहते थे. वे क्रीट से निकली जनजाति ‘डोरियन’ के वंशजों में से थे, जिन्हें अपनी वंश-परंपरा पर गर्व था. लगभग 1100 ईस्वी पूर्व उन्होंने स्पार्टा के मूल निवासियों को युद्ध में पराजित कर वहां अपना शासन स्थापित किया था. लगभग 650 ईस्वी पूर्व तक वे अपनी राजनीतिक हैसियत काफी मजबूत कर चुके थे.

एथेंस की भांति स्पार्टा का समाज भी अभिजातों एवं दासों में बंटा था. राज्य की समस्त भूमि अभिजातों के कानूनी स्वामित्व में थी. उस भूमि पर वे हेलाॅट की सहायता से खेती कराते थे. हेलाॅट एक प्रकार के दास ही थे, लेकिन उनकी स्थिति एथेंस के दासों से बेहतर थी. भू-स्वामित्व के अधिकार से वंचित हेलाॅट का दायित्व था, स्पार्टा के नागरिकों के लिए आवश्यक अन्न एवं वस्त्रादि की व्यवस्था करना. ये कृषिदास जमीन से बंधे होते थे. उनको खरीदने और बेचने पर पाबंदी थी. लेकिन जमीन के सौदे के साथ कृषिदास भी एक स्वामी से दूसरे स्वामी तक पहुंच जाते थे. भूमि अंतरण उत्तराधिकार के माध्यम से होता था. भू-संपत्ति के साथ उत्तराधिकार में कृषिदास भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अंतरित हो जाते थे. विशेष अवसर पर अथवा अपनी खुशी के प्रदर्शन के लिए मालिक किसी भी दास को मुक्त कर सकता था. कृषि-संबंधी का समस्त कार्य इन्हीं कृषिदासों के द्वारा संपन्न कराया जाता था. भू-स्वामी जमीन के बदले सत्तर मेदिम्नी(लगभग 105 बुशेल, एक बुशेल 32 सेर के बराबर) अनाज अपने लिए, 12 मेदिम्नी अपनी पत्नी के लिए ग्रहण करता था. इसके अलावा शराब और फलादि के लिए भी अनाज की सुनिश्चित मात्रा जमींदार को भेंट-स्वरूप प्रदान की जाती थी. इतना अनाज निकालने के बाद जो अनाज बचता था, वह कृषिदास का माना जाता था. स्पर्टावासियों की भांति कृषिदास भी यूनानी ही थे, मगर जहां पूंजीपति वर्ग बिना कुछ श्रम किए मौज-मस्ती भरा जीवन जीता था, वहीं कृषिदासों को उपज का मामूली हिस्सा ही हाथ लगता था. उसके लिए भी उन्हें पूरे वर्ष परिश्रम करना पड़ता था. एक कानून यह भी था कि युद्ध के लिए आवश्यकता पड़ने पर उन दासों को मुक्त करना पड़ेगा. इसलिए कृषिदासों को युद्ध की स्थितियों का अनुभव था. उनमें से कई योद्धा और युद्धनीति में निपुण माने जाते थे. अपनी स्थिति से त्राण पाने के लिए कृषिदासों के विद्रोह अक्सर होते रहते थे. स्थिति पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए स्पार्टावासियों के अधीन गुप्त पुलिस थी. उसके सिपाही कृषिदासों की गतिविधियों पर नजर रखते थे. ये कृषिदास संगठित होकर हमला न कर दें, ऐसी किसी संभावित चुनौती से बचने के लिए वे साल में एकाध बार कृषिदासों पर हमला कर उन्हें अपनी ताकत से परचाते रहते थे. इन युद्धों में हर उस कृषिदास को मौत के घाट उतार दिया जाता था, जिसके विद्रोही होने की संभावना थी. कृषिदासों के दिल में अपने सैन्यबल का खौफ बनाए रखने के लिए कई बार निर्दोषों को भी अकारण मौत के घाट उतार दिया जाता. हालांकि यह स्थिति दासों में आक्रोश पैदा करने का ही काम करती थी.

दासप्रथा के कानून इतने सशक्त थे कि कृषिदास स्वयं को राज्य से मुक्त करा सकते थे, किंतु स्वामी से, जब तक वह न चाहे, दास की मुक्ति असंभव थी. कभी-कभी युद्ध में बहादुरी के अतिरिक्त प्रदर्शन से ही ऐसे पुण्य-क्षण हाथ लग जाते थे. अपनी साम्राज्यवादी मंसूबों को बनाए रखने के लिए आठ सौ ईस्वी पूर्व के आसपास स्पार्टावासियों ने पड़ोसी देश मेसेनिया पर आक्रमण कर उसपर विजय प्राप्त की थी. स्पार्टा के मूल निवासियों की भांति मेसेनियावासियों को भी कृषिदास बनने के लिए विवश किया गया था. मगर स्पार्टा में कृषियोग्य भूमि पहले ही बहुत कम थी. इस कारण उनके समाज में असंतोष उभरने लगा. कृषिदासों को युद्धक्षेत्र का अच्छा अनुभव था. इसलिए बढ़ते आक्रोश के परिणामस्वरूप वहां विद्रोह पनपा. फलस्वरूप कुछ ही वर्षों में मेसोनियावासी खुद को स्वतंत्र कराने में सफल हो गए. स्पार्टा के नागरिकों का मुख्य व्यवसाय था—युद्ध करना. इसके लिए उन्हें बचपन से ही प्रशिक्षित किया जाता था. इस काम में बीमारों को भी नहीं बख्शा जाता था. बल्कि उन्हें मोर्चे पर सबसे आगे रखा जाता था. जो सबसे ताकतवर और लड़ाकू हो, उसका जीवन राज्य के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता, यही सोचते हुए युद्ध के समय उन्हें सबसे पीछे रखने की परंपरा थी. बीस वर्ष की अवस्था तक लड़कों को विद्यालय में युद्ध-संबंधी शिक्षा दी जाती थी. कठिन प्रशिक्षण का उद्देश्य था विद्यार्थियों की सहनशक्ति बढ़ाना. उन्हें अनुशासित रहने तथा आवश्यकता पड़ने पर देश के प्रति सबकुछ न्योछावर कर देने की शिक्षा देना. ज्ञान-विज्ञान, कला और संस्कृति जैसे मानवीय विषयों को मूर्खतापूर्ण माना जाता था. शिक्षा का सिर्फ और सिर्फ एक लक्ष्य था—लड़ाके पैदा करना, जो देश के लिए जान देने और जान लेने के लिए सदैव तत्पर रहें. बीस वर्ष पूरा होने के उपरांत वास्तविक सैन्य प्रशिक्षण आरंभ होता. तीस वर्ष से पहले विवाह करना गैरकानूनी था. उस अवस्था तक लड़ाकों को विशेषरूप से बनाए गए ‘पुरुष सदन’ में रहना पड़ता था, जिसमें स्त्रियों का प्रवेश सर्वथा वर्जित था. दस साल तक सैन्य सेवा देने के बाद ही उसको पूर्ण नागरिक माना जाता था. आर्थिक समानता के विचार का कड़ाई से पालन किया जाता था.

स्पार्टा का प्रत्येक प्रौढ़ नागरिक एक सामूहिक भोजनालय से जुड़ा होता था, जहां वह दूसरे सदस्यों के साथ मिल-बैठकर भोजन करता था. नागरिकों के निजी संपत्ति रखने पर प्रतिबंध था. इसलिए उनमें न तो कोई अमीर था, न गरीब. सिवाय मुफ्त भेंटों के वह दूसरों से कुछ ले भी नहीं सकते थे. व्यापारिक विनिमय के लिए लोहे की मुद्रा का प्रचलन था. सोना, चांदी जैसी कीमती धातुएं रखने की आजादी किसी को भी न थी. इतने अनुशासन और बंदिशों के बावजूद स्पार्टावासी अपने देश पर गर्व करते थे. उनकी देशभक्ति और सादगी दोनों दूसरों के लिए एक मिसाल थीं. वहां स्त्रियों की दशा भी दूसरे देशों से हटकर थी, जिसको वर्तमान परिवेश में असामान्य भी कहा जा सकता है. दूसरे यूनानी राज्यों की स्त्रियों की भांति उन्हें एकांतवास की मनाही थी. शिक्षा के मामले में लड़के और लड़की में कोई भेद नहीं था. बीस वर्ष की अवस्था तक लड़कियों को लड़कों के समान प्रशिक्षण दिया जाता था. लड़के और लड़कियां साथ-साथ अर्धनग्नावस्था में व्यायाम करते थे. बीसवीं शताब्दी के महान दार्शनिक बट्रेंड रसेल ने प्लूटार्क की पुस्तक ‘लाइकराग्स’ के हवाले से लिखा है कि स्पार्टा की—
‘अविवाहित लड़कियां दौड़-भाग, कुश्ती, भाला फेंकने, मुगदर चलाने जैसे करतबों से अपने शरीर को उस सीमा तक सुदृढ़ बनाए रखती थीं, जितना कि संभव था. शारीरिक मजबूती और चुस्ती-फुरती के लिए वे पौष्टिक आहार लेती थीं. नियमित कठोर श्रम, लंबे व्यायाम से वे अपने शरीर को अत्यंत मजबूत और सहनशील बना लेती थीं. इसके फलस्वरूप वे शिशु के प्रजनन की पीड़ा को आराम से सह लेती थीं. अपनी युवावस्था के सबसे संवेदनशील दौर में कुंवारी लड़कियां यद्यपि अपनी देह को अर्धनग्न रखती थीं, तो भी किसी प्रकार की अभद्रता और छेड़खानी के लिए कतई गुंजाइश न थी. उनकी युवावस्था का वह दौर खेलकूद और मस्ती से भरा होता था, मगर उसमें प्रेम, लगाव, शारीरिक संबंध जैसे युवावस्था के स्वाभाविक उद्वेगों के लिए कोई स्थान न था.’

तीस वर्ष से अधिक के व्यक्ति के लिए विवाह करना कानूनी बाध्यता थी. ऐसा न करने पर उसको कानूनी रूप से उपेक्षित कर दिया जाता था. इसके साथ-साथ भीषण शीत लहर के बीच उसे बाध्य किया जाता कि वह नंगे तन खुले में वहां तक जाए जहां युवा लड़के-लड़कियां व्यायाम और नृत्यादि में लीन हैं. स्त्रियों के लिए अत्यंत कानून कड़े थे. वे ऐसी किसी भावना का इजहार नहीं कर सकती थीं, जो राज्य के लिए अहितकारी हो. यद्यपि उन्हें कायरों तथा डरपोकों की भत्र्सना करने का अधिकार था. कमजोर नवजात शिशु की मृत्यु अथवा युद्ध में शहीद हुए बेटे के लिए शोक प्रकट करना निषिद्ध था. यूनानी परंपरा में योनि शुचिता जैसी कोई अवधारणा नहीं थी. विवाहिता स्त्री को भी पवित्र मानने का रिवाज था. यही नहीं राज्य को यदि यह लगे कि किसी मातृत्वविहीन स्त्री को उसके पति के बजाय दूसरा पुरुष मातृत्व-लाभ देने में सक्षम है, तो उसको राज्य का आदेश मानते हुए उसके साथ विवाह करना पड़ता था. बच्चों को उनके जन्म से ही संविधान के प्रति आस्था का पाठ पढ़ाया जाता था. युद्धों में निरंतर लीन रहने वाले स्पार्टा के लिए नए सैनिक पैदा करना भी राजकीय कर्म था. संतानोत्पत्ति को वहां पवित्रकर्म माना जाता था. पति-पत्नी दोनों का धर्म था, राज्य के लिए बुद्धिमान एवं हृष्ट-पुष्ट संतान पैदा करना. तदनुसार तीन बच्चों को जन्म देने के बाद पुरुष को सैनिक सेवा से मुक्ति दे दी जाती थी, जबकि चार बच्चों का पिता होने पर उसे राज्य के प्रति समस्त कर्तव्यों से मुक्त मान लिया जाता था.

स्पार्टा के संविधान की एक और विशेषता थी कि उसमें दो राजाओं का प्रावधान था. दोनों का चयन भिन्न परिवारों से किया जाता था. राजा का पद अनुवांशिक होता था. युद्ध के समय उनमें से कोई एक सम्राट सेना का नेतृत्व करता, किंतु शांतिकाल में उनके अधिकारों की सीमा थी. सामूहिक उपवास के समय उन्हें, सामान्यतः उनमें से किसी एक की खुराक से दुगुना भोजन दिया जाता था. दोनों में से किसी एक सम्राट के निधन पर मृत्यु पर होने वाला शोक मामूली होता था. शासन-व्यवस्था के लिए वरिष्ठों की परिषद थी. दोनों सम्राट उस तीस सदस्यीय परिषद के सदस्य होते थे. परिषद के शेष सदस्यों का चयन नागरिक सभा के तत्वावधान में वरिष्ठ नागरिकों में से किया जाता था. सदस्यता के लिए न्यूनतम वयस् साठ वर्ष निर्धारित थी. केवल अभिजात परिवार के सदस्य ही वरिष्ठों की परिषद की पात्रता रखते थे. परिषद आपराधिक प्रकरणों की भी जांच-पड़ताल करती थी. किंतु अंतिम निर्णय के लिए उसको प्रत्येक प्रकरण विधायिका के समक्ष लाना पड़ता था. विधायिका का गठन सभी नागरिकों से होता था. मगर मामले की सुनवाई के दौरान विधायिका के सदस्य-नागरिकों को केवल ‘हां’ अथवा ‘न’ में अपनी प्रतिक्रिया देने का अधिकार था. यद्यपि बिना विधायिका की स्वीकृति के कोई कानून लागू नहीं हो पाता था, तथापि परिषद के किसी निर्णय को लागू करने के लिए विधायिका की सहमति अनिवार्य तो थी, किंतु अपर्याप्त मानी जाती थी. निर्णय की वैधानिकता के लिए उसकी परिषद के वरिष्ठ सदस्यों और न्यायाधीश द्वारा घोषणा अनिवार्य थी. दो सम्राटों, वरिष्ठों की तीस सदस्यीय परिषद तथा न्यायाधीशों के अलावा सरकार के चैथे शक्ति-केंद्र के रूप में एफर्स की बैंच थी. एफर्स वरिष्ठ न्यायाधीश होते थे. स्पार्टा के किसी भी वरिष्ठ, अभिजात परिवार से संबंधित नागरिक को एफर्स के चुनाव में भाग लेने का अधिकार प्राप्त था. उनका चयन संपूर्ण नागरिक परिषद के बीच से किया जाता था. स्पार्टा की शासन व्यवस्था को गणतांत्रिक बनाने के लिए यह व्यवस्था सम्राट कार्लोस के शासनकाल में ईसा से लगभग नौ शताब्दी पहले संवैधानिक सुधारों के निमित्त की गई थी. इस चार स्तरीय व्यवस्था का उपयोग सम्राट के निर्णयों को संतुलित बनाए रखने की भावना के साथ किया गया था. इसकी संकल्पना के मूल में कबीलाई समाजों में अपनाई जाने वाली न्यायिक प्रक्रिया थी, जिसको संवैधानिक रूप देकर स्पार्टा ने अपेक्षाकृत खुली राजनीति का परिचय दिया था,

प्रत्येक महीने दोनों राजाओं को शपथ लेनी पड़ती थी कि वे संविधान के प्रति निष्ठावान रहकर समस्त मर्यादाओं का अनुपालन करेंगे. तत्पश्चात एफर्स सम्राटों को उस समय तक बनाए रखने, जब तक कि वे स्पार्टा के संविधान के प्रति समर्पित-निष्ठावान बने रहते हैं, शपथ दिलाते थे. एफर्स की परिषद का दर्जा उच्चतम न्यायालय जितना था. आपराधिक मामलों में अंतिम निर्णय उन्हीं का होता था, सम्राट को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं था. जब कोई सम्राट युद्ध जैसे अभियानों पर जाता था तो दो एफर्स उसके साथ उसपर नजर रखने के लिए जाते थे. कुछ विद्वानों के अनुसार यह शासन-व्यवस्था लाइकराग्स द्वारा ईसा से करीब 700 वर्ष पहले लागू की गई थी. बट्रेंड रसेल की मान्यता है कि स्पार्टा की उस व्यवस्था में ऐसा कुछ विशेष नहीं था, जो उस समय यूनान के अन्य नगरों में लागू शासन प्रणाली से भिन्न हो. बल्कि ईसा से आठ शताब्दी पहले तक स्पार्टा में भी कवियों, वैज्ञानिकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों की वैसी ही मौजूदगी और उतना ही सम्मान था, जितना यूनान के अन्य नगर-राज्यों में. ईसा से करीब सात सौ वर्ष पहले स्पार्टा में सैन्य-बहुल शासन प्रणाली को लागू कर दिया गया था. प्राचीन यूनानी गणतंत्र की आधुनिक गणतांत्रिक शासन-प्रणाली से तुलना करना अनुपयुक्त होगा. असल में वह एक प्रकार का कुलीनतंत्र था, वहां नागरिकों का दर्जा केवल अभिजात-वर्ग को प्राप्त था. वे कृषिदासों के साथ वैसा ही व्यवहार करते थे, जैसा उस समय तक अन्य यूनानी राज्यों में दासों के साथ किया जाता था. रसेल ने अपनी पुस्तक ‘दि हिस्ट्री आॅफ वेस्टर्न फिलाॅस्फी’ में तत्कालीन स्पार्टा के बारे में एक विदेशी यात्री की प्रतिक्रिया का उल्लेख किया है कि—

‘ईसापूर्व पांचवीं शताब्दी में निकटवर्ती एथेंस अथवा माइलेटस का एक यात्री स्पार्टा के संघर्षशील गांवों में घूमता-फिरता हुआ पहुंचा. बिना दीवारों के, बेहद सादगीपूर्ण ढंग से बसाए गए स्पार्टा को देखकर उसे लगा मानो वह प्राचीन युग के किसी नगर में जा पहुंचा हो. उस युग में जब मनुष्य विनीत, सादगीमय तथा वीरतापूर्ण जीवन जीता था, धन-संपत्ति से उसका दिमाग खराब नहीं हुआ था, विचारों के अतिरेक से वह अशांत नहीं था. मगर प्लेटो जैसे दर्शनशास्त्री के लिए, जो राजनीतिक विज्ञान के माध्यम से सामाजिक परिवर्तनों को परख रहा था, स्पार्टा नामक वह पड़ोसी राज्य आदर्श राज्य की उसकी परिकल्पना के सर्वाधिक निकट था. एक आम यूनानी के लिए भी वह सादगी एवं सुंदरता की अनूठी मिसाल था, जो उनके अपने नगर-राज्यों से कहीं अधिक सहज एवं सादगीपूर्ण था, हालांकि उसमें रहना उतना आरामदेय नहीं था.’

स्पार्टा की सादगी और सुरुचिपूर्ण जीवनशैली ही उसके स्थायित्व का मुख्य कारण थी. बाकी यूनानी नगर-राज्यों को जहां अंदरूनी और बाहरी तनाव के कारण अस्थिरता का सामना करना पड़ा, जिसके कारण वहां बड़े राजनीतिक परिवर्तनों को अवसर मिला, उनके सापेक्ष स्पार्टा शताब्दियों तक आंतरिक स्तर पर स्थिर बना रहा. यद्यपि इस बीच एफर्स स्वयं को राजनीतिक रूप से अधिकाधिक मजबूत करते गए, मगर वहां जो भी बदलाव हुए वे हिंसा से अछूते, पूरी तरह संवैधानिक एवं राजनीतिक प्रक्रियाओं द्वारा संप्रेरित थे. वस्तुतः स्पार्टा का प्रमुख लक्ष्य था, शेष विश्व के सामने एक अजेय योद्धा की की छवि प्रस्तुत करना. अपने इस उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल रहा था. 480 ईस्वीपूर्व पारसियन सेनाओं के विरुद्ध लड़ाई में जरूर उसे शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था. हालांकि उस लड़ाई में भी स्पार्टावासियों ने अभूतपूर्व वीरता का प्रदर्शन किया था. उस युद्ध में स्पार्टा की सेना अपने सेनापतियों के गलत आकलन का शिकार हुई थी. उन गर्वीलों का मानना था कि पारसियन सेनाएं थर्मोपाइल के संकरे दर्रे को पार नहीं कर सकेंगी. इसलिए उनके निर्देश पर तीन सौ हथियारबंद स्पार्टा सैनिक मोर्चे पर जा डटे थे. वहां भयंकर युद्ध हुआ. अंत में सैनिक ‘करो या मरो’ की भावना से लड़े, मगर संख्याबल में कम होने के कारण वे पारसियन सेनाओं को रोक पाने में विफल रहे. अंततः पारसियन सेना पहाड़ियों के रास्ते भीतर घुस आई. स्पार्टा की सेना को दोनों ओर से घेर लिया गया. एक-एक स्पार्टा सैनिक जी-जान से लड़ा. उस युद्ध में स्पार्टा के जितने सैनिक मोर्चे पर थे, सभी मारे गए. दो सैनिक अस्वस्थ होने के कारण अवकाश पर थे. उनमें से एक ने कृषिदास से मिन्नत की कि वह उसको मोर्चे तक ले चले. उसकी काफी अनुनय-विनय के उपरांत कृषिदास उसको युद्धस्थल तक ले जाने को तैयार हुआ. अस्थायी अंधता का शिकार वह सैनिक अपनी पूरी ताकत और बहादुरी से लड़ा और लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुआ. दूसरे सैनिक का नाम अरिस्तोदमस था. उसको लगा कि वह युद्ध करने में असमर्थ है, इसलिए वह मोर्चे से अनुपस्थित बना रहा. कुछ दिनों के बाद जब वह स्पार्टा लौटा तो कोई उससे बात करने को तैयार न था. स्त्रियां उसको ‘कायर अरिस्तोदमस’ कहकर धिक्कार रही थीं. आत्मग्लानि से भरा अरिस्तोदमस विक्षिप्तों की भांति अपने दिन बिताने लगा. अपने ऊपर लगे लांछन को दूर करने का अवसर उसको शीघ्र ही मिल गया. एक वर्ष बाद प्लेटिया के युद्ध में वह अपनी पूरी ताकत से लड़ा और वीरगति को प्राप्त हुआ. उस युद्ध में स्पार्टा की विजय हुई थी. पूरे नगर में अरिस्तोदमस की जय-जयकार होने लगी. उस युद्ध के बाद थर्मोपाइल के युद्धस्थल पर एक भव्य स्मारक बनाया गया, जिसपर लिखा था—

‘ओ अनजाने यात्री! स्पार्टावासियों को यह संदेश देना कि हम उसकी आज्ञापालन के लिए ही यहां तैनात हैं.’

371 ईस्वी पूर्व, ल्यूक्ट्रा के युद्ध तक, जब उन्हें थेबांस के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा. वर्षों तक स्पार्टावासी अपनी भूमि पर स्वयं को सर्वथा अजेय कौम सिद्ध करते रहे, किंतु ल्यूक्ट्रा का युद्ध उनकी सैन्य-श्रेष्ठता का अवरोधक बन गया. इसके बाद वहां शताब्दियों लंबा पराभव का दौर आरंभ हुआ. उसका एक कारण नए राजनीतिक दर्शन का उदय था, जिसके प्रेरक अरस्तु आदि दार्शनिक थे. दरअसल छोटे नगर-राज्यों के बीच आए दिन होने वाले संघर्षों से बचाव की चिंता बुद्धिजीवियों को बड़े राज्यों के गठन के लिए प्रेरित कर रही थी. ‘पाॅलिटिक्स’ में अरस्तु ने जोर देकर कहा कि मनुष्य स्वभाव से ही राजनीतिक प्राणी है. राज्य का उद्देश्य केवल बेहतर न्याय और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेना नहीं है, बल्कि उसका कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को अच्छे कार्यों की ओर प्रवृत्त करे. राजनीतिक साझेदारी का उद्देश्य उपयोग केवल एक साथ रहने के बजाए कल्याणकारी कार्यों के निष्पादन हेतु होना चाहिए. सादगी-प्रिय जीवनशैली के बावजूद स्पार्टा के जनजीवन में ऐसा कुछ था, जिसको सभ्य समाज में अच्छा नहीं माना जा सकता. महान यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस ने स्पार्टा के लोकजीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार का उल्लेख किया है. यह तब था जब स्पार्टा के धनी अभिजात भी सादगीपूर्ण जीवन जीने पर जोर देते थे. विद्यालयों में भी सादा-सरल जीवनशैली का पाठ पढ़ाया जाता था. अरस्तु स्पार्टा के पराभव के दिनों का साक्षी रहा था. स्पार्टा के संविधान को लेकर उसने जो टिप्पणी की है, वह उसके समकालीन विद्वानों की अपेक्षा इतनी भिन्न है कि लगता ही नहीं कि वह उसी स्थान-देश के बारे में है, जिसके संबंध में दूसरों ने लिखा है. वह लिखता है कि स्पार्टा के—

‘राजनयिक पूरे राज्य को सुदृढ़ और आत्मसंयमी बनाना चाहते थे, किंतु उनका सारा सोच और प्रयास केवल पुरुषों तक सीमित थे. स्त्रियों के मामले में वहां पूरी उदासीनता बरती जाती थी, जो प्रायः भोग-विलास और असंयमित जीवन जीती थीं. इसका दुष्परिणाम यह था कि ऊपर से सादा दिखने वाले समाज में धन की बड़ी महत्ता थी, विशेष बात यह है कि वहां नागरिकों को अपनी-अपनी पत्नी के अधीन काम करना पड़ता था, जैसा अधिकांश लड़ाकू जातियों में होता रहा है. साहस और वीरता के प्रति संपूर्ण सम्मान के बावजूद, जो केवल युद्ध के समय काम आते थे, तथा जिनका सामान्य जन-जीवन के बीच कोई मूल्य न था, स्पार्टा के पुरुषों के जीवन में स्त्रियों का हस्तक्षेप बहुत ही अहम् था. और यह बहुत पहले से चला आ रहा था. कहते हैं कि एक बार लायकराग्स ने स्त्रियों के स्वेच्छाचार को कानून द्वारा नियंत्रित करने की कोशिश की तो उन्होंने विद्रोह कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप लायकराग्स को अपने कदम वापस लेने पड़े थे.’

‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने विवाह-संस्था का निषेध कर, पत्नियों और बच्चों में साझेदारी का विचार प्रस्तुत किया है. इस बात की पूरी संभावना है कि प्लेटो का यह विचार स्पार्टा की स्त्रियों के उच्छ्रंखल व्यवहार से जन्मा हो. क्योंकि ‘रिपब्लिक’ की अन्य कई परिकल्पनाएं, खासकर सादगीपूर्ण और सामूहिक रहन-सहन की प्रेरणा स्पार्टा से प्रभावित थीं. प्राचीन यूनानी समाज और स्पार्टा के संविधान के गहन अध्ययन के पश्चात अरस्तु इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि ऊपरी सादगी और सरलता के बावजूद वहां के समाज में इंसानी लोभ-लालच की कमी न थी. यह दुष्प्रवृत्ति असमान आर्थिक वितरण से जन्मी थी. वहां भू-संपदा के खरीदे-बेचे जाने पर नियंत्रण था. उसे केवल वसीयत के माध्यम से हस्तांतरित करना संभव था. इसका मुख्य कारण स्पार्टा के सैनिकों का युद्ध प्रेम था, जिसमें अकसर जानें जाती थीं. चूंकि पुरुष अधिकतर युद्धस्थल में रहते थे, वे जानते थे कि कभी भी दुश्मन के भाले का शिकार हो सकते हैं. इसलिए वहां संपत्ति को दूसरों के हाथ में जाने से बचाने के लिए स्त्रियों के नाम कर दिया जाता था. अरस्तु के अनुसार राज्य की कुल भूमि का साठ प्रतिशत हिस्सा स्त्रियां के अधिकार में था. इसके अलावा युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं से भी पूरा समाज प्रभावित होता था. परिणामस्वरूप जनसंख्या में भी तीव्र उतार-चढ़ाव आते रहते थे. अरस्तु के अनुसार ये उतार-चढ़ाव इतने बड़े होते थे कि एक समय में स्पार्टा में पुरुषों की संख्या दस हजार थी. उसके कुछ ही समय बाद, एक युद्ध में कबीलों से पराजित होने के बाद वह गिरकर मात्र हजार रह गई थी. जहां प्लेटो स्पार्टा के कानून से प्रभावित था तथा वहां के संविधान की मुक्तकंठ से प्रशंसा करता था, उसका शिष्य अरस्तु उसका आलोचक था. उसने लिखा है कि एफर्स जिनकी हैसियत स्पार्टा के कानून-निर्माता की थी, जो इतने अधिकार-संपन्न थे कि सम्राट को भी अपने न्यायालय में घसीट सकते थे, प्रायः धनाभाव में जीते थे. अपने जीवन-स्तर को बनाए रखने के लिए वह अकसर रिश्वत लेते थे. कहा जा सकता है कि वहां के संविधान की लोकतांत्रिकता आभासीय थी. एक ओर तो एफर्स तथा दूसरे राजनयिक अधिकार-संपन्न अभिजात स्वच्छंद एवं विलासितापूर्ण जीवन जीते थे, दूसरी ओर आम नागरिक के लिए ढेर सारे अभाव तथा बंदिशें थीं.

उल्लेखनीय है कि अरस्तु के ग्रंथों में स्पार्टा के जिस दौर का विवरण मिलता है, उस समय उसका वैभव अवसान पर था. दूसरी ओर प्लेटो का दावा है कि ये बुराइयां बहुत पहले से ही उसके समाज में मौजूद थीं. लिखते समय वह अरस्तु इतना कटु हो जाता है कि उसके विचारों से सचाई की गंध आने लगती है. दरअसल यही वह हकीकत है जो प्राचीन रोम की भौतिक एवं वैचारिक समृद्धि के खोखलेपन को उजागर करती है. जहां तक स्पार्टा के आमनागरिक की बात है, आर्थिक असमानता से जन्मे तमाम अभावों और उत्पीड़क स्थितियों के बावजूद उसके दिमाग में अरस्तु के स्पार्टा के लिए कोई स्थान न था. उसे तो प्लूटार्क के मिथकीय किस्सागोइयों से भरपूर स्पार्टा से प्यार था. अरस्तु के यथार्थ से अधिक उसे प्लेटो की भावुकता-भरी आदर्शवादी संकल्पनाएं भली लगती थीं, जो उसने अपनी पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में अभिव्यक्त की थीं. कालांतर में अरस्तु की तार्किक स्थापनाएं केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सिमटती गईं, जबकि युवा सपनों पर प्लेटो के ‘दार्शनिक सम्राट’ का बिंब शताब्दी दर शताब्दी गहराता चला गया. उल्लेखनीय है कि आदर्शवादी सोच और प्रेम की काल्पनिक शक्ति की सुखानुभूति ने सहòाब्दियों तक मनुष्य को भरमाने का काम किया है और किंचित वह आज भी करती आ रही है. प्लूटार्क कवि था, उसने काव्यात्मक भाषा में स्पार्टा का जो बखान किया, उसका वही मिथकीय रूप जनमानस के मस्तिष्क पर स्थायी भाव से छा गया. लेकिन यह भी सच है कि प्राचीन यूनान ने भले ही अपने मिथकीय संरचनाओं के कारण, पूरी दुनिया को प्रभावित किया है. कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि स्पार्टा की बहादुरी और उसकी प्रेमगाथाएं महज कपोलकल्पनाएं हैं. उनकी आदि प्रेरणा प्लूटार्क से मिली है.

स्थिति चाहे जो भी हो, यह स्वयं सिद्ध है कि प्राचीनकालीन अन्य सामंती समाजों की भांति स्पार्टा की बहादुरी भी आत्मघाती किस्म की थी, जिसमें आपसी अंतद्र्वंद्व और तुच्छ स्पर्धा के कारण विकास बार-बार अवरुद्ध होता रहता था. परिणामस्वरूप वह विज्ञान के क्षेत्र में उतना आगे नहीं बढ़ पाया, जितना उस समय की अन्य सभ्यताएं सहजरूप से प्रगतिशील थी. इस कारण वहां जड़ता की स्थिति बनी रहती है. इस बात से इंकार कर पाना संभव नहीं कि यूनानी भावुकता, प्रेम, दर्शन-चिंतन तथा वहां की महत्त्वाकांक्षी राजनीति ने समस्त विश्व को प्रभावित किया है. सिंकदर का योगदान इसमें इतना है कि उसने यूनानी मिथकों, दर्शन तथा राजनीति महत्त्चकांक्षाओं से पूरे विश्व का परिचय कराया. लोगों ने सही मायने में तभी जाना कि प्राचीन यूनान के इतिहास का अभिप्राय मात्र दो राज्यों अथवा नगरों के बीच लड़े गए युद्धों अथवा दो पीढ़ियों के बीच की उत्तराधिकार के ओछेपन की गाथा मात्र नहीं है, बल्कि वह मनुष्यता द्वारा अपने अतीत की सुखद स्मृतियों का हिस्सा है, जो उसने आलप्स की पहाड़ियों पर सभ्यता के उगते सूरज, मानवीय जिजीविषा के सच्चे संघर्ष और भावनाओं की लंबी उठा-पटक के बीच सहेजी थीं. ये इतनी प्रगाढ़ थीं कि सहòाब्दियों लंबी यात्रा के बाद भी इनका आकर्षण ज्यों का त्यों बना हुआ है. इनमें लोकलुभावन शक्ति है तो बुद्धि-विवेक और वीरता के ऐसे किस्से भी हैं, जो समाज को प्रेरित करने की शक्ति रखते हैं.

प्राचीन यूनान की स्मृतियों, उसकी महत्ता को बनाए रखने के लिए सुकरात के बाद प्लेटो का सर्वाधक योगदान है. उससे पहले राजनीति और धर्म एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड थे, जिसका लाभ शीर्षस्थ वर्ग ही उठा पाता था. इसलिए वहां सामंतवादी संरचनाओं को बल मिला, जिन्होंने समाज के बहुत बड़े वर्ग को विकास के लाभों से सायास वंचित कर दिया. सुकरात ने पहली बार मनुष्य को यह समझाने का प्रयास किया था कि धर्म और राजनीति से इतर भी मनुष्य के कुछ उच्चादर्श संभव है. उनमें सबसे प्रमुख है स्वयं को नैतिक रूप से समर्थ बनाना. उन मूल्यों को मनुष्यता में स्थापित करना, जिनके लिए अभी तक दैवीय शक्ति की परिकल्पना की जाती है. सुकरात के लिए मनुष्यता आदर्श थी. उसकी समस्या थी कि इस आदर्श को प्राप्त कैसे किया जाए, कैसे समाज को अभीष्ट ऊंचाइयों तक ले जाया जाए. अपने गुरु के प्रति अनन्य भक्तिभाव से भरा प्लेटो सुकरातीय आदर्शों के अनुरूप समाज को ढालने के लिए अनुकूल व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता रहा. अपने सोच को रचनात्मक बनाने के लिए प्लेटो को सुकरात के अलावा अपने पूर्ववर्ती एवं समकालीन विचारकों एवं राजनयिकों यथा पाइथागोरस, पेरामेनाडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, लायकराग्स आदि से प्रेरणा मिली थी. डेमोक्रिटिस ने उसको वैज्ञानिक सोच दिया, तो पाइथागोरस उसकी गणित के प्रति अभिरुचि जगाने में सहायक बना था, जिससे उसके लेखन में अनूठी तार्किकता है. प्लेटो से पहले यूनानी समाज में सुधारवाद की पहल लायकराग्स ने की थी. उसने कुल कृषिभूमि को स्पार्टा के नागरिकों में बराबर-बराबर विभाजित कर, समाज में आर्थिक समानता लाने का वातावरण तैयार किया था. व्यापारियों, कारीगरों, श्रमिकों, दस्तकारों के लिए स्वतंत्र बस्तियां बनाकर उसने समाज को व्यवस्थित करने का प्रयास किया था. आर्थिक समानता को समर्पित लायकराग्स ने शहर को दिवालियेपन से बचाने, आर्थिक स्पर्धा को समाप्त करने, विलासिता और फिजूलखर्ची पर रोक लगाने का युग-प्रवत्र्तक काम किया था. सोने और चांदी के आभूषणों पर प्रतिबंध लगाकर उसने प्रदर्शन की वृथा प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया. उसके प्रभाव में लौह-मुद्रा का प्रचलन था. लायकराग्स के अनुशासन में सभी अलाभकारी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई थी. इस प्रकार उसने पूरे स्पार्टा को सादगी संपन्न और विकासोन्मुखी बनाने की शुरुआत की. उसने समाज में लैंगिक समानता लाने का प्रयास भी किया था, किंतु इस क्षेत्र में उसको अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी. तो भी, प्लेटो के लिए उसके योगदान को नकार पाना असंभव था. लायकराग्स की व्यवस्था के कुछ व्यापारिक दुष्परिणाम भी स्पार्टा को भुगतने पड़े थे. आभूषण बनाने वाले कारीगरों के लिए लौहमुद्रा किसी काम की न थी. इसलिए वे स्पार्टा से निकटवर्ती राज्यों में पलायन करने लगे. इसके फलस्वरूप एथेंस में चांदी के सिक्के बनाने का कारोबार खूब फला-फूला. लायकराग्स का एक और महत्त्वपूर्ण आदेश था, नागरिकों को सामूहिक रसोई में भोजन करने के लिए बाध्य करना. प्लेटो लायकराग्स के बनाए कानूनों से तो सहमत नहीं था, मगर उसके विचारों, विशेषकर सादगीपूर्ण जीवनशैली तथा सामूहिक रहन-सहन को उसने भी अपने आदर्शलोक के अनुकूल माना. यह संभव है कि उस समय उसके मस्तिष्क में स्पार्टा के हाथों एथेंस को मिली पराजय के कारण कोई हीनताग्रंथि रही हो. उसको लग रहा था कि विजेता स्पार्टा के अनुसरण से एथेंस को और अधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है.
क्रमशः…..
ओमप्रकाश कश्यप