महामना अय्यंकालि : सामाजिक क्रांति के अग्रदूत

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

            पोईकायल योहान्न, मलयाली कवि

इतिहास सभ्यता का ऐसा दर्पण है, जो सिर्फ सतह से ऊपर देखता है। इसलिए उसमें राजा-महाराजों के ऐश्वर्य राग, लड़ाइयां, स्वामीभक्ति और बुजदिली के किस्से, रणनीति और राजनीति, षड्यंत्र और विश्वासघात—यही सब दिखाई पड़ते हैं। इतिहास उन स्वेद-बिंदुओं की गिनती याद नहीं रखता जो खेती करने वाले किसान, मजदूर इसलिए बहाते हैं, ताकि राजा-महाराजाओं के अन्न-भंडार भरे रहें। उनके मंत्रियों, सिपहसालारों के चेहरे दिपदिपाते रहें। वह देवताओं और पैगंबरों के किस्सों को सहेजता है। जाति, धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर हुए दमन के उन किस्सों को भूल जाता है, जो जमीन के लोगों के हिस्से आते हैं। इसलिए ऐरिक हॉब्सबाम ने सलाह दी थी कि इतिहास को केवल उन सवालों के माध्यम से याद करना चाहिए जो हम उसे लेकर उठा सकते हैं—‘उस रूप में, जिसपर हम इतिहासकारों का भरोसा हो। इतिहास का ऐसा वस्तुनिष्ट सत्य, जिसे सवालों के जरिये जांचा-परखा जा सके। ठीक उस तरह जैसे हम उसे परखना चाहते हैं।’

भारतीय इतिहास दृष्टि चीजों को शिखर से परखती है। शिखर के लोग ही उसमें शामिल होते आए हैं। जनसाधारण क्या सोचता है? अपने समय और इतिहास को लेकर उनकी अपनी दृष्टि क्या है? राजा-महाराजा, जमींदारों और सामंतों से परे जनता का सच भी हो सकता है? इस हकीकत को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की गई। भारत में इतिहास के नाम पर पुराण रचे गए। उन्हें स्वयं-सिद्ध बताया जाता है। सवाल उठाने वालों को संस्कृति विरोधी मान लिया जाता है। इन दिनों तो उन्हें सीधे राष्ट्रद्रोही घोषित करने का चलन है। यही भारतीय और पाश्चात्य इतिहास-दृष्टि का अंतर है। इतिहास का संबंध यदि मनुष्य से है तो उसमें पूरा मानव-समाज प्रतिबिंबित होना चाहिए। उसे राजा-महाराजों के वैभव-विलास, राजनीतिक उठा-पटक और रनिवासों के षड्यंत्रों तक सीमित कर देना इतिहास की आड़ में चारण-कर्म है।

आजादी के बाद इसमें कुछ बदलाव आया। कुछ जमीनी लेखक शामिल हुए हैं। दामोदर धर्मानंद कोसंबी, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं। फुले, आंबेडकर और पेरियार में से कोई भी घोषित रूप से इतिहासकार नहीं था। परंतु उन सभी के पास इतिहास को परखने की दृष्टि थी। वे भारतीय इतिहास और उसकी लेखन-पद्धति पर सवाल उठाते हैं। सांस्कृतिक अंतर्विरोधों की ओर संकेत करते हैं। आधुनिक मूल्यों के संदर्भ में उसे परखना चाहते हैं। यह परंपरावादी इतिहास लेखकों स्वीकार्य नहीं है। उनमें प्रगतिशील होने का दावा करने वाले साम्यवादी लेखक भी शामिल हैं, जिन्हें भारतीय समाज में जातीय विभाजन के आधार पर बनी द्वंद्वात्मक स्थितियां स्वीकार नहीं हैं। इसीलिए दलित और बहुजन लेखकों, जो छूआछूत, जातिगत भेदभाव की कसौटी पर भारतीय इतिहास और संस्कृति की विवेचना करते हैं, राजनीतिक स्वतंत्र के बजाय सामाजिक स्वतंत्रता पर जोर देते हैं—की लगातार उपेक्षा की जाती है। गाल-बजाऊ किस्म के लोग तो उन्हें राष्ट्र-विरोधी तक कह जाते हैं।

कुछ कथित विद्वान जो समानता और स्वतंत्रता का राग रात-दिन अलापते हैं, उन लोगों के योगदान को जिनका भारत को आधुनिक राष्ट्र-समाज बनाने में सर्वाधिक योगदान है—महज इसलिए बिसरा देते हैं, क्योंकि वे उनकी जाति या समाज के नहीं थे। उलटे उनसे टकराकर अपने लक्ष्य तक पहुंचे थे। ऐसे ही लोग फुले और आंबेडकर के योगदान की उपेक्षा करते हैं। पेरियार के नाम पर नाक-मुंह सिकोड़ते हैं। केरल के नवजागरण के अग्रदूत अय्यंकालि को तो लगभग भूल ही चुके हैं। जातीय दुराग्रहों के चलते, ‘केरल: मलयाली भाषियों की मातृभूमि’ जैसी पुस्तक लिखने वाले साम्यवादी ईएमएस नंबूदरीपाद ने न तो दलित महिलाओं पर लगने वाले ‘मुल्लकरम’(स्तन ढकने पर टैक्स) के बारे में कुछ लिखा न है, न वहां की दासप्रथा पर। न उन्हें केरलीय समाज के नवोत्थान में महात्मा अय्यंकालि का योगदान नजर आता है।  

प्रसंगवश बता दें कि केरल, जो पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था, में दलित महिलाओं को वक्ष ढकने का अधिकार नहीं था। दलितों की हैसियत दास के बराबर थी। कुछ अर्थों में पेशवाशाही के दलितों से भी बुरी। दलित स्त्रियों को गले में ग्रेनाइट पत्थर का हार पहनना पड़ता था। कांच और काले पत्थर के मनकों से बने कंठहार उन महिलाओं के गले में सांप जैसे दिखते थे। ये सब उनके दासत्व की निशानियां थीं। स्त्रियों में उस प्रथा के विरुद्ध आक्रोश था। त्रावणकोर के राजा द्वारा लगाए गए कर की वसूली हेतु अधिकारी जब एक गांव में पहुंचा तो वहां नंगेली नाम की स्त्री ने वक्ष-कर का भुगतान करने से इन्कार कर दिया। अधिकारी द्वारा जोर-जबरदस्ती करने से क्षुब्ध उस स्त्री ने गुस्से में आकर अपने दोनों स्तन काट, उन्हें केले के पत्ते पर रखकर, अधिकारी को सौंप दिए। अत्यधिक खून बहने से नंगेली की उसी दिन मृत्यु हो गई थी। नंगेली के बलिदान से केरल में जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ, जिसे मलयाली भाषा में ‘सन्नार लहाला’-उभोवस्त्र अधिकार विद्रोह(Channar Lahala—Upper Cloth Mutiny) कहा जाता है। नंगेली के सम्मान में उसके गांव को ‘मुलाचिपारांबु’ जिसका अर्थ ‘स्तन वाली महिला’ है—कहा जाता है। महिलाओं के वक्ष ढकने के अधिकार को लेकर एक कामयाब लड़ाई अय्यंकालि ने भी लड़ी थी। वह अय्यंकालि द्वारा आधुनिक केरल के नवनिर्माण, महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए लड़ी गई कई लड़ाइयों में से एक थी। भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनाने, दलितों और पिछड़ों में स्वाभिमान चेतना जगाने में महात्मा अय्यंकालि की भूमिका ठीक वैसी ही है, जैसी ज्योतिराव फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर, नारायण गुरु और ई. वी. रामासामी पेरियार की।

अय्यंकालि का जन्म तिरुवनंतपुरम् जनपद से 13 किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित, छोटे से गांव वेंगनूर में 28 अगस्त 1863 को हुआ था। पिता अय्यन और मां माला की आठ संतानों में अय्यंकालि सबसे बड़े थे। माता-पिता ने उनका नाम ‘काली’ रखा था, जो पिता के नाम के साथ जुड़कर अय्यंकालि बन गया। उनकी जाति पुलायार(पुलाया) थी। वेंगनूर आगमन से पहले उनका परिवार पलावर थारावाड़ का रहने वाला था। अपने पैत्रिक गांव के नाम को अय्यन अपने नाम के साथ जोड़कर सम्मान से सहेजे हुए थे। वह उनकी पहचान का हिस्सा था। दक्षिण भारत में पुलायार अछूत जातियों में, सबसे नीचे की मानी जाती है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में उनकी हैसियत भू-दास के समान थी। जमींदार लोग, मुख्यतः नैय्यर अपनी मर्जी से किसी भी पुलायार को काम में झोंक देते थे। सुबह से शाम तक काम करने के बाद उन्हें मिलता था, बामुश्किल  600 ग्राम चावल। कभी-कभी वह भी बेकार….दूसरे दर्जे का।

अय्यन बहुत मेहनती थे। उन्हें एक जमींदार ने जंगल को साफ कर जमीन खेती योग्य बनाने का काम सौंपा हुआ था। जमींदार अपेक्षाकृत उदार था। अय्यन के काम से प्रसन्न होकर उसने उन्हें पांच एकड़ जमीन भेंट कर दी थी। पुलायार जाति के लिए यह बड़ी बात थी। अपने परिवार के साथ अय्यन उसी जमीन में खेती करते थे। इस तरह अय्यंकालि के परिवार की आर्थिक स्थिति उनके ‘जाति-बंधुओं’ की अपेक्षा बेहतर थी। बाकी पुलयारों की हैसियत उस समय भूदासों के समान थी। उन्हें बिना किसी मजदूरी के दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था। इस प्रथा को वहां ‘ऊझीयम वाला’(Oozhiyam vala—Labour Without Pay) कहा जाता था। पुलायारों की संख्या त्रावणकोर में अन्य अछूत जातियों की अपेक्षा कम ही थी। अकेले वे कोई संगठनकारी ताकत नहीं बनते थे। उनकी दयनीय अवस्था और शोषण के पीछे यह भी एक कारण था।  

तत्कालीन समाज जातिवाद और छूआछूत पर टिप्पणी करते हुए चार्ल्स एलेन ने एक ईसाई मिशनरी की पत्नी द्वारा 1860 में अपनी एक मित्र को लिखे गए पत्र का हवाला दिया है। त्रावणकोर में व्याप्त छूआछूत को समझने के लिए यह टिप्पणी बहुत प्रामाणिक है। नियम के अनुसार—

‘नैय्यर नंबूदरी ब्राह्मण1 से मिल सकता था, परंतु उसे छू नहीं सकता था। चोवन(इझवा) जाति के व्यक्ति के लिए नियम था कि वह नंबूरी ब्राह्मण से मिलते समय 36 कदम की दूरी बनाकर  रखेगा। पुलायार जिसकी स्थिति दास जैसी है, को नंबूदरी से 96 कदम दूर खड़े होकर बात करनी पड़ती थी। नैय्यर से मिलते समय चोवाल को बारह कदम दूर खड़े रहने का प्रावधान था। वहीं पुलायार को नैय्यर से 66 कदम की दूरी रखनी पड़ती थी। इसी तरह संत थामस चर्च में विश्वास रखने वाला ईसाई, नैय्यर को छू सकता था, लेकिन नैय्यर के साथ भोजन करने की अनुमति उसे नहीं थी।’2 

जातीय शुचिता के नाम पर अमानवीय व्यवहार का कुछ ऐसा ही उल्लेख कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में भी किया है। इससे तत्कालीन केरल में जाति-भेद और छूआछूत की त्रासद स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

पुलयार जाति के बच्चों को स्कूल जाकर पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी। वे केवल मेहनत-मजदूरी कर सकते थे। अछूत होने के कारण अय्यंकालि को केवल अपनी जाति के बच्चों के साथ खेलने का अधिकार था। फिर भी अय्यंकालि का बचपन स्वजातीय बच्चों से अलग था। वे अपेक्षाकृत मुक्त पारिवारिक वातावरण में पले-बढ़े थे। पिता को कहीं बेगार करने नहीं जाना पड़ता था। इस कारण उनके दोस्तों में कुछ तथाकथित ऊंची जाति के भी थे। बचपन ठीक-ठाक बीत रहा था कि एक दिन अचानक जाति-व्यवस्था का क्रूरतम चेहरा उनके सामने आ गया। उस दिन अय्यंकालि बच्चों के साथ फुटबाल खेल रह थे। उन्होंने फुटबाल को ठोकर मारी, वह उछलती हुई दूर एक आंगन में जा गिरी। वह नैय्यर का घर था। गृहस्वामी गैंद को देखकर आग-बबूला हो गया। उसने अय्यंकालि को ऊंची जाति के बच्चों के साथ न खेलने की हिदायत दी। अपमान से आहत अय्यंकालि ने भविष्य में किसी सवर्ण से दोस्ती न करने की ठान ली। यह संकल्प आगे चलकर उनके और पुलायार समाज के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उसके बाद अय्यंकालि ने अपनी जाति के लड़कों को जोड़ना शुरू किया। उन्हें एकजुट कर उनकी एक टीम तैयार की। इस तरह बचपन से ही नायकत्व की भावना उसके भीतर उभरती चली गई।

बचपन में ही एक और घटना घटी। झगड़े के दौरान अय्यंकालि ने ऊंची जाति के लड़के की पिटाई कर दी। वह पहला अवसर था जब एक पुलायार, जिसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी, ने ऊंची जाति के लड़के को पीटा था। माता-पिता घबरा गए। उन्हें डर था कि उच्च जाति के लोग अवश्य ही बदला लेंगे। ऐसा होना भी था, लेकिन तभी कुछ लोग आकर बीच-बचाव करने लगे। उससे बेपरवाह बालक अय्यंकालि यह कहते हुए बाहर निकल आया कि वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। घर पहुंचा तो माता-पिता ने उसकी जमकर पिटाई की। ‘दिकुओं’3 से फिर कभी न उलझने का निर्देश दिया। माता-पिता का गुस्सा भी अय्यंकालि के संकल्प को डिगा न सका। वे अपनी जाति की दुर्दशा को लेकर सवाल उठाने लगे। इसी के आगे चलकर मुक्ति का विचार उसके दिमाग में जन्मा।

किशोरावस्था में गाने-बजाने का शौक पैदा हुआ। लोकगीतों में रुचि बढ़ी। उसी से रचनात्मकता ने जन्म लिया। किशोरावस्था पार करते-करते देह निखरने लगी थी। लोग अय्यंकालि के शरीर-सौष्ठव की प्रशंसा करने लगे। शरीर के साथ-साथ दिमाग भी हृष्ट-पुष्ट था। मुक्त परिवेश और अच्छी देहयष्टि। दोनों बातें अय्यंकालि का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए काफी थीं। लेकिन जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसमें वे दुर्गुण समान थी। अछूतों के लिए ड्रेस कोड निर्धारित था। वे साफ कपड़े नहीं पहन सकते थे। सार्वजनिक मार्गों पर टहलना निषिद्ध था। ऊंची आवाज में बोलने को उदंडता माना जाता था। इस सबकी परवाह न करते हुए अय्यंकालि साफ कपड़े पहनता। दोस्तों के साथ निरुद्धिग्न टहलता। इस तरह वह मनुस्मृति के उस विधान का उल्लंघन करता था, जो शताब्दियों से शूद्रों और दासों पर शासन का कारण रहा था।

उम्र के साथ रचनात्मकता में भी निखार आ रहा था। अय्यंकालि लोकगीत गाने यहां तक कि रचने भी लगा था। अपने छोटे भाइयों गोपालन, चेतन तथा अपनी जाति के दूसरे किशोरों के साथ वह अपने रचे लोकगीत गाता, नाटक खेलता और उन्हें मनभाता आकार देता था। उसके मित्र उसे सम्मान के साथ उरपिल्लई(प्रिय) या मूथपिल्लई(ज्येष्ठ) कहते थे। अय्यंकालि के गीतों और नाटकों में सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश समाया होता था। स्वाधीनता का आवाह्न किया जाता था। अय्यंकालि की भाषा तमिल मिश्रित मलयाली थी। इससे उसके गीतों और नाटकों का असर त्रावणकोर से आगे बढ़कर मालाबार ओर कोची तक फैलने लगा। गीतों और नाटकों के जरिये वह मुक्ति संदेश को फैलाता। जातीय आधार पर हो रहे शोषण से परचाता। अय्यंकालि के माता-पिता के मन में बेटे को लेकर चिंता सदैव बनी रहती थी। लेकिन जन्मजात विद्रोही अय्यंकालि को इसकी चिंता न थी। संगठन है तो कुछ अनुशासन, ताकत का उचित सदुपयोग करने का हुनर भी होना चाहिए। सो अय्यंकालि ने अपने दल के सदस्यों को मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिए एक प्रशिक्षक रख लिया, जो बहुत दूर से चलकर आता था। अय्यंकालि की गतिविधियां दिकुओं को खटकती थीं। मगर उन्हें इसकी कतई परवाह नहीं थी।

उन दिनों दलितों को गांव में खुला घूमने और मुख्य मार्गों पर निकलने की आजादी नहीं थी। न ही वे साफ, धुला हुआ कपड़ा पहन सकते थे। अय्यंकालि को बनी-बनाई लीक पर चलने की आदत न थी। 25 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपने ही जैसे युवाओं का मजबूत संगठन तैयार कर लिया था। उनके साथी  संकेत-मात्र से मरने-मारने को तैयार हो जाते थे। सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते समय अय्यंकालि के सामने सबसे पहली चुनौती थी, पुलायारों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार दिलाना। 1889 में ऐसी ही एक घटना घटी। कुछ दलित युवा सार्वजनिक रास्तों पर चलने के अधिकार को लेकर आंदोलनरत थे। उसी समय उनपर दिकुओं(सवर्णों) ने उनपर हमला कर दिया। दोनों पक्षों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। सड़क खून से लाल हो गई। इसी तरह की घटनाएं मनाक्कदु, काझाकुट्टम, कनियापुरम् जैसे क्षेत्रों में देखने को आईं। सवर्ण आतंक पर उतर आए थे।

बैलगाड़ी से क्रांति

निडर, निर्भीक अय्यंकालि ने अंततः सीधे टकराने का फैसला कर लिया। 1893 की घटना है। अय्यंकालि ने दो हृष्ट-पुष्ट बैल खरीदे, एक गाड़ी। साथ में पीतल की दो बड़ी-बड़ी घंटियां। खुद को उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक में सजाया हुआ था, जिससे उनकी धज अलग ही नजर आ रही थी। घंटियों को बैलों के गले में बांध, बैलगाड़ी पर सवार हो, अय्यंकालि ने बैलों को हांक लगाई। इशारा मिलते ही बैल गांव की सड़कों पर चल पड़े। मानो कोई योद्धा अपने विजय-अभियान पर अग्रसर हो। उन दिनों पुलायार के लिए बैलगाड़ी पर बैठना तो दूर, उसे खरीदना या पास रखना भी अपराध माना जाता था। अय्यंकालि का गाड़ी पर सवार होकर निकलना शताब्दियों पुरानी व्यवस्था को चुनौती थी। खुला ऐलान। बैलों के गलों में पड़ी घंटियां जोर-जोर से बज रही थीं। आवाज सुनकर दिकुओं में खलबली मच गई। दूसरी ओर अछूतों के दिल अनहोनी की आशंका से दहलने लगे। अय्यंकालि अपनी बैलगाड़ी से गुजर ही रहे थे, सहसा कुछ सवर्णों ने आकर उनका मार्ग रोक लिया। वे अय्यंकालि को ‘सबक’ सिखाना चाहते थे—

‘यह सब क्या है? तुम्हें चादर ओढ़ने की इजाजत किसने दी।’ अय्यंकालि को ऐसे विरोध की आशंका थी। वे उसके लिए तैयार थे। तभी कुछ सवर्ण आगे बैलगाड़ी की ओर बढ़े। एक पल की भी देर किए बिना अय्यंकालि थोड़ा झुके। इससे पहले कि उपद्रवी कुछ समझ पाएं, अय्यंकालि के हाथों में दरांत आ चुकी थी। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। रास्ता रोके खड़े दिकुओं पर दरांत तान, धमकी-भरे अंदाज में अय्यंकालि ने कहा—

‘अगर किसी ने भी मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की तो उसे मेरा यह हथियार मजा चखाएगा।’ एक पुलायार से जिसकी सामाजिक हैसियत दास के समान थी, जो गर्दन झुकाकर चुपचाप हुक्म बजाते आए थे, ऐसे विरोध की आशंका किसी को न थी। वे सहमकर पीछे हट गए। उसके बाद तो अय्यंकालि की बैलगाड़ी प्रतिदिन गांव की सड़कों से गुजरने लगी। इस घटना ने न केवल दिकुओं पर असर डाला, अपितु दलितों के बीच भी खलबली मच गई। हर कोई उसकी चर्चा अपनी-अपनी तरह से कर रहा था। उसके बाद अय्यंकालि का यश चारों ओर फैलने लगा। यह डॉ. आंबेडकर के सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश से करीब 25 वर्ष पहले की घटना थी। जिसने अय्यंकालि को दमन के शिकार वर्गों का स्वाभाविक नेता बना दिया। 25 वर्ष की अवस्था में अय्यंकालि का विवाह कर दिया गया। उनकी पत्नी का नाम चेल्लमा था। आगे चलकर उस दंपति के यहां सात संतानों ने जन्म लिया।

लेकिन सफलता अभी अधूरी थी। अय्यंकालि अपेक्षाकृत संपन्न माता-पिता की संतान थे। उनमें इतना साहस था कि बैलगाड़ी पर घूम सकें। लेकिन उन्हीं की जाति के बाकी लोगों में सार्वजनिक मार्गों पर चलने की न तो हिम्मत थी, न दिकु उन्हें अनुमति देने को तैयार थे। अय्यंकालि का अगला लक्ष्य था, दमन के कारण विश्वास खो बैठे दलितों में आत्मविश्वास पैदा करना। इसके लिए अय्यंकालि ने अपने संगठन को तैयार किया। उनका अगला कदम था, तिरुवनंतपुरम् में दलित बस्ती से पुत्तन बाजार तक ‘आजादी के लिए जुलूस’ निकालना। यह आसान काम नहीं था। विरोधी घात लगाए बैठे थे। जैसे ही उनका काफिला सड़क पर पहुंचा, दिकुओं ने उसपर हमला कर दिया। अय्यंकालि के नेतृत्व में सैकड़ों दलित युवक निडर होकर विरोधियों से जूझ पड़े। सैकड़ों युवाओं को चोट आई। चेलियार में हुए उस संघर्ष से प्रेरित होकर दूसरे कस्बों और गांवों के दलित युवक भी सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर निकल पड़े। मनक्कदु, काझाकोट्टम, कनियापुरम् सहित आसपास के इलाकों में जुलूस निकाले गए। सड़कें खून से लाल होने लगीं। दिकुओं का विरोध जितना बढ़ रहा था, उतना ही दलित युवा अपने अधिकारों को लेकर जाग्रत हो रहे थे। अय्यंकालि का प्रभाव और दलितों का विद्रोह बढ़ता ही जा रहा था। दूसरी दलित जातियां भी पुलायारों के साथ एकजुट होकर अधिकारों की मांग करने लगी थीं। संघर्ष गृहयुद्ध में बदलने लगा था।

पुलायार विद्रोह: शिक्षा क्रांति

उस संघर्ष से दलितों को दूसरे अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा मिली। अय्यंकालि स्वयं अशिक्षित थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी शिक्षा से वंचित रहें। सरकार सभी के समान शिक्षा के दरवाजे वर्षों पहले खोल चुकी थी। मगर स्कूल प्रबंधन पर दिकुओं का अधिकार था। वे पुलायार और दूसरे दलित बच्चों के स्कूल प्रवेश से आनाकानी करते थे। 1904 में अय्यंकालि ने दलितों की शिक्षा के लिए आंदोलन आरंभ कर दिया। पुलायार और दूसरे अछूतों की शिक्षा के लिए उन्होंने उसी वर्ष वेंगनूर में पहला स्कूल खोला। वह केरल का पहला स्कूल था, जिसे केवल दलितों के अध्ययन के लिए खोला गया था। दलितों के लिए वह आशा की किरण जैसा था। परंतु सवर्णों से वह बर्दाश्त न हुआ। उन्होंने स्कूल पर हमला कर, उसे तहस-नहस कर दिया। अय्यंकालि के लिए वह बड़ा धक्का था। लेकिन निरंतर संघर्ष ने उनकी जिजीविषा को बढ़ा दिया था।

संघर्ष को सांस्थानिक रूप देने के लिए अय्यंकालि ने ‘साधु जन परिपालन संघम’ नामक संस्था का गठन किया। उसका उद्देश्य था, पुलायार तथा दूसरे दलितों को शिक्षा के लिए प्रेरित करना। औपनिवेशिक सरकार भी दलितों में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयासरत थी। उस समय मिशेल त्रावणकोर शिक्षा विभाग के निदेशक थे। दलितों के लिए शिक्षा को लेकर अय्यंकालि ने अपनी संस्था के माध्यम से कई पत्र त्रावणकोर के दीवान और शिक्षा निदेशक को लिखे। औपनिवेशिक सरकार की नीति के चलते दीवान ने दलितों की शिक्षा के लिए 1907 में आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए थे। लेकिन आदेशपत्र जारी होने को जानबूझकर रोका गया था। अय्यंकालि द्वारा लगातार लिखने पर मिशेल को उसकी जानकारी मिली। उन्होंने दीवान को उस आदेश पर तत्काल अमल करने का आग्रह किया। अंततः 1910 में आदेशपत्र जारी हुआ, परंतु स्कूल प्रबंधकों में जिनमें जमींदार सम्मिलित थे, उस आदेश पर अमल करने से इन्कार कर दिया।

इसपर अय्यंकालि 1 मार्च 1910 को पूजारी अय्यन की पांच वर्ष की बेटी पंचमी तथा अपने साथियों को लेकर उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् में पहुंचे। वहां अय्यंकालि समर्थकों तथा दिकुओं जिनमें नैय्यरों की संख्या सबसे ज्यादा थी, के बीच जमकर संघर्ष हुआ। गुस्साए नैय्यरों ने पुलायारों की बस्ती पर हमला कर दिया। उनके घर तहस-नहस कर डाले। उपद्रवी नैय्यर पुलायारों की बकरियों, जानवरों तथा गाड़ियों को लूटकर ले गए। औरतों और आदमियों को बुरी तरह से पीटा गया। जिसने भी सामना करने की कोशिश की, उसे बुरी तरह से दबा दिया गया। झोपड़ियों में आग लगा दी गई। सात दिनों तक पुलायारों की बस्ती से धूल और धुआं उड़ता रहा। चीख-पुकार की आवाजें आती रहीं। उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् से उभरी चिंगारी हालांकि कुछ दिनों बाद शांत हो गई। लेकिन आसपास के इलाकों में उससे जो ज्वाला भड़की उसने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दी। उसने मार्यामुट्टम, वेंगनूर, पेरमबाझुथूर, कुनथकाल जैसे इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया। केरल के मुख्य धारा के इतिहासकार उस घटना को ‘पुलायार-विद्रोह’ के नाम से पुकारते हैं। उस विद्रोह में दलितों को जन और दोनों की भारी हानि हुई थी। उनके आगे रोजगार का संकट भी खड़ा हो चुका था। बावजूद इसके आजादी की ललक ऐसी थी कि तमाम विरोधों और दबावों के बावजूद आंदोलन आगे बढ़ता गया।

‘पुलायार आंदोलन’ जातीय दमन के विरोध में उठी आवाज थी। साम्यवादी विचारक उसे वर्ग-संघर्ष की तयशुदा सैद्धांतिकी के अंतर्गत देखते आए हैं। तथाकथित राष्ट्रवादी लेखकों, पत्रकारों की पुलायार आंदोलन को लेकर क्या राय थी। यह के। रामकृष्ण पिल्लई की टिप्पणी से पता चल जाता है। पिल्लई ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक थे। उन्हें कार्ल मार्क्स की जीवनी के अनुवाद का श्रेय भी दिया जाता है, जो मार्क्स  के बारे में किसी भी भारतीय भाषा में प्रकाशित पहली पुस्तक थी। दलित बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने की अय्यंकालि तथा उनके सहयोगियों की मांग तथा उसे सरकार के समर्थन पर पिल्लई ने अपने समाचारपत्र ‘स्वदेशाभिमानी’ में जो लिखा वह ‘त्रिवेणी संघ’ के नेताओं पर कांग्रेसी नेताओं की टिप्पणी की याद दिलाता है। ‘त्रिवेणी संघ’ के नेता जब कांग्रेस के पास टिकट लेने गए तो उसके नेताओं ने न केवल इन्कार कर दिया, अपितु उनका उपहास उड़ाया गया। टिकट मांगने पर किसी को कहा जाता कि ‘वहां(संसद और विधानसभा) क्या साग-भंटा बोना है….किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी है? किसी को ताना मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमक-तेल तौलना है।’ रामकृष्ण पिल्लई ने इतनी तीखी भाषा का प्रयोग तो नहीं किया, मगर वे सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों के प्रवेश के सख्त विरोधी थे। अपने समाचारपत्र में उन्होंने लिखा था कि दलित बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती का आदेश अनपढ़-गंवार और पीढ़ियों से मेहनत-मजदूरी पर गुजर-बसर करते आए लोगों, ‘के बच्चों को उन बच्चों के साथ जोड़ देना है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने दिमाग को तराशते हुए आए हैं। यह घोड़े और भैंस को एक ही गाड़ी में जोत देने जैसा है।’5 

नया स्कूल खोलना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक कठिन था, उसमें पढ़ाई की व्यवस्था करना। उन दिनों में दलितों में कोई पढ़ा-लिखा था नहीं। अय्यंकालि अशिक्षित थे। समस्या थी कि पढ़ाए कौन? जो पढ़े-लिखे थे उनमें से कोई आगे नहीं आ रहा था। सरकार उस समय दलितों के स्कूल में पढ़ाने के लिए छह रुपये महीना देती थी। किसी को आगे न आते देख मासिक वृत्तिका को बढ़ाकर नौ रुपये कर दिया गया। तब, लंबी प्रतीक्षा और कोशिशों के बाद परमेश्वरन पिल्लई नाम का एक युवक पढ़ाने के लिए तैयार हुआ। परमेश्वरन तिरुवनंतपुरम के कैथमुक्कू गांव का रहने वाला था। जिन संस्कारों के बीच वह पला-बढ़ा था, वे अछूतों के संपर्क में आने की अनुमति नहीं देते थे। पहले दिन जब वह स्कूल पहुंचा तो इसी ऊहापोह से घिरा हुआ था। उस समय उसकी प्रगतिगामी मेधा और सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठाओं के बीच द्वंद्व जारी था। उस घटना का उल्लेख ग्रीश्मा ग्रीश्मम ने अपने आलेख ‘डेस्टिनी चेंजिज’ में इस प्रकार किया है—

‘नए अध्यापक ने स्कूल में अनिच्छापूर्वक ऐसे प्रवेश किया, मानो वह किसी कूड़ाघर में जा रहा हो। उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठा तथा प्रगतिगामी के बीच द्वंद्व छिड़ा हुआ था। वह बहुत डरा हुआ था। स्थिति तनावपूर्ण थी। उसी क्षण स्कूल को चारों ओर से घेरे खड़े लोगों ने शोर मचाना आरंभ कर दिया। अय्यंकालि के समर्थक और विरोधी एक-दूसरे के आमने-सामने थे। अफरा-तफरी का माहौल था। तभी एक व्यक्ति अध्यापक की ओर बढ़ा, जो मारे भय के बुरी तरह कांप रहा था। जैसे-तैसे अध्यापक को कक्षा तक पहुंचाया गया। दिन में कक्षाएं चलीं। मगर रात होते ही सवर्णों का दल फिर आ पहुंचा। देखते ही देखते, स्कूल को उजाड़ दिया गया।’6

अय्यंकालि और उनके विरोधियों में मानो होड़ मची थी। बिना किसी विलंब के स्कूल का नया ढांचा खड़ा कर दिया गया। अध्यापक को सुरक्षित लाने-ले जाने के लिए रक्षक लगा दिए गए। तनाव और आशंकाओं के बीच स्कूल फिर चलने लगा।

जैसे-जैसे अय्यंकालि का आंदोलन तेज हो रहा था, वैसे-वैसे उनके विरोधी भी बढ़ते जा रहे थे। उसकी प्रतिक्रिया में दलितों के बीच स्वतंत्रता और समानता को लेकर चेतना भी जाग्रत हो रही थी। उनकी आंखें सपने देखने लगी थीं। इसके साथ-साथ अय्यंकालि की सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ रही थी। सामाजिक उत्थान की दिशा में उनके योगदान की उपेक्षा करना असंभव हो चला था। 1888 में त्रावणकोर में विधायिका परिषद की स्थापना की गई थी। उसके आठ सदस्य थे। उसके पीछे त्रावणकोर के राजा श्रीमूलमथिरुनाल रामवर्मा की प्रेरणा थी जो प्रशासन में जनप्रतिनिधियों को सम्मिलित करना चाहते थे। 1904 तक व्यापारी, जमींदार, ही ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ के सदस्य बन सकते थे। प्रत्येक जिला प्रमुख द्वारा दो सदस्यों का चयन किया जाता था। कोई भी जमींदार जो कम से कम 100 रुपये सालाना लगान देता हो, अथवा व्यापारी जिसकी सालाना आय 6000 रुपये से अधिक हो, वह चुना जा सकता था।

1912 में अय्यंकालि को ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुन लिया गया, उसके बाद वे मृत्युपर्यंत उस पद पर बने रहे। अय्यंकालि पहले दलित थे जिन्हें औपनिवेशिक भारत में राज्य विधायिका का सदस्य मनोनीत किया गया था। विधायिका के सत्र के दौरान, राजा और दीवान की उपस्थिति में अय्यंकालि ने जो भाषण दिया उसमें उन्होंने दलितों के संपत्ति अधिकार, शिक्षा, राज्य की नौकरियों में विशेष आरक्षण दिए जाने तथा बेगार से मुक्ति जैसे मसलों पर बात की थी। 4 मार्च 1912 को अय्यंकालि द्वारा राज्य की विधयिका में दिए गए भाषण का ऐतिहासिक महत्त्व है। वह सरकार के सामने दलित हितों को लेकर उठने वाली किसी दलित की पहली आवाज थी। उसमें अय्यंकालि ने कहा था—

‘‘पुलायारों के प्रतिनिधि के रूप में मैं सरकार को, हमारे बच्चों को वैंगनुर ऐलीमेंट्री स्कूल, दक्षिणी त्रावणकोर के विद्यालयों में प्रवेश के लेकर की गई मदद के लिए अपना आभार प्रकट करना चाहता हूँ। अभी तक पुलायार जाति के बच्चों के प्रवेश के केवल सात स्कूलों को अनुमति दी गई है। मैं चाहता हूं कि राज्य के सभी स्कूलों में हमारे बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो।

‘पुलायार अपने बच्चों को उन सभी स्कूलों में भर्ती करा सकते हैं, जिनमें इझवा जाति के बच्चों को प्रवेश की अनुमति है।’ दीवान ने टोका था। अय्यंकालि ने कहना जारी रखा।

‘नए बच्चों को फीस में में छूट दी जा सकती है। सरकार मुस्लिम बच्चों को फीस में छूट देती है, जो हमसे कहीं आगे हैं। पुलायार बच्चों को भी वैसी ही छूट मिलनी चाहिए।’

दीवान  : क्या पुलायारों के बच्चे मुस्लिमों की तरह फीस में छूट नहीं ले रहे हैं? मेरा मानना है कि ऐसा होना चाहिए।’

अय्यंकालि : पुलायारों को इंजीनियर, स्वास्थ तथा औषध विभाग में भर्ती किया जा सकता है। उनमें कई योग्य सदस्य हैं, जिन्हें शिक्षा विभाग में भर्ती किया जा सकता है। हालांकि पुलायारों को सड़कों पर चलने, कानून की मदद लेने, अदालत जाने के अधिकार के संबंध में शाही आदेश जारी हो चुका है, इसके बावजूद उन्हें रोका जा रहा है। कुछ लोग इसमें बाधा डाल रहे हैं। हमें राहत पहुंचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।’’

अय्यंकालि द्वारा पुलायार बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में आ रही परेशानियों को विधान परिषद में लगातार उठाए जाने से सरकार चेती। 1914 में सरकार ने शिक्षा-नीति पर कठोरता से पालन के आदेश दे दिए। शिक्षा निदेशक मिशेल स्वयं हालात का पता लगाने के लिए दौरे पर निकले। मिशेल के आने की खबर से अधिकारी सचेत हो गए। दलित विद्यार्थियों के प्रवेश को और अधिक लटकाना संभव न था। मिशेल की आगमन की खबर सुनकर जब स्कूल प्रशासन हरकत में आया। लेकिन दलित विद्यार्थियों को स्कूल में प्रवेश करते देख दिकुओं ने हंगामा कर दिया। उपद्रवी भीड़ ने मिशेल की जीप को आग लगा दी। बावजूद इसके वह अधिकारी सरकारी आदेश का पालन करने के लिए डटा रहा। उस दिन आठ पुलायार छात्रों को प्रवेश मिला। उनमें 16 वर्ष का एक किशोर भी था जो पहली कक्षा में प्रवेश के लिए आया था।

यह अय्यंकालि की जीत थी, परंतु समस्याओं का यही अंत नहीं था। दिकुओं ने अपने बच्चों के दिमाग में भी जहर घोला हुआ था। दलित बच्चे पढ़ाई के लिए जैसे ही कक्षा में प्रवेश करते, वे दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते थे। इससे अध्यापकों को बहाना मिला। वे दलित छात्रों को प्रवेश देने से फिर आनाकानी करने लगे। इससे दलितों का आक्रोश भड़क पड़ा। वे स्कूल दिकुओं के विरोध में फिर सड़क पर उतर आए। अय्यंकालि उनका नेतृत्व कर रहे थे। झगड़े हुए। त्रावणकोर के कई शहरों में सांप्रदायिक दंगों जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। अय्यंकालि ने सरकार के सामने मुद्दे को उठाया। कानून का हवाला दिया। उसके फलस्वरूप दिकुओं के हिंसक विरोध के बावजूद दलित विद्याथिर्यों की संख्या बढ़ती गई। 1913-16 के दौरान नैय्यर विद्यार्थियों की संख्या में कुल वृद्धि 45 प्रतिशत, ईसाई विद्यार्थियों की 50 प्रतिशत, मुस्लिमों की लगभग 100 प्रतिशत रही जबकि दलितों में परायस जाति के विद्यार्थियों की संख्या में 400 प्रतिशत और पुलायार विद्यार्थियों की संख्या में सीधे 600 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे अय्यंकालि के प्रभाव तथा उनके आंदोलन की गंभीरता को समझा जा सकता है।

साधु जन परिपालन संघम

अय्यंकालि ने दिकुओं से सीधे टकराव मोल लिया था। उनकी कार्यशैली आंख में आंख डालकर बात करने की थी। लेकिन यह सब आसान काम नहीं था। जनसंख्या की दृष्टि से पुलायार कोई बड़ी ताकत नहीं बनते थे। बावजूद इसके यदि अय्यंकालि को अपेक्षित कामयाबी मिली तो इसके पीछे उनकी दूरदृष्टि, कुशल नेतृत्व क्षमता और साहस का बड़ा योगदान था। उन दिनों सरकार और समाज के सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर सवर्ण जातियों का वर्चस्व था। उनमें भी सर्वाधिक संख्या ब्राह्मणों की थी। ज्ञान के सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर उनका अधिकार था। सवर्ण जातियां डरती थीं कि पढ़ने-लिखने का अधिकार मिलते ही उन्हें मुफ्त में मिलने वाले श्रम से हाथ धोना पड़ेगा। इसलिए वे एकजुट होकर दलित शिक्षा का विरोध करते थे। उन्हें शिक्षा से वंचित रखने के पीछे भी यही कारण था। जबकि सरकार सभी को समान शिक्षा का कानून उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही पास कर चुकी थी। मगर कानून में अमल का काम जिन अधिकारियों के जिम्मे था, उनमें लगभग सभी सवर्ण होते थे। इसलिए दलित कल्याण से जुड़े कानून सिर्फ कानून बनकर रह जाते थे। अय्यंकालि जानते थे कि बड़ी कामयाबी दूसरों की दया पर नहीं आती। पुलायार यदि अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं तो उन्हें विरोधियों से स्वयं निपटना होगा। इसलिए उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता तैयार किए थे, जो अय्यंकालि के कहने पर मरने-मारने को तैयार रहते थे। उनके मार्गदर्शन के लिए बड़े संगठन की आवश्यकता थी। उसके लिए अय्यंकालि ने 1907 में ‘साधु जन परिपालन संघम’ की स्थापना की थी। उस संगठन में उन सभी जातियों का स्वागत था जो जाति और वर्गभेद के आधार पर शताब्दियों दमन और शोषण का शिकार बनती आई थीं।

संस्था के गठन के साथ ही अय्यंकालि को ईसाई, आर्यसमाजी और हिंदू सुधारवादी संगठनों की ओर से बुलावा आने लगा। वे अय्यंकालि के प्रभाव का लाभ उठाकर पुलायार और दूसरी दलित जातियों में अपनी पैठ बनाना चाहते थे। अय्यंकालि यूं भारत की संत-परंपरा में विश्वास रखते थे। नारायण गुरु, स्वामी सदानंद जैसे सुधारवादी धर्मगुरुओं का उनपर प्रभाव था। बावजूद इसके वे अपने आंदोलन को धार्मिक होने से बचाना चाहते थे। उनका मुख्य ध्येय दलितों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान था। उसके लिए शिक्षा सबसे जरूरी उपकरण थी। इसलिए उन्होंने धार्मिक संगठनों से दूरी बनाए रखी। वैसे भी वे संगठन को शक्ति के स्तर पर भी आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, जो धार्मिक संगठनों और धर्माचार्यों की छत्रछाया में असंभव था। ‘साधु जन परिपालन संघम’ पर नारायण गुरु की संस्था ‘श्रीनारायण धर्मपरिपालन संघम’ का असर था। संस्था के संचालन की जिम्मेदारी थॉमस वाडियार को सौंपी गई थी। वह पेशे से अध्यापक तथा अय्यंकालि का रिश्तेदार और भरोसेमंद था। संघम की आरंभिक बैठकों में लिए गए फैसलों से अय्यंकालि के आधुनिक सोच का अनुमान लगाया जा सकता है। उस संस्था के प्रमुख संकल्प थे—

1.  प्रति सप्ताह कार्यदिवसों की संख्या 7 से घटाकर 6 पर सीमित करना।

2.  श्रमिकों को एक दिन का अवकाश तथा

3.  कार्य के दौरान मजूदरों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से मुक्ति

‘साधु जन परिपालन संघम’ का मुख्य कार्यालय वैंगनूर में बनाया गया था। वहां एक कांन्फ्रेंस हाल और पुस्तकालय भी था। संघम की ओर से नियम बनाया गया था कि सभी सदस्य सप्ताह में एकदिन, अपनी समस्याओं पर विचार करने के लिए अवश्य जमा होंगे। मासिक सदस्यता शुल्क भी निर्धारित की गई थी। संस्था की स्थापना के साथ ही स्त्री-पुरुष दोनों उससे जुड़ने लगे। देखते ही देखते उसकी शाखाएं केरल और तमिलनाडु के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खुलने लगीं। लोग उनकी बैठकों में नियमित रूप से आने लगे। संगठन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी उत्साहवर्धक थी। इसका अनुमान उनके द्वारा किए गए सहयोग से भी लगाया जा सकता है। संघम को अपने दैनिक खर्चों के लिए धन की आवश्यकता थी। उसके लिए दलित स्त्रियां पिडीयारी(मुट्ठी-मुट्ठी भर चावल जुटाना) बेचकर संघम की मदद करने लगीं। इससे उसका प्रभावक्षेत्र और कार्यक्षेत्र दोनों बढ़ते गए।

संघम की पैठ जीवन के हर क्षेत्र में थी। उस समय तक अदालतें स्थापित हो चुकी थीं। परंतु अछूतों के अदालत का न्याय प्राप्त करना आसान न था।  अदलतों में काम करने वाले सभी उच्च जाति के थे। यदि कोई दलित अदालत जाने का साहस भी करता तो, वहां मौजूद लोग उसका भरपूर शोषण करते थे। अछूतों के बारे में बनी-बनाई धारणा थी, इसलिए सजा देते समय भी पक्षपात किया जाता था। अछूतों को वैकल्पिक न्यायतंत्र की आवश्यकता थी। उसे देखते हुए अय्यंकालि ने वो किया, जिसकी किसी अशिक्षित व्यक्ति से कम ही उम्मीद की जाती है। अछूतों के आपसी झगड़ों के समाधान के लिए अय्यंकालि ने सामुदायिक न्यायालयों ‘समुदाय कोदाथी’ की स्थापना की। उसका मुख्य केंद्र वेंगनूर में बनाया गया। केंद्रीय कार्यालय में पुस्तकालय और एक कोन्फ्रेंस हाल भी बनाया गया था, जहां नियमित बैठकों की व्यवस्था की गई थी। संघम के प्रत्येक कार्यालय में स्थानीय अदालतों का गठन किया गया। सामुदायिक न्यायालयों की संरचना एकदम औपचारिक न्यायालयों जैसी ही थी। वैसे ही वकील, जज, पुलिस, समन पहुंचाने के लिए बैलिफ, मुंशी वगैरह। यहां तक कि शाखा अदालत के निर्णय के विरुद्ध अपील की व्यवस्था भी थी। कोई भी पीड़ित सामुदायिक अदालत के मुख्य कार्यालय में जाकर, शाखा अदालतों के फैसले के विरुद्ध अपील कर सकता था। जहां स्वयं अय्यंकालि मुख्य न्यायाधीश के रूप में मौजूद रहते थे।

लोगों के मनोरंजन तथा सांस्कृतिक एकता को बढ़ाने के लिए ‘समाजं’ की स्थापना की गई थी। ‘समाजं’ में लोग इकट्टा होकर लोकनृत्य, गाना-बजाना करते थे। नाटक भी खेले जाते थे। उनके माध्यम अय्यंकालि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध चेतना जगाने का काम करते थे। बाद में समाजं ने जरूरतमंद पुलायार विद्यार्थियों के लिए हाॅस्टल का निर्माण भी किया। ‘साधु जन परिपालिनी संघम’ ने केरल के दलितों के बीच चेतना फैलाने का काम किया। उसके प्रभाव में लोग सप्ताह में एक दिन अवकाश करने लगे। रविवार को अवकाश के दिन लोग मिलते-जुलते, समाजं की गतिविधियों में हिस्सा लेते और भविष्य के लिए कार्यक्रम बनाते थे।

पहली श्रमिक हड़ताल

अय्यंकालि दलितों की शिक्षा के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे थे। कानून बन चुका था। सरकार साथ थी। मगर सवर्ण दिकुओं का विरोध जारी था। इस मुद्दे पर आमने-सामने के टकराव भी हो चुके थे। लगातार दबाव पड़ने से दिकु विवश हुए थे। पुलयारों सहित दूसरे दलितों को स्कूलों में प्रवेश मिलने लगा था। मगर वे इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न थे। उन्होंने पुलायारों को काम के दौरान तंग करना शुरू कर दिया था। लेकिन अय्यंकालि आंदोलन को भटकने से रोकना चाहते थे। उनके सामने प्रमुख मुद्दे थे। अछूतों को शिक्षा, रोजगार और भूमि में हिस्सेदारी। विधान परिषद के सदस्य के रूप में वे इन मांगों को सरकार के सामने उठा चुके थे। उन्हें उम्मीद थी कि समय के साथ दलितों के प्रति सवर्णों के रुख में नर्मी आएगी। लेकिन सवर्णों के रवैये में कोई बदलाव न हुआ। आखिरकार अय्यंकालि को दबाव रणनीति अपनानी पड़ी।

यह 1907 की घटना है। रूस की बोल्शेविक क्रांति से भी एक दशक पहले की, जब श्रमिकों ने अपने श्रम का इस्तेमाल अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए किया था। त्रावणकोर राज्य में सर्वाधिक जमीन नैय्यरों के अधिकार में थी। पुलायार उन्हीं के खेतों में मेहनत-मजूदरी करते थे। एक तरह से बेगार, क्योंकि पूरे दिन की मजदूरी के बदले उन्हें मात्र छह सौ ग्राम चावल प्राप्त होता था, वह भी मालिक की मर्जी से। अछूत बच्चों की पढ़ाई में आ रही अड़चन को देखते हुए पुलायारों ने घोषणा कर दी कि वे खेतों में उस समय तक काम नहीं करेंगे, जब तक उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश और बाकी अवसर नहीं दिए जाते। जमींदारों ने इसे हंसकर टाल दिया। उन्हें लगता ही नहीं था कि पुलायार हड़ताल के बारे में सोच भी सकते हैं। जिनके घर चूल्हा ही मजूदरी मिलने के बाद जलता हो, उनके बारे में ऐसा सोचना नाममुकिन भी नहीं था। सो कुछ लोग उपहास में उंगलियों पर हिसाब लगाने लगे कि पुलयारों के घर में उपलब्ध राशन के हिसाब से हड़ताल कितने दिन खिंच सकती है—एक दिन…दो दिन….ढाई दिन…..उसके बाद तो उन्हें सिर झुकाकर आना ही पड़ेगा।

उन दिनों आज की तरह न टेलीफोन थे, न रेडियो, न ही टेलीविजन। पचास-साठ किलोमीटर की बात हो आने-जाने में ही दो दिन लग जाते थे, जबकि वहां तो मामला सैंकड़ों किलोमीटर में फैला हुआ था, लेकिन पुलायारों की आंखों में भविष्य का सपना था और थी, उस सपने के लिए कुछ भी बलिदान करने की जिद। सो हड़ताल खिंचती चली गई, धीरे-धीरे उसमें दूसरी मांगें भी सम्मिलित होती चली गईं; जैसे कि—

    1. नौकरी को स्थायी किया जाए

    2. दंड या दुव्र्यवहार से पहले उचित जांच होनी चाहिए। केवल अनुमान या दूसरों के कहने पर दंड देने से बचा जाए।

    3. कामगारों को झूठे मुकदमों में फंसाने पर रोक।

    4. मजदूरों के साथ अनुचित मारपीट पर तात्कालिक रोक

    5. सार्वजनिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता

    6. दलित बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश

इसके अलावा एक और मांग थी, परती और खाली पड़ी जमीन को उपजाऊ बनाने वाले को उसका मालिकाना हक देने की। कुछ लोगों को दलितों का काम करने से इन्कार करना, हड़ताल पर जाना ही अनुचित लगा। वे लोग समूह बनाकर पुलायारों को डराने धमकाने भी लगे। मार-पीट की घटनाएं भी हुईं। इन सब घटनाओं का अय्यंकालि को पहले से ही अंदेशा था। इसलिए हालात से निपटने के लिए उन्होंने अपने समर्थकों को तैयार किया हुआ था। जमींदार के लोगों ने मजदूरों को डराना-धमकाना आरंभ किया तो संगठन के लोग बीच में आ गए। इससे झगड़े और मार-पीट की नौबत आ गई। उसमें ज्यादा नुकसान दलितों को हुआ, लेकिन वे हड़ताल पर डटे रहे।

वह चावल की रोपाई के दिन थे। देर होने से फसल कमजोर होने की संभावना थी। कुछ जमींदारों ने खुद सारा काम करने की कोशिश की। लेकिन उन्हें काम करने का अभ्यास नहीं था, इस कारण वे बीमार पड़ने लगे। जितने काम को कोई पुलायार अकेला कर देता था, उतना काम छह-छह नैय्यर मिलकर भी नहीं कर पाते थे। अगर वे मजदूर खोजने जाते तो मजदूर मुंह-मांगी मजदूरी मांगता था। नतीजा यह हुआ कि खेत जंगल में बदलने लगे। हड़ताल का लंबा खिंचना पुलायारों के लिए भी समस्या थी। अधिकांश लोग मजदूरी पर पलते थे। उनके घर में खाने की समस्या पैदा होने लगी। समाचार नैय्यरों तक पहुंचा तो वे बहुत खुश हुए। लगा कि एक-दो दिन से ज्यादा हड़ताल खिंच नहीं पाएगी। उसी समय अय्यंकालि ने अपना तुरुफ का इक्का चल दिया। वे विझिंजोम में समंदर से मछलियां पकड़ने वाले मछुआरों के पास गए। उनसे कहा कि वे एक-एक पुलायार को अपने साथ नाव पर रखें और बदले में अपनी आय का एक हिस्सा उसे दें।

मछुआरे स्वयं जातीय भेदभाव और शोषण का शिकार थे। उन्होंने अय्यंकालि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इससे क्षुब्ध जमींदारों ने पुलायारों की बस्ती में आग लगा दी। आंख में आंख डालकर बात करने वाले अय्यंकालि ने उसी अंदाज में उसका जवाब दिया। उनकी सेना ने जमींदारों के घरों में आग लगाना आरंभ कर दिया। गांव में जमींदार इक्का-दुक्का ही होते थे। जबकि दलितों की संख्या अधिक होती थी। एक बार बस्ती में आग लगा देने से उनका बड़ा नुकसान तो होता था, मगर बाद में जले हुए को समेटना बाकी रह जाता था। लेकिन जमींदारों पर हमले से उनका कहीं ज्यादा नुकसान होता था। यह डर भी लगा रहता था कि न जाने कहां ओर किधर से विद्रोही चले आएं। इससे उनमें भय का संचार होने लगा। अय्यंकालि चाहते थे कि जमींदार स्वयं समझौते के लिए आएं। वही हुआ भी। अंततः जमींदारों को ही समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। 1 मार्च 1910 को सरकार ने विद्यालयों में प्रवेश संबंधी कानून बनाकर पुलायार तथा दूसरे दलितों के लिए शिक्षा में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया। उसके अलावा मजदूरी में वृद्धि, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी जैसी मांगें भी मान ली गईं। वह भारतीय इतिहास में मजदूरों की प्रथम हड़ताल थी, बोल्शेविक क्रांति से पहले की, जिसने वहीं किया था, जिसकी मांग कभी कार्ल मार्क्स  ने की थी। ईएमएस नंबूदरीपाद ने अय्यंकालि के आंदोलन पर कुछ नहीं लिखा, लेकिन एक लेख में वे अय्यंकालि के इशारे पर बुलाई गई पहली श्रमिक हड़ताल की चर्चा करने से रोक नहीं पाते—

‘अय्यंकालि केवल दलितों के नेता नहीं थे। वे खेतिहर मजदूरों के भी नेता थे। उनके आंदोलन में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों के अलावा उच्च जातियों के लोग भी सम्मिलित थे। आधुनिक केरल के नवनिर्माण में अय्यंकालि का योगदान नारायण गुरु जितना ही है। दलित बहुजनों को संगठित कर, उनके हक की लड़ाई लड़ने वाले अय्यंकालि नारायण गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने पिछड़ी जाति के इझ़वाओं को संगठित कर, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया था….’

पुनः केरल के मुख्यमंत्री के रूप में अय्यंकालि तथा 1907 की श्रम-हड़ताल को याद करते हुए उन्होंने कहा था—‘1907 में अय्यंकालि ने खेतिहर मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया था, उन्होंने बिखरे हुए और असंगठित श्रमिकों को एकजुट कर, उन्हें संगठित ताकत में बदलने में कामयाबी हासिल की थी।’

महिलाओं के उभोवस्त्र-अधिकार के लिए संघर्ष

स्तन ढकने के अधिकार के विरोध में नंदेली द्वारा राज्य के अधिकारियों को अपने स्तन काटकर दे देने की घटना का उल्लेख पीछे किया जा चुका है। त्रावणकोर राज्य की दलित महिलाओं के साथ त्रासदी थी कि उन्हें अपना वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। केवल घुटने से कटि तक हिस्सा वे ढक सकती थीं। वक्ष के ऊपर के हिस्से पर वे केवल गहने पहनने की छूट थी। उन्हें सोने या चांदी के गहने धारण करने का अधिकार नहीं था। पत्थर का कंठहार उनके गुलाम होने की निशानी था। वह भी काले ग्रेनाइट पत्थर के। उल्लंघन करने पर उन्हें पेड़ से बांधकर कोड़े की सजा दी जाती थी। पत्थर के कंठहार वे चाहे जितने पहन सकती थीं। उसी तरह का ‘आभूषण’ उनकी कलाई पर भी बंधा रहता था। कानों के लिए लोहे की बालियां पहननी पड़ती थीं, जिन्हें ‘कुनुक्कु’ कहा जाता था। अय्यंकालि दलितों की सर्वांग मुक्ति चाहते थे। महिलाएं भी उनके मुक्ति आंदोलन का हिस्सा थीं।

गुलामी के प्रतीक उन आभूषणों से मुक्ति के लिए अय्यंकालि ने दक्षिणी त्रावणकोर के नियत्तिंकर नामक स्थान से आंदोलन की शुरुआत की। सभा में आई स्त्रियों से उन्होंने कहा कि वे दासता के प्रतीक इन आभूषणों को त्यागकर सामान्य ब्लाउज धारण करें। इसपर सवर्णों की तुरंत प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने धमकी दी कि पुरानी परिपाटी को तोड़ने का अंजाम बुरा हो सकता है। लेकिन अय्यंकालि को शुरू से ही ऐसी चुनौतियों का सामना करने की आदत थी। उसके बाद दंगे शुरू हो गए। स्थिति उस समय और बिगड़ गई जब सेंट्रल त्रावणकोर के पुलायार नेता गोपालदास ने स्त्रियों की सभा बुलाकर पत्थर के आभूषणों को फेंक कर, सामान्य बलाउज पहनने का आवाह्न किया। उसकी परिणति त्रावणकोर के अलग-अलग क्षेत्रों में दंगों के रूप में हुई। दलित यहां तक कि औरतें भी पीछे हटने या समझौता करने को तैयार न थीं। दंगों में दोनों ही पक्षों को भारी नुकसान हुआ। दलित हार मानने को तैयार न थे। अंततः दोनों पक्षों को समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। जीत अय्यंकालि की ही हुई। सरकार, नैय्यर नेताओं और अय्यंकालि के बीच समझौता हुआ। उसके बाद क्यूलोन नामक कस्बे में दलित औरतों की बड़ी सभा बुलाई गई। उसमें अय्यंकालि तथा नैय्यर सुधारवादी नेता चेगंनाचेरी परमेश्वरन पिल्लई की उपस्थिति में सैंकड़ों दलित महिलाओं ने गुलामी के प्रतीक ग्रेनाइट के कंठहारों को उतार फेंका।

आदर्श जनप्रतिनिधि

एक जनप्रतिनिधि के रूप में भी अय्यंकालि पुलायारों तथा दलितों के अधिकार की लड़ाई लड़ते रहते थे। पुलायारों के पास न तो अपना घर होता था, न ही खेती योग्य जमीन। खेतिहार मजूदर के रूप में, बेगार की तरह अपनी सेवाएं प्रदान करते थे। भूस्वामी उन्हें कभी भी बाहर निकाल सकता था। ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ के सदस्य के रूप में उन्होंने पुलायारों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत, उनकी गरीबी और उसके कारण हो रही दुर्दशा के बारे में उन्होंने कई बार मुद्दा बैठकों में उठाया था। उन्होंने मांग की थी कि पुलायारों को रहने के लिए आवास तथा खाली पड़ी जमीन उपलब्ध कराई जाए। स्थानीय अधिकारी उनके पुलायारों द्वारा खेती योग्य बनाई गई भूमि को पहले ही उन्हें आवंटित कर चुके थे। लेकिन जमींदार उसमें बाधा बने हुए थे। अय्यंकालि द्वारा निरंतर उठाई गई मांग का परिणाम यह हुआ कि वैंगनूर से 6 किलोमीटर दूर विलंपिंसला में 300 एकड़ कृषि भूमि पुलायारों को आवंटित कर दी। इसके अतिरिक्त निदंमनगाद क्षेत्र के वूझमल्लुकल गांव में 200 सौ एकड़ भूमि उन्हें और दी गई। कुल 500 एकड़ भूमि को 500 पुलायार परिवारों के बीच, एक एकड़ प्रति परिवार के हिसाब से बांट दिया गया। यह अय्यंकालि की बड़ी जीत थी। भू-दास के रूप में खेती करते आए पुलायार अब अपनी भूमि पर खेती कर, आजादी से रह सकते थे।

विधानपरिषद के सदस्य के रूप में अय्यंकालि ने पुलायारों की सरकारी नौकरियों में अनुपस्थिति और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि जब तक पुलायार अपेक्षित योग्यता प्राप्त नहीं कर पाते, उन्हें निचले दर्जे की या मजूदरी के काम पर लगाया जाए। उसके फलस्वरूप अनेक पुलायार युवाओं को सरकारी नौकरी मिली। उन्होंने धर्म पर सीधा हमला नहीं किया। मगर वे पुलायारों को पुरोहितों और धार्मिक आडंबरों से बाहर आने, आचरण की पवित्रता पर जोर देने तथा संगठित रहने की निरंतर अपील करते रहे। उनके प्रयासों से पुलायारों तथा दूसरे दलितों को 1912 में प्रजा सभा में मनोनीत किया गया, जिससे दलितों की राजनीतिक भागीदारी का रास्ता प्रशस्त हुआ।

अय्यंकालि 1904 से ही दमे की बीमारी का शिकार थे। मगर स्वास्थ्य की चिंता न करते हुए वे अपने समाज के कल्याण, उसे न्याय दिलाने के लिए निरंतर जूझते रहते थे। इसके लिए उन्होंने पूरे त्रावणकोर की यात्राएं की थीं। अंततः 24 मई 1941 को उन्होंने पूरी तरह से बिस्तर पकड़ लिया। और 18 जून 1941 को मृत्यु की उस अनथक न्याय-योद्धा ने संसार छोड़ दिया। उम्र में अय्यंकालि ज्योतिराव फुले से 45 वर्ष छोटे थे, और पेरियार से 16 वर्ष बड़े। केरल में उन्होंने वही काम किया, जो फुले ने महाराष्ट्र और पेरियार ने तमिलनाडु में किया था। यह बात अलग है कि अय्यंकालि के योगदान की उपेक्षा हुई। आधुनिक केरल में स्त्रियां बाकी देश की अपेक्षा यदि ज्यादा साक्षर और जागरूक हैं तो उसका बहुत कुछ श्रेय अय्यंकालि को जाता है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1.   नंबूदरी ब्राह्मणों के बारे में ‘दि त्रावणकोर स्टेट मैनुअल’ भाग-एक के हवाले से वी. नगम अइया ने उनकी विचित्र-सी परंपरा का उल्लेख किया है। तदनुसार नंबूदरी ब्राह्मण आमतौर पर संपन्न होते हैं और बड़े आरामदायक घरों में रहते हैं। उनकी स्त्रियों को बाकी लोगों की नजरों से बचाकर पूरी तरह नियंत्रण में रखा जाता है। जब वे घर से बाहर निकलती हैं तो उन्हें कपड़ों या छाते से ढककर रखा जाता है।  औरतों को उनकी सुंदरता के अनुसार सम्मान दिया जाता है, वे सोने के ब्रेसलेट पहनती हैं। परिवार में सबसे बड़े पुत्र को, वह भी केवल अपनी जाति में विवाह करने का अधिकार होता है। उसके छोटे भाई नैय्यर या निचली जाति की स्त्रियों के साथ, केवल अस्थायी विवाह कर सकते हैं। इसके लिए ‘संबंधम’ की प्रथा है। कई बार नंबूदरी ब्राह्मणों को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए भी ‘संबंधम’ बनाए जाते थे। ऐसे संबंध से जन्मी संतान को न तो अपने पिता के नाम-गौत्र पर दावेदारी का अधिकार होता था, न ही उसकी संपत्ति पर। नैय्यर नेताओं के विरोध और लंबे आंदोलन के बाद यह प्रथा अब समाप्त हो चुकी है।

2. चार्ल्स अलेन, कोरोमंडल: एक पर्सनल हिस्ट्री आफ  इंडिया।

3. पुलायार सहित दूसरी अछूत और पिछड़ी जातियां, जनजातियां स्वयं को भारत का मूलनिवासी मानती थीं। नैय्यर, ब्राह्मण आदि कथित उच्च जातियों के लोग, उनकी निगाह में ‘दिकु’(बाहरी) थे। यह मान्यता आर्य-आव्रजन थियरी की पुष्टि करती थी।

4 त्रिवेणी संघ का बिगुल 

5. स्वेदशाभिमानी 2 मार्च 1910, ग्रीश्मा ग्रीश्मम द्वारा Mahathma Ayyankali : The Revolutionary, The Legend   में उद्धृत

6. ग्रीश्मा ग्रीश्मम, Destiny Changes, published in International Journal of Multidisciplinary and Current Research

ई. वी. रामासामी पेरियार का दर्शन : लोकप्रिय दार्शनिक मिथों की वैज्ञानिक पड़ताल

1947 में . वी. रामासामी पेरियार को सलेम कॉलिज के दर्शन विभाग ने एक व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया था। विभागाध्यक्ष थिरू रामासामी ने उस कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी। दर्शनशास्त्र पर दिए गए उस व्याख्यान में पेरियार ने हिंदू धर्म के लोकप्रिय तत्वों पर अपनी बात रखी थी। एक वैज्ञानिक भी भांति वे धर्म, ईश्वर, आत्मा आदि का विश्लेषण करते हैं। उनका कहना था कि परमात्मा और धर्म से जुड़े मुद्दों पर गंभीर अन्वेषण की आवश्यकता है। ठीक वैसे ही जैसे दूसरे वैज्ञानिक विषयों के बारे में जरूरी होता है। उन्होंने जोर देकर कहा था कि शोध और विचारविमर्श के दायरे से कुछ भी छूटना नहीं चाहिए।

उल्लेखनीय है कि पश्चिम में धर्म, ईश्वर आदि की ऐसी ही पड़ताल अठारवीं शताब्दी के विचारक रूसो ने भी की थी। पर पेरियार की चुनौती बड़ी थी। रूसो के सामने अनियंत्रित मशीनीकरण के कारण समाज में आ रही विकृतियां थीं। जबकि पेरियार के सामने हजारों साल पुरानी जाति की समस्या, ऊंच-नीच तथा भेदभाव थे। धर्म, दर्शन, ईश्वर आदि को लेकर पेरियार की कई स्थापनाएं हमें विचित्र लग सकती हैं। क्योंकि उस तरह से सोचने का हमें अभ्यास ही नहीं है। आमतौर पर धर्म-दर्शन की बात चलती है तो आस्था महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यहां तक कि तटस्थता का दावा करने वाले विचारक भी, पूर्वाग्रहों के चलते, आस्था के अनकहे प्रभाव में आ जाते हैं। ऐसे में पेरियार का धर्म-दर्शन पर व्याख्यान, विशुद्ध दार्शनिक विमर्श है, जो हिंदू धर्म-दर्शन के प्रचलित मिथों को समझने की नई दृष्टि देता है। – अनुवादक

आज मुझे दर्शनशास्त्र पर अपनी बात कहने के लिए बुलाया गया है।

सलेम कॉलिज के इस प्रांगण में विद्यार्थियों, उनके अध्यापकों के अलावा और भी बहुत से लोग यहां उपस्थित हुए हैं। मैं नहीं मानता कि यहां, इतने गौरवशाली श्रोताओं को संबोधित करना मेरे लिए आसान बात होगी। मैं नहीं जानता कि मैं अपनी बातें कहां तक आप सबको समझा पाऊंगा, और आप मेरी बातों से संतुष्ट होंगे। इसके अतिरिक्त  यह कहीं ज्यादा आवश्यक है कि कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण और अग्रणी दर्शन-सिद्धांतों पर आपसे चर्चा की जाए। मैं अनुभव करता हूं कि दर्शनों और स्थापित दार्शनिक मान्यताओं पर चर्चा करना मेरे लिए आसान नहीं होगा।

दार्शनिक बोध तथा दार्शनिक अभिव्यक्तियां सत्य होती हैं। उसकी पुनर्व्याख्या, उसे आगे तक पहुंचाने के लिए अपेक्षा की जाती है कि चीजों को उसी रूप में देखा जाए, जैसी कि वे हैं—और ठीक वैसा ही समझा जाए जैसा उनसे प्रत्याशित है। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि ज्ञान प्रकृति से, हमारे सहजानुभवों से प्राप्त होता है।

हमारी मानस-रचना को प्रकृति और दर्शन को अलग-अलग संदर्भ में देखने के लिए ढाला गया है। हमारे लिए यह बड़ा ही मुश्किल है कि हम सत्य को उसी रूप में देखें जैसा वह है। और अत्यंत कठिन है वस्तुजगत के पीछे अंतनिर्हित उसकी वास्तविकता को समझना। इसे स्पष्ट करने के लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। जब भी हम किसी व्यक्ति को देखते हैं, हम उसपर नजर डालते हैं तथा छवि के आधार पर उसका आकलन करते हैं। उस समय वह हमको वास्तविक मनुष्य, जैसा उसे प्रकृति ने गढ़ा है—दिखाई नहीं पड़ता। मनुष्य को उस रूप में देखना जैसा प्रकृति ने उसे ‘गढ़ा’ है, बिना कुछ बदले-छिपाए, नंगे मनुष्य के रूप में देखना है। उस तरह देखने को, हालांकि वही वास्तविकता है—आधुनिक जगत में अच्छा नहीं माना जाएगा। इसके अतिरिक्त वह जुगुप्सा और प्रतिकर्षण का स्रोत होगा, जो जीवन में ढेर सारी असुविधाओं का कारण बनेगा।

इसी प्रकार यदि आप कुछ दूसरी चीजों को यथारूप, उनके सच्चे तथा वास्तविक रूप में देखने का प्रयत्न करो तो वह घृणित, असुविधापूर्ण, असहज और अप्रिय प्रतीत होगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि दर्शनशास्त्र को समझने के लिए जीवन में एक स्तर तक परिपक्व होना पड़ता है।

यही कारण है जिससे मैंने बताया है कि दर्शनशास्त्र को लेकर मेरी विवेचनाएं अनेक लोगों के लिए अरुचिकर होंगी। एक प्रसिद्ध कहावत है कि जो व्यक्ति मिलावट रहित, खरी बात कहता है, वह अनेक लोगों के लिए कट्टर शत्रु बन जाता है। इसका आशय यह नहीं है कि सभी लोगों को झूठ बोलना चाहिए। इससे बस यही जाहिर होता है कि वास्तविक सत्य और दर्शनशास्त्र, समाज में अपनी प्रकृति और नाम से इतर रूप में प्रचलित हैं। हमें वे उस रूप में नजर नहीं आते, जैसे कि वे वास्तव में हैं। यही कारण है कि अनेक सत्य हमें उलझे हुए और अव्यक्त दिखाई पड़ते हैं।

स्वाभाविक रूप से, लोगों के आगे किसी भी दर्शन की विवेचना करना, कमोबेश बेहद नाजुक और कठिन कार्य है। ऊपर से इस सम्मेलन के अध्यक्ष मेरा परिचय देते समय पहले ही बता चुके हैं कि मैं एक नास्तिक, धर्मविरोधी यहां तक कि धर्म से घृणा करने वाला और राजनेताओं का प्रतिद्विंद्वी हूं। जबकि वस्तुत: मैं साधारण इंसान हूं। कुल मिलाकर मेरे जैसे आदमी के लिए दार्शनिक विचारधाराओं और सिद्धांतों में अंतर्निहित सत्य की विवेचना करना, अपेक्षाकृत कहीं जटिल कार्य है।

फिर भी, अपने आलोचकों के समक्ष विनम्र व्याख्या के रूप में, मैं अपनी ओर से दार्शनिक सत्यों की विवेचना का भरसक प्रयास करूंगा। जैसे कि मैं गंभीरतापूर्वक विचार कर रहा था कि इतने संभ्रांत और गरिमामय लोगों की उपस्थिति में मुझे क्या कहना चाहिए। अध्यक्ष महोदय ने मेरे बारे में कुछ विशेष विचार आपके समक्ष रखे हैं, और मैं यह मानता हूं कि अपने वक्तव्य को उनके विवेचन तक सीमित रखना ही पर्याप्त होगा।

साथियो! किसी भी वस्तु या विचार को नगण्य अथवा अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझा जा सकता है। मैं आपको बताऊंगा, कैसे! जनसाधारण के लिए ईश्वर, धर्म या राजनीति बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। वे उनके पीछे अंतनिर्हित दार्शनिक सिद्धांतों की महत्त्व को जरूरी होने के बावजूद नजरंदाज कर जाते हैं। जबकि विद्वान लोगों के लिए वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इसलिए वे उन्हें समझने के लिए जरूरी कष्ट उठाते हैं, उनका सविस्तार ग्रंथीकरण के साथ प्रचार-प्रसार करते हैं।

हम देखते हैं कि महान संगीतकारों के गायन-वादन में सभी मनोवृत्तियों के दर्शक-श्रोता हिस्सा लेते हैं। जनसाधारण गीतों तथा उनके पीछे निहित विचारों को सुनता है, तथा उन्हें संगीत से अलग करके कहता है कि, ‘उसने ईश्वर की स्तुति में गाया था, अथवा उसने महिलाओं के बारे में गाया था। कार्यक्रम में संगीतकार की प्रस्तुति से जुड़कर वे आत्मतुष्टि का अनुभव करते हैं। परंतु जिन्हें संगीत-विज्ञान की समझ है, वे संगीत प्रस्तुति के प्रति अपेक्षाकृत अधिक उत्सुक होते हैं, वे उस सीमा तक गीत-संगीत की प्रस्तुति को समझना चाहते हैं, जिस सीमा तक उस गवैये/कलाकार ने अपनी संगीत कला में महारत हासिल की है। उनकी उपस्थिति के कारण गायक/प्रस्तोता अपनी गायन प्रस्तुति के समय अतिरिक्त रूप से सावधान रहता है। यही वह कारण है जिससे मैंने आरंभ में ही कह दिया था कि मैं जो भी कहूंगा, वह कुछ लोगों को बहुत ही तुच्छ और महत्त्वहीन लग सकता है, जबकि कुछ को बहुत उपयोगी और जोरदार।

ईश्वर

साथियो! अध्यक्ष महोदय ने ईश्वर के संदर्भ में बताया था कि वह सब कुछ करने में समर्थ है। कुछ भी उसकी सीमा से परे नहीं है। धर्म के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि धर्म मनुष्य और ईश्वर को जोड़ने वाले पुल की तरह है। यह कोई धार्मिक सम्मेलन नहीं है। यह बैठक दर्शनशास्त्र पर सामान्य चर्चा के लिए आयोजित की गई है। हमें धर्म और ईश्वर के दर्शन पर विस्तारपूर्वक विचार करना होगा, और मैं इसका बहुत सूक्ष्म विश्लेषण करना चाहता हूं। मैं इन सभी विषयों को साफ-सुथरी तस्वीर के रूप में प्रस्तुत करना चाहता हूं।

कई लोगों की राय है कि मैं नास्तिक हूं, धर्म में विश्वास नहीं करता। कई लोगों ने इसपर खुलकर लिखा, बोला है। मैं सचमुच बहुत प्रसन्न होता, यदि नास्तिकों ने भी इतना ही खुलकर लिखा, बोला होता। यदि आस्तिक ऐसा महसूस करते हैं, तो मैं उनपर केवल तरस खा सकता हूं। बात यहीं तक सीमित नहीं है। ऐसे लोगों के बीच रहने पर मुझे सचमुच बहुत खेद होगा। इस सेमिनार में जिसे यहां दर्शनशास्त्र पर वस्तुनिष्ठ चिंतन के लिए आयोजित किया गया है, यदि मैं अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करने में सकुचाता हूं, तो वह मुझसे वस्तुनिष्ट चिंतन की उम्मीद लगाए बैठे लोगों के साथ विश्वासघात करने जैसा होगा।

इसलिए मैं सीधे तौर पर बताना चाहूंगा कि आस्तिक अपनी अज्ञानता के कारण मुझे नास्तिक बताते हैं। बल्कि मैं तो कहना चाहूंगा कि इसके पीछे उनकी गैर-जिम्मेदारी अधिक है।

इसे और अधिक स्पष्ट करने हेतु मैं एक उदाहरण की मदद लूंगा—

एक ब्राह्मण जो कठिनाईपूर्वक जीवन व्यतीत करता था, अपने घर से चला और उस स्थान पर पहुंचा, जहां एक शुभ कार्यक्रम चल रहा था। वहां उसने भिक्षा मांगी। गृहस्वामी ने चार आना(25 पैसे) दिए। उतने ही जितने उसने दूसरे भिखारियों को दिए थे। इस पर ब्राह्मण ने उससे कहा—‘मैं उनमें से हूं जो दूसरों को दोष नहीं देता। मुझे धन का लालच नहीं है। मुझे किसी प्रकार का अभिमान भी नहीं है। मैं इन सबको कभी का त्याग चुका हूं। क्या तुम जानते हो कि मैंने चार वेद, छह शास्त्र और अठारह पुराणों का अध्ययन किया है? तुमने उन अशिक्षित गधों को भी चार आना दिए हैं। क्या यह न्याय-संगत है? क्या यही तुम्हारा धर्म है?’

इसी प्रकार ये आस्तिक लोग दूसरों पर नास्तिक होने का आरोप लगाते हैं। अब हम इस पर विचार करते हैं कि आस्तिक होने का दावा करने वाले लोग ईश्वर में कैसा विश्वास रखते हैं।

आस्थावादी कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। वे कहते हैं कि वह सर्वव्यापी है। वे बताते हैं कि वह अनुपम, अद्वितीय है। वह यह भी कहते हैं कि सबकुछ उसकी इच्छा से संचालित होता है। यह मान लिया गया है कि मैं ऐसे ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूं, तो मैं कहता हूं कि यह ठीक वैसा ही है, जैसा ब्राह्मण कहते आए हैं। ब्राह्मण दावा करते हैं कि वे स्वार्थी नहीं हैं। दूसरी ओर वे दाता भी कहे जाते हैं। पुनश्च: वे अपनी विद्वता, वेद-शास्त्रों पर पकड़ का दावा भी करते हैं। इससे उनकी आत्ममुग्धता का पता चलता है।

पुनश्च: यह कहना (उचित नहीं है) कि वे दूसरों को गाली नहीं देते, न किसी से नफरत करते हैं। वे दूसरों को अशिक्षित और मूर्ख बताते हैं। उन्हें दूसरों को उनके बराबर चार आना भीख में देने से ईर्ष्या होती है।

इसके अलावा उनका यह दावा है कि वे सब कुछ त्याग चुके हैं; उन्हें धन के प्रति किसी प्रकार का लोभ-लालच नहीं है; फिर वे कहते हैं—‘तुमने मुझे केवल चार आना दिए!’

ये बातें साफतौर पर इशारा करती हैं कि ब्राह्मण अपने विचारों पर दृढ़ नहीं हैं। जिन गुणों के आधार पर ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावे किए जाते हैं, उन्हें वे अपने ही कर्मों से झुठला रहे हैं। हमारी निगाह में वे सच्चे ब्राह्मण नहीं हो सकते। उनकी कथनी और करनी के बीच भारी अंतर है।

इसी तरह यदि मान लिया जाए कि ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है तो कोई अकेला व्यक्ति उसे कैसे नकार सकता है। जब कोई साधारण व्यक्ति ईश्वर को नकार देता है, तो यह स्वयंसिद्ध है कि सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ईश्वर जैसा कुछ भी नहीं है। दूसरे, सिद्ध हो चुका है कि ब्राह्मणों ने ईश्वर की जिन विशेषताओं का दावा किया है, वह बेतुकी और निराधार हैं। वे महज काल्पनिक और मनगढंत कहानियां है। यही सत्य है।

यह कहना कि जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं, वे नास्तिक हैं—अज्ञानता पर आधारित है। किसी व्यक्ति को नास्तिक कहना सरासर मूर्खता है।

यदि ईश्वर सचमुच अस्तित्ववान है तो नास्तिक को उसे नकारने से भला क्या मिलेगा? यदि ईश्वर वास्तव में ही सर्वेसर्वा और सर्वशक्तिमान है तो साधारण व्यक्ति द्वारा उसकी सत्ता को झुठलाए जाने से उसका क्या बनेगा-बिगड़ेगा? इन स्थिति में यह प्रमाणित हो चुका है कि कोई भी व्यक्ति मूर्खता से ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार नहीं करेगा। इसी तरह कोई भी ईश्वर किसी मनुष्य को नास्तिक के रूप में रचने का मूर्खतापूर्ण कृत्य नहीं करेगा।

आपको इन सब बातों पर विचार करना होगा। यदि आप इन बातों पर गंभीरतापूर्वक सोचेंगे तो ईश्वर में अनास्था, अविश्वास या नास्तिकता के लिए किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।

ये वे लोग हैं, जो परमात्मा को नहीं जानते। ऐसे ही लोग दूसरों को नास्तिक और अनास्थावादी कहते हैं। वह स्वयं-सिद्ध नास्तिकता है। ईश्वरवादियों ने ही अनीश्वरवादियों को बनाया है। उनके अज्ञान से ही नास्तिकता पनप रही है। जरा सोचो, यदि ईश्वर सचमुच मौजूद है तो क्या यह संभव है कि एक तुच्छ और साधारण इंसान उसे नकार सके? इससे हम इस स्वाभाविक निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नास्तिकता और नास्तिक शब्द ब्राह्मण के अज्ञान की देन थे, या ऐसा होना चाहिए कि ब्राह्मणों ने ही उन्हें ईश्वर के नाम पर लाभ कमाने, अपने धंधे को आगे बढ़ाने के लिए रचा है। इसलिए ईश्वर उसी के लिए अस्तित्ववान है, जो उसके नाम का धंधा करते है। बाकी को ईश्वर के बारे में चिंता करने की कतई आवश्यकता नहीं है।

ईश्वर संबंधी दर्शन के विश्लेषण का वास्तविक अर्थ है, तत्संबंधी सभी मामलों का सविस्तार और संपूर्णता में विश्लेषण करना। ईश्वर से संबंधित सत्य को अनावृत करने के लिए हमें अनुसंधान करने होंगे। किसी वस्तु के बारे में शोध का मूलभूत सिद्धांत उस वस्तु के यथार्थ को पहचानना है। यह जानना है कि वह क्या है। उसके बाद में यह पता लगाना कि वह क्यों है, फिर यह जानना कि कैसे है, तदनंतर यह समझना कि वह कहां है और अंत में यह जानना कि वह अस्तित्व में कब से है। हमें इन जिज्ञासाओं को आगे रखकर उनके स्पष्ट उत्तर खोजने होंगे। हमें प्रश्नों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। हमें बिना किसी अवरोध ओर बाधा के, निष्पक्ष तरीके से अध्ययन करना होगा। दार्शनिक रूप से सत्य होने का अभिप्राय है, मुद्दों को लेकर तार्किक होना। हमारे उद्देश्य को देखते हुए दोनों परस्पर संबद्ध हैं। इसलिए यह प्रमाणित करना कि ईश्वर निस्संदेह है, वह वास्तव में सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है—असंभव होगा, यदि इन छह या सात प्रश्नों का उत्तर न खोजा जाए। इस प्रमाणन के लिए जितने भी तरीके जरूरी हों, उनका परीक्षण किया जाना आवश्यक है।

ईश्वर में अंधविश्वासी व्यक्ति इस तथ्य की उपेक्षा कर सकता है। वह सोच सकता है कि यह अनावश्यक और अयाचित है। लेकिन दार्शनिक अन्वेषक के लिए यह अत्यावश्यक है। ईश्वर अंध-आस्था से परे नहीं हो सकता। उसे केवल अज्ञानता या लापरवाही द्वारा नहीं पहचाना जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, विशेषरूप से सुधी शोधकर्ता ईश्वर को न तो महज पाखंड समझकर नकार समझ सकता है, न ही अज्ञानता या अंध-आस्था के आधार पर उसे स्वीकार कर सकता है।

ईश्वर क्या है?

ईश्वर क्यों है?

ईश्वर कैसा है?

ऐसे अध्येता के लिए जो दर्शनशास्त्र और ईश्वर का अन्वेषण करना चाहता है, उसके पास इन प्रश्नों का उत्तर, जिज्ञासाओं का संपूर्ण समाधान होना चाहिए। ऐसे ढंग से जो पर्याप्त आश्वस्तिकारक हो।

प्रत्येक मनुष्य तर्क करना जानता है। गहन चिंतन-मनन हेतु मनुष्य तर्कशक्ति से संपन्न होता है। तर्कशक्ति उचित परिप्रेक्ष्य के साथ उसे सत्य तक पहुंचाती है। कुल मिलाकर तर्क और तर्क सामर्थ्य से बचकर मनुष्य को जानवर के स्तर तक नीचे नहीं गिराना चाहिए। अंध-आस्था और छद्म विश्वास से उसे बचना चाहिए। अपने तर्क और विवेक का दुरुपयोग करके मनुष्य ने अपने लिए अनेक कठिनाइयां पैदा कर ली हैं। अपनी विकट समस्याओं से बचने के लिए उसने अनेकानेक परमात्माओं की सर्जना की है।

शासक और शासित आखिर क्या हैं?

लोग अमीर और गरीब क्यों हैं? 

ऊंची और नीची जातियां क्यों बनी हैं?

मजदूर मेहनतकश, उनके मालिक आलसी क्यों हैं?

दुनिया गुलामों और बादशाहों में क्यों बंटी है?

भिखारी और अन्नदाता का विभाजन किसलिए?

आप इन सभी प्रश्नों पर विचार कीजिए। ईश्वर किसके लिए है? क्या आप नहीं सोचते कि ईश्वर की रचना इन सबकी सुरक्षा, इस असमानता को बनाए रखने के लिए हुई है? इसके अतिरिक्त ईश्वर ने मनुष्य के लिए किया ही क्या है?  क्या ईश्वर ने मनुष्यता के कल्याण के लिए अभी तक कोई अच्छा कार्य किया है? क्या हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता है जो बुराइयों को सरंक्षण देता, केवल उन्हीं का भला चाहता हो?

समाज में प्रेम, सुख, संतुष्टि और शांति के अभाव के लिए कौन जिम्मेदार है? अगर तर्क और विवेक बुद्धि से संपन्न व्यक्ति घृणा का पात्र बनते हैं, मृत्यु तक उन्हें चिंताएं घेरे रहती हैं तो कौन उनके लिए जिम्मेदार है? कहीं इसका कारण ईश्वर में घोर आस्था तो नहीं है?

यदि हम इसे मूर्खता कहकर टाल देते हैं, मानवीय अज्ञानता को इसका मूल कारण मान लेते हैं तो प्रकृति ने मनुष्य को बुद्धि की सौगात क्यों दी है? क्या यह कहा जाए कि मनुष्य को उसकी बुद्धि मूर्खतापूर्ण कार्यों के लिए दी गई है? क्या यह कहा जा सकता है कि मानवीय विवेक का काम मूर्खतापूर्ण विश्वासों के साथ जीना और मूर्खतापूर्ण कृत्यों पर अमल करना है?

मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना गया है, बावजूद इसके सभी दुर्गुण उसके भीतर हैं। उसका चेहरा चिंताओं से ढका रहता है, उसमें समस्त दोष और दुर्बलताएं हैं। उसके भीतर दूसरों के प्रति घृणा भरी रहती है। गद्दारी केवल मनुष्यों का लक्षण है, बाकी प्राणियों में वह नहीं पाई जाती, जिन्हें आमतौर पर बुद्धि-विवेक से रहित माना जाता है। 

विवेकवान मनुष्य आखिर वे दुर्गुण क्यों दिखाई पड़ते हैं, जो जंगली जानवरों तक में नहीं पाए जाते? क्या इसके पीछे ईश्वर की रचना और विश्वास है? क्या ऐसा इसलिए कि परमेश्वर की महान विशेषताओं संबंधी उसकी कल्पना अनुचित और पाखंड है। यदि हम यह समझने और पता लगाने में असमर्थ रहते हैं कि इस दुरावस्था के वास्तविक कारण क्या हैं, यदि हम उसके समाधान के लिए उपयुक्त सुझाव नहीं दे पाते—फिर हमारे विवेक की उपयोगिता ही क्या है? 

इस भगवान के लिए क्या करें? क्या मनुष्य ने ईश्वर की खोज किसी प्राकृतिक विधि-विधान से की है? क्या दूसरे प्राणियों ने मनुष्य को ईश्वर को पहचानना तथा उसमें विश्वास करना सिखाया? यदि ईश्वर का निर्माण दूसरे प्राणियों ने नहीं किया था तो यह कैसे संभव हुआ कि वह केवल मनुष्य को दिखेगा, महसूस होगा। वह दूसरों को क्यों दिखाई नहीं देता? यहां तक कि वे लोग जो ईश्वर को पहचानने का दावा करते हैं, उन्हें वह अलग-अलग रूपाकारों में क्यों दिखाई पड़ता है? ईश्वर के कार्य, उसकी शक्तियां और व्यवहारों में इतने ज्यादा विरोधाभास क्यों हैं?

यदि ईश्वर एक निर्मिति था तो उस निर्मिति का उद्देश्य क्या था? उसे बनाने के कारण क्या थे? क्या ईश्वर के निर्माता अपने प्रयासों में सफल हुए थे? क्या ईश्वर ने इस समस्या का समाधान दिया और अपने सृजन के उद्देश्य पर खरा उतरा था  ?

क्या ईश्वर अपनी निर्मिति आप था? अथवा दूसरों के द्वारा उसे गढ़ा गया था? यह कैसे संभव होता है कि लोग उसकी इच्छाओं एवं निर्देशों से विरुद्ध जाने में सफल हो जाते हैं?

ईश्वर को सर्वशक्तिमान बताया जाता है। दावा किया जाता है कि वह सर्वव्यापी और सर्वज्ञ है; और दुनिया में कुछ भी और सब कुछ नियंत्रित करने में सक्षम है। यदि यह सब सत्य है तो मुझे ऐसा कुछ भी बताइए जो ईश्वर ने अब तक किया है? यह मनुष्य ही है जिसने ईश्वर के नाम पर सब कुछ किया है। इतना ही नहीं, मनुष्य ईश्वर का अनादर और उपेक्षा करने में सक्षम है। बावजूद इसके उसने कई काम किए हैं। जो चीजें मनुष्य के हितों के लिए हानिकारक हैं, वे घटित हो रही हैं। जो चीजें समाज के लिए उपयोगी और सहायक नहीं हैं, वे भी सामने आ रही हैं। हम यह देखने में सक्षम नहीं कि प्रत्येक वस्तु को उसकी संपूर्णता और समग्रता में बनाया गया है। वह एक व्यक्ति से लेकर संपूर्ण समाज को संतुष्ट कर सकती है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो मानवीय प्रयासों के बिना संभव हुआ हो। जीवन में ऐसा भी कुछ नहीं है जिससे हम ईश्वर पर गर्व कर सकें। सब कुछ मनुष्य के कठिन परिश्रम की देन है, वही सराहनीय वस्तुओं का निर्माण करने में सक्षम है। अगर दुनिया सुरक्षित है और मानवता की गूंज चारों ओर है तो उसका श्रेय भी मनुष्य के प्रयासों को जाता है। सब कुछ केवल मनुष्य के प्रयासों द्वारा संरक्षित और सुरक्षित है। बल्कि हम तो यहां तक कह सकते हैं कि स्वयं देवतागण भी मनुष्य के प्रयासों के कारण सुरक्षित हैं।

धर्म

अब हमें धर्म पर विचार करना चाहिए।

इन दिनों, लोगों की राय है कि सभी धर्मों की रचना मनुष्यों द्वारा की गई है। समाज में आपको अच्छे मनुष्य मिलेंगे तो बुरे आदमी भी साथ-साथ मिल जाएंगे। इसी तरह तुम समाज को दो श्रेणियों में बांट सकते हो। पहले वे जो समाज की सेवा करते हैं, और दूसरे वे जो स्वार्थी हैं। समाज को दैवी शक्तियों और दैवी-शक्ति विहीन लोगों की श्रेणी में बांट पाना संभव नहीं है। उस तरह का विभाजन इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि लोगों को ज्ञान, अनुभव आदि के आधार पर वर्गीकृत करने का कोई ठोस आधार नहीं है। अतएव आप कोई भी धर्म चुनें, मगर यह दावा नहीं करते कि वह धर्म दैवीय शक्ति के कारण अस्तित्व में आया है। आप केवल इस निष्कर्ष पर पहुँच  सकते हैं कि धर्म कुछ पढ़़े-लिखे लोगों द्वारा गढ़ा गया था। उनके सरोकार बेहतर समाज की रचना से जुड़े थे। धर्म के रचनाकार को लेकर यही वह सत्य है जिसे दर्शनशास्त्र का अध्येता प्राप्त कर सकता है। दार्शनिक अनुसंधान का वास्तविक अभिप्राय क्या है?

एक विद्वान जिन्होंने तमिल ग्रंथ ‘कुरल’(पूरा नाम ‘तिरुक्कुरल’ है। यह तमिल साहित्य की महानतम रचनाओं में से है। उसके रचनाकार तिरुवल्लूवर हैं, जिन्हें जैन रचनाकार माना जाता है। ग्रंथ का रचनाकाल 300 ईस्वी पूर्व से छह सौ ईस्वी तक फैला हुआ है। नीतिशास्त्र विषयक इस ग्रंथ के 1330 मुक्तक जीवन के सभी पक्षों का संस्पर्श करते हैं) की टीका-पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि ‘मिथ्या’ मिथ्या हो चुका है। जबकि असत्य से रहित सत्य आज भी सच्चाइयों के रूप में शेष है। आशय है कि कोई भी चीज जो मिथ्या है, वह एक न एक दिन अवश्य ही गायब हो जानी है। जबकि सत्य की पहचान सत्य के रूप में ही रहेगी। अन्यथा यह वैज्ञानिक शोध एवं अनुसंधान के लिए अपमानजनक होगा। शोध  का एकमात्र उद्देश्य है, सत्य तक पहुंचना। यदि आप इससे भटक जाते हैं, और  दार्शनिक अनुसंधान के नाम पर असत्य को सत्य घोषित करने का प्रयास करते हैं, तो आपका शोध केवल और केवल झूठ की छवि ही प्रस्तुत कर पाएगा। यदि  दर्शनशास्त्र का कोई भी शोध किसी झूठ को स्थापित करता है, तो वह मनुष्य की तर्कशक्ति और विवेक-बुद्धि, यानी सीधे मनुष्यत्व की अवमानना होगी।

जब भी आप धर्म पर विचार करते हैं, और यह जानना चाहते हैं कि मनुष्य के लिए धर्म की सर्जना के उद्देश्य क्या हैं, तो धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों का उत्तर होता है कि धर्म की आवश्यकता मनुष्य को ईश्वर से जोड़ने तथा अंततः उसे देवलोक तक पहुंचाने के लिए पड़ती है। उनके अनुसार धर्म की रचना दिव्य मनुष्यों द्वारा की गई थी। यही बात इस सम्मेलन के अध्यक्ष ने अपने वक्तव्य में भी कही थी। क्या यह धारणा दार्शनिक शोध और वैज्ञानिक अनुसंधान की दृष्टि से स्वीकार्य है? यदि यह मान लिया जाए कि धर्म की रचना दिव्य शक्तियों ने मनुष्य और धर्म(ईश्वर) के बीच संबंध बनाने के लिए की थी, तो यह केवल और केवल ईश्वर की दुर्बलता को दर्शाता है। यह उस ईश्वर की दुर्बलता है, जिसे सर्वशक्तिमान माना गया है। मनुष्य को ईश्वर से संपर्क साधने के लिए किसी दूसरे मनुष्य अथवा दिव्य मनुष्य की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे संबंध का आखिर मतलब ही क्या है?

यदि यह सत्य है कि ईश्वर सर्वत्र है और वह अतिमानवीय शक्तियों से संपन्न है, और यदि यह सत्य है कि केवल वही संसार की समस्त गतिविधियों का संचालक, नियंत्रक और कर्ता-धर्ता है, तो उसके तथा मनुष्य के बीच संबंध स्थापित करने के लिए किसी मध्यस्थ का औचित्य ही क्या है? वह क्यों होना चाहिए? ऐसे रिश्ते की जरूरत भी क्या है? इसके अलावा मैं यह भी जानना चाहूंगा कि वह कौन है जो पेड़-पौधों, कीड़े-मकोड़ों, पक्षियों और जीवाणुओं के अस्तित्व को ईश्वर के साथ जोड़ता है। साथ ही किसी एक को, जिसके पीछे किसी प्रकार का तर्क भी नहीं है, उन सभी जीवधारियों और ईश्वर से संबद्ध करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है? जबकि उन्हें किसी प्रकार के ईश्वर की आवश्यकता ही नहीं है! वे(मनुष्येत्तर प्राणी) ईश्वर के बारे में सर्वथा अनभिज्ञ हैं। उन्हें न तो किसी मध्यस्थ की जरूरत है, न ही धर्म की। जबकि,  मनुष्य जो विवेकवान और तर्कशक्ति से संपन्न है, को दिव्यात्माओं और धर्म की, ईश्वर से संबंध स्थापित करने हेतु आवश्यकता अनिवार्य रूप से पड़ती है। अपने ईश्वरीय संबंधों के लिए मनुष्य को उन पर निर्भर रहना ही पड़ता है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या ऐसा करना तर्कशक्ति संपन्न प्रतिभाओं और दर्शनशास्त्र के गंभीर शोधकर्ता को स्वीकार्य होना चाहिए?

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, आप समाज को अच्छे लोगों, विद्वान लोगों और जनसाधारण में बांट सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों को दैवीय मान लेना, यह कहना कि केवल वही ईश्वर की रचना हैं, अन्यायपूर्ण और अविश्वसनीय होगा। यदि यह कहा जाए कि केवल दिव्य मनुष्यों की रचना ईश्वर ने की है, तो मैं पूछना चाहूंगा कि बाकी लोगों की रचना किसने की है। यदि ईश्वर संपूर्ण मनुष्यता का रचियता है, वह करोड़ों लोगों को साधारण इंसान के रूप में तथा मुट्ठी-भर को दैवी मनुष्य के रूप में, ताकि उनसे संबंध बनाए रख सके—क्यों रचेगा? क्या उसके लिए ऐसा करना आवश्यक है? मनुष्यता की रचना के लिए वह बार-बार इतना कठिन परिश्रम क्यों करेगा? क्या वह एक सरल और एकसमान तरीके से इस काम को अंजाम नहीं सकता?

कहा जा सकता है कि इसी में ईश्वर की खुशी और उसका आनंद है। कुछ लोग इसे आंख मूंदकर स्वीकार भी कर सकते हैं। लेकिन आज हम यहां दर्शन पर चर्चा करने के लिए जमा हुए हैं। हम किसी भी शक्ति या वस्तु को शोध और संदेह से मुक्त नहीं कर सकते। हमें प्रत्येक विषय की गहनतम पड़ताल करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त हम यहां दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं, इसलिए हमें न केवल प्रत्येक वस्तु, अपितु हर विषय-वस्तु पर सवाल खड़े का अधिकार है। हमारा कर्तव्य है कि हम ईश्वर, धर्म तथा उनसे जुड़े प्रत्येक दर्शन की जांच-पड़ताल करें। धर्म और ईश्वर दार्शनिक विवेचनाओं का विषय रहे हैं। हम उन्हें बिना सवाल उठाए नहीं छोड़ सकते। बाकी विषयों के बारे में हमें अधिक पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं है। उनमें से अधिकांश अपने आप में स्पष्ट हैं। हमें सोना, चांदी, तांबा तथा अन्य धातुओं पर शोध के लिए ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हम धातुओं को बिना स्पर्श या परीक्षण के प्रयोग में नहीं लाते। चूंकि आज हमने ईश्वर और धर्म के दर्शन को विमर्श के लिए चुना है, ये अनुसंधान की दृष्टि से कठिन विषय हैं, इसलिए हमें इनपर बहुत अधिक सोच-विचार और तर्क-सामर्थ्य की जरूरत है। हमें उनसे जुड़े सत्य की खोज करनी होगी। इस मामले में यदि मनुष्य के सोचने-समझने और तर्क करने के गुण को वर्जित मान लिया गया तो हम ईश्वर और धर्म की वास्तविकता को कभी महसूस नहीं कर पाएंगे। इसका परिणाम मिथ्या धर्मों के लिए अनंत जीवन बलिदान करने जैसा होगा। ईश्वर और धर्म हमेशा मनुष्य की अंध-आस्था के उपकरण-मात्र बने रहेंगे। इसीलिए मैं आपसे इन विषयों पर विचार करने की अपील करता हूं। आप सोचें कि ईश्वर का साक्षात करने के लिए किसी मध्यस्थ की क्या सचमुच आवश्यकता है।

पुनश्चः, यदि यह सत्य है कि ईश्वर का साक्षात तथा उसकी प्राप्ति केवल धर्म के माध्यम से संभव है तो उसके लिए इतने सारे धर्म क्यों होने चाहिए? क्या धार्मिक और दिव्यात्मा मनुष्यों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए? मनुष्यों और तथाकथित दिव्यात्माओं द्वारा निर्मित धर्मों के बीच इतने विवाद, अनियमितताएं और विरोधाभास क्यों हैं? धार्मिक युद्धों का औचित्य क्या है? धर्म के नाम पर इतने नरसंहार क्यों होते हैं? धर्म के नाम पर मनुष्यता को इतने सारे कष्ट और पीड़ाएं क्यों झेलनी पड़ती हैं? यह कहा जा सकता है कि ये किसी दैवी शक्ति की देन न होकर मनुष्य की अज्ञानता के कारण उत्पन्न हुई हैं। लेकिन यह तर्क दमदार नहीं है। यदि कोई बुद्धिमान और तर्कशक्ति से संपन्न इसका रहस्य समझने में असमर्थ है तो बाकी मनुष्य इसे समझ ही नहीं पाएंगे। यदि कोई विवेकशील, भला मनुष्य दंगों और झगड़ों में दुर्भावनाओं और घृणा का शिकार हो सकता है, तो किसी भले इंसान के लिए कैसे संभव है कि वह ऐसे ईश्वर की मदद मांगने जाए जिसका वह साक्षात नहीं कर सकता। यही नहीं, कहा जाता है कि ईश्वर साधारण मनुष्य की दृष्टि और समझ से परे है। तब मनुष्य के लिए उसे पहचान पाना कैसे संभव है? कृपया इन सब बातों पर विचार कीजिए। विभिन्न धर्मों के रचियताओं को हम दिव्यात्मा कैसे मान सकते हैं, जब समाज में इतने सारे झगड़े, असमानताएं, मारपीट, दंगे और तोड़-फोड़ उनके द्वारा रचित धर्म के नाम पर होते हैं। आपको इन सब प्रश्नों पर गंभीरता से सोचना होगा।

संसार में बढ़ते भेदभाव, मनमुटाव तथा एकता के अभाव के लिए क्या धर्म जिम्मेदार नहीं है? क्या धर्म को समाज में नफरत फैलाने के लिए जिम्मेदार नहीं कहा जाना चाहिए? क्या धर्म मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावों के लिए जिम्मेदार नहीं है?

हम यह कैसे मान सकते हैं कि सभी धर्म दिव्य शक्तियों से युक्त महापुरुषों द्वारा बनाए गए हैं। हमें इन सब मुद्दों पर गहन चिंतन करना होगा। इसलिए कि धर्म-प्रवर्तकों को दिव्यात्मा होने का श्रेय दिया जाता है। उनमें से अनेक आगे चलकर दिव्य महापुरुष के रूप में पूजनीय माने गए हैं। ऐसे पूजनीय दिव्यात्मा, धर्म-प्रवर्तकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। किसी को इस पर सोच-विचार करने की परवाह ही नहीं है। बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, नयानारों, अलवारों, स्वामीजियों, महात्माओं और अनगिनत लोग समय-समय पर स्वयं को दिव्य पुरुष घोषित करते आए हैं। उनके बारे में अनगिनत वाद-विवाद, लड़ाई-झगडे़, मत-मतांतर तथा विरोधाभासी किस्से हैं।

बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार के फलस्वरूप समाज में जागृति आती है। आज, समाज का बड़ा हिस्सा अपने सोचने-समझने की क्षमताओं का निष्पक्ष तरीके से प्रयोग करने में सक्षम है। यही कारण है कि आज तथाकथित दिव्यात्माओं की संख्या घटने लगी है। शताब्दियों पहले अलवारों, नयनारों और दासारों का जन्म तक नहीं हुआ था। जनसाधारण की मुक्ति के लिए इन दिव्य जनों ने क्या योग्यता हासिल की है? उनमें से कितनों ने ईश्वर का पता लगाया, उसके बारे में जांच-पड़ताल की और अपनी प्रार्थनाओं के बल पर उस तक पहुंचने में सक्षम हुए? आज जो स्थिति है उसमें लोग सभी अध्येताओं को दिव्यात्मा स्वीकाने के लिए तैयार नहीं हैं। यहां-वहां, इक्का-दुक्का मनुष्यों को ही दिव्य विभूति के रूप में घोषित करने की कोशिश करते हुए पाते हैं। यही नहीं, इस तरह की दिव्यात्माएं, देशी जमीन में विदेशी पौधे की भांति बहुत जल्दी मुरझाने लगती हैं। जैसे-जैसे तुम ईश्वर और धर्म के बारे में सत्य के करीब जाओगे, उसे महसूस करने लगोगे, ये छलावे की तरह तुमसे दूर भाग जाएंगे।

ईश्वर और धर्म के बारे में मेरी विचारधारा कदाचित तुम्हें चौंका सकती है। मेरे कुछ विचार तुम्हारे विचारों से भिन्न हो सकते हैं।

धर्म और ईश्वर को लेकर इतने सारे संभ्रम और भ्रांतियां भला क्यों होनी चाहिए कि वे हमें, मनुष्यता के लिए महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य होने के लिए बाध्य करने लगें। अनेक लोग ऐसे हैं जिन्होंने इन संभ्रमों को सत्य और मानव-मात्र के लिए परमावश्यक माना है। सच तो यह है कि उनमें से अनेक लोग इन भ्रांतियों और संभ्रमों में इसलिए उलझे हुए हैं, क्योंकि इन्हें उन्होंने मानव जीवन में धर्म और ईश्वर की महत्ता और गहन प्रभावशीलता के परिणामस्वरूप ग्रहण किया है। आज भी, आखिर क्यों इन दिव्यात्माओं द्वारा ईश्वर और धर्म को लोगों के दिलो-दिमाग में  बैठाने के लिए सुनियोजित प्रचार-प्रसार किया जा रहा है? इसकी एकाएक जरूरत कैसे पैदा हो जाती है? उसका प्राप्तव्य क्या है? कौन उसका लाभ उठा रहा है? 

सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात, क्या हम यह सोचते हैं कि यीशु और मोहम्मद जो पूरी तरह निःस्वार्थ थे, जिन्होंने मनुष्यता के लिए बड़े-बड़े त्याग किए थे, वे भी ईश्वर और धर्म में अंतनिर्हित वास्तविक दर्शन को, जैसे उनके बारे में आज उपदेशों में बताया जाता है, उसी तरह से समझ ही नहीं पाए थे?

दोस्तो! मनुष्य ईश्वर को प्रत्यक्ष और स्वतंत्र रूप से देखने या महसूस करने में अक्षम है, भले ही ईश्वर को दुनिया में सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वनियंता कहा जाता हो। इसके लिए वह आज भी दूसरों पर, जिन्हें दिव्यात्माएं कहा जाता है—निर्भर है। ईश्वर को ईश्वर दूसरों ने घोषित किया है। इसी तरह धर्म स्वयं, अपनी मर्जी से नहीं उपजे हैं। उन्हें मनुष्यों द्वारा गढ़ा गया है। मनुष्य को धर्म तथा उसके नियमों के अनुसार आचरण करने के लिए विवश किया जाता है। 

इसका तर्क-सम्मत समाधान क्या है?

धर्म और ईश्वर समाज को भरमा रहे हैं। उन्हें मनुष्यता पर किसी और के द्वारा थोपा गया है। वे अपने अस्तित्व को स्वयं-प्रमाणित करने में असमर्थ हैं। इस काम के लिए भी उन्हें दूसरों की आवश्यकता है। उन्हें आज भी मजबूत प्रचारतंत्र की आवश्यकता है। इस तथ्य को हम भली-भांति समझ चुके हैं।

जो भी हो, हम तथाकथित सभी दिव्यात्माओं की पूरी तरह निंदा नहीं कर सकते। न ही हम उनके सभी कार्यों पर संदेह कर सकते हैं। जीसस और मोहम्मद इसी श्रेणी में आते हैं। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उनके द्वारा कहा गया प्रत्येक शब्द, हर विचार बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है। परंतु हम दावा भी नहीं कर सकते कि वे सभी स्वार्थी थे।

चूंकि ईश्वर और धर्म विशेषरूप से बुद्धिमान और तार्किक मनुष्यों के लिए रचे गए हैं, इसलिए बाकी प्राणियों के लिए न तो कोई धर्म रचा गया है, न ही ईश्वर। इससे हम इस विश्वास तक पहुंचते हैं कि उन्हें केवल मनुष्यता के कल्याण हेतु गढ़ा गया है।

ऐसी आवश्यकता केवल इस तथ्य के कारण उत्पन्न होती है कि समस्त जीवधारियों में केवल मनुष्य ही है, जो साथ-साथ रहने के लिए, समाज का गठन करता है।

आमतौर पर सभी मनुष्येत्तर प्राणी अपनी देखभाल स्वयं करते हैं। वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उत्सुक रहते हैं। वे दूसरे के सुख-साधनों की चिंता नहीं करते। यह उनकी स्वाभाविक वृत्ति है।

अन्य जीवधारियों की तुलना में मनुष्य अपेक्षाकृत ज्यादा बुद्धिमान है। यदि वह असीमित स्वार्थ की तरफ बढ़ा तो उससे दूसरों के हित खतरे में पड़ सकते हैं। परिणामस्वरूप समाज को खतरा उत्पन्न हो सकता है। यही  अवधारणा ईश्वर और धर्म की रचना को औचित्यपूर्ण ठहराती है। लेकिन ऐसे मनुष्य के लिए जो समाज से पूरी तरह अलग-थलग, निरपेक्ष है—उसे ईश्वर या धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है। परंतु ऐसे व्यक्ति पर जो दूसरों के साथ रहता है, बड़े समाज का हिस्सा है, उसपर कुछ प्रतिबंध, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में लगाए गए हैं। इससे उसका जीवन अप्राकृतिक रास्ते पर बढ़ने लगता है। समाज की आवश्यकता उसके अस्तित्व की शर्त भी यही है। अन्यथा आप समाज में मनुष्यों को जानवरों जैसा व्यवहार करते हुए पाएंगे। व्यक्ति में प्रकृति-विरुद्ध जीवन जीने का सामर्थ्य पैदा करने के लिए ही  हमारे विद्वान पूर्वजों को ईश्वर और धर्म की रचना उसके उपदेश के लिए प्रेरित किया था।

इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया विचार कीजिए कि राज्य, सरकार, कानून और दंड जैसी संस्थाएं किसलिए बनीं। यदि राज्य की कृपा, न्याय, कानून और दंड नहीं होगा तो शांति नहीं होगी। पर्याप्त सुरक्षा का अभाव रहेगा। किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं होगी। राज्य, कानून एवं दंड के रूप में व्यवस्था के कारण ही हम जीवन को चलाने में सक्षम हैं। ये व्यवस्थाएं लोगों के एक साथ, शांतिपूर्ण ढंग से जीवनयापन रहने के लिए निस्संदेह उपयोगी हैं। बावजूद इसके हम यह नहीं कह सकते कि इतना पर्याप्त है। हमें कुछ और नहीं चाहिए। समाज को पूरी तरह से शांतिमय बनाने के लिए अब भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। कोई मनुष्य अपने सहवासी मनुष्यों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचाए, इसके लिए अभी और प्रयास करने होंगे। केवल कानून की मदद, उसके प्रवर्तन द्वारा जीवन के सभी लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। जरूरत के समय दूसरों की मदद हासिल करने के लिए समाज में आपसी प्रेम और भाईचारा आवश्यक है। इसके लिए आवश्यक है सभी लोगों के बीच अनुशासन की, प्रेम की, सहानुभूति की, ईमानदारी की और एक-दूसरे के प्रति आभार प्रदर्शन की। समाज में रहते हुए मनुष्य को अच्छी चीजों को ग्रहण करना चाहिए, जो खराब है, उसका विरोध करना चाहिए। किसी को भी दूसरे की वस्तुओं की चाहत या लालच में नहीं पड़ना चाहिए।

ये और इस तरह की दूसरी चीजों को केवल कानून के बल पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। संक्षेप में यदि मनुष्य को अपनी प्राकृतिक स्वतंत्रता के साथ जीने की अनुमति दी जाए तो उसे अनुशासित नहीं किया जा सकता। उसे दूसरों को हानि पहुंचाने से रोकना असंभव होगा। इसलिए कायदे-कानून और सामाजिक मर्यादाएं अपरिहार्य मानी जाती हैं। सामाजिक मर्यादाओं को केवल कानून के सहारे मनुष्यता पर नहीं थोपा जा सकता। ईश्वर को इसलिए रचा गया है, ताकि सामाजिक कायदे-कानूनों को लोगों पर बलपूर्वक लागू किया जा सके। इस तरह ईश्वर और धर्म की अभिरचना का उद्देश्य लोगों को विशिष्ट तरीके से सोचने और कार्य करने के लिए प्रवृत्त करना है। क्या ऐसी रचनाओं का कोई और भी उद्देश्य है? ईश्वर और धर्म लोगों को यह बताने के लिए भी थोपे गए हैं, कि स्वर्ग जाने का अधिकार और अवसर केवल उनके निर्देशों अनुपालन से ही संभव है। ईश्वर के नाम पर इस तरह के दुष्प्रचार में फंसकर भोले-भाले जन उसके आशीर्वाद हेतु निरंतर प्रार्थनारत रहते हैं। मनुष्य का लालच और उसका डर, ये दो बातें हैं, जिनका उपयोग, शासकीय कानूनों एवं दंड विधान से अधिक शक्तिशाली हथियार के रूप में किया जाता है। इस रूप में ईश्वर और धर्म समाज के सहायक की भूमिका निभाते हैं।

यहां एक और महत्वपूर्ण मुद्दे पर मैं चर्चा करना चाहता हूं। उन्नत वैज्ञानिक प्रबोधन और प्रौद्योगिकीय विकास के इस युग में, बढ़ते धार्मिक प्रचार-प्रसार को देखकर, आप पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों है? संक्षेप में अधिक धार्मिक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता को तेजी से महसूस किया जाने लगा है। इसके कई कारण हैं। व्यक्तिगत संपत्ति रखने का अप्राकृतिक अधिकार बढ़ता ही जा रहा है। पूरा समाज सांप्रदायिकता के चंगुल में है। ऊंच-नीच और भेदभाव बढ़ने के चिह्न बढ़ते ही जा रहे हैं। दूसरी ओर शोषण और वर्चस्ववाद के विरोध का भी प्राबल्य है। न्याय और समानता की मांग उत्तरोत्तर बढ़ रही है। केवल कानून के भरोसे इनमें कटौती संभव नहीं है। एक गंभीर स्थिति तेजी से विकसित हो रही है। भले ही सारे कानून उच्च जातियों के मुखियाओं द्वारा बनाए गए हों, आसन्न खतरे को देखते हुए वर्तमान कानूनी प्रावधानों के साथ कोई शासक वर्ग आराम नहीं कर सकता। जो लोग कानून की अवहेलना करते हैं, उनसे कानून की मदद से, सख्ती के साथ निपटा जा सकता है। लेकिन यदि गरीब और निम्नतर श्रेणी के लोगों का विद्रोह बढ़ता है, तो कोई शासक उनके आगे टिक नहीं पाएगा। भारी उथल-पुथल और अव्यवस्था में कानून काम नहीं कर सकते। उस समय  किसी को सजा का भय नहीं रहता। यदि ऐसी अप्राकृतिक स्थितियां बनती हैं, तो उसके लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध भी आवश्यक होंगे। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ही ईश्वर और धर्म को आवश्यक माना गया है। मगर, जहां ईश्वर नहीं है, वहां अमीर और गरीब नहीं हो सकते। इसी तरह यदि कहीं धर्म नहीं है, तो वहां जाति आधारित ऊंच-नीच और भेदभावों के लिए भी कोई जगह न होगी।

इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अमीर लोगों, शोषकों, उच्च जाति के लोगों, तथाकथित महापुरुषों के निहित स्वार्थों और हितों की रक्षा के लिए ही ईश्वर और धर्म की रचना की गई है। शासकवर्ग उसके कानून तथा अन्य दंडविधान, ईश्वर और धर्म के कारण ही सुरक्षित होते आए हैं। क्या इसकी वजह यह है कि समाज को ईश्वर और धर्म के नाम पर ज्यादा बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता था? जिसे कानून के द्वारा निषिद्ध नहीं किया जा सकता, उसे धर्म के सहारे आसानी से आसानी से निषिद्ध ठहराया जा सकता है।

और भी मुखर होते हुए मैं कहना चाहूंगा कि ईश्वर और धर्म, उन समस्याओं का समाधान करने के लिए आवश्यक हैं, जो प्रकृति के विरुद्ध हैं। दैवी शक्तियां चाहती हैं कि मनुष्य अप्राकृतिक परिवेश और परिस्थितियों में रहे। यही कारण है कि वे अधिकाधिक ईश्वरों और धर्मों की रचना के प्रति सतत आग्रहशील रहती हैं।

यदि हम शासक-वर्ग, जाति और विषमताओं को मिटाने में सफल हो जाएं तो ये सभी ईश्वर और धर्म गुमनामी में जाकर नगण्य बन जाएंगे। दर्शनशास्त्र में ईश्वर और धर्म बस इतना ही महत्त्व है, यही हमारे अभी तक के विमर्श का निचोड़ है।

मनुष्य की प्रकृति

आइए, अब हम देखते हैं कि ईश्वर और धर्म की रचना का उद्देश्य क्या था? वे किसके लाभ के लिए बनाए गए थे। कथित दिव्यात्माओं का उनकी रचना के पीछे मूल उद्देश्य क्या था? यह सब इसलिए हुआ कि समस्त प्राणियों में केवल मनुष्य ही विवेक-बुद्धि से संपन्न था।

यही नहीं, जनसाधारण के लिए तो ईश्वर और धर्म का दर्शन ही अस्पष्ट और अलभ्य है। इसके अतिरिक्त उन देव-पुरुषों की एक और रचना भी है। जिसे आप न तो छू सकते हैं, न महसूस कर सकते हैं। वे उसे आत्मा कहते हैं। अब हमें उसकी दार्शनिक अवधारणा पर विचार करेंगे।

मनुष्य क्या है और आत्मा क्या है? इस दुनिया में पाए जाने वाले अनेक प्राणियों में मनुष्य भी एक है। दुनिया में पाए जाने वाली बहुत-सी वस्तुओं में से कुछ चेतन हैं, कुछ अचेतन। दूसरे शब्दों में वे क्रमशः जीवित प्राणी और निर्जीव प्राणी कहे जाते हैं। ये सब विभिन्न चीजों के सम्मिलन का परिणाम हैं। उन्हें उनकी विशिष्ट आकृति और रूपरेखा के अनुसार नाम दिए गए हैं। यदि आप उनमें से किसी एक अंश को अलग करते हो, तो वह वस्तु वह नहीं रहती जो वह है। इसलिए वह अपना नाम खो देती है। उससे अलग हुआ हिस्सा भिन्न नाम से पुकारा जाता है। अंततः उसकी मूल संरचना और आकृति नष्ट जाती है। मनुष्य को भी उन्हीं में से एक माना जाता है।

अब मनुष्य पर आते हैं। उसकी देहयष्टि किसी आदमी से ही मिलती-जुलती है। आप उसकी देह के किसी अंग का स्पर्श करते हैं। प्रत्येक अंग का अलग और विशिष्ट नाम है, जैसे सिर, हाथ, टांग, छाती….वगैरह। लेकिन मान लीजिए आपसे अपने सिर को छूने के लिए कहा जाता है, आप अपने बाल या चेहरे या गर्दन को भी स्पर्श कर सकते हैं। यही बात दूसरी वस्तुओं जैसे कि नली, लेंप, पानी, कुर्सी, जूते, झाडू, बर्तन, गाड़ी, जहाज आदि पर भी लागू होती है। इससे हमें पता चलता है कि कोई भी वस्तु या सामान दूसरी कई वस्तुओं का समुच्च्य मात्र है। इसका आशय है कि विभिन्न वस्तुओं का उन सबके अलग-अलग गुणों के साथ समायोजन। परस्पर सम्मिलित विभिन्न वस्तुएं अलग रूपाकार में ढलती हैं और इस प्रकार वे नया नाम ग्रहण कर लेती हैं।

बढ़ई लकड़ी की अनेक वस्तुएं बनाता है। अपने कार्य हेतु जरूरत पड़ने पर वह लोहे की भी मदद लेता है। बढ़ई द्वारा बनाई गई वस्तुएं विभिन्न नामों से जानी जाती हैं, जैसे कि कुर्सी, बैंच, बॉक्स, चारपाई, अलमारी, गाड़ी, जहाज, ट्रेन आदि आदि। केवल लकड़ी और लोहे जैसे कच्चेमाल के सहारे वह हजारों प्रकार की वस्तुएं, जिनका अलग-अलग प्रयोग हो सकता है, बना देता है। अब आदमी पर आते हैं। दूसरी वस्तुओं की भांति विविध प्रकार के कच्चे माल से बनी मानव-देह भी एक वस्तु है। मनुष्य चल-फिर सकता है। जोर भी लगा सकता है। पशु जैसे कि गाय, सांड, सुअर, गधा, घोड़ा, हाथी, शेर, चीता, लोमड़ी, सांप, बिच्छू, पक्षी, कीड़े-मकोड़े तथा अन्य जीव-जंतु भी अनेक प्रकार के कच्चेमाल के संयोजन से बने हैं। दूसरे प्राणियों की भांति मनुष्य भी जीव है। क्यों? यह इसलिए कि मनुष्य बातचीत कर सकता है और अपनी भावनाओं को स्पष्ट तौर पर अभिव्यक्त कर सकता है। यही मनुष्य की महानता का आधार है। लेकिन आप देखते हैं कि पक्षी आसमान में बहुत ऊंचा उड़ जाते हैं और दिखाते हैं कि इस मामले में वे दूसरे जीव-जंतुओं से श्रेष्ठतर हैं।

सरसरी तौर यदि हम देखते तो मनुष्य में कुछ भी खास या दूसरों से बढ़कर नजर नहीं आता। हम बस इतना ही कह सकते हैं कि चिंतन, अभिव्यक्ति और अकेले काम करने की योग्यता के बल पर वह दूसरे जीवधारियों से तेजी से आगे निकलने में सक्षम होता है।

हमें बिना झिझक यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि बुद्धि-विवेक और चिंतन-सामर्थ्य अधिक मात्रा में केवल मनुष्य में पाए जाते हैं। मनुष्य का यह गुण सर्वस्वीकार्य और निर्णायक है, हालांकि हम कुछ प्राणियों को मनुष्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली पाते हैं। मनुष्य में उनकी शक्ति नहीं होती। लेकिन हमें विचार करना होगा कि कुछ विशिष्ट शक्तिशाली जानवरों की ताकत किसी अन्य तरीके से दूसरे जीवधारियों या मनुष्य के लिए मददगार है? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य तर्कसंगत ढंग से सोच सकता है, जीवन को विनियमित करने के लिए उसने ईश्वर और धर्म की सृष्टि की है। ऐसे मनुष्य के बारे में ईश्वर और धर्म के प्रवर्तक कहते हैं कि वह उनकी मदद के बिना आगे नहीं बढ़ पाएगा।

मैं इस तथ्य की ओर संकेत करना चाहूंगा कि मनुष्य की विवेकशीलता ने उसे अधिक चिंताकुल बनाया है। उसकी इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। वह दूसरों के प्रति ईष्र्या और शत्रुभाव पाले रहता है।

मनुष्य के चिंतन-सामर्थ्य ने उसे दूसरों का शोषण, अवमानना, घृणा करना और धोखा देना सिखाया है।

आप यह नहीं कह सकते कि तर्कशक्ति और चिंतन-सामर्थ्य से संपन्न व्यक्ति, दूसरे जीव-जंतुओं की भांति कोई भी बुरा काम नहीं करता। हिंस्र पशु दूसरे जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं, उनकी पीड़ा का कारण बनते हैं। लेकिन आदमी क्या करता है? क्या तुम कह सकते हो कि मनुष्य दूसरों को हानि नहीं पहुंचाता, या उनके कष्ट का कारण नहीं बनता। नहीं! क्या फिर भी हम कह सकते हैं कि मनुष्य विवेक-बुद्धि और चिंतन-सामर्थ्य से संपन्न है।

कुछ व्यक्ति स्वयं को दूसरों से महान समझते हैं। इस आधार पर कि वे चित्र बना सकते हैं, अथवा कविता की रचना कर सकते हैं, या सोना जमा कर सकते अथवा एक ही दिन में लंदन से लौट-फेर कर सकते हैं। क्या वे सचमुच महान हैं? कृपया इसपर विचार कीजिए। ठीक ऐसे ही जैसे दूसरे प्राणियों में कुछ खास गुण होते हैं, मनुष्य में भी विशेषताएं होती हैं। क्या हम किसी व्यक्ति को केवल इसलिए महान कह सकते हैं कि वह जीवित है, अभी तक उसने मृत्यु का सामना नहीं किया है? क्या हम किसी व्यक्ति को इसलिए महान कह सकते हैं कि वह दूसरों को धोखा देने में माहिर है?

हम देखते हैं कि सभी जीव-जंतुओं का लगभग एक जैसा चरित्र होता है। उनका सोचने और कार्य करने का ढंग भी एक समान होता है। प्राकृतिक रूप से वे लगभग एक जैसे हैं। यहां तक कि जन्म, उत्तरजीविता तथा मृत्यु को लेकर भी जैविक प्राणियों में अद्भुत साम्य होता है। लेकिन समाज में रहते मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र इकाई मानता है।

हम अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग गुण-धर्म महसूस करते हैं। कुछ को अच्छा व्यक्ति कहते हैं। कुछ को हम बुरे आदमियों के रूप में नापसंद करते हैं। कुछ को हम स्वभाव से असभ्य और जंगली मानते हैं। जबकि कुछ को साधु, करुणामय, कंजूस, ईमानदार, निरंकुश, कृतज्ञ, विश्वासघाती, बुद्धिमान, मूर्ख और जिज्ञासु के रूप में पाते हैं। क्या कारण है जो हम विभिन्न व्यक्तियों पर विभिन्न विशेषताएं लाद देते हैं। ऐसे मतभेदों का कारण क्या है? क्या अपने चरित्र वह चाहे जैसा भी हो, के लिए क्या वे स्वयं जिम्मेदार हैं? अथवा उनका रूपाकार, शारीरिक अंगों का समुच्च्य उनकी प्रकृति तथा कर्मों के लिए जिम्मेदार है? इस विषय पर गहराई से विचार करना चाहिए।

आप एक कुत्ते में क्या देखना चाहते हैं? उसे कृतज्ञ होना चाहिए, उसे घर की पहरेदारी करनी चाहिए। उसे अपने स्वामी का विश्वसनीय होना चाहिए।

आप लोमड़ी को देखते हैं जो दिखने में लगभग कुत्ते जैसी ही है। लेकिन उसका व्यवहार? आपको उसमें एकदम विपरीत लक्षण दिखाई देंगे। इसके पीछे कारण क्या है?

यहां तक कि कुत्तों में भी, कुछ कुत्ते कटकने होते हैं। कुछ कुत्ते बिलकुल नहीं काटते। कुछ भोजन चुरा लेते हैं। कुछ अपने स्वामी के हमेशा निकट रहते हैं। कुछ उस समय तक अपने मालिक के पास नहीं आते जब तक बुलाया न जाए। कुछ कुत्ते बहुत बुद्धिमान होते हैं। कुछ कुत्ते पूरी तरह नासमझ होते हैं। स्वभाव के इस अंतर के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या यह प्राकृतिक है? क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि यह जन्म से ही, शरीर में भिन्न प्रकार की तत्व सामग्री के कारण है?

कुछ सांड आदमी को देखते ही उसे अपने सींगों से घायल कर देते हैं। कुछ कोई प्रतिक्रिया नहीं करते, भले ही आप उनकी पिटाई करते रहें।

एक हाथी महावत को ले जाने से मना कर, उसे मार देता है। दूसरा अपने महावत के आदेशानुसार शांतिपूर्वक काम करता रहता है। नरमी से पेश आता है।

अपने व्यवहार के लिए क्या जानवर स्वयं जिम्मेदार हैं? क्या वे प्रकृति से ही ऐसे हैं। क्या उन्होंने अपनी विशेषताएं जन्म से आत्मसात की हैं? क्या हम कहते सकते हैं कि उनके व्यवहार के अंतर के लिए उनकी शरीर रचना में काम आए पदार्थ जिम्मेदार हैं? इन प्रश्नों पर विचार कीजिए।

अब हम मनुष्य पर आते हैं। उसके आचरण को देखिए। कुछ लोग आखिर चोर क्यों हैं? क्यों कुछ लोग सदैव अकृतज्ञ, निष्ठुर, घमंडी और स्वार्थी होते हैं? क्यों कुछ लोग रात-दिन झूठ बक्कारते रहते रहते हैं? क्यों कुछ लोग विश्वासघाती और ईर्ष्यालु होते हैं? मनुष्य का व्यवहार, उसकी प्रकृति तथा उसके कार्यों का संबंध उसके शरीर में मौजूद तत्वों से होता है।

आप एक वाद्ययंत्र को जानते हैं, जिसे बांसुरी कहा जाता है। वह सिर्फ एक वस्तु है। संगीतकार भी एकल व्यक्ति है। बांसुरी के जिस छिद्र पर वह मुंह रखता है, वह भी एक ही है। फिर वह अनेक ध्वनियां कैसे पैदा कर लेता है? वह इसलिए कि बांसुरी में अनेक छिद्र होते हैं, जिनपर संगीतकार की उंगलियां नर्तन करती रहती हैं। इसी प्रकार जीवित प्राणियों, विशेषकर मनुष्यों में मनुष्य का व्यवहार तथा उसकी गतिविधियां—उसकी देह के विभिन्न अंगों-उपांगों से जैसे दिमाग, स्नायुतंत्र, शरीर आदि से संबंधित होती हैं। कुल मिलाकर मनुष्य बहुव्यापी अंतर के लिए जिम्मेदार नहीं है। उसके शरीर में कुछ तत्व है, वही जिम्मेदार हैं।

तर्क सामर्थ्य से संपन्न व्यक्ति इस संबंध को समझने तथा उसके अनुसार आचरण करने में असफल हो चुका था। वह केवल आदमी को दोष देता है, जो न तो वांछित और प्रशंसा योग्य है, न ही विधि-सम्मत। मनुष्य को मानव प्रकृति को पूरी तरह से समझने की संभावनाओं को ही नकार दिया गया था।

यहां तक कि जैसे देखना महज दृष्टि-प्रभाव है, सुनने की अनुभूति कर्ण-संवेदना है, उसी प्रकार आप पाएंगे कि ज्ञान, मैत्री, आविष्कार और शोध-सामर्थ्य तथा अन्य गुणों जैसे कि क्रोध, हंसी, प्यार और प्रतिशोध—कोशिकाओं, नसों, रक्त-कणिकाओं आदि जो मानव-शरीर में समाए हुए हैं—के सम्मिलित प्रभाव हैं।

मैं इस बारे में विस्तार से चर्चा करूंगा, इस तथ्य पर जोर देने के लिए कि मनुष्य सीधे-सीधे और पूरी तौर पर इन सब अभिक्रियाओं और गतिविधियों के लिए जिम्मेदार नहीं है।

आप देखते हैं कि कुत्ता मालिक का भरोसेमंद होता है, बिल्ली चोरी-चकारी करती है। उल्लू रात्रि में देख सकता है। बाज अपने लक्ष्य को बहुत दूर से पहचान सकता है। ये सब संभव हैं और ये प्राणी-विशेष की कोशिकाओं तथा शरीर के दूसरे अंगों के तालमेल की प्रवृत्ति पर निर्भर होते हैं। किसी भी प्राणी की गतिविधि उसके शारीरिक अंगों की व्यवस्था, तथा उसके अवयवों की प्रकृति, जिनसे उनका शरीर बना है—पर आधारित होती है। इसलिए मुझे एक चोर को ईश्वर, धर्म अथवा शास्त्र या कानून के आधार पर दंडित करने का औचित्य प्रतीत नहीं होता।

आप किसी मुर्गी को कीड़े-मकोड़े खाने के लिए कैसे दंडित कर सकते हैं। चूहे खाने पर बिल्ली को कैसे सजा सुनवा सकते हैं। ईश्वर किसी बाज को, कौओ और मुर्गियों पर झपटृा मारकर ले जाने के लिए दंडित कैसे कर सकता है? यदि ईश्वर इन सभी को दंडित करने में सक्षम है, तो वह दीमक को भी सजा सुनाने का सामर्थ्य रखता होगा जो लकड़ी से बने साज-सामान को खाकर नष्ट कर देती है। ईश्वर में उस कीचड़ को दंड देने का सामर्थ्य भी होना चाहिए, जो लोहे से बनी वस्तुओं के जंग का कारण बनता है।

अब मुझे विश्वास है कि मैं मानव शरीर की संरचना तथा उसके विभिन्न अंगों-उपांगों  के कार्यों के बारे में स्पष्ट चर्चा कर चुका हूं। आगे मैं आत्मा पर बातचीत करूंगा।

आत्मा

मनुष्य के शरीर तथा उसके अंगों के बारे में चर्चा करते समय, आपने देखा कि उसमें आत्मा के उल्लेख की कतई आवश्यकता नहीं है। मानव शरीर में जो भी पाया गया था, उसके बारे में बताया जा चुका है। शरीर के अंगों को देखा और अनुभव किया जा सकता है। शरीर के बारे में भली-भांति जानने-समझने में हमारे अनुभव ने हमारी मदद की थी। प्राप्त निष्कर्ष हमारी विवेक-बुद्धि को भी स्वीकार्य थे।

परंतु जब हम आत्मा पर विचार करने बैठते हैं, तो उसे हम न देख पाते हैं, न ही छू सकते हैं। हमें उसका कोई अनुभव नहीं है। इसलिए जहां तक ज्ञान का संबंध है, हम आत्मा के बारे में कुछ भी जुटाने में नाकाम सिद्ध होते हैं।

सीधे तौर पर ‘आत्मा’ का अस्तित्व अंध-आस्था और जड़-विचारशीलता पर निर्भर है। मानवीय विवेक अथवा उसके अनुभव का आत्मा के बारे में कोई योगदान नहीं है। फिर आत्मा क्या है? वह उतनी ही काल्पनिक रचना है, जितना कि ईश्वर। ईश्वर की न तो कोई आकृति है, न ही छवि। आत्मा भी ऐसी ही है। ईश्वर न तो दृश्यमान है, न उसे स्पर्श किया जा सकता है। आत्मा के बारे में भी यही सच है। ईश्वर की कोई निश्चित देहयष्टि या अंग अथवा अवयव जैसे कि आंखें, नाक, कान, मुंह, हाथ आदि नहीं हैं। आत्मा की भी यही स्थिति है। व्यक्ति न तो ईश्वर तक पहुंच सकता हैं, न ही उसे जान सकता है। आप न तो उसकी शक्तियों का आकलन कर सकते हैं, न उसके कार्यों का अवलोकन। कोई भी व्यक्ति ईश्वरीय सत्ता को तर्कशक्ति और भरोसेमंद तरीके से प्रमाणित करने में सक्षम नहीं है। ईश्वर की भांति आत्मा का अस्तित्व भी अप्रमाणित है। फिर हमें आत्मा की आवश्यकता क्यों पड़ती है? उसकी रचना किसलिए हुई है। किसने इन्हें रचा है। इसका लाभ कौन उठा रहा है? आप किसी भी स्रोत से इन प्रश्नों का उत्तर नहीं जान सकते। आपको सीधे तौर पर यह विश्वास करना होगा कि ऐसा कुछ नहीं है, जिसे ‘आत्मा’ की संज्ञा दी जा सके। ‘आत्मा’ कुछ ऐसी चीज है जिसका न तो परीक्षण किया जा सकता है, न ही जांचा-परखा जा सकता है।

लेकिन, ‘आत्मा’ के अस्तित्व को स्वीकारा गया है। ठीक ऐसे ही जैसे अधिकांश लोग ईश्वर और धर्म के अस्तित्व को, विशेष परिस्थितियों के कारण, स्वीकार कर लेते हैं। बाकी लोग जिनका न तो ईश्वर में विश्वास है, न ही धर्म में, जो विवेकवान हैं और जिन्हें तर्क करने का प्रशिक्षण मिला है, उन्हें आत्मा न तो आत्मा से कोई मतलब है, न ही उसे मानने की जरूरत है। आत्मा के दर्शन के बारे विचार करना आवश्यक है।

शरीर(स्पर्श), मुंह, नाक, कान तथा आंखों को पंच-इंद्रियां कहा जाता है। सोचना, बोलना तथा अन्य क्रियाएं ‘मुकारनम’ कही जाती हैं। यदि कोई वस्तु मानवीय संचेतना की इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरती है, उसके वास्तविक अस्तित्व को नहीं स्वीकारा जा सकता। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि ईश्वर किसी भी प्रकार की जांच अथवा साक्ष्य से परे है। लेकिन यह कहना कि सत्य तक पहुंचने के लिए कुछ भी और सभी कुछ परीक्षण से परे है, ‘सत्य’ शब्द को शब्दकोश से मिटाने की कोशिश करने  जैसा है।

‘आत्मा’ शब्द तमिल भाषा का शब्द नहीं है। इससे स्पष्ट है कि द्रविड़ प्रजाति के तमिलवासी, पुख्ता तौर पर आत्मा के दर्शन से अनभिज्ञ थे। आप ‘आत्मा’ का वर्णन केवल उत्तर की भारतीय भाषा संस्कृत में पा सकते हैं। अंग्रेजी शब्द Soul का अर्थ तथा उसकी व्याख्याएं ब्राह्मणों द्वारा की गई ‘आत्मा’ की परिभाषा और व्याख्या से मेल नहीं खाती।

आप मानव-शरीर में ऐसा कोई स्थान नहीं खोज सकते जो आत्मा के लिए निश्चित या निर्धारित हो। ‘आत्मा’ ऐसा कोई कार्य नहीं करती जिसका मनुष्य अथवा उसके शरीर से संबंध हो। मनुष्य के सभी अंग अपना-अपना काम करते हैं। जबकि आत्मा का शरीर में कोई कार्य नहीं है। हमारी इंद्रियां हमें अपने परिवेश को पहचानने का सामर्थ्य देती हैं। वह सब कुछ प्राकृतिक लगता है। परंतु ‘आत्मा’ के बारे में? वह क्या है? कहां रहती है? उसका कार्य क्या है?

‘आत्मा’ मानव शरीर के लिए अप्राकृतिक, अनैच्छिक और असंबद्ध वस्तु है।

कोई मशीन कैसे काम करती है? क्योंकि उसके सभी पुर्जे एक-साथ भली-भांति समायोजित किए गए हैं। घड़ी पर नजर डालिए। वह समय बताती है। अलार्म बजाकर वह मनुष्य को जगा देती है। इसके लिए घड़ी के भीतर तरह-तरह के पुर्जे लगे हैं। उन्हीं के अनुसार वह अनेक प्रकार के कार्य करती है।

यदि हम उसकी आगे जांच करने लगें तो हमें यह तथ्य स्वीकारना पड़ेगा कि वह घड़ी है, जिसमें अनेक पुर्जें यत्नपूर्वक और विशेषक्रम में जोड़े गए हैं, ताकि वह विशेष रूप से निर्धारित कार्यों को कर सके। इसके अलावा भला और क्या कहा जा सकता है? इस बात पर कौन विश्वास करेगा कि घड़ी के भीतर एक चमत्कारी भूत या वस्तु निवास करती है, वही घड़ी को उसके अलग-अलग कार्य करने के योग्य बनाती है। क्या इसपर कोई आंख मूंद कर विश्वास कर लेगा?

एक बार, आज से करीब पचास वर्ष पहले, एक ग्रामीण हमारी दुकान पर आया। उसने दीवार पर टंगी बड़े आकार की घड़ी की ओर देखा। उसने देखा कि घड़ी का पेंडुलम आगे-पीछे डोल रहा है। उसने घंटी की आवाज को सुना। वह आश्चर्य में पड़ गया। उसने पूछा वह आदमी कहां है जो घड़ी के पेंडुलम को हिला रहा है? वह जानना चाहता था कि वह आदमी कहां है जो घंटी बजाकर आवाज निकाल रहा है। मैंने मजाक में कहा कि दीवार के पीछे मौजूद एक आदमी ही सबकुछ कर रहा है। मेरी बात पर विश्वास कर वह मेरी प्रशंसा करने लगा—‘आप भगवान हैं! बड़े महाराज! आप अनेक लोगों को नौकरी पर रख सकते हैं।’

उस ग्रामीण को मैं भला क्या जवाब देता? यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि केवल वही लोग जिनकी मनोरचना उस ग्रामीण जैसी है—ईश्वर, धर्म और आत्मा पर भरोसा कर सकते हैं। इसके अलावा उनपर विश्वास करने का कोई और ठोस कारण नहीं है। आप ऐसी अनेक मशीनों को देखते हैं, जो आश्चर्यजनक कार्य कर रही हैं, जिन्हें करना मनुष्य के सामर्थ्य से परे हैं। उन मशीनों में ऐसी आत्मा जैसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे मनुष्य की गौरवशाली संपदा माना जाता है।

इस्लाम और ईसाई धर्म किसी आत्मा को नहीं मानते। बौद्ध धर्मावलंबी उसके अस्तित्व को नकारते हैं। मूल द्रविड़ों का भी ‘आत्मा के दर्शन पर विश्वास नहीं था। यह कैसे हुआ कि आज यह हमपर पूरी तरह से छाया हुआ है। इस तरह की काल्पनिक और अविश्वसीय वस्तु की रचना के पीछे क्या कोई वास्तविक तर्क है? आत्मा के बारे में जो बताया जाता है, क्या उसपर विश्वास किया जा सकता है? आत्मा का दर्शन केवल धर्म-विशेष पर लागू होता है। दूसरे शब्दों में आत्मा के बिना हिंदू दर्शन शून्य है।

‘आत्मा’ सत्य नहीं है। इसकी रचना केवल धर्म-विशेष की रक्षा हेतु की गई है। एक झूठ को ढकने के लिए, अनेक झूठों की आवश्यकता पड़ती है। इसी तरह एक मिथ्या धर्म और ईश्वर की रक्षा हेतु मिथ्या आत्मा की रचना की गई है। आधारहीन हिंदू दर्शन को स्थापित करने के लिए, ब्राह्मणों द्वारा अनेक आधारहीन दार्शनिक प्रत्ययों यथा आत्मा, स्वर्ग, नर्क, भाग्य, कर्म की रचना की गई है।

हम मनुष्य के बारे में क्या पाते हैं? वह जन्म लेता है। बड़ा होता है। अपने शारीरिक एवं बौद्धिक सामर्थ्य के अनुसार काम करता है। तदनंतर मर जाता है। मृत्यु पश्चात उसे या तो जला दिया जाता है, अथवा दफना दिया जाता है। उसके बाद दुनिया से उसका संबंध टूट जाता है। यही सत्य है जिसे हम मानव जीवन में घटते हुए देखते हैं। इसके अतिरिक्त अनावश्यक रूप से अंधे होकर किसी दूसरे दर्शन पर भरोसा करने की क्या आवश्यकता है?

आत्मा की अवधारणा के सर्जक ने इतनी जहमत क्यों उठाई। आत्मा को एक परमाणु से भी छोटा बताया जाता है। बताया जाता है कि वह बहुत महीन, संवेदनशील मगर अदृश्य वस्तु है, जिसे अनुभव नहीं किया जा सकता। आत्मा का कार्य मनुष्य के विचारों और कार्यों का चयन करते हुए, उसमें से अच्छे कार्यों को अलग करते हुए मनुष्य को अच्छे पदार्थों तथा कार्यों की ओर प्रवृत्त करना है। इसके मायने क्या हैं? क्या आप कुछ भी समझ पा रहे हैं?

हम कुछ ऐसा कहने जा रहे हैं कि एक आदमी जो न तो जन्मा है, न कि किसी स्थान पर पाया गया है, को दुष्कर्मों के लिए अविश्वसनीय दंड से गुजरना होता है। उन दुष्कर्मों के लिए जो वास्तव में उसने किए ही नहीं हैं। आप इस तुलना से क्या समझते हैं।

मान लीजिए घड़ी सही समय नहीं बताती है, इसमें दोष किसका है? उस आदमी का हो सकता है जिसने घड़ी को बनाया है। इसके पीछे उस आदमी की लापरवाही भी हो सकती है, जिसे उस घड़ी की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया है। यह उस आदमी की चूक हो सकती है, जिसने समय देखा था। इन सब आदमियों को छोड़कर जिनका घड़ी से कोई न कोई संबंध है, यदि कोई घड़ी की ‘आत्मा’ पर सारा आरोप मढ़ देता है, और बाद में यह भी नहीं बताता कि आत्मा क्या है, आत्मा कहां है—ऐसे में किसी भी गड़बड़ी के लिए आत्मा को सीधे-सीधे दोषी ठहराना और दंड निर्धारित कर देना, कहां तक उचित होगा? क्या आप नहीं सोचते कि यह बड़ी धोखादड़ी है? इसी प्रकार, किसी आदमी द्वारा किए गए कृत्य को आत्मा से जोड़ देना और आत्मा के ऊपर दंड थोप देना—इससे भी बड़ी धोखादड़ी है।

किसी व्यक्ति के लिए आत्मा का महत्त्व कितना है? एक जीवित प्राणी की जिम्मेदारियां और कर्तव्य क्या हैं? हरे-भरे वृक्षों यहां तक पौधों और झाड़ियों को भी इनमें शामिल कर लीजिए। कोई भी वस्तु या जीव जो जन्म लेता है, अंततः नष्ट हो जाता है। किसी भी चीज को जन्मते हुए देखिए। वह कुछ समय तक रहेगा, अंततः मर जाएगा। किसी भी जीवित प्राणी का जीवन तथा उसके द्वारा किए गए कार्य उसके शरीर की संरचना तथा प्रकृति पर निर्भर होते हैं। जीवित प्राणी, वह चाहे जो भी हो, अपने जीवन में अपने कार्यों तथा जीवन जीने के तरीकों के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार नहीं हैं।

हम मानते हैं कि मनुष्य के आचरण में कुछ अच्छाइयां होती हैं, तो कुछ बुराइयां भी होती हैं। ऐसे में आत्मा को अच्छी राह बताने और भटकाने के लिए क्यों रचा जाना चाहिए? हम केवल कुछ कार्यों को अच्छा कैसे ठहरा सकते हैं? अच्छे या बुरे कार्यों को निर्धारित करने का क्या कोई सार्वभौमिक मानक या सर्वस्वीकार्य पैमाना है? फिर हम कैसे कहें कि हमारी आत्माओं को मृत्योपरांत अच्छे कार्यों के लिए अच्छी चीजें प्राप्त होती हैं। हम इस पर कैसे विश्वास कर सकते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा को बुरे कार्यों के लिए दंड से गुजरना पड़ता है। ये सब कितनी मजेदार बातें हैं। कृपया इन पर विचार कीजिए। इन सबका प्रमाण कहां है? हम ‘आत्मा’ और उसके कार्यों पर भला कैसे विश्वास कर सकते हैं। हम यह कैसे मान सकते हैं कि ‘आत्मा’ केवल अपने अच्छे कार्यों के कारण ‘मोक्ष’ प्राप्त करती है? क्या इसे कोई भी, किसी भी तरीके से प्रमाणित कर सकता है? इसलिए मैं सोचता हूं कि अब आप यह समझ चुके हैं कि आत्मा का दर्शन झूठा और ऊटपटांग है। आप किसी भी रास्ते से सोचिए, आत्मा की रचना का कोई औचित्य नहीं है।

संक्षेप में आत्मा हवा में खड़ा किया गया महल है।

व्यक्ति अपनी वस्तुओं की पहचान के लिए सीधे-सरल तरीके से यह ‘मेरी’, ‘मेरी अपनी’ और ‘मुझसे संबंधित है—कहता है। यदि वह कहे, ‘मेरी आत्मा’ इसलिए क्योंकि वह बिना जाने कि आत्मा क्या है, खुद को पहचानने की सुविधा प्रदान करती है। वास्तव में ‘मेरी आत्मा’ यह कहना ही अर्थहीन है।

जीवन आखिर क्या है? यह स्वयं एक विचारमात्र है। असल में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे जीवन कहा जाए। कुछ कहते हैं, जीवन आत्मा है। दूसरे कहते हैं आत्मा ही जीवन है। कुछ विद्वान कहते हैं जीवन कुछ भी नहीं है। कुछ मानते हैं कि जीवन कुछ ऐसा है जो आत्मनिर्भर होकर कार्य करता है।

जीवन

जीवन कोई वस्तु नहीं है। यदि यह वस्तु होता तो इसमें गति हो सकती थी। हम इसकी तुलना उस मशीन से कर सकते हैं, जो काम करती है। उसके चलने से बाकी हिस्से भी काम करते हैं। इसी तरह जीवन का कार्य है, शरीर के दूसरे सभी हिस्सों को संबंधित, कार्यों की ओर प्रवृत्त करना। यदि जीवन ऊर्जा है जो लोगों को काम करने के लिए चाहिए, यह(शरीर) भोजन के समान है, जो शरीर को क्रियाशील बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक है। शरीर तथा उसके अंगों के निर्माण का चाहे जो उद्देश्य हो, यदि भोजन न मिले तो उनमें से कोई अंग काम नहीं कर पाएगा। इसलिए हम कह सकते हैं कि जीवन उस भोजन की देन है, जिसे हम ग्रहण करते हैं।

यदि शरीर के अंगों को किसी प्रकार की क्षति पहुंचे तो जीवन ठहर जाता है। यदि भोजन न मिले, तब भी जीवन ठहर जाएगा। शरीर की सारी गतिविधियां शांत हो जाएंगी। इसलिए जहां चेतना है, उसे हम मनुष्य कहते हैं। कह सकते हैं कि वही जीवन है। जब मनुष्य की गतिविधि थम जाएगी, वह लाश बनकर रह जाएगा। उस समय वह मनुष्य नहीं रहता। मृत्यु से क्या अभिप्राय है? यदि शरीर में सांस लेने और सांस छोड़ने की ताकत न रहे, तो कहा जाता है कि फेफड़े कमजोर पड़ चुके हैं। जब फेफड़े काम करने के लायक नहीं रहते, मनुष्य सांस लेने के काबिल नहीं रहता।

चूंकि मनुष्य का जीवन ही ऐसा है, वह व्यक्तिगत रूप से अपने सामान के बारे में बताने तथा उसकी ओर इंगित करने के योग्य होता है। दूसरे प्राणी भी अपने बारे में समझने की योग्यता रखते हैं।

यदि आपके पास कुत्ता है, जिसका नाम ‘गुलाब’ है, तो जब भी आप उसके नाम से पुकारेंगे, वह आपकी ओर चला आएगा। अनेक कुत्ते वैसी ही हरकतें करते हैं, जैसी हमें पसंद हैं। वे हमारे आदेश को समझते तथा उसपर अमल करते हैं। दूसरे प्राणी भी अपनी चीजों की समझ रखते हैं। वे अपने घौंसलों, बाड़ों और अपने बच्चों की जानकारी रखते हैं। यदि आप किसी आदमी से पूछें कि उसके लिए जीवन या आत्मा के क्या मायने हैं, वह वर्णन नहीं कर पाएगा। क्यों? इसलिए कि वे उससे संबंधित वस्तु विशेष; अथवा उसके शरीर का कोई हिस्सा नहीं हैं। वह उन रासायनिक अभिक्रियाओं से अनजान है, जो उसके भीतर बदलाव का कारण बनती हैं, तथा उसे वस्तु-जगत का अनुभव कराती हैं। यदि केसर और चूना को मिला दिया जाए, तो लाल रंग बन जाता है। नीला और पीला रंग मिलने पर हरा रंग बनाते हैं। आक्सीजन और हाइड्रोजन का यौगिक जल कहलाता है। इसी तरह जहर भी विशिष्ट तत्वों से मिलकर बनता है। कुछ रसायनों में उबाल आता है। उबलने के बाद कुछ चीजें कठोर हो जाती हैं।  गर्म किए जाने पर कुछ पदार्थों का वाष्पीकरण होने लगता है।

इसलिए जब हम कुछ पदार्थों को मिलते हुए देखते हैं, उस समय उनमें अनेक परिवर्तन होते हैं। यही परिवर्तन का प्राकृतिक नियम है, जिसे लोग भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। उदाहरण के लिए आप किसी संगीत-बॉक्स(रेडियो, ट्रांजिस्टर) को देखिए। नॉब को घुमाने भर से उससे विभिन्न प्रकार के राग और गीत फूटने लगते हैं। जब हम उसकी आवाज सुनते हैं, तभी हम उसकी धुनों, रागों आदि को पहचानने में सक्षम होते हैं। आपने गीतों के पल्लवी, अनुपल्लवी और चरणम् को सुना होगा। वे कैसे लगते हैं। संगीत-बॉक्स को जरूरी उपकरणों के साथ इन सब कार्यों के लिए सक्षम बनाया जाता है। हालांकि वह गीत-संगीतादि को स्वयं अनुभव नहीं कर पाता।

इसी प्रकार शरीर में विभिन्न अंगों के माध्यम से मनुष्य बोलने, सोचने, देखने, सुनने, निर्देश देने, हंसने, चीखने, कूदने, झगड़ने, मारने-पीटने और खोजबीन के कार्य के योग्य होता है। मानव-शरीर में पाए जाने वाले ऐसे प्रबंध मनुष्य को विभिन्न कार्यों को मिलकर करने का सामर्थ्य प्रदान करते हैं। यदि हम इसे समझ लें, हम जीवन या आत्मा को इतर वस्तु मानने से इन्कार कर देंगे। वह महज अनुचित अवधारणा और अंध-आस्था का परिणाम है।

यदि हम आत्मा की उत्पत्ति की खोज के लिए आगे बढ़ें तो आप पाएंगे कि वह धर्म तथा ईश्वर में विश्वास द्वारा गढ़ी गई है।

सामान्यतः आत्मा का संबंध केवल मनुष्यता से बताया जाता है, किसी अन्य प्राणी से नहीं। वेदांती, जो वेदों के अध्येता विद्वान हैं, वे भी मानते हैं कि ईश्वर, आत्मा, जीवन तथा अन्य जीवित प्राणी मात्र एक अनुभूति हैं। यही कारण है कि दर्शनशास्त्र को वेदांत के समान बताया जाता है। सामान्य तौर पर वेदांती मानते हैं कि जो पहले स्वयं को जान लेता है, वह ईश्वर को समझने की योग्यता प्राप्त कर लेता है। उनके इस कथन का अभिप्राय क्या है? यदि मनुष्य यह जान ले कि खुद को समझने का अर्थ क्या है, उसकी अहमन्यता ईश्वर को समझने की योग्यता प्राप्त कर लेता है।

मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है। वह अपने लालच का दास का है। समाज में वह दूसरों के लिए अच्छा करता है या बुरा। कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है। मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा। यह भी एक मिथ मात्र ही है। तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता। उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

मनुष्य अच्छे और बुरे दोनों कर्मों से बंधा हुआ है। जब तक वह जीवित है, तब तक उसके कर्म शरीर के विभिन्न अंगों के काम करने के ढंग पर आधारित होते हैं। इस तरह उसके कर्म अच्छे हो सकते हैं, या फिर बुरे। इसके अलावा कोई कार्य जो किसी के लिए बुरा लगता है, वह दूसरों के लिए अच्छा हो सकता है।

ईश्वर, धर्म और आत्मा की खोज मानव जीवन को नियमित करने के लिए हुई है, इसके पीछे मनुष्य की सदेच्छा छिपी है।

उनके अस्तित्व को वास्तविक मानने वाले लोग स्वार्थी और शोषक लोग हैं।

अपने वक्तव्य के समापन से पूर्व मैं मनुष्य द्वारा निःस्वार्थ जीवन जीने की महत्ता पर जोर देना चाहूंगा।

मैंने जो भी कहा, वे मेरे निजी विचार हैं। मैं नहीं कहता कि आप मैने जो भी कहा, उस पर विश्वास करें।

बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय तक पहुंचना अब आपके ऊपर है।

कृपया इन सब बातों पर विचार कीजिए

आप सभी का धन्यवाद….

अंग्रेजी से अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप