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धर्म के बहाने बौद्धिक जड़ता का सनातनीकरण

सामान्य

आधुनिकता की ओर बढ़ती आज की दुनिया के आगे सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न है—क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना उसका कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं। धर्मानुयायी मानते हैं कि आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते। धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे  समझना आसान नहीं है। इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेति-नेति’ कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचना-समीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मान लिया जाता है। असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, अथवा किसी न किसी बहाने उनपर थोप दी गई हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते। न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा को लांघने की हिमाकत करे। हम धर्म को ऐसी हवेली मान सकते हैं, जिसके अनेकानेक दावेदार हैं। कदाचित इसी कारण वह हजारों वर्षों से बंद है। ताजी हवा का प्रवेश भी उसमें निषिद्ध है। यहाँ तक कि उसके भीतर झांकने की इजाजत भी किसी को नहीं है। यदि कोई उस हवेली के भीतर जाकर झाड़-पौंछ करना चाहे तो उसके दावेदार नाराज हो जाते हैं। डरते हैं कि हवेली साफ हुई तो उनकी सत्ता गई। बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए वे कई बार इतनी कुटिल चालें चलते हैं कि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली उनके आगे घुटने टेक देते हैं। जनसाधारण को बस इतनी अनुमति होती है कि अपने विवेक को गिरवी रखकर उस हवेली के दूर से ही दर्शन कर सके।

ऐसा आज से नहीं, सैकड़ों वर्षों से है। मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण मीमांसक कुमारिल भट्ट हैं। अपने समय के विलक्षण प्रतिभाशाली कुमारिल भट्ट ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। बौद्ध पराजित हुए। लेकिन कुमारिल भट्ट अपनों से हार गए। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें धीमी आंच में तपकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की अनुमति लिए बिना बौद्धमत का अध्ययन किया था। हिंदू धर्म में व्याप्त जड़ता, गुरुडम तथा नए और समकालीन ज्ञान-विज्ञान से जान-बूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए यहाँ उनकी विशेष चर्चा प्रासंगिक है।

शंकराचार्य से एक पीढ़ी, लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे। उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था। कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है। वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी। राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी। बौद्ध दर्शन सनातन वर्ण-व्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था। द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था। राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं। अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक ग्रंथों के अध्ययन-अनुशीलन में लगे थे। गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे। वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी। उसने रोते-रोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

‘क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

‘हे सुकुमारे! रो मत!! वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा’1 राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला। कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्म-दर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्म-दर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था। लक्ष्य-सिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया। तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म-दर्शन की जमकर आलोचना की। यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया। लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही। इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया। बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्ति-कथा लिखी। इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं।

वेदांत की ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशी-मार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे। अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे। उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था। उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया। कुमारिल भट्ट को अग्नि-शैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए। धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसाद-जनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्नि-चिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्मदहन का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्म-ग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए। लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे। धार्मिक वाद-विवाद प्रायः जीवन-मरण का सवाल बन जाता था। ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था। शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र, वेदांती सुरेश्वराचार्य बनकर उसके प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। उसके बाद मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है।

इस प्रसंग के कुछ खास संकेत हैं। पहला प्राचीन गुरु नहीं चाहते थे कि उनका शिष्य ज्ञान और यश में उनसे आगे जाए। दूसरे प्राचीन ऋषियों के लिए बौद्धिक शास्त्रार्थ शारीरिक कुश्ती से भी गया-गुजरा था। कुश्ती में हारा हुआ पहलवान नई तैयारी और हौसले के साथ उसी पहलवान को दुबारा चुनौती दे सकता है। लेकिन शास्त्रार्थ में विजेता, पराजित व्यक्ति के तन और मन दोनों पर अधिकार जमा लेता था। व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी। केवल विजेता का धर्म रह जाता है। कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी।

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जैन और बौद्ध धर्म-दर्शन इसके अपवाद थे। यहाँ जैन दर्शन की तो हमें खास तौर पर प्रशंसा करनी होगी। वैदिक हिंसा और गलाकाट बौद्धिक स्पर्धा के बीच उसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा था। वह विभिन्न विचारों को स्वतंत्र रूप से, एक-दूसरे के समानांतर बहने की अनुमति देने का उदारतापूर्ण विधान था। इसके अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है। प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है। वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता। चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है। वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है। ‘स्याद्वाद’ का दर्शन, वैदिक दर्शन की वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था। लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे; और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था। ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्व न था। अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया।

‘स्याद्वाद’ से पता चलता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था। उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं। उनमें कोई द्वैष न हो। यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा। मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका। यह बात भुला दी गई कि हिंसा प्रधान समाज में वैचारिक अहिंसा का टिके रहना असंभव है। वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक, ‘स्याद्वाद’ जैसे दर्शन के कमजोर पड़ने का परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने न केवल दूसरे विचारों की ओर से अपने आँख-नाक-कान बंद कर लिए, अपितु गैर-ब्राह्मण उनके धर्म-ग्रंथों के पढ़ न पाएँ, इसके लिए भी उनपर बड़े-बड़े प्रतिबंध थोप दिए।

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हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं। हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्नि-शिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ। संभवत: उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो। यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! यह भी संभव है कि  वेदोक्त धर्म-दर्शन के शीर्ष-पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा के साथ निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हों, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके। इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की। आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोल-मोल कर जाते हैं। हिंदू परंपराओं के जानकार के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्व देती है। उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है। उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती।

यहां एक किस्सा याद आ रहा है। रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था। मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

‘बहुत पवित्र मंत्र है। जिसे बताओगे वह तर जाएगा।’

‘जी….गुरु जी।’ रामानुज ने गुरु का धन्यवाद किया।

‘लेकिन एक शर्त है। इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना।’

‘अपात्र कौन?’

‘शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है।’

‘यदि मैं ऐसा करूं तो….’

‘घोर पाप….घोर पाप। सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए। रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया। गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्र-अपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा। गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तब रामानुजाचार्य ने कहा—

‘आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

‘मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

‘यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौ-सौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है।’ रामानुज का उत्तर था।

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं। लेकिन उनके साथ अप्रत्यक्ष स्पर्धा में जीत शंकराचार्य की हुई थी। कैसे? रामानुज विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्त्तक थे, और शंकराचार्य अद्वैत के। रामानुज मानते थे कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, मगर संसार में आकर उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है। शंकराचार्य आत्मा और परमात्मा को एक मानते थे। ब्राह्मणों ने घोषित रूप से शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया। इस्लाम के सूफीवाद की और से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए यह जरूरी था। किंतु आत्मा और परमात्मा एक हैं, इस आधार पर सभी मनुष्य बराबर हैं—इस सत्य को वे कभी गले से नहीं उतार पाए।  

हम यह नहीं कहते कि रामानुज का विशिष्टाद्वैत आदर्श दर्शन है। असल में न तो स्वर्ग होता है, न ही नर्क। मुक्ति स्वयं एक मिथ है। अतएव ऊपर दी गई कहानी को उसकी प्रतीकात्मकता, यानी सामाजिक संदर्भों में समझना चाहिए। कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय हो सकता है, और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है। पूर्ण नैतिकता तब होगी जब बाकी सब लोग, व्यक्ति विशेष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की ठान लें।

अपने मान-अपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे मनीषी की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते। मगर परंपरा से भयभीत शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं। बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक यशपाल ने खूब समझा था। वे लिखते हैं—

‘कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे। पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था….द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाले बौद्ध दर्शन की सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग—द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है। अतः बौद्ध दर्शन से ‘फाइट’ करना आवश्यक है।’2 

कुमारिल भट्ट के प्रायश्चित की घटना द्वारा हम, न केवल उनकी मनोरचना, अपितु तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान को  भी समझ सकते हैं। उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभी-कभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है। कुमारिल भट्ट के जीवन का ही एक किस्सा और है। उन्होंने बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु नालंदा विश्वविद्यालय में छद्म नाम से प्रवेश लिया था। बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे। बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यही मुख्य वजह थी। जब उनके बारे में विश्वविद्यालय में पता चला तो सब बहुत कुपित हुए। कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला कर लिया। जब वे लड़के कुमारिल भट्ट को ढकेलने जा रहे थे, तब उन्होंने उन सभी को सुनाते हुए कहा था—

‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी।’

संयोगवश वे सकुशल बच गए। उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं। वह विवेक पर  अंधश्रद्धा की जीत थी। आत्मदहन से पहले कुमारिल भट्ट ने विपुल वाङ्मय की रचना की थी। लेकिन विलक्षण मेधा के बावजूद वे मीमांसा दर्शन को वह सम्मान दिलाने में नाकाम रहे, जिसके वे आचार्य थे। जिसके लिए उन्होंने बौद्धों को पराजित करने की कामना के साथ गुरु-द्रोह किया था। मंडन मिश्र के पराजित होते ही मीमांसा दर्शन लगभग पूरी तरह उखड़ गया।

शब्द की कसौटी शब्द; और विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है। बावजूद इसके चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से किसी विचार या वस्तु को प्रमाणित करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बहुत पुरानी है। रूढ़ियों को विचारधारा का रूप देने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण भी कई हैं। कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था। तरकीब निराली थी। यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था। अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जल-समाधि के लिए छोड़ दिया जाता था। समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी। लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था। बाद में उस तालाब को पाट दिया गया। इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिए गए।

बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं। अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल, पूर्ण कस्सप जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे। वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था। इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र ग्रंथ हमें प्राप्त नहीं होता। इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और लोकतंत्र के इस दौर में होना तो यह चाहिए कि हम इतिहास से कुछ सबक लें, किंतु विचार के नाम पर जड़ता और धर्म-दर्शन के नाम पर असहिष्णुता निरंतर बढ़ती ही जा रही है। शायद ऐसी ही परिस्थितियां डॉ.  आंबेडकर की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ लिखने की प्रेरणा बनी थीं।

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धर्म से अपेक्षा की जानी चाहिए कि राजनीतिक और आर्थिक कार्य-कलापों से दूर, नैतिक व्यवस्था बने। लेकिन व्यवहार में वह ऐसा धंधा है जो बिना निवेश के स्थायी लाभ देता है। अमीर जनसाधारण की धार्मिक भावनाओं के दोहन के लिए मंदिर बनवाता है। नियमित पूजन-अर्चन के लिए पुजारी स्वयं हाजिर हो जाता है। जो कुछ ज्यादा अमीर है, वह पुजारी और पूजा का खर्च भी उठा लेता है। ऐसे धनाढ्य को मंदिर की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके बावजूद पुजारी उसे धर्म-रक्षक, ईश्वर प्रेमी, भक्त शिरोमणि, ईश्वरानुरागी जैसी पदवियां सौंपता है। इससे उसको व्यापार करने, व्यापार के नाम पर मनमाना लाभ कमाने की छूट मिल जाती है। अपने बनाए मंदिर में व्यापारी स्वयं पूजा करे, आवश्यक नहीं है। इसके लिए वह मंदिर बनवाता ही नहीं। पूजा-पाठ उसके लिए तीसरे-चैथे दर्जे या  बैठे-ठाले का काम होता है। अवसर विशेष को छोड़कर वह उस ओर झांकता तक नहीं है। केवल पुजारी को दी गई तनख्वाह और यदा-कदा की दान-दक्षिणा से उसका ‘धर्म’ सधता रहता है। पुराने जमाने में इसलिए प्राचीन राजा-महाराजा, जमींदार, सेठ आदि का धर्मालय प्रवेश भी खास घटना हुआ करती थी। आज भी व्यापारी वर्ग मोटे दान-दक्षिणा द्वारा वह पुरोहितों को प्रसन्न रखता है। बदले में पुजारी वर्ग उसके मुनाफा कमाने के तरीकों, व्यापारिक अनाचार और भ्रष्टाचार की ओर से आंख मूंद लेता है। गलती के लिए आर्थिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराने की तो मानो उस युग में परंपरा ही नहीं थी। इसलिए भारतीय और विश्व वाङ्मय में राजनीतिकों के अनाचार और दुराचार के किस्से तो अनगिनत हैं, यहां तक कि देवताओं को भी नहीं छोड़ा गया है, मगर आर्थिक दुराचार के बारे में चर्चाएं नगण्य हैं। यहां कुबेर के खजाने का बखान हुआ है। राजा-महाराजाओं, सेठ-साहूकारों के खजाने को भी कुबेर का खजाना कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा है। उस खजाने में धन कैसे आता है, कहां से आता है, धनार्जन के रास्ते नैतिक हैं या अनैतिक—इस पर चर्चा कम ही हो पाती है। हालांकि कौटिल्य, कात्यायन, याज्ञवल्क्य आदि ने कराधान और राज्य के वित्त प्रबंधन संबंधी आवश्यक निर्देश दिए गए हैं, लेकिन उनका वास्तव में कितना पालन होता था, उल्लंघन करने पर कब, किसे, कितना दंड दिया गया था, इस तरह का कोई उदाहरण धर्म-ग्रंथों में नहीं मिलता।

धर्म के नाम पर जीवन के जरूरी सवालों से बच निकलने के प्रसंग इतिहास में अनगिनत हैं। धर्मानुयायी आस्थावादी दृष्टि से उनका महिमामंडन करते हैं। लेकिन विमर्श से बच निकलते हैं। यदि कहीं फंसते हुए दिखें तो ‘नेति-नेति’ कहकर तत्काल पीछा छुड़ा लेते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि धर्म आज भी समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए मानवीय कम, आस्था का विषय ज्यादा है। हालांकि अपनी नैतिक प्रेरणाओं के लिए करोड़ों लोग धर्म पर आज भी आश्रित हैं। धर्म उनके लिए अस्मिता का मसला है। धर्म-विहीन जीवन के बारे में वे सोच भी नहीं सकते। हरिद्वार के कुंभ और गढ़-मुक्तेश्वर के गंगा मेले को देखिए, श्रद्धालुओं का चारों ओर से उमड़ता हुआ हुजूम….कड़कड़ाती ठंड और वर्फ-से हाड़ जमा देने वाले पानी में, आपको सत्तर-अस्सी वर्ष तक के बूढ़े-बूढ़ियां गोते लगाते हुए नजर आएंगे। अनगिनत कष्ट सहकर भी वे खुद को धन्य मानते हैं; या यूं कहो कि श्रद्धातिरेक में काया-कष्ट को भूल जाते हैं। माक्र्स इसे अफीम कहता है। कदाचित धर्म एक नशा है भी। वाल्तेयर, फायरबाख, ब्रूनो बायर, मिखाइल बकुनिन, बर्ट्रेण्ड रसेल जैसे विचारकों ने भी अलग-अलग अंदाज में धर्म को नशा और शोषण का जरिया माना है। लेकिन जब कोई नशा ही समाज के अधिसंख्यक लोगों को प्रिय हो, लोग उसको अपनी पहचान से जुड़ा हुआ मानते हों, और जो पूरी दुनिया के तीन-चौथाई से ज्यादा लोगों की जीवनचर्या को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता हो, तब उसके प्रति एकाएक उपेक्षा या तिरस्कार-भाव कैसे संभव है? क्या ऐसा करना लोगों की नैसर्गिक स्वतंत्रता का अपमान नहीं है? अवश्य होता; बशर्ते मनुष्य अपना धर्म स्वयं तय करता। उसको अपना ईश्वर चुनने का अधिकार होता और जन्म के साथ ही धर्म उसपर थोप नहीं दिया जाता। यह किसी से छिपा नहीं कि जन्म के समय शिशु का मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है। कम से कम ईश्वर और धर्म को लेकर तो वह कुछ भी नहीं जानता। ऐसे में जन्म के साथ ही शिशु के धर्म और ईश्वर का निर्धारण कैसे संभव है! क्या यह खुली हवा में पहली सांस के साथ ही मनुष्य के विवेक को बांध देने की साजिश नहीं है? असल में यह धर्म के आधार पर संगठित होने वाले समाजों का मूक समझौता है, जिसके आधार पर वे अपने अनुयायी बांटते रहते हैं।  

धर्म की प्रमुख विशेषता उसका लचीलापन, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की ताकत है। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार कैसे बदलना है, यह तय करने का अधिकार जनसाधारण को नहीं होता। तय करता है पुरोहित वर्ग। इस काम को वह शास्त्रों की  दुहाई देकर करता है। यहां शास्त्र व्यापक पद है। उसमें ग्रंथों के अलावा श्रुति, परंपरा, यहां तक की शास्त्र के नाम पर मनमानी और अपने मत को ही प्रामाण्य मानने के दुराग्रह के साथ, एकाएक गढ़ ली गई संकल्पनाएं भी शामिल होती हैं। शास्त्रीय पैमाने पुरोहित वर्ग पर भी ज्यों की त्यों लागू हों, यह आवश्यक नहीं है। उनके लिए आपद् धर्म की व्यवस्था हर समय रहती है। जीवन महत्वपूर्ण है इसलिए क्षुधा पीड़ित विश्वामित्र की जीवन रक्षा हेतु मृत पशु का मांस खाने की अनुमति शास्त्र देते हैं। यह इजाजत सभी को; और हमेशा नहीं थी। जो धर्म भूखे विश्वामित्र के प्राण बचाने के लिए लचीलापन दिखाता है, वह महाभारत में राजनीति के साथ जुड़कर बेहद आक्रामक हो जाता है। वहां पांच पांडव बंधुओं को न्याय दिलाने के नाम पर महाभारतकार अठारह अक्षौहिणी सेना को युद्ध की आग में झोंक देने की घटना को धर्म युद्ध की संज्ञा देता है, जिसमें सब कुछ ऊपर से तय होता है और तथाकथित धर्म के नाम पर 19,68,300 सैनिक, 3,93,660 हाथी तथा 11,80,980 घोड़े युद्ध की बलि चढ़ा दिए जाते हैं।

साफ है, सामान्य व्यवहार में धर्म केवल आध्यात्मिक विषय नहीं रह जाता। उसमें शीर्षस्थ वर्ग की स्वार्थपूर्ण राजनीति, उसके मनसूबों और महत्वाकांक्षाओं को साधने का पूरा व्यवहारशास्त्र होता है। नैतिकता का आवरण तो लोगों को लुभाने के लिए होता है। समाज में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ प्रावधान आवश्यक हैं, जैसे—‘अपने पड़ोसी से प्यार करो, सत्यभाषी बनो, आवश्यकता से अधिक संचय मत करो, सभी जीवों पर दया, क्षमा, धृत्ति, करुणा, परोपकार आदि। धर्म की ये व्यवस्थाएं उसके चेहरे को मानवीय बनाती हैं। उसके लिए लोगों के दिल में जगह पैदा करती हैं। जनसाधारण उनसे यथोचित प्रेरणाएं भी लेता है। लेकिन यदि किसी क्षण पुरोहित वर्ग की मदद या व्याख्या की जरूरत आ पड़े तब वह धार्मिक प्रावधानों का उपयोग निहित स्वार्थ के लिए करता है। स्थितियां प्रतिकूल हों तो धर्म तत्क्षण अपने दिखावटी रूप को सामने लाकर उदार सामाजिक मूल्यों का हवाला देने लगता है। चूंकि नैतिकता के स्तर पर सभी धर्मों में अनूठी समानता है, इसलिए उस स्तर पर वे सभी विद्वेष एकाएक मिट जाते हैं, जिन्हें धर्म से जुड़ा सांप्रदायिक सोच जन्म देता हैं। सच तो यह है कि उस समय सिवाय कर्मकांडों और मिथकीय कल्पनाओं के धर्म का अपना कुछ रह ही नहीं जाता, बल्कि दबाव मैं धर्म स्वयं उन्हें दूसरे दर्जे का मानने लगता है। लेकिन दबाव हटते ही धार्मिक दुराग्रह फिर प्रबल होने लगते हैं। वर्गीय सोच के कारण प्रत्येक धर्म किसी न किसी रूप में सामाजिक स्तरीकरण का समर्थन करता है। ऊंच-नीच को स्थायी बनाता है।

ऐसे धर्म की जरूरत आखिर किसे है? पूंजीपति को या जनसाधारण उपभोक्ता को? मेरा उत्तर होगा, दोनों के लिए। पूंजीपति की धार्मिक प्रतीकों में कोई आस्था न हो तो भी वह स्वयं को धार्मिक इसलिए दर्शाता है, क्योंकि उसको अपना सर्वस्व समझने वाले गरीब, मेहनतकश यह मानते हुए कि उसकी संपन्नता के पीछे उसकी चालाकियां, अंधाधुंध मुनाफाखोरी, लालच, झूठ और बेईमानी न होकर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है, उसकी ओर से उदासीन हो जाते हैं। इससे केवल अपने लाभ के लिए उत्पादन करनेवाली पूंजीपति कंपनियों को बढ़ावा मिलता है। इस तरह धर्म सचाई पर पर्दा डालने का काम करता है। उल्लेखनीय है कि अमीर के लिए धर्म का अभिप्राय धार्मिक प्रतीकों, रीति-रिवाजों में आस्था तक सीमित नहीं होता, न वह केवल स्वर्ग के सुखों तक फैला होता है, बल्कि वह उसकी सीधी-सादी व्यापारिक रणनीति का हिस्सा होता है। धर्म की शरण में जाकर अमीर अपने इस जन्म की समृद्धि को पक्का करता है। जबकि गरीब अपने लिए सहनशीलता की मांग करता है, ताकि वर्तमान दुख-अभाव, उत्पीड़न की मार से बच सके। इसी खातिर वह अपने दुखों से खेलता तथा गरीबी और दुश्वारियों को गले लगाता है। वह ताकतवर के अत्याचार को नतभाव से सह लेता है। केवल इस उम्मीद में कि सब कुछ ईश्वर के नाम कर देने से या उसके नाम पर अपने दुखों की ओर से उदासीन हो जाने पर वह प्रसन्न होगा। बदले में उसका भविष्य बेहतर होगा। दूसरे शब्दों में धर्म धनवान और शक्तिशाली के हितों की तात्कालिक सिद्धि करता है, जबकि कमजोर को भरमाता है। उसे प्रलोभन से बांधे रखता है। उल्लेखनीय है कि धर्म और ईश्वर का महिमा-मंडन केवल आस्था-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहता। उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ भी होते हैं। जो मनुष्य को अपनी सीमाओं में बांधते हुए सामाजिक असमानता में उत्तरोत्तर वृद्धि करते हैं।

ईश्वर नामक काल्पनिक और गढ़ी गई सत्ता का प्रयोग प्रायः दो प्रकार के लोग करते हैं। एक जो उसे चाहते या उससे डरते हैं; तथा डर और चाहत के चलते यथा-सामर्थ्य वह सबकुछ करते हैं, जैसा उनसे पुरोहितवर्ग द्वारा कराया जाता है। दूसरे वे जो लोगों पर उसके प्रभाव का उपयोग निहित स्वार्थ हेतु करते हैं। जो लोग ईश्वर को चाहते या उससे डरते हैं—वे इस भ्रम के नाम पर लगातार छले जाते हैं। ईश्वरत्व की वास्तविकता कि वह केवल मनुष्य की मनोरचना है, को समझने वाले ईश्वर की काल्पनिक तस्वीर गढ़ते हैं।  निहित स्वार्थ के लिए वे उसके चारों ओर झूठे किस्से-कहानियों और गाथाओं का पूरा शास्त्र खड़ा कर लेते हैं। फिर उसके माध्यम से उस वर्ग का जो अपने भोलेपन के कारण ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करता है, को बरगलाते तथा उसका तरह-तरह से शोषण करते हैं।

धर्मशास्त्रों में बार-बार बताया जाता है कि दुनिया धर्म पर टिकी है। धर्म के न होने से सामाजिक व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। इंसान इंसान को खाने लगेगा। चारों ओर अराजकता छा जाएगी। असल में यह डर ही धर्म की नींव, उसकी प्राणवायु है। यह डर मनुष्यों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास पैदा करता है, जिसे पैदा करने में धर्म की बड़ी भूमिका होती है। एक-दूसरे के प्रति डर और अविश्वास उन्हें अनावश्यक स्पर्धा में उलझाए रखता है। यह धर्म के संबंध में परस्पर विरोधाभासी मान्यताओं को सामने लगाता है। क्योंकि एक ओर तो वह मानवीय स्नेहानुराग को बनावटी, दुनिया को नकली और मोह-माया ग्रस्त, भव-प्रपंच आदि बताकर जीवन-संघर्ष से पलायन को उकसाता है, दूसरी ओर वह देवताओं की ऐसी कृपालु और महिमामयी तस्वीर गढ़ता है, जो पलक झपकते ही भक्त को उसके समस्त दुखों, अभावों, कमजोरियों और दुश्वारियों से मुक्ति दिला सकते हैं। हालांकि जैसा कि माना जाता है, देवताओं की ‘कृपा’ विनीत बने रहने पर ही संभव हो पाती है। सचाई और साफगोई किसी देवता को पसंद नहीं है। न ही आंख से आंख मिलाकर बात करने वाले भक्त उन्हें रास आते हैं। देवता उन भक्तों को पसंद करते हैं, जो हमेशा गिड़गिड़ाते हुए नजर आएं। खुद सत्तु खाकर उन्हें पकवानों का भोग लगाएं। इस तरह पुरोहितों द्वारा गढ़े गए देवता और तानाशाह में कोई अंतर नहीं रह जाता। बल्कि कई बार तो देवता तानाशाह से भी कहीं अधिक क्रूर और सनकी नजर आते हैं। तानाशाह नाराज होने पर अधिक से अधिक कैद कर लेता है अथवा मनुष्य को मौत के घाट उतार देता है। देवता नाराज हों तो मृत्युदंड के बाद आत्मा युगों-युगों तक दंड की भागी बनती है। बल्कि तानाशाह की अपेक्षा देवताओं के नाराज होने की संभावना अधिक होती है। क्यांकि वहां मानवीय भूलों के लिए कोई स्थान नहीं होता। मानो गुस्सा और नाराजगी देवताओं की नाक पर रखी रहती है। भक्तों से सुबह-शाम नाम लिवाना देवताओं को सर्वाधिक प्रिय है। इस काम यदि भूल से भी चूक हो जाए तो देवताओं का कोप-भाजन बनना पड़ता है। नाराजगी मानो उनकी नाक पर रखी रखती है। दावा किया जाता है कि देवताओं की मर्जी के बिना सृष्टि में पत्ता तक नहीं हिलता, बावजूद इसके यदि कोई चूक हो जाए तो दंड का भागी केवल इंसान को बनना पड़ता है। धर्म की माने तो माया का भरमाया मनुष्य कोई न कोई चूक हर घड़ी करता ही रहता है। इसलिए हर किए-अनकिए की जिम्मेदारी मनुष्य पर आ पड़ती है। माया या माया बनाने वाले का कोई दोष नहीं मानता। प्रत्येक कार्य के पीछे दैवी-विधान मान लेने का नुकसान यह है कि इससे जीवन में सामान्य सुख, यहां तक कि नैसर्गिक स्वतंत्रता भी मनुष्य का अधिकार होने के बावजूद, ‘दैवी-कृपा’ मान लिए जाते हैं। जो लोग किसी कारणवश इन सुविधाओं तथा मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें देवी कृपा से भी वंचित और ‘अभागा’ कहा जाता है।

धर्म का यह चरित्र तभी से है जब से साम्राज्यवादी चेतना का उदय हुआ। तभी से राजा-महाराजाओं, जमींदारों के इर्द-गिर्द चाटुकारों का वर्ग बनने लगा था। चाटुकार वर्ग में पुरोहित भी सम्मिलित थे। वे राजा की सहानुभूति प्राप्त करने तथा जनता पर अपने प्रभाव को स्थायी बनाने के लिए धार्मिक अनुशंसाओं की मनमानी व्याख्याएं करते थे। राजाओं और सामंतों को भोग-विलास प्रिय था। इसलिए पुरोहितों ने देवताओं को भी  स्वार्थी, विलासी, स्वर्णाभूषणों से मंडित दिखाया है। परिणाम यह हुआ कि धर्म की नैतिक और सामाजिक व्यवस्थाएं केवल दिखावे की चीज बनती गईं। धार्मिक मान्यताएं जैसे-जैसे फैलीं, सामाजिक असहिसुष्णता लगातार बढ़ती गई। कालांतर में यही दिखावा देवताओं के चरित्र-चित्रण में भी समा गया। परिणामस्वरूप जो देवता चित्रित किए गए, आदमी की तरह वे भी अपनी आत्मप्रशंसा के भूखे थे। गुस्सा उन्हें भी आता था। साधारण इंसान की भांति मनमानी करने से उनका अहं भी ठंडा होता था। यहां तक कि षड्यंत्र रचने, भोग-विलास और वैभव प्रदर्शन करने में भी वे कम नहीं हैं।

प्रमाण के लिए लक्ष्मी से लेकर विष्णु या किसी और हिंदू देवी-देवता का चित्र देख लीजिए, सभी स्वर्णाभरण से सज्जित हैं। उनके मुकुट हीरे के जड़े हैं। वे चढ़ावे की कीमत देखकर आनुपातिक रूप से प्रसन्न होते हैं। केवल पाशुपति इसके अपवाद हैं। वे देवताओं में सबसे पुराने भी हैं। उनके बारे में प्रस्तर शिल्प से लेकर लिखित साहित्य में इतना कुछ मौजूद था कि पुरोहितों द्वारा उसमें फेरबदल कर पाना, आसान नहीं था। उपलब्ध साक्ष्य यह भी बताते हैं कि शिव अवैदिक देवता हैं। त्रिदेवों में ब्रह्मा को सृजन और विष्णु को पालन का दायित्व सौंपा गया है। थोड़ा-सा विचार करने पर इस रूपक के अभिप्राय को आसानी से समझा जा सकता है। ब्रह्मा के हाथ में वेद हैं, जिसके पीछे असली मंशा वेदों को अपौरुषेय दिखाने की है। विष्णु को पालक देवता का दर्जा प्राप्त है। उन्हें अवतार लेकर बार-बार सृष्टि में आना पड़ता है। यह क्षत्रियों के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता हस्तांतरण का संकेतक है।

शिव को संहार का देवता बताया जाता है। आखिर द्रविड़ों या अनार्यों का देवता ही संहार का देवता क्यों? इसके पीछे की मानसिकता का आकलन कठिन भले हो, असंभव नहीं है। आर्यों के आगमन से पहले इस देश में शिव की प्रतिष्ठा थी। इसके भी प्रमाण हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में पांव जमाने से पहले आर्यों को न केवल यहां के मूल निवासियों से संघर्ष करना पड़ा था, बल्कि अनेक समझौते भी उन्हें करने पड़े थे। आर्यों के साथ निरंतर चलने वाले युद्धों में अंततः अनार्यों को पराजित होना पड़ा पड़ा था, तथापि अनार्यों का डर आर्यों के मन से गया नहीं था। शिव के चिर संगी के रूप में भूत, प्रेत, वैताल आदि हैं, जो अलग-अलग कबीलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही गणशक्ति शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश करती है। शासक वर्ग के मन में जनता का डर, यह डर कि शिव के एक संकेत पर कबीलाई समूह आर्यों के श्रेष्ठ योद्धा होने के सपने को चकनाचूर कर सकते है, शिव को देवताओं का देवता, महादेव और संहार का देवता बनाता है। शिव की भांति गणेश भी गण-प्रमुख यानी कबिलाई संगठनों के नेता हैं। लंबे समय तक उन्हें अनार्यों के मुखिया के रूप में मान्यता मिलती रही। गणेश को उनका वर्तमान रूप आर्यों की गणतंत्र के प्रति अनास्था के कारण, उसके उपहास के कारण मिला है।

विभिन्न धर्मावलंबियों की कोशिश होती है, अपने धर्म को पुराने से पुराना दिखाने की। इसके पीछे उनकी कोशिश अपने-अपने धर्म के रीति-रिवाज, कर्मकांड आदि को ज्यों की त्यों, चलाते जाने की होती है। यह बात अलग है कि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दुनिया में धर्म की आमद को 5000 वर्ष से पहले नहीं ले जाया जा सकता। यह वही समय है जब इंसान ने संगठित होकर रहना सीखा। नगर राज्यों की नींव रखी गई। उन्हीं दिनों धर्म की सांगठनिक शक्ति को पहचाना गया और उसके आधार पर लोगों को जोड़ने की शुरुआत की गई। हालांकि सभ्यता का इतिहास इससे भी काफी पुराना है। यदि प्रबोधीकरण के युग को ही लें तो करीब 12000 वर्ष बीत चुके हैं। यानी प्रबोधीकरण का दो-तिहाई हिस्सा मनुष्य ने बगैर किसी धार्मिक विश्वास के बिताया है। लेकिन एक बार धर्म के अस्तित्व में आने के बाद उससे पीछा छुटा पाना मनुष्य के लिए असंभव रहा है। इस बीच राजसत्ताएं बदलीं। सत्ताओं के रूप और मायने बदले। साथ-साथ धर्म के मायने तथा उसके अभीष्ट भी बदलते रहे हैं। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि धर्म गायब हुआ हो। संगठित राजसत्ता के दौर में धर्म सत्ता और भी फली-फूली और मजबूत हुई है। ऐसे में धर्म से मुक्ति, उसके कर्मकांडों से मुक्ति क्या संभव है? खासकर गत दो हजार वर्षों से धर्म दुनिया-भर के समाजों, लोक-परंपराओं में जितनी गहराई से अंतर्गुंफित हुआ है। उससे मनुष्य की धर्म से मुक्ति आसान नहीं लगती। खासकर तब जब धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों के स्वार्थ एक समान हों। दोनों एक-दूसरे को समर्थन और बल प्रदान करती हों। यह धर्म की ही माया है कि कंप्यूटर अपने ईजाद होने के साथ ही भविष्यवाणी करने लगता है।

यह ठीक है कि आधुनिक युग में धर्म से मुक्ति आसान नहीं दिखती। लेकिन जो कठिन दिखती हो, वह असंभव भी हो, यह बात जमती नहीं। बल्कि इतिहास ने दर्शा दिया है कि कठिनता का जीवनकाल बस कुछ वर्ष का होता है। उसके बाद वह व्यवहार का हिस्सा बन जाती है। आज से सत्तर-अस्सी वर्ष पहले एवरेस्ट की गगनचुंबी चोटी पर पहुंचना असंभव बात थी। बाद में हिलेरी, शेरपा तेनसिंह के साथ गए। असंभव संभव हुआ। आज तो यह स्थिति है कि वहां अपेक्षाकृत आसानी से जाया जाता है। ऐवरेस्ट यात्रा खबरें कोई खास रोमांच नहीं बना पातीं। यही हाल धर्म का है। आज भले ही लोग मानते हों कि सृष्टि धर्म के बल पर टिकी है। पर कल हालात बदल भी सकते हैं। कोई भी दो सत्ताएं जिनके अपने-अपने स्वार्थ हों, लंबे समय तक एक-दूसरे के समर्थन में नहीं रह सकतीं। खासकर तब जब शक्ति के केंद्र बदल रहे हों। पहले भू-संपदा पूंजी का प्रतीक थी। उससे पहले कुछ और था। इसलिए वह दिन दूर नहीं कि जब धर्म की असलियत भी लोगों के सामने होगी। वे उन चेहरों को देख सकेंगे, जो उसकी महिमा मंडन के पीछे हैं।

दूसरी ओर यह भी सही है कि आदमी के मन से आगत-अनागत का डर निकल जाए, धर्म अपने आप ‘फालतू’ मान लिया जाएगा। यह भ्रम भी जाता रहेगा कि धर्म मनुष्य को जोड़ता है। भ्रम टूटते ही मनुष्य समझने लगेगा कि जीवन के जो लक्ष्य हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए किसी तीसरी शक्ति की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य आपसी सहयोग, समर्पण और विश्वास द्वारा भी जीवन-लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। इससे उसका दैन्य घटेगा। आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। भटकाव में कमी आएगी। जीवन के लक्ष्य जब तीसरी अदृश्य सत्ता को बीच में रखकर लेने के बजाय समाज और सामाजिकता को ध्यान में रखकर तय होने लगेंगे तो सामाजिक अंतद्र्वंद्वों का हृास होगा। तनाव में कमी आएगी। समाज की ऊर्जा सामाजिक कार्यों में विकास के लिए खर्च होने लगेगी। अपने पुरुषार्थ पर भरोसा मनुष्य को जीवन और एक-दूसरे के करीब लाएगा। हमें उस दिन की प्रतीक्षा तो कर ही सकते हैं।

ओमप्रकाश कश्यप 

1.  किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. —यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ से उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

2 . यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, 431।

सिंधू घाटी की सभ्यता और आर्य श्रेष्ठता के मिथ

सामान्य

आलेख

क्षेत्रीयता के आधार पर भारतीय संस्कृति को दो भागों में बांटा जा सकता है। उत्तर भारत की संस्कृति जिसे आर्य संस्कृति, वैदिक संस्कृति अथवा सीधे-सीधे ‘ब्राह्मण संस्कृति’ कह दिया जाता है। दूसरी अनार्य संस्कृति अथवा द्रविड़ संस्कृति, जिसकी जड़ें सिंधू सभ्यता तक जाती हैं। भारत का सांस्कृतिक इतिहास इन्हीं संस्कृतियों के बीच समय-समय पर हुए संघर्ष एवं सम्मिलन का लेखा है। यह भी मान लिया गया है कि सिंधू सभ्यता के पराभव के साथ ही, उसकी संस्कृति भी दम तोड़ चुकी थी। अब जो भारतीय संस्कृति है वह मुख्यत: हिंदू यानि ब्राह्मण संस्कृति है। पर क्या सचमुच? सिंधू सभ्यता की भांति क्या उसकी संस्कृति भी पूरी तरह काल-कवलित हो चुकी है? भारतीय संस्कृति की जड़ों की खोज हमें 3500-4000 वर्ष पहले तक ले जाती है। शुरुआत सिंधू घाटी की सभ्यता से होती है। यह ज्ञात तथ्य है कि सिंधू-नदी के तटवर्ती इलाकों में 3300-1750 ईस्वी पूर्व में एक समृद्ध नागरी सभ्यता विद्यमान थी। समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक उन्नत सिंधू सभ्यता का विस्तार करीब नौ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था, जो आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक है। 

अपने वैभवकाल में सिंधू सभ्यता के सबसे विकसित नगर मोहेनजो-दरो की आबादी अनुमतः 35,000-41,000 तथा हड़प्पा की आबादी अनुमतः 23,500 से 35,000 के बीच थी। 35-40 लाख आबादी वाले आधुनिक महानगरों के आगे यह आबादी भले ही छोटी लगे, किंतु उस समय के गांवों की जनसंख्या 50-100 को देखते हुए, वे वास्तव में अपने समय के ‘महानगर’ कहलाने के अधिकारी थे। सिंधू नदी की उपजाऊ भूमि पर बसी वह एक समृद्ध सभ्यता थी। इसका प्रमाण वहां से प्राप्त तरह-तरह के आभूषण, विशालकाय अन्न भंडार तथा बेहतरीन नगर संरचनाएं हैं। खुदाई में बहुत कम मात्रा में हथियारों का मिलना दर्शाता है कि सिंधू सभ्यता के निवासी शांतिमय जीवन जीने में विश्वास रखते थे। वे लोग, ‘लड़ाके नहीं थे; और बाहरी आक्रमण की आशंका भी उन्हें कम ही थी।’1 ऐसी सुसमृद्ध और फलती-फूलती सभ्यता, करीब 1750 ईस्वी पूर्व पहले प्राकृतिक कारणों से पराभव की ओर बढ़ चुकी थी। सभ्यता के अवसानकाल में सिंधूवासियों को एक मानव-जनित आपदा का सामना भी करना पड़ा था। वह था—2000 से 1500 ईस्वी पूर्व हुआ आर्य कबीलों का आक्रमण।2 माना जाता है कि उन आक्रमणों ने ही अनार्यों को उत्तर-पश्चिम की दिशा में विस्थापन के लिए विवश कर दिया था।

इतिहासकारों का दावा है कि आर्य अपेक्षाकृत उच्च सभ्यता के दावेदार थे। ‘अमरकोश’(7/3) में उन्हें ‘महाकुलकुलीनआर्यसभ्यसज्जनसाधवः,’ महाकुल, कुलीन, आर्य, सभ्य, सज्जन, साधु बताया गया है। सिवाय ऐसे उल्लेखों के भारत में आने से पहले आर्यों की प्राचीन सभ्यता के बारे में, उस सभ्यता के बारे में जिसे वे पीछे छोड़कर आए थे—हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है। ऐसा भी कोई साक्ष्य नहीं है जो उस दौर में उनकी सभ्यता को सिंधू-घाटी के अधिवासियों की सभ्यता से श्रेष्ठ दर्शाता हो। तथ्यों को खँगालने पर यह तर्क भी विश्वसनीय नहीं लगता कि अनार्यों के सिंधू घाटी से विस्थापन का एकमात्र कारण, आर्यों का अनपेक्षित आक्रमण था। 

इतिहासकारों के अनुसार आर्यों ने भारत में अलग-अलग समय में कबीलों के रूप में प्रवेश किया था। दूसरी ओर सिंधूवासी आर्येत्तर अपने समय की सर्वाधिक विकसित, नागरी सभ्यता के निर्माता थे। वे पशु-पालक अर्थव्यवस्था को पार करके, उन्नत कृषि एवं व्यापार-केंद्रित अर्थव्यवस्था के स्तर को प्राप्त कर चुके थे। वे भविष्य के लिए अन्न संग्रह करना जानते थे। ऋग्वेद में ‘पणि’ शब्द कई स्थानों पर आया है। ‘निरुक्त’(6/27) के अनुसार पणि ‘व्यवसायी’ लोग थे। वही सिंधू उपत्यका की व्यापार-प्रधान सभ्यता के निर्माता थे। ऋग्वेद में उन्हें आर्य-विरोधी के रूप दर्शाया गया है। बताया गया है कि पणि ऋषिगणों से उनका धन छीनकर ले जाते थे। एक स्थान पर सोम से लालची पणियों को नष्ट कर देने की प्रार्थना की गई है(ऋग्वेद, 6.51.14)। पशु-पालन अर्थव्यवस्था में अंतनिर्हित यायावरी ही आर्यों को भारतीय प्रायद्वीप तक खींच लाई थी। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आर्यों ने जब सिंधू घाटी में कदम रखा तब तक वे लिपि के प्रयोग से अनजान थे। जबकि  सिंधूवासियों के पास 396 अक्षरों वाली समृद्ध लिपि थी।3 वे गणित के प्रयोग में भी दक्ष थे। सिंधूवासियों के साहित्य के बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है। आर्यों की पद्य-रचनाओं के बारे में अवश्य पता चलता है, जिन्हें वे कंठस्थ करके रखा करते थे। राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार—‘अनेक विद्वान समझते हैं कि भारतवर्ष में 800 ईस्वी पूर्व से पहले तक लेखनकला ज्ञात न थी। किंतु यह मत सभी को मान्य नहीं है। पर इतना निस्संदेह है कि भारत में लिपि से बहुत पहले साहित्य बन चुका था।’4 स्पेन, फ्रांस और भारत में भीम बेटका की गुफाओं में बने भित्तिचित्रों से पता चलता है मनुष्य 30,000-35,000 वर्ष पहले कहानी गढ़ना सीख चुका था। मान सकते हैं कि लिखित हो या मौखिक—सिंधू सभ्यता के अधिवासियों का भी कोई न कोई साहित्य अवश्य रहा होगा। वह सब खुद मिटा या मिटा दिया गया, प्रमाणों के अभाव में इसपर कुछ भी कह पाना संभव नहीं है।

ऋग्वेद में पृथ्वी और उर्वी अर्थात लंबी-चौड़ी धरती, जो गायों से भरी हुई होती थी(गोमती), के अलावा नगर और पुर तथा सौ खंबों वाले(शतभुजी), पत्थरों से बने(अश्वमयी) और शरद-ऋतु में काम आने वाले(शारदी) दुर्गों का भी वर्णन है, जिनमें लोग नदियों की बाढ़ के दौरान आत्मरक्षा करते थे।5 किंतु उन दुर्गों के निर्माता आर्य ही थे—यह बात दावे से नहीं कही जा सकती। कारण यह है कि वेदों को लिपि के आविष्कार, यानी 800 ईस्वीपूर्व के आसपास ही लिपिबद्ध किया जा सका था। उस समय तक आर्यों को भारत आए सात-आठ शताब्दियां बीत चुकी थीं। इसलिए इस बात की पर्याप्त संभावना है कि भारत आने के बाद, आर्यों ने जिन नई ऋचाओं की रचना की, उनमें सिंधू सभ्यता के मूल नागरिकों द्वारा बनाए गए पुरों का वर्णन भी शामिल था। राधाकुमुद मुखर्जी ऋग्वैदिक सभ्यता को सिंधू सभ्यता की ‘पूर्वगामिनी अथवा उत्तराधिकारिणी’ कहने से बच जाते हैं। लेकिन इससे वे भी इन्कार नहीं कर पाते कि, ‘जिन भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिस्थितियों में ऋग्वेद की रचना हुई, उनमें आर्येत्तर लोगों की संस्कृति एवं जीवन-परिस्थितियों से आर्यों का परिचित हो जाना स्वाभाविक था, जिनमें से कुछ का उल्लेख ऋग्वेद में आ गया। और जो मोहनजो-दरो से प्राप्त सामग्री से मिलता-जुलता है। तात्पर्य यह है कि ऋग्वेद के आर्येत्तर वे लोग हो सकते हैं, जिन्होंने सिंधू सभ्यता का निर्माण किया था।’6 अन्यत्र वे लिखते हैं कि ‘सिंधू घाटी में आर्यों को एक उन्नत सभ्यता से टक्कर लेनी पड़ी। वह अनेक नगरों में फैली हुई थी।’7 शरद-ऋतु में काम आने वाले(शारदी) दुर्ग….जिनमें लोग नदियों की बाढ़ के दौरान आत्मरक्षा करते थे’—का आशय भी यही है कि आर्य कबीले उनके निर्माता न होकर, उपयोगकर्ता मात्र थे। ऐसे में आर्यों को सभ्यता के स्तर पर आर्येत्तर सिंधूवासियों से उन्नत दर्शाने का कोई औचित्य नहीं है।  

सभ्यता के स्तर पर सिंधूवासियों की श्रेष्ठता को क्या आर्यों ने कभी स्वीकार किया? संस्कृत साहित्य में अनार्यों के प्रति जो अवमाननापूर्ण टिप्पणियां हैं, उन्हें देखकर तो लगता है कि कभी नहीं। स्थापत्य की दृष्टि से ऋग्वेद की भाषा ध्वंस की भाषा है। भारत आने के बाद आर्य शनैः-शनैः नष्ट हो रही उस सभ्यता को सहेजने की कोशिश नहीं करते। कदाचित उनके लिए वह संभव भी नहीं था। संस्कृत साहित्य में भौतिक जगत के प्रति नकार का स्थायी भाव दर्शाता है कि सिंधू सभ्यता के भग्नावशेषों ने आर्यों के मनस् में, भौतिक जगत के प्रति गहन नैराश्य को जन्म दिया था। इस बोध को जन्म दिया था कि प्राकृतिक शक्तियों के समक्ष मनुष्य की शक्तियां नगण्य हैं। कदाचित उससे जन्मा डर ही आगे चलकर ब्राह्मणों के धर्म-दर्शन में मायावाद के प्राबल्य का कारण बना। डरे हुए आर्यों ने वन-प्रांतरों को अपना ठिकाना बनाया। वहीं रहते हुए प्राकृतिक शक्तियों की अभ्यर्थना के लिए रचे गए मंत्रों को लिपिबद्ध किया। 

वन-प्रांतर में रहने के लिए आग जलाकर बैठना सुरक्षा का भरोसा देता था। प्रकारांतर में उसी से यज्ञों का जन्म हुआ। प्राकृतिक शक्तियों के परामानवीकरण की शुरुआत कदाचित लोगों को यज्ञ का औचित्य समझाने के लिए हुई। सूर्य, वरुण, चंद्र, पूषा, उषा जैसे मानवरूपी देवता गढ़े जाने लगे। इंद्र नामक नायक की परिकल्पना की गई। उसे ‘पुरों को तोड़ने वाला’(पुरंदर) घोषित किया गया(ऋग्वेद 1/103/3)। धीरे-धीरे देवताओं का पूरा कल्पनालोक गढ़ लिया गया। इस तरह सिंधू सभ्यता के भग्नावशेष, इंद्रादि काल्पनिक देवताओं के पराक्रम एवं शौर्य-कथाएं गढ़ने के काम आने लगे। आगे चलकर जैसे-जैसे यज्ञ-संस्कृति का विस्तार हुआ, प्राकृतिक शक्तियों के परामानवीकरण तथा उनकी प्रशस्ति में रचा गया मिथकीय साहित्य, आर्यों के लिए खुद को अनार्यों से विकसित और सभ्य दिखाने का एकमात्र माध्यम बन गया। 

कर्मकांड प्रधान ब्राह्मण संस्कृति में प्रदर्शन, वास्तविकता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था। संभवत: सिंधू सभ्यता को देखकर जन्मी कुंठा ही उन्हें आडंबरों की शरण में जाने को उकसा रही थी। उसी के चलते इंद्रादि देवताओं के महिमामंडन हेतु ऋग्वेद में आर्य-अनार्य संघर्ष के बड़े-बड़े रूपक गढ़े गए। एक जगह(4/16/13) 50,000 कृष्ण-योनि दासों का युद्धभूमि में संहार करने का उल्लेख है। इसी तरह मंत्र 4/30/21 में 30,000 दासों को माया से मूर्छित कर देने का उल्लेख है। कह सकते हैं कि पुराणों की तरह चामत्कारिक विवरण की शुरुआत ऋग्वेद के समय में ही हो चुकी थी। वर्चस्व की लड़ाई केवल आर्यों और अनार्यों के बीच ही नहीं थी, अपितु आर्यों के बीच भी थी। ऋग्वेद में वशिष्ट और विश्वामित्र के भिड़ंत की कहानी आर्यों में पनप चुकीं दो समानांतर संस्कृतियों के अंतर्द्वंद्व को दर्शाती है।

ऋग्वेद में सुदास और दस राजाओं(कबीलों) के युद्ध तथा उसमें अनार्य कबीलों की पराजय का उल्लेख है। अन्य युद्ध में कृष्णासुर को इंद्र से पराजित दिखाया गया है। इस तरह के और भी कई युद्ध उसमें हैं, जिनमें इंद्र को अनार्यों का वध करते, उनके दुर्गों को ध्वस्त करते हुए बताया गया है। इन्हीं के आधार पर इतिहासकारों की राय बनी कि आर्यों के हमलों से पराजित अनार्य सिंधू कबीले दक्षिण और उत्तर-पश्चिम की ओर पलायन करने लगे थे। लेकिन रमाप्रसाद चंद्रा के अनुसार, ऋग्वैदिक इतिहास का संबंध आर्यों तथा इंद्रपूजक राजाओं के मध्य घरेलू युद्ध से था, न कि आर्यों और अनार्यो के बीच हुए युद्ध से। वे तो यहां तक लिख जाते हैं कि अनार्यों की केवल एक जाति, निषाद इतनी बड़ी संख्या में थी कि उसे समाप्त करना आसान नहीं था। निषाद इतने शक्तिशाली भी थे कि उन्हें दास बनाना अथवा सभी को एक साथ खदेड़ पाना असंभव ही था। इसलिए उन्होंने निषादों से समझौता करने में ही अपनी भलाई समझी।8 सिंधूघाटी की बसावट से जुड़े आंकड़े भी रमाप्रसाद चंद्रा के निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं। 

2000 ईस्वीपूर्व में भारतीय प्रायद्वीप की कुल जनसंख्या अनुमतः 60 लाख थी। उसमें से 50 लाख लोग सिंधू-क्षेत्र के अधिवासी थे। उस जनसंख्या में 9.4 प्रतिशत प्रति शताब्दी की दर से वृद्धि हो रही थी।9 इस तरह 1500-1600 ईस्वी पूर्व में, जब आर्यों ने भारत-भूमि पर कदम रखा, यहां की कुल जनसंख्या लगभग 85 लाख थी। उनमें 70 लाख से अधिक लोग सिंधू घाटी में रखते थे। 20-22 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली, इतनी बड़ी जनसंख्या को, कुछ सौ या हजार की टुकड़ियों में जब-तब आने वाले आर्य विस्थापित नहीं कर सकते थे। इसलिए आर्यों को यदि सिंधू-क्षेत्र खाली करना पड़ा तो उसके पीछे आर्यों के हमलों से कहीं ज्यादा, कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों का योगदान था। सिंधू-सभ्यता के निवासियों का मुख्य व्यवसाय खेती था; और मौसम पर आधारित खेती की अपनी विडंबनाएं होती हैं। कभी बाढ़ तो कभी सूखा। जाहिर है कि जैसे-जैसे सिंधू-परिक्षेत्र की जनसंख्या बढ़ रही थी, बाढ़-क्षेत्र में खेती की अनिश्चितता उन्हें सुरक्षित ठिकानों की खोज के लिए प्रेरित कर रही थी। कह सकते हैं कि बेहतर ठिकानों की खोज ने ही अनार्यों को गंगा और यमुना के मैदानों तक पहुंचा दिया था। यह विस्थापन आर्यों के भारत आगमन के बाद आरंभ नहीं हुआ था। अपितु सिंधू सभ्यता के आरंभिक दौर में ही आरंभ हो चुका था।

हड़प्पा सभ्यता को लेकर नए पुरातात्विक शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा राखीगढ़ी के उत्खनन को लेकर जारी रिपोर्ट के अनुसार, सिंधू घाटी सभ्यता उत्तर जम्मू और कश्मीर की तलहटी में बसे मंदा तथा ऊपरी अफगानिस्तान के शोर्तुघाई से लेकर, दक्षिण में देमावाड़ तक 1600 किलोमीटर तथा पूरव में आलमगीरपुर से लेकर पश्चिम में सुक्ताघर डोई तक 1600 किलोमीटर से अधिक में उसका विस्तार था। सिंधू सभ्यता के दो प्रमुख नगरों, मोहेंजो-दरो और राखीगढ़ी के बीच ही 1000 किलोमीटर से अधिक का फासला है।10  रिपोर्ट के अनुसार 1800 ईस्वी के आसपास उस क्षेत्र को भीषण सूखे का सामना करना पड़ा था। वर्षों लंबे सूखे के से परेशान होकर  सिंधूवासी उत्तर-पूरव ओर प्रस्थान करने लगे थे। वही हड़प्पा सभ्यता के पराभव का कारण बना था।11 आधुनिक शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं।

दूसरे, यदि आर्यों से पराजय ही अनार्यों के सिंधू क्षेत्र से पलायन का प्रमुख कारण होता तो वे भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर वैसा असर कतई न छोड़ पाते, जैसा आज दिखाई पड़ता है। आर्य संस्कृति का 3000 वर्ष पुराना इतिहास भी उसे मिटा नहीं पाया है। इसमें से हम कुछ की चर्चा करेंगे। पहला है लिंग पूजा। ऋग्वेद(7/21/5, 10/93/3) में आर्येत्तर लोगों के बारे में कहा गया कि वे ‘केवल अपने नियमों का पालन करने वाले’(अन्यवृत) तथा ‘लिंग पूजक’(शिश्नदेवा) थे। सिंधूवासियों की संस्कृति में भी लिंग पूजा का विशेष स्थान था। सिंधू घाटी से विस्थापित अनार्य जहां-जहां गए, वहां उनके साथ लिंग पूजा भी गई। अपने देश में आज भी लिंग पूजा, मूर्ति पूजा का सबसे प्रचलित रूप है। ब्राह्मणों ने ब्रह्मा को भले ही सृष्टि के निर्माता का दर्जा दिया हो, मगर ‘महादेव’ का दर्जा अनार्य देवता ‘शिव’ या ‘पशुपति’ को ही प्राप्त है। गांव-देहात के मंदिरों और पूजा स्थानों पर कोई और मूर्ति हो न हो, शिवलिंग अवश्य दिखाई दे जाता है।

सिंधू सभ्यता में मातृदेवी की पूजा का संकेत भी मिलता है। कुछ स्त्री-मूर्तियां मिलती हैं—‘बहुसम्मत विचार के अनुसार ये महामातृदेवी(महीमाता), या मातृरूप में स्थित प्रकृति की मूर्तियां हैं….यही ऋग्वेद के आदित्यों की माता अदिति हैं। आर्य और अनार्य दोनों प्रकार की भारतीय प्रजा भुइयां आदि ग्रामदेवियों से लेकर आज तक इसी अंबिका या मातृदेवी के नाना रूपों की पूजा करती आई है।’12 कुछ वर्ष पहले तक गांव-देहात में मंदिर हो न हो, मगर कोई न कोई देवी अवश्य होती थी, जिसे कहीं ग्राम देवी कहा जाता था, कहीं चामुंडा तो कहीं कुछ और। निचली जातियां प्रायः उन्हीं देवियों की पूजा करती थीं। आज भी गांवों में ऐसे देवी-स्थान बहुतायत में मिलते हैं। 

सिंधूवासियों का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण योगदान लिपि के क्षेत्र में था। सिंधू घाटी में आने के पहले और यहां आने के बाद, करीब 800 ईस्वी पूर्व तक आर्यों ने जो भी साहित्यिक रचनाएं कीं, वे मौखिक थीं। ई. टॉमस का विचार था कि आर्यों ने ‘विभिन्न देशों में भ्रमण करते हुए किसी लिपि का आविष्कार नहीं किया, किंतु जिस देश में वे जाकर बसे, वहीं की लिपि को अपनी भाषा लिखने के काम में ले लिया।’13 यद्यपि सिंधू लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं गया है। तथापि भाषाशास्त्रियों के अनुसार ब्राह्मी लिपि के कई अक्षरों पर सिंधू लिपि से ही लिए गए हैं। जॉर्ज बुहलर ने अशोककालीन ब्राह्मी लिपि और प्राचीन सिंधू लिपि का तुलनात्मक अध्ययन किया था। उसने एक सूची बनाई थी, तदनुसार ब्राह्मी लिपि के कम से कम 36 अक्षर सिंधू घाटी से प्राप्त लिपि से लिए गए हैं।14 इसके अलावा रक्षावीटिका(गंडा-ताबीज), योग, वृक्षों और पशुओं की देवताओं/अर्धदेवताओं के रूप में पूजा तथा योग जो आज भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं—सभी सिंधू-सभ्यता की देन हैं।  बाद में ब्राह्मण संस्कृति ने थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ अपना लिया था।

उपर्युक्त से साफ है कि उत्तर से दक्षिण तक भारत की जनसंस्कृति आज भी सिंधू सभ्यता के प्रभावों से मुक्त नहीं है। फिर इसमें आर्यों का अवदान क्या है? इसे ब्राह्मण संस्कृति क्यों कहा जाता है? इसका एक ही कारण है, भारतीय समाज का जाति और वर्ण-आधारित विभाजन। सभ्यता और संस्कृति के नाम पर जो कुछ है सभी को ब्राह्मणों की देन मान लेने की प्रवृत्ति। यह सब एक दिन में नहीं हुआ। धर्म और अध्यात्म के नाम पर ब्राह्मणों ने संस्कृति और ज्ञान के सभी केंद्रों पर कब्जा कर लिया था। शासक देशी हो या विदेशी जो उनके विशेषाधिकारों की रक्षा का आश्वासन देता, वे उसी के अनुशासन में ढल जाते थे। बाहर से आए शासकों के लिए भी, बजाय पूरे समाज को खुश करने के, मुट्ठी-भर पुरोहित वर्ग को संतुष्ट करके अपने पक्ष में कर लेना आसान था। यही कारण है कि पिछले ढाई हजार वर्षों के इतिहास में अनेक राजा बदले, राजाओं के धर्म बदले, ठिकाने बदले। ब्राह्मण सदैव सत्ता केंद्र में बने रहे। जिस तरह उन्हें राजाओं और शक्ति केंद्रों के बदलने  से कोई फर्क नहीं पड़ता, वैसे ही देवताओं के घटने-बढ़ने, नई पूजा पद्धतियों के शामिल होने या कुछ लोगों द्वारा उनका बहिष्कार किए जाने से भी उनपर कोई फर्क नहीं पड़ता। आज भी, जब तक जाति के नाम पर मिले उनके विशेषाधिकारों को कोई ठेस न पहुंचे, वे हर समझौते के लिए तैयार रहते हैं। प्राप्त विशेषाधिकारों के बल पर वे जो कह दें उसे धर्म मान लिया जाता है; और जो कर दें वह संस्कृति का हिस्सा बन जाता है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ  

  1.  हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, राजकमल प्रकाशन, हिंदी अनुवाद वासुदेवशरण अग्रवाल, पंचम संस्करण, पृष्ठ 36।  
  2.  ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ इंडिया, दूसरा संस्करण, ज्यूडिथ ई. वाल्श, स्टेट यूनीवर्सिटी ऑफ न्यू यार्क, पृष्ठ 19।
  3.  हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, पृष्ठ 37। अक्षरों की बनावट के लिए जॉन मार्शल की द्वारा संपादित मोहेनजो-दरो एंड हड़प्पा सिविलाइजेशन, खंड-दो, पृष्ठ 434-449 को देखा जा सकता है।
  4. हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, पृष्ठ 22।
  5. उपर्युक्त, पृष्ठ 48। 
  6. उपर्युक्त, पृष्ठ 50। 
  7. उपर्युक्त, पृष्ठ 90।
  8. दि इंडो-आर्यन रेसिस, रमाप्रसाद चंद्रा, दि वारेंद्र रिसर्च सोसाइटी, 1916, पृष्ठ-5।
  9. एटलस ऑफ वर्ल्ड पोपुलेशन हिस्ट्री, कॉलिन मेकएवडी और रिचर्ड जोन्स, प्रकाशक फेक्ट ऑन फाइल, न्यू यार्क, पृष्ठ 91।
  10. डॉ. अमरेन्द्र नाथ, एक्सकेवेशंस एट राखीगढ़ी, भारतीय पुरातत्व विभाग विभाग, पृष्ठ 4
  11. उपर्युक्त, पृष्ठ 50-51
  12. हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, 38। 
  13. उपर्युक्त, पृष्ठ 56।
  14. दि इंडस स्क्रिप्ट, एस. लेंगड़न, मोहेनजो-दरो एंड इंडस सिविलाइजेशन, संपादक जॉन मार्शल, आर्थर प्रोबस्थियन, लंदन, 1931, पृष्ठ 433।

संत गाडगे महाराज : कीर्तन से क्रांति

सामान्य

जीवन चारि दिवस का मेला रे

बांभन(ब्राह्मण)झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे

मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे

लड्डू भोग चढावति जनता, मूरति के ढिंग केला रे

पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे

जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न अधेला रे

पुन्य-पाप या पुनर्जन्म का , बांभन दीन्हा खेला रे

स्वर्ग-नरक, बैकुंठ पधारो, गुरु, शिष्य या चेला रे

जितना दान देवे देव गे ब्राह्मण को देवोगे, वैसा निकरै तेला रे

बांभन जाति सभी बहकावे, जन्ह तंह मचै बबेला रे

छोड़ि के बांभन आ संग मेरे, कह रैदास अकेला रे

                                       —संत रैदास

इन दिनों परिस्थितिकीय असंतुलन सर्वाधिक चिंता का विषय है. होना भी चाहिए. वातावरण में रोज तरह-तरह के जहर घुलकर जिस तरह से उसे विषाक्त कर रहे हैं, यह चिंता वाजिब है. लेकिन एक और किस्म का प्रदूषण होता है. पहले वाले प्रदूषण पर बड़ी-बड़ी पोथियां लिखने वाले, रोज जार-जार आंसू बहाने वाले लोग दूसरी किस्म के प्रदूषण की ओर से चुप्पी साधे रहते हैं. इस प्रदूषण का नाम है—सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण. इसे फैलाते हैं, जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्रीयता, रंगभेद जैसे विषाणु. पहली किस्म का प्रदूषण समाज के बीच भेद नहीं करता. उसका असर सभी पर बराबर पड़ता है, हालांकि चपेट में गरीब और निचले वर्ग ही आते हैं, क्योंकि वे उससे जूझने लायक संसाधन नहीं जुटा पाते. दूसरे प्रकार का प्रदूषण समाज को नीची जाति-ऊंची जाति, स्वामी-मालिक, निदेशक-अनुपालक आदि में बांट देता है. पहली प्रकार के प्रदूषण से निपटने के लिए समाज की सामूहिक चेतना काम करती है. दूसरे प्रदूषण से निपटने के लिए केवल प्रभावित वर्गों को आगे आना पड़ता है. संघर्ष के दौरान उन्हें शीर्षस्थ वर्ग जो उस विकृति का लाभकारी, परजीवी वर्ग है—उसका विरोध भी सहना पड़ता है. इसलिए दूसरे प्रदूषण से मुक्ति आसान नहीं होती. ऐसे में जो लोग तमाम अवरोधों और मुश्किलात के बावजूद अपने अनथक संघर्ष द्वारा, धूल अटी संस्कृति को थोड़ा-भी साफ कर पाते हैं, मनुष्यता का इतिहास उन्हें संत, महात्मा, महापुरुष, युगचेता, युगनायक आदि कहकर सहेज लेता है. ऐसे ही कर्मयोगी संत थे—गाडगे महाराज. जिन्हें हम संत गाडगे या गाडगे बाबा के नाम से भी जानते हैं.

मराठी में ‘गाडगा’ का अर्थ है—खप्पर. टूटे हुए घड़े या हांडी का नीचे का कटोरेनुमा हिस्सा. गाडगे महाराज की वही एकमात्र पूंजी थी. कहीं जाना हो तो उसे अपने सिर पर रख लेते. हाथ में झाड़ू लगी होती. जहां भी गंदगी दिखाई पड़ती, वहीं झाड़ू लगाने लगते. कोई कुछ खाने को देता तो उसे गाडगा में रखवा लेते. कालांतर में गाडगा और झाड़ू ही उनकी पहचान बन गई. झाड़ू से बाहर की सफाई. विचारों से लोगों के मन में जमा उस मैल को साफ करने की कोशिश, जो सैकड़ों वर्षों से उनके मन में जमा था. जिसे हमने दूसरी श्रेणी के प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना है. गांव में एक दिन से ज्यादा ठहरते नहीं थे. रोज नया गांव, नई जगह की सफाई. नए-नए लोगों को सदोपदेश.

संत गाडगे का असली नाम था, डेबुजी झिंगराजी जाणोरकर. उनका जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेड्गांव के धोबी परिवार में हुआ था. पिता का नाम था, झिंगराजी और मां थीं—साखूबाई. गरीब परिवार था. जब शिक्षा की उम्र थी, तब उन्हें गृहस्थी चलाने में परिवार की मदद करनी पड़ती थी. चुनौतियां बस इतनी नहीं थीं. आठ वर्ष की अवस्था में उनके पिता का साया सिर से उठ गया. मां ने उन्हें अपने भाई के यहां भेज दिया. मामा खेती-बाड़ी करते थे. डेबू जी भी उनके साथ खेतों पर जाने लगे. वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट और परिश्रमी थे. सो कुछ ही दिनों में मामा की खेती संभाल ली. युवावस्था में कदम रखने के साथ ही उनका विवाह कर दिया गया. पत्नी का नाम था, कुंतीबाई. दोनों के चार बच्चे हुए. उनमें दो लड़के और दो बेटियां थीं. उस समय तक डेबुजी खेतों में काम करते. खूब मेहनत करते. साहस उनमें कूट-कूट कर भरा था. जरूरत पड़ने पर आततायी से अकेले ही भिड़ने का हौसला रखते थे.

उन दिनों खेती करना आसान बात न थी. जमींदार लगान और साहूकार ब्याज के बहाने किसान की सारी मेहनत हड़प लेता था. कई बार किसान के पास अपने खाने तक को अनाज न बचता था. डेबुजी को यह देखकर अजीब लगता था. एक बार जमींदार का कारिंदा उनके पास लगान लेने पहुंचा तो किसी बात पर डेबुजी का उनसे झगड़ा हो गया. हृष्ट-पुष्ट डेबुजी ने कारिंदे को पटक दिया. उस शाम घर पहुंचने पर उन्हें मामा की नाराजगी झेलनी पड़ी. कुछ दिनों के बाद उनके मामा का भी देहावसान हो गया. डेबुजी के लिए वह बड़ा आघात था. सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति पहले ही कम थी. मामा की मृत्यु के बाद तो उनपर वैराग्य-सा छा गया. डेबुजी को भी समझ में आ गया कि किसानों और मजूदरों की लूट की असली वजह लोगों की अशिक्षा है. लोग गरीबी के असली कारण को जानने के बजाए, उसे अपना भाग्यदोष मानकर चुप हो जाते हैं. बीमार पड़ते हैं तो वैद्य-हकीम से ज्यादा गंडे-ताबीज पर भरोसा करते हैं. 1905 में उन्होंने अपना घर छोड़ दिया. उसके बाद 12 वर्षों तक लगातार भटकते रहे. आरंभ में उनकी यात्रा ईश्वर की खोज को समर्पित थी. लेकिन मंदिरों और शिवालयों में धर्म की धंधागिरी देख पारंपरिक धर्मों से उनका विश्वास उठ गया. उसके बाद उन्होंने अपना समूचा जीवन मनुष्यता की सेवा को समर्पित कर दिया.

संत रविदास और कबीर का प्रभाव था. सो सीधी नजर समाज में व्याप्त गंदगी पर पड़ती थी. वे देखते कि लोग अशिक्षा के कारण अज्ञानता में फंसे हैं. अज्ञानता उन्हें जाति की मार सहने को मजबूर करती है. वही सामंत की चाटुकारिता को विवश करती है. वही समाज में व्याप्त तरह-तरह की रूढ़ियों और अंधविश्वास का कारण है—‘उससे उद्धार का एकमात्र रास्ता है—शिक्षा. इसलिए शिक्षित बनो और बनाओ.’ सादगी उनका जीवन थी. झाड़ू उठाए वे गांव-गांव घूमते. जहां जाते, वहां सफाई में जुट जाते. फकीरनुमा आदमी को सफाई करते देख, लोग कौतूहलवश सवाल करते—‘शाम को कीर्तन होगा, आ जाना.’ इतना कहकर वे पुनः सफाई में लग जाते. ‘कीर्तन के लिए गांव में साफ-सुथरे ठिकाने है’—लोग कहते. ‘हमें सिर्फ अपना घर नहीं, पड़ोस भी साफ रखना चाहिए.’ गाडगे महाराज बातों-बातों में सामूहिकता की महत्ता बता देते. शाम को कीर्तन होता. उसमें वे लोगों को सफाई का महत्त्व समझाते. अशिक्षा, रूढ़ि, धार्मिक-सामाजिक आडंबरों की आलोचना करते. मौज में होते तो ‘गाडगा’ को ही वाद्ययंत्र बना लेते. लकड़ी की मदद से उसे बजाते-बजाते अपनी ही धुन में खो जाते. लोगों को समझाते—‘मनुष्यता ही सच्चा धर्म है. मनुष्य होना सबसे महान लक्ष्य है. इसलिए मनुष्य बनो. भूखे को रोटी दो. बेघर को आसरा दो. पर्यावरण की रक्षा करो.’ कीर्तन करते-करते कभी उनमें कबीर की आत्मा समा जाती तो कभी संत रविदास उनकी जिव्हा पर उतर आते. एक जगह काम पूरा हो जाता तो ‘गाडगा’ को सिर पर औंधा रख, फटी जूतियां चटकाते हुए, किसी नई बस्ती की ओर बढ़ जाते. फटेहाल अवस्था, मिट्टी के कटोरे और झाड़ू के साथ देखकर कई बार लोग उन्हें पागल समझने लगते. विचित्र भेष के कारण आवारा कुत्ते उनपर भौंकते. लोग हंसी उड़ाते, मगर आत्मलीन गाडगे बाबा आगे बढ़ते जाते थे. कोई उनकी वेशभूषा को लेकर सवाल करता तो मुस्कराकर कहते—‘इंसान को हमेशा सीधा-सादा जीवन जीना चाहिए. शान-शौकत उसे बरबाद कर देती है.’

विदेशों में व्यक्ति की महानता का आकलन उसकी योग्यता और लोकहित में किए गए कार्यों द्वारा किया जाता है. भारत में योग्यता और सत्कर्म दूसरे स्थान पर आते हैं. पहले स्थान पर आती है, उसकी जाति. ब्राह्मण की संतान को जन्म से ही सबसे ऊपर की श्रेणी में रख दिया जाता है और जो शूद्र और अंतज्य हैं, उन्हें सबसे निचली श्रेणी प्राप्त होती है. इसलिए एक शूद्र को समाज में अपनी योग्यता को स्थापित करने के लिए, न केवल अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है, अपितु चुनौतियों के बीच अपनी योग्यता भी प्रमाणित करनी पड़ती है. गाडगे बाबा का हृदय करुणा से आपूरित था. स्वार्थ के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देना उन्हें स्वीकार्य न था. वे उसका विरोध करते. जरूरत पड़ने पर उसके लिए परिजनों और पड़ोसियों से भी लड़ जाते थे. ईश्वर और धर्म की उनकी अपनी परिभाषा थी. लोग धर्म के बारे में सवाल करते तो कहते—‘गरीब, कमजोर, दुखी, बेबस, बेसारा और हताश लोगों की मदद करना, उन्हें हिम्मत देना ही सच्चा धर्म है. वही सच्ची ईश्वर भक्ति है.’ ईश्वर को प्रसन्न करना है तो—‘भूखे को रोटी, प्यासे को पानी, वस्त्रहीन को वस्त्र तथा बेघर को घर दो. यही ईश्वर सेवा है.’

पूरी तरह निस्पृह जीवन था. कहते थे कि, ‘अगर आप दूसरों के श्रम पर सिर्फ अपने लिए जिएंगे तो मर जाएंगे. लेकिन यदि आप अपने श्रम से, दूसरों के लिए जिएंगे तो अमर हो जाएंगे.’ कई बार गांव वाले भोजन के साथ कुछ पैसे भी थमा देते. उन पैसों को वे जोड़ते चले जाते. जब पर्याप्त रकम जमा हो जाती तो लोगों की जरूरत के हिसाब से जमाराशि को स्कूल, धर्मशाला, अस्पताल, सड़क आदि बनाने पर खर्च कर देते थे. अपने विचारों को सीधी-सरल भाषा में व्यक्त करते. यह मानते हुए कि धर्मप्राण लोग शब्द-कीर्तन पर ज्यादा विश्वास करते हैं, इसलिए अपने विचारों के बारे में कीर्तन के माध्यम से लोगों को समझाते. कहते कि मंदिर-मठ आदि साधु-संतों के अड्डे हैं. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग-नर्क जैसी बातों पर उन्हें विश्वास ही नहीं था. आंख मूंदकर राम नाम जपने या रामनामी ओढ़ लेने को वे पंडितों का ढोंग बताते थे. पंढरपुर भक्तिमार्गी हिंदुओं का बड़ा तीर्थ है. गाडगे महाराज प्राय: वहां जाते. लेकिन विट्ठल भगवान के दर्शन करने के लिए लोगों को मानव-धर्म का उपदेश देने के लिए. उनके लिए मानव-धर्म का मतलब था—’प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना.’   

उनके जीवन की एक रोचक घटना है. गाडगे महाराज को मथुरा जाना था. उसके लिए मथुरा जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए. सामान के नाम पर उनका वही चिर-परिचित ‘गाडगा’, लाठी, फटे-पुराने चिथड़े कपड़े और झाड़ू था. रास्ते में भुसावल स्टेशन पड़ा तो वहीं उतर गए. कुछ दिन वहीं रुककर आसपास के गांवों में गए. वहां झाड़ू से सफाई की. कीर्तन कर लोगों को उपदेश दिए. मथुरा जाने की सुध आई तो वापस फिर रेलगाड़ी में सवार हो गए. इस बार टिकट निरीक्षक की नजर उनपर पड़ गई. गाडगे बाबा के पास न तो टिकट था, न ही पैसे. टिकट निरीक्षक ने उन्हें धमकाया और स्टेशन पर उतार दिया. उससे यात्रा में आकस्मिक व्यवधान आ गया. लेकिन जाना तो था. देखा, स्टेशन के पास कुछ रेलवे मजदूर काम रहे हैं. डेबुजी उनके पास पहुंचे. कुछ दिन मजदूरों के साथ मिलकर काम किया. मजदूरी के पैसों से टिकट खरीदा और तब कहीं मथुरा जा पाए.

जीवन में वे डॉ. अंबेडकर, गांधी सहित अपने समय के कई प्रगतिशील नेताओं से उनका संपर्क था.  सभी ने गाडगे जी के कार्यों की सराहना की. वे अंबेडकर से वे 15 वर्ष बड़े थे. डॉ. अंबेडकर ने दलितोद्धार के लिए आंदोलन आरंभ किया तो डेबुजी भी अपनी तरह जुट गए. मगर उसके लिए रास्ता नहीं बदला. अपने कीर्तन के माध्यम से वे मनुष्य की समानता और स्वतंत्रता का समर्थन करते. छूआछूत को अमानवीय बताकर उसकी आलोचना करते. लोगों को सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने की सलाह देते. डॉ. अंबेडकर का साधु-संतों से दूर ही रहते थे. परंतु संत गाडगे के कार्यों की उपयोगिता को वे समझते थे. दूर-दराज के गांवों में, अत्यंत विषम परिस्थितियों में रह रहे दलितों के उद्धार का एकमात्र रास्ता है कि उनके बीच रहकर लोगों को समझाया जाए. उन्हीं की भाषा में, उनके करीब रहते रहते हुए. संत गाडगे यही काम करते थे. इसलिए दोनों समय-समय पर मिलते रहते थे.

हिंदू धर्म में साधुओं की कमी नहीं है. एक आम साधु-संत के पास पैसे जाएं तो वह सबसे पहले मंदिर बनवाता है, या फिर धर्मशालाएं, ताकि बैठे-बैठाए जीवनपर्यंत दान की व्यवस्था हो जाए. गाडगे बाबा ने अपने लिए न तो मंदिर बनवाया, न ही मठ. एक सच्चा, त्यागमय और निस्पृह जीवन जिया. कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया. रवींद्रनाथ के एकला चलो के सिद्धांत पर वे हमेशा अकेले ही आगे बढ़ते रहे. उनके कार्यों और उपदेशों से प्रभावित होकर लोग कई बार उन्हें रोकने का प्रयास करते. इसपर वे मुस्करा कर कहते—‘नदिया बहती भली, साधू चलता भला. धीरे-धीरे उनका यश बढ़ता जा रहा था. कीर्तन में सभी वर्गों के लोग आते थे. उनसे कभी-कभी मोटी दक्षिणा भी हाथ लग जाती. उसे वे ज्यों का त्यों संस्थाओं के निर्माण के नाम पर खर्च कर देते थे. शिक्षा के बारे में बात होती तो कहते—‘शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी आ पड़े तो खाने के बर्तन बेच दो. औरत के लिए कम दाम की साड़ियां खरीदो. टूटे-फूटे मकान में रहो. मगर बच्चों को शिक्षा जरूर दो.’ धनी लोगों को समझाते—‘शिक्षित करने से बड़ा कोई परोपकार नहीं है. गरीब बच्चों को शिक्षा दो. उनकी उन्नति में मददगार बनो.’ दान में मिले पैसों की पाई-पाई जोड़कर उन्होंने लगभग 60 संस्थाओं का निर्माण कराया. सारा पैसा उन्होंने गरीबों के लिए स्कूल खोलने, अस्पताल और ब्रद्धाश्रम बनवाने, धर्मशालाएं परिश्रमालय, वृद्धाश्रम बनवाने पर खर्च करते रहे.

संत गाडगे जी की 13 दिसंबर 1956 को अचानक तबियत खराब हुई और 17 दिसंबर 1956 को बहुत ज्यादा खराब हुई, 19 दिसंबर 1956 को रात्रि 11 बजे अमरावती के लिए जब गाड़ी चली तो रास्ते में ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी. गाड़ी में सवार चिकित्सकों ने उन्हें अमरावती ले जाने की सलाह दी. लेकिन गाड़ी कहीं भी जाए, गाडगे बाबा तो अपने जीवन का सफर पूरा कर चुके थे. बलगांव पिढ़ी नदी के पुल पर गाड़ी पहुंचते-पहुंचते मध्यरात्रि हो चुकी थी. उसी समय, रात्रि के 12.30 बजे अर्थात 20 दिसंबर 1956 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली. संत गाडगे सच्चे संत थे. दिखावा उन्हें नापसंद था. अपने अनुयायियों से अकसर यही कहते, मेरी मृत्यु जहां हो जाए, वहीं मेरा संस्कार कर देना. न कोई मूर्ति बनाना, न समाधि, न ही मठ या मंदिर. लोग मेरे जीवन और कार्यों के लिए मुझे याद रखें, यही मेरी उपलब्धि होगी. गाडगे ही इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार जिस जगह किया गया, वह स्थान गाडगे नगर कहलाता है. आज वह वृहद अमरावती शहर का हिस्सा है.

ओमप्रकाश कश्यप

बुद्धिवाद की प्रासंगिकता

सामान्य

—ई.वी. रामासामी पेरियार

(बुद्धिवाद की प्रासंगिकता पर यह भाषण पेरियार ने 22 जून 1971 को कोयंबटूर जिले के मेट्टुपलायम नामक कस्बे में दिया था। अवसर था, ‘तर्कवादी संगठन’ (रेशनलिष्ट एसोशिएसन) के उद्घाटन का। भाषण में वे ईश्वर, धर्म, महाकाव्य, पुराण, धर्मशास्त्र आदि ब्राह्मणवाद के विभिन्न रूपाकारों की बेबाक समीक्षा करते हैं। हर उस चीज पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से विचार करते हैं, जो मनुष्य को भीरू और बौद्धिक दास बनाकर उसकी अज्ञानता; प्रकारांतर में शोषण की नींव तैयार करती है। यह भाषण उनके वैचारिक सातत्य का उदाहरण भी है। उससे सात दशक पहले, 1922 में पेरियार ने कहा था कि ‘रामायण’ और ‘मनुस्मृति’ को आग के हवाले कर देना चाहिए। 1925 में उन्होंने सलाह दी थी कि बड़ी-बड़ी मूर्तियों को नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे गंदे कपड़े धोने, पछारने के काम आ सकें। 1930 में ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ की रचना की। 1956 में राम की तस्वीरों का दहन किया। मूर्तियां तोड़ने का आंदोलन भी चलाया। आरंभ में वे केवल हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद के आलोचक थे। आगे चलकर उन्होंने संपूर्ण धर्मसत्ता को आलोचना के दायरे में ले दिया। उनका मानना था कि धर्म, ईश्वर, वर्ण-व्यवस्था, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, अवतारवाद आदि ब्राह्मणवादी प्रपंच हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य सामाजिक विषमता को स्थायी बनाना है। तदनुसार ब्राह्मणों को सर्वेसर्वा मान अधिकार-शून्य और मतिविहीन हो जाना है। इस भाषण में वे राम, कृष्ण, शिव, ब्रह्मा जैसे हिंदुओं के सभी देवताओं पर निशाना साधते हैं। जहां तक कृष्ण की बात है, पेरियार ब्राह्मणों द्वारा सृजित उस ‘कृष्ण’ की आलोचना करते हैं जो ‘गीता’ के बहाने चातुर्वर्ण्य धर्म का समर्थन करता है। यदुओं के वास्तविक नायक, ऋग्वेद में वर्णित दशराज्ञ युद्ध में यदुसेना का नेतृत्व करने वाले, 10000 योद्धाओं के साथ इंद्र से समरांगण में लोहा लेने वाले महानायक कृष्ण, ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए कृष्ण से एकदम अलग हैं।

पेरियार की खूबी है कि वे अपने विचारों को पाठक पर थोपते नहीं है। वे श्रोताओं से निरंतर आग्रह करते हैं कि उनकी कही बातों पर इसलिए विश्वास न करें कि वे कह रहे हैं। अपितु मुक्त मन से उनपर विचार करें। उसके बाद जो जंचे फैसला करें। जिस समय पेरियार ने यह भाषण दिया, वे 92 वर्ष के थे। इस उम्र तक आते-आते मनुष्य प्रायः अपने विचारों के प्रति दुराग्रही हो जाता है। अपने अनुभवों के आगे दूसरों के अनुभव उसे बेमानी लगने लगते हैं। अपने विचार दूसरों पर लादने में उसे कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता। पेरियार इसके अपवाद थे। 92 की उम्र में करीब 3 घंटे धाराप्रवाह, विषय से भटके बगैर बोलना, बगैर ऐसी उदात्त भावना के संभव ही नहीं था।

साथियो!

यहां आकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। मुझे बताया गया है कि करीब दस वर्ष पहले भी मैं यहां आया था। मुझे भी याद है। लेकिन इससे पहले मैं यहां किस वर्ष आया था, वह मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है। इसके बावजूद मैं खुश हूं। इस बात से खुश हूं कि मुझे आपसे दुबारा मिलने का अवसर दिया गया है। मुझसे पहले यहां कई विद्वान अपनी बात कह चुके हैं। उन सभी के भाषण विचारोत्तेजक थे। कुछ बातें मैं भी आपसे आपसे करना चाहता हूं। आगे मैं जो भी कहूं, उससे पहले मेरा आग्रह है कि मेरी बातों पर, बिना भली-भांति विचार किए हरगिज विश्वास न करें। न ही बिना विचारे उनका अनुसरण करें। मैं बस इतना चाहता हूं कि मैं जो भी कहूं, आप खुले दिमाग से उसपर चिंतन करें। सोचें कि मैंने जो भी कहा है—वह सही है; अथवा नहीं। मेरी बातों में यदि आपको कुछ भी सार्थक लगता है, तभी उसे ग्रहण करें। उसके बाद यदि आपकी इच्छा हो तो उन विचारों को आगे बढ़ाने के लिए जैसा उचित लगे—वैसा कदम उठाएं।

मैंने कहा है, अथवा हमने कहा है—सिर्फ इसीलिए किसी बात पर भरोसा न करें।

किसी व्यक्ति को आखिर क्यों सोचना चाहिए?

मैं आपको बताऊंगा, किसलिए….

हम यहां बुद्धिवाद के प्रचार के लिए आए हैं। हम चाहते हैं कि मनुष्य तर्कशील प्राणी के रूप में जीवनयापन करें। हम अविश्वसनीय और तर्कातीत समझी जाने वाली बातों का प्रचार नहीं करते। न ही हम ईश्वर, ईश्वर की संतान, अवतारों, धर्म, धर्मशास्त्रों, रीति-रिवाजों तथा परंपरा वगैरह के प्रचार में अपना श्रम खपाते हैं। हम केवल उन्हीं चीजों का प्रचार करने में विश्वास रखते हैं, जो आपकी तर्कबुद्धि को हर तरह से स्वीकार्य हो। यदि हमारा समाज तार्किकता और तार्किक मनोवृत्ति को अपना चुका होता, तब चिंता का कोई कारण नहीं था। लेकिन हमारे लोगों को ऐसा करने से रोका गया है।

‘हमने जो कहा है वह आपको सुनना ही चाहिए। हमने जो भी, जैसा भी कहा है वह सब निरा ईश्वरीय कथन है। मैं ईश्वर का ही एक अवतार हूं। इसलिए आपको वही करना चाहिए, जैसा मैं कहता हूं।’—दूसरों पर अपने विचार लादने के लिए इस तरह के भाषण और धार्मिक आख्याएं जरूरी थीं। इनकी मदद से लोगों को स्वतंत्रतापूर्वक सोचने, स्वयं किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से रोक दिया गया था। यह आज का चलन नहीं है। आरंभ में मनुष्य तर्क और बौद्धिक सामर्थ्य से संपन्न था। 2000-3000 वर्षों के बाद आज हम आपसे दुबारा वहीं अपील करना चाह रहे हैं कि स्वतंत्र भाव से सोचो, अपने विवेक पर भरोसा रखो। कितने अफसोस की बात है!

आज यहां हमने एक बुद्धिवादी संगठन का उद्घाटन किया है। यह बात स्वयं-सिद्ध है कि यह बुद्धिवादी लोगों की संस्था है। हम यहां जीवनयापन के सही तरीके पर चर्चा करने जा रहे हैं।

वे लोग जो सोचने अथवा तर्कसम्मत आचरण से इन्कार करते हैं, वे पशुओं के समान हैं। यह मैंने किस आधार पर कहा है? जीवित प्राणियों में, पशुओं के पास तार्किक दृष्टिकोण तथा चिंतन-मनन की शक्ति का अभाव होता है। मनुष्य उनकी तरह नहीं है। मानवीय प्राणियों के पास स्वतंत्र विवेक होता है। उनकी चेतना बहुआयामी होती हैं। पेड़-पौधों और झाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि उनकी चेतना का स्वरूप एकांगी होता है। समानांतर चेतनाओं यानी अपने से बाहर की दुनिया से वे अनभिज्ञ होते हैं। कीड़े-मकोड़ों तथा अन्यान्य जीवाणुओं के पास दो तरह की संवेदनशीलता होती हैं। तैरने वाले प्राणियों यथा—मछली, व्हेल वगैरह के पास त्रिआयामी संवेदन शक्तियां बताई गई हैं। उड़ने वाले पक्षियों के पास चार प्रकार का संवेदन-सामर्थ्य; तथा घूमने-फिरने वाले जीवों यथा गाय, घोड़ा आदि के पास पांच प्रकार की संवेदन-शक्तियां बताई जाती हैं। बुद्धिवाद यानी तर्क करने की शक्ति, स्वतंत्र भाव से सोचने-समझकर निर्णय लेने की आत्मनिर्भरता, जिसे छठी संवेदन-शक्ति भी कहा जाता है—वह केवल मानवीय प्राणी में ही देखी जाती है।

ऐसे भी जीवित प्राणी हैं जिनमें विशिष्ट शक्तियां होती हैं। कुछ ऐसे प्राणी भी हैं जो उन कार्यों को भी कर सकते हैं, जिन्हें कर पाना मानव-सामर्थ्य से परे है। जैसे कि चींटियां। उनकी सूंघने की शक्ति मनुष्य से बेहतर होती है। पक्षियों को देखिए। वे ऊंची उड़ान भर सकते हैं। लंबी दूरी बहुत कम समय में तय कर सकते हैं। मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता। बंदरों को लीजिए। वे एक जगह से दूसरी जगह तक लंबी छलांग लगा सकते हैं। एक शेर अपने से कहीं बड़े हाथी को धराशायी कर सकता है। इस तरह की और भी अनेक विशेषताएं हैं जो मानवेत्तर प्राणियों में ही पाई जाती हैं। कई ऐसे कार्य हैं जिन्हें मनुष्य नहीं कर सकता, जबकि दूसरे प्राणी उन्हें सहज भाव से; तथा बड़ी मात्रा में कर सकते हैं। लेकिन मनुष्य के भीतर सोचने-समझने तर्क करने की ताकत और अपनी अनुभव तथा मानसिक विकास के अनुसार निर्णय लेने की शक्ति उसे सुखी जीवन जीने का अवसर प्रदान करता है। सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता सिवाय मनुष्य के अन्य किसी प्राणी के पास नहीं है।

अपनी तर्क-शक्ति से मनुष्य ने अपनी मेधा को निरंतर विकसित किया है। मगर, ऐसा यानी तर्कशक्ति से संपन्न मनुष्य भी अपने तर्क-सामर्थ्य के प्रयोग में असफल होता आया है। इस कमी के कारण अनेक क्षेत्रों में मनुष्य की प्रगति शून्य है। हम द्रविड़ जनों को तो देखते ही पता चल जाता है कि उनमें स्वाभिमान चेतना का अभाव है। इस बात की उन्हें चिंता भी नहीं है। हमारे लोग यह जानते हुए भी कि दूसरे देशों में मनुष्य लगातार आगे बढ़ रहा है—अपनी तरक्की कर पाने में असमर्थ हैं। दूसरे देशों की प्रगति के बारे में हम लगातार पढ़ते ही रहते हैं। उनके से अनेक महान आविष्कार हमारी नजरों के सामने हैं।

हम ‘शूद्र’ हैं।

हमें शूद्र कहा जाता है। शूद्र का आशय है—वेश्या की संतान। यदि हम पूझते हैं यह कैसे? वे कहते हैं कि शास्त्रों में लिखा है; या किसी ने ऐसा कहा था; और बहुत पहले ईश्वर का भी यही कहना था। इस बात को पूरी तरह सच मान लेने के कारण हम अपनी मर्यादा, आत्मगौरव और स्वाभिमान को गंवा चुके हैं। हमें केवल अपनी भूख की चिंता रहती थी। केवल भोजन की चाहत हम रखते थे। हमारी प्रगति को हर लिया गया था। हमें बस उन चीजों की चिंता रहती थी जिनकी मदद से हम जैसे-तैसे अपना जीवन बिता सकें। यह तो पशुओं की विशेषता है। हम भी जानवरों जैसा जीवन बिता रहे हैं।

अपने देश में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जो आगे बढ़कर बुद्धिवाद के समर्थन में खड़ा हो पाता। यदि किसी ने तर्कवाद की चर्चा की थी, तो 2000-3000 वर्ष पहले।1 वे जो कहते थे, उनके जमाने के लोग उसपर विश्वास भी करते थे। आज हम बावजूद इसके आजकल कोई उनका सम्मान नहीं करता। हमारे तर्कशील बुद्धिजीवियों को भी आज वे बातें स्वीकार्य नहीं हैं। किसी में भी उनके बारे में सोचने-समझने की हिम्मत नहीं है। ऐसा किसलिए हुआ?

वे बीच में भगवान को ले आए। उन्होंने सृष्टि की निर्मितियों पर बात की। उन्होंने बताया कि केवल ईश्वर ही सर्वशक्तिमान हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर-पुत्रों ने कुछ विशिष्ट उपदेश दिए हैं।  उनके अलावा ईश्वर के संदेश-वाहकों ने भी कुछ बातें कही हैं। ये बातें समाज पर इस तरह थोप दी गई थीं कि मनुष्य का स्वयं विचार करना, स्वतंत्र विवेक से निर्णय लेना अनावश्यक मान लिया गया।

इस तरह की गंदी और रूढ़ धारणाएं मनुष्य के दिलोदिमाग में बैठा दी गई थीं। अब उसका कर्तव्य केवल ईश्वर के नाम पर कही गई बातों पर बगैर सोचे-समझे, विश्वास कर लेना था। हर वस्तु के साथ यह मानकर व्यवहार करना था कि वह ईश्वर प्रदत्त है। इस सोच ने मनुष्य को बौद्धिक रूप से जड़ बनाने का काम किया। हमारे यहां कोई तरक्की न होने का भी यही कारण है। आप पूछ सकते हैं कि यह सब हमारे विकास को कैसे अवरुद्ध करता है? कैसे इसने हमारी प्रगति को नाकाम किया है? विदेशों में मनुष्य, पृथ्वी से करीब 4 लाख किलोमीटर दूर चांद तक जाने लगा है। वे 8000-10000 किलोमीटर प्रति घंटा के हिसाब से उड़ान भरने में सक्षम हैं। सोचने समझने, तर्क करने, अपने मस्तिष्क से काम लेने की क्षमता ने उन्हें इतने सारे आविष्कारों के करने के योग्य बनाया है। क्या हम इस तरह का कोई भी लक्ष्य हासिल करने में सक्षम हैं?

हम मानते हैं कि हमारे पास ऋषि-मुनियों और अवतारों की ढेर सारी शुभकामनाएं, आज्ञाएं, उपदेश, संदेश आदि हैं। हमारे यहां हजारों नेता, ऋषि, मुल्ला, पादरी, धर्माचार्य और सनातनी पंडित हैं। हमारे यहां अनेक धर्म भी हैं। मगर इन सबसे मिला हमें क्या है? सिर्फ अपने बल पर हम कुछ भी करने में सक्षम नहीं हैं। आखिर किसलिए? मनुष्य पहली बार जब इस धरती पर आया, उसे कितने वर्ष बीत चुके हैं? हम यह बताने में असमर्थ हें कि पहला व्यक्ति कब जन्मा था। कुछ शोधकर्ता बताते हैं एक लाख वर्ष पहले। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बताते हैं कि मनुष्य इस धरती पर 18 लाख वर्ष पहले जन्मा था। कुछ अन्य विद्वानों का दावा है कि मनुष्य उससे भी पहले आया था। इतने वर्षों के दौरान हमने क्या प्राप्त किया है? हमने पिछले सौ वर्षों में अनेक बदलाव देखे हैं। लेकिन उनमें से कितने आविष्कार अपने देश में हुए हैं? इतनी लंबी अवधि में हमें कितना कुछ प्राप्त कर लेना चाहिए था? हम ऐसा करने में असमर्थ क्यों रहे? इतने सारे साधु-महात्माओं और ईश्वरों के अस्तित्व का औचित्य क्या है। क्या मिला है हमें उनसे?

हमारे पास असंख्य ‘महान’ थे। हमारे समाज में कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से साधु, महात्मा, भक्त या धार्मिक नेता बन सकता है। फिर भी हम अपने भरोसे कुछ भी नया हासिल करने में अक्षम हैं।

वे सभी सुख, सुविधाएं और आराम के संसाधन जिनका हम आनंद उठा रहे हैं, सब के सब दूसरे देशों के वैज्ञानिकों का आविष्कार हैं। हमारे देवताओं को अत्यधिक शक्तिशाली बताया गया है। असलियत में उनकी उपलब्धि क्या है? ईश्वरीय अवतारों से जुड़े मिथकीय आख्यानों में बड़े-बड़े चमत्कारी दावे किए गए हैं। बताया गया है कि कुछ ऐसे भगवान हैं जो पर्वतों से ऐसे खेल सकते हैं मानों गैंद से खेल रहे हों। हमारे देवताओं की अनेक विचित्र गुण हैं। लेकिन क्या बाहरी देशों के लिए हम एक भी चमत्कार दिखा पाए; या मनुष्यता के लिए एक भी मौलिक खोज कर पाए हैं? अभी तक तो नहीं!

यदि यूरोपवासी इस देश में नहीं आते होते तो हमारे देश में माचिस भी नहीं आ पाती। हम अंधेरे में पड़े रहने को मजबूर होते। जीवन ठहरा हुआ होता। हम यात्रा के लिए बैलगाड़ी का इस्तेमाल कर रहे होते। अब आप हवाई जहाज का इस्तेमाल कर सकते हैं? वे सब कहां से आए थे? क्या वे किसी प्रार्थना की देन हैं; अथवा श्लोकों के पाठ से प्राप्त हुए हैं? क्या ये किसी पूजा-पाठ की देन है? नहीं? हरगिज नहीं। ईश्वर की मदद से आप कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते।

यही कारण है कि हम लोगों से अपने विवेक का इस्तेमाल करने, तथा तर्कशील प्राणी के रूप में जीवन जीने का आग्रह करते हैं। ईश्वर के प्रति पारंपरिक अंधश्रद्धा, धर्म, वेद, शास्त्र एवं धर्माचार्यों के प्रति अंधश्रद्धा के कारण आज हमारे लोग अपने सुखमय जीवन के लिए अपेक्षित संसाधन जुटाने में असमर्थ हैं। धार्मिक नेताओं तथा उनकी शिक्षाओं पर आंख मूंदकर भरोसा करने के कारण ही हम दूसरों की अपेक्षा बहुत पीछे हैं।

कुछ वक्ताओं ने हमें हमारे अज्ञान के बारे में बताया है। मत सोचिए कि शास्त्र क्या कहते हैं। धर्माज्ञाएं क्या हैं? हमें बदलना चाहिए। हमें सोचना ही चाहिए। आप ऐसे लोगों को देखते होंगे जो बिल्ली के रास्ता काटने पर उल्टे पांव लौट आते हैं। कुछ देर विश्राम करने के बाद फिर आगे बढ़ते हैं। कारण जानने के लिए आप ऐसे किसी व्यक्ति से पूछ सकते हैं। वह कहेगा कि यह बुरा शकुन है। समाधान के बारे में वह कहेगा कि कुछ देर बैठने के बाद वह फिर आगे जाएगा। जब कोई कौआ कांव-कांव करता है, तब भी ऐसा व्यक्ति आगे बढ़ने से झिझकता है। सोचता है कि अपनी कांव-कांव के जरिए कौआ उसे सावधान कर रहा है। वह मानता है कि पक्षी की बीट पड़ने से वह अपवित्र हो जाएगा। उस अवस्था में वह दूसरों को छूने से इन्कार कर देगा। वह पहने हुए वस्त्रों के साथ ही स्नान करेगा। उसकी ऐसी हरकतें देखकर क्या हम उसे आदमी कह सकते हैं?

ऐसा व्यक्ति मानता है कि दिन का खास समय ही ‘शुभ’ होता है। क्या इस बकवास का, ऐसी भ्रांत धारणा का कोई अर्थ है? इन मूर्खतापूर्ण रीति-रिवाजों का खंडन किसने किया है? कौन है जो ऐसे लोगों को अपने दिमाग से काम लेने की सलाह देता है? अपने ज्ञान और अनुभव से हम कितनी ही वस्तुएं प्राप्त कर सकते थे? लेकिन हमने उनका इस्तेमाल ही नहीं किया। यही कारण कि हम असभ्य दुनिया में रह रहे हैं। मैं बस इतना ही कह सकता हूं।

अच्छा ही हुआ जो विदेशी हमारे देश में आए। उन्होंने साहसपूर्वक कई सुधार लागू किए। उनपर हमारे धर्म और शास्त्रों में हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए गए। यदि अंग्रेज यहां नहीं आए होते तो हम आज भी बहुत पिछड़े हुए होते। विदेशियों पर तरह-तरह के आरोप लगाने के पीछे लोगों के अपने स्वार्थ थे। उनके चले जाने के बाद किसी ने भी लोगों को जागरूक करने की कोशिश नहीं की। केवल ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के हम कार्यकर्ता ही बुद्धिवाद के प्रचार जैसे श्रेष्ठ कार्य हेतु स्वेच्छा से आगे आए थे। यह देखकर कि धर्म और ईश्वर के नाम पर धोखादड़ी और लूट मची हुई है, तथा धर्माचार्य और राजनेता अपनी मनमानी कर रहे हैं—हमने बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार का खतरा मोल लिया है। हमारा मानना है कि बुद्धिवाद का प्रचार-प्रचार ही अंधविश्वासों से मुक्ति का एकमात्र रास्ता है।

हमारी कोशिश समाज के भले के लिए है। हमारे प्रयास मनुष्य को विवेकवान बनाने के लिए हैं। हमने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ जैसे बुद्धिवादी आंदोलन की शुरुआत की थी। उसके माध्यम से हम लोगों के मन में स्वाभिमान चेतना लाना चाहते थे। चाहते थे कि लोग अपनी अस्मिता के प्रति सजग हो जाएं। जिस समय हमने वह आंदोलन आरंभ किया था, अनेक लोगों ने हमारा विरोध किया था। उन्हीं दिनों एक जिम्मेदार मंत्री ने अपनी सुंघनी सूंघते हुए मुझसे पूछा था—‘आत्मसम्मान से तुम्हारा भला क्या मतलब है? इसका तो नाम ही हास्यास्पद है। कोई भी सुनकर हंसने लगेगा।’

मैंने शांतिपूर्वक उसे उत्तर दिया था—‘इसका हमें भी खेद है। कृपया बताएंगे कि आप क्या हैं?’ उन्होंने पूछा कि मैं उनसे ऐसे प्रश्न क्यों कर रहा हूं? मैंने उनसे पूछा था कि इस समय समाज में उनकी हैसियत क्या है? जातीय अनुक्रम में उनका स्थान क्या है? उन्होंने बताया कि वे मंत्री हैं। यही उनकी उपलब्धि है। आगे उन्होंने बताया था कि जाति से वे रेड्डियार हैं। उन्हें यह बताते हुए कि रेड्डी, गाउंडर, नायडु, नायकर आदि वे नाम हैं जो हमने स्वयं गढ़े हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार, धर्म और परंपरा के अनुसार हम सभी ‘शूद्र’ यानी चौथा वर्ण हैं। यही लंबे समय से चला आ रहा है। मैंने उनसे कहा कि हमने अपना आंदोलन लंबे समय से चले आ रहे इस अवमाननाकारी विभाजन को खत्म करने के लिए आरंभ किया था। उसके बाद मैंने उनसे पूछा, ‘शूद्र से क्या अभिप्राय है?’ फिर मैंने खुद की उनसे कह दिया—‘शूद्र के मायने हैं, वेश्या की संतान।’

उसके बाद मैंने अपना कथन जारी रखा। मैंने बताया, ‘आप उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। आपने बीए, बीएल की उपाधियां प्राप्त की हैं। आप तीन वर्षों तक मंत्री थे। आज भी आप मंत्री हैं। आप अभी भी ‘शूद्र’ यानी वेश्या की संतान हैं। बावजूद इसके आप अपने हीन सामाजिक स्तर पर शर्मिंदा नहीं है। एक व्यक्ति जो आपके दरवाजे पर भिक्षा मांगने आता है, एक व्यक्ति जो आपके लिए अपनी स्त्रियों को वेश्यावृति में ढकेलने को भी तैयार है—वह ऊंची जाति का होने का दावा करता है। उसे जाति के आधार पर खुद से ऊंचा मान लेते हैं, आप उसके कदमों पर झुक जाते हैं।’

अंत में मैंने उससे पूछा—‘अब आप बताएं, क्या आप ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की जरूरत महसूस करते हैं या नहीं?’ उसने बस इतना ही कहा था कि यह सब बहुत लंबे समय से चला आ रहा है।

आप स्वयं महसूस करेंगे कि हमारे आंदोलन का उद्देश्य बहुत महान है। हमारा लक्ष्य आसान भी नहीं है। हमें कठिन परिश्रम करना होगा। जख्म हाल का हो तो उसका इलाज करना आसान होता है। लेकिन यह घाव(कैंसर) तो बहुत पुराना है। ऑपरेशन करके अवांछित से मुक्ति पाने के अतिरिक्त इसका और कोई उपचार नहीं है। हमारी सामाजिक बुराइयों की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसकी चीर-फाड़ करने के लिए हमें सर्जन की भूमिका में आना ही पड़ेगा।

आत्मसम्मान आंदोलन: एक बुद्धिवादी अभियान

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की विचारधारा क्या है? किस सैद्धांतिकी पर वह टिका है? इसे समझने से पहले हमें वास्तविक समस्या को समझना पड़ेगा। उन चीजों को समझना पड़ेगा जिन्होंने हमें नीचा दिखाया है। उन कारणों की खोज करनी पड़ेगी जिन्होंने हमें लज्जाजनक परिस्थितियों में लाकर खड़ा किया है। हमने देखा है कि ईश्वर की रचना भी हमें लज्जाजनक परिस्थितियों में ढकेलने की एक वजह है, इसलिए हमें ईश्वर को नष्ट कर देना चाहिए। हमने पाया है कि हमें शर्मनाक हालात तक पहुंचाने कांग्रेस पार्टी का भी योगदान रहा है। इसलिए हम कांग्रेस को खत्म कर देना चाहते हैं। हमने मोहनदास कर्मचंद गांधी को भी हमारे हितों के विरुद्ध काम करते हुए देखा था। इसलिए हम उनके प्रभाव-क्षेत्र से उबरना चाहते हैं। इसी तरह हमने देखा है कि हमें इस विपन्नावस्था में पहुंचाने में ब्राह्मणों का बड़ा योगदान है। इसलिए हम उनके विरुद्ध हैं। हमने देखा है कि धर्म एक सामाजिक बुराई है। इसलिए हम धर्म को भी नष्ट कर देना चाहते हैं।

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ इन पांचों बुराइयों के विरुद्ध है। संक्षेप में आत्मसम्मान आंदोलन ने धर्म, कांग्रेस, गांधीवाद, ईश्वर और ब्राह्मणों के विरुद्ध संघर्ष की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है। यही पांचों ताकतें हैं जो समाज में हानिकारक विचार फैलाकर हमारे लोगों को निशाना बनाती हैं। उन्होंने हमारे लोगों को दास बनाया हुआ है। जब तक हम इस पांचों बुरी ताकतों को ध्वस्त नहीं कर देते, तब तक हम अपने लोगों को उनके उत्तरोत्तर बिगड़ते हालात से, भयावह और चुनौतीपूर्ण सामाजिक जीवन से बाहर नहीं ला सकते। हम अपने लोगों के आत्मसम्मान को लौटाने के लिए संकल्परत हैं।

मेरा मतलब यह नहीं है कि हम राजनीति में छलांग लगाने जा रहे हैं। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ राजनीतिक संगठन नहीं है। यह विशुद्ध रूप से समाज सुधारवादी आंदोलन है। लेकिन यदि ये प्रतिक्रियावादी ताकतें हमारी प्रगति के रास्ते में आएंगीं, हमारे लक्ष्य की बाधा बन खड़ी होंगी—तब उनका विरोध करने के अतिरिक्त हमारे पास अन्य कोई उपाय न होगा। आप जरा कांग्रेसी की नीतियों पर विचार कीजिए। कांग्रेस ने अपनी नीतियों को गांधी, धर्म, जाति तथा ब्राह्मणों के हितों की सुरक्षा के लिए तैयार किया है। ब्राह्मण अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए गांधी की मदद लेना चाहते थे। चूंकि गांधी का सोच पूरी तरह प्रतिक्रियावादी था, इसलिए उन्होंने गांधी को ‘महात्मा’ घोषित किया था। गांधी ब्राह्मणों के साथ हमेशा खड़े होते थे।

एक शराबी और विक्षिप्त व्यक्ति की भांति गांधी हमेशा ईश्वर, धर्मशास्त्र, वर्णाश्रम धर्म, राम और हिंदू धर्म पर बातें करते थे। लोगों पर उनके प्रचार का कुछ असर भी था। आज सभी पत्र-पत्रिकाएं ब्राह्मणों के एकल प्रभाव में हैं। हमारे पास अपनी कोई प्रभावशाली पत्रिका नहीं है। उनके प्रचारतंत्र ने हमारे लोगों को अपने प्रभाव में ले लिया है। जैसे ही किसी ब्राह्मण का जिक्र होता है, उनके मन में आदरभाव उमड़ आता हैं। यही कारण है कि हमने ब्राह्मणवाद को समाज से उखाड़ फैंकने की कसम खाई है। धर्म और ईश्वर दोनों को समाज से बाहर खदेड़ देना चाहिए। गांधी जिन्होंने हमेशा ही वर्णाश्रम व्यवस्था का पक्ष लिया था, का विरोध होना चाहिए। जो सरकार उन सबका, कानून की ताकत के साथ जोरदार समर्थन करती है, उसे बदल देना चाहिए। जो ब्राह्मण विभेदकारी वर्णव्यवस्था के समर्थक हैं, जो जाति के नाम पर अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखना चाहते हैं—उन्हें कड़वा पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। चारों ओर शर्मनाक घटनाएं घट रही हैं।

आप कृपया इन बातों पर विचार कीजिए। मैंने जो कहा वह सही है या नहीं, इसपर सोचिए। मेरे विचार किसी शास्त्र या वेद पर केंद्रित नहीं हैं। मैं बस वही कहता हूं जो मेरे मस्तिष्क को सही जंचता है। आपके पास भी तर्क और विवेचन का सामर्थ्य है। सोचिए….लगातार सोचिए। यदि आपको लगता है कि मैंने जो कहा, उसमें सचाई है, तो उसे अपना लीजिए। नहीं तो जाने दीजिए। मैं अपने विचार किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं थोपना चाहता जिन्हें वे पसंद न हों। दूसरों को अपने इशारों पर हांकने की मेरी  कोई इच्छा नहीं है।

मैं बस आपको इतनी याद दिलाना चाहता हूं कि आप सभी के पास अपना स्वतंत्र विवेक है। उसकी मदद से आप तथ्यों की विवेचना कर सकते हैं। उनके पीछे निहित अच्छे और बुरे की पहचान कर सकते हैं। इसके लिए मैं आपके ऊपर कोई दबाव बनाना नहीं चाहता। मैं तो आपका ध्यान केवल इस तथ्य की ओर दिलाना चाहता हूं कि ब्राह्मणवाद के विनाशकारी औजारों ने आपको विचारहीन गुलाम में बदल दिया है। आप अपनी सोचने-समझने की ताकत गंवा चुके हैं। यही कारण है कि मैं समाज के पुनर्गठन की आवश्यकता पर जोर देता हूं। अनेक नेताओं ने अपने बेहतर जीवन के लिए दूसरे रास्तों को चुना है। वे स्वार्थी हैं। मैं अपने मकसद को लेकर थोड़ा जिद्दी हूं।

तर्कवाद

हमारे समाज को क्रांतिकारी नीतियों की आवश्यकता है। इसके लिए समाज में बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार में तेजी लानी होगी। इस पुनीत उद्देश्य हेतु हमने ‘तर्कवादी मंच और संगठन’(रेशनलिष्ट फोरम एंड एसोशिएसन) का गठन किया है। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जिन्हें इस ‘तर्कवादी संगठन’ के विस्तार से परेशानी हो। जो नहीं चाहते हों  कि यह मंच फले-फूले। वे यह दुष्प्रचार कर सकते हैं कि हमारा आंदोलन अमुक व्यक्ति अथवा वस्तु के विरुद्ध है। मैं आपको स्पष्ट रूप से बता देना चाहता हूं। वस्तु या विचार विशेष के विरुद्ध हम चाहे हों, या न हों। लेकिन हम न तो कभी न्याय के विरुद्ध हो सकते हैं, न ही कभी तर्क की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर सकते हैं। हमने अपने संगठन को ‘तर्कवादी संगठन’ का नाम दिया है। यह आपके ऊपर है कि आप अपने बारे में क्या सोचते हैं। आप सोचें, बस इतनी ही हम आपसे अपेक्षा रखते हैं। वस्तुतः यही एकमात्र यही श्रेष्ठ कार्य है जिसे आपको नि:संकोच करना ही चाहिए।

जरा देखें, दूसरे लोग क्या कर रहे हैं। समानधर्मा लोगों के साथ मिलकर वे आज भी कुटिल कर्मों में संलिप्त हैं। उन्होंने ‘वर्णाश्रम धर्म संगठन’ आरंभ किया है। उसका उद्देश्य जाति-व्यवस्था को संरक्षण प्रदान करना है। उन्होंने ‘सनातनी संघों’ का गठन किया है, जिससे वे प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं को बचाए रखना चाहते हैं। वे ऊंची आवाज में रामकथा की महिमा बखानते हैं। कृष्ण के उपदेशों की बढ़ाई करते हैं और ऐसे ही निरर्थक कार्यों में लगे रहते हैं। इस काम के बदले वे अपने लिए विशेषाधिकारों का दावा करते हैं। वे आपको स्वतंत्र रूप से सोचने-विचारने की अनुमति नहीं देते। ईश्वर, धर्म, धर्माचार्यों तथा दूसरी वस्तुओं के बारे में अभी तक जो कहा गया है, वे आपको उसपर सोचने का अधिकार नहीं देते। उनका यह कहना गलत है कि हमारा अभियान उनके ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध है। वे चीख-चीख कर कहते हैं कि हमारा आंदोलन उनकी भावनाओं को क्षति पहुंचा रहा है। कि हमारी बातों से उनकी भावनाएं आहत होती हैं। इस सब का हमारे लिए इसका क्या मतलब है? बस इतना कि वे जितना नीचा गिरते हैं, गिरने दो।

आखिर हम कब तक सहन कर सकते हैं कि कोई ‘शूद्र’ कहकर हमारी अवमानना करे। मुझे अपने लोगों की बेहद चिंता है। आखिर कब तक हम हर तरह के अपमान को गर्दन झुकाकर सहते रहेंगे? ब्राह्मण जो कहते हैं, उसपर हम और कब तक आंखें मूंदकर विश्वास करते रहेंगे? अगर ऐसा है तो हमारे दिमागों की उपयोगिता ही क्या है? हम लोगों को खुली हवा में उड़ान भरते देखते हैं। क्या हम सिर्फ ब्राह्मणों के पांव धोकर, गंदे पानी को पीकर संतुष्ट हो जाने वाले लोग हैं? जब वे कहते हैं कि हमारे अभियान से उनकी भावनाएं आहत होती हैं, तो हमें उसकी जरा भी परवाह क्यों करनी चाहिए? वे हमसे ज्यादा उदार नहीं हैं। न ही उनका दिल हमारे दिलों से बड़ा हैं। हमें जो ठीक लगता है, वही करना चाहिए। हम जानते हैं कि हमें खतरों और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उसके लिए हम सदैव तैयार हैं। जान की बाजी लगानी पड़े तब भी तैयार हैं। मौत को तो किसी न किसी दिन आना ही है। उसके भय से हम अब और ज्यादा चुप नहीं रह सकते।

अतीत में चूकि हम अत्यधिक विनम्र और सहनशील रहे थे, इसलिए हम कोई विकास नहीं कर सके। पढ़े-लिखे द्रविड़ लोग भी आलसी थे। परिणामस्वरूप उपद्रवी और ठेकेदार किस्म के लोग धर्म की सुरक्षा के के नाम पर एकजुट होते गए। अन्यथा आज तक हम शानदार प्रगति कर चुके होते। आज भी यदि हम(धर्म के विरुद्ध) कुछ कहने के लिए मुंह खोलते हैं, तो ईसाई हमपर हमलावर होकर आ जाते हैं। हम कुछ और कहते हैं तो मुसलमान उसका विरोध करने लगते हैं। उन्हें छोड़कर जब हम केवल अपने धर्म की बारे में बात करते हैं, तब ब्राह्मण अपनी भृकुटियां तान लेते हैं। विरोध प्रदर्शन के लिए ब्राह्मण खुद कभी सामने नहीं आते। ऐसे लोग जो आज भी वेश्या और रखैलों की संतान कहे जाने को तैयार हैं, ऐसे लोग जो माथे पर भभूत मलकर खुद को धन्य समझते हैं; और ऐसे लोग जो ‘राम-राम’, ‘शिव-शिव’ का मंत्रजाप कर रहे होते हैं—वही लड़ने के लिए हमारे आगे तन जाते हैं।

मैं अदालत में अपने ऊपर दायर मुकदमे के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। जब हमने सलेम में राम के चित्रों को पैरों तले कुचला था, तब हमारे विरुद्ध कोई ब्राह्मण कोर्ट में नहीं गया था। वे हमारे ही लोग हैं जिन्होंने मेरे ऊपर मुकदमा दायर किया था। उन्होंने शिकायत की थी कि मेरे कृत्य ने उनकी भावनाओं को आहत किया है। मुझे अदालत का सम्मन प्राप्त हुआ था। उसके बारे में आपने अखबारों में पढ़ा ही होगा। जब तक हम इस भयानक और जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए बड़ा ऑपरेशन नहीं करते, तब तक मुझे नहीं लगता कि हम इसका इलाज कर सकते हैं। आज यह छूत का रोग बन चुका है। यही कारण है कि मैं समस्या की जड़ तक जाना चाहता हूं। केवल बातों द्वारा लक्ष्य सिद्धि असंभव है। इस ‘तर्कवादी संगठन’ का आरंभ हमने कुछ क्रांतिकारी विचारों के प्रचार-प्रसार हेतु किया है। यदि हम स्वयं को तुच्छ, हीन और निचले स्तर का मान लें, यदि हम हिंदू होने को स्वीकार कर लें तो हमें उनके शास्त्रों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, ईश्वर तथा रूढ़िवादी मिथों तथा कर्मकांडों को भी उसी तरह स्वीकार करना पड़ेगा।

क्या हमें यह सवाल नहीं करना चाहिए कि हमें ‘शूद्र’ यानी वेश्या की संतान किसने कहा था? क्या वह तुम्हारा भगवान कृष्ण था? यदि हां, तो उसने ऐसा कहां कहा था? यदि उसने गीता में ऐसा कहा था तो क्या हमें अपनी चप्पलें निकालकर कृष्ण और उसकी गीता की पिटाई नहीं करनी चाहिए? यदि तुम्हें इससे डर लगता है तब तुम सचमुच एक शूद्र का जीवन जीते हो। क्या हुआ अगर हम राम की चप्पलों से पिटाई करते हैं। क्योंकि उसने कहा था कि हम शूद्र हैं।  उसने शूद्रों की हत्या की थी। चूंकि शंबूक शूद्र था, इसलिए उसकी पीट-पीटकर हत्या की गई थी। शंबूक ब्राह्मण के बजाय ईश्वर की पूजा करता था। इसलिए उसके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। शूद्रों को भगवान की पूजा करने का कोई अधिकार नहीं था। उन्हें केवल ब्राह्मण को पूजना चाहिए। यही राम ने कहा था। यह प्रसंग धूर्त्ततापूर्ण ढंग से गढ़ा गया था कि शूद्र द्वारा ईश्वर की प्रार्थना करने से एक ब्राह्मण की मौत हुई है; और उसका मृत शरीर राम के आगे लाकर रख दिया गया था।

मैं आपसे सवाल करना चाहता हूं कि कोई ब्राह्मण इस प्रकार कैसे मर सकता है? उसे तो केवल स्वर्ग जाना चाहिए। यदि एक ब्राह्मण मर भी गया तो क्या हुआ?

कहानी के अनुसार, कहा यह गया है कि राम के शासनकाल में ‘अधर्म’ होने के कारण एक ब्राह्मण की मृत्यु हुई थी। किसके पाप से ऐसा हुआ—राम ने पूछा था। ब्राह्मणों ने उसका कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं दिया था। उन्होंने राम से कहा था कि वह जाएं और खुद इसका पता लगाएं। इसलिए वह वन में गया। वहां उसने शंबूक को तपस्या करते देखा था।

‘तुम क्या कर रहे हो?’ राम ने पूछा था।

‘मैं ईश्वर की साधना कर रह हूं।’ शंबूक का उत्तर था।

राम नाराज हो गया। वह चिल्लाया, ‘तुम शूद्र हो। तुम्हें केवल ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। वह करने के बजाय तुम यहां ईश्वर की पूजा कर रहे हो? यह ‘अधर्म’ है। तुम्हें तो टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहिए।’ और कसाई की तरह राम ने शंबूक को मार डाला।

कल्पना कीजिए, यदि हम यहां न हों तो ये ब्राह्मण क्या कर सकते हैं। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ब्राह्मण मारने के लिए निकल आएंगे? यहां तक कि उन्हें भी जो ईश्वर की पूजा करते हैं। क्या वे हमारे लोगों को दोष नहीं देते? वे इस बात का रोना रोएंगे कि शूद्रों ने हमें बदनाम किया है। वर्णाश्रम पद्धति यानी जाति प्रथा के नियमों को ढंग से लागू न करने के लिए वे शासकों को पहले ही दोष देते रहते हैं।

गीता

ब्राह्मण कहते हैं कि जाति-व्यवस्था की रचना कृष्ण ने की थी। कहा जाता है कि कृष्ण ने ही प्रत्येक जाति के लिए उसके विशिष्ट कर्तव्य का विधान किया था। शूद्रों का जन्म परमपुरुष के पैरों से हुआ था। चूंकि वह असम्मानजनक स्थान है, इसलिए शूद्र चौथे वर्ण में आते हैं। उन्हें दास बनकर ब्राह्मणों की सेवा करनी चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे दंड के पात्र हैं। बताया गया है कि दंड के रूप में कृष्ण उन्हें नर्कवास की सजा देगा।

गीता का यही संदेश है। चूंकि गीता में ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान पर रखा गया है, इसलिए सभी ब्राह्मण गीता का विशेष सम्मान करते हैं। जरा सोचिए ऐसे कृष्ण की यदि हम चप्पलें निकालकर पिटाई न करें, तो हमारा भविष्य क्या होगा? लेकिन जब हम कहते हैं कि उसकी चप्पलों से पिटाई होनी चाहिए, तो लोग नाराज हो जाते हैं। वे उस समय नाराज नहीं होते जब यह कहा जाता है कि हम वेश्या के गर्भ से जन्मे हैं। क्या हम इस बात को सहन कर सकते हैं कि हमारी सब की माताएं वेश्याएँ थीं।

ब्राह्मणों के इस घोषणा ने हमें बरबाद किया है कि कोई भी ईश्वर, धर्म, और शास्त्रों का अनादर नहीं करेगा। उनपर सवाल नहीं उठाएगा। उन्होंने हमें हिंदुत्व के विरुद्ध कुछ भी कहने से रोका हुआ है। जब हम सच बोलते हैं, तब वे कहते हैं कि हमने उन्हें आहत किया है। वे धमकी देते हैं कि बदले में हमारे साथ कुछ बुरा होगा। इस व्यवस्था के तहत उन्होंने हमारे लोगों को प्रतिक्रियावादी बना दिया है। हम द्रविड़ियन तमिलों को  तिरष्कृत और अपमानित किया गया है। इस देश में आज भी यही हो रहा है। क्या त्रासदी है। यहां तक कि पढ़े-लिखे लोगों को भी आजीवन यही झेलना पड़ता है. यह सब देखकर एक विदेशी की क्या प्रतिक्रिया होगी?

कल्पना कीजिए एक विदेशी एक धर्मप्राण हिंदू से मिलकर सवाल करता है—

‘आप कहां जा रहे हैं?’ इसपर हिंदू का जवाब होगा—

‘मैं ईश्वर की पूजा करने मंदिर जा रहा हूं।’

‘कैसा ईश्वर?’ वह प्रश्न करेगा।

‘मंदिर में उसकी मूर्ति है।’ उत्तर होगा।

‘कितने मूर्ख हो तुम! पत्थर या मिट्टी की मूर्ति भला भगवान कैसे हो सकती है? तुम्हें किसने बताया कि यह भगवान है?’

एक विदेशी यह सवाल कर सकता है। लेकिन हमारे लोग यह पूछने से हिचकिचाएंगे। यहां तक कि मुस्लिम भी यह सवाल करने के लिए आगे नहीं आते कि पत्थर के टुकड़े में क्या भगवान सचमुच समाया हुआ है। क्यों? क्योंकि वे बहुसंख्यक हिंदुओं से डरते हैं। वही क्यों, ईसाई भी इसी तरह के हैं।

कौन यह सिद्ध करने की जहमत उठाता है कि पत्थर में भगवान समाया हुआ है? लेकिन आदमी चुपचाप यह विश्वास कर लेता है कि भगवान पत्थर में छिपा हुआ है। मैं पूछता हूं क्या किसी ने भी स्वर्ग या नर्क के दर्शन किए हैं? आने वाले समय में संसार द्वारा हमें दोष नहीं दिया जाना चाहिए। इसके लिए यहां हमारे लोगों की चिंता करने, उनके हितों के निमित्त काम करने वाला कौन है? कौन है जो उनकी मुक्ति के रास्ते तलाशेगा? यदि हर आदमी ब्राह्मणों के पैरों पर गिरकर महान भक्त बनने जिद ठाने है तो कौन हमारी रक्षा करने करने करने की सोचेगा? इसीलिए मैं ‘तर्कवादी संगठन’ को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देता हूं। यह काम किसी भी कीमत पर होना चाहिए। तभी कोई आदमी, आदमी की तरह ससम्मान जी सकता है। हर आदमी, आदमी की तरह वर्ताब करे, उसी के लिए हमारे अभियान की आवश्यकता है। हमें साहसी होना चाहिए। हमें किसी भी चुनौती, किसी भी परीक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। आप जानते हैं कि मुस्लिमों ने अपने धर्म को कैसे सुरक्षित बनाया है। क्या उन्होंने कोई बलिदान नहीं दिया था? यहां तक कि ईसाइयों ने भी अपने धर्म की सुरक्षा के लिए काफी कष्ट सहे हैं। इस अभियान से मुझे काफी उम्मीदें हैं। हमें अच्छे संकेत भी मिल रहे हैं। हवा हमारे अनुकूल है। इस महान अवसर का उपयोग हमें ज्ञान के प्रसार के लिए करना चाहिए।

ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को किस प्रकार नष्ट किया था? उन्होंने हिंसात्मक तरीकों का सहारा लिया था। बौद्धों का कत्लेआम किया गया था. उनके घरों को आग के हवाले कर दिया था। उनके मठों पर कब्जा कर लिया गया था।

श्रमण(जैन) धर्म को कैसे नष्ट किया गया था? क्या उन्होंने जैन श्रमणों का तेज धार वाले हथियारों द्वारा बेरहमी से कत्ल नहीं किया था? उस नरसंहार में 8000 श्रमणों की जानें गई थीं।2 आज उस भीषण नरसंहार की याद में उत्सव मनाया जाता है। आगे चलकर उन्होंने इस घटना को अपने धर्मशास्त्रों जैसे ‘थेवरम’ और ‘प्रबंधम’3 में इस तरह शामिल किया, मानो वे इस अमानवीय कृत्य से प्रसन्न हों।

आज ब्राह्मण शिकायत करते हैं हम जो भाषण देते हैं वे बहुत कड़वे और असहनीय हैं। देखें कि प्रबंधम में क्या लिखा गया है। क्या ये ग्रंथ हिंसा का उपदेश नहीं देते। क्या ये नहीं बताते कि दूसरे धर्मों तथा आध्यात्मिक विश्वासों को बलपूर्वक नष्ट-भ्रष्ट कर देना चाहिए।  

क्या तुमने देखा नहीं कि हिंदू आस्थावादी—स्त्रियों के साथ बलात्कार करने, दूसरे धर्मावलंबियों को उत्पीड़ित करने, यहां तक कि उनकी हत्या हेतु आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भी, ईश्वर की प्रार्थना करते आए हैं? यहां तक कि ‘प्रबंध’ महाकाव्य भी, जो उनके अनुसार पवित्र ग्रंथ हैं—हिंदुओं को दूसरे धर्मावलंबियों को मारने, उनकी हत्या करने, सताने तथा उन्हें कष्ट पहुंचाने के लिए अधिकृत करते आए हैं।

बाइबिल क्या कहती है? उसके अनुसार ईश्वर में विश्वास नहीं रखने वाला व्यक्ति मूर्ख है। दूसरे धर्मों में भी यही सब लिखा हुआ है।

उस अवस्था में हम भला चुप क्यों रहेंगे। हमारे यह कहने में भला क्या बुराई है कि जिसने धर्म का प्रचार किया; और जो ईश्वर की पूजा करता है—मूर्ख हैं। किसी व्यक्ति विशेष पर प्रहार करने के बजाय हम कह सकते हैं—

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है

जिसने भी ईश्वर की रचना की वह मूर्ख है

जो भी ईश्वर का प्रचार करता है, वह कपटी और बदमाश है

जो ईश्वर को पूजता है वह असभ्य है।

यह बात हम किस आधार पर कहते हैं, आगे मैं उसकी सविस्तार विवेचना करूंगा। जिसने भी आत्मा, स्वर्ग, नर्क, यमलोक आदि की रचना की, वह दुष्ट था। उससे भी बड़ा दुष्ट वह है जो इन बातों पर विश्वास रखता है। वे सब हमें अज्ञानी बताते हैं। कहते हैं कि हम कुछ नहीं जानते। हम अज्ञानियों में दिमाग ही नहीं है। वे हमें असभ्य और मूर्ख कहते हैं।

हम उनके झूठे प्रचार तथा धूर्ततापूर्ण आरोपों पर शर्मिंदा नहीं है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो ‘पुनर्जन्म’ की व्याख्या कर सके। बता सके कि पुनर्जन्म के मायने क्या हैं? क्या आप सचमुच ऐसे स्थान की परिकल्पना करते हैं, जहां दिवंगत पूर्वज निवास करते हैं? केवल ब्राह्मण ही इस तरह के प्रवचन देते हैं। हमारे अपने लोग उन्हें दाल, चावल आदि देकर, उनके समक्ष दंडवत प्रणाम करते हैं। ब्राह्मण दावा करता है कि वे सब वस्तुएं उसने हमारे पूर्वजों के लिए ली हैं। आप ब्राह्मण से पूछिए कि वह हमारे दिवंगत पूर्वजों से कब और कहां मिला था? स्वर्ग में या नर्क में अथवा उनके पुनर्जन्म होने के बाद इसी दुनिया में? उसकी ओर से आपको कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलेगा। ब्राह्मण हमारे लोगों को डराते और भरमाते हैं। बावजूद इसके प्रत्येक आदमी जो ब्राह्मणों तथा उनकी बनाई व्यवस्था में विश्वास रखता है और दिवंगत पूर्वजों के नाम पर उनकी बताई वस्तुएं भेंट करता है—ब्राह्मणों से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह सहज भाव से कहेगा, ‘मैं इस सबके बारे में कुछ भी नहीं जानता। मैं तो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ब्राह्मण के आगे महज दंडवत था। इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण आचरण के बारे में हम क्या सोचें? ऐसे लोगों को मूर्ख कहने में हमारी भला क्या गलती है?

ईश्वर

ईश्वर के अस्तित्व के बारे में कौन दावा कर सकता है? कोई यह नहीं कह सकता कि फलां-फलां व्यक्ति ने ईश्वर के दर्शन किए थे। वे केवल आंखें मिचमिचाते रहेंगे। जोर देने पर सिर्फ इतना कहेंगे कि ईश्वर के बारे में कुछ लोग यही बताते हैं। धर्माचार्य कहते हैं कि ईश्वर किसी का बनाया हुआ नहीं है। वह अपनी इच्छा से स्वयं अस्तित्ववान है। उस अवस्था में वे भला मुझसे क्यों लड़ाई मोल लेंगे? मैं तो सिर्फ ईश्वर के निर्माता को दोषी मानता हूं। जबकि वे कहते हैं कि ईश्वर की रचना ही नहीं हुई है। वह अजन्मा है।

उस अवस्था में, थोड़ा साहस करते हुए मैं सवाल करना चाहूंगा कि ईश्वर के अस्तित्ववान होने की प्रक्रिया, उसके जन्म होने के बारे में ब्राह्मणों को जानकारी कैसे और कहां से मिली? जबकि दूसरे लोग उसके व्युत्पत्ति के बारे में कुछ नहीं जानते। ईश्वर अपनी मर्जी से कैसे अस्तित्व में आया इस प्रक्रिया से भी वे अनजान हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली है। परंतु इस बात का उन्हें पता कैसे चला? यह कैसे संभव है कि केवल ब्राह्मण ही इस बारे में जान सकते हैं, दूसरे लोग नहीं? क्या बाकी सभी लोग मूर्ख हैं? यह क्यों कहा जाता है कि ईश्वर से संबंधित जानकारी केवल ब्राह्मण ही रख सकता है? दूसरों को भी ऐसा क्यों नहीं बनाया गया कि वे ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में जान सकें? चूंकि हमारे पास प्रतिभा और बुद्धि है, हम अपने तर्कों के सहारे आगे बढ़ सकते हैं।

ईश्वर की उत्पत्ति

यह तय है कि मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं थी। ईश्वर का प्रचलन केवल विगत 3000 वर्षों में हुआ है। उससे पहले उसका कोई जिक्र तक नहीं करता था। न ही उसके बारे में कोई कुछ जानता था। जब मनुष्य ने तूफान की आवाज सुनी, तब उसके डर से बाहर निकलने की चाहत में उसने कल्पना की कि ऐसी कोई महाशक्ति है जो हवाओं पर नियंत्रण रखती है। तूफानों को बांधे रखना जिसका स्वभाव है। अंधेरे को देखकर भी उसके मन में ऐसे ही विचार उमड़े होंगे। फिर जब सूरज की चमक देखी होगी तब भी उसने ऐसा ही सोचा होगा।

इस तरह की छोटी-छोटी बातों से उसका देवताओं और ईश्वर के प्रति विश्वास बढ़ता गया। फिर सहज भाव से लोगों ने मान लिया कि ढेर सारे देवता और ईश्वर ब्रह्मांड में घट रही घटनाओं पर नियंत्रण रखते हैं। आगे चलकर देवताओं के राजा के रूप में इंद्र की कल्पना की गई। बाद में कुछ और देवता भी गढ़े गए। कल्पना की गई कि उनमें एक ऐसा देवता है जो संपूर्ण प्राणिजगत के जन्म की देखभाल करता है। दूसरा देवता मानव जीवन और पूरी सृष्टि को संभालता है। जबकि तीसरा देवता सृष्टि को नष्ट करने के लिए है। उन्हें क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नाम दिया गया। ऐसी चीजों के बारे में जो मानवीय समझ से परे थीं, मनुष्य सोचने लगा कि देवताओं से परे भी कोई शक्ति है जो सबपर नियंत्रण रखती है। हालांकि अभी तक उसने शीर्षतम शक्ति को परमात्मा का दर्जा नहीं दिया था। वह उसका उसी तरह सम्मान करता था, जैसे हम आजकल मंत्रियों का सम्मान करते हैं। हमारे यहां मंत्रीमंडल में अनेक मंत्रीगण होते हैं। इसी तरह मनुष्य ने कल्पना की कि एक सर्वशक्तिमान परमात्मा है जो हर चीज को नियंत्रित करता है।

वेद के अनुसार हर विशिष्ट शक्ति को नियंत्रित करने वाला एक देवता है। ईसाइयों ने सिर्फ 2000 वर्ष पहले ईश्वर में विश्वास करना शुरू किया। मुसलमानों ने भी सर्वशक्तिमान अल्लाह के बारे में महज 1500 वर्ष सोचना आरंभ किया। इस्लाम में लगभग 1500 वर्ष पहले एक बदलाव हुआ था। लेकिन ब्राह्मणों ने 3000 वर्ष पहले ही अपना ईश्वर गढ़ दिया था। ऐसा वेदों की रचना के बाद ही संभव हो सका। वैदिक युग में कोई भगवान नहीं था। हिंदुओं के देवताओं की निर्मिति वेदों की रचना के बाद हुई थी।

उन दिनों ब्राह्मण अपने देवताओं को क्या कहते थे? वे कहते थे कि एक परमात्मा है। जब पूछा गया कि वह कहां है? ब्राह्मण का उत्तर था, ‘वह अदृश्य है। उसे देख पाना असंभव है।’ जब ईश्वर के अस्तित्व पर शंका करते हुए पूछा गया कि यदि ईश्वर है तो कम से ब्राह्मण ने उसे देखा ही होगा? यदि ‘हां’ तो वह कैसा दिखाई पड़ता है? उसने जवाब दिया, ‘उसे छूना-देखना संभव नहीं है।’ उसने बताया कि ईश्वर की कोई आकृति नहीं है। जब आपने पूछा कि इसपर विश्वास कैसे किया जाए? उसने बताया कि ईश्वर इंद्रियगोचर नहीं है। वह अगम्य, अगोचर, अनुभवातीत है।

यदि मामला इतना ही गड़बड़ है तो इससे कैसे इन्कार किया जाए कि ब्राह्मण मूर्ख हैं। हम उन्हें बुद्धिमान कैसे मान सकते हैं? यदि ईश्वर को कोई भी देख, छू या महसूस नहीं कर सकता तो यह कैसे मान लिया जाए कि केवल ब्राह्मण ही ईश्वर के बारे में जानता है? उन्हें ईश्वर के अस्तित्व की जानकारी कहां से मिली? हमारे लोग ब्राह्मण जो भी उपदेश दें, उसपर आसानी से विश्वास कर लेते हैं। क्या यह मूर्खता नहीं है? क्या ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए नवीनतम और पुख्ता साक्ष्यों के साथ कोई कम से कम एक प्रमाण आवश्यक नहीं है? ऐसा साक्ष्य जिससे ईश्वर की मौजूदगी को असंद्धिग्ध रूप से प्रमाणित किया जा सके।  

क्या ब्राह्मण यहीं पर रुक जाता है? वह कहता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। कि दुनिया में जो कुछ भी घटता है, उसके पीछे ईश्वरीय इच्छा है। वह ईश्वर को उच्चतम गुणों का अधिष्ठान मानता है। वह कहता है कि ईश्वर पवित्र है, करुणानिधान, सत्य और निष्पक्ष है। यदि आप उससे पूछें कि किस आधार पर वह ऐसा मानता है? उसका बस यही जवाब होगा कि लोगों को उसकी सभी बातों पर विश्वास करना चाहिए। यदि यह सत्य है कि ईश्वर परमशक्ति अथवा परा-प्राकृतिक शक्ति है, तो वह अपने होने का प्रमाण क्यों नहीं देता? कुछ ऐसा क्यों नहीं करता कि मैं उसपर विश्वास कर सकूं? यदि वह ऐसा करने में असमर्थ है, जो मैं उसका सम्मान भला कैसे कर सकता हूं? उसकी परमशक्तियां कहां हैं? उसकी शक्तियां इस योग्य नहीं हैं कि उनके माध्यम से लोग उसके बारे में जान सकें।

यदि दुनिया ईश्वर के अस्तित्व को मानने से ही इन्कार कर दे तो उसका क्या बिगड़ जाएगा? कौन-सी ऐसी चीज है जो उसके हाथों से फिसल जाएगी? विश्व की कुल जनसंख्या 450 करोड़(1971 में) आंकी गई है। इतने सारे लोगों में 200 करोड़ लोग नास्तिक हैं। किसी भी ईश्वर में ऐसा इतना सामर्थ्य नहीं है जो इन नास्तिकों को आस्थावादी बना सके।

क्या ब्राह्मण ईश्वर की रचना के बाद शांत बैठ जाता है? नहीं, उसके बाद वह ईश्वर का प्रचार करना चाहता है। इसलिए मैं कहता हूं कि वह धूर्त्त है। वह कहता है कि ईश्वर शक्तिशाली है। तब उसे ईश्वर का प्रचार करने की क्या आवश्यकता है? आप देखिए ब्राह्मण ने क्या किया है। उसने मंदिर बनाया। मूर्तियां गढ़कर देवताओं को आकार दिया। यह कहते हुए कि ईश्वर निराकार है उसने ईश्वर को अनेकानेक रूपों में ढाल दिया। आखिर ईश्वर के इतने सारे रूपाकारों के बारे में उसे पता कैसे चला? जब भी उसने ईश्वर के बारे में कुछ बताने के लिए मुंह खोला, हमेशा उसे मनुष्य जैसा ही बताया। बाकी सभी धर्म कहते हैं कि ईश्वर निराकार है। उसकी कोई आकृति नहीं है। केवल ब्राह्मणों का दावा है कि हिंदू देवी-देवता साकार हैं। इसका क्या मतलब है? आकृति तो स्थायी बनी रहती है। विभिन्न ईश्वरों को विभिन्न रूपाकारों में गढ़ने के पीछे क्या उसका कोई तर्क अथवा विशिष्टानुभूति थी?

एक देवता के धड़ पर सिर्फ एक सिर है। दूसरे देवता के धड़ पर दो सिर उगे हैं। इनके अलावा जो देवता हैं, उनके चार, पांच यहां तक कि छह सिर भी हैं। क्या वह इतने भर से रुक गया? रावण जिनसे राम का प्रतिकार किया था, उसके दस सिर थे। आप जानते हैं, क्यों? उसका उद्देश्य था राम की महानता को स्थापित करना। ऐसी की पराकल्पना देवताओं के हाथों की संख्या के बारे में भी देखी जा सकती है। कुछ देवताओं के महज दो हाथ हैं। कुछ देवताओं के छह हाथ हैं। कुछ देवताओं के इससे भी ज्यादा हाथ हैं। यह सब मनुष्य को छलने, धोखा देने के लिए किया गया। लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ही ब्राह्मणों ने चमत्कारों से भरपूर कहानियां गढ़ी थीं। कोई भी औसत बुद्धिवाला, संवेदनशील व्यक्ति ऐसी मूर्खतापूर्ण परिकल्पनाओं पर कैसे भरोसा कर सकता है? यदि हम दादी-दादा मार्का इन कहानियों पर विश्वास न करें तो हमारा क्या बिगड़ जाएगा?

एक बुद्धिजीवी को इस सबके बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? इन कुत्ता-बिल्ली मार्का कहानियों पर अपना सिर हिलाते हुए हम आखिर कब तक, दीन-हीन और निम्न जातीय शूद्र का जीवन जीते रहेंगे? यदि हमारे भीतर जरा-भी आत्मसम्मान है, तो क्या हमें इस मूर्खतापूर्ण चीजों को नष्ट नहीं कर देना चाहिए? एक भी ऐसा ईश्वर नहीं है जो श्रेष्ठ गुणों से संपन्न हो।

आप शिव के बारे में विचार कर सकते हैं। उसके पांच सिर थे। दूसरे देवता ‘ब्रह्मा’ के भी पांच सिर थे। बताया गया है कि शिव की पत्नी पार्वती इससे भ्रमित हो गई। ब्रह्मा और शिव दोनों के पांच-पांच सिर होने के कारण वह अपने पति की पहचान ही नहीं कर पाती थी। अपनी दुविधा के बारे में उसने अपने पति से शिकायत की। शिव परेशान हो गया। पार्वती की उलझन को दूर करने के लिए उसने तत्क्षण कदम उठाने का फैसला कर लिया। आप जानते हैं कि उसने क्या किया था। उसने ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक को उड़ा दिया था, ताकि पार्वती उसे आसानी से पहचान सके। ईश्वर की इस कहानी के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आप मानते हैं कि पार्वती की समस्या के समाधान के लिए शिव ने जो किया, वह सही था?

मुझे ब्राह्मणों से पूछना चाहिए कि ईश्वरों को चार या पांच सिरों की जरूरत किसलिए पड़ती है। क्या भोजन करने के लिए इतने सारे हाथों की आवश्यकता पड़ती है? वे कहते हैं कि चार सिर चारों दिशाओं में और पांचवा आसमान पर नजर रखने के लिए चाहिए। इस सबका आधिकारिक प्रमाण क्या है? हिंदू धर्म से संबंधित ये लोग हमेशा ही काल्पनिक कहानियां गढ़ने में लगे रहते हैं।  

ईश्वर को बनाने वाले ने कहा था कि उसकी कोई आकृति नहीं है। वह निराकार है। उसने यह नहीं कहा था कि ईश्वर के अनेक हाथ हैं। उसने कहा था कि ईश्वर महज एक विचार है। ईश्वर को मानवेंद्रियों की सीमा से परे, अगम-अगोचर बताया गया है। अलवारों, नयनमारों और महानों में से किसी ने भी नहीं कहा था कि ईश्वर की सुनिश्चित आकृति या कोई निर्धारित रूपाकार है। तब हमारे आज के देवताओं को उनकी तयशुदा देह-यष्टि कहां से प्राप्त हुई? मंदिर में मूर्तियां रख, उन्हें अलग-अलग ईश्वर नामों से पुकारना कैसे सही हो सकता है? क्या ईश्वर को रचने वाला धूर्त्त नहीं था? क्या वह आदमी मूर्ख नहीं था जिसने ईश्वर को सुनिश्चित रूपाकार में ढालने का काम किया था?

यदि यह सच है कि ईश्वर को न तो देखा जा सकता है, न ही स्पर्श किया जा सकता है, तब उसको भोग लगाने का, वह भी दिन में छह-छह बार—भला क्या कोई औचित्य है? चूंकि समाज में ऐसे मूर्खों की संख्या पर्याप्त है जो इन सब बातों पर अपने धन को बरबाद कर सकते हैं, इसलिए ये धूर्त्त लोग अपना षड्यंत्र रचते रहते हैं। ईश्वर को भोजन करते हुए किसने देखा है? क्या ईश्वर को अपने शरीर के लिए दिन में छह बार भोजन की आवश्यकता है? कौन आदमी ईश्वर के मुंह में भोजन का कौर रखता है? क्या ईश्वर भोजन को पचा सकता है? क्या किसी ने भगवान को, दिन में कम से कम एक बार, शौच के लिए जाते हुए देखा था? ईश्वर को पेशाब करते हुए किसने देखा है? वह चल-फिर नहीं सकता। तब वह इन प्राकृतिक क्रियाओं को कैसे संपन्न करता होगा? वे लोग जो सोचने-विचारने में असमर्थ हैं, जिनका दिमाग कुंद हो चुका है, उन्हें महान समझ लिया गया है। ऐसे ही लोगों को आस्तिक माना जाता है।

यदि यह सही है कि ईश्वर संपूर्ण है। उसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। तब ये ब्राह्मण ईश्वर का ब्याह क्यों रचाते हैं? उसे पत्नी, बच्चों आदि की आवश्यकता ही क्या है?

एक ईश्वर के दो पत्नियां हैं। किसी के हजारों पत्नियां हैं। ईश्वर को हजारों पत्नियों की क्या जरूरत है? इन प्रश्नों के उत्तर के बारे में वे विचार नहीं करते। वे चीजों को उसी रूप में नहीं रहने देना चाहते जैसी कि वे हैं। हमारे लोग जो ईश्वर के विवाह को साल-दर-साल पूरी श्रद्धा के साथ मनाते  हैं, वे एक बार भी यह नहीं पूछते कि पिछले वर्ष जो विवाह हुआ था, उसका क्या हुआ? क्या ईश्वर की पत्नी किसी के साथ भाग गई है? अथवा किसी बीमारी के कारण उसका निधन हो चुका था? अथवा ऐसा कोई कानून है कि ईश्वर का विवाह केवल एक वर्ष के लिए ही वैध माना जाएगा? इस प्रकार के सवालों की किसे परवाह है? कैसी मूर्खता है कि लोग हर साल ईश्वर के विवाह में शामिल होने के लिए जाते हैं। आप देख सकते हैं कि किस तरह हमें मूर्ख बनाया जाता था। यदि यह सही है कि ईश्वर सद्गुणों का आधार, उनका एकमात्र स्रोत है, तब हम ईश्वरों को वेश्याओं के साथ संबंध स्थापित करते हुए कैसे देख सकते हैं?

महाकाव्यों के अनुसार सुब्रमानिया, शिव, विष्णु, कृष्ण आदि सभी भगवानों की बहुपत्नियां(रखैल) हैं! क्या किसी ने पूछा है कि अनेक पत्नियों के रहते हुए भी ईश्वर को रखैलों की क्या आवश्यकता है!

जिन लोगों ने देवताओं को गढ़ा है, वे बस यही विराम नहीं लेते। उन्होंने उनके चरित्र और आचरण के बारे में अनेक कहानियां गढ़ी हैं। उनके देवताओं के बारे में यह सोचना कितना डरावना है कि वे अनैतिक और लंपट जैसा व्यवहार करते हैं।

कुछ देवताओं के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दूसरों की पत्नियों के साथ बलात्कार किया था। कुछ मामलों में उनका भेद खुल गया था। कुछ देवताओं को मामूली दंड मिला था। कुछ को गंभीर रूप से दंडित किया गया था। यह सब देवताओं के नाम पर गढ़ा गया है। आप देख सकते हैं कि इस तरह की चीजें हिंदू मंदिरों में आज भी उत्सव की तरह मनाई जाती हैं। श्रीरंगम का देवता एक वेश्या की खोज में उड़ायुर तक पहुंच जाता है। ये ब्राह्मण देवता को अपने कंधों पर लादकर ले जाते हैं। वहां पूरी रात वे प्रतीक्षा करते हें। अगली सुबह वे पत्थर की मूर्ति को वापस श्रीरंगम ले जाते हैं। इसे प्रतिवर्ष एक उत्सव की भांति मनाया जाता है। इसी तरह आप देखते हैं त्योहारों के दौरान देवतागण भी वेश्याओं के घर जाते हैं। कोई ऐसा ईश्वर नहीं है, जिसके मन में नैतिकता के प्रति सम्मान भाव हो। शिव और विष्णु के चरित्र एवं आचरण तो बुरी तरह चित्रित किया गया है।

क्या आप सोचते हैं कि इन देवताओं के चरित्र के अनुसरण द्वारा मनुष्य अपने आपको सुधार सकते हैं? क्या उनसे प्रेरणा लेकर उच्च नैतिक गुणों पर आधारित समाज की रचना संभव है? क्या ईश्वर के लिए एक पत्नी और वेश्या दोनों का होना आवश्यक हे? कोई भी संवेदनशील मनुष्य हिंदू धर्म में झूठ और प्रपंच के इस दलदल से भला कैसे सहमत हो सकता है?

क्या ईश्वर दयावान है

वे कहते हैं कि ईश्वर प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं। आप जाकर देवताओं पर नजर डालिए। उनके हाथों में कटार, तलवार, चक्र, त्रिशूल, वाण, हथौड़ा, तेजधार वाले तथा डरावने हथियार दिखाई देंगे। क्या हिंदू देवता ठग, डकैत, लुटेरे और हत्यारे हैं? हम इस कथन से भला कैसे सहमत हो सकते हैं कि देवता दयालु हैं? यदि यह मान लिया जाए कि शिव प्रेम के प्रतीक हैं, तो उन्होंने अपने हाथ में त्रिशूल क्यों थामा हुआ है?(श्रोताओं की हंसी)। मैं ये बातें सिर्फ हंसी-मजाक के लिए नहीं कह रहा हूं। आप द्रविड़ियन लोगों को इन बातों पर अत्यंत गंभीर होकर विचार करना चाहिए। आपको समझना चाहिए कि हमें किस सीमा तक मूर्ख बनाया गया है। हम इन देवताओं के बीच मनुष्य की भांति रहते हैं। हमें इन देवताओं की जरूरत ही क्या है? देवताओं के इतने सारे अवतार किसलिए हैं? शिव के अवतार का जन्म क्यों होता है? भगवान के रूप में विष्णु की क्या उपयोगिता है? उन्होंने किया क्या है?

यह कहा जाता है कि उन्होंने अनेक लोगों की हत्याएं की हैं। किस्से-कहानियों में सविस्तार बताया गया है कि उन्होंने असुरों, राक्षसों तथा करोड़ों लोगों को मारा था, ठीक ऐसे ही जैसे कोई कसाई  असंख्य बकरियों को मौत के घाट उतार देता है। क्या ये देवता कसाई और हत्यारे हैं? वे खुद को भगवान कहते हैं। रामायण महाकाव्य में कहा गया है कि राम ने करोड़ों लोगों की हत्या की थी। बताया गया है कि इतने लोगों की हत्या उन्होंने भूमा देवी(पृथ्वी) का भार कम करने के लिए की थी। हिंदू धर्म में देवताओं का मुख्य कार्य क्या है? वे सिर्फ मारकाट करने, नरसंहार और लोगों की हत्याएं करने के लिए हैं। यदि आप सोचना आरंभ करेंगे, तभी आप इन देवताओं, मंदिरों और धर्म के बारे में अनेक मूर्खतापूर्ण एवं हास्यास्पद दावों की असलियत को समझ पाएंगे।

कोई मूर्ख ही होगा जो यह मान बैठेगा कि ये सब बातें उससे संबंधित नहीं हैं।

आप देखेंगे कि तमिलवासी द्रविड़ों को अतीत में किस प्रकार छला जाता रहा है। कितने लोगों को मूर्ख बनाया गया होगा? इन बातों पर आपको कम से कम अब तो विचार करना चाहिए। सोचना चाहिए कि हिंदू धर्मशास्त्रों, मंदिरों, भगवानों और मूर्तियों से अब तक हमें क्या लाभ हुआ है।

ये ब्राह्मण अभी तक हिंदू धर्म के लिए सिर्फ पौराणिक ग्रंथ ही रच पाए हैं। पुराणों की संख्या अनगिनत है। वे रामायण से बात शुरू करते हैं। फिर अचानक स्कंद पुराण, वैनायक पुराण आदि  पर चले जाते हैं। ये पुराण वगैरह क्या हैं? आप किसी भी एक पुराण को उठा लीजिए। उसमें केवल अश्लील, अशिष्ट और अविश्वसनीय प्रसंगों की भरमार मिलेगी।

ब्राह्मण हिंदू देवताओं का खूब बखान करते हैं। किंतु एक भी ऐसा देवता नहीं खोज पाएंगे जो अश्लीलता, अनैतिकता और हिंसक व्यवहार के मुक्त हो। कम से कम ईश्वर के मामले में, यदि वह ईश्वर है तो उसके चरित्र में क्या थोड़ी सी भी सचाई, थोड़ा-सी शुभता नहीं होनी चाहिए! हमारी यह चिंता व्यर्थ है, क्योंकि ब्राह्मणों ने जानबूझकर इन कपटपूर्ण चीजों को ईश्वर के नाम पर गढ़ा है। इनके द्वारा ही वे अज्ञानी जनता को धोखा देने में सफल रहे हैं! लेकिन मैं बेहूदा चित्रों और छवियों द्वारा परिकल्पित नीच, दुष्ट, अनैतिक और हत्यारे देवताओं की असलियत को भली-भांति समझता हूं। क्या कोई सचमुच ऐसा ईश्वर है जिसे मनुष्य अपनी इच्छा से स्वीकार कर सके?

अपने समाज में ढेर सारा पुलिस बल, अदालतें और कारागार हैं। क्या इन सब का श्रेय इतने सारे देवताओं को जाता है?

इसलिए मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि असंख्य हिंदू देवताओं ने ही हम द्रविड़ों को मूर्ख बनाया है। ये हिंदू देवता ही समाज में निरंतर बढ़ते भीषणतम अपराधों तथा नैतिक पतन के लिए जिम्मेदार हैं। हम द्रविड़जन आज पहले की अपेक्षा कहीं अधिक साहसी हैं। हम कुछ भी कर सकते हैं। सही हो गलत, अच्छा हो या बुरा—सभी तरह का काम करने की हिम्मत हमारे भीतर है।

यदि हम सब संगठित हो, लोगों को तार्किक बनाकर समाज को बदलना चाहें तो हम अवश्य ही एक बेहतर समाज की रचना कर सकते हैं। एक बार व्यक्ति तर्कशील बन जाए, तब वह दूसरों को नुकसान पहुंचाने के बारे में कभी नहीं सोचेगा। केवल तर्कशील मनुष्य ही दूसरों की भावनाओं को भली-भांति समझ सकता है। वह सोचेगा कि उसका पड़ोसी भी उसी की तरह मनुष्य है। क्या यह भावना हमें आज, इस समाज में दिखाई पड़ती है? वहां तो ऐसे लोग हैं जो दूसरों का शोषण करते रहते हैं। लोगों का शोषण करने के लिए उनके पास आज भी ज्यादा से ज्यादा अवसर हैं। वे अपनी समाज-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप हमारे जीवन को बरबाद करने वाले कारकों एवं कारणों के बारे में अच्छी तरह सोचें। हमारे इस दीन-हीन जीवन की वजह क्या है? करोड़ों तमिलों की प्रगति और सुधार की राह में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारक कौन से हैं?

क्या ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्र, रीति-रिवाज, परंपरा, वेदादि ग्रंथ तथा हिंदू धर्माचार्य हमारे पतन और पिछड़ेपन का वास्तविक कारण नहीं हैं? इस दोषारोपण के कारण मुझे गलत मत समझिए। इन बातों पर यदि आप स्वयं स्वतंत्रतापूर्ण विचार करेंगे, तो अवश्य ही मुझसे सहमत होंगे।

ब्राह्मणों ने इन सब चीजों को कब गढ़ा था? कमोबेश 3000 वर्ष पहले इन देवताओं की रचना की गई थी। उसके बाद ही देवताओं से जुड़ी कहानियां रची गईं। मेरे विचार में रामायण की रचना लगभग 2000 वर्ष पहले हुई। ईसाई धर्म का आगमन ठीक 2000 वर्ष हुआ था। इस्लाम की उम्र तो मात्र 1500 वर्ष है।

आदिम मनुष्य

प्राचीन काल में मानव-जीवन कैसा था? क्या आप जानते हैं कि लगभग 5000 वर्ष पहले मनुष्य किस तरह से रहता था? क्या वह वस्त्र धारण करता था? उन दिनों तन ढकने के लिए वह केवल पत्तों का इस्तेमाल करता था। जंगलों में घूमता रहता था। हरी वनस्पतियों और कच्चे फलों का सेवन करता था। बिना पकाए मछलियों को खा जाता था। जानवरों के कच्चे मांस का भक्षण करता था। उसका भोजन तथा उसके बाकी सभी कार्य उसके अपने ज्ञानानुभवों के अनुसार थे। उसे आधुनिक शिक्षा के वैसे अवसर प्राप्त नहीं थे, जैसे आज हमें प्राप्त हैं।

ऐसे ही दौर में कुछ चतुर किस्म के लोगों ने हमारे अज्ञान का लाभ उठाना उठाना शुरू कर दिया। घोर निराशा के आलम में हमने भी उन अविश्वसनीय बातों पर विश्वास करना आरंभ कर दिया। मानवीय विवेक, विश्वास और तर्क से परे की चीजें हर धर्म में शामिल हैं। धर्म की रचना ही मूर्खतापूर्ण विश्वासों तथा अंतहीन झूठ के बल पर हुई है।

आप रामायण, महाभारत, हिंदू, शैव, वैष्णव, ईसाई और इस्लाम किसी भी धर्म को देख सकते हैं। ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है जो सत्य को पूरी तरह दर्शाता हो। चूंकि विभिन्न धर्मों का समय अलग-अलग समय में हुआ है, इसलिए उनके मिथ्याचार की मात्रा और प्रकृति में अंतर है। मान लीजिए यदि आज कोई व्यक्ति नए धर्म की रचना का संकल्प लेता है, तो वह केवल आज की परिस्थितियों के अनुसार उसकी रचना करेगा। नए धर्म को अधिकाधिक तर्कसंगत, वस्तु-जगत के करीब और आधुनिकतम ज्ञान से समृद्ध करने की कोशिश करेगा। पुराने धर्मप्रवर्त्तकों ने धर्म को अपने समय के अज्ञान के अनुसार गढ़ा है।

पुराने समय में किसी भी धर्म के लिए ‘ईश्वर’ की संकल्पना अनिवार्य थी। ईश्वर भी ऐसा जो पराभौतिक शक्तियों से समृद्ध हो। हिंदू धर्म की रचना भी इसी तरह हुई। बाकी धर्मों ने भी उसी की नकल की। यही सच है। कल को ब्राह्मण कह सकते हैं कि महान परमात्मा गाय के गोबर को भी चंदन लेप जैसा बना सकता है। ऐसा कैसे हो सकता है, इस बात पर कोई विचार नहीं करेगा। वे हमारे साथ ऐसे छल क्यों करते हैं? वह कोई झक्की-पागल ही होगा जो यह दावा करेगा कि कोई शक्ति मरे हुए आदमी को जिंदा कर सकती है। वे इसी तरह लोगों को झांसा देते रहते हैं। वे देव-पुरुषों के चमत्कारों की चर्चा करते हैं। मानते हैं कि कथित ‘ऋषि-मुनियों’ में परामानवीय शक्तियां होती हैं। उनका सारा जोर दिव्यता, धार्मिक नेताओं और ऋषि-मुनियों के महिमा-मंडन पर केंद्रित रहता है। कुल मिलाकर वे सब लोग झूठे हैं।

महाकाव्य

जरा सोचिए, रामायण और महाभारत क्या हैं? बिना धोखे, छल और प्रपंच वे टिक नहीं सकते। वे कहते हैं कि राम दशरथ की संतान थे। यह भी बताया जाता है कि दशरथ 60,000 वर्षों तक जीवित रहा था; तथा उसकी 40,000 रानियां थीं। आजकल वह कहां है? क्या हम यह सवाल नहीं करेंगे? कोई व्यक्ति 60,000 वर्षों तक कैसे जीवित रह सकता है? कोई आदमी भला 60,000 वर्षों तक जीवित क्यों रहेगा? लोगों को धोखे में रखने के लिए ही रामायणकार ने लिखा था कि वह 60,000 वर्षों तक जीवित रहा था। लेकिन कोई व्यक्ति 40,000 स्त्रियों के साथ विवाह भला क्यों करेगा? उस इसकी आवश्यकता ही क्या है? क्या यह कभी भी संभव है?

मान लीजिए ऐसा आदमी किसी एक पत्नी के पास एक दिन गया। तब उससे दुबारा मिलने के लिए उसे 300 वर्ष लगेंगे। वह रानी 300 वर्षों तक क्या करेगी? क्या आप सोचते हैं कि 300 वर्षों तक वह सद्गुणी और ईमानदार पत्नी बनी रहेगी? क्या कमाल की कहानी है? इन बातों पर विश्वास भी कैसे किया जाए। व्यक्ति 40,000 पत्नियों के साथ कैसे निभा सकता है? क्या वह मशीन है? क्या झूठ का अंबार लगाने की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?  

इतनी सारी बेतुकी और हास्यास्पद बातों के रहते क्या कोई राम को ईश्वर के रूप में स्वीकार सकता है? क्या ईश्वर को गढ़ते समय शिष्टता के नियमों का पालन आवश्यक नहीं है? क्या यह जरूरी नहीं था कि वे कम से कम भगवान के प्रति आदर-भाव बनाए रखते? और राम ने क्या किया था? उसने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। क्या वह यज्ञ उसने एक शिष्ट मानवीय प्राणी के नाते संपन्न किया था? क्या एक निरर्थक कार्य में पत्नी के साथ भाग लेना, और जिस अनैतिक तरीके से यज्ञ किए जाते हैं, उसमें अपनी पत्नी और बच्चों को सहभागी बनाना जरूरी था? यहां मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कह रहा। यज्ञ के बारे में यह सब स्वयं रामायण में ही वर्णित है।

यह साफ तौर पर लिखा है कि विवाहिता स्त्रियां दैहिक संबंधों के लिए ब्राह्मणों को सौंप दी जाती थीं। स्त्रियां ब्राह्मणों का वीर्य अपने गर्भ में धारण करतीं तथा उनकी संतान को जन्म देती थीं। इस कार्य के भी ब्राह्मणों को अकूत धन-संपदा भेंट की जाती थी। यही वह विधि थी, जिससे दशरथ को संतान प्राप्ति हुई थी? फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि राम उनके पुत्र थे? यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि दशरथ के बेटों का जन्म उसकी पत्नियों के ब्राह्मणों के साथ सहवास के बाद हुआ था।

राम को ईश्वर का अवतार बताया जाता है। उसके जन्म के बारे में विस्तार के साथ सूचना है। ब्राह्मणों ने राम की मां कौश्लया को नंगा किया था। उससे जमीन पर लेट जाने को कहा गया था। एक घोड़ा मंगवाया गया। उसके लिंग को कौश्लया की योनि में प्रविष्ट कराया गया। इसी विधि से अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ था।

इसके लिए आपको मेरे शब्दों पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। आपको खुद ही रामायण का अध्ययन करना चाहिए। ये सभी बातें आपको उसमें मिल जाएंगीं। मैं ये बातें आपको विस्तार से क्यों बता रहा हूं? आपको जानना चाहिए कि पुराने लोग कितने अज्ञानी थे। ब्राह्मणों ने चतुराईपूर्वक, शातिराना ढंग से ईश्वर की रचना की, जिससे वे द्रविड़ियन लोगों शोषण कर सकें। क्या हम आज भी उस समय के लोगों जितने ही मूर्ख और नासमझ हैं? इसलिए मैं साफ तौर पर, बिना किसी संदेह या हिचक के कहता हूं कि सारे के सारे देवता ब्राह्मणों की कल्पना की उपज थे।

यदि वे मान लें कि राम-कथा काल्पनिक है, तब  हम रामायण को स्वीकार भी कर सकते हैं। यहां तक कि राम को जन्म देने का तरीका भी उतना बुरा नहीं था। परंतु क्या ब्राह्मणों का कर्तव्य नहीं था कि वे राम के चरित्र को शिष्ट और सद्गुण संपन्न इंसान के चरित्र की तरह गढ़ते। उन्होंने क्या किया था? वे कहते हैं कि उसने अपने मददगारों, राक्षस-असुर(द्रविड़ियन) बाली तथा दूसरे कई साथियों, जिनसे वह मिला था—का वध किया था। आप जानते हैं, किसलिए? मेरी बातें आपको सावधानीपूर्वक सुननी चाहिए। ध्यान देना चाहिए कि उसने किसकी हत्या की थी; और किसलिए की थी। राम ने खुद कहा है—‘क्या आप मेरे बारे में जानते हैं। मेरा जन्म ब्राह्मणों के समस्त दुश्मनों के विनाश के लिए हुआ है।’

भले मानुषो! आप यह सब रामायण में पढ़ सकते हो।

यदि ऐसा ही है, तब हम क्या समझें? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि ब्राह्मणों ने रामायण की रचना हमारे अपमान, अवमानना और हमें शर्मिंदा करने के लिए नहीं की है? हमें शूद्र जिसका अभिप्राय वेश्या की संतान है, क्यों कहा जाता है? राम को शूद्रों की हत्या क्यों और किसलिए करनी चाहिए थी? इस अवस्था में हमें खुद को हिंदू क्यों मानना चाहिए? देवता के रूप में राम की पूजा हमें क्यों करनी चाहिए?

अब आप देखिए कि ब्राह्मणों ने अपनी सुरक्षा के लिए क्या किया था? वे सिर्फ इसलिए कामयाब हुए क्योंकि हम द्रविड़ियन लोग मूर्ख थे।

रामायण की रचना शूद्रों के उपहास, उनकी अवमानना करने के लिए की गई है। लेकिन क्या ब्राह्मण राम को सम्मानित देवता बनाने में कामयाब हुए थे? उसकी पत्नी के साथ क्या हुआ था? वह किसी और के साथ भाग निकली थी। वह उसके साथ रही और गर्भवती हुई। उसी अवस्था में वह लौटकर आई। इस कहानी के दूसरे रूप भी हैं। दूसरी कहानी में बताया गया है कि राम की पत्नी सीता का अपहरण किया गया था। यदि राम सचमुच भगवान था, और यह बात यदि सच है तो वह इससे अनभिज्ञ कैसे हो सकता था? उसे इस बात की जानकारी होनी चाहिए थी कि उसके पीछे कोई आकर बलपूर्वक उसकी पत्नी का हरण करके ले जाएगा। अपनी पत्नी की समुचित सुरक्षा का इंतजाम किए बिना ही वह उसे छोड़कर भला कैसे जा सकता था? अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए उसने क्या सावधानियां बरती थीं? कुछ भी नहीं!

क्या राम वास्तव में देवता था? क्या उसकी शक्ति असली थीं? वह अपनी पत्नी को जंगल में बिलकुल अकेले कैसे छोड़ सकता था, जबकि वह खुद भी जंगल में अकेला ही था। जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। मानो सीता ने पहले से ही यह इंतजाम किया हुआ था कि रावण उससे मिले। रावण ने सीता से साथ चलने को कहा था। वह शांतिपूर्वक उसके साथ चली गई। वह वापस नहीं आई थी। जब वह लौटी तब उसे चार महीनों का गर्भ था।

सज्जनो, क्या यह भगवान की कहानियां गढने का तरीका है? यही कारण है कि हम रामायण को स्वीकार नहीं करते। आप देखेंगे कि ब्राह्मणों ने सीता को एक देवी के रूप में गढ़ा है, जिसकी पूजा की जानी चाहिए। राम के चरित्र के बारे में तो आप जानते ही हैं! उसे ईश्वर बनाया गया था। ब्राह्मण राम को ईश्वर बनाकर ही शांत नहीं हुए। उन्होंने राम की पत्नी को भी देवी बना दिया।

कोई विदेशी हमारे बारे में क्या सोचेगा? क्या वह यह कहने में संकोच करेगा कि हमारे देवता दुष्ट प्रवृत्ति के हैं? हमारी देवियां वेश्या हैं?

क्या हमें इनपर विचार करने की कोई समझ नहीं होनी चाहिए? यदि हमारे भीतर थोड़ा स्वाभिमान भी बाकी है तो हम इन सब चीजों को कैसे सहन कर सकते हैं? इस तरह की बेतुकी और हास्यास्पद कहानियां और कलंककारी देवता किसलिए हैं?

कृष्ण, स्कंद, कार्तिकेय, विनायक(गणेश), शिव, विष्णु आदि दूसरे देवताओं को देखिए! वे कौन थे? उनका जन्म कैसे हुआ था?

कृष्ण का जन्म

आपको पता होना चाहिए कि कृष्ण का जन्म कैसे हुआ था। इस बारे में ब्राह्मणों ने बड़ा रोचक  विवरण दिया है। बताया जाता है कि महाविष्णु ने अपने दो बाल उखाड़े। उनका एक बाल काला था, दूसरा सफेद। सो एक बाल कृष्ण बन गया, दूसरा उसका भाई बलराम।4 सोचकर देखें, क्या यह सही है? बालों की मदद से देवताओं के जन्म लेने का क्या यह श्रेष्ठ, सम्मानजनक और भरोसेमंद तरीका है? यदि आपको मुझपर विश्वास नहीं होता तो आप स्वयं पुराणों का अध्ययन कर सकते हैं। देखें, यह कितना भद्दा और बेहूदा है!

विनायक पुराणम्

अब मैं आपको बताऊंगा कि दूसरे भगवान की रचना किस तरह की गई थी। ब्राह्मणों ने गणेश को भी हिंदू देवता के रूप में रचा था। आपको यह जानने में रुचि होगी कि उसका जन्म कैसे हुआ था?

यह बताया गया है कि परमशिव(महादेव) और पार्वती जंगल में विचरण करने के लिए गए थे। वहां उन्होंने एक हाथी युगल रतिक्रिया में तल्लीन देखा? उसे देखकर पार्वती के मन में भी अपने पति के साथ हाथी की तरह संभोग करने की इच्छा जागी। महादेव राजी हो गए। दोनों हाथी-युगल बन गए। उन्होंने परस्पर संभोग किया। उसके बाद गणेश का जन्म हुआ, जो हाथी के बच्चे की तरह था। क्या आप इस कहानी से सहमत हैं? क्या यह देवता गढ़ने का एक सभ्य तरीका है? यह डरावना देवता विनायक(मूर्तियों के रूप में) तमिल नाडु में हर जगह दिखाई पड़ता है। वह यहां अपेक्षाकृत ज्यादा लोकप्रिय है। इस देवता की उत्पत्ति एकदम हाल में हुई है।

यह बताया गया है कि नरसिंह पल्लव का सेनापति वाथापी5 गया था। वहीं से वह नए देवता को हमारे क्षेत्र में लेकर आया। आप मिस्टर टी. पी. मीनाक्षीसुंदरम को जानते हैं। वे विद्वान अध्येता और उपकुलपति हैं। गहन शोध के पश्चात वे कुछ ठोस निष्कर्षों तक पहुंचे हैं। बिना किसी संदेह के, वे सप्रमाण दावा करते हैं कि 1200-1300 वर्ष पहले देवता के रूप में विनायक को उत्तर में स्थित वाथापी से लेकर आया था। आज उसकी हिंदुओं के बड़े देवता के रूप में पहचान है।

सुब्रमणियम देवता

सुब्रमणियम देवता की कहानी क्या है? इस हिंदू देवता को 2000 वर्ष पहले गढ़ा गया था। इस देवता के जन्म के बारे में ब्राह्मणों ने दो कहानियां गढ़ी हुई हैं। एक कथा रामायण में ही उपलब्ध है। मेरे पास यह पुस्तक है(पेरियार ने वह पुस्तक सम्मेलन की अध्यक्ष को सौंपी थी और श्रोताओं को संबंधित हिस्सा पढ़कर सुनाया था)।

सज्जनो! उन दिनों हमारे लोग केवल मूर्ख ही नहीं थे, अपितु वे अपने आत्मसम्मान को भी गंवा चुके थे।

यह कहा गया है कि एक बार सभी देवता मिलकर कैलाश पहुंचे। महादेव के ठिकाने पर पहुंचकर उन्होंने उनकी तपस्या की तथा उनसे देवताओं का सेनापति देने का आग्रह किया। लगता है कि देवताओं की तपस्या को स्वीकार शिव उन्हें उनका सेनापति देने को तैयार हो गए। देवता वापस लौट आए। तदनंतर शिव पार्वती से मिले और कहा कि उन्हें देवताओं को उनका सेनापति देना चाहिए। उसके बाद दोनों ने संभोग आरंभ कर दिया।

क्या किसी सेनापति को जन्म देने का यह उचित तरीका है? संसर्ग का आनंद लेने के लिए वे इस बहाने सहवासरत क्यों हुए होंगे? मैं ये बातें सप्रमाण बता रहा हूं। ठीक है, उसके बाद क्या हुआ था। उनका संभोग लंबा खिंचता गया। केवल कुछ घंटे, दिन, सप्ताह या महीने नहीं। देवताओं का सेनापति पैदा करने के लिए वे दोनों 1000 वर्षों तक एक-दूसरे के साथ सहवासरत पड़े रहे। बावजूद इसके उनके कोई बच्चा नहीं हुआ। बेचारे देवता परेशान थे। वे घबराये हुए थे। आखिरकार वे महादेव और पार्वती के निकट पहुंचे तथा उनसे अपनी अनिच्छा जाहिर की। इसपर महादेव और पार्वती ने उसका कारण जानना चाहा। देवताओं को भय था कि 1000 वर्षों लंबे संभोग से पैदा हुआ देवता खुद उन्हें भी नष्ट कर सकता है। यह सुनते ही पार्वती और महादेव संभोग छोड़कर एक-दूसरे से अलग हो गए। इस बीच महादेव स्खलित हुए और उनका वीर्य नदी की तरह बह निकला। बहता-बहता वह नदी में जा मिला। तुरंत उसने बाढ़ का रूप ले लिया। नदी से होती हुई वीर्य की लहर समुद्र तक पहुंची। समुद्र की सतह पर तैरती हुई वीर्य की उस लहर ने छह सिरों का रूप ले लिया।

यह कैसी गणना है? उसके केवल छह सिर ही क्यों थे? इस शंका का समाधान, इसकी व्याख्या करने कौन करेगा?

छह सिरों वाली वीर्य की वह लहर धारा गंगा तक पहुंची। वहां एक स्त्री खड़ी थी। उसने अपने हाथ बढ़ाकर उस वीर्य को उठाया तथा अपने गले से लगा लिया। वीर्य तत्क्षण छह सिर वाले मनुष्य में बदल गया। उस स्त्री ने किसी तरह उस छह मुंह वाले देवता को दुग्ध पान कराया; तथा उस बच्चे को नाम दिया—अरमुगम। यह वैष्णवियों द्वारा की गई व्याख्या है। इसका विवरण वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध है।

शैव मतावलंबी इसकी अलग व्याख्या करते हैं। उसके अनुसार शिव और पार्वती को संभोगरत हुए 1000 वर्ष बीत जाने से प्रतीक्षारत देवता अकुला गए। उन्होंने उन दोनों से संभोग रोक देने का आग्रह किया। शिव ने मना कर दिया। कहा कि यदि उसने संभोग बीच ही में रोक दिया तो उनका वीर्य उद्दाम वेग से बह निकलेगा। उन्होंने देवताओं से कहा कि हाथ खड़े होकर उसे अपने हाथों में संभाल लें। देवताओं ने ऐसा ही किया। शिव ने संभोग रोक दिया। वीर्य बह निकला। देवताओं ने उसे अपनी हथेलियों में संभाल लिया। तदनंतर शिव ने देवताओं से वीर्य को पी लेने का आग्रह किया। देवताओं ने उसे पी लिया। उसी क्षण उनके गर्भ ठहर गया। यह देख वे फिर चिंतातुर हो गए। उन्होंने फिर शिव की प्रार्थना की। तब शिव ने उन्हें मुक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने देवताओं से एक विशिष्ट तालाब में जाकर स्नान करने का आग्रह किया। परेशान देवता तुरंत उस तालाब तक पहुंचे और वहां स्नान किया। इससे उनका गर्भ स्खलित हो गया।

सज्जनो! ये सब कहानियां पौराणिक ग्रंथों में तरह-तरह से दी हुई हैं।

गर्भ स्खलित होने के बाद शिव के वीर्य की कुछ बूंदें गिर पड़ीं, उन्हीं से सुब्रमणियम का जन्म हुआ। उसे ‘कांदन’ भी कहा जाता है। संस्कृत में ‘कांदन’ का अर्थ ‘वीर्य’ है। तमिल में हम जिसे ‘कांदन’ कहते हें। संस्कृत में उसको ‘स्कंद’ कहा जाता है। ‘संस्कृत में उसका अर्थ ‘निकल पड़ना’ या ‘उछलना’ है। उसका आशय स्खलन से है। तमिल में जो ‘अरुमुगम’ है, वही ब्राह्मणों के लिए ‘सुब्रमणियम’ है।

देखें, ब्राह्मणों ने देवताओं को कितना सम्मान दिया हैं। ब्राह्मणों ने देवताओं को इसी तरह के घृणास्पद तरीकों से गढ़ा है।

ब्रह्मा

अब एक और देवता ब्रह्मा के आचरण पर गौर करें। यह बताया गया है कि उसने अपनी ही पुत्री सरस्वती के साथ विवाह किया था। यह भी पुराणों में आया है।

ब्रह्मा ने एक लड़की की रचना की। वह बहुत सुंदर थी। इसलिए वह उस लड़की पर इतना सम्मोहित हो गया कि उसने अपनी इच्छापूर्ति के लिए दबाव डाला। सरस्वती ने मना कर दिया और अपनी ऐड़ियों तक झुक गई। उसके बाद ब्रह्मा हरिण बन गया और उसकी पुत्री हरिणी बन गई। दोनों दौड़ते-दौड़ते शिव के पास पहुंचे। सरस्वती ने शिव के आगे अपने पिता की शिकायत की। महादेव ने ब्रह्मा को फटकारा। ब्रह्मा ने कहा कि सरस्वती के सौंदर्य को देखकर ही उसमें उससे सहवास की इच्छा जन्मी है और प्यार जब वासना में बदल जाए तो किसी के लिए भी उसे नियंत्रित कर पाना संभव नहीं है। माताओं, बहनों और बेटियों में भेद न कर पाने के पीछे उनकी भला कौन-सी समझदारी, कैसा देवत्व था? जो बात ब्रह्मा ने शिव से कही थी, वही बात शिव ने सरस्वती के आगे रख दी। सरस्वती ने महसूस किया कि स्वयं शिव भी अपनी पुत्री से प्रेम करते थे।

दोस्तो! इस तरह की कहानियां गढ़ने का उद्देश्य क्या था? किसके लिए? इन कहानियों से किसे लाभ पहुंचता था? आप बस इतना समझ लें कि ये कहानियां उन दिनों गढ़ी गई थीं, जब लोग अशिक्षित थे। किसी भी विषय पर गहन विचार कर पाने का सामर्थ्य उनमें नहीं था। आजकल लोगों के पास ज्ञानार्जन के सभी अवसर हैं। वे सोच-समझकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में सक्षम हैं।

मैं समझता हूं कि यह बात आप भली-भांति समझ चुके होगे कि पुराणों में जो लिखा है, वह सच से सर्वथा परे है। उसे गंदा, अश्लील, गंवारू, असभ्य और मनुष्य के विकास का अवरोधक मानकर उसकी भत्र्सना की जानी चाहिए।

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के बुद्धिवादी अभियान का उद्देश्य लोगों का ध्यान भटकाने के लिए नहीं है। बुद्धिवाद का मकसद ‘कुदाल’ को ‘कुदाल’ यानी जो जैसा है, वही बताना है। दूसरी ओर खुद को शंकराचार्य और माधवाचार्य का शिष्य बताने वाले लोग भी हैं, जो लोगों का ध्यान उनकी प्रगति से हटाना चाहते हैं। ऊंचे-ऊंचे मंचों पर विराजमान ये आध्यात्मिक गुरु लोगों के सम्मान के पात्र हैं। लोग उनपर विश्वास करने के लिए ही बने हैं। यही कारण है कि हमने एक अलग संस्था का गठन किया है, जिसका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना है। हमारे अभियान के बिना मनुष्य को जागरूक नहीं किया जा सकता। न ही वह वुद्धिमान बन सकता है।

एक सभा के दौरान मैं कुनराक्कुदी आदिगलार6 से मिला था। उनकी उपस्थिति में मैंने देवताओं और पुराणों पर भाषण दिया था। मैंने उनके अस्तित्व से इन्कार किया था। कहा था कि केवल मूर्ख लोग ही ईश्वर पर विश्वास कर सकते हैं। आदिगलार भाषण के लिए खड़े हुए तो उन्होंने बताया कि वे ईश्वर में विश्वास करते हैं। उन्होंने मुझपर नास्तिकता के प्रचार का आरोप लगाया था, लेकिन कुल मिलाकर उनका आरोप उन लोगों पर था जिन्होंने अस्वाभाविक तरीके से ईश्वर को गढ़ा था। वे मेरे साथ तर्क करने, मेरे कथन का तर्कसंगत खंडन में सक्षम नहीं थे। इसलिए चतुराईपूर्वक वहां से निकल गए थे।

कोई भी व्यक्ति भला तार्किकता और तर्कसंगत बनने से कैसे इन्कार कर सकता है। खासकर तब जब सारी की सारी पुराकथाएं इतने बेहूदा तरीके से लिखी गई हों। अब विचारणीय बात यह है कि इस तरह की कहानियां 2000 वर्ष ही क्यों रची गई थीं। उन दिनों के लोग मूर्ख थे। लेकिन आज भी उन्होंने मंदिर बना लिए हैं। उन्होंने देवताओं की रचना की है। धर्म को फैलाया है। यह सब वे यह सोचकर करते हैं कि आम जनता आज भी मूर्ख है। आखिर क्या कारण हैं कि वे हमारे बुद्धिवादी आंदोलन से ईर्ष्या करते हैं? जबकि हम तो नि:स्वार्थ सेवा में लगे हैं।

आज तक भी, हमारे पास अपनी और ऐसी सरकार नहीं है जिसमें ब्राह्मणों का वर्चस्व न हो। पुराने जमाने में जो राजा-महाराजा शासन करते थे, वे ब्राह्मणों का पूरा-पूरा साथ देते थे। उनके आगे गुलामों की तरह झुके रहते थे. हमारे चेर, चोल, पांडया सम्राट क्या कर रहे थे? वे भी ब्राह्मणों के सम्मान में झुके रहते थे।

केवल इसी शताब्दी में स्थितियों ने बदलना शुरू किया है। यहां तक कि जब मैं बच्चा था, स्त्रियां  ब्राह्मण की पहली नजर को आशीर्वाद जैसा मानती थीं। यह भावना उनके भीतर थी कि ब्राह्मण की उपस्थिति मात्र से स्वर्ग के दरवाजे उनके लिए खुल सकते हैं। संभव है ये सब बातें आज आपकी जानकारी में न हों। मैं आपको पिछले जमाने के बारे में बता रहा हूं। उन दिनों गाय के गोबर को छूना भी पवित्र माना जाता था, जैसा कि आज भी माना जाता है। इसलिए ब्राह्मण को पवित्र समझना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

नास्तिक

हमने दुनिया में कितने बदलाव देखे हैं? अनुमान लगाया गया है कि इस समय(1971 में) दुनिया की जनसंख्या 400 से 450 करोड़ है। उनमें से करीब 125 करोड़ लोग स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते। 100 करोड़ लोग खुद को गर्व से बुद्धिवादी बताते हैं। सोवियत संघ में करीब 35 करोड़ लोग नास्तिक हैं। उन्होंने गिरिजाघरों को ढहा दिया है। बाइबिल को उन्होंने आग के हवाले कर दिया है। धर्माचार्यों की उन्होंने हत्या कर दी है। परिणाम क्या हुआ? आप इसे खुद देख सकते हैं। वहां न कोई धनवान है, न ही विपन्न। सभी समान हैं। सभी खुश हैं। चीन के 85 करोड़ लोगों में से 75 करोड़ जनता बौद्ध धर्म में विश्वास करती है। बर्मा में 2 करोड़ लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं। श्रीलंका में दो-तिहाई जनता बौद्ध धर्म को मानने वाली है। स्याम(थाइलेंड) में तीन-चौथाई लोग बौद्ध हैं। इतने सारे लोग ईश्वरीय सत्ता की मौजूदगी से इन्कार करते हैं। वे ईश्वर में आस्था नहीं रखते। वे सभी नास्तिक हैं।

यूरोप में अनेकानेक तर्कवादी संगठन हैं। जर्मनी, स्पेन, ग्रीक तर्कवादी संगठनों, शोध-केंद्रों, सत्यशोधक संगठनों, थिंकर्स ऐसोशिएसन, नास्तिक संगठन आदि के बल पर आधुनिक सभ्यता का उदाहरण बन चुके हैं। हर शहर में इन संगठनों के लाखों सदस्य मौजूद हैं। मैं उन सभी स्थानों का भ्रमण कर चुका हूं। पेरिस में मैं एक नास्तिक संगठन का मेहमान बना था। उन्होंने एक पत्रिका प्रकाशित की थी। आप उसमें ‘क्रास’ के निशान को तलवार से कटते हुए देख सकते हैं। यह दर्शाता है कि ‘क्रास’(ईसाइयों का धार्मिक चिह्न) महज दिखावटी है। ईश्वर को मारा जा रहा है। केवल इस्लाम ही है जो धर्म के नाम पर इधर-उधर की बातों में उलझा हुआ है। वे केवल सामाजिक एकता पर ध्यान देते हैं।

त्योहार

भारत में मंदिरों की भरमार है। हर मील पर कम से कम पांच-छह मंदिर नजर आ जाएंगे। प्रत्येक मंदिर में 20, 30 से लेकर सौ-सौ भगवान हो सकते हैं। इन मंदिरों में तीन से लेकर छह-छह बार इन प्रभुओं की पूजा की जाती है।

इसके अलावा, प्रतिवर्ष तीन-चार बड़े त्योहार आते हैं। लड़कियों से मिलने के लिए युवा लड़के इन त्योहारों की बेताबी से प्रतीक्षा करते हैं। लड़कियां अच्छी तरह सज-धजकर लड़कों को लुभाने मंदिर और त्योहारों में शामिल होती हैं। इस मुलाकात को ही वे त्योहार कहते हैं। कुछ वर्ष पहले तक, भीड़ जुटाने के लिए मंदिरों में वेश्याओं को बुलाया जाता था। बड़े मंदिरों में तो सौ-सौ वेश्याओं को आमंत्रित किया जाता था। अपने शहर कस्बे में तो हर वेश्या मंदिर के उत्सव में शामिल होती थी। यह पुरानी परंपरा थी। आजकल यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। हम अपने परिवार की स्त्रियों को बाहर जाने की आजादी नहीं देते। मगर उन्हें मंदिर जाकर उत्सव में शामिल होने की अनुमति होती है। वे क्या कर सकती थीं? केवल स्त्रियों के मंदिर जाने के नाम पर ही पुरुष शांत रहते हैं। इसलिए उनके पास युवाओं के मिलने के लिए उससे अच्छा और कोई बहाना ही नहीं होता। स्वाभाविक रूप से कि मंदिर उत्सव, युवा लड़के-लड़कियों के एक-दूसरे से मिलने के लिए अच्छा अवसर लेकर आते हैं। बड़ी भीड़ जुटाने के इसके अलावा और इंतजाम भी करने पड़ते हैं। ईश्वर को इतने सारे प्रचार की क्या आवश्यकता है? इतनी चमक-दमक, तामझाम और दिखावा किसलिए? इन उत्सवों की आखिर क्या आवश्यकता है?

हम, तर्कशील लोग इन मंदिरों, भगवानों और उत्सवों के विरुद्ध हैं। हम बड़े परिवर्तन की कामना करते हैं। यह कैसे संभव है? हम मानते हैं कि बड़े बदलाव के लिए प्रचार-प्रसार ही एकमात्र रास्ता है। हम लोगों को अपने तर्कों द्वारा समझाने की कोशिश करते हैं। उन्हें वास्तविक तथ्यों से अवगत कराते हैं। बिना इसके उनकी मुक्ति का दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए हम लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते हैं। हमें ईश्वरों पर हमला करते देख कुछ लोगों को दुख होता है। वे इस बात को नहीं समझते कि ईश्वर, मंदिर और धर्म जैसी बुराइयों को चुनौती दिए बिना समाज में अभीष्ट परिवर्तन असंभव है।

इस निरंतर परिवर्तनशील दुनिया की ओर देखो। एक साथ कई बदलाव बड़ी तेजी से हो रहे हैं। हम सफलता की सीढ़ी के आखिरी पायदान पर हैं। हम शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए थे। दो हजार वर्ष पहले, हजार लोगों में केवल एक व्यक्ति पढ़ा-लिखा होता था। वह भी ब्राह्मण हुआ करता था। वह भी आधी-अधूरी शिक्षा प्राप्त होता था। जो रटाई गई चीजों को केवल कंठस्थ करके रखता था। लिखना और पढ़ना उसे नहीं आता था।

आप संस्कृत के बारे में क्या सोचते हैं। ब्राह्मण अपनी भाषा के बारे में गर्व के साथ बात करते हैं। क्या वह लोकप्रिय लिपि है? वेदों का तो वे खूब महिमामंडन करते हैं। उनकी भी कोई लिपि नहीं है। वह महज ध्वनियां हैं। उन्होंने हाल ही में सुधरना शुरू किया है।

जनसंख्या

जिस समय ईसा मसीह का जन्म हुआ, दुनिया की आबादी महज 20 करोड़ थी। सन 1460 में यह आवादी 47 करोड़ थी। आबादी को दुगुना होने में 1500 वर्ष लगे थे। 1800 ईस्वी में वह बढ़कर 74 तक पहुंच गई। जनसंख्या बढ़ने के पीछे अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़ा योगदान था। 1914 में विश्व की जनसंख्या 165 करोड़ थी। उसके बाद वैश्विक जनसंख्या ने तेज गति से बढ़ना शुरू कर दिया। हर 15 वर्ष में वह दो गुनी हो जाती थी। 1955 वह बढ़कर 360 करोड़ हो गई। 1964 में उसने 380 करोड़ का आंकड़ा छू लिया। उसके छह वर्ष बाद, 1970 में विश्व की जनसंख्या बढ़कर 400 करोड़ तक पहुंच गई। विज्ञान और प्रौद्योगिकीय आविष्कारों की मदद से स्वास्थ्य सेवाओं में हुए सुधार के कारण विगत शताब्दी में दुनिया की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। तमिलनाडु में यह 4 करोड़ से बढ़कर 5 करोड़ तक पहुंच चुकी है। इन दिनों मनुष्यों की जनसंख्या अपेक्षा सुरक्षित है। मृत्युदर में आई कमी के कारण वह तेजी से बढ़ रही है।

आज मनुष्य की औसत जीविता 45 वर्ष है। पश्चिमी देशों में मानव जीविता 70 वर्ष है। हम इन निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि अगले तीन दशकों के बाद मनुष्य की औसत उम्र 75 वर्ष हो चुकी होगी।7 जबकि यूरोपवासियों का औसत जीवनकाल 100 वर्ष को भी पार कर चुके होगा। यहां आंकड़ों की गणना औसत के आधार पर की गई है। बहुत से लोग इस वृद्धि के कारण को नहीं समझते।

प्राचीन काल में यदि किसी एक गांव में हैजा फैलता था तो पूरे गांव पर मौत बरस पड़ती थी। कई बार तो एक आदमी भी जीवित नहीं बचता था। हाल-फिलहाल की बात यह है कि एक बड़े शहर में 8 लोग हैजे के कारण मारे गए। इससे वहां के स्वास्थ्य अधिकारियों की खिंचाई हुई। उनसे पूछा गया कि बीमारी को रोकने के लिए उन्होंने पहले ही आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए थे। यह सब विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के कारण संभव हुआ कि हम लोगों के जीवन और स्वास्थ्य दोनों का ध्यान रख पा रहे हैं। मुझे थातमबट्टी की एक घटना याद है। वह मेरी मां का पैत्रिक गांव है। उस गांव में हैजा फैला, तो पचास घर एकदम वीरान हो गए। आज भी वहां 3-4 घर हैं।

उन दिनों सलेम में जब हैजा फैलता था तो हर साल 2000 से 3000 जानें ले लेता था। जिन दिनों में इरोद नगरपालिका का अध्यक्ष था, वहां एक साल हैजे के कारण 400 जानें गई थीं। अब इस तरह की मौतें अपवाद बनती जा रही हैं। क्यों? इसलिए कि स्वास्थ्य अधिकारियों ने महामारियों की रोकथाम के लिए सुरक्षात्मक कदम उठाए हैं। नहरें खोदी गई हैं। पानी को छानकर घरों में पहुंचाया जाता है। पानी में बैक्टीरिया नाशक रसायन डाले जाते हैं। इंजेक्शन लगवाने को अनिवार्य कर दिया गया है। उसके फलस्वरूप संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतें थम चुकी हैं।

उन दिनों यदि किसी को टीबी हो जाती तो उसकी मौत निश्चित थी। आज ऐसा नहीं है। अनेक मामलों में सफल इलाज हो चुका है। उन दिनों अनेक बीमारियों का तो इलाज ही नहीं था। इसलिए उनसे होने वाली मौतें भी ज्यादा थीं। आज अस्पतालों में डॉक्टर लगभग सभी बीमारियों का उपचार करने में सफल होते हैं।

सज्जनो! क्या आपने विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में हुई महान प्रगति के बारे में नहीं सुना है? आजकल डॉक्टर किडनी और हृदय का प्रत्यारोपण करने में भी सफल हैं। वे झूठे नहीं हैं। आगे आप और भी चमत्कार देखने वाले हैं। सन 2000 ईस्वी में आप देखेंगे कि लोग 100 वर्ष लंबा जीवन जी रहे हैं। आने वाले समय में मनुष्य की जीविता 150 वर्ष भी हो सकती है। अपने बुद्धिबल की बदौलत मनुष्य ढेर सारी उपलब्धियां प्राप्त करने वाला है।

आपने देखा, मैं 92 वर्ष पार करने के बाद भी जिंदा हूं। अनेक लोगों ने मुझे आराम करने की सलाह दी थी। मैं नाराज हो गया। आराम की जरूरत किसे है? आराम की जरूरत तो धनवानों के लिए है। उन लोगों के लिए है जो महान होने के गुमान में घर से तने-तने निकलते हैं। मैं आराम क्यों करूं? मैं मानता हूं कि कुछ न करना और शांत पड़े रहना भी एक बीमारी है। जहां तक मेरा मामला है, मेरे पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। मैं तो जहां भी जाता हूं, वहां जो भी मिले खा लेता हूं। मैने रेलगाड़ियों में कई रातें बिताई हैं। बावजूद इसके मैं 92 वर्ष की उम्र में भी जीवित हूं।

यदि आप पुराने ढंग से अंधविश्वासियों की तरह सोचें तो मुझे बहुत पहले मर जाना चाहिए था। मैं वह हूं जिसने भगवान को चप्पलों से पीटा था। ऐसा व्यक्ति भला जीवित कैसे रह सकता है? इस समय तक तो मुझे अंधा हो जाना चाहिए था। शरीर को अनगिनत बीमारियों का डेरा बन जाना चाहिए था। आप क्या देखते हैं? मैं अभी तक चुस्त-तंदुरुस्त हूं। आज सभी बीमारियों के उपचार के लिए संसाधन हैं।

एक बार मुझे मूत्राशय संबंधी समस्या हुई थी। ऑपरेशन द्वारा डॉक्टरों ने उसका इलाज कर दिया। मुझे उसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। डॉक्टरों ने मुझसे पूछा था, क्या मैं ऑपरेशन कराना पसंद करूंगा। मैंने उनसे कहा कि यदि उन्हें अपने ऊपर पूरा विश्वास है तो वे कुछ भी कर सकते हैं। मैं बिस्तर पर था। नींद में डूबा हुआ। वे मुझे ऑपरेशन कक्ष में ले गए। ढाई घंटों तक वे ऑपरेशन करते रहे। उसके बाद मुझे बाहर लाकर बिस्तर पर लिटा दिया गया। एक-दो घंटे के बाद मुझे होश आ गया। मैं जानता था कि मेरा ऑपरेशन हुआ था। मैंने उसके बारे में पूछाताछ की। उन्होंने बताया कि सब कुछ निपट चुका है। ‘सबकुछ’ के बारे में अगले दिन ही जान पाया। वह सब कैसे हुआ था? उन्होंने कुछ दवाइयां लिखी थीं। मुझे इंजेक्शन भी लगे थे। उनसे मैं कुछ देर के लिए बेहोश हो गया था। आखिर सब कुछ ठीक-ठाक निपट गया। इस बीमारी की तरह दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए भी हर दिन नई-नई औषधियों की खोज की जा रही है।

लेकिन हमारे बारे में क्या है? हम आज भी चिकने पत्थर से बने लिंग को भगवान मानकर पूज रहे हैं। हम उसके साथ विवाह करते हैं। हम मूर्तियों को वेश्या के कोठे तक ले जाते हैं। भगवान के रथ को खींचते हैं। इन सब मूर्खतापूर्ण गतिविधियों से हम क्या हासिल करने वाले हैं?

इसके ऊपर प्रतिवर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। रथ का वजन 150 टन है। उसे खींचने के लिए लगभग 5000 लोगों की जरूरत पड़ती है। प्रत्येक को मजदूरी के रूप में दो रुपये दिए जाते हैं। आज, 1971 में भी सरकार उसका समर्थन करती है। देखा कितने मूर्ख हैं हम। हमारे लिए मुक्ति का ठौर कहां है?

इसलिए मेरे प्यारे साथियो, हमें सभ्य आदमी बनने का प्रयत्न भी करना चाहिए। उसके लिए हमें धर्म, ईश्वर, शास्त्र तथा अन्यान्य अंधविश्वासों से पीछा छुड़ाना होगा। मुक्ति पानी होगी उनसे। हमें पुराणों को फाड़कर, उनकी चिंदी-चिंदी करके कूड़ेदान में फैंक देना चाहिए। हमें यह पता होना चाहिए कि मनुष्य से बड़ी कोई शक्ति नहीं हैं। ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं हैं।

सज्जनो, मैं बहुत लंबा बोल चुका हूं। फिर भी बहुत-सी चीजें छूट रही हैं। कई बातों पर बोलना बाकी है। आपको इस तरह की कहानियां दुनिया में और कहीं नहीं मिलेंगीं। ब्राह्मण और शूद्र आपको केवल यहीं तमिल नाडु, भारत में ही मिलेंगे।

स्वयं शंकराचार्य ने भी माना है कि ये कहानियां पढ़े-लिखे लोगों के लिए नहीं हैं। वे केवल अशिक्षित लोगों के लिए हैं। आम लोग ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करने लगें, केवल इसलिए कि इन कहानियों को रचा गया है।

यदि हम चुप रहकर, चीजों पर आंख मूंदकर विश्वास करते रहे, तो कभी प्रगति नहीं कर पाएंगे। ब्राह्मण अपने स्वार्थ की फसल काटते रहेंगे। यही कारण है कि हम ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के अभियान द्वारा लोगों को जागरूक करने का काम करते हैं। हम लोगों से अपील करते हैं कि वे अपने अंध विश्वासों से मुक्ति पाएं। हम अपने तर्कवादी देश के लोगों को सुख-सुविधामय और सम्मानित जीवन के योग्य बनाना चाहते हैं। जैसा कि दूसरे देशों के नागरिकों को उपलब्ध है।

अंत में, मैं आपसे कहता हूं कि मैंने जो भी कहा है, उसपर आंख मूंदकर विश्वास न करें। अपने आप सोचें। यदि आपको लगता है कि जो मैंने कहा वह सही है, तो उसे स्वीकार करें और कल से ही अपने जीवन को नया मोड़ दें। यदि आप हमारे संगठन का सदस्य बनना चाहते हैं, तो मंदिरों में जाना छोड़ दें। अपनी पहचान के साथ कोई जातिसूचक चिह्न न लगाएं। ब्राह्मणों को एक पैसा भी दक्षिणा के रूप में न दें। उनके विशेषाधिकारों, मनमानियों और शोषण यहीं खत्म कर दें।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपने भाषण को समाप्त करता हूं।

—ई. वी. रामासामी पेरियार

संदर्भ:

1. ईसापूर्व छठी-सातवीं शताब्दी में भौतिकवादी चिंतन अपने देश में चरम पर था। आजीवक, चार्वाक, लोकायत, वैनायिक जैसी अनीश्वरवादी विचारधाराएं वैदिक धर्म को चुनौती देती रहती थीं। दीघनिकाय(ब्रह्मजाल सुत्त) में गौतम बुद्ध ने अपने समय में प्रचलित 62 दार्शनिक मतों का उल्लेख किया है। बौद्धधर्म, ठेठ अनीश्वरवादी विचारधाराओं और ईश्वरवादी विचारधाराओं(वैदिक धर्म-दर्शन) के सम्मिलन से जन्मा मध्यममार्गी दर्शन था। उसकी गिनती नास्तिक दर्शनों की परंपरा में की जाती है। उन दिनों ब्राह्मण धर्म-दर्शन समाज के अल्पसंख्यक अभिजनों का धर्म-दर्शन था। बहुसंख्यक समाज आजीवक और लोकायत परंपरा में विश्वास रखता था।

2. 11वीं शताब्दी के शैव संत नांबियार नंबी के अनुसार, मदुरै में सातवीं शताब्दी के शैव संत संबदार ने जैन श्रमणों को लंबे शास्त्रार्थ के दौरान पराजित किया था। उससे प्रभावित होकर जैन सम्राट सुंदर पांडयान, जिसे कून पांडयान भी कहा जाता है, ने शैव धर्म अपना लिया था। उससे पहले वह शैव मतावलंबी ही था। जैन धर्म से प्रभावित होकर उसने उस धर्म में दीक्षा ली थी। उसके बाद वह दिगंबर साधु बना और कालांतर में एक मठ का अध्यक्ष भी। बताते हैं कि जैन मठ का अध्यक्ष रहते वह बीमार पड़ गया। तब शैव संत संबदार ने उसका इलाज किया था। ठीक होने के बाद सुंदर पांडयान ने जैन धर्म छोड़ वापस शैव धर्म में शामिल हो गया। संबदार के कहने पर ही उसने 8000 जैन श्रमणों को सूली पर चढ़ा दिया था। कुछ विद्वानों का मत है कि उसके बाद मदुरै से जैन धर्म का अंत हो गया था। पॉल दुंडास के अनुसार उस घटना को मदुरै के प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर सहित अनेक मंदिरों तथा शैव एवं जैन ग्रंथों में दर्शाया गया है। —स्रोत: दि जैन्स, पॉल दुंडास, रालिज, टेलर एंड फ्रांसिस ग्रुप, लंदन/न्यु यार्क, दूसरा संस्करण, पृष्ठ 127।

3. ‘थेवरम’ और ‘प्रबंधम’ प्रसिद्ध तमिल शैव ग्रंथ हैं.

4. भगवान नारायण ने अपने मस्तक से दो केश निकाले, उनमें एक सफेद था और दूसरा श्याम। ये दोनों केश यदुवंश की दो स्त्रियों देवकी तथा रोहिणी के भीतर प्रविष्ट हुए। उनमें से रोहिणी के बलदेव प्रकट हुए, जो भगवान नारायण के श्वेत केश थे। दूसरा केश जिसे श्याम वर्ण बताया गया है, वह देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुआ. महाभारत, आदिपर्व—196/32—33, गीता प्रेस गोरखपुर, 16वां संस्करण. हिंदी : अनुवाद गीता प्रेस,  

5. उत्तरी कर्नाटक, उन दिनों वह चालुक्यों की राजधानी थी। सातवीं शताब्दी में नरसिंह पल्लव ने चालुक्यों को हराकर, विनायक को अपने अधिकार में लिया था। आजकल यह स्थान उत्तरी कर्नाटक के बागलकोट जिले में पड़ता है।

6. कुनराकुद्दी आदिगलार(1925—1995) देवता मुरुगन को अपना आराध्य मानने वाले शैव मतावलंबी, तमिल आध्यात्मिक गुरु।  

7. सन 2001 में भारत में मनुष्य की औसत जीविता 62.69 वर्ष थी। 2020 में वह 69.63 वर्ष तक पहुंच चुकी है।

हिंदी क्षेत्र में पेरियार के दर्शन-चिंतन की दस्तक

सामान्य

उस ईश्वर को नष्ट कर दो, जो तुम्हें शूद्र कहता है। उन पुराणों और महाकाव्यों को नष्ट कर डालो जो ईश्वर को शक्तिशाली बनाते हैं।  यदि कोई ईश्वर वास्तव में दयालु, हितैषी और बुद्धिमान है; तो उसकी प्रार्थना करो।’—सुनहरे बोल, पेरियार, पृष्ठ-44

स्वार्थी सत्ताएं अपने ‘महापुरुष’ भी सुविधानुसार गढ़ती हैं। वे उन्हीं को ‘महान’ घोषित करती हैं, जो उनकी सत्ता को बैधता प्रदान करते हों। इस कोशिश में वास्तविक और पुरोगामी नायक बरबस पीछे ढकेल दिए जाते हैं। इतिहास में इसके अनगिनत उदाहरण हैं। जैसे, साहित्यत्व की कसौटी पर कबीर की काव्य-चेतना तुलसी से कहीं आगे है। मगर मध्यकाल के महाकवि माने गए—तुलसी, जो रामकथा की आड़ में ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना कर—रैदास, कबीर जैसे संत-कवियों की सामाजिक क्रांति पर पानी फेरने का काम करते हैं। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के वास्तविक जननायक ज्योतिबा फुले, आयोथी थास, अय्यंकाली, ई. वी. रामासामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर जैसे युगदृष्टा थे।  भारत को आधुनिक और एकीकृत राष्ट्र में ढालने में उनका योगदान किसी भी कांग्रेसी नेता से कहीं ज्यादा था। बावजूद इसके आजाद भारत के ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा गांधी को मिला। डॉ. आंबेडकर को दलितों के नेता; तथा पेरियार को दक्षिण भारत तक सीमित कर दिया गया। परिणामस्वरूप, स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय जनमानस में जन्मी परिवर्तन की चाहत, असमय काल-कवलित होने लगी।

अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में अभिजन वर्ग की इस साजिश के विरुद्ध बहुजन समाज में जागृति आई है। सोशल मीडिया पर बहुजन एकता के अभियान चलाए जा रहे हैं। वर्चस्वकारी अभिजन संस्कृति के समानांतर सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व पर आधारित लोकोन्मुखी जनसंस्कृति की पुनर्स्थापना की कोशिशें निरंतर जारी हैं। ‘फारवर्ड प्रेस’ द्वारा प्रकाशित पुस्तक, ‘पेरियार : दर्शन चिंतन और सच्ची रामायण’ इसी दिशा में महत्वपूर्ण रचनात्मक अवदान है। इसका महत्व इसलिए भी है कि हिंदी पट्टी में पेरियार के बारे में लोगों की जानकारी बहुत सीमित है। अधिकांश उन्हें ‘सच्ची रामायण’ के लेखक के रूप में जानते हैं। वहीं कुछ उन्हें दक्षिण भारत में लंबे समय तक चले हिंदी विरोधी आंदोलन के प्रखर नेता के रूप में।  

पुस्तक को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले खंड में पेरियार के चुनींदा भाषण और वे लेख हैं जिन्हें उन्हें अपनी ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की पत्रिका ‘विदुथलाई’ और ‘कुदीअरासु’ के लिए लिखा था। दूसरे खंड में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में रामायण का पुनर्पाठ दिया गया, जो अपने लेखन से आज तक उनकी सर्वाधिक विवादित कृति मानी जाती है। पेरियार की यह पुस्तक उनके रामायण संबंधी विस्तृत अध्ययन का परिणाम है। पुस्तक में कुछ स्थानों पर हालांकि वे सपाट नजर आते हैं। लेकिन रामायण को पढ़ते-पढ़ाते समय आस्थावादी जिस तरह से ‘समर्पण’ की अपेक्षा रखते है, उसे देखते हुए पेरियार का विमर्श काफी बुद्धिवादी सिद्ध होता है।  उनका मानना था कि राम बेहद साधारण व्यक्ति हैं, ‘ये कथाएं(रामायण और महाभारत) एक बार फिर इसलिए थोपी गई थीं कि इनके कथानायकों, उनके रिश्तेदारों तथा सहायकों को अलौकिक और अतिमानवीय माना जाए तथा उन्हें पूज्य मानते हुए जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना कि जाए’(सच्ची रामायण, पृष्ठ 118)।     

प्रसंगवश बता दें कि पेरियार ने ‘सच्ची रामायण’ की रचना की थी, किंतु वे ‘सच्ची रामायण’ लिखकर ‘पेरियार’(महान) नहीं बने थे। यह पुस्तक उनके रचनात्मक अवदान का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। इसमें रामकथा नहीं है। बल्कि रामायण के प्रमुख पात्रों के चरित्रों की साहसी और तर्कसम्मत समीक्षा है। ‘रामायण’ तथा उसके कथापात्रों प्राय: आस्था और विश्वास को केंद्र में रखकर किया जाता है। आकादमिक विमर्श भी लोक-आस्था से बंधे होते हैं। इसलिए ‘सच्ची रामायण’ पढ़ते समय आस्थावान हिंदू-मनस् में उसके लेखक के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण बन जाता है। श्रद्धा के आवेग में पाठक भूल जाता है कि पेरियार अपने समकालीनों में सर्वाधिक बुद्धिवादी और सबसे लोकप्रिय नेता थे। उनकी लोकप्रियता के मूल में थी, भारतीय समाज की ‘यूटोपियाई’ संकल्पना। लाभ-हानि, यश-अपयश की चिंता किए बगैर, उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत रहना। आदर्श समाज संबंधी पेरियार की संकल्पना, सहअस्तित्व और ज्ञान-विज्ञान की नींव पर टिके समाज की थी। अंध-श्रद्धा स्वार्थपरता का दूसरा नाम है। वह न केवल समाज, अपितु व्यक्ति के अपने विकास के लिए भी अपकारी सिद्ध होती है— 

‘अंध श्रद्धालु….मान लेते हैं….जो उन्होंने सीखा है, वही एकमात्र सत्य है।  बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है।  वे ज्ञानार्जन को महत्व देते हैं।  अनुभव से काम लेते हैं। उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं। ’(भविष्य की दुनिया, पृष्ठ-29)

अंध-श्रद्धा के नाम पर तर्क और विवेक को किनारे कर देने का मामला साधारण श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं है। धर्माचरण के क्षेत्र में जो जितना बड़ा है, वह उतना ही भीरू और आडंबरवादी हैं—

‘हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी; धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं। यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये जनता को सदियों पीछे धकेल भी चुके हैं। बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को। उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है।’(भविष्य की दुनिया, पृष्ठ-30)

आलेखों की श्रेणी में ‘भविष्य की दुनिया’ को प्रथम स्थान पर रखना संपादकीय बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। असल में यही वह दरवाजा है जिससे गुजरकर पेरियार को समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में पेरियार के समाज और धर्म से संबंधित विचारों को समझने के लिए पहले खंड के आलेख कुंजी का काम करते हैं। ‘भविष्य की दुनिया’ को पढ़ते समय लगता है मानो कोई सैद्धांतिक भौतिकवादी जीवन-जगत में ज्ञान-विज्ञान के नैतिक अनुप्रयोग की संभावनाओं पर विचार कर रहा हो। इस लेख पर टिप्पणी करते हुए अंग्रेजी समाचारपत्र ‘दि हिंदू’ ने पेरियार को ‘बीसवीं शताब्दी का एच. डी. वेल्स’ कहा था। इसमें वे ऐसे कई आविष्कारों की परिकल्पना करते हैं, जो आज हमारे रोजमर्रा की जीवन का हिस्सा हैं—

‘यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र गति से काम करेंगे।  संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी।  सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे।  रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है। छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे। दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों। आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा। शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा। एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे। ’(पृष्ठ-36)

पेरियार के धर्म, दर्शन और ईश्वर संबंधी विचारों को जानने के लिए भी पुस्तक में काफी सामग्री है।  उनके एक भाषण को ‘दर्शनशास्त्र क्या है’ शीर्षक से संकलित किया गया है।  यह भाषण उन्होंने सलेम विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किया था। उसे पढ़ते समय हम पेरियार के अंदर मौजूद तर्कवादी से रू-ब-रू होते हैं। इसमें वे ईश्वर, आत्मा, जीवन, मानव-प्रकृति आदि की समीक्षा करते हैं। अपनी सहज, प्रवाहपूर्ण भाषा में, बिना भारी-भरकम शब्दों की मदद के,  वे धर्म और आडंबरवाद का अंतर स्पष्ट कर देते हैं।  

पेरियार स्वयं-घोषित नास्तिक थे, किंतु उनकी नास्तिकता धर्म-दर्शन की उथली समझ की देन नहीं थी। तर्कवादी दार्शनिक की तरह वे ईश्वर, आत्मा, धर्म आदि उन सभी प्रतीकों पर गहन चिंतन करते हैं, जिनमें विश्वास के कारण किसी मनुष्य को आस्थावादी मान लिया जाता है—

‘यदि यह सत्य है कि ईश्वर का साक्षात्कार तथा उसकी प्राप्ति केवल धर्म के माध्यम से संभव है, तो उसके लिए इतने सारे धर्म क्यों होने चाहिए? क्या धार्मिक और दिव्यात्मा मनुष्यों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?….धार्मिक युद्धों का औचित्य क्या है? धर्म के नाम पर इतने नरसंहार क्यों होते हैं….मनुष्यता को इतने सारे कष्ट और पीड़ाएं क्यों झेलनी पड़ती हैं? कहा जा सकता है कि ये किसी दैवी शक्ति की देन न होकर मनुष्य की अज्ञानता के कारण उत्पन्न हुई हैं। ’(दर्शनशास्त्र क्या है, पृष्ठ-82)

पेरियार के लिए धर्म पुरोहित वर्ग की राजनीति है। धर्म के नाम पर रचा गया साहित्य उसे मान्यता प्रदान करता है। वे रामायण को धार्मिक ग्रंथ मानने से भी इन्कार करते थे।  उनका कहना था कि ‘ब्राह्मणवादियों का साहित्य अज्ञानता का साहित्य है’(पृष्ठ-57)।  मनुष्य की विवेकशीलता के लक्षणों यानी तर्क, विवेक तथा ज्ञान-विज्ञान से उसका कोई नाता नहीं है। धर्म की आड़ में सामाजिक भेदभाव, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी आदि को दैवीय ठहराकर, वास्तविक समस्या से किनारा कर लिया जाता है। धर्म जाति का सुरक्षा-कवच है। पेरियार ‘रामायण’ को साहित्यिक कृति मानने से इन्कार करते हैं। उनके अनुसार वह ‘मनु की संहिता की तरह’(पृष्ठ-58) राजनीतिक कृति है।  

धर्म का सहारा लेकर ब्राह्मणों ने खुद को समाज के शिखर पर, तथा बाकी वर्गों को एक किसी न किसी रूप में दास बनाए रखा। गौरतलब है कि जातीय संरचना में दासता पिरामिडीय आकार लिए होती है। जैसे-जैसे पिरामिड के आधार की ओर जाते हैं, दासता का अनुपात उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है।  इसलिए पेरियार जब कहते हैं कि इस ‘‘इस देश को जाति-व्यवस्था द्वारा बरबाद कर दिया गया है’—तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होता।  इसके लिए वे ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहराते हैं।  उनके अनुसार—

‘ब्राह्मण आपको ईश्वर के नाम पर मूर्ख बना रहे हैं। वे आपको अंधविश्वासी बनाते हैं। वे अस्पृश्य के रूप में  आपकी निंदा कर, बहुत ही आरामदायक जीवन जीते हैं। वे आपकी तरफ से भगवान को प्रार्थना करके खुश करने के लिए आपके साथ सौदा करते हैं। मैं इस दलाली के व्यवसाय की दृढ़तापूर्वक निंदा करता हूं।’(सुनहरे बोल, पृष्ठ-44)

भारतीय समाज की जातीय संरचना तथा उसके विरोध में पेरियार के जीवनपर्यंत संघर्ष को समझने के लिए वी. गीता द्वारा लिखित भूमिका, ‘जाति का विनाश और पेरियार’ एक दस्तावेजी रचना है। उससे पता चलता है कि पेरियार किस तरह एक ही समय में, कई अलग-अलग मोर्चों पर, एक साथ लड़ रहे थे—

‘यद्यपि मैं पूरी तरह से जाति को खत्म करने को समर्पित था, लेकिन जहां तक इस देश का संबंध है, उसका एकमात्र निहितार्थ था कि मैं ईश्वर, धर्म, शास्त्रों तथा ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए आंदोलन करूं।  जाति का समूल नाश तभी संभव है जब इन चारों का नाश हो….केवल आदमी को गुलाम और मूर्ख बनाने के बाद ही जाति को समाज पर थोपा जा सकता था। ’(जाति का विनाश और पेरियार, पृष्ठ-3)

पेरियार स्त्री समानता के प्रबल पक्षधर थे। पुस्तक में उनके दो आलेख ‘पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के जीवनसाथी’ तथा ‘महिलाओं के अधिकार’ शामिल किया गया है। जिस दौर में तिलक जैसे नेता सामाजिक सुधारों को ‘राष्ट्रवाद के लिए खतरा’ मान रहे थे। यह कहकर कि ‘स्त्री का दिमाग पुरुष के दिमाग से औसतन 5 औंस कम होता है’(महराट्टा 13 नवंबर 1887) तिलक अपने अजब-गज़ब विज्ञानबोध का परिचय दे रहे थे—पेरियार महिलाओं के लिए समान अवसर और बराबरी कि मांग कर रहे थे। ऐसे समाज में ‘महिलाओं के अधिकार’ की बात कर रहे थे, जिसमें ‘जमींदार अपने नौकरों और ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरुष उससे भी बदतर व्यवहार अपनी स्त्री के साथ करता है…महिलाएं हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं’(पृष्ठ-103)।

पेरियार ‘पति और पत्नी जैसे शब्दों को अनुचित मानते थे, ‘वे एक-दूसरे के साथी और सहयोगी हैं। गुलाम नहीं। दोनों का दर्जा समान है’(पृष्ठ-109)। यही कारण है कि स्त्रियां उन्हें ‘पेरियार’(महान) कहकर बुलाती थीं।

कुल मिलाकर प्रस्तुत पुस्तक ई. वी. रामास्वामी पेरियार और उनके माध्यम से भारतीय समाज की ग्रंथियों से साक्षात करने का अवसर देती है। पेरियार के आंदोलन का केंद्र मुख्यतः दक्षिण भारत था। परंतु जिन परिस्थितियों और संघर्षों का उल्लेख इस पुस्तक में हुआ है, वे पूरे भारत में एक समान थीं। इसलिए इस पुस्तक कि जितनी महत्ता दक्षिण भारत को समझने के लिए है उतनी ही शेष भारत के लिए भी है।

‘फारवर्ड प्रेस’ की बाकी पुस्तकों की तरह इस पुस्तक का प्रकाशन भी स्तरीय है। मुद्रण त्रुटिविहीन है। कुल मिलाकर पुस्तक में पेरियार के बहाने, हिंदी भाषी पाठकों के मानस को मथने के लिए भरपूर खुराक मौजूद है। यह ऐसी पुस्तक है जिसे बिना किसी पूर्वाग्रह के, हर हाल में पढ़ा जाना चाहिए।   

ओमप्रकाश कश्यप

पुस्तक का नाम : पेरियार: दर्शन चिंतन और सच्ची रामायण(पेरियार के मूल लेखों का चयनित संकलन)

प्रकाशक का नाम : फारवर्ड प्रेस 

पता : 803, दिपाली बिल्डिंग, 92 नेहरू पेलेस

  नई दिल्ली-110019

मूल्य : 400 रुपये

सच्ची रामायण का विरोध धार्मिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक है

सामान्य

मैं मानव समाज का सुधारक हूँ. मैं देश, धर्म, ईश्वर, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मुझे केवल मनुष्यता के विकास और उसके कल्याण की चिंता है—पेरियार

बाइबिल का परमात्मा पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक नाकारा, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक रक्त पिपासु, सबसे ज्यादा निरंकुश तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु था. जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला मुक्त चिंतक था—मिखाइल बकुनिन, ईश्वर और राज्य.

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.’ प्रथम दृष्टया लोकतांत्रिक लगने वाली ये पंक्तियां तुलसी की हैं. पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है. वह साधक को अपनी भावना के अनुसार साध्य गढ़ने की छूट देता है. मगर इनमें लोकतंत्र की व्याप्ति मान लेना वैसा ही संभ्रम है, जैसे यह कहना कि कण-कण में भगवान हैं, इसलिए चराचर जगत में सभी बराबर हैं, दुनिया में आदर्श समानता है. ऊंच-नीच, जात-पात, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत जैसा कुछ भी नहीं है. असल में, धर्म का यह उदार चेहरा उतना ही बनावटी है, जितना किसी पुरोहित का दक्षिणा मिलते ही ‘कल्याणम् भव’ कह, निस्पृह भाव से आगे बढ़ जाना. भारतीय समाज छोटे-छोटे समुदायों, धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों, गोत्रों-उपगोत्रों तथा जातियों-उपजातियों में हमेशा बंटा रहा. उनके बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी लगातार चलते रहे.

हालांकि एक सीमा तक तुलसी गलत भी नहीं थे. जिस दौर में वे रामचरितमानस लिख रहे थे, समाज में रामकथा के अलग-अलग रूप प्रचलित थे. प्रत्येक समूह अपनी रामकथा को असली मानता था. बावजूद इसके रामायण के भिन्न कथारूपों पर विश्वास करने वाले समूहों में परस्पर कोई द्वेष नहीं था. अकेले राम सभी के ‘भगवान’ नहीं थे, लेकिन कोई राम को सबसे बड़ा देवता और भगवान माने, इसपर उन्हें कोई आपत्ति न थी. आदिवासियों, जनजातियों, शूद्रों, अतिशूद्रों के अपने-अपने देवता थे, जो राम जैसे अवतारी, उतने ही पराक्रमी और चमत्कारी; कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे थे. राम के देवत्व पर भरोसा कर अपना आराध्य मानने वालों ने भी, उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुसार ढालने के बाद ही स्वीकार किया था. यही कारण है कि उस जमाने में सीता को राम की बहन बताने वाली जैन रामायण ‘पउमचरिय’ उतनी ही लोकप्रिय और सम्मानीय मानी जाती रही, जितनी राम-सीता को पति-पत्नी बताने वाली वाल्मीकि रामायण.

विभिन्न रामायणों के मुख्य पात्र भले ही एक हों, किंतु उनके चरित्र में आधारभूत अंतर है. जैन रामायण में ब्राह्मणों पर रावण को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है. जैन मान्यता के अनुसार रावण उनके 63 शलाकापुरुषों में से एक था. उसके अनुसार राम और रावण दोनों जैन थे. मृत्यु के बाद राम को कैवल्य; तथा लक्ष्मण को नर्क प्राप्त हुआ था. वाल्मीकि, तुलसी, विमलसूरि(पउमचरिय) द्वारा रचित रामायणों के अलावा भी रामकथा के सैंकड़ों रूप दुनिया-भर में प्रचलित हैं. फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश में प्रचलित रामकथाओं की गणना कर, उनकी संख्या को 300 माना था. अपने लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायण’ में ए. के. रामानुजन रामकथा की विविधता को दर्शाने के लिए जिस लोकश्रुति का सहारा लेते हैं, उसके अनुसार रामकथा अनंत रूपों में, अनादिकालीन कथा है. फिर पेरियार ने ऐसा क्या लिखा था, जिससे उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ का नाम सुनकर ब्राह्मणवादी लाल-पीले होने लगते हैं?

मुख्य कारण था, पेरियार का रामकथा के प्रति दृष्टिकोण. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. जहां रामायण के अन्य प्रारूपों के साथ कोई न कोई धार्मिक दृष्टिकोण जुड़ा था, पेरियार उसे धार्मिक पुस्तक मानने से ही इन्कार करते थे. उनका कहना था कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है. उसकी रचना ब्राह्मणों ने द्रविड़ों पर अपना प्रभुत्व दर्शाने के लिए की गई है. वह द्रविड़ों के आत्मसम्मान की विरोधी, उनकी अस्मिता का हनन करने वाली है. ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ की भूमिका में वे लिखते हैं—

‘रामायण और बरधाम(महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं….इन्हें आर्यों ने द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, निर्णय सामथ्र्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को पथभ्रष्ट करने के लिए रचा है. इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं. जो कि आर्य हैं और बेहद साधारण व्यक्ति हैं. ये कथाएं इसलिए थोपी गईं हैं, ताकि इनके कथानायकों, उनके परिजनों एवं सहायकों को अलौकिक एवं अतिमानवीय मान लिया जाए; तथा उन्हें पूजनीय मानकर, जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए.’ बावजूद इसके रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ जब तक तमिल और अंग्रेजी में थी, तब तक हिंदी पट्टी के ब्राह्मणवादियों को उससे कोई आपत्ति नहीं थी. इसलिए करीब 40 वर्षों तक उसके तमिल और अंग्रेजी में संस्करण पर संस्करण निकलते रहे.

पुस्तक को लेकर तूफान तब उठा जब कानपुर देहात के रहने वाले पेरियार ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया. हिंदी अनुवाद दुलालपुर निवासी, राम आधार द्वारा किया गया था. उसे छापने के लिए उस समय कोई प्रकाशक तैयार नहीं था. इसलिए ललई सिंह ने उसे अपने प्रकाशन, ‘अशोक पुस्तकालय’ कानपुर से 1 अक्टूबर, 1968 को प्रकाशित किया था. मूल कृति ‘रामायण पादिरंगल’(रामायण के कथापात्र) शीर्षक से 1930 में प्रकाशित हुई थी. 1972 तक उसके दस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे. पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 1959 में आया था. उसके बाद दो और संस्करण क्रमशः 1972 और 1980 में प्रकाशित हुए. पुस्तक के हिंदी में आने की संभावना उसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही बनी थी. ‘रामायण पादिरंगल’ की रचना से पहले पेरियार ने लगभग सभी उपलब्ध रामकथाओं यथा जैन, बौद्ध, कंब आदि का गहन अध्ययन किया था. विषय से संबंधित विद्वानों से बातचीत की थी.

रामकथा संबंधी उनके अध्ययन-चिंतन की सफल परिणति एक साथ दो पुस्तकों के रूप में हुई थी. दूसरी पुस्तक का नाम था—रामायण कुरीप्पुकल(रामायण के बारे में कुछ बातें). वह पहली की अपेक्षा अधिक गंभीर तथा कथानक की दृष्टि से मूल रामकथा के करीब थी. उनमें प्रसिद्धि मिली पहली पुस्तक को. अंग्रेजी में उसे मूल शीर्षक से थोड़ा हटकर, ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से छापा गया. उसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में सामने आया. हम सोच सकते हैं कि तमिल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ यानी ‘रामायण के कथापात्र’ के हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में अनूदित होते-होते, शीर्षक के स्तर पर भी काफी अर्थ-परिवर्तन हो चुका था.

‘सच्ची रामायण’(रामायण पादिरंगल) की रचना विखंडनात्मक शैली में हुई है. वह रामकथा की स्थापित छवियों का खंडन करती थी. उसका उद्देश्य रामायण के कथापात्रों के चरित्र का वस्तुनिष्ट विवेचन है. जिस राम को तुलसी मर्यादापुरुषोत्तम कहकर ईश्वरतुल्य बना देते हैं, उसके बारे में पेरियार आरंभ में ही साफ कर देते हैं कि—‘राम कोई आदर्श व्यक्ति नहीं है.’ आगे वे विस्तार से राम के चरित्र को लेकर अपने विचार पेश करते हैं. शंबूक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वे आगे लिखते हैं—

‘राम जिसने तपस्या कर रहे शंबूक की बगैर किसी गलती के, निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है. अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों की क्या दशा होती, जिन्हें शूद्र(जो गालीनुमा संबोधन है) कहा जाता है!’

ऐसी वैचारिक प्रखरता, प्रतिबद्धता और साफगोई के कारण वह उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई.

पेरियार ललई सिंह ने न केवल ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था, अपितु ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार के तर्कों की पुष्टि के लिए, विभिन्न रामकथाओं से कुछ संदर्भ भी दिए थे. जिसे उन्होंने ‘सच्ची रामायण की चाबी’ कहा था. पाठकों की सुविधा के लिए दोनों पुस्तकों को एक ही जिल्द में छापा गया था. उदाहरण के लिए पेरियार ने सीता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की दुर्बलताओं को उजागर किया था तो पेरियार ललई सिंह ने उसकी पुष्टि के लिए रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से, ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिनी’ से एक पद उद्धृत किया था. पद में यूं तो पति-पत्नी का सहज रति प्रसंग है. लेकिन एक ‘वनवासी मर्यादा पुरुषोत्तम’ के संदर्भ से जुड़कर वह अशालीन लगने लगता है. पद में सीता का कथन देखिए—

‘हमारे प्रिय ठाड़े सरजू तीर।।टेक।।

छोड़ लाजि मैं जाय मिली, जहां खड़े लखन के वीर

मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरी खेच लियो तब चीर

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर.1

कह सकते हैं कि पेरियार द्वारा, ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’, के रूप में रामायण की विखंडनवादी अन्वीक्षा, ‘सच्ची रामायण’ में थोड़ी और मुखर, और अधिक व्यंजनात्मक हो चुकी थी. इसलिए ब्राह्मणवादियों के कान खड़े होना स्वाभाविक था. हिंदी में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी जगत में तूफान सा उठ गया. ललई सिंह पर मुकदमा ठोक दिया गया. यह कहकर कि पुस्तक हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली है, उसकी सभी प्रतियों को जब्त करने के आदेश सुना दिए गए. गौरतलब है कि प्रतिबंध और जब्ती के आदेश पुस्तक के केवल अंग्रेजी और हिंदी संस्करण के थे. तमिल तथा दूसरी दक्षिणी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तक की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी. गोया तमिलनाडु या दक्षिण भारत के दूसरे हिस्सों में हिंदू रहते ही नहीं थे. इससे पेरियार के कथन कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है—की पुष्टि होती है. सच तो यह है कि ‘सच्ची रामायण’ के माध्यम से ब्राह्मणवादी राजनीतिक ताकतें, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सत्ता की पुनर्वापसी को अंजाम देने में लगी थीं.

पुस्तक को प्रतिबंध मुक्त कराने के लिए ललई सिंह यादव को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. उसका समापन 16 सितंबर, 1976 के उच्चतम न्यायालय के फैसले से हुआ. शीर्षतम अदालत ने प्रतिबंध को गलत बताकर, पुस्तक की जब्त की गई प्रतियां लौटाने का आदेश दिया था. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक आदेश जारी करने से बचती रही. 1995 में मायावती सरकार के दौरान पुस्तक प्रतिबंध-मुक्त हो सकी. उसके बाद से हिंदी पट्टी में ‘सच्ची रामायण’ की लोकप्रियता बढ़ती गई, मगर पोंगापंथी भी शांत न थे. वे विरोध के लिए नए सिरे से एकजुट होने लगे थे. नया दौर हिंदुओं का न होकर, हिंदुत्ववादियों का था. उनके भीतर पेरियार के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी थी. इसलिए नहीं कि पेरियार ने रामायण के पात्रों के चरित्र पर उंगलियां उठाई थीं. बल्कि इसलिए कि उन्होंने इन धर्मग्रंथों के पीछे छिपे ब्राह्मणवादियों के राजनीतिक मंसूबों को उजागर कर दिया था. पेरियार के प्रति उनके भीतर कितनी नफरत भरी थी, इस समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा.

2002 में लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क जब बन रहा था तो उसमें योजनानुसार ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर, बिरसा मुंडा, कांशीराम जैसी बहुजन शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित की गईं. मायावती उसमें पेरियार की मूर्ति भी लगवाना चाहती थीं. कलाकार को मूर्ति-निर्माण का आदेश जारी हो चुका था. उस समय प्रदेश में भाजपा के सहयोग से बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी. पेरियार का नाम सुनते ही विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा जैसे उग्रपंथी संगठन भड़क उठे. विनय कटियार ने ऐलान किया कि पेरियार की मूर्ति लगाई गई तो वे उसे ढहा देंगे. भाजपा ने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली. बसपा पेरियार को अपना ‘आइकन’ मानती थी. उसके हर कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहूजी महाराज के साथ-साथ पेरियार के चित्र भी लगे होते थे. उस समय मायावती चाहतीं तो सामाजिक न्याय समर्थित वैचारिकी को महत्व देकर, सरकार को दाव पर लगाने का खतरा उठा सकती थीं. लेकिन उन्होंने राजनीतिक सत्ता को बचाने का अवसरवादी विकल्प चुना. बयान दिया कि सरकार का पेरियार की मूर्ति लगाने का कोई इरादा नहीं है. जबकि मूर्ति तैयार होकर शिल्पकार के स्टूडियो में प्रतीक्षारत थी.

मंदिर आंदोलन की आड़ में प्रदेश में दक्षिणपंथी ताकतें दुबारा मजबूत हुई तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद पुस्तक पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगी. 2007 में प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी. उस समय भाजपा की प्रादेशिक इकाई ने आरोप लगाया कि ‘बहुजन समाज पार्टी’ सच्ची रामायण का प्रचार-प्रसार कर रही है. उसके संरक्षण में प्रदेश में बड़े पैमाने पर पुस्तक की बिक्री की जा रही है. भाजपा की प्रदेश इकाई ने, पुस्तक को हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाली बताकर, उसपर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. भाजपा विधान मंडल के तत्कालीन नेता ओमप्रकाश सिंह ने सरकार से मांग की थी कि—‘हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले, अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में स्थान न दे.’ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ने दावा किया था कि 9 अक्टूबर को बसपा की रैली में ‘सच्ची रामायण’ की 4000 प्रतियां बेची गई थीं. हैरानी की बात यह है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली समाजवादी पार्टी भी, ‘सच्ची रामायण’ के विरोध में भाजपा का साथ दे रही थी. विधानसभा में विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के सदस्य अहमद हसन ने ‘सच्ची रामायण’ के जरिये सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि—

‘भगवान राम के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है. पूरी दुनिया के मुसलमान स्वीडिश कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून की भर्त्सना कर रहे हैं. विवादित पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.2

इससे अनुमान लगाया जाता है कि मामला जब धर्म की आलोचना का हो तो समय-समय पर एक-दूसरे के प्रतिद्विंद्वी की भूमिका में उतरने वाले धर्मावलंबी भी एक-दूसरे के समर्थन पर उतर आते हैं.

देखा जाए तो भाजपा का आरोप सरकार पर न होकर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ पर था. उस पार्टी पर जो पेरियार को अपना आदर्श मानती थी. अपनी वैचारिकी पर दृढ़ रहने के बजाए, मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर पीछे हटने का फैसला किया. उनकी ओर से वक्तव्य जारी हुआ—‘बसपा तथा सरकार का सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना—देना नहीं है.’ मामले पर राजनीति करने के बजाय, पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग कर रहे नेताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है.3

इस प्रसंग का सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस ‘सच्ची रामायण’ के विरोध को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार आरोप लगा रही थी, तथा बिना आगा-पीछा सोचे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उसका साथ दे रही थीं, उसकी प्रति न तो भाजपा के पास थी, न सपा, न कांग्रेस और न ही बसपा के पास. यहां तक कि बसपा के साहित्य के प्रकाशक ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी उस पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं थी. जबकि लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनीवर्सल बुक सेलर’ का दावा था, ‘हमने वह पुस्तक कभी नहीं बेची, न ही वह पुस्तक फिलहाल हमारे पास है.’ उल्लेखनीय है कि भाजपा के लखनऊ मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ को लेकर 27—28 अक्टूबर 2007 को एक बैठक हुई थी. उसमें पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रदेश भर में ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री का विरोध करने को कहा था. जबकि जिस पुस्तक का बहिष्कार किया जाना था, उसकी एक भी प्रति उस बैठक में उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा नेताओं द्वारा विधानसभा परिसर के आगे स्थित, अपने पार्टी मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियों का दहन(का नाटक) किया था.4 भाजपा का ‘सच्ची रामायण’ के दहन का दावा कितना खरा था, इसे इंडियन एक्सप्रेस में अलका एस. पांडे की 7 नबंवर की रिपोर्ट से समझा जा सकता है. उसके अनुसार पार्टी ने जैसे-तैसे ‘सच्ची रामायण’ के कुछ पन्ने जुटाए थे. उन्हीं को जलाकर, पुस्तक के दहन का नाटक किया गया था. वे भूल गए कि किसी व्यक्ति को महापुरुष मानना या न मानना, सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा तय नहीं होता. थोपे गए महापुरुषों की कलई अल्पावधि में ही खुलने लगती है. उसके बाद जनता की निगाह में वे खलनायक सरीखे बन जाते हैं.

एक महत्वपूर्ण बात और भी है. रामायण को धार्मिक ग्रंथ न मानकर पेरियार ने उसे विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माना है. पेरियार के आलोचक भी उनपर कुछ ऐसा ही आरोप लगाते हैं. उनके अनुसार पेरियार द्वारा हिंदू धर्म तथा उसके मिथकों की आलोचना पूर्णतः राजनीति से प्रेरित थी. पेरियार इससे इन्कार नहीं करते थे. अंतर सिर्फ इतना है कि ब्राह्मण कभी यह मानने को तैयार नहीं होते कि रामायण तथा रामकथा को हिंदू संस्कृति के केंद्र में रखने के पीछे उनकी राजनीति है. खुद को सबसे ऊपर, शिखर पर बनाए रखने की राजनीति. जबकि पेरियार अपनी मंशा को छिपाते नहीं हैं—

‘मैं अपने समाज के कुछ ऐसे पहलुओं पर प्रहार करता हूं, जो हमें नीचा दिखाते हैं. मेरा जोर इस बात पर है कि जब तक हिंदू धर्म, हिंदू देवताओं, हिंदू शास्त्रों, पुराणों, वेदों और इसके इतिहास पर हमारा विश्वास रहेगा, और जब तक हम इनका अनुसरण करते जाएंगे, तब तक हमारा दमन और शोषण जारी रहेगा. हम समाज की असमानताकारी स्थितियों से कभी उबर ही नहीं पाएंगे. इन सड़ी हुई स्थितियों से उबरने की कोशिश के बजाए, जो केवल इनका पालन करने में लगा रहेगा—वह चाहे जितनी बेहतर स्थिति में आ जाए, खुद को अपनी अवनति और अपमानजनक स्थितियों से कभी उबार नहीं पाएगा.’5

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था—

‘मैं किसी को चाहे प्यार करूं अथवा घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है. वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए.’6

पेरियार का मानना था कि बगैर हिंदू धर्म को मिटाए, जाति-भेद को मिटाना संभव नहीं है. वे धर्मांतरण के विरोधी थे. जाति-आधारित उत्पीड़न और अवमानना से बचने के लिए जिन लोगों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था, उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था. हिंदू धर्म में जो अछूत था, धर्मांतरण के बाद भी उसकी हैसियत अछूत जैसी ही रहती थी. इसलिए शूद्रों और अतिशूद्रों की राजनीतिक, सामाजिक भागीदारी को आवश्यक मानते थे. राजनीति में प्रवेश के साथ ही उन्होंने सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में संरक्षण की मांग शुरू कर दी थी. उन दिनों अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की स्वतंत्रता नहीं थी. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. मगर मंदिर प्रवेश का मसला सामाजिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा था. इसलिए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उसके तिरुपुर सम्मेलन में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सभी अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की इजाजत की मांग की गई थी. लेकिन कांग्रेस कमेटी के ब्राह्मण सदस्यों ने उस प्रस्ताव का जोरदार विरोध विरोध किया. नाराज पेरियार ने तत्काल घोषणा की कि वे मनुस्मृति, रामायण आदि पुस्तकों, जिनका उपयोग कुटिल ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक हथियारों के रूप में किया जाता है—दहन करेंगे.

वह अवसर 1956 में आया. पेरियार ने ऐलान किया कि 1 अगस्त 1956 को वे मद्रास के समुद्री तट पर राम की तस्वीरों की होली जलाएंगे. उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रावण के पुतले को आग लगाई जाती है. पेरियार रावण को आदर्श द्रविड़ राजा मानते थे. इसलिए उत्तर भारतीयों द्वारा रावण के पुतले को आग लगाने के विरोध में उन्होंने राम की तस्वीरों का दहन करने का ऐलान किया था. एक तरह से वह ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था. पेरियार की घोषणा के बाद तमिलनाडु के सभी नेताओं ने उनसे संपर्क कर, कार्यक्रम को टाल देने का अनुरोध किया. तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पी. काक्कन ने कहा कि राम की तस्वीरें जलाना ईश्वर के प्रति उस विश्वास की अवमानना होगी, जिसके भरोसे गांधी ने आजादी प्राप्त की है. उन्हें पेरियार के प्रस्तावित कदम को ‘असामाजिक कृत्य’ घोषित किया था. इसपर पेरियार ने अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हुए जवाब दिया कि उनका यह कदम सामाजिक परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है.

अगले ही दिन सुबह, घर से निकलने के साथ ही पुलिस उपायुक्त ने पेरियार को गिरफ्तार कर लिया. पेरियार इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे. घर से निकलते समय उनके पास माचिस की डिब्बियों, राम की तस्वीरों के अलावा एक बिस्तर भी था, जिसे वे जेलयात्रा की संभावना के कारण अपने साथ लेकर निकले थे. पेरियार के गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी समुद्र तट पर पहुंची जहां उनके समर्थक इकट्ठा थे. उन्होंने पेरियार की गिरफ्तारी की सूचना दी. इससे उनके समर्थक उग्र हो गए और साथ लाई राम की तस्वीरों को आग के हवाले करने लगे. उस समय तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी. करीब आधा घंटे तक पुलिस से बचने और गिरफ्तार होने का नाटक चलता रहा. लोग पिटते रहे, खुद को बचाने के लिए भागते भी रहे. भागते-भागते एक व्यक्ति रेत पर फिसल गया. पुलिस उसे गिरफ्तार करने को दौड़ी. लेकिन तब तक वह राम की तस्वीर को आग लगा चुका था. बाद में पेरियार सहित सभी को रिहा कर दिया गया. पेरियार का उद्देश्य पूरा हो चुका था.

पेरियार के जीवन से जाना जा सकता है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. वे जनता के बीच में खड़े होकर खुलेआम देवी-देवताओं का मखौल उड़ाते थे. धर्म और उसके प्रतीकों में आस्था और विश्वास को जनसाधारण की गरीबी और दैन्य के लिए जिम्मेदार मानते थे. कहते थे कि धर्म का मूल उद्देश्य, ईश्वर के गौरवगान की खातिर मनुष्यता का तिरष्कार करना है. इसपर धर्म भीरू लोग कहते कि पेरियार मूर्ख है. एक न एक दिन ईश्वर का कोप उनपर कहर टूटेगा. उस समय वह संभल नहीं पाएंगे. मगर पेरियार ने 94 वर्ष लंबा संघर्षमय जीवन जिया. अपनी मृत्यु से एक दिन पहले भी वे अपने मिशन को लेकर सतर्क थे. वे अंत तक कहते रहे कि यदि ईश्वर में जरा-भी शक्ति तो वह उन्हें दंड क्यों नहीं देता! उनसे उनका जीवन छीन क्यों नहीं लेता! खुद को ‘पंडित’ और धर्माधिकारी कहने वाले लोगों के पास पेरियार के इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. आस्था और धर्म के नाम पर दूसरों को मूर्ख बनाते आए लोगों के पास पेरियार के तार्किक प्रश्नों का उत्तर हो भी नहीं सकता था.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

  1. सच्ची रामायण और सच्ची रामायण की चाबी, अंबेडकर प्रचार समिति, मोती कटरा आगरा, पृष्ठ 76
  2. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/ar_showdetails.asp?id=711050918&cat=&n_date=20071105
  3. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/articles/India/20071027/805535.html.
  4. वन इंडियाhttps://www.oneindia.com/2007/10/30/bjp—workers—burnt—copies—of—sacchi—ramayan—1193744742.html
  5. रिपब्लिक 19 जनवरी, 1945
  6. दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग के प्रथम संस्करण के प्रकाशकीय से उद्धृत, 1959

वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

बालक और उसका समयबोध

सामान्य

इस लेख का उद्देश्य न तो बालक को समय-प्रबंधन के गुर सिखाना है. न उसे समय-संबंधी दार्शनिक जटिलताओं में उलझाना. हम बालक तथा उसके समयबोध को लेकर सामान्य चर्चा करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि समय को लेकर बालक की जो प्रतीतियां हैं; स्कूल से लेकर घर तक, समय के बारे में उसे जितना और जैसा समझाया जाता है, क्या उसके समय-प्रबोधन का वही एकमात्र और सही तरीका है? बालक के व्यक्तित्व पर समय से संबंधित ऐसी प्रतीतियों और प्रज्ञप्तियों का जो तर्क एवं ज्ञान से परे, केवल सुनी-सुनाई बातों अथवा पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं—क्या कोई दुप्रभाव पड़ता है? क्या वे बालक के स्वतंत्र विवेक की राह में बाधक हैं? आदिकाल से ही मानवमन में एक किस्सागो बैठा हुआ है, जो मनुष्य को अपने आसपास के परिवेश के बारे में झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ने; तथा उनके साथ किसी न किसी रूप में अपना संबंध स्थापित करने को प्रेरित करता रहता है. आमतौर पर वे कहानियां संबंधित समाज की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं. धर्म, ईश्वर, किस्म-किस्म के देवी-देवता सब उसी मानस किस्सागो की कल्पना हैं. क्या समय भी मनुष्य की ऐसी ही रोचक परिकल्पना है?

स्पर्धा के इस युग में बालक को अन्य चुनौतियों के साथ-साथ समय की चुनौती से भी जूझना पड़ता है. जो लोग समय को अनादि, अनंत तथा सतत प्रवाहमान मानते हैं, वही उसकी कमी का हवाला देकर बालक को डराते रहते हैं. खुद को ‘बड़ा’ समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति बालक को सावधान करता है—‘समय बरबाद मत करो. वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता. जरा-भी चूके तो हाथ से फिसल जाएगा….समय के साथ चलो, चलते रहो, नहीं तो पिछड़ जाओगे.’ ऐसे निर्देश बालक को अभिभावकों तथा अध्यापकों की ओर से निरंतर, इतनी बार तथा इतनी तरह से सुनने को मिलते हैं कि उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. अपनी सीमाओं में वह समय की चुनौतियों से निपटने की कोशिश भी करता है. उसके लिए समय-सारणी बनाता है. अपने अध्ययन-कार्य को छोटे-छोटे उपखंडों में बांटता है. घड़ी की टिक-टिक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता है. इसके बावजूद चुनौती बनी ही रहती है. क्योंकि खंडों-उपखंडों में समाहित प्रत्येक घटना बालक के अधिकार में नहीं होती. किसी न किसी रूप में दूसरे भी उससे जुड़े होते हैं.

नई शिक्षा व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा स्पर्धा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. पर्याप्त सहयोग-समर्थन के अभाव में बालक अपनी ही बनाई समय-सारणी के हिसाब से पिछड़ने लगता है. बड़े टोकते हैं. बालक कोशिश करता है. कभी सफल होता है, कभी परिस्थितियां भारी पड़ जाती हैं. ऐसे में समय हाथ से निकल जाने की चिंता बालक का पीछा नहीं छोड़ती. धीरे-धीरे वह उसके आत्मविश्वास पर भारी पड़ने लगती है. ऐसा नहीं है कि केवल बालक ही समय के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से प्रभावित होता है. बड़े भी उससे मुक्त नहीं रह पाते. समय-संबंधी पूर्वाग्रह तो प्रायः बड़ों के माध्यम से ही बच्चों तक पहुंचाए जाते हैं. बालक उन्हें लंबे समय तक, कभी-कभी जीवन-भर विरासत के तौर पर संभाले रखता है.

सामान्य दिनचर्या में समय को ‘सर्वशक्तिमान’ के रूप में पेश किया जाता है. ऐसा महानायक जो कथित देवी-देवताओं से भी ऊपर, सीधे किसी पराशक्ति के अधीन है. जो दैवीय आदेशों से अनुशासित होता है. कभी बताया जाता है कि खुद ईश्वर भी समय के बंधन में बंधा है. भारतीय समाज की जो स्थिति है, उसमें किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बालक अंध-श्रद्धा का शिकार हो चुका होता है. उसके बाद वह तर्क छोड़ आस्था की राह पकड़ लेता है; तथा दैवीय अनुकंपा को समस्त समस्याओं का एकमात्र समाधान मानने लगता है. ईश्वर का जिक्र हो तो वह सर्वशक्तिमान के रूप में सर्वप्रथम उसी की कल्पना करता है. किंतु अगले ही क्षण जब समय की चुनौती सामने होती है, तब वही उसे सर्वशक्तिमान नजर आने लगता है. समय और तथाकथित ईश्वर को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड होती हैं. उनमें कहीं ईश्वर समय पर भारी पड़ता है तो कभी समय ईश्वर के सामने चुनौती बन जाता है. इससे बालक की उलझन सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. भ्रांत बालमन समझ ही नहीं पाता कि पराशक्ति हो अथवा समय, दोनों में कोई एक ही सर्वशक्तिमान हो सकता है. ऊहापोह में वह किसी कार्य को तत्संबंधी घटनाओं के संबंध में देखने-समझने के बजाय, आस्था और पूर्वाग्रहों द्वारा नियंत्रित होने लगता है. यहीं से उसके विचलन का दौर आरंभ होता है, जो उसे वास्तविक और अन्वीक्षणात्मक ज्ञान के बजाय आभासी दुनिया में ले जाकर छोड़ देता है─जहां या तो निरे सपने होते या फिर परंपराओं का बोझ. जहाँ    

रोजमर्रा के कार्य के सिलसिले में बालक द्वारा घड़ी देखने का सिलसिला सुबह के साथ आरंभ हो जाता है. उसके बाद नहाने, नाश्ता करने, स्कूल जाने, स्कूल में टाइम-टेबिल के अनुसार विभिन्न विषयों का पाठ करने, लंच करने, खेलने, घर लौटने, आराम करने, होमवर्क निपटाने, टेलीविजन देखने, भोजन करने से लेकर रात को बिस्तर तक जाने के बीच अपने माता-पिता की भांति बालक भी समय के हिसाब-किताब में उलझा रहता है. उसके समस्त कार्यकलाप छोटे-छोटे टाइम-पॉकेट में बंधे होते हैं. हर पीरियड के साथ स्कूल की घड़ी बदले समय और चुनौती का एहसास कराती है. बीच-बीच में जब भी घटनाक्रम बदलता है, बालक की निगाहें घड़ी की सुइयों में उलझकर रह जाती हैं. उसके सामने चुनौती होती है कि वह न केवल समय के साथ अपनी दिन-चर्या को व्यवस्थित रखे साथ ही सहपाठी अथवा समवयस्क बच्चों, जिनके साथ उसकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्पर्धा है─से जरूरी बढ़त भी बनाए रखे. दूसरों के बराबर रहने वाले को यहां औसत तथा पीछे रहने वाले को फिसड्डी मान लिया जाता है. समय और समवयस्क बच्चों के साथ स्पर्धा बालक को अनावश्यक रूप से तनावग्रस्त रखती है. इसके अलावा एक जैविक घड़ी भी होती है. उसके बारे में आवश्यक नहीं कि बड़े ही बालक को समझाएं. उसका एहसास प्रकृति स्वयं कराने लगती है. जैसे  समय होते ही भूख भोजन तथा थकान आराम की जरूरत की ओर संकेत करने लगती है.

सुबह से शाम तक अनगिनत बार घड़ी देखने से जो प्रथम प्रभाव बालक के मनो-मस्तिष्क पर पड़ता है, वह यह कि घड़ी की सुइयां ही समय हैं. कि अपनी महीन टिक-टिक के साथ घड़ी विराट समय को अपने भीतर समेटे है. घड़ी की सुइयां आगे बढ़ेंगी, तभी समय आगे खिसकेगा. बालक ही क्यों? घर में माता-पिता, स्कूल में अध्यापकगण, मित्र-हितैषी, सगे-संबंधी सभी सीधे घटनाओं पर नजर रखने, उन्हें नियंत्रित करने के बजाए—घड़ी की सुइयों से नियंत्रित होने लगते हैं. स्पर्धा में समय से पिछड़ जाने की आशंका बालक को अनावश्यक चिंता में डाल देती है. उसका आत्मविश्वास आहत होने लगता है. उस समय बालक को यह बताना आवश्यक है कि घड़ी की टिक-टिक समय नहीं है. वह स्वयं एक घटना है, सिर्फ घटना, जिसकी दो आवृतियों के बीच सुनिश्चित अंतराल होता है. घड़ी का कार्य किन्हीं दो घटनाओं के बीच का अंतराल बताना है. प्रत्येक घटना के समानांतर  और आगे-पीछे हजारों-हज़ार घटनाएँ अनंत ब्रह्मांड के भीतर और बाहर, लगातार घटती रहती हैं. जो लोग समय को घटनाओं के प्रवाह के रूप में देखते हैं, वे उनमें रमे रहकर भी अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं. ऐसे लोगों के लिए समय चुनौती नहीं बनता. उनके साथ विलक्षण यात्रा का अनकहा रोमांच होता है.  

बालक को बताया जाना चाहिए कि समय घटनाओं की अन्विति से परे कुछ नहीं है. कि घटनाओं पर विजय पाना, उनके साथ सामंजस्य बनाकर चलना—कठिन भले हो, असंभव नहीं है. कि इस धरती पर ऐसे नरपुंगव भी हुए हैं जिन्होंने समय को न तो देवता माना, न उसकी कभी परवाह ही की. बिना परिस्थितियों से घबराए, चुनौतियों को स्वीकार करके ही वे इस दुनिया को अपनी इच्छानुसार चलाने में कामयाब होते आए हैं. ऐसा बोध बालक के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है. प्रायः ऐसा नहीं होता. क्योंकि समय को ‘नियति’ और ‘भाग्य’ के समकक्ष रखने वाले, दोनों को परस्पर पर्याय मानने वाले, बालक के माता-पिता समय को परम-नियंता और महाशक्तिशाली मान स्वयं उससे भयभीत रहते हैं.

भारतीय दर्शनों में समय पर विचार किया गया है, किंतु उनमें तत्वपरक सामग्री का अभाव है. उसे या तो दैवीय शक्ति के समकक्ष रखकर मनुष्य का भाग्य-नियंता बताया गया है; अथवा घटनाओं तथा उनके वेग के प्रतिफल के रूप में दर्शाया जाता है. भारतीय प्रज्ञा की कमजोरी है कि वह तर्क और विवेक से अधिक, आस्था और पूर्वाग्रहों से प्रेरणा ग्रहण करती है; और उससे बहुत कम बाहर निकल पाती है. समय को लेकर वस्तुनिष्ट चिंतन के अभाव का भी यही कारण है. पूर्वाग्रहों के दबाव में हम समय-संबंधी प्रज्ञप्तियों जिन्हें समयाभास भी कहा जा सकता है, को अपने आसपास घट रही घटनाओं के सापेक्षिक वेग, परिवर्तनशीलता, पदार्थ की विशेष अवस्था आदि के संदर्भ में देखने के बजाए स्वतंत्र सत्ता माने रहते हैं. यह ‘कार्य’ को ‘कारण’ मान लेने जैसी गंभीर चूक है, जिसके साधारण और विशेष सभी लोग शिकार होते आए हैं.  

आगे बढ़ने से पहले समय और समयबोध की ओर संकेत करना आवश्यक है. जैसा ऊपर संकेत किया गया है, समय को लेकर दो प्रकार की प्रज्ञप्तियां आमतौर पर प्रत्येक मनस् में होती हैं. ये एक साथ भी हो सकती हैं तथा एक-दूसरे से स्वतंत्र भी. पहली मान्यता के अनुसार समय कोई भागती हुई चीज है. नदी की मानिंद सतत प्रवाहमान. भूत-वर्तमान और भविष्य में निरूपित. एक के बाद एक गुजरते रात-दिन इसका उदाहरण हैं. जॉन मेकटेग्गार्ट ने इसे ‘ए’ श्रेणी माना है. यानी वह समय जिसे हम श्रेणीबद्ध रूप में अपने सामने से गुजरते हुए देखते हैं. उसका एक उदाहरण इतिहास लेखन भी है. हमारे समय एवं तत्संबंधी सामान्यबोध की शुरुआत ही सौर दिवस से होती है. आदमी रोजमर्रा के कार्यों को अपनी जरूरत, सुविधा अथवा दायित्व-भावना के आधार पर, छोटी-छोटी घटनाओं में बांट लेता है. उन घटनाओं की सापेक्षिक गति ही समयाभास का कारण बनती है. इस मान्यता के अनुसार समय दो संबद्ध घटनाओं के बीच का अंतराल है, जो उनके घटने की दर को दर्शाता है. उससे घटना की अनुभूति तथा उसकी सापेक्षिक गति का आकलन किया जा सकता है. समय पर विचार करते हुए इस तथ्य को प्रायः नजरंदाज कर दिया जाता है कि ब्रह्मांड में घट रही अनंत घटनाओं की भांति सौर दिवस भी प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना इस घटना को अंजाम देता है. दिन-रात को जन्म देने वाली यह घटना भी अपने आप में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है. पृथ्वी अपने केंद्र पर घूमने के अलावा सूर्य की कक्षा में भी चक्कर काटती रहती है. इससे दिन-रात के कुल समय में भले ही ज्यादा अंतर न पड़ता हो, मगर उनकी अवधि घटती-बढ़ती रहती है. यह समय अथवा समयाभास की सापेक्षिकता का द्योतक है.

उपर्युक्त से निष्कर्ष निकलता है कि घटनाएं तथा उनका आधार यह सतत-परिवर्तनशील ब्रह्मांड—शाश्वत हैं. समय वह अंतराल है, जिसमें हम ब्रह्मांड की विभिन्न गतिविधियों के अंतराल का अनुभव करते हैं; तथा जिसके माध्यम से उनकी गति का आकलन किया जा सकता है. परिवर्तन को सृष्टि का मूल लक्षण बताने वाला यूनानी विचारक हेराक्लीट्स कहता है—‘प्रत्येक वस्तु गतिमान है. तुम किसी नदी में दुबारा हाथ नहीं डाल सकते.’ समय को सतत प्रवाह मानने वाली विचारधारा भी कहती है—‘बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता. हम किसी क्षण को दुबारा नहीं जी सकते.’ समय की इस परम-भौतिकता को वैरागी भृर्तहरि अपनी तरह से अभिव्यक्त करता है—‘कालो न यातं वयमेव याताः’—‘समय नहीं गुजरता, हम गुजरते हैं.’1 अरस्तु समय को अवधि(अंतराल) के रूप में देखता था. उसके लिए समय किसी क्रिया की पूर्वकालिक एवं उत्तरकालिक अवस्था की आवधिक गणना है. वह लिखता है—

‘यदि आत्मा की सत्ता नहीं थी, उस अवस्था में समय की सत्ता रही होगी या नहीं—यह जिज्ञासा सीधे-सीधे एक प्रश्न पर ले आती है. जहां कोई गिनने वाला ही नहीं है, वहां ऐसी चीज भी नहीं हो सकती, जिसे गिना जा सके.’2 

इस तर्क को स्वीकारने में वही मुश्किल है, जो यह स्वीकार करने में है, कि                                                                                                                                                                              गंगाधर और तिलक को बनारस जाना था, गंगाधर नहीं गया इसलिए तिलक भी नहीं गया.  समय का तारतम्यता वाला लक्षण बालक के लिए सदैव तनाव या चुनौतियां पेश करे, ऐसा नहीं होता. यह बालक को निश्चिंत भी करता है. बालक अथवा किशोर जब अपने माता-पिता या दादा-दादी, नाना-नानी को क्रमशः वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर अग्रसर देखता है, तब उसके अवचेतन में सहज रूप से यह भाव उत्पन्न होता है कि उसके जीवन की तो अभी बस शुरुआत है. जीने के लिए बड़ा हिस्सा अभी शेष है; तथा सामाजिक जिम्मेदारियों का दौर लंबे अंतराल के पश्चात आरंभ होने वाला है. यह विश्वास बालक को अवसाद से बाहर रखने में मदद करता है. इससे बालक और समय अथवा समयाभास के बीच अनूठा संबंध बनता है, जो उम्मीदों से लबालब और सकारात्मक होता है. यह निश्चिंतता उसे नित-नवीन सपने देखने को प्रेरित करती है. छोटा बालक उमंगों से सराबोर रहता है. मनमानी शरारतें करता है. भविष्य के प्रति आशावान रहता है. उसकी कल्पना बड़ों की अपेक्षा ज्यादा रंगीन होती है. ये सब उसे अधपकी उम्र में जिम्मेदारियों से सीधे टकराने, टूटकर बिखर जाने से बचाते हैं.

सामान्य भौतिकी के लिए समय का प्रवाहशीलता वाला गुण विशेष काम का है. उसके माध्यम से पदार्थ की आंतरिक एवं बाहरी गतियों का अध्ययन किया जाता है. गति पदार्थ की विशेष अवस्था है. क्या पदार्थ की गतिहीन अवस्था में भी समय या समयाभास की कल्पना की जा सकती है? यदि हम वस्तु-विशेष के संदर्भ में देखें तो इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में होगा. गति के लिए किसी पिंड अथवा कण का होना आवश्यक है. पिंड स्थिर हो और परिवेश परिवर्तनशील, तब भी पिंड तथा उसके परिवेश के बीच सापेक्षिक गति बनी रहेगी; और घटनाओं की एक के बाद एक आवृति हमारे समयाभास का कारण होगी. इसे समझने के लिए एक असंभव स्थिति की कल्पना करते हैं. मान लेते हैं कि एक व्यक्ति अंतरिक्ष में किसी अकेले पिंड पर खड़ा है. चारों और केवल शून्य पसरा है. उस अवस्था में यदि प्रेक्षक की आंखों पर ऐसा चश्मा चढ़ा दिया जाए, जिससे वह अपने पिंड की गतिविधियों के साथ-साथ अपनी शारीरिक गतिविधियों की ओर से भी निःसंवेद हो जाए, उस अवस्था में वह खुद को परिवर्तन-शून्य विश्व में पाएगा. ऐसी स्थिति में वह समय की अनुभूति नहीं कर पाएगा. जाहिर है, तब उसका समयबोध भी शून्य होगा.

समय संबंधी पहली प्रज्ञप्ति जिसके अनुसार समय को दो घटनाओं के अंतराल से मापा जाता है, का वर्णन हम ऊपर कर चुके है. दूसरी प्रज्ञप्ति जिसे जॉन मेकटेग्गार्ट ने ‘बी’ श्रेणी की संज्ञा दी है, के अनुसार समय अंतरिक्ष जैसी अंतहीन संरचना हैं, जिसमें सब कुछ निरंतर घटता रहता है. ब्रह्मांड की समस्त घटनाएं, ग्रह-पिंड सभी उसमें समाहित हैं. वह भूत-वर्तमान-भविष्य सभी का आधार तथा ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना का साक्षी है. इस मान्यता के अनुसार सृष्टि की प्रत्येक घटना, अंतरिक्ष के साथ-साथ समय में भी घटित होती है. पहली मान्यता जहां समय को गतिशील मानती है, वहीं इस समानांतर मान्यता के अनुसार समय स्थिर होता है. स्थिर भाव से ही वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घटनाओं का लेखा रखता है. जिस प्रकर अंतरिक्ष में घटनाएं घटती रहती हें. वैसे ही अनंत समय के बीच भी घटनाओं का सिलसिला बना रहता है. अंतरिक्ष वस्तुजगत के भौतिक स्वरूप को वितान देता है. वस्तुहीनता की अवस्था में विराट आभासीय शून्य होगा; जिसमें समस्त गतियों, परिवर्तनशीलता का लोप हो चुका होगा, ऐसी स्थिति में भी समय की परिकल्पना असंभव होगी. आशय है कि परिवर्तन-शून्यता अथवा परम-स्थिर विश्व में समय की परिकल्पना अप्रासंगिक हो जाती है.  

एक मान्यता के अनुसार समय सृष्टि के प्रत्येक परिवर्तन का साक्षी है, मगर खुद परिवर्तनकारी शक्ति नहीं है. न उसका कोई साक्षी होता है. स्टीफन हाकिंग अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति परम-विस्फोट से मानते हैं. हॉकिंग के अनुसार समय की उत्पत्ति का क्षण भी वही है. अपनी बहुचर्चित पुस्तक में ‘समय का इतिहास’ के बहाने वे ब्रह्मांड के इतिहास की ही चर्चा कर रहे होते हैं. उस अवस्था की चर्चा कर रहे होते हैं, जब अपनी पहली हलचल के साथ ब्रह्मांड परम-शून्य से परिवर्तन ओर अग्रसर होता है. हॉकिंग के अनुसार परम-विस्फोट से पहले ब्रह्मांड परम-संपीडन की अवस्था में था. वह परम-स्थिरता की अवस्था थी, जिसका उल्लेख हमने ऊपर किया है. चूंकि उस समय सर्वत्र गति-शून्यता थी, इसलिए उसमें समय अथवा समयाभास की कल्पना भी असंभव है. महाविस्फोट के पश्चात ग्रह-नक्षत्रों का आदि का जन्म हुआ, जिनमें हमारी पृथ्वी भी सम्मिलित हैं.

समयहीनता की कल्पना हमारे लिए उतनी ही दुष्कर है, जितनी कि ब्रह्मांड के लोप हो जाने की परिकल्पना. ब्रह्मांडहीनता की अवस्था में समयबोध का क्या होगा? उसकी पहचान किस तरह से की जाएगी? ऐसे प्रश्न हमारी कल्पना से बाहर है. सवाल है कि समय यदि ‘कुछ भी नहीं’ है, केवल आभास मात्र है, तो उसे व्यावहारिक जीवन में उसे सबकुछ क्यों दिखाया जाता है. कारण है कि ऐसे अवसरों पर हम सत्य की उपेक्षा कर, भ्रांत धारणाओं को ही सबकुछ माने रहते हैं. इसके बीजतत्व भी हमारी शिक्षा-संस्कृति में अंतनिर्हित हैं. हमारी जरूरत की सभी वस्तुएं पृथ्वी उपलब्ध कराती है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मगर हम यह माने रहते हैं कि सातवें-आठवें आसमान पर बैठा कोई देवता है, जो हमें जीवन और पृथ्वी को उर्वरा शक्ति प्रदान करता है. इस तरह से सोचने की आदत ज्यादा से ज्यादा ढाई-तीन हजार वर्ष पुरानी है. लेकिन यही वह कालखंड है जब आदमी द्वारा आदमी पर शासन करने, आदमी द्वारा आदमी को गुलाम बनाने की शुरुआत हुई. धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर असहिष्णुता और असमानता को व्यक्ति की पहचान जोड़ा जाने लगा. ऐसी व्यवस्था में जो भी ऊंचाई पर होता है, वह अपनी ऊंचाई को वैध बनाने के लिए अपने से भी ऊंचे का हवाला देता है. जैसे कि ब्राह्मणों ने अपने शीर्षस्व को वैध बनाने के लिए देवताओं की पूरी फौज की परिकल्पना कर डाली. इसलिए समय को और दूसरी चीजों को सही ढंग से जाना न केवल विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि संस्कृति के परिष्करण तथा मनुष्य के नैतिक प्रबोधन हेतु भी अपरिहार्य है.

ओमप्रकाश कश्यप

अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक

सामान्य

सुनो, सुनो, सुनो—गीत मेरा सुनो

विपन्न, निढाल गरीबी में घिसटते हुए लोगो सुनो 

‘यहां से जाएं, तो कहां जाएं?’

वे रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं

हमारा न कोई घर है, न देश

न ही सिर छिपाने को जंगल

दिन के उजाले में जंगलों की सफाई करना

रात्रि को वहीं निढाल पड़ जाना

बीज बोने के बाद

पेड़ जब देने लगते हैं फल

मालिक आकर कब्जा लेता है उन्हें

हमारे पास अब केवल रोना ही बचा है

हमारे हिस्से है श्रम, केवल श्रम

ढेर सारा, बल्कि सारे का सारा श्रम

हम सड़कों पर चल नहीं सकते

बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है हमें

लेकिन हम बढ़ेंगे….बढ़ेंगे

बढ़ते रहेंगे, बढ़ते ही रहेंगे।

ऊपर दिया गया गीत करीब 100 वर्ष पुराना है। अय्यंकाली द्वारा स्थापित ‘साधुजन परिपालन संघम’ की बैठकों में गाया जाने वाला गीत। केरल के दलितों और आदिद्रविड़ों में आधुनिक भावबोध जगाने में इस गीत का बड़ा योगदान है। चक्कोला कुरुंबम दीविथन इसे गाया करते थे। ऐसे मार्मिक स्वर में कि श्रोतागणों की आंखें डबडबा जाती थीं। इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले अय्यंकाली के जीवन से दो शब्द चित्र—

बैलगाड़ी से क्रांति

वर्ष 1891(कुछ विद्वान इसे 1893 मानते हैं)। करीब 30 वर्ष का एक हृष्ट-पुष्ट और सुदर्शन युवक। एकदम नई बैलगाड़ी, जोतने के लिए एक जोड़ी युवा-छरहरे, सफेद बैल। एक जोड़ी पीतल की बड़ी-बड़ी घंटियां—सब उसने आज ही के लिए खरीदे हैं। इनके अलावा अपने लिए चमकीला अंगवस्त्र, शानदार पगड़ी और रौवदार जूतियां। मानो अपने अनूठे बाने से काल के कपाल पर सुनहरी इबारत टांकने को आतुर हो। बैलों को गाड़ी में जोतने से पहले वह उन्हें प्यार से सहलाता है। फिर उनके गले में घंटियां बांधकर बैलगाड़ी में जोत देता है। उसके बाद पूरी शान से बैलगाड़ी में सवार होता है। सधे बैल इशारा पाते ही आगे बढ़ने लगते हैं। ‘टनश्टन’ बजती घंटियां पचासियों मीटर दूर से उसके आने का पता दे देती हैं। लोग घंटियों की आवाज सुनकर बाहर निकल आते हैं। स्त्रियां और बच्चे खिड़कियों-दरवज्जों से झांकने लगते हैं। 

युवक जिस जाति से आता है, उसे न तो बैलगाड़ी पर सवार होने का अधिकार है। न अंगवस्त्र धारण करने का। न ही उन मार्गों पर चलने का जिनपर उसके बैल हाथियों जैसी मस्त चाल से आगे बढ़े जा रहे हैं। उसकी शान देखकर उसके अपने लोगों का सीना शान से चौड़ा हो जाता है। कुछ को ईर्ष्या होती है। कुछ की आंखों की अंगार फूटने लगते हैं। वे घरों से लाठियां, डंडे वगैरह निकालकर बैलगाड़ी के रास्ता रोक लेते हैं। जो हो रहा है, इसकी उसे उम्मीद थी। इसलिए वह तैयार होकर आया है। रोज-रोज अपमान सहते रहने से अच्छा है, उसका प्रतिकार किया जाए। फैसला इस पार हो या उस पार। विरोधियों को तना देख वह अपनी खुखरी निकाल लेता है। उसका रौद्र रूप देख रास्ता रोकने वाले भयभीत हो जाते हैं। जीत का जश्न मनाती हुई बैलगाड़ी आगे बढ़ जाती है। 

दुनिया में अनेक महापुरुष हुए। सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, परंतु बैलगाड़ी पर चढ़कर क्रांति का शंखनाद करने वाले वे अकेले ही थे। 

बाजार जाने की आजादी

भारत में जाति से बड़ा कलंक दूसरा नहीं। यह जन्म के आधार पर आदमी-आदमी में फर्क करना सिखाती है। ‘द्विज’ कहकर मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में अकूत अधिकार थमा देती है। दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से को शूद्र और अछूत बताकर उनसे उनका मान-सम्मान, सुख-सुविधा और मामूली खुशियां तक छीन लेती है। केरल सहित पूरे दक्षिण भारत में वह और भी विकृत अवस्था में थी। इसलिए 1892 में केरल यात्रा के दौरान, विवेकानंद ने उसे ‘जातियों का पागलखाना’1 तक कह दिया था। बीसवीं शताब्दी में वहां के सवर्ण पुलाया, पारया, कुरुवा जैसी जातियों की छाया से भी बचते थे। दलितों का उत्पीड़न आम बात थी। उन्हें न सार्वजानिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता थी, न बाजार जाने की। न ही अच्छे वस्त्र पहनने की। गुलामों जैसा जीवन था उनका। बैलगाड़ी पर चढ़कर सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी छीन लेने वाला हमारा महानायक, 1898 में उनके मान-सम्मान की खातिर एक बार फिर नए जोश के साथ उठ खड़ा हुआ। इस बार संघर्ष बाजार जाने की आजादी को लेकर था।   

उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया। इरादा आरालुम्मुद बाजार में प्रवेश करने का था। अपने साथियों को लेकर उसने पठानकाडा से आगे बढ़ना शुरू किया। सभी जोश में थे। इस डर से कि विरोधी कभी भी, किसी भी दिशा से हमला कर सकते हैं, वे सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। जैसे ही उनका कारवां चेट्टियार स्ट्रीट, बलरामपुर पहुंचा—हथियारों से लैस ऊंची जातियों के लड़ाके उनके रास्ते में अड़ गए।2 दोनों ओर से घात-प्रतिघात होने लगा। संघर्ष बढ़ा तो बढ़ता ही गया। दलितों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। देखते ही देखते मनाक्कुडु, नेय्याट्टिंकर, नेमोन, अमरविला, परसाला, कोझाकुट्टम, कनियापुरम आदि इलाकों में विद्रोह की चिंगारियां फूटने लगीं। जो अछूत सवर्णों को देख कई हाथ पहले ठिठक जाया करते थे—वे अब नई चेतना और आत्मविश्वास से भरे थे। अपने नेता के इशारे पर कुछ भी करने को सनद्ध। पूरे त्रावणकोर में गृहयुद्ध की स्थिति बन चुकी थी। विद्वान 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं। लेकिन स्वाधीनता की असली लड़ाई तो वे दलित और आदिद्रविड़ लड़ रहे थे। एक सप्ताह बाद हालात सामान्य हुए। तब तक इतिहास उस घटना को ‘चलियार विद्रोह’ के नाम से अपने भीतर टांक चुका था। 

केरल को आधुनिक राज्य बनाने में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। वहां अय्यंकाली का उतना ही योगदान है, जितना ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर का महाराष्ट्र में, पेरियार का तमिलनाडु में है। अय्यंकाली का जन्म 28 अगस्त 1863 को त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में हुआ था। आठ भाई-बहनों में वे सबसे बड़े थे। जाति थी पुलाया। उस जाति के लोग आमतौर पर गुलामों की तरह काम करते थे। अय्यंकाली के पिता अय्यन भी एक जमींदार के गुलाम थे। उनकी मेहनत और वफादारी से प्रसन्न होकर जमींदार ने उन्हें पांच एकड़ जमीन उपहार में दे दी थी। इसलिए अपनी जाति के लोगों में अय्यंकाली के परिवार की हैसियत काफी अच्छी थी। पिता अय्यन पुलाया बस्ती के मुखिया थे।

उस समय समाज पूरी तरह जाति में जकड़ा हुआ था। उस परिवेश से गुजरने वाले बच्चों को समाज में जो उत्पीड़न, उलाहने और तिरष्कार सहना पड़ता है, वैसा अय्यंकाली के साथ भी हुआ था। बचपन से ही वे सुंदर थे। शरीर गठीला और स्वस्थ था। उनका व्यक्तित्व अलग ही छाप छोड़ता था। फुटबाल खेलने का शौक था। एक बार फुटबाल नैय्यर के घर में जा गिरी। वे बॉल लेने पहुंचे तो नैय्यर ने उनका अपमान कर दिया। हिदायत दी कि भविष्य में बॉल उसके घर न आने पाए। उस अपमान ने अय्यंकाली को आहत कर दिया। फुटबाल खेलते समय कुछ सवर्ण लड़के भी उनके साथ शामिल हो जाते थे। अय्यंकाली की जाति के बारे में पता चलते ही उन्होंने आना छोड़ दिया। अय्यंकाली को यह बहुत अखरा। उन्होंने भविष्य में उन बच्चों के साथ कभी न खेलने का फैसला किया। 

अय्यंकाली बचपन से ही रचनात्मक प्रवृत्ति के थे। गाने-बजाने का शौक था। अपनी जाति के बच्चों को इकट्ठा कर उन्होंने एक नाटक मंडली की शुरुआत की। आरंभ में वे परंपरागत नाटक खेलते थे। धीरे-धीरे अपने रचे नाटक भी खेलने लगे। उनके नाटकों में एक संदेश होता था। फलस्वरूप लोग तेजी से उनकी ओर आकर्षित होने लगे। बचपन से ही वे निडर और साहसी थे। इस कारण किसी न किसी मुद्दे को लेकर सवर्णों ने उनका अकसर टकराव होता रहता था। उससे निपटने के लिए विद्रोही अय्यंकाली ने अपने साथियों को संगठित करना आरंभ किया। उन्हें कुश्ती और लाठीबाजी का प्रशिक्षण दिलवाया। इसके लिए कलारी असान नामक प्रशिक्षक को बाहर से बुलवाया गया। इससे पलाया युवकों के भीतर आत्मसम्मान की भावना बढ़ने लगी। चूंकि इस बदलाव के मूल में अय्यंकाली की प्रेरणा और श्रम था, इसलिए प्रशंसक उन्हें सम्मान के साथ ‘उरपिल्लई’ या ‘मूथापिल्लई’ कहते थे। 1888 में उनका विवाह चेल्लमा से हो गया। पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम था। दोनों के सात बच्चे हुए। अय्यंकाली खुद को अच्छा गृहस्थ सिद्ध कर चुके थे। लेकिन उनकी मंजिल वहीं तक सीमित नहीं थी। अछूत होने के कारण उनपर कई प्रकार के बंधन थे। उनसे निपटने के लिए 1893 में बैलगाड़ी पर सवार अय्यंकाली ने वह कर दिखाया, जैसा उनसे पहले किसी न सोचा तक न था। 

शिक्षा हेतु संघर्ष

मैकाले की सलाह पर आगे बढ़ते हुए तत्कालीन वायसराय विलियम बैंटिक 7 मार्च 1835 को एक संकल्पपत्र प्रस्तुत किया था। उद्देश्य था समाज के निचले वर्गों तक शिक्षा का विस्तार। हजारों वर्षों से ज्ञान के नाम पसरे शूण्य की भरपाई करना। लेकिन कानून बनना एक बात है, जरूरतमंदों तक उसका लाभ पहुंचना दूसरी बात। अधिकांश स्कूलों का प्रबंधन द्विज जातियों के हाथ में था। कानून बन जाने बावजूद वे उसकी अवहेलना करती आ रही थीं। फुले का विचार था कि बदहाली से मुक्त होने के लिए शूद्र-अतिशूद्रों को स्वयं प्रयास होंगे, समाज को जगाना होगा। नेतृत्व हेतु प्रभावशाली नेता भी अपने ही भीतर से पैदा करने होंगे। यह सब बिना शिक्षा के असंभव है। अतएव 1848 से ही वे  शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूलों की स्थापना में जुट गए थे। आने वाले 3 वर्षों में 18 स्कूलों की स्थापना कर उन्होंने एक तरह से कीर्तिमान रचा था। 

उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अय्यंकाली ने 1904 में वेंगनूर में पहले स्कूल ‘कुदी पल्लिकूदम’ की नींव रखी। लेकिन सवर्णों से यह सहन न हुआ। निर्माण कार्य शुरू होने के पहले ही दिन उन्होंने अय्यंकाली के स्कूल में आग लगा दी। लोगों के सहयोग से, उन्होंने बिना देर किए नए सिरे से निर्माण शुरू कर दिया। परंतु विद्रोही बाज आने वाले न थे। उन्होंने स्कूल को दूसरी बार भी वही किया। कोई और होता तो कदाचित हार मान लेता। मगर बचपन से ही जुझारू रहे अय्यंकाली के नेतृत्व में निर्माण कार्य चलता रहा। आखिरकार स्कूल बना। बच्चे वहां जाने लगे। वह केरल में किसी दलित द्वारा, दलित बच्चों की शिक्षा के स्थापित पहला स्कूल था। 

अछूत जातियों से जुड़े बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती करने नियम 1907 में ही बन चुका था। परंतु उसपर अमल दूर था। सवर्णों के दबाव में त्रावणकोर के दीवान ने उस आदेश को दबा लिया था। अपने संगठन के माध्यम से अय्यंकाली उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत थे। आखिरकार, सवर्णों के रवैये से निराश होकर उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने अछूतों से कहा कि जब तक उनके बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, तब तक वे नैय्यरों के खेतों में काम करना छोड़ दें। यही हुआ। पुलायाओं ने हड़ताल की घोषणा कर दी। शुरू-शुरू में नैय्यरों ने इसे गीदड़ भभकी माना। सोचा कि भूख से बेहाल, गरीब पुलाया, कुरुवा आदि अछूत, बहुत जल्दी खेतों में लौटने को मजबूर हो जाएंगे। लेकिन अछूतों की आंखों में रोपा गया सपना, उनकी भूख से कहीं ज्यादा बड़ा था। सो हड़ताल खिंचती चली गई। सवर्णों ने अछूतों को डराना-धमकाना शुरू कर दिया। अय्यंकाली और उनके साथियों ने उसका भी सामना किया। 

बुबाई का मौसम आया तो कुछ नैय्यरों ने खुद ही अपने खेतों में धान रोपने की कोशिश की। परंतु दूसरों के श्रम पर जीवन जीते-जीते आलसी हो चुके नैय्यरों के लिए वह काम आसान नहीं था। एक पुलाया जितना काम एक दिन में कर लेता था, उतना काम करने में उन्हें पांच-छह दिन लगते थे। हड़ताल खिंचने से गरीब पुलायाओं के आगे भोजन का संकट उत्पन्न होने लगा। उस समय अय्यंकाली ने बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने मछुआरों से समझौता किया कि हर मछुआरा मछली पकड़ने के लिए अपने साथ एक पुलाया को साथ ले जाएगा। यह फार्मूला कामयाब रहा। इससे विरोधी बुरी तरह चिढ़ गए। उधर हड़ताल का दायरा बढ़ाने के लिए अय्यंकाली ने कुछ नई मांगे जोड़ दीं। उनमें मजदूरों को स्थायी करने, झूठे आरोपों में फंसाकर दंडित करने तथा कोड़ों से प्रहार करने पर रोक, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी, सप्ताह में एक दिन अवकाश जैसी नई मांगें शामिल थीं। 

अय्यंकाली के नेतृत्व का ही जादू था कि शताब्दियों से बैल की तरह सर झुकाए श्रम करते आए अछूत पहली बार जमींदारों के आगे तने खड़े थे। हालात बिगड़ते जा रहे थे। अछूतों के आगे भोजन का संकट था। वहीं जमींदारों की हालत अच्छी न थी। क्षुब्ध होकर उन्होंने पुलायाओं की झोंपड़ियों में आग लगा दी। बदले में अय्यंकाली के हरावल दस्ते ने जमींदारों के मकानों को आग के हवाले कर दिया। इससे उनके गुस्से का ठिकाना न रहा। यह सोचते हुए कि सारे मामले के पीछे अय्यंकाली है, नीचता की हद तक जाते हुए उन्होंने उन्हें मरवाने का फैसला कर लिया। उसके लिए मुंबई के एक गुंडे को नियुक्त किया गया। अय्यंकाली को जीवित लाने पर 2000 रुपये तथा मृत लाने पर 1000 रुपये का ईनाम देने की घोषणा कर दी गई।4 

धमकियों और खून-खराबे के बावजूद अय्यंकाली अपने साथियों के साथ डटे हुए थे। नैय्यरों ने अय्यंकाली तथा उनके अंगरक्षक याकूब के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। याकूब को गिरफ्तार कर लिया। अय्यंकाली तत्काल पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां तब तक डटे रहे, जब तक पुलिस ने याकूब को रिहा न कर दिया। हड़ताल करीब एक वर्ष(1907-08) तक चली। इस बीच शिक्षा निदेशक मिशेल ने त्रावणकोर के दीवान को 1907 के नीतिगत आदेश पर तुरंत अमल करने की सलाह दी। चौतरफा दबाव के बीच त्रावणकोर के दीवान की ओर से 1910 में अछूत बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश संबंधी आदेश जारी कर दिए गए। उस समय के कई बुद्धिजीवियों की ओर से उसका विरोध किया गया था। उनमें से एक खुद को प्रगतिशील बताने वाले ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक रामकृष्ण पिल्लई भी थे। अछूतों बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश पर उन्होंने लिखा था कि यह आदेश—

‘पीढ़ियों से ज्ञान-विज्ञान की खेती करते आए लोगों के बच्चों को, उनके खेतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी करते आए लोगों के बच्चों के साथ रखना—घोड़े और भैंस को एक साथ जोत देने जैसा है।’5 

आदेश का जमीनी असर देखने के लिए अय्यंकाली पूजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नैय्यर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया।6 प्रधान अध्यापक हालात को संभालने की कोशिश कर ही रहे थे कि कंडाल गांव के कुछ नैय्यर वहां जा धमके। वे लाठी-डंडों से लैस थे। अय्यंकाली के साथ भी उनके साथी थे। विवाद बढ़ता गया। गांवों से शुरू हुए उस संघर्ष ने शीघ्र ही आसपास के जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। यहां तक कि दक्षिणी त्रावणकोर भी उस आंदोलन के असर से बच न सका। दलितों के प्रवेश को लेकर नैय्यर इतने विध्वंसात्मक थे कि उन्होंने उन दो स्कूलों में आग लगा दी, जिनमें अय्यंकाली ने अपने समाज के बच्चों का दाखिला कराने के उद्देश्य से पहुंचे थे।

साधुजन परिपालन संघम

भूख, अभाव, विपन्नता और दास जैसा जीवन जीने वाले लोगों को अय्यंकाली ने नया नाम दिया था—‘साधु जन’। अपने आंदोलन को सांस्थानिक रूप देने के लिए उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’(गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की थी। उनके कुछ जीवनीकारों के अनुसार इस संस्था का गठन 1907 में हुआ था। संस्था का ‘कनक्कन’(महासचिव) अय्यंकाली को बनाया गया। अन्य सदस्यों में मूलायिल कालि, थॉमस वाडयार, गोपालन आदि शामिल थे। उसकी सदस्यता सभी अछूत जातियों के लिए खुली थी। उसका प्रमुख उद्देश्य था पुलाया सहित सभी अछूत जातियों को अपने अधिकारों पक्ष में संगठित करना। उन्हें अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा, गरीबी और सवर्णों के आतंक से मुक्ति दिलाना। संस्था के प्रचार-प्रसार के लिए स्थानीय सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता था। सवर्ण उस संस्था के गठन से नाराज थे। इसलिए आरंभ में उसकी बैठक, बस्ती से दूर पेड़ों की ओट में या पहाड़ी के पीछे किसी गोपनीय स्थान पर की जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के मन से यह डर निकलने लगा। ‘साधु जन’ का उद्देश्य पुलायाओं, पारयाओं जैसी अछूत जातियों का उत्थान था। बावजूद इसके उन्होंने अपनी संस्था को ‘धर्म एवं जाति’ संबंधी दुराग्रहों से परे रखा था। इससे उन्हें इन जातियों के राजनीतिकरण में मदद मिली। 

संस्था का प्रबंधन बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया जाता था। आमतौर पर हर गांव में उसकी शाखा थी। संस्था का वार्षिक सम्मेलन त्रिरुवनंतपुरम के ‘विक्टोरिया जुबली हाल’ में किया जाता था। उसमें केरल के अलग-अलग गांवों और शहरों से आए लोग हिस्सा लेते थे। सम्मेलन के दिन त्रिरुवनंतपुरम की सड़कें, काली चमड़ी वाले अछूतों से पट जाती थीं। उसमें संस्था के सदस्यों और अधिकारियों के अलावा विभिन्न सरकारी और राजकीय अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जाता था। संस्था के महासचिव के रूप में उसके कार्यक्रमों, उपलब्धियों और मांगों को सभा के सम्मुख पेश करने का दायित्व अय्यंकाली का था। वे अनपढ़ थे। लेकिन संस्था का संचालन इस प्रकार करते थे कि लोग उनकी प्रबंधन क्षमता के कायल हो जाते थे। ‘साधु जन परिपालन संघ’ के कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘साधु जन परिपालिनी’ नामक मासिक पत्रिका की शुरुआत भी की गई। कालि कोदिक्कुरुप्पन को उसका संपादक नियुक्त किया गया। आने वाले 30 वर्षों तक यह संस्था सुचारू रूप से काम करती रही। 

नेदमंगादु विद्रोह

चालियार विद्रोह के बाद कई बाजारों में पुलायाओं को आने-जाने की आजादी प्राप्त हो चुकी थी। बावजूद इसके कुछ बाजारों में अभी भी उनका आना प्रतिबंधित था। जो पुलाया अपना सामान बेचने के लिए आते थे, उन्हें भी मुख्य बाजार में आने से रोका जाता था। सवर्णों ने उन्हें अलग स्थान दिया था। 1912 में अय्यंकाली ने एक बार फिर अपने साथियों को इकट्ठा किया। इस बार उनके अभियान में स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे। जैसे-जैसे पुलायाओं का दल आगे बढ़ा, उनका साथ देने और हौसला बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के लोग भी उनके साथ आ मिले। उन्होंने अपना अभियान त्रिवेंद्रम से आरंभ किया। नेदमंगाडु तक पहुंचने के लिए उन्होंने जंगल का रास्ता चुना था। मगर बाजार तक पहुंचने से पहले ही सवर्णों ने उनपर हमला बोल दिया। दोनों पक्ष पक्के इरादे से आए थे। विवाद एक बार फिर संघर्ष में बदल गया। एक रणनीति के तहत अय्यंकाली ने पुलायाओं के एक हिस्से को दूसरी दिशा से बाजार में प्रवेश के लिए भेज दिया। घने जंगलों के रास्ते, चुनौतियों से जूझता हुआ हुआ वह जत्था आखिरकार नेदमंगाडु बाजार में प्रवेश करने में कामयाब हो गया।

श्री मूलम प्रजा सभा की सदस्यता

अय्यंकाली के सघर्ष और उनकी ख्याति सरकार तक पहुंच चुकी थी। लोग उनसे प्रभावित थे। इसके फलस्वरूप 1912 में उन्हें ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ का सदस्य मनोनीत कर दिया गया। सभा के समक्ष उनका प्रथम संबोधन छोटा, किंतु प्रभावशाली था। अपने भाषण में उन्होंने पुलायाओं की गरीबी, अशिक्षा के अलावा उन्हें आवास एवं खेती हेतु जमीन दिए जाने की मांग की थी। उनका नारा था, ‘खेत उनके लिए जो जोतें’। अपनी पहली सभा में ही सरकारी अधिकारियों की मनमानी की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए उन्होंने कहा था—

‘हमारे कई परिवारों को धनवान जमींदारों ने इस आश्वासन के साथ उनके घर से निकाल दिया था कि उन्हें वे घर बनाने के लिए अलग से जमीन देंगे। अब वन-विभाग के कर्मचारी, जमींदारों से मिलकर मेरे लोगों पर उन घरों को खाली करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसके साथ-साथ ये अधिकारी जमींदारों को उनकी भूमि पर कब्जा करने में मदद कर रहे है। मैं इस समस्या के निराकरण की प्रार्थना करता हूं।’

अय्यंकाली की अपील पर दीवान ने पुलायाओं को यथासंभव मदद का भरोसा दिलाया। दीवान के मन में उनके प्रति कितना सम्मान था, यह इस घटना से भी जाहिर होता है—

‘एक बार अय्यंकाली प्रजा सभा के सदस्य की हैसियत से, दीवान से मिलने उनके कार्यालय में पहुंचे। वहां तैनात दरबानों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। उन्होंने अय्यंकाली के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी किया। उनका नाम लेकर पुकारा। अय्यंकाली वहां से चले गए। बाहर जाकर उन्होंने तार भेजकर दीवान को सारी घटना से अवगत करा दिया। दीवान ने तुरंत अय्यंकाली को अपने कार्यालय बुला भेजा। वे जब दीवान के कार्यालय में पहुंचे तो दोनों दरबान भी वहां मौजूद थे—

‘मिस्टर अय्यंकाली, अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए आप इन्हें क्या दंड देना चाहेंगे?’ दीवान ने पूछा। यह सुनकर वे दंग रह गए। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने कहा—

‘इन्होंने जो किया, लापरवाही के कारण किया। इन्हें माफ कर दिया जाए।’

दीवान अय्यंकाली से प्रभावित हुआ। आखिरकार दोनों दरबानों को अय्यंकाली के पैर छूकर माफी मांगने के बाद छोड़ दिया गया। 

कोचु कली : अय्यंकाली के वक्ष-कर विरोधी आंदोलन की नायिका

उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। दलित स्त्री-पुरुष दोनों को टैक्स देना पड़ता था। पुरुषों का मूंछें रखना, छाता लेकर चलना निषिद्ध था। ये सब नियम ब्राह्मणों द्वारा अपनी जातीय श्रेष्ठता के नाम पर बनाए गए थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। इसलिए उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

जब स्त्री का वक्ष ही उसका दुश्मन था

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। 1803 में वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा के अनुसार निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष इसलिए ढककर पहुंची थी, ताकि  रानी नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। 1859 के सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त हो चुका था। लेकिन इझ़वा, पुलाया, कुरुवा आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को यह अधिकार 1915 तक भी प्राप्त नहीं था। 

सोने-चांदी के गहने पहनने पर प्रतिबंध  

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लामाला’(कंठमाला) पहन सकती थीं। कान में लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लामाला’ उनके दासत्व का प्रतीक थी। वक्ष कर के विरोध में कई आंदोलन चल चुके थे, परंतु उसके ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया था अय्यंकाली ने।

कौन थी कोचु कली

उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उनमें से एक का नाम था—कोचु कली। कोचु कली आदि द्रविड़ समाज से थी। तांबई रंग और लंबे कद के कारण उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। उसका जन्म उनीसवीं शताब्दी  के अंतिम दशक में, इरनाकुलम जिले के एलुवा नामक गांव में हुआ था। पिता का नाम था, पींगन। मां पल्ली कुरुंबा कीझनाद गांव की रहने वाली थी। सात भाई-बहनों में कोचु तीसरे नंबर की थी। 21 वर्ष की उम्र में उसका विवाह, परंबू हाउस बंगले में काम करने वाले पल्ली के साथ कर दिया गया। विवाह के तीन वर्ष पश्चात दोनों के घर एक पुत्री का जन्म हुआ।

उस समय तक केरल में वक्ष-कर विरोधी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। जगह-जगह उसके समर्थक और विरोधी आमने-सामने थे। उन्हीं दिनों अपनी संस्था ‘साधुजन परिपालन संघ’ के एक कार्यक्रम के दौरान अय्यंकाली पारंबू हाउस में ठहरे थे। वे एक सभा के सिलसिले में वहां पधारे थे। वक्ष-कर विरोध को लेकर चल रहे प्रदेश-व्यापी संघर्ष के बीच वह सभा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी। सभा में शिरकत के लिए अय्यंकाली ने कुछ उदार नैय्यर नेताओं को भी आमंत्रित किया था। 

दासता के प्रतीकों का बहिष्कार

सभा में सभी नेताओं ने वक्ष कर का विरोध किया। अय्यंकाली का नंबर आया तो उन्होंने भी उसकी तीव्र आलोचना की। भाषण के दौरान उन्होंने दो स्त्रियों को मंच पर आमंत्रित किया। उनमें से एक  कोचु कली थी। उस समय वह 24 वर्ष की थी। दोनों स्त्रियां सकुचाती हुई मंच पर पहुंचीं। अय्यंकाली ने उन्हें बताया कि यहां बैठक में मौजूद सभी लोग गुलामी की प्रतीक ‘कल्लामालाओं’ को उतार फैंकने की सहमति दे चुके हैं। उसके बाद उन्होंने चाकू से, उन स्त्रियों के गले में पड़ी ‘कल्लामालाओं’ को काट फैंका। इसके साथ ही उन्होंने उनके तोड़ा(कान में पहने जाने वाला पत्थर का पारंपरिक आभूषण) को तोड़ दिया—

‘आगे से तुम इन्हें कभी मत पहनना। बजाय इसके तुम ‘धोती और ब्लाउज’ पहना करना।’ अय्यंकाली ने कहा। उन्होंने उन स्त्रियों को कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसे भी दिए। उसके बाद कोचु कली वक्ष-कर विरोधी आंदोलन के स्त्री दस्ते की नेता बन गई। 1915 में उसके नेतृत्व में वक्ष-कर विरोधी कई प्रदर्शन हुए। उनमे सबसे महत्वपूर्ण कोल्लम जिले के पेरिनाड में दलित-आदिवासी स्त्रियों का आंदोलन था। उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में स्त्रियों ने गले में पहनी कल्लामालाओं को खुद उतार फेंका था।

सवर्णों की हिंसा

वक्ष कर विरोधी आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी ने सवर्णों को हिलाकर रख दिया था। वे मनमानी पर उतर आये थे। मलयालम पत्रिका ‘मीतावदी’ के जनवरी 1916 के अंक के अनुसार एक पुलाया स्त्री ने अय्यंकाली से मुलाकात के बाद ‘कल्लामाला’ पहनना छोड़ दिया था। एक दिन वह अपने काम पर जा रही थी। अचानक एक आदमी उसके पास पहुंचा और ‘कल्लामाला’ के बारे में पूछा। स्त्री के यह कहने पर कि वह उसे उतार कर फ़ेंक चुकी है, उस आदमी को इतना गुस्सा आया कि उसने तत्काल उस स्त्री के कान काट लिए।

अय्यंकाली की यादों के साथ काटी जिंदगी   

आधुनिक केरल के प्रमुख वास्तुकार अय्यंकाली से जुड़ी जादुई यादों का ही असर था, जिससे कोचु कली ने लंबी उम्र प्राप्त की थी। उनका निधन, 115 वर्ष की अवस्था में 2013 में हुआ था। अय्यंकाली को याद करते समय कोचु कली का चेहरा दमकने लगता था। गर्दन अभिमान से कुछ और तन जाती थी। एक साक्षात्कार में उसने बताया था कि अय्यंकाली के शब्द आज भी उनके कानों में घंटी की तरह गूंजते हैं। उसके अनुसार अय्यंकाली तीन दिन और तीन रात ‘परंबू हाउस’ में ठहरे थे। भोजन में उन्हें चावल और सूखी झींगा मछली की कढ़ी परोसी गई थी। कोचु कली उस दिन को याद करके गर्व से भर जाती थी, जब उसने ‘धोती और ब्लाउज’ को पहली बार पहना था—

‘धोती और ब्लाउज पहनते समय मैं बहुत डरी हुई थी। सोचती थी कि सवर्ण डंडों से हमारी पिटाई करेंगे। लेकिन जब अय्यंकाली ने हमसे बात की, हमारा सारा डर गायब हो गया।’

28 अगस्त 2020 को अय्यंकाली का 157वां जन्मदिवस है। यह अवसर अय्यंकाली के साथ-साथ कोचु कली के संघर्ष को याद करने का भी है।

वक्ष-कर का विरोध

अय्यंकालि द्वारा चलाए गए महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था—वक्ष-कर के विरोध में चलाया गया आंदोलन। वह ऐसा अभियान था, जो उन्हें अपने समकालीन और पूर्ववर्ती कई समाज-सुधारकों से आगे खड़ा सिद्ध कर देता है। उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। उसमें सर्वाधिक प्रताड़ना स्त्रियों को झेलनी पड़ती थी। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। यदि कोई स्त्री अपना वक्ष ढकना चाहे तो बदले में उसे सरकार को कर देना पड़ता था। कर की मात्रा वक्ष के आकार के अनुरूप तय की जाती थी। जितना बड़ा वक्ष, उतना ज्यादा टैक्स। उसकी उगाही के लिए एक अधिकारी नियुक्त था। वक्ष-कर लगाने वाले ब्राह्मण थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। तदनुसार नैय्यर स्त्रियों को नंबूदरी ब्राह्मणों के समक्ष अपना वक्ष ढकने की स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि ब्राह्मण अपना वक्ष केवल मंदिर में देवताओं के समक्ष खुला रखता था। यहां तक उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा केरलीय समाज में लंबे समय से प्रचलित थी। उसमें निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष केवल इसलिए ढककर पहुंचती है कि वह नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। ताकि इस ‘आफत’ से  उसे हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए। 1859 में शुरू हुए सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को अपना वक्ष ढकने की आजादी प्राप्त हो गई। लेकिन इझ़वा, पुलाया आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को 1915 तक वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। 

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लु माला’(कंठ माला) पहन सकती थीं। कान में केवल लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लुमाला’ उनके दास होने की निशानी भी थी। 1915 में एक सभा के दौरान अय्यंकाली ने अछूत स्त्रियों से कहा था कि वे दासता के प्रतीक उन आभूषणों को हमेशा के लिए उतार फेंके। उनके स्थान पर धोती और ब्लाउज जैसे वस्त्र पहनें। उनके आवाह्न पर पेरीनाड की हजारों दलित स्त्रियों ने पत्थर की कंठमालाओं को उतारकर ऊपरी वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। यह देखकर शीर्ष जातियों में खलबली मच गई। उन्होंने इसे स्थापित समाज-व्यवस्था का उल्लंघन माना। ‘अपमान’ का बदला लेने के लिए वे दलितों पर हमलावर होने लगे। वक्ष ढकने के कारण कई दलित स्त्रियों के स्तन काट डाले गए। कइयों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। परिजनों पर जानलेवा हमले किए गए। अनेक स्त्रियों के पति, भाई और माता-पिता को मौत के हवाले कर दिया गया। उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उन जुझारू स्त्रियों में से एक का नाम था—कोचु कली। वह पहली स्त्री थी जिसके गले में पड़ी ‘कल्लुमाला’ को अय्यंकाली ने अपने हाथों से काटा था।

अय्यंकाली के सभी चित्रों में हम उन्हें कोट पहने हुए देखते हैं। वह भेषभूषा भी उन्होंने, ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड को चुनौती देने के लिए अपनाई थी। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी। एक पुलाया अपने शरीर पर केवल पुराना, लंगोटीनुमा वस्त्र लिपेट सकता था। अय्यंकाली उससे विद्रोह करना चाहते थे। लेकिन सोचते थे कि कोट पहनने का अधिकार केवल पढ़े-लिखे लोगों को है, जबकि वे पूरी तरह अनपढ़ थे। कुन्नुकुझी एस. मणि के अनुसार, श्री मूलम प्रजा सभा का सदस्य मनोनीत किए जाने पर, जॉन हेनरी नामक एक यूरोपियन ने उन्हें एक कोट भेंट किया था। प्रजा सभा के अगले सत्र में वे उसी कोट को पहनकर उपस्थित हुए थे। अगले सत्र के लिए वे कुछ और कोट सिलवाना चाहते थे। मगर उन दिनों त्रिरुवनतपुरम् में ऐसा कोई दर्जी नहीं था, जो कोट की सिलाई कर सके। इसलिए उन्होंने कोट्टयम के एक दर्जी को दो कोट सीने का आर्डर दिया। श्रीमूलम पोपुलर असेंबली के अगले सत्र में उन्होंने अपने सिलवाए कोट पहनकर हिस्सा लिया था। नैय्यर उसे देखकर जल-भुन रहे थे। लेकिन अब कुछ भी कर पाना उनके बस से बाहर था। 

केरल के इतिहास में अस्पृश्यता, अशिक्षा और दासता को सबसे जोरदार चोट देने वाला वह पुरोधा, 18 जून, 1941 को सघर्ष चिरनिद्रा में लीन हो गया। एक अवसर पर एक पत्रकार ने उनसे पूछा था—‘आपकी दिली तमन्ना क्या है?’ इस पर अय्यंकाली का उत्तर था—‘आंख मूंदने से पहल मैं अपने समाज के दस-बारह विद्यार्थियों को ग्रेजुएट बने देखना चाहता हूं…बस।’ एक कविता के जरिये  मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय उन्हें इस तरह याद करते हैं—

तुम्हीं ने जलाया था प्रथम ज्ञानदीप

बैलगाड़ी पर सवार हो

गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

अपनी देह की यंत्रशक्ति से

पलट दिया था, कालचक्र को

ओमप्रकाश कश्यप

1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, पृष्ठ 15.

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अयंकाली कंटीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ ट्रावणकोर दलितस, 2018

3. जेटिंल टी. वर्गिस, दि कंन्सट्रक्शन ऑफ़ साधुजनम्: अय्यंकालि एंड दि स्ट्रगल ऑफ़ दि स्लेव कॉस्ट्स फॉर ए न्यू आइडेंटिटी-1884-1941, (2016), पेज 72

4. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

5. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

6.  कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकलि, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, जेटिंल टी. वर्गिस, पृष्ठ 81

7. कोचु कली, दि हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन स्लेव वूमेन, http://dravidagallery.blogspot.com/2013/06/?m=0

8. एम. वेलकुमार, पृष्ठ-197-198

हिंदी महाकाव्यों(महाभारत और रामायण) की विखंडनवादी पुनरीक्षा

सामान्य

महाभारत और रामायण. हिंदुओं के दो महाकाव्य. दोनों विश्व-साहित्य की क्लासिक धरोहरों में आते हैं. कुछ लोग इन्हें इतिहास मानते हैं. परंतु इतिहास के लिए घटनाओं और पात्रों का समय से सुसंगत होना अनिवार्य है. यदि पुराना है तो उसके कुछ पुरातात्विक साक्ष्य होने चाहिए, जैसे सिंधु घाटी की सभ्यता के हैं. महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक आदि के हैं. ऐसे कोई प्रामाणिक साक्ष्य इन महाकाव्यों से संबंधित घटनाओं के नहीं मिलते. कुछ शहरों और नदियों के नाम जरूर मेल खाते हैं. किंतु नगर की मौजूदगी, उसमें व्यक्ति विशेष के प्रवास को तब तक प्रमाणित नहीं करती जब तक कोई दूसरा साक्ष्य न हो. उनके अलावा विभिन्न देवताओं के जगह-जगह फैले कुछ मंदिर आदि है. उनमें से अनेक 1000-1200 वर्ष पुराने और अपनी स्थापत्य कला में बेजोड़ हैं. ये धर्मस्थल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक हैं. इसलिए जब भी महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिकता को चुनौती दी जाती है, प्रमाण के अभाव में ‘भक्तगण’ आस्था के खोल में समा जाते हैं. उसमें दूसरों का प्रवेश निषिद्ध होता है. वे खुद उससे बाहर झांकने की कोशिश कभी नहीं करते.

उनके लिए यदि आस्था कहती है—’राम थे, तो थे! सूर्यग्रहण का कारण उसपर केतु द्वारा उत्पन्न किया गया संकट है, तो यही सच है! यदि ग्रंथों में लिखा है कि बाल हनुमान ने खेल-खेल में सूरज को निगल लिया था, तो संदेह की गुंजाइश कहां बचती है! आस्था को सर्वोपरि मानने वालों का खुद आस्थावान होना आवश्यक नहीं है. आस्था सिर्फ उनकी लोकलुभावन राजनीति का हिस्सा होती है. आस्थावादी कहता है, जो कहा गया है, उसपर विश्वास करो. धर्मग्रंथों पर संदेह करना पाप है. आस्था जितनी ज्यादा संदेह-मुक्त हो, उतनी ही पवित्र मानी जाती है. जबकि ज्ञान की खोज बगैर संदेहाकुलता के संभव ही नहीं है. कह सकते हैं कि आस्था मानवीय विवेक की ऐसी बाड़ाबंदी है, जिसका दूसरा छोर अंधविश्वास से जुड़ा होता है. अंधविश्वास भी ऐसा कि ज्ञान कब अज्ञान में ढल जाता है, व्यक्ति को पता ही नहीं चल पाता. जिन धर्मग्रंथों के आधार पर आस्था का समर्थन किया जाता है, उनमें परस्पर विरोधी सूचनाओं की भरमार है. उदाहरण के लिए ऋग्वेद के कुछ मंत्रों(1/139/11, 8/28/1) में देवताओं की संख्या 33 बताई गई है, जबकि दूसरे मंत्र(3/9/9, 1/52/6) के जरिये 3339 देवताओं का आवाह्न किया गया है. 

हिंदू अतीतोन्मुखी धर्म है. हिंदुओं के लिए पुरातन ही महानतम है. हिंदू धर्म को अधिकाधिक प्राचीन दिखाने के लिए वे लंबी-लंबी, बिना सिर-पैर की कल्पना करते हैं. उनके अनुसार सतयुग की अवधि 17,28,000 वर्ष, त्रेता की 12,96,000 तथा द्वापर की 8,64,000 वर्ष थी. जबकि कलयुग मात्र 4,32,000 वर्ष का होगा. युगावधि की तरह मनुष्य की आयु और लंबाई भी घटती जाती हैं. तदनुसार सतयुग में मनुष्य की आयु 1,00,000 वर्ष, लंबाई 21 हाथ(32 फुट), त्रेता में 10,000 वर्ष, लंबाई 14 हाथ(21 फुट) द्वापर में 1000 वर्ष लंबाई 7 हाथ(11 फुट) तथा कलयुग में मात्र 100 लंबाई 4 हाथ( लगभग फुट) होती है. चारों युगों की अवधि बराबर क्यों नहीं है? युग बदलने के साथ ही मनुष्य की लंबाई और वयस में इतना अंतर अचानक कैसे आ जाता है? क्या दो युगों के बीच कोई शून्यकाल भी होता है? क्या युग का बदलना वर्ष या शताब्दी बदलने जैसा है—जैसे प्रश्नों से वे कन्नी काट जाते हैं. चारों युगों में सतयुग को सर्वोत्तम बताया गया है. महाभारत(149.11-25) में हनुमान भीम को बताते हैं—’‘सतयुग में प्रत्येक मनुष्य पुरुषार्थ सिद्धि कर कृतकृत्य होता था, इसलिए वह कृतयुग कहलाया. उसमें धर्म अपनी संपूर्ण अवस्था में था….किसी को कुछ करना नहीं पड़ता था. इच्छामात्र से जरूरत की वस्तुएं प्राप्त हो जाती थीं.’ रामायण के अनुसार हनुमान का जन्म त्रेता में हुआ था. सतयुग की जानकारी का उनका स्रोत क्या था, इस बारे में वे कुछ नहीं बताते.

गीता के अनुसार जब भी पृथ्वी जब-जब पाप बढ़ते हैं, धर्म संकट में पड़ जाता है—’तब-तब अवतार होते हैं. श्रद्धा के अतिरेक में हम इसपर विश्वास भी कर लेते हैं. यह ख्याल तक नहीं आता कि यदि सतयुग में धर्म चरमोत्कर्ष पर था तो सर्वाधिक अवतार उसी युग में क्यों हुए? स्मरणीय है विष्णु के कुल दस अवतारों में से चार—’मत्स्य, कूर्म, वाराह और नृसिंह, सतयुग के खाते में जाते हैं.  त्रेता के हिस्से में तीन—’वामन, परशुराम और राम तो द्वापर में केवल कृष्ण हैं. गौतम बुद्ध को सनातन धर्म के खांचे में फिट करने के लिए ‘कलयुग’ में उन्हें भी अवतार का दर्जा दिया गया है. दसवें और आखिरी अवतार के रूप में ‘कल्कि’ की पूर्वकल्पना की गई है. गीता के हिसाब से देखा जाए तो धर्म पर सबसे ज्यादा संकट सतयुग के दौरान आए थे, जिससे उस युग में विष्णु को चार अवतार लेने पड़े और सबसे कम द्वापर में जिसमें केवल एक अवतार लेना पड़ा था. हमारा सवाल बस इतना है कि यदि सतयुग में धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था, सभी कुछ ठीक-ठाक था तो उस युग में विष्णु को सर्वाधिक चार-चार अवतार क्यों लेने पड़े थे?  

हमारी शंकाएं बस यहीं तक सीमित नहीं है. त्रेता और द्वापर में अवतार उस समय होते हैं, जब वे अवसान के निकट थे. राम के सरयू में जलसमाधि लेते ही त्रेता भी ‘जलसमाधि’ ले लेता है. इसी तरह कृष्ण की मृत्यु के साथ द्वारिका समुद्र में समा जाती है, द्वापर उड़नछू हो जाता है. अवतार पुरुष की मृत्यु के तुरंत बाद युग-समापन का क्या औचित्य है? क्या किसी राजा का युद्ध जीतकर राजगद्दी पर विराजमान हो जाना सत्ता-परिवर्तन का अभीष्ट हो सकता है? गौरतलब है कि विष्णु के ये दो अवतार ऐसे हैं जिन्हें ‘धर्म की स्थापना’ के नाम पर लाखों-करोड़ों को अपने प्राणों ही आहूति देनी पड़ी थी. बावजूद इसके जो व्यवस्था उन कथित अवतार पुरुषों ने गढ़ी, वह लंबे समय तक क्यों नहीं टिक पाई थी? क्या उनका कार्य नाटक में यवनिका गिराने वाले पात्र जितना सीमित था? क्यों हर अवतार अपने युग का उच्छिष्ट साफ करने के लिए जन्मता है? समाज को सुधारने की जिम्मेदारी वह क्यों नहीं उठाता? जिस धर्मराज्य की स्थापना के लिए वह लाखों योद्धाओं की बलि चढ़ाता है, वह कैसा होता है? अंत तक वह मिथ ही क्यों बना रहता है? यदि हर युग की अवधि सीमित है? यदि तथाकथित धर्म-राज्य की स्थापना के साथ ही युग का पराभव होना पूर्व-निर्धारित है तो ऐसे धर्मराज्य का औचित्य ही क्या है? यदि धर्म-राज्य का लाभ जनसाधारण को नहीं मिल पाता तो उसकी स्थापना किसके लिए की जाती है? जैसे अनगिनत प्रश्न इस व्यवस्था को लेकर हो सकते हैं? लेकिन हमेशा वे प्रश्न ही रह जाते हैं. आस्था और धर्म ने नाम पर फैलाया गया डर, हर जिज्ञासु के मुंह पर ताला डालने का काम करता है.

मानवीय विवेक के सापेक्ष आस्था को अतिरेकी महत्व देना अनायास है? क्या यह किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? क्या यह भी अनायास है कि रामायण के नायक राम और दशरथ के बाकी तीनों पुत्र तथा महाभारत के नायक पांडुपुत्रों में से एक भी अपने पिता की औरस संतान नहीं है. सभी नियोग जनित हैं. क्या ये कथाएं इसलिए गढ़ी गईं कि कोख किसी की भी हो, वीर्य ब्राह्मण का होगा तभी सर्वतेजोमय संतान जन्म ले सकती है? अथवा अश्वमेध आदि यज्ञों की आड़ में जो वासना का वीभत्स खेल खेला जाता था, उसको वैध बनाने के लिए ये मिथ गढ़े गए थे? ध्यातव्य है कि दोनों महाकाव्यों के महानायकों, जिन्हें बाद में ईश्वर मान लिया जाता है—की मृत्यु भी सामान्य नहीं थी. राम सीता को वनवास देने के बाद आत्मग्लानि से भर जाते हैं. वही उनको सरयू में जलसमाधि लेने को विवश करती है. महाभारत की जंग जीत लेने के बाद पांडु भी सुखी नहीं रह पाते. आत्मशांति की तलाश उन्हें हिमालय की ओर ले जाती हैं. वहां द्रोपदी के साथ उसके पांचों पति भी, एक-एक कर मृत्यु को प्राप्त होते हैं.

महाभारत के कृष्ण उस तथाकथित ‘धर्मयुद्ध’ के महानायक हैं. 18 अक्षौहिणी सेनाओं; यानी मनुष्यों और जानवरों को मिलाकर दो करोड़ से ज्यादा प्राणियों की आहूति देने के पश्चात युधिष्ठिर का राज्यारोहण संभव हो पाता है. इसी के साथ धर्म के राज्य की घोषणा कर दी जाती है. लेकिन सब कुछ शांत नहीं हो जाता. थोड़े ही समय के बाद द्वारिका में यादव अंतर्कलह के शिकार हो जाते हैं. उस अंतर्कलह को रोकने के लिए कृष्ण की बुद्धि काम नहीं आ पाती. धरती पर धर्मराज्य की स्थापना का दावा करने वाले कृष्ण अपने ही बंधु-वांधवों को आपस में लड़-लड़कर देखने को विवश हैं. पूरी धरती पर धर्म की स्थापना का दावा करने वाले अवतार-पुरुष कृष्ण अपने ही परिजनों को क्यों नहीं संभाल पाए? महाभारत का यह अंत क्या स्वाभाविक है? क्या गांधारी का शाप और यादव कुल का आपस में लड़-झगड़कर मर जाना, नियतिबद्ध घटना थी? अथवा ऋग्वैदिक कृष्ण के तेज को, उनकी गौरवशाली स्मृतियों को धुंधला करने के लिए जानबूझकर रचा गया षड्यंत्र था?

राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के हिसाब से देखा जाए तो महाभारत रामायण से कहीं आगे की रचना है. रामायण का कथानक एकदिशीय है, महाभारत का बहुआयामी. रामायण मुख्यत: पारिवारिक संबंधों की गाथा है, जबकि महाभारत में संबंधों का दायरा बढ़कर सामाजिक-राजनीतिक हो जाता है. बावजूद इसके प्रतिष्ठा रामायण की कहीं ज्यादा है. उसे पांचवा वेद माना जाता है. वे लोग जिनके कानों में वेदमंत्र पड़ते ही पिघला हुआ सीसा भर देने की बात कही गई थी, उन्हें भी रामायण को पढ़ने और घर में रखने की छूट थी. दूसरी ओर महाभारत को घर लाना निषिद्ध माना गया. कहा गया कि उसे घर में जगह देने से आपस में द्वैष पनपता है. अंतर्कलह बढ़ने से परिवार में फूट पड़ जाती है. क्या इस मान्यता को महज जनसाधारण का अंधविश्वास कहकर टाला जा सकता है?

रामायण में विचारधाराओं का कोई टकराव नहीं है. वहां ब्राह्मण के मुंह से निकले शब्द ही शास्त्र हैं. राम वही करते हैं, जो गुरु कहते हैं. गुरु कहते हैं वाण चलाओ, तो राम, रावण की वनरक्षक और अधेड़ उम्र की स्त्री ताड़का पर शर-संधान करने में देर नहीं करते. ब्राह्मण कहता है कि शंबूक के वेदपाठन से धरती पर पाप बढ़ रहा है, इसे मार डालो तो बिना किसी शंका के राम उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं. रामकथा के अनुसार, ब्रह्म-कथन से विचलन का एकमात्र दंड है—’मौत. समन्वय, सहिष्णुता अथवा भिन्न वैचारिकी से समझौते के लिए उसमें कोई गुंजाइश नहीं है. राम ब्राह्मण द्वारा गढ़ी मर्यादा का पालन आंख मूंदकर, निःशंक भाव से करते हैं, इसलिए तुलसी ने उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा है. रावण उनकी बनाई व्यवस्था का पालन नहीं करता. उल्टे मखौल उड़ाता है—’इसलिए उसे राक्षस कहा गया है. मगर युद्ध में राम द्वारा रावण का वध होते ही रामायणकार को सहसा याद आ जाता है कि रावण ब्राह्मण है. रावण भले मरे, किंतु ब्राह्मणत्व सुरक्षित रहना चाहिए. इसके लिए चलते-चलते एक प्रसंग गढ़ा जाता है. विभीषण राम को मरणासन्न रावण से राजनीति का ज्ञान लेने की सलाह देता है. राम उस समय विजय के मद में हैं. वे खुद न जाकर लक्ष्मण को रावण के पास भेजते हैं. लक्ष्मण रावण के सिरहाने खड़े होकर राजनीतिक ज्ञान की प्रार्थना करते हैं. रावण आंखें मूंदे पड़ा रहता है. लक्ष्मण वापस लौट जाते हैं. तब राम स्वयं उपस्थित होकर रावण के पैरों की ओर खड़े होकर राजनीति का पाठ पढ़ाने का आग्रह करते हैं. रावण तैयार हो जाता है. ‘राम भले ही अवतार सही. मगर पृथ्वी का सर्वेसर्वा तो ब्राह्मण है—’ पाठकों को यह एहसास कराने के साथ ही रामायणकार का उद्देश्य पूरा हो जाता है. यहां इस बात पर कोई विमर्श नहीं होता कि रावण का राजनीतिक दर्शन क्या था? लंका की समृद्धि में उस दर्शन का कितना योगदान था? अथवा ‘रामराज्य’ के निर्माण में रावण के दिए राजनीतिक ज्ञान की क्या भूमिका थी? आस्था यह सवाल उठाने की इजाजत नहीं देती. ‘खट्टर काका’ में हरिमोहन झा इसे बड़े ही रोचक ढंग से दिया है. उपन्यास के अनुसार मिथिला के नैयायिक(न्यायशास्त्र के जन्मदाता गौतम) ने राम से उनके वनवास के बारे में सवाल कर दिया—’

‘‘वनवास का क्या अर्थ? ‘सर्व वनेषु वासः(सभी वनों में वास) अथवा ‘कस्मिंश्चिद् वने वासः(किसी एक वन में वास). यदि पहला अर्थ लो तो सो उन्होंने किया ही नहीं. संभव भी नहीं था. और, यदि दूसरा अर्थ लो, तो फिर अयोध्या के निकट ही किसी वन में रह जाते. चित्रकूट में ही चौदह वर्ष बिता देते. तो भी पिता की आज्ञा का पालन हो जाता. फिर, हजारों मील दूर भटकने की क्या जरूरत थी!  वह भी सुकुमारी सीता को साथ लेकर….राम कुछ उत्तर नहीं दे सके. खीझकर कह दिया— 

‘यः पठैत गौतमी विद्यां शृगालीयोनिमाप्नुयात’(जो भी गौतम की विद्या, उनके तर्कशास्त्र को पढ़े सो गीदड़ होकर जन्म ले).

आखिर राम ब्राह्मणों से इतना भयभीत क्यों थे? इसके लिए उनके पूर्वजों की कथा का स्मरण करना पड़ेगा. राम के पूर्वज थे पृथु. वेन1 की संतान. वेन को धरती का पहला निर्वाचित राजा कहा जाता है. वेन को जगत्कल्याण के लिए राजा नियुक्त किया गया था. इसलिए उसकी निष्ठाएं अपनी जनता के प्रति थीं. एक बार राज्य में अकाल पड़ा. उस समय वेन ने सिर्फ ब्राह्मणों का हित साधने के बजाए, अपनी जनता को वरीयता दी. इसपर ब्राह्मण नाराज हो गए. अकाल के लिए वेन को दोषी ठहराकर वे जनता को भड़काने लगे. अशिक्षित भूख से अकुलाई जनता का विवेक तो पहले ही समाप्त हो चुका था. ब्राह्मणों के इशारे पर वह अपने ही राजा पर झपट पड़ी. वेन के बाद उसके पुत्र पृथु को राजा नियुक्त करने से पहले ब्राह्मणों ने कहा—

‘वेननंदन! जिस कार्य में नियमपूर्वक धर्म की सिद्धि हो, उसे निर्भय होकर करो. लोक में जो कोई भी मनुष्य धर्म से विचलित हो उसे सनातन धर्म पर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबल से परास्त करके दंड दो. यह प्रतीज्ञा करो कि मैं मन, वाणी और कर्म द्वारा भूतलवासी ब्रह्म के आदेश का निरंतर पालन करूंगा….कभी स्वच्छंद नहीं होऊंगा. ब्राह्मण मेरे लिए सदैव अदंडनीय होंगे तथा मैं संपूर्ण जगत को वर्णसंकरता और धर्मसंकरता से बचाऊंगा.’2 

पिता की हत्या से डरे पृथु ने, ऋषिगणों के आदेशानुसार प्रतिज्ञा ली—’‘नरश्रेष्ठ महात्माओ! महाभाग ब्राह्मण मेरे लिए सदैव वंदनीय होंगे.’3 पृथु द्वारा ब्राह्मणों के आगे समर्पित करते ही धर्मसत्ता और राजसत्ता का ऐसा गठजोड़ बना जो पीढ़ियों तक चलता रहा. ब्राह्मणों ने जो दंड उनके पूर्वज वेन को दिया था, उसकी स्मृतियां राम के मन में अवश्य ही रही होंगी. इसलिए वे ब्राह्मणों के आदर्श आज्ञाकारी बने रहने को ही श्रेय मानते हैं.

महाभारत और रामायण दोनों में जातियां हैं. वर्ण-व्यवस्था का महिमामंडन है. रामराज्य में शूद्रों के जीवन, उनके सुख-दुख का वर्णन नहीं है. शूद्र केवल सीता पर लांछन लगाने के लिए उपस्थित होता है. उसकी भूमिका कथानक को विस्तार देने के लिए है. पूरी रामायण में राम के देवत्व को लेकर कोई चुनौती नहीं है. यहां तक कि राम के साथ वैर-भाव रखने वाले रावण और कुंभकरण जैसे महान योद्धा भी उनके देवत्व को चुनौती नहीं देते. वे केवल इसलिए राम के विरुद्ध युद्धरत हैं ताकि उनके हाथों से मृत्यु का वरण कर, अपने पुराने शापों से मुक्ति पा सकें. कृष्ण की एक विशेषता उनका सखा-भाव है. इसमें अर्जुन और सुदामा ही नहीं ब्रज के सभी गोप-गोपियां सम्मिलित हैं. दूसरी ओर राम इतने ‘बड़े’ हैं कि उनके साथ मैत्री-भाव संभव ही नहीं है. हनुमान, सुग्रीव आदि को वे मित्र कहें तो इसे उनकी उदारता बताया जाता है. यदि हनुमान, सुग्रीव आदि खुद को राम का मित्र समझने लगें तो यह उनकी धृष्टता होगी. वह एक तरह से राजा को सर्वाधिकार संपन्न, यहां तक कि निरंकुश बना देने का षड्यंत्र था. ऐसी निरंकुशता जो सिवाय ब्राह्मण के किसी पर भी बरस सकती थी. यहां तक कि रावण भी इसका अपवाद नहीं है. इसलिए कि उसके पूर्व जन्म की कथाएं गढ़कर और मृत्योपरांत स्वर्ग भेजकर, रामकथा लेखक उसकी भरपाई कर देता है. शूद्र मनीषी शंबूक का क्या हुआ, जिन्हें राम ने अपने हाथों से मौत के घाट उतारा था. अगर राम के हाथों से मरने पर स्वर्ग प्राप्ति होती है तो शंबूक को भी स्वर्ग मिलना चाहिए था. लेकिन राक्षस होने के बावजूद ब्राह्मण कुलोत्पन्न रावण को जो सुविधा प्राप्त है, वह शंबूक को नहीं मिल पाती. इसलिए उनके उनके पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद को लेकर रामायण में कोई अंतर्कथा नहीं है.

राम की अपेक्षा कृष्ण का चरित्र बहुआयामी है. उन्हें 16 कलाओं से संपन्न माना गया है. वे प्रबुद्ध हैं, कूटनीतिज्ञ हैं. अर्जुन को असमंजस में देखकर गीता का उपदेश देते हैं. इसलिए अपने समय के खास बौद्धिकों की श्रेणी में भी आते हैं. इसके उलट राम बौद्धिक जीव नहीं हैं. वे हर जगह ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे उनका विवेक किसी ने हर लिया हो. राम का चरित्र ब्राह्मणवादी आकांक्षाओं के अनुरूप गढ़ा गया है. वे ब्राह्मणत्व के आगे न केवल स्वयं नतमस्तक हैं, अपितु जो भी उसके आड़े आता है, उसे बड़े से बड़ा दंड देने को सदैव तत्पर रहते हैं. बदले में ब्राह्मण उन्हें भगवान घोषित कर रहते हैं. कह सकते हैं कि राम की भगवत्ता उपहार में प्राप्त भगवत्ता है. जबकि कृष्ण ने अपनी भगवत्ता अपने बौद्धिक पराक्रम, संगठन-सामर्थ्य और यदुओं की संगठित राज्यशक्ति के बल पर स्वयं हासिल की थी. राजनीति के ज्ञान के लिए वे अपने परमशत्रु रावण के पास अवश्य जाते हैं, परंतु रावण से कुछ सीख पाए, इसमें संदेह है. रावण के राज्य में स्त्रियों का सम्मान था. वे राजकीय सेवा में थीं. अवसर पड़ने पर मंदोदरि रावण को सलाह देती है. उसे बुरा कर्म करने से बरजती है. यह सुविधा रघुकुल की स्त्रियों को प्राप्त नहीं थी. वे घर की शोभा मात्र थीं. केवल रनिवासों में आंसू बहाना जानती थीं. इतनी कोमलांगी कि रावण की दृष्टि पड़ते ही सीता का शील आहत हो जाता है, जिसके लिए उसे अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ा था.

कृष्ण का आदि विवरण ऋग्वेद में मौजूद है. वहां वे अनार्य यदु कबीले के महापराक्रमी योद्धा हैं. इंद्र का प्रभुत्व उन्हें स्वीकार्य नहीं है. ऋग्वेद में उन्हें ‘वृत्र, नमुचि, शंबर, शुष्ण, पणि आदि इंद्र के सात शत्रुओं में से एक माना गया है’(ऋ. 8/96/16). ‘द्रुतगामी कृष्ण अंशुमति(दृषद्वती) नदी तटवर्ती गूढ़ स्थान और विस्तृत प्रदेश में विचरण और सूर्य के समान अवस्थान करता है….इंद्र ने अपनी बुद्धि से उस दीप्तिमान, द्रुतगामी और घोर नाद करने वाले कृष्ण को खोजा तथा लोकहित में, बृहश्पति की सहायता से, कृष्ण और उसकी सेना का नाश किया.(ऋ. 8/96/14-15).4 आर्यों के लिए इंद्र इसलिए भी पूज्य है क्योंकि उसने केवल कृष्ण और उसकी सेनाओं को ही नहीं, उसकी गर्भवती स्त्रियों को भी नहीं छोड़ा—’‘जिस इंद्र ने ऋजिश्वा राजा के साथ कृष्ण नामक असुर की गर्भवती स्त्रियों को निहत किया था, हम उन्हीं शक्तिशाली इंद्र के निमित्त अन्न के साथ हवि एवं स्तुति अर्पित करें’(ऋ. 1/101/1).

ऋग्वेद में इंद्र के हाथों कृष्ण का वध दिखाया गया है. लेकिन संभावना यही है कि कृष्ण अपने यदु कबीले के साथ बच निकले थे. कदाचित इन्हीं स्मृतियों को भिन्न कथानक के माध्यम से महाभारत सहेजा गया है, जिससे कृष्ण के नाम के साथ ‘रणछोड़’ की उपाधि जुड़ जाती है. ‘रणछोड़’ होना कृष्ण के चरित्र का नकारात्मक लक्षण नहीं है. इसके माध्यम से वे दर्शाते हैं कि बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छोटे लक्ष्यों का बलिदान करना ही बुद्धिमानी है. ऋग्वैदिक रणछोड़ कृष्ण के नेतृत्व में; अथवा उनकी प्रेरणा से, कालांतर में गंगा-यमुना के घने, उपजाऊ और तराई क्षेत्र में महान सभ्यता विकसित हुई, जिसे भारतीय इतिहास में गंगा-जमुनी सभ्यता कहा जाता है. कुछ ही शताब्दियों में, संगठित गणशक्ति के बल पर उनकी गिनती भारत के महाशक्तिशाली राज्यों में होने लगी. इतनी कि आर्यों के लिए उनकी उपेक्षा संभव ही नहीं थी. संस्कृतियों के सम्मिलन के दौर में, आर्यों को यदुनायक कृष्ण को भगवान के रूप में स्वीकारना ही पड़ा. क्या उन्होंने सचमुच कृष्ण के चरित्र के उदात्त पक्षों को ज्यों की त्यों स्वीकार लिया था? उत्तर है, नहीं.

महाभारत में कृष्ण का चरित्र उनके ऋग्वैदिक चरित्र से भिन्न है. गीता में वे वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं. अवतार घोषित करने की यह अनिवार्य शर्त थी. दरअसल ब्राह्मणों ने कृष्ण को अवतार तो माना, मगर उनके चरित्र-हनन में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसके लिए ब्रह्मवैवर्त्त पुराण को देखा जा सकता है. जिसमें कृष्ण को स्त्री-लोलुप और लंपट व्यक्ति के रूप में किया है, जो अनेक स्त्रियों के साथ संसर्ग करता है. बाद की रचनाओं को ‘गीत गोविंद’ भी है. यहां कुछ लोग कह सकते हैं कि कृष्ण योगेश्वर हैं. गोपियों के साथ उनका व्यवहार समर्पण की पराकाष्ठा है. सवाल यह है क्या यही छूट वे राम के चरित्र-चित्रण में ले सकते थे? ब्राह्मण लेखकों की चालाकी का यहीं अंत नहीं होता. उन्होंने कृष्ण को तो ईश्वर का दर्जा तो दिया, लेकिन यादव कृष्ण का वंशज होने का दावा न कर सकें, इसके लिए महाभारत में एक आख्यान जोड़ा गया. उसके अनुसार सारे यादव मूर्खों की तरह ही आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं.

यदुओं के प्रति ब्राह्मण लेखकों की ईर्ष्या रामायण में भी नजर आती हैं. याद करें, वह प्रसंग जब राम लंका पर चढ़ाई करते समय समुद्र से रास्ता मांगते हैं. समुद्र द्वारा निवेदन को अनसुना करने पर वे कुपित होकर वाण-संधान कर लेते हैं. घबराया हुआ समुद्र तत्क्षण हाजिर होकर क्षमा-याचना करते हुए अपनी मजबूरी बताता है. इसपर राम तने हुए वाण को तूणीर में वापस लेने से इन्कार करते हुए कहते हैं—’‘हे समुद्र! मेरा वाण अमोध है. मैं इसे वापस नहीं ले सकता.’ उस समय समुद्र के मुंह से कहलवाया गया है—’‘उत्तर दिशा में द्रुमकुल्य नामक एक विख्यात देश है. वहां आभीर(अहीर) आदि जातियों के बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं. उनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं. वे सबके सब पापी और लुटेरे हैं. वे लोग मेरा जल पीते हैं. उन पापाचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मैं सह नहीं सकता. अपने इस उत्तम वाण को वहीं सफल कीजिए.’ समुद्र के कहने पर राम उस अत्यंत प्रज्जवलित वाण को बताई हुई दिशा में छोड़ देते हैं. यदुओं के प्रति इस ईर्ष्या का कारण क्या केवल उनकी जाति अथवा ऋग्वेद-कालीन वैर-भाव की स्मृतियां थीं? क्या इसके कुछ और कारण भी खोजे जा सकते हैं?

गौतम बुद्ध से पहले भारत में 16 महाजनपद अस्तित्व में थे, जहां गणतांत्रिक पद्धति से शासन चलता था. उन महाजनपदों में से एक वृष्णि संघ का केंद्र मथुरा था, जिसके मुखिया शूरसेन थे. बुद्धकाल में तत्कालीन भारत के सबसे बड़े और शक्तिशाली लिच्छिवी गणतंत्र की राजधानी वैशाली थी. मगध सम्राट अजातशत्रु की निगाह वैशाली की समृद्धि पर थी. वह उसपर अधिकार करना चाहता था. सलाह के लिए वह गौतम बुद्ध के पास पहुंचा. तब गौतम बुद्ध ने उससे कहा था कि जब तक लिच्छिवीगण अपने फैसले मिल-जुलकर करते हैं, उनके बीच कोई मतांतर नहीं है, तब तक उन्हें पराजित कर पाना असंभव है. अजातशत्रु लौट जाता है. बाद में वह अपने मंत्री वस्सकार को वैशाली भेजता है. जो छद्मरूप में वहां रहकर लिच्छिवियों में फूट डालने का काम करता है. उसके बाद अजातशत्रु की विजय संभव हो पाती है. महाभारत में यदुओं(वृष्णि) को आपस में लड़ते-झगड़ते दिखाकर, महाभारत लेखक का उद्देश्य गणतांत्रिक प्रणाली की निरर्थकता को भी सिद्ध करना था. क्योंकि बिना उसके ‘धर्मराज्य’ के मिथ की स्थापना संभव ही नहीं थी. गौरतलब है कि महाभारत का मूल कथानक भले ही ईसा से कुछ शताब्दी पुराना हो, लेकिन उसमें लगातार संशोधन होता रहा. रामायण और महाभारत को उनका वर्तमान स्वरूप गुप्तकाल में, या कदाचित उसके भी बाद प्राप्त हुआ है.

ब्राह्मणों के छल का शिकार केवल कृष्ण हुए हों, यह बात नहीं है. स्वयं महादेव भी उनके ऐसे ही षड्यंत्र का शिकार हैं. शिव अनार्यों के देवता हैं. सिंधु सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त मूर्तियां बताती हैं कि वे सिंधुवासियों के भी आराध्य रहे होंगे. वहां वे पाशुपत हैं. कबीलों के सर्वमान्य मुखिया हैं. आर्यों और अनार्यों के बीच समन्वय की प्रक्रिया के फलस्वरूप शिव को त्रिदेवों में स्थान मिला. सिंधु सभ्यता की आपेक्षिक प्राचीनता का सम्मान करते हुए उन्हें आदिदेव भी माना गया. सवाल हैं कि समन्वयीकरण के दौरान शिव तथा उनके अनुयायियों को क्या वही मान-सम्मान प्राप्त हुआ, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे? उन्हें महाविनाश का देवता ही क्यों स्वीकारा गया? शिव-वाद्य डमरू तथा उनके तांडव के क्या और भी निहितार्थ हो सकते हैं? ‘भोला’ कहकर शिव का उपहास उड़ाना क्या उनकी देवताओं और असुरों के प्रति समदृष्टि, उनके न्याय-भाव की उपेक्षा करना नहीं है?

गौरतलब है कि सिंधु सभ्यता का क्षेत्रफल करीब नौ लाख वर्ग किलोमीटर तक विस्तृत था. शिव उन सभी के आराध्य थे. जबकि ब्रह्मा और विष्णु आक्रामक कबीलों के रूप में आए आर्यों की मानस कल्पना थे. समन्वयीकरण की आवश्यकता के चलते आर्य लेखकों ने उन्हें त्रिदेवों में स्थान दिया, मगर बड़ी चतुराई से उन्हें भंगैड़ी, नशाखोर और यायावर सिद्ध कर दिया. शिव की उदारता को भी, यह कहकर कि वे असुरों को भी वैसे ही वरदान लुटाते हैं, जैसे देवताओं को—नकारात्मक रूप में देखा गया. यही नहीं उनके समर्थक कबीलों को भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहकर अपमानित किया जाता है. नशाखोर और यायावर होने के कारण के शिव शासन करने के अयोग्य हैं. इसलिए उन्हें हमेशा के लिए कैलाश पर ठहराकर अवतारों के माध्यम से राज्य करने की जिम्मेदारी विष्णु को सौंप दी गई.  लेकिन लोकशक्ति तो हर युग में सर्वोपरि रही है. वह भड़क जाए तो बड़ी से बड़ी सत्ताएं डोल जाती हैं. त्रिदेवों में यह शक्ति न तो ब्रह्मा के पास थी, न विष्णु के पास. शिव के पीछे खड़ी लोकशक्ति का भय ही था जिससे ब्राह्मण उन्हें विनाश के देवता का दर्जा देते हैं. डमरू कबीलों को युद्ध या जनसभा के लिए एकजुट करने का वाद्य रहा होगा; और तांडव लोकशक्ति को युद्ध के लिए जाग्रत करने की शैली. शिव की तीसरी आंख के माध्यम से सृष्टि के जन्म और विनाश के मिथ गढ़े जाते रहे.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. पृथु की कथा : ठाकुर प्रसाद सिंहhttps://www.hindisamay.com/content/838/4/-कहानी-कथा-संस्कृति-खंड-दोकथा-भूमि–संपादन-कमलेश्वर-उर्वशी-और-पुरुरवा.cspx

2. महाभारत, शांतिपर्व, 59/103-108

3. महाभारत, शांतिपर्व, 59/109

4. हिंदी ऋग्वेद, रामगोविंद त्रिवेदी, इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग, पृष्ठ -1057