Tag Archives: omprakash kashyap

पेरियार की नजर में ‘शुचिता’

सामान्य

ई. वी. रामासामी पेरियार

[पेरियार की गिनती बीसवीं शताब्दी के महान विचारकों और समाज सुधारकों में की जाती है। उनका चिंतन बहुआयामी तथा अपने समय से बहुत आगे था। जहां अन्य समाज सुधारक सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के समाधान में उलझे हुए थे, पेरियार स्त्री समानता, स्वाधीनता तथा उनके नागरिक अधिकारों के पक्ष में जोरदार तरीके से अभियान चला रहे थे। 1934 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘पेन्न यीन अदीमाई आनल’, स्त्री-विमर्श की दृष्टि से भारतीय भाषाओं की पहली मौलिक पुस्तक कही जा सकती है। चाहें तो हम इसे भारत में स्त्री-विमर्श का पहला ‘मेग्नाकार्टा’(अधिकारपत्र) भी कह सकते हैं। इस पुस्तक में पेरियार के, ‘कुदीआरसु’ में 1926 से 1931 के बीच प्रकाशित लेखों में से दस चुने हुए लेखों को शामिल किया गया था। पुस्तक के फ़्रांसिसी अनुवाद का विमोचन जुलाई 2005 में पेरिस में किया गया था। 

पुस्तक का मूल तमिल से अंग्रेजी में अनुवाद सुश्री मीना कंडासामी ने ‘व्हाई वूमेन वर इनस्लेव्ड'(स्त्रियों को गुलाम क्यों बनाया गया?) शीर्षक से किया है। प्रकाशक हैंㅡपेरियार सेल्फ रेस्पेक्ट प्रोपेगेंडा इंस्टीट्यूशन, चैन्नई। यह लेख उसी पुस्तक के 2019 में प्रकाशित तीसरे संस्करण के प्रथम लेख की हिंदी रूपांतर है। भारतीय मनीषा स्त्री की शुचिता पर जोर देती है। हिंदू धर्मशास्त्रों में पतिव्रता स्त्री का बड़ा महिमामंडन किया गया है। पेरियार इसे स्त्री की दासता का सबसे बड़ा कारण मानते हैं। लेख में वे शुचिता की जिस तरह तात्विक विवेचना करते हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है।]

यदि हम तमिल शब्द ‘कार्पू’(शुचिता) के घटक तत्वों के आधार पर इसकी विवेचना करें, तो पाएंगे कि मूल शब्द ‘काल’ से इसकी उत्पत्ति हुई है, जिसका अभिप्राय है—‘सीखने के लिए’। यदि हम इस शब्द को, जैसा कि यह ‘कार्पू येनप पदुवथु सोलथिरंबमई’ कहावत में प्रयुक्त हुआ है—पर नजर डालें तो पाएंगे कि ‘कार्पू’ शब्द का अभिप्राय, ‘किसी के वचन पर खरा उतरना’ है(यही इस कहावत के मायने हैं)। इस तरह इस शब्द में सत्यनिष्ठा, सचाई और समझौते की शर्तों पर ईमानदारी से टिके रहने की भावना समाविष्ट है।

यदि हम ‘कार्पू’ शब्द का उसकी समग्रता में विश्लेषण करें, तो इसे ‘मगालिर नीराई’(स्त्रियों के सद्गुणों) को दर्शाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यहां हम यह समझने में असमर्थ हैं कि ‘नीराई’(सद्गुण) शब्द को विशेषतः स्त्रियों पर कब से थोप दिया गया। ‘नीराई’ शब्द का पर्याय—अभेद्यता(अविनाशिता), दृढ़ता अथवा शुचिता है। मगर किसी के लिए भी यह सिद्ध करना पूरी तरह सेअसंभव है कि ‘कार्पु’ सिर्फ स्त्रियों के संबंध में प्रासंगिक है। हम केवल उसके अर्थ खोज सकते हैं—‘अविनाशी’, मजबूत और टिकाऊ।

यदि हम ‘अविनाशी’ शब्द का समग्र विवेचन करें तो यहां उसका सही अर्थ है—शुद्ध,  अर्थात ‘अविकारित’ और अकलुषित। अंग्रेजी में भी ‘प्योर’(शुद्ध) शब्द का आशय किसी अविकारित वस्तु या विचार से है। ऐसी वस्तु से है जिसे खराब न किया गया हो। इस तरह अंग्रेजी शब्द ‘चेस्टिटी’(शुचिता) का अर्थ है—‘वर्जिनिटी’(कौमार्य)। यदि हम संदर्भ में समझा जाए तो, यह शब्द स्त्रियों तथा पुरुषों में से किसी एक के पक्ष में परिभाषित नहीं है। अपितु संपूर्ण मानव जाति को लक्षित है। और इसका अर्थ है—‘लिंग विशेष की सीमा से परे, परमशुद्धता की अवस्था।’ कुल मिलाकर ‘शुचिता’ का संबंध सिर्फ स्त्रियों से नहीं है। इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि जब कोई पुरुष/स्त्री सहवास करता/कर चुका होता है, उन दोनों की अनुवर्ती पवित्रता के बावजूद, वह(चाहे स्त्री हो या पुरुष) अपनी शुचिता को गंवा देता है।

केवल ‘इंडो-आर्यन’ भाषा संस्कृत में ‘शुचिता’ को पतिव्रता(निष्ठावान पत्नीपन) के रूप में परिभाषित किया गया है। मैं समझता हूं कि यहीं, इसी जगह(इसी भाषा में) पराधीनता की अवधारणा को शुचिता शब्द में समाविष्ट कर दिया गया था। ‘पतिव्रता’ शब्द स्पष्ट रूप से स्त्री-पराधीनता की स्थिति को दर्शाता है। न केवल इसलिए कि इसका अभिप्राय ऐसी पत्नी से है जो, ‘अपने पति को भगवान का दर्जा देती है; पति की दासी बनकर रहने को ही जो अपना ‘संकल्प’(व्रत) मान लेती है, और अपने पति के अलावा वह किसी अन्य पुरुष का विचार तक नहीं रखती। इसलिए भी कि ‘पति’ शब्द का आशय ही स्वामी, रहनुमा और सर्वेसर्वा से है।

यद्यपि, तमिल शब्द ‘थलायवी’(नेतृत्व करने वाली महिला) अथवा ‘नायकी’(नायिका) पत्नी के ही बोधक हैं, किंतु इन शब्दों का उपयोग विशिष्ट अवस्था में तब किया जाता है जब कोई स्त्री प्रेम की अवस्था में हो। जैसे कि ‘थलायवी’ शब्द का प्रयोग उसके वास्तविक अर्थों में नहीं किया जाता, ऐसी स्त्री के संदर्भ में नहीं जो विनीत भाव से जीवन में तल्लीन हो। यही नहीं, उसके समकक्ष शब्दों ‘नायकन’(नायक) और ‘नायकी’(नायिका) का प्रयोग भी सिर्फ महाकाव्यों, कहानियों और विशेषरूप से ऐसी जगह मिलता है, जहां स्त्रियों और पुरुषों के मनोरथ पर जोर दिया गया हो। इसी तरह समानधर्मा शब्दों ‘नायकन-नायकी’(नायक-नायिका) तथा ‘थलायवन-थलायवी’ का प्रयोग प्रेम के विभिन्न चरणों तथा इच्छाओं को दर्शाने के लिए जाता है, जबकि शुचिता की अवस्था केवल स्त्रियों से संदर्भित  है, जिनसे कहा जाता है कि वे अपने-अपने पति को अपना स्वामी और भगवान समझें।

इस मामले में, तिरुवेल्लुवर के विचारों को लेकर मैं थोड़ा भ्रमित हूं। मैं महसूस करता हूं कि तिरुक्कुल के छठे अध्याय, ‘वाझकई थुनेईनलम’(जीवनसाथी का महत्त्व), 91वें अध्याय ‘पेन्नवझी चेराल’(स्त्रियों के नेतृत्व में) तथा कुछ अन्य स्वतंत्र दोहों में, स्त्री के संदर्भ में चरम दासता और घटियापन का वर्णन  किया गया है। यहां तक कह दिया गया है कि जो स्त्री देवताओं को पूजने के बजाय अपने पति की पूजा करती है, उसके आदेश पर बादल भी बरसने लगते हैं, स्त्री को हमेशा अपने पति की सेवा करनी चाहिए—इसी तरह के अनेक घटिया विचार उसमें मिलते हैं।

यदि कुछ लोग इससे असहमत हैं, तो मैं उनसे तिरुक्कुरल के छठे और 91वे अध्यायों का पढ़ने का आग्रह करूंगा, खासतौर पर इसके बीस दोहों(दोहे जैसा दो पंक्तियों का छंद) को, उनके मूल स्वरूप में पढ़ें। न कि उनकी टीकाओं के माध्यम से। सामने कोई भी आए, उनके चरम तर्कों की परवाह किए बिना, अंतत: मैं उनसे एक ही तथ्य पर ध्यान देने का आग्रह करूंगा कि, ‘यदि इन पदों की रचना करने वाले तिरुवेल्लुवर पुरुष न होकर कोई स्त्री रहे होते, क्या तभी वे इन्हीं विचारों का चित्रण कर रहे होते? इसी तरह यदि स्त्रियों ने ही, स्त्रियों के बारे में धर्मशास्त्रों सहित दूसरी पुस्तकें भी रची होतीं, अथवा स्त्रियों ने ‘शुचिता’ शब्द को परिभाषित किया होता, तब क्या वे भी ‘शुचिता’ को ‘पतिव्रता’ जैसा ही अर्थ देतीं?

चूंकि ‘शुचिता’ को ‘पतिव्रता’ के रूप में परिभाषित किया गया है और चूंकि धन-संपत्ति, आमदनी और शारीरिक बल की दृष्टि से पुरुष को स्त्री की अपेक्षा अधिक बलशाली बनाया गया है, सो इसने ऐसी परिस्थितियों को जन्म दिया है, जो स्त्री पराधीनता को बनाये रखने के पक्ष में हैं। दूसरी ओर मनुष्य यह सोचकर मूर्ख बना रहता है कि ‘शुचिता’ से संबंधित कोई भी अवधारणा उसके ऊपर लागू नहीं होती। पुनश्चः, पितृसत्तात्मकता ही एकमात्र कारण है जिससे ऐसे शब्द जो दिखाएं कि शुचिता पुरुष के लिए भी उतनी ही अभीष्ट है, हमारी भाषाओं से गायब कर दिए गए है।

यह नहीं कहा जा सकता कि किसी देश, धर्म अथवा समाज ने इस विषय को लेकर ईमानदारी से काम किया है। केवल रूस(सोवियत भूमि) इसका अपवाद है। उदाहरण के लिए, हालांकि ऐसा प्रतीत होता है कि यूरोपियन स्त्रियों को ढेर सारी स्वाधीनता है, बावजूद इसके श्रेष्ठत्व और हेयत्व का बोध वहां ‘पति’ और ‘पत्नी’ के पर्यायवाची के रूप में निर्दिष्ट किए गए शब्दों में साफ नजर आता है। यहां तक कि वहां का कानून भी स्त्री को पुरुष की आज्ञाकारिणी बने रहने को आवश्यक मानता है। 

पुनश्चः कुछ समाजों में परदे की प्रथा लागू है। वहां स्त्रियों की घर की चौखट पार करने की आजादी नहीं होती। यदि जाना ही हो तो उन्हें मुंह को ढंककर जाता निकलना पड़ता है। वहां एक पुरुष अनेक स्त्रियों से विवाह कर सकता है, जबकि स्त्री को एक से अधिक पुरुषों से विवाह करने की अनुमति नहीं होती। और अपने देश में, हमारे यहां तो स्त्री पर अनेकानेक प्रतिबंध हैं। एक बार पुरुष की विवाहिता बन जाने के बाद मृत्युपर्यंत, स्त्री से उसकी स्वाधीनता छिन जाती है। उसका पति अनेक स्त्रियों से विवाह कर, उसके सामने घर में रह सकता है,  और यदि पत्नी अपने पति के घर में हो, तब भी आपसी विश्वासहीनता के कारण वह अपने पति से केवल भोजन की अपेक्षा कर सकती है। पति पर अपनी कामेच्छाओं की संतुष्टि हेतु दबाव डालने का उसे कोई अधिकार नहीं है।

यह कहना मुश्किल है कि केवल कानून और धर्म ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। चूंकि स्त्रियों ने हालात से खुद समझौता कर लिया है, इस कारण स्थिति दुस्संशोध्य/दीर्घस्थायी हो चुकी है। ठीक ऐसे ही जैसे शताब्दियों पुरानी परंपरा के चलते उन लोगों ने जिन्हें नीची जाति का घोषित किया गया था, मान लिया था कि वे सचमुच नीच जाति के हैं। इस कारण उनमें सिर झुकाने, छिपने या दूर हटकर सवर्णों के लिए रास्ता खाली करने की होड़-सी मच जाती है। इसी तरह, स्त्रियां भी सोचती हैं कि वे पुरुष की संपत्ति हैं। इसके मायने हैं कि उन्हें पुरुष के अधीन रहना चाहिए और मनुष्य के गुस्से का पात्र नहीं बनना चाहिए। इस कारण वे अपनी स्वाधीनता की भी चिंता नहीं करतीं।

यदि स्त्रियां वास्तव में अपनी आजादी चाहती हैं, तो शुचिता की अवधारणा को जो लिंग के आधार पर स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग न्याय का प्रावधान करती है—को तत्काल नष्ट कर देना चाहिए। उसके स्थान पर स्त्री-पुरुष दोनों के लिए एकसमान, स्वःशासित शुचिता की अवधारणा विकसित होनी चाहिए। बलात विवाह, जिसमें बिना किसी प्रेम-भाव के, सिर्फ शुचिता की रक्षा के नाम पर, लोगों को एक-दूसरे के साथ दांपत्य जीवन में बांध दिया जाता है—का नाश हो जाना चाहिए।

निर्दयी धर्म और कानून, जो शुचिता/पातिव्रत धर्म के नाम पर स्त्रियों को पति की पशुवत हरकतों को भी सहते जाने का आदेश देते हैं—उन्हें नष्ट हो जाना चाहिए।

यही नहीं, समाज की क्रूर व्यवस्थाएं, जो यह अपेक्षाएं करती हैं कि शुचिता और पवित्रता के नाम पर हृदय में उमड़ते प्रेम और अनुराग को दबाकर, ऐसे व्यक्ति के साथ रहना चाहिए जिसके साथ न प्रेम हो न ही अनुराग—तत्क्षण बंद हो जाना चाहिए।

इसलिए, कोई व्यक्ति समाज में तभी वास्तविक शुचिता, प्राकृतिक शुचिता, एवं संपूर्ण स्वाधीन शुचिता के दर्शन कर सकता है, जब इन क्रूरताओं का अंत हो जाए। ऐसा जोर-जबरदस्ती से कभी नहीं होगा, न ही विभिन्न लिंगों के लिए अलग-अलग कानून बना देने से होगा, न ही यह शक्तिशाली वर्ग द्वारा कमजोरों के लिए कलमबद्ध निर्देशों के दम पर यह संभव है, इससे केवल दासवत और थोपी गई शुचिता ही संभव है।

मैं तो यहां तक कहूंगा कि इसकी तुलना में समाज में दूसरा और कोई घिनौना कृत्य ही  नहीं है।

कुदीआरसु

8 जनवरी, 1928

अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप

बहुजन राजनीति : कामयाबी के लिए जरूरी हैं बड़े सामाजिक आंदोलन

सामान्य

देश इस समय दो प्रकार की ताकतों के प्रभाव में हैं। अपने-अपने स्वार्थ के लिए दोनों ही इसके भविष्य से खिलवाड़ कर रही हैं। पहली━हिंदुत्व समर्थक ताकतें, जो धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक औजार की तरह करती हैं। उनका असल उद्देश्य जाति तथा उसके आधार पर सवर्णों को प्राप्त विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखना है। भाजपा और आरएसएस जैसे संगठन इसके उदाहरण हैं। आज वे राष्ट्रवादी होने का दावा करते हैं, जबकि आजादी से पहले उनका बड़ा हिस्सा अंग्रेजों का पिट्ठू बना था। अंग्रेजी राज बना रहे, उससे प्राप्त सुविधाएं मिलती रहें━इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों की हरसंभव मदद की थी। 

दूसरी पूंजीवादी ताकतें, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के समय से ही अंग्रेजों के साथ थीं। विश्वयुद्धों के दौरान उन्होंने खूब चांदी काटी थी। बाद में देशभक्त होने का दावा करते हुए वे भी खुद को ‘राष्ट्रवादी’ कहने लगीं। मौका देख कुछ पूंजीपति अखबार और मीडिया के धंधे में घुस गए। उद्देश्य था सरकार और जनता दोनों पर अपनी पकड़ बनाए रखना। ताकि उसका उपयोग मनमाफिक सरकार चुनने; तथा निर्वाचित सरकार से मनमुताबिक काम लेने के लिए कर सकें। 

हिंदुत्व : जातिवाद का सुरक्षाकवच

जातिवादी ताकतों के लिए धर्म अध्यात्म-चेतना का स्वाभाविक विस्तार न होकर, शुद्ध राजनीति है। वे चाहती हैं कि भारत हिंदूवादी राष्ट्र बने। लेकिन वे हजारों वर्ष पुराने जाति-भेद को मिटाने की बात नहीं करतीं। उन जातियों को मिटाने की बात नहीं करतीं जिन्होंने पूरे समाज को ‘शासक’ और ‘शासित’ में बांट दिया है। यह कौन नहीं जानता कि बहुलांश शासित जातियां ही समाज की वास्तविक उत्पादक शाक्ति हैं। मगर देश और समाज के सुखोपभोग हेतु दिन-रात पसीना बहाने के बावजूद उन्हें अधिकार-विपन्न अवस्था में, अपमानित होकर जीना पड़ता है। इस विसंगति को मिटाने की उनकी पार्टी या सरकार के पास कोई योजना नहीं है। शिखर पर बने रहने की उनकी चाहत कभी मंडल बनाम कमंडल, कभी गुजरात मॉडल, कभी मंदिर-मस्जिद और कभी हिंदू-मुस्लिम के नाम से बाहर आती रहती है। जिस हिंदू राष्ट्र की बात वे करती हैं, उसमें संविधान के लिए कोई जगह नहीं है। उनका ‘आदर्शलोक’ मनुस्मृति के कथित ‘दिव्यादेशों’ को ही महत्व देता है।  

अपने स्वार्थपूर्ण गठजोड़ के बल पर ये शक्तियां आजादी के दौरान विकसित सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द्र को कमजोर करने में कामयाब रही हैं। बहुजन समाज को उन्होंने इतने छोटे-छोटे गुटों में बांट दिया है कि अल्पसंख्यक अभिजन की संगठित ताकत की तुलना में उसकी प्रभावी शक्ति शून्य नजर आती है। इसके लिए केवल भाजपा या आरएसएस दोषी नहीं हैं। विपक्ष भी बराबर का जिम्मेदार है। वह भूल चुका है कोरी राजनीति से केवल सत्ता परिवर्तन संभव है। सामाजिक परिवर्तन की त्वरा को बनाए रखने के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। बीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज जिन परिवर्तनों से गुजरा है, उनके पीछे सामाजिक आंदोलनों की बड़ी भूमिका थी। उनके मूल में फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, रामस्वरूप वर्मा, बाबू जगदेवप्रसाद, राममनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों की प्रेरणाएं थीं। आज उनकी विचारधाराएं भले ही पहले से कहीं परिपक्व अवस्था में मौजूद हों, मगर उनसे कट जाने तथा केवल सत्ता की राजनीति करने के कारण━आज पूरा विपक्ष हताश, निराश और किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आता है।

हुजन हितों की कीमत पर राजनीति की बिसात

ऐसा नहीं है कि राजनीति और पूंजीवाद का गठजोड़ एकदम नया हो। आजादी के बाद से ही दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते आए हैं। मगर भाजपा ने धर्म को भी इसमें शामिल कर लिया है। संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर उस भरोसा नहीं है। इस कारण यह पहले से कहीं ज्यादा बेशर्म, कहीं अधिक विकृत रूप में हमारे सामने है। सात साल पहले विकास के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार, बहुजन हितों की कीमत पर, अपने सांप्रदायिक एवं राजनीतिक हितों को साधने में लगी है। 

यह वही भाजपा है जो एक-डेढ़ दशक पहले तक स्वदेशी का राग अलापती थी। कांग्रेस की यह कहकर आलोचना करती थी कि उदारीकरण के नाम पर उसने विश्वबैंक सहित विदेशी आर्थिक शक्तियों के आगे समर्पण कर दिया है। मगर सत्ता में आने के बाद वह स्वदेशी की बात करना भूलकर, सार्वजनिक उद्यमों को ओने-पौने दाम बेचने पर तुली है। गौरतलब है कि धर्म, पूंजी और राजनीति के ऐसे ही बेशर्म गठजोड़ ने फ्रांसिसी क्रांति को जन्म दिया था। इस देश में समाजवाद तो कभी नहीं रहा। कुछ हिस्सों को छोड़कर वामपंथ को भी अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया है। किंतु पूंजीवादी ताकतों के आगे सर्वस्व समर्पण कर देने का साहस तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का भी नहीं था━जिसे देश में उदार आर्थिक नीतियां लागू करने का श्रेय दिया जाता है।

विकास के आरंभिक दौर से ही पूंजीवाद व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थक रहा है। इसलिए नहीं कि उसे व्यक्ति-मात्र की आजादी से प्यार है। बल्कि इसलिए कि अर्थव्यवस्था के बाजारीकरण के लिए व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपरिहार्य है। फिर भारत में पूंजीवाद तथा हिंदुत्व जैसी घोर सांप्रदायिक विचारधारा के गठजोड़ का कारण? गंभीरतापूर्वक विचार करें तो पता चलेगा कि भारत में यह पूंजीवाद की जरूरतों के चलते नहीं, बल्कि फासीवादी ताकतों की स्वार्थपरता के कारण संभव हुआ है।

यह भी कह सकते हैं कि स्वार्थ-सिद्धि की खातिर फासीवादी ताकतों ने पूंजीवाद के समक्ष खुद को समर्पित कर दिया है। रणनीति के रूप में पूंजीवाद ने भी इसे स्वीकार कर लिया है, ताकि वह मजबूर सरकार से मनचाहे फैसले करा सके। धर्म तथा पूंजीवाद के गठजोड़ की सफलता का कारण है कि ये दोनों ही, समाजार्थिक असमानता को नैसर्गिक मानते हैं। समानता, स्वाधीनता और न्याय जैसे मानवतावादी मूल्यों के लिए उनके यहां कोई जगह नहीं है। अपनी स्वार्थपरता पर पर्दा डालने के लिए दोनों ही दान-धर्म, पुण्यादि का बढ़-चढ़कर प्रचार करते हैं। इससे वे जन-असंतोष को कम करने में सफल हो जाते हैं। उनके निरंतर प्रचार-प्रसार से प्रभावित जनसाधारण, सरकार तथा दूसरी शीर्ष शक्तियों को अपना एकमात्र उद्धारक मानकर, समझौतावादी बन जाता है। 

षड्यंत्र को बहुजन भी समझते हैं

ऐसा नहीं है कि बहुजन धर्म, राजनीति और पूंजीवाद के स्वार्थपूर्ण गठजोड़ से सर्वथा अनजान हों। धर्म की आड़ में उत्तरोत्तर फलता-फूलता ब्राह्मणवाद उनकी नजरों से छिपा हो। मुश्किल यह है कि धर्म-राजनीति और पूंजीवाद के संगठित हमलों का सामना करने के लिए जो जमीनी संघर्ष तथा उसे दिशा देने वाले आंदोलन चाहिए━वे इन दिनों पूरी तरह नदारद हैं। ऐसा कोई सामाजिक-राजनीतिक संगठन नहीं है जिसकी पैठ पूरे देश में हो और जो सभी बहुजनों को स्वीकार्य हो। उसके अभाव में आक्रोश की परिणति कथित ‘सोशल मीडिया’ तक सिमटकर रह जाती है, जो किसी भी तरह से ‘सोशल’ नहीं है। वह लोगों को जिस सांगठनिक एकता की प्रतीति कराता है वह पूर्णतः आभासी है। इंटरनेट के माध्यम से मनुष्य विद्युतीय त्वरा के साथ अपने समूहों, मित्रों आदि से तत्क्षण संपर्क कर सकता है, इसलिए वह जमीनी माध्यमों जो आमने-सामने का संपर्क कराते हैं, तथा उनके द्वारा बने संगठनों की आवश्यकता से मुंह मोड़े रहता है।

‘सोशल मीडिया’ के हिसाब से देखा जाए तो पूंजीवाद और भाजपा सहित दूसरे फासीवादी संगठनों के विरुद्ध बहुजनों में आक्रोश उमड़ता हुआ दिखाई देगा। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। असल में यह ऐसा माध्यम है जिसे पूंजीवादी तंत्र ने अपने मुनाफे तथा दीर्घकालिक स्वार्थों की सिद्धि हेतु खड़ा किया है। उसका उपयोग जो जितना ज्यादा शक्तिशाली है, वह उतने ही प्रभावशाली ढंग से कर सकता है। 

सोशल मीडिया ठेठ पूंजीवादी आयोजन है  

दरअसल जिसे ‘सोशल मीडिया’ कहा जाता है उसे पूंजीवादी शक्तियों ने जनाक्रोश के समयानुसार शमन हेतु खड़ा किया है। जैसे प्रेसर कुकर, समय-समय पर भाप को निकालकर, दबाव को एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ने देता, यही काम ‘सोशल मीडिया’ कर रहा है। वह पूंजीवादी संस्थानों द्वारा अपने मुनाफे और बढ़ती आर्थिक-सामाजिक विषमताओं की ओर से ध्यान हटाने के लिए खड़ा किया गया, ठेठ पूंजीवादी आयोजन है। वह जनाक्रोश को स्वर तो देता है, किंतु एक विचार की दूसरे विचार पर इतनी तीव्र ‘ओवरलेपिंग’ करता है कि दिमाग चकराने लगता है। उसके माध्यम से विचारधाराओं के बोन्साई संस्करण, इतनी तेजी से संज्ञान में आते हैं कि पाठक को उन्हें आत्मसात करने, उनके साथ अपनी स्थिति का तादात्मय बिठाने तथा उन्हें आंदोलन का रूप देने के लिए समय ही नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप वैचारिक स्फुर्लिंग, जुगनुओं की तरह टिमटिमाकर अंधेरे में विलीन होते रहते हैं।

सोशल मीडिया का  उपयोग : सावधानी जरूरी है

यहां सोशल मीडिया की उपयोगिता और आवश्यकता को नकारने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है। खासकर ऐसे समय जब टेलीविजन और अखबार बड़े पूंजीपति घरानों के कमाऊ पूत बनकर रह गए हैं, विरोधी स्वरों को संगठित कर आगे बढ़ाने के लिए ‘सोशल मीडिया’ से जनमाध्यम का काम लिया जा सकता है। उसने आमजन को मुखर होना सिखाया है। यह अनायास नहीं है कि सरकार के चहेते पूंजीपतियों अंबानी और अडानी के विरुद्ध कथित ‘सोशल मीडिया’ पर आवाजें बुलंद हो रही हैं। कभी धीरूभाई अंबानी के आर्थिक साम्राज्य को खड़ा करने में मददगार रही कांग्रेस के नेता राहुल गांधी सार्वजनिक मंचों से सरकार को पूंजीपतियों की अवांछित मदद करने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब आक्रोशित किसानों ने रिलायंस के टावरों को उखाड़ फेंकने की कोशिश की हो, और अंबानी समूह को मदद के लिए सरकार के आगे गुहार लगानी पड़ी हो। यह भी पहली बार हो रहा है कि जनता के कोप से बचने के लिए पंजाब में रिलायंस के स्टोर महीनों से बंद पड़े हैं। इसलिए ऐसे समय में जब टेलीविजन, अखबार तथा संचार के अन्यान्य साधनों को पूंजीवादियों और राजनेताओं ने अपने कब्जे में कर लिया हो, यह कम से कम ऐसा मंच तो है जिसके माध्यम से समाज के एकदम निचले वर्ग के लोगों की भावनाएं सामने आ रही हैं। इसलिए जन-अभिव्यक्ति को स्वर देने वाले किसी भी माध्यम की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। किंतु आवश्यक है कि उनका प्रयोग आंदोलन को एकजुट करने के लिए सहायक के तौर पर किया जाए, न कि निर्देशक शक्ति के रूप में। 

जनता के गुस्से को बदलाव का संवाहक बनाना जरूरी

धर्म-पूंजीवाद और राजनीति के विरुद्ध उमड़ा आक्रोश समाज में वास्तविक बदलाव का कारक नहीं बन पा रहा है। आखिर क्यों? यहां 2011 की घटनाओं को याद करने की कोशिश करें। टयुनीशिया से भड़के जनविद्रोह ने देखते ही देखते यमन, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, लीबिया, इराक सहित यूरोप के भी कई देशों को अपनी चपेट में ले दिया था। विद्रोह इतना प्रबल था कि कई अरब देशों में निरंकुश सत्ताधीशों को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। कुछ देशों में तो गृह-युद्ध जैसे हालात बन चुके थे। उसके पीछे सोशल मीडिया का बड़ा योगदान था। इतना कि आम भाषा में उसे ‘फेसबुकिया विद्रोह’ भी कह दिया जाता है। 

सोशल मीडिया के बल पर हुई वे आधी-अधूरी क्रांतियां, कुछेक देशों में तख्तापलट के बावजूद, अपेक्षित व्यवस्था-परिवर्तन करने में नाकाम सिद्ध हुई थीं। कारण वही जो हमने ऊपर गिनाए हैं। इंटरनेट पर विद्युतीय त्वरा से आ रही सूचनाएं, समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित कर, केवल विद्रोह की मनःस्थिति पैदा कर सकती हैं, जमीनी चेतना के अभाव में वास्तविक परिवर्तन की संवाहक नहीं बन सकतीं। उसके लिए क्रांतिकारी विचारधाराओं को केवल जानना ही नहीं, उन्हें लोकमानस में उतारना पड़ता है। जबकि सोशल मीडिया पर एक के बाद एक तेजी से आ रहे विचार, सूचनाओं का रूप लेकर, विचारहीनता के हालात पैदा कर देते हैं। परिणामस्वरूप समाज भीड़ की तरह वर्ताब करने लगता है। 

सोशल मीडिया और पूंजीवाद

2011 की जनक्रांतियां भले ही नाकाम हुई हों, किंतु उनके माध्यम से पूंजीवादी ताकतें विभिन्न राजनीतिक दलों और सरकारों को यह समझाने में कामयाब हुई थीं कि वे जनता को बड़े पैमाने पर भड़काकर न केवल जनविद्रोह के हालात पैदा कर सकते हैं, बल्कि चाहें तो तख्तापलट भी करा सकते हैं। बिना उनकी मदद के सत्ता में बने रहना तो क्या, वहां तक पहुंचना भी संभव नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से वह सत्ता-लोलुप दलों के लिए एक संदेश भी था कि सोशल मीडिया और पूंजीपतियों के समर्थन से वे अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। भारत में उन घटनाओं पर बहुत कम लिखा गया। संभवतः लिखने से जानबूझकर बचा गया। लेकिन उनसे सबक लेने वाले संगठन कम नहीं थे। उनमें प्रमुख थे आरएसएस, भाजपा तथा उनके अनुषंगी संगठन, जो आजादी के बाद से ही अपने जातिवादी एजेंडे को थोपने के लिए सत्ता में आने को लालायित थे। ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय भी ऐसे ही आंदोलन से हुआ था। 

बदलाव के लिए जमीनी आंदोलन जरूरी

सोशल मीडिया की मदद से बहुजन बुद्धिजीवी अपने विचारों को तेजी से अपने समर्थकों और विरोधियों तक पहुंचा सकते हैं। उसके माध्यम से बहुजन समाज में जागरूकता भी पैदा कर सकते हैं। ब्राह्मणवाद की धूर्तताओं से अपने लोगों को परचाकर उन्हें बड़े आंदोलन के लिए तैयार भी कर सकते हैं। लेकिन क्रांतिधर्मा विचारधाराओं को आमूल परिवर्तन की संवाहक बनाने के लिए, जमीनी आंदोलनों की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। 

दूसरे शब्दों में डॉ. आंबेडकर, पेरियार, डॉ. रामस्वरूप वर्मा, स्वामी अछूतानंद, गाडगे महाराज, ललई सिंह ‘पेरियार’, कांशीराम आदि महापुरुषों की विचारधाराओं से प्रेरणा लेने के साथ-साथ उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों को भी━नए समय और संदर्भों के साथ, नए रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत आज भी पहले जितनी ही है। मार्क्स के शब्दों में कहें तो विचारधाराएँ अनेक हैं, समस्या उन्हें परिवर्तन का वाहक बनाने की है। इसलिए बहुजन हितैषियों को चाहिए कि वे परिवर्तनकारी विचारधाराओं को समझने के साथ-साथ, उन्हें जनांदोलन में बदलने के लिए भी काम करें।

ओमप्रकाश कश्यप

डॉ. आंबेडकर और बौद्ध धर्म : कुछ सवाल

सामान्य

चातुर्वर्ण्य न केवल श्रम का विभाजन है, अपितु श्रमिकों का भी विभाजन है। इसलिए वर्गहीन अर्थात जात-पात विरहित समाज की संरचना हेतु संघर्ष किया जाना चाहिए। इसकी प्रारंभिक आवश्यकता है कि उच्च जातियों की अनुकंपा, दया, सहानुभूति तथा सामंजस्यपूर्ण सक्रिय सहयोग उम्मीद छोड़कर समस्त निचली जातियां दलित शक्ति के रूप में संगठित हों। फिर आंतरिक और बाह्यः दोनों मोर्चों पर संघर्ष के वरण से, वर्गवाद-वर्णवाद के उन्मूलन प्रक्रिया को तेज करते हुए, मनुष्यत्व की स्थापना के संघर्ष को आगे बढ़ाएं─डॉ. आंबेडकर। 

डॉ. आंबेडकर ऐसे महामानव थे जो शताब्दियों में जन्म लेते हैं। वे भारतीय गणतंत्र के वास्तुकार और संविधान निर्माता थे। यह संविधान प्रदत्त अधिकारों की ही देन है कि वे फासीवादी शक्तियां, जिनकी आंखों में भारतीय लोकतंत्र बुरी तरह खटकता है, अपने तमाम षड्यंत्रों और मनोरथों के बावजूद संविधान में छेड़छाड़ का साहस नहीं कर पा रही हैं। लेकिन आंबेडकर साहब के प्रति अपनी कुल श्रद्धा और सम्मान के बावजूद मैं उनके धर्मांतरण संबंधी फैसले से सहमत नहीं हो पाता। हालांकि मैं जानता हूं कि हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म तक की उनकी यात्रा एक गाड़ी से उतरकर, दूसरी में सवार हो जाने जितनी आसान नहीं थी। वह पूरी तैयारी के साथ उठाया गया कदम था। फिर भी वह हिंदू धर्म पर वैसी चोट नहीं कर पाया, जैसी अपेक्षित थी; या जिसकी भारतीय समाज को जरूरत थी।  

हिंदू धर्म से नाराजगी और संघर्ष

जाति आरंभ से ही हिंदू धर्म की आलोचना का कारण रही है। वह जन्म के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेद करती है। रुचि और कार्यक्षमता के बजाए वह मनुष्य की योग्यता का आकलन उसकी जाति देखकर करती है। इस विकृति के कारण हिंदुओं के तीन-चौथाई हिस्से को दुख, हताशा, नैराश्य, अभाव और अपमान से भरपूर जीवन जीना पड़ता है। अछूत कही जाने वाली जाति में जन्म लेने के कारण डॉ. आंबेडकर को भी जीवन में अनेक बार अपमान का सामना करना पड़ा था। बचपन में जब वे स्कूल जाते थे, तब कक्षा में बैठने से लेकर पानी पीने तक उनके साथ भेदभाव किया जाता था। महाराजा गायकबाड़ द्वारा दी गई सैन्य सचिव की नौकरी उन्हें जातिगत भेदभाव के कारण छोड़नी पड़ी थी। उसके बाद परिवार के भरण-पोषण हेतु उन्होंने और भी नौकरियों की तलाश की। किंतु अछूत होने के कारण हर बार नाकाम रहना पड़ा। अक्टूबर 1929 में खानदेश(महाराष्ट्र) के दौरे पर ‘चालीस गांव’ के दौरे पर पहुंचे तो तांगेवालों ने उन्हें गंतव्य स्थल तक पहुंचाने से मना कर दिया था।

डॉ. आंबेडकर समझते थे कि यदि उन जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति के साथ हिंदू असहनीय दुर्व्यवहार कर सकते हैं, तो साधारण अछूत का भला क्या हाल होता होगा। इसलिए लंदन में पढ़ाई पूरी करके भारत लौटने के बाद उन्होंने खुद को अछूतों के मुक्ति-समर में झोंक दिया था। 20 मार्च 1927 को महाड़ सत्याग्रह के दौरान चवदार तालाब का पानी पीकर उन्होंने शताब्दियों से चली आ रही छूआछूत की प्रथा को चुनौती दी थी। 25 दिसंबर 1927 को जाति एवं जातिभेद को दैवीय घोषित करने वाली ‘मनुस्मृति’ का दहन किया। अछूतों और शूद्रों में जागरूकता लाने के लिए अखबार निकाले।

उन दिनों गांधी और कांग्रेस के उदारवादी नेता, दलितों के मंदिर प्रवेश का समर्थन करने लगे थे। आंबेडकर के लिए मंदिर प्रवेश कोई महत्वपूर्ण मुद्दा न था। वैसे भी जो धर्म रूढ़ियों, कर्मकांडों, मूर्तिपूजा और जड़-विश्वासों पर टिका हो, उसमें दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार मिल जाने से उनकी सामाजिक स्थिति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। इसलिए 1933 में गांधी द्वारा सुब्ब्रायन विधेयक के समर्थन की मांग पर आंबेडकर का उत्तर था─‘मैं महात्मा को बताना चाहता हूं कि यह केवल हिंदुओं तथा हिंदू धर्म की विफलता ही नहीं है, जिसने मुझमें घृणा और अवमानना की भावना पैदा की है। मुझे हिंदुओं और हिंदू धर्म दोनों से घृणा है। क्योंकि मुझे विश्वास है कि वे गलत आदर्शों और अनुचित सामाजिक जीवन का नेतृत्व करते हैं। हिंदुओं और हिंदू धर्म के साथ मेरा वैर, उनके सामाजिक आचरण की खामियों के कारण नहीं है। बल्कि यह उससे भी अधिक मौलिक है। मेरा उनसे दुराव उनके आदर्शों के कारण है।’

हिंदू धर्म में दलितों के अपमान तथा अत्याचारों से आहत डॉ. आंबेडकर ने 1935 में उसे छोड़ने की घोषणा कर दी। उस समय उन्होंने कहा था─‘मैं जन्म से हिंदू था क्योंकि मेरा इस पर कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।’ धर्मांतरण, डॉ. आंबेडकर के लिए निजी आस्था का विषय नहीं था। प्रबुद्ध व्यक्ति धर्म की बैशाखी के बिना भी नैतिक जीवन जी सकता है। लेकिन अशिक्षा और रूढ़ियों में डूबे जिस समाज का वे नेतृत्व करते थे, वह अपनी अच्छी-बुरी सभी प्रेरणाओं के लिए धर्म पर निर्भर था। धर्म-रहित जीवन की एकाएक परिकल्पना करना उसके लिए असंभव था। बावजूद इसके हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म तक जाने में आंबेडकर ने पूरे बीस वर्ष लगाए थे। इस बीच हिंदू धर्म से अपनी शिकायतों को लेकर उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी। उनमें जातिवाद का उच्छेद(1936), ‘शूद्र कौन थे?’(1946) तथा ‘हिंदू धर्म की पहेलियां(1956) दस्तावेजी महत्व की कृतियाँ हैं।

डॉ. आंबेडकर और बुद्ध का धर्म

1935 में जब डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की थी, गांधी सहित अनेक नेता हिंदू धर्म में सुधार में लगे थे। उनके अलावा कई समाज-सेवी संस्थाएं भी उनके नेतृत्व में जमीनी स्तर पर कार्यरत थीं। उन सबके प्रयासों को देखकर हिंदू धर्म में सुधार की क्षीण-सी उम्मीद डॉ. आंबेडकर को थी। मगर आजादी के बाद वह उम्मीद खत्म होने लगी थी। आखिरकार 1956 में, यह मानते हुए कि हिंदू धर्म के कर्ताधर्ता सुधार के लिए तैयार नहीं हैं, अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले, लाखों समर्थकों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली। उन्हीं दिनों उन्होंने ‘भगवान बुद्ध और उनका धर्म’ शीर्षक से पुस्तक की रचना भी की थी। यह पुस्तक कई मायनों में मौलिक थी। 

अधिकांश विद्वानों ने गौतम बुद्ध के संन्यास को जीवन-जगत के प्रति उपजी निराशा की परिणति माना है। उनके अनुसार कपिलवस्तु के मार्गों से गुजरते हुए युवा सिद्धार्थ की नजर सबसे पहले बूढ़े, फिर एक बीमार व्यक्ति पर पड़ी। परिणामस्वरूप उनके मन में जीवन-जगत को लेकर निराशा पैदा होती है। उस निराशा से वे उबर भी नहीं पाए थे कि अगली बार एक व्यक्ति की शवयात्रा देखकर उनका मन संसार से पूरी तरह उचट गया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पूरा संसार ही दुखमय है। इसी से उनके मन में वैराग्य जन्म लेता है; और वे अर्धरात्रि में, बगैर किसी को बताए, पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को सोते हुए छोड़, घर से निकल पड़ते हैं। बुद्ध के संन्यास के बारे में हर जगह यही कहानी सुनने को मिलती है, जिससे बुद्ध और संसार के प्रति निराशाजनक तस्वीर बनती है। डॉ. आंबेडकर इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। उन्हें यह स्वीकार्य नहीं कि 29 वर्षीय राजकुमार सिद्धार्थ ने उससे पहले किसी बीमार, वृद्ध और मृत व्यक्ति का साक्षात ही न किया हो। बुद्ध द्वारा ‘बूढे-रोगी-मृत-साधु’ को देखकर घर छोड़ देने का विवरण त्रिपिटक साहित्य में भी नहीं है। इसलिए बुद्ध के गृह-निष्क्रमण संबंधी मान्यताओं का खंडन करते हुए वे लिखते हैं─‘जीवन स्वाभावतः दुख है, यह सिद्धांत बौद्ध धर्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है। यदि जीवन ही दुख है, मरण भी दुख है, पुनरुत्पत्ति भी दुख है, तब तो सभी कुछ समाप्त हो जाता है। न धर्म ही किसी आदमी को संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही। यदि दुख से मुक्ति ही नहीं है तो फिर धर्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी व्यक्ति को दुख से मुक्ति दिलाने के लिए क्या कर सकता है, क्योंकि जन्म ही स्वाभावतः दुखमय है।’1

अहिंसा और गणतंत्र के प्रति सकारात्मक रवैया तथा बुद्धिवादी दृष्टिकोण─बौद्ध धर्म की ये विशेषताएं उसे आधुनिक धर्म बनाती हैं। इन्हीं के कारण डॉ. आंबेडकर उसकी ओर आकर्षित हुए थे। उनके  अनुसार, ‘जो बात बुद्धि-संगत है, जो बात तर्क-संगत है─वही बुद्ध वचन है।’ इसलिए, ‘कोई भी ऐसी बात जिसका मानव कल्याण से कोई संबंध न हो, यदि भगवान बुद्ध के सिर मढ़ी जाती है तो उसे बुद्ध-वचन नहीं कहा जा सकता।’2

अश्वघोषकृत ‘बुद्धचरित’ तथा धम्मानंद कोसंबी से प्रेरणा लेते हुए वे बुद्ध के गृह-त्याग की नवीन व्याख्या करते हैं। तदननुसार शाक्यों के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था। रोहिणी नदी दोनों के बीच विभाजक रेखा थी। नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच संघर्ष चलता ही रहता था। समस्या के स्थायी समाधान हेतु शाक्यों ने सभा बुलाई। उसमें सेनापति ने कोलियों के राज्य पर हमला कर देने की सलाह दी। इसपर सिद्धार्थ ने सेनापति के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा─‘युद्ध से कभी किसी समस्या का हल नहीं होता। युद्ध छेड़ देने से हमारे उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण हो जाएगा….केवल अवैर से ही वैर शांत हो सकता है।’3

यह जानते हुए भी कि बहुमत सेनापति के साथ है, बुद्ध न केवल युद्ध के प्रस्ताव का विरोध करते हैं, बल्कि अनिवार्य सैन्य भर्ती को भी गैर-जरूरी बताकर युद्ध में शामिल न होने की घोषणा कर देते हैं। लगातार विरोध से नाराज सेनापति संघ के नियमों का हवाला देकर, सिद्धार्थ तथा उनके परिवार के सामाजिक बहिष्कार की धमकी देता है। इसपर वे परिवार को दंडित करने के बजाय, खुद नगर छोड़ देने का वचन देते हैं। पूरी बहस लोकतांत्रिक विमर्श का शानदार नमूना है। उसके माध्यम से आंबेडकर केवल बुद्ध के चरित्र का नवोन्मेष करते हैं, बल्कि पाठकों को लोकतांत्रिक विमर्श का महत्व भी समझा रहे होते हैं। केवल आंबेडकर जैसा तर्कवादी लेखक ही ऐसा कर सकता था।

बुद्ध के गृह-त्याग की यह व्याख्या इतनी अनूठी और क्रांतिधर्मी है कि उसने अनेक बौद्ध विद्वानों को भी नाराज कर दिया था। 1957 में जब यह पुस्तक पहली बार प्रकाशित होकर बाजार में आई तो न केवल भारत, अपितु विश्व के बौद्ध विद्वानों ने भी उसकी जोरदार आलोचना की थी। लोग यहां तक कहने लगे थे कि पुस्तक ‘बुद्धिज्म नहीं अबेंडकरिज्म है’। आरोप था कि बुद्ध ने अपनी बात की पुष्टि हेतु के लिए आवश्यक संदर्भ नहीं दिए हैं। बाद में जब उस पुस्तक का भदंत आनंद कौसल्यायन ने हिंदी अनुवाद को संदर्भ के साथ प्रकाशित कराया तो आलोचकों के मुंह बंद हो गए।

क्या धर्मांतरण अपरिहार्य था

ऊपर हमने हिंदू समाज में जातिवाद और छुआछूत की बुराई की चर्चा की। उन कारणों पर विचार किया, जिन्होंने डॉ. आंबेडकर को हिंदू धर्म छोड़ने पर विवश किया था। उसके बाद बौद्ध धर्म की उन विशेषताओं की चर्चा भी की, जिन्होंने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित किया था। सवाल है कि क्या बौद्ध धर्म को अपनाना उतना ही अपरिहार्य था? हिंदू धर्म की जिन बुराइयों से बचने के लिए उन्होंने उसका त्याग किया था, क्या बौद्ध धर्म उनसे सर्वथा मुक्त रह सका? ‘भगवान बुद्ध और उनका धम्म’ में डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की जिन विशेषताओं को रेखांकित किया, जरूरत पड़ने पर उनकी मौलिक व्याख्या की लोकतांत्रिक छूट भी ली थी─उनकी प्रेरणा से बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित उन मूल्यों को कितना आत्मसात कर पाए? बौद्ध धर्म को अपना चुके दलित क्या जातिभेद की भावना से मुक्त हो पाए? यदि हिंदू धर्म ब्राह्मणवादी राजनीति का औजार रहा है तो क्या बौद्ध धर्म अतीत में दलित राजनीति तथा वर्तमान में बहुजन राजनीति का औजार नहीं है? उत्तर में कहा जा सकता है कि यह कांटे से कांटा निकालने की युक्ति है। लेकिन क्या इससे बुद्धिवाद और लोकतंत्र, जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्ति के कारगर औजार हो सकते हैं─की उपेक्षा नहीं हो रही है? धर्म के समानांतर दूसरे धर्म को खड़ा करने का ही दुष्परिणाम है कि बीते वर्षों में भारतीय राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर अनेक हमले हुए, तो दलित-बहुजन उसके विरुद्ध बड़ा मोर्चा नहीं खोल पाए।    

यह ठीक है कि बुद्ध ने जातिभेद को नकारा। भिक्षु-विहारों में सभी जाति-वर्ग के लोगों को शामिल होने की अनुमति थी। प्रवज्या ग्रहण करने वालों में उपालि(नाई), सुणीत(वाल्मीकि), सोपाक तथा सुप्पिय(अछूत), सुमंगल(अतिशूद्र), प्रकृति(चांडाल) के अलावा अंगुलिमाल जैसे डाकू भी शामिल थे।  इसके बावजूद यह भी सत्य है कि बुद्ध को केवल जाति और वर्ण-व्यवस्था पर आधारित भेदभाव से शिकायत थी। समाज में जाति और वर्ण के आधार पर विभाजन की पद्धति समाप्त हो, इसे लेकर बुद्ध का कोई निर्देश नहीं है। बुद्ध द्वारा मना करने के बावजूद भिक्षु संघों में जातिभेद कायम था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म के रास्ते सभी जाति-वर्गों के लिए खोल देने के बावजूद बहुत कम शूद्रातिशूद्र, मात्र 8 प्रतिशत उसकी ओर आकर्षित हुए थे। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों की कहानियां दी गई हैं। उनमें बुद्ध के विभिन्न जातियों में पुनर्जन्म लेने के उल्लेख है। लेकिन उनमें जितना उल्लेख ब्राह्मणों का हुआ है, उतना किसी और जाति का नहीं। अपने पूर्वजन्मों में खुद बुद्ध भी सबसे ज्यादा बार ब्राह्मणों के घर ही जन्म लेते हैं।

पीछे संकेत किया गया है कि डॉ. आंबेडकर जैसी विलक्षण प्रतिभा, ऐसे विद्वान के लिए जो ज्ञान तक पहुंचाने वाली संश्लेष्णात्मक और विश्लेषणात्मक, दोनों प्रकार की प्रविधियों में दक्ष हो, को सदाचारी और नैतिक बने रहने के लिए, जिसे धर्म का उद्देश्य बताया जाता है─बौद्ध धर्म या किसी भी अन्य धर्म की कतई आवश्यकता नहीं थी। वे कबीर और रैदास की संत-परंपरा से निकले थे, जो हर तरह के कर्मकांड को ललकारने की साहस रखती थी। मुझे लगता है कि धर्मांतरण संबंधी घोषणा के मूल में ‘बुद्धत्व’ के प्रति विश्वास से अधिक, हिंदू धर्म को छोड़ देने की अपनी वर्षों पुरानी घोषणा का दबाव था। संभव है इसके पीछे हिंदू धर्म के चंगुल में फंसे लाखों-करोड़ों बहुजनों को निकालने का संकल्प भी रहा हो। कदाचित वे सोचते थे हजारों वर्षों से आस्था के गुलाम रहे बहुजनों के हाथ से धर्म की बैशाखी एकाएक छीन लेना, उचित न होगा। इसलिए धर्मांतरण के पक्ष में लिया गया उनका निर्णय आस्था और विश्वास का विषय न होकर, राजनीतिक था। धर्मांतरण के स्थान पर यदि वे धर्म को ही त्याग देने का फैसला करते तो वह युगांतरकारी कदम होता। बुद्ध के समय में भी निचली जातियाँ आजीवक दर्शन में विश्वास रखती थीं।

गौरतलब है कि ब्राह्मणों के लिए भी धर्म मूलतः राजनीति है, जो उनके विशेषाधिकारों का संरक्षण करती है। किंतु अशिक्षित समाज जब सामान्य राजनीति को नहीं समझ पाता तो धर्म के नाम पर चली जाने वाली राजनीति की महीन चालें वह भला कैसे समझ पाता! अधिसंख्यक बहुजनों के धर्मांतरण का महत्व एक नाव से दूसरी नाव में सवार हो जाने जितना है। यही कारण है कि दलित और बहुजन राजनीति के शोर-शराबे के बावजूद बौद्ध धर्म की प्रगति पूरी तरह ठहरी हुई है। 1951 में भारत में बौद्धों की संख्या मात्र 0.05 प्रतिशत थी। डॉ. आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद, 1961 में कुल जनसंख्या का 0.74 प्रतिशत बौद्ध धर्मावलंबी थे। 1991 में वे बढ़कर 0.76 प्रतिशत हो गए। उसके बाद उनका जनसंख्या-अनुपात निरंतर गिर रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार दलितों की कुल जनसंख्या 20.14 करोड़ थी। उनमें से मात्र 84.43 लाख, लगभग 0.70 प्रतिशत ने खुद को बौद्ध घोषित किया था। नए-नए बने बौद्धों में से 87 प्रतिशत अछूत जातियों से थे।

समाधान क्या हो?

उपर्युक्त आंकड़ों से साफ है कि हिंदू धर्म की ब्राह्मणवादी राजनीति का सामना बौद्ध धर्म से करने का प्रयोग असफल सिद्ध हो चुका है। वैसे भी हर धर्मसत्ता की कोई न कोई केंद्रीय शक्ति होती है, जो मानव स्वभाव के लोकतांत्रिकरण का निषेध करती है। उससे मनुष्य और समाज दोनों के प्रबोधीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है। इसलिए जिन्हें बौद्ध धर्म या किसी और धर्म में आस्था है, वे उस धर्म का चयन करें। लेकिन जिन्हें समाज में व्याप्त असमानता, असुरक्षा, सामाजिक भेदभाव आदि से शिकायत है, जो मनुष्य को अधिकाधिक स्वतंत्र और खुशहाल देखने चाहते हैं─उनके लिए अच्छा होगा कि वे बुद्धिवादी बनें, आधुनिक जीवन मूल्यों को अपनाएं जिनकी व्याख्या भारतीय संविधान में मौजूद है। अन्यथा वे कभी धर्म, कभी जाति, कभी अर्थ तो कभी राजनीति की राजनीति का शिकार होते ही रहेंगे।

ओमप्रकाश कश्यप

  1. डॉ. आंबेडकर, भगवान बुद्ध और उनका धर्म, बुद्धभूमि प्रकाशन, नागपुर, अनुवाद भदंत आनंद कौसल्यायन,  1997, पृष्ठ 28।
  2. उपर्युक्त, पृष्ठ-279।
  3. उपर्युक्त, पृष्ठ-279।

रूढ़ियों के शिकार धर्म-दर्शन

सामान्य

आधुनिकता की ओर बढ़ती आज की दुनिया के आगे सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न है—क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना दुनिया का कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं। धर्मानुयायी मानते हैं कि उनके आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते। धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे  समझना आसान नहीं है। इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेति-नेति’ कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचना-समीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मान लिया जाता है। असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, अथवा किसी न किसी बहाने उनपर थोप दी गई हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते। न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा को लांघने की हिमाकत करे। हम धर्म को ऐसी हवेली मान सकते हैं, जिसके अनेकानेक दावेदार हैं। कदाचित इसी कारण वह हजारों वर्षों से बंद है। ताजी हवा का प्रवेश उसमें निषिद्ध है। उसके भीतर झांकने की इजाजत तक किसी को नहीं है। यदि कोई उस हवेली के भीतर जाकर झाड़-पौंछ करना चाहे तो उसके दावेदार नाराज हो जाते हैं। डरते हैं कि हवेली साफ हुई तो उनकी सत्ता गई। बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए वे कई बार इतनी कुटिल चालें चलते हैं कि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली उनके आगे घुटने टेक देते हैं। जनसाधारण को बस इतनी अनुमति होती है कि अपने विवेक को गिरवी रखकर उस हवेली के दूर से ही दर्शन कर सके।

ऐसा आज से नहीं, सैकड़ों वर्षों से है। मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण मीमांसक कुमारिल भट्ट हैं। अपने समय के विलक्षण प्रतिभाशाली कुमारिल भट्ट ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। बौद्ध पराजित हुए। लेकिन कुमारिल भट्ट अपनों से हार गए। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें धीमी आंच में तपकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की अनुमति लिए बिना बौद्धमत का अध्ययन किया था। हिंदू धर्म में व्याप्त जड़ता, गुरुडम तथा नए और समकालीन ज्ञान-विज्ञान से जान-बूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए यहाँ उनकी विशेष चर्चा प्रासंगिक है।

शंकराचार्य से एक पीढ़ी, लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे। उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था। कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है। वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी। राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी। बौद्ध दर्शन सनातन वर्ण-व्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था। द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था। समानता आधारित दर्शन के कारण बौद्ध दर्शन का प्रभाव, भारत के अलावा आसपास के देशों पर भी था। राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं। अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक परंपरा के ग्रंथों के अध्ययन-अनुशीलन में लगे थे। गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे। वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी। उसने रोते-रोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

‘क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

‘हे सुकुमारे! रो मत!! वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा।’1 

राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला। कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्म-दर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्म-दर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था। लक्ष्य-सिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया। तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म-दर्शन की जमकर आलोचना की। यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया। लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही। इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया। बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्ति-कथा लिखी। इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं।

कहते हैं कि वेदांत की ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशी-मार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे। अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे। उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था। उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया। कुमारिल भट्ट को अग्नि-शैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए। धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसाद-जनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्नि-चिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्महत्या का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्म-ग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए। लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे। धार्मिक वाद-विवाद प्रायः जीवन-मरण का सवाल बन जाता था। ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था। शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र, वेदांती सुरेश्वराचार्य बनकर उसके प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। उसके बाद मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है।

इस प्रसंग के कुछ खास संकेत हैं। पहला प्राचीन गुरु नहीं चाहते थे कि उनका शिष्य ज्ञान और यश में उनसे आगे जाए। दूसरे प्राचीन ऋषियों के लिए बौद्धिक शास्त्रार्थ शारीरिक कुश्ती से भी गया-गुजरा था। कुश्ती में हारा हुआ पहलवान नई तैयारी और हौसले के साथ उसी पहलवान को दुबारा चुनौती दे सकता है। लेकिन शास्त्रार्थ में विजेता, पराजित व्यक्ति के तन और मन दोनों पर अधिकार जमा लेता था। व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी। केवल विजेता का धर्म रह जाता है। कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी।

2

जैन और बौद्ध धर्म-दर्शन इसके अपवाद थे। यहाँ जैन दर्शन की तो हमें खास तौर पर प्रशंसा करनी होगी। वैदिक हिंसा और गलाकाट बौद्धिक स्पर्धा के बीच उसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा था। वह विभिन्न विचारों को स्वतंत्र रूप से, एक-दूसरे के समानांतर बहने की अनुमति देने का उदारतापूर्ण विधान था। इसके अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है। प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है। वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता। चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है। वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है। ‘स्याद्वाद’ का दर्शन, वैदिक दर्शन की वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था। लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे; और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था। ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्व न था। अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया।

‘स्याद्वाद’ से पता चलता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था। उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं। उनमें कोई द्वैष न हो। यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा। मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका। यह बात भुला दी गई कि हिंसा प्रधान समाज में वैचारिक अहिंसा का टिके रहना असंभव है। वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक, ‘स्याद्वाद’ जैसे दर्शन के कमजोर पड़ने का परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने न केवल दूसरे विचारों की ओर से अपने आँख-नाक-कान बंद कर लिए, अपितु गैर-ब्राह्मण उनके धर्म-ग्रंथों के पढ़ न पाएँ, इसके लिए भी उनपर बड़े-बड़े प्रतिबंध थोप दिए।

हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं। हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्नि-शिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ। शायद उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो; यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! यह भी संभव है कि  वेदोक्त धर्म-दर्शन के शीर्ष-पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा के साथ निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हों, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके। इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की। आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोल-मोल कर जाते हैं। हिंदू परंपराओं के जानकार के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्व देती है। उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है। उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती।

3

यहां एक किस्सा याद आ रहा है। बताते हैं कि रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था। मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

‘बहुत पवित्र मंत्र है। जिसे बताओगे वह तर जाएगा।’

‘जी….गुरु जी।’ रामानुज ने गुरु का धन्यबाद किया।

‘लेकिन एक शर्त है। इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना।’

‘अपात्र कौन?’

‘शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है।’

‘यदि मैं ऐसा करूं तो….’

‘घोर पाप….घोर पाप। सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए। रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया। गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्र-अपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा। गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तब रामानुजाचार्य ने कहा—

‘आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

‘मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

‘यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौ-सौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है।’ रामानुज का उत्तर था।

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं। लेकिन उनके साथ अप्रत्यक्ष स्पर्धा में जीत शंकराचार्य की हुई थी। कैसे? रामानुज विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्त्तक थे, और शंकराचार्य अद्वैत के। रामानुज मानते थे कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, मगर संसार में आकर उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है। शंकराचार्य आत्मा और परमात्मा को एक मानते थे। ब्राह्मणों ने घोषित रूप से शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया। इस्लाम के सूफीवाद की और से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए यह जरूरी था। किंतु आत्मा और परमात्मा एक हैं, इस आधार पर सभी मनुष्य बराबर हैं—इस सत्य को वे कभी गले से नहीं उतार पाए।  

हम यह नहीं कहते कि रामानुज का विशिष्टाद्वैत आदर्श दर्शन है। असल में न तो स्वर्ग होता है, न ही नर्क। मुक्ति स्वयं एक मिथ है। अतएव ऊपर दी गई कहानी को उसकी प्रतीकात्मकता, यानी सामाजिक संदर्भों में समझना चाहिए। कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय हो सकता है, और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है। पूर्ण नैतिकता तब होगी जब बाकी सब लोग, व्यक्ति विशेष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की ठान लें।

अपने मान-अपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे मनीषी की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते। मगर परंपरा से भयभीत शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं। बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक और क्रांतिकारी यशपाल ने खूब समझा था। वे लिखते हैं—

‘कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे। पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था….द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाले बौद्ध दर्शन की सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग—द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है। अतः बौद्ध दर्शन से ‘फाइट’ करना आवश्यक है।’2 

कुमारिल भट्ट के प्रायश्चित की घटना द्वारा हम, न केवल उनकी मनोरचना, अपितु तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान को  भी समझ सकते हैं। उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभी-कभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है। बताते हैं कि नालंदा में बौद्ध दर्शन के अध्ययन के लिए कुमारिल भट्ट ने छद्म नाम से प्रवेश लिया था। वहां के विद्यार्थियों को जब पता चला तो वे बहुत कुपित हुए। उन्होंने कुमारिल को सबक सिखाने की ठान ली। कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें विश्वविद्यालय की छत से फैंकने का निश्चय किया।  बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे। बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यही मुख्य वजह थी। जब वे लड़के उन्हें कुमारिल को ढकेलने जा रहे थे तब उन्होंने उन सभी को सुनाते हुए कहा था—‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी।’

संयोगवश वे सकुशल बच गए। उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं। वह विवेक पर  अंधश्रद्धा की जीत थी। आत्मदहन से पहले कुमारिल भट्ट ने विपुल वाङ्मय की रचना की थी। लेकिन विलक्षण मेधा के बावजूद वे मीमांसा दर्शन को वह सम्मान दिलाने में नाकाम रहे, जिसके वे आचार्य थे। जिसके लिए उन्होंने बौद्धों को पराजित करने की कामना के साथ गुरु-द्रोह किया था। मंडन मिश्र के पराजित होते ही मीमांसा दर्शन लगभग पूरी तरह उखड़ गया। बाद में ब्राह्मणों ने उनके प्रायश्चित का खूब महिमामंडन किया। उससे दर्शन में विचार को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह लगातार कम होता गया। उसके स्थान पर कर्मकांड और रूढ़ियां अपनी पकड़ बनाते गए।

4

शब्द की कसौटी शब्द; और विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है। बावजूद इसके चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से किसी विचार या वस्तु को प्रमाणित करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बहुत पुरानी है। रूढ़ियों को विचारधारा का रूप देने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण भी कई हैं। कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था। तरकीब निराली थी। यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था। अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जल-समाधि के लिए छोड़ दिया जाता था। समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी। लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था। बाद में उस तालाब को पाट दिया गया। इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिए गए। बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं। अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल, पूर्ण कस्सप जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे। वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था। इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र ग्रंथ हमें प्राप्त नहीं होता। इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है।

संवैधानिक व्यवस्थाओं और लोकतंत्र के इस दौर में होना तो यह चाहिए कि हम इतिहास से कुछ सबक लें, किंतु विचार के नाम पर जड़ता और धर्म-दर्शन के नाम पर असहिष्णुता निरंतर बढ़ती ही जा रही है। शायद ऐसी ही परिस्थितियां डॉ.  आंबेडकर की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ लिखने की प्रेरणा बनी थीं।

ओमप्रकाश कश्यप 

1.   किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. —यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ से उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

2 .   यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, 431।

भगतसिंह : एक क्रांतिकारी की विचारयात्रा

सामान्य

देशभक्ति के लिए यह(फांसी) सर्वोच्च पुरस्कार है। मुझे गर्व है कि मैं यह पुरस्कार पाने जा रहा हूं। वे सोचते हैं कि मेरे पार्थिव शरीर को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जाएंगे। यह उनकी भूल है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी भावनाओं को नहीं कुचल सकते। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मंडराते रहेंगे, जब तक वे यहां से भागने के लिए मजबूर न हो जाएं।’─भगतसिंह, 27 जुलाई 1930।

भारतीय स्वतंत्रता लंबे संघर्ष का परिणाम है। उसके लिए लाखों बलिदानियों ने मौत को खुशी-खुशी गले लगाया था तो उससे कहीं ज्यादा ने कठोर यातनाएं सही थीं। देश उन सबका ऋणी है। उनमें से किसी के भी बलिदान को छोटा या बड़ा कहना स्वतंत्रता की अवमानना करने जैसा है। किंतु आजादी की खातिर जान कुर्बान कर देने वालों में से यदि किसी एक को आदर्श बलिदानी रूप में चुनने को कहा जाए, तो निस्संदेह वे भगतसिंह होंगे। इसलिए नहीं कि मात्र 23 वर्ष की अवस्था में उन्होंने खुशी-खुशी फांसी के फंदे को चूम लिया था। न इसलिए कि उन्होंने असंबेली में बम फेंका था, और न ही इसलिए कि उन्होंने ‘इन्कलाब जिंदाबाद’जैसा नारा बुलंद किया था─जिसे लगाते हुए हजारों-लाखों स्वतंत्रता प्रेमी औपनिवेशिक सत्ता के समक्ष छाती तानकर खड़े हो गए थे। अपितु इसलिए कि उन्हें न केवल भारतीय समाज की विकृतियों तथा अंग्रेजों के साम्राज्यवादी चरित्र की सही-सही पहचान थी, बल्कि भविष्य के भारत की सम्यक रूपरेखा भी उनके पास थी। लोकहित के लिए क्रांति को सही-सही परिभाषित करने में जितना योगदान भगतसिंह का है, उतना किसी और का नहीं है।

कहावत है कि जीवन लंबा नहीं, महत्वपूर्ण होना चाहिए─भगतसिंह ने इसे चरितार्थ कर दिया था। मात्र 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने जो प्राप्त किया, उतना इतनी कम वयस् में शायद ही कोई प्राप्त कर सका। यही कारण है कि उनके बलिदान ने जहां गांधी को संपादकीय लिखने के लिए विवश कर दिया था, वहीं डॉ. आंबेडकर तथा सुदूर दक्षिण में आंदोलनरत रामासामी पेरियार ने भी, अपनी-अपनी तरह से उनके योगदान की सराहना की थी। भगतसिंह की जीवनयात्रा, एक स्वप्न-दृष्टा युवक के महान क्रांतिकारी बनने की कथा है। ऐसा युवक जो अपने देश और समाज के लिए सोचता है। उनके मान-सम्मान, आजादी तथा अस्मिता की सुरक्षा हेतु संघर्ष करता है। ऐसा व्यक्ति जो समाज से जितना ग्रहण करता है, उससे कहीं ज्यादा परिमाण में वापस लौटा देता है। 

1923 में विद्यार्थी जीवन में ही घर छोड़कर, खुद को ‘मकसदे आला….आजादी-ए-हिंद के असल के लिए वक्फ’ कर देने के साथ उनका क्रांतिकारी जीवन आरंभ होता है। उनके लेखन के उत्तरोत्तर विकास से उनके क्रांतिकारी जीवन की यात्रा को समझा जा सकता है। देशभक्ति और क्रांति का पाठ उन्हें परिवार से ही मिला था। दादा सरदार अर्जुन सिंह बड़े जमींदार थे। 80 वर्ष से ज्यादा की उम्र में भी वे राष्ट्रवादी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। सरदार अर्जुन सिंह के भाई सरदार बहादुर दिलबाग सिंह सरकारी कर्मचारी थे; और सरकार की ओर से कई पुरस्कार ले चुके थे। भगतसिंह की दादी श्रीमती जय कौर घरेलू होने के साथ-साथ बहादुर महिला थीं। परिवार में राष्ट्रवादी नेताओं तथा क्रांतिकारियों का नियमित आना-जाना था। एक बार पुलिस प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूफी अंबाप्रसाद को गिरफ्तार करने उनके घर पहुंची। तब श्रीमती जय कौर ने बुद्धिमानी और साहस के साथ हालात को संभालकर पुलिस को बैंरग लौटने को मजबूर कर दिया था।

भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह पंजाब के बड़े किसान नेता थे। वे ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन के मुख्य सूत्रधारों में से थे। परिणामस्वरूप सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करके बर्मा की मांडले जेल भेज दिया था। लाला लाजपतराय भी वहीं थे। लेकिन अजीत सिंह की लोकप्रियता ऐसी थी कि गिरफ्तारी के बाद जनता भड़क उठी। जनाक्रोश ऐसा उमड़ा कि सजा पूरी होने से पहले ही, सरकार को उन्हें रिहा कर देने का आदेश देना पड़ा। बाद में वे विदेश जाकर आजादी के आंदोलन को मजबूत करने के लिए काम करने लगे। वे गदर पार्टी से जुड़े, 1946 में सुभाषचंद बोष के संपर्क में भी आए तथा उनके संघर्ष को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह तथा एक और चाचा सरदार स्वर्ण सिंह भी, भड़काऊ भाषण देने के आरोप में जेल की सजा प्राप्त कर चुके थे। इस तरह क्रांति का पहला सबक भगतसिंह को अपने परिवार से ही प्राप्त हुआ था।

यह प्रभाव इतना गहरा था कि 1924 में भगतसिंह ने ‘पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या’ शीर्षक भाषण लिखा तो वह केवल भाषा, लिपि और अनुवाद की समस्या तक सीमित नहीं था। उस पर शुरू से अंत तक, भगतसिंह को विरासत में मिले संस्कार हावी थे। भाषण उन्होंने ‘पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के आमंत्रण पर लिखा था। सम्मेलन द्वारा आयोजित भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने पर उन्हें 50 रुपये का पुरस्कार भी मिला था। उस भाषण में वे दक्ष भाषाविद की तरह तर्क देते हुए पंजाबी को ‘हिंदी-लिपि’ में लिखने की सलाह देते हैं। हालांकि अंतिम फैसला विद्वानों पर छोड़ देते हैं। लेख में वे जगह-जगह सामाजिक क्रांति के संदर्भ में साहित्य की भूमिका को रेखांकित करते हैं। एक जगह उन्होंने स्वामी रामतीर्थ द्वारा गाए जाने वाले प्रयाण गीत को उद्धृत किया है, जो बूढ़े दिलों में भी जोश भर देने का सामर्थ्य रखता है─

‘हम रूखे टुकड़े खाएंगे, भारत पर वारे जाएंगे।

हम सूखे चने चबाएंगे, भारत की बात बनाएंगे

हम नंगे उमर बिताएंगे, भारत पर जान मिटाएंगे।

मात्र 17 वर्ष की अवस्था में वे जिस तरह दुनिया-भर के क्रांतिकारी आंदोलनों को याद करते हैं, उससे उनके विशद् अध्ययन का अनुमान लगाया जा सकता है─

‘शायद गैरीबाल्डी को इतनी जल्दी सेनाएं न मिल पातीं, यदि मैजिनी ने 30 वर्ष देश में साहित्य तथा साहित्यिक जागृति पैदा करने में ही न लगा दिए होते….रूसो, वाल्तेयर के साहित्य के बिना फ्रांस की राज्य-क्रांति घटित न हो पाती। यदि टाल्सटाय, कार्ल मार्क्स तथा मैक्सिम गौर्की आदि ने प्रगतिशील साहित्य रचने में वर्षों न लगाए होते, तो रूस की क्रांति सफल न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार तो दूर रहा।’

वस्तुतः वे भगतसिंह के लिए ‘भगतसिंह’ बनने के दिन थे। उनकी पढ़ने में रुचि तो बचपन से ही थी। कॉलेज में दाखिला लेने के बाद किताबों की भूख और ज्यादा भड़क चुकी थी। लाहौर के अनारकली बाजार में स्थित ‘रामकृष्ण एंड संस’ नामक किताबों की दुकान, भगतसिंह तथा उनके साथियों का पसंदीदा ठिकाना थी। दुकान पर जब्तशुदा पुस्तकें भी मिल जाया करती थीं। अच्छी पुस्तकें मिलने का एक और ठिकाना थी─लाला लाजपतराय की ‘द्वारकादास लाइब्रेरी’। उसमें रूसी साहित्य और राजनीति पर पुस्तकों का खासा भंडार था। जिस नेशनल कॉलेज में भगतसिंह पढ़ते थे, उसका पुस्तकालय भी समृद्ध था। वहां वैचारिक पुस्तकों का बहुमूल्य खजाना था। इटली, रूस, आयरलेंड की क्रांतियों से संबंधित अनेक पुस्तकें लाइब्रेरी में उपलब्ध  थीं। उनमें से बहुत-सी पुस्तकें भगतसिंह के आग्रह पर ही मंगवाई गई थीं। भगतसिंह के पुस्तक प्रेम के बारे में ‘द्वारकादास लाइब्रेरी’ के संचालक राजाराम शास्त्री का कहना था─

‘भगतसिंह वस्तुतः पुस्तकों को पढ़ता नहीं निगलता था। फिर भी उसकी ज्ञान-पिपासा सदा अनबुझी ही रहती थी। वह पुस्तकों के नोट्स बनाता, अपने साथियों के साथ विचार-विचार करता, अपनी समझ को नए ज्ञान की कसौटी पर आत्मालोचनात्मक ढंग से परखने का प्रयास करता था।’

महान क्रांतिकारी अपने लक्ष्य को देश-प्रदेश की सीमाओं में बांधकर नहीं रखता। उसके सरोकार मानवीय होते हैं, इसलिए उसके दायरे में संपूर्ण मनुष्यता आ जाती है। भगतसिंह का भी एक आदर्शलोक(यूटोपिया) था। एक लक्ष्य जिसे वे क्रांति के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे। उनका आदर्शलोक किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं था। पूरी दुनिया उसमें शामिल थी─

‘सभी अपने हों, कोई भी पराया न हो। कैसा सुखमय होगा वह समय जब संसार से परायापन सर्वथा नष्ट हो जाएगा। जिस दिन यह सिद्धांत समस्त संसार में व्यावहारिक रूप में परिणित होगा, उस दिन संसार को उन्नति के शिखर पर कह सकेंगे….उस दिन इतनी शक्ति होगी कि ‘शांति-शांति’ की पुकार भी शांति भंग नहीं कर सकेगी। भूख लगने पर रोटी के लिए किसी को भी चिल्ल-पौं मचाने की आवश्यकता नहीं हुआ करेगी। व्यापार उस दिन उन्नति के शिखर पर होगा। परंतु फ्रांस और जर्मनी में व्यापार के नाम पर घोर युद्ध न हुआ करेंगे। उस दिन अमेरिका और जापान दोनों होंगे, परंतु उनमें पूर्वीपन और पश्चिमीपन न होगा….शांति होगी, किंतु पीनलकोड की आवश्यकता न होगी। अंग्रेज भी होंगे और भारतवासी भी, मगर उनमें गुलाम और शासक का भाव न होगा….उस समय होगी पूर्ण स्वतंत्रता।’

ऐसा था उस 17 वर्ष के युवा का दर्शन। ऐसी उम्र में जब अधिकांश युवती-युवक तरुणाई के सपने देखते हैं, विपरीत लिंगी के साथ प्यार और मनुहार की पींगें बढ़ाते हैं, भगतसिंह के युवा सपनों में पूरी मनुष्यता समाहित थी। लेखन-पत्रकारिता के आरंभिक दौर में वे भूले-बिसरे क्रांतिकारियों और जनविद्रोहों को याद करते है। निहिलिज्म, अनार्किज्म, समाजवाद, साम्यवाद जैसे राजनीतिक दर्शनों पर अपनी समझ को न केवल पुख्ता करते हैं, अपितु लोगों को उनके बारे में समझाते भी हैं। जिन राजनीतिक दर्शनों पर उन दिनों बहस छिड़ी हुई थी, उनमें ‘अराजकतावाद’ भी था।

विगत शताब्दियों में जिन शब्दों का सर्वाधिक अर्थ-विरूपण किया गया है, उनमें से एक ‘अराजकता’ भी है। ‘अराजकतावाद’ के उत्स की खोज हमें यूनानी दार्शनिक जीनो और चीनी विचारक लाओत्जे तक ले जाती है। आधुनिक विद्वानों में प्रूंधों को इसका पितामह माना जाता है। कार्ल मार्क्स का साथी रूसी दार्शनिक मिखाइल बकुनिन भी अराजकतावादी था। मार्क्स जहां वर्ग संघर्ष में विश्वास रखता था और बुर्जुआ शासन को हटाकर, सर्वहाराओं के शासन का सपना देखता था, वहीं बकुनिन किसी भी प्रकार के राज्य को मनुष्य की स्वतंत्रता के लिए बाधक मानता था। आरंभ में भगतसिंह का रुझान भी अराजकतावादी था। 1928 में उन्होंने ‘किरती’ में ‘अराजकतावाद’ पर एक लेखमाला आरंभ की थी, जिसमें उन्होंने साम्यवाद और समाजवाद की तुलना में ‘अराजकतावाद’ को ‘सबसे ऊंचा और आदर्श’ बताया था। भगतसिंह की उक्त लेखमाला में तीन लेख शामिल थे। उन्होंने लिखा था─

‘जिस आदर्श स्वतंत्रता की कल्पना की जाती है, वह पूर्ण स्वतंत्रता है।’ उसमें न ईश्वर, धर्म, निजी संपत्ति, धर्म और जाति संबंधी विशेषाधिकारों तथा शासन-प्रशासन के प्रतिबंधों के लिए कोई स्थान नहीं है। मानव मात्र की अधिकतम स्वतंत्रता के लिए अराजकतावाद मोटे तौर पर जिन शक्तियों को पूरी तरह खत्म कर देना चाहता है, उनमें पहली है─चर्च, भगवान और धर्म। दूसरी स्टेट(राज्य और सरकार) तथा तीसरी निजी संपत्ति।’

 अराजकतावादियों के अनुसार राज्य संकेन्द्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतिनिधित्व करता है। उसका अस्तित्व हिंसा पर टिका होता है। व्यक्ति के पास आत्मा होती है, चूंकि राज्य आत्मा-विहीन तंत्र होता है, इसलिए उसे हिंसा से विरत कभी नहीं किया जा सकता। शांति-व्यवस्था के नाम पर ज्यों-ज्यों कानून सख्त होते हैं त्यों-त्यों भ्रष्टाचार बढ़ता है। अराजकतावादी मानवमात्र की अधिकतम स्वतन्त्रता हेतु राज्य के विलोपन को जरूरी मानते हैं। कहने को तो गांधी ने भी जब-तब खुद को अराजकतावादी घोषित किया था। वे सरकार को अनिवार्य बुराई मानते थे। मगर गांधी द्वारा खुद को ‘अराजकतावादी’ कहना, उनका अपने ही मुंह खुद को दलितों का सबसे बड़ा हितैषी होने का दावा करने जैसा था। बहरहाल, भगतसिंह द्वारा अराजकतावाद पर लिखे तीसरे लेख के दो संदर्भ विशेष उल्लेखनीय हैं। उनके बाद के अभियानों पर उन दोनों का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। लेख में उन्होंने अराजकतावादी पीटर क्रोप्टोकिन को उद्धृत किया है, जिसमें क्रांति का पूरा दर्शन समाहित है। मिखाइल बकुनिन के अनुयायी क्रोप्टोकिन ने कहा था─

‘कोई एक व्यावहारिक कार्य हजारों पर्चों से अधिक प्रचार कर सकता है। सरकार अपना बचाव करती है। वह बुरी तरह जलती और गुस्साती है। अवसर देख कुछ और लोग प्रतिरोध के लिए आगे आ जाते हैं। सरकार फिर दमन करती है, जो नागरिकों को विद्रोह के लिए उकसाता है। सरकार क्षुब्ध होती है। धीरे-धीरे उसमें अंतर्विरोध उभरने लगते हैं। सरकार अलग-अलग खानों में बंट जाती है। उनमें आपस में ही नोंक-झोंक होने लगती है। इससे जनता की मांगों को स्वीकारने में विलंब होता है। फलस्वरूप इन्कलाब की जंग शुरू हो जाती है।’

आगे वे फ्रांसिसी क्रांतिकारी आगस्ट वैलेंट(27 दिसंबर 1861─5 फरवरी, 1894) का उल्लेख करते हैं। वैलेंट ने 9 दिसंबर, 1893 को फ्रांसिसी संसद के निचले सदन में बम फैंका था। बम बहुत हल्का था, इसलिए कुछ ‘डिप्टियों’ के घायल होने के अलावा उससे कोई और नुकसान न हुआ। बाद में अदालत में सुनवाई के दौरान वैलेंट ने अपना जुर्म स्वीकारते हुए कहा कि ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत पड़ती है।’ ठीक यही शब्द 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली स्थित केंद्रीय विधानसभा में बम धमाके के बाद भगतसिंह ने भी कहे थे। अदालत ने वैलेंट को गिलोटीन पर चढ़ा दिया था। भगतसिंह को भी फांसी की सजा मिली थी।

भगतसिंह की वैचारिक-यात्रा उनके दो लेखों, ‘अछूत का सवाल’(जून 1928); तथा ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’(अक्टूबर 1931) के उल्लेख के बिना अधूरी मानी जाएगी। उस समय तक भारतीय समाज और राजनीति में अस्पृश्यों से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण हो चुके थे। हजारों वर्षों से शोषण और दमन का शिकार रहे शूद्र एवं दलित अपने अधिकारों के लिए एकजुट होने लगे थे। कुल जनसंख्या का पांचवा हिस्सा होने के कारण वे बड़ी राजनीतिक शक्ति भी थे। इसलिए उन्हें लुभाने के लिए इस्लाम, ईसाई आदि धर्मावलंबियों में होड़ मची हुई थी। ऐसे में भगतसिंह ने ‘विद्रोही’ उपनाम से ‘अछूत का सवाल’ शीर्षक से लेख लिखा था, जो ‘किरती’ के जून 1928 अंक में प्रकाशित हुआ था। वे अछूतों की समस्याओं को वर्गीय समस्या के रूप में देख रहे थे। लेख में उन्होंने मदनमोहन मालवीय जैसे कांग्रेसी नेताओं के दोगले चरित्र पर कटाक्ष किया था─

‘इस समय मालवीय जैसे बड़े समाज सुधारक, अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किए बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं!’

दलितों को गंदा और अपवित्र मानने वाली मानसिकता पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा था─‘वे गरीब हैं। गरीबी का इलाज करो। ऊंचे-ऊंचे कुलों के गरीब लोग भी कम गंदे नहीं रहते। गंदे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएं बच्चों का मैला साफ करने से अछूत नहीं जातीं।’ अस्पृश्यों को उनके आत्मगौरव की याद दिलाते हुए,  वे आगे लिखते हैं─

‘हम मानते हैं कि उनके(अछूतों के) अपने जन-प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें। हम तो कहते हैं कि उठो! अछूत कहलाने वाले असली जनसेवको तथा भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोविंद सिंह की फौज की असली ताकत तुम्हीं थे। शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही सब कुछ कर सके। जिस कारण उनका नाम आज भी जिंदा है। तुम्हारी कुर्बानियां स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं….लेंड एलिएनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी जमीन नहीं खरीद सकते….अपनी शक्ति को पहचानो और संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा….स्वतंत्रता की चाहत रखने वालों को गुलामी के विरुद्ध खुद विद्रोह करना पड़ना पड़ेगा….लातों के भूत बातों से नहीं मानते। संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुंह की ओर न ताको….तुम असली सर्वहारा हो। संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट कट जाएंगी। उठो और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आंदोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोये हुए शेरो, उठो! और बगावत खड़ी कर दो।’’ 

मुझे नहीं पता भारत के इतिहास में किसी गैर-बहुजन नेता ने इतना आवाह्नपरक भाषण दिया हो─‘मैं नास्तिक क्यों बना’ शीर्षक से एक और लेख है, जिससे भगतसिंह की विवेचनात्मक क्षमता का पता चलता है। 1930 में जिन दिनों भगतसिंह ने यह लेख लिखा, खुद को नास्तिक कहना आसान नहीं था। धर्म का भूत जनसाधारण के दिलो-दिमाग पर इस कदर सवार था कि धर्म-विहीन जीवन की संकल्पना ही उसके लिए असह् थी। हालांकि माधवाचार्य ने छह हिंदू दर्शनों में चार्वाक दर्शन को पहले स्थान पर रखा है; और चार्वाक दर्शन भारत का अकेला भौतिकवादी संप्रदाय नहीं था। इसके अलावा 62 भौतिकवादी दर्शनों का उल्लेख ‘दीघनिकाय’ में है, जो दर्शन बुद्ध के पहले से ही भारत में प्रचलित थे। बावजूद इसके इस देश में खुद को नास्तिक कहना सरल न था। असुर, राक्षस जैसे गालीनुमा विशेषण पुरोहित वर्ग में नास्तिक लोगों के लिए ही रचे थे। सार्वजनिक जीवन में तो खुद को नास्तिक घोषित करना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था। खुद को नास्तिक घोषित करने के बावजूद जिन दो नेताओं ने भरपूर लोकप्रियता बटोरी, और समाज को प्रभावित करने में सफल रहे, उनमें पहले भगतसिंह, दूसरे दक्षिण के रामासामी पेरियार थे। हालांकि भगतसिंह के लिए ‘नास्तिकता इतनी नई चीज नहीं थी।’ भगतसिंह के अनुसार उन्होंने ‘ईश्वर को मानना तभी बंद कर दिया था’ जब वे अज्ञात नौजवान थे। आस्था और विश्वास ने मनुष्य और मनुष्यता का कितना नुकसान किया है, इसे वे अप्टन सिंक्लेयर के उद्धृण द्वारा समझाते हैं─

‘मनुष्य को दैवी शक्तियों में विश्वास करने वाला बना दो और उसके पास धन-संपत्ति आदि जो कुछ भी सब लूट लो। वह उफ् नहीं करेगा, यहां तक कि अपने आप के लूटने में खुद आपकी मदद करेगा। धार्मिक उपदेशों और सत्ताधारियों की मिलीभगत से ही जेलों, फांसियों, कोड़ों तथा शोषणकारी सिद्धांतों का निर्माण हुआ है।’

भगतसिंह को पढ़ते हुए प्रायः मैं अपने स्कूली दिनों में पहुंच जाता हूं। उन दिनों एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें बालक भगतसिंह अपने पिता को खेतों में काम करते समय पूछता है कि ‘हम इन खेतों में बंदूकें क्यों नहीं बोते?’ उन दिनों बंदूक को ही क्रांति का अनिवार्य अस्त्र माना जाता था। स्कूल में एक अध्यापक महोदय हारमोनियम में रागनियां सुनाते थे। उक्त कहानी पर उन्होंने एक रागिनी तैयार की थी, जिसे वे तन्मय होकर सुनाते थे। आवाज इतनी ओजमय होती कि श्रोताओं के रोंगटे खड़े हो जाते। हर विद्यार्थी खुद को भगतसिंह समझने लगता था। लेकिन गांव के सामंती परिवेश में आपसी हिंसा को ही क्रांति समझ लिया जाता था। आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो हिंसा और क्रांति के बीच फर्क नहीं कर पाते और क्रांति को बंदूक के नजरिये से देखते हैं। जबकि भगतसिंह ने अपनी प्रतिष्ठा वैचारिक क्रांति के दम पर हासिल की थी। उनके विचारों में मौलिकता भले ही न हो, मगर जिन विचारों और मूल्यों पर उनका विश्वास था, उनके साथ वे न केवल ईमानदारी से जिए, बल्कि दिखा दिया कि कोई भी विचार ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य द्वारा अपने आचरण में उतार पाना असंभव हो।

‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में मार्क्स ने लिखा है─‘दार्शनिकों ने इस संसार की तरह-तरह से व्याख्या की है। मुख्य समस्या है कि इसे बदला कैसे जाए?’ क्रांति के दर्शन को अपने जीवन में उतारकर भगतसिंह सिद्ध कर देते हैं कि विशाल पृथ्वी; तथा अनंत आसमान के नीचे ऐसा कुछ नहीं जो असंभव हो। चलते-चलते उनके लेख ‘युवक’(मई 1925) की कुछ पंक्तियां, जो आज भी उतनी ही प्रेरणास्पद हैं, जितनी 95 वर्ष पहले थीं─

‘अलविदा, अलविदा मेरे सच्चे प्यार

सेनाएं आगे बढ़ चुकी हैं

प्रिय, यदि तुम्हारे पास और रुका

तो कायर कहलाऊंगा मैं।

ओमप्रकाश कश्यप

नोट : सभी उद्धृण भगतसिंह तथा उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज,’ संपादक सत्यम, राहुल फाउंडेशन, लखनऊ से।

सार्वजनिक उद्यमों का विनिवेशीकरण

सामान्य

निजीकरण के माध्यम से जातिवादी एजेंडे को साधने की कोशिश

आर्थिक मंदी से उबरने का सरकार को जो सबसे आसान तरीका नजर आता है, वह है विनिवेशीकरण। नीति-आयोग की ऑनलाइन बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योग-धंधे चलाना सरकार का काम नहीं है। वित्त-मंत्री भी बजटीय भाषण में विनिवेशीकरण का ऐलान कर चुकी हैं। फैसले की आलोचना कर रहे लोगों से प्रधानमंत्री का कहना है कि ‘निजी क्षेत्र की महत्ता से भली-भांति परिचित होने के बाद भी कुछ नेता, न केवल अप्रासंगिक हो चुके समाजवादी सोच से चिपके हुए हैं, बल्कि निजी क्षेत्र के उद्यमियों को खलनायक की तरह पेश करने का भी काम कर रहे हैं’1 पुनः 24 फरवरी को बजट पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था कि सरकार द्वारा संचालित उद्यमों के सुनियोजित निनिवेशीकरण द्वारा नागरिकों के विकास एवं रोजगार हेतु नए संसाधन प्राप्त होंगे। उस भाषण में उन्होंने 100 सरकारी उद्यमों के विनिवेशीकरण द्वारा 2.5 लाख करोड़ की धनराशि जुटाने की बात कही थी।2 इस लेख का उद्देश्य पाठकों को  पूंजीवाद और समाजवाद की बहस पर उलझाना नहीं है। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है कि ‘संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाने का संकल्प आज भी उस भारतीय संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा है, जिसकी शपथ लेकर हमारे मंत्री और सांसद, संसद भवन की शोभा बनते आए हैं।

2014 में जब यह सरकार सत्ता में आई थी, तो विकास सबसे बड़ा मुद्दा था। विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए मोदीजी अगले दो वर्षों तक इस देश से उस देश तक घूमते रहे। उन वर्षों में उन्होंने जितनी विदेश यात्राएं की थीं, वह स्वयं एक रिकार्ड है। यह बात अलग है कि अपेक्षित तो क्या न्यूनतम सफलता भी उन्हें इस काम में नहीं मिल सकी। इसके लिए कोई और नहीं, भाजपा के अपने ही नेता जिम्मेदार थे। खासकर वे नेता जिनके लिए हिंदुत्व का मुद्दा, देशहित के किसी भी मुद्दे से बढ़कर था। जीत के साथ ही वे हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने में जुट गए थे। उससे समाज में अशांति और असुरक्षा का वातावरण पनपा, जिसकी क्रूर परिणति मुजफ्फरनगर दंगे के रूप में हुई। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से सरकार का दूसरा ध्वंसात्मक कदम था─विमुद्रीकरण का फैसला। काले धन को बाहर निकालने के नाम पर उठाए गए उस कदम का वास्तविक उद्देश्य उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले विपक्ष को धराशायी कर देना था। कालाधन तो बाहर नहीं आया, उल्टे पुराने नोटों के स्थान पर नए नोट छापने में देश को अरबों रुपयों का चूना लग गया। सामाजिक अविश्वास, अशांति, निरंतर बढ़ते ध्रुवीकरण तथा विमुद्रीकरण के फैसले ने छोटे-उद्योगों और व्यापारियों की कमर तोड़कर रख दी। उसके बाद तो लोग विकास की उम्मीद छोड़, जो था उसी को बचाने की फिक्र करने लगे। ऐसा वातावरण पूंजीवादी कंपनियों के लिए, जो निवेश से पहले नए ठिकाने की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की भली-भांति पड़ताल करती हैं, उपयुक्त नहीं था। कोविड-19 के कारण फैली महामारी की शुरुआत में, चीन के निरंकुश आचरण से खिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने नए ठिकाने की तलाश शुरू कर दी थी। भारत उनके लिए वैकल्पिक ठिकाना हो सकता था। मगर बढ़ती सांप्रदायिकता के कारण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की खराब होती छवि ने भारत को उन अवसरों का लाभ उठाने से वंचित रखा।

सवाल है कि विनिवेशीकरण के मुद्दे से इस सबका क्या संबंध है? क्यों हम सरकार की कमजोरियां गिना रहे हैं? वस्तुतः देश आज जिस आर्थिक मंदी का शिकार है, उसके पीछे सरकार की नीतियों का बड़ा योगदान है। एक ओर जहां सरकार और जनसाधारण को आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह जूझना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इसी अवधि में देश के चुनींदा घरानों की पूंजी में बेइंतहा वृद्धि हुई है। मई 2014 में जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी, सेन्सेक्स 24,000 था। फ़िलहाल वह 50,000 के शिखर को पार कर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। इसका मोटा-मोटा संकेत यह है कि सात वर्ष से भी कम समय में, देश के शीर्ष पूंजीपति घरानों के खजाने में दो गुने से ज्यादा की वृद्धि हुई है। दूसरी ओर मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से भारत 189 देशों में 2014 में भी 131वें स्थान पर था, आज भी वहीं टिका है। साफ है सरकार की नीतियों का जितना लाभ पूंजीपतियों और सरमायेदारों को मिला, उतना छोटे-उद्यमियों, व्यापारियों और आम आदमी को नहीं मिल पाया है। साफ है पूंजी का निचले वर्गों से ऊपर की ओर प्रवाह हुआ है; और जो मंदी है वह पैदा की हुई है। यह अन्यथा नहीं है कि देश के शीर्ष उद्योगपति वर्तमान सरकार से ज्यादा आशान्वित हैं। वे चाहते हैं कि सरकार विनिवेशीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाए।

सवाल उठता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम यदि लाभ नहीं कमा रहे हैं, सरकार के अनुसार उन्हें चलाए रखने के लिए हर वर्ष करीब 400 अरब रुपये का घाटा उठाना पड़ता है─तब उन्हें चलाए रखने का फायदा क्या है? पहली बात तो यह कि यह रकम उससे बहुत कम है जो सरकार को लगभग हर साल बैंकों के घटते एनपीए, कारपोरेट सेक्टर की कर्ज माफी/ब्याज माफी वगैरह के रूप में समायोजित करनी पड़ती है। दूसरा और महत्वपूर्ण प्रश्न, आखिर क्या कारण है कि जो उद्यम सरकार के नियंत्रण में रहते हुए लगातार घाटे में रहते हैं, वे निजी हाथों में जाते ही सोना उगलने लगते हैं? उदाहरण के लिए ‘भारत एल्युमिनियम कारर्पोरेशन लिमिटेड’(बाल्को) तथा ‘हिंदुस्तान जिंक’ जैसी कंपनियां जो कभी घाटे में थीं। निजी हाथों में जाने के बाद ही उनका कायापलट हो चुका है। इनमें से बाल्को की स्थापना 1965 में की गई थी। 2001 तक यह कंपनी शत-प्रतिशत स्वामित्व के साथ भारत सरकार के नियंत्रण में थी। कंपनी विशेष प्रकार के एलुमिनियम धातु का निर्माण करती है, जिसका उपयोग मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों यथा अग्नि, पृथ्वी आदि के निर्माण के लिए किया जाता था। 2001 में उसकी 51 प्रतिशत साझेदारी वेदांता समूह को बेच दे दी गई। दूसरी कंपनी ‘हिंदुस्तान जिंक’ भी वेदांता के अधिकार में हैं। आज ये कंपनियां अपने मालिकों के लिए सालाना अरबों रुपये का मुनाफा कमाती हैं। इन्हीं के कारण वेदांता समूह के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल को आजकल ‘मेटल टाइकून’ कहा जाता है। निजी हाथों में जाते समय कंपनी ने इनमें कोई छंटनी नहीं की थी। यानी कमी प्रबंधन के स्तर पर थी, जिसके लिए सरकार और नौकरशाही ज्यादा जिम्मेदार है। इस बात को देश का पूंजीपति वर्ग भी समझता है। वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल विनिवेशीकरण की प्रक्रिया का लंबे इंतजार कर रहे उद्यमियों में से हैं। इसलिए अवसर मिलते ही वे न केवल सरकार को विनिवेशीकरण के फायदे गिनाने लगते हैं, बल्कि बीमार सार्वजनिक उद्यमों की खरीद पर, चरणबद्ध तरीके से लगभग 74,000 हजार रुपये के निवेश की घोषणा भी कर देते हैं।3

सार्वजनिक क्षेत्र किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। वे देश की आधारभूत संरचना को मजबूत करने के काम आते हैं। पूंजीवादी अर्थतंत्र की कमजोरी होती है कि एक अंतराल के बाद उसमें मंदी के दौर आते हैं। सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले, पूंजीवाद का आदर्श कहे जाने वाला अमेरिका 1785 से अब तक, यानी 240 वर्ष के इतिहास में कुल 47 आर्थिक मंदी के दौर झेल चुका है।4 भारत में औद्योगिकीकरण की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के आरंभ की घटना है। बावजूद इसके आजादी के बाद इस देश में आर्थिक मंदी के 5 दौर आ चुके हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी अवधि; यानी 1947 के बाद अमेरिका को मंदी के छोटे-बड़े 12 झटकों से गुजरना पड़ा है। मंदी से उबारने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बाहरी मदद पहुंचानी पड़ती है। उस समय वे सरकार से करीब-करीब इतनी ही धनराशि ऐंठ लेते हैं, जितनी उन्होंने अपने अच्छे दिनों में कराधान आदि के रूप में सरकार को प्रदान की थी। कभी-कभी आर्थिक मंदी पूर्णतः कृत्रिम होती है। फिर भी मजबूर सरकारों को कर्ज लेकर भी, पूंजीवादी अर्थतंत्र को मदद पहुंचानी पड़ती है। 2008 से 2011 की भीषण आर्थिक मंदी के दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था इतनी रसातल में पहुंच चुकी थी कि दिवालियापन से बचने से लिए उसे कर्ज लेना पड़ा था।

एक समय था जब किसी सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों और विद्वानों की राय महत्वपूर्ण मानी जाती थी। समाचारपत्र-पत्रिकाएं गर्व के साथ समाजविज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों  को जगह देते थे। कथित सोशल मीडिया इस गंभीर कार्य को भी ग्लैमराइज्ड कर दिया है। सोशल मीडिया पर आए दिन कोई अभिनेता, अभिनेत्री, क्रिकेटर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों की विवेचना करता हुआ नजर आता है। ट्विटर और फेसबुक के चलताऊ विमर्श के आधार पर सरकारें भी अपनी राय बनाती नजर आती हैं। ऐसे कृत्रिम बौद्धिकता के माहौल में समाजवाद को समय-बाह्यः मान लेना, न तो अस्वाभाविक है, न ही चौंकाने वाला। असलियत कुछ और ही है। 

एडीसन मेंगस की रिपोर्ट के अनुसार 1700 ईस्वी में जब भारत में औद्योगिकीकरण की हवा तक नहीं पहुंची थी, और पश्चिम में मशीनीकरण की धूमधाम के साथ शुरुआत हो चुकी थी─सकल वैश्विक उत्पादन में भारत और चीन का योगदान 24.4 प्रतिशत और 22.3 प्रतिशत था। इसमें गिरावट का दौर ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद शुरू हुआ। ये कंपनियां दोनों ही देशों में पहुंचीं। परिणामस्वरूप 1913 में भारत 7.5 प्रतिशत; तथा चीन 8.8 प्रतिशत पर सिमटकर रह गया। 1947 में भारत आजाद हुआ और चीन 1949 में साम्यवादी झंडे के नीचे चला गया। मगर 1950 तक चीन और भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक अंतर नहीं था। उस समय वैश्विक सकल उत्पादन में भारत और चीन का योगदान क्रमश 4.2 प्रतिशत और 4.5 प्रतिशत था। यही नहीं, 1991 तक लोकतंत्रात्मक भारत, अपनी मिश्रित अर्थव्यवस्था के बल पर, चीन को टक्कर देता था। उस समय दोनों की वैश्विक उत्पादकता लगभग समान थी।5 इसमें परिवर्तन 1991 के बाद भारत, उस समय आया जब भारत ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के नाम पर अपने दरवाजे बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए खोल दिए। दूसरी ओर चीन मिश्रित अर्थव्यवस्था की डगर पर आगे बढ़ गया। आज भारत और चीन की आर्थिक हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में चीन का सकल घरेलू उत्पाद 14.34 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो भारत के 2.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर, से पांच गुना अधिक है।6

उपर्युक्त विवरण से साफ है कि आर्थिक उदारीकरण के साथ देश ने जो सपने देखे थे, वे महज छलावा सिद्ध हुए हैं। बावजूद इसके पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विरोध में कोई आवाज नहीं उठती। सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की आवाज को दबाकर निजी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए प्राण-प्रण के साथ जुटी है। खुद प्रधानमंत्री समाजवाद को समयबाह्य दर्शन कह जाते हैं। आखिर क्यों? हमें इसके पीछे निहित षड्यंत्र को समझना पड़ेगा। समझना पड़ेगा कि वे कौन से कारण हैं जिन्होंने कुछ वर्ष पहले तक ‘स्वदेशी’ के पैरोकार रही ‘भारतीय जनता पार्टी’ नेता अब उसका नाम तक लेना नहीं चाहते। निश्चय ही इसका तात्कालिक उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना है। साथ ही इसका एक दीर्घकालिक उद्देश्य भी है।

संविधान प्रदत्त अधिकारों का लाभ उठाकर, दलित और पिछड़ी जातियों के लोग सरकारी नौकरियों, उद्योगों और व्यापार में जगह बनाने लगे हैं। हालांकि शिखरस्थ जातियों की अपेक्षा उनकी भागीदारी, उनके जनसंख्या अनुपात  से अभी भी बहुत कम है। बावजूद इसके विप्र मानसिकता के लोगों को यह बहुत रास नहीं आ रहा है। येन-केन-प्रकारेण वे दलितों और पिछड़ों के सबलीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करना चाहते हैं। चूंकि संवैधानिक प्रावधानों के कारण वे सरकार में रहकर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, इसलिए निजी क्षेत्र को मजबूत किया जा रहा है, जहां पिछड़ों और दलितों की उपस्थिति नगण्य है। विनिवेशीकरण इसलिए किया जा रहा है ताकि आरक्षित वर्गों के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के रास्ते सरकारी नौकरियों में जाने के अवसर कम से कम हो जाएँ। अपने इस प्रयोग से वर्तमान सरकार इतनी खुश है कि प्रशासनिक सेवाओं के जिन पदों के लिए युवा घर-परिवार से अलग रहकर रात-दिन मेहनत करते हैं, उनपर भी निजी क्षेत्र से उधार लिए अधिकारियों को बैठाया जा रहा है। कुल मिलकर ‘2014 में सरकार बनाते समय मोदी जी द्वारा दिया गया नारा ‘सबका साथ-सबका विकास’, सरकार के जातिवादी एजेंडे पर चढ़कर, ‘सबका साथ अपनों का विकास’ बनकर रह गया है।

ओमप्रकाश कश्यप

o

संदर्भ

1. जागरण संपादकीय, 21 फरवरी, 2021.

2. दि टाइम्स ऑफ इंडिया, 25 फरवरी, https://timesofindia.indiatimes.com/india/pm-sets-target-of-2-5l-cr-from-asset-monetisation/articleshow/81200196.cms

3. नवभारत टाइम्स, 19 दिसंबर, 2020 https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/anil-agarwal-vedanta-and-centricus-to-invest-10-billion-dollar-in-indian-companies/articleshow/79812797.cm

4. बिजनिस साइकिल्स: थ्योरी, हिस्ट्री, इंडीकेटर्स एंड फोरकास्टिंग, विक्टर जार्नोविट्ज, शिकागो यूनीवर्सिटी, शिकागो प्रेस, 221-226

5. डेवलपमेंट सेंटर स्टडीज दि वर्ल्ड इकॉनामी स्टेटीटिक्स, ओईसीडी, फ्रांस, पृष्ठ 261-262  

6. विश्वबैंक, वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडीकेटर्स, 2 जुलाई 2020 https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_GDP_(nominal)

भक्ति-वेदांत : बहुजन समाज को बौद्धिक दास बनाए रखने का ब्राह्मणवादी प्रपंच

सामान्य

जाति बहुजन के गले की फांस है, वही मुट्ठी-भर लोगों के लिए उनके विशेषाधिकारों का सुरक्षा-कवच है। ब्राह्मण तथा दूसरे सवर्ण नहीं चाहते कि जातिप्रथा समाप्त हो। वे तो चाहते हैं कि शूद्र सदैव शूद्र, दलित हमेशा दलित बना रहे। इसके लिए कदम-कदम पर साजिशें रची जाती हैं। यह षड्यंत्र जितना सामाजिक दिखता है, उससे कहीं ज्यादा मनोवैज्ञानिक है। जितना हिंसक है, उतना अहिंसक भी है। ब्राह्मणों की सदैव कोशिश होती है कि दलित और शूद्र दोनों दिलो-दिमाग से उनके अधीन बने रहें। वे जहां भी, जिस हालत में भी हैं, उसी को अपनी नियति मान लें। इसके लिए वे न केवल गैर-ब्राह्मणों की संस्कृति में जबरन दखलंदाजी करते हैं, बल्कि उनसे उनका इतिहास, उनके महापुरुष तक छीन लेते हैं। चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले ‘भक्तमाल’ से एक दृष्टांत—

‘रामानंद जी का एक ब्रह्मचारी शिष्य था। वह नित्य चून की चुटकी मांगकर लाता। उसी से ठाकुर का भोग लगता, और उसी से संतों का सत्कार किया जाता था। कुटिया के आसपास एक बनिया रहता था। उसने दस-बीस बार ब्रह्मचारी से सीधा लेने का आग्रह किया, किंतु स्वामी जी की आज्ञानुसार उसने कभी उस बनिये से भिक्षा लेना स्वीकार नहीं किया था। एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी। भिक्षा द्वारा अन्न-संग्रह करना भी आवश्यक था। उस दिन गुरु-आज्ञा का उल्लंघन कर, ब्रह्मचारी बनिये द्वारा दिया गया सीधा ले आया। गुरु ने उससे बने हुए पदार्थ को मूर्ति के सामने भोग के लिए रखा और ध्यान किया तो प्रभु की मूरत ध्यान में नहीं आई। इसपर उन्होंने शिष्य से पूछा—‘अरे! आज भीख कहां-कहां से मांगकर लाए हो?’

शिष्य ने सच बता दिया। तब गुरु ने उस दुकानदार के बारे बताया। मालूम हुआ कि वह अत्यंत नीच मनोवृत्ति का है। रुपये के लोभ से एक चमार से साझा कर, व्यापार करता था। स्वामीजी ने इसपर शिष्य को शाप दिया—‘चूंकि तूने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया है, अतः तू हीन-कुल में जन्म ग्रहण करेगा। वही शिष्य दूसरे जन्म में रैदास नाम से एक चमार के घर के घर पैदा हुआ।’1 

इस मिथकीय आख्यान के निहितार्थों पर चर्चा बाद में, पहले दृष्टांत का अगला हिस्सा—

‘बालक रैदास को अपनी माता का दूध पीना तो दूर रहा, उसके शरीर का स्पर्श करना भी बुरा लगता था। गुरु सेवा के प्रभाव से उसे पिछले जन्म की सब याद बनी रही। वह सोचता यदि चमार के यहां भिक्षा मांगने से यह दंड मिला है, तब यदि दूध पी लूंगा तो न जाने क्या गति होगी! इसी बीच स्वामी रामानंद जी को आकाशवाणी हुई कि तुम्हारा शिष्य चमार के घर जन्मा है, उसकी सहायता करिए। सुनकर उनके हृदय को बड़ा कष्ट हुआ। वे तुरंत वहां पहुंचे जहां रैदास जन्मे थे। बच्चे के दूध न पीने के कारण माता-पिता बहुत दुखी थे। स्वामी रामानंद को देखते ही वे उनके पैरों पर गिर पड़े और प्रार्थना की कि कुछ ऐसा उपाय करिए जिससे बच्चा दूध पीने लगे। इसपर रामानंदजी ने बालक को वहीं राम नाम(रं रामाय नमः) की दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। फलस्वरूप उसके सब पाप धुल गए; और वह मां का दूध पीने लगा। दूध पीते ही बच्चे का मानो पुनर्जन्म हो गया और वह स्वामी रामानंद को ईश्वर करके मानने लगा। उसका पूर्वजन्म की भूल का सारा संताप मिट गया।2

आगे दिए गए विवरण के अनुसार, बड़ा होने पर रैदास भक्ति में लीन रहते। घर आए साधु-संतों की पूजा, आदर-सत्कार करते। मजदूरी करके जो कमाते, उसे भिखारियों में बांटकर बचे हुए को आप खाते। धन और मोह-माया से पूरी तरह निर्लिप्त। आखिरकार, नाभादास के शब्दों में— 

‘भगवान की कृपा के फलस्वरूप श्रीरैदास जी ने इसी मर्त्य शरीर से परम-पद प्राप्त किया और राजसिंहासन पर बैठे। अपने शरीर में यज्ञोपवीत का चिन्ह दिखाकर, अपने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि आप पूर्व जन्म में ब्राह्मण थे।’3

‘भक्तमाल’ को भक्तिभाव से पढ़ने वालों से पूछा जा सकता है कि जिस घर में चमड़ा पकाया जाता हो, जो वर्ण-व्यवस्था के हिसाब से अतिशूद्रों और चांडालों की बस्ती हो—वहां रामानंद जैसा ब्राह्मण भला कैसे जा सकता है? यह शंका भी जायज होगी कि एक अबोध शिशु कथित राम-मंत्र को कैसे हृदयंगम कर सकता है? सवाल यह भी है कि जन्म के तुरंत बाद मां की जाति के कारण उसका दूध त्याग देने वाला अबोध शिशु, उसके गर्भ में कैसे रहा था? और राम-नाम का रट्टा मारने से ही यदि ‘रैदास’ बनना संभव था, तो रामानंद के कथित 52 के 52 शिष्यों को रैदास जैसा महाज्ञानी बन जाना चाहिए था, फिर वे क्यों नहीं बन पाए? लेकिन भक्तिमार्ग आस्था पर टिका होता है। भक्त को सवाल उठाने की अनुमति वह नहीं देता। चूंकि मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है, इसलिए कह सकते हैं कि भक्तिमार्ग, जिसे कुछ लोग भक्ति-वेदांत भी कहते हैं—मनुष्य के विवेकीकरण का अवरोधक, समाज को अपने जाल में फंसाए रखने के लिए ब्राह्मणवादी प्रपंच हैं। 

2

रैदास ने कहीं भी रामानंद को अपना गुरु स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने न केवल ब्राह्मणों द्वारा स्थापित वर्ण-व्यवस्था और धर्माडंबरों की आलोचना की, अपितु शूद्र होने के कारण जिन वेदों को पढ़ने का अधिकार उन्हें नहीं था, जिनके सुनने मात्र से दंड का सहभागी बनना पड़ता हो—उन्हें प्रामाणिक मानने से ही इन्कार कर दिया—

चारिउ वेदि किया खण्डोति

ताको विप्र करै दंडोति। 

            ***

जग में वेद वैद्य जानये

पढ़त समझ कुछ न आवत

रैदास की तरह कबीर को भी नहीं बख्शा गया। उनके जन्म के बारे में फैलाई गई कहानी, श्यामसुंदर दास के शब्दों में, कुछ इस प्रकार है—

‘काशी में एक सात्विक ब्राह्मण रहते थे। वे स्वामी रामानंद के बड़े भक्त थे। उनकी एक विधवा कन्या थी। उसे साथ लेकर एक दिन वे रामानंद के आश्रम पर गये। प्रणाम करने पर स्वामी रामानंद ने उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया। ब्राह्मण देवता ने चौंककर जब पुत्री का वैधव्य निवेदन किया तब स्वामी ने सखेद कहा कि मेरा वचन तो अन्यथा नहीं हो सकता है। इतने से संतोष करो कि इससे उत्पन्न पुत्र बड़ा प्रतापी होगा। आशीर्वाद के फलस्वरूप जब उस ब्राह्मण कन्या को पुत्र उत्पन्न हुआ तो लोकलज्जा और लोकापवाद के भय से उसने उसे लहर तालाब के किनारे डाल दिया।4 वही बालक बाद में नीरू नामक जुलाहे के घर पला-बढ़ा और श्यामसुंदर दास के शब्दों में, ‘परम भगवद्भक्त कबीर’ हुआ। कबीर के सूर-तुलसी की तरह भक्तिमार्गी होने में किसी प्रकार का संदेह न रह जाए, इसलिए बाद में उन्हें रामानंद का शिष्य दर्शाने के लिए कहानी भी गढ़ी गई। यह बात अलग है कि रैदास की तरह कबीर भी ब्राह्मणों और पुरोहितों के कर्मकांडों, पूजा-पाखंडों के विरोधी बने रहे। वेदों की दुहाई देने वाले ब्राह्मणों तथा उनकी बनाई गई हर व्यवस्था पर उन्होंने जमकर कटाक्ष किया है। ‘वेद पढ़ते हैं और आत्मप्रशंसा करते हैं। लेकिन मन से संशय की गांठ आज भी नहीं छूटती— 

     पढ़ें वेद और करें बढ़ाई,

     संशय गांठि अजहुं नहिं जाई।।  

कबीर की कविता जीवन-सत्य की खोज की कविता है। उसके लिए बाह्याडंबरों का आमूल बहिष्कार आवश्यक है। धर्म और जाति के नाम पर मिथ्याभिमान वहां चल नहीं सकता—

कबिरा का घर सिखर पै जहां सिलहली गैल

पांव न टिकै पिपीलिका पंडित बांधै बैल

कबीर ज्ञान के शिखर पर विराजमान हैं। वहां का रास्ता फिसलन-भरा है। चींटी(बौद्धिक रूप से क्षुद्र लोगों) का वहां पहुंचना असंभव है; और पंडित उसे ज्ञानाडंबर और मिथ्याभिमान के जरिये प्राप्त करना चाहते हैं।  

3

सवाल है कि रैदास, कबीर जैसी प्रतिभाओं के ब्राह्मणीकरण के पीछे क्या ब्राह्मणों की उदारता है? क्या ऐसी कोशिशें वर्ण-व्यवस्था को लचीला दर्शाने के लिए की जाती है? क्या शूद्रातिशूद्र वर्ग के महापुरुषों-मनीषियों को ब्राह्मणत्व या कभी-कभी ‘ईश्वरत्व’ मिलने पर, बहुजन समाज को खुश होना चाहिए? प्रसन्न होना चाहिए कि उनमें से कम से कम एक व्यक्ति तो खुद को जाति की जलालत से बाहर निकालने में सफल हुआ? अगर बहुजन समाज ऐसा ही सोचता है, तो यह सचमुच ब्राह्मणवाद की जीत है। इसका मतलब होगा कि उसने जाति-व्यवस्था को, जो प्राकृतिक एवं सामाजिक न्याय दोनों के विपरीत है—स्वीकार कर लिया है। उस हालत में वे समझ ही नहीं पाएंगे कि किसी एक युग-प्रवर्त्तक महापुरुष के ब्राह्मणीकरण(अथवा ईश्वरीकरण), परिवर्तन की बनती हुई संभावनाओं को एकाएक खारिज कर देने जैसा है। ब्राह्मणीकरण के साथ ही वह ‘महापुरुष’ अपना सारा तेज गंवा देता है। अपने नए ‘अवतार’ में वह उन्हीं बातों का समर्थन करता हुआ नजर आता है, जिनके विरुद्ध कभी उसने आवाज उठाई थी। इस तरह एक उभरता हुआ आंदोलन असमय ही दम तोड़ने लगता है।

गैर-ब्राह्मण महापुरुषों का ब्राह्मणीकरण कर, उन्हें उनके समाज से छीन लेने की प्रवृत्ति और तरीका बहुत पुराना है। इसी प्रवृत्ति के चलते दो हजार वर्ष पहले ब्राह्मणों ने गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया था। यही प्रवृत्ति वाल्मीकि को ब्राह्मण संतान घोषित करते समय काम कर रही थी। इसके लिए वे संबंधित व्यक्ति के जीवन या कथित पूर्वजन्म/जन्मों के बारे में, कोई न कोई चमत्कारपूर्ण आख्यान गढ़ लेते है। लोकश्रुति या शास्त्रों के माध्यम से उसे प्रचारित भी कर लेते हैं। जरूरत पड़े तो उसे पुराणों और दूसरे धर्मग्रंथों में जगह देकर ब्राह्मण-परंपरा का हिस्सा बना लेते हैं। ऐसा करते समय वे मनमानी छूट लेते हैं। जिसके अंतर्गत संबंधित महापुरुष के क्रांतिकारी विचारों को तोड़-मरोड़कर इस तरह पेश किया जाता है कि अंततः वे ब्राह्मणवाद के पोषक, समर्थक और पूरक नजर आने लगते हैं। लोकश्रुतियों/शास्त्रों का हवाला देकर वे भोले-भाले लोगों को, यह विश्वास दिलाने लगते हैं कि उस महापुरुष की विशिष्ट मेधा तथा उसका योगदान, केवल उसकी अपनी प्रतिभा, श्रम और समर्पण का सुफल न होकर दैवीय अनुकंपा की देन है। उस अवस्था में उसके अनुयायी, महापुरुष के विचारों को पढ़ने-समझने तथा उनसे प्रेरणा लेने के बजाय, उन्हें पूजने लग जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके (गैर-ब्राह्मण)महापुरुष की इज्जत अफजाई के लिए ब्राह्मण खुद आगे आ रहे है। अतिविश्वास में वे यह भी मानने लगते हैं कि ब्राह्मणों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जैसी कठोर नहीं है। इससे उनके मन में ब्राह्मणों तथा उनकी व्यवस्था के प्रति आक्रोश घटने लगता है। यानी एक महापुरुष का ब्राह्मणीकरण, चाहे वह झूठमूठ ही क्यों न हो, उसके समाज के ब्राह्मणीकरण के दरवाजे भी खोल देता है। इससे परिवर्तन की प्रक्रिया, जो महापुरुष द्वारा ब्राह्मणवाद को चुनौती के फलस्वरूप आरंभ हुई थी, धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है। 

4

परिवर्तन के लिए समाज में परिवर्तन की इच्छा का होना भी आवश्यक है। वर्तमान के प्रति असंतोष जितना प्रबल होगा, उसे बदलने की इच्छा भी उतनी ही तीव्रतर होगी। उसके लिए उदात्त, सकारात्मक एवं यथार्थोन्मुखी प्रेरणाएं अपरिहार्य हैं। ब्राजील के शिक्षाशास्त्री पाब्लो फ्रेरा के शब्दों में—‘उत्पीडि़तों को अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष में सफल होने के लिए यथार्थवादी होना पड़ेगा। उन्हें उत्पीड़न के यथार्थ को ऐसी बंद दुनिया के रूप में हरगिज नहीं देखना चाहिए, जिससे निकल पाना असंभव है। उन्हें उसको ऐसी अवरोधक स्थिति के रूप में देखना चाहिए, जिसे वे बदल सकते हैं।’5 बहुजन मुक्ति के लिए भी ऐसी दृष्टि चाहिए जो धर्मशास्त्रों और सांस्कृतिक परंपराओं, रिवाजों में अंतनिर्हित सत्य की बहुजन-दृष्टि से पड़ताल कर सके। उनके बारे में स्थापित सत्य के विखंडन एवं नवोन्मेषण द्वारा वास्तविक और जनोन्मुखी सत्य को सामने ला सके। यहां छांदोग्योपनिषद का एक दृष्टांत द्रष्टव्य है—

‘विद्याध्ययन को उत्सुक सत्यकाम हरिद्रमुत गौतम के आश्रम में पहुंचा। शिष्य बनाने से पहले हरिद्रमुत ने आगंतुक से उसके कुल-गौत्र के बारे में पूछा। वापस आकर सत्यकाम अपनी मां से मिला। पूछने पर उसकी मां ने बताया—‘उन दिनों मैं घर-घर चक्की पीसने का काम करती थी। वहां किसके संसर्ग से तू मेरे गर्भ में चला आया, मुझे नहीं पता….’ सत्यकाम दुबारा हरिद्रमुत के आश्रम में पहुंचा। पूछने पर बोला—‘मेरी मां एक पिसनहारी है। उसका कहना है कि घर-घर जाकर काम करते हुए मैं कब उसके गर्भ में चला आया, उसे पता ही नहीं चला। मैं सत्यकाम हूं। मेरी मां का नाम जाबाला है। सो मैं सत्यकाम जाबालि हुआ।’ यह सुनकर हरिद्रमुत प्रसन्न होकर बोले—‘इतना सत्यभाषी बालक सिवाय ब्राह्मण के और कौन हो सकता है। जा समिधा ले आ। मैं तुझे दीक्षा दूंगा।’

यह कहानी प्राचीन वर्ण-व्यवस्था के उदात्त पक्ष के रूप में अकसर दोहराई जाती है। इस तरह कि पढ़ने-सुनने वाला गदगद् हो जाता है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन सहित अनेक विद्वानों ने प्राचीन भारत के दर्शन एवं संस्कृति का विवेचन करते समय इसका उल्लेख किया है। उनके प्रभाव में मान लिया जाता है कि वर्ण-व्यवस्था की आरंभिक संकल्पना एकदम दोष-विहीन थी। सदियों से ब्राह्मणों के बताए झूठ को सच मानता आया बहुजन मानस इसके ठेठ ब्राह्मणवादी निहितार्थ को समझ ही नहीं पाता। हरिद्रमुत गौतम यह कहकर कि इतना सत्यभाषी बालक सिवाय ब्राह्मण के और कौन हो सकता है, पूरे गैर-ब्राह्मण समुदाय को मिथ्याभाषी घोषित कर देते हैं। यही नहीं वे घर-घर जाकर चक्की पीसने वाली गरीब-मजबूर स्त्री के यौन-शोषण को भी नजरंदाज कर देते हैं, जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है। धर्मशास्त्रों में इस तरह के प्रसंग भरे पड़े हैं। उन्हें समझने के लिए उनकी बहुजन दृष्टि से पड़ताल जरूरी है। फुले इसकी शुरुआत बहुत पहले कर चुके थे। बाद में डॉ. आंबेडकर, पेरियार आदि ने इसे विस्तार दिया। समकालीन बुद्धिजीवियों में कांचा इलैया, डॉ. धर्मवीर ऐसे ही मौलिक व्याख्याकार हैं।  

माओत्से-तुंग ने कहा था कि सत्ताएं बंदूक की गोली से निकलती हैं। यह उनका सच था। सत्ताएं बंदूक की गोली से निकल सकती हैं। मगर इतिहास उनका नहीं होता जिनके हाथों में तलवार होती है। इतिहास उनका होता है जिनके हाथों में कलम होती है। अगर तलवार के जोर पर कलम वाले हाथों को मनमाना इतिहास गढ़ने को मजबूर कर भी दिया जाए तो वह रचना अस्थायी होती है। मुक्त होते ही कलम वाले हाथ, इतिहास को नया रूप देने लगते हैं। अतएव ब्राह्मणवाद के स्वार्थपूर्ण और अवांछित हस्तक्षेप से बचने का एकमात्र रास्ता है कि बहुजन बुद्धिजीवी आगे आएं; वे अपनी मेधा को तराशें तथा धर्म और संस्कृति के नाम पर थोपे गए प्रतीकों-मिथों के निर्माण के पीछे ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को समझते हुए, न्याय, स्वतंत्रता और समानतावादी दृष्टि से उनकी पुनर्व्याख्या करें। यह बहुजन अस्मिता और सम्मान की रक्षा का एकमात्र तरीका है। 

ओमप्रकाश कश्यप

  1.  रामानंदुजू कौ शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक गहे वृत्ति चुटकीकी कहे तासों बानियों। 

करौ अंगीकार सीधो दस-बीस बार बरसे प्रबल धार तामें वापै आनियों।

भोग कों लगावै प्रभु ध्यान नहीं आवै अरे कैसे करि ल्यावै जाय पूछी नीच मानियों।

दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि कुल में उतारि देहि सोईं याको जानियों—श्रीभक्तमाल, नाभादास, भक्ति-रस-बोधिनी-टीका, व्याख्याकार श्रीरामकृष्णदेव गर्ग, श्री अखिल भारतीय  श्रीनिंबार्काचार्य पीठ, वृंदावनधाम, 1960।)

  • माता दूध प्यावै याकों छुयोऊ न भावै सुधि आवै सब पाछिली सुसेवा कों प्रताप है

भई नभ-बानी रामानंद मन जानी बड़ो दंड दियो मानी वेगि आयो चल्यौ आप है

दुखी पितु-मात देखि धाय लपटाये पाय कीजिए उपाय किये शिष्य गयो पाप है। 

स्तन पान किसी जियो जिलयो उन्हें ईस जाति निपट अज्ञानि फेरि भूले भयो ताप है। —वही

  • भगवत कृपा प्रसाद परम गति इहि तन पाई

राजसिंहासन बैठि ग्याति परतीति दिखाई—वही

  • श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘कबीर ग्रंथावली’ की प्रस्तावना, हिंदी समय।
  • पाब्लो फ्रेरा, उत्पीडि़तों का शिक्षाशास्त्र, रमेशचंद शाह द्वारा अनूदित, ग्रंथशिल्पी, नई दिल्ली।

धर्म के बहाने बौद्धिक जड़ता का सनातनीकरण

सामान्य

आधुनिकता की ओर बढ़ती आज की दुनिया के आगे सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न है—क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना उसका कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं। धर्मानुयायी मानते हैं कि आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते। धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे  समझना आसान नहीं है। इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेति-नेति’ कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचना-समीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मान लिया जाता है। असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, अथवा किसी न किसी बहाने उनपर थोप दी गई हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते। न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा को लांघने की हिमाकत करे। हम धर्म को ऐसी हवेली मान सकते हैं, जिसके अनेकानेक दावेदार हैं। कदाचित इसी कारण वह हजारों वर्षों से बंद है। ताजी हवा का प्रवेश भी उसमें निषिद्ध है। यहाँ तक कि उसके भीतर झांकने की इजाजत भी किसी को नहीं है। यदि कोई उस हवेली के भीतर जाकर झाड़-पौंछ करना चाहे तो उसके दावेदार नाराज हो जाते हैं। डरते हैं कि हवेली साफ हुई तो उनकी सत्ता गई। बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए वे कई बार इतनी कुटिल चालें चलते हैं कि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली उनके आगे घुटने टेक देते हैं। जनसाधारण को बस इतनी अनुमति होती है कि अपने विवेक को गिरवी रखकर उस हवेली के दूर से ही दर्शन कर सके।

ऐसा आज से नहीं, सैकड़ों वर्षों से है। मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण मीमांसक कुमारिल भट्ट हैं। अपने समय के विलक्षण प्रतिभाशाली कुमारिल भट्ट ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। बौद्ध पराजित हुए। लेकिन कुमारिल भट्ट अपनों से हार गए। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें धीमी आंच में तपकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की अनुमति लिए बिना बौद्धमत का अध्ययन किया था। हिंदू धर्म में व्याप्त जड़ता, गुरुडम तथा नए और समकालीन ज्ञान-विज्ञान से जान-बूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए यहाँ उनकी विशेष चर्चा प्रासंगिक है।

शंकराचार्य से एक पीढ़ी, लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे। उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था। कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है। वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी। राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी। बौद्ध दर्शन सनातन वर्ण-व्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था। द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था। राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं। अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक ग्रंथों के अध्ययन-अनुशीलन में लगे थे। गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे। वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी। उसने रोते-रोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

‘क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

‘हे सुकुमारे! रो मत!! वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा’1 राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला। कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्म-दर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्म-दर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था। लक्ष्य-सिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया। तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म-दर्शन की जमकर आलोचना की। यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया। लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही। इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया। बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्ति-कथा लिखी। इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं।

वेदांत की ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशी-मार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे। अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे। उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था। उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया। कुमारिल भट्ट को अग्नि-शैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए। धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसाद-जनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्नि-चिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्मदहन का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्म-ग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए। लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे। धार्मिक वाद-विवाद प्रायः जीवन-मरण का सवाल बन जाता था। ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था। शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र, वेदांती सुरेश्वराचार्य बनकर उसके प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। उसके बाद मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है।

इस प्रसंग के कुछ खास संकेत हैं। पहला प्राचीन गुरु नहीं चाहते थे कि उनका शिष्य ज्ञान और यश में उनसे आगे जाए। दूसरे प्राचीन ऋषियों के लिए बौद्धिक शास्त्रार्थ शारीरिक कुश्ती से भी गया-गुजरा था। कुश्ती में हारा हुआ पहलवान नई तैयारी और हौसले के साथ उसी पहलवान को दुबारा चुनौती दे सकता है। लेकिन शास्त्रार्थ में विजेता, पराजित व्यक्ति के तन और मन दोनों पर अधिकार जमा लेता था। व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी। केवल विजेता का धर्म रह जाता है। कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी।

2

जैन और बौद्ध धर्म-दर्शन इसके अपवाद थे। यहाँ जैन दर्शन की तो हमें खास तौर पर प्रशंसा करनी होगी। वैदिक हिंसा और गलाकाट बौद्धिक स्पर्धा के बीच उसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा था। वह विभिन्न विचारों को स्वतंत्र रूप से, एक-दूसरे के समानांतर बहने की अनुमति देने का उदारतापूर्ण विधान था। इसके अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है। प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है। वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता। चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है। वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है। ‘स्याद्वाद’ का दर्शन, वैदिक दर्शन की वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था। लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे; और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था। ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्व न था। अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया।

‘स्याद्वाद’ से पता चलता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था। उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं। उनमें कोई द्वैष न हो। यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा। मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका। यह बात भुला दी गई कि हिंसा प्रधान समाज में वैचारिक अहिंसा का टिके रहना असंभव है। वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक, ‘स्याद्वाद’ जैसे दर्शन के कमजोर पड़ने का परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने न केवल दूसरे विचारों की ओर से अपने आँख-नाक-कान बंद कर लिए, अपितु गैर-ब्राह्मण उनके धर्म-ग्रंथों के पढ़ न पाएँ, इसके लिए भी उनपर बड़े-बड़े प्रतिबंध थोप दिए।

3

हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं। हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्नि-शिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ। संभवत: उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो। यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! यह भी संभव है कि  वेदोक्त धर्म-दर्शन के शीर्ष-पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा के साथ निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हों, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके। इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की। आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोल-मोल कर जाते हैं। हिंदू परंपराओं के जानकार के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्व देती है। उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है। उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती।

यहां एक किस्सा याद आ रहा है। रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था। मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

‘बहुत पवित्र मंत्र है। जिसे बताओगे वह तर जाएगा।’

‘जी….गुरु जी।’ रामानुज ने गुरु का धन्यवाद किया।

‘लेकिन एक शर्त है। इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना।’

‘अपात्र कौन?’

‘शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है।’

‘यदि मैं ऐसा करूं तो….’

‘घोर पाप….घोर पाप। सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए। रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया। गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्र-अपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा। गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तब रामानुजाचार्य ने कहा—

‘आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

‘मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

‘यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौ-सौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है।’ रामानुज का उत्तर था।

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं। लेकिन उनके साथ अप्रत्यक्ष स्पर्धा में जीत शंकराचार्य की हुई थी। कैसे? रामानुज विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्त्तक थे, और शंकराचार्य अद्वैत के। रामानुज मानते थे कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, मगर संसार में आकर उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है। शंकराचार्य आत्मा और परमात्मा को एक मानते थे। ब्राह्मणों ने घोषित रूप से शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया। इस्लाम के सूफीवाद की और से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए यह जरूरी था। किंतु आत्मा और परमात्मा एक हैं, इस आधार पर सभी मनुष्य बराबर हैं—इस सत्य को वे कभी गले से नहीं उतार पाए।  

हम यह नहीं कहते कि रामानुज का विशिष्टाद्वैत आदर्श दर्शन है। असल में न तो स्वर्ग होता है, न ही नर्क। मुक्ति स्वयं एक मिथ है। अतएव ऊपर दी गई कहानी को उसकी प्रतीकात्मकता, यानी सामाजिक संदर्भों में समझना चाहिए। कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय हो सकता है, और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है। पूर्ण नैतिकता तब होगी जब बाकी सब लोग, व्यक्ति विशेष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की ठान लें।

अपने मान-अपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे मनीषी की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते। मगर परंपरा से भयभीत शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं। बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक यशपाल ने खूब समझा था। वे लिखते हैं—

‘कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे। पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था….द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाले बौद्ध दर्शन की सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग—द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है। अतः बौद्ध दर्शन से ‘फाइट’ करना आवश्यक है।’2 

कुमारिल भट्ट के प्रायश्चित की घटना द्वारा हम, न केवल उनकी मनोरचना, अपितु तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान को  भी समझ सकते हैं। उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभी-कभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है। कुमारिल भट्ट के जीवन का ही एक किस्सा और है। उन्होंने बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु नालंदा विश्वविद्यालय में छद्म नाम से प्रवेश लिया था। बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे। बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यही मुख्य वजह थी। जब उनके बारे में विश्वविद्यालय में पता चला तो सब बहुत कुपित हुए। कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें सबक सिखाने का फैसला कर लिया। जब वे लड़के कुमारिल भट्ट को ढकेलने जा रहे थे, तब उन्होंने उन सभी को सुनाते हुए कहा था—

‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी।’

संयोगवश वे सकुशल बच गए। उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं। वह विवेक पर  अंधश्रद्धा की जीत थी। आत्मदहन से पहले कुमारिल भट्ट ने विपुल वाङ्मय की रचना की थी। लेकिन विलक्षण मेधा के बावजूद वे मीमांसा दर्शन को वह सम्मान दिलाने में नाकाम रहे, जिसके वे आचार्य थे। जिसके लिए उन्होंने बौद्धों को पराजित करने की कामना के साथ गुरु-द्रोह किया था। मंडन मिश्र के पराजित होते ही मीमांसा दर्शन लगभग पूरी तरह उखड़ गया।

शब्द की कसौटी शब्द; और विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है। बावजूद इसके चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से किसी विचार या वस्तु को प्रमाणित करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बहुत पुरानी है। रूढ़ियों को विचारधारा का रूप देने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण भी कई हैं। कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था। तरकीब निराली थी। यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था। अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जल-समाधि के लिए छोड़ दिया जाता था। समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी। लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था। बाद में उस तालाब को पाट दिया गया। इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिए गए।

बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं। अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल, पूर्ण कस्सप जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे। वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था। इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र ग्रंथ हमें प्राप्त नहीं होता। इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है। संवैधानिक व्यवस्थाओं और लोकतंत्र के इस दौर में होना तो यह चाहिए कि हम इतिहास से कुछ सबक लें, किंतु विचार के नाम पर जड़ता और धर्म-दर्शन के नाम पर असहिष्णुता निरंतर बढ़ती ही जा रही है। शायद ऐसी ही परिस्थितियां डॉ.  आंबेडकर की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ लिखने की प्रेरणा बनी थीं।

4

धर्म से अपेक्षा की जानी चाहिए कि राजनीतिक और आर्थिक कार्य-कलापों से दूर, नैतिक व्यवस्था बने। लेकिन व्यवहार में वह ऐसा धंधा है जो बिना निवेश के स्थायी लाभ देता है। अमीर जनसाधारण की धार्मिक भावनाओं के दोहन के लिए मंदिर बनवाता है। नियमित पूजन-अर्चन के लिए पुजारी स्वयं हाजिर हो जाता है। जो कुछ ज्यादा अमीर है, वह पुजारी और पूजा का खर्च भी उठा लेता है। ऐसे धनाढ्य को मंदिर की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके बावजूद पुजारी उसे धर्म-रक्षक, ईश्वर प्रेमी, भक्त शिरोमणि, ईश्वरानुरागी जैसी पदवियां सौंपता है। इससे उसको व्यापार करने, व्यापार के नाम पर मनमाना लाभ कमाने की छूट मिल जाती है। अपने बनाए मंदिर में व्यापारी स्वयं पूजा करे, आवश्यक नहीं है। इसके लिए वह मंदिर बनवाता ही नहीं। पूजा-पाठ उसके लिए तीसरे-चैथे दर्जे या  बैठे-ठाले का काम होता है। अवसर विशेष को छोड़कर वह उस ओर झांकता तक नहीं है। केवल पुजारी को दी गई तनख्वाह और यदा-कदा की दान-दक्षिणा से उसका ‘धर्म’ सधता रहता है। पुराने जमाने में इसलिए प्राचीन राजा-महाराजा, जमींदार, सेठ आदि का धर्मालय प्रवेश भी खास घटना हुआ करती थी। आज भी व्यापारी वर्ग मोटे दान-दक्षिणा द्वारा वह पुरोहितों को प्रसन्न रखता है। बदले में पुजारी वर्ग उसके मुनाफा कमाने के तरीकों, व्यापारिक अनाचार और भ्रष्टाचार की ओर से आंख मूंद लेता है। गलती के लिए आर्थिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराने की तो मानो उस युग में परंपरा ही नहीं थी। इसलिए भारतीय और विश्व वाङ्मय में राजनीतिकों के अनाचार और दुराचार के किस्से तो अनगिनत हैं, यहां तक कि देवताओं को भी नहीं छोड़ा गया है, मगर आर्थिक दुराचार के बारे में चर्चाएं नगण्य हैं। यहां कुबेर के खजाने का बखान हुआ है। राजा-महाराजाओं, सेठ-साहूकारों के खजाने को भी कुबेर का खजाना कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा है। उस खजाने में धन कैसे आता है, कहां से आता है, धनार्जन के रास्ते नैतिक हैं या अनैतिक—इस पर चर्चा कम ही हो पाती है। हालांकि कौटिल्य, कात्यायन, याज्ञवल्क्य आदि ने कराधान और राज्य के वित्त प्रबंधन संबंधी आवश्यक निर्देश दिए गए हैं, लेकिन उनका वास्तव में कितना पालन होता था, उल्लंघन करने पर कब, किसे, कितना दंड दिया गया था, इस तरह का कोई उदाहरण धर्म-ग्रंथों में नहीं मिलता।

धर्म के नाम पर जीवन के जरूरी सवालों से बच निकलने के प्रसंग इतिहास में अनगिनत हैं। धर्मानुयायी आस्थावादी दृष्टि से उनका महिमामंडन करते हैं। लेकिन विमर्श से बच निकलते हैं। यदि कहीं फंसते हुए दिखें तो ‘नेति-नेति’ कहकर तत्काल पीछा छुड़ा लेते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि धर्म आज भी समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए मानवीय कम, आस्था का विषय ज्यादा है। हालांकि अपनी नैतिक प्रेरणाओं के लिए करोड़ों लोग धर्म पर आज भी आश्रित हैं। धर्म उनके लिए अस्मिता का मसला है। धर्म-विहीन जीवन के बारे में वे सोच भी नहीं सकते। हरिद्वार के कुंभ और गढ़-मुक्तेश्वर के गंगा मेले को देखिए, श्रद्धालुओं का चारों ओर से उमड़ता हुआ हुजूम….कड़कड़ाती ठंड और वर्फ-से हाड़ जमा देने वाले पानी में, आपको सत्तर-अस्सी वर्ष तक के बूढ़े-बूढ़ियां गोते लगाते हुए नजर आएंगे। अनगिनत कष्ट सहकर भी वे खुद को धन्य मानते हैं; या यूं कहो कि श्रद्धातिरेक में काया-कष्ट को भूल जाते हैं। माक्र्स इसे अफीम कहता है। कदाचित धर्म एक नशा है भी। वाल्तेयर, फायरबाख, ब्रूनो बायर, मिखाइल बकुनिन, बर्ट्रेण्ड रसेल जैसे विचारकों ने भी अलग-अलग अंदाज में धर्म को नशा और शोषण का जरिया माना है। लेकिन जब कोई नशा ही समाज के अधिसंख्यक लोगों को प्रिय हो, लोग उसको अपनी पहचान से जुड़ा हुआ मानते हों, और जो पूरी दुनिया के तीन-चौथाई से ज्यादा लोगों की जीवनचर्या को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता हो, तब उसके प्रति एकाएक उपेक्षा या तिरस्कार-भाव कैसे संभव है? क्या ऐसा करना लोगों की नैसर्गिक स्वतंत्रता का अपमान नहीं है? अवश्य होता; बशर्ते मनुष्य अपना धर्म स्वयं तय करता। उसको अपना ईश्वर चुनने का अधिकार होता और जन्म के साथ ही धर्म उसपर थोप नहीं दिया जाता। यह किसी से छिपा नहीं कि जन्म के समय शिशु का मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है। कम से कम ईश्वर और धर्म को लेकर तो वह कुछ भी नहीं जानता। ऐसे में जन्म के साथ ही शिशु के धर्म और ईश्वर का निर्धारण कैसे संभव है! क्या यह खुली हवा में पहली सांस के साथ ही मनुष्य के विवेक को बांध देने की साजिश नहीं है? असल में यह धर्म के आधार पर संगठित होने वाले समाजों का मूक समझौता है, जिसके आधार पर वे अपने अनुयायी बांटते रहते हैं।  

धर्म की प्रमुख विशेषता उसका लचीलापन, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की ताकत है। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार कैसे बदलना है, यह तय करने का अधिकार जनसाधारण को नहीं होता। तय करता है पुरोहित वर्ग। इस काम को वह शास्त्रों की  दुहाई देकर करता है। यहां शास्त्र व्यापक पद है। उसमें ग्रंथों के अलावा श्रुति, परंपरा, यहां तक की शास्त्र के नाम पर मनमानी और अपने मत को ही प्रामाण्य मानने के दुराग्रह के साथ, एकाएक गढ़ ली गई संकल्पनाएं भी शामिल होती हैं। शास्त्रीय पैमाने पुरोहित वर्ग पर भी ज्यों की त्यों लागू हों, यह आवश्यक नहीं है। उनके लिए आपद् धर्म की व्यवस्था हर समय रहती है। जीवन महत्वपूर्ण है इसलिए क्षुधा पीड़ित विश्वामित्र की जीवन रक्षा हेतु मृत पशु का मांस खाने की अनुमति शास्त्र देते हैं। यह इजाजत सभी को; और हमेशा नहीं थी। जो धर्म भूखे विश्वामित्र के प्राण बचाने के लिए लचीलापन दिखाता है, वह महाभारत में राजनीति के साथ जुड़कर बेहद आक्रामक हो जाता है। वहां पांच पांडव बंधुओं को न्याय दिलाने के नाम पर महाभारतकार अठारह अक्षौहिणी सेना को युद्ध की आग में झोंक देने की घटना को धर्म युद्ध की संज्ञा देता है, जिसमें सब कुछ ऊपर से तय होता है और तथाकथित धर्म के नाम पर 19,68,300 सैनिक, 3,93,660 हाथी तथा 11,80,980 घोड़े युद्ध की बलि चढ़ा दिए जाते हैं।

साफ है, सामान्य व्यवहार में धर्म केवल आध्यात्मिक विषय नहीं रह जाता। उसमें शीर्षस्थ वर्ग की स्वार्थपूर्ण राजनीति, उसके मनसूबों और महत्वाकांक्षाओं को साधने का पूरा व्यवहारशास्त्र होता है। नैतिकता का आवरण तो लोगों को लुभाने के लिए होता है। समाज में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ प्रावधान आवश्यक हैं, जैसे—‘अपने पड़ोसी से प्यार करो, सत्यभाषी बनो, आवश्यकता से अधिक संचय मत करो, सभी जीवों पर दया, क्षमा, धृत्ति, करुणा, परोपकार आदि। धर्म की ये व्यवस्थाएं उसके चेहरे को मानवीय बनाती हैं। उसके लिए लोगों के दिल में जगह पैदा करती हैं। जनसाधारण उनसे यथोचित प्रेरणाएं भी लेता है। लेकिन यदि किसी क्षण पुरोहित वर्ग की मदद या व्याख्या की जरूरत आ पड़े तब वह धार्मिक प्रावधानों का उपयोग निहित स्वार्थ के लिए करता है। स्थितियां प्रतिकूल हों तो धर्म तत्क्षण अपने दिखावटी रूप को सामने लाकर उदार सामाजिक मूल्यों का हवाला देने लगता है। चूंकि नैतिकता के स्तर पर सभी धर्मों में अनूठी समानता है, इसलिए उस स्तर पर वे सभी विद्वेष एकाएक मिट जाते हैं, जिन्हें धर्म से जुड़ा सांप्रदायिक सोच जन्म देता हैं। सच तो यह है कि उस समय सिवाय कर्मकांडों और मिथकीय कल्पनाओं के धर्म का अपना कुछ रह ही नहीं जाता, बल्कि दबाव मैं धर्म स्वयं उन्हें दूसरे दर्जे का मानने लगता है। लेकिन दबाव हटते ही धार्मिक दुराग्रह फिर प्रबल होने लगते हैं। वर्गीय सोच के कारण प्रत्येक धर्म किसी न किसी रूप में सामाजिक स्तरीकरण का समर्थन करता है। ऊंच-नीच को स्थायी बनाता है।

ऐसे धर्म की जरूरत आखिर किसे है? पूंजीपति को या जनसाधारण उपभोक्ता को? मेरा उत्तर होगा, दोनों के लिए। पूंजीपति की धार्मिक प्रतीकों में कोई आस्था न हो तो भी वह स्वयं को धार्मिक इसलिए दर्शाता है, क्योंकि उसको अपना सर्वस्व समझने वाले गरीब, मेहनतकश यह मानते हुए कि उसकी संपन्नता के पीछे उसकी चालाकियां, अंधाधुंध मुनाफाखोरी, लालच, झूठ और बेईमानी न होकर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है, उसकी ओर से उदासीन हो जाते हैं। इससे केवल अपने लाभ के लिए उत्पादन करनेवाली पूंजीपति कंपनियों को बढ़ावा मिलता है। इस तरह धर्म सचाई पर पर्दा डालने का काम करता है। उल्लेखनीय है कि अमीर के लिए धर्म का अभिप्राय धार्मिक प्रतीकों, रीति-रिवाजों में आस्था तक सीमित नहीं होता, न वह केवल स्वर्ग के सुखों तक फैला होता है, बल्कि वह उसकी सीधी-सादी व्यापारिक रणनीति का हिस्सा होता है। धर्म की शरण में जाकर अमीर अपने इस जन्म की समृद्धि को पक्का करता है। जबकि गरीब अपने लिए सहनशीलता की मांग करता है, ताकि वर्तमान दुख-अभाव, उत्पीड़न की मार से बच सके। इसी खातिर वह अपने दुखों से खेलता तथा गरीबी और दुश्वारियों को गले लगाता है। वह ताकतवर के अत्याचार को नतभाव से सह लेता है। केवल इस उम्मीद में कि सब कुछ ईश्वर के नाम कर देने से या उसके नाम पर अपने दुखों की ओर से उदासीन हो जाने पर वह प्रसन्न होगा। बदले में उसका भविष्य बेहतर होगा। दूसरे शब्दों में धर्म धनवान और शक्तिशाली के हितों की तात्कालिक सिद्धि करता है, जबकि कमजोर को भरमाता है। उसे प्रलोभन से बांधे रखता है। उल्लेखनीय है कि धर्म और ईश्वर का महिमा-मंडन केवल आस्था-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहता। उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ भी होते हैं। जो मनुष्य को अपनी सीमाओं में बांधते हुए सामाजिक असमानता में उत्तरोत्तर वृद्धि करते हैं।

ईश्वर नामक काल्पनिक और गढ़ी गई सत्ता का प्रयोग प्रायः दो प्रकार के लोग करते हैं। एक जो उसे चाहते या उससे डरते हैं; तथा डर और चाहत के चलते यथा-सामर्थ्य वह सबकुछ करते हैं, जैसा उनसे पुरोहितवर्ग द्वारा कराया जाता है। दूसरे वे जो लोगों पर उसके प्रभाव का उपयोग निहित स्वार्थ हेतु करते हैं। जो लोग ईश्वर को चाहते या उससे डरते हैं—वे इस भ्रम के नाम पर लगातार छले जाते हैं। ईश्वरत्व की वास्तविकता कि वह केवल मनुष्य की मनोरचना है, को समझने वाले ईश्वर की काल्पनिक तस्वीर गढ़ते हैं।  निहित स्वार्थ के लिए वे उसके चारों ओर झूठे किस्से-कहानियों और गाथाओं का पूरा शास्त्र खड़ा कर लेते हैं। फिर उसके माध्यम से उस वर्ग का जो अपने भोलेपन के कारण ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करता है, को बरगलाते तथा उसका तरह-तरह से शोषण करते हैं।

धर्मशास्त्रों में बार-बार बताया जाता है कि दुनिया धर्म पर टिकी है। धर्म के न होने से सामाजिक व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। इंसान इंसान को खाने लगेगा। चारों ओर अराजकता छा जाएगी। असल में यह डर ही धर्म की नींव, उसकी प्राणवायु है। यह डर मनुष्यों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास पैदा करता है, जिसे पैदा करने में धर्म की बड़ी भूमिका होती है। एक-दूसरे के प्रति डर और अविश्वास उन्हें अनावश्यक स्पर्धा में उलझाए रखता है। यह धर्म के संबंध में परस्पर विरोधाभासी मान्यताओं को सामने लगाता है। क्योंकि एक ओर तो वह मानवीय स्नेहानुराग को बनावटी, दुनिया को नकली और मोह-माया ग्रस्त, भव-प्रपंच आदि बताकर जीवन-संघर्ष से पलायन को उकसाता है, दूसरी ओर वह देवताओं की ऐसी कृपालु और महिमामयी तस्वीर गढ़ता है, जो पलक झपकते ही भक्त को उसके समस्त दुखों, अभावों, कमजोरियों और दुश्वारियों से मुक्ति दिला सकते हैं। हालांकि जैसा कि माना जाता है, देवताओं की ‘कृपा’ विनीत बने रहने पर ही संभव हो पाती है। सचाई और साफगोई किसी देवता को पसंद नहीं है। न ही आंख से आंख मिलाकर बात करने वाले भक्त उन्हें रास आते हैं। देवता उन भक्तों को पसंद करते हैं, जो हमेशा गिड़गिड़ाते हुए नजर आएं। खुद सत्तु खाकर उन्हें पकवानों का भोग लगाएं। इस तरह पुरोहितों द्वारा गढ़े गए देवता और तानाशाह में कोई अंतर नहीं रह जाता। बल्कि कई बार तो देवता तानाशाह से भी कहीं अधिक क्रूर और सनकी नजर आते हैं। तानाशाह नाराज होने पर अधिक से अधिक कैद कर लेता है अथवा मनुष्य को मौत के घाट उतार देता है। देवता नाराज हों तो मृत्युदंड के बाद आत्मा युगों-युगों तक दंड की भागी बनती है। बल्कि तानाशाह की अपेक्षा देवताओं के नाराज होने की संभावना अधिक होती है। क्यांकि वहां मानवीय भूलों के लिए कोई स्थान नहीं होता। मानो गुस्सा और नाराजगी देवताओं की नाक पर रखी रहती है। भक्तों से सुबह-शाम नाम लिवाना देवताओं को सर्वाधिक प्रिय है। इस काम यदि भूल से भी चूक हो जाए तो देवताओं का कोप-भाजन बनना पड़ता है। नाराजगी मानो उनकी नाक पर रखी रखती है। दावा किया जाता है कि देवताओं की मर्जी के बिना सृष्टि में पत्ता तक नहीं हिलता, बावजूद इसके यदि कोई चूक हो जाए तो दंड का भागी केवल इंसान को बनना पड़ता है। धर्म की माने तो माया का भरमाया मनुष्य कोई न कोई चूक हर घड़ी करता ही रहता है। इसलिए हर किए-अनकिए की जिम्मेदारी मनुष्य पर आ पड़ती है। माया या माया बनाने वाले का कोई दोष नहीं मानता। प्रत्येक कार्य के पीछे दैवी-विधान मान लेने का नुकसान यह है कि इससे जीवन में सामान्य सुख, यहां तक कि नैसर्गिक स्वतंत्रता भी मनुष्य का अधिकार होने के बावजूद, ‘दैवी-कृपा’ मान लिए जाते हैं। जो लोग किसी कारणवश इन सुविधाओं तथा मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें देवी कृपा से भी वंचित और ‘अभागा’ कहा जाता है।

धर्म का यह चरित्र तभी से है जब से साम्राज्यवादी चेतना का उदय हुआ। तभी से राजा-महाराजाओं, जमींदारों के इर्द-गिर्द चाटुकारों का वर्ग बनने लगा था। चाटुकार वर्ग में पुरोहित भी सम्मिलित थे। वे राजा की सहानुभूति प्राप्त करने तथा जनता पर अपने प्रभाव को स्थायी बनाने के लिए धार्मिक अनुशंसाओं की मनमानी व्याख्याएं करते थे। राजाओं और सामंतों को भोग-विलास प्रिय था। इसलिए पुरोहितों ने देवताओं को भी  स्वार्थी, विलासी, स्वर्णाभूषणों से मंडित दिखाया है। परिणाम यह हुआ कि धर्म की नैतिक और सामाजिक व्यवस्थाएं केवल दिखावे की चीज बनती गईं। धार्मिक मान्यताएं जैसे-जैसे फैलीं, सामाजिक असहिसुष्णता लगातार बढ़ती गई। कालांतर में यही दिखावा देवताओं के चरित्र-चित्रण में भी समा गया। परिणामस्वरूप जो देवता चित्रित किए गए, आदमी की तरह वे भी अपनी आत्मप्रशंसा के भूखे थे। गुस्सा उन्हें भी आता था। साधारण इंसान की भांति मनमानी करने से उनका अहं भी ठंडा होता था। यहां तक कि षड्यंत्र रचने, भोग-विलास और वैभव प्रदर्शन करने में भी वे कम नहीं हैं।

प्रमाण के लिए लक्ष्मी से लेकर विष्णु या किसी और हिंदू देवी-देवता का चित्र देख लीजिए, सभी स्वर्णाभरण से सज्जित हैं। उनके मुकुट हीरे के जड़े हैं। वे चढ़ावे की कीमत देखकर आनुपातिक रूप से प्रसन्न होते हैं। केवल पाशुपति इसके अपवाद हैं। वे देवताओं में सबसे पुराने भी हैं। उनके बारे में प्रस्तर शिल्प से लेकर लिखित साहित्य में इतना कुछ मौजूद था कि पुरोहितों द्वारा उसमें फेरबदल कर पाना, आसान नहीं था। उपलब्ध साक्ष्य यह भी बताते हैं कि शिव अवैदिक देवता हैं। त्रिदेवों में ब्रह्मा को सृजन और विष्णु को पालन का दायित्व सौंपा गया है। थोड़ा-सा विचार करने पर इस रूपक के अभिप्राय को आसानी से समझा जा सकता है। ब्रह्मा के हाथ में वेद हैं, जिसके पीछे असली मंशा वेदों को अपौरुषेय दिखाने की है। विष्णु को पालक देवता का दर्जा प्राप्त है। उन्हें अवतार लेकर बार-बार सृष्टि में आना पड़ता है। यह क्षत्रियों के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता हस्तांतरण का संकेतक है।

शिव को संहार का देवता बताया जाता है। आखिर द्रविड़ों या अनार्यों का देवता ही संहार का देवता क्यों? इसके पीछे की मानसिकता का आकलन कठिन भले हो, असंभव नहीं है। आर्यों के आगमन से पहले इस देश में शिव की प्रतिष्ठा थी। इसके भी प्रमाण हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में पांव जमाने से पहले आर्यों को न केवल यहां के मूल निवासियों से संघर्ष करना पड़ा था, बल्कि अनेक समझौते भी उन्हें करने पड़े थे। आर्यों के साथ निरंतर चलने वाले युद्धों में अंततः अनार्यों को पराजित होना पड़ा पड़ा था, तथापि अनार्यों का डर आर्यों के मन से गया नहीं था। शिव के चिर संगी के रूप में भूत, प्रेत, वैताल आदि हैं, जो अलग-अलग कबीलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही गणशक्ति शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश करती है। शासक वर्ग के मन में जनता का डर, यह डर कि शिव के एक संकेत पर कबीलाई समूह आर्यों के श्रेष्ठ योद्धा होने के सपने को चकनाचूर कर सकते है, शिव को देवताओं का देवता, महादेव और संहार का देवता बनाता है। शिव की भांति गणेश भी गण-प्रमुख यानी कबिलाई संगठनों के नेता हैं। लंबे समय तक उन्हें अनार्यों के मुखिया के रूप में मान्यता मिलती रही। गणेश को उनका वर्तमान रूप आर्यों की गणतंत्र के प्रति अनास्था के कारण, उसके उपहास के कारण मिला है।

विभिन्न धर्मावलंबियों की कोशिश होती है, अपने धर्म को पुराने से पुराना दिखाने की। इसके पीछे उनकी कोशिश अपने-अपने धर्म के रीति-रिवाज, कर्मकांड आदि को ज्यों की त्यों, चलाते जाने की होती है। यह बात अलग है कि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दुनिया में धर्म की आमद को 5000 वर्ष से पहले नहीं ले जाया जा सकता। यह वही समय है जब इंसान ने संगठित होकर रहना सीखा। नगर राज्यों की नींव रखी गई। उन्हीं दिनों धर्म की सांगठनिक शक्ति को पहचाना गया और उसके आधार पर लोगों को जोड़ने की शुरुआत की गई। हालांकि सभ्यता का इतिहास इससे भी काफी पुराना है। यदि प्रबोधीकरण के युग को ही लें तो करीब 12000 वर्ष बीत चुके हैं। यानी प्रबोधीकरण का दो-तिहाई हिस्सा मनुष्य ने बगैर किसी धार्मिक विश्वास के बिताया है। लेकिन एक बार धर्म के अस्तित्व में आने के बाद उससे पीछा छुटा पाना मनुष्य के लिए असंभव रहा है। इस बीच राजसत्ताएं बदलीं। सत्ताओं के रूप और मायने बदले। साथ-साथ धर्म के मायने तथा उसके अभीष्ट भी बदलते रहे हैं। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि धर्म गायब हुआ हो। संगठित राजसत्ता के दौर में धर्म सत्ता और भी फली-फूली और मजबूत हुई है। ऐसे में धर्म से मुक्ति, उसके कर्मकांडों से मुक्ति क्या संभव है? खासकर गत दो हजार वर्षों से धर्म दुनिया-भर के समाजों, लोक-परंपराओं में जितनी गहराई से अंतर्गुंफित हुआ है। उससे मनुष्य की धर्म से मुक्ति आसान नहीं लगती। खासकर तब जब धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों के स्वार्थ एक समान हों। दोनों एक-दूसरे को समर्थन और बल प्रदान करती हों। यह धर्म की ही माया है कि कंप्यूटर अपने ईजाद होने के साथ ही भविष्यवाणी करने लगता है।

यह ठीक है कि आधुनिक युग में धर्म से मुक्ति आसान नहीं दिखती। लेकिन जो कठिन दिखती हो, वह असंभव भी हो, यह बात जमती नहीं। बल्कि इतिहास ने दर्शा दिया है कि कठिनता का जीवनकाल बस कुछ वर्ष का होता है। उसके बाद वह व्यवहार का हिस्सा बन जाती है। आज से सत्तर-अस्सी वर्ष पहले एवरेस्ट की गगनचुंबी चोटी पर पहुंचना असंभव बात थी। बाद में हिलेरी, शेरपा तेनसिंह के साथ गए। असंभव संभव हुआ। आज तो यह स्थिति है कि वहां अपेक्षाकृत आसानी से जाया जाता है। ऐवरेस्ट यात्रा खबरें कोई खास रोमांच नहीं बना पातीं। यही हाल धर्म का है। आज भले ही लोग मानते हों कि सृष्टि धर्म के बल पर टिकी है। पर कल हालात बदल भी सकते हैं। कोई भी दो सत्ताएं जिनके अपने-अपने स्वार्थ हों, लंबे समय तक एक-दूसरे के समर्थन में नहीं रह सकतीं। खासकर तब जब शक्ति के केंद्र बदल रहे हों। पहले भू-संपदा पूंजी का प्रतीक थी। उससे पहले कुछ और था। इसलिए वह दिन दूर नहीं कि जब धर्म की असलियत भी लोगों के सामने होगी। वे उन चेहरों को देख सकेंगे, जो उसकी महिमा मंडन के पीछे हैं।

दूसरी ओर यह भी सही है कि आदमी के मन से आगत-अनागत का डर निकल जाए, धर्म अपने आप ‘फालतू’ मान लिया जाएगा। यह भ्रम भी जाता रहेगा कि धर्म मनुष्य को जोड़ता है। भ्रम टूटते ही मनुष्य समझने लगेगा कि जीवन के जो लक्ष्य हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए किसी तीसरी शक्ति की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य आपसी सहयोग, समर्पण और विश्वास द्वारा भी जीवन-लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। इससे उसका दैन्य घटेगा। आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। भटकाव में कमी आएगी। जीवन के लक्ष्य जब तीसरी अदृश्य सत्ता को बीच में रखकर लेने के बजाय समाज और सामाजिकता को ध्यान में रखकर तय होने लगेंगे तो सामाजिक अंतद्र्वंद्वों का हृास होगा। तनाव में कमी आएगी। समाज की ऊर्जा सामाजिक कार्यों में विकास के लिए खर्च होने लगेगी। अपने पुरुषार्थ पर भरोसा मनुष्य को जीवन और एक-दूसरे के करीब लाएगा। हमें उस दिन की प्रतीक्षा तो कर ही सकते हैं।

ओमप्रकाश कश्यप 

1.  किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. —यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ से उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

2 . यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, 431।

सिंधू घाटी की सभ्यता और आर्य श्रेष्ठता के मिथ

सामान्य

आलेख

क्षेत्रीयता के आधार पर भारतीय संस्कृति को दो भागों में बांटा जा सकता है। उत्तर भारत की संस्कृति जिसे आर्य संस्कृति, वैदिक संस्कृति अथवा सीधे-सीधे ‘ब्राह्मण संस्कृति’ कह दिया जाता है। दूसरी अनार्य संस्कृति अथवा द्रविड़ संस्कृति, जिसकी जड़ें सिंधू सभ्यता तक जाती हैं। भारत का सांस्कृतिक इतिहास इन्हीं संस्कृतियों के बीच समय-समय पर हुए संघर्ष एवं सम्मिलन का लेखा है। यह भी मान लिया गया है कि सिंधू सभ्यता के पराभव के साथ ही, उसकी संस्कृति भी दम तोड़ चुकी थी। अब जो भारतीय संस्कृति है वह मुख्यत: हिंदू यानि ब्राह्मण संस्कृति है। पर क्या सचमुच? सिंधू सभ्यता की भांति क्या उसकी संस्कृति भी पूरी तरह काल-कवलित हो चुकी है? भारतीय संस्कृति की जड़ों की खोज हमें 3500-4000 वर्ष पहले तक ले जाती है। शुरुआत सिंधू घाटी की सभ्यता से होती है। यह ज्ञात तथ्य है कि सिंधू-नदी के तटवर्ती इलाकों में 3300-1750 ईस्वी पूर्व में एक समृद्ध नागरी सभ्यता विद्यमान थी। समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक उन्नत सिंधू सभ्यता का विस्तार करीब नौ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था, जो आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक है। 

अपने वैभवकाल में सिंधू सभ्यता के सबसे विकसित नगर मोहेनजो-दरो की आबादी अनुमतः 35,000-41,000 तथा हड़प्पा की आबादी अनुमतः 23,500 से 35,000 के बीच थी। 35-40 लाख आबादी वाले आधुनिक महानगरों के आगे यह आबादी भले ही छोटी लगे, किंतु उस समय के गांवों की जनसंख्या 50-100 को देखते हुए, वे वास्तव में अपने समय के ‘महानगर’ कहलाने के अधिकारी थे। सिंधू नदी की उपजाऊ भूमि पर बसी वह एक समृद्ध सभ्यता थी। इसका प्रमाण वहां से प्राप्त तरह-तरह के आभूषण, विशालकाय अन्न भंडार तथा बेहतरीन नगर संरचनाएं हैं। खुदाई में बहुत कम मात्रा में हथियारों का मिलना दर्शाता है कि सिंधू सभ्यता के निवासी शांतिमय जीवन जीने में विश्वास रखते थे। वे लोग, ‘लड़ाके नहीं थे; और बाहरी आक्रमण की आशंका भी उन्हें कम ही थी।’1 ऐसी सुसमृद्ध और फलती-फूलती सभ्यता, करीब 1750 ईस्वी पूर्व पहले प्राकृतिक कारणों से पराभव की ओर बढ़ चुकी थी। सभ्यता के अवसानकाल में सिंधूवासियों को एक मानव-जनित आपदा का सामना भी करना पड़ा था। वह था—2000 से 1500 ईस्वी पूर्व हुआ आर्य कबीलों का आक्रमण।2 माना जाता है कि उन आक्रमणों ने ही अनार्यों को उत्तर-पश्चिम की दिशा में विस्थापन के लिए विवश कर दिया था।

इतिहासकारों का दावा है कि आर्य अपेक्षाकृत उच्च सभ्यता के दावेदार थे। ‘अमरकोश’(7/3) में उन्हें ‘महाकुलकुलीनआर्यसभ्यसज्जनसाधवः,’ महाकुल, कुलीन, आर्य, सभ्य, सज्जन, साधु बताया गया है। सिवाय ऐसे उल्लेखों के भारत में आने से पहले आर्यों की प्राचीन सभ्यता के बारे में, उस सभ्यता के बारे में जिसे वे पीछे छोड़कर आए थे—हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है। ऐसा भी कोई साक्ष्य नहीं है जो उस दौर में उनकी सभ्यता को सिंधू-घाटी के अधिवासियों की सभ्यता से श्रेष्ठ दर्शाता हो। तथ्यों को खँगालने पर यह तर्क भी विश्वसनीय नहीं लगता कि अनार्यों के सिंधू घाटी से विस्थापन का एकमात्र कारण, आर्यों का अनपेक्षित आक्रमण था। 

इतिहासकारों के अनुसार आर्यों ने भारत में अलग-अलग समय में कबीलों के रूप में प्रवेश किया था। दूसरी ओर सिंधूवासी आर्येत्तर अपने समय की सर्वाधिक विकसित, नागरी सभ्यता के निर्माता थे। वे पशु-पालक अर्थव्यवस्था को पार करके, उन्नत कृषि एवं व्यापार-केंद्रित अर्थव्यवस्था के स्तर को प्राप्त कर चुके थे। वे भविष्य के लिए अन्न संग्रह करना जानते थे। ऋग्वेद में ‘पणि’ शब्द कई स्थानों पर आया है। ‘निरुक्त’(6/27) के अनुसार पणि ‘व्यवसायी’ लोग थे। वही सिंधू उपत्यका की व्यापार-प्रधान सभ्यता के निर्माता थे। ऋग्वेद में उन्हें आर्य-विरोधी के रूप दर्शाया गया है। बताया गया है कि पणि ऋषिगणों से उनका धन छीनकर ले जाते थे। एक स्थान पर सोम से लालची पणियों को नष्ट कर देने की प्रार्थना की गई है(ऋग्वेद, 6.51.14)। पशु-पालन अर्थव्यवस्था में अंतनिर्हित यायावरी ही आर्यों को भारतीय प्रायद्वीप तक खींच लाई थी। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि आर्यों ने जब सिंधू घाटी में कदम रखा तब तक वे लिपि के प्रयोग से अनजान थे। जबकि  सिंधूवासियों के पास 396 अक्षरों वाली समृद्ध लिपि थी।3 वे गणित के प्रयोग में भी दक्ष थे। सिंधूवासियों के साहित्य के बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है। आर्यों की पद्य-रचनाओं के बारे में अवश्य पता चलता है, जिन्हें वे कंठस्थ करके रखा करते थे। राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार—‘अनेक विद्वान समझते हैं कि भारतवर्ष में 800 ईस्वी पूर्व से पहले तक लेखनकला ज्ञात न थी। किंतु यह मत सभी को मान्य नहीं है। पर इतना निस्संदेह है कि भारत में लिपि से बहुत पहले साहित्य बन चुका था।’4 स्पेन, फ्रांस और भारत में भीम बेटका की गुफाओं में बने भित्तिचित्रों से पता चलता है मनुष्य 30,000-35,000 वर्ष पहले कहानी गढ़ना सीख चुका था। मान सकते हैं कि लिखित हो या मौखिक—सिंधू सभ्यता के अधिवासियों का भी कोई न कोई साहित्य अवश्य रहा होगा। वह सब खुद मिटा या मिटा दिया गया, प्रमाणों के अभाव में इसपर कुछ भी कह पाना संभव नहीं है।

ऋग्वेद में पृथ्वी और उर्वी अर्थात लंबी-चौड़ी धरती, जो गायों से भरी हुई होती थी(गोमती), के अलावा नगर और पुर तथा सौ खंबों वाले(शतभुजी), पत्थरों से बने(अश्वमयी) और शरद-ऋतु में काम आने वाले(शारदी) दुर्गों का भी वर्णन है, जिनमें लोग नदियों की बाढ़ के दौरान आत्मरक्षा करते थे।5 किंतु उन दुर्गों के निर्माता आर्य ही थे—यह बात दावे से नहीं कही जा सकती। कारण यह है कि वेदों को लिपि के आविष्कार, यानी 800 ईस्वीपूर्व के आसपास ही लिपिबद्ध किया जा सका था। उस समय तक आर्यों को भारत आए सात-आठ शताब्दियां बीत चुकी थीं। इसलिए इस बात की पर्याप्त संभावना है कि भारत आने के बाद, आर्यों ने जिन नई ऋचाओं की रचना की, उनमें सिंधू सभ्यता के मूल नागरिकों द्वारा बनाए गए पुरों का वर्णन भी शामिल था। राधाकुमुद मुखर्जी ऋग्वैदिक सभ्यता को सिंधू सभ्यता की ‘पूर्वगामिनी अथवा उत्तराधिकारिणी’ कहने से बच जाते हैं। लेकिन इससे वे भी इन्कार नहीं कर पाते कि, ‘जिन भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिस्थितियों में ऋग्वेद की रचना हुई, उनमें आर्येत्तर लोगों की संस्कृति एवं जीवन-परिस्थितियों से आर्यों का परिचित हो जाना स्वाभाविक था, जिनमें से कुछ का उल्लेख ऋग्वेद में आ गया। और जो मोहनजो-दरो से प्राप्त सामग्री से मिलता-जुलता है। तात्पर्य यह है कि ऋग्वेद के आर्येत्तर वे लोग हो सकते हैं, जिन्होंने सिंधू सभ्यता का निर्माण किया था।’6 अन्यत्र वे लिखते हैं कि ‘सिंधू घाटी में आर्यों को एक उन्नत सभ्यता से टक्कर लेनी पड़ी। वह अनेक नगरों में फैली हुई थी।’7 शरद-ऋतु में काम आने वाले(शारदी) दुर्ग….जिनमें लोग नदियों की बाढ़ के दौरान आत्मरक्षा करते थे’—का आशय भी यही है कि आर्य कबीले उनके निर्माता न होकर, उपयोगकर्ता मात्र थे। ऐसे में आर्यों को सभ्यता के स्तर पर आर्येत्तर सिंधूवासियों से उन्नत दर्शाने का कोई औचित्य नहीं है।  

सभ्यता के स्तर पर सिंधूवासियों की श्रेष्ठता को क्या आर्यों ने कभी स्वीकार किया? संस्कृत साहित्य में अनार्यों के प्रति जो अवमाननापूर्ण टिप्पणियां हैं, उन्हें देखकर तो लगता है कि कभी नहीं। स्थापत्य की दृष्टि से ऋग्वेद की भाषा ध्वंस की भाषा है। भारत आने के बाद आर्य शनैः-शनैः नष्ट हो रही उस सभ्यता को सहेजने की कोशिश नहीं करते। कदाचित उनके लिए वह संभव भी नहीं था। संस्कृत साहित्य में भौतिक जगत के प्रति नकार का स्थायी भाव दर्शाता है कि सिंधू सभ्यता के भग्नावशेषों ने आर्यों के मनस् में, भौतिक जगत के प्रति गहन नैराश्य को जन्म दिया था। इस बोध को जन्म दिया था कि प्राकृतिक शक्तियों के समक्ष मनुष्य की शक्तियां नगण्य हैं। कदाचित उससे जन्मा डर ही आगे चलकर ब्राह्मणों के धर्म-दर्शन में मायावाद के प्राबल्य का कारण बना। डरे हुए आर्यों ने वन-प्रांतरों को अपना ठिकाना बनाया। वहीं रहते हुए प्राकृतिक शक्तियों की अभ्यर्थना के लिए रचे गए मंत्रों को लिपिबद्ध किया। 

वन-प्रांतर में रहने के लिए आग जलाकर बैठना सुरक्षा का भरोसा देता था। प्रकारांतर में उसी से यज्ञों का जन्म हुआ। प्राकृतिक शक्तियों के परामानवीकरण की शुरुआत कदाचित लोगों को यज्ञ का औचित्य समझाने के लिए हुई। सूर्य, वरुण, चंद्र, पूषा, उषा जैसे मानवरूपी देवता गढ़े जाने लगे। इंद्र नामक नायक की परिकल्पना की गई। उसे ‘पुरों को तोड़ने वाला’(पुरंदर) घोषित किया गया(ऋग्वेद 1/103/3)। धीरे-धीरे देवताओं का पूरा कल्पनालोक गढ़ लिया गया। इस तरह सिंधू सभ्यता के भग्नावशेष, इंद्रादि काल्पनिक देवताओं के पराक्रम एवं शौर्य-कथाएं गढ़ने के काम आने लगे। आगे चलकर जैसे-जैसे यज्ञ-संस्कृति का विस्तार हुआ, प्राकृतिक शक्तियों के परामानवीकरण तथा उनकी प्रशस्ति में रचा गया मिथकीय साहित्य, आर्यों के लिए खुद को अनार्यों से विकसित और सभ्य दिखाने का एकमात्र माध्यम बन गया। 

कर्मकांड प्रधान ब्राह्मण संस्कृति में प्रदर्शन, वास्तविकता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था। संभवत: सिंधू सभ्यता को देखकर जन्मी कुंठा ही उन्हें आडंबरों की शरण में जाने को उकसा रही थी। उसी के चलते इंद्रादि देवताओं के महिमामंडन हेतु ऋग्वेद में आर्य-अनार्य संघर्ष के बड़े-बड़े रूपक गढ़े गए। एक जगह(4/16/13) 50,000 कृष्ण-योनि दासों का युद्धभूमि में संहार करने का उल्लेख है। इसी तरह मंत्र 4/30/21 में 30,000 दासों को माया से मूर्छित कर देने का उल्लेख है। कह सकते हैं कि पुराणों की तरह चामत्कारिक विवरण की शुरुआत ऋग्वेद के समय में ही हो चुकी थी। वर्चस्व की लड़ाई केवल आर्यों और अनार्यों के बीच ही नहीं थी, अपितु आर्यों के बीच भी थी। ऋग्वेद में वशिष्ट और विश्वामित्र के भिड़ंत की कहानी आर्यों में पनप चुकीं दो समानांतर संस्कृतियों के अंतर्द्वंद्व को दर्शाती है।

ऋग्वेद में सुदास और दस राजाओं(कबीलों) के युद्ध तथा उसमें अनार्य कबीलों की पराजय का उल्लेख है। अन्य युद्ध में कृष्णासुर को इंद्र से पराजित दिखाया गया है। इस तरह के और भी कई युद्ध उसमें हैं, जिनमें इंद्र को अनार्यों का वध करते, उनके दुर्गों को ध्वस्त करते हुए बताया गया है। इन्हीं के आधार पर इतिहासकारों की राय बनी कि आर्यों के हमलों से पराजित अनार्य सिंधू कबीले दक्षिण और उत्तर-पश्चिम की ओर पलायन करने लगे थे। लेकिन रमाप्रसाद चंद्रा के अनुसार, ऋग्वैदिक इतिहास का संबंध आर्यों तथा इंद्रपूजक राजाओं के मध्य घरेलू युद्ध से था, न कि आर्यों और अनार्यो के बीच हुए युद्ध से। वे तो यहां तक लिख जाते हैं कि अनार्यों की केवल एक जाति, निषाद इतनी बड़ी संख्या में थी कि उसे समाप्त करना आसान नहीं था। निषाद इतने शक्तिशाली भी थे कि उन्हें दास बनाना अथवा सभी को एक साथ खदेड़ पाना असंभव ही था। इसलिए उन्होंने निषादों से समझौता करने में ही अपनी भलाई समझी।8 सिंधूघाटी की बसावट से जुड़े आंकड़े भी रमाप्रसाद चंद्रा के निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं। 

2000 ईस्वीपूर्व में भारतीय प्रायद्वीप की कुल जनसंख्या अनुमतः 60 लाख थी। उसमें से 50 लाख लोग सिंधू-क्षेत्र के अधिवासी थे। उस जनसंख्या में 9.4 प्रतिशत प्रति शताब्दी की दर से वृद्धि हो रही थी।9 इस तरह 1500-1600 ईस्वी पूर्व में, जब आर्यों ने भारत-भूमि पर कदम रखा, यहां की कुल जनसंख्या लगभग 85 लाख थी। उनमें 70 लाख से अधिक लोग सिंधू घाटी में रखते थे। 20-22 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली, इतनी बड़ी जनसंख्या को, कुछ सौ या हजार की टुकड़ियों में जब-तब आने वाले आर्य विस्थापित नहीं कर सकते थे। इसलिए आर्यों को यदि सिंधू-क्षेत्र खाली करना पड़ा तो उसके पीछे आर्यों के हमलों से कहीं ज्यादा, कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों का योगदान था। सिंधू-सभ्यता के निवासियों का मुख्य व्यवसाय खेती था; और मौसम पर आधारित खेती की अपनी विडंबनाएं होती हैं। कभी बाढ़ तो कभी सूखा। जाहिर है कि जैसे-जैसे सिंधू-परिक्षेत्र की जनसंख्या बढ़ रही थी, बाढ़-क्षेत्र में खेती की अनिश्चितता उन्हें सुरक्षित ठिकानों की खोज के लिए प्रेरित कर रही थी। कह सकते हैं कि बेहतर ठिकानों की खोज ने ही अनार्यों को गंगा और यमुना के मैदानों तक पहुंचा दिया था। यह विस्थापन आर्यों के भारत आगमन के बाद आरंभ नहीं हुआ था। अपितु सिंधू सभ्यता के आरंभिक दौर में ही आरंभ हो चुका था।

हड़प्पा सभ्यता को लेकर नए पुरातात्विक शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा राखीगढ़ी के उत्खनन को लेकर जारी रिपोर्ट के अनुसार, सिंधू घाटी सभ्यता उत्तर जम्मू और कश्मीर की तलहटी में बसे मंदा तथा ऊपरी अफगानिस्तान के शोर्तुघाई से लेकर, दक्षिण में देमावाड़ तक 1600 किलोमीटर तथा पूरव में आलमगीरपुर से लेकर पश्चिम में सुक्ताघर डोई तक 1600 किलोमीटर से अधिक में उसका विस्तार था। सिंधू सभ्यता के दो प्रमुख नगरों, मोहेंजो-दरो और राखीगढ़ी के बीच ही 1000 किलोमीटर से अधिक का फासला है।10  रिपोर्ट के अनुसार 1800 ईस्वी के आसपास उस क्षेत्र को भीषण सूखे का सामना करना पड़ा था। वर्षों लंबे सूखे के से परेशान होकर  सिंधूवासी उत्तर-पूरव ओर प्रस्थान करने लगे थे। वही हड़प्पा सभ्यता के पराभव का कारण बना था।11 आधुनिक शोध भी इसकी पुष्टि करते हैं।

दूसरे, यदि आर्यों से पराजय ही अनार्यों के सिंधू क्षेत्र से पलायन का प्रमुख कारण होता तो वे भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर वैसा असर कतई न छोड़ पाते, जैसा आज दिखाई पड़ता है। आर्य संस्कृति का 3000 वर्ष पुराना इतिहास भी उसे मिटा नहीं पाया है। इसमें से हम कुछ की चर्चा करेंगे। पहला है लिंग पूजा। ऋग्वेद(7/21/5, 10/93/3) में आर्येत्तर लोगों के बारे में कहा गया कि वे ‘केवल अपने नियमों का पालन करने वाले’(अन्यवृत) तथा ‘लिंग पूजक’(शिश्नदेवा) थे। सिंधूवासियों की संस्कृति में भी लिंग पूजा का विशेष स्थान था। सिंधू घाटी से विस्थापित अनार्य जहां-जहां गए, वहां उनके साथ लिंग पूजा भी गई। अपने देश में आज भी लिंग पूजा, मूर्ति पूजा का सबसे प्रचलित रूप है। ब्राह्मणों ने ब्रह्मा को भले ही सृष्टि के निर्माता का दर्जा दिया हो, मगर ‘महादेव’ का दर्जा अनार्य देवता ‘शिव’ या ‘पशुपति’ को ही प्राप्त है। गांव-देहात के मंदिरों और पूजा स्थानों पर कोई और मूर्ति हो न हो, शिवलिंग अवश्य दिखाई दे जाता है।

सिंधू सभ्यता में मातृदेवी की पूजा का संकेत भी मिलता है। कुछ स्त्री-मूर्तियां मिलती हैं—‘बहुसम्मत विचार के अनुसार ये महामातृदेवी(महीमाता), या मातृरूप में स्थित प्रकृति की मूर्तियां हैं….यही ऋग्वेद के आदित्यों की माता अदिति हैं। आर्य और अनार्य दोनों प्रकार की भारतीय प्रजा भुइयां आदि ग्रामदेवियों से लेकर आज तक इसी अंबिका या मातृदेवी के नाना रूपों की पूजा करती आई है।’12 कुछ वर्ष पहले तक गांव-देहात में मंदिर हो न हो, मगर कोई न कोई देवी अवश्य होती थी, जिसे कहीं ग्राम देवी कहा जाता था, कहीं चामुंडा तो कहीं कुछ और। निचली जातियां प्रायः उन्हीं देवियों की पूजा करती थीं। आज भी गांवों में ऐसे देवी-स्थान बहुतायत में मिलते हैं। 

सिंधूवासियों का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण योगदान लिपि के क्षेत्र में था। सिंधू घाटी में आने के पहले और यहां आने के बाद, करीब 800 ईस्वी पूर्व तक आर्यों ने जो भी साहित्यिक रचनाएं कीं, वे मौखिक थीं। ई. टॉमस का विचार था कि आर्यों ने ‘विभिन्न देशों में भ्रमण करते हुए किसी लिपि का आविष्कार नहीं किया, किंतु जिस देश में वे जाकर बसे, वहीं की लिपि को अपनी भाषा लिखने के काम में ले लिया।’13 यद्यपि सिंधू लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं गया है। तथापि भाषाशास्त्रियों के अनुसार ब्राह्मी लिपि के कई अक्षरों पर सिंधू लिपि से ही लिए गए हैं। जॉर्ज बुहलर ने अशोककालीन ब्राह्मी लिपि और प्राचीन सिंधू लिपि का तुलनात्मक अध्ययन किया था। उसने एक सूची बनाई थी, तदनुसार ब्राह्मी लिपि के कम से कम 36 अक्षर सिंधू घाटी से प्राप्त लिपि से लिए गए हैं।14 इसके अलावा रक्षावीटिका(गंडा-ताबीज), योग, वृक्षों और पशुओं की देवताओं/अर्धदेवताओं के रूप में पूजा तथा योग जो आज भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं—सभी सिंधू-सभ्यता की देन हैं।  बाद में ब्राह्मण संस्कृति ने थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ अपना लिया था।

उपर्युक्त से साफ है कि उत्तर से दक्षिण तक भारत की जनसंस्कृति आज भी सिंधू सभ्यता के प्रभावों से मुक्त नहीं है। फिर इसमें आर्यों का अवदान क्या है? इसे ब्राह्मण संस्कृति क्यों कहा जाता है? इसका एक ही कारण है, भारतीय समाज का जाति और वर्ण-आधारित विभाजन। सभ्यता और संस्कृति के नाम पर जो कुछ है सभी को ब्राह्मणों की देन मान लेने की प्रवृत्ति। यह सब एक दिन में नहीं हुआ। धर्म और अध्यात्म के नाम पर ब्राह्मणों ने संस्कृति और ज्ञान के सभी केंद्रों पर कब्जा कर लिया था। शासक देशी हो या विदेशी जो उनके विशेषाधिकारों की रक्षा का आश्वासन देता, वे उसी के अनुशासन में ढल जाते थे। बाहर से आए शासकों के लिए भी, बजाय पूरे समाज को खुश करने के, मुट्ठी-भर पुरोहित वर्ग को संतुष्ट करके अपने पक्ष में कर लेना आसान था। यही कारण है कि पिछले ढाई हजार वर्षों के इतिहास में अनेक राजा बदले, राजाओं के धर्म बदले, ठिकाने बदले। ब्राह्मण सदैव सत्ता केंद्र में बने रहे। जिस तरह उन्हें राजाओं और शक्ति केंद्रों के बदलने  से कोई फर्क नहीं पड़ता, वैसे ही देवताओं के घटने-बढ़ने, नई पूजा पद्धतियों के शामिल होने या कुछ लोगों द्वारा उनका बहिष्कार किए जाने से भी उनपर कोई फर्क नहीं पड़ता। आज भी, जब तक जाति के नाम पर मिले उनके विशेषाधिकारों को कोई ठेस न पहुंचे, वे हर समझौते के लिए तैयार रहते हैं। प्राप्त विशेषाधिकारों के बल पर वे जो कह दें उसे धर्म मान लिया जाता है; और जो कर दें वह संस्कृति का हिस्सा बन जाता है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ  

  1.  हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, राजकमल प्रकाशन, हिंदी अनुवाद वासुदेवशरण अग्रवाल, पंचम संस्करण, पृष्ठ 36।  
  2.  ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ इंडिया, दूसरा संस्करण, ज्यूडिथ ई. वाल्श, स्टेट यूनीवर्सिटी ऑफ न्यू यार्क, पृष्ठ 19।
  3.  हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, पृष्ठ 37। अक्षरों की बनावट के लिए जॉन मार्शल की द्वारा संपादित मोहेनजो-दरो एंड हड़प्पा सिविलाइजेशन, खंड-दो, पृष्ठ 434-449 को देखा जा सकता है।
  4. हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, पृष्ठ 22।
  5. उपर्युक्त, पृष्ठ 48। 
  6. उपर्युक्त, पृष्ठ 50। 
  7. उपर्युक्त, पृष्ठ 90।
  8. दि इंडो-आर्यन रेसिस, रमाप्रसाद चंद्रा, दि वारेंद्र रिसर्च सोसाइटी, 1916, पृष्ठ-5।
  9. एटलस ऑफ वर्ल्ड पोपुलेशन हिस्ट्री, कॉलिन मेकएवडी और रिचर्ड जोन्स, प्रकाशक फेक्ट ऑन फाइल, न्यू यार्क, पृष्ठ 91।
  10. डॉ. अमरेन्द्र नाथ, एक्सकेवेशंस एट राखीगढ़ी, भारतीय पुरातत्व विभाग विभाग, पृष्ठ 4
  11. उपर्युक्त, पृष्ठ 50-51
  12. हिंदू सभ्यता, राधाकुमुद मुखर्जी, 38। 
  13. उपर्युक्त, पृष्ठ 56।
  14. दि इंडस स्क्रिप्ट, एस. लेंगड़न, मोहेनजो-दरो एंड इंडस सिविलाइजेशन, संपादक जॉन मार्शल, आर्थर प्रोबस्थियन, लंदन, 1931, पृष्ठ 433।

संत गाडगे महाराज : कीर्तन से क्रांति

सामान्य

जीवन चारि दिवस का मेला रे

बांभन(ब्राह्मण)झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे

मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे

लड्डू भोग चढावति जनता, मूरति के ढिंग केला रे

पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे

जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न अधेला रे

पुन्य-पाप या पुनर्जन्म का , बांभन दीन्हा खेला रे

स्वर्ग-नरक, बैकुंठ पधारो, गुरु, शिष्य या चेला रे

जितना दान देवे देव गे ब्राह्मण को देवोगे, वैसा निकरै तेला रे

बांभन जाति सभी बहकावे, जन्ह तंह मचै बबेला रे

छोड़ि के बांभन आ संग मेरे, कह रैदास अकेला रे

                                       —संत रैदास

इन दिनों परिस्थितिकीय असंतुलन सर्वाधिक चिंता का विषय है. होना भी चाहिए. वातावरण में रोज तरह-तरह के जहर घुलकर जिस तरह से उसे विषाक्त कर रहे हैं, यह चिंता वाजिब है. लेकिन एक और किस्म का प्रदूषण होता है. पहले वाले प्रदूषण पर बड़ी-बड़ी पोथियां लिखने वाले, रोज जार-जार आंसू बहाने वाले लोग दूसरी किस्म के प्रदूषण की ओर से चुप्पी साधे रहते हैं. इस प्रदूषण का नाम है—सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण. इसे फैलाते हैं, जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्रीयता, रंगभेद जैसे विषाणु. पहली किस्म का प्रदूषण समाज के बीच भेद नहीं करता. उसका असर सभी पर बराबर पड़ता है, हालांकि चपेट में गरीब और निचले वर्ग ही आते हैं, क्योंकि वे उससे जूझने लायक संसाधन नहीं जुटा पाते. दूसरे प्रकार का प्रदूषण समाज को नीची जाति-ऊंची जाति, स्वामी-मालिक, निदेशक-अनुपालक आदि में बांट देता है. पहली प्रकार के प्रदूषण से निपटने के लिए समाज की सामूहिक चेतना काम करती है. दूसरे प्रदूषण से निपटने के लिए केवल प्रभावित वर्गों को आगे आना पड़ता है. संघर्ष के दौरान उन्हें शीर्षस्थ वर्ग जो उस विकृति का लाभकारी, परजीवी वर्ग है—उसका विरोध भी सहना पड़ता है. इसलिए दूसरे प्रदूषण से मुक्ति आसान नहीं होती. ऐसे में जो लोग तमाम अवरोधों और मुश्किलात के बावजूद अपने अनथक संघर्ष द्वारा, धूल अटी संस्कृति को थोड़ा-भी साफ कर पाते हैं, मनुष्यता का इतिहास उन्हें संत, महात्मा, महापुरुष, युगचेता, युगनायक आदि कहकर सहेज लेता है. ऐसे ही कर्मयोगी संत थे—गाडगे महाराज. जिन्हें हम संत गाडगे या गाडगे बाबा के नाम से भी जानते हैं.

मराठी में ‘गाडगा’ का अर्थ है—खप्पर. टूटे हुए घड़े या हांडी का नीचे का कटोरेनुमा हिस्सा. गाडगे महाराज की वही एकमात्र पूंजी थी. कहीं जाना हो तो उसे अपने सिर पर रख लेते. हाथ में झाड़ू लगी होती. जहां भी गंदगी दिखाई पड़ती, वहीं झाड़ू लगाने लगते. कोई कुछ खाने को देता तो उसे गाडगा में रखवा लेते. कालांतर में गाडगा और झाड़ू ही उनकी पहचान बन गई. झाड़ू से बाहर की सफाई. विचारों से लोगों के मन में जमा उस मैल को साफ करने की कोशिश, जो सैकड़ों वर्षों से उनके मन में जमा था. जिसे हमने दूसरी श्रेणी के प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना है. गांव में एक दिन से ज्यादा ठहरते नहीं थे. रोज नया गांव, नई जगह की सफाई. नए-नए लोगों को सदोपदेश.

संत गाडगे का असली नाम था, डेबुजी झिंगराजी जाणोरकर. उनका जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेड्गांव के धोबी परिवार में हुआ था. पिता का नाम था, झिंगराजी और मां थीं—साखूबाई. गरीब परिवार था. जब शिक्षा की उम्र थी, तब उन्हें गृहस्थी चलाने में परिवार की मदद करनी पड़ती थी. चुनौतियां बस इतनी नहीं थीं. आठ वर्ष की अवस्था में उनके पिता का साया सिर से उठ गया. मां ने उन्हें अपने भाई के यहां भेज दिया. मामा खेती-बाड़ी करते थे. डेबू जी भी उनके साथ खेतों पर जाने लगे. वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट और परिश्रमी थे. सो कुछ ही दिनों में मामा की खेती संभाल ली. युवावस्था में कदम रखने के साथ ही उनका विवाह कर दिया गया. पत्नी का नाम था, कुंतीबाई. दोनों के चार बच्चे हुए. उनमें दो लड़के और दो बेटियां थीं. उस समय तक डेबुजी खेतों में काम करते. खूब मेहनत करते. साहस उनमें कूट-कूट कर भरा था. जरूरत पड़ने पर आततायी से अकेले ही भिड़ने का हौसला रखते थे.

उन दिनों खेती करना आसान बात न थी. जमींदार लगान और साहूकार ब्याज के बहाने किसान की सारी मेहनत हड़प लेता था. कई बार किसान के पास अपने खाने तक को अनाज न बचता था. डेबुजी को यह देखकर अजीब लगता था. एक बार जमींदार का कारिंदा उनके पास लगान लेने पहुंचा तो किसी बात पर डेबुजी का उनसे झगड़ा हो गया. हृष्ट-पुष्ट डेबुजी ने कारिंदे को पटक दिया. उस शाम घर पहुंचने पर उन्हें मामा की नाराजगी झेलनी पड़ी. कुछ दिनों के बाद उनके मामा का भी देहावसान हो गया. डेबुजी के लिए वह बड़ा आघात था. सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति पहले ही कम थी. मामा की मृत्यु के बाद तो उनपर वैराग्य-सा छा गया. डेबुजी को भी समझ में आ गया कि किसानों और मजूदरों की लूट की असली वजह लोगों की अशिक्षा है. लोग गरीबी के असली कारण को जानने के बजाए, उसे अपना भाग्यदोष मानकर चुप हो जाते हैं. बीमार पड़ते हैं तो वैद्य-हकीम से ज्यादा गंडे-ताबीज पर भरोसा करते हैं. 1905 में उन्होंने अपना घर छोड़ दिया. उसके बाद 12 वर्षों तक लगातार भटकते रहे. आरंभ में उनकी यात्रा ईश्वर की खोज को समर्पित थी. लेकिन मंदिरों और शिवालयों में धर्म की धंधागिरी देख पारंपरिक धर्मों से उनका विश्वास उठ गया. उसके बाद उन्होंने अपना समूचा जीवन मनुष्यता की सेवा को समर्पित कर दिया.

संत रविदास और कबीर का प्रभाव था. सो सीधी नजर समाज में व्याप्त गंदगी पर पड़ती थी. वे देखते कि लोग अशिक्षा के कारण अज्ञानता में फंसे हैं. अज्ञानता उन्हें जाति की मार सहने को मजबूर करती है. वही सामंत की चाटुकारिता को विवश करती है. वही समाज में व्याप्त तरह-तरह की रूढ़ियों और अंधविश्वास का कारण है—‘उससे उद्धार का एकमात्र रास्ता है—शिक्षा. इसलिए शिक्षित बनो और बनाओ.’ सादगी उनका जीवन थी. झाड़ू उठाए वे गांव-गांव घूमते. जहां जाते, वहां सफाई में जुट जाते. फकीरनुमा आदमी को सफाई करते देख, लोग कौतूहलवश सवाल करते—‘शाम को कीर्तन होगा, आ जाना.’ इतना कहकर वे पुनः सफाई में लग जाते. ‘कीर्तन के लिए गांव में साफ-सुथरे ठिकाने है’—लोग कहते. ‘हमें सिर्फ अपना घर नहीं, पड़ोस भी साफ रखना चाहिए.’ गाडगे महाराज बातों-बातों में सामूहिकता की महत्ता बता देते. शाम को कीर्तन होता. उसमें वे लोगों को सफाई का महत्त्व समझाते. अशिक्षा, रूढ़ि, धार्मिक-सामाजिक आडंबरों की आलोचना करते. मौज में होते तो ‘गाडगा’ को ही वाद्ययंत्र बना लेते. लकड़ी की मदद से उसे बजाते-बजाते अपनी ही धुन में खो जाते. लोगों को समझाते—‘मनुष्यता ही सच्चा धर्म है. मनुष्य होना सबसे महान लक्ष्य है. इसलिए मनुष्य बनो. भूखे को रोटी दो. बेघर को आसरा दो. पर्यावरण की रक्षा करो.’ कीर्तन करते-करते कभी उनमें कबीर की आत्मा समा जाती तो कभी संत रविदास उनकी जिव्हा पर उतर आते. एक जगह काम पूरा हो जाता तो ‘गाडगा’ को सिर पर औंधा रख, फटी जूतियां चटकाते हुए, किसी नई बस्ती की ओर बढ़ जाते. फटेहाल अवस्था, मिट्टी के कटोरे और झाड़ू के साथ देखकर कई बार लोग उन्हें पागल समझने लगते. विचित्र भेष के कारण आवारा कुत्ते उनपर भौंकते. लोग हंसी उड़ाते, मगर आत्मलीन गाडगे बाबा आगे बढ़ते जाते थे. कोई उनकी वेशभूषा को लेकर सवाल करता तो मुस्कराकर कहते—‘इंसान को हमेशा सीधा-सादा जीवन जीना चाहिए. शान-शौकत उसे बरबाद कर देती है.’

विदेशों में व्यक्ति की महानता का आकलन उसकी योग्यता और लोकहित में किए गए कार्यों द्वारा किया जाता है. भारत में योग्यता और सत्कर्म दूसरे स्थान पर आते हैं. पहले स्थान पर आती है, उसकी जाति. ब्राह्मण की संतान को जन्म से ही सबसे ऊपर की श्रेणी में रख दिया जाता है और जो शूद्र और अंतज्य हैं, उन्हें सबसे निचली श्रेणी प्राप्त होती है. इसलिए एक शूद्र को समाज में अपनी योग्यता को स्थापित करने के लिए, न केवल अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है, अपितु चुनौतियों के बीच अपनी योग्यता भी प्रमाणित करनी पड़ती है. गाडगे बाबा का हृदय करुणा से आपूरित था. स्वार्थ के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देना उन्हें स्वीकार्य न था. वे उसका विरोध करते. जरूरत पड़ने पर उसके लिए परिजनों और पड़ोसियों से भी लड़ जाते थे. ईश्वर और धर्म की उनकी अपनी परिभाषा थी. लोग धर्म के बारे में सवाल करते तो कहते—‘गरीब, कमजोर, दुखी, बेबस, बेसारा और हताश लोगों की मदद करना, उन्हें हिम्मत देना ही सच्चा धर्म है. वही सच्ची ईश्वर भक्ति है.’ ईश्वर को प्रसन्न करना है तो—‘भूखे को रोटी, प्यासे को पानी, वस्त्रहीन को वस्त्र तथा बेघर को घर दो. यही ईश्वर सेवा है.’

पूरी तरह निस्पृह जीवन था. कहते थे कि, ‘अगर आप दूसरों के श्रम पर सिर्फ अपने लिए जिएंगे तो मर जाएंगे. लेकिन यदि आप अपने श्रम से, दूसरों के लिए जिएंगे तो अमर हो जाएंगे.’ कई बार गांव वाले भोजन के साथ कुछ पैसे भी थमा देते. उन पैसों को वे जोड़ते चले जाते. जब पर्याप्त रकम जमा हो जाती तो लोगों की जरूरत के हिसाब से जमाराशि को स्कूल, धर्मशाला, अस्पताल, सड़क आदि बनाने पर खर्च कर देते थे. अपने विचारों को सीधी-सरल भाषा में व्यक्त करते. यह मानते हुए कि धर्मप्राण लोग शब्द-कीर्तन पर ज्यादा विश्वास करते हैं, इसलिए अपने विचारों के बारे में कीर्तन के माध्यम से लोगों को समझाते. कहते कि मंदिर-मठ आदि साधु-संतों के अड्डे हैं. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग-नर्क जैसी बातों पर उन्हें विश्वास ही नहीं था. आंख मूंदकर राम नाम जपने या रामनामी ओढ़ लेने को वे पंडितों का ढोंग बताते थे. पंढरपुर भक्तिमार्गी हिंदुओं का बड़ा तीर्थ है. गाडगे महाराज प्राय: वहां जाते. लेकिन विट्ठल भगवान के दर्शन करने के लिए लोगों को मानव-धर्म का उपदेश देने के लिए. उनके लिए मानव-धर्म का मतलब था—’प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना.’   

उनके जीवन की एक रोचक घटना है. गाडगे महाराज को मथुरा जाना था. उसके लिए मथुरा जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए. सामान के नाम पर उनका वही चिर-परिचित ‘गाडगा’, लाठी, फटे-पुराने चिथड़े कपड़े और झाड़ू था. रास्ते में भुसावल स्टेशन पड़ा तो वहीं उतर गए. कुछ दिन वहीं रुककर आसपास के गांवों में गए. वहां झाड़ू से सफाई की. कीर्तन कर लोगों को उपदेश दिए. मथुरा जाने की सुध आई तो वापस फिर रेलगाड़ी में सवार हो गए. इस बार टिकट निरीक्षक की नजर उनपर पड़ गई. गाडगे बाबा के पास न तो टिकट था, न ही पैसे. टिकट निरीक्षक ने उन्हें धमकाया और स्टेशन पर उतार दिया. उससे यात्रा में आकस्मिक व्यवधान आ गया. लेकिन जाना तो था. देखा, स्टेशन के पास कुछ रेलवे मजदूर काम रहे हैं. डेबुजी उनके पास पहुंचे. कुछ दिन मजदूरों के साथ मिलकर काम किया. मजदूरी के पैसों से टिकट खरीदा और तब कहीं मथुरा जा पाए.

जीवन में वे डॉ. अंबेडकर, गांधी सहित अपने समय के कई प्रगतिशील नेताओं से उनका संपर्क था.  सभी ने गाडगे जी के कार्यों की सराहना की. वे अंबेडकर से वे 15 वर्ष बड़े थे. डॉ. अंबेडकर ने दलितोद्धार के लिए आंदोलन आरंभ किया तो डेबुजी भी अपनी तरह जुट गए. मगर उसके लिए रास्ता नहीं बदला. अपने कीर्तन के माध्यम से वे मनुष्य की समानता और स्वतंत्रता का समर्थन करते. छूआछूत को अमानवीय बताकर उसकी आलोचना करते. लोगों को सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने की सलाह देते. डॉ. अंबेडकर का साधु-संतों से दूर ही रहते थे. परंतु संत गाडगे के कार्यों की उपयोगिता को वे समझते थे. दूर-दराज के गांवों में, अत्यंत विषम परिस्थितियों में रह रहे दलितों के उद्धार का एकमात्र रास्ता है कि उनके बीच रहकर लोगों को समझाया जाए. उन्हीं की भाषा में, उनके करीब रहते रहते हुए. संत गाडगे यही काम करते थे. इसलिए दोनों समय-समय पर मिलते रहते थे.

हिंदू धर्म में साधुओं की कमी नहीं है. एक आम साधु-संत के पास पैसे जाएं तो वह सबसे पहले मंदिर बनवाता है, या फिर धर्मशालाएं, ताकि बैठे-बैठाए जीवनपर्यंत दान की व्यवस्था हो जाए. गाडगे बाबा ने अपने लिए न तो मंदिर बनवाया, न ही मठ. एक सच्चा, त्यागमय और निस्पृह जीवन जिया. कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया. रवींद्रनाथ के एकला चलो के सिद्धांत पर वे हमेशा अकेले ही आगे बढ़ते रहे. उनके कार्यों और उपदेशों से प्रभावित होकर लोग कई बार उन्हें रोकने का प्रयास करते. इसपर वे मुस्करा कर कहते—‘नदिया बहती भली, साधू चलता भला. धीरे-धीरे उनका यश बढ़ता जा रहा था. कीर्तन में सभी वर्गों के लोग आते थे. उनसे कभी-कभी मोटी दक्षिणा भी हाथ लग जाती. उसे वे ज्यों का त्यों संस्थाओं के निर्माण के नाम पर खर्च कर देते थे. शिक्षा के बारे में बात होती तो कहते—‘शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी आ पड़े तो खाने के बर्तन बेच दो. औरत के लिए कम दाम की साड़ियां खरीदो. टूटे-फूटे मकान में रहो. मगर बच्चों को शिक्षा जरूर दो.’ धनी लोगों को समझाते—‘शिक्षित करने से बड़ा कोई परोपकार नहीं है. गरीब बच्चों को शिक्षा दो. उनकी उन्नति में मददगार बनो.’ दान में मिले पैसों की पाई-पाई जोड़कर उन्होंने लगभग 60 संस्थाओं का निर्माण कराया. सारा पैसा उन्होंने गरीबों के लिए स्कूल खोलने, अस्पताल और ब्रद्धाश्रम बनवाने, धर्मशालाएं परिश्रमालय, वृद्धाश्रम बनवाने पर खर्च करते रहे.

संत गाडगे जी की 13 दिसंबर 1956 को अचानक तबियत खराब हुई और 17 दिसंबर 1956 को बहुत ज्यादा खराब हुई, 19 दिसंबर 1956 को रात्रि 11 बजे अमरावती के लिए जब गाड़ी चली तो रास्ते में ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी. गाड़ी में सवार चिकित्सकों ने उन्हें अमरावती ले जाने की सलाह दी. लेकिन गाड़ी कहीं भी जाए, गाडगे बाबा तो अपने जीवन का सफर पूरा कर चुके थे. बलगांव पिढ़ी नदी के पुल पर गाड़ी पहुंचते-पहुंचते मध्यरात्रि हो चुकी थी. उसी समय, रात्रि के 12.30 बजे अर्थात 20 दिसंबर 1956 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली. संत गाडगे सच्चे संत थे. दिखावा उन्हें नापसंद था. अपने अनुयायियों से अकसर यही कहते, मेरी मृत्यु जहां हो जाए, वहीं मेरा संस्कार कर देना. न कोई मूर्ति बनाना, न समाधि, न ही मठ या मंदिर. लोग मेरे जीवन और कार्यों के लिए मुझे याद रखें, यही मेरी उपलब्धि होगी. गाडगे ही इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार जिस जगह किया गया, वह स्थान गाडगे नगर कहलाता है. आज वह वृहद अमरावती शहर का हिस्सा है.

ओमप्रकाश कश्यप