पूंजी दि (कैपीटल) : संक्षिप्त विमर्श : अंतिम

28. उपनिवेशीकरण का आधुनिक सिद्धांत

पूंजी’ की रचना के समय पूंजीवादी शोषण की स्पष्ट छवि थी. उत्पादन व्यवसाय में और व्यवसाय शोषण में ढल चुका था. उत्पादन व्यवस्था पर पर पूंजीवादी एकाधिकार की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही थी. पूंजीपतियों की आपसी स्पर्धा के कारण श्रमिक शोषण के नएनए अध्याय खुल रहे थे. समाज में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई निरंतर गहराती जा रही थी. मशीनों के आगमन के समय उनसे जो उम्मीदें बांधी गई थीं, वे टूटने लगी थीं. यद्यपि राजनीतिक वर्चस्व और साम्राज्यवादी विस्तार के लिए होने वाले युद्धों में कमी आई थी. मगर साम्राज्यवाद के नए प्रतीक के रूप में बड़ीबड़ी व्यावसायिक कंपनियां उभरती जा रही थीं. उनका एकमात्र कार्य आर्थिक रूप से पिछड़े देशों की परिस्थितियों का लाभ उठाकर, वहां के श्रमिकों एवं संसाधनों का दोहन कर अपने लिए भारी मुनाफा बटोरना था. कानून उसके समर्थन में था. वह इतना ताकतवर और पहुंचवाला था कि कानून को मनचाहा मोड़ दे सकता था. अपनी पूंजी के दम वह अपने स्वार्थानुकूल संवैधानिक व्यवस्थाएं भी करा सकता था. वह लोकतंत्र का नारा देकर व्यक्तिवाद को उकसाता था. मानवाधिकारों पर जोर देने का उसका उद्देश्य मात्र इतना था कि समाज में अमर्यादित और अविवेकी उपभोक्तावर्ग जन्म ले. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक नए प्रकार का उपनिवेशवाद हवा में था.

पुस्तक के तेतीसवें अध्याय में मार्क्स नव्यउपनिवेशवाद की विशद् व्याख्या करता है. अध्याय का आरंभ वह निजी संपत्ति के दो भिन्न, किंतु परस्पर विरोधी स्वरूपों की चर्चा के साथ करता है. ये दोनों रूप में हैं

. उत्पादक के अपने श्रमकौशल द्वारा अर्जित.

. दूसरों के श्रम के शोषण के आधार पर अर्जित.

मार्क्स के अनुसार दूसरी स्थिति पहली का परिणाम है. संपत्ति की उपस्थिति व्यक्ति को और भी महत्त्वाकांक्षी बनाती है. उसके मन में दूसरों से आगे निकलने की होड़ पैदा करती है. हर पूंजीपति कम समय में अधिक से अधिक संपत्ति अर्जित कर लेना चाहता है. इसके लिए वह श्रमलागत को न्यूनतम कर, लाभानुपात को बढ़ाने का प्रयास करता है. श्रमशोषण के नए तरीकों और बाजारों की खोज करता है. स्थानीय संसाधनों का असीमित दोहन कर प्रकृति और पर्यावरण के लिए विकट समस्याएं खड़ी करता है. उन वस्तुओं के उत्पादन पर जोर देता है, जिनका वास्तविक जरूरतों से कोई संबंध न हो, फिर भी व्यक्ति को उनके अभाव की सतत अनुभूति होती रहे.

मार्क्स के अनुसार उपनिवेशों की स्थापना के बाद पूंजीपति का चरित्र उससे एकदम अलग रूप ले चुका था, जैसा कि वह घरेलू पूंजीवाद, जिसको वह ‘होमलेंड कैपीटलिज्म’ का नाम देता है, के समय था. इस बारे में एडवर्ड गिबन वेकफील्ड लिखता है

औपनिवेशिक पूंजी का अभिप्राय किसी वस्तु/उत्पाद से नहीं है, बल्कि व्यक्तियों के बीच वे सामाजिक संबंध है, जो वस्तुओं के माध्यम से आकार लेते हैं.’

आगे चलकर वह भूमि एवं मजदूरों संबंधों की विवेचना करता है. मार्क्स के अनुसार कोई भी समाज पूंजीवादी संबंधों को अनायास स्वीकार नहीं कर लेता. बल्कि अपनी परंपरा और परिस्थितियों के आधार पर, प्रारंभ में वह उनका जमकर विरोध करता है. किंतु एक नियति के रूप में पराजय ही उसके हाथ लगती है. इस तरह उसे अपने संसाधन पूंजीपतियों को सौंपने ही पड़ते हैं. औपनिवेशिक देशों में भूमि सामान्यतः सस्ती और फैली हुई होती है. इसलिए पूंजीपति वहां अपने लिए बेहतर अवसर देखते हैं. संसाधनों की विपुलता और सस्ता श्रम उन्हें वहां अपने उद्योग लगाने के लिए प्रेरित करता है, तो भी वहां के मजदूर अपने श्रम को बेचने के लिए उस तरह उत्साहित नहीं होते, जैसे कि वे उससे पहले तक करते आए थे. पूंजीवाद की यह विशेषता है कि वह उत्पादनव्यवस्था का सांस्थानिकीकरण करता है. श्रमिकों और शिल्पकारों द्वारा संचालित उत्पादन को कारखानों तक लाकर वह उनका पूंजीकरण कर देता है. इससे पहले से ही उत्पादन में लगे श्रमिक और कामगार बेदखल होते जाते हैं. उनमें से कुछ रोजगार के लिए कारखानों की शरण लेते हैं, तो बाकी बेरोजगार होकर जीविका के लिए अन्य क्षेत्रों में पलायन कर जाते हैं.

आगे मार्क्स एक स्वाभाविकसा प्रश्न उठाता हैµपूंजी और सर्वहारा का उद्गम कैसे हुआ. मार्क्स यहां, पूंजीवाद के उद्गम स्रोत को जानना चाहता है. प्रश्न के बाद वह स्वयं उसकी विवेचना भी करता जाता है. उसके अनुसार उत्पादन की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति अपने श्रम के आधार पर वस्तुओं का अर्जन करता था. कालांतर में सामंतवाद ने दस्तक दी और दूसरे के श्रम पर आधारित जिंदगी जीने वाला एक परजीवी वर्ग समाज में पनपने लगा. इस वर्ग के पास मजदूरों के कठिन परिश्रम से कमाई कई बेशुमार धनसंपदा थी, लेकिन वह उसको उत्पादन में बदलने की कला से अनभिज्ञ था. शायद इसलिए वह विलासितामय रूप को, धनसंपदा के सर्वोत्तम प्रयोग और अपने वैभव प्रदर्शन के रूप में देखता था. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक तत्व उसके सुरक्षा कवच होते थे. प्रौद्योगिकी के विकास के साथ सामंतों का एक वर्ग पूंजीपति के रूप में आकार लेता गया. तो मार्क्स के अनुसार इनकी(पूंजी और मजदूर) उत्पत्ति श्रमिकों के बंटवारे की उस घटना के साथ हुई जब उनका एक वर्ग पूंजी का मालिक बना और दूसरा वर्ग मात्र अपने श्रम का स्वामी बना रहा

यह श्रमिकों के पूंजी के स्वामी और श्रम के स्वामी में विभाजन की घटना से जुड़ा है, जिसके अंतर्गत श्रमिकों ने पूंजी के संचयन के प्रति निष्ठा दर्शाते हुए खुद को श्रम से अनिवार्यरूप से बेदखल कर दिया था.’

मार्क्स के अनुसार उपनिवेशों में भूमि के लिए होने वाला संघर्ष केवल पूंजीवाद की स्थापना तक सीमित नहीं रह जाता. उसकी शुरुआत छोटे किसानों और उद्यमों की बेदखली के साथ होती है. भूनिर्वासन की यह प्रक्रिया क्रमिक और क्षेत्रवार होती है. जहां यह प्रक्रिया अधूरी हो, वहां छोटे किसानों और कृषिव्यवसाय से जुड़े पूंजीपतियों के बीच संघर्ष चलता रहता है. देर तक चलने वाले इस संघर्ष में जीत अंततः पूंजीपतियों की ही होती है, लेकिन उन्हें शतप्रतिशत सफलता कभी नहीं मिल पाती. संघर्ष के विभिन्न चरणों में भूमि छोटे किसानों से हाथों से खिसककर धीरेधीरे पूंजीपतियों के हाथों में जाती ही रहती है. अपवादस्वरूप कई बार किसानमजदूरों का एक वर्ग, पूंजीवादी प्रलोभनों का शिकार होकर, पूंजीकरण की प्रक्रिया को आत्मसात कर लेता है, इससे उसका रवैया पूंजीवाद के प्रति सहयोगात्मक हो जाता है. लेकिन ऐसा हर जगह और हर समाज में संभव नहीं होता. उस अवस्था में पूंजीवादी वर्चस्व के विरुद्ध अपनी परंपरागत उत्पादन प्रविधियों को बचाए रखने का संघर्ष सतत चलता ही रहता है.

मार्क्स के अनुसार श्रम से स्वतःनिर्वासन की यह क्रिया पारंपरिक नियमों के अनुसार संपत्ति संचय की प्राचीन कामना के रूप में व्यक्त हुई थी. यही कारण है कि इसने उपनिवेशों में पूंजीवाद के विस्तार के लिए उत्प्रेरक का काम किया. श्रमिक आत्मनिर्वासन की भावना के साथ, कतिपय कृत्रिम उपायों से मुद्रा (मजदूरी अर्जन हेतु आर्थिकसामाजिक रूप से पूंजीपतियों पर निर्भर होते चले गए. श्रम को बेचने की उनकी आतुरता पूंजीवाद के लिए मददगार बनी. उनकी निर्भरता को स्थायी रूप देने के लिए पूंजीपतियों द्वारा जनसुविधाओं का व्यावसायिकीकरण किया गया. विकास और आधुनिक समाज के प्रतीक के रूप में ऐसी संस्थाओं का गठन किया जाने लगा जो परिवार के गठन की अनिवार्यता पर प्रहार करती थीं. समाज में पहले एकल और छोटे परिवारों के गठन पर बल दिया गया.नतीजा यह हुआ कि पूंजीपतियों को सस्ता श्रम उपलब्ध होने लगा, जो उनके लाभानुपात में भारी वृद्धि का कारण बना. फिर जैसेजैसे उत्पादन पूंजीवादी व्यवस्था के अधीन होता गया, समाज में श्रमिकों की संख्या भी बढ़ती गई. रातदिन चलती फैक्ट्रियां उनके लिए मुनाफा उगलती गईं. पूंजीवाद के विस्तार के साथ ऐसे आर्थिक उपनिवेशों की संख्या में भी विस्तार होता गया.

क्या कोई श्रमिक जितना अपनी मात्रभूमि के प्रति समर्पित है, उतना ही किसी उपनिवेश के प्रति भी हो सकता है. पूंजीवाद के औपनिवेशिक विस्तार की सरणियों को समझने के लिए इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है. पिछले विश्लेषण से हमने जाना कि औपनिवेशिक विस्तार के लिए पूंजीपति संपदासंचयन की प्राचीन पद्धतियोंस्वभावों से लाभ उठाते आए हैं, हालांकि आगे चलकर इसी के आधार पर श्रमिकों को अविरत निर्वासन भी सहना पड़ा है. ये स्थितियां पूंजीवादी समाज की अनिवार्य परिणति हैं. अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पूंजीपति की निजी समृद्धि व्यक्तिगत संपत्ति के हड़पने, पचा लेने के बाद ही संभव है.

पूंजी’ के पहले खंड में मार्क्स आरंभ से अंत तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रमशोषण की अनिवार्य स्थितियों का विश्लेषण करता है. तो भी यह नकारात्मक आख्यान नहीं है. पुस्तक में मार्क्स जहां शोषण की अनिवार्यता और पूंजीवादी दमनचक्र की सर्वव्यापकता का विवरण प्रस्तुत करता है, वहीं वह हमें इस बात का भी भरोसा दिलाता है कि पूंजीवादी उत्पीड़न से मुक्ति संभव है. श्रममुक्ति का गुलाब पूंजीवाद की राख से खिलेगा, ‘पूंजी’ का यह संदेश उसको आधुनिक समय का अर्थशास्त्रीय महाकाव्य सिद्ध करने को पर्याप्त है.

 

दि कैपीटल : खंड दो एवं तीन

उनीसवीं शताब्दी के छठे दशक में लंदन में मात्र तीन कमरों के छोटेसे मकान में अपने बड़े परिवार के साथ रहते हुए मार्क्स अपनी आजीविका के लिए ‘न्यू यार्क डेली ट्रिब्यून’ जैसे समाचारपत्रों के लिए लिखे गए साप्ताहिक लेखों से मिले पारिश्रमिक पर निर्भर था. कुछ आमदनी पुस्तकों की बिक्री तथा स्थानीय समाचारपत्रों द्वारा बड़े परिवार का बोझ उठाने और अपनी लगभग स्थायी बीमारी का इलाज कराने के लिए उतनी आमदनी पर्याप्त न थी. आड़े वक्त में मित्र ऐंगल्स ही काम आता था. विषम परिस्थितियों में भी वह राजनीतिक अर्थशास्त्र पर, धीरेधीरे मगर निरंतर काम करता आ रहा था. 1857 में उसने एक बड़ी पांडुलिपि तैयार की, जिसमें पूंजी, संपत्ति, श्रम, मजदूरी, राज्य, विदेश व्यापार तथा विश्वबाजार जैसी विषयों पर गंभीर काम किया गया था. 1860 में आखिर मार्क्स ने उस पुस्तक को प्रकाशन को भेजने से पहले दुबारा जांचापरखा. पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार तक पहुंचने में सात वर्ष का लंबा समय और लगा. 1867 में ‘पूंजी’ का पहला खंड बाजार में आया. इस खंड में उसने श्रमसिद्धांत, अधिलाभ, मजदूरी, श्रमशोषण आदि अनेक विषयों पर अपने विचारों को प्रस्तुत किया था. पुस्तक का दूसरा और तीसरा खंड भी 1860 में ही तैयार हो चुका था. लेकिन उन्हें अंतिम रूप देने के लिए मार्क्स उन खंडों पर लगातार काम करता रहा. इस तरह दूसरे और तीसरे खंड का प्रकाशन क्रमशः 1885 और 1894 में संभव हो सका. उस समय तक कार्ल मार्क्स की मृत्यु हो चुकी थी. दोनों खंडों का संपादन उसके अभिन्न मित्र और सहयोगी फ्रैड्रिक ऐंगल्स ने किया था.

पूंजी’ का दूसरा खंड भी पहले खंड की तरह श्रममूल्य और पूंजीवादी शोषण की व्याख्या पर टिका है और एक तरह से पहले खंड का पूरक है. तीसरे खंड में मार्क्स ने पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था की प्रवृत्तियों को दर्शाया है. यह सात हिस्सों में बंटा है

1. अधिलाभ का लाभ में तथा अधिलाभ की दर का लाभ की दर में रूपांतरण.

2. लाभ का औसत लाभ में रूपांतरण.

3. लाभदर में गिरावट की प्रवृत्ति का नियम.

4. उपभोक्ता पूंजी तथा पूंजीधनराशि का वाणिज्यिक पूंजी एवं मुद्राव्यवहार पूंजी(सौदागर की पूंजी) में रूपांतरण.

5. लाभ का ब्याज एवं उद्यमलाभ तथा ब्याजयुक्त पूंजी में विभाजन.

6. अधिलाभ का भूमिकर में परिवर्तन.

7. राजस्व एवं उसके स्रोत.

तीसरे खंड में पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के गहन अध्ययन के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादनवृद्धि के दौर में जैसेजैसे मानवीय श्रम की आवश्यकता बढ़ती जाती है, वैसेवैसे लाभ की दर में गिरावट आने लगती है. प्रथम द्रष्टया यह तर्क मार्क्स के अन्य स्थापनाओं का विरोधी जान पड़ता है, जिसके आधार पर वह मशीनीकरण की आलोचना करता है. मगर यह तथ्य मशीनीकरण और बढ़ती स्पर्धा के दौर में यह तथ्य अनिवार्य परिणति के रूप में सामने आता है. मशीनीकरण के युग में मानवीय श्रम की अनिवार्यता का औचित्य क्या है? वे कौनसी स्थितियां हैं जहां प्रौद्योगिकीय उन्नति साथ नहीं दे पाती?

वस्तुतः मशीनों की अभिकल्पना इस उद्देश्य के निमित्त की जाती है कि वे उत्पादन में कमी लाएं. इससे उत्पादन में तेजी आती है. अतिरिक्त उत्पादन को खपाने के लिए पूंजीपति को नए बाजारों की जरूरत पड़ती है. संचार माध्यमों और प्रचार कीे नवीनतम तकनीक के माध्यम से कोई पूंजीपति अपने उत्पाद के पक्ष में माहौल बना सकता है. मगर कठिन स्पर्धा के दौर में इतनेभर से काम नहीं चलता. उत्पादक को अपने उत्पाद की विशेषताओं के साथ उपभोक्ता के करीब जाना पड़ता है. इस कार्य में मशीनों की भूमिका मात्र सहायक तक सिमट जाती है. इसलिए कि उपभोक्ता से अंतरंग संबंध बनाने, उसको अपने उत्पाद से जोड़े रखने के लिए विशेषरूप से प्रशिक्षित मानवीय श्रम की आवश्यकता पड़ती है. स्पर्धा के चलते उत्पादक का इस मद में खर्च लगातार बढ़ता ही जाता है. इस निष्कर्ष से मार्क्स और उसके अनुयायी मानते आए हैं कि पूंजीवाद एक दिन अपने ही बोझ से दबकर समाप्त हो जाएगा. हालांकि उसकी यह भविष्यवाणी अभी तक सच सिद्ध नहीं हुई है, लेकिन मार्क्स के समानताधारित समाज के सपने की स्थापना का औचित्य कम नहीं हो जाता.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

पूंजी (दि कैपीटल): संक्षिप्त विमर्श : चार

1. इतिहास का संकट, पूंजीवाद एवं पूंजीवादी समाज की व्युत्पत्ति

मार्क्स ने पूंजीवाद की समीक्षा ऐतिहासिक संदर्भों के साथ की है. हालांकि कुछ विद्वान इसे इतिहास की अर्थशास्त्रीय व्याख्या भी कहते हैं. मगर इनमें से कुछ भी कहा जाए, बात लगभग एक ही है. इतिहास के अर्थशास्त्रीय अध्ययन द्वारा मार्क्स अपने इस बहुख्यात सिद्धात पर पहुंचा था कि सामाजिक परिवर्तनों का मुख्य आधार उत्पादन के साधनों में परिवर्तन है. उत्पादनपद्धति में आए परिवर्तन से ही उससे जुड़े संबंधों में बदलाव आता है. अर्थ सामाजिक संबंधों का निर्माता और निर्धारक बन जाता है. वही अन्य परिवर्तनों को दिशा देता है. पुस्तक के छबीसवें अध्याय में वह प्राचीन समाजों में पूंजी संचयन के सिद्धांतों के गूढ़ रहस्यों की पड़ताल करता है. मार्क्स के अनुसार प्राचीन समाज यानी पूंजीवादी समाज के उद्भव से पहले पूंजीसंचयन केवल धनसंचयन तक सीमित था. दूसरे शब्दों में उस समय तक धन पूंजी का रूप नहीं ले पाया था. पूरा समाज एक असंगठितसहयोगाधारित समाज था. उत्पादन की बजाय उसका जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता था. शिकार आधारित भोजनव्यवस्था में देखा यह गया था कि कुछ व्यक्ति शिकार करने में निपुण हैं. उनका निशाना अचूक है. एक ही पत्थर में वे खूंखार जानवर को धराशायी कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर उससे स्वयं भिड़ सकते हैं. भारीभरकम शिकार को पीठ पर लादकर ठिकाने तक लेकर आ सकते हैं. कुछ ऐसे भी रहे होंगे, जिन्हें शिकार के नाम से ही डर लगता होगा. जिनका निशाना अचूक नहीं था. स्वाभाविक रूप से कबीले के लोग पहले व्यक्ति को ही नायक के रूप में स्वीकार कर सकते थे. दूसरों से उसको अपने लिए अधिक उपयोगी मान, उसकी बात भी मानते होंगे. कालांतर में ऐसे लोगों को समूह का नेतृत्व सौंपा जाने लगा. परिणाम यह हुआ कि मानवसमाज धीरेधीरे ताकतवर और कमजोर के रूप में बंटता चला गया. अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए ताकतवर लोगों ने संसाधनों को कब्जाना आरंभ कर दिया, परिणामस्वरूप दूसरे वर्ग के हाथों से संसाधन छिनते चले गए और वह पराश्रित होता गया.

मार्क्स के अनुसार आर्थिकसामाजिक परिवर्तन की आरंभिक प्रक्रिया महज धन की जमाखोरी तक सीमित नहीं थी, जिसने आगे चलकर पूंजीवादी संचयन और फिर पूंजीवादी समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया. प्रकारांतर में पूरा समाज सर्वहारा और पूंजीपतिवर्ग में बंटता चला गया. वास्तव में वह समाज के कुल संसाधनों के चंद लोगों के हाथों में सिमटने जाने का परिणाम था, जिसके कारण समाज का बड़ा हिस्सा, जो मेहनती एवं कुशल था और अपने श्रमकौशल के बल पर सम्मानजनक जीवन जीने की योग्यता रखता था, वह संसाधनविहीन और दूसरों पर निर्भर होता चला गया. कालांतर में उस वर्ग की संख्या बढ़ती ही चली गई. एक दिन पूरा समाज दो हिस्सों में बंट गया. पहला वह जिसका समाज के संसाधनों पर कब्जा था, लेकिन उन संसाधनों का वह स्वयं कोई उपयोग नहीं करता था. दूसरा वह जो उन संसाधनों के दम पर जीविकोपार्जन करता था और बदले में पहले वर्ग को संसाधनों का कब्जाधारकस्वामी मानते हुए एक निश्चित राशि, अधिलाभ, लगान, कर आदि के रूप में प्रदान करता था. धनसंग्रह की प्राचीन पद्धति का रहस्य इस तथ्य में निहित था कि वह एक थोड़ेसे पूंजीवादियों से भरे सर्वहारा समाज के बजाय एक हिंसक एवं निर्दयी समाज से जन्मा था. गुलामों और दासों को उनके सामंत जमींदारों से मुक्त कराना, वास्तव में उनके घरों, जमीनों, उनके उत्पादन के संसाधनों और आजीविका के साधनों से भी दूर करना था. इतिहास का अर्थशास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन करता हुआ मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि—

तथाकथित प्राचीन पूंजीसंचय और कुछ नहीं, बल्कि समाज के उत्पादक वर्ग को उत्पादन के संसाधनों से अलग कर देने की प्रक्रिया है.’

मार्क्स के निष्कर्ष पश्चिमी समाज की सामाजिकआर्थिक गतिविधियों के अध्ययन का निकष थे. उसने सोलहवीं शताब्दी से पहले के समाज को पूंजीवादी अवशेषों से रहित समाज स्वीकार किया था. उल्लेखनीय है कि यूरोप के इतिहास में वैज्ञानिक प्रबोधन की शुरुआत ही पंद्रहवीसोलहवीं शताब्दी से होती है. वैज्ञानिक चेतना के विकास का पहला उपयोग उत्पादन में मशीनीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था. जिससे संचित धन को पूंजी में बदलने, उसका उपयोग और अधिक धन कमाने का प्रचलन हुआ. भारत और अन्य एशियाई देशों में यह प्रक्रिया काफी देर से करीब सतरहवीं शताब्दी से ही आरंभ हो पाई थी. सतरहवींअठारहवीं शताब्दी के बौद्धिक आंदोलनों के फलस्वरूप समाज में लोकतंत्र का आगमन हुआ. व्यक्तिस्वातंत्रय का नारा पूंजीवाद के विकास में सहायक सिद्ध हुआ, क्योंकि उसके बहाने वह समाज पर उपभोक्तावादी संस्कार थोपने में सफल सिद्ध हुआ.

22. कृषिआश्रित समूहों को भूसंपदा से बेदखल करना

पूंजी’ के सताइसवें अध्याय में मार्क्स पश्चिमी समाज में औद्योगिकीकरण के बाद आए बदलावों तथा उन स्थितियों पर विचार भी विचार करता है, जिनके कारण एक सामंती समाज पूंजीवादी समाज में परिवर्तित होता चला जाता है. मार्क्स के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम दो दशक यूरोप में पूंजीवाद के उद्भव का समय था. उससे पहले इंग्लेंड में जमींदारी प्रथा थी. सामंतों और जागीरदारों के माध्यम से राजशाही राजनीतिक कार्यव्यवहार देखती थी. उस समय लागू विधान के अनुसार राज्य की समस्त भूसंपदा उसके राजा के अधीन होती थी. उसके प्रबंधन तथा लगान वसूली के लिए वह जागीरदारों और सामंतों की नियुक्ति करता था, जो जनता के साथ निरंकुश व्यवहार करते थे. विज्ञान ने परंपरागत ज्ञान के साथसाथ प्राचीनकाल से चली आ रही अर्थव्यवस्था को भी चुनौती दी थी. परिणामस्वरूप नई प्रौद्योगिकी का जन्म हुआ और उत्पादन के स्रोत अपढ़कुपढ़ सामंतों के हाथों से फिसलकर पढ़ेलिखे पेशेवरों और तकनीशियनों के हाथों में आ गए.

उल्लेखनीय है कि सामंती समाज के पतन के चिह्न चैदहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में ही दिखाई पड़ने लगे थे, जब किसानों से भूसंबंधी अधिकार छीने जा रहे थे. उस समाज में अधिकांश वे कृषक थे, जो जमींदारों और सामंतों के कब्जेवाली भूमि पर खेती करते थे. कठोर परिश्रम के बावजूद उन्हें नाममात्र की ही आमदनी थी. अपनी आजीविका के लिए उन्हें सामंतोंजागीरदारों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था. उनमें कृषकों के अलावा बड़ी संख्या में वे मजदूर भी शामिल थे, जो खेती तथा दूसरे क्षेत्रों में मेहनतमजदूरी करके अपना जीवनयापन करते थे. जिन सामंतोंजमींदारों के लिए वे परिश्रम करते थे, वही उन्हें रहने के लिए छोटे झोपड़ीनुमा घर और जमीन का एक टुकड़ा दे देते थे. उस जमीन से अपने परिवार के भरणपोषण के लिए अन्न उपजा सकते थे. इसके अलावा कुछ सार्वजनिक जमीन भी होती थी, जिसपर वे अपने पशु चराते तथा लकड़ी, चारे और्र इंधनसंबंधी जरूरतें पूरी करते थे. कुल मिलाकर उन मजदूरों की हालत बंधुआ मजदूरों जैसी थी.

पंद्रहवीं शताब्दी के पश्चात हालात बदले. जमींदारों और सामंतों ने किसानों को भूमि से बेदखल करना प्रारंभ कर दिया. मजदूरोंकिसानों ने जो भूमि वर्षों की मेहनत के बाद, पसीना बहाकर कृषि के योग्य बनाई थी, वह भूसामंतों के कब्जे में जाने लगी. जमीन को संपदा मान लिया गया. भाड़े के लठैतों का डर दिखाकर किसानों को ऊबड़खाबड़ और बंजर जमीन की ओर खदेड़ा जाने लगा. वह भूमि जिसपर वे पीढ़ियों से खेती करते आए थे, जिसको उन्होंने वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद तैयार किया था, समाज के ताकतवर वर्ग की निजी संपत्ति में ढलने लगी. उल्लेखनीय है कि कपड़ा उद्योग के विकास के बाद इस वर्ग के पास ऊन और कपास की बिक्री से बेशुमार दौलत जमा हुई थी, जिससे उस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं सातवें आसमान पर थीं. मार्क्स के अनुसार किसानों को बेदखल करने का दूसरा मुख्य कारण वे मशीनें थीं, जिन्होंने सबसे पहले कपड़ा उद्योग में दस्तक दी थी. पूंजीपतियों के पक्ष में अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के उपरांत वे अन्य उद्योगों के साथसाथ, कृषिक्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्शाने लगी थीं. मशीनों का आविष्कार हालांकि मनुष्य को कठोर परिश्रम से मुक्ति दिलाने के नाम पर किया गया था, मगर अनुभव में वे मनुष्य को ही काम से बेदखल करने में लगी थीं. कपड़ा उद्योग में वे यह काम कर चुकी थीं. लाखों बुनकर, रंगरेज, कपास ओटने वाली औरतें, मशीनों के आगमन के बाद बेरोजगार हो चुकी थीं.

अन्य क्षेत्रों की भांति कृषिकर्म भी उनके हमले से अछूता न था. जुताईबुबाईगहाई की भारीभरकम मशीनों ने कम मजदूरों द्वारा बड़े कृषि फार्मों पर खेती करना आसान कर दिया था. चूंकि यूरोप का कपड़ा उन दिनों शीर्ष पर था, इसलिए कपास आदि कृषि उपजों की मांग बढ़ी हुई थी. इसलिए भूसामंतों ने अपने खेतों को बड़े कृषिफार्मों में बदलना आरंभ कर दिया था. परिणामस्वरूप छोटे किसान अपने खेतों से बेदखल किए जाने लगे. सोलहवीं शताब्दी के अंत तक कपड़ा उद्योग के विकास के साथ ऊन की मांग में भी लगातार वृद्धि हो रही थी. ऊन की खेती के लिए भेड़ों के बड़ेबड़े बाड़े बनाए जा रहे थे. उनके चरागाह के लिए किसानों से जमीन छीनी जा रही थी. उनके झोपड़ों को उजाड़कर मिट्टी में मिला दिया गया. जमीन की आवश्यकता तेजी से बन रहे कारखानों के लिए भी थी. इसलिए कस्बों और गांवों में कृषियोग्य भूमि को कारखानों के नाम पर हड़पा जा रहा था. कारखानों, ऊनउत्पादक केंद्रों यहां तक कि भेड़ चराने के लिए भी मानवश्रम की आवश्यकता थी. मगर पहले वे संसाधनों के स्वामी की तरह काम करते थे, उनके शिल्प का सम्मान किया जाता था, मगर अब उन्हें समाज में तेजी से उभरते नवसामंतवर्ग के कारखानों में, उसके अधीन कार्य करना पड़ता था.

सतरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भूसामंत अपनी स्थिति को काफी सुदृढ़ कर चुके थे. उन्हें धार्मिक और राजनीतिक शक्तियों का भी पूरा समर्थन प्राप्त था. हाथों से जमीन और रोजगार छिन जाने के कारण समाज में बेरोजगारों की संख्या बढ़ी थी. इसलिए भूसामंत जो आगे चलकर पूंजीपतिवर्ग में ढलने वाले थे, के पास पूरा अवसर था कि अपनी ताकत और स्थिति का लाभ उठाकर श्रमिकों से मनमानी दरों पर काम ले सकें. यही नहीं, श्रमिकोंकामगारों के शोषण का दौर भी आरंभ हो चुका था. मानवश्रम की जरूरत को पूरा करने के लिए बड़ेबड़े जमींदार और भूसामंत कृषिफार्मों और ऊन के कारखानों के नाम पर बड़ेबड़े बाड़े बनाने लगे थे. उन बाड़ों में सिर्फ पशुओं को ही नहीं, मजदूरों और कामगारों को भी कैद करके रखा जाता था. बाड़े में कैद लोगों में से अधिकांश भूसामंतों और जमींदारों के दास होते थे. जिनकी पशुओं की भांति ही खरीदफरोख्त की जाती थी.

मजदूरों का पूरा का पूरा परिवार उन बाड़ों में काम करता था. यहां तक कि छोटे बच्चों को भी बचपन से ही काम पर जोत दिया जाता था. मजदूरी के रूप में उन्हें सिर्फ पेट भरने लायक रोटी और तन ढकने को कपड़ा दिया जाता था. रहने के लिए ठिकाना, वह भी इसलिए ताकि पतिपत्नी मिलकर मजदूरों और गुलामों की नई पीढ़ी पैदा कर सकें. भूसामंतों, जमींदारों की आमदनी बढ़ने के साथ ही उनमें विलासिता के लक्षण भी पैदा होने लगे थे. किसानों से छीनी गई जमीनों, मगर खाली पड़े कुछ मैदानों को अरण्य क्षेत्र घोषित करने की प्रथा जोर पकड़ चुकी थी. उन अरण्यों का उपयोग हिरन के आखेट के लिए किया जाता. उल्लेखनीय है कि कृषियोग्य जमीन को आखेटस्थलों में बदल जाने का दुष्परिणाम जर्मनी में भीषण अकाल के रूप में देखने को मिला था. बावजूद इसके सरकार भूसामंतों के पक्ष में थी.

अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश संदद में एक बिल पेश किया गया, जिसके द्वारा भूकब्जाधारकों को उसके कानूनी मालिक का रूप दे दिया गया. अब वे अपने कब्जे वाली जमीन का उपयोग निजी संपत्ति के रूप में करने को स्वतंत्र थे. इससे भूस्वामियों को बेरोजगार श्रमिकों के साथ मनमानी करने, उनसे अपनी शर्तों पर काम लेने का अधिकार मिल गया. कृषियोग्य भूमि के छिन जाने से लोग मजदूरी की तलाश में भटकने लगे. दूसरी ओर भूसामंतों, जमींदारों ने अपने कब्जेवाले विशाल कृषि मैदानों में मशीनों के सहारे खेती करना प्रारंभ कर दिया. खेती एक उद्योग में बदलने लगी. भूवंचित किसानों के पास अपनी आजीविका के लिए, सिवाय मजदूरी पर काम करने के और कोई चारा न था. यह एक सर्वहारा वर्ग था, जो रोजीरोटी की तलाश में कहीं तक जाने को विवश था. इन्हीं भूसामंतों ने अतिरिक्त पूंजी के दम पर कारखानों और उद्योगों की स्थापना की. आम जरूरत का वस्तुएं जिन्हें पहले हस्तकौशल से बनाया जाता था और जिनके द्वारा हजारोंलाखों लोगों को रोजगार मिलता था, वे मशीनों द्वारा बनने लगीं. जिससे उन उद्योगधंधों में लगे कारीगर बेरोजगारी का शिकार बनने लगे. विवश होकर वे भी नौकरी के लिए कारखानों और फैक्ट्रियों में भटकने लगे. उनपर नियंत्रण रखने के लिए कानून बनाए गए. पूंजीपतियों के समर्थन पर बनी सरकारें, अनुशासन और व्यवस्था के नाम पर मजदूरों और कामगारों के मौलिक अधिकार, जीविका के अधिकार के हनन में—पूंजीपतियों का साथ दे रही थीं.

23. भू-अधिग्रहण के विरुद्ध खूनी विद्रोह: बुर्जुआ वर्ग का उदय

भूमि छिन जाने के कारण समाज का बड़ा वर्ग बेरोजगारी का शिकार बना था. हजारों एकड़ जमीन जिसपर छोटे किसानमजदूर अपने पसीने से अन्न उपजाते थे, भूसामंतों और जमींदारों की संपत्ति बन चुकी थी. उन दिनों के सभी कानून भूसामंतों और जमींदारों के पक्ष में थे. यूरोप के जिन देशों में सरकार का चयन निर्वाचन द्वारा होता था. वहां एक प्रकार का कुलीनतंत्र था. सरकार के चुनाव में वही लोग चुनाव ले सकते थे, जिनके पास न्यूनतम वांछित क्षेत्रफल की कृषियोग्य जमीन हो. उससे पहले लोग या तो खेती पर निर्भर थे, अथवा आम उपयोग की उन वस्तुओं का निर्माण करते थे, जिनकी स्थानीय लोगों मेें खपत हो. उत्पादन लाभकेंद्रित न होकर, आवश्यकताकेंद्रित था. समाज में कारीगरोंशिल्पकारों को पूरा सम्मान मिलता था. बावजूद इसके, पारस्परिक आवश्यकताओं पर आधारित वह प्रणाली मशीनीकरण की मार झेलने में असमर्थ सिद्ध हो रही थी. मशीनों ने किसान और कामगार दोनों को बेरोजगार किया था. प्रौद्योगिकीय विकास के साथ ही समाज में विशिष्ट तकनीक क्षमता संपन्न दक्ष कामगारों की मांग भी बढ़ती जा रही थी. इसके लिए नए शिक्षासदन और प्रशिक्षण केंद्र खोले जा रहे थे. प्रशिक्षणप्राप्त कामगारों को अपेक्षाकृत अच्छे वेतन पर रखा जाता था. वे पूंजीपतिप्रबंधन के अपेक्षाकृत निकटवर्ती माने जाते थे. इससे श्रमिकों के बीच विषमता की खाई लगातार फैलती जा रही थी.

इसी समय को मार्क्स ने बुर्जुआ वर्ग के उद्भव का काल माना है. वह सामंतवाद और पूंजीवाद का संक्रमणकाल था. आरंभ में पूंजीवाद इतना विकृत भी नहीं हुआ था कि दूसरे के परिश्रम को अपनी प्रगति का आधार बनाया जा सके. न उद्योगों का उतना विकास हो पाया था कि उसमें सर्वहारा वर्ग के सभी बेरोजगारों को खपाया जा सके. न ही किसी एक की जमीन पर कब्जा जमाकर उसको भिखारी बना देने की रीतिनीति चलती थी. सोलहवीं शताब्दी तक यूरोपीय समाज तेजी से पूंजीवादी समाज में ढलने लगा था. बावजूद इसके उसपर परंपरा का पूरा दबाव था. यही वह कारण है जिससे सतरहवीं शताब्दी के आरंभ में ऐसे बहुत से नियम बनाए गए, जिनसे नागरिकों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण दिया जा सके. लेकिन वे सभी कानून समाज के संपन्न और शक्तिशाली वर्ग के हित में थे. वही श्रमशोषण का मुख्य आधार थे. तो भी दासप्रथा के विरुद्ध सोलहवीं शताब्दी से ही आवाजें उठने लगी थीं. स्वयं दासों में भी अपने हालात को लेकर बेचैनी थी. वे आजाद होना चाहते थे. उस समय तक लोकप्रिय हो चुका मानवतावादी चिंतन और उससे जुड़े दार्शनिकविचारक और लेखक उनकी मांगों का समर्थन कर रहे थे. यूरोप के कई देशों में दासप्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया था. किसी भी व्यक्ति को बेगार और गुलामी के लिए बाध्य करना कानूनी अपराध था. कुछ देशों में तो दासता के लिए बाध्य करने पर मृत्युदंड का भी प्रावधान था.

समाज में अनुशासनसंबंधी नियम कड़े थे. कहींकहीं तो उनसे निरंकुशता की झलक भी मिलती थी. थाॅमस मूर के हवाले से मार्क्स ने बताया है कि सोलहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में ही केवल चोरी के आरोप में लगभग 72, 000 नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया था. नागरिक अधिकारांे के संरक्षण की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण उनमें कुछ निर्दोष भी दंडित हुए होंगे. इसलिए कानूनों का विरोध होना स्वाभाविक था. परिणाम यह हुआ कि लोग रोजगार के वैकल्पिक रास्तों की तलाश करने लगे. निश्चित ही उन दिनों तेजी से बढ़ते उद्योग लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने का सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र थे. लोग उनके माध्यम से सामंतवादी अत्याचारों से मुक्ति का सपना देख रहे थे. कारखानों का प्रबंधन पूंजीवादी नियमों के अनुसार किया जाता था. उनके लिए मजदूर का श्रम महज एक कामोडिटी, उपभोक्ता वस्तु जितना था, जिसको बाजार में बोली लगाकर कम से कम कीमत पर खरीदा जा सकता था—बिना यह सोचे कि मजदूर भी एक जैविक इकाई है. उसकी भी अपनी जरूरतें और सपने हो सकते हैं. कालांतर में जैसेजैसे मशीनीकरण का विस्तार हुआ, पूंजीवाद अपने पंजे फैलाता गया, फिर तो जहांजहां वह पहुंचा, मानवीय श्रम को उपभोक्ता वस्तु समझने की प्रथा भी वहांवहां फैलती गई. पूंजीवादी विस्तार के साथ सर्वहारा वर्ग और उसकी समस्याएं भी विस्तार लेती र्गइं. इसके साथ ही पूंजीवाद के प्रति आक्रोश भी परवान चढ़ता गया. इस जनाक्रोश को हवा देने में दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों का भी पूरापूरा हाथ था.

24. पूंजीपति किसान की व्युत्पत्ति

पूंजीवादी व्यवस्था के सच को बेनकाब करने के लिए ‘पूंजी’ में मार्क्स एक ही प्रश्न को अनेक रूपों में जगहजगह उठाता है. उनतीसवें अध्याय में यह प्रश्न एक बार पुनः दोहराया गया है. वह पूछता है कि आखिर पूंजीवाद आया कहां से? इसका मूल उद्गम कहां है? किस प्रकार यह पूरी दुनिया में फैलने में कामयाब हुआ? वे कौनसी शक्तियां थीं, जो पूंजीवाद को अपने हितानुकूल मानकर उसको बचाए रखने का षड्यंत्र रचती थीं? अपने ही प्रश्नों पर विचार करते हुए मार्क्स इस परिणाम पर पहुंचा था कि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो पूंजीपति का विकास वही घटना है, जब समाज में सर्वहारा वर्ग का जन्म हुआ था. दूसरे शब्दों में पूंजीपति और सर्वहारा दोनों का उद्गमकाल एक ही है. उसके अनुसार मनुष्यता के इतिहास में पूंजीवाद और सर्वहारा वर्ग का उद्गम वास्तव में इतिहास का वह हिस्सा है, जब मनुष्य में पहलेपहले धनसंग्रह की प्रवृत्ति का विकास हुआ. कालांतर में इसी से धन को पूंजी की भांति उपयोग करने और उसका पूर्ण आर्थिक लाभ उठाने की परंपरा को जन्म दिया.

न्यूटन का तीसरा नियम है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया साथसाथ और समान बलयुक्त होती है. पूंजीपति वर्ग के उदय के साथ सर्वहारा वर्ग का उद्भव भी ऐसी ही ऐतिहासिक और स्वाभाविक घटना थी. सर्वहारा वर्ग का विकास स्पष्टतः पूंजीवाद के विकास की परिणति था. उन दोनों के बीच स्वाभाविक द्वंद्वात्मकता थी, तो भी वे एकदूसरे के विकास को गति देने का उत्तरदायित्व निभा रहे थे. उनमें से पूंजीपतिवर्ग अपनी ताकत और पहुंच के बल पर पूरी दुनिया पर छा जाने का सपना देख रहा था. दूसरा करीबकरीब विपन्न और साधनविहीन सर्वहारा था. उसकी ताकत उसके संख्याबल में निहित थी, किंतु अन्यान्य कारणों से कई खेमों में बंटे होने के कारण वह किसी निर्णायक स्थिति में नहीं था. हालांकि उसकी भी वैश्विक व्याप्ति थी. मजदूर संगठन थे, मगर आपस में बंटे हुए. मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का उदय किसानों और मजदूरों को उनकी जमीनों से बेदखल करने की घटना से जुड़ा था. पंूजीपतियों का एक वर्ग ऐसा भी था जो मजदूरों और किसानों के बल पर खेती करने का सपना देख रहा था. अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने उत्पादन प्रणाली का आमूल मशीनीकरण किया. पूंजी जमा की और उसके दम पर छोटे किसानों को उजाड़ना आरंभ कर दिया. उजड़े हुए जमीन से बेदखल लोग भूसामंतों, पूंजीपति किसानों के अधीन कार्य करने और उत्पीड़न सहने को विवश थे.

पूंजीपति किसानों और सर्वहारा वर्ग के साथ एक और वर्ग भी बड़ी तेजी से पनप रहा था, जो था तो सर्वहारा वर्ग का हिस्सा, मगर अपने बुद्धिबल के हिसाब से वह पूंजीपति वर्ग के हितों को प्रभावित करने में सक्षम था. यह स्थिति उसने आधुनिक शिक्षा और तकनीकी कौशल के बल पर अर्जित की थी. मशीनीकरण के दौरान विशिष्ट प्रशीक्षणयुक्त कार्मिकों की मांग बढ़ने पर इस वर्ग को आर्थिक लाभ भी पहुंचा था. पूंजीवाद के आगमन के पश्चात नवधनाढ्यों की श्रेणी में आए इस वर्ग को मार्क्स ने ‘बुर्जुआ’ वर्ग कहा है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बीच, देखा जाए तो उसकी भूमिका कैटलिस्ट के समान थी. ‘पूंजीपतियों’ के साथ इस वर्ग के रिश्ते सहयोग और विरोध के थे. निहित स्वार्थों के लिए यह वर्ग कभी श्रमिकों के खेमे में जाकर उनसे अंतरंगता दर्शाता, उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को उकसाता, तो कभी पूंजीपतियों का हितैषी बनकर श्रमिकों के हितों की बलि लेने से भी नहीं हिचकिचाता था.

चूंकि पूंजीपति और सर्वहारा एक ही सामाजिक प्रक्रिया से उद्भूत थे, अतएव जिस सामाजिक प्रक्रिया द्वारा सर्वहारावर्ग का जन्म हुआ था, उसी ने नए किसानों के लिए भी नियम बनाए थे. उनमें से एक नियम यह भी था कि भूसामंत अथवा पूंजीपति किसान अपने कृषिक्षेत्र के प्रबंधन का काम देख सकता था. वहां न्यूनतम मजदूरी के आधार पर नौकर रख सकता था. कालांतर में मजदूरी की दरों में गिरावट लगातार बनी रही, जिसका एक परिणाम मुद्रास्फीति के रूप में सामने आया, जो मजदूरी की दरों में अतिरिक्त गिरावट का कारण बना. उल्लेखनीय है कि अपनी स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए पूंजीपति किसान मजदूरी की गणना मुद्रा की पुरानी दरों के आधार पर करता था. जिससे मजदूरों की वास्तविक आय काफी कम हो जाती थी. मजदूरी की दरों में आई भारी गिरावट और जमींदारों, भूसामंतों को दिए जाने वाले लगान में उत्तरोत्तर कमी का सीधा लाभ पूंजीपतिकिसानों को पहुंचा था. मार्क्स ने उदाहरण देकर इस स्थिति को स्पष्ट करने का पूरापूरा प्रयास किया है, जिसके परिणामस्वरूप परंपरागत जमींदारों और भूसामंतों के स्थान पर उन किसानों का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा था, जो पूंजीवादी सिद्धांतों के अनुसार कृषिकर्म को वरीयता देते थे. यह वर्ग एक ओर जहां मजदूरों का शोषण करता था, वहीं सघन खेती को प्रोत्साहन के सरकार से मिलने वाली सुविधाओं का भी लाभ उठाता था.

25. कृषि-क्रांति का उद्योग-जगत पर प्रभाव

पूंजी’ के तीसवें अध्याय में मार्क्स कृषिउत्पादन में मशीनों के आगमन के बाद आई क्रांति और उसके प्रभावों की विवेचना करता है. वह दर्शाता है कि मशीनीकरण के बाद पूंजीपति वर्ग न केवल उत्पादन क्षेत्र पर, बल्कि अर्थव्यवस्था के प्रत्येक प्रत्येक क्षेत्र पर काबिज हो चुका था. यहां तक कि परंपरागत कृषिकर्म भी उसके आक्रमण से अछूता नहीं था. वह लिखता है कि—सतत एवं सुव्यवस्थित क्रम में कृषकसमूहों को उनकी कृषिभूमि से बेदखल किए जाने से पूरे यूरोप में बेरोजगारी बढ़ी थी. रिक्त कराई गई भूमि का उपयोग पूंजीवादी ढंग से खेती किए जाने अथवा कारखाने स्थापित करने के लिए होता था. यद्यपि नए कारखानों के लिए मजदूरोंकामगारों की आवश्यकता पड़ती थी. तो भी मजदूरों के हिस्से का अधिकांश कार्य मशीनों द्वारा निपटा दिए जाने के बाद कुल रोजगार अवसरों में कमी आई थी. बेरोजगारों की संख्या उन कारखानों में रोजगार प्राप्त श्रमिकों की संख्या से कहीं अधिक थी. सर्वहारावर्ग की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी. मार्क्स आगे लिखता है कि खेती करने वाले किसानों और मजदूरों को जमीन से बेदखल किए जाने के कारण बाजार में उपलब्ध श्रमशक्ति में कई गुना वृद्धि की थी. बेरोजगार हुए वे सभी श्रमिक आजीविका के लिए काम की तलाश में थे.

चूंकि बड़े फार्महाउसों में कृषिकार्य का मशीनीकरण हो चुका था, इसलिए बेदखल किए गए किसानों को वहां रोजगार मिलने की संभावना अत्यंत क्षीण थी. उनके पास सिवाय कारखानों और फैक्ट्रियों में मेहनतमजदूरी करने के लिए खुद को जीवित रखने का और कोई रास्ता न था. जो किसान अपना पसीना बहाकर खेतों में अपनी जरूरत का अन्न उपजा लेते थे, जो उससे पहले तक पूरे समाज का पेट भरते आए थे, अब उन्हें अपना पेट भरने के लिए दूसरों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ रहा था. उनका नया अन्नदाता वह पूंजीपतिवर्ग था, जिसने उनसे उनके खेतों को हड़पकर उनमें बड़ीबड़ी मशीनें खड़ी कर दी थीं. उन्हीं के संसाधनों का दोहन करता हुआ वह तेजी से पूंजी बना रहा था. यही नहीं, अपनी आर्थिक हैसियत और श्रमिकों की मजबूरी का लाभ उठाते हुए वह उनका जमकर शोषण भी करता था.

मार्क्स के अनुसार कृषिक्षेत्र से भारी मात्रा में मजदूरों के बेदखल किए जाने से घरेलू बाजार में वृद्धि हुई थी. इसलिए कि जो किसानमजदूर अपनी जरूरत की वस्तुएं अपने खेतों में उगा लिया करते थे, अब उन्हें वे बाजार से खरीदनी पड़ती थीं. इस तरह जो किसान और खेतिहर मजदूर पहले दूसरों का पेट भरते थे, वे अब अपना पेट भरने के लिए कारखानों में बनाए जा रहे, उत्पादों पर निर्भर हो चले थे. इससे बाजार का विस्तार हुआ था. इसका आशय ही था, पूंजीपतियों के लिए अतिरिक्त मुनाफा, बाजार का उत्तरोत्तर फैलाव और पूंजीवाद का निरंतर विस्तार.

26. औद्योगिक पूंजीवाद की उत्पत्ति

मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का विस्तार एक ऐतिहासिक परिघटना थी. ‘पूंजी’ के अध्यायों में वह एक के बाद एक उन स्थितियों और परिवर्तनों का क्रमानुसार विश्लेषण करता है, जिनसे गुजरते हुए एक सरल समाज प्रकारांतर में औद्योगिक पूंजीवाद का शिकार हुआ और जिसके कारण समानताआधारित अर्थव्यवस्था चंद लोगों के वर्चस्व वाली अर्थव्यवस्था में बदलती जा रही थी. मार्क्स स्पष्ट करता है कि औद्योगिक पूंजीवाद का गुलाब, जमींदारी प्रथा की राख पर खिला था. बेलगाम मुनाफाखोरी के लिए जमीन उन मेहनतकश किसानों से हड़पी गई थी, जो पीढ़ियों से उसपर खेती करते आए थे. जमीन के साथ उनके भावनात्मक और बेहद करीबी संबंध थे. सामंतवादी शोषण और उत्पीड़न की विषम परिस्थितियों के बीच जो अपने जीवन को जैसेतैसे बचाए हुए थे. अपने परंपरागत उद्यमों से बेदखल हुए वे किसानमजदूरशिल्पकार जीवित रहने के लिए भारी संघर्ष से गुजर रहे थे. उनके पास बहुत कम विकल्प थे. अधिकांश लोगों ने पूंजीवादी उद्यमों की शरण ली थी. उनमें मजदूरी कर वे अपना जीवनयापन करने लगे. उनमें से कुछ ने जो व्यवहारकुशल और व्यावसायिक दृष्टि रखते थे, मशीनीकरण की शरण ली. उनमें से कुछ को सफलता भी मिली. लगातार मुनाफा कमाते हुए वे स्वयं को छोटे उद्यमियों की श्रेणी में स्थापित करने में सफल सिद्ध हुए. लेकिन ये सब संसाधनों की कमी का शिकार थे और अपनीअपनी सरकार से संरक्षण की आस लगाए हुए थे.

जमेजमाए उद्योगपति बाजार पर एकाधिकार चाहते थे. उनके पास संसाधनों की कमी न थी. अपने उद्योगों में वे बेहतर तकनीक का उपयोग कर सकते थे. उत्पादों के लिए नए बाजारों की खोज का उन्हें लंबा अनुभव था. किंतु अपने ही जैसे पूंजीपतियों से कड़ी स्पर्धा तथा बाजार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उन्हें भारी मात्रा में श्रमशक्ति की आवश्यकता थी. समस्या के समाधान के लिए पूंजीपतियों ने श्रमिकों को काबू में रखने के लिए दीघसूत्री योजना पर काम करना आरंभ कर दिया. यह योजना राजनीतिक सत्ता के साथ गठजोड़ पर टिकी थी. सरकार पर अपने दबदबे के कारण वे मनमाने कानून बनवाने में भी सक्षम थे. अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार द्वारा आरंभ की गई राष्ट्रीय ऋणकोश, कराधान जैसी अनेक नई व्यवस्थाएं, पूंजीपतियों की योजना के अनुसार थीं, इन सबने येनकेनप्रकारेण पूंजीवाद को मजबूत करने का ही काम किया था. इससे छोटे उद्यमी, किसान स्पर्धा में पिछड़ने लगे थे.

इन सभी व्यवस्थाओं को यद्यपि सर्वतोन्मुखी विकास के नारे के साथ लागू किया गया था. तथापि इनका प्रभाव सीमित एवं श्रमविरोधी था. यह औपनिवेशिक सरंचना आर्थिक मोर्चे पर फतह और नए संसाधन जुटाने के लिए भले अत्यावश्यक हो, मगर मूल रूप में यह श्रमशोषण एवं बेगार के सिद्धांत पर टिकी थी. इसका पलड़ा हमेशा पूंजीपतियों के पक्ष में झुका होता था. परिणाम यह हुआ कि औद्योगिकीकरण के विस्तार और उद्योगों के बीच कड़ी स्पर्धा के बीच अधिकतम लाभ की संभावना के साथ कारखानों में बालमजदूरों की भर्ती और उनका खुलेआम शोषण किया जाने लगा. पूरा का पूरा बाजार पूंजीपति के लाभ के लिए काम में जुट गया. विडंबना देखिए कि यूरोपीय देशों में 1769 से 1770 के बीच पड़ा भीषण अकाल भी पूंजीपतियों के लिए मुनाफे का संदेश लेकर आया था. उसमें एक ओर जहां लाखों गरीबों, बेबसों, स्त्रियों और मासूम बच्चों को जान से हाथ धोना पड़ा, वहीं पूंजीपति जमाखोरों ने सरकारी उदासीनता और अकाल की स्थितियों का लाभ उठाते हुए खूब चांदी काटी थी. लाभ के सिद्धांत पर टिकी उस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अधिकतम मुनाफा ही नैतिकता थी, इसलिए पुराने जीवनमूल्य धराशायी होने लगे थे.

मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी समाज में श्रमिक उसका सबसे शक्तिशाली केंद्रबिंदू हैं. अतएव श्रमिकवर्ग को काबू में रखने के लिए उन्हें संगठित होने, उधार लेने तथा ज्वाइंट स्टाॅक कंपनी की स्थापना के लिए प्रेरित किया गया. यह कार्य आधुनिक समाज में विकास और कल्याणकारी व्यवस्थाओं की स्थापना के नाम पर संपन्न हुए. मानवाधिकार और लोकतंत्र जैसी संस्थाओं ने भी अंततः पूंजीवाद को मजबूत करने का कार्य किया. इससे उत्साहित होकर अधिकांश कामगार ज्वाइंट स्टाॅक कंपनी, स्टाॅक एक्सचेंज तथा आधुनिक बैंक कर्जदारी के लिए प्रवृत्त हुए. उद्योगों को कर्ज प्रदान करने की अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं ने, जो इस तथ्य को गोपनीय रखती थीं कि कर्ज के लिए वित्त की व्यवस्था किन òोतों से की जा रही है, कारखानों में श्रमिकों के शोषण को बढ़ाने का ही काम किया. आयकरदाताओं को टैक्स चुकाने और कर्ज लेने के लिए उकसाया जाता रहा. पूंजीपतियों ने जरूरी सेवाओं को भी बाजार में उतार दिया, ताकि उनके माध्यम से अपने लिए आय के नए स्रोत पैदा कर सकें. इसका उन्हें लाभ भी हुआ. बाजार के बहुमुखी विकास ने नई प्रौद्योगिकी की मांग पैदा की. नए क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी के आगमन से उनमें कार्यरत श्रमिककामगार, नाई, धोबी, दर्जी, बढ़ई, लुहार, स्वर्णकार आदि बेरोजगार होकर सड़क पर आ गए. कुल मिलाकर हालात ऐसे बनाए गए कि श्रमिक, कारीगर, हस्तशिल्पी सब के सब उसमें निरंतर उलझते ही गए. वास्तव में इस व्यवस्था से जुड़ा कोई भी व्यक्ति पूंजी के खूनी पंजों से बाहर जाने में असमर्थ था. वह सिर्फ छटपटा सकता था. अपसंस्कृतीकरण और महंगाई की बढ़ती दर से आहत हो सकता था. अपने हालात पर रो और छटपटा सकता था, लेकिन व्यवस्था में रहने, शोषण का शिकार होने और खुली आंखों से सबकुछ देखते जाने से अधिक कुछ और उसके बस में भी नहीं था. इन सभी परिवर्तनों के फलस्वरूप पूंजीवाद बेलगाम दौड़ता चला गया.

27. पूंजीवादी संचय की ऐतिहासिक प्रवृत्ति

प्रूधों का कहना था—व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है….संपत्तिधारी व्यक्ति चोर है. मार्क्स हालांकि प्रूधों से कई मामलों में असहमत था. मगर व्यक्तिगत संपत्ति को लेकर उसकी कुछ मान्यताएं पू्रधों से मेल खाती हैं. इतिहास का भौतिकवादी अध्ययन करते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन के संसाधन सामाजिक परिवर्तन की मुख्य प्रेरणा रहे हैं, और इसके पीछे मनुष्य की संपत्ति संचय की प्रवृत्ति का भारी योगदान है. ‘पूंजी’ के बतीसवें अध्याय में मार्क्स पूंजीवादी संचय की प्रमुख वृत्तियों और उन अवस्थाओं का वर्णन करता है, जिनकी ओर वह उन्मुख है. लंबे चिंतनविश्लेषण के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि एक दिन श्रमिकवर्ग पूंजीवाद की, जो उसकी दुर्दशा का मूल कारण है, की वास्तविकता को पहचानेगा तथा संगठित होकर क्रांति का शंखनाद करेगा. वह पूंजीवाद का अंतिम दिन होगा. अध्याय के आरंभ में ही वह एक प्रश्न उठाता है—

‘‘प्राचीन पूंजीसंचयन ने अपने भीतर कौनसा परिवर्तन किया है?’ इस प्रश्न का उत्तर वह आगे स्वयं ही दे देता है—‘निजी संपत्ति का विलयन, जो उनके मालिकों ने कठोर परिश्रम द्वारा अर्जित की थी, अर्थात तात्कालिक उत्पादकों को बेदखल कर देना.’

पू्रधों से भिन्न मार्क्स ने निजी संपत्ति की अवधारणा का पक्ष लिया था. उसका मानना था कि श्रमिकों को निजी संपत्ति का अधिकार होना चाहिए, ताकि उसके द्वारा वे छोटेछोटे उद्यम स्थापित कर सकें. वह लघु उद्यमों की सामाजिक उत्पादकता को बनाए रखने एवं श्रमिक की अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए आवश्यक मानता था. श्रमिक अपना बाॅस स्वयं है. चाहे वह हल जोतने वाला किसान हो अथवा हाथ में औजार लेकर काम करने वाला शिल्पकार. चाहे वह कारखानों में पसीना बहाकर रोजीरोटी कमाने वाला मेहनतकश श्रमिक हो अथवा दस्तकार. निजी संपत्ति ही उन सबके कल्याण की वाहक हो सकती है. वह लिखता है कि यद्यपि पूंजीवाद की नींव मजदूरों की भारी मात्रा में हुई बेदखली ने रखी है. निजी संपत्ति पूंजीपति के हाथों में पहुंचकर बहुआयामी शोषण का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है. उसके कारण जो श्रमिककामगार कभी मुक्त जीवन जीने के अभ्यस्त थे, अब विस्थापित मजदूर बनकर कष्टमय जीवन जी रहे हैं. पूंजीवाद के चंगुल में फंसकर वे अपना सबकुछ गंवा चुके, सर्वहारा हैं. पूंजीपतियों ने उनके श्रम को पूंजी में बदल दिया है. उसके माध्यम से वह लाचार श्रमिकों का मनमाना शोषण कर रहा है. मार्क्स स्पष्ट करता है कि पूंजीपति की निजी संपत्ति पूंजीवादी विनियोजन के रूप में अविरत विस्तार लेती जाती है. इस कोशिश में वह अपने संपर्क में आने वाली हर छोटी संपत्ति जिसमें श्रमिक की अपनी पूंजी यानी श्रम भी सम्मिलित है, को आभाहीन कर देती, उसको ग्रस लेती है. ऐसी स्थितियां पैदा कर दी जाती हैं, जिनमें श्रमिकवर्ग का शोषण अपरिहार्य हो जाता है.

पूंजी के अध्ययन से स्पष्ट है कि मार्क्स अपने चारों ओर पूंजीवाद का नंगा नाच देख रहा था. उसके चंगुल में फंसे मजदूरों को उसने छटपटाते हुए देखा था. बावजूद इसके वह पूरी तरह आशावान था. पूंजीवाद की विशद् समीक्षा करने के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अपनी मौत को स्वयं न्योता देना पूंजीवाद की मूल प्रवृत्ति है. यह एक ऐसा भस्मासुर है, जो दूसरे के श्रमकौशल के आधार पर ताकत ग्रहण करता है. किंतु अपनी मौत का उद्यम भी साथ लिए चलता है. श्रमिकअसंतोष की अनियंत्रित स्थितियां कभी भी उसको धराशायी कर सकतीं हैं. इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था जहां अपने लाभ के लिए सार्थक उद्यम करती है, वहीं वह श्रमिकों को भुलावे में रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है. ये भुलावे सांस्कृतिक पहचान, धर्म और विशिष्ट क्षेत्रीयताओं को अस्मितावादी पहचान देने के नाम पर लगातार जारी रहते हैं.

पूंजीवाद की आलोचना करते हुए उसने उसको ऐसा उपक्रम बताया है, जिसमें सामाजिक नियंत्रण, सहयोग और सहकारिता, प्रकृति की नियामक शक्तियों तथा समाज के उत्पादक बलों के मुक्त विकास के लिए कोई स्थान नहीं है. अपने विकास के दौर वह इन्हें हड़पता चला जाता है. पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपतियों के बीच आंखमिचैनी जैसा स्पर्धा का खेल चलता ही रहता है. तमाम व्यावसायिक मनमुटाव और लागडांट के एक भी पूंजीपति नहीं चाहता कि उनके उत्पादनतंत्र में कोई बाहरी शक्ति हस्तक्षेप करे. मगर श्रमिकों के पास संगठन की ताकत, श्रम की ताकत और उत्पादन की योग्यता होती है. उसका विश्वास था कि पूंजीपतियों के व्यापक और शोषणकारी तंत्र को संगठित उत्पादक न केवल उखाड़ फेंक सकते हैं, बल्कि अपने श्रमकौशल के दम पर सर्वकल्याणकारी और विकेंद्रीकृत उत्पादनतंत्र की नींव भी रख सकते हैं. खदेड़ने वालों को भी खदेड़ा जा सकता है, मुट्ठीभर हाथों में सिमटे गैरसामाजिक उत्पादनतंत्र का सामाजीकरण कर उसके लौकिक और मानवीय चरित्र को वापस लौटाना असंभव नहीं है—मजदूरों की कार्यक्षमता में अटूट विश्वास रखने वाले मार्क्स का यही मानना था.

मार्क्स निजी संपत्ति को उतना बुरा नहीं मानता, जितना कि प्रूधों मानता था. बल्कि वह बड़े उद्योगों के स्थान पर छोटे उद्यम लगाने के पक्ष में था, जिनपर श्रमिकों का नियंत्रण हो. जहां वे अपनी जरूरत का सामान बना सकें. जहां हुए उत्पादन का पूरा लाभ वहां कार्यरत श्रमिकों को मिलें. उत्पादनतंत्र के समाजीकरण की प्रक्रिया में उसने निजी संपत्ति को व्यक्तिमात्र की संपत्ति कहा था. वह मानता था कि पूंजीवाद के पतन के बाद, उत्पादन व्यवस्था श्रमिकों के हाथों में चले आने का अभिप्राय निजी संपत्ति की अवधारणा की पुनः स्थापना नहीं है. वह लिखता है कि उत्पादन के समाजीकरण की क्रिया है, जो—

यह निजी संपत्ति की पुनः स्थापना नहीं करती. बजाय उसके यह पूंजीवादी युग की उपलब्धियों एवं शिक्षाओं के आधार पर, व्यक्तिमात्र की संपत्ति की अवधारणा जैसे कि सहयोगसहकारिता, कृषिभूमि पर समाज के संयुक्त अधिकार तथा श्रमिकों द्वारा संचालित विकेंद्रीकृत उत्पादनतंत्र की स्थापना करती करती है.’

मार्क्स की समस्या थी कि पूंजीपति के हाथों में जाकर सर्वभक्षणकारी बन चुकी पूंजी को किस प्रकार लोकोपकारी सामाजिक संपदा में बदला जाए. वह कौनसी प्रक्रिया है जिसमें समाज की संपत्ति उसके सर्वांगीण विकास से प्रेरित हो, न कि मुट्ठीभर लोगों के वर्चस्व वाली पूंजीवादी व्यवस्था से. अपनी पुस्तक में वह लगातार इसपर विचार करता है. वह जानता था कि पूंजी, धर्म और राजनीति के दम पर बेहद शक्तिशाली बन चुके पूंजीपतियों का न तो हृदय परिवर्तन संभव है, न ही उस व्यवस्था से जो मनुष्यमात्र को उपभोक्ता और उसके आसपास की प्रत्येक वस्तु को उपभोक्तावस्तु में बदल देने को प्रयासरत हो, किसी भी प्रकार के परिवर्तन की उम्मीद करना उचित है. वह मानता था सरकार अथवा समाज की अन्य नैतिक शक्तियों द्वारा बेलगाम बन चुके पूंजीवाद को काबू में करना असंभव है. उत्पीड़न से मुक्ति के लिए सिर्फ उत्पीड़क वर्ग को ही आगे आना होगा. श्रमिक अभी तक जो उत्पादन पूंजीपति के लिए करता है, वह अपने लिए करे, पूरे समाज के लिए करे, तभी पूंजीवाद के विषैले दांत उखाड़े जा सकते /हैं.

निरीह मजदूर जो अपनी आजीविका के लिए भी दूसरों पर आश्रित हों, वे शक्तिशाली पूंजीपतियों को भला कैसे उखाड़ सकते हैं? विशेषकर तब जब समस्त कानून, सरकारी विधान उनके पक्ष में होकर, उनकी सुरक्षा के लिए सन्नद्ध हों. इस बारे में मार्क्स का मानना था कि श्रमिकवर्ग को यह अवसर पूंजीवाद की ओर से स्वयं ही प्राप्त होगा. इसलिए कि पूंजीवाद की सबकुछ हड़प लेने का स्वभाव ही उसपर भारी पड़ने वाला है. एक दिन वह स्वयं अपने आप को समाप्त कर लेगा. उस दिन श्रमिकोंकामगारों के पास अवसर होगा कि अपने श्रमकौशल और संगठित शक्ति के दम पर समाज को निर्दिष्ट परिवर्तन की ओर ले जा सकें. जहां समाज मुख्य हो. उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति का कब्जा न होकर समस्त समाज का अधिकार हो. जहां उत्पादन उपभोगआधारित न होकर आवश्यकताआधारित हो. और जहां आवश्यकताएं व्यक्ति की निजी महत्त्वाकांक्षाओं का प्रतीक न होकर, सामाजिक चेतना द्वारा मर्यादित होती हों.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप