बाल्मीकि प्रसंग : जरूरत परंपरा-प्रक्षालन की है

लगता है, हम फिर झांसे में आ गए. वैसे यह नई बात नहीं है. सहस्राब्दियों से यही होता आया है. पहले उन्होंने वर्ण बनाए. चतुराईपूर्वक समाज को बांटा. सावधानी यह रखी की जो वर्ण ऊपर के खाने में हैं, साम-दाम-दंड-भेद यानी जैसे भी हो, सत्ता उन्हीं के हाथों में बनी रहे. उनमें कम से कम लोग हों, इसलिए ऊपर के तीन मालों में गिनी-चुनी जातियों को रखा गया. तदनुसार समाज के प्रबंधन से जुड़ीं जितनी भी जातियां थीं, वे समस्त संसाधनों की स्वामी बनीं. ऊपर के तीन मालों पर कब्जा कर उन्होंने बाकी को निचले खाने में ढकेल दिया. ऊपर सौ में से दस थे तो नीचे नब्बे. वे नब्बे प्रतिशत लोग आपस में मिल न पाएं, इसलिए उनमें जातियों-उपजातियों के हजारों छोटे-छोटे खाने बना दिए गए. उस व्यवस्था से कितनों का हक मारा गया, कितनों का उत्पीड़न हुआ, कितने बेगार करते-करते दम तोड़ गए, किसी का हिसाब नहीं रखा गया. अगर कभी बात चली तो नीचे के माले में कीड़े-मकोड़ों की तरह रेंग रहे लोगों को एक-दूसरे से लड़वा दिया. (हिसाब रखता भी कौन? कसाई कभी सोचता है कि उसने कितने निरीह जानवरों की गर्दन पर छुरा चलाया है. या भेड़िया कभी गिनती करता है कि उसने कितने निरीह मेमनों की बलि ली है! हिसाब रखना है तो मेमने अपना हिसाब रखें? निरीह लोग अपना हिसाब रखें. नहीं तो जो सांसें ‘ऊपर के माले वालों’ की कृपा से बची हैं, उन्हें जैसे-तैसे जिएं. गीता पढ़ें, कर्म करें, फल ऊपर वालों के लिए छोड़ दें.)

उधर गरीब-विपन्न लोग सोचते रहे कि जो पंडित लोग चौंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगला-पिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे. यह सोचकर वे अपने अधिकारों की ओर से, समय की ओर से, समस्याओं की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले माले वालों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. पहले अवसर छीने, फिर मान-सम्मान. अपने से नीचे रह रहे लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच, निकम्मा आदि घोषित करके खुद सभ्यता, संस्कृति और इतिहास के सर्वेसर्वा बन गए. उस इतिहास में भेड़ों और मेमनों को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे जितने भी सुशोभन विशेषण थे, सब के सब उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले ढाई हजार वर्षों का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौता-परस्ती से ही बना है. इसके बावजूद हर व्यवस्था में वे श्रेष्ठ ठहराए गए. जो अच्छा है वह मेरा, जो गंदा है उसे पराया बताकर वे समाज के सर्वोत्तम पर अपना दावा ठोकते रहे. चूंकि ये पुरातन संस्कृति द्वारा अनुमन्य व्यवहार हैं, इसलिए अपने पक्ष के समर्थन के लिए उन्हें आज भी कुछ खास नहीं करना पड़ता. परंपरा की ओर से बने-बनाए तर्क स्वत: हासिल हो जाते हैं. उन्हें शास्त्र-सम्मत बताकर विरोधों और प्रतिवादों को दबाया जाता रहा है. परंपरा से अनुकूलित मस्तिष्क विरोध और लंबे प्रतिवाद की चुनौतियों का सामना करने से कतराते हैं. इसलिए आवश्यक होने पर भी वे परंपरा का संपूर्ण अतिक्रमण करने में नाकाम रहते हैं. मान्य अभिकर्त्ता न होने के कारण समाज भी प्रतिवादी तर्कों प्रति उपेक्षा बरतता है. ऐसे हालात में बहसें या तो इकतरफा सिद्ध होती हैं अथवा निरर्थक रह जाती हैं. इसके बावजूद पीड़ित पक्षों की पहलकदमी पर कुछ विवाद उठें तो उनके समर्थन के लिए आवश्यक तर्क भी संस्कृति और शास्त्र, जिनके वे मुख्य अभिकर्ता माने जाते हैं—की सीमाओं में ही खोजे जाते हैं.

विमर्श की सार्थकता तर्कों की स्वतंत्रता और सकारात्मकता में निहित होती है. मगर कई बार, छिछली राजनीति के प्रभाव में, नकारात्मक बहसें भी उछाल दी जाती हैं. कुछ ऐसा ही साल-भर पहले हुआ. अचानक एक अर्थहीन बहस समाज में गर्माहट पैदा करने लगी. अर्थहीन इस लिहाज से कि प्रतिवाद के लिए आगे आए समूह अपने तर्क उसी परंपरा से ले रहे थे, जो प्रतिवाद की जननी थी. वह बहस आज तक पुराने तर्कों के साथ जारी है. हुआ यह कि कर्नाटक के के. एस. नारायणाचार्य ने अपनी पुस्तक ‘वाल्मीकि यारू’(वाल्मीकि कौन थे?) में लिखा कि वाल्मीकि ब्राह्मण थे. यह कोई नई खोज नहीं थी. लेकिन इससे उस पक्ष की जो वाल्मीकि को अपना पूर्वज और भगवान मानता है—भावनाएं आहत हुईं. देखते ही देखते राजनीति गर्माने लगी. तत्काल प्रतिक्रिया हुई कि वाल्मीकि ‘बेदा’ के घर जन्मे थे. उन्हें ब्राह्मण घोषित करना दलित वर्ग के नायकों के ब्राह्मणीकरण की कोशिश, उनपर कब्जा करने की चाल है. बहरहाल जो परंपरा वाल्मीकि को ब्राह्मण ठहराती है, अन्य संदर्भों में वह, सुस्पष्ट ऐतिहासिक दृष्टि के अभाव के बावजूद—प्रतिवादियों के समर्थन में भी खड़ी नजर आती है. अलग-अलग समय में लिखे गए शास्त्रों में इस तरह के विरोधाभास खूब मिलते है, जिन्हें प्राय: सांस्कृतिक वैविध्य के नाम पर पचा लिया जाता है. अंतत: विवाद कानून के दरवाजे तक पहुंचा. अदालत ने वाल्मीकि की जाति तय करने के लिए चौदह सदस्यीय समिति का गठन कर दिया. फिलहाल मामला विचाराधीन है. कहने को शांति, मगर भीतर ही भीतर सब सुलग रहे हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने एक वर्ग प्रतिबंध हटवाना चाहता है. दूसरा विरोध पर अड़ा हुआ है.

सवाल है कि दो-ढाई हजार वर्ष पहले जिस भलेमानस ने अपने बारे में खुद कुछ न बताया हो, जिसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी न हो. ऊपर से कभी समर्थन करतीं तो कभी एक-दूसरे पर सवाल उठातीं अनेक किंवदंतियां हों. जो अपनी ही ’रामायण’ में खुद को कहीं चांडाल तो कहीं प्रचेता-पुत्र(प्रचेतसोऽहं दशम् पुत्रो राघवनंदन) लिखता हो—ऐसे महापुरुष के जन्म और कुल के बारे में ढाई हजार वर्ष बाद भला कौन सही बता सकता है? खासकर ऐसे समाज में जहां इतिहास लेखन की परंपरा ही न रही हो. एक बात और….उन दिनों वर्ण व्यवस्था में मामूली ही सही, जरूरी खुलापन था. नीचे से ऊपर तथा ऊपर से नीचे के मालों के बीच आवाजाही लगी रहती थी. इसलिए अगर कोई सिद्ध भी कर दे कि वाल्मीकि दलित थे, तब भी जो दलित हैं, उनका पक्ष ज्यादा मजबूत नहीं होने वाला. ऐसे अवसर के लिए वे मनमाने तर्कों के साथ सदैव तैयार रहते हैं. उनका तर्क कुछ ऐसा भी हो सकता है—’जन्म से तो पता नहीं, लेकिन कर्म से वे पूरी तरह ब्राह्मण थे….शास्त्रों में यह भी लिखा है कि जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं—जन्मना जायते शूद्रः. संस्कारात् द्विज उच्यते….रामायण लिखने के बाद बाबा वाल्मीकि के समस्त पाप नष्ट हो चुके थे. इसलिए हमने उन्हें ब्राह्मण मान लिया था. जैसे मतंग ऋषि को माना था, जो ब्राह्मण कन्या और शूद्र नाई की संतान तथा तात्कालिक व्यवस्था के अनुसार चांडाल जाति के थे.’

वे पूरी तरह से गलत भी नहीं हैं. दरअसल इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब केवल क्षत्रियों ने राजकर्म और ब्राह्मणों ने बौद्धिक नेतृत्व संभाला हो. हर युग, प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे नायक हुए जिन्होंने वर्ण-व्यवस्था से ऊपर उठकर प्रदर्शन किया. लेकिन ऐसा इस संस्कृति ने कभी नहीं माना. ब्राह्मण को समाज का मस्तिष्क, क्षत्रिय को भुजाएं, वैश्य को उदर तथा शूद्र को पैर दिखाने वाला रूपक उसके दिमाग में बसा रहा. चूंकि समय के दस्तावेजीकरण का काम समाज के खास लोगों की जिम्मेदारी रही, और उन्होंने वही लिखा जो उनके वर्गीय स्वार्थ की सिद्धि करता था, इसलिए दूसरे वर्गों का अवदान प्राय: अलक्षित बना रहा. जहां सीधे ऐसा संभव न हुआ, वहां उपलब्धि को अपने नाम करने के लिए झूठ के महाकाव्य रचे गए. फिर कुछ अंतराल के पश्चात् संबंधित महापुरुष को ही अपने वर्ग में शामिल कर लिया गया, ताकि उनकी वर्गीय श्रेष्ठता का भ्रम लोगों के मन में बना रहे; और बाकी लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी हीनताबोध से ग्रसित रहें. कबीर ने जुलाहे के घर जन्म लेने की बात स्वयं स्वीकारी थी. उन्हें अपना सिद्ध करने के लिए उन्होंने कबीर को विधवा ब्राह्मणी की संतान बताने में भी संकोच नहीं किया. गौतम बुद्ध को विष्णु के अवतारों में सम्मिलित करना भी उनकी इसी नीति का हिस्सा रहा है. इसकी अपेक्षा वैदिक काल में अपेक्षाकृत खुलापन देखने को मिलता है. वेदों में ऐसे अनेक ऋषि हैं जो ब्राह्मण कुलोत्पन्न न होकर भी ब्राह्मण के रूप में पूज्य हैं. प्राचीन भारतीय विद्वानों में इतिहासबोध न होना भी एक समस्या है. यूं उन्हें लंबी गणनाएं करने में प्रवीणता प्राप्त थी. 33 करोड़ देवताओं की कल्पना हालांकि अतिश्योक्ति है, मगर इससे भारतीयों के बड़ी-बड़ी संख्याओं की कल्पना के प्रति जुनून को समझा जा सकता है. लेकिन पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्य के अभाव में वाल्मीकि चाहे जिस जाति में जन्मे हों, उनके लिए ब्राह्मण ही रहेंगे. इस सचाई को भली-भांति जानने के बावजूद वर्ण व्यवस्था से चिपका, सांस्कृतिक पहचान को तरसता, उत्पीड़न का शिकार होता आया समुदाय शांत नहीं बैठता. वह फिर प्रतिवाद करता है—‘नहीं, वे हमारे थे.’ इससे संस्कृति की धूप-ताप खाए वर्गों द्वारा संस्कृति पुरुष की छांह की खोज की छटपटाहट को समझा जा सकता है.

प्रतिवाद करने वाले भूल जाते हैं कि उनके पास नायकों की नहीं, संस्कृति की कमी है. शिक्षा की कमी है, तथा उन सरोकारों की कमी थी, जिनसे वर्गीय चेतना पनपती है. समानांतर संस्कृति होती तो उनके समाजों के नायकों के दस्तावेजीकरण का सिलसिला भी निरंतर बना रहता. उस समय किसी में साहस नहीं होता कि उनके प्रेरणा पुरुष को अपना बताकर उन्हें उनकी संस्कृति से अलग कर सकें. स्वतंत्र संस्कृति के अभाव में उन्हें व्यक्तियों से ही संतोष करना पड़ता है. कुछ समय बाद उन्हें भी हड़प लिया जाता है. दूसरी ओर विरोधी सत्ताधीशों का आदर्श यह संस्कृति है जो बिना कुछ किए, सिर्फ जन्म के आधार पर उन्हें शीर्ष पद प्रदान करती है. उस संस्कृति के नियामक और सर्वेसर्वा वे स्वयं हैं. ये बातें परस्पर विरोधाभासी लग सकती हैं. लोग कह सकते हैं कि जो संस्कृति योग्यतम को योग्यतम जैसा ही सम्मान देने हेतु सदैव तत्पर रहती है, उसे अपना बनाते हुए देर नहीं करती, जिसके पर्याप्त सांस्कृतिक साक्ष्य हैं—उस संस्कृति पर पक्षपात का आरोप भला कैसे लगाया जा सकता है? निस्संदेह, प्रथम दृष्टया तो यह संस्कृति की उदारता को ही दर्शाता है. इसके लिए ’विविधता में एकता’ के विशेषण के साथ संस्कृति का बार-बार महिमामंडन किया जाता है. तथापि यह हकीकत है कि समाज के जातीय आधार पर विभाजन तथा घोर आर्थिक विषमताओं के चलते संस्कृति की यह उदारता हमेशा स्वयं-स्फूर्त्त तथा निर्विवाद नहीं रह पाती. यह व्यक्ति की रुचि और योग्यता का ख्याल किए बिना, वर्ण व्यवस्था का लंघन करने वाले; अथवा किसी कारण उसका अनुसरण न करने वाले व्यक्ति को दंडित कर उसकी स्वतंत्रता के विरोध में तरह-तरह के व्यवधान उत्पन्न करने लगती है. यही कारण है कि यहां जो संपन्न हैं, सत्ता के करीब हैं, वे अतिरिक्त रूप से अधिकार संपन्न भी हैं.

चूंकि उत्पादकता के संसाधनों पर उसका अधिकार होता है, अत: वह आर्थिक रूप से आश्रित वर्गों पर अपनी वर्गीय श्रेष्ठता को मिथ की भांति थोपने में सफल सिद्ध होते हैं. वे बताते हैं कि जो उन्हें अतिरिक्त रूप से प्राप्त है उसके वे दैवीय अधिकारी हैं. तरह-तरह के कष्टों और चुनौतियों को पार करने के बाद कोई कर्मठ और चेतनाशील मनुष्य जब इतर क्षेत्र में अपनी उपयोगिता सिद्ध करता है, तो कुछ काल के लिए संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचती है. जिसमें विरोधी पराजित होने लगते हैं. लेकिन यथास्थितिवादियों की वह पराजय या हताशा अल्पकालिक होती है. वे हलचलों को दबाने हेतु भरसक प्रयत्न करते है. प्राय: वे कामयाब भी हो जाते हैं. लेकिन कभी-कभी वैकल्पिक धाराओं का उत्स ऐसे महामानवों द्वारा होता है, जो प्रखर मेधावी, चेतनाशील, दूरद्रष्टा और कुशल संयोजक होते हैं. वे जनसाधारण के भीतर विभिन्न सत्ताओं और बेमेलकारी संस्कृति के प्रति दबे आक्रोश को जागते हैं. फलस्वरूप लोग सामाजिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध संगठित होने लगते हैं. धीरे-धीरे एक समानांतर संस्कृति विकसित होने लगती है, जो परंपरागत संस्कृति के अनुयायियों को किनारे कर देती है. वैकल्पिक संस्कृति की ये धाराएं जैसे ही समानांतर रूप से सशक्त होकर व्यापक सामाजिक-राजनीतिक समर्थन प्राप्त करती हैं, परंपरागत संस्कृति के अनुयायी तुरंत समझौते पर उतर आते हैं. तदनंतर शीतकाल का दौर आता है. उसमें दोनों वर्ग अपनी-अपनी शक्तियों को बढ़ाने और सहेजे रखने में जुट जाते हैं. वैकल्पिक संस्कृति के अनुयायी कार्यकर्ता, विद्वान् जब विजयोल्लास में डूबे होते हैं, तब परंपरागत संस्कृति के समर्थक शांत, सशंकित मन से अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं. जैसे ही दूसरा पक्ष कमजोर अथवा अपनी प्रस्थिति के प्रति लापरवाह नजर आता है, वे आक्रामक होकर उसे अपने प्रभाव में ले लेते हैं. पुष्यमित्र की अंतिम बौद्ध सम्राट पर विजय केवल राजनितिक विजय नहीं थी. न ही वह हिंदू धर्म की बौद्ध धर्म-दर्शन पर विजय थी. बौद्ध धर्म-दर्शन के उभार और पतन के बीच हिंदू धर्म-दर्शन में सैद्धांतिक रूप से ऐसा कुछ नहीं हुआ था जो उसे वास्तविक चुनौती दे सके. असल में वह बौद्धिक पराभव तथा तंत्र-मंत्र, जादू-टोने और कर्मकांड में लिप्त बौद्ध धर्म-दर्शन का अपना क्षरण था, जो अनेक विकृतियों के रूप में उसमें प्रवेश कर चुका था. ऐसे धर्म-दर्शन की पराजय स्वाभाविक थी. कुल मिलाकर यह अजगर संस्कृति है, जो महान व्यक्तित्वों को अपना ग्रास बनती है. यह दूसरों की सहमति पर नहीं, समझौते और अतिक्रमण के आधार पर जीवित रहती है. उनके लिए यह इतना महत्त्वपूर्ण है कि व्यक्तियों की कुर्बानी देकर भी संस्कृति रक्षा का ’पुण्य’ संरक्षित रखा जाता है. रावण जैसा विद्वान ब्राह्मण भी संस्कृति-प्रसार की राह में रोड़ा बन जाए तो उसका तिरस्कार करने, यहां तक कि राक्षस घोषित करने में भी उन्हें देर नहीं लगती.

‘रामायण’ इस संस्कृति का आदर्श ग्रंथ है. उसके रचनाकार वाल्मीकि की भूमिका केवल उत्कृष्ट महाकाव्य रच देने तक सीमित नहीं है. इसके साथ-साथ वह राम-संतति के पालक भी हैं. मगर इसी कारण विद्वानों का एक वर्ग उन्हें चांडाल मानने से सकुचाता है. हालांकि जैसे उनका चांडाल होना सिद्ध नहीं होता, वैसे ही उनका ब्राह्मण होना भी तर्क से परे है. तथापि कुछ स्थितियां हैं जिनपर विचार किया जाना चाहिए. पहली यह कि वाल्मीकि का ब्राह्मणीकरण, यदि वैसा हुआ है तो रामायण की रचना के मुकाबले बहुत बाद की घटना है. उसके माध्यम से भारतीय समाज की मनोग्रंथि को समझा जा सकता है. दरअसल जिस व्यवस्था में अस्प्रश्यता शिखर पर हो, छूने-भर से अपवित्र हो जाने का खतरा हो, जो विदेशी आक्रमणों के बाद से अस्मिता के संघर्ष से गुजर रही हो, उसमें संस्कृति के प्रतीक-पुरुष, मर्यादा पुरुषोत्तम की पत्नी और बच्चे ऐसे ऋषि के आश्रम में रहें, जो जन्मना चांडाल है—कैसे स्वीकारा जा सकता है! चांडाल द्वारा क्षत्रीय सम्राट की पत्नी को संरक्षण, उसकी संतति के पालन-पोषण को सच मान लिया जाए तो छुआछूत और जाति-व्यवस्था का आधार ही समाप्त हो जाता है. ऐसा न हो और जाति नामक संस्था बनी रहे, इसलिए अब्राह्मण को ब्राह्मण मानने तथा महापुरुषों, वे चाहे जिस जाति-वर्ग से हों, को वैदिक परंपरा का हिस्सा बनाने की कोशिश हमेशा से रही है. वैसे भी जिस व्यवस्था ने ब्राह्मणों को समाज में शीर्ष स्थान देकर रोज़गार की चिंताओं से मुक्त किया था, उन्हें अकूत मान-सम्मान प्राप्त था, वे उसे एकाएक बदलने वाले न थे. यह उनके वर्गीय आग्रह के अनुरूप था कि वाल्मीकि जन्म से चाहे जो भी हों, उनको ब्राह्मण ठहराया जाए. यही उन्होंने किया भी. उसमें सफल न होते तो कोशिश वाल्मीकि को भुला देने की जाती. जैसा उन्होंने बौद्ध पूर्व विचारकों अजित केशकंबली, मक्खली घोषाल, कौत्स आदि के साथ किया था. लेकिन रामायण की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि उसकी उपेक्षा सर्वथा असंभव थी. उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की थी कि जिस वाल्मीकि का ब्राह्मणीकरण किया गया है(!), कालांतर में हालात ऐसे बदलेंगे कि उसका संबंध पुन: दलितों और शूद्रों से जोड़ना पड़ेगा.

‘वाल्मीकि ब्राह्मण थे’—हाल ही में यह कहकर जिसने माहौल में गर्मी पैदा की है, सवा सौ वर्ष पहले उसी के किसी पुरखे ने लोगों को यह कहकर फुसलाया था कि ऊपर के माले सभी के लिए खुले हैं. कभी डाकू रत्नाकर भी वहां पहुंचा था.’ वह दौर एकदम अलग था. तब निचले माले वालों में हलचल मची हुई थी. सामाजिक विषमता से आहत, उत्पीड़ित जाति-समूह अस्मिता की खोज में दूसरे धर्मों की ओर उत्क्रमण पर उतारू थे. पंजाब के मेहतर ‘बालाशाह’ के उपासक थे. बालाशाह के पीर इमामदीन ने अपनी पुस्तक ‘दीद-हक’ में उसे वाल्मीकि का अवतार बताया था. ‘इमामदीन चूहड़ों के बीच अपना प्रभाव बनाकर उनका इस्लामीकरण करना चाहता था.’(ओमप्रकाश वाल्मीकि, सफाई देवता, पृ. 72). फलस्वरूप गांव-गांव में वाल्मीकि के थान बनने लगे. बालाशाह का कुछ समूहों पर प्रभाव था. आगे चलकर हिंदू मन और बालाशाह के प्रभाव से एक मिली-जुली परंपरा विकसित हुई. मेहतर बस्तियों में पूजा और नमाज साथ-साथ चलने लगीं. उत्पीड़न का शिकार रहीं निचली जातियां सिख और मुस्लिम धर्म की ओर निष्क्रमण करने लगीं. इससे ऊपर के माले वालों को चिंता बढ़ी थी कि निचले माले वाले यदि इसी प्रकार घर छोड़ते रहे तो कौन उनका मैला उठाएगा? कौन उनके लिए बेगार करेगा? कौन उनके लिए खेतों में पसीना बहाएगा? कौन उन्हें ‘अन्नदाता’, ‘हुजूर’, ‘मालिक’ और ‘कृपानिधान’ कहकर घड़ी-घड़ी गुहार लगाएगा? पारंपरिक हिंदुओं में उसे लेकर चिंता अवश्य थी, पर कोई स्थायी समाधान न था. उस समय भी बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का था, जिनकी आस्था हिंदू धर्म में शेष थी. ऐसे लोगों की 1901 में पंजाब के जालंधर में सभा हुई. उस समय तक आर्यसमाजी भी सक्रिय हो चुके थे. उन्होंने कहा—दूसरों के बहकावे में मत आओ. तुम हमारे हो. हमारे ही बने रहो. इसपर कुछ पढ़े-लिखे युवकों ने पूछा था—‘तुम्हारे धर्म में हमारी जगह कहां है?’ जवाब मिला—‘हमने वाल्मीकि को भी तो आदिकवि माना है.’ उनके लिए यह आपद्धर्म था. जिसे उन्होंने वैसे ही स्वीकारा था जैसे अकाल-पीडि़त विश्वामित्र द्वारा कुत्ते के मांस का भक्षण. यह देखते हुए कि उत्पीड़न के शिकार जाति-समूह इतने से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं. वाल्मीकि को यदि वे अपना मानते हैं तो उनके इस विश्वास को बनाए रखने को लिए अतिरिक्त रूप से कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा, उन्होंने वाल्मीकि के जीवन चरित को लेकर लिखना शुरू किया. उसके बाद आर्यसमाजी भाई परमानंद ने ‘वाल्मीकि मुनि का जीवनचरित्र(1925)’ की रचना की. उसके कुछ वर्ष पश्चात अमीचंद शर्मा ने ‘वाल्मीकि प्रकाश’(1928−1932) नामक पुस्तक लिखी. कामिल बुल्के ने भी वाल्मीकि के जीवन को शोधात्मक लेख लिखा. दूसरी भाषाओं में भी वाल्मीकि के चरित्र पर प्रकाश डालने वाली दर्जनों पुस्तकें रची गईं.

उन प्रयासों के फलस्वरूप धर्मांतरण की घटनाओं में कमी आई. मेहतर समुदाय के लोगों में वाल्मीकि को अपना पूर्वज, भगवान, आदि गुरु आदि तथा रामायण को पवित्र ग्रंथ माना जाने लगा. कुछ लोगों ने अपने नाम के साथ ‘वाल्मीकि’ लगाना आरंभ कर दिया था. घरों में रामायण के पाठ होने लगे थे. आर्यसमाजी होने के बावजूद भाई परमानंद और अमीचंद शर्मा द्वारा व्यापक हिंदू आस्था का विरोध संभव न था. मेहतर समाज के अधिकांश लोग वाल्मीकि को अपना पूर्वज मानते थे. जबकि भाई परमानंद ने तो स्पष्ट लिखा कि ’आदि वाल्मीकि’ और ‘चांडाल ‍’वाल्मीकि’ दोनों अलग-अलग थे. दूसरी ओर अमीचंद शर्मा ने अपनी पुस्तक में वाल्मीकि को मेहतरों का गुरु घोषित किया था. दोनों पुस्तकें लगभग साथ-साथ आई थीं. सहस्राब्दियों से उपेक्षा, अशिक्षा और घोर विपन्नता के शिकार तथा पहचान को तरसते लोग इस चालाकी को समझ ही नहीं पाए. उन्हें अपने लिए भारतीय इतिहास और संस्कृति दोनों में जरा-से कोने की तलाश थी. आर्यसमाज के प्रयासों से उनका उत्क्रमण थमने लगा था. वाल्मीकि जयंतियों में राम के साथ-साथ वाल्मीकि के साथ-साथ राम की तस्वीरें भी लगने लगीं. वाल्मीकियों को लगा कि उन्हें विराट हिंदू परंपरा का हिस्सा मान लिया गया है. परिणामस्वरूप जातीय उत्पीड़न के नए-पुराने घावों पर पपड़ी जमने लगी.

भारतीय लोक समाज में सुविधानुसार कहानियां गढ़ने की कला खूब फली-फली है. वाल्मीकि के जीवन को लेकर गढ़ी गई कहानियां भी किसी मिथकीय आख्यान से कम नहीं हैं. एक कथा कहती है की शिशु वाल्मीकि को एक निषाद स्त्री ने चींटियों की बांबी के निकट पाया था. एक किवंदती के अनुसार वे विधवा ब्राह्मणी की संतान थे, जो शिशु वाल्मीकि को चींटियों की बांबी के पास छोड़कर चली गई थी. शायद किसी अपवाद के भय से. अपवाद कैसा? यदि उसका गर्भ किसी गैर ब्राह्मण द्वारा निषेचित था तो ऐसी सन्तान को परंपरानुसार गैर ब्राह्मण ही माना जाएगा. बहरहाल चीटियों की बांबी के पास से मिलने के कारण उनका वाल्मीकि नाम पड़ा. उनके दो नाम बताए जाते हैं—अग्निशर्मा और रत्नाकर. बालक बड़ा हुआ तो डाकू रत्नाकर के रूप में ख्यात हुआ. किंवदंती के अनुसार एक दिन साधुओं का दल रत्नाकर से मिला. उससे रत्नाकर की आंखें खुलीं और वह आश्रम बनाकर साधना (अध्ययन-मनन) में जुट गया. कहानी के अनुसार साधुओं को लगता था कि डाकू रत्नाकर ‘राम-राम’ भी नहीं बोल पाएगा. सो उन्होंने उसे ‘मरा-मरा’ रटने की सलाह दी. ब्राह्मण कुल-दीपक ’राम-राम’ तक नहीं बोल पाए, यह तो कोई मान नहीं पाएगा. ये सारी घटनाएं वाल्मीकि के अब्राह्मण होने की ओर संकेत करती हैं. यह मान सकते हैं कि डाकू का जीवन जी लेने के बावजूद वाल्मीकि में पर्याप्त संवेदनशीलता थी. ‘मरा-मरा’ की युति को ’राम-राम’ में बदलते देख वाल्मीकि को शब्दों से खेलने की कला में दक्षता प्राप्त हुई थी. अयोध्या में चल रही सत्ता की रस्सा-कस्सी से वे अवश्य परिचित रहे होंगे, लेकिन रामाख्यान लिखने की प्रेरणा निष्कासित सीता को संरक्षण देने के बाद ही जगी होगी. इस द्रष्टि से कृति का शीर्षक ‘पुलत्स्य-वध’ रखे जाने का औचित्य भी समझ में आने लगता है.

शात्रों में वाल्मीकि का चरित्र जरूरत के हिसाब से गढ़ा गया है. चाहे वह डाकू रत्नाकर का मिथक हो; अथवा तप-करते-करते चींटियों की बांबी में बदल जाने का. उन्हें दिया गया गुरुमंत्र था, ‘मरा-मरा’ रटते रहना. वाल्मीकि को मूरख भी माना गया और भगवान भी. मूरख ऐसा कि यह सोचकर राम शब्द का उच्चारण भी वह ढंग से न कर सकेगा, इसलिए उसे ‘मरा-मरा’ शब्द रटने को कहा गया. और भगवान ऐसा कि बिना उपस्थि​त हुए युधिष्ठिर का यज्ञ भी अधूरा रह जाए. कवि-कलाकार जिस प्रकार की ठसक के लिए जाने जाते हैं, कुछ वैसी ही ठसक वाल्मीकि के भीतर भी रही होगी. वह दिखाती हैं कि रामाख्यान लिखने के बावजूद वे राम के प्रभामंडल से बंधे हुए नहीं थे. रामाख्यान रचने के बाद वे उसे लेकर स्वयं लेकर राम को सुनाने अयोध्या नहीं जाते. इस काम के लिए वे सीता के पुत्रों लव और कुश का चयन करते हैं. राम से उनका सामना तब होता है जबी वे सीता को वापस अयोध्या पहुँचाने जाते हैं. उस समय वे स्वयं को प्रचेता का दसवां बेटा ते बताते हैं. इस कथन को संकेतात्मक रूप से लेने की आवश्यकता है. प्रचेता के बारे में बताया जाता है कि वे बहुत उग्र स्वभाव के थे. स्वयं वाल्मीकि भी आरंभिक जीवन में उग्र स्वभाव के थे. संभव है अपने क्रोधित स्वभाव के बारे में उन्होंने सीधे कुछ न कहकर संकेत रूप में कुछ कहा हो. ध्यान यह भी रखना होगा कि उपलब्ध वाल्मीकि रामायण का पहला और सातवां अध्याय प्रक्षेपित माना जाता है. वाल्मीकि को चांडाल ॠषि दर्शाने वाली कहानी महाभारत में आई है. उसके अनुसार युधिष्ठिर ने यज्ञ किया. यज्ञ-स्थल पर एक शंख रखा गया. उसके बारे में कहा गया कि यज्ञ संपन्न होते ही वह स्वयं बज उठेगा. आखिर पंडितों ने यज्ञ पूरा होने की घोषणा की. लेकिन शंख नहीं बजा. इसपर युधिष्ठिर चिंतामग्न हो गए. एक उदासी ने यज्ञ मंडप को घेर लिया. तब कृष्ण ने रहस्योदघाटन किया—’यज्ञ संपूर्ण न होने का विशेष कारण है. यद्यपि सभी ​ऋषि इस यज्ञ में सम्मिलित हुए हैं, लेकिन वाल्मीकि नाम के चंडाल ऋषि को नहीं बुलाया गया.’ आखिर भूल सुधार होता है और वाल्मीकि को आमंत्रित किया जाता है.

खुद को वाल्मीकि लिखने वाले समुदाय महाभारत की इस कहानी के आधार पर स्वयं को उनसे जोड़ते हैं. लेकिन दूसरा वर्ग वाल्मीकि को अपने हाथ से जाने देने को तैयार नहीं हैं. निचली जातियों के लोग वाल्मीकि को अपना गुरु मान लें तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि वे वाल्मीकि को शूद्र मान लेते हैं तो उनके वौद्धिक दंभ का पानी उतरने लगता है. कारण स्पष्ट है. वाल्मीकि केवल रामायण के सर्जक नहीं हैं. वे राम संतति के पालक और सीता के संरक्षक भी हैं. राम जब सीता का निष्कासन करते हैं तो वह वाल्मीकि के आश्रम में शरण लेती है. यहां एक और पेच है जो वाल्मीकि के अब्राह्मण होने की ओर संकेत करता है. सवाल है कि निष्कासित सीता की देखभाल के लिए वाल्मीकि को ही क्यों चुना गया था. रास्ते में और भी आश्रम पड़े होंगे. क्या वह केवल संयोग था? कहीं ऐसा तो नहीं कि सामाजिक अपवाद के कारण राजा द्वारा निष्कासित सीता को शरण देने के लिए ब्राह्मण मुनि तैयार न हुए हों. इससे यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि वे आर्य परंपरा से बंधे हुए न थे. वे भूल जाते हैं कि ब्राह्मण पुत्र होकर भी वाल्मीकि इतने निर्बुद्धि क्यों थे, कि राम-राम रटने में भी अक्षम थे. दाता लोग शायद इससे भी डरते थे कि दलित की जुबान पर आकर राम-नाम भी अपवित्र हो जाएगा. आगे चलकर ‘मरा-मरा’ को गुरुमंत्र की तरह पाठ करने की सीख उन्होंने कबीर को भी दी थी. मगर औघड़ज्ञानी कबीर ने ‘मरा-मरा’ को ‘राम-राम’ बनाने वाली संस्कृति को खूब समझा. इसलिए असमानताकारी संस्कृति के ध्वज-धारकों को वे आजीवन दुत्कारते रहे.

महाभारतकार कृष्ण के मुख से कुछ भी कहलवाएं, हिंदुत्व के महारथी, वाल्मीकि को चांडालों का गुरु मानने से अधिक मोहलत देने को तैयार नहीं है. इसलिए भाई परमानंद को इस झूठे आकलन का सहारा लेना पड़ता है—’ऐसा मालूम होता है कि चांडालों में जो कोई ऋषिपद प्राप्त करता था तो उसे आदि वाल्मीकि मुनि के नाम पर वाल्मीकि की ही उपाधि दे दी जाती थी.’ (वाल्मीकि मुनि का जीवनचरित्र, भाई परमानंद, 1925). सवाल उठता है चांडालों में मुनीत्व प्राप्त करने वाले व्यक्ति को वाल्मीकि की उपाधि ही क्यों मिलती थी? क्या संबंध था दोनों का? वे स्वयं को वशिष्ट, भारद्वाज या मतंग ऋषि से भी जोड़ सकते थे! यदि वाल्मीकि से जोड़ते हैं तो दोनों का कुछ न कुछ अंत:संबंध तो है. यह संबंध भी बहुत पुराना है. बहरहाल, वाल्मीकि जन्मे चाहे जिस वर्ग में जन्मे हों, यह तथ्य निर्विवाद है कि उनका पालन-पोषण और विवाह अब्राह्मण परिवार में हुआ था. इतना भी स्पष्ट है कि प्रतिभाएं सभी वर्ग जातियों में होती थीं, लेकिन स्वतंत्र संस्कृति के अभाव में वे विराट वैदिक संस्कृति का हिस्सा बनकर अपनी पहचान खोती रही हैं. एक बात और. वाल्मीकि पर चर्चा करते समय बात केवल रामायण तक सीमित रह जाती है. जबकि वाल्मीकि के नाम से एक और पुस्तक योगवाशिष्ठ के नाम से भी मिलती है. योगवशिष्ट का पुराना नाम ’मोक्षोपाय’ है. ’मोक्षोपाय’ को तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी की कृति माना गया है. उसमें राम तथा वशिष्ठ के संवाद के माध्यम से उसमें अद्वैत वेदांत पर विशिष्ट विमर्श है. संभव है कि ‘मोक्षोपाय’ का लेखक वाल्मीकि ब्राह्मण कुल का सदस्य रहा हो. बाद में इतिहास दृष्टि के अभाव में आदि वाल्मीकि और मोक्षोपाय के लेखक वाल्मीकि को एक मान लिया गया हो.

‘वाल्मीकि’ ब्राह्मण थे या शूद्र, यह अंतहीन बहस है. हमने पहले भी कहा है की जिस तरह वाल्मीकि को शूद्र सिद्ध करना असंभव है वैसे ही उन्हें ब्राह्मण सिद्ध करना भी संभव नहीं है. इसके बावजूद यदि कोई उन्हें अपना पूर्वज मानता है तो माने. इस दृष्टि से पूजना चाहता है तो पूजे. उनकी जयंतियां मनाना चाहता है तो मनाए, यह उसका अधिकार है. इसे कोई छीन नहीं सकता. लेकिन अपनी खातिर, आने वाली पीढियों की खातिर, संस्कृति और शुभता की खातिर जान लें कि जो रामायण है, उससे उनका भला होने वाला नहीं है. रामायण अभिजन संस्कृति का आख्यान है. फिर भी, आदि वाल्मीकि के प्रति अपने अनुराग के कारण, यदि वे ‘रामायण’ के प्रति अनुरक्त हैं तो जरूरी है कि उसके शुद्धिकरण का आंदोलन भी अपने हाथ में लें. आदि वाल्मीकि की कृति ‘पौलत्स्यबध’ में केवल पांच अध्याय थे. राम को विष्णु का अवतार बताने वाले दो अध्याय और प्रक्षेपित कर ‘रामायण’ बना देने का काम तो बहुत बाद में हुआ. इसलिए जो लोग वाल्मीकि को अपना पूर्वज मानते हैं, उन्हें चाहिए कि वे उनकी असली कृति के पुनरुद्धार का संकल्प भी अपने हाथों में ले लें. उनके पूर्वज के नाम पर बाजार में जो कूड़ा-करकट खपाया जा रहा है, उसे साफ करें.

चलते-चलते एक सवाल और. क्या बगैर सांस्कृतिक आधार के कोई जाति आगे बढ़ सकती है? उत्तर है, नहीं. अकेले मनुष्य का काम तो संस्कृति के बिना चल सकता है, लेकिन मनुष्य यदि सामाजिक प्राणी है तो समाज से विलग होकर वह रह ही नहीं सकता. अब समाज है तो उसकी कोई न कोई संस्कृति होगी ही. इसलिए जो लोग समानता का सपना देखते हैं, उन्हें ऐसी संस्कृति की ओर बढ़ना होगा, जो समानता और स्वतंत्रता को समर्पित होकर उसे अपना ध्येय मानती हो. उसके लिए इस मुश्किल लक्ष्य की साधना आवश्यक है. कार्य कठिन भले ही दिखता हो, असंभव नहीं है. एक बार स्वतंत्र रूप से खोज की शुरुआत कीजिए. वेद, पुराण, उपनिषद, स्मृति, आरण्यक आदि में जो दर्ज है, उसका विखंडन करने के बाद जो बचे उसकी बहुजन संस्कृति के मापदंडों पर समीक्षा होने दीजिए. संभव है उस मलबे में आपको तत्काल कुछ न दिखाई पड़े. लेकिन वह प्रक्रिया ही समाज के नए और ऊर्जावान नायकों को जन्म देगी. अस्मिता-निर्माण की वास्तविक यात्रा वहीं से आरंभ होगी. जब तक यह नहीं होता तब तक नए-नए के. एस. नारायणाचार्य पैदा होते रहेंगे. वे पहले आपको दल-दल में ढकेलेंगे. फिर शिखर पर खड़े होकर तालियां बजाते हुए कहेंगे—’देखो-देखो, उन्होंने अपने लिए दलदल का चयन किया है.’ आपकी तसल्ली के लिए, ताकि इस संस्कृति से आपका मन उचाट न हो, वे आपकी विवशता को कभी त्याग तो कभी दान जैसे खूबसूरत विशेषणों से नवाजेंगे. आप समझ ही नहीं पाएंगे कि आपका ’कर्मयोग’ आपके लिए वरदान है कि त्रासदी—

‘‘मैं इस बात पर कतई विश्वास नहीं करता कि वे अपने पेशे से केवल जीविकोपार्जन की खातिर जुड़े हैं. यदि यह सच भी होता तो भी मैं यह हरगिज नहीं कि मान सकता कि वे इस पेशे को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनाए रह सकते थे….समय के किसी मोड़ पर उनके (वाल्मीकियों) किसी सदस्य को यह दिव्यानुभूति हुई होगी कि उनका यह कार्य ईश्वर और समस्त मानवता की खुशी के निमित्त है. इसलिए सफाई के इस कार्य को वे स्वेच्छापूर्वक आगे भी शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी करते रहेंगे. मेरे लिए यह विश्वास करना कठिन है कि उनके पूर्वजों के पास उस पेशे से छुटकारा पाकर दूसरा पेशा चुनने का कोई विकल्प ही नहीं था..’’1

संकेत स्पष्ट हैं, जिन्हें मैला उठने का काम दिव्य लगता है, दिव्यता का एहसास देता है, वे वाल्मीकि को भगवान समझ कर उनकी पूजा करते रह जाएंगे. लेकिन जिन्हें दिव्यता से अधिक मान-सम्मान प्रिय है, वे नए बोध, नए ज्ञान और नई संस्कृति की खोज में आगे बढ़ते जाएंगे.

© ओमप्रकाश कश्यप

  1. At some point of time, somebody must have got the enlightenment that it is their (Valmiks’) duty to work for the happiness of the entire society and the Gods; that they have to do this job bestowed upon them by Gods; and that this job of cleaning up should continue as an internal spiritual activity for centuries. This should have continued generation after generation. It is impossible to believe that their ancestors did not have the choice of adopting any other work or business.” Karmyog, unpublished book of Sh. Narendre Modi(2007), quoted form Christophe Jaffrelot’s book Religion, Caste, and Politics in India, page 405.

 

 

 

ज्ञान और ज्ञानार्जन की उलटबांसियां

ज्ञानार्जन की प्रक्रिया की समीक्षा के दौरान बड़े रोचक प्रसंग सामने आते हैं. उनसे पता चलता है कि ज्ञान के विकास की प्रक्रिया, मानवविकास की प्रक्रिया से भिन्न नहीं है. ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के दौरान सर्वप्रथम ज्ञान का कोई अंकुर किसी मनस्वी के मस्तिष्क में उभरता है. वह उसे अपनी विचारदृष्टि, उपलब्ध ज्ञान और अनुभवों के आधार पर तौलता है. धीरेधीरे उसे रूपाकार के साथ सामने लाता है. नए विचार की मौलिकता कुछ लोगों को लुभाती है तो कुछ को चमत्कृत भी करती है. विद्वतजन ज्ञान की उपलब्ध कसौटियों के आधार पर उसका मूल्यांकन करते हैं. उसी के समानांतर क्रम में या थोड़ाबहुत आगेपीछे कोई दूसरा स्वतंत्र ज्ञानांकुर फूटता है. वह भी अपने जन्मदाता, समर्थकों, प्रशंसकों एवं आलोचकों के बीच धीरेधीरे विस्तार लेता है. ज्ञानयात्रा इसी क्रम में निरंतर प्रवाहमान रहती है.

इस बीच कोई सृजनशील मनस्वी धरती पर जन्म लेता है. वह ज्ञान की विभिन्न धाराओं, लोकानुभवों, संस्कारों का उनकी उपयोगिता एवं लोकमान्यता के आधार पर आकलन करता है. समन्वयात्मक रुख अपनाते हुए उनके अंतःसंबंधों को टटोलता है. तदनंतर उन्हें अपनी विचारदृष्टि के अनुसार समकालीन मानवीय संवेगों, आवेगों, कथारूपकों, सांस्कृतिक प्रतीकों तथा सामाजिक संदर्भों के साथ कलात्मक कलेवर में नियोजित करता है. जरूरत पड़ने पर उपलब्ध ज्ञानांकुरों के साथ उनकी तुलना भी करता है. दूसरे शब्दों में यह नन्हे ज्ञानांकुरों के विशाल बरगद में बदलने, महाकाव्यों में ढल जाने की प्रक्रिया है, जिसमें ज्ञानांकुरों की लोकप्रिय शाखाएं, खंडप्रखंड अपनी खूबियों और खामियों के साथ एकजुट होते जाते हैं. एक तरह से वे अपने समाज के अनुभवों का निचोड़ होते हैं. इस तरह जन्मा महाकाव्य अपनी संस्कृति और सभ्यता का विशिष्ट दस्तावेज होता है. उसमें ऐेतिहासिक चरित्र न हों तब भी उसे सभ्यता के विकास का प्रामाणिक दस्तावेज मान लिया जाता है. फलस्वरूप उसके पात्रों तथा कथारूपकों को, भले ही वे पूरी तरह काल्पनिक हों, जीवन में जगह मिलती है. कई बार तो वे जीतेजागते, चलतेफिरते पात्रों से भी अधिक प्रामाणिक, भरोसेमंद और प्रेरणादायी मान लिए जाते हैं. ज्ञान का यह रूप मिथक कहलाता है. सामाजिक जीवन में मिथक कदमकदम पर मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं. उन लोगों को जीवनदृष्टि देता है जो किन्हीं कारणों से ज्ञान की जीवंत शैलियों से संवाद करना छोड़ देते हैं. अथवा किसी अन्य कारण से ज्ञान के समकालीन उपकरणों के साथ उनका संपर्क कम हो जाता है. हम इसे ‘ज्ञान का समाजीकरण’ अथवा ‘समाज का प्रबोधीकरण’ कुछ भी कह सकते हैं. दुनियाभर के सभी महाकाव्य, वेदोपनिषद, पुराण, ग्रंथमहाग्रंथ इसी प्रक्रिया के अंतर्गत जन्मे हैं. समाज की आर्थिकराजनीतिक या भौगोलिक प्रस्थिति चाहे जैसी हो, ज्ञान के अर्जन की यही शैली है. यह सभी संस्कृतियों में कमोबेश एक समान होती है. समाज द्वारा अपनाए जा रहे उत्पादकता के साधनों से इसका सीधा संबंध होता है. इसका मतलब यह नहीं है कि त्वरित उत्पादकता वाले समाजों में ज्ञानार्जन की गति भी तीव्र होती है. हां, उससे ज्ञान की प्रवृत्ति पर अवश्य अंतर पड़ता है. तीव्र उत्पादकता वाले समाजों में ज्ञान की ऐसी शैलियां जन्म लेने लगती हैं, जो तेजी से परिवर्तनशील समाजों को संतुष्ट कर सकें.

दूसरे शब्दों में समाज की अन्य गतिविधियों की भांति ज्ञान की यात्रा तथा उसका मूल्यांकन दोनों समयसापेक्ष होते है. ज्ञान का स्तर मनुष्य तथा उसके समाज के विवेकीकरण की अवस्था को दर्शाता है. अपनी मौलिकता के संदर्भ में ज्ञान सदैव उर्ध्वगामी होता है. मगर मूल्यांकन के बाद भी यह विशेषता बनी रहे, आवश्यक नहीं है. आलोचना, समीक्षा, पुनःप्रस्तुतीकरण अथवा तुलनात्मक आधार पर कोई ज्ञान उर्ध्वगामी है या अधोगामीयह परिस्थितियों तथा आकलनकर्ता की दृष्टि से तय होता है. ज्ञान की कसौटियां परिवर्तनशील हो सकती हैं. वे व्यक्तिसापेक्ष, समूह सापेक्ष और समय सापेक्ष कुछ भी हो सकती हैं. ज्ञान की यात्रा अधोगामी है या पुरोगामी, इसका पता दूसरी ज्ञानशैलियों के सापेक्ष विचार की स्वीकार्यता से भी देखा जाता है. इससे निरपेक्ष, ज्ञान की नई कसौटियों के बनने और उनके आधार पर उपलब्ध ज्ञानविज्ञान की शाखाओं को परखने का सिलसिला भी लगातार चलता रहता है. कई बार चेतना के उभरते स्वर एक क्रांतिकारी विचार को जन्म देते हैं. वह विचार अपने समय और समाज को झकझोरने का काम करता है. फलस्वरूप पुराने विचार अप्रासंगिक हो जाते हैं. लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक अवधारणाएं खंडखंड बिखरने लगती हैं. एक मोड़ ऐसा भी आता है जब वह उन लोगों को भी आकर्षित करने लगता है, जिनसे जूझते हुए या मुक्तिकामना के साथ उस विचार अथवा ज्ञानांकुर का जन्म हुआ था.

उदाहरण के लिए मध्य युग में उभरे भक्ति आंदोलन को ले सकते हैं. सर्वज्ञात तथ्य है कि भक्ति आंदोलन का उदय मध्यकालीन भारत में व्यक्ति पूजा, बलि, कर्मकांड, पोंगापंथी और सामाजिक असमानता के विरोध में हुआ था. वर्णक्रम में सबसे निचली जातियों ने, जिन्हें धर्मग्रंथों को पढ़ने की मनाही थी, धर्मालयों में जिनका प्रवेश वर्जित था—पहली बार वर्णाश्रम व्यवस्था को चुनौती दी थी. मूर्ति पूजकों, धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव करने वालों को ललकारा था—‘वे तुम्हें धर्मालयों में जाने से रोकते हैं. तुम उन पत्थर के ठिकानों की ओर झांकों भी मत’….‘पत्थर पूजने से यदि ईश्वर मिलता है तो मैं पहाड़ पूजने को तैयार हूं. दिनरात पत्थर के आगे सिर झुकाने से अच्छा है चक्की को पूज लिया जाए, जो पूरे परिवार के भरणपोषण में सहायक है.’….‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’….जैसे चकमक पत्थर में आग छिपी होती है, ऐसे ही तेरा परमात्मा तेरे भीतर है.’—जैसे शब्दों से संत कवियों ने निरर्थक कर्मकांडों और मूर्तिपूजा का बहिष्कार किया. उसका भरपूर असर पड़ा. संतकवि जनजन के दिलों पर राज करने लगे. निराकार भक्तिआंदोलन ने जातिव्यवस्था पर गहरी चोट की. लेकिन विचार के प्रतिविचार को जन्म लेते देर नहीं लगती. जब कोई नया विचार जन्म लेता है, मानस में प्रतिविचार का तुरंत एक और अंकुर फूट पड़ता है. वह पहले का पूरक अथवा विरोधीय या कभीकभी पूरक और विरोधी दोनों होता है.

भक्ति आंदोलन जैसेजैसे लोकप्रियता के शिखर को छू रहा था, उसकी ओर वे लोग भी आकर्षित हो रहे थे, जो वर्णव्यवस्था की शीर्षस्थ श्रेणियों से आए थे. वे वर्णव्यवस्था के पूरी तरह समर्थक न भी हों, मगर उसके संस्कारों से पूरी तरह अनुप्रेत थे. अपने साथ वे अपने वर्गीय संस्कार भी लाए थे. इससे भक्ति आंदोलन में वे सभी कुरीतियां शामिल होने लगीं, जिनकी राख पर उसकी आरंभिक इमारत का निर्माण हुआ था. उनके बीच का अंतर साफ पढ़ा जा सकता है. कबीर मूर्ति पूजा का खंडन करते हैं. जन्म के आधार पर जाति के भेदभाव पर प्रहार करते हैं. सांप्रदायिकता को ललकारते हैं. जबकि भक्ति परंपरा के अगले कवि वर्णाश्रम व्यवस्था को आदर्श बताते हैं. उसमें व्यक्ति की जाति और संस्कार कितने महत्त्वपूर्ण हैं, इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है. कबीर, रैदास और तुलसी तीनों का संबंध धर्म और संस्कृति के शहर बनारस से था. धर्म पर केंद्रीभूत संस्कृति आदमीआदमी में फर्क करती है. वह ‘जपमायाछापातिलक’ को ही सब कुछ माने रहती है. वर्णाश्रम व्यवस्था के सताए संत कवि कबीर, रैदास, दादू बारबार नकली संस्कृति का लबादा उतार फैंकने को कहते हैं. मगर वर्णाश्रम व्यवस्था के शीर्ष से आए भक्त तुलसी के लिए वह आदर्श व्यवस्था है. इसलिए वे शूद्र को ढोल, गंवार और पशु की श्रेणी में रखकर ताड़ते रहने पर जोर देते हैं. रामचरितमानस में ऐसी अनेक चौपाइयां हैं, जो श्रम पर जीवन जीने वाली जातियों का उपहास करती हैं. उस व्यक्ति द्वारा जो दूसरों के श्रम पर जीवन जीता हो, उसके द्वारा अपने परिश्रम पर जीने वाली जातियों का मखौल उड़ान न केवल तुलसी की संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि वह इस संस्कृति के संकट की ओर भी संकेत करता है. तुलसी के लिए ‘रामराज्य’ इसलिए आदर्श है, क्योंकि वहां सभी वर्णाश्रम के अनुसार अनुशासित हैं—‘बरनाश्रम निजनिज धरम निरत वेद पथ लोग.’ जबकि रैदास आचरण की शुद्धता को महत्त्व देते हैं. उनकी आदर्श राज्य की परिकल्पना ‘बेगमपुरा’ के सच होने में है. जहां सभी बराबर हैं. किसी को किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं है.

स्पष्ट है कि ज्ञान की विभिन्न धाराओं का मूल्यांकन मनुष्य अपनी जरूरत के आधार पर करता है. कबीर के साहित्य और तुलसी के साहित्य में वही अंतर है जो एक ‘संत’ और ‘भक्त’ के बीच होता है. ‘संत’ सभी को समदृष्टि से देखता है. उनकी निगाह में न कोई छोटा होता है न बड़ा. संतई वह लोककल्याण के लिए धारण करता है, न कि स्वार्थ साधना के लिए—जिसे प्रायः ‘मुक्ति’ अथवा ‘आत्मकल्याण’ जैसे सम्मोहनकारी संबोधन दे दिए जाते हैं. भक्त कवि लोक को माया समझता है इसलिए दुनियावी सरोकारों से खुद को अलग रखता है. उसकी निगाह में ईश्वरीय न्याय ही सबकुछ होता है. संत कवियों की कविता सवाल उठाती है, भक्त कवियों की कविता परंपरा और आराध्य के महिमामंडन से परे नहीं झांक पाती. उसमें समता का भाव गायब रहता है. जीवन की सामान्य समस्याओं को भक्त कवि भवबाधा के रूप में देखता है, संत कवि के लिए वह मनुष्यता की चुनौती होती है. मनुष्यता के समर्थन में संत कवि बड़े से बड़े बादशाह को भी खरीखोटी सुना सकते है. दास तुलसी के लिए दैन्य से मुक्ति असंभव है. लोकतांत्रिक युग में भक्ति काव्य का कोई सामाजिक मूल्य नहीं है. इसलिए वर्णाश्रम समर्थक विद्वान संतकाव्य और भक्तिकाव्य का अंतर समझाने से बचते हैं. लोग सवाल न उठाएं इसलिए वे दोनों को परस्पर गड्डमड्ड कर देते हैं.

ज्ञान की खूबी है कि उसका अस्तित्व होता है, आकार नहीं होता. ज्ञान को रूपाकार देने का काम ज्ञानीजन करते आए हैं. चूंकि बड़े से बड़े ज्ञानीजन की सीमा होती है. व्यक्ति विराट ज्ञानसंपदा के किसी एक अंश को ही सहेज पाता है. उसी के आधार पर वह सामाजिक घटनाओं और व्यक्तित्वों का मूल्यांकन करता है. यह एक कौड़ी द्वारा धरती को मापने जैसा सत्साहस है. अपने विवेकीकरण की कसौटी को पुख्ता करने के लिए व्यक्ति अपने विषयक्षेत्र की सीमा में इस काम को खुशीखुशी करता है. सदेच्छाओं के बावजूद उसके काम में कहीं न कहीं त्रुटि रह ही जाती है. आम तौर पर युद्ध लोगों के जीवन को प्रभावित करने का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है. लेकिन जो लोग ऐसा मानते हैं, वे गलत हैं. असली प्रभावक ज्ञान होता है. अतः ज्ञान को नियंत्रित करने, उसे अपने अनुकूल ढालने, उससे मनचाहा काम लेने की कोशिश आदिकाल से होती रही है. इतिहास पूर्वाग्रह रहित नहीं होता, इसलिए समाजचेता विद्वान ऐतिहासिक तथ्यों को अधूरा, एकांगी और मनगढ़ंत मानते हैं.

ऋग्वेद को प्रथम वेद माना गया है. मनुष्यता का पहला ज्ञानांकुर. यह मानते हुए कि शूद्र उसके अर्थ का अनर्थ कर सकता है, वेदपाठी ब्राह्मणों ने शूद्र और स्त्री के वेदाध्ययन पर पाबंदी लगाई थी. यदि कोई शूद्र वेद पढ़ ले तो उसके कान में पिघला सीसा डालने जैसे दंड का प्रावधान था. सामवेद की रचना इसलिए की गई कि वैदिक ऋचाओं के सटीक गायन का प्रशिक्षण देकर उनके पाठ की शुद्धता को कायम रख सकें. मूल्य की दृष्टि से वेदानुयायियों के लिए वेद उसी सीमा तक पवित्र और वरेण्य थे, जब तक उनके वर्गीय हितों को कोई आंच न पहुंचती हो. वर्गीय हितों को ठेस की संभावनामात्र पर वे शास्त्रों की व्याख्याएं बदलते रहे हैं. उदाहरण ऋग्वेद से ही खोजे जा सकते हैं. वेदपाठी ब्राह्मण ऋग्वेद के पुरुषसूक्त को तो ज्यों का त्यों बनाए रखते हैं. वर्णाश्रम के समर्थन में अपने तर्कों को वहां तक खींच ले जाते हैं. लेकिन ऋग्वेद की दूसरी शिक्षाएं जिनकी सामाजिक उपयोगिता है, की वे मनमानी व्याख्या करते हैं. ऋग्वेद में जुआ को कुरीति माना गया है. दसवें मंडल में जुआरी का एक प्रसंग आया है जो महाभारत में युधिष्ठिर द्वारा द्रोपदी को दांव में हार जाने से एकदम मिलताजुलता है. अंतर बस इतना है कि ऋग्वेद का जुआरी गरीब है. जबकि युधिष्ठिर सम्राट. ऋग्वेद का जुआरी दिनरात जुआखाने में पड़ा रहता है. पासे को देख उसकी बांछें खिल जाती हैं. उसको गिरते देख वह मद्मत्त हो उठता है. जुआरी की पत्नी अपने पति से बेहद प्यार करती है. यहां तक कि जुए में सबकुछ हार जाने पर भी उसका बहिष्कार नहीं करती. जुआरी की सास भी उसपर दया करती है. जुए की लत से बरबाद हो चुका जुआरी कर्ज लेकर भी जुआ खेलता है. फिर एक दिन सब कुछ गंवा देता है. यहां तक कि अपनी पत्नी को भी. तब उद्गाता ऋषि जुआरी को समझाता है—

जुआ मत खेल. मत खेल जुआ. अपने खेतों को जोत. प्राप्त धन से संतोष कर. उसे अपना मानते हुए परिश्रम कर. ये तेरी गौए हैं. वह तेरी जाया है. सबके साथ रहते हुए अपने सुख और कमाई को बढ़ा.’ (ऋग्वेद—10/34/13).

वेद का जुआरी गरीब है. अपनी मेहनत का खाता है. उसके लिए जुआ खेलना बरबादी का सबब है. मगर राजाओं और सामंतों के लिए जिनके पास अकूत धन संपदा है, और ज्यादा बटोरने के लिए पर्याप्त सैन्यबल है. राजकोष है जिसे भरने के लिए प्रजा रातदिन पसीना बहाती है, उनके लिए जुआ बरबादी नहीं, शान का प्रतीक है. युधिष्ठिर अपनी राजसी आन को बचाने की खातिर जुआ खेलता है. वेदविरुद्ध कार्य करने के बावजूद उससे युधिष्ठिर का धर्मराजपन खंडित नहीं होता. मरणोपरांत यदि उसे कुछ पल के लिए नर्क में जाना पड़ता है तो इसलिए कि उसने अश्वत्थामा के मरने की झूठी सूचना द्रोणाचार्य को देने की कोशिश की थी, जुए में अपनी पत्नी को दांव पर लगा देने के लिए नहीं, जो न केवल उसकी, बल्कि पांचों पांडवों की संयुक्त भार्या थी. साफ है कि जो शक्तिशाली है, सामर्थ्यवान है वह ज्ञान की स्वार्थानुकूल व्याख्या के लिए बुद्धिजीवियों को खरीद लेता है. प्रायः बुद्धिजीवी ही उसकी ओर स्वयं खिंचे चले आते हैं. वे उसके लिए उपलब्ध ज्ञानधाराओं की मनमानी व्याख्या करते हैं. दूसरे शब्दों में अभौतिक होने के बावजूद ज्ञान जिसके पास जाता है, उसकी भावनाओं, विवेक और स्वार्थ के अनुसार आचरण करने लगता है.

ज्ञान के ऐसे दुरुपयोग ‘महाभारत’ को न्योता देते हैं. आधुनिक भाषा में मार्क्स ने इसे द्वंद्ववाद कहा है. ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं होता. लेकिन जब मान लिया जाए कि फलां व्यक्ति या समूह का ज्ञान पर एकाधिकार है, तब उसके मनमाने उपयोग की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए व्यक्ति और समाज दोनों का दायित्व है कि वह ज्ञान के एकाधिकार की भ्रांति से बाहर आए. ध्यान रखें कि विचार की स्थिति दोमुंहे सांप जैसी होती है. वह दोनों और गति कर सकता है. सपोंलों की तरह हर विचार, दूसरे विचार को खाने की कोशिश करता है. जन्म लेते ही नवज्ञानांकुर पर दूसरे ज्ञानांकुर हमला कर देते हैं. प्रकट में यह लड़ाई बहुत मारक दिखती है. असल में होती पूरी तरह अहिंसक है. विचारों के बीच दिखावटी प्रतिद्विंद्वता भले हो, उस लड़ाई में न तो कोई विचार मिटता है, न ही घायल होकर हमेशा के लिए प्रतियोगिता से बाहर चला जाता है. अस्तित्व की इस स्पर्धा में कुछ विचार दब अवश्य जाते हैं. लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में वे पुनः केंद्रीय भूमिका के लिए सक्रियता के धरातल पर लौट आते हैं. विचार के समर्थक इतने उदार नहीं होते. उत्तेजना में वे अकसर बेकाबू हो जाते हैं.

इन स्थितियों से बचने के लिए ज्ञान और ज्ञानी दोनों का निष्प्रह होना आवश्यक है. मनुष्य की विशेषता है कि वह नए की ओर आकर्षित होता है, उसको आत्मसात करने की कोशिश करता है. यह स्वागतयोग्य है. लेकिन ज्ञानी और ज्ञानसाधक दोनों को समझना चाहिए कि समाज उनसे कहीं ज्यादा ज्ञानी है. उनकी बौद्धिकता की इमारत में कुल ज्ञानसंपदा समाज की खर्च हुई है. व्यक्ति तो केवल समाज में अर्जित ज्ञानसंपदा को रूपाकार देता है. उसे अपनी दृष्टि के अनुसार ढालता है. मनुष्यता की संपूर्ण ज्ञानसंपदा के आगे उसका ज्ञान विराट बरगद के एक पत्ते जितना है. वैसे भी समाज का ज्ञानी होना, व्यक्ति के ज्ञानी होने से अधिक महत्त्वपूर्ण है. विडंबना है कि हमारे पास ऐसा कोई कारगार रास्ता नहीं है, जिससे समाज को ज्ञानी बनाया जा सके. इसलिए हम व्यक्तियों के प्रबोधीकरण के जरिये समाज के प्रबोधीकरण का सपना देखते हैं. यह रास्ता आसान है. लेकिन इसमें व्यक्ति खुद को दूसरों से अलग और बड़ा समझने लगता है. शीर्षत्व का गुमान अहंकार पैदा करता है और अहंकार से अकेलेपन और असुरक्षाबोध की वृद्धि होती है. नतीजन सामूहिकता के बीच उसका आचरण भीड़ या भेड़चाल जैसा हो जाता है.

जो वास्तव में मनस्वी होते हैं, वे इस सच से वाकिफ होते हैं. वे जानते हैं कि अपरिमेय ज्ञान की अंतहीन यात्रा में कुछ भी सर्वथा अंतिम और प्रामाणिक नहीं है. इसलिए वे बारबार दोहराते हैं कि उनके कहे को अंतिम मानने से बचो. वे जो कह रहे हैं उसे अपने तर्कों और विवेक की कसौटी पर जांचोपरखो. यही बुद्ध ने भी कहा था, यही गांधी ने भी कहा. प्रकृति भी समझाती है कि किसी अकेले वृक्ष से धरती की शोभा नहीं बनती. पृथ्वी का सौंदर्य सर्वत्र हरियाली में है. यदि छोटेछोटे तिनकों से बनी घास का सौंदर्य भी इसलिए अनुपम होता है कि वहां सभी तृण बराबर होते हैं. सभी सहअस्तित्व की भावना का सम्मान करते हैं. ताड़ का वृक्ष तब तक शोभा नहीं बनता जब तक उसका साथ देने के लिए कुछ और ताड़ वृक्ष न हों. योग्य नागरिक योग्य समाज का उत्पाद होता है. तदनुसार आवश्यक है कि समाज प्रबुद्ध हो. लेकिन ज्ञान की उलटबांसी है कि जब हम व्यक्ति के प्रबोधीकरण पर जोर देते हैं, तो समाज में असमानता पनपने लगती है; और संपूर्ण समाज के प्रबोधीकरण का सीधासरलसर्वस्वीकार्य रास्ता हमारे पास है नहीं.

© ओमप्रकाश कश्यप