जीन-जैकुइस रूसो

यदि हम आधुनिक समाज की किसी एक विशेषता के बारे में सवाल करें, तो लोग सामान्यतः लोकतंत्र अथवा मानवाधिकार का नाम लेंगे. हां, कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो भावुकतावश धर्म या फिर संस्कृति को यह सम्मान देना चाहेंगे. यह उनकी व्यक्तिगत आस्था या फिर जानकारी हो सकती है. मगर यह तो वे भी मानेंगे ही कि धर्म एक तो आधुनिक अवधारणा नहीं है, दूसरे दुनिया के प्रायः सभी धर्मों का अतीत इतना भ्रामक, अंतर्विरोधी, अनिश्चित, रूढ़िवादी और खूनखराबे वाला रहा है कि उनमें मानवाधिकार के नाम पर सिवाय सुबहशाम की आरतीनमाज अथवा कुछ तयशुदा कर्मकांडोंदानदक्षिणा आदि के, शायद ही कुछ और उल्लेखनीय, स्मरणीय जान पड़े. इसके बावजूद उनके अनुयायियों में अपनेअपने धर्म के प्रति लगभग अंधआस्था जैसी होती है, और उनकी अपेक्षा भी होती है कि उनकी मान्यताओं को संदेह से परे रखकर परखा जाना चाहिए. निहित स्वार्थों के कारण धर्म के प्रचारप्रसार में लगे धर्माचार्य, पंडितमौलवीपादरी आदि इस अंधऋद्धा को निरंतर पोषित करते रहते हैं. इस कारण उनके निष्कर्षों में वस्तुनिष्ठता नहीं आ पाती. न वे तर्क की कसौटी पर खरे उतर पाते हैं.

धर्म के प्रशंसक सामान्यत: यह दावा करते हैं कि धर्म की समाज में मौजूदगी उसमें नैतिकता के स्तर को बनाए रखने के लिए जरूरी है, वे यह डर भी दिखाते हैं कि धर्मरहित होते ही समाज में नैतिकता का स्तर जमीन छूने लगेगा, इतना कि उसके वर्तमान ढांचे को बनाए रखना असंभव होगा. लेकिन यह भी उनके सोचेसमझे षडयंत्र का नमूना है. बात इसके पूरी तरह उलट है. नैतिकता अपने आप में संपूर्ण है, उसकी अपनी स्वतंत्र सत्ता है. जिसे हम सामान्यतः मनुष्यता के नाम से जानते हैं, वह दरअसल नैतिकता का ही पर्याय है. यही कारण है कि विभिन्न धर्मों की अध्यात्मसंबंधी मान्यताएं अलगअलग होने के बावजूद उनकी सामाजिक आचारसंहिता में एकरूपता होती है, जो नैतिकता की लोकमान्य अवधारणाओं से विनिर्मित होती है.

धर्म की उत्पत्ति मनुष्य की पारलौकिक जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए की गई थी. उसी कार्य को धर्म अर्से से, बल्कि आज भी करता आ रहो है. इस बीच में धर्म से संबंधित मान्यताएं और रीतिरिवाज भी बदले हैं. मगर उनके परंपरागत स्वरूप में अभी तक कोई खास परिवर्तन नहीं हो पाया है. हालांकि इस बीच मनुष्य ने ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियों के नएनए कीर्तिमान गढ़े हैं. धर्म ने ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में हुए आविष्कारों का लाभ तो उठाया, किंतु अपने कर्मकांडों को पुख्ता करने और गाहेबगाहे उन्हें विज्ञानसम्मत दिखाने के लिए. हालांकि ऐसा करने से धर्म की अपनी कमजोरियां ही जाहिर होती थीं. यह बात अलग है कि वैज्ञानिक उपकरणों और सिद्धांतों के सहारा लेकर धर्म ने जनसाधारण को लुभाने में कामयाबी हासिल की थी. लेकिन उनके उपयोग से अपना परिष्कार कर पाने में असमर्थ रहा है. यही धर्म की सीमा है, जो दोनों के मूल स्वभाव से प्रेरित है.

धर्म और विज्ञान में फर्क भी यही है कि विज्ञान जहां संदेह को ही सबकुछ मानकर चलता है. वैज्ञानिक तर्कसम्मत एवं पुष्ट होने तक अपनी प्रत्येक परिकल्पना को संदेह की दृष्टि से देखता है और परिकल्पना के नियम बनने तक उसपर परीक्षणअन्वेषण का सतत प्रयोग करता रहता है. नियम बन जाने के बाद भी वैज्ञानिक अपनी खोज को लेकर पूर्णतः संतुष्ट नहीं हो जाता, बल्कि उसकी नजर उन स्थितियों पर लगी रहती है, जिनमें उस नियम या सिद्धांत की असफलता सिद्ध होती हो. निश्चय ही इसके पीछे सत्य तक पहुंचने की लालसा ही होती है. सत्य की खोज तथा उस तक पहुंचने के लिए धर्म भी प्रयासरत रहता है, किंतु वह अपनी शुरुआत ही विश्वास से करता है. वह यह मानकर चलता है कि परमसत्य उसके परिचय और पहुंच के दायरे में जिसके लिए धर्माचरण का पालन करना अत्यावश्यक है. संदेह की कम से कम गुंजाइश होने के कारण धार्मिक मामलों में नएपन के लिए अवसर कम से कम होते हैं.

धर्म मानव समाज की विवेकशीलता की प्रारंभिक पहचान है. सभ्यता की और शनैशनै बढ़ते प्राचीन मानव ने प्रारंभ में अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए ही धार्मिक प्रतीकों की कल्पना की होगी. धर्म की इसी ताकत एवं पहुंच का लाभ उठाने के लिए दुनिया के मनीषियों ने उसको समाजसंस्कृति, नैतिकता की परंपरा एवं लोकाचार से जोड़ा; जिससे अर्से तक सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी धर्म के कंधों पर बनी रही. कतिपय अर्थों में वह आज भी है. धर्म की व्यापकता और सर्वमान्यता ने इसे और भी आक्रामक एवं ताकतवर बनाया; जिससे वह मनुष्य के जीवन में ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ करता चला गया. दूसरी ओर उसका तेजी से सांस्थानिकीकरण हुआ है. धर्म और राजनीति अथवा पूंजी और धर्म के गठजोड़ के परिणाम आज हम देख ही रहे हैं. हम कह सकते हैं कि इसी के साथ धर्म में वैचारिक जड़त्व की शुरुआत हुई है, जिसने भारतीय मानस को इतने जोर से पकड़ा हुआ है कि भारतीय समाज के संदर्भ में धर्म का वास्तविक अर्थ लगभग भुला ही दिया गया है.

सांस्थानिकृत होने के बाद से ही धर्म का विधायी स्वरूप अपना प्रभाव खोता चला गया. उसके स्थान पर अज्ञान, रूढ़िवादिता, अवैज्ञानिकता और गुरुडम जैसी कुरूतियां स्थान पाती चली गईं. दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला धर्म खुद नैतिकता से परे छिटकता चला गया. इसलिए सामाजिक परिवर्तन की चाहत रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने धर्म और धार्मिक जड़ता का जमकर विरोध किया. यह भी सच है कि उसको पहली चुनौती स्वार्थी धार्मिक संस्थाओं की ओर से ही मिली. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि लंबे समय से धर्म की जनमानस पर गहरी पकड़ ने इसे ताकतवर एवं उपयोगी बनाया है, लेकिन वह वर्ग जिसको धर्म के कर्मकांड के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, इसमें हुए परिवर्तनों को अपने हितों पर हमले के रूप में देखता है, इसीलिए किसी भी प्रकार के परिवर्तनों का निषेध करता है. यही कारण है कि आमूल परिवर्तन के करीबकरीब हर समर्थक को धार्मिक संस्थाओं, व्यक्तियों के विरोध से भी गुजरना पड़ा है.

दुनिया के प्रायः सभी धर्म इन अंतर्विरोधों के शिकार हैं. प्रकट में वे यही ऐलान करते हैं कि उनकी भांति दूसरों को भी परमसत्य की पहचान है. इसीलिए वे एक हैं, एक जैसी नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, उनमें आपसी मतभेद जरा भी नहीं हैं; किंतु सचाई इसके ठीक उलट है. यथार्थ में वहां सिवाय आत्मव्यामोह एवं मतभेद के कुछ भी नहीं है. विशिष्टता के नाम पर वे अपने दायरे को निरंतर संकीर्ण बनाते चले जाते हैं. वहां वैचारिकता कम, अंधानुसरण ज्यादा होता है. इससे ज्ञान की परंपरा के अवरुद्ध होने या अपने लक्ष्य से भटक जाने का खतरा सदैव बना रहता है, जो समय के साथसाथ निरंतर बढ़ता ही जाता है. धर्म की इन्हीं कमजोरियों के कारण आधुनिक समाज की विशेषताओं में उसका स्थान कहीं नजर नहीं आता. हालांकि वह समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले कारकों में से एक है. अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए धर्म स्वयं को नैतिकता के वाहक के रूप में दर्शाने की कोशिश करता रहा है. धार्मिकों द्वारा दर्शन और नीतिशास्त्र को मिलाकर सिद्धांत गढ़े गए. आज भी नीतिशास्त्र को दर्शनशास्त्र के साथ एक विषय के रूप में पढ़ाए जाने का रिवाज है. मेरी दृष्टि में नीतिशास्त्र का जितना संबंध मानवव्यवहारशास्त्र से है, उतना धर्म से नहीं है. खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए नैतिकता का सहारा लेना धर्म की विवशता भी है. परंपरा भी धर्म और नीति को एक ही विषय के धर्म की इसी जकड़बंदी से प्रभावित होकर रूसो को यह कहना पड़ा था किः

मनुष्य आजाद जन्मा हैफिर भी वह हर कहीं शृंखलाओं में कैद है. हरेक मनुष्य स्वयं को दूसरों का मालिक/मास्टर मानता है. जबकि वह गुलामी के पहले से घने दलदल में फंसता जा रहा है.’

जीन जैकुइस रूसो (Jean-Jacques Rousseau) का जन्म 28 जून 1712 को जिनेवा में हुआ था. इसे विडंबना कहें कि संघर्ष की शुरुआत, प्रसव के समय आए बुखार के कारण उसकी मां सुजान बनार्ड रूसो का निधन हो गया. शिशु रूसो उस समय केवल नौ दिन का था. पिता इसाक मामूली घड़ीसाज था. ऊपर से पत्नी की मृत्यु ने उसे गहरी हताशा में डुबो दिया था. उन्हीं दिनों की बात है कि रूसो के पिता का एक फ्रांसिसी कप्तान से झगड़ा हो गया. इससे वह घबरा गया. गिरफ्तारी के भय से उसने हमेशा के लिए जिनेवा छोड़ दिया. मां थी नहीं, पिता भगोड़ा बना गया. ऐसे में बालक रूसो का पालनपोषण किया उसकी मामा और मामी ने. लेकिन मामी निष्ठुरमना स्त्री थी. वह बालक रूसो को हर समय प्रताड़ित करती रहती. बचपन के इन आघातों का रूसो पर गहरा असर पड़ा. मातापिता के प्यार से वंचित रूसो नीरस और उदंड बन गया. सूखा, नीरस, बातबात पर झगड़ पड़ना उसकी आदत, अस्थिरता उसके स्वभाव का हिस्सा बन गई. सामाजिकता के साथ सामंजस्य वह आगे भी कभी नहीं बैठा सका.

विलक्षण प्रतिभा के लक्षण रूसो में बचपन से ही दिखने लगे थे. प्रारंभिक शिक्षा के दौरान उसने कल्विन तथा प्लूटार्क का अध्ययन किया था. सोलह वर्ष की अवस्था में उसने जिनेवा छोड़ दिया और रोजगार एवं जीवन में स्थायित्व की खोज के लिए यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा पर निकल पड़ा. जीविका के लिए उसने कई काम किए. संगीत में उसकी रुचि थी. इसलिए उसने संगीत सीखने का काम भी प्रारंभ कर दिया. फ्रांस पहुंचकर रूसो के जीवन में कुछ ठहराव आया. इसी बीच वह एक धनी स्त्री के संपर्क में आया, जिसका नाम था—फ्रांसकोइस लुइस दि वार्न (Louise de Warens). वार्न आयु में रूसो से बारह वर्ष बड़ी थी. बावजूद इसके दोनों परस्पर प्यार के बंधन में बंध गए. उसके संपर्क में आने के पश्चात रूसो की आस्था परंपरागत धर्म के प्रति बढ़ी और वह स्वयं को कैथोलिक मानने लगा. 1725 में उसने जीविकोपार्जन के लिए लकड़ी पर नक्काशी करने का कार्य शुरू किया, जिसे वह लंबे समय तक न साथ सका. उसके जिनेवा छोड़ते ही सारे कार्य छूटते चले गए. जीवन का भटकाव उसे अनुभव की दृष्टि से समृद्ध बना रहा था. इसी अनुभव ने उसको जीवन को समझने की मौलिक दृष्टि दी. इसके तीन ही वर्ष के पश्चात अनेक देशों की यात्राएं उसने कीं.

सन 1741 रूसो के जीवन का महत्त्वपूर्ण वर्ष सिद्ध हुआ; जब वह पेरिस की यात्रा पर निकला. उन दिनों फ्रांस में बौद्धिक नवजागरण की हवा बह रही थी. अनेक जानेमाने दार्शनिक पेरिस में रह रहे थे, जिनके तर्कों से नए विचारों एवं ज्ञान की की आंधीसी आई हुई थी. पेरिस में रूसो वाल्तेयर, देकार्ते आदि अपने जमाने के प्रतिष्ठित दार्शनिकों से मिला. लेकिन अपनी पहली भेंट के दौरान रूसो उन्हें प्रभावित कर पाने में असफल रहा. इस बीच रूसो की संगीत में रुचि पैदा हुई और उसने संगीत देने और सिखाने का कार्य प्रारंभ कर दिया.

संगीत के अध्ययनअध्यापन के दौरान रूसो ने कुछ नए प्रयोग भी किए थे, जिन्हें वह लोगों के बीच लाना चाहता था. पेरिस यात्रा का उसका उद्देश्य अपने आविष्कार को विज्ञान अकादमी के सेमीनार में प्रस्तुत करना भी था. रूसो ने उस सेमीनार में हिस्सा लिया था, किंतु विड़बना देखिए कि वह वहां भी विद्वानों को प्रभावित कर पाने में वह असमर्थ ही रहा. विद्धानों ने उसके आविष्कार को खारिज कर दिया. रूसो इससे निराश हुआ, किंतु वह आगे प्रयास करता रहा. कुछ ही अर्सा बाद फ्रांस की यात्रा उसके लिए लाभदायक होने लगी. 1743 में रूसो वेनिस पहुंचा तथा वहां के राजदूत के सचिव के रूप में काम करने लगा. एक वर्ष बाद ही वह वापस पेरिस आ गया और इस बार वह थेरेसा लेवाशियर(Thérèse Lavasseur) नामक स्त्री से प्रेम करने लगा. थेरेसा एक नौकरानी थी. दोनों के पांच बच्चे हुए. उन बच्चों के पालनपोषण के लिए रूसो ने उनको चर्च के अनाथालय में भर्ती करा दिया.

आगे के वर्षों में रूसो ने संगीत के क्षेत्र में कई मौलिक कार्य किए. उसने बालमनोविज्ञान को लेकर भी कुछ लेख लिखे, जिनकी वाल्तेयर ने कटु आलोचना की. भरसक प्रयास के बावजूद वह संगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना पाने में असफल ही रहा. परंतु रूसो जैसे प्रतिभाशाली को बहुत दिनों तक इंतजार नहीं करना पड़ा. वह दार्शनिकों एवं बुद्धिजीवियों के संपर्क में आया, जिससे कई विद्वानों तथा दर्शनशास्त्रियों से उसकी दोस्ती हो गई. सन 1749 में रूसो डिर्डाट (Diderot) से मिलने के लिए विंसेनिस की यात्रा पर था. उसी दौरान उसको डिजान एकादमी द्वारा आयोजित निबंध प्रतियोगिता की सूचना मिली. प्रतियोगिता का विषय था—‘विज्ञान एवं कला की प्रगति क्या सामाजिक शुचिता को निखारती है अथवा यह नैतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है?’ विषय बहुत ही मौलिक किस्म का था और कतिपय जटिल भी. लेकिन रूसो की प्रतिभा को प्रस्फुटन के लिए मानो इसी अवसरी की प्रतीक्षा थी; या फिर सौभाग्य उसके दरवाजे पर खुद आकर दस्तक देने में लगा था. प्रतियोगिता की सूचना मिलते ही वह उछल पड़ा.

उस क्षण की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के बारे में रूसो ने स्वयं लिखा है—

उस समय मैंने अनुभव किया कि हजारों स्फुर्लिंग में भीतर सहसा दमक उठे हों, मस्तिष्क में तरहतरह के विचारों का उद्दाम आवेग उमड़ने लगा. कुछ समय के लिए उसने मेरे दिमाग को भ्रांति के गर्त में ढकेल दिया, जिससे मेरे लिए कोई भी फैसला कर पाना नामुमकिन था. भ्रांति ने मुझे अव्यक्त, अंतहीन तनाव की आग में झोंक दिया था. मुझे लगा कि मेरा दिमाग घूम रहा है और मैं अचेतावस्था के भंवर में बहुत तेजी से धंसता चला जा रहा हूं.’

रूसो ने तत्काल अपना निबंध लिख भेजा. उसके द्वारा लिए गए आलेख का शीर्षक थाµ‘कला एवं विज्ञान पर विमर्श.’ अपने चिंतन को नया रंग देते हुए रूसो ने विषय के नकारात्मक पहलुओं को अपने लेख में उभारा था. अप्रत्याशित रूप से रूसो के उस आलेख को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ, लेख को लेकर खूब वादविवाद हुए. निबंध में रूसो ने तर्क देते हुए अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान की विकास करने की क्षमता पर सवाल उठाए थे. जिन्हें पढ़कर प्रगतिशील नाराज भी हुए. कुछ लोगों को वह लेख विज्ञान और तकनीक के विरुद्ध भी जान पड़ा, तो कुछ लोग तो विज्ञान विरोधी तथा संस्कृति, धर्म, परंपरा आदि के नाम पर यथास्थिति बनाए रखना चाहते है, उन्हें वह लेख अपनी भावनाओं के अनुकूल जान पड़ा. इस बहस के बीच रूसो की ओर विद्वानों का ध्यान जाना स्वाभाविक ही था. वही हुआ, कुछ ही दिनों में उसकी ख्याति पूरे यूरोप में फैल गई.

इससे पहले तक रूसो केवल संगीतशिक्षा के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करना चाहता था. उस लेख से रूसो को एक नई दिशा अनायास ही मिल गई. रूसो देकार्ते से प्रभावित था. उससे अपनी प्रथम मुलाकात का वर्णन करते हुए रूसो ने लिखा है कि जैसे ही उसने देकार्त के कमरे में प्रवेश किया, उसे एक दिव्यानुभूति हुई. देकार्त द्वारा दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में किए गए कार्य को वह अपने समय का सबसे मौलिक अवदान मानता था. तो भी, यहां तक कि देकार्त से वह भेंट रूसो की संगीत के प्रति दीवानगी को कम नहीं कर सकी. विलक्षण प्रतिभा के धनी रूसो ने एक ओर संगीत के क्षे़त्र में नएनए प्रयोग किए, वहीं गंभीर वैचारिक क्षेत्र में भी अपनी मौलिक सोच से समाज को नई दिशा दी.

सम्राट पंद्रहवें लुईस के आग्रह पर सन 1752 में रूसो ने एक नाटक की रचना की, जिसे खूब चर्चा मिली. उसके ठीक दो वर्ष पश्चात यानी 1754 में रूसो पुनः जिनेवा लौट गया. इस बीच बौद्धिक विमर्श के प्रति उसके रवैया में भी बदलाव आया था. इस बार उसका इरादा अपने वैचारिक लेखन को आगे बढ़ाने का था. जिनेवा पहुंचकर उसने दुबारा मार्टिन लूथर के आर्थिक विचारों तथा काल्विनिज्म का गहन अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया तथा वहां की नागरिकता प्राप्त कर ली.

देखा जाए तो यह उसका कायाकल्प था. अगले ही साल उसने एक और महत्त्वपूर्ण कार्य को अंजाम दिया. अपनी नई पुस्तक में रूसो ने समाज में व्याप्त असमानता और उसके कारणों को अपने विवेचनविश्लेषण का आधार बनाया था. पुस्तक का शीर्षक था— ‘सामाजिक असमानता का उद्भव एवं आधार: एक विमर्श. इस निबंध से बौद्धिक जगत में खलबली व्याप गई. फ्रांस सरकार को भी वह आलेख आपत्तिजनक लगा था. 1750 के आसपास ही उसकी पुस्तक ‘फर्स्ट डिस्कोर्स’ (First Discourse) प्रकाशित हुई. यह पुस्तक प्रकाशन के साथ ही चर्चा में आ गई. अभी तक जो लोग रूसो की प्रतिभा को हल्का करके आंक रहे थे, उनकी विचारधारा बदलने लगी. रूसो स्वयं कलाकार था. संगीत का उसको स्तरीय ज्ञान था. बावजूद इसके उसने अपनी पहली पुस्तक में कला एवं विज्ञान के उपयोग की आलोचना की थी. इससे समाजविज्ञानी और प्रगतिशील दोनों ही रूसो के दुश्मन बन बैठे. मगर रूसो की अक्खड़ छवि के कारण स्थिति बिगड़तेबिगड़ते रह गई. रूसो ने स्वयं भी स्वीकार किया था कि—

मैं विज्ञान को दोष नहीं दे रहामैं तो केवल मनुष्यता के पक्ष में सदगुणों की सुरक्षा कर रहा हूं.’

उसी साल अपने अनूठे स्वभाव का परिचय देते हुए रूसो ने मांटमोरेंसी के घने जंगलों में अपना अस्थायी ठिकाना बना लिया तथा एक झोंपड़ी डालकर उसमें अकेला रहने लगा. एकांतवास के दौरान रूसो ने दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की, ये हैं—दि सोशल कांट्रेक्ट [The Social Contract (Du Contrat Social)], तथा ‘एमाइल’ या ‘आन एजुकेशन (Émile, or On Education). आन एजुकेशन में रूसो ने बच्चों के जीवन में आदर्श शिक्षा की उपयोगिता का वर्णन किया था, जबकि ‘दि सोशल कांट्रेक्ट’ के सरोकार व्यापक एवं मानवीय थे. उसमें सामाजिक विमर्श को आगे बढ़ाने का काम किया गया. दोनों ही पुस्तकें रूसो के गहन अध्ययन का परिणाम थीं, उनमें धार्मिक संस्थानों एवं यथास्थितिवाद की पोषक शक्तियों की आलोचना की गई थी. एमाइल में बच्चों की शिक्षा की अपरिहार्यता को दर्शाते हुए वर्तमान परिवेश की आलोचना भी की थी. सोशल कांट्रेक्ट में रूसो की प्रतिभा अपने चरम पर रही होगी. इस पुस्तक के प्रारंभ ही उसने लिखा था कि—

मनुष्य मुक्त जन्मा जरूर है, मगर हर जगह वह बेड़ियों में कैद है.’

इस पुस्तक को बेहद लोकप्रियता मिली. दोनों ही पुस्तकों के बाद रूसो सरकार की आंखों की किरकिरी बन गया. बल्कि बाद की पुस्तकों से तो पूरे समाज में खलबलीसी मच गई. फ्रांस तथा जिनेवा की सरकार दोनों पुस्तकों पर पाबंदी थोप दी. रूसो को इसका लाभ तो अवश्य हुआ, उसकी पुस्तकें धड़ाधड़ बिकने लगीं. इस पुस्तक के आने पर प्रगतिशील के साथसाथ परंपरागत सोच वाले व्यक्ति भी रूसो से नाराज हो गए. लेकिन परिस्थितियों से बिना घबराए, दबावों से डरे बिना ही रूसो ने एक और महत्त्वपूर्ण पुस्तक Profession of Faith of the Savoyard Vicar की रचना की. इस पुस्तक में उसने धर्म के अतार्किक और रूढ़िवादी स्वरूप की आलोचना करते हुए उसको कठघरे में खड़ा किया गया था. जाहिर है कि इससे उन लोगों पर असर पड़ना स्वाभाविक ही था, जो निहित स्वार्थों के लिए धर्म का दुरुपयोग करते आ रहे थे. इस पुस्तक के विरोध में कट्टरपंथी एकजुट होने लगे. उनके दबाव में रूसो को कैद कर लिया गया. उसपर स्विटजरलेंड के बर्न तथा मोंटियार नामक क्षेत्रों में घुसने पर पाबंदी लगा दी गई. यही नहीं गुस्से से बलबला रहे उग्रवादियों ने उसके घर को आग लगा दी.

स्विटजरलेंड में भारी दबाव झेलते हुए रूसो वहां से तंग आ गया था. इससे उसका लिखना बाधित हुआ था. एक दिन उसने जिनेवा फिर छोड़ दिया. वहां से वह इंग्लेंड पहुंचा तथा अपने मित्र डेविड ह्यूम से जाकर मिला. सुप्रसिद्ध दार्शनिक डेविड ह्यूम से रूसो की दोस्ती थी. यह सब होते हुए भी उसने ह्यूम के घर जाकर ही नौकरी की. वहां वह करीब अठारह महीने लगातार रहा. उसी प्रवास के दौरान रूसो ने अपनी एक और चर्चित पुस्तक Constitutional Project for Corsica (Projet de Constitution pour la Corse) नामक पुस्तक की रचना की. इस पुस्तक में भी उसने धर्म को निशाना बनाया था. एक बार फिर प्रगतिशील रूसो के विरुद्ध मोर्चा साधने में लग गए.

करीब चार वर्ष से अधिक एक स्थान से दूसरे स्थान, एक देश से दूसरे देश तक घूमने से वह बोर हो गया था. इससे उसका लेखन भी बाधित हुआ था. अतः जिंदगी को एक पटरी पर लाने के लिए रूसो जिनेवा वापस लौट आया. इसी दौरान उसने थेरेसा से विवाह भी किया. 1770 में रूसो को पेरिस में आने की सशर्त अनुमति मिल गई. जिसके अनुसार उसके लेखन पर पाबंदी लगा दी गई थी. तो भी उसने 1772 में ‘कन्फेशन’ नामक एक पुस्तक पूरी की, लेकिन यह पुस्तक सन 1782 में, रूसो की मृत्यु के बाद ही प्रकाशित हो सकी. 1772 में एक अच्छा अवसर तब आया जब पौलेंड की सरकार ने उसे अपना नया संविधान लिखने के लिए आमंत्रित किया. रूसो का वह राजनीति पर अंतिम कार्य था. लगातार पड़ने वाले सरकारी दबाव तथा लिखने पर पाबंदी ने रूसो को तोड़ कर दिया था. वह हताश और परेशान रहने लगा. लगातार तनाव के कारण वह काफी कमजोरी का अनुभव करने लगा था.

अंततः 3 जुलाई 1778 का वह दिन भी आ गया, जब उस मनुष्यता के सबसे बड़े समर्थक ने अंतिम सांस ली. उस दिन वह प्रातःकाल घूमने के लिए निकला हुआ था कि दिमाग की नसें फटने से उसकी मृत्यु हो गई, रह गया राजनीति और समाजशास्त्र के क्षेत्र में किया गया उसका अनूठा काम जिसने उनीसवीं शताब्दी में पूरी दुनिया को प्रभावित किया.





विचार

एक लेखक और विचारक के रूप में रूसो के वैचारिक अवदान की तुलना माक्र्स तथा फ्रायड से की जा सकती है. वह अठारहवीं शताब्दी का अकेला ऐसा विचारक है जिसने कठिन जीवनसंघर्ष से निकलकर, अपनी प्रतिभा एवं संघर्ष के दम पर अपनी पहचान स्थापित की. वैचारिक ईमानदारी की रक्षा करते हुए उसने जैसा उसको बौद्धिक रूप से जंचा, वैसा ही लिखा. निर्भीक अभिव्यक्ति के कारण अनेक बार कठिनाइयों का सामना किया, उसके लिए निर्वासन और कारावास दोनों ही भोगे, किंतु वह अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहा. उसने जीवन में नैतिकता को सर्वोपरि माना और अपने मौलिक विचारों के दम पर अठारहवीं शताब्दी में मनुष्यता के सबसे बड़े विचारक और प्रचारक के रूप में उभरा. जिसके विचारों से प्रेरणा लेकर उनीसवीं शताब्दी में जनतंत्र और मानवाधिकार आंदोलनों को बढ़ावा मिला.

व्यक्तिवादी चिंतन को बढ़ावा देते हुए रूसो ने मानवाधिकारों के सरंक्षण पर जोर दिया. हालांकि व्यक्तिवादी चिंतन का प्रवत्र्तक वह अकेला और पहला विद्वान नहीं था. उससे पहले जान लाक एवं थामस हाब्स भी व्यक्तिवादी विचारधारा का समर्थन कर चुके थे. हालांकि उन दोनों के विचारों में किंचित भिन्नता थी. हाब्स का कहना था कि मानव स्वभाव विशुद्ध रूप से स्वार्थ से नियंत्रित होता है. इसलिए वह सबसे पहले अपने सुख को महत्त्व देता है. सुख की सुनिश्चतता के लिए उसको समाज में रह रहे अन्य प्राणियों के साथ सतत संघर्ष करना पड़ता है. इस तरह समाज में प्राकृतिक न्याय को अधिमान्यता मिलती है, जिसका आशय है ताकतवर की विजय. हाब्स का विचार मानवतावादी विचारकों को स्वीकार्य नहीं हो सका. विशेषकर उन लोगों को मानवीय संवेदनाओं को ही सबकुछ मानते रहे हैं.

हाब्स की भांति जान लाक भी व्यक्तिवादी विचारधारा का समर्थक था. उसका मानना था कि सभ्यता के बढ़ते क्रम में मनुष्य अपने सुख के लिए सहअस्तित्व को महत्त्व देता है. यह अस्तित्व से यहां आशय है, दूसरों के जीने के अधिकार, उनके फैसला करने के अधिकार, निजी संपत्ति रखने के अधिकार आदि सम्मिलित हैं. रूसो ने हाब्स के ‘आत्मरक्षा हेतु सतत संघर्ष’ के विचार का निषेध किया, किंतु उसने माना कि आत्मरक्षा की भावना मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व एवं उसके व्यवहार को नियंत्रित करने का कार्य करती है. लेकिन उसने यह भी कहा कि बौद्धिक प्राणी होने के नाते मनुष्य पशुवत व्यवहार नहीं कर सकता. समाज को नियंत्रित करने के लिए रूसो ने नैतिकता को आवश्यक और सर्वोपरि माना है.

रूसो ने जान लाक के सहअस्तित्व के सिद्धांत का भी समर्थन किया था. व्यक्तिवादी चिंतन में विज्ञान और कलाओं के महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता. जीवन में विज्ञान और कलाओं की उपयोगिता प्रासंगिकता को लेकर रूसो ने कई सवाल खड़े किए थे. उसने विज्ञान समेत सभी कलाओं यहां तक कि ज्योतिष को भी समाज में असमानता के लिए जिम्मेदार माना था. जिससे परंपरावादी नाराज हो गए.

रूसो राजनीति मानवाधिकार को लेकर गंभीर चिंतन किया है. उसके विचार ‘विज्ञान एवं कला संबंधी विमर्श’ जिसे रूसो का समाजविज्ञान को लेकर पहला गंभीर कार्य माना जाता है, में मौजूद हैं. पहली बार यह पुस्तक सन 1750 में प्रकाशित हुई थी, जिसमें रूसो ने विज्ञान एवं कलाओं को सामाजिक असमानता का कारक मानते हुए जीवन में उनकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए थे. आगे चलकर उसने ‘सामाजिक असमानताः उद्भव एवं मूल स्थापनाओं पर विमर्श’ नामक एक लंबा निबंध लिखा जिसको उसने उसी दुजोन संस्था द्वारा आयोजित प्रतियोगिता को भेजा, जिसने उसके पिछले लेख को पुरस्कृत किया था. उस लेख की काफी चर्चा हुई थी. किंतु इस बार रूसो को निराश होना पड़ा. अपने दूसरे आलेख में रूसो ने सामाजिक असमानता के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक कारणों का विवेचन करते हुए, एक समरस समाज की संकल्पना की थी.

रूसो का आग्रह सहजप्राकृतिक जीवन को अपनाने पर था. उसका आग्रह था कि मनुष्य अपनी आत्मसत्ता को पहचाने तथा दूसरों की जीवन एवं सम्मान की रक्षा करते हुए नैतिक आचरण पर जोर दे. जीवन में नैतिकता एवं मानवमूल्यों की स्थापना के लिए वह व्यक्तित्व की शुभता को निखारने पर बहुत जोर देता था. रूसो की प्रसिद्ध कृति ‘सोशल कांट्रेक्ट’ में उसके धर्म, राजनीति संबंधी विचार आए हैं. उसकी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘दि एमाइल’ (Émile, or On Education) अथवा शिक्षा है. जिसमें उसने स्त्री शिक्षा एवं समानता बच्चों की शिक्षा आदि समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक विषयों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है.

गौरतलब है कि अठारहवीं शताब्दी के दौरान यूरोपीय समाज में स्त्री की अवस्था अत्यंत दयनीय थी. हालांकि औद्योगिकीकरण, नई शिक्षा एवं वैचारिक चेतना के चलते समाज में समाजवादी विचारों का आगमन हो चुका था. व्यक्तिस्वातंत्रय एवं नैतिकता आदि विषयों पर गंभीर काम हो रहा था. बावजूद इसके समाज में सामंती विचारधारा के अवशेष बाकी थे. ‘दि एमाइल’ में रूसो ने स्त्री आधिकारिता पर विचार किया. इसी पुस्तक में उसने बच्चों की शिक्षा तथा उनके अधिकारों के संरक्षण पर जोर दिया है. बालसंरक्षण संबंधी विचारों को लेकर रूसो के सिद्धांत एवं व्यवहार के बीच मौजूद विरोधाभास भी सामने आते हैं. जैसे कि एक ओर तो उसने बच्चों के अधिकार एवं उनकी विधिवत शिक्षा पर काफी जोर दिया है. मगर दूसरी ओर विसंगति देखिए कि अपने ही पांच बच्चों को उसने एक बालगृह के हवाले कर दिया था. हालांकि कथनी और करनी के बीच का यह अंतर अकेला नहीं है. दुनिया के अनेक महापुरुष ऐसे हुए हैं, जिनका आचरण उनके अपने ही सिद्धांतों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता.

रूसो की मनुष्यता में गहरी आस्था थी. उसका मानना था कि मनुष्य अपनी मूल प्रकृति से अच्छा होता है. लेकिन परिस्थितियां कभीकभी उसे विवश कर देती हैं कि वह ऐसा कार्य भी करे जो वह सामान्य स्थितियों में बिलकुल भी करना नहीं चाहता. मानव समाज को लेकर रूसो का मानना था कि सभ्यता के पहले मनुष्य एक विनम्र जंगली के समान था. मगर सामाजिकीकरण की प्रक्रिया ने मनुष्य को चतुराई से काम लेना, दूसरों को धोखा देकर अपना काम निकालना सिखाया है. मानवेच्छाओं का वर्गीकरण करते हुए उसने लिखा है कि—

सबकी इच्छा तथा सामान्य इच्छा में सामान्यतः अंतर होता है. सामान्य इच्छा आमतौर पर समूह के सदस्यों की सामान्य अभिरुचि अथवा अभिरुचियों को दर्शाती है. जबकि सबकी इच्छा से ताकत और दबाव के संकेत उभरते हैं.’

रूसो के इस कथन से लोकतंत्र के प्रति उसकी आस्था के संकेत मिलते हैं. संभवतः सामाजिक असमानता एवं विपन्नता के शिकार व्यक्तियों को देखकर ही रूसो ने कहा था कि—

मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन उसके लिए बंधन प्रत्येक स्थान पर हैं.’

आगे चलकर मानवमूल्यों के पक्षधर विद्वानों के लिए रूसो का यही वाक्य प्रेरक एवं मागदर्शक बना, जिसने उनीसवीं शताब्दी के मानवतावादी आंदोलनों के लिए सूत्रवाक्य का कार्य किया.

विज्ञान और कलाओं की जीवन में उपयोगिता को लेकर रूसो का मानना था कि केवल विज्ञान तथा कलाओं के विकास द्वारा मनुष्य के स्वभाव तथा उसके नैतिक चरित्र में कोई सुधार नहीं लाया जा सकता. मानवीय आचरण में सुधार लाने के बजाय वे असमानता, सुस्ती तथा विलासिता को बढ़ावा देता है. जिससे धन का केंद्रण समाज के एक ही स्थान होने लगता है. धन का एक ही स्थान पर ठहराव सामाजिक असमानता का कारण बनता है, यह स्थिति आगे आने वाले दिनों में वर्गविभाजन को प्रश्रय देती है. विज्ञान की आलोचना करते हुए एक स्थान पर रूसो ने यहां तक लिखा है कि—

यदि विज्ञान सचमुच कुछ अच्छा करने में सक्षम होता है, यदि वह मनुष्य को अपने देश की आजादी के लिए खून बहाना सिखाता है, यदि वह उनके साहस को ऊंचाइयों तक ले जाता है, तब तो प्रौद्योगिकी संपन्न देशों के लोगों को बुद्धिमान, साहसी तथा चिंतामुक्त हो जाना चाहिए. उन्हें ऐसा करने का अधिकार है. लेकिन यदि वे हरेक पाप में जकड़े हुए हैं, सभी तरह के अपराधों से परिचित हैं, न ही उनके न्यायाधीश इतने योग्य हैं कि अपराधी को दंडित करा सकें, न ही वे कानून के बल पर सुरक्षित हैं और न ही वहां प्रजा की सम्मिलित महाशक्ति सम्राट को मनमानी करने से रोक पाती है, न ही उनके अमानवीय अत्याचारों से उनकी रक्षा कर पाती है, ऐसे में उनकी कलाप्रवणता, बुद्धिकौशल तथा उनकी पढ़ाईलिखाई का क्या लाभ है?’

रूसो को विश्वास था कि केवल ईमानदार एवं प्रकृति के सान्न्ध्यि में रहने वाले कार्यकर्ता ही सदगुणों के वास्तविक एवं भरोसेमंद स्वामी हो सकते हैं. क्योंकि वहां उन्हें प्रकृति की विराटता का एहसास सतत बना रहता है. सभ्यता के क्रम वे समाज का गठन तो करते हैं, जिसके साथ रहकर वे निरंतर शैक्षिक एवं तकनीकी विकास की ओर अग्रसर होते हैं. मगर आधुनिकता के दबाव एवं वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण निरंतर सुविधामय जीवन जीते हुए वे अपने आप में सिमटते चले जाते हैं. परिणामस्वरूप वे शेष समाज से कटने लगते. धीरेधीरे उसमें वे सभी बुराइयां आने लगती हैं, जो सामंती संस्कारों से युक्त समाज में होती हैं. इस कुंठा और हताशा से बचने के लिए रूसो के इस विचार का उपयोग एडगर राइस बुरोघ ने अपनी पुस्तक ‘टार्जन’ में किया है—

जमीन, खेतीबाड़ी तथा धातुओं के आविष्कार से सारे कारोबार और निजी संपत्ति की अवधरणा का विकास हुआ है. जिससे समाज गरीब और अमीर में बंटा है. सामाजिक असमानता में वृद्धि हुई. कानून ने राज्य को स्थायित्व और मजबूती प्रदान जरूर की है. ऐतिहासिक विकास की अंतिम मंजिल निरंकुश राज्य में होती है….हम इसलिए समान हैं, क्यों कि हम सभी एक ही मालिक के दास हैं.’

रूसो की विचारधारा का सबसे स्पष्ट एवं मुख्य स्वर हमें उसके ग्रंथ ‘सोशल कांटेªक्ट’ में देखने को मिलता है. इस पुस्तक में उसने आग्रहपूर्वक कहा है कि—

मनुष्य मुक्त जन्मा है. लेकिन हर कहीं वह शृंखलाओं में कैद है. हर मनुष्य स्वयं को दूसरों से बढ़कर, उनका स्वामी समझता है. बावजूद इसके वह दूसरों की अपेक्षा केवल अच्छा चाकर ही सिद्ध हो पाता है.’

रूसो का मानना था कि प्रारंभिक समाज धनी एवं ताकतवर मनुष्यों के अधिकार में था. धीरेधीरे समाज के शक्तिशाली लोगों ने जनसामान्य को अपने प्रभाव में लेना प्रारंभ कर दिया. परिणामस्वरूप असमानता बढ़ती चली गई. आगे उसको सामाजिकता के प्रमुख लक्षण के रूप में स्वीकार्यता भी मिलती चली गई. रूसो का कहना था कि केवल इच्छाओं के सामान्यीकरण के दौरान ही मनुष्य सबसे अधिक आजादी का अनुभव करता है. इससे वह अपने ही जैसे बाकी लोगों के बीच होता है. रूसो सामूहिक जीवन को श्रेष्ठतर मानता था. उसके अनुसार सामान्य इच्छा निश्चित रूप से सामान्य कल्याण की ओर ले जाती हैं. संगठित समुदाय के नागरिक अपनी प्रकृति प्रदत्त आजादी का आदानप्रदान अपेक्षाकृत अच्छे कार्य, नैतिक स्वाधीनता के लिए करते हैं. इस विचारधारा में राजनीतिकों को सामाजिक कल्याण तथा सामूहिक इच्छाओं के लिए व्यक्तिमात्र की स्वैच्छिक अधीनता करते हुए देखा गया है. रूसो की यह विचारधारा लोकतंत्र सहकारिता के सिद्धांत के अनुरूप है. इसीलिए उसे अठारहवीं शताब्दी के सबसे बड़े मानवतावादी विचारकों में स्थान दिया गया है.

ज्ञान को लेकर भी रूसो के विचार अपने समकालीनों से अलग और अछूते थे. उसने तर्क देकर बताया कि ज्ञान का विकास सरकार को और अधिक शक्तिशाली तथा निरंकुश बनाता है; जो मनुष्य को व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त कर देता है. वस्तुतः जिस ज्ञान का निरंकुशता का वाहक बताते समय रूसो के दिमाग में अवश्य ही विज्ञान एवं आधुनिकता के दुरुपयोग की स्थिति रही होगी. इसमें कोई संदेह नहीं है कि नए ज्ञान तथा उसके उपकरणों का सर्वाधिक लाभ सरकार तथा ताकतवर ही उठाते हैं. किंतु यह तो दुनिया के किसी भी संसाधन के बारे में सत्य है. ज्ञान का लाभ भले ही सत्ताधारी वर्ग उठाता आया हो, किंतु इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि सत्ताधारी और शक्तिशाली के उत्पीड़न से बचाव का रास्ता भी ज्ञान के नवीनतम उपकरणों से ही सृजित होता है.

रूसो संभवतः पहला विचारक था जिसने निजी संपत्ति की अवधारणा का जमकर विरोध किया था. इसीलिए कुछ विद्वान उसको आधुनिक समाजवाद एवं साम्यवाद का आदिप्रणेता भी स्वीकार करते हैं. उसका कहना था कि सरकार का कर्तव्य अपने नागरिकों की स्वाधीनता, समानता की रक्षा करना तथा उनके लिए न्याय की सुनिश्चितता करना है. किंतु वह यह मानने के लिए हरगिज तैयार नहीं था कि बहुमत सदैव सही होता है. अपने राजनीतिक दर्शन नामक ग्रंथ में रूसो ने उल्लिखित किया है कि राजनीति तथा नैतिकता को अलग नहीं किया जाना चाहिए. उसका मानना था कि—

प्रकृति ने समग्र मानव सृष्टि को दो स्वयंभू मालिकों, दुःख एवं आनंद में बांटा हुआ है. यह केवल उन दोनों पर निर्भर करता है कि आगे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. उसके एक ओर उचित एवं अनुचित हैं. एक ओर कार्य और कारणों की लंबी कतार है, जिसने हमारे जीवन के प्रत्येक अवसर को अपनी गिरफ्त में लिया हुआ है. दूसरी ओर गहरी खाई, हमारे प्रत्येक कर्म के लिए जिम्मेदार हैंहम सभी समान हैं, क्योंकि हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं.’

सामाजिक संविदा (Social Contract) को रूसो के सर्वश्रेष्ठ कार्य के रूप में मान्यता प्राप्त है. यह पुस्तक सन 1762 में प्रकाशित हुई थी और लगभग ढाई शताब्दी के पश्चात आज भी राजनीतिक दर्शन पर महत्त्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है. इस पुस्तक के माध्यम से रूसो ने धार्मिक आस्थावादियों पर कटाक्ष करते हुए दावा किया है कि धार्मिक होना नैतिक होने की कसौटी नहीं है. जीसस के सच्चे अनुयायी लोगों को अच्छे नागरिक नहीं बना सकते. यह कथन धार्मिक आस्थावादियों पर सीधी चोट, उनकी सत्ता के लिए एक चुनौती के समान थी. अतः इसपर जिनेवा समेत पूरे यूरोप में हंगामा मच गया. बाद में रूसो ने सफाई देने का प्रयास भी किया था, तथापि पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

रूसो ने यूरोपीय वैचारिक क्रांति को जन्म दिया था. उसको फ्रांस की क्रांति का भी जन्मदाता माना जाता है. रूसो अठारहवीं शताब्दी के एक और विलक्षण प्रतिभाशाली विद्वान वाल्तेयर का समकालीन था. बावजूद इसके उन दोनों में कभी सहज संबंध नहीं बन सके. दोनों परस्पर कटु आलोचक बने रहे. रूसो ने अपनी पुस्तक सामाजिक संविदा की प्रति वाल्तेयर को भेंट की तो प्रतिक्रिया में उसका पत्र मिला, जिसमें लिखा था:

मुझे तुम्हारी नई पुस्तक जो मनुष्यता के विरुद्ध है, मिली, धन्यवाद. पाठकों को मूर्ख बनाने के लिए ऐसा चतुराईभरा कार्य इससे पहले कभी नहीं किया गया. तुम्हारी पुस्तक के संदेश को पहचाने तो हम सबको चार पैरों पर चलना शुरू कर देना चाहिए. लेकिन में यह आदत तो साठ वर्ष पहले ही छोड़ चुका हूं. इसकी असंभाव्ययता को स्वीकारते हुए भी मुझे दुख होता है…’

रूसो एक अंतर्मुखी व्यक्ति था. उसके व्यक्तित्व की एक कमजोरी यह भी थी कि वह दूसरों के साथ आसानी से घुलमिल नहीं पाता था. बातबात पर झगड़ पड़ना उसका स्वभाव बन चुका था. समाज के साथ तालमेल न बिठा पाने के कारण वह भीड़ से दूर, एकांत की शरण में भागता था. ये कमजोरियां निश्चित रूप से उसके बचपन की त्रासदियों की देन थीं. उन अभावों और विड़ंबनाओं की भी देन थीं, जिनके बीच उसे आजीवन रहना पड़ा. उसने जीवन में अपने लिए प्यार सहानुभूति की कमी सदैव महसूस की. बावजूद इसके वह विलक्षण प्रतिभा का धनी था. उसके दिल में करुणा थी और प्राणियों के प्रति बेशुमार प्रेम. वह सदैव उत्पीड़ितों और वंचितों के पक्ष में आवाज उठाता रहा. जहां तक व्यक्तिगत उपलब्धियों का सवाल है, जीवन के पहले सेंतीस वर्षों में वह कुछ खास नहीं कर पाया था, सिवाय संगीत में कुछ प्रयोगों और छिटपुट लेखन के, जिन्हें उस समय तक विद्वानों ने विचारयोग्य भी नहीं माना था. मगर बाद के जीवन में रूसो ने जो लिखा उसने उसको अठारहवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली एवं मौलिक चिंतक के पद पर आसीन कर दिया.

आगे आने वर्षों में रूसो ने नवजागरण को न केवल प्रेरित किया, बल्कि उसको वैचारिक समर्थन और समृद्धि भी प्रदान की. रूसो को मनुष्यता में अटूट विश्वास था, उसी के लिए वह अपनी कलम को हथियार बनाकर सतत संघर्ष करता रहा. उसने समाज तथा मानव प्रकृति के मौलिक अंतर को स्पष्ट किया है. अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘सोशल कांट्रेक्ट’ में उसने मनुष्यता के प्रति अपने विश्वास को और भी दृढ़ता के साथ अभिव्यक्त किया है. उसने लोकतंत्र की भी मुक्त कंठ से सराहना की है. ध्यातव्य है कि अठारहवीं शताब्दी के लगभग सभी सुधारवादी विद्वानों और अर्थशास्त्रियों ने अध्यात्म, स्वाधीनता, मुक्त बाजार, विज्ञान और कलाओं का विकास, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार तथा अभिव्यक्ति एवं प्रेस की आजादी का पक्ष लिया है.

उनसे अलग रूसो ने अध्यात्म, नैतिकता तथा व्यक्तिगत संपत्ति संबंधी प्रचलित अवधारणाओं का सतत विरोध करते हुए भी प्रसिद्धि प्राप्त की थी. उसका कहना था कि विज्ञान तथा तकनीक ने मनुष्य को अपने पंजों में जकड़ रखा है. मनुष्य पाषाणकाल में ही सुखी था. उसने इन पर प्रतिबंध लगाने पर जोर दिया है ताकि ये सब मनुष्य को भ्रमित न कर सकें. वर्तमान परिवेश में उसकी सभी मान्यताओं से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता. किंतु इससे उसके विचारों की प्रामाणिकता एवं उनका औचित्य कहीं बाधित नहीं होता. वाल्तेयर के बाद रूसो ही ऐसा विचारक था जिसने मनुष्यता को सर्वोपरि मानते हुए उसकी रक्षा के लिए कलम को हथियार बनाया और अपनी लगन एवं प्रतिभा के दम पर अपने लक्ष्य में सफलता भी प्राप्त की, जिसके लिए उसके योगदान को भुला पाना असंभव है.

© ओमप्रकाश कश्यप


4 टिप्पणियाँ

Filed under जीन-जैकुइस रूसो

4 responses to “जीन-जैकुइस रूसो

  1. आपने बहुत अच्छा लिखा है. कुछ और विचारकों पर भी लिखें .

  2. mohit raj

    accha meterial hai.pr kai jagah deep study ki kmi jhalakti hai.woman education pr unka koi important kam nhi hai.women ko “thing of pleasure” btaya tha..Personalisation se bche jaise “meri dristi me” jaise kathno se.per hindi me itna kuchh hai.eske lie dhanyawad

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