इतिहास में घालमेल के बहाने

इतिहास केवल विजेता का होता है. दो संस्कृतियों के द्वंद्व में पराजित संस्कृति को मिटने के लिए बाध्य किया जाता है. विजेता इतिहास की पुस्तकों को इस प्रकार लिखता है जिसमें उसका गुणगान हो, और विजित को अपमानित किया गया हो. जैसा कि नेपोलियन ने एक बार कहा था, ‘इतिहास क्या है, महज एक दंतकथा, जिससे सब सहमत हों —डॉन ब्राउन.

 

इतिहास दीर्घकालीन राजनीति है. ऐतिहासिक घटनाएं प्रायः द्वंद्वात्मकता में घटती हैं. सत्ता उनकी दशा-दिशा तय करती है. हर नया विजेता सत्तासीन होते ही अपनी कीर्ति-कथा गढ़ने में जुट जाता है. इसके लिए वह क्रीत बुद्धिजीवियों की मदद लेता है. कला और संस्कृति के माध्यमों का इस्तेमाल करता है. खरीदे हुए बुद्धिजीवी स्थितियों की व्याख्या अपने तथा अपने आश्रयदाता के स्वार्थानुसार करने लगते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास से छेड़छाड़ भी करते हैं. उसका एकमात्र उद्देश्य होता है, विजित के दिलोदिमाग पर कब्जा कर लेना. भरोसा दिलाना कि उनकी भलाई आश्रित बने रहने में है. दरअसल बड़े से बड़ा शिखर-पुरुष अपने प्रतिद्विंद्वी से इतना नहीं डरता जितना वह जन-विद्रोह की संभावना से घबराता है. विद्रोह की न्यूनतम संभावना हेतु वह जनता का हर समय बेहद करीबी, भरोसेमंद तथा परम-हितैषी दिखना चाहता है. वाल्तेयर ने इतिहास को ‘सर्वमान्य झूठ का सिलसिला’ कहा है. इससे इतर जार्ज आरवेल की टिप्पणी इतिहास की महत्ता को रेखांकित करती है—

‘किसी समाज को नष्ट करने का सबसे कारगार तरीका है, उसके इतिहासबोध को दूषित और खारिज कर दिया जाए.’

जिस इतिहास की बात आरवेल करते हैं, उसे घटनाओं तथा उन्हें जन्म देने वाली स्थितियों का प्रामाणिक दस्तावेज होना चाहिए. इस कसौटी पर भारत के इतिहास को कैसे देखा जाए? इतिहास के नाम पर हमें जो पढ़ाया जा रहा है, क्या वह प्रामाणिक है? जो लोग निहित स्वार्थ हेतु ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलबाड़ कर रहे हैं, उनसे कैसे निपटा जाए? ऐसे कई प्रश्न हैं, जिनपर विचार करना आज की परिस्थितियों में आवश्यक हो जाता है. वैसे इतिहास से खिलबाड़ की समस्या आज की नहीं है. सहस्राब्दियों से यही होता आया है. आर्य यहां 1500 ईस्वी पूर्व में आए. उस समय सिंधु सभ्यता(3300 ईस्वी पूर्व—1750 ईस्वी पूर्व) पराभव की ओर अग्रसर थी. वे चाहते तो मरणासन्न सभ्यता को सहेजने की कोशिश कर सकते थे. पर इस बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं. उल्टे प्राकृतिक आपदा के शिकार दुर्ग और दुर्गवासियों पर आक्रमण कर अपनी वीरता दिखाते रहे. सहेजने से ज्यादा जोर उन्होंने मिटाने पर दिया. विलासी और विध्वंसक प्रवृत्ति के इंद्र को राजा माना. अनार्य जो समृद्ध सभ्यता के उत्तराधिकारी रह चुके थे, उन्हें असुर, असभ्य, क्षुद्र आदि कहकर अपमानित करते रहे. खुद घुमक्क्ड़ थे. उपलब्धि के नाम पर उनके पास कुछ था नहीं. जिनके पास था, उनका उल्लेख करके अपनी हेटी नहीं करना चाहते थे. झूठे आर्य(श्रेष्ठ)त्व की रक्षा हेतु उन्होंने मिथकों और कपोल-कल्पनाओं से भरे वेद-पुरान रचे. ऐसे ग्रंथ जिनमें सच खोजने चलो तो सबसे शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी भी नाकाम हो जाए. उनका ध्येय था, जैसे भी हो ब्राह्मणवाद का महिमामंडन करना. ब्राह्मण को सबसे ऊपर, अनुपम और परम-प्रज्ञाशील दिखाना.

मध्यकाल में इतिहास-लेखन की दृष्टि से कुछ जागरूकता आती है. उस दौर की रचनाओं में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का बखान है. कुछ तारीखें, घटनाएं तथा तथ्यों का उल्टा-सीधा विवरण है. मगर विरासत में मिले संस्कारों की वजह से इतिहासबोध गायब रहता है. उस समय के कवि-लेखक अपने आश्रयदाता की कीर्ति-कथा गढ़ने, उसे दूसरों से श्रेष्ठतर दिखाने को लालायित दिखते हैं. उसके लिए सत्य को मनचाहे ढंग से तोड़ते-मरोड़ते हैं. चारण, भाट, विदूषक कहलाकर भी गर्व का अनुभव करते हैं. उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक हालात ज्यों की त्यों बने रहते हैं. इसी दौर में पश्चिम में बौद्धिक क्रांति हुई. भारतीय संस्कृति की ओर योरोपीय विद्वानों का आकर्षण बढ़ने लगा. उनकी देखा-देखी भारतीयों में भी इतिहास चेतना उभरने लगी. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का असर भी उसपर पड़ा. उस संघर्ष में समाज के सभी वर्ग सहभागी थे. धर्मनिरपेक्षता अधिकांश के लिए सामाजिक मूल्य बन चुकी थी. ऐसे में जो इतिहास-दृष्टि विकसित हुई, उसका स्वरूप समन्वयवादी था.

भारतीय इतिहासकारों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जा सकता है—पहले वर्ग में वे इतिहासकार हैं जिनके लिए भारतीयता का मतलब हिंदू या ‘हिंदुत्व’ है. अतीतमोह उनकी कमजोरी होता है. मानते हैं कि साहित्य तथा अन्य कला-माध्यमों की सार्थकता विलुप्त भारतीयता की खोज में है. उनके लिए संस्कृति और इतिहास में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों में से चयन करना हो तो वे संस्कृति का पक्ष लेते हैं. इस नासमझी के कारण लाखों सैनिकों की बलि लेने वाला, छल-प्रपंच से भरा ‘महाभारत’ ‘धर्मयुद्ध’ घोषित कर दिया जाता है. दूसरा वर्ग आधुनिकता समर्थक लेखकों-इतिहासकारों का है. ऐसे इतिहासकार अतीत के नाम पर भविष्य कुर्बान नहीं करते. वे अतीत को सहेजते हैं ताकि भविष्य संवारा जा सकें. गंगा-जमुनी संस्कृति के समर्थक के तौर पर वे मानते हैं कि भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाने के लिए सभी वर्गों को साथ लेकर चलना आवश्यक है. आजादी के बाद से कमोबेश यही दृष्टि प्रभावी रही है. हालांकि संघीय विचारधारा के इतिहासविद् अपने लंगड़े इतिहासबोध द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर बीच-बीच में सांप्रदायिक प्रदूषण फैलाने की साजिश रचते आए हैं. कुछ ऐसा ही केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद शुरू हुआ है. 2014 में वह विकास के वायदे के साथ सत्ता में आई थी. मगर आने के साथ ही उसने दिखा दिया था कि उसकी असल मंशा कुछ और ही है. सरकार बनने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान की आधुनिक संस्थाएं उसके सीधे निशाने पर आ गईं. कला-संस्कृति के प्रमुख केंद्रों पर संघीय मानसिकता के लोगों को बिठाया जाने लगा. सरकार का सबसे पहला और विवादित कदम ‘भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद’ के अध्यक्ष की नियुक्ति थी. उसके लिए वाई. सुदर्शन राव को चुना गया था. पद-संबंधी सुदर्शन राव की योग्यता पर प्रख्यात इतिहासविद् रोमिला थापर की टिप्पणी थी—‘इतिहास के क्षेत्र में सुदर्शन राव का, मानक-रहित पत्रिकाओं में हिंदू धर्म के मिथकीय पात्रों पर लेख लिखने से बड़ा और कौन-सा योगदान है.’ दूसरे सचेत बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों ने भी सरकार के उस कदम की आलोचना की थी, किंतु सरकार अड़ी रही.

सुदर्शन राव रामायण और महाभारत के कथ्यों की ऐतिहासिकता को स्वीकारते हैं. उनका यह सोच भाजपा के पितृ संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ से मेल खाता है. आधुनिकता की कसौटी पर जाति प्रथा कलंक साबित हुई है. फिर भी संघ उसे किसी न किसी रूप में सहेजे रखना चाहता है. जाति-पृथा का महिमामंडन करते हुए अपने आलेख ‘भारतीय जातिपृथा: एक पुनर्मूल्यांकन’ में सुदर्शन राव लिखते हैं—‘अतीत में जातिप्रथा भली-भांति काम करती आई है. बीते जमाने में उसे लेकर कोई शिकायत प्राप्त नहीं होती. प्रायः उसे गलत ढंग से पेश किया जाता है. आरोप लगाया जाता है कि वह शासक वर्ग के समाजार्थिक स्वार्थों को कायम रखने के लिए गढ़ी गई थी. असल में वह धर्मशास्त्रों द्वारा समर्थित, सभ्यताकरण की अनिवार्यता है. सुदर्शन राव की ‘योग्यता’ के वास्तविक आकलन हेतु उचित होगा कि जाति-संबंधी उनके विचारों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गुरु गोलवरकर के जाति-संबंधित विचारों के समानांतर रखकर पढ़ लिया जाए.

2007 में ‘कर्मयोग’ शीर्षक से लिखी गई पुस्तक में मोदी जी ने मैला उठाने के काम को ‘वाल्मीकियों के लिए आध्यात्मिक अनुभव’ बताया था. वह जाति-व्यवस्था के महिमामंडन जैसा था, जिसका गुणगान संघ और उसके समर्थक करते ही रहते हैं. शब्दों के किंचित ऐर-फेर के साथ यही विचार गोलवरकर की पुस्तक ‘बंच आफ थाट्स’(भाग-दो, अध्याय दस) में भी देखे जा सकते हैं—‘जातिप्रथा प्राचीनकाल में भी मौजूद थी. यह हमारे राष्ट्रीय जीवन में हजारों वर्षों से निरंतर उपस्थित है….यह लोगों में संगठन तथा बंधुत्व की भावना पैदा करती है.’ भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखने में जाति-प्रथा का योगदान किसी से छिपा नहीं है. मगर गोलवरकर के विचार अलग हैं. उनका मानना है कि जाति-प्रथा थी, इसीलिए यह देश विदेशियों का कम गुलाम रहा. वरना दासता और लंबी खिंच सकती थी. गोलवरकर संभवतः अकेले विचारक हैं जो 800 वर्षों के दासताकाल को भी कम मानते हैं. बहरहाल, ऐसे समय में जब अधिकांश बुद्धिजीवी जाति प्रथा की आलोचना करते हों, सुदर्शन राव जैसे बुद्धिजीवी उसे अकादमिक संदर्भ देते रहते हैं. उन्हें पारितोषिक मिलना ही था.

राव अकेले उदाहरण नहीं हैं. ज्ञान-विज्ञान और कला संस्थाओं के शिखर पदों पर खास विचारधारा के लोगों को नियुक्त कर सरकार ने दिखा दिया था कि तर्क और आलोचनाएं उसे तयशुदा दिशा में काम करने से रोक नहीं सकतीं. केंद्र सरकार तथा भाजपा शासित राज्यों की सरकारों अगली वरीयता है, पाठ्य-पुस्तकों में बदलाव करना. महाराष्ट्र सरकार ने फैसला किया है कि विद्यार्थियों को शिवाजी के बारे में और अधिक पढ़ाया जाना चाहिए. बदले में कुछ मुगल शासकों को पाठ्यपुस्तकों से गायब कर दिया गया. राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में मुगल स्थापत्यकला को दर्शाती, ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक इमारतें हैं. उनमें कुतुबमीनार जैसी विश्वविख्यात निमिर्ति भी शामिल है. बदली नीति के तहत पाठ्यपुस्तकों से रजिया सुल्तान तथा मुहम्मद बिन तुगलक जैसे शासकों से संबंधित पाठ को हटा दिया गया है. जब महाराष्ट्र कर रहा है तो मध्यप्रदेश और राजस्थान क्यों पीछे रहते. करीब तीन वर्ष पहले राजस्थान के तीसरे स्तर के इतिहासकार ने फतवा जारी किया था कि अकबर की सेना के साथ हुए युद्ध में राणा प्रताप विजयी हुए थे. उन्हें पराजित दिखाना वामपंथी इतिहासकारों की चाल है. राज्य के शिक्षामंत्री वासुदेव देवनानी को मानो बैठे-बैठाए एक मुद्दा मिल गया. उन्होंने यह कहकर, ‘अकबर या प्रताप में से एक ही महान हो सकता है. हमारे लिए महान महाराणा प्रताप हैं’—इतिहास को अपने हिसाब से मोड़ने का निर्णय ले लिया है. पाठ्यक्रम में बदलाव से पहले सरकार मामले को ‘हिस्ट्री बोर्ड आफ स्टीज’ के पास भेजकर खानापूर्ति कर लेना चाहती है. मामला केवल निचली कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा. ‘फर्स्ट पोस्ट’ की एक रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान विश्वविद्यालय ने इतिहास की पुस्तकों में चंद्रशेखर शर्मा का एक लेख ‘राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप’ शामिल किया गया है. संघ के विचारक दीनानाथ बत्रा की पुस्तकों को उच्च अध्ययन के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में मान्यता देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

इतिहास के फेरबदल का मामला केवल पाठ्यपुस्तकों सीमित नहीं है. दूरदर्शन और फिल्में भी उसका निशाना बनती आई हैं. हालिया उदाहरण सुभाष घई की फिल्म है, जिसे वे फिल्म की नायिका ‘पदमावती’ के नाम से रिलीज करना चाहते थे. मगर फिल्म को देखे बिना ही करणी सेना बिदक गई. फिल्म में पदमावती को अलाउद्दीन खिलजी के आगे नाचते हुए दिखाना उसके नेताओं को राजपूती आन-बान-शान के विरुद्ध लगा. वे दल-बल सहित आंदोलन पर उतर आए. देखते ही देखते सिनेमाघर, बसें, गाड़ियां फूंक दी गईं. रेल को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी की गई. ‘पदमावत’ में जायसी ने नायिका को काल्पनिक माना है. निर्माताओं ने पदमावती को काल्पनिक चरित्र दर्शाना चाहा, पर उन्हें संतोष न हुआ. आंदोलन राजस्थान की सीमाएं पार कर दूसरे राज्यों तक फैलता गया. पुलिस, प्रशासन, सरकार और विपक्ष मौन तमाशबीन बने रहे. फिल्म का नाम ‘पदमावत’ करने और कुछ दृश्यों के संपादन के बाद समझौता हुआ. अचानक माहौल शांत हो गया. करणी सेना उसे लेकर देश-भर में उत्पात मचाए थी, एकाएक फिल्म के समर्थन में आ गई. सिर्फ इसलिए नहीं कि उसमें अंबानी का पैसा लगा है, बल्कि इसलिए भी कि सती-प्रथा पर सवाल उठाने तथा स्त्री-विरोधी सिद्ध करने के बजाय, फिल्म परोक्षतः उसका महिमा-मंडन करती है. जिसे कुछ लोग आज भी राजपूती शान से जोड़कर देखते हैं.

दूरदर्शन धारावाहिक भी इतिहास के साथ छेड़छाड़ का माध्यम बनते आए हैं. पहले यह काम मुख्यतः मनोरंजन के वास्ते, कभी-कभी कथानक में नाटकीयता पैदा करने के लिए किया जाता था. इन दिनों उनका इस्तेमाल हिंदुत्व के औजार के रूप में किया जा रहा है, इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों को मन मुताबिक बदला जा रहा है. उदाहरण के लिए धारावाहिक ‘सोमनाथ’ पर चर्चा कर सकते हैं. राष्ट्रीयता की प्रचलित अवधारणा पश्चिम से आयातित है. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता की भावना ने लोगों को परस्पर जोड़ा था. संस्कृत ग्रंथों में भी ‘राष्ट्र’ का उल्लेख है, परंतु उसका संदर्भ एकदम अलग है. ‘सोमनाथ’ में राष्ट्रीयता की प्राचीन अवधारणा को, आधुनिक संदर्भ में, सांप्रदायिक उन्माद के साथ प्रस्तुत किया गया है.

लगता है, स्वाधीनता संग्राम में किसी प्रकार का योगदान न होने की कमी को भाजपा और संघ इतिहास की मनमानी व्याख्या द्वारा पाट देना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद उनके हौसले और भी बुलंद हैं. इतिहास में दखलंदाजी का खेल मूर्ति-स्थापना के बहाने भी खेला जा रहा है. महाराष्ट्र में शिवाजी और गुजरात में पटेल की मूर्ति विराट मूर्तियां लगवाने का फैसला लिया जा चुका है. एक कम चर्चित मगर महत्त्वपूर्ण मामला लखनऊ से है. वहां मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने आंबेडकर पार्क में राजा सुहेलदेव(995-1060 ईस्वी) की प्रतिमा लगाने की मांग की थी. जिसे राजनीतिक कारणों से तत्काल मान लिया गया था. इतिहास में सुहेलदेव का वर्णन नहीं है. पर्शियन लेखक अब्दुर्र रहमान चिश्ती सतरहवीं शताब्दी में किस्सागोई से भरपूर कृति ‘मिरात-ए-मसूदी’ में उसकी चर्चा करते हैं. सालार मसूद गजनी के सुलतान का भतीजा था. उसको प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का दोषी माना जाता है. गुजरात से दिल्ली, मेरठ होता हुआ वह बहराइच की ओर रहा था कि सुहेलदेव ने उसे चुनौती थी. राजा सुहेलदेव ने पड़ोसी राजाओं के साथ मिलकर संगठित सेना तैयार की. एक महीने तक चली लड़ाई में दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ. अंततः सालार मसूद युद्ध में घायल हुआ और वहीं चल बसा. उसका मजार बहराइच में है. जहां उसे ‘गाजी मसूद’ नाम से जाना जाता है. ‘मीराते मसूदी’ में सुहेलदेव को भर-थरू जाति से माना जाता है, जो राजपूतों की उपजाति है. लेकिन 1980 के आसपास सुहेलदेव को पासी राजा कहा जाने लगा. वहीं राजभर समुदाय भी सुहेलदेव के नाम पर एकजुट होने लगा. कहानी में सांप्रदायिक रंग घोलते हुए सुहेलदेव को ‘गौ-रक्षक’ बताया गया. हिंदुत्ववादी सालार मसूद को सोमनाथ के सूर्यमंदिर की मूर्ति को ध्वस्त करने का दोषी मानते हैं. जबकि मुस्लिम संप्रदायवादी उसे गाजी और शहीद का दर्जा देते है. इनमें कौन-सा पक्ष सही है, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार यह बता पाना संभव नहीं है. बीच संघ सालार मसूद की मजार पर भी अपना दावा ठोक चुका है. उसके अनुसार जहां मजार है, वह कभी ऋषि बालकराम का आश्रम था. फिरोज तुगलक ने आश्रम के स्थान पर मंदिर बनवा लिया है. इतने सारे विवादों में सुहेलदेव के प्रामाणिक इतिहास को गुम होना था, सो हो चुका है.

चलते-चलते सामान्य-सी जिज्ञासा. आखिर वे इतिहास में अतिक्रमण करना क्यों चाहते हैं? इतिहास की पुस्तकों में उल्टा-सीधा कुछ भी जोड़ देने से वर्तमान तो बदल नहीं जाएगा? इसके लिए हमें संस्कृति-निर्माण में इतिहास की भूमिका को समझना पड़ेगा. राजनीतिक दासता ज्यादा से ज्यादा कुछ दशक या पचास-सौ वर्षों की हो सकती है. परंतु सांस्कृतिक दासता सैकड़ों, हजारों वर्षों तक खिंचती जाती है. उससे उबरना आसान नहीं होता. जैसे भारत में ब्राह्मणवाद. वे इतिहास पर कब्जा करना चाहते हैं. ताकि संस्कृति को काबू में रख सकें. इसलिए वाल्तेयर भले ही इतिहास को झूठ कहे, पर उसकी महत्ता है. इतिहास हर हाल में लिखा जाना चाहिए. जार्ज आरवेल के शब्दों में—‘जो इतिहास को नियंत्रण में रखता है, वह भविष्य को नियंत्रण में रखता है. जो वर्तमान को नियंत्रण में रखता है, वही इतिहास को नियंत्रण में रख सकता है.’ आज जो लोग सत्ता मैं हैं, वे इतिहास की उलटगामी को भली-भांति समझते हैं. इसलिए जब वे सत्ता-बाहर हों, तब भी झूठ-पुराण गढ़ते रहते हैं.

स्थितियां एक बार फिर उनके नियंत्रण में है. सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए वे इतिहास बदलने पर उतारू हैं. वे हमारे इस भ्रम को बनाए रखना चाहते हैं कि शासक होना उनका जन्मजात गुण है. एलफिंस्टिन का कथन कि ‘भारत का इतिहास सिकंदर के आक्रमण के बाद से आरंभ होता है और यही वह समय है जब भारत विदेशियों के संपर्क में आता है.’ उनके लिए अर्थहीन है. उन्हें झूठ का पहाड़ खडा करने में महारत हासिल है. मिथकों और गल्प-आख्यानों के माध्यम से वे काल्पनिक इतिहास को सिकंदर के आक्रमण से भी हजारों वर्ष पीछे तक ले जाते हैं. चूंकि उस समय उनकी उपलब्धियां नगण्य थीं, इसलिए हमारे मन-मस्तिष्क पर छाये रहने के लिए पुराणों और महाकाव्यों के माध्यम से पूरा मिथकीय भंडार हमारे आगे परोस देते हैं. फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे दोहराते चले जाते हैं. उस समय तक जब तक कि उनका गढ़ा गल्पशास्त्र हमें इतिहास जैसा दिखने न लगे. हम जानते हैं कि सिंधुवासियों को लिपि का बोध था. लेकिन उस दौर का ब्राह्मणों के लिखे के अलावा हमारे पास दूसरा कोई वाङ्मय नहीं है. कल्पना कीजिए आज से 3000-3500 वर्ष पहले, उस समय के आर्यों के चाल-चलन को देखते हुए, ऋग्वेद के उन गीतों को सुनकर जिनमें इंद्र से पुरों को ध्वस्त करने की प्रार्थना बार-बार की गई है, सिंधु-सभ्यता के तत्कालीन उत्तराधिकारियों की प्रतिक्रिया कैसी रही होगी. हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. आक्रामक आर्यों को लेकर वे शब्द कदाचित यही रहे होंगे—‘घोर आत्ममुग्ध, उज्जड़, और अहंकारी.’

लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है, अथवा जैसा इतिहास पढ़ाने के लिए वे जी-जान से जुटे हैं, वर्तमान परिस्थितियों में अपनी ओर से क्या हम इस तरह की प्रतिक्रिया की कल्पना कर सकते हैं?

ओमप्रकाश कश्यप

बालक, समाज और शिक्षा

अभिजन समूह अपवाद से बचते हैं. उनकी कोशिश होती है कि उसे कम से कम चुनौतियों का सामना करना पड़े. यथास्थिति बनाए रखने के लिए वे नएनए तरीके आजमाते हैं. यह कोशिश जैसा कि ऊपर बताया गया है, समाजीकरण के नाम से, बचपन से आरंभ कर दी जाती है. धर्म का उत्तराधिकार के रूप में अंतरण, दुनिया के लगभग सभी देशोंसमाजों के बीच बनी मूक सहमति का नतीजा है. धार्मिक विश्वासों को लेकर दुनिया में टकराव होते हैं. आस्था के नाम पर रक्त बहाये जाते हैं. संवेदनशील लोग उससे आहत होते हैं. मनुष्य की आस्था उसके विवेक से संतुलित हो, इसकी कोशिश धर्म केंद्रित समाजों में नहीं की जाती. न व्यक्ति को छूट दी जाती है कि वह अपने धर्म का चयन वयस्क होने के बाद अपने विवेकानुसार कर सके. दरअसल आस्था के कारोबार में लगे लोग भलीभांति जानते हैं कि धर्म का उत्तराधिकार में अंतरण बंद हो जाए तो उसका महत्त्व उस जर्जर खटोले जितना रह जाएगा जिसे कोई परिवार वुजुर्गों की पुरानी यादें सहेजने के लिए संभाले रखता है.

शैश्वावस्था में बुद्धि संश्लेषणात्मक होती है. शिशु अपने परिवेश से सूचना जुटाने में लगा रहता है. उसे सूचनाओं की प्रकृति तथा उनके अंतर्संबंधों की समझ नहीं होती. न ही वह तथ्यों की विवेचना में समर्थ होता है. फिर भी वस्तुजगत के प्रति उसके अवचेतन में तीव्र आकर्षण होता है. दिमाग की कोरी सलेट पर वह तेजी से सूचनाएं दर्ज करता चला जाता है. परिवेश को जानने की उसकी अव्यक्त इच्छा बड़ों से कई गुना प्रबल होती है. तीन वर्ष तक पहुंचतेपहुंचते बालक का कौतूहल अत्यंत तीव्र हो जाता है. तब तक वह मातापिता की भाषा सीख चुका होता है. कुछ शब्द उसके ज्ञानभंडार की शोभा भी बढ़ाने लगते हैं. भाषाबोध उसे परिवेश का मूकदृष्टा नहीं रहने देता. उसकी मदद से बालक की जिज्ञासा फलीभूत होकर ज्ञान में ढलने लगती है. भाषा न केवल बालक के चिंतनसामथ्र्य को निखारती है, अपितु प्रतीकों के माध्यम से उसका मार्गदर्शन भी करती है. उसकी मदद से बालक अपने आसपास के लोगों तथा स्वयं से संवाद करने में सक्षम हो जाता है. फलस्वरूप उसमें परिवेश में हस्तक्षेप करने की कला विकसित होने लगती है.

वस्तुओं के बीच संबंध खोजने की शुरुआत उम्र के पहले वर्ष से हो जाती है. बालक चलअचल में अंतर करने लगता है. उसका प्रभाव संबंधों की प्रकृति पर भी पड़ता है. गायभैंस दूध देती हैं तो उनके बच्चों से प्यार करना, बंदर घुड़की देता है तो उसे देखते ही मुक्का तानना या डंडा उठा लेना—ये क्रियाएं बालक देखतेदेखते सीख जाता है. ढाईतीन वर्ष का बालक परिवेश का सजग दृष्टा होता है. एक वैज्ञानिक की भांति जिज्ञासु और तटस्थ. जिज्ञासापूर्ति के लिए वह मातापिता के आगे नितनए प्रश्न उठाता है. वस्तु सीधी पहुंच में हो तो वह उसके बारे में प्रश्न करने की जहमत नहीं उठाता, बल्कि खुद पड़ताल करने बैठ जाता है. बालक का तीव्र कौतूहल कभीकभी अभिभावकों की चिंता का रूप ले लेता है. जबकि खिलौने के अंगप्रत्यंग को हिलाडुलाकर देखना, उसके साथ तोड़फोड़ करना, गली में चुपचाप बैठे कुत्ते पर कंकड़ उठाकर फेंकना या डंडा उठाकर मारने के प्रयास, हमेषा ध्वंसात्मक वृत्ति का परिचायक नहीं होते. बालक का सहज कौतूहल उसके मूल में होता है. कुत्ते के निकट आने पर मातापिता समझाते हैं, ‘दूर रहो, काट लेगा.’ मातापिता बालक के प्रथम गुरु, मित्र और हितैषी हैं, इसलिए वह मान जाता है. मगर पूरी तरह नहीं. जो बताया गया है, उसे वह स्वयं अनुभव करना चाहता है. इसी सहजभाव से बालक के ज्ञानार्जन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है.

बालक की शरारतें जिन्हें बड़े प्रायः उसका बचपना कहकर नजरंदाज कर देते हैं, उसकी प्रबोधन प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं. ऐसी गतिविधियां बालक के भीतर उभरते आत्मविश्वास, परिवेशचेतना, कौतूहल तथा ज्ञानार्जन की उत्कट इच्छा को दर्शाती हैं. होना तो यह चाहिए कि मातापिता और परिजन बालक की शोधवृत्ति का सम्मान करें. मौलिकता की खोज में उसके सहायक बनें. परंतु यहां समाज के अपने विश्वास 8और परंपराएं आड़े आने लगती हैं. समाज अपनी संस्कृति और रीतिरिवाजों में जीता है. उसे सदैव यह भय सताए रहता है कि लीक से हटते ही उसके अस्तित्व पर बन आएगी. अपनी भौतिक आवश्यकताओं के लिए बालक मातापिता पर निर्भर होता है. इसलिए उनके आग्रहों की उपेक्षा उसके लिए संभव नहीं होती. इसके बावजूद वह अपनी स्वतंत्रता को लेकर बेहद सतर्क रहता है. परिणामस्वरूप समाजीकरण की प्रक्रिया और बालक की चेतना का अघोषित टकराव उसके प्रबोधनकाल से ही आरंभ हो जाता है.

अपने व्यक्तित्व के प्रति पूर्णतः सजग बालक नहीं चाहता कि उसके मातापिता ज्ञानार्जन तथा अनुभव संचयन की कोशिशों में बिना उसकी इच्छा के हस्तक्षेप करें. इससे उसका व्यक्तित्व आहत होता है. वह चाहता है कि मातापिता और परिजन उसकी स्वातंत्र्यचेतना का सम्मान करें. दूसरी ओर मातापिता और परिजन कामना करते हैं कि बालक जल्दी से जल्दी बिना किसी संदेह और प्रश्नाकुलता के, अपनी सामाजिक परंपराओं, रीतिरिवाजों और मर्यादाओं को समझने लगे. इसके लिए उसे समयसमय पर अनेक संस्कारों, जिन्हें समाज पवित्र मानकर अपनी धार्मिकसांस्कृतिक पहचान के रूप में सहेजे रखता हैसे गुजारा जाता है. इसके कुछ अच्छे परिणाम आते हैं. बालक का आत्मविश्वास बढ़ता है. सामाजिक संबंधों, रीतिरिवाजों के प्रति उसकी समझ में इजाफा होता है. नुकसान यह होता है कि उसकी प्रश्नाकुलता मिटने लगती है. कौतूहल पर थोपे गए पूर्वाग्रह हावी हो जाते हैं. बालक बिना किसी शंकासंदेह के सामाजिक मर्यादाओं को अपनाए, उनका अनुपालन करे, यह मातापिता के लिए उसके अच्छेपन की कसौटी होती है. इसलिए वे बारबार परंपरा और संस्कृति की दुहाई देते हैं.

चारपांच वर्ष का बालक औसतन 450 प्रश्न प्रतिदिन अपने अभिभावकों से करता है. समाज में इतना ताव नहीं होता कि वह बालक की जिज्ञासाओं के आवेग को सह सके. इसलिए उसे अवमंदित करने के प्रयास उसके बचपन से ही शुरू कर दिए जाते हैं. नन्हे शिशु के रूप में अपने भाई या बहन को देखकर बालक मां से पूछता है कि वह कहां से आया है? मातापिता का रटारटाया उत्तर होता है‘भगवान के घर से.’ यदि बालक पूछे कि भगवान कौन है? तब दीवार पर टंगी तस्वीर या आले में रखी मूर्ति दिखाकर उसकी जिज्ञासा का शमन करने की कोशिश की जाती है. बालक प्रायः मान लेता है. इसलिए कि वह अपने मातापिता पर भरोसा करता है. दूसरे उस उम्र तक शब्दों की, वाक्यों की एकदो कड़ी से लंबा सोचने का अभ्यास उसे नहीं होता. जब तक उसमें प्रवीण होता है, तब तक संस्कारीकरण की कोशिश सफल हो चुकी होती है. बालक की मेधा अपनी स्वतंत्र राह छोड़, बंधीबंधाई लीक का अनुसरण करने लगती है.

दोष मातापिता का भी नहीं होता. निस्संदेह वे वही कर रहे होते हैं, जो उन्हें उनके बचपन में सिखाया गया था. अज्ञानतावश वे बालक पर उन मान्यताओं और रूढ़ियों को थोपते चले जाते हैं, जिनके आधार पर वे और उनके पूर्वज असमानता और शोषण के शिकार होते आए हैं. परंपरा के प्रति अतिशय लगाव सामाजिक गतिशीलता में ठहराव को जन्म देता है. अप्रासंगिक हो चुकी रूढ़ियों के प्रति मातापिता के दुराग्रह, जिसे उनकी अज्ञानता भी कहा जा सकता है, बालक के विवेकीकरण की प्रक्रिया पर असमय विराम लगा देते हैं.

मातापिता सोचते हैं, सुखशांति, मानसम्मान और भविष्य के लिए निर्धारित मर्यादाओं का पालन अपरिहार्य है. उसके बिना उनकी पहचान अधूरी होगी. इस कारण वे सन्तान को ऐसे किसी भी आचरण से दूर रखना चाहते हैं, जो सामाजिक अपवाद का कारण बने तथा जिससे परिवारसंस्था के भविष्य पर खतरा उत्पन्न हो. यह प्रवृत्ति बालक के मन में अंतद्र्वंद्वों को जन्म देती है. समाज द्वारा दी गई शिक्षा तथा बालक के अपने अनुभवों का विरोधाभास उसे कदमकदम पर चौंकाता है. समाज इसे नजरंदाज करता जाता है. बालक जैसेजैसे बड़ा होता है, स्वाभाविक रूप से भिन्न मान्यताओं वाले समाजों और व्यक्तियों के संपर्क में आता है. उस समय उसके मन में किसी प्रकार का हीनताबोध, संदेह, अविश्वास पैदा न हों, इसके लिए तरहतरह के इंतजाम किए जाते हैं. अपने धर्म, अपनी जाति तथा अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ बताना, आस्था और विश्वास के आगे ज्ञानविज्ञान और तर्क की अवहलेना तथा धार्मिकसांस्कृतिक रूढ़ियों के प्रति दुराग्रही बने रहने की शिक्षाजैसे उपाय लगभग सभी समाजों में करीबकरीब एक तरह से किए जाते हैं. हिंदू समाज में तो धर्म के अलावा जाति की फांस भी है, जिसके माध्यम से बालक के दिलोदिमाग को छुटपन से ही जकड़ लिया जाता है.

सभ्यता के मामले में अगड़ापिछड़ा हर समाज अपनी संस्कृति को श्रेष्ठतम मानता है. दावा करता है कि उसकी संस्कृति में उसके सभी सदस्यों की समान सहभागिता है. अधिकारों का न्यायपूर्ण वितरण है. यह अतिरेकी विश्वास संस्कृति को ईश्वरीय वरदान मानने की प्रेरणा जगाता है. इससे धर्म स्वतः संस्कृति के केंद्र में आ जाता है. एक बार केंद्र में आने के बाद वह शिक्षा, उत्पादन पद्धति, सामाजिक संबंध आदि सभी को अपने अनुरूप ढालने लगता है. धर्म खुद को नैतिकता के स्रोत के रूप में पेश करता है. जबकि उसकी उसकी मूल संरचना सामंतवादी लक्षणों से युक्त होती है. समाज में व्याप्त असमानता को वह व्यक्ति की नियति का नाम देता है. तथा उसके समाधान हेतु ईश्वरीय अनुकंपा को जरूरी मान लेता है. उसके प्रभाव में व्यक्ति मिथकों की दुनिया में जीने लगता है. उसके संघर्ष भावना कमजोर पड़ती है. नियति पर अत्यधिक भरोसा बालक को समझौतावादी बना देता है.

शिक्षा का उद्देश्य बालक को उपलब्ध ज्ञानसंपदा से परचाने के साथ उसके प्रबोधन सामर्थ्य को बढ़ाना है. यह काम बालक की प्रश्नाकुलता को बढ़ाए बिना संभव नहीं है. उचित यही है मातापिता बालक पर अपना धर्म, आस्था और विश्वास थोपने से बाज आए. धर्म के चयन का मामला बड़ा होने तक बालक के विवेक पर छोड़ दिया जाए. लेकिन असमानताग्रस्त समाजों में शिक्षा शीर्षस्थ वर्गों के स्वार्थ को ध्यान में रखकर गढ़ी जाती है. भारतीय समाज इसका उदाहरण है. प्राचीन भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा में अंतर होता था. ब्राह्मण बालक अपनी रुचि और गुरु की आज्ञा के अनुसार कुछ भी सीखने को स्वतंत्र होता था. जबकि वैश्य और क्षत्रिय को उनके कार्य के अनुसार शिक्षा दिए जाने का विधान था. शूद्र का काम चूंकि आज्ञापालन तक सीमित था, इसलिए उसके लिए किसी भी प्रकार की शिक्षा निषिद्ध थी. यदि वह अपने अध्यवसाय से कुछ सीखना चाहे तो उसपर भी नियंत्रण था. नतीजा यह हुआ कि समाज का बड़ा हिस्सा अधिकार एवं आत्मसम्मान की लड़ाई में पिछड़ता गया. दूसरी ओर शीर्षस्थ वर्ग खुद को निरंतर मजबूत करने में लगा रहा.

आजादी के समय देश के पुननिर्माण की जिम्मेदारी थी. इसलिए शिक्षा का स्वरूप बहुआयामी था. उसमें प्रौद्योगिकी, चिकित्सा के अलावा ज्ञानसंपदा से जुड़े सभी विषयों के अध्यापन का ध्यान रखा गया था. अस्सी के दशक तक महसूस किया जाने लगा था कि केवल कृषि के भरोसे समाजार्थिक चुनौतियों से निपटना आसान नहीं है. बढ़ती जनसंख्या के कारण बेरोजगारी बढ़ी थी. उसके समाधान हेतु औद्योगिक विकास पर जोर दिया जाने लगा. धीरेधीरे ज्ञानकेंद्रित शिक्षा के स्थान पर रोजगारमूलक शिक्षा का प्रत्यय लोगों के दिलोदिमाग पर छाता चला गया. जगहजगह आईटीआई, पाॅलिटेक्नीक खुलने लगे. उनका लाभ हुआ. उद्योग जगत में रोजगार के अवसर बढ़ने लगे. इकीसवीं शताब्दी तक पूरी दुनिया में डिजीटल क्रांति हो चुकी थी. स्वचालित मशीनों के आविष्कार से उद्योगों की मानवश्रम पर निर्भरता तेजी से घटी थी. बढ़े उत्पादन को खपाने के लिए बाजार को नए किस्म के प्रबंधकों तथा बिक्री एजेंटों की आवश्यकता थी. उसकी आपूर्ति के लिए निजी संस्थानों के माध्यम से प्रबंधन स्तर की शिक्षा दी जाने लगी. परिणामस्वरूप शिक्षा, जिसका प्रथम ध्येय मनुष्य का विवेकीकरण करना है, प्रबंधन का विषय मान ली गई. देखते ही देखते खरपतवार की तरह ऐसे शिक्षण संस्थान खुल गए जिनके लिए शिक्षा मात्र उत्पाद थी, विद्यार्थी महज उपभोक्ता. यह सब सोचीसमझी नीति के तहत किया जाता है. ऐसी ही कोशिश आज भी जारी है.

अभिजन समूह अपवाद से बचते हैं. उनकी कोशिश होती है कि उसे कम से कम चुनौतियों का सामना करना पड़े. यथास्थिति बनाए रखने के लिए वे नएनए तरीके आजमाते हैं. यह कोशिश जैसा कि ऊपर बताया गया है, समाजीकरण के नाम से, बचपन से आरंभ कर दी जाती है. धर्म का उत्तराधिकार के रूप में अंतरण, दुनिया के लगभग सभी देशोंसमाजों के बीच बनी मूक सहमति का नतीजा है. धार्मिक विश्वासों को लेकर दुनिया में टकराव होते हैं. आस्था के नाम पर रक्त बहाये जाते हैं. संवेदनशील लोग उससे आहत होते हैं. मनुष्य की आस्था उसके विवेक से संतुलित हो, इसकी कोशिश धर्म केंद्रित समाजों में नहीं की जाती. न व्यक्ति को छूट दी जाती है कि वह अपने धर्म का चयन वयस्क होने के बाद अपने विवेकानुसार कर सके. दरअसल आस्था के कारोबार में लगे लोग भलीभांति जानते हैं कि धर्म का उत्तराधिकार में अंतरण बंद हो जाए तो उसका महत्त्व उस जर्जर खटोले जितना रह जाएगा जिसे कोई परिवार वुजुर्गों की पुरानी यादें सहेजने के लिए संभाले रखता है.

ऐसे में जो लोग सामाजिक परिवर्तन की कामना करते हैं, उन्हें बड़ों के साथसाथ बालक को भी अपनी उम्मीद के केंद्र में लाना होगा. बालक की जिज्ञासा, उसके कौतूहल और शिक्षा की मौलिकता की रक्षा करके सामाजिक परिवर्तन की नई राह तैयार की जा सकती है. उसमें परंपरा, संस्कृति और धर्म के लिए सिर्फ इतनी जगह होगी, जिससे बालक को यह एहसास दिलाया जा सके कि वह जिस समाज का सदस्य है उसका बड़ा हिस्सा उनपर विश्वास करता है. यह काम निरे बुद्धिवाद के भरोसे संभव नहीं है. परंतु बुद्धिवाद को नकारने के भी अपने खतरे हैं. विशेषकर बालक से संदर्भ में. इसलिए वौद्धिकता के साथ हम बचपन को भी सहेज सकें, इसी में हम सबकी जय है.

ओमप्रकाश कश्यप