डेविड रिकार्डो

[आधुनिक अर्थशास्त्र के निमार्ताओं में डेविड रिकार्डो का नाम अग्रणी है. एडम स्मिथ के विचारों को विस्तार देते हुए उसने सघन उत्पादन प्रणाली का समर्थन किया. रिकार्डो की प्रसिद्धि उसके मौलिक जनसंख्या सिद्धांत के कारण भी है. माल्थस से गहरी मैत्री के बावजूद उसके जनसंख्या वृद्धि के सिद्धांत जिसमे उसने जनसंख्या को विकास का प्रमुख अवरोधक माना है चुनौती देते हुए उसने उसके बहाने अपने दायित्वों से मुंह मोड़ने वाले बुद्धिजीवियों एवं राजनेताओं को उसने चुनौती दी. रिकार्डो की महत्ता इसमें भी है कि उसने अपने विचारों को बिना गणितीय पद्धति का सहारा लिए सरल शब्दों में व्यक्त किया है. ओमप्रकाश कश्यप]

डेविड रिकार्डो(अप्रैल 18, 1772 सितंबर 11, 1823) उन लोगों में से था, जो अपने ध्येय के प्रति निष्ठावान रहकर, जीवन के आरंभिक वर्षो में ही चामत्कारिक प्रसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, जो न केवल अपनी विलक्षण प्रतिभा के लिए समाज में सम्मान पाते हैं, साथ ही निरंतर अध्ययनमनन से बौद्धिकता के सतत सोपान चढ़ते हुए सफलता के शिखर तक जा पहुंचते हैं, जिनकी दृष्टि दूर तक देखने का सामर्थ्य रखती है, और जिनमें यह साहस होता है कि अपने सिद्धांतों के लिए अड़े रहकर, विरोधियों के समक्ष अपने दावे के पक्ष में अकाट्य तर्क प्रस्तुत कर सकें अथवा स्थितियों के अनुकूल होने तक प्रतीक्षा कर सकें, जो आवश्यकता पड़ने पर मनुष्यता के दूरगामी हितों को देखते हुए उनके लिए निःस्वार्थ संघर्ष छेड़ सकते हैं, जिनमें प्रवाह के विरुद्ध आगे बढ़ने तथा विरोधियों की परवाह किए बिना नए सिद्धांत गढ़ने लायक आत्मविश्वास होता है. ऐसे ही लोग कुछ नया कर पाते, गढ़ पाते हैं. मानवी मेधा ऐसी ही प्रतिभाओं से स्वयं को सम्मानितगौरवान्वित अनुभव करती है.

अर्थशास्त्र के आधुनिक सिद्धांतकारों में अग्रणी माने जाने वाले डेविड रिकार्डो (David Ricardo) का जन्म 18 अप्रैल 1772 (कुछ विद्वान रिकार्डो की जन्मतिथि 19 अप्रैल, 1772 मानते हैं) को लंदन में हुआ था. कुल सतरह भाईबहनों में रिकार्डो तीसरी संतान थे, परिवार पुर्तगाल के संपन्न यहूदियों में से था, जो रिकार्डो के जन्म से ठीक पहले नीदरलैंड से स्थानांतरित होकर इंग्लैंड पहुंचा था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा हालेंड में हुई. उसके तुरंत पश्चात, केवल चैदह वर्ष की अवस्था में रिकार्डो अपने पिता के साथ काम में जुट गया. उसके पिता लंदन स्टाॅक एक्सचेंज में काम करते थे. पिता के साथ कार्य करते हुए रिकार्डो ने व्यवसाय की बारीकियों को समझा. पूंजी की ताकत को पहचाना और उसे कमाने के लिए जरूरी जद्दोजहद का सामान्य ज्ञान प्राप्त किया. आगे चलकर जीवन का वह प्रारंभिक अनुभव रिकार्डो के बहुत काम आया. उसी ने उसके भीतर अर्थशास्त्र के प्रति जिज्ञासा पैदा की. इस दौरान रिकार्डो को बाजार और पूंजी के अंतरंग संबंधों को समझने में मदद मिली, जिससे उसका आत्मविश्वास भी बढ़ा. उसी के परिणामस्वरूप भविष्य में वह स्वयं को कुशल, दूरदृष्टा व्यवसायी और अच्छा वित्तीय प्रबंधक सिद्ध कर सका. भारतीय माइथा॓लाजी से यदि उदाहरण लिया जाए तो अपने जीवन में रिकार्डो की गिनती उन कामयाब महापुरुषों की जा सकती है, जिनपर लक्ष्मी के साथसाथ प्रज्ञा की देवी सरस्वती भी मेहरबान होती है.

यह सबकुछ इतना आसान भी नहीं था. रिकार्डो की कामयाबी के पीछे थी उनकी अलग विचारधारा, ज्ञान के प्रति ललक, खतरे उठाने की जिजीविषा, संकटकाल में धैर्यवान बने रहने एवं अपने विश्वासों पर दृढ़ रहने का गुण, जो उसमें युवावस्था से ही लक्षित होने लगा था. युवा रिकार्डो की धार्मिक मान्यताओं में खास आस्था नहीं थी. इकीसवें वर्ष में वह प्रिसिला एनी विलकिंसन(Priscilla -anne Wilkinson) के संपर्क में आया. प्रिसिला धार्मिक प्रचारक मंडली की सदस्य थी, उसकी मंडली का लक्ष्य शांति एवं अहिंसा का प्रचार करना था. ऐसी महिला से प्रेमसंबंध बढ़ाना, तत्कालीन धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध था. रिकार्डो का अपने परिवार के भीतर भी जबरदस्त विरोध हुआ. यहां तक कि उसको पैत्रिक संपत्ति के अलग कर दिया गया. रिकार्डो की मां तो इस फैसले पर उससे हमेशा नाराज रही. बावजूद इसके रिकार्डो अपने निर्णय पर अटल रहा. अपने परिवार से अलग होकर वह प्रिसिला के साथ रहने लगा. मां और बेटे में उसके बाद कभी बातचीत नहीं हो सकी.

उस समय तक रिकार्डो व्यवसाय के बारे में अच्छा अनुभव बटोर चुका था. उसने स्वतंत्र रूप से स्टा॓क ब्रोकर के रूप में कार्य करना आरंभ किया. कुछ ही वर्षों में अपनी प्रतिभा एवं लगन के दम पर वह अपने व्यवसाय को मजबूत स्थिति में ले आया. उसकी व्यावसायिक सूझबूझ और सफलता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि शूण्य से प्रारंभ करने वाले रिकार्डो की, मृत्यु के समय कुल संपत्ति, आज की कीमतों में सौ मिलियन डा॓लर से ऊपर थी. लगभग सताइस वर्ष की अवस्था (1799) में रिकार्डो के जीवन में परिवर्तनकारी मोड़ उस समय आया जब उसने एडम स्मिथ की चर्चित पुस्तक The Wealth of Nations का अध्ययन किया. उस समय वह बाथ के समुद्री तट पर पिकनिक मनाने के लिए गया हुआ था. पुस्तक ने उसको बेहद प्रभावित किया. उसको लगा कि उसको नया जीवन मिला हो. उस घटना के बाद उसकी अर्थशास्त्र में रुचि बढ़ने लगी. अगले दस वर्ष उसने अपने व्यवसाय की देखभाल के साथसाथ अर्थशास्त्र का गहन अध्ययनमनन करते हुए बिताए.

बैंथम और जेम्स मिल उसके गहरे मित्रों में से थे. वह अपनी अर्थशास्त्र विषयक जिज्ञासाओं के बारे में उन दोनों से विचारविमर्श करता रहता था. उनकी सुखवादी विचारधारा ने भी रिकार्डो को प्रभावित किया. बावजूद इसके अर्थशास्त्र पर अपना पहला आलेख उसने ठीक दस वर्ष पश्चात, लगभग 37 वर्ष की अवस्था में लिखा. इतना लंबा अंतराल दर्शाता है कि अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय पर लिखने से पहले उसने उसका विधिवत अध्ययन किया था. मौलिक सूझबूझ एवं विचारों की स्पष्टता के कारण कुछ ही वर्षों में रिकार्डो की गिनती सुखवादी विचारधारा के प्रमुख हस्ताक्षरों में होने लगी.

इस बीच स्टा॓क मार्केट में काम करते हुए रिकार्डो ने काफी संपत्ति एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी. अध्ययन में रुचि के कारण उसका अपने समय के चर्चित बुद्धिजीवियों से संपर्क भी बना हुआ था. जिनमें जेम्स मिल प्रमुख था. मिल के साथ वह अपने विचारों का आदानप्रदान भी करता था, बल्कि उसके आग्रह पर ही रिकार्डो ने अपनी पहली पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की थी. सन 1810 में रिकार्डो के एक लेख ने उसको अचानक चर्चा के केंद्र में ला दिया. उस लेख में रिकार्डो ने ‘स्वर्णमुद्रा संबंधी विवाद’ Bullionist Controversy को अपने विश्लेषण का विषय बनाया था. उस लेख को अप्रत्याशित चर्चा मिली, जिससे रिकार्डो को विद्वानों के बीच एक उदीयमान अर्थशास्त्री के रूप में मान्यता मिलने लगी.

किंचित विषयांतर का जोखिम उठाते हुए हम अपने पाठकों को बता दें कि ‘स्वर्ण मुद्रासंबंधी विवाद’ अथवा Bullionist Controversy के रूप में चर्चित विवाद का उदय, लंदन में उनीसवीं शताब्दी के बिलकुल प्रारंभिक वर्षों की घटना है. अठारहवीं शताब्दी तक इंग्लैंड के बैंकों में बैंकनोट्स के क्लीयरिंग की जो व्यवस्था थी, उसके अनुसार प्रत्येक बैंकनोट पर लिखा होता था कि वह नोट के बदले में संबंधित बैंक उसपर अंकित मूल्य के बराबर स्वर्ण देने की गारंटी देता है. यह लगभग ऐसी ही आश्वस्ति थी जैसी कि आजकल हम करेंसी नोटों पर लिखी हुई देखते हैं. मगर उन दिनों मुद्रा पर अंकित मूल्य का अभिप्राय उसपर उसके बदले में मिलने वाले स्वर्ण की मात्रा से था. तदनुसार उन दिनों के कानून के अनुसार पांच पाउंड के नोट को बैंक में जमा करके बदले में पांच पाउंड स्वर्ण प्राप्त किया जा सकता था.

स्का॓टलेंड बैंक इससे में किंचित बदली हुई व्यवस्था थी. वहां बैंकनोट्स पर कभीकभी यह भी लिखा होता था कि बैंक को कुछ खास परिस्थितियों में विनिमय को स्थगित करने का अधिकार होगा. इसके पीछे जो कारण थे उन्हें जानने के लिए अभी जरा धैर्य रखना होगा. खैर, स्का॓टलेंड की देखादेखी दूसरे बैंक भी वैसी ही व्यवस्था अपनाने के बारे में सोचने लगे थे. हालांकि बैंक कानूनी रूप से अंकित द्रव्यमान के तुल्य स्वर्ण का भुगतान करने को बाध्य थे, मगर वे अस्थायी रूप से भुगतान को स्थगित करने का अधिकार अपने हाथों में रखते थे; और जरूरी पड़ने पर उसका उपयोग भी करते थे.

परिस्थितियों को देखते हुए यह आवश्यक भी था. भारी मात्रा में अचानक स्वर्ण निकासी से बैंकों के दीवालिया घोषित होने के आसार बन जाते थे. ऐसी स्थिति से स्वयं को बचाने के लिए स्का॓टिश बैंक द्वारा स्वर्णभुगतान को लंबित करने का प्रावधान किया गया था. इसके पीछे बैंक का एक तर्क तो यह था कि संकटकाल में दुश्मन देश इस व्यवस्था के कारण कोई भी अंदरूनी संकट पैदा कर सकता है. दूसरे तर्क के अनुसार यह नियम अन्य प्रतिस्पर्धी बैंकों की निर्दयी चालों से बचाव के लिए बनाया गया था. उदाहरण के लिए मान लीजिए कि कोई बैंक अपने खजाने से कुछ बैंकनोट्स जारी करता है. दूसरे बैंक एक दुरनीति के अंतर्गत उन बैंकनोटों को, बैंक में तत्काल प्रस्तुत करने के बजाय उनको केवल जमा करते चले जाएं. फिर एक दिन अचानक सारे के सारे प्रतिस्पर्धी बैंक मिलकर, उस बैंक एक द्वारा जारी किए गए सारे के सारे नोट्स एक साथ भुगतान के लिए प्रस्तुत कर दें. उस समय यदि वह बैंक किसी कारणवश उन सभी नोट्स, पर अंकित मूल्य के तुल्य स्वर्णद्रव्यमान अदा करने में असमर्थ रहता है, तो उसको कानूनी रूप से दोषी माना जा सकता है. मामला कानून के चंगुल में फंसकर मामला और भी पेचीदा हो जाता था. उस अवस्था में बैंक के दिवालिया होने के साथसाथ देश की शांति एवं सुरक्षा को संकट पैदा हो सकता है. इसलिए कानून न होने के बावजूद स्का॓टिश बैंक द्वारा भुगतान स्थगित करने के नियम को सरकार की ओर से अनौपचारिक स्वीकृति प्राप्त थी. ऐसी घटनाएं कम ही सही, किंतु होती ही रहती थीं.

सन 1797 में अचानक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसने पूरे इंग्लैड की बैंकिंग व्यवस्था को चरमरा दिया. यही नहीं उस घटना के पश्चात स्वर्णमुद्रा में भुगतान की व्यवस्था पर भी उंगलियां उठने लगीं. उन दिनों फ्रांस एवं इंग्लैंड के बीच युद्ध जारी था. धनाभाव के कारण सरकार के सामने अचानक कोई मुश्किल न आए, इसलिए सरकार ने बैंकों से नकदी, विशेषकर स्वर्णमुद्रा के निकास पर रोक लगा दी. कागजी मुद्रा की कमी को रोकने के लिए सरकार ने नए नोट छापकर बाजार में उतारना प्रारंभ कर दिया. परिणामतः मुद्रा प्रसार बढ़ने लगा. तभी अचानक यह अफवाह फैल गई कि फ्रांसिसी सेनाएं इंग्लैंड पर हमला करने वाली हैं. इस अप्रत्याशित आपदा की सूचना से जनता में अफरातफरी मच गई. लोग नोटों के बदले में स्वर्ण लेने के लिए बैंकों की ओर दौड़ पड़े. अचानक हुई निकासी से बैंकों के सामने भुगतान की समस्या खड़ी हो गई. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने ‘बैंक आ॓फ इंग्लैंड’ द्वारा जारी नोटों के भुगतान के अल्पकालिक स्थगन के आदेश दे दिए.

चूंकि फ्रांसिसियों के हमले की बात महज एक अफवाह थी, अतः कुछ ही दिनों में उसका असर जाता रहा. बावजूद इसके सरकार ने बैंकनोटों के बदले स्वर्ण विनिमय की अनुमति नहीं दी. इसी के साथ स्वर्णमुद्रा में भुगतान की व्यवस्था भी विवादों के घेरे में आ गई. अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग उस व्यवस्था के विरोध में था, जबकि दूसरा वर्ग उसको यथावत बनाए रखने पर जोर दे रहा था. लोग इस पर भी दबाव डाल रहे थे कि यदि सरकार बैंकनोट्स के बदले स्वर्णविनिमय को तैयार नहीं है, तो उसे क्षतिपूर्ति के लिए नोट्स के बदले मिलने वाले स्वर्ण के मूल्य से अधिक के नोट्स उनके प्रदाताओं को देने चाहिए. आर्थिक संकट में फंसी हुई सरकार इसके लिए भी सहमत नहीं थी. क्योंकि इससे बाजार में मुद्रा प्रसार जरूरत से अधिक हो जाने का खतरा था, जिसका परिणाम गंभीर मुद्रासंकट के रूप में होता. पूरे मामले पर बुद्धिजीवियों में बहस चल रही थी. जा॓न व्हीटले तथा रिकार्डो जैसे अर्थशास्त्रियों का मानना था कि मुद्रा अवमूल्यन से बचाव के लिए सरकार को बैंकिग नोट्स के बदले स्वर्णभुगतान की नीति को दुबारा लागू कर देना चाहिए. जबकि दूसरा वर्ग उस तरह के संकट से दुबारा गुजरने को हरगिज तैयार न था.

इंग्लैंड में आए वित्तीय संकट की समीक्षा करते हुए रिकार्डो ने लिखा था कि वह वित्तीय संकट जिसके कारण देश को मुद्रा अवमूल्यन के कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है, ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों की देन है. उसने साफसाफ लिखा कि वह सरकार की अदूरदर्शिता थी, जिसके कारण वह संकट उत्पन्न हुआ और सरकार उसका सामना कर पाने में असमर्थ रही है. रिकार्डो का लेख The High Price of Bullion: Proof of the Depreciation of Bank Note सन 1809 में उस समय के चर्चित पत्र Morning Chronicle में प्रकाशित हुआ. अंत में स्थिति पर विचार करने के लिए इंग्लैंड की संसद ‘हाउस आफ का॓मंस’ ने 1819 में एक समिति का गठन किया गया, जिसने रिकार्डो के विचारों को ध्यान में रखते हुए बैंकों पर से प्रतिबंध उठा लेने की अनुशंसा की. विश्वस्तर पर चर्चित इस घटना ने रिकार्डो को एक विद्वान अर्थशास्त्री के रूप में प्रतिष्ठित करने का कार्य किया.

रिकार्डो के इन विचारों ने उसे चर्चा में ला दिया. सरकार की ओर से उसको संसद की सदस्यता देकर सम्मानित किया गया. ध्यातव्य है कि रिकार्डो ने राजनीति में प्रवेश अपने मित्र और समर्थक जेम्स मिल के आग्रह पर किया था. संसद सदस्य के रूप में तो वह बहुत सक्रिय नहीं रह पाया, लेकिन एक अर्थशास्त्री के रूप में उसकी प्रसिद्धि उत्तरोत्तर बढ़ती चली गई. लगभग उन्हीं दिनों प्रकाशित एक और आलेख ने रिकार्डो की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने का कार्य किया. किंतु रिकार्डो को एक विचारक अर्थविज्ञानी के रूप में प्रसिद्धि दिलाने वाला लेख थाEssay on the Influence of a Low Price of Corn on the Profits of Stock इस लेख में उसने कुछ मौलिक स्थापनाएं की थीं, जिनमें उसने तर्क देते हुए स्पष्ट किया था कि अनाज के आयात पर लगाया गया अतिरिक्त शुल्क ही उसकी अप्रत्याशित मूल्यवृद्धि का जनक है. इस मूल्यवृद्धि का परिणाम बड़े किसानों को लाभ पहुंचाना और समाज में वर्गीय अंतर को बढ़ावा देने वाला है. लेख में रिकार्डो ने तुलनात्मक मूल्य(Comparative Costs) की अवधारणा को जन्म दिया था.

आधुनिक अर्थविज्ञानियों के बीच उसके सिद्धांत को तुलनात्मक लाभ (Comparative -dvantage के नाम से जाना जाता है. अपने लेख में रिकार्डो ने उन अर्थशास्त्रियों का तर्कपूर्ण विरोध किया था जो अनाज के आयात पर प्रतिबंध का समर्थन कर रहे थे. उसने जोर देकर कहा था कि यदि कोई उत्पाद विदेश में कम मूल्य पर उपलब्ध है तो उसका अपने देश में निर्माण करने के बजाय, आयात करना ही लाभप्रद होगा. क्योंकि उस अवस्था में बचे हुए संसाधनों का उपयोग अन्य उत्पादक कार्यों के लिए किया जा सकता है. अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उसने कई तर्क भी दिए. रिकार्डो का यही सिद्धांत आधुनिक मुक्त व्यापार की विचारधारा का जनक सिद्ध हुआ है.

अपने तुलनात्मक मूल्यों के सिद्धांत’ को रिकार्डो ने एक उदाहरण द्वारा समझाने का प्रयास किया है

उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान किसी एक स्थायी संसाधन के साथ जितने अधिक संसाधन जुड़ते जाते हैं, लाभांश में उतना ही ह्नास होता जाता है.’

आज के जमाने में सामान्य दिखने वाला यह सिद्धांत अठारहवीं और उनीसवीं शताब्दियों में पूंजीवाद का समर्थक सिद्धांत बना. उसके बाद तो रिकार्डो की गिनती देश के चोटी के अर्थशास्त्रियों में होने लगी थी.

रिकार्डो मुक्त व्यापार का समर्थक था. उसने उन अर्थशास्त्रियों का विरोध किया था जो अनाज के आयात पर प्रतिबंध का समर्थन कर रहे थे. अपने तुलनात्मक मूल्यों के सिद्धांत’ को रिकार्डो ने एक उदाहरण द्वारा समझाने का प्रयास किया है

मान लीजिए कि किसी पिछड़े हुए देश के कारीगरों को एक बोतल सिरका बनाने के लिए पांच घंटे श्रम करना पड़ता है. जिसके लिए उन्हें प्रत्येक दस घंटे में डबल रोटी का एक पैकेट चाहिए. दूसरी ओर संपन्न देश के कारीगर अपेक्षाकृत अधिक उत्पादनसामथ्र्य रखते हैं. वे एक बोतल सिरका बनाने में मात्र तीन श्रमघंटे लगाते हैं. लेकिन उन्हें इसके लिए हर घंटे डबलरोटी के एक पैकेट की जरूरत पड़ती है. सरसरी निगाह डालने पर तो आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि संपन्न देश के कारीगर चूंकि एक बोतल सिरका बनाने में अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम समय लेते हैं, इसीलिए उनका उत्पादन समार्थ्य अधिक है.

लेकिन जरा सोचिएसंपन्न देश के कारीगर हालांकि एक बोतल सिरका बनाने में तुलनात्मक रूप से कम समय लेते हैं. उनके मुकाबले पिछडे़ हुए देश के कारीगर अधिक श्रमघंटे लगाते हैं. लेकिन प्रति बोतल डबल रोटी की खपत के हिसाब से देखा जाए तो एक बोतल सिरका के निर्माण के लिए वे केवल आधी पैकेट डबलरोटी से काम चला लेते हैं. जबकि उनके प्रतिस्पर्धी यानी संपन्न देश के कारीगरों को उतना ही सिरका बनाने के लिए कम से कम तीन पैकेट डबलरोटी चाहिए. साफ है कि पिछड़े देश में एक बोतल सिरका बनाने में आई लागत, श्रमघंटों के आधार पर, संपन्न देश की अपेक्षा महंगी है. मगर उत्पादन लागत के आधार पर वह संपन्न देश के मुकाबले एक तिहाई है. पिछड़े देश में एक पैकेट डवलरोटी के खर्च पर दो बोतल सिरके का निर्माण किया जा सकता है. दूसरी और संपन्न देश में एक बोतल सिरका बनाने में तीन पैकेट डवलरोटी खर्च होती है. इस आधार पर पिछड़े देश में सिरका बनाना संपन्न देश के सापेक्ष सस्ता पड़ेगा और वहां पर उद्यम लगाना संपन्न देश के सापेक्ष लाभ की स्थिति में रहेगा.

यदि एक पैकेट डबलरोटी के बदले एक बोतल सिरके का आदानप्रदान करने की नीति पर अमल किया जाए तो संपन्न देश को जहां एक तिहाई खर्च पर सिरके की बोतल प्राप्त हो सकेगी वहीं पिछड़े देश को भी तीन गुनी मजदूरी की आमद होगी. यदि इसी प्रयोग को लंबे समय तक चलाया जाए तो संपन्न देश डबलरोटी बनाने के काम में पारंगत हो जाएंगे तो दूसरी ओर पिछड़ा देश सिरका बनाने में. लगातार काम करते हुए यह भी संभव है कि वे अपने यहां की स्थितियों के अनुकूल और भी परिष्कृत तकनीक का विकास करने में सफल हो जाएं. इस तरह संपन्न देश तथा पिछड़ा हुआ देश दोनों ही लाभ में रहेगे. भले ही वे आपस में अपनेअपने उत्पाद का पारस्पिरिक व्यापार ना करें. क्योंकि पिछड़ा देश एक बोतल सिरका बनाकर एक डवलरोटी का पैकेट जुटा सकता है. इसलिए अपनी बाकी श्रमशक्ति को वह दूसरे कमाऊ कार्यो में लगा सकता है. इसी प्रकार संपन्न देश भी अपनी श्रमशक्ति का उपयोग अन्य कमाऊ कार्यों के लिए करके अपनी आर्थिक स्थिति को और अधिक सुदृढ़ बना सकता है. अथवा अतिरिक्त व्यापार का प्रयोग अपनी आर्थिक संपन्नता को संपन्न बनाने के लिए कर सकता है. साफ है कि इससे जहां संपन्न देश को अतिरिक्त मात्र में सिरका मिलने की आश्वस्ति होगी, अतः गरीब पिछड़ा हुए देश भी अधिक सिरका का निर्माण कर मुनाफा कमा सकता है.’

यह पद्धति रिकार्डो का निष्कर्ष कही जा सकती है. आधुनिक उदारवादी विचारक के रूप में रिकार्डो का मत आज सबसे अथिक उपयोगी सिद्ध हो रहा है. मुक्त अर्थव्यवस्था की आधारभूत मान्यताओं पर रिकार्डो के विचार आज भी खरे हंै. बचत करना भी एक सरकारी योजना का अनुपालन करना है. लेकिन बचत करना भी एक प्रकार से लाभ में वृद्धि करना है. अतः इस नीति के अंतर्गत परस्पर व्यापार करने का लाभ दोनों ही पक्ष उठाते सकते हैं.

वैचारिकी

रिकार्डो आधुनिक अर्थशास्त्रियों में सबसे अग्रणी स्थान रखते हैं. उन्होंने श्रम के वर्गीकरण एवं उसके ट्रांसफर को आधार मानकर अपने आर्थिक सिद्धांत विकसित किए हैं. उसका ज्ञान व्यावहारिक स्रोतों से विकसित हुआ था. अतः वह प्रयोगों एवं तर्कों की कसौटी पर अधिक विश्वसनीय माना गया. तभी तो रिकार्डो की अर्थशास्त्र के क्षेत्र में की गई स्थापनाएं अधिक विश्वसनीय तथा प्रामाणिक मानी जाती हैं. यहां एक और बेहद महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि रिकार्डो ने अपने सिद्धांतों को प्रस्तुत करते समय, जटिल गणितीय फार्मूलों का प्रयोग कम से कम किया है. जेम्स मिल जो स्वयं रिकार्डो के परिवार में किरायेदार था, रिकार्डो की विचारधारा से बेहद प्रभावित था. रिकार्डो के साहित्य की महत्ता एवं कार्य को लेकर की गई डेविड फ्राइडमेन की टिप्पणी बहुत ही सटीक बन पड़ी है. वह लिखता है कि

रिकार्डो के अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों को पढ़ते हुए आधुनिक इतिहासकार स्वयं को एक ऐसी टीम का सदस्य अनुभव करता है, जो ऐवरेस्ट पहाड़ पर चढ़ी जा रही हो. और जिसने पहाड़ की चोटी को छूने से पहले जबरदस्त बादलों का सामना मात्र एक टीशर्ट और टेनिस के जूते पहनकर किया हो.’

यह टिप्पणी अपने आप में एक रिकार्डो के चिंतन की व्यावहारिकता तथा उसके अनुभवों की प्रामाणिकता को दर्शाने के लिए पर्याप्त है. जटिल सिद्धांतों की व्याख्या बिना गणितीय जटिलता के करना एक सराहनीय काम था. जिसके लिए आधुनिक सिद्धांतकारों ने उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की है.

अपने प्रेरणास्रोत एडम स्मिथ की भांति रिकार्डो भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि उत्पादों पर नियंत्रण के विरोधी थे. वह मुक्त आयातनिर्यात की नीति के समर्थक थे. रिकार्डो का कहना था कि कृषि उत्पादों पर कर लगने से कम उपजाऊ भूमि पर खेती करने की प्रवृत्ति बढ़ती है. दूसरी आय कम होने से सरकार और जमींदार लगान में वृद्धि करते जाते हैं. जिससे जमींदारों तथा भूस्वामियों के लाभ में निरंतर वृद्धि होती जाती है. विडंबना यह है कि जमींदारों तथा भूस्वामियों की आय का बड़ा हिस्सा उपयोगी निवेश के स्थान पर विलासिता के कार्यों में प्रयुक्त होता है. इससे ना तो राष्ट्र को लाभ होता है ना ही समाज के उस वर्ग को अपने केवल श्रम के माध्यम से जीवनयापन करता है.

1817 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘दि प्रंसिपिल्स आ॓फ पा॓लिटिकल इका॓नामी एंड टेक्सेसन’ में रिकार्डो ने किसानों, जमींदारों, मजदूरों एवं पूंजीपतियों के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर विश्लेषण प्रस्तुत किया है. उसने स्पष्ट किया कि आवश्यक वस्तुओं की कीमत उनके निर्माण में लगने वाले श्रम और उत्पादन लागत में जुड़ने वाले ऊपरी खर्चों द्वारा निर्धारित होती है. व्यावसायिक लाभ आमतौर पर मजदूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है. मजदूरी में बढ़ोत्तरी लाभ को नकारात्मक गति प्रदान करती है. जैसेजैसे कृषि लागत में वृद्धि होती है, लगान भी उसी अनुपात में बढ़ता चला जाता है. लगान में वृद्धि जनसंख्या वृद्धि के अनुक्रमानुपाती होती है. जनसंख्या वृद्धि कृषि लागत में वृद्धि को आमंत्रित करती है. प्रकारांतर में उसी अनुपात में कृषि उपकरण एवं उसके दूसरे खर्चों में इजाफा होने लगता है.

आसान शब्दों एवं जटिल गणितीय आकलनों का कम से कम सहारा लेकर रिकार्डो ने सटीक एवं विश्वसनीय सिद्धांत दिए. इसलिए कि उसका ज्ञान व्यावहारिक स्रोतों से जन्मा था. उन्होंने श्रम के वर्गीकरण एवं उसके स्थानांतरण को आधार मानकर अपने आर्थिक सिद्धांतों को जन्म दिया. इसी आधार पर उनके विचारों को प्रयोगों एवं तर्कों की कसौटी पर अधिक विश्वसनीय माना गया. तभी तो रिकार्डो की अर्थशास्त्र के क्षेत्र में की गई स्थापनाएं अधिक विश्वसनीय तथा प्रामाणिक मानी जाती हैं. जेम्स मिल जो स्वयं रिकार्डो के परिवार में किरायेदार था, रिकार्डो की विचारधारा से बेहद प्रभावित था. जटिल अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की व्याख्या बिना गणितीय जटिलता के करना एक दुरूह, किंतु सराहनीय काम था. रिकार्डो ने इस कार्य को पूरी उत्कृष्टता के साथ संभव कर दिखाया पूरा किया था, जिसके लिए आधुनिक सिद्धांतकारों ने उसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की है.

अपने प्रेरणास्रोत एडम स्मिथ की भांति रिकार्डो भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि उत्पादों पर नियंत्रण के विरोधी थे. वह मुक्त आयातनिर्यात की नीति के समर्थक थे. उसका कहना था कि कृषि उत्पादों पर कर लगने से कम उपजाऊ भूमि पर खेती करने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है. दूसरी ओर आय कम होने से सरकार और जमींदार लगान में लगातार वृद्धि करते चले जाते हैं. परिणामतः जमींदारों तथा भूस्वामियों के लाभ में निरंतर वृद्धि होती जाती है. इस विषमताजनक अर्जन की विडंबना यह है कि जमींदारों तथा भूस्वामियों की आय का बड़ा हिस्सा उपयोगी निवेश के स्थान पर विलासिता के कार्यों में प्रयुक्त होता है. इससे न तो राष्ट्र को लाभ होता है, न ही समाज के उस वर्ग को अपने केवल श्रम के माध्यम से जीवनयापन करता है.

बिना कि किसी गणितीय समीकरण के स्थापित, रिकार्डो के जिन सिद्धांतों को सर्वाधिक ख्याति मिली, उनमें से एक लगान का सिद्धांत भी है. यहां वह हालांकि मा॓ल्थस से पे्ररित दिखाई पड़ते हैं. दरअसल रिकार्डो मा॓ल्थस की स्थापना से नाटकीय रूप से जु़ड़े थे. रिकार्डो ने सिद्ध किया कि जैसेजैसे कृषियोग्य भूमि का विस्तार होता है, लगान पर खेती करने वाले किसान उपजाऊ भूमि की अपेक्षा कम उपजाऊ भूमि को जोतना पसंद करते जाते हैं. हालांकि दोनों ही प्रकार की भूमि से उपजे अनाज का मूल्य एकसमान होता है. सिवाय इसके कि उन्हें उपजाऊ जमीन पर कम उपजाऊ जमीन की अपेक्षा अधिक लगान देना पड़ता है; यानी मामूली लालच के कारण वे अधिक उपजाऊ जमीन से होने वाले लाभों से वंचित रह जाते है. ठोस तर्कों के माध्यम से रिकार्डो ने सिद्ध किया कि पैदावार के समय कम लगान देने वाले किसानों की अपेक्षा अधिक लगान वाली जमीन वाले किसान तथा लगान पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानों की अपेक्षा जमींदार अथवा भूस्वामी अधिक लाभ की स्थिति में रहता है.

रिकार्डो की इस स्थापना का उपयोग करते हुए आधुनिक अर्थशास्त्री भी मानते हैं कि कृषि उत्पादों के मूल्य निर्धारण एवं अन्य नीतिगत मामलों के नाम पर किसानों को दी जाने वाली अनुदान सहायता छोटे किसानों की अपेक्षा बड़े किसानों और जमींदारों को लिए अधिक लाभदायक होती है. श्रम से संबंधी रिकार्डो के विचार ‘मूल्य का श्रमसिद्धांत’(Labor Theory of Value) नाम से जाना जाता है. उसका मानना था कि अर्थव्यवस्था सामान्यतः ठहराव की ओर अग्रसर होती है. स्मरणीय है कि रिकार्डो का अर्थशास्त्र की ओर रुझान एडम स्मिथ की पुस्तक ‘दि वेल्थ आ॓फ नेशनस’ पढ़ने के पश्चात पैदा हुआ था. इस पुस्तक के प्रभाव का अनुमान केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके पहले पाठ के तुरंत पश्चात रिकार्डो ने अपने मित्र जेम्स मिल से कहा था कि इस विषय पर वह भी कुछ लिखना चाहता है. मिल की प्रेरणा पर ही उसने अपना पहला निबंध लिखा था; जिसे अपनी मौलिक स्थापनाओं के कारण विद्वानों का भरपूर समर्थन हासिल हुआ.

एडम स्मिथ सुखवादी विचारधारा का समर्थक था. रिकार्डो पर इन बातों का प्रभाव पड़ना भी स्वाभाविक ही था. लेकिन रिकार्डो एवं था॓मस माल्थस में आर्थिक मसलों पर विचारवैभिन्न्य हमेशा बना रहा. रिकार्डो हालांकि मा॓ल्थस की प्रतिभा का सम्मान करता था, किंतु वह उसकी विचारधारा से कभी सहमत न हो सका. इस कारण दोनों में आलोचनाप्रत्यालोचनाओं से भरा पत्रव्यवहार चलता रहा. रिकार्डो माल्थस के आर्थिक विचारों को अव्यावहारिक मानता था. बावजूद इसके उनके निजी जीवन में इस वैचारिक मतभेद का कोई असर नहीं पड़ा था. माल्थस से गहरी मैत्री के बावजूद दोनों के सैद्धांतिक मतभेद जगहजगह स्पष्ट होते हैं. माल्थस ने जनसंख्या वृद्धि को विकास के प्रमुख अवरोधक के रूप में व्यक्त किया था. जनसंख्या के दबाव को विकास के लिए चुनौती मानते हुए रिकार्डो माल्थस की भांति निराश नहीं होते. बल्कि तर्कपूर्ण ढंग से समझाते हैं कि

गणनाओं द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि किसी भी देश की जनसंख्या अनुकूल स्थितियां पाकर पचीस वर्षों में प्रायः दुगुनी हो जाती है. परंतु इस बात की भी प्रबल संभावना है कि वैसी ही अनुकूल परिस्थितियों मिलने पर उस देश की कुल पूंजी उससे अपेक्षाकृत कम अवधि में ही दुगुनी हो जाए. वैसी परिस्थितियों में मजदूरी की दर में सतत वृद्धि बनी रहती है. क्योंकि मजदूरों की मांग उनकी सप्लाई की अपेक्षा किंचित अधिक तेजी से बढ़ती है.’

व्यावहारिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में रिकार्डो का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान श्रम और मूल्य के अंतर्संबंधों की अधिक मानवीय पड़ताल है. एडम स्मिथ के विचारों को नया विस्तार देते हुए रिकार्डो ने लिखा है कि

वस्तुओं के वास्तविक आनुपातिक मूल्य उनमें लगने वाले श्रम द्वारा निर्धरित होते हैं. किसी वस्तु के उत्पादन पर होने वाला लाभ उसके निर्माण में लगी मजदूरी के अनुरूप घट जाता है. हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि किसी वस्तु के वास्तविक समानुपातिक मूल्य और उसमें लगने वाले श्रम में परस्पर अनुक्रमानुपाती संबंध होते हैं.’

रिकार्डो की यह विचारधारा ही आगे चलकर संत साइमन और रावर्ट ओवेन जैसे सहकारिता के प्रमुख सिद्धांतकारों के लिए बहुत उपयोगी एवं प्रेरणादायक सिद्ध हुई. प्रकारांतर में इसी के आधार पर सहकारिता के विचार को कार्यकारी रूप दिया गया. हालांकि पूंजी और श्रम के संबंधों की व्याख्या से जुडे़ कुछ प्रश्नों को रिकार्डो भी जटिल मानते थे. उसने स्वीकार किया था कि भिन्नभिन्न उद्योगों में विभिन्न परिमाण में श्रमबल प्रयुक्त होता है, जिनकी अलगअलग व्याख्या अथवा तुलनात्मक स्वरूप निर्धारित कर पाना आसान नही है. उनमें प्रयुक्त श्रम की मात्रत्मक भिन्नता के कारण ही उनके लाभांश में भी भिन्नता रहती है. हालांकि उसने माना कि मजदूरी संबंधी सिद्धांत तभी सही मायने में लागू किया जा सकता है, जब सभी उद्योगों में पूंजी प्रयुक्तता एक समान हो.

श्रम और पूंजी को समानरूप से सम्मानेय बनाने के लिए रिकार्डो ने दो सुझाव दिए थे. पहला यह कि लाभानुपात को एकसमान बनाए रखने की शर्त पर पूंजीनिवेश मौटे तौर पर उसी अनुपात में किया जाए, जिस अनुपात में श्रम का निवेश किसी भी वस्तु के उत्पादन के लिए आवश्यक है. इससे उत्पादों के वास्तविक मूल्य का सहज आकलन संभव हो सकेगा. दूसरा उपाय उसने यह बताया कि किसी ऐसे उत्पाद को श्रम विवेचना का आधार बनाया जाए, जिसमें प्रति कामगार औसत पूंजी निवेश हो. उस वस्तु के मूल्य को आधार मानकर बाकी वस्तुओं के वास्तविक मूल्य का आकलन किया जाना चाहिए. रिकार्डो का मानना था कि यदि हम ऐसे किसी मानक उत्पाद का पता लगाने में सफल होते हैं तो बाकी कार्य बहुत आसान हो जाएगा. अपने इस सिद्धांत में रिकार्डो का पूरा भरोसा था. इसलिए जीवन के बाकी वर्ष वे ऐसे ही मानक उत्पाद की खोज में लगे रहे, जिसके आधार पर बाकी वस्तुओं के श्रम और पूंजी के मानवीय संबंधों की सामान्य अवधारणा विकसित की जा सके. इक्यावन वर्ष की अल्पावस्था में जब रिकार्डो की मृत्यु हुई तो उसकी मेज पर एक अधूरा आलेख ‘मूल्य के अपरिवर्तनीय मानक’(The Invariable Standard of Value) मिला, जिसमें ऐसी ही कोशिश की गई थी. कार्ल मार्क्स जैसे विचारक को भी रिकार्डो की इस संकल्पना में पूरा भरोसा था. लेकिन वह भी समस्या का सर्वमान्य हल सुझाने में असमर्थ रहे.

रिकार्डो के विचारों की स्थूल जानकारी रखने वाले व्यक्ति को प्रथम द्रष्टया लग सकता है कि उसकी समस्त विचारधारा पूंजीपतियों और ठेकेदारों की पक्षधर है. उसकी विचारों पर अमल करके गरीब देशों की अपेक्षा अमीर देश अधिक लाभ उठा सकते हैं. लेकिन यदि हम ध्यान से देखें तो रिकार्डो के विचार समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए समान उपयोग जान पड़ते हैं. फिर चाहे वह लगान का सिद्धांत हो या सघन उत्पादन की नीति का समर्थन, रिकार्डो बिना किसी भेदभाव के देश और समाज के विकास के उपाय सुझाते नजर आते हैं. हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रिकार्डो एक अर्थविज्ञानी थे, कोई राजनेता या समाजविज्ञानी नहीं. उनका समस्त चिंतन कम पूंजीनिवेश द्वारा, न्यूनतम समय में अधिकतम लाभ संभावना के अर्थशास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार है.

रिकार्डो का मानना था कि केवल तकनीक के विकास से समाज का विकास संभव नहीं है. उसका कहना था कि प्रौद्योगिकी का विकास अंततः ऐसी मशीनों को बढ़ावा देता है जिनसे श्रमिकों की संख्या घटाई जा सके. जिनका मूल्य और स्थापना लागत अत्यधिक लागत होती है. परिणामतः मजदूरी के लिए सरकारी कोष में कमी आ जाती है. ऐसी अवस्था में दो ही उपाय होते हैं कि या तो मजदूरी को न्यूनतम तक ले जाया जाए अथवा कामगारों को निकाल बाहर किया जाए. बेरोजगार हुए कामगारों में कुछ हालांकि बेहतर लाभ वाली कंपनियों से जुड़ सकते हैं. लेकिन उनमें से अधिकांश की स्थिति डांवाडोल ही रहती है तथा वे निम्नतर एवं दयनीय परिस्थितियों में जीवनयापन को विवश रहते हैं.

रिकार्डो का विश्वास था कि किसी वस्तु का मूल्य उसके निर्माण में आई लागत को ही दर्शाता है, जो अंततः वस्तुओं के वास्तविक मूल्य की ओर संकेत करता है. दूसरे शब्दों में किसी वस्तु के निर्माण में लगे श्रम का वास्तविक मूल्य अर्थात श्रम के प्रबंधनपोषण में आई लागत ही उसका वास्तविक मूल्य(Natrual price) है. इसलिए यदि मजदूरी किसी वस्तु की असली कीमत तो उसका स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिससे वह श्रमिकों, कामगारों का अच्छी तरह भरणपोषण कर सके. किसी भी विकासमान अर्थव्यवस्था में मजदूरी का स्तर सामान्य से अधिक ही होना चाहिए; ताकि उसके बचे हिस्से का उत्पादक कार्यों में निवेश किया जा सके.

रिकार्डो का कहना था कि

मजदूरी स्वाभाविक रूप से किसी वस्तु के वास्तविक मूल्य को निर्धरित करती है, यह उसके बाजार मूल्य को भी निर्धारित कर सकती है, तथापि किसी विकासशील समाज में लंबे समय तक, अधिकतम उत्पादनप्रोत्साहन के लिए इसे वस्तुओं के वास्तविक मूल्य से अधिक होना ही चाहिए. जिससे बढ़ी हुई पूंजी श्रमिकों की नई इच्छाओं को जन्म दे सके, उन्हें अनुशासित बना सके, और भविष्य में भी पूंजी का विस्तार और उससे होने वाले लाभ इसी प्रकार लगातार मिलते रहें. पूंजी की वृद्धि यदि इसी अनुपात में और सतत रूप से होती रहे तो वह श्रमिकों की न केवल मांगों और जरूरतों को पूरा करने, उन्हें और अधिक प्रोत्साहित करने में सक्षम होगी, बल्कि विकास के लाभ को समाज के बाकी लोगों तक पहुंचाने का काम भी करेगी.’

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि रिकार्डो का चिंतन सामाजिक सरोकारों से एकदम परे नहीं था. बल्कि कई स्थान पर उसका चिंतन समाजवादी विचारधारा के अनुरूप है. लाभांश की प्रवृत्ति पर लिखे गए एक निबंध में रिकार्डो ने व्यक्त किया है कि जैसेजैसे वास्तविक मजदूरी में वृद्धि होती है, वास्तविक लाभ सतत रूप से कम होता जाता है. क्योंकि उस अवस्था में वस्तु की बिक्री से हुई पूंजी की कुल आमद लाभ एवं मजदूरी में बंटती जाती है. लाभ के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए वह लिखता है कि

लाभ की मात्र अधिक अथवा कम मजदूरी पर निर्भर करती है, मजदूरी आवश्यकताओं के प्रभावी मूल्य पर एवं आवश्यकताएं मुख्यतः भोजन के वास्तविक मूल्य पर निर्भर होती हैं.’

तय है कि रिकार्दॊ के विचार समकालीन विचारकों से न केवल हटकर थे, साथ ही उसकी प्रतिबद्धताएं भी अलग थीं. उसकी विलक्षण प्रतिभा एवं मौलिक सोच के कारण सर्वत्र सफलता प्राप्त हुई. चाहे वह लेखक का क्षेत्र हो अथवा व्यवसाय का. परिवार से अलग होकर उसने स्वतंत्र रूप से व्यवसाय प्रारंभ किया था. जिसमें उसकी प्रतिभा और परिश्रम के कारण उसे अपेक्षित सफलता भी प्राप्त हुई. उसने पर्याप्त धनार्जन कर एक सम्मानजनक जीवन जिया. बावजूद इसके व्यवस्था के प्रति विद्रोह की उसकी प्रवृत्ति जो कि प्रिसिला एनी विलकिंसन से विवाह के समय देखी गई थी, आगे भी सतत रूप से बनी रही. वह अपने साथसाथ सबको सुखी देखना चाहता था. यह बात 1815 में अपने मित्र जेम्स मिल को लिखे गए एक पत्र से भी स्पष्ट हो जाती है. पत्र में वह अपना उल्लेख एक आत्मतुष्ट एवं सुखी व्यक्ति के रूप में करता हैµ

अपनी सभी इच्छाओं तथा मित्रों की जरूरी इच्छाओं को पूरा करने में समर्थ, पर्याप्त रूप से धनी एवं संतुष्ट व्यक्ति.’

रिकार्डो के विचारों से प्रेरित होकर ही राबर्ट ओवेन, फूरिये, विलियम किंग जैसे अर्थशात्री विचारकों ने सहकार के विचार को कार्यकारी रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास किया था. जिसे रोशडेल पायनियर्स के स्वयंसिद्ध एवं कर्मठ सहयोगियों ने व्यावहारिक रूप में संभव कर दिखाया. माक्र्स ने रिकार्डो के विचारों से प्रेरणा लेकर ही अपनी वैचारिकी का आधार तैयार किया था. लेकिन यह भी विडंबना ही है कि रिकार्डो के सिद्धांतों से प्रेरित होकर ही आधुनिक बाजारवाद अथवा जिसको आमतौर पर उदारवाद की नींव रखी गई थी.

ओमप्रकाश कश्यप

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