धर्म और अभिजन संस्कृति : तीन

 धर्म : प्रासंगिकता का सवाल

धर्म शानदार प्रलोभन है, जो जनसाधारण का मुंह बंद रखने के काम आता है. यह वह वस्तु है जो गरीब को अमीर की हत्या करने से रोकती है.1 नेपोलियल बोनापार्ट

अभिजन संस्कृति के प्रमुख सूत्रधार धार्मिक अभिजन के उदय के बारे में चर्चा हमने इस लेख के आरंभिक हिस्से में की. हमने सामाजिक स्तरीकरण के क्षेत्र में धर्म की भूमिका को जाना. यह समझने की कोशिश की कि धर्म किस प्रकार समाज की अभिजन मानसिकता का विकास करने, उसे बनाए रखने तथा शेष समाज में उसके प्रति सहानुभूति पैदा करने का काम करता है. हमने यह भी देखा कि धर्म अभिजन समाज की वर्चस्वकारी नीतियों का न केवल अंधसमर्थन करता है, बल्कि समाज में उन्हें बनाए रखने, स्थायित्व देने तथा उनके माध्यम से समाज के बड़े वर्ग को सत्ता एवं संसाधनों से वंचित कर देने का खेल भी खेलता है. आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण के लिए जिम्मेदार इस खेल में धर्म की सीधे भूमिका यदि न हो, तो भी उसके नाम पर यह कौतुक प्रायः चलता जाता है. आखिर धर्म को यह ताकत कहां से मिलती कहां से है? जिस जिज्ञासा तत्व को विवेकवान मनुष्य का लक्षण कहा जाता है, वह धर्म और आस्था के नाम पर एकाएक निस्तेज कैसे हो जाता है? हमने देखा कि धर्म गाहेबगाहे मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता को दबाने का काम करता है. उसकी कोशिश मनुष्य को ज्ञान की समकालीन धाराओं से काटकर भीड़ में ढाल देने की होती है. इसके बावजूद उसकी लोकप्रियता अक्षुण्ण बनी रहती है. यह धर्म का जादू ही है कि गरीब हो या अमीरधर्म की डगर को छोड़ना कोई नहीं चाहता. हालांकि इसके कारण अलगअलग हैं. अभिजन धर्म को अपनाने का नाटक करता है, ताकि उसके माध्यम से वह सबकुछ पा सके, जिससे उसका वर्चस्व कायम रहे. साधारणजन के पास सिवाय धर्म के दूसरा कोई रास्ता, कोई विकल्प नहीं होता. इसलिए वह अपने इस जन्म के सपनों को अगले जन्म में सूद सहित लौटने के भ्रम में पुजारी के यहां गिरवी रख देता है. यदि कोई ऐसा न करना चाहे, इससे बाहर निकलना भी चाहे तो यह संभव नहीं. क्योंकि परिवार से लेकर समाज तक धर्म की व्याप्ति इतनी गहरी और विविधतापूर्ण है कि किसी न किसी अवसर पर धार्मिक मूल्यों, कर्मकांडों के साथ दिखना उसकी मजबूरी बन जाता है.

धर्म की सत्ता बहुमान्य भले हो, निर्विवाद कभी नहीं रही. तमाम लोकप्रियता एवं बहुस्वीकार्यता के बावजूद उसके आलोचक हमेशा, प्रत्येक युग में रहे हैं. आलोचना का सिलसिला वेदों के जमाने से चला आ रहा है. आजीवक, चार्वाक और लोकायतियों की विचारधारा में भले अंतर हो, ईश्वरीय सत्ता के बहाने निरर्थक वितंडा, धर्म के नाम पर व्याप्त टोटमवाद तथा कर्मकांड के सहारे फलतेफूलते पाखंड के वे सभी समान विरोधी थे. चार्वाकों ने तो वैदिक कर्मकांड की जमकर खिल्ली उड़ाई थी. परिपक्व बौद्धिकता एवं आत्मविश्वास का परिचय देते हुए उन्होंने मौलिक दर्शन की अभिकल्पना की. चार्वाक दर्शन को भारतीय षड्दर्शन के साथसाथ विश्वभर के भौतिकवादी दर्शनों में शीर्ष स्थान प्राप्त है. उसकी लोकप्रियता रही है. आस्तिक विचारधारा के समर्थकों में भी समयसमय पर ऐसे व्यक्ति उभरे जिन्होंने धर्म की आलोचना का जोखिम उठाया. विरोध सहा, नुकसान भी झेले. फिर लगातार संघर्ष के बल पर सफलता भी प्राप्त की. सच यह भी है कि पश्चिम के मुकाबले भारत में धर्म के सार्थक विरोध अथवा उसके विकल्प की तलाश के उदाहरण कम ही रहे हैं. पश्चिम में धार्मिक आडंबरवाद का विरोध करते हुए सुकरात ने जहर का प्याला पिया. ब्रूनों को जिंदा जला दिया गया. मूर को मृत्युदंड की सजा मिली. वाल्तेयर ने ईश्वर को ‘बंद घेरा’ कहा तो चरमपंथी उनसे नाराज हो गए. ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, मगर वह हर जगह बेड़ियों में है’ कहकर मनुष्य की धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता का पक्ष लेने वाले रूसो को जीवन के कई महत्त्वपूर्ण दिन कारावास में बिताने पड़े. धर्म के नाम पर हुए उत्पीड़न और हत्याकांड के उदाहरणों से इतिहास रंगा पड़ा है. इससे धर्म सर्वथा अप्रभावित रहा हो, ऐसा भी नहीं है. धीरेधीरे ही सही धर्म की कुप्रवृत्तियों पर निरंतर प्रहार का असर हुआ. फलस्वरूप पश्चिम में चर्च जो कभी राज्य की निदेशक सत्ता हुआ करता था, व्यक्ति की निजी आस्था तक सिमट गया.

सुधारवाद की हवा भारत में भी चली. हवा का रुख बदलने में सक्षम सुधारक, विद्वान लेखक यहां भी हुए. धर्म की सीमारेखा को लांघने का साहस उनमें न था. इसलिए यहां चले सुधारवादी आंदोलन परंपरा से बोझिल थे. सुधारवादी नेताओं ने सामाजिक कुरीतियों, आडंबरवाद और पौरोहित्यवाद का विरोध करते हुए अध्यात्म संबंधी विचारों को व्यक्तिगत बनाए रखने पर जोर दिया. धर्म को हर किस्म के आडंबरवाद से निकाल देने के लिए ज्ञानमार्गी धारा की राह प्रशस्त की. बताया कि मनुष्य को जितनी जरूरत समाज की है, उतनी ही जरूरत समाज को मनुष्य की है. दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित हैं. इन सुधारकों की सीमा थी. वे समाधान धर्म के दायरे में खोज रहे थे. धर्म की सीमारेखा को लांघने का साहस उनमें न था. धर्म जिन संबंधों को लोकहित में निबाहने का दावा करता है, वे नैतिकता के अनुपालन द्वारा आसानी से और कहीं अधिक सफलता के साथ निभाए जा सकते हैं. अपनी उपयोगिता दर्शाने के लिए धर्म नैतिकता को बैशाखी की तरह इस्तेमाल करता है, लेकिन इससे नैतिकता का प्रभाव आधाअधूरा रह जाता है. इसलिए कोई भी धर्म मनुष्य से ऊपर नहीं है. ‘‘अष्ठादश पुराणेशु व्यासस्य वचनं द्वियम्. परोपकाराय पुण्याय, पापाय परिपीड़नम’—अठारह पुराणों का सार व्यास के दो वचनों में छिपा है, परोपकार पुण्य है, दूसरे को सताना महापाप.’’ यह उक्ति परोक्ष में नैतिकता का ही महिमागान करती है. बगैर नैतिक हुए मानवीय होना असंभव है. इसलिए महात्मा बुद्ध से लेकर आज तक, समयसमय पर धर्म में नैतिकता की स्थापना के प्रयास लगातार होते रहे हैं. लेकिन बौद्धधर्म के अलावा शायद ही कोई दूसरा रास्ता अधिक कारगर रह पाया. कारण साफ था कि बौद्ध दर्शन के अपनी विचारधारा में जनसाधारण के कल्याण की अभिकल्पना की थी. उसी के अनुरूप उनका दर्शन था. अपने मौलिक और व्यावहारिक दर्शन के कारण बौद्ध दर्शन देशविदेश की सीमाओं को लांघकर पूरी दुनिया में फैला. और जैसा कि प्रत्येक संस्था के साथ होता है, अर्से के बाद उसमें भी वैचारिक शिथिलता आने लगी. जिससे वह अप्रासंगिक होने लगा. इसने जहां धर्म के विकल्पों की मांग प्रशस्त की. यह भी सच है कि धर्म के सार्थक विरोध की गंभीर परंपरा हिंदुस्तान में कभी रही ही नहीं. यदि कभी, कहीं हुई भी तो उसको दबा दिया गया. कभीकभी उसको धार्मिकता का ऐसा गाढ़ा रंग दे दिया गया कि उसकी सारी क्रांतिधर्मिता हवा हो गई. गौतम बुद्ध, स्वामी दयानंद, विवेकानंद जैसे महान धार्मिक सुधारवादी नेताओं ने धर्म की मानवतावादी व्याख्या के लिए रूढ़ धर्मावलंबियों की आलोचना का जोखिम भी उठाया था. संयोग देखिये कि इन सभी की मृत्यु संद्धिग्ध परिस्थितियों में हुई है. उनकी मृत्यु का रहस्य दुनिया के सामने नहीं आ पाया है.

मध्य काल में कबीर, दादू, नानक, कुंभादास आदि ने धर्म के नाम पर पल रहे छिछले पोंगापंथ, कर्मकांड एवं पौराणिक वितंडा के विरोध में आवाजें उठाईं. लेकिन वे भी धर्म को कर्मकाड और आडंबरवाद की जकड़बंदी से बाहर न निकाल सके. उन्हें स्थायी न मिलने का प्रमुख कारण था कि वे धर्म द्वारा पैदा की गई समस्याओं का समाधान उसके दायरे में ही खोजना चाहते थे. इसलिए जैसे ही इनके प्रवत्र्तकों का प्रभाव घटा, यथास्थितिवादी शक्तियां अवसर देखकर पुनः सक्रिय हो गईं. पत्थर को ईश्वर का नाम देकर लोगों को सदियों से भरमाती आई शक्तियों के लिए व्यक्तिविशेष को देवता बनाकर मठों में कैद कर देना कठिन न था. सो यही उन्होंने किया भी. इसके चलते गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. चार्वाक, आजीवक एवं लोकायत जैसे भौतिकवादी विचारकों के बारे में तरहतरह के किस्सेकहानियां गढ़कर उन्हें वैदिक परंपरा से जोड़ा गया. ऐसा ही एक गढ़ा हुआ किस्सा कर्णघंट अजामिल का है. कर्णघंट को ‘नारायण’ नाम से ही नफरत थी. इतनी अधिक नफरत कि वह सनक का रूप ले चुकी थी. ‘नारायण’ नाम कान में न पड़े, इसलिए वह दोनों कानों के पास दो घंटियां लटकाए रहता था. यदि कोई ‘नारायण’ कहता भी तो वह झट से गर्दन हिला देता. घंटियों के शोर में वह शब्द दब जाता. कहानी की बुनावट और पुराणलेखकों की अद्भुत किस्सागोई के लिए उनकी सराहना कीजिए कि नारायण नाम से नफरत करने वाला कर्णघंट अपने बेटे का नाम ‘नारायण’ रखने को तैयार हो जाता है. वृद्धावस्था में एक बार वह बीमार पड़ा. मृत्यु सन्निकट देख अंतिम संबोधन के लिए बेटे को आवाज दी—‘नारायण’. अजामिल भले ही अपने बेटे को बुला रहा हो, परंतु कहीं लोग यह न मान लें कि वह सचमुच नारायण को ही बुला रहा था और उन्होंने अनसुना कर दिया—विष्णु क्षीरसागर से दौड़ पड़े. बेटा चाहे सुने या अनसुनी करे, परंतु नारायण को नाम की चिंता. तो नाम के लोभी विष्णु ने अजामिल की पुकार सुनी. इस डर से कि लोग कहीं नाम लेना कम न कर दें, चले आए अजामिल का उद्धार करने. तो ऐसे देवता पंडितों ने गढ़े जो सिर्फ अपना नाम रटाने में बड़प्पन मान लेते थे. साम्राज्यवादी युग में जहां राजा को चापलूसों की पूरी भीड़ चाहिए. भगवान भी ऐसा ही अहंकारी गढ़ा गया. ताकि आमजन सत्तालोलुप सम्राटों की निरंकुशता को पचा सके. साम्राज्यवादी दौर में इससे बेहतर भगवान गढ़ा ही नहीं जा सकता था. उस युग में अजामिल अकेला नास्तिक नहीं था. वह विपुल संख्या में फैले नास्तिकों का प्रतीक था. वह नास्तिक अजामिल का प्रभाव कम करने, उसे तथा उसके अनुयायियों को अपने मायाजाल में बांध लेने की चिंता थी. गोया एक धमकी भी थी कि एक विचार को स्थापित करने में तुम चाहे अपना जीवन खपा दो, अवसर मिलते ही हम तुम्हें अपने पाखंडटोली में मिला ही लेंगे. इसे हम विरोधी परंपराओं को पनपने न देने, उनकी सारी मौलिकता और क्रांतिकारिता को सोख लेने की चाल भी कह सकते हैं. इस चाल के अनेक रूप थे. कुछ स्पष्ट तो कुछ इतने महीन की उन्हें समझना कतई आसान न था.

रामानंद ने कबीर को टालना चाहा था. परंतु कबीर जब गले पड़ ही गए तो ‘मरामरा’ रटने को कहकर आगे बढ़ गए. हो सकता है रामानंद ने शूद्र कबीर को काशी के गंगाघाट की सीढ़ियों पर ‘जा मर’ कहकर धिक्कारा हो. जैसी कि उस समय तक परंपरा थी. यह कबीर की प्रतिभा थी जो उन्होंने जान लिया कि ‘मरामरा’ रटने से ‘रामराम’ की भ्रांति देने लगता है. इससे उन्होंने शब्द की ताकत को समझा. ‘नादबह्म’ की गहराई में झांका. व्यंग्य की मीठी मार को पकड़ा. समझ गए कि जीवन और मृत्यु में कोई खास अंतर नहीं हैं. वह भी प्रकृति की परिवर्तनशीलता का एक उदाहरण है. एक वृक्ष सूखकर गिरता है तो नया पौधा अंकुराने लगता है. पुराना वृक्ष नए के लिए खादपानी बनता है. एक तरह से यह उसका भी पुनर्जन्म है. मृत मानवदेह मिट्टी में समाकर नए जीवन का स्रोत बनती है. लेकिन इसकी व्याख्या किसी भाग्यवादी या नियतिवादी द्रष्टिकोण से करना अनुप्रयुक्त है. यही सृष्टि चक्र है. सबका देखाभाला. सीधीसादासरल. इसे चमत्कार बताकर पुरोहित वर्ग समाज को मूर्ख बनाता रहा है. जनता तक इस सच को पहुंचाने के लिए कबीर ने उलटबांसियां लिखीं. पोंगापंथी साधुओं, मौलवियों को ललकारा. तिरस्कार के जरिये ही सही, कबीर को कबीर बनाने में रामानंद का बड़ा हाथ था. काशी की सीढ़ियों पर रामानंद की जो ठोकर उन्होंने खाई थी, उसको वे जिंदगीभर भुला नहीं पाए. भुला देते तो इतने सिद्ध कैसे बन पाते. इसलिए सजग रहकर भी गुरु के गढ़े ईश्वर को लगातार धिक्कारते रहे. जब भी मौका मिला धर्म के नाम पाखंड फैलाने वालों पर उन्होंने जमकर कटाक्ष किया—

संतो पांडे निपट कसाई/बकरी मार भैंसे पर धावैं, दिल में दर्द न आई/कर स्नान तिलक कर बैठे, बिधि से देव पुजाई/आतम राम क्षण भर में मारा, रक्त की नदी बहाई/अति पवित्र ऊंचा कुल कहिए, सभाओं में अधिकाई/इनसे दीक्षा सब कोई मांगे, हंसी आवे मुझे भाई/पाप काटन को कथा सुनाएं, कर्म करावें नीचा/हम तो दोउ परस्पर देखा, जम लाए हैं खींचा/गऊ मारे उसे तुरक कहिए, इनसे क्या वे छोटे/कहें कबीर सुनो भई संतो, कलि में ब्राह्मण खोटे.’

धर्म ज्ञान का विरुपण करता है. यह वास्तविक बोध को सीमित कर, उसको टोटम में ढाल देता है. आस्था पर इतना जोर देता है कि विवेक सर्वथा उपेक्षित होकर रह जाता है. धर्म के राजनीतिकरण के चलते अंधश्रद्धा को धार्मिकता का पर्याय मान लिया जाता है—‘धर्म का मतलब है, बुद्धिमत्ता की मौत. जब हम किसी सिद्धांत पर जड़ हो जाते हैं, विवेक हमारा साथ छोड़ देता है.’2 सवाल उठता है कि धर्म की आखिर वह कौनसी खूबी है, जिससे वह सदियों से जनअभिजन का कंठहार बना हुआ है. तमाम आलोचनाओं के बावजूद उसकी लोकप्रियता पर आंच नहीं आती. जिसके चलते सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव भी अल्पकालिक सिद्ध होता है, महात्माओं, विद्वानों और दार्शनिकों की बात अनसुनी रह जाती है और समाज थोड़ीबहुत हलचल के बाद वह फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौटने लगता है. आसान शब्दों में कहें तो यह परंपरा के दबाव के कारण होता है. जीवन में सरलीकरण की प्रवृत्ति के चलते होता है. प्रबोधीकरण की लीक छोड़ देने की वजह से होता है. भविष्य की चुनौतियों से डरे समाज परंपरा को ही अपना आदर्श मान लेते हैं. इससे वे ज्ञानविज्ञान की आधुनिकतम प्रणालियों की उपेक्षा करने लगते हैं. यही नहीं असुरक्षा की भावना के चलते वे उपलब्ध ज्ञानविज्ञान का परंपराकरण करने से भी नहीं चूकते. अपने निर्णय के बीच वे बारबार अतीत को ले आते हैं. अतएव चुनौतियों के बीच उन्हें अक्सर पराजय का सामना करना पड़ता है; या उनके हिस्से आती है तो केवल हताशा. हालांकि उन्हीं में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परंपरा का अनुसरण करने के बजाय उनका उपयोग करने में दक्ष होते हैं. ऐसे लोग परंपरापूजन के सामान्य खेल को अपने हितों के अनुसार ढालते रहते हैं. लोगों की भावनाओं तथा उनके अतीतमोह का लाभ उठाकर वे समाज के निर्णायक पदों पर आसीन हो जाते हैं. तदनंतर समाज को अपने स्वार्थ के अनुकूल हांकने लग जाते हैं. दूसरी ओर परंपरानुगमन को जीवन का अभीष्ट मानने वाला आमजन इस स्पर्धा में निरंतर पिछड़ते जाते हैं. उल्लेखनीय है कि ज्ञान व्यक्ति को आत्मविश्वास से लैस करता है. जबकि धर्म का संपूर्ण आयोजन दूसरों की सलाह पर, दूसरों के लिए होता है. यहां व्यक्ति को अपने ही अस्तित्व पर शंका होने लगती है. ऐसे में उसके समस्त प्रयास अनमन्यस्कता से भरे होते हैं. उल्लेखनीय है कि आस्था में न तो स्पर्धा होती है, न सहयोग. इसलिए उसका कोई नैतिक या सामाजिक मूल्य नहीं होता. वह भीड़ को एकजुट करती है, चुनौतियों से पलायन कर जाती है. संकट में वह परमात्मा के साथ होने का भरोसा देती है. नुकसान होने पर नियति बन पसर जाती है. उस अवस्था में व्यक्ति अपने भाग्य को कोसता है. त्राण के लिए छाया के पीछे भागता है. वह इतनी निजी होती है कि हर आदमी उसे अपनी मनोभूमि के अनुसार ढाल सकता है. उसे इच्छित रंग दे सकता है. दूसरी ओर इतनी व्यापक भी होती है कि हजारों व्यक्तियों को एक साथ प्रभावित कर सके. इस कारण उसका राजनीतिक दुरुपयोग भी संभव है. राजनीति में ढलकर, राजनीतिज्ञों को हाथ का औजार बनकर आस्था को अंधआस्था बनते, सांप्रदायिकता में ढलते देर नहीं लगती.

धर्म की लोकप्रियता का दूसरा कारण जीवन की चुनौतियां हैं. शताब्दियों से आमजन अभिजन के शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार रहा है. अपनी स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन वर्ग समस्त निर्णायक शक्तियां अपने हाथों में रखता है, जिससे आमजन चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाता. वास्तविक शोषकों, उत्पीड़कों तथा उत्पीड़न के असली कारणों से बचाए रखने के लिए आमजन को समझाया जाता है कि ‘दुख इस जीवन का मूल है’….‘संसार माया है’. इस विश्वास के चलते सदाग्रही व्यक्ति जो भी कर्म करता है, वह उसका सत्कर्म कहलाता है, जिसमें लाभ की कामना, सुख की वांछा को अगले जन्म तक स्थगित कर दिया जाता है. ‘सत्’ अथवा ‘सत्य’ का आशय बहुत सीमित अर्थों में लिया जाता है. उसका व्यक्ति अथवा समाज के विकास से कोई संबंध नहीं होता. न ही उसका अभिप्राय ज्ञानविज्ञान की ज्ञात प्रणालियों की मदद से समाज और प्रकृति के बारे में बोध अर्जित करना है. धार्मिक व्यक्ति की नजर में ‘सत्’ का अभिप्राय धर्म गुरु के पलायनवादी विचारों में श्रद्धा रखना, पुरोहित के कर्मकांड को अपनाए रखना तथा उनके प्रभाव में रहते हुए तर्क और ज्ञान की प्रणालियों से कट जाना होता है. इससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता का हृास होता है. आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है और वह भेड़चाल को ही अपने जीवन की उपलब्धि मानने लगता है. जीवन की विकट परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने में नाकाम व्यक्ति हताशा और नाउम्मीदी से भर जाते हैं. ‘संसार दुखमय है’….‘दुख कालातीत है’….‘संसार मायाजाल है’….‘रिश्तेनाते सब दिखावा हैं….पिता, पुत्र, पत्नी, भाईबहन सब स्वार्थमय रिश्ते हैं, कोई किसी का नहीं हैं.’ जैसी अवधारणाओं के माध्यम से दुख एवं अविश्वास की प्रतीति को तरहतरह से लोकमानस में बिठाया गया. सुख और उसके संसाधनों के प्रति कुंठा उमगाई गई. इससे जीवन का उत्साह मरने लगता है. हतोत्साह होने से कार्यक्षमता घटती है, संसार के प्रति पलायनवादी द्रष्टिकोण पैदा होता है. बात केवल आज की नहीं, न केवल छोटेबड़े की है. बड़ेबड़े दर्शन भी संसार के प्रति नकारात्मक बोध को बनाने में पीछे नहीं रहे. वेदांतियों ने दृश्य जगत को ही मिथ्या माना है. ‘ब्रह्म सत्यं जगन्नमिथ्यां’. जीवन को लेकर व्यावहारिक द्रष्टिकोण रखने वाले बौद्ध दर्शन ने भी दुख की कारक सत्ता पर विश्वास बनाए रखा. हांलांकि इस बारे में उसका नजरिया भी पलायनवादी था. परंतु बुद्ध ने यह कहकर कि दुख का निवारण संभव है, जीवन के प्रति संभावनाओं को बचाए रखा. बौद्ध दर्शन से मिलाजुला रवैया जैन मतावलंबियों का था. ‘कैवल्य’ की आस में वे भी संसार को लेकर नकारात्मक बोध पैदा करते रहे.

धर्म की लोकप्रियता का तीसरा बड़ा कारण इसका सुलभ और सरल होना है. धर्म को आस्था से जोड़ा गया. धार्मिक बने रहने के लिए किसी स्पर्धा या परीक्षा की आवश्यकता नहीं होती. यह मान लिया जाता है कि ईश्वर बदलाव के विरुद्ध है. एकरसता उसको भाती है. एक ही आरती को बारबार लाखोंकरोड़ों के मुंह से बारबार सुनकर बोर नहीं होता. रोज एक लोटा पानी उसकी प्यास बुझाने और नहलाने के लिए पर्याप्त है. वह निरंकुश है, जो चाहता है कि पूरी दुनिया उसका नाम रटती रहे. केवल उसके बारे में सोचे. केवल उसकी होके रहे. वही देखेसुने जो वह दिखानासुनाना चाहता है. उसके हर निर्णय को सिर झुकाकर माने, जैसे किसी सामंत के आदेश को माना जाता है. दुनिया को मायाजाल माने, संबंधों को भ्रांति. एक ही आरती को रोज गाकर, सुबहसुबह एक लोटा पानी चढ़ाकर ‘भक्त’ मान लेता है कि इससे ईश्वर प्रसन्न होगा. आदमी की जिंदगी गुजर जाती है, परंतु आरती वही रहती है. भक्त मानता है कि चापलूसीभरी स्तुतियां ईश्वर को प्रसन्न्न करेंगी, इसलिए वह तरहतरह का पाठ करता है. ऐसी आरती या पाठ जिसका जरूरी नहीं कि उसको भावार्थ भी आता हो. धर्म व्यक्तित्व परिष्कार पर जोर नहीं देता. न उसके लिए न्यूनतम शिक्षा अथवा मानसिक स्तर जरूरी है. इसलिए जो कुछ नहीं बन पाता, वह धार्मिक आसानी ने बन जाता. जैन और बौद्ध दर्शन निरर्थक कर्मकांड और मिथ्या आडंबरों का विरोध करते हैं. फिर भी मनुष्यता के लिए कुछ चामत्कारिक नहीं कर पाते. इसलिए कि मसीहावाद उनपर भी हावी रहता है. उसी के समर्थन पर वर्चस्वकारी शक्तियां समाज के संसाधनों पर कब्जा कर जनसमाज को उत्पीड़ित करती रहती हैं. इससे आमजन के मन में अपनी स्थिति के प्रति क्षोभ पैदा हो जाता है. इससे उबरने के लिए मसीहावाद के समर्थक, संचालक लोग अतींद्रिय सपनों की नई खेप बाजार में झांेक देते हैं, जो लोगों को भीड़ में बदलने का प्रयत्न करते हैं.

आम आदमी के लिए धर्म का प्रलोभन बड़े काम का था. इसलिए कि जीवन में चारों दिशाओं से समस्याओं से घिरे जीवन की दौड़ में पिछड़ गए व्यक्ति के लिए वह एक अंतिम सहारा था. जो दौड़ में बने रहने की अनुभूति देता था. धर्म की संरचना ही इस प्रकार की गई थी. उसमें आदमी अपने हुनर अपनी बुद्धिमत्ता का कोई योग न था. बल्कि कुछ न होने और सबकुछ छोड़ देने की प्रवृत्ति को वह ‘मुक्ति’ का नाम देकर महिमामंडित करता था. प्रकट में वह गरीब आदमी द्वारा अमीरियत के सपने को धिक्कारता था. धनवान आदमी का स्वर्ग के दरवाजे को पार करना उतना ही असंभव है, जितना हाथी द्वारा सुई की नोंक से पारगमन. यह ईसा मसीह द्वारा कहलवाया गया. मेरा विचार में ईसामसीह ने जो कहा वह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना यह जानना कि यह उन्होंने कितनी विषम परिस्थितियों के बीच कहा था. ईसा से करीब 70 वर्ष पहले रोम में दास योद्धाओं की ओर से जबरदस्त विद्रोह हुआ था. जिसने रोम की साम्राज्यवादी सेना को पीछे हटने को विवश कर दिया था. बाद में रोम और यूनान के अन्य नगरराज्यों की समन्वित सेनाओं के आगे स्पार्टकस के योद्धाओं को हार मिली. स्पार्टकस समेत उसके छह हजार योद्धाओं को सामूहिक सूली पर चढ़ा दिया गया. इससे दासों के दिल में यह बात घर कर गई थी कि यदि स्पार्टकस जैसा महान योद्धा उनकी मुक्ति के रास्ते नहीं खोल सका तो आगे भी असंभव है. ईसा मसीह का उपर्युक्त कथन उन्हें दौड़ में बने रहने की उम्मीद जगाता था. रोम का राज्य न सही, ईश्वर का राज्य उनके लिए सुरक्षित है, वर्तमान की पीड़ाओं, अभावों और नाकामियों को भुलाकर वे सुखमय जीवन जी सकते हैं. खासकर जब उनके सामने अमीरियत का रौब तथा गरीबी के लिए ढेर सारे तर्क सुख मौजूद हों.

धर्म को लोकप्रिय बनाने वाला अगला सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम समानता का सिद्धांत है. धर्म समाज में व्याप्त ऊंचनीच का समर्थन करता है. स्तरीकरण को बनाए रखने के लिए जाति और वर्ण जैसी व्यवस्थाओं का विन्यास करता है. उन्हें समर्थन देकर ताकतवर बनाता है. दूसरी ओर वह बराबर यह दोहराता है कि ‘ईश्वर के दरबार में सब बराबर हैं.’….‘वही सच्चा न्यायकर्ता है’….‘उसके यहां देर है, अंधेर नहीं’ आदिआदि. इस तरह वह एक ओर तो शोषणकारी व्यवस्था का समर्थन करता है, दूसरी ओर शोषित को यह विश्वास भी दिलाता है कि उसके साथ इस दुनिया में जो अन्याय हो रहा है, एक न एक दिन उसका न्याय होना है. वह माने रहता है कि ईश्वर के यहां देर भले हो, अंधेर नहीं है. इस तरह वह एक प्रलोभन की भांति, मरीचिका की भांति व्यक्ति को ललचाता है. उसको अन्याय और उत्पीड़नकारी व्यवस्था से समझौता करना सिखाता है. वह तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था को अपने हितों के लिए प्रभावित करता है तो उससे प्रभावित भी होता है. सामंतवादी दौर में मंदिरप्रवेश, गंगास्थान जैसे धार्मिक कार्यकलापों में सामाजिक वरीष्ठताक्रम के अनुसार भागीदारी का अवसर मिलता था. मंदिर में जब तक गांव का मुखिया पूजा न कर ले, तब तक आमजन को प्रवेश का अधिकार ही नहीं था. अनेक जातियों को मंदिर प्रवेश की अनुमति ही नहीं थी. गंगा स्नान पर मेलों में भी सामाजिक अनुक्रम का ध्यान रखा जाता था. लोकतंत्र में वे परंरपराएं दम तोड़ चुकी हैं.

धर्म का लचीलापन भी उसकी दीर्घायु के लिए जिम्मेदार है. वह हर नए वैज्ञानिक आविष्कार पर नजर रखता है. अपनी आधुनिकता दर्शाने, नवागत पीढ़ी पर प्रभाव जमाने तथा अपने स्थायित्व के लिए तत्काल उसका उपयोग करने, उसका अपने हितों के साथ अनुकूलन करने का प्रयास भी करता है. नवीनतम वैज्ञानिक आविष्कारों को आत्मसात करने की प्रक्रिया धर्म में लगातार चलती रहती है. लेखनकला का विकास हुआ तो मानव जीवन की समस्याओं के बारे में लिखने, चुनौतियों पर तर्क सम्मत ढंग से विचार करने, विकास और जीवन के विभिन्न पक्षों पर उपलब्ध ज्ञान के संग्रहण के बजाय सबसे पहले धर्मग्रंथों के संकलन पर जोर दिया गया. उस समय तक के उपलब्ध ज्ञान को धर्मग्रंथों में जगह भी मिली तो ईश्वर नाम का मुलम्मा चढ़ाकर. कंप्यूटर आया तो उसका उपयोग भविष्य बांचने, कुंडली बनाने में किया जाने लगा. विज्ञान ने मनुष्य को लुभाना शुरू किया तो धार्मिक परंपराओं को ही वैज्ञानिक ठहराने की मानो होड़ सी मच गई. पर्यावरण के प्रति चिंता बढ़ी तो पूजापाठ को पर्यावरण संरक्षण के उपकरण के रूप में उल्लिखित किया जाने लगा. यानी व्यक्ति की चाहे जो विचारधारा हो, या विचारधारा न भी हो तो भी, धर्म के पास उसे लुभाने, उसको अपने पाले में बनाए रखने का भरपूर तामझाम होता है.

इतिहास को अपने हितों के मोड़ने का खेल भी धर्म के नाम पर बाखूबी होता आया है. इस खेल में वह ऐतिहासिक चरित्रों का स्वार्थानुकूल उपयोग करता है. इसका एक उदाहरण भारतीय देवता गणेश हैं. देवताओं के राजा इंद्र हैं. वे वैदिक देवता भी हैं. परंपरा के अनुसार उन्हीं को प्रथम पूज्य होना चाहिए. फिर नवागत देवता गणेश को प्रथम स्थान देना, उन्हें प्रथम पूज्य दिखाना! गणेश वेदोत्तर काल के देवता हैं. पौराणिक युग की अभिकल्पना. गौतम बुद्ध के समय देश में कई स्वतंत्र गणराज्य थे. आकार में छोटे होने के बावजूद अपनी समृद्धि और वैभव में बेमिसाल वे राज्य मगध जैसे बड़े साम्राज्यों के लिए ईष्र्या का विषय बने हुए थे. ईसापूर्व तीनचार सौ वर्ष पहले जब दुनियाभर में आरंभिक गणतांत्रिक राज्य कमजोर पड़ने लगे तो गणतंत्र समर्थकों का मजाक उड़ाने का खासा बहाना उसके साम्राज्यवादी आलोचकों को मिल गया. गणसभा के बीच कार्रवाही का लोकतांत्रिक ढंग से संचालित करते गणप्रमुख या सभापति की झुकी गर्दन को सूंड का रूप दे देना, लगातार बैठे रहने से फूली तोंद बना देना गणप्रमुख की सत्ता पर तीखा कटाक्ष था. जिसका ध्येय था गणप्रमुख और उसके माध्यम से गणतांत्रिक व्यवस्था का उपहास करना. चूंकि सत्ताओं का पतन विचार का पतन नहीं होता. इसलिए केवल छवि विकृत कर देने, उसका मखौल उड़ाने से भी काम नहीं चलने वाला था. अतएव गणतंत्र और साम्राज्यवाद के बीच समन्वयकारी नीति अपनाने की कोशिश भी की गई. और तब गणेश(गणवेश) को केंद्रीय सत्ता का समर्थक घोषित करने के लिए एक रूपक रचा गया. एक कहानी….प्रथम पूज्य होने का सम्मान पाने के लिए देवताओं को प्रतियोगिता में उतारा गया, उस समय गणेश तीनों देवताओं(कहींकहीं अपने मातापिता) की परिक्रमा कर खड़े हो जाते हैं. एक तरह से यह कर्म के आगे व्यक्ति पूजा का उदाहरण भी हो सकता है. जो सिद्ध करता था कि सत्ता की वैधानिकता के लिए जनसमर्थन अथवा जनसहयोग की जरूरत नहीं है. केवल केंद्रीय व्यक्तियों को प्रसन्न करके, उनका आशीर्वाद प्राप्त करके भी शीर्ष पर बना रहा जा सकता है. इसी आधार पर गणप्रमुख की छवि को विकृत कर गणेश के रूप में लाया गया. यह ठीक ऐसा ही आयोजन था, जैसे गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना. असल में यह शक्ति के विकेंद्रीकरण के प्रतीक गणपति को केंद्रीय सत्ता के समर्थन में लाने की कोशिश का नतीजा था. वैसे भी देवेश तो इंद्र हैं, गणेश को तो गणों(नागरिकों) का स्वामी होना चाहिए. पुरा आख्यानों में शिव गणेश को महादेव का पुत्र बताया गया है. यदि हड़प्पाकालीन सभ्यता से प्राप्त अवशेषों पर चर्चा की जाए जाए तो वहां एकमात्र देवता पाशुपत का उल्लेख मिलता है. यदि इसको धार्मिकता से न जोड़ा जाए तो एक प्रतीक के भी कई अर्थ निकलते हैं. जिनमें शिव पहले जननेता या लोकस्वीकृत महामानव दिखाई पड़ते हैं. वे एक ओर तो नीलकंठ हैं, अपनी जनता के कल्याण के लिए कष्टों को पचा जाने वाले, दूसरी ओर उन्हें विनाश का देवता भी कहा गया है. यानी जनता यदि क्रुद्ध हो तो वह पूरे संसार में तांडव मचा सकती है. ये प्रतीक देश के आदि जनतंत्र के अवशेष भी हो सकते हैं. जननेता को देवता का रूप देकर उसकी क्रांतिकारिता पर पानी फेर देना धूत्र्त, प्रवंचक पुरोहितों की केवल चाल नहीं. विवशता भी थी. जो समन्वयकारी परिस्थितियों में आवश्यक था.

धर्म, राजनीति और पूंजी का यही गठजोड़ आज तक चला आ रहा है. पूंजीवाद के कंधों पर सवार आधुनिक अभिजन चाहता है कि लोग बेहतर उपभोक्ता सिद्ध हों. इसके लिए वह धर्म और संस्कृति का सहारा लेता, समाजेतिहासिक तथ्यों को तोड़तामरोड़ता है. पुरोहित, धर्मोेपदेशक, प्रचारक आदि धार्मिक विशेषाधिकार प्राप्त लोग अभिजन संस्कृति को मजबूत करने के लिए पक्षपातपूर्ण ढंग से काम करते हैं. व्यवहार में वे धनसंपदा और भौतिक निधियों की उपेक्षा करते तथा इन्हें धर्म की राह में बाधक बताते हैं. धनवान व्यक्ति के स्वर्ग प्रवेश के बजाय ऊंट का सुई की नोक ने पार निकलना आसान है, ऐसी बातें गरीबी के महिमामंडन में सुनीसुनाई जाती हैं. संस्कृत की में कहा गया है—

तुष्ठो हि राजा यदि सेवकेभ्यो भाग्यात् परं नैव ददाति किचिंत

अहर्निशं वर्षति वारिवाहः तथापि पत्रत्रियः पलाशः.’

अर्थात राजा यदि सेवकों पर खुश हो फिर भी उनके भाग्य से अधिक वह उन्हें कुछ नहीं दे सकता. बादल रातदिन बरसें तो भी पलाश को तो केवल तीन ही पत्ते आते हैं.’ जैसी बातें जन को अपने हालात से संतोष करने, उन्हें भाग्यवादी बनाए रखने के लिए अक्सर कहीसुनी जाती हैं. अप्रकट रूप से वे समाज की कुल धनसंपदा पर कुंडली मारे बैठे मुट्ठीभर अभिजन समाज की अधिकारिता को वैध ठहराने में सहायक बनते हैं. ईश्वर को बीच में लाकर वे वृहद जनसमाज को समझाते हैं कि शीर्षस्थ वर्ग को जो विशेषाधिकार, सुविधाएं, मानसम्मान, धनवैभव आदि प्राप्त हैं, उनके पीछे विशेष ईश्वरीय कृपा है. प्रकारांतर में वे असमानता के प्रमुख कारणों से लोगों का ध्यान हटाए रखते हैं. धार्मिक अभिजन उत्पादकता की दृष्टि से परजीवी समाज होता है. वह स्वयं किसी उत्पादन प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेता. लेकिन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में वह स्वामीवर्ग का पक्ष लेकर उसके शोषण को शास्त्रीय आधार पर मान्य ठहराता है. अपनी उच्च हैसियत को बचाए रखने के लिए वह राजनीतिक अभिजन का भी साथ देता है और उसकी मनमानियों को धर्मसंगत ठहराकर जनाक्रोश की धारा को मोड़ने में सहायक बनता है. इस प्रकार शीर्ष स्तर पर धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक अभिजन की तिकड़ी एकदूसरे को सहयोग देती, परस्पर मनमानियों का समर्थन करते हुई सत्ता में बनी रहती है. यदि कभी परिवर्तन की लहर उठती भी है तो अनुभव और आत्मविश्वास की कमी के कारण जनसाधारण में से बदलाव के लिए लोग आगे नहीं आ पाते और सत्ता अभिजन समाज के ही किसी सदस्य के हाथों में खिसक जाती है. इससे व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन नहीं हो पाता.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

अनुक्रमणिका :

1. “Religion is excellent stuff for keeping common people quiet. Religion is what keeps the poor from murdering the rich.” ―Napoleon Bonaparte

2. belief is the death of intelligence….when dogma enters the brain, all intellectual activity ceases.- Robert Anton Wilson, Cosmic Trigger.

धर्म और अभिजन संस्कृति—दो

अभिजन संस्कृति के विकास में धर्म का योगदान

 

आधुनिक समाज की दृष्टि से देखा जाए तो उसमें पुरोहित, नौकरशाह, व्यापारी, राजनेता, सैन्याधिकारी, उच्च पेशेवर जैसे अभिजन समाज के कई उपवर्ग मिलेंगे. किंतु प्राचीन समाजों में जब संस्थाओं का इतना विस्तार नहीं हुआ था और सामाजिकव्यापारिक संबंध अपेक्षाकृत सरल होते थे, इनकी संख्या धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अभिजन तक सीमित थी. इनमें से पहले किसका जन्म हुआ, यह सहीसही बता पाना संभव नहीं है. इतना तय है कि सामाजिक विकास के आरंभिक दौर में ये सब एक ही वर्ग से संबंधित थे. यह भी कह सकते हैं कि सरल समाजों में अकेला व्यक्ति धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल लेता था. चूंकि संस्कृति सामूहिकता के बीच जन्म लेती है, अतएव सरल समाजों में अभिजन संस्कृति के विकास की कल्पना नहीं की सकती. फिर भी कुछ ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति अवश्य रहे होंगे, जिन्हें एकल सत्ताकेंद्र का आशीर्वाद प्राप्त हो या जो उसके सन्निकट रहकर सुविधालाभ पाते हों. कालांतर में, निरंतर जटिल होते समाजार्थिक संबंधों के बीच, अकेले व्यक्ति द्वारा विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को संभाल पाना कठिन हो चला था. शांतिव्यवस्था के लिए चुनौती पेश करने वाले संकट आंतरिक और बाह्यः सभी प्रकार के थे. बस्तियों में एक साथ रह रहे लोगों के बीच मनमुटाव और छोटेछोटे झगड़ों का होना सामान्य बात थी. अतः जनजीवन को सामान्य बनाने, शांतिव्यवस्था कायम करने, संकट के समय समूह की रक्षा करने तथा विभिन्न गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के समय परस्पर विरोधी पक्षों के बीच तालमेल बनाए रखने हेतु ऐसे लोगों की आवश्यकता थी, जो नेतृत्वकुशल होने के साथसाथ दूरद्रष्टा, ईमानदार, कर्मठ, साहसी, व्यवहारकुशल तथा बुद्धिमान भी हों.

सर्वसम्मति से यह जिम्मेदारी ‘विश’ अथवा ग्रामणी को सौंपी जाने लगी. वह गांव का मुखिया होता था. आरंभ में उसका दायित्व अतिरिक्त अनाज का प्रबंधन करना तथा आवश्यकता के समय उसका समूह के सदस्यों में वितरण करना था. वह आवश्यकतानुसार बस्ती के छोटेमोटे झगड़ों को सुलझाकर विरोधी गुटों में संधिसुलह भी कराता था. उसके अलावा गांव में एक पद पुरोहित का था. उसका प्रमुख कार्य लोगों के धार्मिक मसलों में लोगों को नेतृत्व करना था. पदानुक्रम में उसे बाकी सभी पर वरिष्ठता प्राप्त थी. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उसका कथन निर्णायक माना जाता था. वहीं व्यवस्था का सर्वेसर्वा होता है. भारत की प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष सिंधु घाटी से प्राप्त होते हैं. उनके विश्लेषण से पता चलता है कि उस समय तक नागर व्यवस्था पनप चुकी थी. कृषि के साथसाथ शिल्पकर्म का विकास हो चुका था. अंतर्महाद्वीपीय व्यापार में तेजी आई थी. सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त संकेतों में यद्यपि वहां की शासन व्यवस्था के बारे में सटीक अनुमान लगा पाना संभव नहीं है. लेकिन तत्कालीन मिस्र सहित पश्चिम के कई नगरराज्यों का प्रबंधन धार्मिक नेताओं तथा पुरोहितों के अधीन था. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि उस समय धर्म प्रमुख ही नगरराज्य का वास्तविक कर्ताधर्ता होता था. उपजाऊ जमीन, समृद्ध वनसंपदा के कारण सिंधु सभ्यता के नगर अपने समकालीन नगरराज्यों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित और शांत थे. लेकिन व्यवस्थित शासनप्रणाली का न उभर पाना उस सभ्यता की कमजोरी थी. संभवतः वही दुनिया की उस प्राचीनतम सभ्यताओं में एक के पतन का प्रमुख कारण बना था.

सिंधु घाटी के लोगों का आर्थिक जीवन मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर था. सिंधु सभ्यता के किसान गैहूं, जौ, राई, सरसों आदि की खेती करते थे. अन्नभंडारण के लिए बड़े गोदामों का उपयोग किया जाता था. यहां तक कि अनाज को पीसने के लिए भी सामूहिक प्रबंध थे. खेती के लिए औजारों का प्रचलन था. सिंधुवासियों ने सुदूर मिस्र, रोम, अरब तक व्यापार के अनुकूल जलमार्गों का अन्वेषण किया था. उनपर व्यापारिक दलों का आवागमन लगा ही रहता था. आरंभिक व्यापार असंगठित था. प्रारंभ में प्रायः कारीगर ही समूहबद्ध होकर व्यापार करते थे. उनके अलावा संभवतः एक श्रेष्ठि वर्ग भी पनप चुका था जो खुद तो निर्माण कार्य में दक्ष न था, परंतु उत्पाद को बेचने का हुनर उनके पास था. इस वर्ग ने कारीगरों से माल खरीदकर उसका दूरदराज के क्षेत्रों तक व्यापार करना आरंभ कर दिया. आर्थिक विकास की यह स्वाभाविक परिणति थी. असल में महीनों तक चलने वाली लंबी यात्राओं में व्यस्त रहने के कारण उत्पादक कर्म को स्वयं संभालना संभव भी नहीं था. इसलिए शिल्पकार वर्ग के लिए भी यही उपयुक्त था कि वह केवल उत्पादन पर ध्यान दे. दूरस्थ व्यापारकेंद्रों को बड़े व्यापारियों के लिए छोड़कर स्वयं केवल स्थानीय बाजारों में अपनी पैठ बनाए रखें. हालांकि कुछ ऐसे भी शिल्पकार संगठन अवश्य रहे होंगे जो उत्पादन और वितरण दोनों की जिम्मेदारी स्वयं संभालते थे.

इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता तक समाज में अभिजन मानसिकता जन्म ले चुकी थी. धर्म और अर्थ का नियंत्रण करने वाले शासक वर्ग का उदय हो चुका था. एक वर्ग था जो स्वयं को दूसरों से ऊपर मानता था. मोहनजोदड़ों और हड़प्पा के उत्खनन अवशेषों से सामान्य जन और अभिजन वर्ग के लिए बने अलगअलग आवासों का पता चलता है. सामान्य जनों के आवास जहां छोटे हैं, वहीं अभिजन वर्ग के आवास खासे बड़े हैं. छोटे घरों का आकार प्रायः 26 गुणा 30 फुट का है, वहीं विशिष्ट जनों के आवास उससे काफी बड़े, लगभग 242 फुट गुणा 112 फुट के थे. इसी प्रकार का भेद स्नानागार में मिला है. पुरोहित वर्ग के स्नानागार साधारण लोगों के स्नानागारों की अपेक्षा काफी बड़े हैं. इनसे जहां इन सभ्यताओं के वैभवशाली अतीत तथा सत्ता के आधार पर अभिजन और सामान्यजन में विभाजन का बोध होता है. एक निहितार्थ यह भी है कि सभ्यता और अभिजन वर्ग का उदय परस्पर, पूरक और अन्योन्याश्रित घटनाएं हैं. सांस्कृतिकसांस्कृतिक विकास की अनिवार्यता के रूप में दायित्वों के निर्वाह के लिए केंद्रीय सत्ताकेंद्रों की अभिकल्पना की गई. कालांतर में उन सत्ताकेंद्रों पर नियुक्त व्यक्तियों के भीतर विशिष्टताबोध पनपने लगा, जिसने अभिजन मानसिकता को जन्म दिया. आगे चलकर जब समाज का आर्थिक, सामाजिक विभाजन हुआ तो जनमानस ने भी उन सत्ताकेंद्रों को अपनी नियति की भांति स्वीकार कर लिया. इस बात की परिकल्पना की जा सकती है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता के विकास तक समाज में आर्थिक, राजनीतिक वर्ग की अलगअलग श्रेणियां बन चुकी थीं. उनमें पुरोहित शीर्षस्थ स्थान पर था.

 

ईसा से करीब 2000 वर्ष पहले सिंधु घाटी की सभ्यता का पतन हुआ. अगले एक हजार वर्षों के दौरान गंगायमुना के दोआब में जो नई सभ्यता विकसित हुई, वह अपेक्षाकृत सुस्थिर थी. उस समय तक बड़े राज्यों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी. राज्यों के प्रबंधन के लिए स्वतंत्र राजनीतिक समूह जन्म ले चुका था. लोग यह भी मानने लगे थे कि राज्य की सुरक्षा का मसला धार्मिक आग्रहों से इतर है. इससे समाज को कुल मिलाकर लाभ ही हुआ था. हालांकि लोकजीवन अब भी धर्म के निर्णायक प्रभाव में था. इस कारण धार्मिक अभिजन का प्रतीक पुरोहितवर्ग समाज में अभी तक महत्त्वपूर्ण भूमिका मेें बना हुआ था. उसी के नेतृत्व में महत्त्वाकांक्षी सम्राट चक्रवर्तित्व का सपना पालने लगे थे. यह अवसर आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अनुकूल सिद्ध हुआ. बड़े राज्यों के गठन से व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार को अवसर मिला. यातायात के साधनों में वृद्धि ने अंतर्महाद्वीपीय व्यापार को नई ऊंचाइयां दीं. इससे कुछ ठिकाने, विशेषकर तटवर्ती स्थल महत्त्वपूर्ण व्यापारिककेंद्रों के रूप में पनपने लगे. जिसका सुखद परिणाम तत्कालीन राज्यों की तीव्र आर्थिक समृद्धि के रूप में सामने आया था. बड़े राज्य के प्रबंधन के लिए राजा को अनेक कर्मचारियों, मंत्रियों और अधिकारियों की आवश्यकता थी, जो न केवल अलगअलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ, बल्कि व्यवहारकुशल एवं भरोसेमंद भी हों. फलस्वरूप शिक्षा के नए क्षेत्रों का विकास हुआ, जिसने पुनः व्यापार के नवीनतम क्षेत्रों को जन्म दिया. उससे पहले दुर्गम रास्तों पर लुटेरों का भय बना ही रहता था. राज्यों की सीमा और चौकसी बढ़ने से वे अपेक्षाकृत अधिक दूर तक बिना कोई अतिरिक्त कर चुकाए व्यापार कर सकते थे. सुरक्षा और व्यापारिक कारणों से बड़े राज्यों में सत्ता के छोटेछोटे उपकेंद्र उभरने लगे. इससे व्यापारिक हित भी सधे और राजनीतिक अभिजन का दायरा भी विस्तृत होता गया.

व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार से दो भिन्न संस्कृतियों को परस्पर करीब आने का अवसर मिला. अलगअलग समूहों के देवता, धर्म, रीतिरिवाज और परंपराएं भिन्न होती थीं. इसके बावजूद उनके आर्थिक, सामाजिक हित उन्हें परस्पर जोड़े रखते थे. उससे पहले केवल धर्म था, वही दो समूहों के बीच एैक्य अथवा प्राथक्य का भाव पैदा करता था. बदले हुए हालात में दो भिन्न समूहों में सहयोग या स्पर्धा दर्शाने के लिए व्यापार और राजनीति महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरे थे. अनुत्पादक पुरोहित कर्म में कोई अंदरूनी स्पर्धा नहीं थी. इसलिए पुरोहित वर्ग के आगे आंतरिक एवं बाह्यः चुनौतियां न्यूनतम थीं. लेकिन व्यापारी और राजनीतिक अभिजन को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता था. यूं तो भारत में राजनीतिक और आर्थिक कार्य भी विशिष्ट जातिवर्ग के लिए निर्धारित थे. परंतु स्पर्धा में बने रहने के लिए एक व्यापारी को अपने ही सदस्यों के साथ स्पर्धा करनी पड़ सकती थी. पेशागत चुनौतियों के कारण उसका जीवन अपेक्षाकृत उथलपुथल भरा था. इसका उसको लाभ भी मिलता था. अपनी कार्यकुशलता में सुधार के जरिये वह न केवल अपने, बल्कि दूसरे समूहों को भी प्रभावित करने में सफल होता था. चूंकि अलगअलग समूहों के भिन्न देवता और कर्मकांड रहे होंगे. अतः कर्मकांडों के अंतर एवं बहुदेववादी धारणाओं के चलते एक समूह का पुरोहित दूसरे समूह में न तो उतना सम्मानेय था, न ही जरूरी. इससे धार्मिक अभिजन की सीमाएं साफ नजर आने लगी थीं. पुरोहितवर्ग का प्रभाव केवल अपने समूह तक सिमटने लगा. किंतु समूह के भीतर बीच उसका प्रभाव स्थायी तथा इतना गहरा था कि उसकी अनुशंसा के बगैर दूसरे का वहां दखल दे पाना नामुमकिन जैसा था. विशेष लोगों की जीवनचर्या तथा अन्य सामाजिक मसलों को लेकर. पुरोहित को इससे भी संतुष्टि थी. धर्म को संगठित ताकत के रूप में बदलने के लिए ऐसी ही सघन प्रभावोत्पादकता जरूरी थी. यह तभी संभव तब जनसाधारण को कर्मकांडों में इतनी बुरी तरह से उलझा दिया जाए कि वह चाहकर भी उनकी किलेबंदी को तोड़ न सके. इसके लिए पापपुण्य, स्वर्गनर्क, पुनर्जन्म आदि का मायाजाल खड़ा किया गया. ऐसे शास्त्रों की रचना की गई जो व्यक्ति के मुक्त सोच को अवरुद्ध कर उसे अनुसरण का पाठ पढ़ाते हों. जैसेजैसे समाज का विकास हुआ, धर्म के नाम पर मानवीय विवेक की किलेबंदी बढ़ती ही गई. पंद्रहवी शताब्दी में पश्चिम में वैज्ञानिक प्रस्फुटन हुआ तो पुरोहित वर्ग को अपने अस्तित्व के ऊपर खतरा नजर आने लगा. तब बड़ी चतुराई से उसने धर्म को विज्ञानसम्मत बताने का प्रोपगेंडा आरंभ कर दिया. चूंकि विज्ञान के आगमन के साथ समाज में आर्थिक विभाजन भी बढ़ा था. जो मुख्यतः उत्पादक आर्थिक अभिजन द्वारा मुनाफे के बड़े हिस्से पर अधिकार कर लेने से बढ़ा था. जिसे राजनीतिक समर्थन प्राप्त था. उस समय उत्पादक वर्ग का समर्थन करते हुए पुरोहित वर्ग ने जनसाधारण को तरहतरह से फुसलाना आरंभ कर दिया. धार्मिकराजनीतिकआर्थिक अभिजन की शीर्ष तिकड़ी के आगे जनसाधारण ने अपनी दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगा.

 

धर्म की उत्पत्ति मूलतः आध्यात्मिक जिज्ञासा से प्रेरित थी. वह मानवीय विवेक एवं चिंतन सामथ्र्य से अनुप्रेत होती थी. मनुष्य की विचारणा उसके अनुभव और विवेक के अनुसार नित नए रूप धरती थी. इसलिए धर्म का ताकत के स्रोत में उस समय तक बदलना संभव न था, जब तक उसकी धारणाओं में स्थायित्व न हो. समूह पर दीर्घगामी पकड़ के लिए आवश्यक था कि लोग पुरोहित पर आंख मूंद कर विश्वास करें. उसके कहे को आप्त वचन का सम्मान दें. यहां तक कि उनकी निर्णय क्षमता भी पुरोहित के दिए गए दिशानिर्देशों से अनुशासित हो. इसके लिए कर्मकांडों की अंतहीन और जीवन बहुव्यापी शृंखला बनाई गई. उनका संहिताकरण किया गया. फिर संहिताओं को दैवीय बताकर उनमें संकलित तथ्यों को तरहतरह से जनता पर थोपा जाने लगा. पुराणों, स्मृतियों और महाकाव्यों के जरिये अवतारवाद का गुणगान किया गया. मौलिक ज्ञान की जगह पाखंड को दे दी गई. इससे धर्म के आस्थाकरण को बल मिला. आस्था के दायरे में कैद जनशक्ति राजनेता के काम थी. वह उससे जो चाहे वह काम ले सकता था, अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के लिए किसी भी युद्ध में झोंक सकता था. वह आर्थिक अभिजन के भी काम की थी. अपने उत्पादों की बिक्री के लिए उसको भी बाजार की आवश्यकता थी. इस प्रकार धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक अभिजन का स्वार्थी गठबंधन दिनोंदिन मजबूत होता गया. धार्मिक अभिजन ने आध्यात्मिक जिज्ञासा को आस्था में ढालने की भरपूर कोशिश की थी तो राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों ने आस्था को अंधआस्था तथा श्रद्धा को अंधश्रद्धा में ढालने के साजिशाना काम में अपना पूरापूरा सहयोग दिया.

धर्म की अवधारणा के पीछे आरंभिक सोच शायद इतनी बुरी न थी. अकेले मनुष्य और जानवर में कोई अंतर न था. समाज उसको संस्कारित करता, संरक्षण देता था. इस कारण समाज मनुष्य की जरूरत थी, तो समाज की जरूरत थी, सबकी शांति और खुशहाली. पर सभी लोगों को समूहबद्ध रखना, शांतिव्यवस्था और भाईचारा कायम रखना. सभी को एकसाथ आगे बढ़ते देखना, विकास की निरंतरता को बनाए रखना—आसान बात न थी. ऊपर से आदमी के अपने लोभ, लालच, झूठ और दुर्बलताओं पर काबू रखना, कुछ ऐसा करना जिससे व्यक्तिमात्र की अच्छाइयों का लाभ सबको मिले और बुराइयां उसके भीतर से कभी बाहर ही न आ सकें. बल्कि मनुष्य स्वयं ही उन बुराइयों से जूझता रहे. समाज में लोकोपकारी जीवनमूल्यों करुणा, त्याग, परोपकार, अपरिग्रह, अस्तेय, सत्य, सहयोग आदि का बोलबाला हो. लोगों में एकता और विश्वास की भावना हो. इसके लिए उस समय समाज का भला चाहने वाले मनीषियों को संभवतः एक ही रास्ता समझ में आया—मनुष्य की आदि जिज्ञासा और शाश्वत नैतिक मूल्यों को एकदूसरे से जोड़ देना. मनुष्य की आदि जिज्ञासा थी, अपने जीवनरहस्य को समझना. सूरज, चांद, सितारे, पृथ्वी, अन्यान्य ग्रहनक्षत्रों तथा जीवजगत के सर्जनकर्ता के बारे में जानना. और तब उन मनीषियों ने ईश्वर की परिकल्पना की और जो नैतिकमूल्य उन्हें समाजसृष्टि के कुशल संचालन के लिए जरूरी लगते थे, उन्हें ईश्वरीय विधान बनाकर जीवन की कड़ी मान लिया. आदमी उन्हें माने, उनपर विश्वास करे, उन्हें अपने आचरण में ढाल ले, इसके लिए उन्होंने उन्हें उन नैतिक मूल्यों को परमात्मा द्वारा सृजित बताया. चूंकि समाज को स्थायित्व देने योग्य नैतिक मूल्य पूरी दुनिया में एक जैसे थे तथा व्यक्ति के आध्यात्मिक विश्वास उसकी भौगोलिक, व्यावहारिक परिस्थितियों की देन. इसलिए दुनिया में जितने भी धर्मों की परिकल्पना हुई उनके नैतिक मूल्य हर जगह एक समान थे. अंतर केवल आध्यात्मिक अनुभवों और विश्वास का था. उन उदारचेता मनीषियों ने शायद ही सोचा होगा कि जिस धर्म को मनुष्य की आदि जिज्ञासा के समाधान के नाम पर समाज में उतार रहे हैं, वह एक दिन उसकी जिज्ञासा को ही ग्रहण लगा देगा. स्वार्थी पुरोहित निजी स्वार्थ के लिए कर्मकांडों का इतना बड़ा जखीरा खड़ा कर देंगे कि धर्म के प्राणतत्व नैतिक मूल्यों के लिए उसमें जगह ही नही बचेगी. जिस धर्म के बारे में सोचा गया था कि वह मनुष्यता को परिभाषित करने में सक्षम होगा, एक दिन वही उसके गले की हड्डी बन जाएगा! स्वार्थी, प्रपंची, लोभी, लालची, विलासिता को धर्म और शोषण को पुरुषार्थ मानने वाले लोग, गरीबी का महिमामंडन करेंगे और परलोकसुख का वास्ता देकर जनसाधारण से जीवन के मामूली सुखसुविधाएं भी छीन लेंगे!

आम आदमी के लिए धर्म का प्रलोभन बड़े काम का सिद्ध हुआ. इसलिए कि जीवन में चारों दिशाओं से समस्याओं से घिरे, जीवन की दौड़ में पिछड़ गए व्यक्ति के लिए वह एक अंतिम सहारा था. जो दौड़ में बने रहने की अनुभूति देता था. धर्म की संरचना ही इस प्रकार की गई थी कि जिसमें आदमी अपने हुनर अपनी बुद्धिमत्ता का कोई योग न था. बल्कि कुछ न होने और सबकुछ छोड़ देने की प्रवृत्ति को वह ‘मुक्ति’ का नाम देकर महिमामंडित करता था. प्रकट में वह गरीब आदमी द्वारा अमीरियत के सपने को धिक्कारता था. धनवान आदमी का स्वर्ग के दरवाजे को पार करना उतना ही असंभव है, जितना हाथी द्वारा सुई की नोंक से पारगमन—ईसामसीह के इस कथन का दूसरे धर्मावलंबियों के बीच भी तरहतरह से बखान किया गया. मृत्योपरांत आनंद की प्राप्ति के लिए इहलौकिक कष्टों को मूक सहना तथा दुर्दशा के लिए भी तथाकथित ईश्वर का आभार मानना, यह बात स्वार्थी धर्मावलिंबियों द्वारा जनसाधारण के दिल में बिठा दी गई थी. किन परिस्थितियों में कही गई थी, इस तथ्य को एकदम भुला दिया गया. धर्म के नाम पर होते आए षड्यंत्र को समझने के लिए इसकी तह तक जाना आवश्यक है. यूनान की घृणित दास प्रथा के विरोध में हथियार उठाने वाला रणबांकुरा योद्धा था, वीर स्पार्टकस. उसने दासों को एकजुट कर रोम की सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ा था. स्पार्टकस की वीरता और कुशल रणनीति के कारण रोम की करारी मात हुई थी. दासों को विश्वास हो गया कि आगे दासता का कलंक उन्हें और न ढोना पड़ेगा. उनकी जो संतान जन्म लेंगी वे आजाद होंगी. अपनी मर्जी की मालिक. इसके लिए वे स्पार्टकस के साथ थे. उसको अपना मसीहा मान रहे थे. लेकिन साम्राज्यवादी चुप कहां बैठने वाले थे. दासों के विरोध में यूनान के समस्त साम्राज्यवादी राज्य एकजुट होकर स्पार्टकस की सेना पर टूट पड़े. वह बड़ी वीरता से लड़ा और शहीद हुआ. साम्राज्यवादी शासकों ने पराजित दास सेना के छह हजार योद्धाओं को सामूहिक सूलियों पर चढ़ा दिया गया. दासों के लिए यह बहुत बड़ा आघात था. यदि स्पार्टकस जैसा महानतम योद्धा उनकी मुक्ति के रास्ते नहीं खोल सका तो आगे भी असंभव है. निराशा हताशा में ढल गई. स्पार्टकस की मृत्यु के करीब 70 वर्ष बाद जब ईसामसीह का जन्म हुआ, दास पूरी तरह से हताशा में डूबे हुए थे. स्पार्टकस के शहीद होने के बाद अपने उद्धार की उम्मीद बिलकुल छोड़ चुके थे. ऐसे में ईसामसीह से उन्हें मुक्ति का सपना अलग तरीके से परमात्मा के नाम पर दिखाया तो अंधेरे में डूबे उन दाससमाज ने उसपर आसानी से भरोसा कर लिया. वे ईसामसीह के आसपास एकजुट होने लगे. इस जन्म में मुक्ति संभव नहीं तो अगले जन्म में ही सही. ईसा मसीह का कथन उन्हें दौड़ में बने रहने की उम्मीद जगाता था. रोम का राज्य न सही, ईश्वर का राज्य उनके लिए सुरक्षित है. इस भरोसे वे वर्तमान की पीड़ाओं, अभावों और नाकामियों को भुलाकर जीने लगे. साम्राज्यवादियों को यह बड़ा अच्छा लगा. दासों को हमेशाहमेशा के लिए दास बनाए रखने के लिए एक नया हथियार उनके हाथ आ लगा था, वह हथियार था—धर्म का. उसके बाद यह हथियार पूरी दुनिया में आजमाया जाने लगा. आज तक उसका उपयोग जारी है.

 

धर्म अभिजन वर्ग की सत्ता, संसाधनों पर एकाधिकार को शास्त्रीय मान्यता प्रदान करता है. इस अनुचित अधिकारिता को वह जनसामान्य तक इतनी बार और इतनी तरह से ले जाता है कि जनसाधारण अपनी दुरवस्था को ही अपनी नियति मान लेता है. यह अनुकूलन इतना प्रभावी हो जाता है कि जिन स्थितियों में साधारणजन प्रतिदिन रहता है, उनमें किसी अभिजन को यदि एक दिन भी गुजरना भी पड़े तो उसको दारुण दुख होता है. रामायण में राम का वनगमन एक राजपरिवार के सत्ता के सघर्ष का मसला है. ऐसे संषर्घ उस समय राजपरिवारों में होते रहते थे. इसके लिए राजपरिवारों का उजड़ना और बसना सामान्य बात थी. लेकिन कैकयी जब दशरथ से वरदान मांगकर राम को वनगमन के लिए विवश कर देती है तो इस प्रसंग को नाटक अथवा रामलीला के जरिये देखना, सुनना, राम और सीता का वल्कल वेश में वनगमन करते हुए देखना जनता को उदास बना देता है. अभिजन वर्ग का सत्ता लोलुप स्वार्थपूर्ण चेहरा सामने न आए, उनके अंदरूनी झगड़े, बड़ों का तथाकथित बड़प्पन बना रहे, इसके लिए रामायणकार अपने ही वर्ग की स्त्री मंथरा को दोषी ठहराता है. यह जानते हुए भी कि चतुर दासियां वही कहा करती थीं, जो उनकी स्वामिनी या स्वामी सुनना चाहते थे. परोक्षरूप में वे अपने स्वामी अथवा स्वामिनी की इच्छा की अभिव्यक्ति ही करते थे. तभी वे अपने आश्रयदाता के परमप्रिय और विश्वसनीय होने का उपहार पाते थे. इसलिए मंथरा ने कैकयी से यदि कुछ कहा भी तो एक प्रकार से कैकयी की इच्छा की अभिव्यक्ति ही की थी. फिर भी कैकयी की करनी का दोष जनसामान्य के सहजबोध को कुंठित करने के लिए मंथरा को दिया जाता गया. युधिष्ठिर के जुआ खेलने को बड़े लोगों का स्वाभाविक खेल मानकर शास्त्रकार उसको कोई दोष नहीं देता, यहां तक कि अपनी पत्नी को दांव पर लगाकर हार आने से भी युधिष्ठिर के ‘धर्मराज’ होने पर कोई फर्क नहीं पड़ता. जबकि दुर्योधन द्वारा पांच गांव न देने की जिद उसको खलनायक बना देती है, जिसका समापन उसकी मृत्यु के बाद ही हो पाता है.

निहित स्वार्थ के लिए अभिजन समाज धर्म को पोसता है. धार्मिक मान्यताओं को लेकर उसकी अपनी निष्ठा कितनी प्रामाणिक है, इस अनुच्छेद में इसी को लेकर चर्चा करेंगे. हमारी कोशिश यह देखने की होगी कि अभिजन वर्ग व्यवहार में जिस तरह धर्म को बढ़ावा देता है, जनभावनाओं के नाम पर जिस प्रकार उसका महिमामंडन करता है, उसके प्रति वह स्वयं कितना गंभीर होता है. उदाहरण के लिए एक कारखानेदार विशाल फैक्ट्री का निर्माण करता है. अरबोंखरबों रुपये खर्च करके मशीनें लगाता है. उसके बाद उत्पादन शुरू करता है. धर्म के प्रति अपनी आस्था को दर्शाते, हुए वह फैक्ट्री के प्रांगण में ही एक मंदिर बनवा देता है. उसकी देखभाल के लिए पुजारी भी नियुक्त कर देता है. जिसको कारखाने की ओर से पगार मिलती है. समयसमय पर दक्षिणादि भी. मंदिर की दीवारों पर सांसारिक मोहमाया, लौकिक सुख की निस्सारता, जीवन की क्षणभंगुरता और संतोष की सार्थकता जताने वाली बातें सूक्तियां लिखी होती हैं. मंदिर की देखभाल, आयोजनों आदि पर कारखाने की मद से खर्च होता है. आप कहेंगे कि इसमें बुरा क्या है? आदमी की आस्था का मामला है. कारखानेदार यदि अपनी आस्था को जताना चाहता है, तो उसकी आलोचना क्यों? वैसे भी धर्मग्रंथों में लिखा है कि आदमी को अपनी आमदनी का दसवां या बारहवां हिस्सा धर्म की राह पर खर्च करना चाहिए. यही वह करता है. इस बहाने ईश्वर ने जो उसको सुखसमृद्धि प्रदान की है, उसका धन्यबाद ज्ञापन पर देता है. सवाल अन्यथा नहीं है. यह सुनने में भी न्यायसंगत लगता है. पर बात क्या बस इतनी ही है? कणकण में भगवान, आत्मा को परमात्मा का स्वरूप बताने वाले धर्म का कारखाने में ही मंदिर बनाकर प्रचार करने वाला मालिक जरूरत के समय मजदूर को सौपचास रुपये का एडवांस देने पर देने पर नाकमुंह सिकोड़ लेता है. श्रमकल्याण के नाम पर अपनी मुट्ठी बंद कर लेता है. बातबात पर मजदूर को धमकाता है और जरासे नुकसान पर आगबबूला हो उठता है. वही मालिक, मंदिर और चढ़ावे जैसे अनुत्पादक कार्यों पर अनापशनाप खर्च के लिए तैयार हो जाता है. धार्मिक कर्मकांडों में पानी की तरह पैसा बहाने वाला पूंजीपति स्कूल के लिए कुछ हजार रुपये का चंदा देते समय भी कंजूसी करता है. आखिर क्यों? इसलिए कि धर्म के नाम पर मामूली निवेश उसके मोटे लाभ के रास्ते खोल देता है. मान लीजिए एक कारखाने को सौ मजदूर मिलकर चलाते हैं. इसका सीधासा मतलब है कि उस कारखाने से होने वाला मुनाफा उन सौ मजदूरों के गाढ़े पसीने की कमाई है. नैतिकता की दृष्टि से उस मुनाफे में उन मजदूरों का बराबर का हिस्सा है. लेकिन बात जब मुनाफे के वितरण की आती है तो कारखानेदार अपने विशेषाधिकार के साथ सारी बागडोर अपने हाथों में ले लेता है. उसकी मनमानी के चलते श्रमिक के हाथ में बस इतना आ पाता है कि अगले दिन कारखाने में सही वक्त पर पहुंचकर उत्पादन को आगे बढ़ा सके. इस तरह श्रमिकसमाज कारखानेदार की समृद्धि के लिए दिनप्रतिदिन अपने जीवन को दांव पर लगाता है. धर्म और राजनीति इसमें उसके मददगार सिद्ध होते हैं.

धर्म के प्रति कारखाने मालिक की आस्था मापनी हो तो कुल फैक्ट्री और मंदिर के क्षेत्रफल के अनुपात को देख लीजिए. दसबीस हजार वर्ग मीटर की फैक्ट्री में मंदिर के नाम आठदस मीटर का कोना छिका होगा. वह भी वहां जहां गाड़ियां खड़ी की जाती हैं. मालिक विशिष्ट अवसर के सिवाय शायद ही कभी उस ओर झांकता है. उसकी अपनी आस्था घर पर बने मंदिर में पूजाअर्चन से संपन्न हो जाती है. फिर कारखाने में मंदिर किसके लिए हैं? मजदूरों और कामगारों के लिए? पर उनके लिए तो वे हर बस्ती, सड़क किनारे सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर खड़े कर दिए जाते हैं. फिर कारखाने में बनाए गए मंदिर की उपयोगिता? अब आप इसका अभिप्राय समझने लगे होंगे. धर्म और अभिजन वर्ग के स्वार्थ संबंधों को समझने के लिए एक और उदाहरण लेते हैं. आप की किसी गांव, कस्बे, शहर से गुजरिये, रास्ते के किनारे, चैराहों पर बड़ेबड़े होर्डिंग्स और बैनर दिखाई पड़ेंगे, कोई राजयोग लिखता मिलेगा, कोई हठयोग. कोई सहजयोगी होगा तो कोई निखालिस योगी. कोई रामामृत बांटता नजर आएगा तो कोई कृष्णामृत का पान कराता हुआ. देवियों और साध्वियों की संख्या भी कम नहीं है. जीवन में और कहीं हो न हो, मगर धर्म के नाम पर, स्वयं घोषित भगवानों के बीच किसी नई ‘देवी’ का उभर आना एकदम स्वाभाविक है. लैंगिक भेद के बावजूद उनकी दुकानदारी भी जमी रहती है. पिछले दशक में दो देवता नए चर्चित हुए हैं. शनि महाराज और साईंनाथ. खाली पड़ी जमीन पर इनके मंदिर रातोंरात खड़े कर दिए जाते हैं. अगले दिन से ही भक्तों का तांता भी बंध जाता है. इन मंदिरों का खर्च तो उनके कुछ भक्तों के चढ़ावे से सध जाता है. कि पुजारी के लखपति से करोड़पति होते देर नहीं लगती. चढ़ावे की रकम को बांटने के लिए झगड़े होते रहते हैं. साफ है कि धर्म के नाम पर होने वाला खर्च केवल उसकी आस्था से प्रभावित नहीं होता. बल्कि उसकी मंशा दूसरों को इस खेल में लगाए रखने की होती है. उत्पादन को प्रभावित किए बिना न्यूनतम खर्च में कारखाने को चालू रखने की यह भी एक युक्ति है. एक ऐसा गणित जिसमें पुरोहितवर्ग को दी गई मामूली दक्षिणा से न्यूनतम मजदूरी में भरपूर काम को तैयार मजदूरों की फौज तैयार होती है. एक ऐसा टूल जो मेहनतकश वर्ग के लिए सपने और अपने मालिक के लिए समृद्धि उगलता है. संक्षेप में धर्म ऐसा विधान है जो आदमी अगले जन्म के भरपेट भोजन की आस में व्यक्ति इस जन्म की भूखप्यास से समझौता किए रहता है.

क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

धर्म और अभिजन संस्कृति

अकेले व्यक्ति के हाथ में असीमित सत्ता होना सबसे बड़ी बुराई है. हममें से कोई भी इतना सक्षम नहीं है जो असीमित ताकत को संभाल सके.फ्रैड्रिक आगस्ट वान हयेक.

धर्म के बारे में तो सभी जानते हैं. इसलिए शुरुआत अभिजन संस्कृति से की जाए. अभिजन संख्या में अल्पसंख्यक मगर आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक अथवा धार्मिक क्षेत्र के अतिप्रभुत्वशाली लोग होते हैं. अपने विचार और कर्म से वे पूरे समाज को तरहतरह से प्रभावित करते हैं. अभिजन के अंग्रेजी पर्याय ‘एलीट’ को परिभाषित करते हुए इटली के विचारक विल्फ्रेड परेतो(18481923) ने लिखा है कि ‘एलीट’ वे लोग हैं जो किसी भी क्षेत्र में उच्चतर सफलता प्राप्त कर शिखर पर आसीन हैं. इनमें उच्चासीन नौकरशाह, व्यापारी, राजनेता, पेशेवर, बुद्धिजीवी, कलाकार आदि सम्मिलित हो सकते हैं. परेतो के अनुसार अभिजन संख्या में अल्पसंख्यक होकर भी अधिकार और सत्ता के मामले में शेष समाज से बहुत आगे होते हैं. अपने पद और अधिकार का उपयोग करते हुए वे चतुराईपूर्वक, संसाधनों के बड़े हिस्से पर अपना अधिकार जमा लेते हैं. इटली के समाज के बारे में अपने विशद् अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वहां के कुल 80 प्रतिशत संसाधन मात्र 20 प्रतिशत लोगों के स्वामित्व में हैं. शेष 80 प्रतिशत को अपने जीवन में मात्र 20 प्रतिशत से गुजारा करना पड़ता है. अपने निष्कर्ष को पहेलीनुमा अंदाज में पेश करते हुए उसने कहा थाᅳ‘मान लीजिए दोनों में प्रतियोगिता होती है. तब 20 प्रतिशत अभिजन आबादी को शिखर पर पहुंचने, उपलब्धियों के शतप्रतिशत स्तर को प्राप्त करने के लिए मात्र 20 प्रतिशत की जरूरत पड़ेगी. जबकि शेष 80 प्रतिशत सामान्यजन को उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए न केवल चार गुना ज्यादा चुनौतियों से जूझना पड़ेगा, बल्कि उस 20 प्रतिशत अभिजन से भी टकराना पड़ेगा, जो शीर्ष पर पहले से विराजमान होकर, शक्ति एवं संसाधनों पर अधिकार जमाए हुए है.’ यह न केवल कठिन बल्कि असंभवसा कार्य है. इसलिए कि राष्ट्र के कुल संसाधनों के अस्सी प्रतिशत पर अधिकारिता एवं सत्ताकेंद्रों से निकटता के बल पर अभिजन समाज अपनी ताकत और हैसियत को निरंतर ऊपर उठाता रहता है. अपने सीमित संसाधनों से सामान्य यदि आगे जाने की कोशिश करता है तो उतनी अवधि में उससे कई गुना रफ्तार से तरक्की करता हुआ अभिजन, और भी आगे निकल चुका होता है. परिणामस्वरूप जन और अभिजन के बीच की दूरी निरंतर बढ़ती जाती है. सामान्य जन के लिए अभिजन की स्थिति तक पहुंचना न केवल अतिकठिन, बल्कि असंभवसा कार्य होता है. इसलिए कि अपने कई गुना संसाधनों तथा हैसियत के बल पर अभिजन समाज अपनी ताकत को निरंतर बढ़ाता रहता है.

अभिजन और सर्वजन के बीच संसाधनों के वितरण में 80 : 20 का अनुपात आज भले अजूबा न लगे, मगर 1906 में जब परेतो ने यह निष्कर्ष दुनिया को सुनाया तो सब चौंके थे. खुद परेतो को भी कहां विश्वास था! इस सिद्धांत की जांच करने के लिए उसने इटली के बाहर के समाजों का अध्ययन तत्काल शुरू कर दिया था. उसके साथ दूसरे विद्वान भी इस जांच में आ जुटे थे. आगे आने वाले निष्कर्ष चौंकाने वाले थे. अध्ययन के बाद पाया गया कि खुद को विकसित मानने वाले सभी देश इस समस्या से ग्रस्त हैं. कई समाजों का असमानता अनुपात तो 80 : 20 से भी अधिक पाया गया. नतीजों से हैरान रोमानियाई प्रबंधन गुरु डा॓. जोसेफ जुरान(19042008) के मुंह से निकला थाᅳ‘तंदरुस्त मुट्ठीभर, दुबले हजार’.1 पेशे से क्वालिटी प्रबंधक जुरान ने सिद्ध किया था कि ‘बीस प्रतिशत कारण अस्सी प्रतिशत समस्याओं के जनक हैं.’ व्यवहार में हम देखते हैं कि एक रोग अनेक समस्याएं लेकर आता है. विभिन्न प्रकार के परीक्षणों के उपरांत जुरान ने पाया कि हमारी रोजमर्रा की अनेकानेक समस्याओं के मूल में भी कुछ गिनेचुने कारण होते हैं. इस निष्कर्ष को समाज पर लागू करते हुए उसने कहा कि बीस प्रतिशत अभिजन समाज में अलगअलग क्षेत्रों पर छाए, बेहद ताकतवर और गरिमामय लोग होते हैं. अपने स्वार्थ के लिए वे शेष अस्सी प्रतिशत के जीवन से मनमाना खिलवाड़ करते हैं. परेतो ने कहा था कि अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग अतिसंगठित समुदाय होता है. निहित स्वार्थ उसको एकदूसरे से जोड़े रखते हैं. यदि अस्तित्व पर आन पड़े तो उनकी एकता अभूतपूर्व होती है. उनका एकमात्र काम होता है, किसी भी तरह से अपने वर्चस्व को कायम रखना. ‘मैं वह हूं जो दूसरे लोग नहीं हैं.’यह एहसास अभिजन संस्कृति के विशिष्टताबोध का परिचायक और मूल मंत्र है. शीर्ष पर बने रहने के लिए यह वर्ग सामदामदंडभेद की नीति अपनाता है. संगठित अल्पसंख्यक की शासकीय मनोवृत्ति के आगे बहुसंख्यक वर्ग के अकेले व्यक्ति(सदस्य) की शक्ति नगण्य होती है. इससे अल्पसंख्यक अभिजन समुदाय लगभग अपराजेय बना रहता है. तदनुसार असंगठित, आर्थिक रूप से परावलंबी बहुसंख्यक समाज पर उसका अधिपत्य अपरिहार्य हो जाता है.

अब बात अभिजन संस्कृति की, जिसे ‘अभिजात’ अथवा ‘उच्च’ संस्कृति भी कहा जा सकता है, यह समाज के सफलतम व्यक्तियों, संस्थाओं तथा शीर्षस्थ वर्ग की जीवनशैलियों का वह समुच्चय है, जिसे अत्याधुनिक सामाजिक जीवन का पर्याय और कारण माना जा सकता है. यह मुख्यतः अभिजात्य वर्ग के सदस्यों यथा सफलतम उद्यमियों, व्यापरियों, उच्च पेशेवरों, उच्चपदासीन नौकरशाहों के वर्चस्ववादी सोच, व्यवहार, कला संस्कारों तथा विशिष्ट रुचियों के रूप में सामने आती है. समाज के शीर्षस्थ लोगों की महत्त्वाकांक्षाओं से भरपूर अभिजन संस्कृति सदैव आधुनिकता का पर्याय बनी रहती है. इसके सदस्य बड़प्पन और विशिष्टताबोध से भरे होते हैं. ‘हम जहां है वहां अन्य कोई नहीं है और यह हमारा अधिकार है.’की भावना के साथ वे स्वयं को जनसाधारण से ऊपर मानते हैं. वे प्रायः साधारण जन से अधिक प्रतिभाशाली, मुखर, प्रदर्शनप्रिय और सुविधाभोगी होते हैं. इस कारण अभिजन संस्कृति हर युग में समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए अनुकरणीय तथा उसकी लालसाओं का केंद्र बनी रहती है. सामाजिक, आर्थिक सीमाओं से पूरी तरह आबद्ध सामान्यजन का जीवनसंघर्ष उसकी रोजमर्रा की जरूरतों से बाहर नहीं निकल पाता. पूंजीवादी व्यवस्था में उसे अपने लिए उन संसाधनों और प्राप्तियों से संतोष करना पड़ता है, जो ‘रिसाव के सिद्धांत’(ट्रिकल डाउन थ्योरी) के अनुसार कई स्तरों से गुजरने और कटौतियों के बाद उस तक पहुंचती हैं और जब तक पहुंचती हैं, तब तक अभिजन वर्ग किसी न किसी बहाने उन्हें पुनः हड़पने का इंतजाम कर चुका होता है. इसलिए अभिजन समाज में पूंजी का नीचे से ऊपर की ओर सतत पलायन होता रहता है. यह भी कह सकते हैं कि अपने विकास, यहां तक कि सामान्य जरूरतों के लिए भी जनसामान्य को अभिजन वर्ग की अनुकंपा पर निर्भर रहना पड़ता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि अभिजन आम आदमी की इस विवशता का जमकर दोहन करता है. इस तरह एक आदमी की दैनिक आवश्यकताएं दूसरे के लिए मुनाफादेय व्यवसाय को आगे बढ़ाती हैं.

अभिजन संस्कृति का इतिहास मानव सभ्यता जितना ही पुराना है. पिछले जमाने में पुरोहितवर्ग, गणप्रमुख, सम्राट, जमींदार, नबाव, राजा, सामंत आदि अभिजन संस्कृति के वाहक थे. अभिजन संस्कृति के समानांतर संस्कृति को लोकसंस्कृति अथवा जनसंस्कृति कहा जा सकता है. वह समाज के बहुसंख्यक वर्ग के सोच तथा उसकी जीवनचर्या को तय करती है. अभिजन संस्कृति चूंकि परोक्ष में शासक संस्कृति होती है. अतः इसमें धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था, कला, लोकसंस्कार, व्यापार, शासनप्रशासन आदि क्षेत्रों में निर्णायक पदों पर मौजूद व्यक्तियों को रखा जा सकता है. इसलिए इसे विशेषज्ञ संस्कृति भी कहा जा सकता है. इसके सदस्य अधिकारभावना से लैस होते हैं. दूसरी ओर लोकसंस्कृति प्रायः धर्म, परंपरा, सामाजिक रीतिरिवाज, लोकसाहित्य, पारंपरिक उत्पादन पद्धतियों से प्रभावित रहती है. चूंकि इनकी परिवर्तनदर ज्ञानविज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की अधुनातन धाराओं की अपेक्षा कम होती है, इसलिए लोकसंस्कृति की गतिशीलता यानी परिवर्तन की दर अपेक्षाकृत मद्धिम होती है. इस कारण अभिजन और जनसंस्कृतियों का फासला निरंतर बढ़ता जाता है. उसी अनुपात में समाज में जन और अभिजन के बीच स्तरीकरण बढ़ता है. परिणामस्वरूप जनसाधारण में अभिजन संस्कृति के प्रति ललक भी लगातार बढ़ती जाती है. इसका लाभ अभिजन संस्कृति के वाहक घटकों यथा राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक अभिजनों को मिलता है. राजनीतिक अभिजन दोनों के बीच की दूरी को पाटने के बहाने चतुराईपूर्वक अपनी लोकप्रिय राजनीति को चमकाते हैं. जबकि धार्मिक अभिजन यानी पुरोहित वर्ग इस दूरी के लिए भाग्य और पूर्वजन्म के कर्मों को जिम्मेदार ठहराता है. उनके निदान के नाम पर वह तरहतरह के कर्मकांडों को बीच में ले आता है. जिससे उसकी दुकानदारी चमकती रहती है. आध्यात्मिक जिज्ञासा जो धार्मिक विश्वासों का मूल है, इस क्रम में निरंतर पीछे खिसकती जाती है. आर्थिक अभिजन उस अंतराल को पाटने के लिए सस्ते और नकली उत्पादों की खेप बाजार में उतारकर आभासी पटाव का भ्रम पैदा करता है; और इसके सहारे मुनाफा बटोरता है. इस आभासी पटाव की हकीकत को जन और अभिजन दोनों ही समझते हैं. इसलिए हकीकत का बोध जन के भीतर अविश्वास, सामाजिक नियमों, विधान के प्रति अनास्था पैदा करता है. तो अभिजन अपनी सफलता के दम पर मनमानी करने पर उतारू हो जाता है. यह द्वंद्व सामाजिक अशांति के रूप में सामने आता है.

सामाजिक दुरवस्था के वास्तविक कारणों का बोध जनसाधारण को ज्यादा उद्धिग्न न करे, उसका आक्रोश तय सीमा में बना रहे, इसके लिए प्रशासनिक अभिजन और उसके कृपापात्र बुद्धिजीवी जनसाधारण के बीच बढ़ती हताशा, नैराश्य, गरीबी, दुर्दशा, दैन्यादि के लिए उसके विभिन्न घटकों को दोषी ठहराते हैं. बढ़ती जनसंख्या, प्रवासी समस्या, खास जातीय घटकों का मनमाना आचरण, अशिक्षा, कुरीतियां, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि को उनकी दुर्दशा का कारण बताकर अभिजन संस्कृति के पुरोधा जनसाधारण के बीच अनेक दरारें पैदा कर देता है. हालांकि इसके मूल में अभिजन वर्ग का वर्चस्वकारी आचरण होता है, जिससे वह संसाधनों के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर, बाकी लोगों की दुर्दशा का कारण बनता है. इसके बावजूद उसके विरोध की स्थिति नहीं बन पाती तो इसलिए कि उसी के समान वर्गीय शोषण से गुजर रहे उसके साथी, स्वार्थवश छोटेछोटे हिस्सों में बंटे होते हैं. अपनी सामान्य जरूरतों की पूर्ति के लिए उन्हें अपने ही जैसे लोगों के साथ स्पर्धा करनी पड़ती है. जिसका नुकसान पूरे वर्ग को उठाना पड़ता है. छोटेछोटे अनुत्पादक मुद्दों को लेकर जनसमाज के बीच अनेक टापू बन जाते हैं, जो उन्हें कभी निर्णायक भूमिका में नहीं आने देते. जनसाधारण की इसी कमजोरी और मतवैभिन्न्य का लाभ उठाकर वह संपत्ति पर अपने कब्जे को कानूनी रूप देने में सफल हो जाता है. उसपर कोई जोर न चलता देख साधारण जन अपने ही साथियों को दोष देने लगता है. इससे जनाक्रोश की धारा आत्मघाती रूप ले लेती है. अवसर देख अभिजन वर्ग पुनः सक्रिय होता है तथा समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नई संस्थाओं का गठन कर, वहां अपने समर्थक साथियों को तैनात कर देता है. इससे अभिजन वर्ग की संख्या में यकिंचित वृद्धि होती है, किंतु उसकी सत्ता अधिक सुरक्षित और मान्य हो जाती है. इस स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन वर्ग अपनी ताकत और समृद्धि को लगातार बढ़ाता रहता है.

अभिजन संस्कृति के सदस्य सामान्यतः शासकीय मनोवृत्ति का व्यवहार करते हैं. चूंकि जनसंस्कृति का वाहक जनसमाज धर्म, परंपरा, लोकसंस्कृति, पारंपरिक उत्पादन पद्धति आदि में निपुणता को ही अपनी मनोरथ सिद्धि माने रहता है, इसलिए वह ज्ञानविज्ञान और प्रौद्योगिकी के बूते सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे अभिजन समाज का कभी मुकाबला नहीं कर पाता. उल्टे अभिजन समाज जनसमाज के हिस्से के संसाधनों का उपयोग भी निहित स्वार्थ के लिए करने लगता है. साधारण जन समाज, संस्कृति, निर्धनता, परंपरा और धार्मिक आग्रहों के जाल में इतना फंसा होता है कि इस तरह की स्पर्धा का विचार तक उसके दिमाग में नहीं आता. इसका एक कारण उसके व्यक्तित्व में शासकीय अभिलक्षणों का अभाव है, जिसका लाभ अभिजन वर्ग के असंतुष्ट घटक उठाते रहते हैं. उनके उकसावे में या अपनी ही आंतरिक उथलपुथल से यदि जनसमुदाय में विद्रोह की लहरें उठें भी तो वह आमूल परिवर्तनकारी होने में अक्षम सिद्ध होती हैं. वह प्रायः नहीं समझ पाता कि सत्ता का कौनसा रूप उसके लिए सर्वाधिक कल्याणकारी है. इसलिए निर्णायक अवसरों पर भी वह दूसरों पर निर्भर होने की अपनी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाता. प्रशासकीय अनुभव के अभाव एवं आत्मविश्वास की कमी के कारण सत्ताकेंद्रों के सफल परिचालन के लिए जनसमाज को स्वार्थी अभिजन वर्ग का सहारा लेना ही पड़ता है. इससे उसकी प्रवृत्ति आगे भी पिछलग्गू समाज की बनी रहती है. उल्लेखनीय है कि जिन संस्थाओं को सभ्यता, सहूलियत और प्रशासनिक नियंत्रण के नाम पर जनसमाज पर आरोपित किया जाता है, उनमें से अधिकांश अभिजनवर्ग द्वारा, उसी के स्वार्थ के लिए गठित की होती हैं. वे प्रायः खर्चीली तथा जनसाधारण की दृष्टि से बेहद जटिल होती हैं और उनमें से अनेक ऐसी होती हैं जिनके बगैर भी काम चल सकता है अथवा उनके सस्ते और सरल विकल्प समाज में पहले से ही मौजूद होते हैं. लेकिन प्रशासनिक कौशल का अभाव जनसमाज को आमूल परिवर्तनकारी कदम उठाने से रोकता रहता है. प्रकारांतर में अभिजन वर्ग के अंदरूनी तनाव, उसकी क्षणिक द्वंद्वात्मकता तथा अंतःसंघर्ष भी अंततः उसी के लिए हितकारी सिद्ध होते हैं.

क्या यह विकल्पहीन है? शायद नहीं! न ही यह ऐसी समस्या है, जिससे हमारा समाज अज्ञात रहा हो. पिछले दोढाई सौ वर्षों से तो इसपर निरंतर विचार होता रहा है. गौतम बुद्ध, प्लेटो, वोलनी, वाल्तेयर, रूसो, पीयरे जोसेफ प्रूधों, पीटर क्रोप्टकिन, थाॅमस पेन, मिल आदि दुनिया के महानतम दार्शनिकों का चिंतन हमारे सामने है. माक्र्स और दूसरे बुद्धिजीवी इसके लिए वर्गहीन समाज की स्थापना का सुझाव देते रहे हैं. साम्यवाद की तो पूरी संकल्पना ही वर्गहीन समाज की स्थापना पर टिकी है. इसकी पूरक विचारधाराओं के रूप में हम ‘समष्ठिवाद’, ‘अराजकतावाद’, ‘श्रमिकसंघवाद’, सहजीवितावाद को ले सकते हैं. ये सभी राजनीतिकआर्थिकसामाजिक सहभागिता एवं सहजीवन के विचार पर आधारित दर्शन हैं. ये सामान्य रूप से ऐसे जीवनदर्शन का समर्थन करते हैं जिसमें व्यक्तिगत गुणों, योग्यताओं को तो महत्ता दी जाती है, इस अपेक्षा के साथ कि व्यक्ति उनका प्रयोग इस प्रकार करेगा कि उसके अपने और समाज के व्यापक हितों की पूर्ति संभव हो. इसमें आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक अथवा किसी भी अन्य प्रकार के विशिष्टताबोध को उपेक्षित कर दिया जाता है. अराजकतावाद इनमें सबसे अहं सैद्धांतिकी है, जो व्यक्तिगत संपत्ति के निषेध और राज्य को बेदखल कर उन शक्तियों को निष्प्रभ करने की व्यवस्था करती है, जो सामाजिक स्तरीकरण के लिए जिम्मेदार हैं अथवा उसको बढ़ावा देने का काम करती हैं. इसका आधार यूनानी दार्शनिक की वह उक्ति है जिसमें उसने कहा हैᅳ‘हम न तो शासित होना चाहते हैं, न ही शासक बनने की हमारी इच्छा है.’2 शताब्दियों के बीच अराजकतावाद को लेकर बहुत कार्य हुआ है. माक्र्स की वर्गहीन समाज की संकल्पना भी शासक और शासक के स्तरीकरण को समाप्त करती है. अंतोनियो ग्राम्शी का तो पूरा दर्शन ही सामाजिक, सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को लेकर बुना गया है. ग्राम्शी के अनुसार वर्गीय शोषण की जड़ें संस्कृति में निहित होती हैं. इसमें कोई मतभेद नहीं है कि अभिजनवर्ग एक बेहतर, सुविकसित और वर्चस्ववादी संस्कृति का अनुगामी होता है. उस संस्कृति के जो एक आदमी द्वारा दूसरे पर शासन करने को श्रेष्ठता का पर्याय मानती है. वही उनमें दूसरों पर अधिपत्य बनाए रखने की योग्यता विकसित करती है. उसी के आधार पर वे साधारण जन को अपने अधीन बनाए रखते हैं. सांस्कृतिक अधिपत्य से उबारने के लिए ग्राम्शी ने सर्वहारावर्ग को अपनी समानांतर संस्कृति विकसित करने की सलाह दी थी. जिसके अपने जीवनमूल्य, अपना बुद्धिजीवी वर्ग और विकास के स्वतंत्र मापदंड हों. जो समानता और सरलता के सिद्धांत के आधार पर विकसित हो. इसे भलीभांति समझने के लिए अभिजन संस्कृति के विभिन्न घटकों तथा उनकी ऐतिहासिकी को जानना जरूरी है.

धर्म : अभिजन संस्कृति का आदिउत्प्रेरक

सामाजिक स्तरीकरण को मान्य ठहराने में धर्म का योगदान सर्वाधिक है. अतः धर्म को अभिजन संस्कृति का आदिउत्प्रेरक कहा जाए तो भी यह अनुचित न होगा. बताया जाता है कि इसकी उत्पत्ति मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं की पूर्ति के रूप में हुई. यह अधूरा सच है. जिज्ञासा तत्व किसी भी वस्तु, विचार या अवधारणा पर संदेह तथा उसके मूलभूत कारण को जानने की इच्छा से जुड़ा है. जबकि धर्म की नींव आस्था और विश्वास पर टिकी होती है. संदेह करना, शंकालु होना तथा अंतनिर्हित सत्य को जानने के लिए स्थापित मान्यताओं पर सवाल खड़े करना, धर्म की मूल प्रवृत्ति से ही गायब है. उसकी उत्पत्ति किसी एक धारणा पर स्थिर होकर प्रश्नाकुलता से बच निकलने वाली प्रवृत्ति का परिणाम थी. आरंभिक समाजों में जब कानून तथा राजनीतिक संस्थाओं का विकास नहीं हुआ था, उन दिनों यह सोचकर कि ईश्वर का नाम बीच में आने से मनुष्य उनका पालन निष्ठापूर्वक करेगा, मनुष्य के सामाजिक, नैतिक कर्तव्यों को धर्म से जोड़कर समाज के विभिन्न घटकों के बीच तालमेल बनाने की कोशिश की जाती थी. चूंकि सारे धार्मिक प्रतीक, सांस्कृतिक प्रतिमान और उनकी प्रणालियां प्रकृति के सन्निकट तथा उसी से उद्भूत थीं, इसलिए प्रकृति के संरक्षक के रूप में प्रकल्पित ईश्वर को बीच में लाने का कारण कदाचित जीवन में प्राकृतिक शक्तियों की पैठ और उनकी शक्तियों का वास्ता देना भी था, ताकि खुद को उनके प्रति उत्तरदायी मानता हुआ मनुष्य इनके तथा अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति पूरी तरह श्रद्धावनत एवं निष्ठावान बना रहे. यह अन्यथा भी नहीं था. हालांकि समय के साथसाथ यह सिद्ध होता गया कि प्रकृति को समझने के लिए काल्पनिक शक्ति यानी ईश्वर का सहारा लेना बहुत बड़ी भूल थी. इसने मानव मन में अवांछित भय और काल्पनिक प्रलोभनों को जन्म दिया. इससे संसार और सांसारिक चुनौतियों के प्र्रति उपेक्षाभाव मानवमन में जन्मा. जो लोग इस सपने की हकीकत को समझते थे, वे जनसाधारण के धर्म के प्रति आग्रहअनुराग का उपयोग लोक और उसकी समस्याओं के मूल कारण की ओर से उनका ध्यान हटाने के लिए करते रहे. और जो नादान थे, वे इसके आधार पर निर्मित संस्कृति का शिकार होते रहे.

जीवन की निदेशक सत्ता के रूप में समाज में धर्म को जगह मिलने के कुछ व्यावसायिक कारण भी थे. वस्तुतः कृषि के विकास के साथ मनुष्य ने यायावरी छोड़ जब एक ही स्थान पर टिककर रहना आरंभ किया तो विकास में तेजी आई. जीवन अपेक्षाकृत सुख के साथ कटने लगा. नया जीवन यद्यपि सुविधाजनक था. उसमें पहले जैसी भागमभाग नहीं थी, तथापि प्रकृति की परिवर्तनशीलता बारबार उसे उसके पुराने यायावरी जीवन की याद दिलाती थी. वह चाहता था कि उसे जीवनजगत के रहस्य के बारे में जानकारी हो. कहींकहीं यह रंज भी जरूर रहा होगा कि एक जगह टिककर रहने, घरगृहस्थी में डूब जाने से वह वास्तविक ज्ञान के अवसरों से वंचित हो चुका है. जीवन की भंगुरता एवं प्रकृति के सापेक्ष अत्यल्प जीवन का एहसास भी उसको पलायनवादी बनाता था. इस मानसिकता के निर्माण में पुरोहितों तथा उन लोगों का कम योगदान न था जो धर्म और/या समाज के प्रबंधन से किसी भी प्रकार जुड़े थे तथा उसके साधारणपन का उसे लगातार बोध कराते रहते थे. पुजारी कहता, ‘तुम गृहस्थी के जंजाल में घिरकर बहुत कुछ गंवा चुके हो. तुम्हारा परलोक न बिगड़े इसलिए आज से तुम्हारे कल्याण की चिंता मैं करूंगा.’ गृहस्थ उसकी बातों में फंसा और नियमित दक्षिणा देने का वचन देकर उसने पुजारी को अपने और ईश्वर के बीच बिचैलिया स्वीकार कर लिया. अगली बार राज सत्ता की लालसा रखने वाले ने उससे संपर्क किया, बोलाᅳ‘आज से तुम्हारी सुरक्षा मेरा कर्तव्य. बदले में कुछ कराधान देना होगा’. शांतिपूर्ण जीवन की चाहत में साधारणजन ने यह भी मान लिया. तदनंतर व्यापारी ने दस्तक दी. आम आदमियों संबोधित कर उसने कहा

तुम्हें तुम्हारे सुख, सुविधा के लिए जिनजिन वस्तुओं की आवश्यकता है, मुझे बताओ. उन्हें मैं लाकर दूंगा. तुम्हें वस्तु के वास्तविक मूल्य से बस कुछ अधिक का भुगतान करना होगा, फिर उसके लिए धक्के खाने की जरूरत न रहेगी.’ कारीगरों से कहा, ‘तुम केवल उत्पादन पर ध्यान दो. बिक्री की जिम्मेदारी मेरी.’

बदले में उसने दोनों पक्षों से अपना मुनाफा तय कर लिया. पहले उत्पादक और उपभोक्ता दोनों एकदूसरे को जानते थे. उत्पादक उपभोक्ता की जरूरतों को समझता था तो उपभोक्ता को भी उत्पादक की समस्याओं का बोध था. इसलिए वस्तुओं का मूल्यनिर्धारण श्रम और पारस्परिक जरूरतों से तय होता था. तीसरे वर्ग का बीच में आना वास्तविक उत्पादक से उसका पद; तथा उपभोक्ता से उसकी पसंद छिनने की शुरुआत थी. आगे वही हुआ. उससे पहले तक वस्तुओं के दाम कारीगर तय करता था. वह खुद भी आम आदमी की भांति, उन्हीं के समाज का हिस्सा होता था. व्यापारिक अभिजन ने कारीगर से वस्तुओं के मूल्य तय करने का अधिकार छीन लिया. यही नहीं लाभकामना के ध्येय से वह उपभोक्ता की पसंदों को भी नियंत्रित करने लगा. इस तरह राजा, व्यापारी और पुरोहित तीनों वास्तविक उत्पादक वर्ग यानी शिल्पकर्मी और किसान की सहायता का संकल्प लेकर आए थे. यह भी कह सकते हैं कि समाज के बहुसंख्यक वर्ग की सेवा के प्रति उनकी वचनबद्धता के आधार पर ही उनके उद्यम को स्वीकार्य माना गया था. उस समय शायद ही कोई जानता था कि जो वर्ग वास्तविक उत्पादक की सहायता और सेवा का संकल्प लेकर आया है, यानी जिस पुजारी ने मामूली दक्षिणा के लिए पुरोहितकर्म को अपनाया है, जो राजा कराधान के बदले राज्य की सुरक्षा का वचन दे चुका है और जिस व्यापारी ने मामूली मुनाफे की ऐवज में उपभोक्ता और उत्पादक के बीच पुल बनने की जिम्मेदारी स्वीकार की थीवे एकाएक अपनी भूमिका बदलकर ‘स्वामी मानसिकता’ को अपना लेंगे? यह कार्य धर्म के भरोसे शुरू हुआ, या यूं कहें कि धर्म के सहारे यह परवान चढ़ा. फिर तो पूरे गाजेबाजे के साथ शताब्दियों तक गूंज उठाता रहा.

जीवन में धर्म को अपरिहार्य बनाने वाले कुछ कारण आर्थिक भी थे. कृषि उत्पादन पूरी तरह प्रकृतिअनुकंपा पर टिका था. उसमें उत्पादन की अफरात थी तो प्राकृतिक आपदा द्वारा अकस्मात होने वाला नुकसान भी कम न होता था. कुदरत मेहरबान हो तो घर, भंडार आसानी से भर देती. अपनी और दूसरों की जरूरत के लिए पर्याप्त अन्नसामग्री आसानी से जुट जाती. लेकिन आपदा आ घटे तो नुकसान भी उसी अनुपात में होता था. प्रकृतिकोप यानी अतिवृष्टि, अनावृष्टि, कुहरे, पाले की मार से भरीपूरी खेती तबाह हो जाती. पूरे वर्ष अन्नाभाव से जूझना पड़ता. इसी अनिश्चितता से कृषिकर्म में सहायक देवताओं इंद्र, वरुण, मित्र, मरुत आदि का महत्त्व बढ़ा. ये देवता जीवनसंघर्ष के बीच झूलते मनुष्य को मानसिक संबल प्रदान करते थे. प्रकृति आधारित जीवन के छूट जाने, ज्ञानानुभव के अवसर घट जाने का क्षोभ, एक नास्टेल्जिया, अतीत मोह अथवा व्यामोह की भांति उस समय भी मानवमन में कहीं न कहीं था. इसी कारण जनसाधारण के मन में उन लोगों के प्रति विशिष्ट सम्मानभाव था जो उस समय तक प्रकृति आधारित जीवनशैली अपनाए हुए तथा लोकमान्यता के अनुसार सांसारिक झंझटों से परे थे. ऐसे लोगों से वह संपर्क बनाकर रखता था. समयसमय पर उन्हें अपने घर बुलाकर उनके अनुभवचिंतन द्वारा पीछे छूट गए जीवन के अभाव को पूरा करने का प्रयास करता रहता था.

धीरेधीरे वे लोग जिनका मन प्रकृति आधारित जीवन और सामाजिक जीवन के बीच कहीं फंसा था, वे रहरह कर समाज की ओर लौटने लगे. सामाजिक जीवन की गर्माहट, जीवन में स्थायित्व की चाहत, लोगों की ओर से मिलने वाला मानसम्मान उन्हें आकर्षित करने लगा. चूंकि समाज के बाहर के वनचारी जीवनशैली को अपनाए लोग, आम गृहस्थ को हर समय, उसकी सुविधा और पहुंच के अनुसार मिलने असंभव थे, इस अभाव की पूर्ति हेतु समाज के बीच से ही एक पुरोहित वर्ग पनपने लगा. इस वर्ग का शारीरिक श्रम से कोई वास्ता न था. वे दूसरों के श्रम के आधार पर जीवन जीने वाले परजीवी किस्म के लोग थे, जो अपने इहलोक की सिद्धि के लिए दूसरों का परलोक सुधारने का दावा करते थे. स्वर्ग उनका सबसे लुभावना प्रलोभन था, जिसके माध्यम से व्यक्ति को बगैर किसी परिश्रम के सभी प्रकार के सुखामोद का सपना दिखाया जाता था. स्वयं को ईश्वर का भक्त, उसकी अपने ऊपर अनुकंपा का दावा करने वाले पुरोहित का जीवन अपेक्षाकृत सुखमय बीतता था. वह ऐसे ही, बल्कि उससे कहीं अधिक सुखसमृद्धिमय जीवन का सपना लोगों की आंखों में रोपता था. इस कारण समाज में उसको अतिरिक्त मानसम्मान भी प्राप्त था. परिणामस्वरूप मेहनतकश वर्ग में अपने जीवन के प्रति अविश्वास बढ़ा और संघर्ष से पलायन की प्रवृत्ति भी. प्रकारांतर में यही सब रूढ़ियों और कर्मकांडों के प्रति जनसाधारण की बढ़ती रुचि का वाहक बना.

परलोकसिद्धि की लालसा असल में एक ऐसा मकड़जाल था कि आदमी उससे उबरने की जितनी कोशिश करता, उतना ही उसमें उलझता जाता था. इसके बावजूद उसका आकर्षण ऐसा कि स्वर्ग का कल्पनासुख लेने के लिए भी व्यक्ति पूरा का पूरा जीवन मानवकृत स्थितियों के नर्ककुंड में गुजार देता था. ऊपर से धर्म का आतंक इतना कि उसके विरुद्ध कुछ भी कहा जाए, वह बेअसर सिद्ध होता था. आस्था और विश्वास के आगे बुद्धिविवेक का कोई मोल न था. सच तो यह है कि अपने स्वार्थसिद्धि में लिप्त पुरोहित वर्ग ने ज्ञान की परिभाषा ही बदल दी थी. उसे लिए सच्चा ज्ञान वह था जो लोगों के पूजापाठ, तोतारटंत और कर्मकांडों की सीख देता था. भक्ति को सर्वोपरि बताता था. एक ही नाम को लगातार रटते रहना, पत्थरों के आगे माथा रगड़ना और जीवन की चुनौतियों से मुंह मोड़ लेना उसकी नजरों में साधना थी. चूंकि आम आदमी का जीवन बेहद कष्टमय था, प्राकृतिक आपदाओं और सांसारिक उलझनों से घिरा हुआ, इसलिए ऐसी पलायनवादी सलाह लोगों को खूब पसंद आती थी; या यूं कहें कि इसपर विश्वास करने के अलावा उसके पास कोई और रास्ता ही न था. विज्ञान उस समय तक अविकसित अवस्था में था. नास्तिक लोग उस समय भी थे. आस्तिकों के साथ उनकी बहसें होती रहती थीं. जनसाधारण पर उनका प्रभाव भी था. तथापि सत्ता एवं संसाधनों पर अपनी पकड़ के अभाव में वे समाज को अपने सोच के अनुसार दिशा देने में असमर्थ थे. उधर सत्ता एवं संसाधनों के शिखर पर बैठे लोग थे कि अपनी स्थिति को अक्षुण्ण रखने के लिए वे जनसाधारण का ध्यान उससे दूर जाने ही नहीं देते थे. आम आदमी के लिए रोटी का संघर्ष ही इतना बड़ा था कि उससे इतर सोचने का उसके पास समय ही नहीं था.

सामाजिक स्तरीकरण के प्रतीक बन चुके धर्म के समर्थकों का एक तर्क यह भी था कि सभी मनुष्य समान मेधावी नहीं हो सकते. उनमें कुछ साधारण मेधा संपन्न होंगे तो कुछ विशिष्ट मेधावी. तो जो साधारण मेधावी हैं, उन्हें चाहिए कि वे उन नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करें जिन्हें समाज ने अपने हित के लिए जरूरी माना है. व्यक्ति की बौद्धिक क्षमताओं का आकलन केवल उसके जन्म और वर्ण के आधार पर किया जाता था. यह सरासर अमनोवैज्ञानिक तथ्य था, लेकिन पुरोहितवर्ग अपनी हठ के आगे किसी की सुनने को तैयार न था. इस तरह धर्म, दर्शन के ठहराव तथा उसके मूत्र्तिकरण के माध्यम से मनुष्यों को जन और अभिजन में बांटने वाला प्रमुख कारक बना. दर्शन यानी विचार से कटे जनसमूहों को कर्मकांडों और टोटमबाजी में उलझा देना बहुत आसान था. जातीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए आगे यह किया भी गया. ज्ञान के आस्थाकरण ने न केवल उत्पीड़न को बढ़ावा देने वाली स्थितियों को बढ़ावा दिया, बल्कि उत्पीड़ित को उत्पीड़न सहते रहने के लिए तैयार किया. परिणामस्वरूप वह उत्पीड़न के वास्तविक कारणों की ओर से निरंतर उदासीन होता गया. इससे शीर्षस्थ अभिजन समाज को दूसरे वर्ग के श्रमसंसाधनों के आधार पर फलनेफूलने का अवसर मिला. साथ में धार्मिक अभिजन की अधिसत्ता और उसके विशेषाधिकारों को मान्यता भी, जो कालांतर में लगातार मजबूत होती गई. उल्लेखनीय है कि आरंभ में जब श्रम के आधार पर ऊंचनीच की भावना नहीं थी, कबीले का मुखिया ही प्रमुख अनुष्ठानों के समय उसका काम निपटाता था. बस्ती के दूसरों लोगों की तरह वह खेतीकिसानी भी सबके साथ मिलकर करता था. अल्पविकसित समाजों को नियंत्रित करने के लिए वह आवश्यक भी था. क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर मुखिया स्वयं आगे बढ़कर समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेता था. समय के साथसाथ आस्था धर्म कहलाने लगी और धर्म संगठन का रूप लेता गया. समाज में पुरोहित का महत्त्व बढ़ा तो उसके प्रभाव में बौद्धिक श्रम को शारीरिक श्रम से बड़ा समझा जाने लगा. इससे भी अभिजन मानसिकता को स्थायित्व मिला.

धर्म का उद्भव मनुष्य की अध्यात्मजिज्ञासा के समाधान से जुड़ा है. बल्कि यह कहना ठीक होगा कि धर्म जिस रूप में आज है, पहले उस रूप में था ही नहीं. आरंभिक जीवन में मनुष्य जब सीधे प्रकृति के सान्निघ्य में रहता था. उस समय जीवन को लेकर वह जो कल्पना करता था, वह उसकी अपनी होती थीं. उनके बारे में समूह के भीतर चर्चा भी करता होगा. उस समय भी मौलिक व्याख्या के लिए व्यक्ति को समूह के भीतर अतिरिक्त सम्मान मिलता होगा. धीरेधीरे उसकी बातों पर जब समूह के भीतर और बाहर, बहुत से लोग विश्वास करने लगे. फिर कुछ ऐसे लोग भी पनपे जो केवल दूसरों के आध्यात्मिक अनुभवों, जिज्ञासाओं को रोचक भाषा में प्रस्तुत कर देते थे. उस समय तक सभ्यता आगे बढ़ चुकी थी. मनुष्य का अधिकांश समय रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं को जुटाने में खप जाता था. उसके लिए दूसरों के आध्यात्मिक अनुभवों पर विश्वास करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं था. यहीं से धर्म के सांस्थानिकीकरण की नींव पड़ी. कालांतर में प्रकृति साहचर्य में तत्वदर्शन की खोज करने वाले ज्ञानसाधक मुनि अथवा तत्वदर्शक तथा समाज में साधारण गृहस्थ की तरह रहकर पुरोहिताई करनेवाले लोग ऋषि के रूप में पहचाने गए. अपनी सामाजिक हैसियत को बनाए रखने के लिए पुरोहित वर्ग ने कर्मकांड गढ़े. शास्त्रों की स्वार्थानुकूल टीकाएं कीं और सत्तावर्ग के हर अच्छेबुरे काम का समर्थन कर उससे नजदीकी बनाए रखी. इससे समाज पर उसका प्रभाव बढ़ता गया. इसके बावजूद वनचारी जीवन जीनेवाले निरासक्त मुनियों के प्रति लोगों के मन में अतिरिक्त सम्मान था. शायद इसके पीछे कर्मकांडों की निस्सारता का बोध रहा हो. कहीं न कहीं यह धारणा भी बनी थी कि कर्मकांडों में मदद करने वाला पुरोहित, देवता और यजमान के बीच महज एक बिचैलिया है या शायद वह भी नहीं, क्योंकि जिस ईश्वर की दुहाई देकर वह सारे प्रपंच रचता है, उसका अस्तित्व उसी की कल्पना से उद्भूत और वहीं तक सीमित है. दानदक्षिणा के रूप से कमज्यादा प्रसन्न होने वाला पुजारी का देवता उसी की भांति लालची है. खुद को दुनियादारी से दूर रखकर तपसाधना करनेवाले मुनि उससे बड़े हैं. ऋषिवर्ग पर मुनिवर्ग की श्रेष्ठता रामायण और महाभारत काल तक बनी रही. इस युग में दुर्वासा, कपिल, कणाद, विश्वामित्र, गौतम, याज्ञवल्क्य आदि मुनिगणों का प्रभाव देखा जा सकता है. दशरथ के दरबार में पहुंचकर विश्वामित्र जब राम और लक्ष्मण को अपने साथ वन ले जाने को कहते हैं, तब वशिष्ट चाहकर भी उनका विरोध नहीं कर पाते. समाज के सीधे सान्निध्य में पनप चुके ऋषियों, पुरोहितों आदि को आरंभिक धार्मिक अभिजन कहा जा सकता है. मुनिगण चूंकि समाज से कटे हुए वनचारी लोग थे. इसलिए बावजूद इसके कि उनमें से अनेक के अपने परिवार और आश्रम आदि थे, वे संगठित समाज से दूर रहना ही श्रेयस्कर समझते थे. इस आधार पर उन्हें जन और अभिजन की परिभाषा से अलग रखना उचित होगा. हालांकि कहा यह भी जा सकता है कि स्वयं को तत्वदर्शक मानने वाले मुनिगण अपनी पहुंच और विवेक का उपयोग धर्म के सांस्थानिकीकरण के विरोध के लिए करते तो वह शायद ही इतना रूढ़ और शक्तिशाली हो पाता.

क्रमशः…..

© ओमप्रकाश कश्यप

1.  vital few and trivial many

बालसाहित्य और विज्ञानलेखन

सर्वप्रथम यह जान लेना उचित होगा कि आखिर विज्ञान लेखन है, क्या? वह कौनसा गुण है जो कथित विज्ञान साहित्य को सामान्य साहित्य से अलग कर, उसे विशिष्ट पहचान देता है? और यह भी कि किसी साहित्य को विज्ञान साहित्य की कोटि में रखने की कसौटी क्या हो? क्या केवल वैज्ञानिक खोजों, उपकरणों, नियम, सिद्धांत, परिकल्पना, तकनीक, आविष्कारों, उपकरणों आदि को केंद्र में रखकर कथानक गढ़ लेना ही विज्ञान साहित्य है? यदि हां, तो क्या किसी भी निराधार परिकल्पना या आविष्कार को विज्ञान साहित्य का प्रस्थान बिंदु बनाया जा सकता है? क्या वैज्ञानिक तथ्य से परे भी विज्ञान साहित्य अथवा विज्ञान फंतासी की रचना संभव है? कुछ अन्य प्रश्न भी इसमें सम्मिलित हो सकते हैं. जैसे विज्ञान साहित्य की धारा को कितना और क्यों महत्त्व दिया जाए? जीवन में विज्ञान जितना जरूरी है, उतना तो बच्चे अपने पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में पढ़ते ही हैं. फिर अलग से विज्ञान साहित्य की जरूरत क्या है? यदि जरूरत है तो पाठ्य पुस्तकों में छपी विज्ञानपरक सामग्री तथा विज्ञान साहित्य के मध्य विभाजन रेखा क्या हो? एकदूसरे से अलग दिखनेवाले ये प्रश्न परस्पर संबद्ध है. यदि हम साहित्य के वैज्ञानिक पक्ष को जान लेते हैं तो इनकी आसंगता स्वयं दस्तक देने लगती है.

विज्ञान वस्तुतः एक खास दृष्टिबोध, विशिष्ट अध्ययन पद्धति है. वह व्यक्ति की प्रश्नाकुलता का समाधान करती और क्रमशः आगे बढ़ाती है. आसपास घट रही घटनाओं के मूल में जो कारण हैं, उनका क्रमबद्ध, विश्लेषणात्मक एवं तर्कसंगत बोध, जिसे प्रयोगों की कसौटी पर जांचापरखा जा सके—विज्ञान है. इन्हीं प्रयोगों, क्रमबद्ध ज्ञान की विभिन्न शैलियों, व्यक्ति की प्रश्नाकुलता और ज्ञानार्जन की ललक, उनके प्रभावों तथा निष्कर्षों की तार्किक, कल्पनात्मक एवं मनोरंजक प्रस्तुति विज्ञान साहित्य का उद्देश्य है. संक्षेप में विज्ञान साहित्य का लक्ष्य बच्चों के मनस् में विज्ञानबोध का विस्तार करना है, ताकि वे अपनी निकटवर्ती घटनाओं का अवलोकन वैज्ञानिक प्रबोधन के साथ कर सकें. लेकिन वैज्ञानिक खोजों, आविष्कारों का यथातथ्य विवरण विज्ञान साहित्य नहीं है. वह विज्ञान पत्रकारिता का विषय तो हो सकता है, विज्ञान साहित्य का नहीं. कोई रचना साहित्य की गरिमा तभी प्राप्त कर पाती है, जब उसमें समाज के बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण की भावना जुड़ी हो. कहने का आशय है कि कोई भी नया शोध अथवा विचार, वैज्ञानिक कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरने के बावजूद, लोकोपकारी हुए बगैर विज्ञान साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकता. यही क्षीण मगर सुस्पष्ट रेखा है जो विज्ञानपरक सामग्री एवं विज्ञान साहित्य को विभाजित करती है.

विज्ञान कथा को अंग्रेजी में ‘साइंस फेंटेसी’ अथवा ‘साइंस फिक्शन’ कहा जाता है. एक जैसे दिखने के बावजूद इन दोनों रूपों में पर्याप्त अंतर है. अंग्रेजी शब्द Fiction लैटिन मूल के शब्द Fictus से व्युत्पन्न है. जिसका अभिप्राय है—गढ़ना अथवा रूप देना. इस प्रकार कि पुराना रूप सिमटकर नए कलेवर में ढल जाए. फिक्शन को ‘किस्सा’ या ‘कहानी’ के पर्याय के रूप में भी देख सकते हैं. ‘विज्ञानकथा’ को ‘साइंस फिक्शन’ के हिंदी पर्याय के रूप में लेने का चलन है. इस तरह ‘विज्ञानकथा’ या ‘साइंस फिक्शन’ आमतौर पर ऐसे किस्से अथवा कहानी को कहा जाता है जो समाज पर विज्ञान के वास्तविक अथवा काल्पनिक प्रभाव से बने प्रसंग को कहन की शैली में व्यक्त करे तथा उसके पीछे अनिवार्यतः कोई न कोई वैज्ञानिक सिद्धांत हो. ‘साइंस फेंटेसी’ के हिंदी पर्याय के रूप में ‘विज्ञानगल्प’ शब्द प्रचलित है. Fantasy शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन मूल के शब्द Phantasia से हुई है. इसका शाब्दिक अर्थ है—‘कपोल कल्पना’ अथवा ‘कोरी कल्पना’. जब इसका उपयोग किसी दूरागत वैज्ञानिक परिकल्पना के रूप में किया जाता है, तब उसे ‘विज्ञानगल्प’ कहा जाता है. महान मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने कल्पना को ‘प्राथमिक कल्पना’ और ‘द्वितीयक कल्पना’ के रूप में वर्गीकृत किया है. उसके अनुसार प्राथमिक कल्पनाएं अवचेतन से स्वतः जन्म लेती हैं. जैसे किसी शिशु का नींद में मुस्कराना, पसंदीदा खिलौने को देखकर किलकारी मारना. खिलौने को देखते ही बालक की कल्पनाशक्ति अचानक विस्तार लेने लगती है. वह उसकी आंतरिक संरचना जानने को उत्सुक हो उठता है. यहां तक कि उसके साथ तोड़फोड़ भी करता है. द्वितीयक कल्पनाएं चाहे वे स्वयंस्फूर्त्त हों अथवा सायास, चैतन्य मन की अभिरचना होती हैं. ये प्रायः वयस्क व्यक्ति द्वारा रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में विस्तार पाती हैं. साहित्यिक रचना तथा दूसरी कला प्रस्तुतियां द्वितीयक कल्पना की देन कही जा सकती हैं. प्रख्यात डेनिश कथाकार हैंस एंडरसन ने बच्चों के लिए परीकथाएं लिखते समय अद्भुत कल्पनाओं की सृष्टि की थी. एच. जी. वेल्स की विज्ञान फंतासी ‘टाइम मशीन’ भी रचनात्मक कल्पना की देन है. तदनुसार ‘विज्ञानगल्प’ ऐसी काल्पनिक कहानी को कहा जा सकता है, जिसका यथार्थ से दूर का रिश्ता हो, मगर उसकी नींव किसी ज्ञात अथवा काल्पनिक वैज्ञानिक सिद्धांत या आविष्कार के ऊपर रखी जाए.

विज्ञानगल्प’ में लेखक घटनाओं, सिद्धांतों, नियमों अथवा अन्यान्य स्थितियों की मनचाही कल्पना करने को स्वतंत्र होता है, बशर्ते उन वैज्ञानिक नियमों, आविष्कारों की नींव किसी ज्ञात वैज्ञानिक नियम, सिद्धांत अथवा आविष्कार पर टिकी हो. फिर भले ही निकट भविष्य में उस परिकल्पना के सत्य होने की कोई संभावना न हो. यहां तक आतेआते ‘विज्ञानकथा’ और ‘विज्ञानगल्प’ का अंतर स्पष्ट होने लगता है. ‘विज्ञानकथा’ में आमतौर पर ज्ञात वैज्ञानिक तथ्य या आविष्कार तथा उसके काल्पनिक विस्तार का उपयोग किया जाता है. जबकि ‘विज्ञान फेंटेसी’ अथवा ‘विज्ञानगल्प’ में वैज्ञानिक सिद्धांत अथवा आष्विकार भी परिकल्पित अथवा अतिकल्पित हो सकता है. हालांकि विज्ञानसम्मत बने रहने के लिए आवश्यक है कि उसके मूल में कोई ज्ञात वैज्ञानिक खोज अथवा आविष्कार हो. ‘विज्ञानकथा’ की अपेक्षा ‘विज्ञानगल्प’ में लेखकीय उड़ान के लिए कहीं बड़ा अंतरिक्ष होता है. इससे विज्ञानगल्प के अपेक्षाकृत ज्यादा मनोरंजक होने की संभावना होती है. इस कारण बाल एवं किशोर साहित्य; यानी जहां सघन कल्पनाशीलता अपेक्षित हो—उसका अधिक प्रयोग होता है. उपन्यास जैसी अपेक्षाकृत लंबी रचना में मनोरंजन अनुपात को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है. अतः दक्ष विज्ञान कथाकार उपन्यास लेखन के लिए गल्पप्रधान किस्सागोई शैली को अपनाता है. इससे साहित्य और विज्ञान दोनों का उद्देश्य सध जाता है. विश्व के चर्चित विज्ञान उपन्यासों में अधिकांश ‘विज्ञानगल्प’ की श्रेणी में आते हैं.

विज्ञान लेखन की कसौटी उसका मजबूत सैद्धांतिक आधार है. चाहे वह विज्ञान कथा हो या गल्प, उसके मूल में किसी वैज्ञानिक सिद्धांत अथवा ऐसी परिकल्पना को होना चाहिए जिसका आधार जांचापरखा वैज्ञानिक सत्य हो. वैज्ञानिक तथ्यों को समझे बिना ‘विज्ञानकथा’ अथवा ‘विज्ञानगल्प’ का कोई औचित्य नहीं बन सकता. अक्सर यह देखा गया है कि विज्ञान के किसी आधुनिकतम उपकरण अथवा नई खोज को आधार बनाकर अतिउत्साही लेखक रचना गढ़ देते हैं. लेकिन विज्ञान साहित्य का दर्जा दिलाने के लिए जो स्थितियां गढ़ी जाती हैं, उनका वैज्ञानिक सिद्धांत अथवा परिकल्पना से कोई वास्ता नहीं होता. न ही लेखक अपनी रचना के माध्यम से ब्रह्मांड के किसी रहस्य के पीछे मौजूद वैज्ञानिक तथ्य का उद्घाटन करना चाहता है. वह उसकी कल्पना से उद्भूत तथा वहीं तक सीमित होता है. ऐसी अवस्था में पाठक को चमत्कार के अलावा और कुछ मिल ही नहीं पाता. यह चामत्कारिता परीकथाओं या जादूटोने के आधार पर रची गई रचनाओं जैसी ही अविवेकी एवं निरावलंबी होती है. ऐसी विज्ञान फंतासी उतना ही भ्रम फैलाती हैं, जितना कि गैर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर रची गई तंत्रमंत्र और जादूटोने की कहानियां. बल्कि कई बार तो उससे भी ज्यादा. इसलिए कि सामान्य परीकथाओं में संवेदनतत्त्व का प्राचुर्य होता है. जबकि तर्काधारित विज्ञानकथाएं किसी न किसी रूप में व्यक्ति के हाथों में विज्ञान की ताकत के आने का भरोसा जताती हैं. अयाचित ताकत की अनुभूति व्यक्ति की संवेदनशीलता एवं सामाजिकता को आहत करती है. ‘विज्ञानकथा’ अथवा ‘विज्ञानगल्प’ की रचना हेतु लेखक को विज्ञान के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष का ज्ञान अनिवार्य है. कोई रचना ‘विज्ञानकथा’ है अथवा ‘विज्ञानगल्प’, कई बार यह भेद कर पाना भी कठिन हो जाता है. असल में यह अंतर इतना बारीक है कि जब तक वैज्ञानिक नियमों, आविष्कारों तथा शोधक्षेत्रों का पर्याप्त ज्ञान न हो, अच्छे से अच्छे लेखकसमीक्षक के धोखा खाने की पूरी संभावना होती है.

पश्चिमी देशों में विज्ञान लेखन की नींव उनीसवीं शताब्दी में रखी जा चुकी थी. विज्ञान के पितामह कहे जाने फ्रांसिस बेकन ने सोलहवीं शताब्दी में ‘ज्ञान ही शक्ति है’ कहकर उसका स्वागत किया था. बहुत जल्दी ‘ज्ञान’ का आशय, विशेषरूप से उत्पादन के क्षेत्र में, विज्ञान से लिया जाने लगा. सरलीकरण के इस खतरे को वाल्तेयर ने तत्क्षण भांप लिया था. बेकन की आलोचना करते हुए उसने कहा था कि विज्ञान का अतिरेकी प्रयोग मनुष्यता के नए संकटों को जन्म देगा. वाल्तेयर के बाद इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करनेवाला रूसो था. अप्रगतिशील और प्रकृतिवादी कहे जाने का खतरा उठाकर भी अपने बहुचर्चित निबंध Discourse on the Arts and Sciences में उसने सबकुछ विज्ञान भरोसे छोड़ देने के रवैये की तीखी आलोचना की थी. इसके बावजूद हुआ वही जैसा वाल्तेयर तथा रूसो ने सोचा था. बीसवीं शताब्दी में आइंस्टाइन के ऊर्जा सिद्धांत के आधार पर निर्मित परमाणु बम से तो खतरा पूरी तरह सामने आ गया. आइंस्टाइन ने ही सिद्ध किया था कि भारी परमाणु के नाभिक को न्यूट्रान कणों की बौछार द्वारा विखंडित किया जा सकता है. इससे असीमित ऊर्जा की प्राप्ति होती है. इस असाधारण खोज ने परमाणु बम को जन्म दिया. उसके पीछे था मरनेमारने का सामंती संस्कार. अकेला बम दुनिया की एकतिहाई आबादी को एक झटके में खत्म कर सकता है. माया कलेंडर की भांति यह डर भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए पर्याप्त सिद्ध हुआ. भय के मनोविज्ञान ने उसको व्यापक लोकप्रसिद्धि प्रदान की. प्रकारांतर में उसने दार्शनिकों, वैज्ञानिकों समेत पूरे बुद्धिजीवी समाज को इतनी गहराई से प्रभावित किया कि विज्ञान बुद्धिजीवी वर्ग का नया धर्म बन गया. लोग उसके विरोध में कुछ भी कहनेसुनने को तैयार न थे. जबकि मनुष्यता के हित में उससे अधिक लोकोपकारी आविष्कार पेनसिलिन का था, जिसका आविष्कारक फ्लेंमिंग था. एडबर्ड जेनर द्वारा की गई वैक्सीन की खोज भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण और कल्याणकारी थी. फिर भी आइंस्टाइन को इन दोनों से कहीं अधिक ख्याति मिली. खूबसूरतरोमांचक परीकथा जितनी लोकप्रियता पा चुके आपेक्षिकता के सिद्धांत के आगे विज्ञान के सारे आविष्कार आभाहीन होकर रह गए. मनुष्यता के लिए कल्याणकारी आविष्कारक और भी कई हुए, परंतु उनमें से एक भी आइंस्टाइन की ख्याति के आसपास न पहुंच सका.

अपनी बौद्धिकता और कल्पना की बहुआयामी उड़ान के बावजूूद आपेक्षिकता का सिद्धांत इतना गूढ़ है कि उसे बालसाहित्य में सीधे ढालना आसान नहीं है. मगर आइंस्टाइन के शोध से उपजी एक विचित्रसी कल्पना ने बालसाहित्य की समृद्धि का मानो दरवाजा ही खोल दिया. आइंस्टाइन ने सिद्ध किया था कि समय भी यात्रा का आनंद लेता है. उसका वेग भी अच्छाखासा यानी प्रकाशवेग के बराबर होता है. अभी तक यह माना जा रहा था कि गुजरा हुआ वक्त कभी वापस नहीं आता. आइंस्टाइन ने गणितीय आधार पर सिद्ध किया था कि समय को वापस भी दौड़ाया जा सकता है. यह प्रयोगसिद्ध परिकल्पना थी, जो सुननेसुनाने में परीकथाओं जितना आनंद देती थी. शायद उससे भी अधिक. क्योंकि समय को यात्रा करते देखने या समय में यात्रा करने का रोमांच घिसीपिटी परीकथाओं से कहीं बढ़कर था. इस परिकल्पना का एक और रोमांचक पहलू था, समय के सिकुड़ने का विचार. आइंस्टाइन के पूर्ववर्ती मानते थे कि समय स्थिर वेग से आगे बढ़ता है. सूक्ष्म गणनाओं के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अति उच्च वेगों का असर समय पर भी पड़ता है. विशिष्ट परिस्थितियों में समय को भी लगाम लग जाती है. समय में यात्रा जैसी अविश्वसनीय परिकल्पना ने मनुष्य के लिए अंतरिक्ष के दरवाजे खोल दिए. गणित की विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत इस परिकल्पना और तत्संबंधी प्रयोगों ने अनेक विश्वप्रसिद्ध विज्ञानकथाओं को मसाला दिया, जिसे राइटबंधुओं द्वारा आविष्कृत वायुयान से मजबूत आधार मिला. अंतरिक्ष जो अभी तक महज कल्पना की वस्तु था, जहां उड़ान भरते पक्षियों को देख इंसान की आंखों में मुक्ताकाश में तैरने के सपने कौंधने लगते थे, वहां अब वह स्वयं आजा सकता था. अंतरिक्षयात्रा को लेकर उपन्यासलेखन का सिलसिला तो आइंस्टाइन और राइट बंधुओं से पहले ही आरंभ हो चुका था. अब इन विषयों पर अधिक यथार्थवादी कौशल से लिख पाना संभव था.

सवाल है कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक विज्ञान साहित्य ने जो दिशा पकड़ी, क्या वह साहित्यिक दृष्टि से भी समीचीन थी? इसमें कोई दो राय नहीं कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में विज्ञान लेखन में तेजी आई. बालसाहित्य को अनेक सुंदर और मौलिक कृतियां इस कालखंड में प्राप्त हुईं. वह दौर उन्नत सामाजिक चेतना का था, मनुष्यता दो विश्वयुद्धों के घाव चुकी थी, अतः साहित्यकारों के लिए यह संभव ही नहीं था कि उसकी उपेक्षा कर सकें. इसलिए उस दौर के साहित्यकार जहां एक ओर बालसाहित्य को कल्पनाधारित मौलिक, मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक कृतियां उपलब्ध कर रहे थे, दूसरी ओर वाल्तेयर और रूसो की चेतावनी भी उन्हें याद थी. अपनी कृतियों के माध्यम से वे समाज को सावधान भी कर रहे थे. कह सकते हैं कि सावधानी और सजगता विज्ञान साहित्य के आरंभिक दौर से ही उसके साथ जुड़ चुकी थीं. विज्ञान साहित्य की शुरुआत का श्रेय लेने वाली मेरी शैली से लेकर इसाक अमीसोव(रोबोट, 1950), आर्थर सी. क्लार्क (ए स्पेस आडिसी, 1968), राबर्ट हीलीन(राकेट शिप गैलीलिया, 1947, डबल स्टार, 1956 तथा स्ट्रेंजर इन ए स्ट्रेंज लेंड, 1961) सभी ने विज्ञान के दुरुपयोग की संभावनाओं को ध्यान में रखा. मेरी शैली ने अपनी औपन्यासिक कृति ‘फ्रेंकिस्टीन’(1818) में दो मृत शरीरों की हड्डियों से बने एक प्राणी की कल्पना की थी. वह जीव प्रारंभ में भोलाभाला था. धीरेधीरे उसमें नकारात्मक चरित्र उभरे और उसने अपने जन्मदाता वैज्ञानिक को ही खा लिया. उपन्यास विज्ञान के दुरुपयोग की संभावना से जन्मे डर को सामने लाता था.

हिंदी में आरंभिक ‘विज्ञानकथा’ लेखन अंग्रेजी से प्रभावित था. औपनिवेशिक भारत में यह स्वाभाविक भी था. हिंदी की पहली विज्ञानकथा अंबिकादत्त व्यास की ‘आश्चर्य वृतांत’ मानी जाती है, जो उन्हीं के समाचारपत्र ‘पीयूष प्रवाह’ में धारावाहिक रूप में 1884 से 1888 के बीच प्रकाशित हुई थी. उसके बाद बाबू केशवप्रसाद सिंह की विज्ञानकथा ‘चंद्रलोक की यात्रा’ सरस्वती के भाग 1, संख्या 6 सन 1900 में प्रकाशित हुई. संयोग है कि वे दोनों ही कहानियां जूल बर्न के उपन्यासों पर आधारित थीं. अंबिकादत्त व्यास ने अपनी कहानी के लिए मूल कथानक ‘ए जर्नी टू सेंटर आफ दि अर्थ’ से लिया था. केशवप्रसाद सिंह की कहानी भी बर्न के उपन्यास ‘फाइव वीक इन बैलून’ से प्रभावित थी. इन कहानियों ने हिंदी के पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा. उनमें विज्ञानकथा पढ़ने की ललक बढ़ी. आरंभिक दौर में विज्ञान कथा श्रेणी में हिंदी में प्रकाशित ये कहानियां पाठकों द्वारा खूब सराही गईं. इन्होंने हिंदी पाठकों का परिचय नए साहित्यिक आस्वाद से कराया. जो कालांतर में हिंदी विज्ञान साहित्य के विकास का आधार बना. इसके बावजूद इन्हें हिंदी की मौलिक विज्ञानकथा नहीं कहा जा सकता. इन रचनाओं में मौलिकता का अभाव था. यही स्थिति देर तक बनी रही. हिंदी में विज्ञानसाहित्य के अभाव का महत्त्वपूर्ण कारण बालसाहित्य के प्रति बड़े साहित्यकारों में अनपेक्षित उदासीनता भी थी. अधिकांश प्रतिष्ठित लेखक बालसाहित्य को दोयम दर्जे का मानते थे. यहां तक कि बालसाहित्यकार कहलवाने से भी वे बचते थे. एक अन्य कारण था लेखकों और पाठकों में वैज्ञानिक चेतना की कमी तथा जानकारी का अभाव. जो विद्वान विज्ञान में पारंगत थे, वे लेखकीय कौशल के कमी के चलते इस अभाव की पूर्ति करने में अक्षम थे.

हिंदी की प्रथम मौलिक विज्ञानकथा का श्रेय सत्यदेव परिव्राजक की विज्ञानकथा ‘आश्चर्यजनक घंटी’ को प्राप्त है. बाद के विज्ञान कथाकारों में दुर्गाप्रसाद खत्री, राहुल सांकृत्यायन, डा. संपूर्णानंद, आचार्य चतुरसेन, कृश्न चंदर, डा. ब्रजमोहन गुप्त, लाला श्रीनिवास दास, राजेश्वर प्रसाद सिंह आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इस तरह हिंदी विज्ञान साहित्य का इतिहास कहानी साहित्य जितना ही पुराना है. हालांकि यह मानना पड़ेगा कि एक शताब्दी से ऊपर की इस विकासयात्रा में हिंदी विज्ञान साहित्य का जितना विस्तार अपेक्षित था, उतना नहीं हो पाया. इसका एक कारण संभवतः यह भी हो सकता है कि हिंदी के अधिकांश साहित्यकार गैरवैज्ञानिक शैक्षिक पृष्ठभूमि से आए थे. फिर उनके सामने चुनौतियां भी अनेक थीं. सबसे पहली चुनौती थी, विज्ञान कथा की स्पष्ट अवधारणा का अभाव. उस समय तक शिक्षा और साहित्य का प्रथम उद्देश्य था—बच्चों को भारतीय संस्कृति से परचाना. उन्हें धार्मिक और नैतिक शिक्षा देना. नैतिक शिक्षा को भी सीमित अर्थों में लिया जाता था. धार्मिक ग्रंथों, महापुरुषों के वक्तव्य तथा उनके जीवन चरित्र को नैतिक शिक्षा का प्रमुख स्रोत माना जाता है. धर्म के बगैर भी नैतिक शिक्षा दी जा सकती, यह कोई मानने के लिए तैयार न था. बालकों के मौलिक सोच, तर्कशीलता, मौलिक ज्ञान एवं प्रश्नाकुलता को सिरे चढ़ाने वाले साहित्य का पूरी तरह अभाव था. विज्ञान के बारे में बालक पाठशाला में जो कुछ पढ़ता था, वह केवल उसके शिक्षासदन तक ही सीमित रहता था. घरसमाज में विज्ञान के उपयोग, परिवेश में उसकी व्याप्ति के बारे में समझानेवाला कोई न था. परिवार में बालक की हैसियत परावलंबी प्राणी के रूप में बनी थी. घर पहुंचकर अपनों के बीच यदि वह वैज्ञानिक प्रयोगों को दोहराना चाहे तो प्रोत्साहन की संभावना बहुत कम थी. संक्षेप में कहें तो विज्ञान और उसके साथ विज्ञानलेखन की स्थिति पूरी तरह डांवाडोल थी. भारतीय समाज में वैज्ञानिक बोध के प्रति उदासीनता तब थी जबकि प्रथम वैज्ञानिक क्रांति को हुए चार शताब्दियां गुजर चुकी थीं. आजादी के बाद हिंदी विज्ञान साहित्य की स्थिति में सुधार आया है. तथापि मौलिक सोच और स्तरीय रचनाओं की आज भी कमी है.

एक प्रश्न रहरह दिमाग में कौंधता है. आखिर वह कौनसा गुण है, जो किसी रचना को विज्ञान कथा या वैज्ञानिक साहित्य का रूप देता है. विज्ञान गल्प के नाम पर हिंदी में बच्चों के लिए जो रचनाएं लिखी जाती हैं, वे कितनी वैज्ञानिक हैं? क्या सिर्फ उपग्रह, स्पेस शटल, अंतरिक्ष यात्रा या ऐसे ही किसी काल्पनिक अथवा वास्तविक ग्रह, उपग्रह के यात्रारोमांच को लेकर बुने गए कथानक को विज्ञान साहित्य माना जा सकता है? क्या अच्छे और बुरे का द्वंद्व विज्ञान साहित्य में भी अपरिहार्य है? कई बार लगता है कि हिंदी के विज्ञान साहित्य लेखक विज्ञान और वैज्ञानिकता में अंतर नहीं कर पाते. विज्ञान साहित्यलेखन के लिए गहरे विज्ञानबोध की आवश्यकता होती है. उन्नत विज्ञानबोध के साथ विज्ञान का कामचलाऊ ज्ञान हो तो भी निभ सकता है. वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न लेखक अपने परिवेश से ही ऐसे अनेक विषय खोज सकता है जो बालक के विज्ञान के प्रति रुचि तथा प्रश्नाकुलता को बढ़ाने में सहायक हों. तदनुसार विज्ञान साहित्य ऐसा साहित्य है जिससे किसी वैज्ञानिक सिद्धांत की पुष्टि होती हो; अथवा जो किसी वैज्ञानिक आविष्कार को लेकर तार्किक दृष्टिकोण से लिखा गया हो. उसमें या तो ज्ञात वैज्ञानिक सिद्धांत की विवेचना, उसके अनुप्रयोग की प्रामाणिक जानकारी हो अथवा तत्संबंधी आविष्कारों की परिकल्पना हो. विज्ञान गल्प को सार्थक बनाने लिए आवश्यक है कि उसके लेखक को वैज्ञानिक शोधों तथा प्रविधियों की भरपूर जानकारी हो. उसकी कल्पनाशक्ति प्रखर हो, ताकि वह वैज्ञानिक सिद्धांत जिसके आधार पर वह अपनी रचना को गढ़ना चाहता है, के विकास की संभावनाओं की कल्पना कर सके. यदि ऐसा नहीं है तो विज्ञान कथा कोरी फंतासी बनकर रह जाएगी. ऐसी फंतासी किसी मायावी परीकथा जितनी ही हानिकर सिद्ध हो सकती है. एक रचनाकार का यह भी दायित्व है कि वह प्रचलित वैज्ञानिक नियमों के पक्षविपक्ष को भलीभांति परखे. उनकी ओर संकेत करे.

निर्विवाद सत्य है कि समाज को रूढ़ियों, जादूटोने, भूतप्रेत आदि के मकड़जाल से बाहर रखने में पिछली कुछ शताब्दियों से विज्ञान की बहुत बड़ी भूमिका रही है. विज्ञान के कारण ही देश अनेक आपदाओं तथा जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न खाद्यान्न समस्याओं का सामना करने में सफल रहा है. अनेक महामारियों से समाज को बचाने का श्रेय भी विज्ञान को ही जाता है. ‘श्वेत क्रांति’, ‘हरित क्रांति’ जैसी अनेक उत्पादन क्रांतियां विज्ञान के दम पर ही संभव हो सकी हैं. मगर बीते वर्षों में संचार माध्यमों और बाजार ने विज्ञान को ‘आधुनिकता का धर्म’ की भांति समाज में प्रसारित किया है. लोगों को बताया जाता रहा है कि विज्ञान के विकास की दिशा स्वाभाविक है. जिन क्षेत्रों में उसका विस्तार हुआ है, वही होना भी चाहिए था. जबकि ऐसा नहीं है. बाजार पर दम पर फलनेफूलने वाले समाचारपत्रपत्रिकाएं निहित स्वार्थ के लिए मानव समाज को उपभोक्ता समाज में ढालने की कोशिश करते रहते हैं. वे व्यक्ति के सोच को भी अपने स्वार्थानुरूप अनकूलित करते रहते हैं. पढ़ेलिखे युवाओं से लेकर साहित्यकार, बुद्धिजीवी तक उनकी बातों में आ जाते हैं. इससे विज्ञान पर अंकुश रखने, लोककल्याण के लक्ष्य के साथ उसके शोध क्षेत्रों के नियमन की बात कभी ध्यान में ही नहीं आ पाती. उदाहरण के लिए बीसवीं शताब्दी के विज्ञान की तह में जाकर देख लीजिए. उसका विकास उन क्षेत्रों में कई गुना हुआ, जिससे पूंजीपतियों को लाभ कमाने का अवसर मिलता हो, उनका एकाधिकार पुष्ट होता हो. गांव में बोझा ढोने वाली मशीन हो या शहरी सड़कों पर दिखने वाला रिक्शा. उनमें प्रयुक्त तकनीक में पिछले पचास वर्षांे में कोई बदलाव नहीं आया है. जबकि कार, फ्रिज, मोटर साइकिल, टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल जैसी उपभोक्ता वस्तुओं के हर साल दर्जनों नए माडल बाजार में उतार दिए जाते हैं. हालांकि यह कहना ज्यादती होगी कि ऐसा केवल साहित्यकारों के विज्ञान के प्रति अतिरेकी आग्रह अथवा उनके अनुप्रयोग की ओर से आंखें मूंद लेने के कारण हुआ है. मगर यह भी कटु सत्य है कि समाजविज्ञानियों और साहित्यकर्मियों द्वारा विज्ञान के मनमाने व्यावसायिक अनुप्रयोग का जैसा रचनात्मक विरोध होना चाहिए था, वैसा नहीं हो पाया है. फ्रांसिसी बेकन का मानना था कि विज्ञान मनुष्य को जानलेवा कष्ट से मुक्ति दिलाएगा. आरंभिक आविष्कार इसकी पुष्टि भी करते थे. जेम्सवाट ने भाप का इंजन बनाया तो सबसे पहले उसका उपयोग कोयला खानों से पानी निकालने के लिए किया गया, जिससे हर साल सैकड़ों मजदूरों की जान जाती थी. विज्ञान साहित्य का अभीष्ट भी यही था कि वह विज्ञान के कल्याणकारी अनुप्रयोगों की ओर बुद्धिजीवियोंवैज्ञानिकों का ध्यानाकर्षित करे तथा उनके समर्थन में खड़ा नजर आए. लेकिन विज्ञान लेखन को फैशन की तरह लेने वाले लेखकों से इस मामले में चूक हुई. श्रद्धातिरेक में उन्होंने विज्ञानलेखन को भी धर्म बना लिया. प्रौद्योगिकी प्रदत्त सुविधाओं के जोश में वे भूल गए कि विज्ञान को मर्यादित करने की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है. अपने लेखन को संपूर्ण मनुष्यता के लिए कल्याणकारी मानने वाले साहित्यकारों का क्या यह दायित्व नहीं कि वे ऐसा सपना देखें जिनमें विज्ञान और तकनीक के जरिये देश के उपेक्षित वर्गों के कल्याण के बारे में सोचा गया हो! लोगों को बताएं कि मात्र प्रयोगशाला में जांचापरखा गया सत्य ही सत्य नहीं होता. ‘अहिंसा परमो धर्म’ परमकल्याणक सत्य का प्रतीक है. समाज में शांतिव्यवस्था बनाने रखने के लिए उसका अनुसरण अपरिहार्य है. हालांकि अन्य नैतिक सत्यों की भांति इसे भी किसी तर्क अथवा प्रयोगशाला द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सकता. विज्ञान ऐसे विषयों पर भले विचार न कर पाए, मगर साहित्य अनुभूत सत्य को भी प्रयोगशाला में खरे उतरे विज्ञान जितनी अहमियत देता है. विज्ञान तथा उसके अनुप्रयोग को लेकर नैतिक दृष्टि साहित्य में होगी, तभी तो विज्ञान में आएगी. कोरी वैज्ञानिक दृष्टि आइंस्टाइन के सापेक्षिकता के सिद्धांत से परमाणु बम ही बनवा सकती है.

मुझे दुख होता है जब देखता हूं कि विज्ञान सम्मत लिखने के फेर में कुछ साहित्यकार साहित्य के मर्म को ही भुला देते हैं. ऐसे में यदि उनका विज्ञानबोध भी आधाअधूरा हो तो विज्ञान कथा या गल्प की श्रेणी में लिखी गई रचना भी तंत्रमंत्र और जादूमंतर जैसी बे सिरपैर की कल्पना बन जाती है. कुछ कथित विज्ञानकथाओं में दिखाया जाता है कि नायक या प्रतिनायक के हाथों में ऐसा टार्च है जिससे नीली रोशनी निकलती है. वह रोशनी धातु की मोटी पर्त को भी पिघला देती है. ‘नीली रोशनी’ संबोधन ‘पराबैंगनीं तरंगों’ की तर्ज पर गढ़ा गया है. वे अतिलघु तरंगदैघ्र्य की अदृश्य किरणें होती हैं, जिन्हें स्पेक्ट्रम पैमाने पर नीले अथवा बैंगनी रंग से निचली ओर दर्शाया जाता है. दृश्य बैंगनी प्रकाश की किरणों की तरंगदैघ्र्य से भी अतिलघु होने के उन्हें ‘अल्ट्रावायलेट’ कहा जाता है. इस तथ्य से अनजान हमारे विज्ञान लेखक धड़ल्ले से नीली रोशनी का शब्द का प्रयोग भेदक किरणों के लिए करते हैं. मेरी दृष्टि में नीली किरणें फैंकने वाली टार्च और जादू के बटुए या जादुई छड़ी में उस समय तक कोई अंतर नहीं है, जब तक विज्ञान लेखक अपनी रचना में वर्णित वैज्ञानिक सत्य की ओर स्पष्ट संकेत नहीं करता. आप कहेंगे कि इससे रचना बोझिल हो जाएगी. पठनीयता बाधित होगी. तो मैं कहना चाहूंगा कि पठनीयता और विज्ञान की कसौटी दोनों का निर्वाह करना ही विज्ञान लेखक की सबसे बड़ी चुनौती होती है. इसलिए वैज्ञानिक कथाकार पूरी दुनिया में कम हुए हैं. साहित्यकार का काम वैज्ञानिक तथ्यों का सामान्यीकरण कर उनके और बालमन के बीच तालमेल बैठाने है. वह बालक को अपने आसपास की घटनाओं से जोड़ने की जिम्मेदारी निभाता है, ताकि उसकी जिज्ञासा बलवती हो. उसमें कुछ सीखने की ललक पैदा हो. विज्ञान को ताकत का पर्याय न मान पाए इसलिए वह बारबार इस तथ्य को समाज के बीच लाता है कि मनुष्यत्व की रक्षा संवेदना की सुरक्षा में है. संवेदनरहित फंतासी हमें निःसंवेद रोबोटों की दुनिया में ले जाएगी. साररूप में कहूं तो साहित्य का काम विज्ञान को दिशा देना है, न कि उसको अपनी दृष्टि बनाकर उसके अनुशासन में स्वयं को ढाल लेना. साहित्य अपने आपमें संपूर्ण शब्द है. तर्कसम्मत होना उसका गुण है. किसी रचना में साहित्यत्व की मौजूदगी ही प्रमाण है कि उसमें पर्याप्त विज्ञानबोध है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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