क्रिकेट-करकट


भारत में जितनी चर्चा क्रिकेट की लोकप्रियता की होती है, उसका सहस्रांश भी उसके कारणों की समीक्षा पर खर्च नहीं होता. जैसे मान लिया गया है कि क्रिकेट हमारे खून में है. एक नामी-गिरामी संपादक जो सती प्रथा और क्रिकेट का एकसमान गुणगान करते थे, हाल ही में ‘क्रिकेट-क्रिकेट’ भजते दिवंगत हुए. लोग उनके क्रिकेट-बोध पर फिदा थे, वे खुद देश की सती प्रथा पर. भगवान यदि लापता नहीं है तो उनकी आत्मा को शांति बख्शे. श्रीमान जाते-जाते भी बता गए कि लोग सचिन तेंदुलकर की कामयाबी का राज नाहक उनकी मेहनत और कलाइयों की उस करामात में ढूंढते हैं, जो बल्ले को ऐसे घुमाती हैं कि गेंद सीधी मैदान बाहर सांस लेती है. उनकी माने तो यह सब सचिन के ब्राह्मण होने का प्रताप है. गोया दुनिया के जितने भी बल्लेबाज हैं, गैरी सोबर्स से लेकर डेनिस लिली तक, सबके सब ब्राह्मण की औरस-जात हों.

‘उनने’ भी जितने ‘कागद’ सचिन की महानता का गुणगान करने के लिए ‘कारे’ किए, उसका शतांश भी क्रिकेट की लोकप्रियता के कारणों की पड़ताल पर जाया नहीं किया. क्या वे नहीं जानते थे कि क्रिकेट कोरा खेल न होकर समाज पर पूंजीवादी बाजार का शिकंजा है! सस्ता मनोरंजन है, जिसे नकली देशभक्ति की थाली में सजाकर परोसा जाता है. एक मोहपाश है जो देश के करोड़ों लोगों को भरमाए रखता है! ऎसा खेल जो सीधे-सादे लोगों को इलीट होने का झूठा एहसास देता है. क्या वे नहीं जानते थे कि फिल्मों की भांति क्रिकेट ने भी देश को नकली नायक ही दिए हैं, जो खेलने के अलावा बाजार की मांग पर नाच-गा सकते हैं. बल्कि वे क्रिकेट में जाते ही इसलिए हैं कि बाजार की आंखों के चांद-तारे बन सकें. देशभक्ति उनके लिए, बाजार और विज्ञापन-जगत के लिए महज एक धंधा है.

यह बाजार और उसका स्वार्थ ही है जो अभिताभ बच्चन को सदी का महानायक और सचिन तेंदुलकर को महान बल्लेबाज लिखता है. ‘महान’ शब्द को कितना छोटा बना दिया है इन्होंने. अगर अभिताभ सदी के महानायक हैं, तब भगत सिंह क्या थे! महात्मा गांधी से उनका दर्जा क्यों नहीं छीन लेना चाहिए? यदि इन्हें महान मान जाए तो वैशाली की नगरवधु आम्रपाली को केवल ‘कुशल’ नृत्यांगना कहकर कैसे निपटा सकते हैं! उसे तो भारतीय इतिहास की महादेवी की पदवी मिल ही जानी चाहिए. नचनियों को नायक बनाकर पेश करना लुटेरी बाजारवादी सभ्यता में ही संभव है. इसलिए बाजार में सवाल नहीं उठाए जाते. बाजार चाहता भी यही है कि लोग विज्ञापन के तानपुरे पर केवल गर्दन हिलाएं. अर्थों की खोज की हिमाकत न करें. बात पर कान दें, ध्यान हरगिज न दें.

पिछले दिनों क्रिकेट टीम में छोटे शहरों के कई खिलाड़ी लिए गए. इस बात का बहुत शोर मचाया गया कि छोटे शहरों से भी क्रिकेट की प्रतिभाएं उभर रही हैं. इस सबके पीछे विज्ञापनदाता कंपनियों की सोची-समझी रणनीति थी. सब जानते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां शहरों को निचोड़ चुकी हैं. रीयल ऐस्टेट और दूर संचार कंपनियां जो ऐसे मैचों के प्रमुख प्रायोजक की भूमिका निभाती हैं, सहस्राब्दि की शुरुआत से ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बाजार की संभावनाएं तलाश की रही थीं. उनके निशाने पर छोटे शहर और गांव थे. उनके सुरसामुखी विस्तार के लिए अकेले सचिन का शहरी और उम्रदराज चेहरा काफी नहीं था. इसलिए धोनी को लाया गया. रैना जैसे नए चेहरे लिए गए. टीम का कप्तान बनने के बाद धोनी के खेल में गिरावट आई थी. फिर भी बाजार ने संभाले रखा. किसी न किसी तरह उनके नायकत्व को बनाए रखा गया. इसलिए कि उसकी जितनी धोनी को थी, उतनी ही मीडिया को भी थी. उन कंपनियों को भी थी जो धोनी के ऊपर करोड़ों का दाव लगा चुकी थीं.

इस बात का दावा खूब बढ़-चढ़कर किया जाता है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड क्रिकेट की दुनिया की सबसे धनी संस्था है. मगर यह सवाल कोई नहीं उठाता कि एक गरीब देश का क्रिकेट बोर्ड दुनिया का सबसे मालदार क्रिकेट बोर्ड कैसे बना. हमारा आधुनिकताबोध, समकालीनताबोध क्रिकेटबोध से ऐसा जुड़ा है, कि कोई अलग नहीं होना चाहता. यहां तक कि हम इससे बाहर झांकना तक नहीं चाहते. कितने लोग जानते हैं कि क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड एक प्राइवेट संस्था है; और जिसे हम भारतीय क्रिकेट टीम कहते हैं, वह दरअसल भारतीयों की टीम है! असल में वे ऎसे चेहरें हैं जिनकी विज्ञापन जगत को आवश्यकता है. फिर भी भारत-पाकिस्तान का मैच हो तो नकली देशभक्ति जुनून ऐसा उमड़ता है कि दंगों जैसे हालात पैदा हो जाते हैं. दर्शकों की भावुकता और उनके जुनून को भुनाने वाला मीडिया हमें यह कभी नहीं बताता कि क्यों अमेरिका में क्रिकेट नहीं खेला जाता. ओलंपिक में सबसे अधिक मेडल जीतने वाले चीन और जापान को क्रिकेट के नाम पर इतना परहेज क्यों है? आस्ट्रेलिया को छोड़कर वही देश इस खेल में आगे क्यों हैं, जिनकी अपनी समस्याएं बेशुमार हैं? क्या कारण है कि क्रिकेट का खेल पश्चिमी देशों में जहां यह जन्मा, वहां निरंतर कम होता जा रहा है. आस्ट्रेलिया, इंग्लेंड जैसे देशों में भी हमारे यहां से कम क्रिकेट खेली जाती है. जबकि एशिया महाद्वीप में बिना क्रिकेट के आप कल्पना भी नहीं कर सकते.

कारणों की पड़ताल के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा. सत्तर का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था में परिवर्तन और नए औद्योगिक घरानों और कारखानों के उभार का भी दशक था. राजनीतिक उथल-पुथल के उस दौर में पूंजीवाद समाज और शासन पर अपनी पकड़ बनाता जा रहा था. तेजी से बढ़ते कारखानों को अपने नए उत्पादों के लिए आकर्षक चेहरे-मोहरे वाले मा॓डल्स की तलाश हमेशा रहती है. उससे पहले वे नायक फिल्मों और टेलीविजन से आते थे. किंतु शिक्षा के प्रसार के साथ देश का आम दर्शक-श्रोता भी जानने लगा था कि फिल्मी अभिनेताओं का नायकत्व झूठा है. सेलुलाइड की चमक-दमक नकली और अस्थायी है. सिवाय शारीरिक सौष्ठव के फिल्मी नायक-नायिकाओं की बहादुरी, उनकी कला-प्रवीणता, यहां तक कि उनकी आवाज भी उनकी अपनी नहीं है. बहादुरी के लिए उनके डुप्लीकेट्स हैं, जिनके नाम तक नहीं लिए जाते. गीतों के सुरीले बोल पार्श्व गायकों के गले से आते हैं. इसलिए उत्पादों की बढ़ती संख्या को बाजार में लोकप्रिय बनाने, उनके लिए बड़ा उपभोक्तावर्ग पैदा करने के लिए उन्हें ऐसे नायकों की जरूरत थी, जिनका नायकत्व असली-सा जान पड़े. जिनके माध्यम से वे दर्शकों के हुजूम को अपने विज्ञापन परोस सकें. ऐसे चेहरों की तलाश के लिए विज्ञापन जगत का ध्यान खेलों की ओर गया, जहां सारा का सारा दारोमदार खिलाड़ियों के कौशल पर निर्भर करता है. खेलों में भी क्रिकेट उन्हें सर्वाधिक अनुकूल लगा.

सवाल है कि क्रिकेट का कौन-सा गुण उसको लोकप्रिय बनाता है. जिससे दूसरे खेलों के दर्शक उसकी ओर खिंचे चले आते हैं? चार-पांच दशक पहले तक इस देश का सर्वाधिक लोकप्रिय खेल हाकी था. वही देशभक्ति और राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान था. उसके बरक्स क्रिकेट अंग्रेजों और उनके मुंह लगे सामंतों का खेल था. आजादी के बाद स्थिति बदली. विकास की ओर अग्रसर देश में मध्यवर्ग का तेजी से विकास हुआ, जो खुद को अंग्रेजियत के करीब रखने में गर्व का अनुभव करता था. इस मामले में बाजी क्रिकेट के हाथ थी, क्योंकि उसकी सारी की सारी शब्दावली, खिलाड़ियों की वेशभूषा, खासतौर पर टोपी अंग्रेजियत को उनके एकदम पास ले आती थी. दूसरे इस खेल में नफासत भी थी. आपको बस खड़े-खड़े बल्ला चलाना है. गेंद फेंकने, उठाकर लाने के लिए दूसरे खिलाड़ी हैं. एकदम सामंती अंदाज. खेल में हालांकि गेंदबाज की भी भूमिका होती है. मगर वह दोयम दर्जे की, जैसे परिवार में स्त्री. दूसरे हाकी खेलने के लिए जो दम-खम चाहिए वह शहरी परिवेश में सर्वसुलभ नहीं था. उसके अधिकांश खिलाड़ी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते थे. क्रिकेट में शहरीयत के अलावा इतनी सहजता भी थी कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी रनों और ओवरों का हिसाब लगा सकता है. यानी क्रिकेट इस देश के तेजी से उभरते हुए मध्यवर्ग को जो आधुनिकताबोध दे सकता है, वह हाकी नहीं दे सकती. हालांकि क्रिकेट की भांति उसमें भी मास अपील यानी दर्शकों को अपनी ओर खींचने का सामर्थ्य था. मगर कुछ तकनीकी कारण भी रहे, जिनके चलते हाकी विज्ञापन जगत के लिए बहुत उपयोगी नहीं थी.

हाकी और फुटबाल जैसे खेलों की पारियां अपेक्षाकृत कम समय तक चलती हैं. उनके खेल में अत्यधिक तेजी और निरंतरता होती है. दर्शक गेंद का पीछा करते खिलाड़ियों को केवल सांसें थामकर देख सकता है. वह खिलाड़ियों के कौशल से रोमांचित हो सकता है. मगर उस खेल का खुद हिस्सा बन जाने, टीका-टिप्पणी करने अवसर उसके पास नहीं होता. तेजी से चलते मैच के बीच विज्ञापनों की घुसपैठ भी आसान नहीं है. दूसरी ओर क्रिकेट में हर ओवर के बाद खिलाड़ी अपना स्थान बदलते हैं. बल्ला लगते ही गेंद मैदान के बाहर चली जाए तो खिलाड़ी को दौड़ना भी पड़ता है. इस अंतराल में दर्शक को खेल और खिलाड़ी के बारे में सोचने का अवसर मिल जाता है. वह अपने पसंदीदा खिलाड़ी की प्रशंसा या आलोचना कर सकता है. खुद को उस अवस्था में रखकर सोच सकता है. यही क्षण मीडिया और विज्ञापनदाताओं के काम के होते हैं. इस अंतराल का उपयोग वे दर्शक-श्रोता के मानस पर अपने उत्पाद की पकड़ जमाने के लिए करते हैं.

हाकी और फुटबाल जैसे तीव्र गति खेलों में जब तक गेंद और गोल के बीच दूरी हो, रोमांच बना ही रहता है. उसके बीच से दर्शकों को अपने उत्पाद तक खींच कर ले जाना आसान नहीं होता. जबकि क्रिकेट के खेल में रोमांच के अवसर बीच-बीच में आते ही रहते हैं, जिसका फायदा दर्शकों को खेल से जोड़े रखने के लिए बाखूबी किया जा सकता है. क्रिकेट की लोकप्रियता का एक और कारण यह है कि हाकी और फुटबाल जैसे खेलों में जहां खिलाड़ी का अपना दमखम ज्यादा चलता है, वहीं क्रिकेट संयोगों का खेल है. यह खिलाड़ी के कौशल के अतिरिक्त चांस पर भी निर्भर होता है. यहां मंजा हुआ खिलाड़ी पहली ही बा॓ल पर आउट हो सकता है, तो एकदम नया-नया आया खिलाड़ी पहले ही मैच को शतकीय पारी में बदल सकता है. थोड़ी कड़वी भाषा का इस्तेमाल करें तो क्रिकेट भी टेलीविजन पर खेले जा रहे अनेक जुओं में से एक है. संयोग और अवसर हालांकि दूसरे खेलों में भी चलते हैं, मगर क्रिकेट का पूरा खेल इसी पर निर्भर करता है, यही कारण है कि शाहरुख जैसे पेशेवर अभिनेता भी क्रिकेट की ओर आकर्षित होते हैं तथा लीग मैचों में अपनी टीम की पराजय के बावजूद मोटी कमाई कर जाते हैं. वस्तुत: इस देश में क्रिकेट और कुकरमुत्ते की तरह जगह-जगह उगते कथावाचक ऐसे माध्यम हैं, जो आदमी का मन भरमाए रखते हैं. उसे उसकी दुर्दशा के बारे में सोचने और उसके कारणों की तह में जाने नहीं देते. इनकी आड़ में राजनीतिक ढुलमुलापन, नेताओं का झूठ और भ्रष्टाचार, अधिकारियों का नाकारापन और आम आदमी का भाग्यवाद सब खप जाते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

हिंदी मीडिया: नाम-दाम का चोखा धंधा

मीडिया और हिंदी साहित्य


समाज में मीडिया की भूमिका संवादवहन की होती है. वह समाज के विभिन्न वर्गो, सत्ता-केंद्रों, व्यक्तियों एवं संस्थाओं के बीच पुल का कार्य करता है. इसके लिए एक ओर जहां वह सरकार और सत्ता-केंद्रों यथा धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता आदि की योजनाओं, कार्यक्रमों तथा उपलब्धियों को जनता के बीच ले जाता है.उनकी विशेषताओं, कमजोरियों और खामियों पर समालोचनात्मक विमर्श करता है, वहीं वह जनता की इच्छा-आकांक्षाओं, सपनों, उसकी अंदरूनी हलचलों और विभ्रमों को भी उसके दूसरे वर्गों एवं विभिन्न सत्ता-केंद्रों तक पहुंचाने का कार्य करता है. संवादवहन की इस प्रक्रिया में तथ्यों एवं घटनाओं के प्रस्तुतीकरण की ईमानदारी और निस्पृहता ही उसकी व्यावसायिक नैतिकता को रेखांकित करती है. लोकतांत्रिक समाजों में जनता चूंकि अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयंशासित होती है, इसलिए उनमें मीडिया का दायित्व और भी बढ़ जाता है. अतएव यह अन्यथा नहीं है कि लोकतंत्र मीडिया की उपादेयता एवं उसकी भूमिका आकलन करते हुए उसको अपने चौथे स्तंभ का सम्मान देता है.
यहां एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ सकता है कि आखिर क्यों और किसके भरोसे मीडिया सत्ताकेंद्रों की गतिविधियों का आलोचनात्मक विमर्श रचने, यहां तक कि उनसे टकराने तथा उनके विरुद्ध जनमत पैदा करने का साहस कर पाता है. उत्तर एकदम स्पष्ट है—मीडिया और मीडियाकर को अपनी शक्तियां, अन्याय के प्रतिकार की पे्ररणा अपनी उस स्वयंस्फूर्त प्रतिबद्धता द्वारा प्राप्त होती हैं, जो उसकी ईमानदार मूल्यनिष्ठा और कर्तव्य-भावना की उपज होती है. यह अनुभूति कि उसके किसी निर्णय अथवा कार्य से व्यापक लोकहित संबद्ध है, उसे उस कार्य को पूरा करने की प्रेरणा और संबल प्रदान करती है. इसी नैतिक चेतना और विश्वास के भरोसे वह बड़ी से बड़ी सत्ता से दुश्मनी मोल लेने का साहस कर पाता है. कुशल नेतृत्व मिलने पर मीडिया समाज को वांछित परिवर्तनों की दिशा में ले जाने में सहायक होता है. इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब मीडिया की शक्ति एवं लोकमानस पर उसकी पकड़ को पहचानते हुए महान लोगों ने उसका उपयोग लोक-परिवर्तन के अहिंसक, प्रभावशाली और भरोसेमंद हथियार के रूप में किया है.
अब बात करते हैं साहित्य की. उसका शब्दार्थ है, सबका कल्याण. सः हितः. यानी ऐसी युक्ति ऐसा नियोजन, ऐसा माध्यम, ऐसी संप्रेरणा जिसके पीछे किसी एक वर्ग-जाति-धर्म-समाज-समूह-संप्रदाय-देश के बजाय समस्त विश्व-समाज के कल्याण की भावना सन्निहित हो. साहित्यकार के पास भरपूर कल्पनाशीलता और विश्वदृष्टि होती है. अपनी नैतिक चेतना से अभिप्रेत, कल्पनाशीलता के सहयोग से वह श्रेयस् के स्थायित्व एवं उसकी सार्वत्रिक व्याप्ति के लिए शब्दों तथा अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों द्वारा प्राणीमात्र के कल्याण का प्रयोजन रचता रहता है. संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण यानी ‘सर्व भूत हिते रतः’ की सद्कामना ही साहित्यकार का अभीष्ठ होती है. सृजन के आनंदोत्सव के दौरान वह न तो ‘राजपाट की वांछा रखता है, न स्वर्ग, न ही मोक्ष आदि की. वह सच्चे मन से कामना करता है कि प्राणिमात्र के दुःखों और व्याधियों का अंत हो.1 सभी सुखी हों, सभी निर्भीक होकर मुक्त विचरण करें.2
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना पर जोर देते हुए वह कामना करता है कि समस्त वसुधावासी परिवार की भांति, एक रहते हुए सदैव फलते-फूलते रहें. अभी तक केवल पृथ्वी पर जीवन की ज्ञात उपलब्धता है. यदि किसी अन्य ग्रह पर जीवन की संभाव्यता की भनक लगे, तो साहित्य तुरंत अपनी प्रार्थना में संशोधन करते हुए ‘बृह्मांड कुटुंबकम’ की भावना से युक्त कोई नई और प्रभावशाली प्रार्थना गढ़ लेगा. यहां आकर मीडिया और साहित्य की अंतर्संबद्धता एकदम स्पष्ट हो जाती है. मीडिया यानी वह उद्यम जो समाज के विभिन्न वर्गों, ध्रुवों, शक्ति-केंद्रों के बीच संप्रेषण का दायित्व वहन करे, उपेक्षित-उत्पीड़ित वर्गों के सपनों, आशा-आकांक्षाओं को सरकार और उसके प्रभावशाली वर्गों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाए तथा दोनों के बीच निर्भीक-निष्पक्ष और विश्वसनीय संवादसेतु का काम करे. ताकि लोग एक-दूसरे की इच्छा-आकांक्षाओं, सपनों और समस्याओं को जानें, समझें तथा मिल-जुलकर साथ-साथ प्रगतिपथ पर आगे बढ़ सकें. साहित्य वह जो लोक-कल्याण की भावना के साथ विभिन्न विचारधाराओं, जीवन-मूल्यों, सांस्कृतिक प्रतीकों-प्रतिमानों, कलाओं एवं लोकऐषणाओं के समन्वयीकरण, संरक्षण, संवर्धन, संप्रेषण आदि का दायित्व वहन करता हुआ, उनके बीच वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संदेशों के आदान-प्रदान का माध्यम बने. ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण’ की भावना से युक्त साहित्यकार ऐसी परिस्थितियों की रचना पर जोर देता है, जिनके बीच आम आदमी की भूख और उसके जीवन की जटिल जनसमस्याओं का हल खोजा जा सके.3
यहां स्पष्ट कर दें कि मीडिया का सामान्य अभिप्राय समाचारपत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है. ये आधुनिक मीडिया के चर्चित और प्रभावशाली रूप हैं, जो सूचनाओं के संग्रहण एवं संप्रेषण का दायित्व बाखूबी निभाते हैं. लेकिन जिसे हम मीडिया यानी संवादवहन की युक्ति मानते आए हैं, उसकी हदें इससे कहीं अधिक व्यापक और समाज में विभिन्न रूपों में पैठी हुई हैं. पुराने जमाने के नौटंकी, स्वांग, नाटक सभा से लेकर बैनर, पोस्टर, पंपलेट्स, संभाषण, लोकगायन, विज्ञापन, सेमीनार, चित्रकला आदि मीडिया की प्रचलित परिभाषा से किंचित भिन्न होने के बावजूद उसी के विविध रूप हैं. आधुनिक मोबाइल फोन का प्रारंभिक उद्देश्य भले ही अलग-अलग स्थान पर मौजूद व्यक्तियों के बीच संवाद प्रक्रिया को आसान, बहुव्यापी और चलायमान बनाना हो, लेकिन उन्नत तकनीक, बाजार की जरूरतों तथा बढ़ती विज्ञापन-स्पर्धा ने उसे भी मीडिया के आधुनिक और शक्तिशाली विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है.
इसी प्रकार साहित्य भी लिखित शब्द, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक इत्यादि नहीं है. ये महज विधाएं हैं जिनमें साहित्य अपने विभिन्न कलेवरों और रूपाकारों के साथ प्रकट होता है. साहित्य इनमें अंतनिर्हित वह तत्व है, जो पाठक-श्रोता-दृष्टा आदि के मन में नैतिक प्रेरणाओं और आत्मविश्वास का संचार करते हुए उनके विवेकीकरण में सहायक बनता है. उल्लेखनीय है कि सत्ता चाहे राजनीति की हो, पूंजी की या फिर धर्म की-वर्चस्व की भावना उसके चरित्र का अभिन्न हिस्सा होती है. चूंकि जागरूक और चैतन्य समाज ऐसी सत्ता को उखाड़ फेंकने का सामर्थ्य रखता है, इसी डर के कारण सत्ताएं अपनी वर्चस्वकारी प्रवृत्तियों को छिपाए रखने का भरपूर प्रयास करती हैं. उचित समय पर पर्दाफाश न किया जाए तो उनका दमनकारी रूप लगातार उग्र होता चला जाता है. साहित्य और मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वे परस्पर एकजुट होकर लोकजागरण का संधान करें. चूंकि धर्म की भांति बाजार भी समाज के विवेकीकरण से बचता है, इसलिए पूंजीवादी समाजों में मीडिया का स्वरूप इस तरह गढ़ा जाता है कि वह लोगों को ज्ञान-विज्ञान से समृद्ध करने, उनकी आलोचनात्मक प्रवृत्तियों को विस्तार देने के बजाय, मात्र सूचनाओं के आदान-प्रदान या मनोरंजन को अपना लक्ष्य माने रहता है.
साहित्य अपने पाठकों-श्रोताओं के विवेकीकरण पर जोर देता है. केवल सूचनात्मक ज्ञान से संतुष्ट न होकर वह सूचनाओं की पृष्ठभूमि में निहित तथ्यों के विश्लेषण पर भी समानरूप से विचार करता है. उदाहरण के रूप में दूरदर्शन तथा पत्र-पत्रिकाओं में आधुनिक स्त्री को अर्धनग्न और फैशनेबल रूप में दिखाया जाना पूंजीवादी शक्तियों के स्वार्थानुकूल है, इसलिए उनपर निर्भर मीडिया बगैर किसी शर्म / संकोच के वैसा करता है. साहित्यिक विमर्श का दायरा विस्तृत होता है. गांव-शहर की गरीब-विपन्न अपने अस्तित्व के लिए जूझती और लिंगभेद की मार सहती स्त्री भी उसके विमर्श के दायरे में होती है. इसलिए वह मीडिया की अपेक्षा अपेक्षा अधिक विश्वसनीय माना जाता है. साहित्य के साथ यह संभव है कि वह किसी खास वर्ग, समूह अथवा क्षेत्र की समस्याओं को केंद्र में रखकर रचा गया हो. मगर स्थानीयता साहित्य का तात्कालिक लक्षण भले हो, उसका आदर्श नहीं हो सकती. साहित्य को सामाजिक मान्यता तभी मिलती है, जब वह समाज के विभिन्न वर्गों में समन्वय और सद्भाव की बात करे. नैतिक मूल्यों से आबद्ध साहित्यकार केवल प्रचार अथवा सत्ताप्राप्ति की लालसा में ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकता जो मानवादर्शों के विपरीत हो. अपनी व्याप्ति को व्यापक, स्थायी एवं संग्रहणीय बनाने के लिए साहित्य रसज्ञता का गुण रखता है. मनः रंजन की अनिवार्यता मीडिया के लिए भी है. लेकिन केवल लोकरुचि अथवा मनः रंजन से न तो साहित्य का काम सधता है, न मीडिया का. इसलिए अपनी उपस्थिति को सार्थक और जनसाधारण की पहुंच में बनाए रखने के लिए साहित्य जहां मीडिया से सहयोग की अपेक्षा रखता है, वहीं मीडिया अपनी प्रामाणिकता बनाए रखने के साहित्य को न केवल अपने साथ रखता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसे नारे के रूप में उछालने से भी बाज नहीं आता.
अपनी पूंजी संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए मीडिया बार-बार सरकार और बाजार की शरण में जाने को बाध्य होता है. इसी से उसके दुरुपयोग होने तथा लक्ष्य से भटक जाने की संभावना बढ़ जाती है. पूंजीपति और सरकार मीडिया की मदद तो करते हैं, लेकिन वे यह भी चाहते हैं उनके उपकार का बदला चुकाते हुए मीडिया और साहित्यकार उनके हितों के अनुकूल कार्य करें. शक्तिशाली सत्ताएं प्रायः मनुष्य के विवेकीकरण से घबराती हैं. उनकी कोशिश होती है कि मनुष्य के सोच, उसके विचारों पर हमला किया जाए. इसके लिए उसके दिल-दिमाग का अनुकूलन करते हुए वे उसको अपने अनुसार सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं. इसके लिए मीडिया का उपयोग इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने तथा सांस्कृतिक प्रतीकों की बाजारानुकूल व्याख्या द्वारा किया जाता है. मनुष्य के मुक्त सोच को बाधित करने के लिए ज्ञान को सूचना और सूचना के स्रोतों तक सीमित कर दिया जाता है. प्रभावित साहित्य भी होता है, मगर उसके बदलाव की गति अपेक्षाकृत काफी धीमी और अस्थायी प्रवृत्ति की होती है. इसलिए वह परिवर्तन के स्थायी और भरोसेमंद औजार के रूप में काम करता है.
स्मरणीय है कि हर परिवर्तन पहले विचार के रूप में जन्मता है, बाद में साहित्य के माध्यम से लोकचेतना का हिस्सा बनता है. मीडिया उसे जनांदोलन में ढाल देता है, जिनसे वास्तविक परिवर्तन की राह निकलती है. मीडिया का आदिरूप प्रिंट मीडिया यानी पत्रकारिता का है. वैश्विक पत्रकारिता का इतिहास लगभग 59 ईसवी पूर्व रोम से शुरू होता है. वहां का तत्कालीन सम्राट जूलियस सीजर चाहता था कि राज्य की प्रमुख सामाजिक एवं राजनीतिक घटनाओं की जानकारी उसके प्रजाजनों तक भी पहुंचे. कागज के आविष्कार से पहले समाचार-प्रेषण के लिए पत्थर या धातु की पट्टियों का उपयोग होता था. जरूरी समाचार उकेरकर वे नगर के मुख्य स्थलों पर जनसाधारण के अवलोकन के लिए रख दी जाती थीं. उनमें वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिक-सभाओं की रिपोर्ट तथा सम्राट द्वारा लोकहित में लिए गए निर्णयों की सूचना होती थी.
उन दिनों ग्लेडिएटरों की लड़ाई संभ्रांत वर्ग के मनोरंजन का मुख्य माध्यम थी, इसलिए इन सूचनापट्टों पर उनका विवरण भी मजेदार भाषा में उकेर दिया जाता था. इस तरह विश्व के पहले समाचारपत्र Acta Diurna का जन्म हुआ, जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘दिन की घटनाएं’. चीन से आठवीं शताब्दी में हाथ के लिखे समाचारपत्र के प्रकाशन के प्रमाण मिलते हैं. मगर प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में क्रांति का आगमन पंद्रहवी शताब्दी से हुआ. सुनार का काम करने वाले योहन गुटेनबर्ग ने छपाई मशीन का आविष्कार किया. फिर भी सोलहवीं शताब्दी के अंत तक समाचारपत्र हाथ से ही लिखे जाते रहे. 1605 में यूरोप के योहन कारोलूस नाम व्यवसायी ने सबसे पहले अपने धनवान ग्राहकों के लिए सूचनापत्र मशीन से छपवाया. Relation नाम का वह समाचारपत्र विश्व का पहला मुद्रित अखबार माना जाता है.
भारत में छपाई मशीन 1674 में ही आ चुकी थी, किंतु अखबार-प्रकाशन के लिए 102 वर्ष का लंबा इंतजार करना पड़ा. 1776 में विलेम बाल्ट नामक अंगे्रज ने ईस्ट इंडिया कंपनी के समाचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए अंगे्रजी में अखबार निकालना आरंभ किया. भारत का पहला समाचारपत्र जिसमें समाचारों की विविधता के साथ स्वतंत्र अभिव्यक्ति को भी महत्त्व दिया गया था, जेम्स ओगस्टस हिकी का ‘हिकी बंगाल गजट’ अथवा ‘बंगाल गजेटियर’ था. दो पन्नों के उस अखबार में ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों और उसके वरिष्ठ अधिकारियों के जीवन पर लेख छपते थे. एक बार निर्भीक पत्रकारिता का परिचय देते हुए हिकी ने गवर्नर की पत्नी के दुराचरण पर लेख लिखा. उसके छपते ही कंपनी के अधिकारी नाराज हो गए. दंडस्वरूप हिकी को 500 रुपये का जुर्माना भरना पड़ा. मगर इससे उसकी पत्रकारीय निष्ठा पर कोई प्रभाव न पड़ा. कुछ दिन बाद हिकी ने गवर्नर और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की आलोचना से भरा लेख अपने अखबार में छाप दिया. इसपर कंपनी के अधिकारी उससे पूरी तरह खपा हो गए. हिकी को 5000 रुपये जुर्माने तथा एक साल की कैद की सजा मिली. अखबार बंद कर देना पड़ा.
भारत भाषाओं में प्रिंट मीडिया का उदय वर्षों की गुलामी के विरुद्ध भारतीय चेतना का शंखनाद था. हिंदी के पहले साप्ताहिक ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन 1826 में कलकत्ता की हवेली नंबर 37, आमड़तल्ला गली, कोलू टोला नामक स्थान से हुआ था. संपादक थे-जुगलकिशोर मुकुल. पहला अंक 30 मई, 1826 को बाजार में पहंुचा. इसके बाद तो वह प्रत्येक मंगलवार को पाठकों के दरवाजे पर दस्तक देने लगा. पत्र के प्रथम अंक से ही पत्रकारिता और हिंदी साहित्य के शाश्वत रिश्ते का संकेत मिलता है. अखबार के मुख्यपृष्ठ पर, शीर्षक के ठीक नीचे, उसके उद्देश्य को स्पष्ट करतीं, संस्कृत की पंक्तियां छपी होती थीं.4 पत्र के पहले ही अंक में पाठकों से अपील करते हुए कहा गया था—
‘‘यह ‘उदंत मार्तंड’ अब पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेत जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाल में जो समाचार का कागज छपता है उनका सुख उन बोलियों के जानने और पढ़नेवालों को ही होता है. इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देख आप पढ़ ओ समझ लेयँ ओ पराई अपेक्षा न करें ओ अपने भाषे की उपज न छोड़े। इसलिए दयावान करुणा और गुणनि के निधान सब के कल्यान के विषय गवरनर जेनेरेल बहादुर की आयस से ऐसे साहस में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठाटा…’’
संपादक की भरसक कोशिशों के बावजूद अखबार लंबा न खिंच सका. अंग्रेजी के समाचारपत्रों को सरकार की ओर से विशेष डाक-सुविधाएं प्राप्त थीं. प्रयासों के बावजूद उदंत मार्तंड को वे सुविधाएं प्राप्त न हो सकीं. 4 दिसंबर, 1827 के आखिरी अंक के साथ मात्र डेढ़ वर्ष की अवधि में उसे बंद कर देना पड़ा. अखबार समेटने की घोषणा काव्य-पंक्तियों5 द्वारा की गई थी. उदंत मार्तंड के असामयिक अवसान के पीछे उसके प्रकाशक-संपादक की आर्थिक कठिनाइयां थीं, मगर उनमें पत्रकारीय निष्ठा और संकल्प की कमी नहीं थी. इसलिए करीब 23 वर्ष बाद मुकुल जी की भावनाओं ने पुनः जोर मारा. फलस्वरूप उदंत मार्तंड के नए अवतार ‘सोमदत्त मार्तंड’ का जन्म हुआ.
हिंदी का पहला दैनिक होने का गौरव कोलकाता से ही श्यामसुंदर सेन के संपादन में प्रकाशित ‘समाचार सुधावर्षण’(1854) को प्राप्त है. उदंत मार्तंड की भांति यह भी गैरसाहित्यिक पत्र था. उन दिनों अखबार निकालना संपादक-प्रकाशकों के निजी जुनून का परिणाम था. कोई बड़ा उद्योगपति घराना, खासकर भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों से उस समय तक नहीं जुड़ा था. संसाधनों की कमी उनकी प्रमुख समस्या थी. लेकिन उनके संपादकों की निष्ठा असंद्धिग्ध थी. तत्कालीन पत्रकारिता का प्रमुख लक्ष्य था, समाज सुधार, भारतीय राष्ट्रीय चेतना का विकास तथा रूढ़ियों का बहिष्कार. इसके लिए वे अपने पाठकों को नए ज्ञान से समृद्ध कराना चाहते थे, जो अंग्रेजी भाषा के जरिए समाज में आ रहा था. इस बारे में कृष्णबिहारी मिश्र की टिप्पणी दृष्टव्य है—
‘हिंदी-पत्रकारिता के आदि उन्नायकों का आदर्श बड़ा था, किंतु साधन-शक्ति सीमित थी. वे नई सभ्यता के संपर्क में आ चुके थे और अपने देश तथा समाज के लोगों को नवीनता से संपृक्त करने की आकुल आकांक्षा रखते थे. उन्हें न तो सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन प्राप्त था और न तो हिंदी-समाज का सक्रिय सहयोग ही सुलभ था. प्रचार-प्रसार के साधन अविकसित थे. संपादक का दायित्व ही बहुत बड़ा था क्योंकि प्रकाशन-संबंधी सभी दायित्व उसी को वहन करना पड़ता था. हिंदी में अभी समाचारपत्रों के लिए स्वागत भूमि नहीं तैयार हुई थी. इसलिए इन्हें हर कदम पर प्रतिकूलता से जूझना पड़ता था और प्रगति के प्रत्येक अगले चरण पर अवरोध का मुकाबला करना पड़ता था. तथापि इनकी निष्ठा बड़ी बलवती थी. साधनों की न्यूनता से इनकी निष्ठा सदैव अप्रभावित रही…’5
प्रारंभिक दौर में जो साहित्यकार खड़ी बोली को साहित्यिक समृद्धि प्रदान करने के लिए आगे आए उनमें राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, सदल मिश्र, सल्लूलाल, देवकीनंदन खत्री प्रमुख थे. उनके आगे प्रमुख समस्या थी कि भाषा का रूप तत्सम हो या आम बोलचाल वाला. राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने 1946 में जब ‘बनारस समाचार’ का प्रकाशन आरंभ किया तो उन्होंने संस्कृतनिष्ठ भाषा के इस्तेमाल पर जोर दिया. उसी समय देवकीनंदन खत्री आम बोलचाल की भाषा में लोकप्रसिद्ध रचनाएं दे रहे थे. दोनों के बीच की दूरी को पाटने का काम किया भारतेंदु हरिश्चंद्र ने. 1868 में उन्होंने ‘कविवचन सुधा’ नामक पत्रिका की शुरुआत की तो उसमें सरल खड़ी बोली को महत्त्व दिया. भाषा के इस समन्वयकारी रूप का सर्वत्र स्वागत हुआ. इस पत्रिका का पहला अंक 28 मार्च, 1874 को निकला था. कविताओं पर केंद्रित इस सोलह पृष्ठीय पत्रिका की आवृति आरंभ में मासिक थी, जिसे पाठकों की मांग पर पहले पाक्षिक और तदनंतर साप्ताहिक कर दिया गया. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ही आगे चलकर हरिश्चंद्र मैग्जीन, बाला बोधिनी, हरिश्चंद्र चंद्रिका पत्रिकाएं निकालीं. उनसे प्रेरणा लेकर अन्य पत्रकारों-साहित्यकारों ने भी समाचारपत्र-पत्रिकाओं के संपादन-प्रकाशन का दायित्वभार संभाला. हिंदी के कुछ प्रमुख आरंभिक पत्र, पत्रिकाओं में हिंदी प्रदीप(बालकृष्ण भट्ट), आनंद कादंबिनी(चैधरी बद्रीनारायण प्रेमधन), ब्राह्मण(प्रतापनारायण मिश्र), भारत मित्र(रुद्रदत्त शर्मा), सरस्वती(महावीर प्रसाद द्विवेदी) आदि प्रमुख हैं. इसके बाद तो उनकी बाढ़-सी आ गई. काशी की नागरी प्रचारिणी सभा के प्रबंधन में- नागरी प्रचारिणी पत्रिका, विशाल भारत, चांद, मतवाला, इंदु, माधुरी, हंस, सरस्वती आदि पत्रिकाएं हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार का आधार बन गईं. यह सिलसिला लगातार आगे, देश के दूसरे हिस्सों में भी फैलता चला गया.
उस समय में भी साहित्य केवल साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं था. बल्कि वह दूसरे विषयों पर केंद्रित समाचारपत्रों में भी प्रमुख-रूप से प्रकाशित होता था. दरअसल उन दिनों तक पत्रकार और साहित्यकार के बीच बड़ी विभाजन रेखा भी नहीं थी. भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे समर्पित लेखकों में यह पहचान करना कठिन था कि वे पत्रकार बड़े हैं या साहित्यकार. उस समय के प्रमुख साहित्यकार पत्रकारिता के माध्यम से ही साहित्य के क्षेत्र में आए और प्रतिष्ठित हुए थे. कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने पहले लेखन में नाम कमाया, फिर हिंदी पत्रकारिता जगत पर भी छाए रहे. हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को एक-दूसरे का पूरक बनाने की उन्होंने जो मुहिम आरंभ की, उसी के फलस्वरूप तत्कालीन मीडिया भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान लोकजागरण की जनोन्मुखी भूमिका भली-भांति निभा सका. भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों के पक्ष में लोकचेतना फैलाने के साथ-साथ उसने स्वाधीनता की भावना का सतत प्रचार-प्रसार कर, आंदोलन की आंच को प्रखर बनाए रखने का काम भी किया. जिसके फलस्वरूप माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, विष्णु पराड़कर जैसे समर्पित पत्रकार हिंदी जगत को मिल सके.
स्वतंत्र भारत में लोकतंत्रीय बयार के बीच मीडिया को अपने पांव पसारने का भरपूर अवसर मिला. नए-नए अखबार और पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत हुई. इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के वर्तमान रूप उन दिनों इतने प्रचलित नहीं थे. कुछ के तो आविष्कार ही भविष्य की गर्भनाल में छिपे थे. ले-देकर एक रेडियो हुआ करता था. वह भी अपने व्यावसायिक उपयोग की संभावनाएं तलाश रहा था. दूसरी ओर हिंदी साहित्य के पास वेद-वेदांगों, महाकाव्यों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन एवं भक्ति-साहित्य की विपुल बौद्धिक-शास्त्रीय संपदा थी. हम कह सकते कि तत्कालीन भारतीय समाज और साहित्य का बौद्धिक चरित्र अपनी पांच हजार वर्ष से भी अधिक पुरानी संस्कृति, सभ्यता, सुदीर्घ दर्शन-परंपरा और लोकानुभवों से समृद्ध था, जिनकी उपेक्षा कर समाज में पहचान बना पाना असंभव था. जिसे आज ‘व्यावसायिक नैतिकता’ कहा जाता है, उसका उन दिनों तक जन्म ही नहीं हो पाया था. उत्पादन जनता की जरूरतों के लिए होता था. न कि उत्पादन के अनुसार बाजार और जरूरतों के निर्माण की प्रवृत्ति थी. दूरदर्शन आया तो उसे भी अपनी पहचान बनाने के लिए साहित्य का शरणागत बनना पड़ा. महाभारत, रामायण, वेताल पचीसी, बृहत्कथा/कथासरितसागर, पंचतंत्र, गोदान, रंगभूमि, भारत: एक खोज, चंद्रलेखा, तमस, सिंहासन बतीसी जैसी हिंदी की विशुद्ध साहित्यिक कृतियों पर धारावाहिक बने और चर्चित रहे. साहित्य का ऐसा ही दबदवा प्रिंट मीडिया के क्षेत्र पर भी बना रहा. चूंकि साहित्य और साहित्यकारों के सहयोग के अभाव में समाचारपत्र की गंभीरता और विश्वसनीयता दोनों ही संकट में पड़ जाते थे, इसलिए प्रायः सभी समाचारपत्रों ने साहित्य को प्रमुखता दी. फलस्वरूप धर्मवीर भारती, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेंद्र माथुर, मनोहर श्याम जोशी जैसे लेखक सामने आए जो साहित्य और पत्रकारिता दोनों में समानरूप से प्रवीण थे. प्रकाशन-सुविधा बढ़ने पर निजी प्रयासों से भी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ हुआ. साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को छोड़ भी दिया जाए तो राजनीतिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए निकाले गए अखबारों में साहित्य अपनी भरपूर मौजूदगी बनाए रहा.
प्रारंभ में जब तक सरकारों पर स्वाधीनता संग्राम जैसे जनांदोलनों का प्रभाव था, तब तक सरकारें मीडिया के प्रोत्साहन, प्रेषण को अपने नैतिक धर्म की तरह निभाती रहीं. हालांकि उस दौर में सरकार तथा अन्य स्वार्थी वर्गाें ने मीडिया पर अपने प्रभुत्व का बेजा इस्तेमाल भी खूब किया. फिर भी उसका एक विश्वसनीय चरित्र बना रहा. पूंजीवादी दबावों के बीच सत्ताओं की नैतिक शक्तियां क्षीण होने से मीडिया, जो तब तक अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी हो चला था, खुशी-खुशी पूंजीवाद के चारणगान में जुट गया. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूंर्ति के लिए मीडियाकरों को पूंजीवादी व्यवस्था के हाथों का खिलौना बनने से भी गुरेज नहीं था. लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते हुए बड़े पूंजीपतियों ने स्वतंत्र मीडिया संस्थान खड़े कर लिए, जिनका उद्देश्य सिर्फ अपने व्यावसायिक हितों के लिए सरकार पर दबाव बनाना तथा बाजार को विस्तार देना था. चूंकि परंपरागत भारतीय सोच और मान्यताएं मिल-बांटकर खाने, भोग को नियंत्रित रखने और बचत को समान महत्त्व देती थीं, अधिकांश साहित्य इन्हीं के आधार पर रचा गया था. इसके अलावा साहित्य का जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण भी बाजार के किसी काम का न था, इसलिए नई मीडिया-नीति में साहित्य और साहित्यकार उत्तरोत्तर अप्रासंगिक होते चले गए. नवीं शताब्दी से आर्थिक उदारीकरण के दौर पूंजीपति घरानों को मिली छूट के बाद उत्पादन का आधार आदमी की जरूरत न रहकर मुनाफा कमाना हो गया.
अधिकतम मुनाफे के लिए विशालतम बाजार अपरिहार्य था. मनमाफिक विस्तार के लिए पूंजी-केंद्रित उद्यमों ने मीडिया को और ज्यादा सक्षम बनाने हेतु आधुनिक प्रौद्योगिकी का सहारा लिया, जो काफी महंगी थी. उतनी पूंजी सरकारों की ओर से भी आ सकती थी, मगर वे संसाधनों की कमी का बहाना बनाए रहीं. बड़े औद्योगिक घरानों का कब्जा हो जाने से मीडिया पर कारपोरेट संस्कृति का असर होने लगा. परिणामस्वरूप पत्रकारों के लिए नई आचारसहिंताएं गढ़ी जाने लगीं. मीडियाकरों में व्यावसायिक कौशल को महत्त्व दिया जाने लगा, जिसे बाजारवादी व्यवस्था के अनुचर विद्वान व्यावसायिक नैतिकता जैसा लोकलुभावन नाम देने लगे. बाजार की नब्ज पहचानना, सूचनाओं के भंडार को खंगालकर नए उपभोक्ताओं तक पहुंचना सफल मीडियाकर की अनिवार्य योग्यता मान लिया गया. बाजारवादी नैतिकता के अनुसार हर वह कार्य वरेण्य था, जिसमें अधिकतम लाभ की संभावना निहित हो. लाभ की अवधारणा परंपरागत प्रौद्योगिकी का भी अभिन्न हिस्सा थी. मगर नई अवधारणा ने लाभ को अधिकतम मुद्रार्जन के लक्ष्य तक सीमित कर दिया था, जबकि अपने परंपरागत अर्थों में लाभ का प्रत्यय उत्पाद के संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और नैतिक मूल्यों से जन्मता था. लाभवृद्धि की रफ्तार को बनाए रखने के लिए मीडिया ने साहित्य के साथ अपनी सालोंसाल पुरानी जुगलबंदी को किनारे कर, खुद को सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित कर दिया. उल्लेखनीय है कि साहित्य सोच का परिष्कार करता है, मीडिया रुचि का. सोच अमूत्र्तन अवस्था है, उसका व्यावसायिक लाभ संभव नहीं. इसलिए पूंजीपति की ध्यान मीडिया की ओर होता है, क्योंकि बाजार के विस्तार की संभावनाएं कहीं न कहीं रुचि के परिष्कार पर भी निर्भर होती हैं.
यह कहना भी अनुचित होगा कि साहित्य बाजार के दुष्प्रभावों से स्वयं को बचाने में सर्वथा सफल रहा. बड़े-बड़े समाचारपत्रों ने जो पूंजीपति घरानों से निकलते थे, अपने समय के प्रसिद्ध साहित्यकारों को नौकरियां दीं तथा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में उन्हें अपने हितों के विरुद्ध जाने से रोका. साहित्य-संवर्धन और साहित्यकारों के सम्मान के बहाने इस वर्ग ने बड़े-बड़े पुरस्कार घोषित किए. उनका उद्देश्य साहित्यकारों के सोच और कर्म को अपने अनुरूप ढालना था. लोगों के दिमागों में तरह-तरह से यह बिठाया जाने लगा कि साहित्य और अन्य कलाएं राज्य और पूंजी के ही संरक्षण में सुरक्षित रह सकते हैं. बावजूद इसके वर्चस्वकारी स्वार्थी शक्तियां साहित्य को पूरी तरह कब्जाने में नाकाम रहीं. क्योंकि साहित्यकारों के एक वर्ग को खरीद लेना, कुछ सुविधापरस्त साहित्यकारों की लेखनी की धार कुंद कर देना तो बाजार के लिए संभव था, मगर वह साहित्यकार बनाने का काम नहीं कर सकता था. जनाक्रोश को स्वर देने वाली साहित्यिक प्रतिभाएं प्रायः विसंगतियों और विषमताओं के बीच विकसित होती हैं. इसलिए तमाम पूंजीवादी प्रतिबंधों और आयोजनों के बीच साहित्यिक प्रतिभाएं जन्मती रहीं. उन्हीं के दम पर किंचित परिवर्तनों के बावजूद साहित्य आज भी अपनी स्वतंत्र उपस्थति बनाए हुए है.
साहित्यकारों का एक वर्ग हमेशा ही पूंजी और प्रौद्योगिकी के अंतहीन विस्तार को मानवीय अस्मिता पर संकट के रूप में देखता है. हिंदी साहित्य और मीडिया के वर्तमान संबंधों के विरुद्ध उठ रही बहसें दरअसल इसी वर्ग के जीवट और संघर्ष चेतना की प्रतीति हैं. साहित्य और आधुनिक मीडिया में एक अंतर यह भी है कि साहित्य मानवीय विवेकीकरण के प्रति निरंतर प्रयासरत रहता है. जबकि पूंजीवाद प्रेरित मीडिया की व्यावसायिक नीति लोगों को अनुगामी बनाने की होती हैं. स्थितियों की मूल्यवादी विवेचना की ओर उसका कोई रुझान नहीं होता. वह ज्ञान को सूचनाओं तक समेट देने का प्रयास करता है. यही कारण है कि आधुनिक मीडिया जिनमें हिंदी मीडिया भी सम्मिलित है, के अधिकांश आयोजन अपने दर्शकों, पाठकों के समक्ष सूचनाएं परोसने तक सीमित हैं. विमर्श के नाम पर वह तंत्र-मंत्र, खेल और सिनेमा जगत जैसी उन घटनाओं को लेता है, जो किसी न किसी रूप में बाजार को विस्तार देने के ही टोटके हैं. काले धन के बूते फल-फूल रहा आधुनिक मीडिया इतना बोल्ड हो चुका है कि वह किसी दायित्व-भावना को अपने सिर नहीं लेता. वह खुद को केवल मनोरंजन उद्योग के नाम से परचाना चाहता है. ताकि किसी भी प्रकार की उम्मीद न रखी जाए. लेकिन बात जब सुविधाओं एवं अधिकारों की आती है तो संविधान का हवाला देते हुए वह खुद को लोकतंत्र का संरक्षक घोषित करने लगता है. तथा इस बहाने सरकार से अधिकाधिक सुविधाओं की अपेक्षा रखता है.
सुप्रसिद्ध कन्नड साहित्यकार वेणुगोपाल ने अपने आलेख ‘प्रेमचंद और समकालीन राजनीति’7 में एक आपातकाल की एक घटना का जिक्र किया है. यह आधुनिक मीडिया के चरित्र का खुलासा करने को पर्याप्त है-
‘‘बात तब की है, जब राजकपूर की ‘बा॓बी’ फिल्म का हल्ला था. दिनमान में उन्हीं दिनों एक रपट छपी थी. एक विदेशी विचारक ने यह फिल्म देखी तो हाल से निकलने पर कहा—
‘ए फेंटास्टिक पा॓लिटिकल फिल्म.’ उनके भारतीय यजमान और दूसरे सुनने वाले हैरान-परेशान-कि बा॓बी और पा॓लिटिकल फिल्म! सोचा गया कि शायद विदेशी होने के कारण फिल्म उनकी समझ में नहीं आई होगी, तब उन्हें कहा गया— ‘यह फिल्म तो नई उम्र के एक छोकरे और छोकरी की इश्किया दास्तां है. इसमें पा॓लिटिकल क्या है?’ तो विदेशी विचारक मुस्कराकर बोले- ‘इससे बढ़कर पा॓लिटिकल और क्या होगा कि जिस उम्र में पूरी दुनिया के छोकरे-छोकरियां ‘यूथ पा॓वर और ‘स्टूडेंट पा॓वर’ के नाम से हड़कंप मचाए हुए हैं, उस उम्र में इस फिल्म के हीरो-हीरोइन सिर्फ ‘कमरे में बंद होकर चाबी खो देने में लगे हैं. इससे ज्यादा खतरनाक पा॓लिटिक्स और क्या होगी!’’

भटकाव का शिकार हिंदी का आधुनिक प्रिंट मीडिया तो भाषा के मूल स्वरूप से ही खिलवाड़ कर रहा है. तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों में हिंदी के स्थान पर ‘हिंग्लिश’ का जिस प्रकार धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है, वह चिंता की बात है. गंभीर साहित्य टेलीविजन और अखबार दोनों से गायब होता जा रहा है. धुन के पक्के लोग इसकी भरपाई इंटरनेट के माध्यम से करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वहां ‘संपादक’ नामक अनचाहे जीव की अनुपस्थिति साहित्यिक गुणवत्ता का सबसे बड़ा संकट बनी हुई है, हालांकि वह दिन दूर नहीं जब इंटरनेट पर गंभीर और पठनीय साहित्य का भरपूर जमावड़ा होगा, और वह पूरे समाज में वैचारिक हलचल पैदा करने में सक्षम होगा. अभी तो भाषा के साथ खिलवाड़ और सांस्कृतिक अपसरण पर साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों की चुप्पी, हालात को लगातार खतरनाक बनाती जा रही है. ऐसे में सुधी साहित्यकारों और पत्रकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे एकजुट होकर लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ के अनियंत्रित व्यावसायिकीकरण के विरुद्ध जनमत बनाने का हर संभव प्रयास करें. बस हमें याद रखना होगा कि मीडिया और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, उनके बीच अटूट-सी सहसंबद्धता है, उनके वर्तमान संबंध भले ही अस्पष्ट और दुविधामय नजर आते हों.
ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

1. न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं ना पुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
2. सर्वेऽिप सुखिनः भवंतु, सर्वें संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुःखमाप्युात।।
3. ऐसा चाहौं राज मैं जहां मिलै सबन को अन्न !
छोटे बड़ों सब सम बसै रविदास रहे प्रसन्न !! – संत रविदास.
4. दिवा कांत कांति विनाध्वांदमंतं न चाप्नोति तद्वज्जागत्यज्ञ लोकः। समाचार सेवामृते ज्ञत्वमाप्तां न शक्नोति तस्मात्करोनीति यत्रं।। डा॓. सी. जयशंकर बाबु के आलेख ‘हिंदी पत्रकारिता के उद्भव की पृष्ठभूमि’ से उद्धृत.
5. वही.
6. आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तंड उदंत। अस्ताचल को जात है, दिनकर दिन अंत।। – वही
7- ‘गूंज’, संपादक अकिंचन, सितंबर-अक्टूबर, 2008