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पेरियार ललई सिंह : प्रखर मानवतावादी एवं विद्रोही चेतना

सामान्य

राजनीतिक स्वतंत्रता की आवश्यकता इसलिए होती है कि मनुष्य को सामाजिक स्वतंत्रता हो। मनुष्य, दूसरों की स्वतंत्रता में बाधक न होकर स्वेच्छानुसार खा-पी सके, पहन-ओढ़ सके, चल-फिर सके, मिल-जुल और ब्याह-शादी कर सके। यदि सामाजिक स्वतंत्रता न तो राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता…इसलिए सामाजिक समता और सामाजिक स्वतंत्रता ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। राजनीतिक स्वतंत्रता तो उसमें सहायक होने के कारण ही वांछनीय है।

संतराम बीए, ‘हमारा समाज’ से

कुछ नेता स्वाभाविक नेता होते हैं। समाज की कच्ची-खुरदरी जमीन पर हालात से संघर्ष करते हुए स्वयं उभरते हैं। विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रवृत्ति उन्हें नेता बना देती है। दूसरे वे नेता होते हैं, जिन्हें थोप दिया जाता है। ऐसे नेता प्रायः मान लेते हैं कि राजनीति उनके खून में है, इसलिए सत्ता-केंद्र पर छाए रहना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वे प्रायः परिवर्तन-विरोधी होते हैं। गांधी ऐसे ही नेता थे। 1917 में रूसी क्रांति से डरे हुए भारतीय उद्योगपतियों, जमींदारों यहां तक कि यूरोप को भी ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जो इस देश के मानस को समझता हो। साथ में ठेठ परंपरावादी भी हो। जो परिवर्तन की इच्छा और संभावनाओं को धर्म की आड़ में दबा सके। इसलिए दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आए गांधी को उन्होंने हाथों-हाथ लिया। गांधी ने भी उनकी उम्मीद से बढ़कर काम किया। गरीब जनता के दिल में जगह बनाने के लिए लंगोटी धारण कर ली। उसके बाद जो हुआ, सबके सामने है।

दूसरी श्रेणी के नेताओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे महामनाओं में ज्योतिराव फुले, डाॅ. आंबेडकर, ई. वी. रामासामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद जैसे क्रांतिकारी विचारकों का नाम आता है। पेरियार को छोड़ दें तो बाकी तीनों बहुत साधारण परिवारों से आए थे। परंतु अपने असाधारण सोच, सरोकार और संघर्ष के बल पर वे बड़े परिवर्तन के संवाहक बने। ये सब नए भारत के वास्तुकार हैं। संघर्ष में तपकर निकले नेताओं में ललई सिंह का नाम भी शामिल है। वे कानपुर देहात के छोटे-से गांव में जन्मे और विद्रोही चेतना के बल पर लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये रहे। वर्षों लंबे संघर्ष के दौरान उन्होंने विरोधी भी बनाए और समर्थक भी। विरोधी मृत्यु के साथ ही उन्हें भुला चुके थे, जबकि समर्थकों की संख्या आज भी लगातार बढ़ती जा रही है। बड़े नेता और महत्त्वपूर्ण विचार की प्रासंगिकता समय के साथ-साथ निरंतर बढ़ती जाती है। ललई सिंह इस कसौटी पर एकदम खरे उतरते हैं।

ललई सिंह यादव का जन्म 1 सितंबर, 1911 को कानपुर देहात के गांव कठारा के किसान परिवार में हुआ था। पिता का नाम था गज्जू सिंह और मां थीं, मूला देवी। पिता गज्जू सिंह पक्के आर्यसमाजी थे। जाति-भेद उन्हें छू भी नहीं गया था। उनकी गिनती गांव के दबंग व्यक्तियों में होती थी। मां मूला देवी के पिता साधौ सिंह भी खुले विचारों के थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी। ललई सिंह के जुझारूपन के पीछे उनके माता-पिता के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव था।

ललई सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई थी। उन दिनों दलितों और पिछड़ों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी थी। हालांकि सवर्ण समाज का नजरिया अब भी नकारात्मक था। उन्हें यह डर नहीं था कि दलित और शूद्र पढ़-लिख गए तो उनके पेशों को कौन करेगा। असली डर यह था कि पढ़े-लिखे दलित-शूद्र उनके जातीय वर्चस्व को भी चुनौती देंगे। उन विशेषाधिकारों को चुनौती देंगे जिनके बल पर वे शताब्दियों से सत्ता-सुख भोगते आए हैं। इसलिए दलितों और पिछड़ों की शिक्षा से दूर रखने के लिए वह हरसंभव प्रयास करते थे। ऐसे चुनौतीपूर्ण परिवेश में ललई सिंह ने 1928 में आठवीं की परीक्षा पास की। उसी दौरान उन्होंने फारेस्ट गार्ड की भर्ती में हिस्सा लिया और चुन लिए गए। वह 1929 का समय था। 1931 में मात्र 20 वर्ष की अवस्था उनका विवाह सरदार सिंह की बेटी दुलारी देवी से हो गया। दुलारी देवी पढ़ी-लिखी महिला थीं। उन्होंने टाइप और शार्टहेंड का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। ललई सिंह को फारेस्ट गार्ड की नौकरी से संतोष न था। सो 1933 में वे सशस्त्र पुलिस कंपनी में कनिष्ठ लिपिक बनकर चले गए। वहां उनकी पहली नियुक्ति भिंड मुरैना में हुई।

कानपुर देहात जहां ललई सिंह का जन्म हुआ था, से लेकर भिंड मुरैना तक का क्षेत्र विद्रोही चेतना के लिए विख्यात रहा है। उसका असर ललई सिंह के व्यक्तित्व पर भी पड़ा। उन दिनों गांव-देहात में पुलिस का रौव था, लेकिन स्वयं पुलिस-कर्मियों को अनेक विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। उनका वेतन भी मामूली था। जिसे लेकर उनके मन में आक्रोश था। ललई सिंह के रूप में उन्हें ऐसा साथी मिल चुका था, जो जुझारू होने के साथ-साथ ईमानदार भी था। पुलिसकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए ललई सिंह ने एक संगठन बनाया। उसके माध्यम से वे सहकर्मियों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाने लगे। परिणामस्वरूप अधिकारी वर्ग उनसे नाराज रहने लगा। फिर ऐसा अवसर आया जिससे ललई सिंह और उनके साथियों की अधिकारियों से ठन गई।

जहां उनकी कंपनी का ठिकाना था, वहां एक बावड़ी थी। सभी पुलिसकर्मी नहाने-धोने और पीने के पानी के लिए सीढ़ीदार बावड़ी पर निर्भर थे। नहाने-धोने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता। सो बचा हुआ पानी वापस बावड़ी में चला जाता था। वही पानी पीने के काम भी आता था। प्रदूषित पानी शरीर में जाकर अनेक बीमारियां पैदा करता। उसपर कंपनी कमांडर कुटिल प्रवृत्ति का था। पुलिसकर्मियों की बीमारी उसे बहाना लगती। उपचार के लिए अस्पताल भेजने में वह आनाकानी करता था। अपने साथियों को लेकर ललई सिंह उस अमानवीय व्यवस्था के विरोध में डट गए। अधिकारी पहले ही उनसे नाराज थे। सो जायज विरोध को भी अनुशासनहीनता का नाम देकर उन्होंने ललई सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। ललई सिंह गांव-देहात से आए थे। बहुत अधिक पढ़े-लिखे भी न थे। लेकिन अधिकार चेतना उनमें खूब थी। सो यह दिखाते हुए कि आसानी से हार मान लेने वालों में से वे नहीं हैं, बर्खास्तगी के विरोध में उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने वस्तुस्थिति की समीक्षा की। ललई सिंह निर्दोष सिद्ध होकर, नौकरी में वापस आ गए।

ललई सिंह ससम्मान नौकरी पर वापस लौटे थे। मगर उनका मन सशस्त्र पुलिस बल की नौकरी से ऊब चुका था। वे समय निकालकर पढ़ाई करने लगे। इसका उन्हें फायदा भी हुआ। उन्हीं दिनों उन्होंने फौज की परीक्षा दी और उसमें भर्ती हो गए। फौज की नौकरी सशस्त्र पुलिस बल से अच्छी मानी जाती है। माना जाता है कि सरकार भी फौजियों पर पूरा ध्यान देती है। लेकिन अंदरूनी हालत इससे अलग थी। खासकर ललई सिंह जैसे जुझारू व्यक्ति के लिए। फौज में रहते हुए ललई सिंह ने सैनिक जीवन की विसंगतियों को समझा और उनके विरोध में आवाज उठाने लगे। 1946 में उन्होंने ‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ की स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष चुन लिए गए।

एक और नौकरी की चुनौतियां और संघर्ष थे, दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन की त्रासदियां। ललई सिंह का पारिवारिक जीवन बहुत कष्टमय था। उनकी पत्नी जो उन्हें कदम-कदम पर प्रोत्साहित करती थीं, वे 1939 में ही चल बसी थीं। परिजनों ने उनपर दूसरे विवाह के लिए दबाव डाला, जिसके लिए वे कतई तैयार न थे। सात वर्ष पश्चात 1946 में उनकी एकमात्र संतान, उनकी बेटी शकुंतला का मात्र 11 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। कोई दूसरा होता तो कभी का टूट जाता। परंतु समय मानो बड़े संघर्ष के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। निजी जीवन दुख-दर्द उन्हें समाज में व्याप्त दुख-दर्द से जोड़ रहे थे। उसी वर्ष उन्होंने ‘सिपाही की तबाही’ पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक की प्रेरणा उन्हें लाला हरदयाल की पुस्तक ‘सोल्जर आफ दि वार’ से मिली थी। ‘सिपाही की तबाही’ छपी न सकी। भला कौन प्रकाशक ऐसी पुस्तक छापने को तैयार होता! सो ललई सिंह ने टाइप कराकर उसकी प्रतियां अपने साथियों में बंटवा दीं। पुस्तक लोक-सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले सिपाहियों के जीवन की त्रासदी पर आधारित थी। परोक्षरूप में वह व्यवस्था के नंगे सच पर कटाक्ष करती थी। पुस्तक में सिपाही और उसकी पत्नी के बीच बातचीत के माध्यम से घर की तंगहाली को दर्शाया गया था। पुस्तक का समापन करते हुए उन्होंने लिखा था—

‘वास्तव में पादरियों, मुल्ला-मौलवियों-पुरोहितों की अनदेखी कल्पना, स्वर्ग तथा नर्क नाम की बात बिल्कुल झूठ है। यह है आंखों देखी हुई, सब पर बीती हुई सच्ची नरक की व्यवस्था सिपाही के घर की। इस नर्क की व्यवस्था का कारण है—सिंधिया गवर्नमेंट की बदइंतजामी। अतः इसे प्रत्येक दशा में पलटना है, समाप्त करना है। ‘जनता पर जनता का शासन हो’, तब अपनी सब मांगें मन्जूर होंगी।’

पुस्तक में आजादी और लोकतंत्र दोनों की मांग ध्वनित थी। पुस्तक के सामने आते ही पुलिस विभाग में खलबली मच गई। सैन्य अधिकरियों को पता चला तो पुस्तक की प्रतियां तत्काल जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। उस घटना के बाद ललई सिंह अपने साथियों के ‘हीरो’ बन गए। मार्च 1947 में जब आजादी कुछ ही महीने दूर थी, उन्होंने अपने साथियों को संगठित करके ‘‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ के बैनर तले हड़ताल करा दी। सरकार ने ‘सैनिक विद्रोह’ का मामला दर्ज कर, भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया। ललई सिंह को पांच वर्ष के सश्रम कारावास तथा 5 रुपये का अर्थदंड सुना दिया। वे जेल में चले गए। इस बीच देश आजाद हुआ। अन्य रजबाड़ों की तरह ग्वालियर स्टेट भी भारत गणराज्य का हिस्सा बन गया। 12 जनवरी को 1948 को लगभग 9 महीने की सजा काटने के बाद, ललई सिंह को कारावास से मुक्ति मिली। वे वापस सेना में चले गए। 1950 में सेना से सेवानिवृत्त होने के पश्चात उन्होंने अपने पैत्रिक गांव झींझक को स्थायी ठिकाना बना लिया। वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए वहीं उन्होंने ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था गठित की। साथ ही ‘सस्ता प्रेस’ के नाम से प्रिंटिंग पे्रस भी आरंभ किया।

कारावास में बिताए नौ महीने ललई सिंह के नए व्यक्तित्व के निर्माण के थे। जेल में रहते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया। धीरे-धीरे हिंदू धर्म की कमजोरियां और ब्राह्मणवाद के षड्यंत्र सामने आने लगे। जिन दिनों उनका जन्म हुआ था, भारतीय जनता आजादी की कीमत समझने लगी थी। होश संभाला तो आजादी के आंदोलन को दो हिस्सों में बंटे पाया। पहली श्रेणी में अंग्रेजों को जल्दी से जल्दी बाहर का रास्ता दिखा देने वाले नेता थे। उन्हें लगता था वे राज करने में समर्थ हैं। उनमें से अधिकांश नेता उन वर्गों से थे जिनके पूर्वज इस देश में शताब्दियों से राज करते आए थे। लेकिन आपसी फूट, विलासिता और व्यक्तिगत ऐंठ के कारण वे पहले मुगलों और बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके थे। देश की आजादी से ज्यादा उनकी चाहत सत्ता में हिस्सेदारी की थी। वह चाहे अंग्रेजों के रहते मिले या उनके चले जाने के बाद। 1930 तक उनकी मांग ‘स्वराज’ की थी। ‘राज’ अपना होना चाहिए, ‘राज्य’ इंग्लेंड की महारानी का भले ही रहे। स्वयं गांधी जी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का शीर्षक पहले ‘हिंद स्वराज्य’ रखा था। बाद में उसे संशोधित कर, अंग्रेजी संस्करण में ‘हिंद स्वराज’ कर दिया था। ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’—नारे के माध्यम से तिलक की मांग भी यही थी। 1930, विशेषकर भगत सिंह की शहादत के बाद जब उन्हें पता चला कि जनता ‘स्वराज’ नहीं, ‘स्वराज्य’ चाहती है, तब उन्होंने अपनी मांग में संशोधन किया था। आगे चलकर जब उन्हें लगा कि औपनिवेशिक सत्ता के बस गिने-चुने दिन बाकी हैं, तो उन्होंने खुद को सत्ता दावेदार बताकर, संघर्ष को आजादी की लड़ाई का नाम दे दिया। अब वे चाहते थे कि अंग्रेज उनके हाथों में सत्ता सौंपकर जल्दी से जल्दी इस देश से चले जाएं।

दूसरी श्रेणी में वे नेता थे, जो सामाजिक आजादी को राजनीतिक आजादी से अधिक महत्त्व देते थे। मानते थे कि बिना सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है। कि राजनीतिक स्वतंत्रता से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उनकी दासता और उसके कारण हजारों साल पुराने हैं। नई शिक्षा ने उनके भीतर स्वाभिमान की भावना जाग्रत की थी। उनकी लड़ाई अंग्रेजों से कम, अपने देश के नेताओं से अधिक थी। वे सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर साथ-साथ जूझ रहे थे। महामना फुले, संतराम बी.ए., अय्यंकालि, डाॅ. आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता इसी श्रेणी में आते हैं। स्वयं ललई सिंह इस श्रेणी से थे और जिस परिवेश से जूझते हुए वे निकले थे, उसमें अपना मोर्चा चुन लेना कोई मुश्किल बात न थी। भविष्य के संघर्ष की रूपरेखा क्या हो, इस बारे में वे सोच ही रहे थे कि 1953 में उनके पिता का भी निधन हो गया। ललई सिंह के लिए यह बड़ा आघात था। पिता उनके लिए प्रेरणाशक्ति थे। अपने अधिकारों के संघर्ष के संस्कार पिता की ही देन थे। एक-एक कर उनके सभी परिजन जा चुके थे। परिवार के नाम पर अब वे स्वयं थे, दूसरी ओर था पूरा देश। खासकर धार्मिक और जातीय बंधनों से आहत समाज। उनके अलावा चारों ओर पसरी चुनौतियां थीं। एक बड़ा कार्यक्षेत्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

विद्रोही चेतना का विस्तार

धर्मग्रंथों के निरंतर अध्ययन द्वारा उन्हें पता चला कि हिंदू धर्म असल में राजनीतिक षड्ंयत्र है। ब्राह्मण-पुरोहित उसके नीतिकार हैं। क्षत्रिय अपनी ताकत से लोगों को डराने-दबाने का काम करते हैं; और निहित स्वार्थ के लिए वैश्य इस व्यवस्था का आर्थिक पोषण करते हैं। भाग्य-कर्मफल, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य, छूत-अछूत में उलझे बहुजन इसे समझ ही नहीं पाते हैं। धर्मग्रंथों में ब्राह्मणों के अनर्गल बखान से ललई सिंह को इस षड्यंत्र की तह तक जाने में मदद मिली थी। वे समझ चुके थे कि हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथ सवर्णों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के औजार हैं। जेल में रहते हुए उन्होंने डाॅ. आंबेडकर के भाषणों को सुना था, जिन्होंने हिंदू धर्म को धर्म मानने से ही इन्कार कर दिया था। आंबेडकर स्वयं हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथों को राजनीति मानते थे। कांग्रेसी नेताओं के व्यवहार से यह सिद्ध भी हो रहा था। 1930 के आसपास दलितों और पिछड़ी जातियांें में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था। ‘त्रिवेणी संघ’ जैसे संगठन उसी का सुफल थे। उसकी काट के लिए कांग्रेस ने पार्टी में पिछड़ों के लिए अलग प्रकोष्ठ बना दिया था। उसका मुख्य उद्देश्य था, किसी न किसी बहाने पिछड़ों को उलझाए रखकर उनके वोट बैंक को कब्जाए रखना।

दूसरा कारण पिछड़ी जातियों में शिक्षा का बढ़ता स्तर तथा उसके फलस्वरूप उभरती बौद्धिक चेतना थी। उससे पहले पंडित अपने प्रत्येक स्वार्थ को ‘शास्त्रोक्त’ बताकर थोप दिया करते थे। बदले समय में बहुजन उन ग्रंथों को सीधे पढ़कर निष्कर्ष निकाल सकते थे। इसलिए महाकाव्य और पौराणिक कृतियां जिनका प्रयोग ब्राह्मणादि अल्पजन बहुजनों को फुसलाने के लिए करते थे, जिनमें बहुजनों के प्रति अन्याय और अपमान के किस्से भरे पड़े थे—वे अनायास ही आलोचना के केंद्र में आ गईं। हमें याद रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों में निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुके यादवों को क्षत्रिय मानने पर ब्राह्मणादि अल्पजन आज भले ही मौन हों, मगर उससे पहले वे उनकी निगाह ‘क्षुद्र’ यानी शूद्र ही थे। महाभारत जिसमें कृष्ण को अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसमें भी ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब कृष्ण का उसकी जाति के आधार पर मखौल उड़ाया जाता है। डी. आर. भंडारकर यादवों को भारतीय वर्ण-व्यवस्था से बाहर का गण-समूह यानी पंचम वर्ण का मानते हैं।

महाभारत और ऋग्वेद यदुओं को सरस्वती तट का रहने वाला बताते हैं। लेकिन रामायण जो हिंदुओं का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, में यदुओं का महासागर से पानी पीना भी अपराध मान लिया गया है। याद कीजिए लंका पर चढ़ाई करते समय राम समुद्र से रास्ता मांगता है। समुद्र के प्रसन्न न होने पर वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा लेता है। घबराया हुआ समुद्र उपस्थित होकर रास्ता देने को तैयार हो जाता है। वह राम से वाण को तूणीर में वापस रखने की प्रार्थना करता है। अब राम तो राम है, एक बार प्रत्यंचा चढ़ा वाण नीचे कैसे उतारे। सो समुद्री जीव-जंतुओं को बचाने के लिए वह समुद्र से ही रास्ता पूछता है। समुद्र जो उत्तर देता है, उससे लगता है कि यह पूरा प्रसंग बस इसी के निमित्त गढ़ा गया है—

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित पुण्यतरो मम,

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान

उग्रदर्शन कर्मणो बहवस्तत्र दस्यवः

आभीर प्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम

तैन तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः

अमोधः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः(रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग)

”प्रभो! जैसे आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर ‘द्रुमकुल्य’ नाम से विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है। वहाँ आभीर (अहीर, यादव) आदि जातियों के अनेकानेक मनुष्य निवास करते हैं। उनके रूप और रंग बड़े ही भयानक हैं। वे सब के सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं। उन पापचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मै नहीं सह सकता। हे, राम! आप अपने इस उत्तम बाण को वहीं सफल कीजिए।’

गोया रामायणकार को ‘राक्षस’ रावण से पहले यदुओं को ठिकाने लगा देने की जल्दी थी। राम का जैसा चरित्र गढ़ा है, उसके हिसाब से वह ऐसी सलाह को टाल ही नहीं सकता था। ‘महात्मा’ समुद्र की सलाह मानकर वह उसी दिशा में शर-संधान कर यदुओं सहित बाकी गणों का सफाया कर देता है। यदुओं के प्रति तत्कालीन समाज की नफरत को तुलसीदास ज्यों का त्यों आगे बढ़ा देते हैं। उनके अनुसार—‘आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपचादि अति अधरूपजे’। अहीर, यवन(मुस्लिम), किरात, खस, स्वपच आदि जातियां अत्यंत अधम हैं। यदुओं के विनाश की कहानी को महाभारत में भी बढ़ाया गया है। परंतु थोड़े भिन्न तरीके से। ‘सभा-पर्व’ में यदुओं को सरस्वती नदी के तट बसने वाला बताया गया है।1 कृष्ण को भगवान का दर्जा प्राप्त है। मगर क्षत्रीय जैसे राम की वंश-परंपरा से जोड़ने को आजाद हैं, उस तरह की दावेदारी स्वयं को कृष्ण का वंशज बताकर यादव न करे—इसके लिए गांधारी के शाप को बहाना बनाया जाता है। उसके अनुसार सारे यदुवंशी अंतर्कलह से आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं। आशय है कि यादवों की बढ़ी राजनीतिक शक्ति से भय खाकर ब्राह्मणों ने ‘कृष्ण’ को अवतार का दर्जा तो दिया, लेकिन उनके वंशजों को एक-दूसरे से लड़वाकर मरवा दिया। पहले ये प्रसंग या तो धर्म ग्रंथों में दबे-छिपे रह जाते थे, या ब्राह्मणों की व्याख्या में कुछ का कुछ बना दिए जाते थे, नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में उनके वास्तविक पाठ सबके सामने थे। उन्हें पढ़कर यदु-वंशजों में आक्रोश उभरना तय था।

‘त्रिवेणी संघ’ की सिद्धांत पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ का प्रकाशन 1940 में हो चुका था, उसके लेखक थे—यदुनंदन प्रसाद मेहता संघ में यादव जाति का प्रतिनिधित्व करते थे।। धर्म के नाम पर हो रहे आडंबरों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने उसमें लिखा था—

‘‘धार्मिक मंदिरों और मठों के बाहर साइन-बोर्ड टँगा हुआ है कि ‘जाति पाँति पूछै नहीं कोई, हरि के भजे से हरि का होई।’ लेकिन भीतर जाकर देखिए कि कैसी-कैसी करामातें हो रही हैं। पुजारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे वह नया हो, साधु या कम ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो।भंडारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे उसे पाचन-कर्म का ज्ञान भले ही न हो। अमुक साधु अमुक जाति का है, इसलिए उसे अमुक काम दिया जाए। ब्राह्मण साधु दूसरी जाति के साधु का बनाया हुआ नहीं खा सकता। क्या यहां धर्म की ओट में धर्म का शिकार नहीं किया जाता? तो, त्रिवेणी संघ ऐसी धार्मिक धांधलियों, लूटों, अन्यायों, अत्याचारों, अंधेरों और स्वार्थों का अंत सदा के लिए कर देना चाहता है और उनके स्थान पर, धर्म का सच्चा रूप बताकर जनता को उजाले में ले जाना चाहता है।’’

यही चीजें ललई सिंह का मानस निर्माण कर रही थीं। देश को आजादी मिल चुकी थी, मगर जिस स्वाधीनता की कामना आजादी के साथ की गई थी, वे सपना ही थीं। विशेषरूप से सामाजिक आजादी का सपना। ललई सिंह समझ चुके थे कि यहां से आगे का रास्ता संघर्ष का है, जो उन्हें स्वयं तय करना है। वे ‘रिपब्लिक पार्टी आफ इंडिया’ के सदस्य बन गए। उनकी आवाज कड़क थी। एक सैनिक का जोश उसमें भरा होता था। बिहार में बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा त्रिवेणी संघ के आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुटे थे तो उत्तर प्रदेश में रामस्वरूप शर्मा ने ‘समाज दल’ की स्थापना कर, यथास्थितिवादी राजनीतिक दलों के विरुद्ध एक और मोर्चा खोल दिया था। उधर रिपब्लिकन पार्टी डाॅ. आंबेडकर के बाद बिखरने लगी थी। ललई सिंह उसे छोड़ रामस्वरूप वर्मा के साथ जुड़ गए। बाद में जगदेव प्रसाद कुशवाहा के ‘शोषित दल’ और रामस्वरूप वर्मा के ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ तो उनके लिए लड़ाई और भी आसान हो गई। वे इन दलों के सम्मिलन से बने ‘शोषित समाज दल’; तथा वैकल्पिक राजनीति के प्रचार में जी-जान से जुट गए। उन दिनांे ई। वी। रामासामी पेरियार अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश की यात्राएं कर रहे थे। इसी सिलसिले में जब वे उत्तर प्रदेश आए तो संभवतः 1967 में, ललई सिंह का उनसे संपर्क हुआ। पहली मुलाकात में ही ललई सिंह उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो गए। रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 को ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की। ललई सिंह उसके साथ भी प्राण-प्रण से जुड़ गए।   

पेरियार से पहली मुलाकात के समय ही ललई सिंह ने उनकी पुस्तक ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ को हिंदी में प्रकाशित करने का मन बना लिया था। इसके लिए उन्होंने पेरियार से चर्चा की। पेरियार उन उस पुस्तक के हिंदी अनुवाद की अनुमति चंद्रप्रकाश जिज्ञासु को दे चुके थे। कुछ ही महीने बाद जुलाई 1968 में ललई सिंह को ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी संस्करण प्रकाशित करने की लेखकीय सहमति प्राप्त हो गई।

सहमति मिलना अलग बात थी। पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आना दूसरी बात। कोई भी प्रकाशक हिंदी अनुवाद छापने को तैयार न था। ललई सिंह हार मानने वालों में से न थे। उन्होंने पुस्तक को अपनी ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था से प्रकाशित करने का फैसला कर लिया। आगे चलकर यही संस्था ‘सच्ची रामायण’ सहित उनकी दूसरी पुस्तकों की प्रथम प्रकाशक बनी। ‘सच्ची रामायण’ का हिंदी अनुवाद राम अधार ने किया था। पुस्तक का पहला संस्करण जुलाई 1969 में आया। उसके आने के साथ ही हिंदी जगत में तहलका मच गया। पुस्तक को हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत करने वाली बताकर, उसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी बिना देर किए, 8 दिसंबर 1969 को पुस्तक पर प्रतिबंध की घोषणा कर, प्रकाशित प्रतियों को अपने कब्जे में लेने का आदेश सुना दिया। सरकार का मानना था कि पुस्तक समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं का अपमान करती है। इससे समाज में शांति-भंग खतरा है। यह भी कहा गया कि पुस्तक जानबूझकर समाज में अशांति फैलाने के ध्येय से लिखी गई है। प्रतिबंध केवल हिंदी संस्करण को लेकर था। अंग्रेजी संस्करण ‘रामायण : दि ट्रू रीडिंग’ के तमिल और अंग्रेजी संस्करण उन दिनों भी धड़ल्ले से बिक रहे थे।    

ललई सिंह सरकार के निर्णय से आहत थे। उन्हें लगा कि भारतीय समाज आज भी लोकतांत्रिक भावना से दूर है। उन्होंने प्रदेश सरकार के विरुद्ध अदालत में अपील कर दी। लेकिन मन हिंदू धर्म से खट्टा हो चुका था। वैसे भी ईश्वर, धर्म, आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क आदि में विश्वास वे पेरियार के संपर्क में आने से पहले ही खो चुके थे। अब उनका इरादा हिंदू धर्म को हमेशा के लिए छोड़ देने का था। इसके लिए उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना आरंभ कर दिया। यहां डाॅ. आंबेडकर उनके प्रेरणा-पुरुष बने। बौद्ध धर्म उन्हें अपनी कसौटी पर खरा लगा। जैसे-जैसे उनका अध्ययन बढ़ रहा था, वैसे-वैसे ब्राह्मण धर्म के षड्यंत्र भी खुलकर सामने आ रहे थे। उन्हें यह लगा कि जातियां हिंदू समाज को बांटने का काम करती हैं। अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए ही ब्राह्मणों ने हजारों जातियों की रचना की है। यहां तक कि शोषितों के भी दो वर्ग बना दिए हैं। पहली श्रेणी में वे हैं जिन्हें स्पर्श करने से कोई अपवाद नहीं होता। दूसरी श्रेणी में वे हैं जिनकी छाया भी सवर्णों को अपवित्र कर देती है। ये चीजें जहां ललई सिंह को आहत करती थीं, वहीं संघर्ष में लगातार बने रहने की प्रेरणा भी देती थीं।

पुस्तक जब्ती के सरकारी आदेश के विरुद्ध उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यों की बैंच बनाई गई। ‘सच्ची रामायण’ का मामला अभी न्यायालय में विचारधीन ही था कि सरकार ने 1970 में ललई सिंह की पुस्तकों ‘सच्ची रामायण की चाबी’ और ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ की जब्ती के आदेश जारी कर दिए। ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार ने अपने तर्क तो प्रस्तुत किए थे, परंतु उनके संदर्भ वे नहीं दे पाए थे। ‘सच्ची रामायण की चाबी’ में ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ के तर्कों को पुख्ता बनाने वाले संदर्भ दिए थे। दूसरी पुस्तक डाॅ. आंबेडकर के भाषणों पर आधारित थी। इस जब्ती के मात्र छह महीनों के पश्चात 12 सितंबर 1970 को सरकार ने डाॅ. आंबेडकर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘जातिभेद का उच्छेद’ को भी प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया। यह सरकार का तानाशाही-भरा आचरण था जो हर विरोधी विचारधारा को दबा देना चाहता था। रामस्वरूप वर्मा के प्रोत्साहन पर ललई सिंह ने डाॅ. आंबेडकर की पुस्तकों की जब्ती के आदेश के विरुद्ध अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। परिणाम अनुकूल ही निकला। न्यायमूर्ति ए. कीर्ति ने 19 जनवरी 1971 को ‘सच्ची रामायण’ पर जब्ती के आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते हुए रद्द कर दिया। फैसले में उन्होंने सरकार को निर्देश दिया था कि वह जब्त की गई पुस्तक को लौटाकर प्रकाशक को 300 रुपए का हर्जाना दे। सरकार भी ललई सिंह के पीछे पड़ी थी। उसने ललई सिंह की पुस्तक ‘आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरुद्ध मुकदमा दायर कर दिया। यह मुकदमा उनकी मृत्युपर्यंत अदालत में बना रहा।

ललई सिंह इन दबावों के आगे झुकने वाले न थे। बल्कि इन दबावों से उन्हें और अधिक लिखने की प्रेरणा मिलती थी। इस बीच उन्होंने पांच नाटकों की रचना की थी, उनमें अंगुलीमाल, शंबूक वध, संत माया बलिदान, एकलव्य शामिल थे। संत माया बलिदान का प्रथम लेखन स्वामी अछूतानंद ने किया था। लेकिन वह नाटक अनुपलब्ध था। ललई सिंह ने उसका पुनर्लेखन किया था। वे रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद सिंह कुशवाहा के साथ वंचना एवं षोषण के षिकार हर व्यक्ति के साथ थे। नाटकों के अलावा उन्होंने ‘शोषितों पर धार्मिक डकैती’, ‘शोषितों पर राजनीतिक डकैती’, तथा ‘सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?’ जैसी पुस्तकों की रचना भी की। उनकी सभी पुस्तकें ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध शंखनाद करने वाली थीं। साधारण प्रकाशक उनकी पुस्तकें छापने को तैयार न थे। इसलिए उन्होंने एक के बाद एक तीन प्रेस खरीदे। पुस्तकें छापने और उन्हें बांटने में उनकी काफी जमा रकम निकल गई। यह सोचकर कि मोटी पुस्तकों को खरीदना आम आदमी के लिए आसान नहीं है, उन्होंने छोटी प्रचारनुमा पुस्तकें लिखने को प्राथमिकता दी। वैसे भी उनका उद्देष्य अपने विचारों को अधिकतम लोगों तक पहुंचाना था। यदि ब्राह्मण बीस से चौबीस पृष्ठों की पोथी को पढ़कर ‘पंडित’ कहला सकता है और लोगों को मूर्ख बना सकता है, तो उतने ही आकार की पुस्तकों से लोगों में चेतना का संचार भी संभव है। इसलिए अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने छोटी पुस्तकों को प्राथमिकता दी।

‘सच्ची रामायण’ पर लगे प्रतिबंधों के विरुद्ध वे उच्च न्यायालय में मुकदमा जीत चुके थे। लेकिन उनके विरोधी षांत नहीं थे। उनके दबाव में सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। वहां मामला वरिष्ठ जजों की पीठ के सम्मुख पहुंचा। कोर्ट ने गंभीरतापूर्वक मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केंद्र में रखकर निर्णय सुनाया, जो ललई सिंह के पक्ष में था। यही नहीं, ‘जातिवाद का उच्छेद’ तथा ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ को भी न्यायालय ने प्रतिबंध से मुक्त कर दिया। अदालत के सामने पहुंचे इन मामलों में जीत ललई सिंह की हुई थी। लेकिन जिस तरह प्रतिक्रियावादी षक्तियां उनके पीछे पड़ी थीं, उससे हिंदू धर्म की ओर से उनका मोह-भंग होना स्वाभाविक था। डाॅ. आंबेडकर 1935 में ही हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर चुके थे। धर्मांतरण का कार्यक्रम बना 14 अक्टूबर, 1956 को। ललई सिंह अपने प्रेरणा पुरुष के साथ ही धर्मांतरण करना चाहते थे। लेकिन अचानक खून की उल्टी होने के कारण उन्हें अपना फैसला रोकना पड़ा। उन्होंने घोषणा की कि जिन महास्थिविर से डाॅ. आंबेडकर से दीक्षा ली थी, उन्हीं से वे भी दीक्षा ग्रहण करेंगे। इससे मामला थोड़े दिन टला। आखिरकार 21 जुलाई 1967 को उन्होंने महास्थविर चंद्रमणि के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली।

उस समय वे बहुत आह्लादित थे। धर्मांतरण के बाद दिए गए अपने संक्षिप्त भाषण में उन्होंने न केवल स्वयं को बौद्ध माना था, अपितु अपने नाम के साथ जुड़ा जातिसूचक षब्द छोड़ने का ऐलान भी किया था। उनका कहना था, ‘आज से मैं मनुष्य हूं, मानवतावादी हूं, आज से मैं सिर्फ ललई हूं।’ किसी भी प्रकार के जातीय आग्रहों, मान्यताओं से संपूर्ण मुक्ति का ऐलान करते हुए उन्होंने भविष्य में कभी जातिसूचक शब्द या सामंती शब्दावली का प्रयोग न करने का ऐलान किया था। जुझारूपन उन्हें पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। रामस्वरूप वर्मा ने अपने संस्मरण में एक घटना का उल्लेख किया है—

‘वह हमारे चुनाव प्रचार में भूखे-प्यासे एक स्थान से दूसरे स्थान भागते। बोलने में कोई कसर नहीं रखते थे। उनके जैसा निर्भीक भी मैंने दूसरा नहीं देखा। एक बार चुनाव प्रचार से लौटे पैरियर ललई सिंह जी को मेरे साथी ट्रैक्टर ट्राली से लिए जा रहे थे। जैसे ही खटकर गाँव के समीप से ट्रैक्टर निकला, उन पर गोली चला दी गई। संकट का आभास पाते ही वह कुछ झुक गए, गोली कान के पास से निकल गई। लोगों ने गाँव में चलकर रुकने का दबाव डाला। किन्तु वह नहीं माने। निर्भीकता से उन्होंने कहा, ‘चलो जी, यह तो कट्टेबाजी है, मैंने तो तोपों की गड़गड़ाहट में रोटियां सेकीं हैं।’

24 दिसंबर 1973 को पेरियार का निधन हुआ। उनकी स्मृति में बड़ी सभा का आयोजन 30 दिसंबर 1974 को किया गया। उसमें विश्व-भर के बुद्धिजीवी, चिंतक और राजनेता पधारे हुए थे। ललई सिंह भी उसमें पहुंचे। उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया तो ब्राह्मणवाद सहित हिंदू मिथों पर वैसा ही हमला किया जैसा पेरियार किया करते थे। अंतर केवल इतना था कि पेरियार नास्तिक थे और मनुष्य के लिए किसी भी धर्म को अनावश्यक मानते थे। जबकि डाॅ. आंबेडकर के प्रभाव में आकर ललई सिंह बौद्ध धर्म में शामिल हो चुके थे। अपने भाषण में ललई सिंह ने बौद्ध धर्म का ही पक्ष लिया। बौद्ध धर्म को श्रेष्ठतम बताते हुए उन्होंने कहा कि वह तर्क और मनुष्यता का समर्थन करता है। किसी भी प्रकार के आडंबरवाद के लिए बौद्ध धर्म में कोई गुंजाइश नहीं है। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म की तुलना करते हुए उन्होंने पहले को ‘उधार का धर्म’ और दूसरे को ‘नकद का धर्म’ बताया। अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बौद्ध धर्म मनुष्य को जन्म-मरण के चक्कर में नहीं उलझाता। उसमें मनुष्य जो भलाई करता है, उसका परिणाम इसी जन्म में स्वयं उसके आगे आता है, यानी—‘जा हाथ देब और वा हाथ लेव।’ जबकि हिंदू धर्म भलाई इस जन्म में करो, उसका फल अगले जन्म में प्राप्त होगा—कहकर लोगों को भरमाता रहता है।

वे स्पष्ट और निर्भीक वक्ता थे। घुमा-फिराकर बात करना उन्हें आता ही नहीं था। एक बार वे आगरा में एक सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। मंच पर बौद्ध आचार्यों सहित अनेक विद्वान और कार्यकर्ता मौजूद थे। ललई सिंह के बोलने का नंबर आया तो उन्होंने मंचासीन लोगों पर कटाक्ष करते हुए कहा—‘मेरे पास जो लोग मंच पर बैठे हैं एवं जो लोग सामने बैठे हैं वह सब सहायताइष्ट, वजीफाइष्ट और रिजर्वेशनाइष्ट हैं, आप में से कोई भी बौद्धिष्ट व अम्बेडकराइष्ट नहीं है।’ इसपर कुछ मंचासीन हस्तियों ने आपत्ति की तो उन्होंने उत्तर दिया—‘जब तक आप बौद्धों में रोटी-बेटी का संबंध नहीं बनाएंगे, हिंदू रीति-रिवाजों और त्योहारों को मनाना नहीं छोड़ेंगे—तब तक तक आपका बौद्ध होना सिर्फ ढोंग ही रहेगा।’ उस बैठक के बाद ही उन्हें पेरियार की उपाधि मिली, जो स्वयं ललई सिंह के लिए गर्व की बात थी।

ललई सिंह सच्चे मानवतावादी थे। आस्था से अधिक महत्त्व वे तर्क को देते थे। सच्ची रामायण के प्रकाशन के पीछे उनका उद्देश्य हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को खारिज करना न होकर, मिथों की दुनिया से बाहर निकलकर जीवन-जगत के बारे तर्क संगत ढंग से सोचने और उसके बाद फैसला करने के लिए प्रेरित करना था। वे जाति-भेद और छूआछूत के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत रहे। उनका एक ही ध्येय था, समाज को धार्मिक आंडबरों और जातिवाद जैसी रूढ़ियों से मुक्ति दिलाना। जीवन के अंतिम दिनों में वे आंखों की असाध्य बीमारी का शिकार था। अंततः सामाजिक क्रांति का वह अनन्य सेनानी, अनथक योद्धा 7 फरवरी 1993 को संघर्ष की लंबी विरासत छोड़कर हमारे बीच से उठ गया। गांव में लोग उन्हें ‘दीवानजी’ कहा करते थे। उनके संघर्ष के साक्षी रहे लोग आज भी उन्हें उसी मान-सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं।  

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ:

1. गणानुत्सवसङ्केतान्वयजयत्पुरुषर्षभः

सिंधूकूलाश्रिता ये च ग्रामणेया महाबलाः

शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्

वर्तयंति चे ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिन, सभापर्व, अध्याय 29, 8-9, महाभारत, भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, संपादन: विष्णु एस। सकथांकर

अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक

सामान्य

सुनो, सुनो, सुनो—गीत मेरा सुनो

विपन्न, निढाल गरीबी में घिसटते हुए लोगो सुनो 

‘यहां से जाएं, तो कहां जाएं?’

वे रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं

हमारा न कोई घर है, न देश

न ही सिर छिपाने को जंगल

दिन के उजाले में जंगलों की सफाई करना

रात्रि को वहीं निढाल पड़ जाना

बीज बोने के बाद

पेड़ जब देने लगते हैं फल

मालिक आकर कब्जा लेता है उन्हें

हमारे पास अब केवल रोना ही बचा है

हमारे हिस्से है श्रम, केवल श्रम

ढेर सारा, बल्कि सारे का सारा श्रम

हम सड़कों पर चल नहीं सकते

बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है हमें

लेकिन हम बढ़ेंगे….बढ़ेंगे

बढ़ते रहेंगे, बढ़ते ही रहेंगे।

ऊपर दिया गया गीत करीब 100 वर्ष पुराना है। अय्यंकाली द्वारा स्थापित ‘साधुजन परिपालन संघम’ की बैठकों में गाया जाने वाला गीत। केरल के दलितों और आदिद्रविड़ों में आधुनिक भावबोध जगाने में इस गीत का बड़ा योगदान है। चक्कोला कुरुंबम दीविथन इसे गाया करते थे। ऐसे मार्मिक स्वर में कि श्रोतागणों की आंखें डबडबा जाती थीं। इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले अय्यंकाली के जीवन से दो शब्द चित्र—

बैलगाड़ी से क्रांति

वर्ष 1891(कुछ विद्वान इसे 1893 मानते हैं)। करीब 30 वर्ष का एक हृष्ट-पुष्ट और सुदर्शन युवक। एकदम नई बैलगाड़ी, जोतने के लिए एक जोड़ी युवा-छरहरे, सफेद बैल। एक जोड़ी पीतल की बड़ी-बड़ी घंटियां—सब उसने आज ही के लिए खरीदे हैं। इनके अलावा अपने लिए चमकीला अंगवस्त्र, शानदार पगड़ी और रौवदार जूतियां। मानो अपने अनूठे बाने से काल के कपाल पर सुनहरी इबारत टांकने को आतुर हो। बैलों को गाड़ी में जोतने से पहले वह उन्हें प्यार से सहलाता है। फिर उनके गले में घंटियां बांधकर बैलगाड़ी में जोत देता है। उसके बाद पूरी शान से बैलगाड़ी में सवार होता है। सधे बैल इशारा पाते ही आगे बढ़ने लगते हैं। ‘टनश्टन’ बजती घंटियां पचासियों मीटर दूर से उसके आने का पता दे देती हैं। लोग घंटियों की आवाज सुनकर बाहर निकल आते हैं। स्त्रियां और बच्चे खिड़कियों-दरवज्जों से झांकने लगते हैं। 

युवक जिस जाति से आता है, उसे न तो बैलगाड़ी पर सवार होने का अधिकार है। न अंगवस्त्र धारण करने का। न ही उन मार्गों पर चलने का जिनपर उसके बैल हाथियों जैसी मस्त चाल से आगे बढ़े जा रहे हैं। उसकी शान देखकर उसके अपने लोगों का सीना शान से चौड़ा हो जाता है। कुछ को ईर्ष्या होती है। कुछ की आंखों की अंगार फूटने लगते हैं। वे घरों से लाठियां, डंडे वगैरह निकालकर बैलगाड़ी के रास्ता रोक लेते हैं। जो हो रहा है, इसकी उसे उम्मीद थी। इसलिए वह तैयार होकर आया है। रोज-रोज अपमान सहते रहने से अच्छा है, उसका प्रतिकार किया जाए। फैसला इस पार हो या उस पार। विरोधियों को तना देख वह अपनी खुखरी निकाल लेता है। उसका रौद्र रूप देख रास्ता रोकने वाले भयभीत हो जाते हैं। जीत का जश्न मनाती हुई बैलगाड़ी आगे बढ़ जाती है। 

दुनिया में अनेक महापुरुष हुए। सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, परंतु बैलगाड़ी पर चढ़कर क्रांति का शंखनाद करने वाले वे अकेले ही थे। 

बाजार जाने की आजादी

भारत में जाति से बड़ा कलंक दूसरा नहीं। यह जन्म के आधार पर आदमी-आदमी में फर्क करना सिखाती है। ‘द्विज’ कहकर मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में अकूत अधिकार थमा देती है। दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से को शूद्र और अछूत बताकर उनसे उनका मान-सम्मान, सुख-सुविधा और मामूली खुशियां तक छीन लेती है। केरल सहित पूरे दक्षिण भारत में वह और भी विकृत अवस्था में थी। इसलिए 1892 में केरल यात्रा के दौरान, विवेकानंद ने उसे ‘जातियों का पागलखाना’1 तक कह दिया था। बीसवीं शताब्दी में वहां के सवर्ण पुलाया, पारया, कुरुवा जैसी जातियों की छाया से भी बचते थे। दलितों का उत्पीड़न आम बात थी। उन्हें न सार्वजानिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता थी, न बाजार जाने की। न ही अच्छे वस्त्र पहनने की। गुलामों जैसा जीवन था उनका। बैलगाड़ी पर चढ़कर सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी छीन लेने वाला हमारा महानायक, 1898 में उनके मान-सम्मान की खातिर एक बार फिर नए जोश के साथ उठ खड़ा हुआ। इस बार संघर्ष बाजार जाने की आजादी को लेकर था।   

उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया। इरादा आरालुम्मुद बाजार में प्रवेश करने का था। अपने साथियों को लेकर उसने पठानकाडा से आगे बढ़ना शुरू किया। सभी जोश में थे। इस डर से कि विरोधी कभी भी, किसी भी दिशा से हमला कर सकते हैं, वे सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। जैसे ही उनका कारवां चेट्टियार स्ट्रीट, बलरामपुर पहुंचा—हथियारों से लैस ऊंची जातियों के लड़ाके उनके रास्ते में अड़ गए।2 दोनों ओर से घात-प्रतिघात होने लगा। संघर्ष बढ़ा तो बढ़ता ही गया। दलितों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। देखते ही देखते मनाक्कुडु, नेय्याट्टिंकर, नेमोन, अमरविला, परसाला, कोझाकुट्टम, कनियापुरम आदि इलाकों में विद्रोह की चिंगारियां फूटने लगीं। जो अछूत सवर्णों को देख कई हाथ पहले ठिठक जाया करते थे—वे अब नई चेतना और आत्मविश्वास से भरे थे। अपने नेता के इशारे पर कुछ भी करने को सनद्ध। पूरे त्रावणकोर में गृहयुद्ध की स्थिति बन चुकी थी। विद्वान 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं। लेकिन स्वाधीनता की असली लड़ाई तो वे दलित और आदिद्रविड़ लड़ रहे थे। एक सप्ताह बाद हालात सामान्य हुए। तब तक इतिहास उस घटना को ‘चलियार विद्रोह’ के नाम से अपने भीतर टांक चुका था। 

केरल को आधुनिक राज्य बनाने में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। वहां अय्यंकाली का उतना ही योगदान है, जितना ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर का महाराष्ट्र में, पेरियार का तमिलनाडु में है। अय्यंकाली का जन्म 28 अगस्त 1863 को त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में हुआ था। आठ भाई-बहनों में वे सबसे बड़े थे। जाति थी पुलाया। उस जाति के लोग आमतौर पर गुलामों की तरह काम करते थे। अय्यंकाली के पिता अय्यन भी एक जमींदार के गुलाम थे। उनकी मेहनत और वफादारी से प्रसन्न होकर जमींदार ने उन्हें पांच एकड़ जमीन उपहार में दे दी थी। इसलिए अपनी जाति के लोगों में अय्यंकाली के परिवार की हैसियत काफी अच्छी थी। पिता अय्यन पुलाया बस्ती के मुखिया थे।

उस समय समाज पूरी तरह जाति में जकड़ा हुआ था। उस परिवेश से गुजरने वाले बच्चों को समाज में जो उत्पीड़न, उलाहने और तिरष्कार सहना पड़ता है, वैसा अय्यंकाली के साथ भी हुआ था। बचपन से ही वे सुंदर थे। शरीर गठीला और स्वस्थ था। उनका व्यक्तित्व अलग ही छाप छोड़ता था। फुटबाल खेलने का शौक था। एक बार फुटबाल नैय्यर के घर में जा गिरी। वे बॉल लेने पहुंचे तो नैय्यर ने उनका अपमान कर दिया। हिदायत दी कि भविष्य में बॉल उसके घर न आने पाए। उस अपमान ने अय्यंकाली को आहत कर दिया। फुटबाल खेलते समय कुछ सवर्ण लड़के भी उनके साथ शामिल हो जाते थे। अय्यंकाली की जाति के बारे में पता चलते ही उन्होंने आना छोड़ दिया। अय्यंकाली को यह बहुत अखरा। उन्होंने भविष्य में उन बच्चों के साथ कभी न खेलने का फैसला किया। 

अय्यंकाली बचपन से ही रचनात्मक प्रवृत्ति के थे। गाने-बजाने का शौक था। अपनी जाति के बच्चों को इकट्ठा कर उन्होंने एक नाटक मंडली की शुरुआत की। आरंभ में वे परंपरागत नाटक खेलते थे। धीरे-धीरे अपने रचे नाटक भी खेलने लगे। उनके नाटकों में एक संदेश होता था। फलस्वरूप लोग तेजी से उनकी ओर आकर्षित होने लगे। बचपन से ही वे निडर और साहसी थे। इस कारण किसी न किसी मुद्दे को लेकर सवर्णों ने उनका अकसर टकराव होता रहता था। उससे निपटने के लिए विद्रोही अय्यंकाली ने अपने साथियों को संगठित करना आरंभ किया। उन्हें कुश्ती और लाठीबाजी का प्रशिक्षण दिलवाया। इसके लिए कलारी असान नामक प्रशिक्षक को बाहर से बुलवाया गया। इससे पलाया युवकों के भीतर आत्मसम्मान की भावना बढ़ने लगी। चूंकि इस बदलाव के मूल में अय्यंकाली की प्रेरणा और श्रम था, इसलिए प्रशंसक उन्हें सम्मान के साथ ‘उरपिल्लई’ या ‘मूथापिल्लई’ कहते थे। 1888 में उनका विवाह चेल्लमा से हो गया। पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम था। दोनों के सात बच्चे हुए। अय्यंकाली खुद को अच्छा गृहस्थ सिद्ध कर चुके थे। लेकिन उनकी मंजिल वहीं तक सीमित नहीं थी। अछूत होने के कारण उनपर कई प्रकार के बंधन थे। उनसे निपटने के लिए 1893 में बैलगाड़ी पर सवार अय्यंकाली ने वह कर दिखाया, जैसा उनसे पहले किसी न सोचा तक न था। 

शिक्षा हेतु संघर्ष

मैकाले की सलाह पर आगे बढ़ते हुए तत्कालीन वायसराय विलियम बैंटिक 7 मार्च 1835 को एक संकल्पपत्र प्रस्तुत किया था। उद्देश्य था समाज के निचले वर्गों तक शिक्षा का विस्तार। हजारों वर्षों से ज्ञान के नाम पसरे शूण्य की भरपाई करना। लेकिन कानून बनना एक बात है, जरूरतमंदों तक उसका लाभ पहुंचना दूसरी बात। अधिकांश स्कूलों का प्रबंधन द्विज जातियों के हाथ में था। कानून बन जाने बावजूद वे उसकी अवहेलना करती आ रही थीं। फुले का विचार था कि बदहाली से मुक्त होने के लिए शूद्र-अतिशूद्रों को स्वयं प्रयास होंगे, समाज को जगाना होगा। नेतृत्व हेतु प्रभावशाली नेता भी अपने ही भीतर से पैदा करने होंगे। यह सब बिना शिक्षा के असंभव है। अतएव 1848 से ही वे  शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूलों की स्थापना में जुट गए थे। आने वाले 3 वर्षों में 18 स्कूलों की स्थापना कर उन्होंने एक तरह से कीर्तिमान रचा था। 

उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अय्यंकाली ने 1904 में वेंगनूर में पहले स्कूल ‘कुदी पल्लिकूदम’ की नींव रखी। लेकिन सवर्णों से यह सहन न हुआ। निर्माण कार्य शुरू होने के पहले ही दिन उन्होंने अय्यंकाली के स्कूल में आग लगा दी। लोगों के सहयोग से, उन्होंने बिना देर किए नए सिरे से निर्माण शुरू कर दिया। परंतु विद्रोही बाज आने वाले न थे। उन्होंने स्कूल को दूसरी बार भी वही किया। कोई और होता तो कदाचित हार मान लेता। मगर बचपन से ही जुझारू रहे अय्यंकाली के नेतृत्व में निर्माण कार्य चलता रहा। आखिरकार स्कूल बना। बच्चे वहां जाने लगे। वह केरल में किसी दलित द्वारा, दलित बच्चों की शिक्षा के स्थापित पहला स्कूल था। 

अछूत जातियों से जुड़े बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती करने नियम 1907 में ही बन चुका था। परंतु उसपर अमल दूर था। सवर्णों के दबाव में त्रावणकोर के दीवान ने उस आदेश को दबा लिया था। अपने संगठन के माध्यम से अय्यंकाली उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत थे। आखिरकार, सवर्णों के रवैये से निराश होकर उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने अछूतों से कहा कि जब तक उनके बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, तब तक वे नैय्यरों के खेतों में काम करना छोड़ दें। यही हुआ। पुलायाओं ने हड़ताल की घोषणा कर दी। शुरू-शुरू में नैय्यरों ने इसे गीदड़ भभकी माना। सोचा कि भूख से बेहाल, गरीब पुलाया, कुरुवा आदि अछूत, बहुत जल्दी खेतों में लौटने को मजबूर हो जाएंगे। लेकिन अछूतों की आंखों में रोपा गया सपना, उनकी भूख से कहीं ज्यादा बड़ा था। सो हड़ताल खिंचती चली गई। सवर्णों ने अछूतों को डराना-धमकाना शुरू कर दिया। अय्यंकाली और उनके साथियों ने उसका भी सामना किया। 

बुबाई का मौसम आया तो कुछ नैय्यरों ने खुद ही अपने खेतों में धान रोपने की कोशिश की। परंतु दूसरों के श्रम पर जीवन जीते-जीते आलसी हो चुके नैय्यरों के लिए वह काम आसान नहीं था। एक पुलाया जितना काम एक दिन में कर लेता था, उतना काम करने में उन्हें पांच-छह दिन लगते थे। हड़ताल खिंचने से गरीब पुलायाओं के आगे भोजन का संकट उत्पन्न होने लगा। उस समय अय्यंकाली ने बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने मछुआरों से समझौता किया कि हर मछुआरा मछली पकड़ने के लिए अपने साथ एक पुलाया को साथ ले जाएगा। यह फार्मूला कामयाब रहा। इससे विरोधी बुरी तरह चिढ़ गए। उधर हड़ताल का दायरा बढ़ाने के लिए अय्यंकाली ने कुछ नई मांगे जोड़ दीं। उनमें मजदूरों को स्थायी करने, झूठे आरोपों में फंसाकर दंडित करने तथा कोड़ों से प्रहार करने पर रोक, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी, सप्ताह में एक दिन अवकाश जैसी नई मांगें शामिल थीं। 

अय्यंकाली के नेतृत्व का ही जादू था कि शताब्दियों से बैल की तरह सर झुकाए श्रम करते आए अछूत पहली बार जमींदारों के आगे तने खड़े थे। हालात बिगड़ते जा रहे थे। अछूतों के आगे भोजन का संकट था। वहीं जमींदारों की हालत अच्छी न थी। क्षुब्ध होकर उन्होंने पुलायाओं की झोंपड़ियों में आग लगा दी। बदले में अय्यंकाली के हरावल दस्ते ने जमींदारों के मकानों को आग के हवाले कर दिया। इससे उनके गुस्से का ठिकाना न रहा। यह सोचते हुए कि सारे मामले के पीछे अय्यंकाली है, नीचता की हद तक जाते हुए उन्होंने उन्हें मरवाने का फैसला कर लिया। उसके लिए मुंबई के एक गुंडे को नियुक्त किया गया। अय्यंकाली को जीवित लाने पर 2000 रुपये तथा मृत लाने पर 1000 रुपये का ईनाम देने की घोषणा कर दी गई।4 

धमकियों और खून-खराबे के बावजूद अय्यंकाली अपने साथियों के साथ डटे हुए थे। नैय्यरों ने अय्यंकाली तथा उनके अंगरक्षक याकूब के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। याकूब को गिरफ्तार कर लिया। अय्यंकाली तत्काल पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां तब तक डटे रहे, जब तक पुलिस ने याकूब को रिहा न कर दिया। हड़ताल करीब एक वर्ष(1907-08) तक चली। इस बीच शिक्षा निदेशक मिशेल ने त्रावणकोर के दीवान को 1907 के नीतिगत आदेश पर तुरंत अमल करने की सलाह दी। चौतरफा दबाव के बीच त्रावणकोर के दीवान की ओर से 1910 में अछूत बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश संबंधी आदेश जारी कर दिए गए। उस समय के कई बुद्धिजीवियों की ओर से उसका विरोध किया गया था। उनमें से एक खुद को प्रगतिशील बताने वाले ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक रामकृष्ण पिल्लई भी थे। अछूतों बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश पर उन्होंने लिखा था कि यह आदेश—

‘पीढ़ियों से ज्ञान-विज्ञान की खेती करते आए लोगों के बच्चों को, उनके खेतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी करते आए लोगों के बच्चों के साथ रखना—घोड़े और भैंस को एक साथ जोत देने जैसा है।’5 

आदेश का जमीनी असर देखने के लिए अय्यंकाली पूजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नैय्यर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया।6 प्रधान अध्यापक हालात को संभालने की कोशिश कर ही रहे थे कि कंडाल गांव के कुछ नैय्यर वहां जा धमके। वे लाठी-डंडों से लैस थे। अय्यंकाली के साथ भी उनके साथी थे। विवाद बढ़ता गया। गांवों से शुरू हुए उस संघर्ष ने शीघ्र ही आसपास के जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। यहां तक कि दक्षिणी त्रावणकोर भी उस आंदोलन के असर से बच न सका। दलितों के प्रवेश को लेकर नैय्यर इतने विध्वंसात्मक थे कि उन्होंने उन दो स्कूलों में आग लगा दी, जिनमें अय्यंकाली ने अपने समाज के बच्चों का दाखिला कराने के उद्देश्य से पहुंचे थे।

साधुजन परिपालन संघम

भूख, अभाव, विपन्नता और दास जैसा जीवन जीने वाले लोगों को अय्यंकाली ने नया नाम दिया था—‘साधु जन’। अपने आंदोलन को सांस्थानिक रूप देने के लिए उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’(गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की थी। उनके कुछ जीवनीकारों के अनुसार इस संस्था का गठन 1907 में हुआ था। संस्था का ‘कनक्कन’(महासचिव) अय्यंकाली को बनाया गया। अन्य सदस्यों में मूलायिल कालि, थॉमस वाडयार, गोपालन आदि शामिल थे। उसकी सदस्यता सभी अछूत जातियों के लिए खुली थी। उसका प्रमुख उद्देश्य था पुलाया सहित सभी अछूत जातियों को अपने अधिकारों पक्ष में संगठित करना। उन्हें अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा, गरीबी और सवर्णों के आतंक से मुक्ति दिलाना। संस्था के प्रचार-प्रसार के लिए स्थानीय सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता था। सवर्ण उस संस्था के गठन से नाराज थे। इसलिए आरंभ में उसकी बैठक, बस्ती से दूर पेड़ों की ओट में या पहाड़ी के पीछे किसी गोपनीय स्थान पर की जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के मन से यह डर निकलने लगा। ‘साधु जन’ का उद्देश्य पुलायाओं, पारयाओं जैसी अछूत जातियों का उत्थान था। बावजूद इसके उन्होंने अपनी संस्था को ‘धर्म एवं जाति’ संबंधी दुराग्रहों से परे रखा था। इससे उन्हें इन जातियों के राजनीतिकरण में मदद मिली। 

संस्था का प्रबंधन बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया जाता था। आमतौर पर हर गांव में उसकी शाखा थी। संस्था का वार्षिक सम्मेलन त्रिरुवनंतपुरम के ‘विक्टोरिया जुबली हाल’ में किया जाता था। उसमें केरल के अलग-अलग गांवों और शहरों से आए लोग हिस्सा लेते थे। सम्मेलन के दिन त्रिरुवनंतपुरम की सड़कें, काली चमड़ी वाले अछूतों से पट जाती थीं। उसमें संस्था के सदस्यों और अधिकारियों के अलावा विभिन्न सरकारी और राजकीय अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जाता था। संस्था के महासचिव के रूप में उसके कार्यक्रमों, उपलब्धियों और मांगों को सभा के सम्मुख पेश करने का दायित्व अय्यंकाली का था। वे अनपढ़ थे। लेकिन संस्था का संचालन इस प्रकार करते थे कि लोग उनकी प्रबंधन क्षमता के कायल हो जाते थे। ‘साधु जन परिपालन संघ’ के कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘साधु जन परिपालिनी’ नामक मासिक पत्रिका की शुरुआत भी की गई। कालि कोदिक्कुरुप्पन को उसका संपादक नियुक्त किया गया। आने वाले 30 वर्षों तक यह संस्था सुचारू रूप से काम करती रही। 

नेदमंगादु विद्रोह

चालियार विद्रोह के बाद कई बाजारों में पुलायाओं को आने-जाने की आजादी प्राप्त हो चुकी थी। बावजूद इसके कुछ बाजारों में अभी भी उनका आना प्रतिबंधित था। जो पुलाया अपना सामान बेचने के लिए आते थे, उन्हें भी मुख्य बाजार में आने से रोका जाता था। सवर्णों ने उन्हें अलग स्थान दिया था। 1912 में अय्यंकाली ने एक बार फिर अपने साथियों को इकट्ठा किया। इस बार उनके अभियान में स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे। जैसे-जैसे पुलायाओं का दल आगे बढ़ा, उनका साथ देने और हौसला बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के लोग भी उनके साथ आ मिले। उन्होंने अपना अभियान त्रिवेंद्रम से आरंभ किया। नेदमंगाडु तक पहुंचने के लिए उन्होंने जंगल का रास्ता चुना था। मगर बाजार तक पहुंचने से पहले ही सवर्णों ने उनपर हमला बोल दिया। दोनों पक्ष पक्के इरादे से आए थे। विवाद एक बार फिर संघर्ष में बदल गया। एक रणनीति के तहत अय्यंकाली ने पुलायाओं के एक हिस्से को दूसरी दिशा से बाजार में प्रवेश के लिए भेज दिया। घने जंगलों के रास्ते, चुनौतियों से जूझता हुआ हुआ वह जत्था आखिरकार नेदमंगाडु बाजार में प्रवेश करने में कामयाब हो गया।

श्री मूलम प्रजा सभा की सदस्यता

अय्यंकाली के सघर्ष और उनकी ख्याति सरकार तक पहुंच चुकी थी। लोग उनसे प्रभावित थे। इसके फलस्वरूप 1912 में उन्हें ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ का सदस्य मनोनीत कर दिया गया। सभा के समक्ष उनका प्रथम संबोधन छोटा, किंतु प्रभावशाली था। अपने भाषण में उन्होंने पुलायाओं की गरीबी, अशिक्षा के अलावा उन्हें आवास एवं खेती हेतु जमीन दिए जाने की मांग की थी। उनका नारा था, ‘खेत उनके लिए जो जोतें’। अपनी पहली सभा में ही सरकारी अधिकारियों की मनमानी की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए उन्होंने कहा था—

‘हमारे कई परिवारों को धनवान जमींदारों ने इस आश्वासन के साथ उनके घर से निकाल दिया था कि उन्हें वे घर बनाने के लिए अलग से जमीन देंगे। अब वन-विभाग के कर्मचारी, जमींदारों से मिलकर मेरे लोगों पर उन घरों को खाली करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसके साथ-साथ ये अधिकारी जमींदारों को उनकी भूमि पर कब्जा करने में मदद कर रहे है। मैं इस समस्या के निराकरण की प्रार्थना करता हूं।’

अय्यंकाली की अपील पर दीवान ने पुलायाओं को यथासंभव मदद का भरोसा दिलाया। दीवान के मन में उनके प्रति कितना सम्मान था, यह इस घटना से भी जाहिर होता है—

‘एक बार अय्यंकाली प्रजा सभा के सदस्य की हैसियत से, दीवान से मिलने उनके कार्यालय में पहुंचे। वहां तैनात दरबानों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। उन्होंने अय्यंकाली के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी किया। उनका नाम लेकर पुकारा। अय्यंकाली वहां से चले गए। बाहर जाकर उन्होंने तार भेजकर दीवान को सारी घटना से अवगत करा दिया। दीवान ने तुरंत अय्यंकाली को अपने कार्यालय बुला भेजा। वे जब दीवान के कार्यालय में पहुंचे तो दोनों दरबान भी वहां मौजूद थे—

‘मिस्टर अय्यंकाली, अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए आप इन्हें क्या दंड देना चाहेंगे?’ दीवान ने पूछा। यह सुनकर वे दंग रह गए। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने कहा—

‘इन्होंने जो किया, लापरवाही के कारण किया। इन्हें माफ कर दिया जाए।’

दीवान अय्यंकाली से प्रभावित हुआ। आखिरकार दोनों दरबानों को अय्यंकाली के पैर छूकर माफी मांगने के बाद छोड़ दिया गया। 

कोचु कली : अय्यंकाली के वक्ष-कर विरोधी आंदोलन की नायिका

उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। दलित स्त्री-पुरुष दोनों को टैक्स देना पड़ता था। पुरुषों का मूंछें रखना, छाता लेकर चलना निषिद्ध था। ये सब नियम ब्राह्मणों द्वारा अपनी जातीय श्रेष्ठता के नाम पर बनाए गए थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। इसलिए उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

जब स्त्री का वक्ष ही उसका दुश्मन था

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। 1803 में वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा के अनुसार निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष इसलिए ढककर पहुंची थी, ताकि  रानी नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। 1859 के सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त हो चुका था। लेकिन इझ़वा, पुलाया, कुरुवा आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को यह अधिकार 1915 तक भी प्राप्त नहीं था। 

सोने-चांदी के गहने पहनने पर प्रतिबंध  

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लामाला’(कंठमाला) पहन सकती थीं। कान में लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लामाला’ उनके दासत्व का प्रतीक थी। वक्ष कर के विरोध में कई आंदोलन चल चुके थे, परंतु उसके ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया था अय्यंकाली ने।

कौन थी कोचु कली

उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उनमें से एक का नाम था—कोचु कली। कोचु कली आदि द्रविड़ समाज से थी। तांबई रंग और लंबे कद के कारण उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। उसका जन्म उनीसवीं शताब्दी  के अंतिम दशक में, इरनाकुलम जिले के एलुवा नामक गांव में हुआ था। पिता का नाम था, पींगन। मां पल्ली कुरुंबा कीझनाद गांव की रहने वाली थी। सात भाई-बहनों में कोचु तीसरे नंबर की थी। 21 वर्ष की उम्र में उसका विवाह, परंबू हाउस बंगले में काम करने वाले पल्ली के साथ कर दिया गया। विवाह के तीन वर्ष पश्चात दोनों के घर एक पुत्री का जन्म हुआ।

उस समय तक केरल में वक्ष-कर विरोधी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। जगह-जगह उसके समर्थक और विरोधी आमने-सामने थे। उन्हीं दिनों अपनी संस्था ‘साधुजन परिपालन संघ’ के एक कार्यक्रम के दौरान अय्यंकाली पारंबू हाउस में ठहरे थे। वे एक सभा के सिलसिले में वहां पधारे थे। वक्ष-कर विरोध को लेकर चल रहे प्रदेश-व्यापी संघर्ष के बीच वह सभा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी। सभा में शिरकत के लिए अय्यंकाली ने कुछ उदार नैय्यर नेताओं को भी आमंत्रित किया था। 

दासता के प्रतीकों का बहिष्कार

सभा में सभी नेताओं ने वक्ष कर का विरोध किया। अय्यंकाली का नंबर आया तो उन्होंने भी उसकी तीव्र आलोचना की। भाषण के दौरान उन्होंने दो स्त्रियों को मंच पर आमंत्रित किया। उनमें से एक  कोचु कली थी। उस समय वह 24 वर्ष की थी। दोनों स्त्रियां सकुचाती हुई मंच पर पहुंचीं। अय्यंकाली ने उन्हें बताया कि यहां बैठक में मौजूद सभी लोग गुलामी की प्रतीक ‘कल्लामालाओं’ को उतार फैंकने की सहमति दे चुके हैं। उसके बाद उन्होंने चाकू से, उन स्त्रियों के गले में पड़ी ‘कल्लामालाओं’ को काट फैंका। इसके साथ ही उन्होंने उनके तोड़ा(कान में पहने जाने वाला पत्थर का पारंपरिक आभूषण) को तोड़ दिया—

‘आगे से तुम इन्हें कभी मत पहनना। बजाय इसके तुम ‘धोती और ब्लाउज’ पहना करना।’ अय्यंकाली ने कहा। उन्होंने उन स्त्रियों को कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसे भी दिए। उसके बाद कोचु कली वक्ष-कर विरोधी आंदोलन के स्त्री दस्ते की नेता बन गई। 1915 में उसके नेतृत्व में वक्ष-कर विरोधी कई प्रदर्शन हुए। उनमे सबसे महत्वपूर्ण कोल्लम जिले के पेरिनाड में दलित-आदिवासी स्त्रियों का आंदोलन था। उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में स्त्रियों ने गले में पहनी कल्लामालाओं को खुद उतार फेंका था।

सवर्णों की हिंसा

वक्ष कर विरोधी आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी ने सवर्णों को हिलाकर रख दिया था। वे मनमानी पर उतर आये थे। मलयालम पत्रिका ‘मीतावदी’ के जनवरी 1916 के अंक के अनुसार एक पुलाया स्त्री ने अय्यंकाली से मुलाकात के बाद ‘कल्लामाला’ पहनना छोड़ दिया था। एक दिन वह अपने काम पर जा रही थी। अचानक एक आदमी उसके पास पहुंचा और ‘कल्लामाला’ के बारे में पूछा। स्त्री के यह कहने पर कि वह उसे उतार कर फ़ेंक चुकी है, उस आदमी को इतना गुस्सा आया कि उसने तत्काल उस स्त्री के कान काट लिए।

अय्यंकाली की यादों के साथ काटी जिंदगी   

आधुनिक केरल के प्रमुख वास्तुकार अय्यंकाली से जुड़ी जादुई यादों का ही असर था, जिससे कोचु कली ने लंबी उम्र प्राप्त की थी। उनका निधन, 115 वर्ष की अवस्था में 2013 में हुआ था। अय्यंकाली को याद करते समय कोचु कली का चेहरा दमकने लगता था। गर्दन अभिमान से कुछ और तन जाती थी। एक साक्षात्कार में उसने बताया था कि अय्यंकाली के शब्द आज भी उनके कानों में घंटी की तरह गूंजते हैं। उसके अनुसार अय्यंकाली तीन दिन और तीन रात ‘परंबू हाउस’ में ठहरे थे। भोजन में उन्हें चावल और सूखी झींगा मछली की कढ़ी परोसी गई थी। कोचु कली उस दिन को याद करके गर्व से भर जाती थी, जब उसने ‘धोती और ब्लाउज’ को पहली बार पहना था—

‘धोती और ब्लाउज पहनते समय मैं बहुत डरी हुई थी। सोचती थी कि सवर्ण डंडों से हमारी पिटाई करेंगे। लेकिन जब अय्यंकाली ने हमसे बात की, हमारा सारा डर गायब हो गया।’

28 अगस्त 2020 को अय्यंकाली का 157वां जन्मदिवस है। यह अवसर अय्यंकाली के साथ-साथ कोचु कली के संघर्ष को याद करने का भी है।

वक्ष-कर का विरोध

अय्यंकालि द्वारा चलाए गए महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था—वक्ष-कर के विरोध में चलाया गया आंदोलन। वह ऐसा अभियान था, जो उन्हें अपने समकालीन और पूर्ववर्ती कई समाज-सुधारकों से आगे खड़ा सिद्ध कर देता है। उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। उसमें सर्वाधिक प्रताड़ना स्त्रियों को झेलनी पड़ती थी। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। यदि कोई स्त्री अपना वक्ष ढकना चाहे तो बदले में उसे सरकार को कर देना पड़ता था। कर की मात्रा वक्ष के आकार के अनुरूप तय की जाती थी। जितना बड़ा वक्ष, उतना ज्यादा टैक्स। उसकी उगाही के लिए एक अधिकारी नियुक्त था। वक्ष-कर लगाने वाले ब्राह्मण थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। तदनुसार नैय्यर स्त्रियों को नंबूदरी ब्राह्मणों के समक्ष अपना वक्ष ढकने की स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि ब्राह्मण अपना वक्ष केवल मंदिर में देवताओं के समक्ष खुला रखता था। यहां तक उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा केरलीय समाज में लंबे समय से प्रचलित थी। उसमें निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष केवल इसलिए ढककर पहुंचती है कि वह नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। ताकि इस ‘आफत’ से  उसे हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए। 1859 में शुरू हुए सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को अपना वक्ष ढकने की आजादी प्राप्त हो गई। लेकिन इझ़वा, पुलाया आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को 1915 तक वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। 

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लु माला’(कंठ माला) पहन सकती थीं। कान में केवल लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लुमाला’ उनके दास होने की निशानी भी थी। 1915 में एक सभा के दौरान अय्यंकाली ने अछूत स्त्रियों से कहा था कि वे दासता के प्रतीक उन आभूषणों को हमेशा के लिए उतार फेंके। उनके स्थान पर धोती और ब्लाउज जैसे वस्त्र पहनें। उनके आवाह्न पर पेरीनाड की हजारों दलित स्त्रियों ने पत्थर की कंठमालाओं को उतारकर ऊपरी वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। यह देखकर शीर्ष जातियों में खलबली मच गई। उन्होंने इसे स्थापित समाज-व्यवस्था का उल्लंघन माना। ‘अपमान’ का बदला लेने के लिए वे दलितों पर हमलावर होने लगे। वक्ष ढकने के कारण कई दलित स्त्रियों के स्तन काट डाले गए। कइयों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। परिजनों पर जानलेवा हमले किए गए। अनेक स्त्रियों के पति, भाई और माता-पिता को मौत के हवाले कर दिया गया। उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उन जुझारू स्त्रियों में से एक का नाम था—कोचु कली। वह पहली स्त्री थी जिसके गले में पड़ी ‘कल्लुमाला’ को अय्यंकाली ने अपने हाथों से काटा था।

अय्यंकाली के सभी चित्रों में हम उन्हें कोट पहने हुए देखते हैं। वह भेषभूषा भी उन्होंने, ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड को चुनौती देने के लिए अपनाई थी। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी। एक पुलाया अपने शरीर पर केवल पुराना, लंगोटीनुमा वस्त्र लिपेट सकता था। अय्यंकाली उससे विद्रोह करना चाहते थे। लेकिन सोचते थे कि कोट पहनने का अधिकार केवल पढ़े-लिखे लोगों को है, जबकि वे पूरी तरह अनपढ़ थे। कुन्नुकुझी एस. मणि के अनुसार, श्री मूलम प्रजा सभा का सदस्य मनोनीत किए जाने पर, जॉन हेनरी नामक एक यूरोपियन ने उन्हें एक कोट भेंट किया था। प्रजा सभा के अगले सत्र में वे उसी कोट को पहनकर उपस्थित हुए थे। अगले सत्र के लिए वे कुछ और कोट सिलवाना चाहते थे। मगर उन दिनों त्रिरुवनतपुरम् में ऐसा कोई दर्जी नहीं था, जो कोट की सिलाई कर सके। इसलिए उन्होंने कोट्टयम के एक दर्जी को दो कोट सीने का आर्डर दिया। श्रीमूलम पोपुलर असेंबली के अगले सत्र में उन्होंने अपने सिलवाए कोट पहनकर हिस्सा लिया था। नैय्यर उसे देखकर जल-भुन रहे थे। लेकिन अब कुछ भी कर पाना उनके बस से बाहर था। 

केरल के इतिहास में अस्पृश्यता, अशिक्षा और दासता को सबसे जोरदार चोट देने वाला वह पुरोधा, 18 जून, 1941 को सघर्ष चिरनिद्रा में लीन हो गया। एक अवसर पर एक पत्रकार ने उनसे पूछा था—‘आपकी दिली तमन्ना क्या है?’ इस पर अय्यंकाली का उत्तर था—‘आंख मूंदने से पहल मैं अपने समाज के दस-बारह विद्यार्थियों को ग्रेजुएट बने देखना चाहता हूं…बस।’ एक कविता के जरिये  मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय उन्हें इस तरह याद करते हैं—

तुम्हीं ने जलाया था प्रथम ज्ञानदीप

बैलगाड़ी पर सवार हो

गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

अपनी देह की यंत्रशक्ति से

पलट दिया था, कालचक्र को

ओमप्रकाश कश्यप

1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, पृष्ठ 15.

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अयंकाली कंटीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ ट्रावणकोर दलितस, 2018

3. जेटिंल टी. वर्गिस, दि कंन्सट्रक्शन ऑफ़ साधुजनम्: अय्यंकालि एंड दि स्ट्रगल ऑफ़ दि स्लेव कॉस्ट्स फॉर ए न्यू आइडेंटिटी-1884-1941, (2016), पेज 72

4. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

5. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

6.  कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकलि, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, जेटिंल टी. वर्गिस, पृष्ठ 81

7. कोचु कली, दि हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन स्लेव वूमेन, http://dravidagallery.blogspot.com/2013/06/?m=0

8. एम. वेलकुमार, पृष्ठ-197-198

हिंदी महाकाव्यों(महाभारत और रामायण) की विखंडनवादी पुनरीक्षा

सामान्य

महाभारत और रामायण. हिंदुओं के दो महाकाव्य. दोनों विश्व-साहित्य की क्लासिक धरोहरों में आते हैं. कुछ लोग इन्हें इतिहास मानते हैं. परंतु इतिहास के लिए घटनाओं और पात्रों का समय से सुसंगत होना अनिवार्य है. यदि पुराना है तो उसके कुछ पुरातात्विक साक्ष्य होने चाहिए, जैसे सिंधु घाटी की सभ्यता के हैं. महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक आदि के हैं. ऐसे कोई प्रामाणिक साक्ष्य इन महाकाव्यों से संबंधित घटनाओं के नहीं मिलते. कुछ शहरों और नदियों के नाम जरूर मेल खाते हैं. किंतु नगर की मौजूदगी, उसमें व्यक्ति विशेष के प्रवास को तब तक प्रमाणित नहीं करती जब तक कोई दूसरा साक्ष्य न हो. उनके अलावा विभिन्न देवताओं के जगह-जगह फैले कुछ मंदिर आदि है. उनमें से अनेक 1000-1200 वर्ष पुराने और अपनी स्थापत्य कला में बेजोड़ हैं. ये धर्मस्थल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक हैं. इसलिए जब भी महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिकता को चुनौती दी जाती है, प्रमाण के अभाव में ‘भक्तगण’ आस्था के खोल में समा जाते हैं. उसमें दूसरों का प्रवेश निषिद्ध होता है. वे खुद उससे बाहर झांकने की कोशिश कभी नहीं करते.

उनके लिए यदि आस्था कहती है—’राम थे, तो थे! सूर्यग्रहण का कारण उसपर केतु द्वारा उत्पन्न किया गया संकट है, तो यही सच है! यदि ग्रंथों में लिखा है कि बाल हनुमान ने खेल-खेल में सूरज को निगल लिया था, तो संदेह की गुंजाइश कहां बचती है! आस्था को सर्वोपरि मानने वालों का खुद आस्थावान होना आवश्यक नहीं है. आस्था सिर्फ उनकी लोकलुभावन राजनीति का हिस्सा होती है. आस्थावादी कहता है, जो कहा गया है, उसपर विश्वास करो. धर्मग्रंथों पर संदेह करना पाप है. आस्था जितनी ज्यादा संदेह-मुक्त हो, उतनी ही पवित्र मानी जाती है. जबकि ज्ञान की खोज बगैर संदेहाकुलता के संभव ही नहीं है. कह सकते हैं कि आस्था मानवीय विवेक की ऐसी बाड़ाबंदी है, जिसका दूसरा छोर अंधविश्वास से जुड़ा होता है. अंधविश्वास भी ऐसा कि ज्ञान कब अज्ञान में ढल जाता है, व्यक्ति को पता ही नहीं चल पाता. जिन धर्मग्रंथों के आधार पर आस्था का समर्थन किया जाता है, उनमें परस्पर विरोधी सूचनाओं की भरमार है. उदाहरण के लिए ऋग्वेद के कुछ मंत्रों(1/139/11, 8/28/1) में देवताओं की संख्या 33 बताई गई है, जबकि दूसरे मंत्र(3/9/9, 1/52/6) के जरिये 3339 देवताओं का आवाह्न किया गया है. 

हिंदू अतीतोन्मुखी धर्म है. हिंदुओं के लिए पुरातन ही महानतम है. हिंदू धर्म को अधिकाधिक प्राचीन दिखाने के लिए वे लंबी-लंबी, बिना सिर-पैर की कल्पना करते हैं. उनके अनुसार सतयुग की अवधि 17,28,000 वर्ष, त्रेता की 12,96,000 तथा द्वापर की 8,64,000 वर्ष थी. जबकि कलयुग मात्र 4,32,000 वर्ष का होगा. युगावधि की तरह मनुष्य की आयु और लंबाई भी घटती जाती हैं. तदनुसार सतयुग में मनुष्य की आयु 1,00,000 वर्ष, लंबाई 21 हाथ(32 फुट), त्रेता में 10,000 वर्ष, लंबाई 14 हाथ(21 फुट) द्वापर में 1000 वर्ष लंबाई 7 हाथ(11 फुट) तथा कलयुग में मात्र 100 लंबाई 4 हाथ( लगभग फुट) होती है. चारों युगों की अवधि बराबर क्यों नहीं है? युग बदलने के साथ ही मनुष्य की लंबाई और वयस में इतना अंतर अचानक कैसे आ जाता है? क्या दो युगों के बीच कोई शून्यकाल भी होता है? क्या युग का बदलना वर्ष या शताब्दी बदलने जैसा है—जैसे प्रश्नों से वे कन्नी काट जाते हैं. चारों युगों में सतयुग को सर्वोत्तम बताया गया है. महाभारत(149.11-25) में हनुमान भीम को बताते हैं—’‘सतयुग में प्रत्येक मनुष्य पुरुषार्थ सिद्धि कर कृतकृत्य होता था, इसलिए वह कृतयुग कहलाया. उसमें धर्म अपनी संपूर्ण अवस्था में था….किसी को कुछ करना नहीं पड़ता था. इच्छामात्र से जरूरत की वस्तुएं प्राप्त हो जाती थीं.’ रामायण के अनुसार हनुमान का जन्म त्रेता में हुआ था. सतयुग की जानकारी का उनका स्रोत क्या था, इस बारे में वे कुछ नहीं बताते.

गीता के अनुसार जब भी पृथ्वी जब-जब पाप बढ़ते हैं, धर्म संकट में पड़ जाता है—’तब-तब अवतार होते हैं. श्रद्धा के अतिरेक में हम इसपर विश्वास भी कर लेते हैं. यह ख्याल तक नहीं आता कि यदि सतयुग में धर्म चरमोत्कर्ष पर था तो सर्वाधिक अवतार उसी युग में क्यों हुए? स्मरणीय है विष्णु के कुल दस अवतारों में से चार—’मत्स्य, कूर्म, वाराह और नृसिंह, सतयुग के खाते में जाते हैं.  त्रेता के हिस्से में तीन—’वामन, परशुराम और राम तो द्वापर में केवल कृष्ण हैं. गौतम बुद्ध को सनातन धर्म के खांचे में फिट करने के लिए ‘कलयुग’ में उन्हें भी अवतार का दर्जा दिया गया है. दसवें और आखिरी अवतार के रूप में ‘कल्कि’ की पूर्वकल्पना की गई है. गीता के हिसाब से देखा जाए तो धर्म पर सबसे ज्यादा संकट सतयुग के दौरान आए थे, जिससे उस युग में विष्णु को चार अवतार लेने पड़े और सबसे कम द्वापर में जिसमें केवल एक अवतार लेना पड़ा था. हमारा सवाल बस इतना है कि यदि सतयुग में धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था, सभी कुछ ठीक-ठाक था तो उस युग में विष्णु को सर्वाधिक चार-चार अवतार क्यों लेने पड़े थे?  

हमारी शंकाएं बस यहीं तक सीमित नहीं है. त्रेता और द्वापर में अवतार उस समय होते हैं, जब वे अवसान के निकट थे. राम के सरयू में जलसमाधि लेते ही त्रेता भी ‘जलसमाधि’ ले लेता है. इसी तरह कृष्ण की मृत्यु के साथ द्वारिका समुद्र में समा जाती है, द्वापर उड़नछू हो जाता है. अवतार पुरुष की मृत्यु के तुरंत बाद युग-समापन का क्या औचित्य है? क्या किसी राजा का युद्ध जीतकर राजगद्दी पर विराजमान हो जाना सत्ता-परिवर्तन का अभीष्ट हो सकता है? गौरतलब है कि विष्णु के ये दो अवतार ऐसे हैं जिन्हें ‘धर्म की स्थापना’ के नाम पर लाखों-करोड़ों को अपने प्राणों ही आहूति देनी पड़ी थी. बावजूद इसके जो व्यवस्था उन कथित अवतार पुरुषों ने गढ़ी, वह लंबे समय तक क्यों नहीं टिक पाई थी? क्या उनका कार्य नाटक में यवनिका गिराने वाले पात्र जितना सीमित था? क्यों हर अवतार अपने युग का उच्छिष्ट साफ करने के लिए जन्मता है? समाज को सुधारने की जिम्मेदारी वह क्यों नहीं उठाता? जिस धर्मराज्य की स्थापना के लिए वह लाखों योद्धाओं की बलि चढ़ाता है, वह कैसा होता है? अंत तक वह मिथ ही क्यों बना रहता है? यदि हर युग की अवधि सीमित है? यदि तथाकथित धर्म-राज्य की स्थापना के साथ ही युग का पराभव होना पूर्व-निर्धारित है तो ऐसे धर्मराज्य का औचित्य ही क्या है? यदि धर्म-राज्य का लाभ जनसाधारण को नहीं मिल पाता तो उसकी स्थापना किसके लिए की जाती है? जैसे अनगिनत प्रश्न इस व्यवस्था को लेकर हो सकते हैं? लेकिन हमेशा वे प्रश्न ही रह जाते हैं. आस्था और धर्म ने नाम पर फैलाया गया डर, हर जिज्ञासु के मुंह पर ताला डालने का काम करता है.

मानवीय विवेक के सापेक्ष आस्था को अतिरेकी महत्व देना अनायास है? क्या यह किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? क्या यह भी अनायास है कि रामायण के नायक राम और दशरथ के बाकी तीनों पुत्र तथा महाभारत के नायक पांडुपुत्रों में से एक भी अपने पिता की औरस संतान नहीं है. सभी नियोग जनित हैं. क्या ये कथाएं इसलिए गढ़ी गईं कि कोख किसी की भी हो, वीर्य ब्राह्मण का होगा तभी सर्वतेजोमय संतान जन्म ले सकती है? अथवा अश्वमेध आदि यज्ञों की आड़ में जो वासना का वीभत्स खेल खेला जाता था, उसको वैध बनाने के लिए ये मिथ गढ़े गए थे? ध्यातव्य है कि दोनों महाकाव्यों के महानायकों, जिन्हें बाद में ईश्वर मान लिया जाता है—की मृत्यु भी सामान्य नहीं थी. राम सीता को वनवास देने के बाद आत्मग्लानि से भर जाते हैं. वही उनको सरयू में जलसमाधि लेने को विवश करती है. महाभारत की जंग जीत लेने के बाद पांडु भी सुखी नहीं रह पाते. आत्मशांति की तलाश उन्हें हिमालय की ओर ले जाती हैं. वहां द्रोपदी के साथ उसके पांचों पति भी, एक-एक कर मृत्यु को प्राप्त होते हैं.

महाभारत के कृष्ण उस तथाकथित ‘धर्मयुद्ध’ के महानायक हैं. 18 अक्षौहिणी सेनाओं; यानी मनुष्यों और जानवरों को मिलाकर दो करोड़ से ज्यादा प्राणियों की आहूति देने के पश्चात युधिष्ठिर का राज्यारोहण संभव हो पाता है. इसी के साथ धर्म के राज्य की घोषणा कर दी जाती है. लेकिन सब कुछ शांत नहीं हो जाता. थोड़े ही समय के बाद द्वारिका में यादव अंतर्कलह के शिकार हो जाते हैं. उस अंतर्कलह को रोकने के लिए कृष्ण की बुद्धि काम नहीं आ पाती. धरती पर धर्मराज्य की स्थापना का दावा करने वाले कृष्ण अपने ही बंधु-वांधवों को आपस में लड़-लड़कर देखने को विवश हैं. पूरी धरती पर धर्म की स्थापना का दावा करने वाले अवतार-पुरुष कृष्ण अपने ही परिजनों को क्यों नहीं संभाल पाए? महाभारत का यह अंत क्या स्वाभाविक है? क्या गांधारी का शाप और यादव कुल का आपस में लड़-झगड़कर मर जाना, नियतिबद्ध घटना थी? अथवा ऋग्वैदिक कृष्ण के तेज को, उनकी गौरवशाली स्मृतियों को धुंधला करने के लिए जानबूझकर रचा गया षड्यंत्र था?

राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के हिसाब से देखा जाए तो महाभारत रामायण से कहीं आगे की रचना है. रामायण का कथानक एकदिशीय है, महाभारत का बहुआयामी. रामायण मुख्यत: पारिवारिक संबंधों की गाथा है, जबकि महाभारत में संबंधों का दायरा बढ़कर सामाजिक-राजनीतिक हो जाता है. बावजूद इसके प्रतिष्ठा रामायण की कहीं ज्यादा है. उसे पांचवा वेद माना जाता है. वे लोग जिनके कानों में वेदमंत्र पड़ते ही पिघला हुआ सीसा भर देने की बात कही गई थी, उन्हें भी रामायण को पढ़ने और घर में रखने की छूट थी. दूसरी ओर महाभारत को घर लाना निषिद्ध माना गया. कहा गया कि उसे घर में जगह देने से आपस में द्वैष पनपता है. अंतर्कलह बढ़ने से परिवार में फूट पड़ जाती है. क्या इस मान्यता को महज जनसाधारण का अंधविश्वास कहकर टाला जा सकता है?

रामायण में विचारधाराओं का कोई टकराव नहीं है. वहां ब्राह्मण के मुंह से निकले शब्द ही शास्त्र हैं. राम वही करते हैं, जो गुरु कहते हैं. गुरु कहते हैं वाण चलाओ, तो राम, रावण की वनरक्षक और अधेड़ उम्र की स्त्री ताड़का पर शर-संधान करने में देर नहीं करते. ब्राह्मण कहता है कि शंबूक के वेदपाठन से धरती पर पाप बढ़ रहा है, इसे मार डालो तो बिना किसी शंका के राम उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं. रामकथा के अनुसार, ब्रह्म-कथन से विचलन का एकमात्र दंड है—’मौत. समन्वय, सहिष्णुता अथवा भिन्न वैचारिकी से समझौते के लिए उसमें कोई गुंजाइश नहीं है. राम ब्राह्मण द्वारा गढ़ी मर्यादा का पालन आंख मूंदकर, निःशंक भाव से करते हैं, इसलिए तुलसी ने उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा है. रावण उनकी बनाई व्यवस्था का पालन नहीं करता. उल्टे मखौल उड़ाता है—’इसलिए उसे राक्षस कहा गया है. मगर युद्ध में राम द्वारा रावण का वध होते ही रामायणकार को सहसा याद आ जाता है कि रावण ब्राह्मण है. रावण भले मरे, किंतु ब्राह्मणत्व सुरक्षित रहना चाहिए. इसके लिए चलते-चलते एक प्रसंग गढ़ा जाता है. विभीषण राम को मरणासन्न रावण से राजनीति का ज्ञान लेने की सलाह देता है. राम उस समय विजय के मद में हैं. वे खुद न जाकर लक्ष्मण को रावण के पास भेजते हैं. लक्ष्मण रावण के सिरहाने खड़े होकर राजनीतिक ज्ञान की प्रार्थना करते हैं. रावण आंखें मूंदे पड़ा रहता है. लक्ष्मण वापस लौट जाते हैं. तब राम स्वयं उपस्थित होकर रावण के पैरों की ओर खड़े होकर राजनीति का पाठ पढ़ाने का आग्रह करते हैं. रावण तैयार हो जाता है. ‘राम भले ही अवतार सही. मगर पृथ्वी का सर्वेसर्वा तो ब्राह्मण है—’ पाठकों को यह एहसास कराने के साथ ही रामायणकार का उद्देश्य पूरा हो जाता है. यहां इस बात पर कोई विमर्श नहीं होता कि रावण का राजनीतिक दर्शन क्या था? लंका की समृद्धि में उस दर्शन का कितना योगदान था? अथवा ‘रामराज्य’ के निर्माण में रावण के दिए राजनीतिक ज्ञान की क्या भूमिका थी? आस्था यह सवाल उठाने की इजाजत नहीं देती. ‘खट्टर काका’ में हरिमोहन झा इसे बड़े ही रोचक ढंग से दिया है. उपन्यास के अनुसार मिथिला के नैयायिक(न्यायशास्त्र के जन्मदाता गौतम) ने राम से उनके वनवास के बारे में सवाल कर दिया—’

‘‘वनवास का क्या अर्थ? ‘सर्व वनेषु वासः(सभी वनों में वास) अथवा ‘कस्मिंश्चिद् वने वासः(किसी एक वन में वास). यदि पहला अर्थ लो तो सो उन्होंने किया ही नहीं. संभव भी नहीं था. और, यदि दूसरा अर्थ लो, तो फिर अयोध्या के निकट ही किसी वन में रह जाते. चित्रकूट में ही चौदह वर्ष बिता देते. तो भी पिता की आज्ञा का पालन हो जाता. फिर, हजारों मील दूर भटकने की क्या जरूरत थी!  वह भी सुकुमारी सीता को साथ लेकर….राम कुछ उत्तर नहीं दे सके. खीझकर कह दिया— 

‘यः पठैत गौतमी विद्यां शृगालीयोनिमाप्नुयात’(जो भी गौतम की विद्या, उनके तर्कशास्त्र को पढ़े सो गीदड़ होकर जन्म ले).

आखिर राम ब्राह्मणों से इतना भयभीत क्यों थे? इसके लिए उनके पूर्वजों की कथा का स्मरण करना पड़ेगा. राम के पूर्वज थे पृथु. वेन1 की संतान. वेन को धरती का पहला निर्वाचित राजा कहा जाता है. वेन को जगत्कल्याण के लिए राजा नियुक्त किया गया था. इसलिए उसकी निष्ठाएं अपनी जनता के प्रति थीं. एक बार राज्य में अकाल पड़ा. उस समय वेन ने सिर्फ ब्राह्मणों का हित साधने के बजाए, अपनी जनता को वरीयता दी. इसपर ब्राह्मण नाराज हो गए. अकाल के लिए वेन को दोषी ठहराकर वे जनता को भड़काने लगे. अशिक्षित भूख से अकुलाई जनता का विवेक तो पहले ही समाप्त हो चुका था. ब्राह्मणों के इशारे पर वह अपने ही राजा पर झपट पड़ी. वेन के बाद उसके पुत्र पृथु को राजा नियुक्त करने से पहले ब्राह्मणों ने कहा—

‘वेननंदन! जिस कार्य में नियमपूर्वक धर्म की सिद्धि हो, उसे निर्भय होकर करो. लोक में जो कोई भी मनुष्य धर्म से विचलित हो उसे सनातन धर्म पर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबल से परास्त करके दंड दो. यह प्रतीज्ञा करो कि मैं मन, वाणी और कर्म द्वारा भूतलवासी ब्रह्म के आदेश का निरंतर पालन करूंगा….कभी स्वच्छंद नहीं होऊंगा. ब्राह्मण मेरे लिए सदैव अदंडनीय होंगे तथा मैं संपूर्ण जगत को वर्णसंकरता और धर्मसंकरता से बचाऊंगा.’2 

पिता की हत्या से डरे पृथु ने, ऋषिगणों के आदेशानुसार प्रतिज्ञा ली—’‘नरश्रेष्ठ महात्माओ! महाभाग ब्राह्मण मेरे लिए सदैव वंदनीय होंगे.’3 पृथु द्वारा ब्राह्मणों के आगे समर्पित करते ही धर्मसत्ता और राजसत्ता का ऐसा गठजोड़ बना जो पीढ़ियों तक चलता रहा. ब्राह्मणों ने जो दंड उनके पूर्वज वेन को दिया था, उसकी स्मृतियां राम के मन में अवश्य ही रही होंगी. इसलिए वे ब्राह्मणों के आदर्श आज्ञाकारी बने रहने को ही श्रेय मानते हैं.

महाभारत और रामायण दोनों में जातियां हैं. वर्ण-व्यवस्था का महिमामंडन है. रामराज्य में शूद्रों के जीवन, उनके सुख-दुख का वर्णन नहीं है. शूद्र केवल सीता पर लांछन लगाने के लिए उपस्थित होता है. उसकी भूमिका कथानक को विस्तार देने के लिए है. पूरी रामायण में राम के देवत्व को लेकर कोई चुनौती नहीं है. यहां तक कि राम के साथ वैर-भाव रखने वाले रावण और कुंभकरण जैसे महान योद्धा भी उनके देवत्व को चुनौती नहीं देते. वे केवल इसलिए राम के विरुद्ध युद्धरत हैं ताकि उनके हाथों से मृत्यु का वरण कर, अपने पुराने शापों से मुक्ति पा सकें. कृष्ण की एक विशेषता उनका सखा-भाव है. इसमें अर्जुन और सुदामा ही नहीं ब्रज के सभी गोप-गोपियां सम्मिलित हैं. दूसरी ओर राम इतने ‘बड़े’ हैं कि उनके साथ मैत्री-भाव संभव ही नहीं है. हनुमान, सुग्रीव आदि को वे मित्र कहें तो इसे उनकी उदारता बताया जाता है. यदि हनुमान, सुग्रीव आदि खुद को राम का मित्र समझने लगें तो यह उनकी धृष्टता होगी. वह एक तरह से राजा को सर्वाधिकार संपन्न, यहां तक कि निरंकुश बना देने का षड्यंत्र था. ऐसी निरंकुशता जो सिवाय ब्राह्मण के किसी पर भी बरस सकती थी. यहां तक कि रावण भी इसका अपवाद नहीं है. इसलिए कि उसके पूर्व जन्म की कथाएं गढ़कर और मृत्योपरांत स्वर्ग भेजकर, रामकथा लेखक उसकी भरपाई कर देता है. शूद्र मनीषी शंबूक का क्या हुआ, जिन्हें राम ने अपने हाथों से मौत के घाट उतारा था. अगर राम के हाथों से मरने पर स्वर्ग प्राप्ति होती है तो शंबूक को भी स्वर्ग मिलना चाहिए था. लेकिन राक्षस होने के बावजूद ब्राह्मण कुलोत्पन्न रावण को जो सुविधा प्राप्त है, वह शंबूक को नहीं मिल पाती. इसलिए उनके उनके पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद को लेकर रामायण में कोई अंतर्कथा नहीं है.

राम की अपेक्षा कृष्ण का चरित्र बहुआयामी है. उन्हें 16 कलाओं से संपन्न माना गया है. वे प्रबुद्ध हैं, कूटनीतिज्ञ हैं. अर्जुन को असमंजस में देखकर गीता का उपदेश देते हैं. इसलिए अपने समय के खास बौद्धिकों की श्रेणी में भी आते हैं. इसके उलट राम बौद्धिक जीव नहीं हैं. वे हर जगह ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे उनका विवेक किसी ने हर लिया हो. राम का चरित्र ब्राह्मणवादी आकांक्षाओं के अनुरूप गढ़ा गया है. वे ब्राह्मणत्व के आगे न केवल स्वयं नतमस्तक हैं, अपितु जो भी उसके आड़े आता है, उसे बड़े से बड़ा दंड देने को सदैव तत्पर रहते हैं. बदले में ब्राह्मण उन्हें भगवान घोषित कर रहते हैं. कह सकते हैं कि राम की भगवत्ता उपहार में प्राप्त भगवत्ता है. जबकि कृष्ण ने अपनी भगवत्ता अपने बौद्धिक पराक्रम, संगठन-सामर्थ्य और यदुओं की संगठित राज्यशक्ति के बल पर स्वयं हासिल की थी. राजनीति के ज्ञान के लिए वे अपने परमशत्रु रावण के पास अवश्य जाते हैं, परंतु रावण से कुछ सीख पाए, इसमें संदेह है. रावण के राज्य में स्त्रियों का सम्मान था. वे राजकीय सेवा में थीं. अवसर पड़ने पर मंदोदरि रावण को सलाह देती है. उसे बुरा कर्म करने से बरजती है. यह सुविधा रघुकुल की स्त्रियों को प्राप्त नहीं थी. वे घर की शोभा मात्र थीं. केवल रनिवासों में आंसू बहाना जानती थीं. इतनी कोमलांगी कि रावण की दृष्टि पड़ते ही सीता का शील आहत हो जाता है, जिसके लिए उसे अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ा था.

कृष्ण का आदि विवरण ऋग्वेद में मौजूद है. वहां वे अनार्य यदु कबीले के महापराक्रमी योद्धा हैं. इंद्र का प्रभुत्व उन्हें स्वीकार्य नहीं है. ऋग्वेद में उन्हें ‘वृत्र, नमुचि, शंबर, शुष्ण, पणि आदि इंद्र के सात शत्रुओं में से एक माना गया है’(ऋ. 8/96/16). ‘द्रुतगामी कृष्ण अंशुमति(दृषद्वती) नदी तटवर्ती गूढ़ स्थान और विस्तृत प्रदेश में विचरण और सूर्य के समान अवस्थान करता है….इंद्र ने अपनी बुद्धि से उस दीप्तिमान, द्रुतगामी और घोर नाद करने वाले कृष्ण को खोजा तथा लोकहित में, बृहश्पति की सहायता से, कृष्ण और उसकी सेना का नाश किया.(ऋ. 8/96/14-15).4 आर्यों के लिए इंद्र इसलिए भी पूज्य है क्योंकि उसने केवल कृष्ण और उसकी सेनाओं को ही नहीं, उसकी गर्भवती स्त्रियों को भी नहीं छोड़ा—’‘जिस इंद्र ने ऋजिश्वा राजा के साथ कृष्ण नामक असुर की गर्भवती स्त्रियों को निहत किया था, हम उन्हीं शक्तिशाली इंद्र के निमित्त अन्न के साथ हवि एवं स्तुति अर्पित करें’(ऋ. 1/101/1).

ऋग्वेद में इंद्र के हाथों कृष्ण का वध दिखाया गया है. लेकिन संभावना यही है कि कृष्ण अपने यदु कबीले के साथ बच निकले थे. कदाचित इन्हीं स्मृतियों को भिन्न कथानक के माध्यम से महाभारत सहेजा गया है, जिससे कृष्ण के नाम के साथ ‘रणछोड़’ की उपाधि जुड़ जाती है. ‘रणछोड़’ होना कृष्ण के चरित्र का नकारात्मक लक्षण नहीं है. इसके माध्यम से वे दर्शाते हैं कि बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छोटे लक्ष्यों का बलिदान करना ही बुद्धिमानी है. ऋग्वैदिक रणछोड़ कृष्ण के नेतृत्व में; अथवा उनकी प्रेरणा से, कालांतर में गंगा-यमुना के घने, उपजाऊ और तराई क्षेत्र में महान सभ्यता विकसित हुई, जिसे भारतीय इतिहास में गंगा-जमुनी सभ्यता कहा जाता है. कुछ ही शताब्दियों में, संगठित गणशक्ति के बल पर उनकी गिनती भारत के महाशक्तिशाली राज्यों में होने लगी. इतनी कि आर्यों के लिए उनकी उपेक्षा संभव ही नहीं थी. संस्कृतियों के सम्मिलन के दौर में, आर्यों को यदुनायक कृष्ण को भगवान के रूप में स्वीकारना ही पड़ा. क्या उन्होंने सचमुच कृष्ण के चरित्र के उदात्त पक्षों को ज्यों की त्यों स्वीकार लिया था? उत्तर है, नहीं.

महाभारत में कृष्ण का चरित्र उनके ऋग्वैदिक चरित्र से भिन्न है. गीता में वे वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं. अवतार घोषित करने की यह अनिवार्य शर्त थी. दरअसल ब्राह्मणों ने कृष्ण को अवतार तो माना, मगर उनके चरित्र-हनन में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसके लिए ब्रह्मवैवर्त्त पुराण को देखा जा सकता है. जिसमें कृष्ण को स्त्री-लोलुप और लंपट व्यक्ति के रूप में किया है, जो अनेक स्त्रियों के साथ संसर्ग करता है. बाद की रचनाओं को ‘गीत गोविंद’ भी है. यहां कुछ लोग कह सकते हैं कि कृष्ण योगेश्वर हैं. गोपियों के साथ उनका व्यवहार समर्पण की पराकाष्ठा है. सवाल यह है क्या यही छूट वे राम के चरित्र-चित्रण में ले सकते थे? ब्राह्मण लेखकों की चालाकी का यहीं अंत नहीं होता. उन्होंने कृष्ण को तो ईश्वर का दर्जा तो दिया, लेकिन यादव कृष्ण का वंशज होने का दावा न कर सकें, इसके लिए महाभारत में एक आख्यान जोड़ा गया. उसके अनुसार सारे यादव मूर्खों की तरह ही आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं.

यदुओं के प्रति ब्राह्मण लेखकों की ईर्ष्या रामायण में भी नजर आती हैं. याद करें, वह प्रसंग जब राम लंका पर चढ़ाई करते समय समुद्र से रास्ता मांगते हैं. समुद्र द्वारा निवेदन को अनसुना करने पर वे कुपित होकर वाण-संधान कर लेते हैं. घबराया हुआ समुद्र तत्क्षण हाजिर होकर क्षमा-याचना करते हुए अपनी मजबूरी बताता है. इसपर राम तने हुए वाण को तूणीर में वापस लेने से इन्कार करते हुए कहते हैं—’‘हे समुद्र! मेरा वाण अमोध है. मैं इसे वापस नहीं ले सकता.’ उस समय समुद्र के मुंह से कहलवाया गया है—’‘उत्तर दिशा में द्रुमकुल्य नामक एक विख्यात देश है. वहां आभीर(अहीर) आदि जातियों के बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं. उनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं. वे सबके सब पापी और लुटेरे हैं. वे लोग मेरा जल पीते हैं. उन पापाचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मैं सह नहीं सकता. अपने इस उत्तम वाण को वहीं सफल कीजिए.’ समुद्र के कहने पर राम उस अत्यंत प्रज्जवलित वाण को बताई हुई दिशा में छोड़ देते हैं. यदुओं के प्रति इस ईर्ष्या का कारण क्या केवल उनकी जाति अथवा ऋग्वेद-कालीन वैर-भाव की स्मृतियां थीं? क्या इसके कुछ और कारण भी खोजे जा सकते हैं?

गौतम बुद्ध से पहले भारत में 16 महाजनपद अस्तित्व में थे, जहां गणतांत्रिक पद्धति से शासन चलता था. उन महाजनपदों में से एक वृष्णि संघ का केंद्र मथुरा था, जिसके मुखिया शूरसेन थे. बुद्धकाल में तत्कालीन भारत के सबसे बड़े और शक्तिशाली लिच्छिवी गणतंत्र की राजधानी वैशाली थी. मगध सम्राट अजातशत्रु की निगाह वैशाली की समृद्धि पर थी. वह उसपर अधिकार करना चाहता था. सलाह के लिए वह गौतम बुद्ध के पास पहुंचा. तब गौतम बुद्ध ने उससे कहा था कि जब तक लिच्छिवीगण अपने फैसले मिल-जुलकर करते हैं, उनके बीच कोई मतांतर नहीं है, तब तक उन्हें पराजित कर पाना असंभव है. अजातशत्रु लौट जाता है. बाद में वह अपने मंत्री वस्सकार को वैशाली भेजता है. जो छद्मरूप में वहां रहकर लिच्छिवियों में फूट डालने का काम करता है. उसके बाद अजातशत्रु की विजय संभव हो पाती है. महाभारत में यदुओं(वृष्णि) को आपस में लड़ते-झगड़ते दिखाकर, महाभारत लेखक का उद्देश्य गणतांत्रिक प्रणाली की निरर्थकता को भी सिद्ध करना था. क्योंकि बिना उसके ‘धर्मराज्य’ के मिथ की स्थापना संभव ही नहीं थी. गौरतलब है कि महाभारत का मूल कथानक भले ही ईसा से कुछ शताब्दी पुराना हो, लेकिन उसमें लगातार संशोधन होता रहा. रामायण और महाभारत को उनका वर्तमान स्वरूप गुप्तकाल में, या कदाचित उसके भी बाद प्राप्त हुआ है.

ब्राह्मणों के छल का शिकार केवल कृष्ण हुए हों, यह बात नहीं है. स्वयं महादेव भी उनके ऐसे ही षड्यंत्र का शिकार हैं. शिव अनार्यों के देवता हैं. सिंधु सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त मूर्तियां बताती हैं कि वे सिंधुवासियों के भी आराध्य रहे होंगे. वहां वे पाशुपत हैं. कबीलों के सर्वमान्य मुखिया हैं. आर्यों और अनार्यों के बीच समन्वय की प्रक्रिया के फलस्वरूप शिव को त्रिदेवों में स्थान मिला. सिंधु सभ्यता की आपेक्षिक प्राचीनता का सम्मान करते हुए उन्हें आदिदेव भी माना गया. सवाल हैं कि समन्वयीकरण के दौरान शिव तथा उनके अनुयायियों को क्या वही मान-सम्मान प्राप्त हुआ, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे? उन्हें महाविनाश का देवता ही क्यों स्वीकारा गया? शिव-वाद्य डमरू तथा उनके तांडव के क्या और भी निहितार्थ हो सकते हैं? ‘भोला’ कहकर शिव का उपहास उड़ाना क्या उनकी देवताओं और असुरों के प्रति समदृष्टि, उनके न्याय-भाव की उपेक्षा करना नहीं है?

गौरतलब है कि सिंधु सभ्यता का क्षेत्रफल करीब नौ लाख वर्ग किलोमीटर तक विस्तृत था. शिव उन सभी के आराध्य थे. जबकि ब्रह्मा और विष्णु आक्रामक कबीलों के रूप में आए आर्यों की मानस कल्पना थे. समन्वयीकरण की आवश्यकता के चलते आर्य लेखकों ने उन्हें त्रिदेवों में स्थान दिया, मगर बड़ी चतुराई से उन्हें भंगैड़ी, नशाखोर और यायावर सिद्ध कर दिया. शिव की उदारता को भी, यह कहकर कि वे असुरों को भी वैसे ही वरदान लुटाते हैं, जैसे देवताओं को—नकारात्मक रूप में देखा गया. यही नहीं उनके समर्थक कबीलों को भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहकर अपमानित किया जाता है. नशाखोर और यायावर होने के कारण के शिव शासन करने के अयोग्य हैं. इसलिए उन्हें हमेशा के लिए कैलाश पर ठहराकर अवतारों के माध्यम से राज्य करने की जिम्मेदारी विष्णु को सौंप दी गई.  लेकिन लोकशक्ति तो हर युग में सर्वोपरि रही है. वह भड़क जाए तो बड़ी से बड़ी सत्ताएं डोल जाती हैं. त्रिदेवों में यह शक्ति न तो ब्रह्मा के पास थी, न विष्णु के पास. शिव के पीछे खड़ी लोकशक्ति का भय ही था जिससे ब्राह्मण उन्हें विनाश के देवता का दर्जा देते हैं. डमरू कबीलों को युद्ध या जनसभा के लिए एकजुट करने का वाद्य रहा होगा; और तांडव लोकशक्ति को युद्ध के लिए जाग्रत करने की शैली. शिव की तीसरी आंख के माध्यम से सृष्टि के जन्म और विनाश के मिथ गढ़े जाते रहे.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. पृथु की कथा : ठाकुर प्रसाद सिंहhttps://www.hindisamay.com/content/838/4/-कहानी-कथा-संस्कृति-खंड-दोकथा-भूमि–संपादन-कमलेश्वर-उर्वशी-और-पुरुरवा.cspx

2. महाभारत, शांतिपर्व, 59/103-108

3. महाभारत, शांतिपर्व, 59/109

4. हिंदी ऋग्वेद, रामगोविंद त्रिवेदी, इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग, पृष्ठ -1057