क्रांतिकारी कवि, लेखक, नाटककार और समाजसुधारक : अन्नाभाऊ साठे

विशेष रुप से प्रदर्शित

आगे बढ़ो! जोरदार प्रहार से दुनिया को बदल डालो। ऐसा मुझसे भीमराव कह कर गए हैं। हाथी जैसी ताकत होने के बावजूद गुलामी के दलदल में क्यों फंसे रहते हो। आलस त्याग, जिस्म को झटककर बाहर निकलो और टूट पड़ो।1                                                                

                                                    अन्नाभाऊ साठे

अन्नाभाऊ साठे कौन थे, क्या थे? कहां के थे? बहुत कम लोग जानते हैं। खासकर हम हिंदी वालों में। ‘अन्ना’ नाम सुनकर हमारे मस्तिष्क में सिर्फ अन्ना हजारे की तस्वीर बनती है। क्योंकि निहित स्वार्थ के अनुरूप खबरें गढ़ने वाला पूंजीवादी मीडिया, इस नाम को किसी न किसी बहाने बार-बार हमारे बीच ले आता है। सुनकर शायद हैरानी हो कि अन्नाभाऊ से जुड़े एक प्रश्न ने नेहरू जी को भी उलझन में डाल दिया था। उन दिनों रूस और भारत की गहरी मैत्री थी। नेहरू जी वहां पहुंचे हुए थे। यात्रा के बीच एक व्यक्ति ने अकस्मात पूछ लियाᅳ‘आपके यहां गरीबों और वंचितों की कहानी कहने वाला एक कलाकार और समाज सुधारक अन्नाभाऊ साठे है….कैसा है वह?’

नेहरू जी चुप्प। उन्होंने ऐसे किसी अन्नाभाऊ साठे के बारे में नहीं सुना था। देश लौटे। यहां पता लगाना शुरू किया। पर मुश्किल। काफी कोशिश के बाद पता चला कि मुंबई की चाल में ऐसा ही आदमी रहता है। कद पांच फुट, रंग तांबई, बदन इकहरा। आंखों में चमक। सीधे दिल में उतर जाने वाली तेज, जोशीली आवाज। लिखता, गाता-बजाता, तमाशे करता है। मजदूर आंदोलनों में हिस्सा लेकर उनकी बात उठाता है। बोलने के लिए खड़ा होता है तो बड़ी से बड़ी भीड़ में भी सन्नाटा छा जाता है। लोकप्रियता ऐसी कि तमाशा करे तो दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ता है। अमीरी-गरीबी के बीच भारी अंतर को वह मार्क्सवादी नजरिये से देखता है। लेकिन जातिवाद और छूआछूत की व्याख्या के समय उसे सिर्फ आंबेडकर याद आते हैं। जो सामाजिक न्याय के लिए वर्ग-क्रांति को आवश्यक मानता है।

मराठी साहित्य और कला-जगत के शिखर पुरुष अन्नाभाऊ साठे का जन्म 1 अगस्त 1920 को महाराष्ट्र के सांगली जिले की वालवा तहसील के वाटेगांव के मांगबाड़ा में हुआ था। उनके बचपन का नाम तुकाराम था। पिता का नाम भाऊराव और मां का नाम था बालूवाई। जाति थी मांग(मातंग)। अछूत और देश की सर्वाधिक विपन्न जातियों में से एक, जिसका कोई स्थायी धंधा तक नहीं था। पेट भरने के लिए उस जाति के सदस्य शादी-विवाह, पर्व-त्योहार के अवसर पर ढोल और तुरही बजाते। नाच-गाकर लोगों का मनोरंजन करते। रस्सी बुनते। उससे जो आय हो जाती उससे जैसे-तैसे गृहस्थी चलाते थे। लेकिन ये काम हमेशा तो मिलने वाले नहीं थे। इसलिए बाकी समय में वे मेहनत-मजदूरी वाला कोई भी काम कर लेते थे। अछूत होने के कारण गांव में रहने की मनाही थी। सो गांव-बाहर रहते। चैन वहां भी नहीं था। गांव में जब भी कोई अपराध होता तो शक ‘मांगबाड़ा’ पर ही जाता। शर्म की बात यह कि मानव-मात्र के अधिकारों की सुरक्षा का दावा करने वाली औपनिवेशिक सरकार ने पूरी ‘मांग’ जाति को ‘क्रिमिनल ट्राइव एक्टᅳ1871’ के अंतर्गत अपराधी घोषित किया हुआ था। कुछ ‘समझदार’ किस्म के ग्रामीण किसी ‘मांग’ को ही गांव की चौकीदारी सौंप देते थे। कहीं-कहीं यह कहावत भी चलती थी कि मांग के घर में आटे का बर्तन भले खाली हो, दीवार पर बंदूक जरूर टंगी होती है।  

अन्ना के पिता मुंबई में एक अंग्रेज के घर माली का काम करते थे। बाकी परिवार गांव में रहता था। भाऊराव नौकरी करते थे, इस कारण बाकी सजातीय परिवारों की अपेक्षा उनकी आर्थिक हैसियत थोड़ी अच्छी थी। फिर भी जीवन संघर्षमय था। भाऊराव बेटे को पढ़ाना चाहते थे। एक बार छुट्टी लेकर गांव पहुंचे तो अन्ना की मां ने उनका स्कूल में दाखिला कराने की सलाह दी। लेकिन स्कूल मास्टर कुलकर्णी ‘अपराधी’ जाति के बालक को दाखिला देने को तैयार न था। काफी अनुनय-विनय के बाद वह राजी हुआ। फिर भी जाति-द्वेष बना रहा। अपमान और तिरस्कार भरे माहौल में अन्नाभाऊ ने कुछ दिन जैसे-तैसे काटे। शीघ्र ही उनका स्वाभिमानी मन वहां से ऊब गया। आखिर प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले ही, स्कूल को हमेशा के लिए अलविदा कह, वे जीवन की पाठशाला में भर्ती हो गए। उसके बाद कुछ दिन यायावरी और सिर्फ यायावरी चली। जो सीखा जीवनानुभवों से सीखा। जितना सीखा उतना समाज को लगातार लौटाते भी रहे।

उन दिनों मनोरंजन का प्रमुख साधन गाना-बजाना था। अन्ना का दिमाग तेज था। याददाश्त गजब की। बचपन से ही अनेक लोकगीत उन्हें उन्हें कंठस्थ थे। वे गा-बजाकर अपना और दूसरों का मनोरंजन करते। खेल ही खेल में यदा-कदा कुछ नया भी रच देते थे। यही नहीं, वे तलवार, भाला, दांडपट्टा, कटार आदि चलाने में भी सिद्धहस्त थे। इन हथियारों का प्रयोग अवसर विशेष पर शौर्यकला का प्रदर्शन करने के लिए किया जाता था। असल में वे सामंतों के मनोरंजन का साधन थे। वैभव और शौर्य लुटा चुके जमींदार, सामंत शौर्यकलाओं का मंचन देखकर ही आत्मतुष्ट हो जाया करते थे। बात-बात पर न्याय, नैतिकता, धर्म और संस्कृति की दुहाई देने वाले पंडितजन, जाति के नाम पर आदमी-आदमी में भेद के सवाल पर चुप्पी साध जाते थे।

उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन की गर्मी थी। क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी आई हुई थी। अंग्रेजों का भारतीयों पर संदेह बढ़ता ही जा रहा था। ऊपर से 1930 के दशक की भीषण आर्थिक मंदी का असर। एक दिन भाऊराव को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। हताश-निराश भाऊराव गांव पहुंचे। यह सोचकर कि वहां जैसे बाकी लोग जीते हैं, वैसे वे भी दिन बिता लेंगे। लेकिन गांव पहुंचते ही एक नई आफत से सामना हुआ। उस वर्ष पूरे महाराष्ट्र में सूखा पड़ा था। अकाल जैसे हालात बन चुके थे। उन दिनों मुंबई औद्योगिक नगरी के रूप में तरक्की कर रही थी। लोग रोजगार की तलाश में उसकी ओर आ रहे थे। रोजी-रोटी के सवालों से जूझ रहे भाऊराव साठे ने भी मुंबई जाने का फैसला कर लिया। मगर किराये के लिए जरूरी पैसे उनके पास न थे। बस मुंबई पहुंचने की ललक थी, जो देखते ही देखते उनका संकल्प बन गई। किराये का इंतजाम न हुआ तो परिवार को साथ ले, एक दिन पैदल ही मुंबई की ओर निकल पड़े। गांव-गांव भटकते, खाते-कमाते, पैदल चलते-चलते पूरा परिवार किसी तरह पूना पहुंचा। वहां वे लोग एक ठेकेदार के लिए पत्थर तोड़ने का काम करने लगे। अन्ना भी काम में उनकी मदद करता। लगातार मेहनत से वह कमजोर पड़ने लगा था। ठेकेदार अपने मजदूरों को बंधुआ समझता था। आखिरकार एक पठान की मदद से भाऊराव परिवार को लेकर वहां से निकल लिए। आगे फिर वही पैदल यात्रा। वही संघर्ष और जहालत से भरा जीवन। वाटेगांव से मुंबई करीब 255 किलोमीटर था। इस दूरी को पैदल पाटने में ही दो महीने गुजर गए।2

रास्ते में कुछ कड़वे अनुभव भी हुए। एक बार की बात। चलते-चलते अन्ना को भूख लग आई थी। सामने पके आमों से लदा एक पेड़ देखा तो भूख और भड़क उठी। उसी बेचैनी में उन्होंने पेड़ के मालिक से पूछे बगैर दो-चार आम तोड़ लिए। अचानक मालिक ने आकर उन्हें दबोच लिया। घबराए अन्ना ने आम वापस लौटाने की पेशकश की, लेकिन वह माना नहीं। डरा-धमकाकर आमों को दुबारा डाल से लटकाने की जिद करने लगा।3 इस तरह की अपमानजनक घटनाओं से जन्मे आक्रोश का असर रचनात्मक निखार के साथ अन्नाभाऊ की करीब-करीब हर रचना में है। उनकी बहुप्रसिद्ध कहानी ‘खुलांवादी’ का एक पात्र कहता हैᅳ

‘ये मुरदा नहीं, हाड़-मांस के जिंदा इंसान हैं। बिगडै़ल घोड़े पर सवारी करने की कूबत इनमें है। इन्हें तलवार से जीत पाना नामुमकिन है।’

मुंबई पहुंचते समय तुकाराम उर्फ अन्नाभाऊ की उम्र महज 11 वर्ष थी। गांव में जहां अछूत होने के कारण कोई काम न देता था, मुंबई में काम की कमी न थी। सो घर चलाने के लिए मुंबई में अन्ना ने कुलीगिरी की। होटल में बर्तन धोने से लेकर वेटर तक का काम किया। घरेलू नौकर रहे, कुत्तों की देखभाल के लिए एक अमीर की चाकरी की। घर-घर जाकर सामान बेचा। कुछ और काम न मिलने पर बूट-पालिश पर हाथ भी आजमाया। इस बीच फिल्म देखने का शौक पैदा हुआ। मूक फिल्मों का जमाना था। पर शौक ऐसा कि अपनी मामूली आमदनी का बड़ा हिस्सा टिकट खरीदने पर खर्च कर देते थे। जीवन-संघर्ष के बीच अक्षर जोड़ना और पढ़ना-लिखना सीखा। फिल्मी पोस्टरों और दुकानों के आगे लगे होर्डिंग्स से पढ़ना-लिखना सीखने में मदद मिली। चेंबुर, कुला, मांटुगा, दादर, घाटकोपर वगैरह….मुंबई में काम के अनुसार उनके ठिकाने भी बदलते रहे।

अन्ना भाऊ के निकट रिश्तेदार बापू साठे एक ‘तमाशा’ मंडली चलाते थे। गाने-बजाने का शौक अन्ना को उन्हीं तक ले गया। वे ‘तमाशा’ से जुड़ गए। इस बीच एकाएक ऐसी घटना हुई जिससे अन्नाभाऊ के सोचने का ढंग ही बदल गया। तमाशा मंडली को एक गांव में कार्यक्रम करना था। तमाशा शुरू होने से पहले उसके मंच पर महाराष्ट्र में ‘क्रांतिसिंह’ के नाम से विख्यात नाना पाटिल वहां पहुंचे। वहां उन्होंने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों का खुलासा करने वाला जोरदार भाषण किया। मिलों में हो रहे शोषण के लिए पूंजीपतियों और सरमायेदारों की कारगुजारी पर भी बात की। भाषण सुनने के बाद अन्ना भाऊ को अब तक का गाया-सुना अकारथ लगने लगा। छुटपन में वे ‘भगवान विठ्ठल’ की सेवा में अभंग गाया करते थे। उनमें जातीय ऊंच-नीच को धिक्कारा गया था। बराबरी का संदेश भी था। अब समझ में आया कि गरीबी सामाजिक समानता की राह में सबसे बड़ी बाधक है। आर्थिक असमानता केवल नियति की देन नहीं है। उसका कारण वे लोग हैं जो देश और समाज के धन पर कुंडली मारे बैठे हैं। यह भी समझ में आया कि गाने-बजाने का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। उससे सोये हुए समाज को जगाया भी जा सकता है। उसी दिन अन्ना के ‘लोकशाहिर’(लोककवि) अन्ना भाऊ बनने की नींव पड़ी। समाज में अमीर-गरीब की खाई को वे कम्युनिस्ट विचारधारा की कसौटी से परखने लगे। यही उन्हें कालांतर में कम्युनिस्ट पार्टी तक ले गया। 

तमाशा में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर अवसर मिला। ‘तमाशा’ में वे कोई भी वाद्य बजा लेते। किसी भी प्रकार की भूमिका कर लेते थे। निरंतर सीखने और नए-नए प्रयोग करने की योग्यता ने उन्हें रातों-रात तमाशा मंडली का महानायक बना दिया। कुछ दिनों बाद अपने दो साथियों के साथ मिलकर अन्ना ने 1944 में ‘लाल बावटा कलापथक’(लाल क्रांति कलामंच) नामक नई तमाशा मंडली की शुरुआत की। जिसके तहत उन्होंने कई क्रांतिकारी कार्यक्रम पेश किए। उस समय तक देश में आजादी के प्रति चेतना जाग्रत हो चुकी थी। ‘तमाशा’ जनता से संवाद करने का सीधा माध्यम था। ‘लाल बावटा’ के माध्यम से अन्नाभाऊ मजदूरों के दुख-दर्द को दुनिया के सामने लाते, लोगों को स्वतंत्रता का महत्त्व समझाते थे। इससे वे मजदूरों के बीच तेजी से लोकप्रिय होने लगे। अपनी मंडली को लेकर वे महाराष्ट्र के गांव-गांव तक पहुंचे। वहां लोगों को आजादी के लिए तैयार रहने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आवाह्न किया। लोग उन्हें ‘शाहिर अन्ना भाऊ साठे’ और ‘लोकशाहिर’ कहकर पुकारने लगे। 

आगे चलकर सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगा दिया। जिसके तहत ‘लाल बावटा’ को भी बंद करना पड़ा। लेकिन अन्ना भाऊ के भीतर छिपा कलाकार इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न था। उन्होंने अपने विचारों को लोकगीतों में ढालना आरंभ कर दिया। तमाशा मंडली छोड़ वे एक मिल में काम करने लगे। वहां मजदूरों की समस्याओं से सीधा परिचय हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति लगाव तो ‘क्रांतिसिंह’ नाना पाटिल का भाषण सुनने के बाद से ही था। मिल में मजदूरी करते हुए वे कम्युनिस्ट पार्टी के भी संपर्क में आए और उसके सक्रिय सदस्य बन गए। लोकगीतों के माध्यम से कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने लगे। पार्टी के लिए दरियां बिछाने से लेकर भाषण देने तक का काम किया। इसी बीच विवाह हुआ। लेकिन पहला विवाह ज्यादा जमा नहीं। दूसरा विवाह एक परित्यक्त स्त्री से किया। संतान भी हुई, लेकिन वह संबंध भी ज्यादा दिन टिक न सका।

उद्योगनगरी के रूप में पनपती मुंबई हजारों मजदूरों, किसानों की शरण-स्थली थी। गांव में गरीबी, बेरोजगारी और सामंती उत्पीड़न से त्रस्त मजदूर वर्ग बेहतर जीवन की आस में उसकी ओर खिंचे चले आते थे। उनके लिए वही एक उम्मीद थी। लेकिन बेतरतीव मशीनीकरण ने लोगों की समस्या में इजाफा किया था। एक ओर बड़ी-बड़ी स्लम बस्तियां उभर रही थीं, दूसरी ओर ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं। अमीर-गरीब के बीच निरंतर बढ़ते अंतराल से उन्हें लगने लगा था कि जिन सपनों के लिए उन्होंने अपना गांव-घर छोड़ा था, वे मुंबई आकर भी फलने वाले नहीं है। उस समय तक रूस को आजाद हुए करीब 25 वर्ष बीत चुके थे। अन्नाभाऊ सोवियत संघ की तरक्की के बारे में सुनते, प्रभावित होते। रूस की क्रांतिगाथाएं सुनकर मन उमंगित होने लगता। 1943 के आसपास उन्होंने स्तालिनग्राद को लेकर एक पावड़ा(शौर्यगीत) लिखा। उस पावड़े का अनुवाद रूसी भाषा में भी हुआ। उसके बाद तो अन्नाभाऊ की कीर्ति-कथा देश-देशांतर तक व्यापने लगी।

इस बीच उन्होंने कई उपन्यास और कहानियां लिखीं। कम्युनिस्ट पार्टी के साहित्य को पढ़ा। उन्हें समझ आने लगा कि सामाजिक और आर्थिक विकास परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। वगैर एक के दूसरे को साधना संभव नहीं। खासकर भारत जैसे समाजों में जहां जाति मजबूत सामाजिक संस्था के रूप में वर्षों से अपनी पकड़ बनाए हो। धर्म उसका समर्थन करता हो। लोग मानते हों कि वे वही हैं, जो उन्हें होना चाहिए। जहां तथाकथित ईश्वरीय न्याय को ही सर्वश्रेष्ठ न्याय माना जाता हो। बड़ा वर्ग मानता हो कि समाज में जो जहां, जैसा हैᅳसब ईश्वरेच्छा से है। भारतीय समाज में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब की बेशुमार खाइयां हैं। बावजूद इसके वर्ग-संघर्ष के लिए यह सबसे अनुपजाऊ धरा है। लोगों की यथास्थितिवादी मनोवृति, परिवर्तन की हर संभावना को विफल कर देती है। जब कभी उसके विरुद्ध आवाज उठी, धार्मिक संस्थाएं लोगों को नियतिवाद का पाठ पढ़ाने के लिए सामने आ गईं। गौतम बुद्ध ने जाति को चुनौती दी। उनका आभामंडल इतना प्रखर था कि उनके रहते प्रतिक्रियावादी शक्तियां वर्षों तक सिर छुपाए रहीं। उनके जाते ही देश में फिर ब्राह्मणवादी साहित्य की बाढ़-सी आ गई। नियतिवाद को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए पुराणों और स्मृतियों की रचना की गई। शताब्दियों के बाद संत कवियों ने जाति को ललकारा तो तुलसीदास अपनी रामचरितमानस लेकर आ गए। सामाजिक समानता का सपना शताब्दियों के लिए पुनः नेपथ्य में खिसक गया। धर्म जाति का सुरक्षा-कवच है। इस रहस्य से पर्दा उठा उनीसवीं शताब्दी में। नई शिक्षा और विचारों के आलोक में लोगों ने जाना कि वगैर धर्म को चुनौती दिए जाति से मुक्ति असंभव है। कि आर्थिक और सामाजिक समानता के लिए सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकलना जरूरी है। इस संबंध में सबसे पहली पुकार ज्योतिराव फुले की थी। पुकार क्या मानो मुक्ति-मंत्र था। उस मुक्ति-मंत्र को सिद्धि-मंत्र में बदला डाॅ. आंबेडकर ने। जाति का दंश डाॅ. आंबेडकर ने भी झेला था और अन्नाभाऊ ने भी। साम्यवादी चेतना जहां अन्नाभाऊ के लोकगीतों को ओज से भरपूर बनाती थी, वहीं आंबेडकर से उन्हें हालात से टकराने की प्रेरणा मिलती थी। मार्क्स और आंबेडकर, अन्नाभाऊ के लिए दोनों ही प्रेरणास्रोत थे।

एक क्रांतिधर्मी कलाकार की तरह अन्नाभाऊ ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन तथा गोवा मुक्ति आंदोलन के लिए काम किया। जनता के हित में एक कलाकार के रूप में वे हर आंदोलन में आगे रहे। उनके लिखे पावड़े, लावणियां मुक्ति आंदोलनों को ऊर्जा प्रदान करते रहे। 1945 में अन्ना भाऊ ने साप्ताहिक ‘लोकयुद्ध’ के लिए पत्रकार के रूप में काम करना आरंभ किया। अखबार साम्यवादी विचारधारा को समर्पित था। आम आदमी के संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके अभावों को वे एक पत्रकार के रूप में लगातार उठाते रहे। इसने उन्हें जनसाधारण के बीच नायकत्व प्रदान किया। अखबार के लिए काम करते हुए उन्होंने अक्लेची गोष्ट, खाप्पया चोर, मजही मुंबई जैसे नाटक लिखे। सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगाया तो अन्नाभाऊ ने ‘लाल बावटा’ के लिए लिखे गए नाटकों को आगे चलकर उन्होंने लावणियों और पावड़ा जैसे लोकगीतों में बदल दिया। तमाशे में वे अकेले गाते थे, लोकगीत बनने के बाद वे जन-जन की जुबान पर छाने लगे। अन्नाभाऊ की रचनाओं पर 12 फिल्में बनीं जो सफल मानी जाती हैं।

निरंतर संघर्षमय जीवन जीते हुए अन्नाभाऊ ने 14 लोकनाटक, 35 उपन्यास और 300 से ऊपर कहानियां लिखी। लगभग 250 लावणियां उन्होंने लिखीं। लगभग छह फिल्मों की पटकथाएं और यात्रा वृतांत लिखा। उनकी लिखी 14 कहानियों/उपन्यासों का फिल्मांकन भी हुआ। यात्रा वृतांत ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत होने का गौरव प्राप्त है। उनके उपन्यासों और नाटकों की देश-विदेश में खूब चर्चा हुई। 1959 में प्रकाशित ‘फकीरा’ उपन्यास को खूब सराहा गया। इसे उन्होंने डाॅ. आंबेडकर को समर्पित किया था। यह उपन्यास इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी की शौर्यकथा है, जिसमें उसका सामाजिक जीवन भी समाया हुआ है। इस उपन्यास का 27 देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। 1961 में इसे महाराष्ट्र सरकार के शीर्ष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी दूसरी रचनाएं भी रूसी, फ्रांसिसी, चेक, जर्मनी आदि भाषाओं में अनूदित हुईं। अन्नाभाऊ द्वारा लिखित पुस्तकों में फकीरा, वारण का शेर, अलगुज, केवड़े का भुट्टा, कुरूप, चंदन, अहंकार, आघात, वारणा नदी के किनारे, रानगंगा आदि उपन्यास; चिराग नगर के भूत, कृष्णा किनारे की कथा, जेल में, पागल मनुष्य की फरारी, निखारा, भानामती, आबी आदि 14 कहानी संग्रह; इनामदार, पेग्यां की शादी, सुलतान आदि नाटक हैं। उनके लिखे लोकनाटकों में तमाशा(नौटंकी), दिमाग की काहणी, खाप्पया चोर, देशभक्ते घोटाले, नेता मिल गया, बिलंदर पैसे खाने वाले, मेरी मुंबई, मौन मोर्चा आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं, जिनमें फकीरा, सातरा की करामात, तिलक लागती हूं रक्त से, पहाड़ों की मैना, मुरली मल्हारी रायाणी, वारणे का बाघ तथा वारा गांव का पाणी प्रमुख हैं।

मुंबई में रहते हुए अन्नाभाऊ ने तरह-तरह के काम किए, पैसा भी कमाया, लेकिन गरीबी से पीछा नहीं छूटा। वे 22 वर्ष तक घाटकोपर की खोलियों में रहे। यहां एक सवाल उठ सकता है। कई बड़े अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं से अन्नाभाऊ का संपर्क था। उनकी कहानियों पर फिल्में बन चुकी थीं। उपन्यास ‘फकीरा’ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका था। बावजूद इसके क्यों अपने लिए ठीक-ठाक घर का इंतजाम न कर सके? इस तरह की जिज्ञासा अन्नाभाऊ के एक मित्र को भी थी। वर्षों तक घाटकोपर की चाल में रहते देख उसने अन्नाभाऊ से पूछा थाᅳ

‘आपकी अनेक पुस्तकों का देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। फिल्मों की पटकथाएं भी आपने लिखी हैं। आपकी कई कहानियों और उपन्यासों पर फिल्में बन चुकी हैं। ‘फकीरा’ के रूसी भाषा में अनुवाद से रायल्टी भी मिली होगी। उससे आप बड़ा-सा बंगला क्यों नहीं बनवा लेते?’

इसपर अन्नाभाऊ ने हंसते हुए कहा थाᅳ

‘ठीक कहते हो। लेकिन बंगले में आरामकुर्सी पर बैठकर लिखते समय मैं गरीबी की सिर्फ कल्पना कर सकता हूं। गरीबी की पीड़ा और उसका दर्द तो भूखे पेट रहकर ही अनुभव किया जा सकता है।’ 

अनुभूति की इसी प्रामाणिकता के लिए अन्नाभाऊ ने गरीब-मजदूरों के बीच रहते थे। बिना किसी अहमन्यता, बगैर किसी विशिष्टताबोध के। 1968 में राज्य सरकार कुछ मेहरबान हुई। अन्नाभाऊ के रहने के लिए छोटा-सा घर उपलब्ध करा दिया गया। लेकिन गरीब मजदूरों के बीच, उन्हीं की तरह रहने वाले उस जिंदादिल इंसान को नया ठिकाना रास नहीं आया। एक साल के भीतर ही, 18 जुलाई 1969 को वह महान कलाकार मुंबई को हमेशा के लिए अलविदा कह, दुनिया से चला गय

1 अगस्त 2002 को भारत सरकार ने उनके 82वें जन्म दिवस पर डाक टिकट जारी किया। सरकार का यह प्रयास एक शाश्वत विद्रोही, प्रखर प्रतिभा को मूर्तियों में कैद कर देने जैसा ही माना जाएगा, क्योंकि दर्जनों सरकारी अकादमियां और सांस्कृतिक संस्थाएं होने के बावजूद अन्नाभाऊ के कृतित्व का एकांश भी हिंदी में उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप हिंदी के लेखक इस मराठी कला-संस्कृति और साहित्य की महानतम प्रतिभा के लेखकीय और कलात्मक अवदान से वंचित हैं।

अन्नाभाऊ की रूस यात्रा : एक सपने का सच होना

अन्नाभाऊ का जन्म सोवियत क्रांति के तीन वर्ष बाद हुआ था। किसी देश के बनने में तीन वर्ष की अवधि बहुत ज्यादा नहीं होती। इसलिए कह सकते हैं कि अन्नाभाऊ की जीवनयात्रा और सोवियत रूस की विकास यात्रा एक-दूसरे की सहगामी थीं। रूस रूपहले सपने की तरह अन्नाभाऊ की आंखों में बसता था। वे प्रायः सोचते, काश! श्रमिक क्रांति के बाद रूस के समाज में आए बदलावों को करीब से देख पाते। यह चाहत तब और प्रबल हो जाती जब रूस की शानदार प्रगति का कोई समाचार उन तक पहुंचता। रूस यात्रा की उनकी अभिलाषा कितनी गहरी थी, इसका वर्णन उन्होंने अपने यात्रा-वृतांत में स्वयं किया हैᅳ

‘मेरी अंतःप्रेरणा थी कि अपने जीवन में मैं एक दिन सोवियत संघ की अवश्य यात्रा करूंगा। यह इच्छा लगातार बढ़ती ही जा रही थी। मेरा मस्तिष्क यह कल्पना करते हुए सिहर उठता था कि मजदूर-क्रांति के बाद का रूस कैसा होगा। लेनिन की क्रांति और उनके द्वारा मार्क्स के सपने को जमीन पर उतारने की हकीकत कैसी होगी! कैसी होगी वहां की नई दुनिया, संस्कृति और समाज की चमक-दमक! मैं 1935 में ही कई जब्तशुदा पुस्तकें पढ़ चुका था। उनमें से ‘रूसी क्रांति का इतिहास’ और ‘लेनिन की जीवनी’ ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। इसलिए मैं रूस के दर्शन को उतावला था।’4

रूस यात्रा से पहले उन्होंने दो बार पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। पहली बार उनके आवेदन को बगैर कारण बताए निरस्त कर दिया गया था। असल में सरकार अन्नाभाऊ जैसे प्रतिभा-संपन्न कलाकार को, जिसकी लोकमानस पर गहरी पकड़ हो, जो जनता से उसी की भाषा में संवाद करने का हुनर जानता होᅳरूस भेजने से घबराती थी। इस बारे में जब उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री से संपर्क किया, तो उनका उत्तर भी तिरस्कार भरा थाᅳ‘तुम हमारे प्रति शत्रु-भाव रखते हो। यह हमारी उदारता है जो तुम अभी तक बाहर हो; अन्यथा तुम जेल की सलाखों के पीछे होते।’5 शत्रु-भाव! माने जनवादी चेतना। अन्नाभाऊ जनता से उसी भाषा में संवाद करने में निपुण थे। अपने कई लोकगीतों में अन्नाभाऊ ने मुंबई में बसे श्रमिक वर्ग के जीवन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण कर, उनके स्वप्न-भंग की स्थिति को दर्शाया था। ऐसी रचनाएं किसी भी गैरजिम्मेदार सरकार के लिए बेचैनी का कारण बन सकती थीं।

प्रसंगवश उनकी दो लावणियों का उल्लेख किया जा सकता है। ‘मुंबईची लावणी’(मुंबई की लावणी) तथा ‘माझी मैना गावावीर राहिली’(मेरी प्रिया गांव में रहती है)। उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुंबई में औद्योगिकीकरण की शुरुआत हुई थी। उससे रोजगार की तलाश में गांवों से श्रमिकों और कामगारों का पलायन आरंभ हुआ। उनमें से अधिकांश वे थे जिन्हें गांवों में भीषण गरीबी और सामंती उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। जो वहां रोजगार के अभाव में फाकाकशी का जीवन जीते थे। सामंती उत्पीड़न से मुक्ति और उपयुक्त रोजगार की साध लेकर वे मुंबई पहुंचे थे। वहां पहुंचकर पता चला कि हालात में लगभग ज्यों के त्यों हैं। केवल उत्पीड़क चेहरों में बदलाव आया है। गांव में वे सामंती उत्पीड़न और जातिवाद का शिकार थे। शहर में जातिभेद ज्यादा अंतर नहीं आया है, जबकि सामंत की जगह पुलिस और कानून के नाम पर बनी संस्थाओं ने ले ली है। ‘मुंबईची लावणी’ में इसी पर कटाक्ष किया गया थाᅳ

‘‘मुंबई में शिखर पर मालाबार की पहाड़ियां हैं….वह इंद्रपुरी है, इंद्र देवता की नगरी….वह धनकुबेरों की बस्ती है….रात-दिन सुख में आकंठ डूबे रहने वाले श्रीमंत लोग वहां रहते हैं….दूसरी और परेल हैं, जहां गरीब, मजदूर, कबाड़ी, भिखारी डेरा डाले हुए हैं। वे रात-दिन पसीना बहाते हैं। कड़ी मेहनत के बाद जो मिल जाता है, उसे खा लेते हैं। तीन बत्ती, गोलपीठ और फोरस रोड पर, जिंदा रहने की कीमत पर, न जाने कितने शरीर रोज खरीदे-बेचे जाते हैं।’’

दूसरी लावणी ‘माझी मैना गावावीर राहिली’ में उन मजदूरों की विरह-वेदना और पीड़ा समाई थी, जो घर-परिवार को छोड़कर नए सपने और उम्मीदें लेकर मुंबई आए थे। वहां पहुंचकर वे स्वप्न-भंग की अवस्था में जी रहे थे। इंग्लेंड में अनियोजित मशीनीकरण से पनपी ऐसी ही विषमता ने कार्ल मार्क्स को भी उद्वेलित किया था, जिससे वे पूंजीवाद के विशद अध्ययन को उन्मुख हुए। फलस्वरूप दुनिया को ‘दि कैपीटल’ जैसा महान ग्रंथ प्राप्त हुआ था। गरीब-मजदूरों का दुख-दर्द देख अन्नाभाऊ का संवेदनशील मन आहत होता तो कहानी, उपन्यास और लोकगीतों के रूप में बाहर आता था। उनकी रचनाएं मुंबइया जीवन की हकीकत बयान करती थीं। ऐसा कलाकार लोगों के दिल पर भले ही राज कर ले, उस सरकार को, जिसमें श्रीमंतों का आधिक्य हो, कतई रास नहीं आता। अपने सरोकारों के कारण अन्नाभाऊ भी सरकार की आंखों की किरकिरी बने रहते थे।

बहरहाल, अन्नाभाऊ को रूस जाने का दूसरा अवसर 1948 में मिला था। इस बार उन्हें ‘विश्वशांति सम्मेलन’ के लिए आमंत्रित किया गया था। इस बार अभिनेता मित्र बलराज साहनी ने उनके लिए टिकटों का इंतजाम भी कर दिया था। लेकिन अन्यत्र व्यस्तता के कारण वे समय न निकाल सके। 1961 में अन्नाभाऊ के उपन्यास ‘फकीरा’(1959) को महाराष्ट्र सरकार का सर्वाेच्च सम्मान प्राप्त हुआ। उस समय तक परिस्थितियां थोड़ी अनुकूल होने लगीं थीं। सरकार के मन में भी कम्युनिस्टों के प्रति पूर्वाग्रह में कमी आई थी। इस बार ‘भारत-सोवियत सांस्कृतिक समिति’ ने उनकी रूस-यात्रा का कार्यक्रम बनाया। दोनों सरकारें यात्रा के लिए राजी थीं, इससे पासपोर्ट-वीसा जैसी समस्या न थी। मगर किराये के लिए पैसों की किल्लत पहले जैसी बनी थी। फिर भी इस बार हालात कुछ अलग थे। अन्नाभाऊ को रूस यात्रा का निमंत्रण मिलने का समाचार जैसे ही प्रकाशित हुआ, स्वयं अन्नाभाऊ के शब्दों में ‘रुपयों की मानो बौछार-सी होने लगी। देखते ही देखते आधे खर्च का इंतजाम हो गया।’ जनता की सहानुभूति देख, अपनी इस मान्यता, ‘जो कलाकार जनता के लिए जीता है, जनता उसके पीछे दीवार बनकर खड़ी होती हैᅳपर उनका विश्वास और भी दृढ़ हो गया।

मुंबई से दिल्ली के रास्ते रूस जाने के लिए जब वे जहाज में बैठे तो अपनी साधारण वेशभूषा के कारण बाकी यात्रियों के बीच अलग नजर आ रहे थे। इस बात का उन्हें एहसास भी था। लेकिन यात्रा के दौरान विमान में ऐसी घटना घटी जिससे उनका सारा मलाल जाता रहा। उन्होंने स्वयं लिखा हैᅳ

‘‘उस उड़ान में सम्मेलन में हिस्सा लेने रूस जा रहे, श्रीलंकाई प्रतिनिधि भी सम्मिलित थे। उन्हीं में से एक जो संसद संदस्य और कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य समाचारपत्र का संपादक थेᅳने मुझे पहचान लिया। उसी महीने साहित्यिक पत्रिका ‘मनोहर’ में मेरा सचित्र परिचय मेरे तमाशे ‘खाप्पया चोर’ के चित्र के साथ प्रकाशित हुआ था। विमान के उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद एक यात्री ने मुझे पहचान लिया। पत्रिका का अंक हवा में लहराते हुए उसने चुनौती दी कि ‘खाप्पया चोर’ को जो उड़ान के दौरान हवाई जहाज में ही मौजूद है, कौन पहचानेगा? उसके बाद यात्री उसे लेकर फुसफुसाने लगे। अंत में मुझे मेरे श्रीलंकाई मित्र के साथ पहचान लिया गया।’7

उस समय तक अन्नाभाऊ का दूसरा उपन्यास ‘चित्रा’ भी रूसी भाषा में अनूदित हो चुका था। इसके अलावा उनकी कई कहानियां भी अनूदित होकर रूस पहुंच चुकी थीं। जिनमें उनकी कहानी ‘सुलतान’ भी थी। ‘सुलतान’ एक कैदी पर आधारित कहानी थी, जिससे लेखक की मुलाकात अमरावती की सेंट्रल जेल में हुई थी। अन्नाभाऊ के रूस पहुंचने से पहले सुलतान वहां चर्चित हो चुकी थी। इसलिए अगले दिन के अखबारों की मुख्य खबर थीᅳ”मशहूर कहानी ‘सुलतान’ का लेखक रूस में।” अन्नाभाऊ का लिखा नाटक ‘स्तालिनग्राद’ भी वहां चर्चा का विषय था।

मास्को में उन्होंने होटल के वेटरों, माली, फोटोग्राफर, ड्राइवर, लिफ्ट आपरेटर से दोस्ती की, और वहां के जनजीवन के बारे में जानकारी हासिल की। लेनिनग्राद में उन्होंने संग्रहालय में चंद्रगुप्त मौर्य के कार्यकाल के अनेक सिक्के देखे। रूस में नेहरू की लोकप्रियता को दर्शाती एक घटना का उल्लेख उनके यात्रा-वृतांत में है। जो नेहरू के प्रति उनके दिल में छिपे सम्मान को दर्शाता हैᅳ

‘‘मैं होठों के बीच सिगरेट दबाए रेड स्कवायर से क्रेमलिन की ओर बढ़ रहा था। मेरे पास माचिस नहीं थी और मैं उसके लिए इधर-उधर देख रहा था। सहसा एक आदमी मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसने लाइटर से मेरी सिगरेट सुलगा दी। मेरे लिए वह अप्रत्याशित था।

‘क्या तुम भारतीय हो?’ उस आदमी ने पूछा।

‘जी हां….’ कहकर मैंने उसे धन्यवाद देना चाहा। लेकिन अगले ही पल उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और कहने लगाᅳ

‘कैसे हैं नेहरू जी?’

‘वह बिलकुल ठीक हैं,’ मैंने बताया, ‘आज वे यूएनओ में भाषण देने जा रहे हैं।’ सुनकर वह व्यक्ति बेहद प्रसन्न हुआ और नेहरू जी को धन्यवाद देता हुआ वहां से प्रस्थान कर गया।’’

‘भारत-रूस सांस्कृतिक समिति’ द्वारा रूस की यात्रा के लिए गठित प्रतिनिधिमंडल में अन्नाभाऊ सबसे साधारण और सामान्य दिखने वाले इंसान थे। परंतु रूस की यात्रा पूरी होते-होते अन्नाभाऊ के बारे में उनके सहयात्रियों की धारणा एकदम बदल चुकी थी। प्रतिनिधिमंडल में मद्रास निवासी गिटारवादक जैकोब जिम भी शामिल था। स्तालिनग्राद से अजरबेजान की राजधानी बाकू की ओर वायुयान से जाते समय जैकोब ने अन्नाभाऊ से कहा थाᅳ‘साठे जी, जब हम आपसे पालम एयरपोर्ट पर मिले तो सोचते थे कि आप इस देश से अनजान होंगे और हमारे बीच जम नहीं पाएंगे। लेकिन वह हमारी चूक थी। आप इस देश में बहुत प्रसिद्ध हैं। और निस्संदेह आप अच्छे लेखक हैं। आपके ओजस्वी भाषणों से मैंने बहुत कुछ ग्रहण किया है।’8

अन्नाभाऊ की 40 दिनों की रूस यात्रा अनेक अनुभवों से भरी थी। उनके लिए वह यात्रा एक सपने से गुजरने जैसी थी। एक समानता पर आधारित स्वतंत्र समाज का सपना जो वर्षों से उनके मानस में जड़ जमाए हुए था। रूस में उन्होंने विचार को वास्तविकता में बदलते हुए देखा। जाना कि संकल्प बड़े और नीयत अच्छी हो तो आदर्श और यथार्थ के बीच की दूरी कम होने लगती है। स्वप्न हकीकत में ढलने लगते हैं।

वर्ग-संघर्ष और सामाजिक न्याय को एक साथ साधने वाला जमीनी लेखक

अपनी किशोरावस्था से ही अन्नाभाऊ वामपंथ के संपर्क में आए थे। सामाजिक विषमता और छूआछूत को उन्होंने बचपन से देखा-भोगा था। इसलिए छूआछूत और सामाजिक विषमता के विरुद्ध भारत में संघर्ष कर रहे डाॅ. आंबेडकर के प्रति उनकी श्रद्धा भी स्वाभाविक थी। उपन्यास ‘फकीरा’ को जो इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी के जीवन पर आधारित था, उन्होंने डाॅ. आंबेडकर को समर्पित किया था। उनका समूचा लेखन उनके जीवनानुभवों का दस्तावेज है। एक कहानी संग्रह की प्रस्तावना में उन्होंने अपने इस द्रष्टिकोण को बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत किया हैᅳ

‘जो जीवन मैंने जिया, जीवन में जो भी भोगा, वही मैंने लिखा….मैं कोई पक्षी नहीं हूं जो कल्पना के पंखों पर उड़ान भर सकूं। मैं तो मेडक की तरह हूं, जमीन से चिपका हुआ।’

एक प्रसिद्ध दोहे में उन्होंने हिंदुओं के शेषनाग के मिथ पर टिप्पणी करते हुए लिखा थाᅳ‘यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर नहीं टिकी है। अपितु वह दलितों, काश्तकारों और मजदूरों के हाथों में सुरक्षित है।’ उनका कहना था कि कला शिवजी की तीसरी आंख की तरह होती है, जो संसार को भेदती हुई सभी मिथों को जलाकर भस्म कर देती है। इस आंख को सदैव सतर्क रहना चाहिए, तथा मनुष्य के हितों की देखभाल करनी चाहिए। अन्नाभाऊ के सरोकार मानवीय थे। उनके लेखन में कल्पनातत्व सिर्फ उतना है, जितना रचनात्मक बने रहने के लिए आवश्यक होता है। वे रूसी लेखकों में गोर्की से बेहद प्रभावित थे, जिन्होंने हाशिये के पात्रों को मुख्यधारा के साहित्य में जगह दी थी। अन्नाभाऊ भी अपनी लावणियों, लोकगीतों, कहानियों, उपन्यासों आदि के माध्यम से आम आदमी की चिंताओं और सरोकारों को जगह देते हैं। विशेषरूप से अछूत जातियों की समस्याओं तथा उनके चरित्र के उदात्त पहलुओं को बार-बार उठाते हैं। यही कारण है कि लिखते समय उन्होंने कल्पना का कम से कम सहारा लिया है। ‘मेरे सभी पात्र जीते-जागते समाज का हिस्सा हैं। यह उनका दावा भी था।

अन्नाभाऊ को लेकर एक घटना का उल्लेख सुप्रसिद्ध अभिनेता ए. के. हंगल ने अपने संस्मरणों में भी किया है, जिससे उनके सरोकार स्पष्ट नजर आते हैंᅳ

‘‘एक दिन वह(अन्नाभाऊ) मेरे कमरे पर पहुंचा। उसके हाथों में उसका लिखा एक नाटक भी था। उस समय वह बेहद निरुत्साहित था। उसने बताया कि वह उस नाटक को एक प्रसिद्ध मराठी लेखक के पास उसकी राय जानने के लिए लेकर गया था। उस लेखक ने नाटक को नापसंद किया और तिरस्कारपूर्ण ढंग से कहाᅳ‘जाओ, जाकर मजदूरों के लिए ‘तमाशे’ और ‘पावड़े’ लिखो।

मैं उसकी मदद करना चाहता था। इसलिए मैंने स्वेच्छा से उसके नाटक का हिंदी अनुवाद किया, जो ‘इनामदार’ के नाम से मंचित हुआ। आर. एम. सिंह उसके निर्देशक थे। उसके बाद हम दोनों मित्र बन गए।

एक दिन साहसी मनोस्थिति में मैंने अपना एक नाटक निकाला, जिसे मैंने 15 वर्ष पहले लिखा था। उसपर मैंने अन्नाभाऊ की प्रतिक्रिया जाननी चाही। नाटक ‘छूआछूत’ पर आधारित था, जो उन दिनों की बड़ी समस्या थी। अन्नाभाऊ ने नाटक की पांडुलिपि को धैर्यपूर्वक सुना, बोलाᅳ

‘कामरेड, इसे फाड़कर फेंक दें, यह नाटक नहीं है।’ मैंने उसका विरोध किया और आलोचना का कारण जानना चाहा। इसपर उसका उत्तर थाᅳ‘आप ब्राह्मण के घर जन्मे हैं, दलित की पीड़ा  महसूस कर ही नहीं सकते।’

‘लगभग सभी यहूदी पूंजीपति थे। कार्ल मार्क्स भी यहूदी था, जिसने पूंजीवाद की बखिया उधेड़ दी थी।’ मैंने मजाकिया लहजे में कहा; और पांडुलिपि को किनारे रख दिया। उसके बाद हम दोनों खुले मन से हंसने लगे।

अन्नाभाऊ तेज-तर्रार आलोचक था, लेकिन वह खुद को भी नहीं बख्शता था।’’9

हंगल साहब के नाटक पर अन्नाभाऊ की टिप्पणी उनका पूर्वाग्रह भी हो सकती है। सहानुभूति और स्वानुभूति के लेखन को लेकर हिंदी साहित्य में भी खासी बहस होती होती है। पल-भर के लिए मान लिया जाए कि अन्नाभाऊ पूर्वाग्रह-ग्रस्त थे, तब उस प्रसिद्ध मराठी लेखक को भी पूर्वाग्रस्त मानना पड़ेगा, जिसने अन्नाभाऊ के नाटक को तिरस्कार पूर्ण ढंग से लौटा दिया था।

अन्नाभाऊ ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में गरीबी और जातीय उत्पीड़न के सताए लोगों को जगह दी थी। ऐसे लोग जो साहित्य में उपेक्षित थे। उनकी कहानियों में महार, मांग, रामोशी, बालुतेदार और चमड़े का काम करने वाले पात्र समाए हुए हैं। न केवल उनकी जीवंत उपस्थिति है, अपितु उनकी पीड़ाओं और संघर्ष को भी सम्मान के साथ सहेजा गया है। अन्नाभाऊ की एक बहुत ही मार्मिक कहानी हैᅳ‘तीन भाकरी’। गांव में दो औरतें रहती हैं। उनके बीच सास-बहू का रिश्ता है। दोनों मेहनत-मजदूरी करती हैं। अगर किसी दिन मेहनत से चूक जाएं तो घर का चूल्हा ठंडा पड़ा रहता है। बेहद गरीबी का जीवन जी रही वे औरतें आपस में हमेशा लड़ती रहती हैं। गांव के लोग अशिक्षित, रूढ़िवादी और भूत-प्रेत में विश्वास रखने वाले हैं। दोनों स्त्रियां अछूत हैं। इस कारण गांव-भर की उपेक्षा और तिरस्कार का शिकार हैं। एक दिन सांताजी, कहानी का एक पात्र बताता है कि दोनों भुखमरी की कगार पर हैं। उनके पास कुछ भुट्टे थे, जिससे केवल तीन रोटियां बन सकती हैं। दोनों स्त्रियां पेशोपेश में हैं कि रोटियों का बंटवारा कैसे होगा। दोनों सोचती है कि अगर वह रोटी बनाए तो दो रोटियों पर उसका अधिकार होगा। बहू का भी यही विचार था। परिणाम यह होता है कि दोनों सोचते-सोचते लेट जाती हैं। अगले दिन भूख के कारण उनके प्राण चले जाते हैं।

उनकी सुप्रसिद्ध कहानी ‘सुलतान’ जो एक कैदी की कहानी पर केंद्रित हैᅳके प्रमुख पात्र सुलतान का मानना है कि मनुष्य को उसकी जरूरत की चीजें रोटी, कपड़ा और मकान आसानी से प्राप्त होनी चाहिए। लेकिन गरीबी के कारण उसका सोच आगे नहीं बढ़ पाता। अंततः वह केवल इसलिए जेल चला जाता है क्योंकि मनुष्य को वहां उसकी न्यूनतम आवश्यकता की तीनों चीजें आसानी से उपलब्ध होती हैं। कुछ ऐसा ही दूसरी कहानी के पात्र भोमक्या और गोपिकाबाई भी करते हैं। भुखमरी से बचने के लिए भोमक्या सुलतान की तरह जेल चला जाता है तो गोपिकाबाई एक किसान की शरण ले लेती है। भोमक्या या सुलतान में से कोई भी अपराधी मनोवृत्ति का नहीं था। उन्होंने जेल में रहना केवल इसलिए पसंद किया था, क्योंकि वहां उनकी न्यूनतम आवश्यकताएं आसानी से पूरी हो जाती थीं। अन्नाभाऊ जेल जाने को भुखमरी की समस्या का समाधान नहीं मानते। बल्कि जेल को ऐसा ठिकाना मानते हैं, जहां नागरिक जीवन और मनुष्य का विकास एक साथ ठहर जाते हैं।

एक और कहानी ‘सांवला’ का उल्लेख यहां आवश्यक है। कथानायक सांवला पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री के पक्ष में सवाल उठाता है। रामोशी और मांग जाति के अपने मित्रों के साथ वह ब्रिटिश सत्ता से टकराता है। वे सभी अपने कार्य के प्रति ईमानदार हैं। इस बीच सांवला और उसके साथियों को काशी नाम की युवती के बारे में पता चलता है। ससुराल में दहेज-उत्पीड़न की शिकार है। अपने साथियों के साथ सांवला काशी को उसके सास-ससुर के चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष करता है। इसपर उसके सास-ससुर सांवला पर काशी के साथ बलात्कार का आरोप लगा देते हैं। आरोप से क्षुब्ध सांवला काशी से ससुर से कहता हैᅳ

‘दादा पाटिल! क्या आप सोचते हैं कि सिर्फ आप ही बेदाग चरित्र वाले हैं, क्या आप हमें चरित्रहीन मानते हैं, आपसे किसने यह कहा है?

‘लोग कहते हैं कि सभी मांग बलात्कारी होते हैं।’ यह सुनकर सांवला को क्रोध आ जाता है। वह कहता है, ‘कौन हैं वे लोग, मुझे बताओ। मैं उनकी पूरी दुनिया को जलाकर भस्म कर दूंगा।’ कहानी स्त्री समानता और स्वाधीनता के पक्ष में समाप्त होती है।

ऐसे विद्रोही चरित्रों से अन्नाभाऊ की कहानियां भरी पड़ी हैं।

अन्नाभाऊ के रचनाकर्म का कोई भी उल्लेख उनके उपन्यास ‘फकीरा’ के बिना संभव नहीं है। उनके अधिकांश कथापात्रों की तरह इस उपन्यास का कथापात्र फकीरा भी वास्तविक जीवन से उठाया गया है। वह जाति से मांग और शाश्वत विद्रोही है। फिर भी मानवीय है। अवसर आने पर वह अपने पिता के हत्यारों को मारने के बजाय, उन्हें महज दंड देकर छोड़ देता है। उपन्यास जहां सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है, वहीं जाति के जंजाल में फंसी अछूत जातियों की पीड़ा को भी सामने लाता है। महाराष्ट्र में मांग और महार कहीं-कहीं प्रतिद्विंद्वी जातियों के रूप में सामने आती हैं। इस उपन्यास में अन्नाभाऊ इन दोनों अछूत जातियों की एकता पर भी जोर देते हैं।

कुल मिलाकर अन्नाभाऊ का समस्त रचनाकर्म समाज में हाशिये पर पड़े लोगों के संघर्ष और चारित्रिक विशेषताओं को सामने लाता है। यह दुख की बात है कि उनके रचनाकर्म का हिंदी अनुवाद उनके निधन के 50 वर्ष बाद भी अनुपलब्ध है। अन्नाभाऊ की आस्था मार्क्स और आंबेडकर दोनों में थी। वे दोनों को साथ-साथ साधना चाहते थे। जबकि अधिकांश दलित लेखक मार्क्स और मार्क्सवादी लेखन की उपेक्षा करते आए हैं। अन्नाभाऊ के रचनाकर्म के हिंदी में न आने के पीछे कदाचित यह भी बड़ा कारण है। लेकिन इससे अन्नाभाऊ के प्रति जो अन्याय हुआ है, उसकी भरपाई असंभव है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1.         जग बदल घालूनी घाव

            सांगुनी गेले मला भीमराव

            गुलामगिरीच्या या चिखलात

            रुतुन बसला का ऐरावत

            अंग झाडूनी निघ बाहेरी- जनगीत, साहित्यरत्न लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे

2          My Journey to Russia, Translated by Dr. Ashwin Ranjanikar, New Voices Publications, Juna           Bazar, Aurangabad, 2014, Page-5 & 47.

3.         Dr. Sunil Bhise, Annabhau Sathe: A Socialist Thinker, as quoted from Kathale       Nanasaheb,       2001,    (2nd Edition), ‘Annabhau Sathe : Jeevan Aani Sahitya’, Samata Sainik Dal Prakashan, Parasaran Vyavastha, P-32.

4.         My Journey to Russia, Page-9

5.         Ibidजन

6.         दलित-क्रांति के कवि अण्णा भाऊ साठे, by अमरित लाल उइके http://amritlalukey.blogspot.com/2011/11/anna-bhau-    sathhe.html

7.         My Journey to Russia, Page-12

8.         Ibid page-31

9.        A. K. Hangal, in Life and Times of A. K. Hangal, Sterling Paperbacks,1999, Page 80-81

महामना ज्योतिराव फुले तथा ‘सत्य-शोधक समाज’

भारत में सामाजिक न्याय की जरूरत शताब्दियों से रही है। परंतु उसे लक्ष्य बनाकर सार्थक, सशक्त एवं सफल आंदोलन चलाने का श्रेय प्रथमत: फुले को ही जाता है। उन्होंने जातिप्रथा, पुरोहितवाद के साथ-साथ समाज में बड़े पैमाने पर व्याप्त आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज बुलंद की। यह मानकर कि हिंदू धर्म से टकराए बगैर जाति सहित, समाज में व्याप्त तरह-तरह की कुरीतियों का समाधान असंभव है—उन्होंने हिंदू धर्म को सीधी चुनौती पेश की। हजारों वर्षों से मिथ एवं पुराकथाएं जनसाधारण के लिए शास्त्र का काम करती आई हैं, यह देखते हुए फुले ने ‘गुलामगिरी’ में लोक-प्रचलित मिथों की पड़ताल की। फलस्वरूप ऐसे आंदोलन का जन्म हुआ, जो आगे चलकर देश के विभिन्न भागों में जातिवाद विरोधी आंदोलनों की प्रेरणा बना।

महामना फुले

ज्योतिबा फुले का जन्म एक साधारण माली परिवार में पेशवाई का गढ़ कहे जाने वाले पुणे में हुआ था। पेशवाई शासक जातीय दंभ तथा अस्पृश्यों पर अत्याचार के लिए जाने जाते हैं। शूद्रों और अतिशूद्रों को जातीय उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने के लिए फुले ने उन्हें संगठित होने की सलाह दी। अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले तथा अन्य सहयोगियों की मदद से उन्होंने कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। लोगों को अशिक्षा, पुरोहितशाही, जातीय भेदभाव, उत्पीड़न, भ्रष्टाचार आदि के विरुद्ध जागरूक करने हेतु जो पुस्तकें उन्होंने रचीं—उनमें गुलामगिरी, किसान का कोड़ा, ब्राह्मणों की चालाकी, तीन रत्न(नाटक) आदि प्रमुख हैं।

‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना

आंदोलन को संगठित रूप आगे बढ़ाने हेतु उन्होंने 24 सितंबर, 1873 को ‘सत्य शोधक समाज’ की नींव रखी। उन दिनों समाज सुधार का दावा करने वाले, ‘ब्रह्म समाज’(राजा राममोहनराय), ‘प्रार्थना समाज’(केशवचंद सेन), पुणे सार्वजनिक सभा(महादेव गोविंद रानाडे) जैसे अनेक संगठन कार्यरत थे। लेकिन वे सभी द्विजों द्वारा, द्विजों की हित-सिद्धि के बनाए गए थे। वे चाहते थे कि समाज में जाति रहे, बस जातिभेद चला जाए। शूद्रों-अतिशूद्रों की शिक्षा को लेकर राजा राममोहनराय और केशवचंद सेन दोनों के विचार था कि पहले समाज के उच्च वर्गों में शिक्षा के न्यूनतम स्तर को प्राप्त कर लिया जाए। ऊपर के स्तर पर शिक्षा अनुपात बढ़ेगा तो उसका अनुकूल प्रभाव निचले स्तर पर भी देखने को मिलेगा। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘रिसाव का सिद्धांत’ कहते हैं। इसके अनुसार ऊपर के वर्गों की समृद्धि धीरे-धीरे रिसकर समाज के निचले वर्गों तक पहुंचती रहती है। वे भूल जाते थे कि प्राचीनकाल में जब हर द्विज बच्चे को अनिवार्यतः गुरुकुल जाना पड़ता था, ब्राह्मणों का शिक्षानुपात लगभग शत-प्रतिशत होता था, निचली जातियों का शिक्षानुपात शून्य पर टिका रहता था।

सत्यशोधक समाज के उद्देश्य

‘सत्य शोधक समाज’ के गठन के प्रमुख उद्देश्य थे—‘शूद्रों-अतिशूद्रों को भट्ट, जोशी, पुजारी, पुरोहित, सूदखोर आदि की सामाजिक-सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाना। धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता को खत्म करना। शूद्र-अतिशूद्रों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना, ताकि वे उन धर्मग्रंथों को स्वयं पढ़-समझ सकें जिन्हें ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए गढ़ा है। सामूहिक हितों की प्राप्ति के लिए उनमें एकजुटता का भाव पैदा करना। धार्मिक एवं जाति-आधारित उत्पीड़न से मुक्ति दिलाना। पढ़े-लिखे शूद्रातिशूद्र युवाओं के लिए प्रशासनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना।

सत्यशोधक समाज का फैलाव

शूद्रों एवं अतिशूद्रों का फुले पर विश्वास था। इसलिए ‘सत्य शोधक समाज’ को भी उन्होंने हाथों-हाथ लिया। कुछ ही वर्षों में उसकी शाखाएं मुंबई और पुणे के शहरी, कस्बाई एवं ग्रामीण क्षेत्रों में खुलने लगीं। एक दशक के भीतर तो वह संपूर्ण महाराष्ट्र में पैठ जमा चुका था। समाज की सदस्यता सभी के लिए खुली थी, फिर भी मांग, महार, मातंग, कुन्बी, माली जैसी अस्पृश्य एवं अतिपिछड़ी जातियां तेजी से उससे जुड़ने लगीं। लोगों ने शादी-विवाह, नामकरण आदि अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहितों को बुलाना छोड़ दिया। इससे ब्राह्मणों ने निचली जातियों को यह कहकर भड़काना शुरू कर दिया कि बिना पुरोहित के उनकी प्रार्थनाएं ईश्वर तक नहीं पहुंच पाएंगीं। घबराए हुए लोग फुले के पास गए। फुले ने उन्हें समझाया कि तमिल, बंगाली, कन्नड़ आदि गैर-संस्कृत भाषी लोगों की प्रार्थनाएं ईश्वर तक पहुंच सकती हैं, तो उनकी अपनी भाषा में की गई प्रार्थना को ईश्वर भला कैसे अनसुना कर सकता है। उन्होंने कहा कि जहां बहुत जरूरी हो, वहां अपनी ही जाति के अनुभवी व्यक्ति को पुरोहित की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। स्वयं फुले ने कई अवसर पर पुरोहिताई की।

बिना पुरोहित के विवाहसंस्कार

एक परिवार में शादी होने वाली थी। पुरोहितों ने घर आकर डराया कि बिना ब्राह्मण एवं संस्कृत मंत्रों के हुआ विवाह ईश्वर की दृष्टि में अशुभ माना जाएगा। उसके अत्यंत बुरे परिणाम होंगे। गृहणी सावित्रीबाई फुले को जानती थी। फुले को पता चला उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ के बैनर तले विवाह संपन्न कराने का ऐलान कर दिया। सैकड़ों सदस्यों की उपस्थिति में वह विवाह खुशी-खुशी संपन्न हुआ। प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई उपहार लेकर पहुंचा था। उस घटना के बाद ब्राह्मण सतर्क हो गए। एक अन्य घटना में ब्राह्मणों ने घुड़सवार भेजकर दूल्हे के पिता को धमकी दी। लोगों को यह कहकर भड़काया कि फुले उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं। लेकिन फुले इन धमकियों से कहां डरने वाले थे। अप्रिय घटना से बचने के लिए उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी। पुलिस की निगरानी में वह विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हो सका।

लोगों तक बातें पहुंचाने का निराला अंदाज

ज्योतिराव अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाते थे, इसका एक रोचक किस्सा रोजलिंड ओ’ हेनलान ने अपनी पुस्तक दिया है—एक बार फुले अपने मित्र ज्ञानोबा सासने के साथ पुणे के बाहर स्थित एक बगीचे के भ्रमण के लिए गए। वहां एक कुआं था, जिससे उस बगीचे की सिंचाई होती थी। जैसे ही दोपहर का अवकाश हुआ, सभी मजदूर खाना खाने बैठ गए। यह देख फुले कुएं तक पहुंचे और कुएं के डोल को चलाने लगे। काम करते-करते उन्होंने गाना भी शुरू कर दिया। मजदूर उन्हें देखकर हंसने लगे। फुले ने उन्हें समझाया, ‘इसमें हंसने जैसा कुछ नहीं है? मजदूर लोग काम करते हुए अकसर गाते-बताजे हैं। केवल मेहनत से जी चुराने वाले लोग ही फुर्सत के समय वाद्ययंत्रों का शौक फरमाते हैं। असली मेहनतकश जैसा काम करता है, वैसा ही अपना संगीत गढ़ लेता है।’

सत्य शोधक समाज के माध्यम से फुले ने शूद्रों और अतिशूद्रों को अपने विकास और मान-प्रतिष्ठा अर्जित करने का जो रास्ता करीब 146 वर्ष पहले दिखाया था, सामाजिक न्याय के संदर्भ में आज भी उतना ही जरूरी और प्रासंगिक है।

ओमप्रकाश कश्यप

‘हिंद स्वराज’ का बहुजन पाठ

‘हिंद स्वराज’ गांधी विचार की प्रतिनिधि पुस्तक है। गांधी ने इसकी रचना 1909 में समुद्री यात्रा के दौरान की थी। उन दिनों वे दक्षिणी अफ्रीका में भारतीयों की अस्मिता की लड़ाई के लिए संघर्ष कर रहे थे। वहां सत्याग्रह को आरंभिक सफलताएं मिलने से उनकी ख्याति देश-देशांतर तक फैलने लगी थी। कुशल पत्रकार, संपादक और जनसंवादन कला के धनी गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ मूल रूप से गुजराती में लिखा और अपने अखबार ‘इंडियन ओपीनियन’ में छाप दिया। अगले ही वर्ष वह पुस्तक रूप में भी बाजार में आ गया। फिर जैसी उम्मीद थी, वही हुआ। पुस्तक अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर ली गई। पहले संस्करण के लगभग छह वर्ष पश्चात 1915 में नया अंग्रेजी अनुवाद आया तो अंग्रेजों ने उसकी अनदेखी कर दी। देखते ही देखते पुस्तक विमर्श के क्षेत्र में छा गई।

पूरी पुस्तक बीस अध्यायों में बंटी, संवाद शैली में है। गांधी जी ने इस शैली का उपयोग क्यों किया? यह सोचने की बात नहीं। भारतीय उपनिषदों में यह शैली खूब चली है। केनोपनिषद् तो पूरा का पूरा संवाद-शैली में ही है। सुकरात और उसके प्रिय शिष्य प्लेटो की यह प्रिय शैली रही है। हालांकि धीरे-धीरे इस शैली का प्रचलन बुद्धिजीवियों में कम होता गया था। जिन दिनों गांधी जी ने ‘हिंद स्वराज’ की रचना की थी, यह गंभीर लेखन के क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय शैली भी नहीं थी। कदाचित गांधी का इरादा गंभीर पुस्तक लिखने का था भी नहीं। ‘हिंद स्वराज’ लिखने से करीब एक वर्ष पहले उन्होंने जाॅन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू दि लाॅस्ट’ का ‘सर्वोदय’ शीर्षक से गुजराती अनुवाद भी किया था, जो ‘इंडियन ओपीनियन’ में प्रकाशित हुआ था। ‘हिंद स्वराज’ में गांधी आधुनिकता का पर्याय मान ली गई पश्चिमी संस्कृति की प्रशंसा करते हैं। इसके लिए वे वकील, डॉक्टर, रेल, अदालत आदि की आलोचना करते हैं। यहां तक कि ब्रिटिश संसद पर भी आक्षेप लगाते हैं। कदाचित इसीलिए ‘हिंद स्वराज’ को खूब प्रचार मिला। पुस्तक के अनगिनत प्रशंसक थे तो आलोचक भी कम न थे। अनेक देशी-विदेशी विद्वानों ने ‘हिंद स्वराज’ की प्रशंसा की, वहीं गोखले ने उसे अधकचरी पुस्तक माना और उम्मीद जाहिर की कि भारत लौटने के बाद गांधी स्वयं उस पुस्तक को खारिज कर देंगे।

रस्किन के अतिरिक्त ‘हिंद स्वराज’ पर रूसो, कारपेंटर और थोरो के विचारों की छाया भी देख सकते हैं। पुस्तक के बारे में गांधी की टिप्पणियों से पता चलता है कि वे इस पुस्तक को लेकर अतिरिक्त रूप से मोहाग्रस्त थे। एक जगह उन्होंने लिखा है—‘यह पुस्तक इतनी निर्दोष है कि बच्चों के हाथ में यह दी जा सकती है। यह पुस्तक द्वैषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को स्थापित करती है और पशुबल के खिलाफ आत्मबल को खड़़ा करती है।’ अगर गांधी की संपूर्ण राजनीति को देखें तो उसके पीछे गांधी के कथित आत्मबल की ही प्रेरणा है। यह बात अलग है उस आत्मबल की शक्ति गांधी की अपनी कम, उनके प्रायोजकों की अधिक थी, जिन्होंने गांधी को देखते ही देखते भारतीय राजनीति के महानायक का दर्जा दे दिया था। हजारों वर्षों से दमन और शोषण का शिकार रही दलित और पिछड़ी जातियों में पनप रही जातीय चेतना, जो कभी भी वर्ग-चेतना का रूप ले सकती थी—से बचाव के लिए उन्हें सुरक्षित आड़ की आवश्यकता थी। गांधी और गांधीवाद दोनों इस भूमिका के लिए एकदम खरे थे।

‘हिंद स्वराज’ में कोई क्रमबद्ध चिंतन नहीं है। कुछ छिटपुट गांधी-विचार टिप्पणियों के रूप में आए है। बावजूद इसके ‘हिंद स्वराज’ के प्रति गांधी का विश्वास इतना दृढ़ था कि उसके प्रकाशन के तीन दशक बाद जब किसी पत्रकार ने पूछा कि क्या आप इसमें कोई फेरबदल करना चाहेंगे तो गांधी ने लिखा—‘यह पुस्तक अगर आज मुझे लिखनी हो तो कहीं-कहीं मैं इसकी भाषा को बदलूंगा। लेकिन इसे लिखने के बाद तीस वर्ष जो मैंने आंधियों में बिताए हैं, उनमें मुझे इस पुस्तक में बताए गए विचारों में फेरबदल का कोई कारण नहीं मिला।’1 ‘हिंद स्वराज’ को गांधी विचार का प्रतिनिधि दस्तावेज मानने के पीछे गांधी का यही विश्वास था। बहरहाल, पुस्तक का पांचवां अध्याय ‘इंग्लेंड की हालत’ पर है। हम अपना विमर्श इसी अध्याय से आरंभ करेंगे। चौथे अध्याय में ‘पाठक’ के यह कहने पर कि इंग्लेंड की पार्लियामेंट सब ‘पार्लियामेंटों की माता’ तो बेशक हमें उसकी नकल करनी चाहिए—अगले अध्याय में गांधी ‘इंग्लेंड की हालत’ पर विचार करते हैं। शीर्षक से उम्मीद जगती है कि गांधी इसमें इंग्लेंड के समाज, वहां के जन-जीवन तथा समाजार्थिक परिस्थितियों पर विचार करेंगे। मगर उनपर कोई बातचीत किए बगैर गांधी सीधे इंग्लेंड की पार्लियामेंट पर चर्चा करने लगते हैं। वे लिखते हैं—

‘इंग्लेंड में आज जो हालत है, वह सचमुच तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही मानता हूं कि हिंदुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसपर बहुत अच्छी तरह से लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा, क्योंकि अब तक पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उसपर दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह बेसवा है, क्योंकि जो मंत्री मंडल उसे रखे, उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक एसक्विथ है, कल वालफर होगा और परसों को तीसरा।’’2

उपर्युक्त टिप्पणी को पढ़ते हुए कुछ प्रश्न एकाएक दिमाग में एकाएक आ सकते हैं। मसलन क्या गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट की सुस्ती या नकाराकन के लिए उसकी आलोचना कर रहे थे? क्या उनकी आलोचना ब्रिटिश पार्लियामेंट तक सीमित थी, अथवा उसका दायरा अथवा उनकी आलोचना पूरी संसदीय प्रणाली को लेकर है? क्या ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री हर्बर्ट हेनरी एसक्विथ का आचरण गैर-जिम्मेदाराना और तानाशाही पूर्ण था? संसदीय प्रणाली में पार्लियामेंट की जनता के प्रति जो जवाबदेही होनी चाहिए, क्या ब्रिटिश पार्लियामेंट उसमें नाकाम थी? यदि गांधी की आलोचना केवल पार्लियामेंट की सुस्ती को लेकर है, तो एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या उन दिनों ब्रिटिश पार्लियामेंट सचमुच निष्क्रिय और नाकारा थी? एसक्विथ अप्रैल 1908 से दिसंबर 1916 तक यूनाईटिड किंग्डम के प्रधानमंत्री थे। उन्हें संसदीय सुधार के लिए जाना जाता है। हालांकि 1914 में ब्रिटेन को प्रथम विश्वयुद्ध में ढकेलने के लिए एसक्विथ की आलोचना की जाती है। चूंकि 1914 की घटना ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के बाद की है, इसलिए हमारे लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट और एसक्विथ द्वारा नवंबर 1909; यानी ‘हिंद स्वराज’ लिखे जाने के पहले लिए गए निर्णय ही महत्त्वपूर्ण होंगे।

लेबर पार्टी के सत्ता में आने से पहले यूनाइटिड किंग्डम में कंसरबेटिव पार्टी की सरकार थी। उसने 1902 में शिक्षा अधिनियम पास किया था, जिसके फलस्वरूप वहां शैक्षिक क्रांति को बढ़ावा मिला। उस अधिनियम के फलस्वरूप 1914 तक यानी केवल 12 वर्ष के अंतराल में इंग्लेंड में 1000 नए माध्यमिक विद्यालय खोले गए थे, जिनमें से 349 स्कूल केवल लड़कियों के लिए थे।3 उसके अगले वर्ष कंजरवेटिव सरकार ने ‘एंप्लायमेंट आफ चिल्ड्रन अधिनियम-1903 को मंजूरी दी थी, जिनमें कारखानों में काम कर रहे बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए आवश्यक कानून बनाए गए थे। उस कानून के अनुसार 10 वर्ष के कम के किसी भी बच्चे को फैक्ट्री के काम में नहीं लगाया जा सकता था। बच्चों को ऐसा कोई भी काम सौंपने की मनाही थी, जिसकी परिस्थितियां उनके स्वास्थ्य के प्रतिकूल हों। यही नहीं, काम के साथ-साथ-साथ उनकी शिक्षा की व्यवस्था भी की गई थी।4 1905 में वही संसद ‘बेरोजगारी श्रमिक अधिनियम—1905 के माध्यम से ‘आपदा समिति’ का गठन करती है, आपदा समिति का काम स्थानीय निकायों एवं व्यापरिक निगमों में बेरोजगारों की अधिकाधिक भर्ती के अनुदान आदि की अनुशंसा करना था। ऐसी संसद को, जो प्रतिवर्ष लोककल्याण की दिशा में नए-नए कानून बना रही थी, उसपर अमल भी कर रही थी, गांधी ‘बांझ’ ओर ‘बेसवा’ कह जाते हैं। गौरतलब है कि भारत में गरीब बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा, जो बच्चे किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाते, मिल-कारखानों-खदानों आदि में काम करने को विवश होते हैं—उनके लिए काम के दौरान शिक्षा की मांग कांग्रेस या उसके किसी बड़े नेता के आंदोलन का हिस्सा नहीं थी। कांग्रेस अभिजात्य वर्ग के पढ़े-लिखे युवाओं को सरकारी नौकरियों की हिस्सेदारी की मांग तो कर रही थी, लेकिन किसान और मजदूरों की बेरोजगारी उसके लिए कोई मुद्दा न थी। उसके नेताओं का विचार था की जाति प्रथा के चलते सबके लिए उनके पैतृक व्यवसाय निर्धारित है, ऐसे में बेरोजगारी भारत के लिए बड़ा मुद्दा हो ही नहीं सकती।

बहरहाल, हम पुन: इंग्लेंड की संसद पर लौटकर आते हैं, जिसपर गांधी ने बेसवा’ और नाकारा होने जैसे आरोप लगाए हैं। यूनाइटिड किंग्डम में 1906 में एसक्विथ के नेतृत्व वाली, ‘लेबर पार्टी’ बहुमत के साथ सरकार बनाती है। उसके बाद वहां सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों का सिलसिला और गति पकड़ लेता है। गांधी नशाबंदी के समर्थक थे। भारत लौटने के बाद वे इसके लिए आंदोलन भी चलाते हैं। जन्म के समय होने वाली बाल मृत्युदर पर नियंत्रण हेतु 1907 में इंग्लेंड सरकार ने ‘नोटिफिकेशन आफ बर्थ अधिनियम’ लागू किया था। उसके अनुसार शिशु के जन्म के 36 घंटों के भीतर उसकी सूचना सरकार को देना अनिवार्य कर दिया गया था। 1908 में एसक्विथ सरकार इग्लेंड और वॉल्स के शराब और जुआखानों की लाइसेंसिंग का नया कानून बनाते हैं, परिणामस्वरूप इंग्लेंड और वॉल्स के 100000 पबों में से एक तिहाई बंद करा दिए जाते हैं। इसके अलावा एजुकेशन(एडमिनस्ट्रिेटिव प्रोवीजन) एक्ट-1907, ‘प्रोबेशन आफ ओफेंडर्स एक्ट-1907, चिल्ड्रन एंड यंग पर्सन एक्ट-1908, आइरिश यूनीवर्सिटीज एक्ट-1908, ओल्ड एज पेंशन एक्ट-1908, लेबर एक्सचेंज एक्ट-1909 जैसे दर्जनों सुधारवादी कानून वहां की एसक्विथ के नेतृत्व वाली सरकार बनाती है। यही नहीं, छोटे किसानों को बड़े जमींदारों के चंगुल से बचाने के लिए एसक्विथ सरकार ने 1906 से 1908 के बीच भू-सुधार हेतु अनेक लोकोपयोगी कानून बनाए थे। उनमें एग्रीकल्चर होल्डिंग एक्ट-1906, स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1907, कसोलिडेशन एक्ट-1907 जैसे कानून शामिल थे। ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाॅटमेंट एक्ट-1907’ में सुधार करते हुए ‘स्माल होल्डिंग एंड एलाटमेंट एक्ट-1908’ नामक नया कानून बनाया गया, उसके तहत 1908 से 1914 के बीच लगभग दो लाख एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया, जिसे 14000 लघु-जोतों में बांटकर छोटे किसानों को मदद पहुंचाई गई। आशय है कि 1900 से लेकर 1909 के वे दिन जब गांधी ‘हिंद स्वराज’ में ब्रिटिश संसद पर बांझ और बेसवा होने का आरोप लगा रहे थे, ब्रिटिश जनता की दृष्टि से ब्रिटिश संसद उत्तरदायी सरकार की भूमिका निभा रही थी। सरकार ने नियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था लागू की थी। यही नहीं 1909 में लेबर पार्टी सरकार की ओर से संसद के आगे जो फाइनेंस बिल(बजट) पेश किया गया था, उसे उन्होंने बुद्धिजीवियों ने ‘जनता का बजट’ की संज्ञा दी थी। भारत में उसी तरह के कानून बनाने की आवश्यकता के बजाय गांधी ब्रिटिश पार्लियामेंट पर ही आरोप लगाने लगते हैं।

भारत के संबंध में भी ब्रिटिश संसद ने ऐसे कई युगांतरकारी निर्णय लिए थे, जो आगे चलकर इस देश को आधुनिक राज्य बनाने में सहायक सिद्ध हुए। चार्टर अधिनियम-1813 में भारत में शिक्षा सुधारों की नींव रखी गई थी। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कंपनी के बजट में न्यूनतम एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा प्राप्ति के रास्ते प्रशस्त हुए। उससे पहले देश में मनुस्मृति का विधान लागू था। उसके अनुसार संपूर्ण शिक्षा का अधिकार केवल ब्राह्मणों तक सीमित था। गैर-ब्राह्मण सवर्ण केवल अपने व्यवसाय से संबंधित शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। जिन्हें इसमें संदेह है वे विश्वामित्र और वशिष्ट के संघर्ष को याद कर सकते हैं। शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध थी।

चार्टर अधिनियम-1813 केवल 20 वर्षों के लिए लाया गया था। 1833 में लागू अगले चार्टर में विधि संहिता के निर्माण हेतु विधि आयोग बनाने की अनुशंसा की गई थी। उसके अधीन जो कानून बने, वे सभी भारतीयों यहां तक कि भारत में रह रहे अंग्रेजों पर भी लागू होते थे। उस अधिनियम के बाद प्रशासनिक सेवाओं को पूरी तरह से स्पर्धात्मक बना दिया गया था। जाति, धर्म, संप्रदाय से परे कोई भी उनमें हिस्सा ले सकता था। उससे पहले तीन-चार प्रतिशत ब्राह्मण आबादी 70 प्रतिशत सरकारी पदों पर कब्जा जमाए हुए थी। नए अधिनियम के लागू होने के बाद शूद्रों ओर अतिशूद्रों के लिए सरकारी नौकरियों में जाने का रास्ता साफ हो गया। चार्टर अधिनियम-1853 में स्थानीय प्रशासन में भारतीयों को जगह देने की अनुशंसा की गई थी। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज समझ चुके थे कि ताकतवर जातियों को संतुष्ट किए बिना उनका इस देश में टिके रहना संभव नहीं है। इसलिए 1858 में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनाते समय इंग्लेंड की महारानी ने जो घोषणा की थी, उसमें जमींदारों और राजे-रजबाड़ों के विशेषाधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था। तथापि ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया था। उसके फलस्वरूप शूद्रों और अतिशूद्रों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी और पूरे भारत में सामाजिक सुधार के आंदोलनों में तेजी आई।

ऐसी संसद को गांधी किस आधार पर ‘बांझ’ और ‘बेसवा’ कहते हैं, यह बात समझ से परे है। हालांकि आगे चलकर उन्होंने पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द को बदलने की इच्छा व्यक्त की थी। इसलिए नहीं कि ब्रिटिश संसद को लेकर उनके विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन आया था, या संसदीय प्रणाली में उनके विश्वास में वृद्धि हुई थी, अपितु इसलिए कि उनकी एक अंग्रेज महिला मित्र को पार्लियामेंट के लिए ‘वेश्या’ शब्द अच्छा नहीं लगा गया था। ‘हिंद स्वराज’ के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा था—

‘‘इस समय इस पुस्तक को इसी रूप में प्रकाशित करना मैं आवश्यक समझता हूं। परंतु यदि इसमें, मुझे कुछ भी सुधार करना हो, तो मैं केवल एक शब्द सुधारना चाहूंगा। एक अंग्रेज महिला मित्र को मैंने वह शब्द बदलने का वचन दिया है। पार्लियामेंट को मैंने वेश्या कहा है। यह शब्द उस बहन को पसंद नहीं है। उनके कोमल हृदय को इस शब्द के ग्राम्यः भाव से दुख पहुंचा है।’’

पार्लियामेंट के लिए उन्होंने ‘वेश्या’ जैसा तीखा शब्द क्यों इस्तेमाल किया? इसपर चौंकने की आवश्यकता नहीं है। जिन दिनों ‘हिंद स्वराज’ की रचना हुई, गांधी की संसदीय शासन प्रणाली में कोई आस्था नहीं थी। बजाय संसदीय लोकतंत्र के उनका आदर्श रामराज्य था। भारत के लिए वे रामराज्य की ही परिकल्पना करते थे। उनकी कल्पना का रामराज क्या था, इसे निम्नलिखित उद्धरण से समझा जा सकता है—

‘हम राज को रामराज तभी कह सकते हैं, जब राजा और प्रजा दोनों पवित्र हों। जब दोनों त्यागवृत्ति रखते हों, जब दोनों के बीच पिता ओर पुत्र जैसे संबंध हों। हम यह बात भूल गए, इसलिए डेमोक्रेसी की बात करते हैं। आज ‘डेमोक्रेसी’ का जमाना है। जहां प्रजा की बात सुनी जाती हो। जहां प्रजा के प्रति प्रेम का प्राधान्य हो—कहा जा सकता है कि वहां डेमोक्रेसी है। मेरी कल्पना के ‘रामराज्य’ में सिरों की गिनती अथवा हाथों की गिनती से प्रजा के मत को नहीं मापा जा सकता। जहां इस तरह से मत लिए जाते हों, उसे मैं प्रजा का मत नहीं मापता। ऋषियों-मुनियों ने तपस्या करके यह देखा कि जो व्यक्ति तपश्चर्या करते हों और प्रजा के कल्याण की भावना रखते हों, उनका मत प्रजा का मत कहला सकता है। इसी का नाम सच्ची डेमोक्रेसी है। यदि मुझ जैसा व्यक्ति व्याख्यान देकर आपका मत चुराकर ले जाए तो उस मत से प्रकट होने वाली डेमोक्रेसी नहीं है। मेरी डेमोक्रेसी तो रामायण में लिखी पड़ी है, और मैंने जिस सीधे-सादे ढंग से रामायण को पढ़ा है, रामचंद्रजी उसी के अनुसार राज करते थे।5

हम समझ सकते हैं ‘रामराज्य’ की गांधीवादी अवधारणा में आम-मताधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है। वहां एक प्रकार का मुनितंत्र है। चूंकि ऋषि-मुनि बनने का अधिकार ब्राह्मणों तक सीमित था, इसलिए परोक्ष रूप में गांधी सीधे-सीधे ब्राह्मण-तंत्र की अनुशंसा कर मनु के विधान का समर्थन कर रहे होते हैं। 19 सितंबर 1929 के ‘यंग इंडिया’ में वे पुनः लिखते हैं—‘रामराज्य से मेरा अभिप्रायः हिंदू राज्य से नहीं है। मेरा आशय दैवीय राज्य से, ईश्वरीय राज्य से है….भले ही राम इस धरती पर जीवित रूप में कभी थे या नहीं थे, प्राचीन रामराज्य का आशय सच्चे जनतंत्र से है। जिसमें गरीब से गरीब आदमी भी कम से कम खर्च में न्याय प्राप्त कर सके। रामराज्य में तो बताया गया है कि कुत्ते को भी न्याय प्राप्त हुआ था(यंग इंडिया, 19 सितंबर, 1929)….रामराज्य का मेरा सपना ऐसे राज्य का है जिसमें राजा और रंक दोनों को बराबर अधिकार प्राप्त हों।’(अमृत बाजार पत्रिका, 2 अगस्त, 1934)6

गांधी के लिए रामराज्य आदर्श है, मगर बहुजनों के लिए ऐसे राज्य का कोई महत्त्व नहीं है, जहां का राजा मात्र ब्राह्मण की शिकायत पर, वगैर अपने विवेक का इस्तेमाल किए, वेदाध्ययन के इच्छुक शूद्र को मृत्युदंड देने को अपना पुनीत कर्तव्य मानता हो। अथवा व्यक्ति मात्र के आक्षेप पर अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दे। गांधी राजनीति को ईश्वरीय आस्था और धार्मिक आदर्शों के आधार पर चलाना चाहते थे। इसकी प्रेरणा उन्हें ईसाई धर्म खासतौर पर जाॅन रस्किन जैसे समाजवादियों की ओर से प्राप्त हुई थी, जो समाजवाद का मूल ईसाई धर्म की उदारवादी मान्यताओं में खोजते थे। गांधी का हिंदू मन ‘रामराज्य’ में समाजवादी आदर्श खोजने लगता है। वे भूल जाते हैं कि ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन नहीं है। वहां जन्म के आधार पर मनुष्य को जीवन के मूल-भूत अधिकारों, उसकी स्वतंत्रता और समानता के अधिकार से वंचित नहीं किया जाता था। जबकि हिंदू धर्म की नींव ही जाति-व्यवस्था पर टिकी है। चूंकि ब्रिटिश संसद ने एक के बाद एक प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से भारत में जाति-आधारित विभाजन पर चोट की थी, इसलिए गांधी को वहां की संसद से शिकायत थी। यह शिकायत इतनी बड़ी थी कि वे उसे वेश्या तक कह जाते हैं।

भारत में आधुनिकीकरण की शुरुआत 19वीं शताब्दी से होती है। वही समय औद्योगिकीकरण की शुरुआत का भी है। आवाजाही को सुगम बनाने के लिए रेलगाड़ी की शुरुआत होती है। स्वास्थ्य की देखभाल के लिए अस्पताल बनाए जाते हैं। उससे पहले जो वैद्य आदि हुआ करते थे, वे ऊंची जातियों से आते थे। जातीय शुचिता के नाम पर वे निचली जातियों के मरीजों के इलाज से बचते थे। मजबूर होकर उन्हें तांत्रिकों और ओझाओं की शरण में जाना पड़ता था, जो उनका शोषण करता था। अस्पतालों, वकीलों और स्कूलों के खुलने से शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में न्याय की उम्मीद जगी थी। रेलों ने गरीब मजदूरों, कामगारों और शिल्पकारों को यह अवसर दिया था कि वे गांवों के सामंती उत्पीड़न से बचने के लिए वैकल्पिक रोजगार के लिए शहरों की ओर जा सकें। सरकारी अस्पतालों में सभी वर्ग के लोग आ जा सकते थे। उससे जातिवाद पर चोट पड़ी थी। गांधी आधुनिक समाज के सभी प्रतीकों जैसे अदालत, रेल, अस्पताल, वकील, डॉक्टर आदि की आलोचना करते हुए उन्हें सभ्यता के संकट के रूप में देखते हैं। उन्हें समाज के हजारों वर्षों तक गरीब, विपन्न और एक जैसे हालात में रहने से कोई दुख नहीं है। अपितु उनके लिए यह गौरव की बात है। इसलिए वे गरीबी का महिमामंडन तक कर जाते हैं—

‘हजारों साल पहले जो काम हल से लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हजारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी, वही चलती आई….ऐसा नहीं है कि हमें यंत्र-वगैरह की खोज करना नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि यंत्र वगैरह की खोज करेंगे तो गुलाम बनेंगे, और अपनी नीति को छोड़ देंगे।’7

जिन दिनों गांधी इन पंक्तियों को लिख रहे थे, उससे करीब एक हजार पहले से ही भारत किसी न किसी विदेशी शासक का गुलाम था। उससे पीछे के हजार वर्षों में भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति लगभग शूण्य थी। जाति-व्यवस्था के कारण भारत में सस्ता श्रम लगभग बेगार के रूप में गांव-गांव मौजूद था। मशीनी क्रांति पर आक्षेप लगाकर गांधी जाति-व्यवस्था के समर्थक और यथास्थितिवादी नजर आते हैं। गांधी के शिष्य भी उन्हीं की तरह परिवर्तन-विरोधी थे। विनोबा को आम-मताधिकार से शिकायत थी। नेहरू और उनके खानसामा दोनों को एक ही वोट का अधिकार हो—यह उन्हें विचित्र लगता था। गांधी के दूसरे शिष्य भी ऐसे थी। नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ‘हिंद स्वराज’ के हिंदी अनुवाद की भूमिका में काका कालेलकर लिखते हैं—‘उनकी रेलें, उनकी चिकित्सा और रुग्णालय, उनके न्यायालय और न्याय-दान पद्धति आदि सब बातें अच्छी संस्कृति के लिए आवश्यक नहीं हैं, बल्कि विघातक ही हैं…’ ऐसे गांधीवादियों को कौन समझाए कि रेल, चिकित्सा प्रणाली, न्यायालय आदि अनायास हुई खोजेें नहीं थीं। अपितु इसके पीछे यूरोपीय बौद्धिक चेतना और वैज्ञानिक क्रांति का योगदान था। न्यूटन और काॅपरनिकस जैसे वैज्ञानिकों की उत्कट मेधा और समर्पण था। उससे पहले यूरोप का हाल भारत जैसा ही था। गौरतलब है कि यूरोप की औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना दुनिया-भर में हुई थी। लेकिन वहां की बौद्धिक और प्रौद्योगिकीय क्रांति से किसी को शिकायत न थी। यहाँ तक कि मार्क्स जैसे ठेठ समाजवादी को भी नहीं। यूरोप की बौद्धिक क्रांति का असर दुनिया के सभी अगड़े-पिछड़े समाजों पर पड़ा था। ऐसे में यूरोपीय सभ्यता, संस्कृति की आंख-मूंदकर आलोचना करने नैतिकता की दृष्टि से उचित न था।

शिक्षा-नीति के बारे में भी गांधी के विचार इतने ही दक़ियानूसी हैं। हालांकि ऐसे कई लोग आज भी मिल जाएंगे जो गांधी की बुनियादी शिक्षा-नीति को आदर्श मानकर उसका महिमा मंडन करते हैं। लेकिन ऐसा केवल वही सोच सकता है, जिसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति में सबकुछ साफ-सुथरा, उजला-उजला और पाक-साफ नजर आता हो। इस पर बात करने से पहले गांधी के शिक्षा पर विचार को जान लेना उचित होगा। वे लिखते हैं—‘बहुत से लोग उस(अक्षर-ज्ञान) का बुरा प्रयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा प्रयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है….एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है। उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है। अपने मां-बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री से कैसे बरतना, अपने बच्चों के साथ कैसे पेश आना, जिस देहात में वह बसा हुआ है वहां उसकी चाल-ढाल कैसी होनी चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है, लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता। इस आदमी को अक्षर-ज्ञान देकर आप क्या करना चाहते हैं? उसके सुख में आप कौन-सी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।’8

शिक्षा के बारे में ये ऐसे व्यक्ति के विचार हैं जिसे जीते-जी महात्मा मान लिया गया था। गांधी को लगता था कि ज्ञान का सभी लोग सही प्रयोग नहीं कर सकते। वे सही प्रयोग करें, इसके लिए उन्हें और अधिक शिक्षित-प्रेरित करने से अच्छा है कि उन्हें अक्षर ज्ञान से ही वंचित कर दिया जाए। यहां गांधी दलित-बहुजनों का जिक्र नहीं करते। बात उन्होंने सामान्य तौर पर ही कही है। लेकिन संदेश वही है जो मनुस्मृति और दूसरे हिंदू धर्मशास्त्रों का है। यही कि ज्ञान पर कुछ वर्गों का एकाधिकार रहे। जनसाधारण दुनियावी ज्ञान से अलग-थलग बना रहे, वही अच्छा है। यदि वह पढ़-लिख जाएगा तो अन्याय का विरोध करेगा, धर्म-शास्त्रों को स्वयं पढ़कर उसका अर्थ निकालने लगेगा, पंडे-पुरोहित के जाल में आसानी से फंस न सकेगा। जिन दिनों गांधी यह सब लिख रहे थे, उन दिनों गांव-गांव में महाजनी तंत्र का जाल फैला हुआ था। वे एक के बदले चार चढ़ाकर बही में किसानों और मजदूरों से अंगूठा लगवा लिया करते थे। ओने-पौने ब्याज वसूलते थे। जिस गुजरात से गांधी आते हैं वहां महाजनी प्रथा और भी चरम पर थी। उनके शोषण और षड्यंत्र की ओर इशारा करने, लोगों को उसके विरुद्ध जागरूक करने के लिए शिक्षा की अनिवार्यता पर ज़ोर देने के बजाए, वे अक्षर-ज्ञान की आवश्यकता को ही नकार देते हैं।

इसलिए ‘हिंद स्वराज’ का आदर्श बहुजनों का आदर्श नहीं हो सकता। बहुजन अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लगभग सभी महामानवों ने शिक्षा को जरूरी माना था। ज्योतिराव फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, स्वामी अछूतानंद, महामना अय्यंकालि, पोइकाइल योहन्नान आदि जितने भी बहुजन-चिंतक और आंदोलनकारी हैं उन सभी ने वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के लिए शिक्षा पर ज़ोर दिया था। उसके लिए आंदोलन चलाए थे। सड़कों पर संघर्ष किया था। उन्हें अपना महानायक मानने वाले बहुजन, भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आड़ में वर्ण-व्यवस्था के पोषक और समर्थक गांधी को अपना नायक भला कैसे मान सकते हैं।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. अंग्रेजी मासिक ‘आर्यन पाथ’ के सिंतबर 1938 में ‘हिंद स्वराज अंक’ के लिए भेजा गया संदेश।

2. हिंद स्वराज, अध्याय 5, इंग्लैंड की हालत।

3. जी. आर. शीर्ले, ए न्यू इंग्लेंड? पीस एंड वार, 1886-1918(2005), आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 333-334

4. http://www।educationengland।org।uk/documents/acts/1903-employment-children-act।pdf

5. संपूर्ण गांधी वाङ्मय खंड 35, 1927-28, पृष्ठ 508-509, ‘गांधीजी हिंद स्वराज से नेहरू तक’ में देवेंद्र स्वरूप द्वारा उद्धृत, पृष्ठ 76)

6. https://www।mkgandhi।org/momgandhi/chap67।htm

7. हिंद स्वराज, अध्याय 18, शिक्षा।

8. वही