दक्षिण भारत की बहुजन वीरांगनाएं : वेलु नाचियार और कुयिली

सामान्य

गलत धारणा है कि इतिहास केवल विजेताओं का होता है। इतिहास उनका भी होता है जिनके हाथों में कलम होती है। तलवार भरोसे जीत हासिल करने वालों को भी इतिहास-सिद्ध बनने के लिए कलमकार हाथों की जरूरत पड़ती है। वे प्रायः उन्हीं व्यक्तियों और घटनाओं को इतिहास में जगह देते हैं, जिनसे उनकी स्वार्थ-सिद्धि होती हो। वेलु नाचियार की जगह रानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम में उतरने वाली पहली वीरांगना घोषित कर देना, ऐसे ही छल का नतीजा है।

इतिहास

तमिलनाडु में एक ऐतिहासिक जिला है—शिवगंगा। राजधानी चैन्नई से 450 किलोमीटर दूर दक्षिण; तथा ऐतिहासिक नगरी मदुरै से 48 किलोमीटर हटकर पूरब में बसा हुआ। पिछले कुछ वर्षों से यह जिला एक और कारण से चर्चा में है। शिवगंगा और मदुरै के बीच कीझदी नामक कस्बे में संगमकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। उत्खनन के दौरान प्राप्त ‘तमिल-ब्राह्मी लिपि’ के अक्षरों की बनावट, सिंधु लिपि से मेल खाती है। उससे सिंधु सभ्यता और द्रविड़ सभ्यता के अंतःसंबंधों को समझा जा सकता है। शिवगंगा का पुराना नाम सेतुनाडु था। वह ‘नायक साम्राज्य’ द्वारा स्थापित 72 छावनियों में एक थी। नायक अधिपति अपने नाम के आगे ‘सेतुपति’ लगाते थे। संस्कृत कृति ‘रघुनाथअभ्युदम’ के अनुसार उनकी गिनती शूद्र वर्ग में की जाती है।1

वेलुनाचियार का जन्म

वेलु नाचियार का जन्म 3 जनवरी, 1730 में रामनाथपुरम के राजपरिवार में हुआ था। उसके पिता राजा चेलामुत्तु विजयारगुंडा सेतुपति तथा मां रानी सक्कांदिमुथल नाचियार थीं। माता-पिता की इकलौती संतान वेलु जन्म से ही विलक्षण प्रतिभा की धनी थी। राजा ने उसका लालन-पालन बेटे की तरह किया था। बचपन में वेलु को पढ़ने-लिखने के अलावा हथियार चलाने का भी शौक था। सो कुछ ही अवधि में उसने तलवारबाजी, तीरंदाजी, घुड़सवारी, वलारी(हंसिया फैंकने), सिलंबम(लाठी चलाने) तथा भाला फेंकने जैसी युद्ध कलाओं में महारत हासिल कर ली थी। किशोरावस्था पार करते-करते वह तमिल, फ्रांसिसी, उर्दू, मलयालम, तेलुगू, तमिल और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अर्जित कर चुकी थी। कम उम्र में ही महान तमिल ग्रंथों का अध्ययन कर उसने खुद को अपने पिता का योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध कर दिया था। वेलु की प्रतिभा और लगन देख उसके माता-पिता भी बेटे न होने की चिंता को भूल चुके थे।

1746 में 16 वर्ष की अवस्था में वेलु नाचियार के पिता ने उसका विवाह शिवगंगा के महाराज शशिवर्मा थेवर के बेटे मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर के साथ कर दिया। शशिवर्मा महत्वाकांक्षी राजा थे। उन्होंने शिवगंगा के आसपास के जंगलों को साफ कराया था, ताकि वहां खेती की जा सके। इसके अलावा जगह-जगह तालाब, सड़कें और मंदिर बनवाकर उन्होंने शिवगंगा को संवारने-सजाने का काम किया था। शशिवर्मा के निधन के उपरांत मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर को शिवगंगा का अधिपति बनाया गया। उस समय वेलु नाचियार अपने पति की मित्र, सलाहकार और भरोसेमंद सहयोगी सिद्ध हुईं। कुछ समय बाद दोनों के एक पुत्री का जन्म हुआ। उसका नाम उन्होंने वेलाची नाचियार रखा।

ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर

वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी दक्षिण में अपने पांव पसारने में लगी थी। आरकोट का नबाव उसके आगे समर्पण कर चुका था। कंपनी की नजर शिवगंगा पर थी। बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के चलते रामनाथपुरम और शिवगंगा के शासकों ने नबाव को टैक्स का भुगतान करने से इन्कार कर दिया। इससे आरकोट के नबाव ने ईस्ट इंडिया कंपनी से शिकायत कर दी। अंग्रेज पहले से ही उपयुक्त अवसर की तलाश में थे। नबाव के सहयोग ने उनका काम आसान कर दिया था। शिवगंगा जिले के कालियार कोविल नामक कस्बे में महाकालेश्वर का अति प्राचीन मंदिर था। मुत्तुवेदुंगानाथ थेवर के शासनकाल में उसकी यशकीर्ति चारों-दिशाओं में फैली हुई थी। जून 1772 में मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर अपनी दूसरी पत्नी गोरी नाचियार के साथ महाकालेश्वर के दर्शन के लिए गए हुए थे। इस बीच कर उगाही के बहाने आरकोट के नबाव तथा कंपनी की फौजों ने शिवगंगा पर हमला कर दिया।

नबाव और अंग्रेजों के बीच पक रही खिचड़ी की ओर से वेदुंगानाथ सावधान थे। हमले की आशंका को देखते हुए रानी वेलु नाचियार के साथ वे सुरक्षा प्रबंधों में लगे थे। शिवगंगा के चारों और कंटीली झाड़ियों से भरे हुए मैदान थे। हमलों से बचाव के लिए थेवर ने शिवगंगा की ओर आने वाले रास्तों को खुदवाकर जगह-जगह खाइयां बनवा दीं। उपयुक्त स्थानों पर सैनिक चौकियां बनाकर सुरक्षा के इंतजाम किए गए। आखिर वह समय भी आ पहुंचा जिसकी आशंका थी। 21 जून को कर्नल जोसेफ स्मिथ पूरब तथा कैप्टन बिंजोर पश्चिम से आगे बढ़ा। अंग्रेजों तथा नबाव की संयुक्त फौज के आगे शिवगंगा की सुरक्षा के सभी इंतजाम नाकाफी सिद्ध हुए। देखते ही देखते कीरानूर और शोलापुरम चौकियों पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। 25 जून 1772 को मुत्तुवेदुगानाथ थेवर की फौजों तथा अंग्रेजों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। अपने सेनानायकों के साथ राजा ने दुश्मनों का जमकर सामना किया। मगर दो-तरफा हमले में घिरकर उन्हें तथा गोरी नाचियार को अपनी जान गंवानी पड़ी। उनके गिरते ही अंग्रेज फौज ने भीषण मारकाट मचा दी। मंदिर और बस्ती को लूट लिया गया। सैकड़ों स्त्री-पुरुष और बच्चे मौत के घाट उतार दिए गए।

बचाव की कोई संभावना न देख वेलु नाचियार ने अपनी बेटी के साथ शिवगंगा दुर्ग छोड़ दिया। उसके जाते ही दुर्ग पर आरकोट के नबाव ने कब्जा कर लिया। शिवगंगा का नाम बदलकर हुसैन नगर कर दिया गया। उस बदलाव को कंपनी की मंजूरी भी मिल गई। उधर ब्रिटिश और नबाव की सेना से बचती-बचाती, अपने गिने-चुने अंगरक्षकों साथ रानी डिंडीगुल के निकट विरुपाक्षी पहुंची। वहां का राजा गोपाल नायक्कर रानी का हितैषी था। उसने रानी को संरक्षण दिया। कुछ समय बाद रानी के भरोसेमंद सेनानायक पेरिया मुरुंडू तथा चिन्ना मुरुंडू भी वहां पहुंच गए। क्षुब्ध रानी अंग्रेजों से बदला लेने की सोच रही थी। दूसरी ओर अंग्रेजी फौजें उसे खोजती हुई आगे बढ़ रही थीं। बढ़ते हुए खतरे को देख रानी के शुभचिंतकों सेनापति टी. पिल्लई तथा मुरुंडू बंधुओं ने उसे किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाने की सलाह दी।

हैदर अली से मुलाकात

उस समय मैसूर पर हैदर अली का शासन था। वह चीते जैसा बहादुर था। अंग्रेज उसके नाम से भी घबराते थे। वेलु नाचियार ने हैदर अली को पत्र लिखा। कुछ ही अवधि के बाद रानी को हैदर अली की ओर से बुलावा आ गया। मुलाकात के लिए डिंडीगुल किले को चुना गया। वेलु जब डिंडीगुल पहुंची तो हैदर अली ने उसका स्वागत रानी की तरह किया। वेलु ने उसे सारे घटनाक्रम के बारे में बताया। कहा कि वह अंग्रेजों को खदेड़कर शिवगंगा की वापसी चाहती है। इससे खुश होकर हैदर अली ने वेलु को 400 पाउंड मासिक की आर्थिक सहायता, 5,000 पैदल सेना, इतने ही घुड़सवार सैनिक और भारी मात्रा में अस्त्र-शस्त्र भी प्रदान किए।2 यही नहीं, रानी वेलु नाचियार के प्रति अपनी मैत्री का भरोसा दिलाते हुए हैदर अली ने वहां एक मंदिर भी बनवा दिया।

उदायल नारीसेना’ का गठन

हैदर अली का समर्थन प्राप्त करने के बाद रानी वेलु नाचियार विरुपाक्षी लौट आई। वहां रहते हुए उसने सेना का गठन किया। अलग से स्त्रियों की सेना बनाई, जिसे उसने उदायल नामक बहादुर स्त्री के नाम पर ‘उदायल नारी सेना’ नाम दिया। उन दिनों वेलु नाचियार शिवगंगा से निकलकर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में भटक रही थी। ब्रिटिश सैनिक उसके पीछे लगे थे। उनसे बचते-बचाते वेलु ने अरियाकुरिची कोविल में शरण ली थी। इस बीच उसका पीछा करते हुए अंग्रेज सैनिक वहां पहुंच गए। उन्होंने उदायल से वेलु नाचियार का पता बताने को कहा। उदायल ने साफ मना कर दिया और अकेली ही अंग्रेजों पर टूट पड़ी। क्रुद्ध सैनिकों ने उदायल को वहीं मार दिया।

उसी वीरांगना के नाम पर वेलु ने अपनी नारी सेना का नामकरण किया था। उसने साथ रह रही स्त्रियों को समझाया कि वे पुरुषों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं। अवसर आने पर बड़े से बड़े खतरे का सामना कर सकती हैं। वेलु नाचियार महिला सैनिकों को खुद प्रशिक्षण देती थी। अपनी सबसे भरोसेमंद, बहादुर तथा तीक्ष्ण मति कुयिली को उसने नारी सेना का सेनापति नियुक्त किया था।

कुयिली का आत्मबलिदान और शिवगंगा पर जीत

वेलु नाचियार जोर-शोर से सैन्य तैयारियों में जुटी थी। स्त्री और पुरुष सेनाएं प्रातःकाल प्रशिक्षण में जुट जातीं थीं। रानी खुद उसमें हिस्सा लेती थी। उसने स्त्रियों को तलवारबाजी के अलावा ‘हांसिया’ से निशाना लगाने का प्रशिक्षण भी दिया था। 8 वर्षों तक वेलु नाचियार युद्ध की तैयारी में लगी रही। आखिर वह अवसर आ ही गया, जिसकी उसे लंबे समय से प्रतीक्षा थी।

शिवगंगा दुर्ग के भीतर देवी राजराजेश्वरी का मंदिर था। उसमें प्रतिवर्ष दशहरे का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। देवी-पूजन के समय स्त्रियां बड़ी संख्या में शामिल होती थीं। वेलु नाचियार उसी अवसर का लाभ उठाने का निर्णय किया। उसे अपनी सेनाओं पर भरोसा पर था। उसके बलपर वह कई लड़ाइयां भी जीत चुकी थी। लेकिन अंग्रेजों के पास उस समय के आधुनिकतम हथियार थे। भारी-भरकम सेना थी। उससे पार पाना, असंभव नहीं तो आसान भी नहीं था।

उस समय कुयिली के मस्तिष्क में एक और योजना काम कर रही थी। जिसका अंदाजा स्वयं रानी को भी नहीं था। वह जानती थी कि दशहरे के दिन राज्य-भर की स्त्रियां शिवगंगा के दुर्ग में राजराजेश्वरी देवी की पूजा के लिए जाती हैं। उस दिन दुर्ग के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। मंदिर के पास ही अंग्रेजों का शस्त्रागार होने के कारण पुरुषों को उस उत्सव में शामिल होने की अनुमति नहीं होती। दशहरे के दिन जैसे ही दुर्ग का मुख्य द्वार खुला, कुयिली के साथ ‘उदायल रानी सेना’ की वीरांगनाएं भी दुर्ग में प्रवेश कर गईं। वे सब साधारण वस्त्रों में थीं। फूलों और फलों की टोकरियों में उन्होंने अपने हथियार छिपाए हुए थे। अंग्रेजों के सैनिकों को उसकी भनक तक न लगी।

भीतर जाने के बाद वेलु नाचियार को अंग्रेजों के शस्त्रागार का पता लगाने में देर न लगी। दुर्ग में नबाव और अंग्रेजों की बड़ी सेना मौजूद थी। अवसर देख कुयिली की स्त्री सेना ने हमला बोल दिया। अंग्रेज उनसे जूझने लगे, कुयिली के मस्तिष्क में चल रही योजना के बारे में सिवाय उसके किसी को अंदाजा न था। मंदिर में दीपक जलाने के लिए घी का इंतजाम था। भीड़-भाड़ का फायदा उठाकर कुयिली ने अपने सैनिकों से घी को अपने ऊपर उंडेल देने को कहा। घी से तर-बतर होने के बाद, भीड़ का फायदा उठाकर वह शस्त्रागार की ओर बढ़ गई। भीतर जाते ही उसने अपने कपड़ों में आग लगा ली। वहां तैनात रक्षक कुछ समझ पाएं उससे पहले ही शस्त्रागार में आग भड़क उठी। देखते ही देखते पूरा शस्त्रागार आग की लपटों से घिर गया।

इसी के साथ वेलु नाचियार ने अपनी सेना के साथ शिवगंगा किले पर धावा बोल दिया। अंग्रेज उसका युद्ध कौशल देखकर हैरान थे। कुछ ही देर में वे मैदान छोड़कर भागने लगे। किले पर वेलु नाचियार का कब्जा हो गया। कुयिली सहित उन सभी महिलाओं, जिन्होंने उस युद्ध में बलिदान दिया था, को वेलु नाचियार ने अपनी धर्म-पुत्री का दर्जा दिया। युद्ध में अद्वतीय वीरता का प्रदर्शन करने वाले मुरुंडू बंधुओं, पेरिया मुरुंडू तथा चिन्ना मुरुंडू को मंत्री बनाया गया। उसके बाद रानी करीब 10 वर्षों तक शिवगंगा पर शासन किया।

प्रथम महिला बम कुयिली

शिवगंगा की लड़ाई में आत्मबलिदान करने वाली कुयिली को भारत की प्रथम ‘महिला बम’ होने का गौरव प्राप्त है। तमिल नाडु में लोग उसे ‘वीरामंगाई’(बहादुर स्त्री) और ‘वीरदलपति’(बहादुर सेनानायक) कहकर बुलाते हैं। उसका जन्म ‘अरुण्थथियार’ नामक दलित जाति में हुआ था। तमिलनाडु में इस जाति के लोग आमतौर पर मेहनत-मजदूरी और चमड़े का काम करते हैं। कुयिली के पिता का नाम पेरियामुथन और मां का नाम राकू था। दोनों ही खेतिहर मजदूर थे। कुयिली की मां राकू साहसी और बहादुर महिला के रूप में विख्यात थीं। एक बार एक जंगली सांड ने उसके खेत पर हमला कर दिया था। साहसी राकू अकेले ही उससे भिड़ गई। उसी संघर्ष में उसने अपनी जान दे दी। पत्नी की मृत्यु से विक्षुब्ध पेरियामुथुन, कुयिली को लेकर शिवगंगा चला गया। वहां वह मोची का काम करके अपना जीवनयापन करने लगा।

पेरियामुथुन ने कुयिली को उसकी मां की बहादुरी के किस्से सुनाते हुए बड़ा किया था। वह खुद भी बहादुर था। जिन दिनों वेलु नाचियार सैन्य-संगठन के काम में लगी थी —पेरियामुथुन भी उसकी सेना में शामिल हो गया। वेलु नाचियार ने उसे गुप्तचर का काम सौंप दिया। इसी बीच कुयिली और वेलु नाचियार का परिचय हुआ, जो निरंतर घनिष्टता में बदलता गया। पेरियामुथुन और कुयिली रानी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में थे। वे आवश्यकतानुसार कभी भी, बेरोकटोक रानी के पास आ-जा सकते थे।

कुयिली रानी की निजी सुरक्षा का काम देखती थी। उसने अनेक अवसरों पर रानी के प्राणों की रक्षा की थी। एक रात वेलु नाचियार सोई हुई थी। तभी एक धोखेबाज ने उस पर जान लेवा हमला कर दिया। कुयिली उससे भिड़ गई। उनकी आवाजें सुन हमलावर भाग गया। आवाज सुनकर वेलु नाचियार बाहर आई तो उसने कुयिली को घायल अवस्था में देखा। रानी ने तत्क्षण अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर कुयिली के घावों पर बांध दिया। कुयिली की वीरता, तीक्ष्ण मति की इसके अलावा और भी कई कहानियां हैं।

कुयिली की वीरता और बलिदान की झलक 77 वर्ष बाद झलकारी बाई में भी दिखाई पड़ती है।

ओमप्रकाश कश्यप

1. वी. वरिद्धागिरीसन, दि नायक्स ऑफ तंजोर, एशियन एजुकेशनल सर्विस, दिल्ली 1995, पृष्ठ 26।

2. राज्य सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, शिवगंगा, दिनांक 7 नवंबर, 2017

संत गाडगे महाराज : कीर्तन से क्रांति

सामान्य

जीवन चारि दिवस का मेला रे

बांभन(ब्राह्मण)झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे

मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे

लड्डू भोग चढावति जनता, मूरति के ढिंग केला रे

पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे

जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न अधेला रे

पुन्य-पाप या पुनर्जन्म का , बांभन दीन्हा खेला रे

स्वर्ग-नरक, बैकुंठ पधारो, गुरु, शिष्य या चेला रे

जितना दान देवे देव गे ब्राह्मण को देवोगे, वैसा निकरै तेला रे

बांभन जाति सभी बहकावे, जन्ह तंह मचै बबेला रे

छोड़ि के बांभन आ संग मेरे, कह रैदास अकेला रे

                                       —संत रैदास

इन दिनों परिस्थितिकीय असंतुलन सर्वाधिक चिंता का विषय है. होना भी चाहिए. वातावरण में रोज तरह-तरह के जहर घुलकर जिस तरह से उसे विषाक्त कर रहे हैं, यह चिंता वाजिब है. लेकिन एक और किस्म का प्रदूषण होता है. पहले वाले प्रदूषण पर बड़ी-बड़ी पोथियां लिखने वाले, रोज जार-जार आंसू बहाने वाले लोग दूसरी किस्म के प्रदूषण की ओर से चुप्पी साधे रहते हैं. इस प्रदूषण का नाम है—सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण. इसे फैलाते हैं, जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्रीयता, रंगभेद जैसे विषाणु. पहली किस्म का प्रदूषण समाज के बीच भेद नहीं करता. उसका असर सभी पर बराबर पड़ता है, हालांकि चपेट में गरीब और निचले वर्ग ही आते हैं, क्योंकि वे उससे जूझने लायक संसाधन नहीं जुटा पाते. दूसरे प्रकार का प्रदूषण समाज को नीची जाति-ऊंची जाति, स्वामी-मालिक, निदेशक-अनुपालक आदि में बांट देता है. पहली प्रकार के प्रदूषण से निपटने के लिए समाज की सामूहिक चेतना काम करती है. दूसरे प्रदूषण से निपटने के लिए केवल प्रभावित वर्गों को आगे आना पड़ता है. संघर्ष के दौरान उन्हें शीर्षस्थ वर्ग जो उस विकृति का लाभकारी, परजीवी वर्ग है—उसका विरोध भी सहना पड़ता है. इसलिए दूसरे प्रदूषण से मुक्ति आसान नहीं होती. ऐसे में जो लोग तमाम अवरोधों और मुश्किलात के बावजूद अपने अनथक संघर्ष द्वारा, धूल अटी संस्कृति को थोड़ा-भी साफ कर पाते हैं, मनुष्यता का इतिहास उन्हें संत, महात्मा, महापुरुष, युगचेता, युगनायक आदि कहकर सहेज लेता है. ऐसे ही कर्मयोगी संत थे—गाडगे महाराज. जिन्हें हम संत गाडगे या गाडगे बाबा के नाम से भी जानते हैं.

मराठी में ‘गाडगा’ का अर्थ है—खप्पर. टूटे हुए घड़े या हांडी का नीचे का कटोरेनुमा हिस्सा. गाडगे महाराज की वही एकमात्र पूंजी थी. कहीं जाना हो तो उसे अपने सिर पर रख लेते. हाथ में झाड़ू लगी होती. जहां भी गंदगी दिखाई पड़ती, वहीं झाड़ू लगाने लगते. कोई कुछ खाने को देता तो उसे गाडगा में रखवा लेते. कालांतर में गाडगा और झाड़ू ही उनकी पहचान बन गई. झाड़ू से बाहर की सफाई. विचारों से लोगों के मन में जमा उस मैल को साफ करने की कोशिश, जो सैकड़ों वर्षों से उनके मन में जमा था. जिसे हमने दूसरी श्रेणी के प्रदूषण के लिए जिम्मेदार माना है. गांव में एक दिन से ज्यादा ठहरते नहीं थे. रोज नया गांव, नई जगह की सफाई. नए-नए लोगों को सदोपदेश.

संत गाडगे का असली नाम था, डेबुजी झिंगराजी जाणोरकर. उनका जन्म 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेड्गांव के धोबी परिवार में हुआ था. पिता का नाम था, झिंगराजी और मां थीं—साखूबाई. गरीब परिवार था. जब शिक्षा की उम्र थी, तब उन्हें गृहस्थी चलाने में परिवार की मदद करनी पड़ती थी. चुनौतियां बस इतनी नहीं थीं. आठ वर्ष की अवस्था में उनके पिता का साया सिर से उठ गया. मां ने उन्हें अपने भाई के यहां भेज दिया. मामा खेती-बाड़ी करते थे. डेबू जी भी उनके साथ खेतों पर जाने लगे. वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट और परिश्रमी थे. सो कुछ ही दिनों में मामा की खेती संभाल ली. युवावस्था में कदम रखने के साथ ही उनका विवाह कर दिया गया. पत्नी का नाम था, कुंतीबाई. दोनों के चार बच्चे हुए. उनमें दो लड़के और दो बेटियां थीं. उस समय तक डेबुजी खेतों में काम करते. खूब मेहनत करते. साहस उनमें कूट-कूट कर भरा था. जरूरत पड़ने पर आततायी से अकेले ही भिड़ने का हौसला रखते थे.

उन दिनों खेती करना आसान बात न थी. जमींदार लगान और साहूकार ब्याज के बहाने किसान की सारी मेहनत हड़प लेता था. कई बार किसान के पास अपने खाने तक को अनाज न बचता था. डेबुजी को यह देखकर अजीब लगता था. एक बार जमींदार का कारिंदा उनके पास लगान लेने पहुंचा तो किसी बात पर डेबुजी का उनसे झगड़ा हो गया. हृष्ट-पुष्ट डेबुजी ने कारिंदे को पटक दिया. उस शाम घर पहुंचने पर उन्हें मामा की नाराजगी झेलनी पड़ी. कुछ दिनों के बाद उनके मामा का भी देहावसान हो गया. डेबुजी के लिए वह बड़ा आघात था. सांसारिक सुखों के प्रति आसक्ति पहले ही कम थी. मामा की मृत्यु के बाद तो उनपर वैराग्य-सा छा गया. डेबुजी को भी समझ में आ गया कि किसानों और मजूदरों की लूट की असली वजह लोगों की अशिक्षा है. लोग गरीबी के असली कारण को जानने के बजाए, उसे अपना भाग्यदोष मानकर चुप हो जाते हैं. बीमार पड़ते हैं तो वैद्य-हकीम से ज्यादा गंडे-ताबीज पर भरोसा करते हैं. 1905 में उन्होंने अपना घर छोड़ दिया. उसके बाद 12 वर्षों तक लगातार भटकते रहे. आरंभ में उनकी यात्रा ईश्वर की खोज को समर्पित थी. लेकिन मंदिरों और शिवालयों में धर्म की धंधागिरी देख पारंपरिक धर्मों से उनका विश्वास उठ गया. उसके बाद उन्होंने अपना समूचा जीवन मनुष्यता की सेवा को समर्पित कर दिया.

संत रविदास और कबीर का प्रभाव था. सो सीधी नजर समाज में व्याप्त गंदगी पर पड़ती थी. वे देखते कि लोग अशिक्षा के कारण अज्ञानता में फंसे हैं. अज्ञानता उन्हें जाति की मार सहने को मजबूर करती है. वही सामंत की चाटुकारिता को विवश करती है. वही समाज में व्याप्त तरह-तरह की रूढ़ियों और अंधविश्वास का कारण है—‘उससे उद्धार का एकमात्र रास्ता है—शिक्षा. इसलिए शिक्षित बनो और बनाओ.’ सादगी उनका जीवन थी. झाड़ू उठाए वे गांव-गांव घूमते. जहां जाते, वहां सफाई में जुट जाते. फकीरनुमा आदमी को सफाई करते देख, लोग कौतूहलवश सवाल करते—‘शाम को कीर्तन होगा, आ जाना.’ इतना कहकर वे पुनः सफाई में लग जाते. ‘कीर्तन के लिए गांव में साफ-सुथरे ठिकाने है’—लोग कहते. ‘हमें सिर्फ अपना घर नहीं, पड़ोस भी साफ रखना चाहिए.’ गाडगे महाराज बातों-बातों में सामूहिकता की महत्ता बता देते. शाम को कीर्तन होता. उसमें वे लोगों को सफाई का महत्त्व समझाते. अशिक्षा, रूढ़ि, धार्मिक-सामाजिक आडंबरों की आलोचना करते. मौज में होते तो ‘गाडगा’ को ही वाद्ययंत्र बना लेते. लकड़ी की मदद से उसे बजाते-बजाते अपनी ही धुन में खो जाते. लोगों को समझाते—‘मनुष्यता ही सच्चा धर्म है. मनुष्य होना सबसे महान लक्ष्य है. इसलिए मनुष्य बनो. भूखे को रोटी दो. बेघर को आसरा दो. पर्यावरण की रक्षा करो.’ कीर्तन करते-करते कभी उनमें कबीर की आत्मा समा जाती तो कभी संत रविदास उनकी जिव्हा पर उतर आते. एक जगह काम पूरा हो जाता तो ‘गाडगा’ को सिर पर औंधा रख, फटी जूतियां चटकाते हुए, किसी नई बस्ती की ओर बढ़ जाते. फटेहाल अवस्था, मिट्टी के कटोरे और झाड़ू के साथ देखकर कई बार लोग उन्हें पागल समझने लगते. विचित्र भेष के कारण आवारा कुत्ते उनपर भौंकते. लोग हंसी उड़ाते, मगर आत्मलीन गाडगे बाबा आगे बढ़ते जाते थे. कोई उनकी वेशभूषा को लेकर सवाल करता तो मुस्कराकर कहते—‘इंसान को हमेशा सीधा-सादा जीवन जीना चाहिए. शान-शौकत उसे बरबाद कर देती है.’

विदेशों में व्यक्ति की महानता का आकलन उसकी योग्यता और लोकहित में किए गए कार्यों द्वारा किया जाता है. भारत में योग्यता और सत्कर्म दूसरे स्थान पर आते हैं. पहले स्थान पर आती है, उसकी जाति. ब्राह्मण की संतान को जन्म से ही सबसे ऊपर की श्रेणी में रख दिया जाता है और जो शूद्र और अंतज्य हैं, उन्हें सबसे निचली श्रेणी प्राप्त होती है. इसलिए एक शूद्र को समाज में अपनी योग्यता को स्थापित करने के लिए, न केवल अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है, अपितु चुनौतियों के बीच अपनी योग्यता भी प्रमाणित करनी पड़ती है. गाडगे बाबा का हृदय करुणा से आपूरित था. स्वार्थ के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देना उन्हें स्वीकार्य न था. वे उसका विरोध करते. जरूरत पड़ने पर उसके लिए परिजनों और पड़ोसियों से भी लड़ जाते थे. ईश्वर और धर्म की उनकी अपनी परिभाषा थी. लोग धर्म के बारे में सवाल करते तो कहते—‘गरीब, कमजोर, दुखी, बेबस, बेसारा और हताश लोगों की मदद करना, उन्हें हिम्मत देना ही सच्चा धर्म है. वही सच्ची ईश्वर भक्ति है.’ ईश्वर को प्रसन्न करना है तो—‘भूखे को रोटी, प्यासे को पानी, वस्त्रहीन को वस्त्र तथा बेघर को घर दो. यही ईश्वर सेवा है.’

पूरी तरह निस्पृह जीवन था. कहते थे कि, ‘अगर आप दूसरों के श्रम पर सिर्फ अपने लिए जिएंगे तो मर जाएंगे. लेकिन यदि आप अपने श्रम से, दूसरों के लिए जिएंगे तो अमर हो जाएंगे.’ कई बार गांव वाले भोजन के साथ कुछ पैसे भी थमा देते. उन पैसों को वे जोड़ते चले जाते. जब पर्याप्त रकम जमा हो जाती तो लोगों की जरूरत के हिसाब से जमाराशि को स्कूल, धर्मशाला, अस्पताल, सड़क आदि बनाने पर खर्च कर देते थे. अपने विचारों को सीधी-सरल भाषा में व्यक्त करते. यह मानते हुए कि धर्मप्राण लोग शब्द-कीर्तन पर ज्यादा विश्वास करते हैं, इसलिए अपने विचारों के बारे में कीर्तन के माध्यम से लोगों को समझाते. कहते कि मंदिर-मठ आदि साधु-संतों के अड्डे हैं. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग-नर्क जैसी बातों पर उन्हें विश्वास ही नहीं था. आंख मूंदकर राम नाम जपने या रामनामी ओढ़ लेने को वे पंडितों का ढोंग बताते थे. पंढरपुर भक्तिमार्गी हिंदुओं का बड़ा तीर्थ है. गाडगे महाराज प्राय: वहां जाते. लेकिन विट्ठल भगवान के दर्शन करने के लिए लोगों को मानव-धर्म का उपदेश देने के लिए. उनके लिए मानव-धर्म का मतलब था—’प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना.’   

उनके जीवन की एक रोचक घटना है. गाडगे महाराज को मथुरा जाना था. उसके लिए मथुरा जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए. सामान के नाम पर उनका वही चिर-परिचित ‘गाडगा’, लाठी, फटे-पुराने चिथड़े कपड़े और झाड़ू था. रास्ते में भुसावल स्टेशन पड़ा तो वहीं उतर गए. कुछ दिन वहीं रुककर आसपास के गांवों में गए. वहां झाड़ू से सफाई की. कीर्तन कर लोगों को उपदेश दिए. मथुरा जाने की सुध आई तो वापस फिर रेलगाड़ी में सवार हो गए. इस बार टिकट निरीक्षक की नजर उनपर पड़ गई. गाडगे बाबा के पास न तो टिकट था, न ही पैसे. टिकट निरीक्षक ने उन्हें धमकाया और स्टेशन पर उतार दिया. उससे यात्रा में आकस्मिक व्यवधान आ गया. लेकिन जाना तो था. देखा, स्टेशन के पास कुछ रेलवे मजदूर काम रहे हैं. डेबुजी उनके पास पहुंचे. कुछ दिन मजदूरों के साथ मिलकर काम किया. मजदूरी के पैसों से टिकट खरीदा और तब कहीं मथुरा जा पाए.

जीवन में वे डॉ. अंबेडकर, गांधी सहित अपने समय के कई प्रगतिशील नेताओं से उनका संपर्क था.  सभी ने गाडगे जी के कार्यों की सराहना की. वे अंबेडकर से वे 15 वर्ष बड़े थे. डॉ. अंबेडकर ने दलितोद्धार के लिए आंदोलन आरंभ किया तो डेबुजी भी अपनी तरह जुट गए. मगर उसके लिए रास्ता नहीं बदला. अपने कीर्तन के माध्यम से वे मनुष्य की समानता और स्वतंत्रता का समर्थन करते. छूआछूत को अमानवीय बताकर उसकी आलोचना करते. लोगों को सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने की सलाह देते. डॉ. अंबेडकर का साधु-संतों से दूर ही रहते थे. परंतु संत गाडगे के कार्यों की उपयोगिता को वे समझते थे. दूर-दराज के गांवों में, अत्यंत विषम परिस्थितियों में रह रहे दलितों के उद्धार का एकमात्र रास्ता है कि उनके बीच रहकर लोगों को समझाया जाए. उन्हीं की भाषा में, उनके करीब रहते रहते हुए. संत गाडगे यही काम करते थे. इसलिए दोनों समय-समय पर मिलते रहते थे.

हिंदू धर्म में साधुओं की कमी नहीं है. एक आम साधु-संत के पास पैसे जाएं तो वह सबसे पहले मंदिर बनवाता है, या फिर धर्मशालाएं, ताकि बैठे-बैठाए जीवनपर्यंत दान की व्यवस्था हो जाए. गाडगे बाबा ने अपने लिए न तो मंदिर बनवाया, न ही मठ. एक सच्चा, त्यागमय और निस्पृह जीवन जिया. कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया. रवींद्रनाथ के एकला चलो के सिद्धांत पर वे हमेशा अकेले ही आगे बढ़ते रहे. उनके कार्यों और उपदेशों से प्रभावित होकर लोग कई बार उन्हें रोकने का प्रयास करते. इसपर वे मुस्करा कर कहते—‘नदिया बहती भली, साधू चलता भला. धीरे-धीरे उनका यश बढ़ता जा रहा था. कीर्तन में सभी वर्गों के लोग आते थे. उनसे कभी-कभी मोटी दक्षिणा भी हाथ लग जाती. उसे वे ज्यों का त्यों संस्थाओं के निर्माण के नाम पर खर्च कर देते थे. शिक्षा के बारे में बात होती तो कहते—‘शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी आ पड़े तो खाने के बर्तन बेच दो. औरत के लिए कम दाम की साड़ियां खरीदो. टूटे-फूटे मकान में रहो. मगर बच्चों को शिक्षा जरूर दो.’ धनी लोगों को समझाते—‘शिक्षित करने से बड़ा कोई परोपकार नहीं है. गरीब बच्चों को शिक्षा दो. उनकी उन्नति में मददगार बनो.’ दान में मिले पैसों की पाई-पाई जोड़कर उन्होंने लगभग 60 संस्थाओं का निर्माण कराया. सारा पैसा उन्होंने गरीबों के लिए स्कूल खोलने, अस्पताल और ब्रद्धाश्रम बनवाने, धर्मशालाएं परिश्रमालय, वृद्धाश्रम बनवाने पर खर्च करते रहे.

संत गाडगे जी की 13 दिसंबर 1956 को अचानक तबियत खराब हुई और 17 दिसंबर 1956 को बहुत ज्यादा खराब हुई, 19 दिसंबर 1956 को रात्रि 11 बजे अमरावती के लिए जब गाड़ी चली तो रास्ते में ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी. गाड़ी में सवार चिकित्सकों ने उन्हें अमरावती ले जाने की सलाह दी. लेकिन गाड़ी कहीं भी जाए, गाडगे बाबा तो अपने जीवन का सफर पूरा कर चुके थे. बलगांव पिढ़ी नदी के पुल पर गाड़ी पहुंचते-पहुंचते मध्यरात्रि हो चुकी थी. उसी समय, रात्रि के 12.30 बजे अर्थात 20 दिसंबर 1956 को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली. संत गाडगे सच्चे संत थे. दिखावा उन्हें नापसंद था. अपने अनुयायियों से अकसर यही कहते, मेरी मृत्यु जहां हो जाए, वहीं मेरा संस्कार कर देना. न कोई मूर्ति बनाना, न समाधि, न ही मठ या मंदिर. लोग मेरे जीवन और कार्यों के लिए मुझे याद रखें, यही मेरी उपलब्धि होगी. गाडगे ही इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार जिस जगह किया गया, वह स्थान गाडगे नगर कहलाता है. आज वह वृहद अमरावती शहर का हिस्सा है.

ओमप्रकाश कश्यप

बुद्धिवाद की प्रासंगिकता

सामान्य

—ई.वी. रामासामी पेरियार

(बुद्धिवाद की प्रासंगिकता पर यह भाषण पेरियार ने 22 जून 1971 को कोयंबटूर जिले के मेट्टुपलायम नामक कस्बे में दिया था। अवसर था, ‘तर्कवादी संगठन’ (रेशनलिष्ट एसोशिएसन) के उद्घाटन का। भाषण में वे ईश्वर, धर्म, महाकाव्य, पुराण, धर्मशास्त्र आदि ब्राह्मणवाद के विभिन्न रूपाकारों की बेबाक समीक्षा करते हैं। हर उस चीज पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से विचार करते हैं, जो मनुष्य को भीरू और बौद्धिक दास बनाकर उसकी अज्ञानता; प्रकारांतर में शोषण की नींव तैयार करती है। यह भाषण उनके वैचारिक सातत्य का उदाहरण भी है। उससे सात दशक पहले, 1922 में पेरियार ने कहा था कि ‘रामायण’ और ‘मनुस्मृति’ को आग के हवाले कर देना चाहिए। 1925 में उन्होंने सलाह दी थी कि बड़ी-बड़ी मूर्तियों को नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे गंदे कपड़े धोने, पछारने के काम आ सकें। 1930 में ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ की रचना की। 1956 में राम की तस्वीरों का दहन किया। मूर्तियां तोड़ने का आंदोलन भी चलाया। आरंभ में वे केवल हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद के आलोचक थे। आगे चलकर उन्होंने संपूर्ण धर्मसत्ता को आलोचना के दायरे में ले दिया। उनका मानना था कि धर्म, ईश्वर, वर्ण-व्यवस्था, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, अवतारवाद आदि ब्राह्मणवादी प्रपंच हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य सामाजिक विषमता को स्थायी बनाना है। तदनुसार ब्राह्मणों को सर्वेसर्वा मान अधिकार-शून्य और मतिविहीन हो जाना है। इस भाषण में वे राम, कृष्ण, शिव, ब्रह्मा जैसे हिंदुओं के सभी देवताओं पर निशाना साधते हैं। जहां तक कृष्ण की बात है, पेरियार ब्राह्मणों द्वारा सृजित उस ‘कृष्ण’ की आलोचना करते हैं जो ‘गीता’ के बहाने चातुर्वर्ण्य धर्म का समर्थन करता है। यदुओं के वास्तविक नायक, ऋग्वेद में वर्णित दशराज्ञ युद्ध में यदुसेना का नेतृत्व करने वाले, 10000 योद्धाओं के साथ इंद्र से समरांगण में लोहा लेने वाले महानायक कृष्ण, ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए कृष्ण से एकदम अलग हैं।

पेरियार की खूबी है कि वे अपने विचारों को पाठक पर थोपते नहीं है। वे श्रोताओं से निरंतर आग्रह करते हैं कि उनकी कही बातों पर इसलिए विश्वास न करें कि वे कह रहे हैं। अपितु मुक्त मन से उनपर विचार करें। उसके बाद जो जंचे फैसला करें। जिस समय पेरियार ने यह भाषण दिया, वे 92 वर्ष के थे। इस उम्र तक आते-आते मनुष्य प्रायः अपने विचारों के प्रति दुराग्रही हो जाता है। अपने अनुभवों के आगे दूसरों के अनुभव उसे बेमानी लगने लगते हैं। अपने विचार दूसरों पर लादने में उसे कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता। पेरियार इसके अपवाद थे। 92 की उम्र में करीब 3 घंटे धाराप्रवाह, विषय से भटके बगैर बोलना, बगैर ऐसी उदात्त भावना के संभव ही नहीं था।

साथियो!

यहां आकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। मुझे बताया गया है कि करीब दस वर्ष पहले भी मैं यहां आया था। मुझे भी याद है। लेकिन इससे पहले मैं यहां किस वर्ष आया था, वह मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है। इसके बावजूद मैं खुश हूं। इस बात से खुश हूं कि मुझे आपसे दुबारा मिलने का अवसर दिया गया है। मुझसे पहले यहां कई विद्वान अपनी बात कह चुके हैं। उन सभी के भाषण विचारोत्तेजक थे। कुछ बातें मैं भी आपसे आपसे करना चाहता हूं। आगे मैं जो भी कहूं, उससे पहले मेरा आग्रह है कि मेरी बातों पर, बिना भली-भांति विचार किए हरगिज विश्वास न करें। न ही बिना विचारे उनका अनुसरण करें। मैं बस इतना चाहता हूं कि मैं जो भी कहूं, आप खुले दिमाग से उसपर चिंतन करें। सोचें कि मैंने जो भी कहा है—वह सही है; अथवा नहीं। मेरी बातों में यदि आपको कुछ भी सार्थक लगता है, तभी उसे ग्रहण करें। उसके बाद यदि आपकी इच्छा हो तो उन विचारों को आगे बढ़ाने के लिए जैसा उचित लगे—वैसा कदम उठाएं।

मैंने कहा है, अथवा हमने कहा है—सिर्फ इसीलिए किसी बात पर भरोसा न करें।

किसी व्यक्ति को आखिर क्यों सोचना चाहिए?

मैं आपको बताऊंगा, किसलिए….

हम यहां बुद्धिवाद के प्रचार के लिए आए हैं। हम चाहते हैं कि मनुष्य तर्कशील प्राणी के रूप में जीवनयापन करें। हम अविश्वसनीय और तर्कातीत समझी जाने वाली बातों का प्रचार नहीं करते। न ही हम ईश्वर, ईश्वर की संतान, अवतारों, धर्म, धर्मशास्त्रों, रीति-रिवाजों तथा परंपरा वगैरह के प्रचार में अपना श्रम खपाते हैं। हम केवल उन्हीं चीजों का प्रचार करने में विश्वास रखते हैं, जो आपकी तर्कबुद्धि को हर तरह से स्वीकार्य हो। यदि हमारा समाज तार्किकता और तार्किक मनोवृत्ति को अपना चुका होता, तब चिंता का कोई कारण नहीं था। लेकिन हमारे लोगों को ऐसा करने से रोका गया है।

‘हमने जो कहा है वह आपको सुनना ही चाहिए। हमने जो भी, जैसा भी कहा है वह सब निरा ईश्वरीय कथन है। मैं ईश्वर का ही एक अवतार हूं। इसलिए आपको वही करना चाहिए, जैसा मैं कहता हूं।’—दूसरों पर अपने विचार लादने के लिए इस तरह के भाषण और धार्मिक आख्याएं जरूरी थीं। इनकी मदद से लोगों को स्वतंत्रतापूर्वक सोचने, स्वयं किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से रोक दिया गया था। यह आज का चलन नहीं है। आरंभ में मनुष्य तर्क और बौद्धिक सामर्थ्य से संपन्न था। 2000-3000 वर्षों के बाद आज हम आपसे दुबारा वहीं अपील करना चाह रहे हैं कि स्वतंत्र भाव से सोचो, अपने विवेक पर भरोसा रखो। कितने अफसोस की बात है!

आज यहां हमने एक बुद्धिवादी संगठन का उद्घाटन किया है। यह बात स्वयं-सिद्ध है कि यह बुद्धिवादी लोगों की संस्था है। हम यहां जीवनयापन के सही तरीके पर चर्चा करने जा रहे हैं।

वे लोग जो सोचने अथवा तर्कसम्मत आचरण से इन्कार करते हैं, वे पशुओं के समान हैं। यह मैंने किस आधार पर कहा है? जीवित प्राणियों में, पशुओं के पास तार्किक दृष्टिकोण तथा चिंतन-मनन की शक्ति का अभाव होता है। मनुष्य उनकी तरह नहीं है। मानवीय प्राणियों के पास स्वतंत्र विवेक होता है। उनकी चेतना बहुआयामी होती हैं। पेड़-पौधों और झाड़ियों के बारे में कहा जाता है कि उनकी चेतना का स्वरूप एकांगी होता है। समानांतर चेतनाओं यानी अपने से बाहर की दुनिया से वे अनभिज्ञ होते हैं। कीड़े-मकोड़ों तथा अन्यान्य जीवाणुओं के पास दो तरह की संवेदनशीलता होती हैं। तैरने वाले प्राणियों यथा—मछली, व्हेल वगैरह के पास त्रिआयामी संवेदन शक्तियां बताई गई हैं। उड़ने वाले पक्षियों के पास चार प्रकार का संवेदन-सामर्थ्य; तथा घूमने-फिरने वाले जीवों यथा गाय, घोड़ा आदि के पास पांच प्रकार की संवेदन-शक्तियां बताई जाती हैं। बुद्धिवाद यानी तर्क करने की शक्ति, स्वतंत्र भाव से सोचने-समझकर निर्णय लेने की आत्मनिर्भरता, जिसे छठी संवेदन-शक्ति भी कहा जाता है—वह केवल मानवीय प्राणी में ही देखी जाती है।

ऐसे भी जीवित प्राणी हैं जिनमें विशिष्ट शक्तियां होती हैं। कुछ ऐसे प्राणी भी हैं जो उन कार्यों को भी कर सकते हैं, जिन्हें कर पाना मानव-सामर्थ्य से परे है। जैसे कि चींटियां। उनकी सूंघने की शक्ति मनुष्य से बेहतर होती है। पक्षियों को देखिए। वे ऊंची उड़ान भर सकते हैं। लंबी दूरी बहुत कम समय में तय कर सकते हैं। मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता। बंदरों को लीजिए। वे एक जगह से दूसरी जगह तक लंबी छलांग लगा सकते हैं। एक शेर अपने से कहीं बड़े हाथी को धराशायी कर सकता है। इस तरह की और भी अनेक विशेषताएं हैं जो मानवेत्तर प्राणियों में ही पाई जाती हैं। कई ऐसे कार्य हैं जिन्हें मनुष्य नहीं कर सकता, जबकि दूसरे प्राणी उन्हें सहज भाव से; तथा बड़ी मात्रा में कर सकते हैं। लेकिन मनुष्य के भीतर सोचने-समझने तर्क करने की ताकत और अपनी अनुभव तथा मानसिक विकास के अनुसार निर्णय लेने की शक्ति उसे सुखी जीवन जीने का अवसर प्रदान करता है। सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता सिवाय मनुष्य के अन्य किसी प्राणी के पास नहीं है।

अपनी तर्क-शक्ति से मनुष्य ने अपनी मेधा को निरंतर विकसित किया है। मगर, ऐसा यानी तर्कशक्ति से संपन्न मनुष्य भी अपने तर्क-सामर्थ्य के प्रयोग में असफल होता आया है। इस कमी के कारण अनेक क्षेत्रों में मनुष्य की प्रगति शून्य है। हम द्रविड़ जनों को तो देखते ही पता चल जाता है कि उनमें स्वाभिमान चेतना का अभाव है। इस बात की उन्हें चिंता भी नहीं है। हमारे लोग यह जानते हुए भी कि दूसरे देशों में मनुष्य लगातार आगे बढ़ रहा है—अपनी तरक्की कर पाने में असमर्थ हैं। दूसरे देशों की प्रगति के बारे में हम लगातार पढ़ते ही रहते हैं। उनके से अनेक महान आविष्कार हमारी नजरों के सामने हैं।

हम ‘शूद्र’ हैं।

हमें शूद्र कहा जाता है। शूद्र का आशय है—वेश्या की संतान। यदि हम पूझते हैं यह कैसे? वे कहते हैं कि शास्त्रों में लिखा है; या किसी ने ऐसा कहा था; और बहुत पहले ईश्वर का भी यही कहना था। इस बात को पूरी तरह सच मान लेने के कारण हम अपनी मर्यादा, आत्मगौरव और स्वाभिमान को गंवा चुके हैं। हमें केवल अपनी भूख की चिंता रहती थी। केवल भोजन की चाहत हम रखते थे। हमारी प्रगति को हर लिया गया था। हमें बस उन चीजों की चिंता रहती थी जिनकी मदद से हम जैसे-तैसे अपना जीवन बिता सकें। यह तो पशुओं की विशेषता है। हम भी जानवरों जैसा जीवन बिता रहे हैं।

अपने देश में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जो आगे बढ़कर बुद्धिवाद के समर्थन में खड़ा हो पाता। यदि किसी ने तर्कवाद की चर्चा की थी, तो 2000-3000 वर्ष पहले।1 वे जो कहते थे, उनके जमाने के लोग उसपर विश्वास भी करते थे। आज हम बावजूद इसके आजकल कोई उनका सम्मान नहीं करता। हमारे तर्कशील बुद्धिजीवियों को भी आज वे बातें स्वीकार्य नहीं हैं। किसी में भी उनके बारे में सोचने-समझने की हिम्मत नहीं है। ऐसा किसलिए हुआ?

वे बीच में भगवान को ले आए। उन्होंने सृष्टि की निर्मितियों पर बात की। उन्होंने बताया कि केवल ईश्वर ही सर्वशक्तिमान हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर-पुत्रों ने कुछ विशिष्ट उपदेश दिए हैं।  उनके अलावा ईश्वर के संदेश-वाहकों ने भी कुछ बातें कही हैं। ये बातें समाज पर इस तरह थोप दी गई थीं कि मनुष्य का स्वयं विचार करना, स्वतंत्र विवेक से निर्णय लेना अनावश्यक मान लिया गया।

इस तरह की गंदी और रूढ़ धारणाएं मनुष्य के दिलोदिमाग में बैठा दी गई थीं। अब उसका कर्तव्य केवल ईश्वर के नाम पर कही गई बातों पर बगैर सोचे-समझे, विश्वास कर लेना था। हर वस्तु के साथ यह मानकर व्यवहार करना था कि वह ईश्वर प्रदत्त है। इस सोच ने मनुष्य को बौद्धिक रूप से जड़ बनाने का काम किया। हमारे यहां कोई तरक्की न होने का भी यही कारण है। आप पूछ सकते हैं कि यह सब हमारे विकास को कैसे अवरुद्ध करता है? कैसे इसने हमारी प्रगति को नाकाम किया है? विदेशों में मनुष्य, पृथ्वी से करीब 4 लाख किलोमीटर दूर चांद तक जाने लगा है। वे 8000-10000 किलोमीटर प्रति घंटा के हिसाब से उड़ान भरने में सक्षम हैं। सोचने समझने, तर्क करने, अपने मस्तिष्क से काम लेने की क्षमता ने उन्हें इतने सारे आविष्कारों के करने के योग्य बनाया है। क्या हम इस तरह का कोई भी लक्ष्य हासिल करने में सक्षम हैं?

हम मानते हैं कि हमारे पास ऋषि-मुनियों और अवतारों की ढेर सारी शुभकामनाएं, आज्ञाएं, उपदेश, संदेश आदि हैं। हमारे यहां हजारों नेता, ऋषि, मुल्ला, पादरी, धर्माचार्य और सनातनी पंडित हैं। हमारे यहां अनेक धर्म भी हैं। मगर इन सबसे मिला हमें क्या है? सिर्फ अपने बल पर हम कुछ भी करने में सक्षम नहीं हैं। आखिर किसलिए? मनुष्य पहली बार जब इस धरती पर आया, उसे कितने वर्ष बीत चुके हैं? हम यह बताने में असमर्थ हें कि पहला व्यक्ति कब जन्मा था। कुछ शोधकर्ता बताते हैं एक लाख वर्ष पहले। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बताते हैं कि मनुष्य इस धरती पर 18 लाख वर्ष पहले जन्मा था। कुछ अन्य विद्वानों का दावा है कि मनुष्य उससे भी पहले आया था। इतने वर्षों के दौरान हमने क्या प्राप्त किया है? हमने पिछले सौ वर्षों में अनेक बदलाव देखे हैं। लेकिन उनमें से कितने आविष्कार अपने देश में हुए हैं? इतनी लंबी अवधि में हमें कितना कुछ प्राप्त कर लेना चाहिए था? हम ऐसा करने में असमर्थ क्यों रहे? इतने सारे साधु-महात्माओं और ईश्वरों के अस्तित्व का औचित्य क्या है। क्या मिला है हमें उनसे?

हमारे पास असंख्य ‘महान’ थे। हमारे समाज में कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से साधु, महात्मा, भक्त या धार्मिक नेता बन सकता है। फिर भी हम अपने भरोसे कुछ भी नया हासिल करने में अक्षम हैं।

वे सभी सुख, सुविधाएं और आराम के संसाधन जिनका हम आनंद उठा रहे हैं, सब के सब दूसरे देशों के वैज्ञानिकों का आविष्कार हैं। हमारे देवताओं को अत्यधिक शक्तिशाली बताया गया है। असलियत में उनकी उपलब्धि क्या है? ईश्वरीय अवतारों से जुड़े मिथकीय आख्यानों में बड़े-बड़े चमत्कारी दावे किए गए हैं। बताया गया है कि कुछ ऐसे भगवान हैं जो पर्वतों से ऐसे खेल सकते हैं मानों गैंद से खेल रहे हों। हमारे देवताओं की अनेक विचित्र गुण हैं। लेकिन क्या बाहरी देशों के लिए हम एक भी चमत्कार दिखा पाए; या मनुष्यता के लिए एक भी मौलिक खोज कर पाए हैं? अभी तक तो नहीं!

यदि यूरोपवासी इस देश में नहीं आते होते तो हमारे देश में माचिस भी नहीं आ पाती। हम अंधेरे में पड़े रहने को मजबूर होते। जीवन ठहरा हुआ होता। हम यात्रा के लिए बैलगाड़ी का इस्तेमाल कर रहे होते। अब आप हवाई जहाज का इस्तेमाल कर सकते हैं? वे सब कहां से आए थे? क्या वे किसी प्रार्थना की देन हैं; अथवा श्लोकों के पाठ से प्राप्त हुए हैं? क्या ये किसी पूजा-पाठ की देन है? नहीं? हरगिज नहीं। ईश्वर की मदद से आप कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते।

यही कारण है कि हम लोगों से अपने विवेक का इस्तेमाल करने, तथा तर्कशील प्राणी के रूप में जीवन जीने का आग्रह करते हैं। ईश्वर के प्रति पारंपरिक अंधश्रद्धा, धर्म, वेद, शास्त्र एवं धर्माचार्यों के प्रति अंधश्रद्धा के कारण आज हमारे लोग अपने सुखमय जीवन के लिए अपेक्षित संसाधन जुटाने में असमर्थ हैं। धार्मिक नेताओं तथा उनकी शिक्षाओं पर आंख मूंदकर भरोसा करने के कारण ही हम दूसरों की अपेक्षा बहुत पीछे हैं।

कुछ वक्ताओं ने हमें हमारे अज्ञान के बारे में बताया है। मत सोचिए कि शास्त्र क्या कहते हैं। धर्माज्ञाएं क्या हैं? हमें बदलना चाहिए। हमें सोचना ही चाहिए। आप ऐसे लोगों को देखते होंगे जो बिल्ली के रास्ता काटने पर उल्टे पांव लौट आते हैं। कुछ देर विश्राम करने के बाद फिर आगे बढ़ते हैं। कारण जानने के लिए आप ऐसे किसी व्यक्ति से पूछ सकते हैं। वह कहेगा कि यह बुरा शकुन है। समाधान के बारे में वह कहेगा कि कुछ देर बैठने के बाद वह फिर आगे जाएगा। जब कोई कौआ कांव-कांव करता है, तब भी ऐसा व्यक्ति आगे बढ़ने से झिझकता है। सोचता है कि अपनी कांव-कांव के जरिए कौआ उसे सावधान कर रहा है। वह मानता है कि पक्षी की बीट पड़ने से वह अपवित्र हो जाएगा। उस अवस्था में वह दूसरों को छूने से इन्कार कर देगा। वह पहने हुए वस्त्रों के साथ ही स्नान करेगा। उसकी ऐसी हरकतें देखकर क्या हम उसे आदमी कह सकते हैं?

ऐसा व्यक्ति मानता है कि दिन का खास समय ही ‘शुभ’ होता है। क्या इस बकवास का, ऐसी भ्रांत धारणा का कोई अर्थ है? इन मूर्खतापूर्ण रीति-रिवाजों का खंडन किसने किया है? कौन है जो ऐसे लोगों को अपने दिमाग से काम लेने की सलाह देता है? अपने ज्ञान और अनुभव से हम कितनी ही वस्तुएं प्राप्त कर सकते थे? लेकिन हमने उनका इस्तेमाल ही नहीं किया। यही कारण कि हम असभ्य दुनिया में रह रहे हैं। मैं बस इतना ही कह सकता हूं।

अच्छा ही हुआ जो विदेशी हमारे देश में आए। उन्होंने साहसपूर्वक कई सुधार लागू किए। उनपर हमारे धर्म और शास्त्रों में हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए गए। यदि अंग्रेज यहां नहीं आए होते तो हम आज भी बहुत पिछड़े हुए होते। विदेशियों पर तरह-तरह के आरोप लगाने के पीछे लोगों के अपने स्वार्थ थे। उनके चले जाने के बाद किसी ने भी लोगों को जागरूक करने की कोशिश नहीं की। केवल ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के हम कार्यकर्ता ही बुद्धिवाद के प्रचार जैसे श्रेष्ठ कार्य हेतु स्वेच्छा से आगे आए थे। यह देखकर कि धर्म और ईश्वर के नाम पर धोखादड़ी और लूट मची हुई है, तथा धर्माचार्य और राजनेता अपनी मनमानी कर रहे हैं—हमने बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार का खतरा मोल लिया है। हमारा मानना है कि बुद्धिवाद का प्रचार-प्रचार ही अंधविश्वासों से मुक्ति का एकमात्र रास्ता है।

हमारी कोशिश समाज के भले के लिए है। हमारे प्रयास मनुष्य को विवेकवान बनाने के लिए हैं। हमने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ जैसे बुद्धिवादी आंदोलन की शुरुआत की थी। उसके माध्यम से हम लोगों के मन में स्वाभिमान चेतना लाना चाहते थे। चाहते थे कि लोग अपनी अस्मिता के प्रति सजग हो जाएं। जिस समय हमने वह आंदोलन आरंभ किया था, अनेक लोगों ने हमारा विरोध किया था। उन्हीं दिनों एक जिम्मेदार मंत्री ने अपनी सुंघनी सूंघते हुए मुझसे पूछा था—‘आत्मसम्मान से तुम्हारा भला क्या मतलब है? इसका तो नाम ही हास्यास्पद है। कोई भी सुनकर हंसने लगेगा।’

मैंने शांतिपूर्वक उसे उत्तर दिया था—‘इसका हमें भी खेद है। कृपया बताएंगे कि आप क्या हैं?’ उन्होंने पूछा कि मैं उनसे ऐसे प्रश्न क्यों कर रहा हूं? मैंने उनसे पूछा था कि इस समय समाज में उनकी हैसियत क्या है? जातीय अनुक्रम में उनका स्थान क्या है? उन्होंने बताया कि वे मंत्री हैं। यही उनकी उपलब्धि है। आगे उन्होंने बताया था कि जाति से वे रेड्डियार हैं। उन्हें यह बताते हुए कि रेड्डी, गाउंडर, नायडु, नायकर आदि वे नाम हैं जो हमने स्वयं गढ़े हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार, धर्म और परंपरा के अनुसार हम सभी ‘शूद्र’ यानी चौथा वर्ण हैं। यही लंबे समय से चला आ रहा है। मैंने उनसे कहा कि हमने अपना आंदोलन लंबे समय से चले आ रहे इस अवमाननाकारी विभाजन को खत्म करने के लिए आरंभ किया था। उसके बाद मैंने उनसे पूछा, ‘शूद्र से क्या अभिप्राय है?’ फिर मैंने खुद की उनसे कह दिया—‘शूद्र के मायने हैं, वेश्या की संतान।’

उसके बाद मैंने अपना कथन जारी रखा। मैंने बताया, ‘आप उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। आपने बीए, बीएल की उपाधियां प्राप्त की हैं। आप तीन वर्षों तक मंत्री थे। आज भी आप मंत्री हैं। आप अभी भी ‘शूद्र’ यानी वेश्या की संतान हैं। बावजूद इसके आप अपने हीन सामाजिक स्तर पर शर्मिंदा नहीं है। एक व्यक्ति जो आपके दरवाजे पर भिक्षा मांगने आता है, एक व्यक्ति जो आपके लिए अपनी स्त्रियों को वेश्यावृति में ढकेलने को भी तैयार है—वह ऊंची जाति का होने का दावा करता है। उसे जाति के आधार पर खुद से ऊंचा मान लेते हैं, आप उसके कदमों पर झुक जाते हैं।’

अंत में मैंने उससे पूछा—‘अब आप बताएं, क्या आप ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की जरूरत महसूस करते हैं या नहीं?’ उसने बस इतना ही कहा था कि यह सब बहुत लंबे समय से चला आ रहा है।

आप स्वयं महसूस करेंगे कि हमारे आंदोलन का उद्देश्य बहुत महान है। हमारा लक्ष्य आसान भी नहीं है। हमें कठिन परिश्रम करना होगा। जख्म हाल का हो तो उसका इलाज करना आसान होता है। लेकिन यह घाव(कैंसर) तो बहुत पुराना है। ऑपरेशन करके अवांछित से मुक्ति पाने के अतिरिक्त इसका और कोई उपचार नहीं है। हमारी सामाजिक बुराइयों की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसकी चीर-फाड़ करने के लिए हमें सर्जन की भूमिका में आना ही पड़ेगा।

आत्मसम्मान आंदोलन: एक बुद्धिवादी अभियान

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की विचारधारा क्या है? किस सैद्धांतिकी पर वह टिका है? इसे समझने से पहले हमें वास्तविक समस्या को समझना पड़ेगा। उन चीजों को समझना पड़ेगा जिन्होंने हमें नीचा दिखाया है। उन कारणों की खोज करनी पड़ेगी जिन्होंने हमें लज्जाजनक परिस्थितियों में लाकर खड़ा किया है। हमने देखा है कि ईश्वर की रचना भी हमें लज्जाजनक परिस्थितियों में ढकेलने की एक वजह है, इसलिए हमें ईश्वर को नष्ट कर देना चाहिए। हमने पाया है कि हमें शर्मनाक हालात तक पहुंचाने कांग्रेस पार्टी का भी योगदान रहा है। इसलिए हम कांग्रेस को खत्म कर देना चाहते हैं। हमने मोहनदास कर्मचंद गांधी को भी हमारे हितों के विरुद्ध काम करते हुए देखा था। इसलिए हम उनके प्रभाव-क्षेत्र से उबरना चाहते हैं। इसी तरह हमने देखा है कि हमें इस विपन्नावस्था में पहुंचाने में ब्राह्मणों का बड़ा योगदान है। इसलिए हम उनके विरुद्ध हैं। हमने देखा है कि धर्म एक सामाजिक बुराई है। इसलिए हम धर्म को भी नष्ट कर देना चाहते हैं।

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ इन पांचों बुराइयों के विरुद्ध है। संक्षेप में आत्मसम्मान आंदोलन ने धर्म, कांग्रेस, गांधीवाद, ईश्वर और ब्राह्मणों के विरुद्ध संघर्ष की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है। यही पांचों ताकतें हैं जो समाज में हानिकारक विचार फैलाकर हमारे लोगों को निशाना बनाती हैं। उन्होंने हमारे लोगों को दास बनाया हुआ है। जब तक हम इस पांचों बुरी ताकतों को ध्वस्त नहीं कर देते, तब तक हम अपने लोगों को उनके उत्तरोत्तर बिगड़ते हालात से, भयावह और चुनौतीपूर्ण सामाजिक जीवन से बाहर नहीं ला सकते। हम अपने लोगों के आत्मसम्मान को लौटाने के लिए संकल्परत हैं।

मेरा मतलब यह नहीं है कि हम राजनीति में छलांग लगाने जा रहे हैं। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ राजनीतिक संगठन नहीं है। यह विशुद्ध रूप से समाज सुधारवादी आंदोलन है। लेकिन यदि ये प्रतिक्रियावादी ताकतें हमारी प्रगति के रास्ते में आएंगीं, हमारे लक्ष्य की बाधा बन खड़ी होंगी—तब उनका विरोध करने के अतिरिक्त हमारे पास अन्य कोई उपाय न होगा। आप जरा कांग्रेसी की नीतियों पर विचार कीजिए। कांग्रेस ने अपनी नीतियों को गांधी, धर्म, जाति तथा ब्राह्मणों के हितों की सुरक्षा के लिए तैयार किया है। ब्राह्मण अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए गांधी की मदद लेना चाहते थे। चूंकि गांधी का सोच पूरी तरह प्रतिक्रियावादी था, इसलिए उन्होंने गांधी को ‘महात्मा’ घोषित किया था। गांधी ब्राह्मणों के साथ हमेशा खड़े होते थे।

एक शराबी और विक्षिप्त व्यक्ति की भांति गांधी हमेशा ईश्वर, धर्मशास्त्र, वर्णाश्रम धर्म, राम और हिंदू धर्म पर बातें करते थे। लोगों पर उनके प्रचार का कुछ असर भी था। आज सभी पत्र-पत्रिकाएं ब्राह्मणों के एकल प्रभाव में हैं। हमारे पास अपनी कोई प्रभावशाली पत्रिका नहीं है। उनके प्रचारतंत्र ने हमारे लोगों को अपने प्रभाव में ले लिया है। जैसे ही किसी ब्राह्मण का जिक्र होता है, उनके मन में आदरभाव उमड़ आता हैं। यही कारण है कि हमने ब्राह्मणवाद को समाज से उखाड़ फैंकने की कसम खाई है। धर्म और ईश्वर दोनों को समाज से बाहर खदेड़ देना चाहिए। गांधी जिन्होंने हमेशा ही वर्णाश्रम व्यवस्था का पक्ष लिया था, का विरोध होना चाहिए। जो सरकार उन सबका, कानून की ताकत के साथ जोरदार समर्थन करती है, उसे बदल देना चाहिए। जो ब्राह्मण विभेदकारी वर्णव्यवस्था के समर्थक हैं, जो जाति के नाम पर अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखना चाहते हैं—उन्हें कड़वा पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। चारों ओर शर्मनाक घटनाएं घट रही हैं।

आप कृपया इन बातों पर विचार कीजिए। मैंने जो कहा वह सही है या नहीं, इसपर सोचिए। मेरे विचार किसी शास्त्र या वेद पर केंद्रित नहीं हैं। मैं बस वही कहता हूं जो मेरे मस्तिष्क को सही जंचता है। आपके पास भी तर्क और विवेचन का सामर्थ्य है। सोचिए….लगातार सोचिए। यदि आपको लगता है कि मैंने जो कहा, उसमें सचाई है, तो उसे अपना लीजिए। नहीं तो जाने दीजिए। मैं अपने विचार किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं थोपना चाहता जिन्हें वे पसंद न हों। दूसरों को अपने इशारों पर हांकने की मेरी  कोई इच्छा नहीं है।

मैं बस आपको इतनी याद दिलाना चाहता हूं कि आप सभी के पास अपना स्वतंत्र विवेक है। उसकी मदद से आप तथ्यों की विवेचना कर सकते हैं। उनके पीछे निहित अच्छे और बुरे की पहचान कर सकते हैं। इसके लिए मैं आपके ऊपर कोई दबाव बनाना नहीं चाहता। मैं तो आपका ध्यान केवल इस तथ्य की ओर दिलाना चाहता हूं कि ब्राह्मणवाद के विनाशकारी औजारों ने आपको विचारहीन गुलाम में बदल दिया है। आप अपनी सोचने-समझने की ताकत गंवा चुके हैं। यही कारण है कि मैं समाज के पुनर्गठन की आवश्यकता पर जोर देता हूं। अनेक नेताओं ने अपने बेहतर जीवन के लिए दूसरे रास्तों को चुना है। वे स्वार्थी हैं। मैं अपने मकसद को लेकर थोड़ा जिद्दी हूं।

तर्कवाद

हमारे समाज को क्रांतिकारी नीतियों की आवश्यकता है। इसके लिए समाज में बुद्धिवाद के प्रचार-प्रसार में तेजी लानी होगी। इस पुनीत उद्देश्य हेतु हमने ‘तर्कवादी मंच और संगठन’(रेशनलिष्ट फोरम एंड एसोशिएसन) का गठन किया है। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जिन्हें इस ‘तर्कवादी संगठन’ के विस्तार से परेशानी हो। जो नहीं चाहते हों  कि यह मंच फले-फूले। वे यह दुष्प्रचार कर सकते हैं कि हमारा आंदोलन अमुक व्यक्ति अथवा वस्तु के विरुद्ध है। मैं आपको स्पष्ट रूप से बता देना चाहता हूं। वस्तु या विचार विशेष के विरुद्ध हम चाहे हों, या न हों। लेकिन हम न तो कभी न्याय के विरुद्ध हो सकते हैं, न ही कभी तर्क की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर सकते हैं। हमने अपने संगठन को ‘तर्कवादी संगठन’ का नाम दिया है। यह आपके ऊपर है कि आप अपने बारे में क्या सोचते हैं। आप सोचें, बस इतनी ही हम आपसे अपेक्षा रखते हैं। वस्तुतः यही एकमात्र यही श्रेष्ठ कार्य है जिसे आपको नि:संकोच करना ही चाहिए।

जरा देखें, दूसरे लोग क्या कर रहे हैं। समानधर्मा लोगों के साथ मिलकर वे आज भी कुटिल कर्मों में संलिप्त हैं। उन्होंने ‘वर्णाश्रम धर्म संगठन’ आरंभ किया है। उसका उद्देश्य जाति-व्यवस्था को संरक्षण प्रदान करना है। उन्होंने ‘सनातनी संघों’ का गठन किया है, जिससे वे प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं को बचाए रखना चाहते हैं। वे ऊंची आवाज में रामकथा की महिमा बखानते हैं। कृष्ण के उपदेशों की बढ़ाई करते हैं और ऐसे ही निरर्थक कार्यों में लगे रहते हैं। इस काम के बदले वे अपने लिए विशेषाधिकारों का दावा करते हैं। वे आपको स्वतंत्र रूप से सोचने-विचारने की अनुमति नहीं देते। ईश्वर, धर्म, धर्माचार्यों तथा दूसरी वस्तुओं के बारे में अभी तक जो कहा गया है, वे आपको उसपर सोचने का अधिकार नहीं देते। उनका यह कहना गलत है कि हमारा अभियान उनके ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध है। वे चीख-चीख कर कहते हैं कि हमारा आंदोलन उनकी भावनाओं को क्षति पहुंचा रहा है। कि हमारी बातों से उनकी भावनाएं आहत होती हैं। इस सब का हमारे लिए इसका क्या मतलब है? बस इतना कि वे जितना नीचा गिरते हैं, गिरने दो।

आखिर हम कब तक सहन कर सकते हैं कि कोई ‘शूद्र’ कहकर हमारी अवमानना करे। मुझे अपने लोगों की बेहद चिंता है। आखिर कब तक हम हर तरह के अपमान को गर्दन झुकाकर सहते रहेंगे? ब्राह्मण जो कहते हैं, उसपर हम और कब तक आंखें मूंदकर विश्वास करते रहेंगे? अगर ऐसा है तो हमारे दिमागों की उपयोगिता ही क्या है? हम लोगों को खुली हवा में उड़ान भरते देखते हैं। क्या हम सिर्फ ब्राह्मणों के पांव धोकर, गंदे पानी को पीकर संतुष्ट हो जाने वाले लोग हैं? जब वे कहते हैं कि हमारे अभियान से उनकी भावनाएं आहत होती हैं, तो हमें उसकी जरा भी परवाह क्यों करनी चाहिए? वे हमसे ज्यादा उदार नहीं हैं। न ही उनका दिल हमारे दिलों से बड़ा हैं। हमें जो ठीक लगता है, वही करना चाहिए। हम जानते हैं कि हमें खतरों और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उसके लिए हम सदैव तैयार हैं। जान की बाजी लगानी पड़े तब भी तैयार हैं। मौत को तो किसी न किसी दिन आना ही है। उसके भय से हम अब और ज्यादा चुप नहीं रह सकते।

अतीत में चूकि हम अत्यधिक विनम्र और सहनशील रहे थे, इसलिए हम कोई विकास नहीं कर सके। पढ़े-लिखे द्रविड़ लोग भी आलसी थे। परिणामस्वरूप उपद्रवी और ठेकेदार किस्म के लोग धर्म की सुरक्षा के के नाम पर एकजुट होते गए। अन्यथा आज तक हम शानदार प्रगति कर चुके होते। आज भी यदि हम(धर्म के विरुद्ध) कुछ कहने के लिए मुंह खोलते हैं, तो ईसाई हमपर हमलावर होकर आ जाते हैं। हम कुछ और कहते हैं तो मुसलमान उसका विरोध करने लगते हैं। उन्हें छोड़कर जब हम केवल अपने धर्म की बारे में बात करते हैं, तब ब्राह्मण अपनी भृकुटियां तान लेते हैं। विरोध प्रदर्शन के लिए ब्राह्मण खुद कभी सामने नहीं आते। ऐसे लोग जो आज भी वेश्या और रखैलों की संतान कहे जाने को तैयार हैं, ऐसे लोग जो माथे पर भभूत मलकर खुद को धन्य समझते हैं; और ऐसे लोग जो ‘राम-राम’, ‘शिव-शिव’ का मंत्रजाप कर रहे होते हैं—वही लड़ने के लिए हमारे आगे तन जाते हैं।

मैं अदालत में अपने ऊपर दायर मुकदमे के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। जब हमने सलेम में राम के चित्रों को पैरों तले कुचला था, तब हमारे विरुद्ध कोई ब्राह्मण कोर्ट में नहीं गया था। वे हमारे ही लोग हैं जिन्होंने मेरे ऊपर मुकदमा दायर किया था। उन्होंने शिकायत की थी कि मेरे कृत्य ने उनकी भावनाओं को आहत किया है। मुझे अदालत का सम्मन प्राप्त हुआ था। उसके बारे में आपने अखबारों में पढ़ा ही होगा। जब तक हम इस भयानक और जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए बड़ा ऑपरेशन नहीं करते, तब तक मुझे नहीं लगता कि हम इसका इलाज कर सकते हैं। आज यह छूत का रोग बन चुका है। यही कारण है कि मैं समस्या की जड़ तक जाना चाहता हूं। केवल बातों द्वारा लक्ष्य सिद्धि असंभव है। इस ‘तर्कवादी संगठन’ का आरंभ हमने कुछ क्रांतिकारी विचारों के प्रचार-प्रसार हेतु किया है। यदि हम स्वयं को तुच्छ, हीन और निचले स्तर का मान लें, यदि हम हिंदू होने को स्वीकार कर लें तो हमें उनके शास्त्रों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, ईश्वर तथा रूढ़िवादी मिथों तथा कर्मकांडों को भी उसी तरह स्वीकार करना पड़ेगा।

क्या हमें यह सवाल नहीं करना चाहिए कि हमें ‘शूद्र’ यानी वेश्या की संतान किसने कहा था? क्या वह तुम्हारा भगवान कृष्ण था? यदि हां, तो उसने ऐसा कहां कहा था? यदि उसने गीता में ऐसा कहा था तो क्या हमें अपनी चप्पलें निकालकर कृष्ण और उसकी गीता की पिटाई नहीं करनी चाहिए? यदि तुम्हें इससे डर लगता है तब तुम सचमुच एक शूद्र का जीवन जीते हो। क्या हुआ अगर हम राम की चप्पलों से पिटाई करते हैं। क्योंकि उसने कहा था कि हम शूद्र हैं।  उसने शूद्रों की हत्या की थी। चूंकि शंबूक शूद्र था, इसलिए उसकी पीट-पीटकर हत्या की गई थी। शंबूक ब्राह्मण के बजाय ईश्वर की पूजा करता था। इसलिए उसके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। शूद्रों को भगवान की पूजा करने का कोई अधिकार नहीं था। उन्हें केवल ब्राह्मण को पूजना चाहिए। यही राम ने कहा था। यह प्रसंग धूर्त्ततापूर्ण ढंग से गढ़ा गया था कि शूद्र द्वारा ईश्वर की प्रार्थना करने से एक ब्राह्मण की मौत हुई है; और उसका मृत शरीर राम के आगे लाकर रख दिया गया था।

मैं आपसे सवाल करना चाहता हूं कि कोई ब्राह्मण इस प्रकार कैसे मर सकता है? उसे तो केवल स्वर्ग जाना चाहिए। यदि एक ब्राह्मण मर भी गया तो क्या हुआ?

कहानी के अनुसार, कहा यह गया है कि राम के शासनकाल में ‘अधर्म’ होने के कारण एक ब्राह्मण की मृत्यु हुई थी। किसके पाप से ऐसा हुआ—राम ने पूछा था। ब्राह्मणों ने उसका कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं दिया था। उन्होंने राम से कहा था कि वह जाएं और खुद इसका पता लगाएं। इसलिए वह वन में गया। वहां उसने शंबूक को तपस्या करते देखा था।

‘तुम क्या कर रहे हो?’ राम ने पूछा था।

‘मैं ईश्वर की साधना कर रह हूं।’ शंबूक का उत्तर था।

राम नाराज हो गया। वह चिल्लाया, ‘तुम शूद्र हो। तुम्हें केवल ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। वह करने के बजाय तुम यहां ईश्वर की पूजा कर रहे हो? यह ‘अधर्म’ है। तुम्हें तो टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहिए।’ और कसाई की तरह राम ने शंबूक को मार डाला।

कल्पना कीजिए, यदि हम यहां न हों तो ये ब्राह्मण क्या कर सकते हैं। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ब्राह्मण मारने के लिए निकल आएंगे? यहां तक कि उन्हें भी जो ईश्वर की पूजा करते हैं। क्या वे हमारे लोगों को दोष नहीं देते? वे इस बात का रोना रोएंगे कि शूद्रों ने हमें बदनाम किया है। वर्णाश्रम पद्धति यानी जाति प्रथा के नियमों को ढंग से लागू न करने के लिए वे शासकों को पहले ही दोष देते रहते हैं।

गीता

ब्राह्मण कहते हैं कि जाति-व्यवस्था की रचना कृष्ण ने की थी। कहा जाता है कि कृष्ण ने ही प्रत्येक जाति के लिए उसके विशिष्ट कर्तव्य का विधान किया था। शूद्रों का जन्म परमपुरुष के पैरों से हुआ था। चूंकि वह असम्मानजनक स्थान है, इसलिए शूद्र चौथे वर्ण में आते हैं। उन्हें दास बनकर ब्राह्मणों की सेवा करनी चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे दंड के पात्र हैं। बताया गया है कि दंड के रूप में कृष्ण उन्हें नर्कवास की सजा देगा।

गीता का यही संदेश है। चूंकि गीता में ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान पर रखा गया है, इसलिए सभी ब्राह्मण गीता का विशेष सम्मान करते हैं। जरा सोचिए ऐसे कृष्ण की यदि हम चप्पलें निकालकर पिटाई न करें, तो हमारा भविष्य क्या होगा? लेकिन जब हम कहते हैं कि उसकी चप्पलों से पिटाई होनी चाहिए, तो लोग नाराज हो जाते हैं। वे उस समय नाराज नहीं होते जब यह कहा जाता है कि हम वेश्या के गर्भ से जन्मे हैं। क्या हम इस बात को सहन कर सकते हैं कि हमारी सब की माताएं वेश्याएँ थीं।

ब्राह्मणों के इस घोषणा ने हमें बरबाद किया है कि कोई भी ईश्वर, धर्म, और शास्त्रों का अनादर नहीं करेगा। उनपर सवाल नहीं उठाएगा। उन्होंने हमें हिंदुत्व के विरुद्ध कुछ भी कहने से रोका हुआ है। जब हम सच बोलते हैं, तब वे कहते हैं कि हमने उन्हें आहत किया है। वे धमकी देते हैं कि बदले में हमारे साथ कुछ बुरा होगा। इस व्यवस्था के तहत उन्होंने हमारे लोगों को प्रतिक्रियावादी बना दिया है। हम द्रविड़ियन तमिलों को  तिरष्कृत और अपमानित किया गया है। इस देश में आज भी यही हो रहा है। क्या त्रासदी है। यहां तक कि पढ़े-लिखे लोगों को भी आजीवन यही झेलना पड़ता है. यह सब देखकर एक विदेशी की क्या प्रतिक्रिया होगी?

कल्पना कीजिए एक विदेशी एक धर्मप्राण हिंदू से मिलकर सवाल करता है—

‘आप कहां जा रहे हैं?’ इसपर हिंदू का जवाब होगा—

‘मैं ईश्वर की पूजा करने मंदिर जा रहा हूं।’

‘कैसा ईश्वर?’ वह प्रश्न करेगा।

‘मंदिर में उसकी मूर्ति है।’ उत्तर होगा।

‘कितने मूर्ख हो तुम! पत्थर या मिट्टी की मूर्ति भला भगवान कैसे हो सकती है? तुम्हें किसने बताया कि यह भगवान है?’

एक विदेशी यह सवाल कर सकता है। लेकिन हमारे लोग यह पूछने से हिचकिचाएंगे। यहां तक कि मुस्लिम भी यह सवाल करने के लिए आगे नहीं आते कि पत्थर के टुकड़े में क्या भगवान सचमुच समाया हुआ है। क्यों? क्योंकि वे बहुसंख्यक हिंदुओं से डरते हैं। वही क्यों, ईसाई भी इसी तरह के हैं।

कौन यह सिद्ध करने की जहमत उठाता है कि पत्थर में भगवान समाया हुआ है? लेकिन आदमी चुपचाप यह विश्वास कर लेता है कि भगवान पत्थर में छिपा हुआ है। मैं पूछता हूं क्या किसी ने भी स्वर्ग या नर्क के दर्शन किए हैं? आने वाले समय में संसार द्वारा हमें दोष नहीं दिया जाना चाहिए। इसके लिए यहां हमारे लोगों की चिंता करने, उनके हितों के निमित्त काम करने वाला कौन है? कौन है जो उनकी मुक्ति के रास्ते तलाशेगा? यदि हर आदमी ब्राह्मणों के पैरों पर गिरकर महान भक्त बनने जिद ठाने है तो कौन हमारी रक्षा करने करने करने की सोचेगा? इसीलिए मैं ‘तर्कवादी संगठन’ को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देता हूं। यह काम किसी भी कीमत पर होना चाहिए। तभी कोई आदमी, आदमी की तरह ससम्मान जी सकता है। हर आदमी, आदमी की तरह वर्ताब करे, उसी के लिए हमारे अभियान की आवश्यकता है। हमें साहसी होना चाहिए। हमें किसी भी चुनौती, किसी भी परीक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। आप जानते हैं कि मुस्लिमों ने अपने धर्म को कैसे सुरक्षित बनाया है। क्या उन्होंने कोई बलिदान नहीं दिया था? यहां तक कि ईसाइयों ने भी अपने धर्म की सुरक्षा के लिए काफी कष्ट सहे हैं। इस अभियान से मुझे काफी उम्मीदें हैं। हमें अच्छे संकेत भी मिल रहे हैं। हवा हमारे अनुकूल है। इस महान अवसर का उपयोग हमें ज्ञान के प्रसार के लिए करना चाहिए।

ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को किस प्रकार नष्ट किया था? उन्होंने हिंसात्मक तरीकों का सहारा लिया था। बौद्धों का कत्लेआम किया गया था. उनके घरों को आग के हवाले कर दिया था। उनके मठों पर कब्जा कर लिया गया था।

श्रमण(जैन) धर्म को कैसे नष्ट किया गया था? क्या उन्होंने जैन श्रमणों का तेज धार वाले हथियारों द्वारा बेरहमी से कत्ल नहीं किया था? उस नरसंहार में 8000 श्रमणों की जानें गई थीं।2 आज उस भीषण नरसंहार की याद में उत्सव मनाया जाता है। आगे चलकर उन्होंने इस घटना को अपने धर्मशास्त्रों जैसे ‘थेवरम’ और ‘प्रबंधम’3 में इस तरह शामिल किया, मानो वे इस अमानवीय कृत्य से प्रसन्न हों।

आज ब्राह्मण शिकायत करते हैं हम जो भाषण देते हैं वे बहुत कड़वे और असहनीय हैं। देखें कि प्रबंधम में क्या लिखा गया है। क्या ये ग्रंथ हिंसा का उपदेश नहीं देते। क्या ये नहीं बताते कि दूसरे धर्मों तथा आध्यात्मिक विश्वासों को बलपूर्वक नष्ट-भ्रष्ट कर देना चाहिए।  

क्या तुमने देखा नहीं कि हिंदू आस्थावादी—स्त्रियों के साथ बलात्कार करने, दूसरे धर्मावलंबियों को उत्पीड़ित करने, यहां तक कि उनकी हत्या हेतु आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भी, ईश्वर की प्रार्थना करते आए हैं? यहां तक कि ‘प्रबंध’ महाकाव्य भी, जो उनके अनुसार पवित्र ग्रंथ हैं—हिंदुओं को दूसरे धर्मावलंबियों को मारने, उनकी हत्या करने, सताने तथा उन्हें कष्ट पहुंचाने के लिए अधिकृत करते आए हैं।

बाइबिल क्या कहती है? उसके अनुसार ईश्वर में विश्वास नहीं रखने वाला व्यक्ति मूर्ख है। दूसरे धर्मों में भी यही सब लिखा हुआ है।

उस अवस्था में हम भला चुप क्यों रहेंगे। हमारे यह कहने में भला क्या बुराई है कि जिसने धर्म का प्रचार किया; और जो ईश्वर की पूजा करता है—मूर्ख हैं। किसी व्यक्ति विशेष पर प्रहार करने के बजाय हम कह सकते हैं—

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है

जिसने भी ईश्वर की रचना की वह मूर्ख है

जो भी ईश्वर का प्रचार करता है, वह कपटी और बदमाश है

जो ईश्वर को पूजता है वह असभ्य है।

यह बात हम किस आधार पर कहते हैं, आगे मैं उसकी सविस्तार विवेचना करूंगा। जिसने भी आत्मा, स्वर्ग, नर्क, यमलोक आदि की रचना की, वह दुष्ट था। उससे भी बड़ा दुष्ट वह है जो इन बातों पर विश्वास रखता है। वे सब हमें अज्ञानी बताते हैं। कहते हैं कि हम कुछ नहीं जानते। हम अज्ञानियों में दिमाग ही नहीं है। वे हमें असभ्य और मूर्ख कहते हैं।

हम उनके झूठे प्रचार तथा धूर्ततापूर्ण आरोपों पर शर्मिंदा नहीं है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो ‘पुनर्जन्म’ की व्याख्या कर सके। बता सके कि पुनर्जन्म के मायने क्या हैं? क्या आप सचमुच ऐसे स्थान की परिकल्पना करते हैं, जहां दिवंगत पूर्वज निवास करते हैं? केवल ब्राह्मण ही इस तरह के प्रवचन देते हैं। हमारे अपने लोग उन्हें दाल, चावल आदि देकर, उनके समक्ष दंडवत प्रणाम करते हैं। ब्राह्मण दावा करता है कि वे सब वस्तुएं उसने हमारे पूर्वजों के लिए ली हैं। आप ब्राह्मण से पूछिए कि वह हमारे दिवंगत पूर्वजों से कब और कहां मिला था? स्वर्ग में या नर्क में अथवा उनके पुनर्जन्म होने के बाद इसी दुनिया में? उसकी ओर से आपको कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलेगा। ब्राह्मण हमारे लोगों को डराते और भरमाते हैं। बावजूद इसके प्रत्येक आदमी जो ब्राह्मणों तथा उनकी बनाई व्यवस्था में विश्वास रखता है और दिवंगत पूर्वजों के नाम पर उनकी बताई वस्तुएं भेंट करता है—ब्राह्मणों से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह सहज भाव से कहेगा, ‘मैं इस सबके बारे में कुछ भी नहीं जानता। मैं तो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ब्राह्मण के आगे महज दंडवत था। इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण आचरण के बारे में हम क्या सोचें? ऐसे लोगों को मूर्ख कहने में हमारी भला क्या गलती है?

ईश्वर

ईश्वर के अस्तित्व के बारे में कौन दावा कर सकता है? कोई यह नहीं कह सकता कि फलां-फलां व्यक्ति ने ईश्वर के दर्शन किए थे। वे केवल आंखें मिचमिचाते रहेंगे। जोर देने पर सिर्फ इतना कहेंगे कि ईश्वर के बारे में कुछ लोग यही बताते हैं। धर्माचार्य कहते हैं कि ईश्वर किसी का बनाया हुआ नहीं है। वह अपनी इच्छा से स्वयं अस्तित्ववान है। उस अवस्था में वे भला मुझसे क्यों लड़ाई मोल लेंगे? मैं तो सिर्फ ईश्वर के निर्माता को दोषी मानता हूं। जबकि वे कहते हैं कि ईश्वर की रचना ही नहीं हुई है। वह अजन्मा है।

उस अवस्था में, थोड़ा साहस करते हुए मैं सवाल करना चाहूंगा कि ईश्वर के अस्तित्ववान होने की प्रक्रिया, उसके जन्म होने के बारे में ब्राह्मणों को जानकारी कैसे और कहां से मिली? जबकि दूसरे लोग उसके व्युत्पत्ति के बारे में कुछ नहीं जानते। ईश्वर अपनी मर्जी से कैसे अस्तित्व में आया इस प्रक्रिया से भी वे अनजान हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली है। परंतु इस बात का उन्हें पता कैसे चला? यह कैसे संभव है कि केवल ब्राह्मण ही इस बारे में जान सकते हैं, दूसरे लोग नहीं? क्या बाकी सभी लोग मूर्ख हैं? यह क्यों कहा जाता है कि ईश्वर से संबंधित जानकारी केवल ब्राह्मण ही रख सकता है? दूसरों को भी ऐसा क्यों नहीं बनाया गया कि वे ईश्वर की उत्पत्ति के बारे में जान सकें? चूंकि हमारे पास प्रतिभा और बुद्धि है, हम अपने तर्कों के सहारे आगे बढ़ सकते हैं।

ईश्वर की उत्पत्ति

यह तय है कि मानव सभ्यता के आरंभिक दौर में ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं थी। ईश्वर का प्रचलन केवल विगत 3000 वर्षों में हुआ है। उससे पहले उसका कोई जिक्र तक नहीं करता था। न ही उसके बारे में कोई कुछ जानता था। जब मनुष्य ने तूफान की आवाज सुनी, तब उसके डर से बाहर निकलने की चाहत में उसने कल्पना की कि ऐसी कोई महाशक्ति है जो हवाओं पर नियंत्रण रखती है। तूफानों को बांधे रखना जिसका स्वभाव है। अंधेरे को देखकर भी उसके मन में ऐसे ही विचार उमड़े होंगे। फिर जब सूरज की चमक देखी होगी तब भी उसने ऐसा ही सोचा होगा।

इस तरह की छोटी-छोटी बातों से उसका देवताओं और ईश्वर के प्रति विश्वास बढ़ता गया। फिर सहज भाव से लोगों ने मान लिया कि ढेर सारे देवता और ईश्वर ब्रह्मांड में घट रही घटनाओं पर नियंत्रण रखते हैं। आगे चलकर देवताओं के राजा के रूप में इंद्र की कल्पना की गई। बाद में कुछ और देवता भी गढ़े गए। कल्पना की गई कि उनमें एक ऐसा देवता है जो संपूर्ण प्राणिजगत के जन्म की देखभाल करता है। दूसरा देवता मानव जीवन और पूरी सृष्टि को संभालता है। जबकि तीसरा देवता सृष्टि को नष्ट करने के लिए है। उन्हें क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नाम दिया गया। ऐसी चीजों के बारे में जो मानवीय समझ से परे थीं, मनुष्य सोचने लगा कि देवताओं से परे भी कोई शक्ति है जो सबपर नियंत्रण रखती है। हालांकि अभी तक उसने शीर्षतम शक्ति को परमात्मा का दर्जा नहीं दिया था। वह उसका उसी तरह सम्मान करता था, जैसे हम आजकल मंत्रियों का सम्मान करते हैं। हमारे यहां मंत्रीमंडल में अनेक मंत्रीगण होते हैं। इसी तरह मनुष्य ने कल्पना की कि एक सर्वशक्तिमान परमात्मा है जो हर चीज को नियंत्रित करता है।

वेद के अनुसार हर विशिष्ट शक्ति को नियंत्रित करने वाला एक देवता है। ईसाइयों ने सिर्फ 2000 वर्ष पहले ईश्वर में विश्वास करना शुरू किया। मुसलमानों ने भी सर्वशक्तिमान अल्लाह के बारे में महज 1500 वर्ष सोचना आरंभ किया। इस्लाम में लगभग 1500 वर्ष पहले एक बदलाव हुआ था। लेकिन ब्राह्मणों ने 3000 वर्ष पहले ही अपना ईश्वर गढ़ दिया था। ऐसा वेदों की रचना के बाद ही संभव हो सका। वैदिक युग में कोई भगवान नहीं था। हिंदुओं के देवताओं की निर्मिति वेदों की रचना के बाद हुई थी।

उन दिनों ब्राह्मण अपने देवताओं को क्या कहते थे? वे कहते थे कि एक परमात्मा है। जब पूछा गया कि वह कहां है? ब्राह्मण का उत्तर था, ‘वह अदृश्य है। उसे देख पाना असंभव है।’ जब ईश्वर के अस्तित्व पर शंका करते हुए पूछा गया कि यदि ईश्वर है तो कम से ब्राह्मण ने उसे देखा ही होगा? यदि ‘हां’ तो वह कैसा दिखाई पड़ता है? उसने जवाब दिया, ‘उसे छूना-देखना संभव नहीं है।’ उसने बताया कि ईश्वर की कोई आकृति नहीं है। जब आपने पूछा कि इसपर विश्वास कैसे किया जाए? उसने बताया कि ईश्वर इंद्रियगोचर नहीं है। वह अगम्य, अगोचर, अनुभवातीत है।

यदि मामला इतना ही गड़बड़ है तो इससे कैसे इन्कार किया जाए कि ब्राह्मण मूर्ख हैं। हम उन्हें बुद्धिमान कैसे मान सकते हैं? यदि ईश्वर को कोई भी देख, छू या महसूस नहीं कर सकता तो यह कैसे मान लिया जाए कि केवल ब्राह्मण ही ईश्वर के बारे में जानता है? उन्हें ईश्वर के अस्तित्व की जानकारी कहां से मिली? हमारे लोग ब्राह्मण जो भी उपदेश दें, उसपर आसानी से विश्वास कर लेते हैं। क्या यह मूर्खता नहीं है? क्या ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए नवीनतम और पुख्ता साक्ष्यों के साथ कोई कम से कम एक प्रमाण आवश्यक नहीं है? ऐसा साक्ष्य जिससे ईश्वर की मौजूदगी को असंद्धिग्ध रूप से प्रमाणित किया जा सके।  

क्या ब्राह्मण यहीं पर रुक जाता है? वह कहता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। कि दुनिया में जो कुछ भी घटता है, उसके पीछे ईश्वरीय इच्छा है। वह ईश्वर को उच्चतम गुणों का अधिष्ठान मानता है। वह कहता है कि ईश्वर पवित्र है, करुणानिधान, सत्य और निष्पक्ष है। यदि आप उससे पूछें कि किस आधार पर वह ऐसा मानता है? उसका बस यही जवाब होगा कि लोगों को उसकी सभी बातों पर विश्वास करना चाहिए। यदि यह सत्य है कि ईश्वर परमशक्ति अथवा परा-प्राकृतिक शक्ति है, तो वह अपने होने का प्रमाण क्यों नहीं देता? कुछ ऐसा क्यों नहीं करता कि मैं उसपर विश्वास कर सकूं? यदि वह ऐसा करने में असमर्थ है, जो मैं उसका सम्मान भला कैसे कर सकता हूं? उसकी परमशक्तियां कहां हैं? उसकी शक्तियां इस योग्य नहीं हैं कि उनके माध्यम से लोग उसके बारे में जान सकें।

यदि दुनिया ईश्वर के अस्तित्व को मानने से ही इन्कार कर दे तो उसका क्या बिगड़ जाएगा? कौन-सी ऐसी चीज है जो उसके हाथों से फिसल जाएगी? विश्व की कुल जनसंख्या 450 करोड़(1971 में) आंकी गई है। इतने सारे लोगों में 200 करोड़ लोग नास्तिक हैं। किसी भी ईश्वर में ऐसा इतना सामर्थ्य नहीं है जो इन नास्तिकों को आस्थावादी बना सके।

क्या ब्राह्मण ईश्वर की रचना के बाद शांत बैठ जाता है? नहीं, उसके बाद वह ईश्वर का प्रचार करना चाहता है। इसलिए मैं कहता हूं कि वह धूर्त्त है। वह कहता है कि ईश्वर शक्तिशाली है। तब उसे ईश्वर का प्रचार करने की क्या आवश्यकता है? आप देखिए ब्राह्मण ने क्या किया है। उसने मंदिर बनाया। मूर्तियां गढ़कर देवताओं को आकार दिया। यह कहते हुए कि ईश्वर निराकार है उसने ईश्वर को अनेकानेक रूपों में ढाल दिया। आखिर ईश्वर के इतने सारे रूपाकारों के बारे में उसे पता कैसे चला? जब भी उसने ईश्वर के बारे में कुछ बताने के लिए मुंह खोला, हमेशा उसे मनुष्य जैसा ही बताया। बाकी सभी धर्म कहते हैं कि ईश्वर निराकार है। उसकी कोई आकृति नहीं है। केवल ब्राह्मणों का दावा है कि हिंदू देवी-देवता साकार हैं। इसका क्या मतलब है? आकृति तो स्थायी बनी रहती है। विभिन्न ईश्वरों को विभिन्न रूपाकारों में गढ़ने के पीछे क्या उसका कोई तर्क अथवा विशिष्टानुभूति थी?

एक देवता के धड़ पर सिर्फ एक सिर है। दूसरे देवता के धड़ पर दो सिर उगे हैं। इनके अलावा जो देवता हैं, उनके चार, पांच यहां तक कि छह सिर भी हैं। क्या वह इतने भर से रुक गया? रावण जिनसे राम का प्रतिकार किया था, उसके दस सिर थे। आप जानते हैं, क्यों? उसका उद्देश्य था राम की महानता को स्थापित करना। ऐसी की पराकल्पना देवताओं के हाथों की संख्या के बारे में भी देखी जा सकती है। कुछ देवताओं के महज दो हाथ हैं। कुछ देवताओं के छह हाथ हैं। कुछ देवताओं के इससे भी ज्यादा हाथ हैं। यह सब मनुष्य को छलने, धोखा देने के लिए किया गया। लोगों को मूर्ख बनाने के लिए ही ब्राह्मणों ने चमत्कारों से भरपूर कहानियां गढ़ी थीं। कोई भी औसत बुद्धिवाला, संवेदनशील व्यक्ति ऐसी मूर्खतापूर्ण परिकल्पनाओं पर कैसे भरोसा कर सकता है? यदि हम दादी-दादा मार्का इन कहानियों पर विश्वास न करें तो हमारा क्या बिगड़ जाएगा?

एक बुद्धिजीवी को इस सबके बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? इन कुत्ता-बिल्ली मार्का कहानियों पर अपना सिर हिलाते हुए हम आखिर कब तक, दीन-हीन और निम्न जातीय शूद्र का जीवन जीते रहेंगे? यदि हमारे भीतर जरा-भी आत्मसम्मान है, तो क्या हमें इस मूर्खतापूर्ण चीजों को नष्ट नहीं कर देना चाहिए? एक भी ऐसा ईश्वर नहीं है जो श्रेष्ठ गुणों से संपन्न हो।

आप शिव के बारे में विचार कर सकते हैं। उसके पांच सिर थे। दूसरे देवता ‘ब्रह्मा’ के भी पांच सिर थे। बताया गया है कि शिव की पत्नी पार्वती इससे भ्रमित हो गई। ब्रह्मा और शिव दोनों के पांच-पांच सिर होने के कारण वह अपने पति की पहचान ही नहीं कर पाती थी। अपनी दुविधा के बारे में उसने अपने पति से शिकायत की। शिव परेशान हो गया। पार्वती की उलझन को दूर करने के लिए उसने तत्क्षण कदम उठाने का फैसला कर लिया। आप जानते हैं कि उसने क्या किया था। उसने ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक को उड़ा दिया था, ताकि पार्वती उसे आसानी से पहचान सके। ईश्वर की इस कहानी के बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या आप मानते हैं कि पार्वती की समस्या के समाधान के लिए शिव ने जो किया, वह सही था?

मुझे ब्राह्मणों से पूछना चाहिए कि ईश्वरों को चार या पांच सिरों की जरूरत किसलिए पड़ती है। क्या भोजन करने के लिए इतने सारे हाथों की आवश्यकता पड़ती है? वे कहते हैं कि चार सिर चारों दिशाओं में और पांचवा आसमान पर नजर रखने के लिए चाहिए। इस सबका आधिकारिक प्रमाण क्या है? हिंदू धर्म से संबंधित ये लोग हमेशा ही काल्पनिक कहानियां गढ़ने में लगे रहते हैं।  

ईश्वर को बनाने वाले ने कहा था कि उसकी कोई आकृति नहीं है। वह निराकार है। उसने यह नहीं कहा था कि ईश्वर के अनेक हाथ हैं। उसने कहा था कि ईश्वर महज एक विचार है। ईश्वर को मानवेंद्रियों की सीमा से परे, अगम-अगोचर बताया गया है। अलवारों, नयनमारों और महानों में से किसी ने भी नहीं कहा था कि ईश्वर की सुनिश्चित आकृति या कोई निर्धारित रूपाकार है। तब हमारे आज के देवताओं को उनकी तयशुदा देह-यष्टि कहां से प्राप्त हुई? मंदिर में मूर्तियां रख, उन्हें अलग-अलग ईश्वर नामों से पुकारना कैसे सही हो सकता है? क्या ईश्वर को रचने वाला धूर्त्त नहीं था? क्या वह आदमी मूर्ख नहीं था जिसने ईश्वर को सुनिश्चित रूपाकार में ढालने का काम किया था?

यदि यह सच है कि ईश्वर को न तो देखा जा सकता है, न ही स्पर्श किया जा सकता है, तब उसको भोग लगाने का, वह भी दिन में छह-छह बार—भला क्या कोई औचित्य है? चूंकि समाज में ऐसे मूर्खों की संख्या पर्याप्त है जो इन सब बातों पर अपने धन को बरबाद कर सकते हैं, इसलिए ये धूर्त्त लोग अपना षड्यंत्र रचते रहते हैं। ईश्वर को भोजन करते हुए किसने देखा है? क्या ईश्वर को अपने शरीर के लिए दिन में छह बार भोजन की आवश्यकता है? कौन आदमी ईश्वर के मुंह में भोजन का कौर रखता है? क्या ईश्वर भोजन को पचा सकता है? क्या किसी ने भगवान को, दिन में कम से कम एक बार, शौच के लिए जाते हुए देखा था? ईश्वर को पेशाब करते हुए किसने देखा है? वह चल-फिर नहीं सकता। तब वह इन प्राकृतिक क्रियाओं को कैसे संपन्न करता होगा? वे लोग जो सोचने-विचारने में असमर्थ हैं, जिनका दिमाग कुंद हो चुका है, उन्हें महान समझ लिया गया है। ऐसे ही लोगों को आस्तिक माना जाता है।

यदि यह सही है कि ईश्वर संपूर्ण है। उसे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। तब ये ब्राह्मण ईश्वर का ब्याह क्यों रचाते हैं? उसे पत्नी, बच्चों आदि की आवश्यकता ही क्या है?

एक ईश्वर के दो पत्नियां हैं। किसी के हजारों पत्नियां हैं। ईश्वर को हजारों पत्नियों की क्या जरूरत है? इन प्रश्नों के उत्तर के बारे में वे विचार नहीं करते। वे चीजों को उसी रूप में नहीं रहने देना चाहते जैसी कि वे हैं। हमारे लोग जो ईश्वर के विवाह को साल-दर-साल पूरी श्रद्धा के साथ मनाते  हैं, वे एक बार भी यह नहीं पूछते कि पिछले वर्ष जो विवाह हुआ था, उसका क्या हुआ? क्या ईश्वर की पत्नी किसी के साथ भाग गई है? अथवा किसी बीमारी के कारण उसका निधन हो चुका था? अथवा ऐसा कोई कानून है कि ईश्वर का विवाह केवल एक वर्ष के लिए ही वैध माना जाएगा? इस प्रकार के सवालों की किसे परवाह है? कैसी मूर्खता है कि लोग हर साल ईश्वर के विवाह में शामिल होने के लिए जाते हैं। आप देख सकते हैं कि किस तरह हमें मूर्ख बनाया जाता था। यदि यह सही है कि ईश्वर सद्गुणों का आधार, उनका एकमात्र स्रोत है, तब हम ईश्वरों को वेश्याओं के साथ संबंध स्थापित करते हुए कैसे देख सकते हैं?

महाकाव्यों के अनुसार सुब्रमानिया, शिव, विष्णु, कृष्ण आदि सभी भगवानों की बहुपत्नियां(रखैल) हैं! क्या किसी ने पूछा है कि अनेक पत्नियों के रहते हुए भी ईश्वर को रखैलों की क्या आवश्यकता है!

जिन लोगों ने देवताओं को गढ़ा है, वे बस यही विराम नहीं लेते। उन्होंने उनके चरित्र और आचरण के बारे में अनेक कहानियां गढ़ी हैं। उनके देवताओं के बारे में यह सोचना कितना डरावना है कि वे अनैतिक और लंपट जैसा व्यवहार करते हैं।

कुछ देवताओं के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दूसरों की पत्नियों के साथ बलात्कार किया था। कुछ मामलों में उनका भेद खुल गया था। कुछ देवताओं को मामूली दंड मिला था। कुछ को गंभीर रूप से दंडित किया गया था। यह सब देवताओं के नाम पर गढ़ा गया है। आप देख सकते हैं कि इस तरह की चीजें हिंदू मंदिरों में आज भी उत्सव की तरह मनाई जाती हैं। श्रीरंगम का देवता एक वेश्या की खोज में उड़ायुर तक पहुंच जाता है। ये ब्राह्मण देवता को अपने कंधों पर लादकर ले जाते हैं। वहां पूरी रात वे प्रतीक्षा करते हें। अगली सुबह वे पत्थर की मूर्ति को वापस श्रीरंगम ले जाते हैं। इसे प्रतिवर्ष एक उत्सव की भांति मनाया जाता है। इसी तरह आप देखते हैं त्योहारों के दौरान देवतागण भी वेश्याओं के घर जाते हैं। कोई ऐसा ईश्वर नहीं है, जिसके मन में नैतिकता के प्रति सम्मान भाव हो। शिव और विष्णु के चरित्र एवं आचरण तो बुरी तरह चित्रित किया गया है।

क्या आप सोचते हैं कि इन देवताओं के चरित्र के अनुसरण द्वारा मनुष्य अपने आपको सुधार सकते हैं? क्या उनसे प्रेरणा लेकर उच्च नैतिक गुणों पर आधारित समाज की रचना संभव है? क्या ईश्वर के लिए एक पत्नी और वेश्या दोनों का होना आवश्यक हे? कोई भी संवेदनशील मनुष्य हिंदू धर्म में झूठ और प्रपंच के इस दलदल से भला कैसे सहमत हो सकता है?

क्या ईश्वर दयावान है

वे कहते हैं कि ईश्वर प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं। आप जाकर देवताओं पर नजर डालिए। उनके हाथों में कटार, तलवार, चक्र, त्रिशूल, वाण, हथौड़ा, तेजधार वाले तथा डरावने हथियार दिखाई देंगे। क्या हिंदू देवता ठग, डकैत, लुटेरे और हत्यारे हैं? हम इस कथन से भला कैसे सहमत हो सकते हैं कि देवता दयालु हैं? यदि यह मान लिया जाए कि शिव प्रेम के प्रतीक हैं, तो उन्होंने अपने हाथ में त्रिशूल क्यों थामा हुआ है?(श्रोताओं की हंसी)। मैं ये बातें सिर्फ हंसी-मजाक के लिए नहीं कह रहा हूं। आप द्रविड़ियन लोगों को इन बातों पर अत्यंत गंभीर होकर विचार करना चाहिए। आपको समझना चाहिए कि हमें किस सीमा तक मूर्ख बनाया गया है। हम इन देवताओं के बीच मनुष्य की भांति रहते हैं। हमें इन देवताओं की जरूरत ही क्या है? देवताओं के इतने सारे अवतार किसलिए हैं? शिव के अवतार का जन्म क्यों होता है? भगवान के रूप में विष्णु की क्या उपयोगिता है? उन्होंने किया क्या है?

यह कहा जाता है कि उन्होंने अनेक लोगों की हत्याएं की हैं। किस्से-कहानियों में सविस्तार बताया गया है कि उन्होंने असुरों, राक्षसों तथा करोड़ों लोगों को मारा था, ठीक ऐसे ही जैसे कोई कसाई  असंख्य बकरियों को मौत के घाट उतार देता है। क्या ये देवता कसाई और हत्यारे हैं? वे खुद को भगवान कहते हैं। रामायण महाकाव्य में कहा गया है कि राम ने करोड़ों लोगों की हत्या की थी। बताया गया है कि इतने लोगों की हत्या उन्होंने भूमा देवी(पृथ्वी) का भार कम करने के लिए की थी। हिंदू धर्म में देवताओं का मुख्य कार्य क्या है? वे सिर्फ मारकाट करने, नरसंहार और लोगों की हत्याएं करने के लिए हैं। यदि आप सोचना आरंभ करेंगे, तभी आप इन देवताओं, मंदिरों और धर्म के बारे में अनेक मूर्खतापूर्ण एवं हास्यास्पद दावों की असलियत को समझ पाएंगे।

कोई मूर्ख ही होगा जो यह मान बैठेगा कि ये सब बातें उससे संबंधित नहीं हैं।

आप देखेंगे कि तमिलवासी द्रविड़ों को अतीत में किस प्रकार छला जाता रहा है। कितने लोगों को मूर्ख बनाया गया होगा? इन बातों पर आपको कम से कम अब तो विचार करना चाहिए। सोचना चाहिए कि हिंदू धर्मशास्त्रों, मंदिरों, भगवानों और मूर्तियों से अब तक हमें क्या लाभ हुआ है।

ये ब्राह्मण अभी तक हिंदू धर्म के लिए सिर्फ पौराणिक ग्रंथ ही रच पाए हैं। पुराणों की संख्या अनगिनत है। वे रामायण से बात शुरू करते हैं। फिर अचानक स्कंद पुराण, वैनायक पुराण आदि  पर चले जाते हैं। ये पुराण वगैरह क्या हैं? आप किसी भी एक पुराण को उठा लीजिए। उसमें केवल अश्लील, अशिष्ट और अविश्वसनीय प्रसंगों की भरमार मिलेगी।

ब्राह्मण हिंदू देवताओं का खूब बखान करते हैं। किंतु एक भी ऐसा देवता नहीं खोज पाएंगे जो अश्लीलता, अनैतिकता और हिंसक व्यवहार के मुक्त हो। कम से कम ईश्वर के मामले में, यदि वह ईश्वर है तो उसके चरित्र में क्या थोड़ी सी भी सचाई, थोड़ा-सी शुभता नहीं होनी चाहिए! हमारी यह चिंता व्यर्थ है, क्योंकि ब्राह्मणों ने जानबूझकर इन कपटपूर्ण चीजों को ईश्वर के नाम पर गढ़ा है। इनके द्वारा ही वे अज्ञानी जनता को धोखा देने में सफल रहे हैं! लेकिन मैं बेहूदा चित्रों और छवियों द्वारा परिकल्पित नीच, दुष्ट, अनैतिक और हत्यारे देवताओं की असलियत को भली-भांति समझता हूं। क्या कोई सचमुच ऐसा ईश्वर है जिसे मनुष्य अपनी इच्छा से स्वीकार कर सके?

अपने समाज में ढेर सारा पुलिस बल, अदालतें और कारागार हैं। क्या इन सब का श्रेय इतने सारे देवताओं को जाता है?

इसलिए मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि असंख्य हिंदू देवताओं ने ही हम द्रविड़ों को मूर्ख बनाया है। ये हिंदू देवता ही समाज में निरंतर बढ़ते भीषणतम अपराधों तथा नैतिक पतन के लिए जिम्मेदार हैं। हम द्रविड़जन आज पहले की अपेक्षा कहीं अधिक साहसी हैं। हम कुछ भी कर सकते हैं। सही हो गलत, अच्छा हो या बुरा—सभी तरह का काम करने की हिम्मत हमारे भीतर है।

यदि हम सब संगठित हो, लोगों को तार्किक बनाकर समाज को बदलना चाहें तो हम अवश्य ही एक बेहतर समाज की रचना कर सकते हैं। एक बार व्यक्ति तर्कशील बन जाए, तब वह दूसरों को नुकसान पहुंचाने के बारे में कभी नहीं सोचेगा। केवल तर्कशील मनुष्य ही दूसरों की भावनाओं को भली-भांति समझ सकता है। वह सोचेगा कि उसका पड़ोसी भी उसी की तरह मनुष्य है। क्या यह भावना हमें आज, इस समाज में दिखाई पड़ती है? वहां तो ऐसे लोग हैं जो दूसरों का शोषण करते रहते हैं। लोगों का शोषण करने के लिए उनके पास आज भी ज्यादा से ज्यादा अवसर हैं। वे अपनी समाज-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप हमारे जीवन को बरबाद करने वाले कारकों एवं कारणों के बारे में अच्छी तरह सोचें। हमारे इस दीन-हीन जीवन की वजह क्या है? करोड़ों तमिलों की प्रगति और सुधार की राह में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारक कौन से हैं?

क्या ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्र, रीति-रिवाज, परंपरा, वेदादि ग्रंथ तथा हिंदू धर्माचार्य हमारे पतन और पिछड़ेपन का वास्तविक कारण नहीं हैं? इस दोषारोपण के कारण मुझे गलत मत समझिए। इन बातों पर यदि आप स्वयं स्वतंत्रतापूर्ण विचार करेंगे, तो अवश्य ही मुझसे सहमत होंगे।

ब्राह्मणों ने इन सब चीजों को कब गढ़ा था? कमोबेश 3000 वर्ष पहले इन देवताओं की रचना की गई थी। उसके बाद ही देवताओं से जुड़ी कहानियां रची गईं। मेरे विचार में रामायण की रचना लगभग 2000 वर्ष पहले हुई। ईसाई धर्म का आगमन ठीक 2000 वर्ष हुआ था। इस्लाम की उम्र तो मात्र 1500 वर्ष है।

आदिम मनुष्य

प्राचीन काल में मानव-जीवन कैसा था? क्या आप जानते हैं कि लगभग 5000 वर्ष पहले मनुष्य किस तरह से रहता था? क्या वह वस्त्र धारण करता था? उन दिनों तन ढकने के लिए वह केवल पत्तों का इस्तेमाल करता था। जंगलों में घूमता रहता था। हरी वनस्पतियों और कच्चे फलों का सेवन करता था। बिना पकाए मछलियों को खा जाता था। जानवरों के कच्चे मांस का भक्षण करता था। उसका भोजन तथा उसके बाकी सभी कार्य उसके अपने ज्ञानानुभवों के अनुसार थे। उसे आधुनिक शिक्षा के वैसे अवसर प्राप्त नहीं थे, जैसे आज हमें प्राप्त हैं।

ऐसे ही दौर में कुछ चतुर किस्म के लोगों ने हमारे अज्ञान का लाभ उठाना उठाना शुरू कर दिया। घोर निराशा के आलम में हमने भी उन अविश्वसनीय बातों पर विश्वास करना आरंभ कर दिया। मानवीय विवेक, विश्वास और तर्क से परे की चीजें हर धर्म में शामिल हैं। धर्म की रचना ही मूर्खतापूर्ण विश्वासों तथा अंतहीन झूठ के बल पर हुई है।

आप रामायण, महाभारत, हिंदू, शैव, वैष्णव, ईसाई और इस्लाम किसी भी धर्म को देख सकते हैं। ऐसा कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है जो सत्य को पूरी तरह दर्शाता हो। चूंकि विभिन्न धर्मों का समय अलग-अलग समय में हुआ है, इसलिए उनके मिथ्याचार की मात्रा और प्रकृति में अंतर है। मान लीजिए यदि आज कोई व्यक्ति नए धर्म की रचना का संकल्प लेता है, तो वह केवल आज की परिस्थितियों के अनुसार उसकी रचना करेगा। नए धर्म को अधिकाधिक तर्कसंगत, वस्तु-जगत के करीब और आधुनिकतम ज्ञान से समृद्ध करने की कोशिश करेगा। पुराने धर्मप्रवर्त्तकों ने धर्म को अपने समय के अज्ञान के अनुसार गढ़ा है।

पुराने समय में किसी भी धर्म के लिए ‘ईश्वर’ की संकल्पना अनिवार्य थी। ईश्वर भी ऐसा जो पराभौतिक शक्तियों से समृद्ध हो। हिंदू धर्म की रचना भी इसी तरह हुई। बाकी धर्मों ने भी उसी की नकल की। यही सच है। कल को ब्राह्मण कह सकते हैं कि महान परमात्मा गाय के गोबर को भी चंदन लेप जैसा बना सकता है। ऐसा कैसे हो सकता है, इस बात पर कोई विचार नहीं करेगा। वे हमारे साथ ऐसे छल क्यों करते हैं? वह कोई झक्की-पागल ही होगा जो यह दावा करेगा कि कोई शक्ति मरे हुए आदमी को जिंदा कर सकती है। वे इसी तरह लोगों को झांसा देते रहते हैं। वे देव-पुरुषों के चमत्कारों की चर्चा करते हैं। मानते हैं कि कथित ‘ऋषि-मुनियों’ में परामानवीय शक्तियां होती हैं। उनका सारा जोर दिव्यता, धार्मिक नेताओं और ऋषि-मुनियों के महिमा-मंडन पर केंद्रित रहता है। कुल मिलाकर वे सब लोग झूठे हैं।

महाकाव्य

जरा सोचिए, रामायण और महाभारत क्या हैं? बिना धोखे, छल और प्रपंच वे टिक नहीं सकते। वे कहते हैं कि राम दशरथ की संतान थे। यह भी बताया जाता है कि दशरथ 60,000 वर्षों तक जीवित रहा था; तथा उसकी 40,000 रानियां थीं। आजकल वह कहां है? क्या हम यह सवाल नहीं करेंगे? कोई व्यक्ति 60,000 वर्षों तक कैसे जीवित रह सकता है? कोई आदमी भला 60,000 वर्षों तक जीवित क्यों रहेगा? लोगों को धोखे में रखने के लिए ही रामायणकार ने लिखा था कि वह 60,000 वर्षों तक जीवित रहा था। लेकिन कोई व्यक्ति 40,000 स्त्रियों के साथ विवाह भला क्यों करेगा? उस इसकी आवश्यकता ही क्या है? क्या यह कभी भी संभव है?

मान लीजिए ऐसा आदमी किसी एक पत्नी के पास एक दिन गया। तब उससे दुबारा मिलने के लिए उसे 300 वर्ष लगेंगे। वह रानी 300 वर्षों तक क्या करेगी? क्या आप सोचते हैं कि 300 वर्षों तक वह सद्गुणी और ईमानदार पत्नी बनी रहेगी? क्या कमाल की कहानी है? इन बातों पर विश्वास भी कैसे किया जाए। व्यक्ति 40,000 पत्नियों के साथ कैसे निभा सकता है? क्या वह मशीन है? क्या झूठ का अंबार लगाने की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?  

इतनी सारी बेतुकी और हास्यास्पद बातों के रहते क्या कोई राम को ईश्वर के रूप में स्वीकार सकता है? क्या ईश्वर को गढ़ते समय शिष्टता के नियमों का पालन आवश्यक नहीं है? क्या यह जरूरी नहीं था कि वे कम से कम भगवान के प्रति आदर-भाव बनाए रखते? और राम ने क्या किया था? उसने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। क्या वह यज्ञ उसने एक शिष्ट मानवीय प्राणी के नाते संपन्न किया था? क्या एक निरर्थक कार्य में पत्नी के साथ भाग लेना, और जिस अनैतिक तरीके से यज्ञ किए जाते हैं, उसमें अपनी पत्नी और बच्चों को सहभागी बनाना जरूरी था? यहां मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कह रहा। यज्ञ के बारे में यह सब स्वयं रामायण में ही वर्णित है।

यह साफ तौर पर लिखा है कि विवाहिता स्त्रियां दैहिक संबंधों के लिए ब्राह्मणों को सौंप दी जाती थीं। स्त्रियां ब्राह्मणों का वीर्य अपने गर्भ में धारण करतीं तथा उनकी संतान को जन्म देती थीं। इस कार्य के भी ब्राह्मणों को अकूत धन-संपदा भेंट की जाती थी। यही वह विधि थी, जिससे दशरथ को संतान प्राप्ति हुई थी? फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि राम उनके पुत्र थे? यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि दशरथ के बेटों का जन्म उसकी पत्नियों के ब्राह्मणों के साथ सहवास के बाद हुआ था।

राम को ईश्वर का अवतार बताया जाता है। उसके जन्म के बारे में विस्तार के साथ सूचना है। ब्राह्मणों ने राम की मां कौश्लया को नंगा किया था। उससे जमीन पर लेट जाने को कहा गया था। एक घोड़ा मंगवाया गया। उसके लिंग को कौश्लया की योनि में प्रविष्ट कराया गया। इसी विधि से अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ था।

इसके लिए आपको मेरे शब्दों पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। आपको खुद ही रामायण का अध्ययन करना चाहिए। ये सभी बातें आपको उसमें मिल जाएंगीं। मैं ये बातें आपको विस्तार से क्यों बता रहा हूं? आपको जानना चाहिए कि पुराने लोग कितने अज्ञानी थे। ब्राह्मणों ने चतुराईपूर्वक, शातिराना ढंग से ईश्वर की रचना की, जिससे वे द्रविड़ियन लोगों शोषण कर सकें। क्या हम आज भी उस समय के लोगों जितने ही मूर्ख और नासमझ हैं? इसलिए मैं साफ तौर पर, बिना किसी संदेह या हिचक के कहता हूं कि सारे के सारे देवता ब्राह्मणों की कल्पना की उपज थे।

यदि वे मान लें कि राम-कथा काल्पनिक है, तब  हम रामायण को स्वीकार भी कर सकते हैं। यहां तक कि राम को जन्म देने का तरीका भी उतना बुरा नहीं था। परंतु क्या ब्राह्मणों का कर्तव्य नहीं था कि वे राम के चरित्र को शिष्ट और सद्गुण संपन्न इंसान के चरित्र की तरह गढ़ते। उन्होंने क्या किया था? वे कहते हैं कि उसने अपने मददगारों, राक्षस-असुर(द्रविड़ियन) बाली तथा दूसरे कई साथियों, जिनसे वह मिला था—का वध किया था। आप जानते हैं, किसलिए? मेरी बातें आपको सावधानीपूर्वक सुननी चाहिए। ध्यान देना चाहिए कि उसने किसकी हत्या की थी; और किसलिए की थी। राम ने खुद कहा है—‘क्या आप मेरे बारे में जानते हैं। मेरा जन्म ब्राह्मणों के समस्त दुश्मनों के विनाश के लिए हुआ है।’

भले मानुषो! आप यह सब रामायण में पढ़ सकते हो।

यदि ऐसा ही है, तब हम क्या समझें? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि ब्राह्मणों ने रामायण की रचना हमारे अपमान, अवमानना और हमें शर्मिंदा करने के लिए नहीं की है? हमें शूद्र जिसका अभिप्राय वेश्या की संतान है, क्यों कहा जाता है? राम को शूद्रों की हत्या क्यों और किसलिए करनी चाहिए थी? इस अवस्था में हमें खुद को हिंदू क्यों मानना चाहिए? देवता के रूप में राम की पूजा हमें क्यों करनी चाहिए?

अब आप देखिए कि ब्राह्मणों ने अपनी सुरक्षा के लिए क्या किया था? वे सिर्फ इसलिए कामयाब हुए क्योंकि हम द्रविड़ियन लोग मूर्ख थे।

रामायण की रचना शूद्रों के उपहास, उनकी अवमानना करने के लिए की गई है। लेकिन क्या ब्राह्मण राम को सम्मानित देवता बनाने में कामयाब हुए थे? उसकी पत्नी के साथ क्या हुआ था? वह किसी और के साथ भाग निकली थी। वह उसके साथ रही और गर्भवती हुई। उसी अवस्था में वह लौटकर आई। इस कहानी के दूसरे रूप भी हैं। दूसरी कहानी में बताया गया है कि राम की पत्नी सीता का अपहरण किया गया था। यदि राम सचमुच भगवान था, और यह बात यदि सच है तो वह इससे अनभिज्ञ कैसे हो सकता था? उसे इस बात की जानकारी होनी चाहिए थी कि उसके पीछे कोई आकर बलपूर्वक उसकी पत्नी का हरण करके ले जाएगा। अपनी पत्नी की समुचित सुरक्षा का इंतजाम किए बिना ही वह उसे छोड़कर भला कैसे जा सकता था? अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए उसने क्या सावधानियां बरती थीं? कुछ भी नहीं!

क्या राम वास्तव में देवता था? क्या उसकी शक्ति असली थीं? वह अपनी पत्नी को जंगल में बिलकुल अकेले कैसे छोड़ सकता था, जबकि वह खुद भी जंगल में अकेला ही था। जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। मानो सीता ने पहले से ही यह इंतजाम किया हुआ था कि रावण उससे मिले। रावण ने सीता से साथ चलने को कहा था। वह शांतिपूर्वक उसके साथ चली गई। वह वापस नहीं आई थी। जब वह लौटी तब उसे चार महीनों का गर्भ था।

सज्जनो, क्या यह भगवान की कहानियां गढने का तरीका है? यही कारण है कि हम रामायण को स्वीकार नहीं करते। आप देखेंगे कि ब्राह्मणों ने सीता को एक देवी के रूप में गढ़ा है, जिसकी पूजा की जानी चाहिए। राम के चरित्र के बारे में तो आप जानते ही हैं! उसे ईश्वर बनाया गया था। ब्राह्मण राम को ईश्वर बनाकर ही शांत नहीं हुए। उन्होंने राम की पत्नी को भी देवी बना दिया।

कोई विदेशी हमारे बारे में क्या सोचेगा? क्या वह यह कहने में संकोच करेगा कि हमारे देवता दुष्ट प्रवृत्ति के हैं? हमारी देवियां वेश्या हैं?

क्या हमें इनपर विचार करने की कोई समझ नहीं होनी चाहिए? यदि हमारे भीतर थोड़ा स्वाभिमान भी बाकी है तो हम इन सब चीजों को कैसे सहन कर सकते हैं? इस तरह की बेतुकी और हास्यास्पद कहानियां और कलंककारी देवता किसलिए हैं?

कृष्ण, स्कंद, कार्तिकेय, विनायक(गणेश), शिव, विष्णु आदि दूसरे देवताओं को देखिए! वे कौन थे? उनका जन्म कैसे हुआ था?

कृष्ण का जन्म

आपको पता होना चाहिए कि कृष्ण का जन्म कैसे हुआ था। इस बारे में ब्राह्मणों ने बड़ा रोचक  विवरण दिया है। बताया जाता है कि महाविष्णु ने अपने दो बाल उखाड़े। उनका एक बाल काला था, दूसरा सफेद। सो एक बाल कृष्ण बन गया, दूसरा उसका भाई बलराम।4 सोचकर देखें, क्या यह सही है? बालों की मदद से देवताओं के जन्म लेने का क्या यह श्रेष्ठ, सम्मानजनक और भरोसेमंद तरीका है? यदि आपको मुझपर विश्वास नहीं होता तो आप स्वयं पुराणों का अध्ययन कर सकते हैं। देखें, यह कितना भद्दा और बेहूदा है!

विनायक पुराणम्

अब मैं आपको बताऊंगा कि दूसरे भगवान की रचना किस तरह की गई थी। ब्राह्मणों ने गणेश को भी हिंदू देवता के रूप में रचा था। आपको यह जानने में रुचि होगी कि उसका जन्म कैसे हुआ था?

यह बताया गया है कि परमशिव(महादेव) और पार्वती जंगल में विचरण करने के लिए गए थे। वहां उन्होंने एक हाथी युगल रतिक्रिया में तल्लीन देखा? उसे देखकर पार्वती के मन में भी अपने पति के साथ हाथी की तरह संभोग करने की इच्छा जागी। महादेव राजी हो गए। दोनों हाथी-युगल बन गए। उन्होंने परस्पर संभोग किया। उसके बाद गणेश का जन्म हुआ, जो हाथी के बच्चे की तरह था। क्या आप इस कहानी से सहमत हैं? क्या यह देवता गढ़ने का एक सभ्य तरीका है? यह डरावना देवता विनायक(मूर्तियों के रूप में) तमिल नाडु में हर जगह दिखाई पड़ता है। वह यहां अपेक्षाकृत ज्यादा लोकप्रिय है। इस देवता की उत्पत्ति एकदम हाल में हुई है।

यह बताया गया है कि नरसिंह पल्लव का सेनापति वाथापी5 गया था। वहीं से वह नए देवता को हमारे क्षेत्र में लेकर आया। आप मिस्टर टी. पी. मीनाक्षीसुंदरम को जानते हैं। वे विद्वान अध्येता और उपकुलपति हैं। गहन शोध के पश्चात वे कुछ ठोस निष्कर्षों तक पहुंचे हैं। बिना किसी संदेह के, वे सप्रमाण दावा करते हैं कि 1200-1300 वर्ष पहले देवता के रूप में विनायक को उत्तर में स्थित वाथापी से लेकर आया था। आज उसकी हिंदुओं के बड़े देवता के रूप में पहचान है।

सुब्रमणियम देवता

सुब्रमणियम देवता की कहानी क्या है? इस हिंदू देवता को 2000 वर्ष पहले गढ़ा गया था। इस देवता के जन्म के बारे में ब्राह्मणों ने दो कहानियां गढ़ी हुई हैं। एक कथा रामायण में ही उपलब्ध है। मेरे पास यह पुस्तक है(पेरियार ने वह पुस्तक सम्मेलन की अध्यक्ष को सौंपी थी और श्रोताओं को संबंधित हिस्सा पढ़कर सुनाया था)।

सज्जनो! उन दिनों हमारे लोग केवल मूर्ख ही नहीं थे, अपितु वे अपने आत्मसम्मान को भी गंवा चुके थे।

यह कहा गया है कि एक बार सभी देवता मिलकर कैलाश पहुंचे। महादेव के ठिकाने पर पहुंचकर उन्होंने उनकी तपस्या की तथा उनसे देवताओं का सेनापति देने का आग्रह किया। लगता है कि देवताओं की तपस्या को स्वीकार शिव उन्हें उनका सेनापति देने को तैयार हो गए। देवता वापस लौट आए। तदनंतर शिव पार्वती से मिले और कहा कि उन्हें देवताओं को उनका सेनापति देना चाहिए। उसके बाद दोनों ने संभोग आरंभ कर दिया।

क्या किसी सेनापति को जन्म देने का यह उचित तरीका है? संसर्ग का आनंद लेने के लिए वे इस बहाने सहवासरत क्यों हुए होंगे? मैं ये बातें सप्रमाण बता रहा हूं। ठीक है, उसके बाद क्या हुआ था। उनका संभोग लंबा खिंचता गया। केवल कुछ घंटे, दिन, सप्ताह या महीने नहीं। देवताओं का सेनापति पैदा करने के लिए वे दोनों 1000 वर्षों तक एक-दूसरे के साथ सहवासरत पड़े रहे। बावजूद इसके उनके कोई बच्चा नहीं हुआ। बेचारे देवता परेशान थे। वे घबराये हुए थे। आखिरकार वे महादेव और पार्वती के निकट पहुंचे तथा उनसे अपनी अनिच्छा जाहिर की। इसपर महादेव और पार्वती ने उसका कारण जानना चाहा। देवताओं को भय था कि 1000 वर्षों लंबे संभोग से पैदा हुआ देवता खुद उन्हें भी नष्ट कर सकता है। यह सुनते ही पार्वती और महादेव संभोग छोड़कर एक-दूसरे से अलग हो गए। इस बीच महादेव स्खलित हुए और उनका वीर्य नदी की तरह बह निकला। बहता-बहता वह नदी में जा मिला। तुरंत उसने बाढ़ का रूप ले लिया। नदी से होती हुई वीर्य की लहर समुद्र तक पहुंची। समुद्र की सतह पर तैरती हुई वीर्य की उस लहर ने छह सिरों का रूप ले लिया।

यह कैसी गणना है? उसके केवल छह सिर ही क्यों थे? इस शंका का समाधान, इसकी व्याख्या करने कौन करेगा?

छह सिरों वाली वीर्य की वह लहर धारा गंगा तक पहुंची। वहां एक स्त्री खड़ी थी। उसने अपने हाथ बढ़ाकर उस वीर्य को उठाया तथा अपने गले से लगा लिया। वीर्य तत्क्षण छह सिर वाले मनुष्य में बदल गया। उस स्त्री ने किसी तरह उस छह मुंह वाले देवता को दुग्ध पान कराया; तथा उस बच्चे को नाम दिया—अरमुगम। यह वैष्णवियों द्वारा की गई व्याख्या है। इसका विवरण वाल्मीकि रामायण में उपलब्ध है।

शैव मतावलंबी इसकी अलग व्याख्या करते हैं। उसके अनुसार शिव और पार्वती को संभोगरत हुए 1000 वर्ष बीत जाने से प्रतीक्षारत देवता अकुला गए। उन्होंने उन दोनों से संभोग रोक देने का आग्रह किया। शिव ने मना कर दिया। कहा कि यदि उसने संभोग बीच ही में रोक दिया तो उनका वीर्य उद्दाम वेग से बह निकलेगा। उन्होंने देवताओं से कहा कि हाथ खड़े होकर उसे अपने हाथों में संभाल लें। देवताओं ने ऐसा ही किया। शिव ने संभोग रोक दिया। वीर्य बह निकला। देवताओं ने उसे अपनी हथेलियों में संभाल लिया। तदनंतर शिव ने देवताओं से वीर्य को पी लेने का आग्रह किया। देवताओं ने उसे पी लिया। उसी क्षण उनके गर्भ ठहर गया। यह देख वे फिर चिंतातुर हो गए। उन्होंने फिर शिव की प्रार्थना की। तब शिव ने उन्हें मुक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने देवताओं से एक विशिष्ट तालाब में जाकर स्नान करने का आग्रह किया। परेशान देवता तुरंत उस तालाब तक पहुंचे और वहां स्नान किया। इससे उनका गर्भ स्खलित हो गया।

सज्जनो! ये सब कहानियां पौराणिक ग्रंथों में तरह-तरह से दी हुई हैं।

गर्भ स्खलित होने के बाद शिव के वीर्य की कुछ बूंदें गिर पड़ीं, उन्हीं से सुब्रमणियम का जन्म हुआ। उसे ‘कांदन’ भी कहा जाता है। संस्कृत में ‘कांदन’ का अर्थ ‘वीर्य’ है। तमिल में हम जिसे ‘कांदन’ कहते हें। संस्कृत में उसको ‘स्कंद’ कहा जाता है। ‘संस्कृत में उसका अर्थ ‘निकल पड़ना’ या ‘उछलना’ है। उसका आशय स्खलन से है। तमिल में जो ‘अरुमुगम’ है, वही ब्राह्मणों के लिए ‘सुब्रमणियम’ है।

देखें, ब्राह्मणों ने देवताओं को कितना सम्मान दिया हैं। ब्राह्मणों ने देवताओं को इसी तरह के घृणास्पद तरीकों से गढ़ा है।

ब्रह्मा

अब एक और देवता ब्रह्मा के आचरण पर गौर करें। यह बताया गया है कि उसने अपनी ही पुत्री सरस्वती के साथ विवाह किया था। यह भी पुराणों में आया है।

ब्रह्मा ने एक लड़की की रचना की। वह बहुत सुंदर थी। इसलिए वह उस लड़की पर इतना सम्मोहित हो गया कि उसने अपनी इच्छापूर्ति के लिए दबाव डाला। सरस्वती ने मना कर दिया और अपनी ऐड़ियों तक झुक गई। उसके बाद ब्रह्मा हरिण बन गया और उसकी पुत्री हरिणी बन गई। दोनों दौड़ते-दौड़ते शिव के पास पहुंचे। सरस्वती ने शिव के आगे अपने पिता की शिकायत की। महादेव ने ब्रह्मा को फटकारा। ब्रह्मा ने कहा कि सरस्वती के सौंदर्य को देखकर ही उसमें उससे सहवास की इच्छा जन्मी है और प्यार जब वासना में बदल जाए तो किसी के लिए भी उसे नियंत्रित कर पाना संभव नहीं है। माताओं, बहनों और बेटियों में भेद न कर पाने के पीछे उनकी भला कौन-सी समझदारी, कैसा देवत्व था? जो बात ब्रह्मा ने शिव से कही थी, वही बात शिव ने सरस्वती के आगे रख दी। सरस्वती ने महसूस किया कि स्वयं शिव भी अपनी पुत्री से प्रेम करते थे।

दोस्तो! इस तरह की कहानियां गढ़ने का उद्देश्य क्या था? किसके लिए? इन कहानियों से किसे लाभ पहुंचता था? आप बस इतना समझ लें कि ये कहानियां उन दिनों गढ़ी गई थीं, जब लोग अशिक्षित थे। किसी भी विषय पर गहन विचार कर पाने का सामर्थ्य उनमें नहीं था। आजकल लोगों के पास ज्ञानार्जन के सभी अवसर हैं। वे सोच-समझकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में सक्षम हैं।

मैं समझता हूं कि यह बात आप भली-भांति समझ चुके होगे कि पुराणों में जो लिखा है, वह सच से सर्वथा परे है। उसे गंदा, अश्लील, गंवारू, असभ्य और मनुष्य के विकास का अवरोधक मानकर उसकी भत्र्सना की जानी चाहिए।

‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के बुद्धिवादी अभियान का उद्देश्य लोगों का ध्यान भटकाने के लिए नहीं है। बुद्धिवाद का मकसद ‘कुदाल’ को ‘कुदाल’ यानी जो जैसा है, वही बताना है। दूसरी ओर खुद को शंकराचार्य और माधवाचार्य का शिष्य बताने वाले लोग भी हैं, जो लोगों का ध्यान उनकी प्रगति से हटाना चाहते हैं। ऊंचे-ऊंचे मंचों पर विराजमान ये आध्यात्मिक गुरु लोगों के सम्मान के पात्र हैं। लोग उनपर विश्वास करने के लिए ही बने हैं। यही कारण है कि हमने एक अलग संस्था का गठन किया है, जिसका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना है। हमारे अभियान के बिना मनुष्य को जागरूक नहीं किया जा सकता। न ही वह वुद्धिमान बन सकता है।

एक सभा के दौरान मैं कुनराक्कुदी आदिगलार6 से मिला था। उनकी उपस्थिति में मैंने देवताओं और पुराणों पर भाषण दिया था। मैंने उनके अस्तित्व से इन्कार किया था। कहा था कि केवल मूर्ख लोग ही ईश्वर पर विश्वास कर सकते हैं। आदिगलार भाषण के लिए खड़े हुए तो उन्होंने बताया कि वे ईश्वर में विश्वास करते हैं। उन्होंने मुझपर नास्तिकता के प्रचार का आरोप लगाया था, लेकिन कुल मिलाकर उनका आरोप उन लोगों पर था जिन्होंने अस्वाभाविक तरीके से ईश्वर को गढ़ा था। वे मेरे साथ तर्क करने, मेरे कथन का तर्कसंगत खंडन में सक्षम नहीं थे। इसलिए चतुराईपूर्वक वहां से निकल गए थे।

कोई भी व्यक्ति भला तार्किकता और तर्कसंगत बनने से कैसे इन्कार कर सकता है। खासकर तब जब सारी की सारी पुराकथाएं इतने बेहूदा तरीके से लिखी गई हों। अब विचारणीय बात यह है कि इस तरह की कहानियां 2000 वर्ष ही क्यों रची गई थीं। उन दिनों के लोग मूर्ख थे। लेकिन आज भी उन्होंने मंदिर बना लिए हैं। उन्होंने देवताओं की रचना की है। धर्म को फैलाया है। यह सब वे यह सोचकर करते हैं कि आम जनता आज भी मूर्ख है। आखिर क्या कारण हैं कि वे हमारे बुद्धिवादी आंदोलन से ईर्ष्या करते हैं? जबकि हम तो नि:स्वार्थ सेवा में लगे हैं।

आज तक भी, हमारे पास अपनी और ऐसी सरकार नहीं है जिसमें ब्राह्मणों का वर्चस्व न हो। पुराने जमाने में जो राजा-महाराजा शासन करते थे, वे ब्राह्मणों का पूरा-पूरा साथ देते थे। उनके आगे गुलामों की तरह झुके रहते थे. हमारे चेर, चोल, पांडया सम्राट क्या कर रहे थे? वे भी ब्राह्मणों के सम्मान में झुके रहते थे।

केवल इसी शताब्दी में स्थितियों ने बदलना शुरू किया है। यहां तक कि जब मैं बच्चा था, स्त्रियां  ब्राह्मण की पहली नजर को आशीर्वाद जैसा मानती थीं। यह भावना उनके भीतर थी कि ब्राह्मण की उपस्थिति मात्र से स्वर्ग के दरवाजे उनके लिए खुल सकते हैं। संभव है ये सब बातें आज आपकी जानकारी में न हों। मैं आपको पिछले जमाने के बारे में बता रहा हूं। उन दिनों गाय के गोबर को छूना भी पवित्र माना जाता था, जैसा कि आज भी माना जाता है। इसलिए ब्राह्मण को पवित्र समझना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

नास्तिक

हमने दुनिया में कितने बदलाव देखे हैं? अनुमान लगाया गया है कि इस समय(1971 में) दुनिया की जनसंख्या 400 से 450 करोड़ है। उनमें से करीब 125 करोड़ लोग स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते। 100 करोड़ लोग खुद को गर्व से बुद्धिवादी बताते हैं। सोवियत संघ में करीब 35 करोड़ लोग नास्तिक हैं। उन्होंने गिरिजाघरों को ढहा दिया है। बाइबिल को उन्होंने आग के हवाले कर दिया है। धर्माचार्यों की उन्होंने हत्या कर दी है। परिणाम क्या हुआ? आप इसे खुद देख सकते हैं। वहां न कोई धनवान है, न ही विपन्न। सभी समान हैं। सभी खुश हैं। चीन के 85 करोड़ लोगों में से 75 करोड़ जनता बौद्ध धर्म में विश्वास करती है। बर्मा में 2 करोड़ लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं। श्रीलंका में दो-तिहाई जनता बौद्ध धर्म को मानने वाली है। स्याम(थाइलेंड) में तीन-चौथाई लोग बौद्ध हैं। इतने सारे लोग ईश्वरीय सत्ता की मौजूदगी से इन्कार करते हैं। वे ईश्वर में आस्था नहीं रखते। वे सभी नास्तिक हैं।

यूरोप में अनेकानेक तर्कवादी संगठन हैं। जर्मनी, स्पेन, ग्रीक तर्कवादी संगठनों, शोध-केंद्रों, सत्यशोधक संगठनों, थिंकर्स ऐसोशिएसन, नास्तिक संगठन आदि के बल पर आधुनिक सभ्यता का उदाहरण बन चुके हैं। हर शहर में इन संगठनों के लाखों सदस्य मौजूद हैं। मैं उन सभी स्थानों का भ्रमण कर चुका हूं। पेरिस में मैं एक नास्तिक संगठन का मेहमान बना था। उन्होंने एक पत्रिका प्रकाशित की थी। आप उसमें ‘क्रास’ के निशान को तलवार से कटते हुए देख सकते हैं। यह दर्शाता है कि ‘क्रास’(ईसाइयों का धार्मिक चिह्न) महज दिखावटी है। ईश्वर को मारा जा रहा है। केवल इस्लाम ही है जो धर्म के नाम पर इधर-उधर की बातों में उलझा हुआ है। वे केवल सामाजिक एकता पर ध्यान देते हैं।

त्योहार

भारत में मंदिरों की भरमार है। हर मील पर कम से कम पांच-छह मंदिर नजर आ जाएंगे। प्रत्येक मंदिर में 20, 30 से लेकर सौ-सौ भगवान हो सकते हैं। इन मंदिरों में तीन से लेकर छह-छह बार इन प्रभुओं की पूजा की जाती है।

इसके अलावा, प्रतिवर्ष तीन-चार बड़े त्योहार आते हैं। लड़कियों से मिलने के लिए युवा लड़के इन त्योहारों की बेताबी से प्रतीक्षा करते हैं। लड़कियां अच्छी तरह सज-धजकर लड़कों को लुभाने मंदिर और त्योहारों में शामिल होती हैं। इस मुलाकात को ही वे त्योहार कहते हैं। कुछ वर्ष पहले तक, भीड़ जुटाने के लिए मंदिरों में वेश्याओं को बुलाया जाता था। बड़े मंदिरों में तो सौ-सौ वेश्याओं को आमंत्रित किया जाता था। अपने शहर कस्बे में तो हर वेश्या मंदिर के उत्सव में शामिल होती थी। यह पुरानी परंपरा थी। आजकल यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। हम अपने परिवार की स्त्रियों को बाहर जाने की आजादी नहीं देते। मगर उन्हें मंदिर जाकर उत्सव में शामिल होने की अनुमति होती है। वे क्या कर सकती थीं? केवल स्त्रियों के मंदिर जाने के नाम पर ही पुरुष शांत रहते हैं। इसलिए उनके पास युवाओं के मिलने के लिए उससे अच्छा और कोई बहाना ही नहीं होता। स्वाभाविक रूप से कि मंदिर उत्सव, युवा लड़के-लड़कियों के एक-दूसरे से मिलने के लिए अच्छा अवसर लेकर आते हैं। बड़ी भीड़ जुटाने के इसके अलावा और इंतजाम भी करने पड़ते हैं। ईश्वर को इतने सारे प्रचार की क्या आवश्यकता है? इतनी चमक-दमक, तामझाम और दिखावा किसलिए? इन उत्सवों की आखिर क्या आवश्यकता है?

हम, तर्कशील लोग इन मंदिरों, भगवानों और उत्सवों के विरुद्ध हैं। हम बड़े परिवर्तन की कामना करते हैं। यह कैसे संभव है? हम मानते हैं कि बड़े बदलाव के लिए प्रचार-प्रसार ही एकमात्र रास्ता है। हम लोगों को अपने तर्कों द्वारा समझाने की कोशिश करते हैं। उन्हें वास्तविक तथ्यों से अवगत कराते हैं। बिना इसके उनकी मुक्ति का दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए हम लोगों को जागरूक करने की कोशिश करते हैं। हमें ईश्वरों पर हमला करते देख कुछ लोगों को दुख होता है। वे इस बात को नहीं समझते कि ईश्वर, मंदिर और धर्म जैसी बुराइयों को चुनौती दिए बिना समाज में अभीष्ट परिवर्तन असंभव है।

इस निरंतर परिवर्तनशील दुनिया की ओर देखो। एक साथ कई बदलाव बड़ी तेजी से हो रहे हैं। हम सफलता की सीढ़ी के आखिरी पायदान पर हैं। हम शैक्षिक रूप से काफी पिछड़े हुए थे। दो हजार वर्ष पहले, हजार लोगों में केवल एक व्यक्ति पढ़ा-लिखा होता था। वह भी ब्राह्मण हुआ करता था। वह भी आधी-अधूरी शिक्षा प्राप्त होता था। जो रटाई गई चीजों को केवल कंठस्थ करके रखता था। लिखना और पढ़ना उसे नहीं आता था।

आप संस्कृत के बारे में क्या सोचते हैं। ब्राह्मण अपनी भाषा के बारे में गर्व के साथ बात करते हैं। क्या वह लोकप्रिय लिपि है? वेदों का तो वे खूब महिमामंडन करते हैं। उनकी भी कोई लिपि नहीं है। वह महज ध्वनियां हैं। उन्होंने हाल ही में सुधरना शुरू किया है।

जनसंख्या

जिस समय ईसा मसीह का जन्म हुआ, दुनिया की आबादी महज 20 करोड़ थी। सन 1460 में यह आवादी 47 करोड़ थी। आबादी को दुगुना होने में 1500 वर्ष लगे थे। 1800 ईस्वी में वह बढ़कर 74 तक पहुंच गई। जनसंख्या बढ़ने के पीछे अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़ा योगदान था। 1914 में विश्व की जनसंख्या 165 करोड़ थी। उसके बाद वैश्विक जनसंख्या ने तेज गति से बढ़ना शुरू कर दिया। हर 15 वर्ष में वह दो गुनी हो जाती थी। 1955 वह बढ़कर 360 करोड़ हो गई। 1964 में उसने 380 करोड़ का आंकड़ा छू लिया। उसके छह वर्ष बाद, 1970 में विश्व की जनसंख्या बढ़कर 400 करोड़ तक पहुंच गई। विज्ञान और प्रौद्योगिकीय आविष्कारों की मदद से स्वास्थ्य सेवाओं में हुए सुधार के कारण विगत शताब्दी में दुनिया की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। तमिलनाडु में यह 4 करोड़ से बढ़कर 5 करोड़ तक पहुंच चुकी है। इन दिनों मनुष्यों की जनसंख्या अपेक्षा सुरक्षित है। मृत्युदर में आई कमी के कारण वह तेजी से बढ़ रही है।

आज मनुष्य की औसत जीविता 45 वर्ष है। पश्चिमी देशों में मानव जीविता 70 वर्ष है। हम इन निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि अगले तीन दशकों के बाद मनुष्य की औसत उम्र 75 वर्ष हो चुकी होगी।7 जबकि यूरोपवासियों का औसत जीवनकाल 100 वर्ष को भी पार कर चुके होगा। यहां आंकड़ों की गणना औसत के आधार पर की गई है। बहुत से लोग इस वृद्धि के कारण को नहीं समझते।

प्राचीन काल में यदि किसी एक गांव में हैजा फैलता था तो पूरे गांव पर मौत बरस पड़ती थी। कई बार तो एक आदमी भी जीवित नहीं बचता था। हाल-फिलहाल की बात यह है कि एक बड़े शहर में 8 लोग हैजे के कारण मारे गए। इससे वहां के स्वास्थ्य अधिकारियों की खिंचाई हुई। उनसे पूछा गया कि बीमारी को रोकने के लिए उन्होंने पहले ही आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए थे। यह सब विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के कारण संभव हुआ कि हम लोगों के जीवन और स्वास्थ्य दोनों का ध्यान रख पा रहे हैं। मुझे थातमबट्टी की एक घटना याद है। वह मेरी मां का पैत्रिक गांव है। उस गांव में हैजा फैला, तो पचास घर एकदम वीरान हो गए। आज भी वहां 3-4 घर हैं।

उन दिनों सलेम में जब हैजा फैलता था तो हर साल 2000 से 3000 जानें ले लेता था। जिन दिनों में इरोद नगरपालिका का अध्यक्ष था, वहां एक साल हैजे के कारण 400 जानें गई थीं। अब इस तरह की मौतें अपवाद बनती जा रही हैं। क्यों? इसलिए कि स्वास्थ्य अधिकारियों ने महामारियों की रोकथाम के लिए सुरक्षात्मक कदम उठाए हैं। नहरें खोदी गई हैं। पानी को छानकर घरों में पहुंचाया जाता है। पानी में बैक्टीरिया नाशक रसायन डाले जाते हैं। इंजेक्शन लगवाने को अनिवार्य कर दिया गया है। उसके फलस्वरूप संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतें थम चुकी हैं।

उन दिनों यदि किसी को टीबी हो जाती तो उसकी मौत निश्चित थी। आज ऐसा नहीं है। अनेक मामलों में सफल इलाज हो चुका है। उन दिनों अनेक बीमारियों का तो इलाज ही नहीं था। इसलिए उनसे होने वाली मौतें भी ज्यादा थीं। आज अस्पतालों में डॉक्टर लगभग सभी बीमारियों का उपचार करने में सफल होते हैं।

सज्जनो! क्या आपने विज्ञान और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में हुई महान प्रगति के बारे में नहीं सुना है? आजकल डॉक्टर किडनी और हृदय का प्रत्यारोपण करने में भी सफल हैं। वे झूठे नहीं हैं। आगे आप और भी चमत्कार देखने वाले हैं। सन 2000 ईस्वी में आप देखेंगे कि लोग 100 वर्ष लंबा जीवन जी रहे हैं। आने वाले समय में मनुष्य की जीविता 150 वर्ष भी हो सकती है। अपने बुद्धिबल की बदौलत मनुष्य ढेर सारी उपलब्धियां प्राप्त करने वाला है।

आपने देखा, मैं 92 वर्ष पार करने के बाद भी जिंदा हूं। अनेक लोगों ने मुझे आराम करने की सलाह दी थी। मैं नाराज हो गया। आराम की जरूरत किसे है? आराम की जरूरत तो धनवानों के लिए है। उन लोगों के लिए है जो महान होने के गुमान में घर से तने-तने निकलते हैं। मैं आराम क्यों करूं? मैं मानता हूं कि कुछ न करना और शांत पड़े रहना भी एक बीमारी है। जहां तक मेरा मामला है, मेरे पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। मैं तो जहां भी जाता हूं, वहां जो भी मिले खा लेता हूं। मैने रेलगाड़ियों में कई रातें बिताई हैं। बावजूद इसके मैं 92 वर्ष की उम्र में भी जीवित हूं।

यदि आप पुराने ढंग से अंधविश्वासियों की तरह सोचें तो मुझे बहुत पहले मर जाना चाहिए था। मैं वह हूं जिसने भगवान को चप्पलों से पीटा था। ऐसा व्यक्ति भला जीवित कैसे रह सकता है? इस समय तक तो मुझे अंधा हो जाना चाहिए था। शरीर को अनगिनत बीमारियों का डेरा बन जाना चाहिए था। आप क्या देखते हैं? मैं अभी तक चुस्त-तंदुरुस्त हूं। आज सभी बीमारियों के उपचार के लिए संसाधन हैं।

एक बार मुझे मूत्राशय संबंधी समस्या हुई थी। ऑपरेशन द्वारा डॉक्टरों ने उसका इलाज कर दिया। मुझे उसके बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। डॉक्टरों ने मुझसे पूछा था, क्या मैं ऑपरेशन कराना पसंद करूंगा। मैंने उनसे कहा कि यदि उन्हें अपने ऊपर पूरा विश्वास है तो वे कुछ भी कर सकते हैं। मैं बिस्तर पर था। नींद में डूबा हुआ। वे मुझे ऑपरेशन कक्ष में ले गए। ढाई घंटों तक वे ऑपरेशन करते रहे। उसके बाद मुझे बाहर लाकर बिस्तर पर लिटा दिया गया। एक-दो घंटे के बाद मुझे होश आ गया। मैं जानता था कि मेरा ऑपरेशन हुआ था। मैंने उसके बारे में पूछाताछ की। उन्होंने बताया कि सब कुछ निपट चुका है। ‘सबकुछ’ के बारे में अगले दिन ही जान पाया। वह सब कैसे हुआ था? उन्होंने कुछ दवाइयां लिखी थीं। मुझे इंजेक्शन भी लगे थे। उनसे मैं कुछ देर के लिए बेहोश हो गया था। आखिर सब कुछ ठीक-ठाक निपट गया। इस बीमारी की तरह दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए भी हर दिन नई-नई औषधियों की खोज की जा रही है।

लेकिन हमारे बारे में क्या है? हम आज भी चिकने पत्थर से बने लिंग को भगवान मानकर पूज रहे हैं। हम उसके साथ विवाह करते हैं। हम मूर्तियों को वेश्या के कोठे तक ले जाते हैं। भगवान के रथ को खींचते हैं। इन सब मूर्खतापूर्ण गतिविधियों से हम क्या हासिल करने वाले हैं?

इसके ऊपर प्रतिवर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। रथ का वजन 150 टन है। उसे खींचने के लिए लगभग 5000 लोगों की जरूरत पड़ती है। प्रत्येक को मजदूरी के रूप में दो रुपये दिए जाते हैं। आज, 1971 में भी सरकार उसका समर्थन करती है। देखा कितने मूर्ख हैं हम। हमारे लिए मुक्ति का ठौर कहां है?

इसलिए मेरे प्यारे साथियो, हमें सभ्य आदमी बनने का प्रयत्न भी करना चाहिए। उसके लिए हमें धर्म, ईश्वर, शास्त्र तथा अन्यान्य अंधविश्वासों से पीछा छुड़ाना होगा। मुक्ति पानी होगी उनसे। हमें पुराणों को फाड़कर, उनकी चिंदी-चिंदी करके कूड़ेदान में फैंक देना चाहिए। हमें यह पता होना चाहिए कि मनुष्य से बड़ी कोई शक्ति नहीं हैं। ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं हैं।

सज्जनो, मैं बहुत लंबा बोल चुका हूं। फिर भी बहुत-सी चीजें छूट रही हैं। कई बातों पर बोलना बाकी है। आपको इस तरह की कहानियां दुनिया में और कहीं नहीं मिलेंगीं। ब्राह्मण और शूद्र आपको केवल यहीं तमिल नाडु, भारत में ही मिलेंगे।

स्वयं शंकराचार्य ने भी माना है कि ये कहानियां पढ़े-लिखे लोगों के लिए नहीं हैं। वे केवल अशिक्षित लोगों के लिए हैं। आम लोग ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करने लगें, केवल इसलिए कि इन कहानियों को रचा गया है।

यदि हम चुप रहकर, चीजों पर आंख मूंदकर विश्वास करते रहे, तो कभी प्रगति नहीं कर पाएंगे। ब्राह्मण अपने स्वार्थ की फसल काटते रहेंगे। यही कारण है कि हम ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के अभियान द्वारा लोगों को जागरूक करने का काम करते हैं। हम लोगों से अपील करते हैं कि वे अपने अंध विश्वासों से मुक्ति पाएं। हम अपने तर्कवादी देश के लोगों को सुख-सुविधामय और सम्मानित जीवन के योग्य बनाना चाहते हैं। जैसा कि दूसरे देशों के नागरिकों को उपलब्ध है।

अंत में, मैं आपसे कहता हूं कि मैंने जो भी कहा है, उसपर आंख मूंदकर विश्वास न करें। अपने आप सोचें। यदि आपको लगता है कि जो मैंने कहा वह सही है, तो उसे स्वीकार करें और कल से ही अपने जीवन को नया मोड़ दें। यदि आप हमारे संगठन का सदस्य बनना चाहते हैं, तो मंदिरों में जाना छोड़ दें। अपनी पहचान के साथ कोई जातिसूचक चिह्न न लगाएं। ब्राह्मणों को एक पैसा भी दक्षिणा के रूप में न दें। उनके विशेषाधिकारों, मनमानियों और शोषण यहीं खत्म कर दें।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपने भाषण को समाप्त करता हूं।

—ई. वी. रामासामी पेरियार

संदर्भ:

1. ईसापूर्व छठी-सातवीं शताब्दी में भौतिकवादी चिंतन अपने देश में चरम पर था। आजीवक, चार्वाक, लोकायत, वैनायिक जैसी अनीश्वरवादी विचारधाराएं वैदिक धर्म को चुनौती देती रहती थीं। दीघनिकाय(ब्रह्मजाल सुत्त) में गौतम बुद्ध ने अपने समय में प्रचलित 62 दार्शनिक मतों का उल्लेख किया है। बौद्धधर्म, ठेठ अनीश्वरवादी विचारधाराओं और ईश्वरवादी विचारधाराओं(वैदिक धर्म-दर्शन) के सम्मिलन से जन्मा मध्यममार्गी दर्शन था। उसकी गिनती नास्तिक दर्शनों की परंपरा में की जाती है। उन दिनों ब्राह्मण धर्म-दर्शन समाज के अल्पसंख्यक अभिजनों का धर्म-दर्शन था। बहुसंख्यक समाज आजीवक और लोकायत परंपरा में विश्वास रखता था।

2. 11वीं शताब्दी के शैव संत नांबियार नंबी के अनुसार, मदुरै में सातवीं शताब्दी के शैव संत संबदार ने जैन श्रमणों को लंबे शास्त्रार्थ के दौरान पराजित किया था। उससे प्रभावित होकर जैन सम्राट सुंदर पांडयान, जिसे कून पांडयान भी कहा जाता है, ने शैव धर्म अपना लिया था। उससे पहले वह शैव मतावलंबी ही था। जैन धर्म से प्रभावित होकर उसने उस धर्म में दीक्षा ली थी। उसके बाद वह दिगंबर साधु बना और कालांतर में एक मठ का अध्यक्ष भी। बताते हैं कि जैन मठ का अध्यक्ष रहते वह बीमार पड़ गया। तब शैव संत संबदार ने उसका इलाज किया था। ठीक होने के बाद सुंदर पांडयान ने जैन धर्म छोड़ वापस शैव धर्म में शामिल हो गया। संबदार के कहने पर ही उसने 8000 जैन श्रमणों को सूली पर चढ़ा दिया था। कुछ विद्वानों का मत है कि उसके बाद मदुरै से जैन धर्म का अंत हो गया था। पॉल दुंडास के अनुसार उस घटना को मदुरै के प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर सहित अनेक मंदिरों तथा शैव एवं जैन ग्रंथों में दर्शाया गया है। —स्रोत: दि जैन्स, पॉल दुंडास, रालिज, टेलर एंड फ्रांसिस ग्रुप, लंदन/न्यु यार्क, दूसरा संस्करण, पृष्ठ 127।

3. ‘थेवरम’ और ‘प्रबंधम’ प्रसिद्ध तमिल शैव ग्रंथ हैं.

4. भगवान नारायण ने अपने मस्तक से दो केश निकाले, उनमें एक सफेद था और दूसरा श्याम। ये दोनों केश यदुवंश की दो स्त्रियों देवकी तथा रोहिणी के भीतर प्रविष्ट हुए। उनमें से रोहिणी के बलदेव प्रकट हुए, जो भगवान नारायण के श्वेत केश थे। दूसरा केश जिसे श्याम वर्ण बताया गया है, वह देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुआ. महाभारत, आदिपर्व—196/32—33, गीता प्रेस गोरखपुर, 16वां संस्करण. हिंदी : अनुवाद गीता प्रेस,  

5. उत्तरी कर्नाटक, उन दिनों वह चालुक्यों की राजधानी थी। सातवीं शताब्दी में नरसिंह पल्लव ने चालुक्यों को हराकर, विनायक को अपने अधिकार में लिया था। आजकल यह स्थान उत्तरी कर्नाटक के बागलकोट जिले में पड़ता है।

6. कुनराकुद्दी आदिगलार(1925—1995) देवता मुरुगन को अपना आराध्य मानने वाले शैव मतावलंबी, तमिल आध्यात्मिक गुरु।  

7. सन 2001 में भारत में मनुष्य की औसत जीविता 62.69 वर्ष थी। 2020 में वह 69.63 वर्ष तक पहुंच चुकी है।

सच्ची रामायण का विरोध धार्मिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक है

सामान्य

मैं मानव समाज का सुधारक हूँ. मैं देश, धर्म, ईश्वर, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मुझे केवल मनुष्यता के विकास और उसके कल्याण की चिंता है—पेरियार

बाइबिल का परमात्मा पक्के तौर पर सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक नाकारा, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक रक्त पिपासु, सबसे ज्यादा निरंकुश तथा मानवीय गरिमा एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा शत्रु था. जबकि शैतान शाश्वत विद्रोही और पहला मुक्त चिंतक था—मिखाइल बकुनिन, ईश्वर और राज्य.

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी.’ प्रथम दृष्टया लोकतांत्रिक लगने वाली ये पंक्तियां तुलसी की हैं. पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का लोकतंत्र में अटूट विश्वास है. वह साधक को अपनी भावना के अनुसार साध्य गढ़ने की छूट देता है. मगर इनमें लोकतंत्र की व्याप्ति मान लेना वैसा ही संभ्रम है, जैसे यह कहना कि कण-कण में भगवान हैं, इसलिए चराचर जगत में सभी बराबर हैं, दुनिया में आदर्श समानता है. ऊंच-नीच, जात-पात, छोटा-बड़ा, छूत-अछूत जैसा कुछ भी नहीं है. असल में, धर्म का यह उदार चेहरा उतना ही बनावटी है, जितना किसी पुरोहित का दक्षिणा मिलते ही ‘कल्याणम् भव’ कह, निस्पृह भाव से आगे बढ़ जाना. भारतीय समाज छोटे-छोटे समुदायों, धार्मिक और सांप्रदायिक समूहों, गोत्रों-उपगोत्रों तथा जातियों-उपजातियों में हमेशा बंटा रहा. उनके बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष भी लगातार चलते रहे.

हालांकि एक सीमा तक तुलसी गलत भी नहीं थे. जिस दौर में वे रामचरितमानस लिख रहे थे, समाज में रामकथा के अलग-अलग रूप प्रचलित थे. प्रत्येक समूह अपनी रामकथा को असली मानता था. बावजूद इसके रामायण के भिन्न कथारूपों पर विश्वास करने वाले समूहों में परस्पर कोई द्वेष नहीं था. अकेले राम सभी के ‘भगवान’ नहीं थे, लेकिन कोई राम को सबसे बड़ा देवता और भगवान माने, इसपर उन्हें कोई आपत्ति न थी. आदिवासियों, जनजातियों, शूद्रों, अतिशूद्रों के अपने-अपने देवता थे, जो राम जैसे अवतारी, उतने ही पराक्रमी और चमत्कारी; कहीं-कहीं तो उनसे भी आगे थे. राम के देवत्व पर भरोसा कर अपना आराध्य मानने वालों ने भी, उन्हें अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुसार ढालने के बाद ही स्वीकार किया था. यही कारण है कि उस जमाने में सीता को राम की बहन बताने वाली जैन रामायण ‘पउमचरिय’ उतनी ही लोकप्रिय और सम्मानीय मानी जाती रही, जितनी राम-सीता को पति-पत्नी बताने वाली वाल्मीकि रामायण.

विभिन्न रामायणों के मुख्य पात्र भले ही एक हों, किंतु उनके चरित्र में आधारभूत अंतर है. जैन रामायण में ब्राह्मणों पर रावण को बदनाम करने का आरोप लगाया गया है. जैन मान्यता के अनुसार रावण उनके 63 शलाकापुरुषों में से एक था. उसके अनुसार राम और रावण दोनों जैन थे. मृत्यु के बाद राम को कैवल्य; तथा लक्ष्मण को नर्क प्राप्त हुआ था. वाल्मीकि, तुलसी, विमलसूरि(पउमचरिय) द्वारा रचित रामायणों के अलावा भी रामकथा के सैंकड़ों रूप दुनिया-भर में प्रचलित हैं. फादर कामिल बुल्के ने देश-विदेश में प्रचलित रामकथाओं की गणना कर, उनकी संख्या को 300 माना था. अपने लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायण’ में ए. के. रामानुजन रामकथा की विविधता को दर्शाने के लिए जिस लोकश्रुति का सहारा लेते हैं, उसके अनुसार रामकथा अनंत रूपों में, अनादिकालीन कथा है. फिर पेरियार ने ऐसा क्या लिखा था, जिससे उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ का नाम सुनकर ब्राह्मणवादी लाल-पीले होने लगते हैं?

मुख्य कारण था, पेरियार का रामकथा के प्रति दृष्टिकोण. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. जहां रामायण के अन्य प्रारूपों के साथ कोई न कोई धार्मिक दृष्टिकोण जुड़ा था, पेरियार उसे धार्मिक पुस्तक मानने से ही इन्कार करते थे. उनका कहना था कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है. उसकी रचना ब्राह्मणों ने द्रविड़ों पर अपना प्रभुत्व दर्शाने के लिए की गई है. वह द्रविड़ों के आत्मसम्मान की विरोधी, उनकी अस्मिता का हनन करने वाली है. ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ की भूमिका में वे लिखते हैं—

‘रामायण और बरधाम(महाभारत) काल्पनिक ग्रंथ हैं….इन्हें आर्यों ने द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, निर्णय सामथ्र्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को पथभ्रष्ट करने के लिए रचा है. इन दोनों कथाओं के नायक क्रमशः राम और कृष्ण हैं. जो कि आर्य हैं और बेहद साधारण व्यक्ति हैं. ये कथाएं इसलिए थोपी गईं हैं, ताकि इनके कथानायकों, उनके परिजनों एवं सहायकों को अलौकिक एवं अतिमानवीय मान लिया जाए; तथा उन्हें पूजनीय मानकर, जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना की जाए.’ बावजूद इसके रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ जब तक तमिल और अंग्रेजी में थी, तब तक हिंदी पट्टी के ब्राह्मणवादियों को उससे कोई आपत्ति नहीं थी. इसलिए करीब 40 वर्षों तक उसके तमिल और अंग्रेजी में संस्करण पर संस्करण निकलते रहे.

पुस्तक को लेकर तूफान तब उठा जब कानपुर देहात के रहने वाले पेरियार ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ शीर्षक से उसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया. हिंदी अनुवाद दुलालपुर निवासी, राम आधार द्वारा किया गया था. उसे छापने के लिए उस समय कोई प्रकाशक तैयार नहीं था. इसलिए ललई सिंह ने उसे अपने प्रकाशन, ‘अशोक पुस्तकालय’ कानपुर से 1 अक्टूबर, 1968 को प्रकाशित किया था. मूल कृति ‘रामायण पादिरंगल’(रामायण के कथापात्र) शीर्षक से 1930 में प्रकाशित हुई थी. 1972 तक उसके दस संस्करण प्रकाशित हो चुके थे. पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद 1959 में आया था. उसके बाद दो और संस्करण क्रमशः 1972 और 1980 में प्रकाशित हुए. पुस्तक के हिंदी में आने की संभावना उसके अंग्रेजी अनुवाद के बाद ही बनी थी. ‘रामायण पादिरंगल’ की रचना से पहले पेरियार ने लगभग सभी उपलब्ध रामकथाओं यथा जैन, बौद्ध, कंब आदि का गहन अध्ययन किया था. विषय से संबंधित विद्वानों से बातचीत की थी.

रामकथा संबंधी उनके अध्ययन-चिंतन की सफल परिणति एक साथ दो पुस्तकों के रूप में हुई थी. दूसरी पुस्तक का नाम था—रामायण कुरीप्पुकल(रामायण के बारे में कुछ बातें). वह पहली की अपेक्षा अधिक गंभीर तथा कथानक की दृष्टि से मूल रामकथा के करीब थी. उनमें प्रसिद्धि मिली पहली पुस्तक को. अंग्रेजी में उसे मूल शीर्षक से थोड़ा हटकर, ‘दि रामायण: एक ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से छापा गया. उसका हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में सामने आया. हम सोच सकते हैं कि तमिल कृति ‘रामायण पादिरंगल’ यानी ‘रामायण के कथापात्र’ के हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में अनूदित होते-होते, शीर्षक के स्तर पर भी काफी अर्थ-परिवर्तन हो चुका था.

‘सच्ची रामायण’(रामायण पादिरंगल) की रचना विखंडनात्मक शैली में हुई है. वह रामकथा की स्थापित छवियों का खंडन करती थी. उसका उद्देश्य रामायण के कथापात्रों के चरित्र का वस्तुनिष्ट विवेचन है. जिस राम को तुलसी मर्यादापुरुषोत्तम कहकर ईश्वरतुल्य बना देते हैं, उसके बारे में पेरियार आरंभ में ही साफ कर देते हैं कि—‘राम कोई आदर्श व्यक्ति नहीं है.’ आगे वे विस्तार से राम के चरित्र को लेकर अपने विचार पेश करते हैं. शंबूक प्रसंग का उल्लेख करते हुए वे आगे लिखते हैं—

‘राम जिसने तपस्या कर रहे शंबूक की बगैर किसी गलती के, निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी, उस राम को विष्णु का अवतार माना जाता है. अगर आज राम की तरह का कोई राजा होता तो उन लोगों की क्या दशा होती, जिन्हें शूद्र(जो गालीनुमा संबोधन है) कहा जाता है!’

ऐसी वैचारिक प्रखरता, प्रतिबद्धता और साफगोई के कारण वह उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई.

पेरियार ललई सिंह ने न केवल ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया था, अपितु ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार के तर्कों की पुष्टि के लिए, विभिन्न रामकथाओं से कुछ संदर्भ भी दिए थे. जिसे उन्होंने ‘सच्ची रामायण की चाबी’ कहा था. पाठकों की सुविधा के लिए दोनों पुस्तकों को एक ही जिल्द में छापा गया था. उदाहरण के लिए पेरियार ने सीता का वर्णन करते हुए उसके चरित्र की दुर्बलताओं को उजागर किया था तो पेरियार ललई सिंह ने उसकी पुष्टि के लिए रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से, ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिनी’ से एक पद उद्धृत किया था. पद में यूं तो पति-पत्नी का सहज रति प्रसंग है. लेकिन एक ‘वनवासी मर्यादा पुरुषोत्तम’ के संदर्भ से जुड़कर वह अशालीन लगने लगता है. पद में सीता का कथन देखिए—

‘हमारे प्रिय ठाड़े सरजू तीर।।टेक।।

छोड़ लाजि मैं जाय मिली, जहां खड़े लखन के वीर

मृदु मुसुकाय पकरि कर मेरी खेच लियो तब चीर

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर.1

कह सकते हैं कि पेरियार द्वारा, ‘दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग’, के रूप में रामायण की विखंडनवादी अन्वीक्षा, ‘सच्ची रामायण’ में थोड़ी और मुखर, और अधिक व्यंजनात्मक हो चुकी थी. इसलिए ब्राह्मणवादियों के कान खड़े होना स्वाभाविक था. हिंदी में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी जगत में तूफान सा उठ गया. ललई सिंह पर मुकदमा ठोक दिया गया. यह कहकर कि पुस्तक हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर, सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली है, उसकी सभी प्रतियों को जब्त करने के आदेश सुना दिए गए. गौरतलब है कि प्रतिबंध और जब्ती के आदेश पुस्तक के केवल अंग्रेजी और हिंदी संस्करण के थे. तमिल तथा दूसरी दक्षिणी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तक की बिक्री पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी. गोया तमिलनाडु या दक्षिण भारत के दूसरे हिस्सों में हिंदू रहते ही नहीं थे. इससे पेरियार के कथन कि रामायण एक राजनीतिक ग्रंथ है—की पुष्टि होती है. सच तो यह है कि ‘सच्ची रामायण’ के माध्यम से ब्राह्मणवादी राजनीतिक ताकतें, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सत्ता की पुनर्वापसी को अंजाम देने में लगी थीं.

पुस्तक को प्रतिबंध मुक्त कराने के लिए ललई सिंह यादव को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. उसका समापन 16 सितंबर, 1976 के उच्चतम न्यायालय के फैसले से हुआ. शीर्षतम अदालत ने प्रतिबंध को गलत बताकर, पुस्तक की जब्त की गई प्रतियां लौटाने का आदेश दिया था. उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार औपचारिक आदेश जारी करने से बचती रही. 1995 में मायावती सरकार के दौरान पुस्तक प्रतिबंध-मुक्त हो सकी. उसके बाद से हिंदी पट्टी में ‘सच्ची रामायण’ की लोकप्रियता बढ़ती गई, मगर पोंगापंथी भी शांत न थे. वे विरोध के लिए नए सिरे से एकजुट होने लगे थे. नया दौर हिंदुओं का न होकर, हिंदुत्ववादियों का था. उनके भीतर पेरियार के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी थी. इसलिए नहीं कि पेरियार ने रामायण के पात्रों के चरित्र पर उंगलियां उठाई थीं. बल्कि इसलिए कि उन्होंने इन धर्मग्रंथों के पीछे छिपे ब्राह्मणवादियों के राजनीतिक मंसूबों को उजागर कर दिया था. पेरियार के प्रति उनके भीतर कितनी नफरत भरी थी, इस समझने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा.

2002 में लखनऊ स्थित आंबेडकर पार्क जब बन रहा था तो उसमें योजनानुसार ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, शाहूजी महाराज, डॉ. आंबेडकर, बिरसा मुंडा, कांशीराम जैसी बहुजन शख्सियतों की मूर्तियां स्थापित की गईं. मायावती उसमें पेरियार की मूर्ति भी लगवाना चाहती थीं. कलाकार को मूर्ति-निर्माण का आदेश जारी हो चुका था. उस समय प्रदेश में भाजपा के सहयोग से बनी बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी. पेरियार का नाम सुनते ही विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू महासभा जैसे उग्रपंथी संगठन भड़क उठे. विनय कटियार ने ऐलान किया कि पेरियार की मूर्ति लगाई गई तो वे उसे ढहा देंगे. भाजपा ने समर्थन वापस लेने की धमकी दे डाली. बसपा पेरियार को अपना ‘आइकन’ मानती थी. उसके हर कार्यक्रम में ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर, शाहूजी महाराज के साथ-साथ पेरियार के चित्र भी लगे होते थे. उस समय मायावती चाहतीं तो सामाजिक न्याय समर्थित वैचारिकी को महत्व देकर, सरकार को दाव पर लगाने का खतरा उठा सकती थीं. लेकिन उन्होंने राजनीतिक सत्ता को बचाने का अवसरवादी विकल्प चुना. बयान दिया कि सरकार का पेरियार की मूर्ति लगाने का कोई इरादा नहीं है. जबकि मूर्ति तैयार होकर शिल्पकार के स्टूडियो में प्रतीक्षारत थी.

मंदिर आंदोलन की आड़ में प्रदेश में दक्षिणपंथी ताकतें दुबारा मजबूत हुई तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद पुस्तक पर नए सिरे से प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगी. 2007 में प्रदेश में सुश्री मायावती की सरकार थी. उस समय भाजपा की प्रादेशिक इकाई ने आरोप लगाया कि ‘बहुजन समाज पार्टी’ सच्ची रामायण का प्रचार-प्रसार कर रही है. उसके संरक्षण में प्रदेश में बड़े पैमाने पर पुस्तक की बिक्री की जा रही है. भाजपा की प्रदेश इकाई ने, पुस्तक को हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाली बताकर, उसपर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की थी. भाजपा विधान मंडल के तत्कालीन नेता ओमप्रकाश सिंह ने सरकार से मांग की थी कि—‘हिंदू देवी-देवताओं के विरोधी तथा द्रविड़िस्तान की मांग करने वाले, अलगाववादी पेरियार रामासामी की सरकार निंदा करे तथा उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में स्थान न दे.’ भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ने दावा किया था कि 9 अक्टूबर को बसपा की रैली में ‘सच्ची रामायण’ की 4000 प्रतियां बेची गई थीं. हैरानी की बात यह है कि सामाजिक न्याय की बात करने वाली समाजवादी पार्टी भी, ‘सच्ची रामायण’ के विरोध में भाजपा का साथ दे रही थी. विधानसभा में विपक्ष के नेता और समाजवादी पार्टी के सदस्य अहमद हसन ने ‘सच्ची रामायण’ के जरिये सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि—

‘भगवान राम के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है. पूरी दुनिया के मुसलमान स्वीडिश कार्टूनिस्ट द्वारा बनाए गए पैगंबर मोहम्मद के कार्टून की भर्त्सना कर रहे हैं. विवादित पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.2

इससे अनुमान लगाया जाता है कि मामला जब धर्म की आलोचना का हो तो समय-समय पर एक-दूसरे के प्रतिद्विंद्वी की भूमिका में उतरने वाले धर्मावलंबी भी एक-दूसरे के समर्थन पर उतर आते हैं.

देखा जाए तो भाजपा का आरोप सरकार पर न होकर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ पर था. उस पार्टी पर जो पेरियार को अपना आदर्श मानती थी. अपनी वैचारिकी पर दृढ़ रहने के बजाए, मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर पीछे हटने का फैसला किया. उनकी ओर से वक्तव्य जारी हुआ—‘बसपा तथा सरकार का सच्ची रामायण की बिक्री से कोई लेना—देना नहीं है.’ मामले पर राजनीति करने के बजाय, पुस्तक पर प्रतिबंध की मांग कर रहे नेताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है.3

इस प्रसंग का सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस ‘सच्ची रामायण’ के विरोध को लेकर भाजपा सरकार पर लगातार आरोप लगा रही थी, तथा बिना आगा-पीछा सोचे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उसका साथ दे रही थीं, उसकी प्रति न तो भाजपा के पास थी, न सपा, न कांग्रेस और न ही बसपा के पास. यहां तक कि बसपा के साहित्य के प्रकाशक ‘बहुजन चेतना मंडप’ के पास भी उस पुस्तक की प्रतियां उपलब्ध नहीं थी. जबकि लखनऊ के सबसे बड़े पुस्तक विक्रेता ‘यूनीवर्सल बुक सेलर’ का दावा था, ‘हमने वह पुस्तक कभी नहीं बेची, न ही वह पुस्तक फिलहाल हमारे पास है.’ उल्लेखनीय है कि भाजपा के लखनऊ मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ को लेकर 27—28 अक्टूबर 2007 को एक बैठक हुई थी. उसमें पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रदेश भर में ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री का विरोध करने को कहा था. जबकि जिस पुस्तक का बहिष्कार किया जाना था, उसकी एक भी प्रति उस बैठक में उपलब्ध नहीं थी.

भाजपा नेताओं द्वारा विधानसभा परिसर के आगे स्थित, अपने पार्टी मुख्यालय में ‘सच्ची रामायण’ की प्रतियों का दहन(का नाटक) किया था.4 भाजपा का ‘सच्ची रामायण’ के दहन का दावा कितना खरा था, इसे इंडियन एक्सप्रेस में अलका एस. पांडे की 7 नबंवर की रिपोर्ट से समझा जा सकता है. उसके अनुसार पार्टी ने जैसे-तैसे ‘सच्ची रामायण’ के कुछ पन्ने जुटाए थे. उन्हीं को जलाकर, पुस्तक के दहन का नाटक किया गया था. वे भूल गए कि किसी व्यक्ति को महापुरुष मानना या न मानना, सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा तय नहीं होता. थोपे गए महापुरुषों की कलई अल्पावधि में ही खुलने लगती है. उसके बाद जनता की निगाह में वे खलनायक सरीखे बन जाते हैं.

एक महत्वपूर्ण बात और भी है. रामायण को धार्मिक ग्रंथ न मानकर पेरियार ने उसे विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माना है. पेरियार के आलोचक भी उनपर कुछ ऐसा ही आरोप लगाते हैं. उनके अनुसार पेरियार द्वारा हिंदू धर्म तथा उसके मिथकों की आलोचना पूर्णतः राजनीति से प्रेरित थी. पेरियार इससे इन्कार नहीं करते थे. अंतर सिर्फ इतना है कि ब्राह्मण कभी यह मानने को तैयार नहीं होते कि रामायण तथा रामकथा को हिंदू संस्कृति के केंद्र में रखने के पीछे उनकी राजनीति है. खुद को सबसे ऊपर, शिखर पर बनाए रखने की राजनीति. जबकि पेरियार अपनी मंशा को छिपाते नहीं हैं—

‘मैं अपने समाज के कुछ ऐसे पहलुओं पर प्रहार करता हूं, जो हमें नीचा दिखाते हैं. मेरा जोर इस बात पर है कि जब तक हिंदू धर्म, हिंदू देवताओं, हिंदू शास्त्रों, पुराणों, वेदों और इसके इतिहास पर हमारा विश्वास रहेगा, और जब तक हम इनका अनुसरण करते जाएंगे, तब तक हमारा दमन और शोषण जारी रहेगा. हम समाज की असमानताकारी स्थितियों से कभी उबर ही नहीं पाएंगे. इन सड़ी हुई स्थितियों से उबरने की कोशिश के बजाए, जो केवल इनका पालन करने में लगा रहेगा—वह चाहे जितनी बेहतर स्थिति में आ जाए, खुद को अपनी अवनति और अपमानजनक स्थितियों से कभी उबार नहीं पाएगा.’5

एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा था—

‘मैं किसी को चाहे प्यार करूं अथवा घृणा; दोनों स्थितियों में मेरा सिद्धांत एक ही रहता है. वह सिद्धांत यह है कि मैं यह शिक्षा देता हूं कि धनी लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को गरीब लोगों का खून नहीं चूसना चाहिए.’6

पेरियार का मानना था कि बगैर हिंदू धर्म को मिटाए, जाति-भेद को मिटाना संभव नहीं है. वे धर्मांतरण के विरोधी थे. जाति-आधारित उत्पीड़न और अवमानना से बचने के लिए जिन लोगों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था, उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था. हिंदू धर्म में जो अछूत था, धर्मांतरण के बाद भी उसकी हैसियत अछूत जैसी ही रहती थी. इसलिए शूद्रों और अतिशूद्रों की राजनीतिक, सामाजिक भागीदारी को आवश्यक मानते थे. राजनीति में प्रवेश के साथ ही उन्होंने सभी वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में संरक्षण की मांग शुरू कर दी थी. उन दिनों अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की स्वतंत्रता नहीं थी. पेरियार स्वयं नास्तिक थे. मगर मंदिर प्रवेश का मसला सामाजिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा था. इसलिए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उसके तिरुपुर सम्मेलन में उन्होंने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें सभी अस्पृश्यों को मंदिरों में प्रवेश की इजाजत की मांग की गई थी. लेकिन कांग्रेस कमेटी के ब्राह्मण सदस्यों ने उस प्रस्ताव का जोरदार विरोध विरोध किया. नाराज पेरियार ने तत्काल घोषणा की कि वे मनुस्मृति, रामायण आदि पुस्तकों, जिनका उपयोग कुटिल ब्राह्मणों द्वारा धार्मिक हथियारों के रूप में किया जाता है—दहन करेंगे.

वह अवसर 1956 में आया. पेरियार ने ऐलान किया कि 1 अगस्त 1956 को वे मद्रास के समुद्री तट पर राम की तस्वीरों की होली जलाएंगे. उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर हर वर्ष रावण के पुतले को आग लगाई जाती है. पेरियार रावण को आदर्श द्रविड़ राजा मानते थे. इसलिए उत्तर भारतीयों द्वारा रावण के पुतले को आग लगाने के विरोध में उन्होंने राम की तस्वीरों का दहन करने का ऐलान किया था. एक तरह से वह ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतीकात्मक विरोध था. पेरियार की घोषणा के बाद तमिलनाडु के सभी नेताओं ने उनसे संपर्क कर, कार्यक्रम को टाल देने का अनुरोध किया. तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पी. काक्कन ने कहा कि राम की तस्वीरें जलाना ईश्वर के प्रति उस विश्वास की अवमानना होगी, जिसके भरोसे गांधी ने आजादी प्राप्त की है. उन्हें पेरियार के प्रस्तावित कदम को ‘असामाजिक कृत्य’ घोषित किया था. इसपर पेरियार ने अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हुए जवाब दिया कि उनका यह कदम सामाजिक परिवर्तन के लिए अपरिहार्य है.

अगले ही दिन सुबह, घर से निकलने के साथ ही पुलिस उपायुक्त ने पेरियार को गिरफ्तार कर लिया. पेरियार इस स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे. घर से निकलते समय उनके पास माचिस की डिब्बियों, राम की तस्वीरों के अलावा एक बिस्तर भी था, जिसे वे जेलयात्रा की संभावना के कारण अपने साथ लेकर निकले थे. पेरियार के गिरफ्तार होते ही उनकी पत्नी समुद्र तट पर पहुंची जहां उनके समर्थक इकट्ठा थे. उन्होंने पेरियार की गिरफ्तारी की सूचना दी. इससे उनके समर्थक उग्र हो गए और साथ लाई राम की तस्वीरों को आग के हवाले करने लगे. उस समय तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी. करीब आधा घंटे तक पुलिस से बचने और गिरफ्तार होने का नाटक चलता रहा. लोग पिटते रहे, खुद को बचाने के लिए भागते भी रहे. भागते-भागते एक व्यक्ति रेत पर फिसल गया. पुलिस उसे गिरफ्तार करने को दौड़ी. लेकिन तब तक वह राम की तस्वीर को आग लगा चुका था. बाद में पेरियार सहित सभी को रिहा कर दिया गया. पेरियार का उद्देश्य पूरा हो चुका था.

पेरियार के जीवन से जाना जा सकता है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था. वे जनता के बीच में खड़े होकर खुलेआम देवी-देवताओं का मखौल उड़ाते थे. धर्म और उसके प्रतीकों में आस्था और विश्वास को जनसाधारण की गरीबी और दैन्य के लिए जिम्मेदार मानते थे. कहते थे कि धर्म का मूल उद्देश्य, ईश्वर के गौरवगान की खातिर मनुष्यता का तिरष्कार करना है. इसपर धर्म भीरू लोग कहते कि पेरियार मूर्ख है. एक न एक दिन ईश्वर का कोप उनपर कहर टूटेगा. उस समय वह संभल नहीं पाएंगे. मगर पेरियार ने 94 वर्ष लंबा संघर्षमय जीवन जिया. अपनी मृत्यु से एक दिन पहले भी वे अपने मिशन को लेकर सतर्क थे. वे अंत तक कहते रहे कि यदि ईश्वर में जरा-भी शक्ति तो वह उन्हें दंड क्यों नहीं देता! उनसे उनका जीवन छीन क्यों नहीं लेता! खुद को ‘पंडित’ और धर्माधिकारी कहने वाले लोगों के पास पेरियार के इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. आस्था और धर्म के नाम पर दूसरों को मूर्ख बनाते आए लोगों के पास पेरियार के तार्किक प्रश्नों का उत्तर हो भी नहीं सकता था.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

  1. सच्ची रामायण और सच्ची रामायण की चाबी, अंबेडकर प्रचार समिति, मोती कटरा आगरा, पृष्ठ 76
  2. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/ar_showdetails.asp?id=711050918&cat=&n_date=20071105
  3. वेब दुनियाhttps://news.webindia123.com/news/articles/India/20071027/805535.html.
  4. वन इंडियाhttps://www.oneindia.com/2007/10/30/bjp—workers—burnt—copies—of—sacchi—ramayan—1193744742.html
  5. रिपब्लिक 19 जनवरी, 1945
  6. दि रामायण: ए ट्रू रीडिंग के प्रथम संस्करण के प्रकाशकीय से उद्धृत, 1959

वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक

सामान्य

सुनो, सुनो, सुनो—गीत मेरा सुनो

विपन्न, निढाल गरीबी में घिसटते हुए लोगो सुनो 

‘यहां से जाएं, तो कहां जाएं?’

वे रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं

हमारा न कोई घर है, न देश

न ही सिर छिपाने को जंगल

दिन के उजाले में जंगलों की सफाई करना

रात्रि को वहीं निढाल पड़ जाना

बीज बोने के बाद

पेड़ जब देने लगते हैं फल

मालिक आकर कब्जा लेता है उन्हें

हमारे पास अब केवल रोना ही बचा है

हमारे हिस्से है श्रम, केवल श्रम

ढेर सारा, बल्कि सारे का सारा श्रम

हम सड़कों पर चल नहीं सकते

बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है हमें

लेकिन हम बढ़ेंगे….बढ़ेंगे

बढ़ते रहेंगे, बढ़ते ही रहेंगे।

ऊपर दिया गया गीत करीब 100 वर्ष पुराना है। अय्यंकाली द्वारा स्थापित ‘साधुजन परिपालन संघम’ की बैठकों में गाया जाने वाला गीत। केरल के दलितों और आदिद्रविड़ों में आधुनिक भावबोध जगाने में इस गीत का बड़ा योगदान है। चक्कोला कुरुंबम दीविथन इसे गाया करते थे। ऐसे मार्मिक स्वर में कि श्रोतागणों की आंखें डबडबा जाती थीं। इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले अय्यंकाली के जीवन से दो शब्द चित्र—

बैलगाड़ी से क्रांति

वर्ष 1891(कुछ विद्वान इसे 1893 मानते हैं)। करीब 30 वर्ष का एक हृष्ट-पुष्ट और सुदर्शन युवक। एकदम नई बैलगाड़ी, जोतने के लिए एक जोड़ी युवा-छरहरे, सफेद बैल। एक जोड़ी पीतल की बड़ी-बड़ी घंटियां—सब उसने आज ही के लिए खरीदे हैं। इनके अलावा अपने लिए चमकीला अंगवस्त्र, शानदार पगड़ी और रौवदार जूतियां। मानो अपने अनूठे बाने से काल के कपाल पर सुनहरी इबारत टांकने को आतुर हो। बैलों को गाड़ी में जोतने से पहले वह उन्हें प्यार से सहलाता है। फिर उनके गले में घंटियां बांधकर बैलगाड़ी में जोत देता है। उसके बाद पूरी शान से बैलगाड़ी में सवार होता है। सधे बैल इशारा पाते ही आगे बढ़ने लगते हैं। ‘टनश्टन’ बजती घंटियां पचासियों मीटर दूर से उसके आने का पता दे देती हैं। लोग घंटियों की आवाज सुनकर बाहर निकल आते हैं। स्त्रियां और बच्चे खिड़कियों-दरवज्जों से झांकने लगते हैं। 

युवक जिस जाति से आता है, उसे न तो बैलगाड़ी पर सवार होने का अधिकार है। न अंगवस्त्र धारण करने का। न ही उन मार्गों पर चलने का जिनपर उसके बैल हाथियों जैसी मस्त चाल से आगे बढ़े जा रहे हैं। उसकी शान देखकर उसके अपने लोगों का सीना शान से चौड़ा हो जाता है। कुछ को ईर्ष्या होती है। कुछ की आंखों की अंगार फूटने लगते हैं। वे घरों से लाठियां, डंडे वगैरह निकालकर बैलगाड़ी के रास्ता रोक लेते हैं। जो हो रहा है, इसकी उसे उम्मीद थी। इसलिए वह तैयार होकर आया है। रोज-रोज अपमान सहते रहने से अच्छा है, उसका प्रतिकार किया जाए। फैसला इस पार हो या उस पार। विरोधियों को तना देख वह अपनी खुखरी निकाल लेता है। उसका रौद्र रूप देख रास्ता रोकने वाले भयभीत हो जाते हैं। जीत का जश्न मनाती हुई बैलगाड़ी आगे बढ़ जाती है। 

दुनिया में अनेक महापुरुष हुए। सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, परंतु बैलगाड़ी पर चढ़कर क्रांति का शंखनाद करने वाले वे अकेले ही थे। 

बाजार जाने की आजादी

भारत में जाति से बड़ा कलंक दूसरा नहीं। यह जन्म के आधार पर आदमी-आदमी में फर्क करना सिखाती है। ‘द्विज’ कहकर मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में अकूत अधिकार थमा देती है। दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से को शूद्र और अछूत बताकर उनसे उनका मान-सम्मान, सुख-सुविधा और मामूली खुशियां तक छीन लेती है। केरल सहित पूरे दक्षिण भारत में वह और भी विकृत अवस्था में थी। इसलिए 1892 में केरल यात्रा के दौरान, विवेकानंद ने उसे ‘जातियों का पागलखाना’1 तक कह दिया था। बीसवीं शताब्दी में वहां के सवर्ण पुलाया, पारया, कुरुवा जैसी जातियों की छाया से भी बचते थे। दलितों का उत्पीड़न आम बात थी। उन्हें न सार्वजानिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता थी, न बाजार जाने की। न ही अच्छे वस्त्र पहनने की। गुलामों जैसा जीवन था उनका। बैलगाड़ी पर चढ़कर सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी छीन लेने वाला हमारा महानायक, 1898 में उनके मान-सम्मान की खातिर एक बार फिर नए जोश के साथ उठ खड़ा हुआ। इस बार संघर्ष बाजार जाने की आजादी को लेकर था।   

उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया। इरादा आरालुम्मुद बाजार में प्रवेश करने का था। अपने साथियों को लेकर उसने पठानकाडा से आगे बढ़ना शुरू किया। सभी जोश में थे। इस डर से कि विरोधी कभी भी, किसी भी दिशा से हमला कर सकते हैं, वे सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। जैसे ही उनका कारवां चेट्टियार स्ट्रीट, बलरामपुर पहुंचा—हथियारों से लैस ऊंची जातियों के लड़ाके उनके रास्ते में अड़ गए।2 दोनों ओर से घात-प्रतिघात होने लगा। संघर्ष बढ़ा तो बढ़ता ही गया। दलितों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। देखते ही देखते मनाक्कुडु, नेय्याट्टिंकर, नेमोन, अमरविला, परसाला, कोझाकुट्टम, कनियापुरम आदि इलाकों में विद्रोह की चिंगारियां फूटने लगीं। जो अछूत सवर्णों को देख कई हाथ पहले ठिठक जाया करते थे—वे अब नई चेतना और आत्मविश्वास से भरे थे। अपने नेता के इशारे पर कुछ भी करने को सनद्ध। पूरे त्रावणकोर में गृहयुद्ध की स्थिति बन चुकी थी। विद्वान 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं। लेकिन स्वाधीनता की असली लड़ाई तो वे दलित और आदिद्रविड़ लड़ रहे थे। एक सप्ताह बाद हालात सामान्य हुए। तब तक इतिहास उस घटना को ‘चलियार विद्रोह’ के नाम से अपने भीतर टांक चुका था। 

केरल को आधुनिक राज्य बनाने में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। वहां अय्यंकाली का उतना ही योगदान है, जितना ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर का महाराष्ट्र में, पेरियार का तमिलनाडु में है। अय्यंकाली का जन्म 28 अगस्त 1863 को त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में हुआ था। आठ भाई-बहनों में वे सबसे बड़े थे। जाति थी पुलाया। उस जाति के लोग आमतौर पर गुलामों की तरह काम करते थे। अय्यंकाली के पिता अय्यन भी एक जमींदार के गुलाम थे। उनकी मेहनत और वफादारी से प्रसन्न होकर जमींदार ने उन्हें पांच एकड़ जमीन उपहार में दे दी थी। इसलिए अपनी जाति के लोगों में अय्यंकाली के परिवार की हैसियत काफी अच्छी थी। पिता अय्यन पुलाया बस्ती के मुखिया थे।

उस समय समाज पूरी तरह जाति में जकड़ा हुआ था। उस परिवेश से गुजरने वाले बच्चों को समाज में जो उत्पीड़न, उलाहने और तिरष्कार सहना पड़ता है, वैसा अय्यंकाली के साथ भी हुआ था। बचपन से ही वे सुंदर थे। शरीर गठीला और स्वस्थ था। उनका व्यक्तित्व अलग ही छाप छोड़ता था। फुटबाल खेलने का शौक था। एक बार फुटबाल नैय्यर के घर में जा गिरी। वे बॉल लेने पहुंचे तो नैय्यर ने उनका अपमान कर दिया। हिदायत दी कि भविष्य में बॉल उसके घर न आने पाए। उस अपमान ने अय्यंकाली को आहत कर दिया। फुटबाल खेलते समय कुछ सवर्ण लड़के भी उनके साथ शामिल हो जाते थे। अय्यंकाली की जाति के बारे में पता चलते ही उन्होंने आना छोड़ दिया। अय्यंकाली को यह बहुत अखरा। उन्होंने भविष्य में उन बच्चों के साथ कभी न खेलने का फैसला किया। 

अय्यंकाली बचपन से ही रचनात्मक प्रवृत्ति के थे। गाने-बजाने का शौक था। अपनी जाति के बच्चों को इकट्ठा कर उन्होंने एक नाटक मंडली की शुरुआत की। आरंभ में वे परंपरागत नाटक खेलते थे। धीरे-धीरे अपने रचे नाटक भी खेलने लगे। उनके नाटकों में एक संदेश होता था। फलस्वरूप लोग तेजी से उनकी ओर आकर्षित होने लगे। बचपन से ही वे निडर और साहसी थे। इस कारण किसी न किसी मुद्दे को लेकर सवर्णों ने उनका अकसर टकराव होता रहता था। उससे निपटने के लिए विद्रोही अय्यंकाली ने अपने साथियों को संगठित करना आरंभ किया। उन्हें कुश्ती और लाठीबाजी का प्रशिक्षण दिलवाया। इसके लिए कलारी असान नामक प्रशिक्षक को बाहर से बुलवाया गया। इससे पलाया युवकों के भीतर आत्मसम्मान की भावना बढ़ने लगी। चूंकि इस बदलाव के मूल में अय्यंकाली की प्रेरणा और श्रम था, इसलिए प्रशंसक उन्हें सम्मान के साथ ‘उरपिल्लई’ या ‘मूथापिल्लई’ कहते थे। 1888 में उनका विवाह चेल्लमा से हो गया। पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम था। दोनों के सात बच्चे हुए। अय्यंकाली खुद को अच्छा गृहस्थ सिद्ध कर चुके थे। लेकिन उनकी मंजिल वहीं तक सीमित नहीं थी। अछूत होने के कारण उनपर कई प्रकार के बंधन थे। उनसे निपटने के लिए 1893 में बैलगाड़ी पर सवार अय्यंकाली ने वह कर दिखाया, जैसा उनसे पहले किसी न सोचा तक न था। 

शिक्षा हेतु संघर्ष

मैकाले की सलाह पर आगे बढ़ते हुए तत्कालीन वायसराय विलियम बैंटिक 7 मार्च 1835 को एक संकल्पपत्र प्रस्तुत किया था। उद्देश्य था समाज के निचले वर्गों तक शिक्षा का विस्तार। हजारों वर्षों से ज्ञान के नाम पसरे शूण्य की भरपाई करना। लेकिन कानून बनना एक बात है, जरूरतमंदों तक उसका लाभ पहुंचना दूसरी बात। अधिकांश स्कूलों का प्रबंधन द्विज जातियों के हाथ में था। कानून बन जाने बावजूद वे उसकी अवहेलना करती आ रही थीं। फुले का विचार था कि बदहाली से मुक्त होने के लिए शूद्र-अतिशूद्रों को स्वयं प्रयास होंगे, समाज को जगाना होगा। नेतृत्व हेतु प्रभावशाली नेता भी अपने ही भीतर से पैदा करने होंगे। यह सब बिना शिक्षा के असंभव है। अतएव 1848 से ही वे  शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूलों की स्थापना में जुट गए थे। आने वाले 3 वर्षों में 18 स्कूलों की स्थापना कर उन्होंने एक तरह से कीर्तिमान रचा था। 

उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अय्यंकाली ने 1904 में वेंगनूर में पहले स्कूल ‘कुदी पल्लिकूदम’ की नींव रखी। लेकिन सवर्णों से यह सहन न हुआ। निर्माण कार्य शुरू होने के पहले ही दिन उन्होंने अय्यंकाली के स्कूल में आग लगा दी। लोगों के सहयोग से, उन्होंने बिना देर किए नए सिरे से निर्माण शुरू कर दिया। परंतु विद्रोही बाज आने वाले न थे। उन्होंने स्कूल को दूसरी बार भी वही किया। कोई और होता तो कदाचित हार मान लेता। मगर बचपन से ही जुझारू रहे अय्यंकाली के नेतृत्व में निर्माण कार्य चलता रहा। आखिरकार स्कूल बना। बच्चे वहां जाने लगे। वह केरल में किसी दलित द्वारा, दलित बच्चों की शिक्षा के स्थापित पहला स्कूल था। 

अछूत जातियों से जुड़े बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती करने नियम 1907 में ही बन चुका था। परंतु उसपर अमल दूर था। सवर्णों के दबाव में त्रावणकोर के दीवान ने उस आदेश को दबा लिया था। अपने संगठन के माध्यम से अय्यंकाली उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत थे। आखिरकार, सवर्णों के रवैये से निराश होकर उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने अछूतों से कहा कि जब तक उनके बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, तब तक वे नैय्यरों के खेतों में काम करना छोड़ दें। यही हुआ। पुलायाओं ने हड़ताल की घोषणा कर दी। शुरू-शुरू में नैय्यरों ने इसे गीदड़ भभकी माना। सोचा कि भूख से बेहाल, गरीब पुलाया, कुरुवा आदि अछूत, बहुत जल्दी खेतों में लौटने को मजबूर हो जाएंगे। लेकिन अछूतों की आंखों में रोपा गया सपना, उनकी भूख से कहीं ज्यादा बड़ा था। सो हड़ताल खिंचती चली गई। सवर्णों ने अछूतों को डराना-धमकाना शुरू कर दिया। अय्यंकाली और उनके साथियों ने उसका भी सामना किया। 

बुबाई का मौसम आया तो कुछ नैय्यरों ने खुद ही अपने खेतों में धान रोपने की कोशिश की। परंतु दूसरों के श्रम पर जीवन जीते-जीते आलसी हो चुके नैय्यरों के लिए वह काम आसान नहीं था। एक पुलाया जितना काम एक दिन में कर लेता था, उतना काम करने में उन्हें पांच-छह दिन लगते थे। हड़ताल खिंचने से गरीब पुलायाओं के आगे भोजन का संकट उत्पन्न होने लगा। उस समय अय्यंकाली ने बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने मछुआरों से समझौता किया कि हर मछुआरा मछली पकड़ने के लिए अपने साथ एक पुलाया को साथ ले जाएगा। यह फार्मूला कामयाब रहा। इससे विरोधी बुरी तरह चिढ़ गए। उधर हड़ताल का दायरा बढ़ाने के लिए अय्यंकाली ने कुछ नई मांगे जोड़ दीं। उनमें मजदूरों को स्थायी करने, झूठे आरोपों में फंसाकर दंडित करने तथा कोड़ों से प्रहार करने पर रोक, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी, सप्ताह में एक दिन अवकाश जैसी नई मांगें शामिल थीं। 

अय्यंकाली के नेतृत्व का ही जादू था कि शताब्दियों से बैल की तरह सर झुकाए श्रम करते आए अछूत पहली बार जमींदारों के आगे तने खड़े थे। हालात बिगड़ते जा रहे थे। अछूतों के आगे भोजन का संकट था। वहीं जमींदारों की हालत अच्छी न थी। क्षुब्ध होकर उन्होंने पुलायाओं की झोंपड़ियों में आग लगा दी। बदले में अय्यंकाली के हरावल दस्ते ने जमींदारों के मकानों को आग के हवाले कर दिया। इससे उनके गुस्से का ठिकाना न रहा। यह सोचते हुए कि सारे मामले के पीछे अय्यंकाली है, नीचता की हद तक जाते हुए उन्होंने उन्हें मरवाने का फैसला कर लिया। उसके लिए मुंबई के एक गुंडे को नियुक्त किया गया। अय्यंकाली को जीवित लाने पर 2000 रुपये तथा मृत लाने पर 1000 रुपये का ईनाम देने की घोषणा कर दी गई।4 

धमकियों और खून-खराबे के बावजूद अय्यंकाली अपने साथियों के साथ डटे हुए थे। नैय्यरों ने अय्यंकाली तथा उनके अंगरक्षक याकूब के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। याकूब को गिरफ्तार कर लिया। अय्यंकाली तत्काल पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां तब तक डटे रहे, जब तक पुलिस ने याकूब को रिहा न कर दिया। हड़ताल करीब एक वर्ष(1907-08) तक चली। इस बीच शिक्षा निदेशक मिशेल ने त्रावणकोर के दीवान को 1907 के नीतिगत आदेश पर तुरंत अमल करने की सलाह दी। चौतरफा दबाव के बीच त्रावणकोर के दीवान की ओर से 1910 में अछूत बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश संबंधी आदेश जारी कर दिए गए। उस समय के कई बुद्धिजीवियों की ओर से उसका विरोध किया गया था। उनमें से एक खुद को प्रगतिशील बताने वाले ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक रामकृष्ण पिल्लई भी थे। अछूतों बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश पर उन्होंने लिखा था कि यह आदेश—

‘पीढ़ियों से ज्ञान-विज्ञान की खेती करते आए लोगों के बच्चों को, उनके खेतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी करते आए लोगों के बच्चों के साथ रखना—घोड़े और भैंस को एक साथ जोत देने जैसा है।’5 

आदेश का जमीनी असर देखने के लिए अय्यंकाली पूजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नैय्यर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया।6 प्रधान अध्यापक हालात को संभालने की कोशिश कर ही रहे थे कि कंडाल गांव के कुछ नैय्यर वहां जा धमके। वे लाठी-डंडों से लैस थे। अय्यंकाली के साथ भी उनके साथी थे। विवाद बढ़ता गया। गांवों से शुरू हुए उस संघर्ष ने शीघ्र ही आसपास के जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। यहां तक कि दक्षिणी त्रावणकोर भी उस आंदोलन के असर से बच न सका। दलितों के प्रवेश को लेकर नैय्यर इतने विध्वंसात्मक थे कि उन्होंने उन दो स्कूलों में आग लगा दी, जिनमें अय्यंकाली ने अपने समाज के बच्चों का दाखिला कराने के उद्देश्य से पहुंचे थे।

साधुजन परिपालन संघम

भूख, अभाव, विपन्नता और दास जैसा जीवन जीने वाले लोगों को अय्यंकाली ने नया नाम दिया था—‘साधु जन’। अपने आंदोलन को सांस्थानिक रूप देने के लिए उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’(गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की थी। उनके कुछ जीवनीकारों के अनुसार इस संस्था का गठन 1907 में हुआ था। संस्था का ‘कनक्कन’(महासचिव) अय्यंकाली को बनाया गया। अन्य सदस्यों में मूलायिल कालि, थॉमस वाडयार, गोपालन आदि शामिल थे। उसकी सदस्यता सभी अछूत जातियों के लिए खुली थी। उसका प्रमुख उद्देश्य था पुलाया सहित सभी अछूत जातियों को अपने अधिकारों पक्ष में संगठित करना। उन्हें अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा, गरीबी और सवर्णों के आतंक से मुक्ति दिलाना। संस्था के प्रचार-प्रसार के लिए स्थानीय सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता था। सवर्ण उस संस्था के गठन से नाराज थे। इसलिए आरंभ में उसकी बैठक, बस्ती से दूर पेड़ों की ओट में या पहाड़ी के पीछे किसी गोपनीय स्थान पर की जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के मन से यह डर निकलने लगा। ‘साधु जन’ का उद्देश्य पुलायाओं, पारयाओं जैसी अछूत जातियों का उत्थान था। बावजूद इसके उन्होंने अपनी संस्था को ‘धर्म एवं जाति’ संबंधी दुराग्रहों से परे रखा था। इससे उन्हें इन जातियों के राजनीतिकरण में मदद मिली। 

संस्था का प्रबंधन बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया जाता था। आमतौर पर हर गांव में उसकी शाखा थी। संस्था का वार्षिक सम्मेलन त्रिरुवनंतपुरम के ‘विक्टोरिया जुबली हाल’ में किया जाता था। उसमें केरल के अलग-अलग गांवों और शहरों से आए लोग हिस्सा लेते थे। सम्मेलन के दिन त्रिरुवनंतपुरम की सड़कें, काली चमड़ी वाले अछूतों से पट जाती थीं। उसमें संस्था के सदस्यों और अधिकारियों के अलावा विभिन्न सरकारी और राजकीय अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जाता था। संस्था के महासचिव के रूप में उसके कार्यक्रमों, उपलब्धियों और मांगों को सभा के सम्मुख पेश करने का दायित्व अय्यंकाली का था। वे अनपढ़ थे। लेकिन संस्था का संचालन इस प्रकार करते थे कि लोग उनकी प्रबंधन क्षमता के कायल हो जाते थे। ‘साधु जन परिपालन संघ’ के कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘साधु जन परिपालिनी’ नामक मासिक पत्रिका की शुरुआत भी की गई। कालि कोदिक्कुरुप्पन को उसका संपादक नियुक्त किया गया। आने वाले 30 वर्षों तक यह संस्था सुचारू रूप से काम करती रही। 

नेदमंगादु विद्रोह

चालियार विद्रोह के बाद कई बाजारों में पुलायाओं को आने-जाने की आजादी प्राप्त हो चुकी थी। बावजूद इसके कुछ बाजारों में अभी भी उनका आना प्रतिबंधित था। जो पुलाया अपना सामान बेचने के लिए आते थे, उन्हें भी मुख्य बाजार में आने से रोका जाता था। सवर्णों ने उन्हें अलग स्थान दिया था। 1912 में अय्यंकाली ने एक बार फिर अपने साथियों को इकट्ठा किया। इस बार उनके अभियान में स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे। जैसे-जैसे पुलायाओं का दल आगे बढ़ा, उनका साथ देने और हौसला बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के लोग भी उनके साथ आ मिले। उन्होंने अपना अभियान त्रिवेंद्रम से आरंभ किया। नेदमंगाडु तक पहुंचने के लिए उन्होंने जंगल का रास्ता चुना था। मगर बाजार तक पहुंचने से पहले ही सवर्णों ने उनपर हमला बोल दिया। दोनों पक्ष पक्के इरादे से आए थे। विवाद एक बार फिर संघर्ष में बदल गया। एक रणनीति के तहत अय्यंकाली ने पुलायाओं के एक हिस्से को दूसरी दिशा से बाजार में प्रवेश के लिए भेज दिया। घने जंगलों के रास्ते, चुनौतियों से जूझता हुआ हुआ वह जत्था आखिरकार नेदमंगाडु बाजार में प्रवेश करने में कामयाब हो गया।

श्री मूलम प्रजा सभा की सदस्यता

अय्यंकाली के सघर्ष और उनकी ख्याति सरकार तक पहुंच चुकी थी। लोग उनसे प्रभावित थे। इसके फलस्वरूप 1912 में उन्हें ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ का सदस्य मनोनीत कर दिया गया। सभा के समक्ष उनका प्रथम संबोधन छोटा, किंतु प्रभावशाली था। अपने भाषण में उन्होंने पुलायाओं की गरीबी, अशिक्षा के अलावा उन्हें आवास एवं खेती हेतु जमीन दिए जाने की मांग की थी। उनका नारा था, ‘खेत उनके लिए जो जोतें’। अपनी पहली सभा में ही सरकारी अधिकारियों की मनमानी की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए उन्होंने कहा था—

‘हमारे कई परिवारों को धनवान जमींदारों ने इस आश्वासन के साथ उनके घर से निकाल दिया था कि उन्हें वे घर बनाने के लिए अलग से जमीन देंगे। अब वन-विभाग के कर्मचारी, जमींदारों से मिलकर मेरे लोगों पर उन घरों को खाली करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसके साथ-साथ ये अधिकारी जमींदारों को उनकी भूमि पर कब्जा करने में मदद कर रहे है। मैं इस समस्या के निराकरण की प्रार्थना करता हूं।’

अय्यंकाली की अपील पर दीवान ने पुलायाओं को यथासंभव मदद का भरोसा दिलाया। दीवान के मन में उनके प्रति कितना सम्मान था, यह इस घटना से भी जाहिर होता है—

‘एक बार अय्यंकाली प्रजा सभा के सदस्य की हैसियत से, दीवान से मिलने उनके कार्यालय में पहुंचे। वहां तैनात दरबानों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। उन्होंने अय्यंकाली के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी किया। उनका नाम लेकर पुकारा। अय्यंकाली वहां से चले गए। बाहर जाकर उन्होंने तार भेजकर दीवान को सारी घटना से अवगत करा दिया। दीवान ने तुरंत अय्यंकाली को अपने कार्यालय बुला भेजा। वे जब दीवान के कार्यालय में पहुंचे तो दोनों दरबान भी वहां मौजूद थे—

‘मिस्टर अय्यंकाली, अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए आप इन्हें क्या दंड देना चाहेंगे?’ दीवान ने पूछा। यह सुनकर वे दंग रह गए। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने कहा—

‘इन्होंने जो किया, लापरवाही के कारण किया। इन्हें माफ कर दिया जाए।’

दीवान अय्यंकाली से प्रभावित हुआ। आखिरकार दोनों दरबानों को अय्यंकाली के पैर छूकर माफी मांगने के बाद छोड़ दिया गया। 

कोचु कली : अय्यंकाली के वक्ष-कर विरोधी आंदोलन की नायिका

उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। दलित स्त्री-पुरुष दोनों को टैक्स देना पड़ता था। पुरुषों का मूंछें रखना, छाता लेकर चलना निषिद्ध था। ये सब नियम ब्राह्मणों द्वारा अपनी जातीय श्रेष्ठता के नाम पर बनाए गए थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। इसलिए उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

जब स्त्री का वक्ष ही उसका दुश्मन था

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। 1803 में वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा के अनुसार निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष इसलिए ढककर पहुंची थी, ताकि  रानी नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। 1859 के सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त हो चुका था। लेकिन इझ़वा, पुलाया, कुरुवा आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को यह अधिकार 1915 तक भी प्राप्त नहीं था। 

सोने-चांदी के गहने पहनने पर प्रतिबंध  

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लामाला’(कंठमाला) पहन सकती थीं। कान में लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लामाला’ उनके दासत्व का प्रतीक थी। वक्ष कर के विरोध में कई आंदोलन चल चुके थे, परंतु उसके ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया था अय्यंकाली ने।

कौन थी कोचु कली

उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उनमें से एक का नाम था—कोचु कली। कोचु कली आदि द्रविड़ समाज से थी। तांबई रंग और लंबे कद के कारण उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। उसका जन्म उनीसवीं शताब्दी  के अंतिम दशक में, इरनाकुलम जिले के एलुवा नामक गांव में हुआ था। पिता का नाम था, पींगन। मां पल्ली कुरुंबा कीझनाद गांव की रहने वाली थी। सात भाई-बहनों में कोचु तीसरे नंबर की थी। 21 वर्ष की उम्र में उसका विवाह, परंबू हाउस बंगले में काम करने वाले पल्ली के साथ कर दिया गया। विवाह के तीन वर्ष पश्चात दोनों के घर एक पुत्री का जन्म हुआ।

उस समय तक केरल में वक्ष-कर विरोधी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। जगह-जगह उसके समर्थक और विरोधी आमने-सामने थे। उन्हीं दिनों अपनी संस्था ‘साधुजन परिपालन संघ’ के एक कार्यक्रम के दौरान अय्यंकाली पारंबू हाउस में ठहरे थे। वे एक सभा के सिलसिले में वहां पधारे थे। वक्ष-कर विरोध को लेकर चल रहे प्रदेश-व्यापी संघर्ष के बीच वह सभा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी। सभा में शिरकत के लिए अय्यंकाली ने कुछ उदार नैय्यर नेताओं को भी आमंत्रित किया था। 

दासता के प्रतीकों का बहिष्कार

सभा में सभी नेताओं ने वक्ष कर का विरोध किया। अय्यंकाली का नंबर आया तो उन्होंने भी उसकी तीव्र आलोचना की। भाषण के दौरान उन्होंने दो स्त्रियों को मंच पर आमंत्रित किया। उनमें से एक  कोचु कली थी। उस समय वह 24 वर्ष की थी। दोनों स्त्रियां सकुचाती हुई मंच पर पहुंचीं। अय्यंकाली ने उन्हें बताया कि यहां बैठक में मौजूद सभी लोग गुलामी की प्रतीक ‘कल्लामालाओं’ को उतार फैंकने की सहमति दे चुके हैं। उसके बाद उन्होंने चाकू से, उन स्त्रियों के गले में पड़ी ‘कल्लामालाओं’ को काट फैंका। इसके साथ ही उन्होंने उनके तोड़ा(कान में पहने जाने वाला पत्थर का पारंपरिक आभूषण) को तोड़ दिया—

‘आगे से तुम इन्हें कभी मत पहनना। बजाय इसके तुम ‘धोती और ब्लाउज’ पहना करना।’ अय्यंकाली ने कहा। उन्होंने उन स्त्रियों को कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसे भी दिए। उसके बाद कोचु कली वक्ष-कर विरोधी आंदोलन के स्त्री दस्ते की नेता बन गई। 1915 में उसके नेतृत्व में वक्ष-कर विरोधी कई प्रदर्शन हुए। उनमे सबसे महत्वपूर्ण कोल्लम जिले के पेरिनाड में दलित-आदिवासी स्त्रियों का आंदोलन था। उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में स्त्रियों ने गले में पहनी कल्लामालाओं को खुद उतार फेंका था।

सवर्णों की हिंसा

वक्ष कर विरोधी आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी ने सवर्णों को हिलाकर रख दिया था। वे मनमानी पर उतर आये थे। मलयालम पत्रिका ‘मीतावदी’ के जनवरी 1916 के अंक के अनुसार एक पुलाया स्त्री ने अय्यंकाली से मुलाकात के बाद ‘कल्लामाला’ पहनना छोड़ दिया था। एक दिन वह अपने काम पर जा रही थी। अचानक एक आदमी उसके पास पहुंचा और ‘कल्लामाला’ के बारे में पूछा। स्त्री के यह कहने पर कि वह उसे उतार कर फ़ेंक चुकी है, उस आदमी को इतना गुस्सा आया कि उसने तत्काल उस स्त्री के कान काट लिए।

अय्यंकाली की यादों के साथ काटी जिंदगी   

आधुनिक केरल के प्रमुख वास्तुकार अय्यंकाली से जुड़ी जादुई यादों का ही असर था, जिससे कोचु कली ने लंबी उम्र प्राप्त की थी। उनका निधन, 115 वर्ष की अवस्था में 2013 में हुआ था। अय्यंकाली को याद करते समय कोचु कली का चेहरा दमकने लगता था। गर्दन अभिमान से कुछ और तन जाती थी। एक साक्षात्कार में उसने बताया था कि अय्यंकाली के शब्द आज भी उनके कानों में घंटी की तरह गूंजते हैं। उसके अनुसार अय्यंकाली तीन दिन और तीन रात ‘परंबू हाउस’ में ठहरे थे। भोजन में उन्हें चावल और सूखी झींगा मछली की कढ़ी परोसी गई थी। कोचु कली उस दिन को याद करके गर्व से भर जाती थी, जब उसने ‘धोती और ब्लाउज’ को पहली बार पहना था—

‘धोती और ब्लाउज पहनते समय मैं बहुत डरी हुई थी। सोचती थी कि सवर्ण डंडों से हमारी पिटाई करेंगे। लेकिन जब अय्यंकाली ने हमसे बात की, हमारा सारा डर गायब हो गया।’

28 अगस्त 2020 को अय्यंकाली का 157वां जन्मदिवस है। यह अवसर अय्यंकाली के साथ-साथ कोचु कली के संघर्ष को याद करने का भी है।

वक्ष-कर का विरोध

अय्यंकालि द्वारा चलाए गए महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था—वक्ष-कर के विरोध में चलाया गया आंदोलन। वह ऐसा अभियान था, जो उन्हें अपने समकालीन और पूर्ववर्ती कई समाज-सुधारकों से आगे खड़ा सिद्ध कर देता है। उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। उसमें सर्वाधिक प्रताड़ना स्त्रियों को झेलनी पड़ती थी। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। यदि कोई स्त्री अपना वक्ष ढकना चाहे तो बदले में उसे सरकार को कर देना पड़ता था। कर की मात्रा वक्ष के आकार के अनुरूप तय की जाती थी। जितना बड़ा वक्ष, उतना ज्यादा टैक्स। उसकी उगाही के लिए एक अधिकारी नियुक्त था। वक्ष-कर लगाने वाले ब्राह्मण थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। तदनुसार नैय्यर स्त्रियों को नंबूदरी ब्राह्मणों के समक्ष अपना वक्ष ढकने की स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि ब्राह्मण अपना वक्ष केवल मंदिर में देवताओं के समक्ष खुला रखता था। यहां तक उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा केरलीय समाज में लंबे समय से प्रचलित थी। उसमें निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष केवल इसलिए ढककर पहुंचती है कि वह नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। ताकि इस ‘आफत’ से  उसे हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए। 1859 में शुरू हुए सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को अपना वक्ष ढकने की आजादी प्राप्त हो गई। लेकिन इझ़वा, पुलाया आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को 1915 तक वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। 

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लु माला’(कंठ माला) पहन सकती थीं। कान में केवल लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लुमाला’ उनके दास होने की निशानी भी थी। 1915 में एक सभा के दौरान अय्यंकाली ने अछूत स्त्रियों से कहा था कि वे दासता के प्रतीक उन आभूषणों को हमेशा के लिए उतार फेंके। उनके स्थान पर धोती और ब्लाउज जैसे वस्त्र पहनें। उनके आवाह्न पर पेरीनाड की हजारों दलित स्त्रियों ने पत्थर की कंठमालाओं को उतारकर ऊपरी वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। यह देखकर शीर्ष जातियों में खलबली मच गई। उन्होंने इसे स्थापित समाज-व्यवस्था का उल्लंघन माना। ‘अपमान’ का बदला लेने के लिए वे दलितों पर हमलावर होने लगे। वक्ष ढकने के कारण कई दलित स्त्रियों के स्तन काट डाले गए। कइयों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। परिजनों पर जानलेवा हमले किए गए। अनेक स्त्रियों के पति, भाई और माता-पिता को मौत के हवाले कर दिया गया। उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उन जुझारू स्त्रियों में से एक का नाम था—कोचु कली। वह पहली स्त्री थी जिसके गले में पड़ी ‘कल्लुमाला’ को अय्यंकाली ने अपने हाथों से काटा था।

अय्यंकाली के सभी चित्रों में हम उन्हें कोट पहने हुए देखते हैं। वह भेषभूषा भी उन्होंने, ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड को चुनौती देने के लिए अपनाई थी। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी। एक पुलाया अपने शरीर पर केवल पुराना, लंगोटीनुमा वस्त्र लिपेट सकता था। अय्यंकाली उससे विद्रोह करना चाहते थे। लेकिन सोचते थे कि कोट पहनने का अधिकार केवल पढ़े-लिखे लोगों को है, जबकि वे पूरी तरह अनपढ़ थे। कुन्नुकुझी एस. मणि के अनुसार, श्री मूलम प्रजा सभा का सदस्य मनोनीत किए जाने पर, जॉन हेनरी नामक एक यूरोपियन ने उन्हें एक कोट भेंट किया था। प्रजा सभा के अगले सत्र में वे उसी कोट को पहनकर उपस्थित हुए थे। अगले सत्र के लिए वे कुछ और कोट सिलवाना चाहते थे। मगर उन दिनों त्रिरुवनतपुरम् में ऐसा कोई दर्जी नहीं था, जो कोट की सिलाई कर सके। इसलिए उन्होंने कोट्टयम के एक दर्जी को दो कोट सीने का आर्डर दिया। श्रीमूलम पोपुलर असेंबली के अगले सत्र में उन्होंने अपने सिलवाए कोट पहनकर हिस्सा लिया था। नैय्यर उसे देखकर जल-भुन रहे थे। लेकिन अब कुछ भी कर पाना उनके बस से बाहर था। 

केरल के इतिहास में अस्पृश्यता, अशिक्षा और दासता को सबसे जोरदार चोट देने वाला वह पुरोधा, 18 जून, 1941 को सघर्ष चिरनिद्रा में लीन हो गया। एक अवसर पर एक पत्रकार ने उनसे पूछा था—‘आपकी दिली तमन्ना क्या है?’ इस पर अय्यंकाली का उत्तर था—‘आंख मूंदने से पहल मैं अपने समाज के दस-बारह विद्यार्थियों को ग्रेजुएट बने देखना चाहता हूं…बस।’ एक कविता के जरिये  मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय उन्हें इस तरह याद करते हैं—

तुम्हीं ने जलाया था प्रथम ज्ञानदीप

बैलगाड़ी पर सवार हो

गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

अपनी देह की यंत्रशक्ति से

पलट दिया था, कालचक्र को

ओमप्रकाश कश्यप

1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, पृष्ठ 15.

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अयंकाली कंटीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ ट्रावणकोर दलितस, 2018

3. जेटिंल टी. वर्गिस, दि कंन्सट्रक्शन ऑफ़ साधुजनम्: अय्यंकालि एंड दि स्ट्रगल ऑफ़ दि स्लेव कॉस्ट्स फॉर ए न्यू आइडेंटिटी-1884-1941, (2016), पेज 72

4. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

5. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

6.  कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकलि, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, जेटिंल टी. वर्गिस, पृष्ठ 81

7. कोचु कली, दि हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन स्लेव वूमेन, http://dravidagallery.blogspot.com/2013/06/?m=0

8. एम. वेलकुमार, पृष्ठ-197-198

हिंदी महाकाव्यों(महाभारत और रामायण) की विखंडनवादी पुनरीक्षा

सामान्य

महाभारत और रामायण. हिंदुओं के दो महाकाव्य. दोनों विश्व-साहित्य की क्लासिक धरोहरों में आते हैं. कुछ लोग इन्हें इतिहास मानते हैं. परंतु इतिहास के लिए घटनाओं और पात्रों का समय से सुसंगत होना अनिवार्य है. यदि पुराना है तो उसके कुछ पुरातात्विक साक्ष्य होने चाहिए, जैसे सिंधु घाटी की सभ्यता के हैं. महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक आदि के हैं. ऐसे कोई प्रामाणिक साक्ष्य इन महाकाव्यों से संबंधित घटनाओं के नहीं मिलते. कुछ शहरों और नदियों के नाम जरूर मेल खाते हैं. किंतु नगर की मौजूदगी, उसमें व्यक्ति विशेष के प्रवास को तब तक प्रमाणित नहीं करती जब तक कोई दूसरा साक्ष्य न हो. उनके अलावा विभिन्न देवताओं के जगह-जगह फैले कुछ मंदिर आदि है. उनमें से अनेक 1000-1200 वर्ष पुराने और अपनी स्थापत्य कला में बेजोड़ हैं. ये धर्मस्थल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक हैं. इसलिए जब भी महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिकता को चुनौती दी जाती है, प्रमाण के अभाव में ‘भक्तगण’ आस्था के खोल में समा जाते हैं. उसमें दूसरों का प्रवेश निषिद्ध होता है. वे खुद उससे बाहर झांकने की कोशिश कभी नहीं करते.

उनके लिए यदि आस्था कहती है—’राम थे, तो थे! सूर्यग्रहण का कारण उसपर केतु द्वारा उत्पन्न किया गया संकट है, तो यही सच है! यदि ग्रंथों में लिखा है कि बाल हनुमान ने खेल-खेल में सूरज को निगल लिया था, तो संदेह की गुंजाइश कहां बचती है! आस्था को सर्वोपरि मानने वालों का खुद आस्थावान होना आवश्यक नहीं है. आस्था सिर्फ उनकी लोकलुभावन राजनीति का हिस्सा होती है. आस्थावादी कहता है, जो कहा गया है, उसपर विश्वास करो. धर्मग्रंथों पर संदेह करना पाप है. आस्था जितनी ज्यादा संदेह-मुक्त हो, उतनी ही पवित्र मानी जाती है. जबकि ज्ञान की खोज बगैर संदेहाकुलता के संभव ही नहीं है. कह सकते हैं कि आस्था मानवीय विवेक की ऐसी बाड़ाबंदी है, जिसका दूसरा छोर अंधविश्वास से जुड़ा होता है. अंधविश्वास भी ऐसा कि ज्ञान कब अज्ञान में ढल जाता है, व्यक्ति को पता ही नहीं चल पाता. जिन धर्मग्रंथों के आधार पर आस्था का समर्थन किया जाता है, उनमें परस्पर विरोधी सूचनाओं की भरमार है. उदाहरण के लिए ऋग्वेद के कुछ मंत्रों(1/139/11, 8/28/1) में देवताओं की संख्या 33 बताई गई है, जबकि दूसरे मंत्र(3/9/9, 1/52/6) के जरिये 3339 देवताओं का आवाह्न किया गया है. 

हिंदू अतीतोन्मुखी धर्म है. हिंदुओं के लिए पुरातन ही महानतम है. हिंदू धर्म को अधिकाधिक प्राचीन दिखाने के लिए वे लंबी-लंबी, बिना सिर-पैर की कल्पना करते हैं. उनके अनुसार सतयुग की अवधि 17,28,000 वर्ष, त्रेता की 12,96,000 तथा द्वापर की 8,64,000 वर्ष थी. जबकि कलयुग मात्र 4,32,000 वर्ष का होगा. युगावधि की तरह मनुष्य की आयु और लंबाई भी घटती जाती हैं. तदनुसार सतयुग में मनुष्य की आयु 1,00,000 वर्ष, लंबाई 21 हाथ(32 फुट), त्रेता में 10,000 वर्ष, लंबाई 14 हाथ(21 फुट) द्वापर में 1000 वर्ष लंबाई 7 हाथ(11 फुट) तथा कलयुग में मात्र 100 लंबाई 4 हाथ( लगभग फुट) होती है. चारों युगों की अवधि बराबर क्यों नहीं है? युग बदलने के साथ ही मनुष्य की लंबाई और वयस में इतना अंतर अचानक कैसे आ जाता है? क्या दो युगों के बीच कोई शून्यकाल भी होता है? क्या युग का बदलना वर्ष या शताब्दी बदलने जैसा है—जैसे प्रश्नों से वे कन्नी काट जाते हैं. चारों युगों में सतयुग को सर्वोत्तम बताया गया है. महाभारत(149.11-25) में हनुमान भीम को बताते हैं—’‘सतयुग में प्रत्येक मनुष्य पुरुषार्थ सिद्धि कर कृतकृत्य होता था, इसलिए वह कृतयुग कहलाया. उसमें धर्म अपनी संपूर्ण अवस्था में था….किसी को कुछ करना नहीं पड़ता था. इच्छामात्र से जरूरत की वस्तुएं प्राप्त हो जाती थीं.’ रामायण के अनुसार हनुमान का जन्म त्रेता में हुआ था. सतयुग की जानकारी का उनका स्रोत क्या था, इस बारे में वे कुछ नहीं बताते.

गीता के अनुसार जब भी पृथ्वी जब-जब पाप बढ़ते हैं, धर्म संकट में पड़ जाता है—’तब-तब अवतार होते हैं. श्रद्धा के अतिरेक में हम इसपर विश्वास भी कर लेते हैं. यह ख्याल तक नहीं आता कि यदि सतयुग में धर्म चरमोत्कर्ष पर था तो सर्वाधिक अवतार उसी युग में क्यों हुए? स्मरणीय है विष्णु के कुल दस अवतारों में से चार—’मत्स्य, कूर्म, वाराह और नृसिंह, सतयुग के खाते में जाते हैं.  त्रेता के हिस्से में तीन—’वामन, परशुराम और राम तो द्वापर में केवल कृष्ण हैं. गौतम बुद्ध को सनातन धर्म के खांचे में फिट करने के लिए ‘कलयुग’ में उन्हें भी अवतार का दर्जा दिया गया है. दसवें और आखिरी अवतार के रूप में ‘कल्कि’ की पूर्वकल्पना की गई है. गीता के हिसाब से देखा जाए तो धर्म पर सबसे ज्यादा संकट सतयुग के दौरान आए थे, जिससे उस युग में विष्णु को चार अवतार लेने पड़े और सबसे कम द्वापर में जिसमें केवल एक अवतार लेना पड़ा था. हमारा सवाल बस इतना है कि यदि सतयुग में धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था, सभी कुछ ठीक-ठाक था तो उस युग में विष्णु को सर्वाधिक चार-चार अवतार क्यों लेने पड़े थे?  

हमारी शंकाएं बस यहीं तक सीमित नहीं है. त्रेता और द्वापर में अवतार उस समय होते हैं, जब वे अवसान के निकट थे. राम के सरयू में जलसमाधि लेते ही त्रेता भी ‘जलसमाधि’ ले लेता है. इसी तरह कृष्ण की मृत्यु के साथ द्वारिका समुद्र में समा जाती है, द्वापर उड़नछू हो जाता है. अवतार पुरुष की मृत्यु के तुरंत बाद युग-समापन का क्या औचित्य है? क्या किसी राजा का युद्ध जीतकर राजगद्दी पर विराजमान हो जाना सत्ता-परिवर्तन का अभीष्ट हो सकता है? गौरतलब है कि विष्णु के ये दो अवतार ऐसे हैं जिन्हें ‘धर्म की स्थापना’ के नाम पर लाखों-करोड़ों को अपने प्राणों ही आहूति देनी पड़ी थी. बावजूद इसके जो व्यवस्था उन कथित अवतार पुरुषों ने गढ़ी, वह लंबे समय तक क्यों नहीं टिक पाई थी? क्या उनका कार्य नाटक में यवनिका गिराने वाले पात्र जितना सीमित था? क्यों हर अवतार अपने युग का उच्छिष्ट साफ करने के लिए जन्मता है? समाज को सुधारने की जिम्मेदारी वह क्यों नहीं उठाता? जिस धर्मराज्य की स्थापना के लिए वह लाखों योद्धाओं की बलि चढ़ाता है, वह कैसा होता है? अंत तक वह मिथ ही क्यों बना रहता है? यदि हर युग की अवधि सीमित है? यदि तथाकथित धर्म-राज्य की स्थापना के साथ ही युग का पराभव होना पूर्व-निर्धारित है तो ऐसे धर्मराज्य का औचित्य ही क्या है? यदि धर्म-राज्य का लाभ जनसाधारण को नहीं मिल पाता तो उसकी स्थापना किसके लिए की जाती है? जैसे अनगिनत प्रश्न इस व्यवस्था को लेकर हो सकते हैं? लेकिन हमेशा वे प्रश्न ही रह जाते हैं. आस्था और धर्म ने नाम पर फैलाया गया डर, हर जिज्ञासु के मुंह पर ताला डालने का काम करता है.

मानवीय विवेक के सापेक्ष आस्था को अतिरेकी महत्व देना अनायास है? क्या यह किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? क्या यह भी अनायास है कि रामायण के नायक राम और दशरथ के बाकी तीनों पुत्र तथा महाभारत के नायक पांडुपुत्रों में से एक भी अपने पिता की औरस संतान नहीं है. सभी नियोग जनित हैं. क्या ये कथाएं इसलिए गढ़ी गईं कि कोख किसी की भी हो, वीर्य ब्राह्मण का होगा तभी सर्वतेजोमय संतान जन्म ले सकती है? अथवा अश्वमेध आदि यज्ञों की आड़ में जो वासना का वीभत्स खेल खेला जाता था, उसको वैध बनाने के लिए ये मिथ गढ़े गए थे? ध्यातव्य है कि दोनों महाकाव्यों के महानायकों, जिन्हें बाद में ईश्वर मान लिया जाता है—की मृत्यु भी सामान्य नहीं थी. राम सीता को वनवास देने के बाद आत्मग्लानि से भर जाते हैं. वही उनको सरयू में जलसमाधि लेने को विवश करती है. महाभारत की जंग जीत लेने के बाद पांडु भी सुखी नहीं रह पाते. आत्मशांति की तलाश उन्हें हिमालय की ओर ले जाती हैं. वहां द्रोपदी के साथ उसके पांचों पति भी, एक-एक कर मृत्यु को प्राप्त होते हैं.

महाभारत के कृष्ण उस तथाकथित ‘धर्मयुद्ध’ के महानायक हैं. 18 अक्षौहिणी सेनाओं; यानी मनुष्यों और जानवरों को मिलाकर दो करोड़ से ज्यादा प्राणियों की आहूति देने के पश्चात युधिष्ठिर का राज्यारोहण संभव हो पाता है. इसी के साथ धर्म के राज्य की घोषणा कर दी जाती है. लेकिन सब कुछ शांत नहीं हो जाता. थोड़े ही समय के बाद द्वारिका में यादव अंतर्कलह के शिकार हो जाते हैं. उस अंतर्कलह को रोकने के लिए कृष्ण की बुद्धि काम नहीं आ पाती. धरती पर धर्मराज्य की स्थापना का दावा करने वाले कृष्ण अपने ही बंधु-वांधवों को आपस में लड़-लड़कर देखने को विवश हैं. पूरी धरती पर धर्म की स्थापना का दावा करने वाले अवतार-पुरुष कृष्ण अपने ही परिजनों को क्यों नहीं संभाल पाए? महाभारत का यह अंत क्या स्वाभाविक है? क्या गांधारी का शाप और यादव कुल का आपस में लड़-झगड़कर मर जाना, नियतिबद्ध घटना थी? अथवा ऋग्वैदिक कृष्ण के तेज को, उनकी गौरवशाली स्मृतियों को धुंधला करने के लिए जानबूझकर रचा गया षड्यंत्र था?

राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के हिसाब से देखा जाए तो महाभारत रामायण से कहीं आगे की रचना है. रामायण का कथानक एकदिशीय है, महाभारत का बहुआयामी. रामायण मुख्यत: पारिवारिक संबंधों की गाथा है, जबकि महाभारत में संबंधों का दायरा बढ़कर सामाजिक-राजनीतिक हो जाता है. बावजूद इसके प्रतिष्ठा रामायण की कहीं ज्यादा है. उसे पांचवा वेद माना जाता है. वे लोग जिनके कानों में वेदमंत्र पड़ते ही पिघला हुआ सीसा भर देने की बात कही गई थी, उन्हें भी रामायण को पढ़ने और घर में रखने की छूट थी. दूसरी ओर महाभारत को घर लाना निषिद्ध माना गया. कहा गया कि उसे घर में जगह देने से आपस में द्वैष पनपता है. अंतर्कलह बढ़ने से परिवार में फूट पड़ जाती है. क्या इस मान्यता को महज जनसाधारण का अंधविश्वास कहकर टाला जा सकता है?

रामायण में विचारधाराओं का कोई टकराव नहीं है. वहां ब्राह्मण के मुंह से निकले शब्द ही शास्त्र हैं. राम वही करते हैं, जो गुरु कहते हैं. गुरु कहते हैं वाण चलाओ, तो राम, रावण की वनरक्षक और अधेड़ उम्र की स्त्री ताड़का पर शर-संधान करने में देर नहीं करते. ब्राह्मण कहता है कि शंबूक के वेदपाठन से धरती पर पाप बढ़ रहा है, इसे मार डालो तो बिना किसी शंका के राम उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं. रामकथा के अनुसार, ब्रह्म-कथन से विचलन का एकमात्र दंड है—’मौत. समन्वय, सहिष्णुता अथवा भिन्न वैचारिकी से समझौते के लिए उसमें कोई गुंजाइश नहीं है. राम ब्राह्मण द्वारा गढ़ी मर्यादा का पालन आंख मूंदकर, निःशंक भाव से करते हैं, इसलिए तुलसी ने उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा है. रावण उनकी बनाई व्यवस्था का पालन नहीं करता. उल्टे मखौल उड़ाता है—’इसलिए उसे राक्षस कहा गया है. मगर युद्ध में राम द्वारा रावण का वध होते ही रामायणकार को सहसा याद आ जाता है कि रावण ब्राह्मण है. रावण भले मरे, किंतु ब्राह्मणत्व सुरक्षित रहना चाहिए. इसके लिए चलते-चलते एक प्रसंग गढ़ा जाता है. विभीषण राम को मरणासन्न रावण से राजनीति का ज्ञान लेने की सलाह देता है. राम उस समय विजय के मद में हैं. वे खुद न जाकर लक्ष्मण को रावण के पास भेजते हैं. लक्ष्मण रावण के सिरहाने खड़े होकर राजनीतिक ज्ञान की प्रार्थना करते हैं. रावण आंखें मूंदे पड़ा रहता है. लक्ष्मण वापस लौट जाते हैं. तब राम स्वयं उपस्थित होकर रावण के पैरों की ओर खड़े होकर राजनीति का पाठ पढ़ाने का आग्रह करते हैं. रावण तैयार हो जाता है. ‘राम भले ही अवतार सही. मगर पृथ्वी का सर्वेसर्वा तो ब्राह्मण है—’ पाठकों को यह एहसास कराने के साथ ही रामायणकार का उद्देश्य पूरा हो जाता है. यहां इस बात पर कोई विमर्श नहीं होता कि रावण का राजनीतिक दर्शन क्या था? लंका की समृद्धि में उस दर्शन का कितना योगदान था? अथवा ‘रामराज्य’ के निर्माण में रावण के दिए राजनीतिक ज्ञान की क्या भूमिका थी? आस्था यह सवाल उठाने की इजाजत नहीं देती. ‘खट्टर काका’ में हरिमोहन झा इसे बड़े ही रोचक ढंग से दिया है. उपन्यास के अनुसार मिथिला के नैयायिक(न्यायशास्त्र के जन्मदाता गौतम) ने राम से उनके वनवास के बारे में सवाल कर दिया—’

‘‘वनवास का क्या अर्थ? ‘सर्व वनेषु वासः(सभी वनों में वास) अथवा ‘कस्मिंश्चिद् वने वासः(किसी एक वन में वास). यदि पहला अर्थ लो तो सो उन्होंने किया ही नहीं. संभव भी नहीं था. और, यदि दूसरा अर्थ लो, तो फिर अयोध्या के निकट ही किसी वन में रह जाते. चित्रकूट में ही चौदह वर्ष बिता देते. तो भी पिता की आज्ञा का पालन हो जाता. फिर, हजारों मील दूर भटकने की क्या जरूरत थी!  वह भी सुकुमारी सीता को साथ लेकर….राम कुछ उत्तर नहीं दे सके. खीझकर कह दिया— 

‘यः पठैत गौतमी विद्यां शृगालीयोनिमाप्नुयात’(जो भी गौतम की विद्या, उनके तर्कशास्त्र को पढ़े सो गीदड़ होकर जन्म ले).

आखिर राम ब्राह्मणों से इतना भयभीत क्यों थे? इसके लिए उनके पूर्वजों की कथा का स्मरण करना पड़ेगा. राम के पूर्वज थे पृथु. वेन1 की संतान. वेन को धरती का पहला निर्वाचित राजा कहा जाता है. वेन को जगत्कल्याण के लिए राजा नियुक्त किया गया था. इसलिए उसकी निष्ठाएं अपनी जनता के प्रति थीं. एक बार राज्य में अकाल पड़ा. उस समय वेन ने सिर्फ ब्राह्मणों का हित साधने के बजाए, अपनी जनता को वरीयता दी. इसपर ब्राह्मण नाराज हो गए. अकाल के लिए वेन को दोषी ठहराकर वे जनता को भड़काने लगे. अशिक्षित भूख से अकुलाई जनता का विवेक तो पहले ही समाप्त हो चुका था. ब्राह्मणों के इशारे पर वह अपने ही राजा पर झपट पड़ी. वेन के बाद उसके पुत्र पृथु को राजा नियुक्त करने से पहले ब्राह्मणों ने कहा—

‘वेननंदन! जिस कार्य में नियमपूर्वक धर्म की सिद्धि हो, उसे निर्भय होकर करो. लोक में जो कोई भी मनुष्य धर्म से विचलित हो उसे सनातन धर्म पर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबल से परास्त करके दंड दो. यह प्रतीज्ञा करो कि मैं मन, वाणी और कर्म द्वारा भूतलवासी ब्रह्म के आदेश का निरंतर पालन करूंगा….कभी स्वच्छंद नहीं होऊंगा. ब्राह्मण मेरे लिए सदैव अदंडनीय होंगे तथा मैं संपूर्ण जगत को वर्णसंकरता और धर्मसंकरता से बचाऊंगा.’2 

पिता की हत्या से डरे पृथु ने, ऋषिगणों के आदेशानुसार प्रतिज्ञा ली—’‘नरश्रेष्ठ महात्माओ! महाभाग ब्राह्मण मेरे लिए सदैव वंदनीय होंगे.’3 पृथु द्वारा ब्राह्मणों के आगे समर्पित करते ही धर्मसत्ता और राजसत्ता का ऐसा गठजोड़ बना जो पीढ़ियों तक चलता रहा. ब्राह्मणों ने जो दंड उनके पूर्वज वेन को दिया था, उसकी स्मृतियां राम के मन में अवश्य ही रही होंगी. इसलिए वे ब्राह्मणों के आदर्श आज्ञाकारी बने रहने को ही श्रेय मानते हैं.

महाभारत और रामायण दोनों में जातियां हैं. वर्ण-व्यवस्था का महिमामंडन है. रामराज्य में शूद्रों के जीवन, उनके सुख-दुख का वर्णन नहीं है. शूद्र केवल सीता पर लांछन लगाने के लिए उपस्थित होता है. उसकी भूमिका कथानक को विस्तार देने के लिए है. पूरी रामायण में राम के देवत्व को लेकर कोई चुनौती नहीं है. यहां तक कि राम के साथ वैर-भाव रखने वाले रावण और कुंभकरण जैसे महान योद्धा भी उनके देवत्व को चुनौती नहीं देते. वे केवल इसलिए राम के विरुद्ध युद्धरत हैं ताकि उनके हाथों से मृत्यु का वरण कर, अपने पुराने शापों से मुक्ति पा सकें. कृष्ण की एक विशेषता उनका सखा-भाव है. इसमें अर्जुन और सुदामा ही नहीं ब्रज के सभी गोप-गोपियां सम्मिलित हैं. दूसरी ओर राम इतने ‘बड़े’ हैं कि उनके साथ मैत्री-भाव संभव ही नहीं है. हनुमान, सुग्रीव आदि को वे मित्र कहें तो इसे उनकी उदारता बताया जाता है. यदि हनुमान, सुग्रीव आदि खुद को राम का मित्र समझने लगें तो यह उनकी धृष्टता होगी. वह एक तरह से राजा को सर्वाधिकार संपन्न, यहां तक कि निरंकुश बना देने का षड्यंत्र था. ऐसी निरंकुशता जो सिवाय ब्राह्मण के किसी पर भी बरस सकती थी. यहां तक कि रावण भी इसका अपवाद नहीं है. इसलिए कि उसके पूर्व जन्म की कथाएं गढ़कर और मृत्योपरांत स्वर्ग भेजकर, रामकथा लेखक उसकी भरपाई कर देता है. शूद्र मनीषी शंबूक का क्या हुआ, जिन्हें राम ने अपने हाथों से मौत के घाट उतारा था. अगर राम के हाथों से मरने पर स्वर्ग प्राप्ति होती है तो शंबूक को भी स्वर्ग मिलना चाहिए था. लेकिन राक्षस होने के बावजूद ब्राह्मण कुलोत्पन्न रावण को जो सुविधा प्राप्त है, वह शंबूक को नहीं मिल पाती. इसलिए उनके उनके पूर्वजन्म और मृत्यु के बाद को लेकर रामायण में कोई अंतर्कथा नहीं है.

राम की अपेक्षा कृष्ण का चरित्र बहुआयामी है. उन्हें 16 कलाओं से संपन्न माना गया है. वे प्रबुद्ध हैं, कूटनीतिज्ञ हैं. अर्जुन को असमंजस में देखकर गीता का उपदेश देते हैं. इसलिए अपने समय के खास बौद्धिकों की श्रेणी में भी आते हैं. इसके उलट राम बौद्धिक जीव नहीं हैं. वे हर जगह ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे उनका विवेक किसी ने हर लिया हो. राम का चरित्र ब्राह्मणवादी आकांक्षाओं के अनुरूप गढ़ा गया है. वे ब्राह्मणत्व के आगे न केवल स्वयं नतमस्तक हैं, अपितु जो भी उसके आड़े आता है, उसे बड़े से बड़ा दंड देने को सदैव तत्पर रहते हैं. बदले में ब्राह्मण उन्हें भगवान घोषित कर रहते हैं. कह सकते हैं कि राम की भगवत्ता उपहार में प्राप्त भगवत्ता है. जबकि कृष्ण ने अपनी भगवत्ता अपने बौद्धिक पराक्रम, संगठन-सामर्थ्य और यदुओं की संगठित राज्यशक्ति के बल पर स्वयं हासिल की थी. राजनीति के ज्ञान के लिए वे अपने परमशत्रु रावण के पास अवश्य जाते हैं, परंतु रावण से कुछ सीख पाए, इसमें संदेह है. रावण के राज्य में स्त्रियों का सम्मान था. वे राजकीय सेवा में थीं. अवसर पड़ने पर मंदोदरि रावण को सलाह देती है. उसे बुरा कर्म करने से बरजती है. यह सुविधा रघुकुल की स्त्रियों को प्राप्त नहीं थी. वे घर की शोभा मात्र थीं. केवल रनिवासों में आंसू बहाना जानती थीं. इतनी कोमलांगी कि रावण की दृष्टि पड़ते ही सीता का शील आहत हो जाता है, जिसके लिए उसे अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ा था.

कृष्ण का आदि विवरण ऋग्वेद में मौजूद है. वहां वे अनार्य यदु कबीले के महापराक्रमी योद्धा हैं. इंद्र का प्रभुत्व उन्हें स्वीकार्य नहीं है. ऋग्वेद में उन्हें ‘वृत्र, नमुचि, शंबर, शुष्ण, पणि आदि इंद्र के सात शत्रुओं में से एक माना गया है’(ऋ. 8/96/16). ‘द्रुतगामी कृष्ण अंशुमति(दृषद्वती) नदी तटवर्ती गूढ़ स्थान और विस्तृत प्रदेश में विचरण और सूर्य के समान अवस्थान करता है….इंद्र ने अपनी बुद्धि से उस दीप्तिमान, द्रुतगामी और घोर नाद करने वाले कृष्ण को खोजा तथा लोकहित में, बृहश्पति की सहायता से, कृष्ण और उसकी सेना का नाश किया.(ऋ. 8/96/14-15).4 आर्यों के लिए इंद्र इसलिए भी पूज्य है क्योंकि उसने केवल कृष्ण और उसकी सेनाओं को ही नहीं, उसकी गर्भवती स्त्रियों को भी नहीं छोड़ा—’‘जिस इंद्र ने ऋजिश्वा राजा के साथ कृष्ण नामक असुर की गर्भवती स्त्रियों को निहत किया था, हम उन्हीं शक्तिशाली इंद्र के निमित्त अन्न के साथ हवि एवं स्तुति अर्पित करें’(ऋ. 1/101/1).

ऋग्वेद में इंद्र के हाथों कृष्ण का वध दिखाया गया है. लेकिन संभावना यही है कि कृष्ण अपने यदु कबीले के साथ बच निकले थे. कदाचित इन्हीं स्मृतियों को भिन्न कथानक के माध्यम से महाभारत सहेजा गया है, जिससे कृष्ण के नाम के साथ ‘रणछोड़’ की उपाधि जुड़ जाती है. ‘रणछोड़’ होना कृष्ण के चरित्र का नकारात्मक लक्षण नहीं है. इसके माध्यम से वे दर्शाते हैं कि बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छोटे लक्ष्यों का बलिदान करना ही बुद्धिमानी है. ऋग्वैदिक रणछोड़ कृष्ण के नेतृत्व में; अथवा उनकी प्रेरणा से, कालांतर में गंगा-यमुना के घने, उपजाऊ और तराई क्षेत्र में महान सभ्यता विकसित हुई, जिसे भारतीय इतिहास में गंगा-जमुनी सभ्यता कहा जाता है. कुछ ही शताब्दियों में, संगठित गणशक्ति के बल पर उनकी गिनती भारत के महाशक्तिशाली राज्यों में होने लगी. इतनी कि आर्यों के लिए उनकी उपेक्षा संभव ही नहीं थी. संस्कृतियों के सम्मिलन के दौर में, आर्यों को यदुनायक कृष्ण को भगवान के रूप में स्वीकारना ही पड़ा. क्या उन्होंने सचमुच कृष्ण के चरित्र के उदात्त पक्षों को ज्यों की त्यों स्वीकार लिया था? उत्तर है, नहीं.

महाभारत में कृष्ण का चरित्र उनके ऋग्वैदिक चरित्र से भिन्न है. गीता में वे वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं. अवतार घोषित करने की यह अनिवार्य शर्त थी. दरअसल ब्राह्मणों ने कृष्ण को अवतार तो माना, मगर उनके चरित्र-हनन में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसके लिए ब्रह्मवैवर्त्त पुराण को देखा जा सकता है. जिसमें कृष्ण को स्त्री-लोलुप और लंपट व्यक्ति के रूप में किया है, जो अनेक स्त्रियों के साथ संसर्ग करता है. बाद की रचनाओं को ‘गीत गोविंद’ भी है. यहां कुछ लोग कह सकते हैं कि कृष्ण योगेश्वर हैं. गोपियों के साथ उनका व्यवहार समर्पण की पराकाष्ठा है. सवाल यह है क्या यही छूट वे राम के चरित्र-चित्रण में ले सकते थे? ब्राह्मण लेखकों की चालाकी का यहीं अंत नहीं होता. उन्होंने कृष्ण को तो ईश्वर का दर्जा तो दिया, लेकिन यादव कृष्ण का वंशज होने का दावा न कर सकें, इसके लिए महाभारत में एक आख्यान जोड़ा गया. उसके अनुसार सारे यादव मूर्खों की तरह ही आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं.

यदुओं के प्रति ब्राह्मण लेखकों की ईर्ष्या रामायण में भी नजर आती हैं. याद करें, वह प्रसंग जब राम लंका पर चढ़ाई करते समय समुद्र से रास्ता मांगते हैं. समुद्र द्वारा निवेदन को अनसुना करने पर वे कुपित होकर वाण-संधान कर लेते हैं. घबराया हुआ समुद्र तत्क्षण हाजिर होकर क्षमा-याचना करते हुए अपनी मजबूरी बताता है. इसपर राम तने हुए वाण को तूणीर में वापस लेने से इन्कार करते हुए कहते हैं—’‘हे समुद्र! मेरा वाण अमोध है. मैं इसे वापस नहीं ले सकता.’ उस समय समुद्र के मुंह से कहलवाया गया है—’‘उत्तर दिशा में द्रुमकुल्य नामक एक विख्यात देश है. वहां आभीर(अहीर) आदि जातियों के बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं. उनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं. वे सबके सब पापी और लुटेरे हैं. वे लोग मेरा जल पीते हैं. उन पापाचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मैं सह नहीं सकता. अपने इस उत्तम वाण को वहीं सफल कीजिए.’ समुद्र के कहने पर राम उस अत्यंत प्रज्जवलित वाण को बताई हुई दिशा में छोड़ देते हैं. यदुओं के प्रति इस ईर्ष्या का कारण क्या केवल उनकी जाति अथवा ऋग्वेद-कालीन वैर-भाव की स्मृतियां थीं? क्या इसके कुछ और कारण भी खोजे जा सकते हैं?

गौतम बुद्ध से पहले भारत में 16 महाजनपद अस्तित्व में थे, जहां गणतांत्रिक पद्धति से शासन चलता था. उन महाजनपदों में से एक वृष्णि संघ का केंद्र मथुरा था, जिसके मुखिया शूरसेन थे. बुद्धकाल में तत्कालीन भारत के सबसे बड़े और शक्तिशाली लिच्छिवी गणतंत्र की राजधानी वैशाली थी. मगध सम्राट अजातशत्रु की निगाह वैशाली की समृद्धि पर थी. वह उसपर अधिकार करना चाहता था. सलाह के लिए वह गौतम बुद्ध के पास पहुंचा. तब गौतम बुद्ध ने उससे कहा था कि जब तक लिच्छिवीगण अपने फैसले मिल-जुलकर करते हैं, उनके बीच कोई मतांतर नहीं है, तब तक उन्हें पराजित कर पाना असंभव है. अजातशत्रु लौट जाता है. बाद में वह अपने मंत्री वस्सकार को वैशाली भेजता है. जो छद्मरूप में वहां रहकर लिच्छिवियों में फूट डालने का काम करता है. उसके बाद अजातशत्रु की विजय संभव हो पाती है. महाभारत में यदुओं(वृष्णि) को आपस में लड़ते-झगड़ते दिखाकर, महाभारत लेखक का उद्देश्य गणतांत्रिक प्रणाली की निरर्थकता को भी सिद्ध करना था. क्योंकि बिना उसके ‘धर्मराज्य’ के मिथ की स्थापना संभव ही नहीं थी. गौरतलब है कि महाभारत का मूल कथानक भले ही ईसा से कुछ शताब्दी पुराना हो, लेकिन उसमें लगातार संशोधन होता रहा. रामायण और महाभारत को उनका वर्तमान स्वरूप गुप्तकाल में, या कदाचित उसके भी बाद प्राप्त हुआ है.

ब्राह्मणों के छल का शिकार केवल कृष्ण हुए हों, यह बात नहीं है. स्वयं महादेव भी उनके ऐसे ही षड्यंत्र का शिकार हैं. शिव अनार्यों के देवता हैं. सिंधु सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त मूर्तियां बताती हैं कि वे सिंधुवासियों के भी आराध्य रहे होंगे. वहां वे पाशुपत हैं. कबीलों के सर्वमान्य मुखिया हैं. आर्यों और अनार्यों के बीच समन्वय की प्रक्रिया के फलस्वरूप शिव को त्रिदेवों में स्थान मिला. सिंधु सभ्यता की आपेक्षिक प्राचीनता का सम्मान करते हुए उन्हें आदिदेव भी माना गया. सवाल हैं कि समन्वयीकरण के दौरान शिव तथा उनके अनुयायियों को क्या वही मान-सम्मान प्राप्त हुआ, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे? उन्हें महाविनाश का देवता ही क्यों स्वीकारा गया? शिव-वाद्य डमरू तथा उनके तांडव के क्या और भी निहितार्थ हो सकते हैं? ‘भोला’ कहकर शिव का उपहास उड़ाना क्या उनकी देवताओं और असुरों के प्रति समदृष्टि, उनके न्याय-भाव की उपेक्षा करना नहीं है?

गौरतलब है कि सिंधु सभ्यता का क्षेत्रफल करीब नौ लाख वर्ग किलोमीटर तक विस्तृत था. शिव उन सभी के आराध्य थे. जबकि ब्रह्मा और विष्णु आक्रामक कबीलों के रूप में आए आर्यों की मानस कल्पना थे. समन्वयीकरण की आवश्यकता के चलते आर्य लेखकों ने उन्हें त्रिदेवों में स्थान दिया, मगर बड़ी चतुराई से उन्हें भंगैड़ी, नशाखोर और यायावर सिद्ध कर दिया. शिव की उदारता को भी, यह कहकर कि वे असुरों को भी वैसे ही वरदान लुटाते हैं, जैसे देवताओं को—नकारात्मक रूप में देखा गया. यही नहीं उनके समर्थक कबीलों को भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहकर अपमानित किया जाता है. नशाखोर और यायावर होने के कारण के शिव शासन करने के अयोग्य हैं. इसलिए उन्हें हमेशा के लिए कैलाश पर ठहराकर अवतारों के माध्यम से राज्य करने की जिम्मेदारी विष्णु को सौंप दी गई.  लेकिन लोकशक्ति तो हर युग में सर्वोपरि रही है. वह भड़क जाए तो बड़ी से बड़ी सत्ताएं डोल जाती हैं. त्रिदेवों में यह शक्ति न तो ब्रह्मा के पास थी, न विष्णु के पास. शिव के पीछे खड़ी लोकशक्ति का भय ही था जिससे ब्राह्मण उन्हें विनाश के देवता का दर्जा देते हैं. डमरू कबीलों को युद्ध या जनसभा के लिए एकजुट करने का वाद्य रहा होगा; और तांडव लोकशक्ति को युद्ध के लिए जाग्रत करने की शैली. शिव की तीसरी आंख के माध्यम से सृष्टि के जन्म और विनाश के मिथ गढ़े जाते रहे.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ :

1. पृथु की कथा : ठाकुर प्रसाद सिंहhttps://www.hindisamay.com/content/838/4/-कहानी-कथा-संस्कृति-खंड-दोकथा-भूमि–संपादन-कमलेश्वर-उर्वशी-और-पुरुरवा.cspx

2. महाभारत, शांतिपर्व, 59/103-108

3. महाभारत, शांतिपर्व, 59/109

4. हिंदी ऋग्वेद, रामगोविंद त्रिवेदी, इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग, पृष्ठ -1057  

संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य

प्रत्येक समाज अपनी संस्कृति से पहचाना जाता है. उसका प्रमुख कार्य समाज में एकता की अनुभूति जगाना पैदा करना है. इसके लिए जरूरी है कि वह सामाजिक संबंधों, नागरिकों के सामान्य व्यवहारों, सार्वकालिक जीवन-मूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. प्रायः धर्म एवं संस्कृति को एक मान लिया जाता है. जबकि आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला धर्म विराट संस्कृति का अंग तो हो सकता है, उसका पर्याय नहीं. किसी समाज द्वारा धर्म की केंचुल से बाहर आने की छटपटाहट विवेकीकरण के प्रति उसकी उत्सुकता को दर्शाती है. जहां तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, अधिकांश विद्वान इसे ‘विविधता की संस्कृति’ मानते तथा ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसका महिमा-मंडन करते हैं. इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयं-स्फूर्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. प्राचीनता काल-सापेक्ष स्थिति है. वह केवल घटना-विशेष की ऐतिहासिकता को दर्शाती है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय, समानता और समरसता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. और इन सब के लिए वह लोकतंत्र के कितने करीब है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है.

सच तो यह है कि स्मृति-ग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती है, या एक अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग द्वारा बहुसख्यक जनसमुदाय पर बरबस थोप दी जाती है, वह सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और खुद को बड़ी आसानी से उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़े-लिखें, और किन लोगों से कैसे संबध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों का परिष्कार. बावजूद इसके जीवन में अनावश्यक दखल देकर, वह समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरा-वैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है, जो व्यक्ति को जन्म के साथ ही बता देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशा-रेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. इससे सामूहिकताबोध, जो संस्कृति का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है; और जनशक्ति छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इससे परिवर्तन का लक्ष्य निरंतर दूर खिसकता रहता है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरह-तरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. वे अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जाति-समूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी महाशक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक), दूसरा याचक की भूमिका में होता है. याचक अपने श्रेष्ठतम को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. तत्क्षण खुद को दाता का प्रतिनिधि घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. याचक द्वारा दाता के नाम पर समर्पित सामग्री के अलावा वह दक्षिणा की भी दावेदारी करता है. कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होने के कारण उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में गहरी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयं-घोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में, बगैर किसी ना-नुकर के, स्वीकार कर लेना याचक की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में नगण्य योगदान के बावजूद वे किसी न किसी बहाने लाभ के नब्बे प्रतिशत को हड़पे रहते हैं. उसी के दम पर वे दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. उनके नेतृत्व में पूरी संस्कृति कर्मकांडों में सिमटकर रह जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा अथवा संशोधन-विस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा गढ़े गए लिखित-अलिखित विधान का बगैर ना-नुकुर अनुसरण करें. उनपर किसी भी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आती है. सांस्कृतिक-सामाजिक असमानता का पोषण करने वाली इस संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. उनके दस्तावेजीकरण का काम हमें अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी संस्कृति के करीब ला सकता है. उसे हम जनसंस्कृति अथवा मूल भारतवंशियों की संस्कृति भी कह सकते हंै.

सत्य यह भी है कि कोई भी संस्कृति स्वयं लक्ष्य नहीं होती. वह केवल मार्ग चुनने में मदद करती है. उसका काम मानवीय वृत्तियों को सुसंस्कृत करना है, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की रोजमर्रा की आदतों पर नियंत्रण करना नहीं. विडंबना है कि भारतीय संस्कृति की अधिकांश ऊर्जा नकारात्मक कार्यों में खपती आई है. वह बड़ी आसानी से उन लोगों के हाथों में खेलने लगती है, जिनका काम दूसरों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करना है. शिखरस्थ ब्राह्मण उसके विधान का निर्माता, व्याख्याता, पालक-अनुपालक सब होता है. विशेष मामलों में, या यूं कहिए कि अपवाद-स्वरूप संस्कृति के विशिष्ट प्रवत्र्तकों को, जन्मना ब्राह्मण न हों तो भी उन्हें कर्मणा ब्राह्मण मान लिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, महीदास आदि शास्त्रीय परंपरा के ब्राह्मण नहीं हैं. फिर भी उन्हें ब्राह्मण माना गया है. क्योंकि वे उस संस्कृति के सिद्ध संहिताकार हैं, जो वर्ण-व्यवस्था को आदर्श तथा ब्राह्मणों को समाज का सर्वेसर्वा मानकर उन्हें अंतहीन अधिकार सौंप देती है. कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की उदारता या उसका लचीलापन मानते हैं. असल में यह दूसरे वर्गों के बुद्धिजीवी, उनकी उपलब्धियों का श्रेय हड़प लेने की स्वार्थ-पूर्ण व्यवस्था है. इससे निम्न वर्गों की उच्च स्तरीय मेधा, उच्चस्थ वर्गों की स्वार्थ-सिद्धि में लगी रहती है.

इस प्रवृत्ति के दर्शन ऋग्वेद से लेकर आधुनिक साहित्य तक मौजूद हैं. गुरु उद्दालक के पास सत्यकाम जाबाल जब यह कहता है कि वह घरों में काम करने वाली दासी के गर्भ से जन्मा है और पिता का नाम पता नहीं है, तो महर्षि उसे यह कहकर कि ‘तूने सत्य कहा, ऐसा सत्यभाषी ब्राह्मण पुत्र ही हो सकता है.’-दीक्षा देने को तैयार हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति के अध्येता इस उद्धरण को उसके उदात्त लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते आए हैं. वस्तुतः यह बौद्धिक धूर्तता है, जिससे ब्राह्मणेत्तर वर्गों को एक ही झटके में ‘मिथ्याभाषी’ घोषित दिया जाता है. सत्यकाम जाबालि की भांति महीदास भी दासी पुत्र था. जन्म से शूद्र किंतु मन-बुद्धि से ब्राह्मण संस्कृति का प्रतिभाशाली संहिताकार. ऋग्वेद शाखा के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’, ‘ऐतरेय उपनिषद’ और ‘ऐतरेय आरण्यक’ का रचियता. इस संस्कृति ने महीदास को भी शूद्रों से झटक लिया. अपवादस्वरूप ही सही, ब्राह्मणेत्तर वर्ग के कुछ अतिप्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों को अनुलोम परंपरा के अनुसार ब्राह्मण मान लिए जाने की नीति, प्रतिभाहीन ब्राह्मण पुत्रों के लिए शिखर का स्थान सुरक्षित रखती है. स्तर से ऊपर उठने के लिए ब्राह्मणेत्तर वर्ग के बुद्धिजीवियों को जहां विरलतम प्रतिभा, सर्जनात्मक मेधा एवं विभेदकारी ब्राह्मण-संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का प्रदर्शन करना पड़ता है, वहीं ब्राह्मण-संतति को उसका स्वाभाविक उत्तराधिकारी मान लिया जाता है. प्रमुख प्रतिभाओं के पलायन के बाद निचले वर्ग आवश्यक बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रह जाते हैं. दूसरे षब्दों में भारतीय संस्कृति, उसके नामित देवता, कर्मकांड, धर्म-दर्शन आदि केवल ब्राह्मणों का सृजन नहीं हंै. उसमें ब्राह्मणेत्तर वर्गों का भी भरपूर योगदान रहा है. हालांकि लाभ सर्वाधिक ब्राह्मणों ने उठाया है.

ब्राह्मण संस्कृति के व्याख्याकारों की प्रशंसा करनी होगी कि वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी रचना का श्रेय स्वयं लेने के बजाय वर्गीय श्रेय को प्राथमिकता दी. ब्राह्मण होने के नाते व्यक्तिगत श्रेय-सम्मान तो उन्हें आसानी से मिल ही जाता है. व्यास, याज्ञवल्क्य, वशिष्ट आदि किसी मनीषी के नहीं, गौत्र या परंपरा के नाम हैं. उनका उल्लेख स्मृतिग्रंथों से लेकर रामायण, महाभारत, पुराण यहां तक कि उत्तरवर्ती ग्रंथों में भी, मुख्य सिद्धांतकार के रूप में होता आया है. व्यक्तिगत श्रेय के आगे वर्गीय श्रेय को वरीयता दिए जाने का अच्छा उदाहरण ‘योग वशिष्ट’ है. लगभग एक हजार वर्ष पुराने, 29000 से अधिक पदों वाले तथा शताब्दियों के अंतराल में अनाम लेखकों द्वारा रचित, परिवर्धित इस विशद् ग्रंथ का रचनाकार होने का श्रेय आदि कवि वाल्मीकि को प्राप्त है, जबकि वाल्मीकि का नाम लगभग दो हजार वर्ष पुरानी कृति ‘पुलत्स्य वध’ जो निरंतर प्रक्षेपण के उपरांत ‘रामायण’ महाकाव्य के रूप में ख्यात हुआ-से भी जुड़ा है. ज्ञान को परंपरा में ढाल देने का लाभ तो केवल ब्राह्मणों को जबकि नुकसान पूरे बहुजन समाज को उठाना पड़ा है. वर्ण-व्यवस्था के चलते पोंगा पंडितों को भी बौद्धिक नेतृत्व का अवसर मिलता रहा. पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही धारा के लेखन से मौलिकता का हृास हुआ. चूंकि धर्म-ग्रंथों में प्रक्षेपण अलग-अलग समय में हुआ था, इसलिए उनमें परस्पर विरोधी बातें भी शामिल होती गईं. जिस महाभारत(शांतिपर्व) कहा गया था, ‘वर्ण-विभाजन जैसी कोई चीज असलियत में नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ उसी में द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा मांग लेने के धत्तकर्म को भी ‘धर्म’ मान लिया गया.

उधर व्यवस्था से अनुकूलित गरीब-विपन्न लोग निरंतर यह आस बांधे रहे कि जो पंडित लोग चैंसठ लाख योनियों का हिसाब रखते हैं, आदमी के ‘भाग्य’ का अगला-पिछला सब बांच लेने का दावा करते हैं, वे उनका भी ‘हिसाब’ रखेंगे! यदि परमात्मा छोटे-बड़े, गरीब-अमीर, ब्राह्मण और शूद्र में भेद नहीं रखता तो वे भी नहीं रखेंगे. इस भरोसे के साथ वे अपने अधिकारों की ओर से, इतिहास की ओर से मुंह फेरे रहे. समय के दस्तावेजीकरण के प्रति निचले वर्गों की उदासीनता का लाभ ऊपर वालों ने खूब उठाया. उन्होंने कर्मफल का सिद्धांत पेश किया. उसके जरिये शोषित वर्गों को समझाया जाने लगा कि उनकी दुर्दशा के लिए कोई दूसरा नहीं, वे स्वयं जिम्मेदार हैं. संस्कृति के आवरण में उन्होंने पहले अवसर छीने, फिर मान-सम्मान. अपने से नीचे के लोगों को बर्बर, असभ्य, गंवार, गलीच घोषित करके खुद इतिहास में तोड़-मरोड़ करते रहे. उनके द्वारा रचे गए इतिहास में ‘भेड़ों’ और ‘मेमनों’ को जंगल में अव्यवस्था का दोषी बताया जाता रहा तथा ‘भेड़ियों’ और ‘लक्कड़बघ्घों’ को प्रत्येक अपराध से बरी रहने की व्यवस्था की गई. पंडित, देवता, करुणानिधान, अन्नदाता, रक्षक, सेठ, साहूकार जैसे सुशोभन विशेषण उन्होंने अपने लिए सुरक्षित कर लिए. पिछले दो हजार साल का सांस्कृतिक खेल उनकी चालों और समझौतापरस्ती से बना है. ऐसी संस्कृति में जनसाधारण के लिए न्याय की उम्मीद करना खुद को धोखा देना है.

‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ बनाए रखने की कोशिश के समानांतर उससे उबरने की छटपटाहट भी मानव-इतिहास का हिस्सा रही है. भारत में उसका पहला उदाहरण मक्खलि गोशाल के चिंतन-कर्म में दिखाई पड़ता है. वह पहला विद्वान था जिसने श्रम-शोषक, परजीवी ब्राह्मण संस्कृति के बरक्स समाज में मेहनतकशों, शिल्पकारों तथा उसके श्रम-कौशल के सहारे आजीविका जुटाने वाले लोगों को संगठित कर आजीवक संप्रदाय की स्थापना की थी. मक्खलि की लोकप्रियता का अनुमान इससे भी लगाया जाता है कि उसके जीवनकाल में आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध अनुयायियों से अधिक थी. विद्वता के मामले में भी वह अद्वितीय था. सम्राट प्रसेनजित ने बुद्ध से कहा था कि वह गोशाल को उन(बुद्ध)से अधिक प्रतिभाशाली मानते हैं. बुद्ध की हिंसा तथा कर्मकांड विरोधी भौतिकवादी विचारधारा पर आजीवक संप्रदाय का ही प्रभाव था. मक्खलि तथा बुद्ध के अलावा निगंठ नागपुत्त, संजय वेठलिपुत्त, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि, कौत्स आदि विद्वान भी यज्ञों में दी जाने वाली बलि तथा कर्मकांड का विरोध कर रहे थे. निगंठ नागपुत्त आगे चलकर महावीर स्वामी के नाम से जैन दर्शन के प्रवर्त्तक माने गए. इनमें सर्वाधिक ख्याति मध्यमार्गी गौतम बुद्ध को मिली, जो उस समय की चर्चित दार्शनिक समस्याओं ‘आत्मा’, ‘परमात्मा’ आदि पर विमर्श करने के बजाय उन्हें टालने के पक्ष में थे. क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण बुद्ध और उनके विचारों को उन राजदरबारों में आसानी से प्रवेश मिलता गया, जो ब्राह्मण पुरोहितों के बढ़ते दबाव से तंग आ चुके थे. ‘आजीवक’ और ‘लोकायत’ धारा का प्रतिनिधि साहित्य आज अप्राप्य है. उनका छिटपुट उल्लेख ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ही प्राप्त होता है. सभी में उनकी पड़ताल नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ की गई है. संकेत साफ हैं कि विजेता संस्कृतियों ने, पराजित संस्कृति के ग्रंथों को मिटाने का काम पूर्णतः योजनाबद्ध ढंग से किया.

धर्म और संस्कृति का आधार कहे जाने वाले ग्रंथों में, लंबे प्रक्षेपण के बावजूद ऐसे अनेक तत्व हैं, जो वैकल्पिक जनसंस्कृति के प्रवत्र्तक और संवाहक रहे हैं. महिषासुर, बालि, पौराणिक सम्राट वेन के अलावा गणेश, शिव जैसे अनेक नाम मिथक भी हो सकते हैं और यथार्थ भी. लेकिन यदि इन्हें मिथक मान लिया जाए तो ब्राह्मण संस्कृति के प्रमुख संवाहक ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, हनुमान तथा अन्य देवी-देवताओं को भी मिथक मानना पड़ेगा. क्योंकि उसका पूरा का पूरा भवन इन्हीं के कंधों पर टिका है. शिव भारत की आदिम जातियों के मुखिया रहे होंगे. उनके सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि हमें भारत के आदिम कबीलों की याद दिलाते हैं. आर्यों ने शिव को तो अपनाया. मगर उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा की. अप्रत्यक्ष रूप से बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने और भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाते हुए सृष्टि चलाने(शासन करने) का अधिकार ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा ‘क्षत्रिय विष्णु’ की बपौती मान लिया गया. गणेश का मिथक भी प्राचीन भारतीय गणतंत्रों के मुखिया की याद दिलाता है. गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में मुखिया को प्रथम सम्मानेय माना जाता था. कालांतर में बड़े राज्यों का गठन होने लगा तो सभा का नेतृत्व करने वाले गण-प्रमुख के चरित्र का भी विरूपण किया जाने लगा. बैठे-बैठे सूंड लटक आना और लंबोदर जैसे प्रतीक गण-प्रमुख पर कटाक्ष तथा उसे अपमानित करने के लिए रचे गए.

‘सामाजिक न्याय’ का सपना देखने वाले बुद्धिजीवियों की असली लड़ाई धार्मिक वर्चस्ववाद, विपन्नता और जड़ हो चुकी वर्ण-व्यवस्था से है. इस लक्ष्य की सिद्धि वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति के बिना असंभव है. ब्राह्मण संस्कृति ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती है. न्याय का स्वरूप क्या हो? वंचित तबकों की उन्नति में वह किस भांति सहायक हो सकता है-यह नहीं बताती. ‘सामाजिक न्याय’ के पैरोकारों का प्रथम लक्ष्य ऐसी संस्कृति का पुनरुद्धार करना है, जिसमें संगठित धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. जो पूरी तरह उदार एवं लोकतांत्रिक हो. इसके लिए आवश्यक है कि प्राचीन संस्कृति के उन प्रतीकों को रेखांकित किया जाए जो कभी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध में या उसके समानांतर खड़े थे. क्या यह धर्म के भीतर एक और धर्म की खोज सिद्ध नहीं होगी? यह आशंका पूर्णतः निर्मूल नहीं है. ध्यान यह रखना होगा कि समानांतर संस्कृति के इन प्रतीकों, नायकों, मिथकों का योगदान दमित-शोषित वर्गों के आत्मविश्वास को लौटाने तक सीमित हो. यह एहसास दिलाने के लिए हो कि वे हमेशा से ही ‘ऐसे’ नहीं थे. वे न केवल ‘वैसे’ बल्कि कई मायनों में उनसे भी बढ़कर थे-रावण की लंका में विभीषण को अपनी आस्था और विश्वास के साथ ससम्मान जीने की स्वतंत्रता प्राप्त थी. रामराज्य में शंबूक से यह स्वतंत्रता छीन ली जाती है. इसी तरह राक्षस-सम्राट जलंधर अपनी विष्णु-भक्त पत्नी वृंदा के साथ सुखी जीवन जीता है और उनके दांपत्य के बीच अविश्वास की किरच तक मौजूद नहीं है, जबकि सीता को रावण की अशोकवाटिका में रहने के लिए भी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है. यह गरीबी तथा जाति-भेद द्वारा पैदा की गई अन्यान्य विषमताओं के विरुद्ध जंग भी है. सदियों से जाति के आधार पर सुख-सुविधा और सम्मान भोगते आए समूह, परिवर्तनकामी समूहों पर जातिभेद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को लगता है कि लोकतांत्रिक माहौल का लाभ उठाकर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं. इसलिए वे जाति को संगठनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे है. लेकिन जाति-आधारित संगठनों की अपनी परेशानियां हैं. इस देश में हजारों जातियां हैं. अपनें दम पर कोई भी जाति परिवर्तनकारी ताकत बनने में अक्षम है. अतः लोग समझने लगे हैं कि सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए समानांतर लड़ाई संस्कृति के मोर्चे पर भी लड़नी होगी. जीत उन्हीं की होगी जो संगठित रहने के साथ-साथ सामूहिक विवेक से काम लेंगे.

ओमप्रकाश कश्यप

प्राचीन भारत में दास प्रथा : एक सामाजिक-सांस्कृतिक कलंक

सामान्य

अरस्तु ने कहा था, कुछ व्यक्तियों का जन्म दास बनने के लिए ही हुआ है। मैं इससे इन्कार करता हूं। क्योंकि मैं नहीं मानता कि कुछ लोग जन्मजात मालिक होते हैं—डेनियल वी. चेप्पल

कहा जाता है कि सभ्यता को दासों की जरूरत पड़ती है। मैं कहता हूं, गुलामों की मदद से कोई भी सभ्य और सुसंस्कृत समाज नहीं बनाया जा सकता—विल्हेम रीश

संस्कृति के बारे में जितनी अच्छी-अच्छी बातें संभव हैं, सब भारतीय संस्कृति में भी कही जाती हैं। जैसे कि भारतीय संस्कृति उदार है। समरस है। पुरानी है। नए विचारों का स्वागत करने वाली है। दास प्रथा के बारे में पूछा जाए तो अधिकांश का उत्तर होगा—‘नहीं, यह तो पश्चिम की विशेषता है। खासकर रोम की। भारत का इससे दूर-दूर तक नाता नहीं है।’ जवाब में कोई देवदासी का जिक्र छेड़ दे तो आस्था का मामला कहकर तुरंत दबा दिया जाएगा। बड़े-बड़े विद्वानों का भी यही हाल रहा है। ‘हिंदू सभ्यता’ में राधाकुमुद मुखर्जी इस कुप्रथा पर लगभग मौन साधे रहते हैं। रामविलास शर्मा कुछ ईमानदार हैं। उनके अनुसार यह प्रथा भारत में थी, मगर बहुत बड़े स्तर पर नहीं।1 हालांकि इससे हमारी समस्या कम नहीं होती। महाभारत(सभापर्व-52/45, विराटपर्व-18/21) में युधिष्ठिर द्वारा 88,000 स्नातकों में से प्रत्येक को 30, कुल 26,40,000 दासियां दान में देने का उल्लेख है। यह एक राजा द्वारा अवसर-विशेष पर दिए गए दान का उदाहरण है। धर्मशास्त्रों में एक बार में हजारों दासियां दान करने के उल्लेख कई जगह हैं। रामविलासजी दास-प्रथा के और कितने बड़े स्तर की कल्पना करते थे, कहना मुश्किल है। काणे थोड़ा संतुलित करने का प्रयास करते हैं—‘ऐसा प्रतीत होता है कि यहां दास का अर्थ गुलाम या अर्धदास है।’2 यहां ‘गुलाम’ और ‘दास’ में पारिभाषिक दृष्टि से क्या अंतर है, यह तो काणे साहब ही बता सकते हैं। रोम में अर्धदास को ‘शेरिफ’ अथवा ‘हेलोट’ कहा जाता था। वे कृषि-भूमि के साथ जुड़े होते थे। भूमि के खरीद-बिक्री में उनकी खरीद-फरोख्त भी शामिल होती थी। उपर्युक्त ऋचा में कृषि-भूमि अथवा खेती का कोई उल्लेख नहीं है। कौटिल्य या नारद के विभाजन में कृषिदास का अलग से कोई उल्लेख नहीं है। ए. एल. बाशम ने ‘दास’ शब्द का प्रयोग आक्रमणकारी आर्यों द्वारा पराजित प्राग्वैदिक अनार्यों के लिए किया है।

सिंधु सभ्यता में दास

भारत सहित प्राचीन सभ्यताओं में दास प्रथा के कम से कम 5200 पहले तक के प्रमाण उपलब्ध हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि सिंधु सभ्यता(3300—1750 ईस्वीपूर्व) के प्रमुख नगरों में बड़े-बड़े भवनों के साथ एक कमरे के मकान भी मिले हैं। उससे तत्कालीन समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का अनुमान लगाया जाता है। पुरातत्ववेत्ता जॉन मार्शल के अनुसार एक कमरे के मकान नौकरों अथवा दासों के हो सकते हैं। हालांकि यह केवल अनुमान है। व्हीलर ने हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच हाथीदांत, कपास के साथ-साथ दासों के व्यापार की संभावना भी व्यक्त की है। उसके अनुसार लागेश के बाउ के मंदिर परिसर में एक फैक्ट्री थी। उसमें 21 डबलरोटी बनाने वाले, 27 दासियां, 25 शराब खींचने वाले और छह दास, बुनकर और कताई करने वाले, लुहार तथा अन्य शिल्पकर्मी काम करते थे। व्हीलर के अनुसार कारखाने की संरचना हड़प्पा शैली के अनुरूप थी।3 अब यदि मान लिया जाए कि हड़प्पा और सुमेरियन सभ्यता के बीच दासों का व्यापार भी होता था, तो सिंधु सभ्यता में दासों के मौजूगी स्वतः प्रमाणित हो जाती है। दास प्रथा की उत्पत्ति का संबंध, खेती के विकास से भी बताया जाता है। उसके लिए अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता थी। इसलिए आरंभ में ताकत के बल पर लोगों को खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाने लगा। कुछ लोग जो प्रकृति-आधारित खेती की अनिश्चितता के स्थान पर निश्चित आजीविका को पसंद करते थे, वे दूसरों को अपना श्रम बेचने लगे होंगे। कालांतर में उसी से दास प्रथा का जन्म हुआ, फिर धीरे-धीरे इस प्रथा को समाज की स्वीकृति मिलने लगी। खेती के अलावा घरों, उद्यमों में भी दासों की मदद ली जाने लगी। ऐसा विकास के आरंभिक चरणों में सभी समाजों में हुआ था। फिर जैसे-जैसे राज्य नामक संस्था मजबूत हुई, दासप्रथा के अन्यान्य रूपों का विस्तार होता गया। गौरतलब है कि भारतीय और रोम तथा सुमेरियन समाज में दासों की स्थिति में बड़ा अंतर है। रोम और सुमेर में दास तत्कालीन अर्थव्यवस्था के उपकरण मात्र थे। वे खरीदे-बेचे जाते थे। उस दासप्रथा का जन्म सामंतशाही की चरम अवस्था में हुआ था। सिंधु सभ्यता में दासों की उपस्थिति के जो संकेत मिले हैं, वे रोम और सुमेर की तरह आर्थिक दास ही हैं। जिनका उस समय की अर्थव्यवस्था के संचालन में बड़ा योगदान था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, भारतीय दासप्रथा वर्णव्यवस्था के अनुरूप ढलने लगती है।

ऋग्वेदकालीन दासप्रथा

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ऐसे शताधिक विवरण मौजूद जिनसे तत्कालीन भारतीय समाज में दास प्रथा की बड़े स्तर पर उपस्थिति का पता चलता है। ऋग्वेद में ‘दास’ शब्द अनेक स्थानों पर आया है। उसमें दासों के खरीदने-बेचने, भेंट करने, उपहार अथवा दान में देने, यहां तक कि दान लेने के भी, अनेकानेक प्रसंग हैं। ऋग्वेद(8/56/3) के बालखिल्य सूक्तों में पृषध्र मुनि की उक्ति है—‘शतं मे गर्दभानां, शतमूर्णावतीनाम्। शतं दासाः अति स्रजः।।

‘मुझे एक सौ गधे, एक सौ भेड़ें और एक सौ दास दो।’—यहां दास को गधे और भेड़ के समकक्ष रखकर उसे मनुष्य की संपदा माना गया है।

ऋग्वेद में मोटे तौर पर दो प्रकार के दासों का उल्लेख है। पहले वे जो अपने स्वामी की संपत्ति कहे जाते थे। जिनके शरीर पर उनके मालिक का अधिकार होता था। यानी ऐसे दास जिनका जिक्र होते ही श्रीविहीन, दीन-हीन, अपने मालिक के इशारों पर नाचने वाले व्यक्ति की छवि मन में उभर आती है। इस श्रेणी में आर्य और अनार्य दोनों प्रजातियों के दास शामिल थे। दूसरी श्रेणी उन अनार्य दासों की थी, जो अपेक्षाकृत साधन-संपन्न थे। जिनके पूर्वजों ने सिंधु सभ्यता की नींव रखी थी। उस समय वह सभ्यता अपने पराभवकाल में थी, मगर उसका वैभव पूरी तरह क्षीण नहीं हुआ था। 8 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैली उस सभ्यता के मूल बाशिंदों से आर्य कहीं जूझ रहे थे, तो कहीं मैत्री का हाथ बढ़ा रहे थे। ऋग्वेद(7/99/4) में वृषशिप्र नामक दास का उल्लेख है, जिसमें विष्णु और इंद्र की स्तुति करते हुए कहा गया है—‘तुमने वृषशिप्र नामक दास की माया को संग्राम में विनष्ट किया है।’ एक मंत्र(ऋग्वेद-10/22/8) से आर्यों एवं अनार्यों के बीच भीषण संघर्ष का पता चलता है। युद्धरत आर्य इंद्र की स्तुति कर, उससे अनार्यों के विनाश के लिए प्रार्थना करते हैं—‘हम सब चारों ओर से दस्युओं से घिर चुके हैं। वे यज्ञ कर्म नहीं करते(अकर्मन)। न वे किसी वस्तु को मानते हैं(अमंतु)। उनके व्रत हमसे भिन्न हैं(अन्यव्रत)। वे मनुष्यों जैसा व्यवहार नहीं करते(अमांतुष)। हे शत्रुनाशक इंद्र! तू उन दासों का विनाश कर।’ जाहिर है, इस श्रेणी के ‘दास’ केवल नाम के दास थे—‘दासों और दस्युओं, दोनों ही के कब्जे में अनेक किलाबंद बस्तियां थीं….माना जाता है कि घुमक्कड़ आर्यों की आंखें दुश्मनों की बस्तियों पर संचित संपत्ति पर लगी हुई थीं। उसके लिए दोनों में सतत संघर्ष होता रहता था….ऐसे दो दास प्रमुखों का उल्लेख किया गया है कि जो धनलोलुप माने गए हैं। कामना की गई है कि इंद्र दासों की शक्ति को क्षीण करें तथा उनके द्वारा जमा की गई संपत्ति को लोगों में बांट दें।’4 

‘निरुक्त’ में ‘दास’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘दश्’ धातु से हुई है। इसका तात्पर्य संपन्न करना है। तदनुसार जो व्यक्ति अपने स्वामी के विविध कार्य संपन्न करता है, वह दास कहलाता है। इसका अर्थ ‘देना’ भी है। सवाल है कि दास का देने से क्या संबंध है? जिसकी देह पर भी उसके स्वामी का कब्ज़ा है, जिसे संपत्ति रखने का कोई भी अधिकार नहीं है, वह दूसरों को क्या देगा. ऋग्वैदिक काल के  ‘तरुक्ष’ और ‘बल्बूथ’ नामक अनार्य दास इस कसौटी पर खरे नजर आते हैं। श्रेणी में आते थे। ऋग्वेद में दोनों का उल्लेख दास-प्रमुख के रूप में हुआ है। ऋग्वेद(8/46/32) में लिखा गया है—‘मैंने बल्बूथ नामक दास से सौ गौ और अश्व प्राप्त किए थे।’ बल्बूथ की भांति तरुक्ष नामक दासप्रमुख का उल्लेख भी दानदाता के रूप में आया है। इन दोनों की ओर से पुरोहितों को जो उपहार दिए गए थे उससे उनकी बड़ी सराहना हुई थी।5 ऋग्वेद(8/19/36) में त्रसदस्यु को पचास युवतियां दान करते हुए बताया गया है। निश्चय ही वे युवतियां दासकर्म के निमित्त दान की गई होंगी। ऋग्वेद(10/33/4) में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा को भी श्रेष्ठ दाता बताया गया है—‘मैं कवष ऋषि हूं। मैं त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण राजा के पास याचना करने गया था; क्योंकि वे श्रेष्ठ दाता हैं।’ अथर्ववेद के आरंभिक अंशों में भी दासप्रथा का विवरण दिया है। उसमें दासियों के संबंध में प्रमाण मिले हैं। उसमें एक दासी का उल्लेख है जिसके हाथ भीगे होते थे। वह ओखल-मूसल कूटती थी; तथा गाय के गोबर पर पानी छिड़कती थी।6 

केवल संपदा नहीं, ज्ञान के क्षेत्र में भी दासों का हस्तक्षेप था। ऋग्वेद के उद्गाता ऋषियों में एक महत्त्वपूर्ण नाम कक्षीवान का है। उनका जन्म दीर्घतमस और उशिज नामक स्त्री जो दास कन्या थी, के संसर्ग से हुआ था। उशिज अंगदेश की महारानी की दासी थी। ऋग्वेद में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और लोकोपयोगी प्रसंग है, जुआरी का। उसके उद्गाता ऋषि कवष ऐलूष भी एक दासी की संतान थे। सूर्यकांत बाली ने ‘भारत गाथा’ में कवष ऐलूष को ‘वैदिक कविता को जमीन से जोड़ने वाला कवि’ कहा है। कवष के ऋग्वेद के दशम मंडल में कुल पांच(10/30-34) मंत्र हैं। जिनमें वह जुआरी की मनःस्थिति का वर्णन करता है। अंतः में उसे महत्त्वपूर्ण लौकिक संदेश तक ले जाता है—‘ओ जुआरी। जुआ मत खेल। मत खेल जुआ। जा अपने खेतों को देख। भार्या को देख। खेती करेगा तो धन आएगा। उसी से तुझे इज्जत मिलेगी। उसी से गौएं आएंगी। तेरी भार्या प्रसन्न होगी….घर जा। जुआ मत खेल।’ इस प्रसंग को महाभारतकार ने युधिष्ठिर के प्रसंग में ज्यों का त्यों अपना लिया गया है। बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में भौतिकवादी दर्शन अपने शिखर पर था। उस समय के पांच प्रमुख आजीवक चिंतकों में से एक पूर्ण कस्सप को दास बताया गया है। बाकी दो आजीवक विद्वानों अजीत केशकंबलि और मक्खलि गोसाल की समाजार्थिक स्थिति भी दास की तरह ही थी।

ऋग्वेद(1/24) में शुनःशेप का कथासूत्र आता है। उस कथा का विस्तार ऐतरेय ब्राह्मण, भागवत पुराण, ब्रह्मपुराण आदि में भी देखने को मिलता है। कहानी के अनुसार राजा हरिश्चंद्र संतान की आकांक्षा के साथ वरुण की प्रार्थना करता है। वरुण प्रसन्न होते हैं। परंतु उनका वरदान सशर्त है—‘तुम्हारे संतान तो अवश्य होगी। लेकिन उसके लिए तुम्हें बलि देनी होगी।’ वरदान के फलस्वरूप हरिश्चंद्र के रोहित नामक पुत्र का जन्म होता है। लेकिन राजा बलि देना भूल जाता है। आखिरकार उसे याद दिलाया जाता है। रोग से पीडि़ता, दारुण अवस्था में हरिश्चंद्र 100 गायों के बदले अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को बलि के लिए खरीद लेता है। बाद में विश्वामित्र उसकी रक्षा करते हैं।

ऋग्वेद(2/12/4) तथा अथर्ववेद(20/34/4) में कहा गया है कि इंद्र ने दासों को गुफाओं में रहने को बाध्य कर दिया था। अनार्य दासों को आर्य ‘असुर’ मानते थे(ऋग्वेद, 9/71/2)। उन्हें पराधीन बनाने की जिम्मेदारी इंद्र पर डाली गई है। इंद्र से दासों को पराधीन करने के लिए जिस तरह बार-बार प्रार्थना की गई है, उससे लगता है, कि यह संबोधन उस समय के पूरे आर्येत्तर समुदाय के लिए रहा होगा, जो आर्यों के आगमन के पहले से ही इस भूभाग पर रहते आ रहे थे। ऋग्वेद में ‘दास’ के अलावा ‘दस्यु’ शब्द का भी कई बार प्रयोग हुआ है। सामान्यत दासों एवं दस्युओं को एक मान लिया जाता है। लेकिन ऋग्वेद में दस्युहत्या के उल्लेख हैं, जबकि दासहत्या का कोई उल्लेख नहीं है। दासों की अपेक्षा दस्युओं के विनाश तथा उन्हें पराधीन बनाने की चर्चा अधिक की गई है। इंद्र से अनुरोध किया गया है कि वे दस्युओं से युद्ध कर उन्हें परास्त करें, ताकि आर्यों की शक्ति बढ़ सके। ऋग्वेद(4/30/21) के एक प्रसंग में 30 सहस्र दासों को माया द्वारा मूर्छित करने का उल्लेख है। इससे पता चलता है कि दस्यु भारत आर्यों के आने से पूर्व शासक कबीले थे। ऋग्वेद में दस्युओं की हत्या की चर्चा कम से कम 12 स्थानों पर हुई है। अधिकांश हत्याएं इंद्र द्वारा ही कराई गई है।7 अंतर्जातीय युद्धों में दासों को भी सहायक सेना के रूप भर्ती किया जाता था। बावजूद इसके ‘कृष्णवर्ण अनार्यों को पराजित करना हंसी-खेल न था। अनार्य अपनी बढ़ी-चढ़ी सभ्यता के साथ अपने दुर्गों में सुरक्षित थे। ऋग्वेद(1/4/1/3) में उनके सैकड़ों पुरों और दुर्गों का उल्लेख है। उनमें लोहे(आयसी, 2/58/8), पत्थर(अश्ममयी, 4/30/20), लंबे-चौड़े(पृथ्वी), विस्तृत(उर्वी), गउओं से भरे हुए(गोमती, अथर्व 8/6/23), सौ खंबों वाले(शतभुजी) तथा शरतकालीन जलौघ से बचाने वाले दुर्ग शामिल थे.

अनार्य दास काले रंग(कृष्ण-योनि) के और अनास या चपटी नाक वाले थे। इसके अलावा कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नताएं भी थीं; यथा—

1. उनकी भाषा वैदिक-संस्कृति से भिन्न थी जो स्पष्ट नहीं थी(मृध-वाक्)।

2. वे वैदिक कर्मकांड से शून्य थे।(अकर्मन)

3. वे वैदिक देवों को नहीं पूजते थे(अदेवयु)।

4. वे देवों के लिए भक्ति से रहित थे(अब्रह्मन्)।

5. वे यज्ञ से विरहित थे(अयज्वन्)।

6. वे वैदिक व्रतों का पालन नहीं करते थे।(अव्रत)।

7. उनके स्थान पर भिन्न प्रकार व्रतों या धार्मिक नियमों को मानते थे(अन्यव्रत)।

8. वे वैदिक देवों के निंदक थे(देवपीयु)।

9. वे लिंग की पूजा करते थे(शिश्नदेव)।

ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर और शत्रु हंता कहा गया है। इसलिए कि उसने अनार्यों के सैकड़ों दुर्गों को नष्ट किया था। हजारों हत्याएं की थीं। इंद्र ने ये हत्याएं क्यों कीं? इन्हें समझना कठिन नहीं है। आर्य अपने लिए बेहतर देश की खोज में भारत तक पहुंचे थे। भारत पहुंचने पर उनका सिंधुवासियों से सामना हुआ। जो अपनी नागरी सभ्यता पर गर्व करने वाले, भले और शांतिप्रिय लोग थे। आर्यों ने कहीं बलपूर्वक, तो कहीं सहयोग-समझौते से सिंधु सभ्यता के मूल निवासियों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ किया। इस कार्य में उन्हें जैसे-जैसे सफलता मिली, उनका लक्ष्य भी बदलता गया। राजनीतिक विजय के बाद उनका लक्ष्य था, देव-संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करना; तथा अनार्यों की श्रम संस्कृति, जिसका विकास कृषि के विकास के साथ-साथ हुआ था, को हेय सिद्ध कर, धीरे-धीरे नष्ट कर देना।

गौरतलब है कि अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक श्रेष्ठता को श्रेष्ठतम मानकर, पराजित समूहों को अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परिधि में लाने का काम लगभग सभी ब्राह्मणेत्तर धर्मों और संस्कृतियों में हुआ था। ईसाई और इस्लाम के अनुयायियों ने तो उसके लिए बल-बुद्धि दोनों का प्रयोग किया था। मगर ब्राह्मणों ने एकदम उलटा तरीका अपनाया था। वर्ण-व्यवस्था की मदद से उन्होंने न केवल आर्येत्तर समूहों को, अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी से दूर रखा, अपितु अपने ही एक हिस्से पर जिसे उन्होंने शूद्र की संज्ञा दी थी, ऐसे अनेक प्रतिबंध लागू कर दिए जिससे उनका सामाजिक जीवन, अत्यंत कष्टकारी होता गया। इसके पीछे आर्यों की कुंठा का योगदान भी रहा होगा। सिंधुवासी समृद्ध नागरी सभ्यता के उत्तराधिकारी थे, जो समकालीन संस्कृतियों से श्रेष्ठतम थी। 1500 ईस्वीपूर्व में आर्यों के आगमन तक, उसका प्राचीन वैभव यद्यपि क्षीण होने लगा था, तथापि घुमक्कड़ आर्यों की संस्कृति की अपेक्षा वे कहीं अधिक विकसित थे। यह जानते हुए कि भौतिक प्रगति के मामले में वे सिंधुवासियों से होड़ कर पाना असंभव है, आर्यों ने यज्ञ केंद्रित वायवी संस्कृति की नींव रखी। उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया। दावा करने लगे कि यज्ञादि के माध्यम से वे देवताओं से सीधे संवाद कर सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बुला भी सकते हैं। चूंकि उन दिनों सिंधु सभ्यता अपने अवसानकाल में थी, इसलिए एक समृद्ध सभ्यता के पराभव से निराश हुए सिंधुवासी धीरे-धीरे ब्राह्मणों की वायवी संस्कृति के प्रलोभन में फंसने लगे। ब्राह्मणों ने उन्हें आर्य संस्कृति में जगह दी, मगर इसके लिए उन्हें अपना आत्मसम्मान गंवाना पड़ा। ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र और दास के रूप में स्वीकार किया। दासों की कोई जाति नहीं थी। मगर कई शूद्र जातियों का सामाजिक स्तर शूद्र से भी बदतर था।

ऋग्वेद की कई ऋचाएं इसकी साक्षी हैं कि आरंभिक विजयों के साथ ही आर्यों को अपनी सांस्कृतिक विजय की चिंता होने लगी थी। वे अनार्यों के संसाधनों को कब्जाने के साथ-साथ उनकी संस्कृति को भी तहस-नहस कर देना चाहते थे। कभी छल तो कभी बल-पूर्वक वे लड़ाई को जीतते भी रहे। यह लड़ाई आसान नहीं थी। लोग ईसाइयों पर आरोप लगाते हैं कि मिशनरियों ने जनता के बीच जाकर लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाने, प्रलोभन देकर अपनी ओर मिलाने की कोशिशें कीं। वे इस्लाम के प्रसार हेतु जेहाद छेड़ने वाले मुस्लिमों को भी दोषी ठहराते हैं। जबकि भारत में सबसे पहला ‘जेहाद’ तो आर्यों ने अनार्यों के साथ किया था। बाद में वैसा ही जेहाद पुष्यमित्र शुंग ने वौद्धों का कत्लेआम करके किया था।

उपनिषदों में दासप्रथा

उपनिषदों को आमतौर पर दार्शनिक विमर्श के लिए जाना जाता है। कहा जाता है कि वेदों में जो दार्शनिक विचार सूत्र रूप में दिए हैं, उपनिषदों में आकर वे स्वतंत्र धारा का रूप ले लेते हैं। उपनिषदों में भी सबसे बड़ा है—छांदोग्योपनिषद। उसके चौथे अध्याय में राजा जानश्रुति और वायु को सृष्टि का मूल तत्व मानने वाले ऋषि रैक्व का संदर्भ आता है। रैक्व की ख्याति से प्रभावित जानश्रुति धर्मोपदेश की कामना के साथ अपनी पुत्री और धन-धान्य उन्हें भेंट कर देता है। उपनिषदों में ऐसे और प्रसंग भी हैं, जिनमें स्त्री के साथ दास जैसा व्यवहार किया गया है। कुछ विद्वान ऋग्वेद के दिवोदास को जो स्वयं कई ऋचाओं के उद्गाता थे, दासी-पुत्र मानते हैं।9

दासियों से मनोरंजन का काम लेने का भी उल्लेख है। तैत्तिरीय संहिता में सिर पर कलश रखकर नाचती-गाती हुई दासियों का वर्णन आया है। इसी ग्रंथ में दास के दान का भी उल्लेख है(2/2/6/3)। कठोपनिषद में दासियां नचिकेता को अपनी ओर लुभाने का यत्न करती हैं।11 ऐतरेय ब्राह्मण(39.8) में जिक्र आता है कि राजा ने राज्याभिषेक वाले पुरोहित को दस हजार दासियां और दस हजार हाथी दिए। वृहदारण्यकोपनिषद्(4.4.23) में आया है कि याज्ञवल्क्य से बृह्मविद्या की शिक्षा लेने के पश्चात जनक ने उनसे कहा, ‘विदेहों के साथ मैं स्वयं को दास बनने की कामना के साथ, आपको दान-स्वरूप प्रदान करता हूं।’ छांदोग्योपनिषद(7.24.2) में लिखा है, ‘इस संसार में लोग गायों, घोड़ों, हाथियों, सोने, खेतों, घरों एवं दासियों के साथ अपने घरों को समृद्ध करते हैं।’ इसी उपनिषद के एक प्रसंग में राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से कहा था—‘खच्चरों से जुता हुआ यह रथ, दासियों तथा हार सहित प्रस्तुत है।12 इससे पता चलता है कि ऋग्वेदयुगीन दास प्रथा का वेदोत्तरकाल में खूब विकास हुआ था। यह प्रथा तत्कालीन अभिजन समाज के लिए गर्व की बात थी। यहां तक कि स्वयं को तापस और साधक कहने वाले तथाकथित वेदज्ञ ब्राह्मण भी उससे बचे न थे। आरुणि जब अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा में पांचाल नरेश प्रवाहण जाबालि के निकट पहुंचे तो वहां गाय, अश्व, परिवार और परिधानों के अतिरिक्त ‘दासी’ भी मौजूद थी।13 

स्मृतिकालीन दासप्रथा

हिंदू धर्म में स्मृतियों का स्थान वेद-वेदांगों के बाद आता है। उन्हें हिंदू धर्म का आधारभूत ढांचा माना गया है। सभी धर्मशास्त्र, पुराण, महाकाव्य, सूत्र आदि स्मृतियों का अंग माने गए हैं। जहां तक दासप्रथा का सवाल है, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद, बृहस्पति, कात्यायन स्मृति सहित दोनों महाकाव्यों तथा अन्य धर्मशास्त्रों में उसका उल्लेख हुआ है। स्मृतियों का रचनाकाल बौद्ध धर्म के बाद से, चौथी शताब्दी तक फैला हुआ है। इस बीच दासों के कार्यक्षेत्र में भी वृद्धि हुई थी। गृह्मसूत्रों में सम्मानित अतिथियों के चरण धोने के लिए दासों की नियुक्ति का उल्लेख है। मनु(1.91, 8.413-414) के अनुसार शूद्रों का प्रमुख कर्तव्य है, उच्च वर्णों की सेवा करना। उसके बाद उसने जो व्यवस्थाएं की हैं, उनमें अधिकांश वही हैं, जो दासों के लिए थीं। धन-संचय का अधिकार न शूद्रों को था, न ही दासों को। यदि कोई शूद्र अथवा दास संपत्ति संचय में सफल हो जाए तो उसकी संपत्ति को छीनकर ब्राह्मणों को देने का नियम था। जैसे कुम्हार की संतान कुम्हार, जुलाहे की जुलाहा कही जाती थी, ठीक उसी प्रकार दास की संतान भी दास कहलाती थी। अंतर बस एक था। विशिष्ट परिस्थितियों में दास को स्वतंत्र किया जा सकता था। वह सामान्य जीवन जी सकता था। परंतु शूद्र को अपने जातिगत पेशे से हटकर काम करने की अनुमति नहीं थी। यहां तक कि आजाद होने के बाद भी दास पर उसकी जाति चिपकी रहती थी।

स्मृतिकाल तक दास प्रथा सांस्थानिक रूप ले चुकी थी। दास-दासियों को लेकर कानून बनाए जाने लगे थे। याज्ञवल्क्य किसी दास के साथ विवाद न करने की सलाह देते हैं। वहीं जैमिनी(6.7.6) ने शूद्रों के दान को निषिद्ध माना है, जबकि मनु ने शारीरिक दंड की व्यवस्था में दास एवं पुत्र को एक ही श्रेणी में रखा है(8.299-300)। आपस्तंबधर्मसूत्र(2.4.9.11) में आया है कि अतिथि के अकस्मात पहुंच जाने पर, खुद को, स्त्री या पुत्र को भूखा रखा जा सकता है, किंतु उस दास को नहीं, जो रात-दिन सेवा में लिप्त रहता है। नारद के अनुसार गृहस्वामी चाहे तो दास को पुत्र की भांति अपनी संपत्ति का एक हिस्सा प्रदान कर सकता है। वर्ण-व्यवस्था के बंधन दासों पर भी उसी प्रकार लागू होते थे। याज्ञवल्क्य (2.183) तथा नारद (39) के अनुसार ब्राह्मण के अतिरिक्त बाकी तीनों वर्ण ब्राह्मण के दास बन सकते थे। क्षत्रिय के दास केवल वैश्य अथवा शूद्र बन सकते थे। क्षत्रिय किसी वैश्य या शूद्र का तथा वैश्य शूद्र का दास नहीं सकता था। कात्यायन ब्राह्मण के दासत्व ग्रहण करने पर थोड़ी छूट प्रदान करते हैं। उनके अनुसार ब्राह्मण किसी ब्राह्मण का भी दास नहीं बन सकता। यदि बनना ही चाहता है तो उसे किसी चरित्रवान, एवं वैदिक ब्राह्मण का दास बनने की अनुमति है। वह भी केवल पवित्र कार्यों के लिए।14 कात्यायन(7.33) ने व्यवस्था थी कि संन्यास से भटके हुए ब्राह्मण को राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए। लेकिन संन्यास भ्रष्ट क्षत्रिय एवं वैश्य राजा के दास होते हैं। कौटिल्य(3.13) एवं कात्यायन(7.23) के अनुसार यदि स्वामी दासी से संसर्ग करे और संतानोत्पत्ति हो तो दासी एवं पुत्र दोनों को दासत्व से मुक्ति मिल जाती है। दास की गवाही अमान्य थी। परंतु विशिष्ट परिस्थिति में जब कोई अन्य साक्ष्य अनुपलब्ध हो तो मनु(8.70) ने नाबालिग, स्त्री, नौकर आदि के साथ दास की गवाही को भी मान्य ठहराया है।

स्मृतिकाल तक दासों की कई कोटियां बन चुकी थीं। मनुस्मृति(8.415) में 7 प्रकार के दासों का उल्लेख है। कौटिल्य का मत भी मिलता-जुलता है, जबकि नारदस्मृति दासों की 15 कोटियों की लंबी सूची प्रस्तुत करता है—‘1. घर में पैदा हुआ, 2. खरीदा हुआ।, 3. दान अथवा किसी अन्य प्रकार से प्राप्त, 4. वसीयत से प्राप्त, 5. अकाल में रक्षित, 6. किसी अन्य स्वामी द्वारा प्रतिश्रुत, 7. बड़े ऋण से युक्त, 8. युद्धबंदी, 9. बाजी में जीता हुआ, 10. ‘मैं आपका हूं’ कहकर दासत्व ग्रहण करने वाला, 11. संन्यास से च्युत, 12. जो कुछ दिनों के लिए स्वेच्छापूर्वक दास बना हो, 13. भोजन के लिए दास बना हुआ, 14. दासी के प्रेम से आकृष्ट(बड़वाहृत) तथा 15. स्वयं को बेच देने वाला।15  

‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार स्मृतिकाल में दासों की खरीद-फरोख्त, उन्हें दान में लेने-देने, गिरवी रखने का प्रचलन बढ़ चुका था। कौटिल्य ने लिखा था कि प्रत्येक स्वतंत्र परिवार उदरदास(दास के पेट से उत्पन्न संतान) अवश्य रखता है। दास अपने स्वामी की संपदा कहे जाते थे। उन्हें गिरवी रखा जा सकता था। यहां तक कि उनकी हत्या भी की जा सकती थी। दासों को न्यूनतम न्याय देने के लिए स्मृतियों में कुछ अनुशंषाएं की गई थीं। परंतु व्यवहार में उनका उपयोग बहुत कम हो पाता था। इसलिए स्वामी द्वारा दास पर दंडात्मक कार्यवाही के विरुद्ध किसी अदालत में सुनवाई नहीं थी।16 

उन दिनों दासों का जीवन अत्यंत कष्टकारी होता था। बीमार पड़ जाने पर उनके लिए इलाज की कोई व्यवस्था न थी। नियमानुसार दास अपना मूल्य चुकाकर अपनी आजादी खरीद सकता था। परंतु व्यवहार में ऐसा संभव ही नहीं था। इसलिए दास और उसका परिवार मालिक के लिए जो भी परिश्रम और धनार्जन करता था, उससे उत्पन्न आय उसके स्वामी की मानी जाती थी। दास का अपनी आय का कोई स्रोत नहीं था। इसलिए उसकी आजादी, सिवाय किसी चमत्कार के, असंभव जैसी थी। मुक्ति की चाहत में कई बार कुछ दास अपने स्वामी का घर छोड़कर भाग भी जाते थे। दास पर अत्याचार के समय मौन रहने वाला, उसके विरुद्ध मनमानी दंडात्मक कार्यवाही को दास-स्वामी का विशेषाधिकार मानने वाला राज्य, उस समय एकाएक बीच में कूद पड़ता था। राज्य के कर्मचारी भगोड़े दास को पकड़कर पुनः उसके स्वामी के सुपुर्द कर देते थे। खुद को गिरवी रखने वाला व्यक्ति यदि घबराकर भाग जाता तो उसे जीवन-भर के लिए दास बना लिया जाता था। मालिकों द्वारा दासियों का मान-भंग करने तथा उन्हें दूसरों के आगे पेश करना तो शान की बात मानी जाती थी।

स्मृतिकाल के दौरान दास-प्रथा पर काफी लिखा गया है। विशेषकर नारद और कात्यायन स्मृति में। नारद ने दूसरों की सेवा करने वाले(शुश्रूषक) को पांच भागों में बांटा है—1. वैदिक छात्र, 2. अंतःवासी, 3. पर्यवेक्षक(अधिकर्मकृत), 4. भृतक, तथा 5. दास। इनमें प्रथम चार को कर्मकार कहा जाता था। पवित्र कार्यों के समय उन्हें आवश्यकतानुसार बुलाया जा सकता था। दासों के लिए काम की कोई तय सूची नहीं थी। उनसे कोई भी काम लिया जा सकता था। नारद स्मृति(6.7) के अनुसार दासों के कुछ सामान्य कार्य थे—‘साज-सफाई करना, यथा झाड़ू लगाना, गंदे गड्ढों, मार्ग, गोबर, कूड़ा, तालाब आदि की सफाई करना गुप्तांगों को खुजलाना, मल-मूत्र फेंकना आदि। गौतम धर्मसूत्र(2.1.59) में भी ‘पुरुष दासादयः वंशोवंध्या’ कहकर समाज के उच्च वर्गों की सेवा को उनका कर्तव्य कहा गया है।

दासों के छूटने के नियम तथा उसके मुक्त होने की पूरी पद्धति थी। याज्ञवल्क्य(2.182) के अनुसार यदि दास किसी हमले या दुर्घटना के कारण स्वामी के संकट में पड़े जीवन की रक्षा कर ले, तो उसे मुक्त किया जा सकता है। नारद ने भी इसकी पुष्टि की है। दासत्व से मुक्ति का प्रावधान भी धर्मशास्त्रों में दिया गया है। नारद स्मृति के अनुसार स्वामी जल से भरे मिट्टी के एक घड़े को दास के कंधे से उतारकर उसे तोड़ डालता था। तदनंतर अन्न एवं पुष्पमिश्रित जल को दास के सिर पर छिड़कते हुए तीन बार उसके स्वतंत्र होने की घोषणा करता था।17 ध्यातव्य है कि यूनानी लेखक  मेगस्थनीज, जो चंद्रगुप्त मौर्य की सभा में सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था—ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में भारत में दासप्रथा की मौजूदगी से इन्कार किया है। जबकि उस दौरान लिखे जा रहे सभी धर्मग्रंथ दास प्रथा की मौजूदगी का समर्थन करते हैं।

महाकाव्यों में दास प्रथा

भारतीय जनमानस में रामायण और महाभारत की बड़ी प्रतिष्ठा है। इनमें रामायण को महाभारत से पहला माना जाता है। परंतु जिस तरह उसमें ब्राह्मणवाद मुखर होकर आया है, वह बौद्ध धर्म से पहले की रचना नहीं हो सकती। अपने वर्तमान स्वरूप में दोनों ही ग्रंथ पुष्यमित्र शुंग के बाद की रचना है। हालांकि उनके कुछ कथासूत्र प्राचीन हो सकते हैं। ईसा पूर्व पांचवी-छठी शताब्दी में आजीवकों और बौद्धों की ओर से मिल रही चुनौतियों के कारण आभाहीन हो चुका ब्राह्मण-धर्म, अनुकूल माहौल में अपने राजनीतिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनःस्थापित करने में लगा था। इसके लिए समर्थन और विरोध दोनों नीतियों पर काम जारी था। एक ओर बुद्ध को दसवें अवतार के रूप में प्रतिष्ठित करके उनके विचारों को भारतीय धर्म-दर्शन की शाखा के रूप में मान्यता दी जा रही थी, दूसरी ओर ब्राह्मण धर्म को मजबूत करने के लिए वर्ण-व्यवस्था को दैवीय घोषित करने वाले ग्रंथ रचे जा रहे थे। उन सबका एकमात्र उद्देश्य था, जनसाधारण को यह विश्वास दिलाना कि ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है और वर्ण-व्यवस्था उसका आदर्श विधान है।

जो लोग रामायण और महाभारत की अतिप्राचीनता का दावा करते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि रामायण का मूल संस्करण, जिसे वाल्मीकि ने ‘पुलत्स्य वध’ शीर्षक से लिखा था, वह अनुपलब्ध है। महाभारत के पूर्व संस्करणों ‘जय’, ‘विजय’ और ‘भारत’ के बारे में भी हमारी जानकारी शून्य है। यहां तक कि हम उनकी शैली और कथा-वस्तु के बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कह सकते। लेकिन इतना अवश्य कह सकते हैं कि इनके मूल कथानक अपने समय की साहित्यिक संपदा रहे होंगे। बाद की कृतियों में राम का अतिमानवीकरण, गौतम बुद्ध की श्रीलंका तथा पड़ोसी देशों में ‘धम्म विजय’ के बाद, ब्राह्मणों के मन में जन्मी कुंठा की सृजनात्मक परिणति थे। यह काम बौद्ध धर्म के कमजोर होने के बाद ही संभव था।

महाभारत में जिस प्रकार गणसंघों का प्रमुखत: उल्लेख हुआ है, वह रामायण में मौजूद समाज से करीब 200-300 वर्ष पुराने समाज की प्रतीति कराता है। उन दिनों भारत में गणराज्य काफी मजबूत अवस्था में थे। महाभारत छोटे राज्यों की अप्रासंगिकता को भी दर्शाता है। भारतीय समाज में यह बोध सिकंदर के आक्रमण के बाद बना था। उल्लेखनीय है कि सिंकदर के आक्रमण से पहले भी भारत पर यूनान की तरफ से दो बड़े हमले हो चुके थे। उनमें पहला हमला असीरिया की साम्राज्ञी सेमिरामिस की ओर से था। दूसरा आक्रमण ईरान के प्रसिद्ध विजेता कुरु की ओर से। कुरु को अंग्रेजी में साइरस लिखा जाता है। कुरु ने काबुल से लेकर इराक, शाम, टर्की, बेबिलोन, मिस्र तथा यूनान के कुछ हिस्से पर अपनी विजय पताका लहराई थी। भारत पर आक्रमण के बाद उसे सेमिरामिस की तरह ही शर्मनाक पराजय का रूप देखना पड़ा था। कुरु की मृत्यु भारतीय योद्धा के हाथों ही हुई थी। सिंकदर का आक्रमण इन सबमें बड़ा था। मगर उसका सामना चंद्रगुप्त मौर्य जैसे राजा से था, जिसके पास विश्व की सबसे विशाल सेना थी। उसमें छह लाख से ज्यादा पैदल सिपाही थे। चंद्रगुप्त ने उसमें से पांच लाख सैनिक सिंकदर से लड़ने के लिए उतारे थे। भारतीय कवियों, लेखकों ने पहली बार बड़ी सेना को दुश्मन से लोहा लेते हुए देखा था। उसी से बड़े राज्यों की अवधारणा ने जन्म लिया। कदाचित वही महाभारत की  18 अक्षौहिणी सेना के मिथ की प्रेरणा बना। उसका परिणाम रामायण और महाभारत के उपलब्ध आख्यानों के पुनर्लेखन के रूप में सामने आया। उसके बाद भी इन दोनों ग्रंथों में शताब्दियों तक प्रक्षेपण होते रहे हैं। दो हजार वर्ष पहले तक भारत में दास प्रथा, सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक अंग बन चुकी थी। इसलिए रामायण और महाभारत में उनका खूब उल्लेख हुआ है। तत्कालीन परिस्थितियों में इतनी बड़ी सेना का खर्च उठाने के लिए भारी-भरकम अर्थव्यवस्था; तथा उसके लिए दासप्रथा का होना अपरिहार्य जैसा था। इसके प्रमाण इन दोनों महाकाव्यों में उपलब्ध हैं।  

रामायण में राम के चरित्र को उदात्त बताया गया है। तुलसी उसे ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ तक कह जाते हैं। तुलसी के लिए ‘मर्यादापुरुषोत्तम’ का मतलब ब्राह्मणवादी संस्कृति और वर्णव्यवस्था के प्रति अंध-समर्पण है। दास-दासियों के मामले में भी वह ठेठ परंपरावादी हैं। इसलिए विवाह में खुशी-खुशी दहेज लेते हैं। बकौल तुलसीदास—‘दहेज इतना अधिक था कि उसका वर्णन संभव ही नहीं है। स्वर्ण आभूषणों तथा मणियों से मंडप भर गया था। वहां हाथी, स्वर्णाभूषण, माणिक-मणियां, घोड़े, दास और दासियां तथा अलंकारों से सजी कामधेनु सरीखी बहुत-सी गौएं थीं।’

‘कहि न जाय कछु दायज भूरी, रहा कनक मणि मंडप पूरी

गज रथ तुरग, दास अरु दासी, धेनु अलंकृत काम दुहासी।

इस बात से वाल्मीकि भी इत्तफाक रखते हैं। राम के विवाह में दिए गए दहेज का वर्णन करते हुए वे भी गदगद हो जाते हैं—‘कन्या के पिता जनक ने दास-दासियों सहित, सोने, मोती-माणिकों और मुद्राएं दहेज में अर्पित की थीं।’18 यह तो राजा जनक द्वारा वरपक्ष यानी राम और उसके परिवार को दिए गए दहेज का वर्णन है। इसके अलावा उन्होंने सीता और अपनी बाकी पुत्रियों को भी सौ-सौ कन्याएं तथा उत्तम दास-दासियां दहेज के रूप में प्रदान की थीं। उत्तरकांड में अयोध्या के सामंत और छोटे राजाओं ने दासियां प्रदान की थीं।19 उन दिनों गुरु लोग आश्रमवासी हुआ करते थे। परंतु दासियों का दान लेने से उन्हें भी इन्कार न था। सो मर्यादापुरुषोत्तम गुरु, ब्राह्मणों और आचार्यों को कैसे भूल जाते। खुशी का अवसर नहीं था। वनवास के लिए निकलना था। राजमहल में क्लेश व्याप्त था। फिर भी गुरु को प्रसन्न करने के लिए राम ने उन्हें अपने दास-दासियों को भेंट कर दिया था—‘दासी-दास बोलाइ बहोरी, गुरहि सौंपि बोले कर जोरि’ (रामचरितमानस, अयोध्याकांड)। दशरथ का महल दास-दासियों से भरा हुआ था। राम का भवन हो या लक्ष्मण का; या फिर भरत की आरामगाह हो। सभी जगह दास-दासियों की भरमार थी। कैकई तो मंथरा नामक दासी को मैके से अपने साथ लेकर आई थी। चूंकि मंथरा के लिए कैकई ही उसकी स्वामिनी और सबकुछ थी। इसलिए वह चाहती थी कि भरत ही अयोध्या का भावी सम्राट बने। हनुमान का अपना आचरण दासत्व को पूरी तरह स्वीकार लेने वाला प्राणी जैसा है। उसकी अष्ठ सिद्धियां और नवनिधियां राम के चरणों में पड़े-पड़े गारत हो जाती हैं। शुनःशेप की कहानी रामायण में कुछ और विस्तार से प्रस्तुत है।

रामायण में हमारा तीन समाजों और संस्कृतियों से वास्ता पड़ता है। पहला अयोध्या और उसकी संस्कृति है। दूसरी किश्किंधा और तीसरी लंका की। किश्किंधा में बालि, सुग्रीव अंगद जैसे नेता हैं। वे आखेटक समुदाय से हैं जो प्रकृति से अपना भोजन जुटाते थे। बालि के राज्य में अथवा सुग्रीव के ठिकाने पर किसी दास के दर्शन नहीं होते। आवश्यकता पड़ने पर सभी वानर स्वेच्छा से राम की सेना में भागीदारी करते हैं। उनमें पदानुक्रम तो है परंतु दास और अदास का विभाजन नहीं है। लंकाकांड के दौरान हनुमान राम का संदेश लेकर लंका जाता है। वहां का वैभव देखकर वह हतप्रभ रह जाता है। लंका के सभी घर बराबर थे। धन-धान्य और वैभव से भरपूर। रामायण में लंका की अर्थव्यवस्था के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। मगर जिस तरह की समृद्धि का वर्णन हनुमान करता है, उससे पता चलता है कि वहां अवश्य ही व्यापार केंद्रित अर्थव्यवस्था रही होगी, जबकि अयोध्या का समाज कृषि-केंद्रित था। जहां तक दास-दासियों का सवाल है, उनका उल्लेख न तो किश्किंधा के वानर समाज में था, न ही लंका के राक्षसों के बीच। यहां तक कि रावण के दरबार में भी किसी दास या दासी का उल्लेख नहीं है। अशोकवाटिका में राक्षसियां पहरा देती थीं। मगर वे सभी अनुचरी थीं। यह भी संभव है कि दास प्रथा को शान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, इस कारण वाल्मीकि और तुलसी दोनों ने वहां दासों की कल्पना न की हो। यह बात पात्रों के चरित्र-चित्रण में भी नजर आती है। रावण के दरबारी जरूरत पड़ने पर अपने राजा से बहस करते, उसे समझाते हैं। राम के दरबारियों को यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। वहां सिर्फ ‘हां’ में ‘हां’ मिलाने और जय-जयकार करने का अवसर था। कह सकते हैं कि समाज का दासभाव दरबारियों के चरित्र की भी विशेषता था, इसलिए वहां दास-प्रथा के मजबूत होने के सभी अवसर थे। रामायण का आदर्श भी ऐसा ही समाज है, जहां कुछ लोग मालिक हों और बाकी लोग दास जैसा आचरण करते हों।

महाभारत के नायक कृष्ण हैं। वे अंधक गणराज्य के मुखिया है। गणतंत्र में भरोसा रखते हैं। इसलिए दासत्व के लिए उनके यहां वैसी जगह नहीं है, जैसी राम के यहां हैं। कृष्ण स्वयं अपने साथियों-सहयोगियों के साथ मैत्री-भाव रखते हैं। मगर कृष्ण के देवत्व को मान्यता देने वाले ब्राह्मण उन्हें खुली छूट देने को तैयार नहीं थे। इतिहासचक्र के अचानक घूम जाने की बात है जिससे ब्राह्मणों को एक ग्वाले के देवत्व को स्वीकारना पड़ा। फिर भी इतना ध्यान उन्होंने रखा कि वे ब्राह्मण विरोधी न दिखें। ऋग्वेद में इंद्र को चुनौती देने वाले कृष्ण का नया रूपाकार ब्राह्मणवाद का आराधक हो, इस कारण उन्हें सुदामा के पैर धोते हुए दिखाया गया है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अतिथियों के पांव धोने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को ओटनी पड़ी। महाभारतकार उसी का महिमा मंडन करता है। यदि अतिथियों के पांव-प्रक्षालन करना इतना ही पुनीत कार्य था तो यह काम किसी ब्राह्मण को क्यों नहीं सौंपा गया? अथवा वह जिम्मेदारी युधिष्ठिर या उसके किसी भाई न स्वयं क्यों न संभाल ली? महाभारत में इस सवालों के लिए कोई जगह नहीं है। वैसे भी, जहां धर्म होता है, वहां सवाल या शंकाएं नहीं होतीं। केवल आस्था होती है। आंख मूंदकर विश्वास करना पड़ता है। अगर सवाल होते तो महाभारत धर्मयुद्ध कभी न बन पाता।

महाभारत में दास प्रथा का उल्लेख अनेक अवसरों पर हुआ है। हमने आरंभ में ही बता दिया है कि राजसूय यज्ञ कराने के उपलक्ष्य में युधिष्ठिर ने 88,000 ब्राह्मण पुरोहितों में से प्रत्येक को तीस दासियां उपहार स्वरूप दी थीं। वनपर्व में दिया है कि वैन्य ने अत्रि को एक हजार सुंदर दासियां प्रदान कीं।20 विराटपर्व(18.21) में 30 दासियां दान करने का एक और उल्लेख आया है। दासों का वर्णन जितना खुलकर दिया गया है, उससे लगता है कि समाज में शूद्र और दास में बहुत अंतर नहीं था। सभापर्व में युधिष्ठिर के महल में एक लाख दासियां होने का वर्णन हुआ है। यह वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकता है। संभव है हस्तिनापुर की कुल शूद्र स्त्रियों को ही युधिष्ठिर की दासी मान लिया हो। क्योंकि आगे उसमें लिखा है कि युधिष्ठिर अपनी दासियों का अनुरोध सुनने के लिए सदैव तत्पर रहता था। विराटपर्व(7.17) के अनुसार पांडवों के निजी कक्ष भी दास-दासियों से समृद्ध थे।। दास-दासियों की संख्या को लेकर यह अतिरंजना अन्य स्थानों पर भी पाई जाती है। उदाहरण के लिए देवयानी और शर्मिष्ठा के विवरण को ही लें। उन दोनों की एक-एक हजार दासियां बताई गई हैं। उन दिनों दहेज में दास-दासियां देने का चलन था। द्रोपदी के विवाह में भी द्रुपद की ओर से पांडवों को बड़ी संख्या में दासियां दी गई थीं।21 महाभारत काल में दास-दासियों की उपस्थिति के प्रचुर प्रसंग हैं। दुर्योधन के साथ जुआ खेलते समय युधिष्ठिर ने दावा किया था कि उसके पास एक लाख तरुण दासियां हैं। वे सुंदर हैं। सुवर्णमय मांगलिक आभूषण तथा मनोहारी वस्त्र धारण करती हैं। मणि और स्वर्णाभूषणों से लदीं, चौसठ कलाओं में निपुण उन दासियों को युधिष्ठिर अपना धन मानते थे।22 

महाभारत एक वृहद ग्रंथ है। उसके भीतर अनेक उपकथाएं समाहित हैं। कद्रु-वनिता, नल-दमयंती, देवयानी, शर्मिष्ठा जैसे उपाख्यानों में भी दास प्रथा का उल्लेख है। इसमें भी नल-दमयंती का प्रकरण इतना रोचक है कि वह स्वतंत्र लोककथा के रूप में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ख्यात रहा है। इस उपकथा में भी जुए की बुराई को दर्शाया गया है। नल-दमयंती आख्यान के अंतिम हिस्से में पुष्कर जुए में खुद को हार जाता है। परिणामस्वरूप उसे अपनी स्वतंत्रता लुटाकर दास बनना पड़ता है। कालांतर में वह पुनः मुक्त हो जाता है। उन दिनों एक नियम यह भी था कि युद्ध में पराजित को, विजेता का दासत्व स्वीकारना  वह आमतौर पर तब तक रहता था, जब तक फिरौती या बदले में कुछ हासिल न हो जाए।23 प्राय:  विजेता को प्रसन्न करने के लिए बाकी भेंटों के अलावा दासियां भी भेंट की जाति थीं, इस कारण उन दिनों दास-दासियां प्रचुर संख्या में होती थीं।  महाभारत(3.76.77)। लोपामुद्रा की सेवा में 1000 दासियां रहती थीं। एक प्रसंग में च्यवन ऋषि मछुआरे के जाल में फंसकर उसकी संपत्ति बन जाते हैं। आखिरकार एक राजा उन्हें खरीदकर उनकी स्वतंत्रता वापस दिलाता है। भरत दक्षिणा स्वरूप दासों की भेंट करते हैं। असल में वह शक्तिशालियों का समाज था। स्त्री, पुरुष, धन-धान्य, पशु, भूमि कुछ भी हो, इन सभी को ताकत के बल पर जीता जा सकता था। जीतने के बाद वे विजेता की संपत्ति मान लिए जाते थे। ताकत का बोलबाला था। जो ताकतवर था, वह लोगों गरीबों, विपन्नों और कमजोरों को कैद करने, उन्हें दास बनाने यहां तक कि हत्या करने की धमकी भी देते रहते थे। दास का कर्तव्य था, अपने प्राणों पर खेलकर भी अपने स्वामी के आदेश का पालन करना। कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान एक अवसर ऐसा आता है जब भीष्म(भीष्मपर्व 4.15.534) कृष्ण को अपना स्वामी मानकर अपने हथियार डाल देते हैं—‘हे प्रभो! तुम मुझ पर चाहे जैसे आक्रमण करो, मैं तुम्हारा दास हूं।’ युधिष्ठिर द्वारा खुद को तथा अपने भाइयों को दाव पर लगा देने के बाद, पांडवों की स्थिति भी दास जैसी बन चुकी थी। दास बनने के साथ ही वे अपनी इच्छाएं, अपनी स्वतंत्रता और विरोध की क्षमता भी गंवा चुके थे। उनके शरीर, इच्छाएं सभी कुछ दुर्योधन के अधीन हो चुके थे, जिसने उन्हें जुए में जीता था। एक स्थान पर आता है कि पुत्र, पत्नी और दास का संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता, क्योंकि उनपर क्रमशः पिता, पति और स्वामी का अधिकार होता है।

दास प्रथा में स्त्रियों की और भी अधिक दुर्दशा होती थी। प्राचीन मनीषी मानते थे कि कन्या गिरवी रखे आभूषण की तरह है, जिसे मांगे जाने पर उसके वास्तविक स्वामी को वापस लौटाना ही धर्म है। इस धारणा का विकृत विस्तार मंदिरों में देवदासी प्रथा के रूप में मिलता है जिसमें ईश्वर को समर्पित करने के नाम पर नन्ही बालिकाएं मंदिर के पुजारियों को सौंप दी जाती थीं। महाभारत में एक और प्रसंग आया है जो उस समाज में स्त्री की दुर्दशा को दर्शाता है, जिसके अनुसार स्त्री की हैसियत उस समाज में दास और कहीं-कहीं तो उससे भी बदतर थी। विश्वामित्र ने ऋषि गालव से गुरु दक्षिणा के रूप में 800 श्यामकर्णी घोड़ों की मांग की। 800 श्यामकर्णी घोड़ों का प्रबंध करना हंसी-खेल नहीं था। अगर इससे दस गुनी दासियां मांगी होतीं तो कोई भी राजा पलक झपकते इंतजाम कर देता। लेकिन 800 श्यामकर्णी घोड़े! परेशान गालव अपने मित्र गरुड़ से मिला। गरुड़ ने उसे सम्राट ययाति के पास जाने की सलाह दी। ययाति के पास श्यामकर्णी घोड़े तो थे नहीं। परंतु द्वार पर आए याचक को लौटाए कैसे? अंतत: उसने माधवी नामक अपनी सुंदर पुत्री गालव ऋषि को सौंपते हुए कहा—

‘हे महर्षि! यह मेरी कन्या है। यह अपूर्व सुंदरी, लावण्यमयी एवं सर्वगुणसंपन्न है। तीनों लोकों में ऐसा कोई भी नहीं जो इसे वरण करने की इच्छा न रखता हो। इसमें सुर, नर, किन्नर, आर्यों, अनार्यों सभी को सम्मोहित करने की अभूतपूर्व शक्ति है। मैं इस कन्या को आपको अर्पित करता हूं। इसे किसी भी राजा के पास बेचकर आप आसानी से गुरु दक्षिणा का इंतजाम कर सकते हैं।’24

मानो लड़की न होकर कोई ‘हुंडी’ हो। अपने मित्र गरुण के साथ गालव माधवी को लेकर अयोध्या नरेश हर्यश्व के दरबार में पहुंचा। हर्यश्व के कोई पुत्र नहीं था। ऋषि ने दो सौ श्यामकर्णी अश्वों के बदले माधवी को उसके हवाले कर दिया—‘आप इससे एक पुत्र उत्पन्न कर लें।’(उद्योगपर्व 116.15)। हर्यश्व के माधवी से वसुमना नामक पुत्र पैदा हुआ। कुछ समय बाद गालव ने हर्यश्व से मालती को वापस ले लिया। तदनंतर उस ‘हुंडी’ को लेकर वह राजा दिवोदास के पास पहुंचा। वहां भी दो सौ घोड़ों के बदले उसने लड़की राजा को सौंप दिया(उद्योगपर्व 117.7)। दिवोदास के यहां माधवी से प्रतर्दन नामक पुत्र का जन्म हुआ। निश्चित अवधि के बाद गालव पुन: राजा दिवोदास के दरबार में जा धमका तथा उससे माधवी को वापस ले लिया। तदनंतर वह राजा उशीनर से मिला। राजा उशीनर से भी 200 घोड़े लेकर उसने माधवी को सौंप दिया। उशीनर और माधवी के संयोग से शिवि नामक पुत्र का जन्म हुआ। अब तक गुरु दक्षिणा के 600 घोड़ों का प्रबंध हो चुका था। बाकी दो सौ का प्रबंध कहां से किया जाए? आखिरकार गालव माधवी को लेकर विश्वामित्र के पास पहुंचा और पूरी कहानी सुनाने के बाद, उसने 200 घोड़ों के बदले माधवी को रखने को कहा। मेनका को देखकर आपा खो देने वाला विश्वामित्र भला क्यों इन्कार करता! उसने माधवी को रख लिया। दोनों के संयोग से अष्टक नामक पुत्र का जन्म हुआ(उद्योगपर्व 118.3-8)। बाद में गालव माधवी को उसके पिता के पास वापस लौटाने पहुंचता है। ययाति ने माधवी का स्वयंवर करने की इच्छा प्रकट की। अनिच्छा से चार अलग-अलग पुरुषों की संतान को जन्म देने के बाद बुरी तरह टूट चुकी माधवी ने विवाह से इन्कार कर, संन्यास धारण कर लिया।

इस घटना में माधवी की स्थिति दासी से भी बदतर है। सामान्य दासी का अपनी संतान पर अधिकार होता था। परंतु इस कहानी में माधवी पशुवत एक राजा से दूसरे राजा तक ले जाई जाती है। ले जाने वाला एक ऋषि है और उसका भोग करने वाले उस समय के प्रतिष्ठित राजा हैं, जिनपर न्याय की रक्षा का भार होता है।   

बौद्धकालीन दासप्रथा

बौद्ध धर्म में अष्ठधम्म पद गृहस्थ जनों के लिए आचारसंहिता है। इसका पांचवा ‘धम्म’ ‘सम्यक आजीव’ है। बौद्ध धर्म गृहस्थ जनों के लिए धनार्जन का निषेध नहीं करता। किंतु चोरी, डकैती, हिंसा, लूटमार जैसे दूसरों के लिए कष्टकारी कार्यों द्वारा अर्जित धन को उसमें वर्ज्य माना गया है। ‘अपण्णकसुत्त’ में कहा गया है—‘वही व्यक्ति न्यायपथ पर है, जिसका मस्तिष्क शुद्ध एवं सात्विक है। जो अपने मन को प्रसन्न रखता है, तथा दास अथवा दासी रखने से बचता है।’ दीघनिकाय, ‘सामञ्ञफलसुत्त’ में ‘संतोष’ की स्थितियों का वर्णन करते समय कहा गया है—‘जैसे महाराज कोई पुरुष दास हो। जो पराधीन हो। जिसे अपनी इच्छा से कहीं भी आने-जाने का अधिकार न हो। समय आने पर जब वह दासता से मुक्त हो जाए। स्वतंत्र, अपराधीन, यथेच्छगामी हो जाए। तब उसके मन में ऐसे भाव होने के साथ प्रसन्न एवं आनंदित होना चाहिए—‘मैं पहले दास था, अब स्वतंत्र हूं। जहां जी चाहे वहां जा सकता हूं।’ भिक्षु संघ के नियमों के अनुसार समाज का कोई भी व्यक्ति उसकी दीक्षा ग्रहण कर सकता था। परंतु सैनिक,कर्जदार, दास आदि को भिक्षु संघ में शामिल होने के लिए संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेनी पड़ती थी। 

अंगुत्तर निकाय(5.177) के अनुसार बुद्ध ने पांच प्रकार की आजीविकाओं, जो दूसरों के लिए कष्टकारी हो सकती हैं, को अपनाने से मना किया है। जैसे हथियारों, विष, दास-दासी, वेश्यावृति, मांस तथा उसके उत्पादों की खरीद-बिक्री द्वारा अर्जित धन। इसका आशय यह नहीं है कि बौद्ध काल में दास प्रथा का अभाव था; अथवा बौद्ध धर्म की उपस्थिति से दास-प्रथा में परिमाणात्मक कमी आई थी। अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों की भांति बौद्धकाल में भी दासप्रथा अपने निकृष्टतम रूप में मौजूद थी। सस्ता श्रम, विकास की चाहत और स्वामी के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा—दासप्रथा की ऐसी देन थीं, जिसके कारण सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी ने उसे आवश्यक माना था। भारत में भी बुद्ध जैसे कुछेक अपवादों को छोड़कर लगभग सभी बुद्धिजीवी, दास प्रथा का या तो समर्थन कर रहे थे, अथवा उसकी ओर से मौन साधे हुए थे। ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म के प्रभाव में चलते यज्ञ-बलियों में कमी आई थी। बची हुई पशु-शक्ति का उपयोग उत्पादक कार्यों में होने लगा था। उसका सकारात्मक प्रभाव विकास पर भी पड़ा था। व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा में निरंतर वृद्धि हो रही थी। उसके लिए सस्ता, लगभग मुफ्त श्रम उपलब्ध कराने वाली दासप्रथा का महत्त्व बढ़ता ही जा रहा था। यह भी कह सकते हैं कि अधिकाधिक लाभ की वांछा के कारण तत्कालीन व्यापारी वर्ग उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

बौद्धकाल तक बड़े राज्यों का बनना आरंभ नहीं हुआ था। उन दिनों भारत में मगध और उज्जैनी जैसे राजतंत्र थे। उनके साथ-साथ लिच्छिवी, वाहीक, शाक्य, मल्ल, वृष्णि जैसे गणों की भी प्रतिष्ठा थी। दासों की उपस्थिति राजतंत्र और गणतंत्र दोनों में थी। राजतंत्र में सेना के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे।25 आवश्यकता पड़ने पर दासों को सेना में भी भर्ती किया जा सकता था। हालांकि उनका स्तर, बाकी सैनिकों से कमतर होता था। कई बार राजा युद्धकाल में मृत्युदंड पाए अपराधियों को दास के रूप में सेना में शामिल कर लेता था। वे सैनिकों और जानवरों की देखभाल के काम आते थे। सेना में भर्ती दासों को ‘दासकपुत्त’ कहा जाता था। उन्हें गृह-दास योद्धा का नाम भी दिया गया था। कई बार राजा किसी अपराधी का मृत्युदंड माफ करने के बाद, उसे अपनी सेना में शामिल कर लेता था।

कृषिकर्म के लिए भी दासों की मदद ली जाती थी। समाज के संपन्न वर्गों के पास हजारों एकड़ जमीन पर अधिकार होता था। इतनी बड़ी जमीन पर खेती करने के लिए दासों की मदद लेना तत्कालीन समाज का सामान्य चलन था। उस समय रोम की तरह भारत में दासों की दो श्रेणियां थीं। पहली श्रेणी में वे दास थे, जिनका दासत्व कृषि-भूमि से जुड़ा था। भूमि की बिक्री के साथ वे भी नए स्वामी के अधिकार में चले जाते थे। दूसरे स्वतंत्र दास थे। वे घरों और संस्थानों में काम करते थे। थेरीगाथा एक की कहानी के अनुसार, बौद्धकाल में बनारस के पास ‘दासग्राम’ था, जिसमें संपूर्ण आबादी दासों की थी। यह उन 14 गांवों में से एक था, जिनपर बुद्ध के शिष्य ‘पिप्पली मानव’ यानी महाकाश्यप का नियंत्रण था। विशाखा को दहेज में कृषि औजारों से भरी 500 गाडि़यां तथा सैकड़ों दास भेंट किए गए थे। उन दिनों दासों को अंतःवासी, अहेटक, केटक, दता, मानुस्स, सेवक, उपत्थका जैसे नाम दिए जाते थे, जबकि स्त्री दासों को अंतःपुरिका, अट्ठककारिका, इत्थी, पसेन दारिका आदि नामों से पुकारा जाता था। उनसे दासत्व की प्रवृत्ति तथा उसके कार्यक्षेत्र का बोध भी होता था।  

बुद्ध के समकालीन दार्शनिकों में भौतिकवादी चिंतक पूर्ण कस्सप की बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे अपने समय के महान आजीवक चिंतक थे। उनके जीवन के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। उनके नामकरण के साथ एक कहानी जुड़ी है। हालांकि उसपर विश्वास करना कठिन है। बौद्धग्रंथों के अनुसार वे एक दास थे। जो स्वामी उन्हें दास बनाने के लिए लाया था, उसके 99 दास पहले से ही थे। पूर्ण कस्सप के आने के बाद सौ होने पर, स्वामी को लगा कि उसके दासों की संख्या पूरी हो चुकी है, इसलिए स्वामी ने ही उसका नामकरण पूर्ण या पूरण कस्सप नाम दिया था। उस समय के दूसरे आजीवक एवं लोकायत चिंतकों मक्खलि गोसाल और अजित केशकंबलि की सामाजिक स्थिति भी एक दास की तरह थी। डॉ. धर्मबीर ने ‘महान आजीवक : कबीर, रैदास और गोसाल’(पृष्ठ-227) नामक पुस्तक में कबीर के ‘बीजक’ के शीर्षक की मुख्य प्रेरणा ‘महानारद कश्यप जातक’ के कथासूत्र को बताया है। उक्त जातक में बीजक आजीवक विद्वान है। उसका जन्म पानी लाने वाली दासी के गर्भ से हुआ था। दासता को उन्होंने करीब से देखा था। धर्मवीर के अनुसार बीजक, ‘अपने धर्म और दर्शन में आजीवक थे और दासता के विरोध में लड़ रहे थे।’

मेगस्थनीज चंद्रगुप्त के शासनकाल में भारत आया था। वह चंद्रगुप्त के दरबार में सेल्यूकस की ओर से राजदूत था। अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में मेगस्थनीज ने भारत में दासप्रथा की उपस्थिति से इन्कार किया है। जबकि उन्हीं दिनों रचे जा रहे बौद्ध साहित्य में दासों का खुला उल्लेख है। क्या मेगस्थनीज भारतीय दासप्रथा से सचमुच अनभिज्ञ था? अथवा उसने जानबूझकर उसे छिपाया था? जबकि वह स्वयं ऐसे देश से आया था, जहां जनसंख्या का करीब एक-तिहाई हिस्सा दास की श्रेणी में आता था। असल में मेगस्थनीज की जानकारी का स्रोत केवल ब्राह्मण थे। अतएव एक कारण तो यह हो सकता है कि ब्राह्मणों ने भारत में मौजूद दासप्रथा को जानबूझकर छिपाया हो। दूसरा कारण यह कि भारत में शूद्र एवं दास की स्थिति में बहुत अंतर नहीं था। इसलिए संभव है मेगस्थनीज स्वयं उस समय के शूद्रों एवं दासों के जीवन में अंतर करने में असमर्थ रहा हो।

उन दिनों दास प्रथा अपने चरम पर था। दासों के शरीर पर उसके स्वामी का अधिकार होता था। नाराज होने पर स्वामी उसे दंडित कर सकता था। एक जातक में एक दासी का उल्लेख हुआ है जिसे उसके स्वामी ने दूसरे व्यक्ति के पास काम के लिए भेजा था। जब वह काम करने में असमर्थ रही तो बेंतों से उसकी पिटाई की थी। दूसरी ओर दास द्वारा आत्म-उत्थान के भी उदाहरण है। कटहक का एक दास तीव्र बुद्धि था। वह स्वामी के पुत्रों के साथ पढ़ना-लिखना सीख गया। अन्य कर्मों के साथ-साथ वह भाषण कला में भी पारंगत था। मालिक ने प्रसन्न होकर उसे भंडारगृह के रक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया था। लेकिन उसे सदैव यह भय रहता था कि उसे कभी भी किसी अपराध के कारण काम से हटाया अथवा प्रताडि़त किया जा सकता है।26

बौद्धकाल में दासों की उपस्थिति प्रायः सभी पेशों और उद्यमों में थी। विनयपिटक, दीघनिकाय, जातक कथाओं आदि में दासों की उपस्थिति बनी हुई है। बौद्ध साहित्य में आठ प्रकार के दासों का उल्लेख मिलता है—ध्वजाहृत(युद्ध में जीता गया), उदरदास(भरण-पोषण), आमाय दास(जीवकोपार्जन हेतु दासता स्वीकारना), भयाक्रांत दास(भय के कारण), स्वैच्छिक दास(स्वेच्छापूर्वक दासता को अपनाने वाला), क्रीतदास(धन देकर खरीदा गया), पादमूलिक(राजा और राजपरिवार का विश्वसनीय एवं अंतरंग दास), कम्मंतदास(खेत एवं कार्यशाला में काम करने वाला) तथा दौवारिक(द्वार पर नियुक्त रहकर स्वामी की रक्षा करने वाला)। ‘थेरवादी अट्ठकथा’ के अनुसार सेट्ठि सुदंत अनाथिपिंडक ने विहार की रक्षा के लिए एक दास दिया था। बौद्ध ग्रंथों में दासियों के भी भेद मिलते हैं। दासियां घर के प्रत्येक काम में सहयोग करती थीं। दासी की बेटी भी दासी ही कहलाती थी। ‘विदुर जातक’(जातक संख्या 545) के अनुसार कुछ लोग केवल दासी के पेट से जन्म लेने के कारण दास होते हैं। कुछ लोग धन से खरीदे जाने के बाद दास बनते हैं। कुछ भय से दास बनते हैं तो कुछ स्वयं दास बन जाते हैं। 

दास को योनि मान लिया था। उससे पता चलता था की दासप्रथा को कुछ लोग दैवी विधान घोषित करने  में लगे थे तदनुसार जो व्यक्ति एक बार दास बन जाता वह हमेशा दास ही बना रहता है। इसी जातक में एक जगह माणवक कहता है—’निश्चित रूप से मैं दास योनि में पैदा हुआ हूं। चाहे राजा की वृद्धि हो, चाहे अवृद्धि हो, दूर जाकर भी मैं देव का दास ही रहूंगा।’ ‘निमी जातक’ की बिरानी दासी को दासत्व उत्तराधिकार में मिला था। एक जातक में लापरवाह और आलसी ब्राह्मण स्त्री अपने पति को यह कहकर भिक्षा लेने के लिए भेजती है कि वह उसके लिए दासी खरीदकर लाए। पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए ब्राह्मण 700 कार्षापण मांग कर लाता है। उतने मूल्य में एक दासी खरीदी जा सकती थी। दासियां दहेज में भी दी जाती थीं। ‘सुप्पारक जातक’ के अनुसार विशारक को दहेज में दासियां प्रदान की गई थीं। गणिकाओं के यहां 500 दासियों के होने का उल्लेख है। ‘खंडहाल जातक’ में चंद्रकुमार स्वयं को दास बनाने के लिए समर्पित करता है—

‘देव! हमारा वध न करें। हमें दास बनाकर ‘खंडहाल’ को दे दें। पैरों में बेड़ी पड़ी रहने पर भी हम हाथी-घोड़ों का पालन करेंगे। देव हमारा वध न करें….हम हाथियों की लीद बटोरेंगे….हम घोड़ों की लीद बटोरेंगे….हमें चाहे जिसे दास बनाकर दे दें।’27

ऐसे ही वास्संत्र जातक में एक राजकुमार स्वयं को 1000 पण में बेच देता है। ‘कुस्सजातक’ से पता चलता है कि विधुर के घर में 700 दासियां थीं। दास-दासियों का प्रमुख कार्य परिवार के सदस्यों की सेवा करना था। अतिथियों के आने पर उनके पैर धोना, आवष्यकता पड़ने पर उनके पैर दबाना जैसे कार्य दासों के जिम्मे थे। ‘मझिम्मनिकाय’ के अनुसार ‘काली’ नामक एक दासी चावल पकाने, बिस्तर लगाने, गाय दुहने से लेकर दीपक जलाने जैसे काम करती थी। दासियां धाय का काम भी करती थीं। वे खासतौर पर लड़कियों को पालती-पोसतीं, उन्हें बड़ा करतीं और लड़की के विवाह के बाद, उसकी ससुराल वालों को दान दे जाती थीं। एक जातक कथा के अनुसार एक राजकुमार के 64 दासियां थीं। दासों का रोजमर्रा का जीवन आमतौर पर बड़ा ही कठिन था। वे अपनी नियति को जानते थे, इसलिए उनके सपने बहुत छोटे होते थे। एक जातक कथा में राजा ने प्रसन्न होकर अपने कुलपुरोहित से वरदान मांगने को कहा। इसपर पुरोहित ने अपने परिजनों के साथ-साथ घर में काम करने वाली दासी पुण्णा से उसकी आवष्यकता के बारे में भी पूछा। जवाब में पुण्णा अपने लिए मूसल, सूप तथा गारा मांगती है। दासियों को अपने स्वामी की काम-वासना का षिकार भी होना पड़ता था। जो दासियां सुंदर होतीं, वे अपने स्वामी की रखैल बनकर रहने से खुद को कृतार्थ समझने लगती थीं। उद्दालक जातक के अनुसार एक ब्राह्मण राजपुरोहित अपनी दासी पर आसक्त हो गया। आगे चलकर दासी के गर्भ से उद्दालक का जन्म हुआ। आगे चलकर वह बड़ा ऋषि बना। इस तरह हम देखते हैं कि बुद्ध ने हालांकि दासप्रथा को हेय माना, तथा दास अथवा दासी न रखने की सलाह दी थी। तथापि इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि बौद्ध काल में दासप्रथा पूरे जोरों पर थी।

प्राकृत भाषा में ‘दास’ का उल्लेख अन्य अर्थों में देखने को मिलता है। वह उसकी अब तक स्थापित सामाजिकी से बिलकुल अलग है. प्राकृत में दास का अर्थ है, देखना। ‘दर्शन’ का अर्थ भी यही है। ऐसे लोग जो संसार के आंतरिक और बाहरी रहस्यों को समझते थे, जितनी अंतर्चेतना प्रबल थी, उन्हें दास कहा जाता था। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार में प्राचीन भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के अनुसार, दास मूल रूप से बौद्ध थे. उनके अनुसार साँची और भरहुत के स्तूपों पर अनेक दास तथा दासी उपाधिधारक बौद्धों के शिलालेख हैं, जिन्होंने स्तूप-निर्माण में मदद की थी।’ वे लिखते हैं—

”अरहत दास थे, अरहत दासी थीं, यमी दास थे, जख दासी थीं….अनेक, सभी के नाम लिखे हुए हैं। एक बौद्धकालीन शिलालेख पर प्राकृत में ‘थूप दास’ का वर्णन मिलता है। उसपर लिखा है-‘मोरगिरिह्मा थूपदासस दान थंभे।’ थूप दास मोरगिरि(महाराष्ट्र) के निवासी थे। उन्होंने भरहुत के एक स्तंभ-निर्माण में मदद की थी। वैदिक साहित्य में वर्णित आर्यों का सांस्कृतिक संघर्ष इन्हीं बौद्ध दास-दासियों से हुआ था। वैदिक साहित्य इन दास-दासियों के बारे में बताता है कि ये लोग यज्ञ नहीं करते और न ये इंद्र-वरुण की पूजा करते हैं…स्पष्ट है कि ये बौद्ध हैं। प्राकृत भाषा में ‘दास'(दसन) का अर्थ द्रष्टा है। मगर आर्यों ने सांस्कृतिक दुश्मनी के कारण अपनी पुस्तकों में ‘दास’ का अर्थ ‘गुलाम/नौकर’ कर लिया है। दास और आर्यों का यह सांस्कृतिक संघर्ष 1500 ई.पू. में नहीं बल्कि मौर्य काल के बाद हुआ था।”

इस संबंध में अभी और शोध की अपेक्षा है. यह सच है कि समय और परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण शब्द अपनी अर्थ-छवियां बदलती रही हैं। अठारहवीं-उनीसवीं शताब्दी में ‘अराजकतावाद’ शब्द ‘जनतंत्र’ की उच्चतम अवस्था का प्रतीक था। उसका अर्थ ऐसे राज्य से था, जहां के प्रबुद्ध नागरिक अपने आप में ही इतने अनुशासित और समर्पित हों कि राज्य की आवश्यकता और उसका औचित्य ही जाता रहे। आज यह शब्द एकदम भिन्न अर्थों में अव्यवस्था और कानून विरोध के संदर्भ में प्रयुक्त किया जाने लगा है। अराजक शब्द का उपयोग कई बार गाली की तरह भी किया जाता है.

जैन दर्शन भी बौद्ध दर्शन का समकालीन है। जैन धर्म में अहिंसा पर अत्यधिक जोर दिया गया है। वहां अहिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक है। उसमें मनसा-वाचा-कर्मणा किसी भी प्रकार की हिंसा का निषेध है। चूंकि दास प्रथा में स्वामी दास के विवेक को पनपने नहीं देता। उसपर हमेशा अपना निर्णय लादे रहता है। दास से जीवन के कई मौलिक अधिकार जैसे संपत्ति संचय, छीन लिए जाते हैं। इसलिए कह सकते हैं कि प्रत्यक्ष न सही, परोक्ष में ही—जैन धर्म दास प्रथा का विरोध करता है। हालांकि उसमें सीधे तौर पर कहीं भी दास प्रथा का विरोध नहीं है। जैन दर्शन में महावीर स्वामी के आरंभिक अनुयायियों में चंदनबाला का उल्लेख मिलता है। वह महावीर स्वामी की प्रथम महिला शिष्या थी। कहानी के अनुसार चंदनबाला चंपानगरी के राजा दधिवाहन की बेटी थी। उसका मूल नाम वसुमती था। एक बार चंपानगरी पर पड़ोसी राजा शतानीक ने हमला कर दिया। आकस्मिक हमले से आक्रांत दधिवाहन जंगलों की ओर भाग गए। उनकी पत्नी और बेटी वसुमती को शत्रु सेना ने कैद कर लिया। बाद में उन्होंने वसुमती को बेचने के लिए कोशांबी के चौराहे पर खड़ा कर दिया। वहां उसे धन्नासेठ नाम के व्यापारी ने खरीद लिया। यह देखते हुए कि वसुमती किसी संभ्रांत घर की लड़की है, धन्ना ने उससे दासी का काम लेने के बजाए, चंदनबाला नाम देकर अपनी पुत्री की तरह उसका लालन-पालन किया। बदलते घटनाचक्र के दौरान चंदनबाला महावीर स्वामी के संपर्क में आई और उनकी शिष्या बन गई।

बुद्धेत्तर भारत में दास प्रथा

बाद के कालखंड में भी दास प्रथा की मौजूदगी के पर्याप्त प्रमाण हैं। संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में दासों की मंडी का उल्लेख किया गया। एक व्यक्ति उधार चुकाने में असमर्थ रहता है। इसपर साहूकार के आदमी उसे पीटते हुए मंडी में ले जाते हैं। जहां उसको नीलाम करके अपना कर्ज वसूल लिया जाता है। भारतीय दास प्रथा की चर्चा मध्य एशिया की ओर से आए योद्धाओं की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती। अपने लिए स्थायी राज्य की चाहत में उन्होंने हजारों किलोमीटर लंबी कठिन यात्राएं की थीं। बीच-बीच में उन्हें अस्थायी सफलताएं भी मिलती रहीं। कारण है कि एक अंतराल के पश्चात उनके सहयोगी सैनिकों, जिनमें उनके अपने परिजन भी होते थे—की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगती थीं। जिससे विजित क्षेत्र के शासन-प्रशासन के अधिकार को लेकर उनके बीच सत्ता-संघर्ष शुरू हो जाता था। उससे बचने के लिए कुछ लड़ाकों ने दास प्रथा का सहारा लिया था। दास के पास सिवाय ‘स्वामीभक्ति’ के अपना और गर्व करने लायक कुछ नहीं होता था। यह प्रत्यय भी दास प्रथा को दैवीय उठान देने के मंशा के साथ मालिक ही दासों के मनस् में रोपते आए थे। समय के साथ दास उस अमानवीय प्रथा से अनुकूलित होने लगे। एक समय ऐसा आया, जब दास उन असमानताकारी पृथा को अपना चुके थे। परिणामस्वरूप स्वामीभक्ति उनके लिए बड़ा जीवनमूल्य, बन गई। इसकी पराकाष्ठा हमें पन्ना धाय के चरित्र में दिखाई पड़ती है। सोलहवीं शताब्दी की वह स्त्री जिसका स्तर समाज में दास जैसा ही था, महाराणा संग्राम सिंह के बेटे और मेवाड़ के भावी सम्राट उदय सिंह को बचाने के लिए, अपने बेटे चंदन को हत्यारे बनवीर के आगे कर देती है। बनवीर बिना कोई दया दिखाए एक झटके में उस मासूम की हत्या कर देता है। ऐसा उदात्त दासत्व सत्तानशीनों के बड़े काम का था, इसलिए राजस्थान के इतिहास में पन्ना धाय के त्याग का खूब महिमामंडन किया गया। पन्ना धाय जैसे स्वामीभक्त हर शासक की जरूरत थे। बगैर उनके बड़े और स्थायी राज्य स्थापित कर पाना असंभव था।  

दास के लिए अपने मालिक के सुख-वैभव के अलावा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं था। वे मानापमान की भावना से कोसों परे थे। इसे समझने के लिए एक खलीफा की यह स्वीकारोक्ति काफी होगी—

‘जब मैं दरबार में बैठता हूं तो एक गुलाम को बुलाकर अपने बगल में बिठा सकता हूं। इस तरह कि उसके और मेरे घुटने एक-दूसरे को जकड़ें। जैसे ही दरबार समाप्त हो जाए तो मैं उसे अपने घोड़े की मालिश को कह सकता हूं। उसे इसमें तनिक भी बुरा नहीं लगेगा। अगर में यही काम किसी और से करने को कहूं तो वह कहता, ‘मैं आखिर तुम्हारे पक्षधर का बेटा हूं।’ या ‘तुम्हारा खास साथी हूं।’ और मैं उसे राजी नहीं करवा पाता।’28 

तो बात मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान के जुझारू लड़ाकों की हो रही थी। दसवीं शताब्दी में वे अपनी-अपनी सैन्य टुकडि़यों के साथ संघर्षरत थे। उन्हें जहां भी कमजोर राज्य दिखता, फौरन हमला कर देते थे। मगर वह जीत स्थायी न होती थी। कुछ दिनों बाद उनके अपने बीच भी सत्ता संघर्ष पनपने लगता था। उसे शांत रखने के लिए उन्हें या तो राज्य का बंटवारा करना पड़ता; अथवा अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ती थी। उससे मुक्ति के लिए कुछ महत्त्वाकांक्षी लड़ाकों ने प्रशिक्षित और ख्यातिनाम सैनिकों के बजाए, अपनी सेना में दासों को भर्ती करना शुरू कर दिया। उन्हें सैन्य-प्रशिक्षण देकर लड़ने लायक बनाया। प्रयोग कामयाब रहा। उदाहरण के लिए कुतबुद्दीन ऐबक शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का गुलाम था। गौरी के साथ उसने कई युद्धों में हिस्सा लिया था। मुहम्मद गौरी ने भारत में गौरी-साम्राज्य की नींव डाली थी। परंतु उसका शासन ज्यादा लंबा न खिंच सका। अवसर मिलते ही कुतबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के उत्तराधिकारियों से सत्ता छीन ली। कुतबुद्दीन ऐबक के बाद दिल्ली सल्तनत उसके भाई आरामशाह के हाथों में चली गई। वह अपने नामानुरूप ऐशोआरामपरस्त था। उसे मारकर इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया। इल्तुततमिश कुतबुद्दीन ऐबक का दास, यानी गुलाम का भी गुलाम था। विद्रोहियों के दमन के लिए उसने 40 भरोसेमंद गुलामों को लेकर ‘तुर्कान-ए-चिहालगानी’ नामक संगठन बनाया था, जो साये की तरह उसकी सुरक्षा में रहता था। इल्तुतमिश दास-योद्धाओं से अपने बेटों से भी अधिक प्यार करता था। भारत में गुलाम वंश का शासन 84 वर्षों(1206—1290 ईस्वी) तक रहा। लेकिन वह गुलाम वंश का शासन था, गुलामों का नहीं। क्योंकि न तो उससे समाज के गुलामों के प्रति नजरिये में बदलाव आया, न बाकी गुलामों में उससे आत्मविश्वास का संचार हुआ था और न ही उन शासकों का गुलामों के प्रति नजरिया बाकी लोगों से बहुत ज्यादा अलग था।

दासों का जीवन बहुत चुनौतीपूर्ण और कष्टकारी होता था। इस मामले में शूद्रों की स्थिति भी उनसे खास अच्छी नहीं थी। अछूतों का तो और भी बुरा हाल था। डॉ. आंबेडकर ने छूआछूत को दास प्रथा से भी घृणित एवं निदंनीय माना है—

‘अस्पृश्यता, दासत्व से कहीं अधिक निकृष्ट है, क्योंकि यह अछूतों को उनके हाल पर ऐसे स्थान पर पटक देती है, जहां उनकी आजीविका का कोई साधन ही न हो….दास अपने स्वामी की संपत्ति होता था। इसलिए स्वामी द्वारा उसे मुक्त व्यक्ति के सापेक्ष वरीयता दी जाती थी। मूल्यवान होने के कारण उससे स्वामी के स्वार्थ भी जुड़े होते थे, वह दास के स्वास्थ की देखभाल करता था। रोम में दासों को दलदल  और मलेरिया से ग्रस्त स्थान पर कभी नहीं ठहराया जाता था। वहां केवल मुक्त व्यक्तियों को ही नियुक्त किया जाता था।’29

बावजूद इसके भारतीय छूआछूत को हजारों वर्षों तक गले लगाए रहे। अंग्रेजों ने दास प्रथा को निंदनीय मानते हुए, 1843 में ही समाप्त कर दिया था। मगर छुआछूत को पूरी तरह खत्म करने के लिए संविधान के लागू होने तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

ओमप्रकाश कश्यप

9013 254 232 

संदर्भ

1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

2. डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा उद्धृत, उपर्युक्त, पृष्ठ-74

3. मोर्टीमर व्हीलर, दि इंडस सिविलाइजेशन, कैंब्रिज यूनीवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1968, पृष्ठ-34 & 135

4. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ- 17

5.  उपर्युक्त, 25

6. यद्वा दास्र्याद्रहस्ता समत उलूखल मुसलम् शुम्भताप-अथर्ववेद, 12/3/13)

7. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1992, पृष्ठ-16

8. राधाकुमुद मुखर्जी, हिंदू सभ्यता, पृष्ठ 89

9. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, 25

10. उदकुंभानधिनिधाम दास्यौ मार्जालीयं परिनृत्यंति पदों

      निध्नतीरिदं मधुगायन्त्यों मधु वै दैवानां परममन्नाधाम—तैत्तिरीय संहिता, 7/5/101

  1. डॉ. रामविलास शर्मा, मानव सभ्यता का विकास, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-74

12. प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि—छांदोग्योपनिषद, 5.13.2

13. स होवाच विज्ञायते हस्ति, हिरण्यस्पापस्तं गौ, अश्वानां दासीनां—बृहदारण्यक उपनिषद(6.2.7)।

14. ओमप्रकाश प्रसाद, प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 2006

15. गृह जातस्था, क्रीतो लब्धो, दायादुपागतः

अनाकाल भृतो, लोके अहितः स्वामिना च यः। 24

मोक्षितो महतश्चार्णात्प्राप्तो, युद्धात्पणार्जितः

तवाह मित्युपगतः प्रवज्यावसितः कृतः। 25

भक्तदासश्चविज्ञेयस्तथैव वडवाहतः

विक्रेता चात्मनः शास्त्रै दासाः पंचदशस्मृताः। 26

  1. श्रीपाद अमृत डांगे, आदिम साम्यवाद, हिंदी अनुवाद आदित्य मिश्र, राजकमल प्रकाशन, 1978,  पृष्ठ 195

17. डॉ. सुरेद्र कुमार शर्मा अज्ञात, क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिंदू धर्म, विश्व बुक्स प्रा. लिमिटेड,

18. ददौ कन्यापिता तासां दासीदासमनुत्तमम्।

हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च। रामायण, बालकांड, 1.74.5

19. रूपाजीवाश्म वादिन्यो वणिजश्य महाधनाः

शोभयंतु कुमारस्य वाहिनी सुप्रसारिताः।। उत्तरकांड-6.74.2

20. तस्माततेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च

      दासी सहस्राश्यामानं सुवस्त्राणामलंकृतम्।। वनपर्व, 185.34

21. ‘दासाश्च दास्याश्च सुमृष्ठवेषाः। संभोजकाश्चाप्युपजहृनुरत्नम्।। आदिपर्व-193।

22. शतं दासीसहस्राणि तरूण्यो हेमभद्रिकाः

कंबूकेयूर धारिष्यो निष्ककंठयः स्वलंकृता-महाभारत, 2.61.8

23.  दासॊऽसमीति तवया वाच्यं संसत्सु च सभासु च।
       एवं ते जीवितं दद्याम एष युद्धजितॊ विधिः।। महा.3.256.11

24.  इयं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचायिनी

सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव।।

कांछिता रूपतो बाला सुता मे प्रतिगृह्यताम्

अस्याः शुल्कं प्रदास्यंति नृपा राज्यमपि ध्रुवम्।। उद्योगपर्व, 115.2-3

25. देवराज चानना, सलेवरी इन एन्शीएंट इंडिया, पिपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, 1960, पृष्ठ-40

26. डांगे, आदिम समाज, पृष्ठ 195

27. खंडहाल जातक, भदंत आनंद कौसल्यायन, जातक संख्या 542, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग।

28. सी.एन.सुब्रह्मण्यम, जब गुलाम सुल्तान बने, शैक्षिक संदर्भ, मार्च-अप्रैल 1996

29. कौन ज्यादा बुरा है—गुलामी या अस्पृश्यता?, डॉ. भीमराव आंबेडकर।

दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता : सिंगारवेलु चेट्टियार

सामान्य
जब भी कोई नया महापुरुष जन्मता है, मनुष्यता का भी पुनर्जन्म होता है। प्रत्येक महापुरुष अपने विचारों से, कर्मों से नई इबारत लिखता है। ऐसे कि लोग सम्मोहित होकर उसका उसका अनुसरण करने लगते हैं। फलस्वरूप जड़ और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराएं पीछे छूटने लगती हैं। कुल मिलाकर बात इतनी-सी है कि जब भी किसी महापुरुष का जन्म होता है, इस दुनिया का भी पुनर्जन्म होता है।

आजकल लोग सवाल नहीं गूगल करते हैं। तो चलिए गूगल कर लेते हैं—‘भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत किसने की थी? वर्ग-क्रांति का प्रतीक लाल झंडा भारत में पहली बार किसने फहराया था? कौन था वह भारतीय जिसने खचाखच भरे सभागार में पहली बार ‘कामरेड’ शब्द का संबोधन किया था। जिसे सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा था? भारत में मजदूर आंदोलनों का पितामह कौन था? कौन था, दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्मदाता? गूगल बाबा इन प्रश्नों का थोड़ा घुमा-फिराकर एक ही जवाब देंगे—‘सिंगारवेलु चेट्टियार। लोग उन्हें सम्मान से सिंगारवेलार कहते थे।

अब आप सिंगारवेलु को गूगल करना चाहेंगे। पर थोड़ा धीरज रखिए। पहले कुछ बातें ‘मई दिवस’ पर कर ली जाएं। मशीनीकरण के आरंभ में आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। ‘कार्य-दिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से दिन ढलने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता-बढ़ता तो काम के घंटे भी बदल जाते। कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभी-कभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था। अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ 8 घंटे की मांग का समर्थन किया।1 आंदोलन होने लगे। परंतु न सरकारें चेतीं न कारखाना मालिकों ने ही कोई ध्यान दिया। आखिरकार अमेरिकी मजदूरों ने 1 मई 1886 से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। तीन और चार मई, को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूर संगठनों की भिड़ंत हुई। 4 मई को शिकागो के हेमार्किट चौक पर हुई घटना तो नरसंहार जैसी थी। उसी की याद में मई दिवस मनाया जाता है। मई की पहली तारीख का संबंध 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तथा उसके लिए श्रमिकों द्वारा दी गई कुर्बानियों से है।

भारत में पहला मई उत्सव, 1 मई, 1923 को मद्रास में मनाया गया था। उसी दिन देश में पहले मजदूर संगठन का जन्म हुआ था, नाम था—‘हिंदुस्तान लेबर एंड किसान पार्टी’।2 उसी दिन लाल झंडा पहली बार फहराया गया था।3 आगे चलकर यह झंडा मजदूर आंदोलनों की पहचान बन गया। इन सबका श्रेय जाता है—सिंगारवेलु चेट्टियार को। भारत में ‘कामरेड’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही, दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में किया था।4 यह जादुई शब्द आगे चलकर साम्यवादी चेतना की पहचान बन गया। गया सम्मेलन में सिंगारवेलु ने ही पहली बार भारत के लिए ‘संपूर्ण स्वराज’ की मांग रखी थी।5

जीवन परिचय

सिंगारवेलु  का जन्म 18 फरवरी, 1860 को एक मछुआरा परिवार में हुआ था। समुद्र किनारे जिस बस्ती में वे रहते थे, उसे वे ‘कप्पम’ कहते थे। बस्ती के प्रायः सभी पुरुष मछली पकड़ने का काम करते। बांस और तख्तों से बनी डोंगी से समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे आगे बढ़ जाते। कभी समुद्र की बन आती। उसकी उन्मत्त लहरें, किनारे बसीं झुग्गियों को अपने साथ बहा ले जातीं। मगर कुछ दिनों बाद वे फिर उसी जगह उभर आती थीं। प्रकृति और पुरुष की डांडा-मेंडी….झुग्गियों का बनना-मिटना भी मानो लहरों जैसा हो। सिंगारवेलु के पिता का नाम था—वेंकटचलम चेट्टियार। मां थीं—वाल्लमई। बताया जाता है कि उनके दादा मामूली डोंगी के सहारे बर्मा के तटवर्ती क्षेत्रों तक चले जाते। वहां से चावल और इमारती लकड़ी मद्रास तक ले आते थे।6 कह सकते हैं कि धैर्य और दुस्साहस सिंगारवेलु को विरासत में प्राप्त हुए थे।

जिस जाति में सिंगारवेलु का जन्म हुआ था, उसमें पढ़ने-पढ़ाने की कोई परंपरा न थी। परंतु वेंकटचलम थोड़ा आधुनिक मिजाज थे। उन्होंने सिंगारवेलु को पढ़ाने का फैसला किया। खुद को प्रखर बुद्धि सिद्ध करते हुए सिंगारवेलु ने 1881 में मेट्रिक की परीक्षा पास की। 1884 में क्रिश्चन कॉलेज से एफए पास करने के पष्चात उन्होंने बीए के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दाखिला ले लिया। आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास लॉ कॉलेज से जुड़े। 1902 में कानून की डिग्री मिली। उसके बाद वे मद्रास उच्च न्यायालय में प्रक्टिश करने लगे। प्रतिभाषाली थे ही। सो वकालत के जमने में देर न लगी।7

1889 में उनका विवाह आंगम्मल से हुआ। वह अंतररजातीय विवाह था। दोनों के एकमात्र संतान, बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने कमला रखा था। 1932 में उन्होंने अपने धेवते, कमला के पुत्र सत्यकुमार को उन्होंने कानूनी तरीके से गोद ले लिया।

आरंभ में सिंगारवेलु व्यापार में हाथ आजमाना चाहते थे। इसलिए 1902 में वे चावल के व्यापार की संभावना तलाशने के लिए ब्रिटेन चले गए। सिंगारवेलु के लिए वह यात्रा बहुत परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। वहां उन्हें नई-नई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। लंदन में उन्होंने बौद्ध अधिवेशन में हिस्सा लिया। उससे बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रति ऐसा अनुराग बना कि मद्रास लौटने पर अपने घर पर ही ‘महाबोधि सोसाइटी’ की बैठकें आयोजित करने लगे।8 इससे प्रसन्न होकर उन्हें मद्रास महाबोधि सोसाइटी का अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया गया। उन्हीं दिनों समाज सेवा से लगाव हुआ। वे चाहते थे कि बस्ती के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे बच्चों तथा उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने लगे। आवश्यकता पड़ने पर गरीब बच्चों को पुस्तक, स्टेशनरी, भोजन वगैरह देकर मदद भी करते। पढ़ने का शौक था। सो धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विषयों की नई से नई पुस्तकें अपने लिए जुटाते, पढ़ते। अपने पढ़े हुए पर दूसरों से बातचीत करते। सुब्रह्मयम भारती, वी. चक्करई चेट्टियार जैसे नेताओं के संपर्क में आने के बाद वे राजनीति की ओर मुड़ गए।

प्लेग के दौरान

1905 में रूसी क्रांति की खबरें मिलीं, जिससे पहली बार उनका कम्युनिस्म की ओर वे रुझान बढ़ा। इस बीच उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध बन चुके थे। पार्टी में वे तिलक जैसे उग्रपंथी नेता माने जाते थे। वे मानते थे कि देश को आजाद कराने के लिए बल प्रयोग अपरिहार्य है। बिना उसके साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति असंभव होगी। 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो सिंगारवेलु का ध्यान युद्ध की खबरों से ज्यादा जनसाधारण की बढ़ती समस्याओं की ओर गया। खासकर उन समस्याओं की ओर जो युद्ध की, पूंजीवादी लिप्साओं की देन थीं। उन्हीं दिनों एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में तबाही मचाने वाली प्लेग 1898 में मद्रास तक आ पहुंची। वहां उसने ‘कुप्पम’ को भी अपनी चपेट में लिया। सब कुछ छोड़कर सिंगारवेलु जनसेवा में जुट गए। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने ‘सामुदायिक रसोई’ का संचालन किया। 1910 के बाद प्लेग से छुटकारा मिला तो मलेरिया ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। सिंगारवेलु जूझते रहे। इससे उन्हें गरीबी तथा उसके कारणों को समझने की दृष्टि मिली। वही उन्हें साम्यवाद की ओर ले गई।

राजनीति में दस्तक

13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का रक्त-रंजित दिन था। उस दिन जलियांवाला हत्याकांड 379 लोग मारे गए थे। लगभग 1500 हताहत हुए थे। क्षुब्ध जनता अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगी। उत्तर से दक्षिण तक सब अंग्रेजों के खिलाफ थे। फिर सिंगारवेलु कैसे पीछे रह सकते थे! उन्होंने युवाओं को संगठित कर, कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। उससे प्रेरित होकर सिंगारवेलु ने भी एक जनसभा में अपने गाउन को अग्नि-समर्पित कर अदालत से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी। मई 1921 में उन्होंने गांधी को लिखा—‘मैंने आज अपने वकालत के पेशे से मुक्ति पा ली है। देश-सेवा के लिए मैं भी आपका अनुसरण करूंगा।’9 इसी दौरान वे कांग्रेस के संपर्क में आए। जनमानस में अपनी पैठ, प्रतिभा और सरोकारों के चलते बहुत जल्दी प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

हैलो कामरेड्स

दिसंबर 1922 में उन्हें कांग्रेस के गया अधिवेशन में शामिल होने का अवसर मिला। उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी थे। अधिवेशन में दिए गए भाषण में सिंगारवेलु का रंग एकदम निराला था। गए वे प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में थे, मगर भाषण में वे खुद को कुछ और ही बता रहे थे—‘अध्यक्ष, हाल में मौजूद कामरेड्स, साथी मजदूरो, प्रजाजनो, हिंदुस्तान के किसानो और हलवाहो….मैं आपके बीच आपके मजदूर साथी के रूप में बोलने आया हूं। मैं यहां पूरी दुनिया के लिए महा-कल्याणकारी, कम्युनिस्टों की दुनिया के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचा हूं। मैं यहां उस महान संदेश को दोहराऊंगा, जिसे साम्यवाद दुनिया-भर के मजदूरों को देता आया है।’10 उन दिनों अंग्रेज ‘कम्युनिज्म’ शब्द से ही खार खाते थे। ऐसे में किसी प्रतिनिधि के मुंह से ‘कामरेड्स’ संबोधन सुनना, खुद को साम्यवादी जगत का प्रतिनिधि बताना, कामगारों, मजदूरों और किसानों की बात करना, वहां मौजूद सदस्यों के लिए यह एकदम अप्रत्याशित था। सो सिंगारवेलु की पहली पंक्ति के साथ ही सभागार तालियों से गूंजने लगा।

भाषण में सिंगारवेलु ने कहा था—‘हम स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई हम अहिंसा और असहयोग जैसे हथियारों की मदद से लड़ रहे हैं। मेरा उनमें विश्वास है। मगर इन हथियारों से वर्गहीन समाज की रचना संभव नहीं है।’ उन्होंने कहा था—‘धनाढ्य संभल जाएं। ताकतवर ध्यान दें….दुनिया में जितनी भी अच्छी चीजें हैं, सब मेहनतकश लोगों ने ही तुम्हें दी हैं। तुमने उन्हीं को हाशिये पर ढकेल दिया। वे हमेशा तुम्हारी इच्छाओं के खटते रहते हैं। फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करते हो….याद रखो, भारतीय मजदूर अब जाग चुके हैं। वे अपने अधिकारों को धीरे-धीरे समझने लगे हैं।’11 कांग्रेस के इतिहास में वह पहला अवसर था, जब उसके सम्मेलन में किसान और मजदूर वर्ग पर चर्चा हो रही थी। लोग कांग्रेस के कायाकल्प का श्रेय गांधी को देते हैं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनसे समझौता किए बगैर कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता संभव ही नहीं थी। डॉ. आंबेडकर, रामासामी पेरियार और सिंगारवेलु जैसे नेताओं का दबाव कांग्रेस और गांधी दोनों को बदलने को विवश कर रहा था।

कांग्रेस का गया सम्मेलन सिंगारवेलु की राजनीति की दिशा तय कर चुका था। उनके भाषण ने देश-विदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। देश-भर से पहुंचे प्रतिनिधियों ने मांग की कि सिंगारवेलु को कांग्रेस की श्रमिक मामलों की प्रस्तावित उपसमिति में स्थान दिया जाए। मानवेंद्रनाथ राय ने मजदूरों तथा आम जनता की समस्या की ओर कांग्रेस तथा सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए सिंगारवेलु की प्रशंसा की थी। अपनी उग्र कार्यशैली और साम्यवादी रुझान के कारण वे पहले ही अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। 1921 में पुलिस ने उनके घर पर दबिश दी थी। वह कथित रूप से ‘चुनौती’ शीर्षक से प्रकाशित पंपलेट्स की तलाशी लेने गई थी। लेकिन पुलिस को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा था।12

सिंगारवेलु और गांधी

अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में सिंगारवेलु गांधी से प्रभावित थे। परंतु उनकी कार्यशैली गांधी से अलग थी। प्रिंस ऑफ़ वाल्स भारत दौरे पर आए। शेष भारत की तरह दक्षिण में भी उनकी यात्रा का बहिष्कार किया गया। मद्रास में सिंगारवेलु के नेतृत्व में हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल पूरी तरह कामयाब थी। बाद में पता चला कि हड़ताल में शामिल होने के लिए कुछ दुकानदारों पर दबाव बनाया गया था। कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत पर गांधी ने 9 फरवरी, 1922 के ‘यंग इंडिया’ में ‘सत्याग्रह की मूल भावना का पालन न करने पर’ सिंगारवेलु की आलोचना की थी।13

कम्युनिज्म की ओर

गया सम्मेलन में ही उनकी भेंट श्रीपाद अमृत डांगे से हुई। मानवेंद्रनाथ राय से उनका संपर्क पहले से ही था। अबनीनाथ मुखर्जी, जो अपने साथियों में अबनि मुखर्जी के नाम से पहचाने जाते थे, सिंगारवेलु से मिलने दो बार मद्रास पहुंचे थे। इस तरह सिंगारवेलु कांग्रेस में रहकर भी अपनी स्वतंत्र राजनीति कर रहे थे। पेरियार की तरह वे भी कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी के अंतर को समझते थे। जानते थे कि कांग्रेस कभी भी मजदूरों और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सीधे टकराव का खतरा मोल नहीं लेगी। इसलिए मद्रास लौटते ही उन्होंने अपने विचारों को कार्यरूप देने के लिए काम शुरू कर दिया था। उसके फलस्वरूप ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ का गठन हुआ। वह कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित पहला संगठन था। ध्यातव्य है कि मानवेंद्रनाथ राय, अबानी मुखर्जी, इवेलिना राय आदि नेता मिलकर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’(ताशकंद पार्टी) के गठन की घोषणा कर चुके थे, परंतु 25 दिसंबर 1925 को विधिवत गठन से पहले उसका अस्तित्व केवल अनौपचारिक था।

सिंगारवेलु  के नेतृत्व में पहली बार, 1 मई 1923 को भारत में मई दिवस का आयोजन किया गया। उसी दिन ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ तथा उसके गठन के उद्देश्यों के बारे में लोगों को बताया गया था। मई दिवस का आयोजन सिंगारवेलु ने मद्रास में दो स्थानों पर किया था। पहला उच्च न्यायालय के आगे समुद्र तट पर। दूसरा ट्रिप्लीकेंस तट पर। पहली बैठक की अध्यक्षता स्वयं सिंगारवेलु ने की थी। दूसरे कार्यक्रम की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी सरमा ने। उस अवसर पर सिंगारवेलु ने कहा था कि मई दिवस का आयोजन स्वयं मजदूरों द्वारा किया गया है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश में शीघ्र ही मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी, जो लोगों के विकास को गति देगी। ‘मद्रास मेल’ नामक अखबार ने ‘लेबर किसान पार्टी’ द्वारा मई दिवस की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि केवल वास्तविक मजदूर ही इस उत्सव को मना रहे थे, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। उस अवसर पर लाल-क्रांति का प्रतीक ‘लाल-झंडा’ भी फहराया गया था। सार्वजनिक कार्यक्रम में लाल झंडा फहराने की वह घटना, न केवल भारत, अपितु एशिया में भी पहली घटना थी। उस अवसर पर 2 मई 1923 के ‘दि हिंदू’ में छपा था—

‘लेबर किसान पार्टी ने मद्रास में मई दिवस उत्सव आरंभ किया है। कामरेड सिंगारवेलु ने उस बैठक की अध्यक्षता की थी। प्रदर्शन कामयाब था। मीटिंग में मई दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी की गई। पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के अहिंसक सिद्धांतों के बारे में लोगों को बताया था। उसमें लोगों से आर्थिक मदद की अपील भी की गई। इस बात पर जोर दिया गया था कि भारतीय मजदूरों को दुनिया-भर के मजदूरों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए।’14

दिसंबर 1923 में उन्होंने ‘दि लेबर किसान गजट’ शीर्षक से पाक्षिक की शुरुआत की। इसके साथ-साथ तमिल भाषा में ‘तोझीलालान’(कामगार) शीर्षक से साप्ताहिक भी निकाला था। ‘कामगार’ के एक अंक का मूल्य ‘आधा आना’ था। अंग्रेजों की सिंगारवेलु पर नजर थी। उनकी दृष्टि में ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कहीं अधिक खतरनाक थी। 1924 में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ मामले में सिंगारवेलु को उनके घर पर नजरबंद कर लिया गया। उन दिनों उनकी उम्र 64 वर्ष थी। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

1925 में कानपुर में पहले कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। उस बैठक में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के गठन को स्वीकृति मिली थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में सिंगारवेलु ने छूआछूत की समस्या की चर्चा भी की थी। उनका दृष्टिकोण साम्यवादी दृष्टिकोण से मेल खाता था,

‘हमें साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि साम्यवाद की नजर में छूआछूत पूरी तरह आर्थिक समस्या है। अछूतों को मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों और मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं, इन प्रश्नों का ‘स्वराज’ के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है….कम्युनिस्टों की न तो कोई जाति होती है, न धर्म। व्यक्ति का हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना उसका निजी मामला है….जैसे ही उन(अस्पृश्यों) की आर्थिक पराश्रितता खत्म होगी, छूआछूत की समस्या भी अपने आप समाप्त हो जाएगी।’15

उन दिनों पेरियार राजनीति में, गैर-ब्राह्मण जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज चल रहे थे। उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की स्थापना की थी। सिंगारवेलु की ख्याति उन दिनों शिखर पर थी। उसी दौरान दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। सिंगारवेलु ने ही पेरियार को कांग्रेस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। पेरियार के मनस् में साम्यवाद का बीजारोपण करने वाले भी वही थे। सिंगारवेलु की सलाह पर ही पेरियार ने सोवियत संघ की यात्रा पर गए थे। लौटने के बाद पेरियार ने सोवियत संघ के अनुभवों के आधार पर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कार्यनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया। पेरियार के आग्रह पर सिंगारवेलु ने ‘इरोद कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट तैयार किया। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का एक सम्मेलन 4 मार्च 1934 को मन्नारगुडी, तमिलनाडु में हुआ था। सिंगारवेलु ने उसकी अध्यक्षता की थी। अपने भाषण में सिंगारवेलु ने भारतीय समाज के आर्थिक वैषम्य पर चिंता व्यक्त की थी—

‘देश की 40 प्रतिशत जनता को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। मृत्यदर दूसरे देशों से कहीं ज्यादा है। यह 1000 में 30 है। 100 में से 30 बच्चे एक साल का होते-होते मर जाते हैं। भारत में औसत आयु मात्र 20 है, जबकि इंग्लेंड में 53 साल है….लोग घोर दारिद्रय में जीते हैं, बावजूद इसके मंदिरों की घंटियां टनटनाती रहती हैं। मस्जिदों में नमाज और चर्च में प्रार्थनाएं चलती रहती रहती हैं। लोग जिसे ईश्वर समझकर पूजते हैं, उसके बारे में वे कुछ नहीं जानते। ईश्वर महज मनुष्य की रचना है।’16

उस भाषण में सिंगारवेलु ने अपने पूर्वजों को भी नहीं छोड़ा था—

‘मेरे अपने पूर्वजों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए 1 लाख रुपये अलग रख दिए थे। लेकिन जब उनकी बस्ती के मछुआरे बीमार पड़े, वे केवल देवता को पूजा-अर्चना, प्रार्थना और बलि तक सीमित रहे। मेरी जाति की तरह और भी जातियां हैं। वे भी धर्मादे के लिए रकम एक ओर रख देती हैं और मुष्किल समय में प्रार्थनाओं और बलि देकर मन को तसल्ली देती रहती हैं।’17

पेरियार के मन में सिंगारवेलु के प्रति गहरा सम्मान था। खासकर उनकी वैज्ञानिक सोच पर। पेरियार के आग्रह पर ही सिंगारवेलु ने ‘कुदी अरासु’ में लिखना शुरू किया था। मगर उन दोनों के साथ आने से न तो कांग्रेस खुश थी, न ही अंग्रेज सरकार। अंग्रेजों का मानना था कि यह सिंगारवेलु ने ही पेरियार को ‘बिगाड़ा’ है। ब्रिटिश सरकार नहीं चाहती थी कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को बढ़ावा मिले। उसे देखते हुए सिंगारवेलु ने ‘मजदूर एवं किसान’ जैसे शब्दों को अपनाया। मगर अपनी उग्र कार्यषैली के कारण वे सरकार और विरोधियों की आंखों में हमेशा ही खटकते रहे।

मजदूर नेता के रूप में  

बकिंघम एंड कार्नेटिक मिल, मद्रास की सबसे बड़ी कपड़ा मिल थी। उसका महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहली लेबर यूनियन18, ‘मद्रास लेबर यूनियन’ का गठन अप्रैल 1918 में वहीं के मजदूरों ने मिलकर किया था। ब्रिटिश अधिकारी यूनियन के गठन का विरोध कर रहे थे। घटना की नींव 1920 में पड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारी रिवाल्वर लिए मजदूरों को धमकाता फिर रहा था। एक मजदूर ने उसकी रिवाल्वर छीनकर पुलिस को सौंप दी। इसपर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। बाबूराव और मुरुगन नामक दो युवा मजदूर उस गोलीबारी में मारे गए। मद्रास में श्रम आंदोलन में मरने वाले ये दोनों पहले थे। घटना से नाराज 13000 मजदूर हड़ताल पर उतर आए। बाद में पुलिस और कामगारों के बीच कई भिड़ंत हुईं, जिनमें दर्जनों मजदूरों को प्राण गंवाने पड़े। सिंगारवेलु ने न केवल हड़ताल के नेतृत्व में हिस्सा लिया, बल्कि लगातार लेख लिखकर मजदूरों के उत्पीड़़न के विरुद्ध आवाज उठाते रहे।

उन्हीं दिनों उत्तरी मद्रास में मैसी कंपनी के कामगार भी हड़ताल पर चले गए। वी. चक्करई और ओदीकेसवेलु नायकर जैसे मजदूर नेताओं के साथ सिंगारवेलु एक बार फिर मजदूरों के समर्थन में उतर गए। अपने आग उगलते भाषणों से इन तीनों नेताओं ने सरकार को हिला दिया था। 1927-28 उत्तरी-पश्चिमी रेलवे, बंगाल-नागपुर रेलवे तथा ईस्ट इंडियन रेलवे के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। रेलवे कर्मचारियों को समर्थन देने, उनका हौसला बढ़ाने के लिए सिंगारवेलु ने भोपाल, हावड़ा और बंगाल की यात्राएं कीं। हावड़ा और बंगाल में 30,000 मजदूर-कामगार हड़ताल पर थे। सिंगारवेलु ने अपने साथियों के साथ हड़ताल में हिस्सा लिया था। उत्तरी भारत की यात्रा से लौटे ही थे कि दूसरी हड़ताल की सूचना मिली। 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। मजदूर उनकी योग्यता के नए सिरे से छंटनी का विरोध कर रहे थे। छंटनी के लिए प्रबंधकों ने कर्मचारियों की योग्यता के नए मानदंड तैयार किए थे, जो मजदूरों को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरे रेलवे ने मजदूरों को अलग-अलग ठिकानों पर भेजने का निर्णय लिया था। मजदूर इनका विरोध कर रहे थे। मांगे न मानने पर मजदूर 19 जुलाई 1928 से हड़ताल पर चले गए। उनके समर्थन में बाकी मजदूरों और कामगारों ने भी हड़ताल की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप 21 जुलाई से रेलवे का चक्का जाम हो गया। वह हड़ताल आखिरकार नाकाम सिद्ध हुई। सिंगारवेलु को दस वर्षों की सजा हुई। लेकिन बाद में अपील पर, उनकी बीमारी और उम्र को देखते हुए सजा की अवधि 18 महीने कर दी गई।

1927 में ही जब हड़ताली मजदूर चाको और विंसेंट पुलिस की गोली से मारे गए। मद्रास तक जब वह समाचार पहुंचा तो सिंगारवेलु ने बिना कोई पल गंवाए उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन किया। जिसमें पुलिस के दमन की निंदा की गई। मजदूर और कामगारों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे इतने समर्पित थे कि जब भी, जहां से भी बुलावा मिलता, तुरंत पहुंच जाते थे।

सिंगारवेलु का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ। जब तक जिये तब तक उन्हें मजदूरों के हितों की चिंता सताती रही। जीवन के आखिरी दिनों में जब बढ़ी उम्र के कारण सक्रियता घट गई तो उन्होंने पेरियार की पत्रिकाओं, ‘कुदी अरासु’, ‘रिवोल्ट’ तथा अंग्रेजी दैनिक हिंदू में लेख आदि लिखकर संघर्ष की लौ को जलाए रखा। उनकी आंखों में समानता पर आधारित, वर्गहीन समाज का सपना बसता था। इस कसौटी पर कांग्रेस की ‘स्वराज’ की अवधारणा भी उन्हें अधूरी दिखाई पड़ती थी। उनका गांधी के नाम लिखा गया एक पत्र 24 मई 1922 को ‘नवशक्ति’ में प्रकाशित हुआ था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कि प्रत्येक परिवार को उतनी जमीन मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जरूरत के लायक अन्न उपजा सके। अपना घर होना चाहिए, ताकि किसी को भी किराया न चुकाना पड़े। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था भी सरकार की ओर से करनी चाहिए। जिस स्वराज में यह गारंटी न हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। असली स्वराज केवल जनता द्वारा, और केवल जनता के लिए आएगा। वे बेहद पढ़ाकू थे। उनका पुस्तकालय मद्रास के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से था।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ

  1.  अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग,दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14,799 ब्रोडवे न्यू यार्क, पृष्ठ 3
  2.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम- सिंगारवेलु : फर्स्ट कम्युनिस्ट इन साउथ इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ-1
  3.  पी.मनोहरन, जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी इन इंडिया, पृष्ठ 191।
  4.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-189
  5.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-190
  6.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-1
  7.  पी.वसंतकुमारन, गॉडफादर ऑफ़ इंडियन लेबर, एम. सिंगारवेलु, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  8.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-2
  9.  वसंतकुमारन, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  10.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ 164-165
  11.  उपर्युक्त 165
  12.  पी. मनोहरन, पृष्ठ 183
  13.  दि कलैक्टिड वर्क्स ऑफ़महात्मा गांधी, खंड-26, पृष्ठ 132-134।
  14.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-169
  15. उपर्युक्त पृष्ठ 203
  16.  उपर्युक्त पृष्ठ 221-22
  17.   उपर्युक्त पृष्ठ 222
  18.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-11

मई दिवस : संघर्ष की याद और संकल्पों का दिन

सामान्य

मई दिवस पर विशेष

यदि तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर लटकाकर तुम मजदूर आंदोलन को, गरीबी, बदहाली और विपन्नता में कमरतोड़ परिश्रम करने वाले लाखों लोगों के आंदोलन कोकुचल डालोगे….अगर तुम्हारी यही राय है तो हमें खुशीखुशी फांसी के तख्ते पर चढ़ा दो। किंतु याद रहे, आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो, कल यहांवहां, तुम्हारे आगेपीछे, प्रत्येक दिशा से लपटें उठेंगीं। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे। एक दिन आएगा, जब हमारी खामोशी उन आवाजों से कहीं ज्यादा ताकतवर होगी, जिनका तुम आज गला घोंट रहे हो ऑगस्ट स्पाइस।

मई दिवस’ के साथ कोई खुशनुमा प्रसंग नहीं जुड़ा है। न यह मजदूरों के लिए उत्सव मनाने का दिन है। फिर भी हर मेहनतकश के लिए इस दिन का महत्त्व है। यह उन्हें संगठन की ताकत का एहसास दिलाता है। उस हौसले की याद दिलाता है जिसके बल पर उनके लाखों मजदूर भाई अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए थे। चार्ल्स. रथेनबर्ग के शब्दों में, ‘मई दिवस वह दिन है जो मजदूरों के दिलों में उम्मीद तथा पूंजीपतियों के मन में खौफ पैदा करता है।’ यह अकेला दिन है जिसे मजदूरों के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। मजदूरों के लिए यह याद रखने का दिन है। ठीक ऐसे ही जैसे कोई जीवंत समाज अपनी आजादी के महानायकों के किस्सों को सहेजकर रखता है।

मशीनीकरण के बाद का दौर पूंजी के केंद्रीकरण का था। उसमें आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। फैक्ट्रियों में काम के घंटे निर्धारित नहीं थे। उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘कार्यदिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से सूरज छिपने तक काम करना।1 मौसम के अनुसार दिन घटताबढ़ता तो काम के घंटे भी घटबढ़ जाते। हर कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभीकभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था।2 कार्यघंटों को लेकर महिलाओं और पुरुषों, बच्चों और बड़ों में कोई भेद नहीं थाइसके आलावा मजदूरी बहुत कम थी। 16 से 18 घंटों तक काम करने के बावजूद मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलती थी, जिससे वे सामान्य जीवन भी जी सकें। ऊपर से बार-बार आने वाली मंदी के कारण मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता था। आड़े वक्त में सरकार भी उद्यमियों और पूंजीपतियों का ही पक्ष लेती थी। 1834 में ‘वर्किंगमेन्स एडवोकेट’ नामक अखबार ने छापा था, ‘डबलरोटी के पैकेटों को लानेले जाने के काम में लगे मजदूरों की हालत मिस्र के बंधुआ मजदूरों से भी बुरी थी। उन्हें दिन के 24 घंटों में 18 से 20 घंटे काम करना पड़ता था।’ मजदूर उसे 10 घंटों तक सीमित करने की मांग करते आ रहे थे। 1791 में फिलाडेफिया के बढ़इयों ने 10 घंटे के कार्यदिवस के लिए हड़ताल की थी। उसके बाद 1827 में ‘मेकेनिक्स यूनियन ऑफ़ फिलाडेफिया’, जिसे विश्व का पहला मजदूर संगठन कहा जा सकता है, के नेतृत्व में निर्माण कार्य के मजदूरों ने, 10 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर हड़ताल की थी।3 उनके बैनरों पर लिखा होता था—‘छह से छह तक, दस घंटे काम के, दो घंटे आराम के।’ 1830-40 के बीच उनकी मांग में और भी तेजी आ गई। उसके फलस्वरूप 1860 तक लगभग सभी देशों ने कार्यदिवस के औसत घंटों को 12 से घटाकर, 11 कर दिया था

मजदूर कार्यदिवस को 10 घंटों तक सीमित करने की मांग पर अड़े थे। 1837 में अमेरिका में उसे लेकर चक्काजाम जैसी स्थिति बन गई। आखिरकार संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रपति वेन बुरान ने सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रतिदिन 10 घंटे करने का आदेश जारी कर दिया। उसकी देखादेखी कारखाना मजूदरों ने यह कहते हुए कि उनसे भी सरकारी कर्मचारियों के बराबर काम लिया जाए, आंदोलन को और तेज कर दिया4 1853 में नएनए बने कैलीफोर्निया राज्य ने कार्यघंटों को सीमित करने से संबंधित पहला, मगर आधाअधूरा कानून बनाया था। मूल प्रस्ताव में दस घंटे के वैध कार्यदिवस के साथ, उससे अधिक काम लेने वाले नियोक्ताओं को दंडित किए जाने का प्रावधान था। उसकी काफी चर्चा भी हुई थी। प्रस्ताव कानून की शक्ल ले, उससे पहले ही उद्यमियों ने सरकार पर जोर डालकर, उसे कमजोर करने का षड्यंत्र रच दिया। जो कानून बना उसमें कहा गया था कि ‘राज्य की किसी भी अदालत में 10 घंटों के श्रम को, एक कार्यदिवस का श्रम माना जाएगा।’5 इस तरह दस घंटों के कार्यदिवस की घोषणा महज कानूनी अवधारणा तक सीमित थी। वह नियोक्ताओं को न तो कोई निर्देश देता था, न उसमें क़ानून के उल्लंघन पर किसी तरह के दंड काप्रावधान था। कानून की कमजोरी का लाभ उठाकर नियोक्ता मजदूरों के साथ खूब सौदेबाजी करते थे। मजदूर संगठन उस कानून में आवश्यक संशोधन की मांग कर रहे थे।

10 घंटे के कार्यदिवस की मांग अभी चल ही रही थी कि श्रमिकों ने 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तेज कर दी। इस बार वह मांग सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं थी। बल्कि जहां-जहां भी श्रमिक उत्पीड़न का शिकार थे, वहांवहां वे अपनी मांग के समर्थन में सरकार और उद्योगों पर दबाव बनाने में लगे थे। 1856 में आस्ट्रेलिया के निर्माण मजदूरों ने, 8 घंटे की मांग को लेकर नारा गढ़ा था—‘8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम।’ इस मांग को तब बल मिला जब अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ ने 8 घंटे की मांग का समर्थन किया। वह अमेरिका का पहला मजदूर संगठन था। अपने स्थापना समारोह में ही 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए संगठन की ओर कहा गया था कि पूंजीवादी दासता से श्रमिकों की मुक्ति हेतु वर्तमान समय की सबसे पहली और बड़ी जरूरत है, अमेरिका के सभी राज्यों में 8 घंटे के कार्यदिवस को वैध माना जाए। सितंबर 1866 में फर्स्ट इंटरनेशनल द्वारा अपने जिनेवा सम्मेलन में 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग, घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गईफर्स्ट इंटरनेशनल का निष्कर्ष था—

काम के घंटों की वैध सीमा तय होना आवश्यक है। इसके अभाव में कामगार वर्गों की स्थिति में सुधार तथा शोषण से मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता…..एक वैध कार्यदिवस के लिए यह सभा 8 घंटों की सीमा के प्रस्ताव को मंजूर करती है।’6

1867 में ‘पूंजी’ का प्रथम खंड प्रकाशित हो चुका था। उससे पहले माना जाता था कि उत्पादकता सांस्कृतिक उपादानों पर निर्भर करती है। मार्क्स ने शताब्दियों से चली आ रही इस धारणा का खंडन किया था। कहा था कि संस्कृति स्वयं उत्पादकता के साधनों द्वारा तय होती है। उस पुस्तक में मार्क्स ने श्रमिक शोषण की विशद विवेचना की थी। पूंजीवादी शोषण के लगभग सभी पक्ष उसमें शामिल थे। उसका विश्लेषण इतना गहन था कि श्रमिक शोषण से जुड़ी छोटी-सेछोटी बात भी उसकी पैनी नजर से बच नहीं पाई थीमार्क्स ने ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग का समर्थन किया था। कहा था कि श्रमिकों को रंग-भेद की भावना से ऊपर उठकर, अपने अधिकारों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए। उन दिनों अमेरिका में मजदूर को प्रति सप्ताह 63 घंटे काम करना पड़ता थामार्क्स चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका श्रमिक अधिकारों के समर्थन में 8 घंटों के वैध कार्यदिवस की घोषणा करेपूंजीपतिवर्ग दूसरों को दास बनाकर रखने की मानसिकता से बाहर आए। उसने लिखा था—

जब तक दासता उसके गणतंत्र को विरुपित करती रहेगी, तब तक श्रमिक मुक्ति की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम नाकाम सिद्ध होगा। जब तक काले श्रमिकों की पहचान उनके रंग के आधार पर होगी, तब तक श्वेत मजदूरों के लिए भी शोषणमुक्ति संभव नहीं है….24 घंटे के सामान्य दिन में मनुष्य अपनी कार्यशक्ति का भरपूर इस्तेमाल सीमित घंटों तक ही कर सकता है। यहां तक कि एक घोड़ा भी, प्रतिदिन अधिकतम 8 घंटे काम कर सकता है। दिन के बाकी घंटों में 8 घंटे कार्यशक्ति को आराम करना चाहिए, बाकी घंटे उन्हें अपने भौतिक आवश्यकताओं स्नान, भोजन आदि के लिए मिलने चाहिए।’7

8 घंटे के कार्यदिवस की मांग असामयिक नहीं थी। उसके पीछे भरा-पूरा वैचारिक दर्शन था। उसे जमीन दी थी, पीयरे जोसेफ प्रूधों, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन, एंगेल्स जैसे विचारकों ने। वे अर्थव्यवस्था के समाजीकरण की मांग कर रहे थे। उसके पीछे समानता और स्वतंत्रता का दर्शन था। मान्यता थी कि यदि सब बराबर हैं, तो सभी को अपनी जरूरत के अनुसार भोग करने का भी अधिकार है। इसलिए मार्क्स का कहना था—‘प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप।’ समाजवाद की दिशा में सबसे क्रांतिकारी पहल प्रूधों ने की थी। वह अराजकतावादी चिंतक था। मानता था कि व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा गुलामी जितनी ही घातक है। उसका कहना था—‘व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है। संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है।’ वह संपत्ति को सामाजिक दासता का कारक मानता था—

यदि मुझसे कोई यह पूछे कि गुलामी क्या है? तो मैं उसका एक ही शब्द में उत्तर दूंगा—‘गुलामी, हत्या है!’ मेरा मंतव्य पूरी तरह सरल और स्पष्ट है। उसके लिए किसी अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की चेतना, उसके मस्तिष्क तथा व्यक्तित्व को छीन लेने की शक्ति—उसके जीवनमृत्यु का फैसला करने की शक्ति के समान हैं। यह मनुष्य को गुलाम बनाती है। यह उसकी हत्या है, क्यों? अब यदि कोई मुझसे पूछे—‘संपत्ति क्या है?’ क्या मुझे इसका वैसा ही उत्तर नहीं देना चाहिए! कहना चाहिए कि यह डकैती है!’ इसमें गलत समझे जाने की कतई गुंजाइश नहीं है। दूसरा निष्कर्ष निश्चित रूप से पहले का ही रूपांतरण है?8

प्रूधों की धारा का ही दूसरा विचारक था, मिखाइल बकुनिन। उसका राजनीतिक दर्शन नागरिक स्वतंत्रता, समाजवाद, संघवाद, नास्तिकता और भौतिकवाद से मिलकर बना था। बकुनिन का मानना था कि किसी समाज में व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह को दिए गए विशेषाधिकार उसके बुद्धि-विवेक एवं संवेदनशीलता को मार देते हैं। विशेषाधिकार चाहे राजनीतिक हों अथवा आर्थिक, वे मनुष्य के समाजीकरण की धारा को अवरुद्ध करते हैं। उसे स्वार्थी और आत्मपरक बनाते हैं। मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का समर्थक बकुनिन लोकतंत्र का भी आलोचक था। उसका कहना था कि जब जनता पर लाठियां बरसाई जा रही हों तो लोगों को यह जानकर कोई प्रसन्नता नहीं होगी कि वे लोकतंत्र की लाठियां हैं। बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों से उसकी अपील थी—

हमें अपने सिद्धांतों का प्रचार शब्दों के माध्यम से नहीं, कार्यों के माध्यम से करना चाहिए। यही प्रचार का सबसे लोकप्रिय, शक्तिशाली और अनूठा तरीका है….दुनिया में क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने में सत्तावादी क्रांतिकारियों का बहुत कम योगदान रहा है। इसलिए कि वे जनमानस को आड़ोलित कर, क्रांति की ओर उन्मुख करने के बजाय, मात्र अपने दम पर, अपनी योग्यता, सत्ता और विचारों के माध्यम से क्रांति लाना चाहते थे….उन्हें क्रांति के समर्थन में फरमान जारी करके नहीं, अपितु जनता को अपने लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में प्रोत्साहित करके, क्रांति को बढ़ावा देना चाहिए।’9

मई दिवस के आंदोलन का चरित्र मूलतः ‘अराजकतावादी’ था। बता दें कि अराजकतावाद का आशय, जैसा प्रचार किया जाता है, राज्य तथा उसकी शक्तियों का लोप हो जाना नहीं है। उसके मूल में यह विचार है कि राज्य जनता का चयन है। उसका गठन जनता द्वारा अपने सुख एवं सुरक्षा के लिए किया जाता है। वह जनता के तभी हितकारी हो सकता है, जब उसपर जनता का अधिकाधिक नियंत्रण हो। अराजकतावाद में राज्य की अधिकतम शक्तियां जनता की ओर अंतरित हो जाती हैं। परिणामस्वरूप राज्य की शक्तियां प्रतीकात्मक होकर रह जाती हैं। सरकार की आवश्यकता नहीं रह जाती, यदि हो भी तो वह न्यूनतम अधिकारों के साथ न्यूनतम शासन करती है।

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प्रूधों और बकुनिन का उल्लेख यहां इसलिए प्रासंगिक समझा गया क्योंकि मई दिवस आंदोलन की बागडोर मुख्यतः अराजकतावादियों के हाथों में थी, जो किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोध करते थे। ‘अंतरराष्ट्रीय वर्किंग मेन्स ऐसोशिएसन’ जिसे ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के नाम से भी जाना जाता है, समाजवादी संगठन था। उसके पीछे सोच था कि मजदूर चाहे किसी देश का हो, उसकी मूलभूत समस्याएं और चुनौतियां एक जैसी होती हैं, इसलिए उसके विरोध में लड़ाई भी संगठित होकर लड़ी जानी चाहिए। वे समाजवाद के समर्थक थे, किंतु उसके लिए रास्ता क्या हो, इसे लेकर उनमें मतभेद थे। उसमें से कुछ राबर्ट ओवन के अनुयायी थे, कुछ लुइस ब्लेंक के। कुछ का भरोसा संघवाद में था, तो कुछ अपना तारणहार गणतंत्र को मानते थे। यह विभाजन ऊपर की श्रेणी के बुद्धिजीवियों में भी था। हीगेल से प्रभावित कार्ल मार्क्स द्वंद्ववादी विचारधारा का समर्थक था। उसका मानना था कि सत्ता प्रतिष्ठानों और उत्पादन केंद्रों पर श्रमिक वर्गों का नियंत्रण होना चाहिए। बकुनिन किसी भी प्रकार के सत्तावाद का विरोधी था। उसे वह मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधक मानता था। दोनों गुटों के मतभेद इतने बढ़े कि इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस के बाद, दोनों के बीच विभाजन हो गया। अराजकतावादी बकुनिन के नेतृत्व में अलग हुए टुकड़े को ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ का नाम दिया गया था। ‘एंटी-आथरटेरियन इंटरनेशनल’ के नेता मानते थे कि ‘हड़ताल का संघर्ष का बेशकीमती हथियार’ है। इसलिए श्रमिकों को ‘महान एवं अंतिम चुनौती’ के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। अराजकतावादी नेताओं के मनस् में नई वर्गहीन, समाजवादी आदर्शों से युक्त और सभी प्रकार यहां तक राज्य के वर्चस्व से भी मुक्त नए समाज का सपना कौंधता रहता था। 8 घंटे के कार्यदिवस से जुड़ी हड़ताल में इसी गुट के नेता थे, जो ‘बेहतर समाजवादी दुनिया’ के सपने के साथ जूझ रहे थे

1872 में ‘प्रथम इंटरनेशनल’ का कार्यालय, लंदन से न्यू यार्क शिफ्ट कर दिया गया था। इससे उसकी गतिविधियों में व्यवधान आया था। प्रभाव भी घटने लगा था। लेकिन मजदूर 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग पर अडिग थे। उसके लिए धरना, प्रदर्शन, हड़ताल चलते ही रहते थे। 1877 में मार्टिंग्स वर्ग, पश्चिमी वर्जिनिया में रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया। मामला इतना बढ़ा कि उसपर काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। बलप्रयोग के कारण हड़ताल तो दब गई, परंतु उससे जो चिंगारियां फूटीं उसने बहुत जल्दी वाल्टीमोर, ओहियो, पेनसिल्वेनिया जैसे शहरों की रेलवे कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। धीरे-धीरे दूसरे उद्यमों से जुड़े मजदूर भी हड़ताल पर उतर आए। पहली बार मजदूरों ने सरकार और पूंजीपतियों को अपनी विराट शक्ति का एहसास कराया था। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। वह ऐसा जनउभार था, जिसका असर राष्ट्रव्यापी था

1884 का वर्ष अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलनों के इतिहास में बड़ा परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ। उसी वर्ष फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस, जिसे बाद में ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ के कूटनाम से भी जाना गया—का शिकागो में चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। 7 अक्टूबर, 1884 को आयोजित उस सम्मेलन में निम्नलिखित प्रस्ताव को स्वीकृति मिली थी—

‘‘फेडरेशन ऑफ़ आर्गनाइज्ड ट्रेड एंड लेबर यूनियंस ऑफ़ दि यूनाइटिड स्टेट्स एंड कनाडा’ तय करती है कि पहली मई तथा उसके बाद से 8 कार्यघंटों का एक कार्यदिवस, वैध कार्यदिवस के रूप में जाना जाएगा। हम सभी श्रमिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे अपने-अपने नियमों को इस प्रकार निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों10

अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ स्वैच्छिक और संघीय आधार पर बना था। फेडरेशन के राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय सिर्फ उससे जुड़े श्रमिक संगठनों पर लागू होते थे; वह भी तब जब श्रमिक संगठन उन निर्णयों का विधिवत समर्थन करें। 8 घंटे के प्रस्तावित कार्यदिवस की घोषणा में हड़ताल का संकल्प भी छिपा था। चूंकि हड़ताल के दौरान श्रमिकों के पास अपनी आजीविका का कोई साधन नहीं होता, इसलिए हड़ताल लंबी खिंचने पर मजदूरों को संगठन की आर्थिक मदद की जरूरत पड़ सकती थी। परोक्ष रूप में फेडरेशन का संकेत बड़ी हड़ताल की ओर था। उसके लिए सदस्य श्रमिक संगठनों का समर्थन और सहभागिता आवश्यक थी। उस समय फेडरेशन के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 थी। राष्ट्रीय स्तर पर यह बहुत ज्यादा भी नहीं थी। सरकारों पर दबाव बनाने की स्थिति में तो वह संगठन बिलकुल भी नहीं था

उस दिनों अमेरिका का श्रमिक आंदोलन तीन प्रमुख धाराओं में बंटा हुआ था। उसके सबसे बड़े मजदूर संगठन का नाम था—‘आर्डर ऑफ़ दि नाइट्स ऑफ़ लेबर’ यानी योद्धाओं का संगठन।’ 1886 में सदस्य संख्या की दृष्टि से वह सबसे बड़ा मजदूर संगठन था। उसके लगभग 7 लाख से अधिक सदस्य थे। उसमें कई महिलाएं भी शामिल थीं। टेरेंस वी. पोव्देर्ली उसका नेता था। यह संगठन 1878 में ही 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग करता हुआ आ रहा था। उसकी ख्याति एक जुझारू संगठन की थी। 1886 में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी। इस कारण उसके सदस्यों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। उसके प्रमुख नेता हड़ताल के बजाए सरकार के साथ सहयोग और बातचीत करते हुए, उसका हल निकालना चाहते थे। हालांकि उसका एक हिस्सा हड़ताल के लिए तैयार था। नाइट ऑफ़ लेबरने 1886 की 8 घंटों के कार्यदिवस हेतु ऐतिहासिक हड़ताल में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया था।. नतीजा यह हुआ कि उसका प्रभाव कम पड़ने लगा।। उसके बाद जितनी तेजी से उसकी सदस्य संख्या बढ़ी थी, उतनी ही तेजी से उसकी सदस्य संख्या और प्रतिष्ठा कम होने लगी थी। दूसरी धारा अराजकतावादियों की थी। उन्होंने 1883 में ‘इंटरनेशनल वर्किंग पिपुल्स एसोशिएसन’ का गठन किया था। वे लोग न केवल कानून अपितु राज्य की सत्ता को ही श्रमिक हितों में बाधक मानते थे। इसलिए वे सहयोग या बातचीत के बजाए, मांग को लेकर जोरदार संघर्ष छेड़ने के पक्ष में थे। उसके लिए मारक हथियारों के प्रयोग से भी उन्हें आपत्ति नहीं थी।

तीसरा संगठन ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ था। इस संगठन के कई सदस्य मार्क्सवादी विचारधारा के थे। यह संगठन शुरू से ही आठ घंटों के कार्यदिवस की मांग करता आया था। आरंभ में इसका तरीका भी संवाद और सहयोग पर आधारित था। उसमें एक गुट ऐसा भी था जिसे बातचीत के तरीके पर शुरू से ही विश्वास न था। यह गुट आगे चलकर न केवल फेडरेशन के बाकी सदस्यों को हड़ताल के लिए तैयार करने में सफल रहा, अपितु अपने अनुषंगी संगठनों के कुछ गुटों को हड़ताल के लिए अपने साथ लाने में सफल रहा था

यह दिखाने के लिए कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग केवल घोषणा नहीं है, श्रमिक संगठन उसके बारे में पूरी तरह से गंभीर हैं, ‘फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ ने अपरोक्ष तैयारियां आरंभ कर दी थीं। आने वाले वर्ष में श्रमिक नेताओं की जगह-जगह सभाएं आयोजित की गईं। हर जगह 8 घंटों के कार्यदिवस के संकल्प को दोहराया गया। उसे सबसे सुधारवादी कदम बताया जा रहा था। कहा जा रहा था कि उससे ‘पूंजीवाद’ की जड़ पर प्रहार होगा। हालांकि कुछ अराजकतावादी अब भी यह मानकर चल रहे थे कि 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग से श्रमिकों की हालत में सुधार होने की संभावना बहुत कम है। श्रमिक नेताओं में ऑगस्ट स्पाइस जैसे उग्र अराजकतावादी भी थे, जो 8 कार्यघंटों की मांग से सहमत थे, मगर श्रमिकों के कल्याण के लिए उन्हें अपर्याप्त मानते थे। स्पाइस का विचार था कि—‘हमारी समस्याओं का वास्तविक समाधान बुराई की जड़ पर सीधा प्रहार किए बगैर संभव नहीं है।’11 एक और अराजकतावादी सेमुअल फील्डेन ने हेमार्किट नरसंहार से एक वर्ष पहले अराजकतावादी अखबार ‘दि अलार्म’ में लिखा था—‘‘कोई आदमी चाहे दिन में आठ घंटे काम करे या दस घंटे, वह गुलाम है, गुलाम रहेगा।’12 फील्डेन ने कहा था कि मजदूरों की समस्या का एकमात्र समाधान है, ‘निजी संपत्ति का खात्मा और प्रतिस्पर्धा का अंत।’

8 कार्यघंटों की मांग को श्रमिकों का चौतरफा समर्थन मिल रहा था। मजूदर संगठन भी अपनी-अपनी तरह से सक्रिय थे। ‘कारपेंटरर्स एंड सिगार मेकर्स’, ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ की सदस्य संख्या में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही थी। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है, कि फेडरेशन की घोषणा के बाद, श्रमिक संगठन ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’(मजदूरों के शूरवीर) की सदस्य संख्या 1884 में 70000 से 1885 तक 200000 और फिर 1886 तक 700000 हो चुकी थी13 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग नाइट आफ लेबर के कार्यक्रम का हिस्सा थी। आरंभ में वह उस मुद्दे पर हड़ताल के लिए बाकी सदस्यों का साथ देने को तत्पर था. मगर बाद में, कदाचित मजदूर संगठनों पर अराजकतावादियों के प्रभाव के चलते, नाइट ऑफ़ लेबरके नेता हड़ताल से कटने लगे थे. स्वयं पोव्देर्ली, फेडरेशन से जुड़ी यूनियनों से हड़ताल में भाग लेने को कहने लगा था।

दूसरे कई संगठनों में भी बढ़ती सदस्य संख्या को देखकर उत्साह था। उसका असर किसी एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि अमेरिका के विभिन्न शहरों के श्रमिक इस मांग को लेकर जोश से भरे हुए थे। मजदूरों को अंदाजा था कि 8 कार्यघंटों की मांग के लिए होने वाली हड़ताल लंबी खिंच सकती है। इसलिए कुछ सरकार पर दबाव बनाने के लिए निर्धारित तिथि से पहले अल्पावधिक हड़तालों का सिलसिला शुरू हो चुका था। उन हड़तालों में ‘कुशल और अकुशल, काले और गोरे, स्त्री और पुरुष, नेटिव और प्रवासी सभी शामिल होते थे

3

मजूदर संघर्ष का केंद्र शिकागो बना था। क्या इसके पीछे कोई खास कारण था? बिलकुल। अमेरिकी गृहयुद्ध(1861-1865) के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जोरदार झटका लगा था। वह भयानक मंदी के दौर से गुजर रही थी। 1873 से 1879 के बीच 18000 कंपनियां दिवालिया घोषित हो चुकी थीं। 8 राज्य और सैकड़ों बैंक तबाह हो चुके थे14 मगर जैसे ही मंदी का दौर समाप्त हुआ, अमेरिका खासकर उसके शिकागो शहर में जो उन दिनों बड़ा औद्योगिक केंद्र था—बाहर से आने वाले मजदूरों की संख्या अचानक बढ़ चुकी गई। इससे शहर की समस्याएं भी बढ़ी थीं। उन दिनों अमेरिका में प्रति सप्ताह औसत 63 घंटे काम का प्रावधान था15 मंदी से उबरने की छटपटाहट में जहां उद्योगपति अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहते थे। वहीं श्रमिक संगठन अपने लिए बेहतर मजदूरी की मांग कर रहे थे। कारण यह था कि मंदी के बाद जिस अनुपात में मंहगाई में वृद्धि हो रही थी, उस अनुपात में वेतनवृद्धि नहीं हो पा रही थीतनाव तब और बढ़ गया था जब बाल्टिमोर एंड ऑहियो रेलरोड ने मंदी के बहाने मजदूरों की पगार में 10 की कटौती की घोषणा की नतीजा यह हुआ की जुलाई 25, 1877 से मजदूरों ने हड़ताल कर दी देखते ही देखते उसने पूरे अमेरिका को अपनी चपेट में ले लिया स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल हड़ताल पर काबू पाने में नाकाम रहे तो सेना बुलानी पड़ी दो सप्ताह चलने वाली उस हड़ताल ने सैकड़ों की जान ली थी करोड़ों डॉलर की संपत्ति को नुकसान पहुंचा था जार्ज शिलिंग नाम के एक मजदूर नेता ने उसे ‘सामाजिक और औद्योगिक ग़दर’ की संज्ञा की थी

महत्त्वपूर्ण बात यह कि ‘गृह युद्ध की समाप्ति के एक दशक के भीतर ही उद्योगपति शिकागो पुलिस को गैरभरोसेमंद बताने लगे थे। उनका मानना था कि सरकारी सुरक्षाबल मजदूरों के प्रति उदारता बरतते हैं। ऐसा न हो, इसके लिए सुरक्षा बलों की जगह अपने खर्च पर पेशेवर संगठन बनाने की कोशिश जारी थी। 1870 और 1880 के दशक में उन्होंने प्राइवेट सशस्त्र बलों की भर्ती शुरू कर दी थी। निजी तथा सरकारी सशस्त्र बलों की सुरक्षा के लिए मजबूत हथियार-घर और किले बनाए जा रहे थे16 इसके साथसाथ मजदूर संगठनों पर लगाम लगाने के प्रयत्न भी जारी थे। वे मजदूरों को डराने, धमकाने, उनके संगठनों को काली सूची में डालने जैसे काम कर रहे थे। श्रमिक संगठनों में फूट डालने के लिए जासूसों, ठगों, निजी सुरक्षा बलों, और भेदियों की भरती की जा रही थी। सीधे-साधे गरीब मजदूरों को अनार्किस्ट और कम्युनिस्ट जैसे नाम देकर नौकरी से हटाया जा रहा था। मंदी के नाम पर मजदूरों के वेतन की कटौती की जा रही थी।

इसके बावजूद मुख्य धारा के अखबार पूंजीपतियों का समर्थन कर रहे थे। शिकागो ट्रिबून, दि टाइम्स, जैसे बड़े अखबारों का किसी न किसी रूप में राजनीतिकरण हो चुका था। मजदूरों की ओर ‘सोशलिष्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ जैसे कुछ जनवादी तेवर के अखबार थे। लेकिन तुलनात्मक रूप से उनकी पहुंच बहुत छोटे समूह तक थी। उदाहरण के लिए 1890 के दशक में शिकागो डेली न्यूज की पाठकसंख्या जहां 2,00,000 थी, वहीं सोशलिष्ट और अनार्किस्ट जैसे प्रतिबद्ध विचारधारा के अखबारों की संयुक्त पाठक संख्या महज 30,000 थी17 जैसेजैसे मई का महीना करीब आ रहा था, मजदूरों का जोश भी बढ़ता जा रहा था। 1886 के आरंभ में, जहां जाओ वहां, 8 घंटे के कार्यदिवस, मजदूर एकता और पूंजीपतियों के शोषण पर चर्चा होती सुनाई पड़ती थी। सड़कों पर, सेलूनों और बाजारों में जोशीले गीत सुनाई पड़ते थे —

लाखों मेहनतकश, जागे हुए है

आओ उन्हें मार्च करते हुए देखें

उधर देखो, तानाशाह कांप रहे हैं,

अरे! उनकी ताकत खत्म होने लगी है

ओ श्रमयोद्धाओं किलों को उड़ा दो

अपने उद्देश्य की खातिर लड़ो

लड़ो, ताकि तुम्हें और तुम्हारे

सभी पड़ोसियों को बराबर का हक मिल सके

उठो, इन निरंकुश कानूनों को दफन कर दो

ऐसे गीतों ने श्रमिकों की आंखों में सपने रोपने का काम किया था। सपने बराबरी और एकता के। समानता और स्वतंत्रता के। फेडरेशन ऑफ़ लेबर की 8 कार्यघंटों को कानूनी घोषित करने की मांग के साथ ही श्रमिक संगठन उसके लिए तैयारियों में जुटने लगे थे। कामगारों का जुझारूपन, लक्ष्यप्राप्ति के लिए बलप्रयोग से न हिचकने का संकल्प श्रम आंदोलनों को विस्तार दे रहा था। अराजकतावादी नेताओं में से अल्बर्ट पार्सन्स, जोहान्न मोस्ट, ऑगस्ट स्पाइस, लुईस लिंग्ग जैसे नाम घरघर के जानेपहचाने नाम बन चुके थे। 1885 में ही हड़तालों का सिलसिला आरंभ हो चुका था। अपनी एकजुटता दर्शाने के लिए मजदूर बेंड-बाजे के साथ परेड के निकलते थे। 1881-1884 के बीच अमेरिका में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं का वार्षिक औसत लगभग 500 था। उनमें करीब 1,50,000 श्रमिकों ने हिस्सा लिया था। मगर 1885 में हड़ताल और तालाबंदी की घटनाओं की संख्या 700 तक पहुंच चुकी थी। उनमें 2,50,000 मजदूरों की भागीदारी थी। उससे अगले साल यानी 1886 में हड़तालों तथा तालाबंदी की संख्या पिछले साल, यानी 1885 के मुकाबले दुगुनी से भी ज्यादा, 1572 थी। उनमें 6,00,000 श्रमिकों की हिस्सेदारी थी। 1885 में जहां 2467 औद्योगिक संस्थान हड़ताल और तालाबंदी से प्रभावित थे, वहीं उससे अगले वर्ष में 11562 कारखाने प्रभावित हुए थे। ‘नाइट्स ऑफ़ लेबर’ के नेताओं ने हालांकि हड़ताल में भाग न लेने का खुला ऐलान कर दिया था बावजूद इसके उसके लगभग 7,00,000 सदस्यों में से 5,00,000 कामगार हड़ताल में सीधे तौर पर शामिल थे18

आसन्न संकट को सामने देख सावधान हो जाना मनुष्य का प्राकृतिक लक्षण है। संकट जितना अधिक बड़ा हो, वह उतनी ही अधिक शक्ति से उसका सामना करता है। 1870 और 1880 के बीच श्रमिक संगठनों की भी यही हालत थी। इसलिए एक और जहां पूंजीपति और राज्य मिलकर मजदूर एकता और उनके संगठनों को कमजोर करने में लगे थे, उनसे निपटने की तैयारियां की जा रहीं थीं, वहीं श्रमिक भी 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर एकजुट हो रहे थे। इस बीच श्रमिक संगठनों में ही कुछ ऐसे नेता भी थे, जो मजदूर एकता में खलल डालकर, हड़ताल की संभावना का टालने या उसे कमजोर करने में लगे थेउनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें पूंजीपतियों ने इस काम के लिए नियुक्त किया था। लेकिन मजदूरों में जोश था। 1 मई से ठीक पहले एक गुमनाम प्रकाशक की ओर से छपा पर्चा मजूदरों में बांटा गया, जिसमें अपील थी—

    • मजदूर हथियारों के लिए!

    • महल के लिए युद्ध, झोपड़ी के लिए शांति, विलासितापूर्ण सुस्ती के लिए मौत

    • मजदूरी प्रथा दुनिया की बदहाली की एकमात्र वजह है। वह धनाढ्यों द्वारा समर्थित है। इसे नष्ट करने के लिए उन्हें या तो काम करना होगा, अथवा मरना होगा

    • एक पाउंड डायनामाइट, एक बुशेल मतदातापत्रों से बेहतर है!(बुशेल: 32 सेर या 25.4 किलोग्राम की माप)

    • पूंजीपति लकड़बघ्घों, पुलिस और लड़ाकुओं का समुचित सामना करने के लिए, अपने हाथों में हथियार लेकर, आठ घंटों की मांग उठाओ19

साफ है कि दोनों ओर से कमानें तन चुकी थीं। हड़ताल का केंद्र शिकागो था। लेकिन आंदोलन केवल वहीं तक सीमित नहीं था। न्यू यार्क, बाल्टीमोर, सिनसिनाटी, सेंट लुईस, वाशिंग्टन, डेट्रोइट, पिटसबर्ग, मिलवोकी, कैलीफोर्निया सहित दूसरे और भी कई शहरों में मजदूर भड़के हुए थे। अफवाहों का बाजार गर्म था। इतिहासकार और समाज-वैज्ञानिक एक और गृह युद्ध की संभावना जता रहे थे। पूंजीपतियों के प्रति घृणा चारों ओर पसरी हुई थी। मजदूर मान चुके थे कि कार्यघंटों को लेकर सरकार और कारखाना मालिकों ने उन्हें और रियायत मिलने वाली नहीं है। मैकार्मिक कंपनी ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को लॉकआउट के बहाने बाहर निकाल दिया था। बाहर किए गए कर्मचारी किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें, इसके लिए 300 सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त किया गया था। कंपनी के इस निर्णय को लेकर कर्मचारियों में खासी कड़वाहट थी। मैकार्मिक के लॉकआउट में ‘इंटरनेशनल कारपेंटरर्स यूनियन’ की बड़ी भूमिका था। उसके नेताओं में से एक लुइस लिंग्ग चरमपंथी था। वह निर्भीक और मुखर वक्ता था तथा जो डायनामाइट को ‘सच्चा औजार’ मानता था।

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आखिर वह दिन भी आ पहुंचा जिसके लिए दोनों ही वर्गों ने भरपूर तैयारी की थी। सबसे ज्यादा क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठन शिकागो में ही जमा हुए थे। विभिन्न संगठनों के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ‘8-घंटा समिति’ का गठन किया गया था। दूसरी ओर उग्र वामपंथी मजदूर संगठनों ने हड़ताल का मोर्चा संभालने के लिए ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ का गठन किया था। समन्वय की व्यवस्था ‘8-घंटा समिति’ और ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ के बीच भी थी। उन्होंने हड़ताल के संचालन के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाया हुआ था। ‘सेंट्रल लेबर यूनियन’ ने अभ्यास के लिए 1 मई से पहले रविवार के दिन लामबंदी प्रदर्शन किया था। उसमें कई श्रमिक संगठनों के लगभग 25000 मजदूरों ने हिस्सा लिया था। उसके साथ नाइट्स ऑफ़ लेबर, सोशलिष्ट लेबर पार्टी भी थीं। लेकिन नाइट्स ऑफ़ लेबर ने, शिकागो में एकदम अंतिम क्षण में खुद को प्रस्तावित हड़ताल से अलग कर लिया20 इससे नाराज उसका एक गुट, हड़ताल के सक्रिय समर्थन में उतर आया था। 1 मई का ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ हड़ताल के आवाह्न के साथ पाठकों तक पहुंचा था—

बहादुरो आगे बढ़ो! संघर्ष शुरू हो चुका है….साथियो! इन शब्दों पर ध्यान रखना—कोई समझौता नहीं। कापुरुष पीछे चले जाएं, बहादुर आगे आ जाएं। अब हम पीछे नहीं हट सकते। यह मई की पहली तारीख है….अपनी बंदूकों को साफ करो, कारतूसों को संभालकर रखो। पूंजीपतियों द्वारा किराये पर बुलाए गए हत्यारे, पुलिस और सैन्यबल, हत्या के लिए तैयार हैं। इन दिनों कोई भी मजदूर खाली जेब घर से बाहर कदम नहीं रखेगा।’21

उद्योगपतियों और व्यापारियों ने अपनी सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा बलों का गठन किया था। दूसरी ओर मजदूर संगठन भी 8 घंटे कार्यदिवस की मांग को अपने जीवन और मरण का सवाल बना चुके थे। पूंजीपतियों के सुरक्षाबलों का जवाब देने के लिए जर्मन तथा बोहेमियन समाजवादियों की ओर से शिकागो में ‘लेहर अंड वेहर वीरीन’(शैक्षिक एवं सुरक्षा समिति) का गठन किया गया था22 उद्देश्य था कि राज्य यदि श्रमआंदोलनों को रोकने के लिए बल का इस्तेमाल करे तो उसका उत्तर बलपूर्वक उसी अंदाज में दिया जा सके। साथी मजदूरों से संवाद करने के लिए श्रमिक संगठनों के पास ‘अलार्म’ और ‘आर्बीटर जाइटुंग’ जैसे समाचारपत्र थे। उनका सर्कुलेशन मुख्यधारा के अखबारों के मुकाबले बहुत कम था। मगर मजदूरों पर उनका प्रभाव दूसरे अखबारों की अपेक्षा कहीं ज्यादा था। उनकी भाषा आह्वानकारी होती थी। इसे एक उदाहरण के जरिये समझना उपयुक्त होगा। नवंबर-1884 में ‘इंटरनेशनल एसोशिएसन ऑफ़ वर्किंगमेन’ ने, स्थानीय श्रमिक संगठनों और संस्थाओं की मदद से समाजवाद को परिभाषित करने की कोशिश की थी23

1. निष्ठुर क्रांति तथा अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों की मदद से वर्तमान वर्गीय वर्चस्व को समाप्त करना

2. साम्यवादी संगठनों अथवा उत्पादन को लेकर मुक्त समाज की रचना

3. उत्पादक संगठनों के माध्यम से, बगैर लार्भाजन तथा लूट के बराबर श्रममूल्य के आधार पर वस्तुओं का विनिमय।

4. ऐसा शिक्षातंत्र खड़ा जिसमें स्त्रीपुरुष सभी धर्मरहित, वैज्ञानिक सूझबूझ तथा बराबरी के सिद्धांत के अनुरूप शिक्षा ग्रहण कर सकें।

5. लिंग अथवा जातीय भेदभाव से परे, सभी के लिए समान अधिकार

6. जनता के आपसी कार्यकलापों को संघों एवं कम्यूनों के बीच समझौतों के माध्यम से नियंत्रित करना

इस समाचार को 3 नवंबर 1884 के ‘अलार्म’ ने निम्नलिखित टिप्पणी के साथ प्रकाशित किया गया था—

दुनियाभर के मजदूर भाइयो! एक हो जाओ। साथियो! इस महान लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जो सबसे आवश्यक है, वह है हमारा संगठन और हमारी एकता…..सो एकजुट होने का दिन आ पहुंचा है। हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाओ। ड्रम बजाकर बेखटके युद्ध की मुद्रा में आ जाओ—दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ। तुम्हारे पास खोने के लिए जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है, जीतने के लिए दुनिया पड़ी है।’24

जैसे ही पहली मई का दिन आया, मजदूरों ने अपने औजार रख दिए। उनके चेहरों पर विश्वास था। हर कोई अपने अधिकारों के लिए लड़ने का उद्धत था। श्रमिक आंदोलनों के इतिहास का वह सबसे अविस्मरणीय दिन था। शिकागो मजदूर क्रांति का केंद्र था। वहां मेकार्मिक हार्वेस्टर नामक कंपनी थी, जो खेती के औजार, मशीनें और ट्रक बनाने का काम करती थी। उसके आधे कामगार पहले ही दिन सड़क पर उतर आए। अकेले शिकागो में लगभग 40000 मजदूर हड़ताल पर थे25 उनके चेहरों पर जोश था। होठों पर गगनभेदी नारे थे—‘‘8 घंटे काम के। आठ घंटे आराम के। 8 घंटे हमारी मर्जी के।’ काम के घंटे घटाओ-मजदूरी बढ़ाओ।’ हड़ताल में 11562 कारखानों के मजदूर शामिल हुए थे26 शिकागो के अलावा केलीर्फोनिया जैसे दूसरे बड़े शहर भी हड़ताल में शामिल थे। पूरे अमेरिका में पांच लाख से अधिक मजदूर सड़कों पर थे। नेतागण अपने भाषण द्वारा मजदूरों को प्रोत्साहित कर रहे थे। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, जोहन्न मोस्ट, लुईस लिंग्ग, सेमुअल फील्डेन जैसे अराजकतावादी नेताओं के भाषण आग उगल रहे थे। हड़ताल के बारे में एक अखबार ने लिखा था—‘फैक्ट्रियों और मिलों की ऊंची-ऊंची चिमनियों से उस दिन धुंआ नहीं निकला था। लगता था, जैसे छुट्टी के दिन, सब कुछ ठहरा हुआ हो।’27 उल्लेखनीय स्तर पर शांत रही पहले दिन की हड़ताल ने अमेरिका के श्रम आंदोलन के इतिहास में बड़ा अध्याय जोड़ दिया था

3 मई को हड़ताली फिर सड़क पर थे। इस बार मैकार्मिक हार्वेस्टर कंपनी के अलावा ‘लंबर शोवर’ के 6000 कर्मचारी भी सड़क पर थे। गौरतलब है कि मैकार्मिक कंपनी में 16 फरवरी, 1886 से लॉकआउट चल रहा था। उसके कर्मचारी पिछले तीन महीनों से काम न मिलने के कारण क्षुब्ध थे। सच तो यह है कि वे हताश हो चुके थे। इसलिए उनमें दो वर्ग बन चुके थे। हड़ताली मजदूर मैकार्मिक हार्वेस्टर से थोड़ा हटकर जमा हुए थे। कुछ और हड़ताली वहां पहले से ही जमा थे। कुल लगभग 15000 हडताली वहां जमा थे। हड़ताल का नेतृत्व कर रहे नेताओं में से एक ऑगस्ट स्पाइस ने जोरदार भाषण दिया था। अपने भाषण में उसने पूंजीवादी दमन, उसकी क्रूरताओं और कुटिलताओं पर चर्चा की थी। कहा था कि मजदूरों की हालत गुलामों से भी बदतर है। उसने मजदूरों से अपील की थी कि एकजुट होकर खड़े रहें। अपने मालिकों और हड़ताल तोड़ने वालों को बीच में न घुसने दें। मजदूर सावधान थे। हड़ताली मजदूर सड़क पर आकार मार्च करने लगे। इस बीच उनके बीच कुछ भेदिये भी आ मिले थे, जिन्हें मजदूरों ने वापस लौटने को विवश कर दिया था। मजदूरों का जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था। चारों तरफ से जत्थे निकलकर उसमें शामिल हो रहे थे। तभी हड़तालियों पर पत्थरों, ईंटों और लाठीडंडों से मार पड़ने लगी। मजदूर समझ पाएं, तभी 200 पुलिसकर्मियों का जत्था उनके सामने पहुंच गया। बिना किसी चेतावनी के लिए उसने मजदूरों पर लाठियों और बंदूकों से हमला कर दिया। उसमें चार मजदूरों की मृत्यु हो गई। अनेक घायल हो गए।28

3 मई की घटना के बारे में शिलिंग नामक मजदूर ने पीटर आल्टगोल्ड के सामने इस प्रकार बयान दिया था—‘‘मैकार्मिक कारखाने पर आयोजित प्रदर्शन सिर्फ लंबर शोवर्स यूनियन का ही प्रदर्शन नहीं था, वहां पर मैकार्मिक कारखाने के भी एक हजार से अधिक हड़ताली मजदूर थे। हालांकि ऑगस्ट स्पाइस वहां बोला था, पर उसने गड़बड़ी करने का नारा नहीं दिया था। उसने एकता का आह्वान किया था….गड़बड़ी तो तब शुरू हुई जब हड़तालभेदिये कारखाने से बाहर जाने लगे। हड़तालियों ने उन्हें देख लिया और भला-बुरा कहना, गालियां देना शुरू कर दिया जो यहां दोहराने लायक नहीं हैं। उस दृश्य की कल्पना करो। दो यूनियनों के छह हजार हड़ताली मजदूर बाहर सभा कर रहे हैं और उनकी नजरों के सामने से हड़ताल भेदिये चले जा रहे हैं। मैंने देखा वहां क्या हुआ। मैकार्मिक के हड़ताली कारखाने की ओर बढ़ने लगे। किसी ने उनसे कहा नहीं था। किसी ने उन्हें उकसाया नहीं था। उन्होंने सुनना बंद कर दिया था और वे फाटकों की ओर बढ़ रहे थे। हो सकता है उन्होंने कुछ पत्थर उठा रखे हों, हो सकता है उन्होंने भद्दी बातें कही हों। लेकिन उनके कुछ कहने से पहले की कारखाने की पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। हे भगवान लगता है, जैसे कोई युद्ध हो। हड़ताली निहत्थे और पुलिस मानो चांदमारी कर रही हो, पिस्तौलें हाथभर की दूरी पर थीं। रायफलें भी तनी हुई थीं—धांय, धांय, धांय…..मजदूर ऐसे गिर रहे थे, जैसे लड़ाई का मैदान हो। जब उन्होंने टिककर खड़े होने की कोशिश की तो पुलिस वाले चढ़ दौड़े और लाठियों से पीटकर उन्हें अलग कर दिया। जब वे तितर-बितर होकर दौड़े तो पुलिसवालों ने उनका पीछा किया। पीछे से लाठियां बरसाईं। देखा नहीं जाता था। वह क्रूरता थी। बहशीपन था। भाग जाने का मन कर रहा था। लगता था कै हो जाएगी। और यही किया मैंने.’29

ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि हड़तालियों पर पुलिस का हमला न केवल आकस्मिक, अपितु पूर्वनिर्धारित षड्यंत्र जैसा था। क्रोधित ऑगस्ट स्पाइस अराजकतावादी दैनिक आर्बीटर जाइटुंग के कार्यालय में पहुंचा था। वहां उसने हड़तालियों के नाम एक पोस्टर जारी किया। उसका शीर्षक था—‘बदला।’ घटना के कुछ ही घंटों बाद सड़कें उन पोस्टरों से पटी हुई थीं—

‘‘तुम्हारे मालिकों ने अपने शिकारी कुत्ते, पुलिस भेज दी है। इस दोपहर उन्होंने मैकार्मिक के पास तुम्हारे छह साथियों को मार गिराया है। उन्होंने उन गरीब दुखियारों को मार गिराया है, क्योंकि तुम्हारी तरह उन्होंने भी अपने मालिकों के आगे झुकने से इन्कार कर दिया था….तुम वर्षों से अंतहीन असमानता को झेलते आ रहे हो। तुम उनके लिए मृत्युपर्यंत काम करते हो। उनके लिए तुम अपनी इच्छाओं के साथसाथ, अपनी और अपने बच्चों की भूख को अनंतकाल से दबाते आए हो। यहां तक कि अपने बच्चों को भी तुमने अपने मालिकों के लिए कुर्बान कर दिया है। तुम हमेशा से दुखियारे और आज्ञाकारी गुलाम रहे हो। क्यों? अपने सुस्त और चोर मालिकों के अंतहीन लालच और उनकी तिजोरियों को भर देने के लिए….

यदि तुम इंसान हो, यदि तुम अपने उन पूर्वजों की संतान हो, जिन्होंने तुम्हें आजाद करने के लिए अपनी कुबार्नियां दी हैं, तो महाशक्तिशाली हरकुलिस की तरह उठो। और उन छिपे हुए राक्षसों का अंत कर दो, जो तुम्हें मिटा देना चाहते हैं। हथियार उठाओ….हम तुमसे कहते हैं….हथियार उठा लो।’’30

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4 मई की सुबह ‘दि आर्बीटर जाइटुंग’ के मुख्य पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में छपा था—

खून! असंतुष्ट मजदूरों की सेवा के लिए सिर्फ गोली और बारूद….यह है कानून और पुलिस! वे महलों में महंगी शराब से अपने जाम भरकर कानून और पुलिस के खूनी दरिंदों के स्वास्थ्य की कसमें उठा रहे हैं। गरीब और दुखियारो, अपने आंसू पोंछ डालो। अपनी ताकत को पहचानकर उठे खड़े हो और इस बेईमान शासन को धूल में मिला दो।’31

रातभर में पोस्टरों और पर्चों की एक और खेप सड़कों पर आ चुकी थी। लिखा था—‘मजदूरो, हथियार बांध लो। पूरी ताकत के साथ मोर्चे पर डट जाओ।’ पूरा शहर अफवाहों से भरा हुआ था। दोपहर होते-होते हेमार्किट चौक पर भीड़ जुटने लगी। उपस्थित श्रमिकों में बहुत से बेरोजगार थे। भूख से व्याकुल थे। अनेक लोग ऐसे भी थे, जिनके पास सिर छिपाने के लिए कोई ठिकाना तक नहीं था। सैकड़ों ऐसे थे जिनके सिर पर महीनों से मंदी की तलवार लटकी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि जो वे कर रहे या करने जा रहे हैं, खुद को और अपने परिवार को बचाए रखने के लिए, उसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। उनके पूंजीपति मालिक उन्हें रोजगार देते हैं। लेकिन उनके सपने देखने के अधिकार को छीन लेना चाहते है। यदि कोई सपना बचता-बचाता कहीं से चला आए तो वे उसे नोंचने पर उतारू हो जाते हैं। उनके नेताओं ने उन्हें सपना देखना सिखाया है। अपने ऊपर विश्वास करना सिखाया है। बताया है कि अपनी तमाम लाचारी, बेकारी, हताशा, विपन्नता और दैन्य के बावजूद वे इन्सान हैं। सपने देखने का हक उन्हें भी है। संगठन उनके सपनों के पूरा होने का भरोसा दिलाता है। सपने पूरे हों न हों, लेकिन वे सपनों को छोड़ना नहीं चाहते। 8 घंटे का कार्यदिवस तो असल में बहाना है। हड़ताल तो सपनों को बचाने के लिए है। जीवन रहे या जाए, बस सपने बचे रहें

पूरा शहर दो हिस्सों में बंट चुका था। एक ओर मजदूर थे। भूख और बेरोजगारी के मारे हुए, ठंडे, गरीब और बदहाल। उन्हीं के सामने, उनकी ओर बंदूकें थामें, पुलिस के सिपाही और सुरक्षाबल थे। उनमें और मजदूरों में ज्यादा अंतर नहीं था। बल्कि उन्हीं के बीच से निकलकर आए थे। उन्हीं के भाई-बंधुपड़ोसीरिश्तेदार थे। मालिकों ने उन्हें बंदूकें और लाठियां थमायी थीं। उन हथियारों का असर था कि अब वे अपने ही भाई-बंधुपड़ोसी या रिश्तेदारों को पहचानने को भी तैयार न थे। मालिकों के इशारे पर वे कुछ भी कर सकते थे। दूसरी ओर बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यापारी, पूंजीपति, राजनेता और व्यापारी थे। उनके पास धन था। ताकत थी। अखबार थे, जिनके मदद से वे अपने झूठ को भी सच बनाते आए थे। अपने वर्चस्व को बचाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे।

अचानक आसमान घिर आया। तेज हवाएं चलने लगीं। ऊपर काले बादलों की मोटी परत छा गई। फिर बूंदाबांदी होने लगी। मानो मौसम उन्हें सावधान कर देना चाहता हो। मैदान पर उस समय मात्र तीन हजार लोग थे। जिनमें स्त्री-पुरुष, बच्चेबड़े सभी शामिल थे। मजदूर नेता भाषण दे रहे थे। उनके भाषण में हिंसा की कोई बात नहीं थी। पार्संस ने अर्थव्यवस्था पर बात रखी थी। समानांतर से रूप से उसी समय कारखाना मालिकों की भी गुप्त बैठक चल रही थी। गोपनीय ढंग से आदेश आ-जा रहे थे। घटना स्थल से थोड़ी दूर पर पुलिस स्टेशन था। वहां पुलिस कप्त