भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

(आज रामास्वामी पेरियार का जन्मदिन है, भारत को आधुनिक राज्य बनाने में जितनी भूमिका डॉ. आंबेडकर की है, उतनी ही पेरियार की भी है. अपनी—अपनी भूमिका में दोनों महान हैं. डॉ. आंबेडकर साधारण परिवार से आए थे, अपने श्रम, स्वाध्याय, विद्वता, त्याग और विवेक के बल पर वे इस देश के निर्माता बने. समाज के बड़े वर्ग को जगाने का काम किया. पेरियार के पिता धनी व्यापारी थे. जीवन के आरंभिक वर्षों में धन उन्होंने भी खूब कमाया. धीरे—धीरे उसकी ओर से निस्पृह होते चले गए. आगे चलकर कांग्रेस से जुड़े. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि कांग्रेस के सुधार की एक सीमा है. वह समाज के निचले हिस्सों के भले के लिए उतना की कर सकती है, जितना उपकार—भाव के साथ संभव है. पेरियार ने राजनीति को छोड़ा और केवल जनता पर भरोसा किया. खुद को जनांदोलनों के लिए समर्पित कर दिया. राजनीति से दूर रहते हुए बड़े आंदोलन चलाना, जिनसे आगे चलकर पूरे देश की राजनीति प्रभावित हुई, पेरियार जैसी हस्ती के लिए ही संभव था.

आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम बेगमपुराके नाम से जानते हैं. आने वाली दुनियामें रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. यह आलेख उनके भाषण के अंग्रेजी अनुवाद(प्रो. ए. एस. वेणु)  का अनुवाद है, जो उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलनके एक कार्यक्रम दिया था. वैज्ञानिक सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने दक्षिण एशिया का सुकरातकहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें भारत का वाल्तेयरमाना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक दि हिंदूमें छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं ताब्दी का एच.जी.वेल्स कहा गया था. लेख में गांधी का नाम नहीं है. उनकी ओर संकेत-भर है. परंतु इससे गांधी और पेरियार के सोच का अंतर पूरी तरह सामने आ जाता है.

यह लेख एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. पेरियार की भूमिका के साथ, जो लेख जितनी ही महत्त्वपूर्ण है.  परियार के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उन्हीं के लेख का अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैंओमप्रका कश्यप)

 

प्राक्कथन

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हें. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और विना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सबकुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

लोग चाहे वे किसी भी देश  अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.  

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की. न राजा होगा, न ही राज्य. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं. कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में है. मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है. उनके कारण समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणीमात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी. जनसंख्या बृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डेशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिये आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी सप्ताह में मात्र दो श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे. मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा. आनी वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मषीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और नामा दोनों कमा सकें.

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेष्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेष्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे

मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी.

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पषुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग हांगीं. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पैट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइष नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी.

संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है. यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इत तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईष्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है. यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

 आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

ई वी रामास्वामी पेरियार(1944)

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छोटा मंदिर—बड़ा मंदिर/पचीस लघुकथाएं

1/छोटा मंदिरबड़ा मंदिर

एकांत देख बड़े मंदिर का ईश्वर अपने स्थान से उठा.

बैठेबैठे शरीर अकड़ा, पेट अफरा हुआ था. डकार लेतेलेते नजर सामने खड़ी कृषकाय आकृति पर नजर पड़ी. बड़े मंदिर का ईश्वर कुछ पूछे उससे पहले ही वह बोल पड़ी—

हम दोनों एक हैं.’

होंगे, मुझे क्या!’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने तपाक से कहा.

बस्ती में अकाल पड़ा है. लोगों के पा अपने पेट के लिए कुछ नहीं है तो मेरे लिए कहां से लाएंगे.’

इसमें मैं क्या कर सकता हूं.’

इस मंदिर में रोज अकूत चढ़ावाहै. मामूली हिस्सा भी मिल जाए तो हमारा काम चल जाएगा.’

चढ़ावे का हिसाब तो पुजारी रखता है.’

पुजारी तुम्हारा कहना नहीं टाल पाएगा.’

पर मैं उससे क्यों कहने लगा?’

इतनी रात गए कौन है?’ कहता हुआ पुजारी बाहर आया. छोटे मंदिर के ईश्वर को देख त्योरियां चढ़ गईं.

यह छोटे मंदिर का ईश्वर है. आपके पास मदद के लिए आया है.’ बड़े मंदिर के ईश्वर ने बताया.

चल हटशहर में सैकड़ों मंदिर हैं. हर मंदिर का ईश्वर फरियादी बनकर आ गया तो मेरा क्या होगा?’ कहते हुए पुजारी ने धक्का देकर छोटे मंदिर के ईश्वर को बाहर निकाल दिया. बड़े मंदिर का ईश्वर चुपचाप अपनी मूर्ति में समा गया.

2/वयं ब्रह्माव

तानाशाह हंटर फटकारता है. लोग सहमकर जमीन पर बिछ जाते हैं. कुछ पल बाद उनमें से एक सोचता है—‘तानाशाही की उम्र थोड़ी है. जनता शाश्वत है.’ उसके मन का डर फीका पड़ने लगता है.

अहं ब्रह्मास्मिः!’ कहते हुए वह उठ जाता है. उसकी देखादेखी कुछ और लोग खड़े हो जाते हैं. सहसा एक नाद आसमान में गूंजता है

वयं ब्रह्माव.’ एकदूसरे की देखादेखी बाकी लोग भी खड़े हो जाते हैं. जनता को खड़े देख तानाशाह के हाथ से हंटर छूट जाता है. वह जमीन पर पसर जाता है.

3/तानाशाह

तानाशाह ने हंटर फटकारा —‘मैं पूरे राज्य में अमनचैन कायम करने की घोषणा करता हूं. कुछ दिन के बाद तानाशाह ने सबसे बड़े अधिकारी को बुलाकर पूछा—‘घोषणा पर कितना अमल हुआ?’

आपका इकबाल बुलंद है सर! पूरे राज्य में दंगाफसाद, चोरी चकारी, लूटमार पर लगाम लगी है. आपकी इच्छा के बिना लोग सांस तक लेना पसंद नहीं करते.’ तानाशाह खुश हुआ. उसने अधिकारी को ईनाम दिया. कुछ दिनों के बाद एक गुप्तचर ने तानाशाह को खबर दी—‘लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है सर!’

तानाशाह को एटमबम से इतना डर नहीं लगता था, जितना लोगों के सोचने से. परंतु डर सामने आ जाए तो तानाशाह कैसा—

आदमी हैं तो दिलोदिमाग दोनों होंगे.’ तानाशाह ने लापरवाही दिखाई. गुप्तचर के जाते ही तानाशाह ने अधिकारी को तलब किया—‘हमें खबर मिली है कि लोगों के दिलोदिमाग में हलचल मची है. लोग जरूरत से ज्यादा सोचें, यह हमें हरगिज पसंद नहीं है.’

आदेश दें तो सबको जेल में डाल दूं. चार दिन भीतर रहेंगे तो अकल ठिकाने आ जाएगी.’

नहीं, तुम उनसे बस इतना करो कि जैसे हम हमेशा अपने बारे में सोचते हैं, वे भी केवल हमारे बारे में सोचें.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. कुछ दिन के बाद गुप्तचर फिर हाजिर हुआ.

सर! लोग कुछ ज्यादा ही सोचने लगे हैं.’

हमारे बारे में ही सोचते हैं न.’ तानाशाह हंसा. मानो गुप्तचर का मखौल उड़ा रहा हो.

जी, बस आप ही के बारे में सोचते हैं.’

उनके भाग्यविधाता जो ठहरे.’ तानाशाह ने हंटर फटकारा. गुप्तचर की आगे कुछ कहने की हिम्मत न हुई. वह चलने को हुआ. सहसा पीछे से तानाशाह ने टोक दिया—

जरा बताओ तो वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं?’

जीमैंने लोगों को कहते सुना है….’

रुक क्यों गए, जल्दी बताओ?’

सब यही कहते हैं कि तानाशाह बुरा आदमी है.’

तानाशाह का चेहरा सफेद पड़ गया. हंटर हाथ से छूट गया. सहसा वह चिल्लाया—‘हरामखोरों को जेल में डाल दो. मैंने कहा था, मुझे सोचनेसमझने वाले लोग नापसंद हैं. सबको जेल में डाल दो.’

आजकल वह पागलखाने में है.

4/समाधान

तानाशाह ने पुजारी को बुलाया—‘राज्य में सिर्फ हमारा दिमाग चलना चाहिए. हमें ज्यादा सोचने वाले लोग नापसंद हैं.’

एकदो हो तो ठीक, पूरी जनता के दिमाग में खलबली मची है सर!’ पुजारी बोला.

तब आप कुछ करते क्यों नहीं?’

मुझ अकेले से कुछ नहीं होगा.’

फिर….’ इसपर पुजारी ने तानाशाह के कान में कुछ कहा. तानाशाह ने पूंजीपति को बुलवाया. पूंजीपति का बाजार पर दबदबा था. अगले ही दिन से बाजार से चीजें गायब होने लगीं. बाजार में जरूरत की चीजों की किल्लत बढ़ी तो लोग परेशान होने लगे. रोजमर्रा की चीजों के लिए एकदूसरे से झगड़ने लगे. एकदूसरे पर अविश्वास बढ़ गया. समाज में आपाधापी, मारकाट और लूटखसोट बढ़ गई. मौका देख पुजारी सामने आया. लोगों को संबोधित कर बोला—

हमारी धरती सोना उगल रही है. कारखाने रातदिन चल रहे हैं. फिर भी लोग परेशान हैं, जरा सोचिए, क्यों?’

आप ही बताइए पुजारी जी….’

ईश्वर नाराज है. उसे मनाइए, सब ठीक हो जाएगा.’

जैसा सोचा था, वही हुआ. मंदिरों के आगे कतार बढ़ गई. कीर्तन मंडलियां संकट निवारण में जुट गईं.

तानाशाह खुश है. पुजारी और पूंजीपति दोनों मस्त हैं.

5/अच्छे दिन

चारों ओर बेचैनी थी. गर्म हवाएं उठ रही थीं. ऐसे में तानाशाह मंच पर चढ़ा. हवा में हाथ लहराता हुआ बोला—

भाइयो और बहनो! मैं कहता हूं….दिन है.’

भक्तगण चिल्लाए—‘दिन है.’

मैं कहता हूं….रात है.’

भक्तगण पूरे जोश के साथ चिल्लाए—‘रात है.’

हवा की बेचैनी बढ़ रही थी. बावजूद उसके तानाशाह का जोश कम न हुआ. हवा में हाथ को और ऊपर उठाकर उसने कहा—‘चांदनी खिली है. आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’

पूनम की रात है….आसमान में तारे झिलमिला रहे हैं.’ भक्तों ने साथ दिया.

अच्छे दिन आ गए….’ भक्तगण तानाशाह के साथ थे. दुगुने जोश से चिल्लाए—

अच्छे दिन आ…’ यही वह बात थी, जिसपर हवा आपा खो बैठी. अनजान दिशा से तेज झंझावात उमड़ा और तानाशाह के तंबू को ले उड़ा.

6/संविधान

आखिर जनता ने ठान लिया कि वह अपनी आस्था का ग्रंथ स्वयं चुनेगी. सारे धर्मग्रंथ उस दिन की प्रतीक्षा करने लगे. हर किसी को अपने देवता, अपने मसीहा की श्रेष्ठता पर भरोसा था. उनमें से प्रत्येक को अपने देवता की सर्वोच्चता पर गुमान था—

मेरा देवता सबसे पवित्र है. वह सबको बराबर मानता है. सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है.’ एक धर्मग्रंथ बोला.

मेरा मसीहा करुणानिधान है. वह हमारे पिता जैसा है. हमेशा हमारे भले की सोचता है.’ दूसरे ने दावा किया.

मेरा देवता सर्वाधिक शक्तिशाली है. उसके पास दिव्य अस्त्रशस्त्रों की भरमार है. पलक झपकते नई दुनिया को बना सकता है और मिटा भी सकता है.

एकएक कर सभी धर्म ग्रंथ आए. इतने कि आदमी गिनती करना भूल गया. आखिर में उसकी निगाह एक पुस्तक पर पड़ी.

क्या तुम अपने देवता के बारे में नहीं बताओगे?’

मेरा कोई देवता नहीं है.’

यदि देवता नहीं है तो तुम धर्मग्रंथ कैसे हुए?’

लाखों लोग मुझमें विश्वास रखते हैं. उन्हीं में से कुछ मुझे अपना मार्गदर्शक भी मानते हैं.’

यदि देवता नहीं तो ताकत कहाँ से पाते हो.’

जनता से?’

आखिर तुम हो कौन?’

संविधान.’

संविधान के पीछे नैतिकता का बल, न्याय की चाहत और जनता का विश्वास था. इसलिए बाकी सब धर्म ग्रंथ कन्नी काटते हुए वहां से खिसक गए.

7/एंटीक

मंदिर में अपनी मूर्ति के बराबर एक और मूर्ति देख ईश्वर चौंका. पुजारी के आते ही पूछा—

यह किसलिए?’

छोड़िए, क्या करेंगे जानकर?’ पुजारी ने टालने की कोशिश की.

इस मंदिर का देवता मैं हूं. यहां क्या हो रहा है, उसके बारे में मुझे ही मालूम न हो, यह ठीक नहीं है.’

महाराज कंपटीशन का जमाना है….ग्राहक उस शोरूम में ज्यादा जाते हैं, जिसमें ज्यादा वैराइटीज हों.’

तुम मुझे ‘वेराइटी’ मानते हो?’ ईश्वर ने नाराजगी जताई.

मैंने तो बस हकीकत बयां की है. बराबर की बस्ती में बहुत बड़ा मंदिर बना है. एक ही छत के नीचे सैकड़ों देवताओं के दर्शन हो जाते हैं. हर किस्म का श्रद्धालु वहां जाता है. जबकि यहां आने वाले गिनती के हैं. हम दोनों की तरक्की के लिए यहां दोचार ईश्वर और आ जाएं तो क्या बुराई है?’

पुजारी ने लाख समझाया, लेकिन उस मंदिर का ईश्वर अपनी बगल में दूसरे देवता की मूर्ति रखने को तैयार न हुआ. पुजारी भुनभुनाता हुआ घर लौट गया. ईश्वर हमेशा की तरह आत्ममुग्धता में खो गया. लेकिन पुजारी तो पुजारी था. जो पत्थर को देवता बना सकता है, वह खुद को देवता समझने लगे पत्थर को उसकी औकात की याद भी दिला सकता है. अगले दिन पुजारी ने मंदिर में कीर्तन का ऐलान कर दिया. कीर्तन समाप्त हुआ तो उसके लिए आई मूर्तियां मंदिर की शोभा बढ़ाने लगीं. पुरानी मूर्ति नई मूर्तियों के पीछे दबसी गई.

अगले दिन श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना थी. नए श्रद्धालु तरहतरह का चढ़ावा लेकर आए थे. रात हुई. चढ़ावे को समेट पुजारी गुनगुनाते हुए, मग्नमन बाहर निकला. तभी पुराने ईश्वर ने उसे टोक दिया—‘बहुत निष्ठुर हो. मैंने बीसियों वर्ष तुम्हारा साथ दिया था. अपने ही मंदिर में किनारा करते हुए तुम्हें जरा भी नहीं सोचा!’

सुनकर पुजारी हंसा—‘भगवन! धर्म का धंधा सोचने से नहीं, सोच पर पर्दा डालने से चलता है. नई मूर्तियां चीन से आयातित हैं. निखालिस मूर्तियां. कुछ तो इतनी क्यूटकि भक्तजन उनके साथ सेल्फी लेते दिखे.’ कहकर वह आगे बढ़ा. फिर चलतेचलते पलटकर बोला—‘पर तुम चिंता मत करो. इस धंधे में ‘एंटीक’ की बड़ी महिमा है. जल्दी ही यहां भव्य मंदिर बनेगा. वहां आसन पर तुम मजे से लोट लगाना.’

ईश्वर निरुत्तर. पुजारी गुनगुनाते हुए आगे बढ़ गया.

8/तानाशाहदो

बड़े तानाशाह के संरक्षण में छोटा तानाशाह पनपा. मौका देख उसने भी हंटर फटकारा—‘सूबे में वही होगा, जो मैं चाहूंगा. जो आदेश का उल्लंघन करेगा, उसे राष्ट्रद्रोह की सजा मिलेगी.’ हंटर की आवाज जहां तक गई, लोग सहम गए. छोटा तानाशाह खुश हुआ. उसने फौरन आदेश निकाला—‘गधा इस देश का राष्ट्रीय पशु है, उसे जो गधा कहेगा. उसे कठोर दंड दिया जाएगा.’

आदेश के बाद से सूबे में जितने भी गधे थे सब ‘गदर्भराज’ कहलाने लगे. उन्हें बांधकर रखने पर पाबंदी लगा दी गई. कुछ गधे तो फूल कर कुप्पा हो गए. वे मौकेबेमौके जहांतहां दुलत्ती मारने लगे. पूरे सूबे में अफरातफरी मच गई. कुछ दिनों के बाद छोटे तानाशाह ने एक भाषण में कहा—‘पिछली सरकारें, इतने वर्षों में कुछ नहीं कर पाई थीं. हमनें आने के साथ ही ‘गधा’ को ‘गदर्भराज’ बना दिया. इसे कहते हैं—‘सबका साथ—सबका विकास.’

भक्तगण जयजयकार करने लगे. ठीक उसी समय गधों का एक रेला आया. लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए. अकस्मात एक गधा मंच के पीछे से आया और छोटे तानाशाह को एक दुलत्ती जड़ दी. छोटा तानाशाह जमीन बुहारने लगा.

इसे समझा देना. हर गधा, ‘गधा’ नहीं होता. कहकर वह वहां से नौदो ग्यारह हो गया.

9/ ईश्वर का पलायन

ईश्वर को जिज्ञासा हुई. 140 करोड़ की आबादी वाला भारत देश जिस संविधान के भरोसे चलता है, उसमें अपने अस्तित्व को खोजा जाए. उसे ज्यादा पढ़नेलिखने का अभ्यास तो था नहीं. फिर भी आखरआखर पूरा संविधान बांच डाला. ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को देखते ही उसका माथा ठनका. पुरोहित आया तो ईश्वर ने उसे आड़े हाथों लिया—‘तुम तो कहते थे कि देश में सारा कामकाज धर्मभरोसे चलता है. यहां तो पूरी सरकार धर्मनिरपेक्ष रहने का दावा करती है.’

महाराज! वह गफलत में लिखी गई ‘किताब’ है, भक्तगण उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं.’

तो बदलते क्यों नहीं….’

इतना आसान नहीं है. लोग नाराज हो जाएंगे.’ ईश्वर ने झूठ पकड़ लिया—

यानी लोग चाहते हैं कि सरकार धर्म की ओर से तटस्थ रहे.’

पुरोहित चुप. ईश्वर को लगा कि वह गफलत में था. उसका मन ग्लानि से भर गया. उसी रात सारा तामझाम समेट वह मंदिरों से कूंच कर गया. उस दिन के बाद से भक्त लोगों को धर्मनिरपेक्ष शब्द से चिढ़ होने लगी है. ‘सेकुलर’ शब्द उन्हें गालीजैसा लगता है.

कुछ भी हो, जनता इससे खुश है….

10/सबसे बड़ा देवता

स्कूल में निरीक्षण पर निकले प्रधानाचार्य का बच्चों का टेस्ट लेने का मन हुआ तो बराबर की कक्षा में घुस गए. बच्चे सम्मान में खड़े हो गए. प्रधानाचार्य कभी विज्ञान पढ़ाया करते थे. पर थे पूरी तरह धार्मिक. कक्षा में बच्चों को पढ़ाते कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, घर जाकर शेषनाग को जल चढ़ाते—

बच्चो! हिंदू धर्म के तीन सबसे बड़े देवताओं के नाम कौन बताएगा?’

ब्रह्माविष्णुमहेश….सारे बच्चे एक साथ बुदबुदाने लगे. सिवाय एक बालक के जो कक्षा में सबसे पीछे, शांत बैठा था. मानो चोर पकड़ा गया हो. प्रधानाचार्य उसी की ओर इशारा करके बोले—‘ऐ तुम, हां तुम….हिंदुओं के तीन प्रमुख देवताओं के नाम बताओ?’

ब्राह्मण….!’ लड़के ने झट कहा. बच्चे उसके ‘अज्ञान’ पर हंसने लगे. कक्षाध्यापक की उंगलियां बैंत पर कस गईं. अपने धैर्य की छाप छोड़ने के लिए प्रधानाचार्य ने आराम से पूछा—‘कैसे?’

घर में मां सत्यनारायण की कथा कराती है. कथा शुरू करने से पहले पडिंज्जी देवताओं को बुलाते हैं. कथा समाप्त होते ही देवताओं को अपनेअपने घर भेज देते हैं. देवता उनके इशारे पर ऐसे नाचते हैं, जैसे मदारी के इशारे पर बंदर. फिर सबसे शक्तिशाली कौन हुआ. देवता या ब्राह्मण!.’

बच्चे तो बच्चे थे. फिर हंसने लगे. पर प्रधानाचार्य को कोई बोल न सूझा.

11 /राजा बदरंगा है

तानाशाह को नएनए वस्त्रों का शौक था. दिन में चारचार पोशाकें बदलता. एक दिन की बात. कोई भी पोशाक उसे भा नहीं रही थी. तुरंत दर्जी को तलब किया गया.

हमारे लिए ऐसी पोशाक बनाई जाए, जैसी दुनिया के किसी बादशाह ने, कभी न पहनी हो.’ तानाशाह ने दर्जी से कहा. दर्जी बराबर में रखे हंटर को देख पसीनापसीना था. हिम्मत बटोर जैसेतैसे बोला—

हुजूर, आप तो देशविदेश खूब घूमते हैं. कोई ऐसा देश नहीं, जहां आपके चरण न पड़े हों. वहां जो भी अच्छा लगा हो, बता दीजिए. ठीक वैसी ही पोशाक मैं आपके लिए सिल दूंगा.’

तानाशाह को जहां, जिस देश में, जो पोशाक पसंद आई थी, सब दर्जी को बता दीं. उन सबको मिलाकर दर्जी ने जो पोशाक तैयार की, तानाशाह ने उसे पहनकर एक ‘सेल्फी’ ली और सोशल मीडिया पर डाल दी.

पहली प्रतिक्रिया शायद किसी बच्चे की थी. लिखा था—‘राजा बदरंगा है.’

12/अछूत

ईश्वर पुजारी को रोज चढ़ावा समेटकर घर ले जाते हुए देखता. उसे आश्चर्य होता. दिनभर श्रद्धालुओं को त्याग और मोहममता से दूर रहने का उपदेश देने वाला पुजारी इतने सारे चढ़ावे का क्या करता होगा? एक दिन उसने टोक ही दिया—‘तुम रोज इतना चढ़ावा घर ले जाते हो. अच्छा है, उसे मंदिर के आगे खड़े गरीबों में बांट दिया करो. कितनी उम्मीद लगाए रहते हैं.’

रहने दो प्रभु. तुम क्या जानो इस दुनिया में कितने झंझट हैं. एक दिन मंदिर से बाहर जाकर देखो तब पता चले.’

ईश्वर को बात लग गई. उसने पुजारी से एक दिन मंदिर बंद रखने का आग्रह किया, ‘कल तुम्हें खुद कुछ नहीं करना पड़ेगा. मैं खुद इंतजाम करूंगा.’ पुरोहित सोच में पड़ गया. परंतु यह सोचकर कि लोग ईश्वर को मंदिर से निकलते देखेंगे तो अगले दिन दो गुना चढ़ावा आएगा, वह एक दिन कपाट बंद रखने को राजी हो गया. अगले दिन ईश्वर ने कमंडल उठाया. मंदिर की देहरी पर पहुंचा था कि भीतर से आवाज आई. आवाज में आदेश था. ईश्वर के पांव जहां के तहां जम गए—‘सुनो! सबसे पहले उत्तर दिशा में जाना. उस ओर सेठों की बस्ती है. जो भी नकदी मिले संभाल कर रखना. फिर पश्चिम दिशा में जाना. उस ओर क्षत्रियों की बस्ती है. वे दान देने में कंजूस होते हैं. उनसे धनधान्य जो भी मिले, मना मत करना. जब तक पूर्व दिशा में पहुंचोगे, गृहणियां भोजन की तैयारी कर चुकी होंगी. वहां से जो भी भोजन मिले, संभाल कर रख लेना.’ ईश्वर चलने को हुआ. पीछे से पुजारी ने फिर टोक दिया—‘सुनो! दक्षिण दिशा की ओर जाओ तो किसी को छूना मत. नकदी मिले तो दूर से लेना. भोजन मिले तो हाथ मत लगाना.’

क्यों!’

वे लोग अछूत हैं . किसी ने छू भी लिया तो अपवित्र हो जाओगे.’ ईश्वर को गुस्सा आया. उसने कमंडल फ़ेंक दिया. उसके बाद मंदिर से बाहर निकला तो कभी नहीं लौटा.

13/गैरजिम्मेदार

रात हुई तो बड़े मंदिर का ईश्वर टहलने के इरादे से बाहर निकला. उससे कुछ दूरी पर छोटा मंदिर भी था. बड़े मंदिर के ईश्वर को निकलते देख छोटे मंदिर के ईश्वर की भी टहलने की इच्छा हुई. उस समय तक रात हो चुकी थी. सड़कें सुनसान थीं. दोनों ईश्वर टहलतेटहलते दूर तक निकल गए. बड़े मंदिर का ईश्वर आगे था, छोटे मंदिर का ईश्वर पीछे. सहसा अंधेरे को चीरती चीख उभरी. बड़े मंदिर के ईश्वर के पांव ठिठके.

यह तो छोटे मंदिर के इलाके की स्त्री है.’ सोचते हुए बड़े मंदिर का ईश्वर तत्क्षण आगे बढ़ गया. पीछेपीछे चल रहे छोटे मंदिर के ईश्वर के पांव भी ठिठके.

सबसे ज्यादा चढ़ावा पाने के बावजूद जब वही कुछ नहीं कर रहा तो मैं चक्कर में क्यों पडूं!’ सोचते हुए छोटे मंदिर का ईश्वर भी आगे बढ़ गया. वहीं सड़क किनारे एक कुत्ता आराम कर रहा था. चीखें सुनकर उससे रहा नहीं गया. वह अपने परिवार के साथ उठा और लुटेरों पर टूट पड़ा. एकाएक आक्रमण से लुटेरों के औसान बिगड़ गए और वे वहां से भाग छूटे. उसके बाद कुत्ते की दृश्टि बड़े मंदिर और छोटे मंदिर के ईष्वरों पर पड़ी. वह उनपर भौंकने लगा. बड़े मंदिर के ईश्वर को इसपर हैरानी हुई—‘पहचाना नहीं, हम यहां से रोज गुजरते हैं.’

जानता हूं, पर असलियत आज ही समझ में आई है.’ कुत्ता पूरी ताकत लगाकर भौंकने लगा. दोनों ईष्वरों को धोती समेटकर भागना पड़ा.

14/भक्तगण

गाय और भैंस के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ चरतीं. साथसाथ उठतीबैठतीं. साथसाथ जुगाली करती थीं. अचानक भैंस ने गाय से दूरी बनाना शुरू कर दिया. गाय ने एकदो दिन देखा. कारण समझ न आया तो टोक दिया—‘बहन मुझसे कुछ भूल हुई है?’

ऐसा कुछ भी नहीं है.’ भैंस बोली. लेकिन उसके व्यवहार में परिवर्तन न आया. एक दिन की बात. चुगने के बाद दोनों नदी पर पहुंची. गाय पानी पीने लगी. भैंस भी उससे कुछ दूर हटकर पानी पीने लगी. जहां गाय थी, वहां की जमीन चिकनी थी. पानी गहरा. अचानक उसके पांव फिसले और वह नदी में गिरती चली गई. वहां गड्ढ़ा था. गाय बाहर आने को छटपटाने लगी. मगर जमीन चिकनी होने के कारण नाकाम रही. काफी परिश्रम के बावजूद सफलता न मिली तो वहीं, पसर गई.

भैंस ने गाय की हालत देखी तो रहा न गया. उसने इधरउधर गर्दन घुमाई. जब देखा कि आसपास कोई नहीं है, वह गाय के पास गई और उसके गले में पड़ी रस्सी को सींग में फंसा बाहर खींचने लगी. कठिन परिश्रम के बाद वह गाय को बाहर निकालने में सफल हो गई. भैंस बुरी तरह थक चुकी थी, इसलिए वहीं जमीन पर पसर गई—

तभी न जाने किधर से ‘भक्तों’ का रेला उमड़ा. सब हाथ में डंडे, बर्छी, भाले उठाए थे. उनमें से एक चिल्लाया—‘वो देखो! भैंस ने गाय को मार डाला.’ विवेकहीन भीड़ ‘मारोमारो’ के नारे लगाने लगी. इससे पहले कि गाय कुछ करे, अनगिनत लाठियां भैंस की पीठ पर एक साथ पड़ीं. उसने वहीं दम तोड़ लिया.

भक्तगण जिधर से आए थे—‘गौमाता की जय’ कहते हुए, वापस लौट गए.

15/ठूंठ

शिक्षा पूरी करने के बाद स्नातक भविष्य की योजना बनाता हुआ वापस लौट रहा था. रास्ते में एक साधु से टकरा गया.

क्या सोच रहे हो?’ साधु ने प्रश्न किया. अपने चारों ओर निहारते हुए स्नातक बोला—

यह दुनिया कितनी विविधवर्णी है. जिस रास्ते से मैं आया हूं उसपर नदीझरने, समंदरपहाड़, फूल, पत्तियां, लताएं, भांतिभांति के अनगिनत और विचित्र जीव दिखाई पड़े.’

सब देखा, पर जो देखना था, वह अनदेखा ही रहा.’

क्या?’ स्नातक ने पूछा.

तुमने जो देखा, वह तो नजर का धोखा है, माया है. काश! तुम उस महान रचनाकार को भी देख पाते?’

जिसका साक्षात अनुभव हुआ हो, उसे माया कैसे मान लूं? रचनाकार तो अपनी कृति से पहचाना जाता है, इसलिए मैंने जो देखा, मेरे लिए वही ईश्वर है.’

तुम्हारा ज्ञान अधूरा है. मेरे साथ कणकण में छिपे उस महान रचनाकार को पहचानने का प्रयत्न करो.’ साधु ने पेड़ की ओर इषारा किया—‘साधारण दृष्टि से फूल, पत्तियां, बीज, शाखाएं, तना, यानी जो दिख रहा है, वह वृक्ष है. उसके पीछे जो अदृश्य है, वही ईश्वर सृष्टि का वास्तविक कर्ताधर्ता है.’

जो अदृश्य केवल अनुमान पर आधारित है. आप उसपर विश्वास करें. मैं भी कर सकता हूं. लेकिन उसके लिए मैं जो दिखता है, उसे नहीं नकार सकता.’ साधु स्नातक के अज्ञान को दोष देने लगा. इसपर वह साधु को उस तने के पास ले गया, जो पत्ते झड़ जाने के बाद ठूंठ में बदल चुका था—‘कभी यह भी हराभरा रहा होगा. लेकिन इसके तने को गुमान था कि वही सबकुछ है. नाराज होकर एक दिन पत्तियों ने साथ छोड़ दिया. वे झड़ गईं. उसके बाद जो बचा वही यह ठूंठ है. प्रकृति में जो दिखता है, यदि उससे बाहर सच की खोज करोगे तो सिवाय ठूंठ के कुछ हाथ नहीं लगने वाला.’

साधु निरुत्तर हो गया.

16/ विद्रोही

तानाशाह का आदेश था, जिसकी मुस्कान एक इंच से अधिक होगी, उसे दंडित किया जाएगा. आदेश पाते ही तानाशाह के सैनिक पूरे राज्य में फैल गए. जो भी हंसता दिखाई पड़ता, उसे जेल के हवाले कर दिया जाता. कुछ ही दिनों में सारी जेलें भर गईं, लेकिन अपराधियों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी. एक दिन तानाशाह ने उन सबको दंड सुनाने का फैसला लियाण् सभी कैदियों को खुले स्थान पर लाया गयाण् मैदान खचाखच भर गयाण् दंड सुनाने के लिए तानाशाह मंच पर चढ़ा. लोग गर्दन झुकाए चुपचाप खड़े थे—

प्रत्येक को पचास कोड़े लगाए जाएं.’ तानाशाह ने आदेश दिया. सैनिक कोड़े लेकर जनसमूह की ओर बढ़े. अचानक एक बालक जोर.जोर से हंसने लगा.

कौन बदतमीज है. तानाशाह गुस्से से चिल्लाया. सैनिकों ने बालक को पकड़कर तानाशाह के सामने खड़ा कर दिया—

तुम हंसे क्यों?’

इन लोगों को देखकर, जो इतनी संख्या में और निर्दोष होने के बावजूद गर्दन झुकाए खड़े हैं.’

तुम्हें कोड़ों से डर नहीं लगता?’ तानाशाह ने पूछा.

मैं किसी से नहीं डरता .’

इसके इरादे खतरनाक हैं. इसे मैं अपने हाथों से दंड दूंगा.’ तानाशाह क्रोध से चिल्लाया. उसने बराबर में खड़े सैनिक से हंटर छीन लिया. जैसे लोगों के स्वाभिमान ने अंगड़ाई ली हो. सोयी आत्माएं एक साथ जागी हों. झुकी गर्दनें एकाएक तन गईं. तानाशाह का हंटर बालक की पीठ पर पड़े उससे पहले ही लोगों ने हल्ला बोल दिया.

कुछ देर बाद वहां न तानाशाह था, न उसके सैनिक.

17/ज्ञान

यह सोचते हुए कि दुनिया बदलने का समय आ चुका है, ईश्वर ने अपना पूरा शृंगार किया. गदाशंखचक्र, धनुषवाणकृपा….सारे हथियार संभाले और मृत्युलोक की ओर प्रयाण कर गया. पहली मुलाकात स्कूल जाते बच्चों से हुई—

बहरूपिया.’ ईश्वर की विचित्र भेषभूषा को देख एक बालक ने टिप्पणी की. उसके साथी हंसने लगे.

मूर्खो! मैं ईश्वर हूं.’ ईश्वर चिल्लाया. उसके हाथ धनुषवाण तक पहुंच गए.

तो यहां क्या क्या रहे हैं, जाकर मंदिर संभालिए.’ बालक के स्वर में कटाक्ष था.

मैं दुनिया बदलने निकला हूं.’

गुरुजी तो कहते हैं कि अच्छी दुनिया बनाने के लिए अच्छे विचार जरूरी हैं. देखो, इस पुस्तक में भी यही लिखा है.’ कहकर बालक ने पुस्तक आगे बढ़ा दी. ईश्वर ने दोचार पन्ने पलटे. कुछ समझ में नहीं आया तो पुस्तक को एक ओर फेंक दिया.

समझ गया, तुम सचमुच ईश्वर हो.’ बच्चे हंसने लगे, ‘ज्ञान का तिरष्कार करना तुम्हारी पुरानी आदत है.’

क्या बकते हो?’ ईश्वर का चेहरा तमतमा गया.

गुरुजी कहते हैं, तुमने निर्दोष शंबूक को मारा था….उस दिन शंबूक को मारने के बजाय यदि उससे ज्ञान लिया होता तो पुस्तक की ऐसी उपेक्षा न करते.’

ईश्वर पानीपानी हो गया.

18/बड़ा कौन?

बस्ती के लोग मुखिया के चयन को जमा हुए. उसी समय एक दार्शनिक उधर से गुजरे. उन्हें देख सभी के चेहरे खिल उठे—

आप गुणी इंसान हैं. आ ही गए हैं तो मुखिया चुनने में हमारी मदद कीजिए.’ लोगों ने प्रार्थना की.

मुखिया चुनने का अधिकार तो सिर्फ आपका है?’ दार्शनिक बोले. लोगों के जोर देने पर दार्शनिक ने उनसे एक प्रश्न किया—‘तानाशाह और ईश्वर, दोनों में बड़ा कौन है?’

सुनते ही लोगों की बुद्धि चकरा गई. भला यह भी कोई सवाल हुआ. सवाल हो भी तो इसका मुखिया के चुनाव से क्या संबंध? सुना है, दार्शनिक आधे पागल होते हैं. परंतु यह तो पूरा का पूरा पागल है.’

जो लोग तानाशाह को बड़ा मानते हैं, वे अपने हाथ उठा लें.’ कुछ देर बाद दार्शनिक ने पूछा. एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा.

अब वे लोग हाथ ऊपर करें, जो ईश्वर को बड़ा मानते हैं?’ इसपर सारे लोगों ने हाथ खड़े कर दिए. किंतु एक आदमी शांत बैठा रहा.

तुम क्या फैसला है? ईश्वर या तानाशाह?’

दोनों एक जैसे हैं. जीहुजूरी तानाशाह को पसंद है, ईश्वर को भी. अपनी आलोचना न ईश्वर सुन पाता है, न ही तानाशाह. नाराज होने पर तानाशाह बंदूक तान देता है, और ईश्वर….उसके पास तो अनगिनत हथियार हैं. दोनों को मनमानी पसंद है. दूसरों पर अपना फैसला लादने में दोनों को खुशी मिलती है.’

इस आदमी में मुखिया बनने का आवश्यक गुण मौजूद है.’ दार्शनिक ने कहा और आगे बढ़ गया.

19/असलियत


रोज की तरह पुजारी मूर्ति साफ करने लगा. अचानक हाथ चूका. झाड़न ईश्वर की आंख में जा लगी. वह दर्द से तिलमिलाने लगा. सुबह से शाम तक एक जगह, एक ही मुद्रा में बैठे रहने से उसका धैर्य पहले ही जवाब दे चुका था. पुजारी की हरकत ने आग में घी डालने का काम किया—
देखकर हाथ नहीं चला सकते?’
क्षमा करें भगवन. भक्तों के आने का समय हो चुका है, जल्दीजल्दी में….’
केवल आज की बात नहीं है, तुम दिनोंदिन लापरवाह होते जा रहे हो. मत भूलो कि….’ ईश्वर क्रोध में था.
बसबस….अब तुम कहोगे—सतयुग में बस मैं ही मैं था. त्रेता में मैंने रावण को मारा था, द्वापर में पूरा महाभारत मुझ अकेले ने लड़ा था. इस अवतार में मैंने ये किया था, उस अवतार में मैंने वो किया था….’
इसमें झूठ क्या है?’ ईश्वर बोला.
छोड़िए भगवन! मंदिर में बैठेबैठे चार कहानियां क्या सुन लीं, खुद को पंडित समझने लगे….उनमें असलियत कितनी है, यह केवल मैं जानता हूं….मुंह मत खुलवाओ.’
हकीकत से ईश्वर भी वाकिफ था. इसलिए चुप्पी साध गया.

20/ सिफारिश

अनुचर ने भूतआत्माओं को देवता का संदेश सुनाया—‘जल्दी ही तुम्हें इधरउधर भटकने से मुक्ति मिलने वाली है.’ भूतआत्माएं आश्चर्य से अनुचर की ओर देखने लगीं.

देवता तुमपर प्रसन्न हैं. इस बार तुम्हें लड़की के रूप में मृत्यलोक भेजा जाएगा.’

अनुचर के प्रस्थान करने के बाद एक भूतआत्मा दूसरी से बोली—

सुना है, भारत खंड में हरियाणा नामक प्रदेश है. वहां ‘बेटी बचाओ—बेटी पढ़ाओ’ आंदोलन चल रहा है. उस प्रदेश में जन्म हुआ तो जीवन धन्य हो जाएगा.’

देवता हमारी बात मानेंगे?’

देवता खुशामदपसंद हैं. प्रार्थना करने पर मान ही जाएंगे.’ कहकर भूतआत्मा मुस्कराने लगी.

बुलावा आया तो दोनों भूतआत्माएं देवता से मिलने पहुंचीं. वहां अलगअलग प्रांत के कक्ष बने थे. सबसे अधिक भीड़ हरियाणा वाले कक्ष थी. अधिकांश लड़की के रूप में जन्म लेने वाली आत्माएं.

इतनी भीड़ में हमारा नंबर आएगा.’ भूतआत्माएं परेशान हो गईं. तभी वह अनुचर नजर आया. दोनों भूतआत्माएं लपककर उसके पास पहुंची—‘क्या तुम देवता से सिफारिश कर सकते हो कि वह हमें हरियाणा में भेजने की कृपा करें.’

उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी….तुम्हारा वहां जाना तय है.’ अनुचर ने हंसकर बताया.

क्यों?’

अब वहां कोई नहीं जाना चाहता.’ दोनों भूतआत्माओं की समझ में कुछ नहीं आया. तभी कुछ आत्माएं हाथ में दफ्ती लिए नजर आईं. उनपर नारे लिखे थे. भूतआत्माएं उन्हें पढ़ें उससे पहले ही एक स्क्रीन पर किसी नेता का भाषण दिखाया जाने लगा. पता चला कि हरियाणा का ही कोई नेता है. वह कह रहा था—‘हम आज भी कहते हैं—बेटी बचाओबेटी पढ़ाओ. लेकिन सड़क चलती लड़की की इज्जत की गारंटी नहीं है. जिन लड़कियों को इज्जत प्यारी है, वे घर रहकर चौकाचूल्हा देखें.’

हम भूतआत्मा के रूप में ही भलीं.’ कहते हुए वे दोनों उन आत्माओं में शामिल हो गईं जो हरियाणा न जाने की जिद ठाने थीं.

21/ अवसर

तानाशाह ने सुना कि ईश्वर के पास असीम ताकत होती है. उससे वह कुछ भी कर सकता है. दिव्य अस्त्रशस्त्र होते हैं. उनसे वह दुश्मन को तबाह कर सकता है. उसी दिन से उसने सर्वशक्तिमान बनने की ठान ली. जिन कारखानों में मशीनें बनती थीं, उनमें टेंक बनने लगे. जिनसे वस्त्रों की आपूर्ति होती थी, वहां सैनिकों के लिए बुलेट प्रूफ जॉकटें बनने लगीं. जिस धनराशि से अस्पतालों की औषधियां खरीदी जाती थीं, उनसे गोलाबारूद खरीदे जाने लगे. उस साल अकाल पड़ा. फसल तबाह होने से किसान आत्महत्या करने लगे. बात तानाशाह तक पहुंची—

मजबूत देश बनाने के लिए कुर्बानियां जरूरी हैं.’ तानाशाह ने कहा.

देश की असली ताकत तो जनता में होती है. लोग ही तबाह हो जाएंगे तो देश मजबूत कैसे बनेगा?’ जिस लेखक ने यह लिखा. उसे राज्यद्रोही बनाकर कारावास में ढकेल दिया गया. कुछ दिनों बाद भूख महामारी में बदल गई.

मरने वालों में किस धर्म के ज्यादा हैं?’ नया मृत्यु संदेश लेकर आए मंत्री से तानाशाह ने पूछा—

बराबर हैं?’ तानाशाह चिंता में पड़ गया. थोड़ी देर बाद उसका चेहरा फिर सपाट था—

हमारी संख्या उनसे कहीं अधिक है. दोनों बराबर भी मरे तो ज्यादा नुकसान न होगा, पर देश को विधर्मियों से मुक्ति मिल जाएगी.’

22/नाटक

चमत्कार हुआ. तानाशाह ने घोषणा की—‘आज से तानाशाही खत्म. आगे जनता की मर्जी का राज चलेगा.’ सुनकर ‘भक्तों’ ने जयकारा लगाया. आलोचक मौन हो गए. अधिकारी जोरशोर से चुनाव की तैयारियों में जुट गए. चुनाव के दिन चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. मतदाताओं की सुविधा के लिए हर तरह का इंतजाम था. उत्साहित जनता मुंहअंधेरे मतदानकेंद्रों पर जा डटी.

चुनाव शुरू हुआ. पहला मतदाता भीतर गया; और शोर मचाते हुए तत्क्षण बाहर निकल आया—‘हर बटन पर तानाशाह की तस्वीर छपी है. यह कोई चुनाववुनाव नहीं है.’ लोग कुछ समझ पाएं उससे पहले ही सुरक्षाकर्मियों ने उसे दबोच लिया. वे उसे घसीटते हुए भीतर ले गए. कुछ देर बाद वोट पड़ने की आवाज आई.

चलिए अब आप भी मतदान कीजिए.’ पहले मतदाता को बाहर का रास्ता दिखाते हुए सुरक्षाकर्मियों ने कहा.

उस आदमी ने बताया, मशीन सारे वोट एक ही उम्मीदवार को दे रही है.’

खामोश!’ इंतजाम में लगा बड़ा अधिकारी चिल्लाया—‘तुम्हारा काम केवल वोट डालना है. मशीन ने कैसे वोट दिया, किसे वोट दिया, यह जानने का अधिकार तुम्हें नहीं हैये देखो, सरकार की ओर से भी यही लिखा है न!’ प्रमाण के लिए अधिकारी ने अखबार आगे कर दिया.

फिर हमारी क्या जरूरत है, तुम्हीं लोग काफी हो.’ इस बार कई लोग एक साथ बोल पड़े.

जनता लोकतंत्र चाहती है, तो हमने सोचा, यह नाटक भी सही.’ पीछे खड़ा तानाशाह, जो चुनाव का जायजा लेने निकला था, बोला.

23/ईश्वर की जात

ईश्वर विचारमग्न आगे बढ़ रहा था. चलतेचलते प्यास लगी. उसने इधरउधर देखा. तभी सामने से पुजारी आता दिखाई पड़ा. माथे पर चौड़ा तिलक. कंधे पर पोटली, दाएं हाथ में बड़ासा लोटा थामे. ईश्वर की उम्मीद बढ़ी—‘पानी मिलेगा?’

पुजारी ने ऊपर से नीचे तक देखा, ‘पहले जात बताओ?’

ईश्वर चकराया. देर तक कोई उत्तर न सूझा. प्यास गला जकड़ने लगी थी.

नाम क्या है?’ पुजारी ने अगला सवाल किया.

ईश्वर.’

ऊंह! आजकल नाम से कुछ पता नहीं चलता.’ पुजारी खुद पर झुंझलाया, ‘बाप का नाम?’

मेरा कोई पिता नहीं है.’

यह क्यों नहीं कहते कि वर्णसंकर यानी शूद्र हो!’

भूल गए, मैं वही ईश्वर हूं. जिसकी तुम सुबहशाम रोज आरती उतारते हो.’

चलो मान लिया कि तुम सचमुच के ईश्वर हो. फिर भी मैं तुम्हें पानी क्यों दूं. आज पानी मांग रहे हो, कल दूध, परसों दहीमक्खन, आगे चलकर चढ़ावे में हिस्सा भी मांगने लगोगे. मेरा काम तुम्हारी मूरत से चल जाता है. तुम अपना रास्ता नापो….’ ईश्वर को हटा पुजारी आगे बढ़ गया.

24/देवता का भय

भीषण दरिद्रता, भूखप्यास, गरीबी देखकर अकुलाए एक भलेमानुष ने दुनिया बचाने की ठान ली. समाधान की खोज में चलताचलता वह क्षीरसागर तक पहुंचा. आंखों के सामने दूध का समंदर लहराते देख उसके आनंद का पारावार न रहा—

यहां मेरी चिंताओं का समाधान संभव है?’ आदमी ने सोचा. तभी उसकी दृष्टी शेषनाग पर आंखें मूंदकर लेटी भव्य आकृति पर पड़ी. उसने विनीतभाव से कहा—

जहां से मैं आया हूं वहां भूख का तांडव मचा है. भरपेट भोजन न मिलने से बड़ों की अंतड़ियां सिकुड़ चुकी हैं. मासूम बच्चे माताओं के स्तन से चिपकेचिपके दम तोड़ रहे हैं. इस महासागर से थोड़ासा दूध मिल जाए तो लाखों मासूमों की जान बच सकती है.’

देवता के अधरों पर मुस्कान तैर गई. उसी को सहमति मान भलामानुष धरती की ओर दूध उलीचने लगा. अकस्मात कुछ पंडितजनों की टोली उधर से गुजरी. आदमी को क्षीरसागर के किनारे देख वे चौंक पड़े. उनमें से कई की भृकुटियां तन गईं—‘महाराज! जिस तेजी से यह दूध उलीच रहा है, उससे तो कुछ देर में क्षीरसागर भी खाली कर देगा.’

धरती की भूख मिटाने के लिए यह परमावश्यक है.’ शेषनाग पर लेटे देवता ने कहा.

सोच लीजिए भगवन्! लोग जब तक भूखेप्यासे हैं, तभी तक आपका नाम लेते हैं. भूख और गरीबी न रही तो तुम्हारे साथसाथ हमें भी कोई नहीं पूछेगा.’ देवता ने कुछ देर सोचा. अचानक उसने करवट बदली और मुंह दूसरी ओर कर लिया. भक्तों के लिए इतना इशारा काफी था. ‘असुरअसुर’ कहकर वे उस आदमी पर टूट पड़े.

उस दिन धर्म और भूख के रिश्ते से एक और पर्दा हटा.

25/गाय और ईश्वर

गाय जल्दी से जल्दी बस्ती से चूर निकल जाना चाहती थी. अचानक ईश्वर सामने आ गया—‘जंबूद्वीप में सब कुशल तो हैं?’ ईश्वर ने पूछा. उखड़ी सांसों पर काबू पाने का प्रयत्न करते हुए गाय ने उत्तर दिया—

कुछ भी ठीक नहीं है. लोग धर्म में शांति की खोज करते हैं, जो सर्वाधिक अशांत क्षेत्र है. ऐसी तकनीक के भरोसे बुद्धिमान होना चाहते हैं, जो उन्हें दिमागी तौर पर पंगु बनाने के लिए तैयार की गई है. चाहते सब हैं कि भ्रष्टाचार मिटे, परंतु हवस कोई छोड़ना नहीं चाहता.’

किसी महापुरुष ने कहा है—दुनिया से भागने से अच्छा है, उसे बदलो. वैसे भी भारतवासी तुम्हारी पूजा करते हैं. उन्हें छोड़कर जाना उचित न होगा.’ ईश्वर ने समझाया. गाय झुंझला पड़ी—

आदमी को मेरा दूध और चमड़ी चाहिए. इन दिनों हालात और भी बुरे हैं. हर दंगेफसाद में मेरा नाम घसीट लिया जाता है. जो कुछ नहीं कर पाता सकता, वह गौरक्षक बना फिरता है. मैं ऐसी जगह एक पल भी ठहरना नहीं चाहती.’

मुझसे कहतीं. मैं कभी का ठीक कर देता.’ ईश्वर बोला. गाय का गुस्सा भड़क उठा.

चुप रहो. सारे फसाद की जड़ केवल तुम हो. मंदिर में पड़ेपड़े रोटियां तोड़ते रहते हो. मेहनत न खुद करते हो न भक्तों से करने को कहते हो. तमाशबीन बनकर ईश्वर होने का दावा करने से तो अच्छाहै किसी कुआपोखर में डूब मरो. लोग कुछ दिन हैरानपरेशान रहेंगे. बाद में अपने भरोसे सबकुछ ठीकठाक कर लोगे.

ईश्वर स्तब्ध. वह कुछ उत्तर दे, उससे पहले गाय आगे बढ़ गई.

ओमप्रकाश कश्यप

बहुजन संस्कृति और सामाजिक न्याय

भारत के पास अनगिनत आख्यान हैं, इतिहास नहीं है.—हेनरी बर

 

‘संस्कृति’ समाजशास्त्र के सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले शब्दों में से है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके अलग-अलग संदर्भ होते हैं. कई बार परंपरा को संस्कृति समझ लिया जाता है. जबकि अनेक बार लोग संस्कृति और सामान्य व्यवहार के बीच अंतर नहीं कर पाते. जनसामान्य ‘संस्कृति’ को सलीके से परिभाषित भले ही न कर पाए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति से उसके सामान्य व्यवहार, कार्यकलापों, सामाजिक-पारिवारिक जीवन की प्रेरणाओं के बारे में प्रश्न किया जाए तो बिना झिझके उसका एक ही उत्तर होगा—‘यही मेरी संस्कृति है.’ संस्कृति मनुष्य और समाज के संबंधों को न केवल व्याख्यायित करती है, अपितु उन्हें सफल एवं सार्थक भी बनाती है. संस्कृति के स्वरूप, उसकी अवधारणा, परिभाषा आदि को लेकर समाजविज्ञानियों के बीच मतभेद रहे हैं. कई बार लोग संस्कृति को मनुष्य के सामान्य व्यवहार से जोड़ने लगते हैं तो कई बार उसे सभ्यता के साथ गड्मड कर दिया जाता है. किसी व्यक्ति अथवा समाज के संदर्भ में संस्कृति उसके समग्र ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, रोजमर्रा के व्यवहारों, संबंधों, रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का समुच्चय होती है.

संस्कृति का कोई एक स्रोत नहीं होता. मनुष्य संस्कृति के तत्व माता-पिता, गांव-पड़ोस, रीति-रिवाज, किस्से-कहानियों, साहित्य-कला, ज्ञान-विज्ञान आदि विविध स्रोतों से ग्रहण करता है तथा उन्हें अपनी अस्मिता और पहचान के रूप में सहेजकर रखता है. इस तरह कि वे उसके रोजमर्रा के व्यवहार, ज्ञान, सामाजिक संबंधों और मर्यादाओं का आधार बन जाते हैं. दूसरे शब्दों में संस्कृति उत्तराधिकार का विषय है. व्यक्ति अथवा समाज जिन आदतों को यत्नपूर्वक अपनी विरासत के तौर पर संभाले रहता है, जिनसे उसकी विशिष्ट पहचान बनती है, उनका समन्वित, समावेशी और लोकोपकारी रूप संस्कृति कहा जा सकता है. उनमें कला, साहित्य, अर्जित ज्ञान, रीति-रिवाज, परंपराएं, सामूहिक प्रवृत्तियां, खान-पान, आचार-व्यवहार आदि सब सम्मिलित होते हैं. इसके अलावा उसमें वे आदर्श और नियम भी समाहित होते हैं, जिन्हें कोई समाज खुद को दूसरों से अलग और बेहतर दिखाने तथा स्थायित्व की भावना के साथ अपनाता है. मनुष्य की भौगोलिक और परिस्थितिकीय विशेषताएं भी उसकी संस्कृति को प्रभावित करती हैं.

‘संस्कृति’ शब्द ‘सम्’ और ‘कृति’ की संधि से बना है. उसका आशय ऐसी अमूर्त्त सामाजिक संरचना से है, जिसमें सभी का साझा हो. संस्कृति और सभ्यता को प्रायः एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में देखा जाता है. लेकिन दोनों में अंतर है. सभ्यता की कसौटी भौतिक जगत की उपलब्धियां तथा उनके फलस्वरूप जीवन में आए परिवर्तन को माना जाता है. सभ्यता संस्कृति से प्रभावित होती है, एक तरह से उसका हिस्सा भी है, लेकिन वह स्वयं संस्कृति नहीं होती. ऐसे ही जैसे भाषा ज्ञान की वाहक होती है, स्वयं ज्ञान नहीं होती. हां, भाषा का ज्ञान हो सकता है, जो मनुष्य की संपूर्ण ज्ञान-संपदा का मामूली हिस्सा है. इसी तरह मनुष्य अथवा समाज की भौतिक उपलब्धियां संस्कृति नहीं होतीं. सभ्यता को आमतौर पर संस्कृति का उत्पाद माना जाता है. लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है. सभ्यता और संस्कृति का संबंध अन्योन्याश्रित होता है, जिनमें संस्कृति का स्थान अपेक्षाकृत ऊपर माना जाता है. अपनी हर उपलब्धि के लिए सभ्यता संस्कृति की ऋणी रहती है. उसे हम संस्कृति का आवरण भी कह सकते हैं. परोक्षतः दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. किसी समूह अथवा समाज की सभ्यता को उसकी संस्कृति अथवा संस्कृतियों का समुत्पाद भी कहा जा सकता है.

संस्कृति और व्यवहार में भी अंतर है. लोग संस्कृति को रोजमर्रा के आचरण के रूप में देखने की भूल कर बैठते हैं. यह गलत है. मनुष्य का नैमत्तिक व्यवहार कानून, समाज, बाजार आदि से प्रभावित हो सकता है. उसका अध्ययन मानव-व्यवहार के अंतर्गत आता है. इस तरह वह मनोविज्ञान की विषय-वस्तु है. संस्कृति व्यवहार भी नहीं होती. उसे व्यवहार की नियंत्रक शक्ति अवश्य कहा जा सकता है. कोई भी सामाजिक अथवा व्यक्तिगत व्यवहार संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, उसे संस्कृति नहीं माना जा सकता. कारण यह कि व्यवहार मूर्त्त होता है, संस्कृति अमूर्त्त. होली के पर्व पर एक-दूसरे पर रंग डालना अथवा रक्षाबंधन के अवसर पर बहन द्वारा भाई को राखी बांधना, सहज सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा हैं, स्वयं संस्कृति नहीं है. संस्कृति उनमें अंतर्निहित प्रेरणा है. ऐसी अंतश्चेतना जो मनुष्य को अधिकाधिक सभ्य तथा प्राणिमात्र के प्रति अधिकतम उपयोगी होने का उत्साह जगाती है. मनुष्य ऐसी प्रेरणाओं को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर सकता है. उनके स्वरूप में थोड़ा-बहुत परिवर्तन ला सकता है, किंतु सामाजिक पहचान से जुड़े होने के कारण उन्हें पूर्णतः नकार नहीं सकता. कुल मिलाकर समाज अथवा व्यक्ति-विशेष के संदर्भ में संस्कृति को हम उसकी सामूहिक आदतों, स्वभाव, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के समुच्चय के रूप में देख सकते हैं.

अपने मूल विषय ‘बहुजन संस्कृति’ लौटने से पहले आवश्यक है कि ‘बहुजन’ की अवधारणा तय कर ली जाए. ‘बहुजन’ का अभिधार्थ ‘बहुसंख्यक जन’ अवश्य है, लेकिन इसका आधार मात्र संख्याबल नहीं है. संख्या के माध्यम से बहुजन को परिभाषित करने के अनेक खतरे हैं. इससे ‘बहुजन’ को संख्याबल समझ लिए जाने की संभावना बराबर बनी रहेगी. वह भीड़ को समाज का दर्जा देने के बराबर होगा. प्रकारांतर में वह अनेक भ्रांतियों को जन्म देगा. पुनश्चः ‘बहुजन’ और ‘बहुसंख्यक जन’ दोनों को एक मान लिया गया तो अल्पसंख्यक मुस्लिमों के मुकाबले हिंदू बहुजन होंगे तथा दलितों के सापेक्ष पिछड़ी जातियों के लोग. इस कसौटी पर आदिवासियों के मुकाबले गैर आदिवासी ‘बहुजन’ माने जाएंगे. यह विभाजन आगे भी बढ़ता जाएगा. एक समय ऐसा भी आ सकता है जब बहुजन की संकल्पना का आधार और उद्देश्य दोनों समाप्त हो जाएं. जैसे ‘बहुजन’ को ‘बहुसंख्यकजन’ नहीं कहा सकता, ऐसे ही ‘बहुजन’ के आधार पर ‘बहुजनवाद’ जैसी भी संकल्पना भी अनुचित कही जाएगी. उससे उसके ‘बहुसंख्यकवाद’ में बदलने की संभावना बनी रहेगी. अतएव ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने के लिए संख्या-तत्व को नजरंदाज करना ही उचित होगा.

फिर ‘बहुजन’ किसे माना जाए? इस शब्द का प्रथम उपयोग बौद्ध दर्शन में प्राप्त होता है. बुद्ध इसे परिभाषित नहीं करते, किंतु जिस संदर्भ में वे इसका प्रयोग करते हैं, उससे ‘बहुजन’ की अवधारणा साफ होने लगती है. भिक्षु संघ को संबोधित करते हुए वे कहते हैं—‘चरथ भिक्खवे चारिकम्-बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय.’ ‘हे भिक्षु! बहुजन कल्याण और बहुजन-हित के लिए निरंतर प्रयाण करते रहो.’ बुद्ध राज-परिवार में जन्मे थे. समकालीन राजाओं, विशेषकर श्रेष्ठिवर्ग पर उनका प्रभाव था. फिर भी वे भिक्षुसंघ से ‘बहुजन’ के कल्याण हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहने की कामना करते हैं. आखिर क्यों? तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को देखते हुए इसे समझ पाना कठिन नहीं है. उस समय तक वर्ण-व्यवस्था कट्टर रूप ले चुकी थी. कर्मकांड शिखर पर था. लोग जाति देखकर व्यवहार करते थे. इस मामले में सर्वाधिक मुखर ब्राह्मण थे. उनका दावा था कि उन पर सृष्टि-रचियता ब्रह्मा की विशेष कृपा है. जिसने उन्हें अपने मुख से पैदा किया है. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों अग्नि, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी आदि का देवताकरण किया था और लगातार यह प्रचारित करते रहते कि वे यज्ञों के माध्यम से देवताओं के संपर्क में रहते हैं. दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था, जिसे समाज की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. देवताओं की दुहाई देते-देते ब्राह्मण खुद देवता होने का गुमान करने लगे थे, जबकि क्षत्रिय राज्य के रखवाले से उसका स्वामी बन बैठे थे. स्वार्थ के लिए ब्राह्मण क्षत्रिय का महिमामंडन करता था, क्षत्रिय ब्राह्मण के पांव पखारता था.

तीसरा व्यापारी वर्ग था. पहले दो वर्गों की तरह अनुत्पादक वर्ग. उसका कार्य दूसरों के उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाना था. मुनाफे का एक हिस्सा ब्राह्मण और क्षत्रिय को भेंट कर वह मस्त रहता था. शेष जनसमाज यानी चौथे वर्ग में किसान, मजदूर, शिल्पकार आदि सभी आते थे. उनपर समाज के विकास की जिम्मेदारी थी, परंतु थे सब दूसरों की मर्जी के दास. किसी को अपनी रुचि और हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता न थी. किसान खेत में पसीना बहाता था, मगर फसल पर उसका अधिकार न था. वह राजा और सामंत की मान ली जाती थी. शिल्पकार अपनी कला से संस्कृति और सभ्यता को संवारने का काम करते थे, किंतु अपने ही श्रम-कौशल पर उनका अधिकार न था. उनके श्रमोत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार व्यापारी वर्ग के पास था. शूद्र का कर्तव्य था राज्य के लिए कर और ब्राह्मण के लिए दान देना. वफादार रहना तथा उनके प्रत्येक आदेश  को कृपा-भाव के साथ ग्रहण करते हुए दासत्व का धर्म निभाना. इसी में उसकी मुक्ति है—ऐसा कहा जाता था.

संख्याबल में ऊपर के तीनों वर्ग शेष जनसमाज के सापेक्ष बहुत कम थे. कुल जनसंख्या का बमुश्किल पांचवा हिस्सा. लेकिन समाज के कुल संसाधनों पर उनका अधिकार था. इसलिए संख्या-बहुल होने के बावजूद निचले वर्ण के लोग ऊपर के तीन वर्गों की मनमानी सहने के लिए विवश थे. कार्य-विभाजन के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज के बहुसंख्यक हिस्से को छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में बांट दिया था. बहुजन के पास बुद्धि थी, हस्तकौशल था, अनथक परिश्रम करने का हौसला तथा ईमानदारी भी थी. नहीं था तो आत्मविश्वास और सपने जो जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. ये सब सेवा-भाव की भेंट चढ़ चुके थे. निरंतर बढ़ते सामाजिक दबावों तथा यह भ्रम कि ईश्वर एकमात्र और सच्चा न्यायकर्ता है, कि इस जीवन में उन्हें जो खोना पड़ रहा है वह मृत्योपंरात जीवन में सहज प्राप्त होगा—के चलते वे पूर्णतः नियतिवादी हो चुके थे. अपने सामान्य हितों के बारे में निर्णय लेने के लिए भी वे समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे; तथा उन्हें अपना स्वामी, सर्वेसर्वा एवं मुक्तिदाता मानते थे. हालात ऐसे थे कि अपने प्रत्येक कार्य में स्वार्थ को आगे रखने वाले तीनों शीर्षस्थ वर्गों के बीच अभूतपूर्व एकता थी, जबकि चौथा और बहु-संख्यक वर्ग सामान्य हितों के लिए एक-दूसरे के साथ स्पर्धा करता हुआ, अपनी प्रभावी ताकत खो चुका था. ‘दिमाग’ और ‘हाथों’ की उस अघोषित-अवांछित स्पर्धा में लाखों हाथ, कुछ सौ या हजार दिमागों की मनमानी के समक्ष बेबस थे. ‘बहुजन’ से बुद्ध का आषय ऐसे ही लोगों से था, जो समाज के प्रमुख कर्ता और उत्पादक वर्ग का हिस्सा होने के बावजूद उपेक्षित, तिरष्कृत, उत्पीड़ित और इस कारण विपन्नता का जीवन जीने को विवश थे. अपने जीवन संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए वे ऐसे लोगों पर निर्भर थे जो उन्हीं के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन से शक्तिशाली होकर बहुजन-हितों के विपरीत कार्य करते थे.

कदाचित अब हम ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने की स्थिति में आ चुके हैं. अभी तक के विवरण जो छवि बनती है, उसके अनुसार ‘बहुजन’ समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, जो कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर आरंभ से ही अन्याय, असमानता और शोषण का शिकार रहा है. मानव सभ्यता उसके स्वेद-बिंदुओं की ऋणी है, फिर भी उसे किसी न किसी रूप में, उसके श्रम-लाभों से वंचित रखा गया है. वह खेतों में काम करने वाला मजदूर हो सकता है; और गली-नुक्कड़ पर जूते गांठने वाला मोची भी. स्त्री भी हो सकता है, पुरुष भी. आजीविका उसका धर्म है. वही उसका भरोसा भी. इसी कारण बुद्ध पूर्व भारत में वह आजीवक कहलाता था. उन दिनों प्रकृति पर उसे भरोसा था. वही उसकी श्रद्धा का पात्र भी थी. प्रकृति के प्रति सम्मान-भाव के साथ जिस दर्शन की रचना उसने की थी, विद्वत जगत में वह लोकायत के रूप में ख्यात हुआ. उसकी सहायता से शताब्दियों तक वे लोग आंडबर और याज्ञिक कर्मकांडों पर टिके वैदिक धर्म-दर्शन को चुनौती देता रहा. इस तरह बहुजन की अवधारणा हमें सामाजिक न्याय की भावना से जोड़ती है. अपने साथ-साथ दूसरों के कल्याण के लिए जिम्मेदार बनाती है. यही उसका उद्देश्य है और यही अभीष्ट भी है. हालांकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को लेकर मत-वैभिन्न्य हो सकते हैं.

मार्क्स ने पूंजीवादी तंत्र में उत्पीड़ित वर्ग को ‘सर्वहारा’ का नाम दिया था. ‘सर्वहारा’ और ‘बहुजन’ की आर्थिक अवस्था में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों ही शोषण का शिकार होते हैं. उनमें से किसी को भी अपने श्रम के मूल्यांकन का अधिकार नहीं होता. फिर भी दोनों की सामाजिक स्थिति में अंतर है. मार्क्स का जन्म ऐसे समाज में हुआ था जहां जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर विभाजन न था. अतएव सर्वहारा की उसकी परिकल्पना ठेठ पूंजीवादी समाज में आर्थिक विपन्नता के शिकार श्रमिक-वर्ग के शोषण तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणामों तक सीमित थी. बहुजन की समस्याओं का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव होते हैं. प्रकारांतर में वही उसकी समाजार्थिक दुरावस्था का कारण बनते हैं. मुख्यधारा से जुड़ने के लिए सर्वहारा को आर्थिक बाधाएं पार करनी पड़ती हैं. जबकि बहुजन को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. चूंकि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की गति अत्यंत मंथर होती है, इसलिए बहुजन-कल्याण की राह हमेशा अनेकानेक चुनौतियों से भरी होती है. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर सर्वहारा अपनी स्थिति में सुधार ला सकता है. पश्चिमी देशों में ऐसा हुआ भी है. जाति के संबंध में लोकतांत्रिक सरकारें भी अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पातीं. प्रतिगामी शक्तियां जाति को व्यक्ति का निजी मामला बताकर सामाजिक परिवर्तन को टालती रहती हैं. सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव तथा अवसरों की कमी के कारण बहुजन के लिए आर्थिक विषमताओं के चक्रव्यूह को भेद पाना आसान नहीं होता. जटिल जाति-व्यवस्था तथा उसके साथ धर्म का चिरस्थायी गठजोड़, बहुजन के संघर्ष को कई गुना बढ़ा देते हैं.

‘बहुजन’ का प्रथम उल्लेख भले ही बौद्ध दर्शन में हुआ हो, इसकी भूमिका वैदिक संस्कृति की स्थापना के साथ ही बन चुकी थी. लगभग 1500 ईस्वी पूर्व मध्य एशिया से भारत पहुंचे पशुचारी कबीलों ने खुद को ‘आर्य’ कहा था. इसका अर्थ बताया जाता है—‘श्रेष्ठ’ अथवा ‘श्रेष्ठजन.’ इस संबोधन का आशय था—मूल भारतवासी अथवा उनसे हजारों वर्ष पहले से इस देश में बस चुके जनसमूहों की संस्कृति को हेय मान लेना. भारत के मूल निवासी कौन थे? विद्वान दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में अग्रणी सिंधू सभ्यता को अनार्य सभ्यता मानते हैं. डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी अपने ग्रंथ ‘हिंदू सभ्यता’(राजकमल प्रकाशन, पांचवा संस्करण, 1975, पृष्ठ 46) में मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों के आधार पर सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को चार नस्लों में बांटते हैं—आद्य-निषाद, भूमध्य सागर से संबंधित जन, अल्पाइन तथा मंगोल, किरात. आगे वे लिखते हैं कि आद्य-निषाद भारत महाद्वीप के निवासी थे. भूमध्यसागरीय लोग दक्षिण एशिया से आए थे. अल्पाइन पश्चिमी एशिया तथा मंगोल, किरात वर्ण के लोग पूर्वी एशिया से पलायन कर लंबी यात्रा के उपरांत भारत पहुंचे थे. इनके अलावा  अलग-अलग नस्ल के संसर्ग से जन्मीं संकर नस्लें भी थीं. ऋग्वेदादि ग्रंथों में आर्यजनों ने इन्हीं नस्लों के सापेक्ष जो उनसे सहस्राब्दियों पहले इस प्रायद्वीप पर आकर बस चुकी थीं; तथा अपने श्रम-कौशल के बल पर समृद्ध सभ्यता की स्वामिनी थीं—अपनी वर्ण-श्रेष्ठता का दावा किया है. यदि उनके दावे को स्वीकार कर लिया जाए तो समकालीन बाकी नस्लें जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, तुलनात्मक रूप से अश्रेष्ठ अथवा निकृष्ट सिद्ध होती हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इसे वैदिक ब्राह्मणों की आत्ममुग्धता से अधिक मानने को तैयार नहीं है. आज यह प्रमाणित है कि सिंधू घाटी की सभ्यता ऋग्वैदिक सभ्यता की अपेक्षा 1500-2000 पुरानी तथा उससे कहीं अधिक समृद्ध और सुव्यवस्थित थी. पुरातत्ववेत्ता सिंधू सभ्यता की शुरुआत 3200 ईस्वी पूर्व से मानते हैं. 2300 ईस्वी पूर्व से 1750 ईस्वी पूर्व तक वह सभ्यता अपने वैभव के शिखर पर थी. उसके बाद उसके पराभव का दौर शुरू हुआ. 1500 ईस्वी पूर्व में जब आर्यों ने जब भारत में प्रवेश किया, उस समय वह सभ्यता करीब-करीब मिट चुकी थी. उसके अवशेष हड़प्पा, मोहनजोदड़ो’, कालीबंगा, लोथल, मेहरगढ़ जैसे दर्जनों स्थानों पर आज भी सुरक्षित हैं. सिंधुवासियों को दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध नागरिक सभ्यता की नींव रखने वाला बताया जाता है. पुरातत्ववेत्ता इस बात पर सहमत हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का कुल क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक था.

भारतीय इतिहास के संदर्भ में 1500 ईस्वी पूर्व से 700 ईस्वी पूर्व तक के समय को विद्वान ‘अंधकार युग’ मानते हैं. इसलिए कि उस कालखंड के बारे में हमें प्रामाणिक तौर पर कुछ भी ज्ञात नहीं है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेदादि श्रुति ग्रंथों का रचनाकाल भी यही कालखंड है. लेकिन ये ग्रंथ 700 ईस्वी पूर्व में भी लिखित रूप में मौजूद थे, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. दूसरी ओर यह प्रमाणित तथ्य है कि सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को न केवल लिपि बल्कि संख्याओं, वास्तविक और प्रतीक मुद्रा तथा उनके अनुप्रयोगों की भी पर्याप्त जानकारी थी. उनके खेती के तरीके विकसित थे. इतने विकसित कि भारत में बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक भी उनमें खास परिवर्तन नहीं हो पाया था. उनके पास सुनियोजित व्यापार-तंत्र और ऐसी भाषा थी, जिसके माध्यम से वे समकालीन सभ्यताओं से संवाद करने में सक्षम थे. जबकि आर्यजन महज घुमंतु पशुचारी कबीले थे. सभ्यता की दृष्टि से सिंधुवासियों से लगभग हजार साल पिछड़े हुए. इसके बावजूद यदि उन्होंने स्वयं को ‘आर्य’ यानी ‘श्रेष्ठजन’ कहा, तो इसके दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहला या तो वे सिंधू घाटी की सभ्यता के प्राचीन वैभव तथा उसके महत्त्व से अपरिचित थे. अथवा यह संबोधन उन्होंने बहुत बाद में अनार्यजनों पर अपनी सांस्कृतिक विजय, वैदिक संस्कृति की स्थापना के समय चुना था. वे जानते थे कि अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बताए बिना जीत को स्थायी बनाना और मूल-भारतवासियों पर ‘आर्यत्व’ को थोप पाना असंभव है. ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक वह लक्ष्य ही बना रहा. यह भी संभव है कि ‘आर्य’ संबोधन मध्य एशिया से प्रयाण से पहले ही उनके साथ जुड़ा हो और उसका अभिप्राय ‘श्रेष्ठजन’ न होकर कुछ और हो. ऋग्वेद को प्राचीनतम वेद, हिंदुओं का पवित्रतम ग्रंथ, जिसकी रचना ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए की गई है—माना जाता है. उसके आरंभिक उद्गाता ऋषियों में सभी वर्णों के रचनाकार सम्मिलित हैं.

वेदादि ग्रंथों को ‘ब्राह्मण-ग्रंथ’ कहने की प्रवृत्ति बहुत बाद में, कदाचित यजुर्वेद की रचना के समय हुई. उस समय तक उस समय तक ‘पुरोहित’, ‘राजा’, सम्राट जैसे पदों का सांस्थानीकरण हो चुका था. धर्म और राजनीति दोनों ही व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन चुके थे. वैदिक कर्मकांड जो उससे पहले तक मुख्यतः आश्रमों तक सीमित थे, वे राजा-महाराजाओं तथा धनी व्यापारियों के घर-आंगन तक पहुंचकर वैभव-प्रदर्शन के काम आने लगे थे. ब्राह्मणों की पूरी मेधा यज्ञादि कर्मकांडों को विस्तार देने में जुटी थी. चतुर्भुजी ब्रह्मा के हाथ में ‘ऋग्वेद’ के बजाय ‘यजुर्वेद’ की प्रति का होना, वैदिक धर्म-दर्शन की परपंरा में कर्मकांडों के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है. ऐसे में ज्ञान की परंपरा का अवरुद्ध होना स्वाभाविक था. वही हुआ भी. उसके तुरंत बाद पौराणिक लेखन की बाढ़-सी आ गई, जिसने उस समय तक उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान और ऐतिहासिक तत्वों का मिथकीकरण करने का काम किया.

ऋग्वेद में अनार्य पुरों के ध्वंस का जगह-जगह वर्णन है. लेकिन ऋग्वेद की रचना का जो काल है, उस समय तक सिंधु सभ्यता का पराभव हो चुका था. इसलिए संभावना यही बनती है कि ऋग्वैदिक आर्यों ने सिंधु-घाटी के उन नगरों और पुरों पर हमला किया था, जो प्रकृति की मार के चलते पहले से ही निष्प्रभ हो चुके थे. पराजित अनार्यों में से कुछ यहां-वहां छिटक गए. जो बचे उन्हें लेकर ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य समाज की नींव रखी. चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा कदाचित आर्यों की प्राचीन स्मृति का हिस्सा थी. गौरतलब है कि प्राचीन मिस्र तथा पर्शिया में भी चातुर्वर्ण्य वर्ण-व्यवस्था प्रचलित थी. अवेस्ता(यसना, 19/17, फ्रे) में जिन चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, वे हैं—असर्वण(पुरोहित वर्ग), अर्तेशत्रण(क्षत्रिय), डबेरियन(वैश्य) तथा वास्त्रोषण(शूद्र). ध्वनि के आधार पर आर्य शब्द ‘असर्वण’ के अपेक्षाकृत निकट है. अवेस्ता में ‘असर्वण’ को वर्ण-क्रम में पहला स्थान पर रखा गया है. संभव है ‘आर्य’ शब्द की उत्पत्ति पार्शियन ‘असर्वण’ से हुई हो; या फिर ‘आर्य’ की अवधारणा के मूल में इस शब्द का प्रभाव रहा हो. ‘अवेस्ता’ के अनुसार ‘अहुरमज्द’ एक प्रमुख देवता है. उसे सृष्टि निर्माता और उसका पालक माना गया है. मान्यतानुसार उसने कई द्वीपों की रचना की थी. भारत में प्रवेश के बाद ‘अहुरमज्द’ का ‘अहुर’ ही प्रकारांतर में ‘असुर का रूप ले लेता है. इससे एक संभावना यह भी बनती है कि भारत पहुंचे आर्य कबीले अपने मूल प्रदेश की संस्कृति का प्रतिपक्ष थे. ‘अहुरमज्द’ को सर्वोच्च पद का दिया जाना, उन्हें स्वीकार न था. इसलिए भारत पहुंचकर उन्हें जैसे ही अवसर मिला, ‘अहुरमज्द’ को नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक असुर में ढाल दिया गया. भारत में आर्यों का आगमन अलग-अलग समय में टुकड़ियों के रूप में हुआ था. उधर ऋग्वेद में ‘असुर’ का प्रयोग अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में हुआ है. इससे एक संभावना यह भी है कि अलग-अलग समय में आने वाली आर्य-टोलियां भिन्न समाज और संस्कृतियों से संबंधित थीं. यह भी संभव है कि ‘असुर’ शब्द का प्रयोग पहले ‘अच्छे’ के संदर्भ में होता हो, उसे ‘बुरे’ का प्रतीक और आर्यों का दुश्मन बाद में माना गया हो. मानव-संस्कृति के इतिहास में ऐसे बदलाव स्वाभाविक कहे जा सकते हैं. उन्हें हम समाज में निरंतर बदलते शक्ति-केंद्रों का परिणाम भी कह सकते हैं. आरंभ में गणेश को ‘विघ्नकर्ता’ देवता माना जाता था. प्राचीनतम उल्लेखों में उन्हें कर्मकांड और आडंबरों का विरोधी दर्शाया गया है. आगे चलकर वे हिंदुओं के प्रमुख देवता के रूप में प्रतिष्ठित होकर, ‘विघ्नहर्ता’ मान लिए जाते हैं. ऐसे ही शिव जो पहले अनार्यों के लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित थे, उन्हें देवताओं की तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया.

शिव को संहार का देवता माना जाता है. यह मिथ शिव की अनार्य समूहों के बीच महत्ता को दर्शाता है. भारत में आर्यों का आगमन भले ही उस युग में हुआ हो जब प्राचीन सिंधु सभ्यता का वैभव लुट चुका था. तो भी भारत पहुंचने के बाद उनके लिए यहां के निवासियों पर जीत हासिल करना आसान नहीं रहा होगा. शिव पूरे सिंधु प्रदेश के प्रतिष्ठित लोकनायक थे. उस समय के सभी अनार्य समूहों पर उनका प्रभाव था. इसलिए भारत आने के साथ ही आर्यों को शिव के समर्थकों से जूझना पड़ा होगा. संस्कृत ग्रंथों में इस बात के प्रमाण हैं कि अनार्यों के साथ आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. बल्कि लंबे समय तक जीत उनके लिए सपना ही बनी थी. मजबूरी में आर्यों से सहमति और समझौते से काम लिया. वह समझौता था, अनार्य महानायक शिव को आर्य देवताओं के बराबर का दर्जा देना. उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करना. चूंकि वे शिव के पीछे निहित अनार्य कबीलों की जनशक्ति से परिचित हो चुके थे, और परोक्ष रूप में उसका डर भी उनके मनो-मस्तिष्क पर सवार रहता था, कदाचित उसी भय ने उन्हें शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश किया था. आदिवासी आज भी खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं. कहते हैं कि उनके पूर्वज वैदिक कर्मकांडों के कटु आलोचक; तथा ‘वर्ण-श्रेष्ठता की सैद्धांतिकी’ का विरोध करते थे.

यहां कुछ प्रश्न एकाएक खड़े हो जाते हैं. पहला यह कि सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में कार्य-विभाजन तो दूसरे देशों भी हुआ था. सभ्यताकरण की शुरुआत भी लगभग साथ-साथ हुई थी. अपने आदर्श समाज में प्लेटो ने भी लोगों को तीन वर्गों—स्वर्ण, रजत तथा कांस्य में बांटने की अनुशंसा की थी. भारत की भांति जापान, कोरिया, स्पेन तथा पुर्तगाल के लैटिन अमेरिकी उपनिवेशों, अफ्रीका आदि देशों में भी जातिप्रथा का प्रभाव था. जापान के ‘बराकुमिन’(burakumin) तथा कोरिया के ‘बीकजियोंग’(baekjeong) के हालात भारत के दलितों के समान ही थे. यमन में अल-अखदम(al-Akhdham, Khadem) की स्थिति भारतीय शूद्रां जैसी थी. उन्हें भी जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता था. इनके अलावा पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों का समाज भी छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में विभाजित था. विभिन्न जातियों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी प्रबल थी. फिर बाकी देशों विशेषकर पश्चिमी देशों के सभ्यताकरण तथा भारत के सभ्यताकरण के परिणामों के बीच भारी अंतर क्यों मिलता है?

इस रहस्य को सभ्यताओं के विकास की सामान्य पड़ताल द्वारा समझा जा सकता है. सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता की व्याप्ति पर जोर दिया था. गुरु सुकरात के सपने को लेकर प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. उसने किशोरावस्था के आरंभ से ही बच्चों को माता-पिता से दूर, उनकी पैत्रिक को पहचान छिपाकर, राज्य के संरक्षण में रखने की सिफारिश की थी. उसके आदर्श राज्य में बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा की संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य की थी. एक उम्र तक शिक्षा का स्वरूप भी एक समान था. जबकि भारत में शिक्षा का स्वरूप वर्णानुसार परिवर्तनशील था. वैदिक ज्ञान केवल ब्राह्मण की संतान के लिए सुलभ था. क्षत्रिय और वैश्य की संतान को क्रमशः युद्ध-कौशल और व्यापारिक हिसाब-किताब से संबंधित शिक्षा देने का विधान था. शूद्र के लिए ज्ञान और शिक्षा के अवसर सर्वथा वर्ज्य थे. व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्रता का कोई महत्त्व नहीं था. पुत्र पिता की आजीविका को अपनाने के लिए बाध्य था. जबकि प्राचीन यूनान में सभी के लिए सैन्य शिक्षा एवं सेवा अनिवार्य थीं. तदोपरांत व्यक्ति की योग्यता तथा चारित्रिक विशेषताओं के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. व्यक्ति को जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न झेलना पड़े, इसके लिए प्लेटो ने साहसपूर्वक परिवार संस्था की भी उपेक्षा की थी. उसके बाद आए अरस्तु ने हालांकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी अनुशंसाओं को नकार दिया, परंतु जीवन और समाज में न्याय एवं नैतिकता के महत्त्व से उसे भी इन्कार न था. ‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ राज्य’ बना सकती है, कहकर उसने जीवन व्यक्तिमात्र के महत्त्व को स्थापित किया था. जिसे आधुनिक लोकतंत्र की आरंभिक प्रेरणा भी मान सकते हैं.

सच यह भी है कि सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी प्रमुख दार्शनिक दास प्रथा के समर्थक थे. और उसे उत्पादकता के स्तर को बनाए रखने के आवश्यक मानते थे. अरस्तु जैसा वैज्ञानिक सोच वाला विचारक जिसने प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत शोध किए थे, उत्पादकता में सुधार के लिए विज्ञान और तकनीक के प्रयोग हेतु कोई सुझाव नहीं देता. चूंकि दास के रूप में सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध था, जिसे वे विकास हेतु अपरिहार्य मान चुके थे—इस कारण उत्पादन वृद्धि हेतु विज्ञान और तकनीक के प्रयोग की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता. कुल मिलाकर विश्व के इन महानतम विचारकों द्वारा दास-पृथा को समर्थन, आगे चलकर में मानव-सभ्यता के विकास का अवरोधक सिद्ध हुआ. इस कमी के बावजूद प्राचीन यूनानी दर्शन में कुछ ऐसा अवश्य था, जो विचारकों की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहा. वह था—मनुष्य को सभ्यता और संस्कृति के केंद्र में रखकर सोचना, तथा जीवन में नैतिकता को अत्यधिक महत्त्व देना, यही विशेषताएं आगे चलकर आधुनिक मानवतावादी दर्शनों की प्रेरणा बनी.

भारत में नैतिकता धर्म का उत्पाद उसका एक लक्षण मानी गई है. अधिकांश मामलों में तो धर्म और नैतिकता में कोई अंतर ही नहीं किया जाता. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. एक प्रकार से धर्म भी मनुष्य की वैचारिक और आचरण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. बुराई तब उत्पन्न होती है जब उसकी प्रेरणा का आधार मानवेत्तर शक्तियों को मान लिया जाता है; तथा धर्म की आड़ लेकर कुछ लोग स्वार्थवश देवताओं को, जिनकी हैसियत मिथकीय पात्रों जैसी होती है—मनुष्य के सापेक्ष अतिरिक्त महत्त्व देने लगते हैं. कहने को प्रत्येक धर्म समानता के दावे के साथ जीवन में अपनी जगह बनाता है. परंतु उसकी समानता आभासी होती है. तरह-तरह की असमानताओं से जूझ रहे लोगों को फुसलाने के लिए धर्म ईश्वर के दरबार में बराबरी का भरोसा देता है. उसका वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व ही नहीं है. वह जीवन और समाज में कुछ व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूहों के विशेषाधिकार को भी वैध ठहराता है. उसके प्रभाव में कुछ व्यक्तियों को सर्वेसर्वा और खास; जबकि बहुसंख्यक वर्ग को नगण्य एवं उपेक्षित मान लिया जाता है. भारतीय समाज की पहचान बन चुकी इस कुवृत्ति का दुष्परिणाम यह हुआ है कि जो कार्य अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा रखते थे, उन्हें पूरी तरह शूद्रों तथा दासों के हवाले कर दिया गया. चूंकि संख्याबल में यह वर्ग तीनों शीर्षस्थ वर्गों की अपेक्षा अधिक था, समाज की जरूरत का उत्पादन उपलब्ध श्रम-शक्ति से आसानी से हो जाता था. इसलिए उत्पादन को बढ़ाने या उत्पादन प्रक्रिया को सरलीकृत करने का कार्य लंबे समय तक टलता रहा.

आने वाली शताब्दियों में यूनान का प्राचीन वैभव लुट-सा गया. प्लेटो का आदर्श राज्य चर्च के अधीन होकर धर्म के कुचक्र में हांफता हुआ नजर आया. इसके बावजूद वहां समय-समय पर स्वतंत्र मेधा का धनी ऐसे विचारक हुए जो प्राचीन चिंतकों से प्रेरणा लेकर राज्य को उसकी सीमा और कर्तव्य का एहसास कराते रहे. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन के वैकल्पिक साधनों का विकास किया. उससे पुरानी विचारधाराओं का नवोन्मेष हुआ, उसके साथ-साथ नए विचारों के सृजन में भी तेजी आई. मानव-मुक्ति के प्रश्न नए सिरे से अंगड़ाई लेने लगे. फलस्वरूप राज्य को चर्च के चंगुल से आजाद कराने लायक माहौल बना. नई वैचारिक चेतना ने सामंती व्यवस्था के सभी लक्षणों को जिनमें जाति भी शामिल थी, कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया. जापान, कोरिया जैसे देशों में जहां जातिप्रथा अपने विकृत रूप में उपस्थित थी, वहां उसके संपूर्ण उन्मूलन के लिए सघन कार्यक्रम चलाए गए, जिन्हें वहां के राज्य का पूरा समर्थन मिला. अमेरिकी और फ्रांसिसी क्रांति की सफलता के पश्चात पश्चिम में व्यक्ति-स्वाधीनता की मांग जोर पकड़ने लगी थी. उसका असर उनके उपनिवेशों पर भी पड़ा. फलस्वरूप उन देशों में जाति का संपूर्ण उच्छेद संभव हो सका.

भारत में ऐसा नहीं हो सका. इसलिए कि यहां ज्ञान-विज्ञान को धर्म का अनुचर बना दिया गया था. ऊपर से धर्म की परिकल्पना इतनी अस्पष्ट थी कि हर कोई अपने स्वार्थ को धर्म का नाम दे सकता था. ‘महाभारत’ में कुरुक्षेत्र का भीषण युद्ध, एकलव्य का अंगूठा काट लेना और बाद में छल से उसकी हत्या कर देना जैसे अनेक धत्त्कर्म धर्म के नाम पर ही किए जाते हैं. पश्चिम, विशेषकर प्राचीन यूनानी दर्शन सुकरात और प्लेटो के नैतिकतावादी दर्शनों से प्रभावित था. इन दार्शनिकों ने नैतिकता को मनुष्यता के आदर्श के रूप में सामने रखा था. जबकि भारत में सबकुछ धर्म के अधीन था; और धर्म की संरचना ऐसी थी कि उसे सामंतवाद से अलग देख पाना असंभव था. जाति और धर्म ने एक-दूसरे के समर्थन से भारतीय समाज में जो विकृतियां पैदा की हैं, उनका समाधान आज तक नहीं हो पाया है. भारत में पिछले 2500 वर्षों से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों पर शीर्षस्थ वर्गों का एकाधिकार रहा है. उत्पादक कर्म से दूर रहने के बावजूद उन्होंने अर्थव्यवस्था को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढाला हुआ था. बदली वैश्विक परिस्थितियों के फलस्वरूप समाज के निचले वर्गों को आजादी तो मिली, मगर वह आधी-अधूरी थी. जातीय आधार पर थोपे गए बंधन उसकी स्वतंत्रता की बाधा बने थे. आर्थिक आवश्यकताओं के लिए वे शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे. यह उत्तरोत्तर बढ़ती समाजार्थिक विषमता का प्रमुख कारण बना.

इस संबंध में बड़ा रोचक विश्लेषण डॉ. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की पुस्तक ‘साइंस एंड टेक्नालॉजी इन एनशिएंट इंडिया’ में मिलता है. जार्डन क्लिड के लेख ‘दि अर्बन रिवोल्युशन’ का अध्ययन करते हुए वे लिखते हैं कि तीन प्रमुख प्राचीनतम सभ्यताओं भारत, मेसापोटामिया, मिस्र में लगभग 6000 से 3000 वर्ष पहले तक मानवीय अनुभव-कौशल के आधार पर प्राकृतिक विज्ञानों यथा रसायन, भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान का प्रयोग खूब प्रचलित था. कारीगर लोग चांदी और तांबे के अयस्क को पिघलाकर धातु-शोधन की कला में दक्ष थे. वे वायु की गति का अनुप्रयोग जानते थे. उनके द्वारा बनाए गए जहाज सुदूर सभ्यताओं तक निरंतर यात्रा करते रहते थे. बैलगाड़ी के उपयोग से यातायात सुलभ हुआ था. इससे खाद्यान्न को एक स्थान पर पहुंचाने और उसे सुरक्षित रखना संभव हुआ. सिंधु सभ्यता में 800 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले अन्न भंडारगृह का पता चला है. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की अनूठी भवन-संरचाएं तथा उनके लिए जिस प्रकार की पकी इंर्टों का उपयोग किया गया था, वह न केवल समकालीन सभ्यताओं में बेजोड़ था, बल्कि उसके पराभव के पश्चात एक हजार वर्षों बाद भी, जिसे उन्होंने सभ्यता के ‘अंधकार युग’ की संज्ञा दी है—संभव नहीं पाया था. कमियां उस सभ्यता में भी थीं. चट्टोपाध्याय साफ करते हैं कि प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में इतनी उपलब्धियों के बावजूद, तत्कालीन शासक वर्ग की विज्ञान-संबंधी प्राथमिकताएं प्रायोगिक गणित एवं ज्योतिष तक सीमित थीं. गणित का उपयोग उत्पादों के संवितरण, कराधान, भवन और भवन-सामग्री का निर्माण आदि के लिए किया जाता था, जबकि ज्योतिष की मदद मौसम पर नजर रखने और उसके अनुसार फसल-उत्पादन के लिए ली जाती थी. प्राकृतिक विज्ञान यथा जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि के अनुप्रयोग तथा उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल शिल्पकर्मियों की थी.

वैदिक मेधा भी इस अपसंस्करण का शिकार थी. आरंभिक भारत में बीजगणित का जितना उपयोग यज्ञ-वेदियों के निर्माण के लिए होता था, उतना ही उपयोग नौकाएं बनाने के लिए भी किया जाता था. हवा की गति को पहचानते हुए, महासागर के बीच हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं करने वाली नौकाओं का निर्माण तथा उनके नाविकों द्वारा सफल यात्राएं बिना बीजगणित, सामुद्रिक विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र और गतिज भौतिकी के ज्ञान के असंभव थीं. मगर व्यावहारिक ज्ञान के प्रति कृपणता दिखाते हुए ब्राह्मणों ने ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उन अनेक धाराओं में से केवल गणित को सहेजने का कार्य किया. वह भी सीमित अर्थों में, यज्ञ-वेदियों के निर्माण जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए. बाकी का ज्ञान कर्मकारों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरण के लिए छोड़ दिया गया. संस्कृत साहित्य में बुनकर, तंतुकार, कुंभकार, नाविक, हलवाह, रथवाह, धातुकर्मी जैसे पेशेवरों का उल्लेख मिलता है. उनका ज्ञान मुख्यतः अनुभव आधारित था. लंबे विश्लेषण के बाद चट्टोपाध्याय जोर देकर कहते हैं कि उस समय की सामाजिक-आर्थिक नीतियों में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य था, जो प्राकृतिक विज्ञानों की उपेक्षा कारण बना था. इसके निहितार्थ को समझना कठिन नहीं है.

आर्य इस देश में प्रवासी थे. संभव है, भारत आने के बाद अनेक वर्षों तक खुद को दूसरे देश का मानते रहे हों. प्रवासी को अपनी मूल-संस्कृति से बेहद लगाव होता है. यह लगाव तब और बढ़ जाता है जब उन्हें ऐसे लोगों के बीच रहना पड़े जो उनसे कहीं विकसित सभ्यता के स्वामी हों. इसे उस समूह की हीनता-ग्रंथि भी कह सकते हैं. परंतु यह किसी भी व्यक्ति अथवा समूह के बारे में सच हो सकता है. भारत में यायावर कबीलों के रूप में आए आर्यों के साथ भी कदाचित ऐसा ही था. उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत पशुपालन था. खेती करना उन्होंने द्रविड़ों से सीखा. बावजूद इसके उत्पादकता के अपने परंपरागत संसाधनों के प्रति उनका आकर्षण बना रहा. वैदिक ऋषियों की जीवनचर्या आश्रम-केंद्रित थी. सभी प्रमुख वनवासी ऋषियों के अपने-अपने आश्रम थे. उनकी आय का प्रमुख स्रोत पशु-संपदा थी. उसके लिए परस्पर झगड़े भी होते थे. मात्र एक गाय की खातिर वशिष्ट और विश्वामित्र के बीच हुआ लंबा संघर्ष तो जग-जाहिर है. स्वर्ग के रूप में ऐसी समानांतर परिकल्पना भी मिलती है, जहां दुधारू गाय, भरपूर संख्या में उपलब्ध हों, उसे गोलोक कहा गया है. मान्यता थी कि अच्छी दुधारू गाय समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकती है—‘कामधेनु’ का प्रतीक इसी सोच और पशु-केंद्रित अर्थव्यवस्था के महत्त्व को दर्शाता है. द्रविड़ों के संपर्क में आने के बाद आर्यों ने खेती करना सीखा. फिर भी पशु-पालन के प्रति आकर्षण एवं कृषि-कर्म के प्रति दुराव बना रहा. वर्ण-व्यवस्था कृषि-कर्म में लिप्त लोगों को शूद्र का दर्जा देकर तीसरे पायदान पर ढकेल देती है. उनकी अपेक्षा द्रविड़ क्रमवार विकास करते हुए कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था को अपना चुके थे. वे उन लोगों के वंशज थे, जो सिंधु सभ्यता के पराभव के उपरांत यहां-वहां बिखर चुके थे. वे कृषि-कर्म में दक्ष थे. पुरातत्व से जुड़ी खोजें सिद्ध करती हैं कि सिंधु सभ्यता नागरीकरण के उन शिखरों तक पहुंच चुकी थी, जहां पहुंचने के लिए वैदिक जनों को आगे के एक हजार वर्ष खपाने पड़े. सिंधु सभ्यता की समृद्धि का प्रमुख संबल वहां के शिल्पकर्मी थे. अपने अनूठे शिल्पकर्म के बल पर वे, वैदिक सभ्यता के उभार के दौर में भी, अपनी आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता को बचाए रखने में सफल हुए थे.

सिंधु सभ्यता के उत्खनन से चीनी के बर्तन प्राप्त हुए हैं. उनका उपयोग धातु-शोधन के कार्य हेतु किया जाता था. आज धातु-अयस्क को पिघलाने का काम बड़े-बड़े पूंजीपतियों के अधिकार में जा चुका है. खनिज-संपदा पर कब्जा करने के लिए पूंजीपतियों के बीच होड़ मची रहती है. उसके लिए आदिवासियों को निर्लज्जतापूर्ण ढंग से विस्थापित किया जा रहा है. जिस समय तक ये कारखाने नहीं लगे थे, उन दिनों धातु-शोधन करना मुख्यतः आदिवासियों तथा उन लोगों का कार्य था, जिन्हें बाद में निचली जाति का मान लिया गया. उनके द्वारा शोधित धातुओं(तांबा) से हल की फाल भी बनाई जाती थी, औजार भी. किंतु उनके हुनर और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में उनकी अनुभव-सिद्ध जानकारी का—वैदिक जनों की दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था. न ही उस परिवेश से निकलकर आए आधुनिक ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों का ध्यान उस ओर गया. इसका दुष्परिणाम भारतीय समाज में ज्ञान-विज्ञान की निरंतर उपेक्षा के रूप में सामने आया. विशेषकर नए ज्ञान और शोध को लेकर. धर्म का स्वभाव होता है, वर्तमान और भविष्य की दुहाई देते हुए, अतीत की ओर बार-बार झांकना. उसपर हम भारतीय धर्म को कुछ ज्यादा ही अहमियत देते आए हैं, इसलिए हर नई समस्या का समाधान हमें अतीत की खोह में ले जाता है. समस्या सुलझने के बजाए और जटिल हो जाती है. इसका नुकसान बहुजनों को उठाना पड़ता है. अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन समूह हालात को अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ने में कामयाब हो जाते हैं.

भारतीय संस्कृति में शूद्रों की उपस्थिति को लेकर जितने भी शोध सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश वेदाध्ययन के अधिकार को शूद्रत्व की कसौटी मानते हैं. एक वर्ग कहता है कि शूद्रों को वेदाध्ययन और यज्ञादि कर्मकांडों में हिस्सेदारी का अधिकार था. दूसरा इससे इन्कार करता है. अपने-अपने मत के समर्थन में दोनों अपने तर्क लगभग एक जैसे ग्रंथों से जुटाते हैं. उन ग्रंथों से जो ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से उसका महिमामंडन करते हुए रचे गए हैं. जिनका येन-केन-प्रकारेण उद्देश्य जाति-और वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखना है, ताकि कुछ लोगों के विशेषाधिकार बने रहें. वेदाध्ययन और कर्मकांडों को लेकर स्वयं शूद्रों की दृष्टि क्या थी? क्या उन्हें वेदाध्ययन और कर्मकांडों से वंचित किए जाने बहुत क्षोभ था? क्या इनसे वंचित किए जाने का उनकी उत्पादकता पर कोई प्रभाव पड़ा था? अथवा वे किसी स्वतंत्र धर्म-दर्शन के अनुयायी थे तथा वैदिक कर्मकांडों को निरर्थक मानकर स्वयं ही उनसे सुरक्षित दूरी बनाए हुए थे? इस प्रकार के प्रश्नों को लेकर उनमें कोई बेचैनी नजर नहीं आती. कदाचित उनके लिए यह समस्या ही नहीं थी. उनमें से अधिकांश भारत के अतीत में सिवाय वैदिक सभ्यता और संस्कृति के कुछ ओर दिखाई ही नहीं देता. जो जानते-समझते हैं, वे इस सत्य पर पर्दा डाले रहते हैं. उन्हें डर लगा रहता है कि खुलते ही विशेषाधिकार छीने जा सकते हैं. जिन ग्रंथों के आधार वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, उन्हीं के स्वतंत्र विवेचन द्वारा हम बड़ी आसानी से समझ सकते हैं कि समाज का बड़ा वर्ग, वैदिक कर्मकांडों की निरर्थकता को पहचानकर, स्वयं उनसे दूरी बनाए हुए था. उसमें वही लोग थे, जो अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. धर्म उनके लिए जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति निजी आस्था और विश्वास  का मसला था. उस तरह दिखावे का नहीं जैसा वैदिक धर्म के अनुयायी कर रहे थे.

संस्कृत वाङ्मय के आधार पर अनार्यों की स्थिति का वर्णन करते हुए एक बात अकसर भुला दी जाती है, वह है उनकी आर्थिक स्वतंत्रता. समय के साथ हालांकि उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते थे. बावजूद इसके अपने श्रम-कौशल के दम पर उनका बड़ा हिस्सा अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सफल हुआ था. एक तरह से प्राकृतिक विज्ञानों के अनुप्रयोग की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. हालांकि ज्ञान-विज्ञान का अंतरण मुख्यतः अनुभव आधारित था. शिल्पकार वर्ग अपने पुत्र या उत्तराधिकारी को शिल्पकर्म से जुड़ी जानकारी देकर उऋण हो लेता था.़ अनुभवों की वंशानुगत अंतरण पद्धति में ज्ञान का लंबे समय तक संरक्षण और उसमें क्रमागत विकास असंभव था. ऊपर से निचले वर्गां में शिक्षा का अभाव, जिसने उन्हें अपने ही ज्ञान के प्रति उदासीन बना दिया था. फिर भी अपने संगठन-सामर्थ्य एवं बाहरी स्पर्धा के बल पर, शिल्पकार समूह अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सफल रहे थे. उस समय तक उत्पादन आवश्यकता केंद्रित था. मुनाफे की अवधारणा जन्मी नहीं थी. उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध था. उनके उत्पादों की स्थानीय और सुदूर बाजारों में बराबर मांग थी—इस कारण उनकी उपेक्षा असंभव थी. अनुकूल परिस्थितियां के चलते शिल्पकार वर्ग ने ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक अपनी समाजार्थिक स्वतंत्रता बनाए रखी. किंतु ‘मनुस्मृति’ तथा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद समाज के चार्तुवर्ण्य विभाजन को राज्यों का समर्थन मिलने लगा था. चाणक्य शिल्पकार समूहों की स्वायत्तता को राज्य के लिए हानिकारक मानता था. ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद सहयोगाधारित व्यापारिक संघों पर तरह-तरह के प्रतिबंध थोपे जाने लगे. उसके चलते उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच एक नए व्यापारी वर्ग का उदय हुआ, जिसका प्रमुख कार्य उत्पादों को उसके उपभोक्ता-वर्ग तक पहुंचाना और बदले में अच्छा-खासा मुनाफा अपने लिए सुरक्षित रख लेना था. उससे मुनाफे की अवधारणा विकसित हुई. राज्य के संरक्षण में पनपे व्यापारी वर्ग ने कर्मकार वर्गों से उनके उत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया. कालांतर में वह उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक दुर्दशा का कारण बना.

चाणक्य केंद्रीय सत्ता का समर्थक था. उसकी प्रमुख कृति ‘अर्थशास्त्र’ में किसी नए अर्थशास्त्रीय सिद्धांत की विवेचना नहीं है. वह विशुद्ध रूप से राजनीति का ग्रंथ है. पुस्तक के आरंभ के कई अध्याय राजा की सुरक्षा से संबंधित हैं. इसके लिए वह तरह-तरह के कूटनीतिक उपाय बताता है. राजनीति षड्यंत्रों के समय रहते पर्दाफाश तथा उनसे राज्य और राजा दोनों की सुरक्षा के लिए वह पूर्ववर्ती आचार्यों नारद, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि के ग्रंथों से उद्धरण प्रस्तुत करता है. इस कारण अर्थशास्त्र को ‘आन्वीक्षकी’ भी कहा गया है. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य वंश का संस्थापक तथा अपने समय का सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट था. उसके पास पांच लाख से अधिक का सैन्यबल था. फिर चाणक्य को डर किस बात का था? क्यों राजा की सुरक्षा की चिंता करते हुए उसे अपनी पुस्तक के कई अध्याय ‘आन्वीक्षकी’ के नाम करने पड़े. सवाल यह भी है कि अर्थनीति विषयक साधारण जानकारी के बावजूद उस पुस्तक को ‘अर्थशास्त्र’ जैसा शीर्षक क्यों दिया गया? क्या महज इसलिए कि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक उससे पहले आ चुकी थी; और वह भारत विजय का सपना लेकर निकले सिकंदर का गुरु था? अगर नहीं तो राजनीति-शास्त्र की पुस्तक के अवांतर नामकरण के लिए चाणक्य की जो आलोचना अपेक्षित थी, उससे आगे के विद्वान क्यों बचते रहे? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर भारतीय संस्कृति और इतिहास में नदारद हैं. लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के निष्पक्ष विवेचन द्वारा उनके उत्तर खोजे जा सकते हैं.

सिंकदर का आक्रमण देश पर पहला सुगठित हमला था, जिसके पीछे आक्रमणकारी के साम्राज्यवादी मंसूबे एकदम साफ थे. चंद्रगुप्त के रण-कौशल से वह हमला नाकाम हो चुका था. उसके बहाने सत्ताधारी समूह जनता को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए बड़े राज्यों का गठन अपरिहार्य है. लेकिन बड़े राज्यों की सफलता केंद्रोन्मुखी अर्थव्यवस्था के बिना संभव न थी. चंद्रगुप्त की सेना किसी भी तत्कालीन सम्राट से बड़ी थी. इतनी बड़ी सेना और राज्य के प्रबंधन हेतु भारी-भरकम मशीनरी का इंतजाम तभी संभव था, जब उत्पादन और वितरण के स्रोतों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राज्य के सीधे नियंत्रण, अथवा उसके भरोसेमंद लोगों के अधीन लाया जाए. चाणक्य ने यही किया था. डॉ. रमेश मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘कॉआपरेटिव्स इन एन्शीएंट इंडिया’ में लगभग तीस प्रकार के सहयोगाधारित उत्पादक संगठनों का उल्लेख किया है. वे संगठन पूर्णतः स्वायत्त थे. यहां तक कि राजा को भी उनकी कार्यशैली में दखल देने का अधिकार न था. संगठन के मुखिया को राज-दरबार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता था. आवश्यकता पड़ने पर राजा भी उनसे मदद लेता था. ऋग्वेद में भी ‘पणि’ का उल्लेख हुआ है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों की प्राचीनतम उपस्थिति को दर्शाता है. पणि पशुओं के व्यापारी थे. सहयोगाधारित व्यापार की यह परंपरा सिंधु सभ्यता की देन थी. उसके व्यापारिक काफिले बेबीलोन, मिस्र आदि देशों की निर्बाध यात्रा करते रहते थे. मामूली संसाधनों के भरोसे लंबी व्यापारिक यात्राएं करना बिना आपसी सहयोग के संभव ही नहीं था. सिंधु सभ्यता से लेकर मेसापोटामिया, मिस्र, ईरान आदि में मिली लगभग एक समान मुहरों से इन सभ्यताओं की बीच आपसी लेन-देन की बात पुष्ट होती है.

चाणक्य ने गौ-अध्यक्ष, नाव-अध्यक्ष, रथाध्यक्ष, सीताध्यक्ष जैसे पदों का विधान किया. उससे पहले गोपालक, नाविक, रथवाह, बुनकर, सार्थवाह, तैलिक आदि के अपने-अपने स्वतंत्र संगठन थे. चाणक्य ने नए पदों के सृजन द्वारा उनकी स्वायत्तता को मर्यादित कर, उन्हें  प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में राज्य के अधीन कर लिया गया था. इस तरह सोची-समझी नीति के तहत व्यापारी वर्ग को बढ़ावा दिया गया. ब्राह्मण धर्मसत्ता को संभाले था, जबकि क्षत्रिय का राजसत्ता पर कब्जा था. राज्य के समर्थन और संरक्षण में पनपे तीसरे व्यापारी वर्ग ने जो शेष दो वर्णों, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की भांति अनुत्पादक वर्ग था—उत्पादकता के स्रोतों पर अधिकार कर, अर्थसत्ता को भी अपने अधीन कर लिया गया. राजनीतिशास्त्र की कृति का ‘अर्थशास्त्र’ नामकरण वस्तुतः समाज के उत्पादक वर्गों की स्वायत्तता को, राजनीतिक तंत्र के अधीन लाने की कूटनीतिक चाल थी. उससे स्वतंत्र पेशे जाति का रूप लेने लगे. शिल्पकारों से अपनी मर्जी के उत्पादन तथा उत्पाद का मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया गया. उत्पीड़न के शिकार लोग कभी भी विद्रोह कर, राज्य और राजा दोनों के लिए खतरा बन सकते हैं, चाणक्य को इसका अंदेशा कदाचित ज्यादा ही था. इसलिए वह एक ओर आन्वीक्षकी के तरह-तरह उपाय बताता है, कराधान प्रणाली को मजबूत करने के सुझाव देता है, साथ ही राजा की सुरक्षा और अनुशासन के नाम पर कठोर दंडविधान की अनुशंसा भी करता है. चाणक्य के अर्थशास्त्र में साधारण नागरिक की महत्ता राज्य के प्रति उसकी उपयोगिता से आंकी जाती थी. जो राज्य का नहीं है, वह कहीं का नहीं है.

अरस्तु चाणक्य का समकालीन था. उससे कुछ बड़ा. चाणक्य ने चंद्रगुप्त को शिक्षित किया था तो अरस्तु सिकंदर का गुरु था. दोनों के बीच यह मामूली समानता है. लेकिन दोनों के राजनीति विषयक चिंतन में जमीन-आसमान का अंतर है. चाणक्य के नजरों में राजा सर्वेसर्वा है, जबकि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में मनुष्य है. नैतिकता को राज्य के गठन की आधारशिला मानने वाले अरस्तु का विचार था—‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ शासन को जन्म दे सकती है.’ ‘अर्थशास्त्र’ का मूल संदेश सर्वसत्तावादी है. चाणक्य को राजा के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता. उसकी निगाह में प्रजा और बाकी दरबारीगण केवल इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि वे राजा के होने को प्रासंगिक बनाते हैं. दूसरी ओर अरस्तु का दर्शन ‘न्याय’ का दर्शन है. उसके अनुसार प्रजा-कल्याण हेतु समर्पित भाव से काम करना, राजा का कर्तव्य है. वही राज्य के गठन का औचित्य भी है. ‘अर्थशास्त्र’ में प्रजा कल्याण राजा का कर्तव्य न होकर, ‘कृपाभाव’ है. बहरहाल, भारत में देशज कृति ‘अर्थशास्त्र’ को सराहा गया. वैसे भी दुनिया में हो रही ज्ञान-संबंधी हलचलों की ओर से आंखें मूंदे रहना ब्राह्मणों का स्वभाव रहा है. उनकी आत्ममुग्धता भी कमाल की थी. सिवाय खुद के कुछ देख ही नहीं पाती थी. ज्ञान के क्षेत्र में जो सर्वात्तम है, वह भारतीय है. और भारत में जो श्रेष्ठतम विचार है वह किसी न किसी ब्राह्मण के दिमाग की उपज है—इस भ्रांत धारणा ने उन्हें विदेशी ज्ञान-विज्ञान के प्रति सदैव उदासीन बनाए रखा. दुनिया में ऐसे अनेक यायावर जिज्ञासु रहे हैं, जिन्होंने अपना जीवन और श्रम दूसरे देशों और सभ्यताओं के बीच जाकर ज्ञान को सहेजने में लगाया है. मेगस्थनीज, ह्वेनसांग, फाह्यान, अल-बरूनी, इब्नबतूता, अल-मसूदी, अल-बरूनी जैसे सैकड़ों विद्वान थे, जो ज्ञान-विज्ञान की खोज के लिए हजारों मील की यात्रा करके भारत पहुंचे थे. लेकिन भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इतना आत्ममुग्ध रहा कि उसने बाहरी देशों में चल रही ज्ञान की हलचलों की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया. ब्राह्मणों की मेधा स्मृतियों, पुराणों और आरण्यकों की गुलाम रही. जबकि उनका श्रम वर्ण-व्यवस्था को चिरस्थायी बनाने में लगा रहा. परिणामस्वरूप देश में धर्म और जाति का ऐसा गठजोड़ बना कि सुधारवादी आंदोलनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उनसे जूझने में खपता रहा. चूंकि उन आंदोलनों का नेतृत्व उच्च जाति के लोगों के पास था, जिनके अपने स्वार्थ जाति को सुरक्षित रखने में थे, इसलिए परिवर्तनकारी आंदोलनों के प्रति उनमें से अधिकांश का रवैया ढुलमुल ही रहा. प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में शायद ही कोई उदाहरण हो जिसमें किसी पिता ने वर्णोचित गुणों के अभाव में अपनी संतान के वर्ण के अवमूल्यन की शिकायत की हो. जबकि जातिवाद को प्रश्रय देने, अयोग्य पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में विरासत सौंपने के यहां अनगिनत उदाहरण हैं.

यह ठीक है कि अपने जन्म के साथ ही जाति-प्रथा को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था. कई बार ऐसे अवसर भी आए जब लगा कि इस व्यवस्था के दिन लद चुके हैं. समाज सुधार के क्षेत्र में समय-समय चलाए गए आंदोलनों से उसे कुछ समय के लिए धक्का अवश्य लगा, परंतु धर्म के समर्थन तथा लंबे जाति-आधारित स्तरीकरण के कारण, जो हर जाति को किसी न किसी जाति से ऊपर होने का भरोसा देता है—ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसका अस्तित्व सचमुच खतरे में पड़ा हो. सामंती लक्षणों से युक्त जाति हमेशा ही भारतीय समाज का कलंक बनी रही. जाति और धर्म की जकड़न में आत्मविश्वास गंवा चुके भारतीय समाज ने विकास की ऐसी उल्टी चाल चली कि समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक विकसित सिंधु सभ्यता का जनक और ज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, ज्योतिष, स्थापत्य आदि क्षेत्रों में बाकी देशों के मुकाबले अग्रणी स्थान रखने वाला भारत लगातार पिछड़ने लगा. शताब्दियों से जाति और धर्म के सहारे विशेष सुख-सुविधाओं से लाभान्वित रहा वर्ग, आज भी जाति को भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट देन मानता है; और तमाम आलोचनाओं-विरोधों के बावजूद  उसे किसी न किसी रूप में सुरक्षित रखना चाहता है. उनमें सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की ही है. आखिर जाति का उत्स क्या है?

प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि जातीय शोषण के विरुद्ध निरंतर संघर्ष के बावजूद भारतीय समाज उसकी जकड़न से बाहर आने में क्यों असमर्थ रहा. संख्या में कई गुना होने के बावजूद बहुजन समाज अल्प-संख्यक अभिजनों की समाजार्थिक दासता में बने रहने के लिए विवश क्यों हुआ? इस धारणा को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए जाति-व्यवस्था के विरोधी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. अभी तक जातीयता के उपकार एवं अपकार के अध्ययन हेतु आदि स्रोत के रूप में ऋग्वेद को लेने की मान्यता रही है. ऋग्वेद जो ब्राह्मण मनीषा का आदि ग्रंथ है, उसे भारतीय प्रायद्वीप के बौद्धिक उठान का आदि ग्रंथ भी मान लिया जाता है. ऐसा करके हम आर्यों के आगमन से पूर्व के भारत के इतिहास को पूरी तरह उपेक्षित कर जाते हैं. जबकि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि स्थानों के उत्खन्न के पश्चात हम एक समृद्ध अनार्य सभ्यता से परिचित हो चुके हैं. उसपर प्रामाणिक लेखन और ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे हम समानांतर सभ्यता का चिह्नन कर सकते हैं. ऋग्वेद को भारतीय मनीषा का आदि ग्रंथ मानने का दूसरा बड़ा नुकसान यह होता है कि वर्णाश्रम व्यवस्था का अध्ययन शूद्रों को यज्ञादि का अधिकार होने या न होने में सिमट जाता है. इस तरह हम आलोचना की ब्राह्मणवादी दृष्टि से बाहर नहीं निकल पाते. उदाहरण के लिए ‘शूद्र’ शब्द की व्याख्या को ले सकते हैं. अपने लेखों में विधुशेखर भट्टाचार्य इस शब्द को ‘क्षुद्र’ से व्युत्पत्तित बताते हैं. उनकी पूर्वाग्रहों में रची-बसी दृष्टि शूद्रों की सामाजिक अधिकारिता को वैदिक कर्मकांडों में हिस्सेदारी तक सीमित कर देती है. डॉ. रामशरण शर्मा ने संस्कृत गं्रथों में शूद्र की स्थिति को लेकर गहन अध्ययन किया है. उन्हें वामपंथी सोच का प्रगतिशील लेखक माना जाता है. परंतु शूद्र को लेकर वे भी जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर नहीं निकल पाते. ‘शूद्र इन एन्शीएंट इंडिया’ में वे इसी सोच को विस्तार देते हैं.

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए अधिकांश विद्वान बौद्ध धर्म को प्रस्थान बिंदू मानते हैं. यह धारणा कदाचित डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने से बनी है. बौद्ध धर्म को ब्राह्मणवाद के विरोध का प्रस्थान बिंदू मानने वाले विद्वान प्रायः यह भूल जाते हैं कि बुद्ध का विरोध वर्ण-व्यवस्था से नहीं था. न ही वे जाति को अनावश्यक मानते थे. जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरोध में उन्होंने कोई आंदोलन भी नहीं किया था. वे सिर्फ जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति चाहते थे. बुद्ध के पांच प्रमुख शिष्यों में से एक उपालि नाई जाति से था. कुछ भिक्षु निचली जाति इस कारण उनका उपहास भी उड़ाते थे. बुद्ध तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने उपालि की जाति पर कुछ नहीं कहा. न ही जाति को अनावश्यक माना. केवल जाति के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा न मानने, भेदभाव न करने का उपदेश दिया. कुछ स्थानों पर तो वे वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में खड़े होते दिखाई पड़ते हैं.

ईसा से पांच-छह से वर्ष पहले का समय, मनुष्यता के इतिहास का वह कालखंड है, जिसे मानवीय बुद्धि के विस्फोट के रूप में देखा जाता है. उस दौर में भारत में बुद्ध, महावीर स्वामी, चीन में कन्फ्यूशियस, बेबीलोन में सायरस, पर्शिया में जरथ्रुस्त तथा यूनान में सुकरात जैसे दार्शनिक पैदा हुए. उन सबने जीवन में नैतिकता को महत्त्व दिया. जबकि भारत की सभ्यता का विकास ब्राह्मणवाद की अधीनता तथा उसके वर्चस्व तले हुआ था. ब्राह्मण को नैतिकता, सामाजिक सौहार्द, बराबरी तथा न्याय-परंपरा में कभी विश्वास नहीं रहा. आरंभ से ही वह आधुनिकता विरोधी और धर्मसत्ता के प्रति दुराग्रहशील रहा है. आलोचना से बचने के लिए ब्राह्मणों ने असमानता को दैवीय घोषित किया. ऐसी स्थितियां रचीं कि जो दैवीय है, उसे न्यायसंगत भी मान लिया जाए. यह काम अकेले धर्म के भरोसे संभव नहीं था. इसलिए राजसत्ता को अपने पक्ष में लिया गया. भारत के सांस्कृतिक इतिहास में धर्म की विभिन्न धाराओं के बीच संघर्ष के सैकड़ों उदाहरण हैं. राजनीति के क्षेत्र में भी लोगों की महत्त्वाकांक्षाएं एक-दूसरे से टकराती रही हैं. परंतु धर्म और राजनीति का संघर्ष, विशेषकर राजनीति द्वारा धर्म से आजादी के संघर्ष का यहां कोई उदाहरण नहीं है. दधिचि का महिमामंडन उनकी दानशीलता के लिए किया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने धर्म के लिए जीवन की परवाह नहीं की और देवासुर संग्राम में देवताओं की जीत के लिए, जीते-जी अपनी हड्डियां तक दान कर दीं. लेकिन उस कथित त्रिकाल-दृष्टा महर्षि ने भी प्राणोत्सर्ग से पहले देवासुर संग्राम के औचित्य पर कोई सवाल नहीं किया था. न यह पूछा कि उस संग्राम में न्याय किस ओर है. जाहिर है, दधिचि का दान एक बूढ़े-मरणासन्न ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणवाद को बचाए रखने के लिए किया गया बलिदान था. धर्म उनके लिए राजनीति थी. ऐसा टोटम जिसपर बिना बुद्धि-विवेक के विश्वास कर लिया जाता है. भावनाओं में बहकर बहुजन भी वज्र के लिए देह गलाने वाले दधिचि के निर्णय को न्याय-अन्याय की कसौटी पर कस नहीं पाते. दधिचि के लिए देवताओं का पक्ष ही न्याय का पक्ष है. और जो देवताओं का पक्ष है, असलियत में वह ब्राह्मण का ही पक्ष है. पुराणों और उपनिषदों में भरे ऐसे आख्यान, वर्ण-व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम करते हैं.

दूसरी ओर पश्चिम में नैतिकता और मानवादर्शों के लिए आत्मबलिदान के अनेक उदाहरण हैं. प्लेटो का संबंध एथेंस के राज-परिवार से था. इस आधार पर वह स्वयं को राज्य का  उत्तराधिकारी भी मानता था. बावजूद उसने अपने गुरु सुकरात का अनुसरण करते हुए उसने सत्ता के आगे समर्पण करने के बजाए अपने विवेक और नैतिकता को हमेशा आगे रखा. उसके जीवन में एक या दो ऐसे अवसर आए जब उसे राजसत्ता के कोप से बचने के लिए भागना पड़ा. अरस्तु ग्रीक सेनानी सिकंदर का गुरु था. सिकंदर उसका सम्मान करता था. अरस्तु द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय तथा प्रयोगशालाओं के लिए सिकंदर की ओर से आवश्यक मदद प्राप्त होती थी. इसके बावजूद अरस्तु ने शक्तिशाली राज्य के बजाए नीति-केंद्रित राज्य का समर्थन किया था. अपनी स्वतंत्र लेखनी के कारण एक बार वह सिकंदर को भी जब वह युद्ध अभियान पर निकला हुआ था—नाराज कर बैठा था. जिससे सिकंदर ने उसे मृत्युदंड देने की ठान ली थी. यदि भारत से लौटते समय सिंकदर की असाममियक मृत्यु नहीं होती तो अरस्तु को दंडित किया जाना तय था.

यहां एक और सवाल खड़ा होता है. वर्ण-व्यवस्था के दबाव के चलते यदि शूद्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने, अपनी कला को निखारने का यदि अधिकार ही नहीं था, तो उन्हें सभ्यता का वास्तविक निर्माता कैसे कहा जा सकता है. यदि उनका दिलो-दिमाग ब्राह्मणों तथा दूसरी शीर्ष जातियों के पूरी तरह अधीन था तो वे शिल्पकर्म के अद्भुत चितेरे, अनूठी स्थापत्य कला के धनी, कुशल आविष्कारक भला कैसे कहा जा सकता है? यह आशंका उन ग्रंथों को पढ़ते हुए विश्वास में बदलने लगती है, जिन्हें भारतीय मेधा के चमत्कार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जिन्हें विद्वान प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल के लिए उदाहरण के रूप में पेश करते आए हैं. उनमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राधाकुमुद मुखर्जी, डॉ. रामशरण शर्मा जैसे विद्वान भी शमिल हैं. उनके अध्ययन की एकमात्र विशेषता, जो वस्तुतः उनकी बौद्धिक दुर्बलता है, वह यह है कि वे सभी स्वनामधन्य विद्वान भारतीय सभ्यताकरण की शुरुआत वेदों से करते हैं. ऋग्वेद उनके लिए भारतीयता की पहचान का आदि-ग्रंथ है. वैदिक संस्कृति के व्यामोह में फंसकर वे उन तथ्यों की एकदम उपेक्षा कर जाते हैं, जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल जैसे प्राचीनतम स्थलों के उत्खन्न से प्राप्त हुए हैं.

ऊपर के विश्लेषण से हम एक और सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं. यह कि संस्कृति की पहचान प्रायः उन लोगों से होती है, जो किसी न किसी रूप में उसका मूल्य वसूलने में लगे रहते हैं. न कि उन लोगों से जो उसे बनाने से लेकर सहेज कर रखने में भारी भूमिका निभाते हैं. शिखर पर विराजमान लोग सांस्कृतिक उपादानों का संरक्षण इस प्रकार करते हैं कि संस्कृति निर्माण में बाकी लोगों की भूमिका गौण मान ली जाती है. भारत की प्राचीन संस्कृति जिसे वैदिक संस्कृति भी कहा जाता है, का नाम आते ही बड़े-बड़े आश्रमों में रहने वाले ऋषिकुलों, मंत्रोच्चार करते साधुओं यज्ञ-वेदि के समक्ष गूंजती ऋचाओं का ध्यान आ जाता है. उस समय का बाकी समाज कैसा था? उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों, जीवनशैली, कला-कौशल और समाज की बेहतरी हेतु बहाए गए स्वेद-बिंदुओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता. हम उन राजाओं के बारे में जानते हैं, जिनके शासनकाल में सोमनाथ और खुजराहो जैसे मंदिर बने. ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार जैसी इमारतें बनाने वाले शासकों के नाम भी इतिहास में दर्ज हैं. यह सब कहीं न कहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा भी हैं. लेकिन सोमनाथ और खुजराहो के मंदिरों के असल रचनाकार कौन थे? लालकिले के लिए पत्थर तराशने  वाले, ताजमहल में प्राण-प्रतिष्ठा करने वालां के नाम तक नहीं जानते. शताब्दियों की बौद्धिक गुलामी ने हमारी मानसिक सरंचना ऐसी कर दी है कि हमारा मस्तिष्क, अपने ही इतिहास को उन लोगों की निगाह से देखने लगा है, जो हमारी दासता का कारण रहे हैं. ऋग्वेद में दर्जनों मंत्रों में इंद्र द्वारा असुरों के पुरों का ध्वंस करने का उल्लेख है. उसे पुरंदर की उपाधि भी असुर-नगरों को नष्ट करने के कारण प्राप्त होती है. लेकिन उन दुर्गों का वास्तविक निर्माता, वहां के निवासियों के लिए हथियार और आवश्यक सुख-साधन जुटाने वाले शिल्पकार वर्ग के बारे में यह ग्रंथ मौन रह जाता है.

बहुजन संस्कृति इन्हीं प्रच्छन्न दस्तावेजों की खोज का एक सिलसिला है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

संस्कृति की लोकयात्रा : बरास्ता महिषासुर आंदोलन

संस्कृति’ शब्द ‘कृति’ के आगे ‘सम्’ उपसर्ग लगाने से बना है. ‘संस्कृति’ का अभिप्राय है, जिसे बनाने और आगे बढ़ाने में समाज के सभी वर्गों का योगदान बराबर हो. जिसमें सभी की समान सहभागिता हो. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में सभी बराबर हों तथा प्रत्येक को अपना पक्ष प्रस्तुत करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो. व्यक्ति की चारित्रिक विविधताओं का सम्मान करते हुए संस्कृति सदस्य इकाइयों के मन, विचार, रीतिरिवाज के सामंजस्यीकरण का काम करती है, ताकि आगंतुक पीढ़ियां समाज के आदर्श, रीतिरिवाज तथा ज्ञानानुभवों का लाभ उठा सकें. समाजशास्त्र की दृष्टि से ‘अनेकता में एकता’ की व्याप्ति समाज की उदारता का परिचायक होती है. वह समाजीकरण के उच्चतम स्तर की संकेतक है. उदार संस्कृति नैतिकता से सदैव सामंजस्य बनाए रखती है. दोनों के लक्ष्य में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. नैतिकता जिन कसौटियों का निर्माण करती है, संस्कृति विभिन्न प्रतीकों, परंपराओं एवं संस्कारों के माध्यम से समाज में उन्हें लोगों के आचरण का हिस्सा बनाने के लिए प्रयत्नरत रहती है. समानता और स्वतंत्रता ऐसी ही कसौटियां हैं, जो न केवल समाजीकरण का आधार, अपितु उसकी सभ्यता का मापदंड भी हैं. मनुष्य उनसे प्यार करता है, यथासंभव उन्हें सुरक्षित रखना चाहता है. उन पर कोई आंच न आए, उसके लिए वह अपनी स्वतंत्रता के थोड़ेसे हिस्से का बलिदान कर समाज के अनुशासन में बंधने को स्वीकार होता है. इस उम्मीद के साथ कि समाज उसके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करेगा. जिस सुख को वह अकेले प्राप्त करने में असमर्थ है, समाज में रहते हुए वह सुख आसानी से और लगातार प्राप्त होता रहेगा. समाज तथा उसे नियंत्रित करने वाले विधान, चाहे वह नैतिक हो या कानूनी—की चुनौती होती है कि वह मनुष्य की इन अपेक्षाओं पर खरा उतरकर उसके मानवीकरण के लिए उत्प्रेरक का काम करे.

अनेकता में एकता’ का दावा करने वाली भारतीय संस्कृति को इस कसौटी पर परखें तो बहुत उम्मीद नहीं बंधती. ऊपर से एक नजर आने या एक बताई जानी वाली इस संस्कृति के कई चेहरे, अनेक रंग तथा अनगिनत रूपविधान हैं. उनके बीच प्रतिद्विंद्वता बनी ही रहती है. कुछ ऐसे बिंदू भी हैं, जहां उसके दो मुख्य रूपाकारों को साथसाथ रखना, उनके अंतर्विरोधों पर पर्दा डालना न केवल कठिन, बल्कि असंभवसा हो जाता है. उस समय लगने लगता है कि सांस्कृतिक एकता का भारतीय रूपक मात्र एक छद्म, एक दिखावा है. सामाजिक असमानता, ऊंचनीच एवं भेदभाव को मान्यता देते हुए भारतीय संस्कृति समाज के मुट्ठीभर लोगों के हाथों में इतने अधिकार सौंप देती है, जिनसे वे बाकी जनसमूहों पर अपनी मर्जी लाद सकें. वे सदैव इस प्रयास में रहते हैं कि दमित वर्गों की सांस्कृतिक एकता का जो सूत्र उन वर्गों को सुदूर अतीत में जाकर जोड़ता तथा उनके बीच आत्मगौरव का संचार करता है, वह पूर्णतः छिन्नभिन्न हो जाए तथा अलगअलग टुकड़ों में बंटे या बांट दिए गए सामान्यजन, वर्चस्वकारी संस्कृति की अधीनता को चिरकाल तक स्वीकारने को विवश बने रहें. ‘अनेकता में एकता’ का नारा उनकी इसी प्रवृत्ति का परिचायक है. जाति और धर्म भारतीय संस्कृति के ऐसे ही औजार हैं. उनके दबाव में बहुसंख्यक लोग शोषण और असमानता को अपनी नियति मानने लगते हैं. ऐसे में ‘अनेकता में एकता की खोज’ का नारा उदात्त कल्पना से अधिक महत्त्व नहीं रखता. प्राकृतिक न्याय की भावना के विपरीत भारतीय संस्कृति कुछ लोगों को जन्म से विशेषाधिकार घोषित कर बाकी को उनका सेवादार बनाने का समर्थन करती है. मनुष्य की रुचि, स्वभाव, व्यक्तिगत योग्यता उसके लिए कोई महत्त्व नहीं रखती. अभिजन हितों के संरक्षण की सतत चाहत के दौरान स्वतंत्रता एवं समानता जैसे समाजीकरण के मूलभूत सिद्धांत बहुत पीछे छूट जाते हैं. चूंकि ब्राह्मण को धर्म और संस्कृति में शीर्ष स्थान पर रखा गया है, और नीतियां उसी की इच्छा और स्वार्थ के स्तर से तय होती हैं, इस कारण सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को उसके आलोचकों द्वारा ‘ब्राह्मणवाद’ की संज्ञा दी गई है, जो उचित ही है.

सवाल है कि सबकुछ जानतेबूझते हुए भी बहुसंख्यक वर्ग सांस्कृतिकसामाजिक अधीनता को स्वीकार क्यों करता है? क्यों वह वर्ग स्वयं को उस समाज का हिस्सा माने रहता है जो स्वतंत्रता एवं समानता जैसी समाजीकरण की मूलभूत शर्तों पर ही खरा नहीं उतरता. सुदूर अतीत में क्यों उसने मुट्ठीभर वर्चस्वकारियों को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर श्रेष्ठ मानकर अपने जीवन, यहां तक कि खानपान और रहनसहन जैसे रोजमर्रा के कार्यकलापों को भी उनके हवाले कर दिया था? क्या वह वर्ग बौद्धिक स्तर पर सचमुच इतना पिछड़ा हुआ था कि रोजमर्रा के सामान्य प्रश्नों का समाधान भी अपने बूते न खोज सके? असलियत ठीक इसके उलट है. दमित वर्गों में कमी न तो योग्यता की थी, न ही कार्यकौशल की. ये गुण तो उनमें भरपूर थे. समाज की समृद्धि तथा शिखर का वैभवविलास इन्हीं वर्गों के हुनरमंदों और मेहनतकशों के श्रमकौशल की देन था. कमी अपने बुद्धिचातुर्य और सृजनसामर्थ्य का उपयोग अपने और अपने जैसे दूसरे लोगों के लिए करने के बजाय, अपना निर्णयसामर्थ्य दूसरों के हक में बलिदान कर देने की थी. मेहनत को अपना धर्म और विपन्नता को नियति मान लेना उन्हें इतना महंगा पड़ा कि गुलामी का दौर पीढ़ीदरपीढ़ी चलता रहा.

यह सब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं किया था. बल्कि सब कुछ ब्राह्मणवादियों की सोचीसमझी कार्ययोजना का हिस्सा था. जब तक अर्थव्यवस्था पशुबल तथा जंगलों पर निर्भर थी, तब तक ब्राह्मणवाद को पनपने का अवसर नहीं मिल पाया था. अस्थिर जीवन में न तो स्थायी देवताओं के लिए गुंजाइश थी, न ही ईश्वर की. पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि में से जिससे भी सामूहिक मन मिल जाए, उसी को कबीला अपना ‘टोटम’ मान लेता था. सो जब तक यायावरी जीवन रहा, तब तक ‘टोटमवाद’ भी समाज में जगह बनाए रहा. कालांतर में समाज ने जैसे ही कृषिआधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम रखा, कार्यविभाजन के नाम पर ब्राह्मण को समस्त संसाधनों का स्वामी तथा क्षत्रिय को उनका संरक्षक घोषित कर दिया गया. कहा यह गया कि कार्यविभाजन पूरी तरह से योग्यता पर आधारित होगा. कुछ समय के लिए विभिन्न वर्गों के बीच आवागमन चला. ब्राह्मण की संतान ने क्षत्रिय और वैश्य का धंधा अपनाया तो उसका उल्टा भी देखने को मिला. मगर कोई भी आसानी से प्राप्त सुविधाओं को छोड़ने को तैयार न था. धीरेधीरे वर्णाश्रम व्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी. इसी के साथ समाज के कुल संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का अधिपत्य होने लगा. आजीविका के लिए दूसरे वर्गों पर निर्भरता ही बहुसंख्यक वर्ग की लंबी दासता तथा उत्पीड़न का कारण बनी. वर्चस्व को स्थायी बनाने के लिए अभिजात शीर्षस्थों ने हर वह काम किया, जिसे वे कर सकते थे. उत्पादकता पर समाज के बाकी वर्गों का दावा न रहे, इसके लिए नियति को बीच में लाया गया. इस कार्य में धर्म उनका मददगार बना. उसकी सहायता से लोगों के दिमाग में यह भर दिया गया कि उनकी दुर्दशा उनके पूर्वजन्म के कर्मों की देन है. यदि वे समाज द्वारा तय मर्यादा का पालन नहीं करते हैं तो कर्मफल के रूप में त्रासदी का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा.

आरंभ में सामाजिक विभाजन त्रिस्तरीय था. ब्राह्मण और क्षत्रिय के अलावा बाकी सब शूद्र थे. ढाई हजार वर्ष पहले बौद्ध धर्म के उद्भव के पश्चात, समाज में नए शिल्पकार वर्ग का उदय हुआ जो व्यापार के माध्यम से धनार्जन में निपुण था. धीरेधीरे अनुकूल अवसर मिलते ही वह वर्ग इतना सशक्त हो गया कि ऊपर के दोनों वर्गों द्वारा उनकी उपेक्षा करना संभव न रहा. तब त्रिस्तरीय वर्णाश्रम व्यवस्था के स्थान पर चातुर्वर्ण्य समाज को मान्यता देनी पड़ी. लोग असलियत को समझे बिना केवल परंपरापोषी तथा अनुगामी बने रहें, इसके लिए मनु के विधान में शिक्षा एवं संसाधनों पर कुछ वर्गों का विशेषाधिकार घोषित किया गया. ब्राह्मण व्यवस्था के शिखर पर था और समाजहित में सोचने तथा नियम बनाने का अधिकार केवल उसके पास था. उचित यही था कि वह समाज के विश्वास और सौंपे गए कर्तव्यों पर खरा उतरता. लेकिन संस्कृति के हर प्रतीक, रूपक, घटना और चरित्र की व्याख्या उसने केवल अपने स्वार्थ को केंद्र में रखकर की. बाकी दो वर्गों की मदद से उसने खुद को इतना शक्तिशाली बना लिया कि चौथा वर्ग जो संख्या में बाकी तीन वर्गों की कुल संख्या का कई गुना था, वह शक्ति एवं संसाधनों के मामले में निरंतर कमजोर पड़ता गया. धीरेधीरे लोग हालात से समझौता करने लगे. आज स्थिति यह है कि भारतीय संस्कृति में शोषित एवं शोषक दोनों के चेहरे एकदम साफ नजर आते हैं. पाखंडी पंडितों द्वारा दिया गया परलोक का प्रलोभन यथास्थितिवादियों के लिए इतना फला है कि लोग कल के मिथ्या सुख के बदले अपने आज का सुखचैन और कमाई खुशीखुशी अर्पण कर देते हैं.

अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ब्राह्मणवाद धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलोदिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़, केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. फासीवाद की उम्र अपेक्षाकृत कम होती है. वह व्यक्ति के दिलोदिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खरपतवार को समाप्त कर देती है. संस्कृति व्यक्ति को समाज का प्रदाय होती है और राजनीति उसका अपना वरण. सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य शेष सामाजिक इकाइयों के सहयोगसमर्थन से अपने लिए राजनीतिक दर्शन का चयन कर सकता है, अथवा वर्तमान स्वरूप में आवश्यक बदलाव प्रस्तावित कर सकता है, जिन्हें वह अपने लिए तात्कालिक रूप से आवश्यक मानता है. संस्कृति में त्वरित परिवर्तन संभव नहीं होते.

निर्ब्राह्मणीकरण : क्यों और कैसे

संस्कृति के निर्ब्राह्मणीकरण जरूरत पर चर्चा करने से पहले आवश्यक है कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को समझ लिया जाए. इसे तुलसी से बेहतर शायद हमें कोई नहीं समझा सकता. उनकी प्रमुख कृति ‘रामचरितमानस’ को साहित्य के रूप में पढ़नेपढ़ाने की परिपाटी रही है. विद्यालयों, महाविद्यालयों से लेकर शोध के उच्चतम स्तर तक उसे साहित्य के गौरव से नवाजा जाता है. लोकजीवन में भी ‘मानस’ की चौपाइयां रूढ़ि, परंपरा और भाग्यवाद से डरेसहमे लोगों के मार्गदर्शन के काम आती हैं. सवाल है कि क्या यह पुस्तक साहित्यकर्म को साधती हैं? क्या इसे ऐसी ही मंशा के साथ रचा गया था? क्या यह मनुष्य के मौलिक सोच को विस्तार देने, उसे प्रश्नाकुल बनाने का काम करती है? यदि धार्मिक आग्रहों से परे हटकर सोचा जाए तो क्या इस पुस्तक को साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है? हमारा आक्षेप तुलसी के काव्यसामर्थ्य पर नहीं है. उनमें भरपूर कवित्व रहा होगा. लेकिन वे कविधर्म को भी समझते थे, यह बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती. यहां हम केवल उनकी काव्यरचना के मर्म तथा उद्देश्य पर विचार करने जा रहे हैं.

संस्कृत में साहित्य को परिभाषित करते हुए कहा गया है—‘सहितस्य भावः साहित्यम्.’ अर्थात जो सभी को साथ लेकर चले, जिसमें सभी के हितसाधन का भाव हो—वही ‘साहित्य’ है. साहित्य का विचारक्षेत्र न केवल संपूर्ण प्राणिजगत, अपितु जड़, चेतन और वह सबकुछ है, जिससे प्राणिमात्र का हित प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में जुड़ा है. लेकिन तुलसी जब कहते हैं—‘पूजिये विप्र ज्ञानगुन हीना. पूजिये न शूद्र ज्ञान परवीना.’(ज्ञानगुण विहीन ब्राह्मण भी पूजनीय है. ज्ञान और गुण की खान होने के बावजूद शूद्र की पूजा नहीं की जानी चाहिए); अथवा जब वह लिखते हैं—‘शापत ताड़त परुष कहंता. विप्र पूजि अस गावहिं संता.’(संतजन कहते हैं कि शाप देने वाला, प्रताड़ित करने वाला, अपशब्द कहने वाला ब्राह्मण भी पूजा के योग्य है)—उस समय वे स्वयं को लोककवि के बजाय ‘द्विजजनों का चारण’ सिद्ध कर रहे होते हैं. संवेदना साहित्य की पूंजी होती है. सर्वहित की भावना उसे निष्पक्ष बने रहने को प्रेरित करती है. तुलसी का यह लिखना—‘अधम जाति में विद्या पाए. भयहु यथा अहि दूध पिलाए.’(अधम जाति में जन्मे व्यक्ति को शिक्षा देना विषधर को दूध पिलाने जैसा अपकर्म है)—भी घोर आपत्तिजनक है. साहित्यकार का कर्तव्य ऐतिहासिक तथ्यों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना नहीं है. वस्तुनिष्ठ विवेचन इतिहासकार के लिए जरूरी हो सकता है. साहित्यकार का काम प्रत्येक घटना और चरित्र पर मानवतावादी दृष्टि से विचार करना तथा उन्हें इस तरह प्रस्तुत करना है, ताकि वे मनुष्यता का अधिकतम हित साध सकें. ‘रसेन सहितं साहित्यम्’—यानी साहित्य वह है जिसमें रागात्मकता और सर्वहित का भाव हो.’ साहित्यत्व की कसौटी पर न केवल ‘रामचरितमानस’ बल्कि तुलसी का बाकी साहित्य भी कहीं नहीं टिकता. शंबूक की हत्या का प्रसंग हो या स्त्री और शूद्रों को लेकर तुलसी की दृष्टि, इन सबसे वे ब्राह्मणवाद के सबसे मुखर कवि नजर आते हैं. ऐसी विभेदकारी व्यवस्थाओं के बावजूद ‘रामचरितमानस’ को पंचम वेद के रूप में समाज में प्रचलित करना ही साहित्य और संस्कृति दोनों का ब्राह्मणीकरण है.

जो काम तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ में किया, वही सूर तथा कृष्ण भक्ति परंपरा के अन्य कवियों ने कृष्ण को ब्राह्मणवादी परंपरा में ढालकर किया. ऋग्वेद के आठवें मंडल में इंद्रकृष्णासुर संग्राम का वर्णन है. ऋग्वैदिक कृष्ण यदु कबीले का मुखिया है. वह द्रुतगामी(तीव्रता से प्रयाण करने वाला), दस सहस्र सेनाओं का नायक, चतुर योद्धा, कुशल रणनीतिकार भी है जो अंशुमति (यमुना) नदी के तट पर दीप्तिमान होकर निर्भीक विचरण करता है(ऋग्वेद-8/96/13-15). ऋग्वेद में देवताओं के लिए ‘देव’ तथा ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन मिलते हैं. वहां असुर का अर्थ देवता और अनिष्ठ दूर करने वाला भी है. कुछ स्थानों पर ‘वरुण’ को भी ‘असुर’ कहा गया है. मित्र अर्थात सूर्य के लिए ‘सुर’ और ‘असुर’ दोनों प्रकार के संबोधन ऋग्वेद में प्राप्त होते हैं. इससे अनुमान लगाया जाता है कि आरंभिक ऋग्वैदिक काल में देवताओं के लिए ‘सुर’ संबोधन उतना रूढ़ नहीं हुआ था, जितना आगे चलकर देखने को मिला. ‘कृष्ण’ के प्रति ‘कृष्णासुर’ संबोधन को भी इसी रूप में लेना चाहिए. ऋग्वैदिक कृष्ण आर्यअनार्य संघर्ष में भील तथा दूसरी जनजातियों के साथ मिलकर इंद्र को टक्कर देता है. ऋग्वेद में ही दस गणराज्यों तथा सुदास के बीच घमासान युद्ध का भी उल्लेख है. उसमें सुदास देवताओं की मदद से विजयी होता है. सुदास आर्य सम्राट था. जबकि प्रतिपक्ष में आर्यअनार्य दोनों सम्मिलित थे. इससे संकेत मिलता है कि वर्चस्व की लड़ाई आर्य राजाओं के बीच भी थी. कृष्णासुरइंद्र संग्राम में भी आर्यों की विजय होती है. ये तथ्य ऋग्वैदिक कृष्ण को अनार्य नायक सिद्ध करते हैं.

कृष्ण का दैवीकरण उसके लगभग एक सहस्राब्दी बाद ही संभव हो सका. आर्यों से युद्ध में पराजित यदु, पुरू, यक्ष, अज आदि प्राचीन कबीले उत्तरपश्चिम की ओर प्रयाण कर जाते हैं. 1000-1500 ईसा पूर्व में गंगायमुना के दोआब में पुनः विकसित संस्कृति उभरती है. यदु कबीले के वंशजों ने मथुरा और उसके आसपास बड़े राज्यों की स्थापना की थी. उन्हें अब भी अपने महानायक कृष्ण में आस्था थी. ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से ही भारत पर विदेशी आक्रमण होने लगे थे. तब ब्राह्मणवादी सत्ताओं को बड़े राज्य बनाने की सुध आई. यह कार्य यदुओं को, जो उस समय तक संगठित ताकत का रूप ले चुके थे, साथ लिए बिना संभव न था. सांस्कृतिक दूरियों को मिटाने के लिए यदुओं के आर्यकरण की शुरुआत हुई. उस समय तक वैदिक देवता इंद्र अपनी व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण काफी बदनाम हो चुका था, और उसके साथ यदुओं की अनेक कड़वी स्मृतियां जुड़ी थीं, इसलिए वह सम्मिलन इंद्र के प्रधान देवता पद पर रहते हुए असंभव था. अतः पुराने देवताओं विशेषकर इंद्र का मोह छोड़ते हुए आर्यों ने त्रिवेद(चौथे वर्ग की भांति चौथा वेद भी बहुत बाद में, ईस्वी संवत आरंभ होने के आसपास रचा गया) और त्रिवर्ण की युति के आधार पर त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे नए देवताओं की कल्पना की. इस कल्पना में भी अनार्य जातियों को ब्राह्मणीकरण की परिसीमा में लाने के बंदोबस्त थे. देवत्रयी में ‘शिव’ शस्त्र संधान में पारंगत किरात, भील, यक्ष, शंबर आदि अनार्य जातियों के सर्वमान्य मुखिया और अजेय महानायक का प्रतिनिधित्व करते थे. उन्हें त्रिदेवों में ‘संहार का देवता’ घोषित किया गया है. ‘संहार का देवता’ ही क्यों? दरअसल देवत्रयी में शिव भारत की जिन आदिम जातियों का प्रतिनिधित्व करते थे, वे युद्धकला में निपुण थीं. शिव को नाराज करना संगठितशक्तिशालीयुद्धकला में पारंगत आदिमजातियों की शत्रुता मोल लेना था, जो विदेशी आक्रामकों का भय झेल रही सत्ताओं के लिए आसान नहीं था. यह तत्कालीन ब्राह्मणों के हृदय में आदिम जातियों के प्रति बैठे भय को भी दर्शाता है.

देवत्रयी में दूसरा स्थान विष्णु को मिला. उन्हें सृष्टि का पालक देवता कहा गया. इस कार्य के लिए वे अवतार भी लेते हैं. अवतारवाद किसी सम्राट द्वारा सीधे अथवा दैवी व्यक्तित्व के नेतृत्व में बड़े राज्य की स्थापना तथा उसमें नई(धार्मिक) व्यवस्था लागू करने का प्रतीक है. ‘कृष्ण’ को देवत्व से नवाजने के लिए उन्हें विष्णु का अवतार घोषित किया गया. ब्रह्मा को सृष्टि का रचियता कहा गया. वह ब्राह्मण का प्रतीक था. चूंकि ब्राह्मण उत्पादकता से जुड़ा कोई कार्य नहीं करते इसलिए त्रिदेवों में सृष्टि रचना के बाद ब्रह्मा की भूमिका भी निष्क्रय रह जाती है. कृष्ण का आर्यकरण उनके चरित्र में आमूल परिवर्तन का वाहक बना. ‘महाभारत’ में कृष्ण का जो रूप मिलता है, वह लगभग एक ईस्वी पूर्व की ब्राह्मणवादी कल्पना है. चाणक्य बड़े राज्यों का समर्थक था. ‘अर्थशास्त्र’ में उसने गणराज्यों की आलोचना की. लिखा है कि गणराज्यों में युवा जुए के व्यसनी हो जाते हैं. कृष्ण की प्राचीन स्मृतियां गणराज्यों के मुखियापद से जोड़ती हैं. जबकि महाभारत में उसे चाणक्य की भांति ‘वृहद राष्ट्र्र’ का प्रबल समर्थक दर्शाया गया है. नए अवतार में कृष्ण से वह सब कराया जाता है, जिसके विरोध में उसने इंद्र से संघर्ष किया था. ‘महाभारत’ के युद्ध में भील योद्धा एकलव्य तथा असुर महायोद्धा बर्बरीक दोनों ही कौरवों के पक्ष में युद्ध करने को उद्धत थे. अवतरित कृष्ण एकलव्य की छलपूर्वक हत्या करता है, साथ ही अनार्य महायोद्धा बर्बरीक को भी आत्महत्या के लिए उकसाता है. कृष्ण का यह रूपांतरण यदुओं तथा अनार्य जातियों के बीच द्वेषभाव बढ़ाने के लिए आवश्यक था. आशय है कि यदुओं को कृष्ण के ब्राह्मणीकरण की कीमत चुकाने के लिए उन्हीं देवताओं की शरणागत होना पड़ा था, जिनके सेनापति इंद्र ने उनके पूर्वज कृष्णासुर की हत्या की थी; और जिसके कारण उन्हें अपने मूल स्थान को छोड़ उत्तरपश्चिम में प्रवजन करना पड़ा था.

कृष्ण का उदाहरण हमने ऊपर दिया. देखा कि ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया केवल घटनाओं के वर्गीय प्रस्तुतीकरण तक सीमित नहीं रहती. उसमें चरित्रों के साथ भी जमकर घालमेल किया जाता है. हर अच्छी बात का उत्स देवताओं को बताने की धुन में सत्य के साथ मनमाना व्यवहार किया जाता है. प्रायः दावा किया जाता है कि देवता सात्विक होते हैं. कि मनसावाचाकर्मणा सात्विकता के विभिन्न रूप देवताओं की प्रेरणा से ही बने हैं. कि शुभत्व का एकमात्र स्रोत देवगण हैं. सात्विकता देवताओं में है, इसी कारण वह संसार में भी है. ये बातें ऋग्वेद में वर्णित देवताओं के चरित्र तथा उत्तरवर्ती गं्रथों में देवसभा एवं अमरपुरी के वैभवपूर्ण उल्लेखों से मेल नहीं खाती. बावजूद इसके उदार एवं करुणामय मनुष्य को ‘देवता’ संबोधित करने की प्रथा प्राचीनकाल से चलती आई है. जबकि परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदमकदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंटपूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मनमाफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. क्या यह महज संयोग है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही लोकायत दर्शन के प्रणेता भी हैं? देवसभाओं में अप्सराओं का नृत्यगायन, देवताओं की मौजमस्ती तथा सोमपान, चार्वाकों की ‘खाओपीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. यह भी हो सकता है कि स्वयं देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी बने हों.

दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीतिशास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. देवविधान में दंड की मात्रा पूर्णतः दंडाधिकारी की मनमानी पर निर्भर करती है. जबकि दंडविधान में अपराध की समीक्षा की संभावना भी निहित रहती है. जाहिर है सभ्यता के इन क्षेत्रों में भी असुर आर्यजनों से काफी आगे थे. लंका पहुंचे हनुमान को वहां एक भी दास दिखाई नहीं पड़ता. जबकि अयोध्या, मिथिला आदि में दासदासियों की भरमार है. अनार्यों की समृद्ध सभ्यता के बारे में ऋग्वेद में पर्याप्त वर्णन हैं. वे अपनी बढ़ीचढ़ी सभ्यता के साथ दुर्गों में रहते थे. उनके दुर्ग लोहे(2/58/8) के, पत्थर(4/30/20) के, लंबेचौड़े गौओं से भरे हुए(8/6/23) थे. सौ खंबों वाले(शतभुजी 1/16/8, (7/15/14) दुर्ग का उल्लेख भी ऋग्वेद में है. ‘महाभारत’ की ख्याति प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन पर गंभीर विमर्श के कारण भी है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्सेकहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित उनमें से अनेक हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्र के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टापल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ऐसी उपलब्धियों के बावजूद असुरों को कामी, लोभी, लालची, व्यसनी और झगड़ालू दर्शाने वाले विवरण धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं. दुर्व्यसन के लिए ‘आसुरी वृत्ति’ लोकप्रचलित मुहावरा है. ‘सात्विक’ देवता चाहे जो दुराचरण करें, उनका देवत्व नष्ट नहीं होता. प्रायः उसे ‘लोककल्याण के निमित्त’, ‘धर्मसंस्थापनार्थायः’ मान लिया जाता है. असुर सम्राट जलंधर की भार्या वृंदा के साथ दुराचरण करने के बावजूद विष्णु का देवत्रयी में सम्मानजनक स्थान बना रहता है. ना ही ऋषिपत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार करने पर इंद्र का देवत्व संकट में पड़ता है. उल्टे अहिल्या को ही शिलाखंड जैसा जीवन जीना पड़ता है. भाषा का खेल भी खूब खेला जाता है. देवता नशा करें तो ‘सोमपान’ और असुर करें तो मदिरापान. सोमपान से देवताओं की सात्विकता पर संकट नहीं आता, परंतु मदिरापान से असुर बदचलन और तिरस्कारयोग्य मान लिए जाते हैं. कारण समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. समस्त धर्मग्रंथ ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनके अपने हित विभेदकारी व्यवस्था से जुड़े थे. इसलिए उनके द्वारा गढ़ी गई संस्कृति में समानता एवं सर्वसम्मति के अवसर बहुत कम हैं. जिधर देखो उधर उसका सर्वसत्तावादी रूप नजर आता है. यह सर्वसत्तावाद कदाचित अनार्य संस्कृति के अग्रपुरुषों को भी ललचाने लगा था. इसलिए जब आर्यों का आक्रमण हुआ तो अनेक अनार्य योद्धा भी उनके साथ मिल गए. सुदास और दस राजाओं का युद्ध आर्यों के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी. उसमें सुदास का नेतृत्व वशिष्ट तथा दसराज्ञों का नेतृत्व विश्वामित्र द्वारा किया गया था. मगर दस राजाओं में अज, शिब्रु, शिम्यु, यदु, यक्षु आदि अनार्य कबीले भी सम्मिलित थे. इस तरह भारत को आर्यवर्त्त बनाने में अनार्य योद्धाओं का भी भरपूर योगदान था. हिरण्यकश्यपु पुत्र प्रहलाद भी इन्हीं में आता है. उसने विष्णु को अपना ईष्ट मानकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह में ब्राह्मणवादियों का साथ दिया था. विभीषण, हनुमान, जटायु जैसे पात्र महाकाव्यीन लेखकों की कल्पना की उपज रहे होंगे. संभव है उनसे मिलतेजुलते पात्र समाज में सचमुच रहे हों, जिन्होंने आर्यसंस्कृति से प्रभावित होकर उनके साथ मिलना स्वीकार किया हो. आर्यों की श्रेष्ठता को दर्शाने के लिए ऐसे मिथकीय पात्रों की कल्पना आवश्यक थी. जिसमें उन्हें भरपूर सफलता भी मिली थी. ब्राह्मणीकरण की यह प्रक्रिया बहुत धीमे, युगों तक चली थी. इसके लिए आर्यों को अनगिनत युद्ध लड़ने पड़े और समझौते भी करने पड़े.

स्वाभाविकसा प्रश्न है कि असुर सभ्यता यदि इतनी ही विकसित थी, तो उसका पतन कैसे हुआ? इसका एक कारण यह जान पड़ता है कि आर्यों के आगमन के पूर्व विभिन्न कबीलों के बीच गणतांत्रिक व्यवस्था थी. भूक्षेत्र समृद्ध था. इसलिए सभी अपनेअपने प्रांत में सुखपूर्वक रहते थे. खेती में वे पारंगत थे. हड़प्पा सभ्यता में मिले भंडारगृहों से संभावना जगती है कि किलों का उपयोग सामरिक उद्देश्यों के बजाय, बचे हुए अनाज के भंडारण हेतु किया जाता था. खुद को सुरक्षित मान वे प्रायः निश्चिंत रहा करते थे. इसलिए जब आर्यों की ओर से आक्रमण हुआ तो वे एकाएक स्वयं को संभाल न सके. कालांतर में आर्यों के संपर्क में आकर उनमें भी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं. इसलिए आक्रामकों का एकजुट सामना करने के बजाए वे बंटकर अपने ही लोगों के विरुद्ध मोर्चा संभालने लगे. दुष्परिणाम यह हुआ कि उन्हें समृद्ध सिंधु प्रदेश छोड़, उत्तरपश्चिम और दक्षिण की ओर पलायन करना पड़ा. परास्त होकर या आर्यों के आक्रमण के भय से अनेक अनार्य जातियों ने समझौता कर लिया. धीरेधीरे वे ब्राह्मणीकरण के दायरे में सिमटने लगे. बावजूद इसके इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब सभी ने ब्राह्मणीकरण के आगे हथियार डाल दिए हों. न ही कभी ऐसा हुआ जब किसी युद्ध में सारे आर्य या अनार्य किसी एक पक्ष में रहे हों. रावण, महिषासुर, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, बालि, बलि जैसे कुछ स्वाभिमानी अनार्य सम्राटों की लंबी कतार है, जो अपने मानसम्मान की खातिर आर्यों से आजीवन संघर्ष करते रहे. यदि उस संघर्ष का निष्पक्ष भाव से दस्तावेजीकरण किया गया होता तो भारतीय संस्कृति का स्वरूप कदाचित उतना विभेदकारी नहीं होता, जितना कि आज है.

अनार्य संस्कृति के पराभव का मूल कारण उसके राजाओं की सैन्य दुर्बलता न होकर, अपनी संस्कृति और इतिहास के दस्तावेजीकरण की ओर से उदासीन हो जाना था. जबकि आर्यगण जिन दिनों तक लेखनकला का विकास नहीं हुआ था, उन दिनों भी स्मृतिभरोसे इस कर्तव्य को निभाते रहे. लेखनकला का विस्तार होने के पश्चात उन्होंने प्रत्येक ऐतिहासिक प्रसंग का वर्णन अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर किया. यहां तक कि असुरों की उपलब्धियों और खोजों को भी अपने नाम करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. उन्होंने संस्कृति को मूल माना और पीढ़ीदरपीढ़ी अनेकानेक प्रतिभाशाली लेखक अपने नाम से स्वतंत्र ग्रंथ रचने का मोह छोड़, बिना किसी यशलाभ की अपेक्षा के, पहले से उपलब्ध धर्मशास्त्रों में ही जोड़घटाव करते रहे. अनेक लोगों द्वारा, अलगअलग समय में लिखे जाने के कारण धर्मशास्त्रों में भारी दोहराव है. अंतर्विरोध और असंगतियां भी हैं. परंतु वे इन्हें कमजोरी नहीं मानते. तर्कशीलता के अभाव को ढांपने के लिए उन्होंने आस्था और विश्वास पर जोर दिया. धर्मशास्त्रों पर किसी भी प्रकार के अविश्वास को पाप मानते हुए वे शब्द के स्वयंप्रमाण होने की घोषणा करते रहे. इससे नए ज्ञान के अवसर कम हुए. मनुष्य की स्वाभाविक प्रश्नाकुलता पर भी विराम लगा. लेकिन ब्राह्मणवाद या जिस सर्वसत्तावादी ध्येय के निमित्त उन शास्त्रों की रचना हुई थी, उसमें उन्हें भरपूर कामयाबी मिली.

ब्राह्मणवाद : वर्चस्व की सनातनी परंपरा

संस्कृति मनुष्य की सामाजिक संरचना का आधार होती है. समाज में मनुष्य की पहचान संस्कृति के अलावा शिक्षा, उत्पादन के साधनों आदि से भी होती है. बावजूद इसके समाज का बड़ा हिस्सा अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही वास्तविक पहचान माने रहता है. इसलिए वह सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए एकाएक तैयार नहीं होता. यहां तक कि सांस्कृतिक अंतर्विरोधों, असमानताओं के आगे, उन्हें स्वाभाविक मान समर्पण किए रहता है. परिवर्तन संस्कृति में भी होते हैं. लेकिन वे कभी भी उस सीमा तक नहीं जा पाते कि समाज का तानाबाना ही छिन्नभिन्न हो जाए. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीकों यहां तक कि विरोधाभासों, अंतर्विरोधों के प्रति भी मनुष्य का समर्पण स्वैच्छिक होता है, इसलिए सांस्कृतिक दासता राजनीतिक दासता की अपेक्षा कहीं अधिक टिकाऊ एवं प्रभावशाली होती है. लंबे समय तक केवल संस्कृतियां राज करती हैं. अतः दीर्घ काल तक राज करने की इच्छा रखनेवाला राजनीतिक हमलावर सबसे पहले विजित संस्कृति की उन विशेषताओं पर हमला बोलता है, जो उसे स्वतंत्र संस्कृति की मान्यता दे सकती हैं. यह कार्य आरंभ में बल प्रयोग द्वारा, बाद में सहमति तथा तरहतरह की कूटनीतिक चालों द्वारा किया जाता है. संस्कृति और मनुष्य का संबंध इतना गहरा होता है कि मनुष्य संस्कृति के अंतर्विरोधों को भी अपने व्यक्तित्व का हिस्सा मानकर आत्मसात कर लेता है. भारतीय संस्कृति का ब्राह्मणवाद के ढांचे में ढल जाना इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है.

हिंदुत्व ब्राह्मणवाद का रुपहला पर्याय है. शानदार खिड़की जिसके पीछे वह अपने कुटिल चेहरे को छिपाए रखता है. इस हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवनपद्धति भी माना है. दोष न्यायालय का नहीं है. लोकतंत्र में लोगों की इच्छा का महत्त्व होता है. यदि समाज का बहुसंख्यक वर्ग ब्राह्मणवाद की विभेदकारी व्यवस्थाओं के प्रति आंख मूंदकर, चाहेअनचाहे उसके रंग में रंगा हुआ है, तो न्यायालय इसमें क्या कर सकता है! उसका काम तो सिरों की गिनती करने से चल जाता है. अदालत के लिए वही सत्य होता है, जिसके पक्ष पर्याप्त साक्ष्य हों. गवाह बेमन से गवाही दे, या जानबूझकर गलतबयानी करे, चाहे सवाल को ढंग से समझे बिना सिर्फ हांहू करता जाए तो न्यायालय क्या करे! आदमी आलू भी खरीदने जाता है तो मंडी में चार जगह देखता है. मोलभाव और जांचपरख करता है. चाहे एक वक्त की खरीदारी हो या एक सप्ताह की—एकएक आलू को छांटकर खरीदता है. लेकिन धर्म जो उसके अपने और आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करता है, उसके बारे में कभी कोई सवालजवाब नहीं करता. सवाल करना भी पाप समझता है. बात आ पड़े तो बिना सवालजवाब किए ही मरनेमारने पर उतारू हो जाता है, क्यों? कदमकदम पर एकदूसरे की आलोचना करने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करने वाले धर्मों में एक मुद्दे पर कमाल की सहमति होती है. मुद्दा है जन्म के साथ ही मनुष्य का धर्म तय कर दिया जाना. हर धर्म अपने समर्थकों के सिर गिनता है. सिर में मस्तिष्क भी हो, और मस्तिष्क अपना काम भी करे, इस ओर वह कभी ध्यान नहीं देता. जानता है कि इस ओर ध्यान देना शुरू किया तो चार दिन में सारी दुकानदारी बैठ जाएगी. इसलिए पुरानी शराब की भांति हर धर्म नशे के सामर्थ्य और उसके बहाने अपने कारोबार को बढ़ाता चला जाता है.

बहरहाल, बात हिंदुत्व और उसे जीवनपद्धति बताए जाने की हो रही थी. हिंदुत्व यदि जीवनपद्धति है तो मनुष्य को जो आजादी अपनी जीवनपद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैरसनातनी, हिंदू परिवारों की सामान्य जीवनचर्या मिलीजुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. प्रत्येक घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबहशाम की आरती, पूजाबंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, घर के सदस्य विशेषकर स्त्रियां अन्नजल तक ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़ेतिरछे, भांतिभांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एकदो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि बाबा ‘सत्यनारायण’ कौन हैं? उनका खानदान क्या है? किस हिंदू धर्मशास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरीसहमी कुलललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरीचकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, मातापिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं. वही समाजीकरण का मुख्य आधार भी हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्तिपूजकों का हो या मूर्तिभंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूर्त्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीड़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. परंतु वह भूल जाता है कि शील और सदाचरण धर्म के बाहरी आवरण हैं. महज दिखावा, लोगों को प्रलोभन देने वाले. धर्म कोई भी हो. उसका मूल स्वरूप सामंतवादी होता है. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ नामक कथित ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रतउपवास रखने, पर्वत्योहार पर विधिसम्मत पूजनअर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

ब्राह्मणवाद’ को जीवित रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छलहत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनगिनत धत्तकर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ीदरपीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का शिकार होकर इससे मुक्ति की कामना करते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. उनका असली एजेंडा संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों की इजारेदारी को मजबूत करना तथा उसे किसी भी चुनौती से बचाए रखना है. इसके लिए तरहतरह के टोटम, जादूटोने, पूजापाखंड समाज में लागू किए जाते हैं. जाति के आधार पर तीनचौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य संसाधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रहबीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. धर्म आधारित वर्चस्वकारी संस्कृति तथा जातिभेद के प्रति निरक्षर जनता का निःशर्त समर्पण उन्हें दीर्घजीवी बनाता है.

वर्चस्वकारी संस्कृति का जिक्र हुआ तो बता दें कि वह समाज को दो तरह से अपनी जकड़ में लेती है. पहले बलप्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. उसके द्वारा पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल ढालने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धिचातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिकराजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धिविवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की मजबूरी बन जाता है. कभी हताशा तो कभी अज्ञान के चलते वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और मुक्तिदाता मानने लगता है. ऐसे में परिवर्तन उसी दिशा में होता है, जिसका वास्तविक लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थान उठा सकें. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सहीसही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका मार्गदर्शन कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के पुनरीक्षण की शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास, नानक जैसे संतकवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परमधन कहकर रूखीसूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. वह गरीबी का महिमामंडन, दैन्य को आभूषण मान लेने जैसी चूक थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना, मगर उसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना देखा था वह इतना हताश हो चुका था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानताआधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया. जबकि सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. कुछ दिनों बाद उन लोगों ने ही उसे भुला दिया, जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी.

शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथसाथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. उनमें कुछ उन दबंग जातियों में से भी थे, जो सामंती दौर में विप्र जातियों के ‘लठैत’ का काम करते आए थे. अपने ‘लट्ठपन’ पर उन्हें खूब भरोसा था. कदाचित यह गुमान भी था कि ‘बेलेट’ ने बात बिगाड़ी तो ‘लाठी’ से संभाल लेंगे. 1937 के चुनावों में कांग्रेस से मात त्रिवेणी संघ के पिछड़ी जाति के नेताओं ने यही तो कहा था—‘वोट से हार गए तो क्या हुआ. हमारी लाठी तो हमारे हाथ में है.’ इन्हीं कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेताबुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलगअलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषितउत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सहीसही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धिविवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्तापरिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भलीभांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशाहमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्चशिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

निर्ब्राह्मणीकरण : समानता आधारित समाज का सपना—बरास्ता महिषासुर आंदोलन

समानता और स्वतंत्रता के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति से मुक्ति आवश्यक है. भारतीय समाज सामाजिकसांस्कृतिक स्तर पर बंटा हुआ है. अद्विज आज भी असमानता का दंश झेल रहे हैं. कारण किसी से छिपे नहीं है. ब्राह्मणवादी व्यवस्था मनुष्य को जन्म के साथ ही जाति और धर्म के खानों में बांट देती है. स्वतंत्र भारत में संवैधानिक प्रावधानों द्वारा इस अंतर को मेटने की कोशिश तो हुई, मगर सामाजिकसांस्कृतिक जकड़बंदी इतनी मजबूत है कि आजादी के 69 वर्ष बाद भी लोग उससे उबर नहीं पाए हैं. लोकतांत्रिक परिवेश ने उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों को इतना अवसर जरूर दिया है कि वे इतिहास को अपने ढंग से समझने के साथसाथ उन कारणों की भी समीक्षा कर सकें, जो उनके दमन और दासता के मूल में हैं. इस छटपटाहट से भारतीय संस्कृति के मुख्य प्रतीकों, घटनाओं, चरित्रों यहां तक कि मिथकों के विवेचन की शुरुआत हुई. धीरेधीरे ही सही मगर संस्कृति के विखंडनात्मक विवेचन की प्रक्रिया आगे बढ़ी है. उसके सूत्रधार दमितशोषित वर्गों में जन्मे वे बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें जाति या किसी और कारण से बौद्धिक विमर्श से बाहर रखा गया था. अवसर मिलते ही वे न केवल सवाल उठाने लगे थे. बल्कि उसके जवाब भी अपने बौद्धिक सामर्थ्य के आधार पर स्वयं खोजने को उद्धत थे. उन लोगों के लिए जो अभी तक समाज के बड़े हिस्से को अपनी कूटनीतिक चालों के आधार पर नचाते आए थे, यह बहुत बड़ी चुनौती थी. ‘महिषासुर दिवस’ का आयोजन उसी क्रम में हालिया आंदोलन की एक कड़ी है. वह हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया थाकृ‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखनेसमझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी और क्रांतिकारी शुरुआत है.

जो लोग ‘महिषासुर मर्दिनी’ कहकर देवी का गुणगान करते आए थे, बदले परिवेश में वे महिषासुर को मिथ बताने लगे हैं. जल्दबाजी में वे भूल जाते हैं कि महिषासुर को यदि मिथ मान लिया गया तो देवी दुर्गा भी मिथ ही सिद्ध होगी. साथसाथ उन देवीदेवताओं को भी मिथ मानना पड़ेगा, जिनके कंधों पर कथित देवसंस्कृति की इमारत खड़ी है. ऐसे में यदि कोई राम और दुर्गा के बहाने अपनी संस्कृति थोप सकता है, उनके माध्यम से वर्चस्वकारी सत्ता के शिखर पर टिका रह सकता है, तो उसकी मुक्ति के प्रतीक के रूप में शंबूक और महिषासुर को भी नायक बनाया जाता है. इतिहास की कमजोरी है कि वह बहुत भरोसे की चीज नहीं होता. वह हमेशा विजेता संस्कृति की इच्छाओं और कामनाओं के अनुसार ढाला जाता है. विवेकवान समाज ऐसे इतिहास की परवाह नहीं करता. जानता है कि सुविधानुसार नायक चुनने की जो आजादी अन्य वर्गों को है, उतनी आजादी उसे भी है. ऐतिहासिक भूलों से सीख लेते हुए वह अपने नायक स्वयं चुनता है. ‘महिषासुर’ ऐतिहासिक चरित्र है—इसके समर्थन में उतने ही तर्क जुटाए जा सकते हैं, जितने उनके पास ‘राम’ या ‘रावण’ को इतिहासपुरुष सिद्ध करने के हैं. पूरा मामला तार्किकता से जुड़ा है. इसमें प्रायः वे असफल होते हैं. उस समय वे आस्था का मामला बताकर लोगों के विवेक और इतिहासबोध को ही प्रभावित करने लगते हैं.

धर्मग्रंथों के जरिये एक बात जो प्रामाणिक रूप से सामने आती है, वह है संस्कृतियों का द्वंद्व. जिसमें महिषासुर की उपस्थिति जनसंस्कृति के प्रभावशाली मुखिया के रूप में है. वह श्रमसंस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशुचारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का महानायक था. वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागरमंथन में बरा बरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं. कार्य पूरा होने पर बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. इस आंदोलन का वे लोग विरोध कर रहे हैं जिनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. संस्कृति की पुनरीक्षा तथा उसके आधार पर न्याय की मांग को कुछ लोग देशद्रोह भी कह रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा लोगों को अपने शब्दजाल में उलझाए रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं.

देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्रयचेतना में बसता है. लाखोंकरोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिकसांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति, समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीनचौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार और उसके आसपास घूमने वाले मुट्ठीभर समूहों को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

महिषासुर आंदोलन’ का विरोध कर रहे लोग या तो इस देश के प्राचीन इतिहास से अनभिज्ञ हैं, अथवा जानबूझकर अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं. उनके मानस में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है. भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से वह देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटेछोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप उन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बारबार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चारपांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. दूसरे शब्दों में ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञबलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्वस्तर पर स्थापित किया था. हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उद्यत था. फलस्वरूप व्यापार बढ़ा तथा देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता चला गया.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. यह मनुष्य के विवेकीकरण को समर्पित, धर्म और संस्कृति की सनातनी व्याख्याओं के विरुद्ध विखंडनवादी चेतना है. जो अप्रासंगिक हो चुके विचार, धारणा, प्रतीक आदि को किनारे कर आगे निकल जाना चाहती है. इसमें पर्याप्त ऊर्जा और वैचारिक तेज है. जिसका डर सत्ताधारी अभिजन चेहरों पर पढ़ा जा सकता है. वे जानते हैं कि बहुजन दृष्टि से मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. आज पूरा विश्व एक परिवार सदृश है. उपेक्षित प्रतिभाएं देशविदेश में कहीं भी यशसम्मान अर्जित कर सकती हैं. ऊपर से राष्ट्रीयअंतरराष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकारवादी संगठन. ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. वे भलीभांति समझते हैं कि बहुत जल्दी दूसरे व्यक्तित्व, घटनाएं और मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियां लगी हैं.

महिषासुर दिवस का आयोजन मात्र पांच वर्ष पुरानी घटना है. मगर सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति के लिए उत्पीड़ित वर्ग के संघर्ष का सिलसिला नया नहीं है. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, नानक का नाम हमने ऊपर उद्धृत किया है. हालिया इतिहास में डॉ. अंबेडकर तथा फुले दंपति का नाम हमने ऊपर लिया. फुले ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है, भी श्रमसंस्कृति के उन्नयन को समर्पित था. धर्मिक आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन उसका केंद्र था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देशविदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थरतराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रमकौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था.

कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिलजुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबरबराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

दो गुना क्यों?’

इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबरबराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे कहीं ज्यादा बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध ने दोनों का पक्ष सुना और अंत में लाभ को बराबरबराबर बांटने की सलाह दी. बाइबिल में भी एक कहानी है, जिसमें एक किसान खेतों में काम करने आए मजदूरों को बराबर मजदूरी देने की बात करता है. कहानी आमदनी को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का समर्थन करती है. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को बुद्ध ने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है.

वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदमकदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. उस व्यवस्था में ब्राह्मण का शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवनयापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्णव्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. लेकिन बात जब लाभ के बंटवारे की आती है तो उसे मामूली मजदूरी देकर टरका दिया जाता है. आय का बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था को नकारा है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रमकौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्शोन्मुखी व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता के लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रहग्रस्त रहा है. उन्होंने इस देश की प्राचीनतम संस्कृति जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है—के दस्तावेजीकरण के प्रति पूर्ण उपेक्षा बरती. उसके मानवतावादी मूल्यों को नकारा, जिसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

जबकि नैतिक मूल्यों को यदि निकाल दिया जाए तो धर्म में मिथकीय किस्सागोई और कोरे कर्मकांडों के अलावा कुछ नहीं बचता. चूंकि बाजारवादी अर्थतंत्र में नैतिक मूल्य धराशायी हो चुके हैं, और किस्सागोई का काम संचार माध्यम संभालने लगे हैं, ऐसे में धर्म के हिस्से कर्मकांडों के रहस्यमय पिटारे के अलावा कुछ नहीं बचता. स्वयंभू भगवानों के जरिये यदि कहीं कुछ धार्मिक मिथ बारबार कहेसुने जाते हैं तो उसके पीछे भी बाजार का ही योगदान है, जिसके चलते धर्म सस्ते मगर सबसे कमाऊ धंधे में बदल चुका है. ऐसे धर्म तथा धर्म को ही सबकुछ मानने वाली संस्कृति का प्रतिकार आवश्यक है. अतः लोगों को बारबार याद दिलाया जाना चाहिए कि जीवन और समाज धर्म से नहीं, मानवीय मूल्यों से चलते हैं, चलने चाहिए. समाज बदलते हैं, धर्म बदलता है मगर जीवन के शाश्वत मूल्य वही रहते हैं. इसलिए मिथकों की पुनर्व्याख्या की कसौटी समानता, स्वतंत्रता, सौहार्द्र, प्रेम, संवेदना, सामंजस्यभाव आदि को बनाया जाना चाहिए.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलितबहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शीलपरीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. इस काम में बड़ी सावधानी की जरूरत है. ‘महिषासुर’ एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. केवल तेजी से कुलीनतंत्र की ओर बढ़ता कबीलाई गणतंत्र था. आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. ऐसे हमलों से बचाव के लिए वह हमारी ढाल भी बन सकता है—लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति का रचनात्मक विकल्प दे पाना संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथसाथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की भी है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षाकवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

संस्कृति की इमारत अनगिनत मिथों के सहारे खड़ी होती है. लेकिन मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. किसी मिथ को कारगर और लोकप्रभावी बनाने के लिए अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है. उनका समर्थन या विरोध करते हुए ही मिथ समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसरविशेष पर हमें राह दिखा सकता है. अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिकसांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एकदूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ तथा विखंडनवादी दृष्टिकोण चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों को भी विमर्श के दायरे में लाएं. मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. यह जितना कठिन कार्य है, उतनी ही अधिक उसकी आज हमें आवश्यकता है. जाहिर है यह एक चुनौती है. जिससे निपटने के लिए बहुजन समाज को लक्ष्यसमर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मानसम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं, जो उन्हें दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक सिद्ध करती है. परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमनेसामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घरपरिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी बाड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. लेकिन यह शुरुआतभर है. संघर्ष यात्रा बहुत लंबी चलने वाली है. इसमें जो धैर्यवान होगा, सजग होगा और विवेक से काम लेगा, प्रलोभन जिसे डिगाएंगे नहीं, वही और केवल वही लंबे समय तक टिका रहेगा. अंतिम जीत उसी के हाथ रहेगी. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

© ओमप्रकाश कश्यप

महिषासुर मूवमेंट : ‘डिब्रह्मनाइजिंग अ कल्चर’

परि​चर्चा

(कुछ महीने पहले एक पत्रिका की ओर से परि​चर्चा की गई थी. उसमें उठाए गए मुद्दों पर कुछ बातें)

 

  • फरवरी, 2016 में संसद के बजट सत्र में भारतीय जनता पार्टी की राजनेता व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने महिषासुर शहादत दिवस पर सवाल उठाकर इसे देशद्रोह से जोड़ दिया था. क्‍या ऐसा किया जाना उचित है? आपकी क्‍या राय है?

‘महिषासुर दिवस’ हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया था, अर्से तक जो आरोपित विचारधारा पर ही अपना ईमान कायम रखे था—‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखने-समझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी शुरुआत है. महिषासुर की ऐतिहासिकता पर बहस करना बेकार है. मिथ को इतिहास-सिद्ध करने की दावेदारी कोई कर भी नहीं सकता. राम और रावण भी मिथकीय पात्र हैं. संभव है सभ्यता के किसी दौर में उनसे मिलते-जुलते व्यक्ति सचमुच इस धरती पर रहे हों, लेकिन वे वैसे ही रहे होंगे जैसे महाकाव्यों तथा अन्य ग्रंथों में दर्शाए गए हैं—यह सप्रमाण नहीं कहा जा सकता. मूल कृति ‘पुलत्स्य वध’ से लेकर ‘रामायण’ और फिर ‘रामचरितमानस’ तक उसमें अनगिनत बदलाव हुए हैं. हर प्रस्तोता ने उसमें कुछ न कुछ जोड़ा-घटाया है. इसलिए उसके अनेकानेक पाठ तथा अनगिनत अंतर्विरोध हैं, जिन्हें वे आस्था और विश्वास की झीनी चादर से ढांपते आए हैं. यदि मान लें कि राम नामक राजा कभी इस धरती पर था, तो भी हम उसे अपना नायक क्यों मानें, जिसने शंबूक का वध केवल इसलिए किया था कि वह किसी खास पुस्तक को पढ़कर ज्ञान में हिस्सेदारी करना चाहता था. असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देने वाला ‘रामराज’ हमारा सपना भला कैसे बन सकता है! विवेकवान समाज अपने नायक स्वयं चुनता है. यदि उन्हें अपनी सुविधानुसार नायक चुनने की आजादी है तो वही आजादी बाकी समाज को भी है. ‘महिषासुर’ मिथ होकर भी हमारे लिए सम्मानेय है, क्योंकि वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागर-मंथन में बराबरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं, परंतु बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. ‘महिषासुर’ श्रम-संस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशु-चारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का प्रतीक नायक है.

सरकार और सरकार में बैठे जो लोग इसे देशद्रोह बता रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा हमें शब्दों के जाल में फंसाए रखना रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं. देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्र्य-चेतना में बसता है. लाखों-करोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही हमें स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के 1.3 अरब लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीन-चौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

  • भाजपा द्वारा संसद में इस बात को उठाये जाने के पहले से ही आरएसएस के अन्‍य अनुषांगिक संगठन जैसे विश्‍व हिंदू परिषद व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इसका विरोध करते रहे हैं। क्‍या आपको लगता है कि महिषासुर शहादत स्‍मृति दिवस जैसे सांस्‍कृतिक आंदोलन का विरोध ब्राह्मणवादी वर्चस्‍व को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है?

भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद ऐसे संगठन हैं जिन्हें धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. वे केवल राजनीति करते हैं, जिसमें लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है. उनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बार-बार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चार-पांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. कह सकते हैं कि ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञ-बलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्व-स्तर पर स्थापित किया था, इसलिए हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उत्सुक था. उसके फलस्वरूप व्यापार बढ़ा और देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता गया.

हिंदू राज्य के रूप में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों की निगाह में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है, जो भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटे-छोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप इन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वण्र्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. इसके लिए तत्कालीन लेखकों ने वैदिक चरित्रों को मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया. ऋग्वेद में कृष्ण यदु कबीले का वीर और बुद्धिमान नेता है, वह आर्य-संस्कृति का विरोधी है तथा आर्यों के विरुद्ध संग्राम में अपने कबीले का नेतृत्व कर युद्ध में इंद्र को परास्त करता है. ‘महाभारत’ के परिवर्धित संस्करण में उसे ब्राह्मणी व्यवस्था के समर्थक के रूप में पेश किया गया. इसके ऐवज में यदुओं को वर्ण-क्रम में ‘क्षत्रिय’ का दर्जा प्राप्त हुआ. इस दौर में दर्शन की मुक्त-धारा, धर्म की ताल-तलैयों में सिमटने लगी थी. बहुदेववाद जो वैदिक साहित्य की विशेषता था, जिसे बुद्ध के समकालीन आचार्यों ने उपनिषदों में एकेश्वरवाद में समेटने की कोशिश की थी—वह पुनः छोटे-छोटे संप्रदायों यथा शैव, कापालिक, तांत्रिक, वैष्णव, नाथपंथी, शाक्त आदि में बंट चुका था. उनके बीच बहुत गहरे मतभेद थे. भाजपा तथा उसके आनुषंगिक संगठन ब्राह्मण धर्म में उभरे उन मतभेदों को याद नहीं करते. वे जानते हैं कि लोकतंत्र के दौर में पुराना समय लौटकर नहीं आने वाला. इसलिए वे धर्म के नाम पर केवल राजनीति करते हैं. उनकी राजनीति भी पूरी तरह प्रतिक्रियावादी, मुस्लिम-विरोध से अनुप्रेत है. उनके लिए राष्ट्रवाद और फासीवाद में बहुत अधिक अंतर नहीं है. जबकि लोकतंत्र को सम्मानजनक स्थान न तो फासीवाद दे पाता है, न ही वह कट्टर राष्ट्रवाद के बीच सुरक्षित रह पाता है.

ब्राह्मणवादी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलो-दिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़ केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. लेकिन फासीवाद की उम्र कम होती है. वह व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खर-पतवार को समाप्त कर देती है.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. और यही डर इस सभ्यता के धार्मिक अभिजन ब्राह्मण को सता रहा है. वे जानते हैं कि बहुजन हितों के अनुसार मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी  परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. भाजपा, विश्व हिंदू परिषद जैसे ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. यह सच भी है कि सिलसिला केवल ‘महिषासुर’ के मिथ की पुनर्व्याख्या पर रुकने वाला नहीं है. रुकना भी नहीं चाहिए. उम्मीद है बहुत जल्दी दूसरे मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियाँ लगी हैं.

  • पिछले कुछ सालों में वर्चस्‍ववादी संस्‍कृति के बरक्‍स समतामूलक बहुजन पंरपरा बहुजन संस्‍कृति की बात उच्‍च शिक्षण संस्थानों में पहुंचे ओबीसी, आदिवासी और दलित विद्यार्थी करने लगे हैं. क्‍या आप मानते हैं कि इस तरह के आंदोलनों से समाज में जागृति आएगी? इस तरह के आंदोलनों का क्‍या लाभ आप देखते हैं?  

वर्चस्वकारी संस्कृति दो तरह से समाज को अपनी जकड़ में लेती है. पहले बल-प्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. वर्चस्वकारी संस्कृति बुद्धिजीवियों से लैस होती है. उसके पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल परिभाषित करने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को यह विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धि-विवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की विवशता बन जाता है. वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और शुभेच्छु मानने लगता है. ऐसे में यदि परिवर्तन होता भी है तो केवल सतही, दिखावे के लिए, जिसका लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थानों को जाता है. जनाक्रोश को शांत करने के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति प्रायः अपने आवरण में ऐर-फेर कर परिवर्तन का नाटक करती है. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सही-सही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका नेतृत्व कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास जैसे संत-कवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परम-धन कहकर रूखी-सूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना—जिसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना था वह इतना शोषित, उत्पीड़ित था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानता-आधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया गया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया.

सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथ-साथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. अपनी-अपनी कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेता-बुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलग-अलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषित-उत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सही-सही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धि-विवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता-परिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. वह यह भी जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतिया