डॉ. आंबेडकर : आधुनिक भारत के असली वास्तुकार

भारत में भक्ति या नायकपूजा ने, दुनिया के किसी और हिस्से के बरअक्स, राजनीति में कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका निभाई है. धर्म के हिस्से के रूप में भक्ति आत्मा की मुक्ति की राह भले हो सकती है. परंतु राजनीति में, भक्ति अथवा नायकपूजा देश में लोकतंत्र के अवसान और तानाशाही की ओर ही ले जाएगी.’—डॉ. भीमराव आंबेडकर, संविधान सभा में दिए गए भाषण का अंश. 

आंबेडकर और गांधी

बीसवीं शताब्दी भारत के इतिहास में बेहद महत्त्वपूर्ण है. उसमें भारत न केवल आजाद हुआ, बल्कि विश्व-पटल पर स्वतंत्र-स्वयंभू गण-राज्य के रूप में भी उभरा. उस शताब्दी ने भारत को दो महानायक दिए. पहले डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से ‘बाबा आंबेडकर’ कहते हैं. उन्होंने सामाजिक उत्पीड़न और वंचना के शिकार लोगों के लिए आजीवन संघर्ष किया. वे अपने समय के सर्वाधिक विद्वान और सुविज्ञ नेताओं में से थे. जीवन में तरह-तरह के अपमान, उपेक्षा और उलाहने सहते हुए वे आगे बढ़े. उन लोगों को आवाज दी जिन्हें दमन सहते-सहते चुप्पी साधने की आदत पड़ चुकी थी. वे सही मायने में ‘मूकनायक’ बने. वंचितों के हित में सतत संघर्ष कर जननायक कहलाए. वे अपने जीवन में ही किंवदंति बन चुके थे. नेहरू उन्हें ‘विद्रोह का प्रतीक’ मानते थे. जबकि उनके समकालीन नेता उन्हें ‘पथ-प्रदर्शक’ का सम्मान देते थे. उन्होंने भारतीय समाज को समानता, सद्भाव. न्याय एवं बंधुता के रास्ते पर लाने के लिए सतत संघर्ष किया. दूसरे गांधी, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का लंबे समय तक सफल नेतृत्व किया. अहिंसा और सत्याग्रह जिनके बारे में पहले केवल आकादमिक जगत में चर्चा होती थी—को वे राजनीति में लाए तथा सचाई, शुचिता और सेवाभाव के कारण लंबे समय तक भारतीय राजनीति की धुरी बने रहे. कांग्रेस को उसके अभिजात चरित्र से छुटकारा दिलाकर उसे जनसाधारण तक लेकर गए. नतीजा यह हुआ कि आजादी की मांग जो पहले उच्चवर्गीय नेताओं की नरम-गरम राजनीति का हिस्सा थी, जनसाधारण की अस्मिता के संघर्ष में ढलने लगी. अंततः देश आजाद हुआ. गांधी अपने प्रशंसकों के बीच महात्मा कहलाए. आंबेडकर और गांधी, अपने समय में दोनों ही लोकप्रियता की सीमाओं को पार कर देने वाले नेता थे. गांधी यदि ‘राष्ट्र पिता’ थे, तो डॉ. आंबेडकर ‘राष्ट्र निर्माता’, युग-प्रवर्त्तक, ‘आधुनिक भारत का वास्तुकार’ कहलाने के सर्वथा योग्य हैं. यहां आंबेडकर को पहले स्थान पर रखा गया है. उन्हें यह सम्मान देने का पर्याप्त आधार है. स्वतंत्रता संग्राम भले ही गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया हो, भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में ढालने में आंबेडकर का योगदान गांधी से कहीं ज्यादा है. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, जान जाएंगे.

डॉ. आंबेडकर उन लोगों के नेता थे जो एक साथ दो गुलामियां झेल रहे थे. राजनीतिक गुलामी के अलावा सामाजिक दासता, जिनके शिकार वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते आए थे. ऐसे लोगों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन थी, जब तक सामाजिक दासता से मुक्ति न हो. ऐसे ही सामाजिक-सांस्कृतिक दलन का शिकार रहे लोगों के मान-सम्मान और आजादी के निमित्त उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया. इसके लिए उन्हें दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा. पहला मोर्चा देश की आजादी का था. दूसरा अपने लोगों के सामाजिक मान-सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता का. उनके लिए सामाजिक आजादी राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी. उनका पूरा आंदोलन सामाजिक स्वतंत्रता एवं समानता पर केंद्रित था. कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता को वे वास्तविक स्वतंत्रता मानने को तैयार ही नहीं थे. इस मुद्दे पर गांधी सहित समकालीन नेताओं से उनका मतभेद हमेशा बना रहा. यह आंबेडकर से छिपा भी न था. अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए उन्होंने तरह-तरह की लांछनाएं सहीं. यहां तक कि अंग्रेजों के पिठ्ठू भी कहलाए. अंततः संविधान के माध्यम से उनके लिए ऐसी राह तैयार की जिससे वे सम्मानजनक जीवन का सपना देख सकें. इतिहास को प्रभावित करने करने वाले नेता से इतिहास बदल देने वाला नेता हमेशा बड़ा होता है. उस समय के पूंजीपति, सामंत और बड़े-बड़े सरमायेदार गांधी के समर्थन में थे. गाँधी उन्हें कई डरों से बचाते थे. मगर गांधी के जाते ही उन्हें बिसरा दिया गया. जैसे टूटी हुई ढाल कबाड़घर में शरण पाती है, गांधी भी संग्रहालयों की शोभा बढ़ाने लगे. इन दिनों केवल उनकी ऐनक बाकी है. उसका उपयोग सफाई अभियान के पोस्टरों को सजाने के लिए किया जाता है.

 

आंबेडकर इतिहास बदल देने वाले नेता थे. सामंती सोच में ढले हिंदू समाज को उन्होंने आधुनिक मूल्यों से समृद्ध करने की भरपूर कोशिश की. उनीसवीं शताब्दी की बौद्धिक क्रांति में जिन मानवतावादी विचारों ने पूरे यूरोप में उथल-पुथल मचाई थी, उनका जिस शिद्दत, शालीनता और ईमानदारी के साथ डॉ. आंबेडकर ने भारतीय राजनीति में उपयोग किया, वैसा उनके समकालीन किसी नेता ने नहीं किया. स्वतंत्रता संघर्ष में अहिंसा, सत्याग्रह जैसे मौलिक प्रयोगों का श्रेय यदि गांधी को दिया जा सकता है तो लोकतंत्र, समानता, बंधुता, सामाजिक न्याय, व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे बुनियादी विचारों को आजादी के दौरान और बाद में संविधान के माध्यम से, भारतीय राष्ट्र-राज्य का हिस्सा बनाने का श्रेय डॉ. आंबेडकर को जाता है. यदि यह माना जाए कि बिना अंहिंसा और सत्याग्रह जैसे गांधीवादी औजारों के भारत की आज़ादी असंभव थी, तो यह बात भी स्वत; सिद्ध है कि बिना आंबेडकर के भारत को आधुनिक राज्य बनाना कतई संभव न था. अवश्य ही कुछ दूसरे नेता भी थे. देश को स्वतंत्र कराने में उनका योगदान भी कम नहीं रहा. तथापि देश को वास्तविक स्वतंत्रता दिलाने, विशेषकर सामाजिक न्याय के क्षेत्र में आंबेडकर का योगदान उन सबसे अधिक है. भारत में यदि लोकतंत्र है, समानता और बंधुत्व को उच्च जीवन-मूल्यों के रूप में मान्यता प्राप्त है, यदि दमितों और उत्पीड़ितों की आंखों में सुंदर भविष्य का सपना हिलोर मारता है तो इसका एकमात्र श्रेय आंबेडकर को जाता है. वे हमारे सभ्यताकरण के अप्रतिम महानायक हैं. इस कारण उनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. बल्कि बढ़ती ही जा रही है.

 

गांधी भारतीय होने से पहले ‘हिंदू’ थे—आंबेडकर हिंदू होने से पहले भारतीय. आधुनिक जीवन-मूल्यों के सच्चे पोषक. सभी धर्मों का आदर करने वाले गांधी आजीवन सर्व-धर्म-समभाव को समर्पित रहे. ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ कहकर देश में सांप्रदायिक एकता की अलख जगाते रहे. परंतु उनका सर्वधर्म समभाव हिंदू धर्म की चौहद्दी तक सीमित था. उनके असली आराध्य ‘रघु(कुल) पति’, ‘राघव’, ‘राजा राम’ थे. ‘ईश्वर-अल्लाह’ उनके लिए ‘राजा राम’ के ही उपनाम थे. जीवन के अंतिम क्षण तक वे ‘राम’ की शरणागत बने रहे. उन्होंने वर्ण-व्यवस्था को आदर्श भले न माना, मगर उसे कभी चुनौती भी नहीं दी. धर्म की आड़ में वे उसे लगातार संरक्षण देते रहे. आंबेडकर के लिए जाति की समस्या सामाजिक थी. मानते थे कि समस्या का निदान केवल समाजार्थिक बराबरी द्वारा संभव है. यह केवल कानून के रास्ते संभव है. गांधी के लिए जाति की समस्या ईश्वरीय विधान थी. समाज को छुआछूत से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने हालांकि कई टोटके किए. निजी स्तर पर और कांग्रेस की मदद से अनेक कार्यक्रम भी चलाए. दिखावे के लिए सवर्णों को दलितों के प्रति अत्याचार के लिए डांटा भी था. परंतु जैसा कि आंबेडकर भली-भांति समझते थे, गांधी के सारे प्रयत्न एक राजनीतिक कार्यक्रम से अधिक न थे. दलितों को ‘हरिजन’ घोषित करने के पीछे भी परंपरावादी मन ईश्वरीय विधान और अस्पृश्यों के प्रति हेय-भाव से ग्रस्त था.

उपनिषदों में कहा गया है—‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म.’ यह सारा जगत ही ब्रह्म है….कण-कण में परमात्मा है….प्रत्येक आत्मा परमात्मा का रूप है. फिर दलितों और अतिशूद्रों के लिए ही ‘हरिजन’ संबोधन क्यों? ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए क्यों नहीं? क्या यह दलितों और अतिशूद्रों के प्रति उपकार-भाव की परिणति था? जैसे पुराने जमाने के राजा-महाराजा अपने यहां बेगार करने वाले नौकरों और सेवादारों को उनकी हाड़तोड़ मेहनत के बदले कभी-कभार रुपया-अठन्नी देकर बहला दिया करते थे, ऐसा ही कुछ? गांधी ने यह संबोधन केवल उछाल दिया था. जातीय दलन के शिकार लोग ‘हरिजन’ क्यों हैं? इसका कभी खुलासा नहीं किया. विरोध हुआ तो कह दिया, जो इसे अपनाना चाहते हैं, अपनाएं. दलितों ने कभी इस संबोधन को मन से नहीं लिया. परंतु दिखावे की उदारता के नाम पर कुछ सवर्ण जरूर ‘हरिजन’ प्रेमी हो गए, ताकि उनकी सहानुभूति जीतकर लोकतंत्र का दरिया पार कर सकें. इतना तो सब मानते हैं कि गांधी बिना सोचे-समझे कुछ भी करने वाले न थे. सवाल है कि ‘हरिजन’ की गांधीवादी व्याख्या क्या हो सकती है? और दलित जब इस संबोधन पर आपत्ति कर रहे थे तो गांधी के पास क्या इसका कोई भी विकल्प नहीं था? उत्तर है—बिलकुल था; और बहुत पहले से था. याद कीजिए—‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे…’ गांधी-सभा में नियमित गाया जाने वाला भजन. इसमें एक शब्द आता है, ‘वैष्णव जन’. ‘हरि’ को विष्णु का उपनाम माना जाता है. ‘हरिजन’ और ‘वैष्णव जन’ का भावार्थ भी एक है. दोनों ही नरसी मेहता के पदों से लिए गए हैं. उनमें से एक का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. फिर गांधी ने जातीय दलन का शिकार रहे लोगों को ‘वैष्णव जन’ संबोधन क्यों नहीं दिया? क्यों वे केवल ‘हरिजन’ पर अड़े रहे? यदि गांधी सचमुच वर्ण एवं जाति के विरोधी होते तो और वही कहना चाहते जो उन्होंने ‘हरिजन’ के बारे में बताया है तो ‘वैष्णव जन’ से बेहतर और सम्मानजनक शब्द दूसरा हो ही नहीं सकता था. जरूरी नहीं है कि दलन का शिकार लोगों को ‘वैष्णव जन’ जैसा संबोधन भी स्वीकार होता. परंतु तब वे पक्षपात से बच सकते थे. गांधी ने ऐसा नहीं किया. इसके दो कारण हो सकते हैं. पहला वे बहुत जिद्दी थे. एक बार मुंह से जो निकला उसपर पुनर्विचार करना उनके महात्मापन को स्वीकार न था. उनकी मंशा नहीं थी कि दलितों को ‘वैष्णवजन’ जैसा ‘पवित्र’ नाम या उपाधि दी जाए. ब्राह्मण-ग्रंथों में दलितों के नामकरण को लेकर भी निर्देश हैं. उनके अनुसार दैन्य दलित के नाम से झलकना चाहिए. ‘हरिजन’ में जैसा दैन्य-भाव है, वैसा दैन्य-भाव ‘वैष्णवजन’ में नहीं है. यानी गांधी की सवर्ण-मानसिकता दलितों को ऐसा कोई नाम देना नहीं चाहती थी, जो समाज में सम्मानित हो. जबकि इन्हीं हरिजनों के एक संतपुरुष रैदास ने, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’—कहकर अपने समय के पुरोहितों और पाखंडी पंडितों की बोलती बंद कर दी थी. कह सकते हैं कि गांधी को सामाजिक परिवर्तन वहीं तक स्वीकार्य था, जहां तक वह हिंदू वर्णव्यवस्था को चोट न पहुंचाता हो. एक सीमा के बाद उनकी उदारता जिद में ढल जाती थी. उस समय वे या तो ‘राम-राज्य’ की प्रशंसा करने लगते; या फिर ‘पंचायती राज्य’ के नक्श में भारत का भविष्य तलाशने लगते थे. यह जानते हुए भी कि ‘राम-राज्य’ के माथे ‘शंबूक-हत्या’ तथा स्त्री-विरोधी होने का कलंक लगा है; और पंचायती राज्य का चेहरा जाति-व्यवस्था के कलंक के चलते बेदाग नहीं रह सकता—वे उन्हें आदर्श लगते थे. आंबेडकर गांवों को जाति और सामंती संस्कारों का सबसे सुरक्षित ठिकाना मानते थे. गांधी गांव को आत्मनिर्भर इकाई बनाने का सपना देखते थे. जानते थे कि नई प्रौद्योगिकी नए विचार भी लाएगी, मशीनें प्राचीनतम वर्णव्यवस्था को चुनौती देंगी. इसलिए वे मशीनों को पूरे भारत के लिए खतरा मानते थे. आंबेडकर को नई तकनीक से परहेज नहीं था. वे उन्हें विकास के लिए आवश्यक मानते थे. लेकिन चाहते थे कि बड़े कारखाने सरकार के सीधे नियंत्रण में हों. इस मामले में वे तथाकथित समाजवादियों से भी बड़े समाजवादी थे.

‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने वकीलों और जजों के पेशे को निकृष्ट बताया है. वह भी तब जब वे स्वयं विलायत से वकालत करके आए थे. वही क्यों, कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने भी वकालत के रास्ते राजनीति में कदम रखा था. अजीब-सी स्थापना थी उनकी—‘सत्ता की मुख्य कुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील हैं. अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाए तो अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाए’(हिंदुस्तान की दशा—4, हिंद स्वराज). आखिर अदालतों से क्या रोष था उनका? क्यों उन्होंने वकील के पेशे की तुलना वेश्या से की है? आखिर क्यों? कारण जानने के लिए गांधी की मनोरचना को समझना होगा. वे वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे. उनके हिसाब से वह आदर्श व्यवस्था थी. उसके पोषकों की निगाह में ‘मनुस्मृति’ भारत का आदर्श विधिग्रंथ था, जिसके अनुसार ब्राह्मण का बड़े से बड़ा अपराध क्षम्य था. दूसरी ओर शूद्रों को छोटे-से-छोटे अपराध के लिए दंड करने का अधिकार उसके स्वामी को प्राप्त था. उसकी सुनवाई किसी भी अदालत में नहीं थी. इसे देखते हुए 1834 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मुलाजिम लार्ड मैकाले ने ‘बेहतर प्रशासन’ के लिए ‘विधि आयोग’ की स्थापना की थी. उसके बाद मैकाले भारतीय लेखकों की निगाहों में खलनायक बन गया. ठीक वैसा ही खलनायक जैसा ‘ब्रिटिश भारत का इतिहास’ के लेखक जेम्स मिल को माना गया था. मिल ने अपनी बृहद् ग्रंथमाला में जहां भी आवश्यक समझा हिंदू धर्म और समाज में व्याप्त रूढ़ियों की जमकर आलोचना की है. 1853 में दूसरा विधि आयोग बनाया गया, जिसने 1861 में आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए कानून बनाए. उसकी 25वीं धारा में लिखा था कि आपराधिक कानून सभी पर समान रूप से लागू होगा. उसने ‘मनुस्मृति’ की विधि-संहिता को किनारे कर दिया. शताब्दियों से चले आ रहे ब्राह्मणों के विशेषाधिकार एक झटके में समाप्त हो गए. अदालतें, वकील और अधिकारी विधि-संहिता के अनुसार काम करने लगे. दलितों और अस्पृश्यों के बीच जो वर्षों से दबा-ढका था, वह एकाएक बाहर आने लगा. सवर्णों के विशेषाधिकारों को चुनौती मिलने लगी. ज्योतिबा फुले, आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार जैसे क्रांतिधर्मा नेताओं और विचारकों का जन्म इसी के फलस्वरूप हुआ. यह बदलाव ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोगों के लिए असह् था. गांधी भी अपवाद न थे. जिन दिनों उन्होंने वकालत की थी, संभव है तब तक उन्हें भारतीय समाज की हकीकत का पूरा अंदाजा न रहा हो. परंतु राजनिति में आने के बाद आधुनिक विधि संहिता उन्हें वर्णव्यवस्था के प्रतिकूल दिखने लगी थी. इसलिए वे वकीलों के पेशे को वेश्या के पेशे से नीच मानने की सलाह दे जाते हैं. गांधी आधुनिक शिक्षा के भी विरोधी थे जिसने वर्णव्यस्था की पीठ पर प्रहार किया था. कानून के विद्यार्थी होने के बावजूद वे व्यवस्था को धर्म की सहायता से चलाना चाहते थे. पूरी दुनिया जब धर्म को नकार रही थी, गांधी ने अपने लिए उसकी मर्यादा को आदर्श माना तथा आजीवन भारत को धर्मोन्मुखी राज्य बनाने की सलाह देते रहे. उनके लिए हर समस्या का समाधान धर्म में अंतर्निहित था. धर्म और राजनीति को अलग-अलग देखने वाली पश्चिमी सभ्यता उन्हें शैतान-सभ्यता लगती थी. जबकि स्वयं गांधी और उस समय के प्रमुख नेता इंग्लेंड से पढ़-लिखकर आए थे. दक्षिणी अफ्रीका में तथा वहां से लौटने के बाद भारत में, अंग्रेज सरकार को चुनौती देने के लिए बार-बार अंग्रेजी कानून ही उनके मददगार सिद्ध होते थे.

भक्ति-भाव में गांधी इस बात को नजरंदाज कर जाते थे कि धर्म शक्तिशाली के वर्चस्व को औचित्यपूर्ण ठहराने का सुविचारित तंत्र है. विजेता संस्कृतियों की यह सामान्य खूबी होती है कि वे लंबे और स्थायी शासन हेतु, अपने नायकों को ईश्वर या उसके प्रतिनिधि और उनके फैसलों को ईश्वरीय-न्याय के रूप में पेश करती हैं. उनके निरंतर दबाव के बीच जनसामान्य निर्णय-प्रक्रिया से कटने लगता है. परिणामस्वरूप बहुसंख्यक के विवेक का लोकहित में उपयोग हो ही नहीं पाता. यहीं से उसके संकटों की वास्तविक शुरुआत होती है. दूसरों के आसरे अपने फैसले लेने का अभ्यस्त समाज प्रकारांतर में अपनी खुशी, अपनी स्वतंत्रता, यहां तक कि समानता की चाहत को भी उनके आगे गिरवी रख देता है. पीटर ऑल्टजिल्ड के शब्दों में—

‘शक्तिशाली सदैव सही होता है—इस विचार ने दुनिया को अथाह दुख दिए हैं. यह विचार न केवल कमजोर को कुचलता है, बल्कि ताकतवर को भी नष्ट कर देता है. क्योंकि प्रत्येक झूठ, प्रत्येक छल-कपट और प्रत्येक चूक आगे-पीछे उसके स्वामी को ही नुकसान पहुंचाती है. न्याय समाज के नैतिक स्वास्थ्य को दर्शाता है, खुशियां लाता है, जबकि अन्याय नैतिकता का लोप है, मनुष्य को जीते-जी मार देता है.’

एक दृष्टांत के माध्यम से महाभारत में बताया गया है, ‘जो सबका होता है, वह किसी का नहीं होता.’ गांधी ने सबका बनने की कोशिश की, आजादी के बाद लोगों के मोहभंग की शुरुआत हुई तो सबसे पहले गांधी को किनारे किया गया. उन लोगों ने किनारे किया जिनके लिए वे आजीवन काम करते आए थे. जबकि समय के साथ आंबेडकर की प्रासंगिकता लगातार बढ़ती गई. वे दलितों और वंचितों के मसीहा मान लिए गए. आजादी से पहले देश-भर में गांधी का नाम गूंजता था. धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरने लगा. गांधी दर्शन हवा में बिला गया. दूसरी ओर आंबेडकर-दर्शन में विश्वास रखने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. लोग उनके विचारों के आधार पर संगठित हो रहे हैं. कह सकते हैं कि गांधी नेता बने थे. आंबेडकर को लोगों ने अपना नेता, अपना मार्गदर्शक और उद्धारक स्वत: स्वीकार किया. आजादी के बाद जितनी मूर्तियां आंबेडकर की लगीं, शायद ही किसी और नेता की लगी होंगी. गांधी को प्यार करने वालों के मन में उनके प्रति भावुकता भरा लगाव है. गांधीवाद को बिना भावुकता और अतीतमोह के लागू ही नहीं किया जा सकता. आंबेडकर के अनुयायी उन्हें अधिकार चेतना जगाने तथा ‘अप्पदीपो भव’ की भावना जगाने के लिए याद करते हैं. इसीलिए याद करते हैं क्योंकि उनकी बातों में तार्किकता का समावेश रहता था. गांधी तर्क की कसौटी पर कमजोर पड़ते ही अनशन पर उतर आते थे. उन्हें राष्ट्रपिता की पदवी ओढ़ाई गई थी. आंबेडकर को उनके श्रद्धावनत अनुयायियों ने खुशी-खुशी अपना ‘बाबा’ मान लिया. इन स्थापनाओं पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है. परंतु थोड़ी देर के लिए यदि वे अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर सोचें, आधुनिकता का मंतव्य समझ लेने के बाद आंबेडकर के कार्यों की महत्ता का आकलन करना आसान हो जाएगा.

 

आधुनिकता को सामान्यतः फैशन से लिया जाता है. दूर-दराज के गांवों में धोती-कुर्ता के स्थान पर सूट-बूटेड लड़के को तुरंत ‘मार्डन’ मान लिया जाता है. कोई उसका प्रतिवाद नहीं करता. विद्वान आधुनिकता को प्रौद्योगिकीय विकास से जोड़ते हैं. उनकी निगाह में बुलेट ट्रेन, सुपरसोनिक हवाई जहाज, संचार-क्रांति के क्षेत्र में हुए तीव्र बदलाव—सब आधुनिकता की निशानियां हैं. इस आधार पर देखा जाए तो कलम-दवात छोड़कर फाउंटेन पेन पर आना, फिर फाउंटेन पेन छोड़ कंप्यूटर और लेपटाप की शरणागत होता—आधुनिकीकरण की ही मिसाल है. पर क्या यही आधुनिकता है? असल में ये आधुनिकता के आवरण हैं. ज्यादा से ज्यादा उसका समुत्पाद. मगर कई बार वे मानवीय गरिमा के प्रतिकूल आचरण करते दिखाई पड़ते हैं. उदाहरण के लिए ‘स्मार्टफोन’ को लें. उसमें तकनीक के स्तर पर जो स्मार्टनेस है, वह उसके उपभोक्ता में नहीं आ पाती. बल्कि उपभोक्ता अपनी स्मार्टनेस का इस्तेमाल न करे, जितना करता है उसका अभ्यास भी जाता रहे, इसलिए भी तकनीक को स्मार्ट बनाया जाता है. सुविधा के नाम पर ये फोन मानव-स्मृति और उसकी सामाजिकता पर जैसा हमला करते हैं, उसकी भरपाई किसी अन्य आधुनिक उपकरण द्वारा असंभव है. वे व्यक्ति के अकेलेपन का लाभ उठाते हैं तथा उसे और अधिक बढ़ावा देते हैं. जिससे उसका आत्मविश्वास घटता है. परिणामस्वरूप उनके निर्णय विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से संचालित होने लगते हैं.

आधुनिकता का अभिप्राय वर्तमान और भूतकाल अथवा निकट-भूतकाल के बीच आए बदलाव से है. वह समाजेतिहासिक घटना है, जिसपर अपने समय के वैचारिक और प्रौद्योगिकीय आंदोलनों का प्रभाव पड़ता है. वह समय-सापेक्ष होने के साथ-साथ व्यक्ति-सापेक्ष भी होती है. यानी आधुनिकता के मायने सभी के लिए अलग-अलग हो सकते हैं. किसी फैशनपरस्त युवक के लिए जिसका वैचारिक आंदोलनों से कोई नजदीकी संबंध नहीं है, आधुनिकता का अभिप्रायः महज फैशन की दुनिया में आए बदलावों और उपभोक्ता वस्तुओं की नवीनतम खेप तक सीमित होगा. लेकिन जिसकी विचारों की दुनिया में रुचि है उसके लिए आधुनिकता के मायने कहीं व्यापक होंगे. वह उपभोक्ता बाजार, सभ्यता और संस्कृति के हालिया बदलावों के साथ-साथ उन कारकों पर भी विचार करेगा, जो उन बदलावों के मूल में हैं. ऐसे व्यक्ति के लिए आधुनिकता आंशिक नहीं हो सकती. वह ऐसी आधुनिकता को नकार देगा जिसमें व्यक्ति अत्याधुनिक डिजायन के कपड़े पहने, आधुनिकतम उपकरणों से लैस रहे, परंतु विचारों में पूरी तरह दकियानूसी हो जाएं. यह आवश्यक नहीं है कि केवल नए और मौलिक विचार ही आधुनिकता की श्रेणी में आएं. पुराने विचारों का नवीकरण अथवा नव-प्रस्तुतीकरण भी आधुनिकता की परिसीमा में आता है. आधुनिकता समग्रता में कैसे फलीभूत होती है. इसे जानने के लिए आधुनिक शब्द की उत्पत्ति पर विचार किया जाना आवश्यक है—

आधुनिक शब्द संस्कृत के अद्यः का विस्तार है. जिसका अर्थ है—आज, आजतक. अद्य से ही अद्यतन, अधुनातन शब्द बने हैं, जो आधुनिकता से ही संबंधित हैं. इस तरह आधुनिकता में वे सभी परिवर्तन, विकास-प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं, जिन्हें कोई समाज अपने अधिकतम सदस्यों की शुभता हेतु अपनाता है. आधुनिकता का अंग्रेजी पर्यायवाची modern प्राचीन लेटिन के शब्द modo से बना है. उसका अर्थ है—आज, आजतक, वर्तमानकालीन या समकालीन आदि. modo से ही उत्तरवर्ती लैटिन के शब्द modernus शब्द की उत्पत्ति हुई. जिससे modern  शब्द बना है. इसका भावार्थ है, नएपन का सम्मान. कुछ विद्वान आधुनिकता को अठारहवीं शताब्दी के यूरोपीय पुनर्जागरण से जोड़ते हैं. यह वह समय था पश्चिम में नित-नए विचार आ रहे थे. लोकतंत्र, मानवाधिकार, व्यक्ति-स्वातंत्र्य, बराबरी, सामाजिक न्याय जैसे विचारों ने सामंतवाद, पौरोहित्यवाद आदि को अप्रासंगिक बना दिया था. नए विचारों ने मानव-मेधा को समृद्ध किया, वहीं लोगों में यह विश्वास पैदा किया कि दूसरों की आस्था का सम्मान करके ही अपने विश्वासों की रक्षा संभव है. कुल मिलाकर समानता और सहिष्णुता आधुनिकता की मान्य कसौटियां हैं. सभी के लिए न्याय और सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक बराबरी. यदि समाज इन्हें मानने से इन्कार करता है, तो राज्य का कर्तव्य है कि इन मूल्यों की स्थापना के लिए आवश्यक विधान बनाए, ताकि असमानता और वर्ग भेद को मिटाया जा सके.

 

आधुनिकता की कसौटी पर आंबेडकर गांधी से आगे हैं. हालांकि थोरो, ऑस्कर वाइल्ड, एडबर्ड कारपेंटर के विचारों के प्रभाव में गांधी ने भारतीय राजनीति में अनेक प्रयोग किए. परंतु उनका परंपरावादी मन बार-बार उन्हें पीछे लौटने को बाध्य करता रहा. विशेषकर जाति और धर्म के सवालों को लेकर. उनके सापेक्ष आंबेडकर लोकतंत्र, समानता मानवाधिकार आदि का समर्थन करते हुए आधुनिकता की दौड़ में गांधी से आगे निकल जाते हैं. दोनों की चुनौतियां भी अलग-अलग थीं. गांधी को बस एक मोर्चे पर जूझना था. वह मोर्चा था, आजादी का. उनके लिए सुधारवादी आंदोलन राजनीतिक गतिविधियों हेतु समर्थन जुटाने के औजार थे. आंबेडकर के लिए सामाजिक आजादी का लक्ष्य स्वाधीनता के लक्ष्य से बड़ा था. गांधी भारतीय राजनीति में  दृढ़ता और शालीनता के प्रतीक थे. आंबेडकर जिस वर्ग से आते थे, वह भारत में सहस्राब्दियों से उत्पीड़न का शिकार होता आया था. इस कारण उनके विचारों में स्वाभाविक उग्रता थी. धर्म  और संस्कृति को लेकर तीखा विरोध भी था. लेकिन उसका स्तर कहीं पर भी अशालीन नहीं था. भारतीय राजनीति में डॉ. भीमराव आंबेडकर का उदय युगांतरकारी घटना है. इसलिए उस युग को हम भारतीय राजनीति का प्रबोधनकाल भी कह सकते हैं. उस समय के जितने भी बड़े नेता थे, उनमें कदाचित आंबेडकर ही ऐसे थे, जो नए राजनीतिक दर्शनों से इत्तफाक रखते थे और बिना किसी हिचक के उन्हें स्वतंत्र भारत में अपनाना चाहते थे. उनका अध्ययन विशद् था. हालांकि उन्हें आरंभिक प्रसिद्धि सामाजिक न्याय के हित में किए गए आंदोलनों के कारण मिली. उन कार्यक्रमों की वजह से मिली, जो उन्होंने दलितों और अस्पृश्यों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए चलाए थे. वही उनकी  प्राथमिकता भी थी. उसके पीछे उनके जीवन के कटु अनुभव भी थे. उच्च-शिक्षित होने के बावजूद उन्हें जाति के कारण अनेक दुर्व्यवहारों का सामना करना पड़ा था. वे समझ चुके थे कि यदि उन जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति को जातिवाद का कलंक इतना त्रास दे सकता है तो गरीब, विपन्न दलितों के साथ सवर्णों के दुर्व्यवहार की तो केवल कल्पना ही की जा सकती है. इसलिए पढ़ाई पूरी कर, भारत लौटते ही उन्होंने दलितों में सामाजिक चेतना जगाने को अपना लक्ष्य मान लिया था.

आंबेडकर पर विदेशी विचारकों के साथ-साथ भारतीय चिंतकों का भी प्रभाव था. कबीर, रैदास, ज्योतिबा फुले की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने धर्म की पुनरीक्षा के काम को संभाला और हिंदू धर्म की दुर्बलताओं को तरह-तरह से सामने लाए. इस तरह उन्होंने वह काम किया जो फ्रांस में वाल्तेयर ने किया था. उन्होंने लोगों को समझाया कि हिंदू धर्म और जातिवाद का नाभिनाल का संबंध है. दोनों एक-दूसरे को पूजते-पोषते हैं. इसलिए जातिवाद की समस्या से मुक्ति प्राप्त करनी है तो हिंदूधर्म से मुक्ति अत्यावश्यक है. राजनीतिज्ञ धर्म और जाति दोनों को पोषते हैं. ताकि वे अपनी नीयत और शासन की असफलताओं को ईश्वरीय विधान की आड़ में छिपा सकें. धर्म और जाति के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण वे सवर्णों के निशाने पर भी रहे. परंतु आंबेडकर के पांडित्य को देखते हुए किसी की हिम्मत उनपर सीधा प्रहार करने की न थी. वे जान चुके थे कि आंबेडकर को केवल समझौते से ही रोका जा सकता है. ब्राह्मणों-पुरोहितों के लिए यह कोई नया काम न था. वे अवसरानुकूल अपनी नीतियों में फेरबदल करने के माहिर रहे हैं. स्थितियां प्रतिकूल हों तो अपने अंग-प्रत्यंगों को कछुए की भांति समेटकर शांत पड़े रहना फिर अनुकूल हालात देखते ही भेड़िये की भांति आक्रामक दिखना उनकी पुरानी चाल रही है. लेकिन जिस समय वे शांत दिखते हैं, उस समय भी पूरी तरह शांत नहीं होते. बल्कि शांत रहकर हालात को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. आंबेडकर की प्रतिष्ठा और सम्मान को देखते हुए उन्होंने समझौते के प्रयास शुरू कर दिए थे. ‘जाति-पांत तोड़क मंडल की सभा की अध्यक्षता के लिए डॉ. आंबेडकर को आमंत्रित करने के पीछे उनकी यही चाल थी. वह सम्मेलन कभी हो न सका. आयोजकों ने उसे हमेशा के लिए स्थगित कर दिया था. वे चाहते थे कि आंबेडकर अध्यक्ष पद से जाति प्रथा पर भले ही सवाल उठाएं परंतु वेदों के आगे कोई प्रश्न-चिह्न न लगाएं. आंबेडकर का मानना था कि यदि ऋग्वेद को वर्ण-व्यवस्था का प्राचीनतम स्रोत माना जाता रहेगा, तो उसपर सवाल उठाए जाने लाजिमी हैं. उस अवसर पर आंबेडकर ने जो भाषण तैयार किया था, वह संशोधित रूप में प्रकाशित हुआ. अपने लेख में डॉ. आंबेडकर में जातिप्रथा के संपूर्ण उन्मूलन का समर्थन किया था. वह लेख ‘जातिप्रथा का उच्छेद’ नाम से ख्यात है. भारतीय जाति-व्यवस्था के अध्ययन हेतु वस्तुनिष्ट प्रयत्न तो अनेक हुए हैं, परंतु उसकी विकृति को समझाने वाली आंबेडकर की पुस्तक इकलौती और सबसे प्रामाणिक है.

पुस्तक में उन्होंने माना है कि जाति-व्यवस्था का मूल हिंदू धर्म में पसरा हुआ है. इसलिए यदि जाति-व्यवस्था का उच्छेद करना है तो धर्म का उच्छेद भी लाजिमी है. आंबेडकर चाहते थे कि दलित राजनीति में अधिक से अधिक हिस्सा लें, ताकि उनमें अधिकार चेतना और संघर्ष की भावना उत्पन्न हो सके. गांधी और समकालीन नेताओं तथा आंबेडकर के कार्यों में मूलभूत अंतर भी यही है. गांधी, नेहरू, पटेल सहित उस समय के सभी प्रमुख नेताओं के लिए राजनीति प्रमुख थी. वे शासक जातियों से आए थे. और अंग्रेजों द्वारा सत्ता हस्तांतरण की स्थिति में स्वयं को उसका स्वाभाविक दावेदार मानते थे. गांधी अवश्य सामाजिक सरोकारों की बात करते थे. इसलिए उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को चुनाव के उपरांत कांग्रेस को भंग करने की सलाह दी थी. उस समय गांधी या तो खुद भुलावे में थे, अथवा दूसरों को भुलावे में रखना चाहते थे. जबकि आंबेडकर ने 1936 में ही कह दिया था—

‘भारत में समाज सुधार का मार्ग स्वर्ग के समान दुरूह है. इस कार्य में अनेक कठिनाइयां हैं. भारत में समाज सुधार के कार्य में सहायक मित्र कम और आलोचक अधिक हैं. आलोचकों के दो स्पष्ट वर्ग हैं. एक वर्ग राजनीतिक सुधारकों का है. दूसरे में समाज सुधारक शामिल हैं.’

 

आंबेडकर ने विपुल साहित्य लेखन किया. उनकी पुस्तकें ‘जाति का उन्मूलन’ तथा ‘शूद्र कौन थे’ भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर सवाल खड़े करती हैं. इन पुस्तकों के माध्यम से वे हिंदू समाज की विकृतियों को सामने लाते हैं. दर्शाते हैं कि वर्ण-श्रेष्ठता का दावा करते हुए शिखर पर मौजूद आठ-दस प्रतिशत लोग किस प्रकार बाकी लोगों के मूल-भूत अधिकारों का हनन करते आए हैं. कैसे शोषण को शौर्य की संज्ञा देकर उन्होंने बाकी जनसमाज का लगातार उत्पीड़न किया है. इसके पीछे हिंदू समाज का अलोकतांत्रिक रवैया है. उसकी बुराइयों से सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र के माध्यम से निपटा जा सकता है. आंबेडकर उन लोगों में से थे जो गणतंत्र की तमाम कमजोरियों के बावजूद उसे दुनिया-भर की ज्ञात राजनीतिक प्रणालियों में सर्वोत्तम मानते आए हैं. इसलिए संविधान बनाते समय उन्होंने गणतंत्र को ही स्वतंत्र भारत के राजदर्शन के रूप में चुना. गांधी तथा गांधीवाद के प्रमुख सिद्धांतकारों को बहुमत का विचार ही अटपटा लगता था. विनोबा को यह जानकर विचित्र लगता था कि संविधान में नेहरू और उनके खानसामा दोनों के लिए एक ही वोट का प्रावधान है. ‘हिंद स्वराज’ जिसे प्रभाष जोशी पूर्वाग्रहवश रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट’ तथा मार्क्स के ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जैसी क्रांतिकारी पुस्तक बताते थे, असल में प्रतिगामी दर्शन का दस्तावेज है, जिसे गांधी के समकालीनों ने ही नकार दिया था. इस पुस्तक में गांधी इंग्लेंड की संसद को ‘बांझ और बेसवा’ कहकर संसदीय लोकतंत्र पर सवाल उठाते हैं. बहुमत का निर्णय उन्हें ‘अनीश्वरी बात’ लगता है—‘ज्यादा लोग जो कहें उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिए यह तो अनीश्वरी बात है. एक वहम है.’ ‘हिंद स्वराज’ को पढ़कर कोई भी यह समझ सकता है कि गांधी के लिए ‘न्याय’ और ‘समानता’ कोई मूल्य न थे. वे बीसवीं शताब्दी में भारत का नेतृत्व कर रहे थे, परंतु उनका सोच अठारवीं शताब्दी के सुधारवादियों से अलग न था. वे समाज को शासक और शासित के रूप में बांटकर देखने के अभ्यस्त थे. इसलिए उन्हें सदैव किसी उद्धारक की तलाश रहती थी—‘जितना समय और पैसा पार्लियामेंट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए.’ गांधी के अनुसार निगाह में ‘अच्छे लोग’ वही हैं, जिनका पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्ता और संसाधनों पर कब्जा रहा है. जो कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर जनसाधारण को बरगलाते आए हैं. यह एक प्रकार का कुलीनतावाद है जो कुछ लोगों को जन्म के आधार पर, धर्म के आधार पर विशेषाधिकार संपन्न बनाता है. आंबेडकर इसी से दलितों और पिछड़ों की मुक्ति चाहते थे, जबकि गांधी वर्ग-भेद और वर्ण-भेद दोनों के समर्थक थे. उन्हें ईश्वरीय मानकर किसी न किसी रूप में बचाए रखना थे. आंबेडकर का लोकतंत्र में विश्वास था. वे मानते थे कि समाज में जैसे-जैसे लोकतांत्रिक चेतना का विकास होगा, शताब्दियों से धर्म और सामंती संस्कारों में बंधे लोग उसके चंगुल से बाहर आने लगेंगे. उन्होंने जोर देकर कहा था—

‘लोकतंत्र ऐसी शासन पद्धति है, जिसमें लोगों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में खून की एक बूंद बहाए बिना भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है.’1

लोकतंत्र की खूबी उसके बहुआयामी होने में है. राजनीति के क्षेत्र में वह तभी कामयाब हो सकता है, जब उनकी समान उपस्थिति आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में भी हो. इस बारे में आंबेडकर हेराल्ड लॉस्की के प्रशंसक थे. उसका कहना था कि बिना नैतिकता के आश्रय के लोकतंत्र अधूरा है. लॉस्की न्याय और नैतिकता को परस्पर पर्यायवाची मानता था. उसके अनुसार सत्ता से दूर रहने वाले या उसके महत्त्व को किसी भी रूप में नजरंदाज करने वाले लोग, स्वभावतः दूसरों के अनुगामी बन जाते हैं. इससे निर्णय लेने की उनकी योग्यता का हृस होता है. नतीजन वे दूसरों के अनुसरण को ही अपना कर्तव्य मान बैठते हैं. आगे चलकर वे न केवल अपनी क्षमताओं का आकलन करने में गलती करने लगते हैं, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति और अच्छाइयों को लेकर भी संदेह होने लगता है. जनसाधारण की सत्ता-विमुखता का परिणाम यह होता है कि शिखर पर विराजमान लोग सत्ता-भोग को अपना अधिकार मान, वहीं बने रहने के लिए ऊल-जुलूल तर्कों का सहारा लेने लगते हैं. समाज में न्याय की उपस्थिति के लिए आवश्यक है कि सरकार उन लोगों को जो समाज में किसी भी प्रकार की उपेक्षा या वंचना का शिकार हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर आगे लाए. ऐसा वातावरण उत्पन्न करे जिसमें उनकी अधिकतम उत्पादकता और मान-रक्षा संभव हो सके. राज्य की स्थापना का उद्देश्य भी यही है—

‘साधारण मनुष्य के व्यक्तित्व को रचनात्मक बनाने के लिए आवश्यक है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा की जाएं जिनमें नागरिकों की रचनात्मकता का अधिकतम उपयोग हो सके. यह तभी संभव है जब साधारण से साधारण व्यक्ति यह अनुभव करे कि समाज में उसकी कुछ सार्थकता है. इसे स्वतंत्रता और समानता की अनुपस्थिति में प्राप्त करने की आशा हम नहीं कर सकते.’ (राजनीति के मूल तत्व—हेरॉल्ड लॉस्की)

सामाजिक न्याय एवं समानता के लक्ष्य की सिद्धि केवल सहभागी लोकतंत्र द्वारा संभव है. आंबेडकर के अनुसार लोकतंत्र कोरी राजनीतिक प्रणाली नहीं है. वह जीवन-पद्धति है. वह तभी सफल हो सकता है, जब लोग उसे अपने आचरण का हिस्सा बना लें. तभी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शुचिता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. आंबेडकर का मानवतावादी सोच उन्हें बेहतर इंसान और बड़ा नेता बनाता है. वे मुख्यतः जिन लोगों के नेता थे, उनमें लगभग सभी अशिक्षित थे. गरीबी और बदहाली के शिकार. इतने बदहाल कि उनके लिए अवसरों की समानता का विचार भी महत्त्वहीन था. आंबेडकर जानते थे कि चमत्कारवश यदि भारत में सभी को बराबर मान लिया गया तो भी समाजार्थिक आधार पर पिछड़ चुके लोग, पिछड़े ही रहेंगे. इसलिए सामाजिक न्याय की भावना के अनुसार उन्होंने दलितों और पिछड़ों के लिए विशेष अवसरों की मांग रखी. सदियों से दमन का शिकार लोगों को उन्होंने समझाया—‘शिक्षा शेरनी का दूध है. जो भी पीता है, दहाड़ने लगता है’—इसलिए शिक्षित बनो. लोकतंत्र में संख्याबल महत्त्वपूर्ण होता है. सरकारें जनता की इच्छानुसार बनती-बिगड़ती हैं. उसके लिए लोगों का संगठित रहना आवश्यक है. शताब्दियों से दूसरों के अधिकारों पर कुंडली मारे शीर्षस्थ अभिजन, संसाधनों में हिस्सेदारी के लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे. अपना दैन्य दूसरों के टाले नहीं टलता. मुक्ति के लिए खुद प्रयत्न करना पड़ता है. अतएव अपने अधिकारों के लिए, मान-सम्मान और अस्मिता के लिए, अपनी और आने वाली पीढ़ियों की खुशहाली के लिए—संघर्ष करो. उनके अनुयायियों ने भी ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो.’ को अपना जीवन-मंत्र मान लिया. गांधी-दर्शन में व्यक्ति-स्वातंत्र्य और समानता के लिए कोई स्थान नहीं है. समाज को ऊंच-नीच में बांटने वाला वर्ण-विधान ही उनके लिए सर्वोच्च है. असमानता से गांधी को तब तक कोई शिकायत न थी, जब तक शिखर पर बैठे लोग अनुदार न हों. इसलिए वे सवर्णों से कथित ‘हरिजनों’ के प्रति सदय होने की अपेक्षा रखते हैं. प्रकारांतर में वे दीन को भी बनाए रखना चाहते थे और दीनानाथ को भी. उससे अल्पावधि सुधार के अलावा हालात में बहुत अंतर पड़ने वाला नहीं था. कदाचित इसीलिए 26 जनवरी 1929 को ‘संघ और स्वाधीनता’ विषय पर दिए गए भाषण में आंबेडकर ने गांधी युग को भारतीय इतिहास का ‘काला अध्याय’ घोषित किया था—

‘मुझे इस बात में कतई संदेह नहीं है कि गांधीयुग भारत के इतिहास का काला अध्याय है. यह वह समय है जब भारत की जनता अपने आदर्श, अपने भविष्य की ओर देखने के बजाए बार-बार पीछे मुड़कर अतीत में झांकने लगती है.’2

आंबेडकर का कहा आज सच दिख रहा है. गांधी के नेतृत्व और परिस्थितियों के चलते देश को राजनीतिक स्वतंत्रता मिली. किंतु जिस सामाजिक स्वतंत्रता की मांग आंबेडकर आजीवन करते रहे, वह आज भी स्वप्न है. भारतीय समाज का वह हिस्सा जो वर्ण-व्यवस्था से लाभान्वित होता आया है, येन-केन-प्रकारेण उसे बनाए रखना चाहता है. यूं तो गांधी ने भी सामाजिक एकता और समरसता के लिए कार्यक्रम चलाए. सांप्रदायिक एकता के क्षेत्र में तो उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिली. लेकिन आंबेडकर की प्राथमिकताएं और सोचने का ढंग उनसे अलग था. इस अंतर को धर्म की कसौटी पर भी परखा जा सकता है. गांधी के लिए धर्म पहले था. मनुष्य बाद में. उनके लिए इंसानियत धर्म से परे कुछ न थी. व्यक्त तौर पर वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. लेकिन कुछ भी होने से पहले वे एक हिंदू थे. हिंदू धर्म और जाति-व्यवस्था दोनों अस्थि-मज्जा की तरह एक-दूसरे पर निर्भर है, संकट के समय दोनों एक-दूसरे को साधते हैं—इस तथ्य को जानकर भी वे अनजान बने रहते थे. जबकि जाति आंबेडकर के लिए हिंदू धर्म की विकृति थी. ऐसी विकृति जो उसके उद्भव से ही उससे चिपकी हुई है. इस कारण वे उसकी खुली आलोचना करते थे. उनके लिए मनुष्य पहले था. धर्म का नंबर इंसानियत के बाद आता था. धर्म का ध्येय इंसानियत का पोषण करना है. इसलिए जो धर्म समानता, स्वतंत्रता और सौहार्द का समर्थन न करे, उसे वे मानने से इन्कार करते थे. वे चाहते थे कि दमित वर्ग किसी भी प्रकार के अंधानुकरण से बचे. धर्म और सांस्कृतिक प्रतिमानों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाए. चालबाज पंडितों के बहकावे में आने के बजाय अपने निर्णय स्वयं लेना सीखे. धर्म और आडंबर में फर्क को समझे. दलितों का आवाह्न करते हुए उन्होंने कहा था—

‘तुम्हारी मुक्ति का मार्ग न तो धर्मशास्त्र हैं, न ही मंदिर. तुम्हारा वास्तविक उद्धार उच्च शिक्षा, ऐसे रोजगार जो तुम्हें उद्यमशील बनाएं, श्रेष्ठ आचरण एवं नैतिकता में निहित है. इसलिए तीर्थयात्रा, व्रत-पूजा, ध्यान-आराधन, आडंबरों और कर्मकांडों में अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ मत जाने दो. धर्मग्रंथों का अखंड पाठ करने, यज्ञाहुति देने तथा मंदिरों में माथा टेकने से तुम्हारी दासता दूर नही होगी. न गले में पड़ी तुलसी-माल तुम्हारे लिए विपन्नता से मुक्ति का सुख-संदेश लेकर आएगी. और काल्पनिक देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे नाक रगड़ने से भुखमरी, दुख-दैन्य एवं दासता से भी तुम्हारा पीछा छूटने वाला नहीं है. इसलिए अपने पुरखों की देखा-देखी चिथड़े मत लपेटो. दड़बे जैसे घरों में मत रहो. मत इलाज के अभाव में तड़फ-तड़फ कर जान गंवाओ. भाग्य और दैव-भरोसे रहने की आदत से बाज आओ. तुम्हारे अलावा कोई तुम्हारा उद्धारक नहीं है. खुद तुम्हें अपना उद्धारक बनना है. धर्म मनुष्य के लिए है. मनुष्य धर्म के लिए नही है. जो धर्म तुम्हें मनुष्य मानने से इन्कार करता है, वह अधर्म है. धर्म के नाम पर कलंक है. जो ऊंच-नीच की व्यवस्था का समर्थन करे, आदमी-आदमी के बीच भेदभाव को बढ़ावा दे, वह धर्म हो ही नहीं सकता. असल में वह तुम्हें गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र है.’

हिंदू धर्म से पूरी तरह निराश आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को विकल्प के रूप में चुना था. कदाचित यह उनकी मजबूरी थी. रूसो, वाल्तेयर, बैंथम, थामस पेन, जॉन स्टुअर्ट मिल, लॉस्की आदि जिन विचारकों से वे प्रभावित थे, वे या तो धर्म को अनावश्यक मानते थे, अथवा धर्म उनके लिए केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय था! आंबेडकर के लिए धर्म किसी आध्यात्मिक जिज्ञासा की पूर्ति तक सीमित नहीं था. वे धर्म के संगठन-सामर्थ्य को समझते थे तथा उसे नागरिक समाज की नींव मानते थे. बर्क को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था—‘सच्चा धर्म समाज की नींव है, जिसपर सब नागरिक सरकारें टिकी हुई हैं’(जाति का उन्मूलन, डॉ. भीमराव आंबेडकर). वस्तुतः जिन लोगों का वे नेतृत्व करते थे उनके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म का किसी न किसी प्रकार का हस्तक्षेप था. धर्म-विहीन जीवन की कल्पना भी उनके लिए असंभव थी. आंबेडकर के सामने बड़ा सवाल था कि हिंदू धर्म नहीं तो क्या? बौद्ध धर्म को अपनाने से पहले उन्होंने लगभग सभी लोकप्रिय धर्मों पर विचार किया था. वे समझते थे कि कोई भी धर्म विकृतियों से अछूता नहीं है. प्रत्येक की शुरुआत सामान्य शुभता से होती है. समाज की भलाई के लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं. यह मानते हुए कि उन नियमों के अनुपालन में ही सबका कल्याण है, सदस्यों की सामान्य सहमति के बाद उन्हें सामाजिक आचार-संहिता का हिस्सा बना दिया जाता है. लोकभाषा में वही धर्म कहलाता है. कालांतर में उसके साथ दूसरे मिथ, प्रतीकादि जुड़ते चले जाते हैं. सामाजिक आचार-संहिता का पालन सभी लोग समान निष्ठा के साथ करें, यह आवश्यक होने पर भी संभव नहीं हो पाता. इसलिए समय के साथ प्रत्येक धर्म में क्षरण का दौर आता है. उसके लिए सामाजिक असमानता का तरह-तरह से पोषण करने वाले शीर्षस्थ प्रवर्त्तक ज्यादा जिम्मेदार होते हैं. वे धर्म के नाम पर अपने लिए विशेषाधिकारों की मांग रखते हैं. परिणामस्वरूप जिन समतावादी मूल्यों के निमित्त धर्म का जन्म होता है, वह धूमिल पड़ने लगता है. प्रकारांतर में वह दिखावे की वस्तु बनकर रह जाता है.

बावजूद इसके यह मान लिया गया है कि धर्म मानव जीवन के लिए अपरिहार्य है. बिना उसके जीवन संभव ही नहीं है. मनुष्य को सामान्य नैतिकता के रास्ते पर बनाए रखने के लिए धर्म आवश्यक है. लेकिन धर्म यदि मनुष्य के लिए परिस्थितिजन्य अनिवार्यता है तो उसे ऐसा धर्म चुनना चाहिए जिसमें अधिकतम गत्यात्मकता हो. जो परंपरा और रूढ़ियों के जाल में कम से कम फंसा हो. जिसमें नएपन को अपनाने की अधिकतम छूट हो. जो मनुष्य को अपने निर्णय-सामर्थ्य का स्वागत करता हो. जो दूसरे धर्मों के प्रति उदार हो. इस कसौटी पर हिंदू धर्म आंबेडकर को पूरी तरह निराश करता था. इसलिए 1935 में ही उन्होंने हिंदू धर्म के त्याग की घोषणा कर दी थी. उस घोषणा के पीछे उनका व्यक्तिगत दर्द भी छिपा था. पंढरपुर स्थित ‘विठोबा’ के मंदिर की पूरे महाराष्ट्र में मान्यता थी. आंबेडकर की पहली पत्नी रमाबाई अकसर बीमार रहती थीं. वे पंढरपुर जाकर विठोबा के दर्शन करना चाहती थीं. लेकिन पवित्रता के ढकोसले के चलते मंदिर में अछूतों का प्रवेश वर्जित था. आंबेडकर अपनी पत्नी की यह इच्छा पूरी न कर सके. पत्नी की मृत्यु के पश्चात नासिक जिले के यावला नामक कस्बे में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने कहा था—‘मेरा जन्म हिंदू के रूप में हुआ है. परंतु मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं.’ परोक्ष रूप में वह एक संकल्प था—एक ऐसा पंढरपुर बसाने का जहां झूठी आस्था और पाखंड के स्थान पर ज्ञान, तर्क और मनुष्यता का साम्राज्य हो.

 

आंबेडकर और बौद्ध धर्म

हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म की यात्रा में आंबेडकर ने पूरे 21 वर्ष का समय लिया. इस बीच उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया. उस दौरान विभिन्न धर्मों के आचार्यो की ओर से अनेक प्रलोभन भी आए. लगभग सभी लोकप्रिय धर्मों की विवेचना के उपरांत उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म का चयन किया. मृत्यु से मात्र दो महीने पहले. क्या यह धर्मांतरण आवश्यक था? क्या एक धर्म से दूसरे धर्म के बीच की यात्रा तथा नए धर्म को ठोक-बजाकर देखने-परखने के लिए यह अवधि स्वाभाविक मानी जाएगी? ठीक है, धर्मांतरण या धर्म का चयन मनुष्य का निजी मसला है. परंतु आंबेडकर के संदर्भ में वह महज आस्था का विषय नहीं था. हम जानते हैं—वे जीवन-भर एक मिशनरी की तरह काम करते रहे. सरकार में रहकर और बाहर, स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए उन्होंने रात-दिन अनथक मेहनत की, ताकि दलितों और पिछड़ों को उनकी दुर्दशा से मुक्ति दिला सकें. ऐसे में अपने बारे में निर्णय लेने का उन्हें समय कहां था? तो क्या धर्मांतरण उनके लिए बाकी कार्यों की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण मसला था? इतना कि उसे 21 वर्षों तक टाला जा सके. या फिर वे हिंदू धर्म को सुधार के लिए पर्याप्त समय देना चाहते थे? जब उन्हें लगा कि संविधान लागू होने के छह वर्ष बाद भी हिंदू धर्म की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, न ही उसमें सुधार की कोई संभावना है तो निराश होकर 1956 में नागपुर में उन्होंने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. वे धर्म के संगठन-सामर्थ्य का उपयोग दलितों को संगठित करने के लिए करना चाहते थे. इस तरह धर्मांतरण का निर्णय उनके लिए निजी आस्था और विश्वास का मामला कम, हिंदू धर्म पर निर्णायक चोट करने तथा अपने समाज को, उस समाज को जो बिना धर्म के सांस लेना भी असंभव मानता था, एक बेहतर विकल्प की ओर ले जाने की छटपटाहट का नतीजा था.

आंबेडकर के विचारों पर हम कबीर और फुले के अलावा थॉमस पेन, मिल, वाल्तेयर, रूसो, बर्ट्रेंड रसेल, लॉस्की, बैंथम जैसे विचारकों का प्रभाव देखते हैं. इन विचारकों में से अधिकांश परंपरागत धर्म के चंगुल से बाहर थे. मानते थे कि धर्म अल्पज्ञों की बैशाखी है. जिन्हें खुद पर भरोसा नहीं होता वही धर्म की शरणागत होते हैं. धर्म उनकी बौद्धिक पंगुता को कम करने के बजाय उसका लाभ उठाता है. उसका नशा इतना गहरा होता है कि मनुष्य को अपनी निरंतर पांव पसारती पंगुता का एहसास तक नहीं होता. आंबेडकर विद्वता के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर चुके नेता, विचारक और समाज सुधारक थे. व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें धर्मनुमा बैशाखी की आवश्यकता ही नहीं थी. लेकिन जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, वह बहुत पिछड़ा हुआ था. शताब्दियों से धर्म के आश्रय में रहते हुए वह उसका अभ्यस्त हो चुका था. धर्म और जीवन को एक-दूसरे का पर्याय मानता था. उन्हीं की खातिर आंबेडकर को एक धर्म से दूसरे धर्म तक की यात्रा करनी पड़ी थी.

सवाल है बौद्ध धर्म ही क्यों? क्या इसलिए कि वह मध्यमार्गी था. उसकी नींव निरीश्वरवाद पर टिकी हुई थी? लेकिन बुद्ध के समय में निरीश्वरवादी विचारक तो और भी कई थे. अजित केशकंबलि, मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप, पुकुद कात्यायन, संजय वेलट्ठिपुत्त और कौत्स. वे सब अपने-अपने मत के आचार्य, विद्वान और विचारक थे. बुद्ध से पहले ही वे ब्राह्मण धर्म पर हमला कर समानांतर दर्शनों की स्थापना कर चुके थे. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे विषयों पर उन्हें भरोसा नहीं था. वैदिक कर्मकांडों का वे मजाक उड़ाते थे. पाणिनी शिष्य व्याकरणाचार्य कौत्स ने वेदों को ‘अर्थहीन और निस्सार’ माना था. बौद्ध ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि अपने समय में मक्खलि गोशाल के आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध मतावलंबियों से अधिक थी. हालांकि उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती. वे प्रकृति के साहचर्य में रहने वाले सीधे-सादे लोग थे. जैसा देखते-सोचते, वही लोगों को समझाते थे. उन्होंने कभी सोचा नहीं कि धर्म जो व्यक्तिगत आस्था का विषय है, कभी राजनीति का दायां हाथ बन जाएगा. वस्तुतः बुद्ध के जीवनकाल तक विचारों का आदान-प्रदान मौखिक किया जाता था. धर्म-दर्शन के संहिताकरण की कोई व्यवस्था नहीं थी. स्वयं बुद्ध ने अपने सारे उपदेश मौखिक ही दिए थे. उनके निर्वाण के नब्बे दिन बाद पहली धर्म-संसद हुई. उसमें बुद्ध के जीवन तथा दर्शन के संहिताकरण का संकल्प लिया गया. धर्म-संसद को मगध सम्राट अजातशत्रु का पूरा समर्थन प्राप्त था. निरीश्वरवादी विचारकों तथा उनके विचारों को कलमबद्ध करने के लिए न तो उस समय के बुद्धिजीवी उनके साथ थे न ही अजातशत्रु जैसे सम्राट का उन्हें समर्थन था. इस कारण वह परंपरा लंबे समय तक मौखिक ही बनी रही.

उस समय तक राजाओं की साम्राज्यवादी लालसाएं उमड़ने लगी थीं. धर्म इस कार्य में सहायक था. इस बीच ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच शताब्दियों तक चले संघर्ष में कमी आने लगी थी. बुद्ध और महावीर ने धर्म-दर्शन के क्षेत्र में ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोड़ा था. लोगों तक यह संदेश गया था कि ब्राह्मणों को उन्हीं के क्षेत्र में चुनौती देना संभव है. इसलिए वे समझौतावादी रवैया अपनाने को बाध्य हुए थे. मनुस्मृति इन दोनों वर्गों के बीच हुए समझौते का भी दस्तावेजीकरण है, जिसके माध्यम से शीर्ष के दोनों पद ब्राह्मण और क्षत्रियों ने कब्जा लिए थे. बौद्ध धर्म-दर्शन के संहिताकरण का काम उन्हीं लोगों को सौंपा गया जो या तो शीर्षस्थ वर्णां यानी ब्राह्मण और क्षत्रिय से थे अथवा उनके वर्चस्व का बिना शर्त समर्थन करते थे. राजाओं और श्रेष्ठि वर्ग का समर्थन होने से भी बुद्ध और महावीर को अपने धर्म-दर्शन के प्रसार में मदद मिली. शूद्र होने के कारण निरीश्वरवादी विचारकों—मक्खलि गोशाल, अजित केशकंबलि, पूर्ण कस्सप आदि को ऐसा कोई समर्थन प्राप्त नहीं था. इसलिए उनके विचार मौखिक परंपरा से बाहर न आ सके. उनके बारे में छिटपुट जानकारी हमें बौद्ध एवं जैन ग्रंथों से ही प्राप्त होती है. तदनुसार वे तर्क और ज्ञान पर आधारित भौतिकवादी विचारधाराएं थीं. इन सबको पढ़ते-समझते हुए आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को वरीयता दी. कदाचित उन्हें लगता था कि ठेठ निरीश्वरवादी विचारधारा को उनका अशिक्षित समाज एकाएक स्वीकार नहीं कर पाएगा. समाज को संगठित रखने के लिए वे कोई भी समझौता करने को तैयार थे. बौद्ध धर्म की खूबी है कि वह धुर भौतिकवादी और ठेठ ब्राह्मणवादी दर्शनों के बीच जगह बनाता है. चार्वाकों, लोकायतों और आजीवकों की भांति वह ईश्वर, आत्मा आदि को नकारता नहीं, बस उन्हें किनारे कर जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान देता है. पहली बार नैतिकता को धर्म-दर्शन का हिस्सा बनाने का श्रेय भी बुद्ध को ही जाता है. बौद्ध धर्म की ये विशेषताएं आंबेडकर के विचारों के अनुकूल थीं. यही बौद्ध धर्म की ओर उनके आकर्षण की वजह बनी थीं. फिर भी एक सवाल बाकी रह जाता है. धर्मांतरण के लिए बौद्ध धर्म को चुनने के पीछे क्या यही एकमात्र कारण था?

ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म का पराभव उसकी अपनी ही विकृतियों के कारण हुआ था. अपने लेखों और पुस्तकों में आंबेडकर ने इस तथ्य की विस्तृत समीक्षा की है. ईसाई, इस्लाम और सिख धर्म में भी जाति के लिए कोई जगह नहीं है, तो भी वहां समानता का अभाव है. बौद्धकालीन भिक्षु संघों के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे. जातीय स्तरीकरण, बलि, आडंबर, यज्ञादि कर्मकांडों के लिए उसमें कोई स्थान न था. बुद्ध के समय में वर्ण जाति के रूप में रूढ़ होने लगे थे. धर्म-सूत्रों के लिखने की शुरुआत हो चुकी थी. बावजूद इसके विपुल बौद्ध साहित्य में जाति का उल्लेख नहीं है. न ही उसके आधार पर ऊंच-नीच या भेद-भाव है. पेशों का उल्लेख अवश्य है, जिसे स्वाभाविक माना जाएगा. आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्मों को वरीयता देने का प्रमुख कारण भी यही था. उनका मानना था कि हिंदू धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म में न्याय, नैतिकता और बराबरी के अधिक अवसर हैं. यह बात अलग है; स्वयं डॉ. आंबेडकर ने भी माना है कि भिक्षु संघों में कथित निचली जाति के सदस्यों की संख्या केवल 8.5 प्रतिशत तक सीमित थी, जबकि ब्राह्मणेत्तर जातियों की संख्या उस समय भी देश की कुल जनसंख्या की तीन-चौथाई रही होंगी. इतनी जनसंख्या होने के बावजूद ब्राह्मणेत्तर वर्ग बौद्ध धर्म की ओर से क्यों उदासीन थे? क्यों 75 प्रतिशत ब्राह्मणेत्तर जातियों को गौतम बुद्ध का प्रभा-मंडल आकर्षित नहीं कर पाया था? इन प्रश्नों पर कदाचित आंबेडकर कर ध्यान नहीं गया. न ही बाद में किसी इतिहासकार ने इनपर विचार किया है. फिलहाल इसे शोध का विषय कह सकते हैं. हो सकता है तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश पर विचार करते हुए कुछ तथ्य सामने आ जाएं.

ब्राह्मणेत्तर वर्ग में मुख्यतः कर्मकार जातियां सम्मिलित थीं. उनके सदस्य छोटे-मोटे उद्यमी, शिल्पकार अथवा श्रमिक थे. परिवार के मुखिया या वरिष्ठ सदस्य के लिए यह बहुत कठिन था कि अपनी जिम्मेदारियों से पलायन कर संन्यास ले; अथवा बौद्ध संघ में सम्म्मिलित होकर श्रमण परंपरा का अनुपालन करे. दूसरा कारण अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण है. दरअसल बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में धर्म उतना संगठित एवं शक्तिशाली नहीं था, जितना बाद के वर्षों में देखने को मिला. आश्रमों और गोत्रों की परंपरा थी. सबके अपने-अपने मुखिया और विश्वास थे, जिन्हें वे अपनी-अपनी तरह से सहेजने और आगे बढ़ाने में लगे रहते थे. आश्रम संचालकों का शेष समाज से संबंध दानादि तक सीमित था. यज्ञ के लिए अधिक धन की आवश्यकता हो तो राजा अथवा धनी व्यक्ति की मदद ली जाती थी. शूद्रों का काम मुख्यतः सेवा करना था. उन्हें धार्मिक कर्मकांड में हिस्सा लेने की अनुमति न थी. धार्मिक कर्मकांडों का आयोजन खर्चीला उद्यम था. यह मानते हुए कि शूद्र उसका खर्च उठाने में अक्षम हैं, ब्राह्मणों ने खुद उन्हें यज्ञ के अधिकार से वंचित किया हुआ था. इसके लिए महाभारत में युधिष्ठिर के मुख से कहलवाया गया है—‘कोई गरीब आदमी यज्ञ नहीं कर सकता, क्योंकि यज्ञ के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री प्रचुर मात्रा में इकट्ठी करनी पड़ती है. आगे उसने यह भी कहा है कि यज्ञ करने की योग्यता राजाओं और राजकुमारों को हो सकती है, न कि अकिंचनों और असहायों को.’3 इससे स्पष्ट है कि धार्मिक सरोकार, विशेषकर याज्ञिक कर्मकांड मुख्यतः ब्राह्मणों और क्षत्रियों तक सीमित थे. एकाधिकार की भावना इतनी प्रबल थी कि बाकी वर्गों के निकट आने की भी मनाही थी. राज्य छोटे-छोटे, नगर-राज्य की सीमाओं में कैद थे. उनके आश्रय में पलने वाला पुरोहित वर्ग खुद को आमजन से ऊपर मानता था. बाहरी चुनौती न होने के कारण अधिकाधिक लोगों को धर्म से जोड़ने की उन्हें चिंता भी नहीं थी. कुल मिलाकर धार्मिक विश्वास ताल-तलैया में भरे जल की भांति उथले थे. बावजूद इसके हर वर्ग अपने विश्वास को ही सर्वोत्तम, विशिष्ट और पवित्रतम मानता था. ब्राह्मणों और क्षत्रियों के संबंध भी सहज न थे. उनके बीच वर्चस्व का संघर्ष प्राचीनकाल से चला आ रहा था. लेकिन शेष जाति-वर्गां को लेकर दोनों का व्यवहार एक जैसा था. मनुस्मृति की आलोचना वर्ण-व्यवस्था को शास्त्रीयता का जामा पहनाने के लिए की जाती है. असल में वह शीर्षस्थ वर्गां के बीच समझौते तथा संसाधनों के असमान बंटवारे को ईश्वरीय घोषित करने की चाल थी, ताकि शेष जनसमाज दुरावस्था को ही अपनी नियति मानकर जीता रहे. तदनुसार समाज का बामुश्किल दस प्रतिशत हिस्सा उसके संपूर्ण संसाधनों पर कब्जा जमाए रहता था. धर्म ब्राह्मण के लिए आज भी धंधा है, तब भी धंधा था. बाकी धंधे भौतिक लाभ-हानि के सिद्धांत पर चलाए जाते थे, उसका धंधा पवित्रता और अध्यात्म के नाम पर फलता-फूलता था. रक्षक होने का दावा करते हुए क्षत्रिय भी उसका भोग करता था.

 

शीर्षस्थ वर्गों की सेवा में लगे शूद्रों के अलावा उनका एक वर्ग ऐसा भी है जो अपने शिल्प-कौशल के कारण अपेक्षाकृत स्वतंत्र था. उसमें किसान, धातुकर्मी, बढ़ई, रथ-कार, चर्मकार, बुनकर, रंगरेज, राज-मिस्त्री, तैलिक आदि लोग आते थे. शीर्षस्थ वर्गों को उनकी सेवाओं की जरूरत थी. अपने शिल्प-कौशल के कारण वे आर्थिक स्तर पर अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर समूह थे. ब्राह्मण उन्हें शूद्र कहकर वैदिक कर्मकांडों से अलग रखते थे तो उन्हें भी उनके कार्यक्रमों पर विश्वास न था. वे केवल अपने काम में लिप्त रहते थे. कृषि और पशुपालन दोनों अर्थव्यवस्थाओं में पशुधन की महत्ता थी, उसे बलि के बहाने गंवा देना आर्थिक दृष्टि से भी नुकसानदेह था. इस कारण ब्राह्मणेत्तर जातियों का बड़ा हिस्सा आजीवक विचारधारा का समर्थक था, जो यज्ञादि कर्मकांडों को ढकोसला, पोंगापंथी ब्राह्मणों की चाल मानते थे. महावीर और बुद्ध पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने धर्म के आधार पर समाज को संगठित करने की कोशिश की थी. उस समय उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से उन वर्गों की ओर गया जिन्हें ब्राह्मणों ने धार्मिक कर्मकांड के दायरे से बाहर रखा था. उनमें भी अधिक सफलता बुद्ध को मिली. माना जाता है कि अहिंसा पर अतिरिक्त जोर देने के कारण जैन धर्म लोगों को अव्यावहारिक लगता था. परंतु बौद्ध धर्म की अपेक्षा उसके पिछड़ जाने का एकमात्र यही कारण नहीं था. असली कारण जैन धर्म द्वारा वर्ण-व्यवस्था को ज्यों का त्यों स्वीकार लेना था. वर्ण-व्यवस्था को लेकर ब्राह्मण-धर्म और जैन धर्म की विचारधाराएं परस्पर मेल खाती थीं. अंतर केवल इतना है कि ब्राह्मण-संस्कृति में वर्ण-व्यवस्था के उत्स की खोज हमें ऋग्वेद तक जाती है, जैन धर्मावलंबियों के अनुसार उसकी शुरुआत आदि तीर्थंकर द्वारा की गई थी.

हमारा मूल प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है. आखिर क्या कारण है कि आंबेडकर ने अपने समय के लोकप्रिय धर्मों को छोड़कर बौद्ध धर्म का समर्थन किया था? ऐसा कौन-सा आकर्षण था उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति? जैसा कि ऊपर कहा गया है, बुद्ध के समय आजीवक संप्रदाय की काफी प्रतिष्ठा थी. आंबेडकर आजीवकों के बारे में मौन रह जाते हैं. कदाचित वे सोचते थे कि अपढ़-अशिक्षित जनसमाज बौद्धिक रूप से इतना परिपक्व नहीं है कि किसी नास्तिक दर्शन को अपना सके. दूसरे आजीवकों के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत प्रच्छन्न हैं. जो हैं वे केवल सूत्र रूप में प्राप्त होते हैं. उनमें भी भारी दोहराव है. एक मुश्किल यह भी है कि व्यक्ति से उसका विश्वास एकाएक छीन पाना संभव नहीं होता. उसकी या तो किसी बड़े विश्वास के साथ अदला-बदली की जा सकती है, अथवा विवेक द्वारा धीरे-धीरे समाहार हो सकता है. दलित समाज संत परंपरा का अनुयायी था. कबीर, रैदास, पल्टू जैसे संतकवियों को अपना गुरु मानता था. उन सभी ने तंत्र-मंत्र, कर्मकांड आदि का तो विरोध किया, किंतु किसी न किसी रूप में आत्मा-परमात्मा के अस्तित्व का समर्थन करते थे. स्वयं आंबेडकर के पिता कबीरपंथी थे. ‘मानुष होना कठिन हया, तू साधू कैसे होया’ जैसे कबीरपंथी पदों को सुनते हुए उन्होंने मानवतावाद का पहला पाठ पढ़ा था. वे देशी-विदेशी साहित्य के अध्येता तथा प्रकांड विद्वान थे. ऐसा व्यक्ति बने-बनाए रास्तों का अनुसरण नहीं करता. अपने तथा दूसरे लोगों के लिए नए रास्ते बनाता है. आंबेडकर का पूरा जीवन इसी की मिसाल है.

आंबेडकर का मुख्य ध्येय दलितों में आत्मविश्वास पैदा करना था. वह केवल शिक्षा और राजनीति द्वारा ही संभव था. इसलिए वे एक ओर तो सवर्णों से पर्याप्त सामाजिक-सांस्कृतिक लोकतंत्र की मांग करते रहे, दूसरी ओर दलितों के राजनीतिकरण, शिक्षा और संगठन पर जोर देते रहे. ताकि त्वरित परिवर्तनशील माहौल में वे अपनी जगह बना सकें. संभव है इसके पीछे उनके अपने जीवनानुभवों का भी योगदान रहा हो. उनके पिता सेना में थे. महारों ने अंग्रेजों की सेना में रहते हुए कई निर्णायक युद्धों में भाग लिया था. कोरेगांव के युद्ध में उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ देते हुए पेशवा छत्रपतियों को पराजित किया था. आंबेडकर ने कोरेगांव युद्ध में शहीद महार सैनिकों का स्मारक बनवाने की पहल की थी. प्रत्येक वर्ष जनवरी में वे वहां शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने जाते थे. प्राचीन भारतीय समाज और संस्कृति के बारे में उन्होंने जितना लिखा है, उसमें बौद्ध धर्म के अलावा क्षत्रियों और ब्राह्मण के संघर्ष को ही अधिक स्थान मिला है. इससे पता चलता है कि उनके मन में क्षत्रियत्व के प्रति विशेष आकर्षण था. शूद्रों की उत्पत्ति को लेकर आंबेडकर की सामान्य धारणा थी कि वे पराजित सैनिक, युद्ध-बंदी क्षत्रिय थे. इतिहास का यह पक्ष किसी न किसी रूप में उनके अवचेतन पर आरंभ से ही छाया हुआ था. धर्म-दर्शन के क्षेत्र में ब्राह्मणों का वर्चस्व सर्वमान्य था. बुद्ध ने पहली बार ब्राह्मणों को न केवल धर्म-दर्शन के क्षेत्र में चुनौती दी थी, बल्कि ब्राह्मण-श्रेष्ठत्व के मिथ का भी सटीक प्रत्युत्तर दिया था. ‘अंबट्ठसुत्त’ में वे अनेक तर्क देकर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से उच्चतर सिद्ध करते हैं. उससे पहले आजीवक, लोकायत आदि विद्वान् वर्ण व्यवस्था को ही नकारते थे, परंतु वर्ण व्यवस्था के भीतर रहते हुए ब्राह्मणों के श्रेष्ठत्व को चुनौती देने का काम सबसे पहले बुद्ध ने किया था. हालांकि उस समय वे वर्णव्यवस्था का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. इस बारे में कुछ और प्रमाण भी दिए जा सकते है. एक प्रवचन के दौरान वे कहते हैं—‘बुद्धिमान व्यक्ति को यह जानकारी होनी चाहिए कि उसकी प्रियतमा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्णों में से किस वर्ण की है.’4 तथापि बुद्ध का वर्ण-सिद्धांत विशुद्ध कर्म के सिद्धांत पर आधारित था. उसमें किसी को भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे.

इससे यह निष्कर्ष निकालना कि भिक्षु-संघ जातीय भेदभाव से सर्वथा परे थे, जल्दबाजी होगी. उनमें शामिल होने वाले लोग आखिर थे तो समाज का ही हिस्सा. उस समाज का हिस्सा जिसमें जाति-आधारित भेदभाव बहुत आम था. भिक्षु-संघ में आने के बाद भी उनके व्यवहार में एकाएक बदलाव नहीं हो पाता था. बुद्ध के शिष्यों में उपालि का नाम भी आता है. वह जाति से नाई था और प्रवज्या लेकर संघ में सम्मिलित हुआ था. बुद्ध के पांच करीबी शिष्यों में उसका नाम था. बावजूद इसके भिक्षुणियां उपालि की जाति को लेकर प्रायः उसपर कटाक्ष करती रहती थीं. बुद्ध इस विकृति से परिचित थे. जाति को लेकर संघ में किसी प्रकार का द्वेष न फैले इसलिए उन्होंने निर्देश जारी किए थे कि ‘संघ में कोई भी भिक्षुओं की पूर्व जाति, कम्म आदि के बहाने किसी को अपमानित न करें. न ही इस प्रकार का कोई भेद-भाव करें.’(विनयपिटक, 4/4/11). उनके अनुसार अपने पुरुषार्थ से शूद्र यदि आर्थिक रूप में सक्षम हो तो वह ‘अपने सेवक के रूप में न केवल दूसरे शूद्र को, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य किसी को भी नियुक्त कर सकता था.’(मज्झिम निकाय-II पृष्ठ 84-85, डॉ. रामशरण शर्मा, शूद्रां का प्राचीन इतिहास से उद्धृत). इसी विज्ञानवादी दृष्टिकोण से प्रभावित होकर आंबेडकर ने बौद्ध धर्म का वरण किया था. बुद्ध ने उस दौर में समानता का पक्ष लिया था जब प्रायः सभी प्रमुख दर्शन अभिजात मानसिकता के अनुरूप जनसाधारण से दूरी बनाए थे. आंबेडकर को लगता था कि बौद्ध धर्म को अपनाकर ब्राह्मणवाद पर निर्णायक चोट की जा सकती है, जिसके फलस्वरूप जातिविहीन समाज की स्थापना भी संभव है. वे धर्म के संगठन सामर्थ्य से परिचित थे. उन्हें लगता था कि धर्म-विमुख विचारधारा को दलित समाज एकाएक आत्मसात नहीं कर पाएगा. कदाचित वे सोचते थे कि ईश्वराधारित धर्मों की अपेक्षा ईश्वर को किनारे रखकर जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान देने वाला धर्म, अपने श्रम-कौशल पर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए अधिक उपयोगी होगा; तथा उसके माध्यम से दलितों को एकजुट रखकर देश की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप कर पाना संभव होगा. वे चाहते थे कि समाज आत्मा-परमात्मा की निरर्थक वितंडा से बाहर निकलकर रोजमर्रा की परेशानियों के बारे में सोचे. इस दृष्टि से प्रचलित धर्मों की अपेक्षा बौद्ध धर्म अधिक मुफीद था. देरिदा की मदद लेते हुए कहा जा सकता है कि वे ब्राह्मणों द्वारा गढ़े इतिहास, धर्म और संस्कृति का संपूर्ण विखंडन कर नए, आधुनिकताबोध से अनुप्रेत समाज की नींव रखना चाहते थे. उसके लिए बौद्ध धर्म जरूरी औजार जैसा था.

 

ईश्वरीय विधान बनाम कानून का राज

 जाति के कारण आंबेडकर को अनेक अवसरों पर हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा अपमान का सामना करना पड़ा था. बचपन से बड़े होने तक वे ऐसे ही हालात से गुजरते रहे. पूरे देश का बुरा हाल था. छूआछूत और भेदभाव की भावना बच्चों के दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भर दी जाती थी. यह घटना तब की है जब वे सतारा स्कूल में पढ़ने जाते थे. जैसा चलन था, बच्चे अपना टिफिन ब्लैकबोर्ड के पीछे रखते थे. एक दिन की बात, अध्यापक ने भीमराव से ब्लैकबोर्ड पर आकर गणित का सवाल हल करने को कहा. आंबेडकर उठें, उससे पहले ही पूरी कक्षा में हड़कंप मच गया. बच्चे बदहवास होकर दौड़ पड़े. गिरते-पड़ते, एक दूसरे से टकराते हुए सब ब्लैकबोर्ड तक पहुंचे. भीमराव वहां पहुंचें उससे पहले ही सबने अपना-अपना टिफिन उठा लिया. वे बुरी तरह घबराए हुए थे. कुछ बच्चे चीखे जा रहे थे. मानो भूचाल आ गया हो. प्रत्येक को डर था कि अछूत भीमा के ब्लैकबोर्ड तक पहुंचते ही उसके पीछे रखा भोजन अपवित्र हो जाएगा. बालक भीमराव के दिल पर क्या गुजरेगी, इसका उन्हें भान न था. न ही उन्हें ऐसा कुछ सिखाया गया था. ऐसे ही दर्जनों उदाहरण हैं. आंबेडकर जीवन-भर इस तरह के अपमान झेलते रहे. अंततः उन्होंने अपने लाखों समर्थकों के साथ हिंदू धर्म को छोड़ने का निर्णय लिया था. वह उनकी प्रतीकात्मक कार्रवाही थी. जातिवादियों के नाम संदेश देते हुए एक बार उन्होंने कहा था—हिंदू धर्म स्वयं नहीं बदला तो उसे बहुत जल्दी मिटने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.

वे यह भी जानते थे कि धर्मांतरण समस्या का एकमात्र समाधान नहीं है. दलितों की दुर्दशा का अंत तब तक असंभव है, जबतक राज्य और कानून उनके अधिकारों के समर्थन में न हों. यह केवल विधि-शासित राज्य में ही संभव है. मगर कानून का राज्य भी तभी सफल हो सकता है जब नागरिक अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हों. इसके समाधान हेतु वे लोकतंत्र का सामाजिक-सांस्कृतिक परिक्षेत्रों में विस्तार चाहते थे. उनका विचार था कि अपनी मांगों को राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित रखने वाले नेता, बहुसंख्यक समाज को वास्तविक स्वतंत्रता से दूर रखना चाहते हैं. बिना सामाजिक स्वतंत्रता के राजनीतिक-आर्थिक स्वतंत्रता निरर्थक है—ऐसा उनका मानना था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान तिलक जैसे हिंदू नेताओं का नारा था—‘वेदों की ओर वापसी.’ अप्रत्यक्ष रूप में यह प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था की पुनर्वापसी का ब्राह्मणवादी षड्यंत्र था. उसका उन सपनों से कोई वास्ता न था, जिन्हें उत्पीड़ित समाज आजादी के साथ साकार करना चाहता था. आंबेडकर जानते थे कि भीषण असमानता, शोषण एवं उपेक्षा के शिकार दलितों के लिए जिन्हें आरंभ से ही शिक्षा से वंचित रखा गया है, ऐसे नारे निरर्थक और प्रतिगामी हैं. वे उसी समाज में अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठा सकते हैं, जहां पर्याप्त समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा हो. तिलक के एक और प्रसिद्ध नारे के उत्तर में उनका कहना था—‘तिलक यदि अछूत परिवार में जन्मे होते तो बजाय यह कहने के कि ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है,’ कहते—‘अश्पृश्यता उन्मूलन मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.’5 उनका कहना था कि सरकार यदि तिलक की स्वतंत्रता की मांग को तत्काल मान लेती है, तो वह केवल ब्राह्मणों की आजादी होगी. उसका लाभ समाज के बहुत छोटे-से समूह को प्राप्त होगा, जो समाज में पहले से ही लाभ की अवस्था में रहा है. दलितों और पिछड़ों के हालात में उससे कोई सुधार होने वाला नहीं है. उन्होंने लिखा था कि समाज की शक्तियों और अधिकारों का सीमित हाथों में सिमट जाना सर्वथा अलोकतांत्रिक है. अतएव सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग करना या केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संतुष्ट होकर रह जाना, पूर्णतः अलोकतांत्रिक कदम होगा. इस विचार को वे अपने विभिन्न लेखों में तरह-तरह से उठाते हैं. उन्हीं के शब्दों में—

‘लोकतांत्रिक शासन के लिए लोकतांत्रिक समाज का होना बहुत आवश्यक है. लोकतंत्र के औपचारिक ढांचे का, यदि उसमें सामाजिक लोकतंत्र का अभाव है, तो कोई महत्त्व नहीं है. यदि सामाजिक लोकतंत्र नहीं है तो राजनीतिक लोकतंत्र भी अपूर्ण एवं अनुपयुक्त होगा. वस्तुतः राजनीति से जुड़े लोगों ने यह कभी महसूस नहीं किया कि लोकतंत्र केवल शासन तंत्र नहीं है. वह वास्तव में सामाजिकता का तंत्र है. लोकतांत्रिक समाज के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसमें एकता, सामुदायिक उद्देश्य, लोकहित के प्रति निष्ठा तथा पारस्परिक सहानुभूति जैसी विशेषताएं हों. उसके लिए दो बातें साफ तौर पर आवश्यक होती हैं. पहली है—उदार मनोवृत्ति. अपने साथियों के प्रति सम्मान और समानता का भाव. दूसरी है—एक सामाजिक संगठन जो कठोर सामाजिक बंधनों से सर्वथा मुक्त हो. लोकतंत्र की सदस्यों के अलगाव या अकेलेपन के साथ संगति नहीं होती. ये चीजें समाज में सुविधा-संपन्न एवं सुविधा-वंचित लोगों के बीच दरार पैदा करती हैं.’ (डॉ. आंबेडकर, रानाडे, गांधी और जिन्ना).

भारतीय समाज में व्याप्त भारी असमानता का एक कारण यह है कि वह उन धर्म-ग्रंथों से प्रेरणाएं लेता आया है, जिनमें समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे और सहिष्णुता को उपेक्षित रखा गया है. जो अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय उन अदृश्य शक्तियों के नाम पर लेता है, जिनके आगे मनुष्य का अस्तित्व बिलकुल गौण मान लिया जाता है. चूंकि वे ग्रंथ मानवीय अस्मिता और अधिकारों की अवहेलना करते हैं, इसलिए उनमें मानवीय विवेक को उपेक्षित रखा जाता है. सहज प्रश्नाकुलता को दबाए रखने के लिए विचार-स्वातंत्र्य को भी विद्रोह मान लिया जाता है. दूसरों के श्रम पर पलने वाले अभिजन समूहों को बहुसंख्यक जनसमाज पर शासन करने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है; तथा श्रम से दूर, दूसरों के अर्घ्य के सहारे सांस लेने वालों को देवता का दर्जा देकर पूज्य और पूरे समाज के लिए मानक बना दिया जाता है. धर्म के नाम पर बने वे संगठन इतने शक्तिशाली होते हैं कि बड़े-बड़े भूपति उनके आगे घुटने टेकते आए हैं.

सम्राट वेन का किस्सा अनेक पुराणों में आया है. यह कहानी उन दिनों की याद दिलाती है जब जनता अपना राजा स्वयं चुनती थी. वेन को जनता द्वारा चुना गया प्रथम सम्राट माना गया है. निर्वाचित राजा होने के कारण वेन खुद को जनता के प्रति उत्तरदायी समझता था. जबकि धर्म और राजनीति के माध्यम से समाज पर काबू गांठने को आतुर पुरोहित वर्ग चाहता था कि राजा उसके हितों को प्रमुखता दे. ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को स्वीकार करे. वेन को यह स्वीकार न हुआ तो उन्होंने लोगों को उसके विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया. पुराणों में यह कहानी अपने विकृत रूप में है. ठीक ऐसे ही प्रस्तुत की गई है जैसी ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाली दूसरी कहानियां और मिथ उनमें आए हैं. ब्राह्मणों के बहकावे में आकर उग्र भीड़ वेन की हत्या कर देती है. इस तरह ब्राह्मणों के शब्दों में ‘अन्यायी’ वेन का अंत हो जाता है. पुराणों में दर्ज कथा को पढ़कर आप उससे इतर निष्कर्ष निकाल ही नहीं सकते. परंतु जब हम कहानी के पृथु वाले हिस्से पर जाते हैं तो तस्वीर पूरी तरह साफ नजर आने लगती है. वेन के बाद ब्राह्मण उसके पुत्र पृथु को राजा बनाते हैं. राजा बनते समय पृथु प्रजा के प्रति ईमानदार और कर्मनिष्ठ रहने की शपथ नहीं लेता. उसे शपथ दिलाई जाती है, ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को स्वीकारने की. उनके कहे अनुसार चलने की. कभी उनकी अवज्ञा न करने तथा सदैव उन्हें अपना पूज्य मानने की. पृथु द्वारा शपथ लेते ही प्रकरण का पटाक्षेप नहीं होता. बताया जाता है कि पृथ्वी का नामकरण भी उसी ब्राह्मण-भक्त सम्राट के नाम पर हुआ है. यह दर्शाने के लिए कि पूरी पृथ्वी ब्राह्मणों के अनुशासन में है. वही सबके स्वामी, सर्वेसर्वा और पथ-प्रदर्शक हैं.

सवाल है कि धर्म को इतनी शक्ति मिलती कहां से है? क्या देवताओं से? परंतु उसका तो कोई प्रमाण नहीं है. उनका अस्तित्व वायवी है. धर्म को वास्तविक ताकत उसके अनुयायियों की ओर से मिलती है. केवल जनसमाज धर्म को, राजनीति को और व्यापार को सफल और शक्तिशाली बनाता है. उन्हें सत्ता के रूप में न केवल पालता-पोसता है बल्कि अपने व्यक्तित्व को उनके आगे तुच्छ मानकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके लिए खपता चला जाता है. अतीत में जाकर इसकी पुष्टि भी संभव है. करीब ढाई हजार वर्ष पहले तक समाज के स्तर पर पर्याप्त लोकतांत्रिकता थी. नागरिकगण स्वयं स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी संभालते थे. महत्त्वपूर्ण निर्णय परस्पर विचार-विमर्श द्वारा मिल-जुलकर लिए जाते थे. राज्य भी उतने शक्तिशाली न थे. न ही आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आज जितना वैषम्य था. धीरे-धीरे धर्म का प्रसार हुआ. उसने लोगों के दिलो-दिमाग को अपने बस में करना आरंभ कर दिया. कहने को धर्म सामूहिकता का उद्यम है. असल में उसकी सामूहिकता दिखावे के लिए होती है. जो चालाक लोग हैं वे इस रहस्य को समझते हैं. इसलिए धर्म का उपयोग अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए करते हैं. परंतु जो ऐसे नहीं हैं. जो दूसरों के साथ विश्वास भरा जीवन जीना चाहते हैं, वे प्रकारांतर में इहलौकिक सुखों को ओर से मुंह मोड़ जानबूझकर छाया के पीछे भागने लगते हैं. जिनके वे अधिकारी हैं, वे सुख भी छीन लिए जाएं तब भी उफ् नहीं करते. हालात को नियति मानकर स्वीकार लेते हैं. धर्म का नशा उनके सहज विवेक को कुंठित किए रहता है. ऐसे लोगों का शोषण आसान होता है. दुख की बात यह है कि ऐसे लोग बहुतायत में होते हैं. धर्मसत्ता, राजसत्ता और अर्थसत्ता की प्रगति इन्हीं के कंधों पर टिकी होती है. धर्माचार्य उनकी संख्याबल के आधार पर आवश्यकतानुसार राजसत्ता पर दबाव बनाए रहता है. व्यापारी उनकी सदाशयता का लाभ उठाते हुए उनसे उनके श्रम के मूल्यांकन के अधिकार हर लेता है. राजसत्ता अपने मददगार पुरोहितों को बढ़ावा तथा व्यापारी की बेईमानियों को संरक्षण देती है. बदले में व्यापारी राजसत्ता को भेंट, सौगात कर आदि देकर अपनी ओर मिलाए रखता है. तीनों वर्ग भली-भांति जानते हैं कि वे जनता की शक्ति और संसाधनों का उपयोग करते हैं. केवल जनता उस ओर से अनजान होती है. अतएव जनता को उसकी शक्तियों का बोध कराना तथा अधिकारों से परचाना, परिवर्तनकारी आंदोलनों की पहली मांग होती है.

आंबेडकर इस सच को भली-भांति समझते थे उनकी लड़ाई भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद की विषबेलि, अशिक्षा, अज्ञानता और आडंबरवाद से थी. समाज और कानून के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय योगदान के आधार पर हम उन्हें आधुनिक सभ्यता का वास्तुकार भी कह सकते हैं. हम जानते हैं कि आधुनिकता केवल फैशन का पर्याय नही हैं. फैशन तो उसका बाहरी आवरण है. आधुनिकता बदलते समाजार्थिक मूल्यों को आत्मसात् करते हुए, वर्तमान के साथ अद्यतन रहने की कला है. जिसे हम, आप आधुनिक होना कहते हैं, उसकी नींव मानव-अधिकार, समानता और स्वतंत्रता पर टिकी है. प्रौद्योगिकीय क्रांति के फलस्वरूप आज बाजार में ऐसे अनेक उपकरण हैं, जिनके चलते परिवार और समाज पर मनुष्य की निर्भरता घटी है. आधुनिक सभ्यता के आकलन की व्यावहारिक कसौटी भी यही है. वास्तविक आधुनिकता तर्क, ज्ञान, सहज मानवीय विश्वास पर केंद्रित नए जीवन-मूल्यों को आत्मसात् कर लेने में है. इसका आशय यह नहीं है कि आधुनिकता मनुष्य और समाज के अंतर्संबंधों पर भारी पड़ती है. मनुष्य को समाज की जितनी जरूरत पहले थी, उतनी आज भी है और आगे भी रहेगी. आधुनिकता एक ओर समाज में मनुष्य की महत्ता को भी चिह्नित करती है, दूसरी ओर उसे समाज के प्रति ज्यादा जिम्मेदार भी बनाती है. मनुष्य की कमजोरी है कि केवल किसी वस्तु के आने से उसकी अहं-तुष्टि नहीं होती. वस्तु के बारे में दूसरों को बताना भी उसे जरूरी लगता है. इसलिए प्रौद्योगिकीय विकास द्वारा मनुष्य और समाज के संबंधों में स्वाभाविक परिवर्तन आता रहता है. आधुनिकता का अभिप्राय उन संबंधों के लोकोपकारी स्वरूप को समयानुसार मान्यता देते रहना है.

इस दृष्टि से देखें तो समकालीन नेताओं के बीच कदाचित आंबेडकर अकेले थे, जो आधुनिकता और मनुष्यता के अंतर्संबंधों से भली-भांति परिचित थे. इसलिए वे समाज में निरंतर उन मूल्यों का समर्थन करते रहे, जिनसे सभ्यता का परिष्कार हो सके. वे प्रखर लेखक थे, प्रकांड विद्वान. उन्होंने विपुल लेखन किया. उनके लेखन में सघन प्रतिबद्धता है. उनका लिखा एक-एक शब्द आंदोलनधर्मी है. उसका एकमात्र ध्येय था—समाज के दमित-शोषित वर्गों की समस्याओं को केंद्र में लाना, उनके लिए न्याय सुनिश्चित करना तथा अशिक्षा और अज्ञानता के अंधकार में डूबे लोगों को उनके शोषण और शोषणकारी परिस्थितियों से परचाना. रूसो का कहना था कि मनुष्य आजाद जन्मता है. लेकिन हर जगह बेड़ियों में रहता है. वे बेड़ियां कहां से आती हैं. इसका उत्तर रूसो का समकालीन वाल्तेयर हमें देता है. वह ईश्वर को खूंटा और धर्म को रस्सा मानता था. उसके अनुसार धार्मिक अंधता का शिकार मनुष्य ईश्वर नामक खूंटे के चारों ओर चक्कर काटता रहता है. यूरोपीय पुनर्जागरण के दिनों में लॉक, वाल्तेयर और रूसो ने धर्म और उपलब्ध ज्ञान के प्रति मनुष्य की आलोचनात्मक सोच को पुख्ता किया था. लॉक ने ज्ञानार्जन में अनुभव की महत्ता पर जोर देते हुए मानव-मस्तिष्क की अंतहीन सीमाओं की ओर संकेत किया था. वह स्थापित ज्ञान को ज्यों का त्यों मानने की अपेक्षा उन्हें तर्कसम्मत ढंग से अपनाने का पक्षधर था. वाल्तेयर और रूसो ने धर्म के मकड़जाल को भेदने के लिए अनेक जीवनमंत्र दिए थे. रूसो मानवमात्र की स्वतंत्रता का समर्थक था. उनके क्रांतिधर्मा सोच ने ही फ्रांसिसी क्रांति की नींव रखी थी. भारत के संदर्भ में आंबेडकर वाल्तेयर और रूसो दोनों की भूमिका का साथ-साथ निर्वाह करते हैं. उनका कहना था—

‘गुलाम को उसकी गुलामी का एहसास करा दो, वह क्रांति कर देगा.’

यहां अरस्तु भी याद आते हैं. सुकरात, प्लेटो और अरस्तु तीनों के विचारों में बड़ा अंतर है. परंतु समाज, संस्कृति और राजनीति के प्रति नैतिकतावादी दृष्टिकोण के मामले में वे एक-दूसरे का पूरी तरह समर्थन करते थे. तीनों विचारक शुभत्व को समाज का मूलाधार मानते थे. सुकरात का मानना था कि मानव जीवन का एकमात्र ध्येय शुभत्व की प्राप्ति है. वह केवल नैतिक आचरण द्वारा संभव है. नैतिकता की खूबी है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में लक्ष्य बनी रहती है. मनुष्य जब तक व्यक्तित्व उठान के एक स्तर तक पहुंचता है, नैतिकता का स्तर कुछ और ऊपर उठ चुका होता है. सुकरात का आग्रह था कि मनुष्य को शुभत्व प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए. प्लेटो ऐसे आदर्श समाज का स्वप्न देखता था, जहां नागरिकों के हित परस्पर आबद्ध हों. समाज के सुख-दुख में प्रत्येक नागरिक की समान साझेदारी हो. प्लेटो के अनुसार यह केवल दार्शनिक राजा के शासनकाल में संभव है. अरस्तु अपने पूर्ववर्ती विचारकों की अपेक्षा व्यावहारिक था. जानता था कि दार्शनिक सम्राट की कल्पना आदर्श स्वप्न से परे कुछ नहीं है. आवश्यक नहीं कि विद्वता के शिखर-पुरुष राजनीति में भी उतने ही सफल सिद्ध हों. वैसे भी वह समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था. भारत में बुद्ध, महावीर, चीन में कन्फ्युशियस, ला-ओत्जे, यूनान में सुकरात, प्लेटो जैसे नैतिकतावादी विचारकों का बोलबाला था. उन सबका अपना-अपना तत्व दर्शन था. राजाओं के बीच खुद को विद्वान सिद्ध करने की होड़ मची रहती थी. राजा-महाराजा अपने दरबारों में दार्शनिकों और विद्वानों को उच्च पदों पर रखते थे. इसके बावजूद उनके बीच वर्चस्व की लड़ाइयों का अंत न था. समाज में नैतिक पराभव की स्थिति आम बात थी. ऐसे हालात में अरस्तु की व्यावहारिक सलाह बहुत काम की थी. उसका कहना था कि यदि समाज सामान्य नैतिकता से दूर है तो राजनीति में भी उसका लोप स्वाभाविक है. आंबेडकर का पूरा जीवन सामाजिक शुद्धीकरण को समर्पित रहा. वे एक तो समाज के सवर्णों से समानता, समरसता तथा दलितों के प्रति न्याय-सम्मत व्यवहार की मांग करते रहे, वहीं उन्होंने दलितों का आवाह्न किया कि वे शताब्दियों पुरानी बौद्धिक जड़ता, अज्ञानता के दलदल, रूढ़ियों के मकड़जाल, हताशा और दैन्य से बाहर निकलें. नए ज्ञान का स्वागत करें और अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करें. समझ लें कि उनके हालात को सिवाय उनके अपने कोई बदलने वाला नहीं है. आंबेडकर की निजी उपलब्धियां उनके अपने संघर्ष और स्वाध्याय की दें थीं.

आंबेडकर ने लोगों को समझाया कि मनुष्य अपनी परतंत्रता, दैन्यादि के लिए खुद भी जिम्मेदार होता है. दुरावस्था के कारणों को समझने, उनका विरोध करने की अपेक्षा वह उन्हें सह लेने में अपनी भलाई समझता है. ‘जेहि विध राखे राम तेहि विध रहिए’—जैसी भाग्यवादी मान्यताएं उसे हालात से बच निकलने को प्रेरित करती हैं. शिखर पर विराजमान लोग जनसाधारण की इन दुर्बलताओं को भलीभांति समझते हैं. वे शासन चलाना भले ही न जानें, स्वार्थ-सिद्धि हेतु शिखर पर बने रहना उन्हें भली-भांति आता है. अवसरवादी चालों के बीच उनकी कोशिश किसी भी तरह अपना वर्चस्व बनाए रखने की होती है. वे निरंतर इस प्रयास में रहते हैं कि जनता को वास्तविक मुद्दों से हटाकर जाति, धर्म जैसे नकारात्मक और वायवी मुद्दों में उलझा दिया जाए. इससे उसका ध्यान समस्या के असली कारण के बजाए उस ओर चला जाता है, जिधर वे ले जाना चाहते हैं. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता ऐसे ही औजार हैं. उन्हें ईश्वरीय आदेश बताकर दलितों एवं पिछड़ों को शताब्दियों से दास बनाया जाता रहा है. आंबेडकर इस समस्या को भली-भांति समझते थे. इसलिए वे लगातार इस प्रवृत्ति का विरोध करते रहे. दलितों और पिछड़ों के निरंतर पराभव का एक कारण यह भी था कि वे मान चुके थे कि शासक होना जन्मजात गुण होता है; और उनमें इस गुण का अभाव है. इसलिए शासित रहना उनकी नियति है. उन्हें इस भ्रांति से निकालने के लिए आंबेडकर उनके राजनीतिकरण हेतु सतत प्रयत्नशील रहे.

राजनीति से जुड़ाव तथा परिवर्तनकारी राजनीति करना दोनों अलग-अलग बातें हैं. परिवर्तनकामी राजनीति के लिए समाज में परिवर्तन की इच्छा का होना आवश्यक है. और परिवर्तन को अनुकूल दिशा देने के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाएं लोकतांत्रिक चेतना से भरपूर सामाजिक संस्थाओं के नियंत्रण में कार्य करें. यदि सामाजिक स्तर पर लोकतंत्र का अभाव है तो राजनीतिक क्षेत्र में भी लोकतंत्र अधिक समय तक टिक नहीं पाएगा. आंबेडकर पश्चिमी पुनर्जागरण से प्रेरित थे. रूसो, वाल्तेयर, थामस पेन, बैंथम आदि के विचार उनके चिंतनकर्म पर छाए रहते थे, जिन्होंने उनके सामाजिक न्याय संबंधी विचारों को धार दी थी. उन्होंने दलितों और शोषितों को समझाया कि मनुष्य होने के नाते उन्हें वही अधिकार प्राप्त हैं, जो समाज के किसी भी दूसरे व्यक्ति को प्राप्त हैं. दलित और शोषित वर्ग जो आज शोषण और दैन्य को अपनी नियति स्वीकार बैठा है, उसके पूर्वजों ने ज्ञान के शिखर क्षेत्रों में दखलंदाजी बनाए रखी है. मनु का विधान केवल आलसी और मानसिक दुबर्लता के शिकार लोगों पर पूरी तरह लागू हो पाया है. जिन्होंने उसे नकारने का साहस किया, उसने अपने क्षेत्र में जोरदार उपस्थिति दर्ज की है. प्राचीनकाल में भी ईश्वरवादी और निरीश्वरवादी विचारधाराओं के बीच सदैव संतुलन रहा है. जिन दिनों ब्राह्मण लोग वेद-वेदांग रचने में जुटे थे, उन्हीं दिनों समानांतर रूप से अनीश्वरवादी चिंतक अपनी सशक्त उपस्थिति समाज में बनाए हुए थे.

आंबेडकर का विचार था कि समानता, स्वतंत्रता और सौहार्द की स्थापना के लिए धर्म की भूमिका केवल सहायक की होती है. अधिकारों की रक्षा केवल विधिसम्मत राज्य में ही संभव है. इसके लिए लोगों में सामाजिक एवं नैतिक चेतना की व्याप्ति अपरिहार्य है. यदि सामाजिक चेतना ऐसी है कि वह उन अधिकारों की रक्षा करने में भी सक्षम है, जिसके लिए कानून बनाए जाते हैं, तो उसके सदस्यों के अधिकार सुरक्षित बने रहते हैं. यदि समाज व्यक्ति के मूलभत अधिकारों के प्रति उदासीन है, अथवा उनका विरोध करता है तो कोई कानून, न्यायपालिका या दूसरी वैधानिक व्यवस्था उनका संरक्षण नहीं कर सकती. धर्म और जाति के आधार पर बंटे, असमानता के शिकार समाजों में यह काम प्रभुवर्ग की इच्छा से नहीं हो सकता. जैसा कि गांधी चाहते थे. इसके लिए आवश्यक है कि शिखरस्थ वर्ग अपने सोच में बदलाव लाएं. समानांतर रूप से उत्पीड़ित वर्गों में भी चेतना का संचार हो, ताकि वह शोषण तथा उसके कारणों का तत्क्षण विरोध कर सके. बलात् धर्मांतरण को छोड़ दें तो भी हिंदुओं के बीच धर्मांतरण नई घटना नहीं है. उसके पीछे जो प्रेरणाएं काम करती हैं उनमें पहली सत्ता के निकट, सुख-साधनों और शक्ति से लैस रहने की कामना है. जैसा मुगलों के राज्य में होता था. धर्मांतरण की ऐसी प्रवृत्ति मुख्यतः सवर्ण लोगों में रही है. उनमें से कुछ शक्ति-केंद्र से सटे रहने का मोह छोड़ नहीं पाते. ऐसे लोग सत्ता-परिवर्तन के समय धर्म-परिवर्तन द्वारा भी उसके करीब रहने में ही बुद्धिमानी समझते हैं. धर्मांतरण का दूसरा कारण दूसरा सामाजिक शोषण और उत्पीड़न से बचाव के लिए अपेक्षाकृत उदार धर्म को अपनाना है. जैसा भारत में दलितों ने किया है. धर्मांतरण का तीसरा कारण आध्यात्मिक भी चेतना हो सकती है. व्यक्ति किसी धर्म विशेष के देवता या दर्शन से प्रेरित होकर उसकी ओर आकर्पित होता है. यह धर्मांतरण की श्रेष्ठतम वजह कही जा सकती है. हालांकि ऐसे मामले नगण्य होते हैं. आंबेडकर के लिए धर्मांतरण न तो सत्ता से निकटता बनाए रखने का माध्यम था, न ही आस्था का. वे तो अपने समाज को सामंतवादी लक्षणों से युक्त हिंदू धर्म के चंगुल से बाहर निकालना चाहते थे. ताकि दलित वर्ग अपने संगठन सामर्थ्य को समझे और उसके माध्यम से अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए तैयार रहे. अप्रत्यक्ष रूप से आंबेडकर के धर्मांतरण का लाभ हिंदू धर्म को भी हुआ. उनके द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने से पहले दलितों का पलायन आमतौर पर ईसाई और इस्लाम की ओर होता था. बाद में दलितों का झुकाव भारतीय मूल के बौद्ध धर्म की ओर हो गया.

आंबेडकर मानते थे कि दलितों को मान-सम्मान की प्राप्ति तभी संभव है जब उन्हें राज्य स्वतंत्र नागरिक का सम्मान दे. नागरिक के रूप में स्वीकारे. कम से कम संवैधानिक स्तर पर उनके साथ कोई भेदभाव न हो. इसके लिए ‘मनुस्मृति’ के ईश्वर-केंद्रित विधान को संविधान-समर्थित विधान में बदलना आवश्यक था. रूसो, बैंथम, लॉस्की जैसे विद्वानों का भी मत था कि राज्य को ईश्वरीय विधान या नैतिकता के बजाय कानून के द्वारा चलना चाहिए. ईश्वरीय विधान के अनुसार काम करने वाले समाजों के लिए बार-बार अतीत में झांकना सामान्य बात है. भारत जैसे देश के लिए जहां एक वर्ग आज भी इस खुशफहमी में जीता है कि कभी यह धरती चलते-फिरते देवताओं की बस्ती थी. जिसके एक अवतार का दावा है कि दुर्जनों को ताड़ने और सज्जनों की रक्षा हेतु वह पुनः-पुनः जन्म लेता रहेगा. ऐसे समाज में समस्याओं से जूझने के बजाय उनसे पलायन नागरिक-स्वभाव का हिस्सा स्वतः बन जाता है. आधुनिक समाजों में जो सामाजिक न्याय, समानता एवं मानवाधिकारवादी जीवनमूल्यों के अनुसार संचालित हों, इस प्रवृत्ति को प्रगति-विरोधी, प्रतिगामी और सामंतवाद का पोषक माना जाता है, जिसमें एक वर्ग को दूसरे वर्ग पर शासन करने का अधिकार मिल जाता है. मोसका के अनुसार ऐसे समाजों में असंगठित बहुसंख्यक वर्ग पर संगठित अल्पसंख्यक वर्ग राज करता है. लोग अपनी दुर्दशा को समझ न पाएं इसलिए, चुनौती सामने देख वह दैवी विधान को बीच में ले आता है. आंबेडकर का सपना समानताधारित समाज का था. जिसका रास्ता दलितों और पिछड़ों के सबलीकरण की ओर से जाता था. उनका विचार था कि दलित वर्ग बौद्धिक दैन्य से बाहर आए. ताकि उन्हें किसी दीनानाथ की प्रतीक्षा में जीवन न बिताना पड़े. उन्होंने दलितों और शोषितों का ज्ञान के क्षेत्र में आगे आने के लिए आवाह्न किया, ताकि संस्कृति के आधार पर होने वाले शोषण को समझकर उससे मुक्ति के उपाय सोचे जा सकें.

 

डॉ. आंबेडकर का आर्थिक चिंतन

अर्थशास्त्री के रूप में डॉ. आंबेडकर के महती योगदान की ओर बहुत कम विद्वानों का ध्यान गया है. प्रायः लोग उन्हें संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं. यह भी जानते हैं कि दलितों के उद्धार के लिए उन्होंने अनथक संघर्ष किया. उसके लिए समकालीन नेताओं की अनगिनत आलोचनाएं सहीं. वे अपने समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मगर विवादित नेताओं में रहे. उनकी विद्वता विरोधियों को पस्त करने वाली थी. लेकिन अर्थशास्त्री के रूप में उनके योगदान की प्राय: उपेक्षा ही की गई. वस्तुतः राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में डॉ. आंबेडकर का योगदान इतना महान एवं युगांतरकारी है कि उनके जीवन के बाकी पहलुओं तक लोगों की नजर जा ही नहीं पाती. यहां तक कि दलित विद्वानों का लेखन भी उनके सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में योगदान तक सिमटा रहा है. अर्थशास्त्री के रूप में आंबेडकर के योगदान को केवल एक लेख या लेखांश से आंकना असंभव है. अपने एक व्याख्यान में प्रख्यात अर्थशास्त्री श्रीनिवास अंबीराजन ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र से राजनीति और कानून के क्षेत्र में अंतरण को अर्थशास्त्र की भारी क्षति बताया था. उनके अनुसार अगर वे राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में नहीं आते तो दुनिया-भर में दिग्गज अर्थशास्त्री के रूप में स्थान पाते. इस बात में काफी सचाई भी है. लंबे समय तक आंबेडकर का मन अर्थशास्त्र में रमा रहा. 1947 आते-आते राजनीतिक क्षेत्र में उनकी व्यस्तता काफी बढ़ चुकी थी. लेकिन उन दिनों भी उनकी इच्छा  अर्थशास्त्र के क्षेत्र में छूटे हुए काम को आगे बढ़ाने की थी. उसी वर्ष प्रकाशित ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी’ के संशोधित संस्करण की भूमिका में उन्होंने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में, 1923 के बाद हुए बदलावों को लेकर पुस्तक का दूसरा खंड यथाशीघ्र तैयार करने का आश्वासन दिया था. मगर आजादी के बाद राजनीतिक जिम्मेदारियां अत्यधिक बढ़ जाने के कारण वे छूटे हुए कार्य को पूरा नहीं कर सके.

अर्थशास्त्र आंबेडकर का सर्वाधिक प्रिय विषय था. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय उनके पास कुल 29 विषय ऐसे थे, जिनका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से था. वहां से उन्होंने ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ विषय में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. आगे चलकर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से उन्होंने ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी : इट्स ओरिजिन एंड इट्स सोल्यूशन’ विषय पर डीएससी की डिग्री हेतु शोध प्रबंध लिखा. उस ग्रंथ की भूमिका महान अर्थशास्त्री एडविन केनन ने लिखी थी. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर की विद्वता का अनुमान लगाने के लिए अमर्त्यसेन की टिप्पणी भी मददगार सिद्ध हो सकती है. 2007 में दिए गए एक व्याख्यान में आंबेडकर के अर्थशात्रीय ज्ञान की गुरुता को स्वीकारते हुए हमारे समय के इस महान अर्थशास्त्री ने कहा था—

‘आंबेडकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मेरे जनक हैं. वे दलितों-शोषितों के सच्चे और जाने-माने महानायक हैं. उन्हें आजतक जो भी मान-सम्मान मिला है वे उससे कहीं ज्यादा के अधिकारी हैं. भारत में वे अत्यधिक विवादित हैं. हालांकि उनके जीवन और व्यक्तित्व में विवाद योग्य कुछ भी नहीं है. जो उनकी आलोचना में कहा जाता है, वह वास्तविकता के एकदम परे है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद शानदार है. उसके लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा.’6

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान की चर्चा करने से पहले इस विषय में उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाने वाली एक और घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा. 1930 का दशक पूरे विश्व बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था. ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं, खासकर उपनिवेशों में जहां आजादी की मांग जोड़ पकड़ती जा रही थी, वहां औपनिवेशिक सरकार की पकड़ को बनाए रखने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान आवश्यक था. समस्याओं के मूल में कुछ वैश्विक मंदी का हाथ था और कुछ स्थानीय रोजगारों के उजड़ जाने से उत्पन्न मंदी का. इसलिए अगस्त 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था. इस आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जिन 40 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था, उनमें आंबेडकर भी थे. वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं.

 

बात यहीं खत्म नहीं होती. ‘रॉयल कमीशन’ ने अपनी रिपोर्ट 1926 में प्रकाशित की थी. उसकी अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई. इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राब्लम ऑफ रुपी’ पर आधारित है. उस समय तक उनका मुख्य लेखन अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय को लेकर ही था. मात्र 27 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंबई के एक कॉलिज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी मिल चुकी थी. अध्यापन के अलावा वे विषय से संबंधित सैकड़ों लेख और व्याख्यान दे चुके थे. एक सभा में विद्यार्थियों के बीच पढ़े गए उनके लेख ‘रेस्पांसिबिल्टी ऑफ रेसपांसिबिल गवर्नमेंट’ की प्रशंसा उस समय के महान राजनीतिक विज्ञानी, चिंतक हेराल्ड लॉस्की ने भी की थी. लॉस्की का कहना था कि ‘लेख में आए आंबेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप’ के हैं.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान को और गहराई से समझने के लिए प्राचीन भारत की मुद्रा विनिमय प्रणाली के बारे में जानना आवश्यक है. 1893 तक भारत में केवल चांदी के सिक्कों का प्रयोग किया जाता था. 1841 में स्वर्ण मुद्रा का उपयोग भी होने लगा था. चांदी के सिक्के का मूल्य उसमें उपलब्ध चांदी के द्रव्यमान से आंका जाता था. इस तरह एक स्वर्णमुद्रा का मूल्य 15 चांदी के सिक्कों के बराबर था. 1853 में आस्ट्रेलिया और अमेरिका में स्वर्ण-भंडार मिलने से सोने की आमद बढ़ी. उसके बाद स्वर्ण-मुद्राओं में विनिमय का प्रचलन बढ़ने लगा. हालांकि उसका विधिवत चलन 1873 के बाद की संभव हो पाया. लगभग उसी समय चांदी के नए भंडार मिलने से उसकी आमद भी बढ़ने लगी, परंतु भारत में स्वर्ण उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई थी. परिणामस्वरूप स्वर्ण-मुद्रा के मुकाबले भारतीय रजत-मुद्रा का निरंतर अवमूल्यन होने लगा. उस खाई को पाटने के लिए अधिक मात्रा में रजत-मुद्राएं ढाली जाने लगीं. लेकिन वह समस्या का अस्थायी समाधान था. दूसरे उससे उन व्यक्तियों के लेन-देन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था जो केवल रजत मुद्रा का इस्तेमाल करते थे. जनसामान्य के लिए वह प्रतिकूल स्थिति थी. मुद्रा का अवमूल्यन होने से महंगाई में वृद्धि हुई थी. जबकि आय ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आंतरिक स्तर पर उससे प्रत्येक वर्ग को घाटा हो रहा था. 1872 से लेकर 1893 तक यही हालात बने रहे. मूल्य संतुलन के लिए अंतत: सरकार ने 1893 में रजत-मुद्रा ढालने का काम अपने नियंत्रण में ले लिया.

उस समय तक मुद्राओं का मूल्यांकन उनमें उपलब्ध धातु की मात्रा से आंका जाता था. 1899 में सरकार ने एक समिति का गठन किया, जिसने स्वर्ण-स्टेंडर्ड के स्थान पर स्वर्ण-मुद्रा के उपयोग की सलाह दी थी. तदनुसार मुद्रा का मूल्यांकन उसमें उपलब्ध धातु-मूल्य के बजाए सरकार द्वारा अधिकृत मूल्य जितना आंका जाने लगा. सरकार ने रजत-मुद्रा का मूल्य 1 शिलिंग, 4 पेंस के बराबर कर दिया. नए नियम के अनुसार स्वर्ण-मुद्रा का मूल्य लगभग स्थिर था. उसके मूल्यांकन का अधिकार सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन था, जबकि रजत-मुद्रा के मूल्य-नियंत्रण के लिए उस समय तक कोई व्यवस्था न थी. मुद्राओं के मूल्यांकन को लेकर आंबेडकर का दृष्टिकोण मानवीय था. कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों से मिलता हुआ. उनका कहना था लोगों के लिए मुद्रा का वास्तविक मूल्य उसके बदले मिलने वाली आवश्यक वस्तुओं से तय होता है. सोना बेशकीमती हो सकता है. लेकिन वह आदमी की सामान्य जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. वह न तो किसी भूखे का पेट भर सकता है, न ही उससे किसी नंगे तन को ढका जा सकता है. यदि एक रजत मुद्रा से उन्हें जरूरत की सभी चीजें प्राप्त हो जाती हैं, तो उन्हें स्वर्णमुद्रा की दरकार न होगी. इसके लिए मुद्रा का भरोसेमंद होने के साथ-साथ विनिमय प्रणाली में स्थायित्व भी जरूरी है. मुद्रा के प्रति जनता का अविश्वास तथा उसकी मूल्य-अस्थिरता आर्थिक संकट को जन्म देती है. रजत-मुद्रा के उतार-चढ़ाव को देखते हुए आंबेडकर ने स्वर्ण-मुद्रा को अपनाने का सुझाव दिया; तथा एक रजत-मुद्रा का मूल्य एक शिलिंग तथा छह पैंस रखने की सलाह दी. उनकी अधिकांश अनुशंसाओं को सरकार ने ज्यों की त्यों अपना लिया था. उन्हीं के आधार पर आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक की मूलभूत सैद्धांतिकी का विकास हुआ.

अपने अर्थशास्त्र संबंधी ज्ञान के आधार पर आंबेडकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे क्लासिकल अर्थशास्त्रियों की कतार में खड़े नजर आते हैं. आगे चलकर राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया, उसके आधार पर हम उनके अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों की तुलना इटली के विचारक विलफर्ड परेतो से भी कर सकते हैं. परेतो ने यूरोपीय समाज में व्याप्त असमानताओं का गहरा अध्ययन किया था. उसका मानना था कि शीर्ष पर मौजूद अल्पसंख्यक अभिजन समूह अपने बुद्धि-चातुर्य द्वारा बहुसंख्यक समूह को छोटे-छोटे समूहों में बांटे रखता है. इस तरह संगठित अल्पसंख्यक अभिजन के आगे असंगठित बहुजन की शक्ति नगण्य हो जाती है. ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ के क्षेत्र में ‘परेतो दक्षता तुल्यांक’ की चर्चा लगभग सभी आधुनिक अर्थशास्त्री करते आए हैं. परेतो को स्पर्धात्मक उत्पादन प्रणाली से कोई शिकायत न थी. लेकिन वह चाहता था कि सरकार समाजार्थिक समानता की स्थापना के दायित्व को समझे तथा उसके लिए समयानुसार आवश्यक कदम उठाती रहे. उसके अनुसार स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में लाभार्जन की दर संतोषजनक बनी रहती है. न्याय-भावना के साथ काम करने वाली सरकार उस लाभ का एक हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचाकर असमानता की खाई को पाटते रहने का काम कर सकती है. परेतो के शब्दों में आर्थिक असंतुलन कम करने के लिए—‘समाज में किसी एक नागरिक के साथ निकृष्टतम किए बिना, कम से कम किसी एक नागरिक के साथ श्रेष्ठतम किया जा सकता है.’ आंबेडकर को भी मशीनों और स्पर्धात्मक उत्पादन व्यवस्था से कोई शिकायत न थी. लेकिन वे चाहते थे कि सभी प्रमुख और आधारभूत उद्योग सरकार के अधीन हों. वे मानते थे कि आर्थिक सुधार की कोई भी योजना बिना भूमि सुधार के असंभव है. इसके लिए उन्होंने बड़े भू-स्वामियों की आय को आयकर के दायरे में लाने का सुझाव दिया था. 1946 में अखिल भारतीय स्तर पर भूमि सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि भूमि वितरण में असमानता के कारण समाज के बड़े हिस्से को बहुत छोटी जोतों से काम चलाना पड़ता है. परिणामस्वरूप एक ओर जहां श्रमशक्ति का दुरुपयोग होता है, वहीं बहुत-सी श्रम-शक्ति निष्क्रिय पड़ी रहती है. आवश्यकता से कई गुना भूमि के स्वामी बने जमींदार अपनी श्रम-शक्ति का उपयोग इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें जरूरत से कई गुना श्रमशक्ति बेगार या मामूली मजदूरी पर उपलब्ध हो जाती है. यानी समाज का एक वर्ग संसाधनों के अभाव में अपनी श्रमशक्ति के लाभों से वंचित रह जाता है; जबकि दूसरा आवश्यकता से कहीं अधिक संसाधनों पर काबिज होने के कारण दूसरे के श्रम को कम मूल्य पर खरीदने में सफल हो जाता है. इस तरह न केवल श्रम का अवमूल्यन होता है, बल्कि समाज की बहुत-सी श्रमशक्ति व्यर्थ चली जाती है. इसके लिए आंबेडकर कृषि, उद्योग, बीमा, बैंकादि का संपूर्ण राष्ट्रीयकरण चाहते थे. वे व्यापक भूमि-सुधार के समर्थक थे. चाहते थे कि सरकार समस्त कृषि-योग्य भूमि का अधिग्रहण कर उसे उचित आकार के फार्मों में विभाजित करे और उत्पाद का समुचित अनुपात में समाज के सभी सदस्यों के बीच संवितरण हो. समाजार्थिक समानता की स्थापना के लिए आंबेडकर का यह क्रांतिकारी सोच था.

आंबेडकर की विचारों पर हम समाजवादी चिंतन की छाया देख सकते हैं. लेकिन भारत में समाजवादी आंदोलन का जो स्वरूप रहा है, उस अर्थ में वे कतई समाजवादी न थे. हम उन्हें आमूल परिवर्तनवादी कह सकते हैं. चूंकि वे सामाजिक समानता के लक्ष्य को दलितों की वर्गीय चेतना, शैक्षणिक-सामाजिक उन्नयन तथा लोकतांत्रिक परिवर्तन द्वारा प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए उन्हें गणतांत्रिक समाजवादी कहना भी उपयुक्त होगा. वस्तुतः जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, उसके कल्याण हेतु आर्थिक समरसता का विचार पर्याप्त न था. लाहौर में ‘जात-पात तोड़क मंडल’ के वार्षिक अधिवेशन के लिए लिखे गए अपने लंबे भाषण ‘जाति का उन्मूलन’ में उन्होंने कई उदाहरण देकर बताया था कि आर्थिक समाधान कभी भी सामाजिक समाधान का विकल्प नहीं बन सकते. एक उदाहरण उन्होंने गुजरात के गांव का दिया था. वहां अछूत स्त्रियां घाट से पानी लाने के लिए मिट्टी के घड़ों का उपयोग करती थीं. जानूं गांव की खाते-पीते दलित परिवारों की कुछ स्त्रियों ने पानी लाने के लिए पीतल के घड़ों का उपयोग करना चाहा तो सवर्ण लोगों की त्योरियां चढ़ गईं. उन्होंने विरोध किया. पूरे भारत में यही हालात थे. जयपुर रियासत के चकवारा की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि एक रईस अछूत तीर्थ यात्रा पर गया. लौटा तो परंपरानुसार उसने मित्रों-रिश्तेदारों को भोज देने का फैसला किया. तय किया कि भोज के लिए सभी व्यंजन देशी घी में बनाए जाएंगे. सवर्णों को पता चला तो उबलने लगे. अछूत देशी घी से बने व्यंजनों का भोज दे, यह उन्हें सहन न हुआ. सो ऐन भोज के समय दर्जनों दबंग समारोह स्थल पर जा धमके. पल-भर में सारा भोजन तहस-नहस कर दिया. समाजवाद मुख्यतः आर्थिक समानता को अपना लक्ष्य मानता है. जाति संबंधी प्रश्नों से बचने के कारण भारत में समाजवादी राजनीति कभी भी दलितों की मददगार नहीं बन सकी. न ही सामाजिक न्याय और  संसाधनों के संवितरण की न्यायपूर्ण मांग रखने वाले आंबेडकर को किसी ने समाजवादी विचारक के रूप में मान्यता दी.

आंबेडकर ने मार्क्स की आलोचना करते हुए बुद्ध को अपनाया था. अपने विचारों के कारण लगभग आधी दुनिया पर छाए रहने वाली विश्व-इतिहास की इन महानतम हस्तियों में आपस में कोई स्पर्धा नहीं है. तो भी आंबेडकर के लिए बुद्ध महत्त्वपूर्ण थे. इसलिए कि उन्होंने जाति पर सवालिया निशान लगाते हुए समानता आधारित समाज का सपना देखा था. साम्यवाद के रूप में समानता आधारित समाज का सपना मार्क्स का भी था. लेकिन मार्क्स की सीमा थी कि वे समानता को जीवन के आर्थिक पक्ष से आगे बढ़कर नहीं देख पाए थे. भारत के बारे में उन्होंने काफी लिखा था, तथापि वह जानकारी राजनीतिक और अखबारी सूचनाओं पर केंद्रित थी. जाति की भयावहता जिससे आंबेडकर का सीधा परिचय था और जिसकी विकृति को ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे बुद्ध भी समझते थे, मार्क्स का उस समस्या से सीधा कोई संबंध न था. उनके लिए  समस्या को उतनी गहराई से समझना मुमकिन भी नहीं था.

 

आंबेडकर मार्क्स की वर्ग-भेद की अवधारणा से सहमत थे. परंतु इस संशोधन के साथ कि भारतीय समाज में वर्गभेद मुख्यतः सामाजिक-सांस्कृतिक रहा है. उनका मानना था कि जाति की समस्या के समाधान के बिना भारत में किसी भी सुधारवादी आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध होगी. समाजार्थिक परिवर्तन के लक्ष्य को वे दलितों के प्रबोधीकरण द्वारा प्राप्त करना चाहते थे. इस रूप में वे अपने समय के किसी भी समाजवादी से बड़े और प्रतिबद्ध समाजवादी थे. भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की यह विडंबना रही उसने आंबेडकर को मात्र दलितों का नेता मानकर उपेक्षित रखा. इसके लिए आंबेडकर को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. परंतु जाति के सवालों की ओर से मुंह मोड़े रहने के कारण भारत का समाजवादी आंदोलन लगातार अपनी प्रासंगिकता खोता रहा.

 

आंबेडकर का पूरा जीवन एक महागाथा है. एक लेख या पुस्तक में उनके जीवनकर्म को नहीं समेटा जा सकता. वे अपने मानक आप हैं. इसलिए लेख का समापन हम उन्हीं की बात से करना चाहेंगे. यह दरअसल में एक चेतावनी है जो भारतीय संविधान को लोकार्पित करते हुए उन्होंने हम सबको दी थी. संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत उन्होंने ‘हम भारत के लोग’ से की है. इसकी व्याख्या उनके भाषण में भी मिलती है —‘‘मुझे याद है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय हिंदुस्तानी ‘भारत के लोग’ कहने की अपेक्षा ‘भारतीय राष्ट्र’ कहना अधिक पसंद करते थे. मेरा विचार है कि ‘हम एक राष्ट्र हैं’ ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं हैं, इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. तभी हम राष्ट्र बनने कि जरूरत को बेहतर समझ पाएंगे तथा इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों और साधनों के बारे में बेहतर पाएंगे. (जाति-प्रथा के रहते) इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है….जातियां राष्ट्र-विरोधी हैं. पहला कारण तो ये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं. दूसरे वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को ले आती हैं. अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन सब मुश्किलों से मुक्ति पानी होगी. असली भाईचारा तभी कायम हो सकता है, जब राष्ट्र मौजूद हो—लेकिन बगैर बंधुत्व के समानता, स्वाधीनता और राष्ट्रीयता महज दिखावा ही होंगी.’’

© ओमप्रकाश कश्यप

  1. ‘a form and a method of government whereby revolutionary changes in the economic and social life of the people are brought about without bloodshed.’B. R. Ambedkar- Space, condition, precedent for the successful working of Democracy, Before the Poona District Library(1952).
  2. To my mind there is no doubt that this Gandhi age isthe dark age of India. It is anage in which people instead of looking for their ideals in the future are returning to antiquity.It is an age in which people have ceased to think for themselves and as they have ceased to think they have ceased to read and examine the facts of their lives.— Address delivered on 29th January 1939 at t he Annual Function, of the Gokhale Institute of Politics and Economics held in the Gokhale Hall, Poona.
  3. The doctrine that might makes right has covered the earth with misery. While it crushes the weak, it also destroys the strong. Every deceit, every cruelty, every wrong, reaches back sooner or later and crushes its author. Justice is moral health, bringing happiness, wrong is moral disease, bringing mortal death.” —John Peter Altgeld
  4.     न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञा प्राप्त पितामह बहूपकरणा यज्ञा नाना सम्भारविस्तरा                                                                                                       राजपुत्रोवां शक्या प्राप्तुपितामह नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसहतै. महाभारत. 164(23).
  1.   दीघनिकाय-1/193, मज्झिम निकाय 32 और 40, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, डॉ. रामशरण शर्मा, पृष्ठ 91 से उद्धृत.’
  2. If Tilak had been born amongst the Untouchables, he would not have raised the slogan, “Swaraj is my birthright”, but the slogan would have been: “Annihilation of untouchability is my birthright”-Gupta D, editor. “Caste and Politics: Identity Over System” Annual Review of Anthropology.2005;21:409–27.
  3. 6. Ambedkar is my Father in Economics. He is true celebrated champion of the He deserves more than what he has achieved today. However he was highly controversial figure in his home country, though it was not the reality. His contribution in the field of economics is marvelous and will be remembered forever..!” Dr. Amartya Sen, Economist.

 

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न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—चार

सुकरात, पेरामेनीडिस, हेराक्लाट्स, प्रोटेगोरस आदि

 

न्याय मानव—समाज का सदगुण है. (ऐसा बादल) जो जहां जितना सूखा है, वहां उतना ही ज्यादा बरसता है.—अरस्तु

आदर्श समाज की खोज मनुष्य का आरंभिक सपना है. यह सपना अकेले प्लेटो का नहीं था. किसी देवता, महामानव या अतिविलक्षण प्रतिभाशाली को भी इसका श्रेय नहीं दिया जा सकता. साधारण से साधारण मनुष्य यह कामना करता आया है कि जिस समाज में वह रहता है, उसे जितना कि वह आज है, उससे बेहतर होना चाहिए. भले ही वह यह न जानता हो कि परिवेश को किस प्रकार बेहतर बनाया जाए? या वे कौन से कारण हैं जो समाज की बेहतरी की राह के अवरोधक हैं? जिन्हें दूर किया जाना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए जरूरी है. भारत में ऐसा सपना बुद्ध ने देखा था. मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप और महावीर स्वामी का सपना भी कुछ ऐसा ही था. यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, जेनोफीन, चीन में कन्फ्यूशियस, लाओ जू, चुआंग जू, बाओ जिंग्यान आदि का सपना भी कुछ इसी प्रकार का था. इनमें प्लेटो अतिरिक्त श्रेय का हकदार है. उसने न केवल आदर्श समाज का सपना देखा, बल्कि उस सपने के समर्थन में तर्क देते हुए, समाज को बेहतरी की ओर ले जाने के रास्ते भी बताए. भले ही उसके विचारों को अव्यावहारिक मानकर उसके शिष्य और अगली पीढ़ी के विचारक अरस्तु ने नजरंदाज कर दिया हो, उससे प्लेटो का महत्त्व कम नहीं हो जाता. वह अपने समय का विलक्षण प्रतिभासंपन्न, कविमना दार्शनिक था. अपनी पूरी जिंदगी वह इसी दिशा में प्रयत्न करता रहा. विपुल लेखन उसने किया. ‘रिपब्लिक’ और ‘दि लॉज’ जैसे बहुखंडी ग्रंथ जिन्हें ग्रंथमाला कहना उचित होगा—उसकी विलक्षण मेधा प्रमाण हैं. उससे पहले के समाज के मुकाबले व्यक्ति की हैसियत बहुत कम थी. माना जाता था कि अच्छे और बुरे दो किस्म के लोग होते हैं. अच्छे समाज के मित्र तथा बुरे सामाजिकता के द्रोही हैं. अतः केवल और केवल बुरों को दंडित करके समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. एक तरह से यह मान लिया गया था कि दुष्टता दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव का अभिन्न हिस्सा है. और जो अच्छे हैं, वे बुराई से सर्वथा मुक्त ‘देवतुल्य’ हैं. अतएव बुरों को दंड देकर अथवा शासन का डर दिखाकर बुराई से बचा जा सकता है. बुराई को मिटाने के नाम पर तुनकमिजाजी देवता शाप देते थे, राजा दंड. उस व्यवस्था में बुराई को मिटाने के नाम पर तथाकथित बुरे को ही मिटा दिया जाता था.

यूनान में इस सोच में बदलाव सुकरात के बाद नजर आता है. सुकरात ने सत्य को शुभ माना और समाज को शुभत्व की कर्मस्थली. प्लेटो को जितना विश्वास समाज पर था, उतना सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य पर भी था. उसका मानना था कि आदर्श समाज में दोनों में से किसी एक की उपेक्षा भी असंभव है. इसी विश्वास के साथ उसने आदर्श समाज का खाका तैयार किया था. अपने समय के उस विलक्षणतम दार्शनिक ने कालांतर में दार्शनिकों की ऐसी पीढ़ी विकसित की, जिसने आगामी शताब्दियों में राजनीतिक दर्शन की नई परिभाषाएं गढ़ीं. प्लेटो ने तो ‘रिपब्लिक’ तथा दूसरे ग्रंथों में आदर्श समाज सपने को इतना विस्तार दिया था कि दोनों एकदूसरे के पर्याय जैसे बन गए. आज भी आदर्श समाज का जिक्र हो तो प्लेटो की याद आना स्वाभाविक है. सतत चिंतनविमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित अथवा किसी कल्याणभाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधेसीधे मानवकल्याण से जुड़ा मसला है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. उसके लिए कुछ नियम बनाए. मानवसमूहों के बीच कुछ स्वीकृतियां हुईं. कालांतर में वही नियम तथा उनसे जुड़े रीतिरिवाज संस्कृति का हिस्सा बनते गए. कुल मिलाकर समाज मनुष्य की रचना है. जिसे उसने अपने सुख, सुरक्षा, एवं समृद्धि हेतु गढ़ा है. इसलिए समाज यदि मनमानी करता है, पात्रता के बावजूद किसी व्यक्ति को उसके अधिकारों से वंचित कर देता है तो दोष समाज है. दूसरी ओर यदि मनुष्य अपने कर्तव्य में कोताई बरतता है, या अपने किसी कार्य से दूसरे के सुख, सुरक्षा और समानता के अधिकार को बाधित करता है तो वह उस अनुबंध के साथ विश्वासघात करता है, जो उसके और समाज के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है.

आखिर ऐसे हालात क्यों बनते हैं. यदि कोई मनुष्य समाज के साथ किए गए अपने अनुबंध को तोड़ता है तो उसके लिए क्या केवल वही दोषी है? क्या दोषमुक्त होना केवल समाज का गुण है? और यदि कोई मनुष्य समाज के साथ अपने अनुबंध को तोड़ते हुए पाया जाता है तो उसका समाधान क्या केवल दंड है? इन प्रश्नों के उत्तर की खोज तथा सामाजिक विक्षोभ के कारणों को समझना आसान नहीं है. उसके लिए करीब पांच हजार वर्ष पहले सामाजिकसांस्कृतिक विकास के उस दौर में लौटना पड़ेगा जब मनुष्य यायावर जीवन छोड़ स्थायी प्रवास को अपनाने में लगा था. नागरीय सभ्यता अंगड़ाई लेने लगी थी. खेती के साथसाथ छोटेछोटे उद्योग और लोकशिल्प विकासमान अवस्था में थे. नौकाओं और भारी जलयानों की मदद से मनुष्य लंबी समुद्री यात्रओं पर निकलने लगा था. दुर्गम स्थानों की यात्र के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. इसलिए कुछ व्यापारी दस्युओं का सामना करने के लिए भाड़े के सैनिक रखने लगे. सैन्यबल और धनसंपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थे. व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हुआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. पशु आधारित अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा अविकसित अवस्था में थी. अधिकृत पशुओं की संख्या से जनजातीय समूह की समृद्धि का आकलन किया जाता था. कृषि का विकास हुआ तो समृद्धि का मापदंड अधिकृत पशुओं की संख्या के बजाए अधिकृत भूक्षेत्र को मान लिया गया. फिर भी व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा के विकास में कई शताब्दियां गुजर गईं. जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा सहयोगियों की सहायता से मनुष्य अपने उपनिवेश कायम करने लगा. फिर भी आरंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगरविशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगरराज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिकराजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी. समाज को व्यवस्थित करने की चाहत में नए राजनीतिक दर्शनों की खोज का सिलसिला आरंभ हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को वे भी अपर्याप्त लगने लगे. कुछ लोगों ने महसूस किया कि केवल पराजागतिक कल्पनाओं से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया. उससे ज्ञानविज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ. आरंभिक विज्ञान प्रयोगों के बजाए मनुष्य सहजानुभवों पर आधारित था. उसमें एकरूपता का अभाव था. स्वाभाविक रूप से उसके कुछ अंतर्विरोध भी थे. जैसे खेती के विकास के लिए एक ओर तो औजारों का निर्माण करना, तटबंध बनाना तथा दूसरी ओर कभी वर्षा तो कभी अतिवृष्टिअनावृष्टि की मार से बचने के लिए कल्पनाधारित पराभौतिक शक्तियों को प्रसन्न रखने की कोशिश करना.

इस क्रांतिक परिवर्तन का श्रेय सुकरात को दिया जाता है. लेकिन विचारधारा को तर्कसम्मत बनाने में उससे पहले के विचारकों यथा पेरामेनडिस, एनेक्सीमेंडर, हेराक्लाइटस, डेमोक्रिटस का भी योगदान है. डेमोक्रिट्स की ईसा से 460(कुछ विद्वानों के अनुसार 490) वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़खाबड़ पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं. हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिट्स के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. उस दौर में संवाद के साधन बेहद सीमित थे. ज्ञानविज्ञान का प्रचारप्रसार मुख्यतः मौखिक संवादन पर आधारित था. कमी यह रही कि डेमोक्रिट्स जैसे वैज्ञानिक सोच वाले दार्शनिक बहुत कम थे. वह दौर था जब आपसी झगड़ों के अतिरेक के कारण नगरराज्य की व्यवस्था असफल होने लगी थी; और व्यापारिक सफलता हेतु अपेक्षाकृत बड़े राज्यों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी. चूंकि राज्य के विकास से जनसाधारण की उम्मीदें भी जुड़ी थीं, इसलिए बड़े राज्यों की सफलता किसी बड़े विभ्रम के बिना संभव न थी. विभ्रम तैयार करने का काम धर्म ने किया. जिसे तहत एक ‘ईश्वर’ की कल्पना की गई. लोगों को विश्वास दिलाया गया कि ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर’ राजाओं का राजा है. और जो उपेक्षा या अनाचार लौकिक व्यवस्था के कारण सहना पड़ता है, ईश्वर के राज्य में उसकी संभावना दूरदूर तक नहीं है. वह सच्चा न्यायकर्ता है. जनजातीय समाजों में जहां गणतांत्रिक व्यवस्था थी, परिवार का वरिष्ठ सदस्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राजनीति में हिस्सा लेता था. कृषि के उभार के साथ ऐसा वर्ग पनपा था जो अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर था. जिसका राजनीति से सीधा संपर्क नहीं था. व्यवस्था से असंतोष अथवा अत्याचार के समय यह वर्ग शासन से अपनी दूरी के कारण स्वयं को असहाय एवं उपेक्षित महसूस करता था. ऐसे लोगों के लिए धर्म के नाम पर बनाया गया यह विभ्रम कि ‘सर्वशक्तिमान’ के राज्य में प्रत्येक मनुष्य की समान भागीदारी है, कोई भी सदस्य उपेक्षित नहीं हे, सर्वत्र खुशहाली और सुखों का प्राचुर्य है, वह सबके करीब और सच्चा न्यायकर्ता है—बड़ा कारगर सिद्ध हुआ. इस विभ्रम को लोकप्रतिष्ठित करने में पुरोहित वर्ग का विशेष योगदान था, सही मायनों में यह उसी के द्वारा निहित स्वार्थ हित रचा गया विभ्रम था. इसलिए जनाक्रोश से बचने तथा प्रशासनिक नाकामियों को छिपाने के लिए पुरोहितों को ऊंचे शासकीय पदों पर रखा जाने लगा. राज्य के कार्यों के निपटान के लिए उसकी राय का महत्त्व बढ़ता ही गया. चूंकि वह सिर्फ और विभ्रम था, इसलिए उसके प्रभावस्वरूप शिक्षा पर कम, आडंबरों पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा. विभ्रम का प्रभाव इतना गहरा रहा कि शताब्दियों तक राजामहाराजाओं ने धर्मालय बनवाने पर प्रजा का बेशुमार धन खर्च किया10, परंतु शिक्षा की तरक्की की ओर से वे प्रायः आंख मूंदे रहे. इसके परिणामों को समझे बगैर बहुसंख्यक जनमानस उसी के आधार पर राजामहाराजाओं का महिमामंडन करता रहा. हालात में परिवर्तन उनीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों के आगमन के बाद ही संभव हो सका.

धर्म और राजनीति के गठजोड़ के विरुद्ध विश्वव्यापी प्रतिक्रिया पूरी दुनिया में हुई, जिसने बौद्धिक क्रांति को जन्म दिया. यूनान में सोफिस्ट विचारकों की राज्यसंबंधी अवधारणा बहुत कुछ ब्राह्मणवादी विचारकों से मिलती थी. वैदिक परंपरा के आचार्यों की भांति वे भी राज्य को कृत्रिम व्यवस्था मानते थे. उनका मानना था कि राज्य की उत्पत्ति उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुई है, जिन्हें प्राकृतिक व्यवस्था में आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता था. वैज्ञानिक के रूप में डेमोक्रिट्स का उल्लेख हमने पीछे किया. एक मानवतावादी विचारक के रूप में भी उसका योगदान कम नहीं है. सुकरात पूर्व दार्शनिकों के प्रतिनिधि के तौर पर उसने सोफिस्टों की सर्वसत्तावादी दृष्टि की आलोचना की, जो राजा को अपने स्वार्थ के अनुरूप सभी निर्णय लेने का अधिकार देती थी. उसने राज्य के नैतिक स्वरूप की आवश्यकता पर बल दिया था. डेमोक्रिट्स का विचार था कि गणतांत्रिक राज्य की गरीबी तानाशाही की अमीरी से बेहतर है. यह बात अलग है कि गणतांत्रिक राज्य के स्वरूप की ठोस परिकल्पना करने में वह असमर्थ रहा था. उसने कहा था—‘यह सहीसही तय कर पाना बड़ा ही कठिन है कि राज्य का कौनसा स्वरूप पूर्णतः गणतांत्रिक है.’ उसका मानना था कि राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म है. दासता को वह अपराधतुल्य मानता था. ‘समानता प्रत्येक अवस्था में सम्मानीय है’ कहकर उसने अपने उदार सोच का प्रदर्शन किया था. डेमोक्रिट्स के अनुसार राज्य की सफलता उसके नागरिकों की स्वेच्छिक सहभागिता पर निर्भर करती है—

जनता से जुड़ने का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’11

समाज में राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिट्स ने सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य को अन्य सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलितसा लगे; तथा राजनीति समाज के प्रमुख विधेयात्मक कदम के रूप में स्थापित हो सके. ऐसा राज्य जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषय पर जोर देता हो. डेमोक्रिट्सि का यह सोच कालांतर में प्लेटो, अरस्तु जैसे दार्शनिकों के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. सुकरात ने डेमोक्रिट्स के नैतिकतावादी सूत्र को पकड़ा और राजनीतिकसामाजिक परमादर्श को समर्पित जीवन जीने पर जोर दिया. डेमोक्रिट्स को भी अंदाजा कदाचित नहीं था कि उससे मात्र पचास वर्ष बाद जन्मा प्लेटो आजीवन राजनीतिक दर्शन को समर्पित रहेगा. प्लेटो के बाद अरस्तु ने व्यवाहारिक नैतिकता को केंद्र मानकर राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. प्लेटो की दृष्टि अपेक्षाकृत विशद थी. इसलिए अपने विश्लेषण में उसने प्रायः सभी उपलब्ध राजनीतिक दर्शनों की विवेचना की है. हालांकि सेबाइन आदि कुछ विद्वानों का विचार है कि प्लेटो ने जो भी लिखा, वे सभी विचार यूनानी समाज में पहले से ही मौजूद थे. उनके अनुसार प्लेटो का लेखन तत्कालीन समाज में प्रचलित राजनीतिक चिंतन का बेहतरीन संकलन है. उदाहरण के लिए स्त्रियों को आदर्श समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान दिए जाने का तर्क तथा विवाह संस्था का निषेध. सेबाइन ने संभावना व्यक्त की है कि प्लेटो ने यह विचार अरिस्टोफेंस के प्रहसन ‘एक्लेसियाजूसाइ’(महिलासंसद) से लिया था. उस नाटक में महिलाएं राजनीति के लिए आगे आती हैं. वे पुरुषों को राजनीति से बाहर कर देती हैं. विवाह संस्था का तिरष्कार किया जाता है. संतान को यह नहीं बताया जाता कि उसके मातापिता कौन हैं. बच्चे अपने से बड़ों को मातापिता का दर्जा देते हैं. बड़े भी उन्हें अपनी संतानतुल्य मानते हैं. श्रम केवल दासवर्ग के लिए सुरक्षित है. नाटक के अनुसार इस व्यवस्था के अच्छे परिणाम आते हैं. पुरुषों की नशे और जुआ की लत छूट जाती है. निरर्थक मुकदमेबाजी की घटनाएं कम होने लगती है. इस नाटक का ‘रिपब्लिक’ पर कितना प्रभाव पड़ा इस बारे में सेबाइन पूरी तरह आश्वस्त नहीं है, परंतु हमें जानना चाहिए कि ऐरिस्टोफेंस को प्राचीन यूनानी साहित्य में ‘कामेडी का पितामह’ माना गया है. ईसा से 390 वर्ष पूर्व जब यह नाटक लिखा गया, प्लेटो 37 वर्ष का मननशील युवा था. सुकरात के मृत्युदंड को लगभग एक दशक बीत चुका था. जिससे उसके मन में लोकतंत्र तथा एथेंस की राजनीति के प्रति गहरा क्षोभ था. इसलिए यह अरिस्टोफेंस के प्रहसन के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था. प्लेटो राज्य की सफलता के लिए अनुशासन को अत्यावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राज्य यदि बहुत अधिक उदार होगा तो उसके नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हो जाएंगे. जिससे उसको बिखरने में देर न लगेगी. यदि वह अत्यधिक मजबूत होगा तो देरसवेर सत्तामद में चूर उसके शासकगण तानाशाह बन जाएंगे. दोनों ही स्थितियों में वह उन उद्देश्यों से दूर चला जाएगा जिनके लिए उसका गठन किया गया है.

सुकरात से करीब 30 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने तीस सदस्यीय परिषद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीकठाक चलता रहा. धीरेधीरे वहां भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. गणतंत्र के नाम पर गठित व्यवस्था कुलीनतंत्र में ढल गई. इन सभी परिवर्तनों को प्लेटो ने बहुत करीब से देखा था. लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता ने उसे दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना को प्रेरित किया था. वह स्वयं अभिजात परिवार से था. एथेंस के राजपरिवार से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. इसके बावजूद उसे सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर कभी न मिल सका, मगर राजनीति उसके दिलोदिमाग पर सदैव हावी रही. उसके जीवन में कई ऐसे अवसर आए जब उसे राजनीति या कहो कि विकृत राजनीति का शिकार होना पड़ा. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, उसे कुछ विद्वान सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की देन मानते हैं. मेरे विचार में प्लेटो के अपने जीवनानुभव ही ऐसे थे, जिससे प्रचलित राजनीतिक दर्शनों के प्रति निराशा का भाव पैदा होना स्वाभाविक था. उसका अपना जीवन राजतंत्रें की तानाशाही का शिकार रहा था. उन राजतंत्रें में उसे उत्पीड़न भोगना पड़ा था जो दार्शनिकों का सम्मान करने का दावा करते हुए दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करते थे. जबकि उस समय के सर्वाधिक गर्वीले एथेंस के लोकतंत्र को प्लेटो अपने गुरु और मनीषी सुकरात की हत्या का दोषी मानता था.

प्लेटो की कल्पना ऐसे शक्तिशाली, पूर्णतः आत्मनिर्भर राज्य की थी, जिसके नागरिक राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों से पूरी तरह सचेत हों. यह प्रेरणा उसे स्पार्टा के नागरिक जीवन से मिली थी. वहां के नागरिक वीरता, अनुशासन और सादा जीवनशैली के मामले में अद्वितीय थे. युद्ध उनके लिए खेल के समान था. दूसरी ओर एथेंसवासी प्रायः मननशील, साहित्यकला के अनुरागी, उदार एवं संवेदनशील थे. उन्हें अपने गणतंत्र पर गर्व था, परंतु शिखर पर बैठे लोग वहां भी आत्मश्लाघा तथा स्वार्थ भाव से आपूरित थे. उनमें राजनीतिक मतैक्य का अभाव था. एथेंस को स्पार्टा के हाथों मिली शर्मनाक पराजय के कारण भी वही थे. प्लेटो सुकरात को मृत्युदंड के लिए एथेंस की दोषपूर्ण राजनीति को जिम्मेदार मानता था. आदर्श राज्य में उसने स्पार्टा के अनुशासित नागरिक जीवन से प्रेरणा लेते हुए ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसके नागरिक वीर, जुझारू, निष्ठावान तथा सादा रहनसहन के आदी हों. प्लेटो स्पार्टा की कमजोरी भी समझता था. वहां राज्य के आगे नागरिक जीवन का महत्त्व गौण था. इसलिए आदर्श राज्य में उसने ऐसे समाज की कल्पना की है जहां राज्य और नागरिक दोनों के हित परस्पर जुड़े हों. व्यक्ति को वह सब मिले जो उसका अधिकार है. इस प्रेरणा के पीछे सुकरात के नैतिकतावादी दर्शन का बड़ा योगदान था. वह मानता था कि आदर्श राज्य एवं न्यायसिद्धांत एकदूसरे से जुड़े हैं. न्याय नागरिक और समाज दोनों की शुभत्व की यात्र को संभव बनाता है. एक के अभाव में दूसरे की उपस्थिति संभव ही नहीं है. नगरराज्यों में प्रचलित बुराइयों के निदान हेतु न्याय महत्त्वपूर्ण साधन है. इसलिए राज्य को न्यायआधारित राज्य में बदलना न केवल शासक, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी जिम्मेदारी है.

यह सर्वविदित है कि बुद्ध की भांति सुकरात ने भी स्वयं कुछ नहीं लिखा. दोनों वाचिक परंपरा के विचारक थे. तथापि जैसे बुद्ध भारत में युगप्रवर्त्तक विचारक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, यूनानी दर्शन में सुकरात की महत्ता भी युगप्रवर्त्तक विचारक की है. उसका जन्म शिल्पी परिवार में हुआ था. उसका यौवन पेरीक्लीज के महान युग में बीता था. एक नागरिक के रूप में उसने सभी विहित कर्तव्यों का पालन किया था. एथेंस के लिए उसने कई युद्धों में भाग लिया. डेलियम के सुप्रसिद्ध युद्ध में उसके धैर्य की काफी प्रशंसा हुई थी. राज्य के कानून में उसकी पूरी निष्ठा थी, जिसपर वह आजीवन अडिग बना रहा. उसने एथेंस के शासकवर्ग की आलोचना की. खुली आलोचना की. जिसके लिए उसपर नास्तिक होने के आरोप भी लगे. परंतु नगरराज्य के कानून के प्रति उसके सम्मान में कभी कमी नहीं आई. जब भी शासकवर्ग के स्वार्थ और कानून में द्वंद्व की स्थिति बनी, उसने सदैव कानून और संविधान का साथ दिया. इस कारण उसे नास्तिक तक कहा गया. एथेंस की संसद के कई सदस्य उससे हमेशाहमेशा के लिए नाराज हो गए. तमाम विरोधों के बावजूद वह अपने विचारों पर डटा रहा. उसे अपने देश के कानून से कितना प्यार था, इसके समर्थन में एक उदाहरण अकसर दिया जाता है. एथेंस की संसद द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने पर प्लेटो तथा उसके साथियों ने सुकरात को जेल से बाहर निकालने की योजना बनाई थी. गोपनीय तरीके से प्रस्ताव सुकरात तक पहुंचाया गया. लेकिन जान दाव पर लगी होने के बावजूद सुकरात ने कैद से भागने से यह कहकर इन्कार कर दिया था कि ऐसा करना कानून का उल्लंघन होगा. कानून के प्रति सुकरात की अनन्य निष्ठा को दर्शाने वाला यह अकेला उदाहरण नहीं है. जिन दिनों वह नागरिक परिषद का सदस्य था, उसके सामने नौसेनापतियों का मामला आया. उनपर आरोप था कि अरगिनुगाए के समुद्री युद्ध(405 ईस्वी) के दौरान उन्होंने डूबते हुए नागरिकों को बचाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया था. कुछ विवरणों में बताया गया है कि परिषद की अध्यक्षता समिति का सदस्य होने के साथसाथ सुकरात उस दिन उसका सभापतित्व भी कर रहा था. इसलिए अपराधी सेनापतियों के दंडनिर्धारण के लिए परिषद में मतदान कराने की जिम्मेदारी उसी की थी. निचली अदालत सेनापतियों को एक मत के अंतर से दोषी घोषित कर चुकी थी. इसलिए यदि वह सचमुच आदेश सुना देता तो वह परिषद की सामान्य कार्रवाही मानी जाती. मगर सुकरात ने यह कहकर कि सामूहिक रूप से दंड निर्धारित करना एथेंस के संविधान के विरुद्ध है—फैसले के लिए मतदान कराने से इन्कार कर दिया था. परिषद में केवल सुकरात ऐसा था जिसने दंडनिर्धारण प्रक्रिया को दोषी माना और बाकी सदस्यों के दबाव डालने के बावजूद सुनवाई को टाल गया. उसके सालभर बाद की एक और घटना है. सुकरात तथा चार अन्य नागरिकों को 30 सदस्यों की संसद की ओर से एक अपराधी को गिरफ्तार करके लाने का आदेश दिया गया. उस व्यक्ति को एक मामले में मृत्युदंड सुनाया गया था. सुकरात ने आदेश को संविधान विरुद्ध मानते हुए उसके पालन से इन्कार कर दिया था. नागरिक कर्तव्यों के प्रति संपूर्ण निष्ठा, उनपर अटल रहते हुए उनका पालन तथा कानून की सीमाएं लांघने की दृढ़तापूर्वक अस्वीकृति—दो ऐसी विशेषताएं हैं, जो सुकरात को सामान्य से हटकर उसकी वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती हैं.

महान व्यक्तित्व बहुप्रतिभाशाली होते हैं. कई बार परिस्थितियां भी उनके जीवन को नया मोड़ दे देती हैं. पिता मोरोपंत तांबे ने बेटी ‘मनु’ का विवाह अधेड़ गंगाधर राव से यह सोचकर किया था कि बेटी रानियों की तरह सुख भोगेगी. परंतु वीरांगना लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों को बगावती तेवर दिखाए और 1857 के स्वाधीनता संग्राम की नायिका सिद्ध हुईं. गांधी जी नाकाम वकील से कामयाब नेता बने. डॉ. आंबेडकर की रुचि अर्थशास्त्र में थी. वे कामयाब अर्थशास्त्री थे और उसी क्षेत्र में आगे काम करना चाहते थे. अगर वही करते तो सामाजिक न्याय के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, जिससे आगे चलकर दलितों के लिए कल्याण और अधिकारिता का मार्ग प्रशस्त हुआ, उसके लिए उन्हें किसी और मसीहा की प्रतीक्षा करनी पड़ती. अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए डॉ. आंबेडकर ने संघर्षमय राजनीति का रास्ता चुना. जीवन के आरंभ में सुकरात की रुचि भौतिक विज्ञान में थी. उसने अपने समय के लगभग सभी भौतिकवादी सिद्धांतों का अध्ययन किया था. परंतु उनसे उसे संतुष्टि न मिली थी. उसका मानना था कि भौतिक विज्ञान यह तो बताता है कि ‘चींजें कैसे बनीं?’ परंतु उनके बनने का औचित्य क्या है? कौनसी सत्ता उनके निर्माण के पीछे है? जैसे प्रश्नों का उत्तर वे नहीं दे पातीं. घिसेपिटे प्रश्नों और उत्तरों से उकताए सुकरात के लिए यही प्रश्न सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे. धीरेधीरे वह प्रकृतिविज्ञान और तत्वमीमांसा से जुड़े यांत्रिक प्रश्नों से उकताने लगा. अंततः क्रांतिक छलांग मारते हुए, उसने एनेक्सीमेंडर और हेराक्लाइटस की दुनिया छोड़, ज्ञानमीमांसा की ऐसी दुनिया में प्रवेश किया, जहां ज्ञान के साथसाथ, ज्ञान के निर्माण की विभिन्न पद्धतियों तथा उनकी विशेषताओं पर भी विचार किया जाता था. आगे चलकर उसे प्लेटो, जेनोफीन, इसोक्राइट्स जैसे विद्वान शिष्य और सहयोगी प्राप्त हुए. अपनी प्रतिभा और सूझबूझ के बल पर सुकरात ने अनूठी चिंतनशैली विकसित की, जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में ज्ञानमीमांसा को आगे बढ़ाया जाता है. सुकरात राजनीति को श्रेष्ठ कला मानता था. उसने कहा था—

यदि श्रेय(शुभत्व) कला नहीं, बल्कि उससे ऊंची और उदार चीज है तो कम से कम राजनीति को तो कला मानना ही चाहिए. और राजनीतिज्ञ से भी यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वह प्रशिक्षण प्राप्त करे और एक शिल्पी की भांति किसी उस्ताद की देखरेख में रहे. परंतु हमें राजनीतिज्ञ को तुरंत या एकदम शिल्पी से अभिन्न नहीं मान लेना चाहिए. जिन चीजों का संबंध न्याय एवं संयम से है, यदि उनका संरक्षण उसके जिम्मे है तो सबसे पहले आवश्यक है कि श्रेय के बारे में उसकी सच्ची और दार्शनिक धारणा हो….यह विषय ऐसा है जिसका संबंध कला के बजाय किसी उच्चतर वस्तु से है.’12

एक समय सुकरात की इच्छा नैतिक शिक्षक बनने की थी. प्लेटो के अनुसार सुकरात ने कई परिभाषाओं में समसामयिक नैतिकता के संदर्भों में संशोधन किया था. अतः उसके अनुसार वह नैतिक शिक्षक ही था. हमें उसे कामयाब शिक्षक मानना चाहिए. इसलिए भी कि अपनी कलम से एक भी शब्द लिखे बिना सुकरात की गिनती विश्व के सिरमौर दार्शनिकों में की जाती है. प्लेटो के विपुल लेखन में ऐसी एक भी पंक्ति नहीं है, जिसमें लेखक ने सुकरात का प्रभाव महसूस न किया हो. एक परमजिज्ञासु व्यक्तित्व के रूप में उसने अपने समय की दर्शनचिंतन परंपरा को प्रभावित किया. इसमें प्लेटो के योगदान की उपेक्षा असंभव है. आज हम सुकरात के बारे में जो भी जानते हैं, उसमें प्लेटो तथा उसके अन्य शिष्यों, समकालीनों का बहुत बड़ा योगदान है. यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. जिस समय सोफिस्ट विचारक कोरे तर्क के आधार पर वितंडा रच रहे थे—सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता को सम्मान देने पर जोर दिया. उसके लिए ज्ञान और सद्गुण में कोई अंतर न था. न ही वह बौद्धिक चिंतन को भावना से सर्वथा निरपेक्ष मानता था. सुकरात के अनुसार बौद्धिक चिंतन कुछ ऐसी चीज है जो ‘भावना से अनुप्राणित’ है. जो न केवल ज्ञान को दिशादशा देता है, बल्कि मानवी ऐषणाओं को भी प्रभावितप्रेरित करताकराता है. उसका असर मनुष्य के व्यवहार और कार्यकलापों पर देखने पर मिलता है. इसपर बार्कर ने मेयर को उद्धृत किया है—

यदि हम ज्ञान तथा आचरण को एक ही मान सकें तो वह आचरण का स्थायी मापदंड बन जाता है. जिस ज्ञान का आचरण से कोई संबंध न हो, और जो ज्ञान केवल ज्ञान के लिए ही अर्जित किया जाए, तो ऐसे ज्ञान का इस यूनानी दार्शनिक की दृष्टि में कोई विशेष अर्थ नहीं था. ज्ञान केवल कुछ सूचनाओं का संकलनमात्र नहीं है. व्यक्ति के चरित्रनिर्माण के साथ उसका गहरा संबंध है. ज्ञान बुद्धि के माध्यम से ही समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है. यह इच्छाशक्ति और भावनाओं का निर्माण है. साहस, संयम, न्याय आदि सभी सद्गुणों की उत्पत्ति ज्ञान से ही होती है. साहसी वही व्यक्ति बन सकता है जो भय तथा निर्भीकता का ज्ञान रखता हो.’13

सुकरात के दर्शन में एक शब्द बारबार पढ़ने को मिलता है. वह शब्द है—सद्गुण. इसके पर्याय के रूप में प्लेटो ने ‘अरैती’ शब्द का उपयोग किया है, जिसका भाषिक अर्थ है—‘उत्कृष्टता.’ इस तरह सद्गुण का अभिप्राय है—सभी कर्मक्षेत्रों में उत्कृष्टता. उस गुण में प्रवीणता जिसके लिए उस वस्तु का आविष्कार हुआ है. जैसे कलम का गुण लिखना है, चाकू का गुण काटना. तो कलम की उत्कृष्टता का मापदंड होगा कि उससे कितना अच्छा या बुरा लिखा जा सकता है. ठीक इसी प्रकार चाकू की उत्कृष्टता भी उसके द्वारा किए गए कार्य की गुणवत्ता पर निर्भर होगी. मनुष्य के संदर्भ में उत्कृष्टता का आकलन उसमें मानवीय गुणों की उपस्थिति से आंकी जा सकती है. सुकरात के अनुसार मनुष्य की अच्छाई या बुराई दो प्रकार की होती है. पहली उसकी प्रवृत्ति को लेकर. जिसके आधार पर उसका दूसरे मनुष्यों के साथ व्यवहार का आकलन किया जा सकता है. दूसरी व्यवसाय या कौशल को लेकर. जो उसके उत्पादकता संबंधी गुणों का मापदंड है. समाज के लिए मनुष्य के दोनों ही गुण अभीष्ट हैं. इनमें एक का भी अभाव मनुष्य को समाज के लिए अनुपयोगी बना सकता है. कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा चित्रकार, इंजीनियर, वकील, नेता, डॉक्टर, लेखक आदि हो सकता है. परंतु अच्छा वही मनुष्य हो सकता है, जिसमें मनुष्य की अच्छाई को दर्शाने वाले गुण प्रचुर मात्र में उपलब्ध हों. अच्छाई का मापदंड क्या है? सुकरात के अनुसार संयम, न्याय, साहस और विवेक, मनुष्य के श्रेष्ठत्व के स्तर को दर्शाते हैं. संयुक्त रूप से चारों गुण मानवीय उत्कृष्टता का मापदंड कहे जा सकते हैं. इनके अभाव में मनुष्यत्व पर संकट आ सकता है, जो प्रकारांतर में समाज के लिए भी हानिकारक है. सुकरात के आचरण की उत्कृष्टता के विचार की तुलना बुद्ध के ‘अष्टांग मार्ग’ से की जा सकती है. सुकरात से लगभग आधी शताब्दी पहले जन्मे बुद्ध ने भी आचरण की शुद्धता एवं उत्कृष्टता पर बल दिया था. उनका अष्टांगिक मार्ग—सम्यक दृष्टि, सम्यक कर्म, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक स्मृति, सम्यक जीविका, सम्यक व्यायाम तथा सम्यक समाधि का समर्थन करता है. इन कर्तव्यों में पूर्णता व्यक्ति को निर्वाण की ओर ले जाती है. यह कहना तो अनुचित होगा कि सुकरात ने अपने विचार बुद्ध से लिए थे, परंतु दोनों के कर्मसिद्धांत में अनूठा साम्य मनुष्यता के इन दो हितचिंतकों के समान वैचारिक धरातल को दर्शाता है. सुकरात का विचार था कि डॉक्टरी, नौकासंचालन अथवा दूसरे उद्यमों की भांति राजनीति भी एक कला है. व्यक्ति राजनीति का ज्ञान अर्जित कर, शासनकार्य में निपुणता प्राप्त कर सकता है. परंतु श्रेष्ठ शासन के लिए व्यक्ति का उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास और कर्तव्यपरायणता आवश्यक है. सुकरात के जीवनदर्शन की ये विशेषताएं उसे सोफिस्टों से अलग कर, मनुष्यता के आदिचिंतक के रूप में स्थापित करती हैं.

सुकरात ने जिस आदर्शवाद को केंद्र में रखते हुए उसने अपने दर्शन सिद्धांत गढ़े थे, प्लेटो ने उसी को आधार बनाकर आदर्श समाज की रूपरेखा तैयार की थी. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन नैतिकता से आबद्ध है. सुकरात का उल्लेख उसने ऐसे तेजस्वी विद्वान के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौतीभरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. ‘अकादमी’ की स्थापना उसने इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पलभर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशलनीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते. हालांकि ऐसा सोच सर्वथा निरापद नहीं है. समाज में प्रतिभाशाली लोग हमेशा होते हैं. लेकिन प्रायः लोग विरोधी विचारधाराओं के प्रति लचीलेपन के अभाव में उनकी उपेक्षा कर जाते हैं. समन्वयसामर्थ्य की कमी भी इसका कारण होती है. शिखर पर बैठे लोग प्रायः यह सोचते हैं कि उनके सहयोगी या मातहत ठीक वैसा और उतना ही सोचेंकरें, जैसा वे स्वयं सोचतेचाहते हैं. मार्गेट थैचर जैसे नेता जब कुशल और समर्पित लोगों की कमी की बात करते हैं तो इसका आशय यह नहीं है कि समाज में उस तरह के लोगों की सचमुच कमी होती है. असलियत यह है कि प्रतिभा के साथसाथ जिस अंधसमर्पण की अपेक्षा सत्ताशीन वर्ग दूसरों से करते हैं, वैसा प्रायः नहीं हो पाता. जिसको ऐसे लोग मिल जाते हैं, वह हिटलर की भांति तानाशाह बन जाता है.

यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और कई समकालीन एवं पूर्ववर्त्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका विचार था कि ‘सत्य को सदैव अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’ पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्तिसामर्थ्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल कविता भी अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामेनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्याविश्लेषण तक संभव है. शुभत्व इस आधार पर अस्तित्ववान है क्योंकि वह मानवजीवन को नैतिकता की ओर अग्रसर करता है. दूसरी ओर नैतिकता इसलिए अस्तित्ववान है, क्योंकि वह मनुष्य की शुभत्व की यात्रा को सफल बनाती है. इस कसौटी के अनुसार पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जाता है. कालांतर में वही भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्र का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी है—वह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जब तक पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, तब तक आगे चल रहा व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. ग्रहनक्षत्र भी इसी नियम का पालन करते हैं. हेराक्लाइट्स के अनुसार रातदिन सूर्य चक्र के अनुसार बदलते हैं. हालांकि हर रोज एक ही सूरज दिखाई पड़ता है, किंतु हम एक ही समय में कभी नहीं लौटते. हर बार का सूरज कुछ नया होता है. हम उस अंतर को नहीं समझ पाते; क्योंकि हमारी दृष्टि अरबों वर्ष के अंतराल को परखने में समर्थ नहीं है. हेराक्लाइट्स का यह विचार आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के निकट है. इसे पढ़ते हुए आइंस्टाइन की याद आना स्वाभाविक है. आइंस्टाइन ने भी समय को चौथा आयाम माना है. परंतु हमें याद रखना चाहिए कि हेराक्लाटस के शब्द आइंस्टाइन से लगभग 2400 वर्ष पहले के हैं. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति है—‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि यह वाक्य उसने नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार—

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन है—वह न तो ईश्वरनिर्मित है, न ही मानवनिर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशाहमेशा के लिए रहने वाला है.’14

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चौंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो—

युद्ध आमखास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास तथा कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.15

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस के अलावा सुकरात पूर्व के दार्शनिकों में प्रोटेगोरस का नाम भी बड़े सम्मान के साथ के साथ लिया जाता है. उसके विचारों में हम आर्थिक उदारवाद की झलक देख सकते हैं. वह सोफिस्ट था और गर्व के साथ खुद को पुराने सोफिस्टों की भांति ‘मानवता का शिक्षक’ कहता था. यह बात अलग है कि उसके जीवनकाल में ही सोफिस्टों का सम्मान घटने लगा था. उसके पीछे सोफिस्टों की अपनी चूकों, जैसे कि ज्ञान को वितंडा का पर्याय मानना तथा शिक्षा का अभिप्रायः दूसरों को प्रभावित करने की कला बताना तथा सुकरात की बढ़ती ख्याति का बड़ा योगदान था. सुकरात के प्रभाव में ही प्लेटो भी सोफिस्टों से दूरी बनाए रहा. अपने मौलिक विचारों के कारण प्रोटेगोरस जैसे प्रतिभाशाली चिंतकों का महत्त्व बाद में भी बना रहा. वह प्राचीन क्लासिक किस्म के सोफिस्टों में से था जो प्रकृति और मनुष्य के संबंधों के बीच नएपन की खोज को समर्पित थे. उनीसवीं शताब्दी के उदारवादी विचारकों की भांति उसके दर्शन का केंद्र भी मनुष्य है. इस संबंध में प्रोटेगोरस का पहेलीनुमा कथन है—‘केवल मनुष्य सृष्टि की समस्त वस्तुओं का मापदंड है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी हैं, वैसा है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी नहीं हैं, वैसा नहीं है.’ इस कथन की अनेक व्याख्याएं हुई हैं. प्रकारांतर में वह बताता है कि न्याय अथवा कोई और ऐसी चीज जो समाज की भलाई की दावेदारी करती है, व्यक्तिनिरपेक्ष नहीं हो सकती. ऐसी वस्तुओं की उपयोगिता लोकहित साधते रहने में है. विवेचना को आगे बढ़ाते हुए उसने लिखा है कि, ‘प्रत्येक राज्य के लिए जो भी उचित एवं कल्याणकारी प्रतीत होता है, वह उसके लिए उस समय तक उचित एवं कल्याणकारी बना रहेगा, जब तक उसके विचारों में आमूल परिवर्तन नहीं होता.’ विचारों में परिवर्तन से प्लेटो का आशय समाज में वस्तु या व्यक्ति के प्रति धारणा है. उदाहरण के लिए ऐसे समाजों में जहां बहुपत्नीत्व अथवा बहुपतित्व जैसी प्रथाएं हैं, वहां क्रमशः एकाधिक पत्नी अथवा पति रखना अनुचित नहीं है. प्रथाएं समाज में उस समय तक सम्मानेय अथवा असम्मानेय बनी रहती हैं, जब तक कोई समाज उन्हें सम्मानेय अथवा असम्मानेय मानता है. प्रत्येक बदलाव मनुष्य की इच्छाशक्ति और बदलाव की उत्कंठा को दर्शाता है. अकसर यह कहा जाता है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है. घटनाएं उसके जीवन और विचारों को मनचाहा मोड़ देने में सक्षम होती हैं. परंतु इस सोच की सीमाएं हैं. कोई भी घटना मानवव्यवहार को तभी तक प्रभावित कर सकती हैं, जब उनमें व्यक्ति के आचरण से कुछ सीख लेने का गुण हो. कुल मिलाकर मनुष्य और उसके चारों और घट रही घटनाओं के बीच लेनदेन चलता रहता है. प्लेटो के अनुसार—

नगरराज्य से संबंधित मामलों में प्रत्येक नगर अच्छे और बुरे, उचित और अनुचित, न्यायसंगत और न्यायविरुद्ध, अनुकूल और प्रतिकूल निर्णय कर लेने के बाद उस निर्णय के अनुसार व्यवस्थाओं का गठन करता है, जो समान रूप से मान्य होती हैं. लेकिन इसका आशय यह नहीं कि कोई व्यक्ति अथवा नगर दूसरों के मुकाबले कम अथवा अधिक बुद्धिमान है. किसी नगरराज्य के लिए क्या उपयोगी और सुलभ होगा, इस बारे में मतभेद संभव हैं. परंतु नैतिकता से संबंधित मामलों में राज्य ही एकमात्र सत्ता है. राज्य का निर्णय सामूहिकता की देन होता है.’16

प्रोटेगोरस के अनुसार राज्य नैतिकता और कानून दोनों का आधार है. आदर्श राज्य प्रत्येक नागरिक को अपने मत पर बने रहने, अपने विचारों के साथ जीने की स्वतंत्रता देता है. साथ ही नागरिक इसके लिए भी बाध्य होता है कि वह राज्य द्वारा अनुमन्य सभी नियमों और कानूनों का पालन करेगा, ताकि उसके विचारों के कारण बाकी नागरिकों को जो उससे भिन्न राय रखते हैं किसी प्रकार की परेशानी न हो. स्मरणीय है कि प्रोटेगोरस के जीवनकाल में राज्य छोटेछोटे थे. समाज समुदायों में बंटा हुआ था. कुल जनसंख्या दास और गैर दास में बंटी थी. इसलिए उस समय तक समुदाय और समाज में बड़ा अंतर नहीं था. प्रायः समुदाय की इच्छा को ही समाज की इच्छा के रूप में अभिव्यक्त किया जाता था, हालांकि उसका प्रभाव क्षेत्र समुदाय विशेष तक ही सीमित रहता था. इसलिए प्रोटेगोरस ‘सामुदयिक इच्छा’ पर, जिससे समुदाय के अधिसंख्यक लोगों का भला हो, जोर देता है. समुदाय को बड़े समाज में बदलने की चाहत अरस्तु के बाद आरंभ होती है. अरस्तु सामाजिक नैतिकता का प्रश्न उठाता है और प्लेटो से हटकर सोचते हुए किसी खास राजनीति दर्शन के बजाय व्यक्ति और समाज की सामूहिक चेतना के विस्तार की मांग प्रस्तुत करता है. रूसो उसका उदात्तीकरण करते हुए उसे ‘सामान्य इच्छा’ में बदल देता है. यह अंतर दिखने में भले मामूली लगे, है अत्यंत महत्त्वपूर्ण. ‘सामुदायिक इच्छा’ का आशय ऐसी इच्छा से था, जिससे समाज में अधिसंख्यक लोगों का भला होता हो. ‘सामान्य इच्छा’ में भी बहुसंख्यक वर्ग का हित सुरक्षित है. लेकिन पहली में बहुसंख्यक वर्ग के हितों पर जोर देते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की या तो उपेक्षा कर दी जाती है, अथवा उनके अहित को बहुसंख्यक के हित की अनिवार्यता मानकर उपेक्षित कर दिया जाता है. रूसो की ‘सामान्य इच्छा’ इस मायने में उदार है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों को नजरंदाज करने के बजाय उन्हें राज्य की नैतिकता का प्रश्न बना देता है. तदनुसार उन इच्छाओं पर भी जोर दिया जाया जाता है, जिन्हें अल्प समूह की इच्छाएं मानकर प्रायः नजरंदाज किया जाता है. श्रेष्ठ समाज में ही श्रेष्ठ मनुष्य का वास होता है—कहते हुए अरस्तु बहुसंख्यक वर्ग से उम्मीद करता है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों का भी ध्यान रखेगा; और राज्य जो प्रायः बहुसंख्यक वर्ग की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है, वह अल्पसंख्यक वर्ग के हितों, समानता और स्वतंत्रता को निर्बंध रखने के लिए समुचित कदम उठाएगा.

प्लेटो का विचार था कि आदर्श राज्य की स्थापना केवल समर्थन, सहयोग और परिवर्तनशील बने रहने से संभव नहीं है. इसे दृढ़, स्थायी, अपरिवर्तनीय राजनीतिक तंत्र के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो सामाजिक परिवर्तनों को निरंतर नियंत्रितनिर्देशित करने में सक्षम हो. ‘रिपब्लिक’ और ‘लॉज’ में आदर्श समाज के लिए जिन विचारों को वह स्थान देता है, वे यूनानी समाज में छिटपुट रूप से उससे पहले भी मौजूद थीं. लेकिन प्लेटो का दर्शन इस मायने में विशिष्ट है कि राजनीति पर उस समय तक इतने व्यवस्थित उपयोग के बारे में किसी ने नहीं सोचा था. अतः राजनीतिक दर्शन के लिहाज से यह एक अद्भुत और विकासगामी सोच था. ‘आदर्श समाज’ की परिकल्पना के पीछे उसके कविहृदय का भी उतना ही योगदान था, जितना कि दार्शनिक मस्तिष्क का. इसलिए अपने आदर्श राज्य में उसने कानून के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए आत्मानुशासन पर ज्यादा जोर दिया है. इस ग्रंथ को कुछ विद्वान प्लेटो की कुंठा की उपज भी मानते हैं, जो उनके अनुसार एथेंस की राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा पाने के कारण जनमी थी. प्लेटो स्वयं दार्शनिक था. सुकरात, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, पेरामेनीडिस समेत पाइथागोरस के अन्य अनुयायी आदि जिनसे वह प्रभावित था, वे सब भी दार्शनिक थे. उसने एथेंस में गणतंत्रीय शासन को कुलीनतंत्र की मनमानी में ढलते हुए देखा था. सायराकस के सम्राट डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय की तानाशाही भी देखी थी. डायोनिसियस प्रथम अपने राज्य में विद्वानों और दार्शनिकों को रखता था. लेकिन उसकी मनमानी, सनकों और महत्त्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने में वे सभी अक्षम थे. इसी कारण प्लेटो का राजतंत्र से विश्वास उठ चुका था. राजतंत्र को वह राजा तथा उसके आसपास जुटे अधिकारियों की तानाशाही कहता था. राज्य के मुखिया के रूप में वह ऐसे शासकों की कल्पना करता था, जो दूरदर्शी, वीर, साहसी, दृढ़निश्चयी, बुद्धिमान और किसी भी प्रकार से प्रलोभन से मुक्त हों. उसका मानना था कि ये गुण एकमात्र दार्शनिक में ही संभव हैं. इसलिए वह राज्य की बागडोर दार्शनिक के हाथों में सौंपने की अनुशंसा करता है. ‘रिपब्लिक’ में उसकी यही परिकल्पना विस्तार लेती दिखाई पड़ती है.

ध्यातव्य है कि ‘रिपब्लिक’ प्लेटो के प्रौढ जीवन की रचना है, हालांकि उसका लेखन वर्षां तक चलता रहा. कुछ खंड उसने अपने उत्तरवर्ती जीवन में पूरे किए थे. वे कदाचित उसके जीवन के हताशा भरे दिन थे. उसे लगने लगा था कि ‘रिपब्लिक’ के सपने को यथार्थ में साकार कर पाना सहज नहीं है. तो भी उसका ‘शुभ’ की अनिवार्यता तथा आदर्शों से मोह भंग नहीं हुआ था. अतएव अपने अंतिम दिनों की कृति ‘लॉज’ में वह उन व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता है, जिनके द्वारा उस सपने को साकार किया जा सकता है. ‘रिपब्लिक’ की मुख्य स्थापना थी कि राज्य का मुखिया किसी दार्शनिक को होना चाहिए. वही चुनौतीपूर्ण स्थितियों में दृढ़ निश्चय लेकर राज्य का कल्याण कर सकता है. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग प्लेटो से पहले भी यूनान के नगरराज्यों में हो चुका था. नगरराज्यों में विकास हेतु योजनाएं बनाने तथा शासन हेतु आचारसंहिता तैयार करने का दायित्व प्रायः दार्शनिकविचारक ही संभालते थे. लंबे अनुभव के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि दुर्बलताओं से बाहर निकालने के लिए व्यक्ति के स्वभाव में आमूल परिवर्तन अनिवार्य है. जाहिर है, मार्क्स की भांति प्लेटो भी दुनिया को समझने नहीं, बदलने में विश्वास करता था. यही कारण है कि वह सहस्राब्दियों से दार्शनिक विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा है.

राजनीतिक दर्शन को समर्पित प्लेटो की महान रचना ‘रिपब्लिक’ न तो किसी विशिष्ट राजनीतिक दर्शन की स्थापना करती है, न ही किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्ष लेती है. उसकी स्थापनाएं यूनान के किसी भी नगरराज्य के बारे में सच हो सकती थीं. इसलिए कि वह किसी विशेष राजनीतिक प्रणाली पर जोर देने के बजाय समाज में आदर्शों की स्थापना पर जोर देता था. चूंकि आदर्श की स्थापना परोक्षतः न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना ही है, इसलिए इस ग्रंथ में वह न्याय को विभिन्न कोणों से परिभाषित करने का प्रयास करता है. न्याय की उसकी अवधारणा भी तत्संबंधी आधुनिक विचारधाराओं से भिन्न है. ‘जस्टिस’ के माध्यम से एक भयमुक्त, अपराधमुक्त, न्यायाधारित समाज की स्थापना का पक्ष लेने के बजाय वह नागरिकों में कर्तव्यबोध पैदा करने पर ज्यादा जोर देता है. उसकी निगाह में न्याय का अभिप्राय व्यक्ति और समाज के आचरण की स्वयंस्फूर्त पवित्रता से है. ‘न्याय’ हालांकि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है. इसका संबंध व्यक्ति मात्र के सदाचरण तथा समाज में अनुशासन बनाए रखने से होता है. ‘रिपब्लिक’ के पहले खंड में प्लेटो ने सुकरात को अपने साथियों के साथ ‘न्याय’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए दर्शाया है. उस चर्चा के माध्यम से ‘न्याय’ की मुख्यतः चार परिभाषाएं हमें प्राप्त होती हैं. मगर उनमें से एक भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसे सर्वमान्य और सर्वकालिक माना जा सके.

प्लेटो के अनुसार न्याय का उद्देश्य सार्वकालिकसार्वत्रिक शुभ और सर्वश्रेष्ठ न्यायिकराजनीतिक शासन की स्थापना करना है. वह न्याय के दो स्वरूप मानता है. पहला राज्य की कार्यप्रणाली के माध्यम से सामने आता है. जिसके द्वारा निहित स्वार्थ तथा कर्तव्यों के निष्पादन के लिए राज्य विभिन्न संस्थाओं का गठन करता है. न्याय का दूसरा चेहरा उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई पड़ता है. उसे लोगों के साहस, कर्तव्यों के प्रति उत्साहभाव, नैतिक व्यवहार आदि के माध्यम से जाना जा सकता है. प्लेटो की मान्यता थी कि व्यक्ति की अपेक्षा बड़े तंत्र, जैसे राज्य के व्यवहार में न्याय की पहचान अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है. लेकिन यदि प्रत्येक नागरिक न्याय की ओर से उदासीन हो जाए तो न्याय के राज्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. इसलिए व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह समाज को उस रूप में व्यवस्थित करने के बारे में सोचे और सहयोग करे जिस प्रकार वह स्वयं को व्यवस्थित करना चाहता है. किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे, इसके लिए वह न्याय को ऐसे चरित्रिक लक्षण के रूप में देखना चाहता है जिसकी व्याप्ति व्यक्ति और समाज दोनों जगह समानरूप से हो. चूंकि समाज सदैव दो से बड़ा होता है. अतः बड़ा होने के कारण समाज में न्याय की मौजूदगी उसी अनुपात में अधिक होनी चाहिए. सहजीवन और कठोर अनुशासित जीवनशैली के समर्थक प्लेटो का यह तर्क अजीब लग सकता है. परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह राजनीतिक सत्ता को अधिक न्यायोन्मुखी, उदार, कर्तव्यपरायण और दायित्वभावना से युक्त देखना चाहता था. वह चाहता था कि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचे कि—‘अपने समाज और राज्य की बेहतरी के लिए मैं क्या कर सकता हूं?’ ‘उसके प्रति मेरा कर्तव्य और जिम्मेदारियां क्या हैं?’ इसे कर्तव्यबोध कहें अथवा नागरिकबोध, प्लेटो के मन में ऐसा विचार यूनानवासियों, विशेषकर वहां के अभिजात्यवर्ग के चारित्रिक पतन की प्रतिक्रियास्वरूप उपजा था. परोक्ष रूप में समाज को बेहतर बनाने की चिंता ही ‘रिपब्लिक’ का प्रतिपाद्य विषय है, जो कभी ‘न्याय’ की लोकोन्मुखी अवधारणा और कभी ‘आदर्श राज्य’ की परिकल्पना के रूप में सामने आती है. उसकी निगाह में आदर्श राज्य की स्थापना तब तक असंभव है, जब तक वहां के नागरिक और शीर्षस्थ वर्ग के लोग ‘शुभत्व’ से भलीभांति परिचित न हों. ‘शुभत्व’ की संकल्पना सुकरात की देन थी, जिसको पाने की अभिलाषा प्लेटो के पूरे साहित्य में व्याप्त है. यही उसका आकर्षण है.

प्लेटो को पढ़ते हुए मार्क्स की याद आना स्वाभाविक है. दोनों ही भौतिकवादी थे. दोनों का ही मानना था कि कोई मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है. मानवमात्र की यही अपूर्णता सामाजिक गठन को अपरिहार्य बनाती है. परंतु एक सीमा के बाद मनुष्य और समाज के रिश्ते जटिल होने लगते हैं. उन्हें नियंत्रित करना अकेले समाज के लिए संभव नहीं होता. ऐसे में राज्य की अहमियत बढ़ जाती है. राज्य न केवल मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने के लिए नीतियां बनाता है, अपति कल्याण के बंटवारे के लिए भी उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है. मनुष्य की भोजन, वस्त्र, आवास आदि ऐसी अनेक आवश्यकताएं हैं, जिन्हें उसकी मूलभूत आवश्यकताएं माना जाता है. इनके बगैर जीवन असंभव है. कुछ आवश्यकताएं विकास की देन होती हैं—जैसे सड़क, औजार, मशीनें, बिजली के उपकरण, यातायात के साधन इत्यादि. मनुष्य की सामान्य इच्छा होती है कि उसके जीवन में दूसरों का हस्तक्षेप न हो. सुरक्षा का पक्का भरोसा हो. यह काम मनुष्य आपस में एकदूसरे के साथ सहयोग करते हुए भी कर सकता है. अक्सर करता भी है. यह कार्य वह दूसरों के हितों को देखते हुए, राज्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्य मानकर करे, यही सच्चा न्यायबोध है. यही वह ज्ञान है जिसके भरोसे राज्य के हस्तक्षेप अथवा उसकी नीतियों से स्वतंत्र रहकर भी मनुष्य अपना विकास कर सकता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

10. जिस समाज में धार्मिक आग्रह प्रबल हों, वहां तानाशाही भी मूल्य मान ली जाती है. धर्म स्वयं तानाशाही प्रवृत्ति रखता है. ऐसे समाजों में या तो पुरोहित की मर्जी चलती है, अथवा उसके देवता की. उनपर सवाल उठाना उदंडता समझा जाता है. यहां तक कि यदि कोई शंबूक ज्ञान की चाहत में पढ़नालिखना भी चाहे तो उसे मृत्युदंड देना धर्मरक्षा मान लिया जाता है. धार्मिक संस्थाएं कितनी पूर्वाग्रह ग्रस्त होती हैं, इसके अनेक उदाहरण हैं. उनकी खूबी है कि वे लोगों के दिलोदिमाग में ज्ञानपिपासा जगाने के बजाय उसे अनुकूलित करने का काम करती हैं. विज्ञान हो या साहित्य अथवा कोई ऐतिहासिक प्रसंग हो, वे उन सभी की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुसार करती हैं. ऐसा ही एक उदाहरण मध्यकाल में रहीम को लेकर है. रहीम अकबर के सेनापति, बड़े कवि थे. उनकी दानशीलता के भी बड़े किस्से प्रचलित हैं. एक किस्सा गंग कवि को लेकर है, जो स्वयं अकबर के दरबारी कवि थे. कहते हैं कि गंग कवि ने रहीम की विनत दानशीलता से प्रभावित होकर एक दोहा लिखकर भेजा—

सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन.

ज्योंज्यों कर ऊँचौं कियौं, त्योंत्यों नीचे नैन.

खानखाना ने उसका प्रत्युत्तर वैसी ही विनम्रता और कविकौशल के साथ दिया—

देनहार कोउ और है, देत रहत दिनरैन.

लोग भरम हम पै करें, तासों नीचे नैन.’

हम रहीम के दोहे में आए ‘देनहार’ शब्द पर चर्चा करेंगे. हालांकि यह कोई नया शब्द नहीं है. ‘दाता’ शब्द का उपयोग इसके पर्याय के रूप में हमेशा होता आया है. चूंकि दानकर्म को धर्म से जोड़ा जाता रहा है, इसलिए बिना एक पल गंवाए इसका अर्थ ‘ईश्वर’ या अल्लाह’ मान लिया जाता है. हमारे आस्थावादी दिमाग को यह न तो असंगत लगता है, न ही अनुचित. इसी के साथ रहीम और हर्ष जैसे दानदाताओं की उदारता का विराट आभामंडल हमारे मस्तिष्क में बनने लगता है. अब दान दो प्रकार से दिया जाता है. अपनी कमाई से देना. जैसे कोई गरीब धर्म के नाम पर मंदिरमस्जिद या पीरऔलिया की दरगाह पर देता है. दूसरा राजामहाराजा, जो जनता से खुशीखुशी, जबरन उगाए गए या लूटे हुए धन को दान के नाम बांटकर समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ‘वाहवाह’ लूटते रहते थे. दोनों हालात में असल देनदार जनता है. किसान खेत में हल चलता है, मजदूर कारखानों में पसीना बहता है, उन्हीं की कमाई राजा से राजा का खजाना भरता है. राजा उसके एक हिस्से को दान के रूप में लौटाकर यशप्रतिष्ठा अर्जित करता है—यह हकीकत भूले से भी हमारे दिमाग में नहीं आती. अंधआस्था हमारे विवेक को हर लेती है. नतीजा यह होता है कि हम धर्म और ईश्वर के नाम पर सत्ताओं के प्रत्येक धत्त्कर्म को पचाते चले जाते हैं. तो क्यों न यह मान लिया जाए कि रहीम जैसे संवेदनशील कवि की गर्दन यह जानने के कारण नीची थी कि जिस धन को वे दान में लुटा रहे हैं, वह उनका नहीं उनकी प्रजा के गाढ़े पसीने की कमाई का है.

11. ‘One should think it of greater importance than anything else that the affairs of polis are conducted well is the best means to success: everything depends on this, and if this is preserved, everything is preserved and if this is destroyed everything is destroyed’.-Democritus.

12. अर्नेस्ट बार्कर, यूनानी राजनीतिकसिद्धांत, पृष्ठ—140, अनुवाद विश्वप्रकाश गुप्त.

13. पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास, डॉ. प्रभुदत्त शर्मा से उद्धृत.

14. This world, which is the same for all, no one of gods or men has made; but it was ever, is now,and ever shall be an ever-living Fire, with measures kindling and measures going out.from BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY And Its Connection with Political and Social Circumstances from the Earliest Times to the Present Day.

15. ‘War….is the father of all and the king of all; and some he has made gods and some men, some bond and some free…We must know that war is common to all and strife is justice, and that all things come into being and pass away through strife.’-Heraclitus, quoted by BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY.

16. यूनानी राजनीतिक विचारधारा, टी. . सिनक्लेयर, अनुवाद विष्णुदत्त मिश्र.

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न्याय की पाश्चात्य अवधारणा

न्यायमूलक भावना ही मनुष्यता के साथ प्रेम संबंधों का नैरन्तर्य है.1जॉन रॉल्स

न्याय बड़ा खूबसूरत शब्द है. साथ में सम्मानित भी. परंपरा में वह शब्दों का ‘अभिजन’ है. इसीलिए जो व्यक्ति ईमानदार और न्यायकर्ता है, जिसके पास न्याय करने का अधिकार है. किसी भी दबाव, विशेषकर सत्ता के दबावों से जो मुक्त है, ‘दूध को दूध और पानी को पानी’ सिद्ध करने की कला जिसे आती है—जनसाधारण उसकी ओर उम्मीद-भरी निगाह से देखता है. आवश्यकता पड़ने पर वह अपने जीवन में ऐसे ही न्याय की कामना करता है. किसी भी समाज में न्याय का स्तर उस समाज में मानवीय अधिकारों की पहुंच का भी संकेतक होता है. समृद्ध न्याय-बोध हेतु परिपक्व अधिकारबोध आवश्यक है. परंपरागत समाजों में मनुष्य का अधिकारबोध, सामूहिकताबोध के दबावों से मुक्त नहीं हो पाता था. सामूहिकता का दायरा परिवार, बस्ती, जाति-समूह, पंचायत वगैरह कुछ भी हो सकता था. साधारणजन उन्हीं के बीच रहते हुए प्रचलित सांस्कृतिक प्रतीकों, लोकगाथाओं, रूपकों और मिथों से अपने न्यायबोध का संस्कार करता था. हालात आज भी वही हैं. आज भी किस्से-कहानियां जनसाधारण के न्यायबोध को बनाते हैं. बचपन से ऐसे अनेकानेक किस्सों, मिथों, धार्मिक प्रतीकों और गाथाओं से उसका वास्ता पड़ता है, जो उसे न्याय की प्रतीति कराते हैं. या जिन्हें उसके समक्ष न्याय के मानक के रूप में पेश किया जाता है. ‘जहांगीर का न्याय’, ‘अकबर-बीरबल’, ‘खोजा-बादशाह’, ‘मुल्ला नसरुद्दीन’, उपनिषदों और महाकाव्यों की कहानियों के अलावा समाज में लोक-किस्सों की भरमार हैं. उलझनों के बीच वही हमारी प्रेरणा बनते हैं. वही हमारे लोकमानस को बनाते हैं. उन्हीं से हमारे भीतर न्याय का संस्कार बनता है. भारतीय धर्मग्रंथों में यमराज को भी न्याय-प्रिय बताया गया है. उसे लेकर अनेक कहानियां और मिथ समाज में विद्यमान हैं. चूंकि उनके मूल में मिथकीय अंश ज्यादा हैं, इसलिए वे न्यायबोध को निखारने के बजाय तयशुदा निष्पत्तियों को थोपने का ही काम करते हैं. अपने समग्र प्रभाव में वे व्यक्ति को न्याय की मूल अवधारणा से दूर ले जाते हैं. जिस न्याय पर हम फिलहाल विचार करने जा रहे हैं, उसका दायरा विस्तृत है. वह बादशाह, काजी, अदालत, यमराज या किसी दयालु सम्राट के परंपरागत न्याय-बोध से परे है. न्याय के विविध रूपों पर विचार करने से पहले दो किस्से, बतौर उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं—

‘महमूद गजनबी का पिता सुबुक्तगीन गजनी के बादशाह का गुलाम था. कहते हैं कि प्रतिभा किसी की चेरी नहीं होती. गरीब के घर विद्वान जन्म ले सकता है, और तमाम इंतजामात के बावजूद बादशाह का बेटा निकम्मा, आलसी, दुर्व्यसनी और मंदबुद्धि हो सकता है. तुर्की मूल के गुलाम सुबुक्तगीन की प्रतिभा को देखते हुए गजनी के बादशाह ने उसे अपना दामाद बना लिया था. अवसर मिला तो सुबुक्तगीन की साम्राज्यवादी लालसाएं जोर मारने लगीं. उसने भारत पर आक्रमण कर कांधार पर कब्जा कर लिया और वहां अपनी छावनी बना दीं. सुबुक्तगीन भारतीय इतिहास में खुद तो ज्यादा हस्तक्षेप न कर सका. लेकिन उसके बेटे महमूद गजनवी ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर अपनी सलनत कायम कर ली. महमूद गजनवी भले ही सुलतान हो, हजारों सैनिकों की फौज का बेड़ा रखता हो. परंतु यह बात वह भी भली-भांति जानता था कि राजा-महाराजाओं को तलवार के दम पर दबाया जा सकता है. परंतु प्रजा को तलवार के बल पर लंबे समय तक दबा पाना असंभव होता है. निहत्थी जनता यदि अपनी पर आ जाए तो बड़े-बड़े साम्राज्य भू-लुंठित होने लगते हैं. हां, उसे भुलावे में जरूर रखा जा सकता है. धर्म, परंपरा, संस्कृति, राष्ट्रवाद जनता को भुलावे में रखने के ही उद्यम हैं. निजी मंसूबों को साधने के लिए चालबाज लोग इन्हीं का सहारा लेते आए हैं. भारतीय राजाओं का इतिहास रहा है कि वे आपसी फूट द्वारा प्रतिपक्षी की विजय को खुद आसान बना देते थे. सुबुक्तगीन को इसी का लाभ मिला था. अपनी छोटी-सी सेना की मदद से उसने युद्ध में स्थानीय राजा जयपाल को बुरी तरह पराजित किया था. उस युद्ध में जयपाल ने एक लाख सैनिक उतारे थे. परंतु युद्ध कौशल का अभाव और आपस की फूट ने उसे हथियार डालने को विवश कर दिया था.

बड़ी सलतनत खड़ी करने और लंबे समय तक बनाए रखने के लिए प्रजा का भरोसा जीतना भी आवश्यक है. सो मोहम्मद गजनवी ने प्रजा को न्याय का भरोसा दिलाया. विश्वास दिलाया कि न्याय के आगे बादशाह हो या फकीर सब बराबर हैं. ‘मनुस्मृति’ के विधान के जरिये ऊंच-नीय और गैरबराबरी में जीने वाले भारतीय जनसमाज के लिए ‘इस्लाम का बराबरी का सिद्धांत’ बड़ा ही आकर्षक सिद्ध हुआ. वर्ण-व्यवस्था के सताए लोग इस्लाम में दीक्षित होने लगे. नए धर्म में शामिल होने के बाद उनके हालात में क्या सुधार हुआ, यह कहना कठिन है. परंतु यह बात सही है कि इस्लाम अपने साथ कई आकर्षक परंपराएं भी लेकर आया था. प्राचीन फारस में न्याय के लिए काजी नियुक्त करने की व्यवस्था थी. काजी उसे बनाया जाता था जो अनुभवी हो. निडर हो. राजा-प्रजा के भेद से जिसका न्याय प्रभावित न होता हो. महमूद का काजी था—मोहतसिब. वह सुलतान के किसी भी आदेश से बरी था. न्याय के लिए उसे किसी खास समय की दरकार न थी. इसलिए लोग उसे चलता-फिरता न्यायालय मानते थे. उसका देखा-सुना ही प्रमाण था. घटना का यदि वह स्वयं साक्षी हो तो बिना किसी औपचारिकता के घटना-स्थल पर अदालत लगा, मामले को वहीं निपटा देता था. राज्य में सामाजिक स्थलों पर शराब पीने या शराब पीकर बाहर निकलने पर पूरी पाबंदी थी. एक दिन सुलतान और उसके सरदार ने शराब पी. नशे से दोनों झूमने लगे. शराब पीने के बाद सरदार ने घर जाने की इच्छा जाहिर की. इस पर सुलतान ने उसे रोका. समझाया कि नशा उतरने के बाद बाहर निकलना. लेकिन सरदार न केवल शराब का बल्कि रुतबे का नशा भी सवार था. सो सुलतान की सलाह की परवाह किए बिना वहां से चल दिया. संयोग ऐसा कि उसी समय काजी मोहतसिब खाना खाने के बाद घूमने के लिए निकला था. उसने सरदार को डगमगाते कदमों से गुजरते देखा तो गुस्सा आ गया. तत्क्षण सरदार को गिरफ्तार कर कोड़े लगाने का दंड सुनाया गया. न्याय हुआ, स्वयं बादशाह अपने चहेते सरदार को बचा न सका.’

ऐसे किस्सों में कितना सच होता है कितना झूठ, यह ठीक-ठीक बता पाना आसान नहीं है. सभी राजा-महाराजा, बादशाह-सुलतान दरबार में भाटों को नियुक्त रखते थे. उनका काम ही था, राजा की महिमा का बखान करते रहना. ताकि जनता को अपने राजा पर भरोसा बना रहे. उस समय तक ‘राजा’ और ‘राज्य’ में बड़ा अंतर नहीं था. राजा एक व्यक्ति के साथ-साथ संस्था भी होता था. उसकी इच्छा ही न्याय होती थी. जाहिराना तौर पर उसका झुकाव राजा के करीबियों की ओर अधिक होता था. न्याय के दूसरे स्वरूप को जानने के लिए दूसरा किस्सा प्रस्तुत है. यह न्याय से जुड़े नैतिक पक्ष की ओर संकेत करता है. महाभारत के वनपर्व में राजा उशीनर के न्याय की कहानी आई हैं. कुछ पुराणों इस कहानी को महान असुरराज बलि की दानवीरता से भी जोड़ा गया है—

‘एक दिन उशीनर दरबार में बैठे हुए थे कि एक घबराया हुआ कबूतर उनकी गोद में आकर गिरा. पीछे-पीछे एक बाज भी वहां आ पहुंचा. शरणागत की रक्षा के लिए उशीनर ने तलवार उठा ली. इस पर बाज बोला—‘महाराज! यह मेरा भोजन है. इसपर मेरा अधिकार है.’ उशीनर ने कबूतर की आंखों में झांककर देखा, वहां भय ही भय था. उसे देख राजा ने कहा—‘यह मेरी शरण में आया है और शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म है.’ बाज इस प्रश्न के उत्तर के लिए तैयार था. बोला—‘आपकी दया और दानवीरता के अनेक किस्से मैं सुन चुका हूं. इस समय मैं भूख से व्याकुल हूं. अगर जल्द कुछ इंतजाम न हुआ तो मैं यहीं दरबार में सबके सामने अपने प्राण त्याग दूंगा. राज्य में भूख के कारण मेरी अकाल मृत्यु के जिम्मेदार एकमात्र आप होंगे.’

उशीनर पेशोपेश में पड़ गया. कबूतर भयभीत था. राज्य-धर्म कहता था, शरण में आए की रक्षा करना. दूसरी ओर बाज भी अपनी जगह सही है. सृष्टि में ऐसे अनेक प्राणी है जिनका आहार दूसरे जीव हैं. प्रकृति की इस व्यवस्था को भी नहीं बदला जा सकता. सहसा राजा ने निर्णय लिया. उसका दायां हाथ उठा. कटार चली. राजा ने जांघ पर प्रहार कर मांस का एक हिस्सा शरीर से अलग कर दिया—‘कबूतर के मांस के बराबर मेरा मांस लेकर तुम अपनी क्षुधा शांत कर सकते हो.’

पहले किस्से में न्याय का लोक-प्रचलित रूप है. न्याय को लेकर सामान्य धारणा इसी प्रकार की होती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करे. प्राणरक्षा करना कबूतर का भी अधिकार है. बाज के सामने जब वह खुद को बचा नहीं पाता तो राजा की शरण लेता है. तभी बाज अपने दावे के साथ उपस्थित हो जाता है. एक तरह से दोनों का जीवन दाव पर लगा है. बाज सोचता है कि भोजन नहीं मिला तो उसके प्राण चले जाएंगे. दूसरी ओर कबूतर भी जानता है कि यदि वह बाज के प्राकृतिक अधिकार के आगे झुका तो वह स्वयं अपने जीवन से हाथ धो बैठेगा. उशीनर कबूतर और बाज दोनों के जीवन के अधिकार का सम्मान करता हुआ, तीसरा जो अपेक्षाकृत निरापद रास्ता है, अपनाता है. कबूतर के भार के बराबर अपना मांस देकर वह बाज के जीवन की रक्षा करता है. यह न्याय की पराकाष्ठा है, जिसमें राज्य(उशीनर) किसी भी पक्ष को हानि पहुंचाए बिना उन्हें संतुष्ट कर देता है. यह अपेक्षाकृत दुर्बल प्राणियों के प्रति राज्य के कर्तव्य को दर्शाता है. ऐसी अवस्था में वकील, अदालत आदि की भूमिका अप्रासंगिक हो जाती है. पहले किस्म के न्याय का परिष्कृत रूप हम अदालतों में देखते हैं. न्याय के प्रति जनसाधारण का दृष्टिकोण न्यायालयों में होने वाले न्याय तक सीमित होता है. कई बार क्षोभ और हताशा में डूबा व्यक्ति पुकार उठता है—‘दुनिया से न्याय मानो उठ-सा गया है.’ उस समय उसकी शिकायत पूरे समाज, देश और व्यवस्था से होती है. दूसरी कहानी में न्याय का स्वरूप परिष्कृत है. वहां भौतिक संसाधनों की अपेक्षा अधिकार और कर्तव्य पर चर्चा होती है. न्याय करते हुए उशीनर सामान्य दंडाधिकारी से बहुत ऊपर उठ जाता है. वादी और प्रतिवादी में से किसी को कष्ट न हो, इसलिए वह स्वयं कष्ट-पीड़ा सहकर न्याय का संकल्प उठाता है. हालांकि न्याय की आधुनिक सैद्धांतिकी पर ऐसे उद्धरण पूरी तरह खरे नहीं उतरते.

धर्म-केंद्रित समाजों की सामान्य धारणा होती है कि केवल परमात्मा की कृपा और उसका डर मनुष्य को धर्म की ओर प्रवृत्त कर सकता है. इसलिए हर धर्म के साथ कुछ न कुछ सिद्ध-निषिद्ध जुड़े होते हैं. मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि जो सामाजिक रूप से अनुमन्य है, उसका पालन करे तथा जिन कार्यों को निषिद्ध घोषित किया गया है—उनसे अपेक्षित दूरी बनाए रखे. ये शिक्षाएं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकलापों, किस्से-कहानियों, गाथाओं और मिथकों के माध्यम से जनता तक पहुंचती हैं. उपर्युक्त दोनों कहानियां धर्म के न्यायशील पक्ष को दर्शाती हैं. दोनों राजशाही के दौर की हैं. जिस दौर की ये कहानियां हैं वहां असहमतियों के लिए बहुत कम गुंजाइश थी. इसलिए वर्षों-वर्ष राज्य की मर्जी को ही धर्म और न्याय कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा. प्रकारांतर में ये कहानियां न्याय के दो भिन्न रूपों की ओर हमारा ध्यानाकर्षित करती हैं. जैसा कि अध्याय के आरंभ में ही कहा गया है, इस तरह की कहानियां ही जनसाधारण की चेतना का निर्माण करती हैं. यदि यह सच है तो न्याय को धर्म का विस्तार अथवा उसका प्रतिफल मानने में संकोच कैसा? वैसे भी धर्म जनसाधारण के बीच न्याय की अपेक्षा कहीं लोकप्रिय शब्द है. धर्म का इतिहास भले ही खून-खराबे का रहा हो, पुरोहितों ने उसके सहारे अपना धंधा खूब चमकाया हो, परंतु उसे सामाजिकता का आधार बनाने वाले आरंभिक मनीषियों की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता. यदि उन्होंने समाज की सुख-शांति के लिए डर को आवश्यक माना तथा समाज उसके कारण शताब्दियों तक अनुशासित रहा तो आगे भी उसका अनुसरण करने में बुराई क्या है! प्रश्न जितना आसान दीखता है, उत्तर उतना सरलीकृत नहीं है. धर्म-प्रधान राज्यों की न्याय व्यवस्था को देखकर इस वास्तविकता को समझा जा सकता है. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रत्येक धर्म नैतिकता का समर्थन करता है. यह बात अलग है कि धर्म-प्रेरित नैतिकता स्वयं स्फूर्त्त नहीं होती. वहां ईश्वर या परमात्मा के रूप में तीसरी सत्ता अवश्य होती है. ऐसी सत्ता जो सर्वोपरि है. सर्वशक्तिमान भी है. जिसका स्वरूप अनिश्चित और अदृश्य है. सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान बताकर उसका हर निर्णय अंतिम मान लिया जाता है. वहीं स्वरूप निश्चित न होने के कारण व्यक्ति को यह अवसर मिलता है, कि वह ईश्वर के नाम पर अपनी इच्छाएं थोप सके. धर्मप्राण मनुष्य के सद्कर्म और इच्छाएं बिना ईश्वर को बीच में लाए पूरी नहीं होतीं. परिणामस्वरूप उसके लिए जीवन और व्यक्ति दोनों का महत्त्व घट जाता है. वह अपने फैसले व्यक्ति और समाज की जरूरत के बजाय तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने की चाहत के साथ लेने लगता है. ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के साथ चर्चा करते हुए ग्लाकॉन नामक पात्र धर्माधारित न्याय की इसी कमजोरी की ओर इशारा करता है. इससे विकास के मायने और लक्ष्य दोनों बदल जाते हैं. प्राचीन सम्राट धर्मालयों के निर्माण पर जितना खर्च करते थे, लोकमहत्त्व के निर्माण यथा सड़क, चिकित्सालय, नहर, स्कूल आदि पर बहुत कम खर्च होता था. भारतीय राजाओं ने देश में जितनी बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए, उसका दसवां हिस्सा भी यदि विद्यालय बनवाए होते तो समाज की हालत दूसरी होती. उन्होंने शिक्षा की जिम्मेदारी उस वर्ग को सौंपी हुई थी, जिसके वर्गीय स्वार्थ प्रबल थे. यही कारण है कि शिक्षा भारत में सदा ही धर्म का पूरक संस्कार बनी रही, उसके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं पनप सका. बावजूद इसके प्राचीन समाजों में जनविद्रोह की घटनाएं विरल हैं. यह भी संभव है कि जानबूझकर उनका उल्लेख करने से बचा गया हो. इतिहासकारों, लेखकों और कवियों ने उनके दस्तावेजीकरण में उपेक्षा बरती हो. क्योंकि उस दौर में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं को धर्म और सत्ता की दृष्टि से देखने का चलन था. धर्म का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप था. यह जानते हुए भी कि जिसे धर्मानुशासन कहा जाता है, वह स्वयं-स्फूर्त्त नहीं होता. मनुष्य को उसकी कीमत अपने विवेक के रूप में चुकानी पड़ती है, जिससे अपने बुद्धि-विवेक से निर्णय लेने का अभ्यास निरंतर कम होता जाता है.

उपर्युक्त के बावजूद लंबे समय तक न्याय का धर्म-केंद्रित होना ही ‘श्रेष्ठतम न्याय’ माना जाता रहा. वैदिक युग से लेकर दो-ढाई सौ वर्ष पहले तक भारत में यही व्यवस्था काम करती रही. हालांकि ईश्वर को किसी ने देखा नहीं था, धर्म की परिभाषाएं आपस में गड्ड-मड्ड थी, फिर भी लोग एक-दूसरे को समझाते—‘दुनिया धर्म पर टिकी है. ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है.’ यह सोचते हुए वे अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय भी दूसरों के हवाले कर देते. बिना यह सोचे-विचारे कि ईश्वर के नाम पर स्वार्थ का सारा कारोबार उसके चेले-चपाटों ने कब्जाया हुआ है. चूंकि तीसरी शक्ति का कल्पना से बाहर कोई अस्तित्व नहीं है, इसलिए जनसाधारण ईश्वरेच्छा के नाम पर चंद लोगों की मनमानी का दास होकर रह जाता है, जिन्हें वह अपना गुरु अथवा अधीश्वर मानता है. उनके प्रभाव में न्याय व्यक्ति का अधिकार न रहकर शीर्ष पर बैठे लोगों की अनुकंपा मान लिया जाता है. इसी के साथ व्यक्ति से निर्णय की आलोचना का अधिकार छिन जाता है. कई बार तो न्याय की आलोचना या विरोध को दैवीय इच्छा का अपमान मान लिया जाता है. इस कोशिश में मानवीय अस्मिता को पीछे ढकेल दिया जाता है. मनुष्य के मान-सम्मान, आत्मगौरव, सहज विश्वास यहां तक कि स्वतंत्र पहचान को भी धर्म की राह में बाधक मान लिया जाता है. यह नजरंदाज कर दिया जाता है कि न्याय व्यक्ति का अधिकार, राज्य का अपने नागरिकों के प्रति पवित्रतम दायित्व है. उसे राज्य की अनुकंपा मानना समाजीकरण के उद्देश्यों पर पानी फेरने जैसा है. न्यायशीलता राज्य और राजा दोनों का अभीष्ट गुण है. यदि किसी धर्म में यह गुण मौजूद है तो निश्चित रूप से वह प्रशंसनीय है. फिर भी न्याय को धर्म का प्रतिफल मानना सर्वथा अनुचित होगा. उसे लोकचेतना का विस्तार अवश्य कहा जा सकता है. अरस्तु के शब्दों में न्याय, ‘समाज का शुभत्व है, वही राज्य को शुभत्व प्रदान करता है.’

अभी तक के विश्लेषण से न्याय की दो प्रवृत्तियां उभरती हैं. अदालतों में वकील, जज आदि के माध्यम से होने वाला न्याय. दूसरे अपने नागरिकों के प्रति राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित न्याय. भारतीय धर्मग्रंथों में न्याय के प्रथम रूप पर पर्याप्त चर्चा है. ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियां और धर्मसूत्रों में इसपर खुलकर विचार किया गया है. उसे राज्य का कर्तव्य बताया गया है. परंतु न्याय के दूसरे पक्ष जो नागरिक-समाज के प्रति राज्य के दायित्व को दर्शाता है, को लेकर भारतीय वाङ्मय में गहरी चुप्पी पसरी है. अर्थशास्त्र में राजा के सामने हालांकि लोकहित का बड़ा आदर्श रखा गया है. जोर देकर कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है. प्रजाहित में राजा का हित सन्निहित है.’2 ‘विष्णु धर्मसूत्र’ में भी इस भावना को विस्तार दिया गया है. तदनुसार—‘जो राजा प्रजा के सुख में सुखी, उसके दुख में दुखी हो जाता है. उसे संसार में अपनी कीर्ति बनाए रखने के लिए यज्ञ और तपादि की आवश्यकता नहीं है.’3 लेकिन यही ग्रंथ जब राजा को पृथ्वी का ईश्वर या देवता घोषित करते हैं, और उसके हाथ में सारे अधिकार सौंप देते हैं, और उत्तराधिकार में अंतरित राजन्य जब अयोग्य हाथों में पहुंचकर मनमानी का अवसर देता है, तब वह एक ऐसी निरंकुश शक्ति का प्रतीक बन जाता है, जिसका निर्णय समीक्षा और आलोचना से परे है. इन ग्रंथों के अनुसार राजा अकेला ही रक्षक, प्रजापालक, अन्नदाता, दंडाधिकारी वगैरह सबकुछ होता था. फैसले पर कोई सवाल न उठे, इसलिए उसके निर्णय को देववाणी घोषित कर दिया जाता था.

न्याय की दृष्टि से पश्चिमी दर्शन अपेक्षाकृत उदार रहे हैं. विशेषकर सुकरात और उसके बाद के यूनानी विचारक. मानव-केद्रित होने के कारण वे नियतिवाद से उतने प्रभावित नजर नहीं आते, जितने भारतीय धर्म-दर्शन. ऐसा नहीं है कि यूनानी साहित्य मिथकीय प्रभावों से सर्वथा मुक्त रहा है. इस आधार पर यूनानी दर्शनों को सुकरात पूर्व और सुकरात के बाद के दर्शनों में बांटा जा सकता है. सुकरात पूर्व के यूनानी दर्शनों पर मिथकीय चरित्रों का वैसा ही प्रभाव है, जैसा भारतीय धर्म-दर्शनों पर. कुछ अंशों में यह प्लेटो के विचारों पर भी बना रहता है. लेकिन प्लेटो उससे सिर्फ प्रेरणा लेता है. अपने विचारों को परंपरा से बांधता नहीं है. अरस्तु सहित उत्तरवर्ती विचारक उसे और भी विस्तार देते हैं. वस्तुतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी का समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था, जिसमें विश्वास को तर्क की कसौटी कसा जाने लगा था. भारत में उसके सूत्रधार थे— गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी तथा यूनान में सुकरात, प्लेटो, जेनोफीन, डेमीक्रिटिस आदि. भारत में जैन एवं बौद्ध दर्शन के अलावा अनीश्वरवादी विचारक यथा आजीवक, लोकायत, वैनायिक भी वैदिक परंपरा के धर्म-दर्शनों का तार्किक विरोध कर रहे थे. फिलहाल उनके पक्ष में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण कुछ भी कहना अनुचित होगा. बुद्ध और सुकरात दोनों ने अपने-अपने देश में ठेठ परंपरावाद, आडंबर और दिखावे का जोरदार विरोध किया था. दोनों ने दर्शन के क्षेत्र में व्यावहारिकता को समर्थन दिया. यूनान में सुकरात आदि के नेतृत्व में उभरे बौद्धिक आंदोलनों ने मिथकीय विश्वासों को दर्शन के क्षेत्र से करीब-करीब अलग-थलग कर दिया था. इससे न्याय के क्षेत्र में स्वतंत्र चिंतन को बल मिला.

एक प्रसिद्ध ग्रीक कहावत है—‘मनुष्य अपने लिए न्याय का दरवाजा स्वयं खोलता है.’ इसका मंतव्य एकदम स्पष्ट है. जब भी कोई मनुष्य अपने मित्रों, सगे-संबंधियों, पड़ोसियों तथा परिजनों के प्रति न्याय-भाव से परिपूर्ण आचरण करता है, तो उसके अपने लिए न्याय के रास्ते प्रशस्त हो जाते हैं. उसे न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ता. आवश्यकता पड़ने पर न्याय स्वयं उस तक चला आता है. दूसरे शब्दों में ‘न्याय ही न्याय को कमाता है.’ कदाचित इसीलिए सुकरात ने कहा था—‘न्याय समाज का सद्गुण है. वह समाज में शुभत्व की उपस्थिति को दर्शाता है.’ सुकरात की यह अवधारणा न्याय की आधुनिक परिभाषा के काफी निकट है. हालांकि यूनान में सुकरात के पहले से ही न्याय को समझने की कोशिश होती रही है. सोलोन की कविता में कहा गया है कि ‘बिना कानून के राज्य को कानून एवं व्यवस्था के राज्य में बदल देना चाहिए.’4 यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ को न्याय की देवी बताया गया है. हेसियद की कविता में ‘दाइक’ को ‘क्रूरता को समाप्त करने के लिए जीयस की ओर से उपहार’ बताया गया है. प्लेटो ने ‘दाइक’ को दंड के निषेध के रूप में, उदारता एवं विवेक से न्याय करने वाली पराशक्ति के रूप में परिभाषित किया है. ‘दाइक’ की प्रतिपक्षी के रूप में ‘अदाइका’ का उल्लेख है, जिसे यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘अन्याय’ की देवी माना गया है. मिथकीय गाथा के अनुसार ‘दाइका’ अन्याय की देवी ‘अदाइका’ को छड़ी से पीटकर भगा देती है. रोमन धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ की समकक्ष देवी ‘जस्टीटिया’ है. दोनों अपने हाथ में न्याय के प्रतीक के रूप में ‘तराजू’ को उठाए रहती हैं. स्पष्ट है कि भारतीय धर्मशास्त्रों की भांति प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मशास्त्रों में भी न्याय की आरंभिक अवधारणा रूढ़ ही रही है. उसमें बदलाव ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बाद से दिखाई पड़ता है. सुकरात उसका प्रमुख सूत्रधार है.

उन दिनों का यूनानी समाज युद्ध-प्रिय समाज था. यूनानी द्वीप समूह पर छोटे-छोटे राज्य थे. उनके बीच आपस में युद्ध होता रहता था. स्पार्टा और एथेंस के बीच तो शताब्दियां पुराना वैर-भाव था. वहां का पूरा समाज युद्धक मानसिकता में जीता था. वास्तविक नायकों की पूजा के दौर में मिथकों का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक भी था. उस समय के सभी प्रमुख विचारकों हिरोटोडस, एनेक्सिमेंडर, पेरामेनीडिस, प्लेटो, जेनोफीन, हेराक्लाट्स आदि के विचार युद्धक भावनाओं से भरे हैं. एनेक्सिमेंडर(610—546 ईस्वीपूर्व), हेराक्लाइट्स जैसे विद्वान युद्ध को सकारात्मक अर्थ में देखते थे. वह न्याय को ऐसे ही अंत:संघर्षों का परिणाम मानता था. उसका मानना था, ‘युद्ध सामान्य बात है. न्याय दो पक्षों में विक्षोभ की परिणति है. उसके परिणाम विवाद की प्रवृत्ति और आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं.’ एनेक्सिमेंडर भी न्याय को व्यवहार की श्रेष्ठता के रूप में देखता था. उसके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य है—‘परस्पर न्याय-भावना के साथ पेश आना और एक-दूसरे के अन्याय को भूलते चले जाना.’ उसके अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. उल्लेखनीय है कि एनेक्सिमेंडर की न्याय-संबंधी अवधारणा में समानता और स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं थी. उसका महत्त्व न्याय को दार्शनिक विवेचना की विषय-वस्तु बनाने के कारण है.

उस समय पूरे यूनान में दास प्रथा थी. अर्थव्यवस्था में दासों की संख्या का बड़ा योगदान था. सुकरात के समय एथेंस की कुल जनसंख्या लगभग तीन लाख थी. उसमें से 125000 दास तथा लगभग 25000 कृषिदास अथवा अर्धदास थे. कृषिदास मुख्यतः कृष्ट भूमि से जुड़े किसान थे. भू-अधिकार में परिवर्तन के साथ ही उनका स्वामित्व भी नए भू-स्वामी के हाथों में अंतरित हो जाता था. अर्धदासों में छोटे शिल्पकार और कारीगर भी आते थे. एथेंस और रोम की संपन्नता का सारा दारोमदार उन्हीं के कंधों पर था. इसलिए दर्शन के क्षेत्र में शुभत्व और सदगुण की मांग करने वाले सुकरात, प्लेटो और अरस्तु जैसे विचारक भी दास प्रथा के समर्थक थे. वे उसे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. अभिजात वर्ग में जन्मे विचारकों के लिए उस व्यवस्था का विरोध एकाएक संभव भी न था. न्याय संबंधी उनकी अवधारणा जीवन में सामान्य नैतिकता के अनुपालन तक सीमित थी. एनेक्सिमेंडर के लिए न्याय का सामान्य अर्थ था—व्यक्ति के संपत्ति-अधिकारों की सुरक्षा. उन दिनों यूनानी देशों की परंपरा थी कि यदि किसी कुलीन परिवार की स्त्री का पति मर जाता था, तो उसकी संपत्ति राज्य के अधीन मान ली जाती थी. इस कानून के विरोध में स्त्रियां मोर्चा निकाल चुकी थीं. एनेक्सिमेंडर जैसे कुछ विचारक कुलीन परिवार की विधवाओं को संपत्ति अधिकार देने के पक्ष में थे. दूसरे की संपत्ति पर अधिकार को अनैतिक माना जाने लगा था. सुकरात के समकालीन थियोगनिस की काव्य-पंक्तियों में तत्कालीन समाज में न्याय एवं कानून-व्यवस्था के प्रति क्षोभ समाया हुआ है—

‘उन्होंने हिंसा द्वारा संपत्ति कब्जा ली है. यह पूरे विश्व के लिए संकट की स्थिति है. वास्तविक न्याय अब संभव नहीं दिखता.’5

हेराक्लाइट्स(535—475 ईस्वीपूर्व) न्याय को उसके सामान्य अर्थों से बढ़कर मानता था. उसका मानना था कि न्याय ब्रह्मांड का सर्वाधिक क्रियाशील तत्व है. हेराक्लाइट्स की न्याय संबंधी अवधारणा को एनेक्सिमेंडर के विचारों के तत्वावधान में समझा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर विश्व को दो ध्रुवी मानता था. उसका मानना था कि समय विशेष में दोनों ध्रुवों से कोई एक सक्रिय रहता है. उस दौरान दूसरा शांत बना रहता है. कभी-कभी दोनों में एक जीत की ओर अग्रसर रहता है तो दूसरा पराजित होता दिखाई पड़ता है. द्वंद्व के बीच ऐसा अवसर भी आता है जब दूसरे पक्ष की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है. वह पलटकर प्रहार करता है. इससे परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न होती है. इस धारा का विस्तार हीगेल के ‘द्वंद्ववाद’ तथा मार्क्स के सुप्रसिद्ध दर्शन ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ में देखा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर द्वंद्व को न्याय की स्वाभाविक अवस्था मानता था. उसके अनुसार विपरीत विचारधाराओं का द्वंद्व समाज को न्याय की ओर ले जाता है. उन्हें सार्थक परिणाम तक पहुंचाने में समय की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है. अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए वह धनुष का उदाहरण देता है. उसके अनुसार धनुष में खिंचाव उत्पन्न होने पर उसके दोनों सिरे डोर को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं. उनके खिंचाव की दिशा परस्पर विरोधी होती है. खिंचाव से धनुष असामान्य अवस्था में आ जाता है. फिर भी धनुष ठीक से काम करे उसके लिए खिंचाव आवश्यक है. बगैर तन्यता के धनुष काम नहीं कर पाएगा. लक्ष्य भेदने के लिए खिंचाव की मात्रा तथा उसकी दिशा महत्त्वपूर्ण होती है.

हेराक्लाट्स के अनुसार विपरीतधर्मियों का द्वंद्व सदैव बाहर की ओर नहीं होता. मनुष्य के भीतर भी अंतर्द्वंद्व प्रभावी रहते हैं. अच्छे और बुरे का बोध मानवीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण होता है. वही उस प्रक्रिया को आसान बनाता है. हेराक्लाइट्स के लिए द्वंद्व ही सृष्टि की समस्त गतियों का उत्प्रेरक है. द्वंद्वात्मकता का सबसे बड़ा प्रमाण है, सृष्टि में नर और मादा जैसे विपरीतलिंगी जीवधारियों की मौजूदगी. यदि यह नहीं तो दुनिया में सब कुछ थम-सा जाए. हेराक्लाइट्स यह मानने को तैयार नहीं था कि दुनिया में अन्याय है. बल्कि उसका मानना था कि यह न्याय ही है जो दुनिया की हर चीज को संवारे हुए है. उसके अनुसार संसार में द्वंद्व से मुक्ति असंभव है. द्वंद्व सृष्टि को संवारता तथा उसके विकास को गति देता है. उसका समकालीन पेरामेनीडिस न्याय को समाज के लिए उत्प्रेरक शक्ति के रूप में देखता था. न्याय-केंद्रित समाजों में मनुष्य को यह विश्वास होता है कि समाज में रहते हुए उसके हित सुरक्षित है. आवश्यकता पड़ने पर पूरा समाज मदद के लिए उसके साथ होगा. उसने न्याय को समाज की प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति माना है. तदनुसार न्याय मनुष्य का समाज में विश्वास बढ़ाता है. उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. एक कविता में उसने देवी के मुंह से कहलवाया है—

‘सुनो! बुराई तुम्हें आगे नहीं ले जाएगी. इस रास्ते पर मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बाधाएं अनेक हैं. केवल न्याय और कानून ही तुम्हें राह दिखा सकते हैं.’6

एनेक्सिमेंडर, हेराक्लाट्स, पेरामेनिडस आदि जितने भी सुकरात पूर्व तथा उसके समकालीन यूनानी चिंतक हैं, सभी ने न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश की थी. परंतु लगभग सुकरात पूर्व के सभी विचारक न्याय को ईश्वर के संदर्भ में देख रहे थे. उनके लिए न्याय या तो ईश्वर का उपहार था अथवा दैवीय विधान, जिसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है. कह सकते हैं कि जिस तरह भारतीय चिंतक न्याय को धर्म के उपांग या उपहार के रूप में देखते थे, वैसे ही पश्चिम में भी न्याय ईश्वरीय प्रेरणा या उपहार तक सीमित था. इसके लिए वहां ‘न्याय की देवी’ जैसी मिथकीय कल्पना भी मौजूद है. हालात में परिवर्तन सुकरात के आगमन से होता है. सुकरात ने सत्य को सद्गुण और सद्गुणों को शुभत्व की यात्रा का पाथेय मानकर उसे सामाजिक नैतिकता का विषय बना दिया. भारत में व्यावहारिक नैतिकता पर जोर देने का काम सुकरात से थोड़ा पहले बुद्ध ने किया था. बुद्ध की न्याय-संबंधी अवधारणा व्यैक्तिक एवं सामूहिक हितों से मिलकर बनी थी. उनके अनुसार व्यक्तिमात्र की खुशी आत्मलाभ में होती है. यानी हर कोई अपनी खुशी चाहता है. यह मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति है. दूसरी ओर समाज का हित सामूहिक लाभ में होता है. चूंकि समाज व्यक्ति-सापेक्ष रचना है. उसमें व्यक्ति स्वयं समाहित हैं, इसलिए समाज-हित तभी संभव है जब उसमें व्यक्तिमात्र के हितों की सुरक्षा होती हो. इसलिए न्याय का अभिप्रायः ‘सामूहिक आत्मलाभ’ है. ऐसी व्यवस्था जिसमें समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने तथा बाकी सदस्यों के सुख एवं सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो.

प्लेटो का न्याय-दर्शन

प्लेटो के विपुल लेखन को देखते हुए विद्वानों की यह धारणा रही है कि जो प्लेटो के दर्शन में नहीं है, वह कहीं भी नहीं है. न्याय के बारे में भी सबसे पहले और विशद् विवरण प्लेटो के दर्शन में प्राप्त होता है. न्याय के पर्यायवाची के रूप में उसने ग्रीक भाषा के शब्द ‘दिकायसने’(Dikaisyne) का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है—‘नैतिकता’ अथवा ‘न्याय-परायणता’ से है. ग्रीक साहित्य में ‘दाइक’ मिथकीय कल्पना है, जिसे ‘न्याय’ की देवी’ कहा जाता रहा है. परंतु प्लेटो का ‘दिकायसने’ मिथकीय न होकर न्याय को समर्पित राज्य की आदर्श व्यवस्था है. वह न्याय को मनुष्य की संपूर्ण कर्तव्यपरायणता के रूप में देखता है. कर्तव्यपरायणता से उसका आशय उन सभी कार्यों से है, जिनसे कोई व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रभावित करता है; अथवा जिनके परिणाम किसी न किसी रूप में समाज पर असर डालते हैं. उसके अनुसार व्यक्ति का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में शुभत्व का विस्तार हो. वह न्याय को ‘आत्मा का विशिष्ट गुण’ मानता था.’ उसका मानना था कि सभी मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य को समर्पित होंगे तो समाज स्वतः ही अपने दायित्वों के प्रति सजग रहेगा. अतएव न्याय व्यक्ति-मात्र की ऐसी नैतिक साधना है जिसमें वह उन सभी वस्तुओं से दूरी बनाने लगता है, जो उसके निर्णय सामर्थ्य को नितांत व्यक्तिगत बनाती हैं. यहां तक कि वह अपनी उन सभी इच्छाओं भी से दूरी बना लेता है, जो वृहद सामाजिक हितों का अवरोधक है तथा जिनमें स्वार्थपरता की गंध बसी हो. समाज को शुभत्व की ओर अग्रसर करने के लिए उसकी प्रत्येक इकाई का सहयोग अत्यावश्यक है. इस अवधारणा में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ के बीजतत्व देखे जा सकते हैं, जिन्हें आगे चलकर हॉब्स और रूसो के लेखन में विस्तार मिला.

प्लेटो का न्याय इकतरफा नहीं है. न ही, उसके अनुसार न्याय के स्वत्व को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल मनुष्य की है. समाज की भी जिम्मेदारी है कि अपनी नागरिक इकादयों को वह सब प्राप्त करने में मदद करे जो उनका अधिकार है. समाज और व्यक्ति दोनों का भला इसी में है कि व्यक्तिमात्र को वही कार्य सौंपा जाना चाहिए जिसके वह सर्वाधिक योग्य है.7 न्याय को परिभाषित करते हुए वह लिखता है—‘व्यक्ति को समाज में वह सब कुछ प्राप्त होना चाहिए, जो उसका प्राप्य है.’ अब व्यक्ति का ‘प्राप्य’ क्या है. यदि सभी मनुष्य केवल अपने प्राप्य का ध्यान केंद्रित कर लें तो समाज का क्या होगा? जार्ज हॉलेंड सेबाइन के अनुसार, ‘प्राप्य’ में कर्तव्य और दायित्व दोनों सन्निहित हैं. ‘हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी’ में ‘प्राप्य’ की विवेचना करता है—‘व्यक्ति के लिए उसका प्राप्य क्या है?’ इससे प्लेटो का अभिप्राय है कि व्यक्ति के साथ उसकी योग्यता, रुचि, शिक्षा-दीक्षा और कार्यकुशलता के अनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए. सेबाइन के अनुसार इसमें यह भी अंतर्निहित है कि व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार समाज की ओर से जो भी कर्तव्य सौंपे जाएंगे, उनका पालन वह अपनी संपूर्ण कार्यनिष्ठा, संकल्प और क्षमता के साथ करेगा.’ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा, शांति-व्यवस्था एवं स्वतंत्रता की रक्षा करने तक सीमित नहीं है. राज्य का यह भी कर्तव्य है कि अपने नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में सुधार के लिए वह वे सभी प्रयत्न करे, जो आवश्यक हैं और जिन्हें वह अपने सामर्थ्य के अनुसार करने में सक्षम है. लेकिन राज्य तो अमूर्त्त है. नागरिकों से इतर उसका कोई वजूद नहीं है. इसलिए प्लेटो के अनुसार राज्य के जो अधिकार एवं दायित्व हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से उसके नागरिकों के अधिकार एवं दायित्वों के आधार पर ही जाने जाते हैं. राज्य अपने नागरिकों की योग्यता एवं कार्यकुशलता को देखते हुए उनके लिए कर्तव्य विहित करता है, जिनका अनुपालन नागरिकों की जिम्मेदारी है. बदले में राज्य अपने नागरिकों के सुख, सुविधा, स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए वह सभी करने के लिए वचनबद्ध होता है, जिसे करने में वह सक्षम है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन सुकरात की शुभता की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने ज्ञान को सद्गुण की संज्ञा दी थी. सुकरात ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. परंतु प्लेटो के दर्शन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हर जगह उसकी उपस्थिति है. इसलिए यह तय करना बड़ा ही कठिन है कि ‘रिपब्लिक’ आदि ग्रंथों में जो विचार सुकरात के हवाले से आए हैं, क्या वे सचमुच सुकरात के विचार हैं; अथवा प्लेटो ने अपने विचार, गुरु सुकरात को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए, उसके माध्यम से व्यक्त किए हैं? समानांतर प्रश्न यह भी हो सकता है कि यदि वे विचार सुकरात के ही हैं, तो क्या प्लेटो ने उन्हें उसी रूप में, वस्तुनिष्ठ भाव से अभिव्यक्त किया है, अथवा अपनी ओर से उनमें कुछ फेर-बदल किया है. इस बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कहना कठिन है. इतना अवश्य है कि प्लेटो अपने गुरु से बेहद प्रभावित था. उन दिनों एथेंस में गणतंत्र को आदर्श राजदर्शन के रूप में मान्यता प्राप्त थी. प्लेटो ने गणतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते हुए भी देखा था. सुकरात को गणतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा ही मृत्युदंड दिया गया था. यह प्लेटो के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भारी क्षति थी. इन घटनाओं का उसके व्यक्तित्व पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा था कि सक्रिय राजनीति से ही अरुचि हो चली थी. उसके लेखन का बड़ा हिस्सा आदर्श राजदर्शन की खोज को समर्पित है. इसी क्रम में वह न्याय को अलग-अलग दृष्टि से परिभाषित करता है. न्याय को लेकर ‘रिपब्लिक’ का पहला और चौथा खंड तथा ‘दि लॉज’ जैसा विशद् ग्रंथ विशेषरूप से दृष्टव्य है. ‘दि लॉज’ प्लेटो द्वारा वृद्धावस्था में रचा गया ग्रंथ है, जब उसपर किंचित निराशा हावी होने लगी थी. ‘रिपब्लिक’ की गिनती राजनीतिक दर्शन के प्रमुखतम ग्रंथों में ही जाती है. ग्रंथ में प्लेटो जिस गंभीरता के साथ ‘न्याय’ पर विचार करता है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि उसका मुख्य विषय ‘राजनीतिक दर्शन’ अथवा ‘गणतंत्र’ न होकर ‘न्याय’ है.

न्याय की पर्त-दर-पर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का संपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी निष्ठापूर्ण ढंग से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. इसके साथ-साथ वह यह भी कहता है कि यदि सभी नागरिक अपने-अपने कर्तव्य-पालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. जीवन में राज्य की भूमिका सिमट जाए. राज्य और नागरिकों के संबंधों की व्याख्या प्लेटो के लगभग 2100 वर्ष बाद जॉन लॉक, थॉमस हॉब्स और रूसो के दर्शन में देखने को मिलती है. रूसो का ग्रंथ ‘सोशल कांट्रेक्ट’ प्लेटो के दर्शन-चिंतन का विस्तार है. प्लेटो मानता था कि अज्ञानता और स्वार्थपरता के चलते लोग कर्तव्य-पालन में चूक करते रहते हैं. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. इससे राज्य को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता है. शक्तिशाली राज्य खुद को और शक्तिमान बनाने के लिए नागरिक अधिकारों का हनन करता है. इस समस्या के समाधान हेतु प्लेटो प्रचलित राज्य प्रणालियों पर विचार करता है और अंततः दार्शनिक सम्राट के विचार पर जाकर ठहरता है. उसके अनुसार केवल दार्शनिक ही सत्ता-मोह ने निर्लिप्त, निष्पक्ष, दूरदृष्टा और ईमानदार हो सकता है.

‘न्याय’ को राज्य की नैतिकता से जोड़ने वाला प्लेटो अकेला यूनानी चिंतक नहीं है. बल्कि उसे जमीन देने और आगे बढ़ाने वाले विचारकों की लंबी परंपरा है. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूरे मनोयोग तथा विवेक सम्मत ढंग से करे, इसके लिए उसकी किसी भी पराभौतिक शक्ति के बंधन और तत्संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्ति अनिवार्य है. प्लेटो परमसत्ता को कर्मशील मानता था, जो अपने कर्तव्य से उसी प्रकार आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. यह पराभौतिक शक्तियों पर भी, यदि वे हैं तो, उतनी ही गंभीरता से लागू होता है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. शक्ति की अनुभूति अथवा शक्तिकेंद्रों पर अल्पतम लोगों का अधिकतम नियंत्रण सत्तासीन वर्ग में श्रेष्ठता का दर्प पैदा करता है. यही दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. यह भ्रम पैदा करता है कि वह दूसरों पर शासन करने, नियम बनाने के लिए जन्मा है, न कि बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन हेतु. इसलिए जो व्यक्ति उस जैसे या उतने शक्ति-संपन्न नहीं हैं, उनका कर्तव्य है कि उसका आदेश मानें. श्रेष्ठता-दंभ का प्रभाव आंतरिक भी होता है. सामान्यतः मनुष्य विवेक से अधिक अहं से निर्देशित होते हैं. कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता है जब शक्ति के उन्माद तथा घमंड में डूबा व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो, मनमानी पर उतारू हो जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतर्द्वंद्व पैदा होते हैं. किसी भी सत्ता की संपूर्ण शक्तियां समाज की समेकित शक्ति के सापेक्ष नगण्य होती हैं. इस कारण प्रत्येक सत्ता वह चाहे जितनी शक्तिशाली हो, दूसरों पर शासन चलाने के लिए उसकी शक्तियां लंबे समय तक कारगर नहीं होतीं. शिखर पर बने रहने के लिए उसे जनता के सामान्य समर्थन की जरूरत पड़ती है. शासन के किसी भी निर्णय, वह चाहे जितना महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, की सफलता तब तक संद्धिग्ध रहती है, जब तक समाज के सभी वर्गों का उसे खुला समर्थन प्राप्त न हो. अतः यह कहना कि कानून राज्य बनाता है, और केवल राज्य के भरोसे वे कारगर सिद्ध होते हैं, सर्वथा अनुचित है. राज्य कानून बनाता है. लेकिन कानून बनाने की शक्ति उसे जनसमाज की ओर से प्राप्त होती है. इसलिए कानून की सफलता व्यापक जनसहयोग पर निर्भर करती है. धर्म और सांस्कृतिक प्रतीक तथा उनसे जन्मे संस्कार अधिकतम जनता द्वारा समर्थित होने के कारण ही लोकप्रिय बने रहते हैं. अतएव शिखर पर मौजूद लोगों का दायित्व है कि वे जनता, जो उनकी शक्तियों का एकमात्र स्रोत एवं वास्तविक अधिमान्य सत्ता है, के प्रति ईमानदार तथा कर्तव्यनिष्ठ रहें. परंतु व्यक्ति या समूह का दर्प उसे कानून या अनुशासन में बंधने से रोकता है. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. यह माना गया है कि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा उनके कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ संबंधी अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘सामाजिक आदर्श का बोध तथा कर्तव्यपरायणता. वह मानता था कि आदर्श राज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिए आंतरिक शुभता अपरिहार्य है. व्यापक स्तर पर यह कैसे संभव हो इसके लिए वह प्रचलित राजदर्शनों की विवेचना करता है.

‘रिपब्लिक’ के माध्यम से हमारा सामना प्लेटो की बड़ी समस्या से होता है. सुकरात को एथेंस की न्याय प्रणाली के आधार पर दंडित किया गया था. जूरी के सदस्यों के चयन हेतु कोई विधि-सम्मत प्रक्रिया न थी. उसमें व्यक्ति की आर्थिक समृद्धि का बड़ा योगदान था. वाक्-चातुर्य और दूसरों को प्रभावित करने की कला उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी. जिस जूरी ने सुकरात को मृत्युदंड सुनाया था, उसके सदस्यों अपने दुराग्रह प्रबल थे. उनमें से अधिकांश सुकरात की साफगोई के कारण उससे ईर्ष्या करते थे. सुकरात के विचार उनके लिए चुनौती बने थे. इसलिए सुकरात पर चलाए जा रहे मुकदमे का वास्तविक उद्देश्य उसकी अवमानना या उसे दंडित करने से अधिक उस वैचारिकी को परास्त होते देखना था, जो उनके वर्चस्व के लिए चुनौती बन चुकी थी. सारा तमाशा आधी-अधूरी गणतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से, न्याय के नाम पर हुआ था. यहीं से प्लेटो के मन में सवाल उठा था कि ‘न्याय क्या है?’ क्या जिसे बहुत से लोग मान लें वह न्याय है. अथवा जिसे राज्य अपनी शक्ति के बल पर लागू करे, वह न्याय है? इस समस्या को वह सुकरात के माध्यम से ‘रिपब्लिक’ में उठाता है. अपने स्वभाव के अनुरूप सुकरात अपनी शिष्य-मंडली के बीच प्रश्न उठाता है. चर्चा के पहले चरण में सुकरात के अलावा केफलस, पोलीमार्क, थ्रेचाइमच्स, लीसियस और केल्सीडॉन प्रमुख सहभागी बनते हैं. चर्चा-स्थल केफलस का आवास है. उन सबको केफलस की ओर से एक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया है. मित्रों के आगमन पर बूढ़ा केफलस स्वयं उनका स्वागत करता है. प्रकारांतर में चर्चा का मुख्य सूत्रधार भी वही बनता है. अपने लंबे जीवनानुभवों को याद करते हुए वह ग्रीक कवि पिंडोरयस को उद्धृत करता है, जिसका आशय है—‘जब कोई मनुष्य अपना जीवन न्याय एवं श्रद्धा के साथ व्यतीत करता है तो उसके जीवन को आह्लादित करने तथा वृद्धावस्था में उसको सहारा देने के लिए ‘आशा’ जीवन-संगिनी की भांति सदैव उसके साथ रहना चाहती है.’ इसपर परम जिज्ञासु सुकरात प्रश्न करता है—‘क्या यही न्याय है?’ सुकरात का यही कौतूहल ‘रिपब्लिक’ की चर्चा का केंद्रीय विषय बन जाता है. उससे पहले तक न्याय को व्यक्ति और राज्य के व्यवहार और अंतर्संबंधों के अनुसार देखने की प्रथा थी, जिसमें राज्य की इच्छा और उसका अधिकार पक्ष प्रबल रहता था. चर्चा बढ़ती है तो न्याय पर नए-नए विचार आते चले जाते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

  1. The sense of justice is continuous with the love of mankind.-Rowls.
  2. प्रजासुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।। — अर्थशास्त्र-1/19
  3. प्रजासुखे सुखी राजा. तद्दुःखे यश्च दुःखित। सः कीर्तियुक्तो लोकेस्मिन् प्रेत्य यस्य महीस्यते।।— विष्णुधर्मसूत्र 3,
  4. A-nomia, lawlessness, must be replaced by eunomia, law and order-The Greek Concept of Justice, Eric A. Havelock, page 298.
  5. they seize property by violence; kosmos has perished

Equitable distribution no longer obtains.-Theognis, as quoted by Andrew    Gregory    in  Anaximander: A Re-assessment, Page 77

  1. Welcome! for it is no evil fate [trzoira] that escorted you forth to travel along this way: for indeed it lies [estin] far outside of the treading of men.

No, it was the law [themis] and justice [dike].-Parmenides, from The Greek Concept      of Justice, page 269.

  1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic.

 

 

1 टिप्पणी

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विमुद्रीकरण के बहाने

जनता जब तक निजी क्षेत्र की बढ़ती अर्थशक्ति की ओर से आंखे मूंदे रहेगी, उस समय तक मूंदे रहेगी जब तक कि वे गणतांत्रिक राज्य से अधिक शक्तिशाली नहीं हो जाते, तब तक गणतंत्र असुरक्षित बना रहेगा. कुल मिलाकर फासिस्ज्म का अर्थ सरकार पर किसी व्यक्ति, दल अथवा निजी संस्थान का सर्वाधिकार है.रूजवेल्ट, अमेरिकी राष्ट्रपति.

बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में मुद्रा के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता. 8 नवंबर के बाद ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ की घोषणा के पश्चात देशभर में मचे हाहाकार से उसे समझा जा सकता है. सरकार ने आतंकवाद और कालेधन पर रोकथाम के लिए विमुद्रीकरण की घोषणा की थी. उसका मानना है कि प्रचलित मुद्रा का बड़ा हिस्सा गैरकानूनी रूप से जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के पास जमा है, पड़ोसी देश नकली करेंसी भारत में झोंककर आतंकवाद को बढ़ावा देता है. इसलिए एक साहसिक निर्णय के अंतर्गत प्रधानमंत्री ने प्रचलित मुद्रा को निश्चित अवधि के भीतर वापस लेने का ऐलान किया है. वर्तमान सरकार के लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह पहला निर्णय है, जिसपर पिछली यूपीए सरकार की छाप नहीं है. इसके अलावा वर्तमान सरकार की ‘जनधन’ तथा ‘मनरेगा’ जैसी जितनी भी योजनाएं हैं, सब विरासत में मिली हैं. वर्तमान सरकार ने उन्हें ज्यों की त्यों अथवा नाम बदलकर अपनाया है. योजना आयोग के स्थान पर सरकार ने नीति आयोग का गठन जरूर किया है, परंतु नए संस्थान की ओर से अभी तक ऐसा ठोस कार्यक्रम सामने नहीं आया है, जिससे इस बदलाव का औचित्य सिद्ध हो. जिन मामलों में सरकार ने तत्परता से काम किया है, उनमें उच्च पदों पर प्रतिबद्ध संघियों को नियुक्त करना, उनके संगठनों को प्रोत्साहित करना तथा यथासंभव मदद पहुंचाना शामिल हैं. इसके अलावा जिन कार्यों को इस सरकार ने प्राथमिकता दी है, उनके नाम हैंदूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, पूजापाखंड वाले धारावाहिकों को बढ़ावा देना, पाठ्यक्रम में अपनी विचारधारा के अनुरूप फेरबदल करना और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण हेतु हिंदूमुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा देना. इन सबका विकास से कोई संबंध नहीं है. बल्कि ये समाज को पीछे ढकेलकर लोगों के बीच अविश्वास और अव्यवस्था फैलाने वाले हैं. वर्तमान सरकार ने यदि इनका चयन किया है तो इसलिए कि उसके सबसे बड़े घटक की राजनीति सांप्रदायिक अविश्वास और धार्मिक पाखंड के सहारे चलती है.

प्रचलित करेंसी नोटों को तयशुदा अवधि में वापस लेने की योजना को प्रधानमंत्री ने ‘डीमोनीटाइजेशन’ का नाम दिया है. जिसे मीडिया ने ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया. इसका आशय प्रचलित मुद्रा जिसका एक हिस्सा, सरकार के अनुसार टैक्स चोरों की गिरफ्त में हैको सरकारी खजाने में खींच लेने या छिपाए रखने की स्थिति में उसे कागज के टुकड़ों में बदल देने की नीति से है. यह अर्थशास्त्र सम्मत प्रक्रिया है, जिसकी अनुशंसा डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान अर्थशास्त्री ने भी की है. ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ इस योजना के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं. लेकिन व्यक्ति की भांति भाषा की भी सीमा होती है. कभीकभी ऐसा होता है जब सटीक शब्द की खोज के लिए शब्दकोश अपर्याप्त दिखने लगते हैं. हड़बड़ी में हम उन शब्दों का उपयोग करने लगते हैं, जो हमारे मंतव्य से मेल न खाते हों. यह मुख्यतः मुद्रा के स्वरूप में परिवर्तन से जुड़ा मसला है. उपयुक्त शब्द के अभाव में हम फिलहाल ‘विमुद्रीकरण’ का उपयोग करेंगे. ‘विमुद्रीकरण’ को लेकर असमंजस सरकार के स्तर पर भी था. इसलिए आरंभ में केवल करेंसी नोटों में बदलाव का संकेत देते हुए, बड़े नोटों को बैंकों में जमा करने का आदेश दिया गया. बाद में नकदी की कमी से समाज में अफरातफरी मची तो कागजी मुद्रा के स्थान पर डिजिटल लेनदेन पर जोर दिया जाने लगा.

इस लेख का उद्देश्य विमुद्रीकरण या उसके प्रभावों की समीक्षा करना नहीं है, केवल यह देखना है कि योजना लागू होने के पश्चात समाज में जो उथलपुथल मची है, क्या उसे स्वाभाविक माना जाएगा! क्या यह स्वस्थ समाज का लक्षण है! लाभकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ‘विमुद्रीकरण’ पूंजीवादी कामना है. इससे लोगों के मुद्राअधिकार बाजारहित में बदला जा सकता है. भारत जैसे भीषण समाजार्थिक असमानताओं वाले देश में यह विषमताओं और अधिक बढ़ाएगा. शायद इसीलिए पिछली सरकारें उसे लागू करने से बचती आई थीं. यदि लागू किया भी तो पर्याप्त लचीलापन अपनाते हुए, ताकि जनसाधारण को किसी प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े. कदाचित वर्तमान सरकार को इस कार्य की जटिलता का आभास नहीं था. इतनी बड़ी योजना को तरीके से निपटाने के लिए जैसी तैयारी चाहिए, सरकार उससे बहुत पीछे थी. केवल राजनीतिक हित साधने हेतु किए गए निर्णय के दुष्परिणाम बैंकों तथा एटीएम के आगे लंबीलंबी लाइनों के रूप में सामने आए. लगभग 135 व्यक्तियों की बैंक और एटीएम की लाइनों में लगेलगे जानें चली गईं. यह इस साल भारतपाकिस्तान बार्डर पर मारे गए सैनिकों की संख्या से सवा गुनी है. बाजार से मुद्रा गायब होने से उपभोक्ता और व्यापारी सबका हालबेहाल हैं. उद्योगधंधे ठप्प पड़ चुके हैं. दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोवाले, रेहड़ीखोमचे वाले जिनका चूल्हा रोज की कमाई से चलता हैसब परेशान हैं. रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुके लोग आहत हैं. गांव की राजनीति और बेरोजगारी से बचने के लिए शहर चुना था. अब यहां से कहां जाएं! किसी के पास ग्राहक नहीं है तो किसी के नियोक्ता के पास उसे देने के लिए नकदी का अभाव है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, आयातनिर्यात उत्पादन, सर्विस सेक्टर, खेतीबाड़ी आदि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र आर्थिक मंदी के शिकार हैं. विडंबना यह कि सरकार के कदम से जितना कालाधन उजागर होने की उम्मीद है, उससे कहीं अधिक धनराशि का नुकसान व्यापार तथा उद्योगधंधों की मंदी के चलते पूरा देश उठा चुका है. घोषणा में तीस दिसंबर के बाद हालात सामान्य होने की बात कही गई थी, मगर इसके छह महीने बाद भी सब कुछ पटरी पर आ पाएगा, इसकी बहुत क्षीण संभावना है.

क्या यह मुद्रा की ताकत है? समाजार्थिक विषमताओं से घिरे देश में जो कल्याणराज्य होने का दावा करता हो, क्या मुद्रा को इतना ही शक्तिशाली होना चाहिए? क्या मुद्रा का शक्तिशाली होना देश और समाज के शक्तिशाली होने जैसा ही है? लोकतंत्र में समस्त निर्णायक शक्तियां जनता के पास होती हैं. परंतु लोकहित के नाम पर लिए गए इस निर्णय में लोक ही सर्वाधिक आहत हुआ है. अधिकांश जन निर्णय से नाखुशी जता चुके हैं. बैंक और एटीएम की लाइनों में लोग दम तोड़ रहे हैं. कामधंधे तबाह हो चुके हैं. फिर भी सरकारी निर्णय के विरोध में कोई विशेष आक्रोश नजर नहीं आता. क्यों? बिना सार्थक आक्रोश और विरोध की अभिव्यक्ति के क्या लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है? आप कह सकते हैंजीवन में अर्थ की उपयोगिता है. ‘रुपया’ को ‘बाप और भइया से बड़ा’ भी हमारे यहां कहा गया है. कितने ही मुहावरे जीवन में अर्थ की उपयोगिता को लेकर लोकप्रचलित हैं. हिंदू धर्म में उसे जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है. ठीक है, लेकिन हम एक बात प्रायः भूल जाते हैं. जिन दिनों यह ‘अर्थ’ को पुरुषार्थ माना गया था, उन दिनों मुद्रा का मूल्य वास्तविक होता था. सौ मुद्राएं चुकाने का मतलब था, सौ स्वर्णभार का भुगतान. आज मुद्रा का मूल्य प्रतीकात्मक है. बिना सरकार की गारंटी के नोट महज कागज का टुकड़ा है. वह बाजार में मनुष्य के क्रय सामर्थ्य को दर्शाता है, परंतु स्वयं ‘समृद्धि’ का मानक नहीं है. यद्यपि उसके उपयोग द्वारा वास्तविक ‘समृद्धि’ खरीदी जा सकती है.

यदि बिना सरकारी गारंटी के मुद्रा का वास्तविक मूल्य शून्य है तो नागरिक जीवन में मुद्रा के वास्तविक महत्त्व की समीक्षा आवश्यक हो जाती है. खासकर समृद्धि में उसके योगदान को लेकर. क्योंकि कोई भी सरकार समाज से बड़ी नहीं होती. खुद को व्यवस्थित रखने के लिए समाज ही सरकार का गठन करता है. समाज राज्य की आत्मा है तो सरकार महज उसका एक संस्कार. यदि सरकार अथवा उसकी कोई संविदा सामाजिक संबंधों के लिए ही संकट का विषय बन जाए तो मान लेना चाहिए कि उस संविदा और समाज के अंतःसंबंधों की समीक्षा का समय आ चुका है. उस ओर से समाज की उदासीनता उसके पतन की संकेतक हैं. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं कि बैंक की कतार में खड़ेखड़े नागरिक की मृत्यु हो जाए और लाश को किनारे कर, दोचार हजार रुपये की उम्मीद में लोग कतार में बने रहने के लिए धक्कामुक्की करते रहें. इस घटना ने मानवीय संबंधों को तारतार कर दिया है. उधर सरकार है कि उसके कर्ताधर्ताओं को हर वह व्यक्ति जो बैंक या एटीएम की कतार में है, कहीं न कहीं चालू, बेईमान और भ्रष्टाचारी नजर आता है.

करेंसी राज्य की ओर से आपसी लेनदेन को सुगम बनाने के लिए की जाने वाली व्यवस्था है. उसका अपना कोई मूल्य नहीं होता. राज्य की गारंटी उसे मूल्यवान बनाती है. चूंकि करेंसी का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता, इसलिए वह अर्थव्यवस्था की मजबूती का पर्याय भी नहीं होती. वह केवल उसके प्रवाह को दर्शाती है. जैसे थर्मामीटर का तापांक स्वयं उष्मा न होकर मात्र उसके स्तर को दर्शाता है, वैसे ही मुद्रा की मात्रा केवल मनुष्य के क्रयसामर्थ्य की संकेतक होती है, समृद्धि की नहीं. बाजारकेंद्रित मुद्राप्रवाह में समृद्धि का आवागमन बराबर नहीं होता, बल्कि वह मुनाफे के रूप में निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर रहता है. मुद्रा की उपयोगिता आपसी लेनदेन को सहज बनाने में है. उससे बाजार को गति मिलती है. लोग अपने अधीन मुद्रा का अधिकाधिक उपयोग खरीदफरोख्त में करें, इसके लिए बाजार मुद्रा की मौजूदगी को सराहता है. उसे आर्थिक शक्ति के रूप में पेश करता है. किंतु उसकी मूल्यवत्ता तभी तक है, जब तक उसके पीछे सरकार की गारंटी हो. मुद्रा का उपयोग सभी वर्गों में समान नहीं होता. उसकी मुख्य उपयोगिता मध्य तथा निम्न वर्गों तक सीमित होती है, जिन्हें अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए खरीदफरोख्त करनी होती है. बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों तथा पेशेवरों के लेनदेन में, जहां भुगतान राशि अत्यधिक हो, मुद्रा का उपयोग अव्यावहारिक मान लिया जाता है. उनके यहां समृद्धि का आकलन संसाधनों पर अधिकार से किया जाता है, न कि लेनदेन से. उदाहरण के लिए जमींदार की समृद्धि का आकलन भूसंपदा के आधार किया जाता है. व्यापारी और उद्योगपति की समृद्धि, उसके अधीन बाजार, कलकारखानों आदि पर एकाधिकार से आंकी जाती है. मुद्रा का महत्त्व केवल व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

व्यक्ति करेंसी के उपयोग द्वारा भूमि तथा समृद्धि के दूसरे स्थायी उपादानों का अर्जन कर सकता है. उस समय वह वास्तव में ‘अर्थ’ बन जाती है. लेकिन जनसाधारण द्वारा अर्जित करेंसी का अधिकांश जीवन की भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य जैसी बेहद सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति में ही खप जाता है. वास्तविक समृद्धि में अंतरित करने का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता है. उसे भुलावे में रखने के लिए बाजारवादी ताकतें तथा उसके पोषित अर्थविज्ञानी समृद्धि को दैनिक जरूरतों के संदर्भ में, क्रयसामर्थ्य द्वारा परिभाषित करते हैं. सामान्यतः यह मान भी लिया जाता है. मुद्रा को वास्तविक संपदा अथवा समृद्धि का प्रतीक मानना मूर्ति को देवता मानने की स्थिति है. चालाक पुरोहित जैसे पत्थर की मूर्ति में देवता की प्रतिष्ठा करते रहते हैं, वैसे ही पूंजीवादी शक्तियां अर्थव्यवस्था की सारी ताकत मुद्रा में केंद्रित होने का भ्रम फैलाए रखती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ऊपर के स्तर पर मुनाफे की स्पर्धा होती है, जबकि निचले वर्ग रोजीरोटी के संघर्ष में उलझे रहते हैं. स्पर्धा उनके आत्मविश्वास, आपसी विश्वास और सहअस्तित्व की भावना का हनन करती है. आपसी विश्वासहीनता तथा निचले स्तर की स्पर्धा उनके जीवन में मुद्राआधारित लेनदेन को अपरिहार्य बना देती है. इस तरह मुद्रा की आभासी शक्ति सामान्यतः जनसाधारण तथा मध्यवर्ग को प्रभावित करती है, उच्च वर्गों को नहीं. मुद्रा उनके लिए महज संख्या जितना महत्त्व रखती है, जिसका उपयोग व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

बाजार में करेंसी की किल्लत तथा शीघ्र ही उसके समाधान की क्षीण संभावनाओं को देखते हुए सरकार रोजमर्रा के लेनदेन में डिजिटल करेंसी को अपनाने पर जोर दे रही है. उपभोक्ताओं को डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पेटीएम, आधारकार्ड आदि के माध्यम से खरीदफरोख्त करने की सलाह दी जा रही है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई उपहार योजनाएं लागू की हैं. सेवाकर की छूट, लॉटरी द्वारा पुरस्कार आदि योजनाओं से सरकार की नीयत और नीति दोनों को समझा जा सकता है. इससे सरकार का क्या लाभ है? यह समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. ऐसे दुकानदारों की संख्या लाखों में है जो कर चोरी को अपना अधिकार मान बैठे हैं. बिना रसीद के लेनदेन बाजार में बहुत आम है. करयोग्य आमदनी वाले दुकानदारों में से बामुश्किल दो या तीन प्रतिशत आयकर देते हैं. सरकार का मानना है कि लेनदेन डिजिटल गेटवे से होगा तो भ्रष्ट दुकानदारों, व्यापारियों तथा कालेधन के बूते खरीदारी करने वालों पर नजर रखना आसान हो जाएगा. उसकी आमदनी बढ़ेगी. भ्रष्टाचार पर काबू कर पाना संभव होगा. सवाल है कि इससे उपभोक्ता को क्या लाभ होगा? दुकानदार उसे ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ पर बेचता है, जिसमें सामान्यतः स्थानीय कर भी सम्मिलित होता है. इस तरह व्यक्ति जो भी वस्तु खरीदता है, उसपर दुकानदार के लाभ तथा कर आदि का भुगतान वह कमोबेश करता ही है. क्या नई व्यवस्था उसके लिए हितकर सिद्ध होगी? पेमेंट सीधे बैंक में जाने से धनराशि की सुरक्षा, लानेले जाने में बचत, रकम पर मिलने वाला तात्कालिक ब्याज अपरोक्ष रूप में बड़े दुकानदारों को लाभ पहुंचाएगा. ग्राहक को भी इसका लाभ पहुंचे, सरकार इसपर विचार करने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है. इतना तय है कि इस व्यवस्था से डिजिटल पेमेंट के लिए जिस माध्यम को ग्राहक अपनाएगा, उसके सेवामूल्य के साथ सेवाकर के रूप में अतिरिक्त धनराशि भी उसे वहन करनी पड़ेगी.

बाजार की नीयत और नीति को समझने वालों के लिए यह कोई अबूझ पहेली नहीं है. परंपरागत पद्धतियों में उत्पादक एवं उपभोक्ता का सीधा संबंध होता था. उत्पादक अपने उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करता था. मुनाफे के लालच में उत्पाद का निर्माण करना तब की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नहीं था. कुछ कारीगर और कलाकार ऐसे अवश्य होते थे जो अपने हुनर का प्रदर्शन राजाओं और सामंतों को प्रसन्न करने के लिए करते थे. उनके उत्पाद को कई बार कला तो कई बार विलासिता की वस्तु तक मान लिया जाता था. परंतु वह संख्या की दृष्टि से समाज का मामूली हिस्सा था. वे अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते थे. दूसरे उनका ध्येय महज अपने आश्रयदाता को खुश करना होता था. बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में उत्पाद और उपभोक्ता के बीच दुकानदार के रूप में तीसरा पक्ष उपस्थित हो जाता है. उसके तहत उत्पादक लाभ की कामना के साथ माल बनाता है. उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु के मूल्य में उत्पादक के मुनाफे तथा उत्पादनकर के साथसाथ, दुकानदार का मुनाफा भी जुड़ जाता है. यदि उत्पादक के अलावा उपउत्पादक भी हैं, तथा अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने के वस्तु कई दुकानदारों के हाथों से होकर गुजरती है तो उसमें उपउत्पादकों तथा बिचौलिए दुकानदारों का मुनाफा भी जुड़ता चला जाता है. उपभोक्ता न केवल उन सबके मुनाफे का हिस्सा वहन करता है, अपितु अपरोक्ष रूप में विभिन्न स्तरों पर देय कराधान, यातायात, सर्विस चार्ज, विज्ञापन आदि का बोझ भी वही उठाता है. परिणामस्वरूप वास्तविक उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु की कीमत कई गुना बढ़ जाती है. कई बार तो वास्तविक मूल्य तथा सभी बिचौलिये दुकानदारों के सकल मुनाफे का अनुपात एक और चार का हो जाता है. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध न होने के कारण चालू अर्थव्यवस्था को मुनाफे की अर्थव्यवस्था माना जाता है. जिसमें उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच किसी भी प्रकार की आत्मीयता नहीं पनप पाती. वस्तुविनिमय जरूरत और मुनाफे का लेनदेन बन जाता है. इसमें उपभोक्ता जो अपनी जरूरत के चलते खरीदारी को विवश है, हमेशा घाटे में रहता है.

सरकार को लगता है कि व्यापारी और दुकानदार अपने मुनाफे पर देय आयकर तथा अन्य करों का भुगतान करने में बेईमानी करते हैं. हालांकि इसकी रोकथाम के लिए सरकार के अधीन भारीभरकम निगरानी तंत्र रहता है. उसका कार्य दुकानदारों के आयव्यय पर नजर रखना तथा उनसे निर्धारित कर वसूली करना है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को बढ़ावा देने का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने निगरानी तंत्र की विफलता को स्वीकार चुकी है. उसे लगता है कि लेनदेन के डिजिटलाइजेशन द्वारा कराधान का हिसाबकिताब और संग्रह सुगम हो जाएगा. चूंकि धनराशि का लेनदेन बैंकों या उपबैंकीय संस्थानों तथा संविदाओं यथा पेटीएम, आधारकार्ड, डेबिटक्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से होगा, तब उसकी वसूली भी आसान होगी. फलस्वरूप सरकार की अपने ही तंत्र पर निर्भरता घटेगी. इस निर्णय द्वारा सरकार को दुहरा लाभ होने की उम्मीद है. सरकार को लगता है कि इससे वह अधिकतम कराधान में सफल होगी. दूसरे बैंकिंग सेवाओं के जरिये उसे मोटी रकम सेवाकर के रूप में भी प्राप्त होगी. कुल मिलाकर सरकार अपने निगरानी तंत्र और उपभोक्ताओं से अधिक भरोसा उपबैंकीय एजेंसियों पर कर रही है. यह तब है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं तथा अधिकांश औद्योगिक उत्पादों के मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. कराधान से बढ़े खर्च की भरपाई पूंजीपति और उद्यमी बड़ी आसानी से मूल्य बढ़ाकर कर सकते हैं. उसका असर सीधे उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा. उसके लिए चीजें और भी महंगी होंगी. सेवा प्रदाता बैंकिंग और उपबैंकिंग एजेंसियों का खर्च तथा उसपर लगने वाला सेवा कर भी अंततः उपभोक्ता की जेब से ही जाएगा. उसे न केवल बैंकिंग सेवा के बदले भुगतान करना पड़ेगा, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दुकानदार पर लगने वाले करों का हिस्सा भी उसे ही वहन करना पड़ेगा. चूंकि नकदी जेब में नहीं रहेगी, इसलिए उसका लाभ बैंक उठाएगा. ये बातें आम उपभोक्ता से छिपी नहीं हैं. बावजूद इसके सामाजिक स्तर पर कोई बड़ी हलचल या आक्रोश नजर नहीं आता. आमजन की इस चुप्पी या अपार सहनशीलता को सरकार अपने निर्णय के प्रति समर्थन के रूप में पेश कर रही है. क्या हालात पूर्णतः विकल्पहीन हैं?

लोकतंत्र में मतसंख्या महत्त्वपूर्ण होती है. लेकिन मतदान में समाज के सभी वर्ग समान रूप से हिस्सा नहीं लेते. मतदाताओं की आय के आधार पर हम उन्हें तीन वर्गों में बांट सकते हैं. पहला अतिसंपन्न वर्ग. प्रत्यक्ष या परोक्ष उसका संबंध पक्षविपक्ष के सभी नेताओं से होता है. असल में यह वर्ग राजनीति का उपयोग अपने हक में करता है. चाहे जिस दल की जीत हो यह वर्ग सत्ता के हमेशा करीब रहता है. उसे निर्वाचन प्रक्रिया की परवाह नहीं होती. चुनावों में इसकी आनुपतिक भागीदारी सबसे कम होती है. दूसरा मध्य वर्ग. इस वर्ग में पढ़ालिखा रोजगारपरस्त वर्ग, छोटेव्यापारी, पेशेवर, बुद्धिजीवी आदि आते हैं. यह किसी भी समाज की प्राणशक्ति होता है. इसका एक हिस्सा समाज के शीर्षस्थ वर्ग से समझौता कर अपनी स्वार्थसिद्धि में लगा रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा व्यवस्था से असंतुष्टों का होता है. जनता का साथ मिले तो यह सामाजिक क्रांति का वाहक बन जाता है. इसकी दुर्बलता है कि यह राजनीतिक रूप से बेहद बंटा हुआ होता है. संख्या में यह अतिसंपन्न वर्ग से अधिक तथा राजनीतिक दृष्टि से सबसे चलायमान वर्ग माना जाता है. चुनावों में आगापीछा सोचकर मतदान करता है. बंटा होने के कारण यह वर्ग खुद तो राजनीतिक ताकत नहीं बन पाता, लेकिन लोकमानस को बनानेबिगाड़ने, दलविशेष के संबंध में हवा बनाने में इस वर्ग का बहुत योगदान होता है. इसके मामूली प्रतिशत का किसी दल या विचार की ओर झुकाव, मतदाताओं के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है. तीसरा वर्ग जनसाधारण का होता है, जिसमें किसान, मजदूर, छोटे पेशेवर आदि आते हैं. इस वर्ग के लिए रोजीरोटी के मसले जीवन के बाकी मामलों से बड़े होते हैं. वर्तमान चुनौतीपूर्ण होता है, जिससे भविष्य के सपनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. इस वर्ग के पास देशदुनिया के बारे में ज्यादा सोचने का अवसर नहीं होता. इसलिए मतदान के समय धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे मुद्दों के आधार पर अपनी राय बनाता है, जिनका इसके विकास से कोई संबंध नहीं होता. लोकतांत्रिक विवेक की कमी भी इसका कारण बनती है. इस वर्ग का मानस धर्म, संस्कृति परंपरा के मौखिक पाठों द्वारा तैयार होता है. समस्याओं के निदान के लिए इसे सदैव किसी तारणहार की प्रतीक्षा रहती है. इस कारण इसे फुसलाना आसान होता है. अतएव नेतागण चुनावी नारे इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं. रातदिन इसी के कल्याण का राग अलापते हैं. परंतु चुनाव जीतते ही वे इससे पूरी तरह कटकर उस वर्ग के रहनुमा बन जाते हैं जिसे हमने पहले स्थान पर रखा है.

जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि यदि जनता के नहीं रहते, जनकल्याण के नाम पर बनी सरकारें यदि पूंजीपतियों और सरमायेदारों की हितैषी बन जाती हैं, तो जनता क्या करे? समस्या का कारण जनता की दुर्बलता नहीं, आत्मविश्वास और अपनी शक्ति के प्रति अनभिज्ञता है. लोग जानते हैं कि संसद में पहुंचे नेताओं को सर्वाधिक वोट उन्हीं के प्राप्त होते हैं. जो अमीर हैं, जिनकी सत्ता और संस्थानों तक पहुंच है, वे मतदान के दिन घर से नहीं निकलते. इसके बावजूद नेता हैं कि संसद तथा विधायिकाओं में जाते ही उस वर्ग को भुला देते हैं, जिसका उनकी जीत में सर्वाधिक योगदान है. वे उस वर्ग के पिछलग्गू बन जाते हैं, जो सामान्यतः उनकी परवाह नहीं करता. जनसाधारण जो मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेता है, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार के गठन को संभव बनाता है, अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुनः किसी तारणहार की प्रतीक्षा में लगा रह जाता है.

दरअसल हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर आधेअधूरे मन से. संविधान की भावना के अनुरूप लोगों की चेतना का लोकतांत्रिकरण कर ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया. बताया गया कि लोकतंत्र की परिभाषा जनता द्वारा सरकार चुनना है. जनता इसके लिए निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेती रही. बिना यह जाने कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद और विधायिकाओं में जाते ही शासक बन जाते हैं. निहित स्वार्थ के लिए वे जनसाधारण से उसकी स्वतंत्रता, समानता तथा विकास के अवसर छीन लेते हैं, जिनपर नागरिक होने के नाते उनका अधिकार है. लोकतांत्रिक सरकार को चाहिए कि वह न्यूनतम शासन करे. उसके लिए लोगों का जागरूक रहना जरूरी है. लोग स्वयं जागरूक होंगे तो अनुशासित भी होंगे. अनुशासित होंगे तो सरकार का लावलश्कर कम होगा. लाव लश्कर कम होगा तो नागरिकों की जेब पर पड़ने वाला खर्च स्वतः घट जाएगा. वर्तमान व्यवस्था में सरकार मानती है कि लोगों में जागरूकता की कमी है. अनुशासन बनाए रखने के लिए वह नागरिकों के खर्च पर पुलिस को ले आती है. पुलिस से झगड़ा नहीं सुलझता तो अदालतें आ जाती हैं. हर संस्था नागरिक आजादी को थोड़ी कम करती है और उसकी जेब पर बोझ बढ़ा देती है. यानी लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी केवल प्रतिनिधि चुनने से पूरी नहीं हो जाती. वे प्रतिनिधि ही बने रहें, शासक और सर्वेसर्वा न बनें इसका ध्यान रखना भी जनता की जिम्मेदारी है. इस तरह जनता का जनताकरण राजनीति के लोकतांत्रिकरण की बुनियादी शर्त है.

इस अवांतर से वार्तालाप का लेख की विषयवस्तु से क्या संबंध है? विमुद्रीकरण अर्थशास्त्र की समस्या है, राजनीति की नहीं. फिर भी यह हमें आवश्यक लगा, क्योंकि विमुद्रीकरण का वर्तमान निर्णय विशुद्ध अर्थशास्त्रीय नहीं है. उसके पीछे राजनीति छिपी है. यदि सरकार इसे अर्थशास्त्रीय मुद्दा समझती तो रिजर्ब बैंक या ज्यादा से ज्यादा वित्तमंत्री के स्तर पर इसकी घोषणा होनी चाहिए थी. आधीअधूरी तैयारी के साथ स्वयं प्रधानमंत्री को पहल करने की आवश्यकता नहीं थी. विमुद्रीकरण की घोषणा चार राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले की गई है. सो इसके राजनीतिक निहितार्थ होंगे ही. नेताओं की हर निर्णय को राजनीतिक नफानुकसान सोचकर करने की प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट कराना हमें इसलिए भी आवश्यक लगा क्योंकि यह न केवल समस्या की जड़ है, बल्कि समाधान भी इसी में अंतर्निहित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि जनप्रतिनिधि कर्तव्यपथ से विचलित होते हैं, तो उसके लिए केवल वही दोषी नहीं होते. प्रकारांतर में जनता भी उसके लिए जिम्मेदार होती है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि या चुनी हुई सरकार जनता के कष्टों की ओर से लापरवाह हैं तो जनता के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह अपनी संगठित शक्ति का उपयोग हालात को सुधारने के लिए करे. इस कार्य को जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालकर किया सकता है, यदि फिर भी सरकार के स्तर पर निरंकुशता बनी रहती है तो जनता के पास एकमात्र रास्ता बचता है कि वह सरकार पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए न्यूनतम स्तर पर ले आए. हमारी यह सलाह अव्यावहारिक लग सकती है. लेकिन लोकतंत्र को उत्सव की तरह जीने का रास्ता इसी ओर से जाता है. प्रूधों के शब्दों मेंᅳ‘मुक्त समाज में कानून बनाने, नई संस्थाएं गठित करने, उनका संविधान रचने, स्थापना एवं प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने से लेकर कार्यारंभ तक सरकार की भूमिका न्यूनतम, इतनी कम जितनी कि संभव होहोनी चाहिए. राज्य (सरकार का लाभकारी) उद्यम नहीं है. इसलिए उद्यमों एवं संस्थाओं की स्थापना/संचालन के उपरांत सरकार को उनसे स्वयं अलग होकर, उन्हें स्थानीय प्राधिकरणों और जनसंस्थाओं के सुपुर्द कर देना चाहिए.’

राज्य पर निर्भरता को कम करने के अनेक रास्ते हैं. करेंसी के मुद्दे को ही लें. किसी भी राज्य की राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी जनता में अंतर्निहित होती है. जबकि राज्य करेंसी को प्रत्याभूत करता है. इस तरह करेंसी के प्रत्याभूतिकरण के पीछे अंतिम शक्ति जनता की ही होती है. जनता यदि करेंसी को प्रत्याभूत कर सकती है तो उसके विकल्प भी तलाश सकती है. ऐसे विकल्प जो उसे अधिक स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता का एहसास दिलाते हुए उसके आत्मविश्वास बनाए रखने में मददगार हों. इस दिशा में प्रचलित विकल्पों को समाजवाद के आधुनिक अपररूप की संज्ञा दी जा सकती है. हालांकि इनकी कार्यशैली उससे भिन्न है. ये पूंजीवाद के जूझने के बजाए संगठन और सामूहिक विवेक के बल पर उससे मुक्ति का भरोसा दिलाते हैं. कुछ दशक पहले तक भारत के गांवों में जो प्राचीन सहयोगाधारित व्यवस्था रही है, जिसे हमारी ही पीढ़ी ने दम तोड़ते देखा है, इन्हें उसका संशोधित संस्करण भी कहा जा सकता है. आजकल शहरों में मिश्रित बस्तियों का चलन है. एक ही मुहल्ले में विभिन्न पेशों और कलाओं में दक्ष लोग रहते हैं. उनमें प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई, लुहार, एकाउंटेंट, राजमिस्त्री, पेंटर, ऑटो चालक वगैरह अनेक प्रकार के पेशेवर और तकनीकी कौशल वाले लोग रहते हैं. यदि ये ठान लें कि आपसी व्यवहार के दौरान मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम करेंगे, तो थोड़ीसी आरंभिक हिचक के बावजूद, वे आसानी से ऐसा कर सकते हैं. इस व्यवस्था के अंतर्गत श्रम का आकलन एवं भुगतान बजाय मुद्रा के श्रमघंटों में किया जाएगा. मान लीजिए ‘क’ कंप्यूटर पेशेवर है. उसे अपने घर के लिए प्लंबर की आवश्यकता है. वह बस्ती के प्लंबर ‘ख’ को आमंत्रित करेगा. ‘ख’ को काम पूरा करने में यदि दो घंटे लगते हैं, तो उसके दो श्रमघंटे ‘क’ पर उधार माने जाएंगे. मुद्रा रहित भुगतान प्रणाली में ‘क’ को कुछ ऐसा करना होगा, जिससे वह ‘ख’ के श्रमघंटों का भुगतान श्रमघंटों में ही कर सके. इसके लिए वह ‘ख’ की आवश्यकतानुसार कुछ डिजायन कर सकता है. यदि ऐसा होता है तो वह श्रमघंटों का सीधा आदानप्रदान मान लिया जाएगा. यह भी हो सकता है कि ‘ख’ को ‘क’ की सेवाओं की तत्काल कोई जरूरत न हो. उस अवस्था में उनके बीच का लेनदेन सुरक्षित माना जाएगा. मान लीजिए कुछ दिनों के बाद ‘ख’ को बिजली मिस्त्री ‘ग’ की आवश्यकता पड़ती है. जिसपर ‘क’ के किसी काम के दो श्रमघंटे बकाया हैं. तो ‘ग’ उस उधार के बदले ‘ख’ को अपनी सेवाएं देकर ‘क’ से उऋण हो सकता है. यह उदाहरण है. इस प्रणाली को थोड़े प्रबंधन के साथ आसानी से अपनाया जा सकता है. मुहल्ला सभाएं इस काम को बड़े आराम से कर सकती हैं. हो सकता है कंप्यूटर पेशेवर दावा करे कि उसके काम के लिए आनुपातिक रूप से अधिक योग्यता की आवश्यकता पड़ती है. और वह अपने श्रमघंटों के मूल्य की तुलना बिजली मैकेनिक या पलंबर से करने को तैयार न हो. इस समस्या के समाधान के दो रास्ते हैं. पहला और श्रेष्ठतर उपाय है कि कंप्यूटर पेशेवर से अनुरोध किया जाए कि वृहद सामूहिक हितों के लिए उदारता दिखाते हुए इस प्रकार की तुलना को रहने दे. दूसरा यह कि आपसी सहमति से ऐसे नियम बनाए जाएं जिससे इस प्रकार के विवाद उत्पन्न ही न हों. इससे मौद्रिक लाभ सामाजिक लाभ के अपेक्षा श्रेष्ठतर रूप में प्राप्त होंगे. यह रास्ता अव्यावहारिक लग सकता है, मुश्किल बिलकुल नहीं है. अधिकांश कारखाने अपने कामगारों को वेतन देने के लिए उनके कार्य का मूल्यांकन श्रमघंटों के आधार पर करते ही हैं. एक बार चलन में आ जाने के बाद व्यवस्था सहज लगने लगेगी. इससे सरकार और उसके तंत्र पर निर्भरता घटेगी और मुद्राकेंद्रित क्रयविक्रय में जनता को जो भारीभरकम कर सरकार को चलाने के लिए देना पड़ता है, उसकी बचत हो जाएगी. सरकार का काम सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सिमट जाएगा. क्लेरेंस ली स्वार्ज ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट इज म्युच्युलिज्म’(1927) में इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है

यह एक ऐसा सामाजिक दर्शन है जो सभी नागरिकों के लिए समान स्वाधीनता, पारस्परिक समानताधारित लेनदेन तथा व्यक्तिविशेष की अपने जीवन, श्रम एवं श्रमोत्पाद पर पूर्ण संप्रभुता को दर्शाता है.’

सच यह है कि सरकार का विवेक, जनता के विवेक पर टिका होता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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एक ‘राष्ट्रवादी’ फैसला

  • राष्ट्रवाद महज धारणा है. उससे हम यह मान लेते हैं कि कोई एक देश दुनिया के  बाकी देशों से मात्र इस कारण श्रेष्ठतर है, क्योंकि हमारा  जन्म उसमें हुआ है.                                                               जार्ज बनार्ड शा.

  • कल्पना कीजिए कि (आपका)कोई देश नहीं है, जिसके लिए मारा या मरा जाए. यह सोच पाना बहुत कठिन भी नहीं है. सोचिए कि कोई धर्म भी नहीं है. सब शांतिपूर्वक जीवनयापन कर रहे हैं. आप कह सकते हैं कि मैं कोरा स्वप्नजीवी हूं. लेकिन ऐसा केवल मैं ही नहीं हूं. मुझे उम्मीद है  कि एक दिन तुम भी मेरे साथ खड़े नजर आओगे. उस दिन यह दुनिया एक हो जाएगी.                                    जॉन लिनन.

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को अनिवार्य कर दिया. पता चला कि मामला 13 वर्षों से लटकता आ रहा था. न्यायालय को लगा कि अब और टालना अनुचित होगा. क्यों लगा? क्या इसलिए कि केंद्र में भाजपा की सरकार है? किसी और दल की सरकार होती तो फैसला कुछ और आता! या फिर कुछ वर्ष और लटका रहता! संभवतः कोर्ट ने सोचा हो कि राष्ट्रप्रेम का पाठ स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार के अनुशासन में आसानी से पढ़ाया जा सकता है. सचाई चाहे जो हो, महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि अदालत को अचानक क्यों लगा कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना घट रही है. वह भी स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार तथा वाग्वीर प्रधानमंत्री के रहते. बात-बात पर भारत-माता का जयकारा लगाने वाले ‘आर्यपुत्र’ लोगों में राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा जगाने में असमर्थ क्यों हुए, जो न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए आगे आना पड़ा?

फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत का है तब कुछ हकीकत तो होगी. पेंच यह है कि राष्ट्रप्रेम की क्लास लगाने के लिए सिनेमाघरों को चुना गया है, जहां जाने वाले दर्शकों में बड़ी संख्या बेरोजगारों, रिक्शाचालकों और प्रवासी मजदूरों की होती है. घर-परिवार से दूर, कभी मनोरंजन की चाहत में तो कभी यूं ही, परिजनों की याद से छुटकारा पाने के लिए अधिकांश वही सिनेमाघर जाते हैं. कुछ इसलिए भी जाते हैं क्योंकि उनके पास रात बिताने का ठिकाना नहीं होता. देर रात का शो देखकर लौटने तक सड़कें सुनसान होने लगती हैं. आवारा कुत्ते थककर सड़कों के किनारे, दुकान के थड़ों के आसपास ठिकाना तलाशने लगते हैं. मौका देखकर वे भी जहां सिर समाए, अगली सुबह जिंदगी से जूझने का संकल्प लेकर लुढ़क जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बड़े लोग सिनेमाघर जाते नहीं, सिनेमा खुद उनके बीच चला जाता है. जब भी मन करता है, वे सिने कलाकारों को जन्मदिवस या किसी और बहाने आंगन में नंचवा लेते हैं. जो और बड़े हैं उनके घर ही में सिनेमाघर बने हैं. फैसले से यह साफ नहीं हुआ कि यह कानून क्या ‘एंटीला’ और उस जैसे प्रासादों में बने सिनेमाघरों पर भी लागू होगा? शायद नहीं. इसलिए कि हमारे यहां खुद को राष्ट्रभक्त सिद्ध करने की जिम्मेदारी प्रायः जनसाधारण की होती है. अमीर और वीवीआईपी की नहीं. उनकी राष्ट्रभक्ति तो स्वयंसिद्ध होती है. एहसान तले दबा मीडिया दिन-रात उनके महिमा-मंडन में जुटा रहता है. राष्ट्रप्रेम बलिदान मांगता है. सो बेघर, अकेलेपन के शिकार, बेरोजगार लोगों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते रहना जरूरी है. कदाचित इसीलिए अदालत ने दखल दिया है.

आप कह सकते हैं कि अदालत का फैसला सभी के लिए है. मैं कहूंगा गलत. यदि सभी के लिए होता तो शुरुआत संसद और विधान-सभाओं से होती. हर उस कल-कारखाने से होती जिसे राष्ट्र-निर्माण का मंदिर बताया जाता है. साथ ही स्कूल, कॉलेज, क्रिकेट और खेल के मैदानों तथा हर उस सभा से भी होती, जहां सार्वजनिक उपस्थिति हो. सिनेमाघर तो व्यक्ति हल्के-फुलके मूड के साथ जाता है. कभी खुद को भुलाने, तो कभी भूले हुए को याद करने के लिए. अगंभीर मनस्थिति में राष्ट्रगान में हिस्सा लेने का औचित्य? क्या इससे राष्ट्रप्रेम जगाने में सचमुच सफलता मिलेगी? कल्पना कीजिए पर्दे पर राष्ट्रगान के तुरंत बाद हेलन के डांस या सनी लियोनी के रोमांस का सीन आएगा तो उनमें से कौन-सा दिमाग पर देर तक प्रभावी  रहेगा. या फिर राष्ट्रगान समाप्त होते ही पर्दे पर सोडे के बहाने शराब का विज्ञापन आया तो राष्ट्रगान का असर कितनी देर टिक पाएगा? कुल मिलाकर हाल का निर्णय राष्ट्रीय भावनाओं को धर्म में ढाल देने जैसा है, जिसमें पुजारी दुनिया के सभी कारोबार आरती, पूजा-अर्चन के बीच तथा आगे-पीछे चतुर सौदागर की तरह निपटाता है. राष्ट्रप्रेम धर्म न होकर, नागरिक मात्र का अपने राष्ट्र के प्रति नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है. इसमें राज्य की भूमिका उत्प्रेरक की होनी चाहिए. कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्य के स्वनामधन्य कर्ता-धर्ता अपने स्वार्थपूर्ण आचरण द्वारा इस काम में चूकते रहे हैं. ऐसे में केवल सिनेमाघरों में राष्ट्रीयगान की अनिवार्यता राष्ट्रप्रेम के वास्ते निर्धारित कानूनी कर्मकांड जैसी ही है. राष्ट्रगान की गरिमा तभी है जब परिवेश अनुकूल हो. व्यक्ति उदात्त मन से उसके साथ जुड़ा हो. साथ ही राज्य अपने प्रत्येक नागरिक के साथ ईमानदार एवं निष्पक्ष अभिभावक जैसा व्यवहार करता हो. हमारी संस्कृति कर्मकांड प्रधान सही, परंतु कोरे कर्मकांडों से राष्ट्रप्रेम नहीं जगाया जा सकता. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य कि अपने देश और देशवासियों पर गर्व करे. मगर इसके लिए सिनेमाघर उपयुक्त स्थान नहीं हैं. यदि न्यायालय उन्हें उपयुक्त मानता है, तो क्रिकेट मैच की शुरुआत भी राष्ट्रगान से होनी चाहिए. क्योंकि दोनों ही मनोरंजन का माध्यम हैं; तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दोनों ही बाजारवादी अर्थव्यवस्था का हित साधते हैं.

सिनेमा हाल में राष्ट्रगान को जरूरी बताकर उच्चतम न्यायालय में अप्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया है कि जो लोग सिनेमाघर जाते हैं, वे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उदासीन होते हैं. जबकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब किसी गरीब ने लालच में पड़कर देशद्रोह जैसा धत्तकर्म किया हो. सच तो यह है कि जो लोग घर ही में सिनेमाघर बनवाने का सामर्थ्य रखते हैं, वे प्रतीक की बात दो दूर, खुद को राष्ट्र का पर्याय माने रहते हैं. सीना तान कर प्रधानमंत्री के फोटो का उपयोग अपने प्रॉडक्ट के विज्ञापन के लिए करते हैं. एहसानमंद मीडिया उसे बार-बार दिखाता है. यहां सिनेमा की उपयोगिता से इंकार नहीं है. वह सशक्त माध्यम है. उसका उपयोग राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए किया जा सकता है. अच्छा सिनेमा अनेक राष्ट्रहित साध सकता है. उसके लिए सिनेमाघर में राष्ट्रगान आवश्यक नहीं है. विशेषकर भारत में जहां अधिकांश फिल्में फार्मूलाबद्ध होती हैं. सस्ते मनोरंजन के अतिरिक्त उनकी कोई सार्थकता नहीं होती, गाहे-बगाहे जो सामाजिक असमानता तथा उसकी बाजारवादी प्रवृत्तियों का समर्थन करती हैं—वहां थर्ड ग्रेड सिनेमा राष्ट्रीयताबोध जगाने के किसी भी प्रयास को मजाक में बदल सकता है. समस्या यह है कि सरकार हो या अदालत, ऐसे मामलों में पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्ति असंभव होती है. यह मान लिया गया है कि राष्ट्रधर्म और राष्ट्रीयताबोध, दोनों की रक्षा करना केवल जनसाधारण की जिम्मेदारी है. इन परिस्थितियों में राज्य की भूमिका पेशेवर प्रबंधक जैसी होती है, जो कराधान के बदले नागरिकों को सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराता है.

जनसाधारण काम की बातें प्रायः बड़े लोगों के आचरण से सीखता आया है. ‘महाजने येन गतः सः पंथा.’—जिस रास्ते पर महान लोग जाएं उसी का अनुसरण उत्तम है. यही उसे सिखाया जाता है. यही सीख उसके गीत-संगीत, किस्से-कहानियों, कहावतों और बड़े-बूढ़ों के अनुभवों के रूप में सामने आती है. उसे राष्ट्रगान का महत्त्व समझाने के लिए सिनेमाघर में पर्दे के सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. शिखर पर मौजूद नेतागण, बड़े अधिकारी, पूंजीपति, व्यवसायी यदि अपने आचरण को राष्ट्रीयता की भावनाओं के अनुकूल ढाल लें तो जनसाधारण को अलग से राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. वर्षों पहले इसी देश के एक नेता ने सिर पर टोपी और लंगोटी पहननी शुरू की थी, तब अच्छे-खासे घरों के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा सूट-बूट छोड़ टोपी और लंगोटी में आ गए थे. और उस समय तक न तो देश स्वतंत्र हुआ था, न ही राष्ट्रगान बना था. लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं से पूरा देश ओतप्रोत था. पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण गूंजते नारे  स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सभी में यह एहसास जगा देते थे कि हम सब एक हैं. आजादी के बाद संकट की घड़ी में एक ठिगने कद के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने आवाह्न किया. उस समय न तो टेलीविजन था, न इंटरनेट, न ही बड़े-बड़े सुरसामुखी मीडिया घराने. साउंड ट्रैक का जमाना भी नहीं था. फिर भी उस नेता के कंठ से निकली आवाज को देश के नागरिकों ने दूर-दराज तक सुना था. फिर जैसे-जैसे जहां तक भी संदेश पहुंचा, लोगों ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का नियम बना लिया था. आखिर क्यों? इसलिए कि वह जैसा था, वैसा ही दिखता था. किसी को उसकी ईमानदारी पर संदेह नहीं था. उसके पास केवल तीन-चार जोड़ी वस्त्र होते थे. पूरे वर्ष वह उन्हीं से काम चलाता था. रोज पांच-पांच बार वस्त्र बदलकर ‘फकीरी’ का दावा नहीं करता था. आज के नेता आत्ममोह को आत्मविश्वास मानते हैं. बड़बोले भाषणों से जनता के दिलों पर छाने का भ्रम पाले रहते हैं. पूंजी, प्रचार और पाखंड के भरोसे राजनीति करते हैं. ऐसे नेता जनता पर भरोसा करने का साहस नहीं जुटा पाते. न ही जनता उनपर विश्वास करती है. इसलिए राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है.

क्या किसी को राष्ट्रभक्ति का पाठ सचमुच पढ़ाया जा सकता है? कुछ भाव मन में स्वतः उमड़ते हैं. लोगों को सिखाए नहीं जा सकते. जैसे कि प्रेम करना. हम किसी को इस बात के लिए विवश नहीं कर सकते कि वह हमारी बताई वस्तु या प्राणी से प्रेम करे. प्रेम करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति जिससे प्रेम करे, वह उसके किसी अभाव की पूर्णता का एहसास कराती हो. जमीन किसान का पेट भरती है. इसलिए किसान उससे प्रेम करता है. मां का दर्जा देता है. 1857 में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रस्फुटन के मूल में कोई नेता नहीं था. उस समय तो देश में एक-राष्ट्र की भावना का उदय भी नहीं हुआ था. केवल सामूहिक अस्मिताबोध था. जिसमें प्रत्येक सैनिक खुद को नेता मान बैठा था. अपने उत्साह के बूते उन्होंने पूरे उत्तर भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध जंग के लिए खड़ा कर दिया था. वह संघर्ष नाकाम हुआ, इसलिए कि इतने बड़े आंदोलन को संभालने के लिए जैसी मानसिक तैयारी चाहिए, वह उनके पास नहीं थी. लेकिन वह नाकाम संघर्ष भी देश में राष्ट्रीयताबोध जगाने में सफल सिद्ध हुआ.

ऐसा नहीं कि न्यायालय का निर्णय एकदम हवा से पैदा हुआ है. आजादी के बाद से ही यह देश भीतरी और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा है. पिछले कुछ दशकों से चुनौतियां तेजी से बढ़ी हैं. इस फैसले के मूल में ऐसी कई बातें हैं जो देश की आंतरिक उथल-पुथल को सामने लाती हैं. उत्तर में कश्मीर, पूर्वोत्तर के आतंकवाद पीड़ित राज्यों को छोड़ दें तो भी बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे राज्य हैं, जहां भारत नामक राज्य के विरुद्ध आवाजें उठ रही हैं. आप उन्हें ‘नक्सलाइट’ कहें, ‘चरमपंथी’ कहें या कुछ और—वे निर्विवाद रूप से भारतीय गणराज्य के लिए चुनौती बने हैं. इसका प्रमुख कारण लोकतांत्रिक समाधान के प्रति अविश्वास को जन्म लेना है. विडंबना यह है कि समस्या के कारणों को समझे बिना मीडिया उन्हें केंद्र के विरुद्ध चुनौती के रूप में पेश करता आया है. जबकि राज्य के विरुद्ध हथियार उठाने का अभिप्राय हमेशा यह नहीं होता कि विद्रोहियों को अपनी राष्ट्रीय पहचान से शिकायत है. प्रायः वह राज्य और नागरिक समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है. इसलिए इस प्रकार की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीयता की सीमा में, लोकतांत्रिक सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए. विडंबना है कि भारतीय राज्य की ओर से ऐसी कोई रचनात्मक कोशिश नजर नहीं आती. विकास का मतलब अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों, जिनकी गिद्ध-दृष्टि देश के संसाधनों पर है—के हवाले कर देने तक सीमित रह गया है. मुनाफे की बंदरबांट, लूट और उसके कारण बढ़ती आर्थिक विषमता सामाजिक असंतोष का मूल कारण है. 1857 के संग्राम में जितने लोग अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार लेकर निकले थे, उनसे कहीं बड़ी संख्या आज उन लोगों की है जो ‘नक्सलाइट’ या ‘चरमपंथी’ के रूप में राज्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़े हुए हैं. अपनी असफलता को राज्य कई बार राष्ट्रभक्ति के नाम पर दबाने की कोशिश करता है. उस समय वह खुद को राष्ट्र के पर्याय के रूप में पेश करता है. परिणामस्वरूप राजतंत्र के विरुद्ध उठी आवाजें, राष्ट्र-राज्य के विरुद्ध जंग मान ली जाती हैं. जेएनयू मामले में कन्हैया कुमार के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था.

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक बेहतरीन कविता, देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता.’ बहुत कुछ कह देती है—‘इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/कुछ भी नहीं है/न ईश्वर/न ज्ञान/न चुनाव….जो विवेक/खड़ा हो लाशों को टेक/वह अंधा है/जो शासन/चल रहा हो बंदूक की नली से/हत्यारों का धंधा है.’ राष्ट्रभक्ति के नाम पर नारेबाजी करने वाले लोगों को भी समझना चाहिए कि राष्ट्र का अभिप्राय नदी-नाले, सागर, पहाड़, विशाल भूक्षेत्र या कल-कारखाने तक सीमित नहीं है. न ही वह केवल इतिहास, संस्कृति और सीमाओं के बोध का नाम है. यह बोध तो हम भारतवासियों को हजारों वर्षों से रहा है—उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्/वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः‘(विष्णुपुराण). धर्मशास्त्रों की दृष्टि से हम अलबेले हैं. यदि इन्हीं से सच्ची राष्ट्रभक्ति उत्पन्न होती तो हम संभवतः कभी गुलाम न होते. कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. उनके सामूहिक सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक बोध से बनता है. देश से प्रेम करने के लिए एक-दूसरे से प्रेम और परस्पर भरोसा करना आवश्यक है. सच्ची देशभक्ति सामाजिक एकता और विश्वास में बसती है. उसके लिए आवश्यक है कि लोगों के मन एक हों. सब एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हों; तथा सुख-दुख में साझा करने को सदैव तत्पर रहते हों.बावजूद इसके राष्ट्रीयबोध की मूल-भूत अनिवार्यता के रूप में जिस चीज को हम आरंभ से ही उपेक्षित करते आए हैं, वह है सामाजिक एकता और समानता. सत्ता-शिखर पर बैठे मुट्ठी-भर लोग अपने ही समाज के बहुसंख्यक लोगों का, उन्हें उनके न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर, कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर, शोषण करते आए हैं. नतीजा यह हुआ कि भारतीय समाज आरंभ से ही छोटे-छोटे वर्गां में बंटा रहा. जिनके पास शक्ति थी, साधन थे, उनके अपने स्वार्थ प्रबल थे. उसके लिए वे हर आक्रमणकारी से समझौता करते रहे. और जो समाज के लिए कुछ कर सकते थे, जिनके पास संख्याबल था. जो ईमानदार और मेहनती थे, उन्हें लगातार दुत्कार कर, उनके मनोबल को खंडित किया जाता रहा. परिणामस्वरूप इतना बड़ा देश इतिहास के कुछ हिस्सों को छोड़कर शायद ही कभी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा हो. छोटे-छोटे राज्यों के बीच वर्चस्व का संघर्ष हमेशा रहा है. बाहर के मुल्कों में देश की छवि यदि बनी तो बौद्ध धर्म के कारण, जो विभिन्न समुदायों के बीच एकता और समानता का संदेश लेकर दुनिया-जहान तक पहुंचा था. उसका संदेश था कि व्यक्ति का चरित्र और सदाचरण उसे लोक-प्रतिष्ठित बनाता है.

कोरा राष्ट्रवाद वर्चस्वकारी सत्ताओं का सबसे बड़ा पाखंड है. नागरिकों को भुलावे में रखने के लिए स्वार्थी सत्ताएं सदैव यह चाहती हैं कि लोग राज्य को, जो महज राजनीतिक संस्था है, राष्ट्र का पूरक और पर्याय माने रहें. ताकि वे अपने प्रत्येक फैसले को राष्ट्र का निर्णय बताकर, उसे बहस और आलोचना के दायरे से बाहर रख सकें. वे हमेशा यह समझाने में लगी रहती हैं कि लोगों के हित केवल और केवल उन्हीं के मार्गदर्शन में सुरक्षित हैं. उनकी कोशिश राष्ट्रभक्ति को धर्म बना देने की होती है. कदाचित इसीलिए सैमुअल जानसन ने देशभक्ति को ‘बदमाशों का अंतिम आश्रय’(Patriotism is the last refuge of a scoundrel) माना है. थोड़े परिवर्तन के साथ ऑस्कर वाइल्ड ने भी दुहराया था, ‘देशभक्ति शातिरों का गुण है’(Patriotism is the virtue of the vicious). राष्ट्रीयताबोध स्वतंत्र नागरिक चेतना में बसता है. परिपक्व राष्ट्रीयताबोध के लिए आवश्यक है कि लोग अपने अधिकारों तथा दूसरे के अधिकारां का भी सम्मान करें. इसके लिए राज्य का स्वयंप्रभुता संपन्न होना आवश्यक नहीं है. परतंत्र राज्य में भी मुखर राष्ट्रीयताएं पनपती रही हैं. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. सोवियत संघ में अनेक राज्य प्रभुतासंपन्न राज्य नहीं थे. परंतु उनके नागरिकों के हृदय मैं तीव्र राष्ट्रीयताबोध हिलोर मारता था. सोवियत राज्य ने उसे उपेक्षित रखा, जिसका दुष्परिणाम उसके विघटन के रूप में सामने आया. राष्ट्रीयताबोध के मूल में सांस्कृतिक चेतना और एैक्य-भाव अनिवार्य है. क्या भारतीय समाज के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?

विद्वान भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता की निरंतर दुहाई देते रहे हैं. इसके लिए वे महाकाव्यों और होली, दीपावली जैसे त्योहारों का नाम लेते हैं. तर्क देते हैं कि महाकाव्य देश के सभी भागों में पढ़े-पढ़ाए जाते हैं, होली, दीपावली जैसे त्योहार सभी जगह प्रचलित हैं, इसलिए यह देश भू-सांस्कृतिक इकाई यानी एकराष्ट्र है. जबकि महाकाव्यों में, होली, दिवाली जैसे त्योहारों के मूल में जो विश्वास है, वह स्वयं विरोधाभासी है. लोकतंत्र की कसौटी पर न तो महाकाव्य खरे हैं, न ही इन त्योहारों की अंतर्कथाएं. किसी न किसी रूप में वे सभी धर्म-केंद्रित राजतंत्र का समर्थन करते हैं. जिसमें निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं. लोकतांत्रिक विमर्श के लिए वहां कोई गुंजाइश नहीं होती. इसलिए उसके सहारे विकसित संस्कृति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता का समर्थन करने लगती है. धर्म और राष्ट्रवाद की कई विशेषताएं एक-दूसरे से मेल खाती हैं. दोनों में एक अपेक्षाकृत आधुनिक अवधारणा है. दूसरी लगभग तीन सहस्राब्दी पुरानी. दोनों की ही खूबी है कि वे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की दुश्मन हैं. उनके चयन में मनुष्य का अपना कोई योगदान नहीं होता. अधिसंख्यक मामलों में दोनों जन्म के साथ थोप दी जाती हैं.

राष्ट्रवाद का नकार राष्ट्रप्रेम का नकार नही है. वह राष्ट्रभक्ति के नाम पर मनमानी, उग्रता, पक्षपात तथा एकाधिकार की भावना का नकार है. राज्य की असफलता है कि वह अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि वह संकट में उसके साथ है. इससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों में वृद्धि हुई. हताश राज्य शांति-व्यवस्था के नाम पर कानून की ताकत का तरह-तरह से इस्तेमाल करता है. हाल का अदालती निर्णय भी इसी दिशा में जाता है. इन दिनों भारत में झंडा उठाऊ राष्ट्रवाद का बोलबाला है. उसके नाम पर शोर-शराबा वे लोग कर रहे हैं जिनके पास ताकत है. साथ में सत्ता का समर्थन. सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए जो समाज को अर्से से अपनी तरह हांकते आए हैं. ऐसे लोगों का ‘राष्ट्रवाद’ आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और नागरिकता के मानकों के अनुरूप हो. छदम् राष्ट्रवाद का झंडा उठाए वे दिखाना चाहते हैं कि वे बाकी लोगों से बेहतर हैं. उसमें समानता और स्वतंत्रता से अधिक बल और आक्रामकता प्रभावी होते हैं. यदि राज्य ऐसे ही राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है तो स्थिति उन लोगों के प्रति अन्यायकारी हो जाती है, जिनका राष्ट्रीयताबोध समानता, नैतिकता, स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र जैसे मूल्यों से बना है. यही कसौटी देशप्रेम पर भी लागू होती है. देशभक्ति का अभ्रिप्राय राज्य की प्रत्येक गतिविधि को गर्व की निगाह से देखना नहीं है. इसके लिए आलोचनात्मक विवेक अनिवार्य है. राष्ट्र के प्रति अनुराग तभी तक उचित है, जब तक नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका राष्ट्र समानता, स्वतंत्रता और मानवीय आदर्शों का सम्मान करते हुए उन्हें पाने के लिए सतत प्रयत्नशील है. यदि उन्हें लगता है कि उनका राष्ट्र मानवीय आदर्शां को भुला चुका है, तो नागरिकों को ऐसे राष्ट्र से शिकायत करने, यहां तक कि उससे घृणा करने अधिकार भी प्राप्त होता है. यह जिम्मेदारी राज्य की है कि वह ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न होने दे, जिससे नागरिकों को अपने ही राष्ट्र-राज्य के विरोध हेतु मुखर होना पड़े.

—ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. Imagine there’s no countries/It isn’t hard to do/Nothing to kill or die /And no religion too/Imagine all the people/Living life in peace You may say that I’m a dreamer/But I’m not the only one/I hope someday you’ll join us/And the world will be as one.―John Lennon, Imagine.
  2. उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्।

वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः।।

गायंति देवाः किल गीतिकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद—मार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।।

   (वह देश जो महासागर के उत्तर में बसा है, जिसके दक्षिण में हिमगिरि विद्यमान है. उसी का नाम भारतवर्ष है, वहां बसनेवाले भरत के वंशज हैं/देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्मे लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।/हे देवी पृथ्वी! आप समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली हैं, पर्वतरूपी स्तनों से सुशोभित हैं तथा भगवान विष्णु कि आप पत्नी हैं, आपको पैरों से स्पर्श करने के लिए मैं क्षमा चाहता हूं. विष्णुपुराण.)

 

 

 

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ऋग्वेदकालीन भौतिकवादी चिंतन

अनीश्वरवादी चिंतन की भारतीय परंपरा―दो

हम भारतीय कालिदास को आदिकवि मानते हैं तथा ‘रामायण’ को आदिकाव्य. जबकि आदिग्रंथ होने का गौरव ‘ऋग्वेद’ को देते आए हैं. तो क्या ऋग्वेद की ऋचाएं काव्यरचनाएं नहीं हैं? ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में हमें संकोच क्यों होना चाहिए? उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण है, इस तथ्य को कोई नहीं नकारता. फिर भी लोग ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में संकोच करते हैं. यह कहकर कि वेदों के रचियता ‘मंत्रसृष्टा’ न होकर ‘मंत्रदृष्टा’ कवि थेउन्हें आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकालकर ‘आप्तग्रंथ’ घोषित कर दिया जाता है. कुछ ऐसा ही मुसलमान ‘कुरआन’ के बारे में दावा करते हैं. धर्मग्रंथों को दैवी ग्रंथ सिद्ध कर श्रद्धा का पात्र बना देने की परंपरा लगभग हर धर्म में रही है. अनुयायियों को लगता है कि धर्मग्रंथ को मानवीकृत कहने से उसका महत्त्व घट जाएगा. जबकि दैवीय कह देने से लोग उसके प्रति ऋद्धा के साथ पेश आएंगे. उनमें लिखी बातों का तन्मयता के साथ पालन करेंगे. धर्मग्रंथों के साथ ऐसा हमेशा होता आया है. ऐसा मान लेने से न केवल वह कृति आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकल जाती है, बल्कि उसके मौलिक विस्तार की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं. ऋग्वेद यदि आदि ग्रंथ है. उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण हैं तो स्वाभाविक रूप से उसके रचनाकार इस देश और अपनी भाषा के प्राचीनतम कवि भी हैं. साहित्यिक कृति के रूप में ऋग्वेद की सामग्री का मूल्यांकन न करने का नुकसान यह भी होता है कि वैदिक परंपरा के नाम पर रचे गए कथानकों में आए पात्रों, घटनाओं, चरित्रों आदि का मिथकीकरण करने का अवसर परंपरावादियों को मिल जाता है. ऋग्वेद इसी का शिकार होता आया है. बाद में लिखे गए तीनों वेद किसी न किसी रूप में ऋग्वेद के कर्मकांडीकरण की कोशिश है. कालांतर में यही प्रवृत्ति भारतीय मनीषा का संस्कार बनकर उभरती है, जिसमें बिना प्रतीकों और मिथकों का सहारा लिए विमर्श करना मुश्किल हो जाता है. वेदों को आप्तग्रंथ का गौरव भले ही मिला. परंतु ब्राह्मण मनीषियों के लिए वैदिक परंपरा वेदों से अधिक महत्त्वपूर्ण थी. इसलिए वेदों तथा वेदादि ग्रंथों के पाठ में उनके भाष्यकार के हिसाब से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं. परंतु मूलभूत परंपरा में कोई अंतर नजर नहीं आता.

ब्राह्मणवादी दर्शनपरंपराएं वेदों से उपजी थीं. आरंभ में वे श्रुति की अवस्था में थीं. तथापि ब्राह्मणमनीषियों को उनपर इतना गुमान था कि उनके कारण खुद को विश्वसभ्यता में श्रेष्ठतम होने की दावेदारी करते थे. वेदों में सूत्र रूप में उपस्थित दार्शनिक विचारों को विस्तार देने से अधिक चिंता उन्हें उनके संरक्षण की थी. उसके लिए तरहतरह के आयोजन किए जा रहे थे. गैरब्राह्मणवादी विचारधाराएं आजीवक, लोकायत आदि जिन्हें भौतिकवादी चिंतनधारा भी कहा जा सकता हैके बारे में माना जाता है कि वे ब्राह्मणवादी दर्शनों के विरोध में जन्मीं, तथा उसके बहुत बाद की हैं. वैदिक परंपरा के समर्थक वेदों को भारतीय दर्शनचिंतन का आदिस्रोत तथा वैदिक युग को भारतीय दर्शन परंपरा का आदिचरण मानते हैं. इसे हम उनका पूर्वाग्रह कह सकते हैं. समकालीन दर्शनों को नकारने की प्रवृत्ति भी इसका कारण हो सकती है. सच तो यह है कि वेदों में जो प्रच्छन्न दार्शनिक सूत्र हैं, उनपर प्रकृतिवादी दर्शनों की गहरी छाया है. प्राचीन यायावर मनस्वियों के अनुभवों से उपजीं वे विचारधाराएं वेदों की रचना से बहुत पहले से समाज में निश्चय ही विद्यमान रही होंगी. वैदिक युग से भारतीय चिंतन परंपरा में क्रांतिक बदलाव की शुरुआत होती है. वह ऐसा मोड़ है जहां से अध्यात्मचिंतन में मिथक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं. मौलिक चिंतन में गुरुडम की घुसपैठ होने लगती है. जीवन संबंधी सहजसामान्य दर्शन पर मिथक सवार हो जाते हैं. सत्तासमर्थन के सहारे ब्राह्मण ऋषियों का समूह बिना व्यक्तिगत यशलाभ की कामना के, उस परंपरा को इस तरह आगे बढ़ाता है कि उसमें परंपरामोह निर्णायक रूप ले लेता है. मौलिक चिंतन की महत्ता घटने लगती है. परिणामस्वरूप समकालीन चिंतनधाराएं, विशेषकर वे जो उस परंपरा के लिए चुनौती थींगौण मान ली जाती हैं. ज्ञान के कर्मकांडीकरण की वह परंपरा धीरेधीरे अपने समय के समूचे ज्ञानानुराग एवं सामाजिक विवेक को अपनी गिरफ्त में ले लेती है.

दर्शन की सर्वमान्य कसौटी है कि उसमें स्थायी विश्वास या निष्कर्ष जैसी कोई चीज नहीं होती. दार्शनिक सत्य शाश्वत न होकर चिर नूतन होता है. इसलिए उसकी खोज भी चिर नवीन बनी रहती है. जैसे ही कोई नया विचार सामने आता है, उसका प्रतिविचार तथा मिलेजुले विचारों की शृंखला साथ ही जन्म ले लेती है. विचारों के संलयन एवं विश्लेषण द्वारा पुनः नए विचारों की उत्पत्ति होती है. कल्पना का महत्त्व दर्शन के क्षेत्र में भी होता है. परंतु दार्शनिक कल्पना साहित्यकार की कल्पना से हटकर वैज्ञानिक परिकल्पना के निकट होती है. साहित्यिक कल्पना का वितान अंतहीन होता है. उसके लिए मानवीय मूल्य महत्त्वपूर्ण होते हैं, जबकि दर्शन में महत्त्व केवल और केवल सत्य का होता है. इसका आशय यह नहीं है कि दर्शन जीवनमूल्यों से निरपेक्ष होता है. साहित्य की भांति दर्शन का ध्येय भी जीवन को श्रेष्ठतम की ओर गतिमान रखना है. दर्शन स्वयं शुभत्व की शाश्वत खोज का सिलसिला है. साहित्यकार अपनी कल्पना को लोकपरलोक में कहीं भी लाले जा सकता है. दार्शनिक के लिए उसकी कल्पना सत्य की खोज को समर्पित होती है. इसलिए ज्ञात सत्य अथवा स्थापित तर्कपद्धति ही उसका आधार बनती है. कुल मिलाकर दार्शनिक परिकल्पना वैज्ञानिक परिकल्पना जैसी ही होती है. अंतर केवल इतना है कि दार्शनिक परिकल्पना का विषय मूर्त्तअमूर्त्त कुछ भी हो सकता है. जबकि वैज्ञानिक परिकल्पना किसी न किसी मूर्त्त विषय यानी ऐसे विषयों जिनका भौतिक आधार पर परीक्षणअवलोकन, सत्यापन आदि किया जा सकेसे संबद्ध रहती है. जब तक किसी परिकल्पना का पर्याप्त आधार न हो, दर्शन के क्षेत्र में उसका महत्त्व सहज प्रतीति जितना ही होता है. तर्क की कसौटी पर कमजोर परिकल्पना साहित्य का आधारस्रोत हो सकती है, दर्शन का नहीं.

वेदों में आर्यों का प्रच्छन्न इतिहास है. छिटपुट दर्शन भी है. परंतु उनमें प्रमुख हैयज्ञ संस्कृति. पुरोहितवाद. जिसके प्रभाव में प्रच्छन्न इतिहास मिथकीय रूप में सामने आता है. दार्शनिक अवधारणाओं पर भी मिथकों का प्रभाव है. अग्नि, सूर्य, उषा, इंद्र, सोम, मित्रवरुण, मरुत, द्यावा, पृथ्वी, अश्विन आदि देवता हैं. उनका सीधा संबंध प्रकृति से है. ‘विश्वदेव’ की भी परिकल्पना है जो विभिन्न देवताओं का सूत्रीकरण कर एकेश्वरवाद की ओर इशारा करता है. कुछ स्थानों पर भावनाओं और संवेगों को भी देवताओं में शामिल किया गया है, जैसे वाक्, ज्ञानम्, मनस्, काम इत्यादि. प्रत्येक देवता किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का स्वामी है. सवाल है कि अग्नि, आकाश, पृथ्वी, वायु आदि जीवनदायिनी प्राकृतिक शक्तियों को सीधेसीधे उनके भौतिक रूप में देवता मानने के बजाए, उनके नामानुरूप मिथकीकरण क्यों किया गया? क्यों उनके लिए सातवें आसमान के पार कथित स्वर्ग में मौजूद शक्तियों की कल्पना की गई? हमारा मानना है कि केवल सहूलियत के लिए. ऐसा करना मनुष्य को आसान लगा. हो सकता है आरंभ में केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण ही प्रभावी रहा हो. क्योंकि अनुभवों के सामान्यीकरण के लिए उन्हें किस्सेकहानियों में ढालना जरूरी था. उसके फलस्वरूप पृथ्वी, सूरज, चंद्रमा, जल, आकाश आदि का पहले मानवीकरण किया गया. फिर वे विभिन्न प्रतीकों के रूप में संस्कृति का हिस्सा बनने लगे. वही प्रतीक कालांतर में पुरोहितवाद के हत्थे चढ़, देवता के रूप में पहचाने जाने लगे. जिन्हें वेद कहा जाता है, उनकी अधिकांश सामग्री काल्पनिक प्रतीकों के महिमामंडन तथा उनके नाम पर हुए कर्मकांडीकरण का परिणाम है. आप्त ग्रंथ बताकर कल्पना को प्रामाणिक बनाने की कोशिश ब्राह्मण ग्रंथों में लगातार दिखाई पड़ती है. वेदों को ‘आप्त ग्रंथ’ मानना धर्म की निगाह में महत्त्वपूर्ण हो सकता है. दर्शन की निगाह में यह तर्कबुद्धि को एक खूंटे से बांध देने जैसा विचारहीन कृत्य है. विडंबना यह कि कालांतर में निहित स्वार्थवश इसी को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाने लगा. वेदों को धर्मग्रंथ मान लेने का परिणाम यह हुआ कि दर्शन की बाकी शाखाएं यानी न्याय और वैशेषिक जैसे दर्शन जो केवल तत्व चिंतन को प्राथमिकता देते हैं, लगातार उपेक्षित होते गए. जबकि इन्हीं दर्शनों से कुछ तत्व उधार लेकर कालांतर में जैन और बौद्ध दर्शन ने समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करने का काम किया.

वेदों को श्रुति कहा गया है. वे किसी एक कालखंड की रचना नहीं हैं. इसलिए उनमें विचार के अनेक रूप विद्यमान हैं. जिन मनीषियों के नाम से ऋचाओं का उल्लेख मिलता है, उनके जीवन के बारे हमारे पास नगण्य सूचनाएं हैं. कदाचित इसीलिए उनके रचियताओं के बारे में भिन्न स्रोतों से अलगअलग जानकारी प्राप्त होती है. ‘दीघनिकाय’ के ‘तेविज्जसुत्त’ में बुद्ध ने ब्राह्मण लेखकों तथा मूल वैदिक कवियों का वर्गीकरण किया है. उनके अनुसार वेदों के आदि रचियता ऋषियों की संख्या मात्र दस है―अट्टक, वामक, वामदेव, यमदग्नि, विश्वामित्र, कश्यप, भरद्वाज, भृगु, अंगिरस तथा वशिष्ट. आगे चलकर इस सूची में बदलाव होता है. मनुस्मृति(1/35) में जो नाम गिनाए गए हैं, वे हैं―भृगु, नारद, वशिष्ट, क्रतु, अत्री, अंगीरस, पुलत्स्य, पुलह, प्रचेतस और मैत्रेयी. कुछ जगह केवल ‘सप्त ऋषियों’ को ही वेदों का आदि रचियता होने का गौरव प्राप्त हैं. मनुस्मृति द्वारा गिनाए गए नाम वास्तविक हैं अथवा कुलपरंपरा? इस बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ‘नारदपुराण’ को विद्वान मात्र 1000 वर्ष पुरानी कृति मानते हैं. ब्राह्मण लेखकों की विशेषता यह रही कि उन्होंने व्यक्तिगत श्रेय के बजाय परंपरा को अधिक महत्त्व दिया है. महत्त्वपूर्ण ग्रंथलेखकों ने बिना यशनाम की चिंता किए, अपने मौलिक ग्रंथ केवल परंपरा को समर्पित कर दिए हैं. वेदों में जिन ऋषियों का नामोल्लेख है, वे महाकाव्यों और पुराणों में उपस्थिति बनाए हुए हैं. जबकि उनके रचनाकाल में शताब्दियों का अंतराल है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मनुस्मृति’ में दी गई सूची की तुलना करने पर एक सच यह भी सामने आता है कि ‘मनुस्मृति’ में दर्शाए गए ऋषिगण बौद्धिक विमर्श से अधिक जोर कर्मकांड पर देते आए हैं. इससे यह निष्कर्ष भी सामने आता है कि मनु के लिए वेदों का कर्मकांडपक्ष उनके तात्विक चिंतन से अधिक महत्त्वपूर्ण था. उनके नेतृत्व में दार्शनिक विवेचन का कर्मकांडीकरण होना स्वाभाविक ही था. जनसाधारण वैदिक ऋषियों की कमजोरी को भलीभांति समझता था. इसलिए आजीविका के मामले में स्वतंत्र व्यक्ति ब्राह्मणवादी दर्शनों से दूर रहने में ही भलाई समझते थे.

ऋग्वेद के लिपिबद्ध होने से पहले ही पुरोहितवर्ग समाज में प्रभावशाली भूमिका प्राप्त कर चुका था. तत्कालीन बौद्धिक वर्ग का समर्थन उसे बिना किसी शर्त प्राप्त था. वेदों में या तो पुरोहित वर्ग का वर्णन है अथवा इंद्रादि देवताओं का जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं. श्रमिक वर्ग और शिल्पकार वर्ग वेदों से नदारद है. स्त्रीचरित्र भी गिनेचुने हैं. इससे उन्हें तत्कालीन अभिजन समाज का प्रतिनिधि ग्रंथ भी कहा जा सकता है. इस कारण ब्राह्मणों ने न केवल उनकी सुरक्षा और विस्तार के लिए खुद को समर्पित किया, बल्कि स्वार्थ के हिसाब से लगातार उनकी स्वार्थानुरूप व्याख्याएं और फेरबदल करते रहे. ऐसा नहीं है कि उस समय वेदों और ब्राह्मणवादी परंपरा के आलोचक न थे. ब्राह्मणों तथा उनके कर्मकांडों की आलोचना करने वाले तब भी अधिसंख्यक समाज का हिस्सा थे. लेकिन ब्राह्मणों के ही हाथ लगी. वर्णव्यवस्था के सहारे वे समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहे. उनके द्वारा गढ़े गए मिथ किस्सेकहानियों और संस्कृति का हिस्सा बनकर लोकमेधा का अटूट हिस्सा मान लिए गए. आज भी भारतीय धर्मदर्शन का ककहरा न जानने वाला साधारण से साधारण व्यक्ति अग्नि, वरुण, आकाश, उषा, तमस, अनल पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा आदि की जीवनप्रदायिनी शक्ति के बारे में जानता है. रोजमर्रा के जीवन में प्रत्येक मनुष्य उन्हें उसी रूप में देखतासमझता; और इस तरह अपने बुद्धिविवेक के अनुसार दार्शनिक मान्यताएं गढ़ता है. अनुभवआधारित निष्कर्षों में पर्याप्त गतिशीलता होती है. परंतु जैसे ही व्यक्ति के धार्मिक आग्रह प्रबल होते हैं, उसकी वैचारिक गत्यात्मकता थमने लगती है. धारणा खूंटे से बंध जाती है. अपने ही विवेक पर उसका नियंत्रण नहीं रहता. स्थितियों का आकलन बंधेबंधाए ढर्रे के अनुसार करने लगता है. ब्राह्मण ग्रंथों की रचना कथित रूप से वेदों को सर्वग्राही बनाने के लिए की गई है. लेकिन ये ग्रंथ वेदों में अंतर्निहित दार्शनिक सूत्रों की न तो मौलिक गवेष्णा करते हैं, न ही कोई नया दर्शन प्रस्तावित करते हैं. वे केवल वेदों के कर्मकांड पक्ष पर सविस्तार टिप्पणी करते हैं, जिससे आगे चलकर पुरोहितवाद को बढ़ावा मिला.

वेदों और उत्तरवर्ती ग्रंथों में सृष्टि की प्रत्येक जीवनदायिनी शक्ति के लिए अधिष्ठाता शक्ति की कल्पना की गई है. निहित स्वार्थ हेतु पुरोहित कल्पना के मूर्त्तिकरण को वैध ठहराता है. उसपर संदेह करना उचित नहीं माना जाता. प्रकारांतर में वह संस्कृति पर सवार होकर पूरे समाज के आचारव्यवहार का अनिवार्य हिस्सा मान लिया है. इससे मौलिक सोच का हृस होने लगता है. यहीं से सत्य के मिथकीकरण की प्रक्रिया आरंभ होती है. स्वयं वेदादि ग्रंथ समकालीन बोध के मिथकीकरण का परिणाम हैं. वेदों को आप्त ग्रंथ मानना भी उन्हें मिथ मान लेने जैसा है. हालांकि वेदों में यत्रतत्र दार्शनिक प्रश्न भी आए हैं. समय के हिसाब से उनमें पर्याप्त मौलिकता भी है. लेकिन ऐसी ऋचाएं संख्या में नगण्य हैं. प्राकृतिक शक्तियों को सीधे जाननेसमझने के बजाय अधिकांश ऋचाएं उनके नाम पर गढ़े गए देवताओं का महिमामंडन करती हैं. इसे ‘अनुभवों का मिथकीकरण’ कहें अथवा ‘ज्ञान एवं कौतूहल का कर्मकांडीकरण’ जैसा नाम देंवैदिक मनीषियों के लिए वही ‘धर्म’ रहा है. ऋग्वेद भी इससे अछूता नहीं है

प्रज्वलित तपस्या से यज्ञ और सत्य उत्पन्न हुए. अनंतर दिन और रात उत्पन्न हुए. इसके अनंतर जल से पूर्ण समुद्र की उत्पत्ति हुई. जलपूर्ण समुद्र से संवत्सर उत्पन्न हुआ. ईश्वर दिनरात्रि को बनाते हैं. निमिष आदि वाले सारे संसार के वे स्वामी हैं. पूर्वकाल के अनुसार ही ईश्वर ने सूर्य, चंद्र, आनंददायी स्वर्ग, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष का निर्माण किया.’ऋग्वेद, 10/190/1-3.

उपर्युक्त ऋचाओं के उद्गाता कवि अघमर्षण हैं. तीन ऋचाओं में पहली दो ऋचाएं सृष्टि के जन्म को लेकर दार्शनिक समस्याओं से दो चार होती हैं. इसमें समय की उत्पत्ति को लेकर भारतीय दृष्टिकोण को समझा जा सकता है. हालांकि उसमें काफी लोच है. इस उल्लेख में समय स्वतंत्र नहीं है. वह ईश्वर से जुड़ा है. यह बात अलग है कि ईश्वर अपने कृत्यों के लिए खुद समय से बंधा है. प्रत्येक वर्णन के बीच में ईश्वर को घसीट लाने की प्रवृत्ति, न केवल वेदों, बल्कि बाद के भारतीय विद्वानों यहां तक कि आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञों में भी दिखाई पड़ती है. समय को लेकर चर्चा ऋग्वेद में अन्यत्र भी है. तैतीरीय ब्राह्मण में प्रजापति को संवत्सर कहा गया है. माना गया है कि वही संपूर्ण जीवजगत का निर्माता है(संवत्सरो वे प्रजापतिः. संवत्सरेणैवास्मे प्रजाः प्राजनयत.―तैतीरीय ब्राह्मण, 1.6.2.2). उससे आगे बढ़कर शतपथ ब्राह्मण(10/4/2/2) में प्रजापति और संवत्सर को एक माना गया है. उसके अनुसार प्रजापति चरअचर सहित समस्त वस्तुजगत का निर्माता है. यहां तक कि ईश्वर को भी प्रजापति/संवत्सर की रचना कहा गया है. इस आधार पर विचार किया जाए तो समय ही समस्त वस्तुजगत, देवताओं और चरअचर का निर्माता है. ‘अथर्ववेद’ में संवत्सर को लेकर परिपक्व चिंतन मिलता है. वहां समय या संवत्सर को काल के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उसके अनुसार काल अंतहीन और चिरंतन है. अर्थववेद के अनुसार, ‘जगमगाता सूर्य ही समय के रूप में उपस्थित है. इसलिए सूर्य ही समय है. वह हजार आंखों का क्षरणविहीन है. वह सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर निकलता है.’ ऋग्वेद के दशम् मंडल में महाविस्फोट को ‘ब्रह्मणस्फति’ का नाम दिया गया है. देवताओं की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि उनका जन्म सृष्टि के बाद हुआ. सर्वप्रथम अविद्यमान यानी ‘असत्’ से ‘सत्’ की उत्पत्ति हुई, ‘ब्रह्मणस्फित ने कर्मकार के देवताओं को उत्पन्न किया. देवोत्पत्ति से पूर्व समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. इसके अनंतर दिशाएं बनीं. दिशाओं से अनंतर वृक्ष उत्पन्न हुए….अदिति से दक्ष उत्पन्न हुए और दक्ष से अदिति. अदिति ने देवताओं को जन्म दिया. फिर वह अपने सात पुत्रों को लेकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गई तथा जन्म और मृत्यु के लिए सूर्य को आसमान में रख दिया.’(10/72). अगली ऋचा में इंद्र के जन्म का उल्लेख मिलता है.

चूंकि ईश्वर का विचार अपने आप में संदिग्ध है. उसे बीच में लाने के बाद विश्वास गड़बड़ाने लगता है. अनेक प्रश्न पैदा हो जाते हैं. यदि ईश्वर ही एकमात्र कर्त्ता और परम शक्ति है तो उसे तपस्या की आवश्यकता क्यों पड़ी? कहा गया है कि तपस्या से ही सृष्टि बनी.(ऋग्वेद, 10/129-3). सवाल है कि ‘तप’ से ही क्यों? ‘तप’ के माध्यम से ईश्वर किसे प्रसन्न करना चाहता था? सृष्टि की रचना के लिए उसने एक कर्मकांड को ही माध्यम क्यों बनाया? पृथ्वी, सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों का निर्माण भी क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुआ था? ईश्वरीय समय यानी शून्य से सृष्टि निर्माण की अवधि क्या समयहीनता का अंतराल था? क्या सृष्टिध्वंस के साथ ही समयध्वंस भी हो जाता है? उपर्युक्त ऋचा के अनुसार ईश्वर के अस्तित्व को मान लिया जाए तो क्या ईश्वर की भांति काल भी सृष्टि का साक्षी होता है? क्या समय सीमित और काल असीमित है? क्या ब्रह्मांड का निर्माण और ध्वंस अंतहीन काल में तथा उसकी समस्त गतियां चलायमान समय में होती हैं? इस तरह के अनेक प्रश्न उपर्युक्त ऋचा को लेकर हो सकते हैं. दर्शन का जन्म ऐसी ही आशंकाओं से होता है. लेकिन शंका के लिए ‘स्पेस’ की आवश्यकता पड़ती है. यदि उसपर अंध आस्था और जड़ विश्वास का पर्दा डाल दिया जाए तो दर्शन का विकास थम जाता है. वैदिक मनीषा इसका शिकार होती आई है. जिज्ञासा और कौतूहल का आकस्मिक ठहराव कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है. उदाहरण के लिए यदि तपस्या और तप से ही यज्ञ की उत्पत्ति हुई तो तपस्या की क्रिया क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुई थी? तपस्या करने वाला क्या स्वयं ईश्वर था? यदि ईश्वर था तो वह किसकी तपस्या कर रहा था? यदि ‘तप’ यहां सूर्य का स्थानापन्न है तो आलंकारिकता को छोड़ क्यों न सीधा और स्पष्ट शब्द ‘सूर्य’ को उसका स्थानापन्न कर दिया जाए? प्रश्नों का सिलसिला अंतहीन है. लेकिन तप को यदि उष्मा का पर्याय मान लिया जाए जो कदाचित सही भी है, तो उपर्युक्त ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर आए विचार तत्संबंधी वैज्ञानिक परिकल्पना से मेल खाने लगते हैं. आधुनिक वैज्ञानिकों का बड़ा वर्ग सृष्टि का विकास ‘महाविस्फोट’ की घटना से मानता है. उसके अनुसार आंतरिक दबाव के कारण परम संपीडित ब्रह्मांड में महाविस्फोट हुआ और वह टुकड़ों में बदल गया. एक टुकड़ा सूरज बना. छोटेछोटे टुकड़े ग्रहादि बने. गुरुत्वबल के कारण छोटे पिंड बड़े ग्रहों का चक्कर लगाने लगे. धरती धीरेधीरे ठंडी हुई. गैंसे जमकर तरल में बदलने लगीं. उन्हीं से पानी बना. और जल से जीवन की उत्पत्ति हुई. अघमर्षण जहां तप यानी उष्म से सृष्टि की रचना मानते हैं, वहीं एक और दार्शनिक परमश्रेष्ठि ने जल को ‘तपस’ की संज्ञा देते हुए उसे सृष्टि का मूलाधार माना है,सृष्टि से पहले केवल अंधकार था. अंधकार ही अंधकार को ढांपे था. सभी अज्ञात और सभी जलमय था….तपस्या के प्रभाव से वहीं एक तत्व उत्पन्न हुआ’(ऋग्वेद 10/129/3). परमेष्ठि कदाचित पहला ऐसा भारतीय बुद्धिवादी चिंतक था, जिसने मानवीय मेधा को सूर्य की उपाधि दी. उसके अनुसार ‘काम’ विश्व की उत्प्रेरक शक्ति है. वही मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करता है. वही सूर्य है, ‘जिसकी आंखें इस विश्व को नियंत्रित रखती हैं. वह इससे देखा जा सकता है कि सृष्टि निर्माण को लेकर भौतिक विचारधारा और वेदों के दर्शन में खास अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि वेद बीच में ईश्वर या परमात्मा को ले आते हैं. भौतिकवादी विचारक ऐसी किसी भी शक्ति की उपस्थिति को नकारते आए हैं.

स्पष्ट है कि दर्शन का विकास भौतिकवाद से प्रत्ययवाद की ओर रहा है. आरंभ में ईश्वर या केंद्रीय शक्ति की कल्पना अलगअलग दिखने वाली विचारधाराओं में समन्वय की कोशिश का परिणाम थी. जिसे पुरोहितों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कर्मकांडों तक सीमित कर दिया. देवताकरण के जरिये ब्राह्मणवादी परंपरा के चिंतकों ने उन शक्तियों को अधिभौतिक मान लिया. इससे ज्ञान के वायवीकृत रूप को मान्यता मिलने लगी. निहित स्वार्थ के आधार पर प्राकृतिक शक्तियों के ईश्वरीकरण की प्रवृत्ति ब्राह्मणों के लिए इतनी फूलीफली कि कालांतर में उसी को दर्शन की मुख्य धारा का श्रेय दिया जाने लगा. आज भी यही स्थिति है. बौद्ध धर्म के उदय से पहले दर्शन की ये धाराएं समानांतर रूप में विद्यमान थीं. बुद्ध ने दोनों के बीच का रास्ता अपनाया. चूंकि प्रकृतिवादी विचारधाराएं सृष्टि के विकास को लेकर भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती थीं, इसलिए पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल को भौतिकवादी धाराओं के प्रवर्त्तक मानना अधिक उचित होगा. भौतिकवादी धारा सृष्टि निर्माण के पीछे किसी भी अदृश्य शक्ति के योगदान को नकारती हैं. अधिभौतिक अथवा ईश्वर को महत्त्व देने वाली विचारधाराएं ईश्वर या परमात्मा को सर्वेसर्वा मानने के कारण ईश्वरवादी कहलाती हैं. ध्यातव्य है कि विगत ढाई हजार वर्षों में ब्राह्मण कभी खुशीखुशी सत्ता के हस्तांतरण को तैयार नहीं हुआ. सतयुग ब्राह्मण के लिए इसलिए आदर्श है, क्योंकि उसमें उसे चुनौती देने वाला कोई न था. जनसमाज कबीलों में बंटा था. उसके अपने रीतिरिवाज, परंपराएं और दर्शन थे. ब्राह्मणों के कर्मकांड से उसे उसे कोई लेनादेना न था. अर्थव्यवस्था पशुआधारित थी. इसलिए भूमिअधिकार का विचार पनपा ही नहीं था. राज्य छोटेछोटे थे, एकदम कबीलाई रूप था उनका. इसलिए सतयुग में केवल ब्राह्मण ही ब्राह्मण थे. वही शासक थे, वही नियम बनाने वाले. चारों ओर केवल उन्हीं की दुंदभि बजती थी. त्रेता में उन्हें क्षत्रियों साथ सत्ता का समझौता करना पड़ा. मनुस्मृति ने क्षत्रियों और ब्राह्मणों के बीच जो समझौता कराया था, त्रेता के रूप में उसी की अभिकल्पना की गई थी. द्वापर में थोड़ा और पतन हुआ. सतयुग में आर्यों के आक्रमण से पराजित शूद्रों ने खुद को संगठित कर लिया था. मजबूर होकर उन्हें शूद्र कृष्ण को अवतार स्वीकारना पड़ा. कलयुग में उनका नैतिक, राजनीतिक पराभव हो चुका है. केवल दंभ बाकी है.

अथर्ववेद की एक ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति का कारण ‘तपस’(उष्म) को बताया गया है. वह सूर्य का पर्याय भी है. सूर्य को सृष्टिकर्ता मानने का विचार अन्य धर्मों में भी है. जापान खुद को ‘उगते सूर्य का देश’ बताता है. चीनी भी सूर्य को आदि देवता मानने की परंपरा रही है. चीनी लोककथा1 वहां के सूर्य पूजक समाज के बारे में बताती है. भगवतशरण उपाध्याय ने मिस्र के सूर्यपूजक राजा अखनातून को आदि धर्मप्रवर्त्तक माना है.(सांस्कृतिक निबंध, प्राचीन मिस्र का शंकर अखनातून). ऋग्वेद(7/6-1) में भी सूर्य को समस्त चराचर का स्वामी बताया गया है. सूर्य को सृष्टि का स्रोत मानने का विचार भिन्नभिन्न संस्कृतियों में रहा है. वेदों में उसे समय का जनक माना गया है. हालांकि इससे इतर निष्पत्तियां भी हैं. एक ऋचा के अनुसार सूर्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा जल से सृष्टि का विकास हुआ. तदनुसार ईश्वर को सृष्टि के निर्माण की इच्छा के साथ ईश्वर ने जल का सृजन किया. उससे तेजस बना. फिर उससे ग्रहनक्षत्र, सूर्य, चंद्रादि अस्तित्व में आए. ऋग्वेद को भारतीय दर्शन का आधारग्रंथ माना जाता है. कुछ संकेतों को छोड़ दिया जाए तो ऋग्वेद का भारतीय दर्शनपरंपरा से उतना गहरा संबंध नहीं है, जितना माना जाता है. सच तो यह है कि उसमें जो दार्शनिक तत्व हैं, जिन्हें प्रायः बहुदेववाद के नाम से जाना जाता है, असल में प्राकृतिक उसमें जो विचार सूत्र रूप में मौजूद हैं, उनके आधार पर वह भौतिकवादी दर्शन के अधिक निकट है. कल्पना के अतिरिक को देखते हुए उसे हम भारतीय मनीषा की कविता कह सकते हैं. वेद का नाम उन्हें बाद में दिया गया. आगे चलकर उसी के आधार पर औपनिषिदक दर्शन का विकास हुआ. भौतिकवादी विचारक मानवीय कौतूहल, संदेह और आशंकाओं को बचाए रखकर दार्शनिक गवेष्णाओं के लिए बड़ा मैदान तैयार कर रहे थे. उनका दर्शन मानवमात्र के रोजमर्रा के अनुभवों और जिज्ञासाओं पर टिका था. वे जानते थे कि प्रकृति की विशालता, विचित्रता और अनिश्चितता ने मनुष्य को उसके सामने श्रद्धावनत होने को विवश किया है. प्रकृति की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसको समझना आवश्यक है. इसलिए उन्होंने अपने संदेह और उसके बहाने अनेकानेक संभावनाओं को बनाए रखा.

अपने समय में भी इस तरह का विचार रखने वाले वे अकेले न थे. जीवन में सहायक, उसे संभव बनाने वाली, प्राणदायिनी शक्तियों के प्रति सम्मान, समर्पण और श्रद्धावनत होने की संस्कृति प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में रही हैं. यही जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण है. वेद भी इससे अछूते नहीं हैं. ऋग्वेद में अनेक स्थान पर ‘काम’ का महिमामंडन है. एक ऋचा(10/191/1) में अग्नि को ‘कामवर्षक’ कहते हुए उसे प्राणिमात्र का गुण बताया गया है. कामोद्दीपन के लिए सोमपान का आवाह्न है. उसके लिए रात्रि और उषा(सूर्य) का मानवीकरण करते हुए उन्हें यज्ञस्थल पर आमंत्रित किया गया है(ऋग्वेद 10/13/7). एक स्थान पर उषा को रात्रि की बहन बताया गया है. उषा को साधारण लड़कियों की भांति सजनेसंवरने का शौक है‘एक ही रंग के वस्त्र पहन, नर्तकी की भांति उपस्थित होती है. जैसे गाय दूध देती है. वह अपने स्थान तक पहुंचती है. और अपना उजला वक्ष खोल देती है. इसी के साथ अंधेरा छंट जाता है. रात्रि जो उसकी बहन है, भाग खड़ी होती है. एक अन्य ऋचा में लिखा है कि जैसे कोई खिलाड़ी पासा फेंकता है, उषा दिन का पासा फेंकती है. वह स्वर्ग की पुत्री है. उसके आगमन के साथ ही निशा भाग खड़ी होती है.’ वेदांत में शंकर ने संसार को माया कहा है. संसार को नकारा है. उनके अनुसार भोग आत्मा की मुक्ति की राह का रोड़ा है. वेदों से ऐसा प्रतीत नहीं होता. आर्यगण जीवन को संपूर्णता के साथ जीने के समर्थक थे. खुशी के क्षणों में वे सोम का पान करते थे. एक लड़ाकू जाति का इस तरह सुखामोद में लिप्त होना अनपेक्षित भी नहीं माना जा सकता. यह भी हो सकता है कि सुखामोद में जीने का स्वभाव उन्होंने प्राचीन जातियों से सीखा हो. कुल मिलाकर आर्य ऐसे हरगिज नहीं थे, जैसा शंकर ने कहा है. तैतीरीय उपनिषद में लिखा है कि प्राचीन आर्यजन वर्ष में तीन बार विशेष आयोजन के लिए एकत्र होते थे. उस अवसर पर युवतियां शृंगार कर आती थीं. पुरुष सोमपान करते थे. तत्कालीन समाज में प्रजनन दर को बनाए रखने के लिए ऐसे उत्सवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. दरअसल ये उस दौर की ओर इशारा करती हैं, जब काम सामूहिकता का उत्सव हुआ करता था. प्राकृतिक जीवन कठिन था. चुनौतियों के बीच प्रजनन दर को बनाए रखना बहुत कठिन था. कामोद्दीपन के लिए विशेष अवसरों का सृजन प्रायः हर सभ्यता में किया गया. तैतरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि देवता और मनुष्य वर्ष में तीन बार विशेष अवसर पर मिलते हैं. वसंतोत्सव जैसे त्योहारों की हर सभ्यता में उपस्थिति भी इसी ओर संकेत करती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलग