भारतीय धर्म-दर्शन की परंपरा और भक्ति आंदोलन

भारतीय परंपरा में जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए है. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. ये जीवन का मूल तत्व या पदार्थ भी हैं, जिन्हें प्राप्त कर लेना मानवजीवन की वास्तविक उपलब्धि कही जा सकती है. इनमें से पहले तीन की प्राप्ति इसी जीवन में संभव है, जबकि चौथे के लिए मृत्यु के पार दस्तक देना जरूरी है. इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि मोक्ष क्या है. भारतीय परंपरा में इसका सीधासीधा मतलब है—मुक्ति, यानी संसार के आवागमन से दूर हो जाना. सामान्यत इसका अर्थ उस स्थिति से लिया जाता है जब आत्मा परमात्मा में मिलकर उसका अभिन्नअटूट हिस्सा बन जाती है. दोनों के बीच का सारा द्वैत विलीन हो जाता है. यह जल में कुंभ और कुंभ में जल कीसी स्थिति है. जल घड़े में है, घड़ा जल में. घड़ा यानी पंचमहाभूत से बनी देह. पानी की दो सतहों के बीच फंसी मिट्टी की पतलीसी क्षणभंगुर दीवार, जिसकी उत्पत्ति भी जल यानी परमतत्त्व के बिना संभव नहीं. वेदांत की भाषा में जो माया है. तो उस पंचमहाभूत से बने घट के मिटते ही उसमें मौजूद सारा जल सागर के जल में समा जाता है. सागर में मिलकर उसी का रूप धारण कर लेता है. यही मोक्ष है जिसका दूसरा अर्थ संपूर्णता भी है, आदमी को जब लगने लगे कि जो भी उसका अभीष्ट था, जिसको वह प्राप्त करना चाहता था, वह उसको प्राप्त हो चुका है. उसकी दृष्टि नीरक्षीर का भेद करने में प्रवीण हो चुकी है. जिसके फलस्वरूप वह इस संसार की निस्सारता को, उसके मायावी आवरण को जान चुका है. साथ ही वह इस संसार के मूल और उसके पीछे निहित परमसत्ता को भी पहचानने लगा है. उसे इतना आत्मसात कर चुका है कि उससे विलगाव पूर्णतः असंभव है. अब कोई भी लालच, कोई भी प्रलोभन कोई भी शक्ति अथवा डर उसको अपने निश्चय से डिगा नहीं सकता. इस बोध के साथ ही वह मोक्ष की अवस्था में आ जाता है. तब उसको जन्ममरण के चक्र से गुजरना नहीं पड़ता.

मुक्ति का दूसरा अर्थ है आत्मा की परमात्मा के साथ अटूट संगति. दोनों में ऐसी अंतरगता जिसमें द्वैत असंभव हो जाए. परस्पर इस तरह घुलमिल जाना कि उनमें विलगाव संभव ही न हो. जब ऐसी मुक्ति प्राप्त हो, तब कहा जाता है कि सांसारिक व्याधियों से दूर मन पूरी तरह निस्पृहनिर्लिप्त हो चुका है. जैन दर्शन में इस अवस्था को कैवल्य’ कहा गया है. कैवल्य यानी अपनेपन की समस्त अनुभूतियों का त्यागकर ‘केवल वही’ का बोध रह जाना. यह बोध हो जाना कि मैं भी वहीं हूं और एक दिन उसी का हिस्सा बन जाऊंगा. उस समय न कोई इच्छा होगी न आकांक्षा. न कोई सांसारिक प्रलोभन मुझे विचलित कर पाएगा. इसी स्थिति को बौद्ध दर्शन में ‘निर्वाण’ की संज्ञा दी गई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—‘बुझा हुआ’. व्यक्ति जब इस संसार को जान लेता है, जब वह संसार में रहकर भी संसार से परे रहने की, कीचड़ में कमल जैसी निर्लिप्तता प्राप्त कर लेता है, तब मान लिया जाता है कि वह इस संसार को जीत चुका है. इच्छाआकांक्षाओं और भौतिक प्रलोभनों से सम्यक मुक्ति ही निर्वाण है. गीता में इस स्थिति को कर्म, अकर्म और विकर्म के त्रिकोण के द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है. उसके अनुसार संसार में सभी व्यक्तियों के लिए कुछ न कुछ कर्म निर्दिष्ट हैं. जब तक यह मानव देह है, कर्तव्य से सरासर मुक्ति असंभव है. क्योंकि देह सांस लेने का, आंखें देखने का कान, सुनने का काम करती रहती है. संन्यासी को भी इन कर्तव्यों से मुक्ति नहीं. जब तक प्राण देह में हैं, तब तक उसको देह का धर्म निभाना ही पड़ता है. तब मुक्ति का क्या अभिप्राय है! बुद्ध कहते हैं कि देह में रहकर भी देह से परे होना संभव है. हालांकि उसके लिए लंबी साधना और नैतिक आचरण की जरूरत पड़ती है.

मोक्ष और निर्वाण दोनों ही अवस्थाओं में जीव जन्ममरण के चक्र से छुटकारा पा लेता है. लेकिन मोक्ष मृत्यु के पार की अवस्था है. जबकि निर्वाण के लिए जीवन का अंत अनिवार्य नहीं. गौतम बुद्ध ने सदेह अवस्था में निर्वाण प्राप्त किया था. जैन दर्शन के प्रवत्र्तक महावीर स्वामी भी जीते जी कैवल्यअवस्था को पा चुके थे. किंतु सभी तो उनके जैसे तपस्वीसाधक नहीं हो सकते. तब साधारणजन क्या करें. तो उसके लिए सभी धर्मदर्शनों में एक ही मंत्र दिया गया है. और वह है अनासक्ति. संसार में रहकर भी संसार के बंधनों से मुक्ति, धनसंपत्ति की लालसा, संबंधों और मोहमाया के बंधनों से परे हो जाना, अपनेपराये के अंतर से छुट्टी पा लेना, जो भी अपने पास है उसको परमात्मा की अनुकंपा की तरह स्वीकार करना और अपनी हर उपलब्धि को ईश्वर के नाम करते जाना, यही मुक्ति तक पहुंचने का सहजमार्ग है. इसी को सहजयोग कहा गया है. उस अवस्था में कामनाओं का समाजीकरण होने लगता है. इच्छाएं लोकहित के साथ जुड़कर पवित्र हो जाती हैं. उस अवस्था में व्यक्ति का कुछ भी अपना नहीं रहता. वह परहित को अपना हित, जनकल्याण में निज कल्याण की प्रतीति करने लगता है. दूसरे शब्दों में मुक्ति का एक अर्थ निष्काम हो जाना भी है.

निष्काम होने का अभिप्राय निष्कर्म होना अथवा कर्म से पलायन नहीं है. कर्म करते हुए, सांसारिक कर्मों में अपनी लिप्तता बनाए रखकर भी निष्काम हो जाना सुनने में असंभव और विचित्रसा लगता है? नादान अकर्मण्यता को ही निष्काम्यता का पर्याय मान लेता है. कुछ लोग निष्काम होने के लिए संन्यास की शरण में जाते रहे हैं. लेकिन देह पर संन्यासी बाना धारण कर वनवन घूमने से तो सचमुच का वैराग्य संभव नहीं. जब तक मन मोहमाया से ग्रस्त है तब तक कर्मसंन्यास की वास्तविक स्थिति कैसे संभव हो सकती है. इस उलझन को सुलझाने का रास्ता भी गीता मैं है. कृष्ण कहते हैं कि कर्म करो, मगर फल की इच्छा का त्याग कर दो. निष्काम कर्म यानी कर्म करते हुए कर्म का बोध न होने देना, यह प्रतीति बनाए रखना कि मैं तो निमित्तमात्र हूं, कर्ता तो कोई और है, ‘त्वदीयं वस्तु गोविंदम् तुभ्यमेव समप्यते’ भावना के साथ सारे कर्म, समस्त कर्मफलों को ईश्वरनिर्मित मानकर उसी को समर्पित करते चले जाना ही कर्मयोग है. कर्म करते हुए फल की वांछा का त्याग ही विकर्म है, और यह प्रतीति कि मैं तो केवल निमित्तमात्र हूं, जो किया परमात्मा के लिए किया, जो हुआ परमात्मा के इशारे पर उसी के निमित्त हुआ, यह धारणा कर्म को अकर्म की ऊंचाई जक पहुंचा देती है. संसार से भागकर कर्म से पलायन करने की अपेक्षा संसार में रहते हुए कर्मयोग को साधना कठिन है. इसीलिए तो श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि कर्मसंन्यास कर्मयोग की अपेक्षा श्रेष्ठ हो सकता है, तो भी कर्मयोगी होना कर्मसंन्यासी की अपेक्षा विशिष्ट उससे बढ़कर हैः

कर्मयोगेश्व कर्मसंन्यासयात् निश्रेयंस कराभुवौ।

तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगी विशिष्यते।।

कर्मयोगी होना तलवार की धार पर चलकर मंजिल को तक पहुंचना है. सांसारिक प्रलोभनों से दूर होने के लिए उससे भाग जाना कर्मसंन्यास में संभव है, मगर कर्मयोगी को तो संसार में रहते हुए ही उसके प्रलोभनों से निस्तार पाना होता है. ऐसे कर्मयोग को साधा कैसे जाए! संसार में रहकर उसके मोह से कैसे दूर रहा जाए, इसके लिए विभिन्न धर्मदर्शनों में अलगअलग विधान हैं, हालांकि उनका मूलस्वर प्राय एक जैसा है. मुनिगण इसके लिए तत्वचिंतन में लगे रहते हैं. ऋषिगण मानवव्यवहार को नियंत्रित और मर्यादित रखने के लिए नूतन विधान गढ़ते रहते हैं. प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा चार पुरुषार्थों की अभिकल्पना भी इसी के निमित्त की गई है.

हिंदू परंपरा के चारों पुरुषार्थ असल जीवन के विभिन्न अर्थों में बहुआयामी सिद्धियों के भी सूचक हैं. धर्मरूपी पुरुषार्थ को साधने का अभिप्राय है, कि हम लोकाचार में पारंगत हो चुके हैं. संसार में रहकर क्या करना चाहिए, और क्या नहीं इस सत्य को जान चुके हैं. और हम जान चुके हैं कि यह समस्त चराचर सृष्टि, भांतिभांति के जीव, वनवनस्पति एक ही परमचेतना से उपजे हैं. एक ही परमपिता की संतान होने के कारण हम सब भाईभाई हैं. ध्यान रहे कि धर्म का मतलब पुरुषार्थ के रूप में सिर्फ परमात्मा तक पहुंचने का, उसको जानने की तैयारी करना अथवा जान लेना ही नहीं है. ये सब बातें अध्यात्म के खाते में आती हैं. तब धर्म क्या है? इस बारे में मनुस्मृति में एक दृष्टांत दिया गया है—

धर्म क्या है, यह जानने के लिए ऋषिगण भृगु मुनि के निकट पहुंचे. मुनि के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखते हुए उन्होंने कहा—

महाराज! हम धर्म जानना चाहते हैं?’ इसपर भृगु जी ने उत्तर दिया—

विद्वद्भि सेवितः सद्भिः।’

अर्थात जो अच्छे विद्वान लोग हैं, जो सबके प्रति कल्याणभाव रखते हैं, वे जो आचरण करते हैं, सेवित करते हैं, उनके द्वारा जो आचरित होता है, वही धर्म है. धर्म की इस परिभाषा में न तो आत्मा है, न ही परमात्मा. दूसरे शब्दों में धर्म नैतिकता और सदाचरण का पर्याय है. भारतीय मेधा को अपने अद्वितीय तत्वचिंतन के कारण विश्वभर में सराहना मिली है. प्रमुख भारतीय दर्शनों न्याय, वैशेषिक, जैन, बौद्ध, चार्वाक, मीमांसा और वेदांत आदि सभी में विद्धान मुनिगण अपनीअपनी तरह से जीवन और सृष्टि के रहस्यों की पड़ताल करने का प्रयास करते हैं. उनके दर्शन में कल्पना की अद्भुत उड़ान है. इनमें से जैन, बौद्ध और वेदांत दर्शन तात्विक विवेचना के साथसाथ जीवन को सरल और सुखमय बनाने के लिए व्यावहारिक सिद्धांत भी देते हैं. बौद्ध अष्ठधम्म पद की राह सुझाता है.

इसी तथ्य को और सहजता से जानने के लिए एक कहानी का सहारा लिया जा सकता है—

एक राजा था. बहुत ही उदार, प्रजावत्सल. सभी का ख्याल रखने वाला. उसके राज्य में अनेक शिल्पकार थे. एक से बढ़कर एक, बेजोड़. राजा ने उन शिल्पकारों की दुर्दशा देखी तो उनके लिए एक बाजार लगाने का प्रयास किया. घोषणा की कि बाजार में संध्याकाल तक जो कलाकृति अनबिकी रह जाएगी, उसको वह स्वयं खरीद लगेगा. राजा का आदेश, बाजार लगने लगा. एक दिन बाजार में एक शिल्पकार लक्ष्मी की ढेर सारी मूर्तियां लेकर पहुंचा. मूर्तियां बेजोड़ थीं. संध्याकाल तक उस शिल्पकार की सारी की सारी मूर्तियां बिक गईं. सिवाय एक के. वह मूर्ति अलक्ष्मी की थी. अब भला अलक्ष्मी की मूर्ति को कौन खरीदता! उस मूर्ति को न तो बिकना था, न बिकी. संध्या समय शिल्पकार उस मूर्ति को लेकर राजा के पास पहुंचा. मंत्री राजा के पास था. उसने सलाह दी कि राजा उस मूर्ति को खरीदने से इनकार कर दें. अलक्ष्मी की मूर्ति देखकर लक्ष्मीजी नाराज हो सकती हैं. लेकिन राजा अपने वचन से बंधा था.

मैंने हाट में संध्याकाल तक अनबिकी वस्तुओं को खरीदने का वचन दिया है. अपने वचन का पालन करना मेरा धर्म है. मैं इस मूर्ति को खरीदने से मना कर अपने धर्म से नहीं डिग सकता.’

और राजा ने वह मूर्ति खरीद ली.

दिन भर के कार्यों से निवृत्त होकर राजा सोने चला तो एक स्त्री की आवाज सुनकर चैंक पड़ा. राजा अपने महल के दरवाजे पर पहुंचा. देखा तो एक बेशकीमती वस्त्र, रत्नाभूषण से सुसज्जित स्त्री रो रही है. राजा ने रोने का कारण पूछा.

मैं लक्ष्मी हूं. वर्षों से आपके राजमहल में रहती आई हूं. आज आपने अलक्ष्मी की मूर्ति लाकर मेरा अपमान किया. आप उसको अभी इस महल से बाहर निकालें.’

देवि, मैंने वचन दिया है कि संध्याकाल तक तो भी कलाकृति अनबिकी रह जाएगी, उसको मैं खरीद लूंगा.’

उस कलाकार को मूर्ति का दाम देकर आपने अपने वचन की रक्षा कर ली है, अब तो आप इस मूर्ति को फेंक सकते हैं!’

नहीं देवि, अपने राज्य के शिल्पकारों की कला का सम्मान करना भी मेरा धर्म है, मैं इस मूर्ति को नहीं फेंक सकता.’

तो ठीक है, अपने अपना धर्म निभाइए. मैं जा रही हूं.’ राजा की बात सुनकर लक्ष्मी बोली और वहां से प्रस्थान कर गई. राजा अपने शयनकक्ष की ओर जाने के लिए मुड़ा. तभी पीछे से आहट हुई. राजा ने मुड़कर देखा, दुग्धधवल वस्त्राभूषण धारण किए एक दिव्य आकृति सामने उपस्थित थी.

आप?’ राजा ने प्रश्न किया.

मैं नारायण हूं. राजन आपने मेरी पत्नी लक्ष्मी का अपमान किया है. मैं उनके बगैर नहीं रह सकता. आप अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें.’

मैं अपने धर्म से बंधा हूं देव.’ राजा ने विनम्र होकर कहा.

तब तो मुझे भी जाना ही होगा.’ कहकर नारायण भी वहां से जाने लगे. राजा फिर अपने शयनकक्ष में जाने को मुड़ा. तभी एक और दिव्य आकृति पर उसकी निगाह पड़ी. कदम ठिठक गए.

आप भी इस महल को छोड़कर जाना चाहते हैं, जो चले जाइए, लेकिन मैं अपने धर्म से पीछे नहीं हट सकता.’

यह सुनकर वह दिव्य आकृति मुस्कराई, बोली—‘मैं तो धर्मराज हूं. मैं भला आपको छोड़कर कैसे जा सकता हूं. मैं तो नारायण को विदा करने आया था.’

उसी रात राजा ने सपना देखा. सपने में नारायण और लक्ष्मी दोनों ही थे. हाथ जोड़कर क्षमायाचना करते हुए—

राजन हमसे भूल हुई है, जहां धर्म है, वहीं हमारा ठिकाना है. हम वापस लौट रहे हैं.’ और सचमुच अगली सुबह राजा जब अपने मंदिर में पहुंचा तो वहां नारायण और नारायणी दोनों ही थे.

आप ऐसी कथाओं पर चाहें विश्वास न करें. परंतु इस तरह की कथाएं रची जाती रही हैं, ताकि मनुष्य अपने कर्तव्यपथ से, नैतिकता से बंधा रहे.

धर्म और अध्यात्म का घालमेल कुछ धार्मिक कूपमंडूकता और स्वार्थी राजनेताओं के छल का परिणाम है. वास्तव में तो धर्म उन जीवनमूल्यों में आस्था और उनका अभिधारण है, जिनके अभाव में यह समाज चल ही नहीं सकता. जिनकी उपस्थिति उसके स्थायित्व के लिए अनिवार्य है. विभिन्न समाजों की आध्यात्मिक मान्यताओं, उनकी पूजा पद्धतियों में अंतर हो सकता है, मगर उनके जीवनमूल्य प्रायः एकसमान और अपरिवर्तनीय होते हैं. जब हम धर्म की बात करते हैं और यह मान लेते हैं कि हमें संसार में रहकर अध्यात्म को साधना है तो मामला नैतिकता पर आकर टिक जाता है. नैतिकता बड़ी ऊंची चीज है. यह कर्मयोगी को राह दिखाती है, कर्मसंन्यासी का पथप्रशस्त करती है. नैतिक होना मनसा, वाचा कर्मणा पवित्र होना भी है. आचरण की पवितत्रता, मन की पवित्रता और देह की पवित्रता ही मानवधर्म है. यहां जब हम देह की बात करते हैं तो उसके पीछे उसका पूरा परिवेश स्वतः ही समाहित हो जाता है. मनुष्य बौद्ध धर्म में इसे अष्ठधर्म के सिद्धांत के आधार पर समझाया गया है.

दूसरा हिंदू पुरुषार्थ है, अर्थ. संसार में जीने के लिए, सामाजिकता को बनाए रखने के लिए, आपसी व्यवहार को सुसंगत रूप में चलाने के लिए धन अत्यावश्यक है. वह जीवनव्यवहार को सहज और सुगम बनाता है. जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. यह सामाजिक प्रतिष्ठा का मूल है. मगर यहां एक पेंच है. धन को पुरुषार्थ मान लेने का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी तरीके से अर्जित किया गया धन पुरुषार्थ है. या धन है तो उसका हर उपयोग सामाजिकधार्मिक दृष्टि से मान्य है. चोरी, डकैती, वेश्यावृति और जुआ जैसे दुव्र्यसनों से अर्जित धन को समाज में हेय माना गया है. यहां तक कि उसका तिरष्कार भी किया जाता है. मनुष्यता के उत्थान के लिए साध्य और साधन दोनों की पवित्रता जरूरी है. अत्यधिक धन अर्जित कर लेना, दूसरे के हिस्से का धन हड़प लेना भी पुरुषार्थ नहीं है. धन के पुरुषार्थ मानने का अभिप्राय उससे जुड़े समूचे व्यवहार के मानवीकरण से है. अस्तेय और अपरिग्रह जैसी शास्त्रीय व्यवस्थाएं धर्नाजन और उससे जुड़े प्रत्येक व्यवहार को मानवीय बनाए रखने के लिए की गई हैं. जिसका अभिप्राय है कि चोरीडकैती अथवा लोकमान्य विधियों से अलग ढंग से अर्जित किया गया धन पाप है. धन उतना ही होना चाहिए जितना कि गृहस्थ जीवन को सुगम बनाए रखने के लिए आवश्यक है. कबीर ने धनार्जन को लेकर बहुत अर्थपूर्ण बात कही है—

साधु इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय,

मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए.

धन का अपव्यय आलोचना का विषय है तो उसे व्यय करने के लिए समझदारी की जरूरत पड़ती है. वृथा आडंबरों, लोकदिखावे, कोरी प्रतिष्ठा, जुआ एवं शराबखोरी जैसे दुव्र्यसनों पर खर्च करने के पुरुषार्थसिद्धि असंभव है. दूसरे शब्दों में धन को पुरुषार्थ की गरिमा से विभूषित करना, तत्संबंधी प्रत्येक व्यवहार को मानवीय रूप प्रदान करना है. इस तरह सिर्फ लोकमान्य विधि से अर्जित धन को लोकमान्य तरीकों से खर्च करने में ही में पुरुषार्थसिद्धि संभव है.

काम को हिंदूपरंपरा तीसरे पुरुषार्थ के रूप में मानती है. संसार को गतिमान बनाए रखने के लिए काम अत्यावश्यक है. इससे संततिचक्र आगे बढ़ता है. इसके लिए भी धार्मिक व्यवस्थाएं है. मुक्त, उच्छ्रंखल कामसंबंध समाजव्यवस्था को न केवल धराशायी कर सकते हैं, बल्कि उसमें इतना विक्षोभ पैदा कर सकते हैं कि यह पूरा का पूरा सिस्टम ही छिन्नभिन्न हो जाए. काम को नियमितनियंत्रित करने के लिए ही विभिन्न सामाजिक संबंधों की व्यवस्था हुई है, उनके लिए मर्यादाएं निश्चित की गईं. नैतिकता को बनाए रखने के लिए जो नियम बने उन्हें धर्म और धार्मिकता का आवरण प्रदान किया गया, जिससे वे अधिक से अधिक लोगों के लिए सहजग्राह्यः हो सकें. यहां तक कि उनके साथ आस्था का प्रसंग भी जोड़ा गया, ताकि वृहद सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उन्हें कुछेक व्यक्तियों के हित में तोड़ामरोड़ा न जा सके. वैवाहिक संस्था के गठन का प्रमुख उद्देश्य कामसंबंधों को सामाजिक मर्यादा के दायरे में लाना ही है. निर्धारित कसौटियों पर खरे उतरने वाले कामसंबंध ही तीसरे पुरुषार्थ के रूप में मान्य कहे जा सकते हैं. प्रथम तीनों पुरुषार्थों की सिद्धि के साथ मनुष्य जब धर्म को अपना आचरण बना लेता है, सदाचार और सद्व्यवहार उसके रोजमर्रा के जीवन का अंग बन जाते हैं, ‘अर्थ’ और ‘काम’ के बीच जब वह संतुलन कायम कर चुका होता है, तब वह साधारण लोगों के स्तर से बहुत ऊपर पहुंच उठ जाता है, इसी को परमात्मा के करीब पहुंच जाना कहते हैं. यही मोक्ष की अवस्था है, जहां सिर्फ पवित्रता ही पवित्रता है. किसी भी प्रकार का विक्षोभ या विकार नहीं. यदि कोई विक्षोभ है, यदि कहीं विकार अथवा असंगति नजर आती है, तो दोष हमारी दृष्टि का है, उस विधान का है जो हमने अपनी सुविधा के हिसाब से प्राकृतिक नियमों को ताक पर रखकर रचा है.

हिंदू धर्म के चारों पुरुषार्थ मानव जीवन को मर्यादित करते हैं. मनुष्य को सिखाते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं. लेकिन आप इसे जनसामान्य की दुनिया से उकताहट का परिणाम माने अथवा उसकी अपने आराध्य के प्रति समर्पण की तीव्र अभिलाषा, या फिर अलभ्य को पा लेने की जनसामान्य की सहजस्वाभाविक लालसा, जिसके कारण वह मात्र नियंत्रित जीवनचर्या यानी पुरुषार्थचातुर्य पर निर्भर नहीं रहना चाहता. मोक्ष की कामना उसको वैकल्पिक रास्तों तक ले ही जाती है. धर्मशास्त्रों में मुक्ति यानी परमात्मा को पाने के जो दो प्रमुखमार्ग बताए गए हैं, पहला है ज्ञानमार्ग. वस्तुतः मानव जिज्ञासा की पहली उड़ान इस सृष्टि और उसके रचियता के बारे में जान लेने के बोध के साथ ही हुई थी. ज्ञानमार्गी के अनुसार ईश्वर की दी गई इंद्रियां और दिमाग उस तक पहुंचने का सर्वोत्तम माध्यम हैं. परमात्मा को जान लेना ही उसको प्राप्त कर लेना है—ज्ञानमार्गी इसी विश्वास के साथ चिंतनमनन में डूबे रहते थे. उनकी ज्ञानसाधना के सुफल के रूप में अनेक दर्शनों का जन्म हुआ. वेद, उपनिषद आदि महान ग्रंथों की रचना हुई. ये उदाहरण सिर्फ भारत के हैं. विश्व की बाकी सभ्यताओं में सृष्टि से जुड़ी जिज्ञासा ने भी अनेक दर्शनों को जन्म दिया है. हालांकि इस क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां भारतीय मेधा का ही अनुसरण करती हुई नजर आईं. बल्कि कहना चाहिए कि वे भारतीय वांङमय की उत्कृष्ट व्याख्या अथवा पुन:प्रस्तुति से आगे न बढ़ सकीं.

ज्ञानमार्गी परंपरा को विस्तार देते हुए आदि शंकराचार्य ने नवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में अद्वैत दर्शन का विचार प्रस्तुत किया था. उन्होंने जैमिनी के मीमांसा दर्शन द्वारा पोषितप्रेरित और रूढ़ हो चुके कर्मकांड़ों तथा लोकायतों के विशुद्ध भौतिकवादी दर्शन के स्थान पर वेदांत दर्शन को स्थापित किया. इसके लिए उन्होंने देश के विभिन्न भागों में जाकर बौद्धों और मीमांसकों से गंभीर शास्त्रार्थ किए थे, जिनमें उनका मंडन मिश्र के साथ हुआ शास्त्रार्थ जगतप्रसिद्ध है. अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बल पर शंकराचार्य ने परमात्मा को अनित्य, अनादि, अनंत, अनश्वर, अविकल्प सत्ता माना था. इसके समानांतर उनके परिवर्ती रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन का सिद्धांत रखा. दोनों के ही विचारों में अवतारवाद को मान्यता दी गई थी, लेकिन शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित दर्शन में जीवन और सृष्टि के रहस्यों पर अर्थिक तार्किक दृष्टि से विचार किया गया था. सृष्टि के मूल के रूप में शंकराचार्य ने ‘बृह्म सत्यं जगन्न्मिथ्या’ की अवधारणा के साथ जिस निस्सीम, निर्विकल्प, अनादि और अनंत परमसत्ता की संकल्पना समाज के सामने रखी, वह वेदों एवं उपनिषदों से उद्भूत थी, जिसके आगे ईश्वर और उसके अवतारों को बहुत कम महत्त्व दिया गया था. दूसरी ओर रामानुज ने सदेह ईश्वरवाद को महत्त्व देते हुए विष्णु को सृष्टि का पालक और संचालक माना. वेदांत दर्शन के अंतर्गत शंकराचार्य ने सृष्टि की तत्वमींमासीय व्याख्या की थी, उनके द्वारा स्थापित चार मठों में प्रमुख गोवर्धनपीठ का तो मुख्यवाक्य ही ‘प्रज्ञानम् बृह्म’ (ज्ञान ही बृह्म) है. लेकिन जनसाधारण के लिए उन्होंने भक्ति को भी पर्याप्त महत्ता दी. यही कारण है कि शंकराचार्य और उनका दर्शन स्मात्र्त और वैष्णव दोनों संप्रदायों में एकसमान प्रतिष्ठा प्राप्त कर सका.

शंकराचार्य के प्रयासों से हिंदू धर्म संगठित हुआ. मगर कुछ ही अर्से बाद ज्ञान की उस परंपरा में ठहराव आने लगा. कुछ स्वार्थी, धर्मान्ध और कर्मकांडप्रिय लोगों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए समाज को जातीय आधार पर विभाजित करना आरंभ कर दिया. यहां तक कि वेदशास्त्रों और पूजापद्धति के आधार पर भी नएनए संप्रदाय बनने लगे. जातीयस्तरीकरण को शास्त्रीय आधार प्रदान करने के लिए स्मृति और पुराण गढ़े जाने लगे. परिणाम यह हुआ कि परमसत्ता के प्रतीक अनादि, अनश्वर, निराकार, निगुण ‘बृह्म’ का स्थान दोहाथ, दो पांव वाले देवताओं ने ले लिया. कर्मकांड और वर्गभेद के समर्थन पर टिकी इस व्यवस्था का ज्ञान की पुरातन परंपरा से कोई लगाव न था. विभिन्न मताबलंबियों के बीच आए दिन के विवाद छिड़ने और बहस का स्तर नीचे जाने से प्रचलित दार्शनिक मान्यताओं का स्थूलीकरण होने लगा. परिणामस्वरूप चिंतनधारा सूखने लगी. कर्मकांडों और रूढ़ियों में फंसा धर्म अपनी ही मूल स्थापनाओं से परे हटने लगा. इस नई परंपरा में जनसाधारण के लिए, सिवाय उसके सामाजिकआर्थिकसामाजिक शोषण के कोई और स्थान न था.

एक के बाद एक दर्शनों की खोज एवं विशद्चिंतनपरक भीमकाय ग्रंथों की रचना के बावजूद जब मुनिगण ज्ञान के द्वारा परमात्मा और उसकी सृष्टि के बारे में उठे प्रश्नों का सही और सटीक जबाव देने में नाकाम रहे तो लोगों को लगने लगा कि मनुष्य के बुद्धिविवेक की भी सीमा है. इनके माध्यम से जीवन और संसार की अनेक समस्याओं को सुलझाया तो जा सकता है, मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं को नितनए रूप और उड़ान भी दी जा सकती है. मगर इससे सृष्टि और उसकी संरचना से जुड़े अनगिनत प्रश्श्नों को पूरी तरह हल नहीं किया जा सकता. इसका एक कारण तो यह था कि दार्शनिक खोजें जो कभी चिंतन और मनन का विषय हुआ करती थीं, प्रकारांतर में जड़बुद्धि लोगों के हाथों में पहुचकर कोरा वितंडावाद बन चुकी थीं. तब अपनी सहजबुद्धि से लोगों ने यह मान लिया कि परमात्मा अदृश्य और अगोचर है. वह इतना विराट और विलक्षण है कि उसपर संदेह किया ही नहीं जा सकता. देखा जाए तो यह मानवबुद्धि का पलायनवाद ही था. मगर उन स्थितियों में वही जरूरी भी था. एक बार जब यह मान लिया गया कि ईश्वर अगमअगोचर है, उसके विराट एवं विलक्षण रूप की व्याख्या कर पाना सीमित क्षमता वाली मानवीय इंद्रियों की पहुंच से बाहर है, तब उसको जानने का एक ही रास्ता बचता था, वह था प्रेम और समर्पण का, जो आगे चलकर भक्ति आंदोलन का जनक बना.

शाब्दिक दृष्टि से देखें तो भक्ति शब्द ‘भज्’ धातु में ‘क्तिन्’ प्रत्यय लगाने से बना है. जिसका अर्थ है भजना, स्मरणअर्चन करना. यह ईश्वर के प्रति मनुष्य की गहन अनुरक्ति का सुफल है, उसके कार्यों में सहज हिस्सेदारी है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्ति को धर्म का प्राणतत्व, उसकी रसात्मक अभिव्यक्ति माना है. भक्तिपरंपरा में विश्वास रखने वाले मानते हैं कि परमात्मा अनादिअनंत और परमकृपालु है. सीमित इंद्रियों के माध्यम से उसको प्राप्त करना असंभव है. आत्मा उसी का अंश है, लेकिन वह इस संसाररूपी माया के फेर में फंसकर अपनी पहचान भूल चुकी है. परमात्मा अपनी सृष्टि के उद्धार के लिए समयसमय पर अवतार लेता है. उसको पाने का एकमात्र उपाय है, खुद को अपने ईष्ट, अपने आराध्यदेव के समक्ष पूरी तरह समर्पित कर देना. अपनी हारजीत, अपने संपूर्ण सपने, समस्त आशाआकांक्षाएं उसपर न्योछावर कर देना. भक्ति की पराकाष्ठा में भक्त अपने आराध्यदेव के सिवाय कुछ भी याद नहीं रखना चाहता. अपने चारों और यहां तक भी अपने भीतर ही वह अपने आराध्य के दर्शन करता है. और जब भक्त अपने आराध्य से एकाकार हो जाता है, उसकी भक्ति में एकनिष्ट होकर पूरे संसार को बिसरा देता है तो फिर मुक्ति का लक्ष्य उसके लिए सहजसुलभ हो जाती है. सांसारिक व्याधियां उससे दूर भागने लगती हैं. धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष चारों पुरुषार्थ उसकी चाकरी करने लगते हैं. मोक्ष चरणों में उतरकर उसका सेवादार बन जाता है. ऐसे भक्तशिरोमणि के लिए कर्म और अकर्म का भेद मिट जाता है. उसका हर कर्तव्य धर्मसम्मत होता है. अपने आराध्य के संसर्ग में वह जो प्राप्त करता है, वह बड़ेबड़े साधुसंत, ज्ञानीध्यानी को भी उपलब्ध नहीं हो पाता. इसलिए अथाह प्रेम और समर्पण द्वारा आराध्य को पा चुके भक्त के आगे बड़ेबड़े ज्ञानी भी नतमस्तक होते हैं, वे उसकी चाकरी करके भी खुद को धन्य समझते हैं तथा उसकी पहुंच उसके प्रेमसमर्पण के आगे स्वयं को समर्पित कर देते हैं. ऐसे भक्त शिरोमणि के आगे सारे ज्ञान, सारी सिद्धियां, सारे प्रलोभन छोटे पड़ जाते हैं—

चार पदार्थ करें मजूरी

मुक्ति भरे यहां पानी

कर्मधर्म दोऊ बंटें जेबड़ी

छान छहें ब्रह्मज्ञानी

आशय यही था कि भक्त के लिए सबकुछ सुलभ है. दुनिया की बड़ी से बड़ी शक्ति उसकी ऋद्धा और आस्था के आगे नतमस्तक हो जाती है.

भक्ति की पहली ताजीताजी बयार लगभग बारहवीं शताब्दी में बही थी. एकदम नए उद्गम स्थल से. उस वर्ग की ओर से जो अभी तक धार्मिकआर्थिकसामाजिक शोषण का शिकार रहा था. उसके उद्गाता संतकवियों में से अधिकांश या तो शूद्र थे, अथवा उससे भी नीचे के अन्त्यज. दरअसल यह कर्मकांड के नाम पर रूढ़ियां और ज्ञान के नाम पर कोरा वितंडा रच रहे धार्मिक पाखंडियों के विरुद्ध जनसाधारण का पहला सशक्त सामाजिकसांस्कृतिक विद्रोह था. वेदांत दर्शन से प्रभावित इन संत कवियों ने ‘निर्गुण’ आराध्य की परिकल्पना की; और एक निर्मलनिराकारनिर्विकल्पअनादि और अनंत परमात्मा की भक्ति में खुद को तल्लीन कर दिया. इनमें सभी जातिवर्ग के लोग सम्मिलित थे. मगर बड़ी संख्या उन लोगों की थी, जो उन दिनों तक रूढ़ हो चुके धार्मिकसामाजिक शोषण के शिकार थे. वर्णव्यवस्था के इतिहास में यह पहला अवसर था, जब शूद्रों ने अपने ही संतमहात्मा पैदा किए तथा अपने से कथित ऊंचे वर्ग के शासकों और विचारकों के लिए खुली चुनौती पेश की. उन्होंने न केवल धर्म के नाम पर थोपे जा रहे कर्मकांडों को चुनौती दी, बल्कि वर्गभेद की तीखी आलोचना करते हुए एक समरस समाज की स्थापना के लिए गीत भी लिखे. स्मरणीय है कि भक्ति आंदोलन का उद्भव इतिहास के उस दौर की घटना है, जब भारत पर विदेशी हमले बढ़ने लगे थे. छोटेछोटे राज्यों में बंट चुका यह देश अपनी स्वतंत्र राजनीतिकसांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा के लिए जूझ रहा था. भारत की ज्ञानमार्गी परंपरा निरर्थक बहसों तथा कर्मकांडों में फंसकर वह धार खो चुकी थी, जिसने उससे पांचछह सौ वर्ष पहले तक भारतीय अध्यात्मचेतना को पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित करने का काम किया था.

दक्षिण भारत और महाराष्ट्र से होती हुई भक्ति की यह परंपरा उत्तर भारत में पहुंची, जहां कबीर, रैदास आदि ने धर्म के नाम पर आडंबर फैलाने वालों को सीधे चुनौती पेश की. इसके लिए यथास्थितिवादियों ने उनपर जमकर हमले किए. उन्हें तरहतरह की प्रताड़नाएं दी गईं. बारहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में जन्मे संत ज्ञानेश्वर को भी आडंबरवाद का सामना करना पड़ा था. कट्टरपंथियों के अत्याचारअनाचार के कारण ज्ञानेश्वर और उनके परिवार का जीवन अत्यंत कष्ट और दुःख में बीता. उनके महान ग्रंथ ज्ञानेश्वरी की उपेक्षा कर उसको तीन सौ वर्षों तक दबाए रखा गया. लेकिन उसके बाद जब वह अप्रतिम ग्रंथ दुनिया के सामने आया तो जनसाधारण की आंखें खुलने लगीं. संत ज्ञानेश्वर के अनुयायियों में नामदेव, जानी, नरकरी, चोखामाला, सेवा, गोरा, सावंत, भागू आदि समाज के विभिन्न वर्गों से आए थे. निर्गुण भक्त कवियों का जनसाधारण पर व्यापक असर हुआ. समाज में उनकी प्रतिष्ठा इतनी तेजी से बढ़ने लगी कि वह वर्ग जो प्रारंभ में उनका उपहास उड़ाता था, उनकी राह में नईनई अड़चनें प्रस्तुत करता था, बदले समय में वह भी भक्तिपरंपरा से जुड़ने लगा. इससे आंदोलन की प्रतिष्ठा को बल मिला. मगर समाज के उच्च वर्गों से गए अधिकांश भक्तकवि अपनी वर्गीय निष्ठा से मुक्त नहीं हो पाए थे. भक्ति आंदोलन की लोकव्याप्ति और उसकी जनसाधारण पर उसकी पकड़ का लाभ उठाते हुए, उन कवियों ने धीरेधीरे अपने आराध्य का स्थूलीकरण करना आंरभ कर दिया. भक्ति और समर्पण के नाम पर अपने आराध्य का नखशिख गुणगान करते हुए उन्होंने अपनी सारी प्रतिभा उसके शृंगारिक वर्णन को रसमय और विलासितापूर्ण बनाने पर लगा दी. तुलसी जैसे संत कवियों ने अपने आराध्य की चारित्रिक कमजोरियों को नजरंदाज कर, सिर्फ उसके महिमामंडन पर ध्यान दिया. उनका दासभाव धार्मिक पाखंडियों और सामंतों के लिए यथास्थति बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुआ. इससे भक्तिगीतों में सामंती चरित्रों का उभरना स्वाभाविक था. इसके परिणामस्वरूप भक्ति आंदोलन का क्रांतिकारी स्वरूप धूमिल पड़ने चला गया, जिसकी नींव संत ज्ञानेश्वर, रविदास, कबीर आदि संतकवियों ने की थी; और आगे चलकर गुरु नानकदेव ने जिसके आधार पर स्वतंत्र धर्म की स्थापना की.

कालांतर में भक्तिआंदोलन दो हिस्सों में बंटता चला गया. एक वर्ग था जो परमात्मा को निर्गुण मानकर उसकी अराधना करने में विश्वास रखता था. दूसरे को उसका साकार रूप पसंद था. तुलसी, सूर, मीरा, हरिदास, दादू आदि अधिकांश संतों ने परमात्मा के सगुण और साकार रूप का गुणगान किया. भक्तिमार्गी संतों में रामानंद, तुलसी आदि ने राम को अपना आराध्यदेव माना तो मीरा, सूर, हरिदास आदि की भक्ति कृष्णप्रेम के रूप में प्रकट हुई. सामाजिक वर्णविभाजन का असर यहां भी देखने को मिलता है. सगुण भक्ति के प्रमुख उपासकों में से अधिकांश उस वर्ग से संबद्ध थे, जिन्हें तात्कालिक समाजव्यवस्था का लाभ मिला था. सूर, तुलसी, मीरा आदि समाज के कथित उच्च वर्गों से आए थे, जबकि निरगुनियां गाने वाले संतकवियों में से अधिकांश समाज के उस वर्ग से आए थे, जो अपने श्रमकौशल के आधार पर संघर्षपूर्ण जीवन जीता आया था. संत ज्ञानेश्वर के शिष्यों में नामदेव दर्जी, नरकरी सुनार, चोखामाला महार, सेवा नाई, गोरा कुम्हार, सावंत माली तथा भागू मुहारियन की संतान थे. जानी नामदेव के सेवादार थे, जिन्होंने अपने गुरु के सान्निध्य में रहकर तत्वज्ञान प्राप्त किया था. इसी परंपरा में दादू दयाल, पल्टु, नाभादास, मीराबाई, सहजो, चरणदास आदि अनेक संतों ने, अलगअलग समय में, प्रेम और भक्ति का संदेश देश के कोनेकोने तक पहुचाने का काम किया. उन्होंने अनेक जातिवर्गों में बंटे समाज में समानता एवं समरसता के विचार को आगे बढ़ाया और जोर देकर इंसानइंसान के बीच मौजूद ऊंचनीच की दीवार को ढहाने का क्रांतिकारी प्रयास किया. निगुर्णपंथी, प्रेममार्गी विचारधारा पर सूफी फकीरों का भी प्रभाव था.

पंद्रहवी और सोहलवीं शताब्दी में भारत पर विदेशी शासको का राज्य पूरी तरह स्थापित हो चुका था. हिंदू राजेमहाराजे अपनी कांति खो चुके थे. उनमें से अधिकांश विधर्मी शासकों की सेवा में ही खुद को धन्य महसूस कर रहे थे. भारतीय जनसमाज खुद को अपने शासकों की करतूतों से आहत और अपमानित अनुभव कर रहा था, यही उसकी कुंठा और क्षोभ का कारण बना था. शासकवर्ग की पराजित मानसिकता और हताश जनसमाज के बीच प्रेरणा की तलाश के लिए संतकवियों का पुरातन भारतीय संस्कृति और इतिहास की शरण में जाना स्वाभाविक ही था. इस प्रवृत्ति से सगुणभक्ति को और बल मिला. परिणामस्वरूप निर्गुण भक्ति की धारा पीछे छूटने लगी और सगुण तत्व प्रधान होता चला गया. भारतीय महाकाव्यों के प्रमुख नायक, राम और कृष्ण को अपना उद्दारक मानते हुए भक्त कवियों ने उनकी प्रार्थना के गीत रचने शुरू कर दिए. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि राम और कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले संतकवियों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भी अंतर था. इसके कारण भी इन दोनों के जीवनचरित्र में खोजे जा सकते हैं. अपने जीवन में पित्रभक्ति का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करने वाले राम ने रावण पर विजय प्राप्तकर आर्यसंस्कृति का डंका समुद्र पार लंका में बजाया, मगर अयोध्या लौटने पर निर्दोष सीता का निष्कासन और शंबूक की हत्या उनके चरित्र पर लांछन जैसे हैं.

दूसरी ओर कृष्ण का जीवन सोलह कलासंपूर्ण, राम के व्यक्तित्व की अपेक्षा अधिक लालित्यललाम है. वे गोपियों के अंतरंग सखा के रूप में उनके साथसाथ नृत्य करते हैं, बांसुरी की तान पर उन्हें रचाने की लीला करते हैं, तो संकट के समय गोवर्धन पर्वत को उठाकर संपूर्ण ब्रजमंडल की रक्षा भी करते हैं. यही नहीं युद्धभूमि में युद्ध की विभीषिका और भीषण तनाव के बीच भी वे अपने धैर्य को बनाए रखते हैं, और विकट परिस्थितियों के बीच गीता का उपदेश देते हैं. युद्धस्थल पर अपने सखा अर्जुन को दिया गया निष्काम कर्म का उनका उपदेश अनूठा है, जिसमें वे न केवल सांसारिक व्यवहार की ऊंचनीच से अर्जुन को परचाते है, बल्कि विषम परिस्थितियों में अपनी मानसिक एकाग्रता कायम रखने का उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं. कृष्ण का यही गुण उन्हें असाधारण बनाते हुए ईश्वरीय गरिमा से विभूषित करता है. रावण विजय के उपरांत निर्दोष सीता को निष्कासन की सजा देना राम की मर्यादा पर लांछन जैसा है, जबकि कृष्ण राधा को ब्रज में छोड़ जाते हैं, और सत्यभामा से ब्याह रचा लेते हैं. यहां तक कि महाभारत के युद्ध में आततायी राजाओं के विनाश के लिए वे कूटनीति और छलप्रपंच का भी सहारा लेते हैं, बावजूद इसके कोई उनके देवत्व पर उंगली नहीं उठाता. बल्कि इससे जनसामान्य की निगाह में उनका चरित्र और भी ऊंचा उठ जाता है. इसलिए भक्ति की प्रेममार्गी चिंतनधारा में कृष्ण सर्वदा वरेण्य हैं. ऐसी ही भक्ति को प्राप्त कर चुकी ब्रज की गोपियां उद्धव के सारे तत्वज्ञान को नकार देती हैं. उनके आगे आखिकार उद्धव को ही हार माननी पड़ती है. गोपियों को निर्गुण भक्ति का पाठ पढ़ाने आए ब्रह्मज्ञानी उद्धव अपढ़ गोपियों से हार मानकर मथुरा वापस लौट जाते हैं. श्रीमद् भागवद् में कृष्ण के जीवन के उदात्त पक्षों को दिखाया गया है. इसमें उनके जीवन की न केवल लीलाएं हैं. बल्कि बाल्यकाल से लेकर बड़े होने तक कृष्ण की वीरता और बुद्धिमानी का भी लेखा है. सीता निष्कासन और शंबूक हत्या से जुड़े मामलों में राजा राम का अपने गुरु वशिष्ट की आज्ञा का अक्षरशः पालन करना ब्राह्मणवाद से ग्रस्त तत्कालीन समाज में यथास्थिति बनाए रखने में मदद करना है. जबकि कृष्ण जनसाधारण के कल्याण के लिए देवराज इंद्र की चुनौती स्वीकारने में भी पीछे नहीं रहते. इसलिए यह अकारण नहीं कि राम का व्यक्तित्व समाज में यथास्थिति के पक्षधरों को अपने वर्गीय हितों के अनुकूल जान पड़ता था. शायद इसीलिए राम को अपना आराध्य मानने वाले लगभग सभी संतकवि उच्च जातिवर्ग से संबद्ध थे, जो एक तरह से भक्ति आंदोलन के क्रांतिकारी चरित्र को गंदला करने का प्रयास कर रहे थे. दूसरी ओर कृष्णभक्तों में समाज के सभी वर्गों के, यहां तक कि मुसलमान संतकवि भी सम्मिलित थे.

भक्त कवियों ने ऊंचनीच और सांप्रदायिकता को मिटाकर समाज में समरसता लाने के लिए बहुत काम किया है, लेकिन यह काम जितना निर्गुण भक्त कवियों ने किया, सगुण उपासक उतना नहीं कर सके. इसका कारण है कि अधिकांश निर्गुण उपासक समाज के पिछड़े वर्ग से संबंधित थे, जिन्होंने सामाजिक ऊंचनीच और तज्जनित उत्पीड़न को सहा था. इसलिए उनकी कविता में मुक्ति की छटपटाहट थी. उसमें सामाजिक बदलाव का स्वर मौजूद था. जबकि तुलसी, सूर, हरिदास जैसे सगुण उपासकों ने अपने आराध्य की जिस रूप में परिकल्पना की, वह सामंतवाद से प्रेरित होने के कारण सामाजिक यथास्थिति का पोषण करती थी. उनके आराध्य सत्ताकेंद्रों पर विराजमान, समाज के कथित उच्च एवं शक्तिशाली वर्गों के प्रतिनिधि थे. इसका परिणाम यह हुआ कि समाज में जातीय विभाजन को चाहेअनचाहे मान्यता मिलने लगी, जिससे सामाजिक समरसता का वह सपना जो निर्गुण भक्तकवियों ने देखा था, वह शनैशनै धूमिल होने गया. मुक्तिबोध ने इस स्थिति पर बहुत ही सार्थक टिप्पणी की थी, उनके अनुसार निचली जातियों के बीच से पैदा होने वाले संतों के द्वारा निर्गुण भक्ति आंदोलन एक क्रांतिकारी आंदोलन के रूप में पैदा हुआ. किंतु आगे चलकर ऊंची जाति वालों ने इसकी शक्ति को पहचानकर अपनाया और उसको अपने (सामंती) विचारों के अनुरूप ढालकर उसको राम और कृष्ण की सगुण भक्ति का रूप दे डाला. जिससे उसके क्रांतिकारी दांत उखड़ गए. इस प्रक्रिया में कृष्णभक्ति में तो कुछ क्रांतिकारी तत्व बचे रह गए, लेकिन रामभक्ति में जाकर तो उसके रहे सहे तत्व भी गायब हो गए. शायद इसलिए कि कृष्ण का जीवन और व्यवहार लोकतांत्रिक अवधारणाओं के अपेक्षाकृत अधिक करीब है. बावजूद इसके जीवन और समाज में भक्ति की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता. यह मानव मन के विकारों और सामाजिक अंतर्विरोधों का शमन कर मनुष्य को अहंकारमुक्त करने का काम करती है, जो सामाजिक समरसता एवं एकता के लिए अनिवार्य हैं. लेकिन उस युग का एक विशद् समाजशास्त्रीय अध्ययन अब भी प्रतीक्षित है.

ओमप्रकाश कश्यप

भारतीय समाज: व्यवस्थाएं एवं मानव नियति

 

भारतीय समाज: व्यवस्थाएं एवं मानव नियति

 

 

व्यवस्थाएं सभ्य समाज की प्रबुद्धता का प्रतीक होती हैं. प्रत्येक कल्याणकारी समाज अपनी सदस्य इकाइयों की सुखसुविधा तथा उनके बीच संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण के लिए अनुकूल व्यवस्थाओं का चयन करता है. अपने दायित्वों के निर्वहन की प्रक्रिया में ईमानदार व्यवस्था, सदस्य इकाइयों के प्रति समानतापूर्ण व्यवहार करते हुए, उन्हें विकास के एकसमान एवं न्यायसंगत अवसर उपलब्ध कराती है. कल्याणकारी राज्य की व्यवस्थाओं का स्वरूप पूर्णतः लोकतांत्रिक होता है. उनकी प्रतिबद्धता किसी विचारधारा विशेष, सत्ताशिखर अथवा शक्तिकेंद्र के प्रति न होकर, संपूर्ण समाज के प्रति होती है. अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ये अपने विधान का उत्तरोत्तर युगानुकूल परिमार्जन तथा उसे अधिकाधिक नैतिक स्वरूप प्रदान करने हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहती हैं. ये परंपराओं के अनुकूलन तथा उपलब्ध ज्ञानसंपदा तथा अनुभवों के योग से समरस सामाजिकसांस्कृतिक वातावरण तैयार करती हैं, जहां सभी को अपने ऐच्छिक विकास एवं वैचारिक अभिव्यक्ति के समान अवसर सहज ही उपलब्ध होते हैं. यह जानते हुए भी कि समाज की प्रत्येक इकाई को संतुष्ट कर पाना असंभव है, ये अपने आचरण में ऐसी पारदर्शिता विकसित कर लेती हैं, जिससे असंतुष्ट इकाइयों को भी यह विश्वास होने लगता है कि बहुमत के आधार पर लिया गया निर्णय बृहत्तर समाज के हित में होने के साथसाथ सर्वाधिक समीचीन भी है. इसलिए उस निर्णय के प्रति उनकी भी सहज स्वीकृति बन जाती है.

स्वाधीन भारत में कार्यकारी व्यवस्थाओं को कार्यक्षम एवं जनोन्मुखी बनाए रखने के सभी आवश्यक प्रावधान हमारे संविधान में मौजूद हैं. एक तरह से हमारा संविधान मनुष्यता के सभी निर्दिष्ट प्रतिमानों के अनुरूप है. यह सभी को जीवनयापन एवं विकास के समानुकूल अवसर प्रदान करने में सक्षम है. आमतौर पर ये उपलब्धियां सैद्धांतिक व्यवस्थाओं या कागजों तक सीमित रह जाती हैं, जिसे इस व्यवस्था की विसंगति कहा जा सकता है. व्यवहार में जब व्यवस्थाएं अपने कार्यकारी रूप में प्रकट होती हैं या जब तक ऐसा समय आता हैवे प्रायः अपने लक्ष्य से भटक चुकी होती हैं. हमारे दौर की एक बहुत बड़ी त्रासदी यह भी है कि यहां आम आदमी व्यवस्था द्वारा पूरी तरह उपेक्षित है. उसके नाम पर या उसके लिए बनने वाली योजनाएं सामान्यत: उसकी सहमति/ सूचना के बिना ही गढ़ ही जाती हैं. व्यवस्थाओं का निर्माण मुट्टीभर लोगों द्वारा मुट्ठीभर लोगों की स्वार्थपूर्ति के लिए किया जाता है, उन लोगों के लिए जो पहले से ही मजबूत स्थिति में हैं. यह स्थिति कमोबेश पूरी दुनिया में है. भारत के संदर्भ में यह इसलिए विचारणीय हो जाती है, क्योंकि यहां की तीनचौथाई जनता गरीबी रेखा से नीचे का जीवनयापन कर रही है. कुछ ही महीने पहले सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने अपने अध्ययन में पाया था कि देश के बीस करोड़ से अधिक नागरिक मात्र बीस रुपये प्रतिदिन तक की आय पर जीवन बसर करते हैं, जो सरकार द्वारा निर्धारित गरीबी के मानकों से काफी नीचे हैं. यह स्थिति तब है जब हमारी ख्याति विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में है; और हमारे ही समाज के चंद लोग निकट भविष्य में भारत को दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने का दावा करते रहते हैं. उस समय वे इस तथ्य को पूरी तरह नजरंदाज कर जाते हैं कि जिस रास्ते पर चलते हुए हम विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनने का दावा कर रहे हैं, अथवा हमें ऐसा सपना दिखाया जा रहा है उसी रास्ते का अनुसरण करते हुए अमेरिका की करीब चालीस विशाल आर्थिक कंपनियां खुद को दिवालिया घोषित कर चुकी हैं. अब विश्वसमुदाय में अपनी साख बचाने के लिए अमेरिकी सरकार, राहत की बैशाखी के सहारे उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश में जुटी है.

उल्लेखनीय है कि कानूनी बंदिशें आम आदमी पर ज्यादा शिद्दत से लागू होती हैं. सीधेसीधे कहें तो थोप दी जाती हैं. इसके साथसाथ नागरिककर्तव्यों एवं सामाजिक शुचिता के पालन के लिए आम आदमी से हमारी अपेक्षाएं, उसकी हैसियत के अनुपात से कुछ अधिक ही होती हैं. इन अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए धर्म, राष्ट्रभक्ति, क्षेत्रीयता, प्रारब्ध आदि के नाम पर उससे परिस्थितियों के प्रति समझौतावादी रुख अपनाते रहने की अपेक्षा की जाती हैं. इसलिए कि हम जानते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता आम आदमी के मताधिकार द्वारा ही वैधता प्राप्त करती हैं. चूंकि प्रबुद्ध जनमानस अकल्याणकारी व्यवस्था के दोषों को पहचान कर, प्रतिकार स्वरूप उस व्यवस्था को बदलने में समर्थ होता है अथवा विरोध करते हुए अप्रीतिकर कल्याणकारी व्यवस्था को परेशानी में डाले रखता है, अतः ये व्यवस्थाएं मनुष्य के विवेकबोध से घबराती हैं. ये नहीं चाहती कि समाज के सामान्य विवेकबोध का विकास हो. जिससे वह सत्यासत्य का विवेचन कर, उपयुक्त निर्णय लेने में सक्षम हो सके. इसलिए ये जनता को प्रबुद्ध जनमानस में ढालने की अपेक्षा उसे एक अविवेकी भीड़ में बदल देने की अनवरत कोशिश करती रहती हैं.

स्वार्थी व्यवस्थाएं सदैव इस प्रयास में रहती हैं कि समाज का सामान्य विवेक कुंठित हो जाए, अथवा वह अनेकानेक विचारधाराओं, मतमतांतरों के संघर्ष में फंसकर निष्क्रयनिष्प्रभावी हो जाए. इस दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए ये समाज के अंतर्विरोधों को पाटने अथवा समन्वय हेतु परस्पर विरोधी शक्तियों के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश करने के बजाय, उनके अंतर्विरोधों को हवा देने लगती हैं. अकल्याणकारी व्यवस्था की कोशिश मनुष्य की संवेदनशीलता और संवादप्रियता को नष्ट कर, उसे अपनी ही तरह क्रूर, स्वार्थी एवं विलासी बना देने की होती है. ताकि वह संपूर्ण समाज के व्यापक हितों की अपेक्षा मात्र अपने विकास और सुखसुविधाओं के बारे में ही सोच सके. बड़ी चतुराई से मनुष्य की बौद्धिक लालसाओं एवं गतिविधियों के केंद्र में उन चीजों को प्रवेश करा दिया जाता है, जिनका मनुष्य के विकास से दूरदूर का रिश्ता नहीं होता. विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढ़ाई तथा धर्म बनाम आस्था संबंधी निरर्थक एवं अंतहीन बहसों के थोपे जाने की कोशिशों को इसी रूप में लिया जाना चाहिए. सामान्य चरित्र के अभाव में, समाज में छोटेछोटे अनेक शक्तिकेंद्र पनपने लगते हैं. स्वार्थी व्यवस्था इन लघुशक्ति केंद्रों को इनके क्षुद्र हितों में उलझाकर, अपनी स्वार्थपूर्ति में निमग्न रहती है. परिणामस्वरूप समाज की रचनात्मक ऊर्जा का उपयोग गैर उत्पादक कार्यों में होने लगता है. इससे समाज में अंतर्द्वंद्व पनपने लगते हैं, राजनीति छोटेछोटे टापुओं में बंट जाती है, जो प्रकारांतर में विकास की गति को बाधित करने का काम करते हैं.

कोई भी व्यवस्था जब सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए करने लगती है, तब वह न केवल अनैतिक बन जाती है, बल्कि सत्ता में बने रहने का औचित्य भी खो देती है. इस लक्ष्यच्युत व्यवस्था को जनमानस के सामान्य विवेकबोध से निंयत्रित किया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर इसे बदला भी जा सकता है. परंतु विखंडित जनमानस इस कार्य को करने में सक्षम नहीं होता. इस कारण अकल्याणकारी व्यवस्था को सत्ताशिखर पर बने रहने तथा मनमानी करने का (कु)अवसर मिल जाता है. प्रकारांतर में जिसकी परिणति एक निरंकुश सत्ता और जड़ समाज के रूप में होती है. जैसे बीसवीं शती के नवें दशक का मंडलमंदिर(मंडलकमंडल) आंदोलन मूलतः सामाजिक न्याय, तदनुरूप अवसरों और संसाधनों में समाज के प्रत्येक वर्ग की समान भागीदारी का मुद्दा था, जिसको केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण तक सीमित कर दिया गया. आगे चलकर आरक्षण को उच्चतम न्यायालय की स्वीकृति मिलने तथा सत्ता प्राप्ति के लिए अल्पमत सवर्ण मतों के साथसाथ पिछड़े वर्ग के मतों की अनिवार्यता को समझते हुए, उसे केवल आस्थाओं के मंदिर(राममंदिर) तक समेट दिया गया. नए जमाने में लोग मंदिर के नाम पर इकट्ठा होने में हिचकिचाएं नहीं, इसलिए पुन: उसको राष्ट्रीयअस्मिता का प्रतीक घोषित कर दिया गया. यही नहीं. सामान्यबोध को कुंठित करने के लिए आस्थाओं के प्रश्न को तर्कातीत भी बता दिया गया. इस तर्क को बड़ी चतुराई से छिपा लिया गया कि हिंदु धर्म जिन दार्शनिक मान्यताओं पर टिका रहकर, सहस्राब्दियों से सम्मानीय एवं अनुकरणीय बना हुआ है, उनमें ‘तर्क’ को वही स्थान प्राप्त है, जो आस्था को. ‘मुंडेमुडे मर्तिंभिन्ना’ हमारे वैदिक वाङ्मय का ही सूक्ति वाक्य है. धर्मदर्शन परंपरा में भक्ति(आस्था) को साधारण लोगों का धर्म बताया गया है. जबकि प्रबुद्ध लोग सभी आध्यात्मिक जागतिक प्रश्नों पर अपने बुद्धिविवेक के अनुसार तर्क कर उन्हें स्वीकारअस्वीकार कर सकते हैं. ईश्वर की सत्ता पर विश्वास न करते हुए भी आध्यात्मिक बना जा सकता है, यह हमारी दर्शनपरंपरा ही हमें सिखाती है. एक ओर तो धर्म के ठेकेदारों द्वारा आस्थाओं को तर्कातीत बताकर हमारी सहज बौद्धिक जिज्ञासाओं का गला घोंटा जा रहा है, दूसरी ओर बाजार अपने खानपान, पहनावे और अन्य सुविधाओं के माध्यम से उन चीजों को हमारी प्राथमिकता में ला रहा है, जिनका हमारे विकास से दूरदूर का वास्ता नहीं है. यह बात आग्रहपूर्वक दिमाग में बिठाई जा रही है कि भाषा का काम केवल संवादवहन तक सीमित है. इसलिए सुविधा के नाम पर शब्दों को तोड़नामरोड़ना, अंग्रेजी के शब्दों की मनमानी घुसपैठ करना सब चलेगा. प्रत्येक भाषा अपने साथ पूरी सामाजिक परंपरा लेकर चलती है, वह अपने आप में स्वयं सांस्कृतिक दस्तावेज होती हैइस तथ्य की जानबूझकर उपेक्षा की जा रही है.

धर्म और आस्था के नाम पर बहुमत बनाने का प्रयास, भारतीय लोकमानस को प्रबुद्ध नागरिकता में ढालने के बजाय उसे साधारण अनुयायी बनाए रखने की कोशिश मात्र है. यह कार्य विभिन्न धर्मसत्ताएं और बाजार अपनेअपने स्वार्थ के लिए समानरूप से करते हैं. धर्मसत्ताएं इसलिए ताकि वे गंभीर धार्मिकदार्शनिक प्रश्नों से बचीं रहें. तर्क से कटे जड़ अनुयायियों की भीड़ उनकी स्वार्थसत्ता को चुनौती न दे सके. बाजार इसलिए ताकि वह व्यक्ति के आलोचनासामर्थ्य को न्यूनतम कर सके, जिससे लोग उत्पादों के औचित्य और उनके वास्तविक मूल्य को लेकर कोई प्रश्न न उठा सकें. यानी सौडेढ़सौ वर्ष पहले तक जो कार्य संहिताओं के माध्यम से किया जाता था, वही आज आस्थाओं के मूर्तिकरण द्वारा किया जा रहा है. चूंकि अकल्याणकारी व्यवस्थाएं प्रबुद्ध जनमानस के बीच ज्यादा दिन नहीं पातीं, वे केवल साधारण लोगों के कंधों पर ही सवारी गांठ सकती हैं, इसलिए वे विवेकीकरण की संभावनाओं को लगातार टालती रहती हैं. यह एक त्रासद स्थिति है कि आम आदमी के जीवन में गत्यात्मकता सिर्फ नारों के रूप में ही आती है. प्रायः हर व्यवस्था लोकलुभावन नारों या जनभावनाओं के उभार के बाद सत्ता में आती है; तथा निहित स्वार्थों के कारण वह लक्ष्य से बहुत जल्दी भटक जाती हें. तो क्या अपने कर्तव्यपथ से भटकाव हर व्यवस्था की नियति है? मानव नियति का पर्याय क्या व्यवस्था के हाथों छला जाना ही है? क्या ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो व्यवस्था को उत्तरदायी बना सके? आम आदमी की किस्मत क्या सिर्फ व्यवस्था के हाथों का खिलौना बनकर रहना है, जिससे वह जैसा और जब तक जी चाहे तब तक खेल सके?

चूंकि व्यवस्थाएं सत्ताकेंद्रों द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती हैं, इसलिए उसमें सत्ता केंद्रों के दुर्गुणों और उनकी दुर्बलताओं का प्रभाव पड़ना भी स्वाभाविक होता है. यद्यपि लोकतांत्रिक व्यव्सथा में सारी नियामक शक्तियां जनता के हाथों में सुरक्षित रहती हैं. किंतु लोकतांत्रिक समझ के अभाव में या मूल मुद्दों से भटकाव के कारण वह इन शक्तियों का क्रियान्वयन नहीं कर पाती. समाज में सामान्य विवेकबोध का न होना भी इस असंगति का प्रमुख कारण है. जिसके कारण समस्याओं के साथसाथ मतों का भी विभाजन हो जाता है. उस अवस्था में वे संपूर्ण समाज की समस्या न होकर वर्ग विशेष की समस्याएं बन जाती हैं. जैसे लैंगिक भेदभाव के मुद्दे पर स्त्रियां जितनी उद्वेलित होती हैं, उतना पुरुष नहीं होते. अस्पृश्यता और वर्गभेद की समस्याओं से केवल दलितों और पिछड़ों को दोचार होना पड़ता है. सामाजिक वर्गव्यवस्था में ऊंचे पायदान पर स्थित लोगों के लिए तो संभवतः अस्पृश्यता और वर्गभेद जैसी कोई समस्याओं का अस्तित्व ही नहीं है, परंतु जब दलित वर्ग अपनी सामाजिक प्रस्थिति में गुणात्मक सुधार लाने के लिए संगठित होकर संघर्ष का रास्ता अपनाता है तो सवर्णों को अपने भविष्य की चिंता सताने लगती है. प्रतिक्रिया में वे स्वयं भी संगठित होने का प्रयास करते हैं. इसी प्रकार मजदूरों की समस्याएं मात्र श्रमिक वर्ग को आहत कर पाती हैं. यही स्थिति समाज के दूसरे वर्गों के साथ है. सबका कारण यह है कि स्वाधीनता के पचास से अधिक वर्ष गुजर जाने के पश्चात भी भारतीय समाज में किसी सामान्य सोच(एकात्मकता) का विकास नहीं हो पाया है. परिणामस्वरूप हम बहुमत के बजाय बंटे हुए मतों के आधार पर सत्ताकेंद्रों का निर्माण करते हैं, जो अपने परिणाम में भले की प्रभावशाली नजर आए, वास्तविक रूप में वह भटकावग्रस्त और प्रभावहीन होती है.

दूसरी ओर व्यवस्था के शिखर पर आसीन शक्तियों का चरित्र हर युग में प्रायः एक जैसा रहा है. व्यवस्थाएं बदली हैं. समय के साथसाथ उनके चेहरे मोहरे में भी परिवर्तन आया है. मगर उसका मूल चरित्र जैसा आजादी के पहले था, लगभग वैसा ही आज तक बना हुआ है. परस्पर प्रतिरोधी शक्तियों के बीच संवाद और दोनों तरफ से हस्तक्षेप करने की समान छूट, न पहले थी, न वर्तमान व्यवस्था में उपलब्ध है. सामंतशाही और राजशाही के दौरान निर्णय ऊपर से लिए जाते थे. तब की प्रजा को निर्णय में हस्तक्षेप करने के विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे. लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत चुनी गई सरकारें यद्यपि लोकेच्छा का प्रतिनिधित्व करती हैं, परंतु एक बार चुने जाने के बाद लोकप्रतिनिधि जिस प्रकार से ‘लोक’ की उपेक्षा करते हैं, यह किसी से भी छिपा नहीं है. यद्यपि जनता को इस व्यवस्था में अधिक अधिकार प्राप्त है. सच यह भी है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकारें प्रायः जनता के दबाव में रहती हैं. परंतु यह दबाव सरकार के निर्णयों को बहुत कम मामलों में प्रभावित कर पाता है. यह दबाव सीमा के भीतर ही रहे, इसके लिए व्यवस्थाएं अलगअलग से अभियान चलाती रहती हें. जिससे समाज अलगअलग सामान्य प्राथमिकता से युक्त वर्गों में बंट जाता है. ऐसे समाज में सामान्य विवेकबोध का पूर्ण विकास नहीं हो पाता. दूसरी ओर लगातार कई मनमाने निर्णय लेने के बाद, सत्ताकेंद्रों पर उपस्थित लोग, स्वयं को शक्ति केंद्र भी समझने लगते हैं. आगे चलकर वे अपने पद और प्रतिष्ठा का मनमाना दुरुपयोग करते रहते हैं. इन लोगों की सत्ता समाज की अज्ञानता एवं गलतफहमी पर टिकी रहती है, अर्थात ये नहीं चाहते कि एक प्रबुद्ध समाज का जन्म हो या समाज अपनी स्थिति को पहचाने.

समाज को भ्रमित रखने के लिए व्यवस्थाएं लोकलुभावन नारों का सहारा लेती हैं. वे स्वयं को समाज का नीतिनियंता प्रदर्शित करती है. शिक्षा, समानता, सद्भाव, आर्थिक विकास, सभ्यता एवं संस्कृति जैसे कई विषय हैं जिन्हें लोकलुभावन नारों के बीच जनता के बीच प्रस्तुत किया जाता है. कभीकभी सत्ताकेंद्र से हट जाने का भय और लोकसमर्थन का गिरता ग्राफ भी व्यवस्था को अलोकतांत्रिक कदम उठाने के लिए बाध्य कर देता है. दूसरे शब्दों में व्यवस्थाएं यथास्थिति कायम रखने और सत्ता में बने रहने के लिए हताशापूर्ण कार्रवाहियों का सहारा भी लेती है. यह स्थिति किसी भी प्रकार के समाज में हो सकती है. परंतु प्रौद्योगिकी की दृष्टि से पिछड़े समाजों में व्यवस्थाओं की मनमानी अधिक देखने को मिलती है. विकासशील समाजों में जहां उन्नत प्रौद्योगिकी का तेजी से आगमन होता है, व्यवस्थाएं अक्सर दोगली भूमिका निभाती हैं. वे जनमत के दबाव के कारण लोक हितैषी होने का मुखौटा धारण कर लेती है यद्यपि उनकी स्वाभाविक निष्ठा पूंजीपतियों और विभिन्न शक्तिकेंद्रों के प्रति अधिक होती है.

गरीब और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े समाजों में लोकतांत्रिक समझ का विकास प्रायः हो नहीं पाता. रोटी के लिए किए जाने वाले संघर्षों में उन्हें उनके अधिकारों को समझने और फिर उनके लिए संघर्ष करने का अवसर ही नहीं मिलता. ऐसी अवस्था में वास्तविक परिवर्तन की स्थिति लगातार टलती चली जाती है. स्पष्ट है कि मानव नियति को बदलने के लिए समाज का विवेकीकरण एक विकल्पहीन अनिवार्यता है. समाज के विवेकीकरण में मीडिया और संचार के दूसरे माध्यमों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है. पिछले कुछ वर्षों से देश में मीडिया ने तेजी से प्रगति की है. परंतु एक विडंबना की भांति समस्त संसाधनों पर आज भी शक्ति एवं सत्ताकेंद्रों का दबदबा बना हुआ है. आम आदमी मीडिया की निगाह में आज भी उपेक्षित है. जबकि मीडिया आज ऐसा सशक्त माध्यम है जो समाज को विवेकीकरण की ओर ले जा सकता है. उसको राह दिखा सकता है.

स्वविवेकीकरण के दौरान समाज अपने अंतर्विरोधों पर नियंत्रण रखते हुए, प्रतिक्रियात्मक शक्तियों को सही दिशा देता है. जिससे विध्वंसक कार्यों में खप रही ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक कार्यों हेतु होने लगता है. अतएव संचार माध्यमों सहित सभी प्रबुद्ध लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे समाज की स्वविवेकीकरण की प्रक्रिया में यथासंभव सहयोग देते रहें. उसी अवस्था में यह समाज एक सर्वकल्याणकारी व्यवस्था की प्राप्ति की ओर बढ़ सकता है. तभी मानव नियति पर छाया कुहासा हट सकता है.

ओमप्रकाश कश्यप

राबर्ट ओवेन: आधुनिक सहकारिता आंदोलन का जन्मदाता – तीन

राबर्ट ओवन की कमजोरियां

इस आलेख के पहले दो अंकों में हमने राबर्ट ओवेन के जीवन संघर्ष, उसके त्याग एवं उपलब्धियों बारे में जाना. उसके सपनों और महत्त्वाकांक्षाओं को समझने का प्रयास भी किया. ओवेन के लंबे जीवन की गहन पड़ताल से सिद्ध होता है कि वह एक महान स्वप्नदृष्टा, कामयाब उद्यमी एवं उदार इंसान था. धार्मिक प्रतीकों में कोई आस्था न होने के बावजूद, मानवीय करुणा एवं त्याग का परिचय देते हुए वह गरीब मजदूरों एवं कामगारों के उत्थान के लिए आजीवन कार्य करता रहा. मगर उसकी नाकामियों को देखकर लगता है कि अनुभवों से सबक लेने के गुण का उसमें संभवतः अभाव था. संभवत: अपनी अतिशय उदारता के कारण वह व्यक्तियों को पहचानने में अकसर भूल कर जाता था, इसीलिए अपने जीवन में वह एक ओर तो नई से नई उपलब्धि अर्जित करता रहा, वहीं दूसरी ओर उन्हें किसी न किसी रूप में गंवाता भी रहा. वह बेहद संवेदनशील और भला इंसान था, इसलिए अपने धन का बड़ा हिस्सा उसने दूसरों के कल्याण के लिए खर्च किया. उस समय तक खर्च करता रहा जब तक कि उसकी समस्त पूंजी समाप्त नहीं हो गई. इस बीच उसके साथी उसको छोड़कर जाते रहे. तब भी वह अपने संकल्प पर अडिग रहा. ओवेन को सहकारी आंदोलन का जनक होने का श्रेय प्राप्त है और यह अन्यथा भी नहीं है. उसके जीवन संघर्ष, वैचारिक दृढ़ता, नैतिकतावादी सोच, महान कार्यों, ईमानदारी, जनप्रतिबद्धता और सहजीवन पर आधारित कालोनियों के विस्तार के लिए किए गए कार्य को देखते हुए, उसको यह श्रेय मिलना स्वाभाविक ही है.

ओवेन ने सहकारिता के आदर्श को समाज में स्थापित करने के लिए तमाम प्रयास किए. वह स्वयं एक गरीब परिवार से आया था. अपने परिश्रम के बल पर उसने मेनचेस्टर के कपड़ा उद्योग के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज की थी. जमीन से उठकर वह शिखर तक पहुंचा और अपनी प्रतिभा के आधार पर लंबे समय तक वहां टिका रहा. स्वयं को कामयाब उद्यमी सिद्ध करते हुए उसने तरक्की की कई सीढ़ियां पार कीं. आजीवन आलोचनाओं में घिरे रहने के बावजूद वह न तो घबराया न कभी अपने प्रयासों को मंद ही होने दिया. वह मानता था कि समाज में किसी अकेले व्यक्ति का विकास कोई मायने नहीं रखता, सिवाय मनुष्य के अपने अहं की संतुष्टि के. वह अपने समय के सुखवादी विचारकों से प्रभावित था और सभी के लिए सुख की सुलभता की कामना करता था. उसका मानना था कि—

मजदूर यदि कष्ट में हों तो मालिक का सुख उठाना पाप है. मालिक को समझना चाहिए कि रातदिन कठिन परिश्रम करके फैक्ट्रियों को कमाऊ बनाने वाले मजदूरों का जीवन यदि कष्टकर है, तो उसे मुनाफे को बचाकर रखने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. अपने कर्मचारियों के लिए आवश्यक सुविधाओं का प्रबंध करना उसका नैतिक कर्तव्य है और उसके आगे उसकी बाकी उपलब्धियां अर्थहीन हो जाती हैं.’

ओवेन की यह मान्यता दिखावटी न थी. अवसर मिलते ही उसने अपने मजूदरों के जीवनस्तर में सुधार के लिए कार्य करना शुरू कर दिया था. सबसे पहले उसने मजदूरों की समस्याओं की पहचान की, फिर उनके निदान के लिए मजदूरों के सहयोग से ही उपाय करने प्रारंभ किए. उसके सारे प्रयास स्वयंस्फूर्त थे. कल्याण कार्यक्रमों के संचालन में उसके अपने संसाधन लगे थे. इससे उसके उद्योगों पर अतिरिक्त व्यय बढ़ा था. लेकिन श्रमिककल्याण कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में लगातार वृद्धि के बावजूद, ओवेन की मिलों के कुल मुनाफे में निरंतर इजाफा हो रहा था. ओवेन को मिली कामयाबी ने यह भी दर्शा दिया था कि श्रमिकों के कल्याण के लिए खर्च किया जाने वाला धन गैरउत्पादक नहीं है, बल्कि उसकी वही उपयोगिता है, जो किसी कारखाने में नवीनतम प्रौद्योगिकी की होती है.

अपने सिद्धांतों की व्यावहारिकता सिद्ध करने, उन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए ओवेन ने अपनी जीवनभर की पूंजी, दांव पर लगा दी थी. वह चाहता था कि इस कार्य के लिए अन्य उद्यमी भी आगे आएं, समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझें तथा उसके पुनर्निर्माण में भागीदारी करें. वह जानता था कि समाज में व्याप्त गरीबी और दिशाहीनता के लिए धार्मिक जड़ताएं भी जिम्मेदार हैं. वे मनुष्य को वास्तविक समस्याओं तथा उनके कारण के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं देतीं. सदा भरमाए रखतीं हैं. इस कारण मनुष्य न तो अपनी प्राथमिकताएं तय कर पाता है, न ही उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाने में कामयाब होता है. अज्ञानता का एक कारण अशिक्षा भी है. शिक्षा की उपयोगिता को समझते हुए उसने अपनी मिलों में कार्यरत बालश्रमिकों के अध्ययन की समुचित व्यवस्था भी की थी. ये सब प्रयास क्रांतिकारी प्रभाव के थे. जिससे यथास्थिति की समर्थक शक्तियों द्वारा उसकी आलोचना अवश्यंभावी थी.

ओवेन ने समाज में धर्म के नाम पर तेजी से फैलते जा रहे यथास्थितिवाद का जमकर विरोध किया था. वह उनके विरोध का परिणाम भी भलीभांति जानता था. जानता था कि उस अवस्था में उसका धर्मिक बहिष्कार भी किया जा सकता है, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी धूमिल पड़ सकती है. इसके बावजूद वह अपने सिद्धांतों पर डटा रहा. धर्मिक जड़ताओं और सामाजिक अनाचार के लिए जिम्मेदार शक्तियों पर हमला करने से उसे कोई नहीं रोक सका. अंततः जैसा ओवेन ने सोचा था, वही हुआ भी. उसका सामाजिक बहिष्कार किया गया. सामाजिक अतिवादियों के इस कुकृत्य पर प्रेस चुप्पी साधे रहा. गोया वह भी षड्यंत्र में साझीदार हो. अमेरिका में अपने प्रयोग के विफल हो जाने के पश्चात, जिसमें ओवेन ने अपना सारा भविष्य दांव पर लगा दिया था, उसने स्वयं को श्रमिकों के सुपुर्द कर दिया. उसके आगे के तीन वर्ष उसने मजदूरों के बीच रहकर उनके लिए कार्य करते हुए बिताए. इंग्लैंड का प्रत्येक सामाजिक आंदोलन, श्रमिकों की मार्फत हुई कोई भी नई पहल, राबर्ट ओवेन के नाम से जुड़ी है. किसी अकेले व्यक्ति के लिए यह साधारण उपलब्धि नहीं है.

ओवेन ने सदैव पूरे समूह को साथ लेकर चलने का प्रयास किया था, किंतु आवश्यकता पड़ने पर उसका साथ देने के लिए सिवाय इक्कादुक्का बुद्धिजीवियों के कोई आगे नहीं बढ़ सका. उसके साझीदार ही कारखाने को घाटे में जाते देख अलग होने लगे थे. लेकिन यह न तो अफसोस की बात है, न ही इसके नेपथ्य में किसी विषादगीत जैसी ध्वनियां हैं. प्रकृति का यह शाश्वतसा नियम है कि अपने अभियान के आरंभ में प्रत्येक महापुरुष निपट अकेला होता है. दुनिया उससे टकराती है, हतोत्साहित करने का प्रयास करती है. फिर धीरेधीरे उसके महत्त्व को पहचानने लगती है, तत्पश्चात उसके अनुयायियों की उत्तरोत्तर बढ़ती संख्या आंदोलन का रूप लेती जाती है.

ओवेन को अपने प्रयासों में असफलता मिली. इसे साहचर्यवादी अर्थशास्त्रियों की वैचारिक नाकामी भी कहा जा सकता है. चाहें तो इसे हम सहकारिता आंदोलन की शुरुआती असफलता भी मान सकते हैं. ठीक ऐसे ही जैसे कोई बालक चलना सीखने से पहले लड़ताझगड़ता, गिरता और उठता है. देखा जाए तो यह आवश्यक भी है, क्योंकि केवल इसी से मनुष्य को नए अनुभवों की खेप प्राप्त होती है, जो उसके लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलती है. ओवेन के सहकारी प्रयास की असफलता के पीछे भी निश्चित रूप से कुछ कारण थे, जिन्हें हम निम्नलिखित रूप में वगीकृत कर सकते हैं—

1. हालांकि भारत और पश्चिमी देशों में सहयोगाधारित आर्थिक संगठन उससे पहले भी कामयाबी दर्शा चुके थे. मगर शताब्दियों से विशेषकर सामंतवाद के उभार के दौर में ही वे लुप्तप्रायः थे. पूंजीवाद के दौर में जब अधिकांश विद्वान स्पर्धा को विकास के लिए अपरिहार्य मान रहे थे, साहचर्य पर आधारित संगठन बनाना कतिपय पुराना और अस्वीकृत मान लिया गया विचार था. ओवेन उसको दुबारा केंद्र में लाकर समीचीन बनाने का प्रयास क्रिया था. किंतु तत्कालीन समाज के लिए उस समय तक यह सिद्धांत चूंकि नया था, उसके लिए जिस प्रकार के ईमानदार प्रयास एवं लोकतांत्रिक परिवेश की आवश्यकता थी, उतनी जागरूकता ओवेन द्वारा बनाई गई समितियों के सदस्यों में नहीं थी. यहां तक कि ओवेन के साथी भी उस विचार को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाए थे.

2. ओवेन का आंदोलन पूंजी अथवा उसके नाम पर किसी भी प्रकार के वर्चस्व के विरुद्ध था. वह पूंजी के संपूर्ण विकेंद्रीकरण का समर्थक था. चूंकि उन दिनों नई तकनीक का आगमन शुरू ही हुआ था, अतः उद्योगपति चाहते थे कि जितनी जल्दी हो सके, उच्च निवेश द्वारा खरीदी गई तकनीक से अधिकतम लाभ कमा लिया जाए. अतएव ओवेन का सर्वकल्याण के लिए देखा गया सपना और उसके लिए तात्कालिक रूप से किए गए प्रयास, पूंजीपतियों को अपने हितों के विरुद्ध जान पड़े. उस समय भी सरकारीतंत्र पर पूंजीवादियों का प्रभाव था. आवश्यकता पड़ने पर ओवेन ने अपने अभियान में जब सरकारी मदद की कोशिशें कीं, तो अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए पूंजीपतियों ने सरकार को विवश कर दिया कि वह ओवेन के प्रयासों को किसी भी प्रकार की सहायता या समर्थन आदि न दे. प्रशासन और सरकार पर अपनी पकड़ होने के बावजूद अपनी योजनाओं के समर्थन के लिए ओवेन सरकार और पूंजीपतियों पर किसी भी प्रकार का दबाव बनाने में असफल रहा.

3. ओवेन में संगठन क्षमता का अभाव था. तत्कालीन पूंजीपतियों ने ओवेन द्वारा बनाई गई समितियों से अच्छे और अधिक खपत वाले माल की थोक खरीद करने का भी षड्यंत्र किया, ताकि समिति के भंडारों पर उनकी कमी हो तथा लोगों का उनसे विश्वास कम हो. चूंकि उनके पास पर्याप्त पूंजी थी, तथा दीर्घकालिक लाभों के लिए वे तात्कालिक घाटा उठाने का सामर्थ्य भी रखते थे, अतः उन्हें अपने मकसद में सफलता भी मिली. परिणामत समिति के भंडारग्रहों, विक्रय केंद्रों पर आवश्यक वस्तुओं की कमी पड़ने लगी, जिससे उपभोक्ता बाजार की ओर मुड़ने लगे. ओवेन मजदूरों को पूंजीवादी शक्तियों के इस षड्यंत्र के विरुद्ध संगठित करने में नाकाम रहा.

4. हीगेल से प्रेरित कार्ल मार्क्स. एंजिल्स आदि विद्वानों के विचार अपेक्षाकृत उग्र थे. वे श्रमिकों को यह समझाने में सक्षम रहे थे कि उनकी समस्याओं का निदान केवल वर्गसंघर्ष में निहित है. उन्होंने राबर्ट ओवेन, विलियम किं आदि की ‘कल्पनाशील’ व्यक्ति कहकर खिल्ली उड़ाई थी, जिससे मजदूरों का बड़ा वर्ग कार्ल मार्क्स के विचारों की ओर झुकता चला गया. प्रूधों जैसे विद्वानों ने यद्यपि व्यक्तिगत संपत्ति को हेय बताते हुए उसकी निंदा की थी. उसके बरक्स पूंजीपति अपने उत्पादों को सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बताने लगे थे. उनके प्रलोभनों के आगे जनसाधारण का बहकते जाना स्वाभाविकसी बात थी.

6. ओवेन के प्रयासों की असफलता के पीछे एक कारण यह भी था कि वर्षों के शोषण एवं हताशा भरे जीवन ने मजदूरोंगरीबों को अकर्मण्य एवं भाग्यवादी बना दिया था. वे प्रायः अशिक्षित अथवा अल्पशिक्षित थे. उनमें पर्याप्त अधिकार चेतना एवं जागरूकता का अभाव था, जिसकी किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए आवश्यकता थी.

7. सहकारी प्रयासों के प्रति सरकार की उदासीनता के चलते उसके लिए बाहरी पूंजी की आमद या अन्य स्रोतों से कर्ज मिलने की संभावना कम से कम थी. गरीब मजदूर इस स्थिति में नहीं थे कि वे अपने ओर से सुरक्षित निवेश के लिए आवश्यक धन का प्रबंध कर सकें. जैसा कि हमने रोशडेल पायनियर्स के प्रकरण में भी देखा कि अपना उद्यम प्रारंभ करने के लिए भी सदस्यों का जिस न्यूनतम निवेश की आवश्यकता थी, उतना प्रबंध करने की हैसियत भी मजदूरों की नहीं थी. ओवेन ने पूंजीपतियों से कल्याण कार्यक्रमों में धन लगाने के लिए अनुरोध किया था, जिसका बहुत कम प्रभाव पड़ा. पूंजी की कमी के कारण भी शुरू किए गए सहकारी प्रयास अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ रहे थे.

हालांकि आगे चलकर, धीरेधीरे ही सही, लोगों को सहकारिता की महत्ता समझ में आने लगी थी. यह भी सत्य है कि आपने प्रारंभिक वर्षों में सहकार एक प्रतिक्रियात्मक गतिविधि थी, जिसकी व्युत्पत्ति असमान विकास के कारण हुई थी; और उसको आगे बढ़ाने वाला वह वर्ग था, जिसके हितों को तीव्र मशीनीकरण ने आघात पहुंचाया था. औद्योगिक क्रांति ने नागरीकरण की गति को बढ़ावा तो दिया था, मगर उसका लाभ आमजन को नहीं मिल पा रहा था. इसके एक ओर तो सरकारी उपेक्षा, उदासीनता और उसकी अदूरदर्शी नीतियां थीं, दूसरी ओर मिलमालिकों की न्यूनतम निवेश से अधिकतम लाभ कमाने की प्रवृत्ति और श्रमिककल्याण के प्रति उपेक्षा का भाव. इन सब कारणों से नगरों में आर्थिक विसंगतियां बहुत तेजी से बढ़ी थीं.

एक तरफ गरीब बस्तियांछोटेछोटे घर, गंदगीभरा माहौल और भुखमरी जैसी स्थितियां थीं, दूसरी ओर चिकनी सड़कें, गगनचुंबी अट्टालिकाएं तथा विलासिता के दूसरे साजोसामान थे. पूरा समाज जैसे दो वर्गों में बंट चुका था. एक तरफ धनाढ्य लोगों की बड़ीबड़ी आलीशान कोठियां, भव्य प्रासाद आदि शोभायमान थे, तो दूसरी ओर कुकरमुत्तों की तरह उग आईं, गंदी स्लम बस्तियां, जिनमें सामान्य जनसुविधाओं का अभाव था. औद्योगिक क्रांति से शिल्पकारों से काम छिना था, मशीनीकरण से पहले जो शिल्पकार सम्मान का जीवन जी रहे थे, जिनका संगठित व्यापार देशविदेश के बीच फैला हुआ था, उन्हें विवश होकर नौकरी से गुजारा करना पड़ रहा था. इससे मजदूर वर्ग की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई थी, परिणामतः स्लम बस्तियों की संख्या में उत्तरोतर वृद्धि होती जा रही थी. उसी अनुपात में उनकी समस्याएं भी बढ़ती जा रही थीं. इसलिए लोगों का संगठित होना स्वाभाविक ही था.

कोई भी नया आंदोलन जनमत के सहयोग के बिना नहीं चल पाता. ओवेन अच्छा पूंजीपति तो था, किंतु लोगों को प्रभावित करने की कला का उसमें अभाव था. इस कारण वह मजदूरों के मन में अपने कार्यक्रमों के प्रति विश्वास जगाने में नाकाम रहा था. कहीं न कहीं मजदूरों के मन में उसको लेकर संदेह बना हुआ था, दूसरी ओर पूंजीपति वर्ग भी उसको अपने हितों का विरोधी मान चुका था. ध्यातव्य है कि उन दिनों साम्यवाद का जोर था. हीगेल के दर्शन का राजनीतिक उपयोग करते हुए मार्क्स ने मजदूरों के कल्याण के लिए श्रमिकों तथा स्वामियों के संघर्ष को अनिवार्य बताया था, जिसे मजदूर वर्ग का पूरा समर्थन प्राप्त था. पूरी दुनिया में परिवर्तनकारी राजनीति का दौर चल रहा था. मार्क्स की प्रेरणा पर असंतुष्ट वर्ग लगातार संगठित होता जा रहा था.

ओवेन ने मजदूरों की स्थिति के प्रति दयालुता का प्रदर्शन करते हुए उनकी स्थिति में सुधार के लिए अनेक कदम उठाए, किंतु अपनी कतिपय कमजोरियों के कारण वह श्रमशक्ति को आमूल परिवर्तन के लिए प्रेरितसंगठित कर पाने में असमर्थ रहा. अपनी असफलताओं एवं कतिपय कमजोरियों के बावजूद ओवेन ने जो किया, वह परिवर्तनकारी राजनीति के इतिहास में अनुपम है. उसने लंबा और कर्मयोगी जीवन जिया. समाज से जितना लिया, उससे अधिक लौटाने के लिए वह सदैव कृतसंकल्प बना रहा. मनुष्यता के भले के लिए कम से कम दो क्षेत्रों में उसका योगदान मौलिक अविस्मरणीय बना रहेगा. पहला शिक्षा के क्षेत्र में, उसने अपनी मिलों में काम करने वाले बालश्रमिकों की पढ़ाई की नियमित व्यवस्था की. उनके लिए पाठशालाएं खुलवाईं. और दूसरा सहकारिता के प्रचारप्रसार में. उसने न केवल सहकारी समिति की स्थापना की, बल्कि मजूदरों के कल्याण के लिए National Equilable Labour Exchange की स्थापना भी की, जिसमें वस्तुओं का आदानप्रदान उसमें लगी श्रमशक्ति के आधार पर किया जाता था. यह वस्तु विनिमय की तार्किक व्यवस्था थी, जिसमें किसी वस्तु के मूल्य का आकलन उसमें लगे श्रमघंटों के अनुसार किया जाता था. ओवेन की ही प्रेरणा पर आगे चलकर रोशडेल पायनियर्स ने एक कामयाब सहकारी संगठन की नींव रखी, जो आगे चलकर सहकारिता आंदोलन के विकास में एक क्रांतिकारी प्रयास सिद्ध हुआ.

राबर्ट ओवेन का प्रभाव

राबर्ट ओवेन का पूरा जीवन संघर्षमय रहा. अपने विचारों को व्यावहारिक रूप से कामयाब बनाने के लिए वह आजीवन प्रयास करता रहा. ध्यातव्य है कि ओवेन का उद्देश्य मात्रा आर्थिकसामाजिक विषमताओं का निर्मूलीकरण नहीं था, बल्कि समाज के चरित्र में परिवर्तन के माध्यम से मनुष्य की सहयोगकारी प्रवृत्ति को सभी कर्तव्यों के लिए नियामक बनाना था. वह एक गरीब परिवार से आया था. उसका बचपन अभावों में व्यतीत हुआ था. बावजूद इसके उसने अपने सपनों को कभी मरने नहीं दिया. अल्प आयु में ही वह नौकरी करने के लिए मजबूर हो गया. धार्मिक कर्मकांड में उसकी कोई आस्था नहीं थी, किंतु ईसाई धर्म के सेवा और कल्याण के सिद्धांत में वह विश्वास करता था और आजीवन उसी के लिए कार्य करता रहा. अपनी प्रतिभा, दूरदर्शिता तथा उद्यमशीलता के दम पर उसने खूब धनार्जन किया. मगर धन उसकी मनोवृत्ति को बदल पाने में असफल रहा. इसलिए कि उसके लिए धन साध्य न होकर साधनमात्र था; जिसके द्वारा जीवन के उच्चतर उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके, जिसके लिए वह आजीवन प्रयोग करता रहा. यह बात अलग है कि उनमें से एक में भी उसे स्थायी सफलता प्राप्त न हो सकी. इसके बावजूद उसके प्रयासों को निष्फल मान लेना उचित न होगा. अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, ओवेन ने अपने समकालीन विचारकों को गहराई से प्रभावित किया था. उसने अपने बहुत से अनुयायी भी बनाए. उसने लोगों को प्रेरित किया कि वे ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के लिए विकास की वैकल्पिक पद्धति को अपनाएं, जिसमें संसाधनों के विकेंद्रकरण पर जोर दिया जाता है.

यहां यह स्वीकार करने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि एक विचारक के रूप में ओवेन में मौलिकता का अभाव था. उसने केवल प्रचलित विचारों के कार्यान्वन पर काम किया. इस मामले में वह अपने पूर्ववर्ती और समकालीन विचारकों से अलग और काफी आगे था. जिस रास्ते को दूसरे विचारक कोरा आदर्शवादी दृष्टिकोण, अव्यावहारिक और कल्पना की उड़ान कहकर टाल दिया करते थे, ओवेन उसी पर आजीवन निष्ठापूर्वक चलता रहा और ईमानदारी से नएनए प्रयोग भी करता रहा. उसकी महानता इसमें है कि उसने मानवकल्याण के जुड़े प्रत्येक पक्ष पर विचार करने के साथसाथ, उसके के लिए कारगर योजनाएं भी बनाईं. जिनकी प्रेरणा से दुनियाभर में एक नए आंदोलन का जन्म हो सका.

ओवेन को एक ओर जहां सहकारिता आंदोलन का पितामह होने का गौरव प्राप्त है, वहीं शिशु पाठशालाओं को आरंभ करने का श्रेय भी उसी को जाता है. शिशु पाठशालाओं की स्थापना जैसे कल्याणकारी कदम उठाने के पीछे ओवेन की कोई व्यावसायिक महत्त्वाकांक्षा नहीं थी. इसके पीछे उसका लक्ष्य गरीब मजदूरों के बच्चों को शिक्षा से जोड़कर उन्हें बेहतर नागरिक बनाना था. यद्यपि ओवेन द्वारा प्रारंभिक वर्षों में श्रमिक कल्याण के नाम पर किए गए कार्यों के पीछे, कहीं न कहीं उसके व्यावसायिक हित छिपे थे. किंतु बाद में, विशेषकर सहकार बस्तियों की स्थापना के बाद मिली असफलता के पश्चात, वह पूरी तरह मानवतावादी हो गया था. अपने समस्त धन, कार्यक्षमता एवं ऊर्जा के साथ उसने समाजकल्याण के कार्यों में हिस्सेदारी शुरू कर दी थी. अपने प्रयासों में उसे स्थायी सफलता भले ही न मिल पाई हो, मगर सहकार की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने और उसके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में वह अपेक्षित रूप से सफल रहा था.

ओवेन के विचारों से प्रेरणा लेकर कालांतर में डा॓. विलियम किंग, फ्यूरियर, जोसेफ ब्लैंक, आदि ने सहकारिता के प्रयासों को आगे बढ़ाया. फ्यूरियर ने फ्रांस में सहकारिता आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए वही कार्य किया, जो इंग्लैंड में ओवेन द्वारा किया गया. दोनों में राबर्ट अधिक प्रयोगशील था, जबकि फ्यूरियर ने की पैठ सैद्धांतिक मामलों में अधिक थी. सहकारिता के सिद्धांत पक्ष को मजबूत करने के लिए उसने काफी कार्य किया था. डा॓. विलियम किंग ने सहकारिता के प्रचार के लिए ‘दि कोआपरेटर’ नामक समाचारपत्र निकाला और उसके माध्यम से सहकारिता और समाजवादी विचारधारा को जनजन तक पहुंचाने का कार्य किया. लगभग उसी दौर में चार्ल्स हावर्थ, विलियम हूपर, आदि लंदन के अठाइस बुनकरों ने संगठित होकर रोशडेल पायनियर्स के नाम से एक बड़ी सहकारी संस्था की स्थापना की गई. हालांकि चार्ल्स हावर्थ उससे पहले भी एक और सहकारी समिति का गठन कर चुका था. लेकिन उसका पहला प्रयोग बुरी तरह असफल रहा था. उसके कारण हावर्थ को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा था. बाद में अपनी ही गलतियों से सबक लेते हुए हावर्थ ने अपने अठाइस मजदूर साथियों के साथ एक ओर समिति की स्थापना की. जिसकी कामयाबी ने सहकारी आंदोलन की ताकत से सारे विश्व को चौंका दिया.

ओवेन ने सहकारी आंदोलन का सूत्रपात किया, किंतु आजीवन कोशिश तथा तमाम संसाधनों को झोंक देने के बाद भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी. कारण संभवतः यह रहा कि समाज के बाकी लोगों का विश्वास जिनसे वह सहकार की अपेक्षा रखता था, जिनके माध्यम से आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहता था और कदाचित जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता भी थी, उनका विश्वास जीत पाने में वह असमर्थ रहा था. उसकी मिल में काम करने वाले मजदूरों तथा सामान्यजन के मन में भी उसको लेकर किंचित संदेह की स्थिति बनी रही. दूसरी ओर मार्क्सवादी विद्वानों ने ओवेन, ब्लैंक, विलियम किंग आदि साहचर्य समाजवदियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि उनके द्वारा दिखाया गया समाजवाद का सपना सिर्फ एक कल्पनालोक था.

एक और बात जो ओवेन की सफलता के आड़े आई वह यह थी कि वह स्वयं एक उद्योगपति पहले था. अपने कारखानों में कार्यरत मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए उसने जितने भी कदम उठाए, उनसे उसके मुनाफे में कल्पनातीत वृद्धि हुई थी. इससे यह संकेत भी गया कि उसके द्वारा चलाया जाने सुधारवादी आंदोलन महज उसकी उत्पादन नीति का हिस्सा था. यह बात इससे भी सिद्ध होती थी कि ओवेन के कारखानों में अपेक्षाकृत पुरानी तकनीक पर आधारित मशीनें लगी थीं. उन्हें चलाने के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता पड़ती थी. इसके बावजूद वही कारखाने मुनाफा उगल रहे थे. अतएव ओवेन के आलोचकों को यह कहने का अवसर भी मिल गया कि ओवेन द्वारा मजदूरकल्याण के नाम पर उठाए जा रहे सभी कदम, पुरानी तकनीक से ध्यान हटाने की कोशिश हैं.

इसके साथ कहीं न कहीं यह विचार भी हवा में था कि सहकारिता आंदोलन को मुख्यतः बड़ी सहकार बस्तियों, जिन्हें फ्लेंथ्रापी कहा जाता था, के माध्यम से ही आगे बढ़ाया जा सकता है अर्थात कहीं न कहीं उस आंदोलन को समाज के संपन्न वर्ग और उसकी दयालुता के साथ जोड़ा गया था. जनसामान्य के मन में आत्मविश्वास पैदा कर उसे स्वयं अपनी स्थिति के प्रति जागरूक बनाने तथा समस्याओं के निस्तारण के लिए बिना किसी की सहायता से आगे बढ़ने का विचार उस समय तक आम नहीं हो पाया था. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अठारहवीं शताब्दी तक दुनिया के सभी देशों में सामंतवाद का बोलबाला था. राजसत्ता और राजनीति समेत अनेक स्तरों पर हुआ. सामाजिक स्तर पर वर्ग और जाति बनाकर, धर्मसत्ता निहित स्वार्थों के लिए आमजन के शोषण में लिप्त थे.

ऐसे परिवेश में सहकार को लोकप्रचलन में लाने, केंद्रीय व्यवस्था बनाने के लिए उसपर व्यावहारिक और सैद्धांतिक दोनों स्तर पर काम करने की आवश्यकता थी. इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए संत साइमन, फूरियर, विलियम किंग, लुइस ब्लैंक, प्रूधों आदि विद्वानों ने सहकारिता आंदोलन को स्थापित करने के लिए भिन्नभिन्न स्तर पर कार्य किया. उसे एक ओर जहां पुष्ट वैचारिक आधार देने का काम इन विचारको ने किया, वहीं व्यावहारिक रूप से सहकारी समितियों का गठन करके आंदोलन को आगे ले जाने की योजनाओं को भी बाखूबी अंजाम दिया गया. प्रारंभिक दौर में हालांकि सफलताएं हल्कीफुल्की रहीं, किंतु उन्हें आधार मानकर जो भूमिका गढ़ी गई, आगे चलकर उसी के आधार पर नए समाज का जन्म संभव हो सका.

इन विचारकों की महत्ता इस अर्थ में है कि उन्होंने सहकारिता का सैद्धांतिक स्वरूप स्पष्ट करने में अपनी प्रतिभा से योगदान दिया, जिससे सहकारिता को शास्त्रीय मान्यता मिलने लगी. परिणामतः उसके आलोचकों को जवाब देना आसान हुआ, साथ ही वैकल्पिक अर्थदर्शन को मजबूत आधार मिला. यद्यपि मैकाले जैसे साम्राज्यवाद के समर्थक लोग, काल्पनिक समाजवादी कहकर उनका मजाक भी उड़ाते रहे, शायद इसलिए कि विकास के प्रति साहचर्य समाजवादियों का दृष्टिकोण बहुत कुछ आदर्शवादिता का शिकार था. या इसलिए कि वह अनोखा और अधुनातन था. क्योंकि उससे पहले तक सभ्यता के आरंभ, यानी जहां तक भी उनकी निगाह जाती थी, उन्होंने शिखर पर कुछ ही लोगों को विराजमान देखा था. दुनियाभर का इतिहास किसी न किसी महानायक की या तो प्रणयगाथा है, उसका विजय अभियान या फिर पराभव की दारुण कथा. उसी को पढ़कर उनका मानस विकसित हुआ था. विकास के लिए जरूरी संसाधन आज भी उन्हीं लोगों के पास थे, इसलिए उनके लिए उनके लिए यह संभव भी न था कि एकएक अपने संस्कारों के दबाव से हटकर सोच सकें.

संभव है कि त्वरित परिवर्तनों के कारण स्थिति में बदलाव का डर भी उन्हें प्रतिकूल विचारों से दूर रखने का एक कारण रहा हो. ऐसे लोगों के लिए यह कल्पना करना बहुत ही कठिन था कि जनसाधारण जो अभी तक दूसरों की दयादृष्टि पर निर्भर रहा है, वह न केवल अपना बल्कि पूरे राष्ट्र का भाग्यविधाता भी बन सकता है. राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह राज्य के राष्ट्र में परिवर्तित होते जाने की घटना थी, जिसने आम आदमी को केंद्र में लाकर महत्त्वपूर्ण बनाने का कार्य किया था.

जो हो, उस समय परिवर्तन की डोर ऐसे समाजवादी चिंतकों के हाथ में थी, जिनकी प्रतिबद्धता किसी एक सत्ताप्रतिष्ठान या व्यक्ति विशेष के प्रति न होकर पूरे समाज के प्रति थी. व्यक्तिवादी विचारों के प्रति समाज की आग्रहशीलता ने भी इन बदलावों को आगे ले जाने में मदद की थी. ध्यान रहे कि व्यक्तिवाद के समर्थन में सबसे पहले पूंजीपति ही आगे आए थे. कहा जा सकता है कि यह विचार उन्हीं के पोषित विद्वानों द्वारा समाज में आरोपित किया गया था. क्योंकि व्यक्तिवाद प्रकारांतर में उपभोक्तावाद का ही एक रूप था, जो कि मशीनों द्वारा सघन उत्पादन के सिद्धांत के आधार पर बनाए जा रहे उत्पादों की खपत के लिए अत्यावश्यक माना गया था. यह सोचकर कि अपने समूह या समाज की और झांकते रहने वाला व्यक्ति अच्छा उपभोक्ता नहीं बन सकता, पूंजीपतियों तथा उनके पिट्ठू विद्वानों व्यक्तिवाद का गुणगान किया जाने लगा था. किंतु शिक्षा के प्रचारप्रसार के साथ, नई व्यक्तिवादी विचारचेतना ने पूंजीवाद के समक्ष ही चुनौतियां पेश कर दी थीं. अपनी विपुल नागरिक संख्या तथा उसकी संगठन क्षमता के चलते, अब वह अपनी राह अलग बनाना चाहता था.

कहना न होगा कि मध्यवर्गी चेतना को ऐसा करने का अवसर भी पूंजीवाद और उसकी समर्थक शक्तियों ने ही दिया था. एक ओर शिखर पर छा जाने की की लालसा ने उद्योगपतियों को अधिक लालची और अमानवीय बनाया था, दूसरी ओर अंधाधुध मशीनीकरण ने बेरोजगारी को बढ़ावा देकर सामाजिक असंतोष में वृद्धि कर दी थी. स्थिति उस सपने से एकदम अलग थी, जो मशीनीकरण के आगमन के समय लोगों को दिखाया गया था. विकास के सभी दावे जो औद्योगिकीकरण के साथ सरकार और पूंजीपतियों द्वारा जनता से किए गए थे, वे सभी व्यर्थ सिद्ध हो चुके थे, जिससे समाज में खदबदाहट थी.

इसी असंतोष और बढ़ती जनाकांक्षाओं को व्यक्तिस्वातंत्र्य के हिमायती विचारक सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाने का प्रयास कर रहे थे. वे अधिकांशतः कविहृदय, भावुकता और संवेदनाओं से भरे थे और एक नए समरस सौहार्दपूर्ण समाज का सपना देखते थे. यह उम्मीद करते थे कि महज सामूहिक प्रयासों से, बगैर राजसत्ता और दूसरे शक्ति केंद्रों की मदद के, एक समानताआधारित समाज के सपने को सच किया जा सकता है. जिन लोगों से वे यह उम्मीद बांधे हुए थे, वे सभी साधनविहीन विपन्न, इधरउधर बिखरे कलाकार, असंगठित मजदूर, बेरोजगार शिल्पकार, गरीब कामगार आदि थे, जिनमें से अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित थे. एक खामाख्याली भी उन लोगों को थी कि पूंजीपति और संपन्न लोग इनकी बातों में आकर अपनी समस्त संपत्ति इनके कहने पर न्योछावर कर देंगे. वे यह भी सोच बैठे थे कि अपने अतिसीमित संसाधनों, किंतु विपुल जनसंख्याबल के आधार पर बड़े पूंजीपतियों और उनके भारीभरकम कारखानों को टक्कर दे सकते हैं.

दूसरी ओर समाज के बड़े वर्ग का सोच तब भी पूरी तरह सामंतवादी और पुरातन था. औद्योगिक क्रांति एवं नए आविष्कारों का लाभ उठाकर सामंत और रजबाड़े अपनी पूंजी का निवेश नएनए कारखानों को आगे बढ़ाने में कर रहे थे, उनके पास विपुल संसाधन थे और एकजुटता भी. समाज में लोकतंत्र की बयार से घबराए वे लोग उत्पादन के नए साधनों में निवेश बढ़ा रहे थे. बदलाव का जो सपना औद्योगिकीकरण के साथ देखा गया था, वह सिर्फ अपना चोला बदल रहा था. सामंतवादी नखदंत कूटनीति के ला॓कर में छिपाए जा रहे थे. उनके स्थान पर यत्नपूर्वक डिजाइन की गई मा॓डली मुस्कान को होठों पर चस्पां किया जा रहा था. बावजूद इसके समाजवादी विचारकों का मानना था कि परिवर्तन संभव है, क्योंकि वास्तविक शक्ति जनता के हाथों में है. इस विचारधारा के पीछे मार्टिन लूथर किंग, रूसो, वाल्तेयर, आदि की प्रेरणा थी और बैंथम, जेम्स मिल, फ्यूरियर, प्रूधों आदि का योगदान, जिसने जनतांत्रिक विचारों को आगे बढ़ाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था. प्रकारांतर में इन वैचारिक आंदोलनों का सहकारिता को भी भरपूर लाभ मिला.

राबर्ट ओवेन ने सहकरिता के क्षेत्र में मौलिक प्रयोग किए. उसने अपनी मिलों में काम करने वाले कारीगरों को मानवीय वातावरण प्रदान करने की कोशिश की. मजदूर बच्चों को शिक्षा देने के लिए पाठशालाएं खुलवाईं, इसीलिए उसको सहकारिता के साथसाथ शिशु शिक्षा केंद्रों का जनक भी माना जाता है. ओवेन के प्रयासों का मजदूरों की ओर से भी स्वागत किया गया, जिससे उसका उत्पादन स्तर लगातार बढ़ता चला गया. यहां तक कि इंग्लैंड में आई भयंकर मंदी के दौर में उसकी मिलें मुनाफा उगल रही थीं. ओवेन की सफलता ने उसके आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था. उससे समाजवादी विचारकों को दोहरा लाभ मिला था. एक तो वे यह बात उदाहरण देकर समझा सकते थे कि मजदूरों को दी जाने वाली सुविधाएं अनुत्पादक नहीं हैं. वे भी एक प्रकार का निवेश हैं, जिनके आधार पर लाभानुपात को बढ़ाया जा सकता है. दूसरे सहकारी प्रयासों से, भले ही वे प्राथमिक स्तर पर किए गए थे और कालांतर में असफल भी सिद्ध हुए थे, श्रमिक वर्ग में एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हुआ था. उन्होंने अपने श्रम के मूल्य को समझा, संगठन की शक्ति को पहचाना और पाया कि उन्हीं के श्रम पर भारी मुनाफा कमाने वाला पूंजीपति वर्ग, उसका वास्तविक मूल्य देने से कतराता है. उसका राजनीतिक निकष् साम्यवाद के रूप में तथा वाणिज्यिक परिणाम सहकारिता की स्थापना का कारण बना.

इस तरह नए विचार की स्थापना के लिए जिस प्रकार के माहौल की आवश्यकता होती है, वह प्राथमिक स्तर पर ही सही, धीरेधीरे बनने लगा था. या कहें कि अनुभवों के दौर से गुजर रहा था. यही कारण है कि ओवेन को मिली असफलता के बावजूद नई सहकारी समितियां बनने का सिलसिला बंद होने या हल्का पड़ने के बजाय उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा था. ओवेन के तुरंत बाद विलियम किंग ने दो सहकारी समितियों का गठन किया था. हालांकि उसका प्रयास भी असफल रहा था. लगभग उन्हीं दिनों इंग्लैंड में टोड लेन के बेरोजगार मजदूर बढ़ती महंगाई से त्रस्त होेकर कुछ नया करने को संकल्पबद्ध हो रहे थे. उनमें कुछ सहकारिता के लिए एकदम नए थे, तो कुछ अपने अपने अनुभव का लाभ उठाकर पिछली पराजय के दाग धो डालना चाहते थे.

उनके प्रयासों की परिणति 1844 में एक कामयाब सहकारी संस्था के रूप में हुई. रोशडेल पायनियर्स को मिली सफलता से एक बात और भी साफ हो गई थी कि सहकार में सफलता तभी संभव है, जब उसकी शुरुआत वह स्वयंस्फूर्त भाव से की गई हो. ध्यान रहे कि इससे पहले के सभी प्रयास या तो ओवेन जैसे दयालु उद्यमियों की देन थे अथवा ब्लैंक, फ्यूरियर और विलियम किंग जैसे बुद्धिजीवियोंविचारकों के. रोशडेल पायनियर्स के रूप में पहली बार मजदूरकारीगर स्वयं संगठित होकर आगे आए थे. चूंकि वे सभी औद्योगिक परिवेश से परिचित थे, इसीलिए समिति को उन्होंने एक नैतिकव्यावसायिक आधार देने का प्रयास किया था. उनका प्रयास सफल रहा और वही भविष्य के सहकारिता आंदोलन के लिए दिशानिर्देशक बनकर आगे बढ़ चला.

उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सहकारिता आंदोलन को पूरे विश्व में प्राथमिकता मिलने के पीछे एक कारण सरकारों का यह डर भी था, कि बढ़ती लोकचेतना के दबाव के आगे आम नागरिकों की उपेक्षा लंबे समय तक कर पाना संभव न होगा. क्योंकि उन्हीं दिनों राजनीति पर अस्तित्ववादी एवं साम्यवादी विचारों की झलक साफ दिखने लगी थी. लेनिन, मार्क्स, फ्रैड्रिक ऐंग्लस, आल्वेयर कामू, नीत्शे, मिल आदि विद्वान एक ओर जहां व्यक्तिवादी चिंतन को विस्तार दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर वे पूर्ण समाजवादी राज्य की स्थापना के लिए मजदूरों का आवाह्न भी कर रहे थे, जिसका असर तत्कालीन वैश्विक राजनीति पर साफ दिखने लगा था. इसलिए जनाक्रोश को रोके रखने के लिए साम्राज्यवादी, सामंतवादी और राजशाही समर्थकों का झुकाव भी सहकारिता आंदोलन की ओर दिखने लगा था. क्योंकि सहकारिता ही ऐसा आंदोलन था जो उफनते जनाक्रोश को सकारात्मक दिशा देने में सक्षम था. सहकारिता न केवल लोकसामथ्र्य का उपयोग उद्यमिता के विकास हेतु करने के लिए सहकारिता बेहतरीन विकल्प थी, अपितु बदलते आर्थिक परिवेश में वह राष्ट्र को विकास की पटरी पर बनाए रखकर उसे बाकी दुनिया के साथसाथ आगे ले जाने में भी कामयाब हो सकती थी. यही कारण है कि सहकारिता को वैश्विक समर्थन मिलता चला गया. यह समाज की संगठित ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देकर उसको उपयोगी कार्य में लगाने का उद्यम भी था.

इस शृंखला में हमने अभी तक अपना अध्ययन केवल यूरोपीय विचारकों तक सीमित रखा है. ऐसा हरगिज नहीं है कि जिस उदारवादी सर्वतोन्मुखी कल्याणकारी विचारधारा का प्रतिनिधित्व पश्चिमी विचारक कर रहे थे, उसका भारत और एशियाई देशों में अभाव था. पश्चिमी देशों में फूट रही ज्ञान की उजली रोशनी के सापेक्ष हमारे यहां केवल अंधकार, वैचारिक जड़ता व्याप्त थी. यहां हमें ध्यान रखना होगा कि भारत समेत लगभग संपूर्ण दक्षिण एशिया उन दिनों ब्रिटिश उपनिवेश था और कमजोर, परंतत्र जातियां हताशा में अपने धर्म और संस्कृति की ओर झुक जाती हैं. राजनीतिक सम्मान गवां देने के बाद सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने का संघर्ष प्रारंभ हो जाता है. सभी पुरातन समाजों में एक परजीवीवर्ग भी रहा है, जिसका काम तो मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करना होता है, लेकिन वह धीरेधीरे कर्मकांड तथा दूसरे अनुष्ठानों के जरिए पूरी जीवनपद्धति पर कब्जा जमाए रहता है. धर्म और संस्कृति की रक्षा के नाम पर वह निहित स्वार्थों का ही पोषण करता है.

परतंत्रता के दौर में निराशा में डूबा समाज इसी वर्ग के पास उम्मीद की आस लेकर आता है, किंतु भ्रमों का शिकार होता है. स्वार्थ में डूबा वह परजीवी वर्ग लोगों को अतीतोन्मुखी बनाए रखता है. इससे मौलिक चिंतन की संभावना क्षीण होती चली जाती है. फिर भारत जैसे विशाल भूभाग, विविध संस्कृतियों से युक्त देश ने तो शताब्दियों लंबी गुलामी देखी थी. इसलिए यहां मध्यकाल में मौलिक चिंतन का अभाव रहा है. इस बीच स्थानीय स्तर पर जो प्रयास हुए, ज्ञान की वर्तिकाएं जलीं, विपरीत वातावरण के कारण वह उन्हें भी दुनिया तक पहुंचाने में असफल रहा. समाज का जातीय स्तर पर विभाजन भी मौलिक ज्ञान की खोज में बाधक बना. लंबे समय तक धर्मग्रंथों को रट्टा मार कर पढ़ लेना ही यहां विद्वता का प्रतीक माना जाता रहा. उसी के दम पर समाज का एक वर्ग लंबे समय यहां के बौद्धिक और सांस्कृतिक नेतृत्व को संभाले रहा. उस अवस्था में मौलिकता की खोज तथा उसको सम्मान मिल पाना असंभव ही रहा.

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में स्थानीय स्तर पर व्यापारियों और उद्यमियों के बीच ऐसे संबंध खूब बने जो आधुनिक सहकारिता के सिद्धांत के अनुरूप भले ही न हों, मगर उसकी भावना के बहुत करीब थे. क्षेत्रीय स्तर पर विशेषकर ग्रामीण समाज में, सहकारिता पर आधारित आत्मनिर्भर समूहों की उपस्थिति प्रायः हरेक युग में बनी रही. ‘कामये दुःखताप्तनाम्, प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्’ की कामना भारतीय जनसंस्कृति का प्रधान लक्षण रही है. भारतीय संस्कृति में धनार्जन को चार पुरुषार्थों में से एक तो जाना गया, परंतु भारतीय वांङ्मय में धन को वैसी महत्ता कभी नहीं मिल सकी, जो संतोष और अपरिग्रह को सहज ही उपलब्ध रही. आवश्यकता से अधिक संचय करने वाला यहां चोर माना गया है. श्रीमद्भागवत् में कहा गया है कि—

मनुष्य को केवल उतना प्राप्त करने का अधिकार है, जितने से उसका पेट भर सके, उससे अधि संचय करने वाला व्यक्ति चोर है, दंडनीय है.’

ऐसा भी नहीं है कि सुखवादी परंपरा जिसका अनुसरण करते हुए मिल, बैंथम आदि विद्वानों ने पश्चिमी जगत में वैचारिक क्रांति को जन्म दिया, उसका भारत में कोई स्थान नहीं है या भारतीय विद्वान उससे अपरिचित थे. बल्कि बैंथम से हजारों साल पहले भारत में यह परंपरा चार्वाक या लोकायत दर्शन के नाम से प्रसिद्ध थी, और जनमानस में उसका पर्याप्त प्रचारप्रसार था. किंतु यहां की परिस्थितियों में बहुत अधिक प्रचलित नहीं हो सकी. सत्ता तथा धर्म की स्वार्थी गठजोड़ ने ऐसे विचारों की हमेशा भर्त्सना की, यद्यपि आचरण में वे सभी लोकायती ही बने रहे. जो हो भौतिकवादी विचारधारा भारतीय संस्कृति का कभी सम्मानजनक हिस्सा नहीं बन सकी. चाहें तो हम यह भी कह सकते हैं कि वह कभी भी मुख्यधारा में नहीं आ सकी.

इसका कारण यह है कि भारतीय परंपरा में धर्म और दर्शन के क्षेत्र में जितना विचार हुआ, उसका एक अंश भी आर्थिक विचारों के क्षेत्र में नहीं हो सका. एकमात्र कौटिल्य के अर्थशास्त्र के सहारे इस देश को अर्थविज्ञानी सिद्ध करने के प्रयास शताब्दियों होते रहे; और किसी न किसी बहाने आज भी जारी हैं. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि आर्थिक मामलों को व्यवहार का हिस्सा मानते हुए उसको लिखकर सुरक्षित रखने से भी लोग बचते रहे हों. तो भी प्रोफेसर आर. सी. माजूमदार जैसे विद्वानों ने प्राचीन भारत में आर्थिक परिवेश का गंभीर और प्रामाणिक अध्ययन किया है. कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में व्यापारिक श्रेणियों अथवा गिल्डों का उल्लेख किया गया है, जिनको आधुनिक सहकारी समितियों के प्रारंभिक रूप कहा जा सकता है. गुप्तकाल और बाद में मुगलकाल में भी स्थानीय स्तर पर अर्थव्यवस्था की स्थिति मजबूत रही है.

डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार जैसे विद्वानों का तो मानना है कि सहयोगी संगठन बनाकर व्यावार की शुरुआत भारत में वैदिक युग में भी आरंभ हो चुकी थी. सहकारिता के प्राचीन भारतीय स्वरूप का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं—

उत्तरवैदिक युग में ही विविध शिल्पों का अनुसरण करने वाले सर्वसाधरण जनता के व्यक्ति अपने संगठन बनाकर आर्थिक उत्पादन में तत्पर हो गए थे. यह स्वाभाविक था, क्योंकि शिल्पियों के लिए पूर्णतया स्वच्छंद रूप से कार्य कर सकना संभव भी नहीं था. संगठित होकर ही वे अपने कार्य को सुचारू रूप से संपादित कर सकते थे.’

ओवेन के द्वारा बसाई की बस्तियां, सहकारी उद्यम हालांकि बहुत लंबे समय तक कामयाब नहीं रह सके, बावजूद इसके सहजीवन के उसके विचार को विश्वव्यापी सराहना मिली. आगे चलकर दुनियाभर में विचारकों और सामाजिक आंदोलनकर्मियों ने सहजीवन को विस्तार देने के लिए ऐसी ही अनेक बस्तियों की स्थापना की. भारत में देवेंद्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी, विनोबा भावे ने जगहजगह पर सहजीवन को आगे बढ़ाने के लिए आश्रमों की स्थापना की.

©ओमप्रकाश कश्यप

राबर्ट ओवेन : आधुनिक सहकारिता आंदोलन का जन्मदाता-दो

अमेरिका में सहकार बस्तियों की स्थापना

[इस आलेख के पहले हिस्से में हमने दुनिया के प्रखर समाजवादी विचारक, उद्धमी तथा सहकारिता के जनक राबर्ट ओवेन और उसके जीवनसंघर्ष को समझा. ओवेन का कार्यक्षेत्र और उसके विचारों का भी विहंगावलोकन किया. इस कड़ी में ओवेन के विचारों के साथ-साथ हम उसके द्वारा अमेरिका में सहकारिता के प्रचार-च्रसार और उसके द्वारा वहां की अर्थव्यवस्था में किए गए योगदान के बारे में चर्चा करेंगे. – ओमप्रकाश कश्यप]
न्यू लेनार्क पर ओवेन का प्रभाव घटता जा रहा था. उसके हिस्सेदार भी छोड़कर जा चुके थे. किंतु नैतिकता और सहजीवन के प्रति ओवेन का विश्वास कम नहीं हुआ था. उसकी निगाह अब यूरोप से बाहर के देशों पर लगी थी. इसी बीच ओवेन की ख्याति अमेरिका पहुंची और वहां न्यू हा॓रमनी जाने के लिए ओवेन को अमेरिका का निमंत्रण प्राप्त हुआ. ओवेन ने न्यू लेनार्क छोड़ने का फैसला कर लिया. इस फैसले के पीछे इंग्लैंडवासियों की नए प्रयोगों के प्रति उदासीनता भी थी. यूं तो सहजीवन पर आधारित बस्तियां बसाने के लिए स्का॓टलैंड, आयरलैंड आदि प्रांतों से भी प्रस्ताव आए थे, मगर ओवेन को वहां की परिस्थितियों में कोई अंतर नजर नहीं आया. 1824 में ओवेन अटलांटिक महासागर पार करके हारमनी(Harmony) पहुंचा. वहां उसका जोरदार स्वागत किया गया. 1825 में न्यू लेनार्क के प्रयोगों को आगे बढ़ाने के लिए उसने तीस हजार पाउंड में न्यू हारमानी, इंडियाना नामक स्थान पर कई एकड़ जमीन खरीदी. जहां उसने न्यू लेना॓र्क के प्रयोगों को आगे बढ़ाने के ध्येय से एक नई बस्ती की स्थापना की. कुछ ही महीनों में न्यू हा॓रमनी की ख्याति दुनिया-भर में फैल गई. वहां मिली सफलता से उत्साहित होकर ओवेन ने ओरिबिस्टन(Oribiston) नामक स्थान पर वैसी ही एक और बस्ती की आधारशिला रखी. प्रारंभिक सफलताओं से उत्साहित होकर ओवेन ने कुछ अन्य स्थानों पर भी बस्तियां बसाईं. उनके नाम हैं क्वीन वुड(Queen Wood) रैलटाइन (Ralatine) आदि. वे सभी बस्तियां सहजीवन के सिद्धांत के आधार पर बसाई गई थीं. पहले की भांति इन बस्तियों के माध्यम से भी, ओवेन का सपना शोषण एवं वर्ग-मुक्त समाज की स्थापना करना था.
वह ऐसे समाज की कल्पना करता था जहां सभी पारस्परिकता पर आधारित जीवन-यापन करें. एक बस्ती में 300 से 2000 तक सदस्य हों, जिनके पास एक हजार एकड़ से लेकर 1500 एकड़ तक कृषि-योग्य जमीन हो. बस्ती के सदस्यों के आवास को छोड़कर रसोईघर, भोजनालय, सभा भवन, स्कूल, पुस्तकालय, आटा चक्की, कारखाने आदि सामूहिक हों और इनके लिए एक समचतुर्भुज के आकार की विशाल इमारत हो. ओवेन का सोचना था कि इस प्रकार की व्यवस्था से जीवन में धन की महत्ता घटेगी—जो मनुष्य में संग्रह की आदत के पनपने का प्रमुख कारण है.
सन 1825 से 1829 तक ओवेन के सिद्धांत के आधार पर बसाई गई कुल सोलह बस्तियों में न्यू हा॓रमनी सबसे पहली और प्रसिद्ध थी. लेकिन क्षेत्रीय परिस्थितियों के कारण बस्तियों को चलाने में समस्याएं आने लगीं. दरअसल न्यू हारॅमनी जैसे छोटे से प्रांत में एक साथ अनेक वर्गों के लोग रहते थे. उन सबकी अलग समस्याएं थीं. इसलिए न्यू हारमनी का प्रयोग अधिक लंबा न खिंच सका. अमेरिका में ओवेन के प्रयोगों को पहली ठेस उस समय मिली जब उसका एक अमेरिकी साझेदार अपनी पूंजी सहित ओवेन से अलग हो गया. उल्लेखनीय है कि इन सभी कार्यों में ओवेन की ढेर सारी पूंजी लगी थी; जिससे उसका व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुआ था. उसकी कुल पूंजी का तीन-चौथाई हिस्सा न्यू हा॓रमनी नामक बस्ती की बसाने में पहले ही खर्च हो चुका था.
ओवेन का मानना था कि सहजीवन पर आधारित व्यवस्था की सफलता उसके प्रयासों की व्यापकता में ही संभव है. अकेले व्यक्ति की सीमाएं होती हैं. अतः ऐसे प्रयासों की सफलता के लिए समाज के दूसरे लोगों को भी आगे आना होगा. सरकार भी तो सबसे अधिक जिम्मेदारी है ही. यही सोचते हुए उसने सरकार से भी मदद मांगी थी. मामला संसद-पटल पर भी रखा गया. मगर अव्यावहारिक मानते हुए उस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया.
ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों की खासियत थी कि वहां का जीवन सामूहिक एवं सहयोग पर आधारित था. पूरी बस्ती एक बृहद परिवार के समान थी; जिसके सदस्यों के सुख और दुख साझे थे. महत्त्वाकांक्षाओं में बराबरी थी. यहां तक कि उनके सपनों और संकल्पों पर भी सामूहिकता का प्रभाव था. ओवेन की स्पष्ट धारणा थी कि आदर्शोंन्मुखी समाज में सामाजिक संबंधों का आधार लाभ के स्थान पर सेवा होना चाहिए. वहां के कार्य व्यापार में पारदर्शिता एवं समसहभागिता हो, तभी शोषण से मुक्ति संभव है. ओवेन उन बस्तियों को सहजीवन के आदर्श के रूप में स्थापित करना चाहता था. ओवेन समर्थक समाजवादियों के समूह गान में सहजीवन के आदर्शों की झलक सहज ही देखी जा सकती है. यह गीत ओवेन द्वारा स्थापित बस्तियों में बड़े ही मनोयोग से गाया जाता था—
‘भाइयो उठो! अतुलनीय प्रेम से सराबोर और परमसत्य से आभासित दिन के दर्शन करो. उठकर देखो, मनुष्यता प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सामुदायिक जीवन का आनंद और आशीर्वाद लेने के लिए उत्सुक है. अब न्याय की जीत होगी. ताकतवर के दमन का अंत होगा, सार्वत्रिक आनंद ही आनंद होगा.’
बीस वर्ष तक लगातार वह सामूहिक जीवन की सफलता के लिए काम करता रहा. मगर धीरे-धीरे असफलता साफ नजर आने लगी, कारण कि इन बस्तियों में बसने पहुंचे लोगों में अधिकांश लोग ऐसे थे जिन्हें ओवेन के सिद्धांतों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उनसे बहुत तो अपराधी मनोवृत्ति के थे और सुरक्षित ठिकाने की खोज उन्हें उन बस्तियों तक ले गई थी. नाकारा और कामचोर किस्म के लोगों को सिर छिपाने के लिए ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियां बहुत अनुकूल थीं.
दूसरी समस्या वहां पर समर्पित कार्यकर्ताओं की थी. उन बस्तियों के कुशल संचालन के लिए जिस प्रकार के स्वयं सेवकों की आवश्यकता थी, उनका वहां सरासर अभाव थे. हालांकि बस्तियों में आने वाले कुछ लोग सचमुच ही ओवेन के विचारों को समर्पित होकर वहां पहुंचे थे. मगर अधिकांश केवल शौकिया, वक्त बिताने के लिए वहां चले आते थे. न्यू हारमनी के कुछ सदस्य लोकतांत्रिक परंपरा से निकलकर आए थे, और व्यवस्था में खुलापन लाना चाहते थे. उन्हें ओवेन का एकाधिकार स्वीकार नहीं था. ध्यातव्य है कि उन बस्तियों में ओवेन की स्थिति परिवार के उस वुजुर्ग के समान थी, जिसे परिवार के बाकी सदस्य उपेक्षित करने लगते हैं. परिणाम यह हुआ कि ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों में समस्याएं आने लगीं. जा॓न कर्ल के शब्दों में—
‘बस्ती (न्यू हा॓रमनी) का गठन उसके सदस्यों के उतावलेपन के साथ हुआ था. इसके कारण एक तरह से वे अपने पतन की घोषणा कर ही चुके थे. शायद उनका आपस में मिलना ही दुर्भाग्यपूर्ण था. वास्तव में सहकारिता के आधर पर गठित वह समूह उसकी भावना से कोसों दूर था. नौ सौ से अधिक लोगों के उस समूह का सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यही था कि सहजीवन की शुरुआत करने से वे एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे. उनमें जगह-जगह से, विभिन्न पेशों, परिवेश से आए तरह-तरह के लोग सम्मिलित थे, जिनमें कामकाजी परिवार, मध्यवर्गी बुद्धिजीवी तथा स्वयं को प्रगतिशील कहने वाले घुम्मकड़ किस्म के बुद्धिजीवी आदि सम्मिलित थे. सामूहिक बस्तियों का गठन भारी अनुभवहीनता का शिकार था. जिसका परिणाम उनमें लड़ाई-झगड़े और कलहबाजी के रूप में देखने को मिला. विभिन्न पृष्ठभूमियों, जातियों से संबद्ध लोगों ने आपस में लड़-झगड़कर अपने लिए दूसरों के मन में वैमनस्य की भावना भर दी थी, जिसका निदान असंभव था. उनके आपसी मनमुटाव इतने बढ़ चुके थे कि अंत में जब सामूहिक बस्तियों का प्रयोग असफल होने की घोषणा हुई और लोग वापस लौटने लगे, तो भी उनके पारस्परिक झगड़े लंबे समय तक चलते रहे. अंततः जमीन का बंटवारा कर, न्यू हा॓रमनी के निवासी अनेक सहकार बस्तियों, परिवारों में बंट गए.’
न्यू हा॓रमनी का प्रयोग असफल होने के पश्चात ओवेन ने मैक्सिको में नए सिरे से फिर कोशिश की. वहां गरीबी अनुपात अधिक होने के कारण उसको सफलता की आस अधिक थी. लेकिन आशा के विपरीत मैक्सिको में उसका सामना परंपरावादी चर्च से हुआ, जिसका वहां की गरीब जनता पर अत्यधिक प्रभाव था. परिणाम यह हुआ कि ओवेन अमेरिका से ऊबने लगा. सन 1828 में वह वापस इंग्लैंड के लिए रवाना हो गया. लेकिन तब तक इंग्लैंड की परिस्थितियां भी बदल चुकी थीं. समाजवादी विचारधारा तेजी से अपनी पकड़ बना रही थी. विलियम थामसन जैसे बुद्धिजीवी लोकतांत्रिक समाजवाद की नई व्याख्याएं गढ़ रहे थे.
सहकारिता पर नए प्रयोगों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था. मजदूरों के संगठन बनने लगे थे. समाजवादी विचाधारा को आधार मानकर नए-नए उभरे चार्टिस्ट आंदोलनकारी संघर्ष के रास्ते सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने का मन बना चुके थे. उन्होंने एक के बाद एक तीन बड़ी हड़तालें करके सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी थीं. जिससे उन्हें लग रहा था कि वे शीघ्र ही सत्ता पर सवार होकर बहुत आसानी से बदलाव के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे. ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों का लगातार अवसान हो रहा था.
ध्यातव्य है कि ओवेन द्वारा आदर्शोन्मुखी समाज की यह संकल्पना नई या अनोखी नहीं थी. ना ही वैसा सपना देखने वाला वह अकेला बुद्धिजीवी-विचारक था. बल्कि इस तरह की आदर्शोन्मुखी समाज की संकल्पना उससे करीब साढ़े बाइस सौ वर्ष पहले प्लेटो भी कर चुका था. जा॓न का॓ल्विन, था॓मस मूर, रूसो आदि ने भी आदर्श समाज को लेकर कुछ इसी प्रकार की साधु-संकल्पनाएं की थीं. ओवेन यदि अपने पूर्ववर्ती विचारकों से हटकर और बढ़कर था तो इस कारण कि वह कोरा सिद्धांतकार नहीं था, बल्कि विचारों को मूर्त रूप देने वाला सच्चा एवं संकल्पधर्मी इंसान था. इस तरह कुछ मामलों में वह मौलिक भी था. उसने न केवल वर्गहीन और समानता पर आधारित समाज का सपना देखा, साथ ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने अनेक सफल प्रयोग भी किए थे. यह बात अलग है कि सुधार कार्यक्रमों में उसे जो कामयाबी प्रारंभ में मिली, वह बाद में लगातार घटती चली गई. क्योंकि जिस समाज का सपना ओवेन की आंखों में बस्ता था, तत्कालीन परिस्थितियां उसके विपरीत थीं. बावजूद इसके ओवेन की सफलताओं को नजरंदाज कर पाना मुश्किल है.
ओवेन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का विरोधी था. ओवेन के प्रयोग की खिल्ली उड़ाई गई. उसे अर्धविक्षिप्त और सनकी कहकर उपहास का पात्र बनाया गया. ओवेन को हालांकि समाजवाद का समर्थक माना जाता है. यह भी माना जाता है कि समाजवादी(Socialist) शब्द का पहला प्रयोग उसी ने किया था. वह कुशल लेखक था, अपने विचारों को जनमानस तक पहुंचाने के लिए उसने Cooperative Magazine शीर्षक से एक पत्रिका भी निकाली. लेकिन मार्क्सवादी विचारक ओवेन के सारे अभियान को संदेह की दृष्टि से देखते हैं. स्वयं फ्रैड्रिक ऐंग्लस ने ओवेन की नीयत पर संदेह करते हुए उसे एक तरह से छद्म समाजवादी स्वीकार किया है. ऐंग्लस के अनुसार—
‘मजदूरों के प्रति ओवेन का प्यार ऊपरी यानी केवल दिखावा था, जो मानवीय संवेदनाओं से कोसों दूर था.
प्रमाण के लिए ऎंग्लस ने एक ओवेन की एक उक्ति का उल्लेख अपने लेख में किया है, जिससे ओवेन का दंभ झलकता है.
‘लोग मेरी दया पर जीनेवाले, मेरे दास हैं.’
ओवेन ने बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक, कहा जाए कि व्यावसायिक कुशलता का परिचय देते हुए मजदूरों को कुछ सुविधाएं दी थीं. उसे बदले में जो प्राप्ति हुई, वह किए गए खर्च से कई गुना थी. इस बात को ओवेन के साहित्य से ही उदाहरण लेकर फैड्रिक ऐंग्लस समझाते हैं कि—
‘ओवेन की फैक्ट्रियों में काम करनेवाले मात्र ढाई हजार मजदूर इतना मुनाफा कमाकर दे रहे थे कि जिसे कमाने के लिए आधी शताब्दी से भी कम समय पहले, लगभग छह लाख मजदूरों-दक्ष कामगारों की आवश्यकता पड़ती थी. पूंजी के इस ठहराव पर मैंने एक दिन स्वयं से ही प्रश्न कि, विकास की विडंबना देखिए कि जो धन पहले छह लाख लोगों में बंटता था, वह अब केवल केवल ढाई हजार में बांटना पड़ता है.’
इससे यह भी लगता है कि ओवेन सबसे पहले एक उद्यमी था, कूटनीतिक उद्यमी, जो येन-केन-प्रकारेण अपना ही हित देखता है. उसने जो व्यवस्था न्यू लैनार्क तथा आगे चलकर न्यू हारमनी जैसी बस्तियों के रूप में की उसका अंतिम उद्देश्य मालिकों को लाभ पहुंचाना था. फ्रैड्रिक ऐंग्लस इसे व्यावहारिक साम्यवाद की संज्ञा देता है. यही कारण था जिससे ओवेन अपने साझीदारों पर साथ में बने रहने के लिए कोई नैतिक दबाव नहीं डाल सका. न्यू हा॓रमनी की असफलता का प्रमुख कारण व्यक्तिगत अस्मिताबोध तथा निजी संपत्ति का अभाव था. जोसीह वारेन (Josiah Warren), जो न्यू हा॓रमनी में एक सदस्य के रूप में रह चुका था, उसके असफल होने पर लिखता है किः
‘वहां एक छोटे-से स्थान पर पूरी दुनिया बसी थी….मगर ऐसा लगता है कि प्रकृति का भी अपना एक कानून है जो हमें एक दूसरे से भिन्न बने रहने को उकसाती है, उसी ने हम पर जीत हासिल कर ली थी. हमारे हमारे संगठित हित, सदस्यों के अलग-अलग व्यक्तित्व, परिस्थितियों एवं सदस्यों की निजी अस्मिताबोध कायम रखने की स्वाभाविक इच्छा के सीधे निशाने पर थे.’
न्यू हारमनी से इंग्लेंड लौटने के बाद ओवेन नए सिरे से अपनी योजनाओं को साकार करने में जुट गया. सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन की चाह में वह नए-नए प्रयास करता रहा. न्यू हाॅरमनी में मिली अप्रत्याशित नाकामी ने ओवेन को अपनी विचारधारा और अब तक के कार्यकलापों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य भी किया था. अब वह सच्चे मायनों में समाजवाद के सिद्धांत को जीवन और समाज में स्थापित करना चाहता था. इसी दिशा में अपने प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए ओवेन ने 1832 में श्रम सुधार के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय साम्यिक श्रम विनियम(National Equilable Labour Exchange) की स्थापना की थी. इसके मूल में ओवेन की मान्यता थी कि वस्तुओं के विनिमय की दर उनके निर्माण में लगे श्रम के अनुपात में होनी चाहिए. लाभ को वह चोरी के समान मानता था, उसका मानना था कि मुद्रा-विनिमय के माध्यम से लाभ की इच्छा पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं है. नई व्यवस्था में वस्तुओं का विनिमय, उनके निर्माण में लगे श्रम के आधार पर करने का सुझाव दिया गया था. उस व्यवस्था का उद्देश्य उत्पादक और उपभोक्ता के बीच से बिचैलियों की संभावना को कम करना था.
राष्ट्रीय साम्यिक श्रम विनियम की शुरुआत लंदन में हुई थी. इसके प्रारंभ में ही 840 सदस्य थे. प्रारंभिक दौर में ओवेन को उत्साहजनक सफलता मिली; जिससे उसकी शाखाएं जगह-जगह खुलने लगी. इसके सदस्य स्वनिर्मित वस्तुओं को लाते थे. उनके निर्माण में लगे श्रम के अनुसार उन्हें लिखित श्रम मुद्रा(Labour note) प्राप्त होती थी. इस मुद्रा के आधार पर वे उन वस्तुओं को खरीद सकते थे, जिनके निर्माण में उन श्रम मुद्राओं के बराबर मूल्य का श्रम लगा हो.
सहकारिता के क्षेत्र में यह पहला महान प्रयोग था. यह बात अलग है कि कुछेक कमियों के ओवेन का यह प्रयोग भी बहुत सफल न हो सका. इसका एक कारण सदस्यों में सहकार-भावना का अभाव भी था. दूसरे लाभार्जन से अधिक लाभार्जन की मनोवृत्ति हानिकारक सिद्ध हुई. ओवेन ने अपनी संस्था में लाभार्जन पर अंकुश लगाने का प्रयास तो किया था; किंतु लाभ कमाने की मनोवृत्ति को बदलने में वह नाकामयाब ही रहा था. संभवतः वह लोगों की चारित्रिक दुर्बलताओं से पूरी तरह परिचित नहीं था और शेष दुनिया को अपनी ही तरह भला और दयावान समझता था. यह भी देखा गया था कि लाभ कमाने के लालच में सदस्यगण फालतू सामान उठा लाते; उसमें लगे श्रम को बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे. साथ ही कुछ ऐसी भी चीजें बिकने को आ जाती थीं, जिनका कोई खरीदार ही होता था.
दूसरी ओर महत्त्वपूर्ण और उपयोगी वस्तुओं पर बाहरी व्यापारियों की नजर लगी रहती थी. दरअसल व्यापारीवर्ग प्रारंभ से ही ओवेन का दुश्मन बना था. वह चाहता ही नहीं था कि ओवेन के बहाने से सहकारिता के प्रयोगों को कामयाबी मिले. इसलिए व्यापारी संस्था के सदस्यों के माध्यम से उपयोगी वस्तुओं को ऊंची बोली पर खरीद लेते थे. परिणामतः संस्था के भंडारों में अनावश्यक चीजों की भरमार होने लगी. काम की वस्तुएं उपलब्ध न होने के कारण जरूरतमंद लोगों के भीतर आक्रोश उमड़ना स्वाभाविक ही था; अतः धीरे-धीरे असंतोष पनपने लगा. यहां तक कि विनिमय केंद्रों पर तोड़-फोड़ एवं लूटमार की घटनाएं भी हुईं; जिससे उस संस्था को अंततः समाप्त कर देना पड़ा.
ओवेन को विश्वास था कि पूंजीवाद का मुकाबला संगठित मजदूर आंदोलनों के माध्यम से किया जा सकता है. इसलिए वह शुरू से ही श्रमिकों के कल्याण के प्रति समर्पित रहा था. मजदूर आंदोलन को गतिशीलता प्रदान करने के लिए ओवेन ने ‘राष्ट्रीय समेकित मजदूर महासभा’ (The Grand National Consolidated Trade Union) का गठन किया. बाकी प्रयासों के समान ओवेन को उसमें भी प्रारंभिक सफलता तो मिली. मगर तब तक वह अपने अनेक आलोचक एवं विरोधी पैदा कर चुका था. वे सभी उसको असफल देखना चाहते थे. अपने इस संगठन को चलाने के लिए ओवेन ने सरकारी मदद भी मांगी; किंतु पूंजीपतियों के दबाव के कारण सरकार चुप्पी साधे रही.
ओवेन को लग रहा था कि लोगों में सहजीवन के प्रति चेतना का अभाव भी उसके प्रयोगों की असफलता का कारण है. इसलिए 1840 में उसके मन में अपने सहजीवन को लेकर अपनी मान्यताओं को शिक्षा के माध्यम से प्रचारित करने का निर्णय लिया. उस समय वह हैंपशायर की यात्रा पर था. अपने प्रयोगों को मूर्त रूप देने के लिए उसके पास पर्याप्त पूंजी का अभाव था. अतः उसने अपने पूंजीपति मित्रों से पूंजी का प्रबंध करके सहकार बस्ती की स्थापना की. उस प्रयास में भी ओवेन को पर्याप्त सफलता नहीं मिल पाई. लगभग पांच सौ सदस्यों की क्षमता वाली बस्ती के सदस्यों की संख्या कभी भी सौ का आंकड़ा पार नहीं कर सकी. 1841 में सामुदायिक जीवन के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए उसने ‘नार्मल स्कूल’ की स्थापना की, जिसमें सहजीवन के बारे में विशेष अध्ययन की व्यवस्था की गई थी. इन प्रयासों के दौरान उसका बहुत-सा धन खर्च हो चुका था. ओवेन को सरकार और मित्रों से सहयोग की आस थी. किंतु इस बार कोई मदद के लिए आगे नहीं आया. तब तक ओवेन की आयु भी काफी हो चुकी थी और वह बहुत अधिक श्रम करने की स्थिति में भी नहीं था. ओवेन के अन्य प्रयासों की भांति अंततः ‘राष्ट्रीय समेकित मजदूर महासभा’ भी बिखराव का शिकार होकर रह गई.
अपने प्रयोगों के अंतिम चरण के रूप में ओवेन ने स्वयं भी एक समिति का गठन किया था. डेविड रिकार्डों, जो अपने समय का प्रसिद्ध अर्थशास्त्री था, वह भी ओवेन द्वारा गठित की गई समिति का सदस्य था. समिति के माध्यम से वह कल्याणकारी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना चाहता था, परंतु तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी. ओवेन द्वारा बनाई गई समिति बहुत कारगर तो नहीं हो सकी, परंतु उसने उसको सहकारिता के जनक के रूप में स्थापित अवश्य कर दिया.
ओवेन के प्रयासों को असफलता के लिए उसे दोष देने से पहले हमें याद रखना चाहिए कि ओवेन ने सारे कदम अंतःप्रेरणा के आधार पर उठाए थे और द्धवह उन विचारों को आंदोलन का रूप देना चाह रहा था; जो उससे पहले केवल पुस्तकों तक सीमित थे. उसकी असफलताएं अनुभव के दौर में जन्मीं, और वे कदाचित परिस्थितिजन्य भी थीं. एक तो यह कि उस समय तक लोगों में सामूहिक जीवन के प्रति चेतना का अभाव था. दूसरे ओवेन के विरोधी उसकी योजनाओं को असफल बनाने के लिए लगातार प्रयत्नरत थे. तीसरी और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि सामाजिक परिवर्तनों की गति उतनी तीव्र नहीं होती. आज से डेढ़ सौ वर्ष पहले कम से कम उतनी तीव्र तो बिलकुल नहीं थी; जितनी कि ओवेन चाहता था अथवा जैसी कोशिशें वह कर रहा था. इसके बावजूद ओवेन के विचारों को कामयाबी मिली थी. वैसे भी किसी भी परिवर्तन को परंपराओं से संघर्ष करते हुए समय की सुदीर्घ कसौटी पर अपनी प्रासंगिकता दर्शानी पड़ती है. कुछ ही समयांतराल के पश्चात ओवेन के विचारों की सार्थकता सामने आने लगी थी. इजरायल के किबुट्स(Kibutze) नामक स्थान पर ओवेन का सपना खूब फलीभूत हुआ. रूस में टा॓लसटाय, भारत में महात्मा गांधी और विनोबा भावे ने भी सामूहिक जीवन को सामाजिक परिवर्तन के एक अनिवार्य उपक्रम की तरह इस्तेमाल किया. गांधी तो भारत के अलावा दक्षिण में भी अपने प्रयोगों को कामयाबी के साथ आजमा चुके थे.
ओवेन को अपेक्षित कामयाबी अपने प्रयासों में नहीं मिली थी. इसके बावजूद उसकी ख्याति दुनिया-भर में फैली थी. उदारचेता और परिवर्तन के पक्षधर लोग अपनी-अपनी तरह से ओवेन के विचारों को आगे ले जाने में लगे थे. एक उद्यमी होने के बावजूद उसकी पहचान एक विचारक और दूरदृष्टा समाजकर्मी के रूप में बन चुकी थी. एक अच्छा पत्राकार होने के साथ-साथ वह बेहतर लेखक भी था. ओवेन की प्रेरणा से ही वार्षिक सहकारी अधिवेशन की शुरुआत हुई; जो 1831 से 1835 तक हर वर्ष होता रहा. उसके कारण सहकारिता के विचार को व्यापक प्रसिद्धि मिली. आने वाले वर्षों में पूरी दुनिया पर छा जाने वाले शब्द Socialism का सर्वप्रथम प्रयोग भी ओवेन द्वारा Association of all Classes of all Nations की बैठक के दौरान किया गया.
ओवेन की प्रेरणा से ही सहकारिता के क्षेत्र में सबसे ठोस काम सन 1930 में हुआ, जब विलियम कूपर और उसके सहयोगियों द्वारा पहली सहकारी समिति रोशडेल फ्रैंडली को-आ॓परेटिव सोसाइटी (Rochdale Friendly Co-operative Society) का गठन किया गया. इस समिति को उपभोक्ता भंडारों की शुरुआत करने का श्रेय भी जाता है. समिति के अधिकांश सदस्य श्रमिक थे. रोशडेल फ्रैंडली का॓आपरेटिव सोसायटी के आधार सिद्धांत, यद्यपि ओवेन के विचारों तथा उसके द्वारा गठित की गई समितियों के सिद्धांतों से भिन्न थे और वे सांगठनिकता को स्थायित्व देने के लिए अपनाए गए थे. परंतु उनसे सहकार को विश्वव्यापी ख्याति मिली.
ओवेन आजीवन नास्तिक रहा. परंतु जीवन के अंतिम वर्षों में किसी अज्ञात प्रेरणा से उसका झुकाव अध्यात्म के प्रति हो गया था. आजीवन कर्मशील रहे ओवेन ने 87 वर्ष का सार्थक और संघर्षमय जीवन जिया. प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत के अगले ही वर्ष अर्थात 17 नवंबर 1858 को, उसी कस्बे में जहां उसका जन्म हुआ था, इस उदार हृदय, ईमानदार, सज्जन कर्मयोगी, महामना, दूरदृष्टा और कामयाब उद्यमी ने अततः मौत का वरण किया. ओवेन को अपने समाज के उपेक्षितों, पीड़ितों के कल्याण की चिंता सदैव सताती रही. एक गरीब परिवार से होने के बावजूद वह कामयाब उद्यमी बना और अंत तक अपने समाज के उत्थान के लिए प्रयास करता रहा. यहां तक कि लंबे, कठिन परिश्रम से कमाई गई पूंजी भी जनकल्याण के हित में बलिदान कर दी.
ओवेन की दृढ़ मान्यता थी कि समाज में आमूल परिवर्तन के लिए स्थितियों में बदलाव अत्यावश्यक है. उसी से माध्यम से मनुष्य के स्वभाव में अपेक्षित परिवर्तन किया जा सकता है. जीड तथा रिस्ट ने ओवेन का उल्लेख करते हुए लिखा है—
‘उनका यह सिद्धांत कि सामाजिक व्यवस्था को बदलकर, व्यक्ति को बदला जा सकता है, अर्थशास्त्र में वही महत्त्व रखता है जो लेमार्क का सिद्धांत जीवविज्ञान के क्षेत्र में रखता है.’
एक कर्मठ व्यक्ति की भांति ओवेन अपनी आंतरिक प्रेरणा के आधार पर सतत प्रयास करता रहा. उसे प्रशंसा और सराहना दोनों ही मिली, लेकिन पूरी जिंदगी वह अपनी असफलताओं से जूझता रहा. ओवेन के योगदान की चर्चा इसलिए भी आवश्यक है कि उसने अकेले दम पर सामाजिक परिवर्तन के लिए लगातार प्रयोग किए और उनके लिए अपने समस्त संसाधनों को दाव पर लगा दिया. अपने मौलिक प्रयोगों के बावजूद, ओवेन की कई मोर्चों पर लगातार पराजय यह भी दर्शाती है कि अपने कर्म एवं सोच के आधार पर अपने समय से कई दशक आगे था.

वैचारिकी

किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कार्यों से होती है. फिर ओवेन जैसे उद्यमी और मानवतावादी इंसान की परख करने के लिए उसके कार्यों से अधिक प्रामाणिक और भला हो भी क्या सकता है! उसका पूरा जीवन एक कर्मयोगी के जीवन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. वह औद्योगिक क्रांति का दौर था, जब ओवेन का जन्म हुआ. उसके जन्म से कुछ दशक पहले ही जेम्स वाट ने भाप की शक्ति को पहचानकर भाप के इंजन का आविष्कार किया था. उधर जल-ऊर्जा को उद्यमशीलता से जोड़ते हुए रिचर्ड आर्कराइट(Richard Arkwright) के जलीय संयंत्र ने उत्पादन जगत में क्रांति का सूत्रपात किया था. रिचर्ड आर्कराइट उस समय के प्रतिष्ठित उद्यमी थे. न्यू लेनार्क की स्थापना करने वालों में उनका नाम सर्वोपरि था. जलऊर्जा के उपयोग के कारण उनका कारखाना न्यू लेना॓र्क के चार सबसे बड़े कारखानों में गिना जाता था.
तेज गति से चलने वाली मशीनों ने कपड़ा उद्योग को घरों से छीनकर फैक्ट्रियों के हवाले कर दिया था, जिससे नदी किनारे बसे कस्बे जहां पानी की बहुतायत थी, कपड़ा उद्योग के बड़े केंद्रों में बदलते जा रहे थे. दूसरी ओर गांवों में उद्योग घटने से बेरोजगारी अनुपात बढ़ा था. इसीलिए मेहनत करके अपने हुनर की कमाई खानेवाले ग्रामीण कामगार, बेमिसाल कारीगर कारखानों में मजदूरी करने को विवश हो गए थे. जनसंख्या का शहरी क्षेत्रों की ओर तेजी से पलायन हुआ था. खासकर ऐसे स्थानों पर जहां कपड़ा उद्योग तेजी से पनपा था. इस तथ्य को केवल एक उदाहरण के माध्यम से बहुत आसानी से समझा जा सकता है—
‘मेनचेस्टर में जिसकी जनसंख्या ओवेन के जन्म के समय केवल पचीस हजार थी, वह अगले पचास वर्षों में एक हजार प्रतिशत की वृद्धि के साथ लगभग ढाई लाख हो चुकी थी. फैक्ट्रियों में मजदूरों की मांग एकसमान नहीं थी. उत्तरी इंग्लैंड का इलाका अपने विरल जनसंख्या अनुपात के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध कराने में असमर्थ था. इसलिए इंग्लैंड के, विशेष रूप से दक्षिणी क्षेत्र प्रांतों और लंदन के ठेकेदार करों का दबाव घटाने के लिए बाल मजदूरों को फैक्ट्री ले आते थे. उन बच्चों को बहुत मामूली वेतन पर प्रशिक्षु के रूप में रखा जाता. केवल सात साल की उम्र से उन्हें काम पर झोंक दिया जाता. उन्हें फैक्ट्री के दरवाजे के बाहर उन्हीं के लिए विशेषरूप से बनाए गए कमरों(Prentice Houses) में रहना पड़ता था. यही नहीं आधे घंटे के विश्राम सहित उन्हें प्रातः पांच बजे से सायं आठ बजे तक, लगभग पंद्रह घंटों तक बना रुके काम करना पड़ता था.’
ऐसे ही वातावरण में ओवेन का जन्म और विकास हुआ. उसने गरीबी और लंबे संघर्ष का सामना किया था. युवावस्था में ओवेन को बैंथम और जा॓न स्टुअर्ट मिल (1806-1873) के उपयोगितावाद के सिद्धांत से भी प्रेरणा मिली थी. मनुष्य के जीवन के लक्ष्य की ओर इंगित करते हुए मिल ने स्पष्ट लिखा था कि मानव जीवन का व्यक्तिगत तथा सामाजिक लक्ष्य परमानंद की प्राप्ति है. इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु वह जो भी कार्य करता है—वह पूर्णतः नैतिक है. सामाजिक स्तर पर जिस कार्य से अधिकतम व्यक्तियों को अधिकतम आनंद की प्राप्ति हो, वही आदर्श है. ध्यातव्य है कि मिल अपने पिता जेम्स मिल तथा बैंथम से प्रभावित अवश्य था, परंतु उसकी सुख की अवधारणा उन दोनों से भिन्न थी. मिल की सुख की संकल्पना में ऐंद्रिक सुख का स्थान गौण है. उसके अनुसार सुख एक मानसिक अवस्था है. यह इंद्रियजन्य सुख के बजाए शांति, संतोष एवं बौद्धिकता के तालमेल से युक्त ऐसी उन्नत अवस्था है, जो केवल स्वार्थ के त्याग और सेवा से ही प्राप्त हो सकती है. समाज में न्याय की स्थापना, शिक्षा, समानता एवं संस्कृति कुछ ऐसे कारक हैं जो मनुष्य को आनंद की ओर ले जाने में सक्षम होते हैं. मिल ने ईसाई धर्म की यह कहकर आलोचना की थी कि—
‘उसके आदर्श निषेधात्मक हैं, विधायक(Positive) नहीं है. यह हमें बुराई से बचने की शिक्षा तो देता है, अच्छाई प्राप्त करना नहीं सिखाता.’
ओवेन का जन्म हालांकि निर्धन परिवार में हुआ था, किंतु अपनी प्रतिभा एवं उद्यमशीलता के बल पर वह अपनी युवावस्था में ही उस अवस्था तक पहुंच चुका था, जहां तक पहुंचना किसी के लिए भी सपना होता है. उसके पास भौतिक सुख-सुविधाओं की कमी नहीं थी. उसकी मिलें मेनचेस्टर की सबसे बड़ी मिलों में से थी. ब्रिटेन के सर्वाधिक चर्चित व्यक्तियों में उसकी गिनती होती थी. तो भी वह आत्मिक सुख के लिए निरंतर प्रयास करता रहा. ईसाई धर्म में आस्था के बगैर, वह उसके सेवा और लगन के सिद्धांत को अपने जीवन का लक्ष्य माने रहा. इसके लिए उसने अपने संसाधनों को जनकल्याण के कार्य में झोंक दिया. इस कारण उसके साथी और साझीदार भी उससे छिटककर दूर होते रहे. कठिन मेहनत से कमाई गई उसकी पूंजी धीरे-धीरे चुकती चली गई.
जीवन के अंतिम वर्षों में ओवेन के व्यवहार में यद्यपि आध्यात्मिकता अपना प्रभाव डाल चुकी थी. तथापि यह एक हताश-निराश व्यक्ति का विधाता के आगे समर्पण जैसा नहीं था, ना ही हारे हुए योद्धा का आत्मसमर्पण, बल्कि वर्षों लंबी संघर्षशील, त्यागमयी, सतत यात्रा के पश्चात एक श्रांत-क्लांत यायावर का नीड़ के नीचे आश्रय लेने जैसा था; जो चुनौती भरे अंदाज में कह सकता था कि अपने हाथों से उसने सिर्फ दिया है. समाज से जो लिया उससे कहीं अधिक उसको लौटाया भी है. लंबे संघर्ष और समर्पण के बावजूद ओवेन को स्थायी सफलता तो हासिल नहीं हुई, मगर इसमें ओवेन से ज्यादा दोष उस समय के सामंती संस्कारों से युक्त समाज को भी है; जिसका बहुत बड़ा हिस्सा अशिक्षा से प्रेरित था. तो भी साहचर्य के जिस विचार को मान्यता दिलाने के लिए राबर्ट ओवेन ने आजीवन समर्पण भाव से काम किया, सहकारिता की नींव रखी उसके लिए विचार जगत में उसका नाम चिरस्मरणीय बना रहेगा.
ओवेन न केवल कुशल व्यावसायी, स्वप्नदृष्टा, विचारक और कर्मठ इंसान था, बल्कि सिद्धहस्त लेखक भी था. ‘सोसिलिस्ट’(Socialist) शब्द पहली बार ओवेन की पत्रिका ‘कोआ॓परेटिव मैगजीन’ में प्रकाशित हुआ, यद्यपि उन दिनों इसका अभिप्राय उन लोगों से था जो ओवेन की विचारधारा के समर्थक थे. लगातार लेखन करते हुए ओवेन ने कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की थी; जिनमें से प्रमुख हैं—
1. ए न्यू व्यू आ॓न सोसाइटी: एस्से आन फा॓रमेशन आ॓फ ह्यूमेन करेक्टर-1813.
2. आ॓बजरवेशन आन दि इफेक्ट आ॓फ दि मैन्यूफैक्चरिंग सिस्टम-1815.
3. रिपोर्ट टू दि काउंटी आ॓फ लेनार्क आफ ए प्लान फा॓र रिलीविंग पब्लिक डिस्ट्रेस-1821.
4. एन एड्रेस टू आ॓ल क्लासिस इन दि स्टेट-1832.
5. दि बुक आफ दि न्यू मा॓रेल वर्ल्ड-1848.
6. दि रिवोल्यूशन इन दि माइंड एंड प्रैक्टिश आ॓फ दि ह्यूमेन रेस-1849. ओवेन की मान्यता थी कि केवल स्पर्धा से वास्तविक विकास संभव नहीं है. क्योंकि स्पर्धा द्वारा मस्तिष्क में निषेधात्मक मूल्यों का संचार होता है, जो जीवन में अनावश्यक तनाव को जन्म देती है. तनाव प्रकारांतर में उत्पादकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है. इसलिए स्पर्धा के स्थान पर सहअस्तित्व और पारस्परिक सहयोग को महत्त्व दिया जाना जरूरी है. वह मानव-चरित्र की पवित्रता को बहुत महत्त्व देता था. पवित्रता न केवल विचारों की, बल्कि आचरण की भी. उसका पूरा जीवन इसी पवित्रता और समर्पण की मिसाल रहा. अपने लंबे उतार-चढ़ाव और संघर्षपूर्ण जीवन में ओवेन ने मान लिया था कि वर्तमान पूंजी-प्रधान व्यवस्था में मानव-कल्याण संभव ही नहीं है. मनुष्य अपने चरित्र-निर्माण के लिए अपने परिवेश पर निर्भर होता है और वहां से बहुत-सी बातें ग्रहण करता है. ऐसे में यदि परिवेश ही दूषित हो तो मानव-चरित्र में उसके दोषों का प्रवेश होना स्वाभाविक है. ओवेन की यह मान्यता प्रसिद्ध दार्शनिक जा॓न ला॓क के बहुत करीब थी; जो मानता था कि मनुष्य का मन कोरे स्लेट की तरह होता है. विकासक्रम में वह अपने परिवेश से ही प्रेरणा और आवश्यक सूचनाएं ग्रहण करता है, उन्हें अपने बौद्धिक सामार्थ्य द्वारा विश्लेषित-संश्लेषित कर आवश्यक निर्णय तक पहुंचता है. अतएव मानव चरित्र में बदलाव के लिए उसके चरित्र का गठन बहुत अहम भूमिका निभाता है, जिसके लिए व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव जरूरी है.
ओवेन ने अपने लेखों तथा पुस्तकों के माध्यम से लोगों तक अपने विचार पहुंचाने का प्रयास किया. मजबूर बस्तियों में स्वयं जा-जाकर वह उन्हें सहजीवन के लिए प्रेरित करता रहा. चूंकि समाजवाद के वृहद लक्ष्य को किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा प्राप्त कर पाना संभव नहीं है, इसलिए उसने अपने साथी उद्यमियों का भी आवाह्न किया था कि वे जनकल्याण के लिए आगे आएं. व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा भी उसने सरकार एवं प्रशासन के माध्यम से अपनी सहजीवन पर आधारित बस्तियों को बढ़ावा देने का प्रयास किया था. लेकिन पूंजीपतियों का दबाव झेल रही अपने समय की व्यवस्था के वह बुरी तरह आहत हो चुका था. वह जानता था कि व्यवस्था में वास्तविक बदलाव उसमें आमूल परिवर्तन द्वारा ही संभव है.
समाजवादी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए राबर्ट ओवेन ने कहा कि राज्य की संपत्ति पर व्यक्ति अथवा राज्य के बजाए समाज का अधिकार होना चाहिए. मगर इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति समिति अथवा संगठन के माध्यम से एकजुट हों; ताकि समाज की ऊर्जा एकजुट हो और उपलब्ध संसाधनों का समाज-हित में अधिकतम उपयोग किया जा सके. इस तरह राबर्ट ओवेन ने समाजवाद की एक      अलग धारा का अन्वेषण किया, जिसे विद्वानों ने साहचर्य के विशेषण के साथ ‘साहचर्य समाजवाद’ की संज्ञा दी. साहचर्य समाजवाद की निम्नलिखित विशेषताएं हैं—
1. साहचर्य समाजवाद में सामाजिक कार्यव्यवहार पूर्णतः स्वायत्त संस्थाओं/ संघों के अधीन होता है. उन संस्थाओं के सभी फैसले लोकतांत्रिक आधार पर लिए जाते हैं. सहकारिता की भावना को समर्पित संघ पूर्णतः आत्मनिर्भर, अधिकार-संपन्न एवं चेतना प्रधान होते हैं. इनकी स्थापना तथा नियंत्रण में राज्य अथवा अन्य बाहरी शक्ति का कोई दबाव नहीं होता.
2. यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और साहस के नियम में आस्था रखता है.
3. साहचर्य समाजवादी, आदर्शवादी योजनाओं के अनुसार काम करते हुए समाज में नैतिकता की स्थापना और उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए काम करता है.
4. स्पर्धा को सभी मौजूदा बुराइयों का निमित्त मानते हुए, साहचर्य समाजवादी उसके उन्मूलन पर जोर देते हैं. स्पर्धा के स्थान पर वह सहयोग एवं तथा सहयोग के स्थान पर साहचर्य(Association) को महत्त्व देता है.
कह सकते हैं कि साहचर्य समाजवाद की विचारधारा कदाचित व्यक्ति-स्वातंत्रय के उन घटकों का निषेध कर रही थी, जिनके समर्थन बैंथम, जेम्स मिल जैसे सुखवादी दार्शनिक और एडम स्मिथ जैसे ख्यातिनाम अर्थशास्त्री कर रहे थे. मेरी स्वतंत्रता सभी की स्वतंत्रता के साथ ही सुनिश्चित है और सबके स्वतंत्र रहने में ही मेरी स्वतंत्रता अर्थवान है—साहचर्य समाजवादी कुछ इसी प्रकार का व्यक्तिगत स्वतंत्रता-बोध चाहते थे. यह सामाजिक दृष्टि से गलत भी नहीं है. इसलिए कि समाज अपने भीतर अनेक इकाइयों को शामिल किए रहता है. उसके प्रत्येक सदस्य की अपनी विशिष्ट कार्यक्षमता एवं वैचारिक आग्रह होते हैं. अतः समाज में अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी काम की नहीं होती, जब तक कि उसका पूरा परिवेश स्वतंत्रता की भावना से ओत-प्रोत न हो. स्वतंत्रता हो या संपन्नता वह परिवेश के साथ समरूपता में ही प्रशंसनीय होती है.
ओवेन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण विचार जो आगे चलकर सहकारिता आंदोलन का आधार-सिद्धांत बना, जिसके आधार पर सहकारिता की कामयाब इबारत लिखी जा सकी, लाभ का निषेध था. यद्यपि लाभ के निषेध का विचार ओवेन की मौलिक स्थापना नहीं थी. यह एकमात्र ऐसा सिद्धांत है जो प्रायः सभी धार्मिक-नैतिक व्यवस्थाओं समान रूप में मौजूद रहा है. आर्थिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ पर जोर देने का आग्रह प्रायः सभी समाजों में नैतिक रूप से मान्य रहा है. भारतीय परंपरा में तो चिरकाल से ही अपरिग्रह और अस्तेय की महिमा का बखान होता रहा है, जिनके अनुसार आवश्यकता से अधिक धन का संचय न करने और संकट के समय दूसरों की मदद करने का आदर्श समाहित है. ईसाई धर्म में जहां करुणा एवं मैत्री के प्रति विशेष आग्रह दर्शाते हुए, आर्थिक उपलब्धियों को उनकी अपेक्षा हेय माना गया है. लाभ की मौजूदगी व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा को विस्तार देती है. अरस्तु तक का मानना था कि व्यक्तिगत स्वामित्व होते हुए भी संपत्ति का उपयोग सार्वजनिक कल्याण के लिए किया जाना चाहिए. महात्मा गांधी संपत्ति को ट्रस्टीशिप के अधीन रखना चाहते थे. जिससे लाभ पर समस्त समाज की आधिकारिता हो. संत एक्वीनास का मानना था कि लाभ की कामना निर्धन वर्ग के शोषण को जन्म देते है, अतएव उन्होंने लाभ के उन्मूलन पर बल दिया था. इस्लाम धर्म में ब्याजमुक्त ऋण देना, संकट के समय पड़ोसी की मदद को आगे आना, धार्मिक रूप से मान्य रहा है, जिसके उल्लंघन पर सामाजिक बहिष्कार और जैसे दंड की भी व्यवस्था रही है.
ओवेन का लाभ के निषेध का सिद्धांत मात्र उसके निषेध तक ही सीमित नहीं था. इससे भी आगे बढ़कर वह लाभ के नाम पर अर्जित राशि का सार्वजनिक हित में पुनः निवेशन भी चाहता था, ताकि उसको उत्पादकता से जोड़ा जा सके. इसके लिए उसने प्रबुद्ध लोगों की समिति बनाने का सुझाव दिया था. ताकि लाभ को एकाधिकार की सीमा से बाहर लाया जा सकते. लाभ की भावना का निषेध करते हुए ओवेन ने लिखा है कि—
‘दुनिया में एक जरूरी बुराई, वास्तविक पाप लाभ की कामना है. वस्तुतः लाभ ही वह वर्जित फल था, जिसे खाकर आदम का स्वर्ग से पतन हुआ.’
ओवेन यद्यपि प्रकृति से धार्मिक नहीं था. धर्म को वह विकास के मार्ग में बाधक मानता था. किंतु ईसाई धर्म के कल्याण एवं सेवा के संदेश का उसपर गहरा प्रभाव पड़ा था. उसका प्रत्येक निर्णय इससे प्रभावित नजर आता है. समाजवादी विचारों का उसपर गहरा प्रभाव था. व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का वह विरोधी था तथा उसको बहुत ही घृणित तथा अनैतिक कर्म मानता था. उसका कहना था कि—
‘व्यक्तिगत संपत्ति बहुत ही घृणित एवं अनैतिक शक्ति है…यह असंख्य अन्यायों और अपराधों की जन्मदाता है. इससे चतुर्दिक बुराइयां फैलती है.’
ओवेन ने अपनी उद्यमशीलता का लोहा पूरे समाज से मनवाया था. न्यू लेनार्क के कपड़ा उद्योग में उसकी धाक थी. किंतु यह बात हैरान कर देने वाली है कि उसको तात्कालिक फैक्ट्री सिस्टम से घृणा थी. इसीलिए वह उसमें आमूल बदलाव चाहता था. उसका मानना था कि मौजूदा फैक्ट्री व्यवस्था सामाजिक गैरजिम्मेदारी की भावना, विध्वंसात्मक स्पर्धा एवं अमानीय किस्म के व्यक्तिवाद को बढ़ावा देनेवाली है. जबकि औद्योगिकीकरण के पहले का समाज नैतिकतावादी सोच और मानवीय संबंधों पर आधारित था. अपनी पुस्तक ‘दि न्यू व्यूज आफ सोसाइटी’ में ओवेन ने समाज को लेकर अपने विचारों का उल्लेख किया है. इसमें उसने समाज के रूप में एक ऐसी व्यवस्था की संकल्पना की थी, जो अपने प्रत्येक सदस्य के कल्याण की कामना करते हुए, उसके लिए सततरूप से प्रयत्नशील रहती है—
‘एक सरल, साधरण एवं व्यावहारिक व्यवस्था जिसमें किसी भी व्यक्ति या समाज के किसी वर्ग-विशेष को जरा भी नुकसान ना हो.’
समाज के रूप में वह ऐसी व्यवस्था की कामना करता था, जो गरीबों को सुखी, बंधनमुक्त एवं आत्मनिर्भर बनाती हो. उन्हें गर्व करने का अवसर प्रदान करती हो. ऐसी व्यवस्था के लिए उसने समाज की पुनर्रचना पर जोर दिया है. व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध करने के बावजूद ओवेन इस बात का विरोधी था कि संपत्ति पर राज्य का स्वामित्व हो. उसे संशय था कि इससे राज्य को मानव जीवन पर अनुचित दबाव बनाने की शक्ति मिलने की संभावना बढ़ेगी. इस कारण वह संपत्ति पर समिति या समूहों को अधिकार का पक्षधर था. वह चाहता था कि समाज में ऐसे चैतन्य समूहों का विकास हो जो उत्पादकता को सामूहिक कल्याण से जोड़ने का कार्य कर सकें. संक्षेप में सहकारिता का भी आदर्श भी यही है. कदाचित इसी के कारण ओवेन को उसके आलोचकों ने आधुनिकता का विरोधी कहकर उसका मजाक उड़ाया था. और इसी के आधार पर तत्कालीन परंपरावादी विद्वानों द्वारा उसका समर्थन भी किया था. लेकिन जल्दी ही उनका यह भ्रम जाता रहा. ओवेन द्वारा किए गए कार्यों, सतत लेखन तथा समय-समय पर दिए गए वक्तव्यों ने सिद्ध कर दिया कि वह एक कर्मठ उद्यमी और दूरदर्शी विद्वान था, जिसकी विचारधारा उदारवादी समाजवाद की सहोदरा है.
ओवेन ने जोर देकर कहा कि हम सभी अपने परिवेश की देन हैं. उसी से हमारा व्यक्तित्व एवं संस्कार बनते हैं. इसीलिए परिवेश को बदलकर मानव स्वभाव में भी अनुकूल परिवर्तन लाए जा सकते हैं. ओवेन का यही सूत्रवाक्य उनीसवीं शताब्दी के समस्त समाजवादी चिंतन एवं कार्यक्रमों के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ. विलियम मौरिस तथा बलफर्ट बक्स ओवेन के योगदान की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि—
‘ओवेन ने जनकल्याण के लिए उदारतापूर्वक प्रायः हर तरह के कार्यक्रम को अपनाया. उसके द्वारा सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किए गए कार्य इस सिद्धांत की कसौटी हैं कि मनुष्य का अपना आचरण उसके वातावरण से संपूर्ण बनता और बनाता है. ओवेन के इन्हीं विचारों ने उसको महान समाजवादी और सहकारिता का आदि प्रवर्तक सिद्ध किया. यह अलग है कि ओवेन की सहकारिता-संबंधी अवधारणा वह नहीं थी, जो कि सहकारिता के वर्तमान समर्थक मानते हैं और जिसके आधार पर वैश्विक सहकारिता आंदोलन का वटवृक्ष आज चारों दिशाओं में अपना प्रभाव जमाए हुए है.’
समाज की पुनर्रचना का सपना देखते हुए ओवेन ने ऐसे समाज की परिकल्पना की थी, जहां स्वेच्छिक सहभागिता और पारस्परिकता सभी संबंधों का मुख्याधार हों. लाभ के बजाय लोग सेवा और त्याग को महत्त्व दें और इन्हें स्वेच्छापूर्वक अपने जीवन में अपनाएं. सभी नागरिक स्वयं को वृहद विश्व-परिवार का हिस्सा मानते हुए सौहार्दमय जीवनयापन करें. ओवेन का आदर्श ऐसी बस्तियां थीं, जिनके निवासियों की संख्या ज्यादा से ज्यादा 2000 हो. जहां के लोगों का जीवन सामूहिक हो. प्रत्येक बस्ती के पास एक हजार से डेढ़ हजार एकड़ तक कृषि-योग्य भूमि हो. लोगों के निवास स्थान को छोड़कर बाकी सब सुविधापूर्ण जैसे रसोईघर, स्कूल, पुस्तकालय, कारखाने, दुकानंे आदि सामूहिक उपयोग की हों.
ओवेन को विश्वास था कि ऐसे समाज में न तो व्यक्तिगत संपत्ति की लालसा रहेगी, न ही लाभ कमाने की प्रवृत्ति का विकास होगा. वर्गीय शोषण एवं उत्पीड़न की संभावनाओं से परे वह एक आदर्श, आत्मनिर्भर और एकात्म समाज होगा. अपने कार्यक्रमों के कारण ओवेन ने दुनिया-भर में अपने प्रशंसक पैदा किए थे. जिससे सरकार के लिए उसके विचारों की एकाएक अवहेलना कर पाना संभव न था. व्यक्तिगत प्रभाव से अपनी सामाजिक पुनर्गठन की योजना को वह संसद तक ले जाने में कामयाब भी हुआ था. मगर संसद में उसके प्रस्तावों को अव्यावहारिक मानते हुए अस्वीकृत कर दिया गया.
जाहिर है कि यह सब पूंजीपतियों के दबाव में लिया गया फैसला था, जिन्होंने उससे पहले भी ओवेन को बदनाम करने की भरपूर कोशिश की थी. ओवेन के आलोचक उसको अर्द्धविक्षिप्त कहकर उसका मजाक भी उड़ाते थे. जबकि ओवेन को अपने विचारों पर दृढ़ आस्था थी. वह अपने विरोधी विचारकों के साथ तर्क करने को सदैव तैयार रहता था. मगर विरोधियों को तर्क से ज्यादा आनंद छींटाकशी करने में आता था. भारत की शिक्षा-नीति में अपने उपनिवेशवादी परिवर्तनों के लिए कुख्यात मैकाले ओवेन को ‘दिमाग चाटने वाला बुड्ढा’ कहकर उसका उपहास करता था. वह ओवेन को देखते ही भाग छूटता था.
ओवेन की वैचारिक मान्यताओं तथा उसके जीवन-दर्शन में हमें पवित्रता और नैतिकता के दर्शन होते हैं. उसके विचार केवल कागजों तक सिमटे हुए नहीं थे, बल्कि ऐसे समय में जबकि सभी यूरोपीय देशों में वैचारिक हलचल सर्वाधिक तेज थी, एक से बढ़कर एक विद्वान, बुद्धिजीवी नवीनतम विचारों के साथ विश्वमेधा को लगातार चमत्कृत किए जा रहे थे, महानतम विचारकों की उस भीड़ के बीच ओवेन लगभग अकेला था, जो अपनी मान्यताओं पर पूरी ईमानदारी और लगन के साथ, अपने संसाधनों को खपाकर, लगातार प्रयोग भी कर रहा था. बिना किसी बाहरी मदद के. ओवेन की महानता का कारण यह नहीं कि एक गरीब परिवार और संघर्ष के बीच से उठकर उसने अपने श्रम और कार्य-कुशलता के दमपर पश्चिमी जगत पर अपना प्रभाव स्थापित किया था. उसकी महानता इस तथ्य में निहित है कि उपलब्धियांे के चरम पर पहुंचकर भी वह समाज के मेहनतकश, विपन्न और अभावग्रस्त वर्ग के प्रति अपने कर्तव्य और संवेदनाओं को बनाए रख सका.
इस तरह से देखें तो ओवेन के समकालीन विचारक उससे काफी नीचे नजर आते हैं. अपने विचारों में अटूट आस्था तथा उनके अनुरूप आचरण की ओवेन जैसी नैतिक जिद उसके बाद के यदि किसी महामानव में दिखाई पड़ती है तो वह केवल महात्मा गांधी ही हैं, जो विचारों को प्रयोगों की कसौटी पर निरंतर कसते रहे. हालांकि गांधीजी की भांति ओवेन का न तो जादुई व्यक्तित्व था, न ही उसमें आमजन को प्रभावित करने की वैसी क्षमता ही थी. इसीलिए भी उसको अपने लक्ष्य में वांछित सफलता प्राप्त न हो सकी. मगर इससे ओवेन तथा उसके विचारों की महत्ता कम नहीं हो जाती.
ओवेन आजीवन समाजवादी रहा, किंतु सहकार बस्तियां बनाए जाने का उसका प्रस्ताव, मजदूरों के हित में समय-समय पर छेड़ा गया संघर्ष, व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का निषेध उसको साम्यवादी विचारधारा के करीब ले आता है. माक्र्स और ऐंग्लस जैसे साम्यवादियों ने ओवेन आदि साहचर्य समाजवादियों की ‘स्वप्नजीवी’ कहकर उसकी आलोचना की थी, लेकिन सहकार-बस्तियों की स्थापना के कार्य के लिए माक्र्स के सहयोगी फ्रैड्रिक ऐंग्लस ने ओवेन की बहुत सराहना की है. हालांकि इसके पीछे वह ओवेन पर साम्यवादी विचारधारा का ही प्रभाव मानता था. ओवेन तथा दूसरे साहचर्य समाजवादियों पर लिखे गए अपने एक लेख में ऐंग्लस ने लिखा है कि—
‘साम्यवाद के सामान्य अनुदेशों में ओवेन की रुचि ही उसके जीवन का निर्णायक मोड़ थी. जब तक वह केवल कल्याणवादी था, उसको केवल धन, तालियों की गड़गड़ाहट, मान-सम्मान तथा ख्याति के अतिरिक्त और कुछ हासिल न हो सका. अपने समय में वह यूरोप के सर्वाधिक चर्चित व्यक्तियों में से था. न केवल उद्योगपति जो उसके वर्ग से संबंधित थे, बल्कि राजनेता और शाही परिवार के सदस्य भी उसकी बातों को गंभीरता से लेते थे और उनपर विचार भी करते थे. साम्यवादी विचारधारा से उसका अंतरग परिचय, ही उसके कायाकल्प का प्रमुख साधन बना. गंभीर चिंतन के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि निजी संपत्ति की अवधारणा, विवाह की प्रचलित पद्धति, धर्म आदि मनुष्य के बहुआयामी विकास के प्रमुख अवरोधों में से हैं.’
व्यक्तिगत आचरण में मानवतावादी ओवेन निजी संपत्ति के साथ-साथ धर्म एवं वैवाहिक संस्था का भी बहिष्कार करने के पक्ष में था. वह इन तीनों को मानव जीवन की उन्नति की मुख्य बाधाएं मानता था. उसने लिखा भी हैं—
‘मानव जीवन की उन्नति में तीन मुख्य बाधाएं हैं – धर्म, व्यक्तिगत संपत्ति, एवं विवाह. आदर्श समाज में इन तीनों को समाप्त करना अत्यावश्यक है.’
ओवेन एक दूरदर्शी और प्रतिभासंपन्न उद्यमी था. उसके विचारों एवं कार्यक्रमों के साथ समस्या यह भी रही कि वे समय से पहले ही समाज में प्रस्तुत कर दिए गए. दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि उस समय का समाज, यहां तक कि परिवर्तन का सपना देख रहे बुद्धिजीवी, मानवकल्याण के प्रति आस्थावान उद्योगपति भी ओवेन के संकल्पों में उसका साथ देने में असमर्थ रहे थे. अपने सपने की सच में परिणति के लिए ओवेन अपने संसाधनों को झोंक रहा था. वैसी हिम्मत उसके साथियों में नहीं थी. इसलिए वे एक-एक कर ओवेन से अलग होते चले गए.
दूसरे जिन दिनों ओवेन ने अपने प्रयोग आरंभ किए, वह तीव्र वैचारिक परिवर्तनों एवं नई स्थापनाओं का दौर था. एक ओर सामंतवादी और पूंजीवादी संस्कार जनमानस को जकड़े हुए थे, मशीनीकरण के कारण लोगों से रोजगार के अवसर छीनकर उन्हें बेरोजगार और परावलंबी बनाया जा रहा था. भीषण गरीबी तथा बेरोजगारी के कारण जनमानस का आत्मविश्वास खंडित था और लोग; जिनमें वे कारीगर भी शामिल थे, जो मशीनीकरण से पहले अपनी कला के बदले न केवल जीविका के मामले में आत्मनिर्भर थे, बल्कि उसके कारण समाज में उनका अच्छा-खासा सम्मान था, उन सभी को अब अठारह-बीस घंटे तक मशीनों से जूझना पड़ता था. रहने के लिए शहर की गंदी बस्तियां थीं जहां का जीवन अत्यंत शोचनीय था. मशीनों ने उनकी कला को हेय तथा उन्हें बेचारा बना दिया था.
ऐसी परिस्थितियों में ओवेन पूंजीवाद के आचरण पर संदेह करके, न केवल उसकी खामियों की ओर संकेत कर रहा था, साथ ही वह आमूल परिवर्तनवादियों की तरह समाज में ऐसी व्यवस्था कायम करने के लिए प्रतिबद्ध भी था जो उसके अपने ही वर्ग, यानी पूंजीवादी शक्तियों के हितों के सर्वथा प्रतिकूल थी. ओवेन को समाजवाद का प्रथम आख्याकार भी माना जाता है. यह बात अलग है कि उससे अगली पीढ़ी के समाजवादियों, विशेषकर उन विद्वानों, जिन्हें विश्वास था कि आर्थिक समानता एवं समाजबाद बिना क्रांति के संभव ही नहीं है, ने ओवेन की निष्ठा पर ही सवाल खड़े किए हैं. माक्र्स के सहयोगी फ्रैडरिक ऐंग्लस का मानना था कि ओवेन की साम्यवादी विचारधारा विशुद्ध रूप से व्यापारिक लाभ के सिद्धांत एवं धंधे के जोड़-घटाव पर टिकी थी. चतुर व्यवसायी की भांति उसने ऐसे कार्यक्रमों में निवेश किया जहां से वह अधिकतम मुनाफा बटोर सके. इस कार्य के लिए गरीब कामगारों का भावनात्मक शोषण भी उसने किया. लेकिन उसकी दूरदर्शिता उसको अपने समकालीन उद्यमियों से महान और विशिष्ठ बनाती है. औद्योगिक क्रांति के दौर में जहां बाकी उद्यमी नई उदारवादी व्यवस्था को लेकर संशय और भ्रम के शिकार नजर आते हैं, वहीं ओवेन ने साहसपूर्वक सिद्धांत-आधारित व्यवस्था को अपने कारखानों में अपनाया था.
फ्रैडरिक ऐंग्लस के अनुसार एक चतुर पूंजीपति की भांति ओवेन ने मजदूरों को अपने व्यवसाय के अनुकूल ढालने के लिए नए-नए कार्यक्रम बनाए. ऊपर से देखने पर वे सभी कल्याणकारी तथा अनूठे नजर आते थे, मगर उनके पीछे ओवेन के व्यावसायिक हित जुड़े थे. ओवेन की असली नजर अपने मुनाफे पर थी. मजदूर उसके लिए मुनाफा कमाने का माध्यम भर थे. ऐंग्लस के अनुसार—
‘‘समाज के विपन्न वर्ग के प्रति ओवेन की उदारता और दरियादिली मनुष्यता के तय मापदंडों से बहुत पीछे थी. उनके प्रति उसके सभी आग्रह केवल दिखावटी, अवास्तविक तथा मनुष्यता की पवित्र अवधारणा से बहुत परे थे— ‘लोग मेरी मेहरबानी पर पलने वाले मेरे दास थे.’ ओवेन के ये शब्द उसकी उदारता और दरियादली को कटघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैं. ओवेन द्वारा कामगारों के लिए आनुपातिक रूप से उपलब्ध कराया गया बेहतर वातावरण, व्यक्तित्व के बहुआयामी विकास के लिए आवश्यक परिवेश से बहुत पीछे था.’’
अपने विचार को फ्रैडरिक ऐंग्लस ने उदाहरण देकर समझाने का प्रयास भी किया है. ‘दि रिवोल्युशन इन माइंड एंड पै्रक्टिश’ नामक ग्रंथ में ऐंग्लस का एक यादगार भाषण संकलित है. जिसमें वह ओवेन की फैक्ट्रियों की तात्कालिक स्थिति की आलोचना करते हुए उसके प्रयासों को संदेह के घेरे में ले आता है. ओवेन की व्यावसायिक कुशलता एवं मशीनीकरण के कारण उत्पादन व्यवस्था में आए बदलाव की ओर संकेत करते हुए वह लिखता है कि:
‘लगभग ढाई हजार की आबादी का प्रमुख कामगार वर्ग प्रतिदिन इतना विशुद्ध लाभ कमा रहा था जिसे कमाने के लिए करीब पचास वर्ष पहले पूरे साठ लाख मजदूरों और कामगारों की आवश्यकता पड़ती थी.’ ओवेन की उद्यमशीलता को देखकर ऐंग्लस भी चमत्कृत था. उसने आगे लिखा है कि—‘मैं स्वयं यह सोचकर हैरान हूं कि ढाई हजार कामगारों के ऊपर किए जाने तथा साठ लाख कामगारों के ऊपर किए जाने वाले खर्च का कितना अंतर होगा.’
पूंजी के कारण सामाजिक और राजनीतिक संबंधों में आए बदलाव को लेकर ऎंग्लस एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थापना देता है कि—
‘यदि अत्याधुनिक तकनीक के आधार पर निर्मित मशीनों और नई औद्योगिक नीतियों के कारण, नई पूंजी का सृजन नहीं होता, जैसे कि वह हुआ, तो नेपोलियन के विरुद्ध यूरोप का संगठित युद्ध तथा समाज के संभ्रांत वर्ग के हितों की सुरक्षा असंभव थी. समाज में यह नई ताकत दरअसल औद्योगिकीकरण के कारण नौकरीपेशा लोगों की जमात के पैदा होने के कारण आई थी.’
स्पष्ट है कि उससे पहले तक समाज में सामंती मूल्यों का वर्चस्व था. राजनीति और धर्म के स्वार्थी गठजोड़ से सामाजिक मूल्य धराशायी हुए थे. व्यवस्था के नाम पर केवल अराजकता थी और संगठित चेतना का अभाव. हांलाकि प्रारंभ में कोई बाहरी दबाव न होने के कारण नए-नए जन्मे पूंजीपति वर्ग का सारा जोर अधिक से अधिक रुपया कमाने पर था. मगर उसके लिए लंबे समय तक समाज की उपेक्षा कर पाना संभव नहीं था. क्योंकि उत्पादन एवं उपभोग के स्तर पर पूंजीवादी व्यवस्था को जनसमर्थन की आवश्यकता पड़ती है. इसीलिए पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव के दौरान, उत्पादन व्यवस्था को अधिकाधिक कार्यक्षम बनाने के साथ-साथ उसको लोकोपकारी बनाने के प्रयास भी शुरू हो चुके थे.
उधर समाज में तेजी से उभरते बुद्धिजीवी वर्ग से पूंजीपतियों की नीयत छिपी न थी. इसीलिए उसका एक वर्ग वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण में जुटा था, तो दूसरा वर्ग नागरिकों के सहयोग से पूंजीवाद को नख-दंत विहीन कर देने की कोशिशें कर रहा था. पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का श्रेय रोशडेल पायनियर्स जैसे सहकारी संगठन को जाता है तो दूसरे वर्ग के नेतृत्व की बागडोर राबर्ट ओवेन जैसे उद्यमी-विचारकों के हाथों में थी. ध्यातव्य है कि समाजवादियों का यह उदीयमान वर्ग सुविधाओं को समाज के निम्नतम वर्गों तक पहुंचाने के प्रति संकल्पबद्ध था. धर्म एवं संस्कृतिवादियों द्वारा समाज के निचले वर्ग पर त्याग एवं संयम के नाम पर थोपे गए परंपरागत बंधनों का यह वर्ग निषेध करता था. प्रसिद्ध समाजविज्ञानी जी. डी. एच. कोल इस समाजवादी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा है—
‘किसी औचित्यपूर्ण सामाजिक संस्थान के गठन का आधार, मनुष्य की नैसर्गिक इच्छाओं का दमन न होकर, प्राणीमात्र की इस तरह से संतुष्टि होना चाहिए कि वह आपसी वैमनस्य के स्थान पर सामाजिक सद्भाव का जन्मदाता बन सके.’
यद्यपि ऐंग्लस के अनुसार ओवेन का साम्यवाद मात्रा एक व्यापारिक कर्मकांड था, जो धंधे के स्वाभाविक जोड़-घटाव और लाभ-हानि के सिद्धांत पर टिका था. कहा जा सकता है कि ओवेन ने अपने समय के समाजवादी चिंतकों से प्रेरणा तो ली, किंतु लाभ कमाने की सहज अभिलाषा से वह मुक्त न हो सका था. लाभार्जन किसी भी व्यापारी और उद्यमी की सहज और स्वाभाविक अभिलाषा है. अतः ओवेन के महत्ता मात्रा इस बात से कम नहीं हो जाती कि वह अपनी लाभार्जन की स्वाभाविक इच्छा का परित्याग कर पाने में असमर्थ रहा था. ओवेन की महत्ता इस बात में है कि उसने अपने मजदूरों और कामगारों की समस्याओं को पहचाना तथा उनको हल करने के लिए ठोस पहल भी की. इसका व्यावसायिक लाभ भी उसको मिला. मजदूरों ने ओवेन की भावनाओं का सम्मान करते हुए उसको अपना संपूर्ण सहयोग प्रदान किया था.
ओवेन द्वारा बच्चों के पाठशालाओं की शुरुआत उस समय की एकदम नई पहल थी. इसलिए ओवेन को शिशु पाठशालाओं का जन्मदाता भी माना गया है. 1823 में ओवेन द्वारा आयरलैंड में मजदूरों के कल्याण के लिए बस्तियों की स्थापना, उस समय सहजीवन का एकदम नया प्रयोग था. उसने अपनी संपूर्ण ऊर्जा और संपत्ति उस कार्यक्रम की सफलता के लिए झोंक दी थी. अपनी उन क्रांतिकारी योजनाओं में यद्यपि ओवेन को असफलता ही हाथ लगी थी, मगर उसके पीछे तात्कालिक समाज और राजनीति पर सामंतवाद के अनुचित दबाव थे, जो उसके पश्चात लगभग आधी शताब्दी तक बने रहे. हीगेल, माक्र्स, जा॓न स्टुअर्ट मिल, सार्त्र आदि के प्रभाव से आगे चलकर समाज का जनतांत्रिकरण संभव हो सका. अतः प्रारंभिक असफलताओं को ओवेन की चारित्रिक कमी का पर्याय नहीं माना जा सकता. हां, उसकी सफलता को हम उसके मजदूरों की संवेदनशीलता का परिणाम अवश्य मान सकते है.
यहां यह उल्लेख कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उनीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में पश्चिमी समाज पर कल्पनाशीलता का प्रभाव था, जिसे जा॓न कीट्स ‘विचारों के स्थान पर जीवन में संवेदनशीलता की खातिर.’ के द्वारा आवाह्न कर कर रहे थे तो विलियम ब्लैक जैसे कवि-कथाकार ‘करो जीवन-जल में स्नान’ कहकर काव्यात्मकता और रहस्यात्मकता की ऊचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहे थे. जबकि बैंथम, पूधों और जेम्स मिल जैसे विचारक, एडम स्मिथ और रिकार्डो जैसे विद्वान अर्थशास्त्री स्थितियों पर अधिक वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार कर रहे थे. उन्होंने खोखली रूमानियत तथा धार्मिक मिथ्याचारों से समाज को बाहर लाकर उसे ठोस आधार देने का प्रयास किया तथा सुख को सबकी पहुंच में लाने वाली व्यवस्था का पक्ष लेते हुए उन कुंठाओं से समाज को मुक्त करने का प्रयास किया जिन्होंने समाज को शताब्दियों से जकड़ा हुआ था. ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ इस वर्ग के विचारकों का मूल मंत्र रहा.
धर्म और धार्मिक संस्थाओं की अवहेलना के कारण उनको अनेक बार धर्म-सत्ता के उग्र विरोध का सामना भी करना पड़ा. कई बार धार्मिक पोंगापंथियों ने अपने कुतर्क के सहारे लोगों को फुसलाकर सामाजिक परिवर्तनवादियों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास भी किया. इन लोगों की स्वार्थी दृष्टि में लाभ कमाने की प्रवृत्ति के स्थान पर सेवा-सहयोग-समर्पण एवं त्याग के माध्यम से सामाजिक विकास की रूपरेखा गढ़ना, कल्पना की उड़ान जैसा था. बावजूद इसके समाज में इन विचारकों का प्रभाव लगातार बढ़ता चला गया. विशेषकर तेजी से उभरते मध्यवर्ग में, जो एक और तो नई तकनीक में पारंगत होकर पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत करने पर तुला था, तो दूसरी ओर अपने विद्रोही स्वभाव की रक्षा करता हुआ, समाज में नई वैचारिक क्रांति का आवाह्न कर रहा था. चूंकि समाज के बौद्धिक नेतृत्व की सर्वाधिक जिम्मेदारी मध्यवर्ग की ही थी जिसका अधिकांश समाज के निम्न वर्ग से ऊपर उठकर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहा था, अतः इस वर्ग की स्वाभाविक आस्था परिवर्तनवादी दार्शनिकों एवं अर्थशास्त्रियों के प्रति थी.
बहरहाल, परिवर्तनवादियों के प्रति निरंतर बढ़ते जनसमर्थन के आगे कालांतर में यथास्थितिवादियों को झुकना ही पड़ा. नवजागरण की लहर ने स्वार्थी धर्मसत्ता और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की एक न चलने दी. राबर्ट ओवेन को अपने जीवन में हालांकि असफलता का सामना करना पड़ा था. मगर अपने संसाधनों के आधार पर उसने जो आजीवन प्रयोग किए थे, कालांतर में उन्हीं के आधार पर सहकारिता जैसे कल्याणकारी विचार का जन्म हुआ और आने वाले वर्षों में सहकार की नींव रखी जा सकी.

© ओमप्रकाश कश्यप

राबर्ट ओवेन: आधुनिक सहकारिता आंदोलन का जन्मदाता-एक

[राबर्ट ओवेन की ख्याति एक समाजवादी विचारक, उदार उद्यमी और समर्पित लोक-कार्यकर्ता की है. भीषण गरीबी में बचपन बिताने वाले राबर्ट ओवेन ने मात्र दस वर्ष की वयस् में प्रशिक्षु दर्जी से जीवन-संघर्ष की शुरुआत की. अपनी प्रतिभा, लगन और उद्यमशीलता के दम पर वह आगे चलकर ब्रिटेन का जाना-माना उद्योगपति बना. मनुष्यता के इतिहास में उसे दो प्रमुख आंदोलनों का जन्मदाता और उन्नायक होने का श्रेय प्राप्त है. अपने कारखानों में ओवेन ने सबसे पहले शिशु शिक्षा की शुरुआत की तथा काम के साथ-साथ शिक्षा की अवधारणा का जन्मदाता बना. वह श्रम-अधिकारों का समर्थक था. श्रमिकों को आर्थिक मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनाने के लिए उसने सहकारी समितियां गठित कीं. मजदूरों की आवास-समस्याओं के निदान के लिए उसने सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना की, जिससे सहकारिता का नया रूप दुनिया के सामने आया. कामगार बच्चों के लिए पाठशालाओं के अलावा खेल-सदन एवं गर्भवती स्त्रियों के लिए आराम के घंटों और उपयुक्त इलाज की व्यवस्था भी उसने अपने संसाधनों के बल पर की.
इसमें कोई संदेह नहीं कि ओवेन द्वारा किए गए श्रम-सुधारों का उसको आर्थिक लाभ भी पहुंचा. एक समय में ओवेन के कारखाने ब्रिटेन के सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाले कारखानों में से थे. मगर उसने श्रमिकों के जीवन में सुधार के प्रयास से कभी मुंह नहीं मोड़ा. हर महान व्यक्तित्व की भांति ओवेन को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. कुछ विद्वानों ने ओवेन के प्रयासों को उसकी सोची-समझी उद्योगनीति का हिस्सा माना है. मार्क्स और फ्रेड्रिक ऎंगल्स आदि साम्यवादियों ने ओवेन के विचारों की आलोचना की तो श्रमिकों के कल्याण के लिए उसके द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना भी की. अपने कल्याणधर्मी प्रयासों में ओवेन को हालांकि अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई, किंतु उसकी सदाशयता और श्रम-कल्याण के प्रति समर्पण-भावना का अनुमान मात्र इससे लगाया जा सकता है कि उसने श्रम-पूर्वक कमाई गई अपनी समस्त पूंजी अपने प्रयोगों और योजनाओं पर खर्च कर दी. परिणामस्वरूप उसे अपने जीवन के आखिरी दिन भयानक आर्थिक संकट में बिताने पड़े. वह चाहता था कि बाकी उद्योगपति और सरकार भी श्रम-कल्याण के लिए आगे आएं. मगर सही मायनों में ऐसा हो न सका. ओवेन को अधिकांश उन्हीं लोगों का समर्थन मिला जो आर्थिक मोर्चे पर विपन्न थे. तो भी सहकारिता आंदोलन पुनर्जीवित करने तथा शिशु-शिक्षा की महत्ता को रेखांकित करते हुए उसके लिए व्यापक प्रयास करने का जो महान ऐतिहासिक योगदान ओवेन ने दिया, उसके कारण उसकी उपेक्षा कर पाना शताब्दियों तक असंभव ही रहेगा. राबर्ट ओवेन का जीवन न केवल आधुनिक अर्थव्यवस्था से आजिज आ चुके अर्थशास्त्रियों और विद्वानों के लिए प्रेरक है, बल्कि इससे वे धनकुबेर, विशेषकर भारतीय, भी प्रेरणा ले सकते हैं, जो अस्सी करोड़ भारतीयों की भूख, गरीबी और तंगहाली की कीमत पर रातों-रात और अमीर, और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं. —ओमप्रकाश कश्यप]

सहकारिता के जनक राबर्ट ओवेन (मई 14, 1771 – नवंबर 17, 1858) के बारे में कुछ कहने से पूर्व हमें स्मरण करना होगा कि वह सहकारिता के सिद्धांत का मौलिक विचारक नहीं था. उससे पहले भी आर्थिक संसाधनों के विकेंद्रीकरण के पक्ष में अनेक अर्थशास्त्री अपना पक्ष रख चुके थे. यहां तक कि सहकारिता के पर्याय साहचर्य का शब्द का उदय भी हो चुका था. किंतु इससे राबर्ट ओवेन का योगदान कम नहीं हो जाता. उसकी महत्ता इस बात में है कि उसने सहकार को व्यावहारिकता के धरातल पर साकार करने की कोशिश अपनी पूरी ईमानदारी और सामर्थ्य के साथ की. अपने विचारों के लिए सदैव समर्पित भाव से काम करता रहा. हालांकि उसे अंततः असफलता ही हासिल हुई; मगर तब तक दुनिया सहकार के सामर्थ्य से पूरी तरह परिचित हो चुकी थी.
अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में ही अर्थशास्त्री एवं विचारक यह मानने लगे थे कि समाज की आर्थिक समस्याओं का निदान छोटे-छोटे कार्यसमूह बनाकर किया जा सकता है. उस समय स्पष्ट है कि उनकी निगाह, समाज के उस वंचित, अशिक्षित, गरीब और संसाधनविहीन वर्ग पर थी, जो विभिन्न सामाजिक कारणों से विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ था. उसके पास विपुल श्रम-सामर्थ्य था, परंपरागत तकनिकी कौशल जो जगह-जगह बिखरा पड़ा था. संसाधनों का अभाव था. मगर उससे भी अधिक थे—आत्मविश्वास की कमी, दिशा एवं नेतृत्वकला का अभाव, संसाधनों की विरलता तथा सकारात्मक स्पर्धा में टिके रहकर कार्य करने का जुनून. नकारात्मक स्पर्धा का उपयोग पूंजीपतिवर्ग अर्से से करता आ रहा था. इसी कारण उस श्रमशक्ति का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा था. जबकि उससे कुछ ही दशक पहले दुनिया में पूंजीवाद का आगमन बड़े जोर-शोर के साथ हुआ था.
औद्योगिकीकरण के प्रारंभ में पूंजीवाद ने बड़बोलापन दिखाते हुए दुनिया-भर के गरीब मजदूरों, सर्वहारा वर्ग के आंसू पोंछने का आश्वासन दिया था. प्रत्येक नागरिक को एक बेहतरीन दुनिया का सपना दिखाया गया था. मशीनें चूंकि कठिन श्रम से मुक्ति प्रदान करती थीं, अतएव शुरू-शुरू में मजदूरों एवं शिल्पकारों ने उनका स्वागत खुले मन के साथ किया था. हालांकि समाजवादियों के एक वर्ग के मन में उन्हें लेकर संदेह भी था, किंतु नई तकनीक के आगमन के समय के जोश ने उनकी सलाह को अनसुना करने को विवश कर दिया था. मगर उस आश्वासन का हश्र भी पूंजीपतियों की बाकी घोषणाओं की तरह ही हुआ. औद्योगिक विकास के चलते समाज में मध्यवर्ग का तेजी से विकास होने लगा. कालांतर में मध्यवर्ग खुद भी कई खानों में बंटता गया. एक वर्ग की आस्था परंपरागत समाज-व्यवस्था में थी. किसी भी परिवर्तन के विरोध में खड़ा होने वाला वह वर्ग पहले सामंतों-जमींदारों का समर्थन करता आया था और अब उनके स्थान पर पनपे नवउद्यमी वर्ग के समर्थन में खड़ा था. हमेशा की भांति मध्यवर्ग एक हिस्सा पूरी तरह निष्क्रय था तो उसका दूसरा हिस्सा ऐसा भी था जो स्वाभावतः विद्रोही था. वह देख रहा था कि सामंतवाद के पतन तथा औद्योगिक क्रांति का कोई लाभ समाज के बहुसंख्यक वर्ग को नहीं मिल पाया है. यही वर्ग स्थिति में आमूल परिवर्तन के लिए प्रयासरत था. जब इस वर्ग ने देखा कि औद्योगिकीकरण के अंधड़ में सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती जा रही है और लोगों का भरोसा उनसे उठने लगा था; तो उसने संगठित जनशक्ति का उपयोग कर सहकार की नींव डाली.
राबर्ट ओवेन और उसी के समान सोचवाले कुछ विचारकों का मानना था कि समाज की आर्थिक समस्याओं का हल विशेष उद्देश्य वाले कार्य-समूह बनाकर किया जा सकता है. यह एक युगानुकूल विचारधारा थी. इससे भी बड़ी बात यह रही कि उसको ऐसे समय में कार्यान्वित किया गया जिस समय समाज को उसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी. जाहिर है इसके पीछे यूरोप-भर में सक्रिय बुद्धिजीवियों तथा उनके द्वारा प्रेरित जनतांत्रिक आंदोलनों का भी हाथ था. समाज का बहुत बड़ा वर्ग पूंजी-प्रधान अर्थव्यवस्था से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक असंतुलन से जूझ रहा था. लोगों के मन में गहन आक्रोश था. ऐसे लोगों की ओर से भी राबर्ट ओवेन को भरपूर समर्थन मिला. शास्त्रीय भाषा में इन विचारकों को साहचर्य समाजवादी (Associative Socialists) का नाम दिया गया है.
सहकारिता का उद्भव औद्योगिकीकरण की तीव्र गति के बीच निरंतर कमजोर पड़ते जा रहे, समाजवाद को नई दिशा देने की कोशिशों का परिणाम था. यह एक तरह से समाजवाद की पूरक एवं सहयोगी विचारधारा थी, जिसमें नए जमाने की चुनौतियों से निपटने का क्षमता और उसके लिए जरूरी आत्मविश्वास था. इससे पहले के समाजवादियों का मानना था कि पूंजी एवं अन्य संसाधनों पर पूरे समाज का अधिकार होना चाहिए. जनतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी गई उत्तरदायी सरकारें, उनका प्रयोग राष्ट्रहित में करें. अवसरों की समानता, संसाधनों का विकेंद्रीकरण उस व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं थीं. साहचर्य समाजवादी भी पूंजी सहित सभी संसाधनों पर समाज एवं समूह का सम्मिलित अधिकार मानने के पक्षधर थे, किंतु उनका विश्वास था कि सदस्यों की साझेदारी के अभाव विकास के ऐच्छिक लक्ष्यों की प्राप्ति असंभव है. संसाधनों के विकेंद्रीकरण के लिए वे चाहते थे कि छोटे-छोटे उत्पादक समूह संगठित होकर बड़े दायित्वों का निर्वाह करें. समूह अपने आप में आत्मनिर्भर होंगे, तभी वे समाज को आत्मनिर्भरता की ओर ले जा सकेंगे. तभी संसाधनों का वांछित दोहन तथा लाभ का न्यायिक वितरण संभव हो सकेगा.
साहचर्य शब्द तो आधुनिक समाज की उपज है. राबर्ट ओवेन खुद को मात्र समाजवादी ही मानते थे. अपनी पत्रिका Co-operative Magzine में Socialist शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग भी राबर्ट ओवेन ने किया था. हालांकि इन दोनों ही शब्दों के पारंपरिक अर्थ इनके वर्तमान अर्थों के अपेक्षा तब थोड़े भिन्न थे. किंतु मूल भावनाएं तब भी लगभग वही थीं, जो कि आज हैं.

प्रारंभिक जीवन

ओवन का जन्म 14, मई 1771 को सेंट्रलवैल्स के एक साधारण-से कस्बे न्यूटाउन में हुआ था. सात भाई-बहनों में से एक ओवेन के पिता साधारण व्यापारी थे. लोहे के औजारों की बिक्री की दुकान थी उनकी. जबकि मां का संबंध एक संपन्न किसान परिवार से था. ओवेन का बचपन घने अभावों के बीच बीता. उसकी शिक्षा की शुरुआत तो ठीक-ठाक हुई मगर वह पूरी हो उससे पहले, मात्रा नौ वर्ष की अवस्था में ही उसे स्कूल छोड़कर नौकरी करनी पड़ी. काम की तलाश में वह अपने सबसे बड़े भाई विलियम के साथ लंदन चला गया. उसको पहली नौकरी लंकाशायर में दर्जी के रूप में मिली. कुछ वर्षों तक ओवेन वहां पर काम सीखता रहा. उससे आगे के नौ वर्ष ओवेन ने नौकरी करते हुए बिताए. धीरे-धीरे उसने कुछ रकम और कुछ सपने भी जमा किए. इस बीच महत्त्वाकांक्षाएं जो परिस्थितिवश कुछ समय के लिए दब गई थीं, वे फिर से सिर उठाने लगीं. भाप के इंजन का आविष्कार उससे कुछ ही वर्षों पहले हुआ था, भापशक्ति से चलने वाले करघों के कारण कपड़ा उद्योग में क्रांति आई हुई थी. इसी कारण मैनचेस्टर के कपड़ा उद्योग का उन दिनों बड़ा नाम था. 1790 के आखिरी महीनों में ओवेन ने अपने बड़े भाई विलियम से सौ पौंड की रकम उधार ली. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का खूबसूरत सपना मन में सजाए एक दिन वह मैनचेस्टर पहुंच गया.
अपनी मामूली-सी पूंजी से उसने जोन के साथ मिलकर एक धागे की जूतियां बुनने के छोटे-से कारखाने की शुरुआत की. जोन उससे पहले मैकेनिक का काम करता था. काम को देखते हुए सौ पौंड की पूंजी बहुत कम थी. बड़ी कंपनियों के साथ कठिन स्पर्धा में ओवेन की मिल टिक नहीं पाई. इस बीच जोन के साथ साझेदारी निभाने में भी समस्याएं आने लगी थीं. इसलिए मात्रा तीन महीने के अंतराल में जोन के साथ अपने साझेदारी तोड़कर ओवेन ने अपने अलग कारखाने की नींव रखी. ओवेन उसे चालू रखने के लिए संघर्ष कर ही रहा था कि मैनचेस्टर के एक बड़े कारखाने में प्रबंधक का पद रिक्त होने की सूचना उसे मिली. उसने अपनी मिल का लालच छोड़ दिया और उस नौकरी पर जा लगा. उस समय उसकी उम्र केवल इकीस वर्ष थी. वह एक प्रकार से सतत संघर्ष एवं सफलता की शुरुआत थी. मेहनती और लगनशील तो वह था ही. छह महीने के अल्प समय में ही वह मिल मालिक के दिलो-दिमाग पर अपनी कार्यशैली का सिक्का जमाने में सफल हो गया.
उस कारखाने में उस समय पांच सौ मजदूर काम करते थे. ओवेन के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी, किंतु उसकी सफलताओं का सही मायने में तो यह प्रारंभ ही था. रात-दिन के कठिन परिश्रम, प्रतिभा और लगन से ओवेन ने उस कारखाने को कुछ ही वर्षों में ब्रिटेन के सर्वश्रेष्ठ कारखानों में ला दिया. ओवेन उद्यमशीलता का अनुमान मात्रा एक उदाहरण से लगाया जा सकता है कि उसने अपने कारखाने के लिए अमेरिकी द्वीपों से रूई का आयात किया. वह दक्षिणी राज्यों से पहला रूई का पहला आयात था.
यही नहीं ओवेन ने रूई कताई के कार्य में भी उल्लेखनीय दक्षता प्राप्त की. निर्विवाद रूप से उसका कारखाना तत्कालीन ब्रिटेन के सर्वश्रेष्ठ कताई कारखानों में से एक था; जिसकी सफलता का श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह केवल ओवेन ही था. इकीस वर्ष का तरुण ओवेन 1795 में मेनचेस्टर के एक ओर बड़ी कपड़ा मिल काल्र्टन ट्विस्ट कंपनी का प्रबंधक और हिस्सेदार बन चुका था; जिससे उसका नाम वहां के सर्वाधिक सफल उद्यमियों में गिना जाने लगा.
उन्हीं दिनों ओवेन को अपनी फैक्ट्री के कार्य से न्यू लेनार्क जाना पड़ा, जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण वस्त्र उद्योग के लिए बहुत ही उपयुक्त स्थान था. तब तक वह एक सुदर्शन युवक बन चुका था. वस्तुतः ओवेन को खबर मिली थी कि न्यू लेनार्क के प्रसिद्ध कपड़ा व्यवसायी डेविड डेल अपनी कपड़ा मिलों का सौदा करना चाहते हैं. डेविड डेल की ख्याति दूरदर्शी एवं कामयाब उद्यमियों में होती थी. ओवेन की ख्याति उन तक पहुंच चुकी थी. उसकी बेजोड़ प्रतिभा और लगनशीलता से डेल चमत्कृत थे. न्यू लेनार्क पहुंचते ही ओवेन के जीवन में एक और सुखद मोड़ आया. डेविड डेल की एक बेटी थी—का॓रोलिना डेल. युवा ओवेन उसके प्यार में पड़ गया. का॓रोलिना भी उसके आकर्षण से बच न सकी. डेविड डेल ने ओवेन के हाथों न केवल कपड़ा मिलों के एक हिस्से का सौदा किया, बल्कि अपनी कन्या का विवाह भी उसके साथ कर दिया. यह सितंबर, 1799 की घटना थी, जिसने ओवेन को एक साथ कई उपलब्धियों से लाद दिया. विवाह के पश्चात ओवेन वहीं अपना घर बनाकर रहने लगा.

एक दूरदृष्टा उद्यमी

न्यू लेनार्क की वह फैक्ट्री डेल और रिचर्ड आर्कराइड ने 1784 में प्रारंभ की थी. फैक्ट्री उस समय न्यू लेनार्क की सबसे बड़ी कपड़ा मिलों में से एक थी; जिसे चलाने के लिए जल-शक्ति का उपयोग किया जाता था. दो हजार से अधिक कर्मचारी उसमें कार्य करते थे; जिनमें से लगभग पांच सौ गरीब परिवारों के बच्चे थे. बच्चों में भी अधिकांश की आयु पांच से छह वर्ष के बीच थी. यही स्थिति उन दिनों अधिकांश कपड़ा मिलों में थी. डेविड डेल यद्यपि बालश्रमिकों का पूरा ध्यान रखते थे, लेकिन कोई कारगर व्यवस्था न होने के कारण मजदूरों, विशेषकर बालश्रमिकों की दशा शोचनीय बनी हुई थी. अधिकांश कामगार बेहद गरीब, अशिक्षित परिवारों से संबद्ध थे. अशिक्षा, कुंठा और हताशा के कारण चोरी, जुआ, शराब और नशाखोरी जैसी अनेक कुरीतियां उनके जीवन में प्रवेश कर चुकी थीं. घर के नाम पर उन सभी के पास एक-एक कमरा होता था, छोटा-सा और गंदा भी, जिसमें स्वच्छ हवा का प्रवेश भी असंभव था. बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था तो दूर बीमारों के इलाज के लिए भी कोई इंतजाम नहीं था.
उस समय तक ओवेन खूब संपन्नता एवं समृद्धि बटोर चुका था. विवाह के पश्चात उसके आत्मविश्वास में वृद्धि भी खूब हुई. परंतु ओवेन की महत्त्वाकांक्षाओं का अंत अभी दूर था. उसके भविष्य की रूपरेखा इसी आत्मविश्वास के आधार पर तय होनी थी, क्योंकि यह उसका आत्मविश्वास ही था जिसने उसे कठोर फैसले लेने की प्रेरणा दी, जिससे वह आजीवन अपने विचारों एवं उद्देश्यों के लिए संघर्षरत रह सका. अपने क्रांतिकारी फैसलों के लिए ओवेन ने अपने सरकार और उद्योगपतियों की आलोचनाएं सहीं. उसके हिस्सेदार उसे छोड़कर चले गए. करोड़ो रुपये की संपत्ति जो उसने कठिन परिश्रम से अर्जित की थी, धीरे-धीरे उसकी कल्याणकारी योजनाओं की भंेट चढ़ गई. लेकिन इतिहास में अलग चलने, नया कार्य करने, आने वाली पीढ़ियों के लिए नए प्रतिमान गढ़ने वाले महापुरुषों के लिए यह कोई नया नहीं है. इतिहास का दरबार ऐसी ही चुनौतियों को पार करने वाले महापुरुषों को सहेजने में गर्वानुभूति करता है.
ओवेन कोरा व्यवसायी नहीं था. उसके पास खूबसूरत और संवेदनशील मानस भी था, जो दूसरों को कष्ट में देखते ही विचलित हो उठता था. वह स्वयं गरीब परिवार से आया था. इस कारण गरीबी की विवशताओं और कष्टों से वह भली-भांति परिचित था. उन दिनों न्यू लेना॓र्क में जहां बड़े-बड़े कारखानों की भरमार थी, वहीं उसके आसपास गरीब मजदूरों की छोटी-छोटी अनेक बस्तियां भी बसी हुई थीं. वहां का जीवन नारकीय था. ओवेन को लग रहा था कि उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि कारीगरों और मजदूरों के रहन-सहन तथा उनकी परिस्थितियों में सुधार किए बिना संभव नहीं है. इसलिए उसने अपने जीवन के अगले दस वर्ष मजदूरों की हालत सुधारने के नाम कर दिए. उसने मजदूरों की आवास-बस्तियों का उद्धार किया. उन बस्तियों में स्वयं जा-जाकर मजदूरों की गंदी आदतों को छुड़ाने का प्रयास किया. बालश्रमिकों के कार्य-घंटे कम कर, उनकी शिक्षा एवं मनोरंजन का प्रबंध किया. महिला मजदूरों के लिए अलग विश्रामघर और प्रसूति-केंद्रों की व्यवस्था की. इन प्रयासों से एक ओर तो मजदूरों के जीवन में सुधार आया, अभी तक जो मजदूर औद्योगिकीकरण को संदेह की दृष्टि से देखते थे, उनके विचारों में परिवर्तन भी हुआ. नई व्यवस्था के प्रति उनका आक्रोश कम होने लगा.
परिणामतः उत्पादन बढ़ा, उसका लाभ भी ओवेन को मिला. ध्यातव्य है कि ओवेन द्वारा अपने कर्मचारियों के कल्याण के लिए जितने भी कदम उठाए गए उनके पीछे उसकी विशुद्ध व्यावसायिक दृष्टि थी. एक दक्ष उद्यमी की भांति वह स्थितियों का अपने पक्ष में मोड़ लेने में पारंगत था. कार्ल मार्क्स के सहयोगी और मार्क्सवादी विचारक फ्रैड्रिक ऐंग्लस ने अपने चर्चित लेख—Socialism: Utopian and Scientific में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि—
‘विकास एवं श्रमिक-कल्याण के नाम पर ओवेन द्वारा अभी तक जितने भी कदम उठाए गए थे, वे सभी मानवीय गरिमा से परे, केवल दिखावटी थे. ‘लोग मेरी दया पर निर्भर, मेरे दास के समान हैं.’— ओवेन का यही सोचना था. तुलनात्मक रूप में उसने अपने कर्मचारियों को बेहतर वातावरण उपलब्ध कराने के प्रयास तो किए, मगर वे उनके व्यक्तित्व एवं बुद्धि के चहुमुंखी विकास से काफी दूर थे. उन्हें अपने विवेक का इस्तेमाल करने की छूट बहुत कम, विशिष्ट संदर्भों तक सीमित थी.
ओवेन पर सुधारवादियों का प्रभाव पड़ा था. वह मेनचेस्टर की Literary and Philosophical Society का सम्मानित सदस्य था. स्काटिश नवजागरण आंदोलन से प्रभावित ओवेन का मानना था कि मनुष्य का व्यक्तित्व उसके वातावरण से प्रभावित एवं विनिर्मित होता है. इसलिए वातावरण में सुधार द्वारा व्यक्तित्व का परिष्कार किया जा सकता है.
‘शिक्षा नैतिक जगत से संपर्क कराने वाला इंजन है.’ शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करती किसी इतिहासकार की इस उक्ति का वह समर्थक था. व्यक्तित्व निर्माण के लिए शिक्षा की अनिवार्यता दर्शाते हुए उसने कहा था कि—
‘मनुष्य का व्यक्तित्व उसके वातावरण से प्रभावित होता है. अतः विवेकवान एवं मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत व्यक्तित्व के निर्माण के लिए शिक्षा का योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है. इसलिए शिक्षक का पहला कर्तव्य है कि बालक के मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए पूर्णतः अनुकूल वातावरण की सरंचना करे.’
उन दिनों अधिकांश कारखाना मालिकों द्वारा अपने मजदूरों को नकद मजदूरी देने के बजाए वस्तुविनिमय प्रणाली के आधार पर भुगतान किया जाता था. तदनुसार मजदूरों को टोकन दे दिए जाते थे; जिनकी कारखाना मालिकों के समूह से बाहर कोई कीमत न थी. उन टोकन के बदले मजदूर तयशुदा दुकानों से आवश्यक वस्तुएं खरीद सकते थे. मजदूरों की विवशता का लाभ उठाने के लिए उन दुकानों पर भी उनका खुला शोषण होता था. वहां मिलने वाला सामान घटिया और बाजार की अपेक्षा महंगा होता था. उस कुरीति के विरुद्ध आवाज उठने लगी तो, ब्रिटिश संसद ने गैरकानूनी करार देते हुए उसपर रोक लगा दी थी.
मजदूरों की समस्या को देखते हुए ओवेन ने एक उपभोक्ता केंद्र की शुरुआत की जहां अच्छी गुणवत्ता का सामान लागत-मूल्य से कुछ ही ऊपर का भुगतान करने पर प्राप्त हो सकता था. उसने मजदूरों के चारित्रिक विकास के लिए भी आवश्यक कदम उठाए. यह जानते हुए कि मजदूर अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा शराब तथा नशे की अन्य वस्तुओं पर लुटा देते हैं, ओवेन ने उनकी बिक्री को कड़े नियंत्रण में रख दिया. यही नहीं ओवेन ने अपने कामगारों को उपभोक्ता भंडारों से थोक खरीद के लिए भी प्रोत्साहित किया; जिससे वे अधिक बचत कर सकें. बचत पर जोर देते हुए उसने मजदूरों को कठिन समय के लिए अपनी आय का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से बचाने के लिए कहा. बालश्रमिकों के लिए उसने बेहतर परिस्थितियों का सृजन किया. उनके कार्यघंटे सुनिश्चित किए तथा अनिवार्य शिक्षा के लिए पाठशालाएं खुलवाईं. ओवेन के उपभोक्ता भंडार को पर्याप्त सफलता मिली. उसी ने आगे चलकर सहकारी क्षेत्र के उपभोक्ता आंदोलन को प्रेरित किया. हालांकि सहकारिता पर आधारित उपभोक्ता केंद्रों की सफल शुरुआत उसके लगभग चार दशक पश्चात हो सकी, जब रोशडेल पायनियर्स ने लंदन के टोडलेन इलाके में पहला उपभोक्ता केंद्र स्थापित किया.
उन दिनों मिल मजदूरों को प्रतिदिन कम से कम ग्यारह घंटे लगातार कार्य करना पड़ता था. ओवेन ने उसमें एक घंटा प्रतिदिन की कटौती कर दी. तत्कालीन परिस्थितियों में यह कदम साहसपूर्ण होने के साथ-साथ चामत्कारिक भी था. उसके इस कदम का दूसरे उद्योगपतियों ने जमकर विरोध किया. पूंजीपतियों द्वारा पोषित समाचारपत्र-पत्रिकाओं में ओवेन के इस कदम की आलोचना करने वाले लेख छापे गए. इससे घबराए बिना ओवेन ने दस वर्ष से छोटे बच्चों के अपनी मिल में काम करने पर पाबंदी लगा दी. मिल-मजदूरों के लिए कल्याण सुविधाओं का विस्तार करते हुए उसने उन्हें कारखाने में ही आवास सुविधाएं प्रदान कीं. साथ ही अस्पताल, विश्रामालय और मनोरंजनगृहों की स्थापना की.
उन दिनों काम के दौरान हुई गलतियों का खामियाजा मजदूरों को ही भुगतना पड़ता था, जिससे उनके वेतन का बड़ा हिस्सा नुकसान की भरपाई में ही निकल जाता था. ओवेन ने ऐसे जुर्माने की परंपरा को समाप्त कर दिया, जिसका दूसरे उद्योगपतियों ने काफी विरोध किया. मगर ओवेन अपने निर्णय पर अटल रहा.
ओवेन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करना था. उसने शिशु पाठशालाओं की स्थापना की और सहकार का जन्मदाता होने के साथ-साथ वह शिशु शिक्षा कार्यक्रम का प्रवर्त्तक बना. पांच साल के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य करते हुए उसने एक क्रांति का शुभारंभ किया. यह सब ओवेन ने केवल अपनी आंतरिक प्रेरणा के आधार पर शुरू किया था; जिसका मजदूरवर्ग की ओर जोरदार स्वागत किया गया. ध्यान देने की बात है कि मजदूरों के लिए आवास-बस्तियों के निर्माण, अस्पताल, विश्रामालय, मनोरंजनगृहों तथा शिशु पाठशालाओं के निर्माण पर ओवेन का बहुत-सा धन खर्च हो रहा था. मजदूर कल्याण कार्यक्रमों पर उससे पहले इतना बड़ा निवेश किसी ने नहीं किया था. इसलिए प्रारंभ में लोगों को ओवेन का व्यवहार पागलपन जैसा लगा. विरोधी ओवेन का मजाक उड़ाते, अपने पूर्वाग्रह से भरे मस्तिष्क में उसके एक दिन दिवालिया होने के मंसूबे सजाते. किंतु समय के साथ-साथ लोगों को सब समझ में आने लगा. मजदूर कल्याण कार्यक्रमों में लाखों पाउंड खर्च कर देने के बावजूद ओवेन की फैक्ट्रियां लगातार मुनाफा उगल रही थीं, बल्कि उसके लाभ में निरंतर वृद्धि हो रही थी. साथ ही उसकी लोकप्रियता और प्रसिद्धि में भी निरंतर इजाफा हो रहा था.
ओवेन की कुछ योजनाएं बेहद खर्चीली सिद्ध हुईं थीं. जिससे उसके हिस्सेदारों ने विरोध करना प्रारंभ कर दिया. साझीदार कारखाने को सामान्य तरीके से चलाना चाहते थे. उनसे तंग आकर ओवेन ने एक नई कंपनी की शुरुआत की, जिसमें उसने व्यवस्था की थी कि मुनाफे का बीसवां हिस्सा तयशुदा लोकहितैषी कार्यक्रमों पर खर्च किया जाएगा. जेरेमी बैंथम, विलियम एलेन नई कंपनी में ओवेन के साझेदार बने. ऐसे विचारकों के साथ मिल जाने से ओवेन के जनहितैषी कार्यक्रमों को व्यापक लोकप्रतिष्ठा मिलनी निश्चित ही थी. इस बीच में ओवेन वैचारिक रूप में भी परिपक्व हुआ था. बैंथम के विचारों से वह पहले ही प्रभावित था. अपने विचारों को अभिव्यक्ति देते हुए उसने एक लंबा लेख New View of Society, Or, Essays on the Principle of the Formation of the Human Character, and the Application of the Principle to Practice (1813-16) लिखा. कई किश्तों में लिखी गई उस लेखमाला में ओवेन के समाजवादी विचारों की झलक एकदम साफ थी. समाजवाद के प्रति ओवेन की आस्था आगे भी बढ़ती ही गई. बैंथम मुक्त बाजार-व्यवस्था का समर्थक था. उसका मानना था कि मजदूरों को यह अधिकार हो कि वे अपने लिए अपने पसंदीदा व्यापारी या उत्पादक को चुन सकें. उसपर किसी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष दबाव नहीं होना चाहिए.
तब तक ओवेन की ख्याति बहुत बढ़ चुकी थी. साथ में स्थानीय प्रशासन पर उसका प्रभाव भी. सुधार कार्यक्रमों का उद्योगपतियों की ओर से निरंतर होते विरोध से भी वह विचलित नहीं हुआ. उलटे उसने श्रमिक-अधिकारों के संरक्षण के लिए वैधानिक व्यवस्थाएं करने के अपने प्रयास तेज कर दिए. बालश्रमिकों के कार्य-घंटों को घटाने के लिए भी ओवेन ने भरपूर प्रयास किए. परंतु इस काम में केवल नाकामयाबी ही उसके हाथ लगी; क्योंकि तब तक यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर उद्योगपति और उनके समर्थक अधिकारीगण ओवेन के प्रखर विरोधी बन चुके थे. तब तक ओवेन की ख्याति ब्रिटेन की सीमाओं को लांघकर बाहर जा चुकी थी. श्रमिक कल्याण की वांछा रखने वाले देश, ओवेन के लोकहितैषी कार्यक्रमों का क्रियान्वयन अपने यहां करना चाहते थे. रूस, हालेंड, प्रशा के तत्कालीन शासकों ने ओवेन के परामर्श के अनुसार मजदूर सुधार-कार्यक्रम शुरू कर दिए थे.
ओवेन के सुधार-कार्यक्रमों को मजदूर वर्ग की ओर से भरपूर समर्थन मिला था. उसके कारखानों का मुनाफा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा था. दूसरे उद्योगपति जो ओवेन के सुधार कार्यक्रमों को उसका आत्मघाती कदम बता रहे थे, ओवेन ने एक ही साल में साठ हजार पौंड कमाकर उनकी बोलती बंद कर दी. उसने दिखा दिया कि धनार्जन के लिए शोषण, बेईमानी अथवा गलाकाट प्रतियोगिता ही आवश्यक नहीं है. यदि दूरंदेशी से कार्य किया जाए तो सहयोग और पारस्परिक सहानुभूति से भी प्रगति के लक्ष्य की प्राप्ति संभव है.
ओवेन धर्म के नाम पर थोपी जा रही जड़ मान्यताओं से भी क्षुब्ध था. उसका यह मानना था कि जीवन में धर्म का अतिरेक पूर्ण हस्तक्षेप मनुष्य को तार्किक निर्णय लेने से रोकता है. कि मजदूर वर्ग की दयनीय स्थिति का कारण वे रूढ़ियां भी हैं, जिन्हें वह धर्म के नाम पर पाले हुए है. इसलिए अपने लेखों में उसने धार्मिक मान्यताओं की जमकर आलोचना की थी. परिणाम यह हुआ कि पादरी और धर्मसत्ता पर असीन दूसरे प्रभावशाली लोग उसके विरुद्ध लामबंध होने लगे. अपने कल्याण कार्यक्रमों के कारण वह पूंजीपति वर्ग को पहले ही नाराज कर चुका था. इसलिए स्वार्थी उद्यमियों तथा धर्म के ठेकेदारों ने ओवेन के विरुद्ध अभियान की शुरुआत कर दी. प्रकारांतर में इससे ओवेन की प्रतिष्ठा को धक्का लगा.
ओवन सही मायने में एक महान स्वप्नदृष्टा था. एक बेहतर दुनिया का सपना उसकी आंखों में सदैव झिलमिलाता रहता था. जीवन के प्रारंभिक वर्षों में ही धर्म के उसकी आस्था समाप्त हो चुकी थी. उसका मानना था कि स्वर्ग जैसी स्थितियां धरती से परे संभव ही नहीं है. बड़े लोग यदि थोड़े से त्याग और दूरदर्शिता से काम लें तो इस धरती को ही स्वर्ग समान बनाया जा सकता है. उसके सोच का आधार यह था कि मनुष्य अपना व्यक्तित्व स्वयं नहीं, अपितु स्वयं के लिए बनाता है यानी उसकी उपलब्धियों एवं व्यक्तित्व के निर्माण में किसी न किसी प्रकार दूसरों का भी योगदान होता है. अतः यह मनुष्य का कर्तव्य है कि बाकी लोगों के साथ पूरा-पूरा सहयोग करे ताकि अधिकतम लोगों का भला हो सके.
स्वप्नदृष्टा होने के साथ वह संकल्पवान भी था. उसने अपनी आलोचना की परवाह किए बिना अपनी योजनाओं पर काम किया. मजदूर कल्याण के कार्यक्रमों के अतिरिक्त उसने बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य घोषित कर बाल शिक्षा संस्थानों का आदि प्रवत्र्तक होने का श्रेय लिया. समाज की बेहतरी के लिए उसने और भी अनेक प्रयोग किए; जिनमें पूंजी के साथ-साथ बहुमूल्य समय भी लगा. हालांकि विरोधियों के कारण ओवेन को यद्यपि अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी, मगर असफल रहकर भी उसने उन रास्तों का अन्वेषण किया जिस पर भविष्य की अनेक विकासगाथाएं लिखी जानी थी—और आगे जिनका अनुसरण पूरी दुनिया को करना था.
सन् अठारह सौ पंद्रह में आर्थिक मंदी का दौर चला. ओवेन के लिए सुधार कार्यक्रमों को आगे चलाना कठिन हो गया. इसलिए उसको अपने कार्यक्रम कुछ दिनों के लिए स्थगित करने पड़े. तब तक ओवेन के व्यवस्था की खामियों से परिचित हो चुका था. उसे लग रहा था कि पूंजीवादी व्यवस्था और शोषण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. पूंजीवादी व्यवस्था के परवान चढ़ने के लिए जरूरी है कि समाज में असंतोष और दिशाहीनता हो. भूख, बेकारी, गरीबी और निरक्षरता जो आम आदमी को बेबस बनाते हों, एक कामयाब उद्योगपति के लिए मुनाफे का महल खड़ा करने में सहायक होते हैं. जनता की अज्ञानता और दिगभ्रमता पूंजीवाद के विस्तार के लिए उत्प्रेरक बन जाती हैं. उसको अपने समय की सामाजिक-आर्थिक विषमता देखकर उसके लिए जिम्मेदार व्यवस्था से ऊब और निराशा होने लगी थीं. उसे विश्वास हो चला था कि बेहतर कल के लिए व्यवस्था में आमूल परिवर्तन अत्यावश्यक है. इसलिए कि वर्तमान व्यवस्था पूंजी के केंद्रीयकरण और तज्जनित शोषण को बढ़ावा देने वाली है. ओवन की मनःस्थिति उसी के इन शब्दों से सहज उजागर हो जाती है—
‘मैं अपने लंबे जीवन में व्यापार, उत्पादन और वाणिज्य के विभिन्न वस्तुओं का अनुभव प्राप्त कर चुका हूं. मूझे पूरा विश्वास है कि इस स्वार्थपूर्ण व्यवस्था से किसी श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण संभव नहीं है.’
यह उस संघर्षशील, स्वप्नदृष्टा, कर्मठ और दूरदृष्टा उद्यमी के विचार थे जो अपनी उद्यमशीलता का लोहा देश-विदेश में मनवा चुका था. वह भी अपने अद्वितीय सुधार-कार्यक्रमों के चलते, जिसमें उसने अपने धन और संसाधनों का व्यय किया था. जाहिर है कि पूंजीवादी व्यवस्था की समस्त खामियां ओवेन के सामने आ चुकी थीं. उसको विश्वास हो चला था कि जिस प्रगतिगामी समाज का बिंब उसकी आंखों में है, वह पूंजीवादी व्यवस्था के द्वारा अथवा उसके समर्थन से संभव ही नहीं है. जो व्यवस्था स्वयं शोषण एवं असामानता के ऊपर टिकी हो, वह शोषण-मुक्त और समानता पर आधारित सामाजिकता की वाहक नहीं हो सकती. उसका विश्वास था कि मनुष्य अपने पर्यावरण से प्रभावित होता है, अतः पर्यावरण के बदलाव के साथ उसके व्यक्तित्व में बदलाव भी संभव है. हालांकि उसके विचारों में कहीं-कहीं अंतर्विरोध भी देखने को मिलते हैं. पूंजी-पे्ररित वर्चस्ववाद की आलोचना करते हुए फ्रांसिसी विद्वान फ्यूरियर ने कहा था कि—
‘निर्धनता, सभ्यता के क्रम में मनुष्य की अंतहीन लालसाओं का दुष्परिणाम है.’
व्यापारिक मंदी के दौर से गुजरते हुए ओवेन द्वारा 1816 में की गई टिप्पणी उसकी पूंजीवादी मनोवृत्ति का प्रतीक है. उसने कहा था कि—
‘हमारा सर्वोत्तम ग्राहक युद्ध, अब समाप्त हो चुका है.’
ओवेन को तत्कालीन फैक्ट्री सिस्टम से घृणा थी. उसका मानना था कि इस उत्पादन व्यवस्था ने सामाजिक गैरजिम्मेदारी, विध्वंसक स्पर्धा एवं हृदयविहीन व्यक्तिवाद को जन्म दिया है. उसका विचार था कि सामाजिक तनाव का एक कारण मानवीय श्रम और मशीनों की अवांछित, अनियंत्रित स्पर्धा भी है. इसका हल यही है कि मनुष्य संगठित होकर मशीनों का सहयोग लेते हुए उत्पादन कार्य करे. इसलिए उसने अपने श्रमिकों जीवन-स्तर में सुधार लाने के लिए कई कदम उठाए. यही नहीं उच्च गुणवत्ता के महत्त्व को स्वीकारते हुए उसने उन कर्मचारियों को विशेष लाभ एवं प्रोत्साहन देने का काम प्रारंभ किया जो बेहतर गुणवत्ता का माल बनाने में निपुण थे. उसके कारखाने में प्रत्येक मशीन के बराबर में विभिन्न रंगों के घनाकार टुकड़े रख दिए जाते थे. घन के रंग से बन रहे माल की गुणवत्ता की कोटि निर्धारित की जाती थी. इससे कारीगर को अपने काम के स्तर का पता होता था. उसी के आधार पर प्रोत्साहन राशि का भुगतान किया जाता था. स्पष्ट है कि उस समय ओवेन के कारखानों में कार्य का स्तर और उसकी परिस्थितियां दूसरे कारखानों के अपेक्षा बेहतर, लगभग आदर्श अवस्था में थीं.
पूंजीवादी व्यवस्था से मोहभंग के पश्चात ओवेन ने वर्गहीन और समानता पर आधारित समाज की स्थापना के लिए कुछ नए और तत्कालीन परिवेश में अनोखे कदम उठाए. ऐसे कदम जिनसे समाज के सपंन्न तथा समृद्धिशाली वर्ग की जिम्मेदारी सुनिश्चित होती हो. इस संबंध में ओवेन की विचारधारा बिल्कुल साफ एवं सरल थी. अपनी पहले निबंध—New View of Society, जो आगे चलकर पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, में अपनी योजना की ओर संकेत करते हुए लिखा था—
‘एक सरल, साधारण और पूर्णतः व्यावहारिक योजना, जिससे किसी व्यक्ति या समाज के किसी हिस्से को जरा भी नुकसान ना हो.’
ओवेन का विचार था कि लगभग बारह सौ व्यक्तियों की सामूहिक बस्तियां बसाई जानी चाहिए. हरेक बस्ती के पास चार से छह वर्ग किलोमीटर का परिक्षेत्र हो, जिसमें सामूहिक रसोई, भोजनालय एवं स्नानग्रह आदि की व्यवस्था हो. उनमें से प्रत्येक परिवार के पास आवास के लिए स्वतंत्र रूप से एक कमरा हो. तीन साल तक के बच्चे अपने माता-पिता के साथ रह सकते हैं. उससे बड़े बच्चों को समुदाय का सदस्य माना जाए. लेकिन परिपक्व होने तक माता-पिता उन्हें भोजन-वस्त्र आदि की देखभाल की जिम्मेदारी का निर्वाह कर सकते हैं. मगर उसका खर्च समुदाय द्वारा वहन किया जाए. इस तरह की बस्तियां व्यक्तिगत अथवा सामूहिक प्रयास से बसाई जा सकती हैं. जिम्मेदार पूंजीपति तथा राज्य सरकारें भी इस काम को कर सकते हैं.
ओवेन ने इन बस्तियों को ‘सहकार के गांव’ की संज्ञा’ दी थी. इन गांवों में किसान बस्तियां भी शामिल थीं. कोई भी बेरोजगार व्यक्ति इन बस्तियों में जाकर अपनी योग्यतानुसार किसी भी उत्पादक कार्य से जुड़ सकता था. उसका विश्वास था कि भविष्य में ऐसी बस्तियों का तीव्रता से विकास होगा तथा कुछ ही वर्षो में ये पूरे ब्रिटेन में फैल जाएंगी. क्योंकि एक तो ये परस्पर संगठित श्रम (Cooperative Labor) पर आधारित हैं. दूसरे इनकी उत्पादकता पूंजीवादी फैक्ट्रियों की अपेक्षा अधिक है. इस योजना से ओवेन की निष्ठा झलकती थी. किंतु कालांतर में ओवेन का यह आकलन गलत सिद्ध हुआ. क्योंकि ‘सहकार ग्रामों’ की स्थापना के लिए जितने धन की आवश्यकता थी, वह न तो सरकार की ओर से प्राप्त हो सका था, न ही कोई उद्यमी संस्थान इस कार्य को विस्तार देने के लिए आगे आया. विडंबना यह रही कि श्रमिक नेता जो अपने वर्गीय हितों की देखभाल का दम भरते थे, उसके लिए आंदोलन और संघर्ष करने तक का जिनका दावा था, उन्होंने भी श्रमिक कल्याण की ओवेन की इस योजना को अधिक महत्ता नहीं दी. वे ओवेन के प्रयासों को संदेह की दृष्टि से ही देखते रहे. क्योंकि उनकी निगाह में ओवेन भी एक पूंजीपति ही था.
तो भी यह ओवेन की सफलता ही मानी जाएगी कि उसके द्वारा बसाई गई बस्तियां सहजीवन के आदर्श पर बसी थीं. जहां समस्त फैसलों तथा उत्पादन के साधनों पर सामूहिक अधिकार था. यह कम प्रशंसनीय नहीं है कि सहजीवन के आधार पर ओवेन द्वारा बसाई गई बस्तियों की संख्या 2500 तक जा पहुंची थी, जिनमें पुलिस, न्यायालय, कानूनी विवाद, जुआ तथा अन्य कुरीतियों के लिए कोई स्थान नहीं था. शिशुओं के लिए नियमित पाठशालाएं थीं, जहां उनकी शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था थी. मुफ्त औषधालय, विश्रामकेंद्र आदि बनाए गए थे. हीगेल के द्वंद्ववाद के सिद्धांत के आधार पर समाज की समस्याओं का हल ढूंढने वाले कार्ल मार्क्स आदि समाजवादियों ने हालांकि ओवेन की योजनाओं से असहमत थे. उन्होंने उसकी आलोचना की थी, किंतु उन्हीं के सहयोगी फ्रैडरिक ऐंग्लस ने अपने एक लेख में ओवेन के प्रयासों के क्रांतिकारी परिणाम की सराहना करते हुए लिखा है, कि—
‘ओवेन के प्रतिस्पर्धी कारखानों के कामगार को दिन-भर में जहां तेरह से चैदह घंटे काम करना पड़ता था, वहीं न्यू लैनार्क में ओवेन के कारखाने के मजदूर आधे घंटे के भोजनावकाश सहित मात्र साढे़ दस घंटे काम करते थे. यहां तक कि जब कपास की अनुपलब्ध्ता के कारण जब कारखाने को चार महीनों तक बंद रखना पड़ा, तब भी ओवेन ने अपने मजदूरों को उस अवधि के वेतन का भुगतान किया था.’
यह घटना 1806 की है, अपने इस कदम के कारण ओवेन को लगभग सात हजार पाउंड बिना किसी उत्पादन के खर्च करने पड़े थे. सहजीवन पर आधारित आदर्श बस्तियों की स्थापना के कारण न्यू लेनार्क की ख्याति पूरी दुनिया में फैल चुकी थी. उस समय ओवेन अपने समय के सर्वाधिक चर्चित व्यक्तियों में से था. पूरी दुनिया में उसके प्रयोगों की चर्चा हो रही थी. उसकी ख्याति का अनुमान मात्र इस उदाहरण से लगाया जा सकता है कि सन 1805 से लेकर 1815 तक मात्र एक दशक में न्यू लेनार्क में, वहां की स्थिति और सामाजिक-आर्थिक बदलावों का अध्ययन करने के लिए, लगभग पंद्रह हजार सैलानी, पर्यवेक्षक पहुंचे थे. समाचारपत्र पत्रिकाओं में वहां के विशिष्ट अध्ययन पर लेख छापे गए थे, जिनमें ओवेन के प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की गई थी.
बावजूद इसके ओवेन को अंततः निराशा ही हाथ लगी. इसमें हालांकि कुछ भौगोलिक परिस्थितियां भी सम्मिलित थीं. इसका पहला कारण तो यह कि न्यू लेनार्क में भाप ऊर्जा के स्थान पर जलऊर्जा का उपयोग किया जाता था, जो कतिपय पुरानी तकनीक थी. जिसमें मजदूरों को अधिक परिश्रम करना पड़ता था. हालांकि रोजी-रोटी की तलाश में बाहर से आए कारीगर इतनी जल्दी हताश होने वाले नहीं थे, फिर भी उनमें से कुछ को आधुनिक तकनीक ललचाने लगी थी. जिससे वे भाप ऊर्जा से चलने वाली मशीनों पर कार्य करने को वरीयता देने लगे थे. संक्षेप में हम कह सकते हैं कि न्यू लेनाॅर्क जैसे किसी समय में कपड़ा उद्योग में दुनिया-भर में नाम कमा चुके स्थान पर तकनीक के पिछड़ेपन ने भी लोगों को उस ओर से उदासीन बनाया था—
इन सब खूबियों-कमजोरियों के कारण न्यू लेनार्क समाजवादी व्यवस्था का आदर्श मा॓डल नहीं बन पाया. इसलिए कि मामूली लोकतांत्रिक छोंक के साथ उसपर ओवेन तथा उसके अन्य साझेदारों का सम्मिलित स्वामित्व था. यद्यपि ओवेन ने कुछ मानवीय कदम उठाए थे, बावजूद इसके एक आम उद्यमी की भांति उसके मन में भी लाभ की कामना थी. साथ ही उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व बना हुआ था. इसलिए न्यू लेनार्क की असफलता को समाजवादी मा॓डल की असफलता नहीं माना जा सकता. दरअसल इसका कारण ओवेन का पित्रसत्तावादी मानवबोध था. एक ओर तो वह बदलाव चाहता था और दूसरी और लाभ की वांछा भी रखता था और उद्योगों पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहता था, जो समाजवादी आदर्श के विपरीत थी. एक और कारण यह भी रहा कि न्यू लेनार्क में कार्य करने वाले मजदूर भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमियों से आए थे. उनकी संस्कृति और विचारधारा अलग-अलग थीं, मजदूरों का एक वर्ग स्का॓टिश मूल के केल्विनवादियों का था, जिसका झुकाव अनुशासन, निर्दोष श्रम तथा आत्मपरिष्कार की ओर था.
न्यू लेनार्क में ओवेन को अंततः असफलता का सामना करना पड़ा. लेकिन यह अकेले ओवेन की या उसके विचारों की असफलता नहीं थी. बल्कि यह ओवेन के उस विश्वास की हार थी, जिसके आधार पर वह यह सोच बैठा था कि उसकी तरह ही बाकी उद्यमी भी आवश्यकता पड़ने पर आगे आएंगे. उसके बाद सहजीवन पर आधारित बस्तियों बसाने की गति तीव्र होने और समय नहीं लगेगा.

क्रमश:….
© ओमप्रकाश कश्यप

डा॓. विलियम किंग : गरीबों का डा॓क्टर

[बेहद साधारण परिवार में जन्मे विलियम किंग की ईसाई धर्म में पूरी आस्था थी. वह अत्यंत उदार, संवेदनशील और दूसरों की मदद करने वाला इंसान था. परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए उसने डा॑क्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण की. उस समय यदि वह चाहता तो किसी विकसित शहर में क्लीनिक खोलकर खूब कमाई कर सकता था, वे समस्त सुविधाएं जुटा सकता था, जिन्हें उन दिनों ब्रिटेन के उच्च-मध्यम वर्ग की शान समझा जाता था. किंतु यह सब करने के बजाय उसने लोककल्याण का रास्ता चुना, और अपना पूरा जीवन उसी को समर्पित कर दिया. उसने ब्रिझटन नामक कस्बे को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, जो उन दिनों तेजी से औद्योगिक शहर के रूप में ढलता जा रहा था, वहां बड़ी संख्या गरीब मजदूर और कारीगर निवास करते थे. किंग ने उनके जीवन को करीब से देखा था. उसने अपने पेशे को सेवा का माध्यम बनाया. जिन मजदूरों के तन पर कपड़ा, पेट को रोटी नहीं होती थी, ऐसे मजदूरों का वह न केवल निःशुल्क उपचार करता, बल्कि उन लोगों को आत्मकल्याण हेतु संगठित होने की प्रेरणा भी देता था. गरीब मजदूरों के कल्याण के लिए उसने समितियां बनाईं, समाचारपत्र निकाला. और श्रमपूर्वक कमाई गई अपनी समस्त पूंजी मजदूरों के कल्याण में लगा दी. उसका सूत्रवाक्य था—‘एकता बिना संगठन नि:शक्त : विवेक बगैर एकता व्यर्थ.’* अपने समकालीन प्रूधों, फ्यूरियर की तरह मौलिक विचारक न होते हुए भी सहकारिता और समाजवादी विचारधारा को जनमानस में लोकप्रिय बनाने वाले विद्वान मनीषियों में विलियम किंग का योगदान अविस्मरणीय है. {*Numbers without union are powerless. And union without knowledge is useless.—ओमप्रकाश कश्यप}]

किंग ग्यारहवीं शताब्दी के प्रखर विचारक पीटर अबेला॓र्ड ने लिखा है—

‘संदेह के द्वारा हम जांच-पड़ताल तक पहुंचते हैं, और जांच-पड़ताल हमें सचाई की तह तक ले जाती है.’

आदिकाल में भी संदेह की प्रवृत्ति ही थी, जिसने मनुष्य के लिए ज्ञान के अनगिनत दरवाजे खोले, उसके लिए विकास के नए अवसर उपलब्ध कराए, जिससे वह एक के बाद प्रकृति के रहस्यों से पर्दा हटाता गया. उसी के आधार पर सभ्यता की नींव रखी गई, देवी-देवताओं, पीर-पैगंबरों को गढ़ा गया. ज्ञान-विज्ञान फलस्वरूप धर्म एवं राजनीति पर केंद्रित सत्ताओं का जन्म हुआ. नई व्यवस्थाएं और नियम बनाए गए. संदेह की प्रवृत्ति जैसी हो, जैसा कौतूहल हो वैसा ही ज्ञान का उद्भव होता है. सभ्यता के आरंभ में मनुष्य के मन में प्रकृति और जीवन-जगत के रहस्यों से पर्दा हटाने की आकुलता थी, इसलिए वह प्रकृति की प्रत्येक घटना को कौतूहल और संदेह की दृष्टि से देखता था. संयोगों के बीच तालमेल बिठाकर वह नई-नई परिकल्पनाएं करता, फिर उनके बीच तादात्म्य के आधार पर नई स्थापनाएं भी गढ़ लेता था.

सभ्यता के क्रम में जब उसने छोटे-बड़े का भेद, ऊंच-नीच का अंतर, मान-मयार्दाओं में असमानता और धार्मिक-आर्थिक आधार पर मनुष्य को अनेक खानों में बंटे हुए पाया, तो मानव-मस्तिष्क में उनके कारणों को जानने की आकुलता बढ़ी. जब उसने पाया कि सभ्यता को सुचारू रूप से चलाने के लिए उसने जो नियम बनाए थे, जिन सामाजिक संबंधों के द्वारा वह सभ्यता को स्थायित्व प्रदान का सपना पाले हुए था, जिन व्यवस्थाओं को उसने अपनी सुख और शांति की खातिर गढ़ा था, उन्हीं का सहारा लेकर समाज का एक वर्ग शिखर पर जा बैठा है; और अब अपनी स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए वह वर्ग मनमानी पर उतारू है, कहीं वह दूसरों के अधिकारों का हनन कर रहा है, कहीं लूट-खसोट में लगा हुआ है. दूसरा वर्ग पहले के अन्याय-उत्पीड़न से दबा मुक्ति के लिए छटपटा रहा है, उसकी स्थिति दयनीय है. रात-दिन खटने के बावजूद वह अपने परिवार के लिए भरपेट भोजन का इंतजाम करने में असमर्थ है. अपने कल्याण के लिए कभी वह किसी महापुरुष की ओर देखता है तो कभी किसी देवता के अवतरण की प्रतीक्षा करने लगता है, इस बोध के साथ ही व्यवस्थाओं में संशोधन की जरूरत महसूस की जाने लगी. व्यवस्थाओं में संशोधन किसी एक क्षेत्र अथवा कालखंड विशेष की घटना नहीं है. बल्कि सभ्यता के प्रारंभ में ही, शायद व्यवस्थाओं की स्थापना के साथ ही उनमें सतत संशोधन भी होता रहा है. हालांकि संशोधन की डगर कभी आसान नहीं रही. हर संशोधन को अपने समय में व्यवस्था का सिरमौर बनी शक्तियों से टकराना ही पड़ता है हर युग, हर समय और हर देशकाल में यह होता रहा है. पंद्रहवीं शताब्दी में जब विज्ञान का प्रस्फुटन हुआ तो धर्म को अपनी सत्ता खतरे में नजर आने लगी इसलिए धर्मसत्ता के शिखर पर सर्वेसर्वा बनकर बैठी शक्तियों ने स्वयं को और अधिक सिकोड़ना प्रारंभ कर दिया. यह घटना किसी न किसी रूप पूरी दुनिया में हुई, लेकिन उसका प्रभाव प्रत्येक देश की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न रहा यूरोपीय देशों में मार्टिन लूथर की चुनौती के साथ वर्चस्ववाद से मुक्ति का संघर्ष सामने आया जिसे बाद में उसके अनुयायियों ने नई दिशा दी.

सतरहवीं शताब्दी में मशीनीकरण ने एक बार पुनः उत्पादन व्यवस्था में बदलाव कर क्रांति का सूत्रपात किया. जिससे पूंजी का केंद्रीयकरण होने लगा उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों तक सिमटकर रहने लगा, जिन्हें लगाने के लिए बहुत अधिक पूंजी की आवश्यकता थी. इसलिए किसी न किसी बहाने सत्तासुख भोगते आए लोग अपने संसाधनों के दम पर आर्थिक सत्ता के शिखर पर छाने लगे. आमजन एक बार फिर तबाही की कगार पर पहुंचने लगा. पूंजी के साम्राज्य में आम आदमी की अस्मिता को बचाए रखने के लिए बड़े-बड़े विद्वान सिर खपाने लगे. चूंकि उत्पादन व्यवस्था के लिए बहुत अधिक पूंजी की आवश्यकता थी, अतः सहकार का विचार दिमाग में आया और उसके प्रयोग को आगे बढ़ाने के लिए उद्योगपतियों के बीच से ही एक व्यक्ति आगे निकला वह था—राबर्ट ओवेन. ओवेन ने सहकारी आंदोलन का सूत्रपात किया, किंतु आजीवन कोशिश तथा तमाम संसाधनों को झोंक देने के बाद भी उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी. कारण संभवतः यह रहा कि समाज के बाकी लोगों, जिनसे वह सहकार की अपेक्षा रखता था, जिनके माध्यम से आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहता था और कदाचित जिन्हें उसकी सर्वाधिक आवश्यकता भी थी, उनका विश्वास जीत पाने में वह असमर्थ रहा था. उसकी मिल में काम करने वाले मजदूरों तथा सामान्यजन के मन में भी उसको लेकर किंचित संदेह की स्थिति बनी रही. दूसरी ओर मार्क्सवादी विद्वानों ने ओवेन, ब्लैंक, विलियम किंग आदि साहचर्य समाजवदियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया था कि उनके द्वारा दिखाया गया समाजवाद का सपना सिर्फ एक कल्पनालोक था. एक और बात जो ओवेन की सफलता के आड़े आई वह यह थी कि वह स्वयं एक उद्योगपति पहले था अपने कारखानों में कार्यरत मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए उसने जितने भी कदम उठाए, उनसे उसके मुनाफे में कल्पनातीत वृद्धि हुई थी. इससे यह संकेत भी गया कि उसके द्वारा चलाया जाने सुधारवादी आंदोलन महज उसकी उत्पादन नीति का हिस्सा था. ओवेन के कारखानों में अपेक्षाकृत पुरानी तकनीक पर आधारित मशीनें लगी थीं, उन्हें चलाने के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता पड़ती थी इसके बावजूद वही कारखाने मुनाफा उगल रहे थे अतएव ओवेन के आलोचकों को यह कहने का अवसर भी मिल गया कि ओवेन द्वारा मजदूर-कल्याण के नाम पर उठाए जा रहे सभी कदम, उसके कारखानों में स्थापित पुरानी तकनीक से युक्त मशीनों से ध्यान हटाने की कोशिश हैं, जो अधिक मेहनत की मांग करने के कारण श्रम-विरोधी है.

ओवेन के सुधारवादी प्रयासों का सर्वाधिक प्रभाव उन्हीं के समकालीन समाज सुधारक डा॓क्टर विलियम किंग (अप्रैल 17, 1786 – अक्टूबर 19, 1865) पर पड़ा किंग हालांकि कई मामलों में ओवेन से भिन्न विचार रखते थे; जैसे कि ओवेन की धर्म में जरा भी आस्था नहीं थी. वह नैतिकता तथा सदाचरण को धर्म से अधिक महत्त्व देता था. हालांकि जीवन के अतिंम वर्षों में ओवेन के सोच में बदलाव आया था, मगर उसका लंबा सफर उसने बिना किसी धार्मिक आस्था के तय किया था दूसरी ओर किंग समाज में नैतिकता की स्थापना के लिए धर्म को अनिवार्य मानता था आस्थावादी सोच और पृथक राजनीतिक चेतना के बावजूद वह सहकारिता को सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम मानता था. ओवेन से प्रेरणा लेते हुए किंग ने सहकारी संस्थाएं बनाईं, सहकारिता के प्रचार-प्रसार के लिए ‘दि को-आ॓परेटर’ नामक समाचारपत्र का प्रकाशन किया, जिसने सहकारिता के विचार को आमजन तक पहुंचाने का काम किया. पेशे से एक उदारवादी फिजीशियन डा॓क्टर विलियम किंग का जन्म अप्रैल 17, 1786 को इंग्लैंड के उत्तर-पूर्व में स्थित इप्सविच(Ipswich) नामक कस्बे में हुआ था. पिता का नाम था, जा॓न किंग(Rev. John King). उनका परिवार यार्कशायर का रहने वाला था. ईस्विच आने के पश्चात उसके पिता ने वहां व्याकरण की पाठशाला खोल ली थी. किंग की प्रारंभिक शिक्षा उसी पाठशाला में हुई आगे के अध्ययन के लिए उसने 1809 आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया स्नातक की परीक्षा उसने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से 1812 उत्तीर्ण की बचपन से ही विलियम किंग की अध्यात्म में रुचि थी. प्रारंभ में चर्च के लिए कार्य करना चाहता था, किंतु वहां अपनी कुछ असहमतियों के कारण उसने इरादा बदल दिया और आगे के अध्ययन के लिए पेरिस चला गया. जहां से उसने 1819 में चिकित्सा की डिग्री प्राप्त की. का॓लिज के समय से ही उसने अपनी अध्ययनशीलता से लोगों को प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया था. सन 1820 में कैंब्रिज से चिकित्सा के क्षेत्र में परास्नातक की परीक्षा पास करने के साथ ही उसको रा॓यल का॓लिज आ॓फ फिजिशियनस की फैलोशिप मिल गई. उससे अगले ही वर्ष उसने डा॓. हूकर की बेटी से विवाह किया उसके पश्चात वह ब्रिझटन(Brighton) चला आया. वहां उसने 1823 में एक क्लीनिक की स्थापना की स्थानीय लोगों को अपनी सेवाएं प्रदान करने लगा. भौगोलिक स्थिति अनुकूल होने के कारण ब्रिझटन पर प्रकृति पूरी तरह मेहरबान थी. वह पर्यटनस्थल के रूप में तेजी से विकसित होता जा रहा था. प्राकृतिक वातावरण अनुकूल होने के कारण वहां दूर-दूर से सैलानी आते थे, जिनमें से बड़ी संख्या उन धनवान व्यक्तियों की होती थी, जो स्वास्थ्य लाभ के कामना से वहां पहुंचते थे. हालांकि ब्रिझटन के मूल निवासी भले और गरीब थे, मगर सैलानियों के कारण वह कस्बा तेजी से विकास करता जा रहा था.

कुछ ही समय में डा॓. किंग का क्लीनिक चलने लगा उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ने लगी. बावजूद इसके वह असंतुष्ट रहता था, अपने आप से, समाज से और व्यवस्था से भी समाज के भले के लिए कुछ नया करने की चाह उसके मन में हमेशा बलवती रहती थी. धीरे-धीरे उसने समाज सुधार की गतिविधियों में हिस्सा लेना प्रारंभ कर दिया ब्रिझटन के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए उसने एक पाठशाला की स्थापना में मदद की. उसके कुछ ही दिन पश्चात एलीजाबेथ फ्रे के साथ मिलकर ‘ब्रिझटन प्राविडेंट एंड डिस्ट्रिक्ट सोसाइटी’ की नींव रखी, जो अपने क्षेत्र की पहली संस्था थी. 1825 में वह एक और समाजसेवी डा॓. ब्रिकबेक(1776-1841) के संपर्क में आया, दोनों ने मिलकर ‘ब्रिझटन मैकेनिक्स इंस्टीट्यूट’ की आधारशिला रखी इस इंस्टीट्यूट का लक्ष्य गरीब बच्चों को शिक्षा, विशेषकर तकनीक ज्ञान उपलब्ध कराना था ब्रिझटन के लगभग दो तिहाई कामगार इस संस्थान के प्रबंधन से जुड़े थे. स्वयं किंग उसकी प्रबंधक समिति का सदस्य था. उस पद पर रहते हुए उसने विद्यार्थियों को संबोधित भी किया. वहीं पर गणित और प्राकृतिक दर्शन की एक अनौपचारिक कक्षा के दौरान विलियम किंग का संपर्क राबर्ट ओवेन के समर्थकों से हुआ. विलियम किंग को जैसे अपने जीवन का मकसद मिल गया. ओवेन के विचारों ने उसके चिंतन और सामाजिक कार्यों को नया विस्तार दिया.

विलियम किंग स्वभाव से दयालु था अभावग्रस्त और गरीबों के प्रति उसे सहानुभूति थी उसके क्लीनिक में गरीबों के लिए निःशुल्क अथवा नाममात्र के शुल्क पर चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाती थीं. कुछ ही समय में ब्रिझटन में वह ‘निर्धनों का चिकित्सक’ के नाम से विख्यात हो गया आगे चलकर सहकारी विचारों में अपनी आस्था के पश्चात विलियम किंग ने 1837 में ब्रिझटन में ही एक चिकित्सालय की स्थापना की, जिसका खर्च स्थानीय निवासियों द्वारा स्वयं उठाया जाता था. अपने चिकित्सालय के माध्यम से वह वर्षों तक लोगों की सेवा करता रहा. चिकित्सा के क्षेत्र में, विशेषकर गरीबों को कम मूल्य पर चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के कार्य के लिए किंग की सर्वत्र सराहना होने लगी. उसकी ख्याति सरकार तक भी पहुंची सन 1842 में उसको ‘(रा॓यल) सुसेक्स काउंटी हा॓स्पीटल का परामर्शक चिकित्सक नियुक्त किया गया उस हा॓स्पीटल की स्थापना ईसाई धर्म की भावनाओं के अनुरूप की गई थी, और उसका उद्देश्य विश्व-भर असहाय-निर्धनों, बीमारों को चिकित्सा-सुविधाएं उपलब्ध कराना था विलियम किंग का विश्वास था. गरीबी का निदान वैकल्पिक अर्थव्यवस्था के बिना संभव नहीं है. हालांकि वह कोई ख्यात अर्थशास्त्री नहीं था, न उसका अर्थशास्त्र के क्षेत्र में किसी प्रकार का दखल था, मगर समाज के आर्थिक कल्याण के लिए कुछ करने की साध उसके मन में थी. इसके लिए वह उपयुक्त अवसर की तलाश में था सन 1827 में वह समय भी आया, जब राबर्ट ओवेन ने अमेरिका में सहकारी आंदोलन की आधारशिला रखी न्यू हा॓रमनी में ओवेन का स्वागत करने वालों में सबसे पहला आदमी विलियम किंग ही था. सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना के समय अधिकांश लोगों ने ओवेन का मजाक उड़ाया था. उस समय किंग ने ओवेन के प्रयासों का समर्थन करते हुए उसके आलोचकों को करारा जवाब दिया. कहा जाता है कि ओवेन के सहकार के विचार को आगे बढ़ाने वालों में विलियम किंग सबसे आगे था. ओवेन की प्रेरणा पर विलियम किंग ने दो सहकारी समितियों की स्थापना में सहयोग दिया जिनमें से पहली थी—‘ब्रिझटन को-आ॓परेटिव कल्याणकारी फंड ऐसोशिएसन. दूसरी समिति का नाम ‘ब्रिझटन को-आ॓परेटिव ट्रेडिंग ऐसोशिएसन था. मगर सहकारिता के क्षेत्र में डा. किंग का इससे भी बड़ा योगदान ‘दि को-आ॓परेटिव’ नामक पत्रिका के प्रकाशन के रूप में था, जिसके लिए कुछ लोग उसको ‘सहकारिता का जन्मदाता’ कहकर सम्मानित भी करते हैं. ऐसा मानने वाले विद्वानों का यह भी विचार है कि सहकारिता के क्षेत्र में उसका योगदान अपने समकालीन एवं पूर्ववर्ती किसी भी विद्वान से अधिक था, किंतु उसका सही मूल्यांकन नहीं हो पाया.

ओवेन की भांति विलियम किंग का भी विश्वास था कि जनहितैषी आश्रमों की स्थापना से गरीब मजदूरों का उद्धार संभव है. सबको प्यार करो, सबके उद्धार के लिए कार्य करो, ईश्वर प्रत्येक प्राणी में बसा है. अतः जनसेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है—जनहितैषी आश्रम(Philanthropy) व्यवस्था का यह आधार सिद्धांत था. यहां उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा कि—

‘एक फिलांथ्रांपिस्ट जनहितैषी व्यवस्था का समर्थक वह मनुष्य है जो अपने समय, धन तथा अन्य प्रयासों द्वारा समाज की मदद करता है. सामान्य अवस्था में यह संज्ञा उस व्यक्ति को दी जाती है, जो कल्याणकारी कार्यक्रमों के संचालन के लिए भारी मात्रा में संपत्ति दान करता है. परिस्थितियों के चलते तथा समाज की बेहतरी के लिए, कल्याण कार्यक्रमों के संचालन का दायित्व वह किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को भी सौंप सकता है जो अपनी प्रतिभा, श्रम अथवा धन से लक्षित समूह को अधिकतम कल्याण की स्थिति तक पहुंचा सकें.’

वह आजीवन जनकल्याण के कार्यक्रमों को अपना समर्थन देता रहा इसके लिए उसको समाज का भरपूर प्यार एवं सम्मान भी मिला अंततः 18 अक्टूबर 1865 को लगभग अस्सी वर्ष की अवस्था में उसका निधन हुआ उसकी मृत्यु के कई वर्ष पश्चात डाॅ. हैंस मूलर द्वारा सहकारिता के क्षेत्र में किए गए उसके कार्य को रेखांकित किया गया, जिसको 1913 में अंतरराष्ट्रीय को-आ॓परेटिव एलाइंस की वार्षिक पुस्तिका में ससम्मान स्थान दिया गया किंग का दूसरा महत्त्वपूर्ण मूल्यांकन टी. डब्ल्यू मर्सर द्वारा ‘डा॓. विलियम किंग एंड दि को-आ॓परेटर—1828-1830’ शीर्षक के अंतर्गत किया गया, जिसमें किंग के समाचारपत्र ‘दि को-आ॓परेटर’ के सभी अठाइस अंकों के साथ उसका संक्षिप्त जीवन परिचय भी छापा गया है.

वैचारिकी

राबर्ट ओवेन ने अपने जीवनकाल में भरपूर प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ, अपने आलोचक भी पैदा किए थे. उसके प्रशंसकों के साथ उसके विरोधियों की संख्या भी अनगिनत थी, जिनमें बड़े पूंजीपति और सत्ता के शिखर पर विराजमान लोग थे, जो उसको अपने वर्गीय हितों का विरोधी मानते थे. उन्होंने ही ओवेन का विरोध कर उसकी योजनाओं को सरकारी सहायता से वंचित किया था. ओवेन के प्रयास संभव है, वृथा ही जाते अगर उसको विलियम किंग जैसा सहयोगी और समर्थक न मिला होता. उल्लेखनीय है कि विलियम किंग प्रशिक्षित डा॓क्टर था अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के क्षेत्र में उसका कोई दखल नहीं था, लेकिन उसकी ईसाई धर्म में आस्था थी. इसीलिए उसने प्रारंभ से ही गरीबों और असहायों की सहायता करना अपना लक्ष्य बना लिया था. उसका क्लीनिक गरीबों और पीड़ितों के हर समय खुला रहता था. एक डा॓क्टर के रूप में भी उसकी ख्याति ‘गरीबों के डा॓क्टर’ के रूप में थी बावजूद उसको अपने कार्य से संतोष न था. वह किसी ऐसे माध्यम की तलाश में था, जिससे कि गरीबों और लाचारों की और अधिक मदद कर सके, उनके और अधिक काम आ सके. राबर्ट ओवेन के संपर्क में आने के पश्चात उसे नया बोध हुआ. और उसी क्षण से वह सहकारिता के प्रसार के कार्य में जुट गया उसने ब्रिझटन के मजदूरों और शिल्पकारों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए दो सहकारी समितियों का गठन किया—

1. सहकारी कल्याणकारी संगठन (The Co-operative Benevolent Association) तथा

2.सहकारी वाणिज्यिक संगठन (The Co-operative Trading Association).

सहकारिता के क्षेत्र में अनुभव की कमी के कारण किंग द्वारा स्थापित सहकारी समितियां यद्यपि घाटे का शिकार होती चली गईं, और कुछ ही समय पश्चात उन्हें समाप्त कर देना पड़ा. लेकिन इस अवधि में सहकारिता के प्रति लोगों का विश्वास जगाने में वह पूरी तरह सफल रहा था. सहकारिता के क्षेत्र में विलियम किंग का योगदान अविस्मरणीय है. उसने न केवल सहकारी समितियों का गठन किया, बल्कि सहकारिता के प्रचार तथा उसके विचार को जनसामान्य में प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य किया. सहकार के विचार को जनसामान्य में प्रचलित करने के लिए किंग ने ‘दि को-आ॓परेटर’ शीर्षक से एक पत्रिका भी आरंभ की जिसे आश्चर्यजनक रूप से अत्यधिक सफलता प्राप्त हुई कुछ की महीनों में पत्रिका का सरकुलेशन काफी बढ़ गया. पत्रिका की कामयाबी का आकलन के लिए केवल इतना बताना पर्याप्त होगा कि सन 1828 से 1830 वर्ष की अवधि में पत्रिका के कुल अठाइस अंक प्रकाशित हुए थे. मगर इस अवधि में भी पत्रिका का सरकुलेशन पूरे इंग्लैंड में था. उसकी बारह सौ से अधिक प्रतियां उस समय के सभी प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों द्वारा पढ़ी जाती थीं. पत्रिका के केवल चार पृष्ठ होते थे तथा उसकी कीमत एक पेनी (Penny) थी पाठकों के बीच पत्रिका की उत्सुकता से प्रतीक्षा रहती थी. उसके ग्राहकों में अधिकांश नवशिक्षित वर्ग के लोग थे, जो पूरे इंग्लैंड में फैले हुए थे.

दार्शनिक भावभूमि लिए विलियम किंग के लेखों में जमीनी सचाई होती थी जिससे आगे चलकर लोगों में सहकार के विचार के प्रति आग्रहशीलता बढ़ी. इससे पहले तक सहकारी आंदोलन को केवल आर्थिक उन्नति के एक उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था. विलियम किंग के प्रभाव से लोगों में सहकारिता को लेकर एक नए सोच का विकास हुआ. वह अब केवल समूह के आर्थिक विकास का उपकरण नहीं थी सहकार के माध्यम से सामाजिक-नैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति संभव है, यह विश्वास करने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. ध्यातव्य है कि वह दौर परिवर्तनकारी राजनीति का था. लोग नए विचारों के प्रति गंभीर एवं आग्रहशील बने रहते थे. पत्रिका की लोकप्रियता तथा पाठकों के बीच उसकी पैठ का आकलन इससे भी किया जा सकता है कि मात्र अठाइस अंकों के माध्यम से माध्यम से पत्रिका ने वह कर दिखाया जो किसी भी बड़े नेता या पूंजीपति के लिए संभव न था. अकेले पत्रिका के प्रकाशनकाल में इंग्लैंड में तीन सौ से अधिक विभिन्न उद्देश्यों वाली सहकारी समितियों का गठन किया गया. ब्रिझटन, जहां से उस पत्रिका का प्रकाशन होता था, इंग्लैंड के सहकारी आंदोलन का केंद्र बनकर उभरने लगा. लेकिन उसके इतिहास में महान गर्व के क्षण उस समय आए, जब वहां 1844 में रोशडेल पायनियर्स द्वारा अपनी समिति का विधान रचा गया, जो आगे चलकर पूरी दुनिया के सहकारी आंदोलन का प्रेरक और मार्गदर्शक सिद्ध हुआ. दि को-आ॓परेटर’ के अंक के मुख्यपृष्ठ पर प्राय: एक उक्ति छपी होती थी, जिसका आशय था कि—

‘ज्ञान एवं एकता ही वास्तविक शक्ति है. ज्ञान द्वारा निर्देशित ताकत प्रसन्नता का स्रोत है तथा सृजन का आदिबिंदु प्रसन्नता है.’

विलियम किंग की समाजवाद में गहरी आस्था थी. वह श्रम-आंदोलनों को परिवर्तन का अनिवार्य पक्ष बनाना चाहता था. पूंजीवाद की सर्वग्राही प्रवृत्ति से वह चिंतित था तथा उसको सभी सामाजिक बुराइयों का मूल मानता था उसका विश्वास था कि पूंजीवाद ने समाज में अवांछित स्पर्धा का वातावरण पैदा किया है, जो मानवीय संवेदनाओं के मूल्य पर भौतिक परिवर्तनों को आरोपित कर रही हैं. वह स्पर्धा के स्थान पर सहयोग को प्रतिष्ठित करने के पक्ष में था और मानता था कि छोटी और स्थानीय जरूरतों के आधार पर गठित सहकारी समितियों द्वारा पूंजीवाद की बुराइयों को नियंत्रित किया जा सकता है उसने लिखा था कि—

‘इन (पूंजीवादजनित) बुराइयों को नियंत्रित कर पाना संभव है. इनका उपचार हमारे ही हाथों में है वह एकमात्र उपचार है—सहकारिता.’

डा॓. विलियम किंग ने सहकारिता के विचारों को जन-जन तक ले जाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया सहकारिता आंदोलन को गति प्रदान करने के लिए उसने 1831 में सालाना सहकारी अधिवेशन(Co-operative Congress) की शुरुआत भी की ये अधिवेशन 1835 तक प्रतिवर्ष होते रहे, जिससे सहकारी विचार को व्यापक मान्यता मिली और आम मजदूर, श्रमिक संगठन उसकी ओर आकर्षित होने लगे. लोगों ने सहकारिता के सामर्थ्य को पहचाना राबर्ट ओवेन को यद्यपि सहकारिता आंदोलन का पितामह माना जाता है लेकिन सहकारिता की सैद्धांतिक अवधारणा को लेकर उसके विचार इतने स्पष्ट नहीं थे, जितने कि विलियम किंग के वह चाहता था कि अपनी उदारता का परिचय देते हुए पूंजीपति आगे आएं तथा मजदूरों-कामगारों के कल्याण के लिए जितनी भी संभव हो मदद करें उसने स्वयं भी सहकारी समितियों का गठन किया था. बावजूद इसके वह उस वर्ग में सहकार की पैठ बनाने में असफल सिद्ध हुआ था, जिसकी कि उसे सर्वाधिक आवश्यकता थी तथा जिसके कल्याण के लिए वह सहकारिता को अनिवार्य मानता था. संभवतः इसलिए कि ओवेन स्वयं उद्यमी था और कहीं न कहीं वर्गीय सहानुभूतियों से प्रभावित था, जबकि किंग ने आमजन, मजदूरों तकनीशियनों के बीच रहकर कार्य किया था वह उनसे सच्ची हमदर्दी रखता था वे भी उसको अपना हितैषी मानते थे, यही कारण है कि उसके समाचारपत्र को जहां बुद्धिजीवियों के बीच सराहना मिली, वहीं उसको जनसाधारण ने भी अपनाया तथा उससे प्रेरणा पाकर सहकारिता से जुड़ते चले गए इस तरह ओवेन को यदि सहकारिता का जनक माना जाए तो डा॓. विलियम किंग को उसके जनसामान्य तक पहुंचा देने का श्रेय मिलना ही चाहिए. ओवेन के मतानुसार सहकार द्वारा समाज की आर्थिक समस्याओं का खोजा जाना चाहिए, जबकि विलियम किंग सहकारिता को सामाजिक बदलाव के एक आवश्यक उपक्रम के रूप में देखता था. इसलिए उसने सहकारिता के विचार को आमजन तक ले जाने के भरसक प्रयास किए. उनीस अक्टूबर सन अठारह सौ पैंसठ तक विलियम किंग सहकारिता के प्रचार-प्रसार के लिए लगातार कार्य करता रहा. यहां तक कि एक डा॓क्टर के रूप में कार्य करते हुए उसने जितना धन कमाया था, उसका बड़ा हिस्सा उसने सहकारिता के विचार को आगे ले जाने, सहकारिता आंदोलन को गति प्रदान करने में लगा दिया. सहकारिता की सैद्धांतिक विवेचना करते हुए उसने लिखा है कि—

‘सहकारिता व्यवस्था अथवा कानूनों और तात्कालिक आदेशों का केवल पुलिंदा नहीं है, न ही यह किसी समाज के विचारों तथा आदतों को केंद्र में रखते हुए उसे दूसरे समाज या समुदाय पर थोपना है, जैसा कि मनुष्य का अभी तक स्वभाव रहा है. सहकारिता तो विवेकवान कर्मचारियों के, उनके सभी वैमनस्य और दुरावों को कम करते हुए, छोटे किंतु सक्षम बहुउद्देश्यीय संगठनों बना देना है, ताकि वे अपनी संगठित श्रमशक्ति का उपयोग अपने विकास और ऐच्छिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कर सकें.’

यूरोप और पश्चिम के अन्य देशों के लिए अठारहवीं शताब्दी महान वुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों के लिए जानी जाती है रिकार्डो, एडम स्मिथ, पू्रधों, जेम्स मिल, हीगेल, रेने देकार्ते, कांट, मार्क्स आदि महानतम विद्वानों ने अपनी मेधा से सभ्यता को संवारने का कार्य किया. विलियम किंग भले ही इन सबके जैसी मौलिक प्रतिभा के स्वामी न रहा हो, किंतु मानव-कल्याण के प्रति उसकी इच्छाशक्ति तथा समर्पण से इंकार नहीं किया जा सकता. ओवेन से प्रेरणा लेते हुए उसने अपने विचारों को पूरी ईमानदारी और कहीं अधिक गंभीरता के साथ जनमानस में रोपने का प्रयास किया. विलियम किंग के बिना सहकारिता आंदोलन का क्या होता, यह कल्पना कर पाना तो कठिन है, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि उसके अभाव में सहकारिता का उतना व्यापक और त्वरित विकास होना कठिन था. कह सकते हैं कि राबर्ट ओवेन ने सहकार का जो बीज रोपा था, विलियम किंग ने उसकी देखभाल कर उसको उचित खाद-पानी देकर इस योग्य बनाया कि वह आगे का सफर अपने बलबूते पर स्वयं तय कर सके.

©ओमप्रकाश कश्यप

लुईस ज्यां जोसेफ चार्ल्स ब्लैंक : श्रम कल्याण के लिए समर्पित विचारक और नेता

स्पर्धा औद्योगिक विकास के लिए अपरिहार्य है—ऐसा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में माना जाता है. उसके समर्थक अक्सर यह दावा करते हैं कि किसी विशिष्ट उत्पादन क्षेत्र में नई कंपनियों के आने से स्पर्धा होती है. जिससे ग्राहकों को वस्तुएं सस्ती मिलने लगती हैं. ब्लैंक ने उदाहरण देकर सिद्ध किया था कि स्पर्धा पूंजीवादी व्यवस्था का छल है. हर पूंजीपति उत्पादकता के क्षेत्र में एकाधिकार चाहता है. इसलिए वह उत्पादन के उन क्षेत्रों में निवेश करता है, जिनमें उसको औद्योगिक प्रतिद्विंद्वता का कम से कम सामना करना पड़े. वह नई से नई तकनीक की खोज में रहता है. जो भले ही महंगी हो, मगर जिसका संचालन अकुशल कामगारों द्वारा कम से कम खर्च में किया जा सके. जैसे-जैसे उस क्षेत्र में मांग बढ़ती है, उत्पादक का मुनाफा भी बढ़ता चला जाता है, परिणामस्वरूप वह क्षेत्र नए उद्यमियों को ललचाने लगता है.

इस बीच तकनीक में भी अपेक्षित सुधार होता चला जाता है. नया उद्यमी नवीनतम तकनीक के साथ उस क्षेत्र में प्रवेश करता है, जो और भी श्रम-विरोधी होती है. पुराना जमा-जमाया उद्यमी जो मुनाफा अपनी ग्राहक संख्या के बल पर बटोरता है, नया कम ग्राहकों के बावजूद नवीनतम तकनीक के दम पर कमाता है. सरकार भी औद्योगिक प्रोत्साहन नीति के तहत नए उद्यमियों को विशेष सुविधाएं प्रदान करती है. इसलिए जिसे स्पर्धा द्वारा चीजों का सस्ते होना कहते हैं, वह दरअसल नई तकनीक और बढ़ी हुई ग्राहक-संख्या का लाभ उपभोक्ता तक पहुंचाना है. क्योंकि इससे उत्पादक पूंजीपति का औसत लाभ लगभग अपरिवर्तनशील रहता है, बल्कि अधिकांश मामलों में यह निरंतर बढ़ता ही जाता है. नवीनतम तकनीक चूंकि अत्यंत महंगी भी होती है, इसलिए छोटा उत्पादक उसका लाभ नहीं उठा पाता. अतएव जिसे स्पर्धा कहते हैं, वह वस्तुत: पूंजीपतियों के बीच, पूंजीपतियों द्वारा, अधिकाधिक मुनाफे के लिए खेला जाने वाला पूंजी का नंगा खेल है, जिसमें उपभोक्ता को क्षणिक मौद्रिक लाभ की कीमत सामाजिक लाभों की बलि देकर चुकानी पड़ती है. इस तथ्य को ब्लैंक ने लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले ही पहचान लिया था…                 ओमप्रकाश कश्यप

सहकारिता की अवधारणा को व्यापक जनसमूह के समक्ष लाने तथा उसकी सैद्धांतिक गवेषणा करने में जिन विचारकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, उनमें लुईस ज्यां जोसेफ चार्ल्स ब्लैंक(Louis Jean Joseph Charles Blanc) प्रमुख है. ब्लैंक ने समाजवाद तथा उसके सहयोगी सहकारिता आंदोलन के विकास के लिए सरकारी समर्थन जुटाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. वह सामाजिक आर्थिक समानता तथा श्रम-अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करता रहा. उल्लेखनीय है कि प्रारंभिक दौर में समाजवादी विचारधारा सामान्यतः सैद्धांतिक बहसों और अकादमिक दस्तावेज तक सिमटी हुई थी. जबकि सहकारी प्रयास आमतौर पर बड़े पूंजीपतियों की दया पर निर्भर थे. लोगों में उनकी व्याप्ति भी कम ही थी. सरकारी समर्थन मिलने से सहकारिता को सरकारों द्वारा, विशेषकर उनके द्वारा जो समाजवाद अथवा लोकतांत्रिक पद्धति के आधार पर शासन के लिए जिम्मेदार थीं, सीधे मदद मिलने की संभावना बढ़ी. साथ ही वह एक विचार से अधिक उद्यम के रूप में समाज में लोकप्रिय होने लगा. परिणामस्वरूप सहकारिता आंदोलन को बल मिला. लोग सहकार और पूंजीपतियों से सहायता की उम्मीद छोड़ अपने कल्याण के लिए संगठित होने लगे. ब्लैंक का महत्त्वपूर्ण सिद्धांत जो आगे चलकर समाजवादी विचारधारा का मूलमंत्र माना गया, यह था—

‘प्रत्येक को उसकी क्षमताओं के अनुसार, हर एक को उसकी जरूरत के मुताबिक.’ लुईस ब्लैंक का जन्म 29 अक्टूबर, 1811 को स्पेन के मैड्रिड नामक शहर में हुआ. उसके पिता नेपोलियन बोर्नापाट के भाई सम्राट जोसेफ के दरबार में वित्तीय नियंत्रक थे. राजशाही के साथ उनकी समस्त संपत्ति भी फ्रांसिसी क्रांति की भेंट चढ़ चुकी थी. उसके बाद वे पेरिस के लिए रवाना हो गए. लुइस ब्लैंक का बचपन अत्यधिक गरीबी में बीता. उसकी प्रारंभिक पढ़ाई मैड्रिड में ही हुई थी. आगे पेरिस से कानून की परीक्षा पास करने के पश्चात वह नौकरी की खोज में जुट गया. अपने संघर्षमय जीवन की शुरुआत ब्लैंक ने अखबार की नौकरी से की. जीविका चलाने के लिए उसने एक साथ कई समाचारपत्रों के लिए लेख लिखने का कार्य किया. उसमें चीजों को समझने, उनका विश्लेषण करने की अद्भुत क्षमता थी. अपनी प्रतिभा के दम पर उसने शीघ्र ही अपनी पहचान कायम कर ली और थोड़े ही दिनों में वह एक विचारशील, उपयोगितावादी विचारों के समर्थक के रूप में विख्यात हो गया. किंतु अखबार की नौकरी लेखन-कार्य में बहुत बड़ी बाधा थी. कुछ ही वर्षों में उसने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया.

कुछ दिन फ्रीलांसिंग करने के पश्चात ब्लैंक ने एक समाचारपत्र ‘रिव्यू दि प्रोग्रेस’ (Revue du progres) की शुरुआत की, जिसके द्वारा उसका प्रमुख उद्देश्य था, अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति को विस्तार देना. पत्र में उसने अर्थव्यवस्था एवं राजनीति से संबंधित अपने लेखों को धारावाहिक रूप में प्रकाशित करना शुरू कर दिया. वह समाज में व्याप्त बुराइयों से आहत रहता था. उसका मानना था कि समाज की समस्त बुराइयों का एकमात्र कारण अनावश्यक प्रतिद्वंद्विता है. पूंजीपति सबसे आगे निकलने के लिए अधिकाधिक धन कमाना चाहता है. इसके लिए वह अपने श्रमिकों की उपेक्षा करता है. उन्हें कम से कम मजदूरी देता है. कम मजदूरी मिलने से मजदूरों की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पातीं, जिससे उनके मन में मालिक एवं व्यवस्था के प्रति आक्रोश पनपने लगता है. इन सबसे अंततः सामाजिक अंतविर्रोधों एवं तथा दूसरी बुराइयों को बढ़ावा मिलता है. इसलिए प्रशासन को चाहिए कि वह सामाजिक असंतोष एवं असमानता को बढ़ाने वाले कारकों पर नियंत्रण रखे.

सन 1839 में उसने अपने अखबार में धारावाहिक लेख लिखना प्रारंभ किया, जिसका शीर्षक था—The Organization of Labor झकझोर देने वाले तथ्यों के साथ लिखे गए इस लेख के प्रकाशन के साथ ही धूम मच गई. उस लेख का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ. इस निबंध में ब्लैंक ने व्यक्ति और समाज के अंतर्संबंधों की व्याख्या की थी. उसने लिखा था नागरिकों के रोजगार के अधिकार की सुरक्षा करना सरकार का कर्तव्य है. राज्य को चाहिए कि अपने प्रत्येक नागरिक की योग्यता एवं कार्यक्षमता को पहचानकर उसके लिए उपयुक्त रोजगार की व्यवस्था करे. तत्पश्चात उसे मजदूरी अथवा वेतन के रूप में इतना प्रदान करे, ताकि उसके माध्यम से वह अपनी सभी आवश्यक जरूरतें पूरी कर सके. अपने आर्थिक विचारों की व्याख्या करते हुए ब्लैंक ने उस लेख में व्यक्तिगत हितों को सामूहिक हितों में बदलने की मांग करते हुए, एकसमान मजदूरी का आग्रह किया गया था. इस लेख में जिस तथ्य की ओर बार-बार संकेत किया था, वह था—

‘हर आदमी अपनी भरपूर क्षमता से काम करे. हर आदमी की उसकी जरूरत के अनुसार आमदनी हो.’

ब्लैंक के यही शब्द आगे चलकर जनमानस में विद्रोह की चिंगारी लाने वाले सिद्ध हुए. इस लेख-शृंखला को ब्लैंक ने ‘सामाजिक कार्यशाला’(Social workshops) की संज्ञा दी थी. लेखमाला के माध्यम से उसने मजदूरों का आवाहन किया गया था कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना कब्जा उस स्थिति तक बढ़ाते रहें जब तक कि समाजवादी व्यवस्था का सपना पूरी तरह सच नहीं हो जाता. लेख को चैतरफा मिली सराहना के साथ ही फ्रांस और इंग्लैंड के बुद्धिजीवी क्षेत्रों में उसका नाम होता चला गया. प्रस्तावित ‘सामाजिक कार्यशाला’ का अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से था, जिसपर मजदूर संगठनों तथा सहकारी समितियों का नियंत्रण हो. जहां सभी मजदूर आपस में एक-दूसरे से जुड़े हों. वह एक प्रकार से मजदूर संगठन तथा सहकारी समिति जैसी मिली-जुली व्यवस्था थी, जिसमें मजदूर एक सामान्य हित के लिए परस्पर संबद्ध हों. ब्लैंक के आवाहन पर मजदूर एकजुट होने लगे.

फ्रांसिसी क्रांति को लेकर 1841 में ब्लैंक की पुस्तक[Histoire de dix ans 1830-1840 (History of Ten Years, 1830-1840)], प्रकाशित हुई. जिसके माध्यम से उसने राजशाही की आलोचना की थी. पुस्तक का वौद्धिक जगत द्वारा शानदार स्वागत किया गया. चार वर्ष में ही पुस्तक के चार संस्करण पाठकों के बीच हाथों-हाथ बिक गए. पुस्तक के माध्यम से ब्लैंक की वैचारिक प्रतिबद्धता भी साफ नजर आने लगी. लेकिन ब्लैंक के अवदान को सरकारी स्तर पर उस समय मान्यता मिली, जब 24 फरवरी 1848 को उसको राजशाही के पतन के बाद बनी अंतरिम सरकार का सदस्य मनोनीत किया गया. अंतरिम सरकार के सदस्य के रूप में भी उसने श्रमिकों के अधिकारों के अपने संघर्ष को जारी रखा. उसने लक्समबर्ग आयोग का गठन भी किया, जिसका उद्देश्य सामाजिक समस्याओं एवं उनके निदान के लिए किए जा रहे प्रयासों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था. यही नहीं, श्रम कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए ब्लैंक ने अपने सहयोगियों से आग्रह किया कि वे रोजगार गारंटी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कानून बनाने के सरकार को बाध्य करें. उसने 25 फरवरी 1848 को सरकार के समक्ष एक बिल भी प्रस्तुत किया, जिसमें श्रमिकों की अस्मिता और सम्मान की रक्षा के साथ-साथ उनके लिए कार्य-उपलब्धता की गारंटी देने के लिए प्रथक श्रम मंत्रालय के गठन की मांग की गई. इस मांग को स्वीकार करना अंतरिम सरकार की क्षमता से बाहर है, इस बहाने से उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया गया. लेकिन ब्लैंक को मिल रहे श्रमिकों के भारी समर्थन को देखते हुए, उसको कुछ ही दिनों बाद श्रमआयोग का अध्यक्ष बना दिया गया.

ब्लैंक के साथ अपने मतभेदों के चलते कार्ल मार्क्स ने उसके श्रम और संगठन संबंधी विचारों की आलोचना की थी. लेकिन बुद्धिजीवियों और मजदूरों में ब्लैंक के विचारों को लेकर उत्साह था. वे उसके बारे में अधिक से अधिक पढ़ना और जानना चाहते थे. इससे ब्लैंक के अखबार की बिक्री लगातार बढ़ती चली गई. उसकी सदस्य-संख्या में भी लगातार वृद्धि होती गई, जिनमें अधिकांश मजदूर थे. परिणाम यह हुआ कि 1848 तक आते-आते ब्लैंक की लेखमाला का शीर्षक ‘आर्गेनाइजेशन आफ लेबर’, क्रांतिकारियों के नारे में ढल गया. मजदूर कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए ब्लैंक ने 10 मई, 1848 को संसद में एक बार फिर मजदूरों की समस्याओं पर विचार करते हुए सरकार से मजूदर कल्याण के लिए आवश्यक कानून बनाने की अपील की. किंतु राष्ट्रीय परिषद के अधिकांश सदस्य समाजवादी विचारों के विरोधी थे. उनके दबाव में ब्लैंक का प्रस्ताव एक बार पुनः ठुकरा दिया गया. इस बीच उसको नेशनल कंसरवेटिव असेंबली का सदस्य मनोनीत किया जा चुका था. लेकिन ब्लैंक के विरोधी भी सक्रिय थे. उनके दबाव में लक्समबर्ग आयोग को भंग कर दिया गया.

इसके बाद ब्लैंक का अंतरिम सरकार से मोहभंग होना स्वाभाविक ही था. लेकिन सरकार के कदम की इससे भी बड़ी प्रतिक्रिया मजदूरों के बीच हुई, जिनके अधिकारों के लिए वह संघर्ष कर रहा था. वे मजदूर हिंसा पर उतर आए. जून 1848 में मजदूर विद्रोह को दबाने के लिए जनरल कवेना॓क ने भारी मात्रा में बलप्रयोग किया. जिसमें डेढ़ हजार के अधिक श्रमिक मारे गए. लगभग बारह हजार को गिरफ्तार कर लिया गया तथा हजारों को देशनिकाले की सजा दी गई, जो भाग कर अल्जीरिया पहुंच गए. उस हत्याकांड के लिए जनरल कवेना॓क को ‘जून का कसाई’ कहा जाता है. इतिहास में यह घटना ‘फ्रांसिसी क्रांति’ के नाम से प्रसिद्ध है. क्रांतिकारियों से संबंध के आरोप में ब्लैंक को गिरफ्तार करने का प्रयास भी किया गया, जिसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षागार्डों ने उसके साथ बदसलूकी की. जैसे-तैसे जान बचाकर, फर्जी पासपोर्ट के आधार पर वह फ्रांस से भागकर बेल्जियम के रास्ते लंदन पहुंचा, जहां उसको राजनीतिक शरण दी गई.

ब्लैंक ने  प्रूधों, रिकार्डो, बैंथम, राबर्ट ओवेन, फ्यूरियर आदि विचारकों के जीवन-संघर्ष एवं मान्यताओं का गंभीर अध्ययन किया था. विशेषकर राबर्ट ओवेन के सहजीवन पर आधारित बस्तियों के विचार से वह प्रभावित था; और इसी कारण सहजीवन का समर्थक भी. लंदन पहुंचते ही उसकी कलम फिर सक्रिय हो उठी. तत्कालीन फ्रांसिसी सरकार के तानाशाही रवैये तथा उसकी जनविरोधी नीतियों की आलोचना करते हुए उसने स्थानीय समाचारपत्र-पत्रिकाओं में कई लेख लिखे, जिन्हें बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित भी किया गया. अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘फ्रांसिसी क्रांति का इतिहास’ दो खंड वह 1847 में लिख चुका था. लंदन प्रवास के दौरान उसने फ्रांसिसी क्रांति से जुड़ी सामग्री का संचयन आरंभ कर दिया, जिसके आधार पर उसने ‘फ्रांसीसी क्रांति का इतिहास’ का पुनर्लेखन करते हुए बारह खंडों में एक दस्तावेजी ग्रंथ तैयार किया, जिसने उसको विश्वस्तर पर प्रतिष्ठित करने का कार्य किया.

लंदन में रहते हुए ब्लैंक ने 1865 में क्रिस्टीना ग्रो(Christina Groh) के साथ विवाह किया. किंतु उसका दांपत्य मात्र दस वर्ष तक ही चल सका. 1876 में ग्रो की मृत्यु ने ब्लैंक को मानसिक रूप से कमजोर कर दिया था. भीषण तनाव और लगातार परिश्रम का उसके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था. इस बीच फ्रांस में स्थितियां अनुकूल होने लगी थीं. अंततः बाइस वर्ष(1848-1870) तक निष्कासन की सजा भोगने के पश्चात वह 1870 में पेरिस लौट आया. जहां अगले ही वर्ष उसको राष्ट्रीय परिषद का सदस्य मनोनीत कर दिया गया. उस पद पर रहते हुए उसने अपने सुधारवादी प्रयासों को जारी रखा.

उम्र के इस पड़ाव पर आकर ब्लैंक स्वयं को अकेला अनुभव कर रहा था. उसका स्वास्थ्य भी गड़बड़ाने लगा था. कुछ वर्ष तक लगातार बीमार रहने के पश्चात, अंततः 12 दिसंबर, 1882 को केंस(Cannes) में उसका निधन हो गया. उसकी अंतिम क्रिया राजकीय सम्मान के साथ संपन्न की गई. वह बहुमुखी प्रतिभा का धनी, अच्छा लेखक, उत्कृष्ट वक्ता और मानवतावादी विचारक था. अपने विचारों को लेकर किसी भी प्रकार के संदेह से परे. उसके सामाजिक और राजनीतिक विचारों का प्रभाव फ्रांसिसी समाज और राजनीति पर पड़ा. इसलिए उसको फ्रांसिसी क्रांति के प्रमुखतम नेताओं में गिना जाता है.

वैचारिकी

ब्लैंक के जीवनचरित को पढ़कर बहुत आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध मानवतावादी विचारक था. वह एक प्रभावी वक्ता, विद्वान लेखक एवं सफल संपादक था. उसकी विश्लेषण क्षमता बेजोड़, अभिव्यक्ति सामथ्र्य अत्युत्तम था. फ्रांस की क्रांति का उसने तथ्यपरक एवं बृहद् इतिहास लिखा, जिसको विश्वव्यापी सराहना मिली. अपने समाचारपत्र के माध्यम से उसने मजदूरों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया. ‘आर्गेनाइजेशन आ॓फ लेबर’ शीर्षक के अंतर्गत उसने स्वयं एक लेखमाला लिखी, जिसने मजदूरों को जागरूक एवं संगठित होने के लिए प्रेरित किया, जिसका परिणाम फ्रांसिसी क्रांति और तदुपरांत समाजवाद की स्थापना के रूप में हुआ.

ध्यातव्य है कि जिन दिनों ब्लैंक का जन्म हुआ, उन दिनों पूरे पश्चिमी जगत पर औद्योगिकीकरण की मार पड़ी हुई थी. नई तकनीक एवं मशीनीकरण के बल पर पूंजीपति-वर्ग मजदूरों और शिल्पकारों के शोषण पर तुला हुआ था. घरेलू उद्योग तबाह हो चुके थे. अपनी शिल्पकला के दम पर सम्मान का जीवन जीने वाले बुनकर भुखमरी के कगार पर पहुंचकर, छोटी-मोटी नौकरी करने को मजबूर थे. शहरों में गंदगी का आलम था. सरकार के नाम पर एक तानाशाह व्यवस्था थी, जिसके समक्ष अपना पक्ष रखना भी विद्रोह का प्रतीक था. जनसुविधाओं का अकाल जैसा था. गरीबों और कमजोरों की बात करने को कोई भी तैयार न था. एक और तो सत्तावर्ग अपनी मनमानी कर रहा था, दूसरी ओर पूंजीपति वर्ग की आमदनी और शाहखर्ची बढ़ती ही जा रही थी.

मजदूरों के उत्पीड़न की स्थति से उबारने के लिए ओवेन ने पूंजीपतियों से उदारता की अपील कर, मजदूर कल्याण के लिए आगे आने को कहा था. लेकिन स्वार्थी पूंजीपति वर्ग ने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया. उल्टे ओवेन द्वारा श्रमिक-कल्याण के लिए चलाए जा रहे अभियान को अवरुद्ध करने का पूरा-पूरा प्रयास किया. यही कारण रहा कि ओवेन द्वारा स्थापित सहकार बस्तियों का प्रयोग असफल रहा. यही नहीं फैक्ट्रियों में कार्यघंटे कम करने तथा कार्यानुकूल परिस्थितियां बनाने के ओवेन के प्रयास को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी.

राबर्ट ओवेन, प्रूधों तथा फ्यूरियर के विचारों से प्रभावित ब्लैंक ने राजनीति का उपयोग अपने सिद्धांतों को व्यापक आधार देने के लिए किया था. यह बात अलग है कि पर्याप्त समर्थन न मिल जाने के कारण वह अपेक्षित सफलता से वंचित रहा, किंतु उसने अपने लेखन द्वारा पूंजीवाद के विरुद्ध चेतना फैलाने का जो कार्य किया, प्रकारांतर में वह कार्ल माक्र्स जैसे विचारकों की प्रेरणा बना. ब्लैंक औद्योगिक मजदूर संगठनों एवं सहकारी समितियों को परस्पर पूरक मानता था. वह इन दोनों के तालमेल द्वारा एक ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था कायम करने के पक्ष में था, जो उत्पादन के स्तर को बनाए रखकर, श्रमिक-हितों के साथ भी न्याय कर सके. समाजवाद के प्रति उसकी अटूट आस्था थी. 1839 में ही उसने राजनीति में तानाशाह नेपोलियन बोर्नापाट की वर्चस्वकारी प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हुए, उन्हें फूहड़ और बकवास कहा था. तानाशाही और नेपोलियनिलिज्म की आलोचना करते हुए उसने उसने कहा था कि—

‘बिना कीर्ति के सत्ता हथियाए रखना ठीक वैसा ही है, जैसे कि बिना बादशाह के मुल्क.’

ब्लैंक की समाजवादी विचारधारा के दर्शन उनके महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘आर्गेनाइजेशन आ॓फ लेबर (1848) में होते हैं. उसपर अपने समकालीन एवं पूर्ववर्ती विचारकों सिसमांदी, फूरियर, ओवेन, संत साइमन, प्रूधों आदि का प्रभाव था. राबर्ट ओवेन तथा फ्यूरियर की भांति ब्लैंक भी स्पर्धा के स्थान पर सहयोग को महत्त्व देता था. उसने स्पष्ट कहा था कि सामाजिक बुराइयों की जड़ स्पर्धा की भावना में है. उसने बताया कि स्पर्धा पूंजीवादी समाज का आदर्श तो हो सकती है, क्योंकि उसमें येन-केन प्रकारेण अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने पर जोर दिया जाता है. किंतु किसी कल्याण आधारित राज्य-व्यवस्था का आदर्श उसे कभी नहीं माना जा सकता, क्योंकि वहां राज्य अपने नागरिकों के विकास को नैतिक कर्तव्य मानते हुए, उसके प्रति सतत प्रयत्नशील रहता है. लाभ की स्थिति में बने रहने के लिए उद्यमी अपने उत्पाद की गुणवत्ता घटाने के साथ-साथ, कोई भी ऐसा समझौता करने को तैयार रहता है, जो अधिकतम लाभ की सुनिश्चितता हेतु उपभोक्ता को तिकड़मी जाल में फंसाने के लिए जरूरी लगे. वह अधिकाधिक मशीनीकरण को अपनाता है, ताकि लाभ का बंटवारा कम से कम हाथों तक हो सके. इस प्रयास में ऐसे अनेक व्यक्ति बेरोजगार हो जाते हैं, जिनके पास सिवाय अपने श्रम-कौशल के, अपनी जीविका चलाने के लिए अन्य कोई साधन नहीं है.

यह एक तरह से अनैतिक व्यवस्था है, जहां विकास समाज के एक सीमित वर्ग तक सिमटकर रह जाता है. स्पर्धा में बने रहने के लिए चालाक पूंजीपति लोगों की भावनाओं से भी खिलवाड़ करता है. वह अपने उत्पाद को धर्म, जाति, लिंग आदि से जोड़कर उनकी पहचान के रूप में प्रस्तुत करता है. इससे सामाजिक एकता खतरे में पड़ जाती है और उसका भीतर ही भीतर विभाजन होने लगता है, दूसरे भावनात्मक आधार लिए गए निर्णयों के आधार पर उपभोक्ता को उसके द्वारा लगाए गए धन का उचित मूल्य नहीं मिल पाता. कई बार उत्पाद को लोगों में खपाने के लिए पूंजीपतिवर्ग राजनीतिक और धर्म-सत्तात्मक समर्थन जुटाने का भी प्रयास भी करता है. ब्लैंक ने समाज में व्याप्त गरीबी, दुराचार, असमानता और मूल्यहीनता के लिए स्पर्धा को जिम्मेदार माना है. स्पर्धा के स्थान पर वह सहयोग को महत्त्व देता था—

‘यदि तुम स्पर्धा के दुष्परिणामों से बचना चाहते हो तो तुम्हें इसको आमूल नष्ट कर देना होगा. इसके बदले सहयोग को सामाजिक जीवन का आधार बनाकर नए सिरे से कार्यारंभ करना होगा.’

स्पर्धा के दुष्परिणाम! ब्लैंक की स्वाभाविक निष्ठा समाजवाद के प्रति थी. एक ऐसी व्यवस्था की वह कल्पना करता था, जिसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति की हिस्सेदारी हो, जो उसके प्रत्येक सदस्य को अपनी जान पड़े. स्पर्धा के साथ सभी का अपनापन संभव नहीं है. अपनेपन का अभाव या कि अपनत्व पर संकट ही ‘स्पर्धा का प्रमुख दुष्परिणाम’ है. वस्तुतः औद्योगिकीकरण के आरंभ से ही अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग स्पर्धा को व्यावसायिक विकास का अनिवार्य तत्व मानता रहा है. दूसरी ओर समाजवादी विचारकों का मानना था कि स्पर्धा के माध्यम से समाज की एकजुटता को बनाए रखना संभव न होगा. उनके अनुसार स्पर्धा केवल पूंजी और तकनीक के कंधों पर सवार होकर ही कारगर सिद्ध हो सकती थी, जबकि समाज के बहुलांश के पास इनका अभाव होता है. अतएव सहकार के नए दर्शन के उदय के साथ स्पर्धा को संगठन के सिद्धांत द्वारा अपदस्थ किया गया. लुइस ब्लैंक ने स्पर्धा को दरकिनार करते हुए लिखा—

‘क्या स्पर्धा का अभिप्राय किसी गरीब को मिलने वाले रोजगार की सुनिश्चितता से है? एक सवाल यह भी है कि किसी कामगार के लिए स्पर्धा कितनी उपयोगी हो सकती है? क्या यह कार्य के बंटवारे का न्यायिक सिद्धांत बन सकती है, जिससे कि जिसे काम की सर्वाधिक जरूरत है, उसी को मिले. उत्तर तक पहुंचने के लिए हम एक पहेली बूझते हैं—

मान लीजिए कि किसी ठेकेदार को एक श्रमिक की आवश्यकता है. बुलाने पर तीन चले आते हैं.

‘इस कार्य के बदले तुम्हें कितनी मजदूरी चाहिए?’ ठेकेदार एक से पूछता है.

‘तीन फ्रैंक! मेरे साथ मेरी पत्नी और एक बच्चा भी है.’

‘ठीक है…और तुम?’

‘केवल ढाई फ्रैंक…मेरे साथ केवल मेरी पत्नी है…मैं इतने से ही काम चला सकता हूं.’

‘उससे तो बेहतर है, चलो अब तुम बताओ?’

‘मैं अकेला हूं…मेरे लिए मात्र दो फ्रैंक पर्याप्त होंगे!’

‘बहुत अच्छे, चलो काम पूरा करो.’

इस तरह मोलभाव के साथ मामला तय हो जाता है. लेकिन उन दो गरीब, जरूरतमंदों का क्या हुआ? हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वे जीवित रहेंगे. पर कैसे? क्या होगा यदि पेट भरने के लिए वे चोरी करने लगें? कोई बात नहीं, आप कहेंगे कि हमारे पास बचाव के लिए पुलिस है. लेकिन यदि वे भूख से व्याकुल होकर हत्या करने पर उतर आएं, हत्यारे बन जाएं तब? शायद इस बार आप यह कहेंगे कि ऐसे लोगों के लिए आपके पास जेल की सलाखें हैं. यह भी ठीक है, परंतु क्या आपने सोचा है कि स्पर्धा के चलते उस तीसरे का क्या होगा. उसे तो काम मिल चुका है. ठीक है, लेकिन उसकी जीत भी पक्की कहां है! उसको चुनौती देने के लिए चौथा मजदूर कभी भी टपक सकता है, जिसे दो दिन में केवल एक ही दिन भोजन नसीब होता हो. हो सकता है कि वह सिर्फ पेट-भर रोटी के लिए अपनी सारी मजदूरी छोड़ दे. बेचारा दीन-दरिद्र या फिर जहाजी बेड़े का मजबूर गुलाम!’

ब्लैंक ने अपने इस रूपक से वर्षों पहले यह दर्शा दिया था कि स्पर्धा केवल पूंजीपतियों के लिए कारगर सिद्ध हो सकती है. गरीबों, अभावग्रस्तों के लिए वह अनुपयोगी, बल्कि खतरनाक स्थिति तक नुकसानदेह है. इसलिए उसने स्पर्धा को को अपदस्थ कर उसके स्थान पर सहयोग को स्थापित करने की सलाह दी थी. स्पर्धा के प्रति ब्लैंक का विरोध जीवन में लालसाओं की स्वाभाविक मौजूदगी के कारण था. गरीब संसाधनों के अभाव में स्पर्धा को नहीं चुन सकता, जबकि उद्यमी न केवल स्पर्धा में लगातार बने रहने का सामथ्र्य रखता है, बल्कि उसमें सफलता के लिए महंगी तथा उच्चतर तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है. यही नहीं वह दूसरे माध्यमों से भी स्पर्धा के परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. संभवतः ब्लैंक को यह विश्वास हो चला था कि स्पर्धा को आधुनिक मुक्त अर्थव्यवस्था की देन है, जो शोषण तथा लाभ के असमान बंटवारे पर टिकी है. और वह यह भी समझ चुका था कि स्पर्धा के नाम पर राज्य अपने निर्णय और किंचित अधिकार भी, पूंजीपति वर्ग के हाथों में सौंपकर अपने कर्तव्य से उदासीन भी हो सकता है. उसकी कहना था कि—

‘धन का असमान वितरण, मजदूरी की अनुपयुक्त दरें तथा बेरोजगारी, ये सब स्पर्धा की ही देन हैं.’

ब्लैंक पूंजीवादी व्यवस्था का प्रखर आलोचक था. उसकी पुस्तक ‘सामाजिक प्रयोगशाला’ की अवधारणा सहकारी समूहों के काफी निकट है. फ्रेंक नोफ(Frank Noff) के शब्दों में—

‘सामाजिक प्रयोगशालाएं जिन्हें ब्लैंक स्थापित करना चाहता था, वस्तुतः समान व्यवसाय में लगे सदस्यों का संगठन थीं. सदस्यगण इन समानधर्मा सामाजिक प्रयोगशालाओं में सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शामिल होते थे, इस उद्देश्य के साथ कि वे अपने लक्ष्य को जनतांत्रिक समानता के आधार पर प्राप्त कर सकते हैं.’

ब्लैंक का मानना था कि समाज की अनेक दुरावस्थाओं का निदान उत्पादन की सहकारी व्यवस्था को लागू करके किया जा सकता है. वह कारखानों पर श्रमिकों के अधिकार का समर्थक था और चाहता था कि श्रमिक अपने श्रम की महत्ता को स्वीकारते हुए संगठित हों. उस कारखानों का स्वयं संचालन करें, इस कार्य में राज्य को भी मजदूरों की मदद करनी चाहिए. ब्लैक की विचारधारा उसके अपने शोध एवं अनुभव पर आधारित है.

उसका (ब्लैंक का) मानना था कि केवल लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार ही आर्थिक और सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकती हैं. चूंकि रोजगार प्रत्येक व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है, अतएव सरकार का यह कर्तव्य है कि नागरिकों के इस अधिकार की रक्षा करे. यहां तक कि बीमारों और वुजुर्गों को भी किसी प्रकार की परेशानी न होने दे. इस लक्ष्य को पाने के लिए उसने ‘सामाजिक कार्यशालाओं’ की स्थापना पर जोर दिया है, जो उत्पादक सहकारी समितियों जैसी ही व्यवस्था है. उसका संगठन उत्पादित वस्तु या शिल्प की प्रकृति के आधार पर किया जा सकता है. इन सामाजिक कार्यशालाओं का प्रबंधन मजदूरों के हाथ में होगा. वे लाभ को आपस में बांटकर सरकारी ऋण को लौटाने की जिम्मेदारी संभालेंगे. प्रकारांतर में श्रमिकों के स्वामित्व वाली ये कार्यशालाएं कृषिफार्म, फैक्ट्री, दुकान आदि निजी स्वामित्व वाले सभी उद्यमों और व्यवसायों को अपने अधिकार में ले लेंगी. इस प्रकार से समूचा उत्पादन सहकारिताकेसिद्धांतोंकेअनुरूप होने लगेगा.

ब्लैंक प्रत्येक अवस्था में मजदूरों एवं वंचितों के अधिकारों का संरक्षण चाहता था. आवश्यकता पड़े तो कानून बनाकर भी. वह चाहता था कि कानून इस तरह से बनाए जाने चाहिए कि श्रमिक समूहों द्वारा संचालित कारखाने सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रह सकें. सरकार का दायित्व है कि ऐसे कारखानों के लिए पूंजी का प्रबंध वह अपने òोतों से करे. आवश्यकता पड़ने पर बिना ब्याज का ऋण उपलब्ध कराए. ऐसे कारखानों का प्रबंध पूर्णतः लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप हो. यही नहीं, ब्लैंक मानता था कि प्रबंधन में लगे श्रमिक वर्ग की सहभागिता भी स्वैच्छिक होनी चाहिए, ताकि वे स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकें. उसने सहकारी कारखानों में आय का वितरण तीन मदों में किए जाने का सुझाव दिया है—

1. संचालन निधि : इस निधि से श्रमिकों के वेतन आदि संचालन संबंधी अन्य व्यय निकाले जाएंगे. संचालन संबंधी खर्चों में कच्चे माल की कीमत, भाड़े पर खर्च की गई रकम तथा अनुरक्षण संबंधी व्यय सम्मिलित हैं.

2. सुरक्षित निधि : इस निधि के एक हिस्से से बाह्यः ऋणों का भुगतान किया जाएगा, जबकि दूसरे हिस्से से नवीन पूंजी का निर्माण होगा. नवीन पूंजी का उपयोग कारखाने के विस्तार संबंधी योजनाओं में निवेश हेतु किया जाएगा.

3. लाभ : लाभ में मजदूरों की भागीदारी होगी. वह उनमें बांट दिया जाएगा.

देखा जाए तो ब्लैंक अपने पूर्व के तथा समकालीन विचारकों रिकार्डो, संत साइमन, राबर्ट ओवेन, फूरियर, प्रूधों आदि के स्वर में स्वर मिलाते हुए, उन्हीं की परंपरा को समृद्ध कर रहा थे. किंतु ‘श्रमिकों की उत्पादक सहकारी समितियां’ बनाने का विचार उसका मौलिक था, जिसके लिए उसको सदैव याद किया जाता रहेगा. इस तरह हम कह सकते हैं कि सहकार का जो विचार राबर्ट ओवेन के दिमाग में पनपा था, ब्लैंक ने उसी को खाद-पानी देकर ऊर्जस्वित करने का सार्थक प्रयास किया था. तथापि इन विद्वानों से भिन्न मत रखते हुए ब्लैंक ने आश्चर्यजनक रूप से किफायत और बचत के विचार का भी विरोध किया है. ध्यान रहे कि बचत के सिद्धांत का समर्थन राबर्ट ओवेन ने भी किया है. ब्लैंक का मानना था कि मितव्ययिता और बचत व्यक्ति-विशेष के संबंध में तो उपयोगी हो सकती है, किंतु सामूहिक आधार पर बचत की प्रवृत्ति पूंजी के केंद्रीयकरण को बढ़ावा देती है, जो अन्याय जैसी अन्य अनैतिक व्यवस्थाओं का कारक है. इस संबंध में उसका कहना था—

‘मितव्ययिता अच्छी चीज हो सकती है, परंतु जब वह व्यक्तिवादी उद्देश्य से की जाती है तो अहंकार को जन्म देती है. दानशीलता का विरोध करती है तथा मनुष्य की अच्छी भावनाओं को समाप्त करती है. केवल अपने लिए बचत करना, अपने मित्रों और भविष्य पर अविश्वास करना है.’

ओवेन की भांति ब्लैंक को भी अपने प्रयासों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी. तो भी मजदूरों की सहकारी समिति गठित करने का विचार सहकारिता के क्षेत्र में उसकी मौलिक देन माना जाएगा, जिसकी उस समय पूंजीवाद के बेलगाम घोड़े पर रोक लगाने के लिए अत्यंत आवश्यकता थी. वस्तुतः उस समय यह कार्य सहकारिता आंदोलन की एक भूमिका जैसा था. एक पीठिका थी जिसपर आगे चलकर महाकाव्य लिखा जाना था. यह बात अलग है कि सहकारिता का आगे चलकर जिन लोगों में विकास हुआ, उनमें उत्पादक सहकारी समितियों की संस्था आनुपातिक रूप में कम ही रही है, विशेषकर भारत जैसे विकासशील देशों में, जहां विपुल जनसंख्या के सापेक्ष संसाधनों की विरलता के चलते, इसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सहकारी आंदोलन को खड़ा करने और उसे प्रभावी गत्यात्मकता देने के लिए अनिवार्य कौशल और व्यावहारिकता का गरीब और अल्पशिक्षित वर्गों में अभाव होता है. हालांकि हाल के वर्षों में इसके कुछ अपवाद भी देखने में आए हैं. समाज का गरीब, अशिक्षित वर्ग भी सहकारी संस्थाओं का संचालन कुशलतापूर्वक कर सकता है, कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट भी हो चुका है. मगर यह उन्हीं क्षेत्रों में संभव हो पाया है, जहां कुछ समर्पित और ऊर्जावान व्यक्तियों ने उस वर्ग के उत्थान के लिए प्रतिबद्धता और ईमानदारी के साथ कार्य किया है.

ब्लैंक की मान्यता थी कि कारखानों को समाजवादी आधार पर चलाया जाए, ताकि उनका लाभ अधिकतम लोगों तक पहुंच सके. विचार के रूप में यह बहुत अच्छी बात है, मगर इसके लिए पूंजीपतियों को तैयार करना बड़ा ही मुश्किल, असंभव-सा कार्य था. अधिकांश कारखाने पूंजीपतियों के आधिपत्य में थे और उनसे यह अपेक्षा रखना प्रायः व्यर्थ ही था कि वे अपने स्वामित्व को समाज या श्रमिक संगठनों को आसानी से सौंप देंगे. इस तरह के असफल प्रयास ब्लैंक से पहले भी हो चुके थे, अतएव उसपर विचारों की चोरी का आरोप लगाते हुए, उसकी आलोचना भी की गई.

सही है कि समाज में सबसे बड़ी ताकत साधारणजन की होती है और वह किसी भी महान परिवर्तन का कारण बन सकती है—राबर्ट ओवेन का समाज की कार्यक्षमताओं में विश्वास करना गलत नहीं था, परंतु वह यह आकलन संभवतः नहीं कर पाया था कि जनता भले ही विराट शक्ति की स्वामिनी हो, लेकिन वह स्वयं धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, भाषा, रंगभेद आदि मुद्दों पर बुरी तरह बंटी होती है. अथवा शिखरस्थ शक्तियां निहित स्वार्थों के लिए जनता की भावुकता और भलमनसाहत का लाभ उठाकर उसे ऐसे काल्पनिक वर्गों में बांटे रखती हैं. ऐसे अनेक खानों में बंटे जन-मानस को उद्देश्यपूर्ण सामूहिकता के दायरे में लाना और लंबे समय तक सक्रिय बनाए रखना सरल नहीं होता. इसके लिए महात्मा गांधी जैसे नेताओं की जरूरत पड़ती है, जो पूरी तरह ईमानदार हों, जिनकी कथनी और करनी में एकरूपता हो; और जो इतने चतुर भी हों कि आमजन के मानस की राई-रत्ती परख कर सकें. बिडंवना यह है कि वैसे नेता सहस्राब्दियों में एकाध ही पैदा होते हैं.

स्वाभाविक एवं निरंतर विकास के लिए जागरूक लोकमानस आवश्यक है. एक बार जनमानस जाग्रत होकर लक्ष्योन्मुखी प्रयास करने लगे तो बाकी बाधाएं स्वतः दूर होती जाती हैं. नागरिक कल्याण के वही प्रयास सफलता के शिखर तक पहुंचते हैं, जिनमें शुरुआत साधारणतम से होती है. इस बीच असफलताएं स्वाभाविक रूप से आती हैं, किंतु सक्रिय एवं प्रबुद्ध लोकचेतना उनके निस्तारण का उपाय सहज ही खोज लेती है. इस तथ्य को राबर्ट ओवेन भले ही नहीं समझ पाए हों, लेकिन रोशडेल पायनियर्स के दिलों में इसके प्रति विश्वास अवश्य ही रहा होगा, तभी वे एक कामयाब संगठन को गढ़ सके थे. इसके बावजूद बैंथम, जेम्स मिल, संत साइमन, राबर्ट ओवेन, फ्यूरियर, प्रूधों जैसे विचारकों के योगदान को भुला पाना संभव नहीं हैं. उन्होंने जिस साहसिक जनपक्षधरता का परिचय दिया, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को आधार बनाकर, अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर जो चुनौती-भरे प्रयोग किये, कालांतर में वही सफल सहकारी आंदोलन की नींव बन सके, उन्हीं के आधार पर आगे चलकर विश्वव्यापी सहकारिता आंदोलन खड़ा हो सका.

ब्लैंक के प्रयोगों के असफल रह जाने से उसके आलोचक मुखर हो चुके थे. असफलता के बावजूद उसने अपनी आलोचनाओं को सहज भाव से लिया. उसकी नाकामयाबी का एक कारण यह भी था कि उन दिनों सहकारी आंदोलन अपनी बाल्यावस्था में था. मजदूर वर्ग में शिक्षा और जागरूकता का अभाव था. उनके भीतर अधिकार चेतना धीरे-धीरे पनपने तो लगी थी, परंतु उसकी नेतृत्वकारी शक्तियों, जिनमें ज्यादातर मजदूर ही थे, को सहकारी संगठनों को चलाने का विशेष अनुभव नहीं था. अधिकांश मजदूर गरीब, अशिक्षित और विपन्न थे. पूंजी प्रधान अर्थव्यवस्था के आगे सहकारी समूहों की बाजार में टिके रहने की क्षमता भी बहुत कम थी. न चाहते हुए भी उन्हें तकनीक एवं पूंजी-बाहुल्य वाले निगमों के साथ स्पर्धा करनी पड़ रही थी, जो तात्कालिक परिस्थितियों में निश्चय ही बहुत कठिन एवं चुनौती-भरा काम था.

ब्लैंक के विचारों की उपयोगिता कुछ ही वर्षों के बाद विशेषकर तब समझ में आने लगी थी, जब मजदूर आंदोलनों का विकास हुआ और संगठित मजदूर-संघों ने जागरूक होकर अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष की शुरुआत की. उसके बाद जगह-जगह उत्पादक समितियां बनाकर उन्होंने उत्पादन-प्रणाली को अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया. वैसे भी विचारों को यथार्थ के धरातल पर अपना वजूद सिद्ध करने में कुछ समय तो लगता ही है. ब्लैंक के विचारों ने भी समय आने पर स्वयं को खरा सिद्ध कर दिया था, अतएव समाजवादी आंदोलन के विचारकों में उसका स्थान सुरक्षित है.

©ओमप्रकाश कश्यप

चार्ल्स फ्यूरियर : समाजवादी चिंतन का पुरोधा

फ्यूरियर ने जिंदगी को बहुत करीब से देखा था. वह गरीब परिवार में जन्मा. संघर्षों के साथ बड़ा हुआ. एक सेल्समेन या कहो कि कमीशन एजेंट के रूप में फ्रांस के इस शहर से उस शहर के बीच घूमते हुए उसने पूंजीवाद का नंगा नांच देखा तो भूसामंतों की मनमानी और जमींदारों द्वारा जनसाधारण का उत्पीड़न भी. परिस्थितियों ने उसको लेखक बनाया. संघर्ष ने उसे आलोचकीय दृष्टि दी. उसने समाज में जैसा देखा, वैसा लिखा और खुलकर लिखा. मौलिक सोच और वैज्ञानिक समझ के कारण उसकी गिनती दुनिया के प्रमुख समाजवादी चिंतकों में की जाती है. लगातार निर्भीक और मौलिक लेखन करते हुए उसने अपने समय के बुर्जुआ समाज की खुलकर आलोचना की. उसकी शैली में तंज था. अपने अकाट्य तर्कों से उसने पूंजीवाद का सामना किया और सिद्ध किया कि ‘सभ्यता के विकास के चरण में गरीबी, समाज (के एक वर्ग) की अतिसंपन्नता की देन है.’ (…under civilization poverty is born of superabundance itself). समानता आधारित समाज का पक्ष लेते हुए उसने सहजीवन पर आधारित बस्तियों का समर्थन किया, जो आगे चलकर सहकारिता आंदोलन के विकास का कारण बना.

ओमप्रकाश कश्यप

राबर्ट ओवेन जिन दिनों सहजीवन के विचार को लेकर इंग्लेंड और अमेरिका में लगातार प्रयोग कर रहा था, उन्हीं दिनों फ्यूरियर फ्रांस में सहकारिता और समाजवादी विचारों की स्वीकार्यता के लिए, अपने सतत लेखन द्वारा अपेक्षित माहौल की रचना कर रहा था. वह तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की खामियों और विसंगतियों से लोगों को सावधान करता हुआ, एक समानता आधारित समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत था. उसकी शैली मारक थी. फ्यूरियर अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था, किंतु स्थितियों की पड़ताल करते हुए, भविष्य में झांकने की उसकी क्षमता अद्भुत थी. फ्रांसिसी क्रांति के प्रारंभिक वर्षों में ही फ्यूरियर ने औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप तेजी से पनपते, फूलते, फलते मध्यवर्ग की ताकत और उसकी पहुंच को पहचान लिया था. वह उसी का उपयोग सामाजिक बदलाव के लिए करना चाहता था.

फ्यूरियर का जन्म ७ अप्रैल, १७७२ को फ्रांस के बेसंका॓न(Besancon) नामक स्थान पर हुआ था. वहीं उसकी शिक्षा संपन्न हुई. कुछ समय पश्चात वह लेया॓न(Lyan) के लिए स्थानांतरित हो गया; जो उस समय फ्रांस के बड़े शहरों में से था. उसका परिवार प्रारंभिक दिनों में काफी धनवान था और कपड़े का व्यवसाय करता था. बावजूद इसके फ्यूरियर की शिक्षा अधिक लंबी न खिंच सकी. उसका जीवन संघर्ष भरा रहा. तबियत से आजाद खयाल फ्यूरियर ने सैल्समेन जैसी छोटी-मोटी नौकरियां कीं. कमीशन पर समाचारपत्र-पत्रिकाएं, पुस्तकें, घरेलू सामान आदि बेचने का काम किया. उसी सिलसिले में उसने हालैंड, जर्मनी, बेल्जियम आदि देशों की यात्राएं की. मगर ये कोरी व्यापारिक यात्राएं ही नहीं थीं. सामाजिक विसंगतियों को पहचानने के लिए यह उसका अपना चयन था, जिसके बारे में उसने कहा भी था कि—

‘मेरा भाग्य ही था, दुकानदारों के बेईमानी भरे कार्यों में योगदान करते हुए स्वयं को ऐसे तुच्छ और बकवास कार्य के लिए निरंतर कोसते रहना.’

फूरियर स्वभाव से अध्यवसायी था. उसने अलग-अलग देशों में जाकर वहां के समाज, अर्थव्यवस्था में रुचि लेना जारी रखा और जिससे उन्हें उन देशों की आर्थिक-सामाजिक संरचनाओं को समझने में काफी मदद मिली. उसने देखा कि प्रत्येक समाज आर्थिक आधार पर अमीर और गरीब में बंटा है और उसके कारण तथा तज्जनित समस्याएं प्रायः एक जैसी ही हैं. आर्थिक विभाजन के आधार पर सामाजिक अंतर्द्वंद्व पनपते हैं, जिनसे निपटने में शासन का बहुत-सा धन और समय बेकार चला जाता है. धीरे-धीरे उसकी यह आस्था दृढ़ होती चली गई कि आमूल परिवर्तन के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग अपरिहार्य है. सहकारी संगठन की सफलता के लिए स्वैच्छिक सहभागिता पहली और अनिवार्य शर्त है. उसका कहना था कि सच्चा सामाजिक संगठन मानव-प्रकृतियों को बलपूर्वक नियंत्रित करके नहीं बनाया जा सकता, बल्कि उनको संतुष्ट करके ही बनाया जा सकता है, ताकि संघर्ष के स्थान पर सहयोग प्रभावी रहे तथा सामाजिक ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सके.

फ्यूरियर को अपने व्यवसाय से कभी संतुष्टि नहीं हुई. उसे सदैव यही लगता रहा कि वह धूर्त व्यापारियों के लिए कार्य कर रहा है. सेल्समेन के रूप में काम करते हुए फ्यूरियर ने आवश्यकता पड़ने पर अंशकालिक लिपिक के रूप में भी कार्य किया. जिससे उसका संबंध एक ओर आम आदमी से पड़ा, वहीं दूसरी ओर उसको समाज के प्रभुवर्ग की शोषणवादी प्रवृत्ति को समझने में भी सहायता मिली. उसके ग्राहकों में अधिकांश मध्यवर्ग के लोग शामिल थे. उसके संपर्क में रहकर फ्यूरियर को समझ में आने लगा कि बात-बात में पूंजीवादी व्यवस्था तथा धार्मिक जड़ताओं की आलोचना करने वाला मध्यवर्ग, वक्त पड़ने पर पूंजीपति की ओर ही झुकता है. उसकी इस चाल का सीधा-सीधा नुकसान जनसाधारण को उठाना पड़ता है, जो उसको अपना प्रतिनिधि मानकर अपने नेतृत्व की जिम्मेदारी उसको सौंपे रखता है. अपनी स्थिति का पूरा लाभ मध्यवर्ग भी नहीं उठा पाता. क्योंकि चालाक पूंजीपतिवर्ग चतुराई पूर्वक मध्यवर्ग के विभिन्न गुटों के बीच फूट डाले रखता है. जनसाधारण का कल्याण तब तक संभव नहीं है जब तक अपनी स्थिति को समझते हुए वह अपना प्रवक्ता स्वयं नहीं बन जाता.

इस विसंगति के समझ में आते ही फ्यूरियर की आलोचनात्मक मेधा जोर मारने लगी. उसने सामाजिक असंतुलन तथा उसकी कारक शक्तियों के विरुद्ध लिखना प्रारंभ कर दिया. अपने लेखों में उसने उच्चवर्ग के वर्चस्वकारी संस्कारों की जमकर आलोचना की. मध्यवर्ग की अवसरवादी और चाटुकारितापूर्ण प्रवृत्ति पर प्रहार करते हुए उसने लगातार कई व्यंग्य लिखे. उसके व्यंग्यों के विषय अधिकांश, तात्कालिक सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों पर केंद्रित होते थे. चुटीली शैली के कारण उनकी पठनीयता अदभुत थी. लेकिन उनमें समाज का यथार्थ निहित था. इसलिए जनमानस पर उनका असर भी गहरा होता था. यात्रा के दौरान मिलने वाले लोगों, समाचारपत्रों तथा आपसी बातचीत को उसने अपने विचारों का प्रमुख स्रोत स्वीकार किया है.

अपने अनुभवों को संग्रहित करते हुए उसने कई पुस्तकों की रचना भी की. उसकी पहली पुस्तक सन 1808 में प्रकाशित हुई थी. फ्यूरियर के विचारों में कई स्थान पर अस्थिरता और अनर्गलता भी देखने को मिलती है. कई जगह उसने ऐसे तथ्यों का वर्णन किया है, जिनपर विश्वास करना कठिन है. किंतु उसके सामाजिकबोध और नवजागरण के प्रति उसके समर्पण की एकाएक उपेक्षा कर पाना संभव नहीं है. जीवन के अंतिम वर्षों में वह पेरिस में रहने लगा था. वहीं पर सन १० अक्टूबर, १८३७ में उसकी मृत्यु हो गई. वह फ्रांस के उन महानतम वुद्धिजीवियों में से था, जिन्होंने अपने समय को सर्वाधिक प्रभावित किया था. 1848 की फ्रांसिसी क्रांति जिसने यूरोप सहित पूरी दुनिया में लोकतंत्र को नया वैचारिक दिया, फ्यूरियर जैसे उदारवादी विद्वानों के सतत संघर्ष का ही सुफल थी.

फ्यूरियर हालांकि बहुत पढ़ नहीं सका था, तथापि स्थितियों का विश्लेषण करने की प्रतिभा उसमें अद्वितीय थी. हालांकि उसके कई विचार ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर उसकी अस्थिर मनोवृत्ति का अनुमान होने लगता है. लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वह अपने समय के उन अनेक विद्वानों में से था, जिन्हें भविष्य का सटीक आकलन करने का गुर आता था. उनीसवीं शताब्दी में लोकतंत्र एवं समाजवादी सरकारों की स्थापना के समय, फ्यूरियर के योगदान पर नए सिरे से विचार किया गया और उसको वर्तमान फ्रांस के निर्माताओं में ससम्मान स्थान दिया गया. स्त्री समानता के मुद्दे पर उसके विचार एकदम प्रगतिशील थे. उसका मानना था कि स्त्री-अधिकारों की सुरक्षा ने सामाजिक प्रगति को सकारात्मक दिया दी है. फेमिनिज्म्(Féminisme) शब्द का पहला प्रयोग फ्यूरियर ने ही सन 1837 में किया था. आज महिला अधिकारिता पर जो जोर दिया जाता है, उसके पीछे कहीं न कहीं फ्यूरियर की ही प्रेरणाएं हैं. जिसने आगे चलकर जान स्टुअर्ट मिल, सार्त्र, सिमोन दा’ बुआ तथा उनके अनेक स्त्रीवादी विचारकों को जमीन दी. जिनके कारण आगे चलकर स्त्री-विमर्श को व्यापक आधार मिला.

वैचारिकी

फ्यूरियर ने अपने निष्कर्षों के लिए लेखन की संवाद शैली को अपनाया है. यह वही शैली है जिसपर सुकरात ने अपनी दार्शनिक गवेषणाएं की थीं, बाद में प्लूटो ने भी इसी शैली में अपनी कई प्रसिद्ध पुस्तकों की रचना की थी. फ्यूरियर का समकालीन हीगेल भी उसी शैली को अपना रहा था. उल्लेखनीय है कि जिन दिनों फ्यूरियर जीवन के अनुभव बटोर रहा था, उन दिनों फ्रांस का समाज वैचारिक हलचल से तथा इंग्लेंड औद्योगिकीकरण की तीव्र प्रक्रिया से गुजर रहा था. भाप के इंजन, जल-ऊर्जा द्वारा चलने वाली मशीनों के आविष्कार से उत्पादन पद्धति में आमूल बदलाव आया था. उससे कुछ ही वर्ष पहले छपाई मशीन के विकास से पुस्तक प्रकाशन आसान हुआ था. जिससे पुस्तकों की, ज्ञान की सुलभता बढ़ी थी. ज्ञान को सहेजकर, उसे बड़े पाठकवर्ग तक पहुंचाना, उसके माध्यम से नए विमर्श की शुरुआत करना यह पुस्तकों ने संभव कर दिखाया था. इस औद्योगिकीकरण की भी सीमाएं थीं. इस पर टिप्पणी करते हुए स्टीवन क्रिस लिखते हैं—

‘अठारहवीं शताब्दी के आखिरी दशकों और उनीसवीं शताब्दी के प्रांरभ की औद्योगिक क्रांति सचमुच क्रांतिकारी थी, क्योंकि उसने इंग्लेंड, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की संपूर्ण उत्पादन क्षमता में चमत्कारी परिवर्तन किए थे. ये बदलाव नई मशीनों के आविष्कार, धुआं उगलने वाली फैक्ट्रियों, तीव्र उत्पादकता वृद्धि तथा रहन-सहन का उच्च स्तर कायम करने तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इससे कहीं व्यापक, कहीं अधिक प्रभावकारी थे. इसलिए कि इस क्रांति ने यूरोपीय समाजों को उसकी जड़ों से जोड़ने में कामयाबी हासिल की थी. नवजागरण अथवा फ्रांसिसी क्रांति की भांति, कोई भी उसके परिणामों से अछूता नहीं था. शिल्पकार और उद्योगपति, किसान और जमींदार, बालक और उसके माता-पिता; यानी प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से संबद्ध, एक-दूसरे से प्रभावित था.’

यूरोपीय औद्योगिकीकरण के बहुआयामी प्रभावों को लेकर कुछ ऐसे ही विचार हेरा॓ल्ड परकिन ने व्यक्त किए हैं—

‘(यूरोपीय) औद्योगिक क्रांति मात्र उत्पादन तकनीक अथवा उसके माध्यम से उत्पादकता में आए सकारात्मक परिवर्तन तक ही सीमित नहीं थी, सही मायने में यह सामाजिक कारणों एवं जनाकांक्षाओं से प्रेरित महान सामाजिक क्रांति थी.’

औद्योगिक क्रांति न केवल सामाजिक बदलाव का कारक बनी थी, बल्कि इसने लोगों के विचारों, व्यवहार से लेकर उनके सोचने-विचारने की तकनीक को भी प्रभावित किया था. विज्ञान और परंपरा से प्रेरित विचार की भिन्न-भिन्न शैलियों, अवधारणाओं का जन्म इस युग में हुआ. इतना कि उनके पारस्परिक अंतर्द्वंद्वों की संभावनाओं को कम करने के लिए बचाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा को बल मिला. इसका सुफल यह हुआ कि बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग लोकतंत्र के समर्थन में उतर आया था. सुदृद्ध औद्योगिकीकरण का एक परिणाम मध्यवर्ग का त्वरित उदय भी था. हैरानी की बात है कि यह मध्यवर्ग अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार था. वह जनसाधारण के समक्ष तो उसका होने का दम भरता, उसके मन जैसी बात करता, मगर व्यवहार में पूंजीपति का समर्थक बना रहता है. दूसरे शब्दों में मध्यवर्ग सही मायने में क्रांति का साधक और अवरोधक दोनों था. उसकी महत्त्वाकांक्षाएं उसे औद्योगिकीकरण के समर्थन के लिए उकसाती थीं तथा जातीय स्मृतियां, संस्कार उसपर अपनी जड़ों की ओर लौटने का दबाव डालते रहते थे. उसकी शिक्षा का बढ़ता स्तर, उसके असंतोष को विस्तार दे रहा था, जो क्रमशः नए विचारों तथा आंदोलन के आगमन की भूमिकाएं गढ़ रहा था. मध्यवर्ग के इस असंतोष को जनसाधारण के असंतोष में बदल देने की चुनौती हर क्रांतिकारी विचारक, आंदोलनकारी की रही है. यही कार्य वाल्तेयर(1694-1778) ने अठारहवीं शताब्दी में किया था. इसी को अपनी-अपनी तरह से अंजाम देने वालों में संत साइमन, रेने देकार्ते, जा॓न ला॓क, कांट, मिल, मार्क्स आदि विद्वान थे.

फ्यूरियर के समक्ष भी ऐसी ही परिस्थितियां थीं. उसके समक्ष पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा परिवर्तनकारी आंदोलन की परंपराएं थीं. सहस्राब्दियों तक राजनीति, समाज एवं प्रशासन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने वाली और उसके बहाने पूरे समाज का शोषण करनेवाली धार्मिक संस्थाएं नए ज्ञान तथा वैचारिक चेतना के आगे स्वयं को असहाय अनुभव कर रही थीं. उनका तिलिस्म धीरे-धीरे आभाहीन होता जा रहा था. इस संकट से से उबरने की कोशिश के फलस्वरूप उनके बीच भी दो फाट हो चुके थे. एक वर्ग आधुनिकता से प्रभावित था, स्वयं को आधुनिकता की कसौटी पर कसते हुए वह पूर्वस्थापित धारणाओं में संशोधन करने को भी तैयार था. दूसरा वर्ग बदलाव और आधुनिकता को अपने हितों के विपरीत मानते हुए नए ज्ञान-विज्ञान का आलोचक बना हुआ था. इस तरह परंपराओं को कुल मिलाकर पूरा समाज संक्रमण की स्थिति में था. वह उत्पादक तथा उपभोक्ता वर्ग के बीच तेज गति से बंटता जा रहा था. पूंजीवादी शक्तियां जहां आर्थिक संसाधनों पर कब्जा बनाए रखकर किसी न किसी बहाने अपने मुनाफे को बढ़ाने की कोशिश में थीं, तो सामाजिक बदलाव की समर्थक शक्तियों का सारा प्रयास जनता को पूंजीवादी मंसूबों के प्रति सचेतकर एक ऐसी व्यवस्था की नींव रखना था; जो उपयोगितावाद के मुख्य सिद्धांत ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख’ की भावनाओं के अनुरूप हो.

यह स्थिति पूरे यूरोप में थी, मगर उसका सर्वाधिक प्रभाव इंग्लेंड तथा फ्रांस के समाज पर पड़ा था. इंग्लेंड में बाजी जहां उद्योगपतियों के हाथ में थी, जबकि बाकी यूरोपीय देशों में पूंजीवाद अपनी पकड़ बनाने का प्रयास की कर रहा था. फ्रांस में स्थिति लगभग उलट थी. वहां वैचारिकता का गर्माया हुआ माहौल, एक नई क्रांति की भूमिका गढ़ रहा था. इंग्लेंड की राजनीति पर पूंजीपतियों के वर्चस्व का ही परिणाम था कि ओवेन जैसों को वहां पर अंततः नाकामयाबी ही हाथ लगी. न्यू हा॓रमनी जैसी सहजीवन को समर्पित बस्तियां अमेरिका के कतिपय खुले वातावरण में ही थोड़ी-बहुत संभव हो पाई थीं. हालांकि वहां भी अपेक्षित सफलता इस कारण नहीं मिल सकी कि प्रतिरोधक शक्तियां किसी भी प्रकार से यथास्थिति बनाए रखना चाहती थीं, और परिवर्तकारी शक्तियों के बीच इतना तालमेल और अनुभव नहीं था कि वह उनका मुकाबला कर सकें.

ओवेन की भांति फ्यूरियर का भी मानना था कि समर्पण एवं सहकार सामाजिक विकास के प्रमुख कारक हैं. इन्हीं में समाज के सुख एवं सृमद्धि के रहस्य छिपे पड़े हैं. इन्हीं के माध्यम से एक ऐसे समाज की रचना संभव है, जहां पर न्यूनतम आर्थिक विषमताएं हों. जहां कल्याण में सर्वाधिक की साझेदारी हो. उसका मानना था कि जिन समाजों ने सहकार को अपनाया है, वहां न केवल उत्पादकता के स्तर में अपेक्षाकृत तेजी से सुधार हुआ है; बल्कि नागरिकों की आत्मनिर्भरता भी विकसित हुई है. उसकी मान्यता थी कि कारीगरों को उनकी मेहनत और योगदान के बदले अवश्य ही कुछ मिलना चाहिए. और उनके परिश्रम का सर्वाधिक सुफल सहकारिता पर आधारित उद्यमों की स्थापना से ही संभव सहकारिता के विस्तार के लिए फ्यूरियर ने कल्याण-आश्रमों(Phalanstere) की स्थापना पर जोर दिया. ये आश्रम ओवेन के सर्वहितैषी आश्रमों के ही समान थे. जहां पर समाज के सभी वर्ग के लोग साथ-साथ रह सकते थे.

फ्यूरियर का कहना था कि कामगार को उसकी मेहनत के अनुपात में पूरा पारिश्रमिक मिलना चाहिए. उसके द्वारा बसाई गई बस्तियां अथवा आश्रम चार मंजिला इमारतों में स्थित थे; जिन्हें ‘ग्रांड होटल’ या ‘फेलेंस्टीयर’ (Grand Hotels or Phalanstère) कहा जाता था. फ्लेंस्टीयर शब्द यूनानी फेलेंक्स(Phalanx) से लिया गया था, जिसका अभिप्राय ‘सामूहिक आवास’ से है. फ्यूरियर का विचार था कि प्राचीन यूनान में लोग फेलेंक्स में ही रहते थे; जहां पर जीवन एक-दूसरे पर पूर्णतः निर्भर था. इमारतों के सबसे ऊपर की मंजिल पर समाज के आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्तियों की रहने की व्यवस्था थी; जबकि निर्धन और विपन्न लोग भू-तल पर रहने का आनंद ले सकते थे. काम की अनिवार्यता सभी के लिए थी. कार्यों का वितरण सदस्यों की योग्यता, अनुभव तथा उनकी रुचि के अनुसार किया जाता था. धन का निर्धारण किसी एक व्यक्ति के कार्य के आधार पर होता था. अधिक और अच्छे काम के लिए प्रोत्साहन-निधि की भी व्यवस्था थी. मगर अधिक काम करने पर अतिरिक्त आमदनी का कोई प्रावधान नहीं था.

फ्यूरियर की गणित और मनोविज्ञान में विशेष रुचि थी. आंकड़ों के खेल में उसको मजा आता था. उसकी कई स्थापनाएं आकंड़ों की बाजीगरी का मजा देती हैं. जैसे कि उसको विश्वास था कि कुल मिलाकर बारह प्रकार की सामान्य ऐषणाएं संभव हैं; जिनसे 810 विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व विकसित हो सकते हैं. अब यदि एक जैसे मनोविज्ञान के स्त्री और पुरुष की जोडे़ के रूप में संकल्पना की जाए तो एक फेलेंस्टीयर रहने वाले कुल स्त्री-पुरुषों की आदर्श संख्या 1620 होगी. फ्यूरियर के अनुसार यहां पर ‘इच्छाओं के प्रति लगाव’ का नियम लागू होता है. इच्छाओं के प्रति लगाव का नियम (The Law of Passional Attractions) फ्यूरियर की मौलिक अवधारणा थी.

फ्यूरियर की इस संकल्पना के बारे में स्टीवन क्रिस का कहना है—

‘न्यूटन ने जो कार्य भौतिक विज्ञान के लिए किया, फ्यूरियर ने वही मानव समाज के लिए किया. कहीं न कहीं, फ्यूरियर को यह भी विश्वास था कि उसकी यह खोज न्यूटन की खोज से अधिक महत्त्वपूर्ण है.’

फ्यूरियर मानवीय स्वतंत्रता एवं अधिकारिता का समर्थक था. उसने मानवाधिकारों को उसने सात कोटियों में वर्गीकृत किया है, उनमें प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वस्तुओं का संचयन करना, मछली का शिकार, चरागाह बनाना, आंतरिक संगठन बनाना, शिकार करना, देखभाल करने की आजादी, खोजबीन करने की आजादी तथा सम्मिलित हैं. फ्यूरियर द्वारा निर्धारित मानवाधिकारों को लेकर आज कुछ मतभेद हो सकते हैं. यथा शिकार करने की आजादी को ही लें. वर्तमान में मनुष्य एवं प्रकृति पारस्परिक निर्भरता को देखते हुए वन्यजीव संरक्षण का कानून पूरी दुनिया में लागू है, जिसके अंतर्गत पशु-पक्षियों की विशेष प्रजातियों के संरक्षण की व्यवस्था की जाती है. इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में शिकार करने की आजादी को बहुत प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता. लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि फ्यूरियर द्वारा स्थापित ये मानवाधिकार लगभग दो शताब्दी पुराने हैं. इस बीच परिस्थितियां काफी बदली हैं. फ्यूरियर का मानना था कि सहजीवन पर आधारित बस्तियों द्वारा वर्तमान समाज के दुर्गुणों पर नियंत्रण पाना संभव है. उसके अनुसार—

‘सहकारिता के आधर पर बसाई गई बस्तियों के जो चामत्कारिक परिणाम सामने आ सकते हैं उनमें:

1. तीन गुना अधिक औद्योगिक उत्पादन.

2. उद्योगों के प्रति आकर्षण तथा

3. मानवीय आवेगों में सुसामन्जस्य आदि सम्मलित हैं.

इस प्रकार कुछ ही वर्षों में पूरी दुनिया सहजीवन पर आधरित बस्तियों में व्यवस्थित हो जाएगी. वह मानवीय प्रेम, भाईचारा और आपसी सौहार्द जैसे सकारात्मक मूल्यों द्वारा संचालित होगी तथा दमन, नाकारापन और धोखादड़ी, हत्या, मारकाट आदि अवगुणों को अपदस्थ कर देगी, जो वर्तमान समाज में औद्योगिक प्रतिस्पर्धा एवं घोर व्यक्तिवादिता के कारण पैदा हुए हैं.’

फ्यूरियर का मानना था कि मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए स्वतंत्रता परमावश्यक स्थिति है. किंतु उसका मानना था कि—

‘वास्तविक स्वतंत्रता वही है, जिसका आनंद उठाया जा सके. ऐसी स्वतंत्रता, जिसे मनुष्य जी नहीं सकता, कोरा भ्रम और अवास्तविकता है. स्वाधीनता की रक्षा के लिए कुछ सामाजिक मर्यादाओं का निर्वाह अत्यावश्यक है. फ्यूरियर के अनुसार ये मर्यादाएं निम्नलिखित हैं—

1. कारगर औद्योगिक तंत्र की खोज एवं उसका संचालन.

2. प्रत्येक व्यक्ति के मूल अधिकारों की सुनिश्चितता.

3. धनवान एवं निर्धन व्यक्ति के अधिकारों के बीच सामंजस्य स्थापित करना, ताकि जनसामान्य को भी वे सभी न्यूनतम सुविधाएं प्राप्त हो सकें, जिससे वह जीवन-समाज प्रदत्त सभी सुखों का भोग कर सके.’

फ्यूरियर ने मानव व्यवहार की मनोविज्ञान के आधार पर व्याख्या करने का प्रयास किया है. उसके द्वारा कल्पित बारह मूल ऐषणाओं में पांच प्रमुख मानवीय ऐंद्रिक अनुभूतियां हैं: जिनमें स्पर्श करना, देखना, चखना, सुनना और सूंघना सम्मिलित हैं. चार आत्मिक अनुभूतियां—महत्त्वाकांक्षाएं, मैत्री, प्यार एवं पैत्रिकता की भावना हैं. फ्यूरियर के अनुसार शेष तीन ऐषणाएं विभाजक किस्म की हैं. इनमें से पहली नौ का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है. विभाजक कोटि की ऐषणाओं में पहली ला॓ पेपीला॓न(la Papillone) है; जिसका संबंध विविधताओं के प्रति लगाव से है. फ्यूरियर ने इसके माध्यम से सहज मानवीय प्रवृत्तियों की ओर संकेत किया था कि कोई भी व्यक्ति एकरसता को लंबे समय तक सहन नहीं कर पाता. कारीगर एक ही प्रकार के कार्य से बहुत जल्दी ऊबने लगता है. एक ही तरह का भोजन कुछ दिनों के बाद अरुचिकर लगने लगता है. ठीक ऐसे ही जैसे कि दो प्रेमी कालांतर में अपना आकर्षण खोने लगते हैं, और उनका प्रेम उबाऊ बन जाता है.

आलोचकों की परवाह किए बिना फ्यूरियर ने चर्च की यह कहकर आलोचना की थी कि वह धर्म की आड़ में लोगों के मन में कुंठा, हताशा और अविश्वास को बढ़ावा देता है. मनुष्य अपने कार्य में बदलाव अथवा काम-संबंधों की एकसरता से उबरने के लिए जब भी कोई प्रयास करता है, तो धार्मिक दबावों के कारण उसके मन में एक कुंठा एवं ग्लानिभाव पैदा होने लगता है, जो उसके नैसर्गिक विकास में बाधक होता है. उसने एडम स्मिथ की मान्यता कि समाज में विशेषज्ञ कारीगरों की बहुलता होनी चाहिए, का भी विरोध किया था. उसका मानना था कि इससे समाज में तनाव और कुंठा का विकास होगा. कारीगर को काम के दौरान आनंद की अनुभूति न होने के कारण उसकी उत्पादकता में कमी आएगी, साथ ही नई खोजों को भी नुकसान पहुंचेगा. स्टीवन क्रिस के अनुसार—

‘फ्यूरियर ने अतिरेकपूर्ण औद्योगिकीकरण की निंदा की थी. जेम्स मिल एवं एडम स्मिथ द्वारा समर्थित लेसे फेसर (मनचाहा करने की अनुमति) नामक अर्थव्यवस्था में उदारवाद के समर्थक सिद्धांत भी वह विरोधी था. फ्यूरियर ने उदारवाद और लेसे फेयर का प्रतिवाद उनके द्वारा मानव समाज पर पड़ने वाले प्रभावों के कारण नहीं किया था. अपितु इसलिए कि उसको विश्वास था कि औद्योगिक समाज लंबे समय तक टिकने वाला नहीं है. शायद इसी कारण उसने औद्योगिकीकरण के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए कोई सुझाव तक नहीं दिया. बल्कि बड़ी आसानी से वह इनकी उपेक्षा करता हुआ आगे बढ़ता गया.’

फ्यूरियर ने दूसरी ऐषणा के रूप में ‘ला॓ केबा॓लिसट्’(la cabaliste) यानी स्पर्धा, संगठन और कूटनीति के माध्यम से अपने लक्ष्य को किसी भी भांति प्राप्त कर लेने की कामना को रखा है. उसके अनुसार यह आदिम लालसा का ही रूप है. प्रारंभिक समाजों में संगठन और स्पर्धा कदाचित हानिकारक रूप भी ग्रहण कर लेती थी. लेकिन आधुनिक समाजों में संगठन एवं स्पर्धा विकास के लिए आवश्यक बन चुकी है. एक अच्छा उत्पादक समूह अपने उत्पाद को प्रतिस्पर्धी समूह के उत्पादों की अपेक्षा अधिक उपयोगी, सस्ता एवं सुंदर बना सकता है. शीतल पेय बनाने वाला समूह अपने उत्पाद को प्रतिस्पर्धी उत्पादक की तुलना में अधिक स्वादिष्ट, स्वास्थ्यवर्धक और आकर्षक बनाकर ग्राहकों के मन में अपनी पैठ बना सकता है. ला॓ केबा॓लिस्ट की अवधारणा किसी आधुनिक उद्यम के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही यह सहकारिता के लिए भी उपयोगी है. विवेक तथा उपयुक्त लक्ष्य के अभाव में स्पर्धा षड्यंत्र का रूप ग्रहण कर सकती है, जबकि स्वस्थ स्पर्धा की भावना से मनुष्य की बहस करने की नैसर्गिक प्रवृत्ति तो संतुष्ट होती ही है, उसका विकास के क्षेत्र में भी उपयोग हो सकता है. ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग ही ला॓ केबा॓लिस्ट की अवधारणा का मूलमंत्र है.

अंत में तीसरी प्रमुख ऐषणा ला॓ कंपोसिट(la composite) है. फ्यूरियर ने इसे बाकी तीनों ऐषणाओं में सर्वश्रेष्ठ माना है. ला कंपोसिट का अभिप्राय है— परस्पर मिलकर रहने, मिल-बांटकर खाने और अच्छे मामलों में सबकी साझेदारी से है. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा उसके हित सबके साथ रहने, साथ-साथ काम करने तथा सुख-दुःख में हिस्सेदारी करने से है. यही सामाजिकता का पर्याय, उसका मूल उद्देश्य भी है. उपर्युक्त तीनों ऐषणाओं से साफ है कि फ्यूरियर को मनोविज्ञान की जानकारी थी. मानव प्रवृत्तियों को विभिन्न वर्गों में बांटकर उसने उनकी उन विशेषताओं की ओर साफ संकेत किया था, जो सामाजिक विकास में सहायक सिद्ध हो सकती हैं. यही कारण है कि फ्रांस में फ्यूरियर के विचारों को पर्याप्त स्वीकृति मिली. आने वाले वर्षों में सहकार के विचार को आगे ले जाने में उसके विचार बहुत सहायक सिद्ध हुए.

फ्यूरियर के विचारों का आर्थिक महत्त्व तो असंद्धिग्ध है ही, उनका सामाजिक महत्त्व भी कम नहीं है. फ्यूरियर ने जोरदार ढंग से स्त्री-स्वातंत्रय का समर्थन किया था. यह उसकी विलक्षण मेधा का ही प्रमाण है कि उसने स्त्री-आधिकारिता का उन दिनों समर्थन किया था, जब भारत समेत किसी भी देश में स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता था. सामाजिक भेदभाव का शिकार होने के साथ उसको तरह-तरह के उत्पीड़न का सामना भी करना पड़ता था. फ्यूरियर को इसके लिए स्थानीय चर्च एवं धर्मसभाओं के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. हालांकि बाद में उसके धैर्य एवं विश्वसनीयता ने पूरा मामला उसके पक्ष की ओर मोड़ दिया. आगे चलकर स्त्री-स्वातंत्रय के बड़े-बड़े समर्थक फ्रांसिसी समाज में हुए और एक समता-आधारित आधुनिक समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ. स्त्री-स्वातंत्रय को लेकर फ्यूरियर के विचारों पर स्टीवन क्रिस लिखते हैं.

‘वह कामेच्छा पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंध् के विरुद्ध था. बड़े ही साहसपूर्ण ढंग से उसने समाज में काम-संबंधें की स्वतंत्रता का पक्ष लिया, जो उस समय तक ईसाई मान्यताओं समेत किसी भी धर्म के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. हालंकि पीड़ामय या बलात् काम-संबंधों पर प्रतिबंध का समर्थक था. वह स्त्री-आधिकारिता का भी समर्थक था, हालांकि उसने स्वीकार किया था कि उसके समाज में स्त्री पर अनेक बंधन हैं. वह मानता था कि किसी भी समाज के विकास का स्तर इस बात से आंका जा सकता है कि वह स्त्री के प्रति कितना उदार है तथा स्त्री उसमें स्वयं को कितना मुक्त अनुभव करती है.’

स्त्री-स्वातंत्र्य का पक्षधर होने के कारण यह मान लेना कि फ्यूरियर स्त्री-पुरुष समानता का भी समर्थक था, गलत होगा. उसने कभी स्त्री-पुरुष समानता का पक्ष नहीं लिया. बल्कि उसका मानना था कि स्त्री और पुरुष के बीच नैसर्गिक अंतर होने के कारण वे दोनों कभी समान नहीं हो सकते. तब उसके द्वारा प्रस्तावित फेलेंस्टियरर्स में पारिवारिक संबंध कैसे हों? सर्वकल्याण की अवधारणा पर बने उन आश्रमों में भी क्या स्त्री कल्याण से वंचित रहेगी. लैंगिक आधार पर स्त्री-पुरुष में अंतर बताने वाले फ्यूरियर के बारे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है. फेलेंस्टियरर्स के जनजीवन का उल्लेख करते समय वह एक बार फिर अपनी ही मान्यताऒं का खंडन करता हुआ नजर आता है. फेलेंस्टियरर्स के जनजीवन के बारे में—

‘उस(फ्यूरियर)ने पुरुषसत्तात्मकता का निषेध किया है. उसका मानना था कि यूरोपीय परिवारों की वर्तमान संरचना भी स्त्री की दासता के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है. इसी के कारण मनुष्य का झुकाव अधोमुखी यानी परिवार, पति-पत्नी तथा बच्चों की ओर बना रहता है, न कि उर्ध्वमुखी यानी समाज की ओर. इसलिए फ्यूरियर ने अपने आश्रमों के लिए ऐसी पारिवारिक संरचना की परिकल्पना की थी, जो यूरोपीय सभ्यता के लिए एकदम अलग-अनजानी होगी.’

फ्यूरियर न केवल अच्छा लेखक था बल्कि अच्छा आलोचक भी था. राबर्ट ओवेन की तरह वह भी एक संवेदनशील और आदर्शवादी विचारक था. समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता, शिक्षा एवं सम्मान में भारी अंतर देखकर उसको गहरा क्षोभ होता था. उसने विषमता से परे एक ऐसे समरस समाज की संकल्पना की थी, जहां सभी मिल-जुलकर रह सकें, जहां सभी को विकास के एक समान अवसर उपलब्ध हों तथा जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी के साथ-साथ, सदस्य इकाइयों की राय का पूरा सम्मान होता हो. उसने ऐसे कल्याण-आश्रमों(Phalanstere) की स्थापना का आग्रह किया था, जिसमें लगभग 1500 व्यक्ति सामूहिक रूप से साथ रह सकें.

फ्यूरियर चाहता था कि उसके आश्रमों में सामूहिक रसोईघर, भोजनालय, स्कूल, उद्योग, मनोरंजन-केंद्र आदि की व्यवस्था हो. लोग अपने सामूहिक हितों के अनुसार मिलजुलकर अपने विकास की प्राथमिकताएं तय करें तथा उनके अनुरूप आपस में मिल-बांटकर कर काम करें. कोई भी एक काम किसी व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूह के लिए निर्धारित न हो. सदस्यों की अधिकतम कार्यक्षमता और उत्पादकता को बनाए रखने के लिए उनके काम का बदलते रहना जरूरी है. किंतु कार्य का विभाजन सदस्यों की इच्छा के अनुसार किया जाए, ताकि असहयोग एवं असंतोष की संभावना को न्यूनतम स्तर पर रखकर उत्पादकता के उच्चतम स्तर को प्राप्त किया जा सके. न्यायिक कार्यविभाजन के लिए वह कार्यों का वर्गीकरण करने के पक्ष में था.

फ्यूरियर स्वयं भी फल, सब्जियों, विशेषकर सलाद का शौकीन था, इसलिए वह चाहता था कि फेलेंस्टियर्स की स्थापना नदी के किनारे, उपजाऊ जमीन पर हो. वह अनाज के बजाय फल, सब्जी, मधुमक्खी, मुर्गीपालन आदि के उत्पादन के पक्ष में था. इसलिए कि इन फसलों से जहां कम समय में अधिक नकद आमदनी संभव थी, वहीं अनाज उत्पादन की अपेक्षा समय की बचत और लागत भी कम आती थी. प्रत्येक फेलेंस्टियर का आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना भी एक शर्त थी, जिसके लिए वह चाहता था कि कम से कम चार सौ एकड़ उपजाऊ भूमि उसके पास हो.

फ्यूरियर का मानना था कि सर्वकल्याणकारी आश्रमों (फेलेंस्टियर्स) का संगठन संयुक्त स्कंध के आधार पर होना चाहिए. प्रबंधकों का चयन उसके सदस्यों के बीच से आम चुनाव के आधार पर किया जाए. सदस्यों को उसका अंशधारक होना अत्यावश्यक है. उपनिवेश का प्रबंध निदेशक-मंडल द्वारा किया जाए, जिसके सदस्य यूनार्क(Unarch) कहलांएगे. फ्यूरियर सही मायने में एक दूरदृष्टा विचारक था. उसका सपना पूरे समाज को उसी प्रकार के सर्वकल्याणकारी आश्रमों में बांट देने का था. उसका सपना था कि एक दिन पूरा संसार इसी तरह के फैलेंस्टियर्स में बंट जाएगा. उस दिन पूरा संसार एक संघीय राज्य होगा, जिसकी राजधानी का॓स्टेंटीनापा॓ल(Constantinopol) में होगी और उसके राज्याध्यक्ष का पदनाम ओमीनार्क(Omniarch) होगा. फ्यूरियर को विश्वास था कि इस तरह की व्यवस्था से सामाजिक अलगाव घटेगा, लोग एक-दूसरे के करीब आएंगे, उनके संकटों में कमी आएगी, तब पूरा समाज एक पारिवारिक समूह में बदल जाएगा. कार्यों के बीच अंतरपरिवर्तनीयता होने से सदस्यों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी नहीं रहेगी, न किसी कार्य को हीन समझा जाएगा. प्रकारांतर में इससे विभिन्न कार्यों के लिए मजदूरी में असमान अंतर को भी पाटा जा सकेगा. इस प्रकार समाज में मनुष्य एक-दूसरे के निकट आएंगे और घृणा तथा द्वेष के स्थान पर सहयोग का भाव पैदा होगा. सामूहिक भोजन निश्चय ही परिवार के भोजन की अपेक्षा सुखद होगा.

मिल की भांति फ्यूरियर भी मानता था कि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से सुखाकांक्षी होता है. उसकी प्रवृत्ति को एकाएक बदल पाना संभव नहीं है, अतएव यह आवश्यक है कि समाज का गठन ऐसा हो, जहां मनुष्य के लिए अधिकतम सुखों की प्राप्ति हो सके. इसके लिए सभी अपेक्षित साधन आसानी से प्राप्त हो सकें, ताकि मनुष्य की शक्तियों का अपव्यय न हो तथा वह अपनी कार्यक्षमता का उपयोग अपने और समाज के निर्माण के लिए कर सके. फ्यूरियर की विचारधारा भारतीय आश्रम परंपरा से काफी मेल खाती है. वह प्रस्तावित आश्रमों में फौज, अंगरक्षक, पुलिस, वकील आदि रखने का विरोधी था और उन्हें अपनी आदर्श समाज-व्यवस्था के लिए अनावश्यक मानता था.

फ्यूरियर बड़े नगरों की समाप्ति के पक्ष में था. वह आडंबरविहीन ग्रामीण जीवन को महत्त्व देता था. कृषि को वह रोजगार का महत्त्वपूर्ण साधन मानता था. हालांकि वह इतना अवश्य चाहता था कि किसान अपनी आयवृद्धि के लिए उन फसलों को उगाने के लिए प्राथमिकता दें, जिनसे उन्हें अधिकतम आय हो सके. यहां उल्लेखनीय है कि फ्यूरियर की गांव संबंधी अवधारणा भी परस्पर-आश्रित आत्मनिर्भर समूहों, जिन्हें वह फेलेंस्टियरर्स कहता था, का पर्याय थी. पूर्ण आत्मनिर्भर, आडंबरविहीन ग्राम्याधारित/आश्रमाधारित जीवन को प्रमुखता देते हुए उसने ‘भूमि की ओर चलो’(Back to Land) का नारा भी दिया था. वह चाहता था कि समाज से मजदूरी की प्रथा समाप्त हो जाए, उसने लिखा भी थ—

‘अर्थशास्त्रियों की प्रथम समस्या यह होनी चाहिए कि वे मजदूरी पर काम करने वाले मनुष्य को सहकारी मालिक में बदलने का तरीका खोजें.’

ओवेन और प्रूधों से भिन्न मत रखते हुए फ्यूरियर ने व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार का समर्थन किया है. लेकिन वह अधिकार आंशिक ही है. सहकारिता के द्वारा उसकी रचना में बदलाव लाना चाहता थे. उसका मानना था कि—

‘व्यक्तिगत संपत्ति सभ्य समाज की आज भी सबसे महान उत्प्रेरक शक्ति है.’

फ्यूरियर का आर्थिक दर्शन पूर्णतः व्यावहारिकता पर आधारित था. वह श्रम की महत्ता को समझता था, किंतु चाहता था कि श्रम की उपस्थिति अनुकूल परिस्थितियों और वातावरण में हो, जिससे कि श्रमिक अपने कार्य के प्रति समर्पित रह सके. उसका मानना था कि पूंजीवादी समाज में श्रम की स्थितियां बोझिल और उबाऊ होती हैं, इसलिए कि वहां पर केवल उत्पादन पर जोर दिया जाता है. श्रमिक को महज एक प्राणी माना जाता है, जो पेट भरने और तन ढकने खातिर अपना श्रम बेचता है, जिसका अपने श्रम पर अधिकार भी सीमित है. इसलिए कि श्रम का मूल्य तय करने संबंधी समस्त अधिकार पूंजीपतियों ने अपने पास रख छोड़े हैं. पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमिकों के वास्तविक कल्याण को नकार कर ऐसे कानून बनाए जाते हैं, जो अंततः पूंजीवाद को ही पोषित करते हैं. परिणामतः श्रमिकों को अक्सर शोषण का सामना करना ही पड़ता है.

श्रम को रुचिकर बनाने के लिए फूरियर ने कुछ सुझाव भी दिए, जैसे कि कार्य कर्ता की रुचि के अनुकूल होना चाहिए, किसी भी कर्मचारी से एक-जैसा कार्य लगातार न कराया जाए, कार्य के बदले उचित समय पर वाजिब मजदूरी की व्यवस्था हो, अच्छे कार्य का चयन स्वेच्छा से हो, सहकारी प्रयासों से हो. अच्छे कार्यों से उसका मंतव्य था कि उससे समाज के अधिकतम लोगों को लाभ पहुंचता हो. सहकारी श्रम की महत्ता दर्शाते हुए उसने कहा थाµस्वधीनता की रक्षा के लिए समाज की निर्देशक ताकतों की रक्षा आवश्यक है.

फ्यूरियर ने मुक्त समाज की संकल्पना की थी. वह एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देखता था, जिसके नागरिक निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हों. किंतु उसका मानना था कि स्वाधीनता की रक्षा के लिए सामाजिक नियमों का अनुपालन भी जरूरी है, जिसके अनुसारः

1. विकास के लिए संगठन पर आधारित औद्योगिक प्रणाली की पहचान करना.

2. नैसर्गिक अधिकारों के समान, मनुष्यमात्र के सभी अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी.

3. समाज के अधिकतम लोगों के हितों को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुंचाए बिना, धनी और निर्धन आदमियों के हितों के बीच समुचित तालमेल करना. बशर्ते गरीब लोगों को जीवनयापन के लिए न्यूनतम सुख-सुविधाएं आसानी से उपलब्ध कराई जाती हों.

फ्यूरियर ने मनुष्य के नैसर्गिक अधिकारों को सात वर्गों में बांटा है, जिनमें प्रकृति प्रदत्त उत्पादों को जमा करने का अधिकार, चरागाह जहां पर वह वह अपने पालतू पशुओं का चरा सके, मछलीपालन, शिकार करने का अधिकार, आंतरिक मेलजोल कायम करने तथा संगठन बनाने की स्वतंत्रता, राजनीतिक आजादी एवं लुटने और लूटे जाने से मुक्ति. फ्यूरियर ने जिन प्राकृतिक अधिकारों पर जोर दिया है, उन्हें लेकर मतभेद हो सकते हैं, मगर यह ध्यान रखना होगा कि उनीसवीं शताब्दी के मध्य में जनसामान्य का जीवन प्रकृति के सहारे था. समाज का बड़ा वर्ग उन दिनों भी कृषि तथा उससे जुड़े उद्यमों से जीवन निर्वाह करता था. फ्यूरियर ऐसे संवेदनशील समाज का सपना देखता था, जिसके सदस्य आपस में आत्मा की गहराई तक जुडे़ हों. श्रम और सहकार की महत्ता पर जोर देते हुए उसने एक जगह लिखा है—

‘क्या आप अपने कार्य के दौरान श्रम का आनंद लेना चाहते हैं, इसके लिए आपको अधिक कुछ नहीं करना पड़ेगा, केवल अपने श्रम की दिशा बदलने की जरूरत है. अभी तक आप दूसरों के लिए कार्य करते रहे थे, अब आप एक-दूसरे के लिए कार्य करके देखिए.’

फ्यूरियर उन शुद्धतावादियों का कट्टर विरोधी था, जो मानवीय इच्छाओं के दमन की बात करते रहते हैं. ‘इच्छाओं का सत्कार’ सुखवादियों के साथ-साथ पूंजीवादी मान्यता भी रही है. उसका यह दर्शन पूंजीवाद से पे्ररित था, मगर वह मानव-मूल्यों में भी आस्था रखता था और मानता था कि सामूहिक जीवन से पूंजीवाद की कुरीतियों को दूर किया जा सकता है. ओवेन की भांति फ्यूरियर के साथ भी बिडंबना यह रही कि लगातार समर्पित और प्रयोगरत रहने के बावजूद वह भी स्थायी सफलता से दूर रहा, लोग उसका सनकी कहकर मजाक उड़ाते रहे. गणित के प्रति आस्था और संभवतः नए सिद्धांत गढ़ने के प्रति अतिरिक्त मोह में कई जगह फ्यूरियर ने अपने आलोचकों को अपनी सनक का परिचय भी दिया है. जैसे कि उसका यह आकलन

1. कि पृथ्वी की कक्षा में छह चंद्रमाओं की उपस्थिति.

2. कि एक दिन समुद्रों अपना समस्त खारापन खोकर मीठे पानी के स्रोत बन जाएंगे.

3. कि एक अनुमान के अनुसार होमर अकेला 370 लाख कवियों के बराबर है. 370 गणितज्ञ न्यूटन के तथा दुनिया-भर के 370 लाख नाटककार मोलियर के तुल्य हैं.

4. कि प्रत्येक स्त्री के कम से कम चार प्रेमी होते हैं. पुरुषों के बारे में भी यही हकीकत है.

इन कुछ अनर्गल अवधारणाओं/दुर्बलताओं के बावजूद फ्यूरियर की विद्वता तथा मानवकल्याण के प्रति उसकी आस्था से इंकार नहीं किया जा सकता. सही मायने में उसके विचार अपने समय से वर्षों आगे थे. किंचित वैचारिक अस्थिरता के बावजूद यह साफ है कि वह ज्ञान के नाम पर रूढ़िवादिता से कोसों दूर था. एक प्रसिद्ध द्रष्टांत के माध्यम से फ्यूरियर ने विज्ञान के प्रति अपने आकर्षण का खुलासा किया है. उसके अनुसार—

‘इतिहास का मार्गदर्शन चार सेब करते रहे हैं, जिनमें से दो अपवित्र थे—पहला आदम तथा दूसरी ट्राय की नायिका हेलन. बाकी दो पवित्र हैं, जिनके नाम हैं—न्यूटन और…..!’

फ्यूरियर चौथे सेब का जानबूझकर उल्लेख नहीं करता. उसका फैसला अपने पाठकों पर छोड़ देता है. उसका इशारा अपनी ही तरफ है. कई जगह वह आत्ममोह से भी ग्रस्त नजर आता है. एक स्थान पर उसने स्वयं को ‘तर्क का मसीहा’(Messiah of Reason) घोषित किया है. एक अन्य स्थान पर वह अपनी तुलना न्यूटन से करता है. उसके अनुसार न्यूटन ने सार्वलौकिक आकर्षण(गुरुत्वाकर्षण) बल की खोज की थी और उसने अतितीव्र भावनात्मक आकर्षण(Passional attraction) की. इसे हम उसका पागलपन भी कह सकते हैं. मगर फ्यूरियर के विचारों कई जगह चैंका देने वाली मौलिकता है. रूसो की भांति वह भी बर्जुआ समाज की आलोचना करता है, जो उसके अनुसार असंतुलित विकास का जन्मदाता है. इसके स्थान पर उसने पूर्णतः शोषणमुक्त और समानता पर आधारित समाज की संकल्पना की है, जिसमें मनुष्य का चिंतन उर्ध्वमुखी हो और वह विकास के बहुआयामी लक्ष्य को प्राप्त कर सके.

हम देख सकते हैं कि एक लगभग अनपढ़ सेल्समेन बड़ी साफगोई, निडरता एवं आत्मविश्वास के साथ, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में नए-नए विचारों से अपने समय के बड़े-बड़े विद्वानों को चमत्कृत करता चला जाता है. जिसके विचारों में अनगढ़पन की झलक है, बीच-बीच में उसकी सनकें भी हैं, जो अजीबोंगरीब मान्यताओं के रूप में प्रकट होती रहती हैं, जिनके कारण वह उपहास का पात्र भी बनता है. मगर इस सबके बावजूद उसके विचारों में गजब की मौलिकता भी है. बल्कि उनमें मौजूद नएपन के सापेक्ष असंगतियां नगण्य-सी हैं. यही कारण है कि आनेवाले वर्षों में फ्यूरियर का प्रभाव पूरे समाज पर पड़ा. तथापि किंचित वैचारिक अस्थिरता के कारण वह सीमित अवधि तक ही कायम रह सका.

फ्यूरियर के विचारों की व्यापकता तथा उनके द्वारा पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान केवल इसी से लगाया जा सकता है कि 1855 में उसकी मृत्यु के मात्र अठारह वर्ष पश्चात फ्रांस, बेल्जियम तथा स्वीडन के फ्यूरियरवादियों ने अमेरिका के टेक्सास इलाके में एक साथ कई, सहकार पर आधारित बस्तियों की स्थापना के लिए कार्य किया और अप्रत्याशित सफलता भी प्राप्त की थी. उन दिनों अमेरिका का विस्तृत भूखंड अनेक परिवर्तनवादियों, नवजागरण के समर्थकों, उत्साही समाजसेवियों को आमंत्रित कर रहा था. 1855 के आसपास फ्यूरियर के विचारों से प्रभावित होकर लगभग दो सौ कालोनाइजर सहकार-बस्तियों की स्थापना के लिए टेक्सास पहुंचे थे. वर्तमान हचसन के पास उनका जहाज किनारे लगा. वहां से उतरकर वे उपयुक्त स्थल की तलाश में आगे बढ़े. इस बीच लगभग ढाई सौ किलोमीटर की यात्रा उन्होंने बैलगाड़ियों पर तय की.

अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों में फ्यूरियर के सिद्धांतों के आधार पर उन्होंने लगभग चालीस सहकार बस्तियों स्थापना की थी. उनमें से एक कालोनी वर्तमान डलास(Dallas) के निकट ला॓ रयूनिआ॓न(La Réunion) थी, जिसमें लगभग साढ़े तीन सौ परिवार आकर बसे थे. अपनी एकता तथा स्थानीय निवासियों से स्वयं को अलग दिखाने के लिए वे अलग भाषा प्रयोग करते. उनका प्रशासनिक ढांचा भी अलग था. महिलाएं वहां मतदान में हिस्सा ले सकती थीं. सह-उद्यम उन बस्तियों की अर्थव्यवस्था के आधार थे, जिनसे होने वाले लाभ को सदस्यों में बांट दिया जाता था. साम्यवाद के सिद्धांतों पर आधारित उन बस्तियों की विशेषता यह थी कि उनमें व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकार भी दिया गया था. लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों तथा कार्यकर्ताओं में दूरदर्शिता के अभाव के कारण सहकारिता के वे प्रयोग अपेक्षित सफलता प्राप्त कर पाने में असमर्थ रहे.

टेक्सास का विपरीत मौसम, खाद्यान्न की कम उपलब्धता जैसे कुछ कारण ऐसे रहे जिससे सहकारिता का वह प्रारंभिक प्रयोग लंबा न खिंच सका. लेकिन उन बस्तियों की आंतरिक व्यवस्था दर्शाती थी, नया समाज गढ़ने के अपने प्रारंभिक संकल्प में उन्हें सफलता प्राप्त हुई थी. इन सभी कारणों से सहकारिता और समाजवाद के प्रारंभिक सिद्धांतकारों में फ्यूरियर का योगदान सदैव उल्लेखनीय बना रहेगा. इस संबंध में जी. डी. एच. कोल के विचार भी द्रष्टव्य हैं…

‘समाजवाद अधिक संपन्न विचारों की व्याख्या होता यदि फ्यूरियर के विचारों पर अधिक ध्यान दिया गया होता.’

फ्यूरियर की मौलिक प्रतिभा, चीजों को परखने की उसकी अनूठी शैली ने ही उसको फ्रांसिसी नवजागरण का पुरोधा बनने में मदद की थी. उसके विचारों के आधार पर समाजवादी आंदोलन और सहकार को नई जमीन प्राप्त हुई. यह मामला विशेष छानबीन की मांग करता है कि मात्र डेढ़ शताब्दी पहले यूरोपीय अर्थव्यवस्था की अस्थि-मज्जा बनने वाले सहकारी तंत्र के अचानक कमजोर पड़ने के कारण क्या रहे. वही अमेरिका जो सहकार के शुरुआती दौर के सफलतम प्रयोगों का गढ़ रहा है, कालांतर में पूंजीवाद की झोली में कैसे जा गिरा. तब संभव है कि हमें फ्यूरियर के विचारों की प्रासंगिकता कुछ और अधिक नजर आने लगे.

© ओमप्रकाश कश्यप