धर्मनिरपेक्षता और जाति

  • कोई भी व्यक्ति इतना न्यायप्रिय नहीं होता, जितना पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति.—गिल्बर्ट कीथ चेटरसन

  • ‘‘मेरे विचार में भारत न हिंदू देश बन सकता है ना हिंदू धर्म भारत सरकार का धर्म बन सकता है. हमें याद रखना चाहिए कि हमारे देश में अल्पसंख्यक भी रहते हैं और हमारा यह कर्तव्य है कि उनकी सुरक्षा का प्रबंध करें. यह देश सबका देश है. चाहे कोई धर्म, कोई जाति हो. हम उस रास्ते पर नहीं चल सकते़ जिसपर पाकिस्तान चल रहा है. हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमारे धर्मनिरपेक्ष उद्देश्य सुरक्षित रहें. यहां हर मुसलमान, हर ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक वर्गों को यह विश्वास होना चाहिए कि वह सुरक्षित है और उसे भारतीय नागरिक की हैसियत से बराबर के अधिकार प्राप्त हैं. अगर हम उसे यह विश्वासदिलाने में नाकाम रहे तो यह हमारी विरासत और इस देश का घोर अपमान होगा.’’—सरदार वल्लभभाई पट

धर्मनिरपेक्षता का मामला आधुनिक राष्ट्रराज्य की न्यायचेतना से जुड़ा है. जबकि जाति इस देश के लिए कम से कम तीन हजार वर्ष पुरानी संस्था है. जाति का भारतीय, विशेषकर हिंदू समाज पर इतना गहरा प्रभाव है कि बिना इसके हिंदुओं को अपनी पहचान अधूरी लगती है. जबकि इसी की वजह से समाज के बड़े वर्ग को कदमकदम पर अपमानितलांछित होना पड़ता है. विभिन्न सभ्यताओं में कार्यविभाजन के लिए समाज को अलगअलग बांटने की संस्कृति रही है. वर्तमान में दुनियाभर में केवल भारत ऐसा देश है जहां आज भी जाति का बोलबाला है. जिसके चलते बच्चे के जन्म के साथ ही तय कर दिया जाता है कि वह समाज में कौनसा काम करने के लिए जन्मा है. इन दिनों परिस्थितियां बदली हैं. विशेषरूप से शहरों में. वहां जाति के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं. मगर यह सुगबुगाहट मुख्य रूप से जातिवादी अन्याय एवं शोषण का शिकार रहे वर्गों में देखने को मिलती है. जिन वर्गों को जातीय स्तरीकरण का लाभ मिलता आया है, वे मौका मिलते ही आज भी उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद ऐसा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. हाल ही में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का बयान देखा. उनके अनुसार जाति ठीक, जातिवाद बुरा है. उनके कहने का आशय है कि जाति भले बनी रहे, परंतु जातिवाद जाना चाहिए. यह ठीक ऐसा ही कामना है कि धर्म और धार्मिक दुराग्रह बने रहें और सांप्रदायिकता समाप्त हो जाए. लोकप्रिय राजनीति के दबाव भी जातिवाद को संरक्षित करने का काम करते हैं. हिंदुओं में जाति, सभ्यता और संस्कृति परस्पर अंतर्गुंफित हैं. इसलिए वे एकदूसरे के गुणदोष से भी प्रभावित होते हैं.

जातिवाद की तुलना में धर्मनिरपेक्षता आधुनिक अवधारणा है. कुछ विद्वान इसे मध्यकाल तक ले जाते हैं. अकबर आदि आरंभिक मुगल सम्राटों की यह कहकर प्रशंसा की जाती है कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. उनके राज्य में धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था. वे किसी सीमा तक सही भी हैं. लेकिन अकबर आदि की राजनीति धार्मिक उदारता अर्थात सर्वधर्म समभाव तक सीमित थी. वह स्वयं धार्मिक था और राज्य में अनेक पद धार्मिक आधार पर सुनिश्चित थे. उसे धार्मिक रूप से उदार सम्राट तो कहा जा सकता है, धर्मनिरपेक्ष नहीं. धर्मनिरपेक्षता के लिए राज्य का लोकतांत्रिक होना आवश्यक है. एक सिद्धांत के रूप में धर्मनिरपेक्षता यूरोपीय चिंतन की देन है. इस बारे में विचित्र बात यह है कि बहुधर्मिता जो कई बार सांप्रदायिकता के रंग में रंगकर भारत के लिए विकट स्थितियां पैदा कर देती है, जैसी कोई समस्या यूरोप में न थी. वहां धर्म का एकमात्र केंद्र चर्च था. उसके दो धड़े थे—कैथोलिक और प्रोस्टेंट. दोनों के बीच संघर्ष होता रहता था. वही दौर था जब वाल्तेयर, रूसो, हीगेल, फायरबाख, बूनो बायर, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन आदि ने धार्मिक पाखंड और उसके सहारे फलतेफूलते सामंतवाद का विश्लेषण करते हुए, तज्जनित बौद्धिक जड़ता, शोषण आदि की ओर इशारा किया था. वहीं जॉन लाक, हॉब्स, बैंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल, जेफरसन, थॉमस पेन जैसे विचारकों ने व्यक्ति स्वाधीनता और समानता की मांग को आगे बढ़ाते हुए विधिसम्मत राज्य की स्थापना पर जोर दिया था. उस समय तक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. उसे सफल बनाने का एकमात्र उपाय था, मानवमात्र की सामंतवाद से शारीरिकमानसिक मुक्ति.

धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्मदाता जार्ज जैकोब हॉलीयोक(1817—1906) को माना जाता है. विचारों से नास्तिक हॉलीयोक सहकारिता के पितामह कहे जाने वाले राबर्ट ओवेन से प्रभावित था. ओवेन ने इंग्लेंड एवं अमेरिका में सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना की थी. धर्मनिरपेक्षकता उसके उद्देश्य में व्यावहारिक जरूरत थी. सहकारिता और सहजीवन पर आधारित बस्तियों की सफलता के लिए आवश्यक था कि लोगों में धर्म आदि को लेकर मतभेद न्यूनतम हों. हॉलीयोक धर्मकेंद्रित समाज के स्थान पर ऐसे समाज का सपना देखता था, जिसमें लोग आपसी सहयोग और मैत्री द्वारा बंधे हों. ज्ञानविज्ञान और तर्क के आधार पर निर्णय लेते हों. मानते हों कि मानवतावादी लक्ष्यों की प्राप्ति में मनुष्य का अपना विवेक किसी भी देवता या पैगंबर से अधिक मददगार होता है. 1851 में धर्मनिरपेक्षता का विचार प्रस्तुत करते हुए हॉलीयोक ने ऐसे आदर्शोन्मुखी समाज की परिकल्पना पेश की थी, जिसमें लोग शारीरिक, मानसिक, नैतिक और बौद्धिक उठान के उच्चतम स्तर पर हों. जीवन अदृश्य शक्तियों की कृपा के बजाय ठोस, यथार्थ, सकारात्मक जीवनबोध और मानवविकास के उद्देश्य को समर्पित हो. जिनमें नैसर्गिक शुभता, सदगुण, चारित्रिक उदात्तता तथा वैचारिक गहनता हो; तथा लोग आस्था और वायवी विश्वासों के बजाय ठोस, दृश्यमान, चराचर जगत से प्रेरणाएं ग्रहण करते हों; और विशुद्ध मानवतावादी लक्ष्यों के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित हों. उसका मानना था कि मानवव्यवहार तथा उसके नैतिक प्रतिमानों का एकमात्र आधार लोककल्याण होना चाहिए. उसके लिए धर्म, आस्था, लोकपरलोक जैसी प्रगतिविरोधी मान्यताओं का बहिष्कार अत्यावश्यक है.

भारत में शासन के स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के अनुसरण की पहली विधिवत घोषणा 1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता के बाद हुई थी. उस समय दिल्ली सहित अनेक बड़े राज्यों पर मुस्लिमों का शासक था. दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता हिंदू थी. दोनों ही समुदाय धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़े थे. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के मूल में भी धार्मिक भावनाओं के आहत होने से जन्मा आक्रोश था. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन की बागडोर अपने हाथों में लेते हुए महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा. उसके तुरंत बाद देश में कानूनी सुधार के दौर की शुरुआत हुई. उसके फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप सामने आने लगा. भारतीय संविधान भी धर्मनिरपेक्षता की भावना से ओतप्रोत है. 1951 में हिंदू कोड बिल पर भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर ने जो कहा, उससे धर्मनिरपेक्षता को भलीभांति समझा जा सकता है. आंबेडकर के अनुसार—

धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं का ध्यान नहीं रखेगा. धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ केवल यह है कि यह संसद सारी जनता पर कोई एक विशेष धर्म नहीं थोप पाएगी.’

भारतीय संविधान में धमनिरपेक्षता को सिद्धांततः 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया. तो क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य का धर्म की ओर से महज तटस्थ हो जाना है? क्या यह केवल जनता के धार्मिक विश्वास एवं राज्य से जुड़ा विषय है? डॉ. आंबेडकर के उपर्युक्त कथन और संविधान संशोधन के समय सदस्यों की बहस पर विचार करें तो यही प्रतीत होता है. गांधी, नेहरू, पटेल, के. एम. मुंशी, लक्ष्मीकांत मेघ, के. एम. पणिक्कर, के. संथाराम, एच. आर. खन्ना, पी. वी. गजेंद्रड़कर आदि विद्वानों ने धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संदर्भ में ही परिभाषित करने की कोशिश की है. कुछ ऐसे नेता भी थे जिन्हें धर्मनिरपेक्षता का विचार ही अस्वीकार था. उनमें प्रमुख नाम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है. डॉ. राधाकृष्णन की ख्याति दार्शनिकविचारक के रूप में है. परंतु व्यक्ति के रूप में उन्हें उदार आस्थावादी ही कहा जा सकता है. वे धर्म को नैतिकता के आलंबन के रूप में देखते थे. उन्हें क्षोभ था कि ‘आधुनिक मनुष्य की मानस रचना रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट, मार्क्स की ‘दि कैपीटल’, डार्विन की ‘ऑन दि ओरीजिन्स ऑफ सोसाइटीज’ तथा स्पिंग्लर की ‘डिक्लाइन ऑफ वेस्ट’ के प्रभाव से हुई है.’ उनके अनुसार भारतीय राज्य की निष्पक्षता को धर्मनिरपेक्षता अथवा नास्तिकता के भ्रामक अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए. वे बिना धर्म के नैतिकता को असंभव मानते थे. इसलिए धर्मनिरेक्षता को उन्होंने अपने समय की सबसे बड़ी कमजोरी माना था(रिलीजन एंड सोसाइटी, पृष्ठ 20). इस तरह स्वयं डॉ. राधाकृष्ण भी धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संबंध में ही देखसमझ रहे थे. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज करते रहे कि समाज में अपनी प्रतिष्ठा, अपना स्थान सुरक्षित के लिए धर्म स्वयं नैतिकता का सहारा लेता है. हमारे युग की त्रासदी ही यही है कि यहां धर्म ने नैतिकता को हड़प लिया है.

बहुलतावादी भारतीय समाज में अनेक संस्कृतियां और उपसंस्कृतियां हैं. एक ही राष्ट्र की सीमा में यहां हिंदू, जैन, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि विभिन्न धर्मावलंबी रहते हैं. ऐसी स्थिति में धर्मनिरपेक्षता स्वयं एक मूल्य बन जाती है. ऐसा मूल्य जिसे समाज ने स्वयं हासिल किया है. सम्राट अकबर द्वारा सभी धर्मों के प्रति उदारता पूर्ण व्यवहार, महारानी विक्टोरिया द्वारा धर्मनिरपेक्षता की नीति लागू करना तथा संविधान में उसे एक मूल्य के रूप में शामिल करना इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारतीय जनता ऐसा चाहती थी. धर्म उसके लिए निजी आस्था और व्यवहार का विषय रहा है, राजनीति का नहीं. इसलिए यहां धर्म को लेकर कभी सीमारेखाएं नहीं बनीं. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए तो तत्कालीन भारतीय समाज को सामान्यतः दो हिस्सों में बंटा पाते हैं. एक ओर संभ्रात तबका, जिसमें जमींदार, नबाव, राजेमहाराजे, पुरोहितकाजी, सेठसाहूकार आदि सम्मिलित थे. उन्हें सत्तासंरक्षण प्राप्त था. बदले में वे सरकारी अमले को भेटसौगात आदि देकर प्रसन्न रखते थे. उनकी निगाह में शासन का अभिप्राय जनता से कर वसूली तक सीमित था. लगभग छह सौ रियासतें उस समय देश में थीं. जिनके कर्ताधर्ता अंग्रेजियत में ढले हुए थे.

दूसरा वर्ग किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों तथा उन छोटेछोटे व्यापारियों का था, जो अंग्रेजों तथा उनके मुंह लगे सामंतों के अत्याचारअनाचार का शिकार थे. अपने श्रमकौशल के भरोसे आजीविका कमाने वाला वह वर्ग अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति चाहता था. संभ्रांत तथा गैर संभ्रांत दोनों ही वर्गों में धर्म के आधार पर कोई विभाजन न था. दोनों में सभी प्रकार के धर्मावलंबी शामिल थे. आपसी लेनदेन था. हो सकता है शुद्धतावादियों का एक छोटासा तबका इधरउधर दोनों तरफ रहा हो. लेकिन उसकी जनसमाज में कोई पैठ न थी. आजादी के संघर्ष में यह वर्ग और भी करीब आया था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही यह तय हो चुका था कि स्वतंत्र भारत में सामंतों और पंडापुरोहितों के अधिकारों में भारी कटौती की दरकार होगी. नई व्यवस्था में धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम होगा. जनता मुख्य निर्णायक की भूमिका में रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान गर्मदल, नरम दल, क्रांतिकारी, अहिंसावादी आदि जितने भी समूह बने, उनमें धर्मनिरपेक्षता को लेकर लगभग आमसहमति थी. कह सकते हैं कि जातिविहीन समाज और धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता से जुड़े महत्त्वपूर्ण सर्वसम्मत संकल्प थे. जनमत के दबाव के चलते गांधी जैसे वर्णव्यवस्था समर्थक नेता को भी धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में आना पड़ा था. 1946 में ईसाई मिशनरी से संवाद करते हुए उन्होंने लिखा था—

यदि तानाशाह होता तो राज्य और धर्म को एकदूसरे से अलग कर देता. मैं अपने धर्म से बंधा हूं. उसके लिए अपनी जान भी दे सकता हूं. परंतु वह मेरा निजी मामला है. राज्य के साथ उसका कोई लेनादेना नहीं है. राज्य को स्वास्थ्य, लोककल्याण, संचार, विदेशनीति, मुद्रा जैसे धर्मनिरपेक्ष मामलों में फैसले लेने का पूरा अधिकार है; धर्मिक मामलों नहीं. धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी मसला है.’2

क्या धर्मनिरपेक्षता और शासन की प्रकृति में कोई अंतःसंबंध है? राजतंत्र हो या गणतंत्र धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर क्या दोनों ही खरे हैं? असल में ऐसा नहीं है. राजतंत्रात्मक शासन प्रणालियां किसी न किसी रूप में धर्म से अनुशासित और प्रेरित रही हैं. धर्म की भांति उनका ढांचा भी सर्वसत्तावादी होता है. इसलिए उनके लिए पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना, न केवल कठिन बल्कि असंभव होता है. उदार सम्राट अपने राज्य में विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच समानता का नियम लागू कर सकता है. वह धार्मिक भेदभाव से भी मुक्त हो सकता है. लेकिन धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए केवल इतना अपेक्षित नहीं होता. न ही उसका आशय सर्वधर्म समभाव तक सीमित होता है. राजतंत्र में सम्राट की हैसियत एकल संस्था की होती है. वह उदार हो या कठोर, सारे निर्णय उसकी के विवेककुविवेक से चलते हैं. राजा के कुछ सलाहकार भी होते हैं, परंतु दरबारियों की सलाह पर अमल करना सम्राट के लिए बाध्यकारी नहीं होता. सत्ताअंतरण में अनुवांशिक उत्तराधिकार का नियम राजा को और भी शक्तिशाली बनाता है. इस प्रकार उसकी हर इच्छा वैध मान ली जाती है. ऐसे राज्यों में धर्मनिरपेक्षता व्यक्तिगत निर्णय तक सिमटकर, प्रकारांतर में राजा या सम्राट की अनुकंपा के रूप में सामने आती है. राजा अपने निर्णय को इच्छानुसार कभी भी बदल सकता है. राजा के बाद, अथवा उसके विचारों में आए परिवर्तन के साथ ही धर्मनिरपेक्षता के आगे भी प्रश्नचिह्न लगने लगता है. उधर जो लोग राजा का गुणगान सभी धर्मों के प्रति उसकी उदारता और न्यायभावना के लिए करते आए थे, तत्काल उसे धर्मरक्षक, देवानामप्रिय, धर्मोद्धारक जैसी उपाधियों और अलंकारों से महिमामंडित करने लगते हैं. चूंकि राजतंत्र में राजा स्वयं एक संस्था होता है. इसलिए उसकी मर्जी राज्य की मर्जी भी मान ली जाती है. ऐसे में राजा की आस्था, राज्य की आस्था के रूप में प्रदर्शित होती रहती है. ऐसे राज्य में धर्मनिरपेक्षता न तो पूरी तरह फलित होती है, न ही लंबे समय तक टिकाऊ रह पाती है. आधुनिक राष्ट्रराज्य के लिए जो न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता जैसे मानवमूल्यों के आधार पर गठित होते हैं, वहां धर्मनिरपेक्षता राज्य की ‘कृपा’ के बजाय उसके संवैधानिक कर्तव्य के रूप में निरूपायित होती है. वह राज्य की विभिन्न धर्मावलंबी नागरिकों के प्रति निष्पक्षता एवं न्यायभावना को दर्शाती है.

श्रेष्ठ राज्य की नैतिकता उसके नागरिकों के आचरण में झलकनी चाहिए. धर्मनिरपेक्ष राज्य की अपेक्षा होती है कि नागरिकगण अपने धार्मिक विश्वासों के साथसाथ दूसरों के विश्वासों का भी समादर करें. धर्मनिरपेक्ष आचरण के लिए नागरिकों का धर्मविशेष के प्रति आस्थावान रहना आवश्यक नहीं है. मनुष्य धार्मिक आस्था के बिना भी धर्मनिरपेक्ष रह सकता है. राज्य की ओर से धर्मनिरपेक्ष आचरण दर्शाता है कि वह नागरिकभावनाओं के प्रति कितना उदार और संवेदनशील है. ऐसा राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है. यदि कहीं विवाद हों तो उनका समाधान विधिमान्य कसौटियों के अनुरूप खोजा जाता है. जाहिर है, धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म की उपेक्षा नहीं करता. न ही वह विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन कर उनकी कोटियां बनाता है. न ही यह निर्धारित करता है कि प्रचलित धर्मों में से कौनसा धर्म संवैधानिक मान्यताओं के अधिक करीब है. वह केवल धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर खुद को उसकी ओर से तटस्थ बना लेता है. चूंकि विभिन्न धर्मों के नैतिक सिद्धांतों में एक किस्म की एकता का भाव रहता है. इसलिए सुधी नागरिकगण धर्मनिरपेक्षता को गणतंत्र की अनिवार्यता के रूप में स्वीकारने लगते हैं. उन्हें यह विश्वास रहता है कि उनमें से कोई भी, धर्म को बीच में लाकर न तो किसी विशेष छूट का अधिकारी है न ही धर्म के आधार पर उसे उन अधिकारों और अवसरों से वंचित किया जा सकता है, जो नागरिक होने के नाते उसे सहज प्राप्त हैं.

जाति मुख्यतः हिंदू धर्म से जुड़ा मसला है. चूंकि जाति को हिंदुओं में धर्मसम्मत बताया जाता रहा है, इसलिए इसे हिंदू धर्म की मान्य संस्था भी कहा जा सकता है. कुछ विद्वान इसपर आपत्ति कर सकते हैं. कह सकते हैं कि धर्मग्रंथों में केवल वर्ण का उल्लेख है, जाति का नहीं. वे यह भी कह सकते हैं कि वर्णविभाजन की मिलीजुली परंपरा भारत के अलावा यूनान, अफ्रीका, यूरोप, मिस्र, पूर्वी एशिया, चीन, जापान आदि देशों में भी प्रचलित थी. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता. लेकिन कहीं भी वह उतनी रूढ़ नहीं रही, जैसी कि भारत में. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्तियों को उनके गुणों के आधार पर काम सांपने की अनुशंसा की है. उसने लोगों को उनकी प्रकृति के अनुसार बांटकर, स्वर्ण, रजत, कांस्य और लौह नामक श्रेणियां बनाई थीं. उसके पीछे प्लेटो की आदर्शवादी राज्य की संकल्पना थी. कार्यविभाजन को वंशानुगत न मान लिया जाए, इसके लिए सावधानी बरतते हुए उसने बच्चों का लालनपालन राज्य के संरक्षण में, उनकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने का सुझाव दिया था. भारत में हालात भिन्न थे. यहां मान लिया गया कि ज्ञान और अज्ञान दोनों उत्तराधिकार में अंतरित किए जा सकते हैं. इसलिए पंडित के बेटे को पंडित और शूद्र की संतान को शूद्र का दर्जा दिया जाता रहा. समय के साथ जैसेजैसे नए पेशे बढ़े, जातियों की संख्या में भी वृद्धि होती गई. पेशागत जरूरत को रक्तसंकरण का नाम दिया गया.

यदि सब एक विराट पुरुष की संतान हैं तो रक्तशुद्धता का विचार क्यों? ऐसा तो हो नहीं सकता कि मस्तिष्क में एक प्रकार का खून बहता हो, और पैरों में दूसरा? सवाल जायज है. सवाल उठा भी होगा. परंतु नियम साधारण लोगों के लिए होते हैं. शिखर पर विराजमान लोग स्वार्थसिद्धि हेतु कोई न कोई चोर दरवाजा निकाल ही लेते हैं. ब्राह्मणों ने चोरदरवाजा निकाला था, द्विजीकरण का. एक संस्कार, जिसे ‘दूसरा जन्म’ कहा गया. जातियों और वर्णों के कथित रक्तसंकरण से जो बच्चे जन्मे उन्हें नई जातियों के रूप में समायोजित किया गया. प्राचीन धर्मग्रंथों में जातियां बनने का विस्तारसहित विवरण है. उसका विरोध या आलोचना कहीं भी नहीं है. न ही शूद्रत्व के आधार पर समाज के बड़े वर्ग के शोषण और उत्पीड़न की कहीं आलोचना है. अभिजात हिंदुओं की निगाह में वह आदर्श व्यवस्था रही है. इसलिए दैविक बताकर उसका जगहजगह महिमामंडन किया गया है. रक्तसंकरण के बहाने से मनु, याज्ञवल्क्य, गौतम आदि ने जातियों के बनने का जो विधान रचा है उसका विस्तृत वर्णन पांडुरंग वामन काणे की पुस्तक ‘धर्मसूत्रों का इतिहास’ में दर्ज है. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि हिंदू धर्म केवल वर्णव्यवस्था को समर्थन देता है, जाति को नहीं. पौरोहित्य जातिवाद का संरक्षक रहा है. समाज में जैसेजैसे पुरोहितवाद का असर बढ़ा—न केवल जातियों की संख्या में वृद्धि हुई, बल्कि उनके बीच ऊेचनीच की भावना भी गहराती चली गई.

जातिव्यवस्था के कारण हिंदुओं को देशविदेश में इतनी बदनामी झेलनी पड़ी है कि सीधेसीधे उसके समर्थन में आने का कोई साहस कोई नहीं करता. प्रत्येक जाति के अपनेअपने मंच और संस्थाएं हैं. जिनके जरिये जातीय पहचान को बनाए रखने तथा संगठित शक्ति में बदलकर लोकतंत्र में दबावसमूह की तरह काम करने के प्रयास चलते ही रहते हैं. उच्चतम न्यायालय ‘हिंदुत्व को जीवनपद्धति’ बताना, प्रकारांतर में जातिआधारित समाज का समर्थन करना है. जातिव्यवस्था के समर्थक तर्क देते आए हैं कि मातापिता को काम करते देख संतान भी पैत्रिक व्यवसाय में दक्षता प्राप्त कर लेती है. इससे उनके आगे बेरोजगारी का संकट नहीं रहता. परंतु आजीविका की पहली शर्त उसका सम्मानजनक होना है. दूसरी मनुष्य को उससे इतनी आय होनी चाहिए कि वह अपने परिजनों की जरूरतों को पूरा करने के साथसाथ उन्हें बेहतर भविष्य दे सके. यदि व्यक्ति को लगता है कि उसकी वर्तमान आजीविका इन लक्ष्यों को पूरा करने में अक्षम है तो उसे अपने लिए उपयुक्त रोजगार चुनने का अधिकार होना चाहिए. जाति की अवधारणा इस मूलभूत सिद्धांत की उपेक्षा करती है. वह मनुष्य को अपने श्रम या सेवा के मूल्यांकन का अधिकार नहीं देती. धर्मसूत्रों और स्मृतियों में तो हर वह व्यवस्था की गई है जिससे शूद्र अपने दैन्य से कभी न उभर पाएं. ‘मनुस्मृति’ में शूद्र के पास संपत्ति जमा नहीं होने देने के स्पष्ट निर्देश हैं. यदि किसी कारण वह धन जमा करने में सफल हो जाए तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया है कि वह उसे बलात् छीन ले. गौतम धर्मसूत्र के अनुसार, ‘कन्या के विवाह का खर्च वहन करने के लिए और शास्त्रविहित किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए कोई व्यक्ति शूद्र से छल या बल का उपयोग करके धन ले सकता है.’(द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत). कह सकते हैं अपने आरंभ से ही यह व्यवस्था सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध काम करती आई है.

समाज में लोग अपनेअपने धार्मिक विश्वास के आधार पर और उसके बिना भी रह सकते हैं. इसपर न तो समाज को आपत्ति होती है, न ही राज्य को. बल्कि राज्य का तो ध्येय ही व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी विश्वासों की सुरक्षा के लिए किया जाता है. ऐसा वह तभी कर सकता है, जब वह स्वयं किसी आस्था, विश्वास आदि से बंधा न हो. उसकी प्रतिबद्धता केवल और केवल अपने संविधान के प्रति हो. यदि वह स्वयं धर्म, जाति या वर्ग के प्रति आग्रहशील होगा तो उसके लिए तटस्थ भाव से काम करना कठिन हो जाएगा. समाज पूरी तरह समावेशी न हो तो भी उसके सदस्यों के बीच इतना समझौता अवश्य होता है जिससे वह न्यूनतम शांतिव्यवस्था को बनाए रख सके. जाहिर है संवैधानिक प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरने हेतु राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण समय की मांग बन जाता है. बहुधार्मिकता वाले समाजों में राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण मात्र इसलिए अपेक्षित नहीं होता कि क्योंकि वहां अनेक धर्मावलंबी रहते हैं. वह इसलिए भी अपेक्षित होता है कि समानता, न्याय, स्वतंत्राता और निष्पक्षता के लिए राज्य को उन सभी विचारों और प्रतीकों से दूर रहना चाहिए, जिनके चयन में मानवीय विवेक की कोई भागीदारी न हो. जो व्यवस्था की मनमानी को दर्शाते हों. राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने नागरिकों के पक्ष में अधिकतम स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा. ऐसा वातावरण विनिर्मित करेगा, जिसमें लोग अपने विवेक और स्वतंत्रता का अधिकतम लाभ उठा सकें. उसके लिए थोपी गई किसी भी पहचान के आधार पर पक्षपात नहीं करेगा. धर्म के चयन में, जाति के चयन में मनुष्य की इच्छा या विवेक का कोई योगदान नहीं होता. ये जन्म के साथ ही उसपर थोप दी जाती हैं. धर्म के मामले में आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार धर्मांतरण की छूट तो होती है, परंतु वह काम भी सर्वथा आसान नहीं होता. वहां धर्मकेंद्रित सामाजिकता आड़े आ जाती है.

वस्तुतः धर्म, जाति, वर्ण जैसी प्रतिगामी संस्थाएं परस्पर इतनी अंतर्गुंफित हैं कि इनमें से कौनसी, किसे और कब संबल प्रदान करती हैं, इस पर निर्णय लेना प्रायः कठिन होता है. धर्मसम्मत विधान विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता, ऊंचनीच आदि को दैविक सिद्ध करने की कोशिश में जुटे रहते है. इससे उनकी दुर्दशा के वास्तविक कारणों की पड़ताल कठिन हो जाती है. प्रकारांतर में सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है; और राज्य अपने उद्देश्य में विफल सिद्ध होता है. अतः उचित यही है कि राज्य का संचालन सर्वसम्मत या बहुसम्मत विधान के माध्यम से हो, ताकि असमानता, अन्याय और अनाचार की हालत में जिम्मेदारी तय की जा सके. इस तरह धर्मनिरपेक्षता जहां लोकतंत्र का उदात्त लक्षण है, वहीं जाति सामंतवाद का ऐसा रूप है जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग को बहुसंख्यक वर्गों पर शासन का अधिकार केवल इसलिए मिल जाता है कि उनका जन्म किसी जातिविशेष में हुआ है. परिस्थितिवश यदि सुधार की मांग उठे तो उसे वर्णव्यवस्था के ढांचे के भीतर रखने की पुरजोर कोशिश की जाती है. ऐसे में शासन का यह कर्तव्य है कि नागरिकों को अधिकतम स्वतंत्रता और समानता के अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिक्रियावादी शक्तियों को आगे न आने दे.

वर्णाश्रम व्यवस्था विकास विरोधी भी है. शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के अनुक्रम में जो पहले स्थान पर है, उसे सर्वाधिक शारीरिक श्रम करना पड़ता है. जैसेजैसे आगे बढ़ते हैं, श्रम की मात्रा घटती चली जाती है. अंत में वह लगभग शून्य हो जाती है. ब्राह्मण का श्रम पूरी तरह अनुत्पादक है. जब वह भौतिक जगत एवं सुखसंसाधनों को मोहमाया, क्षणभंगुर आदि कहकर परंपरानुसार नकारता है, तो उत्पादकता का विरोधी बन जाता है. यह विधान ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए तो विशेष सहायक सिद्ध होता है, परंतु शूद्रों के हितों के, जो मुख्य उत्पादक हैं—प्रतिकूल असरकारी होता है. अतः जब भी धर्मनिरपेक्षता की बात चलती है, समाज के वे वर्ग जिन्हें वर्णक्रम में ऊपर रखा गया है, कम या ज्यादा उसके विरोध में उठ खड़े होते हैं.

हम लेख के केंद्रीय विषय तक आ चुके हैं. भारत हिंदू बहुल देश है. जाति उसकी शास्त्रसम्मत संस्था. सवाल है कि धर्मनिरपेक्षता और जाति के संबंधों को कैसे परिभाषित किया जाए? सामाजिक न्याय के लिए धर्मनिरपेक्षता के साथ क्या जातिनिरपेक्षता भी आवश्यक है? चूंकि जाति के आधार पर समाज का बड़ा वर्ग शोषण का शिकार रहा है, इसलिए उत्तर तो ‘हां’ में ही आएगा. प्रथम दृष्टया यह अनुचित भी नहीं लगता. यह सच है कि धर्मनिरपेक्षता के साथ जातिनिरपेक्ष होना भी कामयाब लोकतंत्र की जरूरत है. परंतु मामला इतना आसान नहीं है, क्योंकि इस तरह हम ‘धर्म’ और ‘जाति’ को एक समान मान रहे होते हैं. जबकि जाति धर्म की अपेक्षा कहीं अधिक रूढ़ है. धर्म में जाति से ज्यादा खुलापन रहता है. हिंदुओं में व्यक्ति कथित तैंतीस करोड़ देवताओं में से किसी को भी अपना आराध्य मान सकता है. या फिर उसकी मर्जी है कि समस्त देवताओं तथा उनसे जुड़े कर्मकांडों को पूरी तरह नकारकर नास्तिक होने की घोषणा कर दे. उस समय लोग थोड़ीबहुत आलोचना करेंगे. लेकिन पूजापाठ एवं देवताओं को अंगूठा दिखाने से हिंदू धर्म से उसके संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा. धर्म के नाम पर हिंदुओं में जितना खुलापन है, उतना शायद ही किसी दूसरे धर्म में हो. इसे उसकी विशेषता कहा जा सकता है. परंतु यह उसकी कमजोरी भी है. हिंदू धर्म अनेकास्थावादी धर्म है. इसमें साधक को इतनी छूट है कि वह अपने स्वतंत्र विश्वास के साथ हिंदू रह सकता है. जाति के साथ ऐसा नहीं है. वह जीवन के साथ जन्मती और जान के साथ जाती है. गांधी सहित इस देश के ऐसे असंख्य लोग हैं, जो धर्म के खुलेपन का समर्थन करते हैं, किंतु जाति और वर्ण के नाम पर कट्टर या परंपरापोषी देखे गए हैं. हिंदू समाज में जाति के आधार पर शोषण की शताब्दियों पुरानी रवायत है, जिसने समाज के बड़े वर्ग के जीवन को नर्क में बदल दिया था.

जाति के दो सामान्य पक्ष हैं. पहला व्यैक्तिक, दूसरा सामाजिक. समाज ने किसी जमाने में, सभ्यता के आदिचरण में तय किया कि व्यक्ति अपने पैत्रिक व्यवसाय को ही अपनाएगा. शुरूशुरू में लोगों ने भी मान लिया. उनके पास इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. रक्षा और पाठपूजन के अलावा बाकी सारे काम शूद्रों के हिस्से आते थे. उन्हें पढ़नेलिखने या शस्त्र विद्या की जानकारी लेने की मनाही थी. प्राचीन भारत में ब्राह्मण के लिए पाठशालाएं और विद्यालय थे. क्षत्रियों के शिक्षणप्रशिक्षण के व्यापक प्रबंध थे. लेकिन शिल्पकारों के लिए पढ़नेलिखने या शिल्प के निखार के लिए कोई व्यवस्था न थी. श्रमिकों और कारीगरों का विधिवत विकास हो, इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी जाती थी. लेकिन श्रम और शिल्पकर्म की मांग हर जगह थी. समाज में उनकी अबाध आपूर्ति रहे, इसके लिए नियम बनाया कि बेटा बाप के व्यवसाय को आगे बढ़ाएगा.

जब तक राज्य संस्था शक्तिशाली नहीं हुई थी, समाज में आवश्यक खुलापन था, शिल्पकारों ने भी उस व्यवस्था को सहज भाव से लिया होगा. आगे चलकर ब्राह्मणवाद ने लोगों के मनमस्तिष्क को जकड़ना शुरू किया. राजसत्ता के साथ मिलकर उन्होंने शिल्पकर्म और श्रम के मूल्यनिर्धारण का काम अपने हाथों में ले लिया. इस बीच बौद्धिक स्वातंत्रय का परिचय देते हुए, मेहनतकश वर्गों ने नए दार्शनिक सिद्धांतों की नींव भी रखी. फलस्वरूप आजीवक, चार्वाक, लोकायत, श्रमण, अक्रियावादी, वैनायिक3 जैसे अनीश्वरवादी दर्शन अस्तित्व में आए. शिल्पकर्म की मांग बढ़ी तो वे संगठन बनाकर दूरदराज के देशों तक व्यापार करने लगे. एक समय ऐसा आया जब उन्होंने धर्मसत्ता और राजसत्ता के समानांतर आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली. बौद्ध धर्म के उदय तक लगभग ठीकठाक चलता रहा. कदाचित बुद्ध पहले ऐसे विचारक हुए जिन्होंने धार्मिक आधार पर सांगठनीकरण का रास्ता दिखाया. उसके पहले ब्राह्मण पुरोहित आश्रमों में रहकर वहीं से अपना प्रभुत्व जमाए रहते थे; उनकी पहुंच केवल सत्ताकेंद्रों तक थी. शूद्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे. उन्होंने शूद्रों की उपेक्षा, उन्हें अपने धर्मदर्शन से दूर रखने का हरसंभव प्रयत्न किया था. आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर मिला तो शूद्र पूरे आत्मविश्वास के साथ नए दर्शनों की ओर मुखातिब होने लगे. ईसा से पांच सौ वर्ष पहले तक यही स्थिति बनी रही.

बौद्ध दर्शन का उभार ब्राह्मणों के लिए अप्रत्याशित था. उससे पहले भी विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय तथा शूद्र विद्वानों ने ब्राह्मणों को बौद्धिक क्षेत्र में चुनौती दी थी. लेकिन वे सब वर्णव्यवस्था के समर्थक थे. अवसर मिलते ही ब्राह्मणों ने उन्हें उच्च वर्ण देकर वर्णव्यवस्था को बचाए रखा था. बौद्ध दर्शन को मिली व्यापक लोकप्रियता ने ब्राह्मणों के आगे अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया था. बुद्ध ने न केवल जाति और वर्णव्यवस्था को चुनौती दी थी, बल्कि क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठतर भी माना था. इसलिए बुद्ध के रहते उनका ब्राह्मणीकरण आसान न था. असुरक्षाबोध के बीच पुरोहितों का एक वर्ग पनपा जिसने स्वयं को प्राचीन धर्मदर्शन का अनुयायी बताते हुए आमजन में भी अपनी पैठ बनाना आरंभ कर दिया. परंतु आजीवक संप्रदाय की लोकप्रियता तथा बौद्ध एवं जैन जैसे श्रमण परंपरा पर आधारित धर्मों की लोकप्रियता के चलते आरंभिक शताब्दियों में सफलता उनके लिए दूभर बनी रही. बुद्ध के बाद राजसत्ता और धर्मसत्ता में फैलाव के लिए मानो होड़सी मच गई. चूंकि राज्य को संगठित करने के लिए काफी धन की आवश्यकता थी, इसलिए नए शासकों ने शिल्पकारों से उनके शिल्प के मूल्य निर्धारण का काम छीन लिया. चाणक्य आर्थिक रूप से स्वावलंबी शिल्पकार संगठनों को संदेह की दृष्टि से देखता था. इसलिए उसने सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों को नियंत्रित करना आरंभ कर दिया. इस बीच पुरोहितवर्ग तेजी से पनपा. उसने तेजी से कर्मकांड आधारित धर्मों को फैलाना शुरू कर दिया. जातिव्यवस्था को रूढ़ बनाने तथा तत्संबंधी भेदभाव और ऊंचनीच की नींव रखी जाने लगी. यह भेदभाव आर्थिक स्तर पर कितना गहरा था, इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में मुख्य पुरोहित को प्रतिमाह 48000 पण वेतन मिलता था, जबकि प्रमुख शिल्पकार के लिए मात्रा 120 पण वृत्तिका ही निर्धारित थी.

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि जातीय विभाजन के नाम पर समाज के बड़े वर्ग को उसके मूलभूत अधिकारों से अलग कर देने में समाज के साथसाथ शासन का भी हाथ रहा है. यूं भी कह सकते हैं कि धर्मसत्ता और राजसत्ता के गठजोड़ ने समाज के बहुसंख्यक वर्गों के साथ अनाचार किया है. इसलिए राज्य की जिम्मेदारी केवल खुद को धर्म की ओर से तटस्थ बना लेने से पूरी नहीं होती. विशेषकर ऐसे राज्य के लिए जो लोकतांत्रिक और लोककल्याण को समर्पित होने का दावा करता है, उसका यह दायित्व है कि विकास की दौड़ में किसी भी कारण पिछड़ चुके अथवा पीछे ढकेल दिए गए लोगों के कल्याण के लिए विशिष्ट प्रबंध करे. भारतीय धर्मशास्त्रों में राज्य के लिए इस नैतिक दायित्व के बारे में अधिक नहीं मिलता. यहां धर्म को नैतिकता का पर्याय माना गया है. जबकि पश्चिम में नीतिशास्त्र सुकरात के जमाने से ही अध्ययन का विषय रहा है. ‘पॉलिटिक्स’ में अरस्तु ने न्यायस्थापना को राजनीति का प्रमुख उद्देश्य माना है—‘राजनीति का प्रमुख उद्देश्य है न्याय और न्याय का मूल ध्येय है—सर्वसाधारण का हित.’ इस काम के लिए निष्पक्षता अनिवार्य है. अरस्तु ने इसके लिए संवितरणात्मक न्याय का सिद्धांत प्रस्तुत किया है. उसके अनुसार राजनीति का प्रमुख लक्ष्य न्याय की स्थापना है. यह सभी को समान अवसर देने से पूरा नहीं हो जाता.

अरस्तु ने न्याय को वस्तु पक्ष और व्यक्ति पक्ष में बांटा है. राज्य की ओर से सभी को समान वस्तुएं और अवसर दिए जाने चाहिए. लेकिन इस बारे में कोई एक नियम हमेशा कारगर नहीं हो सकता. मान लीजिए दो व्यक्ति दौड़ में हैं. दोनों का लक्ष्य समान है. किंतु उनमें से एक व्यक्ति लक्ष्य से बेहद दूर, एकदम अंतिम छोर पर है, जबकि दूसरा उसके एकदम पास खड़ा है. ऐसे में उन्हें यदि एक साथ दौड़ने के लिए कहा जाए तो जीत जो लक्ष्य के एकदम पास खड़ा है, उसकी ही सुनिश्चित मानी जाएगी. वह दौड़ में आगे बना रहेगा. दूसरा व्यक्ति कभी उसके बराबर पहुंच ही नहीं पाएगा. यदि दोनों में से एक ताकतवर और दूसरा अत्यधिक कमजोर है, तब भी यही परिणाम होंगे. अतएव राज्य का कर्तव्य है कि जो लक्ष्य से बहुत दूर, विकास के अंतिम छोर पर है अथवा किसी कारणवश कमजोर है, उसे विशेष प्रोत्साहन देकर स्पर्धा हेतु सक्षम बनाए. आधुनिक विचारक इसे संवितरणात्मक न्याय कहकर राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित किया है. इसलिए धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर जातिनिरपेक्ष होना राज्य का आदर्श हो सकता है. परंतु जाति के आधार पर पिछड़ चुके वर्गों की दृष्टि में वह न्याय नहीं कहा जा सकता. धर्मनिरपेक्षता को फलनेफूलने के लिए आधुनिक संवैधानिक कसौटी पर खरे राज्य की आवश्यकता पड़ती है. साथ ही सैद्धांतिक स्तर पर जातिनिरपेक्ष रहते हुए, तज्जनित भेदभाव और अन्याय की भरपाई हेतु सामाजिक स्तर पर पिछड़ गए वर्गों को विशेष प्रोत्साहन द्वारा मुख्यधारा से जोड़ना—राज्य का विशिष्ट कर्तव्य माना गया है. दूसरे शब्दों में समानता और स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दमन का शिकार रही जातियों के लिए विशेष प्रोत्साहन देना उसका संवैधानिक कर्तव्य बन जाता है. इस दृष्टि से भारतीय संविधान को आदर्श कहा जा सकता है. यह बात अलग है कि भारतीय समाज स्वयं को संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप ढालने में अभी तक नाकाम सिद्ध हुआ है. लोकप्रियता की राजनीति इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधा है. उससे बचने के लिए समाज तथा उसकी अन्यान्य संस्थाओं का लोकतांत्रिकरण हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

अंत में कबीर को याद करते/कराते हुए—

सबही भूमि बनारसी, सब निर गंगा होय

ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रम

1. द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत.

2. If I were a , religion and state would 1be separate. I swear by my religion. I will die for it. But it is my personal affair. The state has nothing to do with it. The state would look after your secular welfare, health, communications, foreign relations, currency and so on, but not your or my religion. That is everybody’s personal concern!” ―Gandhi MK, Harijan, 22 September 1946.

3. विनायक गणेश का उपनाम है. गणेश शिवपुत्र जिन्हें आदि यानी अनार्यो का देवता माना जाता है. वे उस दौर के देवता हैं हैं जब देश कबीलों में बंटा था और उनका मुखिया ही सबकुछ होता था. वही सारे निर्णय लेता था. गणेश का वैनायिक को अनीश्वरवादी आजीवकों का ही एक संप्रदाय माना जाता है. इस तरह गणेश और शिव दोनों ही अनार्य अनीश्वरवादी देवता सिद्ध होते हैं. बाद में उन्हें अपने भीतर मिलाने के लिए जहां आर्यों ने अपनी बेटी का विवाह शिव से किया, वहीं गणेश को शामिल करने के लिए उन्हें प्रथम देवता का नाम देना पड़ा. लेकिन गणेश को देवता मानते ही उनके पद गणवेश के साथ खूब खिलबाड़ किया गया. गणेश की सूंड सभापति के स्थान पर बैठकर सबकी बात ध्यानपूर्वक सुनते व्यक्ति का विकृतीकरण है.


अरस्तु का न्याय-दर्शन

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है.

न्याय की व्याख्या करते हुए अरस्तु उसके दोनों रूपों पर विचार करता है. पहला वह जिसके बारे में सामान्यजन सोचता है कि न्याय कानून के तत्वावधान में अदालतों के जरिये प्राप्त होता है. इसके साथसाथ वह मनुष्य के आचरण एवं व्यवहार की व्याख्या करता है. न्याय का यह रूप नागरिक और राष्ट्रराज्य के कानून के अंतर्संबंध को दर्शाता है. उन अनुबंधों की ओर इशारा करता है, जिनसे कोई नागरिक सभ्य समाज का नागरिक होने के नाते जन्म के साथ ही जुड़ जाता है. प्रकारांतर में वह बताता हे कि आदर्शोंन्मुखी समाज में मनुष्य का आचरण एवं कर्तव्य किस प्रकार के होने चाहिए, ताकि समाज में शांति, सुशासन और आदर्शोन्मुखता बनी रहे. प्रायः सभी समाजों में कानून को नकारात्मक ढंग से लिया जाता है. बातबात पर कानून का हवाला देने वालीं, उसके अनुपालन में लगी शक्तियां प्रायः यह मान लेती हैं कि बुराई मानवस्वभाव का स्थायी लक्षण है. जो बुरा है, उसे केवल दंड के माध्यम से बस में रखा जा सकता है. कि मानवव्यक्तित्व पर आज भी अपने उन पूर्वजों के लक्षण शेष हैं जो कभी जंगलों में जानवरों के बीच रहा करते थे. कुछ व्यक्तियों में पाशविक वृत्ति ज्यादा प्रभावी होती है. ऐसे लोगों पर बलप्रयोग उन्हें अनुशासित रखने का एकमात्र उपाय है. इसलिए सभ्यताकरण के आरंभ से ही दंडविधान की व्यवस्था प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. इसे पुष्ट करने के लिए धर्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे अनेक किस्से हैं, जिनसे हमारा संस्कार बनता है. स्वर्गनर्क की कल्पना भी इसी का हिस्सा है. उनमें से अधिकांश पर विजेता संस्कृति का प्रभाव है. आधुनिक संदर्भों में वह भले ही लोकतंत्र और मानवस्वातंत्र्य का विरोधी हो, प्राचीन इतिहास, धर्म और संस्कृति का हिस्सा होने के कारण उसे धरोहर के रूप में सहेजा जाता है.

प्राचीनकाल में जब अदालतें नहीं थीं, तब न्याय करने की जिम्मेदारी बस्ती के मुखिया या समूह के वरिष्ठ सदस्य जिसकी निष्पक्षता असंद्धिग्ध होकी होती थी. इस्लामी शासन के दौरान यह जिम्मेदारी काजी के कंधों पर आ पड़ी. राजशाही में राजा को सर्वेसर्वा माना जाता था. दरबार में आए मामलों की सुनवाई के लिए न्यायाधिकारी और दंडाधिकारी दोनों की जिम्मेदारियां वही संभालता था. दंडविधान का आधार परंपरागत अथवा लिखितअलिखित विधिसंहिताओं को बनाया जाता था. किसी न किसी रूप में वे सभी धार्मिक उपादानों द्वारा शासितअनुशासित होती थीं. उसका लाभ धार्मिक कार्यकलापों में लिप्त ‘धंधेबाज’ उठाते थे. उदाहरण के लिए भारत में एक जैसे अपराध के लिए ब्राह्मणों तथा शूद्रों के लिए अलगअलग दंडविधान था. ब्राह्मणों को मृत्युदंड निषिद्ध था, जबकि ब्राह्मणेत्तर वर्गों के लिए इस तरह की कोई पाबंदी न थी. चूंकि दिए गए दंड के विरुद्ध अपील के बहुत कम अवसर थे, इसलिए जनसाधारण मजबूरी में दैवीय न्याय की उम्मीद करने लगता था. आज भी ऐसे लोग कम नहीं हैं. उनका मानना है कि एकमात्र ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है. जिन्हें अपराधी होने के बावजूद इस जन्म में दंड नहीं मिला, वे ईश्वर के दरबार में अवश्य ही दंडित किए जाएंगेइस विश्वास के साथ साधारणजन बड़े से बड़े अनाचार को पचाते चले जाते थे. आधुनिक समाजों में न्याय की जिम्मेदारी अदालतों पर होती है. उनका आचरण संवैधानिक मर्यादाओं से आबद्ध रहता है. इसलिए यह व्यवस्था न्याय के अपेक्षाकृत अनुकूल है. इसके अनुसार राज्य अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे कानून सम्मत व्यवहार करें, ताकि राज्य को उनके जीवन में हस्तक्षेप की आवश्यकता ही न पड़े. जो व्यक्ति अपने आचरण द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में अमर्यादित हस्तक्षेप करता है, वह राज्य को अपने जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दे देता है. दूसरों के जीवन में अवांछित और अमर्यादित हस्तक्षेप को राज्य अपराध मानता है. दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी निजता का अधिकार भी गंवा देता है. तदनुसार राज्य को समाज द्वारा प्राप्त शक्तियों के बल पर उस व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः हासिल हो जाता है. चूंकि राज्य पर समाज में शांति और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी होती है, इसलिए वह अपराधी के विरुद्ध दंडनीति के तयशुदा प्रावधानों के अनुसार कार्रवाही करता है. न्याय का यह लोकप्रचलित रूप व्यक्ति के कर्तव्य पालन से जुड़ा है, जिसमें विचलन होते ही दंडनीति प्रभावी हो जाती है. प्रायः इसे सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. जनसाधारण न्याय के इसी रूप से सर्वाधिक प्रभावित होता है.

न्याय का दूसरा रूप कानून और अदालतों से प्राप्त होने वाले न्याय से अलग है. पहला जहां राज्य के अधिकारपक्ष के निकट है, दूसरा उसके कर्तव्य पक्ष की महत्ता एवं कार्यक्षेत्र को व्यापकता दर्शाता है. सिसरो के अनुसार राज्य जनता का सर्वाधिकार है. चूंकि राज्य का गठन लोगों द्वारा सामान्य हितों की पूर्ति हेतु किया जाता है, अतएव उसका वही कृत्य न्यायपूर्ण कहा जाएगा, जो उसके द्वारा संपूर्ण विवेक, निष्पक्षता, समानता और सर्वजन के विकास की चाहत के साथ उठाया जाता है. वह राज्य की नैतिकता तथा उसके गठन के औचित्य को दर्शाता है. अरस्तु इसे और भी स्पष्ट कर देता है. उसके अनुसार अन्याय केवल दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप, उसका प्रताड़न; अथवा मान्य कानूनों का उल्लंघन करने तक सीमित नहीं है. बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन करना, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर देना, जो नागरिकों के प्रति राज्य का कर्तव्य भी हैंअन्याय की सीमा में आता है. आखिर मनुष्य के अधिकारों की पहचान कैसे हो? इस बात में कैसे अंतर किया जाए कि जो अधिकार किसी एक व्यक्ति का है, वह दूसरे का भी है अथवा नहीं है? तथा उनके आकलन की कसौटी क्या है?

सवाल और भी हैं. जब हम कहते हैं कि भरपेट भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है? सभ्य समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से प्राप्त होनी चाहिए, तो इस तर्क का आधार क्या होता है? क्यों न मान लिया जाए कि जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से सफल होते हैं, उसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और प्रतिभा का भी कमाल होता है. लोकहित में आवश्यक है कि समाज के सभी सदस्य एकदूसरे के हितों का ध्यान रखें. लेकिन यह भी जरूरी है कि योग्य व्यक्ति को उसकी योग्यता का लाभ खुद भी प्राप्त हो. परंतु इतनेभर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता. मान लीजिए, दो मजूदर किसी कारखाने में काम करते हैं. उनमें एक की क्षमता दस नग प्रतिदिन तैयार करने की है. दूसरा उतने ही समय में बीस नग बना देता है. तो जो कारीगर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, उसके उत्पादन क्षमता का लाभ दस नग प्रतिदिन बनाने वाले के साथ बांट देना क्या उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? यदि किसी व्यक्ति को लगे कि उसके उत्पादन का लाभ उसे नहीं मिल रहा है, तो क्या वह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ लगातार काम कर पाएगा? अपने लाभ को दूसरों में बंटते देख क्या वह हतोत्साहित नहीं होगा? चलताऊ ढंग से सोचें तो बात एकदम सच जान पड़ेगी. पूंजीवादी अर्थतंत्र कहता है, श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ मिले. दावा करता है कि केवल वही है जो श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ दिला सकता है. लाभ का आकलन केवल भौतिक मुद्रा के आधार पर करने वाले पूंजीवाद की निगाह में यही न्याय है. ऐसे ही तर्क देकर वह श्रमिकों को बांटे रखता है. वहां इसे स्पर्धा का नाम दिया जाता है. परिणाम यह होता है कि जो मजदूर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, वह निरंतर आगे निकलता जाता है. जबकि दस नग बनाने वाला कारीगर स्पर्धा में पिछड़ता चला जाता है. वृहद संदर्भों में यह स्पर्धा दो कारखानों के बीच भी देखी जा सकती है. चूंकि समाज में विशिष्ट लोगों की संख्या बहुत कम होती है, अधिकांश दस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार जितने ही कार्यक्षम होते हैं. इसलिए अपने उत्पाद का सारा लाभ खुद रखने वाला कामगार स्पर्धा में निरंतर आगे निकलता चला जाता है. इससे समाज में आर्थिक विभाजन बढ़ता चला जाता है. इसका समाधान क्या है? अरस्तु इतना उदार नहीं है कि वह बीस नग बनाने वाले के श्रमलाभों वाले कामगार के लाभ को दस नग प्रतिदिन बनाने वाले श्रमिकों के बीच बांटने पर सहमत हो जाए. इस असमानता को वह प्राकृतिक मानता है. अरस्तु के समय में मौद्रिक लाभ की अवधारणा इतनी पुष्ट नहीं थी, जैसी वह आज है. इसलिए उसका समाधान भी आज के संदर्भों में ही खोजना पड़ेगा.

ऊपर के उदाहरण में मान लिया गया है कि बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कारीगर की उत्पादन क्षमता केवल उसकी अपनी उपलब्धि है. यहां व्यक्ति के कौशलनिर्माण में उसके परिवेश के प्रभाव जो एक तरह से उसका योगदान ही है, बिसरा दिया गया है. मनुष्य और उसके समाज के बीच का संबंध आपसी लेनदेन का होता है. जो समाज को अधिक लौटाते हैं, या जिनसे समाज को अधिकाधिक लौटाने की अपेक्षा की जाती है, वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज से अधिक ग्रहण भी करते हैं. यदि किसी विद्वान की बात करें तो पहले वह पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान का अध्ययनमनन करता है, तदनंतर अपने विचारों को सामने लाता है. इस तरह से वह अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का कर्जदार होता है. अतएव जो व्यक्ति समाज से जितना अधिक ग्रहण करता है, समाज को उसी अनुपात में वापस लौटाना उसका कर्तव्य भी है. इसमें मौद्रिक लेनदेन आवश्यक नहीं है. इसलिए इसका समाधान भी अकेले मौद्रिक लेनदेन द्वारा संभव नहीं है. उचित यही है कि मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ की अवधारणा को स्थापित किया जाए. शांति और खुशहाली के लिए आवश्यक है कि समाज में आर्थिक विभाजन न्यूनतम हो. कुशल कामगार को यह समझाया जाए कि उसकी उपलब्धियां केवल उस अकेले की नहीं हैं. उनमें उसके परिवेश जिसमें उसके मित्र, संबंधी, पड़ोसी यहां तक कि दुश्मन भी सम्मिलित हैं, सभी का साझा है. इसी तरह धनपति को मालूम होना चाहिए कि उसके लाभ पर सिर्फ उसका अधिकार नहीं है, उन श्रमिकों और कारीगरों का भी योगदान है, जो रातदिन मेहनत करने अपने मालिक की समृद्धि को संभव बनाते हैं. अरस्तु राज्य से अपेक्षा रखता है कि दस नग बनाने वाले को निरंतर प्रोत्साहित करता रहे. और बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार को इस बात के लिए राजी करे कि वह मौद्रिक लाभों के बजाए सामाजिक लाभों पर भी ध्यान दे, ताकि दो भिन्न उत्पादनक्षमता वाले कामगारों के बीच अधिकतम समानता संभव हो सके.

समाजीकरण मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है. यदि केवल किसी एक व्यक्ति के सुखदुख, गुणदोष का मामला हो तो समाजीकरण की आवश्यकता ही न पड़े. समाज न तो विशिष्ट व्यक्ति की चयन है, न ही व्यक्तियों की विशिष्ट पसंद. मनुष्यों की सामूहिक सृष्टि है. उसका सृजन सामूहिक रूप से सर्वकल्याण के उद्देश्य से किया जाता है. समाज की जरूरत उस व्यक्ति को भी पड़ती है, जिसकी आवश्यकता व्यक्ति के अस्तित्व से जुड़ी है. इसकी इच्छा वह व्यक्ति भी करता है, जो अतिरिक्त रूप से गुणी और संपन्न है. इसके कारणों में मामूली अंतर हो सकते हैं. जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से कामयाब होते हैं, वे अपनी सफलता से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं. प्रजा न हो तो राजा का होना अर्थहीन हो जाए. इसी तरह अमीर को अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए गरीब की जरूरत पड़ती है. कह सकते हैं कि मनुष्य की किसी भी उपलब्धि का महत्त्व दूसरों के साथ, उन सबके सापेक्ष है. असफलता सफलता की पहली और निर्णायक कसौटी है. असफल व्यक्ति जितने अधिक संख्या में होंगे, सफलता का मूल्य उतना ही अधिक आंका जाएगा. यही प्रवृत्ति न्याय की जरूरत पर बल देती है.

ऊपर संकेत किया गया है कि किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसके गुणों पर निर्भर नहीं करती. इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस व्यक्ति को जीवन में कामयाबी दर्ज कराने के लिए कितने अवसर और संसाधन प्राप्त थे. तुलना यदि प्राकृतिक स्तर पर हो तो सफल और असफल व्यक्तियों में बहुत अंतर नहीं होता. युद्ध में किसी राजा की जीत केवल इसपर निर्भर नहीं करती कि वह स्वयं कितना बहादुर है, बल्कि उसकी ओर से लड़ रहे सैनिकों की संख्या तथा राजा के प्रति उनकी निष्ठा पर भी निर्भर करती है. इसलिए अपनी सत्ता की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए शासक वर्ग स्वामीभक्ति को महिमामंडित करता रहता है. युद्ध में सैनिक और उनके अस्त्रशस्त्र राजा के लिए संसाधन होते हैं. वे राजा को केवल उसकी निजी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होते. उनमें से अधिकांश उत्तराधिकार में प्राप्त होते हैं. यदि राजा केवल अपने दम पर, आमनेसामने की लड़ाई करे तो उसकी सफलता की संभावना बहुत सीमित स्तर की होगी. कारखानेदार के मामले में सैनिकों का स्थान पूंजी ले लेती है. संभव है उसमें से पूंजी का बड़ा हिस्सा उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ हो. यदि यह न भी हो और किसी उद्यमी ने अपने जीवन में ही बेशुमार प्रगति की है तो इसका कारण केवल यह है कि व्यवस्था के चलते उसके कारखानों में कार्यरत श्रमिकों ने अपना श्रमोत्पाद, मामूली वृत्तिका के बदले कारखानेदार को समर्पित किया है. जैसे सैनिकों द्वारा जान की बाजी लगा देना किसी राजा के साम्राज्यवादी मनसूबों को साकार बनाता है. वैसे ही न्यूनतम मजदूरी के बदले अधिकतम श्रमोत्पाद पर कारखानेदार का अधिकार मान लेना और स्वयं मामूली वृत्तिका से संतुष्ट होकर रातदिन काम में जुटे रहना, पूंजीपति को कामयाबी दिलाता है. उद्यमी की सफलता का स्तर बताता है कि श्रमिकों ने उसके उत्पादनस्तर को शिखर तक पहुंचाने के लिए जीजान से काम किया है. यहां त्याग का अर्थ न्यूनतम वृत्तिका के बदले मालिक को अधिकतम मुनाफा कमाकर संतुष्टि प्राप्त कर लेना है. जाहिर है सफलता चाहे राजा की हो या व्यापारी की, उसमें क्रमशः प्रजा अथवा श्रमिकों का योगदान होता है. यहां पूंजी और राष्ट्रवाद दोनों ही वर्चस्वकारी शक्तियों के स्वार्थ से जुड़ै होते हैं. दोनों की प्रवृत्ति मानवविवेक पर कब्जा कर लेने की होती है. अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद अपनी चमकदमक और भौतिक सुखों का प्रलोभन देकर लोगों को आकर्षित करता है. राष्ट्रवाद के पास उग्र राष्ट्रप्रेम के सिवाय नागरिकों को देने के लिए कुछ नहीं होता. इसलिए वह भावुक प्रतीकों के माध्यम से लोगों को लुभाने का प्रयास करता है.

अमीरगरीब, राजाप्रजा के इस कृत्रिम विभाजन से बाहर निकलकर देखें तो प्राकृतिक स्तर पर उनके बीच कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता. राजाप्रजा, अमीरगरीब सभी को एकसमान जीवनचक्र से गुजरना पड़ता है. धूपवर्षाशीत सभी को लुभाते हैं. सभी को भूखप्यास लगती है. यह ठीक है कि मनुष्य में प्राकृतिक स्तर पर अंतर होता है. एक मनुष्य शक्तिशाली हो सकता है और दूसरा शक्तिविपन्न. परंतु प्राकृतिक स्तर पर शक्तिशाली और शक्तिविपन्न व्यक्ति में अंतर का अनुपात उतना नहीं होता, जितना सामाजिक स्तर पर अमीरगरीब, शक्तिशाली एवं शक्तिविपन्न के बीच होता है. न प्रकृति अपने स्तर पर किसी प्रकार का भेदभाव करती है. चूंकि समाजीकरण की मूलभूत अवधारणा समानता के सिद्धांत पर गढ़ी होती है, राज्य भी इसी दावेदारी के साथ जनसमर्थन प्राप्त करता है कि वह धनीनिर्धन, शक्तिसंपन्न एवं शक्तिविपन्न के बीच बहुत अंधिक अंतर नहीं करेगाइसलिए यदि किसी राज्य में ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि वह अपने गठन के मूलभूत उद्देश्यों से भटका हुआ है. दूसरे शब्दों मे समानता का आशय किसी व्यक्ति से राजा या पूंजीपति बनने के अवसर छीन लेना नहीं है. बल्कि जनसाधारण को इस आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्ति दिलाना है. सफलता सदैव सापेक्षिक होती है, परंतु न्याय निरपेक्ष. इस आधार पर अरस्तु न्याय पर विमर्श के आरंभ में ही उसकी दो कसौटियां बना लेता है. पहली के अनुसार तयशुदा कानून की मर्यादा में रहना न्याय है. जिन कार्यों को राज्य की विधिसंहिता स्वीकारे उनका अनुपालन न्याय है. जिनसे राज्यसमाज में शांतिसुव्यवस्था स्थापित होती हो, वह न्याय है. न्याय का दूसरा रूप अपने साथ बाकी लोगों की स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करना है. जबकि अन्याय वह है जो कानून के विरुद्ध है. जिससे दूसरों के अधिकारों का हनन होता है. जिससे किसी व्यक्ति को उसके विधिसम्मत देय से वंचित कर दिया जाता है.

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है. अरस्तु ने न्याय को सर्वसाधारण के सामान्य हित की संज्ञा दी है. उसके अनुसार न्याय के दो पक्ष होते हैं. पहला व्यक्ति पक्ष और दूसरा वस्तु पक्ष. व्यक्ति का संबंध भी प्रकारांतर में वस्तुओं से होता है. उसके अनुसार न्याय का तकादा है कि सभी मनुष्यों को समान वस्तुएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए. पर कैसे? यहां एक पेंच है जिससे समानता की हमारी सार्वत्रिक अवधारणा संकट में पड़ जाती है. समानता का विचार न तो रूढ़ है न ही व्यक्तिनिरपेक्ष. सभी व्यक्तियों को सभी अवसर दिए जाने का अभिप्राय यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी रुचि या अन्यान्य कारण से किसी पद के अयोग्य है तो समानता के सिद्धांत के अनुसार उसे उस पद की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए. समानता की सीधीसी अवधारणा है कि सभी व्यक्तियों को सभी अवसर प्राप्त हों. तदनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अवसर मिलना चाहिए कि यदि वह स्वयं को राजपद के योग्य बना सके, तो वह पद उसकी पहुंच से दूर नहीं है. राज्य का हित भी इसमें है कि नागरिकों को यथायोग्य पद प्राप्त हों. राजा उसी को चुना जाए जो राजा बनने के योग्य है. अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के अधिकार उसकी योग्यता पर निर्भर करते हैं. तदनुसार राजा बनने का अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो राजपद के योग्य है. श्रेष्ठ राज्य अपने लिए कसौटियां स्वयं तय करता है, जिनके माध्यम से वह स्वयं को नियंत्रित एवं विकासरत रख सकता है. वीरता, व्यक्तित्व, व्यवहार कुशलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमानी जैसे उदात्त चारित्रिक गुण यदि राजा बनने के लिए अपरिहार्य हैंतो समानता के सिद्धांत के अनुसार जिस व्यक्ति में ये सभी गुण पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, उसे राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसपर उसके परिवार अथवा उन गुणों को जिनका राजा के लिए अपेक्षित गुणों से कोई संबंध नहीं है, कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के 12वें अध्याय में अरस्तु बासुंरीवादक का उदाहरण देता है

यदि बहुत से व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में निपुण हों तो उनमें से किसी व्यक्ति को सिर्फ इस कारण अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं दी जानी चाहिए, कि उसका संबंध किसी उच्च कुल से है.’

आगे वह स्पष्ट करता है

बासुंरीवादन एक कला है, जिसका व्यक्ति के कुल से कोई संबंध नहीं है. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में पीछे है, मगर कुल और सुंदरता के मामले में बाकी प्रतिस्पर्धियों से आगे तो भी अच्छी अथवा सर्वाधिक बासुंरिया किसी वाद्यकला में निपुण व्यक्तियों को ही दी जानी चाहिए….कुलपरिवार की सदस्यता के आधार पर भी व्यक्ति अच्छी बांसुरियों की दावेदारी कर सकता है, परंतु उसमें उन गुणों की प्रधानता अपरिहार्य है, जो बांसुरी वादन की कला के लिए अत्यावश्यक हैं.’

आशय है कि श्रेष्ठ वस्तुएं यथायोग्य व्यक्तियों को प्राप्त हों. उन्हें प्राप्त हों, जिन्हें उनकी आवश्यकता है और जो उनका श्रेष्ठतम उपयोग करने में सक्षम हैं. परंतु योग्यता का मापदंड क्या हो? प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि में योग्यतम होता है. फिर जो अधिकतम की दृष्टि में श्रेष्ठतम है, उसके भी आलोचक हो सकते हैं. इसे ‘एथिक्स’ में समझाया गया है. अरस्तु की यह पुस्तक नीतिशास्त्र की श्रेष्ठतम कृतियों में से है. सर्वथा मौलिक. इसके माध्यम से अरस्तु ने नैतिकता को उस दौर में परिभाषित किया, जब राज्य पर धर्म का नियंत्रण था. उत्तराधिकार में जो भी प्राप्त हो, उसे बचाए रखने और उसके माध्यम से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को शिखर तक ले जाने के लिए सारे उद्यम किए जाते थे; फिर उन्हें धर्म का नाम दे दिया जाता था. अरस्तु के अनुसार न्याय ज्ञानविज्ञान की विभिन्न शाखाओं का अंतिम और वास्तविक लक्ष्य है. मनुष्य जो ज्ञानार्जन करता है, वह तब तक अनुयोगी या अल्पउपयोगी माना जाएगा, जब तक उससे किसी न किसी रूप में न्याय की पुष्टि न होती है. ताकि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो जाए कि जो उसका प्राप्य है, वह उसको यथासमय प्राप्त होता रहेगा. आखिर यह कैसे सुनिश्चित हो कि व्यक्ति को जो अधिकार है, वह उसे प्राप्त हैं. यहां राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके राज्य में किसी भी नागरिक के अधिकार बाधित न हों. न ही किसी के साथ कोई पक्षपात हो. यह ध्यान रखते हुए कि समानता न्याय का उद्देश्य है, लेकिन एकमात्र समानता को भी न्याय का पर्याय मान लेना अनुचित होगा. उदाहरण के लिए दो भिन्न व्यक्तियों की कल्पना कीजिए, जिन्हें खराद मशीन पर कोई पुर्जा बनाने को दिया जाता है. मान लीजिए उनमें से पहला दस नगों का उत्पादन करता है और दूसरा उतनी ही अवधि में बीस नगों का. चूंकि व्यक्ति का अपने श्रम पर अधिकार होता है, इसलिए कानून और नैतिकता दोनों दृष्टि में यह उचित माना जाएगा कि जिस व्यक्ति ने अधिक उत्पादन किया है, उसकी अतिरिक्त लाभ में आनुपातिक साझेदारी हो. पूंजीवादी व्यवस्था इसी को न्याय मानती है. उसके अनुसार इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है. चीजें सस्ती होती जाती हैं. उसकी भरपाई के लिए उत्पादक उत्पादनवृद्धि का सहारा लेता है. उससे रोजाकर के अवसर बढ़ते हैं. उसके फलस्वरूप हुई उत्पादन वृद्धि का लाभ पूरे समाज को पहुंचता है. पूंजीवादी राज्यों की सरकारें भी कमोबेश वही सोचती हैं. परंतु राज्य की मजबूरी है कि उसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाकर रखना पड़ता है. उसके लिए वे अधिक आय वाले व्यक्तियों पर कराधान की सीमा बढ़ाकर बाकी लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास करती हैं. यह केवल दिखावा ही होता है, क्योंकि एक ओर जहां अधिक करउगाही का का नाटक किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपतियों को विभिन्न प्रकार की छूट देकर, ओनेपौने दाम में राज्य के संसाधन लुटाकर प्रसन्न रखा जाता है.

यदि शतप्रतिशत ऐसा हो जाए कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितनी उसकी क्षमता है, तो सोचिए क्या यह जंगल के न्याय जैसी व्यवस्था न होगी? जंगल में भी प्राणी अपने सामर्थ्य के अनुसार शिकार करते हैं. चिड़िया मामूली कीड़ेमकोड़ों का शिकार करके पेट भरती है. शेर और चीता भारीभरकम सांड को भी अपना शिकार बन सकते हैं. जानवर के लिए उसका शिकार एक तरह से उसका उत्पाद ही है. अतः न्याय दृष्टि से समानता व्यक्ति और समाजनिरपेक्ष नहीं होती. उसमें परिस्थिति अनुसार बदलाव होते रहते हैं. लेकिन समानता ऐसी पहेली भी नहीं है, जिसे समझा न जा सके. आखिर समानता किसकी और कैसे? सामान्य सिद्धांत के अनुसार असमान व्यक्तियों का हिस्सा समान नहीं हो सकता. समानता की न्यूनतम शर्त नागरिकों को न्याय की अबाध प्रतीति है. यह ठीक है जन्म के आधार पर, स्थितियों के आधार पर लोगों की कार्यक्षमता में अंतर होता है. राज्य और समाज का गठन का उद्देश्य भी यही है कि व्यक्तिमात्र की इन दुर्बलताओं का असर उसकी खुशियों पर न पड़े. जहां कोई नियम या व्यवस्था न हो. दूसरों के सुखदुख की परवाह किए बिना सभी मनमानी पर उतारू रहते हों. वहां राज्य की भूमिका नगण्य मानी जाएगी. यह नियम कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितना उसका सामर्थ्य हैप्रकारांतर में समाज को इस स्वार्थी सोच की प्रेरणा बन सकता है. इससे समाजीकरण का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा. अतः राज्य का कर्तव्य है कि वह उस नागरिकों को जो किसी कारण पिछड़े हुए हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर दूसरों के बराबर लाने का प्रयास करे. साथ में यह विश्वास भी बनाए रखे की समाज की एकता, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ी है.

अरस्तु न्याय के पर्याय के रूप में सद्गुण को स्थापित करता है. राज्य के संदर्भ में ‘न्याय राज्य का सद्गुण’ है. उसकी व्याप्ति राज्य और उसके नागरिकों के आचरण से आंकी जानी चाहिए. न्याय वह है जिसे सभी नागरिक सही मानें. जिसकी श्रेष्ठतम के रूप में प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कामना करे. ठीक इसी तरह अन्याय वह है जो अधिकतम नागरिकों को नियमविरुद्ध और अनुचित प्रतीत होता हो. किंतु न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित की यह बहुत सरलीकृत व्याख्या है. यह दोनों को एक दूसरे का विरोधी दर्शाती है. सामान्यतः यह सही भी दिखता है. न्यायालय का कोई फैसला यदि बहुसंख्यक वर्ग को अनुचित और अन्यायपूर्ण लगता है तो वह उचित और न्यायपूर्ण हो ही नहीं सकता. लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित को लेकर सभी नागरिकों की एकसमान राय हो. लोगों का न्यायबोध उनकी संस्कृति और मानसिक प्रशिक्षण पर भी निर्भर करता है. राजशाही में राजा और उसके परिवार की सुरक्षा शेष जनसमाज की सुरक्षा से महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. उसके लिए अनेकानेक सैनिक की बलि दे देना राजधर्म माना जाता था. अधिकांश युद्ध राजाओं के व्यक्तिगत अहं और राजलिप्सा का परिणाम होते थे. अपने समग्र परिणाम में वे प्रजा के लिए अहितकारी होते थे. बावजूद इसके प्रजा अपने राजा और उसकी व्यवस्था को सराहती थी. क्योंकि उसका मानसिक प्रशिक्षण इसी तरह का होता था. जनतांत्रिक समाजों में नागरिकों का सोच स्वतंत्र होता है. निर्णयविशेष को कुछ लोग उचित मान सकते हैं और कुछ अनुचित. कुछ ऐसे नागरिक भी हो सकते हैं जिन्हें वह निर्णय आंशिक अनुचित और अन्यायपूर्ण अथवा आंशिक उचित और न्यायपूर्ण लगता हो. इस तरह लोगों की दृष्टि के अनुसार न्याय और अन्याय के अनेक रूप संभव हैं. लेकिन राज्य की दृष्टि में न्याय का केवल एक रूप होता है. सभी नागरिकों के साथ समान वर्ताब और समाज में कल्याण विस्तार. ऐसे समाजों में कर्तव्यपरायण मनुष्य, न्यायसंगत बने रहने के लिए वही करता है जो समाज की निगाह में उचित है. वैसा ही सोचता है, जिसे न्यायसंगत माना जा सके.

वे कौनसी स्थितियां हैं, जब मनुष्य के कर्म को न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता? इसे समझना मुश्किल नहीं हैं. उपर्युक्त विवरण के आधार पर देखें तो दो मुख्य स्थितियां हैं जिनके आधार पर मनुष्य के कृत्य को अनुचित या अन्यायपूर्ण कहा जा सकता है. पहला जब वह कानून तोड़ता है. ऐसे काम करता है जो राज्य तथा समाज की निगाह में अनुचित हैं. दूसरी स्वार्थपरता. समाज में रहते हुए उससे अधिक ग्रहण करना जितना अधिकार है. अपने अलावा दूसरों की आवश्यकता पर विचार ही न करना. बल्कि जिसपर दूसरों का अधिकार है, उसे भी हड़प कर जाना. अरस्तु के अनुसार उचित होने के लिए कानून सम्मत और निस्वार्थ होना आवश्यक है. जो कानूनसम्मत नहीं है. जो अपने आचरण में निष्ठावान तथा दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं है, इसलिए वह उचित भी नहीं है. उचित की बहुमान्य परिभाषा उपलब्ध संसाधनों, अवसरों और कर्तव्यों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी है. ऐसी सहभागिता जिससे दूसरों के अधिकार निर्बंध रहें. सच यह भी है कि समाज में रहते हुए अपने हिस्से से अधिक लेना हमेशा अन्यायपूर्ण नहीं होता. कई बार अपने हिस्से को छोड़ देना या दूसरों का हिस्सा भी हड़प जाना प्रशंसा का पात्र बना देता है. जब कोई भूखा व्यक्ति अपने आगे रखी थाली, ज्यों की त्यों दूसरे भूखे प्राणी को सौंप देता है तो उसकी नैतिकता हमें भावाकुल कर देती है. ठंड से ठिठुरते किसी व्यक्ति को अपने वस्त्र उतारकर दे देना मानवचरित्र की उदात्तता से परचाता है. इसी प्रकार सारे के सारे दुर्योग को, जिससे बहुतसे लोगों के अनिष्ट की संभावना हो, अपने हिस्से समेट लेना भी उचित और सराहनीय माना जाएगा. ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें अपनी दोषी संतान को बचाने के लिए पिता उनके सारे अपराध अपने सिर ले लेते हैं. समुद्रमंथन की मिथकथा के अनुसार शिव सबके हिस्से का विषपान करके ही नीलकंठ कहलाए थे. किसी व्यक्ति में कम बुराइयां हों, यह भी अच्छी बात है. अब सवाल है कि कानून क्या है? उससे व्यक्ति का हित सधता है या राज्य का. अथवा व्यक्ति और राज्य दोनों का?कुछ विद्वानों का मानना है कि श्रेष्ठ नागरिक आत्मानुशासित होता है. उसे अपने और दूसरों के सुखदुख की चिंता होती है. इसलिए वह किसी के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करता. ऐसे व्यक्ति को कानून की आवश्यकता नहीं पड़ती. यह बात सही हो सकती है. परंतु हमेशा सही हो आवश्यक नहीं है. कानून अदालती प्रक्रिया मात्र नहीं है. कानून का पलड़ा हालांकि समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर झुका होता है. फिर भी उसमें कई ऐसी खूबियां होती हैं, जिनकी अनुपस्थिति समाज की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है. उनके अभाव में प्रत्येक नागरिक ‘श्रेष्ठ आचरण’ की परिभाषा अपने हिसाब से करेगा. प्रकारांतर में सब मनमानी उतर आएंगे. परिणामस्वरूप समाज के गठन का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा. इसलिए कानून के रूप में सुनिश्चित आचारसंहिता का होना आवश्यक है.

अरस्तु के अनुसार कानून विधायी व्यवस्था है. राज्य यदि नागरिकों के प्रति उदार है तो कानून नागरिकअधिकारों के पक्ष में झुका पाएगा और मानवमात्र के अधिकारों का ध्यान रखेगा. यदि कानून का गठन कुछ लोगों की मर्जी से, स्वार्थभावना के साथ हुआ है तो उसका झुकाव शिखर पर मौजूद अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र के पक्ष में नजर आएगा. केवल उन्हीं लोगों के भले की सोचेगा है जो किसी न किसी रूप से सत्ता से जुड़े हों. निरंकुशता की भावना से गठित कानून केवल तानाशाह की मर्जी से संचालित होंगे. सही मायने में तो वे तानाशाह के स्वार्थ से इतर कुछ हो ही नहीं सकते. इससे हम राज्य में न्याय की मौजूदगी को परखने के लिए कुछ मापदंड बना सकते हैं. ऐसे कानून जिनसे राज्य की उदारता झलकती हो, जो समाज के अधिक से अधिक लोगों के कल्याण की भावना से बनाए गए हों, वे कानून न्यायसंगत माने जाएंगे. जबकि ऐसे कानून जिनसे अल्पसंख्यक वर्गों की स्वार्थसिद्धि होती हो, अथवा जिनका गठन तानाशाह की इच्छाओं को दूसरों पर लादने के लिए हुआ हो, उन्हें न्यायसंगत मानने में हमें संकोच होगा. जिस राज्य में पहली कसौटी का पालन होगा, वह कल्याणराज्य के मापदंडों के अनुरूप होगा. उसमें शुभ की व्याप्ति होगी. तदनुसार न्यायकारी शक्तियों का सत्ताप्रेम अथवा उनपर शासक वर्गों का नियंत्रण शासन की निरंकुशता का परिचायक होता है.

इस विवेचन से न्याय को समझा जा सकता है. न्याय हमेशा दूसरों के प्रति होता है. लेकिन मनुष्य दूसरों के प्रति तभी न्याय कर सकता है, जब उसे अपने प्रति न्याय की उम्मीद हो. इस तरह न्याय सद्गुण है. व्यक्ति का समाज और समाज का अपने नागरिकों के प्रति कल्याणभाव जिससे झलकता हो, वह सद्गुण है. समाज में सद्गुण से श्रेष्ठ कुछ नहीं होता. वह निर्मेल्य होता है. अरस्तु के अनुसार ‘न्याय कुल मिलाकर संपूर्ण सद्गुण या सद्गुणों का समुच्चय है. वह इसलिए सद्गुण है, क्योंकि वह व्यक्ति का अपने पड़ोसियों, अपने मित्र, हितैषी यहां तक कि आलोचकों के प्रति न्यायभाव को दर्शाता है. कुल मिलाकर सद्गुण किसी भी समाज की श्रेष्ठतम उपलब्धि हैं. यदि कोई व्यक्ति केवल अपने मित्रों और सगेसंबंधियों के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करता है और बाकी समाज के प्रति वैसा करने से बचता है, तो उसका आचरण न्याय की कसौटी पर स्वार्थपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में न्याय सद्गुण है और सद्गुण वह है, जिसे कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति कल्याणभाव के साथ करता है. न्यायपूर्ण व्यक्ति वह है जो दूसरों की हितसिद्धि के लिए बिना किसी स्वार्थभाव से प्रयासरत रहता है. और ऐसा व्यक्ति जो केवल स्वार्थसिद्धि में लीन रहता है, दूसरों को किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाता है अथवा उन वस्तुओं पर कब्जा करता है, जो किसी दूसरे का अधिकार हैं, अन्यायी की श्रेणी में आएगा.

मनुष्य क्या है? कैसा है, इसकी पहचान सभा में की जाती है. अकेले मनुष्य की अच्छाई या बुराई किसी काम की नहीं होती. सामाजिक प्राणी होने के नाते, ‘सभा ही मनुष्य के चरित्र का दर्पण है.’ अच्छाई व्यक्तिमात्र का आंतरिक गुण है. मगर इसकी तब तक कोई उपयोगिता नहीं है जब तक उसका कोई सार्वजनिक प्रयोजन न हो. कह सकते हैं कि मानवचरित्र की कसौटी दूसरों के प्रति उसका व्यवहार है. तदनुसार जो केवल अपना हित चाहता है, दूसरों के लाभालाभ से जिसे कोई सरोकार नहीं है, जिसे दूसरों के कष्ट द्रवित नहीं करते, वह अश्रेष्ठ है. वह नागरिक धर्म का पालन नहीं कर पाता. इसलिए किसी न किसी रूप में वह कानून का उल्लंघन करता है. दूसरी ओर जो सभी के साथ समभाव से पेश आता है. उदारता जिसका स्वभाव है. जो अपने अधिकारों के साथसाथ दूसरों के अधिकारों का भी ध्यान रखता है. वह श्रेष्ठता का प्रतीक है. अश्रेष्ठ और श्रेष्ठ के व्यवहार में जो अंतर है, वह अन्याय और न्याय, गैरकानूनी और कानूनी में भी है. न्याय और सद्गुण के अंतर को स्पष्ट करने के लिए अरस्तु की व्याख्या बहुत सरल है. उसके अनुसार न्याय और सदगुण को व्यक्ति के आचरण द्वारा परखा जा सकता है. व्यक्ति दूसरे के संदर्भ में सदाचरण करे, उसकी अच्छाइयां जो लोककल्याण के निमित्त उद्घाटित हों, जो दूसरों के साथ कल्याणभाव से पेश आए वह न्याय प्रिय है. और उसका आचरण न्यायोचित कहा जाएगा. जिनसे मनुष्य के चरित्र आदर्श बने, वह सद्गुण हैं. इसी तरह जब कोई मनुष्य दूसरों पर बुरी नीयत के साथ हमला करता है, उसे नुकसान पहुंचाता है. दूसरे के साथ बदसलूकी करता है या उसके न्यायपूर्ण हिस्से को अपना कहकर छीन लेता है, तो उससे मनुष्य के चरित्र की बुराई लक्षित होती है. और उसका व्यवहार गैरकानूनी तथा अन्यायपूर्ण माना जाएगा. अन्याय और बुराई परस्पर जुड़े होते हैं. अरस्तु यहां व्यक्ति और समाज के अथवा व्यक्ति और शेष जनसमाज के संबंधों के आधार पर न्याय और अन्याय की तुलना करता है. राज्य को बीच में नहीं लाता. उसके अनुसार राज्य समाज का सत्कर्म है, जिसे वह नागरिकों के कल्याण के लिए अपनाता है. समाज की भांति राज्य भी मनुष्य की रचना है. राज्य मनुष्य के राजनीतिक बोध की निर्मिति है. इस कसौटी के अनुसार न्याय सद्गुण का कोई हिस्सा न होकर संपूर्ण सद्गुण है. बिना सद्गुणों के न्याय की अभिकल्पना संभव भी नहीं है.

प्रश्न है कि क्या न्याय और सद्गुण परस्पर पर्यायवाची हैं? यदि ‘हां’ तो उनकी अलगअलग पहचान कैसे संभव है? यदि नहीं तो क्या उन्हें एकदूसरे से जोड़कर, पारस्परिक संबंधों में परखा जा सकता है? अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. जहां न्याय है, वहां सद्गुण हैं. वह समाज में शुभत्व की मौजूदगी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं. शुभत्व माने जड़चेतन सभी के प्रति समान रूप से कल्याण का भाव. फिर उसी के अनुरूप कार्य करने की चेष्ठा. इसी तरह अन्याय या अनाचार विचारों, कर्तव्यों या भावनाओं का वह हिस्सा है जो व्यक्ति और समाज में दुर्गुणों की उपस्थिति और/या दुराचरण के स्तर को दर्शाता है. लेकिन जैसे सद्गुण की संकल्पना तय है, उसी प्रकार सदाचरण की संकल्पना भी सभी के लिए एक समान हो, आवश्यक नहीं है. कल्पना कीजिए दो व्यक्ति हैं. उनमें से एक बदचलनी या भ्रष्टाचरण करता है, और उससे धनार्जन करता है. दूसरा व्यक्ति बदचलनी के नाम पर अपना धन लुटाता है तो उनमें से दूसरे को भ्रष्टाचरण का दोषी माना जाएगा. चूंकि पहला व्यक्ति अपनी गांठ से धन लुटाकर भ्रष्टाचरण करता है, इसलिए उसे कंजूस शायद ही कोई मानेगा. हालांकि सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से दोनों ही समान रूप से दोषी माने जाएंगे. परस्त्रीगमन विशिष्ट किस्म का दोष है. उसे मानवमन का विकार या व्यक्ति का समाज के प्रति अनाचार समझकर क्षमा भी किया जा सकता है. लेकिन यदि बदलचनी के दौरान वह अपने साथी को नुकसान करता है, उसको किसी प्रकार की चोट पहुंचाता है या उससे समाज को किसी प्रकार की हानि पहुंचती तो वह सीधे तौर पर उस व्यक्ति या समाज के प्रति अन्याय माना जाएगा.

बुद्ध ने मध्यम मार्ग की अनुशंसा की थी. अरस्तु ने भी मध्यम मार्ग को ही श्रेष्ठ माना है. ऐसा मार्ग जिसमें राज्य और नागरिक सब मिलकर अपनेअपने अधिकारों का भोग करते हों. जिसमें नागरिक समाज इतना शक्तिशाली हो कि सत्ताओं की मनमानी पर अंकुश लगा सके. इतना विवेक उसमें हो कि शासकवर्ग की नाकामियों को समझकर उनका समाधान खोज सके. क्या अकेला नागरिक ऐसा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर इस तरह भी खोजा जा सकता है कि क्या कोई व्यक्ति केवल अपने हित को राज्य का हित मानता है? यदि वह ऐसा नहीं करता. यदि वह संपूर्ण समाज के या समाज के अधिसंख्यक वर्ग के हित में अपना हित देखता है, तो ऐसे नागरिक के सामने अकेले पड़ जाने की समस्या नहीं झेलनी पड़ती. समाज इतना अनुदार कभी नहीं होता कि अपना हित साधने वाले का अहित कर सके. हां, स्वार्थी शक्तियों के हाथों में झूल रहा राज्य यह कर सकता है. ऐसे राज्य का सामना जनता की सामूहिक शक्ति के साथ किया जाना चाहिए. ठीक हे कि राज्य के पास कानून की ताकत होती है. अकेले नागरिक के सापेक्ष राज्य बहुत बड़ी शक्ति है. लेकिन नागरिकों को यह समझना चाहिए कि राज्य को उसकी शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त होती हैं. जनसमर्थन ही राज्य की ताकत को वैधता प्रदान करता है. अतः आवश्यक है कि राज्य जनता की इच्छा और हित को देखते हुए अपनी शक्तियों का प्रयोग करे. निरंकुश राज्य के हाथों में शक्तियां का केंद्रित हो जाना जनता के लिए हानिकारक होता है.

आशय है कि राज्य को अधिकारसंपन्न बनाने वाली ताकत का मूलस्रोत जनता होती है. परंतु जनता आमतौर पर यह माने रहती है कि राज करना उसका काम नहीं हैं. वह यह भी मान लेती है कि जो राज करते हैं वे विशिष्ट गुणों से संपन्न होते हैं. कि राज करना विलक्षण गुण है, जो जन्मजात या कुछ खास लोगों में ही होता है. कुछ मनोवैज्ञानिक भी इसका समर्थन करते हैं. परंतु हमें यह समझना चाहिए कि मनोवैज्ञानिक धरती से परे के जीव नहीं होते. वे समाज के बीच रहकर, समाज से ही अपने निष्कर्ष ग्रहण करते हैं. कल्पना के घोड़ों की बागडोर अनुभव के हाथों में होती है. मनुष्य अपने अनुभवों की परिधि से बाहर बहुत लंबा नहीं झांक सकता. यदि किसी मनोवैज्ञानिक को ऐसे राज्य में छोड़ दिया जाए जहां सभी बराबर हों, लोग शांतिपूर्ण जीवन जीते हों, उनके बीच किसी प्रकार की स्पर्धा न हो, तो उसका एकमात्र यही निष्कर्ष होगा कि मानव मन बहुत सरल और सहजगम्य है. कुल मिलाकर जनता की यह भ्रांति कि राज्य उससे स्वतंत्र सत्ता है, राज्य को निरंकुश बनने का अवसर देती है. शिखर पर मौजूद लोग स्वयं को सामान्य से हटकर मानने लगते हैं. चूंकि अकेले व्यक्ति के पास इतनी शक्ति नहीं होती कि शिखर पर बैठे लोगों को उनकी चूकों की ओर आगाह कर सके, इसलिए वह हालात से समझौता किए रहता हे. उसे केवल संगठन के बल पर चुनौती दी जा सकती है. परंतु उसके लिए आवश्यक है कि लोग सामान्य हितों को पहचानकर बड़ी संख्या में संगठित हां. उनमें पर्याप्त अधिकार चेतना हो, जिससे वह शासन की मनमानियों के विरोध में खड़े हो सकें. अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. इसलिए सीमित संदभो्र्रं में न्याय सद्गण का ही हिस्सा है. अरस्तु ने समानता को न्याय का पूरक बताया है. जहां असमानता है, वहां न्याय संभव नहीं है. परंतु समानता को परिभाषित करना भी सरल नहीं है. समानता कैसी और किसकी? अरस्तु के अनुसार व्यक्तियों तथा वस्तुओं के वितरण का अनुपात न्यायसंगत होना चाहिए. तदनुसार यदि व्यक्ति एकसमान नहीं हैं, तो उनको मिलने वस्तुएं भी असमान होंगी. लेकिन इसमें दो प्रकार की स्थितियां संभव हैं. पहली दो व्यक्ति जो समान हैं, उन्हें एक समान वस्तुओं की प्राप्ति न हो. दूसरी व्यक्ति असमान हों और उन्हें समान मात्रा में वस्तुएं प्राप्त हों. यह ऐसी उलझन है जिसका निपटारा आसान नहीं है. इसके समाधान के लिए प्रायः कह दिया जाता है कि लोगों में वस्तुओं का वितरण ‘प्राथमिकता के आधार’ पर हो. परंतु प्राथमिकता का भी सर्वमान्य मानक नहीं है. राज्यों की प्रकृति और परिस्थिति के अनुसार प्राथमिकता के मायने बदलते रहते हैं. लोकतांत्रिक समाजों में जन्म के आधार पर ही नवजात के नागरिक अधिकार सुरक्षित मान लिए जाते हैं. भले ही वह उनके बारे में कुछ भी जानता हो. जहां अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र है, वहां संसाधनों का बंटवारा कुलीनों की संख्या को आधार बनाकर किया जाता है. जनसाधारण की जरूरतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. इसी प्रकार निरंकुश राज्य में संसाधनों के विभाजन का कोई नियम नहीं होता. सबकुछ तानाशाह की इच्छा से निर्धारित होता है. तो भी इससे यह नियम खारिज नहीं होता कि न्याय की कसौटी के अनुसार वस्तुओं का विभाजन आनुपातिक होना चाहिए. यानी व्यक्ति को यह लगना चाहिए कि समाज और राज्य उसकी रुचि एवं जरूरतों का ख्याल रखने में सक्षम हैं. और उनका प्रत्येक प्रयास इसी दिशा में जाता है.

अरस्तु को विज्ञान का संस्कार बचपन से प्राप्त था. न्यायसिद्धांत की व्याख्या करते हुए वह आवश्यकतानुसार गणित की मदद भी लेता है. असमानता समाज में स्तरीकरण करती है. दो व्यक्तियों के बीच की असमानता यदि उसी अनुपात में आगे बढ़े तो किन्हीं दो जोड़ों के बीच अधिकतम और न्यूनतम आय के बीच कम से कम चार गुने का अंतर होगा. उदाहरण के लिए ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ के बीच यदि ‘क’ के पास ‘ख’ से दो गुनी संपदा है तथा ‘ग’ के पास ‘घ’ से दो गुनी, तो ‘क’ के पास ‘घ’ से न्यूनतम चार गुनी समृद्धि होगी. इस तरह समृद्धि अनुपात बढ़ने से आर्थिक असमानता, विशेषकर अधिकतम और न्यूनतम के बीच का अंतर बहुत तेजी से बढ़ता है. इसलिए सभी व्यक्तियों को समान आंकना, उन्हें समान अवसर देना और आय में किसी प्रकार का पक्षपात न बरतना ही न्याय है. इस उदाहरण में यदि ‘क’ और ‘ग’ को जोड़ दिया जाए तो उनकी संपत्ति लगभग ‘ख’ के बराबर हो जाएगी. अरस्तु ने इसे ‘वितरणात्मक न्याय’ कहा है. हालांकि उदार लोकतांत्रिक सरकारों में जहां सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति होती है, यह कार्य संभव नहीं है. हालांकि समानता की ओर प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ना उनकी जरूरत होती है.

क्रमश:

© ओमप्रकाश कश्यप