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वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक

सामान्य

सुनो, सुनो, सुनो—गीत मेरा सुनो

विपन्न, निढाल गरीबी में घिसटते हुए लोगो सुनो 

‘यहां से जाएं, तो कहां जाएं?’

वे रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं

हमारा न कोई घर है, न देश

न ही सिर छिपाने को जंगल

दिन के उजाले में जंगलों की सफाई करना

रात्रि को वहीं निढाल पड़ जाना

बीज बोने के बाद

पेड़ जब देने लगते हैं फल

मालिक आकर कब्जा लेता है उन्हें

हमारे पास अब केवल रोना ही बचा है

हमारे हिस्से है श्रम, केवल श्रम

ढेर सारा, बल्कि सारे का सारा श्रम

हम सड़कों पर चल नहीं सकते

बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है हमें

लेकिन हम बढ़ेंगे….बढ़ेंगे

बढ़ते रहेंगे, बढ़ते ही रहेंगे।

ऊपर दिया गया गीत करीब 100 वर्ष पुराना है। अय्यंकाली द्वारा स्थापित ‘साधुजन परिपालन संघम’ की बैठकों में गाया जाने वाला गीत। केरल के दलितों और आदिद्रविड़ों में आधुनिक भावबोध जगाने में इस गीत का बड़ा योगदान है। चक्कोला कुरुंबम दीविथन इसे गाया करते थे। ऐसे मार्मिक स्वर में कि श्रोतागणों की आंखें डबडबा जाती थीं। इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले अय्यंकाली के जीवन से दो शब्द चित्र—

बैलगाड़ी से क्रांति

वर्ष 1891(कुछ विद्वान इसे 1893 मानते हैं)। करीब 30 वर्ष का एक हृष्ट-पुष्ट और सुदर्शन युवक। एकदम नई बैलगाड़ी, जोतने के लिए एक जोड़ी युवा-छरहरे, सफेद बैल। एक जोड़ी पीतल की बड़ी-बड़ी घंटियां—सब उसने आज ही के लिए खरीदे हैं। इनके अलावा अपने लिए चमकीला अंगवस्त्र, शानदार पगड़ी और रौवदार जूतियां। मानो अपने अनूठे बाने से काल के कपाल पर सुनहरी इबारत टांकने को आतुर हो। बैलों को गाड़ी में जोतने से पहले वह उन्हें प्यार से सहलाता है। फिर उनके गले में घंटियां बांधकर बैलगाड़ी में जोत देता है। उसके बाद पूरी शान से बैलगाड़ी में सवार होता है। सधे बैल इशारा पाते ही आगे बढ़ने लगते हैं। ‘टनश्टन’ बजती घंटियां पचासियों मीटर दूर से उसके आने का पता दे देती हैं। लोग घंटियों की आवाज सुनकर बाहर निकल आते हैं। स्त्रियां और बच्चे खिड़कियों-दरवज्जों से झांकने लगते हैं। 

युवक जिस जाति से आता है, उसे न तो बैलगाड़ी पर सवार होने का अधिकार है। न अंगवस्त्र धारण करने का। न ही उन मार्गों पर चलने का जिनपर उसके बैल हाथियों जैसी मस्त चाल से आगे बढ़े जा रहे हैं। उसकी शान देखकर उसके अपने लोगों का सीना शान से चौड़ा हो जाता है। कुछ को ईर्ष्या होती है। कुछ की आंखों की अंगार फूटने लगते हैं। वे घरों से लाठियां, डंडे वगैरह निकालकर बैलगाड़ी के रास्ता रोक लेते हैं। जो हो रहा है, इसकी उसे उम्मीद थी। इसलिए वह तैयार होकर आया है। रोज-रोज अपमान सहते रहने से अच्छा है, उसका प्रतिकार किया जाए। फैसला इस पार हो या उस पार। विरोधियों को तना देख वह अपनी खुखरी निकाल लेता है। उसका रौद्र रूप देख रास्ता रोकने वाले भयभीत हो जाते हैं। जीत का जश्न मनाती हुई बैलगाड़ी आगे बढ़ जाती है। 

दुनिया में अनेक महापुरुष हुए। सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, परंतु बैलगाड़ी पर चढ़कर क्रांति का शंखनाद करने वाले वे अकेले ही थे। 

बाजार जाने की आजादी

भारत में जाति से बड़ा कलंक दूसरा नहीं। यह जन्म के आधार पर आदमी-आदमी में फर्क करना सिखाती है। ‘द्विज’ कहकर मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में अकूत अधिकार थमा देती है। दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से को शूद्र और अछूत बताकर उनसे उनका मान-सम्मान, सुख-सुविधा और मामूली खुशियां तक छीन लेती है। केरल सहित पूरे दक्षिण भारत में वह और भी विकृत अवस्था में थी। इसलिए 1892 में केरल यात्रा के दौरान, विवेकानंद ने उसे ‘जातियों का पागलखाना’1 तक कह दिया था। बीसवीं शताब्दी में वहां के सवर्ण पुलाया, पारया, कुरुवा जैसी जातियों की छाया से भी बचते थे। दलितों का उत्पीड़न आम बात थी। उन्हें न सार्वजानिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता थी, न बाजार जाने की। न ही अच्छे वस्त्र पहनने की। गुलामों जैसा जीवन था उनका। बैलगाड़ी पर चढ़कर सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी छीन लेने वाला हमारा महानायक, 1898 में उनके मान-सम्मान की खातिर एक बार फिर नए जोश के साथ उठ खड़ा हुआ। इस बार संघर्ष बाजार जाने की आजादी को लेकर था।   

उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया। इरादा आरालुम्मुद बाजार में प्रवेश करने का था। अपने साथियों को लेकर उसने पठानकाडा से आगे बढ़ना शुरू किया। सभी जोश में थे। इस डर से कि विरोधी कभी भी, किसी भी दिशा से हमला कर सकते हैं, वे सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। जैसे ही उनका कारवां चेट्टियार स्ट्रीट, बलरामपुर पहुंचा—हथियारों से लैस ऊंची जातियों के लड़ाके उनके रास्ते में अड़ गए।2 दोनों ओर से घात-प्रतिघात होने लगा। संघर्ष बढ़ा तो बढ़ता ही गया। दलितों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। देखते ही देखते मनाक्कुडु, नेय्याट्टिंकर, नेमोन, अमरविला, परसाला, कोझाकुट्टम, कनियापुरम आदि इलाकों में विद्रोह की चिंगारियां फूटने लगीं। जो अछूत सवर्णों को देख कई हाथ पहले ठिठक जाया करते थे—वे अब नई चेतना और आत्मविश्वास से भरे थे। अपने नेता के इशारे पर कुछ भी करने को सनद्ध। पूरे त्रावणकोर में गृहयुद्ध की स्थिति बन चुकी थी। विद्वान 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं। लेकिन स्वाधीनता की असली लड़ाई तो वे दलित और आदिद्रविड़ लड़ रहे थे। एक सप्ताह बाद हालात सामान्य हुए। तब तक इतिहास उस घटना को ‘चलियार विद्रोह’ के नाम से अपने भीतर टांक चुका था। 

केरल को आधुनिक राज्य बनाने में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। वहां अय्यंकाली का उतना ही योगदान है, जितना ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर का महाराष्ट्र में, पेरियार का तमिलनाडु में है। अय्यंकाली का जन्म 28 अगस्त 1863 को त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में हुआ था। आठ भाई-बहनों में वे सबसे बड़े थे। जाति थी पुलाया। उस जाति के लोग आमतौर पर गुलामों की तरह काम करते थे। अय्यंकाली के पिता अय्यन भी एक जमींदार के गुलाम थे। उनकी मेहनत और वफादारी से प्रसन्न होकर जमींदार ने उन्हें पांच एकड़ जमीन उपहार में दे दी थी। इसलिए अपनी जाति के लोगों में अय्यंकाली के परिवार की हैसियत काफी अच्छी थी। पिता अय्यन पुलाया बस्ती के मुखिया थे।

उस समय समाज पूरी तरह जाति में जकड़ा हुआ था। उस परिवेश से गुजरने वाले बच्चों को समाज में जो उत्पीड़न, उलाहने और तिरष्कार सहना पड़ता है, वैसा अय्यंकाली के साथ भी हुआ था। बचपन से ही वे सुंदर थे। शरीर गठीला और स्वस्थ था। उनका व्यक्तित्व अलग ही छाप छोड़ता था। फुटबाल खेलने का शौक था। एक बार फुटबाल नैय्यर के घर में जा गिरी। वे बॉल लेने पहुंचे तो नैय्यर ने उनका अपमान कर दिया। हिदायत दी कि भविष्य में बॉल उसके घर न आने पाए। उस अपमान ने अय्यंकाली को आहत कर दिया। फुटबाल खेलते समय कुछ सवर्ण लड़के भी उनके साथ शामिल हो जाते थे। अय्यंकाली की जाति के बारे में पता चलते ही उन्होंने आना छोड़ दिया। अय्यंकाली को यह बहुत अखरा। उन्होंने भविष्य में उन बच्चों के साथ कभी न खेलने का फैसला किया। 

अय्यंकाली बचपन से ही रचनात्मक प्रवृत्ति के थे। गाने-बजाने का शौक था। अपनी जाति के बच्चों को इकट्ठा कर उन्होंने एक नाटक मंडली की शुरुआत की। आरंभ में वे परंपरागत नाटक खेलते थे। धीरे-धीरे अपने रचे नाटक भी खेलने लगे। उनके नाटकों में एक संदेश होता था। फलस्वरूप लोग तेजी से उनकी ओर आकर्षित होने लगे। बचपन से ही वे निडर और साहसी थे। इस कारण किसी न किसी मुद्दे को लेकर सवर्णों ने उनका अकसर टकराव होता रहता था। उससे निपटने के लिए विद्रोही अय्यंकाली ने अपने साथियों को संगठित करना आरंभ किया। उन्हें कुश्ती और लाठीबाजी का प्रशिक्षण दिलवाया। इसके लिए कलारी असान नामक प्रशिक्षक को बाहर से बुलवाया गया। इससे पलाया युवकों के भीतर आत्मसम्मान की भावना बढ़ने लगी। चूंकि इस बदलाव के मूल में अय्यंकाली की प्रेरणा और श्रम था, इसलिए प्रशंसक उन्हें सम्मान के साथ ‘उरपिल्लई’ या ‘मूथापिल्लई’ कहते थे। 1888 में उनका विवाह चेल्लमा से हो गया। पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम था। दोनों के सात बच्चे हुए। अय्यंकाली खुद को अच्छा गृहस्थ सिद्ध कर चुके थे। लेकिन उनकी मंजिल वहीं तक सीमित नहीं थी। अछूत होने के कारण उनपर कई प्रकार के बंधन थे। उनसे निपटने के लिए 1893 में बैलगाड़ी पर सवार अय्यंकाली ने वह कर दिखाया, जैसा उनसे पहले किसी न सोचा तक न था। 

शिक्षा हेतु संघर्ष

मैकाले की सलाह पर आगे बढ़ते हुए तत्कालीन वायसराय विलियम बैंटिक 7 मार्च 1835 को एक संकल्पपत्र प्रस्तुत किया था। उद्देश्य था समाज के निचले वर्गों तक शिक्षा का विस्तार। हजारों वर्षों से ज्ञान के नाम पसरे शूण्य की भरपाई करना। लेकिन कानून बनना एक बात है, जरूरतमंदों तक उसका लाभ पहुंचना दूसरी बात। अधिकांश स्कूलों का प्रबंधन द्विज जातियों के हाथ में था। कानून बन जाने बावजूद वे उसकी अवहेलना करती आ रही थीं। फुले का विचार था कि बदहाली से मुक्त होने के लिए शूद्र-अतिशूद्रों को स्वयं प्रयास होंगे, समाज को जगाना होगा। नेतृत्व हेतु प्रभावशाली नेता भी अपने ही भीतर से पैदा करने होंगे। यह सब बिना शिक्षा के असंभव है। अतएव 1848 से ही वे  शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूलों की स्थापना में जुट गए थे। आने वाले 3 वर्षों में 18 स्कूलों की स्थापना कर उन्होंने एक तरह से कीर्तिमान रचा था। 

उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अय्यंकाली ने 1904 में वेंगनूर में पहले स्कूल ‘कुदी पल्लिकूदम’ की नींव रखी। लेकिन सवर्णों से यह सहन न हुआ। निर्माण कार्य शुरू होने के पहले ही दिन उन्होंने अय्यंकाली के स्कूल में आग लगा दी। लोगों के सहयोग से, उन्होंने बिना देर किए नए सिरे से निर्माण शुरू कर दिया। परंतु विद्रोही बाज आने वाले न थे। उन्होंने स्कूल को दूसरी बार भी वही किया। कोई और होता तो कदाचित हार मान लेता। मगर बचपन से ही जुझारू रहे अय्यंकाली के नेतृत्व में निर्माण कार्य चलता रहा। आखिरकार स्कूल बना। बच्चे वहां जाने लगे। वह केरल में किसी दलित द्वारा, दलित बच्चों की शिक्षा के स्थापित पहला स्कूल था। 

अछूत जातियों से जुड़े बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती करने नियम 1907 में ही बन चुका था। परंतु उसपर अमल दूर था। सवर्णों के दबाव में त्रावणकोर के दीवान ने उस आदेश को दबा लिया था। अपने संगठन के माध्यम से अय्यंकाली उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत थे। आखिरकार, सवर्णों के रवैये से निराश होकर उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने अछूतों से कहा कि जब तक उनके बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, तब तक वे नैय्यरों के खेतों में काम करना छोड़ दें। यही हुआ। पुलायाओं ने हड़ताल की घोषणा कर दी। शुरू-शुरू में नैय्यरों ने इसे गीदड़ भभकी माना। सोचा कि भूख से बेहाल, गरीब पुलाया, कुरुवा आदि अछूत, बहुत जल्दी खेतों में लौटने को मजबूर हो जाएंगे। लेकिन अछूतों की आंखों में रोपा गया सपना, उनकी भूख से कहीं ज्यादा बड़ा था। सो हड़ताल खिंचती चली गई। सवर्णों ने अछूतों को डराना-धमकाना शुरू कर दिया। अय्यंकाली और उनके साथियों ने उसका भी सामना किया। 

बुबाई का मौसम आया तो कुछ नैय्यरों ने खुद ही अपने खेतों में धान रोपने की कोशिश की। परंतु दूसरों के श्रम पर जीवन जीते-जीते आलसी हो चुके नैय्यरों के लिए वह काम आसान नहीं था। एक पुलाया जितना काम एक दिन में कर लेता था, उतना काम करने में उन्हें पांच-छह दिन लगते थे। हड़ताल खिंचने से गरीब पुलायाओं के आगे भोजन का संकट उत्पन्न होने लगा। उस समय अय्यंकाली ने बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने मछुआरों से समझौता किया कि हर मछुआरा मछली पकड़ने के लिए अपने साथ एक पुलाया को साथ ले जाएगा। यह फार्मूला कामयाब रहा। इससे विरोधी बुरी तरह चिढ़ गए। उधर हड़ताल का दायरा बढ़ाने के लिए अय्यंकाली ने कुछ नई मांगे जोड़ दीं। उनमें मजदूरों को स्थायी करने, झूठे आरोपों में फंसाकर दंडित करने तथा कोड़ों से प्रहार करने पर रोक, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी, सप्ताह में एक दिन अवकाश जैसी नई मांगें शामिल थीं। 

अय्यंकाली के नेतृत्व का ही जादू था कि शताब्दियों से बैल की तरह सर झुकाए श्रम करते आए अछूत पहली बार जमींदारों के आगे तने खड़े थे। हालात बिगड़ते जा रहे थे। अछूतों के आगे भोजन का संकट था। वहीं जमींदारों की हालत अच्छी न थी। क्षुब्ध होकर उन्होंने पुलायाओं की झोंपड़ियों में आग लगा दी। बदले में अय्यंकाली के हरावल दस्ते ने जमींदारों के मकानों को आग के हवाले कर दिया। इससे उनके गुस्से का ठिकाना न रहा। यह सोचते हुए कि सारे मामले के पीछे अय्यंकाली है, नीचता की हद तक जाते हुए उन्होंने उन्हें मरवाने का फैसला कर लिया। उसके लिए मुंबई के एक गुंडे को नियुक्त किया गया। अय्यंकाली को जीवित लाने पर 2000 रुपये तथा मृत लाने पर 1000 रुपये का ईनाम देने की घोषणा कर दी गई।4 

धमकियों और खून-खराबे के बावजूद अय्यंकाली अपने साथियों के साथ डटे हुए थे। नैय्यरों ने अय्यंकाली तथा उनके अंगरक्षक याकूब के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। याकूब को गिरफ्तार कर लिया। अय्यंकाली तत्काल पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां तब तक डटे रहे, जब तक पुलिस ने याकूब को रिहा न कर दिया। हड़ताल करीब एक वर्ष(1907-08) तक चली। इस बीच शिक्षा निदेशक मिशेल ने त्रावणकोर के दीवान को 1907 के नीतिगत आदेश पर तुरंत अमल करने की सलाह दी। चौतरफा दबाव के बीच त्रावणकोर के दीवान की ओर से 1910 में अछूत बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश संबंधी आदेश जारी कर दिए गए। उस समय के कई बुद्धिजीवियों की ओर से उसका विरोध किया गया था। उनमें से एक खुद को प्रगतिशील बताने वाले ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक रामकृष्ण पिल्लई भी थे। अछूतों बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश पर उन्होंने लिखा था कि यह आदेश—

‘पीढ़ियों से ज्ञान-विज्ञान की खेती करते आए लोगों के बच्चों को, उनके खेतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी करते आए लोगों के बच्चों के साथ रखना—घोड़े और भैंस को एक साथ जोत देने जैसा है।’5 

आदेश का जमीनी असर देखने के लिए अय्यंकाली पूजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नैय्यर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया।6 प्रधान अध्यापक हालात को संभालने की कोशिश कर ही रहे थे कि कंडाल गांव के कुछ नैय्यर वहां जा धमके। वे लाठी-डंडों से लैस थे। अय्यंकाली के साथ भी उनके साथी थे। विवाद बढ़ता गया। गांवों से शुरू हुए उस संघर्ष ने शीघ्र ही आसपास के जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। यहां तक कि दक्षिणी त्रावणकोर भी उस आंदोलन के असर से बच न सका। दलितों के प्रवेश को लेकर नैय्यर इतने विध्वंसात्मक थे कि उन्होंने उन दो स्कूलों में आग लगा दी, जिनमें अय्यंकाली ने अपने समाज के बच्चों का दाखिला कराने के उद्देश्य से पहुंचे थे।

साधुजन परिपालन संघम

भूख, अभाव, विपन्नता और दास जैसा जीवन जीने वाले लोगों को अय्यंकाली ने नया नाम दिया था—‘साधु जन’। अपने आंदोलन को सांस्थानिक रूप देने के लिए उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’(गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की थी। उनके कुछ जीवनीकारों के अनुसार इस संस्था का गठन 1907 में हुआ था। संस्था का ‘कनक्कन’(महासचिव) अय्यंकाली को बनाया गया। अन्य सदस्यों में मूलायिल कालि, थॉमस वाडयार, गोपालन आदि शामिल थे। उसकी सदस्यता सभी अछूत जातियों के लिए खुली थी। उसका प्रमुख उद्देश्य था पुलाया सहित सभी अछूत जातियों को अपने अधिकारों पक्ष में संगठित करना। उन्हें अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा, गरीबी और सवर्णों के आतंक से मुक्ति दिलाना। संस्था के प्रचार-प्रसार के लिए स्थानीय सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता था। सवर्ण उस संस्था के गठन से नाराज थे। इसलिए आरंभ में उसकी बैठक, बस्ती से दूर पेड़ों की ओट में या पहाड़ी के पीछे किसी गोपनीय स्थान पर की जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के मन से यह डर निकलने लगा। ‘साधु जन’ का उद्देश्य पुलायाओं, पारयाओं जैसी अछूत जातियों का उत्थान था। बावजूद इसके उन्होंने अपनी संस्था को ‘धर्म एवं जाति’ संबंधी दुराग्रहों से परे रखा था। इससे उन्हें इन जातियों के राजनीतिकरण में मदद मिली। 

संस्था का प्रबंधन बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया जाता था। आमतौर पर हर गांव में उसकी शाखा थी। संस्था का वार्षिक सम्मेलन त्रिरुवनंतपुरम के ‘विक्टोरिया जुबली हाल’ में किया जाता था। उसमें केरल के अलग-अलग गांवों और शहरों से आए लोग हिस्सा लेते थे। सम्मेलन के दिन त्रिरुवनंतपुरम की सड़कें, काली चमड़ी वाले अछूतों से पट जाती थीं। उसमें संस्था के सदस्यों और अधिकारियों के अलावा विभिन्न सरकारी और राजकीय अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जाता था। संस्था के महासचिव के रूप में उसके कार्यक्रमों, उपलब्धियों और मांगों को सभा के सम्मुख पेश करने का दायित्व अय्यंकाली का था। वे अनपढ़ थे। लेकिन संस्था का संचालन इस प्रकार करते थे कि लोग उनकी प्रबंधन क्षमता के कायल हो जाते थे। ‘साधु जन परिपालन संघ’ के कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘साधु जन परिपालिनी’ नामक मासिक पत्रिका की शुरुआत भी की गई। कालि कोदिक्कुरुप्पन को उसका संपादक नियुक्त किया गया। आने वाले 30 वर्षों तक यह संस्था सुचारू रूप से काम करती रही। 

नेदमंगादु विद्रोह

चालियार विद्रोह के बाद कई बाजारों में पुलायाओं को आने-जाने की आजादी प्राप्त हो चुकी थी। बावजूद इसके कुछ बाजारों में अभी भी उनका आना प्रतिबंधित था। जो पुलाया अपना सामान बेचने के लिए आते थे, उन्हें भी मुख्य बाजार में आने से रोका जाता था। सवर्णों ने उन्हें अलग स्थान दिया था। 1912 में अय्यंकाली ने एक बार फिर अपने साथियों को इकट्ठा किया। इस बार उनके अभियान में स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे। जैसे-जैसे पुलायाओं का दल आगे बढ़ा, उनका साथ देने और हौसला बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के लोग भी उनके साथ आ मिले। उन्होंने अपना अभियान त्रिवेंद्रम से आरंभ किया। नेदमंगाडु तक पहुंचने के लिए उन्होंने जंगल का रास्ता चुना था। मगर बाजार तक पहुंचने से पहले ही सवर्णों ने उनपर हमला बोल दिया। दोनों पक्ष पक्के इरादे से आए थे। विवाद एक बार फिर संघर्ष में बदल गया। एक रणनीति के तहत अय्यंकाली ने पुलायाओं के एक हिस्से को दूसरी दिशा से बाजार में प्रवेश के लिए भेज दिया। घने जंगलों के रास्ते, चुनौतियों से जूझता हुआ हुआ वह जत्था आखिरकार नेदमंगाडु बाजार में प्रवेश करने में कामयाब हो गया।

श्री मूलम प्रजा सभा की सदस्यता

अय्यंकाली के सघर्ष और उनकी ख्याति सरकार तक पहुंच चुकी थी। लोग उनसे प्रभावित थे। इसके फलस्वरूप 1912 में उन्हें ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ का सदस्य मनोनीत कर दिया गया। सभा के समक्ष उनका प्रथम संबोधन छोटा, किंतु प्रभावशाली था। अपने भाषण में उन्होंने पुलायाओं की गरीबी, अशिक्षा के अलावा उन्हें आवास एवं खेती हेतु जमीन दिए जाने की मांग की थी। उनका नारा था, ‘खेत उनके लिए जो जोतें’। अपनी पहली सभा में ही सरकारी अधिकारियों की मनमानी की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए उन्होंने कहा था—

‘हमारे कई परिवारों को धनवान जमींदारों ने इस आश्वासन के साथ उनके घर से निकाल दिया था कि उन्हें वे घर बनाने के लिए अलग से जमीन देंगे। अब वन-विभाग के कर्मचारी, जमींदारों से मिलकर मेरे लोगों पर उन घरों को खाली करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसके साथ-साथ ये अधिकारी जमींदारों को उनकी भूमि पर कब्जा करने में मदद कर रहे है। मैं इस समस्या के निराकरण की प्रार्थना करता हूं।’

अय्यंकाली की अपील पर दीवान ने पुलायाओं को यथासंभव मदद का भरोसा दिलाया। दीवान के मन में उनके प्रति कितना सम्मान था, यह इस घटना से भी जाहिर होता है—

‘एक बार अय्यंकाली प्रजा सभा के सदस्य की हैसियत से, दीवान से मिलने उनके कार्यालय में पहुंचे। वहां तैनात दरबानों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। उन्होंने अय्यंकाली के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी किया। उनका नाम लेकर पुकारा। अय्यंकाली वहां से चले गए। बाहर जाकर उन्होंने तार भेजकर दीवान को सारी घटना से अवगत करा दिया। दीवान ने तुरंत अय्यंकाली को अपने कार्यालय बुला भेजा। वे जब दीवान के कार्यालय में पहुंचे तो दोनों दरबान भी वहां मौजूद थे—

‘मिस्टर अय्यंकाली, अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए आप इन्हें क्या दंड देना चाहेंगे?’ दीवान ने पूछा। यह सुनकर वे दंग रह गए। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने कहा—

‘इन्होंने जो किया, लापरवाही के कारण किया। इन्हें माफ कर दिया जाए।’

दीवान अय्यंकाली से प्रभावित हुआ। आखिरकार दोनों दरबानों को अय्यंकाली के पैर छूकर माफी मांगने के बाद छोड़ दिया गया। 

कोचु कली : अय्यंकाली के वक्ष-कर विरोधी आंदोलन की नायिका

उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। दलित स्त्री-पुरुष दोनों को टैक्स देना पड़ता था। पुरुषों का मूंछें रखना, छाता लेकर चलना निषिद्ध था। ये सब नियम ब्राह्मणों द्वारा अपनी जातीय श्रेष्ठता के नाम पर बनाए गए थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। इसलिए उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

जब स्त्री का वक्ष ही उसका दुश्मन था

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। 1803 में वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा के अनुसार निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष इसलिए ढककर पहुंची थी, ताकि  रानी नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। 1859 के सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त हो चुका था। लेकिन इझ़वा, पुलाया, कुरुवा आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को यह अधिकार 1915 तक भी प्राप्त नहीं था। 

सोने-चांदी के गहने पहनने पर प्रतिबंध  

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लामाला’(कंठमाला) पहन सकती थीं। कान में लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लामाला’ उनके दासत्व का प्रतीक थी। वक्ष कर के विरोध में कई आंदोलन चल चुके थे, परंतु उसके ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया था अय्यंकाली ने।

कौन थी कोचु कली

उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उनमें से एक का नाम था—कोचु कली। कोचु कली आदि द्रविड़ समाज से थी। तांबई रंग और लंबे कद के कारण उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। उसका जन्म उनीसवीं शताब्दी  के अंतिम दशक में, इरनाकुलम जिले के एलुवा नामक गांव में हुआ था। पिता का नाम था, पींगन। मां पल्ली कुरुंबा कीझनाद गांव की रहने वाली थी। सात भाई-बहनों में कोचु तीसरे नंबर की थी। 21 वर्ष की उम्र में उसका विवाह, परंबू हाउस बंगले में काम करने वाले पल्ली के साथ कर दिया गया। विवाह के तीन वर्ष पश्चात दोनों के घर एक पुत्री का जन्म हुआ।

उस समय तक केरल में वक्ष-कर विरोधी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। जगह-जगह उसके समर्थक और विरोधी आमने-सामने थे। उन्हीं दिनों अपनी संस्था ‘साधुजन परिपालन संघ’ के एक कार्यक्रम के दौरान अय्यंकाली पारंबू हाउस में ठहरे थे। वे एक सभा के सिलसिले में वहां पधारे थे। वक्ष-कर विरोध को लेकर चल रहे प्रदेश-व्यापी संघर्ष के बीच वह सभा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी। सभा में शिरकत के लिए अय्यंकाली ने कुछ उदार नैय्यर नेताओं को भी आमंत्रित किया था। 

दासता के प्रतीकों का बहिष्कार

सभा में सभी नेताओं ने वक्ष कर का विरोध किया। अय्यंकाली का नंबर आया तो उन्होंने भी उसकी तीव्र आलोचना की। भाषण के दौरान उन्होंने दो स्त्रियों को मंच पर आमंत्रित किया। उनमें से एक  कोचु कली थी। उस समय वह 24 वर्ष की थी। दोनों स्त्रियां सकुचाती हुई मंच पर पहुंचीं। अय्यंकाली ने उन्हें बताया कि यहां बैठक में मौजूद सभी लोग गुलामी की प्रतीक ‘कल्लामालाओं’ को उतार फैंकने की सहमति दे चुके हैं। उसके बाद उन्होंने चाकू से, उन स्त्रियों के गले में पड़ी ‘कल्लामालाओं’ को काट फैंका। इसके साथ ही उन्होंने उनके तोड़ा(कान में पहने जाने वाला पत्थर का पारंपरिक आभूषण) को तोड़ दिया—

‘आगे से तुम इन्हें कभी मत पहनना। बजाय इसके तुम ‘धोती और ब्लाउज’ पहना करना।’ अय्यंकाली ने कहा। उन्होंने उन स्त्रियों को कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसे भी दिए। उसके बाद कोचु कली वक्ष-कर विरोधी आंदोलन के स्त्री दस्ते की नेता बन गई। 1915 में उसके नेतृत्व में वक्ष-कर विरोधी कई प्रदर्शन हुए। उनमे सबसे महत्वपूर्ण कोल्लम जिले के पेरिनाड में दलित-आदिवासी स्त्रियों का आंदोलन था। उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में स्त्रियों ने गले में पहनी कल्लामालाओं को खुद उतार फेंका था।

सवर्णों की हिंसा

वक्ष कर विरोधी आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी ने सवर्णों को हिलाकर रख दिया था। वे मनमानी पर उतर आये थे। मलयालम पत्रिका ‘मीतावदी’ के जनवरी 1916 के अंक के अनुसार एक पुलाया स्त्री ने अय्यंकाली से मुलाकात के बाद ‘कल्लामाला’ पहनना छोड़ दिया था। एक दिन वह अपने काम पर जा रही थी। अचानक एक आदमी उसके पास पहुंचा और ‘कल्लामाला’ के बारे में पूछा। स्त्री के यह कहने पर कि वह उसे उतार कर फ़ेंक चुकी है, उस आदमी को इतना गुस्सा आया कि उसने तत्काल उस स्त्री के कान काट लिए।

अय्यंकाली की यादों के साथ काटी जिंदगी   

आधुनिक केरल के प्रमुख वास्तुकार अय्यंकाली से जुड़ी जादुई यादों का ही असर था, जिससे कोचु कली ने लंबी उम्र प्राप्त की थी। उनका निधन, 115 वर्ष की अवस्था में 2013 में हुआ था। अय्यंकाली को याद करते समय कोचु कली का चेहरा दमकने लगता था। गर्दन अभिमान से कुछ और तन जाती थी। एक साक्षात्कार में उसने बताया था कि अय्यंकाली के शब्द आज भी उनके कानों में घंटी की तरह गूंजते हैं। उसके अनुसार अय्यंकाली तीन दिन और तीन रात ‘परंबू हाउस’ में ठहरे थे। भोजन में उन्हें चावल और सूखी झींगा मछली की कढ़ी परोसी गई थी। कोचु कली उस दिन को याद करके गर्व से भर जाती थी, जब उसने ‘धोती और ब्लाउज’ को पहली बार पहना था—

‘धोती और ब्लाउज पहनते समय मैं बहुत डरी हुई थी। सोचती थी कि सवर्ण डंडों से हमारी पिटाई करेंगे। लेकिन जब अय्यंकाली ने हमसे बात की, हमारा सारा डर गायब हो गया।’

28 अगस्त 2020 को अय्यंकाली का 157वां जन्मदिवस है। यह अवसर अय्यंकाली के साथ-साथ कोचु कली के संघर्ष को याद करने का भी है।

वक्ष-कर का विरोध

अय्यंकालि द्वारा चलाए गए महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था—वक्ष-कर के विरोध में चलाया गया आंदोलन। वह ऐसा अभियान था, जो उन्हें अपने समकालीन और पूर्ववर्ती कई समाज-सुधारकों से आगे खड़ा सिद्ध कर देता है। उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। उसमें सर्वाधिक प्रताड़ना स्त्रियों को झेलनी पड़ती थी। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। यदि कोई स्त्री अपना वक्ष ढकना चाहे तो बदले में उसे सरकार को कर देना पड़ता था। कर की मात्रा वक्ष के आकार के अनुरूप तय की जाती थी। जितना बड़ा वक्ष, उतना ज्यादा टैक्स। उसकी उगाही के लिए एक अधिकारी नियुक्त था। वक्ष-कर लगाने वाले ब्राह्मण थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। तदनुसार नैय्यर स्त्रियों को नंबूदरी ब्राह्मणों के समक्ष अपना वक्ष ढकने की स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि ब्राह्मण अपना वक्ष केवल मंदिर में देवताओं के समक्ष खुला रखता था। यहां तक उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा केरलीय समाज में लंबे समय से प्रचलित थी। उसमें निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष केवल इसलिए ढककर पहुंचती है कि वह नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। ताकि इस ‘आफत’ से  उसे हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए। 1859 में शुरू हुए सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को अपना वक्ष ढकने की आजादी प्राप्त हो गई। लेकिन इझ़वा, पुलाया आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को 1915 तक वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। 

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लु माला’(कंठ माला) पहन सकती थीं। कान में केवल लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लुमाला’ उनके दास होने की निशानी भी थी। 1915 में एक सभा के दौरान अय्यंकाली ने अछूत स्त्रियों से कहा था कि वे दासता के प्रतीक उन आभूषणों को हमेशा के लिए उतार फेंके। उनके स्थान पर धोती और ब्लाउज जैसे वस्त्र पहनें। उनके आवाह्न पर पेरीनाड की हजारों दलित स्त्रियों ने पत्थर की कंठमालाओं को उतारकर ऊपरी वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। यह देखकर शीर्ष जातियों में खलबली मच गई। उन्होंने इसे स्थापित समाज-व्यवस्था का उल्लंघन माना। ‘अपमान’ का बदला लेने के लिए वे दलितों पर हमलावर होने लगे। वक्ष ढकने के कारण कई दलित स्त्रियों के स्तन काट डाले गए। कइयों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। परिजनों पर जानलेवा हमले किए गए। अनेक स्त्रियों के पति, भाई और माता-पिता को मौत के हवाले कर दिया गया। उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उन जुझारू स्त्रियों में से एक का नाम था—कोचु कली। वह पहली स्त्री थी जिसके गले में पड़ी ‘कल्लुमाला’ को अय्यंकाली ने अपने हाथों से काटा था।

अय्यंकाली के सभी चित्रों में हम उन्हें कोट पहने हुए देखते हैं। वह भेषभूषा भी उन्होंने, ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड को चुनौती देने के लिए अपनाई थी। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी। एक पुलाया अपने शरीर पर केवल पुराना, लंगोटीनुमा वस्त्र लिपेट सकता था। अय्यंकाली उससे विद्रोह करना चाहते थे। लेकिन सोचते थे कि कोट पहनने का अधिकार केवल पढ़े-लिखे लोगों को है, जबकि वे पूरी तरह अनपढ़ थे। कुन्नुकुझी एस. मणि के अनुसार, श्री मूलम प्रजा सभा का सदस्य मनोनीत किए जाने पर, जॉन हेनरी नामक एक यूरोपियन ने उन्हें एक कोट भेंट किया था। प्रजा सभा के अगले सत्र में वे उसी कोट को पहनकर उपस्थित हुए थे। अगले सत्र के लिए वे कुछ और कोट सिलवाना चाहते थे। मगर उन दिनों त्रिरुवनतपुरम् में ऐसा कोई दर्जी नहीं था, जो कोट की सिलाई कर सके। इसलिए उन्होंने कोट्टयम के एक दर्जी को दो कोट सीने का आर्डर दिया। श्रीमूलम पोपुलर असेंबली के अगले सत्र में उन्होंने अपने सिलवाए कोट पहनकर हिस्सा लिया था। नैय्यर उसे देखकर जल-भुन रहे थे। लेकिन अब कुछ भी कर पाना उनके बस से बाहर था। 

केरल के इतिहास में अस्पृश्यता, अशिक्षा और दासता को सबसे जोरदार चोट देने वाला वह पुरोधा, 18 जून, 1941 को सघर्ष चिरनिद्रा में लीन हो गया। एक अवसर पर एक पत्रकार ने उनसे पूछा था—‘आपकी दिली तमन्ना क्या है?’ इस पर अय्यंकाली का उत्तर था—‘आंख मूंदने से पहल मैं अपने समाज के दस-बारह विद्यार्थियों को ग्रेजुएट बने देखना चाहता हूं…बस।’ एक कविता के जरिये  मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय उन्हें इस तरह याद करते हैं—

तुम्हीं ने जलाया था प्रथम ज्ञानदीप

बैलगाड़ी पर सवार हो

गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

अपनी देह की यंत्रशक्ति से

पलट दिया था, कालचक्र को

ओमप्रकाश कश्यप

1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, पृष्ठ 15.

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अयंकाली कंटीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ ट्रावणकोर दलितस, 2018

3. जेटिंल टी. वर्गिस, दि कंन्सट्रक्शन ऑफ़ साधुजनम्: अय्यंकालि एंड दि स्ट्रगल ऑफ़ दि स्लेव कॉस्ट्स फॉर ए न्यू आइडेंटिटी-1884-1941, (2016), पेज 72

4. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

5. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

6.  कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकलि, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, जेटिंल टी. वर्गिस, पृष्ठ 81

7. कोचु कली, दि हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन स्लेव वूमेन, http://dravidagallery.blogspot.com/2013/06/?m=0

8. एम. वेलकुमार, पृष्ठ-197-198

महात्मा ज्योतिबा फुले और ‘सत्यशोधक समाज’

सामान्य

अच्छे विचार जब तक उनपर अमल न किया जाए, महज अच्छे सपनों की तरह होते हैं….केवल कर्म ही हैं, जो किसी विचार को मूल्यवान बनाते हैं.—इमर्सन

वर्ष 1873, सिंतबर महीने का 24वां दिन. महाराष्ट्र का मुंबई के बाद दूसरे सबसे बड़े महानगर पुणे का जूनागंज मुहल्ला, मकान नंबर 527. सभागार में पुणे सहित महाराष्ट्र के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से पहुंचे करीब 60 लोग जमा थे. उन्हें ज्योतिबा ने आमंत्रित किया था. बाकी का आना जारी था. ज्योतिबा स्वयं अतिथियों की अगवानी करने में लगे थे. उस समय तक उनकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच चुकी थी. पूरा महाराष्ट्र, खासकर पुणे ज्योतिबा को लेकर दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक ओर वे लोग थे जो उनके विकास-पुरुष कहकर उनका सम्मान करते थे. महाराष्ट्र में शिक्षा-क्रांति के जन्मदाता के रूप में उनका सम्मान करते थे. दूसरी ओर थे कट्टरपंथी ब्राह्मण, जिन्हें बदलाव के नाम से ही चिढ़ थी. साथ में वे लोग भी थे, जो अपना दिलो-दिमाग ब्राह्मणवाद के आगे गिरवी रख चुके थे. समाज में व्याप्त अशिक्षा, आडंबरवाद और जातीय विषमता के विरोध में संघर्ष करते हुए फुले को 25 वर्ष से अधिक हो चुके थे. इस बीच उनके संघर्ष का दायरा बढ़ा था. अब उन्हें लगता है कि आगे के सफर के लिए कुछ सहयोगियों को साथ रखना जरूरी होगा. काम समाज का है तो जितने ज्यादा से ज्यादा लोग साथ निभाएं उतना ही अच्छा.

इसी पर विचार करने के लिए महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था. सभा में ज्योतिबा ने जोरदार भाषण दिया. कहा कि समाज को जातिवाद, पुरोहितवाद, अंधविश्वास और अशिक्षा के दुष्चक्र से बाहर लाने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा. यह काम अभी तक सब अपने-अपने स्तर पर करते आ रहे हैं. इस बीच उनके विरोधी संगठित हुए हैं. इसलिए आंदोलन को मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए उन्हें मजबूत संगठन की आवश्यकता है. उपस्थित लोगों ने हर्षध्वनि के साथ प्रस्ताव पर मुहर लगा दी. संगठन को नाम दिया गया—‘सत्यशोधक समाज’. ज्योतिबा ने नवगठित संगठन के अध्यक्ष और खजांची का पद-भार संभाला. सचिव का दायित्व सौंपा गया—नारायणराव गोपालराव कडलक को. ज्योतिबा के तीन ब्राह्मण मित्रों विनायक बापूजी भंडारकर, विनायक बापूजी डांगले और सीताराम सखाराम दतार की भी संगठन के निर्माण में प्रमुख भूमिका थी. समाज के तीन प्रारंभिक उद्देश्य थे. पहला—ईश्वर एक है, सब उसकी संतान हैं. दूसरा—जैसे माता-पिता से संवाद के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं पड़ती, वैसे ही ईश्वर की अराधना के लिए भी किसी मध्यस्थ यानी पुरोहित की जरूरत नहीं है. तीसरा—किसी भी जाति, धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति जो समाज के उद्देश्य और लक्ष्य के प्रति एक-भाव रखता हो, उसका सदस्य बन सकता है.

उस समय देश-भर में राजा राममोहनराय का ‘ब्रह्म समाज’, केशवचंद सेन का ‘प्रार्थना समाज’, महादेव गोविंद रानाडे का ‘पुणे सार्वजनिक सभा’—जैसे अनगिनत संगठन समाज-सुधार के क्षेत्र में कार्यरत थे. ऐसे में नए संगठन की क्या आवश्यकता थी? दरअसल उस समय तक जितने भी संगठन समाज सुधार के क्षेत्र में काम कर रहे थे, सभी द्विजों द्वारा, द्विजों की हित-सिद्धि हेतु बनाए गए थे. उनके लिए बस इतना समाज-सुधार अभीष्ट था कि चमार के घर में जन्म लेने वाला चमार रहे, जूते गांठे, मरे पशुओं की खाल निकाले, जरूरत पड़ने पर जमींदार की बेगार बजाए, उसी से संतुष्ट रहें. बस इतना हो कि काम के आधार पर उन्हें कोई ओछा न माने. किसी तरह का दुव्र्यवहार उसके साथ न हो. शिक्षा के मामले में राजा राममोहनराय सहित उस समय के द्विज समाज सुधारकों का सोच था कि पहले ऊंची जातियां पढ़-लिख जाएं. वे पढ़-लिख जाएंगी तो नीचे तक शिक्षा अपने आप चली जाएगी. यह अर्थशास्त्र के प्रचलित सिद्धांत—‘ट्रिकिल डाउन थियरी’ जैसा था, जिसे हिंदी में ‘रिसाव का सिद्धांत’ कह दिया जाता है. उसके अनुसार ऊपर के स्तर पर समृद्धि होगी तो बूंद-बूंद रिसकर नीचे भी आएगी. इस सिद्धांत की आलोचना उसकी शुरुआत से ही होने लगी थी. बावजूद इसके अधिकांश समाज-सुधारक ‘रिसाव के सिद्धांत’ पर भरोसा कर, काम करते रहे. उनसे पूछा जा सकता था कि शताब्दियों तक कथित विश्व-गुरु रहने के बावजूद भारत में निचली जातियां अज्ञान के अंधकार में क्यों दबी थीं? ऊपर के वर्गों की शिक्षा, उनकी ज्ञान-संपदा और चालाकियां निचले वर्गों तक क्यों अंतरित नहीं हुईं? यह भी पूछा जा सकता था के ‘महासागर’ के लोकहित में पुनः-पुनः उमगने, सभी को साथ लेकर चलने से किसने रोका था? जो लोग 2000-2500 वर्षों में तक ऊपर के वर्गों की समृद्धि और ज्ञान संपदा नीचे रिसने से रोके रहे, क्या वे उनके कहने भर से एकाएक मान जाएंगे? ज्योतिबा का स्पष्ट मत था कि वे नहीं मानने वाले. ब्राह्मण तो हरगिज नहीं, क्योंकि वर्तमान वर्ण-व्यवस्था उनके आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति करती है. शताब्दियों से बिना कुछ किए-धरे मिल रहे मान-सम्मान, जिसे वे दैवीय कहते हैं, को छोड़ना उनके लिए संभव नहीं. इसलिए बहुजन शूद्र-अतिशूद्रों को अपने विकास के लिए प्रयास स्वयं ही करने होंगे. इसके लिए एक सशक्त संगठन की जरूरत थी. ऐसे सक्रिय, जुझारू और ईमानदार लोगों की जरूरत थी जो संगठन के आदर्शों की प्रति समर्पित होकर लगातार काम कर सकें. उससे पहले जितने भी संगठन थे, सभी समाज के शीर्ष वर्ग के सदस्यों ने गठित किए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ ऐसा संगठन था जिसकी स्थापना समाज के बहुजन शूद्रों अतिशूद्रों ने अपने अधिकारों की बहाली के लिए स्वयं की थी. ‘सत्यशोधक समाज’ के पहले वर्ष की रिपोर्ट में कहा गया था कि उसकी स्थापना—

‘ब्राह्मण, पंडित, जोशी, उपाध्याय-पुरोहित आदि लोगों, जो अपने स्वार्थी (धर्म)ग्रंथों द्वारा हजारों वर्षों से शूद्रों को नीच समझकर लूटते आ रहे हैं—से मुक्त करने के लिए की गई है. इसलिए उपदेश और ज्ञान के द्वारा लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने; अर्थात धर्म एवं व्यवहार से संबंधित ब्राह्मणों के छदम्, स्वार्थी ग्रंथों से जनसाधारण को मुक्ति दिलाने हेतु कुछ जागरूक शूद्रों ने इस समाज की स्थापना की है.’

‘सत्यशोधक समाज’ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक संगठन था. राजनीतिक सवालों पर बोलना उसमें सख्त मना था.  यह फुले का जनता पर प्रभाव और अनूठी कार्यशैली थी कि ‘सत्यशोधक समाज’’ को पांव जमाते देर न लगी. स्थापना के कुछ ही महीनों में मुंबई और पुणे के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी शाखाएं स्थापित होने लगीं. उसका प्रभाव लगभग सभी शूद्र ओर अतिशूद्र जातियों पर था, फिर भी माली और कुन्बी जातियों का उत्साह सबसे बढ़-चढ़कर था. वे ‘सत्यशोधक समाज’ के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं. 1874 में समाज की मुंबई शाखा का उद्घाटन किया गया. उसके पीछे मुख्य योगदान तेलूगु के कमाठी और माली जाति के सदस्यों का था. 1884 में समाज का विस्तार जुन्नार परिक्षेत्र और पश्चिमी पुणे, अहमदनगर के इंदापुर तहसील और थाणे तक फैल गया. अगले दो वर्षों में वह लगभग सभी मराठी भाषी क्षेत्रों तक फैल चुका था. एक वर्ष पूरा होते-होते उसके 232 औपचारिक सदस्य बन चुके थे. लोगों ने शादी-विवाह, नामकरण जैसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहितों को बुलाना छोड़ दिया था. ‘सत्यशोधक समाज’ के सिद्धांतों पर ज्योतिबा फुले के विचारों की स्पष्ट छाया थी. उनका मानना था कि विवाह के समय पंडित-पुरोहित अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर शूद्रों को बरगलाते हैं. उनका पूरा ध्यान यजमान से अधिक से अधिक दक्षिणा वसूलने पर रहता है. शूद्रों-अतिशूद्रों का हित इसी में है कि ऐसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहित को दूर रखा जाए. इस लक्ष्य में ‘सत्यशोधक समाज’ को सफलता भी मिली थी. सतारा निवासी गोविंदराव बापूजी भिलारे ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना के पहले वर्ष में छह विवाह, तथा दूसरे वर्ष में पांच विवाह बगैर ब्राह्मण पुरोहित की उपस्थिति के कराए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुरूप पहला विवाह, 25 दिसंबर, 1873 को पेठ जूनागंज, पूना के रहने वाले सीताराम जवाजी आल्हाट और राधाबाई ग्यानोबा निंबणकर के बीच संपन्न हुआ था. उसमें अन्य लोगों के अलावा सावित्रीबाई फुले और श्रीमती बजूबाई ग्यानोबा निंबणकर ने भी वर-वधु की आर्थिक मदद की थी. दूसरा विवाह ग्यानोबा कृष्णाजी ससाने, मुकाम हड़पसर, पूना का काशीबाई, पुत्री श्री नारायणराव विठोजी शिंदे, निवासी पर्वती, पूना के बीच संपन्न हुआ था. इस बार भी समाज के सदस्यों ने नव-दंपति को उपहार आदि देकर सम्मानित किया था.

‘सत्यशोधक समाज’ द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता को खत्म करने से स्वयं ब्राह्मण समाज उनसे बुरी तरह नाराज था. वे अपनी पुनर्वापसी के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे थे. ग्यानोबा ससाने और काशीबाई का विवाह पहले हड़पसर में होना था. लेकिन एक दुष्ट दलाल ने ऊल-जुलूल बातों द्वारा लड़के के रिश्तेदारों और दोस्तों के दिमाग में भ्रम पैदा कर दिया था. उससे बचने के लिए ज्योतिबा ने विवाह को पूना में कराने का सुझाव दिया. वहां भी लोगों को भड़काने वाले कम न थे. पंडितों के बहकावे में आकर मारुति सटवाजी फुले तथा तुकाराम खंडोजी फुले ने दोनों पक्षों को भड़काने के लिए अफवाह फैलाई कि, ‘हमारे दुर्बल बच्चों के विवाह इन लोगों के जानते-बूझते हुए हैं. उनमें से एक दुलहन उम्र में दो वर्ष की थी, जो ब्याह के कुछ ही दिनों में मर गई. इस लापरवाही के लिए तुकाराम सोनाजी भुजबल को करीब 400 रुपये का नुकसान सहना पड़ा.’ आखिकर ‘सत्यशोधक समाज’ के कार्यकर्ता बाबाजी राणोजी फुले के हस्तक्षेप से वह विवाह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार संपन्न हो सका. इसके बावजूद ब्राह्मणों ने हार नहीं मानी थी. उन्होंने शूद्र-अतिशूद्रों को यह कहकर भड़काना शुरू कर दिया था कि बिना पुरोहित के उनकी प्रार्थनाएं ईश्वर तक नहीं पहुंच पाएंगीं. घबराए हुए लोग फुले के पास गए. फुले ने उन्हें समझाया कि जब तमिल, बंगाली, मलयाली, कन्नड, फारसी आदि गैर-संस्कृत भाषी लोगों की प्रार्थनाएं ईश्वर तक पहुंच सकती हैं, तब उनकी प्रार्थना कैसे अनसुनी रह सकती है. हम अपने माता-पिता, अभिभावक से सीधे संवाद करते हैं. इसलिए ईश्वर को अपना पिता मानने वालों को भी उससे डरने, घबराने तथा पूजा-अर्चना के लिए पुरोहित को बीच में लाने की आवश्यकता कतई नहीं है. फिर भी यदि कोई पूजा-पाठ जैसे कार्यों में पुरोहित की भूमिका को आवश्यक समझता है, तो वह अपनी ही जाति के अनुभवी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपकर अपने मन को समझा सकता है.

धीरे-धीरे ही सही, लोग ज्योतिबा की बातों को समझने लगे थे. तीसरे वर्ष के दौरान उसकी सदस्य संख्या बढ़कर 316 तक पहुँच चुकी थी. दूसरी ओर उनके विरोधी भी शांत न थे. एक परिवार में शादी होने वाली थी. पुरोहितों ने उस घर में पहुंचकर डराया कि बिना ब्राह्मण एवं संस्कृत मंत्रों के हुआ विवाह ईश्वर की दृष्टि में अशुभ माना जाएगा. उसके अत्यंत बुरे परिणाम होंगे. गृहणी सावित्रीबाई फुले को जानती थी. फुले को पता चला उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ के बैनर तले विवाह संपन्न कराने का ऐलान कर दिया. सैकड़ों सदस्यों की उपस्थिति में वह विवाह खुशी-खुशी संपन्न हुआ. प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई उपहार लेकर पहुंचा था. उस घटना के बाद ब्राह्मण सतर्क हो गए. एक अन्य घटना में ब्राह्मणों ने दूल्हे के पिता को धमकी दी. लोगों को यह कहकर भड़काया कि फुले उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं. लेकिन ज्योतिबा के लिए ऐसी चुनौतियां नई नहीं थीं. न ही वे धमकियों से डरने वाले थे. अप्रिय घटना से बचने के लिए उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी. पुलिस आई और उसकी निगरानी में वह विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ.

‘सत्यशोधक समाज’ के दूसरे वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार तब तक उसके में एक और घटना का उल्लेख किया गया है. विट्ठल नामदेव गुठाड़ पुणे के व्यापारी थे. गुठाड़ ने समाज की पद्धति के अनुसार ब्राह्मण को बुलाए बिना ही गृहप्रवेश कर लिया. इससे ब्राह्मणों ने उनके व्यापारिक हिस्सेदार को इतना भड़काया कि उसने हिस्सेदारी तोड़ दी. विरोधी इतने से ही शांत नहीं हुए. उन्होंने गुठाड़ के कामकाज में इतनी परेशानियां पैदा कीं कि उनका व्यापार घाटे में आ गया. हालात यहां तक पहुंच गए कि बच्चे के स्कूल की फीस जमा करने में मुश्किल होने लगी. मामला जब ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्यों के संज्ञान में पहुंचा तो उन्हें गुठाड़ के प्रति चिंता होने लगी. आखिरकार उनकी मदद के लिए गंगाराम भाऊ म्हस्के ने बच्चे के स्कूल की फीस के लिए तीन रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का ऐलान कर दिया. पांच माह तक गुठाड़ ने वह छात्रवृत्ति ली. बाद में जब उनका व्यापार पटरी पर लौट आया तो उन्होंने म्हस्के का आभार व्यक्त करते हुए और अधिक मदद लेने से इन्कार कर दिया.

केवल शिक्षा ही नहीं, सामाजिक मदद के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्य हमेशा आगे रहते थे. सितंबर 1875 में अतिवृष्टि के कारण अहमदाबाद में जल-प्रलय जैसे हालात पैदा हो चुके थे. परिणामस्वरूप हजारों लोगों के आगे जीवन का संकट पैदा हो गया. भीषण बारिश के कारण उनके कपड़े, अनाज, घर आदि सब-कुछ नष्ट हो चुका था. ऐसे आपदाग्रस्त लोगों की मदद के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.  विश्राम रामजी घोले ने सदस्यों से मदद के लिए आगे आने का आवाह्न किया. उसके बाद कुल 195 रुपये की रकम चंदे के रूप में जमा की गई. वह धनराशि अहमदाबाद के कलेक्टर को बाढ़-पीड़ितों की मदद के लिए भेज दी गई. उसकी देखा-देखी ‘सत्यशोधक समाज’ की मुंबई शाखा भी सक्रिय हुई. वहां भी 130 रुपये चंदा के रूप में उगाहकर अहमदाबाद के कलेक्टर के पास भेज दिए गए.

इस बीच कुछ लोगों ने यह कहना आरंभ कर दिया कि बगैर ब्राह्मण पुरोहित की मौजूदगी के होने वाले विवाह  हिंदू रीति-नीति या कानून, किसी भी आधार पर मान्य नहीं हैं. इस कारण लोगों के मन में शंका उत्पन्न होने लगी थी. उसके समाधान के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के अध्यक्ष की ओर से एक पत्र उच्च न्यायालय के एक अधिकारी राघवेंद्रराव रामचंद्रराव को पत्र लिखकर उन विवाहों की वैधता के बारे में राय देने का अनुरोध किया. जवाब में राघवेंद्रराव ने कानूनी प्रमाणों के आधार पर बताया कि ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुसार हो रहे सभी विवाह कानून सम्मत हैं. ज्योतिबा समझते थे कि सामाजिक रूढ़ियों से जूझने के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता अपरिहार्य है. शूद्रों में रचनात्मक प्रतिभा का विकास हो, वे लिखने-पढ़ने के लिए आगे आएं, इसके लिए ‘सत्यशोधक समाज’ ने ऐलान किया कि खेती की उन्नति के उपायों के बारे में शूद्रों में से जो-जो व्यक्ति मौलिक पुस्तक की रचना करेंगे, उनमें से प्रत्येक को डॉ. विश्राम रामजी घोले और रामशेट बापूशेट उरवणे की ओर से 25-25 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा.

अधिकांश शूद्र-अतिशूद्र खेती या दूसरे मेहनत-मजदूरी वाले कामों में जुटे थे. कई बार बच्चों को परिवार के काम में हाथ बंटाना पड़ता था. इस कारण वह दिन में स्कूल जाने के लिए समय नहीं निकाल पाता था. ऐसे युवकों की पढ़ाई अवरुद्ध न हो इसके लिए भांबुर्डे नामक गांव में रात्रि-पाठशाला की शुरुआत की गई थी. समाज को रात्रि-पाठशाला के कामकाज के बारे में शिकायत मिली तो उसने तत्काल, 3 महीने की अवधि के लिए कृष्णराव नामक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया. उसका काम था, पाठशाला का नियमित निरीक्षण कर, उसकी रिपोर्ट समाज को देना. शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के चलते शूद्र और अतिशूद्र परिवारों के बच्चे स्कूल से कन्नी काट जाते थे. इसे देखते हुए समाज ने पांच रुपये प्रतिमाह की वृत्तिका पर एक पट्टेवाले को नौकरी पर रखा. उसका काम था, बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाना तथा उन्हें सही समय पर स्कूल पहुंचाना. उच्च शिक्षा के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ की ओर से व्यवस्था की गई थी. विश्राम रामजी घोले ने समाज की ओर से इंजीनियरिंग कालेज के समक्ष एक प्रतिवेदन पेश किया गया था. प्रतिवेदन में शूद्र विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देने की प्रार्थना की गई थी. उसका सकारात्मक असर हुआ. 1876 में इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य मिस्टर कूक ने 2-3 गरीब विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा के लिए भर्ती किया था. बच्चों में भाषण कला के विकास के लिए भी 2 मई 1876 को व्याख्यान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. व्याख्यान के लिए दो विषय निर्धारित किए गए. पहला था—‘हिंदुस्तान की जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’. और दूसर था ‘मूर्तिपूजा से लाभ और हानि’. ‘जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’ विषय पर व्याख्यान के लिए द्वारकानाथ त्रिंबक सोनार को पहला और गणपत तुकाराम कुंहाड़े को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ. प्रथम विजेता को समाज की ओर से 10 रुपये तथा द्वितीय विजेता को डॉ. विश्राम रामजी घोले घोले की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि दी गई थी. दूसरे विषय पर दामोदर बापूजी शिंपी को समाज के फंड से दस रुपये तथा आनंदराव रणछोड़ को रामशेट बापूशेट तुरवणे की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई थी. एक और वक्ता गोपाल विश्राम घोले को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में ज्योतिराव की ओर से 3 रुपये प्रदान किए गए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ गरीब बच्चों को पढ़ाई की ओर उन्मुख करने के छात्रवृत्ति आदि के रूप में तरह-तरह से मदद करता था.

‘सत्यशोधक समाज’ की गतिविधियों से प्रसन्न होकर लोग तरह-तरह से उसकी मदद के लिए आगे आ रहे थे. हरीरामजी चिपलूनकर ब्राह्मण थे. वे समाज के सदस्य भी नहीं थे. बावजूद इसके उन्होंने शूद्र विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति के लिए प्रतिवर्ष 60 रुपये देने की घोषणा की थी. रामचंद्र मनसाराम ढवारे नाईक पुणे के बड़े ठेकेदार माने जाते थे. उनकी बेतालपेठ में दुमंजिली इमारत थी. उस इमारत को एक मारवाड़ी सेठ 16 रुपये प्रतिमाह पर किराये पर लेने को सहमत था. ‘सत्यशोधक समाज’ को अपने कामकाज के लिए ऐसे ही स्थान की आवश्यकता थी. अध्यक्ष विश्राम रामजी घोले ने तत्काल रामचंद्र नाईक को पत्र लिखकर उस इमारत को सत्यशोधक के कामकाज के लिए देने का अनुरोध किया. रामचंद नाईक ने मात्र 10 रुपये प्रतिमाह के किराये पर वह इमारत समाज को सौंप दी. यही नहीं, उन्होंने समाज के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए 20 रुपये का चंदा भी अपनी ओर से दिया. बाहर से आए शूद्र विद्यार्थियों के भोजन, आवास और अध्ययन की व्यवस्था के लिए समाज ने छात्रावास के निर्माण का फैसला किया था.

शूद्रों और अतिशूद्रों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार ज्योतिबा के जीवन का प्रमुख उद्देश्य था. इसके लिए उन्होंने स्वयं कई पाठशालाओं की स्थापना की थी. इसी को आगे बढ़ाते हुए ‘सत्यशोधक समाज’ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए काम कर रहा था. समाज की ओर से पूना से पांच किलोमीटर दूर हड़पसर में एक विद्यालय की स्थापना की गई थी. सरकारी विद्यालयों में गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए उसने संबंधित अधिकारियों को कई पत्र लिखे थे. उसके फलस्वरूप ‘सार्वजनिक निर्देश’ विभाग के निदेशक के.एम. चेटफील्ड ने एक आदेश के द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए एक आदेश जारी किया गया, जिसके अनुसार उनमें पांच प्रतिशत स्थान गरीब शूद्र बच्चों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे.

जुलाई 1875 में महर्षि दयानंद, महादेव गोविंद रानाडे के आमंत्रण पर पूना गए थे. उस समय तक ‘आर्यसमाज’ की स्थापना को 15 महीने बीत चुके थे. दयानंद उसके प्रचार के लिए देश-भर की यात्रा कर रहे थे. दो महीने के पूना प्रवास के दौरान दयानंद वहां ‘आर्यसमाज’ के प्रचार के लिए कई सभाएं कर चुके थे. उनके कई विचार ‘प्रार्थना समाज’ और रानाडे के ‘पूना सार्वजनिक सभा’ के सिद्धांतों से मेल खाते थे. इसलिए रानाडे सहित कुछ और सुधारवादियों ने दयानंद के सम्मान में जुलूस निकालने का निर्णय लिया. पुरातनपंथियों के लिए वह सीधी चुनौती थी. वे उसके विरोध पर आमादा हो गए. जुलूस के लिए 5 सिंतबर 1875 का दिन तय किया गया था. रानाडे उसकी तैयारी में जुटे थे. जुलूस के लिए पुलिस को भी सूचना दी जा चुकी थी. इस बीच सूचना मिली कि जुलूस में विघ्न डालने के लिए कट्टरपंथी बड़े पैमाने पर विरोध की तैयारी में जुटे हैं. स्थिति से निपटने के लिए जुलूस से एक दिन पहले, सुधारवादियों ने ज्योतिबा फुले से संपर्क किया. ‘आर्यसमाज’ का जाति और छूआछूत विरोधी अभियान, ‘सत्यशोधक समाज’ के मूल सिद्धांतों से मेल खाता था. इसलिए ज्योतिबा उनके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो गए. अगले दिन जुलूस निकला. दयानंद हाथी पर सवार थे. आगे-आगे उनके समर्थक नाचते-गाते, ढोल बजाते हुए चल रहे थे. ज्योतिबा स्वयं रानाडे के साथ जुलूस में शामिल थे. उनके पीछे ‘सत्यशोधक समाज’ के सैकड़ों कार्यकर्ता थे. उधर कट्टरपंथी किसी भी तरह से जुलूस में व्यवधान डालने पर आमादा थे. वे नहीं चाहते थे कि पूना में ऐसे किसी नए आंदोलन को जन्म मिले, जो ‘सत्यशोधक समाज’ की भांति उनकी हजारों वर्ष पुरानी सत्ता को चुनौती देता हो. दयानंद का उपहास उड़ाने के लिए उन्होंने एक गधे को सजाकर उसे ‘गदर्भानंद’ का नाम दिया था. जैसे ही महर्षि दयानंद का जुलूस अपने नियत स्थल पर पहुंचा, कट्टरपंथी भी सजे-धजे ‘गदर्भानंद’ के साथ उनके सामने पहुंच गए. दोनों के बीच टकराव हो गया. टकराव बड़ी हिंसा का रूप ले, उससे पहले ही पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया. उपद्रवी यहां-वहां शरण लेने के लिए भागने लगे. उसके बाद दयानंद ने वहां अपना प्रवचन दिया.

‘आर्यसमाज’ वेदों को प्रामाण्य मानता था, ठीक ऐसे ही जैसे मुस्लिम कुरआन को दैवीय ग्रंथ मानते हैं. महाराष्ट्र, विशेषकर पूना में पेशवाओं के समर्थन के कारण ब्राह्मण अत्यंत शक्तिशाली बन चुके थे. इस कारण वहां जातिवाद की जड़ें भी बहुत गहरी थीं. ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न’ जैसी रचनाओं के माध्यम से ज्योतिबा तथा उनके द्वारा गठित ‘सत्यशोधक समाज’, जातिभेद और पुरोहितवाद को नकारकर—ब्राह्मणवाद को सीधी चुनौती दे रहे थे. दूसरी ओर वेदों को सर्वोपरि बताकर ‘आर्यसमाज’ छद्म रूप से ब्राह्मणवाद को संरक्षण देता था. इस कारण शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में उसके प्रति संदेह का भाव था. ब्राह्मणों के लिए हर वह व्यक्ति जो उनके जातीय वर्चस्व को चुनौती दे, उसे वे देश और धर्म दोनों का दुश्मन मानते थे. यही कारण है कि पूना में दो महीनों तक लगातार प्रचार करने और जाति-भेद को नकारने के बावजूद, ‘आर्यसमाज’ को महाराष्ट्र में अपेक्षित सफलता न मिल सकी.

ज्योतिराव अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाते थे, इसका एक रोचक किस्सा रोजलिंड ओ’ हेनलान ने अपनी पुस्तक ‘कास्ट कनफिलिक्ट एंड आइडियालाजी’(पृष्ठ-251) में दिया है. यह एक घटना को लेकर है, जिसके बारे में फुले के व्यापारिक सहयोगी और मित्र ज्ञानोबा ससाने ने बताया था—‘एक बार की बात है. फुले अपने मित्र ज्ञानोबा ससाने के साथ पुणे के बाहर स्थित एक बगीचे के भ्रमण के लिए गए. वहां एक कुआं था, जिससे उस बगीचे की सिंचाई होती थी. जैसे ही दोपहर का अवकाश हुआ, सभी कर्मचारी खाना खाने चले गए. यह देख फुले कुएं तक पहुंचे और कुएं के डोल को चलाने लगे. इसके साथ-साथ वे गीत गाने लगे. उन्हें गीत गाता देख वहां काम करने वाले मजदूर हंसने लगे. इसपर फुले ने बताया कि इसमें हंसने की बात क्या है? मजदूर लोग काम करते हुए अकसर गाते-बजाते हैं, केवल मेहनत से जी चुराने वाले फुर्सत के समय वाद्ययंत्रों का शौक फरमाते हैं. असली मेहनतकश जैसा काम करता है, वैसा ही अपना संगीत गढ़ लेता है.’

ज्योतिबा फुले आजन्म सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते रहे. उनका सपना ऐसे समाज की स्थापना का था, जो सर्व-समानता के सिद्धांत पर आधारित हो. इसके लिए आजीवन संघर्ष करते रहे. 11 मई 1888 को ‘सत्यशोधक समाज’ और नगर के प्रमुख सुधारवादी नेताओं ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से अलंकृत किया. हालांकि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व कोई भी उपाधि छोटी पड़ जाती है.

ओमप्रकाश कश्यप

नुपी लेन : मणिपुर के महिला-संघर्ष की अनूठी दास्तान

सामान्य

आज की राज बीत चुकी है

एक दिन और गुजर गया

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो

वे अराजक होकर उड़ रहे हैं

क्या तुम भूल गईं….

एक 12 दिसंबर गुजर चुका है

दूसरा 12 दिसंबर आने को है

भूल जाओ कि बालों को बांधना जरूरी है

भूल जाओ कि यह दिन दुबारा लौटकर आएगा

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो….

—हाजिम इराबोट, मणिपुरी जननेता और लोककवि

भारत विविध संस्कृतियों और मान्यताओं वाला विशाल देश है।  अपने आप में लंबा इतिहास समेटे हुए।  मगर जब भी देश के इतिहास और संस्कृति की बात होती है, आमतौर पर सारा विमर्श उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत तक सिमटकर रह जाता है।  ज्यादा से ज्यादा सुदूर दक्षिण को शामिल कर लिया जाता है। पूर्वोत्तर के प्रदेशों जो भारतीय भू-भाग के वैसे ही हिस्से हैं, जैसे बाकी प्रदेश—के योगदान को आमतौर पर बिसरा दिया जाता है।  इसका एक कारण तो उनकी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति है।  हम प्रायः मान लेते हैं कि जनजातीय प्रभाव के कारण पूर्वोत्तर के समाज आधुनिकताबोध से कटे हुए हैं।  जबकि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हलचलों से यह क्षेत्र वैसा ही प्रभावित रहा है, जैसा बाकी देश।  कुछ मामलों में तो यह दूसरों से विशिष्ट है।  जैसे 1904 और 1939 में मणिपुर में हुए दो ‘नुपी-लेन’(महिला-युद्ध) की मिसाल पूरे देश में अन्यत्र नहीं मिलती।  वे महिलाओं द्वारा अपने बल पर चलाए गए एकदम कामयाब जनांदोलन थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारतीय सरकार के संरक्षण में पल रही भ्रष्ट  राजसत्ता को झुकने के लिए विवश कर दिया था।  उनके फलस्वरूप सामाजिक सुधारों का सिलसिला आरंभ हुआ।  संवैधानिक सुधारों की राह प्रशस्त हुई।

मणिपुर विरल जनसंख्या वाला प्रांत है।  लगभग 22300 वर्ग किलोमीटर में फैले इस प्रांत की जनसंख्या करीब तीस लाख है।  प्रदेश का 91 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है। पर जो बात उसे खास बनाती है, वह है—समाजार्थिक-सांस्कृतिक जीवन में महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भागीदारी।  इस दृष्टि से वह देश का इकलौता प्रांत है।  मणिपुर का इतिहास 2000 वर्ष पहले, 33वें ईस्वी सन से आरंभ होता है, जब वहां मैतेई प्रजाति के नोंग्दा लैरन पाखनग्बा ने शासन संभाला।  मैतेई प्रजाति के कारण ही उस क्षेत्र का नाम मणिपुर हुआ।  इस बीच वहां अनेक सामंती समूह पनपे। परंतु शासन-प्रशासन में मैतेई लोगों की प्रधान भूमिका बनी रही।  15वीं-16वीं शताब्दी के बीच मणिपुर में ब्राह्मणों ने प्रवेश किया। देखते ही देखते वे राजसत्ता के करीबी और उसके सबसे बड़े लाभार्थी बन गए।  पूजा-पाठ और कर्मकांडों के माध्यम से उन्होंने वहां के जनजीवन पर कब्जा कर लिया।  सामाजिक सरंचना में सबसे ऊपर मैतेई थे, दूसरे स्थान पर ब्राह्मण, तीसरा वर्ग आम प्रजा, मेहनतकश लोगों का था।  जिनकी अहमियत वहां दासों के समान थी।  उन्हें बाकी दोनों वर्गों की गुलामी करनी पड़ती थी।

मणिपुर की स्वतंत्रता को झटका 1819 में उस समय लगा, जब वहां बर्मा का आक्रमण हुआ।  स्वतंत्रता प्रेमी मणिपुर वासी अगले 7 वर्षों तक हमलावरों से लगातार जूझते रहे।  उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा तो कर ली, परंतु प्रदेश का लैंगिक अनुपात गड़बड़ा गया।  युद्ध में भारी संख्या में पुरुष हताहत हुए थे।  इसलिए गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई।  स्त्रियां कढ़ाई, बुनाई जैसे हस्तशिल्पों में जुट गईं।  हाट-बाजार में सामान ले जाकर बेचने लगीं।  महिलाओं की सक्रियता के फलस्वरूप ‘इमा’ जैसे बाजार बने।  अपने आप में अद्वितीय।  ऐसे बाजार जिन्हें केवल महिलाएं चलाती हैं।  मणिपुर के हस्तशिल्प ने अंग्रेज व्यापारियों को आकर्षित किया था।  मारवाड़ी भी वहां पहुंचे।  अंग्रेज व्यापारियों के साथ मिलकर वे स्थानीय बाजार पर छा गए।

1891 में मणिपुर अंग्रेजों के अधिकार में आ गया।  राजा से सेना और हथियार रखने के अधिकार छीन लिए गए।  अंग्रेजों की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधि, जिसे राज्याध्यक्ष का दर्जा प्राप्त था, शासनकार्य संभालने लगा।  अंग्रेज राजा को शक्तिविहीन-श्रीविहीन कर चुके थे, परंतु मणिपुर के नागरिकों की स्वातंत्र्य-चेतना मरी नहीं थी।  इस कारण वहां अंग्रेज प्रशासकों को अनेक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था।  स्थानीय नागरिकों का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न रूपों में सामने आता था।  जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व हो तो प्रतिरोध के मामले में वे भला कैसे पीछे रह सकती थीं।  पहले नुपी लेन(Nupi-Lan) को वहां ‘महिला-युद्ध’ के रूप में देखा जाता है।  लेकिन उसके मूल में दास प्रथा और नाकारा शासन-व्यवस्था थी।  धर्मसत्ता और राजसत्ता ने मिलकर तरह-तरह के टैक्स जनता पर थोपे हुए थे।  कर-वसूली के लिए अमानवीय बल-प्रयोग आम बात थी।  उनसे वहां का सामान्य जनजीवन त्रस्त था।

पहले महिला-विद्रोह(नुपी लेन) की कहानी 15 मार्च 1904 से आरंभ हुई।  कुछ विद्रोहियों ने औपनिवेशिक सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि तथा सुपरिटेंडेंट जे.  जे.  डनलप के बंगले को आग लगा दी।  उस घटना के बारे में जांच-पड़ताल चल ही रही थी कि छह महीनों के भीतर 4 अगस्त को डनलप और सहायक राजनीतिक प्रतिनिधि एवं राज्याध्यक्ष आई। आर.  नटाल के बंगले दुबारा आग के हवाले कर दिए गए। उससे पहले 6 जुलाई 1904 को विद्रोहियों ने राजधानी इंफाल के सबसे बड़े व्यापारिक स्थल, ख्वारमबंद बाजार में भी आग लगा दी थी। विद्रोहियों के सुराग के लिए अंग्रेज शासकों ने काफी जतन किए। आगजनी को षड्यंत्र मानते हुए डनलप ने सुराग देने के वाले को 500 रुपये का ईनाम भी घोषित किया। लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। तिलमिलाए डनलप ने वर्षों पहले समाप्त कर दी गई बेगार पृथा लालअप(Lalup) को इंफाल में दुबारा शुरू करने का ऐलान कर दिया। पाखनग्बा राजाओं के शासनकाल में आरंभ हुई ‘लालअप’ पृथा असल में कराधान प्रणाली थी।  जिसमें जनता को प्रत्येक 40 दिनों में से 10 दिन बेगार ली जाती थी।  इस तरह स्थानीय जनता से उसके 25 प्रतिशत श्रम-दिवस कराधान के बहाने झटक लिए जाते थे। डनलप ने घोषणा की थी कि क्षतिग्रस्त भवनों का पुनर्निर्माण के लिए स्थानीय जनता को बेगार करनी होगी।

 

मनुष्य प्रकृति से आजाद होता है। जब भी उसे अपनी स्वाधीनता पर खतरा दिखाई देता है, विद्रोह की स्वाभाविक चेतना उसके भीतर उमगने लगती है। चूंकि मनुष्य का व्यवहार उसके विवेक के साथ-साथ परिस्थितियों भी प्रभावित होता है। इससे संभव है, उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो। कई बार तात्कालिक प्रतिक्रिया न होना भी अच्छा होता है। विशेषकर सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से।  स्थायी परिवर्तन के लिए वही बदलाव कामयाब होते हैं, जो लंबे समय तक सुलगती सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का परिणाम हों।  क्योंकि इस बीच उत्पीड़ित जन, उत्पीड़क सत्ता के मनोविज्ञान को पहचानकर उसका सामना करने की रणनीति तैयार कर लेते हैं।  भारतीय स्वाधीनता संग्राम ऐसे ही सत्ता विरोध का परिणाम था। जबकि 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम सैनिकों के तात्कालिक आक्रोश की परिणति होने के कारण अपेक्षित सफलता प्राप्त न कर सका था।  दक्षिण में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की सफलता के मूल में भी लोगों के मन में वर्ण-व्यवस्था के प्रति शताब्दियों पुराने आक्रोश की भूमिका थी।  लंबे समय की परतंत्रता के कारण मनुष्य की स्वातंत्र्य-चेतना कमजोर पड़ सकती है। कई बार वह परिस्थितियों से समझौता कर लेता है।  परिणामस्वरूप पराधीनता उसे समाज और संस्कृति का सहज-स्वाभाविक हिस्सा लगने लगती है। ऐसे में यदि कोई उसे स्वतंत्रता का बोध करा दे, अथवा उसे पराधीनता के कारणों का पता चल जाए तो वह दुबारा दासता के लिए आसानी से तैयार नहीं होता।

डनलप के ऐलान के साथ के साथ ही लोगों को ‘लालअप’ पृथा की वापसी का डर सताने लगा था। जनमानस में बढ़ता आक्रोश देख पंचायत और स्थानीय मुखियाओं के एक दल ने डनलप से भेंट कर फैसला वापस लेने की अपील की। डनलप का कहना था कि स्थानीय पुलिस और चौकीदार अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे हैं। उसने धमकी दी कि आदेश के विरोध को ‘राजद्रोह’ माना जाएगा।  भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पुलिस चौकियां बनाई जाएंगी। उनका खर्च भी स्थानीय जनता से वसूला जाएगा।  इन सूचनाओं ने आग में घी डालने का काम किया।

5 अक्टूबर की सुबह को महिलाएं निकल पड़ीं। लगभग 3000 निहत्थी महिलाओं ने डनलप के आवास को घेर लिया।  वे लालअप के आदेश को वापस लेने की मांग पर अड़ी थीं।  आंदोलनकारियों के बढ़ते दबाव को देखते हुए डलनप को आदेश पर पुनर्विचार करने का निर्णय लेना पड़ा। स्थानीय अधिकारियों के आश्वासन पर महिलाएं वापस लौट आईं। मगर उसी दिन शाम को ख्वारमबंद बाजार में 5000 से अधिक महिलाओं की भीड़ जुट गई। वे अंग्रेज प्रशासक द्वारा दिए गए आदेश पर अमल चाहती थीं। आखिर आंदोलनकारियों की जीत हुई। लालअप आदेश को वापस ले लिया गया।  यह अशिक्षित, गंवई, गरीब और साधनविहीन महिलाओं की बड़ी कामयाबी थी।  इतिहास में अपने किस्म की अनूठी घटना।

 

दूसरा नुपी लेन

दूसरे ‘नुपी लेन’ की परिस्थितियां भिन्न थीं। मगर पहले नुपी लेन की भांति वह भी महिलाओं का स्वयं-स्फूर्त आंदोलन था।  उसका दायरा पहले नुपी-लेन की अपेक्षा काफी विस्तृत था। आरंभ में आंदोलनकारी महिलाएं चावलों के बढ़ते मूल्य तथा उनके निर्यात पर पाबंदी के लिए एकजुट हुई थीं। बाद में उनका लक्ष्य बढ़ता गया।  उसमें वाखई सेल, मेगा सेखई तथा मांग्बा-सेंग्बा जैसी कुरीतियों से मुक्ति की मांगें भी शामिल होती गईं। अंग्रेजों के आने के बाद ‘लालअप’ नामक बेगारी की प्रथा समाप्त हो चुकी थी।  उसके स्थान पर सरकार ने नई कराधान प्रणाली लागू की थी, जिसके अनुसार खाड़ी क्षेत्र में 2 रुपये प्रति आवास तथा पहाड़ी क्षेत्र में तीन रुपये प्रति आवास का नया कर लगाया गया था।  कृषि-योग्य भूमि भी कराधान के दायरे में आती थी। कर-वसूली के लिए जबरदस्ती करना आम बात थी। उसके कारण जनता में आक्रोश था।  शासन प्रणाली में शिखर पर महाराजा और ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधि था, जो ‘दरबार’ की मदद से शासन करते थे। दरबार में अधिकांश प्रतिनिधि राजा की ओर से नियुक्त किए जाते थे। आमतौर पर वे उसके सगे-संबंधी होते थे।  बड़े व्यापार पर मारवाड़ियों का कब्जा था।  सबने मिलकर आम जनता पर तरह-तरह के कर लादे हुए थे।

1939 में चारुचंद मणिपुर का महाराजा था, लेकिन नाममात्र का।  अधिकांश अधिकार औपनिवेशिक सरकार के प्रतिनिधि के अधीन थे।  बड़े फैसलों में उसी की मनमानी चलती थी।  राजसत्ता और धर्मसत्ता की ओर से थोपे गए करों का बोझ आमजन को उठाना पड़ता था।  वाखई सेल(Wakhei sel), मांग्बा-सेंग्बा(Mangba-Sengba), पंडित लोइशंग(Pandit Loishang), चंदन सेंखाई(Chandan Senkhai) तथा कुंजा सेन(Kunja Sen) असल में जनता से वसूले जाने वाले तरह-तरह के टैक्स थे।  इनमें से कुछ तो बड़े ही विचित्र थे।  उनके पीछे राजसत्ता और धर्मसत्ता का स्वार्थमय गठजोड़ था। कई कर मनुष्य के जनजीवन से जुड़ी सामान्य गतिविधियों के नाम पर लगाए गए थे।  वे मनुष्य की मौलिक स्वतंत्रता का हनन करते थे। ‘वाखई सेल’ भूमि के बंदोबस्त, चकबंदी से जुड़ा था, जबकि ‘पंडित लोइशंग’ ब्राह्मण मंडल के नाम पर थोपा हुआ कर था। ‘चंदन सेंखाई’ माथे पर तिलक लगाने के नाम पर वसूला जाता था।  उसके अनुसार प्रत्येक हिंदू परिवार को ‘चार आना’ केवल माथे पर तिलक लगाने के लिए चुकाना पड़ता था। ‘कुंजा सेन’ वेशभूषा कर था।  इनके अतिरिक्त गायकों के नाम पर भी टैक्स का प्रावधान था।

‘मांग्बा-सेंग्बा’ सबसे निकृष्ट और अमानवीय कराधान व्यवस्था थी।  यदि कोई व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता अथवा ब्रह्म-सभा की सत्ता को चुनौती देता या किसी कारणवश ब्रह्म-सभा उससे रुष्ट हो जाती थी, तो ऐसे व्यक्ति को अशुद्ध(मांग्बा) घोषित कर दिया था।  ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति अपने समाज और जाति के लिए अछूत हो जाता था।  शुद्धीकरण(सेंग्बा) यानी समाज में पुनर्वापसी के लिए उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता था।  जुर्माने की दर अलग-अलग थी।  यदि निचली सभा व्यक्ति को अशुद्ध घोषित करती, तो मात्र 50 रुपये की क्षतिपूर्ति देकर शुद्धीकरण किया जा सकता था।  लेकिन यदि ब्रह्म सभा के अशुद्ध घोषित करने पर 85 रुपये 23 पैसे। ‘ब्रह्म सभा’ के अध्यक्ष के रूप में राजा भी किसी व्यक्ति को अशुद्ध घोषित कर सकता था। महाराजा द्वारा ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति को अपने शुद्धीकरण के लिए, 500 रुपये की मोटी धनराशि भेंट करनी पड़ती थी।

महाराजा चारुचंद्र सिंह के शासनकाल में ‘मांग्बा-सेंग्बा’ की समस्या प्लेग की तरह भयावह हो चुकी थी। उसका सामना गरीब, विपन्न और कमजोर तबके को करना पड़ता था। ‘लालअप’ से मिलती-जुलती ‘पोथांग’ जैसी बेगार पृथा भी थी। उसके अनुसार राजा, शाही परिवार का और कोई सदस्य अथवा अंग्रेज अधिकारी जब भी यात्रा या शिकार पर निकलते तो मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों में उन्हें तथा उनके सामान को ढोने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रजा की होती  थी। भोजन और मनोरंजन आदि का प्रबंध भी गरीब जनता को करना पड़ता था। लोगों का विश्वास था कि महाराजा ने ‘ब्रह्म सभा’ के प्रभाव में आकर इन करों को थोपा हुआ है। संवैधानिक सुधारों के बिना उनसे मुक्ति असंभव है।  यह आधुनिक चेतना थी जो लगभग सभी पूर्वोत्तर के सभी प्रदेशों में एक साथ पनप रही थी।  लोग राजा की शक्तियों पर नियंत्रण चाहते थे।  यही वे कारण थे जिन्होंने दूसरे ‘महिला युद्ध’ की जमीन तैयार की थी।  दूसरे ‘महिला युद्ध’ को निखिल मणिपुरी महासभा का समर्थन प्राप्त था।

 

1938-39 में मणिपुर को भारी बाढ़ का सामना करना पड़ा था।  बाढ़ से तबाह हुई संपत्ति की मरम्मत हेतु दरबार की ओर से 16000 रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई।  लेकिन फसल से हुए नुकसान की भरपाई होना मुश्किल था।  फसल मारे जाने से खाद्य-सामग्री के दाम तेजी से बढ़ने लगे।  राज्य में अकाल जैसे हालात पैदा हो गए। हालात को काबू करने के लिए दरबार ने चावल, चिवड़ा के निर्यात को अपने नियंत्रण में ले लिया। आदेश दिया गया कि यदि निर्यात आवश्यक हुआ तो वह केवल राज्य के अन्न-भंडारों के माध्यम से किया जा सकेगा। चावल तथा उसके उत्पादों के निर्यात को हालांकि राजा की मंजूरी प्राप्त नहीं थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि ने उसके पीछे राजा का हाथ मानते हुए, तत्काल प्रतिबंध उठा लेने का निर्देश दिया। दबाव में आकर राजा वैसा ही आदेश देना पड़ा। अंततः चावल तथा चावल उत्पादों के निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया गया। जनता पर इसका उल्टा असर पड़ा।  उन्हें अकाल का डर सताने लगा।  अफवाहों ने काम किया।  लोग गुस्से से उबलने लगे।

चावल और धान के निर्यात की अनुमति का असर स्थानीय बाजारों में आपूर्ति पर पड़ा।  परिणामस्वरूप उनके दाम तेजी से बढ़ने लगे।  अफवाहों का बाजार पुनः गर्म हो गया।  स्त्रियों के अहिंसक आंदोलन का पहला निशाना बनीं खुमुककेम(Khumukcham Tclchcu vhc) चावल मिल, जो चावल के निर्यात में अग्रणी थी।  आंदोलनकारी महिलाओं ने मिल बंद करने को विवश कर दिया। उसके बाद वे साहसी महिलाएं सीधे राजनीतिक प्रतिनिधि क्रिस्टोफर जिमसन के सहायक टी।  ए.  शार्पे के पास पहुंचीं तथा उससे चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका आक्रोश देख शार्पे ने अगले दिन तक संबंधित आदेश जारी करने का आश्वासन दिया।  उसके बाद आंदोलनकारी महिलाएं वापस लौट आईं। मगर आंदोलन का यही समापन नहीं था।  अगले दिन बाजार में काम करने वाली महिलाओं ने बिक्री के लिए आए धान की गाड़ियों को अपने कब्जे में ले लिया।  कब्जे में लिए गए धान को इकट्ठा कर वे दरबार की इमारत के आगे पहुंचीं तथा किसी भी सूरत में धान और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगीं।

महिलाओं का आक्रोश देख दरबार के सदस्य एक-एक कर बाहर निकल गए। केवल राजनीतिक प्रतिनिधि वहां रह गया। महिलाएं घेरा डाले पड़ी थीं।  वे उससे निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध की मांग कर रही थीं। फंसे हुए राजनीतिक प्रतिनिधि ने महाराज की अनुपस्थिति में प्रतिबंध के आदेश देने में असमर्थता प्रकट की।  इसपर औरतों ने कहा कि वे महाराज को टेलीग्राम कर, तत्काल आने को कहें।  उग्र महिलाओं ने राजनीतिक प्रतिनिधि को अपने साथ तार-घर तक चलने को विवश कर दिया। आंदोलनकारियों का व्यवहार देखकर राजनीतिक प्रतिनिधि ने असम रायफल्स के कमांडर बुलफिल्ड को संदेश भेजकर स्थिति से परचाया।  हालात की गंभीरता समझते हुए बुलफिल्ड फौज की टुकड़ी के साथ वहां पहुंच गया। पुलिस बल को वहां देख आंदोलनरत महिलाओं का गुस्सा और भी बढ़ गया।  उसकी परिणति महिलाओं और सिपाहियों के बीच झड़प के रूप में हुई। घायल महिलाओं को इंफाल के अस्पताल में भर्ती कराया गया।  अगले दिन महाराज की ओर से चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के आदेश आ गए।  उसके अनुसार असम रायफल्स की कोहिमा और इंफाल छावनियों को छोड़कर बाकी निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

उसी दिन आदेश पर अमल के लिए महिलाएं दुबारा राजनीतिक प्रतिनिधि और इंजीनियर के आफिस पहुंचीं।  उन्होंने दोनों को अपने साथ चलने के लिए विवश कर दिया।  दोनों अधिकारियों को साथ लेकर आंदोलनकारी महिलाएं चावल मिलों तक पहुंची।  वहां उन्होंने मिलों के विद्युत कनेक्शन काटने के लिए विवश कर दिया। ख्वारेमबंद बाजार में पूरे सात दिनों तक हड़ताल रही।  आंदोलनकारी महिलाओं ने बाजार पहुंचकर माल बेचने बैठे दुकानदारों का सारा सामान उलट-पुलट दिया।  इतने प्रयासों के बावजूद बाजार में चावल का भाव गिर नहीं रहा था। महिलाओं ने पाया कि प्रतिबंध के बाद भी दुकानदार माल को मुनाफे के लिए यहां से वहां ले जा रहे हैं।  उसे रोकने के लिए 28 दिसंबर को महिलाओं का एक जत्था इंफाल के निकट केसमपेट नाम स्थान पर पहुंचा।  वहां उन्होंने चावल से लदी नौ गाड़ियों को गुजरते हुए देखा।  महिलाओं ने उन गाड़ियों को अपने अधिकार में ले लिया।  उन्होंने गाड़ीवान पर दबाव डाला कि वह चावलों को एक रुपया बारह आना प्रति मन(चालीस सेर) के हिसाब से बेचे।  चावलों का व्यापारी उस माल को सीधे दुकानदारों को, ऊंचे दाम पर बेचना चाहता था।  उसके कहने पर गाड़ीवान ने चावल को सस्ता बेचने से इन्कार कर दिया।  इसपर आंदोलनकारी महिलाएं भड़क गईं।  कुपित महिलाओं ने सारा चावल बिखेर दिया और गाड़ीवान को मारने के लिए चढ़ गईं।  अभी तक महिलाओं का आंदोलन अहिंसक चल रहा था।  लेकिन ख्वारेमबंद बाजार और केसमपेट की घटनाओं में महिलाओं का उग्र रूप सामने आया था।  इसके बाद शासन को आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग का बहाना मिल गया।  पुलिस बल ने हस्तक्षेप करते हुए आंदोलनकारी महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।

दूसरा ‘नुपी-लेन’ लगभग 14 महीनों तक चला था।  इतने दिनों तक महिला बाजार भी अस्त-व्यस्त रहा।  महिलाएं वहां माल बेचने पहुंचतीं तो पुलिस बल निगरानी के लिए पहुंच जाता।  इससे आंदोलनकारियों में फूट पड़ने लगी। बावजूद इसके उस ‘नुपी-लेन’ की सफलताएं कम नहीं थीं। असम रायफल्स की दो छावनियों को छोड़कर चावल बाहर भेजने प्रतिबंध लग चुका था। आंदोलन का असर वाखई सेल, मांग्बा-सेंग्बा, चंदन शेखई जैसे कानूनों पर भी पड़ा था। उसने पूरे मणिपुरी समाज को जाग्रत करने का काम किया था।  फलस्वरूप मणिपुर में कानून के राज्य और संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हुआ। आंदोलन के दौरान महिलाएं बजाय किसी नेता के ‘मणिपुर माता की जय’ के साथ आगे बढ़ती थीं। मणिपुर में ‘वंदेमातरम’ गीत सबसे पहले दूसरे नुपी-लेन के दौरान गूंजा था।

दूसरे नुपी-लेन की एक विशेषता यह भी थी कि अपनी एकता, संगठन सामर्थ्य और सूझबूझ के कारण महिलाओं ने शासन-प्रशासन को अपने पीछे चलने के लिए विवश कर दिया था।  बावजूद इसके उस आंदोलन के लिए किसी भी महिला को सजा नहीं हुई। पिछले 12 दिसंबर 2018 को राज्य सरकार द्वारा राजधानी इंफाल में ‘नुपी लेन दिवस’ के रूप में, राजकीय स्तर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया।  उसमें राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि आंदोलन के साक्षी रहे, कासिमपेठ से संजेनथोंग(इंफाल) मार्ग का नामकरण दूसरे नुपी लेन की आंदोलनकारी ‘इमास’(माओं) और इच्स(बहनों) की याद में ‘नुपी लेन रोड़’ के रूप में किया जाएगा।

ओमप्रकाश कश्यप

भारतीय नवजागरण के पुरोधा : स्वामी अछूतानंद

सामान्य

जातिवाद ने भारतीय समाज को पिछड़ा बनाया है। उसने सिवाय बरबादी के हमें कुछ नहीं दिया। लोगों की निगाह में हमें हीन,वंचित एवं विपन्न बनाने वाला भी जातिवाद है….शताब्दियों पुराने जाति-आधारित भेदभाव ने हिंदू समाज को अज्ञानता के अंधकूप में ढकेल दिया है। उसी ने हिंदुओं की चारित्रिक एकता और अखंडता को विरूपित किया है। जातीय ऊंच-नीच का हिंदू मानस पर इतना गहरा प्रभाव है कि उसने उसकी सामान्य बुद्धि को भी कुंठित कर दिया हैᅳपेरियार

 

जाति भारतीय समाज का ऐसा कोढ़ है, जिसे प्रत्येक हिंदू अपनी विशिष्ट पहचान के तौर पर अपनाता है। उसे विश्वास होता है कि समाज में कुछ लोग उससे ऊपर हैं। कि जातीय अनुक्रम में कुछ लोगों का ऊपर होना उनके किसी गुण-विशेष के कारण नहीं है। वे ऊपर सिर्फ इसलिए हैं, क्योंकि उन्होंने जाति-विशेष में जन्म लिया है। विचित्र यह है कि जाति के दम पर जबरन नीचे ढकेल दिए गए व्यक्ति के मन में इससे कोई स्थायी हीनताबोध नहीं पनपता। क्योंकि उसे विश्वास होता है कि समाज में अनेक लोग ऐसे भी हैं, जिनका जन्म उससे निचली जाति में हुआ है। यह कृत्रिम गर्वानुभूति जातिगत ऊंच-नीच से जन्मे हीनताबोध से उसकी रक्षा करती है। जातीय ऊंच-नीच के एहसास से दबा-सहमा व्यक्ति जब कथित ऊंची जातियों के संपर्क में आता है, तो खुद के कमतर होने का एहसास उसके मनस् पर छाया रहता है। लेकिन जैसे ही उसका सामना निचली जाति के व्यक्ति से होता है, उसकी झुकी गर्दन एकाएक तन जाती है। चेहरा गर्व से दमकने लगता है। मुश्किल उस व्यक्ति की होती है जिसका जन्म सबसे निचली जाति में हुआ है। कोई और रास्ता न देख वह धर्म की शरण लेता है। मान लेता है कि जो वह है, वही उसकी नियति है। इस जन्म में उससे त्राण असंभव है। उसे लगातार यह समझाया जाता है कि जाति की मर्यादाओं का पालन करने में ही उसकी भलाई है। यही देवताओं की इच्छा है। इसी में उसका कल्याण है। धीरे-धीरे वह मानने लगता है कि जाति-सिद्ध व्यवस्था से अनुकूलित होकर ही वह देवताओं की निगाह में ऊपर उठ सकता है। 

जहां-जहां हिंदू समाज है, वहां-वहां जाति है। जहां-जहां जाति है, वहां सामाजिक भेदभाव, धर्म के नाम पर कट्टरता, ऊंच-नीच, आर्थिक असमानता को साफ परखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। 1931 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जातियों की संख्या 21 प्रतिशत, पिछड़े लगभग 41.9 तथा सवर्ण मात्र 22.1 प्रतिशत थे। यह हिंदुओं के दो बड़े अवतारों राम और कृष्ण की जन्म भूमि रहा है। काशी जैसी नगरी के अलावा कुछ वर्ष पहले तक हरिद्वार भी प्रदेश का हिस्सा था। ये विशेषताएं इस प्रदेश को बाकी प्रदेशों के मुकाबले खास बनाती हैं। हिंदू संस्कृति के निर्माण में इनकी बड़ी भूमिका है। इनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव में लोग मानने लगते हैं कि धर्म को केंद्र में रखकर बनाए गए नियम ही श्रेष्ठतम हैं। वे विश्वास कर लेते हैं कि जाति दैवीय विधान है। इसलिए जिस जाति, समाज में वे हैंᅳवहां होना ही उनकी नियति है। यही कारण है कि उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के सामाजिक सुधार के लिए चलाए गए आंदोलनों से यह प्रदेश करीब-करीब अछूता रहा है। दक्षिण भारतीय राज्यों की तरह यहां न तो कोई बड़ा जाति-विरोधी आंदोलन पनपा, न महामना फुले, अय्यंकालि, डॉ. आंबेडकर या पेरियार जैसा बहुजन नेतृत्व उभर पाया। धर्म सामाजिक असमानता का किस तरह पालन-पोषण करता है। शास्त्र-सम्मत बताकर जनमानस को किस तरह उसके अनुसार ढाल लेता है, श्रद्धा और भक्ति व्यक्ति के आक्रोश, स्वाभिमान और आत्मगौरव को किस प्रकार निस्तेज कर देते हैंᅳउत्तर प्रदेश का हिंदू समाज इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। प्रदेश में दलितों और पिछड़ों की  हालत आज भी लगभग वैसी ही है, जैसा ‘सत्यशोधक समाज’ के नेता मुकुंदराव पाटिल ने वर्षों पहले लिखा थाᅳ

‘भारत एक विचित्र देश है जहां तरह-तरह के लोग रहते हैं, जो अपने धर्म, विचारों, व्यवहारों और समझ के आधार पर अनेक भागों में बंटे हुए हैं। लेकिन साफ-साफ कहा जाए तो केवल दो ही श्रेणियां हैंᅳबहुसंख्यक निचली जातियां, जिनसे उनके मनुष्य होने के सामान्य अधिकार भी छीन लिए गए हैं। दूसरी विशेषाधिकार प्राप्त ऊंची जातियां जो खुद को दूसरों से श्रेष्ठतर मानती हैं, और बहुसंख्यक जातियों के श्रम के बल पर समस्त सुख-सुविधाओं का आनंद लेती हैं। एक का सुख दूसरे के लिए मुसीबत है, यही उनका संबंध है।’1   

जाति, सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्ववाद, धार्मिक पोंगापंथी के विरोध में पहली और निर्णायक आवाज महात्मा फुले की थी। उन्होंने शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा का महत्त्व समझाया, उनके लिए विशेष शिक्षा-संस्थान खोले, जाति को संरक्षण देने वाले हिंदू धर्म को सीधी चुनौती दी। अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से उन्होंने हिंदू अवतारवाद के साथ-साथ उन मिथों की व्याख्या की, जो हिंदू मानस की संरचना का आधार रहे है। ब्राह्मण ग्रंथों में हिंदू धर्म को सनातन कहा गया है। फुले ने इतिहास और मिथ में अंतर करते हुए मूल-निवासी सिद्धांत को प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने बताया कि शूद्र और अतिशूद्र इस देश के मूल निवासी हैं। आर्यों ने उनकी प्राचीन समृद्ध संस्कृति को तहस-नहस किया था। आर्य इस देश में बाहर से आए, इसकी पुष्टि ऋग्वेद करता था। पश्चिमी विद्वानों के अलावा तिलक भी यही मानते थे। इसलिए फुले द्वारा प्रस्तुत मूल-निवासी सिद्धांत शूद्रों और अतिशूद्रों के दिलो-दिमाग पर तेजी से असर दिखाने लगा। बहुत जल्दी उसका असर देश के बाकी हिस्सों में भी नजर आने लगा। बंगाल में यह ‘नामशूद्र, पंजाब में ‘आदि-धर्म’, आंध्र प्रदेश में ‘आदि आंध्र’, दक्षिण में द्रविड़ बनाम आर्य आंदोलन के रूप में नजर आया। तमिलनाडु में ई. वी. रामासामी पेरियार ‘द्रविड़ संस्कृति’ को भारत की मूल संस्कृति बताते हुए ‘आत्म-सम्मान’ आंदोलन का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि द्रविड़ आर्यों से अलग और भारत के मूल निवासी हैं। इससे सवर्णों के आगे अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडराने लगा। उससे पहले अपने श्रेष्ठता दंभ के चलते वे स्वयं शूद्रों और अतिशूद्रों धर्म-बाह्यः मानते आए थे। चौथे  वर्ण के रूप में स्वीकार करने के बावजूद शूद्रों के सामाजिक-आर्थिक योगदान को नकारा जाता था। अधिकांश मामलों में उसके साथ दास जैसा वर्ताब किया जाता था। 

शिक्षा क्रांति के साथ-साथ स्थानीय निकायों में भारतीयों को स्थान देने की शुरुआत उनीसवीं शताब्दी में ही हो चुकी थी। उसमें संख्याबल का महत्त्व था। इससे सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा मंडराने लगा। उन्हें लगने लगा था कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए शूद्रों और अतिशूद्रों को साथ रखना आवश्यक है। परिणामस्वरूप अनेक सामाजिक आंदोलनों का जन्म हुआ। इनमें दयानंद सरस्वती का ‘आर्य-समाज’ आंदोलन प्रमुख था। स्वामी दयानंद जाति का बहिष्कार करते थे, लेकिन वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे। उन्हें ब्राह्मण वर्चस्व से भी इन्कार न था। ‘आर्य-समाज’ असलियत में उदार ब्राह्मणवाद का सुरक्षा-कवच था। उसके बैनर तले कट्टरपंथी हिंदू उदार और प्रगतिशील होने का नाटक करने लगे थे। भारतीय समाज पर ‘आर्यसमाज’ का, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत में, व्यापक असर पड़ा। पंजाब, गुजरात, हरियाणा, उत्तर-प्रदेश आदि प्रदेशों में निचली और मंझोली जातियां उसकी ओर आकर्षित होने लगीं। मगर आर्य-समाज में शामिल हुए पिछड़ों और अतिपिछड़ों को बहुत जल्दी समझ में आने लगा कि जातिवाद की आलोचना करने वाला आर्यसमाज संगठन के स्तर पर उससे मुक्त नहीं है। इसी बीच ‘हिंदू महासभा’ जैसे संगठन भी उभरे, जो नई शिक्षा प्रणाली का विरोध करते थे। संस्कृति और परंपराओं की दुहाई देकर वे हर परिवर्तन को रोके रखना चाहते थे। इस घेराबंदी का विरोध करने के लिए अनेक दलित नेता और सामाजिक कार्यकर्ता आगे आए। उन्हीं में से एक स्वामी अछूतानंद भी थे, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में दलित-अस्मिता के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की थी।  

 

स्वामी अछूतानंद : जीवन परिचय

अछूतानंद हरिहर का जन्म फर्रुखाबाद जिले के सौरिख गांव में 6 मई 1879; को चमार जाति में हुआ था। उनके पिता का नाम था, मोतीराम तथा मां थीं रामप्यारी। माता-पिता ने उनका नाम हीरालाल रखा था। सौरिख गांव में ब्राह्मणों तथा दूसरी सवर्ण जातियों का बोलबाला था। एक बार उनके पिता और चाचा का ब्राह्मणों से झगड़ा हुआ था। गांव वाले दलितों को किसी भी प्रकार की छूट देने को तैयार न थे। तंग आकर मोतीराम और उनके भाइयों ने सौरिख छोड़ दिया। पलायित होकर वे मैनपुरी जिले की तहसील सिरसागंज के उमरी गांव में आ बसे, जहां उनके सजातीय लोगों का संख्यानुपात अपेक्षाकृत अधिक था।2  ध्यातव्य है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में मैनपुरी में चमार अहीरों के बाद सबसे बड़ी जाति थी। उनमें से कुछ अच्छे काश्तकार थे तो कुछ पारंपरिक धंधे को अपनाए हुए थे। जबकि कुछ मजदूरी करके अपना जीवनयापन करते थे। इस बीच कुछ शिक्षा प्राप्त कर, सरकारी पदों पर विराजमान थे। फलस्वरूप उनके समाज में नई महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगी थीं, जिससे सवर्णों के बीच ईर्ष्याभाव बढ़ता ही जा रहा था। हीरालाल के पिता ने उनका दाखिला उमरी की प्राथमिक पाठशाला में कराने का निर्णय लिया। जब वे हीरालाल को लेकर पाठशाला पहुंचे तो वहां मौजूद ब्राह्मण अध्यापक एक अछूत बालक को देखकर आनाकानी करने लगाᅳ

‘तुम्हारी जात वालों का काम-धंधा पहले से तय है। उसके लिए तुम्हें अपने बच्चे को पढ़ाना आवश्यक नहीं है। दूसरे एक अछूत बालक को दाखिला देकर मैं अपने विद्यालय की बदनामी नहीं करना चाहता।’

स्कूल मास्टर का व्यवहार अनोखा नहीं था। वह समाज में दलितों साथ होने वाले भेदभाव को ही दर्शाता था। बालक हीरालाल के मन पर वर्षों तक पड़ा रहा। पिता के निधन के बाद वे अपने अविवाहित चाचा मथुरा प्रसाद के साथ नसीराबाद, अजमेर में आकर रहने लगे, जो उन दिनों फौज में सूबेदार थे। उन दिनों ब्रिटिश सेना में कार्यरत दलितों के आश्रितों के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान था। और इस तरह मान सकते हैं कि ब्रिटिश सेना का दलितों के उद्धार में बड़ा योगदान रहा था। 

बालक हीरालाल के लिए गांव में रहते हुए शिक्षा के जो दरवाजे बंद थे, अजमेर आने के साथ एकाएक खुल गए। सेना के स्कूल में रहते हुए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। बुद्धि प्रखर थी, सो अल्पावधि में ही हिंदी के अलावा अंग्रेजी और उर्दू भाषा का ज्ञान भी हासिल कर लिया। हीरालाल के चाचा की आस्था कबीरपंथ में थी। उनके यहां रविदासियों और कबीरपंथियों का निरंतर आना-जाना लगा रहता था। हीरालाल के मन पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। किशोरावस्था में उनके भीतर निर्गुण भक्ति के प्रति अनुराग बढ़ने लगा। वे कबीर और रविदास के पद अपने चाचा को गाकर सुनाया करते थे। उस समय तक पिता की मृत्यु हो चुकी थी, जिसका उन्हें बहुत दुख था। कबीर और रविदास की निर्गुण भक्ति का असर और पिता के मृत्यु से जन्मे वैराग्य भाव ने एक दिन उन्हें घर छोड़ने पर विवश कर दिया। स्वामी हरिहरानंद बनकर वे सत्य की खोज में भटकने लगे। उनके लिए वह केवल आध्यात्मिक खोज की यात्रा न थी। कबीरपंथी साधुओं की मंडली के साथ देश की विभिन्न अछूत बस्तियों में यात्रा करते, वहां निर्गुण भक्ति का प्रचार करते। दलितों की दुरावस्था देखकर उनका मन आहत होता। 24 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने हिंदी, उर्दू के अलावा संस्कृत, गुरमुखी, मराठी, गुजराती और बांग्ला भाषा का ज्ञान अर्जित कर लिया। युवावस्था में उनका विवाह इटावा जिले के पीधासर गांव की कन्या दुर्गाबाई से हो गया। उसके बाद पीधासर उनका अस्थायी ठिकाना बन गया। दुर्गाबाई से उन्होंने तीन बेटियों, विद्याबाई, शांतीबाई और सुशीलाबाई को जन्म दिया। दुर्गाबाई उनकी सच्ची जीवनसंगिनी सिद्ध हुईं। वे हरिहरानंद के साथ दलित बस्तियों की यात्रा करतीं। वहां दलित स्त्रियों को समझातीं। उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा देतीं। उनमें आत्मसम्मान की भावना जगातीं। धीरे-धीरे दलित बस्तियों में उनका प्रभाव बढ़ने लगा। लोग तन-मन-धन के साथ उनकी मदद को आगे आने लगे।  

 

आर्यसमाज की ओर

उन्हीं दिनों हरिहरानंद का संपर्क आर्यसमाजी स्वामी सच्चिदानंद से हुआ। आर्यसमाज जाति-प्रथा का विरोध और समाज के सभी वर्गों के लिए शिक्षा का समर्थन करता था। अछूतों के लिए हाॅस्टल बनवाने का आश्वासन भी देता था। इससे प्रभावित होकर हरिहरानंद ने 1905 में आर्यसमाज के अजमेर कार्यालय में विधिवत रूप से आर्यसमाजी के रूप में दीक्षा ग्रहण कर ली। उसके बाद उन्होंने वेदादि  ग्रन्थों का गंभीर अध्ययन किया। आर्यसमाजी के रूप में उनका जीवन बहुत सक्रिय रहा। आर्यसमाज के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक शिक्षा का प्रसार भी था। वे अछूत बस्तियों में जाकर शिक्षा का प्रचार करने लगे। इसी बीच उन्होंने आगरा में ‘आल इंडिया जाटव महासभा’ की स्थापना की। आर्यसमाज के प्रचारक के रूप में उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों की यात्रा की। उससे समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था को एक नए दृष्टिकोण से जानने का अवसर मिला। 

धीरे-धीरे आर्यसमाजियों की कथनी और करनी का अंतर साफ नजर आने लगा। आर्यसमाज की स्थापना हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए की गई थी। लेकिन उसका असली उद्देश्य हिंदुओं के धर्मांतरण पर रोक लगाना था। जातीय उत्पीड़न और भेदभाव से आहत शूद्र इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर आकर्षित रहे थे। इससे सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक होने का खतरा मंडराने लगा था। आर्यसमाज धर्मांतरित हिंदुओं की वापसी के लिए शुद्धि कार्यक्रम चलाता था। लेकिन शुद्धि के बाद हिंदू धर्म में लौटे हिंदुओं के लिए उसकी कोई विशिष्ट नीति नहीं थी। धर्म में वापस आए हिंदुओं को पुनः उसी गलीच जाति-व्यवस्था के बीच लौटना पड़ता था, जिससे क्षुब्ध होकर उन्होंने या उनके पूर्वजों ने धर्मांतरण का सहारा लिया था। हिंदू धर्म में वापस लौटे व्यक्तियों को ससम्मान जीवन जीने के अवसर प्राप्त हों, इसकी ओर से वह पूर्णतः उदासीन था। 1920 के दशक में उसने हिदुंत्व की राह पकड़ ली। वह वेदादि के अलावा उन्हीं प्रतीकों का समर्थन करने लगा, जो जाति-व्यवस्था का समर्थन करते थे। धीरे-धीरे स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज की कमजोरियों का एहसास होने लगा। उन्हें लगने लगा कि आर्यसमाज असल में ब्राह्मणवाद की सुधरे हुए रूप में वापसी का उपक्रम हैं। सवर्ण हिंदू दलितों और पिछड़ों का उपयोग सांप्रदायिक संघर्ष की स्थिति में मुस्लिमों से सामना करने के लिए करना चाहते हैं। 

‘शुद्धि’ कार्यक्रम विशुद्ध राजनीतिक अभियान था। ब्रिटिश सरकार ने 1909 में जातीय प्रतिनिधित्व के कानून के आधार पर मुस्लिमों के प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया था। उससे अगले ही वर्ष मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि मंडल ने वायसराय से मिलकर यह अपील की थी कि जाति-बाह्यः दलितों और शूद्रों को जिन्हें यज्ञादि हिंदू कर्मकांडों का अधिकार प्राप्त नहीं है, हिंदू न माना जाए। इससे सवर्ण हिंदुओं के सामने अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा और भी साफ हो गया था। अछूतों को यज्ञोपवीत संस्कार का समर्थन करने वाला शुद्धिकरण अभियान, उसी की प्रतिक्रिया में उपजा था। आरंभ में उसे बहुत प्रसिद्धि मिली थी। ‘शुद्धि’ की रस्म का उपयोग अछूतों के ‘शुद्धिकरण’ के लिए भी किया जाता था। प्रकारांतर में वह अछूतों को ‘प्रायश्चित’ के लिए प्रेरित करता था। उसका अर्थ था कि शुद्धिकरण से पहले अछूतों की स्थिति पापमय थी। शुद्धिकरण के लिए मुंडन, यज्ञ, जनेऊ धारण कराने जैसी रस्में थीं। गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता था। परंतु यज्ञोपवीत के बावजूद अछूतों को बराबरी का अधिकार न मिलने से यह साफ हो गया था कि हिंदुओं के लिए जाति का मसला धर्म से बड़ा है।3 वे समझने लगे कि शुद्धिकरण के माध्यम से अछूतों को आर्यसमाजी बनाकर हिंदुओं के दायरे में लाना सिवाय नंबरों के खेल के और कुछ नहीं है। उससे अछूतों का वास्तविक उत्थान संभव नहीं है। 

इसी बीच एक घटना ऐसी घटी जिससे उनका आर्यसमाज से मन उचट गया। अछूतों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपने गृहनगर मैनपुरी में स्कूल खोलने का फैसला किया। उसके लिए समाज के सभी वर्गों की ओर से दान राशि प्राप्त हुई। उनकी पत्नी दुर्गाबाई के पास आभूषण के नाम पर एकमात्र अंगूठी थी। उन्होंने उसे भी स्कूल के लिए दान कर दिया था। स्कूल के उद्घाटन के अवसर पर वे मैनपुरी पहुंचे। 1912 का वर्ष था। कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय आर्यसमाजी कार्यकर्ताओं की ओर से किया गया। समारोह स्थल पर उन्होंने जो देखा कि उससे वे हैरान रह गए। आर्यसमाज के प्रति मोह एकाएक भंग हो गया। उन्होंने देखा कि समारोह में ऊंची जाति के बच्चों के बैठने के लिए कालीन का इंतजाम था। जबकि अछूत बच्चों को सीधे जमीन पर बिठाया गया था। उसे देखकर अछूतानंद को आर्यसमाज के सिद्धांतों और व्यवहार में साफ अंतर नजर आने लगा। इससे स्वामी अछूतानंद का आर्यसमाज से मोह-भंग होना स्वाभाविक था। 1912 में ही उपर्युक्त घटना के बाद मेरठ में आयोजित एक सभा में उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा थाᅳ

‘आर्यसमाज का शुद्धिकरण अभियान, वैदिक धर्म के नाम पर मुस्लिमों और ईसाइयों से ब्राह्मणवाद को बचाए रखने का प्रपंच मात्र है। उसका दर्शन और ‘शुद्धि’ अभियान अज्ञानी जनता को गुमराह करने वाले, कह सकते हैं ᅳशब्दों की बाजीगरी मात्र हैं। इस तरह आर्यसमाज न केवल इतिहास का दुश्मन है, अपितु सत्य का हत्यारा भी है। उसका एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं, मुसलमानों और ईसाइयों के बीच वैर-भाव को बढ़ावा देना, प्रकारांतर में उन्हें(बहुसंख्यक गैरसवर्णों को) वेदों और ब्राह्मणों का गुलाम बनाए रखना है।’4 

अंततः यह कहते हुए कि ‘अभी तक हम सोचते थे कि आर्यसमाज जाति-आधारित भेदभाव से मुक्त है; यही कारण है कि हम अपनी पूरी शक्ति से उसके लिए काम कर रहे थे, लेकिन हम अंधेरे में थे। मैनपुरी की घटना हमें अपने पैरों पर खड़े होने तथा अपने समाज के भले के लिए काम करने की शक्ति दी है5ᅳ उन्होंने आर्यसमाज को अलविदा कह दिया। उसके बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से अछूतों और वंचितों के लिए समर्पित कर दिया। 

 

हरिहरानंद से अछूतानंद

उस समय तक आर्यसमाज से जुड़े दूसरे अछूत नेता भी समझने लगे थे कि उसका शुद्धि अभियान महज ब्राह्मणधर्म को बनाए रखने का षड्यंत्र है। वह हिंदुओं के शक्तिशाली वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहा है, जिसका उद्देश्य जाति-व्यवस्था का उन्मूलन न होकर येन-केन-प्रकारेण ब्राह्मणों के वर्चस्व की रक्षा करना है। आर्यसमाज छोड़ने की घोषणा के साथ ही स्वामी अछूतानंद ने दलितों का आवाह्न किया कि वे आर्यसमाज द्वारा फैलाए जा रही भ्रांतियों से बाहर निकलें। उसके फलस्वरूप अस्पृश्यों के कई नेता, आर्यसमाज छोड़कर उनके समर्थन में आ गए। 1917 में उन्होंने दिल्ली में देवीदास, जानकीदास, जगतराम आदि नेताओं के साथ मिलकर ‘अखिल भारतीय अछूत महासभा’ की नींव रखी। उसी दौरान उन्होंने उन्होंने ‘अछूत’ शब्द की नई व्याख्या प्रस्तुत की। ब्राह्मणवादी ग्रंथों में अछूत को गंदा और अपवित्र बताते हुए अस्पृश्य कहा जाता था। स्वामी अछूतानंद ने कहा कि अछूत वे हैं जो किसी भी प्रकार की ‘छूत’ यानी अपवित्रता और गंदगी से मुक्त हैं। जो पूरी तरह पवित्र हैं। इसलिए उन्हें अपने भीतर किसी प्रकार की कुंठा या अपवित्रता की भावना रखने की आवश्यकता नहीं है। नैराश्य और हताशा से ऊपर उठकर उन्हें अपने ऊपर गर्व करना चाहिए। यह अछूतपन की एकदम नई व्याख्या थी, जिसके मूल में जातीय स्वाभिमान का भाव था। फलस्वरूप अस्पृश्य स्वामी अछूतानंद के पीछे संगठित होने लगे। 

स्वामी अछूतानंद का अगला लक्ष्य था, जाति का विनाश। वे समझ चुके थे हिंदू धर्म की परिधि में रहते हुए यह कार्य संभव नहीं है। इसलिए 1920 के दशक आरंभिक वर्षों में ही उन्होंने उत्तरप्रदेश में आदि-हिंदू आंदोलन की शुरुआत की थी। उल्लेखनीय है कि ‘आदि-हिंदू’ के ‘हिंदू’ का हिंदू धर्म से कोई संबंध नहीं है। यह भौगोलिक पद है, जिसे अरबी कबीलों ने सिंधु के इस पार रह रहे भारतीयों के लिए प्रयोग किया था। ‘आदि-हिंदू’ के मूल में भारत के ‘मूल निवासी’ का विचार था, जिसे सबसे पहले ज्योतिराव फुले ने प्रयोग किया था। उन्हीं से प्रेरणा लेकर भाग्यरेड्डी वर्मा ने 1913 में अस्पृश्यों के लिए ‘पंचम’ वर्ण की संज्ञा को नकारकर आदि-हिंदू की पहचान दी थी। उनके अनुसार ‘आदि-हिंदू’ आर्यों के आगमन से पहले से ही भारत में रह रहे, यहां के मूलनिवासी तथा समृद्ध सभ्यता के स्वामी थे। 

स्वामी अछूतानंद द्वारा आर्यसमाज पर किए जा रहे हमलों से उसके नेता परेशान थे। 1921 में स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज के प्रचारक पंडित अखिलानंद की ओर से शास्त्रार्थ की चुनौती मिली, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उससे पहले वे ऋग्वेद सहित दूसरे ग्रंथों का अध्ययन कर चुके थे। 22 अक्टूबर 1921 को अखिलानंद और अछूतानंद के बीच शाहदरा दिल्ली की अनाजमंडी में शास्त्रार्थ हुआ। शास्त्रार्थ का मुख्य विषय आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर था। ऋग्वेद में इंद्र द्वारा दस्युओं के किलों के ध्वंस का उल्लेख अनेक स्थान पर हुआ है। अछूतानंद ने उन्हीं उद्धरणों के माध्यम से आसानी से अखिलानंद को परास्त कर दिया। शास्त्रार्थ के दौरान आर्यसमाजी प्रचारक पंडित रामचंद्र, नौबत सिंह, स्वामी दातानंद सहित आर्यसमाज की स्थानीय शाखा के कई प्रचारक और दलित नेता उपस्थित थे। शास्त्रार्थ में विजयी होने पर उन्हें ‘श्री-108’ की उपाधि प्रदान की गई, जिसका प्रस्ताव पंडित रामचंद्र की ओर से आया था। ‘श्री-108’ की उपाधि संत समाज में बड़ी सम्मानित मानी जाती थी। इस उपाधि के धारक व्यक्ति को पुण्यात्मा, दार्शनिक विषयों का पंडित और शास्त्रार्थ का धनी माना जाता था। किसी अछूत को यह उपाधि मिलना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी। उससे भी बड़ी बात थी कि अछूत व्यक्ति द्वारा उच्च जाति के ब्राह्मण को खुले शास्त्रार्थ में पराजित करना। उस घटना को व्यापक प्रसिद्धि मिलना स्वाभाविक था। अछूतानंद की विजय का समाचार श्री देवीदास द्वारा संपादित ‘प्राचीन भारत’ समाचार के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, आदि में उस विजय को लेकर पोस्टर बंटवाए गए। वह दलित मेधा को पहली सार्वजनिक स्वीकृति थी, वह भी वैदिक ज्ञान के क्षेत्र मेें जिसपर ब्राह्मण शताब्दियों से अपना दावा ठोकते आए थे। इस घटना के बाद ही स्वामी हरिहरानंद ने अपना नाम बदलकर स्वामी अछूतानंद रख लिया। इस नाम का प्रस्ताव शास्त्रार्थ की समाप्ति के बाद, जाटव समाज के नेताओं चौधरी जानकी दास, देवीदास और जगतराम की ओर से आया था। 

 

सामाजिक आंदोलन का राजनीतिक विस्तार  

1919 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में ‘कम्यूनल अवार्ड’ लागू किया था। उसके अनुसार धार्मिक संप्रदायों की संख्या के आधार पर उन्हें राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व दिया जाना था। इसलिए हर संप्रदाय अपनी अधिक से अधिक संख्या बताने में लगा था। आर्यसमाज द्वारा चलाया जा रहा शुद्धि आंदोलन भी उसी से प्रेरित था। वह धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक अभियान था। इस पर टिप्पणी करते हुए स्वामी अछूतानंद के सहयोगी रामचरन ने कहा थाᅳ‘1919 के सुधार लागू हो चुके थे….उसके अनुसार प्रत्येक धार्मिक समूह को उसकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाना था। जिसकी जितनी बड़ी संख्या, उसे उतना ही बड़ा प्रतिनिधित्व। उसके बाद से ही जगह-जगह ‘अछूतोद्धार’ के नाम पर सम्मेलन आयोजित किए जा रहे थे।’6   इस तरह 1920 के दशक से ही आर्यसमाज का इस्तेमाल राजनीति के लिए होने लगा था। स्वामी अछूतानंद सहित पढ़े-लिखे अछूत नेताओं पर उसका सकारात्मक असर पड़ा था। वे संगठन की ताकत को समझने लगे थे। 

1923 तक आदि-हिंदू आंदोलन को औपनिवेशिक सरकार की मान्यता मिल चुकी थी। उसे देश में चल रहे दूसरे सुधारवादी कार्यक्रमों के समकक्ष मान लिया गया था। आंदोलन का मुख्य केंद्र कानपुर था। उसका निरंतर विस्तार हो रहा था। इसके साथ-साथ कांग्रेस और उसके नेताओं की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वे अछूतों को हिंदू धर्म के दायरे में रखना चाहते थे। दूसरी ओर आदि-हिंदू के नेता अपने आप को इस देश की प्राचीनतम सभ्यता का उत्तराधिकारी बता रहे थे। उनके अनुसार ब्राह्मण बाहर से आए आर्यों के उत्तराधिकारी थे। उन्हीं दिनों गांधी के छोटे बेटे देवदास ने स्वामी अछूतानंद से हिंदू समाज तथा कांग्रेस की भलाई के नाम पर आंदोलन को रोक देने की अपील की। यही नहीं, उन्होंने स्वामी अछूतानंद को कुछ धन का प्रलोभन भी दिया। इस पर अछूतानंद ने ब्रेड के एक टुकड़े को दिखाते हुए कहा थाᅳ‘मेरे लिए यही पर्याप्त है।’ देवदास गांधी को यह अपमानजनक लगा। क्षुब्ध होकर उन्होंने स्वामी अछूतानंद को ‘जूतानंद स्वामी’ कहना आरंभ कर दिया।’7 गांधी जो लगभग अपने हर भाषण में मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का समर्थन करते थे, के बेटे का ऐसा व्यवहार पूर्णतः अशोभनीय था। लेकिन उसमें अलग कुछ न था। देवदास दलितों के प्रति सवर्ण हिंदुओं के सामान्य व्यवहार का अनुसरण कर रहे थे।

अक्टूबर 1921 में ‘वाल्स के राजकुमार’ एडवर्ड अष्टम, अपने पांच महीने लंबे दौर पर भारत पहुंचे थे। कांग्रेस उनका बहिष्कार कर रही थी। जबकि डॉ. आंबेडकर सहित लगभग सभी बड़े दलित नेता अपनी मांगों को ब्रिटिश सरकार तक पहुंचाने के लिए उसे अच्छा अवसर मान रहे थे। उनका मानना था कि कांग्रेस तथा दूसरे सवर्ण नेता ‘वाल्स के राजकुमार’ का विरोध निहित स्वार्थों के लिए कर रहे हैं। राजकुमार के स्वागत के लिए स्वामी अछूतानंद ने 1922 में दिल्ली में ‘विराट अछूत सम्मेलन’ का आयोजन किया, जिसमें उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। सम्मेलन में देश के कोने-कोने से आए 25000 से अधिक दलित उपस्थित थे। राजकुमार के सम्मान में भाषण देते हुए स्वामी अछूतानंद ने ‘मुल्की हक’(राष्ट्रीय अधिकार) की आवाज उठाते हुए दलितों की दुर्दशा का मामला उठाया। अपने भाषण में दूर-दूर से आए दलितों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा थाᅳ

‘बाहर से आए आर्य हमलावरों ने हमें दबाया हुआ था। उन्होंने हमें गुलामी और छूआछूत की दहलीज पर पटक दिया था। अब हमें अपने दमन के विरुद्ध आवाज उठानी होगी। इस देश का मूल निवासी होने के कारण हमें अपने ‘मुल्की हक’ की मांग करनी होगी। हमें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के बजाए, राजकुमार का स्वागत करना होगा।’8

‘मुल्की हक’ से स्वामी अछूतानंद का आशय था, वे सभी अधिकार जो किसी स्वयंभू देश के नागरिक को प्राप्त होते हैं। जो दलितों को आर्यों के आगमन से पहले स्वाभाविक तौर पर प्राप्त थे। उन्होंने ‘वाल्स के राजकुमार’ एडवर्ड के आगे लिखित प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया था, जिसमें दलितों की 17 मांगें शामिल थीं। उन मांगों का असर यह हुआ कि उसी वर्ष यानी 1922 में औपनिवेशिक सरकार ने दलितों को संयुक्त प्रांत में कहीं भी सभाएं करने का अधिकार दे दिया। सरकारी अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि वे दलितों को समुचित सुरक्षा प्रदान करें। स्वामी अछूतानंद की वह एक और बड़ी जीत थी। ब्राह्मणों शताब्दियों से शूद्रों को ‘क्षुद्र’ कहकर तथा वर्णव्यवस्था से बाहर के लोगों को दास, दस्यु, राक्षस आदि कहकर अपने धर्म से बाहर मानते आए थे। पूरा संस्कृत वाङ्मय इस तरह के किस्सों से भरा पड़ा है। उन्होंने न केवल गैर सवर्णों के पढ़ने-लिखने पर पाबंदी लगाई थी, बल्कि उन्हें उनके सामान्य अधिकारों से भी वंचित किया हुआ था। बदले समय में पहली बार था, जब सवर्ण अल्पसंख्यक होने के भय से गैर सवर्णों को अपने साथ रखना चाहते थे। आर्यसमाज और दूसरे संगठन इसी कोशिश में लगे थे, जबकि दलित उनके साथ जाने को तैयार न थे। अपितु स्वयं को इस देश का मूल निवासी बताकर अपनी स्वतंत्र संस्कृति और सभ्यता के दावे कर रहे थे। बड़ी बात यह कि जिन धर्मग्रंथों को पढ़ने से दलितों को रोका जाता था, जिनके आधार पर ब्राह्मण पांडित्य का दावा करते आए थे, उन्हीं के आधार पर अछूत ब्राह्मणों को विदेशी मूल का ठहरा रहे थे। 

स्वामी अछूतानंद पर कबीर, रविदास सहित भारतीय संतों का गहरा प्रभाव था। किशोरावस्था में अपने कबीरपंथी चाचा मथुरादास को कबीर और रविदास के पद सुनाया करते थे। उन्हीं से उनकी मानस-रचना हुई थी, वह सभी मनुष्यों को एक समान मानती थी। जाति को कबीरादि संत कवियों ने निशाने पर लिया था और अब वह अछूतानंद के भी निशाने पर थी। बस एक अंतर था। प्राचीन संत दुनियादारी के प्रति आसक्त नहीं थे। इसलिए संतोष पर जोर देते थे। कबीर तो रूखी-सूखी खाकर संतोष करने और दूसरे की चुपड़ी रोटी देख जी न ललचाने की बात खुलेआम करते हैं। कुल मिलाकर संत कवियों के लिए आर्थिक असमानता कोई बड़ा मुद्दा न थी। कबीर ने ‘अमरपुरी’ और रविदास ने ‘बे-गमपुरा’ के बहाने सामाजार्थिक ऊंच-नीच और भेदभाव से मुक्त समाज का सपना जरूर देखा था, मगर तत्कालीन परिस्थितियों में वह महज सपना ही था। उनीसवीं-बीसवीं शताब्दी के दलित आंदोलनों की नींव व्यक्ति स्वातंत्र्य और सहभागिता पर रखी गई थी। इसलिए फुले से लेकर स्वामी अछूतानंद तक, दलित नेताओं की प्रमुख मांगें थींᅳछूआछूत का विरोध, दलितों के साथ सम्मान-भरा व्यवहार, समानता और सहभागिता।   

1927 तक आते-आते देश-भर के दलित अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए थे। महाराष्ट्र में डॉ.  आंबेडकर, तमिलनाडु में ई. वी. रामासामी पेरियार, केरल में पोयकाइल योहन्नान अपनी-अपनी तरह से दलितों की मांगों को आगे बढ़ाने में लगे थे। छूआछूत और दलित उत्पीड़न उन सभी के निशाने पर था। उत्तर प्रदेश में यह जिम्मेदारी स्वामी अछूतानंद संभाले हुए थे। कुल मिलाकर पूरे देश के दलित अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए थे। कांग्रेसी नेताओं का कहना था कि इस समय देश के लिए सबसे बड़ी जरूरत आजादी प्राप्त करना है। अछूतों और अंत्यजों के नेता भी आजादी चाहते थे। लेकिन आजादी की उनकी संकल्पना कांग्रेस और दूसरे सवर्ण नेताओं से भिन्न थी। उसी वर्ष कानपुर में हुए ‘आदि हिंदू सम्मेलन’ में स्वामी अछूतानंद ने आजादी की अपनी संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए कहा था कि इस समय देश में, ‘आजादी के वास्तविक हकदार यदि कोई है तो वे अछूत हैं। क्योंकि उन्हें हजारों वर्षों से गुलामी में रखा गया है।’ कांग्रेस द्वारा आजादी की मांग की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि कांग्रेस द्वारा आजादी की मांग केवल समाज के अभिजन तबके, जो पहले से ही विशेषाधिकार प्राप्त है, की स्वार्थपूर्ति तक सीमित है। अछूतों का उस आजादी से कोई संबंध नहीं है। दिसंबर 1927 में दलित जातियों के प्रतिनिधियों की विशेष बैठक हुई थी। उस समय तक साइमन कमीशन के आने की घोषणा हो चुकी थी। बैठक का साइमन कमीशन के सामने दलितों की मांगों तथा अगले सुधारवादी कार्यक्रमों पर चर्चा होनी थी। बैठक की अध्यक्षता एम. सी. राजा(मिलै चिन्ना थंबी पिल्लई राजा) ने की थी। स्वामी अछूतानंद स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। उस सभा में दलित जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र तथा विधायिकाओं में अधिक सीट सुरक्षित करने की मांग की गई थी।

स्वामी अछूतानंद और डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य एक समान था। दोनों पिछड़ी और दमित जातियों के उत्थान के लिए सक्रिय थे। लेकिन दोनों की सीधी भेंट अभी तक नहीं हो पाई थी। यह अवसर 1928 में आया। अवसर था, मुंबई में होने वाला ‘आदि हिंदू सम्मेलन’। भेंट के दौरान दोनों ने एक-दूसरे के कार्यक्रमों की सराहना की। डॉ. आंबेडकर ने स्वामी अछूतानंद से साइमन कमीशन के आगे दलितों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करने का आग्रह किया। दोनों का संबंध आगे भी बना रहा। 30 नवंबर 1930 को साइमन कमीशन कमीशन भारत आया तो स्वामी अछूतानंद ने अपने सहयोगी नेताओं तिलकचंद कुरील, गिरधारीलाल भगत, लक्षमण प्रसाद, किरोड़ीमल खटीक आदि के साथ कमीशन से लखनऊ में मुलाकात की। कांग्रेस साइमन कमीशन का बहिष्कार करने पर तुली हुई थी। स्वामी अछूतानंद ने आरोप लगाया कि कांग्रेस कमीशन के आगे दलितों और पिछड़ों की गलत तस्वीर पेश कर रही है। उन्होंने कांग्रेस पर दलित बस्तियों में नए कपड़े बांटने का आरोप भी लगाया। स्वामी अछूतानंद ने साइमन कमीशन के आगे दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग की। उन्होंने कहा थाᅳ‘हमें ब्रिटिश सरकार की सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है। हम केवल अपने लिए सम्मान और आदर-भाव की इच्छा रखते हैं।’ डॉ. आंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा के अध्यक्ष के नाते साइमन कमीशन से मुलाकात की थी। उन्होंने सभा की ओर से एक मांगपत्र प्रस्तुत किया था, जिसमें दमित जातियों की दुर्दशा का विवरण तथा सभा की ओर से मांगें थीं। दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए स्वामी अछूतानंद द्वारा किए जा रहे अनथक प्रयासों के कारण देश-विदेश में उनकी ख्याति बढ़ती ही जा रही थी। 

दलितों और पिछड़ों का आत्मविश्वास लौटाने के लिए आदि हिंदू अभियान लगातार अपना काम कर रहा था। स्वामी जी का कहना था कि दलित हमेशा ही दलित न थे। बल्कि वे समृद्ध संस्कृति के जन्मदाता रह चुके हैं। आर्यों के आगमन से पहले उनके भी किले थे। एक समृद्ध सभ्यता थी, जिसमें ऊंच-नीच का भेद न था। आर्यों ने न केवल उस सभ्यता को तहस-नहस किया है, अपितु उसके तथ्यों से भी छेड़छाड़ की है। इलाहाबाद में 17 सिंतबर 1930 को आयोजित आठवें ‘अखिल भारतीय आदि हिंदू सम्मेलन’ की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर जोर दिया था। 1930 में लंदन में होने वाली ‘राउंड टेबल कान्फ्रेंस’ में डॉ. आंबेडकर और रतनमालाई श्रीनिवासन को मिले आमंत्रण का समर्थन करते हुए सरकार को तार भेजे थे, जिसमें उन्होंने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का समर्थन किया था। उस टेलीग्राम में उन्होंने ‘राजा-मुंजे समझौता’ का विरोध भी किया था। यह समझौता अछूतों द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग को देश की एकता के लिए खतरा मानता था। गांधी द्वारा दलितों को दिया गया ‘हरिजन’ नाम भी उन्हें स्वीकार्य न था।  

स्वामी अछूतानंद चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार गोलमेज सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर की बात को गंभीरता से ले। इसके लिए उन्होंने अपने समर्थकों से सरकार को पत्र लिखने का आग्रह किया। उनके संकेत मात्र पर हजारों पत्र डॉ. आंबेडकर के समर्थन में संबंधित अधिकारियों तक पहुंचे थे। उसके फलस्वरूप असर ब्रिटिश सरकार ने डॉ. आंबेडकर को शोषित जातियों का प्रतिनिधि मानकर 1932 में ‘कम्यूनल एवार्ड’ को स्वीकृति दी। उसके फलस्वरूप दलितों की अलग मतदान की मांग को स्वीकार लिया गया। यह दलित आंदोलन की ऐतिहासिक विजय और कांग्रेस की सबसे बड़ी पराजय थी। उसके लिए गांधी को आगे आना पड़ा। कांग्रेस का तर्क था कि दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र घोषित होने से हिंदू समाज बंट जाएगा। इससे उसका हिंदू राष्ट्र बनने का स्वप्न भी जाता रहेगा। यह अनोखा तर्क था। कुछ दशक पहले तक ही सवर्ण निचली जातियों को अपने से अलग मानते आए थे। उनके बड़े हिस्से को वे हिंदू मानने से भी इन्कार कर देते थे। मगर बदली परिस्थिति में ऐसा कतई संभव न था।  

‘आदि हिंदू आंदोलन’ लगातार विस्तार ले रहा था। इसके साथ ही स्वामी अछूतानंद की ख्याति भी बढ़ती जा रही थी। उत्तर भारत में वे दलितों के डॉ. आंबेडकर के बाद सबसे बड़े नेता थे। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ‘आदि हिंदू आंदोलन’ को असली समाजवादी आंदोलन मानते थे। स्वामी अछूतानंद और आंबेडकर को वे क्रमशः कार्ल मार्क्स और लेनिन की संज्ञा देते थे। द्विज उनके लिए बुर्जुआ समुदाय था, जबकि आदि हिंदू सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि। ‘आदि हिंदू आंदोलन’ और अछूतानंद की निरंतर बढ़ती ख्याति सवर्ण हिंदुओं, विशेषकर आर्य समाजियों के लिए सिरदर्द बन चुकी थी। इसलिए उन्होंने स्वामी अछूतानंद तथा उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए तरह-तरह की अफवाहें फैलाना आरंभ कर दिया था। कुछ कहते कि स्वामी अछूतानंद ईसाई बन चुके हैं। वे ईसाई संस्थाओं से पैसा लेते हैं। एक दिन वे अपने समर्थकों को भी ईसाई बना देंगे। कुछ आरोप लगाते कि स्वामी अछूतानंद मुस्लिमों के लिए काम कर रहे हैं। एक अफवाह यह भी फैलाई जा रही थी कि स्वामी अछूतानंद को आर्यसमाज विरोधी गतिविधियों के कारण उससे निकाल दिया था। उसी अपमान से आहत होकर वे आर्यसमाज और हिंदुओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन स्वामी अछूतानंद को उसकी कोेई परवाह न थी। वे केवल अपने काम में लगे थे। उनके लिए उनके आंदोलन का लक्ष्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या बदनामी से कहीं बड़ा था। इसके लिए भूखे-प्यासे रहकर भी काम करना पड़े तो पीछे नहीं रहते थे। चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने उनके बारे में लिखा है कि आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में इतने लिप्त रहते थे कि खाने-पीने की सुध न रहती थी। कभी चना-चबैना के भरोसे वक्त बिताना पड़ता तो कभी भूखे भी सोना पड़ता था। मिशन के काम के लिए मीलों पैदल चलने का तो उन्हें अभ्यास था। बावजूद इसके कभी कोई प्रलोभन, कोई सत्ता उन्हें डिगा नहीं पाती थी। अपने लक्ष्य के प्रति वे कितने सतर्क थे, इसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता हैᅳ

आदि हिंदू आंदोलन के प्रचार के सिलसिले में एक बार उन्हें कन्नौज जाना पड़ा। कन्नौज पुराना शहर है। तय किया गया था कि आदि हिंदू आंदोलन के तहत वहां बड़ा कार्यक्रम होगा। हजारों अस्पृश्य उसमें हिस्सा लेंगे। प्रजा की सहानुभूति बटोरने के लिए उन दिनों राजा-महाराजा भी ऐसे आंदोलनों को मदद पहुंचाया करते थे। हालांकि व्यवहार में वे पूरी तरह परंपरावादी होते थे। केवल पैसे के बल पर हर वर्ग पर अपनी धाक जमाना, प्रकारांतर में उसकी सहानुभूति बटोरना उनका मकसद होता था। कन्नौज के कार्यक्रम के लिए तिरवा के राजा की ओर से मदद का प्रस्ताव आया। वह टेंट और स्टेज पर होने वाले खर्च के लिए मोटी रकम देने को तैयार था। अगर राजा पैसे के दम पर दलित समुदायों की सहानुभूति और प्रशंसा अर्जित कर मसीहा बनना चाहता था तो दलितों में भी एक ऐसा वर्ग था जो सम्मेलन के बहाने राजा को खुश करना चाहता था। उस वर्ग ने प्रस्ताव रखा था कि सम्मेलन की अध्यक्षता राजा तिरवा द्वारा कराई जाए। समाचार अछूतानंद स्वामी तक पहुंचा तो मामला अड़ गया। अछूतों के सम्मेलन की अध्यक्षता कोई गैर-अछूत करे, यह उन्हें बिलकुल स्वीकार्य न था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सम्मेलन की अध्यक्षता किसी उपयुक्त अछूत से ही कराई जानी चाहिए। स्वामी जी के विरोध का सुफल यह हुआ कि राजा से सम्मेलन की अध्यक्षता कराने का प्रस्ताव टाल दिया गया। उसके बजाए अध्यक्षता के लिए वयोवृद्ध दलित नेता रामचरन कुरील को चुना गया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                

28 अप्रैल 1930 को स्वामीजी ने ‘आदि हिंदू सामाजिक परिषद’ की अमरावती बरार में बैठक हुई। उस बैठक में उन्होंने खुलासा किया कि कुछ लोग उन्हें मारने की योजना बना रहे हैं। इससे पहले भी अखबारों में ऐसी सूचना प्रकाशित हो चुकी थी। आगरा की एक सभा में उनपर हमला हो चुका था, जिससे वे किसी तरह सुरक्षित बच निकलने में कामयाब रहे थे। लगातार बढ़ रहे हमले स्वामी अछूतानंद की बढ़ती लोकप्रियता और उनके आंदोलन की सफलता का प्रमाण थे। बड़ी बात यह थी कि स्वामी अछूतानंद ने दलित आंदोलन को बड़ा मोड़ दिया था। उससे पहले के दलित उद्धार से जुड़े कार्यक्रम मुख्यतः सामाजिक होते थे। डॉ. आंबेडकर और अछूतानंद के आने से उसमें राजनीतिक लक्ष्य भी जुड़ चुका था। उसका अर्थ था, राजनीति के क्षेत्र में सहभागिता। ‘आदि हिंदू आंदोलन’ के मूल में ही राजनीति थी। उसके अनुसार आदि हिंदू इस देश के पुराने शासक-संचालक थे। वह कांग्रेस को उसके स्वराज का जवाब था। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस स्वराज के माध्यम से राजनीतिक सहभागिता की मांग तो करती थी, लेकिन उसमें समाज के पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी भी सुनिश्चित हो, इसका कोई विचार न था। उन दिनों तक सत्ता के दो प्रमुख दावेदार थेᅳहिंदू और मुसलमान। मुस्लिमों का दावा था कि इस देश पर सात-आठ सौ वर्षों तक उनके पूर्वजों का राज्य रहा है। इसलिए अंग्रेजों को चाहिए कि देश को छोड़ते समय उन्हीं के हाथों में सत्ता सौंपकर जाएं, जिनसे उन्होंने सत्ता छीनी थी। हिंदुओं का दावा था कि वे बहुसंख्यक हैं। देश-दुनिया की प्राचीनतम संस्कृति के वारिस हैं। इस्लाम के आगमन से पहले हजारों वर्षों से देश उन्हीं के अधीन रहा है। इसलिए देश की सत्ता के वही वास्तविक उत्तराधिकारी हैं। 

उनके लिए हिंदुओं का आशय चंद ऊंची जातियों से था। अछूत और शूद्रों को सत्ता में भागीदारी के अयोग्य माना जाता था। मुस्लिमों के प्रतिनिधि मोहम्मद अली जिन्ना थे। गांधी ने दावा किया था कि वे हिंदुओं के एकमात्र प्रतिनिधि हैं। इसपर डॉ. आंबेडकर ने कहा कि अस्पृश्य हिंदू नहीं हैं। उन्होंने अछूतों के प्रतिनिधि के रूप में ही उन्होंने गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेकर उनके लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की थी। आर्यसमाज और कांग्रेस नहीं चाहते थे कि आंबेडकर की योजना सफल हो। ऐसे में स्वामी अछूतानंद ने न केवल खुले मन से डॉ. आंबेडकर का समर्थन किया था, अपितु अपने समर्थकों से कहकर हजारों पर ब्रिटिश सरकार को भिजवाए थे, जिनसे डॉ. आंबेडकर को दलितों का प्रतिनिधि बताया गया था। उसी के फलस्वरूप आंबेडकर की दावेदारी मजबूत हुई थी और गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार उनकी मांग मानने को बाध्य हुई थी। गांधी जी जानते थे कि डॉ. आंबेडकर की पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग के केवल राजनीतिक निहितार्थ नहीं है। यदि वह मान ली जाती है तो सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच हमेशा के लिए गहरी खाई बन जाएगी। उससे डॉ. आंबेडकर की मान्यता जिससे वे अस्पृश्यों को हिंदू मानने से इन्कार करते थेᅳको बल मिलेगा। यह कहने पर कि इससे हिंदू राष्ट्र की संकल्पना ही समाप्त हो जाएगी, डॉ. आंबेडकर का गांधी को उत्तर थाᅳ‘सही मायने में तो भारतीयों का कोई राष्ट्र नहीं है। अभी उसका सृजन किया जाना है।’ उन्होंने आगे कहा था कि ‘राष्ट्र के सृजन का तरीका यह नहीं है कि किसी अलग और विशिष्ट समुदाय का दमन किया जाए। दूसरे अस्पृश्य यदि अस्पृश्य प्रतिनिधि का चयन करता है तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि निर्वाचित प्रतिनिधि उनका वास्तविक प्रतिनिधि होगा। यदि यही सही स्थिति है तो अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था ही अस्पृश्यों के वास्तविक प्रतिनिधित्व की गारंटी हो सकती है।’ 18 मई 1932 को ‘अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन’ उत्तरप्रदेश के कामठी में हुआ। सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से आए सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। जिसमें एक बार फिर दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग पर जोर दिया गया।  

यह बात अलग है कि आगे चलकर गांधी की जिद और डॉ. आंबेडकर पर चौतरफा दबावों के बाद उन्हें पूना समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा और उन्हें स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की अपनी मांग छोड़नी पड़ी थी। पूना समझौते के विरोध में स्वामी अछूतानंद ने सितंबर 1932 में कई प्रदर्शन किए थे। समझौते का विरोध करते हुए उन्होंने देश के विभिन्न भागों की यात्राएं की थीं। उन्हीं दिनों गांधी ने अछूतों को ‘हरिजन’ नाम दिया था। डॉ. आंबेडकर सहित विभिन्न दलित नेताओं और स्वामी अछूतानंद ने उसका तीखा विरोध किया। स्वामी अछूतानंद कवि थे। अपना विरोध दर्शाते हुए उन्हीं दिनों उन्होंने कविता लिखी थी। उस कविता में जहां अछूतों के अतीत के गौरव को याद दिलाया गया था, वहीं उसमें उनकी पीड़ा भी समाई हुई थीᅳ

कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान

अन्त्यज, पतित, बहिष्कृत, पादज, पंचम, शूद्र महान

संकर बरन और वर्णाधम पद अछूत-उपमान

                            ….

हम तो कहत हम आदि-निवासी, आदि-वंस संतान

भारत भुइयाँ-माता हमरी, जिनकौ लाल निशान

आर्य-वंश वारे-सारे तुम, लिये वेद कौ ज्ञान

पता नहीं कित तें इत आये, बांधत ऊँच मचान

….

हम हरिजन तौ तुम हूँ हरिजन कस न, कहौ श्रीमान?

कि तुम हौ उनके जन, जिनको जगत कहत शैतान

स्वामी अछूतानंद भारत के नवजागरण के प्रतीक और सच्चे समाज सुधारक थे। मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ग्वालियर में ‘विराट आदि-हिंदू सम्मेलन’ में भी हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने स्त्रियों के शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी। उन्होंने कहा था कि आदि-हिंदू संस्कृति में स्त्री का सम्मान होता आया है। विधवा विवाह पर रोकथाम, बाल-विवाह हिंदुत्व की कुरीतियां हैं। आदि हिंदूओं में इन बुराइयों के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने जोर देकर कहा था कि आर्यों के आगमन से पहले महिलाओं का समाज में सम्मान होता था। उन्हें शिक्षा दी जाती थी। सम्मेलन में उन्होंने महिलाओं, बच्चों और अछूतों पर अत्याचार करने वाले जमींदारों का सम्मान करने के लिए सरकार की आलोचना भी की थी। पूना समझौते का असर उनके मन-मस्तिष्क पर था। ग्वालियर सम्मेलन के बाद वे बीमार पड़ गए। शरीर लगातार क्षीण पड़ने लगा। अंततः 22 जुलाई 1933 को कानपुर में उन्होंने देह-त्याग निर्वाण का रास्ता पकड़ लिया। उस समय उनकी उम्र मात्र 54 वर्ष की थी। मृत्यु से कुछ दिन पहले जब ‘पूना समझौता’ पर उनकी राय जाननी चाही तो उनका कहना थाᅳ

‘जो हुआ, वह भी काफी अच्छा है। इसे स्वीकार कर लेने में ही बुद्धिमानी है। इससे एक ओर तो महात्मा गांधी के प्राणों की रक्षा हुई, और हम कलंक से बच गए, दूसरे हम अपने बड़े भइयों(हिंदुओं) से मेल-जोल बना रहा। देखना है, अब हिंदू किस तरह अपना प्रायश्चित और आत्मशुद्धि करते हैं। किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि इस समझौते से हमारा सामाजिक और धार्मिक आंदोलन बंद हो जाएगा। उसे तो और जोरों से चलना चलना चाहिए। हमें हिंदुओं के मंदिर में जाने की जरूरत नहीं है। हमारे आत्मदेव का मंदिर समस्त विश्व है और प्रत्येक घट मंदिर है। यह जो कुछ हुआ है, सब हमारे ‘आदि-हिंदू आंदोलन’ का ही फल है।’9  

फुले और आंबेडकर की भांति स्वामी अछूतानंद भी अछूतों और पिछड़ी जातियों के संगठन की कामना करते थे। उनका कहना था कि यदि ये वर्ग एकजुट हो जाएं तो अपने आप में बड़ा समूह होंगे। उन्हें राजनीतिक रूप से परास्त करना असंभव होगा। वे अपनी सरकार स्वयं बना सकेंगे। पिछड़ों और अतिपिछड़ों को फुले की तरह वे भी ‘बहुजन समाज’ कहकर पुकारते थे। जो आज भी प्रासंगिक है। जिसमें भविष्य की सामाजिक न्याय की राजनीति के बीजतत्व छिपे हुए हैं। नेता और मार्गदर्शक के अलावा स्वामी अछूतानंद अच्छे कवि, लेखक और नाटककार भी थे। उनकी छह पुस्तकों में राजा राम न्याय(नाटक), मायानंद बलिदान(जीवनी), पाखंड खंडिनी, अछूत पुकार(दोनों कविता संग्रह) आदि शामिल हैं। शोषित जातियों में जागरूकता लाने के लिए उन्होंने दिल्ली से ‘अछूत’ मासिक पत्र की शुरुआत की थी। पत्रिका ज्यादा दिन न चल सकी। उसके तुरंत बाद उन्होंने ‘प्राचीन हिंदू’ शीर्षक से पत्रिका का आरंभ किया। संयोगवश वह अखबार भी एक वर्ष ही निकल पाया। उसके बाद उन्होंने कानपुर से ‘आदि हिंदू जर्नल’ की शुरुआत की। अपने भाषण के बीच-बीच वे कविता का उपयोग करते थे। लेख के समापन पर उनकी कविता के कुछ पद प्रस्तुत हैं, जिसे उन्होंने 1927 में ‘उत्तर प्रदेश आदि सभा सम्मेलन’ के समापन पर पढ़ा थाᅳ

निसिदिन मनुस्मृति ये हमको जला रही है,

उपर न उठने देती नीचे गिरा रही है

हमको बिना मजूरी, बैलों के संग जोते,

गाली व मार उस पर हमको दिला रही है

लेते बेगार, खाना तक पेट भर न देते,

बच्चे तड़पते भूखे, क्या जुल्म ढा रही है

….

ब्राह्मण व क्षत्रियों को सबका बनाया अफसर

हमको ‘पुराने उतरन पहनो’ बता रही है

दौलत कभी न जोड़े, गर हो तो छीन लें वह

फिर ‘नीच’ कह हमारा, दिल भी दुखा रही है

कुत्ते व बिल्ली, मक्खी, से भी बना के नीचा

हा शोक! ग्राम बाहर, हमको बसा रही है

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. एम. पाटिल, जून-1913, दीनमित्र, गेल ओमवेड ‘कल्चर रिवोल्ट इन कोलोनियल सोसाइटी : नाॅन ब्राह्मन मूवमेंट इन  वेस्टर्न इंडिया, 1873ᅳ1930, पुणे साइंटिफिक सोशलिष्ट एजुकेशन ट्रस्ट’ में उद्धृत पृष्ठ -157.
2. ई. आर. नीव द्वारा संपादित और संकलित, मैनपुरी गजैटियर, संयुक्त प्रांत जिला आगरा और अवध, खंड-10, इलाहाबाद : सुपरिटेंडेंट, गवर्नमेंट प्रेस, उ.प्र. 1910, पृष्ठ 89.
3. केनिथ डब्ल्यू जोन्स, आर्यधर्म : हिंदू काॅसियशनेस इन नाइनटीथ सेन्चुरी पंजाब, नई दिल्ली, मनोहर पब्लिकेशन, 1976, पृष्ठ 310
4. डॉ. अमरजीत द्वारा ‘स्वामी अछूतानंद एंड राइज आफ दलित कानशियसनेस’ लेख से उद्धृत।  
5. उपर्युक्त, मूलतः गुरुप्रसाद मदान: स्वामी अछूतानंद हरिहर : जीवन और कृतित्व, अप्रकाशित पांडुलिपि 1969,
6. अछूतानंद स्वामी जी, इंजीनियर हेमराज फोंसा का आलेख, दलित विजन: http://dalitvision.blogspot.com/2017/06/achhutanand-swami-ji-1879-to-1933-his.html 
7. नंदिनी गोप्तू, दि पाॅलिटिक्स आफ अर्बन पूअर इन अर्ली ट्वंटीथ सेन्चुरी इंडिया, पृष्ठ-157
8. चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, भारतीय मौलिक समाजवाद : सृष्टि और मानव समाज का विकास, आदिहिंदू ज्ञान प्रसारक ब्यूरो, 1941, पृष्ठ 271-272, से डॉ.अमरदीप द्वारा उद्धृत 
9. कंवल भारती, ‘स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ का जीवनवृत’ से उद्धृत :
https://www.forwardpress.in/2019/01/swami-acchutanad-harihari-profile-story-hindi/#_ftn23

सामाजिक न्याय की कसौटी पर ‘स्वामीभक्ति’ और ‘राष्ट्रवाद’ का आकलन

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हिंदी में एक बड़ा ही निर्लज्ज शब्द है—स्वामीभक्ति। निर्लज्ज मैं आज कह रहा हूं। एक जमाने में यह बड़ा ही पुण्यवान शब्द माना जाता था। स्वामीभक्त व्यक्ति का समाज में बड़ा मान-सम्मान और प्रतिष्ठा थी। उसकी गिनती मालिक के सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों में होती थी। स्वामीभक्ति सिखाने के लिए न तो कोई स्कूल था, न इसके लिए कोई अलग से धर्मशास्त्र रचा गया था। फिर भी स्वामीभक्त होना, कुछ लोगों के लिए अत्यंत गौरवशाली होता था। ‘स्वामीभक्ति’ कदाचित जन्मजात गुण था। समाज में कहीं से, कोई भी, ऐसा ‘स्वामीभक्त’ निकल आता, जो अपना सर्वस्व किसी सत्ता अथवा सत्ता-शिखर पर विराजमान व्यक्ति या दरबारियों में से किसी एक को सौंप देता था। उसके बाद स्वामी का मित्र उसका मित्र; तथा स्वामी का दुश्मन उसका दुश्मन बन जाता था। उसका समर्पण इतना प्रबल होता था कि ‘स्वामी’ के हित में यदि निर्दोष व्यक्ति की जान लेनी पड़े; अथवा किसी अपने की बलि देनी पड़े तो भी वह खुशी-खुशी कर्तव्य-पूर्ति का आनंद लेता था। मालिक का विश्वासपात्र होना ही उसकी उपलब्धि थी। यही उसका श्रेय था और यही उसका प्रेय—जिसके लिए वह बड़े से बड़ा बलिदान करने को तत्पर होता था। इस कारण अपने आश्रयदाता की कीर्ति-गाथा रचने वाले कवि, इतिहासकार भी उसके विश्वासपात्रों को नजरंदाज नहीं कर पाते थे। कभी-कभी स्वामीभक्ति का सिलसिला पीढ़ियों तक चलता रहता था। हर ‘स्वामीभक्त’ गर्व से दोहराता था कि उसकी इतनी पीढ़ियां अमुक व्यक्ति तथा उसके परिवार की विश्वासपात्र रही हैं।  

स्वामीभक्त के लिए उसकी ‘स्वामीभक्ति’ ही सब कुछ थी। ईश्वरभक्ति और स्वामीभक्ति में उसके लिए कोई अंतर न था। यद्यपि राजा के आदेशानुसार काम करने वाले सैंकड़ों-हजारों लोग हो सकते थे। ऐसे लोग जो दावा करते हों कि वे ठीक वही करते हैं, जो उनका मालिक कहता है। लेकिन इतने भर से वे स्वामीभक्त नहीं हो जाते थे। इसलिए कि स्वामीभक्ति, स्वामीभक्त व्यक्ति द्वारा संपन्न कार्य के बजाय, उस समर्पण एवं विश्वास में होती है, जिसमें एकमात्र स्वामी की इच्छा सर्वोपरि हो। बदले में स्वामीभक्त को क्या मिलता था—यह वर्णनातीत है। गूंगे के गुण के समान—सच्चा स्वामीभक्त ही उसे महसूस कर सकता था। ‘अमुक व्यक्ति मेरा भरोसेमंद है’—ये चंद शब्द स्वामीभक्त द्वारा आत्ममुग्ध जीवन जीने के लिए पर्याप्त होते थे। अपने ‘मैं’ को मारकर, पूरी तरह स्वामी का हो जाना, अपना अच्छा-बुरा कुछ भी न सोचना, स्वामी के हित को अपना हित मान लेना, उसके प्रत्येक आदेश को सिर-माथे लेना, अच्छाई-बुराई, नीति-अनीति पर कतई विचार न करना, विवेक और तर्कबुद्धि को मालिक के नाम पर गिरवी रख देना, स्वामी दिन कहे तो दिन, रात कहे तो रात बताना—ये स्वामीभक्ति के विशिष्ट लक्षण माने जाते थे। समाज में इन गुणों की इज्जत चाहे हो या न हो, स्वामीभक्त के लिए यही सबकुछ होते थे। वह केवल अपने ‘स्वामी’ के लिए जीता था। जीवन देकर भी स्वामी के हित की रक्षा करने को अपना सौभाग्य मानता था। बदले में जो भी मिलता, उसी को पुण्यफल मानकर ग्रहण कर लेता था। अपने मालिक या राज्य के प्रति सब कुछ बलिदान कर देने की भावना अवश्य ही उदात्त एवं सराहनीय मानी जा सकती है। इसीलिए इतिहास उसे महिमामंडित करता आया है। कमी यह थी कि मालिक के प्रति समर्पण और बलिदान के समय स्वामिभक्त मनुष्य अपने विवेक तथा कार्य के औचित्य को एकदम भुला देता था। स्वामीभक्त व्यक्ति की तत्कालीन समाज में क्या इज्जत थी? जनसाधारण उसे किस प्रकार देखता था? इसका कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। तथापि लगता तो यही है कि स्वामीभक्त की सारी मान-मर्यादा और सम्मान स्वामी के पद-गौरव में विलीन होकर रह जाते थे। इस बात को स्वामीभक्त भी समझता था, मगर इससे उसकी स्वामीभक्ति पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। 

स्वामीभक्ति का एक चलताऊ नाम है—नमकहलाली। लेकिन उसमें स्वयंस्फूर्त्त स्वामीभक्ति की भावना नहीं है। ‘तुमने उनका नमक खाया है, इसलिए उनके साथ दगा करने की सोचना भी मत’ या ‘मैंने उसका नमक खाया है, मैं भला उसको धोखा कैसे दे सकता हूं’ कहकर नमकहलाल, व्यक्ति-विशेष के साथ कभी छल न करने को प्रतिबद्ध हो जाता था। लेकिन नमकहलाली का प्रत्यय सामान्यतः आमजन के लिए ही था। शिखरस्थ वर्गों में ‘हम पियाला—हम निवाला’ बनने के बावजूद वर्चस्व का संघर्ष चलता रहता था। तब वह कूटनीति माना जाता था। सीधे तौर पर कहें तो जनसाधारण पर नमकहलाली के नाम पर स्वामीभक्ति सायास थोप दी जाती है। सवाल है कि नमक ही क्यों? बड़े से बड़ा व्यक्ति हमेशा खैरात तो बांटता नहीं था। बल्कि भिखारियों और फकीरों से तो, जिनका जीवन पूरी तरह खैरात पर पलता था, नमकहलाली की अपेक्षा की ही नहीं जाती थी। नमकहलाली की अपेक्षा आमतौर पर ऐसे लोगों से की जाती थी, जो सेवा में रहते थे। जिन्हें उनका मालिक नौकरी के बदले मात्र नमक जितना देता था। उस ‘नमक’ जितनी पगार के लिए नमकहलाल ने अपनी देह का कितना नमक बहाया है, इस बात को वह न तो खुद समझ पाता था, न उसके आसपास रहने वालों को समझ आती थी। नमक की कीमत चुकाने में अकसर पीढ़ियां गुजर जाती थीं। बावजूद इसके, मजबूरी में ही सही स्वामीभक्ति दर्शाने वाले लोग कम न थे। इनमें अधिकांश समाज की पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों के लोग होते थे, जो अपनी आजीविका के लिए ‘स्वामी’ पर निर्भर थे। स्वामीभक्ति दर्शाना एक तरह से आजीविका को सुरक्षित रखने का माध्यम भी था। एक बात और, जिन दिनों यह शब्द बना या यूं कहो कि जब से स्वामीभक्ति को आदर्श माना गया—उन दिनों सत्ता और संसाधनों में जनसाधारण की हिस्सेदारी नमक जितनी भी नहीं थी। जनसाधारण के पास कुल पूंजी के नाम पर, केवल उसकी देह होती थी। अपने स्वामी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए सिवाय देह के वह कुछ और दांव पर लगा ही नहीं सकता था। इसलिए स्वामीभक्त बने रहना कुछ लोगों के लिए उनकी मजबूरी भी थी।

उन दिनों पृथ्वी की समस्त निधियों और संपदाओं का स्वामी ब्राह्मण को माना जाता था। उसका कोई स्वामी न था। वह अपना स्वामी स्वयं होता था। दूसरे पायदान पर राजा यानी क्षत्रिय था। उसका दायित्व था, ब्राह्मण के नाम पर, उसके मार्गदर्शन में उसकी संपदाओं की सुरक्षा और संवर्धन करना। तीसरे में व्यापारी-वर्ग आता था। उसके कराधान से राज्य का खर्च चलता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों के पास ‘नमक’ की अफरात थी। बावजूद इसके स्वामीभक्त शब्द उन तीनों के लिए नहीं बना था। ये तीनों खुद ‘स्वामीवर्ग’ से थे। उनमें वर्चस्व के लिए स्पर्धा चलती रहती थी। एक-दूसरे को नीचा दिखाकर आगे निकलने के लिए षड्यंत्र भी होते रहते थे। स्पर्धा ऊपर के तीन वर्गों में हो तो प्रत्येक वर्ग स्वयं को श्रेष्ठतम मानकर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगा रहता था। लेकिन किसी कारणवश, हालांकि इसकी संभावना बहुत कम थी, यदि चौथा वर्ग मुकाबले में आ जाए तो  ऊपर के तीनों वर्ग अपने सारे वैर-भाव बिसराकर एक हो जाते थे। इस चौथे वर्ग के साथ मुकाबले जैसी स्थिति न बने, लोग सहज भाव के साथ अपने शूद्रत्व को धारण करें—‘स्वामीभक्ति’ शब्द ऐसे अवसर के लिए ही बना था। 

‘शूद्र’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘क्षुद्र’ से हुई थी। ‘क्षुद्र’ यानी ओछा, यानी नाकुछ। समाज के एक हिस्से को, जो संख्या में कुल जनसंख्या के तीन-चौथाई से भी अधिक था, ‘शूद्र’ कहकर पायदान में सबसे नीचे ढकेल दिया गया था। उसके कुछ लोग वर्ण-व्यवस्था के भीतर थे, कुछ बाहर। उन्हें पक्के घर बनाने का अधिकार नहीं था। शरीर वे केवल आधा ढक सकते थे। रहने के लिए उन्हें बस्ती से बाहर स्थान दिया जाता था। नए वस्त्र पहनना निषिद्ध था। स्वामी जो उतार दे, वही पहनना उनके लिए गौरव की बात थी। नाम वे ऐसे रखते थे जिनसे दरिद्रता झलकती हो। सार्वजनिक मार्गों पर चलते हुए जिन्हें सिर झुकाकर निकलना पड़ता था। अपनी ही बस्ती में यदि चारपाई या चौपाल पर बैठे हों और रास्ते से सवर्ण गुजरे तो उसके सम्मान में खड़ा न होना धृष्टता मानी जाती थी। धन जुटाने के अवसर नहीं थे। फिर भी अपने पुरुषार्थ और परिश्रम से यदि शूद्र कुछ धन जुटा ले तो ब्राह्मण को अधिकार था कि उसे हड़प लें। शिक्षा प्राप्त करने की हसरत के साथ शूद्र यदि गुरुकुल पहुंच जाए तो उसे एकलव्य की भांति अपमानित करके बाहर निकाल दिया जाता था। या फिर कर्ण की तरह आजीवन शाप ढोना पड़ता था। धर्मशास्त्रों को पढ़ने की चाहत करें तो शंबूक की भांति गर्दन उड़ा दी जाती थी। सुनने की कोशिश करें तो कान में सीसा उंडेल दिया जाता। सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय माना जाता था। धर्म मनुष्य की पूरी जीवनचर्या, उसके समस्त कार्यकलापों को नियंत्रित करता था। सांस्कृतिक अधिपत्य के औजार के रूप में ‘सीसा’ का इस्तेमाल भारत की अकेली और मौलिक खोज थी। उसका इस्तेमाल उन कानों को बंद करने के लिए किया जाता था, जिनमें वेदादि धर्मग्रंथों के शब्द जा घुसे हैं। यह इसलिए आवश्यक था ताकि ब्राह्मण धर्मशास्त्रों की मनमानी व्याख्या कर जनसाधारण को छलते रहें। उनका गुरुत्व बना रहे और बौद्धिक वर्चस्व को किसी भी प्रकार की चुनौती पेश न हो। अमानवीय और असमानताकारी होने के बावजूद यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकी रही तो इसलिए कि सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से अनुकूलन के चलते पीड़ित वर्ग ने स्वयं इसे स्वेच्छापूर्वक अपना लिया था। 

जब सब कुछ ऊपर से तय होता हो, समस्त लाभ-कामनाएं शीर्षस्थ वर्ग के लिए की जाती हों—ऐसे में जनसाधारण द्वारा जीवन को ‘आभार’ की तरह लेना स्वाभाविक ही था। इसलिए लोग स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को भुला बैठे थे। अधिकांश ने मान लिया था कि उनका जन्म ही सेवाकर्म के लिए हुआ है। उसी में वे अपने जीवन की छोटी-मोटी खुशियां तलाशते रहते थे। और वह खुशी थी, खाना-पीना, समाज के प्रभुवर्ग के लिए कामकाजी हाथ पैदा करना और मर जाना। कई बार समाज की जातीय संरचना उनकी मामूली खुशियों पर भी भारी पड़ जाती थी। अछूत कही जाने वाली जाति का व्यक्ति यदि गलती से भी किसी सछूत को छू ले तो उसके लिए कड़े दंड की व्यवस्था थी। उसे चुनौती देने के लिए कोई अदालत न थी। जाहिर है, स्वामीभक्ति केवल व्यक्ति विशेष का मसला नहीं था—अपितु जातीय शोषण को महिमा-मंडित करने की सोची-समझी चाल थी। जाति-केंद्रित व्यवस्था में उसे सर्वसम्मति से स्वीकार लिया गया था। निचली जाति के सदस्यों से उम्मीद की जाती थी कि वे अपने अधिकार एवं खुशियों को भुलाकर, उच्च जाति के सदस्यों के प्रति सम्मान, सदाशयता, सत्यनिष्ठा एवं स्वामीभक्ति का प्रदर्शन करें। इस व्यवस्था के अनुसार यदि बेगार भी करनी पड़े तो खुशी-खुशी करता था।  

असल में वह परिवेश ही ऐसा था जो लोगों के दिलो-दिमाग को निष्क्रिय कर देता था। उनके सोचने-समझने की शक्ति को छीन लेता था। स्वामीभक्ति को समर्पित व्यक्ति जहर को अमृत समझने लगता था। इसे समझने के लिए पन्ना धाय के जीवन को देखा जाता है। पन्ना राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह की दाई थी। उसका अपना बेटा भी था—चंदन। पन्ना ने दोनों का दूध पिलाकर बड़ा किया था। राणा सांगा के बाद बनवीर ने राज-परंपरा से विद्रोह कर दिया। बनवीर राणा सांगा के भाई का पुत्र था। उसकी मां एक दासी थी। उस समय की परंपरा के अनुसार राजा अपनी वासना पूर्ति के लिए राजमहल में मौजूद दासियों के साथ सो तो सकते थे, परंतु उनका उत्तराधिकारी विवाहिता पत्नी द्वारा उत्पन्न संतान में से ही होता था। राजा के महल में ऐसी स्त्रियां भी होती थीं, जिन्हें राजा हरण करके ले आते थे, या पसंद आने पर रंगमहल की शोभा मान ली जाती थीं। उन्हें विवाहिता स्त्री के अधिकार प्राप्त नहीं थे। महत्त्वाकांक्षी बनवीर ने राणा के वंशजों को एक-एक कर मौत के घाट उतार दिया। रह गया बस उदय सिंह जो पन्ना धाय के संरक्षण में था। एक दिन नंगी तलवार लिए वह पन्ना के महल में भी आ धमका। पन्ना को उसकी पूर्वसूचना मिल चुकी थी। उसने उदय सिंह को बांस की टोकरी में सुलाकर, झूठी पत्तलों से ढककर बाहर भेज दिया और अपने बेटे चंदन को उसके पलंग पर सुला दिया। बनवीर ने एक ही झटके में चंदन की हत्या कर दी। पन्ना खड़ी, चुपचाप देखती रही। 

इसी ‘त्याग’ के लिए इतिहास पन्ना को महिमा-मंडित करता आया है। उसके बलिदान को लेकर न जाने कितने ग्रंथ और लोककाव्य रचे गए हैं। वर्षों तक पन्ना धाय को स्वामीभक्ति और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। राजस्थान में आज भी यही स्थिति है। पन्ना दासी थी। परिस्थितिवश उसे उदय सिंह को अपना दूध पिलाना पड़ा था। बनवीर भी दासी-पुत्र था। पन्ना यह भी सोच सकती थी कि बनवीर की मां और उसकी त्रासदी एक समान है। कि राज-पुरुष की संतान होने के बावजूद बनवीर जिन अधिकारों से वंचित है, स्वयं उसके पुत्र को भी उन अधिकारों से वंचित रहना पड़ेगा। कि बनवीर का आक्रोश स्वाभाविक है, अतएव उसका साथ देकर वह व्यवस्था को चुनौती दे सकती है। वह सोच सकती थी कि राज्य यदि समाजीकरण की प्रक्रिया में लोगों द्वारा गढ़ी गई संस्था है तो उसका अधिकार किसी परिवार या वंश परपंरा के अनुसार क्यों तय होना चाहिए! अनपढ़ और सामंती संस्कारों के बीच पली-बढ़ी पन्ना यह नहीं सोच पाती। वह वही करती है जो वर्चस्वकारी संस्कृति ने उसे सिखाया था। कि राज करना केवल राजा और उसके उत्तराधिकारियों का अधिकार है। कि राज करने वाले लोग दैवी कृपा से संपन्न होते हैं। बाकी लोगों का कर्तव्य है कि इस अधिकार का सम्मान करें। खुद को केवल सेवा-भाव द्वारा संतुष्ट रखें। वर्चस्वकारी संस्कृति की रक्षा के लिए अपने मन-प्राण समर्पित कर दें।

पन्ना ने जो किया वह उस समय का युग-संस्कार था, जिसे वर्चस्वकारी संस्कृति के निर्माता और संरक्षकों ने बनाया हुआ था और जिसे वे युगों से बचाते आए थे। पन्ना ने किया वह अनोखा भले लगे, स्वामीभक्ति का  अकेला कृत्य नहीं था। समाज के निचले वर्ग उच्च वर्गों की समृद्धि एवं सुरक्षा हेतु शताब्दियों से समर्पित होते आए हैं। वैसी मानसिकता से अनुकूलित लोग ही पन्ना धाय के कृत्य को ‘बलिदान’ कहकर महिमामंडित करते आए हैं। आधुनिक चेतना से संपन्न व्यक्ति पन्ना के निर्णय को लेकर सवाल कर सकता है। क्या मां होने के नाते पन्ना का चंदन के प्राणों पर भी अधिकार था? क्या एक राजकुमार के प्राण तथा सामान्य व्यक्ति के प्राण के मूल्य में कोई अंतर हो सकता है? क्या बनवीर का आक्रोश एकदम वृथा था? लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी जन्मदात्री मां को वाल्सल्य और त्याग की प्रतिमूर्ति माना जाता है। लेकिन इससे किसी मां को उसकी संतान के प्राणों पर अधिकार नहीं मिल जाता। बावजूद इसके शताब्दियों से पन्ना धाय को गौरवान्वित किया जाता रहा है। पन्ना का आचरण तत्कालीन गैरबराबरी वाले समाज और संस्कृति में स्वामीभक्ति की पराकाष्ठा है, जो कुछ वर्गों के सत्ता एवं संसाधनों पर एकाधिकार के दावे को पुष्ट करता है।

जब तक राजशाही रही, स्वामीभक्ति को खूब फलने-फूलने का अवसर मिला। मगर लोकतंत्र के उदय के साथ उसपर संकट मंडराने लगा। बदले समय में राजा-रानी और उनकी गाथाओं की चमक फीकी पड़ी तो ‘स्वामीभक्ति’ की अवधारणा भी अप्रासंगिक होने लगी। बड़े अर्थों में उसे नए चलन में ‘स्वामीभक्त’ के स्थान पर ‘चापलूस’ और ‘चमचा’ जैसे  शब्दों का प्रचलन बढ़ता गया। ये शब्द पहले भी थे, मगर सार्वजनिक जीवन में इनका उपयोग परिहासजनक स्थिति में—प्रायः कमजोर के लिए किया जाता था। शक्तिशाली के संदर्भ में ‘स्वामीभक्त’ का ही प्रचलन था। शायद इसलिए कि ‘स्वामीभक्ति की अपेक्षा ‘चमचागिरी’ बहुत हल्का शब्द था। उसमें स्वामीभक्ति का विकल्प बनने की योग्यता नहीं थी। 

उस दौर में सत्ता राजा तथा उसके गिने-चुने दरबारियों के अधीन होती थी। जनता राजनीतिक शक्ति से विहीन होती थी। इसलिए उस समय ऐसे स्वामीभक्तों की आवश्यकता पड़ती थी, जिनके माध्यम से राजसत्ता अपने वैभव और मेहरबानियों का प्रदर्शन कर सके। जो राजसत्ता का गुणगान करते हुए उसके पक्ष में माहौल बनाने का काम करें। लोकतंत्र में सरकार बनाने की ताकत जनता को हस्तांतरित हो चुकी थी। उसके फलस्वरूप नागरिकों में अधिकार चेतना में भी विस्तार हुआ था। अतएव सर्वसत्तावादियों को, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी अपने अधिपत्य को सुरक्षित रखना चाहते थे—स्वामीभक्ति की परंपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए, नए युगबोध के अनुकूल ऐसे शब्द की आवश्यकता थी, जो देखने-सुनने में थोड़ा आधुनिक प्रतीत हो, जिसमें स्वामीभक्ति जैसा ही आभासी आदर्श और गौरव की प्रतीति हो, इसके साथ-साथ जिसमें ठीक वैसा ही नशा हो जैसा स्वामीभक्ति में है; या जिसे ‘सम्मानित’ नशे के रूप में पेश किया जा सके। मुखर अभिव्यक्तियों के दौर में हालांकि ऐसा कोई सर्वमान्य शब्द मिलना आसान भले न हो, मगर मुश्किल भी नहीं था। बदले समय के अनुरूप स्वामीभक्ति के मुकाबले जिस शब्द को प्राथमिकता दी वह था—‘राष्ट्रवाद’। राष्ट्रवाद चूंकि राजनीतिक संकल्पना है, और जाति-भेद से ग्रस्त भारतीय समाज में विशुद्ध राजनीतिक संकल्पनाएं सर्वसत्तावादियों के मंसूबों को पूरा करने की दिशा में अपर्याप्त मान ली जाती हैं, इसलिए ‘राष्ट्रवाद’ को हमारे यहां ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में थोपा जा रहा है।

अब हम इस नई अवधारणा की पृष्ठभूमि पर विचार करेंगे। दरअसल, नए विचारों के उदय के साथ इस स्थापना को स्वीकृति मिली थी कि राज्य नागरिकों की रचना है। मनुष्य ने उसे अपने सुख और सुरक्षा के लिए गढ़ा है, इसलिए उसको नागरिकों के प्रति कल्याणकारी होना चाहिए। लेकिन जहां राज्य के नागरिकों के प्रति कुछ दायित्व हैं, वहीं नागरिकों के भी राज्य के प्रति कर्तव्य हैं। राज्य और नागरिकों के सहसंबंधों को समझने की पहल अरस्तु बहुत पहले कर चुका था, तथापि उसपर सही मायने में विचार सोलहवीं शताब्दी के बाद ही संभव हो पाया। थॉमस हॉब्स, ग्रीन, जॉन लॉक, रेने देकार्त्त, रूसो, मिल, बैंथम, इमानुअल कांट, टॉमस पेन, थॉमस जेफरसन आदि चिंतकों ने राज्य और मनुष्य के संबंधों को परिभाषित किया था। कालांतर में उसी के आधार पर आधुनिक राज्य की नींव पड़ी। उसके मूल में जहां राज्य की गरिमा को प्राथमिकता दी गई थी, वहीं नागरिकों के कर्तव्यों एवं अधिकारों को भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। 

यह ठीक है कि परंपरागत राजनीतिक दर्शनों में भी प्रजा-कल्याण पर जोर दिया जाता था। उन दिनों उसी राजा को श्रेष्ठ माना जाता था जो राज्य की सुरक्षा के साथ-साथ प्रजा के कल्याण पर भी ध्यान दे। प्रजा के सुख में अपना सुख देखे। श्रेष्ठ राजा में क्या गुण होने चाहिए, इस बारे में ‘अर्थशास्त्र’ कहता है—‘राजा का सुख प्रजा के सुख में निहित है। राजा के सुख में प्रजा का सुख निहित नहीं होता। जो स्वयं को प्रिय हो, उसमें राजा का हित नहीं है, बल्कि जो प्रजा को प्रिय लगे उसी में रजा का हित है’(अर्थशास्त्र 1/19)। अर्थशास्त्र के अलावा ‘महाभारत’ और ‘शुक्रनीति’ में भी राजनीतिक दर्शन पर विचार हुआ है। उस व्यवस्था की कमजोरी थी कि उसमें प्रजा और राजा के बीच संवाद का कोई मजबूत तंत्र न था। कुछ कहानियों में राजा या उसके मंत्रियों को भेष-बदलकर राज्य की स्थिति का जायजा लेते हुए पाते हैं। प्रजा चाहती क्या है? राजा द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों से वह संतुष्ट है अथवा असंतुष्ट? इसे जानने-समझने के लिए कोई मजबूत तंत्र न था। चाणक्य हालांकि प्रजा की मनोस्थिति को समझने के लिए राजा को गुप्तचर रखने की सलाह देते हैं। लेकिन उसके पीछे प्रजाकल्याण की भावना कम, राजा को षड्यंत्रों से बचाए रखने की वांछा ही प्रबल थी। दूसरे राजपद के साथ अनेक महत्त्वाकांक्षाएं जुड़ी होती थीं। उनमें से एक राज्य की सीमाओं का विस्तार भी था। राजाओं का बड़ा समय सीमाओं के विस्तार हेतु पराक्रम दिखाने अथवा विद्रोहों को दबाने में गुजर जाता था। आमतौर पर राजा के बदलने के साथ राज्य की प्राथमिकताएं भी बदल जाया करती थीं। चापलूस दरबारियों से घिरे राजा लोककल्याण के कार्यक्रमों को प्रजा पर अपनी कृपा मानने लगते थे। 

बदले परिवेश में लोक-कल्याण को वरीयता देना, राज्य के गठन का प्राथमिक उद्देश्य था। पहले राज्य को राजा की निर्मिति माना जाता था। बदली मान्यता में उसे नागरिकों का सृजन मान लिया गया। आज राज्याध्यक्ष निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। यदि वह नागरिक अपेक्षाओं पर खरा न उतरे तो उसे बदल देने का अधिकार भी जनता को प्राप्त है। ऐसे में ‘स्वामीभक्ति’ का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक है। यद्यपि किस्से-कहानियों में वह आज भी जिंदा है, तथा उसके महत्त्व को पुनर्स्थापित करने के प्रयत्न भी जारी हैं। प्राचीन कथानकों को लेकर ऐसे ग्रंथ रचे जा रहे हैं, जिनसे स्वामीभक्ति का महिमा-मंडन होता हो। सच तो यह है कि समाज के एक हिस्से का अतीतमोह उसे बार-बार प्राचीन इतिहास और संस्कृति की ओर खींच ले जाता है। हर स्थिति में अपने स्वार्थ को आगे रखने वाले उस वर्ग की धारणा है कि आजादी के बाद भारतीय समाज और राजनीति में आए परिवर्तन अस्थायी हैं। धर्म और संस्कृति की मदद से आमजन को फुसलाकर, परिवर्तन-चक्र को वापस किया जा सकता है। लोकतंत्र की आड़ में ऐसी कोशिशें लगातार होती रही हैं। संविधान की सौगंध उठाने वाले राजनीतिक दल भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इसमें सहयोगी बन जाते हैं।

संवैधानिक व्यवस्थाओं में जहां अधिकारों एवं कर्तव्यों की लिखित व्यवस्था हो, परंपरागत ‘स्वामीभक्ति’ को हेय मान लिया जाता है। लोकतंत्र व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करता है। परिणामस्वरूप ‘स्वामीभक्ति’ जिसने कुछ खास वर्गों को शिखर पर बनाए रखा है—का दौर औपचारिक तौर पर लगभग खत्म हो चुका है। मगर शासक वर्ग का काम बिना उसके नहीं चलता। वह अपने वर्चस्व को लगातार कायम रखना चाहता है। इसके लिए उसे भरोसेमंद लोगों की जरूरत पड़ती है। ऐसे नागरिकों की आवश्यकता पड़ती है जो अपनी निजी महत्त्वाकांक्षाओं को सत्तावर्ग की महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दें। कुछ सीमा तक यह काम नौकरशाही भी करती आई है। उसे सत्ताधारी वर्ग, वह चाहे जिस रास्ते से सत्तासीन हुआ हो—के प्रति ईमानदार रहने की शिक्षा दी जाती है। किंतु लोकतंत्र में जहां निश्चित अवधि के बाद जनता के समर्थन की आवश्यकता पड़ती है—सत्ता में बने रहने के लिए केवल नौकरशाही का समर्पण पर्याप्त नहीं होता, अपितु ‘राष्ट्रवाद’ जैसी लोकलुभावन संकल्पनाओं की भी जरूरत पड़ती है। उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को व्यक्तिगत अस्मिताओं पर वरीयता दी जाती है। नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी पहचान को राष्ट्र की पहचान में विलीन कर दें। राष्ट्रीय गौरव और मान-सम्मान के लिए यथासंभव बलिदान देने को तत्पर हों। उन्हें लगातार यह विश्वास दिलाया जाता है कि वर्तमान व्यवस्था तथा उसको चला रहे लोग ही सर्वाधिक श्रेष्ठ, ईमानदार और विश्वसनीय हैं। प्रकारांतर में राष्ट्रवाद समाज को दो वर्गों में बांट देता है। पहले वर्ग में सत्ता-लाभान्वित, विशेषाधिकार प्राप्त लोग होते हैं, जो येन-केन-प्रकारेण सत्ता से चिपटे रहना चाहते हैं। दूसरी ओर जनसाधारण, जिनसे उनकी राष्ट्रीय पहचान के बदले, यथासामर्थ्य त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है।

‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा पुरानी है। इस पद का सर्वप्रथम प्रयोग, 18वीं शताब्दी में जर्मन दार्शनिक जॉन गाटफ्रेड हर्डर ने किया था। हर्डर ने राष्ट्रवाद को समूची मानवता के संदर्भ में देखा था। उसका कहना था कि राष्ट्र केवल साझे इतिहास, भाषा, संस्कृति, नस्ल, धर्म और भौगोलिक क्षेत्र से बनता है। वह नागरिकों के गर्व करने की चीज है। विश्व अनेक राष्ट्रीयताओं का समुच्चय है। क्षेत्रीय विशेषता होने के बावजूद राष्ट्रवाद में ऐसा कुछ नहीं है जो दूसरी राष्ट्रीयताओं से श्रेष्ठतर दर्शाता हो—‘किसी देश द्वारा अपनी ही बढ़ाई करना, घमंड का मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन है।’ ‘राष्ट्र क्या है?’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने कहा था कि राष्ट्र, ‘एक घना जंगल है जिसमें अच्छे और बुरे दोनों तरह के पौधे होते हैं।’ हर्डर की परिभाषा के अनुसार भारतीय राष्ट्रवाद की क्या स्थिति है? इसे समझना आसान नहीं है। क्योंकि भारत में इतिहास, भाषा एवं संस्कृति के क्षेत्र में अनेक विविधताएं हैं। विद्वान भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं का उभार उनीसवीं शताब्दी के आरंभ से मानते आए हैं। यदि गहराई से सोचें तो वह कालखंड दो समानांतर घटनाओं का साक्षी था। पहला, भारत के निचले वर्गों में शिक्षा के प्रति चेतना का उभार। दूसरा, औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की छटपटाहट। 

यदि आप सोचें कि ये दोनों घटनाएं भारतीय राष्ट्रवाद के विस्तार में समानरूप से सहायक थीं, तो आप पूरी तरह गलत होंगे। दरअसल भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जिसे हजारों वर्षों से दबाकर रखा गया था। जो पीढ़ियों से शिक्षा, स्वतंत्रता, मान-सम्मान सहित सामान्य प्राकृतिक अधिकारों से भी वंचित था। चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके मनुष्य होने के अहसास को पुनर्जीवित किया था, उनके लिए समानता और शिक्षा की राह प्रशस्त की थी। अतएव भारतीय समाज का वह बहुसंख्यक हिस्सा, औपनिवेशिक शासन को अपने लिए अवसर के रूप में देखता था। ऐसे में राष्ट्रवाद बहुजन चेतना का हिस्सा बन ही नहीं सकता था। उनके लिए सामाजिक न्याय, राष्ट्रवाद से कहीं बड़ा मुद्दा था। दूसरे स्वाधीनता आंदोलन में भी सामाजिक यथास्थितिवादी, बुर्जुआ ताकतों का वर्चस्व था। नए भारत को वे अपने वर्गीय सोच, जो प्रकृति से सांप्रदायिक और जातिवादी था—के अनुसार ढालना चाहती थीं। यही कारण है कि बहुजन समुदाय राष्ट्रवादी भावनाओं के उभार को अपने हितों के लिए घातक मानता रहा। कुछ सीमा तक आज भी मानता है, क्योंकि आजादी से उसकी जो अपेक्षाएं थीं, वे आज भी स्वप्न तक सीमित हैं। 

दूसरी घटना; यानी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की छटपटाहट की परिणति 1857 के स्वाधीनता संग्राम के रूप में हुई थी। उस समय उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंद था। बड़ी बात यह थी कि हिंदू और मुसलमान भारत के दो बड़े धार्मिक समूह, उस समय अंग्रेजों के विरुद्ध कंधे से कंधा मिलाकर, साथ-साथ खड़े थे। इसी आधार पर अधिकांश विद्वान 1857 के स्वाधीनता संग्राम को भारत में राष्ट्रवादी चेतना के उभार के रूप में देखते हैं। लेकिन हर्डर ने राष्ट्रवाद की जो कसौटी तय की है, उसपर 1857 की घटना खरी नहीं उतरती। 1857 के विद्रोह की शुरुआत सैनिक विद्रोह से हुई थी। उसके मूल में धर्मिक भावनाएं थीं। सैनिकों को कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के प्रयोग के बहाने उकसाया गया था। विद्रोही सैनिकों का लक्ष्य, धर्मभ्रष्ट करने वाले अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ देना तो था, परंतु उसके बाद क्या होगा, इसकी उनके मस्तिष्क में कोई योजना नहीं थी। यह विश्वास तक नहीं था कि केवल अपने दम पर, बिना किसी बड़े नेतृत्व के, वे अंग्रेजों से जंग जीत सकते हैं। नेतृत्व के लिए पहले वे झांसी की रानी सहित कई रजबाड़ों के पास गए थे। वहां से निराश होने के बाद उन्होंने बूढ़े बहादुरशाह जफर को अपना नेता चुना था। उस युद्ध में जिन राजे-रजबाड़ों ने विद्रोही सैनिकों का साथ दिया, सबकी अपनी-अपनी मांगें थीं। इसलिए युद्ध के दौरान, 1858 में जैसे ही ब्रिटेन ने उनकी मांगों के प्रति सहमति दर्शायी, अधिकांश ने खुद को विद्रोह से अलग कर लिया। कल्पना कीजिए, उस युद्ध के बाद यदि झांसी पर रानी लक्ष्मी बाई और दिल्ली पर बहादुरशाह का परचम लहराने लगता तो उनकी देखा-देखी बाकी राजे-महाराजे भी खुद को आजाद घोषित कर देते। उससे देश में सीधे राजशाही की वापसी होती। तब हम 1857 की घटना को राष्ट्रवादी चेतना के उभार से कभी नहीं जोड़ पाते। हमें ध्यान रखना चाहिए कि राष्ट्रवादी चेतना का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता की प्रतीति में निहित है। जबकि भारतीय समाज आज भी जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, संप्रदाय एवं क्षेत्रीयता के आधार पर अनेक हिस्सों में बंटा हुआ है। यही कारण है कि भारतीय राष्ट्रवाद आज भी एक संद्धिग्ध अवधारणा है।

इसका आशय यह नहीं है कि भारतीय नागरिक अपने देश को प्यार नहीं करते? बिलकुल करते हैं। सामान्य स्थिति में  ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ में खास अंतर नहीं होता। अपनी भाषा, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति से लगाव नैसर्गिक चेतना है। हम जिस देश में रहते हैं, उससे प्यार करना, जरूरत पड़ने पर मदद के लिए आगे आना, न केवल स्वाभाविक है, अपितु आवश्यक भी है। यही देशभक्ति है। जिस तरह देशभक्ति अपने साझा इतिहास, संस्कृति, भौगोलिकता, धर्म आदि के प्रति जनसाधारण की स्वयंस्फूर्त्त  भावना और उद्गार है, उसी तरह राष्ट्रवाद भी है। देश पर संकट के समय जैसे समर्पण की अपेक्षा किसी ‘देशभक्त’ से की जाती है, ठीक ऐसे ही राष्ट्रवाद में भी जाती है। बावजूद इसके देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर है। देशभक्ति स्वयंस्फूर्त्त भावना है। अपनी मिट्टी के प्रति सहजानुराग है। कर्तव्यपरायण होना भी देशभक्ति का लक्षण है। एक मजदूर जो ईमानदारी से अपना काम निपटाता है, वह भी सीमा पर डटे सैनिक जितना ही देशभक्त है। देशभक्ति सत्ता निरपेक्ष होती है तथा नागरिकों में देश के प्रति स्वयंस्फूर्त्त समर्पण एवं बलिदान की प्रेरणा जगाती है। 

इसके उलट राष्ट्रवाद कृत्रिम और सत्ता-सापेक्ष संकल्पना है। देशभक्ति में सहज नागरिक-सामाजिक संबंध तथा स्थानीयता का भाव होता है। उनमें पर्याप्त लचीलापन होता है। नागरिक अपने देश, वहां के समाज, संस्कृति और देशवासियों से बराबर प्यार करते हैं। यह मानते हैं कि जिस तरह वे अपने देश से प्यार करते हैं, बाकी लोग भी अपने देश से उतना ही प्यार करते होंगे। इसमें किसी देश या उसके नागरिकों के देशप्रेम को छोटा या कमतर नहीं आंका जाता। अपने प्रचलित रूप में ‘राष्ट्रवाद’, राष्ट्र को गौरवशाली स्तंभ की भांति प्रस्तुत करता है। नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्र के हित में बलिदान हेतु तत्पर रहें। इसके लिए आवश्यकतानुसार कानून भी बनाया जा सकता है। प्रसंगवश बता दें कि पश्चिमी के कई देशों में अनिवार्य सैन्य सेवा का कानून है। भारत में ऐसा नहीं है। राष्ट्रवाद को प्रासंगिक ठहराने के लिए यहां प्रायः संस्कृति की मदद ली जाती है, जो अपने आप में जातीय भेदभाव से ग्रस्त रही है। 

संवैधानिक राज्य होने के बावजूद भारत में आज भी जाति मानवीय पहचान का महत्त्वपूर्ण पहलू है; और वह नीचे से ऊपर तक असरकारी है। यहां तक कि यह सरकार और उसके फैसलों को भी प्रभावित करता है। ऐसे में जो लोग जाति के आधार पर पिछड़े हुए हैं, सरकार की नजर में भी उनका अस्तित्व गौण हो जाता है; या वे ज्यादा से ज्यादा वोट-बैंक तक सीमित होकर रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि छोटी और अल्पसंख्यक अस्मिताएं, बहुसंख्यक अस्मिताओं के दबाव में खुद को उपेक्षित समझने लगती हैं। शासक वर्ग की निरंतर उपेक्षा कभी-कभी उन्हें हताशा की ओर ढकेल देती है। दूसरी ओर राष्ट्रवाद के चलते शासक वर्ग के हाथों में अतिरिक्त अधिकार आ जाते हैं, जिनसे उनके निरंकुश आचरण की संभावना बढ़ जाती है। मूर्तियों पर अनाप-शनाप पैसा खर्च करना, मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ देना—सरकार की वैचारिक निरंकुशता को दर्शाता है। निरंकुशता का दूसरा रूप दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर हमलों के रूप में नजर आता है।

राष्ट्रवाद जब तक नागरिक-मन की स्वयंस्फूर्त्त भावना है, तब तक उसमें और देशभक्ति में कोई अंतर नहीं होता। ऐसा राष्ट्रवाद(या देशभक्ति) देश तथा उसके नागरिक, सभी के लिए श्रेयस्कर होता है। लेकिन जब भी कोई शासकवर्ग राष्ट्रवाद को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का औजार बनाकर, दूसरी राष्ट्रीयताओं के संदर्भ में उसका उपयोग करने लगता है, जब वह दावा करता है कि उसकी राष्ट्रीयता दूसरी राष्ट्रीयताओं से श्रेष्ठतर है, तथा उसे श्रेष्ठतम बनाने की आवश्यकता है, अर्थात जब राष्ट्रवाद शासकवर्ग की साम्राज्यवादी लिप्साओं का हथियार बन जाता है—तब वह सामाजिक-राजनीतिक स्तरीकरण का प्रस्तावक एवं पोषक भी बन जाता है। राष्ट्रीयताओं के स्तरीकरण की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति पहले सत्ता का चरित्र बनती है, कालांतर में नागरिक भी, कभी दबाव तो कभी प्रलोभनों के चलते उससे अनुकूलित होने लगते हैं। 

कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद खासकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, देशप्रेम से इतर थोपी गई अवधारणा है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में होता प्रायः यह है कि जो वर्ग शक्तिशाली और सत्ता के केंद्र में है उन्हें स्वयं को दूसरों से अच्छा और योग्य सिद्ध करने का अवसर मिलता रहता है। जो हाशिये पर हैं, उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए यदि वे संघर्ष करना चाहें तो, सत्ताकेंद्र पर विराजमान लोग अपनी पहुंच और अधिकारों का उपयोग कर, उन्हें समाज का शांति-भंजक, यहां तक कि राष्ट्रद्रोही तक कह जाते हैं। दूसरे शब्दों में राष्ट्रवाद की अभिकल्पना के समय हर्डर की चाहे जितनी सदेच्छा रही हो, कालांतर में इसका उदय अंध-राष्ट्रवाद के रूप में देखने में आया, जिसमें बड़ी अस्मिताएं छोटी अस्मिताओं को कुचलने में लगी होती हैं। स्वयं जर्मनी इसका उदाहरण है। वहां जर्मन राष्ट्रवाद के नाम पर हिटलर ने पूरी दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध की भट्टी में ढकेल दिया था। सामूहिक फांसीघर बनवाकर हजारों अल्पसंख्यक यहूदियों को सामूहिक मृत्युदंड की सजा दी थी। 

आवश्यक नहीं कि कथित बड़ी संस्कृतियां अपने समर्थकों के संख्याबल के अनुसार भी बड़ी हों। बावजूद इसके सत्ताकेंद्र पर विराजमान लोग अपनी संस्कृति और धार्मिक विश्वासों को ही मुख्य संस्कृति की तरह पेश करते हैं। ग्राम्शी ने इसे ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ कहा था, जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग, सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दावे के साथ, बहुसंख्यकों के दिलो-दिमाग पर कब्जा कर लेता है। जनसाधारण के विवेकीकरण तथा मनुष्य को उसके अधिकारों से परचाकर इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है। इसके लिए सामाजिक न्याय को समर्पित राज्य तथा ऐसे नागरिक संगठनों की जरुरत पड़ती है जो नागरिक प्रबोधीकरण के लिए आवश्यक कार्यक्रमों का संचालन कर सकें। 

ओमप्रका कश्यप

1.  प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् ।

न आत्मप्रियम् हितम् राज्ञः प्रजानाम् तु प्रियम् हितम्॥ अर्थशास्त्र 1/19

क्रांतिकारी कवि, लेखक, नाटककार और समाजसुधारक : अन्नाभाऊ साठे

सामान्य

आगे बढ़ो! जोरदार प्रहार से दुनिया को बदल डालो। ऐसा मुझसे भीमराव कह कर गए हैं। हाथी जैसी ताकत होने के बावजूद गुलामी के दलदल में क्यों फंसे रहते हो। आलस त्याग, जिस्म को झटककर बाहर निकलो और टूट पड़ो।1                                                                

                                                    अन्नाभाऊ साठे

अन्नाभाऊ साठे कौन थे, क्या थे? कहां के थे? बहुत कम लोग जानते हैं। खासकर हम हिंदी वालों में। ‘अन्ना’ नाम सुनकर हमारे मस्तिष्क में सिर्फ अन्ना हजारे की तस्वीर बनती है। क्योंकि निहित स्वार्थ के अनुरूप खबरें गढ़ने वाला पूंजीवादी मीडिया, इस नाम को किसी न किसी बहाने बार-बार हमारे बीच ले आता है। सुनकर शायद हैरानी हो कि अन्नाभाऊ से जुड़े एक प्रश्न ने नेहरू जी को भी उलझन में डाल दिया था। उन दिनों रूस और भारत की गहरी मैत्री थी। नेहरू जी वहां पहुंचे हुए थे। यात्रा के बीच एक व्यक्ति ने अकस्मात पूछ लियाᅳ‘आपके यहां गरीबों और वंचितों की कहानी कहने वाला एक कलाकार और समाज सुधारक अन्नाभाऊ साठे है….कैसा है वह?’

नेहरू जी चुप्प। उन्होंने ऐसे किसी अन्नाभाऊ साठे के बारे में नहीं सुना था। देश लौटे। यहां पता लगाना शुरू किया। पर मुश्किल। काफी कोशिश के बाद पता चला कि मुंबई की चाल में ऐसा ही आदमी रहता है। कद पांच फुट, रंग तांबई, बदन इकहरा। आंखों में चमक। सीधे दिल में उतर जाने वाली तेज, जोशीली आवाज। लिखता, गाता-बजाता, तमाशे करता है। मजदूर आंदोलनों में हिस्सा लेकर उनकी बात उठाता है। बोलने के लिए खड़ा होता है तो बड़ी से बड़ी भीड़ में भी सन्नाटा छा जाता है। लोकप्रियता ऐसी कि तमाशा करे तो दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ता है। अमीरी-गरीबी के बीच भारी अंतर को वह मार्क्सवादी नजरिये से देखता है। लेकिन जातिवाद और छूआछूत की व्याख्या के समय उसे सिर्फ आंबेडकर याद आते हैं। जो सामाजिक न्याय के लिए वर्ग-क्रांति को आवश्यक मानता है।

मराठी साहित्य और कला-जगत के शिखर पुरुष अन्नाभाऊ साठे का जन्म 1 अगस्त 1920 को महाराष्ट्र के सांगली जिले की वालवा तहसील के वाटेगांव के मांगबाड़ा में हुआ था। उनके बचपन का नाम तुकाराम था। पिता का नाम भाऊराव और मां का नाम था बालूवाई। जाति थी मांग(मातंग)। अछूत और देश की सर्वाधिक विपन्न जातियों में से एक, जिसका कोई स्थायी धंधा तक नहीं था। पेट भरने के लिए उस जाति के सदस्य शादी-विवाह, पर्व-त्योहार के अवसर पर ढोल और तुरही बजाते। नाच-गाकर लोगों का मनोरंजन करते। रस्सी बुनते। उससे जो आय हो जाती उससे जैसे-तैसे गृहस्थी चलाते थे। लेकिन ये काम हमेशा तो मिलने वाले नहीं थे। इसलिए बाकी समय में वे मेहनत-मजदूरी वाला कोई भी काम कर लेते थे। अछूत होने के कारण गांव में रहने की मनाही थी। सो गांव-बाहर रहते। चैन वहां भी नहीं था। गांव में जब भी कोई अपराध होता तो शक ‘मांगबाड़ा’ पर ही जाता। शर्म की बात यह कि मानव-मात्र के अधिकारों की सुरक्षा का दावा करने वाली औपनिवेशिक सरकार ने पूरी ‘मांग’ जाति को ‘क्रिमिनल ट्राइव एक्टᅳ1871’ के अंतर्गत अपराधी घोषित किया हुआ था। कुछ ‘समझदार’ किस्म के ग्रामीण किसी ‘मांग’ को ही गांव की चौकीदारी सौंप देते थे। कहीं-कहीं यह कहावत भी चलती थी कि मांग के घर में आटे का बर्तन भले खाली हो, दीवार पर बंदूक जरूर टंगी होती है।  

अन्ना के पिता मुंबई में एक अंग्रेज के घर माली का काम करते थे। बाकी परिवार गांव में रहता था। भाऊराव नौकरी करते थे, इस कारण बाकी सजातीय परिवारों की अपेक्षा उनकी आर्थिक हैसियत थोड़ी अच्छी थी। फिर भी जीवन संघर्षमय था। भाऊराव बेटे को पढ़ाना चाहते थे। एक बार छुट्टी लेकर गांव पहुंचे तो अन्ना की मां ने उनका स्कूल में दाखिला कराने की सलाह दी। लेकिन स्कूल मास्टर कुलकर्णी ‘अपराधी’ जाति के बालक को दाखिला देने को तैयार न था। काफी अनुनय-विनय के बाद वह राजी हुआ। फिर भी जाति-द्वेष बना रहा। अपमान और तिरस्कार भरे माहौल में अन्नाभाऊ ने कुछ दिन जैसे-तैसे काटे। शीघ्र ही उनका स्वाभिमानी मन वहां से ऊब गया। आखिर प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले ही, स्कूल को हमेशा के लिए अलविदा कह, वे जीवन की पाठशाला में भर्ती हो गए। उसके बाद कुछ दिन यायावरी और सिर्फ यायावरी चली। जो सीखा जीवनानुभवों से सीखा। जितना सीखा उतना समाज को लगातार लौटाते भी रहे।

उन दिनों मनोरंजन का प्रमुख साधन गाना-बजाना था। अन्ना का दिमाग तेज था। याददाश्त गजब की। बचपन से ही अनेक लोकगीत उन्हें उन्हें कंठस्थ थे। वे गा-बजाकर अपना और दूसरों का मनोरंजन करते। खेल ही खेल में यदा-कदा कुछ नया भी रच देते थे। यही नहीं, वे तलवार, भाला, दांडपट्टा, कटार आदि चलाने में भी सिद्धहस्त थे। इन हथियारों का प्रयोग अवसर विशेष पर शौर्यकला का प्रदर्शन करने के लिए किया जाता था। असल में वे सामंतों के मनोरंजन का साधन थे। वैभव और शौर्य लुटा चुके जमींदार, सामंत शौर्यकलाओं का मंचन देखकर ही आत्मतुष्ट हो जाया करते थे। बात-बात पर न्याय, नैतिकता, धर्म और संस्कृति की दुहाई देने वाले पंडितजन, जाति के नाम पर आदमी-आदमी में भेद के सवाल पर चुप्पी साध जाते थे।

उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन की गर्मी थी। क्रांतिकारी गतिविधियों में तेजी आई हुई थी। अंग्रेजों का भारतीयों पर संदेह बढ़ता ही जा रहा था। ऊपर से 1930 के दशक की भीषण आर्थिक मंदी का असर। एक दिन भाऊराव को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। हताश-निराश भाऊराव गांव पहुंचे। यह सोचकर कि वहां जैसे बाकी लोग जीते हैं, वैसे वे भी दिन बिता लेंगे। लेकिन गांव पहुंचते ही एक नई आफत से सामना हुआ। उस वर्ष पूरे महाराष्ट्र में सूखा पड़ा था। अकाल जैसे हालात बन चुके थे। उन दिनों मुंबई औद्योगिक नगरी के रूप में तरक्की कर रही थी। लोग रोजगार की तलाश में उसकी ओर आ रहे थे। रोजी-रोटी के सवालों से जूझ रहे भाऊराव साठे ने भी मुंबई जाने का फैसला कर लिया। मगर किराये के लिए जरूरी पैसे उनके पास न थे। बस मुंबई पहुंचने की ललक थी, जो देखते ही देखते उनका संकल्प बन गई। किराये का इंतजाम न हुआ तो परिवार को साथ ले, एक दिन पैदल ही मुंबई की ओर निकल पड़े। गांव-गांव भटकते, खाते-कमाते, पैदल चलते-चलते पूरा परिवार किसी तरह पूना पहुंचा। वहां वे लोग एक ठेकेदार के लिए पत्थर तोड़ने का काम करने लगे। अन्ना भी काम में उनकी मदद करता। लगातार मेहनत से वह कमजोर पड़ने लगा था। ठेकेदार अपने मजदूरों को बंधुआ समझता था। आखिरकार एक पठान की मदद से भाऊराव परिवार को लेकर वहां से निकल लिए। आगे फिर वही पैदल यात्रा। वही संघर्ष और जहालत से भरा जीवन। वाटेगांव से मुंबई करीब 255 किलोमीटर था। इस दूरी को पैदल पाटने में ही दो महीने गुजर गए।2

रास्ते में कुछ कड़वे अनुभव भी हुए। एक बार की बात। चलते-चलते अन्ना को भूख लग आई थी। सामने पके आमों से लदा एक पेड़ देखा तो भूख और भड़क उठी। उसी बेचैनी में उन्होंने पेड़ के मालिक से पूछे बगैर दो-चार आम तोड़ लिए। अचानक मालिक ने आकर उन्हें दबोच लिया। घबराए अन्ना ने आम वापस लौटाने की पेशकश की, लेकिन वह माना नहीं। डरा-धमकाकर आमों को दुबारा डाल से लटकाने की जिद करने लगा।3 इस तरह की अपमानजनक घटनाओं से जन्मे आक्रोश का असर रचनात्मक निखार के साथ अन्नाभाऊ की करीब-करीब हर रचना में है। उनकी बहुप्रसिद्ध कहानी ‘खुलांवादी’ का एक पात्र कहता हैᅳ

‘ये मुरदा नहीं, हाड़-मांस के जिंदा इंसान हैं। बिगडै़ल घोड़े पर सवारी करने की कूबत इनमें है। इन्हें तलवार से जीत पाना नामुमकिन है।’

मुंबई पहुंचते समय तुकाराम उर्फ अन्नाभाऊ की उम्र महज 11 वर्ष थी। गांव में जहां अछूत होने के कारण कोई काम न देता था, मुंबई में काम की कमी न थी। सो घर चलाने के लिए मुंबई में अन्ना ने कुलीगिरी की। होटल में बर्तन धोने से लेकर वेटर तक का काम किया। घरेलू नौकर रहे, कुत्तों की देखभाल के लिए एक अमीर की चाकरी की। घर-घर जाकर सामान बेचा। कुछ और काम न मिलने पर बूट-पालिश पर हाथ भी आजमाया। इस बीच फिल्म देखने का शौक पैदा हुआ। मूक फिल्मों का जमाना था। पर शौक ऐसा कि अपनी मामूली आमदनी का बड़ा हिस्सा टिकट खरीदने पर खर्च कर देते थे। जीवन-संघर्ष के बीच अक्षर जोड़ना और पढ़ना-लिखना सीखा। फिल्मी पोस्टरों और दुकानों के आगे लगे होर्डिंग्स से पढ़ना-लिखना सीखने में मदद मिली। चेंबुर, कुला, मांटुगा, दादर, घाटकोपर वगैरह….मुंबई में काम के अनुसार उनके ठिकाने भी बदलते रहे।

अन्ना भाऊ के निकट रिश्तेदार बापू साठे एक ‘तमाशा’ मंडली चलाते थे। गाने-बजाने का शौक अन्ना को उन्हीं तक ले गया। वे ‘तमाशा’ से जुड़ गए। इस बीच एकाएक ऐसी घटना हुई जिससे अन्नाभाऊ के सोचने का ढंग ही बदल गया। तमाशा मंडली को एक गांव में कार्यक्रम करना था। तमाशा शुरू होने से पहले उसके मंच पर महाराष्ट्र में ‘क्रांतिसिंह’ के नाम से विख्यात नाना पाटिल वहां पहुंचे। वहां उन्होंने ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों का खुलासा करने वाला जोरदार भाषण किया। मिलों में हो रहे शोषण के लिए पूंजीपतियों और सरमायेदारों की कारगुजारी पर भी बात की। भाषण सुनने के बाद अन्ना भाऊ को अब तक का गाया-सुना अकारथ लगने लगा। छुटपन में वे ‘भगवान विठ्ठल’ की सेवा में अभंग गाया करते थे। उनमें जातीय ऊंच-नीच को धिक्कारा गया था। बराबरी का संदेश भी था। अब समझ में आया कि गरीबी सामाजिक समानता की राह में सबसे बड़ी बाधक है। आर्थिक असमानता केवल नियति की देन नहीं है। उसका कारण वे लोग हैं जो देश और समाज के धन पर कुंडली मारे बैठे हैं। यह भी समझ में आया कि गाने-बजाने का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। उससे सोये हुए समाज को जगाया भी जा सकता है। उसी दिन अन्ना के ‘लोकशाहिर’(लोककवि) अन्ना भाऊ बनने की नींव पड़ी। समाज में अमीर-गरीब की खाई को वे कम्युनिस्ट विचारधारा की कसौटी से परखने लगे। यही उन्हें कालांतर में कम्युनिस्ट पार्टी तक ले गया। 

तमाशा में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर अवसर मिला। ‘तमाशा’ में वे कोई भी वाद्य बजा लेते। किसी भी प्रकार की भूमिका कर लेते थे। निरंतर सीखने और नए-नए प्रयोग करने की योग्यता ने उन्हें रातों-रात तमाशा मंडली का महानायक बना दिया। कुछ दिनों बाद अपने दो साथियों के साथ मिलकर अन्ना ने 1944 में ‘लाल बावटा कलापथक’(लाल क्रांति कलामंच) नामक नई तमाशा मंडली की शुरुआत की। जिसके तहत उन्होंने कई क्रांतिकारी कार्यक्रम पेश किए। उस समय तक देश में आजादी के प्रति चेतना जाग्रत हो चुकी थी। ‘तमाशा’ जनता से संवाद करने का सीधा माध्यम था। ‘लाल बावटा’ के माध्यम से अन्नाभाऊ मजदूरों के दुख-दर्द को दुनिया के सामने लाते, लोगों को स्वतंत्रता का महत्त्व समझाते थे। इससे वे मजदूरों के बीच तेजी से लोकप्रिय होने लगे। अपनी मंडली को लेकर वे महाराष्ट्र के गांव-गांव तक पहुंचे। वहां लोगों को आजादी के लिए तैयार रहने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आवाह्न किया। लोग उन्हें ‘शाहिर अन्ना भाऊ साठे’ और ‘लोकशाहिर’ कहकर पुकारने लगे। 

आगे चलकर सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगा दिया। जिसके तहत ‘लाल बावटा’ को भी बंद करना पड़ा। लेकिन अन्ना भाऊ के भीतर छिपा कलाकार इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न था। उन्होंने अपने विचारों को लोकगीतों में ढालना आरंभ कर दिया। तमाशा मंडली छोड़ वे एक मिल में काम करने लगे। वहां मजदूरों की समस्याओं से सीधा परिचय हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति लगाव तो ‘क्रांतिसिंह’ नाना पाटिल का भाषण सुनने के बाद से ही था। मिल में मजदूरी करते हुए वे कम्युनिस्ट पार्टी के भी संपर्क में आए और उसके सक्रिय सदस्य बन गए। लोकगीतों के माध्यम से कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने लगे। पार्टी के लिए दरियां बिछाने से लेकर भाषण देने तक का काम किया। इसी बीच विवाह हुआ। लेकिन पहला विवाह ज्यादा जमा नहीं। दूसरा विवाह एक परित्यक्त स्त्री से किया। संतान भी हुई, लेकिन वह संबंध भी ज्यादा दिन टिक न सका।

उद्योगनगरी के रूप में पनपती मुंबई हजारों मजदूरों, किसानों की शरण-स्थली थी। गांव में गरीबी, बेरोजगारी और सामंती उत्पीड़न से त्रस्त मजदूर वर्ग बेहतर जीवन की आस में उसकी ओर खिंचे चले आते थे। उनके लिए वही एक उम्मीद थी। लेकिन बेतरतीव मशीनीकरण ने लोगों की समस्या में इजाफा किया था। एक ओर बड़ी-बड़ी स्लम बस्तियां उभर रही थीं, दूसरी ओर ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं। अमीर-गरीब के बीच निरंतर बढ़ते अंतराल से उन्हें लगने लगा था कि जिन सपनों के लिए उन्होंने अपना गांव-घर छोड़ा था, वे मुंबई आकर भी फलने वाले नहीं है। उस समय तक रूस को आजाद हुए करीब 25 वर्ष बीत चुके थे। अन्नाभाऊ सोवियत संघ की तरक्की के बारे में सुनते, प्रभावित होते। रूस की क्रांतिगाथाएं सुनकर मन उमंगित होने लगता। 1943 के आसपास उन्होंने स्तालिनग्राद को लेकर एक पावड़ा(शौर्यगीत) लिखा। उस पावड़े का अनुवाद रूसी भाषा में भी हुआ। उसके बाद तो अन्नाभाऊ की कीर्ति-कथा देश-देशांतर तक व्यापने लगी।

इस बीच उन्होंने कई उपन्यास और कहानियां लिखीं। कम्युनिस्ट पार्टी के साहित्य को पढ़ा। उन्हें समझ आने लगा कि सामाजिक और आर्थिक विकास परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। वगैर एक के दूसरे को साधना संभव नहीं। खासकर भारत जैसे समाजों में जहां जाति मजबूत सामाजिक संस्था के रूप में वर्षों से अपनी पकड़ बनाए हो। धर्म उसका समर्थन करता हो। लोग मानते हों कि वे वही हैं, जो उन्हें होना चाहिए। जहां तथाकथित ईश्वरीय न्याय को ही सर्वश्रेष्ठ न्याय माना जाता हो। बड़ा वर्ग मानता हो कि समाज में जो जहां, जैसा हैᅳसब ईश्वरेच्छा से है। भारतीय समाज में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब की बेशुमार खाइयां हैं। बावजूद इसके वर्ग-संघर्ष के लिए यह सबसे अनुपजाऊ धरा है। लोगों की यथास्थितिवादी मनोवृति, परिवर्तन की हर संभावना को विफल कर देती है। जब कभी उसके विरुद्ध आवाज उठी, धार्मिक संस्थाएं लोगों को नियतिवाद का पाठ पढ़ाने के लिए सामने आ गईं। गौतम बुद्ध ने जाति को चुनौती दी। उनका आभामंडल इतना प्रखर था कि उनके रहते प्रतिक्रियावादी शक्तियां वर्षों तक सिर छुपाए रहीं। उनके जाते ही देश में फिर ब्राह्मणवादी साहित्य की बाढ़-सी आ गई। नियतिवाद को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए पुराणों और स्मृतियों की रचना की गई। शताब्दियों के बाद संत कवियों ने जाति को ललकारा तो तुलसीदास अपनी रामचरितमानस लेकर आ गए। सामाजिक समानता का सपना शताब्दियों के लिए पुनः नेपथ्य में खिसक गया। धर्म जाति का सुरक्षा-कवच है। इस रहस्य से पर्दा उठा उनीसवीं शताब्दी में। नई शिक्षा और विचारों के आलोक में लोगों ने जाना कि वगैर धर्म को चुनौती दिए जाति से मुक्ति असंभव है। कि आर्थिक और सामाजिक समानता के लिए सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकलना जरूरी है। इस संबंध में सबसे पहली पुकार ज्योतिराव फुले की थी। पुकार क्या मानो मुक्ति-मंत्र था। उस मुक्ति-मंत्र को सिद्धि-मंत्र में बदला डाॅ. आंबेडकर ने। जाति का दंश डाॅ. आंबेडकर ने भी झेला था और अन्नाभाऊ ने भी। साम्यवादी चेतना जहां अन्नाभाऊ के लोकगीतों को ओज से भरपूर बनाती थी, वहीं आंबेडकर से उन्हें हालात से टकराने की प्रेरणा मिलती थी। मार्क्स और आंबेडकर, अन्नाभाऊ के लिए दोनों ही प्रेरणास्रोत थे।

एक क्रांतिधर्मी कलाकार की तरह अन्नाभाऊ ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन तथा गोवा मुक्ति आंदोलन के लिए काम किया। जनता के हित में एक कलाकार के रूप में वे हर आंदोलन में आगे रहे। उनके लिखे पावड़े, लावणियां मुक्ति आंदोलनों को ऊर्जा प्रदान करते रहे। 1945 में अन्ना भाऊ ने साप्ताहिक ‘लोकयुद्ध’ के लिए पत्रकार के रूप में काम करना आरंभ किया। अखबार साम्यवादी विचारधारा को समर्पित था। आम आदमी के संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके अभावों को वे एक पत्रकार के रूप में लगातार उठाते रहे। इसने उन्हें जनसाधारण के बीच नायकत्व प्रदान किया। अखबार के लिए काम करते हुए उन्होंने अक्लेची गोष्ट, खाप्पया चोर, मजही मुंबई जैसे नाटक लिखे। सरकार ने ‘तमाशा’ पर प्रतिबंध लगाया तो अन्नाभाऊ ने ‘लाल बावटा’ के लिए लिखे गए नाटकों को आगे चलकर उन्होंने लावणियों और पावड़ा जैसे लोकगीतों में बदल दिया। तमाशे में वे अकेले गाते थे, लोकगीत बनने के बाद वे जन-जन की जुबान पर छाने लगे। अन्नाभाऊ की रचनाओं पर 12 फिल्में बनीं जो सफल मानी जाती हैं।

निरंतर संघर्षमय जीवन जीते हुए अन्नाभाऊ ने 14 लोकनाटक, 35 उपन्यास और 300 से ऊपर कहानियां लिखी। लगभग 250 लावणियां उन्होंने लिखीं। लगभग छह फिल्मों की पटकथाएं और यात्रा वृतांत लिखा। उनकी लिखी 14 कहानियों/उपन्यासों का फिल्मांकन भी हुआ। यात्रा वृतांत ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत होने का गौरव प्राप्त है। उनके उपन्यासों और नाटकों की देश-विदेश में खूब चर्चा हुई। 1959 में प्रकाशित ‘फकीरा’ उपन्यास को खूब सराहा गया। इसे उन्होंने डाॅ. आंबेडकर को समर्पित किया था। यह उपन्यास इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी की शौर्यकथा है, जिसमें उसका सामाजिक जीवन भी समाया हुआ है। इस उपन्यास का 27 देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। 1961 में इसे महाराष्ट्र सरकार के शीर्ष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी दूसरी रचनाएं भी रूसी, फ्रांसिसी, चेक, जर्मनी आदि भाषाओं में अनूदित हुईं। अन्नाभाऊ द्वारा लिखित पुस्तकों में फकीरा, वारण का शेर, अलगुज, केवड़े का भुट्टा, कुरूप, चंदन, अहंकार, आघात, वारणा नदी के किनारे, रानगंगा आदि उपन्यास; चिराग नगर के भूत, कृष्णा किनारे की कथा, जेल में, पागल मनुष्य की फरारी, निखारा, भानामती, आबी आदि 14 कहानी संग्रह; इनामदार, पेग्यां की शादी, सुलतान आदि नाटक हैं। उनके लिखे लोकनाटकों में तमाशा(नौटंकी), दिमाग की काहणी, खाप्पया चोर, देशभक्ते घोटाले, नेता मिल गया, बिलंदर पैसे खाने वाले, मेरी मुंबई, मौन मोर्चा आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं, जिनमें फकीरा, सातरा की करामात, तिलक लागती हूं रक्त से, पहाड़ों की मैना, मुरली मल्हारी रायाणी, वारणे का बाघ तथा वारा गांव का पाणी प्रमुख हैं।

मुंबई में रहते हुए अन्नाभाऊ ने तरह-तरह के काम किए, पैसा भी कमाया, लेकिन गरीबी से पीछा नहीं छूटा। वे 22 वर्ष तक घाटकोपर की खोलियों में रहे। यहां एक सवाल उठ सकता है। कई बड़े अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं से अन्नाभाऊ का संपर्क था। उनकी कहानियों पर फिल्में बन चुकी थीं। उपन्यास ‘फकीरा’ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका था। बावजूद इसके क्यों अपने लिए ठीक-ठाक घर का इंतजाम न कर सके? इस तरह की जिज्ञासा अन्नाभाऊ के एक मित्र को भी थी। वर्षों तक घाटकोपर की चाल में रहते देख उसने अन्नाभाऊ से पूछा थाᅳ

‘आपकी अनेक पुस्तकों का देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। फिल्मों की पटकथाएं भी आपने लिखी हैं। आपकी कई कहानियों और उपन्यासों पर फिल्में बन चुकी हैं। ‘फकीरा’ के रूसी भाषा में अनुवाद से रायल्टी भी मिली होगी। उससे आप बड़ा-सा बंगला क्यों नहीं बनवा लेते?’

इसपर अन्नाभाऊ ने हंसते हुए कहा थाᅳ

‘ठीक कहते हो। लेकिन बंगले में आरामकुर्सी पर बैठकर लिखते समय मैं गरीबी की सिर्फ कल्पना कर सकता हूं। गरीबी की पीड़ा और उसका दर्द तो भूखे पेट रहकर ही अनुभव किया जा सकता है।’ 

अनुभूति की इसी प्रामाणिकता के लिए अन्नाभाऊ ने गरीब-मजदूरों के बीच रहते थे। बिना किसी अहमन्यता, बगैर किसी विशिष्टताबोध के। 1968 में राज्य सरकार कुछ मेहरबान हुई। अन्नाभाऊ के रहने के लिए छोटा-सा घर उपलब्ध करा दिया गया। लेकिन गरीब मजदूरों के बीच, उन्हीं की तरह रहने वाले उस जिंदादिल इंसान को नया ठिकाना रास नहीं आया। एक साल के भीतर ही, 18 जुलाई 1969 को वह महान कलाकार मुंबई को हमेशा के लिए अलविदा कह, दुनिया से चला गय

1 अगस्त 2002 को भारत सरकार ने उनके 82वें जन्म दिवस पर डाक टिकट जारी किया। सरकार का यह प्रयास एक शाश्वत विद्रोही, प्रखर प्रतिभा को मूर्तियों में कैद कर देने जैसा ही माना जाएगा, क्योंकि दर्जनों सरकारी अकादमियां और सांस्कृतिक संस्थाएं होने के बावजूद अन्नाभाऊ के कृतित्व का एकांश भी हिंदी में उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप हिंदी के लेखक इस मराठी कला-संस्कृति और साहित्य की महानतम प्रतिभा के लेखकीय और कलात्मक अवदान से वंचित हैं।

अन्नाभाऊ की रूस यात्रा : एक सपने का सच होना

अन्नाभाऊ का जन्म सोवियत क्रांति के तीन वर्ष बाद हुआ था। किसी देश के बनने में तीन वर्ष की अवधि बहुत ज्यादा नहीं होती। इसलिए कह सकते हैं कि अन्नाभाऊ की जीवनयात्रा और सोवियत रूस की विकास यात्रा एक-दूसरे की सहगामी थीं। रूस रूपहले सपने की तरह अन्नाभाऊ की आंखों में बसता था। वे प्रायः सोचते, काश! श्रमिक क्रांति के बाद रूस के समाज में आए बदलावों को करीब से देख पाते। यह चाहत तब और प्रबल हो जाती जब रूस की शानदार प्रगति का कोई समाचार उन तक पहुंचता। रूस यात्रा की उनकी अभिलाषा कितनी गहरी थी, इसका वर्णन उन्होंने अपने यात्रा-वृतांत में स्वयं किया हैᅳ

‘मेरी अंतःप्रेरणा थी कि अपने जीवन में मैं एक दिन सोवियत संघ की अवश्य यात्रा करूंगा। यह इच्छा लगातार बढ़ती ही जा रही थी। मेरा मस्तिष्क यह कल्पना करते हुए सिहर उठता था कि मजदूर-क्रांति के बाद का रूस कैसा होगा। लेनिन की क्रांति और उनके द्वारा मार्क्स के सपने को जमीन पर उतारने की हकीकत कैसी होगी! कैसी होगी वहां की नई दुनिया, संस्कृति और समाज की चमक-दमक! मैं 1935 में ही कई जब्तशुदा पुस्तकें पढ़ चुका था। उनमें से ‘रूसी क्रांति का इतिहास’ और ‘लेनिन की जीवनी’ ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। इसलिए मैं रूस के दर्शन को उतावला था।’4

रूस यात्रा से पहले उन्होंने दो बार पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। पहली बार उनके आवेदन को बगैर कारण बताए निरस्त कर दिया गया था। असल में सरकार अन्नाभाऊ जैसे प्रतिभा-संपन्न कलाकार को, जिसकी लोकमानस पर गहरी पकड़ हो, जो जनता से उसी की भाषा में संवाद करने का हुनर जानता होᅳरूस भेजने से घबराती थी। इस बारे में जब उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री से संपर्क किया, तो उनका उत्तर भी तिरस्कार भरा थाᅳ‘तुम हमारे प्रति शत्रु-भाव रखते हो। यह हमारी उदारता है जो तुम अभी तक बाहर हो; अन्यथा तुम जेल की सलाखों के पीछे होते।’5 शत्रु-भाव! माने जनवादी चेतना। अन्नाभाऊ जनता से उसी भाषा में संवाद करने में निपुण थे। अपने कई लोकगीतों में अन्नाभाऊ ने मुंबई में बसे श्रमिक वर्ग के जीवन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण कर, उनके स्वप्न-भंग की स्थिति को दर्शाया था। ऐसी रचनाएं किसी भी गैरजिम्मेदार सरकार के लिए बेचैनी का कारण बन सकती थीं।

प्रसंगवश उनकी दो लावणियों का उल्लेख किया जा सकता है। ‘मुंबईची लावणी’(मुंबई की लावणी) तथा ‘माझी मैना गावावीर राहिली’(मेरी प्रिया गांव में रहती है)। उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुंबई में औद्योगिकीकरण की शुरुआत हुई थी। उससे रोजगार की तलाश में गांवों से श्रमिकों और कामगारों का पलायन आरंभ हुआ। उनमें से अधिकांश वे थे जिन्हें गांवों में भीषण गरीबी और सामंती उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। जो वहां रोजगार के अभाव में फाकाकशी का जीवन जीते थे। सामंती उत्पीड़न से मुक्ति और उपयुक्त रोजगार की साध लेकर वे मुंबई पहुंचे थे। वहां पहुंचकर पता चला कि हालात में लगभग ज्यों के त्यों हैं। केवल उत्पीड़क चेहरों में बदलाव आया है। गांव में वे सामंती उत्पीड़न और जातिवाद का शिकार थे। शहर में जातिभेद ज्यादा अंतर नहीं आया है, जबकि सामंत की जगह पुलिस और कानून के नाम पर बनी संस्थाओं ने ले ली है। ‘मुंबईची लावणी’ में इसी पर कटाक्ष किया गया थाᅳ

‘‘मुंबई में शिखर पर मालाबार की पहाड़ियां हैं….वह इंद्रपुरी है, इंद्र देवता की नगरी….वह धनकुबेरों की बस्ती है….रात-दिन सुख में आकंठ डूबे रहने वाले श्रीमंत लोग वहां रहते हैं….दूसरी और परेल हैं, जहां गरीब, मजदूर, कबाड़ी, भिखारी डेरा डाले हुए हैं। वे रात-दिन पसीना बहाते हैं। कड़ी मेहनत के बाद जो मिल जाता है, उसे खा लेते हैं। तीन बत्ती, गोलपीठ और फोरस रोड पर, जिंदा रहने की कीमत पर, न जाने कितने शरीर रोज खरीदे-बेचे जाते हैं।’’

दूसरी लावणी ‘माझी मैना गावावीर राहिली’ में उन मजदूरों की विरह-वेदना और पीड़ा समाई थी, जो घर-परिवार को छोड़कर नए सपने और उम्मीदें लेकर मुंबई आए थे। वहां पहुंचकर वे स्वप्न-भंग की अवस्था में जी रहे थे। इंग्लेंड में अनियोजित मशीनीकरण से पनपी ऐसी ही विषमता ने कार्ल मार्क्स को भी उद्वेलित किया था, जिससे वे पूंजीवाद के विशद अध्ययन को उन्मुख हुए। फलस्वरूप दुनिया को ‘दि कैपीटल’ जैसा महान ग्रंथ प्राप्त हुआ था। गरीब-मजदूरों का दुख-दर्द देख अन्नाभाऊ का संवेदनशील मन आहत होता तो कहानी, उपन्यास और लोकगीतों के रूप में बाहर आता था। उनकी रचनाएं मुंबइया जीवन की हकीकत बयान करती थीं। ऐसा कलाकार लोगों के दिल पर भले ही राज कर ले, उस सरकार को, जिसमें श्रीमंतों का आधिक्य हो, कतई रास नहीं आता। अपने सरोकारों के कारण अन्नाभाऊ भी सरकार की आंखों की किरकिरी बने रहते थे।

बहरहाल, अन्नाभाऊ को रूस जाने का दूसरा अवसर 1948 में मिला था। इस बार उन्हें ‘विश्वशांति सम्मेलन’ के लिए आमंत्रित किया गया था। इस बार अभिनेता मित्र बलराज साहनी ने उनके लिए टिकटों का इंतजाम भी कर दिया था। लेकिन अन्यत्र व्यस्तता के कारण वे समय न निकाल सके। 1961 में अन्नाभाऊ के उपन्यास ‘फकीरा’(1959) को महाराष्ट्र सरकार का सर्वाेच्च सम्मान प्राप्त हुआ। उस समय तक परिस्थितियां थोड़ी अनुकूल होने लगीं थीं। सरकार के मन में भी कम्युनिस्टों के प्रति पूर्वाग्रह में कमी आई थी। इस बार ‘भारत-सोवियत सांस्कृतिक समिति’ ने उनकी रूस-यात्रा का कार्यक्रम बनाया। दोनों सरकारें यात्रा के लिए राजी थीं, इससे पासपोर्ट-वीसा जैसी समस्या न थी। मगर किराये के लिए पैसों की किल्लत पहले जैसी बनी थी। फिर भी इस बार हालात कुछ अलग थे। अन्नाभाऊ को रूस यात्रा का निमंत्रण मिलने का समाचार जैसे ही प्रकाशित हुआ, स्वयं अन्नाभाऊ के शब्दों में ‘रुपयों की मानो बौछार-सी होने लगी। देखते ही देखते आधे खर्च का इंतजाम हो गया।’ जनता की सहानुभूति देख, अपनी इस मान्यता, ‘जो कलाकार जनता के लिए जीता है, जनता उसके पीछे दीवार बनकर खड़ी होती हैᅳपर उनका विश्वास और भी दृढ़ हो गया।

मुंबई से दिल्ली के रास्ते रूस जाने के लिए जब वे जहाज में बैठे तो अपनी साधारण वेशभूषा के कारण बाकी यात्रियों के बीच अलग नजर आ रहे थे। इस बात का उन्हें एहसास भी था। लेकिन यात्रा के दौरान विमान में ऐसी घटना घटी जिससे उनका सारा मलाल जाता रहा। उन्होंने स्वयं लिखा हैᅳ

‘‘उस उड़ान में सम्मेलन में हिस्सा लेने रूस जा रहे, श्रीलंकाई प्रतिनिधि भी सम्मिलित थे। उन्हीं में से एक जो संसद संदस्य और कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य समाचारपत्र का संपादक थेᅳने मुझे पहचान लिया। उसी महीने साहित्यिक पत्रिका ‘मनोहर’ में मेरा सचित्र परिचय मेरे तमाशे ‘खाप्पया चोर’ के चित्र के साथ प्रकाशित हुआ था। विमान के उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद एक यात्री ने मुझे पहचान लिया। पत्रिका का अंक हवा में लहराते हुए उसने चुनौती दी कि ‘खाप्पया चोर’ को जो उड़ान के दौरान हवाई जहाज में ही मौजूद है, कौन पहचानेगा? उसके बाद यात्री उसे लेकर फुसफुसाने लगे। अंत में मुझे मेरे श्रीलंकाई मित्र के साथ पहचान लिया गया।’7

उस समय तक अन्नाभाऊ का दूसरा उपन्यास ‘चित्रा’ भी रूसी भाषा में अनूदित हो चुका था। इसके अलावा उनकी कई कहानियां भी अनूदित होकर रूस पहुंच चुकी थीं। जिनमें उनकी कहानी ‘सुलतान’ भी थी। ‘सुलतान’ एक कैदी पर आधारित कहानी थी, जिससे लेखक की मुलाकात अमरावती की सेंट्रल जेल में हुई थी। अन्नाभाऊ के रूस पहुंचने से पहले सुलतान वहां चर्चित हो चुकी थी। इसलिए अगले दिन के अखबारों की मुख्य खबर थीᅳ”मशहूर कहानी ‘सुलतान’ का लेखक रूस में।” अन्नाभाऊ का लिखा नाटक ‘स्तालिनग्राद’ भी वहां चर्चा का विषय था।

मास्को में उन्होंने होटल के वेटरों, माली, फोटोग्राफर, ड्राइवर, लिफ्ट आपरेटर से दोस्ती की, और वहां के जनजीवन के बारे में जानकारी हासिल की। लेनिनग्राद में उन्होंने संग्रहालय में चंद्रगुप्त मौर्य के कार्यकाल के अनेक सिक्के देखे। रूस में नेहरू की लोकप्रियता को दर्शाती एक घटना का उल्लेख उनके यात्रा-वृतांत में है। जो नेहरू के प्रति उनके दिल में छिपे सम्मान को दर्शाता हैᅳ

‘‘मैं होठों के बीच सिगरेट दबाए रेड स्कवायर से क्रेमलिन की ओर बढ़ रहा था। मेरे पास माचिस नहीं थी और मैं उसके लिए इधर-उधर देख रहा था। सहसा एक आदमी मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसने लाइटर से मेरी सिगरेट सुलगा दी। मेरे लिए वह अप्रत्याशित था।

‘क्या तुम भारतीय हो?’ उस आदमी ने पूछा।

‘जी हां….’ कहकर मैंने उसे धन्यवाद देना चाहा। लेकिन अगले ही पल उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और कहने लगाᅳ

‘कैसे हैं नेहरू जी?’

‘वह बिलकुल ठीक हैं,’ मैंने बताया, ‘आज वे यूएनओ में भाषण देने जा रहे हैं।’ सुनकर वह व्यक्ति बेहद प्रसन्न हुआ और नेहरू जी को धन्यवाद देता हुआ वहां से प्रस्थान कर गया।’’

‘भारत-रूस सांस्कृतिक समिति’ द्वारा रूस की यात्रा के लिए गठित प्रतिनिधिमंडल में अन्नाभाऊ सबसे साधारण और सामान्य दिखने वाले इंसान थे। परंतु रूस की यात्रा पूरी होते-होते अन्नाभाऊ के बारे में उनके सहयात्रियों की धारणा एकदम बदल चुकी थी। प्रतिनिधिमंडल में मद्रास निवासी गिटारवादक जैकोब जिम भी शामिल था। स्तालिनग्राद से अजरबेजान की राजधानी बाकू की ओर वायुयान से जाते समय जैकोब ने अन्नाभाऊ से कहा थाᅳ‘साठे जी, जब हम आपसे पालम एयरपोर्ट पर मिले तो सोचते थे कि आप इस देश से अनजान होंगे और हमारे बीच जम नहीं पाएंगे। लेकिन वह हमारी चूक थी। आप इस देश में बहुत प्रसिद्ध हैं। और निस्संदेह आप अच्छे लेखक हैं। आपके ओजस्वी भाषणों से मैंने बहुत कुछ ग्रहण किया है।’8

अन्नाभाऊ की 40 दिनों की रूस यात्रा अनेक अनुभवों से भरी थी। उनके लिए वह यात्रा एक सपने से गुजरने जैसी थी। एक समानता पर आधारित स्वतंत्र समाज का सपना जो वर्षों से उनके मानस में जड़ जमाए हुए था। रूस में उन्होंने विचार को वास्तविकता में बदलते हुए देखा। जाना कि संकल्प बड़े और नीयत अच्छी हो तो आदर्श और यथार्थ के बीच की दूरी कम होने लगती है। स्वप्न हकीकत में ढलने लगते हैं।

वर्ग-संघर्ष और सामाजिक न्याय को एक साथ साधने वाला जमीनी लेखक

अपनी किशोरावस्था से ही अन्नाभाऊ वामपंथ के संपर्क में आए थे। सामाजिक विषमता और छूआछूत को उन्होंने बचपन से देखा-भोगा था। इसलिए छूआछूत और सामाजिक विषमता के विरुद्ध भारत में संघर्ष कर रहे डाॅ. आंबेडकर के प्रति उनकी श्रद्धा भी स्वाभाविक थी। उपन्यास ‘फकीरा’ को जो इसी नाम के मातंग जाति के क्रांतिकारी के जीवन पर आधारित था, उन्होंने डाॅ. आंबेडकर को समर्पित किया था। उनका समूचा लेखन उनके जीवनानुभवों का दस्तावेज है। एक कहानी संग्रह की प्रस्तावना में उन्होंने अपने इस द्रष्टिकोण को बड़ी बेबाकी से प्रस्तुत किया हैᅳ

‘जो जीवन मैंने जिया, जीवन में जो भी भोगा, वही मैंने लिखा….मैं कोई पक्षी नहीं हूं जो कल्पना के पंखों पर उड़ान भर सकूं। मैं तो मेडक की तरह हूं, जमीन से चिपका हुआ।’

एक प्रसिद्ध दोहे में उन्होंने हिंदुओं के शेषनाग के मिथ पर टिप्पणी करते हुए लिखा थाᅳ‘यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर नहीं टिकी है। अपितु वह दलितों, काश्तकारों और मजदूरों के हाथों में सुरक्षित है।’ उनका कहना था कि कला शिवजी की तीसरी आंख की तरह होती है, जो संसार को भेदती हुई सभी मिथों को जलाकर भस्म कर देती है। इस आंख को सदैव सतर्क रहना चाहिए, तथा मनुष्य के हितों की देखभाल करनी चाहिए। अन्नाभाऊ के सरोकार मानवीय थे। उनके लेखन में कल्पनातत्व सिर्फ उतना है, जितना रचनात्मक बने रहने के लिए आवश्यक होता है। वे रूसी लेखकों में गोर्की से बेहद प्रभावित थे, जिन्होंने हाशिये के पात्रों को मुख्यधारा के साहित्य में जगह दी थी। अन्नाभाऊ भी अपनी लावणियों, लोकगीतों, कहानियों, उपन्यासों आदि के माध्यम से आम आदमी की चिंताओं और सरोकारों को जगह देते हैं। विशेषरूप से अछूत जातियों की समस्याओं तथा उनके चरित्र के उदात्त पहलुओं को बार-बार उठाते हैं। यही कारण है कि लिखते समय उन्होंने कल्पना का कम से कम सहारा लिया है। ‘मेरे सभी पात्र जीते-जागते समाज का हिस्सा हैं। यह उनका दावा भी था।

अन्नाभाऊ को लेकर एक घटना का उल्लेख सुप्रसिद्ध अभिनेता ए. के. हंगल ने अपने संस्मरणों में भी किया है, जिससे उनके सरोकार स्पष्ट नजर आते हैंᅳ

‘‘एक दिन वह(अन्नाभाऊ) मेरे कमरे पर पहुंचा। उसके हाथों में उसका लिखा एक नाटक भी था। उस समय वह बेहद निरुत्साहित था। उसने बताया कि वह उस नाटक को एक प्रसिद्ध मराठी लेखक के पास उसकी राय जानने के लिए लेकर गया था। उस लेखक ने नाटक को नापसंद किया और तिरस्कारपूर्ण ढंग से कहाᅳ‘जाओ, जाकर मजदूरों के लिए ‘तमाशे’ और ‘पावड़े’ लिखो।

मैं उसकी मदद करना चाहता था। इसलिए मैंने स्वेच्छा से उसके नाटक का हिंदी अनुवाद किया, जो ‘इनामदार’ के नाम से मंचित हुआ। आर. एम. सिंह उसके निर्देशक थे। उसके बाद हम दोनों मित्र बन गए।

एक दिन साहसी मनोस्थिति में मैंने अपना एक नाटक निकाला, जिसे मैंने 15 वर्ष पहले लिखा था। उसपर मैंने अन्नाभाऊ की प्रतिक्रिया जाननी चाही। नाटक ‘छूआछूत’ पर आधारित था, जो उन दिनों की बड़ी समस्या थी। अन्नाभाऊ ने नाटक की पांडुलिपि को धैर्यपूर्वक सुना, बोलाᅳ

‘कामरेड, इसे फाड़कर फेंक दें, यह नाटक नहीं है।’ मैंने उसका विरोध किया और आलोचना का कारण जानना चाहा। इसपर उसका उत्तर थाᅳ‘आप ब्राह्मण के घर जन्मे हैं, दलित की पीड़ा  महसूस कर ही नहीं सकते।’

‘लगभग सभी यहूदी पूंजीपति थे। कार्ल मार्क्स भी यहूदी था, जिसने पूंजीवाद की बखिया उधेड़ दी थी।’ मैंने मजाकिया लहजे में कहा; और पांडुलिपि को किनारे रख दिया। उसके बाद हम दोनों खुले मन से हंसने लगे।

अन्नाभाऊ तेज-तर्रार आलोचक था, लेकिन वह खुद को भी नहीं बख्शता था।’’9

हंगल साहब के नाटक पर अन्नाभाऊ की टिप्पणी उनका पूर्वाग्रह भी हो सकती है। सहानुभूति और स्वानुभूति के लेखन को लेकर हिंदी साहित्य में भी खासी बहस होती होती है। पल-भर के लिए मान लिया जाए कि अन्नाभाऊ पूर्वाग्रह-ग्रस्त थे, तब उस प्रसिद्ध मराठी लेखक को भी पूर्वाग्रस्त मानना पड़ेगा, जिसने अन्नाभाऊ के नाटक को तिरस्कार पूर्ण ढंग से लौटा दिया था।

अन्नाभाऊ ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में गरीबी और जातीय उत्पीड़न के सताए लोगों को जगह दी थी। ऐसे लोग जो साहित्य में उपेक्षित थे। उनकी कहानियों में महार, मांग, रामोशी, बालुतेदार और चमड़े का काम करने वाले पात्र समाए हुए हैं। न केवल उनकी जीवंत उपस्थिति है, अपितु उनकी पीड़ाओं और संघर्ष को भी सम्मान के साथ सहेजा गया है। अन्नाभाऊ की एक बहुत ही मार्मिक कहानी हैᅳ‘तीन भाकरी’। गांव में दो औरतें रहती हैं। उनके बीच सास-बहू का रिश्ता है। दोनों मेहनत-मजदूरी करती हैं। अगर किसी दिन मेहनत से चूक जाएं तो घर का चूल्हा ठंडा पड़ा रहता है। बेहद गरीबी का जीवन जी रही वे औरतें आपस में हमेशा लड़ती रहती हैं। गांव के लोग अशिक्षित, रूढ़िवादी और भूत-प्रेत में विश्वास रखने वाले हैं। दोनों स्त्रियां अछूत हैं। इस कारण गांव-भर की उपेक्षा और तिरस्कार का शिकार हैं। एक दिन सांताजी, कहानी का एक पात्र बताता है कि दोनों भुखमरी की कगार पर हैं। उनके पास कुछ भुट्टे थे, जिससे केवल तीन रोटियां बन सकती हैं। दोनों स्त्रियां पेशोपेश में हैं कि रोटियों का बंटवारा कैसे होगा। दोनों सोचती है कि अगर वह रोटी बनाए तो दो रोटियों पर उसका अधिकार होगा। बहू का भी यही विचार था। परिणाम यह होता है कि दोनों सोचते-सोचते लेट जाती हैं। अगले दिन भूख के कारण उनके प्राण चले जाते हैं।

उनकी सुप्रसिद्ध कहानी ‘सुलतान’ जो एक कैदी की कहानी पर केंद्रित हैᅳके प्रमुख पात्र सुलतान का मानना है कि मनुष्य को उसकी जरूरत की चीजें रोटी, कपड़ा और मकान आसानी से प्राप्त होनी चाहिए। लेकिन गरीबी के कारण उसका सोच आगे नहीं बढ़ पाता। अंततः वह केवल इसलिए जेल चला जाता है क्योंकि मनुष्य को वहां उसकी न्यूनतम आवश्यकता की तीनों चीजें आसानी से उपलब्ध होती हैं। कुछ ऐसा ही दूसरी कहानी के पात्र भोमक्या और गोपिकाबाई भी करते हैं। भुखमरी से बचने के लिए भोमक्या सुलतान की तरह जेल चला जाता है तो गोपिकाबाई एक किसान की शरण ले लेती है। भोमक्या या सुलतान में से कोई भी अपराधी मनोवृत्ति का नहीं था। उन्होंने जेल में रहना केवल इसलिए पसंद किया था, क्योंकि वहां उनकी न्यूनतम आवश्यकताएं आसानी से पूरी हो जाती थीं। अन्नाभाऊ जेल जाने को भुखमरी की समस्या का समाधान नहीं मानते। बल्कि जेल को ऐसा ठिकाना मानते हैं, जहां नागरिक जीवन और मनुष्य का विकास एक साथ ठहर जाते हैं।

एक और कहानी ‘सांवला’ का उल्लेख यहां आवश्यक है। कथानायक सांवला पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री के पक्ष में सवाल उठाता है। रामोशी और मांग जाति के अपने मित्रों के साथ वह ब्रिटिश सत्ता से टकराता है। वे सभी अपने कार्य के प्रति ईमानदार हैं। इस बीच सांवला और उसके साथियों को काशी नाम की युवती के बारे में पता चलता है। ससुराल में दहेज-उत्पीड़न की शिकार है। अपने साथियों के साथ सांवला काशी को उसके सास-ससुर के चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष करता है। इसपर उसके सास-ससुर सांवला पर काशी के साथ बलात्कार का आरोप लगा देते हैं। आरोप से क्षुब्ध सांवला काशी से ससुर से कहता हैᅳ

‘दादा पाटिल! क्या आप सोचते हैं कि सिर्फ आप ही बेदाग चरित्र वाले हैं, क्या आप हमें चरित्रहीन मानते हैं, आपसे किसने यह कहा है?

‘लोग कहते हैं कि सभी मांग बलात्कारी होते हैं।’ यह सुनकर सांवला को क्रोध आ जाता है। वह कहता है, ‘कौन हैं वे लोग, मुझे बताओ। मैं उनकी पूरी दुनिया को जलाकर भस्म कर दूंगा।’ कहानी स्त्री समानता और स्वाधीनता के पक्ष में समाप्त होती है।

ऐसे विद्रोही चरित्रों से अन्नाभाऊ की कहानियां भरी पड़ी हैं।

अन्नाभाऊ के रचनाकर्म का कोई भी उल्लेख उनके उपन्यास ‘फकीरा’ के बिना संभव नहीं है। उनके अधिकांश कथापात्रों की तरह इस उपन्यास का कथापात्र फकीरा भी वास्तविक जीवन से उठाया गया है। वह जाति से मांग और शाश्वत विद्रोही है। फिर भी मानवीय है। अवसर आने पर वह अपने पिता के हत्यारों को मारने के बजाय, उन्हें महज दंड देकर छोड़ देता है। उपन्यास जहां सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करता है, वहीं जाति के जंजाल में फंसी अछूत जातियों की पीड़ा को भी सामने लाता है। महाराष्ट्र में मांग और महार कहीं-कहीं प्रतिद्विंद्वी जातियों के रूप में सामने आती हैं। इस उपन्यास में अन्नाभाऊ इन दोनों अछूत जातियों की एकता पर भी जोर देते हैं।

कुल मिलाकर अन्नाभाऊ का समस्त रचनाकर्म समाज में हाशिये पर पड़े लोगों के संघर्ष और चारित्रिक विशेषताओं को सामने लाता है। यह दुख की बात है कि उनके रचनाकर्म का हिंदी अनुवाद उनके निधन के 50 वर्ष बाद भी अनुपलब्ध है। अन्नाभाऊ की आस्था मार्क्स और आंबेडकर दोनों में थी। वे दोनों को साथ-साथ साधना चाहते थे। जबकि अधिकांश दलित लेखक मार्क्स और मार्क्सवादी लेखन की उपेक्षा करते आए हैं। अन्नाभाऊ के रचनाकर्म के हिंदी में न आने के पीछे कदाचित यह भी बड़ा कारण है। लेकिन इससे अन्नाभाऊ के प्रति जो अन्याय हुआ है, उसकी भरपाई असंभव है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1.         जग बदल घालूनी घाव

            सांगुनी गेले मला भीमराव

            गुलामगिरीच्या या चिखलात

            रुतुन बसला का ऐरावत

            अंग झाडूनी निघ बाहेरी- जनगीत, साहित्यरत्न लोकशाहीर अन्नाभाऊ साठे

2          My Journey to Russia, Translated by Dr. Ashwin Ranjanikar, New Voices Publications, Juna           Bazar, Aurangabad, 2014, Page-5 & 47.

3.         Dr. Sunil Bhise, Annabhau Sathe: A Socialist Thinker, as quoted from Kathale       Nanasaheb,       2001,    (2nd Edition), ‘Annabhau Sathe : Jeevan Aani Sahitya’, Samata Sainik Dal Prakashan, Parasaran Vyavastha, P-32.

4.         My Journey to Russia, Page-9

5.         Ibidजन

6.         दलित-क्रांति के कवि अण्णा भाऊ साठे, by अमरित लाल उइके http://amritlalukey.blogspot.com/2011/11/anna-bhau-    sathhe.html

7.         My Journey to Russia, Page-12

8.         Ibid page-31

9.        A. K. Hangal, in Life and Times of A. K. Hangal, Sterling Paperbacks,1999, Page 80-81

क्रांतिकारी कवि और उपदेशक : पोईकाइल योहन्नान

सामान्य

लेख

बीसवीं शताब्दी का दूसरा दशक। पूरा भारतवर्ष आजादी के संघर्ष में डूबा हुआ है। रविवार का दिन। दूर दक्षिण की त्रावणकोर रियासत में खपरैली छत की पुरानी इमारत प्रार्थना-संगीत से गूंज रही है। श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण किए, कच्चे फर्श पर विराजमान हैं। उनके आगे थोड़ा खाली स्थान है। उसके बाद चार फुट ऊंचा मिट्टी का बना चबूतरा। चबूतरे के बीचों-बीच दीपक झिलमिला रहा है। एक अधेड़, अधनंगा आदमी उसमें तेल डालने के लिए बार-बार उठकर आता है। दीपक के पीछे कोई दैवी प्रतीक है। उसका चेहरा एकदम खाली है। सिर के पीछे पीला प्रकाश फैला हुआ है। श्रद्धालुओं के आगे कुछ कुर्सियां और एक मेज हैं। एक बुजुर्ग आदमी कुर्सी के सहारे खड़ा होकर प्रवचन कर रहा है। सम्मोहित श्रद्धालु उसकी उपदेश गंगा में स्नान कर रहे हैं। बीच-बीच में वह अपनी आंखों में उतर आई नमी को साफ करता है। उपदेशक सीरियाई मारथोमा चर्च से छिटककर आया है। बाईबिल में इसलिए विश्वास नहीं करता, क्योंकि उसमें उसके लोगों और पूर्वजों के बारे में एक भी शब्द नहीं है। प्रवचन के बीच-बीच में वह उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने दास पूर्वजों के बारे में बताता है। उनके साथ हुए जातीय और सामंती उत्पीड़न का जिक्र करता है। श्रद्धालुओं को उपदेशक की एक-एक बात पर विश्वास है। इसलिए कि जो वह बता रहा है, वे स्वयं उन्हीं हालात से गुजर रहे हैं। दास लोग हैं, उन्हें न खुलकर बोलने की आजादी है, न मनभाता खाने और पहनने की। सार्वजनिक स्थानों पर वे आ-जा नहीं सकते। अपने मालिक से बात करनी हो तो कम से कम पचास कदम की दूरी रखनी पड़ती है। कहीं देह की  छाया भी उनपर पड़ न जाए। ऊपर से बात-बात पर मार देने या बेच आने की धमकी। उपदेशक उन्हें उनके जीवन की त्रासदियों के साथ-साथ सपनों से भी परचाता है। प्रवचन में लीन श्रद्धालु कभी भाव-विभोर होकर झूमने लगते हैं, तो कभी उनकी आंखें छलछला जाती हैं। सारा देश अंग्रेजों से देश की आजादी चाहता है। वे लोग जातीय उत्पीड़न और अपने दासत्व से मुक्ति के लिए प्रार्थनारत हैं। मुक्ति-संदेश जब-जब आंखों में आजादी का बिंब बनकर उभरता है, झुर्राए चेहरों पर खुशी झिलमिलाने लगती है।

भारतीय इतिहास की कोई भी पुस्तक उठाकर देख लीजिए। इस तरह की घटनाओं का उल्लेख नहीं मिलेगा। क्योंकि इतिहासकारों को राजा-महाराजाओं की जय-पराजय, उनके वैभव-विलास और पर्दे के पीछे चलने वाले षड्यंत्रों को लिखने में मजा आता है। आम आदमी की समस्याएं, उसके सुख-दुख उनकी चिंता का विषय नहीं होते। ‘फलां राजा ने नहर बनवाई’─वे बस इतना लिखते हैं। नहर का पानी हर जरूरतमंद तक पहुंचा या नहीं, यह उनकी चिंता का विषय नहीं होता। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी को वे भारतीय समाज के नवजागरण का नाम देते हैं। लेकिन समाज सुधारकों का नाम पूछा जाए तो अधिकांश की सुई राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती और विवेकानंद तक आते-आते अटक जाएगी। कुछ और खंगाला जाए तो संभव है, केशवचंद सेन, महादेव गोविंद रानाडे का नाम भी निकलकर सामने आ जाए। किसी पिछड़े या दलित समुदाय के समाज सुधारक का नाम जानने की कोशिश कीजिए? सवाल सुनते ही लोग कन्नी काटने लगेंगे। संभव है कुछ हंसने भी लग जाएं? कहें कि जो अपना भला नहीं कर सकते वे समाज का खाक सुधार करेंगे। इस तरह की टिप्पणी करने वालों पर आपको चाहे जितना गुस्सा आए, पर असल में उनका ज्यादा दोष नहीं है। शताब्दियों से उन्हें यही सिखाया गया है। यही उनकी मानस-रचना है। भारत का इतिहास, उसके धर्म-शास्त्र, नीति-शास्त्र सब समाज के खास लोगों द्वारा खास लोगों के लिए गढे़ गए हैं। इस तरह गढे़ गए हैं कि उनमें जो विरोधाभास और बड़बोलापन है, वह नजर ही नहीं आता। महाभारत के लिए नायक अवतारी कृष्ण हैं। परंतु धर्मराज का दर्जा पांडव-ज्येष्ठ को प्राप्त है। ये ‘धर्मराज’ एक बार 88000 ब्राह्मण स्नातकों को, प्रति स्नातक 30 के हिसाब से कुल 26,40,000 दासियां दान कर देते हैं(सभापर्व, शिशुपाल बध, भाग 48)। इतनी सारी दासियां कहां से जुटाई गईं? ब्राह्मण स्नातक इतनी दासियों का क्या करेंगे? ये सवाल दिमाग में आते ही नहीं हैं। क्योंकि सवाल करना उन धर्मग्रंथों के अनुसार पाप की श्रेणी में आता है।

यहां जो धर्म का लाभार्थी है, वह जाति का लाभार्थी भी है। जो इन दोनों का जितना बड़ा लाभार्थी है, समाज में उसका स्थान उतना ही ऊंचा है। जो इनका लाभार्थी नहीं है, उससे इस व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का अधिकार ही छीना हुआ है। जातिवाद की पैठ इतनी गहरी है कि ईसाई और इस्लाम जैसे धर्म जिनकी मूल संरचना में जाति के लिए कोई स्थान नहीं था, भारत आकर वे भी जाति के प्रभाव से मुक्त न रह सके। हिंदू धर्म से राहत की उम्मीद लेकर दूसरे धर्मों में गए लोग, अपने साथ जाति ले जाना नहीं भूले─

एक के बाद एक नए-नए चर्च बनते गए

फिर भी जाति-भेद गया नहीं….

एक चर्च स्वामी की खातिर है

एक चर्च दास के लिए

एक चर्च पुलाया के लिए है

एक परायास के लिए

एक चर्च ‘मुराक्कन’

मछुआरे के लिए है।1

इस प्रवृत्ति का विरोध न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। उनीसवीं शताब्दी में दलितों और पिछड़ों को लेकर कई सुधारवादी आंदोलन समानांतर रूप से चले थे, जिनका नेतृत्व उन समाजों के महापुरुषों के हाथों में था। उनकी पहल करने वाले थे, ज्योतिराव फुले। महाराष्ट्र में ‘सत्यशोधक मंडल’ की स्थापना द्वारा उन्होंने सीधे ब्राह्मणवाद को चुनौती दी थी। पंजाब में जाति-भेद और ब्राह्मणवाद विरोधी चेतना ‘आदिधर्म आंदोलन’, मध्यप्रदेश में ‘आदि हिंदू आंदोलन’ और बंगाल में ‘नामशूद्र आंदोलन’ के रूप में विद्यमान थी। दक्षिण भारत भी अप्रभावित नहीं था। बल्कि कुछ मायनों में तो वह शेष भारत से भी आगे था। तमिलनाडु में पेरियार के नेतृत्व में ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के साथ वैकल्पिक राजनीति की मांग करते हुए धर्म तथा जाति से जुड़े सभी प्राचीन संस्थानों को चुनौती दे रहे थे। केरल में श्री नारायण गुरु, अय्यंकालि, तथा पोईकाइल योहन्नान के नेतृत्व में क्रमशः ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम’, ‘साधु जन परिपालन संघम’ तथा ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ ने भी शताब्दियों से व्याप्त जातीय असमानता के विरुद्ध लोगों को जागरूक करने का काम किया था। आधुनिक भारत के निर्माण में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। 

ऊपर जिस उपदेशक का जिक्र हुआ है, वे थे─पोईकाइल योहन्नान। जिस सभा का वर्णन किया गया है, वह थी पोईकाइल योहन्नान द्वारा स्थापित ‘प्रत्यक्ष रक्षा देव सभा’ की साप्ताहिक धर्म-गोष्ठी। आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि सरसरी निगाह केरल के तत्कालीन हालात पर भी डाल ली जाए। 19वीं शताब्दी का केरल तीन बड़े राज्यों─कोचीन, त्रावणकोर और मालाबार में बंटा हुआ था। ईसाई मिशनरियां वहां सक्रिय थीं। समाज मुख्यतः दो हिस्सों में विभाजित था। पहले में विशेषाधिकार प्राप्त जातियां थीं। नंबूदरी ब्राह्मण, जो स्थानीय ब्राह्मण थे। उनका दर्जा समाज में सबसे ऊंचा था। दूसरे स्थान पर बाहर से आए ब्राह्मण और क्षत्रिय थे। नैय्यर मुख्यतः जमींदार थे। मंदिरों की देखरेख का काम भी उन्हीं के अधीन था। सरकारी नौकरियों पर भी उनका अधिकार था। इनके अलावा चेट्यिार, मुस्लिम और ईसाई भी समाज के उच्च वर्गों में आते थे। निचले वर्गों में इझ़वा, पुलाया, परायास, चेनान जैसी जातियां शामिल थीं। इझ़वा पिछड़ी जाति में गिने जाते थे। उनकी कुल जनसंख्या लगभग 15 प्रतिशत थी।  इझ़वाओं की आर्थिक स्थिति दलितों से कुछ बेहतर थी; लेकिन सामाजिक स्तर पर वे भी भेदभाव का शिकार थे। पुलाया(पुलायार), परायास, चेन्नान जातियों  की स्थिति दास के समान थी। छूआछूत कायम थी। इझ़वा ब्राह्मण से 30 फुट दूर रखकर बात कर सकता था, जबकि नैय्यर के अधिकाधिक 12 फुट निकट जा सकता था। वहीं पुलाया को ब्राह्मण से 90 फुट तथा नैय्यर से 60 दूरी रखनी पड़ती थी। सब कुछ ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार था।

दास प्रथा का चलन था। चांगनचेरी बड़ा बाजार था, जहां दासों की बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त होती थी। अन्य बाजारों में तिरुअंकारा, अलेप्पी, कुनोल, अतिंग्गल, कायमकुलम जैसे बाजार थे। उनमें माता-पिता या सगे-संबंधी दास लड़के-लड़कियों को बिक्री के लिए लाते थे। एक दास युवक का मूल्य 6 से 18 रुपयों के बीच हो सकता था। डॉ। जेनफी के अनुसार अकेले त्रावणकोर में खरीदे गए दासों की संख्या 130000 थी। ईसाई मिशनरियां उनके बीच तेजी से पैठ बना रही थीं। धर्मांतरित पुलाया, परायास को ईसाई धर्म में स्वीकृति तो मिल जाती थी। परंतु उनकी सामाजिक स्थिति पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। इझ़वा चूंकि समाज में बीच की हैसियत रखते थे, इसलिए तत्कालीन जातिप्रथा से उन्हें बहुत ज्यादा शिकायत नहीं थी। श्री नारायण गुरु ने इझ़वाओं को सड़क पर चलने और मंदिर प्रवेश की आजादी के लिए सफल आंदोलन किया था। जिसके लिए उन्हें पेरियार का समर्थन भी प्राप्त हुआ था, लेकिन पुलाया आंदोलन के नेता अय्यंकालि का, जिन्होंने दलित जातियों के आत्मसम्मान के लिए सवर्णों से सीधी लड़ाई लड़ी थी, श्रीनारायण गुरु ने कोई साथ नहीं दिया था। इससे तत्कालीन केरल की सामाजिक स्थिति को समझा जा सकता है। नारायण गुरु का नारा था─‘एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर।’ पेरियार और अय्यंकालि के सपने को उन आंदोलनों के साक्षी और सहभागी रहे, कवि सहोदरन अय्यपन(1889-1968) की कविता से समझा जा सकता है─

‘कोई धर्म नहीं, कोई जाति नहीं,

न कोई ईश्वर

केवल सदाचार, सदाचार….सदाचार

सबसे अच्छी तरह से,

और भी अच्छी तरह से’

पोईकाइल योहन्नान का जन्म 17 फरवरी 1879 को तत्कालीन त्रावणकोर राज्य तथा आधुनिक केरल के  पथानमथिट्टा जिले के इराबीपेरूर नामक गांव में हुआ था। पिता थे कंडन, मां केचि। माता-पिता ने उन्हें कोमारन नाम दिया था। ‘कोमारन’ कुमारन का अपभ्रंश है। जिस जाति, परायास में उनका जन्म हुआ था, समाज में उसकी हैसियत दास के समान थी। उन्हें शुद्ध संस्कृत नाम रखने की अनुमति न थी। हालांकि सरकार 1855 में कानून बनाकर दास प्रथा के उन्मूलन की घोषणा कर चुकी थी। बावजूद इसके दूर-दराज के क्षेत्रों हालात पहले जैसे ही थे। कुमारन के माता-पिता उसी गांव के जमींदार शंकरमंग्गलम के यहां दास थे। उस जाति के अधिकांश सदस्यों की हैसियत भू-दास के समान थी। जिस जमीन पर वे खेती करते थे, उसी के साथ उनका जीवन बंधा होता था। जमीन की खरीद-फरोख्त में आमतौर पर उससे जुड़े दास के स्वामी भी बदल जाते थे। ऐसा भी होता था कि दासों की खरीद-फरोख्त में उनका पूरा परिवार बिखर जाता था। नया मालिक केवल माता-पिता की कीमत लगाता, ऐसे में बच्चे अनाथ होकर रह जाते थे। कई बार माता-पिता अलग-अलग मालिकों की सेवा में चले जाते; और बच्चे बेसहारा होकर इधर-उधर भटकते रहते थे─

सुनो-सुनो

मेरे प्यारे भाइयो सुनो

हमारे पूर्वजों ने खूब झेला है

गुलामी में जीना

बिना रुके मालिक की मार सहना

कष्ट और अभावों से गुजरना

पिता एक बाजार में बिके

मां दूसरे में

बच्चे हुए अनाथ2

उन दिनों ईसाई मिशनरियां दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में लगी थीं। कुमारन जब पांच वर्ष का था, तभी उसका ‘बपत्सिमा’ कर दिया था। अपनी जाति के दूसरे किशोरों की भांति कुमारन को भी जमींदार के लिए काम करना पड़ता था। अपने मालिक के लिए वह जानवर चराता। हल जोतते समय यथासंभव मदद करता। इसके अलावा वह काम भी करता जो उसका मालिक उसे सौंपता था। दास के रूप में जन्म लेने के बावजूद कुमारन अपने हमउम्र बच्चों से अलग था। उसका मस्तिष्क सक्रिय था। अपनी सामाजिक स्थिति को देखकर उसके दिमाग में अनेक सवाल कौंधते रहते थे। जातीय ऊंच-नीच और छूआछूत के प्रति वह उद्धिग्न रहता था। घर में तरह-तरह के रीति-रिवाज देख वह चकित रह जाता था। 

परायास जाति का एक रिवाज था। बालक के शुद्धिकरण के नाम पर उसके कान में पानी डालना। कुमारन की मां जब उसका शुद्धिकरण करने चलीं तो उसने मां से सहज भाव से पूछा था─‘एक कान में पानी डालते समय, यदि दूसरे कान से गंदगी प्रवेश करेगी, तब तुम उसे कैसे रोकोगी?’3 भोली स्त्री को कोई जवाब न सूझा। वह बस बेटे के मुंह की ओर देखने लगी। कुमारन की व्यवस्था से विद्रोह, परंपराओं को लेकर सवाल खड़े करने की प्रवृत्ति, उम्र के साथ-साथ बढ़ती गई। उसकी जिज्ञासाएं व्यावहारिक होती थीं। उनका समाधान वह अपने रोजमर्रा के जीवन से ही खोजने की कोशिश करता था। निचली जातियों में तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक और काला जादू को लेकर अनेक भ्रांतियां व्याप्त थीं। एक जादूगर कौड़ियों और घंटी की मदद से काला-जादू दिखाया करता था। एक बार कुमारन ने खेल-खेल में उसकी कौड़ियां और घंटी चुरा लीं। जब वह तांत्रिक काला-जादू दिखाने लगा तो उसने इन चीजों को अपने झोले से गायब पाया। इसपर कुमारन ने उसे चुनौती दी, ‘यदि तुम्हारे काले जादू में सचमुच कोई शक्ति है तो उसकी मदद से उन चीजों को ढूंढकर दिखाओ।’ तांत्रिक बगलें झांकने लगा। कुमारन ने अपने दोस्तों को समझाया कि काला जादू जैसी कोई चीज नहीं होती─

‘यदि काला जादू ठीक उसी तरह काम करता, जैसा तांत्रिक का दावा है तो हम शताब्दियों से दास बनकर नहीं रह रहे होते।’4

इससे जहां कुमारन की सूझबूझ का पता चलता है, वहीं अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने दासत्व को लेकर वह बचपन में कितना सजग था। यही सजगता आगे चलकर जातीय शोषण और सामाजिक रूढ़ियों प्रति आक्रोश का रूप लेती गई। उन्हीं दिनों की एक घटना है। एक दिन कुमारन सामंत के खेतों में हल चला रहा था। उसकी जाति के कई और लड़के भी उसके साथ थे। खेत जोतते समय एकाएक नरकंकाल सामने आ गया। बाकी लड़के भी नरकंकाल को देखने के लिए आसपास सिमट आए। सभी के भीतर कंकाल के बारे में जानने की उत्सुकता थी। तब कुमारन ने अपने साथियों से कहा कि वह कंकाल उनके किसी पुरखे का भी हो सकता है, जो भूख-प्यास से व्याकुल काम करते-करते खेत में गिर पड़ा हो या मालिक ने मारकर यहां दफना दिया हो। सुनते ही उसके दोस्त सोच में पड़ गए। उन्होंने नरकंकाल के अवशेषों को संभालकर मिट्टी से उठाया और पूरे सम्मान के साथ पुनः जमीन में दफना दिया।

मालिक के यहां कुमारन को सुपारी के पत्तों पर खाना परोसा जाता था, जो उनके दासत्व को दर्शाता था। पोईकाइल नामकरण के पीछे भी एक कहानी है। कुमारन अपने अनुभव से जो सीखता था, उसे अपने दोस्तों को बता देता था। धीरे-धीरे दोस्तों के बीच उसकी इज्जत बढ़ने लगी। उसने ‘पोइका कूत्तर’(पोइका की सभा) नामक एक संगठन बनाया था, जिसमें वह अपने अनुभव द्वारा सीखी हुई बातें नियमित रूप से साथियों को बताता था। उसी से उसको ‘पोईकाइल’ उपनाम मिला। आगे चलकर वही उसकी मुख्य पहचान बन गया।  

ईसाई मिशनरियां दलितों में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए कई तरह से प्रयास कर रही थीं। भयंकर जातिवाद के चलते सरकारी स्कूलों में दलित और निम्नतर जातियों को पढ़ाए जाने की सुविधा प्राप्त न थी। मिशनरियां ऐसी ही जातियों में पैठ बनाने की कोशिशा में लगी थीं। उनके लिए स्कूल खोले जा रहे थे। शिक्षा के नाम पर वहां केवल बाईबिल तथा ईसाई धर्म से जुड़े विश्वासों के बारे में सिखाया जाता था। विद्यालयों में प्रवेश के समय ही बच्चों को ईसाई परंपरा के अनुरूप नया नाम दिया जाता था। उसके बाद वे ईसाई समुदाय का हिस्सा मान लिए जाते थे, उसके लिए बपत्सिमा की रस्म, जो ईसाई धर्म का खास संस्कार है─आवश्यक नहीं थी। नए नाम या धार्मिक पहचान से जुड़ने का विद्यार्थी या उसके माता-पिता की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ता था, बावजूद इसके स्कूल प्रवेश के समय नया नाम देने की परंपरा बड़े पैमाने पर स्वीकार्य थी। इसका मुख्य कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की मान्यताओं के चलते दास समुदाय अपने लिए अच्छे नाम चुन ही सकता था। बाकी स्कूलों के दरवाजे दलित समुदाय के लिए बंद थे। ऐसी स्थिति में मिशनरी स्कूल जो पहचान देते, वही मान ली जाती थी।

उन थेवरक्कुटू कोचकुंजु नाम का दलित अध्यापक बच्चों को ईसाई धर्म के अनुरूप शिक्षा देने के लिए पाठशाला चलाता था। कुमारन को उसी की पाठशाला में भर्ती कराया गया। वहीं रहकर उसने बाईबिल का अध्ययन किया। बाईबिल की कहानियों में पढ़ाया जाता था कि परमात्मा दुखी लोगों की मदद करता है। उनके लिए ईश्वर के दरवाजे सदैव खुले रहते हैं। इसपर वह सोचता कि यदि परमात्मा सचमुच ऐसा ही है तो वह दलितों और दासों के उद्धार के लिए कोई पहल क्यों नहीं करता? किसने उसे रोक रखा है? बाईबिल में किसी दास जाति का वर्णन क्यों नहीं है? यहीं से प्रचलित धर्म को लेकर उसके मन में शंकाएं पैदा होने लगीं। पर यह शुरुआत थी। शिक्षा के दौरान कुमारन ने स्वयं को अच्छा विद्यार्थी सिद्ध किया। बड़ा होने पर कुमारन की धर्म-संबंधी जिज्ञासाएं उसे चर्च की ओर ले गईं।

वे पोईकाइल के पोईकाइल योहन्नान बनने के लिए दिन थे। हालांकि माता-पिता और बस्ती वालों के लिए वह तब भी ‘कोमारन’ ही था। योहन्नान संत थॉमस द्वारा स्थापित मारथोमा चर्च में धर्म की शिक्षा देने लगे। चर्च का हिस्सा बनने के बावजूद योहन्नान के अपने समाज और जाति के प्रति सरोकार पूर्ववत थे। धीरे-धीरे उन्होंने खुलना आरंभ किया। दुनिया भर में बाईबिल को परमात्मा का संदेश खोजने के लिए पढ़ा जाता है। योहन्नान उसमें अपने समाज को खोजने लगे। उन्हें लगा कि बाईबिल के पात्रों की त्रासदी उनके अपने समाज के, त्रावणकोर के दास जीवन की त्रासदी से मेल खाती हैं। 

उन दिनों ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होने वाले दो तरह के लोग थे। अंग्रेजों को अपना शासन चलाने के लिए अंग्रेजी के जानकार लोगों की आवश्यकता थी, ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो उनके भरोसेमंद रहकर सौंपी गई जिम्मेदारियों को निभा सकें। इससे आकर्षित होकर आरंभ में उच्च जाति के लोग बड़ी संख्या में ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हुए थे। दूसरा वर्ग पुलाया, परायास जैसी दास जातियों का था, जो जातीय उत्पीड़न से तंग आकर या सरकारी स्कूलों में शिक्षा के अवसर न देखकर ईसाई मिशनरियों की शरण में चले जाते थे। वहां उन्हें, उनके चाहे-अनचाहे ईसाई पहचान से जोड़ दिया जाता था। उच्च जाति के ईसाई धर्म में शामिल हुए लोग अपने साथ अपने जातीय संस्कार भी ले जाते थे। इसलिए मूल ईसाई धर्म में जाति-आधारित विभाजन की भले ही कोई अनुमति न हो, परंतु भारतीय ईसाइयों में इस तरह का विभाजन सामान्य बात थी। इसी से योहन्नान के मन में ईसाई धर्म के प्रति शंकाएं उत्पन्न होने लगीं। उन्हें लगा कि ईसाई धर्मांतरित होकर आने वाले दलितों को कभी भी अपेक्षित मान-सम्मान देने वाले नहीं हैं। धर्म की सांगठनिक क्षमता का उपयोग करते हुए उन्होंने निचली जाति के लोगों को जोड़ना आरंभ किया।

लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए योहन्नान ने जो रास्ता अपनाया उसी में उनकी मौलिकता छिपी थी। दूसरे धर्मप्रचारक परमात्मा के साम्राज्य का महिमा-मंडन करते। इस संसार तो पाप और दुराचारों से भरपूर बताते थे। मानव-जीवन को वे अब्बा और ईव के दुराचार की देन मानते थे। योहन्नान का इस कहानी पर विश्वास नहीं था। जीवन चाहे जितना कष्टमय हो, पर है तो वह जीवन ही। जिस बाईबिल में यह कहानी है, वह उनके समाज की नहीं हो सकती। होगी किसी अदृश्य-अनाम समाज की। बाईबिल में जो स्थितियां हैं उनका देशकाल एकदम भिन्न है। उसमें एक भी अध्याय ऐसा नहीं है जो पुलायाओं और परायासों की कहानी कहता हो─

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

यह एक प्रकार की राजनीति ही थी? शताब्दियों से लुटी-पिटी जातियों को न्याय दिलाने की राजनीति! या फिर पुराने धर्म को कठघरे में लाकर नया संप्रदाय चलाने की राजनीति! परंतु राजनीति कहां नहीं है? हिंदू धर्म स्वयं बड़ी राजनीति है जो जाति के नाम पर समाज का स्तरीकरण कर देता है। उसे ऊंच-नीच में बांट देता है। व्यवस्था ऐसी है कि जो इसमें सबसे ऊपर है, तमाम कमजोरियों के बावजूद वह वहीं बना रहता है। और जो नीचे है, वह कितना ही अच्छा करने का प्रयत्न करे, ऊपर जाने का उसका स्वप्न भी पाप मान लिया जाता है। यह ऐसी संस्कृति है जिसमें देवराज इंद्र चाहे जितने बलात्कार करें, उनका देवत्व कभी खंडित नहीं होता। अपवित्र और पतित मानी जाती हैं, बलत्कृत होने वाली स्त्रियां।

बाईबिल का स्वप्नलोक(यूटोपिया) यदि योहन्नान का स्वप्नलोक नहीं था तो फिर क्या था? कह सकते हैं कि योहन्नान ने अपना स्वप्नलोक बड़ी शाइस्तगी से गढ़ा था। वही द्रविड़ अस्मिता का यूटोपिया, जिसमें उसने बस थोड़ा-सा संशोधन किया था। ब्राह्मणों को विदेशी मूल का बताकर फुले ने अनार्य बहुजनों को इस देश का मूल निवासी घोषित किया था। मैक्समूलर से लेकर तिलक तक, सबकी यही मान्यता थी। यह दर्शाती थी कि दक्षिण भारत के निवासी ही इस देश के मूल निवासी हैं। ऐतिहासिक सिद्धांत के रूप में पेरियार ने इसी को आधार मानकर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की रूपरेखा गढ़ी थी। योहन्नान ने इसका सीमित संदर्भों में, अपनी तरह से प्रयोग किया था। उसने पुलाया और परायास जातियों को समझाया कि उनके पूर्वज त्रावणकोर के वैभवशाली बाशिंदे थे। उसकी सुख-समृद्धि उनकी अपनी सुख-समृद्धि थी। आर्य उसे लूटकर खुद त्रावणकोर के वैभवशाली शासक बन बैठे। जो कभी स्वामी थे आज वे गुलामगिरी करने के लिए विवश हैं।

पुराने वैभव को प्राप्त करने के फुले बहुजनों को शिक्षित होने की सलाह देते हैं। पेरियार का तरीका लोकतांत्रिक था। वे चाहते थे कि धर्म और जाति का विनाश हो। लोग उनसे ऊपर उठकर सोचें। जातिवाद के संरक्षक ब्राह्मणवाद भी नाश हो। लोग लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए संगठित हों। योहन्नान के लिए वही पुराना धर्म का रास्ता था। उद्धार के लिए मसीहा का इंतजार करना। कई बार वे स्वयं को ही मसीही दूत के रूप में पेश कर देते थे। रास्ता भले ही पुराना हो, सपना तो नया था। वह सपना ही लोगों को योहन्नान की ओर खींच रहा था। योहन्नान की धर्म-संबंधी व्याख्याएं चर्च के अधिकारियों को स्वीकार्य न थीं। भीतर ही भीतर उसके विरुद्ध माहौल बनता जा रहा था। लेकिन यह सोचकर कि लोग योहन्नान से प्रभावित हैं, उनकी सभाओं में भीड़ बढ़ती ही जा रही है, सब के सब अनुयायी ईसाई धर्म की निरंतर फूलती-फलती खेती हैं─वे आरंभ में उनके प्रति नर्म बने रहे।

उन्हीं दिनों एक घटना घटी जिससे योहन्नान को सीधे चर्च के विरोध में उतरना पड़ा। एक निम्न जातीय दलित को चर्च की कब्रगाह में दफनाया गया था। अधिकारियों को पता चला तो उन्होंने कब्र खोदकर उसका शव बाहर निकाल दिया। कहा कि उसे उसकी जाति की कब्रगाह में ले जाकर दफनाएं। योहन्नान के लिए यह सूचना हैरान कर देने वाली थी। उन्हें चर्च का व्यवहार पक्षपातपूर्ण लगा। विवाद बढ़ा तो योहन्नान ने सीरयाई चर्च को अलविदा कह दिया। बाद उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ की सदस्यता ग्रहण कर ली। लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए योहन्नान को खास ठिकाने की आवश्यकता नहीं थी। लोगों के बीच जाकर, जहां भी, जिस रूप में भी अपने विचार रखने का अवसर मिले, उन्हें स्वीकार था। वे चौराहों पर, सड़क किनारे, घरों और झोंपड़ियों के बीच कहीं भी उपयुक्त स्थान देख, लोगों को एकजुट कर, उपदेश देने लगते थे। बाईबिल की बातों को ज्यों का त्यों स्वीकारने के बजाए वे दलित दृष्टिकोण से उनकी व्याख्या करते। उनका मानना था कि बाईबिल ने स्वयं दमितों के साथ छल किया गया है। ये बातें चर्च की चारदीवारी में संभव नहीं थीं, इसलिए वे वहां से हटकर सभाएं करते। लोगों को समझाते कि उनकी सामाजिक हैसियत हमेशा से ऐसी न थी, अपितु त्रावणकोर के प्राचीन वैभव में उनका भी योगदान था। आर्यों ने उनपर हमला करके द्रविड़ों को अपना गुलाम बना लिया। वे लोगों को बताते कि प्राचीन द्रविड़ उदार सभ्यता के निर्माता थे। उनमें ऊंच-नीच की भावना नहीं थी। आर्यों ने न केवल उस सभ्यता को नष्ट किया, अपितु दास-पृथा भी लागू की। जिससे समाज में गुलाम और मालिक का चलन आरंभ हुआ। तभी से द्रविड़ों का जीवन नर्कमय बना हुआ है। योहन्नान के उपदेशों से प्रभावित होकर पुलायार और परायास जैसी दास जातियों के लोग उसके पीछे संगठित होने लगे। एक उपदेशक के रूप में उनका मान-सम्मान बढ़ता ही जा रहा था। योहन्नान ने बड़ी कुशलता से धर्म की ताकत को शताब्दियों से होते आ रहे शोषण से जोड़ा था। 

लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए वे कई कहानियों का सहारा लेते। कुछ मौखिक कहानियां भी दासों के बीच विद्यमान थी। उनमें से एक यह थी कि दास पृथा लागू होने से पहले खेती के लिए बैलों का उपयोग किया जाता था। दास पृथा लागू होने के बाद हल में बैलों के साथ-साथ दास भी जोते जाने लगे। उनकी साप्ताहिक बैठकों में एक किस्सा खूब चलता था, जिसमें एक कमजोर मरणासन्न दास को हल में बैल के साथ जुता हुआ दिखाया जाता। बताया जाता कि 1855 में दास-पृथा उन्मूलन से पहले प्रत्येक दास की पीठ पर सांड का निशान बना होता था, जो उसके दासत्व का प्रतीक था। उनके पुराने अनुयायी मानते थे कि वैसा ही निशान योहन्नान की पीठ पर भी था। साप्ताहिक सभाओं में योहन्नान अकसर यह गीत लोगों को सुनाया करते थे─

जंजीरों में जकड़े, तालों में कैद

रखा जाता था उन्हें बंदियों की तरह

पीठ पर बरसते कोड़े कर उन्हें देते थे अधमरा

जीवन उनका था जानवरों के समान

बैल के साथ हल में जोतकर

जुतवाए जाते थे खेत….

ये गीत दासों को उनके जीवन की त्रासदियों से परचाते थे। इसलिए लोग उन कहानियों पर सहज विश्वास कर लेते थे। योहन्नान उनके लिए न केवल उपदेशक थे, बल्कि मार्गदर्शक भी। अनुयायियों को लगता था कि केवल वही उनका उद्धार कर सकते हैं। 

उच्च जातियों में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी। सो चर्च सहित तथाकथित उच्च जातियों का बड़ा वर्ग योहन्नान के विरोध में संगठित होने लगा। उसकी सभाओं पर हमले होने लगे। एक बड़ा हमला, 1905 में कडापरा में धर्मांतरित दलित ईसाई कुझीपरंबिल पैथ्रोस के घर पर हुआ। उस दिन योहन्नान ने एक गोपनीय बैठक बुलाई हुई थी। बैठक का विषय था, ‘अनैतिकता की संतान, ईश्वर की संतान तथा एशिया के सात चर्च’। उस बैठक में उनका व्याख्यान व्यंग्यात्मक था। दूसरा हमला जो पहले से भी बड़ा था, ‘ओथारा’ में हुआ। उस बैठक में भारी संख्या में लोग जमा थे। बैठक के लिए पंडाल का इंतजाम किया गया था। उपद्रवियों ने रोशनी के लिए लगाए गए लालटेनों की मदद से पंडाल को आग के हवाले कर दिया। दलितों को वहां से भागना पड़ा। योहन्नान को अपने अनुयायियों के साथ एक पेड़ के नीचे शरण लेने पड़ी। ऐसे ही एक बार जब हमलावर उनपर आक्रमण के उतारू थे, योहन्नान को भागकर नाले में छिपना पड़ा था। कोझुकुचिरा, वेलांदि, वैंकठनम, मंगलम् की सभाओं में भी व्यवधान उत्पन्न किया गया। वेत्तियादु की बैठक में उपद्रवियों के हमले में एक महिला की हत्या कर दी गई। एक बार जब वे प्रवचन कर रहे थे, उच्च जातियों का हमला हुआ। जान बचाने के लिए उन्हें स्त्रियों के बीच छिपना पड़ा।  

योहन्नान उच्च जाति के लोगों के साथ-साथ चर्च की निगाह में खटकने लगे थे। उसपर चर्च छोड़ने का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। लोग किसी भी तरह योहन्नान को दंडित करना चाहते थे। दूसरी ओर लगातार हमलों से योहन्नान की प्रतिष्ठा बढ़ती ही जा रही थी। साथ ही बढ़ रहा था, उसका हौसला। एक अवसर ऐसा आया जब योहन्नान और चर्च एकदम आमने सामने थे। उन दिनों वे ‘ब्रेदरान मिशन’ के सदस्य थे। उस संप्रदाय के लोगों का विश्वास था कि यह संसार कपटपूर्ण लोगों का जमाबड़ा है। योहन्नान को वह कपट अपने चारों और नजर आता। उन्हीं दिनों योहन्नान ने बाईबिल को भी अपनी आलोचना के दायरे में शामिल कर लिया। उसके तर्क बहुत सीधे और लोगों के दिमाग में घर कर जाने वाले थे। जैसे कि उसका कहना था कि बाईबिल के धर्मादेश बाहरी लोगों के लिए हैं। नए धर्मादेश(न्यू टेस्टामेंट) के बारे में योहन्नान का कहना था कि उसमें संत पॉल और दूसरे लोगों के धर्म-संदेश उन लोगों, जैसे रोमन और कुरिंथवासियों के लिए हैं, जिन्हें वे संबोधित करना चाहते थे। उनमें त्रावणकोर के पुलायाओं के लिए एक भी धर्म-संदेश शामिल नहीं है। ईसाई धर्म कहता है कि स्वर्ग का राज्य उन लोगों के लिए है, जो शोषित और उत्पीड़ित हैं। यह सच के नाम पर मजाक है। वे लोगों को समझाते कि धरती से परे स्वर्ग कहीं नहीं है। पुलायाओं और परायासों का स्वर्ग कभी त्रावणकोर था। उसका वैभव उनका अपना वैभव था। उसकी समृद्धि उनके अपने जीवन से झलकती थी। कुछ कपटी लोगों के कारण उनका सुख-वैभव उनसे छिन चुका है। केवल बाईबिल के प्रति आस्था उसे नहीं लौटा सकती। उसे दुबारा प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मृत्यु बाद स्वर्ग का बाईबिल का दावा लोगों के साथ सिवाय छल के कुछ और नहीं है।

ध्यातव्य है कि पेरियार ने भी तमिलनाडु को द्रविड़ों की मूल भूमि घोषित करने के साथ-साथ ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया था। वे नास्तिक थे। किसी धर्म में विश्वास नहीं करते थे। योहन्नान आस्थावादी थे। उन्होंने अपना जीवन चर्च के उपदेशक से आरंभ किया था। लेकिन बाईबिल से उनका विश्वास हट चुका था। इस ईसाई मान्यता पर भी उनका विश्वास नहीं था कि परमात्मा सब देख रहा है। जितने भी दीन-दुखी हैं, अंत में सब उसकी शरण में होंगे। वह न्याय करेगा। योहन्नान ने स्वतंत्र रास्ता चुना था। ईसाई धर्म के प्रति उठते इन्हीं संदेहों के फलस्वरूप योहन्नान ने बहुप्रसिद्ध मेरामोन सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। उसके पहले वे वेकठनम की सभा में बाईबिल की आलोचना कर चुके थे। उनका कहना था कि दासों के लिए वह पुस्तक वृथा है। इसलिए उसे साथ लेकर चलना बेमानी है।

मेरामेन सम्मेलन के विरोध में मुथलपुरा में समानांतर सम्मेलन का आयोजन किया गया। उस समय तक योहन्नान अपने समर्थकों के हृदय में ईसाईधर्म और बाईबिल के प्रति आक्रोश पैदा कर चुके थे। मुथलपुरा सम्मेलन में उसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला। उसके अनुयायी अपने हाथों में बाईबिल की प्रतियां लिए हुए थे। उत्साहित लोगों ने बड़ी वेदिका तैयार की। उसमें आग जलाई गई। देखते ही देखते लोग साथ लाई बाईबिल की प्रतियां उसमें फैंकने लगे। जो लोग बाईबिल को आग के हवाले करने से झिझक रहे थे, उन्हें दूसरे लोगों  द्वारा उकसाया गया। एक ही दिन में बाईबिल की हजारों प्रतियां आग के हवाले कर दी गईं।5 यह अप्रत्याशित था। योहन्नान के उस कदम से सारा ईसाई समुदाय सकते में आ गया। आनन-फानन में योहन्नान के कृत्य को धर्म-विरोधी घोषित कर दिया गया। जांच कमीशन बिठाया गया। योहन्नान को मारथोमा चर्च से निष्काषित कर दिया गया।

यह 1905 के आसपास की घटना है। उसके बाद वे ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ से जुड़े। उसका नजरिया अपेक्षाकृत सुधारवादी था। उसका प्रभावक्षेत्र ऊंची जाति के लोगों में अधिक था। जाति-भेद के प्रति उसका नजरिया भी दूसरों से अलग न था। योहन्नान का बहुत जल्दी उससे भी मोह भंग हो गया। खिन्न होकर उन्होंने ‘चर्च मिशनरी सोसाइटी’ को छोड़ दिया। उसके बाद कुछ समय के लिए ‘ब्रोदरान मिशन’ में शामिल हुए। ये ईसाई धर्म की वे संस्थाएं थीं जो मानव-मात्र के बीच बराबरी का दावा करती थीं। लेकिन एक के बाद एक संस्था का अनुभव प्राप्त करने के बाद योहन्नान समझ चुके थे कि संस्थाओं का मूल चरित्र जो बताया जाता है, उससे बिलकुल अलग है। उनके साथ रहकर दासत्व और जातिभेद का समाधान तो दूर, उनके विरोध में आवाज उठाना भी संभव नहीं है। 1907 के आसपास उन्होंने ‘ब्रोदरान मिशन’ को भी छोड़ दिया और स्वतंत्र होकर काम करने लगे।

प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा

यह मानते हुए कि ईसाई धर्म में कपटी जातिवादी लोगों का जमाबड़ा है, बाईबिल दासों के लिए पूरी तरह अप्रासंगिक  है। वह दमित जातियों की समस्या का समाधान करने में अक्षम है─ योहन्नान ने 1909 में उन्होंने ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ की स्थापना की। अब योहन्नान स्वतंत्र ‘उपदेशी’ थे। उनके सामने उनका समाज था, उसके दमन और शोषण की अंतहीन व्यथाएं थीं। अपने व्याख्यानों वे दास जातियों से साफ-सुथरा रहने को कहते। शिक्षा ग्रहण करने की सलाह देते और संगठित होने का आवाह्न करते। ‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ के मुख्य उद्देश्य थे─

1. ईसाई धर्म और हिंदुत्व दोनों का खंडन करना।

2. यह विश्वास करना कि ईश्वर दमित लोगों के उत्थान के लिए पुनः अवतरित होंगे।

3. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व भाव में विश्वास रखना

4. सृष्टि रचियता के नाम पर प्रार्थना करना, लेकिन बलिप्रथा का परित्याग

5. चर्च से अलग, अपने मंदिर में प्रार्थना करना

‘प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा’ का एकमात्र स्वप्न था, दासत्व से मुक्ति उसका एकमात्र स्वप्न था। दास जातियों के पुराने वैभव को प्राप्त करना। हालांकि इसके लिए योहन्नान के पास सिवाय प्रार्थना के दूसरा कोई रास्ता न था। प्रत्यक्ष रक्षा दैव सभा का एक गीत6 जिसमें व्यंग्य भी झलकता है, इस प्रकार है─

ईश्वर को किसी ने नहीं सुना

देवदूतों को किसी ने भी देखा नहीं

मुक्ति की चाहत में प्रार्थना करने वाले

उसके सेवक भी दिखाई नहीं पड़ते

मैंने परमात्मा को नहीं देखा

मैंने जीसस को नहीं देखा

कोई देवदूत, कोई आत्मा

भी मेरी निगाह से नहीं गुजरी

…..

उनसे जुड़ी दुखद अनुभूतियों

की चर्चा न कर पाने का मुझे खेद है।

पेरियार की भांति योहन्नान ने भी अपने अनुयायियों को ‘आदि द्रविड़’ कहकर संबोधित किया है। उसका मानना था कि दलित एक समृद्ध परंपरा के अनुगामी थे। लेकिन लंबी दासता के चलते वे अपने ही इतिहास को भुला चुके हैं। और जब तक उनमें दास-भाव है, तब तक वे अपनी समृद्ध परंपरा की ओर नहीं लौट सकते। उसका विश्वास था कि ‘परमात्मा गुलामों की मुक्ति के रूप में उसके रूप में अवतरित हुए हैं।’7 यह कहना एकदम गलत है कि ‘स्वर्ग’ और ‘मोक्ष’ की प्राप्ति केवल मृत्यु के बाद ही संभव है। परमात्मा अपनी मर्जी से समय-समय पर जन्म लेते हैं। इसलिए उनके नाम पर बनी परंपराएं और कर्मकांड वृथा हैं। मुथलपुरा की घटना की जांच के लिए समिति के सदस्यों में के। वी। सिमॉन नाम का सदस्य भी था। जन्म से दलित सिमॉन कवि, लेखक और उपदेशक भी थे। अपनी पुस्तक ‘दि वर्क आफ पोईकाइल योहन्नान एंड पीआरडीएस’ में उसने लिखा है─

‘योहन्नान और उसके साथियों का मुख्य लक्ष्य था, अपने अनुयायियों को जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति दिलाना….बाईबिल उस समय या उसकी पीढ़ी(जाति) के लिए उपयोगी नहीं थी। इस दुनिया में चर्च को धर्मदूतों(जीसस के प्रथम 12 अनुयायी) के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए था। तब से आज तक हजारों वर्ष के अंतराल में एक भी व्यक्ति की रक्षा नहीं हो सकी है….कोई दुबारा आने वाला नहीं है, कोई हजार वर्ष लंबा शासन नहीं है। इन(बाईबिल के) उपदेशों के फलस्वरूप जिन्होंने स्वयं को औपचारिक रूप से ‘सुरक्षित’ मान लिया था, वे एक बार फिर योहन्नान के हाथों में सुरक्षित हुए(उनमें से अधिकांश निचली जाति के लोग थे)। इन ‘सुरक्षित’ अनुयायियों को योहन्नान के उपदेशों और विचारों से परे किसी चीज की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए उन्होंने बाईबिल को आग के हवाले कर दिया। उनके लिए योहन्नान के शब्द किसी भी धर्मादेश या कानून से बढ़कर थे।’7  

यह ठीक है कि योहन्नान दलितों को कोई स्पष्ट पहचान देने में असमर्थ रहे। उनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित था। फिर भी वे अकेले संत थे, जो ईसाई धर्म को मंदिरों और चर्च की दीवारों से बाहर निकालकर लोगों के बीच ले आए थे। उनके लिए मुक्ति का अभिप्राय मोक्ष नहीं था, बल्कि उस दासत्व से मुक्ति थी, जिसे उनके लोगों पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी के रूप में भोगते आए थे। ऐसे लोग पचास-सौ या हजार नहीं, लाखों में हैं। योहन्नान के समकालीन कवि और समाज सुधारक सहोदरान अय्यपन ने अपनी कविता में इस ओर इशारा करते हुए कहा है─

अपने पसीने और जीवन-रक्त के साथ

इस वसुंधरा के धन-भंडार भरने वाले बहुजनो

श्रमजनो….याद रखो

जीर्ण-शीर्ण झोपड़ियों में,

भोजन और वस्त्रों के लिए तिल-तिल करतीं संघर्ष

गरीब, अभावग्रस्त─कच्चे नर्म फर्श पर बच्चे जनती स्त्रियां                                                                                                                                                                                                               

एक-दो नहीं लाखों में हैं

योहन्नान के योगदान को देखते हुए उन्हें त्रावणकोर की पहली विधायिका ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुना गया था। वे 1921 और 1931 में दो बार उस पद पर रहे। वे कदाचित अकेले सदस्य थे जिन्हें कई जातियों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था। उस पद पर रहते हुए योहन्नान ने दास कही जाने वाली जातियों के लड़कों को शिक्षा में अतिरिक्त मदद देने का प्रस्ताव पेश किया था, ताकि वे दूसरी जाति के बच्चों के साथ स्पर्धा कर सकें। इसके अलावा उन्होंने सरकार निचली जाति की गरीबी दूर करने के लिए उनके बीच छोटे उद्यमों को बढ़ावा देने की मांग भी की थी , जिससे वे आत्मनिर्भर होकर आगे बढ़ सकें। अपने अनुयायियों के बीच वे पोईकाइल अप्पचन, कुमार देवा के नाम से भी जाने जाते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

1.      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 15.

2.           Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies, Kottayam

3.            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T. Tharun

4.           As above

5.            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated by P. M. Abraham, February 1996, Page 12.

6.      Above, page 14-15.

7।       As above page 13

1-      PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 15।

2।            Songs of Poykayil Appachan 1905 to 1939, Edited by V V Swamy and E V Anil, Institute of PRDS Studies,        Kottayam।

3।            An Anti-Slavery Spiritual Revolution in Kerala — Prathyaksha Raksha Daiva Sabha, article written by Tharun T।             Tharun

4।            As above।

5।            PRDS and Dalit Renaissance: An essay set by The Association of Kerala History Publication Committee, translated       by P। M। Abraham, February 1996, Page 12।

6।       Above, page 14-15।

7।       As above page 13

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

सामान्य

(आज रामास्वामी पेरियार का जन्मदिवस है, भारत को आधुनिक राज्य बनाने में जितनी भूमिका डॉ. आंबेडकर की है, उतनी ही पेरियार की भी है. अपनी—अपनी भूमिका में दोनों महान हैं. डॉ. आंबेडकर साधारण परिवार से आए थे, अपने श्रम, स्वाध्याय, विद्वता, त्याग और विवेक के बल पर वे इस देश के निर्माता बने. समाज के बड़े वर्ग को जगाने का काम किया. पेरियार के पिता धनी व्यापारी थे. जीवन के आरंभिक वर्षों में धन उन्होंने भी खूब कमाया. धीरे—धीरे उसकी ओर से निस्पृह होते चले गए. आगे चलकर कांग्रेस से जुड़े. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि कांग्रेस के सुधार की एक सीमा है. वह समाज के निचले हिस्सों के भले के लिए उतना की कर सकती है, जितना उपकार—भाव के साथ संभव है. पेरियार ने राजनीति को छोड़ा और केवल जनता पर भरोसा किया. खुद को जनांदोलनों के लिए समर्पित कर दिया. राजनीति से दूर रहते हुए बड़े आंदोलन चलाना, जिनसे आगे चलकर पूरे देश की राजनीति प्रभावित हुई, पेरियार जैसी हस्ती के लिए ही संभव था.

आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम बेगमपुराके नाम से जानते हैं. आने वाली दुनियामें रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. यह आलेख उनके भाषण के अंग्रेजी अनुवाद(प्रो. ए. एस. वेणु)  का अनुवाद है, जो उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलनके एक कार्यक्रम दिया था. वैज्ञानिक सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने दक्षिण एशिया का सुकरातकहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें भारत का वाल्तेयरमाना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक दि हिंदूमें छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं ताब्दी का एच.जी.वेल्स कहा गया था. लेख में गांधी का नाम नहीं है. उनकी ओर संकेत-भर है. परंतु इससे गांधी और पेरियार के सोच का अंतर पूरी तरह सामने आ जाता है.

यह लेख एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. पेरियार की भूमिका के साथ, जो लेख जितनी ही महत्त्वपूर्ण है.  परियार के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उन्हीं के लेख का अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैंओमप्रका कश्यप)

 

प्राक्कथन

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हें. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और विना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सबकुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

लोग चाहे वे किसी भी देश  अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.  

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की. न राजा होगा, न ही राज्य. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं. कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में है. मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है. उनके कारण समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणीमात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी. जनसंख्या बृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डेशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिये आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी सप्ताह में मात्र दो श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे. मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा. आनी वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मषीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और नामा दोनों कमा सकें.

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेष्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेष्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे

मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी.

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पषुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग हांगीं. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पैट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइष नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी.

संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है. यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इत तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईष्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है. यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

 आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

ई वी रामास्वामी पेरियार(1944)

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्यᅳदो

सामान्य

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और संस्कृति

 

न्याय एक वर्ग संख्या हैपाइथागोरस

मार्क्स ने मुख्यतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों का विश्लेषण किया है. उसमें एक सिरे पर अनियोजित मशीनीकरण का शिकार श्रमिक वर्ग है, दूसरे पर पूंजीपति उत्पादक. उन दिनों चीन, रूस, ब्राजील आदि देशों की अर्थव्यवस्था की भांति भारतीय अर्थव्यवस्था भी कृषिकेंद्रित थी. इन सभी देशों ने वर्गसंघर्ष के सिद्धांत का प्रयोग स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया. जहां आवश्यक लगा, वहां संशोधन भी किया. भारत में ऐसा नहीं हो सका. जबकि मार्क्स तथा उसके वर्गसंघर्ष की सूचना यहां बहुत पहले पहुंच चुकी थी. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में युवा क्रांतिकारी आजाद भारत के लिए वर्गसंघर्ष की अनिवार्यता को समझते थे. सोवियत संघ की ओर से उन्हें भरपूर मदद भी मिल रही थी. स्वामी विवेकानंद, डॉ. हरदयाल, रासबिहारी बोस, करतार सिंह सराबा, सोहन सिंह भखना आदि पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था. भगत सिंह तो लेनिन को अपना आदर्श मानते ही थे. आधुनिक भारत के निर्माताओं में प्रमुखतम स्थान रखने वाले डॉ. आंबेडकर की आरंभिक चेतना भी समाजवादी थी. दक्षिण में रामास्वामी पेरियार ने अपनी राजनीति साम्यवादी संगठनों के सक्रिय सदस्य के रूप में आरंभ की थी. उन दिनों सैकड़ों उत्साही युवा वर्गक्रांति का सपना देखते थे. उनमें से कुछ ने साम्यवाद को समझने के लिए सोवियतसंघ की यात्रा तक थी. उसकी तरफ से साम्यवादीक्रांति की कोशिश में जुटे युवाओं को आर्थिक मदद भी प्राप्त होती थी. देश में साम्यवाद के नाम पर राजनीतिक दल भी बने, लेकिन वे सभी प्रयास केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने तक सीमित थे. परिणामस्वरूप हमारे यहां वर्गसंघर्ष की वैसी स्थिति कभी नहीं बन सकीं, जिस तरह बाकी देशों में, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. जिन प्रांतों में वर्षों तक साम्यवादी दलों की सरकारें रहीं, वहां भी न तो धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग किया गया, न जाति को किसी प्रकार की चुनौती पेश की गई. न ही वर्गहीन समाज की स्थापना के विशेष प्रयास किए गए. परिणामतः जातिधर्म के चक्रब्यूह में बुरी तरह फंसा भारतीय ‘सर्वहारा’, वर्गचेतना से दूर बना रहा. वह वर्चस्वकारी संस्कृति से इतना अनुकूलित रहा कि उससे बाहर निकलने के विचारमात्र से उसे अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगता था.

जातिव्यवस्था के शिखर पर ब्राह्मण और उसके आजूबाजू क्षत्रिय और वैश्य रहे हैं. चौथे यानी अंतिम पायदान पर शूद्र. उनकी स्थिति उन मजदूरों से भी कहीं अधिक दयनीय थी, जिन्हें मार्क्स ने अपने विशद ग्रंथ पूंजी में ‘सर्वहारा’ से संबोधित किया था. ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने श्रमिकोंमजदूरों और मेहनतकश जिंदगी जीने वाले छोटेकिसानों, शिल्पकर्मियों को छोटेछोटे जातिसमूहों में बांट दिया है. शूद्र को उसकी सेवा का वास्तविक मूल्य देने के बजाय, स्वर्गादि के प्रलोभन से बहला दिया जाता है. इसलिए संख्या में प्रथम तीन वर्गों से चार गुना होने के बावजूद वे कोई परिवर्तनकारी शक्ति नहीं बन पाते. उनके हित पहले भी एकदूसरे से टकराते थे, आज भी टकराते हैं. परिणामस्वरूप उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आंतरिक संघर्ष में खपता रहता है. इसका एकमात्र समाधान था कि शूद्रों में वर्गीय चेतना का विस्तार किया जाए. मगर गांधी सहित लगभग सभी कांग्रेसी नेता शूद्रों में वर्गीय चेतना उभारने के बजाय उन्हें हालात से संतोष करने की सलाह देते थे. सामाजिक मोर्चे पर गांधी का समूचा आंदोलन यथास्थिति बनाए रखने तक सीमित था. व्यवस्था परिवर्तन की यदि कोई मांग भी करे तो वे तत्क्षण विरोध पर उतर आते थे. गांधी के अनुसार पाखाना साफ करने का काम दैवीय अनुभव था. ठीक यही बात हमारे आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’(2007) में दोहरा चुके हैं. कुल मिलाकर मार्क्स ने जिन परिस्थितियों को वर्गसंघर्ष के लिए जरूरी माना है, उसकी जो कसौटियां तय कीं हैं, भारत में उससे कहीं त्रासद हालात होने के बावजूद यहां क्रांति की बात करना, दिवास्वप्न बना रहा. निम्नस्थ वर्गों में वर्गीय चेतना की कमी, शीर्षस्थ वर्गों के उत्पीड़न और अत्याचारों को स्थायी बनाती है. उसके अभाव में बहुसंख्यक वर्ग छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर अपनी प्रभावी क्षमता को नष्ट करता रहता है.

ऊपर से सत्तासीन अभिजन द्वारा यथास्थिति बनाए रखने की कूटनीतिक चालें. जो कभी दान, कभी सहयोग, तो कभी न्याय के नाम पर अपनी आय का एक हिस्सा उन कार्यों पर खर्च करता है, जिनके माध्यम से बहुजन को निरंतर भुलावे में रख सके. उन्हें लगे कि वर्तमान व्यवस्था ही उनके लिए सर्वाधिक हितकारी और श्रेयस्कर है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए शक्तिशाली अभिजन अनेक रणनीतियां अपनाता है. भारतीय संस्कृति के संदर्भ में उसका भावप्रवण नारा हैᅳ‘अनेकता में एकता.’ जनाक्रोश से बचने के लिए अल्पसंख्यक अभिजन प्रायः इस तर्क के माध्यम से भारतीय संस्कृति का महिमामंडन करता है कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद भारतीय संस्कृति में एकता के तत्व समाहित हैं. स्कूलों में बच्चों को यह पाठ शुरुआत से ही पढ़ाया जाता है. इस नारे के साथ भारतीय समाज के अंतर्विरोधों तथा उस उत्पीड़न की ओर से आंखें मूंद ली जाती हैं, जिसका सामना बहुजन समूह शताब्दियों से करते आए हैं. प्रकारांतर में ‘अनेकता में एकता’ का मिथ सांस्कृतिक शोषण का शिकार रहे लोगों के लिए बोझ बन जाता है. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीक आस्था और विश्वास के रास्ते जीवन में जगह बनाते हैं, उन्हें तर्क और संशय से प्रायः परे रखा जाता हैइस कारण उनसे निपटना आसान नहीं होता. दूसरी ओर अल्पसंख्यक अभिजन यथास्थिति बनाए रखने के लिए हर समय यथाशक्ति प्रयत्नशील रहते हैं. संस्कृति के शोषणकारी तत्वों का वे मिथों के माध्यम से निरंतर महिमामंडन करते रहते हैं. आवश्यकता पड़ने पर नए मिथ गढ़ना अथवा लोकप्रचलित मिथों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करना उनकी पुरानी आदत है. वौद्धिक स्तर पर शीर्षस्थ जातियों पर पूरी तरह निर्भर बहुजन समुदाय, इन चालाकियां को समय रहते समझ नहीं पाता; और अपनी अज्ञानता के कारण ‘अनेकता में एकता’ की भ्रांति को सच माने रहता है.

वर्गचेतना, वर्गसंघर्ष की प्रथम और अनिवार्य शर्त है. जातिभेद का शिकार रहे, दैवीयअनुकंपा की आस में जीने वाले तथा शोषण को अपनी नियति मान चुके भारतीय समाज में शुरू से ही इसका अभाव रहा है. सांस्कृतिक एकता की दुहाई भजनकीर्तन, पूजापाठ जैसे अनुत्पादक तरीकों, त्योहारों तथा उन सामान्य रीतिरिवाजों के माध्यम से दी जाती है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच एकदूसरे के साथ रहते, साथसाथ काम करते हुए स्वाभाविक रूप से एकदूसरे समूह के बीच चले आते हैं. इसके बहाने अल्पसंख्यक अभिजन आसानी से उन प्रतीकों को थोपने में सफल हो जाता है, जो वर्गीय असमानता तथा अल्पसंख्यक शीर्षस्थ अभिजन की सामाजिकसांस्कृतिक श्रेष्ठता के मिथ को, बहुजन के मानस पर स्थापित करते हैं. गांवों में दिवाली से चार दिन पहले कुम्हार घरघर दिये पहुंचाता है. यत्न से दीपक बनाने, घरघर पहुंचाने के बावजूद कीमत वही मिलती है, जो यजमान तय करता है. अपने ही श्रमोत्पाद का मूल्यांकन करने का अधिकार कुम्हार को नहीं होता. होली को समसरता का त्योहार माना जाता है. कहा जाता है कि सारे वर्गभेद होली के रंगों में बह जाते हैं. असल में ऐसा नहीं है. उस दिन भी पुजारी पूजापाठ करता है, बढ़ई लकड़ियां चीरता है और कुम्हार हमेशा की तरह घरघर मिट्टी के बर्तन सप्लाई करता है. यही स्थिति बाकी त्योहारों की भी है. इन विसंगतियों को प्रायः सहजीवन और समरसता, जिन्हें समाज में समानता के पूरक के रूप में पेश किया जाताके नाम पर पचा लिया जाता है. जाहिर है भारतीय संस्कृति को लेकर ‘अनेकता में एकता’ का मिथ भ्रम अथवा भावुक अवधारणा से इतर कुछ भी नहीं है. जाति और वर्ण के आधार पर असमानता को नैसर्गिक मान लेने वाली भारतीय संस्कृति, मूलतः वर्चस्वकारी संस्कृति है. उसे मुट्ठीभर लोगों की मर्जी से, उन्हीं के द्वारा, उन्हीं की स्वार्थसिद्धि के लिए कायम रखा गया है. सांस्कृतिक अंतर्विरोधों एवं तज्जनित असंतोषों को नकारने की बात, मूलतः सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत है. यह काम वही लोग करते हैं, जिन्हें इस संस्कृति ने असीमित विशेषाधिकार देकर अपने सिर पर सवार रखा है. बहुजन समूहों की अज्ञानता, आपसी स्पर्धा और दूसरों के लिए श्रम करने की प्रवृत्ति ने उन्हें शक्तिशाली बनाया हुआ है.

अनेकता में एकता’ की दावेदार भारतीय संस्कृति में अंतर्विरोधों की भरमार है. इसलिए उसमें अंतर्संघर्ष भी हैं. वैदिक काल में उसे आजीवकों, लोकायतियों, वैनायिकों, चार्वाकों जैसे भौतिकवादी चिंतकों की ओर से चुनौती मिलती थी. कालांतर में श्रमणसाधकों ने आश्रमों में पनपने वाली कर्मकांड संस्कृति को चुनौती पेश की और मध्यमार्गी तत्वदर्शन के भरोसे ऐसी कामयाबी हासिल की कि कर्मकांड केंद्रित वैदिक धर्मदर्शनों को, आने वाली कई शताब्दियों तक पुनः आश्रमों और कंदराओं में शरण लेने को विवश होना पड़ा. बौद्ध दर्शन के पराभव की शुरुआत हुई तो पुरोहित स्तर के धर्माचार्यों ने स्मृति, पुराण जैसे ग्रंथों के माध्यम से धार्मिक कर्मकांडों, पाखंडों को नए सिरे से थोपना आरंभ कर दिया. उस दौर में भी उसका सामना श्रमणों और भौतिकवादी दार्शनिकों द्वारा किया गया. उसके कुछ अर्से बाद यहां इस्लाम का आगमन हुआ. तैंतीस करोड़ देवीदेवताओं के बोझ से दबे हिंदू धर्म को इस्लाम के एकेश्वरवाद की ओर से चुनौती मिली. उसमें जीत एकेश्वरवाद की हुई. जातीय भेदभाव झेल रही जातियों में इस्लाम के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा. धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए शंकराचार्य को वेदांत में अद्वैतवाद के समर्थन में आना पड़ा. मध्यकाल में धर्म के नाम पर तंत्रमंत्र, ऊंचनीच और पाखंड बढ़े तो संतकवि आड़े आ गए. तुकाराम, रैदास, कबीर, दादू आदि ने धार्मिक पाखंडियों को खूब ललकारा. औपनिवेशिक भारत में हालात बदले. अठारवींउनीसवीं शताब्दी के वैचारिक आंदोलनों से अनुप्रेत अंग्रेज अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति अनुगामी थे. उनके समक्ष ब्राह्मण संस्कृति की अतीतोन्मुखी महानता कारगर न थी. दूसरे उन्हें योरोप के जनांदोलनों का अनुभव था. इसलिए विपुल जनशक्ति की अवहेलना उनके लिए संभव न थी. इसलिए उन्होंने यहां विधि के शासन को लागू किया.

ये उदाहरण जहां भारतीय संस्कृति के असमानताकारी रूप को सामने लाते हैं, वहीं दिखाते हैं कि भारतीय समाज में द्वंद्वात्मकता के लक्षण आरंभ से ही रहे हैं. वे काफी विस्तृत हैं. इस वर्गभेद को आर्यअनार्य, सवर्णअवर्ण, ब्राह्मणअब्राह्मण, तथाकथित ऊंची जाति वाले, नीची जाति वाले जैसा कुछ भी कहा जा सकता है. भारतीय समाज के आंतरिक विभाजन को दर्शाने वाला एक महत्त्वपूर्ण आधार और भी है. ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य अनुत्पादक वर्ग हैं. तीनों ही दूसरों के श्रम पर आश्रित रहते हैं. इसके बावजूद उन्हें ‘सवर्ण’ होने का गुमान रहता है. वर्णश्रेष्ठता का यह दंभ, श्रम और समानता दोनों का सिद्धांततः विरोधी है. जो संस्कृति इस दंभ को शरण देती है, वह शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से हेय मानती है. परिणामस्वरूप यहां जो हुनरमंद है, जो परिश्रम करता है, अपने शिल्पकौशल के भरोसे समाज को संवारता हैउसके हिस्से आजीवन तिरष्कार और उपेक्षा ही आती है. आर्थिक दृष्टिकोण से भारतीय संस्कृति मूलतः अनुत्पादक संस्कृति सिद्ध होती है, जो उत्पादनकर्म में लगे श्रमिकों तथा कामगारों को, बौद्धिक कर्म का दिखावा करने वाले वर्गों से हेय माने रहती है.

इस तरह भारतीय समाज अनायास ही दो हिस्सों, उत्पादक और अनुत्पादक समूहों में बंट जाता है. संख्या में उत्पादक समूह अपने प्रतिद्विंद्वी से लगभग चार गुना होता है. मगर समाज और संस्कृति की संरचना ऐसी है कि इस अधिसंख्यक वर्ग के हाथों में न्यूनतम संसाधन और नाकुछ अधिकार आते हैं. जिस अल्पसंख्यक अभिजन को यह संस्कृति विशेषाधिकार सौंपकर अत्यंत शक्तिशाली बनाती है, वह मुख्यतः अपने स्वार्थ के लिए काम करता है. दिखने में ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य तीन अलगअलग वर्ण हैं, जो क्रमशः धर्म, राजनीति और अर्थसंपदा का प्रबंधन करते हैं. बहुजन मुख्यतः सेवाप्रदाता वर्ग है. वह वर्णव्यवस्था में सबसे निचला या उससे बाहर का हिस्सा है. दोनों ही स्थितियों में उसका दायित्व शीर्षस्थ वर्गों की सेवा करना है. उसे न तो अपने श्रमोत्पाद पर अधिकार होता है, न ही संपत्ति अर्जित करने का अधिकार उसे है. उसका कर्तव्य है सेवाश्रम के बदले जो मिले उसे अनुकंपाभाव से ग्रहण करना. वह अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों और पेशों में बंटी, संख्याबहुल और प्रभावी जनशक्ति है. प्रत्येक का पेशा ही उसकी पहचान है. इनके सपने छोटे होते हैं, संघर्ष बड़े. छोटीछोटी जरूरतों की खातिर इन्हें एकदूसरे के साथ स्पर्धा करनी पड़ती है. अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों में बंटा होने के कारण इस वर्ग की प्रभावी शक्ति क्षीण हो जाती है. दूसरी ओर सामान्य हित उच्चस्थ वर्णों को आपस में जोड़े रखते हैं. प्रतिस्पर्धा उच्चस्थ वर्गों में भी रही है. किंतु उसका आधार जीवन के मूलभूत प्रश्नों, समस्याओं से प्रभावित नहीं होता. उदाहरण के लिए परशुराम द्वारा पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन करने का मिथ क्षत्रियों के विशेष रोष का कारण नहीं बन पाता. यह जानते हुए कि जो संस्कृति ब्राह्मण को श्रेष्ठतम ठहराती है, वह क्षत्रियों को राजकर्म का अधिकार भी देती है. इसलिए वर्णव्यवस्था के आगे जब भी कोई चुनौती आती है; अथवा उनमें से किसी एक वर्ण के अधिकारों पर हमला होता हैतीनों एकजुट भाव से उसका सामना करते हैं. इससे संख्या में कम होने के बावजूद पहला वर्ग शक्तिशाली बनकर, खुद को समाज का नियामक और वास्तविक कर्ता सिद्ध करने में सफल हो जाता है.

व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हेतु आवश्यक है कि उत्पीड़ित लोगों की वर्गचेतना को उभारा जाए. लोगों को बताया जाए कि ‘अनेकता में एकता’ का मिथ संस्कृति के वर्चस्वकारी स्वरूप को बनाए रखने का उद्यम हैं. सामाजिक क्रांति को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि उत्पीड़न के शिकार वर्गों को उनकी स्थिति और अधिकारों से परचाया जाए. बताया जाए कि उनके हित साझे है. जो संस्कृति उन्हें भेद करना सिखाती है, समाज को जन्म और पेशों के आधार पर अलगअलग जातियों में बांटती है, जो श्रम की अवमानना करती हैवह उनकी संस्कृति हो ही नहीं सकती. इसकी शुरुआत ज्योतिराव फुले द्वारा की गई. फुले ने उन मिथकों का पुनर्पाठ किया, जिनसे भारतीय संस्कृति की पहचान निर्धारित की जाती है. जिनके सहारे सवर्ण जातियां शताब्दियों से अपना श्रेष्ठत्व गैरसवर्ण समूहों पर थोपती आई थीं. अवसर अनुकूल था. शिक्षा के द्वार सभी वर्गों के लिए खुल चुके थे. ‘मनुस्मृति’ की जगह ‘कानून के राज्य’ ने ले ली थी. नए कानून के आगे सभी नागरिक बराबर थे. ज्योतिराव फुले ने निर्भय होकर हिंदू मिथों के बारे में लिखा. धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ प्रस्तुत किया. शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, अपनी पत्नी के साथ मिलकर जगहजगह स्कूल खोले. स्त्रियों की पढ़ाईलिखाई को जरूरी माना. धीरेधीरे लोगों को यह एहसास होने लगा कि जिस धर्म और संस्कृति की वे अभी तक पूजा करते आए हैं, असल में वह एक षड्यंत्र, उन्हें बरसोंबरस गुलाम बनाए रखने का प्रलोभनकारी माध्यम है. जिन मिथकीय प्रतीकों, स्वार्थी विधान के भरोसे वे अभी तक शासित होते आए हैं, वे अंतिम या परमसत्य नहीं हैं. बल्कि शक्तिशाली जातीय समूहों द्वारा उन्हें मानसिकशारीरिक रूप से दास बनाए रखने के लिए की गई सोचीसमझी साजिश हैं. उनके सहारे शीर्षस्थ जातियां शताब्दियों से उनपर राज करती आई हैं. फुले के प्रयासों से पिछड़े और अंतज्य समाजों में वर्गचेतना पनपने लगी.

फुले के बाद परिवर्तनकारी राजनीति की बागडोर उत्तर में डॉ. आंबेडकर के हाथों में आ गई. वे अपने समय के नेताओं में सर्वाधिक पढ़ेलिखे, बुद्धिमान, व्यवहारकुशल, दूरदृष्टा और लक्ष्य के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नेता थे. जिस वर्ष फुले का निधन हुआ, उसी वर्ष उनका जन्म हुआ था. मानो समय खुद बदलाव के लिए आमादा था. इसलिए एक जिम्मेदार और समर्पित नेता द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की कमान संभालने के लिए उसने वैसे ही जिम्मेदार, समर्पित, बुद्धिमान और संघर्षधर्मी व्यक्तित्व को समयपटल पर आगे कर दिया था. डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का दायरा व्यापक था. उन्होंने बहुजन अस्मिता के प्रश्न को उठाया. फुले का अनुसरण करते हुए धार्मिक प्रतीकों की अधुनातन व्याख्या को अपने हाथ में लिया. उन मिथों को आड़े हाथों लिया जो सामाजिकसांस्कृतिक शोषण का माध्यम बने थे. उनका सबसे बड़ा काम जातिव्यवस्था पर हमला था, जिसने तथाकथित सवर्णों को तिलमिलाने को विवश कर दिया. जिस जाति के आधार पर वे बहुजन का शोषण करते आए थे, डॉ. आंबेडकर ने उसी के संगठनसामर्थ्य का सहारा लेकर दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने में कामयाबी हासिल की थी. इससे शीर्षस्थ जातियों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक था. वे डॉ. आंबेडकर के वर्गशत्रु बन गए. मगर डॉ. आंबेडकर के बौद्धिक तेज के आगे उनकी एक न चली.

देश के उत्तरपश्चिम में जिस संकल्प के साथ डॉ. आंबेडकर आगे बढ़ रहे थे, दक्षिण भारत में वही जिम्मेदारी, उतनी ही शिद्दत के साथ रामास्वामी पेरियार संभाले हुए थे. दोनों के व्यक्तित्व और विचारों में अंतर था, परंतु लक्ष्य एक ही था, जिसे लेकर वे पूरी तरह स्पष्ट और ईमानदार थे. आरंभ में पेरियार पर साम्यवाद का असर था. गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो पेरियार उनसे प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हो गए. गांधी के आवाह्न पर उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. असहयोग आंदोलन में लाठियां खाईं. लेकिन बहुत जल्दी उनका कांग्रेस तथा उसके नेताओं से मोह भंग हो गया. उसके बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर उन्होंने खुद को सामाजिक आंदोलनों के समर्पित कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से उन्होंने बहुजन समूहों के बीच वर्गीय चेतना फैलाने का काम किया. उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में डॉ. आंबेडकर और पेरियार का लगभग बराबर का योगदान है.

डॉ. आंबेडकर और पेरियार के प्रयासों से दलितों और शोषितों में वर्गचेतना का संचार हुआ था. सवाल है यदि उन सभी का मकसद समानताआधारित समाज की रचना करना, भेदभावों को मिटाना था, तो उसके लिए ‘मार्क्सवाद’ या ‘साम्यवाद’ की प्रचलित सैद्धांतिकी को क्यों नहीं अपनाया गया? यह सवाल उन साम्यवादियों से भी है जो वर्गहीन समाज की स्थापना को लेकर राजनीति में आए थे; और समस्त वर्गभेदों का उन्मूलन कर समताआधारित समाज का सपना देखते थे. प्रथम दृष्टया इसे हम भारतीय वामपंथ तथा सामाजिक न्याय के पक्ष में चलने वाले आंदोलनों की कमजोरी मान सकते हैं. इसके कारणों को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की मामूली पड़ताल से समझा जा सकता है. यहां उनका वर्णन विषयांतर होगा. इतना कह सकते हैं कि भारत में वर्गक्रांति की शुरुआत ‘सामाजिक न्याय’ की मांग के तहत हुई थी. हालांकि वर्गसंघर्ष की अवधारणा को ‘सामाजिकन्याय’ की भावना तक सीमित कर देना कभी निरापद नहीं रहा. इससे बहुजन समाज की एकता प्रभावित हुई. इसे समझने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ की सैद्धांतिकी तथा उन परिस्थितियों को समझना होगा, जिनके कारण ‘सामाजिक न्याय’ को अधिकांश अस्मितावादी आंदोलनों का लक्ष्य मान लिया गया था.

साम्यवाद बनाम सामाजिक न्याय

साम्यवाद की मुश्किल यह रही है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब बड़े साम्राज्यवादी राज्यों का गठन आरंभ हुआ, और जिन दिनों पूरी दुनिया को साम्यवाद की परिधि में शामिल करने का स्वप्न देखा जा रहा था, उन्हीं दिनों दुनिया को दो विश्वयुद्धों का सामना करना पड़ा. वे युद्ध केवल राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं लड़े गए थे. उनके पीछे पूंजीपति वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं भी शामिल थीं. प्रौद्योगिकीय क्रांति के दौर में हथियार निर्माण के क्षेत्र में भारी निवेश हुआ था. उत्पाद की खपत के लिए हथियारनिर्माता कंपनियों को नए बाजारों की जरूरत थी. उनका हित इसी में था कि दुनिया पर युद्ध का खतरा मंडराता रहे. देश एकदूसरे से लड़तेझगड़ते रहें. इस उद्देश्य में वे कामयाब भी रहीं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा बेहद जरूरी मुद्दा बन गया. आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के नाम पर हथियारों की अधिकाधिक खरीद की जाने लगी. इनमें भारत जैसे विकासशील देश भी पीछे न थे, जिनका कथित रूप से अहिंसा में विश्वास था और जिन्होंने अपनी आधीअधूरी स्वाधीनता अहिंसक तरीकों से अर्जित की थी. 1930 में दुनियाभर में आर्थिक मंदी पैठी हुई थी. हालांकि मंदी के जो मापदंड निर्धारित किए गए थे, वे स्वयं संदेह से परे न थे. राजनीति और पूंजीपतियों के गठजोड़ के चलते उस समय तक अर्थव्यवस्था की रफ्तार का आकलन करने के पैमाने बदल चुके थे. चुनिंदा कंपनियों की विश्वबाजार में स्थिति से मंदी या तेजी का आकलन किया जाने लगा था. आभासी मंदी से इतर जनता की दुर्दशा का असली कारण यह था कि सरकारों ने अपने समस्त संसाधन युद्ध और युद्ध की तैयारियों पर झोंक दिए थे. साम्यवादी देश भी इसमें पीछे न थे. इस कारण वहां जनअसंतोष पनपने लगा था. उसे दबाने तथा प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी देशों के साथ विकास की दौड़ में बने रहने की जरूरत ने स्टालिन जैसे कट्टर साम्यवादी नेताओं को जगह दी.

प्रथम विश्वयुद्ध दुनिया में भारी तबाही का कारण बना था. और जैसा कि बताया गया है, युद्ध की परिस्थितियां बनाने में अतिमहत्त्वाकांक्षी नेताओं तथा पूंजीपतियों का समान योगदान था. लेकिन जब युद्ध के परिणाम आने लगे तो आर्थिक घराने बड़ी चतुराई से खुद को उनसे अलग करने में कामयाब हो गए. इस कारण युद्ध के बाद उत्पन्न समस्याओं तथा उनसे उपजे जनाक्रोश का सामना संबंधित देशों की सरकारों को करना पड़ा. युद्ध के मोर्चे पर सारे संसाधन झोंक चुके राष्ट्रप्रमुखों के लिए उस समय एकमात्र रास्ता था कि आर्थिक विपन्नता से घिर चुके राज्य के विकास; तथा जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजीपतियों को आमंत्रित किया जाए. यही हुआ भी. दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात, पुनर्निर्माण के नाम पर सारे ठेके, बड़ीबड़ी पूंजीप्रधान कंपनियों को सौंप दिए गए. आर्थिक विकास के नाम पर उन्हें तरहतरह की छूट दी जाने लगी. वह विचित्र संयोग था. जब तीसरी दुनिया के देश तेजी से योरोप और अमेरिका की औपनिवेशिक दासता से बाहर आ रहे थे, तभी बड़ीबड़ी पूंजीवादी कंपनियां, तीसरी दुनिया के देशों में पहुंचकर वहां आर्थिक औपनिवेशीकरण की शुरुआत कर रही थीं. अर्थसत्ता का उत्तरोत्तर सबलीकरण राजसत्ता को कमजोर कर रहा था. उसका प्रभाव दुनिया के प्रायः सभी देशों पर था. चूंकि तीसरी दुनिया के अल्पविकसित और विकासशील देश स्थानीय समस्याओं और समाज की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के लिए पूंजीवाद पर आश्रित हो चुके थे, इसलिए वे आर्थिक औपनिवेशीकरण के सर्वाधिक शिकार थे.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने भी खुद को बदला था. सामाजिक भेदभाव और भारी आर्थिक विषमता से गुजर रहे देशों में वर्गसंघर्ष की स्थिति दुबारा न बने, इसके लिए जनसाधारण में यह विश्वास जगाना अत्यावश्यक था कि वह पूंजीवाद के विस्तार में ही अपना भला समझे. इसके लिए वह सरकार के साथ मिलकर लोगों की मनोरचना बदलने में लगा था. लोगों की प्रशंसा तथा सहानुभूति बटोरने के लिए उसने सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार जैसे कई मुखौटे पहने हुए थे. पूंजीवादी कंपनियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, खेती जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सुधारवादी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी आरंभ कर दी थी. इसी दौर में मान लिया गया कि जनसमस्याओं का समाधान अकेले सरकार द्वारा संभव नहीं है. विकासकार्यक्रमों में सरकार की मदद हेतु गैरसरकारी संस्थाओं को बढ़ावा दिया जाने लगा था. उन संस्थाओं के संचालन का दायित्व पढ़ेलिखे, समाज के प्रबुद्ध हिस्से के अधीन था, जिसकी जनता पर पकड़ थी. उसे लुभाने के लिए बड़े कारपोरेट घरानों ने अपनी आय का एक हिस्सा, जाहिर है बहुत मामूली हिस्सा, चंदे तथा अनुदान के रूप में गैरसरकारी संस्थाओं को देना आरंभ कर दिया. एक तरह से वह जनता का ही पैसा था. गैरसरकारी संस्थाओं को दिए गए चंदे को लोककल्याण की मद में किया गया खर्च दिखाकर, पूंजीवादी कंपनियां टैक्स के रूप में दी जाने वाली धनराशि में कटौती कर लेती थीं. चूंकि पूंजीपति घरानों की ओर से यह पैसा सीधे गैरसरकारी संस्थाओं को जाता था, इसलिए परोक्ष रूप में वे जनता के पढ़ेलिखे वर्गों की, उन लोगों की जिन्हें जनता की समस्याओं की समझ थी और जो समाज के भीतर रहकर काम करने का अनुभव रखते थेसहानुभूति बटोर रहे थे. इन संस्थाओं में प्रायः वही मध्यमवर्ग शामिल था, जिसकी पिछली पीढ़ियां अमेरिका और योरोपीय देशों मेंआम मताधिकार, न्यूनतम मजदूरी तथा लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद जैसे राजनीतिक दर्शनों के समर्थन में सड़कों पर उतरी थीं; जिनकी बौद्धिक चेतना ने अनेक नए राजनीतिक दर्शनों को जन्म दिया था. परिणामस्वरूप पूरी दुनिया में पूंजीवाद के समर्थन में माहौल बन रहा था. साम्यवाद, समाजवाद जैसे दर्शन जिन्हें कभी आधुनिक और उदार समाज की पहचान से जोड़ा गया था, की प्रतिष्ठा निरंतर घट रही थी. युवा पीढ़ी तो उन्हें समयबाह्यः मान चुकी थी.

गैरसरकारी संस्थाएं समाज में पूंजीवाद के लिए अनुकूल माहौल बनाने का काम कर रही थीं. यह कार्य समाजकल्याण, सामाजिक न्याय, कला, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचारप्रसार के नाम पर किया जा रहा था. सरकारों को भी इससे लाभ था. योजनाओं के कार्यान्वन की जिम्मेदारी स्वयंसेवी जनसंस्थाओं के कंधों पर डालकर वे सीधी जिम्मेदारी से बचने लगी थीं. इससे साम्यवाद के उभार के दिनों में पूंजीवाद के प्रति जो आक्रोश पनपा था, वह धीरेधीरे घटने लगा. इसलिए वह अकारण नहीं है कि 1930 का दशक जो वैश्विक मंदी का दशक भी थाᅳ‘सामाजिक न्याय’ के राज्यों की कल्याण नीति का प्रमुख हिस्सा बनने का भी दशक बना. उसके बाद यह शब्दयुग्म, विशेषकर लोकतांत्रिक राज्यों में इस तरह प्रचलित हुआ कि उसे उत्तरदायी सरकार के प्रमुख लक्षण के रूप में गिना जाने लगा. उससे लोगों की मनोरचना में ऐसा बदलाव आया, जो पूंजीवादी विस्तार के अनुकूल था. उपभोक्तावाद के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा व्यक्तिस्वातन्त्र्य जैसी आधुनिक विचारधाराओं को अपनाया गया. फिर जैसेजैसे पूंजीवाद का विस्तार हुआ, राज्य के प्रमुख उद्देश्य के रूप में ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता लगातार बढ़ती गई.

उससे पहले की व्यवस्थाओं में धर्म व्यक्ति, समाज और राज्य तीनों की मार्गदर्शक शक्ति हुआ करता था. राजा खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर जनता पर अपनी इच्छाएं थोपता था. उस व्यवस्था में ‘कल्याण’ धर्म और ईश्वर के नाम पर, दान अथवा राज्य की अनुकंपा के रूप में निचले तथा जरूरतमंद वर्गों को अंतरित होता था. आजकल वह ‘सामाजिक न्याय’ जैसा आकर्षक से जाना जाता है. उसमें न्याय नागरिक का अधिकार न होकर सहायता, अनुदान, प्रोत्साहननिधि जैसे नामों से जनता की ओर अंतरित होता है. यह पूंजीवाद की कार्यशैली के अनुरूप है. ‘ट्रिकल डाउन थियरी’ जिसे ‘रिसाव का सिद्धांत’ कहा जाता है, में समृद्धि नीचे की ओर धीरेधीरे रिसकर पहुंचती है. कुछ विद्वान इसी आधार पर पूंजीवाद की प्रशंसा करते हैं. किंतु ‘रिसाव का सिद्धांत’ सामान्यतः तब कारगर होता है, जब ऊपर के स्तर पर ‘बफर’ समृद्धि हो. चूंकि पूंजीपति अपनी आमदनी को खर्च करने के बजाय पुनर्लाभ हेतु उसका निवेश करना पसंद करता हैइसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में असमानता का अनुपात निरंतर बढ़ता जाता है. ऐसे देश जो लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं, किसी न किसी रूप में वे सभी ‘सामाजिक न्याय’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते रहते हैं. वे इस बात को बढ़ाचढ़ाकर जनता के बीच लाते हैं कि सामाजिक न्याय को लेकर उनकी योजनाएं जनता की सामान्य सहमति के आधार पर चलाई जाती हैं. उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वे उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ को प्रासंगिक बनाती हैं. परिणामस्वरूप न्याय के नाम पर बनीं योजनाएं राज्य की अनुकंपा, अनुदान जैसी वे धर्मप्रधान राजतंत्र में होती हैंलौकतांत्रिक राज्यों में भी बनी रहती हैं.

देखनेसुनने में ‘सामाजिकन्याय’ बड़ा रुपहला शब्द है. अधिकांश समाजों में उसे मनुष्यता के पर्याय, राज्य के पुनीत कर्तव्य के रूप में लिया जाता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि उसका लक्ष्य गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वह उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करता है जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विशेष कार्यक्रम चलाने की जरूरत पैदा करती हैं. उल्टे परंपरा, संस्कृति तथा निजी पहचान के नाम पर अन्याय एवं असमानताकारी संस्थाओं का संरक्षण किया जाता है. ‘सामाजिक न्याय’ के तहत बनाई जाने वाली अधिकांश योजनाएं प्रायः सस्ते भोजन, सामान्य शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तथा इतिहास एवं संस्कृति के सरंक्षण संबंधी कार्यक्रमों तक सीमित रहती हैं. इसलिए वे कमजोर वर्गों का ज्यादा भला नहीं कर पातीं. यही कारण है कि सरकार द्वारा लोकतंत्र और कल्याण राज्य की दावेदारी के बावजूद, राज्यों की केंद्राभिमुखता में कोई कमी नहीं आ पाती. पहले वे पुरोहितों और सामंतों के संरक्षण तथा उन्हीं के नेतृत्व में चलाई जाती थीं. नए विधान में उनका कार्यान्वन विशेषज्ञों के नेतृत्व में किया जाता है, जो उन्हीं वर्गों से आते हैं, जिनके हित असमानताकारी संस्कृति से जुड़े होते हैं. अपनेअपने स्वार्थ के लिए पूंजीपति और शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ उनका संरक्षण करते हैं. कल्याणकार्यक्रमों में जनसहभागिता का अभाव, लोगों के आत्मविश्वास को कमजोर कर, उन्हें पराश्रित बनाए रखता है. इससे उन योजनाओं का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है.

सवाल है कि यदि केंद्र उतना ही शक्तिशाली है बना जितना वह धर्मकेंद्रित व्यवस्थाओं में था और आमजन की हालत वैसी की वैसी थी, तो धर्म के स्थान पर, ‘सामाजिक न्याय’ जैसी नई अवधारणाओं को लाने से शीर्षस्थ वर्गां की कौनसी स्वार्थसिद्धि हो रही थी? इसके लिए धर्म के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. दुनिया के जितने भी धर्म हैं, कमोबेश सभी इस संसार और सांसारिक सुखों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं. लगभग सभी इसपर सहमत हैं कि सांसारिक सुख जीवन के अंतिम उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधक हैं. शंकर का मायावाद, विभिन्न नामों और मिलेजुले सिद्धांतों के आधार पर कमोबेश हर धर्म का हिस्सा है. किसी न किसी रूप में वे सभी सांसारिक सुखों को हेय मानते हैं. यह सोच मुक्त उपभोग को बढ़ावा देने की सबसे बड़ी बाधा है. दुनियावी सुखों के प्रति नकारात्मक सोच के चलते उपभोक्तावाद, जिसके भरोसे पूंजीवाद ने अपनी विस्तारवादी नीतियों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, उस तरह से पनप ही नहीं सकता था, जिस तरह से वह आज है. इसलिए पूंजीवादी तंत्र के लिए धर्म गैरजरूरी संस्था है. हां, सांप्रदायिकता पूंजीवाद का खूब भला करती है. बढ़ती सांप्रदायिकता लोगों के अंतर्मन में भ्रम की सृष्टि करती है. उससे एकदूसरे के प्रति संदेह, स्पर्धा तथा जीवन के प्रति अनिश्चितता बढ़ती है. प्रकारांतर में वह उपभोग की संस्कृति को बढ़ावा देती है.

हमारा आशय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय जैसी आधुनिक विचारधाराओं की महत्ता को नकारना नहीं है. मगर इनकी सफलता तभी संभव है जब जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो. वह तर्कसम्मत निर्णय लेने की अभ्यस्त हो चुकी हो. भारत जैसे समाजों में जहां मनुष्य कदमकदम पर जाति, धर्म और वर्गभेद से प्रेरणा लेती हो, उन्हें अपनी सामाजिक पहचान का जरूरी हिस्सा मानती हो, वहां लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातं×य जैसी विचारधाराएं अधिक कारगर नहीं हो पातीं. पर्याप्त अधिकारबोध के अभाव में नागरिक सरकार पर आवश्यक दबाव बनाने के बजाए, आपस में ही एकदूसरे के साथ स्पर्धा करते रहते हैं. इससे चुने गए प्रतिनिधि लोकहित के बजाए अपने स्वार्थ के लिए काम करने लगते हैं. जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें जब लोकतांत्रिक उद्देश्यों की प्राप्ति में नाकाम सिद्ध होती हैं, तब जनाक्रोश से बचने के लिए वे ‘सामाजिक न्याय’ को ढाल बनाती हैं. जागरूकता के अभाव में लोकतंत्र भीड़तंत्र में तथा ‘सामाजिक न्याय’ गैरबराबरी को पोषण करने वाली व्यवस्था का रक्षाकवच बन जाता है.

साम्यवाद और बहुजन

जाति हमारे यहां ‘सामाजिक न्याय’ और ‘साम्यवाद’ दोनों के गले की फांस रही है. यह व्यक्ति को जन्म के आधार पर छोटाबड़ा बनाकर, मनुष्य से उसकी स्वतंत्रता तथा जीवन के मूलभूत अधिकार छीन लेती है. भारतीय समाज में निचली जातियों के शोषण और उत्पीड़न का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना सभ्यता का. उनका संत्रास इतना बड़ा है कि भीषण आर्थिक विपन्नता के बावजूद उन्हें जातिवाद से मुक्ति ही बड़ी और न्यायपूर्ण उपलब्धि जान पड़ती है. जातिव्यवस्था के कारण ही भारत में राजनीति सवर्णों का विषेषाधिकार रही है. जातिवादी सोच से साम्यवादी दल भी उससे मुक्त नहीं है. अधिकांश सवर्ण वामपंथी वर्णव्यवस्था के प्रश्न पर मौन साधते आए हैं. जातिसंबंधी प्रश्न तथा उसके नाम पर होने वाले अत्याचार उन्हें उद्वेलित नहीं करते. वे उन्हें भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सहेजे रखना चाहते हैं. इस कारण दलितों और पिछड़ों के मन में, जो भारतीय समाज का सबसे बड़ा हिस्सा है, मार्क्स की भाषा में जिसे सर्वहारा कहा जा सकता हैसाम्यवाद को लेकर कभी कोई उत्साह नहीं रहा. एकाध अवसर पर उन्होंने साम्यवाद को अपनाने की कोशिश भी की. कुछ ऐसे संकेत दिए, जिनपर ध्यान दिया जाता तो देश में साम्यवाद की सफलता की कहानी लिखी जा सकती थी. यहां एक घटना का वर्णन प्रासंगिक होगा. इसका उल्लेख डॉ. धर्मवीर ने अपने लेख ‘दलितों ने क्या चाहा था’ में किया है

दलितों ने कम्यूनिस्ट शब्द का अपनी देशी जबान में तद्भव बनाकर ‘कौमनष्ट’ के रूप में अर्थ लिया था. उस जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के शांति त्यागी अपने समर्थकों के साथ मेरे गांव में चमारों की तरफ वोट मांगने आए. हम सब दादा हरिया के ओसारे के नीचे थे. धूलधूप में शांति त्यागी(मेरठ के कम्यूनिस्ट नेता) ने आते ही दादा से पानी मांगा. दादा हरिया ने घड़े से गिलास में ठंडा पानी निकाला और शांति त्यागी ने वहीं वह सबके सामने पिया. उनके जाने के बाद चमारों में वोट के बारे में मंत्रणा हुई. सारे चमारों का वोट एकमुश्त एक तरफ जा रहा था, पर दादा हरिया ने कह दिया, मेरा वोट शांति त्यागी को जाएगा, क्योंकि उसने मेरे हाथ का पानी पिया है. चमारों में से केवल वही एक वोट शांति त्यागी को मिला था .3

कम्यूनिस्ट’ को ‘कौमनष्ट’ मान लेना दलितों और पिछड़ों की एकतरफा अपेक्षा थी. नई, मूल्य आधारित राजनीति से उनके जुड़ने का कारण ही यह उम्मीद थी कि उससे सामाजिकसांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह प्रशस्त होगी. उसमें समानताआधारित समाज की उनकी पुरानी आकांक्षा भी अंतनिर्हित थी. लेकिन उसकी चिंता न तो कांग्रेसी नेताओं को थी, न ही साम्यवाद के तत्कालीन कर्णधारों को. भारतीय साम्यवादियों में अधिकतर उच्चस्थ जातियों से आए थे. वे अपने जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने को कतई तैयार न थे. उनके लिए साम्यवाद सामाजिक पुनर्निर्माण का लक्ष्य न होकर महज राजनीति थी. ऐसे नेताओं के मार्गदर्शन में साम्यवादी दलों ने जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए न तो कोई कार्यक्रम बनाया, न इस मांग के समर्थन में वे डॉ. आंबेडकर जैसे नेताओं के साथ आए. दलितों और पिछड़ों को साम्यवाद से ज्यादा उम्मीद अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए विधि के शासन से थी, जिसने उन्हें मनुस्मृति के सहस्राब्दियों पुराने विधान से मुक्ति दिलाकर, कानूनी तौर पर ही सही, बराबरी के एहसास के साथ जीने का अवसर दिया था. हालांकि सामाजिक समानता का लक्ष्य अभी बहुत दूर था. दलितों द्वारा यह मजबूरी में किया गया समझौता था. इसका नुकसान न केवल भारतीय साम्यवादी आंदोलन, अपितु दलितों को भी उठाना पड़ा.

भेदभाव से परे, समानता पर आधारित वर्गहीन समाज की रचना यदि बहुजन का सपना है तो उसने इस लक्ष्य की दिशा में अपने भरोसे बढ़ने की कोषिष क्यों नहीं की? वे संख्याबहुल थे. अगर जातिविहीन समाज की दिशा में स्वयं आगे बढ़ते तो अपने मकसद में सफल हो सकते थे. संभवतः अंग्रेजों का साथ भी उन्हें मिलता. बहुजन ने इसके लिए स्वयं पहल क्यों नहीं की? इस तरह की जिज्ञासाएं स्वाभाविक हैं. किंतु हमें याद रखना होगा कि सांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह बेहद कठिन होती है. राजनीति में शासक और षासित आमनेसामने होते हैं. अवसर मिलने पर शासक को पराजित कर शासित, राजनीतिक दासता से मुक्त हो सकता है. सांस्कृतिक दासता से उबरने के लिए व्यक्ति को अपने साथसाथ, आसपास के लोगों से भी, जो उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा हो सकते हैंजूझना पड़ता है. उसका अपना समाज भी आड़े आता है. इसलिए सांस्कृतिक परिवर्तन की लड़ाई बेहद कठिन और लंबी होती है. उसके लिए व्यक्ति को अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ता है. जाति के आधार पर हजारों वर्षों से शोषण एवं उत्पीड़न का षिकार रहा बहुजन स्वयं हजारों प्रकार की जातियों, उपजातियां में बंटा था. धर्म और क्षेत्रीयता की दीवारें भी थीं. उन सबकी अपनीअपनी सामाजिकसांस्कृतिक विविधताएं, संघर्ष और अंतर्द्वंद्व थे. इस कारण वह कभी ऐसी सामाजिक षक्ति नहीं बन सका, जो उसे सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति दिला सके. उसकी इस कमजोरी का लाभ जिससे जैसे भी बन पड़ा, उसने वैसे ही उठाया.

अंग्रेजों ने भारत में पुराने धर्मसम्मत राज्य को विधिशासित राज्य में बदलने का बड़ा काम किया. हालांकि इसके पीछे उनका न तो कोई उदारवादी नजरिया था, न ही ‘सामाजिक न्याय’ जैसा बड़ा उद्देश्य. उनके स्वार्थ उनके कद से कहीं ज्यादा बड़े थे. भारत आने के बाद उन्होंने अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान किया, मगर सामाजिक अन्याय के निवारण हेतु सार्थक कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने कभी नहीं की. वे इस देश में शासक बनकर रहना चाहते थे. और हमेशा रहे भी. विधि