‘मैं भी चौकीदार’ : चुनावी जुमला या युवा सपनों की हत्या की राजनीति


बात चाय बेचने वाले से आरंभ हुई थी. फिर पकौड़े वाले और अब चौकीदार तक आ चुकी है. चुनावों की बेला है. आगे कहां तक जाएगी, कहना मुश्किल है. 2014 सबकी यादों में है. मोदी जी ने चाय वाले ओबीसी नेता का ऐसा रूपक खड़ा किया था कि गुजरात दंगों के दाग गायब होने लगे थे. सांप्रदायिकता की आग से झुलस चुके गुजरात को विकास का मॉडल; तथा मोदी को विकास-पुरुष मान लिया गया. धमाकेदार जीत के साथ वे प्रधानमंत्री बने. उसके बाद मामला लाखों के सूट का हो या नोटबंदी का, गौ-रक्षा के नाम पर नर-हत्याएं हों अथवा हिंदुस्तान-मुसलमान का खेल, बार-बार गलतबयानी हो अथवा जुमलाछाप राजनीति—पूरे पांच वर्ष वे सिर्फ अपने मन की कहते, करते रहे. देश-देश घूमना, नए-नए जुमले गढ़ना, उनका शगल रहा. इन दिनों उनपर खुद को देश का चौकीदार कहने का भूत सवार है. ‘मैं भी चौकीदार’ का पट्टा गले में लटकाए भक्त-मंडली भी पीछे-पीछे है. पिछले पांच वर्षां में मोदी जी तथा उनकी सरकार की यही उपलब्धि है. नौ दिन में अढ़ाई कोस की यात्रा. ऐसी यात्रा जिसमें व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ता है तो चार कदम पीछे की ओर खिसक जाता है. संस्कृति की आड़ में घोर परंपराकरण को वे राष्ट्रवाद के भावनात्मक नारे के नीचे दबा देना चाहते हैं.

पिछले चुनावों में मोदी जी को विकास पुरुष के तौर पर पेश किया गया था. यह दावा खोखला सिद्ध हो चुका है. विकास उल्टी चाल चल रहा है. दो करोड़ रोजगार देने का वायदा था. जीएसटी और नोटबंदी के चक्कर में रोजगार दर फिसलकर खतरनाक स्तर तक जा गिरी है. उसका समाधान करने के बजाय, रेहड़ी-ठेली वालों के रोजगार का उदाहरण देकर युवाओं को बरगलाया जा रहा है. स्वयं प्रधानमंत्री पढ़ाई-लिखाई की कमी या मजबूरी में अपनाए गए उस धंधे को सम्मानजनक रोजगार के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं. इस तरह यदि चाय बेचने वाला गोल-गप्पे बेचने की प्रशंसा करने लगे, तो वह भी विकास है. चुनावी सभाओं में दिए गए आश्वासन यदि ‘जुमला’ करार दे दिए जाएं तो यही होता है. लेकिन इसे पढ़े-लिखे युवाओं के साथ छल या लतीफा कहकर नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए. चाय, चाटवाले और चौकीदार की त्रिआयामी यात्रा को समझना इतना आसान भी नहीं है, फिर!

यदि संघ, भाजपा और हिंदुत्व की विचारधारा की कसौटी पर इसका विवेचन किया जाए तो निहितार्थ दूसरे ही निकलते हैं. इसकी चर्चा करने से पहले 2014 के चुनाव तथा उसकी परिस्थितियों पर विचार करना आवष्यक है. उन दिनों देष आर्थिक मंदी की चपेट में था. नकली प्रतिभूतियों तथा बैलेंस सीटों के सहारे गढ़ी गई झूठी समृद्धि की तस्वीरों का सच सामने आते ही बाजार ओंधे मुंह जा गिरा था. उसके पहले के हालात दूसरे थे. बाजार झूम रहा था. उद्योग जगत से अच्छी-अच्छी खबरें आ रही थीं. देष का युवा आह्लादित था. अकादमिक शिक्षा को अनुत्पादक मान लिया गया था. गांव-देहात तक में बच्चों को एमबीए और इंजीनियर बनाने की होड़ मची थी. खर-पतवार की तरह नित नए मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग कॉलेज खुल रहे थे. उनमें प्रवेश की मारा-मारी बनी हुई थी. जिनके पैसा पास नहीं था, वे कर्ज लेकर बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम रहे थे. युवाओं के दिमाग में उज्ज्वल भविष्य का सपना था. उच्च शिक्षण संस्थानों की मांग ऐसी बढ़ी थी कि उद्यमी कारखाने बंद कर स्कूल-कॉलेज खोलने लगे थे. मगर 2008 की वैश्विक मंदी ने युवाओं के अरमानों पर पानी फेरकर, उनमें हताशा का संचार काम किया है.  

उदारीकरण के दौर में अर्थव्यवस्था की गति और उसके प्रभाव पूरे विश्व में लगभग एकरैखिक होते हैं. आर्थिक मंदी का कहर यूरोप से लेकर अमेरिका तक हर कहीं था. 2012 तक दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं पटखनी खा चुकी थीं. भारत में बड़े कारपोरेट उद्यम उससे ज्यादा प्रभावित थे. बहुत चिंताजनक स्थिति इसलिए नहीं थी क्योंकि देश के कुल रोजगारों का बहुत छोटा हिस्सा बड़े कारपोरेट उद्यमों से आता है. अर्थशात्री प्रधानमंत्री होने का लाभ भी देश को मिला था. मनमोहन सिंह ने सरकार और बाजार दोनों के बीच में संतुलन बनाने की कामयाब कोशिश की थी. उससे यह संदेश गया था कि भारत वैश्विक मंदी के प्रभावों से सुरक्षित निकल आने में सक्षम है. हालांकि ‘सत्यम’ जैसी कंपनी के दिवालिया होने की खबरों की चर्चा भी खूब हुई थी. लेकिन वह और उस जैसे दूसरे प्रभावित उद्यम मुख्यतः सांस्थानिक भ्रष्टाचार के शिकार थे. दूसरे आंतरिक कारणों से यूरोप की अपेक्षा भारत पर उसका असर कम था. इसलिए युवाओं का सरकार और नई अर्थनीतियों पर भरोसा बना हुआ था. उनके सपने अंगड़ाई ले रहे थे. जिसके लिए उन्हें किसी चमत्कारी व्यक्तित्व की दरकार थी.

चुनावों के दौरान मीडिया ने युवा वर्ग की उम्मीदों को भड़काने और सपने दिखाने का काम किया था. उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि निजी क्षेत्र द्वारा विकास की रफ्तार पकड़ते ही घटती सरकारी नौकरियों की चिंता न रहेगी. कभी सीधे तो कभी ओट लेकर सवर्ण विद्यार्थियों के दिमाग में डाला गया कि ओबीसी और दलितों को दिया जाने वाला आरक्षण उनकी नौकरियां खा रहा है. भाजपा उन्हें इस अन्याय से मुक्ति दिलाएगी. यह समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देने की राजनीति थी.

वैश्विक मंदी से उबरने के लिए पूंजीपतियों को सरकारी खजाने की दरकार थी. यूपीए के दूसरे दौर में वामदल सरकार से बाहर थे. मगर किसी न किसी रूप में सरकार पर उनकी नीतियों का असर था. आम आदमी पर मंदी का असर न पड़े इसके लिए सरकार भी सावधान थी. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन को उसने महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हुई थीं. कह सकते हैं कि उदारीकरण की समर्थक होने के बावजूद, तत्कालीन सरकार के लिए यह संभव नहीं था कि पूंजीपतियों की अपेक्षाओं के अनुरूप सरकारी खजाने को खोल सके. कदाचित उसका परिणाम भी वे जानते थे. 2012 में कई अरब देशों में जनता ने सड़क पर उतर कर अपनी-अपनी सरकारों के विरुद्ध रोष प्रदर्शन किए थे. कुछ देशों में तख्तापलट भी हुए थे. ऐसे में बड़े पूंजीपतियों की ओर से कांग्रेस का पलटी मारना स्वाभाविक था.  

दशकों से हिंदू राष्ट्र का सपना पाल रहे संघ को ऐसे ही अवसर की दरकार थी. उस समय तक मोदी जी स्वयं को हिंदुत्व समर्थक नेता के रूप में स्थापित कर चुके थे. गुजरात दंगों के पश्चात देश में हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने उन्हें संघ की निगाहों में चढ़ा दिया था. आर्थिक मंदी के मारे और अरब-क्रांति से डरे-सहमे पूंजीपतियों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर दाव खेला. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में, राजनीति या अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उनकी कोई उपलब्धि नहीं थी. कई मामलों में तो गुजरात देश के गरीब प्रदेशों से भी पीछे था. लेकिन खरीदे गए मीडिया के दम पर मोदीजी के समर्थन में तेज अभियान चलाया गया. मनमाफिक व्यक्ति को सत्ताकेंद्र तक पहुंचाने के लिए पूंजीपतियों और व्यापारियों ने सारे संसाधन झोंक दिए थे. ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की मानसिकता के साथ संघ ने भी पर्दे के पीछे जमकर काम किया. मोदी जी की ओर से पिछड़ा कार्ड भी खेला गया. गोयबल्स के नक्शेकदम पर चलते हुए स्वयं मोदी तथा उनके सहयोगी, बार-बार झूठ बोलकर उसे सच बनाने में जुटे रहे.

हिटलर के प्रचारमंत्री जोसेफ गोयबल्स का कहना था कि प्रोपेगेंडा तभी सबसे शानदार काम करता है, जब वे लोग जिन्हें प्रोपेगेंडा द्वारा बदला जाना है, यह विश्वास कर लें कि वे स्वेच्छा और स्वतंत्रता से वैसा कर रह रहे हैं.’ जाति और धर्म ब्राह्मणवाद के हथियार और रक्षा-कवच हैं. इन्हीं के माध्यम से दलितों और पिछड़ों को यह विश्वास दिलाया जाता कि जिन दुर्वव्यवस्थाओं और दुरावस्थाओं का सामना उन्हें करना पड़ता है, वे सब उसके भाग्यलेख का हिस्सा है. उसके लिए उनके पूर्वजन्मों के पाप समाज में उनके लिए कोई सीधे-सीधे जिम्मेदार नहीं हैं. इस विश्वास से लोगों की परिवर्तन की इच्छा को मारने का काम किया. कदाचित इसी को ध्यान में रखकर डॉ. आंबेडकर ने कहा था—‘शोषित को उसके शोषण का एहसास करा दो, वह विद्रोह कर देगा.’

धर्म और पूंजी का वह गठजोड़ अपने आप में पहली और अकेली घटना नहीं थी. पूंजी हमेशा ही सत्ता की समर्थक रही है. भारत के धन्नासेठ ईस्ट इंडिया कंपनी के बड़े फाइनेंसर थे. उनके लिए उनका व्यापार और मुनाफा ही सबकुछ था. उन्हीं के समर्थन और सहयोग से अंग्रेज इस देश में पांव जमाने में कामयाब हुए थे. उन धन्ना सेठों के उत्तराधिकारी आज बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों में ढल चुके हैं. उनकी निगाह आज भी केवल और केवल मुनाफे पर रहती है. पूछा जा सकता है कि इसका ‘मैं भी चौकीदार’ या ‘चाय और चाटवाले लेकर चौकीदार तक की यात्रा’ से क्या संबंध है? सवाल यह भी है कि यदि खुद को ‘चाय वाला’ और चौकीदार’ बताकर कुछ नेता जनता से अपनी नजदीकी दर्शाना चाहते हैं, तो इसमें बुराई क्या है? चुनाव के दिनों में ऐसा पाखंड तो हर नेता करता है. संभव है दिखावे की यह एकता कालांतर में दोनों वर्गों की दूरियां मिटाने में सहायक सिद्ध हो.

अगर बात यहीं तक सीमित होती तो कदाचित इस लेख की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. लेकिन मामला केवल राजनीति तक सीमित नहीं है. समाचार चैनलों को देख लीजिए, सब के सब सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता बने हुए हैं. मनोरंजन चैनलों से धर्म और संस्कृति के बहाने रूढ़ियों और कर्मकांडों को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस षड्यंत्र को समझना कठिन नहीं है. परिवर्तन के लिए आवश्यक है परिवर्तन की चाहत. विकास का सपना. जिन लोगों को विकास के सपने नहीं आते, स्वयं विकास भी उनसे दूरी गांठे रखता है. यानी परिवर्तन की इच्छा तभी संभव है जब लोगों की आंखों में सपने हों. जो उम्मीदों को उद्वेलित कर, उसके असंतोष को भड़का सकें. यथास्थितिवादियों का हमला भी इन्हीं पर होता है. लोगों के मन में परिवर्तन की चाहत न रहे, असंतोष न रहे, उसकी आंखों में सपने और उम्मीदें न रहें, इसके लिए समाज और राजनीति के शिखर पर विराजमान लोग तरह-तरह के बानक बनाया करते हैं. विद्रोह की भावना को दबाए रखने के लिए संतोष को महिमामंडित किया जाता है.

संतोष को यथास्थितिवाद का पर्यायवाची भी कह सकते हैं. जो है, जैसा है, जितना है—उसी को पर्याप्त मानकर समझौता किए रहना. आंखों में उभरने से पहले ही सपनों की हत्या कर देना. यह इतना लुभावना शब्द है कि कबीर जैसे संत कवि भी उसके आकर्षण से बच नहीं पाए थे. ‘माया महाठगिनी’ गाते हुए वे आजीवन रूखी-सूखी खाने और ठंडा पानी पीने का उपदेश देते रहे. रहीम संतोषधन के आगे ‘गौधन, गजधन, बाजिधन’ को धूल-समान कहकर कबीर के स्वर में स्वर मिलाते नजर आते हैं. ऐसे कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो संतोष का महिमा-मंडन तथा गरीब को ‘संतोषधन’ पर गर्व करने का उपदेश देने वाले वही लोग हैं, जो राजाओं और सामंतों की समृद्धि, उनकी वैभव-लिप्सा का बखान करते नहीं थकते. जानते हैं कि ऊपर के वर्गों की समृद्धि, निचले वर्गों द्वारा सुख-सुविधाओं को माया और भोग-विलास मानकर खुद को उनकी स्पर्धा से बाहर निकाल लेने पर ही संभव है. इसके लिए आवश्यक है कि वे अपनी विपन्नता पर गर्व करें और दैन्य से समझौता कर लें. मुट्ठी-भर लोगों के लिए विलासितापूर्ण जीवन के लिए अधिसंख्यक वर्ग का अपनी न्यूनतम संसाधनों से गुजारा करना  आवश्यक है.

इस अधिसंख्यक वर्ग में युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है. सब जानते हैं, इकीसवीं शताब्दी युवाओं के लिए बड़े सपने लेकर आई थी. सरकार को चाहिए था कि सपनों और उनसे जुड़े अरमानों को फलने-फूलने के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करती. वर्तमान सरकार तो आई ही ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे के साथ थी. लेकिन ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे को सच करने के लिए न्याय, लोकतंत्र और समानता में विश्वास आवश्यक है. ये तीनों भारतीय संविधान का केद्रीय विचार भी हैं. लेकिन सरकार बनने के साथ ही कह दिया गया कि चुनावों के दौरान कही गई बातें जुमला होती हैं.

सरकार में बैठे लोग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा को मानते हैं. जिसे जिसकी आस्था न तो लोकतंत्र में है, न ही समानता के विचार में. ना ही सामाजिक न्याय उसे भाता है. इसके विपरीत वह वर्णव्यवस्था का समर्थन करता है. समरसता की आड़ में वह चाहता है कि यथास्थिति बनी रहे. लोग जहां, जैसी भी अवस्था में हैं, वहीं रहकर शांति बनाए रखें. भारतीय संविधान उसकी आंखों में खटकता है. उसका आदर्श भारत की वर्णव्यवस्था, सामाजिक आर्थिक ऊंच-नीच को दैवीय घोषित करने वाली मनुस्मृति है. वे जानते हैं कि सभी की आंखों में सपने होंगे तो भारतीय समाज और राजनीति का मनुस्मृतिकरण असंभव हो जाएगा. इसलिए चतुराई से चायवाले, पकौड़ा तलने वाले और चौकीदार के पेशे का महिमामंडन किया जा रहा है. प्राचीन सामंती व्यवस्था खुद को लंबे समय तक टिकाए रखने में इस कारण कामयाब हुई थी, क्योंकि उसमें समाज का बड़ा हिस्सा सुख की स्पर्धा से बाहर था. ऊपर के वर्गों की कृपा से जितना और जैसा मिल जाता था, उसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेता था.

दलितों और पिछड़ों को लंबा समय सवर्णों की दासता में इसलिए भी गुजारना पड़ा था, क्योंकि लंबे समय तक उनकी आंखों में मुक्ति का कोई सपना ही नहीं था. नियति और भाग्यवाद के चंगुल में फंसे लोगों को लगता है कि वे जिस स्थान पर, जैसी भी अवस्था में हैं, वही उनके लिए सर्वोपयुक्त है. यदि वहां कोई अभाव या दुख है तो उसमें उनका अपना या समाज का कोई दोष नहीं है. इसलिए दुख-अभाव-उत्पीड़न सबकुछ सहते हुए, उसी स्थान पर बने रहना, ईश्वरीय इच्छा है. इसे उभरते युवा सपनों की असमय हत्या का षड्यंत्र भी कह सकते हैं, ताकि समाज और सत्ता के शिखर पर मौजूद लोग अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए इंद्रधनुषी सपनों की फसल उगा सकें. कभी-कभी यह खेल राष्ट्रवाद की आड़ में भी खेल लिया जाता है. चायवाला होने पर गर्व करना, चाट-पकौड़ा तलने को रोजगार मान लेना या ‘मैं भी चौकीदार’ की तख्ती लगाए फिरना—असल में कुछ यथास्थितिवादियों के आगे हथियार डाल देने जैसा है. इसका यह आशय नहीं है कि इन रोजगारों में लगे लोग सम्मान के पात्र नहीं हैं. आशय बस इतना है कि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ये कार्य प्रायः किसी मजबूरी में अपनाए जाते हैं. वे लोग अपनाते हैं, जो किन्हीं कारणों से स्पर्धा में पिछड़ जाते हैं. इसलिए आवश्यक है कि इन नारों के पीछे स्थित सरकार की नीयत को समझा जाए; और जो लोग युवा आंखों से सपने नोंच लेना चाहते हैं, उन्हें आने वाले चुनावों में अच्छी तरह सबक सिखाया जाए. इसी में लोकतंत्र की जीत है.

  ओमप्रकाश कश्यप