सहकार : आत्मनिर्भरता का दर्शन

उत्तरोत्तर कठिन होते जा रहे श्रमिक-जीवन की परेशानियों से मुक्ति का एक रास्ता समस्याओं के साथ-साथ जीवन से पलायन का हो सकता है. जैसा कि हमारे पूर्वज भी करते आए हैं. कभी संतोष के नाम तो कभी भाग्य के नाम पर. कभी धर्म तो कभी परलोक-सिद्धि के प्रलोभन से. कभी आत्मविश्वास गंवा जिंदगी से हार मानते हुए तो कभी शक्तिशाली के आतंक के चलते. यदि हमेशा यही होता तो जीवन में संभावनाओं की उपस्थिति और मानवीय जिजीविषा की चामत्कारिक देन से लोगों का भरोसा ही उठ जाता. परस्पर सहयोग और समर्पण की जादुई शक्ति को मनुष्य पहचान ही नहीं पाता. अमेरिका के शेकर साहचर्यवादियों के एक प्रसिद्ध गीत का गीत का भावार्थ  है—

जो भी सर्वोच्च शिखर तक पहुंचना चाहता है, उसको सर्वप्रथम समाज के सबसे निचले स्तर की ओर देखना चाहिए. तत्पश्चात सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति को साथ लेकर सर्वोच्च शिखर तक पहंुचने के लिए चढ़ाई आरंभ कर देनी चाहिए.’

मनुष्य एवं सहकार का संबंध सहस्राब्दियों पुराना है. हड़प्पा और मोअ-जो-दड़ो की सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि उन दिनों भारतीय व्यापारिक संगठन सुदूर रोम तक की यात्रा करते थे. प्राचीन चीन और जापान में ऐसे सहयोगी संगठन थे, जिनके सदस्य प्रतिमाह एक निश्चित रकम एक स्थान पर जमा करते रहते थे. धीरे-धीरे रकम बड़ी हो जाती, तो परस्पर बांट लिया जाता था. ऐसे सहयोगी संगठनों को चीन और जापान में क्रमशः यू हुई तथा तोनोमुशी कहा जाता था. भारतीय श्रेणि और यूरोपीय देशों में गिल्ड के बीच अच्छे व्यापारिक संबंध थे. आधुनिक सहकारिता आंदोलन की विधिवत शुरुआत रोशडेल पायनियर्स द्वारा 21 दिसंबर, 1844 को सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत के साथ हुई थी.

सहकारिता को प्रेरित करने में सुप्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स डिकेन्स की अद्वितीय प्रेरणा का योगदान भी कम नहीं है. 1843 की गर्मियों में चार्ल्स डिकेन्स, जो उन दिनों 31 वर्ष के सुदर्शन युवक थे, लंकाशायर की यात्रा पर निकले. उद्देश्य था अपनी नई पुस्तक के लिए जमीनी अनुभव बटोरना. देखना चाहते थे कि उत्तरी इंग्लेंड, जो उद्योग के क्षेत्र में विश्व-भर में नाम कमा रहा है, वहां पर आम जनजीवन कैसा है. उन्होंने मेनचेस्टर की मजदूर बस्तियों की यात्रा की, यह जानने के लिए कि अपने मालिकों के लिए साल में करोड़ों पाउंड का मुनाफा कमाने वाली कपड़ा मिलों के मजदूर किन परिस्थितियों में रहते हैं. डिकेन्स ने वहां जो देखा वह देह तो देह आत्मा तक को सुन्न कर देने वाला था. मजदूर बस्तियों में भूख, गरीबी और बीमारियों के नंगे नांच ने डिकेन्स को विचलित कर दिया. औद्योगिक क्रांति का हृदय-प्रदेश माने जाने वाले उस क्षेत्र में जीवन कितना मुश्किल और अमानवीय है. मानो पूरे इंग्लेंड को दो हिस्सों में बांट दिया गया हो. उसके एक ओर तो बड़े-बड़े धन्नासेठों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और कमाऊ नौकरशाहों का इंग्लंेड है, तो दूसरे इंग्लेंड में भूखे, नंगे, विपन्न, शोषित-उत्पीड़ित और बीमार स्त्री-पुरुषों का बसेरा है. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिक क्रांति का कड़वा सच उसके सामने था. उसने जो देखा वह घोर अमानवीय, मनुष्यता को लांछित करने वाला था. अनियमितत मशीनीकरण के कारण प्रदूषण लगातार बढ़ता ही जा रहा था. नागरिक सुविधाएं पूरी तरह उजाड़ पड़ी थीं. वस्तुतः 1848 के आसपास रोशडेल में जीवन-संभाव्यता मात्र 21 वर्ष थी, जो उस समय इंग्लेंड की औसत जीवन-संभाव्यता से कहीं कम थी. औरतों के पास बदलने के लिए कपड़े तक नहीं होते थे. उनके गंदे और चिथड़े कपड़े बेहद बदबूदार होते थे. पलंग पर न तकिये होते थे, न चादर. बच्चे को जन्म देने के लिए औरतें प्रसूता के अगल-बगल, अपनी बाहों का सहारा देने के लिए खड़ी हो जाती थीं. भीषण दरिद्रता की यह अवस्था उन बुनकर परिवारों की साथ थी, जिनके बारे में यह दावा किया जाता था, कि वे पूरे विश्व के लिए कपड़ा तैयार करते हैं.

अगले ही दिन अथेनयिम क्लब में नौकरशाहों तथा कारखाना मालिकों की उपस्थिति में, वहां उपस्थित मजदूरों का आवाह्न करते हुए डिकेन्स ने कहा कि उन्हें अपनी इस अज्ञानता और अपराध-ग्रंथि से बाहर आ जाना चाहिए कि वे गरीबी और अपराध के बेबस जन्मदाता हैं. कि वे स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ हैं, या उनका विकास दूसरे की दया-दृष्टि के बगैर संभव ही नहीं है. उन्हें इस भ्रम से भी बाहर आ जाना चाहिए कि एक दिन धनवान लोग अपनी आत्मा की आवाज से प्रेरित होकर आए आएंगे; और मिलकर उनकी समस्याओं का खोजेंगे. उन्होंने नौकरशाहों और कारखाना मालिकों से भी अपील की थी कि श्रमिकों की हालत में सुधार लाने के लिए वे आपसी कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों का परस्पर आदान-प्रदान करें. कि उनकी समृद्धि समाज की समृद्धि के बिना अधूरी और बेमानी है.

मजदूर बस्तियों में छायी गरीबी और बदहाली ने डिकेन्स को इतना व्यथित कर दिया था कि ट्रेन द्वारा लंदन वापस लौटते हुए उन्होंने अपनी नई पुस्तक ‘दि क्रिसमस कैरोल’ की अभिकल्पना की. एक सप्ताह बाद ही उन्होंने वह पुस्तक लिखनी प्रारंभ कर दी. उसके लगभग छह महीने के बाद 19 दिसंबर, 1843 को वह पुस्तक प्रकाशित होकर आई, जिसने पूरे इंग्लेंड के बुद्धिजीवियों को झकझोर कर रख दिया. लोग मजदूरों की स्थिति के बारे में सोचने को विवश हो उठे. क्रिसमस का उस जैसा उल्लास पहले कभी नहीं हुआ था— डेविड जे. थांपसन उस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि लंदन लौटने के बाद चार्ल्स डिकेन्स ने अपने आंख, नाक तथा कान यह जानने पर लगा दिए थे कि मेनचेस्टर और लंकाशायर की मजदूर बस्तियों के उत्थान के लिए पूंजीपति और सरकार कितने चिंतित हैं; तथा मजदूर अपने शोषण एवं उत्पीड़न का कितना और किस तरह सकारात्मक विरोध कर पाते हैं.

चार्ल्स डिकेन्स की पुस्तक ‘दि क्रिसमल कैरोल’ लगभग जीवनी थी. एक मजदूर के संघर्षों और दुःखों की महागाथा. उसमें डिकेंस ने यह कल्पना कि थी एक पिता अपनी गरीबी से बेहद तंग आ चुका है. कर्ज न चुका पाने के कारण सजा काटते हुए भी वह अपने परिवार के प्रति चिंचित और परेशान है. उपन्यास का मुख्य पात्र बॉब क्रेस्टी नाम के अत्यंत गरीब मजदूर को बनाया गया था, जो अपने मालिक के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने के बावजूद परिवार का भरण-पोषण कठिनाई-पूर्वक ही कर पाता है. उसका एक बेटा नन्हा टिम बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ है. बॉब का मालिक स्क्रूज खूब धनवान मगर हद से ज्यादा कंजूस है. उसके जीवन का प्रमुख लक्ष्य अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना है. स्क्रूज को उन भूखे-बीमार मजदूरों और उनके परिवारों की कतई फिक्र नहीं है, जिनके परिश्रम के दम पर उसके कारखाने सोना उगलते हैं.

पुस्तक के बहाने डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया रूपक तेजी से बदलते ब्रिटिश समाज पर तीखा कटाक्ष था, जिसका एक सिरा बेहद चमकदार और चकाचौंध से युक्त था, उसपर मुट्ठी-भर लोगों का अधिपत्य था. जबकि दूसरे सिरे पर हजारों-लाखों उत्पीड़ित-शोषित जन थे, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए तरसते हुए. आगे चलकर इसी वर्ग को कार्ल माक्र्स ने सर्वहारा कहकर पुकारा था. कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें न भरपेट रोटी मिलती थी, न तन ढकने को जरूरत-भर कपड़ा. पुस्तक के बहाने लेखक ने मजदूर जीवन की विसंगतियों को पूरी दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें भरपूर कामयाबी प्राप्त हुई. डिकेन्स की यह पुस्तक आगे चलकर यूरोप देशों के सामाजिक अध्ययन का प्रमुख दस्तावेज बनी. उससे लोग विकास को आलोचनात्मक दृष्टि से परखने के लिए विवश हो उठे. डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया पात्र बॉब क्रेस्टी समाज के गरीब, ऋणग्रस्त, उत्पीड़ित और शोषित मजदूर का प्रतीक बन गया. कुटिल स्क्रूज को कंजूसी और शोषक पूंजीपति का पर्याय मान लिया गया. एक और मुख्य बात मजदूरों को यह समझ में आने लगी कि अपनी बेहाली और दुर्दशा के वे या उनका भाग्य जिम्मेदार नहीं हैं, असली जिम्मेदार वह व्यवस्था है, जो पूंजी को सीमित हाथों में कैद करने का अवसर देती है. वे समझने लगे कि इस अवस्था से उभरने के लिए उन्हें स्वयं ही प्रयास करने होंगे.

इंग्लेंड के चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को आम मताधिकार के लिए छेड़े गए लंबे संघर्ष के लिए जाना जाता है. मगर सहकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान कम नहीं है. मजदूरों की आवास समस्या के समाधान के लिए चार्टिस्ट नेता ओ’काॅनर ने 1843 ईस्वी में ‘चार्टिस्ट को-आपरेटिव लेंड कंपनी’ नाम से एक सहकारी संस्था का गठन किया था. उसे आगे चलकर ‘नेशनल लेंड कंपनी’ का नाम दिया गया. उस संस्था का एक सम्मिलित कोष था. केवल मजूदर उसके सदस्य बन सकते थे. 1844 से 1848 के दौरान संस्था द्वारा पांच स्थानों पर विशाल भूखंडों पर आवासीय इकाइयों का निर्माण कर, उन्हें चुने हुए श्रमिकों में बांटा भी गया. तत्कालिक कानून के अनुसार भूमिहीनों को मताधिकार से वंचित रखा गया था. अतः श्रमिकों को भू-स्वामी बनाना, उस समय के नियमों के अनुसार श्रमिकों को मान-सम्मान दिलाना था. उससे भी पहले 1830 में आर्थिक आत्मनिर्भरता द्वारा जनसाधारण का सम्मान वापस लाने का प्रयास सहयोगी उद्यमों के माध्यम से हो चुका था. 1830 में चार्ल्स हावर्थ के प्रयासों से ‘रोशडेल फ्रेंडली कोआपरेटिव सोसाइटी’ का गठन किया गया था. उस समिति ने सहकारी उद्यम की शुरुआत उपभोक्ता भंडार के माध्यम से की थी. परंतु अनुभव की कमी, सहकारिता संबंधी जागरूकता के अभाव, व्यवस्थागत कमजोरियों तथा कानूनी शिथिलताओं के वह समिति असफलता का शिकार हुई थी. असफलता के अन्य कारणों में प्रमुख कारण थे, उधार बिक्री का प्रावधान तथा नियमों की अस्पष्टता. मजदूरों की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए, समिति के विधान में की गई व्यवस्था के अनुसार सदस्यों को उसके उपभोक्ता भंडार से एक सप्ताह का उधार दिया जाता था. उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि सप्ताह के अंत में उधार की रकम का भुगतान कर देंगे. व्यावहारिक रूप में वह व्यवस्था बहुत दिनों तक नहीं चल सकी. सीमित वेतन तथा अन्य आकस्मिक खर्चों के कारण बहुत से मजदूर सप्ताहांत में रकम लौटाने में असमर्थ रहते थे. परिणाम यह हुआ कि समिति को व्यापार मेें घाटा होने लगा. चार्ल्स हावर्थ को व्यक्तिगत रूप में भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा. कुछ ही दिनों पश्चात वह समिति भंग हो गई.

कोई और होता तो दो बड़ी असफलताओं के चलते टूट जाता. भारी नुकसान सहकर शायद ही अगला प्रयास करता. लेकिन मजदूरों के समक्ष ‘करो या मरो’ की स्थिति थी. बाजार में महंगाई बढ़ती जा रही थी, ऊपर से दुकानदार खाने-पीने के सामान में भारी मिलावट करते थे. उससे भी अधिक था उधार का बोझ, जो मजदूरों के जीवन की पहली सांस से आरंभ होकर अंतिम क्षणों तक बना रहता था. मजदूरों को यह बोध हो चला था कि अपनी समस्याओं का निदान स्वयं उनके हाथों में है. इसलिए बिना और विलंब किए उन्हें स्वयं आगे आना होगा. इनमें वे लोग लोग थे, जिनकी भविष्य पर निगाह थी. जिनका आशावाद अभी मरा नहीं था, जिनकी जनसंगठन और लोकशक्ति में प्रबल आस्था थी, जो जानते थे कि मनुष्यमात्र उतना बुरा नहीं, जितनी कि लोग उसके बारे में सामान्य धारणा बना लेते हैं. मनुष्य की सकारात्मक प्रवृत्तियों को उभारकर उसकी समस्याओं का निदान संभव है. मनुष्यता के ऐसे ही महान स्वप्नदृष्टाओं में से एक था, डॉ. विलियम किंग(1786-1865), जिसकी सहकार और सहयोगाधारित उपक्रमों में प्रबल आस्था थी. सहकारिता के विचार को जन-जन तक पहुंचाने के लिए डॉ. किंग ने एक समाचारपत्र भी निकाला था, नाम था—दि को-आॅपरेटर. अपने समाचारपत्र में उसने लिखा था—

‘बगैर संगठन के संख्या-बल निःशक्त है. जबकि विवेक बिना संगठन-शक्ति निरर्थक.’

डिकेन्स के मेनचेस्टर दौरे से पहले ही मजदूरों एक समूह वहां से मात्र सतरह किलोमीटर दूर रोशडेल में अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए निरंतर बैठकें करता आ रहा था. उन बैठकों में मजदूरों की समस्याओं तथा उनसे मुक्ति के बारे में विचार होता. ऐसी ही एक बैठक में जॉन कार्सव नामक एक मजदूर कार्यकर्ता ने सहकारी समिति के गठन का सुझाव दिया था. सहकारिता के पुराने प्रयोग असफल सिद्ध हो चुके थे. इसलिए उसके प्रस्ताव पर कुछ लोग चौंके. परंतु यदि सहकारिता नहीं तो क्या? दूसरे विकल्पों का सरासर अभाव था. अंततः उस सभा में सहकारी समिति बनाने के निर्णय को अनुमति मिल गई. उसका मुख्य उद्देश्य बनाया गया ग्राहकों को शुद्ध, पवित्र पूरे माल की आपूर्ति.

वह 15 अगस्त, 1844 का दिन था. बाकी दिनों से कहीं अधिक पवित्र और उम्मीदों से भरा हुआ, जब ‘रोशडेल पायनियर्स इक्वीट्वेल कोआॅपरेटिव सोसाइटी’ के गठन को सैद्धांतिक सहमति मिली, जिसने दुनिया-भर के सहकारिता आंदोलन को नई दिशा दी. रोशडेल पायनियर्स की संस्थापकों में कुल अठाइस सदस्य थे. सहकारी समिति की बात करना, उसके विचार को आगे चलाना अलग बात थी. उसके लिए पूंजी का प्रबंध करना अलग बात. मगर जहां चाह-वहां राह, और जहां राह-वहां हिम्मत और मंजिल भी. बैठक के दौरान मजदूरों ने निर्णय लिया कि प्रत्येक मजदूर को जो समिति का सदस्य बनना चाहता है, समिति के कोष में न्यूनतम एक पाउंड का निवेश करना होगा. एक-एक पेनी के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मजदूरों के लिए एक पाउंड की रकम बहुत बड़ी थी. समस्या किसी एक की नहीं, अधिकांश मजदूरों की थी. तब सर्वसम्मिति से यह सुझाव आया कि इसके लिए कारखाना मालिकों से उधार लिया जाए. जो उधार देने में आनाकानी करें, उन्हें हड़ताल या धरना-प्रदर्शन के माध्यम से अग्रिम धनराशि देने के लिए विवश किया जाए. उस समय जो सदस्यगण काम करें, वे यह प्रयास भी करें कि हड़ताल पर गए सदस्यों के हिस्से के पेंस भी बचा सकें.

हड़ताल की धमकी मिलते ही कुछ कारखाना मालिक एडवांस देने को सहमत हो गए. यह संगठित शक्ति की पहली जीत थी. कुछ कारखाना मालिकों ने एकदम इंकार कर दिया. इसपर श्रमिकों का आक्रोश फूट पड़ा. उसके बाद मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष भी हुआ. इसपर कुछ मजदूर निराश होकर समिति के प्रस्ताव से पीछे हटने लगे. कुछ अभी भी उम्मीद बांधे रहे. प्रत्येक सप्ताह दो पेंस की रकम उनके लक्ष्य को देखते हुए अपर्याप्त थी. हालांकि कुछ कारखाना मालिक उतनी रकम एडवांस के रूप में देने को तैयार थे, जबकि कुछ इस मांग को पूरी तरह नकार चुके थे. अततः मजदूरों तथा कारखाना मालिकों के बीच यह समझौता हुआ कि उतनी रकम मालिकों की ओर से मजदूर संगठन को एडवांस के रूप दी जाएगी. वहां से सदस्य उस राशि को उधार के रूप में ग्रहण कर सकते हैं.

 दो पेंस की रकम उस समय अधिकतर कामगारों की लगभग दो सप्ताह की मजदूरी के बराबर थी. कह सकते हैं कि उन बुनकरों के लिए यह रकम भी मामूली न थी. इसे उगाहने के लिए तीन व्यक्ति नियुक्त किए गए, जो प्रत्येक सोमवार सदस्यों से रकम लाकर खजांची के पास जमा कर देते थे. विषम स्थितियों में एक पाउंड की शेयर-निधि जुटाना भी कठिन प्रतीत हो रहा था. सदस्य प्रति सप्ताह दो पेंस जमा करने में भी नाकाम हो रहे थे. कई बार ऐसे भी अवसर आए जब सदस्यों पर निराशा हावी होने लगी थी. उस समय यह सुझाव दिया गया कि समिति के गठन का कार्य फिलहाल स्थगित कर दिया जाए तथा विकास के वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचा जाए. साथ ही अभी तक जमा की गई रकम, संबंधित सदस्यों को लौटा दी जाए. भविष्य में जब भी हालात अनुकूल हों, तब संगठन के बारे में नए सिरे से विचार किया जाए. कुछ सदस्य तो हताश होकर उस समय तक जमा कराई गई शेयर-निधि वापस भी मांगने लगे थे.

यह प्रतिकूल स्थिति थी. लेकिन उम्मीदों एवं घनी निराशाओं के बीच मजदूरों का अभियान आगे बढ़ता रहा. इस बीच चार्ल्स हावर्थ बिना समय खोए तेजी से समिति के लिए विधान की रचना में लगा था. विपरीत स्थितियों और आस-निराश के बीच डोलते उस छोटे-से समूह के लिए पहला पड़ाव आया 24 अक्टूबर 1844 को, जब हावर्थ द्वारा बनाए गए नियमों को ‘रजिस्ट्रार आॅफ फैमिली सोसाइटीज’ द्वारा पंजीकृत कराके, नियमों की उस व्यवस्था को संसद के अधिनियम के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था की पहचान दी गई. इस तरह ‘रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स को-आपरेटिव संस्था’ की नींव रखी गई. एक सपना अंगड़ाई लेने को आंखों में उतर चुका था. पंछी उड़ान भरने को पर खोल चुके थे, और अब पूरा अंतरिक्ष उनके लिए खुला था.

सदस्यगण अपने बाकी खर्च में कटौती करके एक-एक पेनी जोड़ते रहे. अंततः दिसंबर तक रोशडेल पायनियर्स मिलकर प्रारंभिक 28 पाउंड की पूंजी जमा करने में कामयाब हो गए. अब समस्या ऐसे स्थान की थी जो व्यावसायिक दृष्टि से उपयुक्त हो, साथ में पर्याप्त सस्ता भी. थोड़ी तलाश के बाद वह स्थान भी मिल गया. रोशडेल के 21, टोड लेन पर एक पुरानी मिल वर्षों से बंद पड़ी थी. देखभाल न होने के कारण वह खंडहर में बदलती जा रही थी. उसके मालिक मिस्टर डनलप से बात की गई, लेकिन वे उसको किसी समिति के नाम किराये पर देने को तैयार न थे. अंततः एक उपाय निकाला गया. समिति के ही एक स्थायी सदस्य के नाम पर उस गोदाम के भू-तल स्थित 23 फुट चौड़े तथा 50 फुट लंबे स्थान को तीन वर्ष के लिए किराये पर लिखवा लिया गया. किराया तय हुआ—दस पाउंड प्रति वर्ष. उसी स्थान के अगले हिस्से के 23 फुट चौड़े तथा सतरह फुट लंबे स्थल को दुकान के रूप में प्रयोग में लाया गया. शेष स्थान को भंडार तथा मीटिंग आदि के उपयोग के छोड़ दिया गया.

तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. आखिर वह दिन भी आ गया जिसकी उन्हें वर्षों से प्रतीक्षा थी. रात-दिन जिसका उन्होंने इंतजार किया था. हजारों-लाखों सपने संजोए थे. अठाइस पाउंड में से दस पाउंड किराये के नाम खर्च हो चुके थे. कुछ उस इमारत की मरम्मत और सफेदी के नाम चढ़ गए. बाकी पाउंड से उन्होंने रोजमर्रा में काम आने वाली चीजें खरीदीं. कुल इतना सामान जितना कि छोटी-सी ट्राली में समा सके. उपभोक्ता भंडार का सपना और जरा-सा सामान! यह कहकर रोशडेल पायनियर्स का उपहास भी किया गया. मगर उन्होंने धैर्य से काम लिया. बिना प्रतिक्रिया दिए वे अपने काम से लगे रहे. पूर्णतः अनुशसित और लक्ष्य-समर्पित. आखिर उसी स्थान से, वर्ष की सबसे लंबी रात अर्थात 21 दिसंबर, 1844 को, सायं आठ बजे किटकिटाती ठंड के बीच रोशडेल पायनियर्स द्वारा सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत की गई. मानो घने अंधियारे के बीच एक टिमटिमाती-सी लौ जली हो, जो बढ़ते-बढ़ते विश्वव्यापी दीपमाल बन गई. कुछ ही समय बाद जब वह स्थान छोटा पड़ने लगा तो भंडार को नए स्थान पर ले जाया गया. उपभोक्ता भंडार से आरंभ हुआ सहकारिता का अभियान उत्पादन, विपणन, निर्माण, थोक आपूर्ति जैसे नए-नए क्षेत्रों में फैलता चला गया. रोशडेल नाम सहकारिता का पर्याय बन गया. जगह-जगह से लोग उस स्थान को देखने के लिए आने लगे. उस अभियान कामयाबी ने सहकारिता का मखौल उड़ाने वाले लोगों की आंखें चैंधियां दीं. इस भ्रम को भी दूर कर दिया कि सीमित पूंजी के दम पर कोई उद्यम आरंभ कर पाना असंभव है.

तब से आज तक लगभग 170 वर्ष की अवधि में सहकारी आंदोलन ने पूरी दुनिया में तरक्की के नए-नए सोपान प्राप्त किए हैं. यह उस मिथ का खंडन करता है जो मानता है कि व्यावसायिक सफलता केवल स्पर्धा के माध्यम से संभव है. इसके उलट आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का तो संपूर्ण दर्शन ही स्पर्धा पर टिका हुआ है. एक-दूसरे को नीचा दिखाकर बाजार पर छा जाने का प्रयास; और प्रयास भी ऐसा जो षड्यंत्र तक जाता हो, करना—आधुनिक उद्योग-नीति का ही हिस्सा है. इसमें कोई संदेह नहीं कि स्पर्धा से उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है. एक-दूसरे से बेहतर बनने की चाहत, स्वयं में परिष्कार का बोध भी जगाती है. लेकिन स्पर्धा सदैव निरापद नहीं होती. वह अपने साथ अनेक चुनौतियां लिए चलती है, जिनमे जरा-सी चूक पिछली सभी सफलताओं पर भारी पड़ सकती है. सुदीर्घ यात्रा के दौरान सहकारिता के क्षेत्र में भी अनेक बदलाव आए हैं. उच्च तकनीक ने सहकारी उद्यमों में भी जगह बनाई है. बावजूद इसके मूल सिद्धांत लगभग वही हैं, जो रोशडेल पाॅयनियर्स द्वारा अपनाए गए थे. उनमें देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर संशोधन अवश्य होते रहते हैं. इंग्लेंड से शुरू हुआ सहकारिता आंदोलन बड़ी तेजी से फ्रांस, स्वीडन, चीन, इटली, जर्मनी, जापान, स्पेन, अमेरिका, भारत आदि देशों में फैलता चला गया. आखिर क्यों, इसे समझने के लिए एक पुराना प्रसंग—

अरस्तु जब वह मात्र इकीस वर्ष युवा था, एक दिन वह मेकदोलन के सम्राट फिलिप के दरबार में पहुंचा. वहां उसने सिकंदर को पढ़ाने की इच्छा व्यक्त की. प्लेटो के शिष्य रह चुके अरस्तु को भला कौन मना करता! अनुमति मिलते ही अरस्तु ने अध्यापन आरंभ कर दिया. सिकंदर उस समय ग्यारह वर्ष का किशोर था. बड़ा ही सुंदर और उससे कहीं ज्यादा मेधावी. एक दिन की बात. अरस्तु गणित पढ़ा रहे थे कि अचानक सिकंदर ने टोक दिया—‘गुरुजी, एक कितने होते हैं?’

सवाल बहुत आसान दिखता है. अरस्तु इसको दार्शनिक रूप देना चाहते तो कह सकते थे कि एक यानी एकता यानी एकेश्वर अर्थात परमशक्ति! वे गणित का खेल दिखाते हुए यह भी कह सकते थे कि एक यानी दो का आधा या एक बटा दो का दुगुना; अथवा चार का एक-चौथाई. चाहते तो कोई और भी पहेली की तरह जवाब सुझा सकते थे. लेकिन जवाब देने के बजाय अरस्तु ने कहा—

‘मुझे सोचना होगा?’ उसके बाद वे घर लौट आए.

अगले दिन वे वापस लौटे. सिंकदर उत्तर की प्रतीक्षा में था. तब अरस्तु ने कहा—‘एक बहुत अधिक से भी अधिक हो सकता है.’

बात स्पष्ट थी. हम सब अलग-अलग मिलकर यदि केवल भीड़ बनाते हैं तो हमारी शक्ति, अकेले इंसान की शक्ति से कुछ ही ज्यादा होगी है. लेकिन यदि हम एकजुट हो जाएं, हमारे मनोरथ आपस में मिल जाएं, यदि हम अपनी संकल्पशक्ति का साझा कर लें, तब हम एक-एक होकर भी बहुत अधिक से अधिक हो सकते हैं.

यही सहकारिता है. यही संगठन की ताकत, यही इस लेख का उद्देश्य भी है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

नास्तिक दर्शन : पुरोहितवाद विरुद्ध सार्थक मोर्चा (दो)

विशेष रुप से प्रदर्शित

यदि ईश्वर सचमुच कही है, तो उसे मिटा देने में ही भलाई है.—मिखाइल बेकुनिन.

पाठकों के लिए यह जिज्ञासा का विषय हो सकता है कि ‘सामन्नल सुत्त’ का अंतिम संदेश क्या है? अजातशत्रु पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है? छह समकालीन दार्शनिकों से असंतुष्ट होकर बुद्ध तक पहुंचा अजातशत्रु क्या उनसे संतुष्ट हो पाता है? धर्म के मनोविज्ञान को समझने के लिए भी अजातशत्रु के निर्णय को जानना आवश्यक है. शांति की खोज में आए अजातशत्रु को बुद्ध शील(आरंभिक शील, मध्यम शील, महाशील), संयम, स्मृति संप्रजन्य, संतोष, समाधि, प्रज्ञा, करुणा आदि का उपदेश देते हैं. उनके उपदेश में दर्शन का गांभीर्य और नैतिकता का परमोत्कर्ष दोनों हैं. उपदेश के समापन पर वे कहते हैं—‘महाराज! इस श्रामण्यफल से बढ़कर दूसरा कोई श्रामण्यफल नहीं है.’ अजातशत्रु की प्रतिक्रिया अनुकूल है. वह बुद्ध के दर्शन से प्रभावित नजर आता है—

अद्भुत भंते! अद्भुत!! जैसे कोई उल्टे को सीधा कर दे, भटके हुए को उचित मार्ग दिखा दे, छिपे हुए को उजागर कर दे, अंधियारे में भटकते हुओं को प्रकाश में ले आए, ऐसे ही भंते! भगवान ने अनेक प्रकार से धर्म को प्रकाशित किया है. भंते! मैं भगवान की शरण में जाता हूं. धर्म और संघ की शरणागत होता हूं. आज से जीवनपर्यंत आप मुझे अपनी शरण में आया उपासक स्वीकार करने की अनुकंपा करें.’ उसके बाद वह अपने मन के उद्वेग को प्रकट करता है. उस वेदना को सामने रखता है जो उसे भटकाए रखती है. अजातशत्रु का ग्लानिबोध पुराना है. उससे मुक्ति की छटपटाहट उसे बुद्ध की शरण में ले आती है—‘भंते! मैंने जघन्य अपराध किया है. अपनी मूर्खता और पाप के वशीभूत होकर मैंने अपने पिता की हत्या की है. मुझे क्षमा करें. आशीर्वाद दें कि भविष्य में मेरे कदम कभी डगमगाएं नहीं.’

बुद्ध उसे क्षमादान देते हैं—‘अपनी मूढ़ता, अज्ञानता और कुविचारों के बशीभूत होकर तुमने अपने महान पिता की हत्या कर बहुत भारी अपराध किया है. किंतु तुम अपने पाप को स्वीकार करके भविष्य में संभलकर रहने की प्रतिज्ञा करते हो. इस कारण तुम क्षमा के पात्र हो. मनुष्य अपने अपराध को स्वीकार कर, भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा कर ले, इसी में उसकी बुद्धिमानी है.’ बुद्ध का कथन परोक्ष रूप में अजातशत्रु को संघ में सम्मिलित होने का आमंत्रण है. किंतु अजातशत्रु अभी तक ‘सहेजे रखने’ और ‘मुक्त होने’ के द्वंद्व में उलझा है. उसका बुद्ध तक पहुंचना असल में प्रायश्चितबोध से उपजी अंतर्वेदना की परिणति है. वह केवल अपने पिता की ही हत्या नहीं करता, बुद्ध के फुफेरे भाई देवदत्त के उकसावे में आकर स्वयं बुद्ध के लिए भी परेशानी खड़ी करता है. बुद्ध उसके सभी अपराधों को क्षमा करते जाते हैं. अजातशत्रु की प्रतिक्रिया तत्कालीन भावोद्रेक से युक्त है. लेकिन उसे अपने राजन्य तथा राजनीतिकसामाजिक पदप्रतिष्ठा का भी बोध है, जिसे वह एकाएक छोड़ना नहीं चाहता. बहरहाल, ग्लानिबोध और लोकानुराग के बीच जीत अंततः लोकानुराग की होती है. अजातशत्रु के भीतर पैठे ‘सम्राट’ की होती है. वह शास्ता से वापस लौटने की अनुमति चाहता है—‘भंते! अब मैं चलता हूं. अनेक अत्यावश्यक कार्य निपटाने हैं.’ उसके बाद शास्ता की प्रदक्षिणा कर वहां से प्रस्थान कर जाता है. अजातशत्रु के लौटने के पश्चात बुद्ध भिक्षुओं को संबोधित करते हैं—

इस राजा का संस्कार अच्छा नहीं रहा. यह अभागा है. यदि यह अपने धर्मशील पिता की हत्या न करता तो आज इसी स्थान पर बैठेबैठे निर्मल, निश्चल, निष्कलुष ज्ञान को प्राप्त कर लेता.’ क्या यह बुद्धमार्ग की असफलता थी; या अथवा शिष्यों को समझाने के बहाने वे स्वयं को दिलासा दे रहे थे? यदि अजातशत्रु सबकुछ छोड़कर संघ में रहने का निर्णय ले लेता, क्या तब भी बुद्ध की यही प्रतिक्रिया होती? क्या श्रामण्य जीवन सभी प्रकार के पापों के समाधान, प्रायश्चित की सर्वोत्तम जीवनशैली है. बुद्ध के शिष्यों में अंगुलिमाल का उदाहरण भी है. अनेक लोगों को लूटकर हत्या कर देने वाला अंगुलिमाल बुद्ध की शरण में जाने के बाद भिक्षु संघ का होकर रह जाता है. बुद्ध उसे अभागा नहीं कहते. क्या अपने पिता के हत्यारे तथा निर्दोष लोगों की हत्या करनेवाले डाकू के पाप में कोई अंतर है? ‘सामाफल सुत्त’ इन प्रश्नों पर विचार किए बिना ही संपन्न मान लिया जाता है.

इसी प्रसंग की चर्चा ‘संयुत्त निकाय’(3.1.1) तथा थोड़े बदले स्वरूप में ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी है. अंतर केवल इतना है कि ‘संयुत्त निकाय’ में अजातशत्रु का स्थान कोसल सम्राट प्रसेनदि ले लेता है. स्थान राजग्रह स्थित जीवक की आम्रवाटिका के बजाय सावित्थी नदी से सटे जेतवन में अनाथपिंडक का उपवन हो जाता है. ‘संयुत्त निकाय’ के अनुसार बुद्ध उन दिनों अनाथपिंडक के आश्रम में विहार कर रहे थे. कोशल सम्राट प्रसेनदि ने सुना तो तत्वज्ञान की इच्छा के साथ उनसे मिलने पहुंचा. बुद्ध को अभिवादन कर, कुशलक्षेम जानने के पश्चात उसने आसन ग्रहण किया. तदनंतर मन की जिज्ञासा को बुद्ध के समक्ष रखते हुए कहा—‘हे गौतम! आप तो खुद को सर्वोत्तम, सम्यक संबुद्ध, परमज्ञानी तथा श्रेष्ठतम मानते हैं. इस तरह का दावा भी करते हैं.’ बुद्ध हमेशा की भांति आत्मविश्वास से भरपूर हैं. देखा जाए तो बुद्ध का अटूट आत्मविश्वास ही है जो उन्हें अपने समकालीन दार्शनिकों में विशिष्ट बनाता है. उस समय ब्राह्मणवादी परंपरा के विचारक जहां आत्मा और परमात्मा की व्याख्याओं में उलझे हुए थे. दार्शनिक विचारों को लेकर उनकी मान्यताएं इतनी डांवाडोल थीं कि उनकी विपुल शास्त्रसंपदा के बीच से किसी स्पष्ट विचारधारा को खोजना आज भी असंभवप्रायः है. वहां सैद्धांतिक रूप से एकेश्वरवाद का पक्ष लेने वाले भी व्यावहारिक रूप में बहुदेववाद का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. किसी न किसी रूप में सभी परंपरापोषी. उन दिनों भी ब्राह्मणवादी दार्शनिकों के बीच सृष्टि के अस्तित्व को नकारना मानो फैशन का रूप ले चुका था, आत्मविश्वास की कमी के चलते सृष्टि को माया था अथवा मिट्टी समान नश्वर बताया जा रहा था. सिर्फ इसलिए कि पुरोहितों की दुकानदारी चलती रहे. महावीर ‘स्याद्वाद’ के सिद्धांत को बढ़ाते हुए अनेकांतवाद का समर्थन करने लगते थे. एकमात्र बुद्ध ऐसे थे जो अपने स्थिरमति होने के साथ, अपनी विचारधारा और संघ को लेकर गौरवान्वित भी थे. प्रसेनदि को उत्तर देते हुए बुद्ध कहते हैं—

सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ, सम्यक संबुद्ध, परमज्ञानी अर्थात जो भलीभांति जान चुका है, ऐसा जिसके बारे में ठीकठीक कहा जा सकता है, उसका आशय मुझसे ही समझना चाहिए.’

प्रसेनदि इससे आश्वस्त नहीं है. यह यूं कहो कि विश्वास करने से पहले भलीभांति परीक्षा कर लेना चाहता है. अगले चरण में अजातशत्रु की भांति वह भी नास्तिक दार्शनिकों का नाम लेता है. लेकिन अजातशत्रु जहां नास्तिक विचारकों की ओर से निराश है, वहीं एक प्रसंग में प्रसेनदि उनसे प्रभावित नजर आता है—‘पूर्ण कस्सप, मक्खलिपुत्र गोशालक, निग्र्रंथ नागपुत्त, संजय वेलत्थिपुत्त, अजित केशकंबलि तथा पुकुद कात्यायन—ये सब गणाचार्य, संघाधिपति, स्वयंसंबुद्ध, यशस्वी तीर्थंकर, परमज्ञानी आदि कहे जाते हैं. सभी आपसे उम्र में छोटे हैं, पूर्ण कस्सप तथा गोसाल तो आपसे पहले ही जिनत्व को प्राप्त कर चुके हैं. लेकिन यह पूछने पर कि क्या आप स्वयंसंबुद्ध हैं, उनमें से कोई भी स्वयं को परमज्ञानी, सम्यक संबुद्ध, सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम होने का दावा नहीं करता. ऐसे में आप स्वयं के सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञानी, सर्वोत्तम, सम्यक संबुद्ध तथा परमतत्व का ज्ञाता होने का दावा कैसे कर सकते हैं?’

प्रसेनदि का कथन तर्कसम्मत है. मगर बुद्ध सीधे उत्तर देने के बजाय उदाहरण थमाने लगते हैं—‘महाराज! तीन चीजें हैं जिन्हें कभी हल्का करके नहीं लेना चाहिए. वे तीन हैं—क्षत्रीय, सर्प, अग्नि एवं भिक्षु. क्षत्रीय का काम युद्ध करना है. आप उसका अवमूल्यन करेंगे तो वह अपमानित होगा. उस अवस्था में उसके मन में गांठ भी पड़ सकती है. वह जीवन में कभी भी आपसे बदला ले सकता है. यही सर्प के साथ है. सर्प के छोटा या बड़ा होने से उसके विष का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. अग्नि का भी यही स्वभाव है. स्फुर्लिंग मामूली ही क्यों न हों, उसकी कभी उपेक्षा या निरादर नहीं करना चाहिए. मामूली स्फुर्लिंग भी पलक झपकते पूरी बस्ती को खाक में मिला सकता है. चैथे यानी सदाचारी भिक्षु का तो कतई निरादर नहीं करना चाहिए. भिक्षु निष्पृह, पशुधन विहीन होता है. इसलिए विद्वान पुरुष कभी भिक्षु का निरादर नहीं कहते.’ संवाद के समापन पर प्रसेनदि वही कहता है, जो ‘दीघनिकाय’ में अजातशत्रु ने कहा था. और प्रकारांतर में वही जो बौद्ध लेखक उनसे कहलवाना चाहता है—‘आश्चर्य भंते आश्चर्य. जैसे कोई उल्टे को सीधा कर दे, भटकते हुए को प्रकाश में ले आए, वैसे ही आपने मेरा मार्गदर्शन किया है. कृपया, मुझे अपना उपासक स्वीकार करें.’(संयुत्त निकाय, कोसल सुत्त).

अपने मत के प्रचारप्रसार के लिए बौद्ध दर्शन को न केवल ब्राह्मणवादी परंपरा से जूझना पड़ रहा था, बल्कि उन नास्तिक दार्शनिकों से भी उसका विरोध था, जो जीवन के कारोबार में किसी भी दैवी शक्ति के हस्तक्षेप को नकारते थे. जिनका विश्वास था कि मनुष्य प्रकृति का सहजस्वाभाविक अंग है. प्राणिमात्र का जीवन भौतिकी के उन्हीं नियमों से अनुशासित होता है, जिनसे प्रकृति. इसलिए वे जीवन और प्रकृति के सामन्जस्य को ही मनुष्यता की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानते थे. प्रकृति और जीवन से उनका सहज जुड़ाव था. देखा जाए तो वह जीवन के प्रति पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण था. वे सत्तावादी प्रलोभनों, छलप्रपंच, लालच आदि से दूर, यायावर चिंतनपरंपरा से निकले विद्वान थे. दूसरी ओर ब्राह्मण दर्शनों का पोषणपल्लवन राज्य के संरक्षणसमर्थन के साथ हुआ था. धर्म और राजसत्ता के उस गठजोड़ ने केंद्रोन्मुखी संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया था. एकदूसरे के प्रकटतः विरोधी और आलोचक दिखने के बावजूद उसके विभिन्न घटक पारस्परिक हितों को लेकर संगठित थे. उनकी रक्षा एवं विस्तार के लिए वे सम्मिलित शक्तियों का उपयोग करते थे. इस कारण जनसाधारण के लिए सत्तासमर्थित पुरोहितसंस्कृति, कर्मकांड एवं बलि प्रथा का विरोध न केवल अनेक प्रकार के खतरों से भरा, बल्कि असंभवजैसा था. इस शक्तिशाली गठजोड़ के बावजूद देश में भौतिकवादी दर्शन शताब्दियों तक समाज में अस्तित्व बनाए रहा तो इसलिए कि अपने श्रमकौशल के आधार पर जीवन जीने वाले श्रमजीवी तथा शिल्पकार वर्ग आर्थिक स्वावलंबन हेतु परस्पर संगठित थे. ईसापूर्व पांचवीछठी शताब्दी तक उन्होंने सामान्य हितों के लिए खुद को इतना एकजुट कर लिया था कि विशेष परिस्थिति को छोड़कर संगठन की गतिविधियों में राज्य का हस्तक्षेप भी संभव न था. आजीवक दार्शनिक उन्हीं की मेधा की उड़ान का प्रतिनिधित्व करते थे. किंतु अपने इतिहास, शिक्षा, संस्कृति तथा ज्ञान के दस्तावेजीकरण के मामले में पिछड़ा होने के कारण वे लोग मेहनती, प्रतिभाशाली एवं कलासंपन्न होने के बावजूद, लंबे समय तक अपनी उपलब्धियों को सुरक्षित रखने में असमर्थ रहे. इस कमी के कारण उनके ज्ञान और अनुभवों को न केवल बिसरा दिया गया, बल्कि मनमानी व्याख्याओं द्वारा उन्हें विकृत भी किया गया.

ब्राह्मणदर्शनों की भांति बौद्ध दर्शन भी राज्य की शक्ति और संसाधनों का उपयोग करता था, इसलिए बौद्ध लेखक ब्राह्मणवादी परंपरा के लेखकों के साथ वैसा व्यवहार नहीं करते, जैसा भौतिकवादी परंपरा के महान विचारकों के साथ करते हैं. इसे उनकी व्यावहारिक समझ कह सकते हैं और चाहें तो आंतरिक समझौता भी. उन्होंने वैदिक कर्मकांडों और पुरोहितवाद पर तो प्रहार किया, किंतु वर्णाश्रम व्यवस्था को, उस व्यवस्था पर जो ब्राह्मणों को शिखर का दर्जा देती थी, कभी चुनौती नहीं दी. तो भी भारतीय संस्कृति में बौद्ध धर्म के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. बुद्ध ने धर्मदर्शन के क्षेत्र में कर्मकांड की भूमिका को कम करते हुए उसकी जगह नैतिक मूल्यों को महत्त्व दिया. सामूहिक जीवन में विश्वास जगाया तथा बलि प्रथा का निषेध किया. संभव है ये प्रेरणाएं उन्हें नास्तिक दर्शनों से मिली हों. क्योंकि जो दर्शन जीवन में पराभौतिक शक्तियों की भूमिका को नकारते हों, मनुष्य को केंद्र में रखकर गढ़े गए हों, उनकी प्रतिष्ठा जीवन में मानवीय मूल्यों को उच्च स्थान दिए बिना संभव न थी. तो भी निश्चित प्रमाणों के अभाव में इस बारे में दावे के साथ कुछ भी कहना असंभव है.

महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुलों से आए थे. सो उनकी अन्य उपलब्धि यह भी रही कि ज्ञानसाधना का क्षेत्र जो पहले केवल ब्राह्मणों के लिए आरक्षित था, क्षत्रियों को भी स्थान मिलने लगा. पहले यदि जन्मना ब्राह्मण हों तो अच्छा, न हो तो उस परंपरा में व्यक्तिविशेष के विशिष्ट योगदान हेतु उसे किसी न किसी बहाने ब्राह्मणत्व से जोड़ दिया जाता था. मिथ गढ़ने की कला में प्रवीण वह वर्ग ऐसी हर घटना के लिए कोई नया किस्सा या मिथ गढ़ ही लेता था, जिसपर बाकी जनसमुदाय को देरसवेर विश्वास करना ही पड़ता था. इसके अनेक उदाहरण है, किंतु हम जो कहने जा रहे हैं, उसके लिए विश्वामित्र का उदाहरण अधिक प्रासंगिक है. विश्वामित्र का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था, लेकिन तत्संबंधी मिथों के अनुसार अपने स्वाध्याय के बल उन्होंने शस्त्र के साथसाथ शास्त्रों में भी प्रवीणता हासिल कर ली थी. इसलिए वे चाहते थे कि लोग उन्हें ब्राह्मण के रूप में मान्यता प्रदान करें. जबकि वशिष्ट उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित करने को तैयार नही थे. विश्वामित्र के राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनने का लंबा संघर्ष है, जिससे स्पष्ट होता है कि पर्याप्त बौद्धिक तेजस्विता के बावजूद एक क्षत्रिय के तत्वज्ञान को ब्राह्मणों के बीच अपेक्षित मान्यता प्राप्त नहीं थी. ‘जातक कथा’ के अनुसार बुद्ध के समय तक यह मान लिया गया था कि बोधिसत्व ‘वैश्य या शूद्र कुल में उत्पन्न नहीं होते. लोकमान्य क्षत्रिय या ब्राह्मण इन्हीं दो कुलों में उत्पन्न होते हैं.’ यही देखते हुए महापुरुष(गौतम बुद्ध) निर्णय लेते हैं—‘आजकल क्षत्रिय कुल ही लोकमान्य है, इसीलिए इसी में जन्म लूंगा’(बुद्धचर्या, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-1). यह एक बड़ा बदलाव था. हो सकता है, तत्कालीन ब्राह्मणों को बौद्ध लेखकों की यह स्थापना अस्वीकार्य रही हो. किंतु बुद्ध की व्यापक लोकप्रियता के चलते इस बदलाव को स्वीकारना उनकी बाध्यता थी. राजसत्ताओं से समानरूप से लाभान्वित होने के कारण बौद्ध लेखक ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों पर वैसा चारित्रिक हमला नहीं करते, जैसा वे नास्तिक परंपरा के दार्शनिकों पर करते हैं. ठीक ऐसे ही जैसे दो बड़े पूंजीपति बाजार पर पकड़ बनाए रखने के लिए उत्पाद की ऊपरी विशेषताओं को गिनाते हुए विज्ञापनजगत में घमासान मचाए रखते हैं. उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता, मूल्य निर्धारण एवं उत्पादन की प्रक्रिया, उत्पादक तथा उसके मुनाफे पर कोई चर्चा नहीं की जाती. इसके विपरीत नास्तिक दार्शनिकों का बौद्ध ग्रंथों में न केवल मनमाना उल्लेखउपयोग किया गया है, बल्कि जबतब उनका उपहास भी किया गया है. यह तब है जबकि बौद्ध दार्शनिकों ने ब्राह्मणवादी धारा के सार्थक विरोध हेतु आवश्यक बौद्धिक सामग्री, तर्क आदि कदाचित नास्तिक परंपरा से ही ग्रहण किए थे. बावजूद इसके उन्होंने नास्तिक विचारकों के ससम्मान उल्लेख में कोताही बरती थी—

संयुत्त निकाय’ दलमें कोसलाधिपति प्रसेनदि द्वारा छह नास्तिक विचारकों से संपर्क करने का उल्लेख किया गया है. उसका विवरण उपहास की भाषा में है. प्रसंग इस प्रकार है—‘छह भौतिकवादी विचारकों से प्रभावित, उनकी शिष्यमंडली के सदस्य यहां से वहां विचरण करते हुए, एक बार श्रावस्ती पहुंचे. वहां उन्होंने नगरवासियों के बीच यह प्रचार करना आरंभ कर दिया कि उनके गुरु पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि संपूर्ण, सम्यक संबुद्ध एवं सर्वज्ञ हैं.’ राजा के अनुचरों ने यह बात राजा प्रसेनदि तक पहुंचा दी. कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से पहले राजा ने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया. उसने सैनिकों को आदेश दिया—‘उन्हें दरबार में आमंत्रित किया जाए.’ सम्राट प्रसेनदि के आमंत्रण पर छह नास्तिक दार्शनिक उसके दरबार में पहुंचे. राजा ने उनका स्वागत करते हुए कहा—‘आसन ग्रहण कीजिए.’

यह सोचते हुए कि ऊंचे आसन पर बैठने से उनके भीतर भी राजमद आ सकता है, वे बहुमूल्य आसन का मोह त्याग धरती पर ही बैठ गए. यह देख राजा को अजीब लगा. वह तत्काल इस निर्णय पर पहुंचा कि जो श्रमण मेरे समक्ष आसन ग्रहण करने से ही घबरा रहे हैं, ‘उनके भीतर धर्म का तेज नहीं है.’ इसके साथ ही राजा उखड़ गया. बिना किसी सम्मानभाव के उसने रूक्ष स्वर में पूछा, ‘क्या तुम बुद्ध हो? राजा का व्यवहार देखकर वे सोच में पड़ गए. सोचने लगे—‘यदि हम कहें कि बुद्ध हैं’ तो राजा अवश्य ही हमसे हमारे ‘बुद्धत्व’ को लेकर प्रश्न करेगा. सही उत्तर न मिलने पर वह हमारी जिव्हा भी कटवा सकता है.’ इसी भय के कारण उन्होंने कहा, ‘हम बुद्ध नहीं है.’ यह सुनते ही राजा ने उन्हें दरबार से निकलवा दिया.’

दूसरा उदाहरण ‘संयुत्त निकाय’ के चैथे अध्याय से लिया जा सकता है. उसमें श्रमण वच्चागोत्त का प्रसंग आया है. वच्चागोत्त ‘निर्वाण’ को समझना चाहता है. उसे लेकर वच्चागोत्त की कुछ जिज्ञासाएं हैं, कुछ प्रश्न. वह जानना चाहता है कि क्या यह ‘संसार चिरंतन है….’ ‘मृत्यु के बाद क्या होता है?’ ‘क्या पुनर्जन्म है.’ ‘क्या तथागतों को भी पुनर्जन्म की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है?’ अपनी जिज्ञासा को लेकर वह अनेक लोगों से मिलता है. उनमें बुद्ध के शिष्य भी सम्मिलित हैं. सबसे पहले वह बुद्ध के पास जाता है. उसके बाद उनके शिष्य मोग्गलायन तथा अन्य मताब्लंबियों से. बुद्ध उसका प्रश्न सुनकर मौन पड़ जाते हैं. संयुत्त निकाय(4/44) में दिया है. उसके अनुसार वच्चागोत्त मोग्गलायन से कहता है—‘मैंने यही प्रश्न दूसरी मताब्लंबियों से किया तो वे अपने विचारों को लेकर पूरी तरह अनिश्चित थे. उनका मानना था कि ‘संसार चिरंतन हो सकता है’ और ‘संसार चिरंतन नहीं भी हो सकता.’ आगे एक शास्त्रार्थ का उल्लेख है. जिसमें बुद्ध के अलावा पूर्ण कस्सप, मक्खलिपुत्र गोशालक, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्लठिपुत्त, अजित केशकंबलि, निंगठ नागपुत्त भी सम्मिलित होते हैं. वच्चागोत्त उनसे भी वही प्रश्न करता है—‘संसार चिरंतन है. क्या तथागत मृत्यु बाद भी होते हैं? या तथागत मत्यु के बाद नहीं होते हैं? इस बारे में पूर्ण कस्सप का कहना था—‘संसार चिरंतन है. तथागत न तो हैं, न ही मृत्यु के बाद होते हैं.’ समापन से पहले मामला बुद्ध के पास जाता है. बुद्ध उसे आत्मज्ञान देते हैं. वे निर्वाण की महत्ता तथा उसकी अवधारणा को स्पष्ट करते हैं.

नास्तिक परंपरा के विचारकों का उल्लेख बुद्ध से लगभग पांच सौ वर्ष बाद के ग्रंथ ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी आता है. ‘दीघ निकाय’ में अजातशत्रु और बुद्ध के बीच संवाद दिखाया गया है. ‘मिलिंद प्रश्न’ में संवाद सम्राट मिलिंद और बौद्ध विद्वान नागसेन के बीच है तथा स्थान ‘सागल’(स्यालकोट, पाकिस्तान) हो जाता है. अजातशत्रु गौतम बुद्ध से मिलने के लिए अपनी पांच सौ पत्नियों तथा सैनिकों के साथ जीवक की आम्रवाटिका में जाता है, जहां गौतम बुद्ध 1250 भिक्षुओं की मंडली के साथ मौजूद हैं. ‘मिलिंद प्रश्न’ में सम्राट मिलिंद द्वारा 500 यवन सैनिकों के साथ नागसेन से भंेट करने का उल्लेख किया गया है, जिसके साथ अस्सी हजार भिक्षुओं का जत्था है. यह संख्या अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकती है. संभव है, लेखक का मंतव्य नगर के कुल बौद्ध अनुयायियों से हो. इससे बौद्ध धर्म के प्रसार का भी अनुमान लगाया जा सकता है. बहरहाल, अजातशत्रु के साथ गई 500 रानियों और सैनिकों, तथा मिलिंद के साथ गए 500 यवनों पर बुद्ध के दर्शन का क्या प्रभाव पड़ा, इसका कोई उल्लेख संबंधित ग्रंथ में नहीं है. कदाचित उल्लेख की आवश्यकता ही नहीं समझी गई. शायद इसलिए कि लेखक का मंतव्य भौतिकवादी दर्शनों के सापेक्ष अपने दर्शन की श्रेष्ठता को सिद्ध करना था. सोचता था कि यदि अजातशत्रु बौद्ध दर्शन के प्रभाव में आ जाता है तो प्रजा स्वतः उसकी ओर चली आएगी—‘यतो राजा, ततो प्रजा.’ उपर्युक्त उद्धरणों में से एक में श्रमण परंपरा से निकले नास्तिक विचारक हैं, जो राजदरबार में राजमद के भय से उच्च आसन पर बैठने के बजाय सीधे जमीन को आसन बना लेते हैं. दूसरी और बौद्ध विचारक हैं, जो सम्राटों और श्रेष्ठि जन द्वारा विशेष रूप से बनाए गए विहारों में ठहरते रहते थे और उस अवसर का प्रयोग अपने धर्म को संगठित करने में करते थे. उल्लेखनीय है कि ब्राह्मण धर्म स्वतः सत्ता केंद्रित रहा तथा राज्याश्रय में फलाफूला है. ‘संयुत्त निकाय’ के अनुसार महाराज प्रसेनदि या ‘मिलिंद प्रश्न’ के अनुसार सम्राट मिलिंद का भिक्षु नागसेन से मिलना तथा दोनों अवसरों पर, यानी बुद्ध और नागसेन के पास भिक्षुओं की अपेक्षाकृत बड़ी संख्या दिखाया जाना, दर्शाता है कि बौद्ध लेखकों के लिए संख्याबल भी महत्त्वपूर्ण था; और इसके द्वारा वे राजसत्ता के समानांतर धर्मसत्ता की पैठ को दर्शाते थे.

दीघ निकाय’, ‘संयुत्त निकाय’ तथा ‘मिलिंद प्रश्न’ में एक ही घटना को तीन अलगअलग रूपों में देखकर उनकी प्रामाणिकता पर संदेह हो सकता है. जबकि तीनों घटनाओं की विषयवस्तु एक है. उनमें केवल पात्र और स्थान रहते हैं. इससे यह संभावना भी बलवती होती है कि अजातशत्रु तथा प्रसेनदि की बुद्ध से तथा ‘मिलिंद प्रश्न’ के अनुसार सम्राट मिलिंद की नागसेन से भेंट बौद्ध लेखकों की कल्पना की उपज थी. चूंकि प्रत्येक विवरण में नास्तिक विचारकों के नाम अपरिवर्तित रहते हैं, और वही नाम जैन साहित्य में भी उसी रूप में मौजूद हैं. इससे उनकी ऐतिहासिकता संदेह से परे है. वह दर्शाती है कि बौद्ध लेखकों द्वारा इन प्रसंगों की कल्पना भौतिकवादी विचारधारा के बरक्स अपने दर्शन की श्रेष्ठता दर्शाने के लिए की गई थी. ध्यान देनेवाली बात है कि ‘दीघ निकाय’ एवं ‘संयुत्त निकाय’ दोनों ही ग्रंथों में संबंधित प्रसंग की शुरूआत ‘ऐसा मैंने सुना….’ से की गई है. यानी लेखकगण संबंधित घटना के न तो स्वयं साक्षी हैं, न ही उसका उल्लेख बुद्ध के हवाले से कर रहे हैं. इसे हम उनके लेखकों की लेखकीय ईमानदारी भी कह सकते हैं कि वे उन प्रसंगों को प्रामाणिक घटनाओं के रूप में प्रस्तुत करने के बजाए ‘कथन’ या ‘उपकथन’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. श्रुति आधारित घटनाओं में पात्रों का बदल जाना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता. ‘मिलिंद प्रश्न’ में उसी प्रसंग को पांच शताब्दियों के बाद तत्कालीन सम्राट के नाम के साथ पेश करने एक संभावना यह भी हो सकती है कि आजीवक विचारधारा बुद्ध के पांच सौ साल बाद भी, न केवल लोकप्रचलित थी बल्कि उस समय की अन्य दर्शनपरंपराओं को चुनौती देने की स्थिति में थी. कदाचित यही स्थिति आगे भी बनी रही. यही नहीं दसवीं शताब्दी के तमिल काव्य ‘नीलकेशी’ में भी पूर्ण कस्सप, मक्खलिपुत्र गोशालक का नामोल्लेख है. उसमें नीलकेशी को अर्धदेवी या मायावी के रूप में दर्शाया गया है, जो कालांतर में जैन धर्म स्वीकार लेती है. ज्ञान और आत्मशांति की खोज में नास्तिक विचारकों से भी मिलती है.

अजातशत्रु एवं प्रसेनदि और सम्राट मिलिंद द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार लेने का उल्लेख संबंधित ग्रंथों में है. एक ही प्रसंग को अलगअलग ग्रंथों में अलगअलग नाम के साथ प्रस्तुत करने से पता चलता है कि अपने समय के किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को बीच में लाकर अपने मंतव्य के अनुरूप नए प्रसंग गढ़ लेना बौद्ध विद्वानों की शैली रही है. वैसे भी श्रमण जीवन की श्रेष्ठता का ‘मिथ’ तभी स्थापित हो सकता था, जब समाज का प्रभुसत्तासंपन्न वर्ग, जिसके पास आमोदप्रमोद, वैभवविलास के संसाधनों का प्राचुर्य हो, सांसारिक सुखों को निस्सार मानते हुए—उनके आगे नतमस्तक हो. उस समय की परंपरा के अनुसार अपने दार्शनिक विचारों को आमजन तक पहुंचाने के लिए तत्कालीन बौद्ध विद्वान भी किस्सेकहानियों का सहारा ले रहे थे. आवश्यकता के अनुसार वे नए किस्सेकहानियां गढ़ भी रहे थे. नास्तिक विचारक कदाचित तर्क को ज्यादा महत्त्व देते थे, इसलिए वे अपने विचारों को दीर्घकालिक संस्कृति में ढालने में असमर्थ रहे. बावजूद इसके उनका असर लंबे समय तक समाज पर बना रहा. ‘श्रामण्य जीवनशैली’ पर जोर देने के बावजूद बौद्ध और जैन श्रमणों को अपने समय के सम्राटों के दरबार में जाने, तत्कालीन श्रेष्ठि वर्ग का आतिथ्य स्वीकार करने में हिचक नहीं थी. इसे उनका वर्गीय संस्कार भी कह सकते हैं. दोनों ही राजकुलों में जन्मे थे. ऐसे परिवेश में पलेबढ़े थे, जिसमें बड़े साम्राज्य का सपना आरंभ से ही मानस में रोप दिया जाता है. ‘धम्मविजय’ का सपना तथा अपने साथ सैकड़ों, हजारों भिक्षुओं को लेकर निकलना, उन्हीं महत्त्वाकांक्षाओं की सात्विक परिणति था. श्रमण जीवन की महत्ता समझाने के लिए वे जहां अपने समय के प्रमुख सम्राटों को बीच में ले आते हंै, वहीं अहिंसा के दर्शन को ऊंचा दिखाने के लिए अंगुलिमाल की सहायता ली जाती है. विचारों के प्रचारप्रसार के लिए कहानियों तथा अन्य लोककलाओं का उपयोग न तो अस्वाभाविक था, न ही नया. पुरोहितवर्ग स्वयं कहानियां गढ़ने में माहिर था. इसका उन्हें लाभ भी मिला. जबकि केवल तर्क के आधार पर अपने दर्शन को दुनिया के सामने लाने वाले और तत्कालीन सत्ताशिखरों से किसी भी प्रकार कर समझौता न करने वाले लोकायत और आजीवक धर्मानुयायी बड़ी आसानी से भुलाए जाते रहे. जबकि किस्सेकहानियां गढ़ने में माहिर बौद्ध, जैन और ब्राह्मण धर्मानुयायियों ने कालांतर में उन्हें बदनाम करने के लिए भी किस्सेकहानियों का सहारा लेना आरंभ कर दिया. जो वास्तव में मानवमात्र की मुक्ति चाहते थे, मानवीय विवेक को महत्त्व देते थे, बौद्ध, जैन और ब्राह्मण लेखको के जरिये वे मनुष्यता के दुश्मन, राक्षस, दैत्य आदि कहे जाने लगे.

दीघ निकाय’ में यह पूरी तरह तय नहीं हो पाता कि अजातशत्रु ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था या नहीं? जैन और बौद्ध दोनों धर्म उसपर अपना अनुयायी होने की दावेदारी करते हैं. बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के एक वर्ष बाद आयोजित होने वाली पहली बौद्ध परिषद का आयोजन भी अजातशत्रु की पहल पर किया गया था. इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अजातशत्रु ने बौद्ध धर्म अपना लिया था. मगर अजातशत्रु के जीवन से जुड़ी घटनाएं बताती हैं कि उसने बौद्ध धर्म को उसने अपनाया भी होगा तो केवल नाममात्र के लिए. यहां इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना पर विचार करना आवश्यक है. उससे ‘धर्मसत्ता’ एवं ‘राजसत्ता’ के गठबंधन तथा एकदूसरे के हितों के लिए काम करने की नीयत को समझा जा सकता है. भारतीय इतिहास में वैशाली की चर्चा उसकी अकूत समृद्धि, वैभव के साथसाथ गणतंत्र के लिए भी होती है. जब हम गणतंत्र के इतिहास की खोज करते हैं तो नजर सीधे बौद्ध कालीन भारत में वैशाली पर जाती है. जहां नागरिक तंत्र पर्याप्त रूप में मौजूद था. लोग अपने निर्णय मिलजुलकर लेते थे. अपना शासक स्वयं सुनते थे. हालांकि आधुनिक लोकतंत्र के सापेक्ष उनका गणतंत्र बहुत पिछड़ा हुआ था. उनमें निर्णय प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अधिकार समाज के सीमित लोगों को प्राप्त था. स्त्री और गरीब मताधिकार से वंचित थे. एक तरह से वह कुलीनतंत्र ही था, बावजूद इसके समकालीन निरंकुश राज्यों की तुलना में वैशाली को बेहतर राज्य माना जा सकता है.

अपनी अकूत संपत्ति और वैभव के कारण वैशाली अजातशत्रु की आंख की किरकिरी बनी थी. उसकी निगाह वैशाली की पर टिकी थीं. महावीर स्वामी का जन्म वैशाली में ही हुआ था, इसलिए वहां की प्रजा(उसे नागरिक या जनता कहने में मुझे संकोच है) पर जैनमत का प्रभाव था. इस कारण वैशाली गणतंत्र अजातशत्रु के साथसाथ बुद्ध के लिए भी चुनौती बना हुआ था. बुद्ध उसे अपनी ‘धम्म’ के प्रभावक्षेत्र में लाना चाहते थे. इस कोशिश में बुद्ध वैशाली में कई सभाएं कर चुके थे. लेकिन वैशाली के प्रजाजन उनके प्रभाव से बाहर थे. बुद्ध के लिए ‘मगध’ एवं ‘कोसल’ जैसे राज्यों में जहां राजा निरंकुश होता था, ‘धम्म’ का प्रचारप्रसार करना आसान था. वहां सम्राट को अपने प्रभाव में लाकर उसकी प्रजा के सोच को प्रभावित किया जा सकता था. राज्य का मुख्य अधिपति समर्थन में हो तो उसके संसाधनों के उपयोग का रास्ता भी साफ हो जाता है. जैसे मगध में हुआ. मगर वैशाली के मामले में ऐसा न था. उसमें प्रत्येक नागरिक अपने आपको राजा समझता था. और अपनी वैचारिक चेतना को लेकर स्वतंत्र था. बौद्ध ग्रंथों के अनुसार उस समय वैशाली में 7707 प्रासाद, 7707 कुटागार, 7707 उद्यान, 7707 पुष्करणियां तथा इतने ही राजा थे. यानी जितने प्रासाद थे, उतने ही राजा थे. मान सकते हैं कि जो अपेक्षाकृत बड़े भवनों में रहते थे, जिनका एक सीमा से ऊपर आर्थिक हैसियत थी, केवल उन्हीं को ‘राजा’ बनने का अधिकार था. दूसरे राजा की पदवी के लिए जन्मना क्षत्रिय होना आवश्यक था. इससे यह भी संकेत मिलता है कि 7707 प्रासादों में रहनेवाले 7707 क्षत्रिय परिवार के मुखियाओं को ही ‘राजा’ होने का गौरव प्राप्त था. उनकी नियमित सभा होती थी. जिसमें प्रत्येक ‘राजा’ को अपना मत प्रस्तुत करने का अधिकार था. जहां बौद्धिक स्वातंत्रय हो, वहां किसी एक व्यक्ति, कथित रूप से वह कितना ही पहुंचा हुआ क्यों न हो, को प्रभावित करने से काम बनने वाला नहीं था. जो भी हो बुद्ध द्वारा वैशाली में बौद्ध धर्म के प्रसार के कई प्रयास विफल सिद्ध हुए थे. दूसरी ओर अजातशत्रु भी वैशाली को अपराजेय मानता था. बुद्ध उन दिनों राजग्रह में गृधकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे. वैशाली पर ‘धम्म’ की पकड़ न बन पाने के कारण वे खिन्न थे. उधर मगध सम्राट अजातशत्रु भी वैशाली को अपने अधीन करने के लिए ललचा रहा था.

वैशाली उन दिनों वज्जि संघों की महानगरी थी. वज्जि संघ तथा अजातशत्रु दोनों के राज्य की सीमाएं गंगा से मिलती थीं. उन दिनों नदियां दूरदराज के व्यापार का प्रमुख माध्यम थीं. मगध एवं वैशाली के वैभव से आकर्षित हो दूरदूर से व्यापारिक काफिले वहां आया करते थे. नदीतट से जुड़े आधा योजन(लगभग 7.5 किलोमीटर लगभग) तक मगध का अधिकार था और इतने ही क्षेत्र पर वैशाली का. दूरदराज से आए व्यापारियों से माल खरीदने के लिए वैशाली तथा मगध मंे होड़ लगी रहती थी. लेकिन बाजी वज्जि संघ के हाथ लगती थी. इस बात से आहत एक दिन उसने वज्जि संघ को तबाह करने का प्रण किया. लेकिन वह जानता था कि वज्जियों को तबाह कर पाना आसान नहीं है. वज्जि संघ को अपने अधिकार में किस तरह लिया जाए, इस बारे में चर्चा के लिए अजातशत्रु ने अपने महामात्य ‘वस्सकार’ को बुद्ध के पास भेजा. बुद्ध उन दिनों राजग्रह में गिद्धकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे. वे जीवन की अंतिम बेला में थे. वैशाली को अपने प्रभावक्षेत्र में न ला पाने का उन्हें किंचित अफसोस भी था. वस्सकार ने सम्राट का यथायोग्य अभिवादन कर सम्राट अजातशत्रु का सारा संदेश कह सुनाया. तब बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से चर्चा के माध्यम से अजातशत्रु को संकेत दिया कि जब तक वैशाली के नागरिक मिलजुलकर फैसले करते हैं, स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ों का सम्मान करते हैं, अपने विवादों का निपटारा शांतिपूर्वक कर लेते हैं उस समय तक वे अजेय बने रहेंगे. यह एक संकेत था. जिसे सुनकर चतुर ‘वस्सकार’ की आंखों में चमक आ गई. वापस लौटने के बाद वह अजातशत्रु से मिला. उसके बाद दोनों ने एक गुप्त योजना पर काम करने लगे. योजना के अनुसार सम्राट के निर्णय में अनुचित हस्तक्षेप का आरोप लगाकर वस्सकार को राज्य से निकाल दिया गया. नाराज वस्सकार सीधे वैशाली पहुंचा. अजातशत्रु से अपने मतभेदों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करके उसने वैशाली के नगरवासियों की सहानुभूति अर्जित कर ली. उसके बाद कूटनीतिक चालें चलते हुए उसने वैशाली के नागरिकों में फूट पैदा कर दी. गणराज्य का तानाबाना छिन्नभिन्न होने लगा. वैशाली को कमजोर होते देख अजातशत्रु ने एकाएक उसपर हमला कर दिया. वैशाली में रहते हुए वह वहां के नागरिकों में फूट पैदा कर देता है. उसके बाद अजातशत्रु हमला करता है तो विजय उसी के हाथ लगती है. अजातशत्रु न केवल वैशाली के गणतंत्र को छिन्नभिन्न कर देता है, बल्कि उस समय के 36 अन्य गणतांत्रिक राज्यों को तबाह कर वहां अपना शासन स्थापित कर लेता है. बुद्ध इसके लिए उसका विरोध नहीं करते.

चूंकि बुद्ध के विचारों का संग्रहण उनके निर्वाण प्राप्ति के बाद किया गया था, इसलिए उनके शिष्यों के पास इस तरह के प्रयोगों की भरपूर स्वतंत्रता थी. अपने मत के प्रचारप्रसार के लिए उन्होंने जो भी, जैसा भी आवश्यक समझा, उसका भरपूर उपयोग किया. यहां तक कि ईश्वर और अवतारवाद से भी गुरेज नहीं किया. नागसेन को बुद्ध का अवतार सिद्ध करने के लिए स्वयं बुद्ध के मुंह से कहलवाया गया कि 500 वर्ष बाद वे नागसेन के रूप में जन्म लेंगे. ‘मिलिंद प्रश्न’ जो स्पष्टतः बुद्ध से 500 वर्ष बाद की रचना है—जिससे बौद्ध धर्म की ब्राह्मण धर्म के बीच घटती दूरी का पता चलता है. उस समय तक बुद्ध को ‘भगवान’ मान लिया गया था. अवतारवाद, जादूटोना जैसे विकार, जिनका बुद्ध ने अपने उपदेशों में विरोध किया था, समय के साथ बौद्ध दर्शन में भी आने लगे थे. यह कदाचित जनसाधारण के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखने की लालसा का भी परिणाम था. दरअसल ईसा से पहलीदूसरी शताब्दी के आसपास बौद्ध धर्म दो प्रकार की समानांतर चुनौतियों के बीच से गुजर रहा था. पहली चुनौती उसे ब्राह्मण धर्म की ओर से मिल रही थी. पुरोहितवादी शक्तियां जो बौद्ध धर्म के प्रभाव में कुछ शताब्दियों के लिए आभाहीन हो गई थीं, वे स्वयं को नए सिरे से संगठित करने लगी थीं. तीसरी संभवत आजीवक विचारधारा थी, जो उस समय तक हालांकि क्षीण पड़ चुकी थी, किंतु निरंतर आभाहीन होते बौद्ध विद्वानों को उसका भय सताता रहता था. यह भी हो सकता है कि आजीवकों और ब्राह्मण धर्माबलंबियों की ओर से बढ़ती चुनौती के बीच अपनी श्रेष्ठता के प्रदर्शन के लिए बौद्ध विद्वान नास्तिक विचारकों पर अपनी जीत को बदले समय और चुनौतियों के बीच पात्र बदलबदलकर दोहराते रहते हों. उल्लेखनीय है कि भौतिकवादी विचारकों के प्रभाव से केवल बौद्ध दार्शनिक चिंतित नहीं थे, जैन दर्शन के लिए भी वह चुनौती बना था.

यह ऐतिहासिक सचाई है कि ब्राह्मण धर्म की ओर से निरंतर मिलती चुनौतियों तथा बौद्ध दर्शन के विस्तार के बीच में भौतिकवादी दर्शन धीरेधीरे सिमटने लगे थे. उसके विचारक सामाजिकसांस्कृतिक मूल्यों की तर्क और ज्ञान पर समीक्षा करते थे और कमजोर होने पर जमकर उनकी खिल्ली उड़ाते थे. जबकि आस्था और विश्वास पर आधारित धर्म होने के कारण ब्राह्मण धर्म तर्क से दूर था. बौद्ध धर्म ने भौतिकवादी दर्शनों से उनकी तर्कपद्धति सीखी थी. चूंकि जनसाधारण के आगे जीवन की चुनौतियां बढ़ती जा रही थीं. समाज के गठन का उद्देश्य कि सभी को समान अधिकार मिलेगा, शासक सभी के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करेगा—धूमिल पड़ने लगा था. जिस ‘राजा’ नामक संस्था को संसाधनों की सुरक्षा और न्यायपूर्ण विभाजन के अधिकार के साथ गठित किया गया था, वह सभी संसाधनों और निर्णय प्रक्रिया पर एकाधिकार कर स्वयं को सर्वेसर्वा घोषित कर चुकी थी. ऐसे में लोगों का विश्वास तथाकथित ईश्वरीय न्याय के प्रति बढ़ना स्वाभाविक ही था. उसके लिए तर्क में उलझने के बजाय आस्था और विश्वास के सहारे जीवन बिताना कहीं आसान था. वैसे भी सत्ता के संसाधनों के साथ ज्ञान का भी केंद्रीकरण हुआ था. यह मान लिया गया था कि जो शिखर पद पर या उसका कृपापात्र होकर उसके आसपास भी है, वह शिखर से दूर लोगों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान एवं योग्य है. इस धारणा के चलते समाज अपनी ही प्रखर मेधाओं के लाभ से वंचित रहने लगा था. राजाओं को, वे चाहे जितने शक्तिशाली हों, शांति एवं जनसमर्थन की आवश्यकता पड़ती थी. जिनमें पुरोहितवर्ग भी सम्मिलित था. इसलिए वह लोगों के विश्वास(चाहे वह अंधविश्वास) ही क्यों न हो, बाधक बनने के बजाए उसमें सहायक की भूमिका निभाता था. यही कारण है कि प्राचीन भारतीय इतिहास में सम्राटों द्वारा स्कूल एवं पाठशालाएं खुलवाने के उदाहरण नगण्य हैं. जबकि अपने नाम और यश के अनुरूप छोटे से छोटा राजा भी मंदिर और धर्मशालाएं बनवाने का कार्य प्राथमिकता के आधार पर कराता था. अध्ययनअध्यापन का कार्य ब्राह्मणों के सुपुर्द था. राज्य उनकी पाठशालाओं और आश्रमों को दानादि देकर प्रसन्न रखता था. अतः उन पाठशालाओं में वही पढ़ाया जाता था जिनसे सम्राट और शिक्षक ब्राह्मण का हित सधता हो. इसका दुष्परिणाम सत्ता का केंद्रीकरण तथा समाज में भारी असमानताओं के रूप में सामने आया. उपेक्षित वर्गों में असंतोष न पनपे, उसके लिए धर्म की शरण ली. जाति और धर्म के चंगुल में फंसा समाज समाजार्थिक असमानताओं को अपनी नियति मानकर जीने लगा. कुल मिलाकर धर्मदर्शन का पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास, समाज के अनेकानेक टुकड़ों में बंटने और निरंतर प्रतिक्रियावादी होते जाने का सिलसिला भी है. इस बीच समयसमय पर बदलाव की कोशिशें भी हुईं. कई महामानव उभरे. लेकिन किसी न किसी रूप में उन सभी के प्रयास धर्मकेंद्रित रहे. धर्म के सामंती संस्कारों के दबाव में समानताआधारित स्वावलंबी समाज का गठन, कुछ भले लोगों के स्वप्न से आगे न बढ़ सका.

© ओमप्रकाश कश्यप