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साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्यᅳदो

सामान्य

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और संस्कृति

 

न्याय एक वर्ग संख्या हैपाइथागोरस

मार्क्स ने मुख्यतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों का विश्लेषण किया है. उसमें एक सिरे पर अनियोजित मशीनीकरण का शिकार श्रमिक वर्ग है, दूसरे पर पूंजीपति उत्पादक. उन दिनों चीन, रूस, ब्राजील आदि देशों की अर्थव्यवस्था की भांति भारतीय अर्थव्यवस्था भी कृषिकेंद्रित थी. इन सभी देशों ने वर्गसंघर्ष के सिद्धांत का प्रयोग स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया. जहां आवश्यक लगा, वहां संशोधन भी किया. भारत में ऐसा नहीं हो सका. जबकि मार्क्स तथा उसके वर्गसंघर्ष की सूचना यहां बहुत पहले पहुंच चुकी थी. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में युवा क्रांतिकारी आजाद भारत के लिए वर्गसंघर्ष की अनिवार्यता को समझते थे. सोवियत संघ की ओर से उन्हें भरपूर मदद भी मिल रही थी. स्वामी विवेकानंद, डॉ. हरदयाल, रासबिहारी बोस, करतार सिंह सराबा, सोहन सिंह भखना आदि पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था. भगत सिंह तो लेनिन को अपना आदर्श मानते ही थे. आधुनिक भारत के निर्माताओं में प्रमुखतम स्थान रखने वाले डॉ. आंबेडकर की आरंभिक चेतना भी समाजवादी थी. दक्षिण में रामास्वामी पेरियार ने अपनी राजनीति साम्यवादी संगठनों के सक्रिय सदस्य के रूप में आरंभ की थी. उन दिनों सैकड़ों उत्साही युवा वर्गक्रांति का सपना देखते थे. उनमें से कुछ ने साम्यवाद को समझने के लिए सोवियतसंघ की यात्रा तक थी. उसकी तरफ से साम्यवादीक्रांति की कोशिश में जुटे युवाओं को आर्थिक मदद भी प्राप्त होती थी. देश में साम्यवाद के नाम पर राजनीतिक दल भी बने, लेकिन वे सभी प्रयास केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने तक सीमित थे. परिणामस्वरूप हमारे यहां वर्गसंघर्ष की वैसी स्थिति कभी नहीं बन सकीं, जिस तरह बाकी देशों में, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. जिन प्रांतों में वर्षों तक साम्यवादी दलों की सरकारें रहीं, वहां भी न तो धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग किया गया, न जाति को किसी प्रकार की चुनौती पेश की गई. न ही वर्गहीन समाज की स्थापना के विशेष प्रयास किए गए. परिणामतः जातिधर्म के चक्रब्यूह में बुरी तरह फंसा भारतीय ‘सर्वहारा’, वर्गचेतना से दूर बना रहा. वह वर्चस्वकारी संस्कृति से इतना अनुकूलित रहा कि उससे बाहर निकलने के विचारमात्र से उसे अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगता था.

जातिव्यवस्था के शिखर पर ब्राह्मण और उसके आजूबाजू क्षत्रिय और वैश्य रहे हैं. चौथे यानी अंतिम पायदान पर शूद्र. उनकी स्थिति उन मजदूरों से भी कहीं अधिक दयनीय थी, जिन्हें मार्क्स ने अपने विशद ग्रंथ पूंजी में ‘सर्वहारा’ से संबोधित किया था. ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने श्रमिकोंमजदूरों और मेहनतकश जिंदगी जीने वाले छोटेकिसानों, शिल्पकर्मियों को छोटेछोटे जातिसमूहों में बांट दिया है. शूद्र को उसकी सेवा का वास्तविक मूल्य देने के बजाय, स्वर्गादि के प्रलोभन से बहला दिया जाता है. इसलिए संख्या में प्रथम तीन वर्गों से चार गुना होने के बावजूद वे कोई परिवर्तनकारी शक्ति नहीं बन पाते. उनके हित पहले भी एकदूसरे से टकराते थे, आज भी टकराते हैं. परिणामस्वरूप उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आंतरिक संघर्ष में खपता रहता है. इसका एकमात्र समाधान था कि शूद्रों में वर्गीय चेतना का विस्तार किया जाए. मगर गांधी सहित लगभग सभी कांग्रेसी नेता शूद्रों में वर्गीय चेतना उभारने के बजाय उन्हें हालात से संतोष करने की सलाह देते थे. सामाजिक मोर्चे पर गांधी का समूचा आंदोलन यथास्थिति बनाए रखने तक सीमित था. व्यवस्था परिवर्तन की यदि कोई मांग भी करे तो वे तत्क्षण विरोध पर उतर आते थे. गांधी के अनुसार पाखाना साफ करने का काम दैवीय अनुभव था. ठीक यही बात हमारे आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’(2007) में दोहरा चुके हैं. कुल मिलाकर मार्क्स ने जिन परिस्थितियों को वर्गसंघर्ष के लिए जरूरी माना है, उसकी जो कसौटियां तय कीं हैं, भारत में उससे कहीं त्रासद हालात होने के बावजूद यहां क्रांति की बात करना, दिवास्वप्न बना रहा. निम्नस्थ वर्गों में वर्गीय चेतना की कमी, शीर्षस्थ वर्गों के उत्पीड़न और अत्याचारों को स्थायी बनाती है. उसके अभाव में बहुसंख्यक वर्ग छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर अपनी प्रभावी क्षमता को नष्ट करता रहता है.

ऊपर से सत्तासीन अभिजन द्वारा यथास्थिति बनाए रखने की कूटनीतिक चालें. जो कभी दान, कभी सहयोग, तो कभी न्याय के नाम पर अपनी आय का एक हिस्सा उन कार्यों पर खर्च करता है, जिनके माध्यम से बहुजन को निरंतर भुलावे में रख सके. उन्हें लगे कि वर्तमान व्यवस्था ही उनके लिए सर्वाधिक हितकारी और श्रेयस्कर है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए शक्तिशाली अभिजन अनेक रणनीतियां अपनाता है. भारतीय संस्कृति के संदर्भ में उसका भावप्रवण नारा हैᅳ‘अनेकता में एकता.’ जनाक्रोश से बचने के लिए अल्पसंख्यक अभिजन प्रायः इस तर्क के माध्यम से भारतीय संस्कृति का महिमामंडन करता है कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद भारतीय संस्कृति में एकता के तत्व समाहित हैं. स्कूलों में बच्चों को यह पाठ शुरुआत से ही पढ़ाया जाता है. इस नारे के साथ भारतीय समाज के अंतर्विरोधों तथा उस उत्पीड़न की ओर से आंखें मूंद ली जाती हैं, जिसका सामना बहुजन समूह शताब्दियों से करते आए हैं. प्रकारांतर में ‘अनेकता में एकता’ का मिथ सांस्कृतिक शोषण का शिकार रहे लोगों के लिए बोझ बन जाता है. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीक आस्था और विश्वास के रास्ते जीवन में जगह बनाते हैं, उन्हें तर्क और संशय से प्रायः परे रखा जाता हैइस कारण उनसे निपटना आसान नहीं होता. दूसरी ओर अल्पसंख्यक अभिजन यथास्थिति बनाए रखने के लिए हर समय यथाशक्ति प्रयत्नशील रहते हैं. संस्कृति के शोषणकारी तत्वों का वे मिथों के माध्यम से निरंतर महिमामंडन करते रहते हैं. आवश्यकता पड़ने पर नए मिथ गढ़ना अथवा लोकप्रचलित मिथों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करना उनकी पुरानी आदत है. वौद्धिक स्तर पर शीर्षस्थ जातियों पर पूरी तरह निर्भर बहुजन समुदाय, इन चालाकियां को समय रहते समझ नहीं पाता; और अपनी अज्ञानता के कारण ‘अनेकता में एकता’ की भ्रांति को सच माने रहता है.

वर्गचेतना, वर्गसंघर्ष की प्रथम और अनिवार्य शर्त है. जातिभेद का शिकार रहे, दैवीयअनुकंपा की आस में जीने वाले तथा शोषण को अपनी नियति मान चुके भारतीय समाज में शुरू से ही इसका अभाव रहा है. सांस्कृतिक एकता की दुहाई भजनकीर्तन, पूजापाठ जैसे अनुत्पादक तरीकों, त्योहारों तथा उन सामान्य रीतिरिवाजों के माध्यम से दी जाती है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच एकदूसरे के साथ रहते, साथसाथ काम करते हुए स्वाभाविक रूप से एकदूसरे समूह के बीच चले आते हैं. इसके बहाने अल्पसंख्यक अभिजन आसानी से उन प्रतीकों को थोपने में सफल हो जाता है, जो वर्गीय असमानता तथा अल्पसंख्यक शीर्षस्थ अभिजन की सामाजिकसांस्कृतिक श्रेष्ठता के मिथ को, बहुजन के मानस पर स्थापित करते हैं. गांवों में दिवाली से चार दिन पहले कुम्हार घरघर दिये पहुंचाता है. यत्न से दीपक बनाने, घरघर पहुंचाने के बावजूद कीमत वही मिलती है, जो यजमान तय करता है. अपने ही श्रमोत्पाद का मूल्यांकन करने का अधिकार कुम्हार को नहीं होता. होली को समसरता का त्योहार माना जाता है. कहा जाता है कि सारे वर्गभेद होली के रंगों में बह जाते हैं. असल में ऐसा नहीं है. उस दिन भी पुजारी पूजापाठ करता है, बढ़ई लकड़ियां चीरता है और कुम्हार हमेशा की तरह घरघर मिट्टी के बर्तन सप्लाई करता है. यही स्थिति बाकी त्योहारों की भी है. इन विसंगतियों को प्रायः सहजीवन और समरसता, जिन्हें समाज में समानता के पूरक के रूप में पेश किया जाताके नाम पर पचा लिया जाता है. जाहिर है भारतीय संस्कृति को लेकर ‘अनेकता में एकता’ का मिथ भ्रम अथवा भावुक अवधारणा से इतर कुछ भी नहीं है. जाति और वर्ण के आधार पर असमानता को नैसर्गिक मान लेने वाली भारतीय संस्कृति, मूलतः वर्चस्वकारी संस्कृति है. उसे मुट्ठीभर लोगों की मर्जी से, उन्हीं के द्वारा, उन्हीं की स्वार्थसिद्धि के लिए कायम रखा गया है. सांस्कृतिक अंतर्विरोधों एवं तज्जनित असंतोषों को नकारने की बात, मूलतः सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत है. यह काम वही लोग करते हैं, जिन्हें इस संस्कृति ने असीमित विशेषाधिकार देकर अपने सिर पर सवार रखा है. बहुजन समूहों की अज्ञानता, आपसी स्पर्धा और दूसरों के लिए श्रम करने की प्रवृत्ति ने उन्हें शक्तिशाली बनाया हुआ है.

अनेकता में एकता’ की दावेदार भारतीय संस्कृति में अंतर्विरोधों की भरमार है. इसलिए उसमें अंतर्संघर्ष भी हैं. वैदिक काल में उसे आजीवकों, लोकायतियों, वैनायिकों, चार्वाकों जैसे भौतिकवादी चिंतकों की ओर से चुनौती मिलती थी. कालांतर में श्रमणसाधकों ने आश्रमों में पनपने वाली कर्मकांड संस्कृति को चुनौती पेश की और मध्यमार्गी तत्वदर्शन के भरोसे ऐसी कामयाबी हासिल की कि कर्मकांड केंद्रित वैदिक धर्मदर्शनों को, आने वाली कई शताब्दियों तक पुनः आश्रमों और कंदराओं में शरण लेने को विवश होना पड़ा. बौद्ध दर्शन के पराभव की शुरुआत हुई तो पुरोहित स्तर के धर्माचार्यों ने स्मृति, पुराण जैसे ग्रंथों के माध्यम से धार्मिक कर्मकांडों, पाखंडों को नए सिरे से थोपना आरंभ कर दिया. उस दौर में भी उसका सामना श्रमणों और भौतिकवादी दार्शनिकों द्वारा किया गया. उसके कुछ अर्से बाद यहां इस्लाम का आगमन हुआ. तैंतीस करोड़ देवीदेवताओं के बोझ से दबे हिंदू धर्म को इस्लाम के एकेश्वरवाद की ओर से चुनौती मिली. उसमें जीत एकेश्वरवाद की हुई. जातीय भेदभाव झेल रही जातियों में इस्लाम के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा. धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए शंकराचार्य को वेदांत में अद्वैतवाद के समर्थन में आना पड़ा. मध्यकाल में धर्म के नाम पर तंत्रमंत्र, ऊंचनीच और पाखंड बढ़े तो संतकवि आड़े आ गए. तुकाराम, रैदास, कबीर, दादू आदि ने धार्मिक पाखंडियों को खूब ललकारा. औपनिवेशिक भारत में हालात बदले. अठारवींउनीसवीं शताब्दी के वैचारिक आंदोलनों से अनुप्रेत अंग्रेज अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति अनुगामी थे. उनके समक्ष ब्राह्मण संस्कृति की अतीतोन्मुखी महानता कारगर न थी. दूसरे उन्हें योरोप के जनांदोलनों का अनुभव था. इसलिए विपुल जनशक्ति की अवहेलना उनके लिए संभव न थी. इसलिए उन्होंने यहां विधि के शासन को लागू किया.

ये उदाहरण जहां भारतीय संस्कृति के असमानताकारी रूप को सामने लाते हैं, वहीं दिखाते हैं कि भारतीय समाज में द्वंद्वात्मकता के लक्षण आरंभ से ही रहे हैं. वे काफी विस्तृत हैं. इस वर्गभेद को आर्यअनार्य, सवर्णअवर्ण, ब्राह्मणअब्राह्मण, तथाकथित ऊंची जाति वाले, नीची जाति वाले जैसा कुछ भी कहा जा सकता है. भारतीय समाज के आंतरिक विभाजन को दर्शाने वाला एक महत्त्वपूर्ण आधार और भी है. ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य अनुत्पादक वर्ग हैं. तीनों ही दूसरों के श्रम पर आश्रित रहते हैं. इसके बावजूद उन्हें ‘सवर्ण’ होने का गुमान रहता है. वर्णश्रेष्ठता का यह दंभ, श्रम और समानता दोनों का सिद्धांततः विरोधी है. जो संस्कृति इस दंभ को शरण देती है, वह शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से हेय मानती है. परिणामस्वरूप यहां जो हुनरमंद है, जो परिश्रम करता है, अपने शिल्पकौशल के भरोसे समाज को संवारता हैउसके हिस्से आजीवन तिरष्कार और उपेक्षा ही आती है. आर्थिक दृष्टिकोण से भारतीय संस्कृति मूलतः अनुत्पादक संस्कृति सिद्ध होती है, जो उत्पादनकर्म में लगे श्रमिकों तथा कामगारों को, बौद्धिक कर्म का दिखावा करने वाले वर्गों से हेय माने रहती है.

इस तरह भारतीय समाज अनायास ही दो हिस्सों, उत्पादक और अनुत्पादक समूहों में बंट जाता है. संख्या में उत्पादक समूह अपने प्रतिद्विंद्वी से लगभग चार गुना होता है. मगर समाज और संस्कृति की संरचना ऐसी है कि इस अधिसंख्यक वर्ग के हाथों में न्यूनतम संसाधन और नाकुछ अधिकार आते हैं. जिस अल्पसंख्यक अभिजन को यह संस्कृति विशेषाधिकार सौंपकर अत्यंत शक्तिशाली बनाती है, वह मुख्यतः अपने स्वार्थ के लिए काम करता है. दिखने में ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य तीन अलगअलग वर्ण हैं, जो क्रमशः धर्म, राजनीति और अर्थसंपदा का प्रबंधन करते हैं. बहुजन मुख्यतः सेवाप्रदाता वर्ग है. वह वर्णव्यवस्था में सबसे निचला या उससे बाहर का हिस्सा है. दोनों ही स्थितियों में उसका दायित्व शीर्षस्थ वर्गों की सेवा करना है. उसे न तो अपने श्रमोत्पाद पर अधिकार होता है, न ही संपत्ति अर्जित करने का अधिकार उसे है. उसका कर्तव्य है सेवाश्रम के बदले जो मिले उसे अनुकंपाभाव से ग्रहण करना. वह अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों और पेशों में बंटी, संख्याबहुल और प्रभावी जनशक्ति है. प्रत्येक का पेशा ही उसकी पहचान है. इनके सपने छोटे होते हैं, संघर्ष बड़े. छोटीछोटी जरूरतों की खातिर इन्हें एकदूसरे के साथ स्पर्धा करनी पड़ती है. अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों में बंटा होने के कारण इस वर्ग की प्रभावी शक्ति क्षीण हो जाती है. दूसरी ओर सामान्य हित उच्चस्थ वर्णों को आपस में जोड़े रखते हैं. प्रतिस्पर्धा उच्चस्थ वर्गों में भी रही है. किंतु उसका आधार जीवन के मूलभूत प्रश्नों, समस्याओं से प्रभावित नहीं होता. उदाहरण के लिए परशुराम द्वारा पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन करने का मिथ क्षत्रियों के विशेष रोष का कारण नहीं बन पाता. यह जानते हुए कि जो संस्कृति ब्राह्मण को श्रेष्ठतम ठहराती है, वह क्षत्रियों को राजकर्म का अधिकार भी देती है. इसलिए वर्णव्यवस्था के आगे जब भी कोई चुनौती आती है; अथवा उनमें से किसी एक वर्ण के अधिकारों पर हमला होता हैतीनों एकजुट भाव से उसका सामना करते हैं. इससे संख्या में कम होने के बावजूद पहला वर्ग शक्तिशाली बनकर, खुद को समाज का नियामक और वास्तविक कर्ता सिद्ध करने में सफल हो जाता है.

व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हेतु आवश्यक है कि उत्पीड़ित लोगों की वर्गचेतना को उभारा जाए. लोगों को बताया जाए कि ‘अनेकता में एकता’ का मिथ संस्कृति के वर्चस्वकारी स्वरूप को बनाए रखने का उद्यम हैं. सामाजिक क्रांति को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि उत्पीड़न के शिकार वर्गों को उनकी स्थिति और अधिकारों से परचाया जाए. बताया जाए कि उनके हित साझे है. जो संस्कृति उन्हें भेद करना सिखाती है, समाज को जन्म और पेशों के आधार पर अलगअलग जातियों में बांटती है, जो श्रम की अवमानना करती हैवह उनकी संस्कृति हो ही नहीं सकती. इसकी शुरुआत ज्योतिराव फुले द्वारा की गई. फुले ने उन मिथकों का पुनर्पाठ किया, जिनसे भारतीय संस्कृति की पहचान निर्धारित की जाती है. जिनके सहारे सवर्ण जातियां शताब्दियों से अपना श्रेष्ठत्व गैरसवर्ण समूहों पर थोपती आई थीं. अवसर अनुकूल था. शिक्षा के द्वार सभी वर्गों के लिए खुल चुके थे. ‘मनुस्मृति’ की जगह ‘कानून के राज्य’ ने ले ली थी. नए कानून के आगे सभी नागरिक बराबर थे. ज्योतिराव फुले ने निर्भय होकर हिंदू मिथों के बारे में लिखा. धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ प्रस्तुत किया. शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, अपनी पत्नी के साथ मिलकर जगहजगह स्कूल खोले. स्त्रियों की पढ़ाईलिखाई को जरूरी माना. धीरेधीरे लोगों को यह एहसास होने लगा कि जिस धर्म और संस्कृति की वे अभी तक पूजा करते आए हैं, असल में वह एक षड्यंत्र, उन्हें बरसोंबरस गुलाम बनाए रखने का प्रलोभनकारी माध्यम है. जिन मिथकीय प्रतीकों, स्वार्थी विधान के भरोसे वे अभी तक शासित होते आए हैं, वे अंतिम या परमसत्य नहीं हैं. बल्कि शक्तिशाली जातीय समूहों द्वारा उन्हें मानसिकशारीरिक रूप से दास बनाए रखने के लिए की गई सोचीसमझी साजिश हैं. उनके सहारे शीर्षस्थ जातियां शताब्दियों से उनपर राज करती आई हैं. फुले के प्रयासों से पिछड़े और अंतज्य समाजों में वर्गचेतना पनपने लगी.

फुले के बाद परिवर्तनकारी राजनीति की बागडोर उत्तर में डॉ. आंबेडकर के हाथों में आ गई. वे अपने समय के नेताओं में सर्वाधिक पढ़ेलिखे, बुद्धिमान, व्यवहारकुशल, दूरदृष्टा और लक्ष्य के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नेता थे. जिस वर्ष फुले का निधन हुआ, उसी वर्ष उनका जन्म हुआ था. मानो समय खुद बदलाव के लिए आमादा था. इसलिए एक जिम्मेदार और समर्पित नेता द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की कमान संभालने के लिए उसने वैसे ही जिम्मेदार, समर्पित, बुद्धिमान और संघर्षधर्मी व्यक्तित्व को समयपटल पर आगे कर दिया था. डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का दायरा व्यापक था. उन्होंने बहुजन अस्मिता के प्रश्न को उठाया. फुले का अनुसरण करते हुए धार्मिक प्रतीकों की अधुनातन व्याख्या को अपने हाथ में लिया. उन मिथों को आड़े हाथों लिया जो सामाजिकसांस्कृतिक शोषण का माध्यम बने थे. उनका सबसे बड़ा काम जातिव्यवस्था पर हमला था, जिसने तथाकथित सवर्णों को तिलमिलाने को विवश कर दिया. जिस जाति के आधार पर वे बहुजन का शोषण करते आए थे, डॉ. आंबेडकर ने उसी के संगठनसामर्थ्य का सहारा लेकर दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने में कामयाबी हासिल की थी. इससे शीर्षस्थ जातियों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक था. वे डॉ. आंबेडकर के वर्गशत्रु बन गए. मगर डॉ. आंबेडकर के बौद्धिक तेज के आगे उनकी एक न चली.

देश के उत्तरपश्चिम में जिस संकल्प के साथ डॉ. आंबेडकर आगे बढ़ रहे थे, दक्षिण भारत में वही जिम्मेदारी, उतनी ही शिद्दत के साथ रामास्वामी पेरियार संभाले हुए थे. दोनों के व्यक्तित्व और विचारों में अंतर था, परंतु लक्ष्य एक ही था, जिसे लेकर वे पूरी तरह स्पष्ट और ईमानदार थे. आरंभ में पेरियार पर साम्यवाद का असर था. गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो पेरियार उनसे प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हो गए. गांधी के आवाह्न पर उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. असहयोग आंदोलन में लाठियां खाईं. लेकिन बहुत जल्दी उनका कांग्रेस तथा उसके नेताओं से मोह भंग हो गया. उसके बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर उन्होंने खुद को सामाजिक आंदोलनों के समर्पित कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से उन्होंने बहुजन समूहों के बीच वर्गीय चेतना फैलाने का काम किया. उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में डॉ. आंबेडकर और पेरियार का लगभग बराबर का योगदान है.

डॉ. आंबेडकर और पेरियार के प्रयासों से दलितों और शोषितों में वर्गचेतना का संचार हुआ था. सवाल है यदि उन सभी का मकसद समानताआधारित समाज की रचना करना, भेदभावों को मिटाना था, तो उसके लिए ‘मार्क्सवाद’ या ‘साम्यवाद’ की प्रचलित सैद्धांतिकी को क्यों नहीं अपनाया गया? यह सवाल उन साम्यवादियों से भी है जो वर्गहीन समाज की स्थापना को लेकर राजनीति में आए थे; और समस्त वर्गभेदों का उन्मूलन कर समताआधारित समाज का सपना देखते थे. प्रथम दृष्टया इसे हम भारतीय वामपंथ तथा सामाजिक न्याय के पक्ष में चलने वाले आंदोलनों की कमजोरी मान सकते हैं. इसके कारणों को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की मामूली पड़ताल से समझा जा सकता है. यहां उनका वर्णन विषयांतर होगा. इतना कह सकते हैं कि भारत में वर्गक्रांति की शुरुआत ‘सामाजिक न्याय’ की मांग के तहत हुई थी. हालांकि वर्गसंघर्ष की अवधारणा को ‘सामाजिकन्याय’ की भावना तक सीमित कर देना कभी निरापद नहीं रहा. इससे बहुजन समाज की एकता प्रभावित हुई. इसे समझने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ की सैद्धांतिकी तथा उन परिस्थितियों को समझना होगा, जिनके कारण ‘सामाजिक न्याय’ को अधिकांश अस्मितावादी आंदोलनों का लक्ष्य मान लिया गया था.

साम्यवाद बनाम सामाजिक न्याय

साम्यवाद की मुश्किल यह रही है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब बड़े साम्राज्यवादी राज्यों का गठन आरंभ हुआ, और जिन दिनों पूरी दुनिया को साम्यवाद की परिधि में शामिल करने का स्वप्न देखा जा रहा था, उन्हीं दिनों दुनिया को दो विश्वयुद्धों का सामना करना पड़ा. वे युद्ध केवल राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं लड़े गए थे. उनके पीछे पूंजीपति वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं भी शामिल थीं. प्रौद्योगिकीय क्रांति के दौर में हथियार निर्माण के क्षेत्र में भारी निवेश हुआ था. उत्पाद की खपत के लिए हथियारनिर्माता कंपनियों को नए बाजारों की जरूरत थी. उनका हित इसी में था कि दुनिया पर युद्ध का खतरा मंडराता रहे. देश एकदूसरे से लड़तेझगड़ते रहें. इस उद्देश्य में वे कामयाब भी रहीं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा बेहद जरूरी मुद्दा बन गया. आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के नाम पर हथियारों की अधिकाधिक खरीद की जाने लगी. इनमें भारत जैसे विकासशील देश भी पीछे न थे, जिनका कथित रूप से अहिंसा में विश्वास था और जिन्होंने अपनी आधीअधूरी स्वाधीनता अहिंसक तरीकों से अर्जित की थी. 1930 में दुनियाभर में आर्थिक मंदी पैठी हुई थी. हालांकि मंदी के जो मापदंड निर्धारित किए गए थे, वे स्वयं संदेह से परे न थे. राजनीति और पूंजीपतियों के गठजोड़ के चलते उस समय तक अर्थव्यवस्था की रफ्तार का आकलन करने के पैमाने बदल चुके थे. चुनिंदा कंपनियों की विश्वबाजार में स्थिति से मंदी या तेजी का आकलन किया जाने लगा था. आभासी मंदी से इतर जनता की दुर्दशा का असली कारण यह था कि सरकारों ने अपने समस्त संसाधन युद्ध और युद्ध की तैयारियों पर झोंक दिए थे. साम्यवादी देश भी इसमें पीछे न थे. इस कारण वहां जनअसंतोष पनपने लगा था. उसे दबाने तथा प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी देशों के साथ विकास की दौड़ में बने रहने की जरूरत ने स्टालिन जैसे कट्टर साम्यवादी नेताओं को जगह दी.

प्रथम विश्वयुद्ध दुनिया में भारी तबाही का कारण बना था. और जैसा कि बताया गया है, युद्ध की परिस्थितियां बनाने में अतिमहत्त्वाकांक्षी नेताओं तथा पूंजीपतियों का समान योगदान था. लेकिन जब युद्ध के परिणाम आने लगे तो आर्थिक घराने बड़ी चतुराई से खुद को उनसे अलग करने में कामयाब हो गए. इस कारण युद्ध के बाद उत्पन्न समस्याओं तथा उनसे उपजे जनाक्रोश का सामना संबंधित देशों की सरकारों को करना पड़ा. युद्ध के मोर्चे पर सारे संसाधन झोंक चुके राष्ट्रप्रमुखों के लिए उस समय एकमात्र रास्ता था कि आर्थिक विपन्नता से घिर चुके राज्य के विकास; तथा जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजीपतियों को आमंत्रित किया जाए. यही हुआ भी. दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात, पुनर्निर्माण के नाम पर सारे ठेके, बड़ीबड़ी पूंजीप्रधान कंपनियों को सौंप दिए गए. आर्थिक विकास के नाम पर उन्हें तरहतरह की छूट दी जाने लगी. वह विचित्र संयोग था. जब तीसरी दुनिया के देश तेजी से योरोप और अमेरिका की औपनिवेशिक दासता से बाहर आ रहे थे, तभी बड़ीबड़ी पूंजीवादी कंपनियां, तीसरी दुनिया के देशों में पहुंचकर वहां आर्थिक औपनिवेशीकरण की शुरुआत कर रही थीं. अर्थसत्ता का उत्तरोत्तर सबलीकरण राजसत्ता को कमजोर कर रहा था. उसका प्रभाव दुनिया के प्रायः सभी देशों पर था. चूंकि तीसरी दुनिया के अल्पविकसित और विकासशील देश स्थानीय समस्याओं और समाज की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के लिए पूंजीवाद पर आश्रित हो चुके थे, इसलिए वे आर्थिक औपनिवेशीकरण के सर्वाधिक शिकार थे.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने भी खुद को बदला था. सामाजिक भेदभाव और भारी आर्थिक विषमता से गुजर रहे देशों में वर्गसंघर्ष की स्थिति दुबारा न बने, इसके लिए जनसाधारण में यह विश्वास जगाना अत्यावश्यक था कि वह पूंजीवाद के विस्तार में ही अपना भला समझे. इसके लिए वह सरकार के साथ मिलकर लोगों की मनोरचना बदलने में लगा था. लोगों की प्रशंसा तथा सहानुभूति बटोरने के लिए उसने सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार जैसे कई मुखौटे पहने हुए थे. पूंजीवादी कंपनियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, खेती जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सुधारवादी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी आरंभ कर दी थी. इसी दौर में मान लिया गया कि जनसमस्याओं का समाधान अकेले सरकार द्वारा संभव नहीं है. विकासकार्यक्रमों में सरकार की मदद हेतु गैरसरकारी संस्थाओं को बढ़ावा दिया जाने लगा था. उन संस्थाओं के संचालन का दायित्व पढ़ेलिखे, समाज के प्रबुद्ध हिस्से के अधीन था, जिसकी जनता पर पकड़ थी. उसे लुभाने के लिए बड़े कारपोरेट घरानों ने अपनी आय का एक हिस्सा, जाहिर है बहुत मामूली हिस्सा, चंदे तथा अनुदान के रूप में गैरसरकारी संस्थाओं को देना आरंभ कर दिया. एक तरह से वह जनता का ही पैसा था. गैरसरकारी संस्थाओं को दिए गए चंदे को लोककल्याण की मद में किया गया खर्च दिखाकर, पूंजीवादी कंपनियां टैक्स के रूप में दी जाने वाली धनराशि में कटौती कर लेती थीं. चूंकि पूंजीपति घरानों की ओर से यह पैसा सीधे गैरसरकारी संस्थाओं को जाता था, इसलिए परोक्ष रूप में वे जनता के पढ़ेलिखे वर्गों की, उन लोगों की जिन्हें जनता की समस्याओं की समझ थी और जो समाज के भीतर रहकर काम करने का अनुभव रखते थेसहानुभूति बटोर रहे थे. इन संस्थाओं में प्रायः वही मध्यमवर्ग शामिल था, जिसकी पिछली पीढ़ियां अमेरिका और योरोपीय देशों मेंआम मताधिकार, न्यूनतम मजदूरी तथा लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद जैसे राजनीतिक दर्शनों के समर्थन में सड़कों पर उतरी थीं; जिनकी बौद्धिक चेतना ने अनेक नए राजनीतिक दर्शनों को जन्म दिया था. परिणामस्वरूप पूरी दुनिया में पूंजीवाद के समर्थन में माहौल बन रहा था. साम्यवाद, समाजवाद जैसे दर्शन जिन्हें कभी आधुनिक और उदार समाज की पहचान से जोड़ा गया था, की प्रतिष्ठा निरंतर घट रही थी. युवा पीढ़ी तो उन्हें समयबाह्यः मान चुकी थी.

गैरसरकारी संस्थाएं समाज में पूंजीवाद के लिए अनुकूल माहौल बनाने का काम कर रही थीं. यह कार्य समाजकल्याण, सामाजिक न्याय, कला, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचारप्रसार के नाम पर किया जा रहा था. सरकारों को भी इससे लाभ था. योजनाओं के कार्यान्वन की जिम्मेदारी स्वयंसेवी जनसंस्थाओं के कंधों पर डालकर वे सीधी जिम्मेदारी से बचने लगी थीं. इससे साम्यवाद के उभार के दिनों में पूंजीवाद के प्रति जो आक्रोश पनपा था, वह धीरेधीरे घटने लगा. इसलिए वह अकारण नहीं है कि 1930 का दशक जो वैश्विक मंदी का दशक भी थाᅳ‘सामाजिक न्याय’ के राज्यों की कल्याण नीति का प्रमुख हिस्सा बनने का भी दशक बना. उसके बाद यह शब्दयुग्म, विशेषकर लोकतांत्रिक राज्यों में इस तरह प्रचलित हुआ कि उसे उत्तरदायी सरकार के प्रमुख लक्षण के रूप में गिना जाने लगा. उससे लोगों की मनोरचना में ऐसा बदलाव आया, जो पूंजीवादी विस्तार के अनुकूल था. उपभोक्तावाद के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा व्यक्तिस्वातन्त्र्य जैसी आधुनिक विचारधाराओं को अपनाया गया. फिर जैसेजैसे पूंजीवाद का विस्तार हुआ, राज्य के प्रमुख उद्देश्य के रूप में ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता लगातार बढ़ती गई.

उससे पहले की व्यवस्थाओं में धर्म व्यक्ति, समाज और राज्य तीनों की मार्गदर्शक शक्ति हुआ करता था. राजा खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर जनता पर अपनी इच्छाएं थोपता था. उस व्यवस्था में ‘कल्याण’ धर्म और ईश्वर के नाम पर, दान अथवा राज्य की अनुकंपा के रूप में निचले तथा जरूरतमंद वर्गों को अंतरित होता था. आजकल वह ‘सामाजिक न्याय’ जैसा आकर्षक से जाना जाता है. उसमें न्याय नागरिक का अधिकार न होकर सहायता, अनुदान, प्रोत्साहननिधि जैसे नामों से जनता की ओर अंतरित होता है. यह पूंजीवाद की कार्यशैली के अनुरूप है. ‘ट्रिकल डाउन थियरी’ जिसे ‘रिसाव का सिद्धांत’ कहा जाता है, में समृद्धि नीचे की ओर धीरेधीरे रिसकर पहुंचती है. कुछ विद्वान इसी आधार पर पूंजीवाद की प्रशंसा करते हैं. किंतु ‘रिसाव का सिद्धांत’ सामान्यतः तब कारगर होता है, जब ऊपर के स्तर पर ‘बफर’ समृद्धि हो. चूंकि पूंजीपति अपनी आमदनी को खर्च करने के बजाय पुनर्लाभ हेतु उसका निवेश करना पसंद करता हैइसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में असमानता का अनुपात निरंतर बढ़ता जाता है. ऐसे देश जो लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं, किसी न किसी रूप में वे सभी ‘सामाजिक न्याय’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते रहते हैं. वे इस बात को बढ़ाचढ़ाकर जनता के बीच लाते हैं कि सामाजिक न्याय को लेकर उनकी योजनाएं जनता की सामान्य सहमति के आधार पर चलाई जाती हैं. उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वे उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ को प्रासंगिक बनाती हैं. परिणामस्वरूप न्याय के नाम पर बनीं योजनाएं राज्य की अनुकंपा, अनुदान जैसी वे धर्मप्रधान राजतंत्र में होती हैंलौकतांत्रिक राज्यों में भी बनी रहती हैं.

देखनेसुनने में ‘सामाजिकन्याय’ बड़ा रुपहला शब्द है. अधिकांश समाजों में उसे मनुष्यता के पर्याय, राज्य के पुनीत कर्तव्य के रूप में लिया जाता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि उसका लक्ष्य गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वह उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करता है जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विशेष कार्यक्रम चलाने की जरूरत पैदा करती हैं. उल्टे परंपरा, संस्कृति तथा निजी पहचान के नाम पर अन्याय एवं असमानताकारी संस्थाओं का संरक्षण किया जाता है. ‘सामाजिक न्याय’ के तहत बनाई जाने वाली अधिकांश योजनाएं प्रायः सस्ते भोजन, सामान्य शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तथा इतिहास एवं संस्कृति के सरंक्षण संबंधी कार्यक्रमों तक सीमित रहती हैं. इसलिए वे कमजोर वर्गों का ज्यादा भला नहीं कर पातीं. यही कारण है कि सरकार द्वारा लोकतंत्र और कल्याण राज्य की दावेदारी के बावजूद, राज्यों की केंद्राभिमुखता में कोई कमी नहीं आ पाती. पहले वे पुरोहितों और सामंतों के संरक्षण तथा उन्हीं के नेतृत्व में चलाई जाती थीं. नए विधान में उनका कार्यान्वन विशेषज्ञों के नेतृत्व में किया जाता है, जो उन्हीं वर्गों से आते हैं, जिनके हित असमानताकारी संस्कृति से जुड़े होते हैं. अपनेअपने स्वार्थ के लिए पूंजीपति और शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ उनका संरक्षण करते हैं. कल्याणकार्यक्रमों में जनसहभागिता का अभाव, लोगों के आत्मविश्वास को कमजोर कर, उन्हें पराश्रित बनाए रखता है. इससे उन योजनाओं का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है.

सवाल है कि यदि केंद्र उतना ही शक्तिशाली है बना जितना वह धर्मकेंद्रित व्यवस्थाओं में था और आमजन की हालत वैसी की वैसी थी, तो धर्म के स्थान पर, ‘सामाजिक न्याय’ जैसी नई अवधारणाओं को लाने से शीर्षस्थ वर्गां की कौनसी स्वार्थसिद्धि हो रही थी? इसके लिए धर्म के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. दुनिया के जितने भी धर्म हैं, कमोबेश सभी इस संसार और सांसारिक सुखों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं. लगभग सभी इसपर सहमत हैं कि सांसारिक सुख जीवन के अंतिम उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधक हैं. शंकर का मायावाद, विभिन्न नामों और मिलेजुले सिद्धांतों के आधार पर कमोबेश हर धर्म का हिस्सा है. किसी न किसी रूप में वे सभी सांसारिक सुखों को हेय मानते हैं. यह सोच मुक्त उपभोग को बढ़ावा देने की सबसे बड़ी बाधा है. दुनियावी सुखों के प्रति नकारात्मक सोच के चलते उपभोक्तावाद, जिसके भरोसे पूंजीवाद ने अपनी विस्तारवादी नीतियों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, उस तरह से पनप ही नहीं सकता था, जिस तरह से वह आज है. इसलिए पूंजीवादी तंत्र के लिए धर्म गैरजरूरी संस्था है. हां, सांप्रदायिकता पूंजीवाद का खूब भला करती है. बढ़ती सांप्रदायिकता लोगों के अंतर्मन में भ्रम की सृष्टि करती है. उससे एकदूसरे के प्रति संदेह, स्पर्धा तथा जीवन के प्रति अनिश्चितता बढ़ती है. प्रकारांतर में वह उपभोग की संस्कृति को बढ़ावा देती है.

हमारा आशय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय जैसी आधुनिक विचारधाराओं की महत्ता को नकारना नहीं है. मगर इनकी सफलता तभी संभव है जब जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो. वह तर्कसम्मत निर्णय लेने की अभ्यस्त हो चुकी हो. भारत जैसे समाजों में जहां मनुष्य कदमकदम पर जाति, धर्म और वर्गभेद से प्रेरणा लेती हो, उन्हें अपनी सामाजिक पहचान का जरूरी हिस्सा मानती हो, वहां लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातं×य जैसी विचारधाराएं अधिक कारगर नहीं हो पातीं. पर्याप्त अधिकारबोध के अभाव में नागरिक सरकार पर आवश्यक दबाव बनाने के बजाए, आपस में ही एकदूसरे के साथ स्पर्धा करते रहते हैं. इससे चुने गए प्रतिनिधि लोकहित के बजाए अपने स्वार्थ के लिए काम करने लगते हैं. जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें जब लोकतांत्रिक उद्देश्यों की प्राप्ति में नाकाम सिद्ध होती हैं, तब जनाक्रोश से बचने के लिए वे ‘सामाजिक न्याय’ को ढाल बनाती हैं. जागरूकता के अभाव में लोकतंत्र भीड़तंत्र में तथा ‘सामाजिक न्याय’ गैरबराबरी को पोषण करने वाली व्यवस्था का रक्षाकवच बन जाता है.

साम्यवाद और बहुजन

जाति हमारे यहां ‘सामाजिक न्याय’ और ‘साम्यवाद’ दोनों के गले की फांस रही है. यह व्यक्ति को जन्म के आधार पर छोटाबड़ा बनाकर, मनुष्य से उसकी स्वतंत्रता तथा जीवन के मूलभूत अधिकार छीन लेती है. भारतीय समाज में निचली जातियों के शोषण और उत्पीड़न का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना सभ्यता का. उनका संत्रास इतना बड़ा है कि भीषण आर्थिक विपन्नता के बावजूद उन्हें जातिवाद से मुक्ति ही बड़ी और न्यायपूर्ण उपलब्धि जान पड़ती है. जातिव्यवस्था के कारण ही भारत में राजनीति सवर्णों का विषेषाधिकार रही है. जातिवादी सोच से साम्यवादी दल भी उससे मुक्त नहीं है. अधिकांश सवर्ण वामपंथी वर्णव्यवस्था के प्रश्न पर मौन साधते आए हैं. जातिसंबंधी प्रश्न तथा उसके नाम पर होने वाले अत्याचार उन्हें उद्वेलित नहीं करते. वे उन्हें भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सहेजे रखना चाहते हैं. इस कारण दलितों और पिछड़ों के मन में, जो भारतीय समाज का सबसे बड़ा हिस्सा है, मार्क्स की भाषा में जिसे सर्वहारा कहा जा सकता हैसाम्यवाद को लेकर कभी कोई उत्साह नहीं रहा. एकाध अवसर पर उन्होंने साम्यवाद को अपनाने की कोशिश भी की. कुछ ऐसे संकेत दिए, जिनपर ध्यान दिया जाता तो देश में साम्यवाद की सफलता की कहानी लिखी जा सकती थी. यहां एक घटना का वर्णन प्रासंगिक होगा. इसका उल्लेख डॉ. धर्मवीर ने अपने लेख ‘दलितों ने क्या चाहा था’ में किया है

दलितों ने कम्यूनिस्ट शब्द का अपनी देशी जबान में तद्भव बनाकर ‘कौमनष्ट’ के रूप में अर्थ लिया था. उस जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के शांति त्यागी अपने समर्थकों के साथ मेरे गांव में चमारों की तरफ वोट मांगने आए. हम सब दादा हरिया के ओसारे के नीचे थे. धूलधूप में शांति त्यागी(मेरठ के कम्यूनिस्ट नेता) ने आते ही दादा से पानी मांगा. दादा हरिया ने घड़े से गिलास में ठंडा पानी निकाला और शांति त्यागी ने वहीं वह सबके सामने पिया. उनके जाने के बाद चमारों में वोट के बारे में मंत्रणा हुई. सारे चमारों का वोट एकमुश्त एक तरफ जा रहा था, पर दादा हरिया ने कह दिया, मेरा वोट शांति त्यागी को जाएगा, क्योंकि उसने मेरे हाथ का पानी पिया है. चमारों में से केवल वही एक वोट शांति त्यागी को मिला था .3

कम्यूनिस्ट’ को ‘कौमनष्ट’ मान लेना दलितों और पिछड़ों की एकतरफा अपेक्षा थी. नई, मूल्य आधारित राजनीति से उनके जुड़ने का कारण ही यह उम्मीद थी कि उससे सामाजिकसांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह प्रशस्त होगी. उसमें समानताआधारित समाज की उनकी पुरानी आकांक्षा भी अंतनिर्हित थी. लेकिन उसकी चिंता न तो कांग्रेसी नेताओं को थी, न ही साम्यवाद के तत्कालीन कर्णधारों को. भारतीय साम्यवादियों में अधिकतर उच्चस्थ जातियों से आए थे. वे अपने जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने को कतई तैयार न थे. उनके लिए साम्यवाद सामाजिक पुनर्निर्माण का लक्ष्य न होकर महज राजनीति थी. ऐसे नेताओं के मार्गदर्शन में साम्यवादी दलों ने जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए न तो कोई कार्यक्रम बनाया, न इस मांग के समर्थन में वे डॉ. आंबेडकर जैसे नेताओं के साथ आए. दलितों और पिछड़ों को साम्यवाद से ज्यादा उम्मीद अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए विधि के शासन से थी, जिसने उन्हें मनुस्मृति के सहस्राब्दियों पुराने विधान से मुक्ति दिलाकर, कानूनी तौर पर ही सही, बराबरी के एहसास के साथ जीने का अवसर दिया था. हालांकि सामाजिक समानता का लक्ष्य अभी बहुत दूर था. दलितों द्वारा यह मजबूरी में किया गया समझौता था. इसका नुकसान न केवल भारतीय साम्यवादी आंदोलन, अपितु दलितों को भी उठाना पड़ा.

भेदभाव से परे, समानता पर आधारित वर्गहीन समाज की रचना यदि बहुजन का सपना है तो उसने इस लक्ष्य की दिशा में अपने भरोसे बढ़ने की कोषिष क्यों नहीं की? वे संख्याबहुल थे. अगर जातिविहीन समाज की दिशा में स्वयं आगे बढ़ते तो अपने मकसद में सफल हो सकते थे. संभवतः अंग्रेजों का साथ भी उन्हें मिलता. बहुजन ने इसके लिए स्वयं पहल क्यों नहीं की? इस तरह की जिज्ञासाएं स्वाभाविक हैं. किंतु हमें याद रखना होगा कि सांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह बेहद कठिन होती है. राजनीति में शासक और षासित आमनेसामने होते हैं. अवसर मिलने पर शासक को पराजित कर शासित, राजनीतिक दासता से मुक्त हो सकता है. सांस्कृतिक दासता से उबरने के लिए व्यक्ति को अपने साथसाथ, आसपास के लोगों से भी, जो उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा हो सकते हैंजूझना पड़ता है. उसका अपना समाज भी आड़े आता है. इसलिए सांस्कृतिक परिवर्तन की लड़ाई बेहद कठिन और लंबी होती है. उसके लिए व्यक्ति को अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ता है. जाति के आधार पर हजारों वर्षों से शोषण एवं उत्पीड़न का षिकार रहा बहुजन स्वयं हजारों प्रकार की जातियों, उपजातियां में बंटा था. धर्म और क्षेत्रीयता की दीवारें भी थीं. उन सबकी अपनीअपनी सामाजिकसांस्कृतिक विविधताएं, संघर्ष और अंतर्द्वंद्व थे. इस कारण वह कभी ऐसी सामाजिक षक्ति नहीं बन सका, जो उसे सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति दिला सके. उसकी इस कमजोरी का लाभ जिससे जैसे भी बन पड़ा, उसने वैसे ही उठाया.

अंग्रेजों ने भारत में पुराने धर्मसम्मत राज्य को विधिशासित राज्य में बदलने का बड़ा काम किया. हालांकि इसके पीछे उनका न तो कोई उदारवादी नजरिया था, न ही ‘सामाजिक न्याय’ जैसा बड़ा उद्देश्य. उनके स्वार्थ उनके कद से कहीं ज्यादा बड़े थे. भारत आने के बाद उन्होंने अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान किया, मगर सामाजिक अन्याय के निवारण हेतु सार्थक कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने कभी नहीं की. वे इस देश में शासक बनकर रहना चाहते थे. और हमेशा रहे भी. विधिसम्मत शासनव्यवस्था लागू करने के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य खुद को परिष्कृत सभ्यता का अनुगामी सिद्ध कर जनसाधारण की सहानुभूति और समर्थन प्राप्त करना था. इसका उन्हें लाभ भी मिला. समाज का बड़ा हिस्सा जो धर्मकेंद्रित शासनव्यवस्था में उपेक्षा, उत्पीड़न और जातीय शोषण का शिकार था, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में वह नए शासन का समर्थन करने लगा.

अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान करने के बावजूद अंग्रेजों ने न तो जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए कोई कानून बनाया, न तत्संबंधी किसी सुधार कार्यक्रम का कभी समर्थन किया. जबकि भारत में जड़ जमाने के साथ ही वे भारतीय जातिव्यवस्था तथा उसकी कमजोरियों को भलीभांति समझ चुके थे. वे ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक हैसियत और समाज पर उनकी पकड़ को समझते थे. जानते थे कि इन वर्गों की मदद से, शेष समाज को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. ब्राह्मण तथा दूसरे सवर्ण सोचते थे कि अंग्रेज उनके निजी मामलों में दखल न देने की नीति पर अटल हैं. मुगल शासकों से भी उनकी यही अपेक्षा थी. इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उनके मुगलकाल में भी शीर्ष पदों पर थे. इस प्रवृत्ति के चलते देश को एक हजार से अधिक वर्ष विदेशी शासकों के अधीन काटने पड़े. यही कारण रहा जो मुट्ठीभर अंग्रेज, अपने देश से आठ हजार किलोमीटर दूर आकर भारत पर करीब दो सौ वर्षों तक राज करते रहे. हजार वर्षों के पराधीनताकाल में ब्राह्मणों की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ा. ब्राह्मणों के लिए उनका धर्म और कर्मकांड की सबकुछ थे. वे बचे रहें, देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता की भावना से उनका कोई सरोकार न था.

अवर्णों को भी औपनिवेशिक शासन से खास आपत्ति न थी. अंग्रेजों ने उन्हें ‘मनुस्मृति’ के चंगुल से आजाद कराया था. शिक्षा जो पुरानी व्यवस्था में अपराध थी, उसके दरवाजे शूद्रों और दलितों के लिए खोल दिए गए थे. दलितों और पिछड़ों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी. यही कारण है कि स्वाधीनता संग्राम का समर्थन करने के बावजूद दलित और पिछड़े वर्ग के नेता, सामाजिक आजादी की मांग बराबर दोहराते रहे. पेरियार ने तो सक्रिय राजनीति से 1925 में ही किनारा कर लिया था. उसके बाद उन्होंने स्वयं को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया था, जो सामाजिक न्याय को समर्पित बड़ा, वर्षों लंबा चलने वाला सफल आंदोलन था.

सामाजिकन्याय’ की अवधारणा ने भारत में पश्चिम के रास्ते प्रवेश किया था. स्वाधीनता आंदोलन में अपनी सक्रियता और चरमसफलता के दिनों में भी कांग्रेस ने, जो खुद को भारतीयों की एकमात्र प्रतिनिधि पार्टी होने का दावा करती थी, सामाजिक न्याय की कभी मांग नहीं की. देश की राजनीति में उसे आजादी के बाद ही जगह मिल सकी. उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियां राजनीतिक चेतना से लैस हो चुकी थीं. स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. बदले परिवेश में उनकी उपेक्षा असंभव थी. इसलिए कांग्रेस तथा दूसरे अभिजन नेताओं द्वारा तमाम चालाकी बरतने के बावजूद अंतत उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाना ही पड़ा. आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना गया. चूंकि लोकतंत्र में संख्याबल बड़ी भूमिका होती है, इसलिए दलितों और पिछड़ों को साथ लेकर चलना सभी दलों की मजबूरी बन गई. दलितों को फुसलाने के लिए फिर सामाजिक न्याय का प्रलोभन दिया जाने लगा. इस बीच ऐसा वर्ग भी रहा जिसका मानना था कि समानता और न्याय के लक्ष्य को हासिल करने के लिए विदेशों से विचारधारा उधार लेने की आवश्यकता नहीं है.

ऐसे लोगों ने ‘सामाजिक न्याय’ के विकल्प के तौर पर ‘रामराज्य’ को आगे किया. प्रकारांतर में उनकी कोशिश प्राचीन धर्मकेंद्रित शासन को वापस लाने की थी. वे अपने उन स्वार्थों को विशेषाधिकार बनाना चाहते थे, जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में लगातार चुनौती मिल रही थी. जिनकी सुरक्षा हेतु दलितों और पिछड़ों का सांस्कृतिकरण या यूं कि कहें कि वर्चस्वकारी संस्कृति के प्रति समर्पण आवश्यक था. 2014 में सत्तापरिवर्तन के बाद वे शक्तियां केंद्र तक पहुंच चुकी हैं. उनका नया नारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का है. ‘रामराज्य’ उनके लिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद का टोटम, ऐसा औजार है जिसके माध्यम से वे सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं. अपने समर्थक बुद्धिजीवियों के माध्यम से वे उसे जनता के बीच लगातार प्रचारित करते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास में मनमाना हस्तक्षेप तक करते हैं. भूल जाते हैं कि राज्य जब वास्तविक न्याय की ओर से तटस्थ हो जाता है, तो वह वर्गीय तानाशाही का शिकार होने लगता है. उस समय धर्म स्वतः उसकी कार्यशैली में हस्तक्षेप करने लगता है. ऐसा राज्य अपने निर्णय न्याय और नागरिकों की सामान्य इच्छा, जरूरतों के आधार पर लेने के बजाय आस्था, विश्वास और परंपरा के अनुसार लेने लगता है. प्रकारांतर में राज्य का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. उसकी बनावटी निष्पक्षता, शीर्षस्थ वर्गों की आत्ममुग्धता का रूप ले लेती है.

रामराज्य’ का जिक्र हुआ है तो उसपर थोड़ी चर्चा और. कल्याण राज्य की पहचान उसकी उदारता और न्यायभावना से की जाती है. इस बात से होती है कि उसका मनुष्यता में कितना विश्वास है. राजा के रूप में राम की कोई न्यायसंहिता नहीं है. राम को धर्मसंस्थापक माना गया है. उसकी कथित महानता ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि मान उसे ‘धर्म’ के नाम से प्रतिस्थापित करना है. इस कारण वह न तो अपनी पत्नी के साथ न्याय कर पाता है, न शंबूक के साथ. निर्दोष पत्नी को धोबी के मिथ्या आक्षेप पर देशनिकाला दे देता है तो शंबूक को चंट ब्राह्मणों के बहकावे में आकर मौत के घाट उतार देता है. ऐसे न्याय से एक ही वर्ग लाभान्वित हो सकता है. वह जिसके हाथों में धर्म का नियंत्रण है. चूंकि सामाजिक न्याय की अवधारणा अपने आप में अस्पष्ट अवधारणा है, उसकी कार्यशैली स्पष्ट नहीं है, इसलिए उसके नाम पर मनमानी करने का अवसर स्वार्थी राज्यप्रतिनिधियों को आसानी से मिल जाता है. ‘रामराज्य’ जैसी पुराकथाओं के माध्यम से वे जनसाधारण का सतत भावनात्मक दोहन करते हैं.

यदि ‘सामाजिक न्याय’ नहीं तो और क्या? क्या सामाजिक उत्पीड़न तथा भेदभाव का शिकार रहे लोगों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ पूर्णतः अप्रासंगिक और अनपेक्षित है? क्या जाति, धर्म, वर्ण आदि के नाम पर शोषण और अन्याय का शिकार होते आए बहुजनों द्वारा ‘सामाजिक न्याय’ की मांग निरर्थक है? क्या बहुजन को ‘सामाजिक न्याय’ की मांग तक सीमित रह जाना चाहिए? अथवा ‘साम्यवाद’ की मांग करते हुए वर्गहीन समाज की संरचना हेतु अग्रसर होना चाहिए? ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ की मूलभूत विशेषताओं का अभी तक जो विवेचन किया गया है, उससे यह द्वंद्व स्पष्ट हो जाता है. उपसंहार के रूप में हमें केवल इतना जोड़ना है कि ‘सामाजिक न्याय’ समानता का समर्थन नहीं करता. वह असमानता के शिकार लोगों को थोड़ी राहत की मांग करते हुए यथास्थिति बनाए रखना चाहता है. शासक और शासित, दाता और याचक के बीच जो अंतर है, उसे मिटाने के बजाए वह उन्हें अपरोक्ष समर्थन देता है. वैसे भी ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर न्यायसंबंधी अधिकांश योजनाएं जनता की जरूरत के बजाय संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर बनाई जाती हैं. युद्ध, महंगाई, आर्थिक मंदी, प्राकृतिक आपदा आदि से अर्थव्यवस्था पर आकस्मिक दबाव उत्पन्न हो तो उसकी भरपाई ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर बनी संस्थाओं के बजट से की जाती है. सरकार ऐसी योजनाओं को औपचारिक भाव से कार्यान्वित करती है. प्रतिबद्धता के अभाव में वे योजनाएं आसानी से भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं.

राज्य और सरकार दोनों नागरिक का कार्य हैं. उनका गठन सामाजिक सुरक्षा एवं ऐसे लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किया जाता है, जिससे उन सुखों को आसानी से प्राप्त किया जा सके, जो किसी अकेले व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. जैसे राज्य और सरकार नागरिक का कार्य है, ऐसे ही सामाजिक न्याय राज्य का दायित्व है, जिसे वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु अपनाता है. बावजूद इसके जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें चाहे वे किसी भी तरह की क्यों न हों, नागरिकों के श्रम और पैसे से चलने के बावजूदकालांतर में अपने दायित्वों से मुंह मोड़ने लगती हैं. वे ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विपन्नताग्रस्त वर्गों को मामूली राहत पहुंचाकर कल्याणकारी होने का दम भरती रहती हैं. प्रकारांतर में वे ऐसी संस्कृति का पोषणपल्लवन करती हैं, जो समाज को श्रेष्ठतम और साधारण, शासक और शासित में बांटे रखती हैं. जनता की उदासीनता के चलते, वे येनकेनप्रकारेण नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब होती हैं कि श्रेष्ठतम की शासकीय भूमिका और साधारण का शासित होना नियतिसिद्ध है. साम्यवाद इस तरह के वर्गभेद को नकारता है. वह सांस्कृतिक वर्चस्व के मूलाधार धर्म को राज्य के कामकाज से एकदम अलग रखने पर जोर देता है. धर्मकेंद्रित संस्कृति के स्थान पर वह श्रमकेंद्रित संस्कृति को बढ़ावा देता है. जिससे शारीरिक और बौद्धिक श्रम के बीच का अंतर मिटने लगता है. ऐसा ही समाज बहुजन का सपना और आदर्श हो सकता है.

तो क्या आमूल परिवर्तन की मांग को टालने, यथास्थिति बनाए रखने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ महज राजनीतिक स्टंट है? ‘सामाजिक न्याय’ के उद्देश्य को देखते हुए उसकी सीधे आलोचना भले ही अनुचित लगे, परंतु जब तक जनता अपने हितों एवं अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगी हालात में सुधार के लिए जब तक खुद को दूसरों पर आश्रित मानती रहेंगीतब तक ‘सामाजिक न्याय’ अपने उद्देश्य में विफल बना रहेगा. हालात उसी ओर संकेत कर रहे हैं. हाल के वर्षों में राजनीति व्यापार तथा चुनाव मतप्रबंधन में बदल चुका है. दलित और पिछड़े मतदाताओं को लुभाने के चुनावी प्रयासों के लिए इधर एक नया शब्द निकलकर आया हैᅳ‘सोशल इंजीनियरिंग. उसका सामाजिक न्याय से कोई संबंध नहीं है. यह उसके नाम पर मतदाताओं को लुभाने जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में साधने की चुनावी तकनीक है, जिसे अवसरवादी दल अकेले या दूसरे दलों के साथ गठजोड़ करके अमल में लाते हैं. सामाजिक न्याय का संबंध राज्य के स्वरूप से न होकर, उसके उत्तरदायी आचरण से है; और राज्य तभी अपने दायित्वों के प्रति सजग रह सकता है, जब जनता जागरूक तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग हो.

संक्षेप में सामाजिक न्याय धर्म की प्रभुता में, मानवीय मूल्यों को साथ लेकर चलने की कला है. जबकि साम्यवाद धर्म को किनारे कर, विधायी तरीकों से न्याय की अपेक्षा करता है. अभी तक साम्यवाद के लिए वर्गक्रांति को अनिवार्य माना गया है. किंतु वर्गक्रांति केवल हिंसा के बल पर फलीभूत हो, यह आवश्यक नहीं है. देखा यही गया है कि जिन देशों में हिंसक वर्गक्रांति के बल पर सत्ता परिवर्तन हुआ, वहां वर्गहीन समाज की रचना का स्वप्न पूरा होने से पहले ही सर्वहारा शक्तियां अपने अंतर्द्वंद्वों के कारण बिखराब का शिकार होती गईं. कारण है कि हिंसा की मदद से सत्तापरिवर्तन का लक्ष्य पाने वाले राज्य आगे भी उसके पैरोकार बने रहते हैं. इससे चाहेअनचाहे वे अपने चारों और फैली बुर्जुआ ताकतों के बीच शक्तिसंतुलन बनाने की होड़ में जुट जाते हैं. नतीजा यह होता है कि उनके संसाधनों का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च होने लगता है, जो प्रकारातंर में सामाजिक असंतोष में वृद्धि करता है. वर्गहीन समाज की रचना तभी संभव है जब जनता के सभी समूह उसके लिए प्रतिबद्ध हों. यह कैसे संभव हो? समानता, समरसता, न्याय और स्वतंत्रता का सपना देखने वालों के लिए हमारे समय की यही सबसे बड़ी चुनौती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. The best safeguard against fascism is to establish social Justice to the maximum possible extent. Arnold Toynbee, 1876

2. Justice is first virtue of social institutions, as truth is of system of thought. A theory however elegant and economical must be rejected or revised if it is untrue; likewise laws and institutions no matter how efficient and well arranged must be reformed or abolished. -John Rowls(1971)

3. http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=5525

न्याय, न्याय की परंपरा और समाज : दो

सामान्य

सोशल कांट्रेक्ट (सामाजिक संविदा) की अवधारणा

न्याय के संदर्भ में हॉब्स के विचारों को हम प्राचीन धर्माधारित विधानों तथा आधुनिक गणतांत्रिक राजनीतिक दर्शन के संधिस्थल के रूप में भी देख सकते हैं. हॉब्स ने परिवर्ती विचारकों की पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. ‘सामाजिक संविदा’(सोशल कांट्रेक्ट) का उसका विचार जान लॉक, रूसो, डेविड ह्यूम, इमानुएल कांट, जैरमी बैंथम आदि के राजनीतिक दर्शन की पृष्ठभूमि बना. अपने युगांतरकारी लेखन द्वारा उसने परंपरा एवं आधुनिकता के बीच तालमेल स्थापित करने की कोशिश की. फलस्वरूप न्यायव्यवस्था जो पहले नियतिवादी थी, उसे मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं अधिकारिता के संदर्भ में देखापरखा जाने लगा. वह बड़ा परिवर्तन था, जिससे आधुनिक गणतांत्रिक राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ. ध्यातव्य है कि ‘सामाजिक संविदा’ यानी सामाजिक करारनामे का विचार हॉब्स की मौलिक स्थापना नहीं थी. इसके बीजतत्व भारतीय चिंतन परंपरा सहित प्लेटो और अरस्तु के दर्शन में पहले से ही मौजूद थे. सभी ने नागरिक, समाज और राज्य के मध्य सामंजस्य बनाए रखने पर जोर दिया था. यहां तक कि राजा की नियुक्ति भी निःशर्त न थी. उसके पीछे सामाजिक सोद्देश्यता और करार की भावना आरंभ से ही जुड़ी थी. आरंभिक समाजों में राजा मनोनीत किया जाता था. उसका प्रथम कर्तव्य होता था, प्रजा हित को अपना हित समझकर कार्य करना. अथर्ववेद में कहा गया है—

प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित है। प्रजा के कल्याण में ही राजा का कल्याण संभव है।’1

बीच में शताब्दियों लंबा दौर ऐसा भी आया जब ‘राजा’ नामक सत्ता को पूर्णतः दैवीय मान लिया गया. व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा विकसित हुई तो भौतिक संपदा की भांति राज्य को भी उत्तराधिकार में सौंपा जाने लगा. अयोग्य प्रतिनिधियों के कंधों पर शासनभार आने से राजनीति का स्तर गिरा. अनुबंध के आधार पर राजन्य की स्थापना के संबंध में प्राप्त प्राचीन उल्लेखों के अध्ययन से पता चलता है कि सभ्यता के आरंभिक दिनों में ‘राजा’ कोई विशेषाधिकार संपन्न संस्था नहीं थी. उसकी स्वीकार्यता लोगों की सहमति पर निर्भर थी. उसे वही अधिकार प्राप्त थे, जो कार्यों के निष्पादन के लिए आवश्यक माने जाते थे. उस विधान में समूह या समाज अपने निर्वाचित प्रतिनिधि से अधिक शक्तिशाली होता था. यह व्यवस्था हजारों साल तक कायम रही. इसमें बदलाव धर्म के आने के बाद उस समय सामने आया, जब राज्याश्रय में पलने वाले पुरोहितों और पंडितों ने निहित स्वार्थ के लिए राजा को पृथ्वी का स्वामी और सर्वेसर्वा घोषित करना आरंभ किया. धीरेधीरे धर्म, राजनीति और अर्थसत्ता का ऐसा गठजोड़ बनता गया, जो न केवल बुद्धि बल्कि संसाधनों के मामले में भी आगे था. उसने जनसाधारण को एकदम किनारे कर दिया. इसमें सबसे बड़ी भूमिका धर्म की रही.

राजा की नियुक्ति के संबंध में प्राचीनतम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण(1/14) में मिलता है. उसके अनुसार देवताओं और राक्षसों का युद्ध चल रहा था. देवता पराजय की कगार पर थे. उस समय देवताओं ने विचार किया कि एक राजा होना चाहिए, जो उनकी सेना का नेतृत्व कर सके. तब ‘इंद्र’ को देवसम्राट मनोनीत किया गया. इस कहानी के अनुसार राजा नामक संस्था की उत्पत्ति सैन्य उद्देश्य से हुई. इससे मिलतीजुलती कहानी आगे चलकर ‘तैत्तीरीय उपनिषद’ में मिलती है. तदनुसार देवासुर संग्राम में पराजय सम्मुख देख देवताओं ने मदद के लिए प्रजापति से प्रार्थना की. तब उन्होंने प्रसन्न होकर अपने पुत्र इंद्र को देवताओं की मदद के लिए भेजा. प्रजापति के अनुसार, ‘इंद्र अपेक्षित कार्य के निष्पादन हेतु सर्वाधिक सक्षम, शक्तिशाली, स्वस्थ, सर्वोत्तम तथा सभी तरह से पूर्ण था.’ ‘शुक्रनीतिसारदोनों की अपेक्षा काफी बाद की रचना है. उसमें लिखा है कि ‘जब सभी भयाकुल होकर इधरउधर दौड़ने लगे, जब विश्व में कोई किसी का स्वामी नहीं था, तब विधाता की ओर से नृप की नियुक्ति की गई.’(शुक्रनीतिसार,1/71). इस तरह राजा धरती पर विधाता का प्रतिनिधि बना. कालांतर में उसके फैसलों को देवाज्ञा माना जाने लगा. तीसरी कहानी का कथानक कुछ अलग अवश्य लगता हो, मगर संकेत उसका भी यही है कि राजा समाज की राजनीतिक और सामरिक आवश्यकता है. इसलिए शारीरिक और मानसिक सर्वश्रेष्ठता को उसके चयन का आधार बनाया गया. बिहार के गया, सोनपुर आदि क्षेत्रों के उत्खनन से ज्ञात होता है कि भारत में कृषिकर्म की शुरुआत लगभग दस हजार वर्ष पहले हो चुकी थी. हड़प्पा सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि उस क्षेत्र में ईसा से 1500-3000 वर्ष पहले तक समृद्ध नागरी संस्कृति विकसित हो चुकी थी, जिनके व्यापारिक रिश्ते दूरदराज की सभ्यताओं से थे. समूह की एकता और नेतृत्व हेतु सम्राट की नियुक्ति की शुरुआत का वही दौर रहा होगा. उसके सापेक्ष ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ आदि ऊपरोल्लिखित कृतियां बहुत बाद की रचना हैं. जाहिर है इनकी रचना उस समय हुई जब देश में राज्य बड़ी और केंद्रीय सत्ता के रूप में ढल चुका था. वर्णव्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी थी. आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए तत्कालीन बुद्धिजीवी वर्ग उनके सत्ताधिकार को वैध ठहराने में लगा था. राजा की नियुक्ति को देवताओं का निर्णय घोषित करना, इसी दिशा का संकेतक है. वे अपने समय की साहित्यिक रचनाएं रही होंगी, जिनके रचनाकर अपने अतीत से प्रेरणा लेकर उन्हें गढ़ रहे थे. आगे चलकर जब मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं धर्म और तज्जनित कर्मकांडों के रूप में रूढ़ होने लगीं, तब उन्हें धर्मशास्त्र का दर्जा दे दिया गया.

विशुद्ध लौकिक उद्देश्य के लिए जनता द्वारा राजा के चयन का उल्लेख ऋग्वेद के अलावा पुराणों में भी मौजूद है. जनसहमति के आधार पर निर्वाचित पहले सम्राट की कहानी हमें उस कालखंड तक ले जाती है जब पशुआधारित अर्थव्यवस्था, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में ढलने को उत्सुक थी. खेती के प्रति रुझान में तेजी आ रही थी. हालांकि व्यक्तिगत भूसंपत्ति की अवधारणा तब तक नहीं पनपी थी. सम्मिलित खेती में कृषि उत्पाद पर सामूहिक अधिकार माना जाता था. धीरेधीरे यह समस्या सामने आने लगी कि अनाज का समूह के बीच बंटवारा कैसे किया जाए? उसका आधार क्या हो? क्योंकि कुछ लोग जहां आवश्यकता से अधिक अनाज एकत्र कर लेते थे, वहीं कुछ ऐसे भी होते थे जिन्हें अपनी आवश्यकता के अनुसार अन्न मिल ही नहीं पाता था. उनके बीच अनाज को लेकर परस्पर छीनाझपटी होती थी. बंटवारे के दौरान विवाद उत्पन्न होना बहुत सामान्य बात थी. समस्या के समाधान हेतु ऐसे व्यक्ति के चयन का निश्चय किया गया, जो बुद्धिमान होने के साथसाथ निष्पक्ष और निर्विवाद भी हो. जो कुशलतापूर्वक सदस्यों के बीच अनाज का बंटवारा कर सके. बदले में उस व्यक्ति को कृषि उत्पाद का एक हिस्सा देने का प्रावधान किया गया, जो बहुत कारगर सिद्ध हुआ. लेकिन गणप्रमुख या विश के मुखिया की सफलता तभी तक संभव थी, जब लोगों के पास उनकी जरूरत लायक अनाज मौजूद हों. किसी कारण यदि भरपूर अनाज उत्पन्न न हो, तब लोगों के मन में क्षोभ उभरना स्वाभाविक था. कुछ ऐसा ही सम्राट वेन के प्रकरण में हुआ था. वेन की कथा2 विष्णु पुराण, भागवत पुराण तथा पदम पुराण में आती है, हालांकि उनमें प्रक्षेपण एवं रूपांतरण की बहुत अधिक संभावना है. वेन के बारे में अलगअलग जगह मौजूद कहानियों में अंतर है. तथापि सभी जगह उसे जनता द्वारा पहला निर्वाचित राजा माना गया है. सम्राट मनोनीत होने के पश्चात वेन ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए यथोचित उपाय किए. लेकिन परिस्थितियों ने ऐसी करवट ली कि जिन लोगों ने उसको अपना राजा घोषित किया था, उन्हीं के हाथों उसका अंत भी हुआ.

पुराणों में पृथु का मुक्त गुणगान है. पृथु वें का पुत्र था. पिता की हत्या के बाद वह समझ चुका था कि ऋषिगणों को नाराज करके राजकर्म करना आसान नहीं है. अतः राज्याभिषेक के समय ही उसने ऋषिगणों को आश्वस्त करते हुए कहा—‘मैं स्वधर्म, आश्रमधर्म एवं वर्णाश्रम धर्म की स्थापना करूंगा तथा राजदंड द्वारा उन्हें कार्यान्वित करूंगा.’3 वह जनतंत्र की पहली पराजय और पुरोहितवाद की पहली बड़ी जीत थी. पृथु ने ब्राह्मणों को सभी राज्यादेशों से ऊपर रखने की घोषणा की थी. कुल मिलाकर उसने वही किया था, जो ऋषिगण चाहते थे. माना जाता है कि पृथ्वी का नामकरण उसी के नाम पर पड़ा. इन प्रसंगों से यह संकेत भी मिलता है कि प्राचीनकाल में राजा का चयन केवल दैवी प्रेरणा या नियुक्ति तक सीमित नहीं था.

राज्य की उत्पत्ति को लेकर अनुबंध का सिद्धांत बौद्ध ग्रंथों में भी मौजूद है. ‘दीर्घनिकाय’, ‘महावस्तु’ आदि बौद्ध ग्रंथ राजा की नियुक्ति से संबंधित अनुबंध के सिद्धांत की पुष्टि करते हैं. ‘दीर्घनिकाय’ में राजा की नियुक्ति को लेकर एक निर्देश प्राप्त होता है. उसमें मनोनीत राजा अपनी प्रजा के साथ करार करता है कि वह केवल ‘वहीं पर क्रोध करेगा, जहां उसे करना चाहिए. उसी की भर्त्सना करेगा, जो भर्त्सनायोग्य है. उसी को देश निकाला देगा, जिसे देश निकाला मिलना चाहिए.’4 बौद्ध समर्थित राजदर्शन लोककल्याण के आदर्श के इर्दगिर्द घूमता है. ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में राजा के चरित्र में ओज और साहस जैसे गुणों को महत्त्वपूर्ण बताया गया है. वहीं ‘दीर्घनिकाय’ में राजा की लोकप्रियता, सौंदर्यबोध, बुद्धिमत्ता आदि को उसका प्रमुख गुण माना गया है. राजा पर प्रजा के खेतों, धनधान्य और पशुओं की सुरक्षा का दायित्व होता था. बदले में प्रजा उसे अपनी आय का एक हिस्सा देने का वचन देती थी. ‘महावस्तु’, दीर्घनिकाय से लगभग तीन शताब्दी बाद की रचना है. लौकिक संस्कृत में लिखा गया यह ग्रंथ अपने भीतर बौद्ध दर्शन की अनेक आदर्श स्थापनाओं को समेटे है. ‘दीर्घनिकाय’ की भांति ‘महावस्तु’ भी राजा की नियुक्ति को लेकर ‘आपसी सहमति’ के लौकिक सिद्धांत की पुष्टि करता है—

सृष्टि के आरंभ में सभी प्राणी एक दिव्य स्थल पर निवास करते थे. वे सुगंधित का आनंद लेते. सुरम्य धरा पर मग्नमन नृत्य करते. उस समय उन्हें न तो भोजन की आवश्यकता थी, न वस्त्रों की, न निजी संपत्ति थी, न सरकार, न ही किसी प्रकार का कानून. और तब सृष्टि का पतन आरंभ हुआ. मनुष्य उस पुनीत लोक से पतित होकर पृथ्वी पर आ गिरा. मनुष्य का पतन आरंभ हो चुका था. अब उसे भोजन और आवास की आवश्यकता महसूस हुई. मनुष्य अपनी आरंभिक पवित्रता को खो चुका था. वर्णव्यवस्था का आरंभ हुआ और लोगों ने एक दूसरे के साथ अनुबंध के आधार पर रहना आरंभ किया. परिवार और निजी संपत्ति उस अनुबंध का हिस्सा बने. इसी के साथ चोरी, हत्या, लूटमार, परस्त्रीगमन जैसे अपराध होने लगे. समस्या से मुक्ति पाने के लिए सब मनुष्य एक बार एकत्र हुए, उन्होंने मिलजुलकर एक राजा चुना, जो उनकी फसल का वाजिब हिस्सा उन्हें बांट सके. उस चयन को उन्होंने ‘अनेक द्वारा एक का चयन’ यानी ‘महासम्मत’ की संज्ञा दी. उस व्यक्ति से अनेक लोगों को खुशी प्राप्त हुई थी, इसलिए उन्होंने उसे ‘राजा’ कहना आरंभ कर दिया. उसी से ‘राजनीति’ का विकास हुआ.’5

उपर्युक्त उद्धरणों से वैदिक परंपरा और बौद्ध परंपरा के बीच राजा की नियुक्ति संबंधी अंतर को समझा जा सकता है. वैदिक परंपरा में राजा निर्वाचित न होकर, कभी धर्म तो कभी देवताओं के नाम पर ऊपर से थोपा जाता है. राजपद की आवश्यकता विशुद्ध राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पड़ती है. वह आर्यों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का संकेतक है. बौद्ध परंपरा में राजा की नियुक्ति का उद्देश्य उन लौकिक कर्तव्यों की पूर्ति करना है, जो समाज में सुख, समृद्धि और शांति की स्थापना के लिए आवश्यक माने जाते हैं. दोनों ही मान्यताओं में इतना स्पष्ट है कि राजा के रूप में मनोनीत व्यक्ति सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता और नेतृत्व के विशिष्ट गुणों से संपन्न होता था. उसका मुख्य कर्तव्य लोककल्याण के निमित्त उन कर्तव्यों का निष्पादन करना था, जो उसकी प्रजा के हितों के लिए आवश्यक हों. यह बात अलग है कि खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि घोषित करने वाला व्यक्ति अवसर आने पर स्वयं को प्रजा से बहुत ऊपर, यहां तक कि ईश्वरतुल्य समझने लगता था. इससे राजनीति में विकार आना स्वाभाविक था.

सुकरात, प्लेटो, अरस्तु आदि विचारकों ने राजसत्ता एवं समाज के कर्तव्यों एवं दायित्वों में तालमेल बनाए रखने के लिए न्यूनतम अनुबंध का समर्थन किया था. प्लेटो ने तो दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना पेश की थी. उसका विचार था कि केवल दार्शनिक ही सत्ता के अहंकार, विलासिता तथा अन्य विकारों से स्वयं को बचा सकता है. अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ और लॉज में राज्य एवं समाज के कर्तव्यों की विस्तृत व्याख्या करते हुए उसने आदर्श राज्य की रूपरेखा प्रस्तुत की थी. अरस्तु राज्य के उच्च नैतिक स्तर को बनाए रखने का समर्थक था. उनके कुछ शताब्दी पश्चात पश्चिम की वैचारिक चेतना अपना तेज खोने लगी थी. मध्यकाल तक वहां भी धर्मसत्ता और राजसत्ता का ऐसा गठजोड़ बन चुका था, जिसमें जनसाधारण की नियति केवल आदेशानुपालन करना तथा परंपराओं का बोझ ढोनाभर रह गया. इंग्लेंड में जेम्स प्रथम ने राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि और सर्वेसर्वा माना. उसका मानना था कि राज्य और समाज दोनों के लिए राजा का होना अपरिहार्य है. बगैर राजा के न तो राज्य चल सकता है न ही समाज—‘राजा के बिना नागरिक समाज की कोई गति नहीं है. बिना नेतृत्व के समाज बुद्धिहीन भीड़ बनकर रह जाता है.’ राजा को अतिमानवीय सत्ता मानते हुए जेम्स प्रथम ने उसके अधिकारों और कर्तव्यों को राज्य की समीक्षा से ऊपर माना था. 1616 ईस्वी में न्यायाधीशों की बैठक को संबोधित करते समय उसने कहा था—‘राजा की शक्ति से संबंधित बातों पर चर्चा करना विधिसंगत नहीं है. ऐसा करना राजा की दुर्बलता को दर्शाना तथा उसके प्रति अपने सम्मान भाव को नष्ट करने जैसा होगा. राजा ईश्वर के सिंहासन पर बैठता है.’

जाहिर है समाज में राजा का स्थान ऊंचा रखा गया है. उसकी इच्छा की अवहेलना या अपमान अपराध की श्रेणी में आता था और उसके लिए दंड का प्रावधान था. राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि घोषित करने का ध्येय समाज में उसके निर्णयों के प्रति सम्मानभाव पैदा करने तक सीमित न था. किसी एक या कुछ लोगों को सामान्य से बहुत ऊंचा उठा देने की परिणति दूसरों को, खासकर उन्हें जो सत्ताकेंद्र से दूर हैं, स्वतः ही नीचे ले आती है. यह अंतर सत्ताकेंद्र में दूरी के अनुपात में बढ़ता ही जाता है. उत्तराधिकार प्रणाली का लाभ उठाते हुए शिखर पर यदि ऐसा व्यक्ति आ बैठे जो औसत से बहुत कम प्रतिभाशाली और स्वार्थी हो तो इस प्रणाली के बहुत भयावह परिणाम निकलते हैं. इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब केंद्रीय नेतृत्व की अकुशलता और अदूरदर्शिता का नुकसान जनसाधारण को उठाना पड़ा है. कुल मिलाकर वह निषेधात्मक व्यवस्था थी. उसका मानना था कि बगैर दंड के शांति और सुव्यवस्था असंभव है. दूसरे शब्दों में प्राचीन विधिसंहिता का गठन, समाज के बड़े वर्ग के प्रति अविश्वास की भावना के साथ हुआ था. उसकी कमजोरी थी कि वह समाज को शासक एवं शासित में बांट देती थी, जबकि न्याय की आधुनिक अवधारणा में मानवीय स्वतंत्रता, समानता और सुरक्षा अनिवार्य शर्तें हैं.

राजतंत्र, भले ही उसके शिखर पर मौजूद व्यक्ति चाहे जितना उदार एवं मानवमूल्यों को समर्पित क्यों न हो, कुल मिलाकर व्यक्तिवादी संस्था है. वह एक व्यक्ति को सर्वेसर्वा मानकर काम करती है. वहां शक्तियां किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के हाथों में सीमित रहती हैं, जिसमें बाकी लोग निर्णय प्रक्रिया से कट जाते हैं. ऐसे में यदि राजपद पर कोई कुटिल और स्वार्थी व्यक्ति मौजूद हो तो जनसाधारण एकदम अलगथलग पड़ जाता है. राजतंत्र में समानता और सभी की स्वतंत्रता जैसी बातों को हवाई माना जाता है. उसके अनुसार मनुष्य जन्म से असमान होते हैं. उनमें से कुछ श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न होते हैं, जबकि कुछ निष्कृष्ट और अल्प बुद्धि संपन्न. जो निष्कृष्ट अथवा अल्प बुद्धिमान हैं, उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है. इसके लिए ईश्वर कुछ व्यक्तियों को शासन का अधिकार देकर पृथ्वी पर भेजता है. समाज की एकता एवं अखंडता के लिए बाकी लोगों द्वारा उसके आदेश का पालन करना, ईश्वरीय आज्ञा होती है. राजा ईश्वर के नाम पर राज्य करता है. इस कार्य में धर्म उसके मार्गदर्शन की जिम्मेदारी निभाता है. धार्मिक शक्तियां एक ओर तो राजा के अतिरिक्त अधिकारसंपन्न होने का समर्थन करती हैं. दूसरी ओर यह दावा भी किया जाता है कि ईश्वर की निगाह में सभी बराबर हैं. उस समय वे प्रकृति और ईश्वर में भेद नहीं कर पातीं. जबकि प्रकृति की विशेषता है कि वह भेद नहीं करती. सभी के साथ समानतापूर्ण एवं पारदर्शी व्यवहार करती है. इसके बावजूद वे अवसर मिलते ही न्याय प्रदाता शक्ति के रूप में ईश्वर को बीच में ले आते हैं. उस समय प्रकृति को ईश्वर में समाहित मान लिया जाता है, जो न तो दृश्यमान है, न ही प्रामाणिक. परिणामस्वरूप मूर्त्त सत्य अमूर्त्तन में ढल जाता है. जनसाधारण को भरमाने के लिए सहज प्राकृतिक घटनाओं की मनमानी और स्वार्थपूर्ण व्याख्याएं चलती रहती हैं. जनसाधारण उनके वितंडा में उलझकर रह जाता है. इससे धर्माधारित विधानों की कमजोरी को समझा जा सकता है. विभिन्न किस्म की आस्थाओं और वितंडाओं में उलझा व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि ईश्वर की निगाह में यदि सब बराबर हैं तो समाज में भीषण असमानता क्यों है? किसी व्यक्ति के पास दूसरे को दंडित करने का अधिकार कहां से आता है? और शिखर पर विराजमान, खुद को स्वयंभू, सर्वशक्तिमान, सर्वोपरि और निरंकुश समझने वाला ईश्वर समानता का समर्थन भला कैसे कर सकता है. लोगों को उलझाने के लिए प्रायः वे कहते हैं कि सबकुछ नियतिबद्ध होता है. आदमी के बस के बाहर. कठपुतली की भांति मनुष्य की नियति उसको बस सहते जाना है.

यदि यह मान लिया जाए कि समाज को व्यवस्थित रखने के लिए राजा का होना आवश्यक है, ईश्वर स्वयं उसका विधान रचता है, तो राजा के औचित्य पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. बावजूद इसके यहां एक प्रश्न अनायास सामने आता है कि यदि सभी कुछ पूर्वनिर्धारित और नियतिबद्ध है तो दोषी को, उसका अपराध चाहे जो भी हो, दंडित करने का औचित्य नहीं रह जाता. इस विचार के साथ ही न्यायआधारित समाज की संकल्पना भी सवालों के घेरे में आ जाती है. चूंकि धार्मिक स्थापनाएं आस्था और विश्वास पर चलती हैं, इसलिए वहां तर्क की कोई गुंजाइश नहीं रहती. बल्कि कई बार तो संदेह करना भी कुफ्र मान लिया जाता है. उसकी खूबी भी यही है कि अपनी सहजता और किस्सेकहानियों की मदद द्वारा वह बहुत आसानी से लोकसंस्कृति का हिस्सा बन जाती है. मनुष्य उन्हें इतनी गहराई से आत्मसात् करता है कि उनपर किसी भी प्रकार के संदेह, शंका आदि का विचार उसके दिमाग में नहीं आता. लोक की जुबान पर चढ़ी ये कहानियां शिखर पर मौजूद लोगों तथा बेमेलकारी विचारों का गुणगान करती हैं. जनसाधारण अपने रोजमर्रा के कार्यों के संपादन हेतु इन्हीं से प्रेरणाएं लेता हैं. सामान्य परिस्थितियों में इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. लेकिन यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की चुनौती का मसला हो या ऐसा ही कोई दूसरा मसला, जिसमें नागरिकअस्मिता दाव पर लगी हो, तथा उसके समाधान के लिए तर्क और विश्वसनीयता जरूरी आन पड़े—वहां यह व्यवस्था असफल होती जाती है.

यह कहना तो ज्यादती होगी कि समाज में धर्म की भूमिका हमेशा नकारात्मक रही है. संगठित धर्म भले ही दोढाई हजार वर्ष पुराने हों, मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं उसी समय से उसके साथ जुड़ी हैं, जब उसने सोचनासमझना आरंभ किया था. आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को स्थायी रूप देने की कोशिश के फलस्वरूप ही धर्म का विकास हुआ था. बाद में आध्यामिक शक्तियों के प्रति मनुष्य के सम्मानभाव एवं डर को देखते हुए उनका उपयोग समाज को अनुशासित करने के लिए किया जाने लगा. उससे एक वर्ग ऐसा पनपा, जिसने ईश्वर को जाननेसमझने से अधिक उसके महिमामंडन पर जोर दिया. उससे समाजीकरण के साथसाथ विकसित होते नैतिक मूल्यों की व्याख्या भी धर्म और राजसत्ता के स्वार्थानुरूप की जाने लगी. सामंती संस्कार और जीवन की बढ़ती चुनौतियों के बीच लोगों को यह सहज भी लगा. कालांतर में नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक विश्वास एकदूसरे में इतने गड्डमड्ड हो गए कि धर्म और नैतिकता को परस्पर पर्याय मान लिया गया. वह संस्कृति और विकास दोनों की दृष्टि से प्रतिगामी चलन था. अध्यात्म एवं संस्कृति दोनों सतत नवोन्मेषी और पुरोगामी रहें, तभी उनकी सार्थकता है. आस्था और विश्वास में ढल जाने से उनकी स्वाभाविक वृद्धि रुक जाती है. यही हाल नैतिकता का भी है. मनुष्य नैतिक मूल्यों से प्रेरित होता है. उनसे अपनी सभ्यता और संस्कृति का अलंकरण करता है. लेकिन नैतिक मूल्य, कुछ प्राकृतिक मूल्यों को छोड़कर सतत परिवर्तनशील रहते हैं. इसी में उनकी गरिमा है. धर्म का हिस्सा बन जाने के बाद मनुष्य के विवेकीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध होने लगती है. परिणामस्वरूप समाजीकरण की प्रक्रिया में भी अवमंदन का दौर शुरू हो जाता है. धर्म की इस दुर्बलता को सहस्राब्दियों पहले समझ लिया गया था. भारत में मक्खलि घोषाल, अजित केशकंबलि, कौत्स ने धर्म को गुरुडम और पाखंड में ढालने के और पुरोहितवर्ग की जमकर आलोचना की थी. वहीं बुद्ध ने धर्म के नाम पर चलने वाले कर्मकांडों एवं आडंबरों का तर्कसम्मत प्रतिकार किया. लेकिन वास्तविक सफलता 15वीं शताब्दी के बाद, उस समय मिलनी शुरू हुई जब प्रौद्योगिकीकरण ने वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की राह प्रशस्त की. उससे जनसाधारण के लिए सामंतवाद के चंगुल से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त हुआ. मशीनीकरण से नए मध्यवर्ग का विकास हुआ. कालांतर में उसने अपने बुद्धिजीवी पैदा किए, जिन्होंने असमानताकारी व्यवस्थाओं के विरोध में बौद्धिक एवं राजनीतिक आंदोलनों का सूत्रपात किया.

हॉब्स, लॉक, रूसो आदि प्राचीन विचारकों का योगदान यह भी है कि उन्होंने न्याय और सुशासन जैसी व्यवस्थाओं को धर्म और सामंतवाद के चंगुल से निकालकर तर्कसम्मत बनाने का काम किया. उसके फलस्वरूप लोगों ने प्रश्न करना सीखा. हॉब्स यद्यपि राजतंत्र का समर्थक था. लेकिन वह उसमें सुधार चाहता था. उसने राजा के दैवी अधिकारों का निषेध किया है. इस तरह वह जेम्स प्रथम, राबर्ट फिल्मर आदि की उस विचारधारा को खारिज करता है, जो उस समय प्रचलित थी. जेम्स प्रथम की भांति फिल्मर का भी विश्वास था कि राजा की सत्ता तथा उसकी शक्तियां ईश्वरप्रदत्त होती हैं. कि राजा का आदेश और उसकी इच्छा अपने आप में स्वतः प्रमाण है. फिल्मर राजनीति को धर्म में समाहित कर देता है. समकालीन उदारवादियों की भांति हॉब्स यह मानने को तैयार नहीं था कि राज्य की शक्तियां सम्राट और सांसदों के बीच विकेंद्रीकृत होनी चाहिए. इसके समानांतर हॉब्स जो वैचारिकी प्रस्तुत करता है, वह अपने समय का कदाचित सबसे क्रांतिकारी सोच था. वह जोर देकर कहता है कि राज्य की शक्तियां तथा उसके संकल्प उसकी सदस्य इकाइयों की निजी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर निर्भर करते हैं. समाज में किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरों पर शासन करे. उसकी इच्छाओं का दमन कर अपनी इच्छाएं थोपे. हॉब्स नागरिकों को अधिकार देता है कि अपने सुख, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं. इस तरह नागरिकों की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है, लेकिन स्वतंत्रता का आशय कुछ भी करने की स्वच्छंदता नहीं है. आधुनिक विचारकों की भांति हॉब्स का भी मानना था व्यक्ति की आजादी अन्य नागरिकों के सुख और सुविधा पर निर्भर करती है. समाज में किसी को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि अपने सुख के लिए वह दूसरों के हितों की बलि चढ़ाए अथवा उन्हें किसी भी प्रकार से कष्ट दे. इस परिस्थिति में हॉब्स राज्य के समर्थन में खड़ा नजर आता है. समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए वह राज्य को असीमित अधिकार दे देता है. इस तरह हम उसके विचारों में परंपरा और आधुनिकता के बीच झूलता हुआ पाते हैं. असल में वह विचारों के इतिहास का वह क्रांतिकारी दौर है, जब पुराने विचार अप्रासंगिक लगने लगते हैं, जबकि नए विचार केंद्र में आने के संघर्षरत होते हैं. वैचारिक संवेदनशीलता का परिचय देता हुआ हॉब्स दोनों के बीच संतुलन बिठाने की सफल कोशिश करता है, और अपने उत्तरवर्त्ती विचारकों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है.

हॉब्स के पश्चात न्याय और सामाजिक समानता के ध्येय को लेकर जिन विचारकों का उल्लेखनीय योगदान है, उनमें जान लॉक, रूसो, डेविड ह्यूम, इमानुएल कांट, बैंथम, जान रॉल्स आदि का नाम लिया जा सकता है. इनमें से लॉक एवं रूसो ने न्याय को लेकर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया, उनका मुख्य योगदान राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में है. लेकिन जिस आग्रह और तर्कसम्मत ढंग से वे स्वतंत्रता और समानतासंबंधी मुद्दों को उठाते हैं, और विशेषकर मानवस्वातंत्र्य के लिए जमीन तैयार करते हैं, आगे चलकर उन्हीं से सामाजिक न्याय की नई संकल्पनाएं जन्म लेती हैं. मसलन आदर्श राज्य को कैसा होना चाहिए? आदर्श राज्य में नागरिकों के क्या कर्तव्य हैं? समानता, सुरक्षा और स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राजनीति का स्वरूप कैसा हो? इन सब विषयों पर उन्होंने विस्तार से लिखा है. कहने की आवश्यकता नहीं कि आधुनिक राजनीति पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा है. कालांतर में उन्हीं की प्रेरणा से आधुनिक विधिसंहिता के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ. इस आधार पर लॉक एवं रूसो को युग प्रवर्त्तक दार्शनिकों की श्रेणी में कहा जा सकता है. जान लॉक(1632—1704) अनुभववादी दार्शनिक था. मानता था कि मनुष्य अपने अनुभवों से सीखता है तथा अपने विवेक द्वारा ज्ञान को आगे बढ़ाता है. प्राकृतिक रूप से सभी मनुष्य समान हैं. जन्म के आधार पर न तो किसी को शासक घोषित किया जा सकता है, न ही यह मान लेना चाहिए कि कोई व्यक्ति केवल शासित होने के लिए जन्मा है. प्रकृति सभी प्राणियों के साथ समभाव का प्रदर्शन करती है. स्वतंत्रता स्वयं प्राकृतिक देन है. आदर्श राज्य वही है जो मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का संरक्षण करने में सक्षम हो. जिसमें नागरिक अपनी अधिकतम सुख और सुरक्षा का अनुभव कर सकें. इसके लिए व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की पूरीपूरी स्वतंत्रता आवश्यक है. इसका आशय यह नहीं है कि प्राकृतिक विधान सभी को सभी कुछ करने की आजादी देता है. न ही किसी नागरिक को यह अधिकार होता है कि अपने सुख के लिए ऐसे कार्य करे, जिससे दूसरों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप होता हो. आदर्श राज्य का अभिप्राय ऐसे भूराजनीतिक क्षेत्र से है जहां व्यक्ति को वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो, जिसमें वह दूसरे के सुख एवं स्वतंत्रता को बाधित किए बिना अपने सुख और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अधिकतम स्तर तक कर सके. लॉक मानता था कि मनुष्य मूलतः स्वार्थी होता है. इसलिए उसने किसी कदम की सीधी व्याख्या संभव नहीं है. प्रकृति हालांकि सभी प्राणियों के साथ समानता का भाव रखती है, लेकिन उन लोगों के सुधार हेतु जो स्वार्थवश प्राकृतिक नियमों की अवहेलना करते हैं, कोई तर्कसम्मत व्यवस्था उसके पास नहीं होती. प्राकृतिक न्याय अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है. किंतु समाज में रहते हुए अधिकतम स्वतंत्रता के भोग की उसमें कोई व्यवस्था नहीं होती. यही कारण है कि प्राचीन न्यायसंहिताओं में जो प्राकृतिक न्याय के अपेक्षाकृत करीब थीं, मृत्युदंड और अंगभंग जैसी सजाओं को सामान्य समझा जाता था.

लॉक के अनुसार प्राकृतिक न्याय ईश्वरीय भाव से प्रेरित होता है. इसलिए उसमें प्राणिमात्र के प्रति समानता और स्वतंत्रता का भाव होता है. यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता अथवा अस्मिता पर संकट आ पड़े तो ईश्वरीय न्यायव्यवस्था चरमराने लगती है. उस अवस्था में पुरोहितवर्ग या तो नियतिवादी समाधान सुझाने लगता है अथवा किसी चमत्कार की उम्मीद में वास्तविकता से कट जाता है. दोनों अवस्थाओं में पीडि़त व्यक्ति को न्याय नहीं मिल पाता. समाधान की धर्मसम्मत व्यवस्था, चुनौतियों का सामना करने के बजाय उनसे पलायन की प्रेरणा देती है. समस्या के विधिसम्मत समाधान हेतु लॉक हॉब्स की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की अवधारणा को आगे कर देता है. अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘सेकिंड ट्रटीज आफ दि गवर्नमेंट’ में वह लिखता है कि जीवन, संपत्ति एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु नागरिकों को परस्पर एकजुट होकर सामान्य हितों के लिए ‘सामाजिक संविदा’ के अनुरूप कार्य करना चाहिए. वह कामना करता है कि नागरिकगण बजाय व्यक्तिगत लाभ के संपूर्ण समाज के लाभों के लिए एकजुट होंगे. उस समय उनके समक्ष दो उद्देश्य हो सकते हैं. पहला उस समाज की रूपरेखा बनाना या सपना देखना, जैसे समाज की कामना वे अपने लिए करते हैं. दूसरी उस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अनिवार्य संकल्पबद्धता. प्राकृतिक एवं धर्मकेंद्रित समाजों में यह काम दैवी शक्ति के भरोसे होता है. इसलिए वहां नागरिकों में आत्मविश्वास की कमी सहज ही देखने को मिलती है. आकस्मिक चुनौती के समय वे प्रायः बिखर जाते हैं और उद्धार के लिए चमत्कारों की उम्मीद में जीने लगते हैं, जो विकास को नकारात्मक दर से प्रभावित करती है. चूंकि इतिहास चक्र में वापस लौटना संभव नहीं होता, इसलिए समाज में दो प्रकार की शक्तियां प्रभावी होती हैं. लोगों की परिवर्तन की वांछा जो चमत्कारों और जनसंकल्प के बीच कहीं झूलती रहती है. दूसरा अतीत के प्रति अतिरेकी लगाव जो धर्म और परंपरा के जरिये मानवस्वभाव का जटिल हिस्सा बन जाता है. अंतर्द्वंद्वों में फंसा समाज इन्हीं के बीच कहीं झूलता रहता है.

प्राकृतिक अथवा धर्मकेंद्रित समाजों के राजनीतिकरण का आरंभ सामान्य हितों की पहचान तथा उनके लिए एकजुटता बरतने से होता है. उसके अगले चरण में नागरिकों को अपने मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए कुछ हितों का बलिदान देना पड़ सकता है. जिसमें उनकी स्वतंत्रता के एक हिस्से में कटौती भी संभव है. किंतु समाजीकरण के वृहद उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य अवस्था है. समाजीकरण की यह प्रक्रिया सामान्य सहमति के आधार पर गठित सरकार के तत्वावधान में होनी चाहिए. उसमें नागरिकों की सविवेक भागीदारी भी अपेक्षित है. थामस हॉब्स ‘सामाजिक संविदा’ का प्रमुख सिद्धांतकार है. उसका समर्थन करने के साथसाथ लॉक उसके परिष्करण की संभावनाओं का भी विवेचन करता है. उसे आगे बढ़ाते हुए रूसो व्यक्ति, समाज एवं राज्य के संबंधों को लेकर आदर्शोन्मुखी व्यवस्था की कामना के साथ सही मायने में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की रचना करता है. उसे विश्वास था कि नागरिकगण अपनी स्वतंत्रता, समानता और जीवन के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेंगे. रूसो का जीवनकाल यूरोपीय इतिहास का ऐसा दौर है, जब वह अपनी बौद्धिक चेतना के एकदम शिखर पर था. लॉक की भांति वह भी व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति अधिकारों का तीव्र समर्थक था. आस्था, विश्वास और परंपरा के स्थान पर वह मानवीय विवेक को महत्त्व देता है. ऐसे समाज की रूपरेखा पेश करता है, जो आपसी सहयोग और सामान्य विवेक द्वारा अनुशासित होता है. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता और समानता का समर्थक होने के कारण लॉक और रूसो का न्याय की आधुनिक अवधारणा को विकसित करने में बड़ा योगदान है. जबकि रूसो की कृति ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की गिनती कार्ल मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के साथ विश्व की उन तीनचार अतिमहत्त्वपूर्ण पुस्तकों में की जाती है, जिनकी आधुनिक विश्व को गढ़ने में विलक्षण भूमिका रही है.

मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक रूसो की प्रसिद्ध उक्ति है—‘मनुष्य आजाद जन्मता है, किंतु वह हर जगह बेडि़यों में है.’ ये बेडि़यां कहां से आती हैं? कैसे प्रभावी हो जाती है और कैसे अल्पसंख्यक अभिजन, बहुसंख्यक जनसामान्य को छोटेछोटे हिस्सों में बांटकर उन्हें अपना दास और आश्रित बना लेता है? यदि रूसो की माने तो बंधन मनुष्य के चारों ओर से प्रभावी रहते हैं. हर कोई मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता पर डाका डालने को तत्पर रहता है. जबकि प्राकृतिक राज्य में मनुष्य अपनी स्वाधीनता के अधिकतम हिस्से भोग कर रहा होता है. कानून और समाज की मर्यादाएं वहां आड़े नहीं आतीं. प्रौद्योगिकी द्वारा नियंत्रित समाज में प्राकृतिक राज्य की वापसी सुदूर इतिहास का हिस्सा बन चुकी है. मनुष्य तकनीक पर इतना आश्रित है कि उनसे मुक्त जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता. चूंकि आधुनिक प्रौद्योगिकी महंगी है. उसपर निरंतर ऐसे लोगों का अधिकार बना रहता है, जिनके वर्गीय स्वार्थ मानवकल्याण की भावनाओं पर सदैव भारी पड़ते हैं. प्रौद्योगिकी के बल पर वे अकूत मुनाफा बटोरते हैं. फिर उसका एक हिस्सा शोध और प्रौद्योगिकीय प्रौन्नति हेतु करते हैं. उससे आर्थिक और सामाजिक अंतर बढ़ता ही जाता है. संक्षेप में आधुनिक समाज की समस्याएं आधुनिक जीवनशैली की देन हैं, जिसके प्रति मनुष्य का बेहद लगाव है. हमारी कमजोरी है कि विचारधाराओं के मामले में प्रायः रूढ़ दृष्टिकोण अपनाते हैं. यह जान ते हुए भी कि आधुनिक समाज की समस्याओं के समाधान हेतु आधुनिक विचार आवश्यक है, हम समाधान के लिए प्राचीन धर्मग्रंथों और परंपराओं में झांकते रहते हैं. प्राकृतिक राज्य की महत्ता अपनी जगह स्वयंसिद्ध है, लेकिन यदि कोई आधुनिकता द्वारा उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्राकृतिक राज्य में चाहे तो सिवाय पलायन के उसके कुछ और हाथ नहीं लगने वाला. दूसरी ओर यह भी सच है कि शिक्षा और संसाधनों ने मनुष्य को पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक बनाया है. इसलिए परंपरागत राज्य की नीतियां, जिसमें निर्णय ऊपर से थोप दिए जाते थे, उसे रास नहीं आतीं.

थोरो, एडबर्ड कारपेंटर, गांधी, रसेल आदि का विचार था कि आधुनिक समाज की अनेक समस्याएं अतिरेकी मशीनीकरण की देन है. सुविधाओं की चाहत तथा उसके लिए अंधाधुंध मशीनीकरण ने अनियोजित विकास को जन्म दिया है. रूसो ने इसकी कल्पना करीब ढाई सौ वर्ष पहले ही कर ली थी. उसका विचार था कि प्राकृतिक राज्य में मनुष्य इच्छाओं के संबंध में मुक्त होता था. जरूरत की वस्तुओं पर किसी का एकाधिकार नहीं था. आवश्यक श्रम के उपरांत मनुष्य उन्हें जुटा ही लेता था. इस कारण उन दिनों गलाकाट स्पर्धा भी नहीं थी. आधुनिक मनुष्य की इच्छाएं उसकी आवश्यकता के आधार पर जन्मने के बजाए बाजारवादी प्रलोभनों, दूसरों से पिछड़ जाने के भय तथा भौतिक लालसाओं द्वारा पैदा होती हैं. वे समाज में अनावश्यक स्पर्धा को जन्म देती हैं. रूसो के अनुसार आधुनिक समाज की समस्याएं मुक्ति की न होकर स्वतंत्रता के हृास के कारण जन्मी है. ऐसे में मनुष्य परस्पर सहयोग तथा एकदूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए अधिकतम स्वतंत्रता का भोग कर सकता है. प्राकृतिक राज्य की प्रशंसा करने के बावजूद वह उसकी ओर लौटने पक्ष में न था. उसका मानना था कि उसमें सबकुछ अव्यवस्थित रहता है. उसे हम ऐसा भूक्षेत्र मान सकते हैं जिसमें प्रत्येक नागरिक अपनी शक्ति के सर्वोच्च शिखर पर हो सकता है. लेकिन संगठन के अभाव में व्यक्ति की शक्तियां, एकदूसरे के साथ क्षुद्र स्पर्धा में अकसर व्यर्थ चली जाती हैं. कई बार तो व्यक्ति अपनी शक्तियों और कार्यक्षमता का अनुमान तक नहीं लगा पाता. आकस्मिक संकट के समय ऐसे समाज में व्यक्ति एकदम अकेला पड़ जाता है. मानवीय स्वतंत्रता और विकास की दृष्टि से भी प्राकृतिक राज्य सर्वथा निरापद नहीं है. उसकी अपनी कमजोरियां हैं. रूसो के अनुसार प्राकृतिक राज्य में मनुष्य का नैतिक स्तर अपने चरम पर हो सकता है. लेकिन समाज का कोई स्पष्ट चरित्र नहीं बन पाता. इससे व्यक्ति और समूह के स्तर पर असंतोष पलता रहता है. परिणामस्वरूप व्यक्ति की उच्च नैतिकता भी निष्प्रभावी होकर रह जाती है. परंपरा और आधुनिकता के बेमेल गठबंधन से पैदा द्वंद्व उसे ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की प्रेरणा बनता है.

रूसो के जीवनकाल तक मशीनी क्रांति आरंभ हो चुकी थी. मध्यवर्ग का उभार तेजी पर था. उसके फलस्वरूप सामाजिक उथलपुथल जारी थी. इसी के साथ जारी था, नए सामाजिक संबंधों के गठन का सिलसिला. प्रमुख चुनौती मशीनों के आगमन से उत्पन्न मानवीय अवमूल्यन की चुनौतियों से निपटने की थी. रूसो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बडे़ पूंजीपतियों के हाथों में देखकर भविष्य का अंदाजा लगा चुका था. उसका विचार था कि मनुष्य की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याएं आधुनिक विकासमान समाजों की देन हैं. वह ‘सोशल कांट्रेक्ट’ का आरंभ ही इन शब्दों से करता है—‘मनुष्य मुक्त जन्म लेता है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में हैं.’ ये बेड़ियां कभी सामाजिक शुचिता के नाम पर थोपी जाती हैं, कभी कानून, तो कभी मनुष्यता की भलाई के नाम पर. लेकिन हर बार ये मनुष्य की स्वतंत्रता का एक हिस्सा हड़प लेती हैं. मानवीय स्वतंत्रता की सलामती के लिए आवश्यक है कि उन श्रंखलाओं को तोड़ा जाए. पुस्तक में वह उन सभी विसंगतियों की विवेचना करता है जो मानवीय स्वतंत्रता को बाधित कर सकती हैं. उसके अनुसार राजनीति का मुख्य उद्देश्य मनुष्य की स्वतंत्रता, जो समाजार्थिक असमानता, विद्वैष भाव आदि से संकटग्रस्त है, को वापस दिलाना है. यह कार्य किसी सरकार या सत्ता के भरोसे संभव नहीं है. क्योंकि वे वर्चस्व की भावना को कभी त्यागने वाली नहीं है. उसके लिए पीड़ित पक्षों को स्वयं आगे आना होगा. अधिकतम स्वतंत्रता का लक्ष्य एकदूसरे की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के साथ ही प्राप्त किया जा सकता है. हॉब्स और लॉक की भांति रूसो भी इच्छाओं के सामान्यीकरण पर बल देता है. उसके अनुसार सामान्यीकृत इच्छा का आशय समाज की ऐसी सम्मिलित इच्छा से है जिसे वह विकास के अन्यान्य अवसरों, तकनीकों के बीच से अधिकतम लाभकामना के साथ चुनता है. रूसो उस समय पूर्ववर्ती प्रकृतिवादी विचारकों के समर्थन में उतर आता है, जिनका विचार था कि प्राकृतिक रूप से सभी बराबर हैं. प्रकृति की ओर से सभी मुक्त भी हैं. जिस तरह प्रकृति में सामंजस्य की अनूठी भावना और तालमेल है, वह चाहती हैं प्राणिमात्र में भी इसी प्रकार के सहयोग और सामंजस्य की भावना हो. सृष्टि का एकमात्र विवेकवान प्राणी होने के नाते मनुष्य का दायित्व अन्य प्राणियों से कहीं अधिक है. इसलिए उसे चाहिए कि वह ऐसे कार्य करे, जिससे प्राणिमात्र की स्वतंत्रता और समानअधिकारिता की रक्षा हो सके. ध्यान रखे कि प्रकृति सभी को एकदूसरे के साथ सहयोग करने की अनुमति तो देती है, मगर एकल अधिकार किसी का भी पसंद नहीं करती. तदनुसार पृथ्वी के जितने भी उपहार हैं, वे सबके लिए हैं. मगर वह स्वयं भी किसी एक की न होकर सबकी है. चाहती है कि लोग उसके उपहारों का मिलजुलकर भोग करें. किसी भी प्रकार का दुराव या स्पर्धा उनमें न हो.

रूसो का विश्वास था कि व्यवस्थित समाज की रचना केवल आपसी सहमति के आधार पर संभव है. समाज की वास्तविक स्थापना ही तब होती है जब अलगअलग नागरिक मिलकर प्रबुद्ध जनता में ढल जाते हैं. यहां ‘प्रजा’ और ‘जनता’ के सूक्ष्म भेद पर कुछ चर्चा प्रासंगिक होगी. दोनों में वही अंतर है जो बाड़े में बंद भेड़ों तथा जंगल में मुक्त विचरने वाले प्राणियों के बीच होता है. प्रजा अपने अधिकतम अधिकार राजा को सौंपकर उसकी इच्छा की अनुगामी हो जाती हैं. यहां तक कि उसके जीवन पर भी उसका अधिकार नहीं रहता. उसमें राजा और राजकुल के सदस्यों का जीवन साधारण प्रजाजन के जीवन से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए राजा अथवा राजकुल के किसी सदस्य को बचाने के लिए एक या अनेक प्रजाजनों की बलि पर भी वहां कोई सवाल खड़े नहीं करता. प्रायः ‘स्वामीभक्ति’ या ‘राजभक्ति’ कहकर उसका महिमामंडन किया जाता है. प्रजा के उलट जनता अधिकतम अधिकार अपने पास रखती है. जागरूक जनता को दास नहीं बनाया जा सकता. यदि कहीं ऐसा प्रतीत होता तो समझ लेना चाहिए कि वहां की जनता बनावटी किस्सों को सुनतेसुनते अपने आत्मबल को बिसरा चुकी है. प्रबुद्ध जनता अपने सामान्य हितों लिए संगठित होती है. उसके लिए वह अपने शासक स्वयं चुनती है. बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करते हुए चुने हुए अपने प्रतिनिधि को उतने ही अधिकार सौंपती है, जितने शासकीय कर्तव्यों के निष्पादन हेतु आवश्यक हों. वह अपने शासकों पर नजर भी रखती है. यदि उसे लगे कि निर्वाचित प्रतिनिधि कर्तव्यच्युत हैं तो वह उन्हें वापस बुलाने में भी देर नहीं करती. शीर्षस्थ स्वार्थी शक्तियों की कोशिश होती है कि जनता अपना आत्मगौरव बिसराकर प्रजा में ढल जाए. जनताकरण विवेकीकृत जनसमूह की खुद के उत्थान हेतु स्वयंस्फूर्त्त प्रक्रिया है. आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के बाद, प्रजा जनताकरण का सपना देखना आरंभ करती है और फिर धीरेधीरे उस दिशा की ओर अग्रसर होती है. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उसे अनेक जनांदोलनों से गुजरना पड़ता है. उसकी यह गति उसकी आर्थिकसामाजिक स्वतंत्रता के स्तर से तय होती है. कह सकते हैं कि जनता नागरिकों का समूह होने के साथसाथ उसकी उपलब्धि भी है. वह सामूहिकता में विश्वास रखती है. अपने निर्णय स्वयं लेती है. उसके सदस्य नागरिक बहुमत के निर्णयों का सामान्यीकरण करने में माहिर होते हैं. चालाक राजनीतिज्ञ जनता की जागरूकता, विशेषकर ‘बहुमत के निर्णयों का सामान्यीकरण करते रहने की कला’ से घबराते हैं. इसलिए समाज में असमानता के प्रतीकों को इस चतुराई से रोपते हैं कि जनता की एकता प्रभावित हो. वह अलगअलग समूहों में बंट जाए. जिससे उसकी शक्ति एवं ऊर्जा निर्दिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश के बजाए एकदूसरे पर संदेह करने लगे. धीरेधीरे लोग उस षड्यंत्र का शिकार होने लगते हैं.

आशय है कि जनता विवेकवान न हो, या उसका नेतृत्व अकुशल और बेईमान हो तो वह दिग्भ्रमित होकर बड़ी आसानी से भीड़ में ढल जाती है. लोकतंत्र में शासन जनप्रतिनिधियों के माध्यम से चलता है. भीड़ की मानसिकता से प्रभावित जनता अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन तथा उन्हें अनुशासित रखने में चूक जाती है. उस समय जनता की समस्त सर्जनात्मक शक्तियां छोटेछोटे समूहों की विशेषताओं में ढलकर, एकदूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में दम तोड़ने लगती हैं. इससे सामाजिक असंतोष पनपता है और शासन को शांति और सुरक्षा के नाम पर बल प्रयोग करने का बहाना मिल जाता है. स्थिति का लाभ उठाकर स्वार्थी शीर्षस्थ वर्ग जनता द्वारा दी गई शक्तियों का उपयोग स्वयं जनता के ऊपर करने लगते हैं. छोटेछोटे समूहों में विभाजित, भीड़ की मानसिकता से ग्रस्त मनोबलविहीन जनता अपने प्रतिनिधियों पर आश्रित होकर रह जाती है. परिणामस्वरूप लोकतंत्र कुछ लोगों की मर्जी से संचालित होने लगता है. सामाजिक विकास प्रतिगामी रूप ले लेता है और मनुष्य स्वतंत्रता और समानता के अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है. सवाल है कि जनता यदि जागरूक है तो विभाजनकारी शक्तियों का शिकार कैसे हो जाती है? यदि उसे इतनी जल्दी बरगलाया जा सकता है तो प्रजाऔर जनतामें कुछ अंतर ही नहीं रह जाता. यह कठिन पहेली है. दरअसल उन समाजों में जहां भारी असमानता हो, जनसाधारण को संसाधनों की भारी कमी से गुजरना पड़ता हो, वहां रोजमर्रा की वस्तुओं का अभाव अनावश्यक स्पर्धा को जन्म देता है. जिससे उनका ध्यान दूरगामी हितों के बजाए रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित होकर रह जाता है. इससे उसके विवेकीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध हो सकती है. ऐसी समस्याओं से उबरने के लिए जनता को कुशल नेतृत्व और मजबूत संगठन की आवश्यकता पड़ती है.

रूसो न्याय को लेकर सीधे विचार नहीं करता, किंतु सामाजिक असमानता और अन्याय को जन्म देने वाली स्थितियों की गहन विवेचना करता है. वह लिखता है कि स्वतंत्र समाज में व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का सम्मान होता है. अन्योन्याश्रितता की भावना से संगठित समाज में, व्यक्तिगत इच्छाएं सदस्य इकाइयों को व्यक्तिमात्र के हितों की रक्षा हेतु प्रेरित करती हैं. ध्यातव्य है कि रूसो जब व्यक्तिगत हित की बात करता है तो उसकी निगाह में कोई व्यक्ति अथवा समूहविशेष नहीं होता. मानवमात्र के सम्मान, समानता और न्याय की रक्षा हेतु वह पूरे समाज को विराट मानव के रूप में कल्पित करता है. जो भलीभांति जानता है कि उसकी सफलता उसके सभी अंगों के परस्पर तालमेल और मिलजुलकर कार्य करने की योग्यता पर निर्भर है. इसलिए वह अपने प्रत्येक अंग का बराबर ध्यान रखता है. सभी को सम्मान की दृष्टि से देखता है. महसूस करता है कि यदि एक की स्वतंत्रता भी बाधित होती है तो पूरी देह की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है.

रूसो की दृष्टि में व्यक्तिस्वातंत्र्य का मसला सर्वोपरि था. वह किसी भी स्थिति में मानवमात्र की स्वतंत्रता को खतरे में नहीं डालना चाहता. न ही उसमें किसी भी कारण किसी तरह की कटौती की कामना करता है. उसके अनुसार समाज के नियंताओं, जिन्हें जनता की ओर से निर्णय लेने का दायित्व सौंपा गया है, को चाहिए कि वे व्यक्तिमात्र की इच्छा की अवमानना करने के बजाय, इच्छाओं के सामान्यीकरण पर जोर दें. इस कार्य में कुछ समय लग सकता है. किंतु एक बार आदत विकसित हो जाने के पश्चात सामान्य इच्छाएं सामान्य हितों का मार्ग प्रशस्त करने लगती हैं. इनमें से कौनसा रास्ता हितकारी है पहली स्थिति समाज में व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने वाली लग सकती है. इसलिए कोई भला व्यक्ति दूसरी स्थिति, यानी ‘सामान्य इच्छाओं को सामान्य हितों का मार्ग प्रशस्त’ करते हुए देखना चाहेगा. यहां रूसो का विचार अलग है. या यूं कहें कि वह इस लक्ष्य पर सीधे और एकाएक नहीं पहुंचता. यही ‘सामाजिक संविदा’ का प्राणतत्व भी है. रूसो के अनुसार सुव्यवस्थित समाज में कर्तव्य अन्योन्याश्रित होते हैं. अपनी कला और योग्यता के अनुसार मनुष्य जो उत्पादित करता है, वह केवल उसके लिए नहीं होता. उत्पादन के समय उसके दिलोदिमाग में हमेशा यह बोध समाया होता है कि उसके उत्पाद दूसरों के काम आएंगे और उनके ऐवज में वह उन सुविधाओं को प्राप्त कर सकेगा, जिन्हें अकेले अर्जित कर पाना उसके लिए असंभव है. पूंजीवादी समाज में यह इच्छा होड़ में बदल जाती है. उसमें व्यक्ति अपने श्रमकौशल एवं बौद्धिक ज्ञान का लाभ तो उठाना चाहता है, किंतु दूसरे व्यक्तियों के श्रमकौशल का लाभ उन्हें देने में कंजूसी करता है. इस तरह उस तंत्र में हर कोई केवल अपने लिए काम करने लगता है. उससे अपने काम के प्रति उसका अनुराग तथा उसके पीछे निहित सामाजिक लाभ की वांछा पीछे छूट जाती है. परिणामस्वरूप सामाजिक संबंध बजाए नैतिकता और मानवीय मूल्यों के, बाजार तथा उत्पादों के आधार पर बनने लगते हैं. मानवीय स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह बेहद खतरनाक स्थिति है क्योंकि उस अवस्था में मनुष्य की पहचान उत्पादों में सिमटकर रह जाती है. उन्हीं के आधार पर अपने संबंधों का निर्धारण करने लगता है. इससे सामान्य राय बनाने में मुश्किलें आती हैं.

रूसो के अनुसार समाज और व्यक्ति दोनों की स्वयंप्रभुता इसमें है कि पूरा समाज व्यक्तिमात्र के हितों की संपूर्ति को समर्पित हो, वहीं व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह संपूर्ण समाज के कल्याण के निमित्त कार्य करे. यदि पूरा समाज व्यक्तिमात्र के हितों की पूर्ति के लिए समर्पित है तो क्या प्रत्येक आदमी को केवल अपने स्वार्थ की दिशा में काम करने की अनुमति दी जा सकती है? रूसो इसका जोरदार खंडन करता है. उसके अनुसार यह ‘सामाजिक संविदा’ की अवधारणा के विरुद्ध होगा. व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह सामान्य हितों को ही अपना कर्तव्य माने. केवल हितों की अन्योन्याश्रितता ‘सामाजिक संविदा’ को स्थायित्व प्रदान कर सकती है. अतएव ‘सामाजिक अनुबंध’ का सबसे पहली शर्त एक ऐसे प्रस्ताव पर सहमति है जिसमें लोग व्यक्तिगत रूप से सम्मिलित होकर जागरूक ‘जनता’ के रूप में ढलने लगते हैं. उनमें से हर कोई दो बातें भलीभांति जानता है. पहली यह कि व्यक्तिगत स्तर पर उन सभी की जरूरतें तथा रुचियां भिन्न हैं. दूसरी बात उसे यह भी भरोसा होता है कि भिन्न रुचियों, जरूरतों और कार्यक्षमताओं के बावजूद समाज में सामान्य ‘रुचि’ एवं ‘आवश्यकता’ का निर्धारण किया जा सकता है. इस कार्य को वे सब मिलकर, एकदूसरे के अधिकारों का समर्थन और संवर्धन करते हुए आसानी से कर सकते हैं.

सामान्य सहमति के आधार पर अर्जित सुविधाएं व्यक्ति को स्वार्थपूर्ण ढंग से जुटाई गई सुविधाओं की अपेक्षा अधिक सुखसंतोष प्रदान कर सकती हैं. ये प्रेरणाएं उन्हें ‘सामाजिक अनुबंध’ को अपनाने के लिए उमगाती हैं. ‘सामाजिक अनुबंध’ के तहत एकजुट होते समय वे सामान्य रुचि और हितों का चयन करते हैं. उसमें संभव है कि कुछ लोगों को अपने हितों की उपेक्षा होती दिखाई पड़े. लेकिन यह बात उनसे छिपी नहीं रहती. वे जानते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ है कि जो व्यवस्था निर्मित की गई है, वह उनसे कहीं अधिक लोगों को लिए हितकारी है. साथ में उन्हें यह भरोसा भी होता है कि समूह के लोग उनसे अलग नहीं हैं. वे अवश्य उनके हितों का ख्याल रखेंगे. यानी संख्या में कम होकर भी वे उपेक्षित नहीं है. सामान्य इच्छा का हिस्सा न होने पर भी समाज उनकी जरूरतों और चाहतों के प्रति संवेदनशील है—यह विश्वास ही इस व्यवस्था की जान है. इस दायित्व के सफल निष्पादन की जिम्मेदारी ऐसी संस्थाओं की होती है, जिसपर समूह के सभी या अधिकतम सदस्यों का विश्वास हो. प्रत्येक जनसमूह या जनसमुदाय अपने आप में स्वयंभू निकाय होता है. उसकी खूबी है कि उसे अपनी शक्तियां किसी सरकार या सत्ता प्रतिष्ठानों की ओर से प्राप्त नहीं होतीं. बल्कि नागरिकों की ओर से प्राप्त होती हैं. सरकार तथा सत्ता प्रतिष्ठान, यह मानते हुए कि उसे अपनी शक्तियां नागरिकों की ओर से प्राप्त हैं, केवल उन्हें मान्यता प्रदान करते हैं. इसे संस्थान तथा सामाजिक अनुबंध’ की कसौटी कैसे माना जाए? कैसे तय किया जाए कि वह व्यवस्था सफल सिद्ध हुई है? इस प्रश्न का उत्तर देते समय रूसो जरा भी नहीं हिचकता. वह अपने आप में पूरी तरह स्पष्ट है. उसके अनुसार यदि ये प्रबंध सामाजिक विकास की विकृतियों का समाधान खोजने में कामयाब हैं, यदि उसमें ताकत की नहीं, लोगों की सामूहिक इच्छा की चलती है, और समूह किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह के बजाए संपूर्ण समाज के विकास हेतु अपने विवेक एवं ऊर्जा का उपयोग करता है—तो मानना चाहिए कि ‘सामाजिक अनुबंध’ की व्यवस्था सफल हुई है. सहमति के आधार पर क्रियाशील समाजों में शक्ति के प्रयोग को मान्यता नहीं दी जा सकती. यदि फिर भी उनमें महत्त्वपूर्ण फैसले शक्ति के आधार पर लिए जाते हैं, तो मान लेना चाहिए कि उसमें कुछ व्यवस्थागत खोट है. जिसका समाधान समाज के सभी लोगों को गणतांत्रिक भावना के अनुसार खोजना आवश्यक है.

रूसो जब यह कहता है कि ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह जंजीरों में जकड़ा है.’6 तब वह सीधेसीधे प्राकृतिक समाज से आधुनिक समाज तक हुए बदलाव की ओर संकेत कर रहा होता है. अपने सवालों के माध्यम से वह आधुनिक प्रौद्योगिकी युक्त संस्कृति को अनेक सवालों के घेरे में ले आता है. वह बताता है कि प्रकृति आधारित समाज के आधुनिक समाज में बनने तक मनुष्य को अपनी स्वतंत्रता और समानता के बड़े हिस्से का बलिदान करना पड़ा है. मानवीय गरिमा की पुनर्वापसी आधुनिकता की सबसे बड़ी चुनौती है. वह तभी संभव है जब लोगों में एकदूसरे पर पूरी तरह विश्वास हो. वे सामान्य जरूरतों के आधार पर एकदूसरे से जुड़े हों. साथ ही अपनी और दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु समर्पित हों. रूसो प्राकृतिक राज्य की प्रशंसा करता है, किंतु पूरी तरह प्राकृतिक राज्य की ओर जाने से इन्कार कर देता है. उसके अनुसार यह न तो वांछित है न ही उपयोगी है. चूंकि प्राकृतिक राज्य का सबसे बड़ा गुण सामूहिकता था. रूसो उसे आधुनिक राज्यों के लिए भी आवश्यक मानता है. उसके अनुसार मनुष्य को चाहिए कि आधुनिक समाज में रहते हुए प्राकृतिक राज्य की विशेषताओं को प्राप्त करने का लक्ष्य रखे. तदनुसार मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता को लौटाना आधुनिक राजनीति का प्रमुख हिस्सा तथा जीवन का मुख्य उद्देश्य भी होना चाहिए.

सोशल कांट्रेक्ट’ की सैद्धांतिकी ने जिन विद्वानों को प्रभावित किया, उनमें जान रॉल्स प्रमुख हैं. रॉल्स ने समाज को आत्मनिर्भर बनाने, उसमें न्याय की व्याप्ति के लिए रूसो के विचारों का समर्थन किया है. लेकिन ऐसे समाजों में जहां सामाजिकआर्थिक और राजनीतिक स्तर पर भारी असमानताएं हों, न्याय की स्थापना हेतु वह कल्याणकारी शासन की भूमिका को महत्त्वपूर्ण मानता है. लेकिन बिना अनुशासन के अच्छे से अच्छा शासक भी निरंकुश हो जाता है. आधुनिक गणतांत्रिक समाजों में बेहतर शासन चुनने की जिम्मेदारी जनता पर होती है. बेहतर शासन की संभावनाएं कम न हों, उसके लिए जनता के सतत प्रबोधीकरण की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है. कुल मिलाकर समाजीकरण की पहली चुनौती है कि मनुष्य को उसकी अधिकतम स्वतंत्रता किस तरह लौटाई जाए. कैसे लोगों को तैयार किया जाए कि वे अधिकतम लोगों की इच्छाओं के साथ अपनी इच्छा का मेल कर सकें और बहुसंख्यक लोग बराबर यह ध्यान रखें कि समूह का कोई सदस्य अपने आपको उपेक्षित न समझे. रूसो के राजनीतिक दर्शन में राज्य अधिकतम लोगों की हितरक्षण को समर्पित संस्था से अधिक कुछ नहीं है. अपने पूर्ववर्ती विचारकों हॉब्स, जान लॉक की भांति वह मानता है कि प्राकृतिक रूप में सभी मनुष्य समान हैं. प्रकृति किसी को भी किसी पर शासन करने का अधिकार नहीं देती. अतएव शासन यदि आधुनिक राज्यों की अनिवार्यता है तो वही संस्था शासन करने योग्य है जो लोगों की सहमति से बंधी हो. लोग ऐसी संस्था का गठन कर सकें, इसके लिए उनका पूरी तरह मुक्त होना आवश्यक है. रूसो इसके लिए प्रत्यक्ष गणतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करता है, जिसमें नागरिकों की सीधी और सक्रिय भागीदारी हो. ऐसे समाज में लोगों को न्याय के लिए राज्य को ओर ताकना नहीं पड़ता. न्याय नागरिक पहल पर स्वतः हासिल होता रहता है. यही ‘सोशल कांट्रेक्ट’ का अभीष्ट है.

© ओमप्रकाश कश्यप

  1. प्रजा सुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्!— अथर्ववेद।

  2. राजा निर्वाचित होते ही वेन ने खेती में सुधार को अपना लक्ष्य बना लिया. वह ‘विश’ के निवासियों को खेती के लिए प्रेरित करने लगा. पशु पहले भी मनुष्य के साथी थे. खेती के विकास के साथ समाज में उनकी उपयोगिता बढ़ती ही जा रही थी. वेन ने देखा कि यज्ञ में होने वाली बलि से हजारों निर्दोष पशु अकारण मारे जाते हैं. उन्हें बचाकर ‘विश’ को और भी समृद्ध बनाया जा सकता है. यही सोचकर उसने ऋषिगणों से यज्ञों के नाम पर होने वाली पशुबलि पर रोक लगाने को कहा. परिणामस्वरूप ऋषिगण वेन से नाराज रहने लगे. वेन को अपने ऊपर विश्वास था. इसलिए उसने पशुबलि का विरोध करना जारी रखा. वेन का यही आग्रह आगे चलकर उसपर भारी सिद्ध हुआ.

    ऋषियों के आश्रम नदी तट पर बने थे. इस कारण नदी से सटी जमीन पर भी उनका कब्जा था. वेन के प्रयत्नों से ‘विश’ तेजी से विकास की ओर अग्रसर था. अचानक प्राकृतिक आपदा ने उसके सारे सपनों पर पानी फेर दिया. एक के बाद एक कई मौसम बीते, बारिश न हुई. सूखे से नदी तट से दूर की भूमि पपड़ाने लगी. आसमान सूना पड़ने लगा. फसलें झुलस गईं. जिन जनों के अधिकार में वह भूमि थी, उनपर भूख का संकट मंडराने लगा. नदी तट से लगे ऋषिगणों के खेत अब भी लहलहा रहे थे. अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए वेन ने पुरोहितों को बैठक के लिए आमंत्रित किया. उनसे प्राकृतिक आपदा में साथ देने का अनुरोध किया. कहा कि जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आएं. जो है, जितना है, उसे मिलबांटकर संकटग्रस्त लोगों की मदद करें. ऋषिगणों ने मना करने पर वेन ने अपने अधिकार का प्रयोग करना चाहा. नाराज ऋषिगणों ने जनता को वेन के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया. भूख से पीडि़त जन अपना संयम खोते जा रहे थे. नीरक्षीर का विवेक समाप्त हो चुका था. लगातार बढ़ता जनाक्रोश वेन की हत्या के बाद ही शांत हुआ. जनता ने अपने ही चुने राजा की बलि ले ली. ऋषिगणों का काम हो चुका था. सत्ता से निर्लिप्तता दर्शाते हुए उन्होंने वेन के पुत्र पृथु को ‘विश’ का राजा घोषित कर दिया.

  3. विष्णु पुराण, स्कंध प्रथम, अध्याय 13, प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं, रामशरण शर्मा, पृष्ठ 67 से उद्धृत.

  4. दीर्घनिकाय 3, पृष्ठ 93.

  5. In the early days of cosmic cycle mankind live on an immaterial plane, dancing on air in the sort of fairyland, where there was no need of food or clothing, and no private property, family, Government or laws. Then gradually process of cosmic decay began its work and mankind become earthbound, and felt the need of food and shelter. All men lost their primeval glory, distinctions of class(verna) arose, and they entered in agreement with on another, accepting the institutions of private property and the family. With this theft, murder, adultery, and other crime began, and so the people met and decided to appoint one man among them to maintain in return for a share of produce of their fields and herds. He was called ‘the great choosen one’ (Mahasammta), and he received the title of ‘raja’ because the pleased the people.-THE WONDER THAT WAS INDIA, A. L. Basham, page-82.

  6. Man was born free, and he is everywhere in chains” -Rousseau in Social Contract