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ईश्वर और धर्म से मुक्ति : पेरियार और धर्म 

सामान्य

धर्म और राज्य में व्यावहारिक रूप में चाहे जितना अंतर नजर आता हो, उनकी उत्पत्ति का कारण समान है। वह कारण है—व्यक्ति का अहंबोध। यह मान लेना कि वही श्रेष्ठतम है….दूसरों को उसका आदेश मानना ही चाहिए। इन दोनों की अवधारणा उस क्षण जन्मी थी, जिस क्षण किसी व्यक्ति के मन में श्रेष्ठतम होने का एहसास जन्मा था।( यहाँ  धर्म और अध्यात्म को एक-दूसरे से अलग ही रखें तो अच्छा। अध्यात्म का संबंध मनुष्य की आंतरिक और बाह्य: जगत को लेकर उपजी जिज्ञासा और कौतूहल से है। उसमें नवीनता और वैभिन्न्य के लिए भरपूर गुंजाइश होती है। एक ही समूह के अलग-अलग व्यक्ति अपने स्वतंत्र अध्यात्मबोध के साथ जी सकते हैं। उनमें किसी एक का अध्यात्मबोध दूसरे के अध्यात्मबोध की राह में बाधक नहीं बनता। धर्म के साथ ऐसा नहीं है।) धर्म वर्चस्व की भावना एवं स्पर्धा को जन्म देता है। चूंकि राज्य और धर्म की उत्पत्ति का क्षण एक; तथा प्रवृत्ति लगभग समान है, इसलिए उनका इतिहास भी एक-दूसरे से मेल खाता है। अपने-अपने विस्तार के लिए दोनों ने खूब खून-खराबा किया है। चूंकि दोनों के स्वार्थ एक-दूसरे से जुड़े हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर राज्य यह कहकर कि उसने जो किया, धर्म के लिए किया….तथा धर्म यह दावा करते हुए कि उसने जो किया, वही देवेच्छा थी, इसी में सबका कल्याण है—दोनों एक-दूसरे का सुरक्षा-कवच बनते आए हैं। इस कोशिश में दोनों न केवल एक दूसरे की कमजोरियों पर पर्दा डालते हैं, अपितु मनमानी करने का अवसर भी देते हैं।  

समाज और संस्थाओं का स्तरीकरण धर्म की प्रवृत्ति है। वह खुद भी एक बहुस्तरीकृत संस्था है। अपने स्थायित्व के लिए वह पूरी सृष्टि को ‘देवता’ और ‘देवता नहीं हैं’ में बांट देता है। फिर ‘देवता नहीं हैं’ का एक छोटा-सा हिस्सा खुद को उससे अलग कर लेता है। वह स्वयं को ‘देवता’ का विशेषज्ञ और उसका जानकार होने का दावा करने लगता है। अपनी जानकारी के दावे के समर्थन में वह ‘देवता’ को लेकर कुछ चमत्कारयुक्त मिथ गढ़ लेता है। उन मिथों के सहारे ‘देवता’ से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध स्थापित कर, बचे हुए ‘देवता नहीं हैं’ वर्ग के आगे श्रेष्ठतर होने का दावा पेश कर देता है। चूंकि चमत्कार और मिथों से जुड़ी कहानियां सभी को लुभाती हैं, इसलिए आरंभ में केवल मनोरंजन और कौतूहल की वांछा से, ‘देवता नहीं है’ समूह के बाकी लोग उन्हें सहज भाव से अपना लेते हैं। धीरे-धीरे जब वे मिथ और चमत्कार, प्रतीकों, कलाओं, लिखित सामग्री, श्रुति आदि के रूप में अगली पीढ़ी तक, उत्तराधिकार के रूप में पहुँचते हैं, तो आगंतुक पीढ़ी उनके प्रति ठीक वैसी ही निरपेक्ष नहीं रह जाती, जैसी उससे पिछली पीढ़ी थी। नई पीढ़ी उन्हें पिछली पीढ़ी के ‘पवित्र’ अवदान के रूप में सहेजकर रखती है। उसके बाद तो हर नई पीढ़ी के साथ ‘पवित्रताबोध’ का अनुपात बढ़ता ही जाता है। किसी सामान्य घटना, विचार अथवा वस्तु के ‘धर्म’ अथवा ‘टोटम’ बनने के पीछे यही प्रवृत्ति काम करती है। इस बात को शासकवर्ग भी भली-भांति जानता था। वह धर्म की शक्ति का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए करता है। इसलिए यह अन्यथा नहीं है कि भारत में धर्मसत्ता के मजबूत होने का जो समय है, वही समय राजसत्ता के मजबूत होने का भी है। पहली बार गौतम बुद्ध ने दुनिया को संगठित धर्म की ताकत का अहसास कराया था। अशोक ने उसका उपयोग कलिंग युद्ध के बाद बिगड़ चुकी अपनी छवि के सुधार के लिए किया। इससे लोगों को पहली बार धर्म की सांगठनिक क्षमता के बारे पता चला। उसके बाद तो हर राजा अपने मंसूबे साधने के लिए धर्म की मदद लेने लगा। ईसा मसीह और मोहम्मद साहब दोनों को अपने क्रांतिधर्मा विचारों के कारण समाज में विरोध का सामना करना पड़ा था। लेकिन कुछ अरसे बाद जब जनता में उनके विचारों का प्रभाव बढ़ा और लोग उनके प्रति सम्मोहित नजर आने लगी तो राजाओं और राजसत्ता का सपना देखने वाले लोगों ने भी जनता को अपने प्रभाव में लेने के लिए उनके विचारों का इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया। धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने ही साम्राज्यवाद को संभव बनाया है। यही कारण है कि समानता और स्वतंत्रता को मनुष्य का मौलिक अधिकार मानने वाले, लगभग सभी आधुनिक विचारकों ने धर्म और उसके सहारे पलने वाले सांस्कृतिक वर्चस्व की आलोचना की है।

मिखाइल बकुनिन ने कहा था कि धर्म का खास गुण, ईश्वर के महिमामंडन द्वारा मनुष्यता का अनादर करना है। हिंदू धर्म की स्थिति थोड़ी अलग है। हिंदुओं में ब्राह्मण खुद को ईश्वर और धर्म का व्याख्याकार बताकर खुद को बाकी लोगों से अलग कर लेता है। बकौल ‘मनुस्मृति’ वह पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि बनकर रहता है। इसलिए हिंदू धर्म में मनुष्यता का अनादर मुख्यतः गैर-ब्राह्मणों तक, जो कुल आबादी का 90 प्रतिशत हैं, सीमित होकर रह जाता है। इसलिए धर्म और ईश्वर के प्रति चुनौती को ब्राह्मण, अपने अस्तित्व को चुनौती मान लेते हैं। ‘ईश्वर और राज्य’ में बकुनिन ने लिखा है कि ईश्वर, ‘मानवीय गरिमा तथा उसकी स्वतंत्रता के प्रति निश्चित रूप से सर्वाधिक ईर्ष्यालु, सर्वाधिक अहंकारी, सर्वाधिक क्रूर, सर्वाधिक अन्यायी, सर्वाधिक जालिम, सर्वाधिक निरंकुश और सबसे ज्यादा शत्रुतापूर्ण था।’ उसके बनिस्पत शैतान या राक्षस बकुनिन के शब्दों में—‘शाश्वत विद्रोही, प्रथम मुक्त चिंतक तथा मनुष्यता का मुक्तिदाता है। वह पहला प्राणी है जो मनुष्यता की समस्त बंधनों से मुक्ति का सपना देखता है।’ बकुनिन ने यह मुख्यतः बाईबिल के बारे में लिखा है। लेकिन हर धर्म के ‘ईश्वर’ की यही स्थिति है। हर ‘ईश्वर’ अपने पक्ष को अंतिम और सर्वोपरि मानता है। संवाद का अवसर दिए बिना, वह चाहता है कि लोग केवल उसका आदेश मानें। उल्लंघन करने पर दंड के लिए तैयार रहें। मनमानी करना सत्ता का लक्षण है। इसलिए दुनिया में जितने भी ‘ईश्वर’ हैं, वे सत्ता के समर्थन से ही ‘ईश्वर’ बने हैं। सत्ता ने उन्हें गढ़ा ही इसलिए कि ईश्वर के नाम पर वह अपनी मनमानियों को वैध बना सके। एक बार ‘ईश्वर’ स्थापित हो जाए तो सर्वसत्तावादियों का खेल आसान हो जाता है। अपने स्वार्थ को ईश्वरेच्छा बताकर वे अपनी इच्छाओं को अपने अनुयायियों पर थोपने लगते हैं। अनुयायी उनपर तथा उनके गढ़े हुए ईश्वर पर भरोसा करें, इसलिए उसके नाम पर चमत्कारों भरे आख्यान गढ़ लिए जाते हैं। जनता उन्हें धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर सहेजती जाती है। लोक-स्मृति से उन्हें मिटाना असंभव नहीं तो कठिन बहुत होता है। इसके लिए लंबा और सतत बुद्धिवादी संघर्ष अपेक्षित होता है।

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जनता के बीच धर्म का सीधा अर्थ आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वास से है। लोगों को यही बताया भी जाता है वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार इसका अर्थ उन आध्यात्मिक एवं सांसारिक गतिविधियों से भी है, जिन्हें कोई व्यक्ति जाति-विशेष से संबद्ध होने के नाते करता है; अथवा वर्ण-विधान के आधार पर उससे ऐसा करने की अपेक्षा की जाती है। धर्म पर टिके इस जाति-विधान में ब्राह्मण का दर्जा सर्वोपरि है। वही धर्म का मुख्य कर्ता-धर्ता है। इस कारण उसके कुछ विशेषाधिकार भी हैं। जाति चूंकि मानवीय विवेक, चयन के नैसर्गिक अधिकार का निषेध करती है, इसलिए जब से बनी है, तभी से उसकी आलोचना होती आई है। लेकिन कुछ लोगों के लिए वह पवित्र विधान है। अत: जब भी उसपर संकट आता है, या बड़ी चुनौती खड़ी होती है, धर्म उसका सुरक्षा-कवच बन जाता है। धर्म ऐसा क्यों करता है? जाति तो उसकी अनिवार्यता नहीं है। हिंदू धर्म को छोड़ और किसी धर्म में समाज के जातीय विभाजन की अवधारणा नहीं है। हिंदू धर्म में इसलिए है क्योंकि इसका मुख्य कर्ता-धर्ता ब्राह्मण जातिक्रम में भी शिखर पर हैं। शीर्षस्थ शक्ति होने के कारण इस व्यवस्था में वह हमेशा लाभ की स्थिति में रहता है। जब भी जाति को चुनौती मिलती है, वह धर्म और संस्कृति के अपसंस्करण का मुद्दा खड़ा कर देता है। उन्हीं की आड़ में वह जाति को बचा ले जाता है। चुनौतियों के बीच यदि कुछ समजौते करने पड़ें तो करता है, लेकिन अपनी सामाजिक प्रस्थिति और विशेषाधिकारों पर कोई आंच नहीं आने देता। 

जाति-व्यवस्था और उसके सर्वाधिक विकृत रूप छूआछूत को चुनौती देने के लिए धर्म को आलोचना की जद में लाना आवश्यक था। ऐसा किसी न किसी रूप में जाति और धर्म की उत्पत्ति के समय से ही होता आया है। बीसवीं शताब्दी में यदि किसी ने जाति, धर्म और धार्मिक आडंबरवाद,  यहाँ  तक कि धर्म की शीर्षतम परिकल्पना ईश्वर को भी खुली चुनौती दी, तथा अपने स्वार्थ के लिए उनका प्रचार-प्रसार करने वाले पुरोहित वर्ग ब्राह्मणवाद के विरोध में खुलकर संघर्ष किया तो वे थे—ई. वी. रामासामी पेरियार। यद्यपि ज्योतिबा फुले और डॉ. आंबेडकर ने भी हिंदू धर्म में व्याप्त रूढि़यों और आडंबरों के लिए ब्राह्मणवाद को जिम्मेदार माना था। फुले तो उसके जन्मदाता ही थे। फुले ने ‘तृत्तीय रतन’, ‘किसान का कोड़ा’ और ‘गुलामगिरी’ जैसी पुस्तकों में ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा जनसाधारण के शोषण के बारे में बताया है।  ‘गुलामगिरी’ हिंदू धर्म और संस्कृति का विखंडनात्मक पाठ है। डॉ. आंबेडकर ने ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’, ‘जाति का उच्छेद’ जैसी पुस्तकें लिखकर हिंदूधर्म की विकृतियों की बारीकी से पड़ताल की थी। पेरियार ने जनसंवाद का रास्ता अपनाया। ब्राह्मणवाद की कटु आलोचना की; और द्रविड़ संस्कृति को उसके समानांतर लाकर, आमने-सामने की लड़ाई बना दिया था। धर्म और जाति के मामले में वे सीधे उच्छेदवादी थे। देखा जाए तो डॉ. आंबेडकर और पेरियार के बीच यही मामूली अंतर भी है। आंबेडकर जाति को लेकर पूरी तरह उच्छेदवादी हैं। जबकि धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण सुधारवादी था। आरंभ में उन्हें उम्मीद थी कि हिंदू धर्म अपने भीतर सुधार करेगा। ‘जाति का उच्छेद’ पुस्तक लिखकर उन्होंने हिंदू समाज के उस नासूर को सामने लाने का काम किया था, जिससे छुटकारा पाए बगैर हिंदू धर्म का स्वस्थ, मानवीय धर्म बन पाना असंभव था। हिंदू धर्म के नेता, धर्माचार्य उस विकृति का उपचार करेंगे, इसकी वे 20 वर्ष तक प्रतीक्षा करते रहे। इस बीच दूसरे धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन भी करते रहे। अंत में हिंदू धर्म और धर्माचार्यों की ओर से जन्मी निराशा ने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर प्रवृत्त कर दिया।  

1920 से 1927 तक पेरियार भी जाति-व्यवस्था और छूआछूत के कारण हिंदू धर्म पर हमलावर रहते हैं। वे जातीय असमानता और धर्म दोनों की आलोचना करते हैं, परंतु धर्म-सत्ता पर पूरी तरह हमलावर नहीं होते। बदलाव उनकी विदेश यात्रा के बाद आता है। यूरोप और सोवियत संघ की प्रगति देखकर वे अचंभित होते हैं। समानता, सहयोग और सहअस्तित्व के आधार पर बनीं वहाँ की नई सामाजिक संरचना उन्हें लुभाती है। वहाँ से ठेठ बुद्धिवादी बनकर लौटते हैं। यात्रा से पहले केवल हिंदू धर्म उनके निशाने पर था। इसलिए कि वह जातिवाद और छूआछूत को प्रश्रय देता; और उन्हें दैवीय बताता था। धीरे-धीरे समूची धर्मसत्ता उनकी आलोचना की जद में आ जाती है। एक नए पेरियार का जन्म होता है, जो बुद्धिवाद का समर्थक है। तर्क और ज्ञान-विज्ञान को महत्व देता है। समाजवादी राज्य का सपना देखता है। मिजाज से नास्तिक है। धर्मसत्ता पर बगैर हिचके प्रहार करता है। 

इस दृष्टि से उनकी तुलना मिखाइल बकुनिन से की जा सकती है। मार्क्स का विचार था कि ‘शक्तिशाली वर्ग राज्य की मदद से शासन करता है’। ‘राज्य और ईश्वर’ में बकुनिन ने लिखा है कि ‘राज्य शक्तिशाली वर्ग की मदद से राज करता है।’ राज्य कुछ और नहीं, शक्तिशाली वर्ग की इच्छा की परिणति होता है। वह इस तरह छाया रहता है कि शक्तिशाली वर्ग की इच्छा ही राज्य की इच्छा मान ली जाती है। जनसाधारण राजनीति और पूँजीवाद के गठजोड़ को न समझ पाए, इसके लिए वह धर्म की मदद लेता है। इसलिए मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। बकुनिन धर्म के अभिजन चरित्र को उजागर करता है। कहता है कि राज्य और धर्म का अपवित्र गठबंधन कमजोरों और गरीबों की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी बाधा है, अपने स्वार्थ के लिए दोनों उसे विपन्न बनाए रखते हैं। पेरियार मिजाज से अराजकतावादी थे। फिर भी राज्य के प्रति उतने सख्त नहीं थे। कारण यह है कि जिस वर्ग की लड़ाई वे लड़ रहे थे, उसके अधिकारों पर धार्मिक-सांस्कृतिक शक्तियों ने डाका डाला हुआ था। उनके विरुद्ध संघर्ष में राज्य कभी-कभी मददगार की भूमिका निभाने लगता था। उनकी असल लड़ाई ब्राह्मणों तथा उनके धर्म से थी। राज्य के प्रति आलोचक थे तो इसलिए थे कि अपने स्वार्थ के लिए वह पुरोहितवाद को संरक्षण देने लगता है। उनका कहना था कि शूद्रों को ‘वेश्या की संतान’ बनाए रखने के राज्य और ब्राह्मण दोनों मिलकर काम करते हैं। 

अज्ञात का डर समाज में धर्म के लिए जगह बनाता है। इसलिए शूद्रातिशूद्र धर्म की ओर आकर्षित होते हैं। बिना यह जाने कि वे सब व्यवस्थाएं ब्राह्मणों ने अपने वर्गीय हितों को सुरक्षित रखने के लिए बनाई हैं। यह शूद्रातिशूद्रों की अज्ञानता ही है कि उन्होंने अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा मंदिरों में प्रवेश के लिए खपाया है। पेरियार के इस विषय में क्या विचार थे, इसे वायक्कम आंदोलन से समझ सकते हैं। नारायण गुरु ने वायक्कम मंदिर में प्रवेश के अधिकार के लिए शूद्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया था। उन दिनों शूद्रों को चुनींदा मार्गों पर ही चलने का अधिकार था। वायक्कम मंदिर के आसपास से गुजरती सड़कों पर भी उन्हें चलने का अधिकार नहीं था। वायक्कम सत्याग्रह की शुरुआत के बाद एक समय ऐसा आया जब पेरियार को उसमें सहभागी बनने के लिए आमंत्रित किया गया। उनके लिए मंदिर प्रवेश कोई मुद्दा नहीं था। वे सत्याग्रह में शामिल हुए। जीत भी मिली, परंतु उनकी प्राथमिकता, अस्पृश्यों की सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी को लेकर थी। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था—

”महारानी(त्रावणकोर) निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार की खातिर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गाँधी यात्री-भवन में पहुँचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए।”18 

पेरियार नास्तिक कैसे बने? क्यों बने? नास्तिक बनने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली? इसकी खोज करते हुए जी. अलोसियस औपनिवेशिक शासन के दौरान प्रशासनिक बदलावों की शुरुआत तक चले जाते हैं।19 उन्हीं के कारण गैर-ब्राह्मणों को शिक्षा के अवसर मिले। औद्योगिकीकरण से वैकल्पिक रोजगार के अवसर बढ़े। इन दोनों ने जाति-प्रथा को कमजोर करने का काम किया। पहले हिंदुओं के प्रमुख ग्रंथ संस्कृत में थे। उसे पढ़ने-लिखने का अधिकार भी केवल ब्राह्मणों तक सीमित था। इसलिए धर्म की व्याख्या के लिए ब्राह्मणेत्तर जातियां ब्राह्मणों पर निर्भर थीं। जैसा वे कहते वैसा मानना ही पड़ता था। बदले परिवेश में वे सभी ग्रंथ अँग्रेजी और दूसरी यूरोपीय भाषाओं में उपलब्ध होने लगे। धर्म-ग्रंथों को पढ़ने-लिखने से लेकर उनकी आलोचना तक का अधिकार समाज के सभी वर्गों को प्राप्त हो गया। पूर्व-स्थापित मान्यताओं का विश्लेषण कर, उनके नए अर्थ निकाले जाने लगे। इस बीच धार्मिक अंतरण के नए रास्ते खुले। धर्मों के बीच स्पर्धा बढ़ने से उनके काम में लगी शक्तियों को सुरक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा। इससे मनुष्य का आत्मविश्वास बढ़ा और वह मुक्ति के नए आयाम खोजने लगा।

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आधुनिक भारत में नास्तिकता को वापस लाने का श्रेय दक्षिण भारत को जाता है। 1878 में वहाँ ‘मद्रास सेकुलर सोसाइटी’ का गठन हुआ था। उसके सदस्य संख्या में कम, मगर सक्रियता के मामले में बहुत आगे थे। अगले दस वर्षों तक वे धर्मसत्ता और उसके विभिन्न अपररूपों पर लगातार प्रहार करते रहे। ‘असुर’, ‘राक्षस’ आदि जिन्हें हिंदू संस्कृति का खलपात्र माना गया है, की उन्होंने पुनर्व्याख्या की। आर्य-श्रेष्ठता के मिथ को चुनौती दी। धर्म के आलोचना पक्ष को मजबूत करने के लिए ‘दि थिंकर’ नाम का अखबार निकाला, जो नास्तिक विचारों का प्रचार करता था। उसके फलस्वरूप धर्म वैसी पवित्र गाय नहीं रह गया था, जैसा वह पहले था। धार्मिक सुधारों की मांग बढ़ रही थी। पेरियार के समय तक हिंदू धर्म के सुधारवादी और यथास्थितिवादी आमने-सामने आ चुके थे। एक वर्ग आधुनिक विचारों के तत्वावधान में उसका नवोन्मेषण चाहता था। दूसरे को उसकी स्वयं-घोषित महानता पर पूरा विश्वास था। इसलिए वह किसी भी प्रकार के बदलाव का विरोधी था। 

हिंदू धर्म की बढ़ती आलोचना और ब्राह्मणों के यथास्थितिवादी दृष्टिकोण ने असंतुष्टों को करीब एक हजार वर्ष पहले लुप्त हो चुके बौद्ध धर्म की खोज के लिए प्रेरित किया। उसकी शिक्षाओं को अपेक्षाकृत आधुनिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के करीब माना गया। प्राचीन ‘संघम साहित्य’ एवं बौद्ध धर्म के अंतःसंबंधों की खोज से स्वतंत्र द्राविड़ अस्मिता की अवधारणा को बल मिला। इस क्षेत्र में पहल करने वाले थे—आयोथि थास। उन्हें दक्षिण भारतीय समाज में नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है। दक्षिण भारत में प्रचलित जातिप्रथा तथा उसके प्रति लोगों के दुराग्रह पर टिप्पणी करते हुए, आयोथि थास ने कहा था कि द्रविडि़यन आर्यों की जाति-प्रथा को मानते हैं। इस तरह मानते हैं मानो वह उन्हीं का आविष्कार हो। जाति-प्रथा के चलते कृषि, उद्योग, व्यापार, शिक्षा आदि का विकास नहीं हो सकता। क्योंकि ब्राह्मण का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन होता है। क्षत्रिय शासन करता है और व्यापारियों का काम लेन-देन तक सीमित होता है। केवल शूद्र वर्ग ऐसा है जो खेती और उत्पादन दोनों की जिम्मेदारी संभालता है। लेकिन उसे ज्ञानार्जन का अधिकार नहीं होता। उसके अभाव में वह परंपरागत तरीके से ही काम चलाता है। प्राचीन सभ्यताओं में यह निभ सकता था। क्योंकि उस समय मनुष्य की सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय उत्पादक आसानी से कर सकते थे। परंतु वर्तमान में जब मनुष्य की जरूरतें बढ़ती जा रही हैं, परंपरागत ढंग की प्रणालियों से काम चलना आसान नहीं है। इसलिए शोषणकारी जातिप्रथा का उन्मूलन जितनी जल्दी संभव हो, हो जाना चाहिए।‘ थॉस ने अशिक्षित और गरीब जनता को लूटने वाले राजनेताओं को फटकार लगाई थीा उनका कहना था कि वे लोग जनता का हितैषी बनकर उसे लूटने का काम करते हैं। ब्राह्मण कहते हैं कि शूद्रों को वेदादि ग्रंथ पढ़ने का अधिकार नहीं है। इस तरह की भेदभावपूर्ण नीतियों को बनाने वाला ईश्वर हो ही नहीं सकता। वह कुटिल ब्राह्मण अथवा कोई निरंकुश ताकत हो सकता है. ऐसे ईश्वर के प्रति आस्था का प्रदर्शन करने से अच्छा है कि किसी महापुरुष की अभ्यर्थना कर ली  जाए।

आगे बढ़ने से पहले एक बात और। भारत में धार्मिक-सामाजिक सुधारवाद की शुरुआत का श्रेय बंगाल को देने की परंपरा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि राजाराममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशवचंद सेन, देवेंद्रनाथ ठाकुर आदि भारत के आरंभिक सुधारवादियों का संबंध बंगाल से था। उनकी विशेषता, जिसे उनकी कमजोरी भी कहा जा सकता है, थी कि वे हिंदू धर्म की परिसीमा में रहते हुए, धार्मिक-सामाजिक सुधारों को अंजाम देना चाहते थे। धार्मिक-सामाजिक सुधारवाद की समानांतर लहर दक्षिण से भी चली थी, जो अपेक्षाकृत निर्णायक और अधिक परिवर्तनकामी थी। दक्षिण में जन्मे संत अय्यंकालि, आयोथि थास आदि ने वहाँ धार्मिक-सामाजिक सुधारवादी आंदोलनों का नेतृत्व किया था। उनमें और बंगाल के सुधारवादियों में मूल-भूत अंतर यह था कि बंगाल के सुधारवादी हिंदू धर्म के प्रति अधिक आशान्वित थे। मानते थे कि सुधारों के माध्यम से हिंदू धर्म को अधिक मानवीय बनाया जा सकता है। वहीं दक्षिण के सुधारवादी हिंदू धर्म को सुधार का अवसर देना चाहते थे। लेकिन यदि हिंदू धर्म अपेक्षित सुधारों के लिए तैयार नहीं होता है तो उन्हें उसे छोड़ देने से भी गुरेज नहीं था। एक और बड़ा अंतर जिसका संबंध पहले से ही है, वह यह है कि बंगाल और उत्तर भारत के सुधारवादियों का विश्वास था कि यदि हिंदू धर्म में ऊपर के वर्गों में सुधार होता है, तो सुधार की वह प्रक्रिया, प्रकारांतर में निचले वर्गों में भी अंतरित होगी। इसलिए धार्मिक सुधारवाद की पहल उन्होंने समाज के शीर्षस्थ वर्गों के साथ आरंभ की थी। जबकि संत अय्यंकालि, पेरियार जैसे दक्षिण भारतीयों ने अपना कार्यक्रम निचले वर्गों के बीच से शुरू किया था। ठीक ऐसे ही जैसे ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र में किया था। वे निचले वर्गों को मजबूत करके, ऊपर के वर्गों को चुनौती देना चाहते थे कि धर्म, समाज और देश-हित में उन्हें आवश्यक सुधारों को स्वीकार लेना चाहिए। इसके बीजतत्व दक्षिण भारतीय साहित्य और संस्कृति में पहले से ही मौजूद थे। तमिल में तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व के संघम साहित्य से लेकर, संत तिरुवेलुवर तक साहित्य और संस्कृति की प्राचीनतम परंपरा थी, जो आर्य-संस्कृति की श्रेष्ठता के मिथ को नकारती थी। पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन की पृष्ठभूमि में वही विचारधारा थी। पांचवी शताब्दी का जैन काव्य ‘नीलकेसी’ तथा उसकी प्रतिक्रिया में रचा गया, बौद्ध काव्य ‘कुंडालकेसी’ वहाँ बौद्ध एवं जैन धर्म की न केवल उपस्थिति दर्शाता है। बल्कि जिस तरह ‘नीलकेसी’ की प्रतिक्रिया में बौद्ध आचार्य ‘कुडांलकेसी’ की रचना करते हैं, उससे लगता है कि उस समय भारतीय धर्म-दर्शन की ये दोनों शाखाएं दक्षिण में काफी जीवंत रूप में विद्यमान थीं। उनके बीच बहस होती रहती थी। इनके साथ-साथ मक्खलि गोशाल का ‘आजीवक’ संप्रदाय भी हर्षवर्धन के काल तक अपनी उपस्थिति बनाए हुए था। 

नास्तिकता, पेरियार के बचपन के अनुभवों का उपहार थी। उनके पिता की दुकान पर हिंदू साधु-संत आते थे। अधिकांश का मकसद होता था, दान-दक्षिणा के नाम पर कुछ न कुछ ऐंठ लेना। पेरियार ने इसे करीब से देखा था। ब्राह्मणों का लालच देखकर कभी-कभी वे उनका उपहास भी करने लगते थे। इसके अलावा, किशोरावस्था से ही पेरियार को जिन्होंने प्रभावित किया, उनमें से एक थे मुरुथैया पिल्लई। मरुथैया इरोड के ही रहने वाले थे। वे तमिल के प्रखर विद्वान, ओजस्वी वक्ता, जाति, परंपरावाद, धार्मिक आडंबरों और धर्म के कटु आलोचक थे। ब्राह्मण उनके सामने पड़ने से कतराते थे। पेरियार को आलोचना दृष्टि को समृद्ध करने वालों में दूसरा नाम था—कैवल्य सामियार का। मुरुथैया पिल्लई की भांति कैवल्य सामियार भी तर्कवादी और ब्राह्मणवाद के कट्टर आलोचकों में से थे। इन दोनों के जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। पेरियार के जीवनीकार और आत्मसम्मान आंदोलन के नेता चिदंबरानार के अनुसार, इन दोनों की पेरियार के चरित्र-निर्माण में बड़ी भूमिका थी। 

काशी यात्रा के दौरान उनका परिचय हिंदू धर्म की विकृतियों से हुआ था। 1933 में विदेश यात्रा के बाद तो उनका विश्वास धर्म नामक संस्था से बिलकुल उठ चुका था। मास्को पहुँचने पर उन्होंने ‘एंटी रिलीजियस प्रापेगेंडा ऑफिस में अपना पंजीकरण भी कराया था। उनका मानना था कि वर्गहीन समाज की रचना हेतु धर्म से मुक्ति आवश्यक है। सोवियत संघ की प्रगति, वहाँ की सामाजिक रचना से वे इतने प्रभावित थे कि वहाँ से लौटते ही उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलन की वैचारिकी और संगठन में भारी फेरबदल करने का निर्णय किया था। बावजूद इसके सोवियत संघ की तरह सत्ता का सघन केंद्रीकरण, उसकी समस्त कार्यकारी शक्तियों का एक जगह जमा हो जाना—उन्हें स्वीकार न था। भारत के लिए वे उदार साम्यवाद की कल्पना करते थे। उनका मानना था कि ब्राह्मणों की धार्मिक-सामाजिक अधिसत्ता के रहते, भारत में सोवियत मॉडल को लागू कर पाना संभव नहीं है। 7 जून, 1931 के ‘कुदीआरसु’ में उन्होंने लिखा था कि गैर-ब्राह्मणों और अछूतों, गरीब और कामगार लोगों को यदि वे समानता और समाजवाद लाना चाहते हैं, तो सबसे पहले हिंदुत्व को खत्म करना होगा। सोवियत संघ से वे श्रीलंका के रास्ते भारत लौटे थे। वहाँ कोलंबों में दिए गए भाषण में उन्होंने एक बार फिर मनुष्यता, आत्मसम्मान और देश के लिए ईश्वर तथा धर्म का बहिष्कार करने का आग्रह किया था।20

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विदेश यात्रा से लौटने के बाद ‘कुदीआरसु’ में समाजवाद और नास्तिकता विषयक लेखों की संख्या बढ़ी थी। भगतसिंह के लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का तमिल अनुवाद, ‘नान नाथिकन येन’ शीर्षक से पी. जीवानंदम् ने किया था। पी. जीवानंदम् ‘मद्रास प्रांत नास्तिक संगठन’ के सचिव, विचारों से साम्यवादी और पेरियार के सहयोगी थे। ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का प्रथम पुस्तिकाकार प्रकाशन पेरियार द्वारा स्थापित ‘पहुथारिवु पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड’ ने 1934 में किया था। तमिल शब्द ‘पहुथारिवु’ का अर्थ ‘तर्कशील’ है। पुस्तक में पेरियार द्वारा 29 मार्च 1931 को ‘कुदीआरसु’ में भगतसिंह की शहादत पर लिखित संपादकीय को भी शामिल किया गया था। भूमिका में प्रकाशक की ओर से लिखा गया था कि वे भगतसिंह की राजनीतिक विचारधारा से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। पुस्तिका का मूल उद्देश्य आम जनता, विशेषकर नास्तिकों तथा कांग्रेसजनों को भगतसिंह के ईश्वर-संबंधी विचारों से परचाना है। 46 पृष्ठों की पुस्तिका के पहले 40 पृष्ठों पर मूल लेख छपा था। बाद के 6 पृष्ठों में ‘कुदीआरसु’ के संपादकीय को जगह मिली थी। संपादकीय में पेरियार ने भगतसिंह तथा उनके साथियों के साहस और बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। उसमें भगतसिंह द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र के एक अंश को भी उद्धृत किया गया—

‘हमारी लड़ाई निश्चित रूप से उस समय तक चलती रहेगी, जब तक कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में नहीं आ जाती और लोगों के स्तर में जो अंतर है, वह समाप्त नहीं हो जाता। यह युद्ध हमें मार देने से समाप्त नहीं होगा। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप यह संघर्ष हमेशा जारी रहेगा।’

संपादकीय में गाँधी के साथ-साथ लार्ड इरविन की भी आलोचना थी। विचित्र बात यह है कि भगतसिंह द्वारा मूल अँग्रेजी में लिखे गए उस लेख में औपनिवेशिक सरकार को कुछ भी ‘निषिद्ध’ या ‘आपत्तिजनक’ नहीं लगा था। हालाँकि धर्माचायों की आंखों की किरकिरी वह आरंभ से ही था। पेरियार द्वारा तमिल अनुवाद के साथ पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र का संदर्भ जोड़ देने से वह औपनिवेशिक शासकों की दृष्टि में भी ‘अपराध’ बन चुका था। इसलिए पुस्तिका के छपते ही उसका संज्ञान लिया गया। अगस्त 1934 में ‘आपराधिक जांच विभाग’ की स्थानीय शाखा ने उसके बारे में सरकार को लिखा। बिना समय गंवाए सीआईडी ने पुस्तिका की प्रतियां सरकार को भिजवा दीं। मद्रास सरकार के मुख्य सचिव जी.टी.एच. ब्राकेन ने मद्रास सरकार के कार्यालय में कार्यरत तमिल अनुवादक एन. सरवण मुदलियार, से पूरी पुस्तिका का अनुवाद करने को कहा। मुदलियार ने आपत्तिजनक अंशों को हाईलाइट करते हुए, 16 अक्टूबर 1934 को अनुवाद की प्रति ब्राकेन को भेज दी गई। ब्राकेन ने 22 अक्टूबर, 1934 को भारतीय प्रेस(आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम—1931 के अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत पुस्तिका और उससे जुड़ी सामग्री को जब्त करने के आदेश जारी कर दिए। आदेश में पुस्तिका की सामग्री को अधिनियम की धारा 4(1) के अंतर्गत आपत्तिजनक माना गया था। नोटिफिकेशन जारी होते ही, पुस्तिका की प्रतियां जब्त कर ली गईं। तब तक भगतसिंह के विचारों की चिंगारी वडवानल बन चुकी थी। पुस्तिका से प्रेरणा लेकर तरह-तरह के पंपलेट, पुस्तिकाएं, चित्र, कार्टून वगैरह भारी मात्रा में प्रकाशित हो चुके थे। न केवल तमिल, अपितु क्षेत्रीय भाषाओं मलयालम, तेलुगू, कन्नड़ आदि में भी भगतसिंह और उनके साथियों के समर्थन में विपुल सामग्री का प्रकाशन हुआ था। नतीजा यह हुआ कि सरकार द्वारा पुस्तक तथा संबंधित सामग्री, की जब्ती की कार्रवाही, 1938 तक चलती रही। कह सकते हैं कि दक्षिण तक भगत सिंह के विचारों को ले जाने तथा उन्हें लोकप्रिय बनाने में पेरियार की बड़ी भूमिका थी। यह कहना भी अन्यथा न होगा कि जिस परिवेश और परिस्थिति में पेरियार ने वह काम किया, वैसा करने का साहस भी उन दिनों किसी में नहीं था। 

भगतसिंह की पुस्तक के अलावा बर्ट्रेंड रसेल की ‘व्हाई आम एम नाट ए क्रिश्चन’, लेनिन की जीवनी, राबर्ट इंगरसोल की समाजवाद विषयक पुस्तकों के तमिल अनुवाद भी पेरियार के प्रकाशन द्वारा छापे गए थे। उनका मानना था कि ईश्वर, धर्म और उनसे जुड़े अनगिनत कर्मकांड प्रगतिशील समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा हैं। लेकिन समाज में सभी के लिए नास्तिक बन पाना आसान नहीं है। खासकर तब जब कुछ अपवादस्वरूप लोगों को छोड़, लगभग सभी धर्मविहीन जीवन को असंभव मानते हों। इसलिए उन लोगों के लिए पेरियार ने, महज रणनीति के तौर, यह सोचकर कि दबाव में आने पर हिंदू धर्म संभवतः अपने पुनरावलोकन के लिए तैयार हो—उन्होंने इस्लाम और बौद्ध धर्म का समर्थन किया था। हालाँकि व्यक्तिगत जीवन में वे पूरी तरह नास्तिक थे। 1969 में उन्होंने कहा था—

‘मैं मनुष्यता का सुधारक हूं। मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता। मेरे सरोकार केवल और केवल मानव समाज की उन्नत्ति और विकास तक सीमित हैं।’

तमिल नाडु में कम्युनिस्ट आंदोलन की नींव रखने का श्रेय सिंगरावेलु चेट्टियार, जिन्हें लोग सम्मान के साथ ‘सिंगरावेलु’ कहते थे—को जाता है। उन्होंने ही मद्रास में 1 मई 1923 को ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान’ की स्थापना की थी। उसी दिन भारत में ‘मई दिवस’ को उत्सव की तरह मनाने की शुरुआत हुई थी। सिंगरावेलु, पेरियार से बीस वर्ष बड़े थे। दोनों के प्रगाढ़ संबंध थे। धर्म और जाति के प्रति दोनों के विचारों में एकरूपता थी। सिंगरावेलु का कहना था, ‘प्रत्येक धर्म समाज के शिखर पर बैठे लोगों का समर्थन करता है। वह ‘सर्वसंपन्न’ एवं ‘सर्वविपन्न’ के भेद को स्थायी भाव देता है, असमानता को नियतिसिद्ध कहकर मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा-बड़ा मान लेता है। सभी भाई हैं, सभी का एक ईश्वर है, यदि हम अपने आसपास की दुनिया को देखें तो ये बातें एकदम मिथ्या और प्रपंच सिद्ध होती हैं, मगर समाज में इन्हीं पर घमासान छिड़ा रहता है।’

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सिंगरावेलु के संपर्क में आने के बाद पेरियार ने अपने साथियों को ‘कामरेड’ कहना आरंभ किया था। बावजूद इसके पेरियार का मार्क्सवाद, खासकर उसकी वर्ग-संघर्ष की वैचारिकी में ज्यादा विश्वास नहीं था। वे सिंगरावेलु के बुद्धिवादी सोच से प्रभावित थे। उनके आग्रह पर ही सिंगरावेलु ने ‘कुदीआरसु’ के लिए कई विज्ञान-केंद्रित लेख लिखे थे। ‘इरोड कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट भी सिंगरावेलु ने ही तैयार किया था। उस समय सिंगरावेलु ने आत्मसम्मान आंदोलन के नाम को लेकर एक सवाल उठाया था। उनका कहना था कि इसे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ कहना उचित होगा; अथवा ‘अवमानना आंदोलन’?21 इस प्रश्न के पीछे सिंगरावेलु के भीतर छिपा वर्ग-संघर्ष का योद्धा बोल रहा था। ‘अवमानना आंदोलन’ का आशय था, सामाजिक असमानता के लिए लिए जिम्मेदार ‘बुर्जुआ’ सोच वाली शक्तियों का तिरस्कार। उन्हें सीधी चुनौती, तथा उनकी सार्वजानिक भर्त्सना। पेरियार को सीधे टकराव से किसी प्रकार का संकोच नहीं था। भविष्य में ऐसे कई अवसर आए जब पेरियार तथा उनके विरोधी आमने-सामने थे; और पेरियार ने ‘न दैन्यम न पलायनम’ की भावना के साथ उनका सामना किया था। बावजूद इसके वे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का नाम बदलने को तैयार नहीं थे। सिंगारवेलार ने भले ही मजाक में नाम बदलने का सुझाव दिया हो, परंतु नाम न बदलकर पेरियार ने एक तरह से अच्छा ही किया था। क्योंकि आगे चलकर वे समाज को ‘ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण’ और ‘आर्य बनाम द्रविड़’ में बांटने में सफल रहे थे। 

पेरियार का विश्वास साम्यवाद से ज्यादा समाजवाद में था। इसका एक कारण यह भी है कि नवगठित कम्युनिस्ट पार्टी में भी प्रमुख पदों पर ब्राह्मण छाने लगे थे। वर्ग-संघर्ष उनके लिए महज नारा था। एक तरह से कृत्रिम लड़ाई। जिन यूरोपीय देशों में जहां साम्यवाद को कामयाबी मिली थी, वहाँ मशीनीकरण काफी तरक्की कर चुका था। भारत में मशीनीकरण आरंभिक दौर में था। कहने को तो वर्ग-क्रांति के समय सोवियत संघ भी भारत की तरह औद्योगिक प्रगति में पिछड़ा हुआ था। परंतु वहाँ लेनिन और ट्रोट्स्की ने वर्ग-संघर्ष की वैचारिकी का स्थानीयकरण करते हुए, संयुक्त खेती का विचार रखा था। उसके फलस्वरूप वहाँ वोल्शैविक क्रांति की जमीन तैयार हुई। भारत में अधिकांश कृषि भूमि पर समाज की ऊंची जातियों का कब्जा था, उन्हीं से निकले नेता कम्युनिस्ट पार्टी तथा उसके सहायक संगठनों को कब्जाए हुए थे। सामूहिक खेती के विचार से उनके अपने हितों को नुकसान पहुँच सकता था। इसलिए उनकी राजनीति मजूदर आंदोलनों और हड़तालों से आगे न बढ़ सकी। दूसरे शब्दों में भारतीय कम्युनिस्ट संगठन ऐसे वर्ग के भरोसे वर्ग-संघर्ष का सपना देखते रहे, जो वास्तव में था ही नहीं। शताब्दियों पहले जो काम तुलसी, सूरदास, मीरा जैसे भक्त कवियों ने रैदास, कबीर, दादूदयाल आदि संत कवियों द्वारा शुरू की गई सामाजिक क्रांति को तेजहीन करके किया था, वही धत्त-कर्म भारत के साम्यवादी दलों ने कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ किया था। 

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दुनिया भर में प्रचलित धर्मों में पेरियार यदि किसी धर्म के प्रति नर्म नजर आते हैं तो वह है, बौद्ध धर्म। हिंदू धर्म के अलावा उन्होंने यदि किसी धर्म पर लगातार चर्चा की है, तो वह बौद्ध धर्म की। हिंदू धर्म के प्रति उनकी दृष्टि आलोचनात्मक है, वहीं बौद्ध धर्म के प्रति हम उन्हें सहानुभूतिपरक पाते हैं। दोनों के बीच वे बौद्ध धर्म श्रेष्ठतर मानते थे। हिंदू धर्म में बढ़ती धर्मांतरण की घटनाओं के लिए ब्राह्मण ईसाई मिशनरियों को जिम्मेदार मानते थे। पेरियार का विचार था कि हिंदू धर्म ने ही भारत में ईसाई धर्म और इस्लाम की राह आसान की है—

‘जो दुष्टता वे(ब्राह्मण) गैर-ब्राह्मणों के साथ बरतते हैं, वह उस दुष्टता से कम है जो वे मुस्लिमों और ईसाइयों के साथ बरतते हैं। मगर अछूतों के साथ वे जिस निर्दयता के साथ पेश आते हैं, वह किसी भी अन्य अत्याचार से बढ़कर है। अपरोक्ष रूप में हिंदू धर्म ने ही इस्लाम और ईसाई धर्म के फलने-फूलने के लिए रास्ता तैयार किया है। हिंदू धर्म बाकी दोनों धर्मों के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ है। अतएव हिंदू धर्म को नष्ट करना, गैर-ब्राह्मणों और अछूतों की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।’22 

गौरतलब है कि दक्षिण भारत में हिंदू धर्म से इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर अंतरण की प्रक्रिया बहुत पहले आरंभ हो चुकी थी। उनीसवीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश की अनुमति मिलने के बाद उसमें और भी तेजी आई थी। ब्राह्मणों का मानना था कि ईसाई मिशनरियां निचली जातियों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर उन्हें धर्मांतरण के लिए उकसाती हैं। मुगलों के शासनकाल में जहां बलपूर्वक कुछ लोग मुस्लिम बनाए गए, वहीं स्वेच्छा से इस्लाम में शामिल होने वालों की संख्या भी काफी थी। पेरियार के लिए धर्मातंरण का मुद्दा आस्था से ज्यादा सामाजिक महत्व का था। उनका मानना था कि हिंदू धर्म की आंतरिक संरचना, उसमें गैर-ब्राह्मणों एवं अछूतों की निम्नतम स्थिति उन्हें धर्मांतरण के लिए विवश करती है—

‘हमारे देश के एक करोड़ ईसाई कौन हैं? हमारे राष्ट्र में 7 करोड़ मुस्लिम कौन हैं? ब्राह्मणों एवं धार्मिक नेताओं के अत्याचारों के कारण वे धर्मांतरण के लिए बाध्य हुए थे। वे हमारे ही भाई हैं। वे यरोशलम या अरब से नहीं आए हैं।

हम 24 करोड़ लोग खुद को सम्मानित कैसे मान सकते हैं? मुस्लिम हमें ‘काफिर’ कहते हैं। ईसाई हमें ‘धार्मिक रूप से भटके हुए लोग’ बताते हैं। अँग्रेज हमें ‘कुली’ कहते हैं। ब्रिटेन हमें ‘असभ्य’ बताता है; और ब्राह्मण हमें ‘शूद्र’ कहते हैं। हम इन संबोधनों से अपमानित महसूस नहीं करते। धर्म के नाम पर चुनींदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने से हमें आज भी रोका जाता है। वेदों में केवल चार जातियां हैं, लेकिन अब  यहाँ  4000 से अधिक जातियां हैं। ये जातियां भी अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जूझती रहती हैं।’23 

पेरियार ने हिंदू धर्मग्रंथों की खुली आलोचना की थी। इतने तीखे स्वरों में कि विरोधी तिलमिला उठते थे। उनके निष्कर्ष तर्क केंद्रित होते थे। तार्किक विश्लेषण करते समय प्रायः वे निर्मम भी हो जाते थे। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की पत्रिकाओं विदुथलाई, कुदीआरसु और रिवोल्ट में हिंदू धर्म की आलोचना से जुड़े सैंकड़ों आलेख प्रकाशित हुए थे। लेखकों में पेरियार के अलावा एस. गुरुसामी और रामानाथन शामिल थे। प्रकाशित लेखों में कुछ की शैली विवेचनात्मक है तो कुछ की व्यंग्य प्रधान। कल्पना कर सकते हैं कि जिन दिनों ‘हिंदू महासभा’ जैसे संगठन हिंदू धर्म के पुनरुद्धार में जुटे थे। जिनका सपना स्वतंत्र भारत को ‘हिंदू राज्य’ के रूप में देखना था, उन्हीं दिनों पेरियार अपने सहयोगियों के साथ हिंदू देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़े मिथों की निरंतर पड़ताल में लगे थे। यदि हिंदू कट्टरपंथी, पेरियार की तीखी, तेज-तर्रार भाषा को सहने के लिए विवश थे तो इसलिए कि लगभग पूरा का पूरा गैर-ब्राह्मण समाज पेरियार के समर्थन में था। उनका मानना था कि मनुस्मृति, गीता, रामायण, महाभारत, पुराणादि ग्रंथ ब्राह्मणवाद को थोपने के लिए रचे हैं। उनमें वर्णित आख्यान विशुद्ध काल्पनिक हैं। उन्होंने लोकप्रिय हिंदू देवताओं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रयी के अलावा इंद्र, कार्तिकेय, गणेश, राम और कृष्ण के चरित्र की बिना किसी झिझक या भय के आलोचना की थी। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जिस समय गाँधी गीता और रामायण को भारत की राष्ट्रीय एकता का आधारग्रंथ घोषित कर रहे थे, राम को आदर्श पुरुष बताते हुए रामराज्य का सपना पूरे देश को दिखा रहे थे, उन्हीं दिनों पेरियार उनकी अन्वीक्षा में लगे थे। उपलब्ध रामकथाओं का विश्लेषण करते हुए उन्होंने ‘रामायण’ का पुनर्पाठ किया था, जो आगे चलकर ‘सच्ची  रामायण’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ विवाद का कारण बना। रावण को वे द्रविण संस्कृति के आदि संरक्षक के रूप में देखते थे। रामायण के बारे में उनका विचार था—

‘रामायण एक षड्यंत्रकारी कथा है, उसे केवल ब्राह्मणों ने वर्णाश्रम धर्म की रक्षा हेतु रचा था। उसके माध्यम से वे अपनी वैचारिकी को स्थापित करना चाहते हैं, कहते हैं कि विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया था।’

सीता को रावण की कैद से छुड़ाने के बाद राम राजगद्दी पर थे। तभी एक किशोर ब्राह्मण बालक मर गया। उसका पिता राम के पास जाकर बोला—‘तुम और तुम्हारे लोग धर्म के विरुद्ध काम कर रहे हैं, इसलिए आज मेरा बेटा मृत्यु को प्राप्त हुआ। एक ब्राह्मण को सौ वर्ष तक जीना चाहिए। ब्राह्मण पुत्र के अकाल मौत मरने का मतलब है कि उस देश का राजा शास्त्र-विरुद्ध काम कर रहा है।’24 ‘रामायण का अंत कैसे होता है? यह बताते हुए कि शूद्र ऋषि शंबूक की प्रार्थना करने पर ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु हुई थी। राम द्वारा शंबूक की हत्या करते ही ब्राह्मण का मृत पुत्र जीवित हो उठता है। इससे वे लोगों को क्या समझाना चाहते हैं? यह कि शूद्र को ईश्वर की सीधे पूजा नहीं करनी चाहिए। वह केवल ब्राह्मण के माध्यम से पूजा कर सकता है।’25 वर्णाश्रम व्यवस्था में मनुष्य के लिए सौ वर्ष की आयु निर्धारित की गई। लेकिन, वाल्मीकि या तुलसी यह नहीं बताते कि उस समय गैर-ब्राह्मणों की औसत आयु और सामाजिक स्थिति क्या थी। गौरतलब है कि धर्म और जाति के आधार पर समाज का विभाजन प्रकारांतर में आर्थिक विभाजन को भी न्योता देता है। जनसाधारण का उस ओर ध्यान न जाए, इसलिए कर्म-सिद्धांत गढ़ा गया है। धर्म किस प्रकार आर्थिक विषमता को जायज बनाता है। इस बारे में पेरियार का विचार था—

‘इन दिनों भिक्षा मांगने वाला ब्राह्मण भी दिन में दो बार कॉफ़ी पी लेता है, परंतु एक किसान जो कड़ी धूप में दिन-भर श्रम करता है, उसे नमक मिले मांड से काम चलाना पड़ता है। जबकि मंदिर या होटल में काम करने वाला ब्राह्मण अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर कलेक्टर, जज, मंत्री, प्रधानमंत्री तक बना सकता है। दूसरी ओर मेहनतकश लोगों को निचले पदों से संतोष करना पड़ता है।’26 

अपने लेखों में पेरियार बार-बार धर्म और जाति की बात उठाते हैं। हर बार मांग करते हैं, कि जाति को आमूल नष्ट होना चाहिए। इसलिए कि जाति की मदद से समाज के बड़े हिस्से को मूलभूत सुख-सुविधाओं तथा जीवन के मामूली अधिकारों से भी वंचित किया गया है। 

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सवाल है कि ब्राह्मणवाद को मजबूत करने में धर्म की भूमिका बड़ी है या जाति की। पेरियार का निष्कर्ष है, जाति की। ब्राह्मण जाति और धर्म दोनों के शिखर पर मौजूद है। अकेले धर्म की मदद से वह समाज के शिखर पर नहीं रह सकता। जाति ब्राह्मण के अधिकारों का संरक्षण करती है। वह न हो तो किसी भी जाति-वर्ग का व्यक्ति धार्मिक कर्मकांडों का संचालन कर सकता है। जैसा विदेशों में है। वहाँ मोची का बेटा चर्च में पादरी या बड़ा धर्म-पुरुष बन सकता है। हिंदू धर्म में ये पद केवल ब्राह्मणों के लिए आरक्षित हैं। इसलिए जाति की सुरक्षा के लिए ब्राह्मण कोई भी धत्तकर्म करने को तैयार रहता है। गौतम बुद्ध, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद से लेकर गाँधी तक, जिन्होंने भी जाति-संबंधी नियमों को शिथिल करने की कोशिश की थी, सभी को अपने प्राणों से हाथ धोने पड़े थे। गाँधी की ह्त्या भी एक ब्राह्मण ने की थी। पेरियार के अनुसार गाँधी स्वयं जातिवाद के समर्थक थे—

‘‘महात्माओं में सबसे बड़े महात्मा(गाँधी) कहते हैं, दुनिया सदगुण-संपन्न है। क्या उन्होंने कभी यह मांग की कि जाति का उच्छेद होना चाहिए? उन्होंने बस इतना कहा है कि छूआछूत नहीं रहनी चाहिए। क्या उन्होंने एक शब्द भी इस बारे में कहा है कि जाति का नाश होना चाहिए? उन्होंने बस यही कहा है, ‘मैंने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। मैं वर्णाश्रम धर्म समर्थित समाज से हूं। मेरा प्रथम उद्देश्य रामराज्य की स्थापना करना है।’ बावजूद इसके गाँधी को छूआछूत उन्मूलन के कार्यक्रमों की कीमत अपने प्राण देकर चुकानी पड़ी थी।(इसका आशय है कि लोग गाँधी जितना उदार बनने या उनसे कुछ सीखने को भी तैयार नहीं हैं)। वर्णाश्रम व्यवस्था कहती है कि शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं है। परंतु गाँधी अपने समय के दबावों के चलते यह मानने को विवश थे कि शूद्रों को भी पढ़ने का अधिकार है। आखिर क्या हुआ?—‘उन्हें तीन गोलियों का शिकार बनना पड़ा….उन्हें एक ब्राह्मण द्वारा गोली मारी गई थी। गाँधी ने कहा था कि हिंदू धर्म और इस्लाम एक ही हैं(अल्लाह, ईश्वर सब एक ही परमशक्ति के नाम हैं), इसलिए उनकी हत्या कर दी गई।”27  

साफ है कि ब्राह्मण के लिए धर्म से ज्यादा जाति प्रिय है। यदि कुल जनसंख्या के मात्र 3 प्रतिशत ब्राह्मण अपने स्वार्थ के लिए संगठित होकर, धर्म और जाति का इस्तेमाल करते हैं, तो बाकी लोगों का भी दायित्व बनता है कि स्वयं को अमानवीय जातीय विषमता से बचाने के लिए उसका इस्तेमाल अपने संगठन को मजबूत करने के लिए करें । इसके लिए जरूरी है—

‘द्रविड़ जनता उन मंदिरों में न जाए, केवल ब्राह्मण पुरोहित पूजा कराते हैं। खासतौर पर उन मंदिरों का बहिष्कार करे, जहां यह नियम है कि केवल ब्राह्मण ही पुरोहित बनकर पूजा-पाठ करा सकते हैं। यदि वे ऐसे मंदिरों में जाते भी हैं तो उन्हें चाहिए कि ब्राह्मणों द्वारा संपन्न कराई जाने वाले पूजा-पाठ अथवा दूसरे कर्मकांडों में हिस्सा न लें।’28 

पेरियार बहुत पढ़े-लिखे भले न हों, मगर सत्ता और धर्म के गठजोड़ को भली-भांति समझते थे। जानते थे कि धर्म को चुनौती देने के लिए उन मिथों को संद्धिग्ध बनाना होगा, जिनके माध्यम से कोई धर्म जनमानस में पैठ बनाता है। इसलिए बिना कोई नर्मी दिखाए उन्होंने हिंदू धर्मशात्रों तथा उनके द्वारा स्थापित मिथों की आलोचना की थी। जैसे गाय और हनुमान का मिथ। शंकराचार्य का वेदांत दर्शन ईश्वास्योपनिषद के इस कथन पर विश्वास करता है—’सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शांत उपासीत’—यानी जो दृष्टिगोचर है, वह ब्रह्म है। लेकिन व्यवहार में तो मनुष्यों की भांति पशुओं के बीच भी रंग और प्रजाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है। पेरियार इस तरह के अंधविश्वासों पर मुखर थे—

‘प्रत्येक संस्कृति में अंधविश्वास नकारात्मक सोच की तरह पैठा है। वह मानव-मस्तिष्क में वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता को ग्रस लेता है। सांपों के प्रति डर उन्हें पूजनीय बनाता है। यह सरासर अंधविश्वास है कि सांप को पूजने के बाद वह मनुष्य को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। विद्वानों के अनुसार आधुनिक भारत में अंधविश्वास इतना शक्तिशाली है कि  यहाँ  बंदरों की पूजा भी हनुमान के रूप में की जाती है। जिसकी छोटी-छोटी मूर्तियां देश-भर में जगह-जगह लगी हैं। उनके अलावा राजमार्गों पर विशालकाय मूर्तियां भी नजर आती हैं। इसकी न तो कोई वैज्ञानिक तुक है, न ही कारण। हमारे देश में 21वीं शताब्दी का सबसे बड़ा अंधविश्वास है, बंदर की पूजा। हनुमान की 60 फुट ऊंची प्रतिमा की पूजा तमिल नाडु में होती है। इस मूर्खता पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता!

उसके अलावा गाय है, जिसे हिंदू पवित्र मानते हैं और जिसे सभी हिंदुओं की मां कहा जाता है….कुल मिलाकर, पवित्रता और अपवित्रता की अवधारणाएं महज धार्मिक टोटम हैं।’29 

गाय को लेकर एक जगह वे लिखते हैं, ‘शंकराचार्य कहते हैं, गौहत्या पाप है। वे सभी जानवरों की प्राण-रक्षा की मांग नहीं करते, केवल गाय की करते हैं।30 

पेरियार का मानना था कि विशेषाधिकार प्राप्त अभिजन ब्राह्मण, भारत में वर्गहीन, समानता पर आधारित समाज की स्थापना की सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्होंने गैर-ब्राह्मणों, दलितों और स्त्रियों की अवमानना, उनके लिए निराशाजनक स्थितियों का निर्माण करने, आजादी की राह में मुश्किल खड़ी करने के लिए ब्राह्मणों को जिम्मेदार माना था। स्त्री-समानता पर उनके विचार अपने समकालीन नेताओं की अपेक्षा कहीं ज्यादा आधुनिक थे। वैदिक रीति से विवाह, जिसमें पंडित मंत्रोच्चार करता है, वर-वधु अग्नि की सप्तपदी लेते हैं, के वे घोर विरोधी थे। मानते थे कि स्त्री-पुरुष का विवाह स्वर्ग में बनी जोड़ियां नहीं हैं। वह दांपत्य सुख के लिए किया गया समझौता मात्र है, जिसमें लड़का और लड़की दोनों बराबर के सहभागी होते हैं। मातृत्व स्त्री का चयन होना चाहिए। कर्तव्य नहीं। यदि कोई स्त्री संतान नहीं चाहती, तो उसे संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। 

पेरियार ने ब्राह्मणों को विदेशी मूल के आर्यों का उत्तराधिकारी बताते हुए, द्रविड़ अस्मिता का मामला उठाया। मैक्समूलर से लेकर तिलक तक, सभी ने इस विषय पर खूब लिखा है। ‘गुलामगिरी’ और दूसरी कई पुस्तकों में फुले ने ब्राह्मणों को भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराया था। सो पेरियार का द्रविड़ अस्मितावादी आंदोलन जनता के दिल की आवाज बन गया। सांस्कृतिक वर्चस्व बनाए रखने में धर्म की भूमिका सर्वोपरि होती है। फुले ने इसे समझा था। उन्होंने धर्म और संस्कृति के आधार पर थोपे गए सांस्कृतिक प्रतीकों, मिथों की तार्किक स्तर पर पड़ताल की थी, जिसका समाज पर सकारात्मक असर पड़ा। उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक शोषण को द्रविड़ अस्मिता से जोड़ा । समाज में नैतिकता और सदाचरण का पर्याय मान लिए गए धार्मिक प्रतीकों और मिथों की तार्किक व्याख्या की । रामायण की प्रतियों का दहन किया । लोगों से अपील की थी कि धर्म को धंधा बना देने वाले पंडे पुरोहितों के चक्कर में आने के बजाय स्वयं उनकी समीक्षा करें । तर्क-बुद्धि से काम लें ।     

उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन तेजी पर था। दक्षिण भी उससे अछूता न था। पेरियार के नेतृत्व में एक और समानांतर आंदोलन उभरने लगा, जिसका उद्देश्य सामाजिक-सांस्कृतिक आजादी प्राप्त करना था। इसी सिलसिले में पेरियार 1926 में बंगलुरू आए गाँधी से मिले। उन्होंने कहा कि वर्ण-व्यवस्था के उन्मूलन के बगैर छूआछूत पर काबू कर पाना मुश्किल है। गाँधी के सामने उन्होंने उस समय की तीन प्रमुख बुराइयों का उल्लेख करते हुए, उन्हें तत्काल मिटाने का आवश्यकता पर जोर दिया। पहला ब्राह्मणों के नियंत्रण वाली कांग्रेस पार्टी, दूसरा हिंदू धर्म और उसकी जाति पृथा तथा तीसरा समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व।

‘वायक्कम सत्याग्रह’ की सफलता के बाद पिछड़ों और अतिपिछड़ों का हौसला बढ़ा था। स्वयं पेरियार कांग्रेस से त्यागपत्र देने के बाद ब्राह्मणवाद विरोधी कार्यक्रमों में उतर चुके थे। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ दक्षिण भारत में द्रविड़ अस्मिता की पहचान बनकर उभर रहा था। पेरियार छूआछूत विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे। 10 फरवरी 1929 को छूआछूत उन्मूलन के मुद्दे पर बुलाई गई सभा में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था—

‘वे कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। ऊंच-नीच का भेद नहीं मानता। दूसरी ओर वे कहते हैं कि अछूतों पर हो रहे अत्याचारों के लिए एकमात्र ईश्वर जिम्मेदार है। यह कितने शर्म की बात है। यह भी कहा जाता है कि छूआछूत की रचना स्वयं ईश्वर ने की है। यदि यह सही है तो सर्वप्रथम हमें उस ईश्वर का बहिष्कार करना चाहिए। उसके बाद ही किसी और कार्यक्रम पर विचार किया जा सकता है। यदि ईश्वर छुआछूत के बारे में अनजान है तो भी जितना जल्दी हो सके, उसका बहिष्कार कर देना चाहिए। यदि ईश्वर इस अन्याय को मिटाने में असमर्थ है, यदि वह ब्राह्मण पुरोहितों पर नियंत्रण करने में नाकाम रहता है तो उसे दुनिया के किसी भी स्थान पर बसने का अधिकार नहीं है। ऐसे में जितनी जल्दी हो सके, उसे उखाड़ फेंकना ही न्यायसंगत होगा। 

यदि ऐसा कोई आधार है, जो यह बताता है कि ईश्वर या धर्म छूआछूत के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, तो उसे भी जलाकर खाक कर देना चाहिए। बजाय यह जाने कि वह क्या है अथवा किसने कहा है?’31 

पेरियार का मानना था कि भारत में ऊंची जातियां समानता की राह की सबसे बड़ी बाधा हैं। वे धर्म का उपयोग अपनी वर्गीय श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए करती हैं। राज्य के अधिकांश निर्णायक पदों पर उन्हीं का वर्चस्व होता है। इसलिए राज्य भी उनके हितों का ज्यादा ख्याल रखता है। धार्मिक जड़ता का एक कारण धर्म का उत्तराधिकार के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाना है। इससे एक तो ब्राह्मण की सर्वोच्चता का विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अंतरित होता रहता है। दूसरे व्यक्ति बगैर धर्म की खूबियों और खामियों की पड़ताल के, उसे अपनाने को विवश होता है। उसे अपने जीवन में धर्म की समीक्षा करने का अवसर कभी मिल ही नहीं पाता। धर्माचार्य या पुरोहित भी नहीं चाहते कि लोग धर्म के चयन में अपने विवेक और तर्क-शक्ति का इस्तेमाल करें। उपलब्ध धर्मों के गुणों-अवगुणों का परस्पर निष्पक्ष और तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद ही किसी एक धर्म को अपनाएं। ऐसे में धर्माचार्य हो अथवा धर्मानुयायी, सभी को धर्म के बाहरी प्रतीकों से अपना काम चलाना पड़ता है। कुल मिलाकर धर्म मनुष्य के विवेकीकरण में कोई मदद नहीं करता। इस कारण मानव-जीवन के लिए उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। अछूतों, गैर-ब्राह्मणों और स्त्रियों का सामाजिक अवमूल्यन करने, उनकी मुक्ति की राह में अनावश्यक अड़चन पैदा करने के लिए पेरियार ने ब्राह्मणों तथा उनके धर्म की आलोचना की थी। पेरियार के अनुसार धर्म विवेकशील मनुष्य की उसके जीवन में कोई मदद नहीं करता। इसलिए वह अनावश्यक है।  फिर भी यदि कोई व्यक्ति खूब सोच-विचार के बाद किसी धर्म का स्वेच्छापूर्वक चयन करे—तब उन्हें कोई आपत्ति न थी। उनके अनुसार केवल भली-भांति सोचने के बाद स्वेच्छापूर्वक ढंग से अपनाया गया धर्म लोगों को मुक्त कर सकता है वही उनकी धार्मिक दासता को समाप्त कर सकता है। धर्म और मानवीय विवेक को परस्पर विरोधी बताते हुए पेरियार का कहना था कि केवल तर्क-सम्मत आधार पर, स्वेच्छापूर्वक अपनाया गया धर्म ही, जाति और धर्म की मदद से दास बनाए गए लोगों का आत्मसम्मान वापस दिला सकता है। 

वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

पेरियार – दो : दक्षिण भारत का आत्मसम्मान आंदोलन

सामान्य

(आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम ‘बेगमपुरा’ के नाम से जानते हैं. आने वाली दुनिया’ में रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. वैज्ञानि सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने ‘दक्षिण एशिया का सुकरात’ कहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें ‘भारत का वाल्तेयर’ माना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. उनके एक लेख के आधार पर अंग्रेजी दैनिक ‘दि हिंदू’ में उनकी तुलना बीसवीं शताब्दी का एच.जी.वेल्स से की गई थी. ओमप्रकाश कश्यप)

 

कांग्रेस से मोहभंग के पश्चात पेरियार का सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में स्वतंत्र रूप से सक्रिय होना, न केवल उनके, अपितु पूरे तमिलनाडु के लिए क्रांतिकारी घटना थी. किंतु जैसे सूरज के ताप और प्रकाश का स्वयं सूरज के लिए उतना महत्त्च नहीं होता, जितना शेष जीवजगत के लिए, उसी प्रकार पेरियार के नेतृत्व में चले आंदोलनों का लाभ जितना उनके देश और समाज को हुआ, उसके सापेक्ष पेरियार को मिली प्रसिद्धि और मानसम्मान न के बराबर है. उस आंदोलन के फलस्वरूप देश के दक्षिणी प्रांतों के साथसाथ बाकी हिस्सों में भी सामाजिक जागृति का संचार हुआ. उत्पीड़न एवं वंचना के शिकार लोग अपने अधिकारों तथा मानसम्मान की सुरक्षा एवं संरक्षा हेतु सन्नद्ध होने लगे. उसके फलस्वरूप न केवल कांग्रेस को अपनी नीतियों में बदलाव के लिए विवश होना पड़ा, अपितु सरकार को भी सामाजिक न्याय की भावना के साथ आगे आना पड़ा. पेरियार ने हजारों वर्षों से रूढ़ पड़ी परंपराओं, आडंबरों और बौद्धिक पाखंडों पर प्रहार किया. इस कारण समाज का एक वर्ग आज भी उनसे बुरी तरह चिढ़ता है. पेरियार बहुत कम समय तक सक्रिय राजनीति मंे रहे. कांग्रेस से अलग होने के बाद कभी राजनीति से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बावजूद इसके दक्षिण भारतीय राजनीति को जितना उन्होंने प्रभावित किया, उतना उनका समकालीन कोई नेता न कर सका. अपने समाज के बीच पेरियार की वही भूमिका है, जो अमेरिकी समाज में अब्राह्मम लिंकन, थाॅमस जेफरसन और टाॅमस पेन, इंग्लेंड में जाॅन स्टुअर्ट मिल तथा फ्रांस में वाल्तेयर और रूसो की है. उनसे पहले समाज में जितने भी नैतिक प्रतिमान प्रचलित थे, धर्म तथा उसके गर्भ से जन्मी परंपराएं उनका एकमात्र òोत हुआ करती थीं. उनका प्रभाव इतना गहरा होता था कि लोग न केवल धर्म और परंपराओं को जीते थे, बल्कि उनके लिए भी जीते थे. देखने में सबकुछ सहज और स्वाभाविक लगता था, असलियत में वह सामंतवाद को बचाए रखने, शोषण को स्थायी बनाए रखने वाली व्यवस्था थी. ‘क्या’, ‘क्यों’ और ‘क्यों नहीं’ जैसे प्रश्नों के लिए जिनपर आधुनिक सभ्यता की नींव टिकी है, उसमें कोई स्थान न था. जो भी था, सब किसी न किसी रूप में थोपा हुआ रहता था. दावा हालांकि खुलेपन का था, दिखाया यही जाता था कि लोगों ने उसे खुशीखुशी अपनाया हुआ है—लेकिन सब कुछ पूर्वनियोजित, पूर्वनिर्धारित और पुरोहित वर्ग की स्वार्थसिद्धि के वास्ते था. परंपरा को प्रमाण बनाए रखने के लिए कुछ कहानियां और मिथ गढ़ लिए जाते थे. जनसमाज के लिए वही सांसारिकता का पर्याय होते थे. उन्हीं के अंधानुकरण को वह जीवनसिद्धि माने रहता था. उनके प्रभाव में मानवीय विवेक की भूमिका घट जाती थी. मानसिक रूप से परंतत्र व्यक्ति केवल अनुसरण कर सकता है, सो परंपरा को प्रमाण मानने वाले समाज में अनुगमन की प्रवृत्ति पीढ़ीदरपीढ़ी कायम रहती थी.

पेरियार समृद्ध पिता की सफल संतान थे. परंतु आर्थिक समृद्धि से उनकी सामाजिक प्रस्थिति पर खास अंतर नहीं पड़ा था. कथित उच्च जातियों से आए कांग्रेसजनों के बीच उनकी स्थिति अब भी ‘पिछड़े’ व्यक्ति के समान थी. वे समझ चुके थे कि व्यक्तिगत उपलब्धियों के बल पर लोगों के मन में सम्मानभाव तो जगाया जा सकता है, परंतु उन धारणाओं को नहीं बदला जा सकता जो लोगों के मनोमस्तिष्क में शताब्दियों से काई की भांति जमा हैं. जो मनुष्य को जन्म से ही ऊंचा या नीचा घोषित कर देती हैं. वह न केवल दक्षिणभारत बल्कि संपूर्ण दुनिया के लिए सर्वाधिक परिवर्तनकारी दौर था. रूसी क्रांति संपन्न हो चुकी थी. साम्यवाद का प्रभाव दक्षिण भारत में भी था, किंतु शेष भारत की तरह दक्षिण में भी अधिकांश साम्यवादी नेता तथाकथित उच्च जातियों से आए थे. उनके अपने जातीय स्वार्थ प्रबल थे. भारत में जाति सामाजिक स्तरीकरण और अमानवीय आचरण का मुख्य कारण रही है. जातिआधारित वर्गभेद पर प्रहार किए बिना साम्यवाद की सफलता संभव भी नहीं थी. इससे भारत में साम्यवादी आंदोलन की असफलता और भटकाव के कारणों को समझा जा सकता है. यही कारण है कि उत्पीड़ित और वंचित जनों के पक्ष में आवाज उठाने वाले पेरियार, साम्यवादी होने का दावा करने वाले नेताओं से दूरी बनाए हुए थे. उनका मानना था कि माक्र्स का दर्शन केवल पश्चिमी देशों में कारगर हो सकता है, जहां जाति जैसी भयावह बीमारी नहीं है. धर्म का सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप है. भारतीय समाज में समानता और आत्मसम्मान की लड़ाई यदि किसी को लड़नी है तो उसे पहले जाति से टकराना पड़ता है; और जाति की जंग जब तक अविजित रहेगी, जब तक उसे धर्म का समर्थन प्राप्त है. यथास्थितिवादियों के अनुसार जाति और धर्म समाज में सुखशांति बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं. किंतु असलियत में वे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के मूलभूत अधिकारों पर कुठाराघात करती हैं. जातीय अनुशासन का लाभ उठाकर कथित ऊंची जातियां निचली जातियों के लिए शासक का काम करती हैं. सामाजिक सुखशांति के लिए जो लोग धर्म और जाति को अपरिहार्य मानते हैं, वे या तो बहुत चालाक और स्वार्थी हैं, अथवा दिग्भ्रमित.

पेरियार ने धर्म को चुनौती दी. जाति के आधार पर राजनीति के स्वाभाविक दावेदार बने शीर्षस्थ जातियों के बड़े नेताओं को बहस के लिए ललकारा. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ द्वारा द्रविड़ों की सोयी चेतना को जगाने का काम भी किया. उन्होंने तमिलवासियों को सवाल करना सिखाया. उसके फलस्वरूप पहली बार 90 प्रतिशत लोग यह सोचने को विवश हुए कि वे शिक्षा और रोजगार के अवसरों से बंचित क्यों हैं? कि तीन प्रतिशत ब्राह्मण सरकार के तीनचैथाई से अधिक पदों पर कैसे चले जाते हैं? कि दलितों और पिछड़ों को सार्वजनिक मार्गों पर आनेजाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं है? कि जन्म से एक समान होने के बावजूद मनुष्य को जाति के आधार पर भेदभाव और असमानता का शिकार क्यों बनाया जाता है? इन प्रश्नों को उठाने वालों में पेरियार पहले नेता नहीं थे. दक्षिण भारत की लंबी पूरी संतपंरपरा उनके समर्थन में थी. 1892 में गठित ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ ने भी सांगठनिक स्तर पर द्रविड़ अस्मिता का मामला उठाया था. फुले के विचारों से प्रभावित संघ के नेताओं ने जोरशोर से यह प्रचारित किया था कि ब्राह्मण विदेशी आर्यों के वंशज हैं, जबकि गैरब्राह्मण द्रविड़ भारत के मूल निवासी हैं. फुले ने धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाए थे. कहा था कि वे सब ब्राह्मणों द्वारा स्वार्थसिद्धि के लिए गढ़ी गई गल्पकथाएं हैं. उसी परंपरा को विस्तार देते हुए पेरियार ने धर्मशास्त्रों को अपनी विवेचना का आधार बनाया. इसके साथसाथ उन्होंने धर्म तथा ईश्वर की सत्ता को भी कठघरे में लिया. उससे पहले न्याय और समानता की मांगों का आकलन धार्मिक आचारसंहिताओं के आधार पर किया जाता था. आवश्यकता पड़ने पर उनका समाधान भी शास्त्रों में खोजा जाता था. परंपराश्रित होने के कारण ब्राह्मणसंस्कृति विशेषता विहीन, विशेषज्ञ संस्कृति थी. उसमें कुछ जातियां विशेषाधिकार संपन्न होती हैं, तो कुछ पूर्णतः अधिकारविपन्न. अधिकारविपन्नों के लिए व्यवस्था होती कि वे विशेषाधिकार संपन्न जातियों के आदेशों का बिना किसी शर्त के पालन करें. यही शास्त्रसम्मत मर्यादा है. दुष्परिणाम यह होता है सामाजिक नेतृत्व हेतु मौलिक प्रतिभाएं आगे नहीं आ पातीं. इससे ज्ञान की धारा अवरुद्ध होती है; तथा सत्ताकेंद्रों पर खास वर्गों का अधिपत्य निरंतर बना रहता है. समयानुकूल बोध के अभाव में परंपरा और मिथक जनसाधारण का मार्गदर्शन करने लगते हैं; और सभ्यता की प्रतिगामी यात्रा शुरू हो जाती है. पेरियार ने लोगों के दिमाग को ब्राह्मणवाद से मुक्त किया. उनके सोच को वैज्ञानिकीकरण की ओर ले गए. इस योगदान के लिए तमिल जनता ने उन्हें अपना वास्तविक ‘जननेता’(थलाईवर) स्वीकार किया. कांग्रेस छोड़ते समय पेरियार ने कहा था—‘कांग्रेस और उसके नेता गैरब्राह्मणों का भला नहीं कर सकते. इसलिए मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, कांग्रेस को खत्म करना.’ वे अपने उद्देश्य में सफल भी रहे. गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज नेताओं के रहते कांग्रेस दक्षिण भारत में तीसरे स्तर का राजनीतिक दल बना रहा.

1925 में कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया. पहले सम्मेलन में उन्होंने समानता और आत्मगौरव का मुद्दा उठाया. उन्होंने गैरब्राह्मणों का आवाह्न किया कि वे किसी भी बौद्धिकसांस्कृतिक और सामाजिक जड़ताओं से खुद को मुक्त करें. समानता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. लेकिन वह लक्ष्य किसी की दया या परोपकार के भरोसे प्राप्त नहीं किया जा सकता. लक्ष्यपूर्ति के लिए अपने आप को समझना और उसके लिए संगठित प्रयास आवश्यक हैं. संस्था का दूसरा सम्मेलन एम. आर. जयकर की अध्यक्षता में पेरियार के गृह नगर इरोड में 10 मई 1930 को हुआ. पेरियार ने उसमें जोरदार भाषण दिया. अपने भाषण में उन्होंने मूर्तिपूजा और आडंबरवाद को त्यागने का आवाह्न किया. उससे अगले सम्मेलन में जो अगस्त 1931 में विरुदनगर में हुआ था, पेरियार ने छूआछूत का विरोध करते हुए अंतरजातीय विवाह पर जोर दिया. सम्मेलन में उन्होंने शिक्षा और सामूहिक भोज को बढ़ावा देने की सलाह दी. लोगों पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ा. वे समझने लगे कि जातीयविषमताओं को मिटाने के लिए आधुनिक शिक्षा के साथसाथ सामूहिक भोजन को बढ़ावा देना अत्यावश्यक है.

महात्मा ज्योतिराव फुले और डाॅ. भीमराव आंबेडकर दोनों सामाजिक समानता और स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता से अधिक महत्त्व देते थे. आजादी से पहले आवश्यक है ऐसे समाज का गठन जो आजादी का मूल्य समझता हो. जिसे अपने साथसाथ दूसरों की स्वतंत्रता की भी फिक्र हो. इस संबंध में पेरियार की राय महात्मा फुले और डाॅ. आंबेडकर जैसी ही थी. सक्रिय राजनीति का परित्याग तथा ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाना—उनका सुविचारित निर्णय था. हिंदू धर्म में व्याप्त ऊंचनीच और छूआछूत की भावना का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में हो चुका था. बचपन और युवावस्था की कुछ घटनाएं उनके दिमाग पर छायी रहती थीं. एक घटना ने ईश्वर और हिंदू धर्म में उनके रहेसहे विश्वास को भी चूरचूर कर दिया. उस समय तक पेरियार के पिता का निधन हुए तीनचार वर्ष बीत चुके थे. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. वे पैत्रिक व्यवसाय को कुशलतापूर्वक संभाले हुए थे. समृद्ध व्यवसायी के रूप में दूरदूर तक उनका नाम था. फिर भी उन्हें संतुष्टि न थी. उन्हीं दिनों बनारस की यात्रा पर जाना हुआ. उस समय तक पेरियार की धर्म में आस्था शेष थी. बनारस के बारे में उनका मानना था कि वह हिंदुओं की पवित्रतम नगरी है. बनारस पहुंचकर वे कई दिनों तक शंति की खोज में यहां से वहां भटकते रहे. वहां उन्होंने मंदिरों में काम करती युवा देवदासियों को देखा. पता चला कि अपनी युवावस्था में वे देवदासियां पुजारियों की वासना का शिकार बनती हैं. बूढ़ी होने के बाद उन्हें मंदिर की सफाई तथा दूसरे कामों में झांेक दिया जाता है. जब देख थक जाती है और शरीर से वे किसी काम की नहीं रहतीं, तब पुण्यार्जन के नाम पर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. बीमार होने पर उपचार की माकूल व्यवस्था का कोई इंतजाम न था. इन अनुभवों ने पेरियार के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया. उस यात्रा के दौरान एक घटना ऐसी घटी जिससे उनका मन धर्म की ओर से एकदम उचट गया.

उस दिन उन्हें बहुत भूख लगी थी. भटकते हुए वे ऐसे आश्रम में पहुंचे जहां देशविदेश से आए अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था थी. भोजन की आस में वे प्रवचन सुनने बैठ गए. प्रवचन पूरा होने के बाद लोग भोजन के लिए जाने लगे तो पेरियार भी उनके साथ चल पड़े. तब उन्हें पता चला कि भोजन का इंतजाम केवल ब्राह्मणों के लिए है. भूख के दबाव में पेरियार ने स्वयं को ब्राह्मण बताया. किंतु अपनी मूंछों के कारण पहचान लिए गए. उस समय तक ब्राह्मणों के लिए मूंछ रखना निषिद्ध था. वहां मौजूद ब्राह्मण चिल्लाने लगे—‘यह नकली है. इसे खदेड़ दो.’ एकाएक दर्जनों ब्राह्मण न जाने कहांकहां से निकलकर उन्हें ठेलने लगे. भूख से व्याकुल पेरियार को उचिष्ठ से काम चलाना पड़ा. उस समय वे खुद को बेहद अपमानित अनुभव कर रहे थे. धर्म के प्रति आस्था तारतार हो चुकी थी. ब्राह्मणवाद का कुटिल चेहरा उनके सामने था. वे समझ गए कि धार्मिक रहते हुए स्वाभिमान के साथ जीना संभव नहीं है. उसी दिन उन्होंने खुद को नास्तिक घोषित कर दिया. उससे पेरियार को हानि नहीं हुई. उनके लिए वह पुनर्जन्म के समान था.

बनारस की घटना से हिंदू धर्म का कुत्सित चेहरा पेरियार ने देखा था. जातिआधारिक ऊंचनीच और तत्संबंधी विकृतियों का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में ही हो चुका था. उनके विवाह से संबंधित घटना का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. दो अन्य घटनाओं का उल्लेख पेरियार के व्यक्तित्व को समझने में सहायक सिद्ध होगा. एक घटना 1902 की है. उन दिनों वे मात्र 23 वर्ष के युवा थे. धर्मशास्त्रों और पुराणों पर विश्वास तब तक उठने लगा था. एक संघर्षशील युवा की छवि विकसित होने लगी थी. उन्हीं दिनों इरोड के एक व्यापारी ने भोज का आयोजन किया. उसमें निरुंजनपेट्टई गांव के मुखिया को भी आमंत्रित किया गया था. संयोगवश मुखिया का भाई एक व्यापारी का कर्जदार था. दबंगई दिखाते हुए वह कर्ज चुकाने से आनाकानी करता आ रहा था. मामला न्यायालय में लंबित था. कोर्ट ने मुखिया के भाई को भगोड़ा घोषित कर, उसके वारंट निकाले हुए थे. पुलिस उसके पीछे लगी थी. लेकिन वह पुलिस और कर्ज वसूली में लगे अधिकारियों को लगातार चकमा देता आ रहा था. युवा पेरियार ने उसे पकड़वाने की ठान ली. जिस समय स्वामी और उसका भाई भोज में हिस्सा ले रहे थे, पेरियार एक झटके में पंडाल में घुस गएा. उस समय सरकार के स्तर पर चाहे जो हो, समाज में मनु का विधान लागू था. तदनुसार ब्राह्मणभोज के स्थल पर कुत्ता, सूअर, शूद्र और स्त्री का प्रवेश निषिद्ध माना जाता है. पेरियार शूद्र परिवार में जन्मे थे. उनके प्रवेश से भोजस्थल पर खलबली मच गई. भोजन अपवित्र हो चुका था. कोई साधारण परिवार से होता तो ब्राह्मण खुद ही निपट लेते. परंतु पेरियार धनाढ्य व्यवसायी की संतान था. उसके पिता दानादि देकर ब्राह्मणों को तृप्त रखते थे. इसलिए पेरियार की शिकायत उसके पिता से की गई. पिता ने उन्हें सामाजिक मर्यादा का पालन न करने के लिए खूब धिक्कारा. जातिसंबंधी विधान के उल्लंघन करने के लिए पेरियार की चप्पलों से पिटाई हुई. पेरियार ने पिता के क्रोध को सहा. लेकिन सामाजिक अनाचार ने निपटने की ठान ली. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण आयोजन प्रत्येक वर्ष चैत्र पूर्णिमा के दिन वे सामूहिक भोज था, जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग एक साथ सामूहिक भोज का आनंद लेते थे. यह ब्राह्मणवाद पर बड़ी मार थी. दमित एवं पिछड़े वर्गाें को संगठित करने में सामूहिक भोज के कार्यक्रम बहुत मददगार सिद्ध हुए.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य कार्यक्रम पेरियार के अपने जीवनानुभवों की देन थे. अंतररजातीय विवाह का मुद्दा स्त्रीमुक्ति से जुड़ा था. उसकी प्रेरणा उन्हें अपनी युवावस्था की एक घटना से मिली थी. वलेला जाति के एक युवक ने नौकरी की इच्छा के साथ पेरियार से संपर्क किया. पेरियार ने उसे अपनी दुकान पर मुनीम का सांैप दिया. कुछ अवधि के बाद उस लड़के की मां ने पेरियार से संपर्क कर, उसका विवाह कराने की प्रार्थना की. पेरियार ने उसके लिए नायडू परिवार की लड़की को चुना. लड़की अवैध नायडू संतान थी. वह शादी पेरियार के दोस्तों, स्थानीय नेताओं और सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति में बड़ी धूमधाम से हुई. वह पहली शादी थी, जिसे पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के तहत कराया था. उसकी खूब चर्चा हुई. इससे पेरियार के विद्रोही स्वभाव की खबर दूर तक फैल गई. ‘स्त्रीमुक्ति’ के क्षेत्र में दूसरा कार्यक्रम विधवा विवाह को प्रोत्साहन देना था. बनारस सहित अन्य धर्मस्थानों पर उन्होंने ऐसी अनेक विधवाओं को देखा था, जिन्हें पति की मृत्यु के बाद घर छोड़ना पड़ा था.

स्त्रीसमानता पर उनके विचार आधुनिकता से भरपूर थे. वे वैदिक रीति से विवाह, जिसमें पंडित मंत्रोच्चार करता है, वरवधु अग्नि की सप्तपदी लेते हैं, के वे घोर विरोधी थे. स्त्रीपुरुष का विवाह स्वर्ग में बनी जोड़ियां नहीं हैं. वह दांपत्य सुख के लिए किया गया समझौता है, जिसमें लड़का और लड़की दोनों बराबर के सहभागी होते हैं. पेरियार ने मुक्त कंठ से स्त्री समानता और स्वतंत्रता का समर्थन किया. कहा कि समाज में स्त्री को वे सब अधिकार और अवसर प्राप्त होने चाहिए जो पुरुष को प्राप्त हैं. मातृत्व स्त्री का चयन होना चाहिए. कर्तव्य नहीं. यदि कोई स्त्री संतान नहीं चाहती, तो उसे संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने बालविवाह का विरोध तथा विधवा विवाह का जोरदार तरीके से समर्थन किया. 1930 में मद्रास में देवदासी प्रथा के विरोध में बिल लाया गया. पेरियार ने उसका जोरदार तरीके से समर्थन किया. जातिप्रथा को समाज और देश के लिए हानिकारक मानते हुए उन्होंने अंतरर्जातीय विवाह का समर्थन किया. वे स्त्री को संपत्ति संबंधी समान अधिकार देने के पक्ष में थे.

जब भी कोई व्यक्ति धर्म के विकल्प की आवाज उठाता है, बड़ेबड़ी बुद्धिजीवी मौन हो जाते हैं. अधिकांश नास्तिकों को भी धर्म का विरोध दिखता है, उसका विकल्प नहीं. ऐसे लोगों के नेतृत्व में नास्तिकता प्रतिक्रियावाद का शिकार हो जाती है. पेरियार नास्तिक थे. उनके पास आस्थावादियों के ‘धर्म नहीं तो क्या?’ जैसे प्रश्नों का भी उत्तर था. धर्म के विकल्प के रूप में वे बुद्धिवाद को स्थापित करना चाहिए थे. इस संबंध में उनके कई आलेख स्थानीय पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे. उन्होंने एक अंग्रेजी की पत्रिका ‘दि मोडर्न रेशनलिस्ट’ की शुरुआत भी की थी. अपने लेखों में उन्होंने समझाया था कि समाज की स्थापना धर्म अथवा संस्कृति जैसे प्राचीन अवधारणाओं के बजाय आधुनिकता और बुद्धिवाद के आधार पर होनी चाहिए. 1971 में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—

हम चाहते हैं कि लोग विवेकवान प्राणी के रूप में जीवनयापन करें. हम ऐसी किसी चीज का प्रचार नहीं करते, जो अविश्वसनीय और काल्पनिक हो. हमें ईश्वर पर आश्रित कुछ भी नहीं चाहिए, न ईश्वर की संतान, न धर्म, न शास्त्र, न पूजापाठ और न किसी प्रकार का कर्मकांड. हम उन्हीं चीजों तक सीमित रहेंगे जो विवेकसम्मत होते हुए तर्क की कसौटी पर खरी उतरती हों. आप सबको भी तर्क को बढ़ावा देने में जुट जाना चाहिए. हम जो कह रहे हैं, उसपर विश्वास करने से पहले उसके प्रत्येक शब्द पर सोचिए, समझिए और भलीभांति विवकसम्मत सिद्ध होने पर उसे अपनाइए.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ दिनोंदिन फैल रहा था. पेरियार सक्रिय राजनीति छोड़ सामाजिक क्रांति लाने के लिए संकल्परत थे. फिर एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया. त्रावणकोर रियासत के वायकम में महादेव का पुराना मंदिर था. उसमें अछूतों का प्रवेश निषिद्ध था. मंदिर के आसपास की कुछ सड़कें ब्राह्मणों और राजपरिवार के सदस्यों के लिए आरक्षित थीं. अछूत उनपर चल नहीं सकते थे. इस अमानवीय व्यवस्था का विरोध लंबे समय से चला आ रहा था. जनता की मांग को देखते हुए ट्रावणकोर सरकार ने 1865 में अध्यादेश के जरिये कानून बनाया था. उसके अनुसार राज्य के सभी नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर आनेजाने की छूट दी गई थी. व्यवस्था की गई थी कि राज्य की सभी सड़कें सभी नागरिकों के लिए खुली रहेंगी. कोई भी नागरिक उनपर आजा सकेगा. किंतु ब्राह्मण तथा राजपरिवार के सदस्य इस आदेश का विरोध करते आ रहे थे. उनकी परवाह न करते हुए 1884 में सरकार की ओर से एक और आदेश जारी किया गया था, जिसमें पिछली व्यवस्था का समर्थन किया गया था. उसके विरोध में ब्राह्मणों ने ट्रावणकोर उच्च न्यायालय में अपील कर दी. जिसमें मंदिर के आसपास की कुछ सड़कों पर अछूतों के लिए चलना निषिद्ध कर दिया गया. उस आदेश की अछूतों में तीखी प्रतिक्रिया हुई. नारायण गुरु के नेतृत्व मंे उन्होंने अपना आंदोलन तेज कर दिया. दूसरी ओर दलितों और पिछड़ों को सबक सिखाने के लिए सवर्ण भी ब्राह्मणों के नेतृत्व में संगठित होने लगे थे.

एक बार नारायण गुरु अपने शिष्यों के साथ गाड़ी में सवार होकर मंदिर के बराबर से गुजर रहे थे. महाकवि कुमारन और दलितपिछड़ों के अनेक नेता उनके साथ थे. अचानक उच्च जाति के कुछ गुंडे आकर उनकी गाड़ी के आगे खड़े हो गए. उनका नेतृत्व एक ब्राह्मण कर रहा था. उसने नारायण गुरु की गाड़ी को वहां से हटने के लिए विवश कर दिया. उस घटना का वर्णन सुप्रसिद्ध मलयाली कवि मुलूर एस. पद्मनाभा पणिक्कर ने अपनी कविता में इस प्रकार किया है—

बहुत पहले की बात है. महान नारायण गुरु रथ पर सवार होकर वायकम की सड़क से गुजर रहे थे. अचानक एक मूर्ख ब्राह्मण जो खुद को पृथ्वी का देवता कहता था, वहां आया. उसने नारायण गुरु के रथ को वहां से हटने का आदेश देने लगा.’

पेरियार उस समय तक नास्तिक होने का संकल्प ले चुके थे. लेकिन ऐसे समाज में जहां धर्म जीवन की समस्त पे्ररणाओं का स्रोत हो, बगैर धार्मिक स्वतंत्रता के सामाजिकराजनीतिक स्वतंत्रता की अनुभूति असंभव है. फिर वायकम में केवल मंदिर प्रवेश मुद्दा न था. बल्कि दलितों के सार्वजनिक स्थानों पर उपयोग का अधिकार भी शामिल था. इसलिए उन्होंने वायकम आंदोलनकारियों का साथ देने का निर्णय लिया. 1924 में मंदिर प्रवेश तथा सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर संघर्ष तेज हो चुका था. आंदोलनकारियों को दुनियाभर से समर्थन मिल रहा था. लोग खुले मन से सत्याग्रह का हिस्सा बन रहे थे. आंदोलनरत दलितों को सिख, ईसाई सहित अन्य धर्माब्लंवियों का सहयोग भी मिल रहा था. सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था का काम 200 से अधिक सिख स्वयंसेवक कर रहे थे. गांधी जी स्वयं उस मामले में रुचि ले रहे थे. किंतु वे इसे हिंदुओं का आंतरिक मामला मानते हुए, अन्य धर्माबलंबियों के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे. ‘यंग इंडिया’ में लेख लिखकर उन्होंने गैरहिंदुओं को वहां से हट जाने का आग्रह किया था, जिसे उन्होंने नकार दिया था. गांधी, कांग्रेस और पेरियार को भी वायकम सत्याग्रह से दूर रखना चाहते थे. कांग्रेस गांधी के प्रभाव में थी. किंतु पेरियार का निर्णय अटल था. वे स्वयं को गांधी और कांग्रेस की छाया से बाहर लाने के लिए तैयार कर चुके थे. 14 अप्रैल 1924 को वे अपने साथियों के साथ वायकम आंदोलनकारियों के साथ मिल गए. पेरियार की लोकमानस में पैठ थी. उनके उतरते ही आंदोलन में तेजी आ गई. जयार ने वायकम आंदोलन को द्रविड़ अस्मिता का मुद्दा बनाया. लोग उनके समर्थन में जुटने लगे. आंदोलन तेजी से आगे बढ़ने लगा. अंततः गांधी को भी वायकम सत्याग्रहियों के समर्थन में आना पड़ा. ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा—‘यदि ब्राह्मणों ने अछूतों को सड़कों पर चलने की आजादी नहीं दी तो यह आंदोलन दिनोंदिन उग्र होता जाएगा. अभी तक सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनकारी आगे मंदिर प्रवेश की स्वतंत्रता की मांग भी करने लगेंगे.’

वही हुआ. पेरियार वायकम मुद्दे को दक्षिण भारतीय दलितों को पिछड़े वर्गों की अस्मिता का मुद्दा बना चुके थे. सरकार ने पेरियार को दबाने की कोशिश की. उन्हें दो बाहर कैद किया गया. तरहतरह के दबाव डाले गए. लेकिन पेरियार डटे रहे. जेल से लौटने के साथ ही वे पुनः आंदोलकारियों से जुड़ जाते थे. अंततः ब्राह्मणों को झुकना पड़ा. एक निर्णय के तहत सरकार ने दलितों को सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता बहाल कर दी. वह पेरियार की बड़ी सफलता थी. उनके योगदान को केरल उच्च न्यायालय और सरकार दोनों की ओर से सराहा गया था. उस जीत ने पेरियार को संपूर्ण दक्षिण भारत में प्रतिष्ठित कर दिया. उसके फलस्वरूप वहां गांधी का प्रभावक्षेत्र सिकुड़ने लगा. यह पेरियार की बड़ी जीत थी. यहां तक कि कांग्रेस को भी जो आरंभ में पेरियार के कार्यक्रमों का विरोध कर रही थी, अंततः उनके समर्थन में आना पड़ा. कांचीपुरम् अधिवेशन में कांगे्रस ने उन्हें ‘वायकम वीरर’, ‘वायकम का हीरो’ कहकर सम्मानित किया.

गांधी तथा वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ पेरियार के मतभेद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से सर्वथा मुक्त थे. कांग्रेस राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग कर रही थी. कांग्रेस के अभिजन नेता, अंगेजी के साथ आ रहे आधुनिक विचारों से त्रस्त थे. वे उसे ‘भारतीयता’ पर संकट के रूप में देखते थे. औपनिवेशिक शासन से मुक्ति केवल उसका राजनीतिक एजेंडा नहीं था. बल्कि उसके पीछे कांग्रेस के अभिजन नेताओं के वर्गीय स्वार्थ भी छिपे थे. ऐसे नेताओं का प्रमुख उद्देश्य था, सामाजिक परिवर्तन की धारा को अवरुद्ध कर, उसे मनमानी दिशा दी जा सके. राजनीतिक स्वतंत्रता से उनका आशय था, राष्ट्रवाद के नाम पर स्वतंत्रता को भावनात्मक मुद्दा बताकर उसके लिए व्यापक जनसहमति हासिल लेना चाहते थे. जबकि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी कारगर हो सकती है, जब लोग अपनी स्वाधीनता को जीना जानते हों. उनमें अपने अधिकारों के प्रति पर्याप्त चेतना हो. इसलिए पेरियार की राजनीति संबंधी मांग केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी. गांधी की भांति पेरियार का भी विचार था कि अशिक्षा, धर्म और तज्जनित तरहतरह के अंधविश्वासों से ग्रसित समाज राजनीतिक आजादी को पूरी तरह आत्मसात् करने में सक्षम नहीं है. ऐसे समाज को यदि राजनीतिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो वह उसका लाभ उठाने में अक्षम होगा. इसलिए तिलक आदि नेता जो कहते आए थे कि ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ के बजाए पेरियार का नारा था—‘आत्मसम्मान मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.’ छूआछूत से ग्रसित दलितों और उत्पीड़न के शिकार अन्त्यजों के लिए इस नारे का विशेष महत्त्व था. नारे के पीछे उनकी समानता और न्याय की भावना अंतनिर्हित थी. प्रकारांतर में वे कांग्रेस के समानांतर एक ऐसे आंदोलन का संचालन कर रहे थे जो विशुद्ध तर्कसम्मत समाज की स्थापना को समर्पित था. ऐसे समाज के लिए जिसमें मनुष्य अपने विवेक को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रहों से मुक्त रख सकता है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी अनिवार्य शर्त है. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के उद्देश्यों और कार्यक्रमों को तमिल जनता तक पहुंचाने के लिए पेरियार ने दो पर्चे प्रकाशित किए थे. उनके द्वारा पेरियार की आदर्श समाज संबंधी संकल्पना और संपनों को समझा जा सकता है—

1. ऐसे समाज को उखाड़ फेंकना जिसमें एक वर्ग दूसरे से खुद को ऊंचा समझता है. मात्र जन्म के आधार पर जो आदमीआदमी के बीच अविश्वास को जन्म देता और उसे निरंतर पालतापोसता है.

2. ऐसे समाज की स्थापना करना जिसमें सभी बराबर हों. जिसमें सभी को अपनी बात कहने की आजादी हो. विकास के लिए समान अवसर प्राप्त होते हैं. जिसमें गैरबराबरी के लिए कोई जगह न हो. कानून और समाज के स्तर पर स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार और मानसम्मान प्राप्त होता हो. उन्हें समाजार्थिक स्तर पर किसी पर किसी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े.

3. जिसमें समाज के सभी वर्गों को अपनेअपने विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों. जिससे वे अपनी नैसर्गिक स्वाधीनता का आनंद ले सकें.

4. छूआछूत का समूल नाश करते हुए आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना के अनुरूप समाज की स्थापना करना.

5. अनाथों और विधवाओं के लिए आवासइकाइयों का निर्माण तथा उनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध करना.

6. जनसाधारण को नए मंदिर, मठ तथा गुरुकुल पद्धति पर स्कूल बनाने की प्रवृत्ति की ओर से हतोत्साहित करना.

7. नाम के साथ जाति अथवा गौत्र सूचक शब्दों के प्रयोग बंद करने पर जोर देना. उपलब्ध संसाधनों एवं संपदाओं के सामूहिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना. उससे सभी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आवास आदि के विकास पर जोर देना. इसके लिए सामूहिक स्तर पर प्रयास करते रहना.

आत्मसम्मान आंदोलन’ लंबे समय तक अनौपचारिक संगठन के रूप में काम करता रहा. उसे विधिसम्मत संस्था के रूप में 1952 में त्रिरुचिलापल्ली में पंजीकृत कराया गया. नाम रखा गया—‘पेरियार आत्मसम्मान प्रचार संस्था.’ संस्था का प्रमुख लक्ष्य था—अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त ऐसे समाज की संरचना पर बल देना जो समानता और समरसता के सिद्धांतों पर टिका हो. धर्म केंद्रित आचारसंहिता में स्त्री को पुरुष से हेय माना गया है. पेरियार ने स्त्रीसमानता पर जोर दिया और उसे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य उद्देश्य के रूप में शामिल किया. बनारस यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिरों में देवदासियों की दुर्दशा के बारे में देखा था. धर्म के नाम पर स्त्रीअस्मिता के अपमान ने उनके अंतर्मन को आहत किया था. हिंदू धर्म के प्रति उनकी नफरत का एक कारण मंदिरों में चल रही देवदासी प्रथा भी थी, जिनमें ईश्वर की सेवा के नाम पर युवा लड़कियों को अघोषित वेश्यावृत्ति की ओर ढकेल दिया था. स्त्रीसमानता और स्वतंत्रता के लिए विवाह को स्त्रीपुरुष के बीच एक करार की संज्ञा दी थी, जबकि ब्राह्मणी सभ्यता मानती थी कि दांपत्य संबंध स्वर्ग में तय किए जाते हैं. देवदासी प्रथा को समाप्त करने के लिए 1930 में पेरियार ने मद्रास विधानसभा में एक बिल भी पेश किया था. उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया, जिसकी उस समय स्त्रीवादी संगठनों ने भूरिभूरि प्रशंसा की थी. उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए 1938 में मद्रास में प्रांतीय महिला संगठनों का बड़ा सम्मेलन हुआ था. उसमें पेरियार के स्त्रीउत्थान को लेकर चलाए जा रहे कार्यक्रमों की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘पेरियार’ की उपाधि से अलंकृत किया था.

पेरियार के आदर्श समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव, छूआछूत और रूढ़ियों के लिए कोई स्थान न था.‘आमसम्मान आंदोलन’ के पीछे निहित पेरियार की भावना को समझना कठिन नहीं है. पेरियार ने जाति और धर्म के आधार पर ब्राह्मणों द्वारा गैरब्राह्मणों के शोषण को अपनी आंखों से देखा था. कांग्रेस में रहकर वे समझ चुके थे कि उसके अभिजन नेता येनकेनप्रकारेण स्वार्थसिद्धि में लगे रहते हैं. वे वही राह अपनाते हैं, जिससे उनके वर्गीय हितों को लाभ पहुंचता हो. इसके लिए वे धर्म को, राजनीति को हथियार बनाते हैं. शूद्रों को संपत्तिअधिकार से बेदखल कर समाज बड़े वर्ग को अपंग बनाने की व्यवस्था उन्होंने पहले से ही धर्मशास्त्रों में की हुई है. ऐसे में गैरब्राह्मणों का भला तभी संभव है, जब वे अपने सामूहिक हितों के प्रति संगठित हों. इसके लिए उनमें स्वाभिमान की भावना का संचार करना आवश्यक है. इसके लिए उन्हें पहले ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर निकालना होगा.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के पीछे पेरियार की कांग्रेस और गांधी की ओर से जन्मी निराशा थी. वे चाहते थे कि कांग्रेस और गांधी सामाजिक न्याय को भी अपने आंदोलन का मुद्दा बनाएं. राजनीति और समाज में ब्राह्मणवर्चस्व को कम करने के लिए उनका साथ दें. जबकि कांग्रेस के सर्वेसर्वा बने गांधी धर्म और जाति के क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने को प्रयत्नरत थे. हिंदू धर्म में सुधार की उनकी योजना किसी भी तरह वर्णव्यवस्था को बचाए रखने तक सीमित थी. कांग्रेस को जनसाधारण के सरोकारों से जोड़ने के लिए उन्होंने एक प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें समाज के उपेक्षित एवं विपन्न वर्गों के लिए शिक्षा एवं अन्यान्य अवसरों में समानता की मांग की गई थी. वे उसे कांग्रेस के कांचीपुरम् अधिवेशन में पेश करना चाहते थे. किंतु उस समय के बड़े कांग्रेसी नेताओं ने यह कहते हुए कि इससे समाज में दरार आएगी, पेरियार के प्रस्ताव पर विचार करने से ही इन्कार कर दिया था. कांग्रेस उससे पहले भी पेरियार के प्रस्ताव को ठुकरा चुकी थी. तनमनधन से कांग्रेस को पूरी तरह समर्पित पेरियार के लिए यह बड़ा झटका था. नाराज होकर उन्होंने अधिवेशन का बहिष्कार कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ इसी विद्रोह की देन था. उनका ध्येय था, दलित और पिछड़ों के सम्मान की रक्षा. मानवमात्र की स्वतंत्रता, समानता सामाजिक समरसता की सुरक्षा करते हुए आधुनिक जीवनमूल्यों पर आधारित समाज की संरचना के लिए काम करना. यह जानते हुए कि गांधी और कांग्रेसी नेता उनका साथ देने वाले नहीं हैं, आंदोलन का शुरुआती संकल्प था—‘न ईश्वर, न धर्म, न ब्राह्मण, न गांधी और न ही कांगे्रस.’ ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ मनुष्य के मूलभूत अधिकारों और अस्मिता की रक्षा को समर्पित होगा. आत्मसम्मान आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था—

द्रविड़ जनता के मनस् की ब्राह्मणवाद से मुक्ति. द्रविड़ों को उनके प्राचीन गौरव का विश्वास दिलाना. उसके लिए उन सभी धर्मग्रंथों, रीतिरिवाजों और परंपराओं से मुक्त करना जो ब्राह्मणवर्चस्व को अपरिहार्य ठहराते थे.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ के नामकरण के पीछे की वैचारिकी को समझना कठिन नहीं है. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में आर्यों और द्रविड़ों के संघर्ष का उल्लेख हुआ है. उनके अनुसार आर्य कबीलों ने भारत के मूल निवासी कबीलों को युद्ध में पराजित कर, दक्षिण दिशा में पलायन के लिए बाध्य कर दिया था. द्रविड़ उन्हीं के वंशज माने जाते हैं. इस तरह द्रविड़ होना एक ऐतिहासिकसांस्कृतिक पराजय का कलंक अपने सिरमाथे ढोना है. हालांकि जो महाकाव्य या मिथ उन युद्धों को लेकर गढ़े गए हैं, उनकी प्रामाणिकता को लेकर अनेकानेक संशय हैं. किंतु अन्य प्रमाणों के अभाव में लेखकों एवं इतिहासकारों को महाकाव्यों तथा प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में मौजूद मिथकीय आख्यानों से ही इतिहास के सूत्र खोजने पड़ते हैं. भारतीय संस्कृति की विडंबना है कि उसके नेतृत्व और संरक्षण का दायित्व लंबे समय से उन वर्गों के अधीन रहा, जिनके अपने स्वार्थ लोकहित की अपेक्षा प्रबल थे. जिनमें निष्पक्षता का अभाव था. यही कारण है कि समानता और स्वतंत्रता जैसे मूलभूत गुणों का, जो किसी संस्कृति को महान बनाते हैं—भारतीय संस्कृति में अभाव बना रहा. बावजूद इसके वे वर्ग श्रेष्ठतम होने का दावा भी करते रहे.

प्रक्षेपण का शिकार होने के कारण प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में अनेक विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं. पुराणों में दर्ज है कि अनार्य भारतीयों की युद्धशैली आक्रामक आर्यों की अपेक्षा परिष्कृत थी. देवासुर संग्राम में देवताओं को अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा था. सफलता तब मिली जब उन्होंने अनार्यों कबीलों में फूट डालकर उनमें से कुछ का बारीबारी से सहयोग लेना आरंभ किया. समाजीकरण की उस प्रक्रिया में एक ऐसा वर्ग भी पनपा जिसकी निपुणता कर्मकांडों में थी. जिसका दावा था कि वह दैवीय शक्तियों का ज्ञाता है तथा यज्ञादि कर्मकांडों के माध्यम से उनसे संवाद भी कर सकता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि वे शक्तियां उस वर्ग की कल्पना की उपज थीं. फिर भी उनकी बातों का जादू ऐसा था कि उस समय का बड़ा वर्ग उससे प्रभावित था. विशेष अवसरों पर उस वर्ग की राय महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. अपनी काल्पनिक योग्यता के बल पर वह वर्ग जनसाधारण को सम्मोहित करने का सामथ्र्य रखता था. सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते हुए वह वर्ग प्रायः विजेता के पक्ष में रहता था. हालांकि कालांतर में, सांस्कृतिक विजय प्राप्त होने के बाद उस वर्ग ने जो नए मिथ गढ़े, उनमें पराजित वर्गों; यानी उन वर्गों को भी अपना समर्थक और अनुयायी दर्शाने की कोशिश की, जिनसे विरुद्ध संघर्ष में उसने आर्यों का नेतृत्व किया था. सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व लिए यह अनिवार्य था. आरंभ में सब कुछ स्वाभाविक लगता था. यज्ञादि कर्मकांडों के लिए संसाधनों की आवश्यकता थी. उसके लिए गणप्रमुख अथवा मुखिया की मदद आवश्यक थी. आगे चलकर गणप्रमुख का पद राजा ने ले लिया और यज्ञ को प्रतिष्ठा का विषय माना जाना लगा. जो यज्ञ में अधिक बलि दे, दानादि में ज्यादा संसाधन खपाए और अधिकाधिक लोगों को भोज कराए, वह उतना ही बड़ा राजा माना जाता था. धीरेधीरे यज्ञों की संख्या और उनकी मान्यता बढ़ती गई. अपना वैशिष्ठ्य बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने अवसरविशेष के अनुसार यज्ञों और कर्मकांडों का नियमन किया; और अवसरानुकूल रणनीति अपनाकर उसे शेष समाज पर थोपते चले गए. वास्तविकता से हटाकर वायवी दुनिया की ओर ले जाने की उस प्रवृत्ति जैसा विरोध अपेक्षित था, वैसा नहीं हुआ. यदि छिटपुट विरोध हुए भी तो उन्हें दबा दिया गया. पुराणों के अनुसार वेन पृथ्वी का पहला राजा था. उसे जनता ने चुना था. कदाचित इसीलिए वह ब्राह्मणों को अतिरिक्त महत्त्व देने के लिए तैयार न था. इससे क्षुब्ध ब्राह्मणों ने जनता को उसके विरुद्ध भड़का दिया और वेन उत्तेजित भीड़ के कोप का शिकार बन गया. प्रजा की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों ने वेन के बेटे पृथु को राजा नियुक्त किया. पृथु ब्राह्मणों की शक्ति को समझ चुका था. पिता की हत्या से भयभीत पृथु ने ब्राह्मणों की प्रत्येक आज्ञा को शिरोधार्य किया. इसलिए उनकी दृष्टि में वह आदर्श राजा कहलाया. पुराणों में उसकी भूरिभूरि प्रशंसा की गई है. बताया जाता है कि उसी के नाम पर पृथ्वी का नामकरण हुआ है. वेन और पृथु की कहानियां दर्शाती हैं कि ब्राह्मणत्व या ब्राह्मण की खुशी राजसत्ता के श्रेष्ठत्व का प्रमाण मान ली गई थी. महाभारत में पांडव सारे धत्त्कर्म करने के बाद भी धर्मानुयायी घोषित कर दिए जाते हैं.

सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थायी बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने देवताओं को अपराजेय एवं अलौकिक शक्तियों का स्वामी घोषित कर दिया था. सांस्कृतिक संघर्ष शताब्दियों तक चलता रहा. इतिहास के एक चरण में जैसे ही आर्य कबीलों को अवसर मिला, उन्होंने सांस्कृतिक प्रतीकों और धरोहरों का अपने स्वार्थ के अनुसार अनुकूलन करना आरंभ कर दिया. उनमें बड़ी चालाकी से आर्यश्रेष्ठता के मिथ को स्थापित किया गया. इतिहास और संस्कृति की ताकत से अनजान अनार्य कबीले धीरेधीरे उस षड्यंत्र का शिकार होते गए. सभ्यता के इतिहास में किसी प्रजाति अथवा समूह की राजनीतिक पराजय अनहोनी घटना नहीं है. देशविदेश के इतिहास में इस तरह की लाखों घटनाएं दर्ज हैं. परंतु जब इतिहास को मिथ में ढालकर आस्था का विषय बना दिया जाए तो उसपर विमर्श की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है. साक्ष्यों के अभाव में विद्वानों को केवल अपनी कल्पनाशक्ति और विवेक से काम लेना पड़ता है. परिणामस्वरूप उनके निष्कर्षों में एकरूपता का अभाव होता है. ठोस वैचारिक चेतना की कमी के चलते सुधार के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं बन पाता.

इस देश में विदेशी आक्रामक सामरिक शक्ति अथवा बुद्धिबल के कारण कभी सफल नहीं हुए. वे भारत पर लंबे समय तक शासन करने में इसलिए कामयाब रहे क्योंकि उन्होंने यहां के बुद्धिजीवी वर्ग, यानी ब्राह्मणों के सांस्कृतिक साम्राज्य में सैंध लगाने की कभी कोशिश नहीं की. सैकड़ों वर्षों के दौरान देश राजनीतिक स्तर पर अनेक उतारचढ़ाव से गुजरा. बड़ेबड़े साम्राज्य बने और ढहे भी, परंतु ब्राह्मणों के सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व को कभी चुनौती नहीं मिली. 400 वर्ष से अधिक समय तक दिल्ली के तख्त पर आसीन, मुगल सम्राटों ने जान लिया था कि ब्राह्मण जो समाज का बहुत छोटासा हिस्सा है, को साधकर पूरे भारत को साधा जा सकता है. यही आगे चलकर अंग्रेजों ने किया. यही कारण है कि इस देश में विदेशी शासकों के प्रति आक्रोश कहीं नजर नहीं आता. उनीसवीं शताब्दी में यदि विदेशी सत्ता के प्रति जनज्वार उमड़ता दिखाई पड़ता है तो इसलिए कि नई शिक्षा की रोशनी में समाज का बड़ा हिस्सा ब्राह्मणों के बौद्धिक वर्चस्व को नकारकर स्वतंत्र निर्णय लेने लगा था. दूसरे अमेरिका और फ्रांस में हुई क्रांतियों के दबाव में वे समानता और स्वतंत्रतामूलक आधुनिक जीवनमूल्यों को अपना चुके थे. इसलिए भारत में आगमन के साथ ही उन्होंने समाननागरिक संहिता का पर अमल करना आरंभ कर दिया. जिसके फलस्वरूप वर्ण, जाति, धर्म आदि के नाम पर उपेक्षा और दमन का शिकार रहे वर्गों को शिक्षा और जीवन के बाकी क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर मिला. अकादमिक स्तर पर बहुत अधिक पढ़ेलिखे न होने के बावजूद पेरियार इसे समझते थे. वे जान चुके थे कि आत्मसम्मान आंदोलन की सफलता के लिए ब्राह्मणों के बौद्धिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठतावाद को चुनौती देना अत्यावश्यक है. श्रेष्ठतादंभ के शिकार तमिल ब्राह्मण स्वयं को आर्य मूल का मानते थे. पिछड़े समूहों को उनके वर्चस्व से बाहर निकालने के लिए प्राचीन सांस्कृतिक स्थापनाओं को चुनौती देना आवश्यक था. पेरियार ने धर्म को सीधी चुनौती दी. कहा कि धर्म के अंधेरे में भटकने बजाय लोगों को चाहिए कि वे अपने विवेक का इस्तेमाल करें. उन्होंने महाकाव्यों और पुराणों को कपोलकल्पित माना. समाज को मूर्तिपूजा और तत्संबंधी अन्यान्य आंडबरों से दूर रखने के लिए आंदोलन चलाया. जिसमें गणेश की प्रतिमाएं तोड़ डाली गईं. वर्णव्यवस्था का समर्थन करने वाले ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाई गईं. 1953 में उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर राम के पुतलों का दहन किया. 1955 में सार्वजनिक स्ािान पर राम के चित्र का दहन करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके लिए उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा, किंतु वे डटे रहे.

पेरियार के विचार था कि धर्म बहुसंख्यक वर्ग को सामाजिकबौद्धिक रूप से दास बनाए रखने का शक्तिशाली माध्यम है. उसका पहला हमला मनुष्य के आत्मविश्वास पर होता है. जिससे वह अपने विवेक से काम लेने के बजाए पंडेपुरोहितों के प्रपंच में फंसकर रह जाता है. फुले और आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से ऊपर मानते थे. उनका मानना था कि उत्पीड़ित वर्गों यथा दलितोंपिछड़ों के लिए सामाजिकसांस्कृतिक स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इसलिए जाति प्रथा का उन्मूलन ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का प्रमुख एजेंडा था. पेरियार का मानना था कि ईश्वर, धर्म और ब्राह्मण, तीनों किसी न किसी रूप में जातिप्रथा के जन्मदाता रहे हैं. जबकि गांधी और कांग्रेस दोनों जातिप्रथा के छदम् विरोधी थे. पेरियार का मानना था कि जाति के समूल उच्छेद के बिना मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता असंभव है. उस समय तक समानता का सपना भी अधूरा रहेगा. अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द न लगाने का निर्णय वे 1923 में ही ले चुके थे. ‘पेरियार’ संबोधन उन्हीं दिनों उन्होंने अपनाया था.

दक्षिण में अस्मितावादी राजनीति की बागडोर धनी पिछड़ी जातियों के हाथों में थी. उनमें रेड्डी, कम्मा, वेल्लाल, नायर, वेलमाज आदि शुरू से सक्रिय थीं. यह भी कह सकते हैं कि ब्राह्मणों के विरुद्ध दलित एवं पिछड़ी जातियों में विकसी चेतना का लाभ उठाने के लिए वे जातियां अकस्मात मैदान में उतर आई थीं, जो उससे पहले तक ब्राह्मणों के साथ थीं और किसी न किसी प्रकार सत्तासुख भोगती आई थीं. चूंकि वह आंदोलन ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण, द्रविड़ बनाम आर्य था, इसलिए उनके आंदोलन को पिछड़ी एवं दलित जातियों का सहयोग भी प्राप्त था. ‘दव्रिड़त्व’ उन्हें अतीत से जोड़ता था. पेरियार के लिए वह कोई चिंताजनक बात न थी. वे ब्राह्मणवाद को किसी भी प्रकार के क्षेत्रीयतावाद से खतरनाक मानते थे. ब्राह्मणवाद पर निर्णायक चोट करने के लिए उन्होंने जातिवाद के समूल उन्मूलन, स्त्रीमुक्ति की मांग की. अस्मितावादी राजनीति प्रकारांतर में यह संदेश भी देती थी कि विभिन्न जातियोंउपजातियों में बंटे द्रविड़ कभी साझा इतिहास और संस्कृति के सहचर थे. उनके बीच भेदभाव की भावना आर्यों, जिनसे उनका आशय प्रायः ब्राह्मणों तक सीमित था, द्वारा अपने स्वार्थ के लिए आरंभ किया गया था. पिछड़े वर्ग की धनी जातियों का संगठन उत्तर भारत में भी बना था. गत शताब्दी के चैथे दशक में कुर्मी, कुशवाहा और यादव, पिछड़ों में अपेक्षाकृत समृद्ध जातियों ने ‘त्रिवेणी संघ’ के रूप में वर्चस्वकारी जातियों का विरोध रचने की कोशिश की थी. उनकी कमजोरी थी कि सिवाय जाति के उनके बीच दूसरा कोई संगठनकारी तत्व न था. दक्षिण में अस्मितावादी आंदोलन की सफलता का कारण द्रविड़ के रूप में उनकी स्वतंत्र पहचान थी. ‘त्रिवेणी संघ’ का प्रयोग महत्त्वपूर्ण और अत्यावश्यक होने के बावजूद लंबे समय तक कारगर न हो सका. इसलिए कि संगठन में शामिल जातियां स्वयं को क्षत्रिय वंशज मानती थीं. इस तरह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में वे उसी ब्राह्मणवाद का समर्थन करती थीं, जिसने उन्हें शताब्दियों तक उत्पीड़ित रखा था और जिससे मुक्ति की कामना के लिए उन्होंने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी. इसलिए बहुसंख्यक होने के बावजूद वे मणवाद के विरोध में सार्थक प्रतिपक्ष न बना सकीं. चुनावों में मिली पराजय के बाद वे पूरी तरह बिखर गईं. दूसरे पिछड़ों में उभरती चेतना के बाद स्वयं कांग्रेस ने ‘पिछड़ा वर्ग कल्याण संघ’ की स्थापना की थी. चूंकि कांग्रेस को गांधी का आशीर्वाद प्राप्त था. जनमानस में उनकी पैठ को देखते हुए

दक्षिण भारत के इतिहास में 1927 से 1934 तक का समय सर्वाधिक परिवर्तनकामी था. उस समय तक पेरियार द्वारा चलाया गया ‘अस्मितावादी आंदोलन’ जनमानस में गहरी पैठ बना चुका था. उससे पूर्ववर्ती आंदोलनों पर किसी न किसी रूप में धर्म की छाया थी. जबकि आत्मसम्मान आंदोलन की नींव धर्मनिरपेक्षता और किसी भी प्रकार के आडंबरवाद से मुक्त थी. आत्मसम्मान आंदोलन की पैठ का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि न केवल सामाजिक शक्तियां बल्कि दक्षिण भारत के सैन्य बल भी उसके समर्थन में थे. ब्राह्मणीकरण की काट के लिए पेरियार ने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को उछाला था, जिसे वहां के जनसाधारण की स्वीकृति प्राप्त थी. ब्राह्मणवाद की नींव आस्था और विश्वास पर केंद्रित रही है. पेरियार की कोशिश ऐसे समाज की रचना की थी, जो आधुनिक ज्ञान और तर्क को समर्पित हो. ‘जस्टिस पार्टी’ के वरिष्ठ नेता और दक्षिण भारत में ‘निब्र्राह्मणीकरण आंदोलन’ के सक्रिय कार्यकर्ता आॅर्कट रामास्वामी मुदलियार ने पेरियार के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के लिए उनकी तुलना महान दार्शनिक रूसो के साथ की है—

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में फ्रांसिसी विचारक रूसो ने अपने देशवासियों के तर्कसामर्थ्य को संदीप्त किया. जिससे वहां फ्रांसिसी समाज बड़ी क्रांति के लिए तैयार हुआ. मैं यह कहूंगा कि पेरियार के कारण ही हम तमिलवासियों ने तर्क करना सीखा. जिसने आगे चलकर हमारे भी आत्मसम्मान की चेतना जाग्रत की. इस आधार पर पेरियार तमिलनाडू के रूसो हैं.’

आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से बढ़कर मानते थे. उनका मानना था कि दलित और पिछड़े लोग जो समाजार्थिक कारणों से दूसरों पर निर्भर हैं, या निर्भर बना दिए गए हैं, कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता उनका भला नहीं कर सकती. राजनीतिक स्वतंत्रता राज्य को केवल कानून बनाने तथा उनपर अमल करने हेतु आवश्यक स्वायत्तता प्रदान करती है. वह व्यक्तिमात्र को उसकी स्वाधीनता का एहसास कराने की जिम्मेदारी नहीं लेती. असमानताग्रस्त समाजों में कुछ नागरिक अधिकांश नागरिकों पर अधिकार जमाए रहते हैं. दूसरी ओर शिक्षा, अज्ञानता अथवा संसाधनों के मामले में अभिजन समाज पर निर्भरता के कारण बहुजन समाज अपनी स्वाधीनता का उपयोग करने में असमर्थ रहता है. उसके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता समाज के शीर्षस्थ वर्ग के निर्णयों का दास बन जाने तक सीमित हो जाती है. स्वतंत्रता को अपने हक में इस्तेमाल करना, जीवन में उसका आनंद लेना स्वाधीनता है. यह स्वतंत्रता को जीने, उसे जीवन में उतारने का नागरिक अधिकार है. नागरिक हित में आवश्यक है कि लोग स्वतंत्रता के साथसाथ स्वाधीनता का मोल भी समझें. पेरियार का कहना था कि बगैर सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन होगी. गांधी, नेहरू जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि उनके लिए मानवमात्र की सम्मानता का विचार कोई मूल्य नहीं है. भारतीय गौरव की प्रशंसा करते हुए वे प्रायः उस दौर का महिमामंडन करने लगते हैं, जब चातुर्वर्ण्य का बोलबाला था. शूद्रों और दलितों को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है. गांधी और कांग्रेस एक और तो दलितों और पिछड़ों को समानता और स्वतंत्रता का सपना दिखाते हैं. दूसरी ओर व्यवहार के स्तर उन संस्थाओं को भी बचाए रखना चाहते हैं, जो शताब्दियों से समाज के बड़े वर्ग के शोषण का कारण रही हैं. मानवमात्र के सम्मान की सुरक्षा के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की परिकल्पना करना अनैतिक विचार है.

जैसेजैसे सामाजिक परिवर्तन को लेकर पेरियार की स्वतंत्र वैचारिकी का निर्माण हो रहा था, वैसेवैसे कांग्रेस तथा उसकी नीतियों के प्रति उनका विरोध भी बढ़ता जा रहा था. उसकी रचनात्मक परिणति ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के रूप में सामने आई. इतिहासकारों के अनुसार द्रविड़ पराजित जाति रही है. आर्यों ने उन्हें दक्षिण की ओर ढकेल दिया था. जाति के आधार पर समाज के विभाजन तथा ऊंचनीच की भावना करीबकरीब पूरे देश में एकसमान है. मगर द्रविड़ों के माथे आर्यों के माथे पर आर्यों से पराजय का दोष मढ़ा था. इससे उबरने के लिए पेरियार ने द्रविड़ों को भारत का मूल निवासी बताया और आर्यों को आक्रामक. ब्राह्मणवाद पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ब्राह्मण विदेशी के हैं. इसलिए इस देश और यहां के संसाधनों पर मूलनिवासियों का अधिकार उनसे ज्यादा है. मूल निवासी की अवधारणा नई नहीं थीं. ज्योतिबा फुले उसे वर्षों पहले ‘गुलामगिरी’ में स्थापित कर चुके थे. 1892 में ‘मद्रास समाज सुधार संघ’ का गठन भी इसी सिद्धांत के आधार पर किया गया था.

1925 में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को आरंभ में केवल पढ़ेलिखे और मध्यवर्गी युवाओं का आकर्षण था. आरंभ में उन्हीं के भरोसे आंदोलन आगे बढ़ा. धीरेधीरे बात लोगों की समझ में आने लगी. शहर से लेकर गांव तक लोक पेरियार से जुड़ने लगे. 1930 में वह पूरे दक्षिण भारत में अपनी पकड़ बना चुका था. आंदोलन के साथसाथ पेरियार का आत्मविश्वास भी बढ़ता गया. उन्हें लग रहा था कि सामाजिक विकास के लक्ष्य को केवल सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है. राजनीति ऐच्छिक सामाजिक परिवर्तनों की दिशा में राजनीति केवल उत्प्रेरक का काम कर सकती है. धीरेधीरे पेरियार के मन में सक्रिय राजनीति को लेकर निराशा उमड़ने लगी. उन्हें यह विश्वास हो चला था कि सामाजिक सुधार के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति लोकप्रिय राजनीति के माध्यम से संभव नहीं है.

अपने विचारों को जनजन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘कुदी अरासु’(गणतंत्र) शीर्षक से साप्ताहिक की शुरुआत की. उसमें उन्होंने महिला उत्थान, सामाजिक न्याय, धर्म और पाखंड के विरोध में लिखना आरंभ किया. ‘कुदी अरासु’ नए मूल्यों को समर्पित साप्ताहिक था. इसी पत्र में उन्होंने 1935 में भगत सिंह के चर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों बना’ का तमिल अनुवाद प्रकाशित किया. ‘कुदी अरासु’ के उस अंक को सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया. पेरियार के लिए यह कोई नई बात न थी. उग्र विचारों के कारण मद्रास सरकार ‘कुदी अरासु’ को कई बार प्रतिबंधित कर चुकी थी. प्रोफेसर चमनलाल के अनुसार आजादी के बाद एक समय ऐसा भी आया जब भगत सिंह के उपर्युक्त लेख का अंग्रेजी प्रारूप उपलब्ध नहीं था. तब पेरियार द्वारा छापे गए लेख का अंग्रेजी में दुबारा अनुवाद करके काम चलाया गया. ‘कुदी अरासु’ में भगत सिंह को फांसी पर गांधी की चुप्पी की आलोचना करते हुए पेरियार ने इस पत्रिका के 29 मार्च 1931 के अंक में लिखा था—

देशभर में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसने भगत सिंह की फांसी की निंदा न की हो. कहीं कोई भी नहीं है जिसने इस घटना के लिए सरकार को कोसा न हो. दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि देशभर में ऐसे अनेक देशभक्त, और राष्ट्रनेता हैं जो गांधी को इस घटना के लिए दोषी मानते हैं.’

पेरियार की भाषा में कबीर जैसा तंज और साफगोई थी. अल्पशिक्षिात होने के बावजूद उनमें गजब आत्मविश्वास था. वे मुखर वक्ता, निर्भीक और मानवमूल्यों से प्रतिबद्ध नेता थे. उनके लिए सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक भागीदारी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण था. फुले का अनुसरण करते हुए पेरियार ने शोषण का आधार रहे ब्राह्मणवादी मिथकों पर न केवल जोरदार प्रहार किया, बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को भी चुनौती दी. यह जानते हुए भी भारत की धर्मप्राण जनता नास्तिक व्यक्ति को अपने नेता के रूप में शायद ही स्वीकार करेगी, पेरियार ने खुद को नास्तिक कहा और आजीवन नास्तिकता के प्रचार में लगे रहे. पेरियार के योगदान को सम्मानित करते हुए यूनेस्को ने उन्हें ‘दक्षिणपूर्वी एशिया का सुकरात’ का दर्जा दिया था.

ओमप्रकाश कश्यप