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वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

पेरियार – दो : दक्षिण भारत का आत्मसम्मान आंदोलन

सामान्य

(आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम ‘बेगमपुरा’ के नाम से जानते हैं. आने वाली दुनिया’ में रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. वैज्ञानि सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने ‘दक्षिण एशिया का सुकरात’ कहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें ‘भारत का वाल्तेयर’ माना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. उनके एक लेख के आधार पर अंग्रेजी दैनिक ‘दि हिंदू’ में उनकी तुलना बीसवीं शताब्दी का एच.जी.वेल्स से की गई थी. ओमप्रकाश कश्यप)

 

कांग्रेस से मोहभंग के पश्चात पेरियार का सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में स्वतंत्र रूप से सक्रिय होना, न केवल उनके, अपितु पूरे तमिलनाडु के लिए क्रांतिकारी घटना थी. किंतु जैसे सूरज के ताप और प्रकाश का स्वयं सूरज के लिए उतना महत्त्च नहीं होता, जितना शेष जीवजगत के लिए, उसी प्रकार पेरियार के नेतृत्व में चले आंदोलनों का लाभ जितना उनके देश और समाज को हुआ, उसके सापेक्ष पेरियार को मिली प्रसिद्धि और मानसम्मान न के बराबर है. उस आंदोलन के फलस्वरूप देश के दक्षिणी प्रांतों के साथसाथ बाकी हिस्सों में भी सामाजिक जागृति का संचार हुआ. उत्पीड़न एवं वंचना के शिकार लोग अपने अधिकारों तथा मानसम्मान की सुरक्षा एवं संरक्षा हेतु सन्नद्ध होने लगे. उसके फलस्वरूप न केवल कांग्रेस को अपनी नीतियों में बदलाव के लिए विवश होना पड़ा, अपितु सरकार को भी सामाजिक न्याय की भावना के साथ आगे आना पड़ा. पेरियार ने हजारों वर्षों से रूढ़ पड़ी परंपराओं, आडंबरों और बौद्धिक पाखंडों पर प्रहार किया. इस कारण समाज का एक वर्ग आज भी उनसे बुरी तरह चिढ़ता है. पेरियार बहुत कम समय तक सक्रिय राजनीति मंे रहे. कांग्रेस से अलग होने के बाद कभी राजनीति से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बावजूद इसके दक्षिण भारतीय राजनीति को जितना उन्होंने प्रभावित किया, उतना उनका समकालीन कोई नेता न कर सका. अपने समाज के बीच पेरियार की वही भूमिका है, जो अमेरिकी समाज में अब्राह्मम लिंकन, थाॅमस जेफरसन और टाॅमस पेन, इंग्लेंड में जाॅन स्टुअर्ट मिल तथा फ्रांस में वाल्तेयर और रूसो की है. उनसे पहले समाज में जितने भी नैतिक प्रतिमान प्रचलित थे, धर्म तथा उसके गर्भ से जन्मी परंपराएं उनका एकमात्र òोत हुआ करती थीं. उनका प्रभाव इतना गहरा होता था कि लोग न केवल धर्म और परंपराओं को जीते थे, बल्कि उनके लिए भी जीते थे. देखने में सबकुछ सहज और स्वाभाविक लगता था, असलियत में वह सामंतवाद को बचाए रखने, शोषण को स्थायी बनाए रखने वाली व्यवस्था थी. ‘क्या’, ‘क्यों’ और ‘क्यों नहीं’ जैसे प्रश्नों के लिए जिनपर आधुनिक सभ्यता की नींव टिकी है, उसमें कोई स्थान न था. जो भी था, सब किसी न किसी रूप में थोपा हुआ रहता था. दावा हालांकि खुलेपन का था, दिखाया यही जाता था कि लोगों ने उसे खुशीखुशी अपनाया हुआ है—लेकिन सब कुछ पूर्वनियोजित, पूर्वनिर्धारित और पुरोहित वर्ग की स्वार्थसिद्धि के वास्ते था. परंपरा को प्रमाण बनाए रखने के लिए कुछ कहानियां और मिथ गढ़ लिए जाते थे. जनसमाज के लिए वही सांसारिकता का पर्याय होते थे. उन्हीं के अंधानुकरण को वह जीवनसिद्धि माने रहता था. उनके प्रभाव में मानवीय विवेक की भूमिका घट जाती थी. मानसिक रूप से परंतत्र व्यक्ति केवल अनुसरण कर सकता है, सो परंपरा को प्रमाण मानने वाले समाज में अनुगमन की प्रवृत्ति पीढ़ीदरपीढ़ी कायम रहती थी.

पेरियार समृद्ध पिता की सफल संतान थे. परंतु आर्थिक समृद्धि से उनकी सामाजिक प्रस्थिति पर खास अंतर नहीं पड़ा था. कथित उच्च जातियों से आए कांग्रेसजनों के बीच उनकी स्थिति अब भी ‘पिछड़े’ व्यक्ति के समान थी. वे समझ चुके थे कि व्यक्तिगत उपलब्धियों के बल पर लोगों के मन में सम्मानभाव तो जगाया जा सकता है, परंतु उन धारणाओं को नहीं बदला जा सकता जो लोगों के मनोमस्तिष्क में शताब्दियों से काई की भांति जमा हैं. जो मनुष्य को जन्म से ही ऊंचा या नीचा घोषित कर देती हैं. वह न केवल दक्षिणभारत बल्कि संपूर्ण दुनिया के लिए सर्वाधिक परिवर्तनकारी दौर था. रूसी क्रांति संपन्न हो चुकी थी. साम्यवाद का प्रभाव दक्षिण भारत में भी था, किंतु शेष भारत की तरह दक्षिण में भी अधिकांश साम्यवादी नेता तथाकथित उच्च जातियों से आए थे. उनके अपने जातीय स्वार्थ प्रबल थे. भारत में जाति सामाजिक स्तरीकरण और अमानवीय आचरण का मुख्य कारण रही है. जातिआधारित वर्गभेद पर प्रहार किए बिना साम्यवाद की सफलता संभव भी नहीं थी. इससे भारत में साम्यवादी आंदोलन की असफलता और भटकाव के कारणों को समझा जा सकता है. यही कारण है कि उत्पीड़ित और वंचित जनों के पक्ष में आवाज उठाने वाले पेरियार, साम्यवादी होने का दावा करने वाले नेताओं से दूरी बनाए हुए थे. उनका मानना था कि माक्र्स का दर्शन केवल पश्चिमी देशों में कारगर हो सकता है, जहां जाति जैसी भयावह बीमारी नहीं है. धर्म का सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप है. भारतीय समाज में समानता और आत्मसम्मान की लड़ाई यदि किसी को लड़नी है तो उसे पहले जाति से टकराना पड़ता है; और जाति की जंग जब तक अविजित रहेगी, जब तक उसे धर्म का समर्थन प्राप्त है. यथास्थितिवादियों के अनुसार जाति और धर्म समाज में सुखशांति बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं. किंतु असलियत में वे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के मूलभूत अधिकारों पर कुठाराघात करती हैं. जातीय अनुशासन का लाभ उठाकर कथित ऊंची जातियां निचली जातियों के लिए शासक का काम करती हैं. सामाजिक सुखशांति के लिए जो लोग धर्म और जाति को अपरिहार्य मानते हैं, वे या तो बहुत चालाक और स्वार्थी हैं, अथवा दिग्भ्रमित.

पेरियार ने धर्म को चुनौती दी. जाति के आधार पर राजनीति के स्वाभाविक दावेदार बने शीर्षस्थ जातियों के बड़े नेताओं को बहस के लिए ललकारा. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ द्वारा द्रविड़ों की सोयी चेतना को जगाने का काम भी किया. उन्होंने तमिलवासियों को सवाल करना सिखाया. उसके फलस्वरूप पहली बार 90 प्रतिशत लोग यह सोचने को विवश हुए कि वे शिक्षा और रोजगार के अवसरों से बंचित क्यों हैं? कि तीन प्रतिशत ब्राह्मण सरकार के तीनचैथाई से अधिक पदों पर कैसे चले जाते हैं? कि दलितों और पिछड़ों को सार्वजनिक मार्गों पर आनेजाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं है? कि जन्म से एक समान होने के बावजूद मनुष्य को जाति के आधार पर भेदभाव और असमानता का शिकार क्यों बनाया जाता है? इन प्रश्नों को उठाने वालों में पेरियार पहले नेता नहीं थे. दक्षिण भारत की लंबी पूरी संतपंरपरा उनके समर्थन में थी. 1892 में गठित ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ ने भी सांगठनिक स्तर पर द्रविड़ अस्मिता का मामला उठाया था. फुले के विचारों से प्रभावित संघ के नेताओं ने जोरशोर से यह प्रचारित किया था कि ब्राह्मण विदेशी आर्यों के वंशज हैं, जबकि गैरब्राह्मण द्रविड़ भारत के मूल निवासी हैं. फुले ने धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाए थे. कहा था कि वे सब ब्राह्मणों द्वारा स्वार्थसिद्धि के लिए गढ़ी गई गल्पकथाएं हैं. उसी परंपरा को विस्तार देते हुए पेरियार ने धर्मशास्त्रों को अपनी विवेचना का आधार बनाया. इसके साथसाथ उन्होंने धर्म तथा ईश्वर की सत्ता को भी कठघरे में लिया. उससे पहले न्याय और समानता की मांगों का आकलन धार्मिक आचारसंहिताओं के आधार पर किया जाता था. आवश्यकता पड़ने पर उनका समाधान भी शास्त्रों में खोजा जाता था. परंपराश्रित होने के कारण ब्राह्मणसंस्कृति विशेषता विहीन, विशेषज्ञ संस्कृति थी. उसमें कुछ जातियां विशेषाधिकार संपन्न होती हैं, तो कुछ पूर्णतः अधिकारविपन्न. अधिकारविपन्नों के लिए व्यवस्था होती कि वे विशेषाधिकार संपन्न जातियों के आदेशों का बिना किसी शर्त के पालन करें. यही शास्त्रसम्मत मर्यादा है. दुष्परिणाम यह होता है सामाजिक नेतृत्व हेतु मौलिक प्रतिभाएं आगे नहीं आ पातीं. इससे ज्ञान की धारा अवरुद्ध होती है; तथा सत्ताकेंद्रों पर खास वर्गों का अधिपत्य निरंतर बना रहता है. समयानुकूल बोध के अभाव में परंपरा और मिथक जनसाधारण का मार्गदर्शन करने लगते हैं; और सभ्यता की प्रतिगामी यात्रा शुरू हो जाती है. पेरियार ने लोगों के दिमाग को ब्राह्मणवाद से मुक्त किया. उनके सोच को वैज्ञानिकीकरण की ओर ले गए. इस योगदान के लिए तमिल जनता ने उन्हें अपना वास्तविक ‘जननेता’(थलाईवर) स्वीकार किया. कांग्रेस छोड़ते समय पेरियार ने कहा था—‘कांग्रेस और उसके नेता गैरब्राह्मणों का भला नहीं कर सकते. इसलिए मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, कांग्रेस को खत्म करना.’ वे अपने उद्देश्य में सफल भी रहे. गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज नेताओं के रहते कांग्रेस दक्षिण भारत में तीसरे स्तर का राजनीतिक दल बना रहा.

1925 में कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया. पहले सम्मेलन में उन्होंने समानता और आत्मगौरव का मुद्दा उठाया. उन्होंने गैरब्राह्मणों का आवाह्न किया कि वे किसी भी बौद्धिकसांस्कृतिक और सामाजिक जड़ताओं से खुद को मुक्त करें. समानता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. लेकिन वह लक्ष्य किसी की दया या परोपकार के भरोसे प्राप्त नहीं किया जा सकता. लक्ष्यपूर्ति के लिए अपने आप को समझना और उसके लिए संगठित प्रयास आवश्यक हैं. संस्था का दूसरा सम्मेलन एम. आर. जयकर की अध्यक्षता में पेरियार के गृह नगर इरोड में 10 मई 1930 को हुआ. पेरियार ने उसमें जोरदार भाषण दिया. अपने भाषण में उन्होंने मूर्तिपूजा और आडंबरवाद को त्यागने का आवाह्न किया. उससे अगले सम्मेलन में जो अगस्त 1931 में विरुदनगर में हुआ था, पेरियार ने छूआछूत का विरोध करते हुए अंतरजातीय विवाह पर जोर दिया. सम्मेलन में उन्होंने शिक्षा और सामूहिक भोज को बढ़ावा देने की सलाह दी. लोगों पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ा. वे समझने लगे कि जातीयविषमताओं को मिटाने के लिए आधुनिक शिक्षा के साथसाथ सामूहिक भोजन को बढ़ावा देना अत्यावश्यक है.

महात्मा ज्योतिराव फुले और डाॅ. भीमराव आंबेडकर दोनों सामाजिक समानता और स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता से अधिक महत्त्व देते थे. आजादी से पहले आवश्यक है ऐसे समाज का गठन जो आजादी का मूल्य समझता हो. जिसे अपने साथसाथ दूसरों की स्वतंत्रता की भी फिक्र हो. इस संबंध में पेरियार की राय महात्मा फुले और डाॅ. आंबेडकर जैसी ही थी. सक्रिय राजनीति का परित्याग तथा ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाना—उनका सुविचारित निर्णय था. हिंदू धर्म में व्याप्त ऊंचनीच और छूआछूत की भावना का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में हो चुका था. बचपन और युवावस्था की कुछ घटनाएं उनके दिमाग पर छायी रहती थीं. एक घटना ने ईश्वर और हिंदू धर्म में उनके रहेसहे विश्वास को भी चूरचूर कर दिया. उस समय तक पेरियार के पिता का निधन हुए तीनचार वर्ष बीत चुके थे. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. वे पैत्रिक व्यवसाय को कुशलतापूर्वक संभाले हुए थे. समृद्ध व्यवसायी के रूप में दूरदूर तक उनका नाम था. फिर भी उन्हें संतुष्टि न थी. उन्हीं दिनों बनारस की यात्रा पर जाना हुआ. उस समय तक पेरियार की धर्म में आस्था शेष थी. बनारस के बारे में उनका मानना था कि वह हिंदुओं की पवित्रतम नगरी है. बनारस पहुंचकर वे कई दिनों तक शंति की खोज में यहां से वहां भटकते रहे. वहां उन्होंने मंदिरों में काम करती युवा देवदासियों को देखा. पता चला कि अपनी युवावस्था में वे देवदासियां पुजारियों की वासना का शिकार बनती हैं. बूढ़ी होने के बाद उन्हें मंदिर की सफाई तथा दूसरे कामों में झांेक दिया जाता है. जब देख थक जाती है और शरीर से वे किसी काम की नहीं रहतीं, तब पुण्यार्जन के नाम पर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. बीमार होने पर उपचार की माकूल व्यवस्था का कोई इंतजाम न था. इन अनुभवों ने पेरियार के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया. उस यात्रा के दौरान एक घटना ऐसी घटी जिससे उनका मन धर्म की ओर से एकदम उचट गया.

उस दिन उन्हें बहुत भूख लगी थी. भटकते हुए वे ऐसे आश्रम में पहुंचे जहां देशविदेश से आए अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था थी. भोजन की आस में वे प्रवचन सुनने बैठ गए. प्रवचन पूरा होने के बाद लोग भोजन के लिए जाने लगे तो पेरियार भी उनके साथ चल पड़े. तब उन्हें पता चला कि भोजन का इंतजाम केवल ब्राह्मणों के लिए है. भूख के दबाव में पेरियार ने स्वयं को ब्राह्मण बताया. किंतु अपनी मूंछों के कारण पहचान लिए गए. उस समय तक ब्राह्मणों के लिए मूंछ रखना निषिद्ध था. वहां मौजूद ब्राह्मण चिल्लाने लगे—‘यह नकली है. इसे खदेड़ दो.’ एकाएक दर्जनों ब्राह्मण न जाने कहांकहां से निकलकर उन्हें ठेलने लगे. भूख से व्याकुल पेरियार को उचिष्ठ से काम चलाना पड़ा. उस समय वे खुद को बेहद अपमानित अनुभव कर रहे थे. धर्म के प्रति आस्था तारतार हो चुकी थी. ब्राह्मणवाद का कुटिल चेहरा उनके सामने था. वे समझ गए कि धार्मिक रहते हुए स्वाभिमान के साथ जीना संभव नहीं है. उसी दिन उन्होंने खुद को नास्तिक घोषित कर दिया. उससे पेरियार को हानि नहीं हुई. उनके लिए वह पुनर्जन्म के समान था.

बनारस की घटना से हिंदू धर्म का कुत्सित चेहरा पेरियार ने देखा था. जातिआधारिक ऊंचनीच और तत्संबंधी विकृतियों का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में ही हो चुका था. उनके विवाह से संबंधित घटना का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. दो अन्य घटनाओं का उल्लेख पेरियार के व्यक्तित्व को समझने में सहायक सिद्ध होगा. एक घटना 1902 की है. उन दिनों वे मात्र 23 वर्ष के युवा थे. धर्मशास्त्रों और पुराणों पर विश्वास तब तक उठने लगा था. एक संघर्षशील युवा की छवि विकसित होने लगी थी. उन्हीं दिनों इरोड के एक व्यापारी ने भोज का आयोजन किया. उसमें निरुंजनपेट्टई गांव के मुखिया को भी आमंत्रित किया गया था. संयोगवश मुखिया का भाई एक व्यापारी का कर्जदार था. दबंगई दिखाते हुए वह कर्ज चुकाने से आनाकानी करता आ रहा था. मामला न्यायालय में लंबित था. कोर्ट ने मुखिया के भाई को भगोड़ा घोषित कर, उसके वारंट निकाले हुए थे. पुलिस उसके पीछे लगी थी. लेकिन वह पुलिस और कर्ज वसूली में लगे अधिकारियों को लगातार चकमा देता आ रहा था. युवा पेरियार ने उसे पकड़वाने की ठान ली. जिस समय स्वामी और उसका भाई भोज में हिस्सा ले रहे थे, पेरियार एक झटके में पंडाल में घुस गएा. उस समय सरकार के स्तर पर चाहे जो हो, समाज में मनु का विधान लागू था. तदनुसार ब्राह्मणभोज के स्थल पर कुत्ता, सूअर, शूद्र और स्त्री का प्रवेश निषिद्ध माना जाता है. पेरियार शूद्र परिवार में जन्मे थे. उनके प्रवेश से भोजस्थल पर खलबली मच गई. भोजन अपवित्र हो चुका था. कोई साधारण परिवार से होता तो ब्राह्मण खुद ही निपट लेते. परंतु पेरियार धनाढ्य व्यवसायी की संतान था. उसके पिता दानादि देकर ब्राह्मणों को तृप्त रखते थे. इसलिए पेरियार की शिकायत उसके पिता से की गई. पिता ने उन्हें सामाजिक मर्यादा का पालन न करने के लिए खूब धिक्कारा. जातिसंबंधी विधान के उल्लंघन करने के लिए पेरियार की चप्पलों से पिटाई हुई. पेरियार ने पिता के क्रोध को सहा. लेकिन सामाजिक अनाचार ने निपटने की ठान ली. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण आयोजन प्रत्येक वर्ष चैत्र पूर्णिमा के दिन वे सामूहिक भोज था, जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग एक साथ सामूहिक भोज का आनंद लेते थे. यह ब्राह्मणवाद पर बड़ी मार थी. दमित एवं पिछड़े वर्गाें को संगठित करने में सामूहिक भोज के कार्यक्रम बहुत मददगार सिद्ध हुए.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य कार्यक्रम पेरियार के अपने जीवनानुभवों की देन थे. अंतररजातीय विवाह का मुद्दा स्त्रीमुक्ति से जुड़ा था. उसकी प्रेरणा उन्हें अपनी युवावस्था की एक घटना से मिली थी. वलेला जाति के एक युवक ने नौकरी की इच्छा के साथ पेरियार से संपर्क किया. पेरियार ने उसे अपनी दुकान पर मुनीम का सांैप दिया. कुछ अवधि के बाद उस लड़के की मां ने पेरियार से संपर्क कर, उसका विवाह कराने की प्रार्थना की. पेरियार ने उसके लिए नायडू परिवार की लड़की को चुना. लड़की अवैध नायडू संतान थी. वह शादी पेरियार के दोस्तों, स्थानीय नेताओं और सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति में बड़ी धूमधाम से हुई. वह पहली शादी थी, जिसे पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के तहत कराया था. उसकी खूब चर्चा हुई. इससे पेरियार के विद्रोही स्वभाव की खबर दूर तक फैल गई. ‘स्त्रीमुक्ति’ के क्षेत्र में दूसरा कार्यक्रम विधवा विवाह को प्रोत्साहन देना था. बनारस सहित अन्य धर्मस्थानों पर उन्होंने ऐसी अनेक विधवाओं को देखा था, जिन्हें पति की मृत्यु के बाद घर छोड़ना पड़ा था.

स्त्रीसमानता पर उनके विचार आधुनिकता से भरपूर थे. वे वैदिक रीति से विवाह, जिसमें पंडित मंत्रोच्चार करता है, वरवधु अग्नि की सप्तपदी लेते हैं, के वे घोर विरोधी थे. स्त्रीपुरुष का विवाह स्वर्ग में बनी जोड़ियां नहीं हैं. वह दांपत्य सुख के लिए किया गया समझौता है, जिसमें लड़का और लड़की दोनों बराबर के सहभागी होते हैं. पेरियार ने मुक्त कंठ से स्त्री समानता और स्वतंत्रता का समर्थन किया. कहा कि समाज में स्त्री को वे सब अधिकार और अवसर प्राप्त होने चाहिए जो पुरुष को प्राप्त हैं. मातृत्व स्त्री का चयन होना चाहिए. कर्तव्य नहीं. यदि कोई स्त्री संतान नहीं चाहती, तो उसे संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने बालविवाह का विरोध तथा विधवा विवाह का जोरदार तरीके से समर्थन किया. 1930 में मद्रास में देवदासी प्रथा के विरोध में बिल लाया गया. पेरियार ने उसका जोरदार तरीके से समर्थन किया. जातिप्रथा को समाज और देश के लिए हानिकारक मानते हुए उन्होंने अंतरर्जातीय विवाह का समर्थन किया. वे स्त्री को संपत्ति संबंधी समान अधिकार देने के पक्ष में थे.

जब भी कोई व्यक्ति धर्म के विकल्प की आवाज उठाता है, बड़ेबड़ी बुद्धिजीवी मौन हो जाते हैं. अधिकांश नास्तिकों को भी धर्म का विरोध दिखता है, उसका विकल्प नहीं. ऐसे लोगों के नेतृत्व में नास्तिकता प्रतिक्रियावाद का शिकार हो जाती है. पेरियार नास्तिक थे. उनके पास आस्थावादियों के ‘धर्म नहीं तो क्या?’ जैसे प्रश्नों का भी उत्तर था. धर्म के विकल्प के रूप में वे बुद्धिवाद को स्थापित करना चाहिए थे. इस संबंध में उनके कई आलेख स्थानीय पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे. उन्होंने एक अंग्रेजी की पत्रिका ‘दि मोडर्न रेशनलिस्ट’ की शुरुआत भी की थी. अपने लेखों में उन्होंने समझाया था कि समाज की स्थापना धर्म अथवा संस्कृति जैसे प्राचीन अवधारणाओं के बजाय आधुनिकता और बुद्धिवाद के आधार पर होनी चाहिए. 1971 में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—

हम चाहते हैं कि लोग विवेकवान प्राणी के रूप में जीवनयापन करें. हम ऐसी किसी चीज का प्रचार नहीं करते, जो अविश्वसनीय और काल्पनिक हो. हमें ईश्वर पर आश्रित कुछ भी नहीं चाहिए, न ईश्वर की संतान, न धर्म, न शास्त्र, न पूजापाठ और न किसी प्रकार का कर्मकांड. हम उन्हीं चीजों तक सीमित रहेंगे जो विवेकसम्मत होते हुए तर्क की कसौटी पर खरी उतरती हों. आप सबको भी तर्क को बढ़ावा देने में जुट जाना चाहिए. हम जो कह रहे हैं, उसपर विश्वास करने से पहले उसके प्रत्येक शब्द पर सोचिए, समझिए और भलीभांति विवकसम्मत सिद्ध होने पर उसे अपनाइए.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ दिनोंदिन फैल रहा था. पेरियार सक्रिय राजनीति छोड़ सामाजिक क्रांति लाने के लिए संकल्परत थे. फिर एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया. त्रावणकोर रियासत के वायकम में महादेव का पुराना मंदिर था. उसमें अछूतों का प्रवेश निषिद्ध था. मंदिर के आसपास की कुछ सड़कें ब्राह्मणों और राजपरिवार के सदस्यों के लिए आरक्षित थीं. अछूत उनपर चल नहीं सकते थे. इस अमानवीय व्यवस्था का विरोध लंबे समय से चला आ रहा था. जनता की मांग को देखते हुए ट्रावणकोर सरकार ने 1865 में अध्यादेश के जरिये कानून बनाया था. उसके अनुसार राज्य के सभी नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर आनेजाने की छूट दी गई थी. व्यवस्था की गई थी कि राज्य की सभी सड़कें सभी नागरिकों के लिए खुली रहेंगी. कोई भी नागरिक उनपर आजा सकेगा. किंतु ब्राह्मण तथा राजपरिवार के सदस्य इस आदेश का विरोध करते आ रहे थे. उनकी परवाह न करते हुए 1884 में सरकार की ओर से एक और आदेश जारी किया गया था, जिसमें पिछली व्यवस्था का समर्थन किया गया था. उसके विरोध में ब्राह्मणों ने ट्रावणकोर उच्च न्यायालय में अपील कर दी. जिसमें मंदिर के आसपास की कुछ सड़कों पर अछूतों के लिए चलना निषिद्ध कर दिया गया. उस आदेश की अछूतों में तीखी प्रतिक्रिया हुई. नारायण गुरु के नेतृत्व मंे उन्होंने अपना आंदोलन तेज कर दिया. दूसरी ओर दलितों और पिछड़ों को सबक सिखाने के लिए सवर्ण भी ब्राह्मणों के नेतृत्व में संगठित होने लगे थे.

एक बार नारायण गुरु अपने शिष्यों के साथ गाड़ी में सवार होकर मंदिर के बराबर से गुजर रहे थे. महाकवि कुमारन और दलितपिछड़ों के अनेक नेता उनके साथ थे. अचानक उच्च जाति के कुछ गुंडे आकर उनकी गाड़ी के आगे खड़े हो गए. उनका नेतृत्व एक ब्राह्मण कर रहा था. उसने नारायण गुरु की गाड़ी को वहां से हटने के लिए विवश कर दिया. उस घटना का वर्णन सुप्रसिद्ध मलयाली कवि मुलूर एस. पद्मनाभा पणिक्कर ने अपनी कविता में इस प्रकार किया है—

बहुत पहले की बात है. महान नारायण गुरु रथ पर सवार होकर वायकम की सड़क से गुजर रहे थे. अचानक एक मूर्ख ब्राह्मण जो खुद को पृथ्वी का देवता कहता था, वहां आया. उसने नारायण गुरु के रथ को वहां से हटने का आदेश देने लगा.’

पेरियार उस समय तक नास्तिक होने का संकल्प ले चुके थे. लेकिन ऐसे समाज में जहां धर्म जीवन की समस्त पे्ररणाओं का स्रोत हो, बगैर धार्मिक स्वतंत्रता के सामाजिकराजनीतिक स्वतंत्रता की अनुभूति असंभव है. फिर वायकम में केवल मंदिर प्रवेश मुद्दा न था. बल्कि दलितों के सार्वजनिक स्थानों पर उपयोग का अधिकार भी शामिल था. इसलिए उन्होंने वायकम आंदोलनकारियों का साथ देने का निर्णय लिया. 1924 में मंदिर प्रवेश तथा सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर संघर्ष तेज हो चुका था. आंदोलनकारियों को दुनियाभर से समर्थन मिल रहा था. लोग खुले मन से सत्याग्रह का हिस्सा बन रहे थे. आंदोलनरत दलितों को सिख, ईसाई सहित अन्य धर्माब्लंवियों का सहयोग भी मिल रहा था. सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था का काम 200 से अधिक सिख स्वयंसेवक कर रहे थे. गांधी जी स्वयं उस मामले में रुचि ले रहे थे. किंतु वे इसे हिंदुओं का आंतरिक मामला मानते हुए, अन्य धर्माबलंबियों के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे. ‘यंग इंडिया’ में लेख लिखकर उन्होंने गैरहिंदुओं को वहां से हट जाने का आग्रह किया था, जिसे उन्होंने नकार दिया था. गांधी, कांग्रेस और पेरियार को भी वायकम सत्याग्रह से दूर रखना चाहते थे. कांग्रेस गांधी के प्रभाव में थी. किंतु पेरियार का निर्णय अटल था. वे स्वयं को गांधी और कांग्रेस की छाया से बाहर लाने के लिए तैयार कर चुके थे. 14 अप्रैल 1924 को वे अपने साथियों के साथ वायकम आंदोलनकारियों के साथ मिल गए. पेरियार की लोकमानस में पैठ थी. उनके उतरते ही आंदोलन में तेजी आ गई. जयार ने वायकम आंदोलन को द्रविड़ अस्मिता का मुद्दा बनाया. लोग उनके समर्थन में जुटने लगे. आंदोलन तेजी से आगे बढ़ने लगा. अंततः गांधी को भी वायकम सत्याग्रहियों के समर्थन में आना पड़ा. ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा—‘यदि ब्राह्मणों ने अछूतों को सड़कों पर चलने की आजादी नहीं दी तो यह आंदोलन दिनोंदिन उग्र होता जाएगा. अभी तक सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनकारी आगे मंदिर प्रवेश की स्वतंत्रता की मांग भी करने लगेंगे.’

वही हुआ. पेरियार वायकम मुद्दे को दक्षिण भारतीय दलितों को पिछड़े वर्गों की अस्मिता का मुद्दा बना चुके थे. सरकार ने पेरियार को दबाने की कोशिश की. उन्हें दो बाहर कैद किया गया. तरहतरह के दबाव डाले गए. लेकिन पेरियार डटे रहे. जेल से लौटने के साथ ही वे पुनः आंदोलकारियों से जुड़ जाते थे. अंततः ब्राह्मणों को झुकना पड़ा. एक निर्णय के तहत सरकार ने दलितों को सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता बहाल कर दी. वह पेरियार की बड़ी सफलता थी. उनके योगदान को केरल उच्च न्यायालय और सरकार दोनों की ओर से सराहा गया था. उस जीत ने पेरियार को संपूर्ण दक्षिण भारत में प्रतिष्ठित कर दिया. उसके फलस्वरूप वहां गांधी का प्रभावक्षेत्र सिकुड़ने लगा. यह पेरियार की बड़ी जीत थी. यहां तक कि कांग्रेस को भी जो आरंभ में पेरियार के कार्यक्रमों का विरोध कर रही थी, अंततः उनके समर्थन में आना पड़ा. कांचीपुरम् अधिवेशन में कांगे्रस ने उन्हें ‘वायकम वीरर’, ‘वायकम का हीरो’ कहकर सम्मानित किया.

गांधी तथा वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ पेरियार के मतभेद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से सर्वथा मुक्त थे. कांग्रेस राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग कर रही थी. कांग्रेस के अभिजन नेता, अंगेजी के साथ आ रहे आधुनिक विचारों से त्रस्त थे. वे उसे ‘भारतीयता’ पर संकट के रूप में देखते थे. औपनिवेशिक शासन से मुक्ति केवल उसका राजनीतिक एजेंडा नहीं था. बल्कि उसके पीछे कांग्रेस के अभिजन नेताओं के वर्गीय स्वार्थ भी छिपे थे. ऐसे नेताओं का प्रमुख उद्देश्य था, सामाजिक परिवर्तन की धारा को अवरुद्ध कर, उसे मनमानी दिशा दी जा सके. राजनीतिक स्वतंत्रता से उनका आशय था, राष्ट्रवाद के नाम पर स्वतंत्रता को भावनात्मक मुद्दा बताकर उसके लिए व्यापक जनसहमति हासिल लेना चाहते थे. जबकि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी कारगर हो सकती है, जब लोग अपनी स्वाधीनता को जीना जानते हों. उनमें अपने अधिकारों के प्रति पर्याप्त चेतना हो. इसलिए पेरियार की राजनीति संबंधी मांग केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी. गांधी की भांति पेरियार का भी विचार था कि अशिक्षा, धर्म और तज्जनित तरहतरह के अंधविश्वासों से ग्रसित समाज राजनीतिक आजादी को पूरी तरह आत्मसात् करने में सक्षम नहीं है. ऐसे समाज को यदि राजनीतिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो वह उसका लाभ उठाने में अक्षम होगा. इसलिए तिलक आदि नेता जो कहते आए थे कि ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ के बजाए पेरियार का नारा था—‘आत्मसम्मान मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.’ छूआछूत से ग्रसित दलितों और उत्पीड़न के शिकार अन्त्यजों के लिए इस नारे का विशेष महत्त्व था. नारे के पीछे उनकी समानता और न्याय की भावना अंतनिर्हित थी. प्रकारांतर में वे कांग्रेस के समानांतर एक ऐसे आंदोलन का संचालन कर रहे थे जो विशुद्ध तर्कसम्मत समाज की स्थापना को समर्पित था. ऐसे समाज के लिए जिसमें मनुष्य अपने विवेक को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रहों से मुक्त रख सकता है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी अनिवार्य शर्त है. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के उद्देश्यों और कार्यक्रमों को तमिल जनता तक पहुंचाने के लिए पेरियार ने दो पर्चे प्रकाशित किए थे. उनके द्वारा पेरियार की आदर्श समाज संबंधी संकल्पना और संपनों को समझा जा सकता है—

1. ऐसे समाज को उखाड़ फेंकना जिसमें एक वर्ग दूसरे से खुद को ऊंचा समझता है. मात्र जन्म के आधार पर जो आदमीआदमी के बीच अविश्वास को जन्म देता और उसे निरंतर पालतापोसता है.

2. ऐसे समाज की स्थापना करना जिसमें सभी बराबर हों. जिसमें सभी को अपनी बात कहने की आजादी हो. विकास के लिए समान अवसर प्राप्त होते हैं. जिसमें गैरबराबरी के लिए कोई जगह न हो. कानून और समाज के स्तर पर स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार और मानसम्मान प्राप्त होता हो. उन्हें समाजार्थिक स्तर पर किसी पर किसी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े.

3. जिसमें समाज के सभी वर्गों को अपनेअपने विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों. जिससे वे अपनी नैसर्गिक स्वाधीनता का आनंद ले सकें.

4. छूआछूत का समूल नाश करते हुए आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना के अनुरूप समाज की स्थापना करना.

5. अनाथों और विधवाओं के लिए आवासइकाइयों का निर्माण तथा उनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध करना.

6. जनसाधारण को नए मंदिर, मठ तथा गुरुकुल पद्धति पर स्कूल बनाने की प्रवृत्ति की ओर से हतोत्साहित करना.

7. नाम के साथ जाति अथवा गौत्र सूचक शब्दों के प्रयोग बंद करने पर जोर देना. उपलब्ध संसाधनों एवं संपदाओं के सामूहिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना. उससे सभी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आवास आदि के विकास पर जोर देना. इसके लिए सामूहिक स्तर पर प्रयास करते रहना.

आत्मसम्मान आंदोलन’ लंबे समय तक अनौपचारिक संगठन के रूप में काम करता रहा. उसे विधिसम्मत संस्था के रूप में 1952 में त्रिरुचिलापल्ली में पंजीकृत कराया गया. नाम रखा गया—‘पेरियार आत्मसम्मान प्रचार संस्था.’ संस्था का प्रमुख लक्ष्य था—अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त ऐसे समाज की संरचना पर बल देना जो समानता और समरसता के सिद्धांतों पर टिका हो. धर्म केंद्रित आचारसंहिता में स्त्री को पुरुष से हेय माना गया है. पेरियार ने स्त्रीसमानता पर जोर दिया और उसे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य उद्देश्य के रूप में शामिल किया. बनारस यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिरों में देवदासियों की दुर्दशा के बारे में देखा था. धर्म के नाम पर स्त्रीअस्मिता के अपमान ने उनके अंतर्मन को आहत किया था. हिंदू धर्म के प्रति उनकी नफरत का एक कारण मंदिरों में चल रही देवदासी प्रथा भी थी, जिनमें ईश्वर की सेवा के नाम पर युवा लड़कियों को अघोषित वेश्यावृत्ति की ओर ढकेल दिया था. स्त्रीसमानता और स्वतंत्रता के लिए विवाह को स्त्रीपुरुष के बीच एक करार की संज्ञा दी थी, जबकि ब्राह्मणी सभ्यता मानती थी कि दांपत्य संबंध स्वर्ग में तय किए जाते हैं. देवदासी प्रथा को समाप्त करने के लिए 1930 में पेरियार ने मद्रास विधानसभा में एक बिल भी पेश किया था. उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया, जिसकी उस समय स्त्रीवादी संगठनों ने भूरिभूरि प्रशंसा की थी. उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए 1938 में मद्रास में प्रांतीय महिला संगठनों का बड़ा सम्मेलन हुआ था. उसमें पेरियार के स्त्रीउत्थान को लेकर चलाए जा रहे कार्यक्रमों की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘पेरियार’ की उपाधि से अलंकृत किया था.

पेरियार के आदर्श समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव, छूआछूत और रूढ़ियों के लिए कोई स्थान न था.‘आमसम्मान आंदोलन’ के पीछे निहित पेरियार की भावना को समझना कठिन नहीं है. पेरियार ने जाति और धर्म के आधार पर ब्राह्मणों द्वारा गैरब्राह्मणों के शोषण को अपनी आंखों से देखा था. कांग्रेस में रहकर वे समझ चुके थे कि उसके अभिजन नेता येनकेनप्रकारेण स्वार्थसिद्धि में लगे रहते हैं. वे वही राह अपनाते हैं, जिससे उनके वर्गीय हितों को लाभ पहुंचता हो. इसके लिए वे धर्म को, राजनीति को हथियार बनाते हैं. शूद्रों को संपत्तिअधिकार से बेदखल कर समाज बड़े वर्ग को अपंग बनाने की व्यवस्था उन्होंने पहले से ही धर्मशास्त्रों में की हुई है. ऐसे में गैरब्राह्मणों का भला तभी संभव है, जब वे अपने सामूहिक हितों के प्रति संगठित हों. इसके लिए उनमें स्वाभिमान की भावना का संचार करना आवश्यक है. इसके लिए उन्हें पहले ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर निकालना होगा.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के पीछे पेरियार की कांग्रेस और गांधी की ओर से जन्मी निराशा थी. वे चाहते थे कि कांग्रेस और गांधी सामाजिक न्याय को भी अपने आंदोलन का मुद्दा बनाएं. राजनीति और समाज में ब्राह्मणवर्चस्व को कम करने के लिए उनका साथ दें. जबकि कांग्रेस के सर्वेसर्वा बने गांधी धर्म और जाति के क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने को प्रयत्नरत थे. हिंदू धर्म में सुधार की उनकी योजना किसी भी तरह वर्णव्यवस्था को बचाए रखने तक सीमित थी. कांग्रेस को जनसाधारण के सरोकारों से जोड़ने के लिए उन्होंने एक प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें समाज के उपेक्षित एवं विपन्न वर्गों के लिए शिक्षा एवं अन्यान्य अवसरों में समानता की मांग की गई थी. वे उसे कांग्रेस के कांचीपुरम् अधिवेशन में पेश करना चाहते थे. किंतु उस समय के बड़े कांग्रेसी नेताओं ने यह कहते हुए कि इससे समाज में दरार आएगी, पेरियार के प्रस्ताव पर विचार करने से ही इन्कार कर दिया था. कांग्रेस उससे पहले भी पेरियार के प्रस्ताव को ठुकरा चुकी थी. तनमनधन से कांग्रेस को पूरी तरह समर्पित पेरियार के लिए यह बड़ा झटका था. नाराज होकर उन्होंने अधिवेशन का बहिष्कार कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ इसी विद्रोह की देन था. उनका ध्येय था, दलित और पिछड़ों के सम्मान की रक्षा. मानवमात्र की स्वतंत्रता, समानता सामाजिक समरसता की सुरक्षा करते हुए आधुनिक जीवनमूल्यों पर आधारित समाज की संरचना के लिए काम करना. यह जानते हुए कि गांधी और कांग्रेसी नेता उनका साथ देने वाले नहीं हैं, आंदोलन का शुरुआती संकल्प था—‘न ईश्वर, न धर्म, न ब्राह्मण, न गांधी और न ही कांगे्रस.’ ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ मनुष्य के मूलभूत अधिकारों और अस्मिता की रक्षा को समर्पित होगा. आत्मसम्मान आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था—

द्रविड़ जनता के मनस् की ब्राह्मणवाद से मुक्ति. द्रविड़ों को उनके प्राचीन गौरव का विश्वास दिलाना. उसके लिए उन सभी धर्मग्रंथों, रीतिरिवाजों और परंपराओं से मुक्त करना जो ब्राह्मणवर्चस्व को अपरिहार्य ठहराते थे.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ के नामकरण के पीछे की वैचारिकी को समझना कठिन नहीं है. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में आर्यों और द्रविड़ों के संघर्ष का उल्लेख हुआ है. उनके अनुसार आर्य कबीलों ने भारत के मूल निवासी कबीलों को युद्ध में पराजित कर, दक्षिण दिशा में पलायन के लिए बाध्य कर दिया था. द्रविड़ उन्हीं के वंशज माने जाते हैं. इस तरह द्रविड़ होना एक ऐतिहासिकसांस्कृतिक पराजय का कलंक अपने सिरमाथे ढोना है. हालांकि जो महाकाव्य या मिथ उन युद्धों को लेकर गढ़े गए हैं, उनकी प्रामाणिकता को लेकर अनेकानेक संशय हैं. किंतु अन्य प्रमाणों के अभाव में लेखकों एवं इतिहासकारों को महाकाव्यों तथा प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में मौजूद मिथकीय आख्यानों से ही इतिहास के सूत्र खोजने पड़ते हैं. भारतीय संस्कृति की विडंबना है कि उसके नेतृत्व और संरक्षण का दायित्व लंबे समय से उन वर्गों के अधीन रहा, जिनके अपने स्वार्थ लोकहित की अपेक्षा प्रबल थे. जिनमें निष्पक्षता का अभाव था. यही कारण है कि समानता और स्वतंत्रता जैसे मूलभूत गुणों का, जो किसी संस्कृति को महान बनाते हैं—भारतीय संस्कृति में अभाव बना रहा. बावजूद इसके वे वर्ग श्रेष्ठतम होने का दावा भी करते रहे.

प्रक्षेपण का शिकार होने के कारण प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में अनेक विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं. पुराणों में दर्ज है कि अनार्य भारतीयों की युद्धशैली आक्रामक आर्यों की अपेक्षा परिष्कृत थी. देवासुर संग्राम में देवताओं को अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा था. सफलता तब मिली जब उन्होंने अनार्यों कबीलों में फूट डालकर उनमें से कुछ का बारीबारी से सहयोग लेना आरंभ किया. समाजीकरण की उस प्रक्रिया में एक ऐसा वर्ग भी पनपा जिसकी निपुणता कर्मकांडों में थी. जिसका दावा था कि वह दैवीय शक्तियों का ज्ञाता है तथा यज्ञादि कर्मकांडों के माध्यम से उनसे संवाद भी कर सकता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि वे शक्तियां उस वर्ग की कल्पना की उपज थीं. फिर भी उनकी बातों का जादू ऐसा था कि उस समय का बड़ा वर्ग उससे प्रभावित था. विशेष अवसरों पर उस वर्ग की राय महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. अपनी काल्पनिक योग्यता के बल पर वह वर्ग जनसाधारण को सम्मोहित करने का सामथ्र्य रखता था. सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते हुए वह वर्ग प्रायः विजेता के पक्ष में रहता था. हालांकि कालांतर में, सांस्कृतिक विजय प्राप्त होने के बाद उस वर्ग ने जो नए मिथ गढ़े, उनमें पराजित वर्गों; यानी उन वर्गों को भी अपना समर्थक और अनुयायी दर्शाने की कोशिश की, जिनसे विरुद्ध संघर्ष में उसने आर्यों का नेतृत्व किया था. सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व लिए यह अनिवार्य था. आरंभ में सब कुछ स्वाभाविक लगता था. यज्ञादि कर्मकांडों के लिए संसाधनों की आवश्यकता थी. उसके लिए गणप्रमुख अथवा मुखिया की मदद आवश्यक थी. आगे चलकर गणप्रमुख का पद राजा ने ले लिया और यज्ञ को प्रतिष्ठा का विषय माना जाना लगा. जो यज्ञ में अधिक बलि दे, दानादि में ज्यादा संसाधन खपाए और अधिकाधिक लोगों को भोज कराए, वह उतना ही बड़ा राजा माना जाता था. धीरेधीरे यज्ञों की संख्या और उनकी मान्यता बढ़ती गई. अपना वैशिष्ठ्य बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने अवसरविशेष के अनुसार यज्ञों और कर्मकांडों का नियमन किया; और अवसरानुकूल रणनीति अपनाकर उसे शेष समाज पर थोपते चले गए. वास्तविकता से हटाकर वायवी दुनिया की ओर ले जाने की उस प्रवृत्ति जैसा विरोध अपेक्षित था, वैसा नहीं हुआ. यदि छिटपुट विरोध हुए भी तो उन्हें दबा दिया गया. पुराणों के अनुसार वेन पृथ्वी का पहला राजा था. उसे जनता ने चुना था. कदाचित इसीलिए वह ब्राह्मणों को अतिरिक्त महत्त्व देने के लिए तैयार न था. इससे क्षुब्ध ब्राह्मणों ने जनता को उसके विरुद्ध भड़का दिया और वेन उत्तेजित भीड़ के कोप का शिकार बन गया. प्रजा की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों ने वेन के बेटे पृथु को राजा नियुक्त किया. पृथु ब्राह्मणों की शक्ति को समझ चुका था. पिता की हत्या से भयभीत पृथु ने ब्राह्मणों की प्रत्येक आज्ञा को शिरोधार्य किया. इसलिए उनकी दृष्टि में वह आदर्श राजा कहलाया. पुराणों में उसकी भूरिभूरि प्रशंसा की गई है. बताया जाता है कि उसी के नाम पर पृथ्वी का नामकरण हुआ है. वेन और पृथु की कहानियां दर्शाती हैं कि ब्राह्मणत्व या ब्राह्मण की खुशी राजसत्ता के श्रेष्ठत्व का प्रमाण मान ली गई थी. महाभारत में पांडव सारे धत्त्कर्म करने के बाद भी धर्मानुयायी घोषित कर दिए जाते हैं.

सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थायी बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने देवताओं को अपराजेय एवं अलौकिक शक्तियों का स्वामी घोषित कर दिया था. सांस्कृतिक संघर्ष शताब्दियों तक चलता रहा. इतिहास के एक चरण में जैसे ही आर्य कबीलों को अवसर मिला, उन्होंने सांस्कृतिक प्रतीकों और धरोहरों का अपने स्वार्थ के अनुसार अनुकूलन करना आरंभ कर दिया. उनमें बड़ी चालाकी से आर्यश्रेष्ठता के मिथ को स्थापित किया गया. इतिहास और संस्कृति की ताकत से अनजान अनार्य कबीले धीरेधीरे उस षड्यंत्र का शिकार होते गए. सभ्यता के इतिहास में किसी प्रजाति अथवा समूह की राजनीतिक पराजय अनहोनी घटना नहीं है. देशविदेश के इतिहास में इस तरह की लाखों घटनाएं दर्ज हैं. परंतु जब इतिहास को मिथ में ढालकर आस्था का विषय बना दिया जाए तो उसपर विमर्श की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है. साक्ष्यों के अभाव में विद्वानों को केवल अपनी कल्पनाशक्ति और विवेक से काम लेना पड़ता है. परिणामस्वरूप उनके निष्कर्षों में एकरूपता का अभाव होता है. ठोस वैचारिक चेतना की कमी के चलते सुधार के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं बन पाता.

इस देश में विदेशी आक्रामक सामरिक शक्ति अथवा बुद्धिबल के कारण कभी सफल नहीं हुए. वे भारत पर लंबे समय तक शासन करने में इसलिए कामयाब रहे क्योंकि उन्होंने यहां के बुद्धिजीवी वर्ग, यानी ब्राह्मणों के सांस्कृतिक साम्राज्य में सैंध लगाने की कभी कोशिश नहीं की. सैकड़ों वर्षों के दौरान देश राजनीतिक स्तर पर अनेक उतारचढ़ाव से गुजरा. बड़ेबड़े साम्राज्य बने और ढहे भी, परंतु ब्राह्मणों के सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व को कभी चुनौती नहीं मिली. 400 वर्ष से अधिक समय तक दिल्ली के तख्त पर आसीन, मुगल सम्राटों ने जान लिया था कि ब्राह्मण जो समाज का बहुत छोटासा हिस्सा है, को साधकर पूरे भारत को साधा जा सकता है. यही आगे चलकर अंग्रेजों ने किया. यही कारण है कि इस देश में विदेशी शासकों के प्रति आक्रोश कहीं नजर नहीं आता. उनीसवीं शताब्दी में यदि विदेशी सत्ता के प्रति जनज्वार उमड़ता दिखाई पड़ता है तो इसलिए कि नई शिक्षा की रोशनी में समाज का बड़ा हिस्सा ब्राह्मणों के बौद्धिक वर्चस्व को नकारकर स्वतंत्र निर्णय लेने लगा था. दूसरे अमेरिका और फ्रांस में हुई क्रांतियों के दबाव में वे समानता और स्वतंत्रतामूलक आधुनिक जीवनमूल्यों को अपना चुके थे. इसलिए भारत में आगमन के साथ ही उन्होंने समाननागरिक संहिता का पर अमल करना आरंभ कर दिया. जिसके फलस्वरूप वर्ण, जाति, धर्म आदि के नाम पर उपेक्षा और दमन का शिकार रहे वर्गों को शिक्षा और जीवन के बाकी क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर मिला. अकादमिक स्तर पर बहुत अधिक पढ़ेलिखे न होने के बावजूद पेरियार इसे समझते थे. वे जान चुके थे कि आत्मसम्मान आंदोलन की सफलता के लिए ब्राह्मणों के बौद्धिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठतावाद को चुनौती देना अत्यावश्यक है. श्रेष्ठतादंभ के शिकार तमिल ब्राह्मण स्वयं को आर्य मूल का मानते थे. पिछड़े समूहों को उनके वर्चस्व से बाहर निकालने के लिए प्राचीन सांस्कृतिक स्थापनाओं को चुनौती देना आवश्यक था. पेरियार ने धर्म को सीधी चुनौती दी. कहा कि धर्म के अंधेरे में भटकने बजाय लोगों को चाहिए कि वे अपने विवेक का इस्तेमाल करें. उन्होंने महाकाव्यों और पुराणों को कपोलकल्पित माना. समाज को मूर्तिपूजा और तत्संबंधी अन्यान्य आंडबरों से दूर रखने के लिए आंदोलन चलाया. जिसमें गणेश की प्रतिमाएं तोड़ डाली गईं. वर्णव्यवस्था का समर्थन करने वाले ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाई गईं. 1953 में उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर राम के पुतलों का दहन किया. 1955 में सार्वजनिक स्ािान पर राम के चित्र का दहन करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके लिए उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा, किंतु वे डटे रहे.

पेरियार के विचार था कि धर्म बहुसंख्यक वर्ग को सामाजिकबौद्धिक रूप से दास बनाए रखने का शक्तिशाली माध्यम है. उसका पहला हमला मनुष्य के आत्मविश्वास पर होता है. जिससे वह अपने विवेक से काम लेने के बजाए पंडेपुरोहितों के प्रपंच में फंसकर रह जाता है. फुले और आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से ऊपर मानते थे. उनका मानना था कि उत्पीड़ित वर्गों यथा दलितोंपिछड़ों के लिए सामाजिकसांस्कृतिक स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इसलिए जाति प्रथा का उन्मूलन ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का प्रमुख एजेंडा था. पेरियार का मानना था कि ईश्वर, धर्म और ब्राह्मण, तीनों किसी न किसी रूप में जातिप्रथा के जन्मदाता रहे हैं. जबकि गांधी और कांग्रेस दोनों जातिप्रथा के छदम् विरोधी थे. पेरियार का मानना था कि जाति के समूल उच्छेद के बिना मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता असंभव है. उस समय तक समानता का सपना भी अधूरा रहेगा. अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द न लगाने का निर्णय वे 1923 में ही ले चुके थे. ‘पेरियार’ संबोधन उन्हीं दिनों उन्होंने अपनाया था.

दक्षिण में अस्मितावादी राजनीति की बागडोर धनी पिछड़ी जातियों के हाथों में थी. उनमें रेड्डी, कम्मा, वेल्लाल, नायर, वेलमाज आदि शुरू से सक्रिय थीं. यह भी कह सकते हैं कि ब्राह्मणों के विरुद्ध दलित एवं पिछड़ी जातियों में विकसी चेतना का लाभ उठाने के लिए वे जातियां अकस्मात मैदान में उतर आई थीं, जो उससे पहले तक ब्राह्मणों के साथ थीं और किसी न किसी प्रकार सत्तासुख भोगती आई थीं. चूंकि वह आंदोलन ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण, द्रविड़ बनाम आर्य था, इसलिए उनके आंदोलन को पिछड़ी एवं दलित जातियों का सहयोग भी प्राप्त था. ‘दव्रिड़त्व’ उन्हें अतीत से जोड़ता था. पेरियार के लिए वह कोई चिंताजनक बात न थी. वे ब्राह्मणवाद को किसी भी प्रकार के क्षेत्रीयतावाद से खतरनाक मानते थे. ब्राह्मणवाद पर निर्णायक चोट करने के लिए उन्होंने जातिवाद के समूल उन्मूलन, स्त्रीमुक्ति की मांग की. अस्मितावादी राजनीति प्रकारांतर में यह संदेश भी देती थी कि विभिन्न जातियोंउपजातियों में बंटे द्रविड़ कभी साझा इतिहास और संस्कृति के सहचर थे. उनके बीच भेदभाव की भावना आर्यों, जिनसे उनका आशय प्रायः ब्राह्मणों तक सीमित था, द्वारा अपने स्वार्थ के लिए आरंभ किया गया था. पिछड़े वर्ग की धनी जातियों का संगठन उत्तर भारत में भी बना था. गत शताब्दी के चैथे दशक में कुर्मी, कुशवाहा और यादव, पिछड़ों में अपेक्षाकृत समृद्ध जातियों ने ‘त्रिवेणी संघ’ के रूप में वर्चस्वकारी जातियों का विरोध रचने की कोशिश की थी. उनकी कमजोरी थी कि सिवाय जाति के उनके बीच दूसरा कोई संगठनकारी तत्व न था. दक्षिण में अस्मितावादी आंदोलन की सफलता का कारण द्रविड़ के रूप में उनकी स्वतंत्र पहचान थी. ‘त्रिवेणी संघ’ का प्रयोग महत्त्वपूर्ण और अत्यावश्यक होने के बावजूद लंबे समय तक कारगर न हो सका. इसलिए कि संगठन में शामिल जातियां स्वयं को क्षत्रिय वंशज मानती थीं. इस तरह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में वे उसी ब्राह्मणवाद का समर्थन करती थीं, जिसने उन्हें शताब्दियों तक उत्पीड़ित रखा था और जिससे मुक्ति की कामना के लिए उन्होंने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी. इसलिए बहुसंख्यक होने के बावजूद वे मणवाद के विरोध में सार्थक प्रतिपक्ष न बना सकीं. चुनावों में मिली पराजय के बाद वे पूरी तरह बिखर गईं. दूसरे पिछड़ों में उभरती चेतना के बाद स्वयं कांग्रेस ने ‘पिछड़ा वर्ग कल्याण संघ’ की स्थापना की थी. चूंकि कांग्रेस को गांधी का आशीर्वाद प्राप्त था. जनमानस में उनकी पैठ को देखते हुए

दक्षिण भारत के इतिहास में 1927 से 1934 तक का समय सर्वाधिक परिवर्तनकामी था. उस समय तक पेरियार द्वारा चलाया गया ‘अस्मितावादी आंदोलन’ जनमानस में गहरी पैठ बना चुका था. उससे पूर्ववर्ती आंदोलनों पर किसी न किसी रूप में धर्म की छाया थी. जबकि आत्मसम्मान आंदोलन की नींव धर्मनिरपेक्षता और किसी भी प्रकार के आडंबरवाद से मुक्त थी. आत्मसम्मान आंदोलन की पैठ का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि न केवल सामाजिक शक्तियां बल्कि दक्षिण भारत के सैन्य बल भी उसके समर्थन में थे. ब्राह्मणीकरण की काट के लिए पेरियार ने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को उछाला था, जिसे वहां के जनसाधारण की स्वीकृति प्राप्त थी. ब्राह्मणवाद की नींव आस्था और विश्वास पर केंद्रित रही है. पेरियार की कोशिश ऐसे समाज की रचना की थी, जो आधुनिक ज्ञान और तर्क को समर्पित हो. ‘जस्टिस पार्टी’ के वरिष्ठ नेता और दक्षिण भारत में ‘निब्र्राह्मणीकरण आंदोलन’ के सक्रिय कार्यकर्ता आॅर्कट रामास्वामी मुदलियार ने पेरियार के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के लिए उनकी तुलना महान दार्शनिक रूसो के साथ की है—

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में फ्रांसिसी विचारक रूसो ने अपने देशवासियों के तर्कसामर्थ्य को संदीप्त किया. जिससे वहां फ्रांसिसी समाज बड़ी क्रांति के लिए तैयार हुआ. मैं यह कहूंगा कि पेरियार के कारण ही हम तमिलवासियों ने तर्क करना सीखा. जिसने आगे चलकर हमारे भी आत्मसम्मान की चेतना जाग्रत की. इस आधार पर पेरियार तमिलनाडू के रूसो हैं.’

आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से बढ़कर मानते थे. उनका मानना था कि दलित और पिछड़े लोग जो समाजार्थिक कारणों से दूसरों पर निर्भर हैं, या निर्भर बना दिए गए हैं, कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता उनका भला नहीं कर सकती. राजनीतिक स्वतंत्रता राज्य को केवल कानून बनाने तथा उनपर अमल करने हेतु आवश्यक स्वायत्तता प्रदान करती है. वह व्यक्तिमात्र को उसकी स्वाधीनता का एहसास कराने की जिम्मेदारी नहीं लेती. असमानताग्रस्त समाजों में कुछ नागरिक अधिकांश नागरिकों पर अधिकार जमाए रहते हैं. दूसरी ओर शिक्षा, अज्ञानता अथवा संसाधनों के मामले में अभिजन समाज पर निर्भरता के कारण बहुजन समाज अपनी स्वाधीनता का उपयोग करने में असमर्थ रहता है. उसके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता समाज के शीर्षस्थ वर्ग के निर्णयों का दास बन जाने तक सीमित हो जाती है. स्वतंत्रता को अपने हक में इस्तेमाल करना, जीवन में उसका आनंद लेना स्वाधीनता है. यह स्वतंत्रता को जीने, उसे जीवन में उतारने का नागरिक अधिकार है. नागरिक हित में आवश्यक है कि लोग स्वतंत्रता के साथसाथ स्वाधीनता का मोल भी समझें. पेरियार का कहना था कि बगैर सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन होगी. गांधी, नेहरू जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि उनके लिए मानवमात्र की सम्मानता का विचार कोई मूल्य नहीं है. भारतीय गौरव की प्रशंसा करते हुए वे प्रायः उस दौर का महिमामंडन करने लगते हैं, जब चातुर्वर्ण्य का बोलबाला था. शूद्रों और दलितों को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है. गांधी और कांग्रेस एक और तो दलितों और पिछड़ों को समानता और स्वतंत्रता का सपना दिखाते हैं. दूसरी ओर व्यवहार के स्तर उन संस्थाओं को भी बचाए रखना चाहते हैं, जो शताब्दियों से समाज के बड़े वर्ग के शोषण का कारण रही हैं. मानवमात्र के सम्मान की सुरक्षा के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की परिकल्पना करना अनैतिक विचार है.

जैसेजैसे सामाजिक परिवर्तन को लेकर पेरियार की स्वतंत्र वैचारिकी का निर्माण हो रहा था, वैसेवैसे कांग्रेस तथा उसकी नीतियों के प्रति उनका विरोध भी बढ़ता जा रहा था. उसकी रचनात्मक परिणति ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के रूप में सामने आई. इतिहासकारों के अनुसार द्रविड़ पराजित जाति रही है. आर्यों ने उन्हें दक्षिण की ओर ढकेल दिया था. जाति के आधार पर समाज के विभाजन तथा ऊंचनीच की भावना करीबकरीब पूरे देश में एकसमान है. मगर द्रविड़ों के माथे आर्यों के माथे पर आर्यों से पराजय का दोष मढ़ा था. इससे उबरने के लिए पेरियार ने द्रविड़ों को भारत का मूल निवासी बताया और आर्यों को आक्रामक. ब्राह्मणवाद पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ब्राह्मण विदेशी के हैं. इसलिए इस देश और यहां के संसाधनों पर मूलनिवासियों का अधिकार उनसे ज्यादा है. मूल निवासी की अवधारणा नई नहीं थीं. ज्योतिबा फुले उसे वर्षों पहले ‘गुलामगिरी’ में स्थापित कर चुके थे. 1892 में ‘मद्रास समाज सुधार संघ’ का गठन भी इसी सिद्धांत के आधार पर किया गया था.

1925 में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को आरंभ में केवल पढ़ेलिखे और मध्यवर्गी युवाओं का आकर्षण था. आरंभ में उन्हीं के भरोसे आंदोलन आगे बढ़ा. धीरेधीरे बात लोगों की समझ में आने लगी. शहर से लेकर गांव तक लोक पेरियार से जुड़ने लगे. 1930 में वह पूरे दक्षिण भारत में अपनी पकड़ बना चुका था. आंदोलन के साथसाथ पेरियार का आत्मविश्वास भी बढ़ता गया. उन्हें लग रहा था कि सामाजिक विकास के लक्ष्य को केवल सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है. राजनीति ऐच्छिक सामाजिक परिवर्तनों की दिशा में राजनीति केवल उत्प्रेरक का काम कर सकती है. धीरेधीरे पेरियार के मन में सक्रिय राजनीति को लेकर निराशा उमड़ने लगी. उन्हें यह विश्वास हो चला था कि सामाजिक सुधार के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति लोकप्रिय राजनीति के माध्यम से संभव नहीं है.

अपने विचारों को जनजन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘कुदी अरासु’(गणतंत्र) शीर्षक से साप्ताहिक की शुरुआत की. उसमें उन्होंने महिला उत्थान, सामाजिक न्याय, धर्म और पाखंड के विरोध में लिखना आरंभ किया. ‘कुदी अरासु’ नए मूल्यों को समर्पित साप्ताहिक था. इसी पत्र में उन्होंने 1935 में भगत सिंह के चर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों बना’ का तमिल अनुवाद प्रकाशित किया. ‘कुदी अरासु’ के उस अंक को सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया. पेरियार के लिए यह कोई नई बात न थी. उग्र विचारों के कारण मद्रास सरकार ‘कुदी अरासु’ को कई बार प्रतिबंधित कर चुकी थी. प्रोफेसर चमनलाल के अनुसार आजादी के बाद एक समय ऐसा भी आया जब भगत सिंह के उपर्युक्त लेख का अंग्रेजी प्रारूप उपलब्ध नहीं था. तब पेरियार द्वारा छापे गए लेख का अंग्रेजी में दुबारा अनुवाद करके काम चलाया गया. ‘कुदी अरासु’ में भगत सिंह को फांसी पर गांधी की चुप्पी की आलोचना करते हुए पेरियार ने इस पत्रिका के 29 मार्च 1931 के अंक में लिखा था—

देशभर में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसने भगत सिंह की फांसी की निंदा न की हो. कहीं कोई भी नहीं है जिसने इस घटना के लिए सरकार को कोसा न हो. दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि देशभर में ऐसे अनेक देशभक्त, और राष्ट्रनेता हैं जो गांधी को इस घटना के लिए दोषी मानते हैं.’

पेरियार की भाषा में कबीर जैसा तंज और साफगोई थी. अल्पशिक्षिात होने के बावजूद उनमें गजब आत्मविश्वास था. वे मुखर वक्ता, निर्भीक और मानवमूल्यों से प्रतिबद्ध नेता थे. उनके लिए सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक भागीदारी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण था. फुले का अनुसरण करते हुए पेरियार ने शोषण का आधार रहे ब्राह्मणवादी मिथकों पर न केवल जोरदार प्रहार किया, बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को भी चुनौती दी. यह जानते हुए भी भारत की धर्मप्राण जनता नास्तिक व्यक्ति को अपने नेता के रूप में शायद ही स्वीकार करेगी, पेरियार ने खुद को नास्तिक कहा और आजीवन नास्तिकता के प्रचार में लगे रहे. पेरियार के योगदान को सम्मानित करते हुए यूनेस्को ने उन्हें ‘दक्षिणपूर्वी एशिया का सुकरात’ का दर्जा दिया था.

ओमप्रकाश कश्यप