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साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामान्य
  • फासिज्म रोकने का श्रेष्ठतम उपाय है, समाज में सामाजिक न्याय की यथासंभव प्रतिष्ठाआर्नोल्ड टॉयनबी.

  • भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय लोकप्रिय राजनीति का तकिया कलाम है. जिसे हर नेता प्रत्येक चुनाव में

    अपनीअपनी तरह से इस्तेमाल करता है.

साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ दोनों आयातित पद हैं. हमारे यहां मार्क्सवाद ज्यादा चलता है, जिसे खुद मार्क्स ने ही खारिज कर दिया था. लोहिया भी मार्क्सवाद कहने से बचते थे. हालांकि मार्क्सवाद के आदर्श से उन्हें कोई शिकायत न थी. साम्यवादी लक्ष्य को लेकर इस देश में जितने भी राजनीतिक संगठन बने, किसी न किसी रूप में वे सभी मार्क्सवाद का प्रतिनिधि दल होने का दावा करते हैं. इतनी शिद्दत से करते हैं कि अपना लक्ष्य, साम्यवाद का आदर्श ही उन्हें याद नहीं रहता. शायद इसलिए कि ‘मार्क्सवाद’ की प्रचलित शब्दावली यथा वर्गसंघर्ष, मजदूर, पूंजीपति, शोषण आदि को लोकप्रिय राजनीति के खांचे में आसानी से फिट किया जा सकता है. उसे लेकर राजनीति करना आसान है. साम्यवाद अपेक्षाकृत स्वप्नीला शब्द है. आदर्श और मनुष्यता के बेहद करीब. वह जिस आदर्शोन्मुखी, वर्गहीन और समतायुक्त समाज का सपना देखता है, उसकी पूर्णता पर आमजन तो क्या, आकादमिक प्रतिष्ठा वाले बड़ेबड़े विद्वान विश्वास नहीं करते.

पश्चिम में प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना करीबकरीब साम्यवादी परिकल्पना ही थी. भारत में रैदास ने ‘बेगमपुरा’ तथा कबीर ने ‘अमरपुरी’ के रूप में समताआधारित समाज का सपना देखा था. उसके कुछ समय बाद योरोप में संत साइमन ने भी व्यंग्यात्मक शैली में वर्गहीन तथा आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. प्लेटो की परिकल्पना को अरस्तु ने ही अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था, वहीं संत साइमन के सपने पर उनके समकालीनों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया. मगर डेड़दो शताब्दी बाद ही, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में साइमन की यूटोपियाई कल्पना आदर्शवादी समाज का सपना देखने वाले विद्वानों, चिंतकों और आंदोलनकारियों का सपना बन गई. संत साइमन के थोड़ा आगेपीछे जॉन लाक, इमानुएल कांट, प्रस्टीले, रूसो, राबर्ट ओवेन, बैंथम, जान स्टुअर्ट मिल, मिखाइल बकुनिन आदि ने समानता और स्वाधीनता पर आधारित ऐसे राजनीतिक दर्शन को दुनिया के सामने रखा, जिसमें व्यक्तिमात्र की गरिमा, स्वतंत्रता और समान सुख की उम्मीद शामिल थी. भारत में स्थितियां अलग थीं. यहां का समाज जाति और धर्म के आधार पर बुरी तरह विभाजित था. सत्ता और संसाधन जिन लोगों के अधीन थे, वे हर हालत में यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे. जिस धर्मसंस्कृति के भारतीय अनुगामी रहेवह खुद वर्गभेद का पोषण करता है. इसलिए समाज के उत्पीड़ित वर्गों से आए रैदास आदि संत कवियों के सपने की ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. जाति और वर्णभेद में बुरी तरह फंसे, उन्हें विधि का विधान मानकर जीने वाले समाज के लिए यह कोई अनहोनी बात नहीं थी. लोग अपने दुख, दैन्य, दमन और दासत्व के साथ जीना सीख चुके थे. आजादी के बाद भी शताब्दियों के संस्कार देश के बुद्धिजीवियों के अवचेतन पर असर बनाए रहे. यही कारण है कि हमारे यहां खुद को समाजवादी कहने वाले नेता हुए, मार्क्सवादी हुए, मगर साम्यवाद कभी भी बौद्धिक और आकादमिक बहसों से बाहर न आ सका.

आजादी के बाद रोजमर्रा की शब्दावली में साम्यवाद अ़ौर मार्क्सवाद दोनों के लिए वैकल्पिक शब्द का चलन शुरू हुआ. वह शब्द हैवामपंथ. बदले परिवेश में ‘वामपंथ’ को गाली मान लिया गया है. तो भी मार्क्सवाद के पर्याय के रूप में या जिन्हें मार्क्सवाद कहनेलिखने से चिढ़ है, वे प्रायः ‘वामपंथ’ का ही प्रयोग करते हैं. वामपंथ क्या है? वह जो दक्षिणपंथ नहीं है? एक वैचारिकी के रूप में वामपंथ का साम्यवाद या मार्क्सवाद से दूरपास का कितना नाता है? क्या वह मार्क्सवाद या साम्यवाद के पर्याय से अधिक कुछ नहीं है? ऐसे प्रश्नों पर वे विचार ही नहीं करना चाहते. मार्क्सवाद और साम्यवाद की तरह ‘वामपंथ’ भी आयातित विचार है. अपने मूल अर्थों में इसका मार्क्सवाद से दूर का ही नाता है. एक रास्ता है, जिससे साम्यवाद की ओर बढ़ा जा सकता है. वामपंथ का संबंध फ्रांस की क्रांति से है, जो कभी मार्क्सवादी या साम्यवादी देश नहीं रहा. प्रथम वामपंथी होने का श्रेय टॉमस पेन तथा उसके सहयोगियों को जाता है. पेन मूलतः व्यक्तिमात्र की अधिकतम स्वाधीनता का समर्थक था. अमेरिकी क्रांति की सफलता के पश्चात, मित्र थॉमस जेफरसन से विदा लेकर वह फ्रांस पहुंचा था. वहां राजशाही के विरुद्ध उसका संघर्ष जारी था. पेन की पुस्तक ‘राइट्स ऑफ मेन’ उनीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक प्रभावशाली पुस्तकों में से है. इस पुस्तक ने फ्रांसिसी क्रांति के लिए उत्प्रेरक का काम किया था.

फ्रांसिसी क्रांति ने सामाजिकराजनीतिक संरचनाओं में अनेक बदलाव किए थे. उससे पहले धर्म राजनीति के मुख्य मार्गदर्शक की भूमिका निभाता था. क्रांति के बाद धर्म के प्रभावक्षेत्र मनुष्य के निजी विश्वास और आचरण तक सीमित हो गया. नई विचारधाराओं के आलोक में राजनीति में धर्म की कार्यकारी भूमिका को लगभग समाप्त कर दिया गया था. उसके स्थान पर न्याय, लोककल्याण, नागरिक और राज्य की आंतरिक शुभता, मानवाधिकार आदि को राजनीति का प्रमुख मार्गदर्शक घोषित कर दिया गया. फलस्वरूप विधि के शासन को बल मिला. राज्य जिसे पहले दैवीय अथवा देवताओं की विशेष अनुकंपा माना जाता था, उसको मनुष्य द्वारा अपने तथा मानवमात्र के कल्याण हेतु निर्मित संस्था कहा जाने लगा. राज्य के संचालन में नागरिकों की भूमिका जो धर्मप्रधान राजनीति में अत्यंत गौण थी, वह प्रमुख हो गई. तीसरी और प्रमुख सफलता थी, राजनीति में कुल, परंपरा, जाति, वंशाधिकार, वर्णश्रेष्ठता आदि के दावे के आधार पर विशेषाधिकारों का लोप. उससे, कालांतर में लोकतंत्र के रास्ते प्रशस्त हुए, आधुनिक समाज की नींव रखी गई.

आरंभिक अवधारणा के अनुसार वामपंथ मार्क्सवाद या साम्यवाद का पर्याय भले न हो, किंतु अपनी इन समानधर्मा विचारधाराओं की भांति वह किसी भी प्रकार की सर्वसत्तावादी अवधारणा का विरोध करता है, इस दृष्टि से इसे साम्यवाद और मार्क्सवाद दोनों के करीब माना जा सकता है. मार्क्सवाद का मूलभूत विचार वर्गसंघर्ष है. वर्गहीन समाज की स्थापना उसका लक्ष्य है. वर्गसंघर्ष को हम हीगेल की दार्शनिक संकल्पना ‘द्वंद्ववाद’ का राजनीतिक अवतार भी कह सकते हैं. 1848 में श्रमिकों का आवाह्न करते हुए मार्क्स ने कहा थाᅳ‘तुम्हारे पास खोने के लिए सिवाय अपनी बेड़ियों के कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है.’ इस कथन के संकेत साफ थे. मार्क्स चाहता था कि श्रमिक वर्ग संगठित क्रांति द्वारा उत्पादन एवं सत्ता प्रतिष्ठानों पर अधिकार कर ले. इस आवाह्न का श्रमिक संगठनों ने खुले दिल से स्वागत किया था. उसके आधार पर 1871 में पेरिस क्रांति हुई. उसका सुफल ‘पेरिस कम्यून’ के रूप में दुनिया सामने आया. पेरिस और आसपास के कुछ ठिकानों पर श्रमिकसंगठनों का अधिकार हो गया. वह सफलता अस्थायी सिद्ध हुई. तीन महीने से भी कम समय में सत्ता श्रमिकसंगठनों से वापस छीन ली गई. पेरिस कम्यून की असफलता मार्क्स के लिए भी सबक थी. वर्गक्रांति की सफलता के लिए वर्गभेद के कारणों को समझना और समझाना अत्यावश्यक था. उसके बाद मार्क्स ने खुद को पूंजीवाद के गंभीर अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया था. वर्गहीन समाज की संकल्पना उसके लंबे अध्ययनमनन का सुफल थी. ‘पेरिसक्रांति’ के बाद मार्क्स का नाम दुनियाभर में फैल चुका था. लोग संगठित विद्रोह की शक्ति से परिचित हो चुके थे. समझने लगे थे कि संगठित ताकत से आजादी को संभव बनाया जा सकता है. भारत भी उससे अछूता न था. ‘वर्गसंघर्ष का उपयोग औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए किस प्रकार किया जाए?’ यह प्रश्न अनेक विचारवान लोगों को उद्वेलित करने लगा था. मार्क्स से मिलने की साध लेकर राजा राममोहनराय ने इंग्लेंड की यात्रा भी की थी. हालांकि उन दोनों की भेंट के बारे में दावे के साथ कुछ भी कह पाना कठिन है.

सर्वहारा शोषण की जिन स्थितियों का विश्लेषण मार्क्स ने अपने लेखन में किया था, वे उससे पहले भी अजानी नहीं थीं. प्लेटो और अरस्तु दोनों यद्यपि दास पृथा के समर्थक थे, लेकिन वे राज्य से अपेक्षा करते थे कि वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों को समझे तथा उनका निष्ठापूर्वक पालन करे. मध्यकाल के विचारक भी लोककल्याण के लिए राज्य की ओर से उत्तरदायी आचरण की अपेक्षा करते हैं. फ्रांसिसी विचारक पियरे जोसेफ प्रूंधों ने समाजार्थिक समानता पर आधारित राज्य की परिकल्पना की थी. बेहद मामूली, गरीब परिवार में जन्मा प्रूंधों बचपन में अपने पिता के साथ कहवाघर में काम करता था. उसने अपना सारा ज्ञान जीवनानुभवों और स्वाध्याय के बल पर अर्जित किया था. वह अराजकतावादी था. उसका मानना था कि राज्य की कुल संपत्ति पर सरकार का अधिकार होना चाहिए. सरकार कैसी हो? इस बारे में उसकी स्पष्ट मान्यता थीᅳ‘प्रत्येक के द्वारा खुद की सरकार’. कुल मिलाकर शासक वर्ग का पूर्णतया लोप. प्रत्येक नागरिक के लिए अधिकतम स्वतंत्रता. यह थोरो द्वारा दी गई अच्छी सरकार की विशेषता, ‘अच्छी सरकार वह है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती’का समर्थन करती है. प्रूंधों ने व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी और संपत्तिधारक को चोर कहा था. अपने समय में वह मार्क्स कहीं अधिक लोकप्रिय था. लेकिन पूंजीवाद के दुष्प्रभावों को लेकर मार्क्स का अध्ययन कहीं अधिक व्यापक और तथ्यपरक था. सभ्यताओं के लंबे, ऐतिहासिक अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन प्रविधियों में बदलाव संस्कृति एवं सभ्यता को प्रभावित करता है. उत्पादकता के साधनों पर पूंजीवादी वर्चस्व के रहते शोषण से मुक्ति असंभव है. एकमात्र समाधान वर्गसंघर्ष है. वह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रमुख औजार है. ऐसा रास्ता, जिसका लक्ष्य साम्यवाद है. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में मार्क्स का निष्कर्षवाक्य हैᅳ‘दार्शनिकों ने इस संसार की अनेक तरह से व्याख्या की है. सवाल है कि उसे बदला किस तरह जाए?’ मार्क्स का पूरा जीवन बदलाव को समर्पित रहा. इसके लिए उसने वर्गक्रांति का आवाह्न किया, जो इतनी ओजपूर्ण है कि प्रायः वर्गसंघर्ष को ही साम्यवाद की आधारसैद्धांतिकी मान लिया जाता है. मार्क्स और मार्क्सवाद के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी अनजाने में तो कभी जानबूझकर ऐसी गलती करते रहते हैं. कदाचित इसलिए भी कि वर्गसंघर्ष यानी टकराव की राजनीति करना आसान है. विशेषकर भीषण असमानता के शिकार उन समाजों में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति तक सिमटकर अपनी गरिमा तथा उद्देश्य दोनों से दूर जा चुका है.

सामाजिक न्याय : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

सामाजिक न्याय’ पर चर्चा करने से पहले उचित होगा कि उसके इतिहास पर भी कुछ बातचीत कर ली जाए. उन परिस्थितियों पर विचार किया जाए जिनके कारण चर्च जैसी शक्तिशाली संस्था को कल्याणराज्य के समर्थन में उतरना पड़ा था? 16वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति यूरोप में कई वैचारिक आंदोलनों की प्रेरक बनी थी. उनके केंद्र में मनुष्य था. फलस्वरूप सामंतवादी दौर की वे विचारधाराएं सवालों के घेरे में आने लगीं, जो किसी अजाने, अदृश्य लोक तथा पैगंबर की बातें किया करती थीं. जिनकी निगाह में सब कुद्ध नियतिबद्ध था. उन्हें कठघरे में लाने की शुरुआत थॉमस हॉब्स की ओर से हो चुकी थी. आगे चलकर उसे ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, इमानुएल कांट, बैंथम, प्रूधां और टॉमस पेन जैसे विचारकों का समर्थन मिला. इनमें कई आस्थावादी भी थे, मगर धर्म उनके लिए व्यक्तिगत आस्था और विश्वास तक सीमित था. राजनीति के साथ उसके घालमेल के सभी विरोधी थे. नई विचारधाराओं के आलोक में लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा था. फ्रांसिसी क्रांति तथा उसके पहले संपन्न हुई अमेरिकी क्रांति, धर्म केंद्रित प्राचीन राजनीतिक संस्थाओं को वर्षों पहले नकार चुकी थीं. नए राजनीतिक दर्शनों पर बहस जारी थी. इससे पुरातनपंथी धर्माचार्यों में बेचैनी थी. अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए वे छटपटा रहे थे.

विज्ञान के पंखों पर सवार होकर आने वाली औद्योगिक क्रांति सर्वथा निरापद न थी. अनियोजित मशीनीकरण ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए ‘आधुनिक विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन ने कहा था कि औद्योगिक क्रांति श्रमिकों को उनके जानलेवा कष्टों से मुक्ति दिलाकर नए समाज की नींव रखेगी. किंतु उद्योगपतियों की स्वार्थपरता, लाभ को केंद्र में रखकर उत्पादन करने की उनकी नीति तथा श्रमिकों को उनके श्रम का पूरा लाभ न देकर सबकुछ हड़प जाने की लालची वृत्ति ने मशीनीकरण के लाभों को विशिष्ट वर्ग तक सीमित कर, श्रमिक वर्ग के उन सभी सपनों पर पानी फेरने का काम किया था, जो उसने औद्योगिक क्रांति के साथ देखे थे. उससे श्रमिकों का आक्रोश बढ़ रहा था. वे एक साथ लामबंद होने लगे थे. चार्ल्स फ्यूरियर, प्रूंधों, मार्क्स, मिखाइन बकुनिन जैसे विचारक, आंदोलनकारी उनके समर्थन में थे. फ्रांसिसी क्रांति की सफलता से श्रमिक संगठनों के हौसले बढ़े हुए थे. उसका दूरगामी असर भविष्य की राजनीति पर पड़ा. फलस्वरूप राजनीति में धर्म की भूमिका सिमटने लगी. न्याय का ईश्वरीय आधार समाप्त हो गया. प्रशासनिक फैसलों में तर्क और ज्ञानविज्ञान की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई. क्रांति की तीसरी बड़ी उपलब्धि थी, वंशानुगत शासन का अंत. फलस्वरूप वैधानिक और नागरिक अधिकार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगे. शासनप्रशासन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की संख्या बढ़ने लगी, जिनके लिए नागरिक तथा नागरिकअधिकार प्रमुख थे.

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में सोवियत क्रांति की कामयाबी श्रमिक आंदोलन के इतिहास में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई. सोवियतसंघ विश्व का पहला समाजवादी राज्य था, जिसका गठन साम्यवादी सपने के मद्देनजर किया गया था. उस सफलता से उत्साहित सर्वहारा वर्ग पूरे विश्व को कम्युनिज्म की परिसीमा में लाने का सपना देख रहा था. मंगोलिया, जर्मनी, इटली, रोमानिया जैसे दर्जनों देशों उसके प्रभाव में आ चुके थे. अमेरिका, इंग्लेंड जैसे ठेठ पूंजीवादी देशों में साम्यवादी दलों का गठन हो चुका था. उन्हें अपने समय के प्रखर विद्वानों और बुद्धिजीवियों का नेतृत्व प्राप्त था. चीन भी तेजी से श्रमिकक्रांति की ओर अग्रसर था. वहां माओ के नेतृत्व में परिवर्तन की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ी जा रही थी. उधर अमेरिका के उपनिवेश रहे अफ्रीकी देशों में वर्गचेतना अंगड़ाई ले रही थी. लोग औपनिवेशिक दासता से बाहर निकलने के लिए आतुर थे. हथियार खरीद की अवांछित स्पर्धा का सीधा असर उन देशों की विकासदर पर पड़ा. दूसरे विश्वयुद्ध का डर दिखाकर प्रतिक्रियावादी शक्तियां सत्ताकेंद्रों पर सवार होने लगी थीं.

औपनिवेशिक देशों में आजादी की बढ़ती मांग का एक असर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में सामने आ रहा था. उनीसवीं शताब्दी में तेजी से हो रही बाजारवृद्धि लगभग रुकसी गई थी. ऊपर से विश्वयुद्ध की मार. विश्वघटनाक्रम तेजी से बदल रहा था. जिन देशों में सर्वहारा क्रांति संपन्न हुई थी, वहां वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य अभी बाकी था. युद्ध से जनअसंतोष में वृद्धि हुई थी. पूंजीवादी ताकतों के सामने केवल दो रास्ते शेष थे. पहला बिना किसी ढांचागत परिवर्तन के, श्रमिक आंदोलन की ओर से आंखें मूंदकर उत्पादन में तेजी लाई जाए. तत्कालीन परिस्थतियां में वह असंभव जैसा था. दूसरा और अंतिम रास्ता यही था कि श्रमिकों की वैध मांगों से समझौता कर श्रमिकअसंतोष को दूर करने के उपाय किए जाएं. इस भावना ने ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को जन्म दिया. इस तरह अपने मूल में ‘सामाजिक न्याय’ जरूरतमंदों को बहलाफुसलाकर उनके असंतोष को दबा देने की कोशिश का परिणाम था. धार्मिक संगठन उसे राज्य की उदारता के रूप में, जनता का विश्वास जीतने के लिए आवश्यक मानते थे, ताकि उसकी आड़ में धर्मसत्ता अपने वर्गीय स्वार्थों का संरक्षण कर सकें. इसके समर्थन में वे विचारक, बुद्धिजीवी, लेखक और धर्माचार्य भी थे जो सामाजिकऔद्योगिक संरचना में बड़ा बदलाव किए बिना, औद्योगिक लाभों का एक हिस्सा राज्य के माध्यम से श्रमिकों तक पहुंचाकरश्रमिकआंदोलनों से उपजे असंतोष का समाधान खोजना चाहते थे. इसे श्रमिक आंदोलन से गुजर रहे देशों की सरकारों का समर्थन हासिल था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विभिन्न राष्ट्रों में मारक हथियार खरीदने की होड़ शुरू हो चुकी थी. वर्गक्रांति से गुजर चुके देशों ने भी अपने संसाधन युद्ध की तैयारी अथवा संभावित युद्ध की अवस्था में बचाव के लिए झोंक दिए थे. वे देश एकदूसरे के साथ स्पर्धा में थे. साम्यवाद की सफलता स्पर्धा के बजाय सहयोग पर टिकी होती है. स्पर्धा, भले ही वह हथियारों के लिए दूसरे देशों के साथ हो, साम्यवाद के मूल सिद्धांतों के विपरीत है. हथियारों की स्पर्धा उन देशों में साम्यवादी मूल्यों के प्रचारप्रसार पर भारी पड़ने लगी थी.

सामाजिक न्याय की उद्भावना के दौर में एक वर्ग आमूल परिवर्तनवादियों का भी था. उसके समर्थक मानते थे कि धर्म और धर्म जैसी सामंती चरित्र वाली संस्थाओं के सहारे सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन असंभव है. इन विचारधाराओं के मूल में यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति का बड़ा योगदान था. मशीनीकरण द्वारा पूंजीपति वर्ग की संपत्ति में तेज बढ़ोत्तरी हुई थी. पुराने उद्योगधंधे उजड़ने से शिल्पकार और कामगार वर्ग में असंतोष पनप रहा था. अनियोजित शहरीकरण ने भी अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. फलस्वरूप उन देशों में पूंजीवाद के विरुद्ध माहौल बनने लगा था. वैज्ञानिक क्रांति ने लोगों के सोच और मानस को बदला था. नईनई विचारधाराएं सामने आ रही थीं. धार्मिक संस्थाएं, पहले जिनकी हर शिक्षा जनसाधारण के लिए आदेश होती थी, अब उतनी विश्वसनीय नहीं रह गई थीं. बल्कि यह मानते हुए कि धर्म शोषण में मददगार है, उसके विरुद्ध आवाज उठने लगी थीं. हॉब्स, ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, प्रूधों आदि ने धर्म की विश्वसनीयता तथा उसके सर्वसत्तावादी स्वरूप पर सवाल उठाए थे. नए विचारों का मूल्यबोध मानवमात्र के सुख, स्वतंत्रता और सम्मान से अभिप्रेत था. उन्हें जनसमाज का समर्थन भी प्राप्त था. औद्योगिकीकरण रोजगार के परंपरागत संसाधनों पर उनकी निर्भरता घटी थी. उनका आत्मविश्वास लौटा था और अब वे स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम थे. इसका एहसास पूंजीपति और राजनेताओं को भी था. इसलिए श्रमिककामगार वर्ग को संतुष्ट रखने की कोशिशें श्रमिक चेतना के उभार के साथ ही आरंभ हो चुकी थी. चूंकि जनसाधारण पर धर्म का गहरा प्रभाव था, इसलिए श्रमिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए आरंभ में धर्म को ही माध्यम बनाया गया.

यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि ‘सोशल जस्टिस’ जैसे शब्दयुग्म जिसका प्रयोग राज्य की उदारता और न्यायप्रियता दर्शाने के लिए किया जाता है, का प्रथम प्रयोग एक कट्टर पुरातनपंथी द्वारा किया गया था. इटली निवासी ल्यूगी अजीलिओ टपरेली पेशे से धर्मप्रचारक पादरी था. 1845 में लिखे गए एक लेख Theoretic Essay of Natural Straight में उसने इस शब्दयुग्म का पहली बार प्रयोग किया था. ‘सामाजिक न्याय’ से टपरेली का आशय भी वह नहीं था, जैसा आज है. उसका आशय राज्य के सामान्य न्यायबोध से था. उन दिनों लेखकों और चिंतकों का एक ऐसा वर्ग था जो ईसाई धर्म की मूलभूत मान्यताओं को आगे रखकर राज्य से नागरिकों के प्रति करुणा और सहानुभूतिपूर्ण आचरण की मांग कर रहा था. थॉमस एक्वीनस से प्रभावित, उसे अपना गुरु मानने वाले टपरेली का संबंध इसी वर्ग से था. वह मानता था कि आधुनिकता से लोगों की जो अपेक्षाएं हैं, धर्म की परिसीमा में उनका समाधान संभव है. समानता और व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को लेकर टपरेली के विचार दकियानूसी किस्म के थे. वह मध्यकालीन दर्शनों से प्रभावित था. जिनमें राजसत्ता से, धर्मसत्ता की अनुप्रेरणा अथवा उसके मार्गदर्शन में काम करने की अपेक्षा की जाती है. उसका विचार था कि प्राकृतिक आधार पर मनुष्य भी बाकी जीवों के समान है. परंतु अपनी मेधा, स्वाध्याय, धन, चरित्र, कुलपरंपरा आदि के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से अलग होता है. चरित्र एवं गुणों में दूसरों से श्रेष्ठतर व्यक्ति, श्रेष्ठता की कसौटी पर कमजोर वर्गां पर शासन करने का अधिकार स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेता है. समाज को शासक एवं शासित के रूप में देखने वाले टपरेली के लिए न्याय राज्य की उदारता का लक्षण है. उसके दर्शन में शासक एवं शासित के बीच द्वंद्वात्मकता के लिए जगह नहीं है. वह किसी व्यक्ति के शिखर पर होने को उसका विशेषाधिकार मान लेता है. उसके अनुसार कोई व्यक्ति शासन इसलिए करता है, क्योंकि उसमें राज करने का स्वयंअर्जित गुण है.

वर्तमान में ‘सामाजिकन्याय’ जिन अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, उन तक पहुंचने के लिए उसे आधी शताब्दी से भी अधिक का समय लगा है. इस बीच उसका प्रयोग विभिन्न लेखकों, विचारकों द्वारा अलगअलग संदर्भों में किया जाता रहा. 1851 में इतालवी भाषा के एक आलेख ‘दि कैथोलिक सिविलाइजेशन’ में ‘सामाजिक न्याय’ को सामान्य प्रकृतिबोध, ज्ञानविज्ञान और अनुभव पर आधारित ऐसा दर्शन माना गया जो विकेंद्रीकृत सत्ता का विरोध करता है. उसके लगभग तीन दशक बाद 1883 में फ्रांसिसी कैथोलिक समाजविज्ञानी दि मुन ने ‘सामाजिक न्याय’ को श्रमिकों और कामगारों के ऐसे संगठन के साथ जोड़ा, जिसके सदस्य पारस्परिक उत्तरदायित्व एवं सामाजिक आदर्श की भावना के साथ समान उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु परस्पर एकजुट होकर काम करते हैं. उसके दो वर्ष बाद फ्रांसिसी समाजवादी नेता, लेखक और विचारक जार्ज गोयो ने ‘सामाजिक न्याय’ की कामना के साथ ऐसे राष्ट्र के गठन पर जोर दिया, जिसमें नागरिक और सरकार दोनों अपनेअपने कर्तव्य को समर्पित हों; तथा जिसमें नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा का पूरा भरोसा हो. बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यह शब्दयुग्म विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था. दर्जनों लेखकों ने ‘सामाजिक न्याय’ को अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हुए उसकी जरूरत पर बल दिया. अमेरिकी लेखक डब्ल्यू विलियोग्वि ने ‘सामाजिक न्याय’ को लेकर कई लेख लिखे. एक लेख में उसने लिखाᅳ‘न्याय का आशय नागरिकों को यथासंभव ऐसे और इतने अवसर उपलब्ध कराना है, जिनसे वह अपने भीतर के शुभत्व को उच्चतम बिंदू तक उठान दे सके. राज्य का स्वरूप ऐसा हो जिसमें सभी को अपने विकास के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों.’ विलियोग्वि की यह परिभाषा ‘सामाजिक न्याय’ की आधुनिक अवधारणा के काफी करीब है. 1930 तक ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा पूरी तरह चलन में आ चुकी थी. उसके माध्यम से ऐसे राज्य की परिकल्पना को बल मिला, जहां नागरिक व्यक्तिगत एवं सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों और राज्य अपने नागरिकों के हितों के प्रति जागरूक.

1924 में सोवियत क्रांति के महानायक रहे विलादिमिर लेनिन की मृत्यु के बाद सत्ता जोसेफ स्टालिन के हाथों में आ चुकी थी. स्टालिन का अर्थ हैलौहपुरुष. अपने नाम के अनुरूप स्वभाव पाया था उसने. इरादों से मजबूत. कड़े फैसले लेने में सक्षम. स्टालिन की पूरी कोशिश सोवियत संघ को वर्गहीन समाज में बदल देने की थी. उसके लिए बड़े पैमाने पर भूप्रबंधन किया जा रहा था. धर्म को किनारे कर पारंपरिक संस्थाओं को शक्तिहीन किया जा चुका था. अपने कठोर निर्णयों से वह अपने मित्रों की नाराजगी भी मोल ले चुका था. मगर स्टालिन के लिए यह विशेष चिंता का विषय नहीं था. ट्राटस्की, लेव केमानोव जैसे नेता जो सोवियत क्रांति के दौरान लेनिन के सहयोगी रह चुके थे, को मृत्युदंड देकर उसने अपने मजबूत इरादों को दर्शा दिया था. चूंकि स्टालिन के नेतृत्व में रूस तरक्की कर रहा था, इसलिए जनता उसके साथ थी. साम्यवादी राष्ट्रकुल के गठन की दिशा में उसकी उसकी प्रगति दर चौंकाने वाली थी. औपनिवेशिक दासता का शिकार देशों में साम्यवाद का तेजी से विस्तार हो रहा था. यह डर पूंजीपतियों तथा उनके समर्थनसहयोग के आधार पर टिकी सरकारों के लिए काफी था. यथास्थिति बनाए रखने का एकमात्र रास्ता था, श्रमिकों और कामगारों को अपने पक्ष में लिया जाए. इसके लिए उन्हें थोड़ीबहुत छूट देकर न्याय का माहौल बनाया गया. विश्वस्तर पर ऐसे बुद्धिजीवियों की पहचान की जाने लगी, जिन्हें पूंजीवाद से कोई शिकायत न थी; अथवा जो बदलाव के लिए हिंसक क्रांति का विरोध करते थे ऐसे बुद्धिजीवियों के समर्थन में आने से ‘सामाजिक न्याय’ का खूब प्रचारप्रसार हुआ.

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामाजिक न्याय’ की ऐतिहासिक अवधारणा हमें प्लेटो और अरस्तु तक ले जाती है. न्याय से प्लेटो का अभिप्राय थामानवीय सद्गुण. ऐसे गुण जो आत्मा का लक्षण और मनुष्यता की कसौटी हैं. जो मनुष्य को एकदूसरे के प्रति सदाशयी तथा समाज का जिम्मेदार सदस्य बनाते हैं.’ न्याय समाज से प्लेटो का अभिप्राय ऐसे समाज से था, जिसमें मनुष्य उन सभी कर्तव्यों को स्वेच्छापूर्वक पूरा करे, जिनका पालन समाज के प्रयोजनों की दृष्टि से अपरिहार्य है. आदर्श समाज में समाज और राज्य मिलकर नागरिकों की योग्यतानुसार जिन कर्तव्यों का निर्धारण करते हैं, उन्हें पालन किया जाना ही श्रेयस्कर है. न्यायअनुगामी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन इस भावना के साथ करता है कि उसी में उसकी तथा बाकी समाज की खुशी है. बदले में समाज भी पीछे नहीं रहता. अपनी प्रत्येक इकाई के साथ वह ऐसा व्यवहार करता है मानो उसकी खुशी के अभाव में शेष समाज की खुशी भी अधूरी है. इस तरह एक व्यक्ति का सुख समाज के सुख में तथा समाज का सुख उसकी प्रत्येक इकाई के सुख के संरक्षण में नजर आने लगता है. उस अवस्था में सुख का बंटवारा नहीं, उसमें हिस्सेदारी होती है. न्यायसमर्पित समाज सुख को सामूहिक उपलब्धि मानता है. उसमें व्यक्तिगत इच्छाओं का सम्मान किया जाता है, पर जोर सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति पर दिया जाता है. यह काम सामान्य इच्छा के भरोसे किया जाता है. फलस्वरूप ऐसे समाज में व्यक्तिगत और सामूहिक सुख का अंतर मिटने लगता है. न्यायसमर्पित समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं सम्मान यह सोचकर करता है, मानो वे उसका अधिकार हां. वहां प्रत्येक नागरिक दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए अपनी इच्छाओं को मर्यादित रखता है. जिम्मेदार समाज इसमें भी सदस्य इकाइयों की मदद करता है. इस तरह कि सदस्य इकाइयों की अधिकतम इकाइयों की इच्छाओं की अधिकतम पूर्ति संभव हो सके.

सामाजिक न्याय’ राज्य के समर्थन तथा उसके जिम्मेदराना आचरण पर टिका होता है. वह राज्य को न केवल आवश्यक कार्यकारी शक्तियां सौंपने का समर्थन करता है, बल्कि उनके सकारात्मक उपयोग की राह भी बताता है. वह राज्य से अपेक्षा करता है कि ऐसे नागरिकों के साथ सहानुभूति और जिम्मेदराना ढंग से पेश आए, जो प्राकृतिक अथवा अन्य किसी कारण से सामान्य सुखसुविधा के मामले में पिछड़ चुके हैं. इसके लिए कोई एक और सार्वभौमिक रास्ता संभव नहीं है. संसाधनों के उपयोग के लिए न्यायानुगामी राज्य सामान्य सहमति को आधार बनाता है. फिर उसपर इस तरह अमल करता है, जिससे समाजार्थिक असमानताओं को न्यूनतम किया जा सके. फलस्वरूप अन्याय और असमानता के शिकार रहे लोगों के मन में एकदूसरे के प्रति सामंजस्य भाव का संचार होता है. उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. इस प्रकार न्यायप्रधान राज्य वह है जिसमें दुखदैन्य के शिकार प्रत्येक नागरिक को राज्य और समाज दोनों की मदद का भरोसा होता है. ऐसा राज्य जो न्याय को अपना नैतिक और वैधानिक कर्तव्य मानता है. उसके अभाव में राज्य अपने होने का औचित्य खो देता है. न्यायशास्त्र के सुविख्यात अध्येता, विचारक जान रॉल्स ने ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है

जैसे किसी भी विचारधारा की पहला गुण उसका सत्य होना है, वैसे ही न्याय, सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण है. कोई दर्शन वह चाहे जितना सरल और सुंदर क्यों न हो, यदि वह असत्य को बढ़ावा देता है तो उसे या तो बदलना चाहिए, अन्यथा मिट जाना चाहिए. ऐसे ही कोई कानून या संस्था वह चाहे जितनी व्यवस्थित और क्षमतावान क्यों न हो, यदि वह अन्याय का समर्थन करती है, तो उसे सुधरना चाहिए, वरना खत्म हो जाना चाहिए.’2

अपने विशद लेखन में रॉल्स क्लासिक समाजवादियों यथा हॉब्स, जॉन लाक, रूसो की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की सैद्धांतिकी को ही विस्तार देता है. उसके अनुसार न्याय श्रेष्ठ समाज का सर्वश्रेष्ठ गुण है. न्याय की पहचान कैसे की जाए? कोई नियम या विचार कब न्यायसंगत बनता है? इसके लिए रॉल्स बहुत साधारण सूत्र देता हैयदि व्यक्तियों के एक समूह को उनकी वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों से एकदम स्वतंत्र कर, उन्हें अपने लिए नया देश, नया परिवेश चुनने तथा नवीन संस्थाएं गढ़ने की आजादी हो, तो उस समूह के लिए यह प्राकृतिक अवस्था में लौटने जैसा होगा. रॉल्स इसे मूल अवस्था की संज्ञा देता है. पुनश्चः मूल अवस्था में लौटी इकाइयों को यदि यह आजादी दी जाए कि भावी समाज के गठन हेतु सोचसमझकर जरूरी नियमों का गठन करें. उस समय परस्पर सहमति, सहभागिता तथा सहकल्याण हेतु वे जिन नियमों का वरण करेंगी, वही न्यायोचित राह होगी. उन नियमों पर ईमानदारी से चलते हुए वे जिन कर्तव्यों का निष्पादन करेंगे, वे सामाजिक न्याय को बढ़ावा देंगे. उसके अनुसार ‘सामाजिक न्याय’ समाज की प्रत्येक इकाई की आंतरिक शक्तियों, शुभताओं, सद्गुणों एवं कर्तव्यों को पहचानने, तथा उन्हें अपने भले के लिए इस प्रकार प्रयुक्त करना है, जिससे शेष सामाजिक इकाइयों के हित बाधित न हों. ‘सामाजिक न्याय’ उत्तरदायी सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राथमिक कर्तव्य है. उसके माध्यम से वह अपने होने के औचित्य को सिद्ध कर सकती है.

यदि नागरिककल्याण को कसौटी मान लिया जाए तो ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ के बीच की दूरी मिटने लगती है. वे समानधर्मा न होकर पूरक विचारधाराएं सिद्ध होती हैं. लक्ष्य की दृष्टि से दोनों के बीच कोई खास मतभेद नहीं है. अंतर वहां तक पहुंचने के रास्ते में है. उसके लिए साम्यवाद वर्गसंघर्ष का रास्ता अपनाता है. उसकी मूल धारणा है कि शिखर पर आसीन सर्वसत्तावादी शक्तियां अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए कभी तैयार न होंगी. वर्गहीन समाज की रचना के लिए आवश्यक है कि उनसे उन सभी संसाधनों को छीनकर राज्य के नियंत्रण में ले लिया जाए जो उन्होंने श्रमिकों और कामगारों के अंतहीन शोषण द्वारा अर्जित किए हैं. ‘सामाजिक न्याय’ समाजवादी राज्य का आदर्श सामने रखता है. वह अपेक्षा करता है कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति से पेश आए जो किसी कारण विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वर्गहीन समाज की परिकल्पना के साथ साम्यवाद, समाजवाद से आगे की, अपेक्षाकृत प्रगतिशील विचारधारा है, जिसमें नागरिकों को सहभागिता के सिद्धांत पर अपनी अधिकतम स्वतंत्रता का भोग करने के अवसर प्राप्त होते हैं.

साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों में संपत्ति पर राज्य का अधिकार होता है. समाजवाद की मूल सैद्धांतिकी है, ‘प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार, तथा प्रत्येक को उसके योगदान के अनुसार.’ साम्यवाद राज्य से और अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा रखता है. उसका आदर्श हैᅳ‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार.’ ‘साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों ही अपने नागरिकों से उम्मीद करते हैं कि वे राज्य के विकास में अपना भरपूर योगदान दें. यह पूंजीवादी तंत्र से बिलकुल अलग है. उसमें लाभ पर पूंजीपति का एकाधिकार होता है. वही उत्पादन किया जाता है, जिससे पूंजीपति को अधिकतम लाभ की संभावना हो. समाजवादी राज्य लोगों की सामान्य आवश्यकताओं के आधार पर अपनी उत्पादननीति बनाता है; तथा उनका लोककल्याण के निमित्त प्रयोग करता है. दूसरी ओर पूंजीवादी उत्पादन की मुख्य प्रेरणा लाभार्जन होता है. अधिक लाभ की उम्मीद हो तो पूंजीपति, केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर नई मांग बनाने का प्रयत्न करता है. उसका लोगों की सामान्य जरूरत से कोई संबंध नहीं होता. अशक्तता अथवा किसी अन्य कारण से यदि कोई नागरिक राज्य के विकास में अपना पर्याप्त योगदान देने में असमर्थ है तो, समाजवादी तंत्र में उसकी आय या परिलब्धियां उसके द्वारा दिए गए योगदान के अनुसार तय होंगी. साम्यवादी राज्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है. उसका संकल्प यहीं पूरा नहीं हो जाता. अपति साम्यवादी राज्य निरंतर ऐसी कोशिश में रहता है, जिससे नागरिक असमानता और अन्याय को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां दुबारा पैदा न हों. इस तरह साम्यवाद, मानवमात्र के कल्याण की दृष्टि से अधिक उपयोगी दर्शन है.

अधिकांश लोग ‘समाजवाद’ और ‘साम्यवाद’ का अंतर ही नहीं समझ पाते. जैसा कि कहा गया है साम्यवाद, समाजवाद से आगे की चीज है. समाजवाद में उत्पादन एवं वितरण का अधिकार चुनी गई सरकार के अधीन होता है. समस्त संसाधन जनता की संपत्ति माने जाते हैं. सरकार न्याय भावना के साथ, सभी के विकास को ध्यान में रखकर उनका प्रबंधन करती है. साम्यवाद राजनीतिक परिवर्तन का सपना संजोता है और श्रमिक संगठनों द्वारा अधिकृत व्यवस्था में समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर देता है. इस रूप में वह एक राजनीतिक संकल्प है. अपनी मूल संकल्पना में ‘सामाजिक न्याय’ बीच का रास्ता है, जो व्यवस्था में बिना किसी बड़े परिवर्तन के राज्य से समाजार्थिक विपन्नता के शिकार नागरिकों के कल्याण हेतु विशेष प्रयास करने की अपेक्षा रहता है. वह कामना करता है कि अपने उत्तरदायी आचरण द्वारा राज्य ऐसे नागरिकों के कल्याण के लिए विशेष प्रयत्न करें, जो किसी कारणवश विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. साम्यवाद का मुख्यआधार बहुआयामी समानता है. समाजवाद भी सामाजिक स्तर पर नागरिकों के लिए समान अवसरों का पक्ष लेता है. ‘सामाजिक न्याय’ समान अवसर उपलब्ध कराने के अलावा राज्य द्वारा ऐसे आचरण की अपेक्षा रखता है, ताकि सभी नागरिक उसका लाभ उठा सकें और ऐसे नागरिक जिन्हें किसी भी रूप में विशेष मदद या प्रोत्साहन की आवश्यकता है, उन्हें वह समयानुसार प्राप्त होता रहे. ‘सामाजिकन्याय’ चूंकि राज्य की सदेच्छा का सुफल है, इसलिए यदि पूर्ण समानता संभव न हो तो समरसता से ही संतोष कर लिया जाता है. ताकि सामाजिक विक्षोभों में कमी आए और राज्य की ऊर्जा प्रतिक्रियात्मक कार्यों के बजाय राज्य के निर्माण में काम आने लगे. साम्यवाद का लक्ष्य पूर्ण समानता है. जिसमें किसी भी प्रकार की ऊंचनीच, वर्गीकरण आदि के लिए कोई जगह न हो. भारतीय समाज में जाति सामाजिक विषमता, अन्याय, वर्गभेद और उत्पीड़न का मुख्य कारण रही है. इसलिए यहां धर्म, जाति, वर्ण जैसी विभेदकारी संस्थाओं का उन्मूलन सामाजिक न्याय के कार्यकर्ताओं और विचारकों की प्रमुख मांग रही है.

किसी राज्य को साम्यवाद की ओर ले जाना आसान नहीं है. यह कई चरणों में संपन्न होने वाली प्रक्रिया है. मार्क्स इसके दो प्रमुख चरणों का उल्लेख करता है. उसके अनुसार केवल सत्ताकेंद्रों पर सर्वहारा के अधिकार से क्रांति का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता. उसकी अगली चुनौती यानी दूसरा चरण वर्गहीन समाज की स्थापना करना है. उसमें समस्त अंतर्भेदों का शमन हो जाता है. उन स्थितियां का लोप हो जाता है, जो असमानता और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं. यह बड़ा लक्ष्य है. आदर्श को एकदम छूता हुआ. मार्क्स मानता है कि वर्गहीन समाज की स्थापना शीर्षस्थ वर्ग का सपना नहीं हो सकता. जो सुख, सुविधाएं और विशेषाधिकार उसे वर्तमान व्यवस्था में आसानी से प्राप्त हैंउन्हें वह आसानी से छोड़ने के लिए भला क्यों तैयार होगा? यथास्थिति बनाए रखने के लिए उसे जो भी कदम उन्हें उठाना पड़े, उससे वह पीछे नहीं रहता. आमूल परिवर्तन का सपना केवल सर्वहारा देख सकता है. इसलिए क्रांति की सफलता और संचालन उसी पर निर्भर करता है.

साम्यवाद जिस वर्ग का सपना या संकल्प हो सकता है, उसका बड़ा हिस्सा, भीषण गरीबी, अशिक्षा और अनेकानेक रूढ़ियों से ग्रस्त रहा है. भारत के संदर्भ में जाति भी बाधा है. हजारों वर्षों की पराधीनता, शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहने के कारण, अपने लिए स्वयं निर्णय लेने की आदत करीबकरीब छूट चुकी है. दूसरी ओर विपुल संसाधनों, ज्ञानविज्ञान तथा सभी प्रकार की शक्तियों से लैस अल्पसंख्यक अभिजन समुदाय हमेशा आत्मविश्वास से भरा रहता है. वह बदलाव के लिए उतनी ही छूट देने को तैयार होता है, जिससे उसके स्वार्थ को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे. व्यवस्था में आमूल परिवर्तन न तो उनका सपना होता है, न ही संकल्प. आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब लोगों में वर्गीय चेतना जागृत हो. वे शोषण के कारणों को समझें तथा समान हितों के लिए संगठित हों. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ का समापन वाक्य, जिसमें मार्क्स बदलाव की जरूरत पर अतिरिक्त बल देता है, क्रांति की आवश्यकता तथा आकादमिक ज्ञान की सीमाओं को ही रेखांकित करता है. इससे मार्क्स तथा उसके पूर्ववर्ती चिंतकों, जिनमें उदार कैथोलिक विचारक भी शामिल हैं, का अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स का केवल कथनी और करनी के अंतर को पाटने तक सीमित नहीं रहता, लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है. कथनी और करनी की समानता को लेकर गांधी का उल्लेख प्रासंगिक है. बताया जाता कि उनकी कथनी और करनी में समानता थी. लेकिन उनकी कथनी, करनी सामान्य राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित थी. ग्राम को स्वतंत्र आर्थिक इकाई के रूप में प्रचारित करते हुए वे भूल जाते हैं कि अपनी समाजार्थिक संरचना में भारतीय गांव सामंतवाद और जातिवाद के गढ़ रहे हैं. सामाजिक न्याय की गांधीवादी परिकल्पना उच्चस्थ जातियों द्वारा निचली जातियों के प्रति सामान्य सदाचार से अधिक कुछ न थी. यानी कुल मिलाकर उसमें ‘सामाजिक न्याय’ जैसा कुछ था ही नहीं. जाति और धर्म को लेकर सामान्य उदारता गांधी से पहले के विचारक भी प्रकट कर चुके थे. गांधी लगभग उसी को दोहराते हैं. ‘हिंदस्वराज’ में उनका आधुनिकताविरोधी रवैया मशीनीकरण से विलगाव के रूप में सामने आता है. गांधी लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातन्त्र्य के क्षेत्र में हो रहे बदलावों से निस्पृह थे, जबकि मार्क्स का एकएक शब्द आवाह्नकारी है.

यहां से साम्यवाद जिसे मार्क्स के प्रति सम्मानभाव दिखाने के लिए सामान्यतः ‘मार्क्सवाद’ भी कहा जाता है, का अन्य विचारधाराओं से अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स के पूर्ववर्ती विचारक सभ्यता के आधुनिक मूल्यों की प्राप्ति के लिए राज्य से उदार आचरण की उम्मीद करते थे. किसी न किसी रूप में वे राज्य की अधिसत्ता को स्वीकारते थे. उनका विश्वास था कि राज्य के अभाव में समाज का ऐच्छिक विकास संभव ही नहीं है. बदलाव संबंधी उनकी उम्मीदें राज्य के उदार एवं जिम्मेदाराना आचरण पर टिकी थीं. मार्क्स सत्ता एवं शक्ति के केंद्रीकरण के दुष्परिणामों को समझता था. उसके अनुसार सत्ता हाथ में आने के बाद सर्वहारा संगठनों को चाहिए कि वे ऐसे प्रयास करें, जिससे वर्गसंघर्ष की स्थितियां दुबारा उत्पन्न न हों. पर यह काम आसान नहीं है. इसलिए कि लगातार वर्गभेद के बीच रहने के कारण उत्पीड़क वर्ग उसी के अनुसार जीने का अभ्यस्त हो जाता है. चूंकि शीर्षस्थ वर्ग उससे दूर होता है. इतना दूर कि उसके करीब पहुंचना तो दूर, ऐसा सोचना भी उसके लिए सपने जैसा होता है. उसका संपर्क उन्हीं हालात में जी रहे, अपने जैसे आसपास के लोगों से रहता है. इसलिए वह अपने हालात की तुलना बजाय शिखरस्थ अभिजन के, अपने ही जैसे लोगों के साथ करने लगता है. शीर्षस्थ अभिजन के सुखसाधन तथा वैभवविलास उसे मिथकीय आभास देने लगते हैं. समयसमय पर उनका प्रयोग वह अपनी कुंठाओं के शमन हेतु करता है. जीवन की लगातार बढ़ती चुनौतियां उसे बहुत बड़े सपने देखने की अनुमति नहीं देतीं. सपनों के अभाव में वह अपने कष्टों की तुलना आसपास के लोगों से करता है, जब सैकड़ोंहजारों लोगों को अपने जैसे हालात में जीते हुए देखता है, तब वह उन्हें जीवन की स्वाभाविक अवस्था मानने लगता है. यह अनुभूति उसे समझौतावादी बनाती है. यदि वह स्पर्धा के लिए आगे आता तो अपने ही जैसे लोगों के साथ. उस समय अपने ही जैसे लोगों साथ वह वही आचरण करता है; जैसा वह भोगता हुआ आया है. इस तरह परिवर्तन का उसका सपना स्वयं को उत्पीड़क की स्थिति में लाने तक सिमट जाता है. ऐसे में यदि वर्गक्रांति सफल हो जाए तब भी वास्तविक परिवर्तन अलभ्य बना रहता है.

  अगले खंड में समाप्य…..

ओमप्रकाश कश्यप

इतिहास में घालमेल के बहाने

सामान्य
इतिहास केवल विजेता का होता है. दो संस्कृतियों के द्वंद्व में पराजित संस्कृति को मिटने के लिए बाध्य किया जाता है. विजेता इतिहास की पुस्तकों को इस प्रकार लिखता है जिसमें उसका गुणगान हो, और विजित को अपमानित किया गया हो. जैसा कि नेपोलियन ने एक बार कहा था, ‘इतिहास क्या है, महज एक दंतकथा, जिससे सब सहमत हों —डॉन ब्राउन.

 

इतिहास दीर्घकालीन राजनीति है. ऐतिहासिक घटनाएं प्रायः द्वंद्वात्मकता में घटती हैं. सत्ता उनकी दशा-दिशा तय करती है. हर नया विजेता सत्तासीन होते ही अपनी कीर्ति-कथा गढ़ने में जुट जाता है. इसके लिए वह क्रीत बुद्धिजीवियों की मदद लेता है. कला और संस्कृति के माध्यमों का इस्तेमाल करता है. खरीदे हुए बुद्धिजीवी स्थितियों की व्याख्या अपने तथा अपने आश्रयदाता के स्वार्थानुसार करने लगते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास से छेड़छाड़ भी करते हैं. उसका एकमात्र उद्देश्य होता है, विजित के दिलोदिमाग पर कब्जा कर लेना. भरोसा दिलाना कि उनकी भलाई आश्रित बने रहने में है. दरअसल बड़े से बड़ा शिखर-पुरुष अपने प्रतिद्विंद्वी से इतना नहीं डरता जितना वह जन-विद्रोह की संभावना से घबराता है. विद्रोह की न्यूनतम संभावना हेतु वह जनता का हर समय बेहद करीबी, भरोसेमंद तथा परम-हितैषी दिखना चाहता है. वाल्तेयर ने इतिहास को ‘सर्वमान्य झूठ का सिलसिला’ कहा है. इससे इतर जार्ज आरवेल की टिप्पणी इतिहास की महत्ता को रेखांकित करती है—

‘किसी समाज को नष्ट करने का सबसे कारगार तरीका है, उसके इतिहासबोध को दूषित और खारिज कर दिया जाए.’

जिस इतिहास की बात आरवेल करते हैं, उसे घटनाओं तथा उन्हें जन्म देने वाली स्थितियों का प्रामाणिक दस्तावेज होना चाहिए. इस कसौटी पर भारत के इतिहास को कैसे देखा जाए? इतिहास के नाम पर हमें जो पढ़ाया जा रहा है, क्या वह प्रामाणिक है? जो लोग निहित स्वार्थ हेतु ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलबाड़ कर रहे हैं, उनसे कैसे निपटा जाए? ऐसे कई प्रश्न हैं, जिनपर विचार करना आज की परिस्थितियों में आवश्यक हो जाता है. वैसे इतिहास से खिलबाड़ की समस्या आज की नहीं है. सहस्राब्दियों से यही होता आया है. आर्य यहां 1500 ईस्वी पूर्व में आए. उस समय सिंधु सभ्यता(3300 ईस्वी पूर्व—1750 ईस्वी पूर्व) पराभव की ओर अग्रसर थी. वे चाहते तो मरणासन्न सभ्यता को सहेजने की कोशिश कर सकते थे. पर इस बारे में उन्होंने सोचा तक नहीं. उल्टे प्राकृतिक आपदा के शिकार दुर्ग और दुर्गवासियों पर आक्रमण कर अपनी वीरता दिखाते रहे. सहेजने से ज्यादा जोर उन्होंने मिटाने पर दिया. विलासी और विध्वंसक प्रवृत्ति के इंद्र को राजा माना. अनार्य जो समृद्ध सभ्यता के उत्तराधिकारी रह चुके थे, उन्हें असुर, असभ्य, क्षुद्र आदि कहकर अपमानित करते रहे. खुद घुमक्क्ड़ थे. उपलब्धि के नाम पर उनके पास कुछ था नहीं. जिनके पास था, उनका उल्लेख करके अपनी हेटी नहीं करना चाहते थे. झूठे आर्य(श्रेष्ठ)त्व की रक्षा हेतु उन्होंने मिथकों और कपोल-कल्पनाओं से भरे वेद-पुरान रचे. ऐसे ग्रंथ जिनमें सच खोजने चलो तो सबसे शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी भी नाकाम हो जाए. उनका ध्येय था, जैसे भी हो ब्राह्मणवाद का महिमामंडन करना. ब्राह्मण को सबसे ऊपर, अनुपम और परम-प्रज्ञाशील दिखाना.

मध्यकाल में इतिहास-लेखन की दृष्टि से कुछ जागरूकता आती है. उस दौर की रचनाओं में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का बखान है. कुछ तारीखें, घटनाएं तथा तथ्यों का उल्टा-सीधा विवरण है. मगर विरासत में मिले संस्कारों की वजह से इतिहासबोध गायब रहता है. उस समय के कवि-लेखक अपने आश्रयदाता की कीर्ति-कथा गढ़ने, उसे दूसरों से श्रेष्ठतर दिखाने को लालायित दिखते हैं. उसके लिए सत्य को मनचाहे ढंग से तोड़ते-मरोड़ते हैं. चारण, भाट, विदूषक कहलाकर भी गर्व का अनुभव करते हैं. उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक हालात ज्यों की त्यों बने रहते हैं. इसी दौर में पश्चिम में बौद्धिक क्रांति हुई. भारतीय संस्कृति की ओर योरोपीय विद्वानों का आकर्षण बढ़ने लगा. उनकी देखा-देखी भारतीयों में भी इतिहास चेतना उभरने लगी. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का असर भी उसपर पड़ा. उस संघर्ष में समाज के सभी वर्ग सहभागी थे. धर्मनिरपेक्षता अधिकांश के लिए सामाजिक मूल्य बन चुकी थी. ऐसे में जो इतिहास-दृष्टि विकसित हुई, उसका स्वरूप समन्वयवादी था.

भारतीय इतिहासकारों को मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जा सकता है—पहले वर्ग में वे इतिहासकार हैं जिनके लिए भारतीयता का मतलब हिंदू या ‘हिंदुत्व’ है. अतीतमोह उनकी कमजोरी होता है. मानते हैं कि साहित्य तथा अन्य कला-माध्यमों की सार्थकता विलुप्त भारतीयता की खोज में है. उनके लिए संस्कृति और इतिहास में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों में से चयन करना हो तो वे संस्कृति का पक्ष लेते हैं. इस नासमझी के कारण लाखों सैनिकों की बलि लेने वाला, छल-प्रपंच से भरा ‘महाभारत’ ‘धर्मयुद्ध’ घोषित कर दिया जाता है. दूसरा वर्ग आधुनिकता समर्थक लेखकों-इतिहासकारों का है. ऐसे इतिहासकार अतीत के नाम पर भविष्य कुर्बान नहीं करते. वे अतीत को सहेजते हैं ताकि भविष्य संवारा जा सकें. गंगा-जमुनी संस्कृति के समर्थक के तौर पर वे मानते हैं कि भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाने के लिए सभी वर्गों को साथ लेकर चलना आवश्यक है. आजादी के बाद से कमोबेश यही दृष्टि प्रभावी रही है. हालांकि संघीय विचारधारा के इतिहासविद् अपने लंगड़े इतिहासबोध द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर बीच-बीच में सांप्रदायिक प्रदूषण फैलाने की साजिश रचते आए हैं. कुछ ऐसा ही केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद शुरू हुआ है. 2014 में वह विकास के वायदे के साथ सत्ता में आई थी. मगर आने के साथ ही उसने दिखा दिया था कि उसकी असल मंशा कुछ और ही है. सरकार बनने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान की आधुनिक संस्थाएं उसके सीधे निशाने पर आ गईं. कला-संस्कृति के प्रमुख केंद्रों पर संघीय मानसिकता के लोगों को बिठाया जाने लगा. सरकार का सबसे पहला और विवादित कदम ‘भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद’ के अध्यक्ष की नियुक्ति थी. उसके लिए वाई. सुदर्शन राव को चुना गया था. पद-संबंधी सुदर्शन राव की योग्यता पर प्रख्यात इतिहासविद् रोमिला थापर की टिप्पणी थी—‘इतिहास के क्षेत्र में सुदर्शन राव का, मानक-रहित पत्रिकाओं में हिंदू धर्म के मिथकीय पात्रों पर लेख लिखने से बड़ा और कौन-सा योगदान है.’ दूसरे सचेत बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों ने भी सरकार के उस कदम की आलोचना की थी, किंतु सरकार अड़ी रही.

सुदर्शन राव रामायण और महाभारत के कथ्यों की ऐतिहासिकता को स्वीकारते हैं. उनका यह सोच भाजपा के पितृ संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ से मेल खाता है. आधुनिकता की कसौटी पर जाति प्रथा कलंक साबित हुई है. फिर भी संघ उसे किसी न किसी रूप में सहेजे रखना चाहता है. जाति-पृथा का महिमामंडन करते हुए अपने आलेख ‘भारतीय जातिपृथा: एक पुनर्मूल्यांकन’ में सुदर्शन राव लिखते हैं—‘अतीत में जातिप्रथा भली-भांति काम करती आई है. बीते जमाने में उसे लेकर कोई शिकायत प्राप्त नहीं होती. प्रायः उसे गलत ढंग से पेश किया जाता है. आरोप लगाया जाता है कि वह शासक वर्ग के समाजार्थिक स्वार्थों को कायम रखने के लिए गढ़ी गई थी. असल में वह धर्मशास्त्रों द्वारा समर्थित, सभ्यताकरण की अनिवार्यता है. सुदर्शन राव की ‘योग्यता’ के वास्तविक आकलन हेतु उचित होगा कि जाति-संबंधी उनके विचारों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गुरु गोलवरकर के जाति-संबंधित विचारों के समानांतर रखकर पढ़ लिया जाए.

2007 में ‘कर्मयोग’ शीर्षक से लिखी गई पुस्तक में मोदी जी ने मैला उठाने के काम को ‘वाल्मीकियों के लिए आध्यात्मिक अनुभव’ बताया था. वह जाति-व्यवस्था के महिमामंडन जैसा था, जिसका गुणगान संघ और उसके समर्थक करते ही रहते हैं. शब्दों के किंचित ऐर-फेर के साथ यही विचार गोलवरकर की पुस्तक ‘बंच आफ थाट्स’(भाग-दो, अध्याय दस) में भी देखे जा सकते हैं—‘जातिप्रथा प्राचीनकाल में भी मौजूद थी. यह हमारे राष्ट्रीय जीवन में हजारों वर्षों से निरंतर उपस्थित है….यह लोगों में संगठन तथा बंधुत्व की भावना पैदा करती है.’ भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखने में जाति-प्रथा का योगदान किसी से छिपा नहीं है. मगर गोलवरकर के विचार अलग हैं. उनका मानना है कि जाति-प्रथा थी, इसीलिए यह देश विदेशियों का कम गुलाम रहा. वरना दासता और लंबी खिंच सकती थी. गोलवरकर संभवतः अकेले विचारक हैं जो 800 वर्षों के दासताकाल को भी कम मानते हैं. बहरहाल, ऐसे समय में जब अधिकांश बुद्धिजीवी जाति प्रथा की आलोचना करते हों, सुदर्शन राव जैसे बुद्धिजीवी उसे अकादमिक संदर्भ देते रहते हैं. उन्हें पारितोषिक मिलना ही था.

राव अकेले उदाहरण नहीं हैं. ज्ञान-विज्ञान और कला संस्थाओं के शिखर पदों पर खास विचारधारा के लोगों को नियुक्त कर सरकार ने दिखा दिया था कि तर्क और आलोचनाएं उसे तयशुदा दिशा में काम करने से रोक नहीं सकतीं. केंद्र सरकार तथा भाजपा शासित राज्यों की सरकारों अगली वरीयता है, पाठ्य-पुस्तकों में बदलाव करना. महाराष्ट्र सरकार ने फैसला किया है कि विद्यार्थियों को शिवाजी के बारे में और अधिक पढ़ाया जाना चाहिए. बदले में कुछ मुगल शासकों को पाठ्यपुस्तकों से गायब कर दिया गया. राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में मुगल स्थापत्यकला को दर्शाती, ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक इमारतें हैं. उनमें कुतुबमीनार जैसी विश्वविख्यात निमिर्ति भी शामिल है. बदली नीति के तहत पाठ्यपुस्तकों से रजिया सुल्तान तथा मुहम्मद बिन तुगलक जैसे शासकों से संबंधित पाठ को हटा दिया गया है. जब महाराष्ट्र कर रहा है तो मध्यप्रदेश और राजस्थान क्यों पीछे रहते. करीब तीन वर्ष पहले राजस्थान के तीसरे स्तर के इतिहासकार ने फतवा जारी किया था कि अकबर की सेना के साथ हुए युद्ध में राणा प्रताप विजयी हुए थे. उन्हें पराजित दिखाना वामपंथी इतिहासकारों की चाल है. राज्य के शिक्षामंत्री वासुदेव देवनानी को मानो बैठे-बैठाए एक मुद्दा मिल गया. उन्होंने यह कहकर, ‘अकबर या प्रताप में से एक ही महान हो सकता है. हमारे लिए महान महाराणा प्रताप हैं’—इतिहास को अपने हिसाब से मोड़ने का निर्णय ले लिया है. पाठ्यक्रम में बदलाव से पहले सरकार मामले को ‘हिस्ट्री बोर्ड आफ स्टीज’ के पास भेजकर खानापूर्ति कर लेना चाहती है. मामला केवल निचली कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा. ‘फर्स्ट पोस्ट’ की एक रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान विश्वविद्यालय ने इतिहास की पुस्तकों में चंद्रशेखर शर्मा का एक लेख ‘राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप’ शामिल किया गया है. संघ के विचारक दीनानाथ बत्रा की पुस्तकों को उच्च अध्ययन के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में मान्यता देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

इतिहास के फेरबदल का मामला केवल पाठ्यपुस्तकों सीमित नहीं है. दूरदर्शन और फिल्में भी उसका निशाना बनती आई हैं. हालिया उदाहरण सुभाष घई की फिल्म है, जिसे वे फिल्म की नायिका ‘पदमावती’ के नाम से रिलीज करना चाहते थे. मगर फिल्म को देखे बिना ही करणी सेना बिदक गई. फिल्म में पदमावती को अलाउद्दीन खिलजी के आगे नाचते हुए दिखाना उसके नेताओं को राजपूती आन-बान-शान के विरुद्ध लगा. वे दल-बल सहित आंदोलन पर उतर आए. देखते ही देखते सिनेमाघर, बसें, गाड़ियां फूंक दी गईं. रेल को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी की गई. ‘पदमावत’ में जायसी ने नायिका को काल्पनिक माना है. निर्माताओं ने पदमावती को काल्पनिक चरित्र दर्शाना चाहा, पर उन्हें संतोष न हुआ. आंदोलन राजस्थान की सीमाएं पार कर दूसरे राज्यों तक फैलता गया. पुलिस, प्रशासन, सरकार और विपक्ष मौन तमाशबीन बने रहे. फिल्म का नाम ‘पदमावत’ करने और कुछ दृश्यों के संपादन के बाद समझौता हुआ. अचानक माहौल शांत हो गया. करणी सेना उसे लेकर देश-भर में उत्पात मचाए थी, एकाएक फिल्म के समर्थन में आ गई. सिर्फ इसलिए नहीं कि उसमें अंबानी का पैसा लगा है, बल्कि इसलिए भी कि सती-प्रथा पर सवाल उठाने तथा स्त्री-विरोधी सिद्ध करने के बजाय, फिल्म परोक्षतः उसका महिमा-मंडन करती है. जिसे कुछ लोग आज भी राजपूती शान से जोड़कर देखते हैं.

दूरदर्शन धारावाहिक भी इतिहास के साथ छेड़छाड़ का माध्यम बनते आए हैं. पहले यह काम मुख्यतः मनोरंजन के वास्ते, कभी-कभी कथानक में नाटकीयता पैदा करने के लिए किया जाता था. इन दिनों उनका इस्तेमाल हिंदुत्व के औजार के रूप में किया जा रहा है, इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों को मन मुताबिक बदला जा रहा है. उदाहरण के लिए धारावाहिक ‘सोमनाथ’ पर चर्चा कर सकते हैं. राष्ट्रीयता की प्रचलित अवधारणा पश्चिम से आयातित है. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता की भावना ने लोगों को परस्पर जोड़ा था. संस्कृत ग्रंथों में भी ‘राष्ट्र’ का उल्लेख है, परंतु उसका संदर्भ एकदम अलग है. ‘सोमनाथ’ में राष्ट्रीयता की प्राचीन अवधारणा को, आधुनिक संदर्भ में, सांप्रदायिक उन्माद के साथ प्रस्तुत किया गया है.

लगता है, स्वाधीनता संग्राम में किसी प्रकार का योगदान न होने की कमी को भाजपा और संघ इतिहास की मनमानी व्याख्या द्वारा पाट देना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद उनके हौसले और भी बुलंद हैं. इतिहास में दखलंदाजी का खेल मूर्ति-स्थापना के बहाने भी खेला जा रहा है. महाराष्ट्र में शिवाजी और गुजरात में पटेल की मूर्ति विराट मूर्तियां लगवाने का फैसला लिया जा चुका है. एक कम चर्चित मगर महत्त्वपूर्ण मामला लखनऊ से है. वहां मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने आंबेडकर पार्क में राजा सुहेलदेव(995-1060 ईस्वी) की प्रतिमा लगाने की मांग की थी. जिसे राजनीतिक कारणों से तत्काल मान लिया गया था. इतिहास में सुहेलदेव का वर्णन नहीं है. पर्शियन लेखक अब्दुर्र रहमान चिश्ती सतरहवीं शताब्दी में किस्सागोई से भरपूर कृति ‘मिरात-ए-मसूदी’ में उसकी चर्चा करते हैं. सालार मसूद गजनी के सुलतान का भतीजा था. उसको प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का दोषी माना जाता है. गुजरात से दिल्ली, मेरठ होता हुआ वह बहराइच की ओर रहा था कि सुहेलदेव ने उसे चुनौती थी. राजा सुहेलदेव ने पड़ोसी राजाओं के साथ मिलकर संगठित सेना तैयार की. एक महीने तक चली लड़ाई में दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ. अंततः सालार मसूद युद्ध में घायल हुआ और वहीं चल बसा. उसका मजार बहराइच में है. जहां उसे ‘गाजी मसूद’ नाम से जाना जाता है. ‘मीराते मसूदी’ में सुहेलदेव को भर-थरू जाति से माना जाता है, जो राजपूतों की उपजाति है. लेकिन 1980 के आसपास सुहेलदेव को पासी राजा कहा जाने लगा. वहीं राजभर समुदाय भी सुहेलदेव के नाम पर एकजुट होने लगा. कहानी में सांप्रदायिक रंग घोलते हुए सुहेलदेव को ‘गौ-रक्षक’ बताया गया. हिंदुत्ववादी सालार मसूद को सोमनाथ के सूर्यमंदिर की मूर्ति को ध्वस्त करने का दोषी मानते हैं. जबकि मुस्लिम संप्रदायवादी उसे गाजी और शहीद का दर्जा देते है. इनमें कौन-सा पक्ष सही है, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार यह बता पाना संभव नहीं है. बीच संघ सालार मसूद की मजार पर भी अपना दावा ठोक चुका है. उसके अनुसार जहां मजार है, वह कभी ऋषि बालकराम का आश्रम था. फिरोज तुगलक ने आश्रम के स्थान पर मंदिर बनवा लिया है. इतने सारे विवादों में सुहेलदेव के प्रामाणिक इतिहास को गुम होना था, सो हो चुका है.

चलते-चलते सामान्य-सी जिज्ञासा. आखिर वे इतिहास में अतिक्रमण करना क्यों चाहते हैं? इतिहास की पुस्तकों में उल्टा-सीधा कुछ भी जोड़ देने से वर्तमान तो बदल नहीं जाएगा? इसके लिए हमें संस्कृति-निर्माण में इतिहास की भूमिका को समझना पड़ेगा. राजनीतिक दासता ज्यादा से ज्यादा कुछ दशक या पचास-सौ वर्षों की हो सकती है. परंतु सांस्कृतिक दासता सैकड़ों, हजारों वर्षों तक खिंचती जाती है. उससे उबरना आसान नहीं होता. जैसे भारत में ब्राह्मणवाद. वे इतिहास पर कब्जा करना चाहते हैं. ताकि संस्कृति को काबू में रख सकें. इसलिए वाल्तेयर भले ही इतिहास को झूठ कहे, पर उसकी महत्ता है. इतिहास हर हाल में लिखा जाना चाहिए. जार्ज आरवेल के शब्दों में—‘जो इतिहास को नियंत्रण में रखता है, वह भविष्य को नियंत्रण में रखता है. जो वर्तमान को नियंत्रण में रखता है, वही इतिहास को नियंत्रण में रख सकता है.’ आज जो लोग सत्ता मैं हैं, वे इतिहास की उलटगामी को भली-भांति समझते हैं. इसलिए जब वे सत्ता-बाहर हों, तब भी झूठ-पुराण गढ़ते रहते हैं.

स्थितियां एक बार फिर उनके नियंत्रण में है. सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए वे इतिहास बदलने पर उतारू हैं. वे हमारे इस भ्रम को बनाए रखना चाहते हैं कि शासक होना उनका जन्मजात गुण है. एलफिंस्टिन का कथन कि ‘भारत का इतिहास सिकंदर के आक्रमण के बाद से आरंभ होता है और यही वह समय है जब भारत विदेशियों के संपर्क में आता है.’ उनके लिए अर्थहीन है. उन्हें झूठ का पहाड़ खडा करने में महारत हासिल है. मिथकों और गल्प-आख्यानों के माध्यम से वे काल्पनिक इतिहास को सिकंदर के आक्रमण से भी हजारों वर्ष पीछे तक ले जाते हैं. चूंकि उस समय उनकी उपलब्धियां नगण्य थीं, इसलिए हमारे मन-मस्तिष्क पर छाये रहने के लिए पुराणों और महाकाव्यों के माध्यम से पूरा मिथकीय भंडार हमारे आगे परोस देते हैं. फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे दोहराते चले जाते हैं. उस समय तक जब तक कि उनका गढ़ा गल्पशास्त्र हमें इतिहास जैसा दिखने न लगे. हम जानते हैं कि सिंधुवासियों को लिपि का बोध था. लेकिन उस दौर का ब्राह्मणों के लिखे के अलावा हमारे पास दूसरा कोई वाङ्मय नहीं है. कल्पना कीजिए आज से 3000-3500 वर्ष पहले, उस समय के आर्यों के चाल-चलन को देखते हुए, ऋग्वेद के उन गीतों को सुनकर जिनमें इंद्र से पुरों को ध्वस्त करने की प्रार्थना बार-बार की गई है, सिंधु-सभ्यता के तत्कालीन उत्तराधिकारियों की प्रतिक्रिया कैसी रही होगी. हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. आक्रामक आर्यों को लेकर वे शब्द कदाचित यही रहे होंगे—‘घोर आत्ममुग्ध, उज्जड़, और अहंकारी.’

लेकिन जो इतिहास हमें पढ़ाया गया है, अथवा जैसा इतिहास पढ़ाने के लिए वे जी-जान से जुटे हैं, वर्तमान परिस्थितियों में अपनी ओर से क्या हम इस तरह की प्रतिक्रिया की कल्पना कर सकते हैं?

ओमप्रकाश कश्यप

शरद यादव और वैकल्पिक राजनीति की चुनौतियां

सामान्य
सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ असल में मिथ है. उसका वास्तविक प्रतीति यदि समाज में ही नहीं है, तब वह राजनीतिक दलों की एकता का आधार भला कैसे बन सकती है? क्या भारत जैसे विविधताओं वाले बड़े समाज को ‘सांझी संस्कृति’ के कोरे मिथ के सहारे एक किया जा सकता है? क्या केवल मिथ के भरोसे परिवर्तन की निर्णायक लड़ाई संभव है? इन सबसे महत्त्वपूर्ण एक प्रश्न यह है कि जो दल या नेता सांझी संस्कृति को बचाने के नाम पर एकजुट होना चाहते हैं, क्या उनका अपना जीवन या राजनीति सांझी संस्कृति की भावना पर खरी उतरती है?

रद यादव सांझी विरासत बचाने के लिए प्रयत्नरत हैं. वे जगहजगह सभाएं कर रहे हैं. वरिष्ठ नेता होने के साथसाथ उनकी प्रतिबद्धताएं भी स्पष्ट हैं. संसद में बोलते समय वे अपने सरोकारों के साथ ईमानदार नजर आते थे. पिछले महीने उन्होंने पटना में एक सम्मेलन में हिस्सा लिया था. 27 अगस्त 2017 को लालू यादव द्वारा बुलाई गई रैली में वे उनके साथ, गले मिलते नजर आए. घनी बारिष तथा राज्य के 18 से अधिक जिले बाढ़ग्रस्त होने के बावजूद जितने लोग उत्साह और उम्मीद के साथ गांधी मैदान पहुंचे, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि जनता भय और सांपद्रायिकता की राजनीति से तंग आ चुकी है. सार्थक विकल्प की तलाश करीबकरीब सभी को है. शरद यादव की अब तक की प्रतिबद्धताएं उनसे थोड़ी उम्मीद जगाती हैं. परंतु रास्ता क्या इतना ही आसान है? जिस तरह की राजनीति का आजकल चलन है, बाजार ने जिस तरह लोगों के दिलोदिमाग को कब्जाया हुआ है, ऐसे में क्या मूल्यों और प्रतिबद्धता की सफल राजनीति संभव है? जो लोग शरद यादव को सुनने, उनके सम्मेलनों में उमड़ रहे हैं, क्या वे चुनाव के दिन भी उनके साथ खड़े होकर ‘सांझी विरासत’ बचाने के लिए सहभागी बनेंगे? और भारत में जहां व्यक्ति की पहचान उसके धर्म और जाति से की जाती है, वहां लोग क्या ‘सांझी विरासत’ को समझते हैं. यदि यह केवल आकादमिक अवधारणा है तो उसे लोकअवधारणा बनाने के लिए शरद यादव और उनके सहयोगियों की क्या कोई योजना है? ये प्रश्न प्रासंगिक हैं. इन्हीं में शरद यादव तथा परिवर्तन की राजनीति का सपना देखने वाले किसी भी नेता की मुश्किलें और चुनौतियां भी छिपी हैं.

आजादी के आसपास मूल्यविहीन राजनीति की कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था. देश पूंजीवाद के चंगुल से बाहर था. स्कूलों में गर्व से पढ़ाया जाता था कि भारत कृषिप्रधान देश है. पूंजीपति राजनीति के पिछलग्गू थे. मनमाफिक नीति बनवाने के लिए उन्हें नेताओं और अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ते थे. उत्पादन में प्रत्यक्ष श्रम की उपयोगिता थी, इसलिए श्रमिकों के साथ बेहतर संबंध रखना उद्योगपतियों की मजबूरी थी. इसके बावजूद बड़े से बड़े नेता में यह साहस नहीं था कि पूंजीपति के साथ गले मिलते हुए फोटो खिंचवा सके. अस्सी के बाद हालात बदले. राजनीतिक मूल्यों का त्वरित क्षरण होने लगा. स्वाधीनता संग्राम ने कुछ नेताओ को महानायकत्व प्रदान किया था. उसके दबाव में तत्कालीन नेता अपनी छवि, जिसे गढ़ने में उनके परिश्रम एवं त्याग के अतिरिक्त परिस्थितियों का भी योगदान था—से बाहर आने का साहस कम ही जुटा पाते थे. बाद में आई पीढ़ी पर ऐसा कोई दबाव न था. इसलिए जनता, जो पुराने नेताओं के साथ खुशीखुशी और उत्साहपूर्वक जुड़ी थी, को अपनी ओर आकर्पित करने तथा उसका विश्वास जीतने के लिए उन्हें अतिरिक्त प्रयत्न करने पड़ते थे. उत्पादन प्रौद्योगिकी में भी बदलाव आया था. जटिल प्रौद्योगिकी विशेषज्ञता की मांग करती थी. तीव्र मशीनीकरण से मालिक और मजदूर का सीधा संपर्क टूटने लगा था. पूंजीपति का लालच उत्तरोत्तर बढ़ रहा था. संचारक्रांति की मदद लेकर पूंजीपतियों ने लोकसंचार के जितने भी साधन थे, धीरेधीरे सब कब्जा लिए. उनके माध्यम से वह जनता के दिलोदिमाग को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढालने में लगा था. पहले मतदाता के मानसनिर्माण का काम नेता करता था. इसके लिए उसे जनता के बीच जाना ही पड़ता था. पूंजीपतियों ने मीडिया का उपयोग पहले लोगों के उपभोक्ताकरण के लिए किया. समाज में उपभोग की संस्कृति विकसित हुई. परिणामस्वरूप व्यक्ति और विचारधारा के बीच जो अंतरंग संबंध था, जो व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाकर, उसके प्रति समाज के विश्वास को सुदृढ़ करता था, जिसके बल पर आंबेडकर, गांधी, नेहरू, लोहिया, पटेल जैसे नेताओं को जनता का प्यार, दुलार और समर्थन प्राप्त होता आया था—वह कमजोर पड़ने लगा था. हालांकि इस दौर में भी जयप्रकाश नारायण, विश्वनाथ प्रताप सिंह, कर्पूरी ठाकुर जैसे प्रभावशाली नेता आए. परंतु उनका प्रभामंडल ऐसा न था कि राजनीति पर पूंजी की निरंतर सुदृढ़ होती पकड़ को कमजोर कर सकें. इसका कारण भी था. उस समय के बड़े उद्योगपति जो दूर की नजर रखते थे, जिन्हें अंदाज था कि भारत में अंग्रेजी राज के दिन गिनेचुने हैं, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान बड़ेबड़े नेताओं, जिनमें गांधी भी थे—से करीबी रिश्ता बनाने में कामयाब रहे थे. उनके लिए यह भी एक प्रकार का निवेश था. आजाद भारत में उन्हें संबंधों का लाभ उठाना आरंभ कर दिया. आजादी के तुरंत बाद पूंजीपतियों के बीच संसाधनों पर कब्जा करने की होड़ शुरू हो चुकी थी. नेतागण कहीं उनके साझीदार बने, कहीं सहयोगी और कहीं हितसंरक्षक. एकदूसरे के साथ स्पर्धा करते हुए पूंजीपतियों ने बड़ेबड़े सरकारी कांट्रेक्ट हासिल किए. कलकारखानां के नाम पर ओनेपोने भाव जमीन खरीदी. प्राकृतिक संसाधनों को जैसे भी संभव हुआ, कब्जाया. नएनए आजाद हुए देश में जनता भी ढेर सारी उम्मीदें पाले थी. उसके लिए कुछ कार्यक्रम पंचवर्षीय योजनाओं के नाम पर चलाए गए. लेकिन भ्रष्टाचार और लचर नौकरशाही के कारण वे अपेक्षित परिणाम न दे सके. ठोस अर्थनीति, राजनीतिक दिशाहीनता और बढ़ते भ्रष्टाचार के दबाव में अधिकांश नेता मानने लगे कि बिना पूंजीपतियों के सहयोग के विकास को अपेक्षित गति दे पाना असंभव है. कुल मिलाकर पूंजीवाद के प्रति समर्पण का वातावरण देश स्वतंत्र होने के साथ ही बनने लगा था. निश्चय ही उसके पीछे पूंजीपतियों की सोचीसमझी रणनीति थी. दूसरे विश्वयुद्ध में औपनिवेशिक सरकार का साथ देने वाले, युद्ध के जरिये खूब मुनाफा कमाने वाले भारतीय उद्योगपति युद्धोपरांत ब्रिटेन की खस्ता आर्थिक स्थिति देख ‘राष्ट्रवाद’ का चोला ओढने लगे थे.

अगले चरण में मीडियाक्रांति का लाभ उठाकर, पूंजीपतियों ने मतदाताओं के मानसनिर्माण का काम भी अपने अधीन कर लिया. पूंजीवाद का ‘अप्रत्यक्ष हाथ’ देश की राजनीति, अर्थनीति और सामाजिकसांस्कृतिक गतिविधियों को नियंत्रित करने लगा. युद्ध, आतंकवाद, भय, जातिवाद, तंत्रमंत्र, सांप्रदायिकता, धर्म तथा उसके आडंबरों जिनसे वह लोकमानस को प्रभावित करता था—सब उसके द्वारा नियंत्रित होने लगे. पूंजीवाद की अतिसक्रियता के बीच, जनमानस पर नेताओं की पकड़ ढीली पड़ने लगी. मानसनिर्माण का सारा काम मीडिया और ‘अप्रत्यक्ष हाथ’ ने संभाल लिया. विवश होकर नेता को भी पूंजीपति का शरणागत होना पड़ा. विचार की राजनीति, जिसके भरोसे आजादी की लंबी जंग लड़ी गई थी, दम तोड़ने लगी. पश्चिम की नकल पर पूंजीवाद का जादू ऐसा चला कि चाहेअनचाहे नेता भी उसका सहारा लेने लगे. सड़क, बिजली, पानी जैसे नगरपालिका स्तर के मुद्दों को आधार बनाकर प्रधानमंत्री कद के नेता चुनाव लड़ने लगे. क्या दक्षिणपंथ और क्या वामपंथ सब लोकप्रियता और तात्कालिक लाभ की राजनीति का शिकार होते गए. मीडिया की मदद से देशभक्ति का मनोभाव क्रिकेटर, गायक, अभिनेता जैसे नकली नायकों के हवाले कर दिया कर गया. आजादी से पहले भी ‘महामना’, ‘महात्मा’, ‘लोकमान्य’, ‘नेताजी’ जैसी उपाधियां बांटी जाती थीं. उन दिनों वे जनसंघर्ष में तपकर निकले नेताओं को अलंकृत करती थीं. इससे जनता में उनके प्रति विश्वसनीयता भी थी. बाजार को विज्ञापन के लिए नकली नायकों की आवश्यकता थी. इसलिए उसके इशारे पर फिल्मी अभिनेताओं, क्रिकेटरों तथा सस्ता मनोरंजन करने वाले कलाकारों को ‘सदी के महानायक’, ‘क्रिकेट का भगवान’ जैसे अलंकरण दिए जाने लगे. तात्कालिक लोकप्रियता की दिशाविहीन राजनीति का लाभ उठाकर साधुसंतों भी सत्ता की राजनीति की ओर आकर्षित हुए. उन्हें धर्म के नाम पर वाग्जाल तथा शब्दाडंबर खड़ा करने का खासा अभ्यास था, इसलिए बड़ी आसानी से वे राजनीति में स्थान बनाते चले गए. परिणामस्वरूप दूसरे और तीसरे स्तर के अभिनेता, क्रिकेटर, धंधेबाज धर्माचार्य आदि चाटुकार संसद और विधायिकाओं की शोभा बढ़ाने लगे. समाज उस रास्ते चल पड़ा जहां विघटन ही विघटन, बिखराव ही बिखराव था. उसका सबसे विकृत रूप आज हमारे सामने है.

पूंजीवाद के पीछे केवल लाभ की विचारधारा काम करती है. यही उसकी ताकत और सही मायने में उसकी कमजोरी भी है. लाभ की विचारधारा के प्रभाव में वह केवल अपना हित देखता है. उपभोक्तासंस्कृति जो और कुछ नहीं, पूंजीवाद की महत्त्वाकांक्षाओं और स्वार्थलिप्सा की उपज होती है—उसे आगे बढ़ाने में सहायक होती है. उसके दबाव में जनसंस्कृति सुविधासंस्कृति का रूप लेने लगती है. परिणामस्वरूप सब केवल अपने सुखसुविधा की चिंता करने लगते हैं. विचारधारा के अभाव में समाज लक्ष्यविहीन हो जाता है. ऐसे समाज को मर्जीमुताबिक हांकना आसान होता है. मीडिया आज यही कर रहा है. प्राचीन वाङ्मय की पड़ताल से यह भलीभांति जाना जा सकता है कि ज्ञान तथा उसकी परंपरा पर कभी किसी का विषेषाधिकार नहीं रहा. एक साधारण किसान और मजदूर भी समाज के हित में मौलिक चिंतन कर सकता है. बावजूद इसके सामाजिक ऊंचनीच को नैसर्गिक सिद्ध करने, कुछ खास वर्गों को दूसरों से सक्षम दर्षाने के लिए ज्ञान को विषिष्ट कर्म घोषित करने की परंपरा भारत में हजारों वर्षों से रही है. आधुनिक भारतीय मीडिया का संस्कार ऐसे ही लोगों ने गढ़ा है. इसलिए वह भी ज्ञान को कुछ लोगों के विषेषाधिकार के रूप में पेष करता आया है. हम किसी विचार से सहमत हों या असहमत, प्रत्येक अवस्था में वह हमारा और समाज का मार्गदर्शन करता है. यदि हम किसी विचार से असहमत हैं तो वह हमें बताता है कि विचारगत स्थितियां हमें क्यों पसंद नहीं हैं. इसी तरह विचारविशेष से सहमति उस विचार से संबंध रखने वाली स्थितियों के प्रति हमारी पसंद तथा उसके स्तर को दर्शाती है. वह लोगों को धैर्यवान बनाकर, उनकी उम्मीद बनाए रखने में मददगार बनता है. इसे दरकिनार करते हुए गत शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘विचारधारा के अंत’ का नारा खूब उछाला गया था. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान और उसके बाद के दोतीन दशकों में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव नेताओं और समाज के बुद्धिजीवी तबके पर था. कोई सोच भी नहीं सकता था कि आजादी के कुछ ही दशक बाद के नेता और सरकारें, जनसाधारण के प्रति अपने संकल्प को भुलाकर दक्षिणपंथी ताकतों के हाथ का खिलौना बन जाएंगी. लेकिन हुआ वही जो अनपेक्षित था. धर्म, पूंजी और राजनीति के गठजोड़ के परिणामस्वरूप देश में दक्षिणपंथ उत्तरोत्तर मजबूत होता चला गया.

ऐसा नहीं है कि इसका विरोध नहीं हुआ. परिवर्तनकामी शक्तियों की ओर से उन्हें चुनौती भी खूब मिली. आजादी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद दलित और पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ था. लोकतांत्रिक परिवेश में वे अपने लिए समानता और स्वतंत्रता की मांग करने लगी थीं. बहुमत में होने के कारण उनकी उपेक्षा करना ठेठ दक्षिणपंथी ताकतों के लिए भी आसान न था. इसलिए जातिवाद को बचाए रखने के लिए उन्होंने धर्म का सहारा लिया. सांप्रदायिकता को उभारा. उनकी कोशिश जाति और धर्म के सहारे बहुसंख्यक वर्ग को छोटेछोटे समूहों में बांटने की रही. कभी प्रलोभन तो कहीं फूट डालकर वे जनचेतना को अवरुद्ध करने में लगी रहीं, ताकि संगठित शक्ति का रूप लेकर वह उनके लिए कभी चुनौती न बन सकें. पूंजीवाद के उभार के साथ सार्वजनिक स्थलों पर जातीय भेदभाव में तो कमी आई, किंतु उत्तरोत्तर सिकुड़ती सामाजिकता के कारण, परिवार और समूह के भीतर लोग घोर जातिवादी होते चले गए. इस विकृति के बावजूद वंचित समूहों में उभरती लोकतांत्रिक चेतना ने दक्षिणपंथ को जबरदस्त टक्कर दी; और आज तक दे रहे हैं. इन दिनों देश में पूंजीवाद चरम पर है. चूंकि इस देश की पूंजी और संसाधनों का बड़ा हिस्सा दक्षिणपंथी समूहों के अधिकार में है, इसलिए गैरदक्षिणपंथी धाराओं के दमन और उपेक्षा की नीति आज भी जारी है.

दक्षिणपंथ का उभार शेष दुनिया में भी बड़ी तेजी से हुआ, किंतु भारतीय दक्षिणपंथ कई मायनों में उससे भिन्न था. वहां सामाजिक स्तरीकरण का एकमात्र आधार या तो नस्ल थी अथवा पूंजी. नस्ल के प्रभाव को अमेरिकी क्रांति काफी हद तक बेअसर कर चुकी थी. फ्रांसिसी क्रांति के बाद तो व्यक्तिस्वातंत्र्य और मानवाधिकार की हवाएं पूरी दुनिया में बहने लगीं. भारत भी उनसे अछूता नहीं था. हालांकि यहां हालात पश्चिम से भिन्न थे. आर्थिक असमानता के अतिरिक्त यहां जाति और धर्म के आधार पर भी सामाजिक ऊंचनीच और विषमताएं थीं. इसलिए दक्षिणपंथ की विकृतियों को सहेजे रखना यहां बहुत आसान था. इसलिए जिस लोकतंत्र से उम्मीद की जाती थी कि वह दक्षिणपंथी ताकतों को किनारे होने के लिए विवश कर देगा, अंततः वही उनका पालनहार बन गया. कुछ ऐसी ही उम्मीद तकनीक और प्रौद्योगिकी से भी थे. पश्चिम में ‘विज्ञान के पितामह’ कहे जाने कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन ने मशीनीकरण का स्वागत करते हुए कहा था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा उनकी मुक्ति में सहायक बनेंगीं. किंतु एक शताब्दी से भी कम समय में अनियोजित मशीनीकरण की विकृतियां सामने आने लगी थीं. दोष मशीनों और मशीनीकरण का नहीं था. दोष विपुल उत्पादन में सहायक प्रौद्योगिकी के कुछ हाथों तक सीमित होकर रह जाना था.

हाल के दशकों में भारतीय पूंजीवाद अपने उग्रतम रूप में सामने आया है. किंतु वैश्विक स्तर पर यह नया नहीं हैं. अठारवीं शताब्दी से पहले तक लौकिक संस्कार और धार्मिक विश्वास वहां भी मनुष्य का स्वैच्छिक वरण नहीं थे. सामाजिकता की अनिवार्य शर्त के रूप में वे जन्म के साथ जनसाधारण पर थोप दिए जाते थे. अपनी सामाजिक हैसियत को सुरक्षित रखने के लिए चालाक अभिजन शक्तियां सामाजिक प्रतीकों, मिथों में मनमाना हस्तक्षेप करती थीं. इस तरह संस्कृति की आड़ में अल्पसंख्यक समूहों की बहुसंख्यक पर इजारेदारी पीढ़ीदरपीढ़ी चलती रहती थी. जनसाधारण यह माने रहता था कि अभिजन शक्तियां अपने जन्मजात गुणों के कारण उससे श्रेष्ठ हैं. इसलिए शिखर पर बने रहने का उनका दावा भी स्वाभाविक है. चूंकि पश्चिमी समाज में जातीय विभाजन जैसी कोई परिकल्पना नहीं थी, इसलिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध जंग जीतना वहां अपेक्षाकृत आसान था. इसके प्रयास वहां पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ से ही होने लगे थे. मैकियावेली ने राजतंत्र की अपेक्षा नागरिक समूहों द्वारा गठित सरकार को श्रेष्ठ माना था. उसका प्रभाव आने वाली शताब्दियों में पड़ा. इससे राज्य की अवधारणा पुष्ट हुई. उससे पहले राजतंत्र में केवल केंद्र हुआ करता था. किसी भी राजा द्वारा शासित क्षेत्रों की उसके नाम के साथ गिनती की जाती थी. नागरिक की पहचान, जो पहले सामान्यतः राजाविशेष की प्रजा के रूप में होती थी, राज्य की अवधारणा विकसित होने के बाद, स्वतंत्र रूप से स्पष्ट होने लगी. अठारहवीं शताब्दी तक वहां मानवमात्र की समानता और स्वतंत्रता का समर्थन करने वाली अनेक विचारधाराएं अस्तित्व में आ चुकी थीं. उनके बीच अनेक मतांतर थे. कुछ मुद्दों को लेकर आपसी टकराव भी था. लेकिन मानवमात्र की आजादी और सुख में सबकी सहभागिता को लेकर वे प्रायः एकमत थीं.

सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध बौद्धिक चेतना का प्रादुर्भाव इटली में हुआ था. भारत की इटलीवासी भी अपनी प्राचीन संस्कृति को श्रेष्ठतादंभ का शिकार थे. उसमें भी समाज के बहुत छोटे हिस्से को अतिरिक्त अधिकार प्राप्त थे. विल्फ्रेड परेतो, गेइतानो मोस्का, अंतोनियों ग्राम्शी आदि ने संस्कृतिक विभाजन की पड़ताल की. परेतो पेशे से इंजीनियर था. अपने अध्ययन से उसने यह निष्कर्ष निकाला कि इटली की कुल अस्सी प्रतिशत संपदा पर वहां के 20 प्रतिशत अभिजन समूहों का अधिकार है. अगले चरण में उसने अपने अध्ययन का दूसरे यूरोपीय देशों तक विस्तार किया. वह यह देखकर हैरान रह गया कि दूसरे देशों भी समाज का बहुत छोटा हिस्सा बाकी समूहों पर अपनी सांस्कृतिकसामाजिक और आर्थिक श्रेष्ठता का दम भरते हुए, शासन करता है. मोस्का का अध्ययन अभिजन समूहों की पहचान तथा उनकी प्रवृत्तियों को लेकर था. उसका कहना था कि शासकवर्ग अपनी बौद्धिक चतुराइयों के बल पर दूसरों पर शासन गांठने में कामयाब होता है. मार्क्स ने पूंजीवाद की चुनौतियों से निपटने के लिए श्रमिकों का संगठित विरोध के लिए आवाह्न किया था. श्रमिक समूहों को उसका सुझाव था कि उन्हें आगे बढ़कर सत्ता और संसाधनों पर अपना अधिकार सुनिश्चित कर लेना चाहिए. ग्राम्शी मार्क्सवाद के नाम पर हुई क्रांतियों की असफलता से परिचित था. अपने चिंतन से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि सफल सर्वहारा राज्य की परिकल्पना तभी संभव है, जब सर्वहारा समूहों में राज्य करने की पर्याप्त योग्यता हो. वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हों. गैरअभिजन समूहों के अपने बुद्धिजीवी हों जो अभिजन वर्ग की बौद्धिक चतुराइयों को समझकर समय रहते उसका समाधान खोजकर, गैरअभिजन समूहों की स्वतंत्रता बनाए रख सकें. इसे राजनीतिक पराधीनता कहें या नए ज्ञान के प्रति उदासीनता का स्वभाव, भारतीय बुद्धिजीवी विश्वस्तर पर हो रही बौद्धिक क्रांतियों से अनजान बने रहे. यह स्वाभाविक भी था. भारतीय समाज जातियों में बंटा था और जाति के आधार पर जिस वर्ग का बौद्धिक कार्यों में दखल था, और जो उसका स्वयंनिर्धारित कर्तव्य था, उसके हित समाज में बौद्धिक जड़ता बनाए रखने से जुड़े थे. उसके लिए उसकी कल्पना में गढ़ा गया ‘सतयुग’ ही सबकुछ था, जिसमें वह निरंकुशता की परिसीमा तक अधिकारसंपन्न था. राज्य उसकी जिदों और महत्त्वाकांक्षाओं के आगे बौना दिखाई पड़ता था. उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में, अंग्रेजी शिक्षा के साथ, देश के बौद्धिक वातावरण में हलचल दिखाई पड़ी. आरंभ में अंग्रेजी पढ़ना सरकार के करीब पहुंचने का जरिया था. धीरेधीरे अंग्रेजी के ज्ञानविज्ञान ने दूसरे क्षेत्रों में भी दखल देना शुरू किर दिया. नई व्यवस्था में शिक्षा के दरवाजे सभी के लिए खुल चुके थे. इससे गैरब्राह्मणों का भी बौद्धिक क्षेत्र में दखल बढ़ा. उसके फलस्वरूप आधुनिक प्रगतिगामी विचारधाराएं भारत में प्रवेश करने लगीं.

आधुनिक विद्वानों में जॉन देरिदा, मिशेल फूको जैसे विचारकों के नाम शामिल हैं. वे मानवीय सरोकारों से प्रतिबद्ध थे. दोनों ने उत्तरआधुनिकता को अपने अध्ययन का विषय बनाया. उत्तरआधुनिकता उपभोक्तावादी संस्कृति की देन, व्यक्तिवाद और पूंजीवाद का बेमेल संस्करण है. उसमें ज्ञान को भी आकादमिक उत्पाद मान लिया जाता है. पूंजी के वर्चस्व के आगे विचारधाराएं मौन और असहाय नजर आती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में व्यक्तिस्वातंत्र्य और समानता का बोध, उपभोग की स्वतंत्रता तक सीमित हो जाते हैं. आधुनिक सभ्यता की इस विसंगति की सहीसही पहचान फूको ने की थी. उसका विचार था कि पूंजीपति वर्ग को इन दिनों केवल आर्थिक सत्ता से संतोष नहीं है. वह अपनी सामाजिक सत्ता भी बनाए रखना चाहता है. इसके लिए वह हिंसा के उपकरणों सेना, पुलिस आदि का भी मनमाना उपयोग करने में दक्ष होता है. समाज को नियंत्रित करने के लिए वह अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर कुछ कसौटियां बना लेता है. जो भी व्यक्ति उन कसौटियों पर खरा नहीं उतरता, वह उसे अक्षम मानकर डराता है. इस तरह लोगों को अक्षमता का भय दिखाकर उनपर नियंत्रण बनाए रखता है. डरा हुआ व्यक्ति दूसरों को भयभीत करता है. परिणामस्वरूप लोग एकदूसरे पर संदेह करने लगते हैं. समाज में उत्तरोत्तर बढ़ती विश्वासहीनता के बीच पूंजीपति का काम आसान हो जाता है. मानवीय संबंधों में आई दरार को पाटने के लिए वह कृत्रिम संबंधों का निर्माण करता है. मनुष्य को वास्तविकता से काटकर आभासी दुनिया में ले जाता है. लोगों को लगता है कि तकनीक के आधार पर निर्मित दुनिया में वह अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र और सुरक्षित है. केवल नई दुनिया उसकी बौद्धिक एवं भावनात्मक उपलब्धियों की सहीसही पहचान करती है. इस भ्रम में वह आभासी दुनिया को असली दुनिया से अधिक वास्तविक और भरोसेमंद मानने लगता है. जबकि आभासी दुनिया में व्यक्ति या व्यक्तिसमूहों की स्वतंत्रता उपभोक्ताबाजार तक सीमित होती है. लोकतंत्र और मानवाधिकार उपभोक्ताअधिकारों की जकड़बंदी से बाहर नहीं निकल पाते.

देरिदा ने गिनती पिछली शताब्दी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली और मौलिक चिंतक के रूप में की जाती है. वे ‘विखंडनवाद’ के सिद्धांतकार हैं. देरिदा के विचारों को ग्राम्शी के सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के सिद्धांत के समानांतर रखकर आसानी से समझा जाता है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए अल्पसंख्यक अभिजन केवल समाज के संसाधनों का स्वार्थ हेतु उपयोग नहीं करता. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के विस्तार एवं भविष्य की चुनौतियों को कम करने के लिए वह बहुसंख्यक वर्ग के दिलोदिमाग पर भी अधिकार जमाए रखता है. अपने स्वार्थ को वह बहुजन समूह के हित के रूप में पेश करता है. इस चालाकी से बेखबर अपने बौद्धिक नेतृत्व हेतु अभिजन समूहों पर निर्भर बहुजन, अल्पसंख्यक अभिजनों द्वारा विनिर्मित तंत्र और सामाजिकसांस्कृतिक विश्लेषण को ही असल माने रहते हैं. प्रकारांतर में वे अभिजन समूह की स्वार्थपूर्ति में ही अपना कल्याण समझने लगते हैं. यह उसी तरह है जैसे कारखाने के मुनाफे और विस्तार को किसी मजदूर या कारीगर द्वारा अपनी तरक्की मान लेना. अल्पसंख्यक अभिजन द्वारा थोपी गई भ्रांतियां बहुसंख्यक वर्ग को ऐसा सोचने को बाध्य करती हैं. इसलिए ग्राम्शी ने अभिजन वर्चस्व से बौद्धिकशारीरिक मुक्ति के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मुक्ति को आवश्यक माना. यह मुक्ति एकदम आसान नहीं है. इसलिए कि वैचारिकता के आकलन के जितने भी ज्ञात मापदंड हैं, सब पर अभिजन वर्ग की स्वार्थदृष्टि का प्रभाव है. उदाहरण के लिए लेखकों और कलाकारों के बड़े वर्ग में प्रचलित ‘कला कला के लिए’—जैसी अवधारणा. या फिर यह विचार कि ‘साहित्य का प्रथम उद्देश्य मनोरंजन है.’ ये मान्यताएं समाज के शीर्षस्थ अभिजनों द्वारा जो समस्त कलाओं को उपयोग अपने सुखसुविधा के लिए करना चाहते हैं—द्वारा थोपी गई हैं. प्राचीन आलोचनाशास्त्र इन्हीं कसौटियों के आसपास घूमता है. वर्णव्यवस्था और सामंती वृत्तियों के घोर समर्थक तुलसी उसकी दृष्टि में हिंदी के श्रेष्ठतम कवि हैं. आलोचना के ऐसे मापदंडों से साहित्य की लोकोपकारी समालोचना असंभव है. इस लिए देरिदा साहित्य के नए पाठ हेतु नवीन आलोचनादृष्टि को अपरिहार्य मानता है.

देरिदा का विचार था कि इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के उपलब्ध स्रोतों में अत्यधिक दोहराव है. जैसे मशीन अपनी पूर्ववर्ती अवस्था में निरंतर लौटती रहती है, इसी प्रकार इतिहास भी बारबार अपनी उन्हीं प्रतिज्ञाओं को दोहराता है, जिनसे येनकेनप्रकारेण अभिजन हितों की पुष्टि होती हो. जिससे ऐतिहासिक निष्कर्षों पर जड़ता हावी होने लगती है. इतिहास के प्रभामंडल से बाहर आने के लिए आवश्यक है कि सभ्यता और संस्कृति के रूप में उपलब्ध ज्ञानसामग्री तथा आलोचना के उपकरणों को संदेह के दायरे में लाया जाए. उन्हें अपर्याप्त तथा ‘ना कुछ’ मानकर किनारे करते हुए नवोन्वेषण हेतु कमर कस ली जाए. चुनौती यहीं समाप्त नहीं होती. वृहद सामाजिक हितों के अनुरूप नई व्याख्याएं पेश करने कैसे संभव हो? कैसे मनुष्य को उसकी प्रतिगामी सोच से बाहर लाया जाए? इसके लिए देरिदा ने ‘विखंडनवाद’ का विचार दिया. उनका आशय था किसी भी कृति, शब्द या विचार के ज्ञात अर्थों तथा प्रज्ञप्तियों पर अविश्वास करते हुए, स्थापित अर्थो को पूरी तरह किनारे कर, उसके नवीनतम पाठों की ओर बढ़ना. बौद्धिक वर्चस्व से मुक्ति के लिए इस तरह का विखंडन अपरिहार्य है.

लोकहित का दावा करने वाली प्राचीन विचारधाराओं का संज्ञान न लेते हुए, यदि केवल विगत दोतीन शताब्दियों के बौद्धिक आंदोलनों पर ही विचार किया जाए तो इस अवधि में मानवकल्याण का दावा करने वाले अनेक दर्शन सामने आए हैं. उनपर किसी को भी गर्व हो सकता है. उनके प्रवर्त्तकों की ईमानदारी पर भी संदेह नहीं किया जा सकता. मगर समाज में उत्तरोत्तर बढ़ती विचारहीनता, अविश्वास, हताशा, भय और तनाव की स्थिति दर्शाती है कि समग्र लोकहित का दावा करने वाली उन विचारधाराओं में कोई न कोई कमी अवश्य रही है. कुछ है, जिससे समाज उससे अपेक्षित रूप में लाभान्वित न हो सका. या तो वे विचारधाराएं कमजोर थीं. अथवा समाज को उनके अनुरूप ढालने में कोताही बरती गई. सच यह भी है कि सामाजिक जटिलताओं की व्याख्या के लिए कोई भी एकल विचार, वह चाहे जितना परिपक्व दिखाई पड़े, अपर्याप्त होता है. एक सीमा के बाद प्रत्येक विचारधारा कमजोर दिखने लगती है. उचित यह है कि विचारों के कार्यान्वन, समाज निर्माण में लगी शक्तियां अपनी संक्रियता को निरंतर बना यह भी संभव है कि विचारधाराओं में कोई कमी न हो, उनके प्रवर्त्तकों की सदाशता भी संदेह से परे हो, लेकिन वृहद जनसमाज में उन विचारधाराओं को लेकर अविश्वास का भाव रहा हो? विचारबहुलता के दौर में समाज का विचारहीनता की ओर बढ़ना दर्शाता है कि विचार चाहे जिस वर्ग की देन रहे हों, प्रत्येक युग में समाज को उनसे परचाने तथा उनके कार्यान्वन हेतु सक्षम योजनाएं बनाने के प्रमुख सूत्रधार शीर्षस्थ अभिजन ही रहे हैं. भारत में मार्क्सवाद और वामपंथ की असफलता का बड़ा कारण भी यही है. चूंकि बहुजन तथा अभिजन वर्ग के हितों में सदैव टकराव रहा है, इसलिए विचारधाराओं के कार्यान्वन के लिए आधीअधूरी योजनाएं बनाने, तथा जनता में उन कार्यक्रमों के प्रति उदासीनता के कारण समाज उनसे अपेक्षित लाभ उठाने में अक्षम रहा है. बहुजन वर्ग भी ऐसी विचारधाराओं को संदेह की दृष्टि से देखता है. वह उन्हें थोपी हुई विचारधारा मानता है. यही कारण है कि उद्देश्यों की पवित्रता के बावजूद ऐसे विचार समाज का प्रबोधीकरण करने में नाकाम होते आए हैं.

असफलता का बड़ा कारण जीवन में पूंजी का अवांछित हस्तक्षेप है. ठोस विचारधारा के अभाव में सामूहिक हितों की पड़ताल कठिन हो जाती है. छोटेछोटे सामाजिक समूहों को ललचाने के लिए राजनीतिक दल ऐसे मुद्दे लाते हैं, जो विशेष प्रलोभनकारी और किसी न किसी प्रकार उपभोग से जुड़े होते हैं. पूंजीवादी मीडिया इस काम में उनकी मदद करता है. चूंकि उपभोक्ता के मानसनिर्माण का कार्य मुख्यतः मीडिया के अधीन होता है, जिसपर पूंजीपतियों का अधिकार है. चर्चा में बने रहने के लिए राजनीतिक दल मीडिया की शरण में जाते हैं किसी न किसी रूप में पूंजीपति संस्थानों के लिए कठपुतली की तरह काम करते हैं. उससे शासन पूंजीवाद के हितसंरक्षण में जुड़ जाता है. विचारधारा से अलगाव उनके भीतर अपने ही राजनीतिक कार्यक्रमों के प्रति अविश्वासहीनता को जन्म देता है. प्रकारांतर में वे पूंजीवादी संगठनों के हाथ की कठपुतली की तरह काम करने लगते हैं. पक्षविपक्ष दोनों की राजनीतिक गतिविधियां पूंजीपतियों के हितसंरक्षण में लगी होती हैं. पूंजीवाद का अप्रत्यक्ष हाथ उन्हें अपने स्वार्थ के हिसाब से अनुकूलित करता रहता है. दुष्परिणाम यह होता है कि सरकार और संगठन जनता से कटकर पूंजीपतियों के हितसाधन में लगे रहते हैं. चूंकि पूंजीपति वर्ग ये सारे काम पर्दे के पीछे रहकर, बड़ी चतुराई के साथ करता है, इसलिए शासन की असफलताओं, जनता की कसौटियों पर खरा न उतरने का दोष सरकार और उसके नेताओं पर आता है. हकीकत से अनजान जनता चुनावों के जरिये बारबार सरकार बदलती है. लेकिन हालात वही के वही रहते हैं. इसलिए कि लोग जो उम्मीद अपनी सरकार से पालते हैं, वह कदाचित उसके बस से बाहर होता है.

इसका आषय यह नहीं है कि जितने नेता हैं, सभी पाकसाफ और दूध के धुले हैं. उद्देष्य केवल यह बताना है कि लोकतांत्रिक दायित्वों को निभाने के लिए यदि कोई उत्साही नेता आगे बढ़ना चाहे तो उसके लिए नई चुनौतियों से गुजरना बेहद कठिन होता है. इसलिए पढ़ेलिखे विचारवान नेता भी मूल्यकेंद्रित राजनीति से कतराने लगते हैं. योगेंद्र यादव इसका सटीक उदाहरण हैं. वे विचार की दुनिया से राजनीति में आए हैं. समाजविज्ञान के ज्ञाता हैं. राजनीति में लोकभागीदारी सुनिश्चित करना चाहते हैं. यही लक्ष्य गणतांत्रिक समाजवाद का भी है, जो एक आधुनिक और लोकप्रिय विचारधारा है. योगेंद्र जी की निष्ठा और कार्यशैली पर संदेह नहीं किया जा सकता. गणतांत्रिक लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब नागरिक उससे भलीभांति परिचित हों. देशभर में घूमघूमकर अपनी सभाओं के माध्यम से वे भी लोकजागरण के काम में जुटे हैं. जाति, धर्म और सामंतवाद के साये में रही जनता के लोकतांत्रिक प्रबोधीकरण के लिए ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता आजादी के बाद से ही थी. मगर कभी कोई गंभीर कोशिश इस दिशा में नहीं की गई. यहां ‘रोशडेल पायनियर्स’ का उल्लेख प्रासंगिक होगा. उसे विश्व की पहली सफल सहकारी संस्था होने का गौरव प्राप्त है. यह समझते हुए कि कामयाब सहकारिता के लिए सदस्यों को उसकी सैद्धांतिकी के बारे में समझाना आवश्यक है, संस्था की ओर से सीमित संसाधनों के बावजूद उसकी नियमित व्यवस्था की गई थी. ‘रोशडेल पार्यनियर्स’ की सफलता दूसरों के लिए मार्गदर्शक बनी. फलस्वरूप सहकारिता आंदोलन दुनियाभर में फैला. बहरहाल बात योगेंद्र यादव की हो रही है. उनसे जब भी वैचारिक प्रतिबद्धता के बारे में चर्चा हुई, वे सीधे व्यवहार पर उतर आते हैं. यह कुछ ऐसा ही है जैसे तेज आंधीतूफान के बीच बिना छत के घर के नीचे षरण लेने की सलाह देना. दुनिया को नए चिचारों की नहीं, उसे बदलने वालों की जरूरत है—यह कार्ल मार्क्स ने भी कहा था. वह आज की तरह विचारशून्यता का समय नहीं, बौद्धिक क्रांति का दौर था. समाज में नए राजनीतिक दर्षनों के बीच बहस छिड़ी थी. विभिन्न विचारधाराओं के बीच सीधी प्रतिद्विंद्वता थी. स्वयं मार्क्स भी अपने ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ के साथ चर्चा में थे. दिनोंदिन पांव पसारते पूंजीवाद पर अंकुश लगाने के लिए सीधा टकराव आवश्यक था. इसलिए उन दिनों पूंजीवाद और शेष विचारधाराएं आमनेसामने थीं. उनकी पहचान करना सरल था. आज वैसा नहीं है. समय के साथ पूंजीवाद ने खुद को बदला है. राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उसकी गहरी घुसपैठ है. वामपंथी नेता भी इससे अछूते नहीं हैं. वामपंथ की मूलभूत प्रतिबद्धताओं को वे व्यावहारिकता का तकाजा कहकर किनारे करते आए हैं. इसलिए समाज में पूंजीवाद के प्रति सामान्य सहमति दिखाई पड़ती है.

2012 में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में चले जनांदोलन ने समाज में परिवर्तन के प्रति उत्सुकता चलाई थी. चूंकि उसके पीछे कोई ठोस विचारधारा नहीं थी, इसलिए कुछ ही महीनों में वह आंदोलन बिखरसा गया. उसके नेता लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा बनते चले गए. इस बीच कई जनांदोलन पनपे. पूंजीवादी मीडिया की नीति उन्हें उपेक्षित करने की रही. जनांदोलनों की उपेक्षा अथवा उनके नेताओं की चरित्रहत्या द्वारा वह लोकसशक्तिकरण के कार्यों में बाधक रहा है. पूंजीवादी चालों को समझने वालों के लिए यह अनपेक्षित नहीं है. उसके अभाव में संसदीय बहसें सड़कें, बिजली, पानी और आरक्षण जैसे मामूली मुद्दों के आसपास घूमती रहती हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि कारपोरेट सेक्टर भी यही चाहता है. इससे उपभोक्ताकरण में मदद मिलती है. लोग अमर्यादित उपभोग और उपयोग का अंतर भूलने लगते हैं. समस्या इतनी भयावह है कि गंभीर और स्वचेता किस्म के लोग भी उम्मीद छोड़ने लगे हैं. जबतब ‘विचारधारा के अंत’ की बात भी सुनाई पड़ जाती है. ऐसे दौर में जब क्रिकेट और फिल्में देशभक्ति का पर्याय बन चुकी हों, मोबाइल उत्तरोत्तर ‘स्मार्ट’ मगर आदमी का दिलोदिमाग कुंद होता जा रहा हो, लोग आभासी और वास्तविक दुनिया का भेद भूल चुके हों, क्या प्रतिबद्धता की सफल राजनीति संभव है? सवाल यह भी है कि षरद यादव, लालू यादव, अखिलेश यादव सहित 17 दलों के प्रमुख नेता अथवा उनके प्रतिनिधि जो उस रैली में उपस्थित थे, क्या सार्थक विकल्प देने के लिए कृतसंकल्प हैं?

उस रैली में बसपा की ओर से सतीष चंद्र मिश्र मौजूद थे. सामाजिक न्याय को लेकर उनकी क्या प्रतिबद्धता है, यह स्पष्ट नहीं है. बसपा के साथ वे केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए जुड़े हैं. फिर सुश्री मायावती द्वारा रैली में बतौर बसपा प्रतिनिधि सतीश मिश्रा को ही क्यों चुना? ठीक है, बात जब ‘सांझी विरासत’ की हो तो उसमें ब्राह्मणों को भी सम्मानजनक हिस्सा मिलना चाहिए. पर बात केवल इतनी नहीं है. उन्हीं दिनों ‘सोषल मीडिया’ पर एक तस्वीर वायरल हुई थी. तस्वीर क्या बसपा की ओर से या उसके नाम पर बनाया गया पोस्टर था. उसमें बसपा प्रमुख की आदमकद तस्वीर थी. बाकी दलों के नेताओं के, जिन्हें गठबंधन के सदस्य के रूप में देखा जा रहा है, के केवल मुखौटे थे. पोस्टर को किसने बनाया? किसने और क्यों सोषल मीडिया पर वायरल किया? संभव है वह किसी विरोधी नेता की साजिश अथवा जानबूझकर की गई सांकेतिक कार्रवाही रही हो. बताया यह भी गया कि वह बसपा का अधिकारिक पोस्टर नहीं था. लेकिन वह जिस तरह बनाया गया था, बसपा की ओर से उसका खंडन न होना, गठबंधन बनाने में जुटे नेताओं की मनोदषा को दर्षाता है.

उत्तर प्रदेश विधान सभा के पिछले चुनावों के बाद प्रत्येक दल भलीभांति समझ चुका है कि वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा का सामना उनमें से किसी एक दल द्वारा संभव नहीं है. सब जानते हैं कि 70 प्रतिषत मत विपक्षी दलों के बीच थोड़ेथोड़े बंट जाते हैं और बाकी बचे वैध मतों में से 28-29 प्रतिषत मत पाकर भाजपा पूरी ठसक के साथ सरकार बना ले जाती है. भाजपा को हराने के लिए विरोधी मतों को एकजुट करना न केवल उनके लिए बल्कि देष की एकता, अखंडता, सामाजिक सद्भाव और देश की सुखसमृद्धि के लिए अत्यावश्यक है. बावजूद इसके प्रत्येक दल संभावित गठबंधन में अपने लिए अधिकाधिक सीटें सुनिष्चित कर लेना चाहता है. वर्तमान भारतीय राजनीति, विषेषकर विपक्ष की सबसे बड़ी त्रासदी उसका विचारषूण्य हो जाना है. बिना किसी ठोस नीति और वैचारिक संकल्प के वे ऐसा गठबंधन बनाना चाहते हैं जो भाजपा को जो इस समय अपनी विचारधारा को लेकर सर्वाधिक उग्र और आत्मविश्वास से भरपूर है—चुनौती देना चाहते हैं. भाजपा जैसे शुद्ध सांप्रदायिक और घोर जातिवादी दल को हराने के लिए गठबंधन अपरिहार्य है. किंतु दूरदृष्टि और ठोस नीति के अभाव में कोई भी संभावित गठबंधन विषुद्ध अवसरवादी समझौता होगा.

चलतेचलते कुछ चर्चा ‘सांझी विरासत’ पर भी. शरद यादव जाति के बजाय जमात की बात करते हैं. धर्म और छोटेछोटे जाति समूहों के रूप में बुरी तरह विभाजित समाज में इन शब्दों के गहरे निहितार्थ हैं. सवाल है कि ‘सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ जैसी कोई चीज क्या सचमुच भारतीय समाज में रही है? भारत के संदर्भ में कहीं वह सामाजिक यथास्थितिवाद का पर्याय तो नहीं? देश में सांस्कृतिक एकता की बात करने वाले विद्वान प्रायः ‘विविधता में एकता’ की बात कहकर भारतीय संस्कृति का महिमामंडन करते हैं. प्रथम दृष्टया वे गलत भी नहीं हैं. इस देश में उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक ऐसी अनेक समानताएं हैं, जिनसे विविधता में एकता का आभास होता है. उदाहरण के लिए होली, दीवाली, रक्षाबंधन, दशहरा जैसे त्योहार, पूरे देश में एक साथ और लगभग एक तरह से मनाए जाते हैं. स्थानीय रीतिरिवाज और आदिवासी समाजों को छोड़कर पूरे देश में विवाह संस्कार भी एक समान होता है. लोग समान रूप से आस्थावान हैं. जातिव्यवस्था को लेकर सभी के लगभग एक जैसे विचार हैं. स्थानीय देवीदेवताओं के अलावा राम, कृष्ण जैसे सामंती संस्कारों वाले देवता भी हैं, जिनकी पूजा किसी न किसी रूप में पूरे देश में की जाती है. प्रायः सभी प्रांतों में अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत खेती है. ‘सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ का दावा करने के लिए क्या इतना पर्याप्त है?

यदि संस्कृति पीढ़ीदरपीढ़ी आगे बढ़ने वाला सामान्य लोकाचार है तो ‘सांझी संस्कृति’ उसे कहा जा सकता है, जिसे बनाने में सभी का बराबर का योगदान हो. जिसमें अवसरों की समानता हो. भारतीय संस्कृति इस दृष्टि से बहुत विपन्न है. प्रकटतः उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो सामूहिकता, सहभागिता और मानवमात्र की स्वतंत्रता की प्रतीति कराता हो. भारतीय समाज जाति और धर्म के नाम पर अनेक छोटेछोटे समूहों में बंटा है. देशभर में तीस हजार से ऊपर जातियां, उपजातियां, गोत्र, उपगोत्र आदि हैं. उनके बीच ऊंचनीच की चौड़ी खाई है. वैवाहिक संबंध, खानपान और रहनसहन को लेकर भांतिभांति के प्रतिबंध हैं, जिन्हें वह अतीत की धरोहर के रूप में सौंपता है. धर्म पर संप्रदायवाद हावी है. प्रत्येक मतावलंबी अपने पंथ को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है. जबकि तत्संबंधी उसका ज्ञान रूढ़ियों, आडंबरों और जड़विश्वासों का घालमेल होता है. कुल मिलाकर जिसे हम सांझा संस्कृति कहते हैं, उसमें कहीं न कहीं अपनेअपने विश्वासों, रीतिरिवाजों, धार्मिकसामाजिक आडंबरों यहां तक कि रूढ़ियों और पाखंडों के साथ जीने की बाध्यता बनी रहती है. यदि कोई उससे अलग चलना चाहे, तो संस्कृति उसे इजाजत नहीं देती. उल्टे तरहतरह की बाधाएं उत्पन्न कर, जीवन को दुष्कर बना देती है.

सांझी संस्कृति’ अथवा ‘सांझी विरासत’ असल में मिथ है. उसका वास्तविक प्रतीति यदि समाज में ही नहीं है, तब वह राजनीतिक दलों की एकता का आधार भला कैसे बन सकती है? क्या भारत जैसे विविधताओं वाले बड़े समाज को ‘सांझी संस्कृति’ के कोरे मिथ के सहारे एक किया जा सकता है? क्या केवल मिथ के भरोसे परिवर्तन की निर्णायक लड़ाई संभव है? इन सबसे महत्त्वपूर्ण एक प्रश्न यह है कि जो दल या नेता सांझी संस्कृति को बचाने के नाम पर एकजुट होना चाहते हैं, क्या उनका अपना जीवन या राजनीति सांझी संस्कृति की भावना पर खरी उतरती है? कुछ दशक पहले तक राजनीति पर सवर्णों का अधिकार था. कोई चुनौती उनके आगे नहीं थी. राजनीति में पिछड़ों और दलितों की संख्या नगण्य थी. आजादी के बाद दलितों और पिछड़ों के भीतर आत्मसम्मान की भावना जाग्रत हुई. लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, मायावती, नितीश कुमार जैसे नेता अस्मितावादी आंदोलनों की ही देन हैं. जातिआधारित भेदभाव और उत्पीड़न को उन्होंने या उनके पूर्वजों ने स्वयं झेला है. बावजूद इसके उनकी लड़ाई जाति के विरोध में न होकर, कहीं न कहीं अपने जातीय हितों की अधिकतम सुरक्षा तक सीमित रही है. पाब्लो फ्रेरा का मानना था कि उत्पीड़न के कारणों का सही बोध न होने के कारण उत्पीड़ित जनों की लड़ाई आमूल परिवर्तन के लिए न होकर तात्कालिक लाभों तक सिमट जाती है. परिवर्तन के आरंभिक दौर में उत्पीड़ित उत्पीड़क की नकल करता हुआ, उसके जैसा बनना चाहता है. स्वातंत्र्योत्तर भारत में दलितोंपिछड़ों की राजनीति के साथ यही हुआ है. लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर जो दलितपिछड़े नेता सत्ताकेंद्रों तक पहुंचे, उन्होंने आमूल परिवर्तन के लिए संघर्ष जारी रखने के बजाय क्षुद्र हितों से समझौता करना उचित समझा. इसलिए उनकी उपलब्धियां प्रदेशविशेष तक सीमित रहीं. जाहिर है जिस सांझी संस्कृति की बात शरद यादव कर रहे हैं, उसपर महागठबंधन के संभावित घटक दलों का न तो विश्वास है, न वह पूरी तरह से उनकी जीवनशैली का हिस्सा ही रहा है.

जातिवाद भाजपा और कांग्रेस के चरित्र का भी हिस्सा है. जातिवादी होने के साथसाथ वे यथास्थितिवादी भी हैं. एकदूसरे का विरोधी दल होने का दावा करने वाले ये दल असल में अभिजन संस्कृति के प्रमुख संरक्षक, पालक और प्रवर्त्तक रहे हैं. भाजपा अधिक उग्र है. वह जातिवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साये में सुरक्षित रखना चाहती है. उसके लिए समयसमय पर अनेक चालें चलती रहती है. कांग्रेस चुपचाप काम करने में विश्वास रखती है. दोनों पर समाज के अभिजन तबकों का कब्जा है. दलितों और शूद्रों की उपस्थिति केवल मतदाताओं को लुभाने अथवा संवैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने तक सीमित है. व्यवस्था में आमूल परिवर्तन न तो भाजपा का अभीष्ट है, न कांग्रेस का. दोनों उन्हीं जातियों की हितसंरक्षक रही हैं, जो आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर हमेशा से शक्तिशाली रही हैं. इस आधार पर उनके पास सचमुच ‘सांझी विरासत’ है. ऐसी विरासत जिसमें वे मिलबांटकर सुखसाधनों का भोग करती आई हैं. अपनी सामाजिकसांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए वे बाकी जनसमूहों पर शताब्दियों से शासन करती आई हैं. उसे पूंजीपतियों और सरमायेदारों का समाजवाद कह सकते हैं. ठीक सतयुग की तरह जिसमें समस्त सुखसंसाधन देवताओं की थाती मान लिए गए थे. जो देवता नहीं थे, वे या तो असुर थे या दास, जिन्हें धरती के बोझ की भांति देखा जाता था. सवर्ण जानते हैं कि यदि वे बिखरे तो लोकतंत्र का लाभ उठाकर संख्याबल में चार गुना बहुजन उन्हें सत्ता से हमेशाहमेशा के लिए बेदखल कर सकते हैं. यही स्वार्थपरता उन्हें एक रखती है. इसलिए वे बहुजन समूह में फूट डालकर, समयसमय पर जातिसमूहों को फुसलाकर अपनी राजनीतिक हैसियत को बचाने का षड्यंत्र रचते रहते हैं. धर्मकेद्रित संस्कृति उनका वर्चस्व कायम रखने में मददगार होती हैं. संगठित अल्पसंख्यक अभिजन असंगठित बहुजन समूहों पर शताब्दियों से राज करती आए हैं; और आज भी कर रहे हैं. इस बात को भाजपा के नेता भलीभांति जानते हैं.

यह कहना तो अनुचित होगा कि शरद यादव जैसा अनुभवी और मंजा हुआ राजनीतिज्ञ इन तथ्यों से अनजान हो. लेकिन शीर्ष जातियों के सांस्कृतिक वर्चस्व से जूझने और अभिजन संस्कृति के मुकाबले जनसंस्कृति को खड़ा करने के लिए जो सोच, साहस, राजनीतिक दूरदृष्टि और संकल्पसामर्थ्य चाहिए, वह उनके पास नहीं है. इसलिए कि वे स्वयं भी जातिवादी राजनीति का उपज हैं. दूसरा बड़ा कारण है—‘थिंक टेंक’ का अभाव. भाजपा आज यदि सफल है तो उसके पीछे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का मजबूत वैचारिक स्रोत है, जो अपने ठेठ जातिवादी सोच को धर्म और राष्ट्रीयता के पर्दे में छिपाए रखता है. लेकिन संघ तो पहले भी था. अटलविहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता संघ के प्रति उतने ही आस्थावान और समर्पित थे, जितने आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. लेकिन उस समय तक समाजवादी पार्टी पर राममनोहर लोहिया और बसपा पर ज्योतिराव फुले, डॉ. आंबेडकर, पेरियार और कांशीराम के आंदोलन का असर था. उनका विरोध कांग्रेस का था जो जातिवादी राजनीति करते हुए भी अपने सोच को बहुजन हितकारी दिखाती थी. गांधी की वैचारिकी से बंधी होने का दावा करने वाली कांग्रेस दलितों और पिछड़ों के सीधे विरोध में जा ही नहीं सकती थी. सत्ता की राजनीति करतेकरते ये दल अपनी वैचारिकी से दूर हटते गए. संघ उस समय तक नेपथ्य में रहकर कार्य करने को विवश था. कांग्रेस के कमजोर पड़ते ही संघ खुलकर सामने आ गया. बड़ी चतुराई से वह दलितों और पिछड़ों के बीच दरार बनाने में कामयाब रहा. सोचीसमझी रणनीति के तहत संघ ने भाजपा की राजनीति में हस्तक्षेप करना आरंभ किया. चुनावों को सांप्रदायिकता का रंग देने के लिए पिछले चुनावों में उसने मुस्लिम उम्मीदवारों से किनारा किया. पिछड़ी जातियों में सैंध डालने के लिए मोदी जैसे घोर संघी मानसिकता के नेता को पिछड़ी जाति का बताकर भाजपा का मुखौटा बनाया. उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाजपा की जीत के बाद वह खुलकर मैदान में आ गया. समाज का सांप्रदायिक और जातीय विभाजन करने में इतना सफल हुआ कि प्रदेश की राजनीति में आगे मुखौटा लगाने की आवश्यकता ही नहीं समझी; और केशव प्रसाद मौर्य को किनारे कर, योगी आदित्यनाथ को सूबे की सत्ता का कर्णधार बना दिया गया. आरएसएस जैसे ‘थिंक टेंक’ के बल पर भाजपा का संघर्ष आरंभ से ही उर्ध्वगामी बना रहा. जाति केंद्रित राजनीति तक सीमित मुलायम सिंह यादव, मायावती, लालू यादव आदि ने कभी भी ‘थिंक टेंक’ की आवश्यकता को नहीं समझा. इसलिए उनकी सत्ता उनके अपने प्रदेशों में कैद रहने के साथसाथ बिखराव का शिकार होती रही.

ऐसे में शरद यादव से क्या उम्मीद रखी जाए? उल्लेखनीय है कि राजनीतिक वर्चस्व की अपेक्षा सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध लड़ाई हमेशा कठिन होती है. उसमें प्रतिद्विंद्वी के अलावा अपने लोग भी प्रतिपक्ष की भूमिका में रहते हैं. शताब्दियों से बौद्धिक दमन के शिकार रहे लोग धीरेधीरे उस व्यवस्था से अनुकूलित होकर, शोषणकारी व्यवस्था को साथ देने में ही अपना त्राण समझने लगते हैं. जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता, इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाते हैं. आर्थिक वंचना का शिकार, धनवान को देखकर सोच सकता है कि उसके पास अतिरिक्त धन क्यों है? मेरे पास क्यों नहीं है? इसी तरह राजनीतिक अधिपत्य के बीच जीता आया व्यक्ति राजीतिक रूप से शक्तिशाली व्यक्ति को देखकर सोच सकता है कि जो अधिकार उसके पास हैं, उतने ही अधिकार मेरे पास क्यों नहीं हैं? किंतु वर्चस्वकारी संस्कृति के जाल में फंसा नागरिक स्वेच्छा से उसमें फंसा रहता है. यह जानते हुए भी कि संस्कृति के नियम उसके बनाए नहीं हैं और उनका झुकाव पूरी तरह से शक्तिशाली वर्गों की ओर है; लोग उससे समझौता किए रहते हैं. शक्तिशाली वर्गों द्वारा गढ़ी गई संस्कृति, उत्पीड़ित वर्गों के विरुद्ध हथियार का काम करती है. उसके आगे समाज का बहुसंख्यक वर्ग बेबस बना रहता है. संस्कृति का नशा हमेशा उसपर सवार रहता है. वह भूल जाता है कि संस्कृति के नियम उसपर थोपे हुए हैं और बहुसंख्यक वर्गों को बौद्धिक दास बनाए रखने के लिए अभिजन समाज सदियों से उनका प्रयोग करता आया है. उसमें जनसाधारण की भूमिका केवल अनुगमन तक सीमित कर दी जाती है. परिणामस्वप व्यक्ति जिस हाल में है, उसी को श्रेष्ठतर माने रहता है. लोकप्रिय राजनीति आंदोलन नहीं, उसका केवल मिथ पैदा करती है. उसके बुद्धिजीवी उन प्रतीकों की सत्तोन्मुखी व्याख्या करने में जुटे रहते हैं. कतार में लगा उपासक कभी नहीं सोचता कि उसकी थाली खाली और दूसरे की जरूरत से ज्यादा भरी क्यों है. वह केवल अपनी श्रद्धा को सबकुछ माने रहता है. अभावों को सहना और उनके बीच जीना उसकी आदत बनने लगता है. वह मान लेता है कि समाज जो ऊंचनीच, अनाचारअत्याचार हैं उनके कारण समाज के बीच न होकर उससे बाहर हैं, इसलिए नियंत्रण से परे हैं.

इसका आशय यह नहीं कि शरद यादव जिस ‘सांझी संस्कृति’ को आधार बनाकर आंदोलनरत हैं, उसकी उपेक्षा की जानी चाहिए. संघ और भाजपा जिस विघटनकारी सोच को लेकर काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए सांझी संस्कृति और सहअस्तित्व की बात करना भी जीवनमूल्यों को बचाए रखने जैसा है. लेकिन परिवर्तनोन्मुखी राजनीति का संकल्प उठाने वाले किसी भी नेता को समझ लेना चाहिए कि उनका सामना केवल राजनीतिक शक्तियों से नहीं है. न ही केवल सत्ता परिवर्तन द्वारा सामाजिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन संभव है. इसलिए उन्हें राजनीतिकसामाजिक सघर्ष के साथसाथ जनता को धर्मसत्ता और अर्थसत्ता से टकराव के लिए भी तैयार करना चाहिए. आर्थिक असमानता से जूझ रहे समाजों में यह संघर्ष और भी कठिन हो जाता है. क्योंकि शक्तिशाली आर्थिक शक्तियां समाज के विपन्न वर्गों को आश्रित बनाए रखने के लिए सारे निर्णयाधिकार अपने पास रखती हैं. जनसाधारण जो समाज की मुख्य कार्यकारी शक्ति है, अपनी ताकत से अनजान किंतु अपनी जरूरतों के लिए आर्थिक शक्तियों पर निर्भर रहता है. उसे सदैव यह डर सताता रहता है कि आर्थिक शक्तियों की नाराजगी उसकी आजीविका के मामूली साधनों के लिए भी संकट का कारण बन सकती है. अतएव आमजन के आत्मविश्वास को बनाए रखना और उन्हें परिवर्तन की बड़ी लड़ाई के लिए तैयार करना, प्रत्येक राजनीतिकसामाजिक आंदोलन का उद्देश्य होना चाहिए. ‘सांझी संस्कृति’ का नारा यदि बहुसंख्यक वर्गों के आत्मविश्वास को बचाए रखने में सहायक होता है, तब भी वह आज की राजनीति में बड़ी उपलब्धि माना जाएगा.

©ओमप्रकाश कश्यप

मुखौटे की त्रासदी

सामान्य

शासक वर्ग और शासित वर्ग में से प्रथम वर्ग में लोगों की संख्या कम होती है, परंतु समस्त राजनीतिक कामकाज को यही वर्ग अंजाम देता है. सारी सत्ता केवल उसी हाथों में केंद्रित होती है. वह सत्ता के लाभों को प्राप्त करने में रस लेता है. इसके विपरीत दूसरा वर्ग बहुसंख्यक है. यह पहले वर्ग द्वारा कभी कमोबेश वैधानिक तरीकों से, तो कभी कम या अधिक स्वेच्छाचारपूर्ण एवं हिंसक तरीकों से चालित-नियंत्रित होता है….अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक समाज पर केवल इसलिए राज कर पाता है, कि वह संगठित है.गायतानो मोस्का, दि रूलिंग क्लॉस.

2014 में भाजपा की जीत के नायक मोदी जी थे. जीत इतनी शानदार थी कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे पार्टी के दिग्गज नेता नेपथ्य में खिसका दिए गए. इसे परिणाम कहें कि दुष्परिणाम, जो सरकार पूरे देश की मानी जाती है, उसे ‘मोदी सरकार’ कहा जाने लगा. कुछ नेता जीतकर भी पराजित नजर आए. राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश में अति-पिछड़ी जातियां को पार्टी से जोड़कर बड़ा काम साधा था. जिससे भाजपा की जीत की असली इबारत लिखी गई—‘हर-हर मोदी—घर-घर मोदी’ के नारों के बीच वह भी फीका पड़ गया. पूरी भाजपा मोदीमय थी. नतीजा यह हुआ कि चुनाव जीतने के तुरंत बाद जिन राजनाथ सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के बराबर का दावेदार माना जा रहा था, उन्हें दूसरे नंबर के पद से संतोष करना पड़ा. उसके बाद उपचुनाव हुए. भाजपा के लिए परिणाम आशा के विपरीत थे. बिहार, दिल्ली, केरल, पश्चिमी बंगाल जैसे प्रदेशों में वह कोई सफलता प्राप्त न कर सकी. सिवाय मीडिया के हर कोई मान चुका था कि मोदी का जादू उतार पर है. यहां तक कि पार्टी के भीतर से भी विरोधी स्वर उभरने लगे थे. कुछ नया करने की जरूरत थी. सो मीडिया को साधते हुए मोदीजी ने नोट-बंदी जैसा सबको हैरान-परेशान करने वाला कदम उठा लिया. चाहते तो फैसला लेकर रिजर्ब बैंक को आगे कर सकते थे. परंतु सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली. नोटबंदी की सफलता से अधिक असफलताएं सामने आईं. नोट बदलने के लिए कतार में लगे 130 लोगों को जान गंवानी पड़ी. नकदी के अभाव में बाजार सूने पड़ गए. शहरों में काम करने वाले लाखों मजदूर, कारीगर बेरोजगार होकर अपने ‘देस’ लौट गए. सरकार की खूब आलोचना हुई. मीडिया बचाव करता रहा. सरकार कदम-कदम पर संवेदनहीन नजर आई. मोदी और पार्टी नेता चुप्पी साधे रहे.

फिर एक समय ऐसा आया जब मोदी और मीडिया एक ओर थे, पूरा विपक्ष दूसरी ओर. यहां तक कि भाजपा के अपने ही लोग दबे स्वर में नोटबंदी के कदम को आत्मघाती बताने लगे थे. मानो सब कुछ सोची-समझी नीति के अनुसार हो. मोदी न केवल नोटबंदी को राष्ट्रहित में बताकर उसके लाभ गिनाते रहे, बल्कि विधानसभा चुनावों से ऐन पहले बेनामी संपत्ति का मसला उठाकर उन्होंने एक और धमाका कर दिया था. हर बार की भांति इस बार भी पूरा विपक्ष दो-फाड़ नजर आया. एक ओर मीडिया और मोदी. दूसरी ओर अपने आप से हैरान-परेशान विपक्ष जो सिवाय मोदी की आलोचना के बाकी सब मुद्दों पर विभाजित था. राजनीति के बड़े-बड़े पंडित समझ ही नहीं पाए कि नोटबंदी जैसे आत्मघाती कदम के तुरंत बाद बेनामी संपत्ति का मुद्दा उठाना मोदी तथा उनके सहयोगियों की चाल हो सकती है. मोदी यदि भ्रष्टाचार से सचमुच लड़ना चाहते तो सरकार के पास स्विस बैंक के खाताधारों की सूची तैयार थी. उनपर कार्रवाही करते; या फिर जांच एजेंसियों के माध्यम से भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाते; जैसा कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था. असल में वह आने वाले विधानसभा चुनावों में जनमत को ‘मोदी बनाम गैर-मोदी’ में बांट देने की कूटनीति थी, जिसमें वे कामयाब नजर आए. पूरा चुनाव मुद्दों के बजाय व्यक्तियों पर केंद्रित रहा. उसमें बाजी मोदी के हाथ लगनी थी, सो लगी.

लोकतंत्र में चुनावों का लोकहितकारी मुद्दों के बजाय कुछ चेहरों पर केंद्रित होकर रह जाना, अपने आपमें त्रासदी है. उसमें जनता के सवाल गौण हो जाते हैं. चूंकि चेहरों की स्पर्धा में मीडिया की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, इसलिए मीडिया से गठजोड़ से वास्तविक चेहरों के स्थान पर कठपुतलियां चुनावी समर में कब उतार दी जाती हैं, जनसाधारण को पता ही नहीं चलता. हाल के विधानसभा चुनावों में तो पक्ष-विपक्ष दोनों ही मुद्दों के साथ चुनावों में उतरने की हिम्मत खो चुके थे. भाजपा के लिए यह सबसे सुरक्षित मोर्चा था. उसे पूरा विश्वास था कि चुनाव को ‘मोदी बनाम अन्य’ कर देने से हिंदुत्व की सोच रखने वाला मतदाता, घुटनों के बल चलकर भी भाजपा को वोट देने आएगा. विरोधी मत जहां अलग-अलग हिस्से में बंट जाएंगे, वहीं समर्थन में इतने मत निकल आएंगे कि जीत का जश्न मनाया जा सके. इसी फार्मूले के तहत लड़े गए पिछले लोकसभा चुनाव में केवल 31 प्रतिशत मत पाने वाली भाजपा की जीत को धमाकेदार माना गया था, क्योंकि शेष 69 प्रतिशत मत अलग-अलग दलों में बंटकर बेअसर हो चुके थे.

यह समझना मुश्किल नहीं है कि जो भाजपा 2014 में विकास के मुद्दे के साथ आई थी, वह विधानसभा चुनावों को व्यक्तित्वों की लड़ाई में बदल देने को क्यों उत्सुक थी. दरअसल अपने तीन वर्ष के कार्यकाल में सिवाय पुरानी योजनाओं को आधे-अधूरे मन से आगे बढ़ाने के सरकार कुछ खास नहीं कर पाई है. पार्टी नेता जानते थे कि बढ़ती बेरोजगारी, सकल उत्पादन और व्यापार में गिरावट, मुद्रा स्फीति जैसे कई विषय हैं, जिन्हें विपक्ष उठाने लगा तो जवाबदेही कठिन हो जाएगी. यही समस्या प्रांतीय सरकारों के साथ भी थी. इसलिए वही हुआ जो भाजपा चाहती थी. चुनाव अभियान के दौरान एक-दूसरे को खूब अपशब्द कहे गए. शालीनता की सीमाएं पक्ष-विपक्ष दोनों ओर से जमकर लांघी गईं. जुबानी लड़ाई में जीत प्रायः बड़बोले की होती है, वही इन चुनावों में हुआ.

उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत के कई कारण गिनाए जा सकते हैं. प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो भी भाजपा ने ये चुनाव ज्यादा सूझबूझ, कूटनीति, प्रबंधकीय कौशल तथा कार्यकर्त्ताओं के साथ बेहतर तालमेल से लड़े थे. जीत के लिए उसने हर वह पैंतरा आजमाया जिसे वह आजमा सकती थी. संघ समझता है कि भारत का आम मतदाता किसी भी प्रकार के अतिवाद को पसंद नहीं करता. उग्र हिंदूवाद समाज के एक वर्ग को पार्टी के पक्ष में संगठित रख सकता है, अपने दम पर सरकार नहीं बनवा सकता. अगर ऐसा होता तो लालकृष्ण अडवाणी पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते तथा अटलविहारी वाजपेयी को उनके पीछे कदम-से-कदम मिलाकर चलना पड़ता. उस समय संघ और पार्टी ने अटलविहारी वाजपेयी के नरमपंथी ‘मुखौटे’ के पीछे चुनाव लड़ा था. उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियों के मन में भाजपा को लेकर अविश्वास था. इसलिए सरकार बनाने के लिए अटलजी को दूसरे दलों की मदद लेनी पड़ी थी. पिछले कुछ दशकों में दलितों और पिछड़े वर्गों में फूट डालने के लिए जमकर चालें चली गईं. राजनीति में स्थायी दोस्ती-दुश्मनी नहीं होती. परंतु मीडिया ने मुलायम और माया को उनके मतभेदों के आधार पर इतना भड़काया कि दोनों उसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई मान बैठे. अतिपिछड़ों को पिछड़ों तथा महादलितों को दलितों से अलग कर देने की रणनीति 2014 में कामयाब रही. पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पार्टी को ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जिसकी हिंदुत्व के प्रति निष्ठा असंद्धिग्ध हो. मोदी की उग्र हिंदुवादी छवि तथा उनका घोषित रूप से पिछड़े वर्ग का होना उनकी दावेदारी को पुष्ट करता था. ध्यातव्य है कि मोदी की अपनी जाति हमेशा से पिछड़े वर्गों में शुमार नहीं थी. गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वयं मोदी ने उसे पिछड़ी जातियों में शामिल किया था. कदाचित सोची-समझी दूरगामी रणनीति के तहत. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी जी का यह पिछड़ावाद दशकों से चली आ रही दलित एवं पिछड़ी जातियों की राजनीति में हलचल पैदा कर, जमे-जमाए दलित-पिछड़े नेताओं को किनारे कर देगा.

रणनीति के तहत बड़बोले भाजपाई नेता प्रायः उकसावे वाले बयान देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश लगातार करते रहते हैं. परंतु इन चुनावों के दौरान पार्टी अपेक्षाकृत शांत थी. इसलिए भी कि पूरा विपक्ष, विशेषकर उत्तरप्रदेश में, उसका मददगार बना था. वहां जीत के दावेदार दो प्रमुख दलों के बीच मुस्लिम मतों के लिए अलग तरह का दंगल जारी था. समाजवादी पार्टी का मानना था कि प्रदेश में उसे छोड़कर मुस्लिम मतदाताओं के लिए दूसरा कोई विकल्प नहीं है. लगभग सौ मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर बसपा भी एकमुश्त मुस्लिम मतों की उम्मीद लगाए बैठी थी. मायावती अपनी सभाओं में शान से बताती थीं कि उनकी पार्टी ने सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव में उतारे हैं. ऐसे दल के लिए जिसका गठन ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को पुष्ट करने के पीठिका पर हुआ हो, क्या ऐसा करना उचित था? प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 18 प्रतिशत है. टिकट दिए गए 24 प्रतिशत को. मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या में छह प्रतिशत की बढ़ोत्तरी अतिपिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व में कटौती के बाद ही संभव थी. कुछ ऐसा ही सपा ने भी किया था. जबकि समीकरण चाहे जो रहे हों, ये दोनों दल जब-जब सत्ता में आए हैं, जीत में अतिपिछड़ी कही जाने वाली जातियों का बड़ा योगदान रहा है. पहले यह वर्ग कांग्रेस का मतदाता था. आगे चलकर सपा और बसपा के बीच झूलने लगा. दोनों दलों की मूल वैचारिकी, जो केवल नारेबाजी तक शेष बची है—सामाजिक न्याय से जुड़ी है. एक बरास्ते फुले-अंबेडकरवाद तो दूसरी राममनोहर लोहिया के माध्यम से. इसलिए दोनों दल बहुजन हितों की नुमाइंदगी का दावा कर सकते हैं. इस बार दोनों अतिपिछड़ों की ओर से उदासीन थे. मायावती को अपनी जाति के एक-मुश्त वोटों का भरोसा क्या मिला, उन्होंने बाकी दलित एवं अतिपिछड़े वर्गों की उपेक्षा करनी शुरू कर दी. सोचती थीं कि मुसलमानों को साध लिया तो सब सधते चले जाएंगे. नतीजा यह हुआ कि गैर जाटव दलित और अतिपिछड़ी जातियां बसपा से छिटकने लगीं, जिसका लाभ सीधे भाजपा को मिला. इस तरह उत्तरप्रदेश में भाजपा को जीत सपा-बसपा ने थाली में सजाकर भेंट की है? जब ये तीनों पार्टियां प्रदेश के मुसलमानों को लुभाने के लिए एक किए थीं, भाजपा एक भी मुसलमान को टिकट न देकर, मतों के मौन धु्रवीकरण में लगी थी. जिन दिनों कांग्रेस के नेता प्रशांत किशोर के आगे दंडवत थे, संघ भाजपा के लिए प्रदेश में केसरिया कालीन बिछाने में लगा था. वैसे भी देश की सबसे बड़ी पार्टी का, उस पार्टी का जो स्वाधीनता समर से तपकर निकली हो, आंदोलन जिसका इतिहास रहा हो, वह अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से विश्वास खोकर चुनाव-प्रबंधकों की शरण में चली जाए, सीधे-सीधे उसके नेताओं के अपरिपक्व सोच और आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है.

भाजपा की जीत में सपा का योगदान भी कम नहीं हैं. मुलायम सिंह ने उसे अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के कारण गढ़ा था. लोहिया और समाजवाद का नाम पार्टी ठीक ऐसे ही इस्तेमाल करती है, जैसे कांग्रेस गांधी और गांधीवाद का. मुलायम सिंह के नेतृत्व में पार्टी में खूब परिवारवाद पनपा. आंतरिक कलह से जूझ रही समाजवादी पार्टी अपने परंपरागत वोटों के अलावा ब्राह्मणों और ठाकुरों को साधने में जुटी थी. यह कुछ ऐसा ही था जैसे अपने घर की रखवाली छोड़ दूसरे के घर में ताकझांक करना. उधर मीडिया प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में यह प्रचारित करने में जुटा था कि समाजवादी पार्टी के राज में केवल यादवों तथा बसपा के राज्य में सिर्फ जाटवों को लाभ पहुंचा है. अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए मीडिया के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था. सपा और बसपा दोनों इसका खंडन सकती थीं. परंतु एक ने भी प्रतिवाद नहीं किया. कदाचित एकमुश्त जातीय मतों के लालच में वे इस भ्रम(!) को बनाए रखना चाहते थे. इससे अतिपिछड़े वर्गों का भरोसा इन दलों से टूटा और लगभग बिना किसी शर्त के वे भाजपा से जुड़ते चले गए. यह जानते हुए भीकि भाजपा के पास उनके लिए न तो कोई नया विचार है, न ही योजना. जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का समर्थन वह करती है, उसमें शूद्रों के लिए कोई सम्मानजनक स्थान नहीं है. बल्कि लोकतंत्र के बल पर जो अधिकार और अवसर उन्होंने प्राप्त किए हैं, उनके भी छिन जाने की संभावना है.

संघ के लिए राजनीतिक परिवर्तन उतना आवश्यक नहीं है, जितना कि सांस्कृतिक परिवर्तन. राजनीति उसके लिए सिर्फ औजार है, जिससे वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और प्रकारांतर में हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करना चाहता है. उसकी सारी प्रेरणाएं और विमर्श वर्ण-व्यवस्था समर्थक वेदादि ग्रंथों, स्मृतियां और महाकाव्यों से आते हैं. उस व्यवस्था में खुद को पिछड़ी जाति का बताने वाले मोदी को प्रधानमंत्री पद देना ‘आपद्धर्म’ हैं; जबकि आदित्यनाथ के हाथों में सत्ता आना उनका स्वाभाविक कर्म. यह अनायास नहीं है कि विगत चार-पांच वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति में सर्वाधिक स्पेस घेरने वाले मोदी इन दिनों मीडिया के फोकस से बाहर हैं. आदित्यनाथ उनसे कहीं अधिक स्पेस घेर रहे हैं. 2019 के चुनावों की तैयारी पर आदित्यनाथ का बयान दर्शाता है कि आने वाले समय में बहुत कुछ बदलने वाला है. लगता है, संघ मान चुका है कि ‘मोदी मैजिक’ से जितना काम लेना था, लिया जा चुका है? कि यह इशारों या प्रतीकों के माध्यम से बात करने का नहीं, सीधी कार्रवाही का समय है. उसके लिए योगी आदित्यनाथ ज्यादा उपयोगी सिद्ध होंगे. हो सकता है, अमेरिका में टं्रप का उभार इसकी तात्कालिक प्रेरणा हो. तो क्या मोदी पार्टी के लिए महज मुखौटे थे? ठीक ऐसे ही जैसे कभी अटल पार्टी के मुखौटे कहे जाते थे? सच तो यही है कि हिंदुत्व के जिस सांस्कृतिक परिक्षेत्र के रूप में संघ और भाजपा भारत की परिकल्पना करते हैं, उसमें एक शूद्र की नियति इससे अधिक हो ही नहीं सकती. अगर माहौल अनुकूल रहा तो संघ की अगली कोशिश संविधान का हिंदूकरण करने की होगी. एक तरह से मनुवाद की वापसी. यह कार्य आसान नहीं है. किंतु पिछड़ों और दलितों का बिखराव तथा उनके नेताओं के अहं का टकराव इसी तरह रहा तो दूर-भविष्य में यह असंभव भी नहीं हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

 

 

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—तीन

सामान्य

‘रिपब्लिक’ के चौथे खंड में सूत्रधार की भूमिका ग्लाकॉन और एडीमेंटस संभालते हैं. पहले खंड में जहां न्याय क्या नहीं है, जानने का प्रयत्न किया गया है, चौथे खंड में प्लेटो ‘न्याय क्या है’ यह बताने की कोशिश करता है. शुरुआत करते हुए ग्लाकॉन ‘शुभत्व’ को तीन हिस्सों में परिभाषित करता है. आंतरिक, जैसे कि सुख, आनंद, वस्तुनिष्ठ जैसे कि सुख-सुविधा के संसाधन, धन जिससे सुख-समृद्धि बटोरी जा सकती है. तीसरा आंतरिक और वस्तुनिष्ठ जैसे कि स्वास्थ्य. तीनों में से एक का भी अभाव मनुष्य को अपूर्णता का एहसास कराता है. ग्लाकॉन द्वारा यह पूछने पर कि तीनों में से कौन-सा शुभत्व न्याय है, सुकरात तीसरे का समर्थन करता है. सुकरात मानता है कि उससे न्याय को समग्रता में परखा जाता है. लेकिन वह अपने निर्णय के समर्थन में पर्याप्त तर्क देने में असमर्थ रहता है. ग्लाकॉन न्याय संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहता है कि न्याय दूसरों को हानि पहुंचाने तथा जरूरतमंद की मदद के बीच संतुलन हेतु व्यक्तिमात्र की अपने प्रति प्रतिबद्धता है. ऐसा करते हुए वह स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने का काम करता है. स्वार्थपरकता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है. वह व्यक्ति को व्यक्ति और समाज दोनों के प्रति गैर-जिम्मेदार बनाती है. मानव की स्वाभाविक कमजोरियों लालच, स्वार्थ आदि को स्वीकारते हुए ग्लाकॉन न्याय को उनसे दूर रहने तथा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनाए रखने वाली प्रेरणाशक्ति के रूप में स्वीकारता है. उसके अनुसार न्यायशील व्यक्ति का अपने और समाज के प्रति ईमानदार रहना आवश्यक है. यदि ऐसा नहीं है. यदि कोई व्यक्ति यह भ्रम रखते हुए कि केवल वही न्याय के पथ पर है, दूसरों की आलोचना करता है तथा उनपर अपना स्वार्थ थोपने का प्रयास करता है. तो ऐसे कथित न्यायशील व्यक्ति की अपेक्षा अन्याय का समर्थन करना उचित है. उसके अनुसार न्याय की एकमात्र कसौटी वृहद सामाजिक हित में है.

ग्लाकॉन के अनुसार न्याय कृत्रिम चीज, रूढ़ियों की उपज है. इसके लिए उसके तर्क अपने साथियों से थोड़ा हटकर हैं. वह कहता है कि प्राकृतिक अवस्था में लोग अन्याय करते और सहते हैं. लेकिन अन्याय की मात्रा व्यक्ति की शक्ति पर निर्भर करती है. जो अधिक शक्तिशाली है, वह तदानुरूप अधिक अन्याय करने में सक्षम होता है. इसलिए जब कमजोर यह देखते हैं कि वे उतना अन्याय करने में अक्षम हैं, जितना उन्हें सहना पड़ता है, तब वे संगठन के विवश होते हैं. इस तरह न्याय सबल की नहीं, दुर्बल की आवश्यकता और इच्छा का परिणाम बन जाता है. उसके माध्यम से वह अपने से शक्तिशाली के व्यवहार को नियंत्रित करने का सपना देख सकता है. एक संविदा के तहत, जिसका आधार धर्म भी हो सकता है और संविधान भी, वे एक-दूसरे के प्रति अत्याचार न करने, न ही सहने के लिए वचनबद्ध होते हैं. धीरे-धीरे वह संविदा कानून का रूप ग्रहण कर लेती है. लेकिन मानव-प्रवृत्ति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जब उसको लगता है कि किसी कानून या बल के आधार पर उसे नियंत्रित करने की तैयारी हो रही है, तो वह विरोध पर उतर आता है. परिणामस्वरूप समाज में जिसका गठन सहअस्तित्व की भावना के साथ हुआ था, कुछ लोग बल की भाषा बोलने-समझने लगते हैं. इससे समाज के वर्ग के भीतर भय उमड़ने लगता है. उसी से न्याय की उत्पत्ति होती है. ग्लाकॉन के अनुसार, ‘न्याय सबसे अच्छे और सबसे बुरे के बीच का रास्ता, एक समझौता है. सर्वोत्तम यह है कि मनुष्य अन्याय से दूर रहे, ताकि दंड से बचा रहे और सबसे बुरा यह है कि अन्याय सहे और बदला न ले सके.’ निर्बल सबल से बदला कैसे ले सकता है? वह जानता है कि वह अकेला शक्तिशाली का सामना नहीं कर सकता. अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वह अपने ही जैसे लोगों के साथ समझौते को बाध्य होता है. चूंकि समाज में कमजोरों की संख्या अधिक होती है, इसलिए बहुसंख्यक वर्ग की सम्मिलित शक्ति अल्पसंख्यक शक्तिशाली वर्ग से अधिक हो जाती है. शक्तिशाली वर्ग इस सत्य को भली-भांति समझता है. इसलिए वह निरंतर इस प्रयास में रहता है कि शक्ति-विपन्न वर्गों में फूट डालकर उन्हें एकजुट होने से रोक सके. अल्पसंख्यक शक्तिशाली समूहों की बहुसंख्यक शक्ति-विपन्न समूहों पर शासन करने की योग्यता, प्रायः इस बात पर निर्भर करती है कि वह उन्हें बांटे रखने में कितना सफल हो पाता है. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग-भेद आदि ऐसे ही माध्यम हैं जो असल जिंदगी में अनुपयोगी होने के बावजूद बहुसंख्यक समाज को बांटे रखने में सहायक होते हैं.

थ्रेचाइमच्स ने ‘ताकतवर हमेशा सही’ कहते हुए न्याय को ‘शक्तिशाली का स्वार्थ’ माना है. जबकि गलाकॉन न्याय की उत्पत्ति भय से मानता है. दोनों न्याय तक पहुंचने के लिए धुर-विपरीत ध्रुवों से अपनी विचार-यात्रा की शुरुआत करते हैं. यह प्लेटो की विशिष्ट शैली है. इसके माध्यम से वह किसी दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अपने मंतव्य को प्रत्येक दृष्टिकोण से परख लेना चाहता है. ग्लाकॉन का विचार वृथा नहीं गया. मध्यकाल में हॉब्स जैसे विचारकों ने भी उसका समर्थन किया है. ग्लाकॉन के विचारों में हमें परंस्पर अंतर्विरोधी तत्व दिखाई पड़ते हैं. परंतु ये अंतर्विरोध अकेले  ग्लाकॉन के नहीं है. यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह आसन्न संकट पर विजय की क्षीण संभावनाएं देख समझौते पर उतर आता है. उसके लिए लिखित-अलिखित संविदा करता है. लेकिन धीरे-धीरे वह उस वातावरण से ऊबने लगता है. हालात अनुकूल देख के शक्तिशाली वर्गों की महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगती हैं. और वे उन शक्तियों की अवहेलना करने लगते हैं, जिन्होंने उनके अस्तित्व को संभव बनाया है. वे भी मानते हैं कि कि न्याय मनुष्य के अंतर्मन की वस्तु नहीं है. समाज उसका सृजन करता है और फिर राज्य-सत्ता के सहयोग द्वारा लागू करता है. समाज में न्यायी और अन्यायी दोनों प्रकार के लोग हो सकते हैं. लेकिन न्यायी और अन्यायी को तभी रेखांकित किया जा सकता है, जब समाज में बल-प्रयोग की शक्ति हो. ग्लाकॉन और हॉब्स दोनों इस तथ्य से करीब-करीब सहमत नजर आते हैं कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी होता है. साधारणतः वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, और यह मानते हुए कि दूसरे उसके जितने श्रेष्ठ नहीं हैं, उसे अपनी श्रेष्ठता पर खतरा दिखाई पड़ता है. यह अंतर्विरोध या कि आत्मसंघर्ष मनुष्य को दूसरों से सहयोग और समझौते के लिए प्रेरित करता है. स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठतर सिद्ध करने की प्रवृत्ति मनुष्य की यशलिप्सा के रूप में प्रकट होती है. जाहिर है समाज में रहते हुए व्यक्ति को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक संघर्ष से भी गुजरना पड़ता है. यही द्वंद्व समाज में न्याय को प्रासंगिक बनाता है.

केफलस, पॉलीमार्क्स, थ्रेचाइमच्स और ग्लाकॉन सब न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करते हैं. उसके लिए वे अलग-अलग तर्क देते हैं. सुकरात को बीच में लाकर प्लेटो उनकी मान्यता के कमजोर पक्षों की ओर इशारा करता है. अलग-अलग दिखने वाले उन विचारों में प्लेटो को जो सामान्य बात नजर आती है, वह यह है कि चारों न्याय को बाहरी चीज मानते हैं. उनके अनुसार न्याय चूंकि बाहर की चीज है इसलिए किसी न किसी रूप में वे सभी मनुष्य की क्षमताओं, उसकी प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर संदेह कर रहे होते हैं. चारों के दर्शन में प्लेटो को यही बात सर्वाधिक अखरती है. मन से कवि और विचारों से दार्शनिक प्लेटो मनुष्य और मनुष्यता में अपने विश्वास को कम नहीं होने देता. इसलिए वह यह सिद्ध करने में जुट जाता है कि न्याय बाहरी वस्तु न होकर मनुष्य के आंतरिक बल का परिचायक है. वह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय न तो बाहरी सौगात है, न ही रूढ़ि न ही किसी अदृश्य सत्ता की ओर से उपहार. असल में वह मनुष्य की अपनी महिमा, उसका आंतरिक बल, ओज और तेज है. वह बताता है कि उसके साथी न्याय पर समग्रता से विचार करने के बजाय, उसके परिस्थितिगत लक्षणों पर विचार कर रहे हें. इसलिए न्याय को लेकर उनके विचार अधूरे और अपर्याप्त हैं. उसके अनुसार न्याय मानव प्रकृति की उच्चतम अवस्था है. समाज का अपना व्यक्तित्व होता है. सीमित संदर्भों में जहां न्याय मानव-मात्र की आंतरिक शुभता का परिणाम हैं, वहीं व्यापक संदर्भों में वह समाज की आंतरिक शुभता को भी दर्शाता है. इसकी विवेचना हेतु प्लेटो पुस्तक का उदाहरण देता है. मान लीजिए एक व्यक्ति के पास किसी पुस्तक की दो प्रतियां हैं. उनमें से एक बड़े अक्षरों में टाइप होने के कारण काफी मोटी है, दूसरी छोटे अक्षरों में, आकार में अपेक्षाकृत छोटी है. हालांकि दोनों प्रतियों की विषय-वस्तु में कोई अंतर नहीं है. फिर यदि किसी व्यक्ति को उन्हें पढ़ने को दिया जाए तो वह बड़े फांट की पुस्तक को पढ़ना पसंद करेगा. यही उसके लिए आसान भी होगा. भले ही बड़े अक्षरों वाली पुस्तक को लाना-ले-जाना उसके लिए कठिन हो. प्लेटो के अनुसार व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय में यही अंतर है. दोनों मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसके सदाचार और सद्गुणों की उत्पत्ति होता है. समाज में जाकर उसका रूप बड़ा हो जाता है. वह व्यक्ति से अधिक समाज को समझने पर जोर देता है. अपने दायरे के कुछ लोगों को वह दूसरों से अधिक जान पाता है तो इसलिए कि वे उसकी सामाजिकता के दायरे में हैं. आदर्श समाज में किसी नागरिक को जानने और समाज को जानने में अंतर नहीं होता. न्याय की इस विशेषता को समाज के प्रति सकारात्मक सोच और वृहद संदर्भों में ही परखा जा सकता है. इसके लिए प्लेटो स्पष्ट करता है कि कोई राज्य अपनी धन-संपदा या शक्ति के बल पर आदर्श नहीं बनता. आदर्श राज्य अपने नागरिकों के श्रेष्ठतम चरित्र से आकार लेता है.

चर्चा के अगले चरण में एडीमेंटस विमर्श में शामिल हो जाता है. न्याय की उसकी व्याख्या सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित तथा आत्मपरक है. उसके अनुसार लोग अपने बच्चों को न्याय का समर्थन करना इसलिए नहीं सिखाते क्योंकि वह शुभता का प्रतीक है. बल्कि इसलिए सिखाते हैं कि बच्चे बड़े होकर उनका साथ दे सकें. प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि एडीमेंटस न्याय को पारिवारिक सुख तक सीमित रखकर, राज्य की उपेक्षा कर रहा है. लेकिन ऐडीमेंटस निरा परिवारवादी नहीं है. उसका समाज में भरोसा है. वह मानता है कि समाज कोई अमूर्त्त अवधारणा नहीं है. किसी भी व्यक्ति का समाज उसके आसपास के परिवेश से बनता है, जिसमें उसमें परिवार भी सम्मिलित होता है. इसलिए परिवार और परिवेश के प्रति निष्ठा प्रकारांतर में समाज के प्रति निष्ठा की परिचायक है. अतएव व्यक्ति को न्याय के प्रति अनुरक्त करने का सर्वात्तम रास्ता है कि उसके परिवेश में सुधार लाया जाए. ऐसे परिवेश का निर्माण किया जाए जिसमें उसे न्यूनतम अंतर्द्वंद्वों का सामना करना पड़े. समाज और सामाजिकता में विश्वास बनाए रखने का दायित्व व्यक्ति और समाज दोनों का है. ऐडीमेंटस आगे कहता है कि न्याय से लोगों को परचाने, उसके अनुपालन करने हेतु धार्मिक शिक्षा अपर्याप्त है. वह न्याय को राज्य एवं नागरिकों के बीच शुभता के आदान-प्रदान के रूप में प्रभावी करने के बजाए, उसे दैवीय बना देती है. धार्मिक व्यक्ति कहता है—यदि तुम दूसरों के साथ न्याय करोगे तो ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा, तुम्हें उसका पारितोषिक देगा. और यदि तुम अन्याय करोगे तो ईश्वर की निगाह में दंड के भागी बनोगे. स्वर्ग-नर्क की अवधारणा, मोक्ष आदि न्याय के ऐसे ही भ्रांत स्वरूप हैं. ऐसे में व्यक्ति जो करता है, वह या तो डर के कारण, अथवा दूसरों के विवेक से अनुशासित होकर. कर्तव्य एवं न्याय-भावना को भुलाकर पूजापाठ, दान-पुण्य आदि के बहाने वह ईश्वर को खुश करने की कवायद में जुट जाता है. चूंकि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए धार्मिक व्यक्ति का न्यायबोध सिवाय भ्रांति के कुछ नहीं होता. यह भ्रांति न केवल उसके अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है. इसके चलते ईश्वरीय न्याय को ही वास्तविक न्याय मानने का दावा करने वाले उसके नाम पर मनमानी करने में सफल हो जाते हैं. न्याय सामाजिक शुभता का दूसरा नाम है. अवास्तविक अथवा काल्पनिक पात्रों के सहारे समाज द्वारा उसकी सिद्धि असंभव है. न ही उसे भय फैलाकर प्राप्त किया जा सकता है. ईश्वर के नाम पर होने वाला न्याय पुरोहित तथा उसके चेले-चपाटों के बीच चढ़ावे की हिस्सेदारी में सिमटकर रह जाता है. धर्म को लेकर एंडीमेटस का दृष्टिकोण कई मायने में महत्त्वपूर्ण है. वह न्याय के बारे में आधुनिक विचारधाराओं से मेल खाता है. जान लॉक, रूसो, बैंथम, फायरबाख, कार्ल मार्क्स, से लेकर पीटर क्रोप्टोकिन तक सभी विचारक जीवन में धर्म के अतिरेकी विस्तार तथा उसे न्याय का पर्याय मानने वाली मानसिकता का विरोध करते आए हैं. इसी का प्रभाव है कि धर्म को आधुनिक राज्यों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया से अलग-थलग कर दिया गया है.

वैसे भी धर्म और न्याय का कोई अंतःसंबंध नहीं है. आरंभ से ही धर्म अभिजन-हितों का समर्थक-साधक रहा है. इसके अनगिनत उदाहरण रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. महाभारत-युद्ध को प्रायः धर्म-युद्ध कहकर प्रचारित किया जाता है. युद्ध के प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभाता हुआ कृष्ण अठारह अक्षौहिणी सेना, जो उस समय विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई थी, को एक-दूसरे से भिड़ाकर भगवान बन जाता है. उस युद्ध का प्राप्य क्या था? युधिष्ठिर को राज्य मिला. पर अठारह अक्षौहिणी सेना का हिस्सा बनकर लड़े सैनिकों या उनके परिजनों को क्या मिला? इसपर महाभारत या इतिहास की किसी पुस्तक में कोई उल्लेख नहीं है. आज भी इस पर कोई चर्चा नहीं करता. बस धर्म-युद्ध मानकर उसपर उठने वाले प्रत्येक सवाल पर पर्दा डाल दिया जाता है. युधिष्ठिर के धर्म-राज्य में प्रजा का क्या हाल था, पता नहीं. परंतु स्वयं महाभारत का संकेत है कि उस युद्ध ने एक परजीवी वर्ग को जन्म दिया था, जो इतना शक्तिशाली था कि नवनियुक्त सम्राट की आंखों के सामने किसी की भी हत्या कर सकता था. धर्मराज होने का दावा करने वाला युधिष्ठिर उसको देखकर भी चुप रहने को विवश था. यह उदाहरण महाभारत के शांतिपर्व से है—

‘कुरुक्षेत्र के महाभारत के बाद जब पांडव विजयी होकर लौटे तो प्रजा उनके स्वागत को उमड़ पड़ी थी. हजारों ब्राह्मण भी दान की अभिलाषा युधिष्ठिर को आशीर्वाद देने के नाम पर नगर-द्वार पर आ जुटे. जैसे ही युधिष्ठिर का रथ आता दिखाई पड़ा, प्रजा उसकी जय-जयकार करने लगी. नगर-द्वार पर जमा ब्राह्मण स्तुतिगान में लग गए. उस खुशनुमा माहौल में एक श्रमण साधुओं के बीच से अचानक निकला और युधिष्ठिर को देखकर कहने लगा—

‘हे युधिष्ठिर! तुमने अपने बंधुओं की हत्या की है. स्वजनों की हत्या और गुरुजनों का नरसंहार करके तुम्हें क्या मिला? तुम पापी हो. तुम्हें क्षोभ से मर जाना चाहिए.’

युधिष्ठिर स्तब्ध. लोगों को काटो तो खून नहीं. कुछ पलों के लिए ब्राह्मणों को भी मानो सांप सूंघ गया. अपराधबोध का मारा युधिष्ठिर सचमुच मर जाना चाहता था. अचानक ब्राह्मण दल को चेत हुआ. सारे के सारे ब्राह्मण एक-साथ चिल्लाने लगे—‘यह हमारा प्रतिनिधि नहीं है. हम ऐसा नहीं सोचते. यह पापी चार्वाक है. इस अधर्मी को जीने का कोई अधिकार नहीं है.’

यह कहकर सारे साधु उस श्रमण पर टूट पड़े. धर्मावतार युधिष्ठिर की आंखों के सामने उसे जीते-जी भस्म कर दिया गया.’

धर्म के नाम पर ऐसे ही अमानवीय न्याय का उदाहरण वेन की कहानी के रूप में आया है. पुराणों में वेन को विश्व का पहला निर्वाचित सम्राट बताया गया है. कहानी के अनुसार आर्यों ने जब कृषि की शुरुआत की और उसके लिए एक जगह टिककर रहना आरंभ किया तो सुरक्षा के लिए राजा चुनने का विचार सामने आया. ऐसा व्यक्ति जो जरूरत के समय उनका नेतृत्व कर सके. उस समय लोगों ने सर्वसम्मिति से वेन को अपना राजा निर्वाचित किया. वेन ने न्याय करते हुए जमीन का समुचित विभाजन किया. ब्राह्मण चूंकि शिक्षा का दायित्व संभाले हुए थे, उन्हें अनेक कर्मकांडों में लिप्त रहना पड़ता था, इसलिए उन्हें नदी किनारे की उपजाऊ जमीन दी गई. लोग खेती करने लगे. वेन के नेतृत्व में विश् तरक्की करने लगा. लेकिन खेती तो मौसम पर निर्भर थी. एक बार भयंकर अकाल पड़ा. पूरा विश् भूख की चपेट में आ गया. लोग तड़फ-तड़फकर मरने लगे. जब तक सुख देती थी, तब तक नई व्यवस्था लोगों को हितकारी लगती थी. मौसम की मार के साथ ही उसकी कमजोरी सामने आ गई. लोग वेन को दोष देने लगे. एक राजा का दायित्व निभाते हुए वेन ने विश् के लोगों की बैठक बुलाई. ब्राह्मणों को दी गई भूमि पर अब भी खेती हो रही थी. नदी किनारे होने का उसे लाभ मिला था. वेन उनसे आपद्धर्म के रूप में कृषि उपज को जरूरतमंदों के बीच बांटने का आग्रह किया. इसपर वे चिढ़ गए. लोगों को राजा के विरुद्ध भड़काने लगे. भूखे लोगों का दिलो-दिमाग सुन्न हो चुका था. आक्रोश जब सीमा पार कर गया तो भूखे से अकुलाए उग्र विश-वासियों ने राजा पर हमला कर दिया. इस तरह प्रथम निर्वाचत राजा अपने ही लोगों के हाथों मारा गया.

विमर्श के अगले चरण में प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्याय को उसकी लोकोन्मुखता तथा वृहद सामाजिक हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. न कि उन व्यक्तियों के व्यवहार से जो न्याय प्रक्रिया में सम्मिलित होने की दावेदारी करते हैं. न्याय-संबंधी विमर्श में अनेक लोगों को सम्मिलित कर वह तत्कालीन समाज में प्रचलित न्याय के परंपरावादी, उग्रवादी एवं व्यवहारवादी स्वरूपों की समीक्षा करता है. अंततः उसका संवेदनशील कवि हृदय उसको आदर्शवाद के समर्थन में ले जाता है. सुकरात के माध्यम से वह स्पष्ट करता है कि न्याय मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसका सदाचरण है—‘यदि कोई व्यक्ति अपने दायित्वों का समुचित वहन करता है, तो उसका आचरण ही उसकी न्याय-प्रियता का प्रमाण बन जाता है.’ वह मानता है कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है. मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का समयानुसार पालन करना ही न्याय है. जाहिर है प्लेटो के लिए न्याय कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर आचरण की वस्तु है. क्या न्याय की शिक्षा दी जा सकती है? इसी से जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या शिक्षा व्यक्ति को अधिक न्यायशील बनाती है. प्लेटो शिक्षा की उपयोगिता से इन्कार नहीं करता. व्यक्तित्व विकास हेतु शिक्षा अनिवार्य है. तथापि उसके अनुसार शिक्षा साध्य नहीं है. वह केवल साधनमात्र है. उसका महत्त्व व्यक्ति को राज्य का योग्यतम सदस्य बनाने में मदद करना है. शिक्षा के अलावा अधिकार चेतना, जिसमें अपने साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का बोध भी जरूरी है तथा कर्तव्य के प्रति जागरूकता और समर्पण का भाव व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करता है. ‘रिपब्लिक’ की शुरुआत वह व्यैक्तिक नैतिकता एवं न्याय-प्रिय व्यक्ति के न्याय-संगत जीवन की विशेषताओं से करता है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते स्थिति साफ होती जाती है. पता चलता है कि लेखक का उद्देश्य संपूर्ण समाज को न्याय एवं नैतिकता से बंधे हुए देखना है. वह मानता है कि न्याय समाज का विशिष्ट गुण है. यह गुण समाज में बाहर से नहीं आता. बल्कि उसके नागरिकगण अपने न्याय-संगत आचरण द्वारा उसे संभव बनाते हैं. न्याय तथा औचित्य अथवा अन्याय एवं अनौचित्य जिस प्रकार व्यक्ति के गुण-दोष हो सकते हैं, उसी प्रकार ये समाज के भी गुण-दोष हो सकते हैं. न्याय व्यक्ति एवं समाज को परस्पर अन्योन्याश्रित, पूरक एवं प्रेरक बनाता है.

आधुनिक विचारक जॉन रॉउल न्याय को सामाजिक संस्थाओं का विशेष लक्षण मानता है. उसके अनुसार—‘न्याय सामाजिक संस्थाओं का शुभत्व है. उसका वही महत्त्व है जो वैचारिक उद्यमों में सत्य का होता है.’8 प्लेटो के लिए न्याय एवं नैतिकता में कोई अंतर नहीं है. दोनों परस्पर पूरक और पर्याय हैं. आदर्श स्थिति वह है जब व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर न्याय में अंतर मिट जाता है. इसके लिए प्लेटो समाज को शासक, रक्षक और कृषक तीन हिस्सों में बांटता है. जैसे भारत में शूद्रों को वर्ण विभाजन में सबसे निचले स्तर पर रखा गया है और दासों को वर्ण विभाजन में स्थान ही नहीं दिया गया है, इसी प्रकार प्लेटो के आदर्श राज्य में भी दासों को कार्यविभाजन से बाहर रखा गया है. दोनों ही जगह उनकी स्थिति खरीदी गई वस्तु या संसाधन के समान है. बावजूद इसके दोनों में बड़ा अंतर है. प्लेटो का सिद्धांत पूरी तरह से सामाजिक जरूरतों और विकास के नजरिये पर आधारित है. वह किसी व्यक्ति को जन्म, लिंग अथवा उसकी पैत्रिक पहचान के आधार पर छोटा या बड़ा घोषित नहीं करता. व्यक्ति का चयन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर, विशुद्ध योग्यता के आधार पर हो—इसके लिए वह बच्चों का पालन-पोषण सात वर्ष का होते ही—माता-पिता से दूर, उसकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने की अनुशंसा करता है. ताकि बड़े होने पर उनमें जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न किया जा सके. भारत में कार्यविभाजन इससे भिन्न था. वेदों, स्मृतियों तथा धर्म-सूत्रों में कार्यविभाजन के नाम पर समाज को चार वर्गां में बांटने का विधान रचा गया है. हालांकि दावा यह किया गया है कि वह विशुद्ध गुणों पर आधारित विभाजन हे और कोई मनुष्य अपने गुण एवं प्रतिभा के आधार पर वर्ग-अंतरण कर सकता है. परंतु वास्तविकता इससे अलग है. कर्म-गुण के आधार पर भारतीय समाज में वर्ग-अंतरण के उदाहरण इतने विरल हैं कि उन्हें अपवाद मानकर छोड़ा जा सकता है. भारतीय विशेषकर हिंदू समाज में जाति-व्यवस्था दास प्रथा की अपेक्षा कहीं अधिक निकृष्ट और भयावह थी. अपने स्वामी की अनुकंपा अथवा तय मूल्य-राशि का भुगतान करने के पश्चात दास अपनी स्वतंत्रता खरीद सकता था. जातिप्रथा में दबे शूद्रों को इस प्रकार के अवसर उपलब्ध न थे. जाति जन्म के साथ जीवन में प्रवेश करती और मरण तक देह और मन से चिपकी रहती थी. ‘रिपब्लिक’ में कार्य-विभाजन नीति-सम्मत है. प्लेटो व्यक्ति के गुण-दोष के अनुसार उसे उपयुक्त जिम्मेदारी सौंपने की सिफारिश करता है, ताकि उसकी योग्यता का समाज-हित में भरपूर इस्तेमाल किया जा सके. भारतीय, विशेषकर हिंदु समाज में जातीय विभाजन धर्म-सम्मत व्यवस्था है. जाति-व्यवस्था के लिए व्यक्ति की रुचि एवं योग्यता कोई मूल्य नहीं है. वह सबकुछ जन्म के आधार पर, बिना व्यक्ति की रुचि अथवा योग्यता देखे, काम सौंपने में विश्वास रखती है. इसलिए उसमें बदलाव सरल नहीं है. दूसरी ओर प्लेटो का कार्य-विभाजन अधिक वैज्ञानिक, निष्पक्ष और राज्य-कल्याण की भावना से भरा है.

‘रिपब्लिक’ मानवीय मेधा की अमूल्य धरोहर है. उसकी प्रशंसा करते हुए बार्कर ने लिखा है—न्याय रिपब्लिक की आधारशिला है. और रिपब्लिक न्याय की मूल अवधारणा का संस्थागत रूप है.’ ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने कहा है कि समाज के तीनों वर्गों को बिना एक-दूसरे के कार्य में व्यवधान उत्पन्न किए, काम करते रहना चाहिए. सब अपना-अपना कार्य मनोयोग से करेंगे तो सामाजिक शांति और सद्भाव बना रहेगा. राज्य आत्मनिर्भर बनेगा. अंतर्द्वंद्व घटेंगे और उनके समाधान में खप रही ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग लोककल्याण के निमित्त संभव हो सकेगा. सेबाइन ने प्लेटो के न्याय-सिद्धांत को सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक माना है. उसके अनुसार—‘न्याय वह बंधन है जो मानव-समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है. यह उन व्यक्तियों के सहयोग और समन्वय का नाम है जो अपनी शिक्षा-दीक्षा, योग्यता एवं रुचि के अनुसार अपने कर्तव्य का चयन करते हैं और फिर अपनी संपूर्ण निष्ठा से उसके अनुपालन में लगे रहते हैं. अपनी निष्ठा एवं समर्पण भावना से वे समाज को संपूर्ण एवं आत्मनिर्भर बनाते हैं. ऐसा समाज जो संपूर्ण मानव-मनस् की रचना हो, जिसमें हर कोई अपना प्रतिबिंब देख सके. सामाजिक जीवन के ऐसे ही मूलभूत, उदात्त रूप को प्लेटो ने न्याय की संज्ञा दी है. आचरण की शुभता पर जोर देते हुए वह ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें मानव-व्यक्तित्व की उठान सामाजिक शुभता के परम-बिदु को छूने लगती हे. लक्ष्य आसान नहीं है. परंतु निजता को सर्वकल्याण को समर्पित करने के बाद मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है.

प्लेटो न्याय और ज्ञान को परस्पर पूरक मानता है. उसके अनुसार ज्ञान मनुष्य को न्याय की पहचान कराता है. ज्ञान ही एकमात्र ऐसा उपकरण है जिससे मनुष्य शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे का बोध कराता है. ज्ञान न्याय की पूर्वापेक्षा और अनिवार्यता है. इसलिए ज्ञान एकमात्र शुभ है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो द्वारा न्याय की खोज का सिलसिला आदर्श समाज की अवधारणा तक बढ़ जाता है. प्लेटो ने साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधाओं, नाटक, कविता आदि की आलोचना की थी. वह उन्हें लोकरंजन के माध्यम से अधिक मानने को तैयार न था. नाटक एवं कविता को तो वह मानव-चरित्र को दुर्बल बनाने वाली विधाएं मानता था. लेकिन उसके दर्शन में कवि मन की संवेदनशीलता साफ-साफ झलकती है. ‘रिपब्लिक’ में न्याय की खोज का सिलसिला, संवेदनशील मन की कविता जैसा है, जिसे उसकी विद्वता महत्त्वपूर्ण बना देती है. प्लेटो की न्याय-संबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ध्यातव्य है कि प्लेटो का संबंध एथेंस के शासक परिवार से था. वह स्वयं को एथेंस की सत्ता की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से एक मानता था. लेकिन सुकरात को मृत्युदंड दिए जाने के बाद से तत्कालीन राजनीति से उसका जी उचट गया था. प्लेटो से पहले यूनानी समाज में कोई खास कार्यविभाजन न था. न ही कार्य-विशेष के प्रति व्यक्ति की रुचि का कोई महत्त्व था. इसलिए माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी कार्य कर सकता है. इसी धारणा के चलते एथेंस में गणतांत्रिक पदों पर नियुक्तियां लॉटरी के माध्यम से की जाती थीं. इसके चलते कई बार कार्य-विशेष के लिए अयोग्य व्यक्ति चुन लिए जाते थे. इस अविवेकी व्यवस्था ने एथेंस का गणतंत्र अयोग्य हाथों की कठपुतली बना हुआ था. सुकरात ने उस पर चोट की थी. खुद को गणतंत्र का समर्थक मानने वाले एथेंस की यह सबसे बड़ी त्रासदी थी. प्लेटो की आदर्श राज्य की परिकल्पना उसकी इसी छटपटाहट का सुफल कही जा सकती है. न्याय की विवेचना के रूप में यही छटपटाहट आदर्श राज्य की कल्पना में भी दिखाई पड़ती है. वह ऐसे राज्य की कल्पना पेश करता है, जहां लोग बजाए स्वार्थ-भाव के सर्वोदय भाव से जुड़े हों. जिनमें पारस्परिक कल्याण के प्रति एका और विश्वास हो. वह स्पष्ट करता है कि न्याय आदर्शोन्मुखी समाज की सहज-स्वाभाविक उपलब्धि है. वह कृत्रिम अथवा बाहरी शक्ति द्वारा थोपी गई व्यवस्था नहीं है. किसी भी समाज में न्याय का संरक्षण किसी भय या दबाव में न होकर उसके स्वयं स्फूर्त्त प्रयासों के माध्यम से होता हे. वह इसलिए भी आवश्यक है कि न्याय का कोई दूसरा या तीसरा पक्ष नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसे केवल वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है. उसके लिए आवश्यक है कि समाज की इकाइयों में परस्पर सामंजस्य और एक-दूसरे के प्रति विश्वास का भाव हो.

‘रिपब्लिक’ के लिए प्लेटो को अपूर्व ख्याति प्राप्त हुई है. उसे ‘दार्शनिकों का दार्शनिक’ माना गया है. यह माना गया है कि जो प्लेटो के यहां नहीं है, दर्शन में वह कहीं भी नहीं है. बावजूद इसके प्लेटो को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है. कुछ विद्वानों ने उसके न्याय-संबंधी दर्शन को निष्क्रियता का दर्शन माना है. उनका कहना है कि प्लेटो का न्याय कल्पना की उड़ान, खूबसूरत सपने से अधिक कुछ नहीं है. न्याय को लेकर वह जो सपना देखता है, उसका सच हो पाना असंभव है. प्लेटो की भांति उसका न्याय भी इतना आत्मसंयमी और मर्यादित है कि उसे व्यवहार में उतार पाना बेहद कठिन है. बार्कर तो प्लेटो के न्याय को न्याय मानने के लिए ही तैयार नहीं है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय महज भावना या कवि मन की खूबसूरत परिकल्पना है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय-सिद्धांत एकतरफा है. वह केवल मनुष्य के कर्तव्यों को निर्धारित करता है और अधिकारों को तय करने का काम पूरी तरह समाज की मर्जी पर थोप देता है. यदि समाज सचमुच इतना ही उदार हो, जैसा कि प्लेटो सोचता है तो ऐसे समाज में न्याय का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. वस्तुतः ईसापूर्व चौथी-पांचवीं शताब्दी के जिस समाज का जिक्र प्लेटो के ग्रंथों में मिलता है, उन दिनों यूनानी समाज युद्ध प्रिय समाज था. वहां छोटे-छोटे नगर राज्य थे, जिनके बीच युद्ध अकसर होते रहते थे. एथेंस स्पार्टा के हाथों पराजित हो चुका था. वह पराजय भी एथेंसवासियों के लिए कुंठा का कारण बनी थी. एथेंस जहां अपने दार्शनिक विचारों, कवियों और सुंदरियों के लिए प्रसिद्ध था, उसके पड़ोसी नगर-राज्य स्पार्टा की प्रतिष्ठा वहां के बहादुर सैनिकों के कारण थी. एक युद्ध में स्पार्टा के हाथों भीषण पराजय के बाद एथेंसवासियों के मन में ‘उस जैसा’ बनने की बड़ी कामना थी. आदर्श गणराज्य के रूप में प्लेटो ऐसे ही गणतंत्र की कामना करता है. सेबाइन ने भी माना है कि प्लेटो की ‘न्याय-संबंधी कल्पना जड़, आत्मपरक, निष्क्रिय, ठहराव-युक्त, अव्यावहारिक एवं अविश्वसनीय है.’ ‘न्याय’ की बात करता हुआ प्लेटो कहीं-कहीं ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है; यदि यह मान लिया जाए कि व्यक्ति या समूह अपनी किसी खास प्रवृति का दास होता है तो भी उसे यह बताने की क्या आवश्यकता है कि प्रत्येक मनुष्य केवल एक ही कार्य करे. या केवल समाज द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को ही करे.

दरअसल न्याय की विवेचना करते हुए प्लेटो विषय को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभव-सा हो जाता है. इससे उसके विचारों में कहीं-कहीं असंगतियां और अंतर्विरोध भी दिखने लगता है. वह एक ओर तो दावा करता है कि आदर्श समाज में कोई व्यक्ति दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरी ओर राज्य को व्यक्ति के कर्तव्यों के निर्धारण का अधिकार देकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेता है. प्लेटो के अनुसार समाज में संरक्षक वर्ग का कर्तव्य अपने बुद्धि-विवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘संरक्षक’ या संरक्षक वर्ग से नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, जेसे दास, यदि ऐसा व्यक्ति बुद्धि-विवेक में ‘संरक्षक’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए? न्याय-भावना तो इसमें है कि ऐसे व्यक्ति को तत्काल संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी काबलियत का उपयोग लोक-हित में किया जाए. साथ ही संरक्षक वर्ग में सम्मिलित व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाज-हित के बजाय जो केवल स्वार्थ को वरीयता देते हैं तथा नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. समाज हित के लिए यह जरूरी भी है. प्लेटो उसकी कोई व्यवस्था नहीं करता. बजाए इसके वह दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है. चह दार्शनिक सम्राट को इतना अधिकार-संपन्न बना देता है कि वह निरंकुश नजर आने लगता है. कदाचित वह सोचता था कि जो ‘दार्शनिक सम्राट’ के लिए अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर चुके व्यक्ति मनुष्य की सामान्य कमजोरियों से मुक्त होंगे. जबकि मानवीय प्रवृत्ति परिवर्तनशील है. ध्यातव्य है कि दासप्रथा का समर्थन करने वाला प्लेटो अकेला विचारक नहीं है, सुकरात, अरस्तु, जेनोफीन जैसे उसके समकालीन विचारक भी उससे सहमत हैं. दूसरे प्लेटो के आदर्श राज्य में जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका कवि-हृदय सपने की तरह केवल आदर्श बुनता है. नैतिकता चूंकि स्वयं एक आदर्श है, इसलिए उसके सपने की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता.

प्लेटो ने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटे-बेटियां समाज के शेष वर्गां की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में वह ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया हो. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो. वह प्रश्न उठाता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए? वह कौन-सा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. ‘रिपब्लिक’ में उसने बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें माता-पिता अथवा उनकी संतान एक-दूसरे को कभी पहचान ही सकें. उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिनके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. काम-संबंधों में पर्याप्त खुलापन था. प्लेटो ने विवाह संस्था का निषेध किया है. इसके दो कारण थे. पहला उसे लगता था कि पारिवारिक संबंध व्यक्ति के उद्देश्यों को सीमित बनाते हैं. दूसरा स्त्री को पुरुष के बराबर दर्जा देना. प्लेटो ने दांपत्य संबंधों में साम्यवाद का समर्थन किया है. एक-दूसरे की इच्छा पर कोई भी युगल परस्पर सहवास कर सकता था. संतानोपत्ति का मुख्य ध्येय युद्धप्रिय राज्य को श्रेष्ठ योद्धा उपलब्ध कराना था. संरक्षक स्त्री-पुरुषों के लिए नियम और भी कठोर थे. ‘रिपब्लिक’ में उसने लिखा है—

‘संरक्षक वर्ग के स्त्री-पुरुषों में से कोई भी अपना घर-परिवार नहीं बसाएगा. कोई भी किसी के साथ व्यक्तिगत रूप से सहवास नहीं करेगा. शासक स्त्रियां शासक वर्ग के सभी पुरुषों की समान रूप से पत्नियां होंगी. उनकी संतानें भी समान रूप से सभी की होंगी. न तो माता-पिता अपनी वास्तविक संतान के बारे में जान पाएंगे न ही संतान अपने वास्तविक जन्मदाता को जान सकेगी.’

ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. परंतु वह भी आसान न था. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! चूंकि लोकहित के कार्यों को टाला नहीं जा सकता, बल्कि कुछ कार्य तो अत्यावश्यक, नैमत्तिक महत्त्व के होते हैं, स्पष्ट है कि ऐसे कार्यों के लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी.

प्लेटो स्वीकार करता है कि आदर्श राष्ट्र-राज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. परंतु कैसे? लोग अप्रीतिकर कार्यों को भी समाज के प्रति अपना दायित्व मानकर करें, यह प्लेटो के समक्ष बड़ी चुनौती थी. ऐसे कार्यों को करने के लिए कोई तो नियुक्त किया जाएगा. जिसे वे कार्य सौंपे जाएंगे, क्या वह उन्हें खुशी-खुशी करने को तैयार होगा? यदि नहीं जो जिसे वे कार्य बलपूर्वक सौंपे जाएंगे क्या वह उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? क्या उसे राज्य की मनमानी नहीं माना जाएगा? विकसित देशों में मशीनीकरण के बाद से अप्रीतिकर अथवा खतरे की अधिक संभावना वाले कार्यों को मशीनों से लिया जाने लगा है. लेकिन प्लेटो के समय में ऐसे कार्यों को करने के लिए केवल दास थे. उनकी उपस्थिति राज्य की सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक थी. परंतु जिनके अधिकारों की ओर किसी का ध्यान न था. उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था. राजनीति में उनकी कोई हिस्सेदारी न थी. दूसरी ओर एथेंस का हर वयस्क आम सभा का सदस्य होता था. बुद्धकालीन गणतंत्रों में भी एक समय ऐसा था, जब वहां का प्रत्येक नागरिक ‘मैं राजा हूं’, ‘मैं राजा हूं’ कहकर शासक होने का दावा करता था. सोफिस्टों के कार्यकाल में एथेंस का भी यही हाल था. ऐसे समाज में जहां प्रत्येक आदमी खुद को ‘मुखिया’ समझता हो, वहां नागरिकों को व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता के प्रचार द्वारा प्रेरित किया जा सकता था. उसके लिए प्लेटो की सारी उम्मीद दार्शनिक सम्राट पर टिकी थी. उसका मानना था कि दार्शनिक सम्राट किसी भी प्रकार के लालच से परे, परमबुद्धिमान, व्यवहारकुशल, परम-प्रज्ञावान, वीर, तेजस्वी और परिश्रमी होंगे. लोग स्वयं उससे प्रेरणा ले सकेंगे. लेकिन महामानव की खोज आसान नहीं थी. इस बात को प्लेटो भी समझता था. ऐसी अवस्था में उसने दार्शनिकों के समूह को राज्य की बागडोर सौंपने की अनुशंसा की है. मुश्किल यह है कि केवल विचार के बल पर समाज नहीं चलता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा? प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. न ही उसकी कल्पनाशीलता काम करती है. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन एथेंस की राजनीति से प्रभावित था. एथेंसवासियों को गर्व था कि वे एक विकसित गणतंत्र के संचालक हैं. जबकि असल में वह भीड़तंत्र द्वारा शासित राज्य था. उसमें तीन प्रमुख दोष थे. पहला यह कि राजनीतिक अनुभवहीनता और अपर्याप्त ज्ञान के बावजूद एथेंस का प्रत्येक नागरिक राजनीति में हिस्सा लेता था. उससे गलत फैसले होते थे. सुकरात को मृत्युदंड का निर्णय ऐसा ही अनुचित निर्णय था. उस घटना के बाद प्लेटो का लोकतंत्र से विश्वास उठ-सा गया था. दूसरा दोष यह था कि प्रत्येक नागरिक खुद की निगाह में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था. किसी का किसी में विश्वास न था. हर कोई अपने लिए अधिकतम सुख-सुविधाओं की अपेक्षा रखता था. भ्रष्टाचार और स्वार्थभाव चरम पर था. बिना इसकी चिंता किए कि उनके दुराचरण से राज्य का कितना अहित हो रहा है, एथेंस के नागरिक स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे. प्लेटो के आगे स्पार्टा का उदाहरण था, जहां के नागरिक राज्य को समर्पित थे. इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में राज्य को व्यक्ति से बढ़कर माना है. वह व्यक्ति का राज्य में विलय कर देने जैसा था. तीसरा और महत्त्वपूर्ण यह कि उस समय एथेंस की राजनीति में दो गुट बने हुए थे. उनके अपने-अपने समर्थक थे. दोनों हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर लगे रहते थे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो विभिन्न प्रतिद्विंद्वी समूहों को राज्य के प्रति समर्पित होने को कहता है. उसके अनुसार राज्य किसी एक व्यक्ति, समूह या वर्ग का नहीं होता—‘उसपर सभी वर्गों का समानाधिकार है. इसलिए प्रत्येक वर्ग का यह स्वयंसिद्ध कर्तव्य है कि वह राज्य की अखंडता तथा बल-वैभव को बनाए रखने के लिए समर्पित भाव के साथ काम करे.’ दार्शनिक सम्राट की अवधारणा भी प्लेटो का पूर्वाग्रह था. राजनीति को अनुभवहीन लोगों के हाथों से निकालकर परिपक्व हाथों को समर्पित करने की कोशिश. परंतु उसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल की टिप्पणी है—

‘उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब, जब सामना करीब-करीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चित रूप से, न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’9

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतार-चढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कवि-हृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्ति-सापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुख-सुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौन-सा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरित-प्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो—जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देकर उसे लोकोन्मुखी बनाती हों. समाज का हित है कि ऐसी पसंदों को प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान तथा कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इस तरह इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानव-स्वभाव से निरपेक्ष नहीं होता. प्लेटो का विश्वास था कि उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी. फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालन-पोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं भी अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. जबकि दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. इसी तरह भारतीय राष्ट्रवादी का सामान्य सोच होगा कि भारत दुनिया में अन्य सभी देशों में अग्रणी हो. अतिश्रद्धालु व्यक्ति अपने धर्म को पूरी दुनिया पर छाये हुए देखना चाहेगा. जबकि मानवतावादी सपना होगा कि विश्व के सभी देश बराबर हों. किसी का किसी पर अधिकार न हो. लोग अपने-अपने विश्वास, मान्यताओं और परंपरा के साथ सुरक्षित रहें. सुख में सभी की समान साझेदारी हो. ऐसे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले मनुष्य समाज में एक साथ होंगे तो उनके मतभेद उभरकर सामने आएंगे ही. फिर उनके बीच तालमेल कैसे संभव है? कैसे उन सभी की रचनात्मक क्षमताओं का इस्तेमाल समाज-हित में किया जाए? यह चुनौती प्लेटो के समय में थी. आज भी है. निजी स्वार्थ एवं मतभेदों के कारण वह एथेंस के गणतंत्र की दुर्दशा को देख चुका था. उसका मानना था कि व्यक्तिगत मतभेदों का समाहाहर केवल आदर्श समाज में संभव है. आदर्श समाज से उसका आशय था, ऐसा समाज जहां सभी को अपने-अपने कर्तव्य का एहसास हो और सभी उसके प्रति समर्पित होकर काम करें. बदले में राज्य बिना किसी पक्षपात के सभी को जीवनयापन के आवश्यक संसाधन उपलब्घ कराने की जिम्मेदारी ले.

अहं संवेदनाओं को कुचलता आया है. अहं के टकराव की समस्या प्लेटो के समय में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्ति-विशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनिया-भर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति, जो केवल किसी खास देश, धर्म अथवा संस्कृति को सबसे आगे निकलते देखने की इच्छा रखता है, पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. उसके बावजूद नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इस संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना उसी कोटि की है. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना अथवा उसे निरंकुश राज्य का समर्थक मानना—सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो बुद्ध ने न केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना था. जबकि श्रमण परंपरा को छोड़कर बुद्ध से पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन उन्हीं विषयों पर केंद्रित था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिक-सामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथों-हाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे. बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत समानता पर जोर देता था. उनके प्रभाव के चलते समाज में जातीय वैमनस्य में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष भी घटा था.

प्लेटो के अनुसार इच्छाओं का पूर्ण सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय संभव नहीं है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर विशेष झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. इसके लिए व्यक्ति में नैतिक साहस का होना जरूरी है. जहां नैतिक सहमति-असहमति आसान न हो, वहां बल-प्रयोग की संभावना बनी ही रहती है. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स जब यह कहता है कि ‘न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है,’ उस समय वह सुकरात सहित उन सभी साथियों से असहमति दर्शा रहा होता है, जो उसके मत के विरोध में हैं. न्याय को सबल का एकाधिकार कहने वाला थ्रेचाइमच्स अकेला व्यक्ति नहीं था. उसका मत न केवल सोफिस्ट विचारकों से प्रेरित था, बल्कि जनसाधारण के सामान्य सोच का भी प्रतिनिधित्व करता है. दुनिया में लगभग नब्बे प्रतिशत लोग आस्थावादी हैं. हर श्रद्धालु मानता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वही सच्चा न्यायकर्ता भी है. भारत में धर्म को, जिसका पूरा कारोबार ईश्वर और डर पर टिका है, न्याय के रूप में थोपा जाता रहा है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति दूसरों पर शासन करने का सपना देखता है; या अधिकांश लोग शासित होने को अपनी नियति माने रहते हैं. सच तो यह है कि सुख की कामना प्रत्येक व्यक्ति को होती है. सुख और सुरक्षा पर खतरा उसे प्रतिरोध के लिए उकसाता है. समाज को अंतर्द्वंद्वों और अनावश्यक विक्षोभों से बचाने के लिए आवश्यक है कि नागरिकों के बीच असमानता का स्तर न्यूनतम हो. उनमें यह भरोसा बना रहे कि राज्य न्याय के समर्थन और सुरक्षा में खड़ा है. इसलिए बात जब आदर्श समाज की होगी, तो लोकहित से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की मांग भी उठेगी. सच यह भी है कि अधिकांश समाज न्याय की वस्तुनिष्ठ समीक्षा और उसकी व्याप्ति की ओर से उदासीन रहते हैं. सरकारें सत्ताधारी वर्ग के जो संख्या में अल्प हैं, हित साधने में लगी रहती हैं. इस कारण ‘न्याय’ की वस्तुनिष्ठ समीक्षा, उसकी संकल्पना पर गंभीर विमर्श संभव नहीं हो पाता. कारण यह भी है कि अधिकांश लोग न्याय के वृहत्तर संदर्भों से अपरिचित होते हैं. वे उसे किसी अदालती ‘फैसले’ के रूप में लेते हैं, जिसमें दो पक्षों के बीच तीसरा पक्ष जो घटना से पूरी तरह अनजान है, निर्णायक पक्ष की भूमिका निभाता है. तीसरा पक्ष हालांकि राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. इसने भी न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. बहस को प्रभावित करने के बजाय वह केवल दर्शक के रूप में मौजूद है. वह देखता है कि सुकरात जैसे विद्वान की उपस्थिति के बावजूद बहस के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है.

फिर विमर्श का समापन कहां पर हो? ‘आदर्श पसंदों’ का विचार इसी की परिणति था. ‘आदर्श पसंदों’ से उसका अभिप्राय ऐसी पसंदों से था, जिनकी अधिकांश लोग कामना करते हों. परोक्ष रूप में यह भी बहुमत की दादागिरी हुई, जिसे न्याय की दृष्टि से निरापद नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र को ‘बहुमत की दादागिरी’ बताकर प्रायः उसकी आलोचना की जाती है. दादागिरी या निरंकुश आचरण किसी का भी हो सकता है. राजशाही में अकसर उस व्यक्ति की दावेदारी चलती थी, जिसके हाथों में राजमुद्रा हो. धर्म को लोककल्याणकारी बताया जाता है. परंतु वह भक्त और भगवान दोनों की अतियों पर निर्भर करता है. भक्त समर्पण की उच्चतम सीमा तक समर्पित होता है. ईश्वर उच्चतम सीमा तक निरंकुश और तानाशाह, परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर हुए धत्त्कर्म को जीवन के आदर्श की तरह थोपा जाता है. एक प्रकार से यह भी अति ही है. व्यावहारिक सोच यही है कि चयन जब ‘बहुमत की दादागिरी’ और ‘अल्पमत की दादागिरी’ के बीच हो तो न्याय को पहले के पक्ष में झुके हुए नजर आना चाहिए. आदर्शवादी प्लेटो को इस तरह का व्यावहारिक चलन नापसंद था. उसके अनुसार न्याय के लिए कोई बीच का रास्ता नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसके सामने अपने आदर्श नगर-राज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. लोकतंत्र की विकृतियों को वह देख-समझ सका था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

क्या न्याय को धर्म के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है? जो समाज ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर न्याय करने का दावा करते हैं, क्या उनकी वैचारिकी को आदर्श समाज की वैचारिकी के बराबर माना जा सकता है? प्लेटो इसपर विचार नहीं करता. एक सपाट-सी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. इससे समस्या सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. सब जानते हैं कि ईश्वर अपनी इच्छा के बारे में किसी से भी संवाद नहीं करता. उसका अपना अस्तित्व ही संद्धिग्ध है. वह अपने भक्तों के विश्वास से परे, जिसे वे अपना धर्म मानते हैं, कुछ भी नहीं है. बावजूद इसके धर्माचार्य दावा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो कथित ईश्वरेच्छा को अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. उनके अनुसार ईश्वर परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा भी रास्ता है, जिससे कथित ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? दूसरे जिसे ईश्वरेच्छा होने का दावा किया जाता है, उसके प्रमाणन का सही रास्ता क्या हो? कैसे तय किया जाए कि जिसे ईश्वरेच्छा बताया जा रहा है, वही श्रेष्ठतम विकल्प है. चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है. ईश्वरेच्छा अपने आप में अप्रामाणिक है. इसलिए उसके अनुयायी उसे आस्था का विषय बनाकर पेश करते हैं. सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहòाब्दियों से रचता आ रहा है. हो सकता है धर्मानुशासन से समाज का थोड़ा-बहुत भला होता हो. परंतु उसके माध्यम से होने वाला नुकसान उससे कहीं अधिक होता है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्ति-सापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ का प्रमुख लक्षण है, परंतु ‘सफेद’ कह देने-भर से वर्फ का बोध नहीं होता. बगुले का रंग भी सफेद होता है. यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिक-सामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है. सुकरातकालीन एथेंस की तीन लाख की आबादी में लगभग आधी दास और अर्धदास लोगों की थी, जिन्हें सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रखा गया था. प्लेटो की आलोचना का यह बड़ा आधार है. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. लेकिन प्लेटो के चिंतन का दायरा विशद है. उसकी आलोचना की जा सकती है. असहमत भी हुआ जा सकता है. स्वयं प्लेटो ने अपने साथियों के असमति के अधिकार की रक्षा की है. लेकिन उसके चिंतन को नकारा नहीं जा सकता. प्लेटो के दर्शन को लेकर थ्रेचाइमच्स की टिप्पणी सहस्राब्दियों बाद भी प्रासंगिक है. उसका कहना था—‘प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ इतना है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की कल्पना से कितने और कहां तक सहमत हैं? यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है.’

कुल मिलाकर प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता आया है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके माता-पिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालना-पोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला दार्शनिक था, जिसने ऐसे समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

9. The answer is rather humdrum. It will achieve success in wars against roughly equal populations, and it will secure a livelihood for a certain small number of people. It will almost certainly produce no art or science, because of its rigidity.-BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY, page 109.

 

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

सामान्य

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधार पर जाने जाते थे. तर्क-नैपुण्य उनके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था कि आगे चलकर उन्होंने उसी को अपना व्यवसाय बना लिया था. यूनानी समाज में उनकी हैसियत ठीक ऐसी ही थी जैसी भारत में पुरोहित वर्ग की. थ्रेचाइमच्स के विचार ‘सत्ता-सर्वेसर्वा’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहस में उतरने के पश्चात वह दावा करता है कि शक्तिशाली की हित-सिद्धि ही न्याय है. उसके अनुसार—‘सबल सर्वदा सही होता है.’ ‘राजा जो करे वही न्याय’—ऐसी मान्यता भारत में भी रही है. तुलसी ने लिखा है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं.’ इसी से शायद यह कहावत भी बनी है—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस.’ अपने मंतव्य को स्पष्ट करता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है—

‘विभिन्न प्रकार के राजदर्शनों यथा जनतंत्रात्मक, निरंकुश, कुलीनतंत्री आदि के आधार पर गठित सरकारें इस प्रकार के कानून बनाती हैं, जिनके द्वारा उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि होती है. निहित स्वार्थ के लिए बनाए गए कानूनों को ही वे न्याय की संज्ञा देती हैं और चाहती हैं कि लोग बिना कोई प्रश्न उठाए उनका पालन करें. जो व्यक्ति उनके आदेश की अवहेलना करता है उसे वे कानून के उल्लंघन का तर्क देते हुए दंडित करती हैं. सभी राज्यों में न्याय का एकमात्र उद्देश्य है शासकीय वर्गों का हित. चूंकि राज्य अपने आप में शक्तिशाली तंत्र होता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि न्याय सर्वत्र एक ही है, वह है—शासक वर्ग का हित और शक्तिशाली का स्वार्थ.’

थ्रेचाइमच्स के अनुसार न्याय शक्तिशाली का अधिकार है. जो शक्तिसंपन्न है, वह न्याय को अपने पक्ष में कर लेता है. शक्तिशाली हमेशा अपने पक्ष में कानून बनाता है. सवाल है शक्ति कैसी? देह की, मन की या किसी और प्रकार की? सुकरात प्रश्न करता है. थ्रेचाइमच्स इस बारे में स्पष्ट है. वह शारीरिक शक्ति से इन्कार करता है. भूल जाता है कि शारीरिक शक्तियों, जिनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी सम्मिलित है, से इतर जितनी भी शक्तियां हैं, वे सभी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज की ओर से प्राप्त होती हैं, भले ही समाज अपनी इस देन को गंभीरता से न लेता हो. उसमें व्यक्ति की अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम का भी योगदान होता है, परंतु इतना नहीं कि समाज के योगदान की बराबरी कर सके. अध्ययन-अध्यापन, अनुभव आदि के माध्यम से मनुष्य जो ज्ञान अर्जित करता है, वह उसकी पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ होता है. परंतु अहंभाव के चलते व्यक्ति समाज की देन को अपनी मान बैठता है. यह उसका अहंभाव है. अपने ज्ञान पर गर्व करने का अधिकार उसे है. लेकिन पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के योगदान को बिसरा देना भी अनैतिक कर्म है. थ्रेचाइमच्स नेतृत्व के अधिकार को शक्ति मानता है. उसके अनुसार जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है, उसे दूसरों पर नियंत्रण का अधिकार और अवसर स्वतः प्राप्त हो जाते हैं. थ्रेचाइमच्स की कसौटी है कि जो शक्ति-संपन्न है, वह न्याय-संपन्न भी है. कानून-निर्माता होने के कारण शक्तिशाली सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. उस गड़हरिया की भांति जो अपनी भेड़ों को इसलिए पालता है ताकि समय आने पर वह उनसे काम ले सके. जिसमें जरूरत पड़ने पर उसकी बलि भी शामिल है. थ्रेचाइमच्स का विचार प्राचीन राजनीति के बेहद करीब है. प्राचीन सम्राट अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए प्रजा को कभी भी युद्ध में उतार सकते थे, लोगों से मनचाहा काम या बेगार ले सकते थे. थ्रेचाइमच्स के अनुसार जो लोग शासन से दूर हैं, जिन्हें कानून बनाने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है, वे सामान्यतः नुकसान में रहते हैं. शिखर पर मौजूद व्यक्ति यदि जनता की भलाई के लिए काम भी करता है तो इसलिए कि उसके पीछे उसका कहीं बड़ा स्वार्थ निहित है. सुकरात को यह तर्क मंजूर नहीं है. उसके अनुसार ऐसा करना राज्य की नीयत को कठघरे में लाना तथा उसके औचित्य के आगे प्रश्न-चिह्न लगाना है, शिखर पर मौजूद लोग अपना स्वार्थ देखते हैं. परंतु वे ऐसा हमेशा करें, यह आवश्यक नहीं है. डॉक्टर अपनी प्रक्टिश केवल धन जुटाने के लिए नहीं करता. लोग सेवाभाव से भी चिकित्सक के पेशे को अपनाते आए हैं. यही बात शिक्षक पर भी लागू होती है. कलाकार भी लोक-कल्याण का भाव लेकर कला-साधना करता है.

सुकरात को विपरीत-कथन या व्याजोक्ति के लिए भी जाना जाता है. बहस के दौरान ऐसा ही विपरीत-कथन जैसा थ्रेचाइमच्स भी करता है. हालांकि वह अपने विचारों पर दृढ़ है और उसका यह कथन ‘शक्तिशाली सदा सही’ का ही विस्तार है. वह कहता है—‘अन्याय करना न्याय करने से बेहतर है.’ अपने तर्क को नई दिशा में बढ़ाता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है कि न्याय को शक्तिशाली की इच्छा या उसके लाभ तक सीमित कर देने से प्रत्येक व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल पाएगा. बल्कि जो अन्यायी है वह अधिक प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई पड़ेगा. इन परिस्थितियों में अन्याय अधिक सुखदायी और आश्वस्तिकारक हो सकता है. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने स्वार्थानुरूप कार्य करेगा, जिसके लिए उसे अन्यायी मान लिया जाएगा. जबकि वह वही कर रहा है, जिसे करने में वह सक्षम है और जिसके द्वारा उसकी स्वार्थ-सिद्धि संभव है. कुल मिलाकर व्यक्ति का हित अन्यायी बनने में है. अपने तर्क की पुष्टि के लिए थ्रेचाइमच्स के पास अपने तर्क हैं. आप उन्हें कुतर्क सकते हैं; और चाहें तो वाग्जाल भी. लेकिन अन्य सोफिस्टों की भांति थ्रेचाइमच्स को भी अपनी इस कला पर गर्व था. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह कहता है—‘यदि न्यायी और अन्यायी दो व्यक्ति साथ-साथ व्यापार करें तो लाभ की गणना के समय यह कहना बहुत कठिन होगा कि न्यायी को अधिक लाभ हुआ हो. संभावना इसी की है जो अन्यायी है, उसने अधिक लाभ कमाया हो. व्यवहार में प्रायः देखा जाता है कि न्यायी व्यक्ति हमेशा घाटे में रहता है, जबकि अन्यायी ज्यादा ऐंठ ले जाता है. कराधान के समय भी अन्यायी कर-चोरी कर लाभ की अवस्था में रहता है. दूसरी ओर न्यायी व्यक्ति ईमानदारी बरतते हुए अधिक कराधान कर अपेक्षाकृत घाटे में रहता है. राज्य की ओर कोई सुविधा प्राप्त करनी हो तो अन्यायी आगे बढ़कर ज्यादा हाथ मार ले जाता है, जबकि न्यायी वहां भी पिछड़ जाता है. इन तर्कों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्यायी व्यक्ति से अन्यायी होना अच्छा है. थ्रेचाइमच्स के अनुसार, ‘न्याय बलवान का स्वार्थ’ अथवा ‘सबल की स्वार्थ दृष्टि है.’ जनसाधारण को न्याय सिवाय आत्मतुष्टि के, कुछ नहीं दे पाता. थ्रेचाइमच्स का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता. वह आगे बढ़कर शासकीय पदों पर विराजमान व्यक्तियों की तुलना करते हुए कहता है कि अन्यायी व्यक्ति, न्यायी की अपेक्षा सदैव अधिक लाभ कमाते हैं. अन्यायी व्यक्ति न केवल अपने परिजनों को अधिक सुख दे पाता है, बल्कि न्यायी की अपेक्षा अधिक यश-लाभ का भी भागी बनता है. अन्याय जितना बड़ा हो, लाभ में रहने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है. छोटी-मोटी चोरी या लूट करने वाले चोर-डकैत कहे जाते हैं और समाज में अपमान और दंड के भागी बनते हैं. जबकि अपनी सेना और शक्ति के भरोसे यदि कोई नरेश दूसरे राज्य को लूटकर ले जाता है तो वह यश का भागी बनता है. चारणवृंद उसकी गौरव-गाथाएं लिखते हैं. इसलिए थ्रेचाइमच्स कहता है कि—‘हे सुकरात! पर्याप्त रूप से बड़े स्तर पर किया गया अन्याय, न्याय की अपेक्षा अधिक गौरवशाली, स्वच्छंद एवं यश-लाभ देने वाला कार्य है.’ उस समय थ्रेचाइमच्स न्याय के साथ-साथ लाभ को भी बहुत सीमित संदर्भों में ले रहा होता है. या यह कहें कि न्याय और लाभ को लेकर शक्तिशाली की जो दृष्टि है, वह उसी को आगे बढ़ाता है. आदर्श राज्य में लाभ का अभिप्रायः केवल मौद्रिक लाभ तक सीमित नहीं रहता. बल्कि उसके सारे कारोबार और संकल्प सामाजिक लाभ की दृष्टि के साथ रचे जाते हैं. राज्य व्यक्तियों से इतर संस्था नहीं है. वह अपने नागरिकों की सामूहिक इच्छा और संकल्पशक्ति का ही रूप है. राज्य की समस्त शक्तियां, संसाधन तथा लक्ष्य उसके नागरिकों के सामूहिक श्रम तथा इच्छा का सुफल होते हैं. इसलिए जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना अपना काम करते हुए यथानिर्दिष्ट कराधान देता है, वह परोक्ष रूप में उन कार्यों को पूरा करने में भी सहभागी बनता है, जिनके लिए राज्य का गठन किया गया है. ऐसा व्यक्ति मौद्रिक अवदान के बदला सामाजिक लाभ के अपेक्षाकृत वृहत्तर संदर्भों में प्राप्त करता है.

थ्रेचाइमच्स का कथन सर्वथा गलत भी नहीं है. सामान्य धारणा यही है कि न्याय सदैव सबल का पक्ष लेता है. शक्तिशाली के आगे अदालतें भी झुक जाया करती हैं. रोजमर्रा के सामान्य अनुभवों से न्याय को लेकर एक दृष्टिकोण यह भी बनता है कि न्याय का जन्म दुर्बलों को शक्तिशाली वर्ग की लोभ, लालच और स्वार्थपरता से बचाने के लिए हुआ है. समाज में यदि सभी सबल हों अथवा सभी दुर्बल हो तो न्याय की कदाचित आवश्यकता ही न पड़े. इसलिए न्याय एक कृत्रिम व्यवस्था है, जो असमानताओं के अन्याय को पाटने के लिए जरूरी मानी गई है. उसे ‘भय की संतान’ या कमजोर का ‘रक्षाकवच’ भी कहा जा सकता है. प्रकृति में भी हम देखते हैं कि वहां जो शक्तिशाली है, वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. इसलिए न्याय और कानून जैसी कृत्रिम व्यवस्थाएं कमजोर वर्ग की सुरक्षा और बेहतरी के लिए की गई हैं. वे शक्तिशाली वर्ग की मनमानी पर रोक लगाने तथा दुर्बल वर्ग को संरक्षण देने का काम करती हैं. ‘रिपब्लिक’ के अगले ‘संवाद’ में प्लेटो गलाकॉन के मुंह से कहलवाता है—‘जनसाधारण की मान्यता है कि न्याय को वास्तविक अच्छाई और शुभता का पर्याय कभी नहीं माना जा सकता. असल में वह ऐसी चीज है जिसको अन्याय न कर पाने की क्षमता के कारण स्वीकार्य माना जाता है.’ ग्लाकॉन के अनुसार न्याय की जरूरत कमजोर व्यक्ति की अन्याय न कर पाने की क्षमता तथा अन्यायी का सामना न करने की अक्षमता के कारण पड़ती है. दूसरे शब्दों में न्याय कमजोर की बैशाखी है, और शक्तिशाली की राह की बाधा. थ्रेचाइमच्स जहां न्याय को शक्तिशाली व्यक्तियों का हित स्वीकारता है, ग्लाकॉन उसे भय की भावना के कारण दुर्बल वर्ग के हित में बनाई कई अनिवार्यता की संज्ञा देता है. दोनों ही न्याय को बनावटी और दुर्बल वर्ग की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था स्वीकारते हैं. दोनों का मानना है कि न्याय को अपने आप में नैतिक या शाश्वत सिद्धांत नहीं माना जा सकता. अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए थ्रेचाइमच्स कुतर्क की सीमा तक चला जाता है. उसके कहने का आशय है कि मनुष्य अपनी शक्ति के बल पर जितना समेट सकता है, उतना समेट लेने का उसे अधिकार है और यह काम उसे करते रहना चाहिए. इसी में उसका सुख है. वह संतोष को दुर्बल व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता मानता है. लोकतंत्र में भी जनता यदि शासन की ओर से मुंह मोड़ ले, पूरी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़कर शासन की ओर से उदासीन हो जाए तो लोकतंत्र के अल्पतंत्र में बदलने में देर नहीं लगती. ऐसे राज्यों के कानून केवल अल्पतंत्र के हितों का ही रक्षण करते हैं. लोकतांत्रिक सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती हैं. उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में जो संख्या में अत्यल्प होते हैं—कानून बनाने के अधिकार होते हैं. संयोग से अल्पतंत्र में भी कानून बनाने का अधिकार सीमित वर्ग के अधीन होता है. इसलिए जनता की उदासीनता अथवा जनमत के बंटा होने पर शासन-शिखर पर मौजूद लोगों को मनमानी का अधिकार मिल जाता है. परिणामतः जनतंत्र के अल्पतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

थ्रेचाइमच्स के अनुसार द्वारा ‘शक्तिशाली सदा सही’ कहना अनुभव-सिद्ध निर्णय था. जिस दौर में सोफिस्ट विचारधारा पनपी थी, उस दौर के शासकों के लिए शक्ति की सबकुछ थी. यूनान ही क्यों, प्राचीन सभी सभ्यताओं में लगभग वही स्थिति थी. भारत में इसे धर्म कहा गया है; और धर्म के नाम पर सत्ता के प्रत्येक धत्तकर्म को श्रेय की कोटि में रख दिया जाता था. राम जब शंबूक को मृत्युदंड देता है, निर्दोष पत्नी को वनवास की सजा सुनाता है अथवा बालि की छिपकर हत्या करता है, तो तत्कालीन विधान उसे दोष नहीं देता. उल्टे उसका महिमा-मंडन करता है. चूंकि राम वर्चस्वकारी संस्कृति का महानायक है, इसलिए उसके दोष पर पर्दा डालने के लिए समर्थन में तर्क गढ़ लिए जाते हैं. धर्म-विजय कहकर शक्तिशाली के वर्चस्व को अधिमान्य ठहराया जाता है. महाभारत युद्ध को जीतने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल करता है. उसकी हर चतुराई और छल का भी धर्म बताकर महिमामंडन कर दिया जाता है. अपने स्तर पर यही काम संस्कृति भी करती है. इसे विजेता संस्कृति का दर्प भी कह सकते हैं, जो इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करती रहती है. प्लेटो का ध्येय न्याय संबंधी प्रचलित अवधारणाओं पर विचार करते हुए उसके वास्तविक रूप की पहचान करना है. थ्रेचाइमच्स का तर्क तत्कालीन यूनानी प्रभुवर्ग की सामान्य मानसिकता को दर्शाता है. चर्चा के दौरान सवाल करने पर वह कहता है—‘न्याय असल में दूसरों के कल्याण से ही संबंधित है. शासकवर्ग नियम बनाता है, इसलिए वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है.’ किसी न किसी रूप में वह उन्हीं नियमों को मान्यता देता है जो उसके लिए हितकारी हैं. जो व्यक्ति उन नियमों को एकतरफा मानकर उसका विरोध करता है, उन्हें वह दंडित करता है; अथवा उपेक्षित कर हाशिये पर ढकेल देता है.’ उस समय वह बड़ी चतुराई से संस्कृति, समाज तथा कानूनी प्रावधानों की अपने पक्ष में व्याख्या करता है. न्याय की यह अवधारणा सुकरात की निगाह में उचित नहीं है. यदि शक्तिशाली द्वारा मनमाने ढंग से, केवल अपने हितों में काम करने को न्याय मान लिया जाए तो उसकी मूल अवधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी. न्याय को परखने के लिए वह तीन कसौटियां बनाता है—‘कौन-सा कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण है?’ ‘सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है?’ तथा ‘जीवन में शुभत्व की स्थापना किस प्रकार संभव है?’ सुकरात के लिए इनमें तीसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.

‘रिपब्लिक’ की शैली में दार्शनिक गांभीर्य है. प्लेटो न तो व्यंजना का सहारा लेता है, न ही अनपेक्षित संवेदना को बीच में हालात है. ध्रेचाइमच्स के माध्यम से वह सोफिस्टों की न्याय-संबंधी अवधारणा को हमारे सामने लाता है. सोफिस्ट शक्ति का आराधन करने वाले थे. लेकिन उनके राज्य बड़े नहीं थे. जब चारों और शक्ति का बोलबाला हो और लोग समाज की समन्वित शक्ति के बजाय अपनी-अपनी शक्ति पर नाज करते हों तो संघर्ष की स्थितियां बनेंगी ही. सो उस समय तक राज्य नगरीय सीमाओं में सिमटे हुए थे. थ्रेचाइमच्स शक्ति के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण को हमारे सामने रखता है. सुकरात को माध्यम बनाकर प्लेटो उसका प्रतिवाद करता है. बताता है कि केवल शक्ति-आराधन से राज्य नहीं बनते. प्रत्येक समाज में ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों के लिए समर्पण-भाव से जीना जानते हैं. डॉक्टर अपना पेशा दूसरों के भले के लिए चलाता है. अध्यापक ज्ञान बांटता है. दर्जी दूसरों के लिए वस्त्र सिलता है, कलाकर लोककल्याण की भावना के साथ चित्र बनाता है. ठीक है ये सब अपने-अपने कार्य के बदले में समाज से कुछ वसूलते हैं. डॉक्टर रोगी से फीस लेता है. अध्यापक को पढ़ाई के बदले वेतन मिलता है. इसी तरह दर्जी, कलाकार आदि भी अपने-अपने श्रम-कौशल के बदले समाज से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं. परंतु यह सब तो इसलिए आवश्यक है ताकि वे समाज को अपनी अनवरत सेवाएं प्रदान कर सकें. इससे उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स सुकरात के तर्कों के आगे शांत हो जाता है. परंतु जिस प्रकार वह शक्ति का पक्ष लेता है, उसके सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है, उसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है. थ्रेचाइमच्स के दृष्टिकोण का विस्तार उनीसवीं शताब्दी में, नीत्शे के दर्शन में नजर आता है. प्लेटो ने जहां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पन की थी, नीत्शे ने महामानव की परिकल्पना की, जो प्लेटो के दार्शनिक सम्राट जैसा ही सर्वगुणसंपन्न, विराट व्यक्त्वि का स्वामी है. अपनी पुस्तक The genealogy of morals में वह  ‘दास नैतिकता’ और ‘स्वामी नैतिकता’ की बात करता है. उसके अनुसार स्वामी के नैतिक मूल्य शक्ति, सदाचरण, सज्जनता, अच्छे और बुरे को परखने की दृष्टि से देखे जा सकते हैं, जो दास की नैतिकता ‘समर्पण’, दयालुता, मानवता, करुणा और संवेदना से परखी जा सकती है.

प्लेटो मानता है कि सृष्टि में पूर्ण समानता असंभव है. जितने भी प्राणी हैं उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएं हैं. प्रकृति में देखा जाता है कि शक्तिशाली कमजोर पर राज्य करता है. उसपर अधिकार जमाकर किसी न किसी रूप में उसके अधिकारों का हनन करता है. ऐसे में राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य प्राकृतिक असमानताओं की खाई को पाटते हुए लोगों को समान धरातल पर लाने का प्रयास करता है. यही उसके गठन का उद्देश्य भी है. साधारण सोच यही है कि शक्तिशाली को दुर्बल पर राज्य करना चाहिए. वृहद सामाजिक हितों के लिए यह अत्यावश्यक है. सोफिस्ट चिंतक यही मानते थे. ‘जार्जियस’ नामक संवाद में प्लेटो स्वयं यूनानी विचारक केलीक्लिस के विचारों से सहमत नजर आता है. वह स्वीकारता है कि प्राकृतिक आधार पर असमानताओं की भरपाई के लिए शक्तिशाली को समाज के कमजोर पक्षों का समर्थन, प्रोत्साहन करते हुए शासन करना चाहिए. इसी से प्राकृतिक स्तर पर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है. सुकरात वहां भी प्रतिवादी के रूप में उपस्थित हो जाता है. वह उसी प्रश्न को दोहराता है, जो उसने थ्रेचाइमच्स से किया था कि श्रेष्ठतम के चयन की कसौटी क्या हो? शक्ति या फिर बुद्धिमत्ता? केवल ताकत के भरोसे शासन करना संभव नहीं है. जनता की सामूहिक शक्ति किसी भी शक्तिशाली शासक के कुल सैन्य-सामर्थ्य से अधिक होती है. प्रजा ही कभी समर्थन तो कभी निष्क्रिय रहकर राज्य के सर्वसत्तासंपन्न होने का भ्रम पैदा करती है. युद्ध तक में शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शारीरिक बल को श्रेष्ठता का पर्याय मान लेना प्रकारांतर में प्राकृतिक न्याय को सामाजिक न्याय मान लेने जैसा ही है. यदि मान लिया जाए कि शक्ति ही सबकुछ है तो उसके आधार पर प्रतिफल की अपेक्षा से कौन रोक सकता है. सुकरात के अनुसार केलीकिल्स न्याय की मूल-भावना को पकड़ने में असमर्थ है. केवल शक्ति को न्याय का पर्याय बताकर वह अन्याय का पक्ष लेने की गलती कर जाता है. पहले चरण की बहस बेनतीजा समाप्त होती है. उससे हम यह तो जान लेते हैं कि ‘न्याय क्या नहीं है’, परंतु यह नहीं जान पाते कि ‘न्याय वास्तव में क्या है?’

© ओमप्रकाश कश्यप

एक ‘राष्ट्रवादी’ फैसला

सामान्य
  • राष्ट्रवाद महज धारणा है. उससे हम यह मान लेते हैं कि कोई एक देश दुनिया के  बाकी देशों से मात्र इस कारण श्रेष्ठतर है, क्योंकि हमारा  जन्म उसमें हुआ है.                                                               जार्ज बनार्ड शा.

  • कल्पना कीजिए कि (आपका)कोई देश नहीं है, जिसके लिए मारा या मरा जाए. यह सोच पाना बहुत कठिन भी नहीं है. सोचिए कि कोई धर्म भी नहीं है. सब शांतिपूर्वक जीवनयापन कर रहे हैं. आप कह सकते हैं कि मैं कोरा स्वप्नजीवी हूं. लेकिन ऐसा केवल मैं ही नहीं हूं. मुझे उम्मीद है  कि एक दिन तुम भी मेरे साथ खड़े नजर आओगे. उस दिन यह दुनिया एक हो जाएगी.                                    जॉन लिनन.

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को अनिवार्य कर दिया. पता चला कि मामला 13 वर्षों से लटकता आ रहा था. न्यायालय को लगा कि अब और टालना अनुचित होगा. क्यों लगा? क्या इसलिए कि केंद्र में भाजपा की सरकार है? किसी और दल की सरकार होती तो फैसला कुछ और आता! या फिर कुछ वर्ष और लटका रहता! संभवतः कोर्ट ने सोचा हो कि राष्ट्रप्रेम का पाठ स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार के अनुशासन में आसानी से पढ़ाया जा सकता है. सचाई चाहे जो हो, महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि अदालत को अचानक क्यों लगा कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना घट रही है. वह भी स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार तथा वाग्वीर प्रधानमंत्री के रहते. बात-बात पर भारत-माता का जयकारा लगाने वाले ‘आर्यपुत्र’ लोगों में राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा जगाने में असमर्थ क्यों हुए, जो न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए आगे आना पड़ा?

फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत का है तब कुछ हकीकत तो होगी. पेंच यह है कि राष्ट्रप्रेम की क्लास लगाने के लिए सिनेमाघरों को चुना गया है, जहां जाने वाले दर्शकों में बड़ी संख्या बेरोजगारों, रिक्शाचालकों और प्रवासी मजदूरों की होती है. घर-परिवार से दूर, कभी मनोरंजन की चाहत में तो कभी यूं ही, परिजनों की याद से छुटकारा पाने के लिए अधिकांश वही सिनेमाघर जाते हैं. कुछ इसलिए भी जाते हैं क्योंकि उनके पास रात बिताने का ठिकाना नहीं होता. देर रात का शो देखकर लौटने तक सड़कें सुनसान होने लगती हैं. आवारा कुत्ते थककर सड़कों के किनारे, दुकान के थड़ों के आसपास ठिकाना तलाशने लगते हैं. मौका देखकर वे भी जहां सिर समाए, अगली सुबह जिंदगी से जूझने का संकल्प लेकर लुढ़क जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बड़े लोग सिनेमाघर जाते नहीं, सिनेमा खुद उनके बीच चला जाता है. जब भी मन करता है, वे सिने कलाकारों को जन्मदिवस या किसी और बहाने आंगन में नंचवा लेते हैं. जो और बड़े हैं उनके घर ही में सिनेमाघर बने हैं. फैसले से यह साफ नहीं हुआ कि यह कानून क्या ‘एंटीला’ और उस जैसे प्रासादों में बने सिनेमाघरों पर भी लागू होगा? शायद नहीं. इसलिए कि हमारे यहां खुद को राष्ट्रभक्त सिद्ध करने की जिम्मेदारी प्रायः जनसाधारण की होती है. अमीर और वीवीआईपी की नहीं. उनकी राष्ट्रभक्ति तो स्वयंसिद्ध होती है. एहसान तले दबा मीडिया दिन-रात उनके महिमा-मंडन में जुटा रहता है. राष्ट्रप्रेम बलिदान मांगता है. सो बेघर, अकेलेपन के शिकार, बेरोजगार लोगों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते रहना जरूरी है. कदाचित इसीलिए अदालत ने दखल दिया है.

आप कह सकते हैं कि अदालत का फैसला सभी के लिए है. मैं कहूंगा गलत. यदि सभी के लिए होता तो शुरुआत संसद और विधान-सभाओं से होती. हर उस कल-कारखाने से होती जिसे राष्ट्र-निर्माण का मंदिर बताया जाता है. साथ ही स्कूल, कॉलेज, क्रिकेट और खेल के मैदानों तथा हर उस सभा से भी होती, जहां सार्वजनिक उपस्थिति हो. सिनेमाघर तो व्यक्ति हल्के-फुलके मूड के साथ जाता है. कभी खुद को भुलाने, तो कभी भूले हुए को याद करने के लिए. अगंभीर मनस्थिति में राष्ट्रगान में हिस्सा लेने का औचित्य? क्या इससे राष्ट्रप्रेम जगाने में सचमुच सफलता मिलेगी? कल्पना कीजिए पर्दे पर राष्ट्रगान के तुरंत बाद हेलन के डांस या सनी लियोनी के रोमांस का सीन आएगा तो उनमें से कौन-सा दिमाग पर देर तक प्रभावी  रहेगा. या फिर राष्ट्रगान समाप्त होते ही पर्दे पर सोडे के बहाने शराब का विज्ञापन आया तो राष्ट्रगान का असर कितनी देर टिक पाएगा? कुल मिलाकर हाल का निर्णय राष्ट्रीय भावनाओं को धर्म में ढाल देने जैसा है, जिसमें पुजारी दुनिया के सभी कारोबार आरती, पूजा-अर्चन के बीच तथा आगे-पीछे चतुर सौदागर की तरह निपटाता है. राष्ट्रप्रेम धर्म न होकर, नागरिक मात्र का अपने राष्ट्र के प्रति नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है. इसमें राज्य की भूमिका उत्प्रेरक की होनी चाहिए. कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्य के स्वनामधन्य कर्ता-धर्ता अपने स्वार्थपूर्ण आचरण द्वारा इस काम में चूकते रहे हैं. ऐसे में केवल सिनेमाघरों में राष्ट्रीयगान की अनिवार्यता राष्ट्रप्रेम के वास्ते निर्धारित कानूनी कर्मकांड जैसी ही है. राष्ट्रगान की गरिमा तभी है जब परिवेश अनुकूल हो. व्यक्ति उदात्त मन से उसके साथ जुड़ा हो. साथ ही राज्य अपने प्रत्येक नागरिक के साथ ईमानदार एवं निष्पक्ष अभिभावक जैसा व्यवहार करता हो. हमारी संस्कृति कर्मकांड प्रधान सही, परंतु कोरे कर्मकांडों से राष्ट्रप्रेम नहीं जगाया जा सकता. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य कि अपने देश और देशवासियों पर गर्व करे. मगर इसके लिए सिनेमाघर उपयुक्त स्थान नहीं हैं. यदि न्यायालय उन्हें उपयुक्त मानता है, तो क्रिकेट मैच की शुरुआत भी राष्ट्रगान से होनी चाहिए. क्योंकि दोनों ही मनोरंजन का माध्यम हैं; तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दोनों ही बाजारवादी अर्थव्यवस्था का हित साधते हैं.

सिनेमा हाल में राष्ट्रगान को जरूरी बताकर उच्चतम न्यायालय में अप्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया है कि जो लोग सिनेमाघर जाते हैं, वे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उदासीन होते हैं. जबकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब किसी गरीब ने लालच में पड़कर देशद्रोह जैसा धत्तकर्म किया हो. सच तो यह है कि जो लोग घर ही में सिनेमाघर बनवाने का सामर्थ्य रखते हैं, वे प्रतीक की बात दो दूर, खुद को राष्ट्र का पर्याय माने रहते हैं. सीना तान कर प्रधानमंत्री के फोटो का उपयोग अपने प्रॉडक्ट के विज्ञापन के लिए करते हैं. एहसानमंद मीडिया उसे बार-बार दिखाता है. यहां सिनेमा की उपयोगिता से इंकार नहीं है. वह सशक्त माध्यम है. उसका उपयोग राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए किया जा सकता है. अच्छा सिनेमा अनेक राष्ट्रहित साध सकता है. उसके लिए सिनेमाघर में राष्ट्रगान आवश्यक नहीं है. विशेषकर भारत में जहां अधिकांश फिल्में फार्मूलाबद्ध होती हैं. सस्ते मनोरंजन के अतिरिक्त उनकी कोई सार्थकता नहीं होती, गाहे-बगाहे जो सामाजिक असमानता तथा उसकी बाजारवादी प्रवृत्तियों का समर्थन करती हैं—वहां थर्ड ग्रेड सिनेमा राष्ट्रीयताबोध जगाने के किसी भी प्रयास को मजाक में बदल सकता है. समस्या यह है कि सरकार हो या अदालत, ऐसे मामलों में पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्ति असंभव होती है. यह मान लिया गया है कि राष्ट्रधर्म और राष्ट्रीयताबोध, दोनों की रक्षा करना केवल जनसाधारण की जिम्मेदारी है. इन परिस्थितियों में राज्य की भूमिका पेशेवर प्रबंधक जैसी होती है, जो कराधान के बदले नागरिकों को सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराता है.

जनसाधारण काम की बातें प्रायः बड़े लोगों के आचरण से सीखता आया है. ‘महाजने येन गतः सः पंथा.’—जिस रास्ते पर महान लोग जाएं उसी का अनुसरण उत्तम है. यही उसे सिखाया जाता है. यही सीख उसके गीत-संगीत, किस्से-कहानियों, कहावतों और बड़े-बूढ़ों के अनुभवों के रूप में सामने आती है. उसे राष्ट्रगान का महत्त्व समझाने के लिए सिनेमाघर में पर्दे के सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. शिखर पर मौजूद नेतागण, बड़े अधिकारी, पूंजीपति, व्यवसायी यदि अपने आचरण को राष्ट्रीयता की भावनाओं के अनुकूल ढाल लें तो जनसाधारण को अलग से राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. वर्षों पहले इसी देश के एक नेता ने सिर पर टोपी और लंगोटी पहननी शुरू की थी, तब अच्छे-खासे घरों के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा सूट-बूट छोड़ टोपी और लंगोटी में आ गए थे. और उस समय तक न तो देश स्वतंत्र हुआ था, न ही राष्ट्रगान बना था. लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं से पूरा देश ओतप्रोत था. पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण गूंजते नारे  स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सभी में यह एहसास जगा देते थे कि हम सब एक हैं. आजादी के बाद संकट की घड़ी में एक ठिगने कद के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने आवाह्न किया. उस समय न तो टेलीविजन था, न इंटरनेट, न ही बड़े-बड़े सुरसामुखी मीडिया घराने. साउंड ट्रैक का जमाना भी नहीं था. फिर भी उस नेता के कंठ से निकली आवाज को देश के नागरिकों ने दूर-दराज तक सुना था. फिर जैसे-जैसे जहां तक भी संदेश पहुंचा, लोगों ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का नियम बना लिया था. आखिर क्यों? इसलिए कि वह जैसा था, वैसा ही दिखता था. किसी को उसकी ईमानदारी पर संदेह नहीं था. उसके पास केवल तीन-चार जोड़ी वस्त्र होते थे. पूरे वर्ष वह उन्हीं से काम चलाता था. रोज पांच-पांच बार वस्त्र बदलकर ‘फकीरी’ का दावा नहीं करता था. आज के नेता आत्ममोह को आत्मविश्वास मानते हैं. बड़बोले भाषणों से जनता के दिलों पर छाने का भ्रम पाले रहते हैं. पूंजी, प्रचार और पाखंड के भरोसे राजनीति करते हैं. ऐसे नेता जनता पर भरोसा करने का साहस नहीं जुटा पाते. न ही जनता उनपर विश्वास करती है. इसलिए राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है.

क्या किसी को राष्ट्रभक्ति का पाठ सचमुच पढ़ाया जा सकता है? कुछ भाव मन में स्वतः उमड़ते हैं. लोगों को सिखाए नहीं जा सकते. जैसे कि प्रेम करना. हम किसी को इस बात के लिए विवश नहीं कर सकते कि वह हमारी बताई वस्तु या प्राणी से प्रेम करे. प्रेम करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति जिससे प्रेम करे, वह उसके किसी अभाव की पूर्णता का एहसास कराती हो. जमीन किसान का पेट भरती है. इसलिए किसान उससे प्रेम करता है. मां का दर्जा देता है. 1857 में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रस्फुटन के मूल में कोई नेता नहीं था. उस समय तो देश में एक-राष्ट्र की भावना का उदय भी नहीं हुआ था. केवल सामूहिक अस्मिताबोध था. जिसमें प्रत्येक सैनिक खुद को नेता मान बैठा था. अपने उत्साह के बूते उन्होंने पूरे उत्तर भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध जंग के लिए खड़ा कर दिया था. वह संघर्ष नाकाम हुआ, इसलिए कि इतने बड़े आंदोलन को संभालने के लिए जैसी मानसिक तैयारी चाहिए, वह उनके पास नहीं थी. लेकिन वह नाकाम संघर्ष भी देश में राष्ट्रीयताबोध जगाने में सफल सिद्ध हुआ.

ऐसा नहीं कि न्यायालय का निर्णय एकदम हवा से पैदा हुआ है. आजादी के बाद से ही यह देश भीतरी और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा है. पिछले कुछ दशकों से चुनौतियां तेजी से बढ़ी हैं. इस फैसले के मूल में ऐसी कई बातें हैं जो देश की आंतरिक उथल-पुथल को सामने लाती हैं. उत्तर में कश्मीर, पूर्वोत्तर के आतंकवाद पीड़ित राज्यों को छोड़ दें तो भी बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे राज्य हैं, जहां भारत नामक राज्य के विरुद्ध आवाजें उठ रही हैं. आप उन्हें ‘नक्सलाइट’ कहें, ‘चरमपंथी’ कहें या कुछ और—वे निर्विवाद रूप से भारतीय गणराज्य के लिए चुनौती बने हैं. इसका प्रमुख कारण लोकतांत्रिक समाधान के प्रति अविश्वास को जन्म लेना है. विडंबना यह है कि समस्या के कारणों को समझे बिना मीडिया उन्हें केंद्र के विरुद्ध चुनौती के रूप में पेश करता आया है. जबकि राज्य के विरुद्ध हथियार उठाने का अभिप्राय हमेशा यह नहीं होता कि विद्रोहियों को अपनी राष्ट्रीय पहचान से शिकायत है. प्रायः वह राज्य और नागरिक समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है. इसलिए इस प्रकार की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीयता की सीमा में, लोकतांत्रिक सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए. विडंबना है कि भारतीय राज्य की ओर से ऐसी कोई रचनात्मक कोशिश नजर नहीं आती. विकास का मतलब अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों, जिनकी गिद्ध-दृष्टि देश के संसाधनों पर है—के हवाले कर देने तक सीमित रह गया है. मुनाफे की बंदरबांट, लूट और उसके कारण बढ़ती आर्थिक विषमता सामाजिक असंतोष का मूल कारण है. 1857 के संग्राम में जितने लोग अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार लेकर निकले थे, उनसे कहीं बड़ी संख्या आज उन लोगों की है जो ‘नक्सलाइट’ या ‘चरमपंथी’ के रूप में राज्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़े हुए हैं. अपनी असफलता को राज्य कई बार राष्ट्रभक्ति के नाम पर दबाने की कोशिश करता है. उस समय वह खुद को राष्ट्र के पर्याय के रूप में पेश करता है. परिणामस्वरूप राजतंत्र के विरुद्ध उठी आवाजें, राष्ट्र-राज्य के विरुद्ध जंग मान ली जाती हैं. जेएनयू मामले में कन्हैया कुमार के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था.

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक बेहतरीन कविता, देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता.’ बहुत कुछ कह देती है—‘इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/कुछ भी नहीं है/न ईश्वर/न ज्ञान/न चुनाव….जो विवेक/खड़ा हो लाशों को टेक/वह अंधा है/जो शासन/चल रहा हो बंदूक की नली से/हत्यारों का धंधा है.’ राष्ट्रभक्ति के नाम पर नारेबाजी करने वाले लोगों को भी समझना चाहिए कि राष्ट्र का अभिप्राय नदी-नाले, सागर, पहाड़, विशाल भूक्षेत्र या कल-कारखाने तक सीमित नहीं है. न ही वह केवल इतिहास, संस्कृति और सीमाओं के बोध का नाम है. यह बोध तो हम भारतवासियों को हजारों वर्षों से रहा है—उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्/वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः‘(विष्णुपुराण). धर्मशास्त्रों की दृष्टि से हम अलबेले हैं. यदि इन्हीं से सच्ची राष्ट्रभक्ति उत्पन्न होती तो हम संभवतः कभी गुलाम न होते. कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. उनके सामूहिक सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक बोध से बनता है. देश से प्रेम करने के लिए एक-दूसरे से प्रेम और परस्पर भरोसा करना आवश्यक है. सच्ची देशभक्ति सामाजिक एकता और विश्वास में बसती है. उसके लिए आवश्यक है कि लोगों के मन एक हों. सब एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हों; तथा सुख-दुख में साझा करने को सदैव तत्पर रहते हों.बावजूद इसके राष्ट्रीयबोध की मूल-भूत अनिवार्यता के रूप में जिस चीज को हम आरंभ से ही उपेक्षित करते आए हैं, वह है सामाजिक एकता और समानता. सत्ता-शिखर पर बैठे मुट्ठी-भर लोग अपने ही समाज के बहुसंख्यक लोगों का, उन्हें उनके न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर, कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर, शोषण करते आए हैं. नतीजा यह हुआ कि भारतीय समाज आरंभ से ही छोटे-छोटे वर्गां में बंटा रहा. जिनके पास शक्ति थी, साधन थे, उनके अपने स्वार्थ प्रबल थे. उसके लिए वे हर आक्रमणकारी से समझौता करते रहे. और जो समाज के लिए कुछ कर सकते थे, जिनके पास संख्याबल था. जो ईमानदार और मेहनती थे, उन्हें लगातार दुत्कार कर, उनके मनोबल को खंडित किया जाता रहा. परिणामस्वरूप इतना बड़ा देश इतिहास के कुछ हिस्सों को छोड़कर शायद ही कभी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा हो. छोटे-छोटे राज्यों के बीच वर्चस्व का संघर्ष हमेशा रहा है. बाहर के मुल्कों में देश की छवि यदि बनी तो बौद्ध धर्म के कारण, जो विभिन्न समुदायों के बीच एकता और समानता का संदेश लेकर दुनिया-जहान तक पहुंचा था. उसका संदेश था कि व्यक्ति का चरित्र और सदाचरण उसे लोक-प्रतिष्ठित बनाता है.

कोरा राष्ट्रवाद वर्चस्वकारी सत्ताओं का सबसे बड़ा पाखंड है. नागरिकों को भुलावे में रखने के लिए स्वार्थी सत्ताएं सदैव यह चाहती हैं कि लोग राज्य को, जो महज राजनीतिक संस्था है, राष्ट्र का पूरक और पर्याय माने रहें. ताकि वे अपने प्रत्येक फैसले को राष्ट्र का निर्णय बताकर, उसे बहस और आलोचना के दायरे से बाहर रख सकें. वे हमेशा यह समझाने में लगी रहती हैं कि लोगों के हित केवल और केवल उन्हीं के मार्गदर्शन में सुरक्षित हैं. उनकी कोशिश राष्ट्रभक्ति को धर्म बना देने की होती है. कदाचित इसीलिए सैमुअल जानसन ने देशभक्ति को ‘बदमाशों का अंतिम आश्रय’(Patriotism is the last refuge of a scoundrel) माना है. थोड़े परिवर्तन के साथ ऑस्कर वाइल्ड ने भी दुहराया था, ‘देशभक्ति शातिरों का गुण है’(Patriotism is the virtue of the vicious). राष्ट्रीयताबोध स्वतंत्र नागरिक चेतना में बसता है. परिपक्व राष्ट्रीयताबोध के लिए आवश्यक है कि लोग अपने अधिकारों तथा दूसरे के अधिकारां का भी सम्मान करें. इसके लिए राज्य का स्वयंप्रभुता संपन्न होना आवश्यक नहीं है. परतंत्र राज्य में भी मुखर राष्ट्रीयताएं पनपती रही हैं. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. सोवियत संघ में अनेक राज्य प्रभुतासंपन्न राज्य नहीं थे. परंतु उनके नागरिकों के हृदय मैं तीव्र राष्ट्रीयताबोध हिलोर मारता था. सोवियत राज्य ने उसे उपेक्षित रखा, जिसका दुष्परिणाम उसके विघटन के रूप में सामने आया. राष्ट्रीयताबोध के मूल में सांस्कृतिक चेतना और एैक्य-भाव अनिवार्य है. क्या भारतीय समाज के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?

विद्वान भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता की निरंतर दुहाई देते रहे हैं. इसके लिए वे महाकाव्यों और होली, दीपावली जैसे त्योहारों का नाम लेते हैं. तर्क देते हैं कि महाकाव्य देश के सभी भागों में पढ़े-पढ़ाए जाते हैं, होली, दीपावली जैसे त्योहार सभी जगह प्रचलित हैं, इसलिए यह देश भू-सांस्कृतिक इकाई यानी एकराष्ट्र है. जबकि महाकाव्यों में, होली, दिवाली जैसे त्योहारों के मूल में जो विश्वास है, वह स्वयं विरोधाभासी है. लोकतंत्र की कसौटी पर न तो महाकाव्य खरे हैं, न ही इन त्योहारों की अंतर्कथाएं. किसी न किसी रूप में वे सभी धर्म-केंद्रित राजतंत्र का समर्थन करते हैं. जिसमें निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं. लोकतांत्रिक विमर्श के लिए वहां कोई गुंजाइश नहीं होती. इसलिए उसके सहारे विकसित संस्कृति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता का समर्थन करने लगती है. धर्म और राष्ट्रवाद की कई विशेषताएं एक-दूसरे से मेल खाती हैं. दोनों में एक अपेक्षाकृत आधुनिक अवधारणा है. दूसरी लगभग तीन सहस्राब्दी पुरानी. दोनों की ही खूबी है कि वे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की दुश्मन हैं. उनके चयन में मनुष्य का अपना कोई योगदान नहीं होता. अधिसंख्यक मामलों में दोनों जन्म के साथ थोप दी जाती हैं.

राष्ट्रवाद का नकार राष्ट्रप्रेम का नकार नही है. वह राष्ट्रभक्ति के नाम पर मनमानी, उग्रता, पक्षपात तथा एकाधिकार की भावना का नकार है. राज्य की असफलता है कि वह अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि वह संकट में उसके साथ है. इससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों में वृद्धि हुई. हताश राज्य शांति-व्यवस्था के नाम पर कानून की ताकत का तरह-तरह से इस्तेमाल करता है. हाल का अदालती निर्णय भी इसी दिशा में जाता है. इन दिनों भारत में झंडा उठाऊ राष्ट्रवाद का बोलबाला है. उसके नाम पर शोर-शराबा वे लोग कर रहे हैं जिनके पास ताकत है. साथ में सत्ता का समर्थन. सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए जो समाज को अर्से से अपनी तरह हांकते आए हैं. ऐसे लोगों का ‘राष्ट्रवाद’ आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और नागरिकता के मानकों के अनुरूप हो. छदम् राष्ट्रवाद का झंडा उठाए वे दिखाना चाहते हैं कि वे बाकी लोगों से बेहतर हैं. उसमें समानता और स्वतंत्रता से अधिक बल और आक्रामकता प्रभावी होते हैं. यदि राज्य ऐसे ही राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है तो स्थिति उन लोगों के प्रति अन्यायकारी हो जाती है, जिनका राष्ट्रीयताबोध समानता, नैतिकता, स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र जैसे मूल्यों से बना है. यही कसौटी देशप्रेम पर भी लागू होती है. देशभक्ति का अभ्रिप्राय राज्य की प्रत्येक गतिविधि को गर्व की निगाह से देखना नहीं है. इसके लिए आलोचनात्मक विवेक अनिवार्य है. राष्ट्र के प्रति अनुराग तभी तक उचित है, जब तक नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका राष्ट्र समानता, स्वतंत्रता और मानवीय आदर्शों का सम्मान करते हुए उन्हें पाने के लिए सतत प्रयत्नशील है. यदि उन्हें लगता है कि उनका राष्ट्र मानवीय आदर्शां को भुला चुका है, तो नागरिकों को ऐसे राष्ट्र से शिकायत करने, यहां तक कि उससे घृणा करने अधिकार भी प्राप्त होता है. यह जिम्मेदारी राज्य की है कि वह ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न होने दे, जिससे नागरिकों को अपने ही राष्ट्र-राज्य के विरोध हेतु मुखर होना पड़े.

—ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. Imagine there’s no countries/It isn’t hard to do/Nothing to kill or die /And no religion too/Imagine all the people/Living life in peace You may say that I’m a dreamer/But I’m not the only one/I hope someday you’ll join us/And the world will be as one.―John Lennon, Imagine.
  2. उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्।

वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः।।

गायंति देवाः किल गीतिकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद—मार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।।

   (वह देश जो महासागर के उत्तर में बसा है, जिसके दक्षिण में हिमगिरि विद्यमान है. उसी का नाम भारतवर्ष है, वहां बसनेवाले भरत के वंशज हैं/देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्मे लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।/हे देवी पृथ्वी! आप समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली हैं, पर्वतरूपी स्तनों से सुशोभित हैं तथा भगवान विष्णु कि आप पत्नी हैं, आपको पैरों से स्पर्श करने के लिए मैं क्षमा चाहता हूं. विष्णुपुराण.)

 

 

 

आभासी लोकतंत्र यानी लोकप्रतिनिधित्व की प्रामाणिकता

सामान्य

यह सिद्धांततः मान लिया गया है कि लोकतंत्र में बहुमत की सरकार शासन की जिम्मेदारी संभालती है. जो बहुमत में नहीं है, वह या तो विपक्ष में बैठता है अथवा सरकार से पूरी तरह बाहर कर दिया जाता है. प्रश्न है कि जिसे सरकार बनाने या उसमें शामिल होने का अवसर दिया जाता है, क्या वह वास्तव में ही बहुसंख्यक का प्रतिनिधि होता है? दूसरे शब्दों में जीतकर सरकार बनाने वाले विधायक अथवा सांसद क्या सचमुच जनप्रतिनिधि होने का दावा कर सकते हैं? जहां तक मीडिया तथा उसके पोषित बुद्धिजीवियों की बात है, वे प्रत्येक चुनाव को लोकतंत्र के उत्सव की भांति देखते हैं. सरकार भी ऐसा ही मानती है. वे पूरी तरह गलत भी नहीं हैं. देश में बहुमत के आकलन की जो सामान्य कसौटी है, उसपर वे खरे उतरते हैं. जबकि लोकप्रिय अथवा संसदीय राजनीति की विवशताओं के चलते जो सच सामने आता है, वह वास्तविक बहुमत से बहुत दूर होता है. इसे हम धर्म, संस्कृति, जाति और क्षेत्रीयता के खानों में बंटे समाज की विडंबना भी कह सकते हैं, जिसमें व्यक्ति अपने राजनीतिक निर्णय देश अथवा समाज नहीं, चंद समूहों के स्वार्थ को केंद्र में रखकर लेता है. लोकप्रतिनिधित्व की प्रामाणिकता को परखने के लिए चुनावी आंकड़ों के खेल को समझना आवश्यक है. उसे हम साधारण गणित के माध्यम से जानने की कोशिश करेंगे, जो अपने आप में खासा रोचक है.

मान लीजिए किसी निर्वाचन क्षेत्र की कुल जनसंख्या 10000 है. उसमें बच्चों और 18 वर्ष से कम के मताधिकार से वंचित लोगों की संख्या को लगभग एकतिहाई मान लिया जाए तो मताधिकार प्राप्त नागरिकों की संख्या लगभग 66 प्रतिशत यानी 6600 होगी. अब मान लीजिए कि मतदान होता है. मतदाता उसमें बढ़चढ़कर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. भारतीय लोकतंत्र के जैसे हालात हैं, उनमें 65 प्रतिशत मतदान को भी ‘आदर्श’ मान लिया जाता है. इस तरह 6600 का 65 प्रतिशत यानी कुल 4290 नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. यह कुल जनसंख्या का लगभग 43 प्रतिशत है. इस तरह चुनाव प्रक्रिया के संपन्न होतेहोते करीब 57 प्रतिशत मतदाता विभिन्न कारणों से या तो निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सेदारी के अयोग्य मान लिए जाते हैं, अथवा उससे वंचित रह जाते हैं. इसे एकदम स्वाभाविक मान लिया जाता है. सिवाय चुनावी दिनों के जनता को अपनी सरकार चुनने तथा जनप्रतिनिधियों की गतिविधियों को जाननेसमझने का कोई प्रयास नहीं किया जाता.

संसदीय लोकतंत्र में दलगत उम्मीदवारों के अलावा निर्दलीय उम्मीदवार भी हिस्सा लेते हैं. कुछ डमी उम्मीदवार भी खड़े कर दिए जाते हैं. जिनका उद्देश्य विरोधी उम्मीदवार के वोट काटना होता है. धरतीपकड़ जैसे उम्मीदवार भी लोकतंत्र का प्रहसन रचते नजर आते है. हार सुनिश्चित होने के बावजूद ऐसे प्रतिनिधि चुनावों में हिस्सा लेते हैं. तमाम सावधानियों के बावजूद कुछ मत खारिज होते हैं. कुछ ऐसे मतदाता होते हैं, जिन्हें एक भी प्रत्याशी योग्य नहीं लगता. निर्वाचन केंद्र पर वे ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प चुनते हैं. इन परिस्थितियों में 30—35 प्रतिशत मतदान प्राप्त कर लेने वाले राजनीतिक दल चुनावों में अप्रत्याशित जीत दर्ज कर लेते हैं. विगत चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिले बंपर बहुमत के पीछे मात्र 31 प्रतिशत वोट थे. यह प्रतिशत कुल दर्ज मतों में से वैध मतों का है. यदि मान लिया जाए कि अवैध मतों का प्रतिशत शून्य या नगण्य है तो उपर्युक्त उदाहरण में विजेता दल को 4290 का 31 प्रतिशत; यानी मात्र 1716 मत प्राप्त होंगे. यदि इसे कुल जनसंख्या के अनुपात में देखा जाए तो यह लगभग 17 प्रतिशत यानी उसका छठा हिस्सा है. ये 17 प्रतिशत लोगों के प्रतिनिधि ही आगे चलकर देश का शासनभार संभालते हैं. शेष 83 प्रतिशत नागरिकों में मताधिकार से वंचित लोगों के अलावा वे लोग सम्मिलित होते हैं, जो विपक्ष होने के कारण सीधे सरकार चलाने की जिम्मेदारी से मुक्त होते हैं. यही स्थिति चुनाव जीतने वाले प्रत्याशियों की भी है. वे भी कुल मतदान का पचीसतीस और जनसंख्या का पंद्रहबीस प्रतिशत मत पाकर जीत दर्ज करा ले जाते हैं; यानी जिसे सरकार कहते हैं, वह मात्र 1718 प्रतिशत लोगों की इच्छाओं को अभिव्यक्त करती है. बाकी के मत विभिन्न दलों/प्रत्याशियों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाते हैं.

ऊपर दिया गया उदाहरण केवल मानसकल्पना नहीं है. चुनावों में इस प्रकार के खेल खूब खेले जाते हैं. इस सचाई को वे देश में फलतेफूलते लोकतंत्र का नाम देकर महिमामंडित करते रहते हैं. आगे बढ़ने से पहले हम वास्तविक आंकड़ों पर आते हैं. मई 2014 में देश की कुल जनसंख्या लगभग 124 करोड़ थी. उसी महीने हुए आम चुनाव में कुल 83.42 करोड़ (कुल जनसंख्या का 67.3 प्रतिशत) निर्वाचकों में से 53.38 करोड़; यानी 66.38 प्रतिशत (कुल जनसंख्या के हिसाब से मात्र 44.66 प्रतिशत) मतदाताओं ने मतदान में हिस्सा लिया था. इनमें से विजेता भारतीय जनता पार्टी को मात्र 17.16 करोड़ वोट, कुल मतदान का 31 प्रतिशत तथा एनडीए को कुल मिलाकर 35 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. इस तरह संसद में सर्वाधिक सीट लाने वाली भाजपा को कुल मतदाता संख्या के मात्र 20.57 प्रतिशत तथा देश की कुल जनसंख्या का मात्र 13.84 प्रतिशत (लगभग सातवां हिस्सा) मत प्राप्त हुए हैं. कुल जनसंख्या के 86.16 प्रतिशत लोग या तो किसी कारणवश चुनाव प्रक्रिया से बाहर थे, अथवा भाजपा के स्थान पर दूसरे विकल्प उनकी पसंद थे. दूसरे शब्दों में जिसे ‘मोदी मैजिक’ कहा गया है, वह औसतन पांच मतदाताओं में से केवल एक पर चला है. जबकि देश के कुल मतदाताओं में से लगभग अस्सी प्रतिशत ऐसे थे, जिन्हें मोदीजी, भाजपा तथा उसका संगठन अस्वीकार्य था. चूंकि वे बिखरे हुए थे, इतने बिखरे थे कि अलगअलग समूह तथा नेता की इच्छाओं की अभिव्यक्ति करते थे. इसीलिए उन्हें मिले खंडित जनादेश को निष्प्रभावी मानते हुए किनारे कर दिया गया. इसे हम अप्रत्यक्ष लोकतंत्र की सीमा भी कह सकते हैं. भारत में जनता केवल अपने प्रतिनिधि चुनती है. उसके बाद सरकार बनाने, और चलाने का अधिकार जनता के हाथों से निकलकर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अधीन चला जाता है. जनता प्रायः मूक दृष्टा बन जाती है. इसलिए 16वीं लोकसभा में कुल मतदाताओं में से दोतिहाई से ज्यादा मत विपक्ष के संयुक्त खाते में आने के बावजूद, तकनीकी कारणों से नेता विपक्ष का पद खाली रह जाता है. इसे प्रथम दृष्ट्या सत्तारूढ़ दल की लोकतांत्रिक मूल्यों में अनास्था मान सकते हैं, लेकिन भारतीय संसद के इतिहास में यह पहली घटना नहीं है. ऐसा पहले भी हो चुका है, जब अपनी जीत पर इतराया हुआ सत्तापक्ष विपक्ष की मांग अनसुनी कर देता है. भूल जाता है कि इस विशाल लोकतांत्रिक देश में उसे मतदाताओं के केवल चौथेपांचवे हिस्से का समर्थन प्राप्त है. बाकी का समर्थन विपक्ष में बंटा होने के कारण वह निष्प्रभावी भले हो, लेकिन उपेक्षायोग्य हरगिज नहीं है. सच तो यह है कि सत्ता में आने के बाद इस देश के राजनीतिक दल, केवल सरकार बनाने और चलाने की सोचते हैं, लोकतांत्रिक मूल्यों में उसकी उसकी अपेक्षित आस्था रह ही नहीं जाती. दूसरे शब्दों में जिसे हम बहुमत की राजनीति कहते हैं, वह असल में अल्पमत की राजनीति होती है. सरकारें कुल मिलाकर आभासी बहुमत के सहारे शासन करती हैं. आभासी बहुमत के सहारे चलने वाली सरकारों से देश में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना असंभव है. यह प्रकारांतर में अन्यान्य विकृतियों की वजह भी है.

व्यावहारिक राजनीति की मजबूरियों को कुछ देर के लिए नजरंदाज कर दिया जाए तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जिसे बहुमत की सरकार कहा जाता है, असल में वह देश की कुल जनसंख्या तथा निर्वाचकों की संख्या के अनुपात में अल्पमत की सरकार होती है. इस पर विचार करने, स्थिति में सुधार लाने हेतु गंभीर प्रयास करने के बजाय, समस्या को बहुदलीय लोकतंत्र की स्वाभाविक परिणति मान लिया जाता है. वर्तमान व्यवस्था की कमी है कि इसमें उस बंटे हुए ‘बहुमत’ का कोई सदुपयोग नहीं होता, जो सत्ताधारी दल को प्राप्त मतों की संख्या से कहीं अधिक है, लेकिन छोटेछोटे हिस्सों में बंटकर अपना प्रभाव खो चुका है. सोलहवीं संसद में ही कुल मतदाता संख्या के हिसाब से प्रत्येक पांच में से चार और दर्ज मतदान के हिसाब से प्रत्येक तीन से से दो मतदाता वर्तमान सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगियों के विरोध में थे. ऐसे में केवल एक अपेक्षा रह जाती है कि सरकारें सभी प्रकार के भेदभाव, राजनीतिकसामाजिक वैमनस्य को भुलाकर संपूर्ण समाज के कल्याण के लिए काम करें. यह तब संभव है जब जीतकर सरकार बनाने वाले नेतागण ध्यान रखें कि वे केवल आभासी बहुमत के सहारे उस पद तक पहंुचे हैं. यदि उन्हें पसंद कर संसद या विधानसभा में पहुंचाने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं तो उसको नापसंद करने वाले अथवा विकल्प की तलाश करनेवाले मतदाताओं की संख्या उनसे कहीं बड़ी है. उसके नेतृत्व की कसौटी उन सब का विश्वास प्राप्त करने से आंकी जाएगी जिन्होंने उसके विरोध में मतदान किया था. यहां कहा जा सकता है कि जिन लोगों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया, अथवा आयु अथवा अन्य किसी कारण से मताधिकार से वंचित रहे हैं, वे सत्तारूढ़ दल के विरोध में ही मतदान करें, यह आवश्यक नहीं है. दूसरे ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके आधार पर नागरिकों को मतदान के लिए बाध्य किया जा सके. इसलिए जो मतदाता स्वेच्छासहित निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सेदारी करते हैं, उनकी राय के आधार पर निर्णय लेना ही उचित है. यह व्यावहारिक हो सकता है और तर्कसंगत भी, लेकिन ऐसा करते हुए हम अनायास ही उस विभाजित बहुमत की महत्ता को नकार रहे होते हैं, जिसने चुनावों में सक्रियता दिखाते हुए सत्तारूढ़ दल के विकल्पों में अपना विश्वास जाहिर किया था. दूसरी प्रतिक्रिया यह हो सकती है एक बार सरकार बन जाने के बाद उसे चुनावी राजनीति से ऊपर मान लिया जाता है. माना जाता है कि सरकार संविधान के प्रति आस्थावान है. इसलिए वह देश के सभी नागरिकों के लिए, चाहे उसने समर्थन में मतदान किया हो या विरोध में, बिना किसी पक्षपात के काम करती है. इस बारे में हमारा केवल यह कहना है कि लोकतंत्र में विपक्ष भी जनता की राय की नुमाइंदगी करता है, इसलिए उसके नेता पद को सत्तारूढ़ दल की इच्छा अथवा संसद में प्राप्त सीटों के पर निर्भर नहीं होना चाहिए.

इस दावे में सचाई है कि विजेता दल को इतने मत तो प्राप्त हो ही जाते हैं जितने किसी दूसरे दल को प्राप्त नहीं होते. चुनावों में 31 प्रतिशत वोट पाकर भी भाजपा प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस (लगभग 19 प्रतिशत) से काफी आगे है. लोकतंत्र में चूंकि मतदाता सर्वोपरि होता है, अतएव उसके किसी निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाना अनुचित है. फिर जो लोकतंत्र मतदाताओं को सरकार चुनने का अधिकारी बनाता है, वह राजनीतिक दलों और नेताओं को भी अधिकृत करता है कि वे सरकार में सम्मिलित होने के लिए अपनी तरह से दावेदारी पेश करें. इस परिस्थितियों में मतदाता अपने विवेक के आधार पर जो निर्णय लेता है, और उसमें जो बहुमत सामने आता है— लोकतांत्रिक प्रक्रिया उसी के सहारे आगे बढ़ती है. उसमें बहुमत छोटाबड़ा, कम या ज्यादा मतों का नहीं देखा जाता, वह केवल बहुमत होता है, भले ही जीत का अंतर एक वोट का क्यों न हो. इसलिए संसद में जिस दल का बहुमत हो वही स्वयं या अपने सहयोगियों के साथ सरकार बनाने का अधिकार रखता है. लेकिन यह व्यवस्था प्रकारांतर में उस विशाल जनमत की उपेक्षा करती है, जो विजेता प्रत्याशी के विरोध अथवा विकल्प की तलाश में पड़ा था. यहां सरकार या सत्तापक्ष के अधिकार को लेकर कोई चुनौती देने या उसकी वैधता पर सवाल उठाने का हमारा कोई लक्ष्य नहीं है. हमारा लक्ष्य लोकतंत्र और लोकप्रिय राजनीति की उन विडंबनाओं की ओर संकेत करना मात्र है, जिनके चलते मतदान के साथ ही कुल मतदाताओं का 69 प्रतिशत तथा जनसंख्या का 87 प्रतिशत हिस्सा सरकार और उसकी निर्णय प्रक्रिया से बाहर हो जाता है. यह स्थिति उन लोगों के लिए विशेष रूप से असंतोषजनक होती है जो मानते हैं कि भारत एक कल्याण राज्य है. जो लोकतंत्र के आदर्श ‘जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन’ में विश्वास रखते हैं.

भारतीय समाज में अशिक्षा और अंधविश्वास बड़ी समस्या है. लोग आज भी धर्म एवं मिथकीय आख्यानों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं. लोकतंत्र तथा आधुनिक राजनीतिक दर्शनों को लेकर उनकी समझ आजादी के 68वें वर्ष बाद भी अधूरी है. इसका प्रभाव चुनाव प्रचार पर भी पड़ता है. निर्वाचन प्रक्रिया प्रायः उन मुद्दों पर केंद्रित हो जाती है, जिनका लोगों के विकास से कोई संबंध नहीं होता. बल्कि कई बार तो वह विकास की प्रतिगामी धारा पकड़ लेती है. लोकप्रिय राजनीति में नेता यह मान लेते हैं कि नेतृत्व करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. इसलिए वे सत्ता तक पहुंचने के लिए मनमाने हथकंडे अपनाते हैं. यह भूलकर कि लोकतंत्र में सरकारें जनमत के आधार पर बनती और चलाई जाती हैं, वे स्वयं को शिखर पर स्थापित करने का हरसंभव षड्यंत्र रचते रहते हैं. भारत जैसे देशों में जहां लोकतंत्र कुछ ही दशक पुराना है तथा धर्म और जाति के चंगुल में फंसे समाज पर सामंतवाद का प्रभाव आज भी है, ऐसे लोगों की संख्या काफी होती है. वे लोग अपनीअपनी तरह से स्वयं को शिखर तक पहुंचाने की योजनाएं बनाते रहते हैं, जिनकी रूपरेखा मतदाता के हितों के बजाए नेता के स्वार्थ के आधार पर गढ़ी जाती है. परिणामस्वरूप चुनाव नागरिकों की सामान्य सहमति के आधार पर संचालित होने के बजाय प्रबंधनकला में ढलने लगता है. जिसके प्रभाव में लोगों को क्षुद्र मुद्दों के आधार पर छोटेछोटे समूहों में बांटकर काम चलाऊ बहुमत जुटाने का प्रयत्न यथासंभव किया जाता है. जिससे पूरी चुनाव प्रक्रिया एक तमाशे का रूप ले लेती है. मतदाता प्रत्याशियों की कथनी और करनी के अंतर को समझता है, किंतु सही विकल्पों का अभाव उसकी निर्णय शैली को अगंभीर और चलायमान बना देता है. अन्यमनस्कता के बीच वह लोकप्रिय राजनीति के वोटजुटाऊ हथकंडों का शिकार होता रहता है. यदि हम ध्यानपूर्वक विश्लेषण करें तो पाएंगे कि भारतीय राजनीति की अनेकानेक समस्याएं सांप्रदायिकता, चुनावों के दौरान उत्तेजक मुद्दे उछालना, जनमत को विभाजित करने की कोशिश करना, इसी की देन हैं.

कोई भी चयन आपके विवेक और एकाग्रता की परख करता है. सर्वोत्तम चयन के लिए आवश्यक है कि वह एकदम शांत और निरुद्धिग्न वातावरण में संपन्न हो. जबकि भारत में पूरी निर्वाचन प्रक्रिया उत्तेजना के माहौल में संपन्न होती है. मतदाता को यह जाननेसमझने का अवसर मिल ही नहीं पाता कि उसका अपना हित किसमें है? उसे अकसर उन्हीं मुद्दों के बीच अपनी राय बनानी पड़ती है, जो राजनीतिक पार्टियां और मीडिया उसके बीच पेश करते हैं. ऐसे में वह भीड़ की मानसिकता से नियंत्रित होता है. विराट बहुमत विपक्ष में बंटकर निष्प्रभावी हो जाता है; और कुल निर्वाचकों के 17—18 प्रतिशत मत बटोरने वाले नेता के आगे जीत परोस दी जाती है—इसलिए नेतागण तात्कालिक महत्त्व के उन मुद्दों को उठाते हैं, जिनका दूरगामी प्रभाव विकासविरोधी होता है. उससे सामाजिकसांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ जाता है. वे समझते हैं कि कुल मतदाताओं के पांचवेंछठे हिस्से को भी प्रभावित कर लिया जाए तो भी सफलता की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए मतदान प्रबंधन में बदल जाता है. इससे चुनाव प्रक्रिया के दौरान अमित शाह जैसे कुशल राजनीतिक प्रबंधकों और कार्यकत्र्ताओं का महत्त्व बढ़ जाता है. ऐसे लोगों के पास न तो विकास के लिए खास नीति होती है, न ही लोकहित के वैकल्पिक कार्यक्रम. वे लोग जाति, धर्म, क्षेत्रीयता के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित करना जानते हैं. किस तरह समर्थक मतदाताओं को अपनी ओर खींचा जाए और विरोधी के मतों को बांट दिया जाए, इसपर जमकर चर्चा होती है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता साफसाफ कहा करते थे कि चुनाव बूथप्रबंधन से अधिक कुछ नहीं है. इसलिए वे प्रत्येक बूथ पर किस तरह समर्थक मतों को अपने पक्ष में खींचा जाए और जो समर्थन में नहीं हैं, उन्हें बांट दिया जाए, इसपर खुलकर चर्चा करते थे. पिछले चुनावों को ही लें तो पिछला चुनाव विकास के नारे और सांप्रदायिकता के बीच लड़ा गया था. भाजपा के पास कोई वैकल्पिक विकास नीति नहीं थी. आज भी वह कांग्रेस सरकार द्वारा लागू नीतियों के विकल्प में कोई नया कार्यक्रम नहीं ला पाई है, न ही उसके पास कोई वैकल्पिक विचार है. लेकिन सांप्रदायिकता के नाम पर वह मतों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही और प्रत्येक तीन मतदाताओं में दो द्वारा नकारने के बावजूद वह संसद में सबसे अधिक जनप्रतिनिधि लाने में सफल हुई.

बहुदलीय व्यवस्था में चुनावों के दौरान मत अनेक हिस्सों में बंट जाते हैं, और जैसा कि हाल के चुनावों में देखा गया है, अनेक हिस्सों में बंटे मतदाता अपनी राजनीतिक अहमियत भी खो देते हैं. इसलिए चुनावों में जीत हासिल करने के लिए संघर्ष बहुत महीन स्तर पर किया जाता है. उसके लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की योजनाएं बनाई जाती हैं. उसके तहत वोट खींचने के साथसाथ दूसरे दलों के वोट काटने के षड्यंत्र भी रचे जाते हैं. चूंकि भारतीय समाज जातिआधार पर बुरी तरह विभाजित है, अतएव जातियों और जातिसमूहों को अपनी ओर खींचने के लिए तरहतरह की चालें चली जाती हैं. इसके प्रमुख हथियार आरक्षण, सांप्रदायिकता आदि हैं. उदाहरण के लिए दलित और पिछड़े दोनों ही जातिआधारित शोषण का शिकार रहे हैं. यह स्वाभाविक था और समय भी मांग भी कि आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की लड़ाई इन दोनों वर्गों द्वारा मिलकर लड़ी जाती. राममनोहर लोहिया से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह, कांशीराम आदि का यही सपना था. जनता पार्टी के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम सिंह यादव क्रमशः दलित और पिछड़ी राजनीति के शिखर नेतृत्व के रूप में उभरे थे. अपेक्षित था कि वे आगे चलकर वर्णव्यवस्था समर्थक शक्तियों से एकजुट रहकर संघर्ष करते. लेकिन सवर्ण सोच वाले मीडिया, नौकरशाहों और कुछ राजनीतिक दलों ने ऐसी चालें चलीं कि दोनों के बीच की स्वाभाविक मैत्री की अपेक्षा, स्थायी दुश्मनी में बदल गई. नतीजा यह हुआ कि जीत के लिए दोनों दल कथित ऊंची जातियों के मतों के मोहताज बनकर रह गए और पिछले आम चुनावों सवर्ण वोट बैंक के अपने स्वाभाविक खाने में खिसक जाने से दोनों ही को मुंह की खानी पड़ी.

दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच चल रही नूराकुश्ती को भी देश में लगातार बढ़ रही नकारात्मक राजनीति के रूप में देख सकते हैं. अरविंद केजरीवाल और आआप की महत्त्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं. नई होने के बावजूद राज्य सरकार की स्वायत्तता के नाम पर आआप ने केंद्र सरकार को समयसमय पर चुनौती दी है. इससे उसकी मंशा कांग्रेस को मृतप्रायः सिद्ध कर, स्वयं को भाजपा के एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करने की है. इसके लिए राज्य सरकार ने दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर उपराज्यपाल नामक संस्था से बेजा टकराव किया है. दूसरी ओर उपराज्यपाल ने भी अनेक अवसरों पर खुद को केंद्र का प्रतिनिधि होने से अधिक भाजपा सरकार के प्रतिनिधि दर्शाने की कोशिश की है. आआप नेताओं को लगता है कि जैसे दिल्ली में कांग्रेस के वोटबैंक पर कब्जा किया है, वैसा ही वे बाकी राज्यों में भी कर सकते हैं. आभासी प्रतिद्विंद्वता दर्शाने का दूसरा उदाहरण नकली प्रमाणपत्रों के आधार पर एकदूसरे पर हमला करना है. केंद्रीय मंत्री पर समान आरोप होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने केवल दिल्ली सरकार के मंत्री को फर्जी डिग्री के आरोप में गिरफ्तार करने में तत्परता दिखाई. दूसरे कुछ मामले भी चर्चा में हैं.

उल्लेखनीय है कि नामांकन के समय भरे जाने वाले शपथपत्रों में शैक्षिक योग्यता के अलावा संपत्ति संबंधी ब्यौरे भी होते हैं. लेकिन न तो भाजपा न ही आआप के किसी नेता ने प्रतिपक्षी को शपथपत्र में दर्ज संपत्ति संबंधी आंकड़ों की प्रामाणिकता को परखने तथा उनके आधार पर दोषी को घेरने की कोशिश की. क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि संपत्ति के आधार पर बात आगे बढ़ी तो दूर तक जाएगी. राबर्ट बढेरा को कथित रूप से भूमि लेनदेन में लाभ पहुंचाने को भी कांग्रेस के विरोध में मुद्दा बनाया गया था. मगर चुनाव के बाद मामला पूरी तरह ठंडे बस्ते में है. क्योंकि हरियाणा में जमीन खरीद के सौदों में लाभ प्राप्त करने वालों में सुषमा स्वराज के संबंधियों का नाम भी आ चुका है. जाहिर है उस हम्माम में सभी नंगे हैं, इसलिए उससे बचा गया है. यूं भी नूराकुश्ती में जैसे सबसे हल्के और दिखावटी दांव चले जाते हैं. संजय सिंह जैसे आआप के महत्त्वाकांक्षी नेता उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं. हालांकि आआप के लिए उत्तर प्रदेश के चुनाव दिल्ली जैसे आसान होने वाले नहीं हैं. फिर भी वे खुद को राजनीतिक विकल्प के रूप में खड़ा करने की भरसक कोशिश में हैं. इस नूराकुश्ती में भाजपा का भी लाभ है. वह चाहती है कि इस अवधि में आआप को इतना चर्चित कर दिया जाए कि वह राज्यों में भाजपा विरोधी मतों के विभाजन में सफल हो जाए. चूंकि महत्त्वाकांक्षी आआप के नेता दूसरे दलों से समझौता करके चुनाव लड़ने वाले नहीं हैं, इसलिए मतविभाजन का इसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा. इसलिए जंग के बहाने भाजपा भी एक नकली जंग आआप से लड़ रही है. यह नूराकुश्ती आगे भी चलती रहेगी. इसका चुनाव बिहार चुनावों में भले ही न मिले, क्योंकि वहां केजरीवाल नितीश कुमार को समर्थन देने की घोषणा कर चुके हैं. मगर उत्तर प्रदेश में जहां पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का मूड बना रही है, वहां भाजपा को इस नूराकुश्ती का लाभ मिलने की पूरी उम्मीद है.

आजादी और उसके बाद अनेक अवसरों पर भारतीय जनता ने दिखाया है कि वह परंपरागत राजनीति से ऊब चुकी है. स्वाधीनता संग्राम के दौरान गांधी और बाद में लोहिया, जयप्रकाश नारायण, विश्वनाथ प्रताप सिंह आदि के नेतृत्व में आगे आकर उसने अपनी जागरूकता का प्रदर्शन किया है. दिल्ली की जनता ने भी कांग्रेस के परंपरागत नेतृत्व को नकारकर आआप को अपनाया है. ये घटनाएं दिखाती हैं कि इस देश में वैकल्पिक राजनीति के लिए भरपूर संभावनाएं मौजूद हैं. अतः परिवर्तन की चाहत रखने वाले बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि वे जनता में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति विश्वास पैदा करें. लोगों को अपने हितों की पहचान करने तथा उनके लिए संगठित होने की प्रेरणा जगाएं. ताकि छोटेछोटे मुद्दों के आधार पर होने वाले मतविभाजन को रोका जा सके. यदि आवश्यक हो तो कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं भी की जा सकती हैं. दुनिया में कुछ ऐसे देश भी हैं जहां कुल मतदाताओं का पचास प्रतिशत वोट न मिलने पर चुनाव प्रक्रिया को ही अपूर्ण मान लिया जाता है. जाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर बंटे भारतीय समाज मंे यह फिलहाल असंभवसा है. लेकिन सरकारें वास्तविक बहुमत यानी अधिकतम के समर्थन के आधार पर बनें या चलें, ऐसी कोशिशें चलती रहनी चाहिए. आभासी लोकतंत्र को वास्तविक लोकतंत्र में बदलने का एक रास्ता यह भी हो सकता है कि बहुमत संपन्न दल की भांति ही वे दल जो सरकार के साथ नहीं हैं, पार्टीलाइन से ऊपर उठकर विपक्ष के नेता का चुनाव करें. विपक्ष के नेता का चुनाव दलविशेष के सदस्यों की न्यूनतम संख्या पर निर्भर न होकर उन सदस्यों की मर्जी से हो जो सरकार बना रहे दल अथवा समूह से किसी भी प्रकार से असंबद्ध हों. वह सदस्य संपूर्ण विपक्ष की नुमाइंदगी विवेक सम्मत ढंग से, लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार करे. तभी वास्तविक बहुमत जो विपक्ष के साथ है, की मानरक्षा संभव है.

© ओमप्रकाश कश्यप