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साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्यᅳदो

सामान्य

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और संस्कृति

 

न्याय एक वर्ग संख्या हैपाइथागोरस

मार्क्स ने मुख्यतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों का विश्लेषण किया है. उसमें एक सिरे पर अनियोजित मशीनीकरण का शिकार श्रमिक वर्ग है, दूसरे पर पूंजीपति उत्पादक. उन दिनों चीन, रूस, ब्राजील आदि देशों की अर्थव्यवस्था की भांति भारतीय अर्थव्यवस्था भी कृषिकेंद्रित थी. इन सभी देशों ने वर्गसंघर्ष के सिद्धांत का प्रयोग स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया. जहां आवश्यक लगा, वहां संशोधन भी किया. भारत में ऐसा नहीं हो सका. जबकि मार्क्स तथा उसके वर्गसंघर्ष की सूचना यहां बहुत पहले पहुंच चुकी थी. बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में युवा क्रांतिकारी आजाद भारत के लिए वर्गसंघर्ष की अनिवार्यता को समझते थे. सोवियत संघ की ओर से उन्हें भरपूर मदद भी मिल रही थी. स्वामी विवेकानंद, डॉ. हरदयाल, रासबिहारी बोस, करतार सिंह सराबा, सोहन सिंह भखना आदि पर साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव था. भगत सिंह तो लेनिन को अपना आदर्श मानते ही थे. आधुनिक भारत के निर्माताओं में प्रमुखतम स्थान रखने वाले डॉ. आंबेडकर की आरंभिक चेतना भी समाजवादी थी. दक्षिण में रामास्वामी पेरियार ने अपनी राजनीति साम्यवादी संगठनों के सक्रिय सदस्य के रूप में आरंभ की थी. उन दिनों सैकड़ों उत्साही युवा वर्गक्रांति का सपना देखते थे. उनमें से कुछ ने साम्यवाद को समझने के लिए सोवियतसंघ की यात्रा तक थी. उसकी तरफ से साम्यवादीक्रांति की कोशिश में जुटे युवाओं को आर्थिक मदद भी प्राप्त होती थी. देश में साम्यवाद के नाम पर राजनीतिक दल भी बने, लेकिन वे सभी प्रयास केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने तक सीमित थे. परिणामस्वरूप हमारे यहां वर्गसंघर्ष की वैसी स्थिति कभी नहीं बन सकीं, जिस तरह बाकी देशों में, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. जिन प्रांतों में वर्षों तक साम्यवादी दलों की सरकारें रहीं, वहां भी न तो धर्म को राजनीति से पूरी तरह अलग किया गया, न जाति को किसी प्रकार की चुनौती पेश की गई. न ही वर्गहीन समाज की स्थापना के विशेष प्रयास किए गए. परिणामतः जातिधर्म के चक्रब्यूह में बुरी तरह फंसा भारतीय ‘सर्वहारा’, वर्गचेतना से दूर बना रहा. वह वर्चस्वकारी संस्कृति से इतना अनुकूलित रहा कि उससे बाहर निकलने के विचारमात्र से उसे अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगता था.

जातिव्यवस्था के शिखर पर ब्राह्मण और उसके आजूबाजू क्षत्रिय और वैश्य रहे हैं. चौथे यानी अंतिम पायदान पर शूद्र. उनकी स्थिति उन मजदूरों से भी कहीं अधिक दयनीय थी, जिन्हें मार्क्स ने अपने विशद ग्रंथ पूंजी में ‘सर्वहारा’ से संबोधित किया था. ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने श्रमिकोंमजदूरों और मेहनतकश जिंदगी जीने वाले छोटेकिसानों, शिल्पकर्मियों को छोटेछोटे जातिसमूहों में बांट दिया है. शूद्र को उसकी सेवा का वास्तविक मूल्य देने के बजाय, स्वर्गादि के प्रलोभन से बहला दिया जाता है. इसलिए संख्या में प्रथम तीन वर्गों से चार गुना होने के बावजूद वे कोई परिवर्तनकारी शक्ति नहीं बन पाते. उनके हित पहले भी एकदूसरे से टकराते थे, आज भी टकराते हैं. परिणामस्वरूप उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आंतरिक संघर्ष में खपता रहता है. इसका एकमात्र समाधान था कि शूद्रों में वर्गीय चेतना का विस्तार किया जाए. मगर गांधी सहित लगभग सभी कांग्रेसी नेता शूद्रों में वर्गीय चेतना उभारने के बजाय उन्हें हालात से संतोष करने की सलाह देते थे. सामाजिक मोर्चे पर गांधी का समूचा आंदोलन यथास्थिति बनाए रखने तक सीमित था. व्यवस्था परिवर्तन की यदि कोई मांग भी करे तो वे तत्क्षण विरोध पर उतर आते थे. गांधी के अनुसार पाखाना साफ करने का काम दैवीय अनुभव था. ठीक यही बात हमारे आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’(2007) में दोहरा चुके हैं. कुल मिलाकर मार्क्स ने जिन परिस्थितियों को वर्गसंघर्ष के लिए जरूरी माना है, उसकी जो कसौटियां तय कीं हैं, भारत में उससे कहीं त्रासद हालात होने के बावजूद यहां क्रांति की बात करना, दिवास्वप्न बना रहा. निम्नस्थ वर्गों में वर्गीय चेतना की कमी, शीर्षस्थ वर्गों के उत्पीड़न और अत्याचारों को स्थायी बनाती है. उसके अभाव में बहुसंख्यक वर्ग छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर अपनी प्रभावी क्षमता को नष्ट करता रहता है.

ऊपर से सत्तासीन अभिजन द्वारा यथास्थिति बनाए रखने की कूटनीतिक चालें. जो कभी दान, कभी सहयोग, तो कभी न्याय के नाम पर अपनी आय का एक हिस्सा उन कार्यों पर खर्च करता है, जिनके माध्यम से बहुजन को निरंतर भुलावे में रख सके. उन्हें लगे कि वर्तमान व्यवस्था ही उनके लिए सर्वाधिक हितकारी और श्रेयस्कर है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए शक्तिशाली अभिजन अनेक रणनीतियां अपनाता है. भारतीय संस्कृति के संदर्भ में उसका भावप्रवण नारा हैᅳ‘अनेकता में एकता.’ जनाक्रोश से बचने के लिए अल्पसंख्यक अभिजन प्रायः इस तर्क के माध्यम से भारतीय संस्कृति का महिमामंडन करता है कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद भारतीय संस्कृति में एकता के तत्व समाहित हैं. स्कूलों में बच्चों को यह पाठ शुरुआत से ही पढ़ाया जाता है. इस नारे के साथ भारतीय समाज के अंतर्विरोधों तथा उस उत्पीड़न की ओर से आंखें मूंद ली जाती हैं, जिसका सामना बहुजन समूह शताब्दियों से करते आए हैं. प्रकारांतर में ‘अनेकता में एकता’ का मिथ सांस्कृतिक शोषण का शिकार रहे लोगों के लिए बोझ बन जाता है. चूंकि सांस्कृतिक प्रतीक आस्था और विश्वास के रास्ते जीवन में जगह बनाते हैं, उन्हें तर्क और संशय से प्रायः परे रखा जाता हैइस कारण उनसे निपटना आसान नहीं होता. दूसरी ओर अल्पसंख्यक अभिजन यथास्थिति बनाए रखने के लिए हर समय यथाशक्ति प्रयत्नशील रहते हैं. संस्कृति के शोषणकारी तत्वों का वे मिथों के माध्यम से निरंतर महिमामंडन करते रहते हैं. आवश्यकता पड़ने पर नए मिथ गढ़ना अथवा लोकप्रचलित मिथों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करना उनकी पुरानी आदत है. वौद्धिक स्तर पर शीर्षस्थ जातियों पर पूरी तरह निर्भर बहुजन समुदाय, इन चालाकियां को समय रहते समझ नहीं पाता; और अपनी अज्ञानता के कारण ‘अनेकता में एकता’ की भ्रांति को सच माने रहता है.

वर्गचेतना, वर्गसंघर्ष की प्रथम और अनिवार्य शर्त है. जातिभेद का शिकार रहे, दैवीयअनुकंपा की आस में जीने वाले तथा शोषण को अपनी नियति मान चुके भारतीय समाज में शुरू से ही इसका अभाव रहा है. सांस्कृतिक एकता की दुहाई भजनकीर्तन, पूजापाठ जैसे अनुत्पादक तरीकों, त्योहारों तथा उन सामान्य रीतिरिवाजों के माध्यम से दी जाती है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच एकदूसरे के साथ रहते, साथसाथ काम करते हुए स्वाभाविक रूप से एकदूसरे समूह के बीच चले आते हैं. इसके बहाने अल्पसंख्यक अभिजन आसानी से उन प्रतीकों को थोपने में सफल हो जाता है, जो वर्गीय असमानता तथा अल्पसंख्यक शीर्षस्थ अभिजन की सामाजिकसांस्कृतिक श्रेष्ठता के मिथ को, बहुजन के मानस पर स्थापित करते हैं. गांवों में दिवाली से चार दिन पहले कुम्हार घरघर दिये पहुंचाता है. यत्न से दीपक बनाने, घरघर पहुंचाने के बावजूद कीमत वही मिलती है, जो यजमान तय करता है. अपने ही श्रमोत्पाद का मूल्यांकन करने का अधिकार कुम्हार को नहीं होता. होली को समसरता का त्योहार माना जाता है. कहा जाता है कि सारे वर्गभेद होली के रंगों में बह जाते हैं. असल में ऐसा नहीं है. उस दिन भी पुजारी पूजापाठ करता है, बढ़ई लकड़ियां चीरता है और कुम्हार हमेशा की तरह घरघर मिट्टी के बर्तन सप्लाई करता है. यही स्थिति बाकी त्योहारों की भी है. इन विसंगतियों को प्रायः सहजीवन और समरसता, जिन्हें समाज में समानता के पूरक के रूप में पेश किया जाताके नाम पर पचा लिया जाता है. जाहिर है भारतीय संस्कृति को लेकर ‘अनेकता में एकता’ का मिथ भ्रम अथवा भावुक अवधारणा से इतर कुछ भी नहीं है. जाति और वर्ण के आधार पर असमानता को नैसर्गिक मान लेने वाली भारतीय संस्कृति, मूलतः वर्चस्वकारी संस्कृति है. उसे मुट्ठीभर लोगों की मर्जी से, उन्हीं के द्वारा, उन्हीं की स्वार्थसिद्धि के लिए कायम रखा गया है. सांस्कृतिक अंतर्विरोधों एवं तज्जनित असंतोषों को नकारने की बात, मूलतः सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने की चाहत है. यह काम वही लोग करते हैं, जिन्हें इस संस्कृति ने असीमित विशेषाधिकार देकर अपने सिर पर सवार रखा है. बहुजन समूहों की अज्ञानता, आपसी स्पर्धा और दूसरों के लिए श्रम करने की प्रवृत्ति ने उन्हें शक्तिशाली बनाया हुआ है.

अनेकता में एकता’ की दावेदार भारतीय संस्कृति में अंतर्विरोधों की भरमार है. इसलिए उसमें अंतर्संघर्ष भी हैं. वैदिक काल में उसे आजीवकों, लोकायतियों, वैनायिकों, चार्वाकों जैसे भौतिकवादी चिंतकों की ओर से चुनौती मिलती थी. कालांतर में श्रमणसाधकों ने आश्रमों में पनपने वाली कर्मकांड संस्कृति को चुनौती पेश की और मध्यमार्गी तत्वदर्शन के भरोसे ऐसी कामयाबी हासिल की कि कर्मकांड केंद्रित वैदिक धर्मदर्शनों को, आने वाली कई शताब्दियों तक पुनः आश्रमों और कंदराओं में शरण लेने को विवश होना पड़ा. बौद्ध दर्शन के पराभव की शुरुआत हुई तो पुरोहित स्तर के धर्माचार्यों ने स्मृति, पुराण जैसे ग्रंथों के माध्यम से धार्मिक कर्मकांडों, पाखंडों को नए सिरे से थोपना आरंभ कर दिया. उस दौर में भी उसका सामना श्रमणों और भौतिकवादी दार्शनिकों द्वारा किया गया. उसके कुछ अर्से बाद यहां इस्लाम का आगमन हुआ. तैंतीस करोड़ देवीदेवताओं के बोझ से दबे हिंदू धर्म को इस्लाम के एकेश्वरवाद की ओर से चुनौती मिली. उसमें जीत एकेश्वरवाद की हुई. जातीय भेदभाव झेल रही जातियों में इस्लाम के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा. धर्मांतरण की बढ़ती घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए शंकराचार्य को वेदांत में अद्वैतवाद के समर्थन में आना पड़ा. मध्यकाल में धर्म के नाम पर तंत्रमंत्र, ऊंचनीच और पाखंड बढ़े तो संतकवि आड़े आ गए. तुकाराम, रैदास, कबीर, दादू आदि ने धार्मिक पाखंडियों को खूब ललकारा. औपनिवेशिक भारत में हालात बदले. अठारवींउनीसवीं शताब्दी के वैचारिक आंदोलनों से अनुप्रेत अंग्रेज अपेक्षाकृत विकसित संस्कृति अनुगामी थे. उनके समक्ष ब्राह्मण संस्कृति की अतीतोन्मुखी महानता कारगर न थी. दूसरे उन्हें योरोप के जनांदोलनों का अनुभव था. इसलिए विपुल जनशक्ति की अवहेलना उनके लिए संभव न थी. इसलिए उन्होंने यहां विधि के शासन को लागू किया.

ये उदाहरण जहां भारतीय संस्कृति के असमानताकारी रूप को सामने लाते हैं, वहीं दिखाते हैं कि भारतीय समाज में द्वंद्वात्मकता के लक्षण आरंभ से ही रहे हैं. वे काफी विस्तृत हैं. इस वर्गभेद को आर्यअनार्य, सवर्णअवर्ण, ब्राह्मणअब्राह्मण, तथाकथित ऊंची जाति वाले, नीची जाति वाले जैसा कुछ भी कहा जा सकता है. भारतीय समाज के आंतरिक विभाजन को दर्शाने वाला एक महत्त्वपूर्ण आधार और भी है. ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य अनुत्पादक वर्ग हैं. तीनों ही दूसरों के श्रम पर आश्रित रहते हैं. इसके बावजूद उन्हें ‘सवर्ण’ होने का गुमान रहता है. वर्णश्रेष्ठता का यह दंभ, श्रम और समानता दोनों का सिद्धांततः विरोधी है. जो संस्कृति इस दंभ को शरण देती है, वह शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से हेय मानती है. परिणामस्वरूप यहां जो हुनरमंद है, जो परिश्रम करता है, अपने शिल्पकौशल के भरोसे समाज को संवारता हैउसके हिस्से आजीवन तिरष्कार और उपेक्षा ही आती है. आर्थिक दृष्टिकोण से भारतीय संस्कृति मूलतः अनुत्पादक संस्कृति सिद्ध होती है, जो उत्पादनकर्म में लगे श्रमिकों तथा कामगारों को, बौद्धिक कर्म का दिखावा करने वाले वर्गों से हेय माने रहती है.

इस तरह भारतीय समाज अनायास ही दो हिस्सों, उत्पादक और अनुत्पादक समूहों में बंट जाता है. संख्या में उत्पादक समूह अपने प्रतिद्विंद्वी से लगभग चार गुना होता है. मगर समाज और संस्कृति की संरचना ऐसी है कि इस अधिसंख्यक वर्ग के हाथों में न्यूनतम संसाधन और नाकुछ अधिकार आते हैं. जिस अल्पसंख्यक अभिजन को यह संस्कृति विशेषाधिकार सौंपकर अत्यंत शक्तिशाली बनाती है, वह मुख्यतः अपने स्वार्थ के लिए काम करता है. दिखने में ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य तीन अलगअलग वर्ण हैं, जो क्रमशः धर्म, राजनीति और अर्थसंपदा का प्रबंधन करते हैं. बहुजन मुख्यतः सेवाप्रदाता वर्ग है. वह वर्णव्यवस्था में सबसे निचला या उससे बाहर का हिस्सा है. दोनों ही स्थितियों में उसका दायित्व शीर्षस्थ वर्गों की सेवा करना है. उसे न तो अपने श्रमोत्पाद पर अधिकार होता है, न ही संपत्ति अर्जित करने का अधिकार उसे है. उसका कर्तव्य है सेवाश्रम के बदले जो मिले उसे अनुकंपाभाव से ग्रहण करना. वह अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों और पेशों में बंटी, संख्याबहुल और प्रभावी जनशक्ति है. प्रत्येक का पेशा ही उसकी पहचान है. इनके सपने छोटे होते हैं, संघर्ष बड़े. छोटीछोटी जरूरतों की खातिर इन्हें एकदूसरे के साथ स्पर्धा करनी पड़ती है. अनेक जातियों, वर्गों, उपवर्गों में बंटा होने के कारण इस वर्ग की प्रभावी शक्ति क्षीण हो जाती है. दूसरी ओर सामान्य हित उच्चस्थ वर्णों को आपस में जोड़े रखते हैं. प्रतिस्पर्धा उच्चस्थ वर्गों में भी रही है. किंतु उसका आधार जीवन के मूलभूत प्रश्नों, समस्याओं से प्रभावित नहीं होता. उदाहरण के लिए परशुराम द्वारा पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन करने का मिथ क्षत्रियों के विशेष रोष का कारण नहीं बन पाता. यह जानते हुए कि जो संस्कृति ब्राह्मण को श्रेष्ठतम ठहराती है, वह क्षत्रियों को राजकर्म का अधिकार भी देती है. इसलिए वर्णव्यवस्था के आगे जब भी कोई चुनौती आती है; अथवा उनमें से किसी एक वर्ण के अधिकारों पर हमला होता हैतीनों एकजुट भाव से उसका सामना करते हैं. इससे संख्या में कम होने के बावजूद पहला वर्ग शक्तिशाली बनकर, खुद को समाज का नियामक और वास्तविक कर्ता सिद्ध करने में सफल हो जाता है.

व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हेतु आवश्यक है कि उत्पीड़ित लोगों की वर्गचेतना को उभारा जाए. लोगों को बताया जाए कि ‘अनेकता में एकता’ का मिथ संस्कृति के वर्चस्वकारी स्वरूप को बनाए रखने का उद्यम हैं. सामाजिक क्रांति को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि उत्पीड़न के शिकार वर्गों को उनकी स्थिति और अधिकारों से परचाया जाए. बताया जाए कि उनके हित साझे है. जो संस्कृति उन्हें भेद करना सिखाती है, समाज को जन्म और पेशों के आधार पर अलगअलग जातियों में बांटती है, जो श्रम की अवमानना करती हैवह उनकी संस्कृति हो ही नहीं सकती. इसकी शुरुआत ज्योतिराव फुले द्वारा की गई. फुले ने उन मिथकों का पुनर्पाठ किया, जिनसे भारतीय संस्कृति की पहचान निर्धारित की जाती है. जिनके सहारे सवर्ण जातियां शताब्दियों से अपना श्रेष्ठत्व गैरसवर्ण समूहों पर थोपती आई थीं. अवसर अनुकूल था. शिक्षा के द्वार सभी वर्गों के लिए खुल चुके थे. ‘मनुस्मृति’ की जगह ‘कानून के राज्य’ ने ले ली थी. नए कानून के आगे सभी नागरिक बराबर थे. ज्योतिराव फुले ने निर्भय होकर हिंदू मिथों के बारे में लिखा. धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ प्रस्तुत किया. शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, अपनी पत्नी के साथ मिलकर जगहजगह स्कूल खोले. स्त्रियों की पढ़ाईलिखाई को जरूरी माना. धीरेधीरे लोगों को यह एहसास होने लगा कि जिस धर्म और संस्कृति की वे अभी तक पूजा करते आए हैं, असल में वह एक षड्यंत्र, उन्हें बरसोंबरस गुलाम बनाए रखने का प्रलोभनकारी माध्यम है. जिन मिथकीय प्रतीकों, स्वार्थी विधान के भरोसे वे अभी तक शासित होते आए हैं, वे अंतिम या परमसत्य नहीं हैं. बल्कि शक्तिशाली जातीय समूहों द्वारा उन्हें मानसिकशारीरिक रूप से दास बनाए रखने के लिए की गई सोचीसमझी साजिश हैं. उनके सहारे शीर्षस्थ जातियां शताब्दियों से उनपर राज करती आई हैं. फुले के प्रयासों से पिछड़े और अंतज्य समाजों में वर्गचेतना पनपने लगी.

फुले के बाद परिवर्तनकारी राजनीति की बागडोर उत्तर में डॉ. आंबेडकर के हाथों में आ गई. वे अपने समय के नेताओं में सर्वाधिक पढ़ेलिखे, बुद्धिमान, व्यवहारकुशल, दूरदृष्टा और लक्ष्य के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नेता थे. जिस वर्ष फुले का निधन हुआ, उसी वर्ष उनका जन्म हुआ था. मानो समय खुद बदलाव के लिए आमादा था. इसलिए एक जिम्मेदार और समर्पित नेता द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की कमान संभालने के लिए उसने वैसे ही जिम्मेदार, समर्पित, बुद्धिमान और संघर्षधर्मी व्यक्तित्व को समयपटल पर आगे कर दिया था. डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का दायरा व्यापक था. उन्होंने बहुजन अस्मिता के प्रश्न को उठाया. फुले का अनुसरण करते हुए धार्मिक प्रतीकों की अधुनातन व्याख्या को अपने हाथ में लिया. उन मिथों को आड़े हाथों लिया जो सामाजिकसांस्कृतिक शोषण का माध्यम बने थे. उनका सबसे बड़ा काम जातिव्यवस्था पर हमला था, जिसने तथाकथित सवर्णों को तिलमिलाने को विवश कर दिया. जिस जाति के आधार पर वे बहुजन का शोषण करते आए थे, डॉ. आंबेडकर ने उसी के संगठनसामर्थ्य का सहारा लेकर दलितों और पिछड़ों को एकजुट करने में कामयाबी हासिल की थी. इससे शीर्षस्थ जातियों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक था. वे डॉ. आंबेडकर के वर्गशत्रु बन गए. मगर डॉ. आंबेडकर के बौद्धिक तेज के आगे उनकी एक न चली.

देश के उत्तरपश्चिम में जिस संकल्प के साथ डॉ. आंबेडकर आगे बढ़ रहे थे, दक्षिण भारत में वही जिम्मेदारी, उतनी ही शिद्दत के साथ रामास्वामी पेरियार संभाले हुए थे. दोनों के व्यक्तित्व और विचारों में अंतर था, परंतु लक्ष्य एक ही था, जिसे लेकर वे पूरी तरह स्पष्ट और ईमानदार थे. आरंभ में पेरियार पर साम्यवाद का असर था. गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो पेरियार उनसे प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हो गए. गांधी के आवाह्न पर उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. असहयोग आंदोलन में लाठियां खाईं. लेकिन बहुत जल्दी उनका कांग्रेस तथा उसके नेताओं से मोह भंग हो गया. उसके बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर उन्होंने खुद को सामाजिक आंदोलनों के समर्पित कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से उन्होंने बहुजन समूहों के बीच वर्गीय चेतना फैलाने का काम किया. उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिली. भारत को आधुनिक राज्य बनाने में डॉ. आंबेडकर और पेरियार का लगभग बराबर का योगदान है.

डॉ. आंबेडकर और पेरियार के प्रयासों से दलितों और शोषितों में वर्गचेतना का संचार हुआ था. सवाल है यदि उन सभी का मकसद समानताआधारित समाज की रचना करना, भेदभावों को मिटाना था, तो उसके लिए ‘मार्क्सवाद’ या ‘साम्यवाद’ की प्रचलित सैद्धांतिकी को क्यों नहीं अपनाया गया? यह सवाल उन साम्यवादियों से भी है जो वर्गहीन समाज की स्थापना को लेकर राजनीति में आए थे; और समस्त वर्गभेदों का उन्मूलन कर समताआधारित समाज का सपना देखते थे. प्रथम दृष्टया इसे हम भारतीय वामपंथ तथा सामाजिक न्याय के पक्ष में चलने वाले आंदोलनों की कमजोरी मान सकते हैं. इसके कारणों को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की मामूली पड़ताल से समझा जा सकता है. यहां उनका वर्णन विषयांतर होगा. इतना कह सकते हैं कि भारत में वर्गक्रांति की शुरुआत ‘सामाजिक न्याय’ की मांग के तहत हुई थी. हालांकि वर्गसंघर्ष की अवधारणा को ‘सामाजिकन्याय’ की भावना तक सीमित कर देना कभी निरापद नहीं रहा. इससे बहुजन समाज की एकता प्रभावित हुई. इसे समझने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ की सैद्धांतिकी तथा उन परिस्थितियों को समझना होगा, जिनके कारण ‘सामाजिक न्याय’ को अधिकांश अस्मितावादी आंदोलनों का लक्ष्य मान लिया गया था.

साम्यवाद बनाम सामाजिक न्याय

साम्यवाद की मुश्किल यह रही है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब बड़े साम्राज्यवादी राज्यों का गठन आरंभ हुआ, और जिन दिनों पूरी दुनिया को साम्यवाद की परिधि में शामिल करने का स्वप्न देखा जा रहा था, उन्हीं दिनों दुनिया को दो विश्वयुद्धों का सामना करना पड़ा. वे युद्ध केवल राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं लड़े गए थे. उनके पीछे पूंजीपति वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं भी शामिल थीं. प्रौद्योगिकीय क्रांति के दौर में हथियार निर्माण के क्षेत्र में भारी निवेश हुआ था. उत्पाद की खपत के लिए हथियारनिर्माता कंपनियों को नए बाजारों की जरूरत थी. उनका हित इसी में था कि दुनिया पर युद्ध का खतरा मंडराता रहे. देश एकदूसरे से लड़तेझगड़ते रहें. इस उद्देश्य में वे कामयाब भी रहीं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा बेहद जरूरी मुद्दा बन गया. आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के नाम पर हथियारों की अधिकाधिक खरीद की जाने लगी. इनमें भारत जैसे विकासशील देश भी पीछे न थे, जिनका कथित रूप से अहिंसा में विश्वास था और जिन्होंने अपनी आधीअधूरी स्वाधीनता अहिंसक तरीकों से अर्जित की थी. 1930 में दुनियाभर में आर्थिक मंदी पैठी हुई थी. हालांकि मंदी के जो मापदंड निर्धारित किए गए थे, वे स्वयं संदेह से परे न थे. राजनीति और पूंजीपतियों के गठजोड़ के चलते उस समय तक अर्थव्यवस्था की रफ्तार का आकलन करने के पैमाने बदल चुके थे. चुनिंदा कंपनियों की विश्वबाजार में स्थिति से मंदी या तेजी का आकलन किया जाने लगा था. आभासी मंदी से इतर जनता की दुर्दशा का असली कारण यह था कि सरकारों ने अपने समस्त संसाधन युद्ध और युद्ध की तैयारियों पर झोंक दिए थे. साम्यवादी देश भी इसमें पीछे न थे. इस कारण वहां जनअसंतोष पनपने लगा था. उसे दबाने तथा प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी देशों के साथ विकास की दौड़ में बने रहने की जरूरत ने स्टालिन जैसे कट्टर साम्यवादी नेताओं को जगह दी.

प्रथम विश्वयुद्ध दुनिया में भारी तबाही का कारण बना था. और जैसा कि बताया गया है, युद्ध की परिस्थितियां बनाने में अतिमहत्त्वाकांक्षी नेताओं तथा पूंजीपतियों का समान योगदान था. लेकिन जब युद्ध के परिणाम आने लगे तो आर्थिक घराने बड़ी चतुराई से खुद को उनसे अलग करने में कामयाब हो गए. इस कारण युद्ध के बाद उत्पन्न समस्याओं तथा उनसे उपजे जनाक्रोश का सामना संबंधित देशों की सरकारों को करना पड़ा. युद्ध के मोर्चे पर सारे संसाधन झोंक चुके राष्ट्रप्रमुखों के लिए उस समय एकमात्र रास्ता था कि आर्थिक विपन्नता से घिर चुके राज्य के विकास; तथा जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजीपतियों को आमंत्रित किया जाए. यही हुआ भी. दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात, पुनर्निर्माण के नाम पर सारे ठेके, बड़ीबड़ी पूंजीप्रधान कंपनियों को सौंप दिए गए. आर्थिक विकास के नाम पर उन्हें तरहतरह की छूट दी जाने लगी. वह विचित्र संयोग था. जब तीसरी दुनिया के देश तेजी से योरोप और अमेरिका की औपनिवेशिक दासता से बाहर आ रहे थे, तभी बड़ीबड़ी पूंजीवादी कंपनियां, तीसरी दुनिया के देशों में पहुंचकर वहां आर्थिक औपनिवेशीकरण की शुरुआत कर रही थीं. अर्थसत्ता का उत्तरोत्तर सबलीकरण राजसत्ता को कमजोर कर रहा था. उसका प्रभाव दुनिया के प्रायः सभी देशों पर था. चूंकि तीसरी दुनिया के अल्पविकसित और विकासशील देश स्थानीय समस्याओं और समाज की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं के लिए पूंजीवाद पर आश्रित हो चुके थे, इसलिए वे आर्थिक औपनिवेशीकरण के सर्वाधिक शिकार थे.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद ने भी खुद को बदला था. सामाजिक भेदभाव और भारी आर्थिक विषमता से गुजर रहे देशों में वर्गसंघर्ष की स्थिति दुबारा न बने, इसके लिए जनसाधारण में यह विश्वास जगाना अत्यावश्यक था कि वह पूंजीवाद के विस्तार में ही अपना भला समझे. इसके लिए वह सरकार के साथ मिलकर लोगों की मनोरचना बदलने में लगा था. लोगों की प्रशंसा तथा सहानुभूति बटोरने के लिए उसने सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, उपभोक्ता अधिकार जैसे कई मुखौटे पहने हुए थे. पूंजीवादी कंपनियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, खेती जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सुधारवादी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी आरंभ कर दी थी. इसी दौर में मान लिया गया कि जनसमस्याओं का समाधान अकेले सरकार द्वारा संभव नहीं है. विकासकार्यक्रमों में सरकार की मदद हेतु गैरसरकारी संस्थाओं को बढ़ावा दिया जाने लगा था. उन संस्थाओं के संचालन का दायित्व पढ़ेलिखे, समाज के प्रबुद्ध हिस्से के अधीन था, जिसकी जनता पर पकड़ थी. उसे लुभाने के लिए बड़े कारपोरेट घरानों ने अपनी आय का एक हिस्सा, जाहिर है बहुत मामूली हिस्सा, चंदे तथा अनुदान के रूप में गैरसरकारी संस्थाओं को देना आरंभ कर दिया. एक तरह से वह जनता का ही पैसा था. गैरसरकारी संस्थाओं को दिए गए चंदे को लोककल्याण की मद में किया गया खर्च दिखाकर, पूंजीवादी कंपनियां टैक्स के रूप में दी जाने वाली धनराशि में कटौती कर लेती थीं. चूंकि पूंजीपति घरानों की ओर से यह पैसा सीधे गैरसरकारी संस्थाओं को जाता था, इसलिए परोक्ष रूप में वे जनता के पढ़ेलिखे वर्गों की, उन लोगों की जिन्हें जनता की समस्याओं की समझ थी और जो समाज के भीतर रहकर काम करने का अनुभव रखते थेसहानुभूति बटोर रहे थे. इन संस्थाओं में प्रायः वही मध्यमवर्ग शामिल था, जिसकी पिछली पीढ़ियां अमेरिका और योरोपीय देशों मेंआम मताधिकार, न्यूनतम मजदूरी तथा लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद, अराजकतावाद जैसे राजनीतिक दर्शनों के समर्थन में सड़कों पर उतरी थीं; जिनकी बौद्धिक चेतना ने अनेक नए राजनीतिक दर्शनों को जन्म दिया था. परिणामस्वरूप पूरी दुनिया में पूंजीवाद के समर्थन में माहौल बन रहा था. साम्यवाद, समाजवाद जैसे दर्शन जिन्हें कभी आधुनिक और उदार समाज की पहचान से जोड़ा गया था, की प्रतिष्ठा निरंतर घट रही थी. युवा पीढ़ी तो उन्हें समयबाह्यः मान चुकी थी.

गैरसरकारी संस्थाएं समाज में पूंजीवाद के लिए अनुकूल माहौल बनाने का काम कर रही थीं. यह कार्य समाजकल्याण, सामाजिक न्याय, कला, साहित्य एवं संस्कृति के प्रचारप्रसार के नाम पर किया जा रहा था. सरकारों को भी इससे लाभ था. योजनाओं के कार्यान्वन की जिम्मेदारी स्वयंसेवी जनसंस्थाओं के कंधों पर डालकर वे सीधी जिम्मेदारी से बचने लगी थीं. इससे साम्यवाद के उभार के दिनों में पूंजीवाद के प्रति जो आक्रोश पनपा था, वह धीरेधीरे घटने लगा. इसलिए वह अकारण नहीं है कि 1930 का दशक जो वैश्विक मंदी का दशक भी थाᅳ‘सामाजिक न्याय’ के राज्यों की कल्याण नीति का प्रमुख हिस्सा बनने का भी दशक बना. उसके बाद यह शब्दयुग्म, विशेषकर लोकतांत्रिक राज्यों में इस तरह प्रचलित हुआ कि उसे उत्तरदायी सरकार के प्रमुख लक्षण के रूप में गिना जाने लगा. उससे लोगों की मनोरचना में ऐसा बदलाव आया, जो पूंजीवादी विस्तार के अनुकूल था. उपभोक्तावाद के पक्ष में माहौल बनाने के लिए लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा व्यक्तिस्वातन्त्र्य जैसी आधुनिक विचारधाराओं को अपनाया गया. फिर जैसेजैसे पूंजीवाद का विस्तार हुआ, राज्य के प्रमुख उद्देश्य के रूप में ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता लगातार बढ़ती गई.

उससे पहले की व्यवस्थाओं में धर्म व्यक्ति, समाज और राज्य तीनों की मार्गदर्शक शक्ति हुआ करता था. राजा खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर जनता पर अपनी इच्छाएं थोपता था. उस व्यवस्था में ‘कल्याण’ धर्म और ईश्वर के नाम पर, दान अथवा राज्य की अनुकंपा के रूप में निचले तथा जरूरतमंद वर्गों को अंतरित होता था. आजकल वह ‘सामाजिक न्याय’ जैसा आकर्षक से जाना जाता है. उसमें न्याय नागरिक का अधिकार न होकर सहायता, अनुदान, प्रोत्साहननिधि जैसे नामों से जनता की ओर अंतरित होता है. यह पूंजीवाद की कार्यशैली के अनुरूप है. ‘ट्रिकल डाउन थियरी’ जिसे ‘रिसाव का सिद्धांत’ कहा जाता है, में समृद्धि नीचे की ओर धीरेधीरे रिसकर पहुंचती है. कुछ विद्वान इसी आधार पर पूंजीवाद की प्रशंसा करते हैं. किंतु ‘रिसाव का सिद्धांत’ सामान्यतः तब कारगर होता है, जब ऊपर के स्तर पर ‘बफर’ समृद्धि हो. चूंकि पूंजीपति अपनी आमदनी को खर्च करने के बजाय पुनर्लाभ हेतु उसका निवेश करना पसंद करता हैइसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में असमानता का अनुपात निरंतर बढ़ता जाता है. ऐसे देश जो लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं, किसी न किसी रूप में वे सभी ‘सामाजिक न्याय’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते रहते हैं. वे इस बात को बढ़ाचढ़ाकर जनता के बीच लाते हैं कि सामाजिक न्याय को लेकर उनकी योजनाएं जनता की सामान्य सहमति के आधार पर चलाई जाती हैं. उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वे उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ को प्रासंगिक बनाती हैं. परिणामस्वरूप न्याय के नाम पर बनीं योजनाएं राज्य की अनुकंपा, अनुदान जैसी वे धर्मप्रधान राजतंत्र में होती हैंलौकतांत्रिक राज्यों में भी बनी रहती हैं.

देखनेसुनने में ‘सामाजिकन्याय’ बड़ा रुपहला शब्द है. अधिकांश समाजों में उसे मनुष्यता के पर्याय, राज्य के पुनीत कर्तव्य के रूप में लिया जाता है. दूसरी ओर यह भी सच है कि उसका लक्ष्य गैरबराबरी को समाप्त करना नहीं होता. न ही वह उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करता है जो सामाजिक विषमताएं पैदा कर, कमजोर वर्गों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विशेष कार्यक्रम चलाने की जरूरत पैदा करती हैं. उल्टे परंपरा, संस्कृति तथा निजी पहचान के नाम पर अन्याय एवं असमानताकारी संस्थाओं का संरक्षण किया जाता है. ‘सामाजिक न्याय’ के तहत बनाई जाने वाली अधिकांश योजनाएं प्रायः सस्ते भोजन, सामान्य शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तथा इतिहास एवं संस्कृति के सरंक्षण संबंधी कार्यक्रमों तक सीमित रहती हैं. इसलिए वे कमजोर वर्गों का ज्यादा भला नहीं कर पातीं. यही कारण है कि सरकार द्वारा लोकतंत्र और कल्याण राज्य की दावेदारी के बावजूद, राज्यों की केंद्राभिमुखता में कोई कमी नहीं आ पाती. पहले वे पुरोहितों और सामंतों के संरक्षण तथा उन्हीं के नेतृत्व में चलाई जाती थीं. नए विधान में उनका कार्यान्वन विशेषज्ञों के नेतृत्व में किया जाता है, जो उन्हीं वर्गों से आते हैं, जिनके हित असमानताकारी संस्कृति से जुड़े होते हैं. अपनेअपने स्वार्थ के लिए पूंजीपति और शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ उनका संरक्षण करते हैं. कल्याणकार्यक्रमों में जनसहभागिता का अभाव, लोगों के आत्मविश्वास को कमजोर कर, उन्हें पराश्रित बनाए रखता है. इससे उन योजनाओं का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है.

सवाल है कि यदि केंद्र उतना ही शक्तिशाली है बना जितना वह धर्मकेंद्रित व्यवस्थाओं में था और आमजन की हालत वैसी की वैसी थी, तो धर्म के स्थान पर, ‘सामाजिक न्याय’ जैसी नई अवधारणाओं को लाने से शीर्षस्थ वर्गां की कौनसी स्वार्थसिद्धि हो रही थी? इसके लिए धर्म के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. दुनिया के जितने भी धर्म हैं, कमोबेश सभी इस संसार और सांसारिक सुखों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं. लगभग सभी इसपर सहमत हैं कि सांसारिक सुख जीवन के अंतिम उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधक हैं. शंकर का मायावाद, विभिन्न नामों और मिलेजुले सिद्धांतों के आधार पर कमोबेश हर धर्म का हिस्सा है. किसी न किसी रूप में वे सभी सांसारिक सुखों को हेय मानते हैं. यह सोच मुक्त उपभोग को बढ़ावा देने की सबसे बड़ी बाधा है. दुनियावी सुखों के प्रति नकारात्मक सोच के चलते उपभोक्तावाद, जिसके भरोसे पूंजीवाद ने अपनी विस्तारवादी नीतियों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, उस तरह से पनप ही नहीं सकता था, जिस तरह से वह आज है. इसलिए पूंजीवादी तंत्र के लिए धर्म गैरजरूरी संस्था है. हां, सांप्रदायिकता पूंजीवाद का खूब भला करती है. बढ़ती सांप्रदायिकता लोगों के अंतर्मन में भ्रम की सृष्टि करती है. उससे एकदूसरे के प्रति संदेह, स्पर्धा तथा जीवन के प्रति अनिश्चितता बढ़ती है. प्रकारांतर में वह उपभोग की संस्कृति को बढ़ावा देती है.

हमारा आशय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय जैसी आधुनिक विचारधाराओं की महत्ता को नकारना नहीं है. मगर इनकी सफलता तभी संभव है जब जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो. वह तर्कसम्मत निर्णय लेने की अभ्यस्त हो चुकी हो. भारत जैसे समाजों में जहां मनुष्य कदमकदम पर जाति, धर्म और वर्गभेद से प्रेरणा लेती हो, उन्हें अपनी सामाजिक पहचान का जरूरी हिस्सा मानती हो, वहां लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातं×य जैसी विचारधाराएं अधिक कारगर नहीं हो पातीं. पर्याप्त अधिकारबोध के अभाव में नागरिक सरकार पर आवश्यक दबाव बनाने के बजाए, आपस में ही एकदूसरे के साथ स्पर्धा करते रहते हैं. इससे चुने गए प्रतिनिधि लोकहित के बजाए अपने स्वार्थ के लिए काम करने लगते हैं. जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें जब लोकतांत्रिक उद्देश्यों की प्राप्ति में नाकाम सिद्ध होती हैं, तब जनाक्रोश से बचने के लिए वे ‘सामाजिक न्याय’ को ढाल बनाती हैं. जागरूकता के अभाव में लोकतंत्र भीड़तंत्र में तथा ‘सामाजिक न्याय’ गैरबराबरी को पोषण करने वाली व्यवस्था का रक्षाकवच बन जाता है.

साम्यवाद और बहुजन

जाति हमारे यहां ‘सामाजिक न्याय’ और ‘साम्यवाद’ दोनों के गले की फांस रही है. यह व्यक्ति को जन्म के आधार पर छोटाबड़ा बनाकर, मनुष्य से उसकी स्वतंत्रता तथा जीवन के मूलभूत अधिकार छीन लेती है. भारतीय समाज में निचली जातियों के शोषण और उत्पीड़न का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना सभ्यता का. उनका संत्रास इतना बड़ा है कि भीषण आर्थिक विपन्नता के बावजूद उन्हें जातिवाद से मुक्ति ही बड़ी और न्यायपूर्ण उपलब्धि जान पड़ती है. जातिव्यवस्था के कारण ही भारत में राजनीति सवर्णों का विषेषाधिकार रही है. जातिवादी सोच से साम्यवादी दल भी उससे मुक्त नहीं है. अधिकांश सवर्ण वामपंथी वर्णव्यवस्था के प्रश्न पर मौन साधते आए हैं. जातिसंबंधी प्रश्न तथा उसके नाम पर होने वाले अत्याचार उन्हें उद्वेलित नहीं करते. वे उन्हें भारत की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सहेजे रखना चाहते हैं. इस कारण दलितों और पिछड़ों के मन में, जो भारतीय समाज का सबसे बड़ा हिस्सा है, मार्क्स की भाषा में जिसे सर्वहारा कहा जा सकता हैसाम्यवाद को लेकर कभी कोई उत्साह नहीं रहा. एकाध अवसर पर उन्होंने साम्यवाद को अपनाने की कोशिश भी की. कुछ ऐसे संकेत दिए, जिनपर ध्यान दिया जाता तो देश में साम्यवाद की सफलता की कहानी लिखी जा सकती थी. यहां एक घटना का वर्णन प्रासंगिक होगा. इसका उल्लेख डॉ. धर्मवीर ने अपने लेख ‘दलितों ने क्या चाहा था’ में किया है

दलितों ने कम्यूनिस्ट शब्द का अपनी देशी जबान में तद्भव बनाकर ‘कौमनष्ट’ के रूप में अर्थ लिया था. उस जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के शांति त्यागी अपने समर्थकों के साथ मेरे गांव में चमारों की तरफ वोट मांगने आए. हम सब दादा हरिया के ओसारे के नीचे थे. धूलधूप में शांति त्यागी(मेरठ के कम्यूनिस्ट नेता) ने आते ही दादा से पानी मांगा. दादा हरिया ने घड़े से गिलास में ठंडा पानी निकाला और शांति त्यागी ने वहीं वह सबके सामने पिया. उनके जाने के बाद चमारों में वोट के बारे में मंत्रणा हुई. सारे चमारों का वोट एकमुश्त एक तरफ जा रहा था, पर दादा हरिया ने कह दिया, मेरा वोट शांति त्यागी को जाएगा, क्योंकि उसने मेरे हाथ का पानी पिया है. चमारों में से केवल वही एक वोट शांति त्यागी को मिला था .3

कम्यूनिस्ट’ को ‘कौमनष्ट’ मान लेना दलितों और पिछड़ों की एकतरफा अपेक्षा थी. नई, मूल्य आधारित राजनीति से उनके जुड़ने का कारण ही यह उम्मीद थी कि उससे सामाजिकसांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह प्रशस्त होगी. उसमें समानताआधारित समाज की उनकी पुरानी आकांक्षा भी अंतनिर्हित थी. लेकिन उसकी चिंता न तो कांग्रेसी नेताओं को थी, न ही साम्यवाद के तत्कालीन कर्णधारों को. भारतीय साम्यवादियों में अधिकतर उच्चस्थ जातियों से आए थे. वे अपने जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने को कतई तैयार न थे. उनके लिए साम्यवाद सामाजिक पुनर्निर्माण का लक्ष्य न होकर महज राजनीति थी. ऐसे नेताओं के मार्गदर्शन में साम्यवादी दलों ने जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए न तो कोई कार्यक्रम बनाया, न इस मांग के समर्थन में वे डॉ. आंबेडकर जैसे नेताओं के साथ आए. दलितों और पिछड़ों को साम्यवाद से ज्यादा उम्मीद अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए विधि के शासन से थी, जिसने उन्हें मनुस्मृति के सहस्राब्दियों पुराने विधान से मुक्ति दिलाकर, कानूनी तौर पर ही सही, बराबरी के एहसास के साथ जीने का अवसर दिया था. हालांकि सामाजिक समानता का लक्ष्य अभी बहुत दूर था. दलितों द्वारा यह मजबूरी में किया गया समझौता था. इसका नुकसान न केवल भारतीय साम्यवादी आंदोलन, अपितु दलितों को भी उठाना पड़ा.

भेदभाव से परे, समानता पर आधारित वर्गहीन समाज की रचना यदि बहुजन का सपना है तो उसने इस लक्ष्य की दिशा में अपने भरोसे बढ़ने की कोषिष क्यों नहीं की? वे संख्याबहुल थे. अगर जातिविहीन समाज की दिशा में स्वयं आगे बढ़ते तो अपने मकसद में सफल हो सकते थे. संभवतः अंग्रेजों का साथ भी उन्हें मिलता. बहुजन ने इसके लिए स्वयं पहल क्यों नहीं की? इस तरह की जिज्ञासाएं स्वाभाविक हैं. किंतु हमें याद रखना होगा कि सांस्कृतिक दासता से मुक्ति की राह बेहद कठिन होती है. राजनीति में शासक और षासित आमनेसामने होते हैं. अवसर मिलने पर शासक को पराजित कर शासित, राजनीतिक दासता से मुक्त हो सकता है. सांस्कृतिक दासता से उबरने के लिए व्यक्ति को अपने साथसाथ, आसपास के लोगों से भी, जो उसकी सामाजिक पहचान का हिस्सा हो सकते हैंजूझना पड़ता है. उसका अपना समाज भी आड़े आता है. इसलिए सांस्कृतिक परिवर्तन की लड़ाई बेहद कठिन और लंबी होती है. उसके लिए व्यक्ति को अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ता है. जाति के आधार पर हजारों वर्षों से शोषण एवं उत्पीड़न का षिकार रहा बहुजन स्वयं हजारों प्रकार की जातियों, उपजातियां में बंटा था. धर्म और क्षेत्रीयता की दीवारें भी थीं. उन सबकी अपनीअपनी सामाजिकसांस्कृतिक विविधताएं, संघर्ष और अंतर्द्वंद्व थे. इस कारण वह कभी ऐसी सामाजिक षक्ति नहीं बन सका, जो उसे सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति दिला सके. उसकी इस कमजोरी का लाभ जिससे जैसे भी बन पड़ा, उसने वैसे ही उठाया.

अंग्रेजों ने भारत में पुराने धर्मसम्मत राज्य को विधिशासित राज्य में बदलने का बड़ा काम किया. हालांकि इसके पीछे उनका न तो कोई उदारवादी नजरिया था, न ही ‘सामाजिक न्याय’ जैसा बड़ा उद्देश्य. उनके स्वार्थ उनके कद से कहीं ज्यादा बड़े थे. भारत आने के बाद उन्होंने अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान किया, मगर सामाजिक अन्याय के निवारण हेतु सार्थक कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने कभी नहीं की. वे इस देश में शासक बनकर रहना चाहते थे. और हमेशा रहे भी. विधिसम्मत शासनव्यवस्था लागू करने के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य खुद को परिष्कृत सभ्यता का अनुगामी सिद्ध कर जनसाधारण की सहानुभूति और समर्थन प्राप्त करना था. इसका उन्हें लाभ भी मिला. समाज का बड़ा हिस्सा जो धर्मकेंद्रित शासनव्यवस्था में उपेक्षा, उत्पीड़न और जातीय शोषण का शिकार था, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में वह नए शासन का समर्थन करने लगा.

अपनी न्यायप्रियता का बढ़चढ़कर बखान करने के बावजूद अंग्रेजों ने न तो जातिव्यवस्था के उन्मूलन के लिए कोई कानून बनाया, न तत्संबंधी किसी सुधार कार्यक्रम का कभी समर्थन किया. जबकि भारत में जड़ जमाने के साथ ही वे भारतीय जातिव्यवस्था तथा उसकी कमजोरियों को भलीभांति समझ चुके थे. वे ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सामाजिक हैसियत और समाज पर उनकी पकड़ को समझते थे. जानते थे कि इन वर्गों की मदद से, शेष समाज को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है. ब्राह्मण तथा दूसरे सवर्ण सोचते थे कि अंग्रेज उनके निजी मामलों में दखल न देने की नीति पर अटल हैं. मुगल शासकों से भी उनकी यही अपेक्षा थी. इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि उनके मुगलकाल में भी शीर्ष पदों पर थे. इस प्रवृत्ति के चलते देश को एक हजार से अधिक वर्ष विदेशी शासकों के अधीन काटने पड़े. यही कारण रहा जो मुट्ठीभर अंग्रेज, अपने देश से आठ हजार किलोमीटर दूर आकर भारत पर करीब दो सौ वर्षों तक राज करते रहे. हजार वर्षों के पराधीनताकाल में ब्राह्मणों की सामाजिक हैसियत पर कोई अंतर नहीं पड़ा. ब्राह्मणों के लिए उनका धर्म और कर्मकांड की सबकुछ थे. वे बचे रहें, देशप्रेम तथा राष्ट्रीयता की भावना से उनका कोई सरोकार न था.

अवर्णों को भी औपनिवेशिक शासन से खास आपत्ति न थी. अंग्रेजों ने उन्हें ‘मनुस्मृति’ के चंगुल से आजाद कराया था. शिक्षा जो पुरानी व्यवस्था में अपराध थी, उसके दरवाजे शूद्रों और दलितों के लिए खोल दिए गए थे. दलितों और पिछड़ों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी. यही कारण है कि स्वाधीनता संग्राम का समर्थन करने के बावजूद दलित और पिछड़े वर्ग के नेता, सामाजिक आजादी की मांग बराबर दोहराते रहे. पेरियार ने तो सक्रिय राजनीति से 1925 में ही किनारा कर लिया था. उसके बाद उन्होंने स्वयं को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया था, जो सामाजिक न्याय को समर्पित बड़ा, वर्षों लंबा चलने वाला सफल आंदोलन था.

सामाजिकन्याय’ की अवधारणा ने भारत में पश्चिम के रास्ते प्रवेश किया था. स्वाधीनता आंदोलन में अपनी सक्रियता और चरमसफलता के दिनों में भी कांग्रेस ने, जो खुद को भारतीयों की एकमात्र प्रतिनिधि पार्टी होने का दावा करती थी, सामाजिक न्याय की कभी मांग नहीं की. देश की राजनीति में उसे आजादी के बाद ही जगह मिल सकी. उस समय तक दलित और पिछड़ी जातियां राजनीतिक चेतना से लैस हो चुकी थीं. स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. बदले परिवेश में उनकी उपेक्षा असंभव थी. इसलिए कांग्रेस तथा दूसरे अभिजन नेताओं द्वारा तमाम चालाकी बरतने के बावजूद अंतत उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाना ही पड़ा. आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना गया. चूंकि लोकतंत्र में संख्याबल बड़ी भूमिका होती है, इसलिए दलितों और पिछड़ों को साथ लेकर चलना सभी दलों की मजबूरी बन गई. दलितों को फुसलाने के लिए फिर सामाजिक न्याय का प्रलोभन दिया जाने लगा. इस बीच ऐसा वर्ग भी रहा जिसका मानना था कि समानता और न्याय के लक्ष्य को हासिल करने के लिए विदेशों से विचारधारा उधार लेने की आवश्यकता नहीं है.

ऐसे लोगों ने ‘सामाजिक न्याय’ के विकल्प के तौर पर ‘रामराज्य’ को आगे किया. प्रकारांतर में उनकी कोशिश प्राचीन धर्मकेंद्रित शासन को वापस लाने की थी. वे अपने उन स्वार्थों को विशेषाधिकार बनाना चाहते थे, जिन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में लगातार चुनौती मिल रही थी. जिनकी सुरक्षा हेतु दलितों और पिछड़ों का सांस्कृतिकरण या यूं कि कहें कि वर्चस्वकारी संस्कृति के प्रति समर्पण आवश्यक था. 2014 में सत्तापरिवर्तन के बाद वे शक्तियां केंद्र तक पहुंच चुकी हैं. उनका नया नारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का है. ‘रामराज्य’ उनके लिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद का टोटम, ऐसा औजार है जिसके माध्यम से वे सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखना चाहते हैं. अपने समर्थक बुद्धिजीवियों के माध्यम से वे उसे जनता के बीच लगातार प्रचारित करते हैं. जरूरत पड़ने पर इतिहास में मनमाना हस्तक्षेप तक करते हैं. भूल जाते हैं कि राज्य जब वास्तविक न्याय की ओर से तटस्थ हो जाता है, तो वह वर्गीय तानाशाही का शिकार होने लगता है. उस समय धर्म स्वतः उसकी कार्यशैली में हस्तक्षेप करने लगता है. ऐसा राज्य अपने निर्णय न्याय और नागरिकों की सामान्य इच्छा, जरूरतों के आधार पर लेने के बजाय आस्था, विश्वास और परंपरा के अनुसार लेने लगता है. प्रकारांतर में राज्य का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. उसकी बनावटी निष्पक्षता, शीर्षस्थ वर्गों की आत्ममुग्धता का रूप ले लेती है.

रामराज्य’ का जिक्र हुआ है तो उसपर थोड़ी चर्चा और. कल्याण राज्य की पहचान उसकी उदारता और न्यायभावना से की जाती है. इस बात से होती है कि उसका मनुष्यता में कितना विश्वास है. राजा के रूप में राम की कोई न्यायसंहिता नहीं है. राम को धर्मसंस्थापक माना गया है. उसकी कथित महानता ब्राह्मणवाद को सर्वोपरि मान उसे ‘धर्म’ के नाम से प्रतिस्थापित करना है. इस कारण वह न तो अपनी पत्नी के साथ न्याय कर पाता है, न शंबूक के साथ. निर्दोष पत्नी को धोबी के मिथ्या आक्षेप पर देशनिकाला दे देता है तो शंबूक को चंट ब्राह्मणों के बहकावे में आकर मौत के घाट उतार देता है. ऐसे न्याय से एक ही वर्ग लाभान्वित हो सकता है. वह जिसके हाथों में धर्म का नियंत्रण है. चूंकि सामाजिक न्याय की अवधारणा अपने आप में अस्पष्ट अवधारणा है, उसकी कार्यशैली स्पष्ट नहीं है, इसलिए उसके नाम पर मनमानी करने का अवसर स्वार्थी राज्यप्रतिनिधियों को आसानी से मिल जाता है. ‘रामराज्य’ जैसी पुराकथाओं के माध्यम से वे जनसाधारण का सतत भावनात्मक दोहन करते हैं.

यदि ‘सामाजिक न्याय’ नहीं तो और क्या? क्या सामाजिक उत्पीड़न तथा भेदभाव का शिकार रहे लोगों के लिए ‘सामाजिक न्याय’ पूर्णतः अप्रासंगिक और अनपेक्षित है? क्या जाति, धर्म, वर्ण आदि के नाम पर शोषण और अन्याय का शिकार होते आए बहुजनों द्वारा ‘सामाजिक न्याय’ की मांग निरर्थक है? क्या बहुजन को ‘सामाजिक न्याय’ की मांग तक सीमित रह जाना चाहिए? अथवा ‘साम्यवाद’ की मांग करते हुए वर्गहीन समाज की संरचना हेतु अग्रसर होना चाहिए? ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ की मूलभूत विशेषताओं का अभी तक जो विवेचन किया गया है, उससे यह द्वंद्व स्पष्ट हो जाता है. उपसंहार के रूप में हमें केवल इतना जोड़ना है कि ‘सामाजिक न्याय’ समानता का समर्थन नहीं करता. वह असमानता के शिकार लोगों को थोड़ी राहत की मांग करते हुए यथास्थिति बनाए रखना चाहता है. शासक और शासित, दाता और याचक के बीच जो अंतर है, उसे मिटाने के बजाए वह उन्हें अपरोक्ष समर्थन देता है. वैसे भी ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर न्यायसंबंधी अधिकांश योजनाएं जनता की जरूरत के बजाय संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर बनाई जाती हैं. युद्ध, महंगाई, आर्थिक मंदी, प्राकृतिक आपदा आदि से अर्थव्यवस्था पर आकस्मिक दबाव उत्पन्न हो तो उसकी भरपाई ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर बनी संस्थाओं के बजट से की जाती है. सरकार ऐसी योजनाओं को औपचारिक भाव से कार्यान्वित करती है. प्रतिबद्धता के अभाव में वे योजनाएं आसानी से भ्रष्टाचार का शिकार हो जाती हैं.

राज्य और सरकार दोनों नागरिक का कार्य हैं. उनका गठन सामाजिक सुरक्षा एवं ऐसे लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु किया जाता है, जिससे उन सुखों को आसानी से प्राप्त किया जा सके, जो किसी अकेले व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. जैसे राज्य और सरकार नागरिक का कार्य है, ऐसे ही सामाजिक न्याय राज्य का दायित्व है, जिसे वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु अपनाता है. बावजूद इसके जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें चाहे वे किसी भी तरह की क्यों न हों, नागरिकों के श्रम और पैसे से चलने के बावजूदकालांतर में अपने दायित्वों से मुंह मोड़ने लगती हैं. वे ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर विपन्नताग्रस्त वर्गों को मामूली राहत पहुंचाकर कल्याणकारी होने का दम भरती रहती हैं. प्रकारांतर में वे ऐसी संस्कृति का पोषणपल्लवन करती हैं, जो समाज को श्रेष्ठतम और साधारण, शासक और शासित में बांटे रखती हैं. जनता की उदासीनता के चलते, वे येनकेनप्रकारेण नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब होती हैं कि श्रेष्ठतम की शासकीय भूमिका और साधारण का शासित होना नियतिसिद्ध है. साम्यवाद इस तरह के वर्गभेद को नकारता है. वह सांस्कृतिक वर्चस्व के मूलाधार धर्म को राज्य के कामकाज से एकदम अलग रखने पर जोर देता है. धर्मकेंद्रित संस्कृति के स्थान पर वह श्रमकेंद्रित संस्कृति को बढ़ावा देता है. जिससे शारीरिक और बौद्धिक श्रम के बीच का अंतर मिटने लगता है. ऐसा ही समाज बहुजन का सपना और आदर्श हो सकता है.

तो क्या आमूल परिवर्तन की मांग को टालने, यथास्थिति बनाए रखने के लिए ‘सामाजिक न्याय’ महज राजनीतिक स्टंट है? ‘सामाजिक न्याय’ के उद्देश्य को देखते हुए उसकी सीधे आलोचना भले ही अनुचित लगे, परंतु जब तक जनता अपने हितों एवं अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होगी हालात में सुधार के लिए जब तक खुद को दूसरों पर आश्रित मानती रहेंगीतब तक ‘सामाजिक न्याय’ अपने उद्देश्य में विफल बना रहेगा. हालात उसी ओर संकेत कर रहे हैं. हाल के वर्षों में राजनीति व्यापार तथा चुनाव मतप्रबंधन में बदल चुका है. दलित और पिछड़े मतदाताओं को लुभाने के चुनावी प्रयासों के लिए इधर एक नया शब्द निकलकर आया हैᅳ‘सोशल इंजीनियरिंग. उसका सामाजिक न्याय से कोई संबंध नहीं है. यह उसके नाम पर मतदाताओं को लुभाने जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में साधने की चुनावी तकनीक है, जिसे अवसरवादी दल अकेले या दूसरे दलों के साथ गठजोड़ करके अमल में लाते हैं. सामाजिक न्याय का संबंध राज्य के स्वरूप से न होकर, उसके उत्तरदायी आचरण से है; और राज्य तभी अपने दायित्वों के प्रति सजग रह सकता है, जब जनता जागरूक तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग हो.

संक्षेप में सामाजिक न्याय धर्म की प्रभुता में, मानवीय मूल्यों को साथ लेकर चलने की कला है. जबकि साम्यवाद धर्म को किनारे कर, विधायी तरीकों से न्याय की अपेक्षा करता है. अभी तक साम्यवाद के लिए वर्गक्रांति को अनिवार्य माना गया है. किंतु वर्गक्रांति केवल हिंसा के बल पर फलीभूत हो, यह आवश्यक नहीं है. देखा यही गया है कि जिन देशों में हिंसक वर्गक्रांति के बल पर सत्ता परिवर्तन हुआ, वहां वर्गहीन समाज की रचना का स्वप्न पूरा होने से पहले ही सर्वहारा शक्तियां अपने अंतर्द्वंद्वों के कारण बिखराब का शिकार होती गईं. कारण है कि हिंसा की मदद से सत्तापरिवर्तन का लक्ष्य पाने वाले राज्य आगे भी उसके पैरोकार बने रहते हैं. इससे चाहेअनचाहे वे अपने चारों और फैली बुर्जुआ ताकतों के बीच शक्तिसंतुलन बनाने की होड़ में जुट जाते हैं. नतीजा यह होता है कि उनके संसाधनों का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक कार्यों पर खर्च होने लगता है, जो प्रकारातंर में सामाजिक असंतोष में वृद्धि करता है. वर्गहीन समाज की रचना तभी संभव है जब जनता के सभी समूह उसके लिए प्रतिबद्ध हों. यह कैसे संभव हो? समानता, समरसता, न्याय और स्वतंत्रता का सपना देखने वालों के लिए हमारे समय की यही सबसे बड़ी चुनौती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. The best safeguard against fascism is to establish social Justice to the maximum possible extent. Arnold Toynbee, 1876

2. Justice is first virtue of social institutions, as truth is of system of thought. A theory however elegant and economical must be rejected or revised if it is untrue; likewise laws and institutions no matter how efficient and well arranged must be reformed or abolished. -John Rowls(1971)

3. http://janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=5525

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामान्य
  • फासिज्म रोकने का श्रेष्ठतम उपाय है, समाज में सामाजिक न्याय की यथासंभव प्रतिष्ठाआर्नोल्ड टॉयनबी.

  • भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय लोकप्रिय राजनीति का तकिया कलाम है. जिसे हर नेता प्रत्येक चुनाव में

    अपनीअपनी तरह से इस्तेमाल करता है.

साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ दोनों आयातित पद हैं. हमारे यहां मार्क्सवाद ज्यादा चलता है, जिसे खुद मार्क्स ने ही खारिज कर दिया था. लोहिया भी मार्क्सवाद कहने से बचते थे. हालांकि मार्क्सवाद के आदर्श से उन्हें कोई शिकायत न थी. साम्यवादी लक्ष्य को लेकर इस देश में जितने भी राजनीतिक संगठन बने, किसी न किसी रूप में वे सभी मार्क्सवाद का प्रतिनिधि दल होने का दावा करते हैं. इतनी शिद्दत से करते हैं कि अपना लक्ष्य, साम्यवाद का आदर्श ही उन्हें याद नहीं रहता. शायद इसलिए कि ‘मार्क्सवाद’ की प्रचलित शब्दावली यथा वर्गसंघर्ष, मजदूर, पूंजीपति, शोषण आदि को लोकप्रिय राजनीति के खांचे में आसानी से फिट किया जा सकता है. उसे लेकर राजनीति करना आसान है. साम्यवाद अपेक्षाकृत स्वप्नीला शब्द है. आदर्श और मनुष्यता के बेहद करीब. वह जिस आदर्शोन्मुखी, वर्गहीन और समतायुक्त समाज का सपना देखता है, उसकी पूर्णता पर आमजन तो क्या, आकादमिक प्रतिष्ठा वाले बड़ेबड़े विद्वान विश्वास नहीं करते.

पश्चिम में प्लेटो का आदर्श राज्य का सपना करीबकरीब साम्यवादी परिकल्पना ही थी. भारत में रैदास ने ‘बेगमपुरा’ तथा कबीर ने ‘अमरपुरी’ के रूप में समताआधारित समाज का सपना देखा था. उसके कुछ समय बाद योरोप में संत साइमन ने भी व्यंग्यात्मक शैली में वर्गहीन तथा आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. प्लेटो की परिकल्पना को अरस्तु ने ही अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था, वहीं संत साइमन के सपने पर उनके समकालीनों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया. मगर डेड़दो शताब्दी बाद ही, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में साइमन की यूटोपियाई कल्पना आदर्शवादी समाज का सपना देखने वाले विद्वानों, चिंतकों और आंदोलनकारियों का सपना बन गई. संत साइमन के थोड़ा आगेपीछे जॉन लाक, इमानुएल कांट, प्रस्टीले, रूसो, राबर्ट ओवेन, बैंथम, जान स्टुअर्ट मिल, मिखाइल बकुनिन आदि ने समानता और स्वाधीनता पर आधारित ऐसे राजनीतिक दर्शन को दुनिया के सामने रखा, जिसमें व्यक्तिमात्र की गरिमा, स्वतंत्रता और समान सुख की उम्मीद शामिल थी. भारत में स्थितियां अलग थीं. यहां का समाज जाति और धर्म के आधार पर बुरी तरह विभाजित था. सत्ता और संसाधन जिन लोगों के अधीन थे, वे हर हालत में यथास्थिति बनाए रखना चाहते थे. जिस धर्मसंस्कृति के भारतीय अनुगामी रहेवह खुद वर्गभेद का पोषण करता है. इसलिए समाज के उत्पीड़ित वर्गों से आए रैदास आदि संत कवियों के सपने की ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. जाति और वर्णभेद में बुरी तरह फंसे, उन्हें विधि का विधान मानकर जीने वाले समाज के लिए यह कोई अनहोनी बात नहीं थी. लोग अपने दुख, दैन्य, दमन और दासत्व के साथ जीना सीख चुके थे. आजादी के बाद भी शताब्दियों के संस्कार देश के बुद्धिजीवियों के अवचेतन पर असर बनाए रहे. यही कारण है कि हमारे यहां खुद को समाजवादी कहने वाले नेता हुए, मार्क्सवादी हुए, मगर साम्यवाद कभी भी बौद्धिक और आकादमिक बहसों से बाहर न आ सका.

आजादी के बाद रोजमर्रा की शब्दावली में साम्यवाद अ़ौर मार्क्सवाद दोनों के लिए वैकल्पिक शब्द का चलन शुरू हुआ. वह शब्द हैवामपंथ. बदले परिवेश में ‘वामपंथ’ को गाली मान लिया गया है. तो भी मार्क्सवाद के पर्याय के रूप में या जिन्हें मार्क्सवाद कहनेलिखने से चिढ़ है, वे प्रायः ‘वामपंथ’ का ही प्रयोग करते हैं. वामपंथ क्या है? वह जो दक्षिणपंथ नहीं है? एक वैचारिकी के रूप में वामपंथ का साम्यवाद या मार्क्सवाद से दूरपास का कितना नाता है? क्या वह मार्क्सवाद या साम्यवाद के पर्याय से अधिक कुछ नहीं है? ऐसे प्रश्नों पर वे विचार ही नहीं करना चाहते. मार्क्सवाद और साम्यवाद की तरह ‘वामपंथ’ भी आयातित विचार है. अपने मूल अर्थों में इसका मार्क्सवाद से दूर का ही नाता है. एक रास्ता है, जिससे साम्यवाद की ओर बढ़ा जा सकता है. वामपंथ का संबंध फ्रांस की क्रांति से है, जो कभी मार्क्सवादी या साम्यवादी देश नहीं रहा. प्रथम वामपंथी होने का श्रेय टॉमस पेन तथा उसके सहयोगियों को जाता है. पेन मूलतः व्यक्तिमात्र की अधिकतम स्वाधीनता का समर्थक था. अमेरिकी क्रांति की सफलता के पश्चात, मित्र थॉमस जेफरसन से विदा लेकर वह फ्रांस पहुंचा था. वहां राजशाही के विरुद्ध उसका संघर्ष जारी था. पेन की पुस्तक ‘राइट्स ऑफ मेन’ उनीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक प्रभावशाली पुस्तकों में से है. इस पुस्तक ने फ्रांसिसी क्रांति के लिए उत्प्रेरक का काम किया था.

फ्रांसिसी क्रांति ने सामाजिकराजनीतिक संरचनाओं में अनेक बदलाव किए थे. उससे पहले धर्म राजनीति के मुख्य मार्गदर्शक की भूमिका निभाता था. क्रांति के बाद धर्म के प्रभावक्षेत्र मनुष्य के निजी विश्वास और आचरण तक सीमित हो गया. नई विचारधाराओं के आलोक में राजनीति में धर्म की कार्यकारी भूमिका को लगभग समाप्त कर दिया गया था. उसके स्थान पर न्याय, लोककल्याण, नागरिक और राज्य की आंतरिक शुभता, मानवाधिकार आदि को राजनीति का प्रमुख मार्गदर्शक घोषित कर दिया गया. फलस्वरूप विधि के शासन को बल मिला. राज्य जिसे पहले दैवीय अथवा देवताओं की विशेष अनुकंपा माना जाता था, उसको मनुष्य द्वारा अपने तथा मानवमात्र के कल्याण हेतु निर्मित संस्था कहा जाने लगा. राज्य के संचालन में नागरिकों की भूमिका जो धर्मप्रधान राजनीति में अत्यंत गौण थी, वह प्रमुख हो गई. तीसरी और प्रमुख सफलता थी, राजनीति में कुल, परंपरा, जाति, वंशाधिकार, वर्णश्रेष्ठता आदि के दावे के आधार पर विशेषाधिकारों का लोप. उससे, कालांतर में लोकतंत्र के रास्ते प्रशस्त हुए, आधुनिक समाज की नींव रखी गई.

आरंभिक अवधारणा के अनुसार वामपंथ मार्क्सवाद या साम्यवाद का पर्याय भले न हो, किंतु अपनी इन समानधर्मा विचारधाराओं की भांति वह किसी भी प्रकार की सर्वसत्तावादी अवधारणा का विरोध करता है, इस दृष्टि से इसे साम्यवाद और मार्क्सवाद दोनों के करीब माना जा सकता है. मार्क्सवाद का मूलभूत विचार वर्गसंघर्ष है. वर्गहीन समाज की स्थापना उसका लक्ष्य है. वर्गसंघर्ष को हम हीगेल की दार्शनिक संकल्पना ‘द्वंद्ववाद’ का राजनीतिक अवतार भी कह सकते हैं. 1848 में श्रमिकों का आवाह्न करते हुए मार्क्स ने कहा थाᅳ‘तुम्हारे पास खोने के लिए सिवाय अपनी बेड़ियों के कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है.’ इस कथन के संकेत साफ थे. मार्क्स चाहता था कि श्रमिक वर्ग संगठित क्रांति द्वारा उत्पादन एवं सत्ता प्रतिष्ठानों पर अधिकार कर ले. इस आवाह्न का श्रमिक संगठनों ने खुले दिल से स्वागत किया था. उसके आधार पर 1871 में पेरिस क्रांति हुई. उसका सुफल ‘पेरिस कम्यून’ के रूप में दुनिया सामने आया. पेरिस और आसपास के कुछ ठिकानों पर श्रमिकसंगठनों का अधिकार हो गया. वह सफलता अस्थायी सिद्ध हुई. तीन महीने से भी कम समय में सत्ता श्रमिकसंगठनों से वापस छीन ली गई. पेरिस कम्यून की असफलता मार्क्स के लिए भी सबक थी. वर्गक्रांति की सफलता के लिए वर्गभेद के कारणों को समझना और समझाना अत्यावश्यक था. उसके बाद मार्क्स ने खुद को पूंजीवाद के गंभीर अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया था. वर्गहीन समाज की संकल्पना उसके लंबे अध्ययनमनन का सुफल थी. ‘पेरिसक्रांति’ के बाद मार्क्स का नाम दुनियाभर में फैल चुका था. लोग संगठित विद्रोह की शक्ति से परिचित हो चुके थे. समझने लगे थे कि संगठित ताकत से आजादी को संभव बनाया जा सकता है. भारत भी उससे अछूता न था. ‘वर्गसंघर्ष का उपयोग औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए किस प्रकार किया जाए?’ यह प्रश्न अनेक विचारवान लोगों को उद्वेलित करने लगा था. मार्क्स से मिलने की साध लेकर राजा राममोहनराय ने इंग्लेंड की यात्रा भी की थी. हालांकि उन दोनों की भेंट के बारे में दावे के साथ कुछ भी कह पाना कठिन है.

सर्वहारा शोषण की जिन स्थितियों का विश्लेषण मार्क्स ने अपने लेखन में किया था, वे उससे पहले भी अजानी नहीं थीं. प्लेटो और अरस्तु दोनों यद्यपि दास पृथा के समर्थक थे, लेकिन वे राज्य से अपेक्षा करते थे कि वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों को समझे तथा उनका निष्ठापूर्वक पालन करे. मध्यकाल के विचारक भी लोककल्याण के लिए राज्य की ओर से उत्तरदायी आचरण की अपेक्षा करते हैं. फ्रांसिसी विचारक पियरे जोसेफ प्रूंधों ने समाजार्थिक समानता पर आधारित राज्य की परिकल्पना की थी. बेहद मामूली, गरीब परिवार में जन्मा प्रूंधों बचपन में अपने पिता के साथ कहवाघर में काम करता था. उसने अपना सारा ज्ञान जीवनानुभवों और स्वाध्याय के बल पर अर्जित किया था. वह अराजकतावादी था. उसका मानना था कि राज्य की कुल संपत्ति पर सरकार का अधिकार होना चाहिए. सरकार कैसी हो? इस बारे में उसकी स्पष्ट मान्यता थीᅳ‘प्रत्येक के द्वारा खुद की सरकार’. कुल मिलाकर शासक वर्ग का पूर्णतया लोप. प्रत्येक नागरिक के लिए अधिकतम स्वतंत्रता. यह थोरो द्वारा दी गई अच्छी सरकार की विशेषता, ‘अच्छी सरकार वह है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती’का समर्थन करती है. प्रूंधों ने व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी और संपत्तिधारक को चोर कहा था. अपने समय में वह मार्क्स कहीं अधिक लोकप्रिय था. लेकिन पूंजीवाद के दुष्प्रभावों को लेकर मार्क्स का अध्ययन कहीं अधिक व्यापक और तथ्यपरक था. सभ्यताओं के लंबे, ऐतिहासिक अध्ययन द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन प्रविधियों में बदलाव संस्कृति एवं सभ्यता को प्रभावित करता है. उत्पादकता के साधनों पर पूंजीवादी वर्चस्व के रहते शोषण से मुक्ति असंभव है. एकमात्र समाधान वर्गसंघर्ष है. वह सामाजिक परिवर्तन की दिशा में प्रमुख औजार है. ऐसा रास्ता, जिसका लक्ष्य साम्यवाद है. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में मार्क्स का निष्कर्षवाक्य हैᅳ‘दार्शनिकों ने इस संसार की अनेक तरह से व्याख्या की है. सवाल है कि उसे बदला किस तरह जाए?’ मार्क्स का पूरा जीवन बदलाव को समर्पित रहा. इसके लिए उसने वर्गक्रांति का आवाह्न किया, जो इतनी ओजपूर्ण है कि प्रायः वर्गसंघर्ष को ही साम्यवाद की आधारसैद्धांतिकी मान लिया जाता है. मार्क्स और मार्क्सवाद के नाम पर राजनीति करने वाले लोग कभी अनजाने में तो कभी जानबूझकर ऐसी गलती करते रहते हैं. कदाचित इसलिए भी कि वर्गसंघर्ष यानी टकराव की राजनीति करना आसान है. विशेषकर भीषण असमानता के शिकार उन समाजों में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति तक सिमटकर अपनी गरिमा तथा उद्देश्य दोनों से दूर जा चुका है.

सामाजिक न्याय : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

सामाजिक न्याय’ पर चर्चा करने से पहले उचित होगा कि उसके इतिहास पर भी कुछ बातचीत कर ली जाए. उन परिस्थितियों पर विचार किया जाए जिनके कारण चर्च जैसी शक्तिशाली संस्था को कल्याणराज्य के समर्थन में उतरना पड़ा था? 16वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति यूरोप में कई वैचारिक आंदोलनों की प्रेरक बनी थी. उनके केंद्र में मनुष्य था. फलस्वरूप सामंतवादी दौर की वे विचारधाराएं सवालों के घेरे में आने लगीं, जो किसी अजाने, अदृश्य लोक तथा पैगंबर की बातें किया करती थीं. जिनकी निगाह में सब कुद्ध नियतिबद्ध था. उन्हें कठघरे में लाने की शुरुआत थॉमस हॉब्स की ओर से हो चुकी थी. आगे चलकर उसे ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, इमानुएल कांट, बैंथम, प्रूधां और टॉमस पेन जैसे विचारकों का समर्थन मिला. इनमें कई आस्थावादी भी थे, मगर धर्म उनके लिए व्यक्तिगत आस्था और विश्वास तक सीमित था. राजनीति के साथ उसके घालमेल के सभी विरोधी थे. नई विचारधाराओं के आलोक में लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातंत्र्य पर जोर दिया जाने लगा था. फ्रांसिसी क्रांति तथा उसके पहले संपन्न हुई अमेरिकी क्रांति, धर्म केंद्रित प्राचीन राजनीतिक संस्थाओं को वर्षों पहले नकार चुकी थीं. नए राजनीतिक दर्शनों पर बहस जारी थी. इससे पुरातनपंथी धर्माचार्यों में बेचैनी थी. अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए वे छटपटा रहे थे.

विज्ञान के पंखों पर सवार होकर आने वाली औद्योगिक क्रांति सर्वथा निरापद न थी. अनियोजित मशीनीकरण ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए ‘आधुनिक विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन ने कहा था कि औद्योगिक क्रांति श्रमिकों को उनके जानलेवा कष्टों से मुक्ति दिलाकर नए समाज की नींव रखेगी. किंतु उद्योगपतियों की स्वार्थपरता, लाभ को केंद्र में रखकर उत्पादन करने की उनकी नीति तथा श्रमिकों को उनके श्रम का पूरा लाभ न देकर सबकुछ हड़प जाने की लालची वृत्ति ने मशीनीकरण के लाभों को विशिष्ट वर्ग तक सीमित कर, श्रमिक वर्ग के उन सभी सपनों पर पानी फेरने का काम किया था, जो उसने औद्योगिक क्रांति के साथ देखे थे. उससे श्रमिकों का आक्रोश बढ़ रहा था. वे एक साथ लामबंद होने लगे थे. चार्ल्स फ्यूरियर, प्रूंधों, मार्क्स, मिखाइन बकुनिन जैसे विचारक, आंदोलनकारी उनके समर्थन में थे. फ्रांसिसी क्रांति की सफलता से श्रमिक संगठनों के हौसले बढ़े हुए थे. उसका दूरगामी असर भविष्य की राजनीति पर पड़ा. फलस्वरूप राजनीति में धर्म की भूमिका सिमटने लगी. न्याय का ईश्वरीय आधार समाप्त हो गया. प्रशासनिक फैसलों में तर्क और ज्ञानविज्ञान की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई. क्रांति की तीसरी बड़ी उपलब्धि थी, वंशानुगत शासन का अंत. फलस्वरूप वैधानिक और नागरिक अधिकार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगे. शासनप्रशासन में लोकतांत्रिक संस्थाओं की संख्या बढ़ने लगी, जिनके लिए नागरिक तथा नागरिकअधिकार प्रमुख थे.

बीसवीं शताब्दी के आरंभ में सोवियत क्रांति की कामयाबी श्रमिक आंदोलन के इतिहास में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई. सोवियतसंघ विश्व का पहला समाजवादी राज्य था, जिसका गठन साम्यवादी सपने के मद्देनजर किया गया था. उस सफलता से उत्साहित सर्वहारा वर्ग पूरे विश्व को कम्युनिज्म की परिसीमा में लाने का सपना देख रहा था. मंगोलिया, जर्मनी, इटली, रोमानिया जैसे दर्जनों देशों उसके प्रभाव में आ चुके थे. अमेरिका, इंग्लेंड जैसे ठेठ पूंजीवादी देशों में साम्यवादी दलों का गठन हो चुका था. उन्हें अपने समय के प्रखर विद्वानों और बुद्धिजीवियों का नेतृत्व प्राप्त था. चीन भी तेजी से श्रमिकक्रांति की ओर अग्रसर था. वहां माओ के नेतृत्व में परिवर्तन की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ी जा रही थी. उधर अमेरिका के उपनिवेश रहे अफ्रीकी देशों में वर्गचेतना अंगड़ाई ले रही थी. लोग औपनिवेशिक दासता से बाहर निकलने के लिए आतुर थे. हथियार खरीद की अवांछित स्पर्धा का सीधा असर उन देशों की विकासदर पर पड़ा. दूसरे विश्वयुद्ध का डर दिखाकर प्रतिक्रियावादी शक्तियां सत्ताकेंद्रों पर सवार होने लगी थीं.

औपनिवेशिक देशों में आजादी की बढ़ती मांग का एक असर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में सामने आ रहा था. उनीसवीं शताब्दी में तेजी से हो रही बाजारवृद्धि लगभग रुकसी गई थी. ऊपर से विश्वयुद्ध की मार. विश्वघटनाक्रम तेजी से बदल रहा था. जिन देशों में सर्वहारा क्रांति संपन्न हुई थी, वहां वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य अभी बाकी था. युद्ध से जनअसंतोष में वृद्धि हुई थी. पूंजीवादी ताकतों के सामने केवल दो रास्ते शेष थे. पहला बिना किसी ढांचागत परिवर्तन के, श्रमिक आंदोलन की ओर से आंखें मूंदकर उत्पादन में तेजी लाई जाए. तत्कालीन परिस्थतियां में वह असंभव जैसा था. दूसरा और अंतिम रास्ता यही था कि श्रमिकों की वैध मांगों से समझौता कर श्रमिकअसंतोष को दूर करने के उपाय किए जाएं. इस भावना ने ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा को जन्म दिया. इस तरह अपने मूल में ‘सामाजिक न्याय’ जरूरतमंदों को बहलाफुसलाकर उनके असंतोष को दबा देने की कोशिश का परिणाम था. धार्मिक संगठन उसे राज्य की उदारता के रूप में, जनता का विश्वास जीतने के लिए आवश्यक मानते थे, ताकि उसकी आड़ में धर्मसत्ता अपने वर्गीय स्वार्थों का संरक्षण कर सकें. इसके समर्थन में वे विचारक, बुद्धिजीवी, लेखक और धर्माचार्य भी थे जो सामाजिकऔद्योगिक संरचना में बड़ा बदलाव किए बिना, औद्योगिक लाभों का एक हिस्सा राज्य के माध्यम से श्रमिकों तक पहुंचाकरश्रमिकआंदोलनों से उपजे असंतोष का समाधान खोजना चाहते थे. इसे श्रमिक आंदोलन से गुजर रहे देशों की सरकारों का समर्थन हासिल था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विभिन्न राष्ट्रों में मारक हथियार खरीदने की होड़ शुरू हो चुकी थी. वर्गक्रांति से गुजर चुके देशों ने भी अपने संसाधन युद्ध की तैयारी अथवा संभावित युद्ध की अवस्था में बचाव के लिए झोंक दिए थे. वे देश एकदूसरे के साथ स्पर्धा में थे. साम्यवाद की सफलता स्पर्धा के बजाय सहयोग पर टिकी होती है. स्पर्धा, भले ही वह हथियारों के लिए दूसरे देशों के साथ हो, साम्यवाद के मूल सिद्धांतों के विपरीत है. हथियारों की स्पर्धा उन देशों में साम्यवादी मूल्यों के प्रचारप्रसार पर भारी पड़ने लगी थी.

सामाजिक न्याय की उद्भावना के दौर में एक वर्ग आमूल परिवर्तनवादियों का भी था. उसके समर्थक मानते थे कि धर्म और धर्म जैसी सामंती चरित्र वाली संस्थाओं के सहारे सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन असंभव है. इन विचारधाराओं के मूल में यूरोप की वैज्ञानिक क्रांति का बड़ा योगदान था. मशीनीकरण द्वारा पूंजीपति वर्ग की संपत्ति में तेज बढ़ोत्तरी हुई थी. पुराने उद्योगधंधे उजड़ने से शिल्पकार और कामगार वर्ग में असंतोष पनप रहा था. अनियोजित शहरीकरण ने भी अनेक समस्याओं को जन्म दिया था. फलस्वरूप उन देशों में पूंजीवाद के विरुद्ध माहौल बनने लगा था. वैज्ञानिक क्रांति ने लोगों के सोच और मानस को बदला था. नईनई विचारधाराएं सामने आ रही थीं. धार्मिक संस्थाएं, पहले जिनकी हर शिक्षा जनसाधारण के लिए आदेश होती थी, अब उतनी विश्वसनीय नहीं रह गई थीं. बल्कि यह मानते हुए कि धर्म शोषण में मददगार है, उसके विरुद्ध आवाज उठने लगी थीं. हॉब्स, ह्यूम, जान लॉक, देकार्त्त, वाल्तेयर, रूसो, बैंथम, प्रूधों आदि ने धर्म की विश्वसनीयता तथा उसके सर्वसत्तावादी स्वरूप पर सवाल उठाए थे. नए विचारों का मूल्यबोध मानवमात्र के सुख, स्वतंत्रता और सम्मान से अभिप्रेत था. उन्हें जनसमाज का समर्थन भी प्राप्त था. औद्योगिकीकरण रोजगार के परंपरागत संसाधनों पर उनकी निर्भरता घटी थी. उनका आत्मविश्वास लौटा था और अब वे स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम थे. इसका एहसास पूंजीपति और राजनेताओं को भी था. इसलिए श्रमिककामगार वर्ग को संतुष्ट रखने की कोशिशें श्रमिक चेतना के उभार के साथ ही आरंभ हो चुकी थी. चूंकि जनसाधारण पर धर्म का गहरा प्रभाव था, इसलिए श्रमिक असंतोष को नियंत्रित करने के लिए आरंभ में धर्म को ही माध्यम बनाया गया.

यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि ‘सोशल जस्टिस’ जैसे शब्दयुग्म जिसका प्रयोग राज्य की उदारता और न्यायप्रियता दर्शाने के लिए किया जाता है, का प्रथम प्रयोग एक कट्टर पुरातनपंथी द्वारा किया गया था. इटली निवासी ल्यूगी अजीलिओ टपरेली पेशे से धर्मप्रचारक पादरी था. 1845 में लिखे गए एक लेख Theoretic Essay of Natural Straight में उसने इस शब्दयुग्म का पहली बार प्रयोग किया था. ‘सामाजिक न्याय’ से टपरेली का आशय भी वह नहीं था, जैसा आज है. उसका आशय राज्य के सामान्य न्यायबोध से था. उन दिनों लेखकों और चिंतकों का एक ऐसा वर्ग था जो ईसाई धर्म की मूलभूत मान्यताओं को आगे रखकर राज्य से नागरिकों के प्रति करुणा और सहानुभूतिपूर्ण आचरण की मांग कर रहा था. थॉमस एक्वीनस से प्रभावित, उसे अपना गुरु मानने वाले टपरेली का संबंध इसी वर्ग से था. वह मानता था कि आधुनिकता से लोगों की जो अपेक्षाएं हैं, धर्म की परिसीमा में उनका समाधान संभव है. समानता और व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को लेकर टपरेली के विचार दकियानूसी किस्म के थे. वह मध्यकालीन दर्शनों से प्रभावित था. जिनमें राजसत्ता से, धर्मसत्ता की अनुप्रेरणा अथवा उसके मार्गदर्शन में काम करने की अपेक्षा की जाती है. उसका विचार था कि प्राकृतिक आधार पर मनुष्य भी बाकी जीवों के समान है. परंतु अपनी मेधा, स्वाध्याय, धन, चरित्र, कुलपरंपरा आदि के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति दूसरों से अलग होता है. चरित्र एवं गुणों में दूसरों से श्रेष्ठतर व्यक्ति, श्रेष्ठता की कसौटी पर कमजोर वर्गां पर शासन करने का अधिकार स्वाभाविक रूप से प्राप्त कर लेता है. समाज को शासक एवं शासित के रूप में देखने वाले टपरेली के लिए न्याय राज्य की उदारता का लक्षण है. उसके दर्शन में शासक एवं शासित के बीच द्वंद्वात्मकता के लिए जगह नहीं है. वह किसी व्यक्ति के शिखर पर होने को उसका विशेषाधिकार मान लेता है. उसके अनुसार कोई व्यक्ति शासन इसलिए करता है, क्योंकि उसमें राज करने का स्वयंअर्जित गुण है.

वर्तमान में ‘सामाजिकन्याय’ जिन अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, उन तक पहुंचने के लिए उसे आधी शताब्दी से भी अधिक का समय लगा है. इस बीच उसका प्रयोग विभिन्न लेखकों, विचारकों द्वारा अलगअलग संदर्भों में किया जाता रहा. 1851 में इतालवी भाषा के एक आलेख ‘दि कैथोलिक सिविलाइजेशन’ में ‘सामाजिक न्याय’ को सामान्य प्रकृतिबोध, ज्ञानविज्ञान और अनुभव पर आधारित ऐसा दर्शन माना गया जो विकेंद्रीकृत सत्ता का विरोध करता है. उसके लगभग तीन दशक बाद 1883 में फ्रांसिसी कैथोलिक समाजविज्ञानी दि मुन ने ‘सामाजिक न्याय’ को श्रमिकों और कामगारों के ऐसे संगठन के साथ जोड़ा, जिसके सदस्य पारस्परिक उत्तरदायित्व एवं सामाजिक आदर्श की भावना के साथ समान उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु परस्पर एकजुट होकर काम करते हैं. उसके दो वर्ष बाद फ्रांसिसी समाजवादी नेता, लेखक और विचारक जार्ज गोयो ने ‘सामाजिक न्याय’ की कामना के साथ ऐसे राष्ट्र के गठन पर जोर दिया, जिसमें नागरिक और सरकार दोनों अपनेअपने कर्तव्य को समर्पित हों; तथा जिसमें नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा का पूरा भरोसा हो. बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यह शब्दयुग्म विमर्श का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था. दर्जनों लेखकों ने ‘सामाजिक न्याय’ को अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हुए उसकी जरूरत पर बल दिया. अमेरिकी लेखक डब्ल्यू विलियोग्वि ने ‘सामाजिक न्याय’ को लेकर कई लेख लिखे. एक लेख में उसने लिखाᅳ‘न्याय का आशय नागरिकों को यथासंभव ऐसे और इतने अवसर उपलब्ध कराना है, जिनसे वह अपने भीतर के शुभत्व को उच्चतम बिंदू तक उठान दे सके. राज्य का स्वरूप ऐसा हो जिसमें सभी को अपने विकास के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों.’ विलियोग्वि की यह परिभाषा ‘सामाजिक न्याय’ की आधुनिक अवधारणा के काफी करीब है. 1930 तक ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा पूरी तरह चलन में आ चुकी थी. उसके माध्यम से ऐसे राज्य की परिकल्पना को बल मिला, जहां नागरिक व्यक्तिगत एवं सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हों और राज्य अपने नागरिकों के हितों के प्रति जागरूक.

1924 में सोवियत क्रांति के महानायक रहे विलादिमिर लेनिन की मृत्यु के बाद सत्ता जोसेफ स्टालिन के हाथों में आ चुकी थी. स्टालिन का अर्थ हैलौहपुरुष. अपने नाम के अनुरूप स्वभाव पाया था उसने. इरादों से मजबूत. कड़े फैसले लेने में सक्षम. स्टालिन की पूरी कोशिश सोवियत संघ को वर्गहीन समाज में बदल देने की थी. उसके लिए बड़े पैमाने पर भूप्रबंधन किया जा रहा था. धर्म को किनारे कर पारंपरिक संस्थाओं को शक्तिहीन किया जा चुका था. अपने कठोर निर्णयों से वह अपने मित्रों की नाराजगी भी मोल ले चुका था. मगर स्टालिन के लिए यह विशेष चिंता का विषय नहीं था. ट्राटस्की, लेव केमानोव जैसे नेता जो सोवियत क्रांति के दौरान लेनिन के सहयोगी रह चुके थे, को मृत्युदंड देकर उसने अपने मजबूत इरादों को दर्शा दिया था. चूंकि स्टालिन के नेतृत्व में रूस तरक्की कर रहा था, इसलिए जनता उसके साथ थी. साम्यवादी राष्ट्रकुल के गठन की दिशा में उसकी उसकी प्रगति दर चौंकाने वाली थी. औपनिवेशिक दासता का शिकार देशों में साम्यवाद का तेजी से विस्तार हो रहा था. यह डर पूंजीपतियों तथा उनके समर्थनसहयोग के आधार पर टिकी सरकारों के लिए काफी था. यथास्थिति बनाए रखने का एकमात्र रास्ता था, श्रमिकों और कामगारों को अपने पक्ष में लिया जाए. इसके लिए उन्हें थोड़ीबहुत छूट देकर न्याय का माहौल बनाया गया. विश्वस्तर पर ऐसे बुद्धिजीवियों की पहचान की जाने लगी, जिन्हें पूंजीवाद से कोई शिकायत न थी; अथवा जो बदलाव के लिए हिंसक क्रांति का विरोध करते थे ऐसे बुद्धिजीवियों के समर्थन में आने से ‘सामाजिक न्याय’ का खूब प्रचारप्रसार हुआ.

साम्यवाद, सामाजिक न्याय और राज्य

सामाजिक न्याय’ की ऐतिहासिक अवधारणा हमें प्लेटो और अरस्तु तक ले जाती है. न्याय से प्लेटो का अभिप्राय थामानवीय सद्गुण. ऐसे गुण जो आत्मा का लक्षण और मनुष्यता की कसौटी हैं. जो मनुष्य को एकदूसरे के प्रति सदाशयी तथा समाज का जिम्मेदार सदस्य बनाते हैं.’ न्याय समाज से प्लेटो का अभिप्राय ऐसे समाज से था, जिसमें मनुष्य उन सभी कर्तव्यों को स्वेच्छापूर्वक पूरा करे, जिनका पालन समाज के प्रयोजनों की दृष्टि से अपरिहार्य है. आदर्श समाज में समाज और राज्य मिलकर नागरिकों की योग्यतानुसार जिन कर्तव्यों का निर्धारण करते हैं, उन्हें पालन किया जाना ही श्रेयस्कर है. न्यायअनुगामी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन इस भावना के साथ करता है कि उसी में उसकी तथा बाकी समाज की खुशी है. बदले में समाज भी पीछे नहीं रहता. अपनी प्रत्येक इकाई के साथ वह ऐसा व्यवहार करता है मानो उसकी खुशी के अभाव में शेष समाज की खुशी भी अधूरी है. इस तरह एक व्यक्ति का सुख समाज के सुख में तथा समाज का सुख उसकी प्रत्येक इकाई के सुख के संरक्षण में नजर आने लगता है. उस अवस्था में सुख का बंटवारा नहीं, उसमें हिस्सेदारी होती है. न्यायसमर्पित समाज सुख को सामूहिक उपलब्धि मानता है. उसमें व्यक्तिगत इच्छाओं का सम्मान किया जाता है, पर जोर सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति पर दिया जाता है. यह काम सामान्य इच्छा के भरोसे किया जाता है. फलस्वरूप ऐसे समाज में व्यक्तिगत और सामूहिक सुख का अंतर मिटने लगता है. न्यायसमर्पित समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं सम्मान यह सोचकर करता है, मानो वे उसका अधिकार हां. वहां प्रत्येक नागरिक दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए अपनी इच्छाओं को मर्यादित रखता है. जिम्मेदार समाज इसमें भी सदस्य इकाइयों की मदद करता है. इस तरह कि सदस्य इकाइयों की अधिकतम इकाइयों की इच्छाओं की अधिकतम पूर्ति संभव हो सके.

सामाजिक न्याय’ राज्य के समर्थन तथा उसके जिम्मेदराना आचरण पर टिका होता है. वह राज्य को न केवल आवश्यक कार्यकारी शक्तियां सौंपने का समर्थन करता है, बल्कि उनके सकारात्मक उपयोग की राह भी बताता है. वह राज्य से अपेक्षा करता है कि ऐसे नागरिकों के साथ सहानुभूति और जिम्मेदराना ढंग से पेश आए, जो प्राकृतिक अथवा अन्य किसी कारण से सामान्य सुखसुविधा के मामले में पिछड़ चुके हैं. इसके लिए कोई एक और सार्वभौमिक रास्ता संभव नहीं है. संसाधनों के उपयोग के लिए न्यायानुगामी राज्य सामान्य सहमति को आधार बनाता है. फिर उसपर इस तरह अमल करता है, जिससे समाजार्थिक असमानताओं को न्यूनतम किया जा सके. फलस्वरूप अन्याय और असमानता के शिकार रहे लोगों के मन में एकदूसरे के प्रति सामंजस्य भाव का संचार होता है. उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. इस प्रकार न्यायप्रधान राज्य वह है जिसमें दुखदैन्य के शिकार प्रत्येक नागरिक को राज्य और समाज दोनों की मदद का भरोसा होता है. ऐसा राज्य जो न्याय को अपना नैतिक और वैधानिक कर्तव्य मानता है. उसके अभाव में राज्य अपने होने का औचित्य खो देता है. न्यायशास्त्र के सुविख्यात अध्येता, विचारक जान रॉल्स ने ‘सामाजिक न्याय’ की महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है

जैसे किसी भी विचारधारा की पहला गुण उसका सत्य होना है, वैसे ही न्याय, सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण है. कोई दर्शन वह चाहे जितना सरल और सुंदर क्यों न हो, यदि वह असत्य को बढ़ावा देता है तो उसे या तो बदलना चाहिए, अन्यथा मिट जाना चाहिए. ऐसे ही कोई कानून या संस्था वह चाहे जितनी व्यवस्थित और क्षमतावान क्यों न हो, यदि वह अन्याय का समर्थन करती है, तो उसे सुधरना चाहिए, वरना खत्म हो जाना चाहिए.’2

अपने विशद लेखन में रॉल्स क्लासिक समाजवादियों यथा हॉब्स, जॉन लाक, रूसो की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की सैद्धांतिकी को ही विस्तार देता है. उसके अनुसार न्याय श्रेष्ठ समाज का सर्वश्रेष्ठ गुण है. न्याय की पहचान कैसे की जाए? कोई नियम या विचार कब न्यायसंगत बनता है? इसके लिए रॉल्स बहुत साधारण सूत्र देता हैयदि व्यक्तियों के एक समूह को उनकी वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों से एकदम स्वतंत्र कर, उन्हें अपने लिए नया देश, नया परिवेश चुनने तथा नवीन संस्थाएं गढ़ने की आजादी हो, तो उस समूह के लिए यह प्राकृतिक अवस्था में लौटने जैसा होगा. रॉल्स इसे मूल अवस्था की संज्ञा देता है. पुनश्चः मूल अवस्था में लौटी इकाइयों को यदि यह आजादी दी जाए कि भावी समाज के गठन हेतु सोचसमझकर जरूरी नियमों का गठन करें. उस समय परस्पर सहमति, सहभागिता तथा सहकल्याण हेतु वे जिन नियमों का वरण करेंगी, वही न्यायोचित राह होगी. उन नियमों पर ईमानदारी से चलते हुए वे जिन कर्तव्यों का निष्पादन करेंगे, वे सामाजिक न्याय को बढ़ावा देंगे. उसके अनुसार ‘सामाजिक न्याय’ समाज की प्रत्येक इकाई की आंतरिक शक्तियों, शुभताओं, सद्गुणों एवं कर्तव्यों को पहचानने, तथा उन्हें अपने भले के लिए इस प्रकार प्रयुक्त करना है, जिससे शेष सामाजिक इकाइयों के हित बाधित न हों. ‘सामाजिक न्याय’ उत्तरदायी सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राथमिक कर्तव्य है. उसके माध्यम से वह अपने होने के औचित्य को सिद्ध कर सकती है.

यदि नागरिककल्याण को कसौटी मान लिया जाए तो ‘साम्यवाद’ और ‘सामाजिक न्याय’ के बीच की दूरी मिटने लगती है. वे समानधर्मा न होकर पूरक विचारधाराएं सिद्ध होती हैं. लक्ष्य की दृष्टि से दोनों के बीच कोई खास मतभेद नहीं है. अंतर वहां तक पहुंचने के रास्ते में है. उसके लिए साम्यवाद वर्गसंघर्ष का रास्ता अपनाता है. उसकी मूल धारणा है कि शिखर पर आसीन सर्वसत्तावादी शक्तियां अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए कभी तैयार न होंगी. वर्गहीन समाज की रचना के लिए आवश्यक है कि उनसे उन सभी संसाधनों को छीनकर राज्य के नियंत्रण में ले लिया जाए जो उन्होंने श्रमिकों और कामगारों के अंतहीन शोषण द्वारा अर्जित किए हैं. ‘सामाजिक न्याय’ समाजवादी राज्य का आदर्श सामने रखता है. वह अपेक्षा करता है कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति से पेश आए जो किसी कारण विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वर्गहीन समाज की परिकल्पना के साथ साम्यवाद, समाजवाद से आगे की, अपेक्षाकृत प्रगतिशील विचारधारा है, जिसमें नागरिकों को सहभागिता के सिद्धांत पर अपनी अधिकतम स्वतंत्रता का भोग करने के अवसर प्राप्त होते हैं.

साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों में संपत्ति पर राज्य का अधिकार होता है. समाजवाद की मूल सैद्धांतिकी है, ‘प्रत्येक से उसकी क्षमतानुसार, तथा प्रत्येक को उसके योगदान के अनुसार.’ साम्यवाद राज्य से और अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा रखता है. उसका आदर्श हैᅳ‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार.’ ‘साम्यवाद’ और ‘समाजवाद’ दोनों ही अपने नागरिकों से उम्मीद करते हैं कि वे राज्य के विकास में अपना भरपूर योगदान दें. यह पूंजीवादी तंत्र से बिलकुल अलग है. उसमें लाभ पर पूंजीपति का एकाधिकार होता है. वही उत्पादन किया जाता है, जिससे पूंजीपति को अधिकतम लाभ की संभावना हो. समाजवादी राज्य लोगों की सामान्य आवश्यकताओं के आधार पर अपनी उत्पादननीति बनाता है; तथा उनका लोककल्याण के निमित्त प्रयोग करता है. दूसरी ओर पूंजीवादी उत्पादन की मुख्य प्रेरणा लाभार्जन होता है. अधिक लाभ की उम्मीद हो तो पूंजीपति, केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर नई मांग बनाने का प्रयत्न करता है. उसका लोगों की सामान्य जरूरत से कोई संबंध नहीं होता. अशक्तता अथवा किसी अन्य कारण से यदि कोई नागरिक राज्य के विकास में अपना पर्याप्त योगदान देने में असमर्थ है तो, समाजवादी तंत्र में उसकी आय या परिलब्धियां उसके द्वारा दिए गए योगदान के अनुसार तय होंगी. साम्यवादी राज्य व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है. उसका संकल्प यहीं पूरा नहीं हो जाता. अपति साम्यवादी राज्य निरंतर ऐसी कोशिश में रहता है, जिससे नागरिक असमानता और अन्याय को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां दुबारा पैदा न हों. इस तरह साम्यवाद, मानवमात्र के कल्याण की दृष्टि से अधिक उपयोगी दर्शन है.

अधिकांश लोग ‘समाजवाद’ और ‘साम्यवाद’ का अंतर ही नहीं समझ पाते. जैसा कि कहा गया है साम्यवाद, समाजवाद से आगे की चीज है. समाजवाद में उत्पादन एवं वितरण का अधिकार चुनी गई सरकार के अधीन होता है. समस्त संसाधन जनता की संपत्ति माने जाते हैं. सरकार न्याय भावना के साथ, सभी के विकास को ध्यान में रखकर उनका प्रबंधन करती है. साम्यवाद राजनीतिक परिवर्तन का सपना संजोता है और श्रमिक संगठनों द्वारा अधिकृत व्यवस्था में समतामूलक समाज की स्थापना पर जोर देता है. इस रूप में वह एक राजनीतिक संकल्प है. अपनी मूल संकल्पना में ‘सामाजिक न्याय’ बीच का रास्ता है, जो व्यवस्था में बिना किसी बड़े परिवर्तन के राज्य से समाजार्थिक विपन्नता के शिकार नागरिकों के कल्याण हेतु विशेष प्रयास करने की अपेक्षा रहता है. वह कामना करता है कि अपने उत्तरदायी आचरण द्वारा राज्य ऐसे नागरिकों के कल्याण के लिए विशेष प्रयत्न करें, जो किसी कारणवश विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. साम्यवाद का मुख्यआधार बहुआयामी समानता है. समाजवाद भी सामाजिक स्तर पर नागरिकों के लिए समान अवसरों का पक्ष लेता है. ‘सामाजिक न्याय’ समान अवसर उपलब्ध कराने के अलावा राज्य द्वारा ऐसे आचरण की अपेक्षा रखता है, ताकि सभी नागरिक उसका लाभ उठा सकें और ऐसे नागरिक जिन्हें किसी भी रूप में विशेष मदद या प्रोत्साहन की आवश्यकता है, उन्हें वह समयानुसार प्राप्त होता रहे. ‘सामाजिकन्याय’ चूंकि राज्य की सदेच्छा का सुफल है, इसलिए यदि पूर्ण समानता संभव न हो तो समरसता से ही संतोष कर लिया जाता है. ताकि सामाजिक विक्षोभों में कमी आए और राज्य की ऊर्जा प्रतिक्रियात्मक कार्यों के बजाय राज्य के निर्माण में काम आने लगे. साम्यवाद का लक्ष्य पूर्ण समानता है. जिसमें किसी भी प्रकार की ऊंचनीच, वर्गीकरण आदि के लिए कोई जगह न हो. भारतीय समाज में जाति सामाजिक विषमता, अन्याय, वर्गभेद और उत्पीड़न का मुख्य कारण रही है. इसलिए यहां धर्म, जाति, वर्ण जैसी विभेदकारी संस्थाओं का उन्मूलन सामाजिक न्याय के कार्यकर्ताओं और विचारकों की प्रमुख मांग रही है.

किसी राज्य को साम्यवाद की ओर ले जाना आसान नहीं है. यह कई चरणों में संपन्न होने वाली प्रक्रिया है. मार्क्स इसके दो प्रमुख चरणों का उल्लेख करता है. उसके अनुसार केवल सत्ताकेंद्रों पर सर्वहारा के अधिकार से क्रांति का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता. उसकी अगली चुनौती यानी दूसरा चरण वर्गहीन समाज की स्थापना करना है. उसमें समस्त अंतर्भेदों का शमन हो जाता है. उन स्थितियां का लोप हो जाता है, जो असमानता और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं. यह बड़ा लक्ष्य है. आदर्श को एकदम छूता हुआ. मार्क्स मानता है कि वर्गहीन समाज की स्थापना शीर्षस्थ वर्ग का सपना नहीं हो सकता. जो सुख, सुविधाएं और विशेषाधिकार उसे वर्तमान व्यवस्था में आसानी से प्राप्त हैंउन्हें वह आसानी से छोड़ने के लिए भला क्यों तैयार होगा? यथास्थिति बनाए रखने के लिए उसे जो भी कदम उन्हें उठाना पड़े, उससे वह पीछे नहीं रहता. आमूल परिवर्तन का सपना केवल सर्वहारा देख सकता है. इसलिए क्रांति की सफलता और संचालन उसी पर निर्भर करता है.

साम्यवाद जिस वर्ग का सपना या संकल्प हो सकता है, उसका बड़ा हिस्सा, भीषण गरीबी, अशिक्षा और अनेकानेक रूढ़ियों से ग्रस्त रहा है. भारत के संदर्भ में जाति भी बाधा है. हजारों वर्षों की पराधीनता, शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहने के कारण, अपने लिए स्वयं निर्णय लेने की आदत करीबकरीब छूट चुकी है. दूसरी ओर विपुल संसाधनों, ज्ञानविज्ञान तथा सभी प्रकार की शक्तियों से लैस अल्पसंख्यक अभिजन समुदाय हमेशा आत्मविश्वास से भरा रहता है. वह बदलाव के लिए उतनी ही छूट देने को तैयार होता है, जिससे उसके स्वार्थ को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे. व्यवस्था में आमूल परिवर्तन न तो उनका सपना होता है, न ही संकल्प. आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब लोगों में वर्गीय चेतना जागृत हो. वे शोषण के कारणों को समझें तथा समान हितों के लिए संगठित हों. ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ का समापन वाक्य, जिसमें मार्क्स बदलाव की जरूरत पर अतिरिक्त बल देता है, क्रांति की आवश्यकता तथा आकादमिक ज्ञान की सीमाओं को ही रेखांकित करता है. इससे मार्क्स तथा उसके पूर्ववर्ती चिंतकों, जिनमें उदार कैथोलिक विचारक भी शामिल हैं, का अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स का केवल कथनी और करनी के अंतर को पाटने तक सीमित नहीं रहता, लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता भी बताता है. कथनी और करनी की समानता को लेकर गांधी का उल्लेख प्रासंगिक है. बताया जाता कि उनकी कथनी और करनी में समानता थी. लेकिन उनकी कथनी, करनी सामान्य राजनीतिक कार्यक्रमों तक सीमित थी. ग्राम को स्वतंत्र आर्थिक इकाई के रूप में प्रचारित करते हुए वे भूल जाते हैं कि अपनी समाजार्थिक संरचना में भारतीय गांव सामंतवाद और जातिवाद के गढ़ रहे हैं. सामाजिक न्याय की गांधीवादी परिकल्पना उच्चस्थ जातियों द्वारा निचली जातियों के प्रति सामान्य सदाचार से अधिक कुछ न थी. यानी कुल मिलाकर उसमें ‘सामाजिक न्याय’ जैसा कुछ था ही नहीं. जाति और धर्म को लेकर सामान्य उदारता गांधी से पहले के विचारक भी प्रकट कर चुके थे. गांधी लगभग उसी को दोहराते हैं. ‘हिंदस्वराज’ में उनका आधुनिकताविरोधी रवैया मशीनीकरण से विलगाव के रूप में सामने आता है. गांधी लोकतंत्र और व्यक्तिस्वातन्त्र्य के क्षेत्र में हो रहे बदलावों से निस्पृह थे, जबकि मार्क्स का एकएक शब्द आवाह्नकारी है.

यहां से साम्यवाद जिसे मार्क्स के प्रति सम्मानभाव दिखाने के लिए सामान्यतः ‘मार्क्सवाद’ भी कहा जाता है, का अन्य विचारधाराओं से अंतर साफ दिखने लगता है. मार्क्स के पूर्ववर्ती विचारक सभ्यता के आधुनिक मूल्यों की प्राप्ति के लिए राज्य से उदार आचरण की उम्मीद करते थे. किसी न किसी रूप में वे राज्य की अधिसत्ता को स्वीकारते थे. उनका विश्वास था कि राज्य के अभाव में समाज का ऐच्छिक विकास संभव ही नहीं है. बदलाव संबंधी उनकी उम्मीदें राज्य के उदार एवं जिम्मेदाराना आचरण पर टिकी थीं. मार्क्स सत्ता एवं शक्ति के केंद्रीकरण के दुष्परिणामों को समझता था. उसके अनुसार सत्ता हाथ में आने के बाद सर्वहारा संगठनों को चाहिए कि वे ऐसे प्रयास करें, जिससे वर्गसंघर्ष की स्थितियां दुबारा उत्पन्न न हों. पर यह काम आसान नहीं है. इसलिए कि लगातार वर्गभेद के बीच रहने के कारण उत्पीड़क वर्ग उसी के अनुसार जीने का अभ्यस्त हो जाता है. चूंकि शीर्षस्थ वर्ग उससे दूर होता है. इतना दूर कि उसके करीब पहुंचना तो दूर, ऐसा सोचना भी उसके लिए सपने जैसा होता है. उसका संपर्क उन्हीं हालात में जी रहे, अपने जैसे आसपास के लोगों से रहता है. इसलिए वह अपने हालात की तुलना बजाय शिखरस्थ अभिजन के, अपने ही जैसे लोगों के साथ करने लगता है. शीर्षस्थ अभिजन के सुखसाधन तथा वैभवविलास उसे मिथकीय आभास देने लगते हैं. समयसमय पर उनका प्रयोग वह अपनी कुंठाओं के शमन हेतु करता है. जीवन की लगातार बढ़ती चुनौतियां उसे बहुत बड़े सपने देखने की अनुमति नहीं देतीं. सपनों के अभाव में वह अपने कष्टों की तुलना आसपास के लोगों से करता है, जब सैकड़ोंहजारों लोगों को अपने जैसे हालात में जीते हुए देखता है, तब वह उन्हें जीवन की स्वाभाविक अवस्था मानने लगता है. यह अनुभूति उसे समझौतावादी बनाती है. यदि वह स्पर्धा के लिए आगे आता तो अपने ही जैसे लोगों के साथ. उस समय अपने ही जैसे लोगों साथ वह वही आचरण करता है; जैसा वह भोगता हुआ आया है. इस तरह परिवर्तन का उसका सपना स्वयं को उत्पीड़क की स्थिति में लाने तक सिमट जाता है. ऐसे में यदि वर्गक्रांति सफल हो जाए तब भी वास्तविक परिवर्तन अलभ्य बना रहता है.

  अगले खंड में समाप्य…..

ओमप्रकाश कश्यप

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—तीन

सामान्य

‘रिपब्लिक’ के चौथे खंड में सूत्रधार की भूमिका ग्लाकॉन और एडीमेंटस संभालते हैं. पहले खंड में जहां न्याय क्या नहीं है, जानने का प्रयत्न किया गया है, चौथे खंड में प्लेटो ‘न्याय क्या है’ यह बताने की कोशिश करता है. शुरुआत करते हुए ग्लाकॉन ‘शुभत्व’ को तीन हिस्सों में परिभाषित करता है. आंतरिक, जैसे कि सुख, आनंद, वस्तुनिष्ठ जैसे कि सुख-सुविधा के संसाधन, धन जिससे सुख-समृद्धि बटोरी जा सकती है. तीसरा आंतरिक और वस्तुनिष्ठ जैसे कि स्वास्थ्य. तीनों में से एक का भी अभाव मनुष्य को अपूर्णता का एहसास कराता है. ग्लाकॉन द्वारा यह पूछने पर कि तीनों में से कौन-सा शुभत्व न्याय है, सुकरात तीसरे का समर्थन करता है. सुकरात मानता है कि उससे न्याय को समग्रता में परखा जाता है. लेकिन वह अपने निर्णय के समर्थन में पर्याप्त तर्क देने में असमर्थ रहता है. ग्लाकॉन न्याय संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहता है कि न्याय दूसरों को हानि पहुंचाने तथा जरूरतमंद की मदद के बीच संतुलन हेतु व्यक्तिमात्र की अपने प्रति प्रतिबद्धता है. ऐसा करते हुए वह स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने का काम करता है. स्वार्थपरकता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है. वह व्यक्ति को व्यक्ति और समाज दोनों के प्रति गैर-जिम्मेदार बनाती है. मानव की स्वाभाविक कमजोरियों लालच, स्वार्थ आदि को स्वीकारते हुए ग्लाकॉन न्याय को उनसे दूर रहने तथा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनाए रखने वाली प्रेरणाशक्ति के रूप में स्वीकारता है. उसके अनुसार न्यायशील व्यक्ति का अपने और समाज के प्रति ईमानदार रहना आवश्यक है. यदि ऐसा नहीं है. यदि कोई व्यक्ति यह भ्रम रखते हुए कि केवल वही न्याय के पथ पर है, दूसरों की आलोचना करता है तथा उनपर अपना स्वार्थ थोपने का प्रयास करता है. तो ऐसे कथित न्यायशील व्यक्ति की अपेक्षा अन्याय का समर्थन करना उचित है. उसके अनुसार न्याय की एकमात्र कसौटी वृहद सामाजिक हित में है.

ग्लाकॉन के अनुसार न्याय कृत्रिम चीज, रूढ़ियों की उपज है. इसके लिए उसके तर्क अपने साथियों से थोड़ा हटकर हैं. वह कहता है कि प्राकृतिक अवस्था में लोग अन्याय करते और सहते हैं. लेकिन अन्याय की मात्रा व्यक्ति की शक्ति पर निर्भर करती है. जो अधिक शक्तिशाली है, वह तदानुरूप अधिक अन्याय करने में सक्षम होता है. इसलिए जब कमजोर यह देखते हैं कि वे उतना अन्याय करने में अक्षम हैं, जितना उन्हें सहना पड़ता है, तब वे संगठन के विवश होते हैं. इस तरह न्याय सबल की नहीं, दुर्बल की आवश्यकता और इच्छा का परिणाम बन जाता है. उसके माध्यम से वह अपने से शक्तिशाली के व्यवहार को नियंत्रित करने का सपना देख सकता है. एक संविदा के तहत, जिसका आधार धर्म भी हो सकता है और संविधान भी, वे एक-दूसरे के प्रति अत्याचार न करने, न ही सहने के लिए वचनबद्ध होते हैं. धीरे-धीरे वह संविदा कानून का रूप ग्रहण कर लेती है. लेकिन मानव-प्रवृत्ति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जब उसको लगता है कि किसी कानून या बल के आधार पर उसे नियंत्रित करने की तैयारी हो रही है, तो वह विरोध पर उतर आता है. परिणामस्वरूप समाज में जिसका गठन सहअस्तित्व की भावना के साथ हुआ था, कुछ लोग बल की भाषा बोलने-समझने लगते हैं. इससे समाज के वर्ग के भीतर भय उमड़ने लगता है. उसी से न्याय की उत्पत्ति होती है. ग्लाकॉन के अनुसार, ‘न्याय सबसे अच्छे और सबसे बुरे के बीच का रास्ता, एक समझौता है. सर्वोत्तम यह है कि मनुष्य अन्याय से दूर रहे, ताकि दंड से बचा रहे और सबसे बुरा यह है कि अन्याय सहे और बदला न ले सके.’ निर्बल सबल से बदला कैसे ले सकता है? वह जानता है कि वह अकेला शक्तिशाली का सामना नहीं कर सकता. अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वह अपने ही जैसे लोगों के साथ समझौते को बाध्य होता है. चूंकि समाज में कमजोरों की संख्या अधिक होती है, इसलिए बहुसंख्यक वर्ग की सम्मिलित शक्ति अल्पसंख्यक शक्तिशाली वर्ग से अधिक हो जाती है. शक्तिशाली वर्ग इस सत्य को भली-भांति समझता है. इसलिए वह निरंतर इस प्रयास में रहता है कि शक्ति-विपन्न वर्गों में फूट डालकर उन्हें एकजुट होने से रोक सके. अल्पसंख्यक शक्तिशाली समूहों की बहुसंख्यक शक्ति-विपन्न समूहों पर शासन करने की योग्यता, प्रायः इस बात पर निर्भर करती है कि वह उन्हें बांटे रखने में कितना सफल हो पाता है. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग-भेद आदि ऐसे ही माध्यम हैं जो असल जिंदगी में अनुपयोगी होने के बावजूद बहुसंख्यक समाज को बांटे रखने में सहायक होते हैं.

थ्रेचाइमच्स ने ‘ताकतवर हमेशा सही’ कहते हुए न्याय को ‘शक्तिशाली का स्वार्थ’ माना है. जबकि गलाकॉन न्याय की उत्पत्ति भय से मानता है. दोनों न्याय तक पहुंचने के लिए धुर-विपरीत ध्रुवों से अपनी विचार-यात्रा की शुरुआत करते हैं. यह प्लेटो की विशिष्ट शैली है. इसके माध्यम से वह किसी दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अपने मंतव्य को प्रत्येक दृष्टिकोण से परख लेना चाहता है. ग्लाकॉन का विचार वृथा नहीं गया. मध्यकाल में हॉब्स जैसे विचारकों ने भी उसका समर्थन किया है. ग्लाकॉन के विचारों में हमें परंस्पर अंतर्विरोधी तत्व दिखाई पड़ते हैं. परंतु ये अंतर्विरोध अकेले  ग्लाकॉन के नहीं है. यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह आसन्न संकट पर विजय की क्षीण संभावनाएं देख समझौते पर उतर आता है. उसके लिए लिखित-अलिखित संविदा करता है. लेकिन धीरे-धीरे वह उस वातावरण से ऊबने लगता है. हालात अनुकूल देख के शक्तिशाली वर्गों की महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगती हैं. और वे उन शक्तियों की अवहेलना करने लगते हैं, जिन्होंने उनके अस्तित्व को संभव बनाया है. वे भी मानते हैं कि कि न्याय मनुष्य के अंतर्मन की वस्तु नहीं है. समाज उसका सृजन करता है और फिर राज्य-सत्ता के सहयोग द्वारा लागू करता है. समाज में न्यायी और अन्यायी दोनों प्रकार के लोग हो सकते हैं. लेकिन न्यायी और अन्यायी को तभी रेखांकित किया जा सकता है, जब समाज में बल-प्रयोग की शक्ति हो. ग्लाकॉन और हॉब्स दोनों इस तथ्य से करीब-करीब सहमत नजर आते हैं कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी होता है. साधारणतः वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, और यह मानते हुए कि दूसरे उसके जितने श्रेष्ठ नहीं हैं, उसे अपनी श्रेष्ठता पर खतरा दिखाई पड़ता है. यह अंतर्विरोध या कि आत्मसंघर्ष मनुष्य को दूसरों से सहयोग और समझौते के लिए प्रेरित करता है. स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठतर सिद्ध करने की प्रवृत्ति मनुष्य की यशलिप्सा के रूप में प्रकट होती है. जाहिर है समाज में रहते हुए व्यक्ति को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक संघर्ष से भी गुजरना पड़ता है. यही द्वंद्व समाज में न्याय को प्रासंगिक बनाता है.

केफलस, पॉलीमार्क्स, थ्रेचाइमच्स और ग्लाकॉन सब न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करते हैं. उसके लिए वे अलग-अलग तर्क देते हैं. सुकरात को बीच में लाकर प्लेटो उनकी मान्यता के कमजोर पक्षों की ओर इशारा करता है. अलग-अलग दिखने वाले उन विचारों में प्लेटो को जो सामान्य बात नजर आती है, वह यह है कि चारों न्याय को बाहरी चीज मानते हैं. उनके अनुसार न्याय चूंकि बाहर की चीज है इसलिए किसी न किसी रूप में वे सभी मनुष्य की क्षमताओं, उसकी प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर संदेह कर रहे होते हैं. चारों के दर्शन में प्लेटो को यही बात सर्वाधिक अखरती है. मन से कवि और विचारों से दार्शनिक प्लेटो मनुष्य और मनुष्यता में अपने विश्वास को कम नहीं होने देता. इसलिए वह यह सिद्ध करने में जुट जाता है कि न्याय बाहरी वस्तु न होकर मनुष्य के आंतरिक बल का परिचायक है. वह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय न तो बाहरी सौगात है, न ही रूढ़ि न ही किसी अदृश्य सत्ता की ओर से उपहार. असल में वह मनुष्य की अपनी महिमा, उसका आंतरिक बल, ओज और तेज है. वह बताता है कि उसके साथी न्याय पर समग्रता से विचार करने के बजाय, उसके परिस्थितिगत लक्षणों पर विचार कर रहे हें. इसलिए न्याय को लेकर उनके विचार अधूरे और अपर्याप्त हैं. उसके अनुसार न्याय मानव प्रकृति की उच्चतम अवस्था है. समाज का अपना व्यक्तित्व होता है. सीमित संदर्भों में जहां न्याय मानव-मात्र की आंतरिक शुभता का परिणाम हैं, वहीं व्यापक संदर्भों में वह समाज की आंतरिक शुभता को भी दर्शाता है. इसकी विवेचना हेतु प्लेटो पुस्तक का उदाहरण देता है. मान लीजिए एक व्यक्ति के पास किसी पुस्तक की दो प्रतियां हैं. उनमें से एक बड़े अक्षरों में टाइप होने के कारण काफी मोटी है, दूसरी छोटे अक्षरों में, आकार में अपेक्षाकृत छोटी है. हालांकि दोनों प्रतियों की विषय-वस्तु में कोई अंतर नहीं है. फिर यदि किसी व्यक्ति को उन्हें पढ़ने को दिया जाए तो वह बड़े फांट की पुस्तक को पढ़ना पसंद करेगा. यही उसके लिए आसान भी होगा. भले ही बड़े अक्षरों वाली पुस्तक को लाना-ले-जाना उसके लिए कठिन हो. प्लेटो के अनुसार व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय में यही अंतर है. दोनों मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसके सदाचार और सद्गुणों की उत्पत्ति होता है. समाज में जाकर उसका रूप बड़ा हो जाता है. वह व्यक्ति से अधिक समाज को समझने पर जोर देता है. अपने दायरे के कुछ लोगों को वह दूसरों से अधिक जान पाता है तो इसलिए कि वे उसकी सामाजिकता के दायरे में हैं. आदर्श समाज में किसी नागरिक को जानने और समाज को जानने में अंतर नहीं होता. न्याय की इस विशेषता को समाज के प्रति सकारात्मक सोच और वृहद संदर्भों में ही परखा जा सकता है. इसके लिए प्लेटो स्पष्ट करता है कि कोई राज्य अपनी धन-संपदा या शक्ति के बल पर आदर्श नहीं बनता. आदर्श राज्य अपने नागरिकों के श्रेष्ठतम चरित्र से आकार लेता है.

चर्चा के अगले चरण में एडीमेंटस विमर्श में शामिल हो जाता है. न्याय की उसकी व्याख्या सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित तथा आत्मपरक है. उसके अनुसार लोग अपने बच्चों को न्याय का समर्थन करना इसलिए नहीं सिखाते क्योंकि वह शुभता का प्रतीक है. बल्कि इसलिए सिखाते हैं कि बच्चे बड़े होकर उनका साथ दे सकें. प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि एडीमेंटस न्याय को पारिवारिक सुख तक सीमित रखकर, राज्य की उपेक्षा कर रहा है. लेकिन ऐडीमेंटस निरा परिवारवादी नहीं है. उसका समाज में भरोसा है. वह मानता है कि समाज कोई अमूर्त्त अवधारणा नहीं है. किसी भी व्यक्ति का समाज उसके आसपास के परिवेश से बनता है, जिसमें उसमें परिवार भी सम्मिलित होता है. इसलिए परिवार और परिवेश के प्रति निष्ठा प्रकारांतर में समाज के प्रति निष्ठा की परिचायक है. अतएव व्यक्ति को न्याय के प्रति अनुरक्त करने का सर्वात्तम रास्ता है कि उसके परिवेश में सुधार लाया जाए. ऐसे परिवेश का निर्माण किया जाए जिसमें उसे न्यूनतम अंतर्द्वंद्वों का सामना करना पड़े. समाज और सामाजिकता में विश्वास बनाए रखने का दायित्व व्यक्ति और समाज दोनों का है. ऐडीमेंटस आगे कहता है कि न्याय से लोगों को परचाने, उसके अनुपालन करने हेतु धार्मिक शिक्षा अपर्याप्त है. वह न्याय को राज्य एवं नागरिकों के बीच शुभता के आदान-प्रदान के रूप में प्रभावी करने के बजाए, उसे दैवीय बना देती है. धार्मिक व्यक्ति कहता है—यदि तुम दूसरों के साथ न्याय करोगे तो ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा, तुम्हें उसका पारितोषिक देगा. और यदि तुम अन्याय करोगे तो ईश्वर की निगाह में दंड के भागी बनोगे. स्वर्ग-नर्क की अवधारणा, मोक्ष आदि न्याय के ऐसे ही भ्रांत स्वरूप हैं. ऐसे में व्यक्ति जो करता है, वह या तो डर के कारण, अथवा दूसरों के विवेक से अनुशासित होकर. कर्तव्य एवं न्याय-भावना को भुलाकर पूजापाठ, दान-पुण्य आदि के बहाने वह ईश्वर को खुश करने की कवायद में जुट जाता है. चूंकि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए धार्मिक व्यक्ति का न्यायबोध सिवाय भ्रांति के कुछ नहीं होता. यह भ्रांति न केवल उसके अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है. इसके चलते ईश्वरीय न्याय को ही वास्तविक न्याय मानने का दावा करने वाले उसके नाम पर मनमानी करने में सफल हो जाते हैं. न्याय सामाजिक शुभता का दूसरा नाम है. अवास्तविक अथवा काल्पनिक पात्रों के सहारे समाज द्वारा उसकी सिद्धि असंभव है. न ही उसे भय फैलाकर प्राप्त किया जा सकता है. ईश्वर के नाम पर होने वाला न्याय पुरोहित तथा उसके चेले-चपाटों के बीच चढ़ावे की हिस्सेदारी में सिमटकर रह जाता है. धर्म को लेकर एंडीमेटस का दृष्टिकोण कई मायने में महत्त्वपूर्ण है. वह न्याय के बारे में आधुनिक विचारधाराओं से मेल खाता है. जान लॉक, रूसो, बैंथम, फायरबाख, कार्ल मार्क्स, से लेकर पीटर क्रोप्टोकिन तक सभी विचारक जीवन में धर्म के अतिरेकी विस्तार तथा उसे न्याय का पर्याय मानने वाली मानसिकता का विरोध करते आए हैं. इसी का प्रभाव है कि धर्म को आधुनिक राज्यों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया से अलग-थलग कर दिया गया है.

वैसे भी धर्म और न्याय का कोई अंतःसंबंध नहीं है. आरंभ से ही धर्म अभिजन-हितों का समर्थक-साधक रहा है. इसके अनगिनत उदाहरण रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. महाभारत-युद्ध को प्रायः धर्म-युद्ध कहकर प्रचारित किया जाता है. युद्ध के प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभाता हुआ कृष्ण अठारह अक्षौहिणी सेना, जो उस समय विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई थी, को एक-दूसरे से भिड़ाकर भगवान बन जाता है. उस युद्ध का प्राप्य क्या था? युधिष्ठिर को राज्य मिला. पर अठारह अक्षौहिणी सेना का हिस्सा बनकर लड़े सैनिकों या उनके परिजनों को क्या मिला? इसपर महाभारत या इतिहास की किसी पुस्तक में कोई उल्लेख नहीं है. आज भी इस पर कोई चर्चा नहीं करता. बस धर्म-युद्ध मानकर उसपर उठने वाले प्रत्येक सवाल पर पर्दा डाल दिया जाता है. युधिष्ठिर के धर्म-राज्य में प्रजा का क्या हाल था, पता नहीं. परंतु स्वयं महाभारत का संकेत है कि उस युद्ध ने एक परजीवी वर्ग को जन्म दिया था, जो इतना शक्तिशाली था कि नवनियुक्त सम्राट की आंखों के सामने किसी की भी हत्या कर सकता था. धर्मराज होने का दावा करने वाला युधिष्ठिर उसको देखकर भी चुप रहने को विवश था. यह उदाहरण महाभारत के शांतिपर्व से है—

‘कुरुक्षेत्र के महाभारत के बाद जब पांडव विजयी होकर लौटे तो प्रजा उनके स्वागत को उमड़ पड़ी थी. हजारों ब्राह्मण भी दान की अभिलाषा युधिष्ठिर को आशीर्वाद देने के नाम पर नगर-द्वार पर आ जुटे. जैसे ही युधिष्ठिर का रथ आता दिखाई पड़ा, प्रजा उसकी जय-जयकार करने लगी. नगर-द्वार पर जमा ब्राह्मण स्तुतिगान में लग गए. उस खुशनुमा माहौल में एक श्रमण साधुओं के बीच से अचानक निकला और युधिष्ठिर को देखकर कहने लगा—

‘हे युधिष्ठिर! तुमने अपने बंधुओं की हत्या की है. स्वजनों की हत्या और गुरुजनों का नरसंहार करके तुम्हें क्या मिला? तुम पापी हो. तुम्हें क्षोभ से मर जाना चाहिए.’

युधिष्ठिर स्तब्ध. लोगों को काटो तो खून नहीं. कुछ पलों के लिए ब्राह्मणों को भी मानो सांप सूंघ गया. अपराधबोध का मारा युधिष्ठिर सचमुच मर जाना चाहता था. अचानक ब्राह्मण दल को चेत हुआ. सारे के सारे ब्राह्मण एक-साथ चिल्लाने लगे—‘यह हमारा प्रतिनिधि नहीं है. हम ऐसा नहीं सोचते. यह पापी चार्वाक है. इस अधर्मी को जीने का कोई अधिकार नहीं है.’

यह कहकर सारे साधु उस श्रमण पर टूट पड़े. धर्मावतार युधिष्ठिर की आंखों के सामने उसे जीते-जी भस्म कर दिया गया.’

धर्म के नाम पर ऐसे ही अमानवीय न्याय का उदाहरण वेन की कहानी के रूप में आया है. पुराणों में वेन को विश्व का पहला निर्वाचित सम्राट बताया गया है. कहानी के अनुसार आर्यों ने जब कृषि की शुरुआत की और उसके लिए एक जगह टिककर रहना आरंभ किया तो सुरक्षा के लिए राजा चुनने का विचार सामने आया. ऐसा व्यक्ति जो जरूरत के समय उनका नेतृत्व कर सके. उस समय लोगों ने सर्वसम्मिति से वेन को अपना राजा निर्वाचित किया. वेन ने न्याय करते हुए जमीन का समुचित विभाजन किया. ब्राह्मण चूंकि शिक्षा का दायित्व संभाले हुए थे, उन्हें अनेक कर्मकांडों में लिप्त रहना पड़ता था, इसलिए उन्हें नदी किनारे की उपजाऊ जमीन दी गई. लोग खेती करने लगे. वेन के नेतृत्व में विश् तरक्की करने लगा. लेकिन खेती तो मौसम पर निर्भर थी. एक बार भयंकर अकाल पड़ा. पूरा विश् भूख की चपेट में आ गया. लोग तड़फ-तड़फकर मरने लगे. जब तक सुख देती थी, तब तक नई व्यवस्था लोगों को हितकारी लगती थी. मौसम की मार के साथ ही उसकी कमजोरी सामने आ गई. लोग वेन को दोष देने लगे. एक राजा का दायित्व निभाते हुए वेन ने विश् के लोगों की बैठक बुलाई. ब्राह्मणों को दी गई भूमि पर अब भी खेती हो रही थी. नदी किनारे होने का उसे लाभ मिला था. वेन उनसे आपद्धर्म के रूप में कृषि उपज को जरूरतमंदों के बीच बांटने का आग्रह किया. इसपर वे चिढ़ गए. लोगों को राजा के विरुद्ध भड़काने लगे. भूखे लोगों का दिलो-दिमाग सुन्न हो चुका था. आक्रोश जब सीमा पार कर गया तो भूखे से अकुलाए उग्र विश-वासियों ने राजा पर हमला कर दिया. इस तरह प्रथम निर्वाचत राजा अपने ही लोगों के हाथों मारा गया.

विमर्श के अगले चरण में प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्याय को उसकी लोकोन्मुखता तथा वृहद सामाजिक हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. न कि उन व्यक्तियों के व्यवहार से जो न्याय प्रक्रिया में सम्मिलित होने की दावेदारी करते हैं. न्याय-संबंधी विमर्श में अनेक लोगों को सम्मिलित कर वह तत्कालीन समाज में प्रचलित न्याय के परंपरावादी, उग्रवादी एवं व्यवहारवादी स्वरूपों की समीक्षा करता है. अंततः उसका संवेदनशील कवि हृदय उसको आदर्शवाद के समर्थन में ले जाता है. सुकरात के माध्यम से वह स्पष्ट करता है कि न्याय मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसका सदाचरण है—‘यदि कोई व्यक्ति अपने दायित्वों का समुचित वहन करता है, तो उसका आचरण ही उसकी न्याय-प्रियता का प्रमाण बन जाता है.’ वह मानता है कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है. मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का समयानुसार पालन करना ही न्याय है. जाहिर है प्लेटो के लिए न्याय कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर आचरण की वस्तु है. क्या न्याय की शिक्षा दी जा सकती है? इसी से जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या शिक्षा व्यक्ति को अधिक न्यायशील बनाती है. प्लेटो शिक्षा की उपयोगिता से इन्कार नहीं करता. व्यक्तित्व विकास हेतु शिक्षा अनिवार्य है. तथापि उसके अनुसार शिक्षा साध्य नहीं है. वह केवल साधनमात्र है. उसका महत्त्व व्यक्ति को राज्य का योग्यतम सदस्य बनाने में मदद करना है. शिक्षा के अलावा अधिकार चेतना, जिसमें अपने साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का बोध भी जरूरी है तथा कर्तव्य के प्रति जागरूकता और समर्पण का भाव व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करता है. ‘रिपब्लिक’ की शुरुआत वह व्यैक्तिक नैतिकता एवं न्याय-प्रिय व्यक्ति के न्याय-संगत जीवन की विशेषताओं से करता है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते स्थिति साफ होती जाती है. पता चलता है कि लेखक का उद्देश्य संपूर्ण समाज को न्याय एवं नैतिकता से बंधे हुए देखना है. वह मानता है कि न्याय समाज का विशिष्ट गुण है. यह गुण समाज में बाहर से नहीं आता. बल्कि उसके नागरिकगण अपने न्याय-संगत आचरण द्वारा उसे संभव बनाते हैं. न्याय तथा औचित्य अथवा अन्याय एवं अनौचित्य जिस प्रकार व्यक्ति के गुण-दोष हो सकते हैं, उसी प्रकार ये समाज के भी गुण-दोष हो सकते हैं. न्याय व्यक्ति एवं समाज को परस्पर अन्योन्याश्रित, पूरक एवं प्रेरक बनाता है.

आधुनिक विचारक जॉन रॉउल न्याय को सामाजिक संस्थाओं का विशेष लक्षण मानता है. उसके अनुसार—‘न्याय सामाजिक संस्थाओं का शुभत्व है. उसका वही महत्त्व है जो वैचारिक उद्यमों में सत्य का होता है.’8 प्लेटो के लिए न्याय एवं नैतिकता में कोई अंतर नहीं है. दोनों परस्पर पूरक और पर्याय हैं. आदर्श स्थिति वह है जब व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर न्याय में अंतर मिट जाता है. इसके लिए प्लेटो समाज को शासक, रक्षक और कृषक तीन हिस्सों में बांटता है. जैसे भारत में शूद्रों को वर्ण विभाजन में सबसे निचले स्तर पर रखा गया है और दासों को वर्ण विभाजन में स्थान ही नहीं दिया गया है, इसी प्रकार प्लेटो के आदर्श राज्य में भी दासों को कार्यविभाजन से बाहर रखा गया है. दोनों ही जगह उनकी स्थिति खरीदी गई वस्तु या संसाधन के समान है. बावजूद इसके दोनों में बड़ा अंतर है. प्लेटो का सिद्धांत पूरी तरह से सामाजिक जरूरतों और विकास के नजरिये पर आधारित है. वह किसी व्यक्ति को जन्म, लिंग अथवा उसकी पैत्रिक पहचान के आधार पर छोटा या बड़ा घोषित नहीं करता. व्यक्ति का चयन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर, विशुद्ध योग्यता के आधार पर हो—इसके लिए वह बच्चों का पालन-पोषण सात वर्ष का होते ही—माता-पिता से दूर, उसकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने की अनुशंसा करता है. ताकि बड़े होने पर उनमें जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न किया जा सके. भारत में कार्यविभाजन इससे भिन्न था. वेदों, स्मृतियों तथा धर्म-सूत्रों में कार्यविभाजन के नाम पर समाज को चार वर्गां में बांटने का विधान रचा गया है. हालांकि दावा यह किया गया है कि वह विशुद्ध गुणों पर आधारित विभाजन हे और कोई मनुष्य अपने गुण एवं प्रतिभा के आधार पर वर्ग-अंतरण कर सकता है. परंतु वास्तविकता इससे अलग है. कर्म-गुण के आधार पर भारतीय समाज में वर्ग-अंतरण के उदाहरण इतने विरल हैं कि उन्हें अपवाद मानकर छोड़ा जा सकता है. भारतीय विशेषकर हिंदू समाज में जाति-व्यवस्था दास प्रथा की अपेक्षा कहीं अधिक निकृष्ट और भयावह थी. अपने स्वामी की अनुकंपा अथवा तय मूल्य-राशि का भुगतान करने के पश्चात दास अपनी स्वतंत्रता खरीद सकता था. जातिप्रथा में दबे शूद्रों को इस प्रकार के अवसर उपलब्ध न थे. जाति जन्म के साथ जीवन में प्रवेश करती और मरण तक देह और मन से चिपकी रहती थी. ‘रिपब्लिक’ में कार्य-विभाजन नीति-सम्मत है. प्लेटो व्यक्ति के गुण-दोष के अनुसार उसे उपयुक्त जिम्मेदारी सौंपने की सिफारिश करता है, ताकि उसकी योग्यता का समाज-हित में भरपूर इस्तेमाल किया जा सके. भारतीय, विशेषकर हिंदु समाज में जातीय विभाजन धर्म-सम्मत व्यवस्था है. जाति-व्यवस्था के लिए व्यक्ति की रुचि एवं योग्यता कोई मूल्य नहीं है. वह सबकुछ जन्म के आधार पर, बिना व्यक्ति की रुचि अथवा योग्यता देखे, काम सौंपने में विश्वास रखती है. इसलिए उसमें बदलाव सरल नहीं है. दूसरी ओर प्लेटो का कार्य-विभाजन अधिक वैज्ञानिक, निष्पक्ष और राज्य-कल्याण की भावना से भरा है.

‘रिपब्लिक’ मानवीय मेधा की अमूल्य धरोहर है. उसकी प्रशंसा करते हुए बार्कर ने लिखा है—न्याय रिपब्लिक की आधारशिला है. और रिपब्लिक न्याय की मूल अवधारणा का संस्थागत रूप है.’ ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने कहा है कि समाज के तीनों वर्गों को बिना एक-दूसरे के कार्य में व्यवधान उत्पन्न किए, काम करते रहना चाहिए. सब अपना-अपना कार्य मनोयोग से करेंगे तो सामाजिक शांति और सद्भाव बना रहेगा. राज्य आत्मनिर्भर बनेगा. अंतर्द्वंद्व घटेंगे और उनके समाधान में खप रही ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग लोककल्याण के निमित्त संभव हो सकेगा. सेबाइन ने प्लेटो के न्याय-सिद्धांत को सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक माना है. उसके अनुसार—‘न्याय वह बंधन है जो मानव-समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है. यह उन व्यक्तियों के सहयोग और समन्वय का नाम है जो अपनी शिक्षा-दीक्षा, योग्यता एवं रुचि के अनुसार अपने कर्तव्य का चयन करते हैं और फिर अपनी संपूर्ण निष्ठा से उसके अनुपालन में लगे रहते हैं. अपनी निष्ठा एवं समर्पण भावना से वे समाज को संपूर्ण एवं आत्मनिर्भर बनाते हैं. ऐसा समाज जो संपूर्ण मानव-मनस् की रचना हो, जिसमें हर कोई अपना प्रतिबिंब देख सके. सामाजिक जीवन के ऐसे ही मूलभूत, उदात्त रूप को प्लेटो ने न्याय की संज्ञा दी है. आचरण की शुभता पर जोर देते हुए वह ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें मानव-व्यक्तित्व की उठान सामाजिक शुभता के परम-बिदु को छूने लगती हे. लक्ष्य आसान नहीं है. परंतु निजता को सर्वकल्याण को समर्पित करने के बाद मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है.

प्लेटो न्याय और ज्ञान को परस्पर पूरक मानता है. उसके अनुसार ज्ञान मनुष्य को न्याय की पहचान कराता है. ज्ञान ही एकमात्र ऐसा उपकरण है जिससे मनुष्य शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे का बोध कराता है. ज्ञान न्याय की पूर्वापेक्षा और अनिवार्यता है. इसलिए ज्ञान एकमात्र शुभ है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो द्वारा न्याय की खोज का सिलसिला आदर्श समाज की अवधारणा तक बढ़ जाता है. प्लेटो ने साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधाओं, नाटक, कविता आदि की आलोचना की थी. वह उन्हें लोकरंजन के माध्यम से अधिक मानने को तैयार न था. नाटक एवं कविता को तो वह मानव-चरित्र को दुर्बल बनाने वाली विधाएं मानता था. लेकिन उसके दर्शन में कवि मन की संवेदनशीलता साफ-साफ झलकती है. ‘रिपब्लिक’ में न्याय की खोज का सिलसिला, संवेदनशील मन की कविता जैसा है, जिसे उसकी विद्वता महत्त्वपूर्ण बना देती है. प्लेटो की न्याय-संबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ध्यातव्य है कि प्लेटो का संबंध एथेंस के शासक परिवार से था. वह स्वयं को एथेंस की सत्ता की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से एक मानता था. लेकिन सुकरात को मृत्युदंड दिए जाने के बाद से तत्कालीन राजनीति से उसका जी उचट गया था. प्लेटो से पहले यूनानी समाज में कोई खास कार्यविभाजन न था. न ही कार्य-विशेष के प्रति व्यक्ति की रुचि का कोई महत्त्व था. इसलिए माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी कार्य कर सकता है. इसी धारणा के चलते एथेंस में गणतांत्रिक पदों पर नियुक्तियां लॉटरी के माध्यम से की जाती थीं. इसके चलते कई बार कार्य-विशेष के लिए अयोग्य व्यक्ति चुन लिए जाते थे. इस अविवेकी व्यवस्था ने एथेंस का गणतंत्र अयोग्य हाथों की कठपुतली बना हुआ था. सुकरात ने उस पर चोट की थी. खुद को गणतंत्र का समर्थक मानने वाले एथेंस की यह सबसे बड़ी त्रासदी थी. प्लेटो की आदर्श राज्य की परिकल्पना उसकी इसी छटपटाहट का सुफल कही जा सकती है. न्याय की विवेचना के रूप में यही छटपटाहट आदर्श राज्य की कल्पना में भी दिखाई पड़ती है. वह ऐसे राज्य की कल्पना पेश करता है, जहां लोग बजाए स्वार्थ-भाव के सर्वोदय भाव से जुड़े हों. जिनमें पारस्परिक कल्याण के प्रति एका और विश्वास हो. वह स्पष्ट करता है कि न्याय आदर्शोन्मुखी समाज की सहज-स्वाभाविक उपलब्धि है. वह कृत्रिम अथवा बाहरी शक्ति द्वारा थोपी गई व्यवस्था नहीं है. किसी भी समाज में न्याय का संरक्षण किसी भय या दबाव में न होकर उसके स्वयं स्फूर्त्त प्रयासों के माध्यम से होता हे. वह इसलिए भी आवश्यक है कि न्याय का कोई दूसरा या तीसरा पक्ष नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसे केवल वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है. उसके लिए आवश्यक है कि समाज की इकाइयों में परस्पर सामंजस्य और एक-दूसरे के प्रति विश्वास का भाव हो.

‘रिपब्लिक’ के लिए प्लेटो को अपूर्व ख्याति प्राप्त हुई है. उसे ‘दार्शनिकों का दार्शनिक’ माना गया है. यह माना गया है कि जो प्लेटो के यहां नहीं है, दर्शन में वह कहीं भी नहीं है. बावजूद इसके प्लेटो को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है. कुछ विद्वानों ने उसके न्याय-संबंधी दर्शन को निष्क्रियता का दर्शन माना है. उनका कहना है कि प्लेटो का न्याय कल्पना की उड़ान, खूबसूरत सपने से अधिक कुछ नहीं है. न्याय को लेकर वह जो सपना देखता है, उसका सच हो पाना असंभव है. प्लेटो की भांति उसका न्याय भी इतना आत्मसंयमी और मर्यादित है कि उसे व्यवहार में उतार पाना बेहद कठिन है. बार्कर तो प्लेटो के न्याय को न्याय मानने के लिए ही तैयार नहीं है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय महज भावना या कवि मन की खूबसूरत परिकल्पना है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय-सिद्धांत एकतरफा है. वह केवल मनुष्य के कर्तव्यों को निर्धारित करता है और अधिकारों को तय करने का काम पूरी तरह समाज की मर्जी पर थोप देता है. यदि समाज सचमुच इतना ही उदार हो, जैसा कि प्लेटो सोचता है तो ऐसे समाज में न्याय का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. वस्तुतः ईसापूर्व चौथी-पांचवीं शताब्दी के जिस समाज का जिक्र प्लेटो के ग्रंथों में मिलता है, उन दिनों यूनानी समाज युद्ध प्रिय समाज था. वहां छोटे-छोटे नगर राज्य थे, जिनके बीच युद्ध अकसर होते रहते थे. एथेंस स्पार्टा के हाथों पराजित हो चुका था. वह पराजय भी एथेंसवासियों के लिए कुंठा का कारण बनी थी. एथेंस जहां अपने दार्शनिक विचारों, कवियों और सुंदरियों के लिए प्रसिद्ध था, उसके पड़ोसी नगर-राज्य स्पार्टा की प्रतिष्ठा वहां के बहादुर सैनिकों के कारण थी. एक युद्ध में स्पार्टा के हाथों भीषण पराजय के बाद एथेंसवासियों के मन में ‘उस जैसा’ बनने की बड़ी कामना थी. आदर्श गणराज्य के रूप में प्लेटो ऐसे ही गणतंत्र की कामना करता है. सेबाइन ने भी माना है कि प्लेटो की ‘न्याय-संबंधी कल्पना जड़, आत्मपरक, निष्क्रिय, ठहराव-युक्त, अव्यावहारिक एवं अविश्वसनीय है.’ ‘न्याय’ की बात करता हुआ प्लेटो कहीं-कहीं ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है; यदि यह मान लिया जाए कि व्यक्ति या समूह अपनी किसी खास प्रवृति का दास होता है तो भी उसे यह बताने की क्या आवश्यकता है कि प्रत्येक मनुष्य केवल एक ही कार्य करे. या केवल समाज द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को ही करे.

दरअसल न्याय की विवेचना करते हुए प्लेटो विषय को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभव-सा हो जाता है. इससे उसके विचारों में कहीं-कहीं असंगतियां और अंतर्विरोध भी दिखने लगता है. वह एक ओर तो दावा करता है कि आदर्श समाज में कोई व्यक्ति दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरी ओर राज्य को व्यक्ति के कर्तव्यों के निर्धारण का अधिकार देकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेता है. प्लेटो के अनुसार समाज में संरक्षक वर्ग का कर्तव्य अपने बुद्धि-विवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘संरक्षक’ या संरक्षक वर्ग से नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, जेसे दास, यदि ऐसा व्यक्ति बुद्धि-विवेक में ‘संरक्षक’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए? न्याय-भावना तो इसमें है कि ऐसे व्यक्ति को तत्काल संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी काबलियत का उपयोग लोक-हित में किया जाए. साथ ही संरक्षक वर्ग में सम्मिलित व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाज-हित के बजाय जो केवल स्वार्थ को वरीयता देते हैं तथा नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. समाज हित के लिए यह जरूरी भी है. प्लेटो उसकी कोई व्यवस्था नहीं करता. बजाए इसके वह दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है. चह दार्शनिक सम्राट को इतना अधिकार-संपन्न बना देता है कि वह निरंकुश नजर आने लगता है. कदाचित वह सोचता था कि जो ‘दार्शनिक सम्राट’ के लिए अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर चुके व्यक्ति मनुष्य की सामान्य कमजोरियों से मुक्त होंगे. जबकि मानवीय प्रवृत्ति परिवर्तनशील है. ध्यातव्य है कि दासप्रथा का समर्थन करने वाला प्लेटो अकेला विचारक नहीं है, सुकरात, अरस्तु, जेनोफीन जैसे उसके समकालीन विचारक भी उससे सहमत हैं. दूसरे प्लेटो के आदर्श राज्य में जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका कवि-हृदय सपने की तरह केवल आदर्श बुनता है. नैतिकता चूंकि स्वयं एक आदर्श है, इसलिए उसके सपने की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता.

प्लेटो ने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटे-बेटियां समाज के शेष वर्गां की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में वह ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया हो. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो. वह प्रश्न उठाता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए? वह कौन-सा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. ‘रिपब्लिक’ में उसने बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें माता-पिता अथवा उनकी संतान एक-दूसरे को कभी पहचान ही सकें. उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिनके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. काम-संबंधों में पर्याप्त खुलापन था. प्लेटो ने विवाह संस्था का निषेध किया है. इसके दो कारण थे. पहला उसे लगता था कि पारिवारिक संबंध व्यक्ति के उद्देश्यों को सीमित बनाते हैं. दूसरा स्त्री को पुरुष के बराबर दर्जा देना. प्लेटो ने दांपत्य संबंधों में साम्यवाद का समर्थन किया है. एक-दूसरे की इच्छा पर कोई भी युगल परस्पर सहवास कर सकता था. संतानोपत्ति का मुख्य ध्येय युद्धप्रिय राज्य को श्रेष्ठ योद्धा उपलब्ध कराना था. संरक्षक स्त्री-पुरुषों के लिए नियम और भी कठोर थे. ‘रिपब्लिक’ में उसने लिखा है—

‘संरक्षक वर्ग के स्त्री-पुरुषों में से कोई भी अपना घर-परिवार नहीं बसाएगा. कोई भी किसी के साथ व्यक्तिगत रूप से सहवास नहीं करेगा. शासक स्त्रियां शासक वर्ग के सभी पुरुषों की समान रूप से पत्नियां होंगी. उनकी संतानें भी समान रूप से सभी की होंगी. न तो माता-पिता अपनी वास्तविक संतान के बारे में जान पाएंगे न ही संतान अपने वास्तविक जन्मदाता को जान सकेगी.’

ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. परंतु वह भी आसान न था. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! चूंकि लोकहित के कार्यों को टाला नहीं जा सकता, बल्कि कुछ कार्य तो अत्यावश्यक, नैमत्तिक महत्त्व के होते हैं, स्पष्ट है कि ऐसे कार्यों के लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी.

प्लेटो स्वीकार करता है कि आदर्श राष्ट्र-राज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. परंतु कैसे? लोग अप्रीतिकर कार्यों को भी समाज के प्रति अपना दायित्व मानकर करें, यह प्लेटो के समक्ष बड़ी चुनौती थी. ऐसे कार्यों को करने के लिए कोई तो नियुक्त किया जाएगा. जिसे वे कार्य सौंपे जाएंगे, क्या वह उन्हें खुशी-खुशी करने को तैयार होगा? यदि नहीं जो जिसे वे कार्य बलपूर्वक सौंपे जाएंगे क्या वह उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? क्या उसे राज्य की मनमानी नहीं माना जाएगा? विकसित देशों में मशीनीकरण के बाद से अप्रीतिकर अथवा खतरे की अधिक संभावना वाले कार्यों को मशीनों से लिया जाने लगा है. लेकिन प्लेटो के समय में ऐसे कार्यों को करने के लिए केवल दास थे. उनकी उपस्थिति राज्य की सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक थी. परंतु जिनके अधिकारों की ओर किसी का ध्यान न था. उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था. राजनीति में उनकी कोई हिस्सेदारी न थी. दूसरी ओर एथेंस का हर वयस्क आम सभा का सदस्य होता था. बुद्धकालीन गणतंत्रों में भी एक समय ऐसा था, जब वहां का प्रत्येक नागरिक ‘मैं राजा हूं’, ‘मैं राजा हूं’ कहकर शासक होने का दावा करता था. सोफिस्टों के कार्यकाल में एथेंस का भी यही हाल था. ऐसे समाज में जहां प्रत्येक आदमी खुद को ‘मुखिया’ समझता हो, वहां नागरिकों को व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता के प्रचार द्वारा प्रेरित किया जा सकता था. उसके लिए प्लेटो की सारी उम्मीद दार्शनिक सम्राट पर टिकी थी. उसका मानना था कि दार्शनिक सम्राट किसी भी प्रकार के लालच से परे, परमबुद्धिमान, व्यवहारकुशल, परम-प्रज्ञावान, वीर, तेजस्वी और परिश्रमी होंगे. लोग स्वयं उससे प्रेरणा ले सकेंगे. लेकिन महामानव की खोज आसान नहीं थी. इस बात को प्लेटो भी समझता था. ऐसी अवस्था में उसने दार्शनिकों के समूह को राज्य की बागडोर सौंपने की अनुशंसा की है. मुश्किल यह है कि केवल विचार के बल पर समाज नहीं चलता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा? प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. न ही उसकी कल्पनाशीलता काम करती है. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन एथेंस की राजनीति से प्रभावित था. एथेंसवासियों को गर्व था कि वे एक विकसित गणतंत्र के संचालक हैं. जबकि असल में वह भीड़तंत्र द्वारा शासित राज्य था. उसमें तीन प्रमुख दोष थे. पहला यह कि राजनीतिक अनुभवहीनता और अपर्याप्त ज्ञान के बावजूद एथेंस का प्रत्येक नागरिक राजनीति में हिस्सा लेता था. उससे गलत फैसले होते थे. सुकरात को मृत्युदंड का निर्णय ऐसा ही अनुचित निर्णय था. उस घटना के बाद प्लेटो का लोकतंत्र से विश्वास उठ-सा गया था. दूसरा दोष यह था कि प्रत्येक नागरिक खुद की निगाह में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था. किसी का किसी में विश्वास न था. हर कोई अपने लिए अधिकतम सुख-सुविधाओं की अपेक्षा रखता था. भ्रष्टाचार और स्वार्थभाव चरम पर था. बिना इसकी चिंता किए कि उनके दुराचरण से राज्य का कितना अहित हो रहा है, एथेंस के नागरिक स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे. प्लेटो के आगे स्पार्टा का उदाहरण था, जहां के नागरिक राज्य को समर्पित थे. इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में राज्य को व्यक्ति से बढ़कर माना है. वह व्यक्ति का राज्य में विलय कर देने जैसा था. तीसरा और महत्त्वपूर्ण यह कि उस समय एथेंस की राजनीति में दो गुट बने हुए थे. उनके अपने-अपने समर्थक थे. दोनों हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर लगे रहते थे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो विभिन्न प्रतिद्विंद्वी समूहों को राज्य के प्रति समर्पित होने को कहता है. उसके अनुसार राज्य किसी एक व्यक्ति, समूह या वर्ग का नहीं होता—‘उसपर सभी वर्गों का समानाधिकार है. इसलिए प्रत्येक वर्ग का यह स्वयंसिद्ध कर्तव्य है कि वह राज्य की अखंडता तथा बल-वैभव को बनाए रखने के लिए समर्पित भाव के साथ काम करे.’ दार्शनिक सम्राट की अवधारणा भी प्लेटो का पूर्वाग्रह था. राजनीति को अनुभवहीन लोगों के हाथों से निकालकर परिपक्व हाथों को समर्पित करने की कोशिश. परंतु उसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल की टिप्पणी है—

‘उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब, जब सामना करीब-करीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चित रूप से, न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’9

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतार-चढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कवि-हृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्ति-सापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुख-सुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौन-सा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरित-प्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो—जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देकर उसे लोकोन्मुखी बनाती हों. समाज का हित है कि ऐसी पसंदों को प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान तथा कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इस तरह इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानव-स्वभाव से निरपेक्ष नहीं होता. प्लेटो का विश्वास था कि उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी. फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालन-पोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं भी अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. जबकि दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. इसी तरह भारतीय राष्ट्रवादी का सामान्य सोच होगा कि भारत दुनिया में अन्य सभी देशों में अग्रणी हो. अतिश्रद्धालु व्यक्ति अपने धर्म को पूरी दुनिया पर छाये हुए देखना चाहेगा. जबकि मानवतावादी सपना होगा कि विश्व के सभी देश बराबर हों. किसी का किसी पर अधिकार न हो. लोग अपने-अपने विश्वास, मान्यताओं और परंपरा के साथ सुरक्षित रहें. सुख में सभी की समान साझेदारी हो. ऐसे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले मनुष्य समाज में एक साथ होंगे तो उनके मतभेद उभरकर सामने आएंगे ही. फिर उनके बीच तालमेल कैसे संभव है? कैसे उन सभी की रचनात्मक क्षमताओं का इस्तेमाल समाज-हित में किया जाए? यह चुनौती प्लेटो के समय में थी. आज भी है. निजी स्वार्थ एवं मतभेदों के कारण वह एथेंस के गणतंत्र की दुर्दशा को देख चुका था. उसका मानना था कि व्यक्तिगत मतभेदों का समाहाहर केवल आदर्श समाज में संभव है. आदर्श समाज से उसका आशय था, ऐसा समाज जहां सभी को अपने-अपने कर्तव्य का एहसास हो और सभी उसके प्रति समर्पित होकर काम करें. बदले में राज्य बिना किसी पक्षपात के सभी को जीवनयापन के आवश्यक संसाधन उपलब्घ कराने की जिम्मेदारी ले.

अहं संवेदनाओं को कुचलता आया है. अहं के टकराव की समस्या प्लेटो के समय में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्ति-विशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनिया-भर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति, जो केवल किसी खास देश, धर्म अथवा संस्कृति को सबसे आगे निकलते देखने की इच्छा रखता है, पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. उसके बावजूद नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इस संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना उसी कोटि की है. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना अथवा उसे निरंकुश राज्य का समर्थक मानना—सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो बुद्ध ने न केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना था. जबकि श्रमण परंपरा को छोड़कर बुद्ध से पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन उन्हीं विषयों पर केंद्रित था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिक-सामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथों-हाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे. बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत समानता पर जोर देता था. उनके प्रभाव के चलते समाज में जातीय वैमनस्य में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष भी घटा था.

प्लेटो के अनुसार इच्छाओं का पूर्ण सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय संभव नहीं है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर विशेष झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. इसके लिए व्यक्ति में नैतिक साहस का होना जरूरी है. जहां नैतिक सहमति-असहमति आसान न हो, वहां बल-प्रयोग की संभावना बनी ही रहती है. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स जब यह कहता है कि ‘न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है,’ उस समय वह सुकरात सहित उन सभी साथियों से असहमति दर्शा रहा होता है, जो उसके मत के विरोध में हैं. न्याय को सबल का एकाधिकार कहने वाला थ्रेचाइमच्स अकेला व्यक्ति नहीं था. उसका मत न केवल सोफिस्ट विचारकों से प्रेरित था, बल्कि जनसाधारण के सामान्य सोच का भी प्रतिनिधित्व करता है. दुनिया में लगभग नब्बे प्रतिशत लोग आस्थावादी हैं. हर श्रद्धालु मानता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वही सच्चा न्यायकर्ता भी है. भारत में धर्म को, जिसका पूरा कारोबार ईश्वर और डर पर टिका है, न्याय के रूप में थोपा जाता रहा है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति दूसरों पर शासन करने का सपना देखता है; या अधिकांश लोग शासित होने को अपनी नियति माने रहते हैं. सच तो यह है कि सुख की कामना प्रत्येक व्यक्ति को होती है. सुख और सुरक्षा पर खतरा उसे प्रतिरोध के लिए उकसाता है. समाज को अंतर्द्वंद्वों और अनावश्यक विक्षोभों से बचाने के लिए आवश्यक है कि नागरिकों के बीच असमानता का स्तर न्यूनतम हो. उनमें यह भरोसा बना रहे कि राज्य न्याय के समर्थन और सुरक्षा में खड़ा है. इसलिए बात जब आदर्श समाज की होगी, तो लोकहित से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की मांग भी उठेगी. सच यह भी है कि अधिकांश समाज न्याय की वस्तुनिष्ठ समीक्षा और उसकी व्याप्ति की ओर से उदासीन रहते हैं. सरकारें सत्ताधारी वर्ग के जो संख्या में अल्प हैं, हित साधने में लगी रहती हैं. इस कारण ‘न्याय’ की वस्तुनिष्ठ समीक्षा, उसकी संकल्पना पर गंभीर विमर्श संभव नहीं हो पाता. कारण यह भी है कि अधिकांश लोग न्याय के वृहत्तर संदर्भों से अपरिचित होते हैं. वे उसे किसी अदालती ‘फैसले’ के रूप में लेते हैं, जिसमें दो पक्षों के बीच तीसरा पक्ष जो घटना से पूरी तरह अनजान है, निर्णायक पक्ष की भूमिका निभाता है. तीसरा पक्ष हालांकि राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. इसने भी न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. बहस को प्रभावित करने के बजाय वह केवल दर्शक के रूप में मौजूद है. वह देखता है कि सुकरात जैसे विद्वान की उपस्थिति के बावजूद बहस के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है.

फिर विमर्श का समापन कहां पर हो? ‘आदर्श पसंदों’ का विचार इसी की परिणति था. ‘आदर्श पसंदों’ से उसका अभिप्राय ऐसी पसंदों से था, जिनकी अधिकांश लोग कामना करते हों. परोक्ष रूप में यह भी बहुमत की दादागिरी हुई, जिसे न्याय की दृष्टि से निरापद नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र को ‘बहुमत की दादागिरी’ बताकर प्रायः उसकी आलोचना की जाती है. दादागिरी या निरंकुश आचरण किसी का भी हो सकता है. राजशाही में अकसर उस व्यक्ति की दावेदारी चलती थी, जिसके हाथों में राजमुद्रा हो. धर्म को लोककल्याणकारी बताया जाता है. परंतु वह भक्त और भगवान दोनों की अतियों पर निर्भर करता है. भक्त समर्पण की उच्चतम सीमा तक समर्पित होता है. ईश्वर उच्चतम सीमा तक निरंकुश और तानाशाह, परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर हुए धत्त्कर्म को जीवन के आदर्श की तरह थोपा जाता है. एक प्रकार से यह भी अति ही है. व्यावहारिक सोच यही है कि चयन जब ‘बहुमत की दादागिरी’ और ‘अल्पमत की दादागिरी’ के बीच हो तो न्याय को पहले के पक्ष में झुके हुए नजर आना चाहिए. आदर्शवादी प्लेटो को इस तरह का व्यावहारिक चलन नापसंद था. उसके अनुसार न्याय के लिए कोई बीच का रास्ता नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसके सामने अपने आदर्श नगर-राज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. लोकतंत्र की विकृतियों को वह देख-समझ सका था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

क्या न्याय को धर्म के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है? जो समाज ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर न्याय करने का दावा करते हैं, क्या उनकी वैचारिकी को आदर्श समाज की वैचारिकी के बराबर माना जा सकता है? प्लेटो इसपर विचार नहीं करता. एक सपाट-सी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. इससे समस्या सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. सब जानते हैं कि ईश्वर अपनी इच्छा के बारे में किसी से भी संवाद नहीं करता. उसका अपना अस्तित्व ही संद्धिग्ध है. वह अपने भक्तों के विश्वास से परे, जिसे वे अपना धर्म मानते हैं, कुछ भी नहीं है. बावजूद इसके धर्माचार्य दावा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो कथित ईश्वरेच्छा को अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. उनके अनुसार ईश्वर परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा भी रास्ता है, जिससे कथित ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? दूसरे जिसे ईश्वरेच्छा होने का दावा किया जाता है, उसके प्रमाणन का सही रास्ता क्या हो? कैसे तय किया जाए कि जिसे ईश्वरेच्छा बताया जा रहा है, वही श्रेष्ठतम विकल्प है. चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है. ईश्वरेच्छा अपने आप में अप्रामाणिक है. इसलिए उसके अनुयायी उसे आस्था का विषय बनाकर पेश करते हैं. सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहòाब्दियों से रचता आ रहा है. हो सकता है धर्मानुशासन से समाज का थोड़ा-बहुत भला होता हो. परंतु उसके माध्यम से होने वाला नुकसान उससे कहीं अधिक होता है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्ति-सापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ का प्रमुख लक्षण है, परंतु ‘सफेद’ कह देने-भर से वर्फ का बोध नहीं होता. बगुले का रंग भी सफेद होता है. यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिक-सामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है. सुकरातकालीन एथेंस की तीन लाख की आबादी में लगभग आधी दास और अर्धदास लोगों की थी, जिन्हें सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रखा गया था. प्लेटो की आलोचना का यह बड़ा आधार है. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. लेकिन प्लेटो के चिंतन का दायरा विशद है. उसकी आलोचना की जा सकती है. असहमत भी हुआ जा सकता है. स्वयं प्लेटो ने अपने साथियों के असमति के अधिकार की रक्षा की है. लेकिन उसके चिंतन को नकारा नहीं जा सकता. प्लेटो के दर्शन को लेकर थ्रेचाइमच्स की टिप्पणी सहस्राब्दियों बाद भी प्रासंगिक है. उसका कहना था—‘प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ इतना है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की कल्पना से कितने और कहां तक सहमत हैं? यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है.’

कुल मिलाकर प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता आया है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके माता-पिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालना-पोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला दार्शनिक था, जिसने ऐसे समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

9. The answer is rather humdrum. It will achieve success in wars against roughly equal populations, and it will secure a livelihood for a certain small number of people. It will almost certainly produce no art or science, because of its rigidity.-BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY, page 109.

 

एक ‘राष्ट्रवादी’ फैसला

सामान्य
  • राष्ट्रवाद महज धारणा है. उससे हम यह मान लेते हैं कि कोई एक देश दुनिया के  बाकी देशों से मात्र इस कारण श्रेष्ठतर है, क्योंकि हमारा  जन्म उसमें हुआ है.                                                               जार्ज बनार्ड शा.

  • कल्पना कीजिए कि (आपका)कोई देश नहीं है, जिसके लिए मारा या मरा जाए. यह सोच पाना बहुत कठिन भी नहीं है. सोचिए कि कोई धर्म भी नहीं है. सब शांतिपूर्वक जीवनयापन कर रहे हैं. आप कह सकते हैं कि मैं कोरा स्वप्नजीवी हूं. लेकिन ऐसा केवल मैं ही नहीं हूं. मुझे उम्मीद है  कि एक दिन तुम भी मेरे साथ खड़े नजर आओगे. उस दिन यह दुनिया एक हो जाएगी.                                    जॉन लिनन.

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को अनिवार्य कर दिया. पता चला कि मामला 13 वर्षों से लटकता आ रहा था. न्यायालय को लगा कि अब और टालना अनुचित होगा. क्यों लगा? क्या इसलिए कि केंद्र में भाजपा की सरकार है? किसी और दल की सरकार होती तो फैसला कुछ और आता! या फिर कुछ वर्ष और लटका रहता! संभवतः कोर्ट ने सोचा हो कि राष्ट्रप्रेम का पाठ स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार के अनुशासन में आसानी से पढ़ाया जा सकता है. सचाई चाहे जो हो, महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि अदालत को अचानक क्यों लगा कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना घट रही है. वह भी स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार तथा वाग्वीर प्रधानमंत्री के रहते. बात-बात पर भारत-माता का जयकारा लगाने वाले ‘आर्यपुत्र’ लोगों में राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा जगाने में असमर्थ क्यों हुए, जो न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए आगे आना पड़ा?

फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत का है तब कुछ हकीकत तो होगी. पेंच यह है कि राष्ट्रप्रेम की क्लास लगाने के लिए सिनेमाघरों को चुना गया है, जहां जाने वाले दर्शकों में बड़ी संख्या बेरोजगारों, रिक्शाचालकों और प्रवासी मजदूरों की होती है. घर-परिवार से दूर, कभी मनोरंजन की चाहत में तो कभी यूं ही, परिजनों की याद से छुटकारा पाने के लिए अधिकांश वही सिनेमाघर जाते हैं. कुछ इसलिए भी जाते हैं क्योंकि उनके पास रात बिताने का ठिकाना नहीं होता. देर रात का शो देखकर लौटने तक सड़कें सुनसान होने लगती हैं. आवारा कुत्ते थककर सड़कों के किनारे, दुकान के थड़ों के आसपास ठिकाना तलाशने लगते हैं. मौका देखकर वे भी जहां सिर समाए, अगली सुबह जिंदगी से जूझने का संकल्प लेकर लुढ़क जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बड़े लोग सिनेमाघर जाते नहीं, सिनेमा खुद उनके बीच चला जाता है. जब भी मन करता है, वे सिने कलाकारों को जन्मदिवस या किसी और बहाने आंगन में नंचवा लेते हैं. जो और बड़े हैं उनके घर ही में सिनेमाघर बने हैं. फैसले से यह साफ नहीं हुआ कि यह कानून क्या ‘एंटीला’ और उस जैसे प्रासादों में बने सिनेमाघरों पर भी लागू होगा? शायद नहीं. इसलिए कि हमारे यहां खुद को राष्ट्रभक्त सिद्ध करने की जिम्मेदारी प्रायः जनसाधारण की होती है. अमीर और वीवीआईपी की नहीं. उनकी राष्ट्रभक्ति तो स्वयंसिद्ध होती है. एहसान तले दबा मीडिया दिन-रात उनके महिमा-मंडन में जुटा रहता है. राष्ट्रप्रेम बलिदान मांगता है. सो बेघर, अकेलेपन के शिकार, बेरोजगार लोगों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते रहना जरूरी है. कदाचित इसीलिए अदालत ने दखल दिया है.

आप कह सकते हैं कि अदालत का फैसला सभी के लिए है. मैं कहूंगा गलत. यदि सभी के लिए होता तो शुरुआत संसद और विधान-सभाओं से होती. हर उस कल-कारखाने से होती जिसे राष्ट्र-निर्माण का मंदिर बताया जाता है. साथ ही स्कूल, कॉलेज, क्रिकेट और खेल के मैदानों तथा हर उस सभा से भी होती, जहां सार्वजनिक उपस्थिति हो. सिनेमाघर तो व्यक्ति हल्के-फुलके मूड के साथ जाता है. कभी खुद को भुलाने, तो कभी भूले हुए को याद करने के लिए. अगंभीर मनस्थिति में राष्ट्रगान में हिस्सा लेने का औचित्य? क्या इससे राष्ट्रप्रेम जगाने में सचमुच सफलता मिलेगी? कल्पना कीजिए पर्दे पर राष्ट्रगान के तुरंत बाद हेलन के डांस या सनी लियोनी के रोमांस का सीन आएगा तो उनमें से कौन-सा दिमाग पर देर तक प्रभावी  रहेगा. या फिर राष्ट्रगान समाप्त होते ही पर्दे पर सोडे के बहाने शराब का विज्ञापन आया तो राष्ट्रगान का असर कितनी देर टिक पाएगा? कुल मिलाकर हाल का निर्णय राष्ट्रीय भावनाओं को धर्म में ढाल देने जैसा है, जिसमें पुजारी दुनिया के सभी कारोबार आरती, पूजा-अर्चन के बीच तथा आगे-पीछे चतुर सौदागर की तरह निपटाता है. राष्ट्रप्रेम धर्म न होकर, नागरिक मात्र का अपने राष्ट्र के प्रति नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है. इसमें राज्य की भूमिका उत्प्रेरक की होनी चाहिए. कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्य के स्वनामधन्य कर्ता-धर्ता अपने स्वार्थपूर्ण आचरण द्वारा इस काम में चूकते रहे हैं. ऐसे में केवल सिनेमाघरों में राष्ट्रीयगान की अनिवार्यता राष्ट्रप्रेम के वास्ते निर्धारित कानूनी कर्मकांड जैसी ही है. राष्ट्रगान की गरिमा तभी है जब परिवेश अनुकूल हो. व्यक्ति उदात्त मन से उसके साथ जुड़ा हो. साथ ही राज्य अपने प्रत्येक नागरिक के साथ ईमानदार एवं निष्पक्ष अभिभावक जैसा व्यवहार करता हो. हमारी संस्कृति कर्मकांड प्रधान सही, परंतु कोरे कर्मकांडों से राष्ट्रप्रेम नहीं जगाया जा सकता. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य कि अपने देश और देशवासियों पर गर्व करे. मगर इसके लिए सिनेमाघर उपयुक्त स्थान नहीं हैं. यदि न्यायालय उन्हें उपयुक्त मानता है, तो क्रिकेट मैच की शुरुआत भी राष्ट्रगान से होनी चाहिए. क्योंकि दोनों ही मनोरंजन का माध्यम हैं; तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दोनों ही बाजारवादी अर्थव्यवस्था का हित साधते हैं.

सिनेमा हाल में राष्ट्रगान को जरूरी बताकर उच्चतम न्यायालय में अप्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया है कि जो लोग सिनेमाघर जाते हैं, वे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उदासीन होते हैं. जबकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब किसी गरीब ने लालच में पड़कर देशद्रोह जैसा धत्तकर्म किया हो. सच तो यह है कि जो लोग घर ही में सिनेमाघर बनवाने का सामर्थ्य रखते हैं, वे प्रतीक की बात दो दूर, खुद को राष्ट्र का पर्याय माने रहते हैं. सीना तान कर प्रधानमंत्री के फोटो का उपयोग अपने प्रॉडक्ट के विज्ञापन के लिए करते हैं. एहसानमंद मीडिया उसे बार-बार दिखाता है. यहां सिनेमा की उपयोगिता से इंकार नहीं है. वह सशक्त माध्यम है. उसका उपयोग राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए किया जा सकता है. अच्छा सिनेमा अनेक राष्ट्रहित साध सकता है. उसके लिए सिनेमाघर में राष्ट्रगान आवश्यक नहीं है. विशेषकर भारत में जहां अधिकांश फिल्में फार्मूलाबद्ध होती हैं. सस्ते मनोरंजन के अतिरिक्त उनकी कोई सार्थकता नहीं होती, गाहे-बगाहे जो सामाजिक असमानता तथा उसकी बाजारवादी प्रवृत्तियों का समर्थन करती हैं—वहां थर्ड ग्रेड सिनेमा राष्ट्रीयताबोध जगाने के किसी भी प्रयास को मजाक में बदल सकता है. समस्या यह है कि सरकार हो या अदालत, ऐसे मामलों में पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्ति असंभव होती है. यह मान लिया गया है कि राष्ट्रधर्म और राष्ट्रीयताबोध, दोनों की रक्षा करना केवल जनसाधारण की जिम्मेदारी है. इन परिस्थितियों में राज्य की भूमिका पेशेवर प्रबंधक जैसी होती है, जो कराधान के बदले नागरिकों को सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराता है.

जनसाधारण काम की बातें प्रायः बड़े लोगों के आचरण से सीखता आया है. ‘महाजने येन गतः सः पंथा.’—जिस रास्ते पर महान लोग जाएं उसी का अनुसरण उत्तम है. यही उसे सिखाया जाता है. यही सीख उसके गीत-संगीत, किस्से-कहानियों, कहावतों और बड़े-बूढ़ों के अनुभवों के रूप में सामने आती है. उसे राष्ट्रगान का महत्त्व समझाने के लिए सिनेमाघर में पर्दे के सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. शिखर पर मौजूद नेतागण, बड़े अधिकारी, पूंजीपति, व्यवसायी यदि अपने आचरण को राष्ट्रीयता की भावनाओं के अनुकूल ढाल लें तो जनसाधारण को अलग से राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. वर्षों पहले इसी देश के एक नेता ने सिर पर टोपी और लंगोटी पहननी शुरू की थी, तब अच्छे-खासे घरों के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा सूट-बूट छोड़ टोपी और लंगोटी में आ गए थे. और उस समय तक न तो देश स्वतंत्र हुआ था, न ही राष्ट्रगान बना था. लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं से पूरा देश ओतप्रोत था. पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण गूंजते नारे  स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सभी में यह एहसास जगा देते थे कि हम सब एक हैं. आजादी के बाद संकट की घड़ी में एक ठिगने कद के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने आवाह्न किया. उस समय न तो टेलीविजन था, न इंटरनेट, न ही बड़े-बड़े सुरसामुखी मीडिया घराने. साउंड ट्रैक का जमाना भी नहीं था. फिर भी उस नेता के कंठ से निकली आवाज को देश के नागरिकों ने दूर-दराज तक सुना था. फिर जैसे-जैसे जहां तक भी संदेश पहुंचा, लोगों ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का नियम बना लिया था. आखिर क्यों? इसलिए कि वह जैसा था, वैसा ही दिखता था. किसी को उसकी ईमानदारी पर संदेह नहीं था. उसके पास केवल तीन-चार जोड़ी वस्त्र होते थे. पूरे वर्ष वह उन्हीं से काम चलाता था. रोज पांच-पांच बार वस्त्र बदलकर ‘फकीरी’ का दावा नहीं करता था. आज के नेता आत्ममोह को आत्मविश्वास मानते हैं. बड़बोले भाषणों से जनता के दिलों पर छाने का भ्रम पाले रहते हैं. पूंजी, प्रचार और पाखंड के भरोसे राजनीति करते हैं. ऐसे नेता जनता पर भरोसा करने का साहस नहीं जुटा पाते. न ही जनता उनपर विश्वास करती है. इसलिए राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है.

क्या किसी को राष्ट्रभक्ति का पाठ सचमुच पढ़ाया जा सकता है? कुछ भाव मन में स्वतः उमड़ते हैं. लोगों को सिखाए नहीं जा सकते. जैसे कि प्रेम करना. हम किसी को इस बात के लिए विवश नहीं कर सकते कि वह हमारी बताई वस्तु या प्राणी से प्रेम करे. प्रेम करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति जिससे प्रेम करे, वह उसके किसी अभाव की पूर्णता का एहसास कराती हो. जमीन किसान का पेट भरती है. इसलिए किसान उससे प्रेम करता है. मां का दर्जा देता है. 1857 में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रस्फुटन के मूल में कोई नेता नहीं था. उस समय तो देश में एक-राष्ट्र की भावना का उदय भी नहीं हुआ था. केवल सामूहिक अस्मिताबोध था. जिसमें प्रत्येक सैनिक खुद को नेता मान बैठा था. अपने उत्साह के बूते उन्होंने पूरे उत्तर भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध जंग के लिए खड़ा कर दिया था. वह संघर्ष नाकाम हुआ, इसलिए कि इतने बड़े आंदोलन को संभालने के लिए जैसी मानसिक तैयारी चाहिए, वह उनके पास नहीं थी. लेकिन वह नाकाम संघर्ष भी देश में राष्ट्रीयताबोध जगाने में सफल सिद्ध हुआ.

ऐसा नहीं कि न्यायालय का निर्णय एकदम हवा से पैदा हुआ है. आजादी के बाद से ही यह देश भीतरी और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा है. पिछले कुछ दशकों से चुनौतियां तेजी से बढ़ी हैं. इस फैसले के मूल में ऐसी कई बातें हैं जो देश की आंतरिक उथल-पुथल को सामने लाती हैं. उत्तर में कश्मीर, पूर्वोत्तर के आतंकवाद पीड़ित राज्यों को छोड़ दें तो भी बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे राज्य हैं, जहां भारत नामक राज्य के विरुद्ध आवाजें उठ रही हैं. आप उन्हें ‘नक्सलाइट’ कहें, ‘चरमपंथी’ कहें या कुछ और—वे निर्विवाद रूप से भारतीय गणराज्य के लिए चुनौती बने हैं. इसका प्रमुख कारण लोकतांत्रिक समाधान के प्रति अविश्वास को जन्म लेना है. विडंबना यह है कि समस्या के कारणों को समझे बिना मीडिया उन्हें केंद्र के विरुद्ध चुनौती के रूप में पेश करता आया है. जबकि राज्य के विरुद्ध हथियार उठाने का अभिप्राय हमेशा यह नहीं होता कि विद्रोहियों को अपनी राष्ट्रीय पहचान से शिकायत है. प्रायः वह राज्य और नागरिक समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है. इसलिए इस प्रकार की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीयता की सीमा में, लोकतांत्रिक सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए. विडंबना है कि भारतीय राज्य की ओर से ऐसी कोई रचनात्मक कोशिश नजर नहीं आती. विकास का मतलब अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों, जिनकी गिद्ध-दृष्टि देश के संसाधनों पर है—के हवाले कर देने तक सीमित रह गया है. मुनाफे की बंदरबांट, लूट और उसके कारण बढ़ती आर्थिक विषमता सामाजिक असंतोष का मूल कारण है. 1857 के संग्राम में जितने लोग अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार लेकर निकले थे, उनसे कहीं बड़ी संख्या आज उन लोगों की है जो ‘नक्सलाइट’ या ‘चरमपंथी’ के रूप में राज्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़े हुए हैं. अपनी असफलता को राज्य कई बार राष्ट्रभक्ति के नाम पर दबाने की कोशिश करता है. उस समय वह खुद को राष्ट्र के पर्याय के रूप में पेश करता है. परिणामस्वरूप राजतंत्र के विरुद्ध उठी आवाजें, राष्ट्र-राज्य के विरुद्ध जंग मान ली जाती हैं. जेएनयू मामले में कन्हैया कुमार के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था.

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक बेहतरीन कविता, देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता.’ बहुत कुछ कह देती है—‘इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/कुछ भी नहीं है/न ईश्वर/न ज्ञान/न चुनाव….जो विवेक/खड़ा हो लाशों को टेक/वह अंधा है/जो शासन/चल रहा हो बंदूक की नली से/हत्यारों का धंधा है.’ राष्ट्रभक्ति के नाम पर नारेबाजी करने वाले लोगों को भी समझना चाहिए कि राष्ट्र का अभिप्राय नदी-नाले, सागर, पहाड़, विशाल भूक्षेत्र या कल-कारखाने तक सीमित नहीं है. न ही वह केवल इतिहास, संस्कृति और सीमाओं के बोध का नाम है. यह बोध तो हम भारतवासियों को हजारों वर्षों से रहा है—उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्/वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः‘(विष्णुपुराण). धर्मशास्त्रों की दृष्टि से हम अलबेले हैं. यदि इन्हीं से सच्ची राष्ट्रभक्ति उत्पन्न होती तो हम संभवतः कभी गुलाम न होते. कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. उनके सामूहिक सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक बोध से बनता है. देश से प्रेम करने के लिए एक-दूसरे से प्रेम और परस्पर भरोसा करना आवश्यक है. सच्ची देशभक्ति सामाजिक एकता और विश्वास में बसती है. उसके लिए आवश्यक है कि लोगों के मन एक हों. सब एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हों; तथा सुख-दुख में साझा करने को सदैव तत्पर रहते हों.बावजूद इसके राष्ट्रीयबोध की मूल-भूत अनिवार्यता के रूप में जिस चीज को हम आरंभ से ही उपेक्षित करते आए हैं, वह है सामाजिक एकता और समानता. सत्ता-शिखर पर बैठे मुट्ठी-भर लोग अपने ही समाज के बहुसंख्यक लोगों का, उन्हें उनके न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर, कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर, शोषण करते आए हैं. नतीजा यह हुआ कि भारतीय समाज आरंभ से ही छोटे-छोटे वर्गां में बंटा रहा. जिनके पास शक्ति थी, साधन थे, उनके अपने स्वार्थ प्रबल थे. उसके लिए वे हर आक्रमणकारी से समझौता करते रहे. और जो समाज के लिए कुछ कर सकते थे, जिनके पास संख्याबल था. जो ईमानदार और मेहनती थे, उन्हें लगातार दुत्कार कर, उनके मनोबल को खंडित किया जाता रहा. परिणामस्वरूप इतना बड़ा देश इतिहास के कुछ हिस्सों को छोड़कर शायद ही कभी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा हो. छोटे-छोटे राज्यों के बीच वर्चस्व का संघर्ष हमेशा रहा है. बाहर के मुल्कों में देश की छवि यदि बनी तो बौद्ध धर्म के कारण, जो विभिन्न समुदायों के बीच एकता और समानता का संदेश लेकर दुनिया-जहान तक पहुंचा था. उसका संदेश था कि व्यक्ति का चरित्र और सदाचरण उसे लोक-प्रतिष्ठित बनाता है.

कोरा राष्ट्रवाद वर्चस्वकारी सत्ताओं का सबसे बड़ा पाखंड है. नागरिकों को भुलावे में रखने के लिए स्वार्थी सत्ताएं सदैव यह चाहती हैं कि लोग राज्य को, जो महज राजनीतिक संस्था है, राष्ट्र का पूरक और पर्याय माने रहें. ताकि वे अपने प्रत्येक फैसले को राष्ट्र का निर्णय बताकर, उसे बहस और आलोचना के दायरे से बाहर रख सकें. वे हमेशा यह समझाने में लगी रहती हैं कि लोगों के हित केवल और केवल उन्हीं के मार्गदर्शन में सुरक्षित हैं. उनकी कोशिश राष्ट्रभक्ति को धर्म बना देने की होती है. कदाचित इसीलिए सैमुअल जानसन ने देशभक्ति को ‘बदमाशों का अंतिम आश्रय’(Patriotism is the last refuge of a scoundrel) माना है. थोड़े परिवर्तन के साथ ऑस्कर वाइल्ड ने भी दुहराया था, ‘देशभक्ति शातिरों का गुण है’(Patriotism is the virtue of the vicious). राष्ट्रीयताबोध स्वतंत्र नागरिक चेतना में बसता है. परिपक्व राष्ट्रीयताबोध के लिए आवश्यक है कि लोग अपने अधिकारों तथा दूसरे के अधिकारां का भी सम्मान करें. इसके लिए राज्य का स्वयंप्रभुता संपन्न होना आवश्यक नहीं है. परतंत्र राज्य में भी मुखर राष्ट्रीयताएं पनपती रही हैं. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. सोवियत संघ में अनेक राज्य प्रभुतासंपन्न राज्य नहीं थे. परंतु उनके नागरिकों के हृदय मैं तीव्र राष्ट्रीयताबोध हिलोर मारता था. सोवियत राज्य ने उसे उपेक्षित रखा, जिसका दुष्परिणाम उसके विघटन के रूप में सामने आया. राष्ट्रीयताबोध के मूल में सांस्कृतिक चेतना और एैक्य-भाव अनिवार्य है. क्या भारतीय समाज के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?

विद्वान भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता की निरंतर दुहाई देते रहे हैं. इसके लिए वे महाकाव्यों और होली, दीपावली जैसे त्योहारों का नाम लेते हैं. तर्क देते हैं कि महाकाव्य देश के सभी भागों में पढ़े-पढ़ाए जाते हैं, होली, दीपावली जैसे त्योहार सभी जगह प्रचलित हैं, इसलिए यह देश भू-सांस्कृतिक इकाई यानी एकराष्ट्र है. जबकि महाकाव्यों में, होली, दिवाली जैसे त्योहारों के मूल में जो विश्वास है, वह स्वयं विरोधाभासी है. लोकतंत्र की कसौटी पर न तो महाकाव्य खरे हैं, न ही इन त्योहारों की अंतर्कथाएं. किसी न किसी रूप में वे सभी धर्म-केंद्रित राजतंत्र का समर्थन करते हैं. जिसमें निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं. लोकतांत्रिक विमर्श के लिए वहां कोई गुंजाइश नहीं होती. इसलिए उसके सहारे विकसित संस्कृति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता का समर्थन करने लगती है. धर्म और राष्ट्रवाद की कई विशेषताएं एक-दूसरे से मेल खाती हैं. दोनों में एक अपेक्षाकृत आधुनिक अवधारणा है. दूसरी लगभग तीन सहस्राब्दी पुरानी. दोनों की ही खूबी है कि वे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की दुश्मन हैं. उनके चयन में मनुष्य का अपना कोई योगदान नहीं होता. अधिसंख्यक मामलों में दोनों जन्म के साथ थोप दी जाती हैं.

राष्ट्रवाद का नकार राष्ट्रप्रेम का नकार नही है. वह राष्ट्रभक्ति के नाम पर मनमानी, उग्रता, पक्षपात तथा एकाधिकार की भावना का नकार है. राज्य की असफलता है कि वह अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि वह संकट में उसके साथ है. इससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों में वृद्धि हुई. हताश राज्य शांति-व्यवस्था के नाम पर कानून की ताकत का तरह-तरह से इस्तेमाल करता है. हाल का अदालती निर्णय भी इसी दिशा में जाता है. इन दिनों भारत में झंडा उठाऊ राष्ट्रवाद का बोलबाला है. उसके नाम पर शोर-शराबा वे लोग कर रहे हैं जिनके पास ताकत है. साथ में सत्ता का समर्थन. सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए जो समाज को अर्से से अपनी तरह हांकते आए हैं. ऐसे लोगों का ‘राष्ट्रवाद’ आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और नागरिकता के मानकों के अनुरूप हो. छदम् राष्ट्रवाद का झंडा उठाए वे दिखाना चाहते हैं कि वे बाकी लोगों से बेहतर हैं. उसमें समानता और स्वतंत्रता से अधिक बल और आक्रामकता प्रभावी होते हैं. यदि राज्य ऐसे ही राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है तो स्थिति उन लोगों के प्रति अन्यायकारी हो जाती है, जिनका राष्ट्रीयताबोध समानता, नैतिकता, स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र जैसे मूल्यों से बना है. यही कसौटी देशप्रेम पर भी लागू होती है. देशभक्ति का अभ्रिप्राय राज्य की प्रत्येक गतिविधि को गर्व की निगाह से देखना नहीं है. इसके लिए आलोचनात्मक विवेक अनिवार्य है. राष्ट्र के प्रति अनुराग तभी तक उचित है, जब तक नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका राष्ट्र समानता, स्वतंत्रता और मानवीय आदर्शों का सम्मान करते हुए उन्हें पाने के लिए सतत प्रयत्नशील है. यदि उन्हें लगता है कि उनका राष्ट्र मानवीय आदर्शां को भुला चुका है, तो नागरिकों को ऐसे राष्ट्र से शिकायत करने, यहां तक कि उससे घृणा करने अधिकार भी प्राप्त होता है. यह जिम्मेदारी राज्य की है कि वह ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न होने दे, जिससे नागरिकों को अपने ही राष्ट्र-राज्य के विरोध हेतु मुखर होना पड़े.

—ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. Imagine there’s no countries/It isn’t hard to do/Nothing to kill or die /And no religion too/Imagine all the people/Living life in peace You may say that I’m a dreamer/But I’m not the only one/I hope someday you’ll join us/And the world will be as one.―John Lennon, Imagine.
  2. उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्।

वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः।।

गायंति देवाः किल गीतिकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद—मार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।।

   (वह देश जो महासागर के उत्तर में बसा है, जिसके दक्षिण में हिमगिरि विद्यमान है. उसी का नाम भारतवर्ष है, वहां बसनेवाले भरत के वंशज हैं/देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्मे लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।/हे देवी पृथ्वी! आप समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली हैं, पर्वतरूपी स्तनों से सुशोभित हैं तथा भगवान विष्णु कि आप पत्नी हैं, आपको पैरों से स्पर्श करने के लिए मैं क्षमा चाहता हूं. विष्णुपुराण.)

 

 

 

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद (Libertarianism)

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति—15

 
सम्मानजनक जीवन जीने का एकमात्र रास्ता है, किसी को हानि मत पहुंचाओ, प्रत्येक व्यक्ति को वह सब दो, जो उसकी अपनी कमाई है.1
                                                                         अल्पीनियस(170—235 ईस्वी).

मनुष्य स्वतंत्र प्रकृति की स्वतंत्र संतान है. परतंत्र रहना उसका स्वभाव नहीं है. सामाजिकता की भावना उसमें विवेक और सुरक्षा की चाहत के साथ फूटी है. इस बोध से फूटी है कि अपनी शारीरिक और बौद्धिक सीमाओं के बीच वह अपने लिए सभी सुखों का प्रबंध करने में अक्षम है. यह अपूर्णताबोध केवल मनुष्य की समस्या नहीं है. प्रकृति में हर कोई किसी न किसी प्रकार के अपूर्णताबोध द्वारा ग्रस्त है. उसी के प्रभाव में विराट, विलक्षण और तबीयत से स्वतंत्र प्रकृति स्वयं अनेक मर्यादाओं से आबद्ध होती है. जैसे सूरज समयानुसार उदय-अस्त होता है. ऋतुएं तय समय के अनुरूप बदलती हैं. वनस्पतियां निर्धारित समय पर फलती-फूलती हैं. ऐसे ही मनुष्य की मर्यादाएं भी निर्धारित हैं. समाज मर्यादाओं का सांस्थानिक रूप है; सभ्यता और संस्कृति उनकी तारतम्यता की विकास यात्रा. इस विकासयात्रा की उपलब्धियों में मनुष्य की जरूरतों का बहुत बड़ा योगदान है. मनुष्य की आवश्यकताएं केवल जैविक नहीं हैं. बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह आवश्यकताओं का सृजन भी करता है. यह विशेषता उसको अन्य प्राणियों से अलग करती है. यही मनुष्य तथा शेष प्राणियों में अंतर का आधार है. दूसरे प्राणी प्रायः उतना अर्जित करते हैं, जितना उनके तात्कालिक भोग के लिए जरूरी हो. अपने स्वाद और रुचि के अनुसार वे व्यंजन तैयार नहीं करते. भविष्य की ओर से वे लगभग निश्चिंत होते हैं. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. उसे प्रकृति की ओर से स्मृति का उपहार मिला हुआ है. उसकी मदद से वह अनुभवों को सहेज सकता है. प्राणिजगत में सबसे तेज-तर्रार मस्तिष्क का वह स्वामी है. अनुभवों का विश्लेषण, संश्लेषण आदि कर, वह उनसे सीख ले सकता है. यह गुण उसको श्रेष्ठ उत्पादक बनाता है. एक उत्पादक के रूप में वह अपनी तात्कालिक आवश्यकता से अधिक अर्जित करने में सक्षम होता है. मनुष्य की यह विशेषता उसकी सुदीर्घ सांस्कृतिक यात्रा का आधार रही है. एक प्रश्न और भी है जिसे हम उपर्युक्त विशेषता की निष्पत्ति कह सकते हैं. प्रश्न कुछ यों है कि मनुष्य यदि श्रेष्ठ उत्पादक है तो उसके अतिरिक्त श्रम-कौशल का लाभ किसे प्राप्त होना चाहिए? मनुष्य को, जिसने अपनी सूझबूझ और कठिन परिश्रम से उत्पादन को संभव बनाया है? अथवा उस समाज को जिसका वह सदस्य है, जिसमें रहकर वह ज्ञानानुभव ग्रहण करता है. अपनी निरंतरता में जो मनुष्य के शिक्षण-प्रशिक्षण एवं मानवीकरण में सहायक होता है, जिससे परे मनुष्य की अपनी महत्ता शून्य है. जो उसकी अस्मिता, उसके आत्मगौरव का परिचायक है तथा जिसके आधार पर वह प्राणिजगत से अलग और विशिष्ट होने का दावा करता है. लाभ यदि मनुष्य को मिलना चाहिए तो किस अनुपात में?

यह प्रश्न आज का नहीं है. सभ्यताकरण के आरंभ से ही उत्पादन पर अधिकार तथा उसके न्यायपूर्ण वितरण को लेकर एक चुनौती इंसान के सामने हमेशा रही है. विद्वानों के बीच इसे लेकर मतभेद हैं. एक वर्ग का मानना है कि मनुष्य के श्रम-लाभ पर सबसे पहला अधिकार श्रम-कर्ता का ही होता है. तदनुसार मनुष्य अपने श्रम एवं बुद्धिबल द्वारा जो भी अर्जित करता है, उसका लाभ उसको मिलना ही चाहिए. यह तर्क अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं. लेकिन मनुष्यता की विविधता वैचारिक स्वातंत्र्य में भी है. विद्वानों के दूसरे वर्ग का मानना है कि संसार अनुभवों का विशाल महासागर है. इस महासागर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी नया जल अंतरित होता रहता है. नई पीढ़ी अपने अनुभवों का सफर वहां से आरंभ करती है, जहां उसकी पिछली पीढ़ी ने छोड़ा था. इस आधार पर प्रत्येक पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की कर्जमंद होती है, वह जिस अनुभव और ज्ञान-संपदा के बल पर आगे बढ़ती है, वह पिछली पीढ़ियों की ओर से सभ्यता, संस्कृति एवं संचित ज्ञान-संपदा के रूप में प्राप्त होता है. इन्हें सहेजने वाली व्यवस्था का नाम ही समाज है. वह परंपरा एवं सांस्कृतिक प्रवाह के बीच वर्तमान की यात्रा और भविष्य का सपना है. उसका दायित्व मनुष्य को संरक्षण प्रदान करना तथा विकास हेतु अनुकूल वातावरण का सृजन करना है. साथ में उसे भावनात्मक रूप से समृद्ध करते रहना है, ताकि वह योग्य नागरिक बनकर समाज-विकास में अपना अधिकतम योगदान दे सके. अगर समाज यह सब न करे? अगर वह अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाए तब? हालांकि समाज के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य उसकी रचना का आधारस्रोत है. उसकी उपेक्षा करना खुद को संकट में डालना होगा. यदि ऐसा हो जाए तो समाज अस्तित्वहीन हो जाएगा. बिना समाज के मनुष्य और पशु के बीच किसी प्रकार का अंतर ही न रहेगा. इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि वह समाज, जिसने उसकी कदम-कदम पर सहायता की है—के विकास में अपना भरपूर योगदान दे. इस वर्ग का मानना है कि समस्त संसाधन समाज की सांझी धरोहर हैं. उनके उपयोग अथवा परिशोधन द्वारा मनुष्य जो अर्जित करता है, उसपर संपूर्ण समाज का अधिकार होता है. सभ्यता के आरंभिक वर्षों से लेकर आजतक सामाजिक न्याय के नाम पर जितने भी विचार जन्मे हैं, सभी संसाधनों और अवसरों के न्यायिक वितरण की मांग करते आए हैं. उनमें दृश्यमान अंतर का आधार संसाधनों के वितरण तथा व्यक्ति-स्वातंत्र्य को लेकर उनके स्वतंत्र दृष्टिकोण हैं.

अपनी सीमाओं में मनुष्य समाज से सामंजस्य बनाए रखने का यथासंभव प्रयत्न करता है. स्वतंत्र सामाजिक इकाई के रूप में वह प्रायः यही चाहता है कि अपने योगदान के रूप में कुछ न कुछ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी छोड़ता चले. कुछ ऐसा करे जो समाज के अधिकतम वर्गों के लिए लाभकारी हो. कह सकते हैं कि मनुष्य समाज से यदि कुछ ग्रहण करता है, तो कदाचित परिष्कृत-परिवर्धित रूप में कुछ न कुछ लौटा भी देता है. इसे माटी का कर्ज उतारना कह सकते हैं. सामाजिकता के निर्वाह के लिए यह जरूरी भी है. मगर इस दायित्व का इकतरफा निबाह सरासर असंभव है. यह ठीक है कि मनुष्य के दायित्व बड़े हैं. उनसे वह भाग नहीं सकता. उनका अनुपालन करना मनुष्यता का लक्षण है. लेकिन इससे समाज की जिम्मेदारियां कम होने के बजाय और भी बढ़ जाती हैं. समाजीकरण की प्रक्रिया में मनुष्य को अपनी आजादी का एक अंश कुर्बान करना पड़ता है. यह अंश समाज एवं शासन को शक्तिशाली बनाने में मदद करता है. इस तरह राज्य की कुल शक्ति उनके नागरिकों का विशिष्ट प्रदेय होती हैं. इसकी सफलता हेतु व्यक्ति को समाज के साथ हितों का अनुकूलन भी करना पड़ता है. दूसरे शब्दों में समाज से जुड़ना भले ही मनुष्य की अपनी आवश्यकता हो, सर्वथा निःशुल्क नहीं होता. अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से के रूप में मनुष्य के उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. यह कार्य वह समाज की मर्यादा, उसमें सुख और शांति की स्थापना के लिए करता है. इसलिए समाज का कर्तव्य है कि व्यक्ति-हितों का ध्यान रखे. ऐसी व्यवस्था बनाए ताकि संबंधित इकाइयां उससे जुड़ा होने पर गर्व का अनुभव करें. बड़ी, संगठित इकाई होने के नाते समाज के दायित्व भी बड़े हैं. उसका सर्वप्रथम दायित्व है कि वह अपनी सदस्य इकाइयों के सुख का ख्याल रखे. उन्हें कभी अन्याय की प्रतीति न होने दे. उदारतापूर्वक उनकी स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखे. ध्यान रखे कि शांति और व्यवस्था हेतु लोकहित में कानून आवश्यक हैं, किंतु मनुष्यता किसी भी प्रकार के कानून से ऊपर है. कानूनों का अतिस्त्व मनुष्य से है. मनुष्य उनपर निर्भर नहीं है. मानवीय अस्मिता एवं स्वतंत्रता के आगे हर कानून बौना है. अल्पीनियस की यह नेक सलाह महत्त्वपूर्ण है कि परिस्थितियां चाहे जो भी हों, मनुष्य की ‘स्वतंत्रता को कानून से आबद्ध नहीं होना चाहिए.’2 कानून का ध्येय होना चाहिए, अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख और स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना. ऐसे वातावरण का निर्माण करना, जिसमें मनुष्य अधिकतम स्वतंत्रता के साथ अधिकतम सुखोपभोग कर सके. यह तभी संभव है जब समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं का सम्मान करे. व्यक्ति को अपना मंतव्य खुलकर प्रकट करने की आजादी हो.

उत्तरोत्तर बढ़ती सामाजिक जटिलताओं के बीच जहां आधुनिकीकरण और सभ्यताकरण के नाम पर निरंतर नई संस्थाओं का गठन होता रहता हो, वहां मानवीय स्वतंत्रता का संरक्षण असंभव भले न हो, मगर चुनौती-भरा कार्य है. इसलिए भी कि सभ्यताकरण के नाम पर नई संस्थाओं और विधानों का गठन जितनी जल्दबाजी के साथ होता है, वैसी जल्दबाजी लोगों को उससे परचाने, नई व्यवस्था से उसका अनुकूलन करने हेतु नहीं की जाती. जन और अभिजन में विभाजित समाजों में उसके लिए कोई कोशिश भी नहीं होती. मानवीकरण की कोशिशों को पूरी तरह परिस्थिति के भरोसे छोड़ दिया जाता है. परिणामस्वरूप यथार्थ एवं आदर्श; यानी ‘जो है’ और ‘जो होना चाहिए’—का अंतराल निरंतर बढ़ता ही जाता है. लोक-स्वातंत्र्य एवं मानवाधिकारिता के पक्ष में बढ़ती मांगों के दबाव में शासन और शीर्षस्थ अभिजन मिलकर निगरानी संस्थाएं तो खड़ी कर देते हैं, किंतु उनके शिखर पर उन्हीं वर्चस्वकारी शक्तियों का कब्जा होता है, जो जनसाधारण के दमन और दुर्दशा के लिए जिम्मेदार रही हैं; तथा जिनसे मुक्ति की कामना उन संस्थाओं के गठन का मूल उद्देश्य होता है. जिसकी मनमानी के चलते व्यवस्था का अभिजात संस्कृति की ओर झुकाव वर्ष-दर-वर्ष बढ़ता ही जाता है, जिससे आमजन के लिए न्याय निरंतर दुर्लभ और दुरूह होने लगता है. समस्या है कि न तो यह प्रवृत्ति नई है, न संस्थाएं आज पैदा हुई हैं. इतिहास साक्षी है कि समाजीकरण के आरंभ से ही व्यवस्था का चरित्र मूलतः लोक-विरोधी रहा है. उससे पहले परिवार ही समाज था. उसका मुखिया मर्यादाएं निर्धारित कर लेता था. जनसंख्या कम थी, जरूरतें सीमित. ऊपर से पूर्णतः प्रकृति-आधारित जीवन की अनिश्चितता. इसके बावजूद परिवार या कबीलाई गुट में बंटे मनुष्य आपसी संबंधों का युक्ति-युक्त ढंग से निर्वाह कर लेते थे.

जरूरतों को मिल-बांटकर पूरा करने की प्रवृत्ति समाजीकरण की आरंभिक प्रेरणा थी. कालांतर में जनसंख्या बढ़ी. जरूरतें विस्तार लेती गईं. व्यक्ति एक स्थान पर टिककर रहने लगा. तब समस्या के निदान के लिए व्यक्ति की आध्यात्मिक जिज्ञासा, सामाजिक आचारसंहिता तथा सामान्य नैतिकता के योग से धर्म का गठन किया गया, जो एक सर्वथा कल्पित, कथितरूप से सर्वाधिक शक्तिशाली और सर्वेसर्वा परमात्मा की मनमानी के इर्द-गिर्द घूमता है. प्रकृति से डरे, अशीक्षित जनसमाज में धर्म को पूरी जगह मिली. बाद में तो उसे बलात् थोपा जाने लगा था. राजसत्ता और धर्मसत्ता के संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मान लिया गया. अपनी मूल प्रवृत्ति में धर्म ठेठ सामंतवादी था. अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही वह शिखर की ओर देखता था. शिखरस्थ अभिजन उसमें लाभ की अवस्था में थे. धर्म की वर्चस्ववादी, केंद्रोन्मुखी, परंपरानुयायी प्रवृत्ति ने ही सामाजिक स्तरीकरण और ऊंच-नीच की भावना को स्थायित्व देने का काम किया था. लोग धीरे-धीरे उसी में मग्न होते गए. इस बीच समाज और मनुष्य की जरूरतों का दायरा और भी फैलता गया. पंद्रहवीं शताब्दी के वैज्ञानिक प्रबोधन तक यह सिलसिला अबाध चलता रहा. उसके बाद धार्मिक संस्थाओं के औचित्य पर जोर-शोर से सवाल उठाए जाने लगे थे. नए ज्ञान की रोशनी में धर्म के लिए यह संभव न रहा कि वह समाज को पूरी तरह अनुशासित रख सके. उस जरूरत ने आर्थिक साम्राज्यवाद के विचार को जन्म दिया. बहरहाल सभ्यता की यात्रा में मनुष्य निरंतर नई-नवेली संस्थाएं गढ़ता गया. उनसे संतुलन बनाए की चाहत में मनुष्य को हर बार नई अनुशासन प्रणाली को अपनाना पड़ा. हर बार उसे अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि देनी पड़ी. यह जानते हुए भी कि ‘प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार दिलाने की दृढ़ और स्थायी इच्छा ही न्याय है.’3 समाज अपनी सभी इकाइयों को एकसमान न्याय उपलब्ध कराने, उसकी स्वतंत्रता के अधिकतम स्तर को अक्षुण्ण रखने के अपने मूलभूत ध्येय से निरंतर दूर होता गया.

सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य दो प्रकार की स्वतंत्रता की परिकल्पना करता है. पहली राजनीतिक स्वतंत्रता, यानी सामाजिक मर्यादाओं के भीतर स्वतंत्र नागरिक जीवन जीने की स्वतंत्रता. स्वतंत्र, सामाजिक जीवन के लिए अर्थ भी महत्त्वपूर्ण होता है, अतएव आर्थिक स्वतंत्रता का भाव भी इसी में सन्निहित है. तदनुसार दूसरी स्वतंत्रता है, अवसरों की समानता के बीच विधिपूर्ण ढंग से संपत्ति उपार्जन करने तथा उसका बगैर किसी प्रतिबंध के इच्छानुसार भोग करने की स्वतंत्रता. अपने नागरिकों के लिए दोनों स्वतंत्रताओं को सुनिश्चित करना किसी भी कल्याण राज्य का प्रथम-संकल्प होना चाहिए. न्याय के इस रूप की व्याख्या को इच्छा-स्वातंत्र्यवाद या ‘लिबरटेरियनिज्म’ कहा जाता है. इस न्यायवादी विचारधारा के अनुसार सभी मनुष्य एकसमान है. अतएव राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को बनाए रखे. यहां स्वतंत्रता का अर्थ उसके सामान्य अर्थों से कहीं व्यापक है. उसमें अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य, अवसरों की समानता के साथ संपत्ति अधिकार भी सम्मिलित हैं. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता एवं उपयुक्त संपत्ति प्राधिकार के बगैर राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार संपत्ति अर्जित करने तथा उसका इच्छानुसार भोग करने का अधिकार मिलना ही चाहिए. जान हास्पर्स के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का स्वामी है. किसी भी व्यक्ति को किसी दूसरे के जीवन का स्वामित्व हासिल नहीं है. इसलिए एक व्यक्ति का दूसरे के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप सर्वथा अनुचित है. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद आधुनिक मानवतावादी दर्शन है. पुरानी विचारधाराओं से हटकर. ‘प्राचीन एवं आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत परंपरागत रूप से इस बात पर ध्यान देते थे कि कौन स्वामी होगा और कौन दास और कौन दास….’4 इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार, ‘न तो कोई किसी का स्वामी है, न ही कोई किसी का दास. जिस प्रकार अपने बारे में एकमात्र मुझे यह तय करने का अधिकार है कि मेरा जीवन किस प्रकार का हो, उसी प्रकार तुम्हें अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का पूरा-पूरा अधिकार है. मैं चाहे जितना शक्तिशाली होऊं, या फिर सत्ता मेरी मुट्ठी में हो, इसके बावजूद तुम्हें दास बनाकर तुम्हारा स्वामी बन बैठने का कतई अधिकार नहीं है, इसी तरह तुम्हें भी यह अधिकार नहीं है कि मुझे गुलाम बनाकर मेरे हाकिम बन जाओ. दासता बलात् ताबेदारी है.’5 अतएव प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने पसंदीदा कार्यक्षेत्र को चुने और इच्छानुसार काम भी करे. बशर्ते उसके कार्य से किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित न होती हो.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद का जन्म बीसवीं शताब्दी के उस दौर में हुआ, जब पूंजीवाद समाजार्थिक एवं राजनीतिक सत्ताओं पर अपना प्रभुत्व जमा चुका था. साम्राज्यवाद अपने पराभव के दौर में था, वैज्ञानिक प्रबोधन के बीच पुरानी विचारधाराओं के आगे प्रश्न-चिह्न लग चुका था. नई प्रौद्योगिकी के आगमन से परंपरागत उत्पादन प्रविधियों पर संकट मंडराने लगा था. बड़ी पूंजीपति कंपनियां लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा कर, उसको अनुगामी उपभोक्ता में ढाल देना चाहती थीं. राजनीतिक अस्थिरता एवं अदूरदर्शिता के बीच महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर पूंजीपति घरानों का असर साफ नजर आने लगा था. उनकी ओर से निहित स्वार्थ हेतु उपभोक्ताकरण का अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा था. तेजी से उभरता मीडिया उनका सबसे बड़ा मददगार बना हुआ था. ऐसे प्रलोभनकारी परिवेश में मनुष्य की भौतिक इच्छाओं का फैलाव अवश्यंभावी था. यही पूंजीवादी शक्तियां भी चाहती थीं कि मनुष्य परंपरागत विधानों, विशेषकर उन व्यवस्थाओं के जो उसे संयम और त्याग का पाठ पढ़ाती हैं, सांसारिक सुखामोदों को निस्सार समझती हैं—के नियंत्रण से मुक्त हो. उससे पहले धर्म और सामंती संस्कारों के रूप में अनेक बेड़ियां मनुष्य अनेक को जकड़े हुए थी. विचारकों का बड़ा वर्ग उनसे बाहर लाने को कटिबद्ध था. फलस्वरूप बीसवीं शताब्दी तक मानवीय स्वतंत्रता और समानता के पक्ष में माहौल पूरी तरह बन चुका था. नए विचारों के आलोक में विश्व-भर में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हुईं. उनका संघर्ष किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद के विरुद्ध था. इस बीच अपनी अनुकूलनवादी प्रवृत्ति के कारण पूंजीवादी ताकतें भी लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाने में कामयाब हुईं. शती के मध्याह्न तक पूंजीवाद दुनिया के आधे से अधिक देशों को अपने प्रभाव में ले चुका था. दूसरे विश्वयुद्ध में हुई भीषण जनहानि और पश्चातापग्रस्त राजनीति ने उसे अपने पांव फैलाने का कुछ और मौका दिया. फलस्वरूप मानवाधिकार समर्थक ऐसे अनेक बुद्धिजीवी प्रकाश में आए, जो पूंजीवाद की चमक-दमक से प्रभावित थे और उसी में मानवीय समस्याओं का हल खोजते थे. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद जैसी मुखर विचारधाराओं का उभार उसी दौर की घटना है.

‘इच्छा-स्वातंत्र्यवाद’ का अभिप्राय केवल रुचियों की स्वतंत्रता पर विचार करना नहीं है. अपने समर्थकों की निगाह में यह सामाजिक न्याय की उदात्त भावना पर केंद्रित व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का विधान है. आदमी स्वतंत्र होगा, तभी वह स्वयं को अभिव्यक्त करने का साहस जुटा पाएगा, तभी वह अधिकतम इच्छाओं को अभिव्यक्त कर, उनकी पूर्ति के लिए आखिर तक, समर्पित भाव से काम करने में सक्षम होगा. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद नागरिकों को वैचारिक आजादी देता है. उनका विवेकीकरण कर, स्वतंत्रता से प्रेम करना सिखाता है. उसमें मनुष्य को विश्वास होता है कि समाज में उसकी इच्छा के विरुद्ध यदि कुछ भी अप्रिय होगा, तो पूरा समाज मददगार की भूमिका में उसके साथ खड़ा नजर आएगा. स्वेच्छानुसार तय की गई मर्यादाओं के बावजूद वह इतना स्वाधीन और मुक्त होगा कि बगैर किसी बाहरी प्रतिबंधों के अपने लक्ष्य का निर्धारण कर सके. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों का मानना है कि उस व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति हर वह वस्तु प्राप्त करने में सक्षम होगा, जिसको वह अपने लिए जरूरी मानता है. उसे अपने भविष्य को ऐच्छिक दिशा देने की भरपूर स्वतंत्रता होगी. राज्य का एकमात्र उद्देश्य अपने नागरिकों के हितों की सुरक्षा करना है. यह कार्य मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की भावना के साथ किया जाना चाहिए. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार प्रत्येक नागरिक के सामान्य अधिकार होते हैं. वही कल्याणराज्य की परिकल्पना को साकार करने में सक्षम है. उनके अनुसार मानवाधिकार केवल मनुष्य को उसके नागरिक अधिकारों से ही नहीं परचाते. उनकी उपस्थिति दूसरे व्यक्तियों को भी उतने ही अधिकार देती है जितने मनुष्य को स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक हों. उन्हें ‘कुदरती राज्य’ की स्वच्छदतावादी अवधारणा प्रिय है. उसे वे राज्य के न्यूनतम नियंत्रण के बीच आधुनिक राष्ट्र-राज्यवादी चेतनाओं के बीच भी जिलाए रखना चाहते हैं. प्रकारांतर में वे स्वच्छंद आचरण यानी स्वतंत्रता को स्वच्छंदता मान लेने से भी रोकते हैं. मगर स्वतंत्रता कोई नया प्रत्यय नहीं है. लॉक की ‘प्राकृतिक राज्य’ की अवधारणा के अनुसार वह मनुष्य को जन्म से ही प्राप्त होती है. उसी तरह संपत्ति भी प्रकृति का अंश है. स्वतंत्रता के सिद्धांत के अनुसार दूसरों पर अधिकर करना भी अनुचित एवं प्रकृति-विरुद्ध आचरण है. फिर इच्छा-स्वातंत्र्यवादी अभिव्यक्ति और संपत्ति अधिकार की स्वतंत्रता पर इतना जोर क्यों देते हैं? उनमें और दूसरे स्वतंत्रतावादियों में प्रमुख अंतर क्या हैं? इसपर विचार करने के लिए इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की वैचारिकी में गहरे उतरना पड़ेगा.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के प्रमुख विचारक जॉन हॉस्पर्स(1918—2011) तथा राबर्ट नॉजिक(1938—2002) रहे हैं. अपनी पुस्तक ‘लिबरटेरियन मेनीफेस्टो’ में हॉस्पर्स लिखता है—‘प्रत्येक मनुष्य अपना स्वामी है. सभी स्वतंत्र हैं. किसी को किसी पर अधिकार नहीं है.’ उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपनी रुचि एवं जरूरत के अनुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते उस कदम से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का अवांछित हस्तक्षेप न होता हो. न ही उस व्यक्ति को लगे कि उसकी उपेक्षा की जा रही है. वह इस बात पर जोर देता है कि समाज में न तो कोई स्वामी है, न दास. या तो सभी स्वामी हैं अथवा सभी दास. दूसरे शब्दों में प्रत्येक मनुष्य अपना स्वामी है. इसलिए किसी भी मनुष्य को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप कर सके. यह स्वतंत्रताबोध ही इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की आधारशिला है. रूसो से लेकर लॉक तक इसी का समर्थन करते आए हैं. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक इसका जोरदार समर्थन करते हैं. इतना कि कई बार उनका स्वातंत्र्यबोध नकारात्मक दिखने लगता है. अधिकारों को लेकर भी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी काफी उदार हैं. उसमें वे सभी अधिकार सम्मिलित हैं जिन्हें आधुनिक विचारक मानवाधिकार के अंतर्गत सम्मिलित करते हैं. उनका मानना है कि मनुष्य को संपत्ति अर्जित करने का पूरा अधिकार प्राप्त होना चाहिए. प्रकारांतर में उन्हें पूंजीवाद से भी परहेज नहीं हैं. संपत्ति अधिकार को वे मानवीय स्वतंत्रता और अस्मिता की सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानते हैं. उनके लिए संपत्ति अधिकार के बगैर नागरिक अधिकार की परिकल्पना अनौचित्यपूर्ण है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के लिए संपत्ति का आशय महज जमीन-जायदाद या नकदी तक सीमित नहीं है. उनके लिए हर वह वस्तु जिसे कोई व्यक्ति अपना होने का दावा करते हुए, गर्वानुभूति करता है—संपत्ति की श्रेणी में आती है. जैसे आभूषण, पुस्तक, वस्त्राभरण आदि. यही नहीं ज्ञान, कला-कौशल, क्षेत्र-विशेष में अर्जित विशेष योग्यता और बौद्धिक संपदा को भी वे संपत्ति की श्रेणी में रखते हैं. उनके अनुसार ऐसी बहुत-सी चीजें संपत्ति कही जा सकती हैं, जिन्हें केवल कुछ चुने हुए लोग पसंद करते हों. उन्हें लेकर समाज में बहुत स्पर्धा की भावना भी न हो. चूंकि उनके होने से व्यक्ति को कुछ होने की गर्वानुभूति होने लगती है, इसलिए वे संपत्ति का ही अपररूप हैं. विचारधारा के रूप में इच्छा-स्वातंत्र्यवाद का उद्भव बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिका में हुआ. तब तक लोकतंत्र पर पूंजीवादी ताकतें अपना प्रभुत्व जमा चुकी थीं. लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कारपोरेट संस्कृति का असर साफ दिखने लगा था. संभवतः उसी से सम्मोहित इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक व्यक्तिवाद का महिमा-मंडन करते हुए, सर्वस्वातंत्र्य की भावना को उदार-समाज के प्रमुख लक्षण के रूप में देखते हैं. लेकिन किसी भी विचार को सामाजिक मान्यता दिलाना सामान्य नैतिकता को बीच में लाए बिना असंभव है. तदनुसार संपत्ति पर अधिकार का आशय यह हरगिज नहीं है कि किसी की भी संपत्ति को कब्जाकर उसपर अपना दावा ठोक दिया जाए. जैसा कि प्राचीन काल में साम्राज्यवादी सोच के चलते होता था. जब कोई सम्राट अपनी सैन्य-शक्ति या कूटनीति द्वारा किसी राज्य पर कब्जा कर ले तो वह उसका अधिकार मान लिया जाता था. संपत्ति अधिकार की प्राचीन परिभाषा में वह उचित माना जाता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी इस मायने में व्यावहारिक नैतिकता का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. उनके अनुसार संपत्ति अधिकारिता का अभिप्राय वैध तरीकों द्वारा अर्जित संपत्ति पर अधिकार, फिर उसका सकारात्मक ढंग से समाज की कुल उत्पादन क्षमता में वृद्धि हेतु उपयोग किए जाने से है. ताकि समाज विकास की ओर अग्रसर रह सके. कुल मिलाकर संपत्ति से उनका आशय उस धन से है जो आसानी से, स्वैच्छिक आदान-प्रदान की सीमा में आता है. और उसपर अधिकारिता के मायने संपत्ति का अपने संपूर्ण सामर्थ्य से, अपने साथ-साथ लोकहित में उपयोग करने से है. लोगों को संपत्ति अधिकार से वंचित करना, उनसे उनके मूलभूत अधिकार जो उन्हें मनुष्य होने का बोध कराते हैं—छीन लेना है. व्यक्तिमात्र के लिए स्वतंत्रता अपने भविष्य की बेहतरी के लिए सोचने तथा उसके लिए पर्याप्त योजनाएं विकसित करने में देखी जाती है.

इच्छा-स्वांतत्र्यवादियों के अनुसार मानवीय इच्छा और कर्तव्य को निर्धारित करने वाले अधिकार उदार होने चाहिए. उनका स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि समाज का कमजोर से कमजोर व्यक्ति उनका लाभ उठा सके. संपत्ति जुटाने तथा उसके हस्तांतरण संबंधी अधिकार मनुष्य की पसंद तथा उसकी कार्यशैली की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं. यदि व्यक्ति को अपने जीवन के बारे में उपयुक्त निर्णय लेने, विकास के लिए योजनाएं बनाने या अपने ही श्रम के लाभों से वंचित कर दिया जाए? यदि उसको स्वतंत्र बताते हुए उससे अभिव्यक्ति के अधिकार को ही छीन लिया जाए? उस अवस्था में स्वतंत्रता और समानता के कोई मायने ही नहीं रहेंगे. यहां विचारणीय है कि बौद्धिक संपदा, शिल्प-कौशल, व्यावसायिक हुनर, श्रम आदि को छोड़ दिया जाए तो संपत्ति प्रायः प्रकृति का हिस्सा होती है. इस नाते वह पूरे समाज की है. बल्कि उन समाजों की है जो धरती पर कहीं भी किसी भी रूप में मौजूद हैं. जड़ वस्तुओं की भांति मनुष्य भी कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों से अनुशासित होता है. सवाल है कि क्या एक प्राकृतिक वस्तु या प्राणी का दूसरी प्राकृतिक वस्तु या प्राणी पर अधिकार न्यायोचित है. बीसवीं शताब्दी में जितनी भी मानवतावादी विचारधाराएं उभरीं, वे इस इसके पक्ष, विपक्ष और समन्वय का ही लेखा हैं. मनुष्य हालांकि अन्य प्राणियों और वस्तुजगत की भांति प्रकृति का ही हिस्सा हैं. घर्षण, जड़त्व, गुरुत्वाकर्षण आदि प्रभाव जैसे जड़ वस्तुओं और जीवजगत को प्रभावित करते हैं, मनुष्य भी उनसे उसी तरह प्रभावित होता है. अंतर केवल इतना है कि सहस्राब्दियों के अंतराल में मनुष्य ने अपनी बुद्धि विकसित की है. यही वह गुण है जिसके आधार पर वह शेष प्राणियों और वस्तुजगत पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करता आया है. उसी के आधार पर वह प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में शोधन, परिशोधन करता रहता है. चूंकि प्रत्येक मनुष्य का बौद्धिक सामर्थ्य और समाज निर्माण में उसका योगदान भिन्न होता है, यह मनुष्य की अपनी योग्यता पर भी निर्भर करता आया है, इसलिए मनुष्य के संबंध में संपत्ति अधिकारों की स्वतंत्र व्याख्या की आवश्यकता हमेशा रही है. मनुष्य की सीमा है कि वह प्रकृति में मौजूद पदार्थ को केवल वस्तु में बदल सकता है. उसका शोधन-परिशोधन कर सकता है. पदार्थ को बना नहीं सकता. यदि किसी मनुष्य का संपत्ति पर अधिकार है तो वह संबंधित वस्तु के शोधन-प्रशोधन में किए गए योगदान तक सीमित रहना चाहिए. जॉन लॉक की ओर से आए ये विचार कालांतर में इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों की प्रेरणा बने. उनमें से अधिकांश का मानना था कि अभिव्यक्ति या अभिमत के अधिकार के बिना स्वतंत्रता असंभव है. इसलिए संपत्ति अधिकारों की रूपरेखा, योजनावद्ध तरीके से, कुल समाज के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी का संपत्ति अधिकार दूसरों के अधिकार में बाधा न बने.

इच्छा-स्वांतत्र्यवादी विचारकों के अनुसार संपत्ति उपार्जन की दो मान्य विधियां हैं. पहला दो व्यक्तियों अथवा दो समूहों अथवा व्यक्ति और समूह के बीच हुआ अंतरण. उसके अनुसार संपत्ति का यह अंतरण न्यायसंगत होना चाहिए. समाज द्वारा घोषित ऐसे तरीके से संपत्ति अंतरण ही कानून सम्मत कहा जाएगा. जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों के बीच विश्वास की भावना हो. अंतरण के बाद भी क्रेता को लगे कि उसके साथ कोई धोखा या छल नहीं हुआ है. वहीं विक्रेता को यह विश्वास होना चाहिए कि वह किए गए भुगतान के बदले उपयुक्त मूल्य की संपत्ति प्राप्त कर चुका है. श्रम, बौद्धिक संपदा तथा ऐसे सभी उपार्जन जो पूर्ण संपत्ति-प्राधिकार के साथ संपन्न होते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं. उपार्जन की दूसरी श्रेणी में अस्वामित्व युक्त संपत्ति से स्वामित्व युक्त संपत्ति का अंतरण आता है. यानी ऐसा उपार्जन जो किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी संपत्ति के माध्यम से किया गया हो, जिसका वह स्वामी ही नहीं है. उल्लेखनीय है कि श्रम पर सबसे पहला अधिकार श्रमिक का होता है. यदि कोई व्यक्ति श्रम का वाजिब मूल्य, यानी श्रम के मूल्यांकन का अधिकार छीनकर उसके उत्पाद पर कब्जा कर लेता है. तब उसका मामला दूसरी श्रेणी में आता है. यह कुछ ऐसा ही है जैसे कोई जमींदार उस जमीन की फसल को घर ले जाए, जो उसने अपनी दबंगई के आधार पर कब्जाई हुई है. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के अनुसार व्यक्ति का संपत्ति पर अधिकार तभी मान्य है, जब उसे विधि-मान्य तरीकों द्वारा अर्जित किया गया हो. इसमें न्यायपूर्ण आधार पर अर्जित संपत्ति के वे सभी अपररूप सम्मिलित हैं, जिन्हें मनुष्य इस श्रेणी में सम्मिलित करता आया है. उनकी निगाह में संपत्ति अर्जन का दूसरा तरीका निकृष्ट है. यह मानवीय स्वतंत्रता के दायरे में अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप करता है. यदि संपत्ति का अंतरण न्यायपूर्ण ढंग से हुआ है, तो उसके आधार पर समाज में असमान आर्थिक वितरण को भी मान्यता देनी होगी. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों को ऐसी आर्थिक असमानता से भी गुरेज नहीं है. यहां वे मानवीय इच्छा के निर्माण में उन वर्चस्वकारी शक्तियों की अदृश्य भूमिका की उपेक्षा कर देते हैं, जो समाजार्थिक असमानता तथा तज्जनित ऊंच-नीच की भावना के वास्तविक कारण होते हैं. वे सामाजिक असमानताओं की बीच पनपते हैं; तथा मनुष्य के सोच पर नकारात्मक असर डालते हैं. जिनके चलते श्रमिक से उसके श्रम के मूल्यांकन का वैध अधिकार देखते ही देखते छीन लिया जाता है. उसके अभाव में मनुष्य का स्वातंत्र्य-बोध शीर्षस्थ शक्तियों का विशेषाधिकार उनकी अनुकंपा तक सिमट जाता है. तदनुसार इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के लिए संपत्ति का असमान वितरण कोई महत्त्व नहीं रखता. चाहे हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुरूप संपत्ति प्राप्त हो अथवा वह कुछेक हाथों में सिमट जाए. वे इसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य के उपहार के रूप में देखते हैं.

इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों की दृष्टि में नियोजित अर्थव्यवस्था उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितनी निजी स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का मान-सम्मान. उसमें व्यक्ति को न केवल संपत्ति-अधिकार, बल्कि संगठन बनाने, मुक्त व्यापार करने की आजादी प्राप्त होती है. शर्त केवल इतनी है कि उसके द्वारा किया गया कार्य विधि-सम्मत होना चाहिए. निजी-अधिकारिता पर जरा-सा अंकुश, मामूली नियंत्रण उन्हें स्वीकार्य नहीं है. पूंजीवाद भी कुछ ऐसा ही चाहता है. उनका मानना है कि व्यक्ति जितना नियंत्रण मुक्त होगा, उतना उसके उपभोक्ताकरण में आसानी रहेगी. यदि वह अकेलापन अनुभव करेगा तो उसके खालीपन को भरने के लिए नई वस्तुओं का बाजार बढ़ेगा. इससे कुल मिलाकर पूंजीपतियों का ही लाभ होगा. उल्लेखनीय है कि उनीसवीं शताब्दी में सुखवादी विचारक भी पूंजीवाद को व्यक्तिमात्र के सुख के विस्तार के लिए जरूरी मानते थे. उनका मानना था कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से समाज-कल्याण में वृद्धि होगी और सुख जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन का ध्येय है, उसका लोग अधिकाधिक भोग कर सकेंगे. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी भी पूंजीवाद का समर्थन करते हैं, लेकिन केवल सुख के लिए नहीं. उनकी दृष्टि में व्यक्ति-स्वातंत्र्य का मूल्य ‘व्यक्तिमात्र के सुख’ से कहीं अधिक है. अधिकारों की समानता को बढ़ावा दिए बगैर भ्रष्टाचार, धोखादड़ी और बाजार की मनमानियों पर रोकथाम असंभव है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों को कल्याण राज्य की अवधारणा भी अमान्य है. कल्याण राज्य के मूल लक्ष्य अर्थात लोगों के भले के लिए अनिवार्य संस्थाओं का गठन, सामाजिक सुरक्षा, श्रम-कल्याण, स्वास्थ्य संबंधी देखभाल, स्वास्थ्य बीमा, रंगभेद तथा लैंगिक पक्षपात पर रोकथाम वाले कानून बना देने से उन्हें संतोष नहीं है. इसके बजाय वे व्यक्तिमात्र की संपूर्ण स्वतंत्रता पर जोर देते हैं. सब आजाद होंगे, परस्पर बराबर होंगे तो समाज में शोषण के लिए जगह न बचेगी—ऐसा वे मानते हैं. उनका यह भी मानना है कि लोगों को पूर्ण संपत्ति अधिकार देने के साथ-साथ इच्छानुसार संगठन बनाने, अपनी निधियों का अपने भले के लिए उपयोग करने की संपूर्ण आजादी होनी चाहिए. मगर उनकी कमजोरी है कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य का पक्ष लेते-लेते कई बार वे अपनी सीमा के पार निकल जाते हैं. ‘अति सर्वत्र वज्र्यते’ की चेतावनी उन्हें याद नहीं रहती. यदि कोई व्यक्ति रंगभेद समर्थक सोच के कारण अपने संस्थान में केवल गोरों को नौकरी पर रखना चाहता है तो, इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार उसे इसका भी अधिकार है. शेष समाज को उसके अधिकार का सम्मान करना चाहिए. बशर्ते उसके कृत्य से किसी हिंसक व्यवहार या दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप न होता हो. ऐसे ही यदि कोई गृह-स्वामी अपने भवन को अपने ही वर्ण के किसी व्यक्ति को बेचना चाहता है, तो उसको भी इसका अधिकार है. उनके अनुसार न्याय की मांग है कि यह अधिकार उन्हें मिलना ही चाहिए. बशर्ते वह दूसरों के जीवन का उतना ही सम्मान करता हो, जितने सम्मान की अपेक्षा वह दूसरों से अपने लिए रखता है. यहां वे भूल जाते हैं कि वर्णभेद या किसी अन्य प्राकृतिक या सामाजिक कारण जो व्यक्ति के नियंत्रण में न हो, से लोगों को उनके वाजिब अधिकारों से वंचित कर देना—उनके जीवन में अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप है. चूंकि कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि उसे उन कारणों के लिए दंडित किया जाए, जो प्राकृतिक होने के कारण उसके नियंत्रण से बाहर हैं, इसलिए इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों की स्वतंत्रता संबंधी अवधारणा में किंचित दोषपूर्ण नजर आती है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की विशेषता जिसे उसका नकारात्मक पक्ष कहा जाएगा, यह है कि रंगभेद, जाति, धर्म अथवा क्षेत्रीयता की भावना से ग्रस्त कोई व्यक्ति यदि अपनी इच्छा और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के बहाने किसी प्रकार का पूर्वाग्रह रखता है, तो इच्छा-स्वातंत्र्यवादी उसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की सीमा में रखकर स्वीकार्य मान लेता है. व्यक्ति रंगभेद की भावनाओं से मुक्त हो, इसके लिए भी व्यक्ति-स्वातंत्र्य की भावना को परम के स्तर तक ऊपर उठाना होगा. यह केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है. समाज का भी दायित्व है कि वह ऐसा वातावरण निर्मित करे जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता और समानता का अधिकतम आनंद ले सके. आशय यही है कि मनुष्य अच्छे हों, इसके लिए समाज को अपनी अच्छाई के उच्च मापदंड स्थापित करने होंगे, ताकि उसके सदस्य अपने भीतर से ही प्रेरणाएं ग्रहण कर सकें. समाज में समानता एवं स्वतंत्रता का उच्चतम स्तर बना रहा तो व्यक्ति की रंग अथवा लिंग के आधार पर पक्षपातपूर्ण निर्णय लेने की इच्छा ही नहीं रहेगी. इस तरह इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक मानव-मात्र के सुख की कल्पना करते हुए उसके आधार पर आदर्श समाज की रचना का सपना देखते हैं. अपनी विचारधारा के प्रति उनका गजब का सम्मोहन है. मानते हैं कि इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के माध्यम से ही मानवीकरण के उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. दूसरी ओर उसके आलोचकों का मानना है कि वह व्यक्ति-स्वातंत्र्य की आड़ में रंग-भेद, लैंगिक असमानता आदि का समर्थन कर, परोक्ष रूप में नकारात्मक अधिकारों की स्थापना करता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक अर्थव्यवस्था के उदारीकरण तथा मुक्त बाजार व्यवस्था का अति की सीमा तक समर्थन करते हैं. ‘लेजेज फेयर’ उनके लिए न केवल अर्थव्यवस्था, बल्कि राजनीति और समाज के लिए भी सर्वाधिक अपेक्षित दर्शन है. व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करते-करते वे अप्रकट रूप में लोक-शिक्षा, नियोजित अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र आदि को ही नकारने लगते हैं. यही उनकी विशेषता है और कदाचित यही उनकी सीमा भी.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के समर्थक विद्वानों में जॉन हास्पर्स के अलावा राबर्ट नॉजिक का नाम भी लिया जा सकता है. बीसवीं शताब्दी का यह अराजकतावादी विचारक न्याय की स्थापना के लिए संपूर्ण स्वाधीनता का समर्थन करता है. इस लक्ष्य-प्राप्ति की राह में वह राज्य की सीमित भूमिका का समर्थन करता है. इसलिए कुछ विद्वान उसे अर्ध-अराजकतावादी भी मानते हैं. जॉन हॉस्पर्स पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थक था. उसने जोर देकर कहा था कि अपने जीवन पर सर्वाधिक अधिकार संबंधित व्यक्ति का है. परिवार, समाज और देश बाद में आते हैं. व्यक्ति-स्वातंत्र्य का आधार ही यह भावना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा का मान रखने, उसको लक्ष्य मानकर उसके अनुरूप आचरण करने का पूरा-पूरा अधिकार है. यह एक व्यक्तिवादी द्रष्टिकोण है. चूंकि सुखवाद और व्यक्तिवाद परस्पर पूरक और सहायक विचारधाराएं हैं, इसलिए अधिकांश इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक स्वयं को सुखवादी दर्शन के करीब मानते थे. वे पूंजीवाद का सीधे समर्थन नहीं करते. सर्व-स्वातंत्र्य का पक्ष एक मुक्त, आत्मनिर्णयी व्यक्ति और समाज की रचना उनका ध्येय है. लेकिन पूंजी के आधार पर समाज में जिस प्रकार का विभाजन स्वाभाविक रूप से आ जाता है, उसपर भी वह कोई विचार नहीं करते. इस तरह वे जाने-अनजाने पूंजीवाद का अप्रत्यक्ष समर्थन करते हुए नजर आते हैं. वे सुखवाद का समर्थन भी इसलिए करते हैं क्योंकि यह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता की राह को आसान बनाता है. मगर कोरे सुखवादी द्रष्टिकोण से समाज में न्याय की स्थापना असंभव है. राबर्ट नॉजिक स्वयं यह मानता था कि सुखवाद न्याय की राह का सबसे बड़ा पत्थर है. यदि सब अपने-अपने सुख की स्पर्धा में होंगे तो उन लोगों के सुख की चिंता जो किसी कारणवश दौड़ से बाहर हैं, अथवा दौड़ में पिछड़ चुके हैं—कौन करेगा! इस तर्क के साथ नॉजिक सुखवादी दर्शन को, विशेषकर न्याय के संदर्भ में, करीब-करीब नकार ही देता है. उसकी पुस्तक ‘अनार्की, स्टेट और यूटोपिया’ जॉन लाक(1632—1704) के मानवाधिकार संबंधी विचारों के आगे का चिंतन है. राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत मानवाधिकारों का पक्ष लेते हुए उसने लिखा था कि मनुष्य प्रकृति से ही मुक्त और समान होता है. प्रकृति से उसे जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति-संबंधी अधिकार प्राप्त होते हैं. उन्हीं के आधार पर वह समाज से जुड़ता है. समाज व्यक्ति की निजी एवं सार्वजनिक इच्छा-आकांक्षाओं का विस्तार है. उसकी स्थिरता, संपन्नता तथा अपनी स्वाधीनता के सुखमय भोग हेतु मनुष्य अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता के एक हिस्से को समाज और सरकार को सौंप देता है. उसी से उन दोनों को वैधता और ताकत प्राप्त होती है. चूंकि सरकार लोगों की इच्छा से बनती तथा उनकी सहमति से चलती है, इसलिए उसका प्रथम कर्तव्य लोगों की स्वाधीनता तथा अधिकारों की रक्षा करना है. राबर्ट नॉजिक जॉन लॉक के प्राकृतिक अधिकारों को स्वीकारता है. उसके अनुसार ये अधिकार मनुष्य होने की कसौटी हैं, इसलिए इनका किसी प्रकार से उल्लंघन मनुष्यता के प्रति अक्षम्य अपराध है. चूंकि सभी के जीवन-संबंधी अधिकार बराबर हैं, इसलिए मनुष्य के संपत्ति-संबंधी अधिकार सामाजिक नैतिकता से बंधे होते हैं. वे तभी तक मान्य हैं जब तक संपत्ति का अर्जन और हस्तांतरण विधिमान्य तरीके से, बगैर किसी हिंसा, धोखादड़ी और क्षोभ के संभव हो सके. नॉजिक के अनुसार संपत्ति अधिकार तथा उनके अंतरण की संबंधी न्याय के तत्संबंधी तीन सामान्य सिद्धांतों द्वारा समझी जा सकती है—

1. यदि कोई व्यक्ति न्याय के सिद्धांतों के अनुसार संपत्ति अर्जित करता है, तो उसको अर्जित संपत्ति को अपने अधीन रखने का अधिकार है, अथवा
2. कोई व्यक्ति किसी संपत्ति को न्याय के सिद्धांत के अनुसार ऐसे व्यक्ति की ओर से अंतरण के दौरान प्राप्त करता है, जिसका उस संपत्ति पर विधिक अधिकार था, तब भी प्राप्तकर्ता अर्जित संपत्ति को अपने अधीन रखने का अधिकारी है.
3. उपर्युक्त दो प्रविधियों के अलावा किसी भी अन्य तरीके से अर्जित की गई संपत्ति अनाधिकृत कब्जे के भीतर मानी जाएगी.

नॉजिक कराधान व्यवस्था का विरोध करता है. सरकार और प्रशासन द्वारा उसके पक्ष में दिए जाने वाले अनेक तर्कों के बावजूद, वह इसे लागू रखने के लिए कतई तैयार नहीं था. उसके अनुसार कराधान की पद्धति ही दोषपूर्ण है. वह मनुष्य की स्वतंत्रता और संपत्ति संबंधी अधिकारों में सेंध लगाती है. ऐसा प्रतीत होता है कि वह कराधान को एक प्रकार की चोरी मानता है. ऐसी चोरी जो सरकार अथवा राज्य द्वारा कानून और अधिकार के नाम पर की जाती है. सरकार टैक्स वसूलने के लिए बलप्रयोग का सहारा ले सकती है. उसके अनुसार मनुष्य के वैध संपत्ति-अधिकार पर, उसकी इच्छा के बगैर हस्तक्षेप करने का अधिकार सरकार समेत किसी को भी नहीं है. तदनुसार गरीबों के लिए निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, भोजन, आवास आदि संबंधी कोई भी गतिविधि जो कराधान के नाम पर जनता से बलपूर्वक ऐंठी गई धनराशि द्वारा संचालित है, अवैध मानी जाएगी. अराजकतावादी नॉजिक का मानना था कि राज्य को अल्पाधिकार संपन्न होना चाहिए. उसका दायित्व नागरिक-कल्याण के लिए बनाए गए विधान को लागू करना तथा अपराध जैसे डकैती, चोरी, धोखादड़ी, लूट-खसोट, मारपीट आदि के मामलों में समाज की रक्षा तक सीमित है. बाकी दायित्व नागरिकों द्वारा अपने विवेक, संगठन, सहकार, स्वातंत्र्यबोध एवं समानता की भावना से संपन्न होने चाहिए. नॉजिक के ये विचार हास्पर्स की भावनाओं से मेल खाते हैं. उसके अनुसार, ‘सरकार की जरूरत केवल विद्रोह या उपद्रव को शांत करने के लिए पड़ती है. विकास अथवा दुनिया को बेहतर बनाने जैसे कार्यों में उसकी कोई भूमिका नहीं है. न ही सरकार का काम फैसला करना है कि उसे किस व्यवसाय से कितना मुनाफा मिल सकता है. उसका कार्य कानून की सहायता से आक्रामक कार्यवाही को नियंत्रित करना है.’6

इन विचारों पर हम ‘लैजेज फेयर’ की छाया देख सकते हैं. नॉजिक के अनुसार ‘राजनीतिक दर्शन की मूलभूत समस्या’ इस तथ्य पर विचार करना नहीं है कि ‘सरकार का स्वरूप कैसा होना चाहिए.’ बल्कि यह देखना है कि ‘क्या सभी के लिए एक राज्य होना चाहिए.’ नॉजिक राज्य के औचित्य पर हालांकि उतनी गंभीरता से सवाल नहीं उठाता, जिस तरह पियरे जोसेफ प्रूधों, मिखाइल बकुनिन जैसे अराजकतावादी उठाते हैं, मगर नागरिक कल्याण और विकास के क्षेत्र में उसकी भूमिका को बहुत सीमित कर देना चाहता है. नॉजिक राज्य तथा उसके उद्देश्यों की समीक्षा को आधुनिक राजनीतिक दर्शन की प्रमुख समस्या मानता था. इस संबंध में वह सतरहवीं शताब्दी के महान अनुभववादी दार्शनिक जॉन लॉक के बेहद करीब था. लॉक का कहना था—‘कुदरती राज्य को शासित करने के लिए प्रकृति के अपने नियम होते हैं.’7 लॉक के अनुसार वह नियम है—‘न्याय.’ जाहिर है कि न्याय यहां व्यापक संदर्भों में प्रयुक्त हुआ है. उसका मूल संदेश है कि दुनिया में, ‘किसी को भी दूसरे के जीवन, स्वतंत्रता तथा संपत्ति को हानि पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है.’8 ‘कुदरती राज्य’ की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए नॉजिक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के अधिकारक्षेत्र में कटौती का सुझाव देता है. उसका कहना था कि नागरिकों में यह भ्रम नहीं फैलाया जाना चाहिए कि उनकी सुरक्षा सरकार के शक्तिशाली होने पर निर्भर है और सरकार जैसे-जैसे शक्तिशाली होगी, उनकी स्वतंत्रता, सुरक्षा और समृद्धि उसी अनुपात में बढ़ती जाएंगी. मनुष्य दूसरे मनुष्य से राज्य के आधार पर नहीं, मुख्यतः प्रकृति, समाज तथा अपनी जरूरतों के आधार पर जुड़ा होता है. उसके अनुसार राज्य की शक्तियों का उपयोग नागरिकों को एक-दूसरे की मदद करने, अपने हितों की स्वयं सुरक्षा करने की सहज-स्वाभाविक प्रवृत्ति के उत्प्रेरक के रूप में किया जाना चाहिए, न कि उनके विरुद्ध अवरोधक शक्ति के रूप में. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता तथा अपने संसाधनों का अपने सुख और स्वतंत्रता के लिए प्रयोग किए जाने के अधिकार को वह खिलाड़ी का उदाहरण देकर समझाने की कोशिश करता है—‘मान लीजिए कोई व्यावसायिक खिलाड़ी किसी टीम के लिए अपनी शर्तों पर खेलने के लिए तैयार होता है. शर्त के अनुसार वह तय कर लेता है कि वह खेल के लिए बिके टिकटों से प्राप्त धनराशि का पांच प्रतिशत लेगा. आयोजक खिलाड़ी के मानदेय या कमीशन को लेकर सौदेबाजी कर सकते हैं. लेकिन बाद में अनुबंध के अंतर्गत प्राप्त होने वाली धनराशि को इच्छानुसार खर्च करने का सर्वाधिकार केवल उस खिलाड़ी को होगा. एक बार अनुबंध कर लेने के बाद टीम प्रबंधन अथवा किसी भी अन्य को यह अधिकार नहीं रह जाता कि वह खिलाड़ी से अनुबंध के तहत मिलने वाली धनराशि के खर्च को लेकर किसी प्रकार का सवाल-जवाब करे.’

बीसवीं शताब्दी में पूंजीवाद के औचित्य को दर्शाने के लिए उसको मानवीय स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखने की कोशिशें लगातार होने लगी थीं. मनुष्य स्वतंत्र है. वह अपनी मर्जी का मालिक है. उसके अपने अधिकार हैं. किसी को उसकी स्वतंत्रता में दखल देने का अधिकार नहीं है—मानवीय स्वतंत्रता और अस्मिता के नाम पर ये बातें खूब उछाली जा रही थीं. राज्य चूंकि जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नाम पर व्यक्तिवाद का नारा तभी सफल हो सकता था, जब राज्य के अधिकार क्षेत्र को सीमित कर दिया जाए. यदि व्यक्तिमात्र अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, वह स्व-चेता, स्व-अनुशासित है तो राज्य की भूमिका अपने आप ही सिमट जाती है. लेकिन आजादी का अभिप्राय यदि केवल अपनी संपत्ति और संसाधनों का मनमाना उपयोग है तब, यह माना जाएगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग उसको पूंजीवादी ताकतों के हाथों का खिलौना बनाने के लिए किया जा रहा है. नॉजिक व्यक्ति को अपनी संपत्ति और संसाधनों के निर्बंध उपयोग का अधिकार देने का जोरदार समर्थन करता है. अप्रत्यक्ष रूप से वह स्वीकार लेता है कि मनुष्य अकेला है. वह भूल जाता है कि स्वतंत्रता का ध्येय व्यक्ति को उसकी निजता के दायरे में कैद कर देना नहीं है, बल्कि समाज में सबके साथ रहते हुए अपने सम्मान, अस्मिताबोध एवं अभिव्यक्ति कौशल को बचाए रखने का अधिकार है. यह स्वतंत्रता की नकारात्मक व्याख्या है. इसपर विचार करते समय नॉजिक समाज कल्याण, शिक्षा जैसे सकारात्मक मूल्यों की एकाएक उपेक्षा कर देता है. दूसरे इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों की भांति कराधान प्रणाली की आलोचना करते हुए वह उसको सरकार की ओर से अवरोधक कार्रवाही मान लेता है, जो उसके अनुसार संपत्ति पर मनुष्य के नैतिक अधिकार में कटौती का काम करती है. तो क्या समाज कल्याण जैसी कोई अवधारणा नहीं है? और जो स्पर्धा में किसी कारण पिछड़ चुके हैं, उनके विकास को लेकर राज्य और समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है? नॉजिक इन प्रश्नों को नजरंदाज कर जाता है. उसका मानना है कि जब राज्य की ओर से न्यूनतम प्रतिबंध होंगे, मनुष्य-मात्र को अपने द्वारा अर्जित की गई संपदा पर अधिकार होगा, तब सभी लोग अपने-अपने विकास के लिए समर्पित भाव से कार्य करेंगे. समाज में सभी को विकास के समान अवसर और स्वतंत्रता रहेगी तो एक भी व्यक्ति विकास के लाभों से वंचित न रहेगा. और समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर होगा जो मनुष्यता का सबसे बड़ा सपना है. इसके लिए वह मनुष्य के अधिकारों की व्याख्या करता है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि नॉजिक की मानवाधिकार संबंधी अवधारणा मुख्यतः संपत्ति पर अधिकार एवं तत्संबंधी स्वतंत्रता पर केंद्रित है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद एवं मानवाधिकार

व्यक्ति विशेष के संदर्भ में स्वतंत्रता सम्मानजनक व्यवहार, जीवन-सुरक्षा, अवसरों की समानता, अभिव्यक्ति तथा अर्जित संपत्ति के ऐच्छिक उपयोग का अधिकार है. किसी समाज में इन अधिकारों की अनुपस्थिति में माना जाएगा कि वहां व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता खतरे में हैं. यहां जिन अधिकारों को स्वतंत्रता का पर्याय माना गया है, वे व्यक्ति के मूलभूत अधिकार हैं. समाज में सम्मिलित होने से पूर्व भी वे मनुष्य को प्राप्त होते हैं. समाजीकरण की आनुपातिक सफलता, समाज में नागरिक अधिकारों की उपलब्धता के स्तर पर निर्भर करती है. उसी से समाज में न्याय की पैठ का अनुमान लगाया जा सकता है. दूसरे शब्दों में अधिकार समाज में न्याय की स्थापना को संभव बनाते हैं. चूंकि ये व्यक्ति के मौलिक अधिकार हैं, इसलिए व्यक्ति को उनके लिए आवाज उठाने तथा आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष करने का अधिकार भी सहज प्राप्त होता है. नॉजिक समाज में न्याय के स्वरूप को लेकर बहुत स्पष्ट न हो, किंतु अधिकारों की उसने जोरदार वकालत की है. वह अधिकारों को न्याय का पर्याय मानता हैं. समाज में, ‘न्याय की पकड़ तभी तक संभव है जब तक वहां मानवाधिकारों का सम्मान होता है.’9—यह बात उसने अनेक संदर्भों के साथ, कई बार-घुमा-फिराकर कही है. उसका मानना है कि अधिकार मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रतीक हैं, आदर्श समाज में ये व्यक्ति को सहजरूप में प्राप्त होने चाहिए. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संपत्ति संबंधी अधिकारों ज्यादा महत्त्व देते हैं. उनका मानना है कि अर्जित संपत्ति पर मनुष्य का पूरा अधिकार है. और राज्य समेत किसी को भी इस अधिकार में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. जो कानूनी रूप से जिसका है, वह उसको सहज-स्वाभाविक रूप में प्राप्त हो—यह इच्छा-स्वातंत्र्यवादी न्याय का आधार-सिद्धांत है. संपत्ति संबंधी अधिकारों को लेकर उनका आग्रह इतना अधिक है कि अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य जो मानवीय स्वतंत्रता का असली पहचान है, कदाचित पीछे छूटा प्रतीत होता है. आगे हम नॉजिक की न्यायाधारित समाज की परिकल्पना में अधिकारों के महत्त्व पर विचार करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि उसकी ‘स्वत्व’ अथवा ‘आत्म-स्वामित्व’ की सैद्धांतिकी क्या है? साथ ही हम इसपर भी विचार करेंगे कि नॉजिक के लिए संपत्ति अधिकार, संपत्ति के मायने तथा उसकी विशिष्टयां क्या हैं?

1. सर्वसुलभ मौलिक अधिकार

नॉजिक के लिए न्यायाधारित समाज की पहली विशेषता है कि उसमें व्यक्ति के मूलभूत अधिकार सुरक्षित होने चाहिए. हालांकि वहां उसका चिंतन केवल संपत्ति संबंधी अधिकारों की विवेचना तक सीमित होकर रह जाता है. उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य का अर्जित संपत्ति पर पूर्णाधिकार है. वह उसको अपनी मर्जी के अनुसार खर्च कर सकता है, दान में दे सकता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक मानते आए हैं कि मनुष्य अपना मालिक स्वयं होता है. नॉजिक की पुस्तक ‘अनार्की, स्टेट एंड यूटोपिया’ में ‘आत्म-स्वामित्व’(सेल्फ आनरशिप) शब्द केवल एक बार, उस समय आता है, जब वह कराधान और बेगार पर चर्चा करता है. उसकी परिभाषा में आत्म-स्वामित्व वह अवस्था है जब स्वामी और वस्तु एक और समान हो. अपने शरीर पर सबसे पहला अधिकार मनुष्य का है. अपने श्रम एवं योग्यता के बल पर वह जो भी अर्जित करता है, उसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए. आत्मस्वामित्व के अलावा वह ‘संपूर्ण स्वामित्व’ की अवधारणा को भी स्पष्ट करता है. उसके अनुसार समाज में न्याय की उपस्थिति तभी संभव है जब व्यक्ति को अपने कमाई पर पूरा अधिकार हो. वह अर्जित संपत्ति को बेचने, अंतरित करने को पूरी तरह स्वतंत्र हो. आत्मरक्षा और संपत्ति की सुरक्षा के लिए शत्रु का प्रतिकार करने, हिंसा को टालने, नुकसान की वैध तरीकों से भरपाई करने का अधिकार व्यक्ति को मिलना चाहिए. यह भी ‘संपूर्ण स्वामित्व की श्रेणी में आता है. संपूर्ण स्वामित्व की दूसरी घटनाएं संपत्ति के अंतरण, सुरक्षा, दंगों तथा किसी भी अन्य प्रकार की आपदा से संपत्ति को होने वाले नुकसान से बचाव के अधिकार के रूप में आता है. यह संपत्ति अधिकार के प्रति दूसरों की विनम्र सहमति, नैतिक सामर्थ्य, तथा संपत्ति के उपयोग को लेकर स्वामी के असीमित अधिकार का प्रतीक होती है. लेकिन ‘संपूर्ण स्वामित्व’ का आशय अर्जित संपत्ति के मनमाने प्रयोग का अधिकार नहीं है. हाकी खिलाड़ी को मैदान में इस बात का पूरा अधिकार होता है कि वह अपनी स्टिक का कमाल दिखाकर प्रतिद्विंद्वी टीम को मैदान में पूरी तरह छका दे. उससे लगातार गोल दागे. लेकिन उसको हाकी स्टिक से प्रतिद्विंद्वी का सिर फोड़ने का अधिकार नहीं दिया जा सकता. व्यक्ति इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र है कि अर्जित संपत्ति का विधिमान्य ढंग से अपने सुख एवं स्वतंत्रता के विस्तार हेतु प्रयोग करे, लेकिन दूसरों को उसके माध्यम से हानि पहुंचाए, यह स्वतंत्रता उसे हरगिज नहीं दी जा सकती. क्योंकि प्रकारांतर में ऐसा करना, दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप है, जिसका इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक विरोध करते हैं. साफ है कि संपत्ति पर संपूर्ण अधिकारिता का भाव भी दूसरे के अधिकार और जीवन का सम्मान करने की भावना से जुड़ा है. उसमें केवल वे वैध उपयोग सम्मिलित हैं, जो बिना दूसरे के जीवन और स्वतंत्रता में अवांछित, अनाधिकार हस्तक्षेप किए बगैर विधिमान्य ढंग से प्रदान किए जाते हैं. इसलिए संपूर्ण स्वामित्व भी समाज द्वारा मर्यादित, नियंत्रित उपयोग लिए होता है. इसलिए कुछ विद्वानों ने इसके लिए ‘सीमित निजी-स्वामित्व’ भी कहा है. हालांकि स्वयं नॉजिक इस शब्द-युग्म के प्रयोग से बचा है. वह निजी संपत्ति को जरूरी मानता है. उसका जोरदार तरीके से समर्थन भी करता है. साथ ही जोड़ देता है कि व्यक्ति बिना दूसरों को किसी भी प्रकार भी प्रकार की क्षति पहुंचाए, उग्रता दिखाए या दूसरों की स्वतंत्रता को बाधित किए निजी संपत्ति के उपयोग हेतु पूरी तरह स्वतंत्र है.

2.  न्यायसंगत अधिग्रहण

संपत्ति के अर्जन को लेकर इच्छा-स्वातंत्र्यवादी दृष्टिकोण पूरी तरह स्पष्ट है. मनुष्य का केवल उसी संपत्ति के उपयोग पर नैतिक अधिकार है, जो उसने न्याय संगत ढंग से अर्जित की हो. ऐसी संपत्ति जो उसने बलपूर्वक हथियाई गई हो, जिसके अर्जन में उसका कोई योगदान न हो, उसके उपयोग का व्यक्ति को कोई नैतिक अधिकार नहीं है. मगर समाज में हर बार आदर्श से काम नहीं चलाया जा सकता. कुछ व्यावहारिक दृष्टिकोण भी अपनाना पड़ता है. मनुष्य दूसरे के श्रम से से अर्जित वस्तु का उपयोग करे, यह उचित नहीं है. किंतु यदि उस अस्वामित्व युक्त संसाधनों, यानी ऐसे संसाधनों द्वारा जिनपर व्यक्ति का वैध अधिकार न हो, की मदद से यदि वह कुछ अर्जित करता है, तब उस उत्पाद पर किसका अधिकार माना जाएगा? न्यायसंगत अधिग्रहण में इसी पर विचार किया गया है. उसके अनुसार ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर अपना दावा करते हुए उससे कुछ अर्जित करता है, उसके लिए उचित है कि अर्जित उत्पाद के बड़े हिस्से को दूसरों के लिए छोड़ दे. यह सीधा-सा व्यावहारिक द्रष्टिकोण है. जिसको मानवीय कमजोरियों के बीच सामंजस्य तथा समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने की अनुकरणीय कोशिश के रूप में भी देख सकते हैं. यह व्यावहारिकता के दबाव ही हैं कि प्रायः सभी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विद्वान अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर कब्जे की स्थिति को स्वीकारते हैं. लेकिन वे उस अस्थायी अधिकार या व्यवस्था को उसी सीमा तक मान्यता देते हैं, जब तक वह कुछ न्यूनतम शर्तों का पालन करता है. उनके इस द्रष्टिकोण की आलोचना भी होती रही है. ‘अनाधिकृत संपत्ति पर अधिकार’ की तीन भिन्न स्थितियों की चर्चा इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों ने की है. उनके अनुसार मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी ऐसे संसाधन पर जो उसके स्वामित्त्व से बाहर है, श्रम करते हुए कुछ अर्जित करता है. अथवा जिसका वह संसाधन है, उसके साथ मिलकर श्रम करते हुए उत्पादन में सहायक बनता है—तब उसका उस उत्पाद पर कितना और किस सीमा तक अधिकार होगा?

बिलकुल भी नहीं….शून्य.’ आलोचक खरा जवाब देते हैं. उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति चैराहे पर खड़ी कार के शीशों की, बगैर उसके स्वामी की अनुमति के आकर सफाई करने लगे तो उसको उस कार का स्वामित्व नहीं दिया जा सकता. इसके समर्थन में यदि कोई यह दावा करे कि इस प्रकार मिला-जुला श्रम आवश्यक है, और समाज में बिना श्रम का साझा किए काम नहीं चलता, तब तो न्याय-संगत अधिकारिता की अवधारणा ही अर्थहीन होकर रह जाएगी. क्योंकि तीसरा अचानक बीच में आकर दूसरे व्यक्ति द्वारा संपत्ति पर बलात् कब्जे को भी बैध घोषित कर सकता है. इससे उस व्यक्ति के अधिकारों का सीधा हनन होगा, जो उत्पादन के लिए वाकई जिम्मेदार है, दूसरे व्यक्ति ने दबंगई दिखाकर जिसके उत्पाद को कब्जाने की कोशिश की है. राजशाही और साम्राज्यवाद में यही होता था. अपने सम्राट या आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए ऐसा सुझाव उनके मुंह-लगे दरबारी प्रायः देते ही रहते थे. यात्रा के दौरान जंगल में एक रात बिता लेने का मतलब यह नहीं है कि आप उसपर स्वामित्व का दावा ठोकने लगें. तीसरे अधिग्रहण अथवा कब्जे के माध्यम से अर्जित संपत्ति पर आवश्यक नहीं कि वह आपके संपूर्ण स्वामित्व वाली ही हो. उनके स्वामित्व को लेकर दूसरे लोगों की भी वैसी ही दावेदारी संभव है. उस अवस्था में वास्तविक स्वामी जानबूझकर या अनजाने ही अपनी दावेदारी पेश करने में चूक भी सकता है. साफ है कि सांसारिक वस्तुओं पर संपत्ति अधिकारिता ऐतिहासिक संदर्भ लिए रहते हैं. यह समस्याएं इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों के समक्ष पहले से ही थीं. नॉजिक ने उसकी सरल और सटीक विवेचना की है.

संपत्ति अधिग्रहण को लेकर राबर्ट नॉजिक ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाता. इस विषय में उसका मन संशयग्रस्त है. वह लॉक से सहमति दर्शाते हुए श्रम के सम्मिश्रण पर अपना ध्यान केंद्रित रखता है. उल्लेखनीय है कि ईसाई परंपरा में समस्त भूमि परमात्मा की मानी जाती है. राजा धरती पर परमात्मा के परम-पुत्र का प्रतिनिधि है. राजा को दैवीय-अधिकार से संपन्न मानने वाले सोलहवीं शताब्दी के अंग्रेजी लेखक राबर्ट फिल्मर ने लिखा था कि परमात्मा ने समस्त भूमि ईसा मसीह को सौंपी थी. मसीह ने उसको नागरिकों के बीच विभाजित कर दिया. फिल्मर के कथन कि परमात्मा ने संपूर्ण धरा ईश्वर के प्रतिनिधि यानी राजा को सौंपी गई थी, का विरोध करते हुए लॉक ने ‘सैकिंड टिट्रीज आन गवर्नमेंट’ में लिखा कि ईश्वर के सामने राजा और प्रजा के प्रश्न उठाने का कोई औचित्य नहीं है. उसके अनुसार परमात्मा ने जमीन सीधे जनसाधारण को उसकी सामान्य देखभाल के लिए सौंपी थी. इसलिए वह स्वामित्व से परे है. प्रत्येक व्यक्ति का उसपर उतना ही अधिकार है, जितना किसी दूसरे का है. किसी व्यक्ति द्वारा शेष समाज की मर्जी के बगैर प्राकृतिक संपत्ति और संसाधनों पर किसी भी प्रकार की दावेदारी अवैध कही जाएगी. तब मनुष्य के बस में क्या है? भू-उत्पाद पर उसकी दावेदारी का आधार क्या हो? लॉक का मानना है कि मनुष्य परिश्रम के जरिये अस्वामित्व युक्त धरा पर निजी अधिकारिता का दावा कर सकता है. ‘सैकिंड ट्रिटीज आन दि सिविल गवर्नमेंट’ के पांचवे अध्याय में वह तर्क देता है—

1. यदि कोई व्यक्ति अपने स्वामित्व युक्त वस्तु को किसी ऐसी वस्तु में मिलाता है, जिसका कोई स्वामी नहीं है, तो वह वस्तु उस व्यक्ति की मान ली जाती है.
2. प्रत्येक मनुष्य को अपने श्रम पर पूरा अधिकार है.
3. इसलिए जब कोई व्यक्ति अपने श्रम को जिसका वह स्वामी है, अस्वामित्व युक्त भूमि से योग करता है तो वह उसपर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है.11

लॉक का ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर संपत्ति-अधिकार के पक्ष में दिया गया यह तर्क दोषपूर्ण था. चूंकि अन्यान्य प्राणियों, वस्तुजगत की भांति मनुष्य भी प्रकृति का ही हिस्सा है. इसलिए शोधन, परिशोधन अथवा रूपांतरण के बहाने व्यक्ति द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर जिन तर्कों के आधार पर निजी अधिकारिता का दावेदारी की जाती है, उसी तरह, उन्हीं तर्कों के आधार पर प्राकृतिक संपदा होने के कारण मनुष्य पर भी प्रकृति या समाज की दावेदारी संभव है. उस अवस्था में मनुष्य की अविकल स्वतंत्रता की अवधारणा खटाई में पड़ सकती है. इन कमियों के बावजूद लॉक का विचार आधुनिक इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विद्वानों को आकर्षित करता है. स्वयं नॉजिक ने भी श्रम-सम्मिश्रण के विचार को दोषपूर्ण माना था. हालांकि वह उसका सार्थक विकल्प देने में असमर्थ रहा था. नॉजिक के अनुसार ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के सिद्धांत की कमजोरी है कि इस आधार पर हुए संपत्ति अंतरण पर स्वामित्व की सीमा के बारे में ठोस समाधान नहीं देता. उदाहरण के लिए मान लीजिए मंगलग्रह की यात्रा पर निकला यात्री उस ग्रह पर उतरने में कामयाब हो जाता है. मंगल की सतह पर उतरने के बाद वह उस स्थल की सफाई करता है. लंबे परिश्रम के बाद वह उस स्थल को साफ और समतल करने में कामयाब हो जाता है. अब यदि मंगलग्रह पर उतरने वाला वह पहला अंतरिक्ष यात्री है तो सवाल उठता है कि श्रम-सम्मिश्रण के सिद्धांत के अनुसार उसका कितनी भूमि पर अधिकार होगा. क्या पूरा मंगल ग्रह उसका मान लिया जाना चाहिए, अथवा केवल वह स्थल जितना उसने साफ किया है? नॉजिक इस प्रश्न को यहीं छोड़ देता है. उत्तर नहीं देता. उसकी ओर एक सुझाव यह भी आता है कि ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के विचार को ही किनारे कर अधिकारिता की समस्या पर व्यक्तिमात्र की मौजूदगी तथा उसकी मूलभूत आवश्यकता को ध्यान में रख, उपयोगितावादी द्रष्टिकोण से विचार किया जाए.

आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि उस समस्या पर विचार कर लिया जाए जिसका हमने ऊपर उल्लेख किया है. यानी अस्वामित्वयुक्त यानी नैसर्गिक संपदा पर निजी अधिकारिता को किस प्रकार परिभाषित किया जाए? उसके वर्गीकरण का आधार क्या हो? ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर व्यक्ति की संपत्ति कितनी और किस सीमा तक उचित है. कुछ विद्वान इसे सीमाहीन मानते हैं. उनके अनुसार यह मनुष्य पर है कि अपनी योग्यता और सामर्थ्य के बल पर वह अस्वामित्वयुक्त वस्तुओं के जितने बड़े हिस्से पर दावा ठोंक सकता है, वह उसका अधिकार है—जो उसको मिलना ही चाहिए. लेकिन उनके आगे भी व्यावहारिक समस्याएं कम नहीं है. ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर मनुष्य जिस संपत्ति पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहता है, संभव है उसके पहले से ही लोग उसका किसी ओर रूप में उपयोग कर चुके हों. उदाहरण के लिए एक किसान जंगल को साफ कर, उसको खेती लायक बनाता है. वह साफ की गई जमीन पर अपने स्वामित्व का दावा भी करता है. लेकिन किसान जमीन को उपयोग में लाने वाला अकेला पहला व्यक्ति नहीं है. यह पूरी तरह संभव है कि उससे पहले भी कुछ लोग उसका उपयोग कर चुके हों. गांव के आसपास खाली पड़ी जमीन का उपयोग लोग पशुओं को बांधने, उपले थापने के लिए करते हैं. बाद में उस जमीन पर कोई व्यक्ति घर बना लेता है, अथवा खेती या कुछ और करने लगता है. यदि प्रथम उपयोग ही स्वामित्व की शर्त है तो बाद में जिसने उस जमीन पर गृह-निर्माण किया है, उसका अधिकार अवैध माना जाना चाहिए. किंतु अवैध कहे जाने की बात तब तक निराधार है, जब तक कि बाकी लोगों को उससे कोई आपत्ति न हो. यदि वह समाज द्वारा मान्य चलन है तो ऐसे संपत्ति अधिकार को मान्यता देनी होगी. हालांकि यह भी संभावना है कि उस संपत्ति अधिकार से शेष लोगों को कोई शिकायत न हो, किंतु हमेशा ही उन्हें कोई शिकायत या नुकसान न होगा, यह कहना बहुत ही कठिन है. यह भी संभव है कि उस कब्जे से केवल संबंधित व्यक्ति को लाभ हो, जबकि बाकी गांव वालों को नुकसान उठाना पड़ रहा हो. क्या उस अवस्था में भी उस व्यक्ति के संपत्ति प्राधिकार को वैध माना जाएगा. इस तर्क के बाद समाधान के लिए नॉजिक पुनः लॉक की ओर देखने लगता है और लॉक ऐसे संपत्ति प्राधिकार को, जिससे दूसरों को हानि पहुंचने की संभावना हो, इस शर्त के साथ स्वीकृति देता है कि दूसरों के लिए भी श्रेष्ठ और पर्याप्त हिस्सा छोड़ दिया जाना चाहिए—

‘बहती नदी से पानी पी लेने से किसी को नुकसान पहुंच सकता है? इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. भले किसी ने उससे आकंठ जल पिया हो. क्योंकि नदी वैसी की वैसी वहां होगी, दोनों की प्यास बुझाने के लिए पर्याप्त. यदि बात दोनों के लिए ठीक-ठाक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भूमि के बारे में भी कही जा सकती है.’12 नॉजिक के अनुसार अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर अधिकार दर्शाने के लिए लॉक के उपर्युक्त प्रतिबंध का पालन किया जाना चाहिए. हालांकि इस तर्क में इतनी खामियां हैं कि स्वयं नॉजिक ही उससे संतुष्ट नहीं हो पाता. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह लिखता है, ‘किसी भी व्यक्ति का स्वामित्व उससे अधिक भला क्यों हो, जितना उसने किसी पदार्थ की मूल्यवत्ता को बढ़ाने में योगदान दिया है.’13 अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वह स्थिति की पूरी व्याख्या करता है. कोई व्यक्ति किसी वस्तु का स्वामित्व हासिल करने के लिए अपना श्रम क्यों लगाता है. शायद इसलिए कि उसके पास केवल उसका श्रम है. उसी के माध्यम से वह अपनी उपयोगिता दर्शा सकता है. जब कोई व्यक्ति अस्वामित्वयुक्त वस्तु पर अपना श्रम लगाता है, जो उसका श्रम उस वस्तु पर छा जाता है. उसका प्रभाव वस्तु पर स्पष्ट झलकने लगता है. श्रम के पश्चात वस्तु ठीक पहले जैसी नहीं रहती. श्रम का यही प्रसार दूसरों के मुकाबले वस्तु पर श्रमिक की दावेदारी को पुष्ट करता है. लेकिन श्रम का स्वरूप क्या हो? क्या किसी भी प्रकार के श्रम से वस्तु पर दावेदारी कर पाना नैतिक होगा. नॉजिक इस एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करता है, ‘मान लीजिए मेरे हाथ में टमाटर के सूप से भरी एक केन है. उस केन को मैं यदि समुद्र की लहरों पर बहा दूं तो सूप के कण समुद्र में दूर तक फैल जाएंगे. क्या उसके आधार पर समुद्र के उतने हिस्से पर, जहां तक टमाटर सूप के कण फैले हैं, मैं अपने स्वामित्व का दावा कर सकता हूं. जाहिर है यह मूर्खतापूर्ण बात होगी.’ इसके बाद वह निष्कर्ष पर आता है कि वही श्रम स्वामित्व दिलाने में सहायक है, जिससे वस्तु के मूल्य में वृद्धि होती है. वह अपनी और समाज की नजरों में अधिक मूल्यवान होता हो. यह एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष है. जो जीवन के उद्देश्य तथा समाज में मनुष्य की उपयोगिता के लिए मार्गदर्शक का काम करता है. कोई कार्य जो केवल व्यक्ति विशेष के लिए मूल्यवान है, बाकी लोगों के लिए व्यर्थ, बल्कि नुकसानदेह तो उसका संसार में उसका वास्तविक मूल्य शून्य है. उदाहरण के लिए उपर्युक्त उदाहरण में ऐसा हो सकता है कि टमाटर सूप को पानी पर बहाना किसी व्यक्ति के लिए खेल हो, उसे उससे खुशी मिलती हो. लेकिन यदि उससे समुद्र में किसी प्रकार का प्रदूषण फैलता है, तो उसका नुकसान पूरे समाज को होगा. जाहिर है कि व्यक्ति का श्रम-उत्पाद न केवल उसके लिए, बल्कि बाकी समाज उपयोगी होना चाहिए, तभी व्यक्ति की उसपर दावेदारी वैध मानी जाएगी. श्रम का सकारात्मक उपयोग, अपने साथ-साथ दूसरों का भी भला देखना ही स्वत्वाधिकार की पहली और आखिरी शर्त है.

3.  न्यायसंगत अंतरण

न्यायसंगत अंतरण संपत्ति पर संपूर्ण स्वामित्व की स्थिति को दर्शाता है. समाज में संपत्ति अंतरण के निकृष्ट रूप भी प्रचलित हैं. उदाहरण के लिए कुछ व्यक्ति चोरी कर, दूसरे के धन को घर ले आते हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इसके लिए धोखादड़ी जैसे आसान किंतु हेय रास्ते का चयन करते हैं. इससे संपत्ति अंतरित होकर उनके कब्जे में चली जाती है. लेकिन उसपर न्यायिक दावेदारी संभव नहीं है. चोर यह कहकर कि उसने संपत्ति संचय के लिए चोरी का सहारा लिया है, उसपर अपनी दावेदारी नहीं कर सकता. न ही कोई धोखेबाज व्यक्ति दूसरों के साथ छल-प्रपंच के आधार पर जुटाई गई संपत्ति को अपना बना सकता है. इसी प्रकार यदि कोई संपत्ति का स्वामी है, मगर उसके अंतरण के लिए तैयार नहीं है. उसकी असहमति के बावजूद यदि उसे संपत्ति-अंतरण हेतु बाध्य किया जाता है, तो उस अवस्था में, भले ही अंतरण की प्रक्रिया विधि-सम्मत हो, स्वामी के इच्छा-विरुद्ध वस्तु के अंतरण को न्यायिक नहीं कहा जा सकता. यदि उस वस्तु से व्यापक लोकहित जुड़े हैं तथा अंतरण की प्रक्रिया विधि-सम्मत है तब भी व्यक्ति को उस अंतरण के लिए राजी करना न्याय-भावना के अनुसार अपेक्षित होगा. ऐसे राज्य में जो न्याय-मार्ग पर होने की दावेदारी करता है, अंतरण हेतु वैध प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है. तदनुसार संपत्ति पर स्वामित्व के अंतरण के लिए आवश्यक है कि उसे स्वेच्छापूर्वक, वैध, न्याय-सम्मत प्रक्रिया के माध्यम से संपन्न किया जाए. यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति या संसाधन पर अधिकार रखता है, उसका अधिकार विधिसम्मत तथा समाज द्वारा मान्य है, तभी वह उसको किसी दूसरे को अंतरित करने का अधिकार भी रखता है. श्रमिक के मामले में यदि कोई श्रमिक किसी कार्य को स्वेच्छापूर्वक करने के लिए तैयार नहीं है, तब उसकी मर्जी के बिना कार्य करने के लिए बाध्य किया जाना, इस विचारधारा के अंतर्गत अमान्य है.

एक स्थिति यह भी हो सकती है कि कोई व्यक्ति अपने स्वामित्वयुक्त वस्तु को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से किसी व्यक्ति को अंतरित करना चाहता हो, किंतु दूसरा व्यक्ति उसे लेने के लिए तैयार न हो. नॉजिक जोर देकर कहता है कि संपत्ति अंतरण की वैधता हेतु दाता की सहमति अनिवार्य है. लेकिन लेने वाले की सहमति? यदि कोई व्यक्ति किसी दान या उपहार को लेना न चाहे, तब? इस स्थिति को वह पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाता. लेकिन वह जोर देकर कहता है कि क्रेता को उस अवसर पर उपस्थित अवश्य होना चाहिए. मौन को सहमति का पर्याय मानते हुए वह इस निर्णय पर पहुंचता है कि संपत्ति अंतरण की प्रक्रिया के दौरान क्रेता की सहमति भी अनिवार्य है. यानी कोई व्यक्ति कहे कि उसने संपत्ति का स्वेच्छापूर्वक अंतरण किया है, मगर संबंधित व्यक्ति उसे स्वीकार करने से इन्कार कर दे, तब अंतरण की प्रक्रिया को अपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में अंतरण-प्रक्रिया को भली-भांति संपन्न होने के लिए क्रेता के साथ-साथ विक्रेता की सहमति भी अनिवार्य है. यह कार्य दोनों के हितों को ध्यान में रखकर शांतिपूर्वक और विधिसम्मत ढंग से किया जाना चाहिए. नॉजिक के अनुसार जो शर्तें किसी वस्तु के अर्जन पर लागू होती हैं, वही शर्तें उसकी बिक्री या अन्य किसी अंतरण पर भी लागू होती हैं. उदाहरण के लिए यदि किसी शर्त के अधीन किसी को दुनिया में कहीं से भी पेयजल लेने से प्रतिबंधित कर दिया है, तो इस नियम की पूर्वापेक्षा और शर्त के अनुसार उस व्यक्ति के लिए पेयजल की बिक्री भी स्वाभाविक रूप से प्रतिबंधित होगी. दूसरे शब्दों में यदि किसी व्यक्ति के लिए कोई वस्तु निषिद्ध मान ली गई है, तो उसके उपयोग की छूट, उस व्यक्ति को किसी भी प्रकार से नहीं दी जा सकती. कुछ स्थानों पर हम नॉजिक को अस्पष्ट और धुंधला पाते हैं. वस्तुविशेष के स्वामित्व को लेकर यह दावा प्रायः किया जाता है कि उसमें सभी अधिकार पूर्ण अंतरणीय हैं. लेकिन यह सोचा-विचारा सत्य नहीं है. ऐसे अनेक उदाहरण खोजे जा सकते हैं जिसके अनुसार व्यक्ति के पास किसी वस्तु को अपने पास रखने का अधिकार हो, किंतु उसके अंतरण का अधिकार उसके पास न हो. मसलन, किराये का मकान, जिसमें व्यक्ति रह सकता है, उसपर अपने तात्कालिक कब्जे की दावेदारी कर सकता है, अपने सामर्थ्य के अनुसार उसकी मरम्मत, सजावट आदि पर धनराशि भी खर्च कर सकता है, किंतु उसे बेचना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर होता है. आशय है कि यदि व्यक्ति का संपूर्ण स्वामित्व किसी वस्तु पर है, तभी उसे उस वस्तु को बेचने अथवा इच्छानुसार अंतरित करने के वाजिब अधिकार प्राप्त होंगे. एक तरह से वह वस्तु उसकी दास के समान होगी. उसके बारे में संपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार, उसका स्वामी होने के कारण उसके पास माना जाएगा. किसी को अनाधिकार बेचना, अथवा वैध स्वामी की इच्छा के बिना, वस्तु का मूल्य चुकाए बगैर उसे अपने स्वामित्व में लेना अनैतिक एवं स्वामित्व के सिद्धांत का उल्लंघन है. दूसरे शब्दों में वस्तु का संपूर्ण स्वामित्व प्राप्त करने के लिए वस्तु के वर्तमान स्वामी की सहमति जुटाना, फिर उसका उपयुक्त मूल्य चुकाना आवश्यक है. इनमें से एक भी अभाव, अथवा आंशिक विचलन से भी संपूर्ण स्वामित्व खतरे में पड़ सकता है. न्याय की मांग है कि वस्तु का अंतरण संपूर्ण स्वामित्व से संपूर्ण स्वामित्व के लिए हो. यदि कोई सोचता है कि न्याय का मुख्य उद्देश्य वस्तु-विशेष पर संपूर्ण स्वामित्व की रक्षा करना, अथवा स्वामित्व को बढ़ावा देना, अथवा उसके लिए प्रभावी कोशिश करना है, उस अवस्था में स्वैच्छिक दासत्व समस्या हो सकती है. इसपर यदि कोई यह सोचता है कि न्याय का मूल उद्देश्य केवल स्वायत्तता को बचाए रखने की कवायद है, तब भी वह गलती पर है. उदाहरण के लिए अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए सोच-समझकर खुद की बोली लगवाना, खुद की नीलामी पर उतर आना—केवल स्वायत्तता की कवायद मानी जाएगी. हालांकि इस तरह से किसी व्यक्ति द्वारा अपनी स्वायत्तता के विचार को लागू करना, उसकी चरम कार्रवाही कहा जाएगा. आदर्श समाज में ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

4.  न्यायिक संशोधन एवं निवारण

न्याय सौगात नहीं है. न ही समाज में हमेशा सब कुछ शुभ और शांतिमय होता है. प्रत्येक समय समाज में अनुकूल एवं विरोधी शक्तियां कार्यरत रहती हैं. वे कभी मनुष्य के कर्तव्य पालन में सहायक बनती हैं तो कभी विरोध पर उतर आती हैं. इसलिए न्याय का एक रूप संघर्ष का भी है. समाज चाहता है कि वहां न्याय के लिए कभी कोई खतरा न हो. यानी न तो व्यक्ति किसी दूसरे के अधिकारों के लिए संकट का कारण बने, न ही कोई उसके अधिकारों के लिए संकट की जमीन तैयार करे. यह आदर्श स्थिति है. व्यवहार में समाज में संघर्ष की स्थितियां बनी रहती हैं. राज, समाज किसी के लिए भी यह संभव नहीं होता कि वह चैबीस घंटे व्यक्ति के अधिकार-संरक्षण तथा कर्तव्यपालन के प्रेरणा में लगा रहे. इसलिए व्यक्ति को अपने अधिकारों और अस्तित्व पर संकट के समय, आत्मरक्षा अथव संपत्ति की सुरक्षा के लिए समयानुसार प्रतिकार करने की छूट दे दी जाती है. यह सामाजिक गतिविधियों में संशोधन एवं निवारण के दौरान न्याय की स्थिति को दर्शाती है. राबर्ट नॉजिक के अनुसार व्यक्तिमात्र को यह आजादी होती है कि वह अपने अधिकार, संपत्ति और जीवन की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर उपयुक्त बलप्रयोग कर सके, मगर यह ध्यान रखते हुए कि संकट अथवा आसन्न आपदा की स्थिति में दूसरों को भी वही अधिकार उपलब्ध होंगे. यदि ‘क’ को ‘ख’ द्वारा किए गए दुराचरण से नुकसान उठाना पड़ा है तब, ‘क’ को उसका समयानुसार प्रतिरोध करने तथा नुकसान की स्थिति में ‘ख’ से क्षतिपूर्ति का दावा करने का पूरा अधिकार होगा. इसके बावजूद यदि ‘ख’ का दुराचरण बना रहता है, तब ‘क’ को उसे कानून द्वारा अथवा सीधे ही दुराचरण के लिए दंडित करने का अधिकार होगा. ये अधिकार सामाजिकता की नींव हैं तथा सभी सदस्यों को बराबर होते हैं. उपर्युक्त उदाहरण की ही बात करें तो यदि किसी भी क्षण ‘क’, ‘ख’ के साथ दुराचरण में लिप्त पाया जाता है तो ‘ख’ को भी अधिकार होगा कि वह ‘क’ को दंडित कर सके, और यदि उसके आचरण से उसको क्षति पहुंची है तो अपनी क्षतिपूर्ति के लिए दावा कर सके.

नॉजिक की खूबी है कि अपने विवेचन में वह न केवल मानव-व्यवहार की दुर्बलताओं पर विचार करता है, बल्कि मानवीय स्वतंत्रता के दायरे में उनका समाधान भी सुझाता है. अपने सूक्ष्म विवेचन सामर्थ्य से वह जहां अनेक गंभीर मुद्दों का समाधान देता है, वहीं कुछ मुद्दों को अनसुलझा ही छोड़ जाता है. व्यक्ति को अपनी प्राणरक्षा, संपत्ति रक्षा का अधिकार है, आवश्यकता पड़ने पर वह अपने ऊपर होने वाले किसी भी प्रकार के हमले का प्रतिकार कर सकता है. और यदि किसी के आचरण से उसको नुकसान पहुंचा है तो उस नुकसान की भरपाई की दावेदारी भी कर सकता है. मनुष्य को ये अधिकार कुछेक परंपरागत समाजों को छोड़कर, प्रायः सभी आधुनिक समाजों में प्राप्त हैं. इसके बावजूद विद्वानों के एक वर्ग को नॉजिक के अति-व्यक्तिवादी सोच से आपत्ति है. यह आपत्ति अकेले नॉजिक से नहीं, लगभग सभी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों से है. उन्हें लगता है कि संपत्ति अधिकार को लेकर व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करते हुए वे इतनी आगे निकल जाते हैं कि उसके विचारों में व्यक्तिवाद उन्मुक्त और उच्छ्रंखल दिखने लगता है. इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षतिपूर्ति की दावेदारी का अधिकार है. लेकिन क्षतिपूर्ति की सीमा क्या हो? इसको तय करने का अधिकार किसे होगा? क्या केवल उसको जिसे क्षति पहुंची है? यदि वह अपनी क्षति का बढ़-चढ़कर मूल्यांकन करता है तब क्या होगा? ऐसे में यदि सरकार कानून के माध्यम से हस्तक्षेप करती है तो क्या उसका प्रयास व्यक्ति-स्वातंत्र्य के दायरे में अनावश्यक माना जाएगा? ऐसे प्रश्नों पर प्रतिक्रिया बहुत विलंब से मिल पाती है. राबर्ट नॉजिक की ओर से अपराध के लिए दूसरे को दंडित करने का सुझाव पर बहुतों को आपत्ति है. उनके अनुसार व्यक्ति को अपने ही स्तर पर दंड सुनाने का कोई अधिकार नहीं है. क्योंकि नुकसान की भरपाई किस सीमा तक हो? यदि यह उस व्यक्ति पर छोड़ दी जाए जिसका नुकसान हुआ है, तो वह सही है या गलत इसका निर्णय कौन करेगा? अभियुक्त को दंडित करने का अधिकार प्रभावित मनुष्य को एकाएक नहीं दिया जाता. ऐसे मामलों में राज्य की उपस्थिति जरूरी मानने से हालांकि व्यक्ति-स्वातंत्र्य की भावना को ठेस पहुंच सकती है, लेकिन इससे स्वार्थ के वशीभूत हो, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को हानि पहुंचाए जाने की संभावना में भी कमी आती है. यह ऐसा मोड़ है जहां इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की सीमा साफ नजर आने लगती है. नॉजिक बड़े परिश्रम से व्यक्तिमात्र के संपूर्ण स्वातंत्र्य का पक्ष लेता है, किंतु संपत्ति के संरक्षण तथा समस्याओं के सीधे निवारण में इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की जो दुर्बलताएं हैं, वे थोड़ा-सा विचार करने पर सामने आ ही जाती हैं..

राबर्ट नॉजिक ने कराधान पद्धति की आलोचना की है. लोगों से कराधान जुटाकर उसी धनराशि से पुलिस को पोसना, यह लोगों की नैसर्गिक स्वाधीनता पर डाका डालना है. लेकिन शासन और सरकार चलाने के लिए तो धन चाहिए. नॉजिक इसके लिए लोगों को जागरूक करने की बात करता है. लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का बोध होगा, साथ में यह विश्वास होगा कि उनकी स्वाधीनता अक्षुण्ण है. समाज में रहकर उनकी संपत्ति और अधिकारों को कोई खतरा नहीं है, तो वे स्वयं अनुशासित होकर काम करेंगे. लेकिन समाज में अनुशासन और शांति-व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त राज्य के और भी दायित्व होते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, अभिरक्षा जैसे बहुत से मामले हैं जिन्हें बढ़ावा देना राज्य का पुनीत कर्तव्य माना जाता है. उनके लिए धन की आपूर्ति कहां से होगी? नॉजिक इसके लिए दान और स्वैच्छिक सहयोग का समर्थन करता है. यहां नॉजिक और हास्पर्स के विचारों में समानता देखी जा सकती है. जॉन हास्पर्स भी मानता था कि सरकार का एकमात्र कार्य ‘उपद्रव आदि के समय लोगों के जान-माल की रक्षा करना है.’ लेकिन उपद्रवियों पर काबू पाने के सरकार के पास समुचित शक्ति और अधिकारों का होना जरूरी है, ताकि अवसर पड़ने पर वह न्यायकर्ता की भूमिका भी निभा सके. इन सब कार्यों के लिए सरकार के पास धन आना चाहिए. हास्पर्स के अनुसार उपयुक्त तो यही है कि कानून और व्यवस्था के लिए सरकार को धन की आपूर्ति नागरिकों के स्वैच्छिक सहयोग और दान की भावना से हो. यदि कराधान का सहारा लेती है तो कर-राशि का उपयोग केवल समाज में शांति और सुरक्षा के विस्तार के लिए किया जाना चाहिए. वह जोर देकर कहता है—‘समाज में कानून और व्यवस्था कायम रखने के अलावा किसी और कार्य के लिए जनता से धन जुटाने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है.’ नॉजिक का न्यायदर्शन एक आदर्शवादी उद्गार है. एक भावुक मन का सर्वशुद्धतावादी सपना. एक ऐसा विचार जिसे मानवतावादी समय-समय पर देखते आए हैं. उसकी कुछ सीमाएं हैं. अनेक समस्याएं ऐसी हैं जिनपर नॉजिक विचार करने से बचा है. इसके बावजूद उसके विचारों में एक आदर्श, मानवतावादी समाज के गठन का सपना मौजूद है. कुल मिलाकर इच्छा-स्वातंत्र्यवाद मनुष्य के अधिकार, स्वतंत्रता और एक आदर्श समाज के सपने को बहुत ही आसान भाषा में दुनिया के सामने लाता है. नथानियल ब्रांडेन के शब्दों में, ‘इच्छा-स्वातंत्र्यवाद बहुत सरल, स्पष्ट, आसान भाषा में लिखा हुआ दर्शन है, जिसे समझने के लिए किसी विशेष तकनीकी योग्यता की आवश्यकता नहीं है. यह जानकारीपरक और आनंददायक पाठ है.’14

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. To live honorably, to harm no one, to give to each his own.” Ulpianus in Digesta of Justinianus Augustus, 1.1.10.1
2. The sovereign is not bound by the laws.-Ulpianus, Digesta 1.3.31.
3. Justice is the constant and perpetual will to render to every man his due.” Digesta 1.1.10.
4. Political theories past and present have traditionally been concerned with who should be the master (usually the king, the dictator, or government bureaucracy) and who should be the slaves, -John Hospers, What Libertarianism Is.
5. No one is anyone else master, and no one is anyone else slave. Since I am the one to decide how my life is to be conducted, just as you decide about yours, I have no right (even if I had the power) to make you my slave and be your master, nor have you the right to become the master by enslaving me. Slavery is forced servitude. Ibid
6. Government should intervene only in a RETALIATORY situation. The government must never INITIATE an action to create a better world — it is not the business of government to make an advance decision about what counts as benefit. Through laws, government can prohibit various aggressive actions, but it cannot require the bringing about of supposedly beneficial ones. John Hospers, What Libertarianism Is.
7. The state of Nature has a law of Nature to govern it.- John Locke, Second Treatise on Civil Government.
8. …no one ought to harm another in his life, liberty, and or property-Ibid.
9. justice to hold just in case rights are respected. -Peter Vallentyne in Nozick’s Libertarian Theory of Justice
10. a right is something for which one can demand or enforce compliance” Nozick in Philosophical Explanations ,1981, p. 499.
11. a. If one mixes what one owns with something that is unowned, one thereby comes to own the unowned thing.
b. Each person owns her own labor.
c. If one mixes one’s labor with unowned land, one thereby comes to own the land.
12. No body could think himself injured by the drinking of another man, though he took a good drought, who had a whole river of the same water left him to quench his thirst: and the case of land and water, where there is enough of both, is perfectly the same.-John Locke: Second Treatise of Civil Government, Chapter 5.
13. Why should one’s entitlement extend to the whole object rather than just to the added value one’s labor has produced?- Nozick, Anarchy, State, and Utopia, p. 175.
14. “Libertarianism is very simply and clearly written and requires no technical knowledge on the part of the reader. Enjoyable, informative reading.”- Nathaniel Branden, as quoted by John Hospers in Libertarianism: A Political Philosophy for Tomorrow.