Tag Archives: Plato

अरस्तु का न्याय-दर्शन

सामान्य
समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है.

न्याय की व्याख्या करते हुए अरस्तु उसके दोनों रूपों पर विचार करता है. पहला वह जिसके बारे में सामान्यजन सोचता है कि न्याय कानून के तत्वावधान में अदालतों के जरिये प्राप्त होता है. इसके साथसाथ वह मनुष्य के आचरण एवं व्यवहार की व्याख्या करता है. न्याय का यह रूप नागरिक और राष्ट्रराज्य के कानून के अंतर्संबंध को दर्शाता है. उन अनुबंधों की ओर इशारा करता है, जिनसे कोई नागरिक सभ्य समाज का नागरिक होने के नाते जन्म के साथ ही जुड़ जाता है. प्रकारांतर में वह बताता हे कि आदर्शोंन्मुखी समाज में मनुष्य का आचरण एवं कर्तव्य किस प्रकार के होने चाहिए, ताकि समाज में शांति, सुशासन और आदर्शोन्मुखता बनी रहे. प्रायः सभी समाजों में कानून को नकारात्मक ढंग से लिया जाता है. बातबात पर कानून का हवाला देने वालीं, उसके अनुपालन में लगी शक्तियां प्रायः यह मान लेती हैं कि बुराई मानवस्वभाव का स्थायी लक्षण है. जो बुरा है, उसे केवल दंड के माध्यम से बस में रखा जा सकता है. कि मानवव्यक्तित्व पर आज भी अपने उन पूर्वजों के लक्षण शेष हैं जो कभी जंगलों में जानवरों के बीच रहा करते थे. कुछ व्यक्तियों में पाशविक वृत्ति ज्यादा प्रभावी होती है. ऐसे लोगों पर बलप्रयोग उन्हें अनुशासित रखने का एकमात्र उपाय है. इसलिए सभ्यताकरण के आरंभ से ही दंडविधान की व्यवस्था प्रत्येक समाज और संस्कृति में रही है. इसे पुष्ट करने के लिए धर्म और संस्कृति से जुड़े ऐसे अनेक किस्से हैं, जिनसे हमारा संस्कार बनता है. स्वर्गनर्क की कल्पना भी इसी का हिस्सा है. उनमें से अधिकांश पर विजेता संस्कृति का प्रभाव है. आधुनिक संदर्भों में वह भले ही लोकतंत्र और मानवस्वातंत्र्य का विरोधी हो, प्राचीन इतिहास, धर्म और संस्कृति का हिस्सा होने के कारण उसे धरोहर के रूप में सहेजा जाता है.

प्राचीनकाल में जब अदालतें नहीं थीं, तब न्याय करने की जिम्मेदारी बस्ती के मुखिया या समूह के वरिष्ठ सदस्य जिसकी निष्पक्षता असंद्धिग्ध होकी होती थी. इस्लामी शासन के दौरान यह जिम्मेदारी काजी के कंधों पर आ पड़ी. राजशाही में राजा को सर्वेसर्वा माना जाता था. दरबार में आए मामलों की सुनवाई के लिए न्यायाधिकारी और दंडाधिकारी दोनों की जिम्मेदारियां वही संभालता था. दंडविधान का आधार परंपरागत अथवा लिखितअलिखित विधिसंहिताओं को बनाया जाता था. किसी न किसी रूप में वे सभी धार्मिक उपादानों द्वारा शासितअनुशासित होती थीं. उसका लाभ धार्मिक कार्यकलापों में लिप्त ‘धंधेबाज’ उठाते थे. उदाहरण के लिए भारत में एक जैसे अपराध के लिए ब्राह्मणों तथा शूद्रों के लिए अलगअलग दंडविधान था. ब्राह्मणों को मृत्युदंड निषिद्ध था, जबकि ब्राह्मणेत्तर वर्गों के लिए इस तरह की कोई पाबंदी न थी. चूंकि दिए गए दंड के विरुद्ध अपील के बहुत कम अवसर थे, इसलिए जनसाधारण मजबूरी में दैवीय न्याय की उम्मीद करने लगता था. आज भी ऐसे लोग कम नहीं हैं. उनका मानना है कि एकमात्र ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है. जिन्हें अपराधी होने के बावजूद इस जन्म में दंड नहीं मिला, वे ईश्वर के दरबार में अवश्य ही दंडित किए जाएंगेइस विश्वास के साथ साधारणजन बड़े से बड़े अनाचार को पचाते चले जाते थे. आधुनिक समाजों में न्याय की जिम्मेदारी अदालतों पर होती है. उनका आचरण संवैधानिक मर्यादाओं से आबद्ध रहता है. इसलिए यह व्यवस्था न्याय के अपेक्षाकृत अनुकूल है. इसके अनुसार राज्य अपने नागरिकों से अपेक्षा करता है कि वे कानून सम्मत व्यवहार करें, ताकि राज्य को उनके जीवन में हस्तक्षेप की आवश्यकता ही न पड़े. जो व्यक्ति अपने आचरण द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में अमर्यादित हस्तक्षेप करता है, वह राज्य को अपने जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दे देता है. दूसरों के जीवन में अवांछित और अमर्यादित हस्तक्षेप को राज्य अपराध मानता है. दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी निजता का अधिकार भी गंवा देता है. तदनुसार राज्य को समाज द्वारा प्राप्त शक्तियों के बल पर उस व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः हासिल हो जाता है. चूंकि राज्य पर समाज में शांति और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी होती है, इसलिए वह अपराधी के विरुद्ध दंडनीति के तयशुदा प्रावधानों के अनुसार कार्रवाही करता है. न्याय का यह लोकप्रचलित रूप व्यक्ति के कर्तव्य पालन से जुड़ा है, जिसमें विचलन होते ही दंडनीति प्रभावी हो जाती है. प्रायः इसे सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. जनसाधारण न्याय के इसी रूप से सर्वाधिक प्रभावित होता है.

न्याय का दूसरा रूप कानून और अदालतों से प्राप्त होने वाले न्याय से अलग है. पहला जहां राज्य के अधिकारपक्ष के निकट है, दूसरा उसके कर्तव्य पक्ष की महत्ता एवं कार्यक्षेत्र को व्यापकता दर्शाता है. सिसरो के अनुसार राज्य जनता का सर्वाधिकार है. चूंकि राज्य का गठन लोगों द्वारा सामान्य हितों की पूर्ति हेतु किया जाता है, अतएव उसका वही कृत्य न्यायपूर्ण कहा जाएगा, जो उसके द्वारा संपूर्ण विवेक, निष्पक्षता, समानता और सर्वजन के विकास की चाहत के साथ उठाया जाता है. वह राज्य की नैतिकता तथा उसके गठन के औचित्य को दर्शाता है. अरस्तु इसे और भी स्पष्ट कर देता है. उसके अनुसार अन्याय केवल दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप, उसका प्रताड़न; अथवा मान्य कानूनों का उल्लंघन करने तक सीमित नहीं है. बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन करना, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर देना, जो नागरिकों के प्रति राज्य का कर्तव्य भी हैंअन्याय की सीमा में आता है. आखिर मनुष्य के अधिकारों की पहचान कैसे हो? इस बात में कैसे अंतर किया जाए कि जो अधिकार किसी एक व्यक्ति का है, वह दूसरे का भी है अथवा नहीं है? तथा उनके आकलन की कसौटी क्या है?

सवाल और भी हैं. जब हम कहते हैं कि भरपेट भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार है? सभ्य समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से प्राप्त होनी चाहिए, तो इस तर्क का आधार क्या होता है? क्यों न मान लिया जाए कि जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से सफल होते हैं, उसके पीछे उनकी अपनी मेहनत और प्रतिभा का भी कमाल होता है. लोकहित में आवश्यक है कि समाज के सभी सदस्य एकदूसरे के हितों का ध्यान रखें. लेकिन यह भी जरूरी है कि योग्य व्यक्ति को उसकी योग्यता का लाभ खुद भी प्राप्त हो. परंतु इतनेभर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता. मान लीजिए, दो मजूदर किसी कारखाने में काम करते हैं. उनमें एक की क्षमता दस नग प्रतिदिन तैयार करने की है. दूसरा उतने ही समय में बीस नग बना देता है. तो जो कारीगर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, उसके उत्पादन क्षमता का लाभ दस नग प्रतिदिन बनाने वाले के साथ बांट देना क्या उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? यदि किसी व्यक्ति को लगे कि उसके उत्पादन का लाभ उसे नहीं मिल रहा है, तो क्या वह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ लगातार काम कर पाएगा? अपने लाभ को दूसरों में बंटते देख क्या वह हतोत्साहित नहीं होगा? चलताऊ ढंग से सोचें तो बात एकदम सच जान पड़ेगी. पूंजीवादी अर्थतंत्र कहता है, श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ मिले. दावा करता है कि केवल वही है जो श्रमिक को उसके श्रम का पूरा लाभ दिला सकता है. लाभ का आकलन केवल भौतिक मुद्रा के आधार पर करने वाले पूंजीवाद की निगाह में यही न्याय है. ऐसे ही तर्क देकर वह श्रमिकों को बांटे रखता है. वहां इसे स्पर्धा का नाम दिया जाता है. परिणाम यह होता है कि जो मजदूर बीस नग प्रतिदिन बनाता है, वह निरंतर आगे निकलता जाता है. जबकि दस नग बनाने वाला कारीगर स्पर्धा में पिछड़ता चला जाता है. वृहद संदर्भों में यह स्पर्धा दो कारखानों के बीच भी देखी जा सकती है. चूंकि समाज में विशिष्ट लोगों की संख्या बहुत कम होती है, अधिकांश दस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार जितने ही कार्यक्षम होते हैं. इसलिए अपने उत्पाद का सारा लाभ खुद रखने वाला कामगार स्पर्धा में निरंतर आगे निकलता चला जाता है. इससे समाज में आर्थिक विभाजन बढ़ता चला जाता है. इसका समाधान क्या है? अरस्तु इतना उदार नहीं है कि वह बीस नग बनाने वाले के श्रमलाभों वाले कामगार के लाभ को दस नग प्रतिदिन बनाने वाले श्रमिकों के बीच बांटने पर सहमत हो जाए. इस असमानता को वह प्राकृतिक मानता है. अरस्तु के समय में मौद्रिक लाभ की अवधारणा इतनी पुष्ट नहीं थी, जैसी वह आज है. इसलिए उसका समाधान भी आज के संदर्भों में ही खोजना पड़ेगा.

ऊपर के उदाहरण में मान लिया गया है कि बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कारीगर की उत्पादन क्षमता केवल उसकी अपनी उपलब्धि है. यहां व्यक्ति के कौशलनिर्माण में उसके परिवेश के प्रभाव जो एक तरह से उसका योगदान ही है, बिसरा दिया गया है. मनुष्य और उसके समाज के बीच का संबंध आपसी लेनदेन का होता है. जो समाज को अधिक लौटाते हैं, या जिनसे समाज को अधिकाधिक लौटाने की अपेक्षा की जाती है, वे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज से अधिक ग्रहण भी करते हैं. यदि किसी विद्वान की बात करें तो पहले वह पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान का अध्ययनमनन करता है, तदनंतर अपने विचारों को सामने लाता है. इस तरह से वह अपने पूर्ववर्ती विद्वानों का कर्जदार होता है. अतएव जो व्यक्ति समाज से जितना अधिक ग्रहण करता है, समाज को उसी अनुपात में वापस लौटाना उसका कर्तव्य भी है. इसमें मौद्रिक लेनदेन आवश्यक नहीं है. इसलिए इसका समाधान भी अकेले मौद्रिक लेनदेन द्वारा संभव नहीं है. उचित यही है कि मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ की अवधारणा को स्थापित किया जाए. शांति और खुशहाली के लिए आवश्यक है कि समाज में आर्थिक विभाजन न्यूनतम हो. कुशल कामगार को यह समझाया जाए कि उसकी उपलब्धियां केवल उस अकेले की नहीं हैं. उनमें उसके परिवेश जिसमें उसके मित्र, संबंधी, पड़ोसी यहां तक कि दुश्मन भी सम्मिलित हैं, सभी का साझा है. इसी तरह धनपति को मालूम होना चाहिए कि उसके लाभ पर सिर्फ उसका अधिकार नहीं है, उन श्रमिकों और कारीगरों का भी योगदान है, जो रातदिन मेहनत करने अपने मालिक की समृद्धि को संभव बनाते हैं. अरस्तु राज्य से अपेक्षा रखता है कि दस नग बनाने वाले को निरंतर प्रोत्साहित करता रहे. और बीस नग प्रतिदिन बनाने वाले कामगार को इस बात के लिए राजी करे कि वह मौद्रिक लाभों के बजाए सामाजिक लाभों पर भी ध्यान दे, ताकि दो भिन्न उत्पादनक्षमता वाले कामगारों के बीच अधिकतम समानता संभव हो सके.

समाजीकरण मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है. यदि केवल किसी एक व्यक्ति के सुखदुख, गुणदोष का मामला हो तो समाजीकरण की आवश्यकता ही न पड़े. समाज न तो विशिष्ट व्यक्ति की चयन है, न ही व्यक्तियों की विशिष्ट पसंद. मनुष्यों की सामूहिक सृष्टि है. उसका सृजन सामूहिक रूप से सर्वकल्याण के उद्देश्य से किया जाता है. समाज की जरूरत उस व्यक्ति को भी पड़ती है, जिसकी आवश्यकता व्यक्ति के अस्तित्व से जुड़ी है. इसकी इच्छा वह व्यक्ति भी करता है, जो अतिरिक्त रूप से गुणी और संपन्न है. इसके कारणों में मामूली अंतर हो सकते हैं. जो व्यक्ति जीवन में अतिरिक्त रूप से कामयाब होते हैं, वे अपनी सफलता से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं. प्रजा न हो तो राजा का होना अर्थहीन हो जाए. इसी तरह अमीर को अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए गरीब की जरूरत पड़ती है. कह सकते हैं कि मनुष्य की किसी भी उपलब्धि का महत्त्व दूसरों के साथ, उन सबके सापेक्ष है. असफलता सफलता की पहली और निर्णायक कसौटी है. असफल व्यक्ति जितने अधिक संख्या में होंगे, सफलता का मूल्य उतना ही अधिक आंका जाएगा. यही प्रवृत्ति न्याय की जरूरत पर बल देती है.

ऊपर संकेत किया गया है कि किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसके गुणों पर निर्भर नहीं करती. इस बात पर भी निर्भर करती है कि उस व्यक्ति को जीवन में कामयाबी दर्ज कराने के लिए कितने अवसर और संसाधन प्राप्त थे. तुलना यदि प्राकृतिक स्तर पर हो तो सफल और असफल व्यक्तियों में बहुत अंतर नहीं होता. युद्ध में किसी राजा की जीत केवल इसपर निर्भर नहीं करती कि वह स्वयं कितना बहादुर है, बल्कि उसकी ओर से लड़ रहे सैनिकों की संख्या तथा राजा के प्रति उनकी निष्ठा पर भी निर्भर करती है. इसलिए अपनी सत्ता की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए शासक वर्ग स्वामीभक्ति को महिमामंडित करता रहता है. युद्ध में सैनिक और उनके अस्त्रशस्त्र राजा के लिए संसाधन होते हैं. वे राजा को केवल उसकी निजी योग्यता के आधार पर प्राप्त नहीं होते. उनमें से अधिकांश उत्तराधिकार में प्राप्त होते हैं. यदि राजा केवल अपने दम पर, आमनेसामने की लड़ाई करे तो उसकी सफलता की संभावना बहुत सीमित स्तर की होगी. कारखानेदार के मामले में सैनिकों का स्थान पूंजी ले लेती है. संभव है उसमें से पूंजी का बड़ा हिस्सा उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुआ हो. यदि यह न भी हो और किसी उद्यमी ने अपने जीवन में ही बेशुमार प्रगति की है तो इसका कारण केवल यह है कि व्यवस्था के चलते उसके कारखानों में कार्यरत श्रमिकों ने अपना श्रमोत्पाद, मामूली वृत्तिका के बदले कारखानेदार को समर्पित किया है. जैसे सैनिकों द्वारा जान की बाजी लगा देना किसी राजा के साम्राज्यवादी मनसूबों को साकार बनाता है. वैसे ही न्यूनतम मजदूरी के बदले अधिकतम श्रमोत्पाद पर कारखानेदार का अधिकार मान लेना और स्वयं मामूली वृत्तिका से संतुष्ट होकर रातदिन काम में जुटे रहना, पूंजीपति को कामयाबी दिलाता है. उद्यमी की सफलता का स्तर बताता है कि श्रमिकों ने उसके उत्पादनस्तर को शिखर तक पहुंचाने के लिए जीजान से काम किया है. यहां त्याग का अर्थ न्यूनतम वृत्तिका के बदले मालिक को अधिकतम मुनाफा कमाकर संतुष्टि प्राप्त कर लेना है. जाहिर है सफलता चाहे राजा की हो या व्यापारी की, उसमें क्रमशः प्रजा अथवा श्रमिकों का योगदान होता है. यहां पूंजी और राष्ट्रवाद दोनों ही वर्चस्वकारी शक्तियों के स्वार्थ से जुड़ै होते हैं. दोनों की प्रवृत्ति मानवविवेक पर कब्जा कर लेने की होती है. अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद अपनी चमकदमक और भौतिक सुखों का प्रलोभन देकर लोगों को आकर्षित करता है. राष्ट्रवाद के पास उग्र राष्ट्रप्रेम के सिवाय नागरिकों को देने के लिए कुछ नहीं होता. इसलिए वह भावुक प्रतीकों के माध्यम से लोगों को लुभाने का प्रयास करता है.

अमीरगरीब, राजाप्रजा के इस कृत्रिम विभाजन से बाहर निकलकर देखें तो प्राकृतिक स्तर पर उनके बीच कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता. राजाप्रजा, अमीरगरीब सभी को एकसमान जीवनचक्र से गुजरना पड़ता है. धूपवर्षाशीत सभी को लुभाते हैं. सभी को भूखप्यास लगती है. यह ठीक है कि मनुष्य में प्राकृतिक स्तर पर अंतर होता है. एक मनुष्य शक्तिशाली हो सकता है और दूसरा शक्तिविपन्न. परंतु प्राकृतिक स्तर पर शक्तिशाली और शक्तिविपन्न व्यक्ति में अंतर का अनुपात उतना नहीं होता, जितना सामाजिक स्तर पर अमीरगरीब, शक्तिशाली एवं शक्तिविपन्न के बीच होता है. न प्रकृति अपने स्तर पर किसी प्रकार का भेदभाव करती है. चूंकि समाजीकरण की मूलभूत अवधारणा समानता के सिद्धांत पर गढ़ी होती है, राज्य भी इसी दावेदारी के साथ जनसमर्थन प्राप्त करता है कि वह धनीनिर्धन, शक्तिसंपन्न एवं शक्तिविपन्न के बीच बहुत अंधिक अंतर नहीं करेगाइसलिए यदि किसी राज्य में ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि वह अपने गठन के मूलभूत उद्देश्यों से भटका हुआ है. दूसरे शब्दों मे समानता का आशय किसी व्यक्ति से राजा या पूंजीपति बनने के अवसर छीन लेना नहीं है. बल्कि जनसाधारण को इस आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्ति दिलाना है. सफलता सदैव सापेक्षिक होती है, परंतु न्याय निरपेक्ष. इस आधार पर अरस्तु न्याय पर विमर्श के आरंभ में ही उसकी दो कसौटियां बना लेता है. पहली के अनुसार तयशुदा कानून की मर्यादा में रहना न्याय है. जिन कार्यों को राज्य की विधिसंहिता स्वीकारे उनका अनुपालन न्याय है. जिनसे राज्यसमाज में शांतिसुव्यवस्था स्थापित होती हो, वह न्याय है. न्याय का दूसरा रूप अपने साथ बाकी लोगों की स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करना है. जबकि अन्याय वह है जो कानून के विरुद्ध है. जिससे दूसरों के अधिकारों का हनन होता है. जिससे किसी व्यक्ति को उसके विधिसम्मत देय से वंचित कर दिया जाता है.

समानता का आशय यह नहीं है कि व्यक्ति की पसंदों का ध्यान न रखा जाए. न्याय इसमें है कि प्रत्येक नागरिक को विकास के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए अवसरों की समानता तथा किसी कारणवश विकास में पिछड़ चुके हैं नागरिकों को विशेष प्रोत्साहन देकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश करते रहनान्याय और समाजीकरण दोनों की प्रथम कसौटी है. अरस्तु ने न्याय को सर्वसाधारण के सामान्य हित की संज्ञा दी है. उसके अनुसार न्याय के दो पक्ष होते हैं. पहला व्यक्ति पक्ष और दूसरा वस्तु पक्ष. व्यक्ति का संबंध भी प्रकारांतर में वस्तुओं से होता है. उसके अनुसार न्याय का तकादा है कि सभी मनुष्यों को समान वस्तुएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए. पर कैसे? यहां एक पेंच है जिससे समानता की हमारी सार्वत्रिक अवधारणा संकट में पड़ जाती है. समानता का विचार न तो रूढ़ है न ही व्यक्तिनिरपेक्ष. सभी व्यक्तियों को सभी अवसर दिए जाने का अभिप्राय यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपनी रुचि या अन्यान्य कारण से किसी पद के अयोग्य है तो समानता के सिद्धांत के अनुसार उसे उस पद की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए. समानता की सीधीसी अवधारणा है कि सभी व्यक्तियों को सभी अवसर प्राप्त हों. तदनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अवसर मिलना चाहिए कि यदि वह स्वयं को राजपद के योग्य बना सके, तो वह पद उसकी पहुंच से दूर नहीं है. राज्य का हित भी इसमें है कि नागरिकों को यथायोग्य पद प्राप्त हों. राजा उसी को चुना जाए जो राजा बनने के योग्य है. अरस्तु के अनुसार व्यक्ति के अधिकार उसकी योग्यता पर निर्भर करते हैं. तदनुसार राजा बनने का अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो राजपद के योग्य है. श्रेष्ठ राज्य अपने लिए कसौटियां स्वयं तय करता है, जिनके माध्यम से वह स्वयं को नियंत्रित एवं विकासरत रख सकता है. वीरता, व्यक्तित्व, व्यवहार कुशलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमानी जैसे उदात्त चारित्रिक गुण यदि राजा बनने के लिए अपरिहार्य हैंतो समानता के सिद्धांत के अनुसार जिस व्यक्ति में ये सभी गुण पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, उसे राजा बनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसपर उसके परिवार अथवा उन गुणों को जिनका राजा के लिए अपेक्षित गुणों से कोई संबंध नहीं है, कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के 12वें अध्याय में अरस्तु बासुंरीवादक का उदाहरण देता है

यदि बहुत से व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में निपुण हों तो उनमें से किसी व्यक्ति को सिर्फ इस कारण अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं दी जानी चाहिए, कि उसका संबंध किसी उच्च कुल से है.’

आगे वह स्पष्ट करता है

बासुंरीवादन एक कला है, जिसका व्यक्ति के कुल से कोई संबंध नहीं है. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति बासुंरी वादन की कला में पीछे है, मगर कुल और सुंदरता के मामले में बाकी प्रतिस्पर्धियों से आगे तो भी अच्छी अथवा सर्वाधिक बासुंरिया किसी वाद्यकला में निपुण व्यक्तियों को ही दी जानी चाहिए….कुलपरिवार की सदस्यता के आधार पर भी व्यक्ति अच्छी बांसुरियों की दावेदारी कर सकता है, परंतु उसमें उन गुणों की प्रधानता अपरिहार्य है, जो बांसुरी वादन की कला के लिए अत्यावश्यक हैं.’

आशय है कि श्रेष्ठ वस्तुएं यथायोग्य व्यक्तियों को प्राप्त हों. उन्हें प्राप्त हों, जिन्हें उनकी आवश्यकता है और जो उनका श्रेष्ठतम उपयोग करने में सक्षम हैं. परंतु योग्यता का मापदंड क्या हो? प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि में योग्यतम होता है. फिर जो अधिकतम की दृष्टि में श्रेष्ठतम है, उसके भी आलोचक हो सकते हैं. इसे ‘एथिक्स’ में समझाया गया है. अरस्तु की यह पुस्तक नीतिशास्त्र की श्रेष्ठतम कृतियों में से है. सर्वथा मौलिक. इसके माध्यम से अरस्तु ने नैतिकता को उस दौर में परिभाषित किया, जब राज्य पर धर्म का नियंत्रण था. उत्तराधिकार में जो भी प्राप्त हो, उसे बचाए रखने और उसके माध्यम से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को शिखर तक ले जाने के लिए सारे उद्यम किए जाते थे; फिर उन्हें धर्म का नाम दे दिया जाता था. अरस्तु के अनुसार न्याय ज्ञानविज्ञान की विभिन्न शाखाओं का अंतिम और वास्तविक लक्ष्य है. मनुष्य जो ज्ञानार्जन करता है, वह तब तक अनुयोगी या अल्पउपयोगी माना जाएगा, जब तक उससे किसी न किसी रूप में न्याय की पुष्टि न होती है. ताकि प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो जाए कि जो उसका प्राप्य है, वह उसको यथासमय प्राप्त होता रहेगा. आखिर यह कैसे सुनिश्चित हो कि व्यक्ति को जो अधिकार है, वह उसे प्राप्त हैं. यहां राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके राज्य में किसी भी नागरिक के अधिकार बाधित न हों. न ही किसी के साथ कोई पक्षपात हो. यह ध्यान रखते हुए कि समानता न्याय का उद्देश्य है, लेकिन एकमात्र समानता को भी न्याय का पर्याय मान लेना अनुचित होगा. उदाहरण के लिए दो भिन्न व्यक्तियों की कल्पना कीजिए, जिन्हें खराद मशीन पर कोई पुर्जा बनाने को दिया जाता है. मान लीजिए उनमें से पहला दस नगों का उत्पादन करता है और दूसरा उतनी ही अवधि में बीस नगों का. चूंकि व्यक्ति का अपने श्रम पर अधिकार होता है, इसलिए कानून और नैतिकता दोनों दृष्टि में यह उचित माना जाएगा कि जिस व्यक्ति ने अधिक उत्पादन किया है, उसकी अतिरिक्त लाभ में आनुपातिक साझेदारी हो. पूंजीवादी व्यवस्था इसी को न्याय मानती है. उसके अनुसार इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है. चीजें सस्ती होती जाती हैं. उसकी भरपाई के लिए उत्पादक उत्पादनवृद्धि का सहारा लेता है. उससे रोजाकर के अवसर बढ़ते हैं. उसके फलस्वरूप हुई उत्पादन वृद्धि का लाभ पूरे समाज को पहुंचता है. पूंजीवादी राज्यों की सरकारें भी कमोबेश वही सोचती हैं. परंतु राज्य की मजबूरी है कि उसे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाकर रखना पड़ता है. उसके लिए वे अधिक आय वाले व्यक्तियों पर कराधान की सीमा बढ़ाकर बाकी लोगों को संतुष्ट करने का प्रयास करती हैं. यह केवल दिखावा ही होता है, क्योंकि एक ओर जहां अधिक करउगाही का का नाटक किया जाता है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपतियों को विभिन्न प्रकार की छूट देकर, ओनेपौने दाम में राज्य के संसाधन लुटाकर प्रसन्न रखा जाता है.

यदि शतप्रतिशत ऐसा हो जाए कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितनी उसकी क्षमता है, तो सोचिए क्या यह जंगल के न्याय जैसी व्यवस्था न होगी? जंगल में भी प्राणी अपने सामर्थ्य के अनुसार शिकार करते हैं. चिड़िया मामूली कीड़ेमकोड़ों का शिकार करके पेट भरती है. शेर और चीता भारीभरकम सांड को भी अपना शिकार बन सकते हैं. जानवर के लिए उसका शिकार एक तरह से उसका उत्पाद ही है. अतः न्याय दृष्टि से समानता व्यक्ति और समाजनिरपेक्ष नहीं होती. उसमें परिस्थिति अनुसार बदलाव होते रहते हैं. लेकिन समानता ऐसी पहेली भी नहीं है, जिसे समझा न जा सके. आखिर समानता किसकी और कैसे? सामान्य सिद्धांत के अनुसार असमान व्यक्तियों का हिस्सा समान नहीं हो सकता. समानता की न्यूनतम शर्त नागरिकों को न्याय की अबाध प्रतीति है. यह ठीक है जन्म के आधार पर, स्थितियों के आधार पर लोगों की कार्यक्षमता में अंतर होता है. राज्य और समाज का गठन का उद्देश्य भी यही है कि व्यक्तिमात्र की इन दुर्बलताओं का असर उसकी खुशियों पर न पड़े. जहां कोई नियम या व्यवस्था न हो. दूसरों के सुखदुख की परवाह किए बिना सभी मनमानी पर उतारू रहते हों. वहां राज्य की भूमिका नगण्य मानी जाएगी. यह नियम कि व्यक्ति को ठीक उतना ही प्राप्त हो, जितना उसका सामर्थ्य हैप्रकारांतर में समाज को इस स्वार्थी सोच की प्रेरणा बन सकता है. इससे समाजीकरण का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा. अतः राज्य का कर्तव्य है कि वह उस नागरिकों को जो किसी कारण पिछड़े हुए हैं, विशेष प्रोत्साहन देकर दूसरों के बराबर लाने का प्रयास करे. साथ में यह विश्वास भी बनाए रखे की समाज की एकता, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि से बड़ी है.

अरस्तु न्याय के पर्याय के रूप में सद्गुण को स्थापित करता है. राज्य के संदर्भ में ‘न्याय राज्य का सद्गुण’ है. उसकी व्याप्ति राज्य और उसके नागरिकों के आचरण से आंकी जानी चाहिए. न्याय वह है जिसे सभी नागरिक सही मानें. जिसकी श्रेष्ठतम के रूप में प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कामना करे. ठीक इसी तरह अन्याय वह है जो अधिकतम नागरिकों को नियमविरुद्ध और अनुचित प्रतीत होता हो. किंतु न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित की यह बहुत सरलीकृत व्याख्या है. यह दोनों को एक दूसरे का विरोधी दर्शाती है. सामान्यतः यह सही भी दिखता है. न्यायालय का कोई फैसला यदि बहुसंख्यक वर्ग को अनुचित और अन्यायपूर्ण लगता है तो वह उचित और न्यायपूर्ण हो ही नहीं सकता. लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि न्याय और अन्याय, उचित और अनुचित को लेकर सभी नागरिकों की एकसमान राय हो. लोगों का न्यायबोध उनकी संस्कृति और मानसिक प्रशिक्षण पर भी निर्भर करता है. राजशाही में राजा और उसके परिवार की सुरक्षा शेष जनसमाज की सुरक्षा से महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. उसके लिए अनेकानेक सैनिक की बलि दे देना राजधर्म माना जाता था. अधिकांश युद्ध राजाओं के व्यक्तिगत अहं और राजलिप्सा का परिणाम होते थे. अपने समग्र परिणाम में वे प्रजा के लिए अहितकारी होते थे. बावजूद इसके प्रजा अपने राजा और उसकी व्यवस्था को सराहती थी. क्योंकि उसका मानसिक प्रशिक्षण इसी तरह का होता था. जनतांत्रिक समाजों में नागरिकों का सोच स्वतंत्र होता है. निर्णयविशेष को कुछ लोग उचित मान सकते हैं और कुछ अनुचित. कुछ ऐसे नागरिक भी हो सकते हैं जिन्हें वह निर्णय आंशिक अनुचित और अन्यायपूर्ण अथवा आंशिक उचित और न्यायपूर्ण लगता हो. इस तरह लोगों की दृष्टि के अनुसार न्याय और अन्याय के अनेक रूप संभव हैं. लेकिन राज्य की दृष्टि में न्याय का केवल एक रूप होता है. सभी नागरिकों के साथ समान वर्ताब और समाज में कल्याण विस्तार. ऐसे समाजों में कर्तव्यपरायण मनुष्य, न्यायसंगत बने रहने के लिए वही करता है जो समाज की निगाह में उचित है. वैसा ही सोचता है, जिसे न्यायसंगत माना जा सके.

वे कौनसी स्थितियां हैं, जब मनुष्य के कर्म को न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता? इसे समझना मुश्किल नहीं हैं. उपर्युक्त विवरण के आधार पर देखें तो दो मुख्य स्थितियां हैं जिनके आधार पर मनुष्य के कृत्य को अनुचित या अन्यायपूर्ण कहा जा सकता है. पहला जब वह कानून तोड़ता है. ऐसे काम करता है जो राज्य तथा समाज की निगाह में अनुचित हैं. दूसरी स्वार्थपरता. समाज में रहते हुए उससे अधिक ग्रहण करना जितना अधिकार है. अपने अलावा दूसरों की आवश्यकता पर विचार ही न करना. बल्कि जिसपर दूसरों का अधिकार है, उसे भी हड़प कर जाना. अरस्तु के अनुसार उचित होने के लिए कानून सम्मत और निस्वार्थ होना आवश्यक है. जो कानूनसम्मत नहीं है. जो अपने आचरण में निष्ठावान तथा दूसरों के प्रति ईमानदार नहीं है, इसलिए वह उचित भी नहीं है. उचित की बहुमान्य परिभाषा उपलब्ध संसाधनों, अवसरों और कर्तव्यों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी है. ऐसी सहभागिता जिससे दूसरों के अधिकार निर्बंध रहें. सच यह भी है कि समाज में रहते हुए अपने हिस्से से अधिक लेना हमेशा अन्यायपूर्ण नहीं होता. कई बार अपने हिस्से को छोड़ देना या दूसरों का हिस्सा भी हड़प जाना प्रशंसा का पात्र बना देता है. जब कोई भूखा व्यक्ति अपने आगे रखी थाली, ज्यों की त्यों दूसरे भूखे प्राणी को सौंप देता है तो उसकी नैतिकता हमें भावाकुल कर देती है. ठंड से ठिठुरते किसी व्यक्ति को अपने वस्त्र उतारकर दे देना मानवचरित्र की उदात्तता से परचाता है. इसी प्रकार सारे के सारे दुर्योग को, जिससे बहुतसे लोगों के अनिष्ट की संभावना हो, अपने हिस्से समेट लेना भी उचित और सराहनीय माना जाएगा. ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें अपनी दोषी संतान को बचाने के लिए पिता उनके सारे अपराध अपने सिर ले लेते हैं. समुद्रमंथन की मिथकथा के अनुसार शिव सबके हिस्से का विषपान करके ही नीलकंठ कहलाए थे. किसी व्यक्ति में कम बुराइयां हों, यह भी अच्छी बात है. अब सवाल है कि कानून क्या है? उससे व्यक्ति का हित सधता है या राज्य का. अथवा व्यक्ति और राज्य दोनों का?कुछ विद्वानों का मानना है कि श्रेष्ठ नागरिक आत्मानुशासित होता है. उसे अपने और दूसरों के सुखदुख की चिंता होती है. इसलिए वह किसी के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करता. ऐसे व्यक्ति को कानून की आवश्यकता नहीं पड़ती. यह बात सही हो सकती है. परंतु हमेशा सही हो आवश्यक नहीं है. कानून अदालती प्रक्रिया मात्र नहीं है. कानून का पलड़ा हालांकि समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर झुका होता है. फिर भी उसमें कई ऐसी खूबियां होती हैं, जिनकी अनुपस्थिति समाज की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकती है. उनके अभाव में प्रत्येक नागरिक ‘श्रेष्ठ आचरण’ की परिभाषा अपने हिसाब से करेगा. प्रकारांतर में सब मनमानी उतर आएंगे. परिणामस्वरूप समाज के गठन का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा. इसलिए कानून के रूप में सुनिश्चित आचारसंहिता का होना आवश्यक है.

अरस्तु के अनुसार कानून विधायी व्यवस्था है. राज्य यदि नागरिकों के प्रति उदार है तो कानून नागरिकअधिकारों के पक्ष में झुका पाएगा और मानवमात्र के अधिकारों का ध्यान रखेगा. यदि कानून का गठन कुछ लोगों की मर्जी से, स्वार्थभावना के साथ हुआ है तो उसका झुकाव शिखर पर मौजूद अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र के पक्ष में नजर आएगा. केवल उन्हीं लोगों के भले की सोचेगा है जो किसी न किसी रूप से सत्ता से जुड़े हों. निरंकुशता की भावना से गठित कानून केवल तानाशाह की मर्जी से संचालित होंगे. सही मायने में तो वे तानाशाह के स्वार्थ से इतर कुछ हो ही नहीं सकते. इससे हम राज्य में न्याय की मौजूदगी को परखने के लिए कुछ मापदंड बना सकते हैं. ऐसे कानून जिनसे राज्य की उदारता झलकती हो, जो समाज के अधिक से अधिक लोगों के कल्याण की भावना से बनाए गए हों, वे कानून न्यायसंगत माने जाएंगे. जबकि ऐसे कानून जिनसे अल्पसंख्यक वर्गों की स्वार्थसिद्धि होती हो, अथवा जिनका गठन तानाशाह की इच्छाओं को दूसरों पर लादने के लिए हुआ हो, उन्हें न्यायसंगत मानने में हमें संकोच होगा. जिस राज्य में पहली कसौटी का पालन होगा, वह कल्याणराज्य के मापदंडों के अनुरूप होगा. उसमें शुभ की व्याप्ति होगी. तदनुसार न्यायकारी शक्तियों का सत्ताप्रेम अथवा उनपर शासक वर्गों का नियंत्रण शासन की निरंकुशता का परिचायक होता है.

इस विवेचन से न्याय को समझा जा सकता है. न्याय हमेशा दूसरों के प्रति होता है. लेकिन मनुष्य दूसरों के प्रति तभी न्याय कर सकता है, जब उसे अपने प्रति न्याय की उम्मीद हो. इस तरह न्याय सद्गुण है. व्यक्ति का समाज और समाज का अपने नागरिकों के प्रति कल्याणभाव जिससे झलकता हो, वह सद्गुण है. समाज में सद्गुण से श्रेष्ठ कुछ नहीं होता. वह निर्मेल्य होता है. अरस्तु के अनुसार ‘न्याय कुल मिलाकर संपूर्ण सद्गुण या सद्गुणों का समुच्चय है. वह इसलिए सद्गुण है, क्योंकि वह व्यक्ति का अपने पड़ोसियों, अपने मित्र, हितैषी यहां तक कि आलोचकों के प्रति न्यायभाव को दर्शाता है. कुल मिलाकर सद्गुण किसी भी समाज की श्रेष्ठतम उपलब्धि हैं. यदि कोई व्यक्ति केवल अपने मित्रों और सगेसंबंधियों के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करता है और बाकी समाज के प्रति वैसा करने से बचता है, तो उसका आचरण न्याय की कसौटी पर स्वार्थपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में न्याय सद्गुण है और सद्गुण वह है, जिसे कोई व्यक्ति दूसरों के प्रति कल्याणभाव के साथ करता है. न्यायपूर्ण व्यक्ति वह है जो दूसरों की हितसिद्धि के लिए बिना किसी स्वार्थभाव से प्रयासरत रहता है. और ऐसा व्यक्ति जो केवल स्वार्थसिद्धि में लीन रहता है, दूसरों को किसी प्रकार का कष्ट पहुंचाता है अथवा उन वस्तुओं पर कब्जा करता है, जो किसी दूसरे का अधिकार हैं, अन्यायी की श्रेणी में आएगा.

मनुष्य क्या है? कैसा है, इसकी पहचान सभा में की जाती है. अकेले मनुष्य की अच्छाई या बुराई किसी काम की नहीं होती. सामाजिक प्राणी होने के नाते, ‘सभा ही मनुष्य के चरित्र का दर्पण है.’ अच्छाई व्यक्तिमात्र का आंतरिक गुण है. मगर इसकी तब तक कोई उपयोगिता नहीं है जब तक उसका कोई सार्वजनिक प्रयोजन न हो. कह सकते हैं कि मानवचरित्र की कसौटी दूसरों के प्रति उसका व्यवहार है. तदनुसार जो केवल अपना हित चाहता है, दूसरों के लाभालाभ से जिसे कोई सरोकार नहीं है, जिसे दूसरों के कष्ट द्रवित नहीं करते, वह अश्रेष्ठ है. वह नागरिक धर्म का पालन नहीं कर पाता. इसलिए किसी न किसी रूप में वह कानून का उल्लंघन करता है. दूसरी ओर जो सभी के साथ समभाव से पेश आता है. उदारता जिसका स्वभाव है. जो अपने अधिकारों के साथसाथ दूसरों के अधिकारों का भी ध्यान रखता है. वह श्रेष्ठता का प्रतीक है. अश्रेष्ठ और श्रेष्ठ के व्यवहार में जो अंतर है, वह अन्याय और न्याय, गैरकानूनी और कानूनी में भी है. न्याय और सद्गुण के अंतर को स्पष्ट करने के लिए अरस्तु की व्याख्या बहुत सरल है. उसके अनुसार न्याय और सदगुण को व्यक्ति के आचरण द्वारा परखा जा सकता है. व्यक्ति दूसरे के संदर्भ में सदाचरण करे, उसकी अच्छाइयां जो लोककल्याण के निमित्त उद्घाटित हों, जो दूसरों के साथ कल्याणभाव से पेश आए वह न्याय प्रिय है. और उसका आचरण न्यायोचित कहा जाएगा. जिनसे मनुष्य के चरित्र आदर्श बने, वह सद्गुण हैं. इसी तरह जब कोई मनुष्य दूसरों पर बुरी नीयत के साथ हमला करता है, उसे नुकसान पहुंचाता है. दूसरे के साथ बदसलूकी करता है या उसके न्यायपूर्ण हिस्से को अपना कहकर छीन लेता है, तो उससे मनुष्य के चरित्र की बुराई लक्षित होती है. और उसका व्यवहार गैरकानूनी तथा अन्यायपूर्ण माना जाएगा. अन्याय और बुराई परस्पर जुड़े होते हैं. अरस्तु यहां व्यक्ति और समाज के अथवा व्यक्ति और शेष जनसमाज के संबंधों के आधार पर न्याय और अन्याय की तुलना करता है. राज्य को बीच में नहीं लाता. उसके अनुसार राज्य समाज का सत्कर्म है, जिसे वह नागरिकों के कल्याण के लिए अपनाता है. समाज की भांति राज्य भी मनुष्य की रचना है. राज्य मनुष्य के राजनीतिक बोध की निर्मिति है. इस कसौटी के अनुसार न्याय सद्गुण का कोई हिस्सा न होकर संपूर्ण सद्गुण है. बिना सद्गुणों के न्याय की अभिकल्पना संभव भी नहीं है.

प्रश्न है कि क्या न्याय और सद्गुण परस्पर पर्यायवाची हैं? यदि ‘हां’ तो उनकी अलगअलग पहचान कैसे संभव है? यदि नहीं तो क्या उन्हें एकदूसरे से जोड़कर, पारस्परिक संबंधों में परखा जा सकता है? अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. जहां न्याय है, वहां सद्गुण हैं. वह समाज में शुभत्व की मौजूदगी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं. शुभत्व माने जड़चेतन सभी के प्रति समान रूप से कल्याण का भाव. फिर उसी के अनुरूप कार्य करने की चेष्ठा. इसी तरह अन्याय या अनाचार विचारों, कर्तव्यों या भावनाओं का वह हिस्सा है जो व्यक्ति और समाज में दुर्गुणों की उपस्थिति और/या दुराचरण के स्तर को दर्शाता है. लेकिन जैसे सद्गुण की संकल्पना तय है, उसी प्रकार सदाचरण की संकल्पना भी सभी के लिए एक समान हो, आवश्यक नहीं है. कल्पना कीजिए दो व्यक्ति हैं. उनमें से एक बदचलनी या भ्रष्टाचरण करता है, और उससे धनार्जन करता है. दूसरा व्यक्ति बदचलनी के नाम पर अपना धन लुटाता है तो उनमें से दूसरे को भ्रष्टाचरण का दोषी माना जाएगा. चूंकि पहला व्यक्ति अपनी गांठ से धन लुटाकर भ्रष्टाचरण करता है, इसलिए उसे कंजूस शायद ही कोई मानेगा. हालांकि सामाजिक नैतिकता की दृष्टि से दोनों ही समान रूप से दोषी माने जाएंगे. परस्त्रीगमन विशिष्ट किस्म का दोष है. उसे मानवमन का विकार या व्यक्ति का समाज के प्रति अनाचार समझकर क्षमा भी किया जा सकता है. लेकिन यदि बदलचनी के दौरान वह अपने साथी को नुकसान करता है, उसको किसी प्रकार की चोट पहुंचाता है या उससे समाज को किसी प्रकार की हानि पहुंचती तो वह सीधे तौर पर उस व्यक्ति या समाज के प्रति अन्याय माना जाएगा.

बुद्ध ने मध्यम मार्ग की अनुशंसा की थी. अरस्तु ने भी मध्यम मार्ग को ही श्रेष्ठ माना है. ऐसा मार्ग जिसमें राज्य और नागरिक सब मिलकर अपनेअपने अधिकारों का भोग करते हों. जिसमें नागरिक समाज इतना शक्तिशाली हो कि सत्ताओं की मनमानी पर अंकुश लगा सके. इतना विवेक उसमें हो कि शासकवर्ग की नाकामियों को समझकर उनका समाधान खोज सके. क्या अकेला नागरिक ऐसा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर इस तरह भी खोजा जा सकता है कि क्या कोई व्यक्ति केवल अपने हित को राज्य का हित मानता है? यदि वह ऐसा नहीं करता. यदि वह संपूर्ण समाज के या समाज के अधिसंख्यक वर्ग के हित में अपना हित देखता है, तो ऐसे नागरिक के सामने अकेले पड़ जाने की समस्या नहीं झेलनी पड़ती. समाज इतना अनुदार कभी नहीं होता कि अपना हित साधने वाले का अहित कर सके. हां, स्वार्थी शक्तियों के हाथों में झूल रहा राज्य यह कर सकता है. ऐसे राज्य का सामना जनता की सामूहिक शक्ति के साथ किया जाना चाहिए. ठीक हे कि राज्य के पास कानून की ताकत होती है. अकेले नागरिक के सापेक्ष राज्य बहुत बड़ी शक्ति है. लेकिन नागरिकों को यह समझना चाहिए कि राज्य को उसकी शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त होती हैं. जनसमर्थन ही राज्य की ताकत को वैधता प्रदान करता है. अतः आवश्यक है कि राज्य जनता की इच्छा और हित को देखते हुए अपनी शक्तियों का प्रयोग करे. निरंकुश राज्य के हाथों में शक्तियां का केंद्रित हो जाना जनता के लिए हानिकारक होता है.

आशय है कि राज्य को अधिकारसंपन्न बनाने वाली ताकत का मूलस्रोत जनता होती है. परंतु जनता आमतौर पर यह माने रहती है कि राज करना उसका काम नहीं हैं. वह यह भी मान लेती है कि जो राज करते हैं वे विशिष्ट गुणों से संपन्न होते हैं. कि राज करना विलक्षण गुण है, जो जन्मजात या कुछ खास लोगों में ही होता है. कुछ मनोवैज्ञानिक भी इसका समर्थन करते हैं. परंतु हमें यह समझना चाहिए कि मनोवैज्ञानिक धरती से परे के जीव नहीं होते. वे समाज के बीच रहकर, समाज से ही अपने निष्कर्ष ग्रहण करते हैं. कल्पना के घोड़ों की बागडोर अनुभव के हाथों में होती है. मनुष्य अपने अनुभवों की परिधि से बाहर बहुत लंबा नहीं झांक सकता. यदि किसी मनोवैज्ञानिक को ऐसे राज्य में छोड़ दिया जाए जहां सभी बराबर हों, लोग शांतिपूर्ण जीवन जीते हों, उनके बीच किसी प्रकार की स्पर्धा न हो, तो उसका एकमात्र यही निष्कर्ष होगा कि मानव मन बहुत सरल और सहजगम्य है. कुल मिलाकर जनता की यह भ्रांति कि राज्य उससे स्वतंत्र सत्ता है, राज्य को निरंकुश बनने का अवसर देती है. शिखर पर मौजूद लोग स्वयं को सामान्य से हटकर मानने लगते हैं. चूंकि अकेले व्यक्ति के पास इतनी शक्ति नहीं होती कि शिखर पर बैठे लोगों को उनकी चूकों की ओर आगाह कर सके, इसलिए वह हालात से समझौता किए रहता हे. उसे केवल संगठन के बल पर चुनौती दी जा सकती है. परंतु उसके लिए आवश्यक है कि लोग सामान्य हितों को पहचानकर बड़ी संख्या में संगठित हां. उनमें पर्याप्त अधिकार चेतना हो, जिससे वह शासन की मनमानियों के विरोध में खड़े हो सकें. अरस्तु के अनुसार न्याय संपूर्ण सद्गुण है. इसलिए सीमित संदभो्र्रं में न्याय सद्गण का ही हिस्सा है. अरस्तु ने समानता को न्याय का पूरक बताया है. जहां असमानता है, वहां न्याय संभव नहीं है. परंतु समानता को परिभाषित करना भी सरल नहीं है. समानता कैसी और किसकी? अरस्तु के अनुसार व्यक्तियों तथा वस्तुओं के वितरण का अनुपात न्यायसंगत होना चाहिए. तदनुसार यदि व्यक्ति एकसमान नहीं हैं, तो उनको मिलने वस्तुएं भी असमान होंगी. लेकिन इसमें दो प्रकार की स्थितियां संभव हैं. पहली दो व्यक्ति जो समान हैं, उन्हें एक समान वस्तुओं की प्राप्ति न हो. दूसरी व्यक्ति असमान हों और उन्हें समान मात्रा में वस्तुएं प्राप्त हों. यह ऐसी उलझन है जिसका निपटारा आसान नहीं है. इसके समाधान के लिए प्रायः कह दिया जाता है कि लोगों में वस्तुओं का वितरण ‘प्राथमिकता के आधार’ पर हो. परंतु प्राथमिकता का भी सर्वमान्य मानक नहीं है. राज्यों की प्रकृति और परिस्थिति के अनुसार प्राथमिकता के मायने बदलते रहते हैं. लोकतांत्रिक समाजों में जन्म के आधार पर ही नवजात के नागरिक अधिकार सुरक्षित मान लिए जाते हैं. भले ही वह उनके बारे में कुछ भी जानता हो. जहां अल्पतंत्र अथवा कुलीनतंत्र है, वहां संसाधनों का बंटवारा कुलीनों की संख्या को आधार बनाकर किया जाता है. जनसाधारण की जरूरतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. इसी प्रकार निरंकुश राज्य में संसाधनों के विभाजन का कोई नियम नहीं होता. सबकुछ तानाशाह की इच्छा से निर्धारित होता है. तो भी इससे यह नियम खारिज नहीं होता कि न्याय की कसौटी के अनुसार वस्तुओं का विभाजन आनुपातिक होना चाहिए. यानी व्यक्ति को यह लगना चाहिए कि समाज और राज्य उसकी रुचि एवं जरूरतों का ख्याल रखने में सक्षम हैं. और उनका प्रत्येक प्रयास इसी दिशा में जाता है.

अरस्तु को विज्ञान का संस्कार बचपन से प्राप्त था. न्यायसिद्धांत की व्याख्या करते हुए वह आवश्यकतानुसार गणित की मदद भी लेता है. असमानता समाज में स्तरीकरण करती है. दो व्यक्तियों के बीच की असमानता यदि उसी अनुपात में आगे बढ़े तो किन्हीं दो जोड़ों के बीच अधिकतम और न्यूनतम आय के बीच कम से कम चार गुने का अंतर होगा. उदाहरण के लिए ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ के बीच यदि ‘क’ के पास ‘ख’ से दो गुनी संपदा है तथा ‘ग’ के पास ‘घ’ से दो गुनी, तो ‘क’ के पास ‘घ’ से न्यूनतम चार गुनी समृद्धि होगी. इस तरह समृद्धि अनुपात बढ़ने से आर्थिक असमानता, विशेषकर अधिकतम और न्यूनतम के बीच का अंतर बहुत तेजी से बढ़ता है. इसलिए सभी व्यक्तियों को समान आंकना, उन्हें समान अवसर देना और आय में किसी प्रकार का पक्षपात न बरतना ही न्याय है. इस उदाहरण में यदि ‘क’ और ‘ग’ को जोड़ दिया जाए तो उनकी संपत्ति लगभग ‘ख’ के बराबर हो जाएगी. अरस्तु ने इसे ‘वितरणात्मक न्याय’ कहा है. हालांकि उदार लोकतांत्रिक सरकारों में जहां सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति होती है, यह कार्य संभव नहीं है. हालांकि समानता की ओर प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ना उनकी जरूरत होती है.

क्रमश:

© ओमप्रकाश कश्यप

अरस्तु : विद्वानों का विद्वान

सामान्य

 

ज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरुशिष्य परंपरा का महत्त्व बताया गया है. आज भी है. भारत में सैकड़ों आश्रम और धर्मगुरु हैं. उनके लाखोंकरोड़ों भक्त हैं. प्रत्येक गुरु अपने शिष्यों के भौतिकअधिभौतिक उत्थान का दावा करता है. शिष्य भी मानते हैं कि उनके गुरु अनन्य हैं. वे अपने और गुरु के बीच मर्यादा की लकीर खींचे रहते हैं. जिसके अनुसार गुरु की आलोचना करना, सुनना यहां तक कि मन में गुरु के प्रति भूल से भी अविश्वास लाना पाप माना जाता है. इसी जड़श्रद्धा के भरोसे गुरुओं का कारोबार चलता है. उस कारोबार में कभी घाटा नहीं आता. जड़श्रद्धा के बल पर ही गुरु कमाते, भक्त गंवाते हैं. बुद्ध ने जड़श्रद्धा का निषेध किया था. दूसरी ओर मीमांसक कुमारिल भट्ट को मात्र इस कारण खुद को प्रायश्चिताग्नि के सुपुर्द करना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने गुरु की पूर्वानुमति के बिना बौद्ध दर्शन का अध्ययन इसलिए किया था, ताकि शास्त्रार्थ में बौद्ध आचार्यों को पराजित कर वैदिक दर्शनों की श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें. उद्देश्य सही था. ज्ञान का भी यही तकाजा था. परंतु तत्कालीन परंपरा को स्वीकार्य न था. कुमारिल अपने उद्देश्य में सफल हुए थे, किंतु गुरुद्रोह के अपराध के प्रायश्चितस्वरूप खुद को अग्निसमर्पित करना पड़ा था. सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की गुरुशिष्य परंपरा में अंधश्रद्धा के लिए कोई स्थान न था. तीनों परंपरापोषण के बजाय उसके परिमार्जन पर जोर देते हैं. उसका आदिप्रस्तावक सुकरात खुले संवाद में विश्वास रखता था. यह सुनकर कि लोग उसे यूनान का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मानते हैं, सुकरात को अपने ही ऊपर संदेह होने लगा था. संदेह दूर करने के लिए वह एथेंस के वुद्धिमान कहे जाने वाले राजनयिकों, दार्शनिकों और तत्ववेत्ताओं से मिला. अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वह सचमुच सबसे बुद्धिमान है. इसलिए नहीं कि उसे सर्वाधिक ज्ञान है. सुकरात ने माना कि वह केवल एक चीज दूसरों से अधिक जानता है, वह है—अपने ही अज्ञान का ज्ञान. ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ कहकर उसने खुद को उन दार्शनिकों, विचारकों और तत्ववेत्ताआ से अलग कर लिया था, जिन्हें अपने ज्ञान का गुमान था. उसके लिए ज्ञान से ज्यादा ज्ञानार्जन की चाहत और उसकी कोशिश का महत्त्व था. ज्ञान की मौलिकता के लिए वह संदेह को आवश्यक मानता था. सुकरात की इसी प्रेरणा पर अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना है. विवेकशीलता में स्वयं अपने ज्ञानानुभवों के पुनरावलोकन की, संदेह की भावना अंतर्निहित है. ज्ञानार्जन के लिए संदेह की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए ग्यारहवीं शताब्दी के फ्रांसिसी विचारक पीटर अबलार्ड ने लिखा था—‘संदेह हमें जांचपड़ताल के लिए प्रेरित करता है. जांचपड़ताल हमें सत्य का दर्शन कराती है.’ ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ की त्रयी के विचारों में अंधश्रद्धा के लिए कोई जगह न थी. हालांकि इस विद्वानत्रयी को अनुपम और अद्वितीय मानने पर कुछ लेखकों को ऐतराज है.

पॉलिटिक्स’ का अनुवाद करते समय भोलानाथ शर्मा ने ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ की त्रयी के समकक्ष ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ त्रयी का उदाहरण दिया है. इस निष्कर्ष के पीछे उनके पूर्वाग्रह साफ नजर आते हैं. यह ठीक है कि ‘पराशरव्यास और शुकदेव’ की पितापुत्रपौत्र त्रयी में भी तीनों लेखक थे. पराशर को भारतीय परंपरा में पुराणों के आदिरचियता होने का श्रेय दिया जाता है. बताया जाता है कि व्यास ने महाभारत के अलावा पिता के लिखे पुराणों का पुनर्लेखन कर, उन्हें वह कलेवर प्रदान किया जिसमें वे आज प्राप्त होते हैं. तीसरे शुकदेव ने ‘भागवत पुराण’ लिखकर पुराण साहित्य को समृद्धि प्रदान की थी. बावजूद इसके ये तीनों भारतीय लेखक उस कोटि के मौलिक लेखकविचारक नहीं हैं, जिस कोटि के ‘सुकरातप्लेटो और अरस्तु’ हैं. व्यास की कृति ‘महाभारत’ अवश्य अलग है. उसमें अपने समय का सामाजिकसांस्कृतिक एवं राजनीतिक विमर्श मौजूद है, परंतु जिस महाभारत से हम आज परिचित हैं, वह ईस्वी संवत्सर की शुरुआत के आसपास की कृति है, जब देश में एकराष्ट्र की भावना प्रबल थी. गणतांत्रिक पद्धति पर आधारित छोटेछोटे राज्यों को अनावश्यक मान लिया गया था. एकराष्ट्र अथवा साम्राज्यवादी सोच का उद्भव पूरी दुनिया में लगभग एक साथ हुआ था. भारत में इसका प्रवर्त्तक चाणक्य था, जबकि यूनान में अरस्तु ने सिकंदर की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का समर्थन करते हुए उसे एशिया पूर्व के छोटेछोटे देशों को अपने अधीन करने की सलाह दी थी. महाभारत मूलतः धार्मिक ग्रंथ है और उसकी रचना शताब्दियों के अंतराल में एकाधिक लेखकों द्वारा की गई है. दूसरे केवल लेखक होना ही शर्त होती तो एक ही धारा के तीन लेखकों के अनेक उदाहरण दुनियाभर में मिल जाएंगे. यहां कसौटी ज्ञान की विलक्षणता, मनुष्यता के प्रति अगाध निष्ठा तथा एकदूसरे से असहमति जताते हुए उसकी ज्ञानपरंपरा को विस्तृत तथा सतत परिमार्जित करने की है—जिसपर यह त्रयी विश्वपटल पर अनुपम है. प्लेटो के लेखन के हर हिस्से पर सुकरात की छाप है. इसी तरह अरस्तु के लेखन पर भी प्लेटो का प्रभाव छाया हुआ है. लेकिन प्लेटो सुकरात से तथा अरस्तु प्लेटो से कदमकदम पर असहमति दर्शाते हैं. प्लेटो से अरस्तु की असहमतियों का दायरा तो इतना बड़ा है कि उन्हें एक ही दर्शनपरंपरा से जोड़ना अनुचित जान पड़ता है. जैसे कि पारिवारिक जीवन का महत्त्व, सुखस्वास्थ्य प्राप्ति के संसाधन, लोकमत का सम्मान, जनसाधारण की रुचि एवं इच्छाओं का समादर जैसे विषयों पर अरस्तु पर्याप्त उदार था. जबकि प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में सामूहिक संस्कृति और सहजीवन पर जोर देते हुए परिवार संस्था को अनावश्यक मानते हुए कठोरअनुशासित जीवन जीने की अनुशंसा की है.

फिर प्रभाव किस बात का है? कौनसा सूत्र है जो इन तीनों को परस्पर जोड़ता है? इस तारतम्यता को इन्हें पढ़ते हुए आसानी से समझा जा सकता है. एकसूत्रात्मकता ‘पराशरव्यासशुकदेव’ की त्रयी के बीच भी है. अंतर केवल इतना है कि भारतीय परंपरा के लेखकों पर अध्यात्म प्रभावी रहा है, जो अतिरेकी आस्था और विश्वास के दबाव में अंधानुकरण में ढल जाता है. जबकि ‘सुकरातप्लेटोअरस्तु’ के बीच ज्ञान की लालसा तथा शुभत्व की खोज के लिए एकदूसरे पर संदेह का सिलसिला निरंतर बना रहता है. परंपरापोषी होने के कारण भारतीय लेखक एकदूसरे को दोहराते अथवा परंपरा का पिष्ठप्रेषण करते हुए नजर आते हैं. पश्चिम का लेखन विशेषकर वह लेखन जो सुकरात से आरंभ होकर अरस्तु और आगे थामस हॉब्स, जान लॉक, रूसो, वाल्तेयर, बैंथम आदि तक जाता है, उसमें संदेह का सिलसिला कभी टूटता नहीं है. वाल्तेयर और रूसो एकदूसरे के समकालीन लेखक थे. जीतेजी उनमें हमेशा विलगाव बना रहा. दोनों एकदूसरे के कट्टर आलोचक थे. परंतु वाल्तेयर और रूसो को पढ़ते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से किसी एक के मन में ज्ञान की ललक, मनुष्यता को बेहतर बनाए जाने की उत्कंठा दूसरे से कम है. जिस तरह प्लेटो सुकरात के प्रति और अरस्तु प्लेटो के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास रखते हुए, विनम्र असहमति क साथ विचारपरंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वैसा भारतीय परंपरा में दुर्लभ है. प्लेटो के विपुल वाङ्मय में एक भी शब्द, एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जिसपर सुकरात का असर न हो. बावजूद इसके जहां आवश्यक समझा उसने सुकरात की बात भी काटी है. अरस्तु तो प्लेटो से आगे निकल जाता है. उसके मन में गुरु प्लेटो के प्रति गहरा सम्मान था. बावजूद इसके उसके ग्रंथों में प्लेटो के विचारों के प्रति सहमति से अधिक असहमति नजर आती है. प्लेटो और अरस्तु अपनेअपने गुरु के ज्ञान को आत्मसात करते हैं, परंतु उनका विश्वास उस परंपरा को आगे बढ़ाने में है, न कि अनुसरण में. प्लेटो भावुक, कवि हृदय है, जबकि अरस्तु अपेक्षाकृत वैज्ञानिक प्रवृत्ति से युक्त. इसलिए अरस्तु के लेखन में असहमति अधिक मुखर है. इस कारण कुछ विद्वान तो अरस्तु को प्लेटो का शिष्य मानने को ही तैयार नहीं है. लेकिन अरस्तु के लेखन में प्लेटो के प्रति जैसा सम्मानभाव है उसे देखते हुए यह असंभव भी नहीं लगता. कथ्य के आधार पर उनमें अंतर न के बराबर मिलेगा. ऐसा महसूस होगा मानो सारे पुराण एक ही लेखक द्वारा रचित अलगअलग कालखंड की कृतियां हैं; अथवा उनके लेखक मंजे हुए किस्सागो थे. उन्होंने समाज में पहले से प्रचलित कहानियां को अतिरेकपूर्ण कल्पनाओं और रोचकता के साथ पौराणिक कलेवर प्रदान किया था.

अरस्तु(जन्म 384 ईस्वीपूर्व) और प्लेटो के जन्म के बीच लगभग चार दशक का अंतराल था. Aristole का अर्थ है—‘श्रेष्ठतम लक्ष्य’(The best purpose). कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने नामानुरूप अरस्तु ने जीवन में महान उद्देश्य सिद्ध किए. अरस्तु का मुख्य कर्मक्षेत्र एथेंस रहा, परंतु सुकरात और प्लेटो की भांति वह मूल एथेंसवासी नहीं था. उसका जन्म एथेंस से लगभग 340 किलोमीटर दूर, थ्रेस नदी के किनारे स्थित स्तेगिरा नामक छोटे से शहर में हुआ था. उसके पिता का नाम निकोमाराक्स् था. उनके पूर्वज मैसेनिया से ईसापूर्व सातवींआठवीं शताब्दी में स्तेगिरा में आकर बसे थे. उसकी मां का नाम फैस्तिस था और उसके पूर्वज यूबोइया प्रदेश के खालिक्स नामक मामूली शहर के रहने वाले थे. मेसिडन के राजा एमींतस जिसकी प्रतिष्ठा सिंकदर का दादा होने के कारण भी है—का निजी चिकित्सक होने के कारण निकोमाराक्स् की समाज में प्रतिष्ठा थी. वे वैद्यों की पंचायत के सदस्य भी थे. उन दिनों यूनान के अनेक राज्यों में नगरराज्य की व्यवस्था थी, जहां शासन प्रक्रिया में अधिकांश नागरिकों की भागीदारी रहती थी. मेडिसन में राजतंत्र था. और जैसा कि इस प्रकार की राज्य प्रणालियों में होता है, मेडिसन में भी वंशानुक्रम के आधार पर राजा की घोषणा की जाती थी. अरस्तु के बचपन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. यत्रतत्र बिखरी सूचनाओं से पता चलता है कि उसकी प्राथमिक शिक्षा होमर की रचनाओं से आरंभ हुई था. उसपर अपने चिकित्सक पिता का विशेष प्रभाव पड़ा. उन दिनों चिकित्सक परिवार के बच्चों को बचपन से ही शल्यचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाता था.सो अरस्तु को भी शरीर विज्ञान और वनस्पतियों की शिक्षा बचपन से ही मिलने लगी थी.शरीर विज्ञान और प्रकृतिविज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में अरस्तु की रुचि को देखते हुए उस समय शायद ही कोई कल्पना कर सकता था कि आगे चलकर यूनानी दर्शन और तर्कशास्त्र का महापंडित कहलाएगा. बचपन के वही अनुभव कालांतर में विज्ञान, विशेषकर वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में उसकी रुचि का कारण बने. यह भी बताया जाता है कि बचपन के चिकित्सा क्षेत्र के अनुभवों के कारण ही अरस्तु को चिकित्सकों की स्थानीय संस्था का सदस्य बना लिया था.

अरस्तु का परिवार समृद्ध था. इसलिए बचपन में उसे सुखसुविधाओं की कमी न थी. उसका बचपन राजपरिवार के लोगों के सान्निध्य में, सुखपूर्वक बीता. संयोगवश अरस्तु के मातापिता की मृत्यु उसकी किशोरावस्था में ही हो चुकी थी. उसके बाद उसकी देखभाल का दायित्व उसके एक रिश्तेदार प्रॉक्सीनस ने संभाला. सुकरात की भांति अरस्तु की आरंभिक इच्छा भी विज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की थी. उसने अपने जीवन का लंबा समय वैज्ञानिक अनुभवों के लिए लगाया था. अनेक ग्रंथों की रचना की, बाद में वह प्रकृति विज्ञान से उकताने लगा. इसका कारण स्टेगिरा की राजनीति थी. सम्राट एमींतस महत्त्वाकांक्षी था. राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए उसने कई युद्ध लड़े थे. जिसमें उसे सफलता भी मिली थी. लेकिन राज्य की सीमाओं का विस्तार और प्रजा के सुखसंतोष में विस्तार के बीच कोई तालमेल न था. लगातार युद्ध के मैदान में रहने वाले राजा की प्रजा को जो कष्ट भोगने पड़ते हैं, वे कष्ट स्तेगिरा की प्रजा को भी भोगने पड़ते थे. इसी विसंगति से अरस्तु के मन में राजनीति को समझने की ललक पैदा हुई. उसने अनुभव किया था कि राज्य के उद्देश्यों तथा उसके कार्यों के बीच कोई तालमेल नहीं है. युवावस्था तक पहुंचतेपहुंचते वह ज्ञान के परंपरागत संसाधनों से उकताने लगा था. उसका झुकाव दर्शन और राजनीति की ओर गया. उस समय पूरे यूनान में प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादेमी’ की प्रतिष्ठा थी. अरस्तु की प्रतिभा और उच्च शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए प्रॉक्सीनस ने उसका दाखिला प्लेटो की अकादेमी में करा दिया. ईस्वी पूर्व 367 में वह एथेंस पहुंचकर प्लेटो की अकादमी का सदस्य बन गया. उस समय उसकी वयस् मात्र 17 वर्ष थी. अकादमी में आने का उद्देश्य केवल राजनीति और दर्शन की शिक्षा के साथसाथ विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में रहकर अध्ययन करने की लालसा थी.

अरस्तु प्लेटो की अकादेमी में लगभग बीस वर्षों तक रहा. वहां रहते हुए उसने गणित, दर्शन, राजनीति आदि विषयों में ज्ञान प्राप्त किया. उसके बाद कुछ अर्से तक अकादेमी में अध्यापन कार्य भी किया. यहीं उसके और प्लेटो के बीच आत्मीयता का विस्तार हुआ. अरस्तु को पुस्तकें जमा करने का शौक था और अपने धन का बड़ा हिस्सा पुस्तकों और पांडुलिपियों को जुटाने पर करता था. प्लेटो ने उसके आवास को ‘श्रेष्ठ अध्येता का घर’ कहा था. कुछ लोग मजाक में कहा करते थे कि ईश्वर ने अरस्तु के मस्तिष्क में गहरा गड्ढा बना दिया है, जिसमें वह पुस्तकों को सहेज कर रखता है. अकादेमी में रहते हुए अरस्तु पर प्लेटो की विद्वता का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया. प्लेटो की लेखनशैली का अनुकरण करते हुए उसने अकादमी प्रवास के दौरान भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, तर्कशास्त्र, तत्वदर्शन आदि पर अनेक पुस्तकों की रचना की. अरस्तु के मन में अपने गुरु के प्रति बेहद सम्मान था. वहीं प्लेटो भी अरस्तु की प्रतिभा का मुरीद था. वह उसे ‘अकादेमी का मस्तिष्क’ और ‘सर्वश्रेष्ठ अध्ययनशील’ विद्यार्थी मानता था. प्लेटो का निधन हुआ, उस समय अरस्तु की उम्र लगभग 37 वर्ष थी. वह प्लेटो के उत्तराधिकारियों में से एक था. प्रतिभा को देखते हुए अरस्तु की दावेदारी भी बनती थी. वह प्लेटो का वास्तविक उत्तराधिकारी है, यह उसने आगे चलकर सिद्ध भी कर दिया था. परंतु ‘अकादमी’ का अध्यक्ष प्लेटो के रिश्तेदार तथा गणित एवं जीवविज्ञान के पंडित स्पूसिपस को बनाया गया. इसका कारण प्लेटो से अरस्तु की वैचारिक असहमतियां भी थीं. अधिकारियों में इतना साहस न था कि अकादेमी का संचालन का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दें, जिसकी अकादेमी के संस्थापक और गुरु से घोर असहमतियां रही हों, हालांकि अरस्तु की प्रतिभा को लेकर उन्हें कोई संदेह न था. नतीजा यह हुआ कि अरस्तु का जी अकादेमी से उचट गया. निराश होकर उसने एथेंस छोड़ दिया. वहां से वह माइसिया में एटारनियस नामक स्थान पर पहुंचा. वहां अकादेमी के पूर्व छात्रों की मंडली का सदस्य बन गया. उनमें वहां का शासक हरमियॉस भी शामिल था. इससे अरस्तु को पुनः राजपरिवार के निकट आने का अवसर मिला. कुछ ही दिनों में हरमियॉस और अरस्तु गहरे दोस्त बन गए. इसका सुखद परिणाम अरस्तु और हरमियॉस की भतीजी(कुछ विद्वानों के अनुसार भानजी) पिथियास के विवाह के रूप में सामने आया. उसके फलस्वरूप उसके जीवन में स्थायित्व आया. अकादमी में प्राप्त गणित और विज्ञान की शिक्षा बहुत कारगर सिद्ध हुई. पिथियास से विवाह के उपरांत उसने खुद को प्रकृति विज्ञान की खोज में लगा दिया. समुद्र तटीय स्थानों पर जाकर वह वनस्पतियों और जीवजंतुओं का अध्ययन करने लगा. उन अनुभवों के आधार पर उसने आगे चलकर कई पुस्तकों की रचना की. एथेंस छोड़ने के बाद 12 वर्षों तक वह इसी तरह अनुभव और ज्ञान बंटोरता रहा. इस बीच राजतंत्र की निरंकुशता को करीब से देखने का अवसर मिला. कदाचित इसी बीच उसके मन में छोटेछोटे राज्यों की विकृतियां सामने आने लगी थीं. वही अनुभव कालांतर में आगे चलकर ‘पॉलिटिक्स’ एवं ‘एथिक्स’ जैसे गं्रथों की प्रेरणा बनी. अपने उत्तरवर्ती जीवन में अरस्तु ने एक अन्य युवती हरपिलिस से विवाह किया, जिससे उसे संतान हुई. पुत्र का नाम उसने अपने पिता के नाम पर निकोमाराक्स् रखा.

342 ईस्वीपूर्व के आसपास उसको मेसिडन के सम्राट की ओर से निमंत्रण प्राप्त हुआ. इस अवधि में वहां काफी कुछ बदल चुका था. एमींतस के बाद फिलिप मेसिडन का सम्राट था. उसे अपने बेटे सिकंदर के लिए योग्य शिक्षक की तलाश थी. अरस्तु की प्रतिभा के बारे में वह पहले से ही परिचित था. अकादेमी में अरस्तु द्वारा किए गए कार्य भी उसकी जानकारी में थे. ऐसे में सिकंदर की शिक्षा के लिए अरस्तु से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. निमंत्रण मिलते ही अरस्तु मेसिडन लौट आया. सम्राट फिलिप की ओर से उसका जोरदार स्वागत किया गया. आते ही उसे ‘रॉयल अकादेमी ऑफ मेसिडन’ का अध्यक्ष बना दिया गया. अगले तीन वर्षों तक वह इसी पद पर बना रहा. शिक्षक के तौर पर उसने राजकुमार सिकंदर में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जगाने का काम किया. उसने सिंकदर को राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए एशियामाइनर तथा अन्य उत्तरपूर्वी राज्यों पर अधिकार करने की सलाह दी. इस बीच एटारनियस से दुखद समाचार आया कि एक ईरानी सेनापति ने उसके मित्र और वहां के शासक हरमियॉस को धोखे से पकड़कर उसकी हत्या कर दी है. इस सूचना ने अरस्तु को व्यथित कर दिया. 340 ईस्वी पूर्व में फिलिप की मृत्यु के बाद सिकंदर सम्राट बना. सिंकदर के मन में शुरू से ही साम्राज्यवादी भावनाएं जोर मारती थीं. सत्ता हाथ में आते ही वह युद्ध पर निकल पड़ा. अब मेसिडन में अरस्तु को कोई काम न था. इसी बीच उसे एथेंस जाने का अवसर मिला. उसी समय अकादेमी अध्यक्ष पद के रिक्त होने की सूचना मिली. अरस्तु के मन में अकादेमी से जुड़ने की लालसा अब भी शेष थी. परंतु अरस्तु की उपेक्षा करते हुए अकादेमी के अधिकारियों द्वारा खेनोक्रातेस को अकादेमी का मुख्यअधिष्ठाता मनोनीत किया गया. अरस्तु एक बार फिर निराश हो गया. परंतु उसके जैसे मननशील व्यक्ति के आगे निराशा बहुत टिकाऊ नहीं थी. उसने स्वयं को अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया.

335 ईस्वी पूर्व में उसे पुनः एथेंस लौटने का अवसर मिला. इस बार आमंत्रित करने वाला था, हर्मेडयस उस समय उसकी उम्र 51 वर्ष थी और एक विद्वान दार्शनिक के रूप में उसकी ख्याति आसपास के देशों में फैल चुकी थी. एथेंस की ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में धाक थी. अवसर गंवाए बिना अरस्तु एथेंस के लिए प्रस्थान कर गया. उन दिनों एथेंस और मेसीडन के संबंध अच्छे न थे. परंतु अरस्तु की विद्वता की धाक ऐसी थी कि एथेंस में उसका स्वागत हुआ. जाहिर है इसके पीछे एथेंसवासियों की ज्ञान के प्रति सम्मानभावना का असर था. एथेंस के उत्तरपूर्व स्थित उपनगर अपोलो में लीशियस देवी का मंदिर था. एथेंस के कानून के अनुसार वहां बाहरी व्यक्तियों को भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी. इसलिए अरस्तु ने मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में कुछ मकान किराये पर लेकर अपने विश्वविद्यालय की स्थापना की. विश्वविद्यालय का नाम लीशियस देवी के नाम के आधार पर ‘लीशियम’ रखा गया. कुछ ही दिनों में एथेंस के अनेक प्रतिष्ठित लोग जिनमें अकादेमी से शिक्षित लोग भी थे, अरस्तु से जुड़ने लगे. इससे अरस्तु और उसके विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उस विश्वविद्यालय की खूबी थी कि वहां टहलते हुए शिक्षार्जन पर जोर दिया जाता था. अरस्तु स्वयं टहलते हुए पढ़ाता था. इसलिए कुछ प्लेटो को ‘टहलतेटहलते पढ़ाने वाला अध्यापक’ तथा संस्था को ‘परिभ्रामी विद्यालय’;च्मतपचंजमजपब ैबीववसद्ध भी कहने लगे थे. लीशियम में रहते हुए अरस्तु ने अध्यापन के अलावा कई महत्त्वपूर्ण काम किए. पुस्तक संग्रह का शौक उसको अकादेमी प्रवास से ही था. लीशियम में उसे पुस्तकें जमा करने के भरपूर अवसर मिला. फलस्वरूप उसने सैकड़ों पुस्तकों एवं पांडुलियों का संग्रह किया. और उन्हें सुरक्षित रखने लिए लीशियम के भीतर एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण किया. अरस्तु द्वारा निर्मित पुस्तकालय उसके समकालीन नाटककार यूरीपिडिस के पुस्तकालय को छोड़कर, पूरे यूनान में सबसे बड़ा था. यही नहीं उसने पुस्तकों को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक नियम भी बनाए थे. पुस्तकालय के अलावा उसने विश्वविद्यालय में विचित्र वस्तुओं, शैवालों तथा मानचित्रों का एक अजायबघर तैयार किया. हालांकि स्वयं अरस्तु के पास धन की कमी न थी. उसकी पत्नी धनाड्य परिवार से थीं. इसके साथसाथ पुस्तकालय, अजायबघर, वैज्ञानिक उपकरण आदि के लिए सिंकदर की ओर से भी समयसमय पर मदद प्राप्त होती रहती थी. गुरु अरस्तु के प्रति सिंकदर का सम्मान इससे भी जाहिर होता है कि उसने अपने सैनिकों, मछुआरों, बहेलियों और शिकारियों को आदेश दिया था कि काम के दौरान यदि कोई विचित्र वस्तु मिले तो उसे संग्रहित कर, लीशियम के संग्रहालय में जमा करा दें. इसके अतिरिक्त सिंकदर ने जीव विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान संबंधी खोजों के वैज्ञानिक उपकरण भेजकर भी अरस्तु की मदद की थी.

अरस्तु ‘लीशियम’ में 12 वर्षों तक रहा. इस बीच उसका विद्यालय निरंतर प्रगति करता रहा. लगभग सभी विषय की शिक्षाओं का वहां प्रबंध था और शिक्षार्थी के रूप में दूरदूर के विद्यार्थी वहां पहुंचते थे. ‘लीशियम’ के प्रशासन हेतु अरस्तु ने विशेष प्रबंध किए थे. उस व्यवस्था को प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ तो नहीं कह सकते, परंतु शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अनौपचारिक बातचीत को बढ़ाने, शिक्षा में सहजता लाने की भावनाएं उसके पीछे अवश्य थीं. तदनुसार विद्यार्थी अपने बीच से एक विद्यार्थी को चुनते थे. अगले दस दिनों तक वही विश्वविद्यालय के प्रशासक का काम करता था. इसके बावजूद ‘लीशियम’ में पर्याप्त अनुशासन था. भोजनव्यवस्था वहां सामूहिक थी. महीने में एक दिन विशेष परिचर्चा के लिए सुरक्षित था, जिसके नियम अरस्तु ने निर्धारित किए थे. अरस्तु का यह विश्वविद्यालय ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सका. एक तरह से यह उसकी शाखा जैसा ही था. दोनों में एक विशेष अंतर भी था. ‘अकादेमी’ में गणित पर ज्यादा जोर दिया जाता था, जबकि ‘लीशियम’ में जीवविज्ञान और वनस्पति विज्ञान की शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाता था. प्रायोगिक शिक्षा का खास महत्त्व था. उन दिनों बाढ़ आम समस्या थी. बरसात के समय नील नदी उफनने लगती. अरस्तु ने नियमित आने वाली बाढ़ों की रोकथाम के लिए भी शोधकार्य किया था. ‘लीशियम’ को प्लेटो के ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा भले ही प्राप्त न कर सका, परंतु एक दार्शनिक के रूप में अरस्तु को वैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी, जैसी कभी सुकरात और प्लेटो को प्राप्त था. अरस्तु को नकारकर जिस व्यक्ति को अकादेमी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था, अरस्तु के प्रभामंडल के आगे उसकी प्रतिष्ठा नगण्य थी.

लीशियम में अध्यापन करते हुए अरस्तु ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की. उस समय सिकंदर विश्वविजय के लिए निकला हुआ था. यात्रा के विवरणों को दर्ज करने के लिए सिंकदर के साथ कल्लिस्थेसनस् नामक युवा भी उसके साथ अभियान पर था. वह अरस्तु का शिष्य था और अपने गुरु की भांति स्पष्टवक्ता भी. अभियान के दौरान किसी कार्य के लिए कल्लिस्थेसनस् ने सिंकदर की आलोचना कर दी. परिणामस्वरूप सिंकदर उससे रुष्ट हो गया. उस समय तक सिंकदर की विश्वविजय की कामनाएं उभार पर थीं. आलोचना उससे सहन न हुई. उसके आदेश पर कल्लिस्थेसनस् को मृत्युदंउ सुनाया गया. कल्लिस्थेसनस अरस्तु का करीबी शिष्य था. अरस्तु ने ही उसे सिकंदर के साथ भेजा था, इसलिए कल्लिस्थेसनस् के साथसाथ अरस्तु को भी दोषी माना गया. सिंकदर ने अरस्तु को दंडित करने का निर्णय कर लिया. लेकिन भारत अभियान में वह इतनी बुरी तरह से उलझा कि वापस लौट ही नहीं पाया. ईसा पूर्व 323वें वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई.सिकंदर की मौत का समाचार जैसे ही मेसिडन पहुंचा वहां विद्रोह हो गया. अरस्तु सिंकदर का गुरु और करीबी रह चुका था, इसलिए विद्रोहियों ने उसे भी दंडित करने का निर्णय किया. लेकिन अरस्तु को दंडित करना आसान न था. उसकी पूरे यूनान में प्रतिष्ठा थी. विद्रोहियों ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित कर दिया. आरोप का आधार अरस्तु द्वारा ईसापूर्व 340-341 में अपने दोस्त हरमियॉस पर लिखी कविता को बनाया गया. वह कविता अरस्तु ने हरमियॉस की हत्या के बाद लिखी थी, जिसमें उसके गुणों का बखान करते हुए उसे देवतुल्य घोषित किया गया था. बीस वर्ष पुरानी उस कविता के समय और परिस्थिति को देखते हुए इस प्रकार के आरोप बेमानी थे. विरोधी किसी भी प्रकार अरस्तु को दंडित करना चाहते थे, इसलिए अरस्तु को नास्तिक घोषित करना, जनता के बीच उसकी छवि को धूमिल करने की चाल थी. अपने विरुद्ध बढ़ता माहौल देख अरस्तु को एथेंस छोड़ना पड़ा. उसी वर्ष 62 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई.

एथेंस छोड़ते समय उसने घोषणा की थी कि एथेंसवासियों को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध नहीं करने देगा. दर्शनशास्त्र के विरुद्ध एथेंसवासियों का पहला अपराध उसकी संसद द्वारा सुकरात को दिया गया मृत्युदंड था. एथेंस से वह युबोइया के लिए प्रस्थान कर गया. वहां खॉल्किस नामक छोटे से नगर में जाकर रहने लगा. वहीं रहते हुए उसने अपनी वसीयत तैयार की, जिसमें उसने अपनी पत्नी हर्पीलियस के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उसके लिए धन की व्यवस्था की थी. पहली पत्नी पिथियास की यादें अब भी उसके दिल में बसी थीं. इसलिए उसने वसीयत में लिखा कि उसे पिथियास के अवशेषों के साथ दफनाया जाए. अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा दासों के नाम किया था और कुछ को उसने दासत्व से मुक्त कर, स्वतंत्र कर दिया था. ये घटनाएं उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं. कविहृदय प्लेटो ने भी पाया था, परंतु उसे कविता से अरुचि थी. मानता था कि कविता और नाटक जैसी विधाएं मनुष्य को यथार्थ से परे ले जाकर कमजोर बनाती हैं. अरस्तु मनोमस्तिष्क से वैज्ञानिक होने के साथसाथ संवेदनशील कवि भी था. एक कविता में उसने प्लेटो की विलक्षण मेधा की प्रशंसा करते हुए उसे विद्वानों के बीच अद्वितीय घोषित किया है. देहयष्टि को लेकर भी अरस्तु और प्लेटो के बीच उल्लेखनीय अंतर था. प्लेटो लंबेचौड़े डीलडोल, चौड़ी छाती और सुदर्शन चेहरे वाला व्यक्ति था. उसके नामकरण का कारण ही उसका लंबाचौड़ा डीलडौल था. दूसरी ओर अरस्तु की आंखें छोटीछोटी. पैर पतले. कदकाठी सामान्य थी. बोलते समय वह कभीकभी तुतलाने लगता था. यह भी कहा गया है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसके बाल झड़ चुके थे. रहनसहन और बोलचाल में वह असंयमी था. अरस्तु की वाक्पटुता की प्रशंसा की जाती है. दियोगेनस ने उसकी वाक्पटुता के उदाहरणों को पुस्तकाकार संग्रहित किया है. मगर उसकी प्रतिभा बेमिसाल थी. वह अपने समय के शीर्षतम दार्शनिकों और कुछ मामलों में तो अपने गुरु प्लेटो से भी आगे था. दांते ने उसे ‘सभी विद्वानों का गुरु’ घोषित किया है. अरस्तु ने विपुल साहित्य की रचना की. उसके ग्रंथों की संख्या लगभग चार सौ बताई जाती है. उनमें से अनेक ग्रंथ तो दर्शनशास्त्र और राजनीति की धरोहर हैं. लेकिन यह भी विडंबना है कि अरस्तु जैसे महामेधावी दार्शनिक की पुस्तकें भी उसके निधन के लगभग 250 वर्ष बाद ही सिसरो के प्रयासों के फलस्वरूप प्रकाशित हो सकीं. इस बीच उसकी अनेक पांडुलिपियां लुप्त हो चुकी थीं. अब सिवाय संदर्भों के उनका कहीं अतापता नहीं है. लेकिन ‘पॉलिटिक्स’ और ‘एथिक्स’ जैसे ग्रंथ मानवता के उपहार के रूप में आज भी सुरक्षित हैं.

प्लेटो और अरस्तु

अरस्तु की विलक्षणता उसके तार्किक विश्लेषण में है. सुकरात और प्लेटो की शैली मुख्यतः निगमनात्मक थी. अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले सुकरात अपने प्रतिपक्षी के आगे तर्क करता था. उत्तर प्राप्त होने पर वह प्रति तर्क अथवा प्रत्युत्तर के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ाता था. सुकरात को पढ़ते हुए सुधी पाठक समझ जाता है कि संबंधित विषय को लेकर उसका खास दृष्टिकोण है. परंतु निष्कर्ष को सामने रखने से पूर्व वह उसके सभी पक्षों को गंभीरतापूर्वक परख लेना चाहता है. प्रत्येक तर्क के साथ वह अपने मंतव्य को मजबूत करता जाता है. संवादात्मक शैली इसमें सहायक बनती है. यह तर्क की निगमनात्मक पद्धति है, जिसमें एक परिकल्पना को सिद्धांत में बदलने के लिए उसके समर्थन में तर्क जुटाए जाते हैं. पर्याप्त साक्ष्य हों तो ठीक वरना उस परिकल्पना को किनारे कर नए शोध की शुरुआत की जाती है. इसका मुख्य प्रयोग विज्ञान में होता है, जिसमें एक परिकल्पना के साथ परीक्षण, अनुरीक्षण करते हुए निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश की जाती है. आगमनात्मक पद्धति में निष्कर्ष भविष्य में निहित होता है. उससे जुड़ी कुछ छोटीछोटी स्थितियां, विचार अथवा अनुभवादि होते हैं. फिर उनकी पड़ताल, पुराने निष्कर्षों के साथ मिलान, व्याख्या और परिणामों में आवश्यक संशोधनपरिवर्धन के बाद अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है. अरस्तु को तर्क के क्षेत्र में आगमनात्मक पद्धति के प्रथम उपयोग का श्रेय भी प्राप्त है.

अरस्तु को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उसने राजनीति को फुटकर विचारों से ऊपर उठाकर स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता दिलाने का काम किया. उससे पूर्व वह धर्मदर्शन का हिस्सा थी. भारत में तो वह आगे भी बनी रही. अरस्तु का समकालीन चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ में अपने राजनीतिक विचारों को सामने रखता है और मजबूत केंद्र के समर्थन में तर्क देते हुए राज्य की सुरक्षा और मजबूती हेतु अनेक सुझाव भी देता है, परंतु ‘अर्थशास्त्र’ और ‘पॉलिटिक्स’ की विचारधारा में खास अंतर है. यह अंतर प्राचीन भारतीय और पश्चिम के राजनीतिक दर्शन का भी है. उनमें अरस्तु की विचारधारा आधुनिकताबोध से संपन्न और मानवमूल्यों के करीब है. ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में भी मनुष्य और राज्य है. दोनों का लक्ष्य नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति है. अरस्तु के अनुसार राजनीतिकसामाजिक आदर्शों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है नागरिक और राज्य दोनों अपनीअपनी मर्यादा में रहें. सामान्य नैतिकता का अनुपालन करते हुए एकदूसरे के हितों की रक्षा करें. इस तरह मनुष्य एवं राज्य दोनों एकदूसरे के लिए साध्य भी साधन भी. ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य अपेक्षाकृत शक्तिशाली संस्था है. उसमें राज्यहित के आगे मनुष्य की उपयोगिता महज संसाधन जितनी है. लोककल्याण के नाम पर चाणक्य यदि राज्य के कुछ कर्तव्य सुनिश्चित करता है तो उसका ध्येय मात्र राज्य के लिए योग्य मनुष्यों की आपूर्ति तक सीमित है. ‘पॉलिटिक्स’ के विचारों के केंद्र में नैतिकता है. वहां राज्य का महत्त्व उसके साथ पूरे समाज का हित जुड़े होने के कारण है. राज्य द्वारा अपने हितों के लिए नागरिक हितों की बलि चढ़ाना निषिद्ध बताया गया है. दूसरी ओर ‘अर्थशास्त्र’ के नियम नैतिकता के बजाए धर्म को केंद्र में रखकर बुने गए हैं, जहां ‘कल्याण’ व्यक्ति का अधिकार न होकर, दैवीय अनुकंपा के रूप में प्राप्त होता है. जिसका ध्येय राज्य की मजबूती और संपन्नता के लिए आवश्यक जनबल का समर्थन और सहयोग प्राप्त करना है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई पूंजीपति श्रमिककामगार को मात्र उतना देता है, जिससे वह अपनी स्वामी के मुनाफे में उत्तरोत्तर संबृद्धि हेतु अपने उत्पादनसामर्थ्य को बनाए रख सके.

अरस्तु के जीवनकाल में यूनान भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रहा था. लोग छोटैछोटे राज्यों से उकताने लगे थे. गणतांत्रिक प्रणाली को नाकाम होते देख साम्राज्यवादियों का हौसला बढ़ा था. वे नए सिरे से साम्राज्यवादी विस्तार की तैयारियों में लगे थे. छोटे राज्यों के असफल होने के दो कारण थे. पहला उनमें आपस में बहुत झगड़े होते थे. जरासी बात पर तलवारें खिंच जाया करती थीं. दूसरा और प्रमुख कारण था—व्यापारिक बाधाएं. ईसा पूर्व पांचवीछठी शताब्दी में अंतर्प्रायद्विपीय व्यापार ने काफी तरक्की की थी. व्यापारिक बेड़े दूरदराज के राज्यों के साथ व्यापार करते थे. दूसरे राज्य में व्यापार की अनुमति पारस्परिक राजनीतिक संबंधों पर निर्भर करती थी. संबंध अनुकूल हों तब भी शिल्पकार संगठनों को दूसरे राज्य में व्यापार हेतु भारीभरकम करों का भुगतान करना पड़ता था. बड़े राज्यों के गठन के पीछे मूल विचार था कि उनमें मुक्त व्यापार के लिए अधिक बाजार उपलब्ध हो सकेगा. कुल मिलाकर बड़े राज्यों के गठन के पीछे जहां सभ्यताकरण की प्रेरणाएं थीं, वहीं वर्तमान के प्रति असंतोष की भावना भी थी. अरस्तु जैसा प्रखर विद्वान परिवर्तनों का मूकनिष्पंद द्रष्टा बनकर नहीं रह सकता था. वह दार्शनिक था. विचारों का उसकी दुनिया में महत्त्व था. विचारों को वह किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आधारशिला मानता था. उसका मानना था कि मनुष्य श्रेष्ठ का चयन तब कर सकता है, जब उसे श्रेष्ठत्व का बोध हो. उन खूबियों की जानकारी हो जो श्रेष्ठ को श्रेष्ठत्व प्रदान करती हैं. ऐसा नहीं है कि इसकी शुरुआत अरस्तु या प्लेटो से हुई हो. दर्शन के रूप में राजनीति के अध्ययन की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. प्राचीन यूनान में होमर, लायक्राग्स, सोलन, प्रोटेगोरस, एंडीफोन, पाइथागोरस, जेनोफीन जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने राजनीति को सभ्यताकरण के उपकरण की भांति प्रयुक्त किया था. तथापि सुसंगत राजनीतिक चिंतन का अभाव था. राजा प्रजा की मांग तथा अपनी सुविधा के अनुसार कुछ नियम बना लिया करते थे. फिर लंबे समय तक उन्हीं को मार्गदर्शक मानकर काम चलाया जाता था. उनमें से कुछ पर अमल हो पाता था, कुछ पर नहीं. प्रजा कुछ समय तक प्रशासन की दुर्बलताओं को सहती. धीरेधीरे असंतोष उमड़ने लगता था. फलस्वरूप नए सिरे से व्यवस्थापरिवर्तन की मांग उठने लगती थी. नियमों में बड़ा परिवर्तन प्रायः बड़े सत्तापरिवर्तन के साथ ही हो पाता था.

प्लेटो ने न केवल विभिन्न राजनीतिक दर्शनों को एक साथ अध्ययनचिंतन का विषय बनाया, वहीं उनकी खूबियों और खामियों पर भी चर्चा की. उसका लक्ष्य सामाजिक आदर्श थे, जिनके लिए वे राजनीति को औजार के रूप में उपयोग करना चाहता था. अरस्तु ने उस अध्ययन को तर्कसम्मत ढंग से विस्तार दिया. उसके लिए कसौटी न्याय और नैतिकता को बनाया. अरस्तु की कामना ऐसे राज्य की थी, जो परमशुभ की प्राप्ति हेतु सतत अग्रसर हो. जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अच्छाइयों के साथ जीने की आजादी हो. और वह अंतःस्फूर्त्त प्रेरणा के साथ लक्ष्यप्राप्ति हेतु संकल्परत हो. यह तभी संभव है जब व्यक्ति को कानून और समाज की मर्यादा में, वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो जिसे वह अपने लिए उपयुक्त मानता है. इसके लिए आवश्यक है कि राज्य अपेक्षित रूप में उदार हो. निरंकुश, अल्पतंत्रात्मक राज्यों में जनसाधारण से उसके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है. इस कारण प्लेटो ने निरंकुश राज्य को सबसे बुरा माना है. उसके अनुसार निरंकुश राज्य में नीचे से ऊपर तक सभी स्वार्थलिप्त होते हैं. संसाधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होता है. बहुसंख्यक वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह अल्पसंख्यक शासक वर्ग की मनमानियों को सहते हुए शासन में सहयोग करे तथा राज्य के हित को, जो वास्तव में उसपर शासक वर्ग द्वारा थोपा हुआ उसका स्वार्थ होता है—अपना हित समझकर वर्ताब करे. ऐसे राज्य में मनुष्य सज्जन की संगत को तरस जाता है. दुर्जन उसे चारों ओर से घेरे रहते हैं. परिणामस्वरूप वह अपनी ही अच्छाइयों से कट जाता है. दुष्प्रभाव केवल यहीं तक सीमिन नहीं रहता. अपने चारों और स्वार्थपरक माहौल देख भले नागरिकों का अपनी मूलभूत अच्छाई से भरोसा उठने लगता है. वे मान लेते हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दुर्जनों के बीच दुर्जन जैसा व्यवहार करना उसकी मजबूरी है. बुराई के लिए आपधापी में अच्छाई की बलि चढ़ा दी जाती है. परिणामस्वरूप लोगों के स्वार्थ प्रबल होने लगते हैं. केवल अपने लिए जीने की होड़ मच जाती है. कुल मिलाकर निरंकुश राज्य नागरिकों को स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है. ऐसे समाजों में चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए जीता है, इसलिए सामूहिक हितों के लिए संगठित प्रतिरोध की उसकी क्षमता निरंतर घटती जाती है. ऐसे समाजों में न्याय के अवसर विरल हो जाते हैं.

प्लेटो व्यक्ति एवं समाज की अंतःनिर्भरता पर जोर देता है. सामाजिकता की शर्त है कि अन्योन्याश्रितता केवल सुखसुविधाओं और संसाधनों की नहीं, आचारव्यवहार की भी बनी रहे. इस दृष्टि से मनुष्य तथा समाज के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होता. श्रेष्ठ मनुष्य श्रेष्ठ नागरिक भी होता है, किंतु अकेले मनुष्य की श्रेष्ठता क्षणभंगुर होती है. मनुष्य अपने आचारव्यवहार में श्रेष्ठतर बना रहे, उसके लिए समाज की श्रेष्ठता अपरिहार्य है. इस तरह जो मनुष्य के लिए आदर्श है, प्रकारांतर में वह राज्य के लिए भी आदर्श होना चाहिए. न्याय मानव जीवन का उद्देश्य तभी बन सकता है, जब वह समाज का उद्दिष्ट हो. यदि समाज में न्याय का अभाव है तो समझना चाहिए कि राज्य एवं नागरिकों के बीच विश्वास एवं तालमेल की कमी है. विचार को आगे बढ़ाता हुआ प्लेटो लिखता है कि मनुष्य के लिए क्या श्रेष्ठ है, इसे उस समय तक नहीं जाना जा सकता, जब तक हम यह न जान लें कि राज्य के लिए क्या श्रेष्ठ है. अथवा राज्य जो उसके नागरिकों के लिए श्रेष्ठ है, उसे अपने लिए भी श्रेष्ठ न मान ले. निरंकुश राज्य में ऐसा संभव नहीं होता. वहां नागरिकों से न केवल उनके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है, बल्कि लोगों को विवश किया जाता है कि वे अपने विवेक से काम लेने के बजाय दूसरों के आदेश का अनुपालन करें. इससे मनुष्य अपने नागरिक धर्म को भूल जाता है. दूसरी ओर वे लोग जो दूसरों के श्रम और अधिकारों पर कब्जा जमाए होते हैं, विरोध की कोई संभावना न देख उनका दुस्साहस बढ़ता ही जाता है. परिणामस्वरूप स्तरीकरण स्थायी रूप ले लेता है. इससे समाज दो हिस्सों में बंट जाता है. एक ओर आज्ञाप्रदाता समूह होता है. दूसरी ओर आज्ञापालक लोग, जो संख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकारवंचित होने के कारण दबाव में रहने को विवश होते हैं. इससे मनुष्य की मूलभूत पहचान जो उसके मानवीकरण की शर्त के साथ जुड़ी है, धूमिल पड़ने लगती है. अरस्तु ने मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना है. मनुष्य सबके साथ मिलकर जीने को उत्सुक होता है, इस कारण वह दूसरों से श्रेष्ठ है. परंतु सामूहिकरण की भावना जो पशुओं में भी होती है. यहां तक कि कीटपतंगे भी समूह में जीना जानते हैं. फिर मनुष्य की सामूहिकता और मानवेत्तर प्राणियों की सामूहिकता में क्या अंतर है? अरस्तु के अनुसार मनुष्य की सामूहिकता समाज के रूप में कुछ नियमों से बंधी होती है. या यह कहो कि अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए वह सामाजिक नियमों के रूप में कुछ मर्यादाएं चुनता है. फिर उनके अनुपालन हेतु संस्थाओं का गठन करता है. मानवेत्तर प्राणियों में ऐसा नहीं होता. वहां केवल बल का साम्राज्य होता है. इसलिए जब कोई बलशाली प्राणी अपने से कमजोर पर आक्रमण कर उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तो बाकी जानवरों में उसकी कोई स्थायी प्रतिक्रिया नहीं होती. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. मानवसमाज में अधिकार एवं कर्तव्य साथसाथ चलते हैं. परंतु ऐसे समाजों में जहां स्तरीकरण बहुत अधिक हो, समाज शक्तिशाली और शक्तिविपन्न वर्गों में बंटा हो, वहां मिलजुलकर रहने की प्रवृत्ति भी कमजोर पड़ती जाती है. न्यायभावना किसी भी मनुष्य की श्रेष्ठता का मापदंड होती है. न्यायभावना से कटा मनुष्य नितांत जंगली हो सकता है.

कविहृदय प्लेटो आदर्श राज्य के सपने को अपनी कल्पना के जरिये विस्तार देता है. उसका वैचारिक स्तर इतना ऊंचा है कि व्यावहारिक कठिनाइयों को कभी समझ ही नहीं पाता. अरस्तु को मानवव्यक्तित्व की जटिलताओं की समझ अपेक्षाकृत अधिक थी. वह जानता था कि मनुष्य के व्यवहार के बारे में कोई भी सटीक भविष्यवाणी कर पाना संभव नहीं है. यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसी मनुष्य में जो गुण आज हैं, वे सदैव बने रहेंगे. इसलिए किसी व्यक्ति का दार्शनिक होना उसके चरित्र का स्थायी लक्षण नहीं है. अपने विचारों की व्याख्या के लिए अरस्तु ने ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के तेरहवें अध्याय में पेरियांडर का उदाहरण दिया है. पेरियांडर ने 627 ईस्वीपूर्व से 587 ईस्वीपूर्व तक कोरिंथ पर राज किया था. उसकी गिनती ग्रीक के सात प्राचीन संतपुरुषों में होती है. वह दार्शनिक, कवि, आविष्कारक, योद्धा और श्रेष्ठ प्रशासक था. यातायात साधनों की खोज तथा अनेक महत्त्वपूर्ण भवनों के निर्माण के कई आविष्कारों का श्रेय भी उसे दिया जाता है. किंतु उसका आचरण उसकी विद्वता के सर्वथा विपरीत था. अपने आचरण में वह पूरी तरह निरंकुश, क्रोधी, निर्मम, कठोर और कुटिल तानाशाह था. एक बार उसे अपनी पत्नी लिसिडा पर इतना क्रोध आया कि उसे सीढ़ियां पर ढकेल दिया था, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई. पेरियांडर और मेनिटस के राजा थ्रेसीबुलस् के बीच गहरी मैत्री थी. पेरियांडर की भांति थ्रेसीबुलस् भी निरंकुश सम्राट था. मेलिटस और लीडिया के बीच लंबा संग्राम चला था. वर्षों तक चलने वाले युद्ध का कोई परिणाम न निकलता देख दोनों राज्य आपस में समझौते के लिए विवश हो गए. थ्रेसीबुलस ने युद्ध विराम की घोषणा तो कर दी, लेकिन वह अपने विरोधियों को मित्र का दर्जा देने को तैयार न था. इस कारण वह भीतर से बहुत आहत था. सो उसने पेरियांडर से सलाह लेने के लिए उसके पास अपना दूत भेजा. पेरियांडर ने दूत की बातें सुनीं. सलाह देने के बजाय वह दूत को बस्ती से बाहर खेत में ले गया. वहां गेहूं की फसल खड़ी थी. पेरियांडर ने साथ आए सैनिकों को सबसे ऊपर निकली बालियों को काटने का आदेश दिया. उसके इशारे पर सैनिकों ने सबसे ऊपर दिखने वाली बालियों को काटकर जमीन पर बिछा दिया. उसके बाद थ्रेसीबुलस् के दूत को वापस लौटा दिया. दूत की कुछ समझ न आया. उसने वापस लौटकर जो कुछ घटा था, सम्राट को बता दिया. सुनकर थ्रेसीबुलस् की आंखों में चमक आ गई. वह पेरियांडर का इशारा समझ गया. सबसे ऊंची बालियों को नष्ट कर देने का अर्थ जो उसने निकाला वह था, अपने सभी प्रमुख विरोधियों का निर्ममतापूर्ण सफाया. अरस्तु का निष्कर्ष था कि सत्ताएं अपना विरोध नहीं सह पातीं. गणतांत्रिक सरकारें तानाशाहों की भांति कठोर फैसले लेने से बचती हैं, लेकिन विरोधियों को वे भी अपवादस्वरूप ही पचा पाती हैं. विरोधियों के क्रूरतापूर्ण दमन से बचते हुए वे आरंभ में अपेक्षाकृत उदार दिखने वाले रास्ते अपनाती हैं. उनकी पहली कोशिश विरोधियों के संगठन को तोड़ने की होती है. फिर उनमें से एक पक्ष को बहलाफुसला या सत्ता में हिस्सेदार बनाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है. यदि उससे समाधान की संभावना कम हो अथवा कोई अड़ जाए राष्ट्रहित का हवाला देते हुए देशनिकाले जैसी सजा देकर उससे मुक्ति पा ली जाती है.

अरस्तु आदर्श और व्यवहार के अंतर को वह भलीभांति समझता था. प्लेटो आदर्श से तनिक पीछे हटने को तैयार न था, जबकि अरस्तु आदर्श और व्यवहार में संतुलन बनाए रखने का समर्थक था. व्यावहारिकता से जराभी पीछे हटे बिना वह समाज में नैतिकता और अनुशासन को बनाए रखने का समर्थन करता है. व्यावहारिक आदर्शोन्मुखता उसके दर्शन का मुख्य लक्षण है. उल्लेखनीय है कि ‘पॉलिटिक्स’ की रचना से पहले उसने 158 नगरराज्यों के संविधानों का अध्ययन किया था. अंततः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रत्येक राजनीतिक दर्शन स्वयं में अपूर्ण है. केवल चरित्र की ईमानदारी और निष्ठा से अपेक्षित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा भी उन आदर्शों को प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसके लिए समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सहयोग और तालमेल आवश्यक है. समाजवाद की भाषा में कहें तो सब एक के लिए और एक सबके लिए जीने को तैयार हो, तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है. राजनीति के आधुनिक पंडित राजतंत्र की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि वहां राजा वंशानुगत आधार पर सत्ता ग्रहण करता है. एक ही वर्ग की मनमानी चलती रहती है. महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते समय जनता से सलाहमशविरा करने अथवा लोगों की इच्छाओं का सम्मान करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती. प्रायः सत्ता पक्ष की पसंदों को प्रजा की पसंद या उसके लिए सर्वथा हितकारी बनाकर लाद दिया जाता है. ऐसे समाजों में संपन्न लोगों की चलती है और न्याय की संभावना अत्यंत विरल हो जाती है. जबकि अरस्तु के अनुसार न्याय प्रत्येक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए. तदनुसार न्याय की दृष्टि में जो श्रेष्ठ है, वही राज्य के गठन का उद्देश्य भी है. इसलिए राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र, यदि उसका शासन समाजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हुए राज्य के उद्देश्यों के प्रति समर्पित है, यदि वह राजकर्म को समाज द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानता है तो उसे अनैतिक नहीं माना जा सकता. हालांकि अकेले व्यक्ति के हाथों में सत्ता आने पर उसकी मनमानी के आसार अधिक होते हैं. राजतंत्र में प्रायः यह सोचकर कि राजा के सुख में ही प्रजा का सुख निहित है—नीतियां बनाई जाती हैं. इसलिए प्रजा की पसंदों के बारे में पता ही नहीं चल पाता. प्रजा भी राज्य की ओर से उम्मीद खो बैठती है. उस अवस्था में राज्य के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. यदि प्रजा की उदासीनता बहुत अधिक बढ़ जाए तो वह राज्य की प्रवृत्ति तथा उसके बदलाव में रुचि लेना छोड़ देती है. इससे शीर्ष पर बैठे लोगों की मनमानियां बढ़ती जाती हैं.

भारत में राजा नामक संस्था को असुरों की देन बताया गया है. ऐतरेय ब्राह्मण में रोचक प्रसंग आया है—‘‘देव और असुर परस्पर युद्धरत रहते थे. दोनों के बीच पूरब दिशा में युद्ध हुआ. उसमें देवता पराजित हुए. अगली लड़ाई दक्षिण में हुई. उसमें भी असुरों की जीत हुई. उसके बाद पश्चिम में युद्ध हुआ. असुरों ने एक बार पुनः देवताओं को पराजित किया. फिर उत्तर दिशा में युद्ध हुआ. देवता उस युद्ध में भी पराजित हुए. उसके बाद वे उत्तरपूर्व में युद्धरत हुए. इस बार देवताओं की विजय हुई. देवताओं ने माना, वह दिशा ‘अपराजेय’ है….केवल वही दिशा थी, जिसमें देवताओं को जीत मिली. अंततः देवताओं को समझ आया—‘हम इसलिए पराजित हुए, क्योंकि हमारा कोई राजा नहीं है.’ उसके बाद उन्होंने सोम को अपना राजा चुना.’’16 उसके बाद राजा नियुक्ति की जाने लगी. यजुर्वेद में राजा को उसके कर्तव्यों के बारे में चेताते हुए कहा गया है—‘तुम्हें यह राष्ट्र सौंपा जाना है—प्रजा के क्षेम तथा उसके सर्वविध पोषण, कृषि की उन्नति एवं बहुआयामी विकास के लिए.’17 अथर्ववेद में कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख, प्रजा कल्याण में राजा का कल्याण निहित है.18 लेकिन कल्याण का स्वरूप क्या हो? प्रजा के सुख को तय करने वाले मापदंड कैसे हों? क्या यह संभव है कि कोई एक सुख प्रजा के सभी सदस्यों के लिए समानरूप से सुखकारी हो? राजतंत्र चूंकि किसी एक व्यक्ति या चुने हुए व्यक्तियों के समूह की इच्छा द्वारा नियंत्रित होता है, इसलिए राजतंत्र में इन प्रश्नों को प्रायः अनसुना कर दिया जाता है.

देवासुर संग्राम एक प्रतीक है. मिथकीय आख्यान. परंतु यह ऐतिहासिक सत्य है कि प्राचीन भारत में लंबे समय तक यही हाल रहा. छोटेछोटे राज्य आपस में लड़ते रहते थे. इसलिए प्रजा ‘कोऊ नृप होय हमें क्या हानि’—कहकर राज्य और राजा दोनों की ओर से उदासीन बनी रहती थी. यहां तक कि सत्ता केंद्र पूरी तरह बदल जाने पर भी परिवर्तनों पर उसका ध्यान नहीं जाता था. सामान्यतः इसे राजनीति की असफलता कहा जाएगा. क्योंकि वह उन लोगों के राज्य का नेतृत्व करने का दावा करती थी, जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनका राज्य के प्रति और राज्य का उनके प्रति क्या कर्तव्य है? न ही यह मालूम होता है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं, बल्कि समाज द्वारा खुद को व्यवस्थित रखने के लिए गढ़ी गई संस्था है, जिसपर एकमात्र जनता का सर्वाधिकार है. यदि उन्हें या उनमें से किसी एक को राज्य की ओर से कुछ समस्या है तो इसका कारण केवल राज्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उनका अपने ही अधिकारों के प्रति उपेक्षाभाव भी है. असल में वे जान ही नहीं पाते कि वास्तविक समस्या राज्य को उत्तराधिकार का विषय और केवल शक्तिकेंद्र समझकर उसपर काबिज होने, फिर उन कर्तव्यों से पलायन से जन्म लेती है, जो राजा नामक संस्था के लिए विहित हैं. इसलिए अरस्तु ने राजतंत्र की आलोचना करने के बजाए राजा के आदर्शों पर ज्यादा जोर दिया है. उसका विचार था कि जिस व्यक्ति में नेतृत्व का गुण हो, वही राजा है. स्टोइक विचारकों के अनुसार केवल वही व्यक्ति सम्राट बनने का अधिकारी था, जो आचरण में सर्वश्रेष्ठ तथा राजपद के लिए अपेक्षित योग्यताएं रखता हो. सुकरात का विचार था कि राजा उसे बनाना चाहिए जिसमें राजा के लिए अपेक्षित सभी गुणों का समावेश हो. इस तरह सिद्धांत के स्तर पर राजशाही में भी लोकहित को साधने पर जोर दिया जाता है. परंतु यदि समाज का बहुसंख्यक समुदाय ही राज्य, उसकी गतिविधियों और अपने अधिकारों की ओर से उदासीन हो जाए तो शिखर पर बैठे लोगों को मनमानी का अवसर सहज ही मिल जाता है. अरस्तु का विचार था कि यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तथा शासक वर्ग कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सचेत हो तो कोई भी राजनीतिक दर्शन राज्य के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है. इसलिए दोष किसी विचार अथवा विचारधारा का न होकर उसका सही अनुपालन न करने तथा राजनीतिज्ञों के स्वार्थ से घिर जाने का है. इसलिए उसने कहा था—

कम से कम आधी राजनीति उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण तथा परिस्थितियों का श्रेष्ठतम उपयोग करने में है.’

ऐसा नहीं है कि अरस्तु राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं अथवा उसमें नए चिंतन और विचारों को अनावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राजनीतिक दर्शनों में सुधार की भरपूर संभावना है. उसके लिए राज्य एवं नागरिकों का आपसी विश्वास एवं सहयोग आवश्यक है. यह तभी संभव है जब राज्य के सभी नागरिक श्रेष्ठतम आचरण का प्रदर्शन करें, तथा राज्य के केंद्र पर आसीन शक्तियां अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग एवं समर्पित हों. आदर्श राज्य को लेकर कुछ ऐसा ही स्वप्न प्लेटो का भी था. क्या दोनों का परिकल्पनाएं समान हैं? यदि कुछ अंतर है तो क्या है? ‘दि लॉज’ प्लेटो की प्रौढ़ वयस् की रचना है. उसकी गिनती राजनीतिक दर्शन की श्रेष्ठतम कृतियों में की जाती है. प्लेटो ने उसमें आदर्श राज्य की संकल्पना को प्रस्तुत किया है. अरस्तु को वह परिकल्पना अव्यावहारिक लगती है. प्लेटो के विचारों को सर्वथा मौलिक और अनुपम बताकर वह उसकी प्रशंसा करता है, साथ में यह भी जोड़ देता है कि उसके विचार उत्कृष्ट वैचारिकता से भरपूर होने के साथसाथ, अत्यधिक क्रांतिकारी किंतु अतिकल्पनात्मक हैं. उसके शब्दों में छिपी व्यंग्यरेख को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. अप्रत्यक्ष रूप से वह प्लेटो के विचारों को अव्यावहारिक करार देता देता है. इसका आशय यह नहीं है कि राज्य के लिए जिस उच्चतम आदर्शं की परिकल्पना प्लेटो करता है, उसके स्वरूप एवं संचालन को लेकर अरस्तु की उससे कुछ कम अपेक्षाएं हैं. देखा जाए तो दार्शनिक सम्राट के रूप में उसकी कामना ऐसे महामानव की है जो उच्च मानवादर्शों से युक्त हो. जो लोगों की समानता और स्वतंत्रता में विश्वास रखता हो. उनके सुख एवं सुरक्षा में संवृद्धि के प्रति पूरी तरह संकल्पबद्ध हो. ऐसा महामानव मिलना असंभव है. यदि चमत्कारस्वरूप मिल भी जाए तो उसके परिवर्त्ती सम्राट उसी की भांति गुणवंत होंगे इसकी संभावना अत्यंत विरल है. समय के साथ स्वयं व्यक्ति के आदर्श एवं प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है. आदर्श राज्य के लिए ‘दार्शनिक सम्राट’ की अनुशंसा करते समय प्लेटो प्रकारांतर में राजतंत्र का ही पक्ष लेता है, जिसमें राजा की इच्छा सर्वोपरि होती है. जबकि व्यक्ति वह चाहे जितना उदार क्यों न हो, अपने ईमानदार सोच, संपूर्ण सदेच्छा और समर्पण के साथ काम भी करता हो, यह आवश्यक नहीं कि जिसे वह विस्तृत जनसमाज के लिए हितकारी मानता है, वह उसके लिए वास्तव में उतना ही हितकारी हो. पेरियांडर का उदाहरण पीछे दिया गया है. छब्बीस शताब्दी पहले ग्रीक में जन्मा पेरियांडर एक साथ वीर, दूरदृष्टा, आविष्कारक, कुशल प्रशासक, महत्त्वाकांक्षी सम्राट आदि सबकुछ था. उसके शासन के दौरान कोरिंथ ने खूब तरक्की की. कई नए आविष्कार उसने किए. महत्त्वपूर्ण इमारतों का निर्माण कराया, परंतु समय के साथ उसकी मान्यताओं में बदलाव आता गया. आज कुछ लोग उसे तानाशाह के रूप में पहचानते हैं, जबकि कुछ के लिए जो उसके आरंभिक जीवन के कार्यकलापों पर अटके रहते हैं, पेरियांडर संत की हैसियत रखता है. ठीक ऐसे ही जैसे राम के बारे में कहा जाता है. रामराज्य को आदर्श बताने वालों के लिए राम इतना आदर्श राजा है कि वे उसे ईश्वर का दर्जा देते है. परंतु जो लोग उसे शंबूक हत्या का दोषी मानते हैं, उनकी निगाह में वह निरंकुश सम्राट है.

वस्तुतः राजनीतिक आदर्श के रूप में अरस्तु राज्य के जिस स्वरूप की कल्पना करता है, उसमें और प्लेटो के दर्शन में विशेष अंतर नहीं है. ‘आदर्श राज्य’ के रूप में प्लेटो जो कल्पना करता है, अरस्तु उसी सपने को ‘राज्य के आदर्श’ के रूप में साकार करना चाहता है. इस तरह हम अरस्तु के विचारों पर प्लेटो की छाया को देख सकते हैं. बावजूद इसके अरस्तु के विचारों को प्लेटो के दर्शन की पुनरावृत्ति नहीं कहा जा सकता. ‘राज्य के आदर्श’ को परिपक्व दर्शन के रूप में विस्तार देने से पहले वह प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ से उतनी ही प्रेरणा लेता है, जितनी आवश्यक है. ‘लॉज’ में प्लेटो का यह विचार कि न्याय सभ्यताकरण की कसौटी है तथा न्याय से ही मानव ने सभ्यता का पाठ पढ़ा है—अरस्तु के दर्शन के लिए प्रस्थान बिंदू का काम करता है.

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

16. ऐतरेय ब्राह्मण, 1/1/14

17. इय ते राष्ट्र. कृप्ये त्वा क्षैमाय. त्वा रय्यै त्वा पोषाय, त्वा। यजुर्वेद-9/22।।

18. प्रजा सुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्!—अथर्ववेद.

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—चार

सामान्य

सुकरात, पेरामेनीडिस, हेराक्लाट्स, प्रोटेगोरस आदि

 

न्याय मानव—समाज का सदगुण है. (ऐसा बादल) जो जहां जितना सूखा है, वहां उतना ही ज्यादा बरसता है.—अरस्तु

आदर्श समाज की खोज मनुष्य का आरंभिक सपना है. यह सपना अकेले प्लेटो का नहीं था. किसी देवता, महामानव या अतिविलक्षण प्रतिभाशाली को भी इसका श्रेय नहीं दिया जा सकता. साधारण से साधारण मनुष्य यह कामना करता आया है कि जिस समाज में वह रहता है, उसे जितना कि वह आज है, उससे बेहतर होना चाहिए. भले ही वह यह न जानता हो कि परिवेश को किस प्रकार बेहतर बनाया जाए? या वे कौन से कारण हैं जो समाज की बेहतरी की राह के अवरोधक हैं? जिन्हें दूर किया जाना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए जरूरी है. भारत में ऐसा सपना बुद्ध ने देखा था. मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप और महावीर स्वामी का सपना भी कुछ ऐसा ही था. यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, जेनोफीन, चीन में कन्फ्यूशियस, लाओ जू, चुआंग जू, बाओ जिंग्यान आदि का सपना भी कुछ इसी प्रकार का था. इनमें प्लेटो अतिरिक्त श्रेय का हकदार है. उसने न केवल आदर्श समाज का सपना देखा, बल्कि उस सपने के समर्थन में तर्क देते हुए, समाज को बेहतरी की ओर ले जाने के रास्ते भी बताए. भले ही उसके विचारों को अव्यावहारिक मानकर उसके शिष्य और अगली पीढ़ी के विचारक अरस्तु ने नजरंदाज कर दिया हो, उससे प्लेटो का महत्त्व कम नहीं हो जाता. वह अपने समय का विलक्षण प्रतिभासंपन्न, कविमना दार्शनिक था. अपनी पूरी जिंदगी वह इसी दिशा में प्रयत्न करता रहा. विपुल लेखन उसने किया. ‘रिपब्लिक’ और ‘दि लॉज’ जैसे बहुखंडी ग्रंथ जिन्हें ग्रंथमाला कहना उचित होगा—उसकी विलक्षण मेधा प्रमाण हैं. उससे पहले के समाज के मुकाबले व्यक्ति की हैसियत बहुत कम थी. माना जाता था कि अच्छे और बुरे दो किस्म के लोग होते हैं. अच्छे समाज के मित्र तथा बुरे सामाजिकता के द्रोही हैं. अतः केवल और केवल बुरों को दंडित करके समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. एक तरह से यह मान लिया गया था कि दुष्टता दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव का अभिन्न हिस्सा है. और जो अच्छे हैं, वे बुराई से सर्वथा मुक्त ‘देवतुल्य’ हैं. अतएव बुरों को दंड देकर अथवा शासन का डर दिखाकर बुराई से बचा जा सकता है. बुराई को मिटाने के नाम पर तुनकमिजाजी देवता शाप देते थे, राजा दंड. उस व्यवस्था में बुराई को मिटाने के नाम पर तथाकथित बुरे को ही मिटा दिया जाता था.

यूनान में इस सोच में बदलाव सुकरात के बाद नजर आता है. सुकरात ने सत्य को शुभ माना और समाज को शुभत्व की कर्मस्थली. प्लेटो को जितना विश्वास समाज पर था, उतना सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य पर भी था. उसका मानना था कि आदर्श समाज में दोनों में से किसी एक की उपेक्षा भी असंभव है. इसी विश्वास के साथ उसने आदर्श समाज का खाका तैयार किया था. अपने समय के उस विलक्षणतम दार्शनिक ने कालांतर में दार्शनिकों की ऐसी पीढ़ी विकसित की, जिसने आगामी शताब्दियों में राजनीतिक दर्शन की नई परिभाषाएं गढ़ीं. प्लेटो ने तो ‘रिपब्लिक’ तथा दूसरे ग्रंथों में आदर्श समाज सपने को इतना विस्तार दिया था कि दोनों एकदूसरे के पर्याय जैसे बन गए. आज भी आदर्श समाज का जिक्र हो तो प्लेटो की याद आना स्वाभाविक है. सतत चिंतनविमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि समाज के गठन का उद्देश्य अयाचित अथवा किसी कल्याणभाव से प्रेरित नहीं है. यह सीधेसीधे मानवकल्याण से जुड़ा मसला है. चूंकि अकेले मनुष्य के लिए जीवन की अनेक दुश्वारियां थीं, इसलिए उसने समूह में रहना सीखा. उसके लिए कुछ नियम बनाए. मानवसमूहों के बीच कुछ स्वीकृतियां हुईं. कालांतर में वही नियम तथा उनसे जुड़े रीतिरिवाज संस्कृति का हिस्सा बनते गए. कुल मिलाकर समाज मनुष्य की रचना है. जिसे उसने अपने सुख, सुरक्षा, एवं समृद्धि हेतु गढ़ा है. इसलिए समाज यदि मनमानी करता है, पात्रता के बावजूद किसी व्यक्ति को उसके अधिकारों से वंचित कर देता है तो दोष समाज है. दूसरी ओर यदि मनुष्य अपने कर्तव्य में कोताई बरतता है, या अपने किसी कार्य से दूसरे के सुख, सुरक्षा और समानता के अधिकार को बाधित करता है तो वह उस अनुबंध के साथ विश्वासघात करता है, जो उसके और समाज के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है.

आखिर ऐसे हालात क्यों बनते हैं. यदि कोई मनुष्य समाज के साथ किए गए अपने अनुबंध को तोड़ता है तो उसके लिए क्या केवल वही दोषी है? क्या दोषमुक्त होना केवल समाज का गुण है? और यदि कोई मनुष्य समाज के साथ अपने अनुबंध को तोड़ते हुए पाया जाता है तो उसका समाधान क्या केवल दंड है? इन प्रश्नों के उत्तर की खोज तथा सामाजिक विक्षोभ के कारणों को समझना आसान नहीं है. उसके लिए करीब पांच हजार वर्ष पहले सामाजिकसांस्कृतिक विकास के उस दौर में लौटना पड़ेगा जब मनुष्य यायावर जीवन छोड़ स्थायी प्रवास को अपनाने में लगा था. नागरीय सभ्यता अंगड़ाई लेने लगी थी. खेती के साथसाथ छोटेछोटे उद्योग और लोकशिल्प विकासमान अवस्था में थे. नौकाओं और भारी जलयानों की मदद से मनुष्य लंबी समुद्री यात्रओं पर निकलने लगा था. दुर्गम स्थानों की यात्र के लिए वह पशुओं की मदद लेता था. रास्ते में हिंस्र पशुओं और दस्युओं का खतरा था. इसलिए कुछ व्यापारी दस्युओं का सामना करने के लिए भाड़े के सैनिक रखने लगे. सैन्यबल और धनसंपदा दोनों ही ताकत का प्रतीक थे. व्यक्ति के पास जब इनका प्राचुर्य हुआ तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं अंगड़ाई लेने लगीं. पशु आधारित अर्थव्यवस्था में व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा अविकसित अवस्था में थी. अधिकृत पशुओं की संख्या से जनजातीय समूह की समृद्धि का आकलन किया जाता था. कृषि का विकास हुआ तो समृद्धि का मापदंड अधिकृत पशुओं की संख्या के बजाए अधिकृत भूक्षेत्र को मान लिया गया. फिर भी व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा के विकास में कई शताब्दियां गुजर गईं. जिन स्थानों से उसको वाणिज्यिक लाभ पहुंचता था, उन स्थानों पर सीधे अथवा सहयोगियों की सहायता से मनुष्य अपने उपनिवेश कायम करने लगा. फिर भी आरंभ में जो राज्य बने उनका क्षेत्रफल बहुत कम, नगरविशेष की सीमा तक होता था. निश्चितरूप से तत्कालीन नगरराज्य की स्थापना एक स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर आर्थिकराजनीतिक इकाई के रूप में की गई होगी. शीघ्र ही मनुष्य को लगने लगा था कि विकास की निरंतरता के लिए ऐसी कार्यकारी संस्थाओं की आवश्यकता है जिनके द्वारा संबंधों को मर्यादित और नियंत्रित किया जा सके. आदिम मानवीय जिज्ञासा केवल जीवन और प्रकृति के रहस्यों के अन्वेषण तक सीमित थी. समाज को व्यवस्थित करने की चाहत में नए राजनीतिक दर्शनों की खोज का सिलसिला आरंभ हुआ. बहुत शीघ्र मनुष्य को वे भी अपर्याप्त लगने लगे. कुछ लोगों ने महसूस किया कि केवल पराजागतिक कल्पनाओं से काम चलने वाला नहीं है. जीवन को अधिक सुविधासंपन्न बनाने तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रकृति को समझना भी अनिवार्य है. इसलिए बुद्धिजीवियों का ध्यान इहलौकिक सत्यों के अन्वेषण की ओर गया. उससे ज्ञानविज्ञान की खोज के नए रास्तों का विकास हुआ. आरंभिक विज्ञान प्रयोगों के बजाए मनुष्य सहजानुभवों पर आधारित था. उसमें एकरूपता का अभाव था. स्वाभाविक रूप से उसके कुछ अंतर्विरोध भी थे. जैसे खेती के विकास के लिए एक ओर तो औजारों का निर्माण करना, तटबंध बनाना तथा दूसरी ओर कभी वर्षा तो कभी अतिवृष्टिअनावृष्टि की मार से बचने के लिए कल्पनाधारित पराभौतिक शक्तियों को प्रसन्न रखने की कोशिश करना.

इस क्रांतिक परिवर्तन का श्रेय सुकरात को दिया जाता है. लेकिन विचारधारा को तर्कसम्मत बनाने में उससे पहले के विचारकों यथा पेरामेनडिस, एनेक्सीमेंडर, हेराक्लाइटस, डेमोक्रिटस का भी योगदान है. डेमोक्रिट्स की ईसा से 460(कुछ विद्वानों के अनुसार 490) वर्ष पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक वैज्ञानिक डेमोक्रिटस ने लोकभ्रांतियों का खंडन करते हुए घोषणा की कि चंद्रमा पर दिखने वाली छाया वस्तुतः उसकी सतह पर बने ऊबड़खाबड़ पठार हैं. उसने नीहारिकाओं का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि रात में आसमान में नजर आने वाली दूधिया नदी, वास्तव में तारों का प्रकाश है, जो अरबों की संख्या में विराट अंतरिक्ष में फैले हुए हैं. हालांकि लोकमानस सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों की भावनात्मक कहानियां आगे भी गढ़ता रहा, तो भी डेमोक्रिट्स के लेखन से आने वाले विचारकों को एक नई दिशा मिली. लोगों को लगा कि विश्वसमाज और उसकी उत्पत्ति की तह में जाने का एक तरीका यह भी हो सकता है, जो दूसरे की अपेक्षा कहीं अधिक वस्तुनिष्ठ और तर्कसम्मत है. इससे आगे चलकर विज्ञान के विकास को नई दिशा मिली. उस दौर में संवाद के साधन बेहद सीमित थे. ज्ञानविज्ञान का प्रचारप्रसार मुख्यतः मौखिक संवादन पर आधारित था. कमी यह रही कि डेमोक्रिट्स जैसे वैज्ञानिक सोच वाले दार्शनिक बहुत कम थे. वह दौर था जब आपसी झगड़ों के अतिरेक के कारण नगरराज्य की व्यवस्था असफल होने लगी थी; और व्यापारिक सफलता हेतु अपेक्षाकृत बड़े राज्यों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी. चूंकि राज्य के विकास से जनसाधारण की उम्मीदें भी जुड़ी थीं, इसलिए बड़े राज्यों की सफलता किसी बड़े विभ्रम के बिना संभव न थी. विभ्रम तैयार करने का काम धर्म ने किया. जिसे तहत एक ‘ईश्वर’ की कल्पना की गई. लोगों को विश्वास दिलाया गया कि ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर’ राजाओं का राजा है. और जो उपेक्षा या अनाचार लौकिक व्यवस्था के कारण सहना पड़ता है, ईश्वर के राज्य में उसकी संभावना दूरदूर तक नहीं है. वह सच्चा न्यायकर्ता है. जनजातीय समाजों में जहां गणतांत्रिक व्यवस्था थी, परिवार का वरिष्ठ सदस्य प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राजनीति में हिस्सा लेता था. कृषि के उभार के साथ ऐसा वर्ग पनपा था जो अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर था. जिसका राजनीति से सीधा संपर्क नहीं था. व्यवस्था से असंतोष अथवा अत्याचार के समय यह वर्ग शासन से अपनी दूरी के कारण स्वयं को असहाय एवं उपेक्षित महसूस करता था. ऐसे लोगों के लिए धर्म के नाम पर बनाया गया यह विभ्रम कि ‘सर्वशक्तिमान’ के राज्य में प्रत्येक मनुष्य की समान भागीदारी है, कोई भी सदस्य उपेक्षित नहीं हे, सर्वत्र खुशहाली और सुखों का प्राचुर्य है, वह सबके करीब और सच्चा न्यायकर्ता है—बड़ा कारगर सिद्ध हुआ. इस विभ्रम को लोकप्रतिष्ठित करने में पुरोहित वर्ग का विशेष योगदान था, सही मायनों में यह उसी के द्वारा निहित स्वार्थ हित रचा गया विभ्रम था. इसलिए जनाक्रोश से बचने तथा प्रशासनिक नाकामियों को छिपाने के लिए पुरोहितों को ऊंचे शासकीय पदों पर रखा जाने लगा. राज्य के कार्यों के निपटान के लिए उसकी राय का महत्त्व बढ़ता ही गया. चूंकि वह सिर्फ और विभ्रम था, इसलिए उसके प्रभावस्वरूप शिक्षा पर कम, आडंबरों पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा. विभ्रम का प्रभाव इतना गहरा रहा कि शताब्दियों तक राजामहाराजाओं ने धर्मालय बनवाने पर प्रजा का बेशुमार धन खर्च किया10, परंतु शिक्षा की तरक्की की ओर से वे प्रायः आंख मूंदे रहे. इसके परिणामों को समझे बगैर बहुसंख्यक जनमानस उसी के आधार पर राजामहाराजाओं का महिमामंडन करता रहा. हालात में परिवर्तन उनीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों के आगमन के बाद ही संभव हो सका.

धर्म और राजनीति के गठजोड़ के विरुद्ध विश्वव्यापी प्रतिक्रिया पूरी दुनिया में हुई, जिसने बौद्धिक क्रांति को जन्म दिया. यूनान में सोफिस्ट विचारकों की राज्यसंबंधी अवधारणा बहुत कुछ ब्राह्मणवादी विचारकों से मिलती थी. वैदिक परंपरा के आचार्यों की भांति वे भी राज्य को कृत्रिम व्यवस्था मानते थे. उनका मानना था कि राज्य की उत्पत्ति उन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुई है, जिन्हें प्राकृतिक व्यवस्था में आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता था. वैज्ञानिक के रूप में डेमोक्रिट्स का उल्लेख हमने पीछे किया. एक मानवतावादी विचारक के रूप में भी उसका योगदान कम नहीं है. सुकरात पूर्व दार्शनिकों के प्रतिनिधि के तौर पर उसने सोफिस्टों की सर्वसत्तावादी दृष्टि की आलोचना की, जो राजा को अपने स्वार्थ के अनुरूप सभी निर्णय लेने का अधिकार देती थी. उसने राज्य के नैतिक स्वरूप की आवश्यकता पर बल दिया था. डेमोक्रिट्स का विचार था कि गणतांत्रिक राज्य की गरीबी तानाशाही की अमीरी से बेहतर है. यह बात अलग है कि गणतांत्रिक राज्य के स्वरूप की ठोस परिकल्पना करने में वह असमर्थ रहा था. उसने कहा था—‘यह सहीसही तय कर पाना बड़ा ही कठिन है कि राज्य का कौनसा स्वरूप पूर्णतः गणतांत्रिक है.’ उसका मानना था कि राज्य का प्रबंधन किसी भी अन्य कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण और श्लाघनीय कर्म है. दासता को वह अपराधतुल्य मानता था. ‘समानता प्रत्येक अवस्था में सम्मानीय है’ कहकर उसने अपने उदार सोच का प्रदर्शन किया था. डेमोक्रिट्स के अनुसार राज्य की सफलता उसके नागरिकों की स्वेच्छिक सहभागिता पर निर्भर करती है—

जनता से जुड़ने का सर्वोत्तम रास्ता है कि सबकुछ इसी(राज्य)पर निर्भर हो. यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा; और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा.’11

समाज में राज्य की उत्तरोत्तर बढ़ती महत्ता को पहचानकर डेमोक्रिट्स ने सपना देखा था कि कोई तो होगा जो राज्य को अन्य सभी मामलों पर तजरीह देगा. कुछ इस तरह कि सबकुछ संतुलितसा लगे; तथा राजनीति समाज के प्रमुख विधेयात्मक कदम के रूप में स्थापित हो सके. ऐसा राज्य जो न तो वास्तविकता से बहुत परे, विवादपूर्ण हो, न ही किसी सार्वजनिक शुभ से इतर विषय पर जोर देता हो. डेमोक्रिट्सि का यह सोच कालांतर में प्लेटो, अरस्तु जैसे दार्शनिकों के राजनीतिक चिंतन की प्रेरणा बना. सुकरात ने डेमोक्रिट्स के नैतिकतावादी सूत्र को पकड़ा और राजनीतिकसामाजिक परमादर्श को समर्पित जीवन जीने पर जोर दिया. डेमोक्रिट्स को भी अंदाजा कदाचित नहीं था कि उससे मात्र पचास वर्ष बाद जन्मा प्लेटो आजीवन राजनीतिक दर्शन को समर्पित रहेगा. प्लेटो के बाद अरस्तु ने व्यवाहारिक नैतिकता को केंद्र मानकर राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. प्लेटो की दृष्टि अपेक्षाकृत विशद थी. इसलिए अपने विश्लेषण में उसने प्रायः सभी उपलब्ध राजनीतिक दर्शनों की विवेचना की है. हालांकि सेबाइन आदि कुछ विद्वानों का विचार है कि प्लेटो ने जो भी लिखा, वे सभी विचार यूनानी समाज में पहले से ही मौजूद थे. उनके अनुसार प्लेटो का लेखन तत्कालीन समाज में प्रचलित राजनीतिक चिंतन का बेहतरीन संकलन है. उदाहरण के लिए स्त्रियों को आदर्श समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान दिए जाने का तर्क तथा विवाह संस्था का निषेध. सेबाइन ने संभावना व्यक्त की है कि प्लेटो ने यह विचार अरिस्टोफेंस के प्रहसन ‘एक्लेसियाजूसाइ’(महिलासंसद) से लिया था. उस नाटक में महिलाएं राजनीति के लिए आगे आती हैं. वे पुरुषों को राजनीति से बाहर कर देती हैं. विवाह संस्था का तिरष्कार किया जाता है. संतान को यह नहीं बताया जाता कि उसके मातापिता कौन हैं. बच्चे अपने से बड़ों को मातापिता का दर्जा देते हैं. बड़े भी उन्हें अपनी संतानतुल्य मानते हैं. श्रम केवल दासवर्ग के लिए सुरक्षित है. नाटक के अनुसार इस व्यवस्था के अच्छे परिणाम आते हैं. पुरुषों की नशे और जुआ की लत छूट जाती है. निरर्थक मुकदमेबाजी की घटनाएं कम होने लगती है. इस नाटक का ‘रिपब्लिक’ पर कितना प्रभाव पड़ा इस बारे में सेबाइन पूरी तरह आश्वस्त नहीं है, परंतु हमें जानना चाहिए कि ऐरिस्टोफेंस को प्राचीन यूनानी साहित्य में ‘कामेडी का पितामह’ माना गया है. ईसा से 390 वर्ष पूर्व जब यह नाटक लिखा गया, प्लेटो 37 वर्ष का मननशील युवा था. सुकरात के मृत्युदंड को लगभग एक दशक बीत चुका था. जिससे उसके मन में लोकतंत्र तथा एथेंस की राजनीति के प्रति गहरा क्षोभ था. इसलिए यह अरिस्टोफेंस के प्रहसन के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था. प्लेटो राज्य की सफलता के लिए अनुशासन को अत्यावश्यक मानता था. उसका विचार था कि राज्य यदि बहुत अधिक उदार होगा तो उसके नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हो जाएंगे. जिससे उसको बिखरने में देर न लगेगी. यदि वह अत्यधिक मजबूत होगा तो देरसवेर सत्तामद में चूर उसके शासकगण तानाशाह बन जाएंगे. दोनों ही स्थितियों में वह उन उद्देश्यों से दूर चला जाएगा जिनके लिए उसका गठन किया गया है.

सुकरात से करीब 30 वर्ष छोटे प्लेटो ने एथेंस और स्पार्टा के बीच तीस वर्ष तक चलने वाले युद्ध को अपनी आंखों से देखा था. वह 429 ईस्वी पूर्व की एथेंस की प्लेग का भी साक्षी रहा था, जिसमें उसके महान योद्धा और राजनीतिज्ञ पेरीक्लीस समेत अनेक बहादुर सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी. 401 ईस्वी पूर्व में एथेंस की हार के बाद वहां के सम्राट को अपदस्थ कर विजयी स्पार्टा ने तीस सदस्यीय परिषद की स्थापना की थी. उसके बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीकठाक चलता रहा. धीरेधीरे वहां भ्रष्टाचार और तानाशाही का बोलबाला हो गया. परिषद के सदस्य निजी अहं के शिकार होकर मनमानी करने लगे. गणतंत्र के नाम पर गठित व्यवस्था कुलीनतंत्र में ढल गई. इन सभी परिवर्तनों को प्लेटो ने बहुत करीब से देखा था. लोकतांत्रिक संस्थाओं की विफलता ने उसे दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना को प्रेरित किया था. वह स्वयं अभिजात परिवार से था. एथेंस के राजपरिवार से उसका संबंध था, इस कारण वह स्वयं को एथेंस की राजनीति का उत्तराधिकारी भी मानता था. इसके बावजूद उसे सक्रिय राजनीति में योगदान देने का अवसर कभी न मिल सका, मगर राजनीति उसके दिलोदिमाग पर सदैव हावी रही. उसके जीवन में कई ऐसे अवसर आए जब उसे राजनीति या कहो कि विकृत राजनीति का शिकार होना पड़ा. ‘रिपब्लिक’ में जिस आदर्शलोक का सपना वह देखता है और उसके लिए जिस राजनीतिक दर्शन की परिकल्पना करता है, उसे कुछ विद्वान सक्रिय राजनीति में हिस्सा न ले पाने से उत्पन्न कुंठा की देन मानते हैं. मेरे विचार में प्लेटो के अपने जीवनानुभव ही ऐसे थे, जिससे प्रचलित राजनीतिक दर्शनों के प्रति निराशा का भाव पैदा होना स्वाभाविक था. उसका अपना जीवन राजतंत्रें की तानाशाही का शिकार रहा था. उन राजतंत्रें में उसे उत्पीड़न भोगना पड़ा था जो दार्शनिकों का सम्मान करने का दावा करते हुए दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करते थे. जबकि उस समय के सर्वाधिक गर्वीले एथेंस के लोकतंत्र को प्लेटो अपने गुरु और मनीषी सुकरात की हत्या का दोषी मानता था.

प्लेटो की कल्पना ऐसे शक्तिशाली, पूर्णतः आत्मनिर्भर राज्य की थी, जिसके नागरिक राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों से पूरी तरह सचेत हों. यह प्रेरणा उसे स्पार्टा के नागरिक जीवन से मिली थी. वहां के नागरिक वीरता, अनुशासन और सादा जीवनशैली के मामले में अद्वितीय थे. युद्ध उनके लिए खेल के समान था. दूसरी ओर एथेंसवासी प्रायः मननशील, साहित्यकला के अनुरागी, उदार एवं संवेदनशील थे. उन्हें अपने गणतंत्र पर गर्व था, परंतु शिखर पर बैठे लोग वहां भी आत्मश्लाघा तथा स्वार्थ भाव से आपूरित थे. उनमें राजनीतिक मतैक्य का अभाव था. एथेंस को स्पार्टा के हाथों मिली शर्मनाक पराजय के कारण भी वही थे. प्लेटो सुकरात को मृत्युदंड के लिए एथेंस की दोषपूर्ण राजनीति को जिम्मेदार मानता था. आदर्श राज्य में उसने स्पार्टा के अनुशासित नागरिक जीवन से प्रेरणा लेते हुए ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसके नागरिक वीर, जुझारू, निष्ठावान तथा सादा रहनसहन के आदी हों. प्लेटो स्पार्टा की कमजोरी भी समझता था. वहां राज्य के आगे नागरिक जीवन का महत्त्व गौण था. इसलिए आदर्श राज्य में उसने ऐसे समाज की कल्पना की है जहां राज्य और नागरिक दोनों के हित परस्पर जुड़े हों. व्यक्ति को वह सब मिले जो उसका अधिकार है. इस प्रेरणा के पीछे सुकरात के नैतिकतावादी दर्शन का बड़ा योगदान था. वह मानता था कि आदर्श राज्य एवं न्यायसिद्धांत एकदूसरे से जुड़े हैं. न्याय नागरिक और समाज दोनों की शुभत्व की यात्र को संभव बनाता है. एक के अभाव में दूसरे की उपस्थिति संभव ही नहीं है. नगरराज्यों में प्रचलित बुराइयों के निदान हेतु न्याय महत्त्वपूर्ण साधन है. इसलिए राज्य को न्यायआधारित राज्य में बदलना न केवल शासक, बल्कि जागरूक नागरिकों की भी जिम्मेदारी है.

यह सर्वविदित है कि बुद्ध की भांति सुकरात ने भी स्वयं कुछ नहीं लिखा. दोनों वाचिक परंपरा के विचारक थे. तथापि जैसे बुद्ध भारत में युगप्रवर्त्तक विचारक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, यूनानी दर्शन में सुकरात की महत्ता भी युगप्रवर्त्तक विचारक की है. उसका जन्म शिल्पी परिवार में हुआ था. उसका यौवन पेरीक्लीज के महान युग में बीता था. एक नागरिक के रूप में उसने सभी विहित कर्तव्यों का पालन किया था. एथेंस के लिए उसने कई युद्धों में भाग लिया. डेलियम के सुप्रसिद्ध युद्ध में उसके धैर्य की काफी प्रशंसा हुई थी. राज्य के कानून में उसकी पूरी निष्ठा थी, जिसपर वह आजीवन अडिग बना रहा. उसने एथेंस के शासकवर्ग की आलोचना की. खुली आलोचना की. जिसके लिए उसपर नास्तिक होने के आरोप भी लगे. परंतु नगरराज्य के कानून के प्रति उसके सम्मान में कभी कमी नहीं आई. जब भी शासकवर्ग के स्वार्थ और कानून में द्वंद्व की स्थिति बनी, उसने सदैव कानून और संविधान का साथ दिया. इस कारण उसे नास्तिक तक कहा गया. एथेंस की संसद के कई सदस्य उससे हमेशाहमेशा के लिए नाराज हो गए. तमाम विरोधों के बावजूद वह अपने विचारों पर डटा रहा. उसे अपने देश के कानून से कितना प्यार था, इसके समर्थन में एक उदाहरण अकसर दिया जाता है. एथेंस की संसद द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने पर प्लेटो तथा उसके साथियों ने सुकरात को जेल से बाहर निकालने की योजना बनाई थी. गोपनीय तरीके से प्रस्ताव सुकरात तक पहुंचाया गया. लेकिन जान दाव पर लगी होने के बावजूद सुकरात ने कैद से भागने से यह कहकर इन्कार कर दिया था कि ऐसा करना कानून का उल्लंघन होगा. कानून के प्रति सुकरात की अनन्य निष्ठा को दर्शाने वाला यह अकेला उदाहरण नहीं है. जिन दिनों वह नागरिक परिषद का सदस्य था, उसके सामने नौसेनापतियों का मामला आया. उनपर आरोप था कि अरगिनुगाए के समुद्री युद्ध(405 ईस्वी) के दौरान उन्होंने डूबते हुए नागरिकों को बचाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया था. कुछ विवरणों में बताया गया है कि परिषद की अध्यक्षता समिति का सदस्य होने के साथसाथ सुकरात उस दिन उसका सभापतित्व भी कर रहा था. इसलिए अपराधी सेनापतियों के दंडनिर्धारण के लिए परिषद में मतदान कराने की जिम्मेदारी उसी की थी. निचली अदालत सेनापतियों को एक मत के अंतर से दोषी घोषित कर चुकी थी. इसलिए यदि वह सचमुच आदेश सुना देता तो वह परिषद की सामान्य कार्रवाही मानी जाती. मगर सुकरात ने यह कहकर कि सामूहिक रूप से दंड निर्धारित करना एथेंस के संविधान के विरुद्ध है—फैसले के लिए मतदान कराने से इन्कार कर दिया था. परिषद में केवल सुकरात ऐसा था जिसने दंडनिर्धारण प्रक्रिया को दोषी माना और बाकी सदस्यों के दबाव डालने के बावजूद सुनवाई को टाल गया. उसके सालभर बाद की एक और घटना है. सुकरात तथा चार अन्य नागरिकों को 30 सदस्यों की संसद की ओर से एक अपराधी को गिरफ्तार करके लाने का आदेश दिया गया. उस व्यक्ति को एक मामले में मृत्युदंड सुनाया गया था. सुकरात ने आदेश को संविधान विरुद्ध मानते हुए उसके पालन से इन्कार कर दिया था. नागरिक कर्तव्यों के प्रति संपूर्ण निष्ठा, उनपर अटल रहते हुए उनका पालन तथा कानून की सीमाएं लांघने की दृढ़तापूर्वक अस्वीकृति—दो ऐसी विशेषताएं हैं, जो सुकरात को सामान्य से हटकर उसकी वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती हैं.

महान व्यक्तित्व बहुप्रतिभाशाली होते हैं. कई बार परिस्थितियां भी उनके जीवन को नया मोड़ दे देती हैं. पिता मोरोपंत तांबे ने बेटी ‘मनु’ का विवाह अधेड़ गंगाधर राव से यह सोचकर किया था कि बेटी रानियों की तरह सुख भोगेगी. परंतु वीरांगना लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों को बगावती तेवर दिखाए और 1857 के स्वाधीनता संग्राम की नायिका सिद्ध हुईं. गांधी जी नाकाम वकील से कामयाब नेता बने. डॉ. आंबेडकर की रुचि अर्थशास्त्र में थी. वे कामयाब अर्थशास्त्री थे और उसी क्षेत्र में आगे काम करना चाहते थे. अगर वही करते तो सामाजिक न्याय के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, जिससे आगे चलकर दलितों के लिए कल्याण और अधिकारिता का मार्ग प्रशस्त हुआ, उसके लिए उन्हें किसी और मसीहा की प्रतीक्षा करनी पड़ती. अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए डॉ. आंबेडकर ने संघर्षमय राजनीति का रास्ता चुना. जीवन के आरंभ में सुकरात की रुचि भौतिक विज्ञान में थी. उसने अपने समय के लगभग सभी भौतिकवादी सिद्धांतों का अध्ययन किया था. परंतु उनसे उसे संतुष्टि न मिली थी. उसका मानना था कि भौतिक विज्ञान यह तो बताता है कि ‘चींजें कैसे बनीं?’ परंतु उनके बनने का औचित्य क्या है? कौनसी सत्ता उनके निर्माण के पीछे है? जैसे प्रश्नों का उत्तर वे नहीं दे पातीं. घिसेपिटे प्रश्नों और उत्तरों से उकताए सुकरात के लिए यही प्रश्न सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे. धीरेधीरे वह प्रकृतिविज्ञान और तत्वमीमांसा से जुड़े यांत्रिक प्रश्नों से उकताने लगा. अंततः क्रांतिक छलांग मारते हुए, उसने एनेक्सीमेंडर और हेराक्लाइटस की दुनिया छोड़, ज्ञानमीमांसा की ऐसी दुनिया में प्रवेश किया, जहां ज्ञान के साथसाथ, ज्ञान के निर्माण की विभिन्न पद्धतियों तथा उनकी विशेषताओं पर भी विचार किया जाता था. आगे चलकर उसे प्लेटो, जेनोफीन, इसोक्राइट्स जैसे विद्वान शिष्य और सहयोगी प्राप्त हुए. अपनी प्रतिभा और सूझबूझ के बल पर सुकरात ने अनूठी चिंतनशैली विकसित की, जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में ज्ञानमीमांसा को आगे बढ़ाया जाता है. सुकरात राजनीति को श्रेष्ठ कला मानता था. उसने कहा था—

यदि श्रेय(शुभत्व) कला नहीं, बल्कि उससे ऊंची और उदार चीज है तो कम से कम राजनीति को तो कला मानना ही चाहिए. और राजनीतिज्ञ से भी यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वह प्रशिक्षण प्राप्त करे और एक शिल्पी की भांति किसी उस्ताद की देखरेख में रहे. परंतु हमें राजनीतिज्ञ को तुरंत या एकदम शिल्पी से अभिन्न नहीं मान लेना चाहिए. जिन चीजों का संबंध न्याय एवं संयम से है, यदि उनका संरक्षण उसके जिम्मे है तो सबसे पहले आवश्यक है कि श्रेय के बारे में उसकी सच्ची और दार्शनिक धारणा हो….यह विषय ऐसा है जिसका संबंध कला के बजाय किसी उच्चतर वस्तु से है.’12

एक समय सुकरात की इच्छा नैतिक शिक्षक बनने की थी. प्लेटो के अनुसार सुकरात ने कई परिभाषाओं में समसामयिक नैतिकता के संदर्भों में संशोधन किया था. अतः उसके अनुसार वह नैतिक शिक्षक ही था. हमें उसे कामयाब शिक्षक मानना चाहिए. इसलिए भी कि अपनी कलम से एक भी शब्द लिखे बिना सुकरात की गिनती विश्व के सिरमौर दार्शनिकों में की जाती है. प्लेटो के विपुल लेखन में ऐसी एक भी पंक्ति नहीं है, जिसमें लेखक ने सुकरात का प्रभाव महसूस न किया हो. एक परमजिज्ञासु व्यक्तित्व के रूप में उसने अपने समय की दर्शनचिंतन परंपरा को प्रभावित किया. इसमें प्लेटो के योगदान की उपेक्षा असंभव है. आज हम सुकरात के बारे में जो भी जानते हैं, उसमें प्लेटो तथा उसके अन्य शिष्यों, समकालीनों का बहुत बड़ा योगदान है. यह सुकरात के सोच का अनूठापन ही था कि उसको प्लेटो जैसे विचारकों ने अपना गुरु माना. जिस समय सोफिस्ट विचारक कोरे तर्क के आधार पर वितंडा रच रहे थे—सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता को सम्मान देने पर जोर दिया. उसके लिए ज्ञान और सद्गुण में कोई अंतर न था. न ही वह बौद्धिक चिंतन को भावना से सर्वथा निरपेक्ष मानता था. सुकरात के अनुसार बौद्धिक चिंतन कुछ ऐसी चीज है जो ‘भावना से अनुप्राणित’ है. जो न केवल ज्ञान को दिशादशा देता है, बल्कि मानवी ऐषणाओं को भी प्रभावितप्रेरित करताकराता है. उसका असर मनुष्य के व्यवहार और कार्यकलापों पर देखने पर मिलता है. इसपर बार्कर ने मेयर को उद्धृत किया है—

यदि हम ज्ञान तथा आचरण को एक ही मान सकें तो वह आचरण का स्थायी मापदंड बन जाता है. जिस ज्ञान का आचरण से कोई संबंध न हो, और जो ज्ञान केवल ज्ञान के लिए ही अर्जित किया जाए, तो ऐसे ज्ञान का इस यूनानी दार्शनिक की दृष्टि में कोई विशेष अर्थ नहीं था. ज्ञान केवल कुछ सूचनाओं का संकलनमात्र नहीं है. व्यक्ति के चरित्रनिर्माण के साथ उसका गहरा संबंध है. ज्ञान बुद्धि के माध्यम से ही समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है. यह इच्छाशक्ति और भावनाओं का निर्माण है. साहस, संयम, न्याय आदि सभी सद्गुणों की उत्पत्ति ज्ञान से ही होती है. साहसी वही व्यक्ति बन सकता है जो भय तथा निर्भीकता का ज्ञान रखता हो.’13

सुकरात के दर्शन में एक शब्द बारबार पढ़ने को मिलता है. वह शब्द है—सद्गुण. इसके पर्याय के रूप में प्लेटो ने ‘अरैती’ शब्द का उपयोग किया है, जिसका भाषिक अर्थ है—‘उत्कृष्टता.’ इस तरह सद्गुण का अभिप्राय है—सभी कर्मक्षेत्रों में उत्कृष्टता. उस गुण में प्रवीणता जिसके लिए उस वस्तु का आविष्कार हुआ है. जैसे कलम का गुण लिखना है, चाकू का गुण काटना. तो कलम की उत्कृष्टता का मापदंड होगा कि उससे कितना अच्छा या बुरा लिखा जा सकता है. ठीक इसी प्रकार चाकू की उत्कृष्टता भी उसके द्वारा किए गए कार्य की गुणवत्ता पर निर्भर होगी. मनुष्य के संदर्भ में उत्कृष्टता का आकलन उसमें मानवीय गुणों की उपस्थिति से आंकी जा सकती है. सुकरात के अनुसार मनुष्य की अच्छाई या बुराई दो प्रकार की होती है. पहली उसकी प्रवृत्ति को लेकर. जिसके आधार पर उसका दूसरे मनुष्यों के साथ व्यवहार का आकलन किया जा सकता है. दूसरी व्यवसाय या कौशल को लेकर. जो उसके उत्पादकता संबंधी गुणों का मापदंड है. समाज के लिए मनुष्य के दोनों ही गुण अभीष्ट हैं. इनमें एक का भी अभाव मनुष्य को समाज के लिए अनुपयोगी बना सकता है. कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा चित्रकार, इंजीनियर, वकील, नेता, डॉक्टर, लेखक आदि हो सकता है. परंतु अच्छा वही मनुष्य हो सकता है, जिसमें मनुष्य की अच्छाई को दर्शाने वाले गुण प्रचुर मात्र में उपलब्ध हों. अच्छाई का मापदंड क्या है? सुकरात के अनुसार संयम, न्याय, साहस और विवेक, मनुष्य के श्रेष्ठत्व के स्तर को दर्शाते हैं. संयुक्त रूप से चारों गुण मानवीय उत्कृष्टता का मापदंड कहे जा सकते हैं. इनके अभाव में मनुष्यत्व पर संकट आ सकता है, जो प्रकारांतर में समाज के लिए भी हानिकारक है. सुकरात के आचरण की उत्कृष्टता के विचार की तुलना बुद्ध के ‘अष्टांग मार्ग’ से की जा सकती है. सुकरात से लगभग आधी शताब्दी पहले जन्मे बुद्ध ने भी आचरण की शुद्धता एवं उत्कृष्टता पर बल दिया था. उनका अष्टांगिक मार्ग—सम्यक दृष्टि, सम्यक कर्म, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक स्मृति, सम्यक जीविका, सम्यक व्यायाम तथा सम्यक समाधि का समर्थन करता है. इन कर्तव्यों में पूर्णता व्यक्ति को निर्वाण की ओर ले जाती है. यह कहना तो अनुचित होगा कि सुकरात ने अपने विचार बुद्ध से लिए थे, परंतु दोनों के कर्मसिद्धांत में अनूठा साम्य मनुष्यता के इन दो हितचिंतकों के समान वैचारिक धरातल को दर्शाता है. सुकरात का विचार था कि डॉक्टरी, नौकासंचालन अथवा दूसरे उद्यमों की भांति राजनीति भी एक कला है. व्यक्ति राजनीति का ज्ञान अर्जित कर, शासनकार्य में निपुणता प्राप्त कर सकता है. परंतु श्रेष्ठ शासन के लिए व्यक्ति का उच्च नैतिक मूल्यों में विश्वास और कर्तव्यपरायणता आवश्यक है. सुकरात के जीवनदर्शन की ये विशेषताएं उसे सोफिस्टों से अलग कर, मनुष्यता के आदिचिंतक के रूप में स्थापित करती हैं.

सुकरात ने जिस आदर्शवाद को केंद्र में रखते हुए उसने अपने दर्शन सिद्धांत गढ़े थे, प्लेटो ने उसी को आधार बनाकर आदर्श समाज की रूपरेखा तैयार की थी. यही कारण है कि प्लेटो का राजनीतिक दर्शन नैतिकता से आबद्ध है. सुकरात का उल्लेख उसने ऐसे तेजस्वी विद्वान के रूप में किया है, जो ‘शुभ’ को पहचानने तथा उसका अनुसरण करने की आवश्यकता पर जोर देता है. वह ईश्वर की परंपरागत अवधारणा से भिन्न, यद्यपि उसकी कुछ समानताएं लिए हुए है. प्लेटो को लगता था कि राजनीतिक पदों पर जिम्मेदारी का निर्वहन चुनौतीभरा काम होता है. महत्त्वपूर्ण कर्तव्यों के निष्पादन के लिए उपयुक्त व्यक्ति पर्याप्त संख्या में सर्वदा उपलब्ध हों, यह संभव भी नहीं होता. इसलिए किसी भी राज्य के सामने, जो नागरिक हितों को सर्वोपरि समझता है, बड़ी समस्या ईमानदार, दूरदृष्टा, साहसी और नीतिवान राजनीतिज्ञों के चयन की होती है. प्लेटो को विश्वास था कि शिक्षा के माध्यम से अच्छे राजनीतिज्ञ तैयार किए जा सकते हैं. ‘अकादमी’ की स्थापना उसने इसी उद्देश्य के निमित्त की गई थी. पलभर के लिए एकदम हाल के युग में लौटकर याद करने की कोशिश करें. कुशलनीतिवान राजनीतिज्ञों की उपलब्धता की समस्या को लेकर ब्रिटिश की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारर्गेट थैचर ने भी अपने एक बयान में कहा था कि उन्हें राजकर्म के कुशल संपादन के लिए केवल छह व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो निपुण एवं नीतिवान हों. पर ऐसे लोग इतनी संख्या में कभी एक साथ नहीं मिल पाते. हालांकि ऐसा सोच सर्वथा निरापद नहीं है. समाज में प्रतिभाशाली लोग हमेशा होते हैं. लेकिन प्रायः लोग विरोधी विचारधाराओं के प्रति लचीलेपन के अभाव में उनकी उपेक्षा कर जाते हैं. समन्वयसामर्थ्य की कमी भी इसका कारण होती है. शिखर पर बैठे लोग प्रायः यह सोचते हैं कि उनके सहयोगी या मातहत ठीक वैसा और उतना ही सोचेंकरें, जैसा वे स्वयं सोचतेचाहते हैं. मार्गेट थैचर जैसे नेता जब कुशल और समर्पित लोगों की कमी की बात करते हैं तो इसका आशय यह नहीं है कि समाज में उस तरह के लोगों की सचमुच कमी होती है. असलियत यह है कि प्रतिभा के साथसाथ जिस अंधसमर्पण की अपेक्षा सत्ताशीन वर्ग दूसरों से करते हैं, वैसा प्रायः नहीं हो पाता. जिसको ऐसे लोग मिल जाते हैं, वह हिटलर की भांति तानाशाह बन जाता है.

यही समस्या प्लेटो के सामने भी थी. इसलिए उसने शिक्षा के माध्यम से भावी राजनीतिज्ञों की पीढ़ी तैयार करने पर जोर दिया था. ‘रिपब्लिक’ की रचना में प्लेटो के गुरु सुकरात के अलावा उसके और कई समकालीन एवं पूर्ववर्त्ती दार्शनिकों का योगदान था. उनमें पाइथागोरेस के अनुयायी, पेरामेनीडिस, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाटस आदि प्रमुख थे. प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव, ईसा से पांच शताब्दी पहले जन्मे यूनानी दार्शनिक पेरामेनीडिस का पड़ा था. उसका विचार था कि ‘सत्य को सदैव अनतिंम तथा अपरिवर्तनीय होना चाहिए.’ पेरामेनीडिस शब्दों की ताकत पर भरोसा करता था. उसका विचार था कि यदि भाषा में अभिव्यक्तिसामर्थ्य है तो उसके द्वारा हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, यानी लगातार विमर्श के माध्यम से जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है, वह भी सच होना चाहिए. पेरामेनीडिस के दर्शन का स्रोत ‘दि नेचर’ शीर्षक से लिखी गई एक कविता है. कहा जाता है कि उस कविता में लगभग 3000 पद थे. उनमें से अधिकांश पद अब गायब हो चुके हैं. मूल कविता भी अनुपलब्ध है. उसका सिर्फ संदर्भ प्राप्त होता है. अपनी कविता में पेरामेनीडिस ने कहा था कि आप उस वस्तु के बारे में नहीं जान सकते जिसका कोई अस्तित्व ही न हो. इसका अभिप्राय है कि मनुष्य का ज्ञान केवल अस्तित्वमान प्रत्ययों की व्याख्याविश्लेषण तक संभव है. शुभत्व इस आधार पर अस्तित्ववान है क्योंकि वह मानवजीवन को नैतिकता की ओर अग्रसर करता है. दूसरी ओर नैतिकता इसलिए अस्तित्ववान है, क्योंकि वह मनुष्य की शुभत्व की यात्रा को सफल बनाती है. इस कसौटी के अनुसार पेरामेनीडिस को पहला तत्वविज्ञानी भी कहा जाता है. कालांतर में वही भौतिकवादी दर्शन की प्रेरणा बना.

पेरामेनीडिस के अलावा प्लेटो पर सर्वाधिक प्रभाव उससे कुछ ही वर्ष पहले जन्मे हेराक्लाट्स का पड़ा था. यूनानी दर्शन के पितामह थेल्स से प्रभावित हेराक्लाट्स जल को ही सृष्टि का मूलाधार मानता था. उसका मानना था कि सबकुछ गतिमान है. दो व्यक्ति यदि आगे पीछे जा रहे हैं तो पीछे मौजूद व्यक्ति कभी पहले को नहीं पकड़ पाएगा. इसलिए कि उनकी यात्र का भौतिक जगत के अलावा एक आयाम और भी है—वह है समय, जो सदैव गतिमान रहता है. जब तक पीछे चल रहा व्यक्ति आगे वाले के बराबर पहुंचेगा, तब तक आगे चल रहा व्यक्ति समय के प्रवाह में कुछ और आगे निकल चुका होगा. ग्रहनक्षत्र भी इसी नियम का पालन करते हैं. हेराक्लाइट्स के अनुसार रातदिन सूर्य चक्र के अनुसार बदलते हैं. हालांकि हर रोज एक ही सूरज दिखाई पड़ता है, किंतु हम एक ही समय में कभी नहीं लौटते. हर बार का सूरज कुछ नया होता है. हम उस अंतर को नहीं समझ पाते; क्योंकि हमारी दृष्टि अरबों वर्ष के अंतराल को परखने में समर्थ नहीं है. हेराक्लाइट्स का यह विचार आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के निकट है. इसे पढ़ते हुए आइंस्टाइन की याद आना स्वाभाविक है. आइंस्टाइन ने भी समय को चौथा आयाम माना है. परंतु हमें याद रखना चाहिए कि हेराक्लाटस के शब्द आइंस्टाइन से लगभग 2400 वर्ष पहले के हैं. हेराक्लाइटस की प्रसिद्ध उक्ति है—‘सबकुछ प्रवाहमान है.’ किवदंति है कि यह वाक्य उसने नदी में खड़े होकर, उसके प्रवाह को देखते हुए कहा था. हेराक्लाइट्स के अनुसार—

यह विश्व, जो सभी के लिए एक समान है, इसमें जो कुछ है सभी सनातन है—वह न तो ईश्वरनिर्मित है, न ही मानवनिर्मित. जो कुछ आज है वह अखंड ज्योति के समान, परिवर्तनशीलता के बीच, हमेशाहमेशा के लिए रहने वाला है.’14

हेराक्लाइट्स के चिंतन में भौतिकवादी विचारधारा के बीजतत्व मौजूद हैं, जिन्होंने प्लेटो, अरस्तु समेत आने वाली पीढ़ी के अनेक दार्शनिकों को प्रभावित किया था. उसके बारे में यह बात भी चौंका सकती है कि वह युद्ध का समर्थक था. यहां तक कि न्याय की स्थापना के लिए भी वह युद्ध को अनिवार्य मानता था. युद्ध का जैसा दुराग्रही समर्थन हेराक्लाइट्स ने किया, वैसा शायद ही किसी और विचारक ने किया हो—

युद्ध आमखास, राजाओं तथा राजाओं के राजा का जनक है. युद्ध ने ही कुछ को भगवान, कुछ को इंसान, कुछ को दास तथा कुछ को स्वामी बनाया है. हमें मालूम होना चाहिए कि युद्ध से हम सभी का नाता है. विरोध न्याय का जन्मदाता है, प्रत्येक वस्तु संघर्ष से ही जन्मती तथा उसी से अंत को प्राप्त होती है.15

हेराक्लाइट्स तथा पारमेनीडिस के अलावा सुकरात पूर्व के दार्शनिकों में प्रोटेगोरस का नाम भी बड़े सम्मान के साथ के साथ लिया जाता है. उसके विचारों में हम आर्थिक उदारवाद की झलक देख सकते हैं. वह सोफिस्ट था और गर्व के साथ खुद को पुराने सोफिस्टों की भांति ‘मानवता का शिक्षक’ कहता था. यह बात अलग है कि उसके जीवनकाल में ही सोफिस्टों का सम्मान घटने लगा था. उसके पीछे सोफिस्टों की अपनी चूकों, जैसे कि ज्ञान को वितंडा का पर्याय मानना तथा शिक्षा का अभिप्रायः दूसरों को प्रभावित करने की कला बताना तथा सुकरात की बढ़ती ख्याति का बड़ा योगदान था. सुकरात के प्रभाव में ही प्लेटो भी सोफिस्टों से दूरी बनाए रहा. अपने मौलिक विचारों के कारण प्रोटेगोरस जैसे प्रतिभाशाली चिंतकों का महत्त्व बाद में भी बना रहा. वह प्राचीन क्लासिक किस्म के सोफिस्टों में से था जो प्रकृति और मनुष्य के संबंधों के बीच नएपन की खोज को समर्पित थे. उनीसवीं शताब्दी के उदारवादी विचारकों की भांति उसके दर्शन का केंद्र भी मनुष्य है. इस संबंध में प्रोटेगोरस का पहेलीनुमा कथन है—‘केवल मनुष्य सृष्टि की समस्त वस्तुओं का मापदंड है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी हैं, वैसा है. ऐसी वस्तुओं का जो जैसी नहीं हैं, वैसा नहीं है.’ इस कथन की अनेक व्याख्याएं हुई हैं. प्रकारांतर में वह बताता है कि न्याय अथवा कोई और ऐसी चीज जो समाज की भलाई की दावेदारी करती है, व्यक्तिनिरपेक्ष नहीं हो सकती. ऐसी वस्तुओं की उपयोगिता लोकहित साधते रहने में है. विवेचना को आगे बढ़ाते हुए उसने लिखा है कि, ‘प्रत्येक राज्य के लिए जो भी उचित एवं कल्याणकारी प्रतीत होता है, वह उसके लिए उस समय तक उचित एवं कल्याणकारी बना रहेगा, जब तक उसके विचारों में आमूल परिवर्तन नहीं होता.’ विचारों में परिवर्तन से प्लेटो का आशय समाज में वस्तु या व्यक्ति के प्रति धारणा है. उदाहरण के लिए ऐसे समाजों में जहां बहुपत्नीत्व अथवा बहुपतित्व जैसी प्रथाएं हैं, वहां क्रमशः एकाधिक पत्नी अथवा पति रखना अनुचित नहीं है. प्रथाएं समाज में उस समय तक सम्मानेय अथवा असम्मानेय बनी रहती हैं, जब तक कोई समाज उन्हें सम्मानेय अथवा असम्मानेय मानता है. प्रत्येक बदलाव मनुष्य की इच्छाशक्ति और बदलाव की उत्कंठा को दर्शाता है. अकसर यह कहा जाता है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है. घटनाएं उसके जीवन और विचारों को मनचाहा मोड़ देने में सक्षम होती हैं. परंतु इस सोच की सीमाएं हैं. कोई भी घटना मानवव्यवहार को तभी तक प्रभावित कर सकती हैं, जब उनमें व्यक्ति के आचरण से कुछ सीख लेने का गुण हो. कुल मिलाकर मनुष्य और उसके चारों और घट रही घटनाओं के बीच लेनदेन चलता रहता है. प्लेटो के अनुसार—

नगरराज्य से संबंधित मामलों में प्रत्येक नगर अच्छे और बुरे, उचित और अनुचित, न्यायसंगत और न्यायविरुद्ध, अनुकूल और प्रतिकूल निर्णय कर लेने के बाद उस निर्णय के अनुसार व्यवस्थाओं का गठन करता है, जो समान रूप से मान्य होती हैं. लेकिन इसका आशय यह नहीं कि कोई व्यक्ति अथवा नगर दूसरों के मुकाबले कम अथवा अधिक बुद्धिमान है. किसी नगरराज्य के लिए क्या उपयोगी और सुलभ होगा, इस बारे में मतभेद संभव हैं. परंतु नैतिकता से संबंधित मामलों में राज्य ही एकमात्र सत्ता है. राज्य का निर्णय सामूहिकता की देन होता है.’16

प्रोटेगोरस के अनुसार राज्य नैतिकता और कानून दोनों का आधार है. आदर्श राज्य प्रत्येक नागरिक को अपने मत पर बने रहने, अपने विचारों के साथ जीने की स्वतंत्रता देता है. साथ ही नागरिक इसके लिए भी बाध्य होता है कि वह राज्य द्वारा अनुमन्य सभी नियमों और कानूनों का पालन करेगा, ताकि उसके विचारों के कारण बाकी नागरिकों को जो उससे भिन्न राय रखते हैं किसी प्रकार की परेशानी न हो. स्मरणीय है कि प्रोटेगोरस के जीवनकाल में राज्य छोटेछोटे थे. समाज समुदायों में बंटा हुआ था. कुल जनसंख्या दास और गैर दास में बंटी थी. इसलिए उस समय तक समुदाय और समाज में बड़ा अंतर नहीं था. प्रायः समुदाय की इच्छा को ही समाज की इच्छा के रूप में अभिव्यक्त किया जाता था, हालांकि उसका प्रभाव क्षेत्र समुदाय विशेष तक ही सीमित रहता था. इसलिए प्रोटेगोरस ‘सामुदयिक इच्छा’ पर, जिससे समुदाय के अधिसंख्यक लोगों का भला हो, जोर देता है. समुदाय को बड़े समाज में बदलने की चाहत अरस्तु के बाद आरंभ होती है. अरस्तु सामाजिक नैतिकता का प्रश्न उठाता है और प्लेटो से हटकर सोचते हुए किसी खास राजनीति दर्शन के बजाय व्यक्ति और समाज की सामूहिक चेतना के विस्तार की मांग प्रस्तुत करता है. रूसो उसका उदात्तीकरण करते हुए उसे ‘सामान्य इच्छा’ में बदल देता है. यह अंतर दिखने में भले मामूली लगे, है अत्यंत महत्त्वपूर्ण. ‘सामुदायिक इच्छा’ का आशय ऐसी इच्छा से था, जिससे समाज में अधिसंख्यक लोगों का भला होता हो. ‘सामान्य इच्छा’ में भी बहुसंख्यक वर्ग का हित सुरक्षित है. लेकिन पहली में बहुसंख्यक वर्ग के हितों पर जोर देते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की या तो उपेक्षा कर दी जाती है, अथवा उनके अहित को बहुसंख्यक के हित की अनिवार्यता मानकर उपेक्षित कर दिया जाता है. रूसो की ‘सामान्य इच्छा’ इस मायने में उदार है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों को नजरंदाज करने के बजाय उन्हें राज्य की नैतिकता का प्रश्न बना देता है. तदनुसार उन इच्छाओं पर भी जोर दिया जाया जाता है, जिन्हें अल्प समूह की इच्छाएं मानकर प्रायः नजरंदाज किया जाता है. श्रेष्ठ समाज में ही श्रेष्ठ मनुष्य का वास होता है—कहते हुए अरस्तु बहुसंख्यक वर्ग से उम्मीद करता है कि वह अल्पसंख्यक वर्ग की पसंदों का भी ध्यान रखेगा; और राज्य जो प्रायः बहुसंख्यक वर्ग की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है, वह अल्पसंख्यक वर्ग के हितों, समानता और स्वतंत्रता को निर्बंध रखने के लिए समुचित कदम उठाएगा.

प्लेटो का विचार था कि आदर्श राज्य की स्थापना केवल समर्थन, सहयोग और परिवर्तनशील बने रहने से संभव नहीं है. इसे दृढ़, स्थायी, अपरिवर्तनीय राजनीतिक तंत्र के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो सामाजिक परिवर्तनों को निरंतर नियंत्रितनिर्देशित करने में सक्षम हो. ‘रिपब्लिक’ और ‘लॉज’ में आदर्श समाज के लिए जिन विचारों को वह स्थान देता है, वे यूनानी समाज में छिटपुट रूप से उससे पहले भी मौजूद थीं. लेकिन प्लेटो का दर्शन इस मायने में विशिष्ट है कि राजनीति पर उस समय तक इतने व्यवस्थित उपयोग के बारे में किसी ने नहीं सोचा था. अतः राजनीतिक दर्शन के लिहाज से यह एक अद्भुत और विकासगामी सोच था. ‘आदर्श समाज’ की परिकल्पना के पीछे उसके कविहृदय का भी उतना ही योगदान था, जितना कि दार्शनिक मस्तिष्क का. इसलिए अपने आदर्श राज्य में उसने कानून के हस्तक्षेप को न्यूनतम रखते हुए आत्मानुशासन पर ज्यादा जोर दिया है. इस ग्रंथ को कुछ विद्वान प्लेटो की कुंठा की उपज भी मानते हैं, जो उनके अनुसार एथेंस की राजनीति में सक्रिय भूमिका न निभा पाने के कारण जनमी थी. प्लेटो स्वयं दार्शनिक था. सुकरात, डेमोक्रिटिस, हेराक्लाइट्स, पेरामेनीडिस समेत पाइथागोरस के अन्य अनुयायी आदि जिनसे वह प्रभावित था, वे सब भी दार्शनिक थे. उसने एथेंस में गणतंत्रीय शासन को कुलीनतंत्र की मनमानी में ढलते हुए देखा था. सायराकस के सम्राट डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय की तानाशाही भी देखी थी. डायोनिसियस प्रथम अपने राज्य में विद्वानों और दार्शनिकों को रखता था. लेकिन उसकी मनमानी, सनकों और महत्त्वाकांक्षाओं पर रोक लगाने में वे सभी अक्षम थे. इसी कारण प्लेटो का राजतंत्र से विश्वास उठ चुका था. राजतंत्र को वह राजा तथा उसके आसपास जुटे अधिकारियों की तानाशाही कहता था. राज्य के मुखिया के रूप में वह ऐसे शासकों की कल्पना करता था, जो दूरदर्शी, वीर, साहसी, दृढ़निश्चयी, बुद्धिमान और किसी भी प्रकार से प्रलोभन से मुक्त हों. उसका मानना था कि ये गुण एकमात्र दार्शनिक में ही संभव हैं. इसलिए वह राज्य की बागडोर दार्शनिक के हाथों में सौंपने की अनुशंसा करता है. ‘रिपब्लिक’ में उसकी यही परिकल्पना विस्तार लेती दिखाई पड़ती है.

ध्यातव्य है कि ‘रिपब्लिक’ प्लेटो के प्रौढ जीवन की रचना है, हालांकि उसका लेखन वर्षां तक चलता रहा. कुछ खंड उसने अपने उत्तरवर्ती जीवन में पूरे किए थे. वे कदाचित उसके जीवन के हताशा भरे दिन थे. उसे लगने लगा था कि ‘रिपब्लिक’ के सपने को यथार्थ में साकार कर पाना सहज नहीं है. तो भी उसका ‘शुभ’ की अनिवार्यता तथा आदर्शों से मोह भंग नहीं हुआ था. अतएव अपने अंतिम दिनों की कृति ‘लॉज’ में वह उन व्यवस्थाओं की परिकल्पना करता है, जिनके द्वारा उस सपने को साकार किया जा सकता है. ‘रिपब्लिक’ की मुख्य स्थापना थी कि राज्य का मुखिया किसी दार्शनिक को होना चाहिए. वही चुनौतीपूर्ण स्थितियों में दृढ़ निश्चय लेकर राज्य का कल्याण कर सकता है. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग प्लेटो से पहले भी यूनान के नगरराज्यों में हो चुका था. नगरराज्यों में विकास हेतु योजनाएं बनाने तथा शासन हेतु आचारसंहिता तैयार करने का दायित्व प्रायः दार्शनिकविचारक ही संभालते थे. लंबे अनुभव के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि दुर्बलताओं से बाहर निकालने के लिए व्यक्ति के स्वभाव में आमूल परिवर्तन अनिवार्य है. जाहिर है, मार्क्स की भांति प्लेटो भी दुनिया को समझने नहीं, बदलने में विश्वास करता था. यही कारण है कि वह सहस्राब्दियों से दार्शनिक विचारकों को प्रभावित करने में सक्षम रहा है.

राजनीतिक दर्शन को समर्पित प्लेटो की महान रचना ‘रिपब्लिक’ न तो किसी विशिष्ट राजनीतिक दर्शन की स्थापना करती है, न ही किसी खास राजनीतिक विचारधारा का पक्ष लेती है. उसकी स्थापनाएं यूनान के किसी भी नगरराज्य के बारे में सच हो सकती थीं. इसलिए कि वह किसी विशेष राजनीतिक प्रणाली पर जोर देने के बजाय समाज में आदर्शों की स्थापना पर जोर देता था. चूंकि आदर्श की स्थापना परोक्षतः न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना ही है, इसलिए इस ग्रंथ में वह न्याय को विभिन्न कोणों से परिभाषित करने का प्रयास करता है. न्याय की उसकी अवधारणा भी तत्संबंधी आधुनिक विचारधाराओं से भिन्न है. ‘जस्टिस’ के माध्यम से एक भयमुक्त, अपराधमुक्त, न्यायाधारित समाज की स्थापना का पक्ष लेने के बजाय वह नागरिकों में कर्तव्यबोध पैदा करने पर ज्यादा जोर देता है. उसकी निगाह में न्याय का अभिप्राय व्यक्ति और समाज के आचरण की स्वयंस्फूर्त पवित्रता से है. ‘न्याय’ हालांकि अपने आप में एक जटिल अवधारणा है. इसका संबंध व्यक्ति मात्र के सदाचरण तथा समाज में अनुशासन बनाए रखने से होता है. ‘रिपब्लिक’ के पहले खंड में प्लेटो ने सुकरात को अपने साथियों के साथ ‘न्याय’ की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा करते हुए दर्शाया है. उस चर्चा के माध्यम से ‘न्याय’ की मुख्यतः चार परिभाषाएं हमें प्राप्त होती हैं. मगर उनमें से एक भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसे सर्वमान्य और सर्वकालिक माना जा सके.

प्लेटो के अनुसार न्याय का उद्देश्य सार्वकालिकसार्वत्रिक शुभ और सर्वश्रेष्ठ न्यायिकराजनीतिक शासन की स्थापना करना है. वह न्याय के दो स्वरूप मानता है. पहला राज्य की कार्यप्रणाली के माध्यम से सामने आता है. जिसके द्वारा निहित स्वार्थ तथा कर्तव्यों के निष्पादन के लिए राज्य विभिन्न संस्थाओं का गठन करता है. न्याय का दूसरा चेहरा उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई पड़ता है. उसे लोगों के साहस, कर्तव्यों के प्रति उत्साहभाव, नैतिक व्यवहार आदि के माध्यम से जाना जा सकता है. प्लेटो की मान्यता थी कि व्यक्ति की अपेक्षा बड़े तंत्र, जैसे राज्य के व्यवहार में न्याय की पहचान अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है. लेकिन यदि प्रत्येक नागरिक न्याय की ओर से उदासीन हो जाए तो न्याय के राज्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को मनमानी करने का अवसर मिल जाता है. इसलिए व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह समाज को उस रूप में व्यवस्थित करने के बारे में सोचे और सहयोग करे जिस प्रकार वह स्वयं को व्यवस्थित करना चाहता है. किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रहे, इसके लिए वह न्याय को ऐसे चरित्रिक लक्षण के रूप में देखना चाहता है जिसकी व्याप्ति व्यक्ति और समाज दोनों जगह समानरूप से हो. चूंकि समाज सदैव दो से बड़ा होता है. अतः बड़ा होने के कारण समाज में न्याय की मौजूदगी उसी अनुपात में अधिक होनी चाहिए. सहजीवन और कठोर अनुशासित जीवनशैली के समर्थक प्लेटो का यह तर्क अजीब लग सकता है. परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि वह राजनीतिक सत्ता को अधिक न्यायोन्मुखी, उदार, कर्तव्यपरायण और दायित्वभावना से युक्त देखना चाहता था. वह चाहता था कि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचे कि—‘अपने समाज और राज्य की बेहतरी के लिए मैं क्या कर सकता हूं?’ ‘उसके प्रति मेरा कर्तव्य और जिम्मेदारियां क्या हैं?’ इसे कर्तव्यबोध कहें अथवा नागरिकबोध, प्लेटो के मन में ऐसा विचार यूनानवासियों, विशेषकर वहां के अभिजात्यवर्ग के चारित्रिक पतन की प्रतिक्रियास्वरूप उपजा था. परोक्ष रूप में समाज को बेहतर बनाने की चिंता ही ‘रिपब्लिक’ का प्रतिपाद्य विषय है, जो कभी ‘न्याय’ की लोकोन्मुखी अवधारणा और कभी ‘आदर्श राज्य’ की परिकल्पना के रूप में सामने आती है. उसकी निगाह में आदर्श राज्य की स्थापना तब तक असंभव है, जब तक वहां के नागरिक और शीर्षस्थ वर्ग के लोग ‘शुभत्व’ से भलीभांति परिचित न हों. ‘शुभत्व’ की संकल्पना सुकरात की देन थी, जिसको पाने की अभिलाषा प्लेटो के पूरे साहित्य में व्याप्त है. यही उसका आकर्षण है.

प्लेटो को पढ़ते हुए मार्क्स की याद आना स्वाभाविक है. दोनों ही भौतिकवादी थे. दोनों का ही मानना था कि कोई मनुष्य अपने आप में पूर्ण नहीं है. मानवमात्र की यही अपूर्णता सामाजिक गठन को अपरिहार्य बनाती है. परंतु एक सीमा के बाद मनुष्य और समाज के रिश्ते जटिल होने लगते हैं. उन्हें नियंत्रित करना अकेले समाज के लिए संभव नहीं होता. ऐसे में राज्य की अहमियत बढ़ जाती है. राज्य न केवल मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने के लिए नीतियां बनाता है, अपति कल्याण के बंटवारे के लिए भी उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है. मनुष्य की भोजन, वस्त्र, आवास आदि ऐसी अनेक आवश्यकताएं हैं, जिन्हें उसकी मूलभूत आवश्यकताएं माना जाता है. इनके बगैर जीवन असंभव है. कुछ आवश्यकताएं विकास की देन होती हैं—जैसे सड़क, औजार, मशीनें, बिजली के उपकरण, यातायात के साधन इत्यादि. मनुष्य की सामान्य इच्छा होती है कि उसके जीवन में दूसरों का हस्तक्षेप न हो. सुरक्षा का पक्का भरोसा हो. यह काम मनुष्य आपस में एकदूसरे के साथ सहयोग करते हुए भी कर सकता है. अक्सर करता भी है. यह कार्य वह दूसरों के हितों को देखते हुए, राज्य और समाज के प्रति अपने कर्तव्य मानकर करे, यही सच्चा न्यायबोध है. यही वह ज्ञान है जिसके भरोसे राज्य के हस्तक्षेप अथवा उसकी नीतियों से स्वतंत्र रहकर भी मनुष्य अपना विकास कर सकता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

10. जिस समाज में धार्मिक आग्रह प्रबल हों, वहां तानाशाही भी मूल्य मान ली जाती है. धर्म स्वयं तानाशाही प्रवृत्ति रखता है. ऐसे समाजों में या तो पुरोहित की मर्जी चलती है, अथवा उसके देवता की. उनपर सवाल उठाना उदंडता समझा जाता है. यहां तक कि यदि कोई शंबूक ज्ञान की चाहत में पढ़नालिखना भी चाहे तो उसे मृत्युदंड देना धर्मरक्षा मान लिया जाता है. धार्मिक संस्थाएं कितनी पूर्वाग्रह ग्रस्त होती हैं, इसके अनेक उदाहरण हैं. उनकी खूबी है कि वे लोगों के दिलोदिमाग में ज्ञानपिपासा जगाने के बजाय उसे अनुकूलित करने का काम करती हैं. विज्ञान हो या साहित्य अथवा कोई ऐतिहासिक प्रसंग हो, वे उन सभी की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुसार करती हैं. ऐसा ही एक उदाहरण मध्यकाल में रहीम को लेकर है. रहीम अकबर के सेनापति, बड़े कवि थे. उनकी दानशीलता के भी बड़े किस्से प्रचलित हैं. एक किस्सा गंग कवि को लेकर है, जो स्वयं अकबर के दरबारी कवि थे. कहते हैं कि गंग कवि ने रहीम की विनत दानशीलता से प्रभावित होकर एक दोहा लिखकर भेजा—

सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी दैन.

ज्योंज्यों कर ऊँचौं कियौं, त्योंत्यों नीचे नैन.

खानखाना ने उसका प्रत्युत्तर वैसी ही विनम्रता और कविकौशल के साथ दिया—

देनहार कोउ और है, देत रहत दिनरैन.

लोग भरम हम पै करें, तासों नीचे नैन.’

हम रहीम के दोहे में आए ‘देनहार’ शब्द पर चर्चा करेंगे. हालांकि यह कोई नया शब्द नहीं है. ‘दाता’ शब्द का उपयोग इसके पर्याय के रूप में हमेशा होता आया है. चूंकि दानकर्म को धर्म से जोड़ा जाता रहा है, इसलिए बिना एक पल गंवाए इसका अर्थ ‘ईश्वर’ या अल्लाह’ मान लिया जाता है. हमारे आस्थावादी दिमाग को यह न तो असंगत लगता है, न ही अनुचित. इसी के साथ रहीम और हर्ष जैसे दानदाताओं की उदारता का विराट आभामंडल हमारे मस्तिष्क में बनने लगता है. अब दान दो प्रकार से दिया जाता है. अपनी कमाई से देना. जैसे कोई गरीब धर्म के नाम पर मंदिरमस्जिद या पीरऔलिया की दरगाह पर देता है. दूसरा राजामहाराजा, जो जनता से खुशीखुशी, जबरन उगाए गए या लूटे हुए धन को दान के नाम बांटकर समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ‘वाहवाह’ लूटते रहते थे. दोनों हालात में असल देनदार जनता है. किसान खेत में हल चलता है, मजदूर कारखानों में पसीना बहता है, उन्हीं की कमाई राजा से राजा का खजाना भरता है. राजा उसके एक हिस्से को दान के रूप में लौटाकर यशप्रतिष्ठा अर्जित करता है—यह हकीकत भूले से भी हमारे दिमाग में नहीं आती. अंधआस्था हमारे विवेक को हर लेती है. नतीजा यह होता है कि हम धर्म और ईश्वर के नाम पर सत्ताओं के प्रत्येक धत्त्कर्म को पचाते चले जाते हैं. तो क्यों न यह मान लिया जाए कि रहीम जैसे संवेदनशील कवि की गर्दन यह जानने के कारण नीची थी कि जिस धन को वे दान में लुटा रहे हैं, वह उनका नहीं उनकी प्रजा के गाढ़े पसीने की कमाई का है.

11. ‘One should think it of greater importance than anything else that the affairs of polis are conducted well is the best means to success: everything depends on this, and if this is preserved, everything is preserved and if this is destroyed everything is destroyed’.-Democritus.

12. अर्नेस्ट बार्कर, यूनानी राजनीतिकसिद्धांत, पृष्ठ—140, अनुवाद विश्वप्रकाश गुप्त.

13. पाश्चात्य राजनीतिक विचारों का इतिहास, डॉ. प्रभुदत्त शर्मा से उद्धृत.

14. This world, which is the same for all, no one of gods or men has made; but it was ever, is now,and ever shall be an ever-living Fire, with measures kindling and measures going out.from BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY And Its Connection with Political and Social Circumstances from the Earliest Times to the Present Day.

15. ‘War….is the father of all and the king of all; and some he has made gods and some men, some bond and some free…We must know that war is common to all and strife is justice, and that all things come into being and pass away through strife.’-Heraclitus, quoted by BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY.

16. यूनानी राजनीतिक विचारधारा, टी. . सिनक्लेयर, अनुवाद विष्णुदत्त मिश्र.

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—तीन

सामान्य

‘रिपब्लिक’ के चौथे खंड में सूत्रधार की भूमिका ग्लाकॉन और एडीमेंटस संभालते हैं. पहले खंड में जहां न्याय क्या नहीं है, जानने का प्रयत्न किया गया है, चौथे खंड में प्लेटो ‘न्याय क्या है’ यह बताने की कोशिश करता है. शुरुआत करते हुए ग्लाकॉन ‘शुभत्व’ को तीन हिस्सों में परिभाषित करता है. आंतरिक, जैसे कि सुख, आनंद, वस्तुनिष्ठ जैसे कि सुख-सुविधा के संसाधन, धन जिससे सुख-समृद्धि बटोरी जा सकती है. तीसरा आंतरिक और वस्तुनिष्ठ जैसे कि स्वास्थ्य. तीनों में से एक का भी अभाव मनुष्य को अपूर्णता का एहसास कराता है. ग्लाकॉन द्वारा यह पूछने पर कि तीनों में से कौन-सा शुभत्व न्याय है, सुकरात तीसरे का समर्थन करता है. सुकरात मानता है कि उससे न्याय को समग्रता में परखा जाता है. लेकिन वह अपने निर्णय के समर्थन में पर्याप्त तर्क देने में असमर्थ रहता है. ग्लाकॉन न्याय संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहता है कि न्याय दूसरों को हानि पहुंचाने तथा जरूरतमंद की मदद के बीच संतुलन हेतु व्यक्तिमात्र की अपने प्रति प्रतिबद्धता है. ऐसा करते हुए वह स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने का काम करता है. स्वार्थपरकता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है. वह व्यक्ति को व्यक्ति और समाज दोनों के प्रति गैर-जिम्मेदार बनाती है. मानव की स्वाभाविक कमजोरियों लालच, स्वार्थ आदि को स्वीकारते हुए ग्लाकॉन न्याय को उनसे दूर रहने तथा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान बनाए रखने वाली प्रेरणाशक्ति के रूप में स्वीकारता है. उसके अनुसार न्यायशील व्यक्ति का अपने और समाज के प्रति ईमानदार रहना आवश्यक है. यदि ऐसा नहीं है. यदि कोई व्यक्ति यह भ्रम रखते हुए कि केवल वही न्याय के पथ पर है, दूसरों की आलोचना करता है तथा उनपर अपना स्वार्थ थोपने का प्रयास करता है. तो ऐसे कथित न्यायशील व्यक्ति की अपेक्षा अन्याय का समर्थन करना उचित है. उसके अनुसार न्याय की एकमात्र कसौटी वृहद सामाजिक हित में है.

ग्लाकॉन के अनुसार न्याय कृत्रिम चीज, रूढ़ियों की उपज है. इसके लिए उसके तर्क अपने साथियों से थोड़ा हटकर हैं. वह कहता है कि प्राकृतिक अवस्था में लोग अन्याय करते और सहते हैं. लेकिन अन्याय की मात्रा व्यक्ति की शक्ति पर निर्भर करती है. जो अधिक शक्तिशाली है, वह तदानुरूप अधिक अन्याय करने में सक्षम होता है. इसलिए जब कमजोर यह देखते हैं कि वे उतना अन्याय करने में अक्षम हैं, जितना उन्हें सहना पड़ता है, तब वे संगठन के विवश होते हैं. इस तरह न्याय सबल की नहीं, दुर्बल की आवश्यकता और इच्छा का परिणाम बन जाता है. उसके माध्यम से वह अपने से शक्तिशाली के व्यवहार को नियंत्रित करने का सपना देख सकता है. एक संविदा के तहत, जिसका आधार धर्म भी हो सकता है और संविधान भी, वे एक-दूसरे के प्रति अत्याचार न करने, न ही सहने के लिए वचनबद्ध होते हैं. धीरे-धीरे वह संविदा कानून का रूप ग्रहण कर लेती है. लेकिन मानव-प्रवृत्ति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. जब उसको लगता है कि किसी कानून या बल के आधार पर उसे नियंत्रित करने की तैयारी हो रही है, तो वह विरोध पर उतर आता है. परिणामस्वरूप समाज में जिसका गठन सहअस्तित्व की भावना के साथ हुआ था, कुछ लोग बल की भाषा बोलने-समझने लगते हैं. इससे समाज के वर्ग के भीतर भय उमड़ने लगता है. उसी से न्याय की उत्पत्ति होती है. ग्लाकॉन के अनुसार, ‘न्याय सबसे अच्छे और सबसे बुरे के बीच का रास्ता, एक समझौता है. सर्वोत्तम यह है कि मनुष्य अन्याय से दूर रहे, ताकि दंड से बचा रहे और सबसे बुरा यह है कि अन्याय सहे और बदला न ले सके.’ निर्बल सबल से बदला कैसे ले सकता है? वह जानता है कि वह अकेला शक्तिशाली का सामना नहीं कर सकता. अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वह अपने ही जैसे लोगों के साथ समझौते को बाध्य होता है. चूंकि समाज में कमजोरों की संख्या अधिक होती है, इसलिए बहुसंख्यक वर्ग की सम्मिलित शक्ति अल्पसंख्यक शक्तिशाली वर्ग से अधिक हो जाती है. शक्तिशाली वर्ग इस सत्य को भली-भांति समझता है. इसलिए वह निरंतर इस प्रयास में रहता है कि शक्ति-विपन्न वर्गों में फूट डालकर उन्हें एकजुट होने से रोक सके. अल्पसंख्यक शक्तिशाली समूहों की बहुसंख्यक शक्ति-विपन्न समूहों पर शासन करने की योग्यता, प्रायः इस बात पर निर्भर करती है कि वह उन्हें बांटे रखने में कितना सफल हो पाता है. धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग-भेद आदि ऐसे ही माध्यम हैं जो असल जिंदगी में अनुपयोगी होने के बावजूद बहुसंख्यक समाज को बांटे रखने में सहायक होते हैं.

थ्रेचाइमच्स ने ‘ताकतवर हमेशा सही’ कहते हुए न्याय को ‘शक्तिशाली का स्वार्थ’ माना है. जबकि गलाकॉन न्याय की उत्पत्ति भय से मानता है. दोनों न्याय तक पहुंचने के लिए धुर-विपरीत ध्रुवों से अपनी विचार-यात्रा की शुरुआत करते हैं. यह प्लेटो की विशिष्ट शैली है. इसके माध्यम से वह किसी दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अपने मंतव्य को प्रत्येक दृष्टिकोण से परख लेना चाहता है. ग्लाकॉन का विचार वृथा नहीं गया. मध्यकाल में हॉब्स जैसे विचारकों ने भी उसका समर्थन किया है. ग्लाकॉन के विचारों में हमें परंस्पर अंतर्विरोधी तत्व दिखाई पड़ते हैं. परंतु ये अंतर्विरोध अकेले  ग्लाकॉन के नहीं है. यह मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह आसन्न संकट पर विजय की क्षीण संभावनाएं देख समझौते पर उतर आता है. उसके लिए लिखित-अलिखित संविदा करता है. लेकिन धीरे-धीरे वह उस वातावरण से ऊबने लगता है. हालात अनुकूल देख के शक्तिशाली वर्गों की महत्त्वाकांक्षाएं पनपने लगती हैं. और वे उन शक्तियों की अवहेलना करने लगते हैं, जिन्होंने उनके अस्तित्व को संभव बनाया है. वे भी मानते हैं कि कि न्याय मनुष्य के अंतर्मन की वस्तु नहीं है. समाज उसका सृजन करता है और फिर राज्य-सत्ता के सहयोग द्वारा लागू करता है. समाज में न्यायी और अन्यायी दोनों प्रकार के लोग हो सकते हैं. लेकिन न्यायी और अन्यायी को तभी रेखांकित किया जा सकता है, जब समाज में बल-प्रयोग की शक्ति हो. ग्लाकॉन और हॉब्स दोनों इस तथ्य से करीब-करीब सहमत नजर आते हैं कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से स्वार्थी होता है. साधारणतः वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, और यह मानते हुए कि दूसरे उसके जितने श्रेष्ठ नहीं हैं, उसे अपनी श्रेष्ठता पर खतरा दिखाई पड़ता है. यह अंतर्विरोध या कि आत्मसंघर्ष मनुष्य को दूसरों से सहयोग और समझौते के लिए प्रेरित करता है. स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठतर सिद्ध करने की प्रवृत्ति मनुष्य की यशलिप्सा के रूप में प्रकट होती है. जाहिर है समाज में रहते हुए व्यक्ति को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक संघर्ष से भी गुजरना पड़ता है. यही द्वंद्व समाज में न्याय को प्रासंगिक बनाता है.

केफलस, पॉलीमार्क्स, थ्रेचाइमच्स और ग्लाकॉन सब न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करते हैं. उसके लिए वे अलग-अलग तर्क देते हैं. सुकरात को बीच में लाकर प्लेटो उनकी मान्यता के कमजोर पक्षों की ओर इशारा करता है. अलग-अलग दिखने वाले उन विचारों में प्लेटो को जो सामान्य बात नजर आती है, वह यह है कि चारों न्याय को बाहरी चीज मानते हैं. उनके अनुसार न्याय चूंकि बाहर की चीज है इसलिए किसी न किसी रूप में वे सभी मनुष्य की क्षमताओं, उसकी प्रवृत्तियों और संभावनाओं पर संदेह कर रहे होते हैं. चारों के दर्शन में प्लेटो को यही बात सर्वाधिक अखरती है. मन से कवि और विचारों से दार्शनिक प्लेटो मनुष्य और मनुष्यता में अपने विश्वास को कम नहीं होने देता. इसलिए वह यह सिद्ध करने में जुट जाता है कि न्याय बाहरी वस्तु न होकर मनुष्य के आंतरिक बल का परिचायक है. वह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय न तो बाहरी सौगात है, न ही रूढ़ि न ही किसी अदृश्य सत्ता की ओर से उपहार. असल में वह मनुष्य की अपनी महिमा, उसका आंतरिक बल, ओज और तेज है. वह बताता है कि उसके साथी न्याय पर समग्रता से विचार करने के बजाय, उसके परिस्थितिगत लक्षणों पर विचार कर रहे हें. इसलिए न्याय को लेकर उनके विचार अधूरे और अपर्याप्त हैं. उसके अनुसार न्याय मानव प्रकृति की उच्चतम अवस्था है. समाज का अपना व्यक्तित्व होता है. सीमित संदर्भों में जहां न्याय मानव-मात्र की आंतरिक शुभता का परिणाम हैं, वहीं व्यापक संदर्भों में वह समाज की आंतरिक शुभता को भी दर्शाता है. इसकी विवेचना हेतु प्लेटो पुस्तक का उदाहरण देता है. मान लीजिए एक व्यक्ति के पास किसी पुस्तक की दो प्रतियां हैं. उनमें से एक बड़े अक्षरों में टाइप होने के कारण काफी मोटी है, दूसरी छोटे अक्षरों में, आकार में अपेक्षाकृत छोटी है. हालांकि दोनों प्रतियों की विषय-वस्तु में कोई अंतर नहीं है. फिर यदि किसी व्यक्ति को उन्हें पढ़ने को दिया जाए तो वह बड़े फांट की पुस्तक को पढ़ना पसंद करेगा. यही उसके लिए आसान भी होगा. भले ही बड़े अक्षरों वाली पुस्तक को लाना-ले-जाना उसके लिए कठिन हो. प्लेटो के अनुसार व्यक्तिगत न्याय और सामाजिक न्याय में यही अंतर है. दोनों मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसके सदाचार और सद्गुणों की उत्पत्ति होता है. समाज में जाकर उसका रूप बड़ा हो जाता है. वह व्यक्ति से अधिक समाज को समझने पर जोर देता है. अपने दायरे के कुछ लोगों को वह दूसरों से अधिक जान पाता है तो इसलिए कि वे उसकी सामाजिकता के दायरे में हैं. आदर्श समाज में किसी नागरिक को जानने और समाज को जानने में अंतर नहीं होता. न्याय की इस विशेषता को समाज के प्रति सकारात्मक सोच और वृहद संदर्भों में ही परखा जा सकता है. इसके लिए प्लेटो स्पष्ट करता है कि कोई राज्य अपनी धन-संपदा या शक्ति के बल पर आदर्श नहीं बनता. आदर्श राज्य अपने नागरिकों के श्रेष्ठतम चरित्र से आकार लेता है.

चर्चा के अगले चरण में एडीमेंटस विमर्श में शामिल हो जाता है. न्याय की उसकी व्याख्या सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित तथा आत्मपरक है. उसके अनुसार लोग अपने बच्चों को न्याय का समर्थन करना इसलिए नहीं सिखाते क्योंकि वह शुभता का प्रतीक है. बल्कि इसलिए सिखाते हैं कि बच्चे बड़े होकर उनका साथ दे सकें. प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि एडीमेंटस न्याय को पारिवारिक सुख तक सीमित रखकर, राज्य की उपेक्षा कर रहा है. लेकिन ऐडीमेंटस निरा परिवारवादी नहीं है. उसका समाज में भरोसा है. वह मानता है कि समाज कोई अमूर्त्त अवधारणा नहीं है. किसी भी व्यक्ति का समाज उसके आसपास के परिवेश से बनता है, जिसमें उसमें परिवार भी सम्मिलित होता है. इसलिए परिवार और परिवेश के प्रति निष्ठा प्रकारांतर में समाज के प्रति निष्ठा की परिचायक है. अतएव व्यक्ति को न्याय के प्रति अनुरक्त करने का सर्वात्तम रास्ता है कि उसके परिवेश में सुधार लाया जाए. ऐसे परिवेश का निर्माण किया जाए जिसमें उसे न्यूनतम अंतर्द्वंद्वों का सामना करना पड़े. समाज और सामाजिकता में विश्वास बनाए रखने का दायित्व व्यक्ति और समाज दोनों का है. ऐडीमेंटस आगे कहता है कि न्याय से लोगों को परचाने, उसके अनुपालन करने हेतु धार्मिक शिक्षा अपर्याप्त है. वह न्याय को राज्य एवं नागरिकों के बीच शुभता के आदान-प्रदान के रूप में प्रभावी करने के बजाए, उसे दैवीय बना देती है. धार्मिक व्यक्ति कहता है—यदि तुम दूसरों के साथ न्याय करोगे तो ईश्वर तुम्हारी मदद करेगा, तुम्हें उसका पारितोषिक देगा. और यदि तुम अन्याय करोगे तो ईश्वर की निगाह में दंड के भागी बनोगे. स्वर्ग-नर्क की अवधारणा, मोक्ष आदि न्याय के ऐसे ही भ्रांत स्वरूप हैं. ऐसे में व्यक्ति जो करता है, वह या तो डर के कारण, अथवा दूसरों के विवेक से अनुशासित होकर. कर्तव्य एवं न्याय-भावना को भुलाकर पूजापाठ, दान-पुण्य आदि के बहाने वह ईश्वर को खुश करने की कवायद में जुट जाता है. चूंकि ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए धार्मिक व्यक्ति का न्यायबोध सिवाय भ्रांति के कुछ नहीं होता. यह भ्रांति न केवल उसके अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है. इसके चलते ईश्वरीय न्याय को ही वास्तविक न्याय मानने का दावा करने वाले उसके नाम पर मनमानी करने में सफल हो जाते हैं. न्याय सामाजिक शुभता का दूसरा नाम है. अवास्तविक अथवा काल्पनिक पात्रों के सहारे समाज द्वारा उसकी सिद्धि असंभव है. न ही उसे भय फैलाकर प्राप्त किया जा सकता है. ईश्वर के नाम पर होने वाला न्याय पुरोहित तथा उसके चेले-चपाटों के बीच चढ़ावे की हिस्सेदारी में सिमटकर रह जाता है. धर्म को लेकर एंडीमेटस का दृष्टिकोण कई मायने में महत्त्वपूर्ण है. वह न्याय के बारे में आधुनिक विचारधाराओं से मेल खाता है. जान लॉक, रूसो, बैंथम, फायरबाख, कार्ल मार्क्स, से लेकर पीटर क्रोप्टोकिन तक सभी विचारक जीवन में धर्म के अतिरेकी विस्तार तथा उसे न्याय का पर्याय मानने वाली मानसिकता का विरोध करते आए हैं. इसी का प्रभाव है कि धर्म को आधुनिक राज्यों में नीति-निर्माण की प्रक्रिया से अलग-थलग कर दिया गया है.

वैसे भी धर्म और न्याय का कोई अंतःसंबंध नहीं है. आरंभ से ही धर्म अभिजन-हितों का समर्थक-साधक रहा है. इसके अनगिनत उदाहरण रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. महाभारत-युद्ध को प्रायः धर्म-युद्ध कहकर प्रचारित किया जाता है. युद्ध के प्रमुख सूत्रधार की भूमिका निभाता हुआ कृष्ण अठारह अक्षौहिणी सेना, जो उस समय विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई थी, को एक-दूसरे से भिड़ाकर भगवान बन जाता है. उस युद्ध का प्राप्य क्या था? युधिष्ठिर को राज्य मिला. पर अठारह अक्षौहिणी सेना का हिस्सा बनकर लड़े सैनिकों या उनके परिजनों को क्या मिला? इसपर महाभारत या इतिहास की किसी पुस्तक में कोई उल्लेख नहीं है. आज भी इस पर कोई चर्चा नहीं करता. बस धर्म-युद्ध मानकर उसपर उठने वाले प्रत्येक सवाल पर पर्दा डाल दिया जाता है. युधिष्ठिर के धर्म-राज्य में प्रजा का क्या हाल था, पता नहीं. परंतु स्वयं महाभारत का संकेत है कि उस युद्ध ने एक परजीवी वर्ग को जन्म दिया था, जो इतना शक्तिशाली था कि नवनियुक्त सम्राट की आंखों के सामने किसी की भी हत्या कर सकता था. धर्मराज होने का दावा करने वाला युधिष्ठिर उसको देखकर भी चुप रहने को विवश था. यह उदाहरण महाभारत के शांतिपर्व से है—

‘कुरुक्षेत्र के महाभारत के बाद जब पांडव विजयी होकर लौटे तो प्रजा उनके स्वागत को उमड़ पड़ी थी. हजारों ब्राह्मण भी दान की अभिलाषा युधिष्ठिर को आशीर्वाद देने के नाम पर नगर-द्वार पर आ जुटे. जैसे ही युधिष्ठिर का रथ आता दिखाई पड़ा, प्रजा उसकी जय-जयकार करने लगी. नगर-द्वार पर जमा ब्राह्मण स्तुतिगान में लग गए. उस खुशनुमा माहौल में एक श्रमण साधुओं के बीच से अचानक निकला और युधिष्ठिर को देखकर कहने लगा—

‘हे युधिष्ठिर! तुमने अपने बंधुओं की हत्या की है. स्वजनों की हत्या और गुरुजनों का नरसंहार करके तुम्हें क्या मिला? तुम पापी हो. तुम्हें क्षोभ से मर जाना चाहिए.’

युधिष्ठिर स्तब्ध. लोगों को काटो तो खून नहीं. कुछ पलों के लिए ब्राह्मणों को भी मानो सांप सूंघ गया. अपराधबोध का मारा युधिष्ठिर सचमुच मर जाना चाहता था. अचानक ब्राह्मण दल को चेत हुआ. सारे के सारे ब्राह्मण एक-साथ चिल्लाने लगे—‘यह हमारा प्रतिनिधि नहीं है. हम ऐसा नहीं सोचते. यह पापी चार्वाक है. इस अधर्मी को जीने का कोई अधिकार नहीं है.’

यह कहकर सारे साधु उस श्रमण पर टूट पड़े. धर्मावतार युधिष्ठिर की आंखों के सामने उसे जीते-जी भस्म कर दिया गया.’

धर्म के नाम पर ऐसे ही अमानवीय न्याय का उदाहरण वेन की कहानी के रूप में आया है. पुराणों में वेन को विश्व का पहला निर्वाचित सम्राट बताया गया है. कहानी के अनुसार आर्यों ने जब कृषि की शुरुआत की और उसके लिए एक जगह टिककर रहना आरंभ किया तो सुरक्षा के लिए राजा चुनने का विचार सामने आया. ऐसा व्यक्ति जो जरूरत के समय उनका नेतृत्व कर सके. उस समय लोगों ने सर्वसम्मिति से वेन को अपना राजा निर्वाचित किया. वेन ने न्याय करते हुए जमीन का समुचित विभाजन किया. ब्राह्मण चूंकि शिक्षा का दायित्व संभाले हुए थे, उन्हें अनेक कर्मकांडों में लिप्त रहना पड़ता था, इसलिए उन्हें नदी किनारे की उपजाऊ जमीन दी गई. लोग खेती करने लगे. वेन के नेतृत्व में विश् तरक्की करने लगा. लेकिन खेती तो मौसम पर निर्भर थी. एक बार भयंकर अकाल पड़ा. पूरा विश् भूख की चपेट में आ गया. लोग तड़फ-तड़फकर मरने लगे. जब तक सुख देती थी, तब तक नई व्यवस्था लोगों को हितकारी लगती थी. मौसम की मार के साथ ही उसकी कमजोरी सामने आ गई. लोग वेन को दोष देने लगे. एक राजा का दायित्व निभाते हुए वेन ने विश् के लोगों की बैठक बुलाई. ब्राह्मणों को दी गई भूमि पर अब भी खेती हो रही थी. नदी किनारे होने का उसे लाभ मिला था. वेन उनसे आपद्धर्म के रूप में कृषि उपज को जरूरतमंदों के बीच बांटने का आग्रह किया. इसपर वे चिढ़ गए. लोगों को राजा के विरुद्ध भड़काने लगे. भूखे लोगों का दिलो-दिमाग सुन्न हो चुका था. आक्रोश जब सीमा पार कर गया तो भूखे से अकुलाए उग्र विश-वासियों ने राजा पर हमला कर दिया. इस तरह प्रथम निर्वाचत राजा अपने ही लोगों के हाथों मारा गया.

विमर्श के अगले चरण में प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्याय को उसकी लोकोन्मुखता तथा वृहद सामाजिक हितों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. न कि उन व्यक्तियों के व्यवहार से जो न्याय प्रक्रिया में सम्मिलित होने की दावेदारी करते हैं. न्याय-संबंधी विमर्श में अनेक लोगों को सम्मिलित कर वह तत्कालीन समाज में प्रचलित न्याय के परंपरावादी, उग्रवादी एवं व्यवहारवादी स्वरूपों की समीक्षा करता है. अंततः उसका संवेदनशील कवि हृदय उसको आदर्शवाद के समर्थन में ले जाता है. सुकरात के माध्यम से वह स्पष्ट करता है कि न्याय मनुष्य की आंतरिक शुभता, उसका सदाचरण है—‘यदि कोई व्यक्ति अपने दायित्वों का समुचित वहन करता है, तो उसका आचरण ही उसकी न्याय-प्रियता का प्रमाण बन जाता है.’ वह मानता है कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है. मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का समयानुसार पालन करना ही न्याय है. जाहिर है प्लेटो के लिए न्याय कोई सिद्धांत या विचारधारा न होकर आचरण की वस्तु है. क्या न्याय की शिक्षा दी जा सकती है? इसी से जुड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या शिक्षा व्यक्ति को अधिक न्यायशील बनाती है. प्लेटो शिक्षा की उपयोगिता से इन्कार नहीं करता. व्यक्तित्व विकास हेतु शिक्षा अनिवार्य है. तथापि उसके अनुसार शिक्षा साध्य नहीं है. वह केवल साधनमात्र है. उसका महत्त्व व्यक्ति को राज्य का योग्यतम सदस्य बनाने में मदद करना है. शिक्षा के अलावा अधिकार चेतना, जिसमें अपने साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का बोध भी जरूरी है तथा कर्तव्य के प्रति जागरूकता और समर्पण का भाव व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाने में मदद करता है. ‘रिपब्लिक’ की शुरुआत वह व्यैक्तिक नैतिकता एवं न्याय-प्रिय व्यक्ति के न्याय-संगत जीवन की विशेषताओं से करता है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते स्थिति साफ होती जाती है. पता चलता है कि लेखक का उद्देश्य संपूर्ण समाज को न्याय एवं नैतिकता से बंधे हुए देखना है. वह मानता है कि न्याय समाज का विशिष्ट गुण है. यह गुण समाज में बाहर से नहीं आता. बल्कि उसके नागरिकगण अपने न्याय-संगत आचरण द्वारा उसे संभव बनाते हैं. न्याय तथा औचित्य अथवा अन्याय एवं अनौचित्य जिस प्रकार व्यक्ति के गुण-दोष हो सकते हैं, उसी प्रकार ये समाज के भी गुण-दोष हो सकते हैं. न्याय व्यक्ति एवं समाज को परस्पर अन्योन्याश्रित, पूरक एवं प्रेरक बनाता है.

आधुनिक विचारक जॉन रॉउल न्याय को सामाजिक संस्थाओं का विशेष लक्षण मानता है. उसके अनुसार—‘न्याय सामाजिक संस्थाओं का शुभत्व है. उसका वही महत्त्व है जो वैचारिक उद्यमों में सत्य का होता है.’8 प्लेटो के लिए न्याय एवं नैतिकता में कोई अंतर नहीं है. दोनों परस्पर पूरक और पर्याय हैं. आदर्श स्थिति वह है जब व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर न्याय में अंतर मिट जाता है. इसके लिए प्लेटो समाज को शासक, रक्षक और कृषक तीन हिस्सों में बांटता है. जैसे भारत में शूद्रों को वर्ण विभाजन में सबसे निचले स्तर पर रखा गया है और दासों को वर्ण विभाजन में स्थान ही नहीं दिया गया है, इसी प्रकार प्लेटो के आदर्श राज्य में भी दासों को कार्यविभाजन से बाहर रखा गया है. दोनों ही जगह उनकी स्थिति खरीदी गई वस्तु या संसाधन के समान है. बावजूद इसके दोनों में बड़ा अंतर है. प्लेटो का सिद्धांत पूरी तरह से सामाजिक जरूरतों और विकास के नजरिये पर आधारित है. वह किसी व्यक्ति को जन्म, लिंग अथवा उसकी पैत्रिक पहचान के आधार पर छोटा या बड़ा घोषित नहीं करता. व्यक्ति का चयन उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से इतर, विशुद्ध योग्यता के आधार पर हो—इसके लिए वह बच्चों का पालन-पोषण सात वर्ष का होते ही—माता-पिता से दूर, उसकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने की अनुशंसा करता है. ताकि बड़े होने पर उनमें जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न किया जा सके. भारत में कार्यविभाजन इससे भिन्न था. वेदों, स्मृतियों तथा धर्म-सूत्रों में कार्यविभाजन के नाम पर समाज को चार वर्गां में बांटने का विधान रचा गया है. हालांकि दावा यह किया गया है कि वह विशुद्ध गुणों पर आधारित विभाजन हे और कोई मनुष्य अपने गुण एवं प्रतिभा के आधार पर वर्ग-अंतरण कर सकता है. परंतु वास्तविकता इससे अलग है. कर्म-गुण के आधार पर भारतीय समाज में वर्ग-अंतरण के उदाहरण इतने विरल हैं कि उन्हें अपवाद मानकर छोड़ा जा सकता है. भारतीय विशेषकर हिंदू समाज में जाति-व्यवस्था दास प्रथा की अपेक्षा कहीं अधिक निकृष्ट और भयावह थी. अपने स्वामी की अनुकंपा अथवा तय मूल्य-राशि का भुगतान करने के पश्चात दास अपनी स्वतंत्रता खरीद सकता था. जातिप्रथा में दबे शूद्रों को इस प्रकार के अवसर उपलब्ध न थे. जाति जन्म के साथ जीवन में प्रवेश करती और मरण तक देह और मन से चिपकी रहती थी. ‘रिपब्लिक’ में कार्य-विभाजन नीति-सम्मत है. प्लेटो व्यक्ति के गुण-दोष के अनुसार उसे उपयुक्त जिम्मेदारी सौंपने की सिफारिश करता है, ताकि उसकी योग्यता का समाज-हित में भरपूर इस्तेमाल किया जा सके. भारतीय, विशेषकर हिंदु समाज में जातीय विभाजन धर्म-सम्मत व्यवस्था है. जाति-व्यवस्था के लिए व्यक्ति की रुचि एवं योग्यता कोई मूल्य नहीं है. वह सबकुछ जन्म के आधार पर, बिना व्यक्ति की रुचि अथवा योग्यता देखे, काम सौंपने में विश्वास रखती है. इसलिए उसमें बदलाव सरल नहीं है. दूसरी ओर प्लेटो का कार्य-विभाजन अधिक वैज्ञानिक, निष्पक्ष और राज्य-कल्याण की भावना से भरा है.

‘रिपब्लिक’ मानवीय मेधा की अमूल्य धरोहर है. उसकी प्रशंसा करते हुए बार्कर ने लिखा है—न्याय रिपब्लिक की आधारशिला है. और रिपब्लिक न्याय की मूल अवधारणा का संस्थागत रूप है.’ ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने कहा है कि समाज के तीनों वर्गों को बिना एक-दूसरे के कार्य में व्यवधान उत्पन्न किए, काम करते रहना चाहिए. सब अपना-अपना कार्य मनोयोग से करेंगे तो सामाजिक शांति और सद्भाव बना रहेगा. राज्य आत्मनिर्भर बनेगा. अंतर्द्वंद्व घटेंगे और उनके समाधान में खप रही ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग लोककल्याण के निमित्त संभव हो सकेगा. सेबाइन ने प्लेटो के न्याय-सिद्धांत को सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक माना है. उसके अनुसार—‘न्याय वह बंधन है जो मानव-समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है. यह उन व्यक्तियों के सहयोग और समन्वय का नाम है जो अपनी शिक्षा-दीक्षा, योग्यता एवं रुचि के अनुसार अपने कर्तव्य का चयन करते हैं और फिर अपनी संपूर्ण निष्ठा से उसके अनुपालन में लगे रहते हैं. अपनी निष्ठा एवं समर्पण भावना से वे समाज को संपूर्ण एवं आत्मनिर्भर बनाते हैं. ऐसा समाज जो संपूर्ण मानव-मनस् की रचना हो, जिसमें हर कोई अपना प्रतिबिंब देख सके. सामाजिक जीवन के ऐसे ही मूलभूत, उदात्त रूप को प्लेटो ने न्याय की संज्ञा दी है. आचरण की शुभता पर जोर देते हुए वह ऐसे आदर्श समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें मानव-व्यक्तित्व की उठान सामाजिक शुभता के परम-बिदु को छूने लगती हे. लक्ष्य आसान नहीं है. परंतु निजता को सर्वकल्याण को समर्पित करने के बाद मनुष्य उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है.

प्लेटो न्याय और ज्ञान को परस्पर पूरक मानता है. उसके अनुसार ज्ञान मनुष्य को न्याय की पहचान कराता है. ज्ञान ही एकमात्र ऐसा उपकरण है जिससे मनुष्य शुभ-अशुभ, अच्छे-बुरे का बोध कराता है. ज्ञान न्याय की पूर्वापेक्षा और अनिवार्यता है. इसलिए ज्ञान एकमात्र शुभ है. सुकरात के माध्यम से प्लेटो द्वारा न्याय की खोज का सिलसिला आदर्श समाज की अवधारणा तक बढ़ जाता है. प्लेटो ने साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधाओं, नाटक, कविता आदि की आलोचना की थी. वह उन्हें लोकरंजन के माध्यम से अधिक मानने को तैयार न था. नाटक एवं कविता को तो वह मानव-चरित्र को दुर्बल बनाने वाली विधाएं मानता था. लेकिन उसके दर्शन में कवि मन की संवेदनशीलता साफ-साफ झलकती है. ‘रिपब्लिक’ में न्याय की खोज का सिलसिला, संवेदनशील मन की कविता जैसा है, जिसे उसकी विद्वता महत्त्वपूर्ण बना देती है. प्लेटो की न्याय-संबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ध्यातव्य है कि प्लेटो का संबंध एथेंस के शासक परिवार से था. वह स्वयं को एथेंस की सत्ता की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से एक मानता था. लेकिन सुकरात को मृत्युदंड दिए जाने के बाद से तत्कालीन राजनीति से उसका जी उचट गया था. प्लेटो से पहले यूनानी समाज में कोई खास कार्यविभाजन न था. न ही कार्य-विशेष के प्रति व्यक्ति की रुचि का कोई महत्त्व था. इसलिए माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी कार्य कर सकता है. इसी धारणा के चलते एथेंस में गणतांत्रिक पदों पर नियुक्तियां लॉटरी के माध्यम से की जाती थीं. इसके चलते कई बार कार्य-विशेष के लिए अयोग्य व्यक्ति चुन लिए जाते थे. इस अविवेकी व्यवस्था ने एथेंस का गणतंत्र अयोग्य हाथों की कठपुतली बना हुआ था. सुकरात ने उस पर चोट की थी. खुद को गणतंत्र का समर्थक मानने वाले एथेंस की यह सबसे बड़ी त्रासदी थी. प्लेटो की आदर्श राज्य की परिकल्पना उसकी इसी छटपटाहट का सुफल कही जा सकती है. न्याय की विवेचना के रूप में यही छटपटाहट आदर्श राज्य की कल्पना में भी दिखाई पड़ती है. वह ऐसे राज्य की कल्पना पेश करता है, जहां लोग बजाए स्वार्थ-भाव के सर्वोदय भाव से जुड़े हों. जिनमें पारस्परिक कल्याण के प्रति एका और विश्वास हो. वह स्पष्ट करता है कि न्याय आदर्शोन्मुखी समाज की सहज-स्वाभाविक उपलब्धि है. वह कृत्रिम अथवा बाहरी शक्ति द्वारा थोपी गई व्यवस्था नहीं है. किसी भी समाज में न्याय का संरक्षण किसी भय या दबाव में न होकर उसके स्वयं स्फूर्त्त प्रयासों के माध्यम से होता हे. वह इसलिए भी आवश्यक है कि न्याय का कोई दूसरा या तीसरा पक्ष नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसे केवल वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है. उसके लिए आवश्यक है कि समाज की इकाइयों में परस्पर सामंजस्य और एक-दूसरे के प्रति विश्वास का भाव हो.

‘रिपब्लिक’ के लिए प्लेटो को अपूर्व ख्याति प्राप्त हुई है. उसे ‘दार्शनिकों का दार्शनिक’ माना गया है. यह माना गया है कि जो प्लेटो के यहां नहीं है, दर्शन में वह कहीं भी नहीं है. बावजूद इसके प्लेटो को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा है. कुछ विद्वानों ने उसके न्याय-संबंधी दर्शन को निष्क्रियता का दर्शन माना है. उनका कहना है कि प्लेटो का न्याय कल्पना की उड़ान, खूबसूरत सपने से अधिक कुछ नहीं है. न्याय को लेकर वह जो सपना देखता है, उसका सच हो पाना असंभव है. प्लेटो की भांति उसका न्याय भी इतना आत्मसंयमी और मर्यादित है कि उसे व्यवहार में उतार पाना बेहद कठिन है. बार्कर तो प्लेटो के न्याय को न्याय मानने के लिए ही तैयार नहीं है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय महज भावना या कवि मन की खूबसूरत परिकल्पना है. उसके अनुसार प्लेटो का न्याय-सिद्धांत एकतरफा है. वह केवल मनुष्य के कर्तव्यों को निर्धारित करता है और अधिकारों को तय करने का काम पूरी तरह समाज की मर्जी पर थोप देता है. यदि समाज सचमुच इतना ही उदार हो, जैसा कि प्लेटो सोचता है तो ऐसे समाज में न्याय का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. वस्तुतः ईसापूर्व चौथी-पांचवीं शताब्दी के जिस समाज का जिक्र प्लेटो के ग्रंथों में मिलता है, उन दिनों यूनानी समाज युद्ध प्रिय समाज था. वहां छोटे-छोटे नगर राज्य थे, जिनके बीच युद्ध अकसर होते रहते थे. एथेंस स्पार्टा के हाथों पराजित हो चुका था. वह पराजय भी एथेंसवासियों के लिए कुंठा का कारण बनी थी. एथेंस जहां अपने दार्शनिक विचारों, कवियों और सुंदरियों के लिए प्रसिद्ध था, उसके पड़ोसी नगर-राज्य स्पार्टा की प्रतिष्ठा वहां के बहादुर सैनिकों के कारण थी. एक युद्ध में स्पार्टा के हाथों भीषण पराजय के बाद एथेंसवासियों के मन में ‘उस जैसा’ बनने की बड़ी कामना थी. आदर्श गणराज्य के रूप में प्लेटो ऐसे ही गणतंत्र की कामना करता है. सेबाइन ने भी माना है कि प्लेटो की ‘न्याय-संबंधी कल्पना जड़, आत्मपरक, निष्क्रिय, ठहराव-युक्त, अव्यावहारिक एवं अविश्वसनीय है.’ ‘न्याय’ की बात करता हुआ प्लेटो कहीं-कहीं ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है; यदि यह मान लिया जाए कि व्यक्ति या समूह अपनी किसी खास प्रवृति का दास होता है तो भी उसे यह बताने की क्या आवश्यकता है कि प्रत्येक मनुष्य केवल एक ही कार्य करे. या केवल समाज द्वारा निर्दिष्ट कार्यों को ही करे.

दरअसल न्याय की विवेचना करते हुए प्लेटो विषय को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभव-सा हो जाता है. इससे उसके विचारों में कहीं-कहीं असंगतियां और अंतर्विरोध भी दिखने लगता है. वह एक ओर तो दावा करता है कि आदर्श समाज में कोई व्यक्ति दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरी ओर राज्य को व्यक्ति के कर्तव्यों के निर्धारण का अधिकार देकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेता है. प्लेटो के अनुसार समाज में संरक्षक वर्ग का कर्तव्य अपने बुद्धि-विवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘संरक्षक’ या संरक्षक वर्ग से नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, जेसे दास, यदि ऐसा व्यक्ति बुद्धि-विवेक में ‘संरक्षक’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए? न्याय-भावना तो इसमें है कि ऐसे व्यक्ति को तत्काल संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी काबलियत का उपयोग लोक-हित में किया जाए. साथ ही संरक्षक वर्ग में सम्मिलित व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाज-हित के बजाय जो केवल स्वार्थ को वरीयता देते हैं तथा नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. समाज हित के लिए यह जरूरी भी है. प्लेटो उसकी कोई व्यवस्था नहीं करता. बजाए इसके वह दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है. चह दार्शनिक सम्राट को इतना अधिकार-संपन्न बना देता है कि वह निरंकुश नजर आने लगता है. कदाचित वह सोचता था कि जो ‘दार्शनिक सम्राट’ के लिए अपेक्षित स्तर को प्राप्त कर चुके व्यक्ति मनुष्य की सामान्य कमजोरियों से मुक्त होंगे. जबकि मानवीय प्रवृत्ति परिवर्तनशील है. ध्यातव्य है कि दासप्रथा का समर्थन करने वाला प्लेटो अकेला विचारक नहीं है, सुकरात, अरस्तु, जेनोफीन जैसे उसके समकालीन विचारक भी उससे सहमत हैं. दूसरे प्लेटो के आदर्श राज्य में जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका कवि-हृदय सपने की तरह केवल आदर्श बुनता है. नैतिकता चूंकि स्वयं एक आदर्श है, इसलिए उसके सपने की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता.

प्लेटो ने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटे-बेटियां समाज के शेष वर्गां की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में वह ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया हो. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो. वह प्रश्न उठाता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए? वह कौन-सा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. ‘रिपब्लिक’ में उसने बच्चों का पालन-पोषण माता-पिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें माता-पिता अथवा उनकी संतान एक-दूसरे को कभी पहचान ही सकें. उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिनके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. काम-संबंधों में पर्याप्त खुलापन था. प्लेटो ने विवाह संस्था का निषेध किया है. इसके दो कारण थे. पहला उसे लगता था कि पारिवारिक संबंध व्यक्ति के उद्देश्यों को सीमित बनाते हैं. दूसरा स्त्री को पुरुष के बराबर दर्जा देना. प्लेटो ने दांपत्य संबंधों में साम्यवाद का समर्थन किया है. एक-दूसरे की इच्छा पर कोई भी युगल परस्पर सहवास कर सकता था. संतानोपत्ति का मुख्य ध्येय युद्धप्रिय राज्य को श्रेष्ठ योद्धा उपलब्ध कराना था. संरक्षक स्त्री-पुरुषों के लिए नियम और भी कठोर थे. ‘रिपब्लिक’ में उसने लिखा है—

‘संरक्षक वर्ग के स्त्री-पुरुषों में से कोई भी अपना घर-परिवार नहीं बसाएगा. कोई भी किसी के साथ व्यक्तिगत रूप से सहवास नहीं करेगा. शासक स्त्रियां शासक वर्ग के सभी पुरुषों की समान रूप से पत्नियां होंगी. उनकी संतानें भी समान रूप से सभी की होंगी. न तो माता-पिता अपनी वास्तविक संतान के बारे में जान पाएंगे न ही संतान अपने वास्तविक जन्मदाता को जान सकेगी.’

ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. परंतु वह भी आसान न था. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! चूंकि लोकहित के कार्यों को टाला नहीं जा सकता, बल्कि कुछ कार्य तो अत्यावश्यक, नैमत्तिक महत्त्व के होते हैं, स्पष्ट है कि ऐसे कार्यों के लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी.

प्लेटो स्वीकार करता है कि आदर्श राष्ट्र-राज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. परंतु कैसे? लोग अप्रीतिकर कार्यों को भी समाज के प्रति अपना दायित्व मानकर करें, यह प्लेटो के समक्ष बड़ी चुनौती थी. ऐसे कार्यों को करने के लिए कोई तो नियुक्त किया जाएगा. जिसे वे कार्य सौंपे जाएंगे, क्या वह उन्हें खुशी-खुशी करने को तैयार होगा? यदि नहीं जो जिसे वे कार्य बलपूर्वक सौंपे जाएंगे क्या वह उसके प्रति अन्याय नहीं होगा? क्या उसे राज्य की मनमानी नहीं माना जाएगा? विकसित देशों में मशीनीकरण के बाद से अप्रीतिकर अथवा खतरे की अधिक संभावना वाले कार्यों को मशीनों से लिया जाने लगा है. लेकिन प्लेटो के समय में ऐसे कार्यों को करने के लिए केवल दास थे. उनकी उपस्थिति राज्य की सुख-समृद्धि के लिए आवश्यक थी. परंतु जिनके अधिकारों की ओर किसी का ध्यान न था. उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था. राजनीति में उनकी कोई हिस्सेदारी न थी. दूसरी ओर एथेंस का हर वयस्क आम सभा का सदस्य होता था. बुद्धकालीन गणतंत्रों में भी एक समय ऐसा था, जब वहां का प्रत्येक नागरिक ‘मैं राजा हूं’, ‘मैं राजा हूं’ कहकर शासक होने का दावा करता था. सोफिस्टों के कार्यकाल में एथेंस का भी यही हाल था. ऐसे समाज में जहां प्रत्येक आदमी खुद को ‘मुखिया’ समझता हो, वहां नागरिकों को व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता के प्रचार द्वारा प्रेरित किया जा सकता था. उसके लिए प्लेटो की सारी उम्मीद दार्शनिक सम्राट पर टिकी थी. उसका मानना था कि दार्शनिक सम्राट किसी भी प्रकार के लालच से परे, परमबुद्धिमान, व्यवहारकुशल, परम-प्रज्ञावान, वीर, तेजस्वी और परिश्रमी होंगे. लोग स्वयं उससे प्रेरणा ले सकेंगे. लेकिन महामानव की खोज आसान नहीं थी. इस बात को प्लेटो भी समझता था. ऐसी अवस्था में उसने दार्शनिकों के समूह को राज्य की बागडोर सौंपने की अनुशंसा की है. मुश्किल यह है कि केवल विचार के बल पर समाज नहीं चलता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा? प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. न ही उसकी कल्पनाशीलता काम करती है. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन एथेंस की राजनीति से प्रभावित था. एथेंसवासियों को गर्व था कि वे एक विकसित गणतंत्र के संचालक हैं. जबकि असल में वह भीड़तंत्र द्वारा शासित राज्य था. उसमें तीन प्रमुख दोष थे. पहला यह कि राजनीतिक अनुभवहीनता और अपर्याप्त ज्ञान के बावजूद एथेंस का प्रत्येक नागरिक राजनीति में हिस्सा लेता था. उससे गलत फैसले होते थे. सुकरात को मृत्युदंड का निर्णय ऐसा ही अनुचित निर्णय था. उस घटना के बाद प्लेटो का लोकतंत्र से विश्वास उठ-सा गया था. दूसरा दोष यह था कि प्रत्येक नागरिक खुद की निगाह में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था. किसी का किसी में विश्वास न था. हर कोई अपने लिए अधिकतम सुख-सुविधाओं की अपेक्षा रखता था. भ्रष्टाचार और स्वार्थभाव चरम पर था. बिना इसकी चिंता किए कि उनके दुराचरण से राज्य का कितना अहित हो रहा है, एथेंस के नागरिक स्वार्थ-सिद्धि में लगे रहते थे. प्लेटो के आगे स्पार्टा का उदाहरण था, जहां के नागरिक राज्य को समर्पित थे. इसलिए उसने ‘रिपब्लिक’ में राज्य को व्यक्ति से बढ़कर माना है. वह व्यक्ति का राज्य में विलय कर देने जैसा था. तीसरा और महत्त्वपूर्ण यह कि उस समय एथेंस की राजनीति में दो गुट बने हुए थे. उनके अपने-अपने समर्थक थे. दोनों हमेशा एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर लगे रहते थे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो विभिन्न प्रतिद्विंद्वी समूहों को राज्य के प्रति समर्पित होने को कहता है. उसके अनुसार राज्य किसी एक व्यक्ति, समूह या वर्ग का नहीं होता—‘उसपर सभी वर्गों का समानाधिकार है. इसलिए प्रत्येक वर्ग का यह स्वयंसिद्ध कर्तव्य है कि वह राज्य की अखंडता तथा बल-वैभव को बनाए रखने के लिए समर्पित भाव के साथ काम करे.’ दार्शनिक सम्राट की अवधारणा भी प्लेटो का पूर्वाग्रह था. राजनीति को अनुभवहीन लोगों के हाथों से निकालकर परिपक्व हाथों को समर्पित करने की कोशिश. परंतु उसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक बीसवीं शताब्दी के महानतम दार्शनिकों में से एक बर्ट्रेंड रसेल की टिप्पणी है—

‘उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब, जब सामना करीब-करीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चित रूप से, न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’9

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतार-चढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कवि-हृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्ति-सापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुख-सुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौन-सा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरित-प्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो—जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देकर उसे लोकोन्मुखी बनाती हों. समाज का हित है कि ऐसी पसंदों को प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान तथा कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इस तरह इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानव-स्वभाव से निरपेक्ष नहीं होता. प्लेटो का विश्वास था कि उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी. फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालन-पोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं भी अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. जबकि दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. इसी तरह भारतीय राष्ट्रवादी का सामान्य सोच होगा कि भारत दुनिया में अन्य सभी देशों में अग्रणी हो. अतिश्रद्धालु व्यक्ति अपने धर्म को पूरी दुनिया पर छाये हुए देखना चाहेगा. जबकि मानवतावादी सपना होगा कि विश्व के सभी देश बराबर हों. किसी का किसी पर अधिकार न हो. लोग अपने-अपने विश्वास, मान्यताओं और परंपरा के साथ सुरक्षित रहें. सुख में सभी की समान साझेदारी हो. ऐसे परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले मनुष्य समाज में एक साथ होंगे तो उनके मतभेद उभरकर सामने आएंगे ही. फिर उनके बीच तालमेल कैसे संभव है? कैसे उन सभी की रचनात्मक क्षमताओं का इस्तेमाल समाज-हित में किया जाए? यह चुनौती प्लेटो के समय में थी. आज भी है. निजी स्वार्थ एवं मतभेदों के कारण वह एथेंस के गणतंत्र की दुर्दशा को देख चुका था. उसका मानना था कि व्यक्तिगत मतभेदों का समाहाहर केवल आदर्श समाज में संभव है. आदर्श समाज से उसका आशय था, ऐसा समाज जहां सभी को अपने-अपने कर्तव्य का एहसास हो और सभी उसके प्रति समर्पित होकर काम करें. बदले में राज्य बिना किसी पक्षपात के सभी को जीवनयापन के आवश्यक संसाधन उपलब्घ कराने की जिम्मेदारी ले.

अहं संवेदनाओं को कुचलता आया है. अहं के टकराव की समस्या प्लेटो के समय में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्ति-विशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनिया-भर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति, जो केवल किसी खास देश, धर्म अथवा संस्कृति को सबसे आगे निकलते देखने की इच्छा रखता है, पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. उसके बावजूद नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इस संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना उसी कोटि की है. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना अथवा उसे निरंकुश राज्य का समर्थक मानना—सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो बुद्ध ने न केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना था. जबकि श्रमण परंपरा को छोड़कर बुद्ध से पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन उन्हीं विषयों पर केंद्रित था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिक-सामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथों-हाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे. बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत समानता पर जोर देता था. उनके प्रभाव के चलते समाज में जातीय वैमनस्य में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष भी घटा था.

प्लेटो के अनुसार इच्छाओं का पूर्ण सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय संभव नहीं है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर विशेष झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. इसके लिए व्यक्ति में नैतिक साहस का होना जरूरी है. जहां नैतिक सहमति-असहमति आसान न हो, वहां बल-प्रयोग की संभावना बनी ही रहती है. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स जब यह कहता है कि ‘न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है,’ उस समय वह सुकरात सहित उन सभी साथियों से असहमति दर्शा रहा होता है, जो उसके मत के विरोध में हैं. न्याय को सबल का एकाधिकार कहने वाला थ्रेचाइमच्स अकेला व्यक्ति नहीं था. उसका मत न केवल सोफिस्ट विचारकों से प्रेरित था, बल्कि जनसाधारण के सामान्य सोच का भी प्रतिनिधित्व करता है. दुनिया में लगभग नब्बे प्रतिशत लोग आस्थावादी हैं. हर श्रद्धालु मानता है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और वही सच्चा न्यायकर्ता भी है. भारत में धर्म को, जिसका पूरा कारोबार ईश्वर और डर पर टिका है, न्याय के रूप में थोपा जाता रहा है. इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति दूसरों पर शासन करने का सपना देखता है; या अधिकांश लोग शासित होने को अपनी नियति माने रहते हैं. सच तो यह है कि सुख की कामना प्रत्येक व्यक्ति को होती है. सुख और सुरक्षा पर खतरा उसे प्रतिरोध के लिए उकसाता है. समाज को अंतर्द्वंद्वों और अनावश्यक विक्षोभों से बचाने के लिए आवश्यक है कि नागरिकों के बीच असमानता का स्तर न्यूनतम हो. उनमें यह भरोसा बना रहे कि राज्य न्याय के समर्थन और सुरक्षा में खड़ा है. इसलिए बात जब आदर्श समाज की होगी, तो लोकहित से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की मांग भी उठेगी. सच यह भी है कि अधिकांश समाज न्याय की वस्तुनिष्ठ समीक्षा और उसकी व्याप्ति की ओर से उदासीन रहते हैं. सरकारें सत्ताधारी वर्ग के जो संख्या में अल्प हैं, हित साधने में लगी रहती हैं. इस कारण ‘न्याय’ की वस्तुनिष्ठ समीक्षा, उसकी संकल्पना पर गंभीर विमर्श संभव नहीं हो पाता. कारण यह भी है कि अधिकांश लोग न्याय के वृहत्तर संदर्भों से अपरिचित होते हैं. वे उसे किसी अदालती ‘फैसले’ के रूप में लेते हैं, जिसमें दो पक्षों के बीच तीसरा पक्ष जो घटना से पूरी तरह अनजान है, निर्णायक पक्ष की भूमिका निभाता है. तीसरा पक्ष हालांकि राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. इसने भी न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. बहस को प्रभावित करने के बजाय वह केवल दर्शक के रूप में मौजूद है. वह देखता है कि सुकरात जैसे विद्वान की उपस्थिति के बावजूद बहस के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है.

फिर विमर्श का समापन कहां पर हो? ‘आदर्श पसंदों’ का विचार इसी की परिणति था. ‘आदर्श पसंदों’ से उसका अभिप्राय ऐसी पसंदों से था, जिनकी अधिकांश लोग कामना करते हों. परोक्ष रूप में यह भी बहुमत की दादागिरी हुई, जिसे न्याय की दृष्टि से निरापद नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र को ‘बहुमत की दादागिरी’ बताकर प्रायः उसकी आलोचना की जाती है. दादागिरी या निरंकुश आचरण किसी का भी हो सकता है. राजशाही में अकसर उस व्यक्ति की दावेदारी चलती थी, जिसके हाथों में राजमुद्रा हो. धर्म को लोककल्याणकारी बताया जाता है. परंतु वह भक्त और भगवान दोनों की अतियों पर निर्भर करता है. भक्त समर्पण की उच्चतम सीमा तक समर्पित होता है. ईश्वर उच्चतम सीमा तक निरंकुश और तानाशाह, परिणामस्वरूप धर्म के नाम पर हुए धत्त्कर्म को जीवन के आदर्श की तरह थोपा जाता है. एक प्रकार से यह भी अति ही है. व्यावहारिक सोच यही है कि चयन जब ‘बहुमत की दादागिरी’ और ‘अल्पमत की दादागिरी’ के बीच हो तो न्याय को पहले के पक्ष में झुके हुए नजर आना चाहिए. आदर्शवादी प्लेटो को इस तरह का व्यावहारिक चलन नापसंद था. उसके अनुसार न्याय के लिए कोई बीच का रास्ता नहीं होता. न्याय या तो न्याय होता है, अथवा न्याय नहीं होता. उसके सामने अपने आदर्श नगर-राज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. लोकतंत्र की विकृतियों को वह देख-समझ सका था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

क्या न्याय को धर्म के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है? जो समाज ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर न्याय करने का दावा करते हैं, क्या उनकी वैचारिकी को आदर्श समाज की वैचारिकी के बराबर माना जा सकता है? प्लेटो इसपर विचार नहीं करता. एक सपाट-सी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. इससे समस्या सुलझने के बजाय और भी उलझ जाती है. सब जानते हैं कि ईश्वर अपनी इच्छा के बारे में किसी से भी संवाद नहीं करता. उसका अपना अस्तित्व ही संद्धिग्ध है. वह अपने भक्तों के विश्वास से परे, जिसे वे अपना धर्म मानते हैं, कुछ भी नहीं है. बावजूद इसके धर्माचार्य दावा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो कथित ईश्वरेच्छा को अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. उनके अनुसार ईश्वर परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा भी रास्ता है, जिससे कथित ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? दूसरे जिसे ईश्वरेच्छा होने का दावा किया जाता है, उसके प्रमाणन का सही रास्ता क्या हो? कैसे तय किया जाए कि जिसे ईश्वरेच्छा बताया जा रहा है, वही श्रेष्ठतम विकल्प है. चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है. ईश्वरेच्छा अपने आप में अप्रामाणिक है. इसलिए उसके अनुयायी उसे आस्था का विषय बनाकर पेश करते हैं. सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहòाब्दियों से रचता आ रहा है. हो सकता है धर्मानुशासन से समाज का थोड़ा-बहुत भला होता हो. परंतु उसके माध्यम से होने वाला नुकसान उससे कहीं अधिक होता है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्ति-सापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ का प्रमुख लक्षण है, परंतु ‘सफेद’ कह देने-भर से वर्फ का बोध नहीं होता. बगुले का रंग भी सफेद होता है. यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिक-सामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है. सुकरातकालीन एथेंस की तीन लाख की आबादी में लगभग आधी दास और अर्धदास लोगों की थी, जिन्हें सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रखा गया था. प्लेटो की आलोचना का यह बड़ा आधार है. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. लेकिन प्लेटो के चिंतन का दायरा विशद है. उसकी आलोचना की जा सकती है. असहमत भी हुआ जा सकता है. स्वयं प्लेटो ने अपने साथियों के असमति के अधिकार की रक्षा की है. लेकिन उसके चिंतन को नकारा नहीं जा सकता. प्लेटो के दर्शन को लेकर थ्रेचाइमच्स की टिप्पणी सहस्राब्दियों बाद भी प्रासंगिक है. उसका कहना था—‘प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ इतना है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की कल्पना से कितने और कहां तक सहमत हैं? यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है.’

कुल मिलाकर प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता आया है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके माता-पिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालना-पोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला दार्शनिक था, जिसने ऐसे समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

9. The answer is rather humdrum. It will achieve success in wars against roughly equal populations, and it will secure a livelihood for a certain small number of people. It will almost certainly produce no art or science, because of its rigidity.-BERTRAND RUSSELL, A HISTORY OF WESTERN PHILOSOPHY, page 109.

 

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

सामान्य

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधा