Tag Archives: phylosophy

बिल्लियों और बंदर की कहानी : एक पुनर्दृष्टि

सामान्य

एक अत्यंत पुरानी, मगर बहुश्रुत कहानी है जिसमें बिल्लियों को मूर्ख और बंदर को चालाक बताया गया है. बिना उनकी भूख और जरूरतों पर विचार किए. पाठक-श्रोता के रूप में हम भी उसपर विश्वास कर लेते हैं. न लेखक की मंशा पर संदेह करते हैं, न अपनी ओर से कुछ जोड़ते-घटाते हैं. वैसे भी कहानियां आमतौर पर मनोरंजन की चाहत के साथ पढ़ी जाती हैं. कहानी खत्म, बात खत्म. कहानी इस प्रकार हैーदो बिल्लियों को रोटी का टुकड़ा मिला. जो है, जितना है, उसे एक-दूसरे के साथ बांटने, मिल-जुलकर उपयोग करने के बजाए वे परस्पर झगड़ने लगीं. अकस्मात एक बंदर नमूदार हुआ. रोटी के टुकड़े को बराबर-बराबर बांटने के बहाने वह सारी रोटी चट कर गया. बिल्लियां एक-दूसरे का मुंह देखती रह गईं. लेखक बिल्लियों की चारित्रिक दुर्बलता दिखाकर एकता का सकारात्मक संदेश देता है. दो पक्षों की लड़ाई में लाभ कोई तीसरा ही उठाता है. कहानी का यह संदेश जगजाहिर है. पर क्या सिर्फ इतनी-सी बात है?

कहानी के अनुसार दोनों बिल्लियों को इतना विवेक भी नहीं था कि रोटी का स्वयं बंटवारा कर सकें. भूख की तीव्रता में वे अपनी सामान्य नैतिकता खो चुकी थीं. खुद पर, एक-दूसरे पर विष्वास नहीं था! क्या बिल्लियां शुरू से ही ऐसी थीं? या उनकी नीयत रोटी के मामूली टुकड़े को देखकर खराब हुई थी? अच्छा होता लेखक उनके हालात पर भी विचार करता. उनकी भूख और जरूरत को समझने की कोशिश करता. उन परिस्थितियों पर भी चर्चा करता जिन्होंने उन्हें मूर्खतापूर्ण आचरण के लिए विवश किया था. या फिर भिन्न स्थितियों के साथ ऐसी कहानी लिखता जिसमें बिल्लियां कुछ देर झगड़तीं. फिर रोटी के मामूली टुकड़े के लिए लड़ने के बजाय उसे एक ओर रख, उतनी रोटियों की तलाष में नए सिरे से निकल जातीं, जिनसे दोनों का पेट भली-भांति भर सके. आखिर वह उनके लिए एक दिन का काम तो था नहीं. पर्याप्त भोजन जुटाने के बाद वापस लौटतीं. मिल-बैठकर खातीं. भोजन इतना होता कि किसने कितना खाया, उसका हिसाब रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती. बच जाता तो बंदर को दे देतीं. वह भी उपकृत हो, भविष्य में किसी को धोखा न देने का संकल्प कर लेता. वैसे साहित्य में बिल्लियों की समझदारी या समझदार बिल्ली की कहानियां भी अवश्य होंगी. लेकिन जब भी बिल्ली और बंदर की कहानी की चर्चा होती है, दिमाग में वही पुरानी कहानी आ जाती है. क्या इसका कारण कहानी की अतीव लोकप्रियता है, अतीतमोह है या कुछ और?

हमारा इरादा बिल्लियों और बंदर की कहानी के आदि लेखक की नीयत पर संदेह करने का नहीं है. रचनाकार का अधिकार है कि अपने मंतव्य को पाठकों तक पहुंचाने के लिए मनचाही विधा और भाषा-शैली का इस्तेमाल करे. वैसी स्वतंत्रता इस कथा-लेखक को भी थी. कहानी की वैश्विक लोकप्रियता से पता चलता है कि लेखक अपने उद्देश्य में सफल भी रहा है. इस कहानी और इस तरह की अनेक कहानियां हैं, जिनका संदेश इतना स्पष्ट और लोकव्यापी है कि मात्र शीर्षक से पूरी कहानी हमारे दिमाग में कौंध जाती है. यहां लेखकीय कौशल स्वतःप्रमाणित है. परंतु बात यहीं तक सीमित नहीं है. ऐसी कहानियां जो अपने संदेष के साथ रूढ हों या रूढ कर दी जाएं, लोग ऐसा मान लें कि उनका कोई और निहितार्थ असंभव है, मिथ में ढल जाती हैं. मिथ अपनी अर्थ-भंगिमाओं से बंधे होते हैं. उनमें ज्यादा फेरबदल संभव नहीं होती. कुछ ऐसा ही दृष्टांत में भी होता है. लेकिन दृष्टांत में कथापक्ष का अधिक महत्त्व होता है. लोग उसी के लिए उसे पढ़ना-सुनना पसंद करते हैं. स्थानीय जरूरत के हिसाब से उसमें थोड़ी-बहुत फेरबदल की भी छूट होती है. दृष्टांत पूरा होने पर पाठक-श्रोता को उसके संदेश की व्याख्या अपने विवेकानुसार करने की छूट होती है. जैसे रावण ऐसा मिथ है, जिसे समाज में बुराई का प्रतीक मान लिया गया है. विभिन्न देशों और संस्कृतियों में रामायण के भिन्न रूप प्रचलित हैं. लेकिन रावण के मूल-भूत चरित्र में कोई बदलाव नहीं मिलेगा. बिल्ली और बंदर की कहानी भी अपने कथानक से ज्यादा संदेश से बंधी है. हम उसके संदेश से इतने अनुकूलित हैं कि किसी दूसरे निहितार्थ, यहां तक कि उसकी संभावना की ओर भी हमारा ध्यान नहीं जाता. ऐसी कथाएं जैसी हैं, जिस रूप में हैं, उसी में पूर्ण मान ली जाती हैं. नतीजा यह होता है कि बिल्लियों की मूर्खता और बंदर की धूर्त्तता हमारे मनोमस्तिष्क पर छाई रहती है. कहानी जिस तरह बयान की गई है, उससे पता चलता है कि कहानीकार खुद नहीं चाहता कि पाठक बिल्लियों के जीवन की किसी और हकीकत से परिचित हो. आखिर क्यों?

कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि बिल्लियां क्षुधा-पीड़ित थीं. इतनी कि सामान्य नैतिकता को खो बैठी थीं. भूख के कारण उनमें इतना सामर्थ्य भी नहीं था कि और रोटी की तलाश में निकल सकें. हताशा में वे परस्पर झगड़ने लगती हैं. कभी-कभी ऐसा हो जाता है. प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’ इंसान और इंसानियत की इसी दुर्दशा को बयान करती है. बादल सरकार का बहुचर्चित नाटक हैー‘पगला घोड़ा’, जिसका हाल ही में फिल्मांकन हुआ है, इसी कड़ी में आता है. नाटक में चार आदमी शमशान के आगे बैठकर ताश के पत्ते फेंटते और शराब पीते हैं. भीतर जलती चिता की लपटें उनकी नैतिकता को झकझोरती हैं. रात के अंधेरे में वे चारों अपनी-अपनी कहानी जो एक तरह से उनका अपराधबोध भी है, से गुजरते हैं. उनके साथ-साथ दर्शक भी सामाजिक त्रासदियों से दो-चार होते हैं. संस्कृत की एक कहावत हैー‘भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप नहीं करता.’ शास्त्रों में भूख को आपद्धर्म कहा गया है. आपद्धर्म के चलते क्षुधा-पीड़ित विश्वामित्र ने चांडाल के घर से कुत्ते का मांस चुराकर खाया था. यदि विश्वमित्र का ब्राह्मणत्व इससे आहत नहीं होता तो, मामूली झगड़े के लिए बिल्लियों के चरित्र पर हमेशा-हमेशा के लिए दाग क्यों लगे? हमें तो उन बेजुबान प्राणियों से सहानुभूति होनी चाहिए. परंतु कहानीकार हमें इस ओर नहीं ले जाता. एक झटके में वह हमें वहां पहुंचा देता है, जहां बिल्लियों को मूर्ख तथा बंदर को चालाक मानने के अलावा हमारे पास दूसरा रास्ता ही नहीं बचता. ठीक ऐसे ही जैसे वर्ण-व्यवस्था शूद्र को हेय और तिरस्कार योग्य मान लेती है, हम बिल्लियों को मूर्ख ठहरा देते हैं.

कहानी में बंदर का चरित्र उस पुरोहित की याद दिलाता है जो दिन-भर एक के बाद एक, यजमानों के घर जाकर पूजा-पाठ करता है और उनके लिए ईश्वरीय अनुकंपा के नाम पर अपनी दक्षिणा लेकर आगे बढ़ जाता है. कभी किसी याचक को नहीं कहता कि यह रहा देवता को प्रसन्न करने का मंत्र, यह रही समिधा की सूची और ये है कर्मकांड की प्रविधि. आगे जब मन करे, देवता को प्रसन्न करने का कर्मकांड स्वयं कर सकते हो. मंत्र नहीं पढ़ सकते तो टूटी-फूटी भाषा में ही देवता से संवाद करने की कोशिश करना. वह इसका बुरा नहीं मानेगा. लेकिन जैसे पुरोहित यजमान के प्रबोधन पर ध्यान नहीं देता, वैसे ही बंदर बिल्लियों के प्रबोधन की जरूरत नहीं समझता. अपने-अपने स्वार्थ के लिए दोनों दलाल-तंत्र को प्रश्रय देते हैं. पुरोहित ईश्वरीय अनुकंपा के नाम पर दलाली लेता है, बंदर न्याय के नाम पर. धर्म और राज्य का यह गठजोड़ शताब्दियों पुराना है.

अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए राज्य नागरिकों को निरंतर यह विश्वास दिलाए रहता है कि वह न हो तो समाज में सबकुछ अस्त-व्यस्त हो जाए. सरकार के चहेते बुद्धिजीवी उन्हें समझाते हैं कि स्वभाव का जंगलीपन मनुष्य ने प्रकृति से उधार पाया है. यह उन प्रवृत्तियों का अवशेष है जब मनुष्य जंगल में वन्य प्राणियों के बीच रहता था. अस्तित्व पर संकट आ पड़े तो वन्य पशुओं को उतने ही जंगलीपन के साथ जवाब भी देता था. राज्य की बातों में आकर हम ऐसी कहानियों पर बहुत जल्दी विश्वास कर लेते हैं जिनमें गरीब और कमजोर को मामूली बातों पर लड़ते-झगड़ते दिखाया जाता है. वर्ण-व्यवस्था का स्थापित तर्क हैー‘शूद्र जन्मत: असभ्य होता है.’ हालांकि जो सभ्यता शूद्रों को असभ्य और विवेकहीन बताती है, उसी के धर्मग्रंथों में शूद्र-ऋषियों और शिल्पकारों की महिमा का बखान किया गया है. कितने ही धर्मग्रंथ उनकी रचना हैं. लेकिन प्रकट में शूद्रों को विवेकहीन, स्वार्थी, लालची बताया जाता है. कहानियों और मिथकों पर आंख-मूंदकर विश्वास करने के अभ्यस्त लोग उसपर आसानी से विश्वास भी कर लेते हैं. ‘बिल्लियां और बंदर’ जैसी कहानियां इस तरह फैसले करने का अभ्यस्त बनाती हैं. दरअसल, नई स्थितियों के प्रति मानव-मस्तिष्क की सक्रियता आरंभ में तीव्र होती है, किंतु जब कोई घटना, स्थिति, विचार या वस्तु एक-समान अवस्था में, बगैर किसी परिवर्तन के बारंबार गुजरती है, दिमाग उसका नोटिस लेना बंद कर देता है. उस अवस्था में वह अपने निष्कर्ष को अवचेतन के हवाले कर देता है. आगे जब वही स्थिति दुबारा सामने आती है, अवचेतन तत्क्षण अपना पूर्वनिर्धारित निर्णय सुना देता है. इससे पाठक-श्रोता तक रचना का बंधा-बंधाया संदेष तो पहुंचता है, मगर साहित्य होने का मर्म पूरा नहीं होता. क्योंकि साहित्य का काम निर्णय सुनाना नहीं, परिस्थिति के अनुसार सर्वात्तम निर्णय लेने का सामर्थ्य पैदा करना है.

प्लेटो ने न्याय को आदर्श राज्य का श्रेष्ठतम गुण माना है. बाद के विचारकों ने भी अपनी-अपनी तरह से उसका समर्थन किया है. हर राजनीतिज्ञ ‘न्याय’ के आश्वासन के साथ ही सत्ता-केंद्र तक पहुंचता है. परंतु सत्ता में आने के बाद उसकी भूमिका उपर्युक्त कहानी में ‘बंदर’ जैसी हो जाती है. वह समाज के विभिन्न संघर्षरत समूहों को इसलिए एक नहीं होने देता क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि जनता की एकता तथा ऊंचे मनोबल से उसके स्वार्थ खटाई में पड़ सकते हैं. ऐसे में आत्मकल्याण के लिए जनता के पास एकमात्र यही उपाय शेष बचता है कि अपने प्रबोधन की जिम्मेदारी वह स्वयं संभाले. जनता समझदारी दिखाए तो राज्य की भूमिका अपने आप सिमट जाए. राज्य की भूमिका बनी रहे, इसलिए येन-केन-प्रकारेण जनता को मूर्ख, कमजोर आपस में लड़ते-झगड़ते दिखाया जाता है. जैसे उपर्युक्त कहानी में बंदर के पास अपना कोई अर्जन नहीं था, शासक वर्ग के पास भी अपना कोई अर्जन नहीं होता. उसका अस्तित्व जनता के परिश्रम पर टिका होता है. इस बात को शासक वर्ग और उससे जुड़े लोग भली-भांति जानते हैं. जबकि जनता परमशक्तिशाली होने के बावजूद, इस हकीकत के से अनजान बनी रहती है. लोग इसी तरह अनजान बने रहें, इसके लिए उनकी एकता और आत्मविश्वास पर लगातार हमला किया जाता है.

किसी कलाकृति या रचना का अर्थ-विशेष के साथ बंध जाना, उसके साहित्यपन को कमजोर करता है. मुहावरे और लोकोक्तियां भी शब्दों-प्रसंगों के अर्थ-रूढ हो जाने के कारण बनते हैं. हम अकसर लोगों को सलाह देते हुए सुनते हैंー ‘भैया पैर उतने पसारो जितनी चादर है.’ सुनने वाला इसका प्रतिवाद नहीं करता. तुरंत मान लेता है कि संतोषी होना अच्छी बात है. क्योंकि उसने जन्म से ही संतोष-धन का महिमा-मंडन होते देखा है. कबीर जैसे पहुंचे हुए कवि भी संतोष की महिमा का बखान करना नहीं भूलते. संतोष को परमधन बताने वाले इस सवाल को गोल कर जाते हैं कि देश में मुट्ठी-भर लोगों की ‘चादर’ उनकी जरूरत से कई गुना बड़ी और हजारों-हजार लोगों की चादर उनकी जरूरत के हिसाब से बेहद छोटी क्यों होती है? दूसरे यदि किसी की चादर उसके पैरों को पूर्णतः तरह ढकने में असमर्थ है तो उसे यह सलाह क्यों नहीं दी जानी चाहिए कि वह धैर्य-पूर्वक, अपने श्रम-कौषल और आत्मविश्वास के साथ चादर के आकार को उस समय तक बढ़ाता रहे जब तक उसमें न केवल वह स्वयंー बल्कि उसके मित्र-हितैषी, घर-परिवार, पड़ोसी सब सरंक्षण प्राप्त कर सकें. असंतोष की आलोचना करते समय प्रायः उसे लालच का पर्याय मान लिया जाता है. जबकि लोककल्याण की वांछा से जुड़ा असंतोष समाज के समग्र विकास हेतु एक प्रेरक-शक्ति बनने का सामर्थ्य रखता है.

संतोष को लेकर भारतीय संस्कृति के अंतर्विरोध कम नहीं हैं. संस्कृति के चार पुरुषार्थों में धनार्जन भी सम्मिलित है. पुरुषार्थ की मर्यादा होती है, सीमा नहीं. धन यदि पुरुषार्थ है तो भारतीय संस्कृति के अनुसार आदमी का कर्तव्य है कि वह अधिक से अधिक धन जुटाए. ऐसे में संतोष-धन का बखान किसके लिए था? जाहिर है, ‘शूद्र’ और ‘दास’ के लिए जिन्हें संपत्ति रखने की मनाही थी. यदि किसी कारण शूद्र के पास संपत्ति जमा हो जाए तो उसको बलात छीन लेने का अधिकार धर्मशास्त्रों में है. एक और बात. संतोष को परमगुण बताने वाले स्वयं भी संतोषी हों, यह आवश्यक नहीं है. ऐसे ही लोग राजाओं की साम्राज्यवादी लिप्साओं का वर्णन करते समय चंदबरदाई बन जाया करते हैं. संतोष को परमधन कहना भले ही ‘परउपदेश कुशल बहुतेरे’ जैसा प्रहसन हो, किंतु इसी का सहारा लेकर यथास्थितिवादी गरीबी और दैन्य का महिमामंडन करने लगते हैं. यथास्थिति का दूसरा रूप भाग्य भी है. ऐसे लोगों के लिए सामाजिक विषमता को पाटने का एकमात्र रास्ता है ー चमत्कार. सुदामा-कृष्ण जैसे अतार्किक मिथ उसे समाज में स्थापित किए रहते हैं. प्रकारांतर में वे दिखाना चाहते हैं कि महत्त्वाकांक्षी होना समृद्ध को शोभा देता है. गरीब का हित इसी में है कि वह गरीबी का महिमा-मंडन करते हुए अपने दिन काटे. सपने यदि आंखों में आएं तो निकाल फेंके. यह बात उसे कोई बताने नहीं आता. फिर भी हर आदमी समझ जाता है.

बात बिल्लियों और बंदर की कहानी से शुरू हुई थी और असंतोष पर आ गई. साहित्य में, जिसका काम अपने पाठक-श्रोता का प्रबोधन करना है ー यह संभावना बनी रहती है. साहित्यिक कृति की सफलता के लिए आवश्यक है कि पाठक उसके निहितार्थ को लेकर स्वतंत्र हो. प्रचलित अर्थों को लेकर संदेह की क्षीण संभावना उनके मन में हमेशा बनी रहे. यह धारणा बनी रहे कि कृति को जैसा समझा या समझाया गया है, उसका अर्थ उससे इतर भी संभव है. इसी से रचना के नए अर्थ खुलते हें. ‘बिल्लियां और बंदर’ जैसी कहानियां अपने निहितार्थ को लेकर इतनी स्पष्ट और संप्रेषणीय होती हैं. यह उनकी सफलता भी है और सीमा भी. क्योंकि अर्थ-विशेष के साथ रूढ़ हो जाने से वे पाठक का वैसा प्रबोधन नहीं कर पातीं, जैसा किसी साहित्यिक कृति से अपेक्षित होता है. समाज ऐसी कहानियों को सांस्कृतिकरण की जरूरत के रूप में सहेजता है. प्रकारांतर में वे समाज में यथास्थिति बनाए रखने में सहायक होती हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

विमुद्रीकरण के बहाने

सामान्य

जनता जब तक निजी क्षेत्र की बढ़ती अर्थशक्ति की ओर से आंखे मूंदे रहेगी, उस समय तक मूंदे रहेगी जब तक कि वे गणतांत्रिक राज्य से अधिक शक्तिशाली नहीं हो जाते, तब तक गणतंत्र असुरक्षित बना रहेगा. कुल मिलाकर फासिस्ज्म का अर्थ सरकार पर किसी व्यक्ति, दल अथवा निजी संस्थान का सर्वाधिकार है.रूजवेल्ट, अमेरिकी राष्ट्रपति.

बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में मुद्रा के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता. 8 नवंबर के बाद ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ की घोषणा के पश्चात देशभर में मचे हाहाकार से उसे समझा जा सकता है. सरकार ने आतंकवाद और कालेधन पर रोकथाम के लिए विमुद्रीकरण की घोषणा की थी. उसका मानना है कि प्रचलित मुद्रा का बड़ा हिस्सा गैरकानूनी रूप से जमाखोरों तथा कालाबाजारियों के पास जमा है, पड़ोसी देश नकली करेंसी भारत में झोंककर आतंकवाद को बढ़ावा देता है. इसलिए एक साहसिक निर्णय के अंतर्गत प्रधानमंत्री ने प्रचलित मुद्रा को निश्चित अवधि के भीतर वापस लेने का ऐलान किया है. वर्तमान सरकार के लगभग ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह पहला निर्णय है, जिसपर पिछली यूपीए सरकार की छाप नहीं है. इसके अलावा वर्तमान सरकार की ‘जनधन’ तथा ‘मनरेगा’ जैसी जितनी भी योजनाएं हैं, सब विरासत में मिली हैं. वर्तमान सरकार ने उन्हें ज्यों की त्यों अथवा नाम बदलकर अपनाया है. योजना आयोग के स्थान पर सरकार ने नीति आयोग का गठन जरूर किया है, परंतु नए संस्थान की ओर से अभी तक ऐसा ठोस कार्यक्रम सामने नहीं आया है, जिससे इस बदलाव का औचित्य सिद्ध हो. जिन मामलों में सरकार ने तत्परता से काम किया है, उनमें उच्च पदों पर प्रतिबद्ध संघियों को नियुक्त करना, उनके संगठनों को प्रोत्साहित करना तथा यथासंभव मदद पहुंचाना शामिल हैं. इसके अलावा जिन कार्यों को इस सरकार ने प्राथमिकता दी है, उनके नाम हैंदूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, पूजापाखंड वाले धारावाहिकों को बढ़ावा देना, पाठ्यक्रम में अपनी विचारधारा के अनुरूप फेरबदल करना और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण हेतु हिंदूमुस्लिम सांप्रदायिकता को हवा देना. इन सबका विकास से कोई संबंध नहीं है. बल्कि ये समाज को पीछे ढकेलकर लोगों के बीच अविश्वास और अव्यवस्था फैलाने वाले हैं. वर्तमान सरकार ने यदि इनका चयन किया है तो इसलिए कि उसके सबसे बड़े घटक की राजनीति सांप्रदायिक अविश्वास और धार्मिक पाखंड के सहारे चलती है.

प्रचलित करेंसी नोटों को तयशुदा अवधि में वापस लेने की योजना को प्रधानमंत्री ने ‘डीमोनीटाइजेशन’ का नाम दिया है. जिसे मीडिया ने ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया. इसका आशय प्रचलित मुद्रा जिसका एक हिस्सा, सरकार के अनुसार टैक्स चोरों की गिरफ्त में हैको सरकारी खजाने में खींच लेने या छिपाए रखने की स्थिति में उसे कागज के टुकड़ों में बदल देने की नीति से है. यह अर्थशास्त्र सम्मत प्रक्रिया है, जिसकी अनुशंसा डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान अर्थशास्त्री ने भी की है. ‘नोटबंदी’ या ‘विमुद्रीकरण’ इस योजना के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं. लेकिन व्यक्ति की भांति भाषा की भी सीमा होती है. कभीकभी ऐसा होता है जब सटीक शब्द की खोज के लिए शब्दकोश अपर्याप्त दिखने लगते हैं. हड़बड़ी में हम उन शब्दों का उपयोग करने लगते हैं, जो हमारे मंतव्य से मेल न खाते हों. यह मुख्यतः मुद्रा के स्वरूप में परिवर्तन से जुड़ा मसला है. उपयुक्त शब्द के अभाव में हम फिलहाल ‘विमुद्रीकरण’ का उपयोग करेंगे. ‘विमुद्रीकरण’ को लेकर असमंजस सरकार के स्तर पर भी था. इसलिए आरंभ में केवल करेंसी नोटों में बदलाव का संकेत देते हुए, बड़े नोटों को बैंकों में जमा करने का आदेश दिया गया. बाद में नकदी की कमी से समाज में अफरातफरी मची तो कागजी मुद्रा के स्थान पर डिजिटल लेनदेन पर जोर दिया जाने लगा.

इस लेख का उद्देश्य विमुद्रीकरण या उसके प्रभावों की समीक्षा करना नहीं है, केवल यह देखना है कि योजना लागू होने के पश्चात समाज में जो उथलपुथल मची है, क्या उसे स्वाभाविक माना जाएगा! क्या यह स्वस्थ समाज का लक्षण है! लाभकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ‘विमुद्रीकरण’ पूंजीवादी कामना है. इससे लोगों के मुद्राअधिकार बाजारहित में बदला जा सकता है. भारत जैसे भीषण समाजार्थिक असमानताओं वाले देश में यह विषमताओं और अधिक बढ़ाएगा. शायद इसीलिए पिछली सरकारें उसे लागू करने से बचती आई थीं. यदि लागू किया भी तो पर्याप्त लचीलापन अपनाते हुए, ताकि जनसाधारण को किसी प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े. कदाचित वर्तमान सरकार को इस कार्य की जटिलता का आभास नहीं था. इतनी बड़ी योजना को तरीके से निपटाने के लिए जैसी तैयारी चाहिए, सरकार उससे बहुत पीछे थी. केवल राजनीतिक हित साधने हेतु किए गए निर्णय के दुष्परिणाम बैंकों तथा एटीएम के आगे लंबीलंबी लाइनों के रूप में सामने आए. लगभग 135 व्यक्तियों की बैंक और एटीएम की लाइनों में लगेलगे जानें चली गईं. यह इस साल भारतपाकिस्तान बार्डर पर मारे गए सैनिकों की संख्या से सवा गुनी है. बाजार से मुद्रा गायब होने से उपभोक्ता और व्यापारी सबका हालबेहाल हैं. उद्योगधंधे ठप्प पड़ चुके हैं. दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोवाले, रेहड़ीखोमचे वाले जिनका चूल्हा रोज की कमाई से चलता हैसब परेशान हैं. रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुके लोग आहत हैं. गांव की राजनीति और बेरोजगारी से बचने के लिए शहर चुना था. अब यहां से कहां जाएं! किसी के पास ग्राहक नहीं है तो किसी के नियोक्ता के पास उसे देने के लिए नकदी का अभाव है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, आयातनिर्यात उत्पादन, सर्विस सेक्टर, खेतीबाड़ी आदि अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र आर्थिक मंदी के शिकार हैं. विडंबना यह कि सरकार के कदम से जितना कालाधन उजागर होने की उम्मीद है, उससे कहीं अधिक धनराशि का नुकसान व्यापार तथा उद्योगधंधों की मंदी के चलते पूरा देश उठा चुका है. घोषणा में तीस दिसंबर के बाद हालात सामान्य होने की बात कही गई थी, मगर इसके छह महीने बाद भी सब कुछ पटरी पर आ पाएगा, इसकी बहुत क्षीण संभावना है.

क्या यह मुद्रा की ताकत है? समाजार्थिक विषमताओं से घिरे देश में जो कल्याणराज्य होने का दावा करता हो, क्या मुद्रा को इतना ही शक्तिशाली होना चाहिए? क्या मुद्रा का शक्तिशाली होना देश और समाज के शक्तिशाली होने जैसा ही है? लोकतंत्र में समस्त निर्णायक शक्तियां जनता के पास होती हैं. परंतु लोकहित के नाम पर लिए गए इस निर्णय में लोक ही सर्वाधिक आहत हुआ है. अधिकांश जन निर्णय से नाखुशी जता चुके हैं. बैंक और एटीएम की लाइनों में लोग दम तोड़ रहे हैं. कामधंधे तबाह हो चुके हैं. फिर भी सरकारी निर्णय के विरोध में कोई विशेष आक्रोश नजर नहीं आता. क्यों? बिना सार्थक आक्रोश और विरोध की अभिव्यक्ति के क्या लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है? आप कह सकते हैंजीवन में अर्थ की उपयोगिता है. ‘रुपया’ को ‘बाप और भइया से बड़ा’ भी हमारे यहां कहा गया है. कितने ही मुहावरे जीवन में अर्थ की उपयोगिता को लेकर लोकप्रचलित हैं. हिंदू धर्म में उसे जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है. ठीक है, लेकिन हम एक बात प्रायः भूल जाते हैं. जिन दिनों यह ‘अर्थ’ को पुरुषार्थ माना गया था, उन दिनों मुद्रा का मूल्य वास्तविक होता था. सौ मुद्राएं चुकाने का मतलब था, सौ स्वर्णभार का भुगतान. आज मुद्रा का मूल्य प्रतीकात्मक है. बिना सरकार की गारंटी के नोट महज कागज का टुकड़ा है. वह बाजार में मनुष्य के क्रय सामर्थ्य को दर्शाता है, परंतु स्वयं ‘समृद्धि’ का मानक नहीं है. यद्यपि उसके उपयोग द्वारा वास्तविक ‘समृद्धि’ खरीदी जा सकती है.

यदि बिना सरकारी गारंटी के मुद्रा का वास्तविक मूल्य शून्य है तो नागरिक जीवन में मुद्रा के वास्तविक महत्त्व की समीक्षा आवश्यक हो जाती है. खासकर समृद्धि में उसके योगदान को लेकर. क्योंकि कोई भी सरकार समाज से बड़ी नहीं होती. खुद को व्यवस्थित रखने के लिए समाज ही सरकार का गठन करता है. समाज राज्य की आत्मा है तो सरकार महज उसका एक संस्कार. यदि सरकार अथवा उसकी कोई संविदा सामाजिक संबंधों के लिए ही संकट का विषय बन जाए तो मान लेना चाहिए कि उस संविदा और समाज के अंतःसंबंधों की समीक्षा का समय आ चुका है. उस ओर से समाज की उदासीनता उसके पतन की संकेतक हैं. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं कि बैंक की कतार में खड़ेखड़े नागरिक की मृत्यु हो जाए और लाश को किनारे कर, दोचार हजार रुपये की उम्मीद में लोग कतार में बने रहने के लिए धक्कामुक्की करते रहें. इस घटना ने मानवीय संबंधों को तारतार कर दिया है. उधर सरकार है कि उसके कर्ताधर्ताओं को हर वह व्यक्ति जो बैंक या एटीएम की कतार में है, कहीं न कहीं चालू, बेईमान और भ्रष्टाचारी नजर आता है.

करेंसी राज्य की ओर से आपसी लेनदेन को सुगम बनाने के लिए की जाने वाली व्यवस्था है. उसका अपना कोई मूल्य नहीं होता. राज्य की गारंटी उसे मूल्यवान बनाती है. चूंकि करेंसी का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता, इसलिए वह अर्थव्यवस्था की मजबूती का पर्याय भी नहीं होती. वह केवल उसके प्रवाह को दर्शाती है. जैसे थर्मामीटर का तापांक स्वयं उष्मा न होकर मात्र उसके स्तर को दर्शाता है, वैसे ही मुद्रा की मात्रा केवल मनुष्य के क्रयसामर्थ्य की संकेतक होती है, समृद्धि की नहीं. बाजारकेंद्रित मुद्राप्रवाह में समृद्धि का आवागमन बराबर नहीं होता, बल्कि वह मुनाफे के रूप में निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर रहता है. मुद्रा की उपयोगिता आपसी लेनदेन को सहज बनाने में है. उससे बाजार को गति मिलती है. लोग अपने अधीन मुद्रा का अधिकाधिक उपयोग खरीदफरोख्त में करें, इसके लिए बाजार मुद्रा की मौजूदगी को सराहता है. उसे आर्थिक शक्ति के रूप में पेश करता है. किंतु उसकी मूल्यवत्ता तभी तक है, जब तक उसके पीछे सरकार की गारंटी हो. मुद्रा का उपयोग सभी वर्गों में समान नहीं होता. उसकी मुख्य उपयोगिता मध्य तथा निम्न वर्गों तक सीमित होती है, जिन्हें अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए खरीदफरोख्त करनी होती है. बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों तथा पेशेवरों के लेनदेन में, जहां भुगतान राशि अत्यधिक हो, मुद्रा का उपयोग अव्यावहारिक मान लिया जाता है. उनके यहां समृद्धि का आकलन संसाधनों पर अधिकार से किया जाता है, न कि लेनदेन से. उदाहरण के लिए जमींदार की समृद्धि का आकलन भूसंपदा के आधार किया जाता है. व्यापारी और उद्योगपति की समृद्धि, उसके अधीन बाजार, कलकारखानों आदि पर एकाधिकार से आंकी जाती है. मुद्रा का महत्त्व केवल व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

व्यक्ति करेंसी के उपयोग द्वारा भूमि तथा समृद्धि के दूसरे स्थायी उपादानों का अर्जन कर सकता है. उस समय वह वास्तव में ‘अर्थ’ बन जाती है. लेकिन जनसाधारण द्वारा अर्जित करेंसी का अधिकांश जीवन की भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य जैसी बेहद सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति में ही खप जाता है. वास्तविक समृद्धि में अंतरित करने का अवसर उसे कम ही प्राप्त होता है. उसे भुलावे में रखने के लिए बाजारवादी ताकतें तथा उसके पोषित अर्थविज्ञानी समृद्धि को दैनिक जरूरतों के संदर्भ में, क्रयसामर्थ्य द्वारा परिभाषित करते हैं. सामान्यतः यह मान भी लिया जाता है. मुद्रा को वास्तविक संपदा अथवा समृद्धि का प्रतीक मानना मूर्ति को देवता मानने की स्थिति है. चालाक पुरोहित जैसे पत्थर की मूर्ति में देवता की प्रतिष्ठा करते रहते हैं, वैसे ही पूंजीवादी शक्तियां अर्थव्यवस्था की सारी ताकत मुद्रा में केंद्रित होने का भ्रम फैलाए रखती हैं. बाजारकेंद्रित अर्थव्यवस्था में ऊपर के स्तर पर मुनाफे की स्पर्धा होती है, जबकि निचले वर्ग रोजीरोटी के संघर्ष में उलझे रहते हैं. स्पर्धा उनके आत्मविश्वास, आपसी विश्वास और सहअस्तित्व की भावना का हनन करती है. आपसी विश्वासहीनता तथा निचले स्तर की स्पर्धा उनके जीवन में मुद्राआधारित लेनदेन को अपरिहार्य बना देती है. इस तरह मुद्रा की आभासी शक्ति सामान्यतः जनसाधारण तथा मध्यवर्ग को प्रभावित करती है, उच्च वर्गों को नहीं. मुद्रा उनके लिए महज संख्या जितना महत्त्व रखती है, जिसका उपयोग व्यापारिक हिसाबकिताब तक सीमित होता है.

बाजार में करेंसी की किल्लत तथा शीघ्र ही उसके समाधान की क्षीण संभावनाओं को देखते हुए सरकार रोजमर्रा के लेनदेन में डिजिटल करेंसी को अपनाने पर जोर दे रही है. उपभोक्ताओं को डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पेटीएम, आधारकार्ड आदि के माध्यम से खरीदफरोख्त करने की सलाह दी जा रही है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई उपहार योजनाएं लागू की हैं. सेवाकर की छूट, लॉटरी द्वारा पुरस्कार आदि योजनाओं से सरकार की नीयत और नीति दोनों को समझा जा सकता है. इससे सरकार का क्या लाभ है? यह समझने के लिए ज्यादा माथापच्ची की आवश्यकता नहीं है. ऐसे दुकानदारों की संख्या लाखों में है जो कर चोरी को अपना अधिकार मान बैठे हैं. बिना रसीद के लेनदेन बाजार में बहुत आम है. करयोग्य आमदनी वाले दुकानदारों में से बामुश्किल दो या तीन प्रतिशत आयकर देते हैं. सरकार का मानना है कि लेनदेन डिजिटल गेटवे से होगा तो भ्रष्ट दुकानदारों, व्यापारियों तथा कालेधन के बूते खरीदारी करने वालों पर नजर रखना आसान हो जाएगा. उसकी आमदनी बढ़ेगी. भ्रष्टाचार पर काबू कर पाना संभव होगा. सवाल है कि इससे उपभोक्ता को क्या लाभ होगा? दुकानदार उसे ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ पर बेचता है, जिसमें सामान्यतः स्थानीय कर भी सम्मिलित होता है. इस तरह व्यक्ति जो भी वस्तु खरीदता है, उसपर दुकानदार के लाभ तथा कर आदि का भुगतान वह कमोबेश करता ही है. क्या नई व्यवस्था उसके लिए हितकर सिद्ध होगी? पेमेंट सीधे बैंक में जाने से धनराशि की सुरक्षा, लानेले जाने में बचत, रकम पर मिलने वाला तात्कालिक ब्याज अपरोक्ष रूप में बड़े दुकानदारों को लाभ पहुंचाएगा. ग्राहक को भी इसका लाभ पहुंचे, सरकार इसपर विचार करने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है. इतना तय है कि इस व्यवस्था से डिजिटल पेमेंट के लिए जिस माध्यम को ग्राहक अपनाएगा, उसके सेवामूल्य के साथ सेवाकर के रूप में अतिरिक्त धनराशि भी उसे वहन करनी पड़ेगी.

बाजार की नीयत और नीति को समझने वालों के लिए यह कोई अबूझ पहेली नहीं है. परंपरागत पद्धतियों में उत्पादक एवं उपभोक्ता का सीधा संबंध होता था. उत्पादक अपने उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुसार उत्पादन करता था. मुनाफे के लालच में उत्पाद का निर्माण करना तब की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नहीं था. कुछ कारीगर और कलाकार ऐसे अवश्य होते थे जो अपने हुनर का प्रदर्शन राजाओं और सामंतों को प्रसन्न करने के लिए करते थे. उनके उत्पाद को कई बार कला तो कई बार विलासिता की वस्तु तक मान लिया जाता था. परंतु वह संख्या की दृष्टि से समाज का मामूली हिस्सा था. वे अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते थे. दूसरे उनका ध्येय महज अपने आश्रयदाता को खुश करना होता था. बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था में उत्पाद और उपभोक्ता के बीच दुकानदार के रूप में तीसरा पक्ष उपस्थित हो जाता है. उसके तहत उत्पादक लाभ की कामना के साथ माल बनाता है. उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु के मूल्य में उत्पादक के मुनाफे तथा उत्पादनकर के साथसाथ, दुकानदार का मुनाफा भी जुड़ जाता है. यदि उत्पादक के अलावा उपउत्पादक भी हैं, तथा अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने के वस्तु कई दुकानदारों के हाथों से होकर गुजरती है तो उसमें उपउत्पादकों तथा बिचौलिए दुकानदारों का मुनाफा भी जुड़ता चला जाता है. उपभोक्ता न केवल उन सबके मुनाफे का हिस्सा वहन करता है, अपितु अपरोक्ष रूप में विभिन्न स्तरों पर देय कराधान, यातायात, सर्विस चार्ज, विज्ञापन आदि का बोझ भी वही उठाता है. परिणामस्वरूप वास्तविक उपभोक्ता तक पहुंचतेपहुंचते वस्तु की कीमत कई गुना बढ़ जाती है. कई बार तो वास्तविक मूल्य तथा सभी बिचौलिये दुकानदारों के सकल मुनाफे का अनुपात एक और चार का हो जाता है. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध न होने के कारण चालू अर्थव्यवस्था को मुनाफे की अर्थव्यवस्था माना जाता है. जिसमें उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच किसी भी प्रकार की आत्मीयता नहीं पनप पाती. वस्तुविनिमय जरूरत और मुनाफे का लेनदेन बन जाता है. इसमें उपभोक्ता जो अपनी जरूरत के चलते खरीदारी को विवश है, हमेशा घाटे में रहता है.

सरकार को लगता है कि व्यापारी और दुकानदार अपने मुनाफे पर देय आयकर तथा अन्य करों का भुगतान करने में बेईमानी करते हैं. हालांकि इसकी रोकथाम के लिए सरकार के अधीन भारीभरकम निगरानी तंत्र रहता है. उसका कार्य दुकानदारों के आयव्यय पर नजर रखना तथा उनसे निर्धारित कर वसूली करना है. डिजिटल पेमेंट गेटवे को बढ़ावा देने का अर्थ यह भी है कि सरकार अपने निगरानी तंत्र की विफलता को स्वीकार चुकी है. उसे लगता है कि लेनदेन के डिजिटलाइजेशन द्वारा कराधान का हिसाबकिताब और संग्रह सुगम हो जाएगा. चूंकि धनराशि का लेनदेन बैंकों या उपबैंकीय संस्थानों तथा संविदाओं यथा पेटीएम, आधारकार्ड, डेबिटक्रेडिट कार्ड आदि के माध्यम से होगा, तब उसकी वसूली भी आसान होगी. फलस्वरूप सरकार की अपने ही तंत्र पर निर्भरता घटेगी. इस निर्णय द्वारा सरकार को दुहरा लाभ होने की उम्मीद है. सरकार को लगता है कि इससे वह अधिकतम कराधान में सफल होगी. दूसरे बैंकिंग सेवाओं के जरिये उसे मोटी रकम सेवाकर के रूप में भी प्राप्त होगी. कुल मिलाकर सरकार अपने निगरानी तंत्र और उपभोक्ताओं से अधिक भरोसा उपबैंकीय एजेंसियों पर कर रही है. यह तब है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं तथा अधिकांश औद्योगिक उत्पादों के मूल्य पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. कराधान से बढ़े खर्च की भरपाई पूंजीपति और उद्यमी बड़ी आसानी से मूल्य बढ़ाकर कर सकते हैं. उसका असर सीधे उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा. उसके लिए चीजें और भी महंगी होंगी. सेवा प्रदाता बैंकिंग और उपबैंकिंग एजेंसियों का खर्च तथा उसपर लगने वाला सेवा कर भी अंततः उपभोक्ता की जेब से ही जाएगा. उसे न केवल बैंकिंग सेवा के बदले भुगतान करना पड़ेगा, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दुकानदार पर लगने वाले करों का हिस्सा भी उसे ही वहन करना पड़ेगा. चूंकि नकदी जेब में नहीं रहेगी, इसलिए उसका लाभ बैंक उठाएगा. ये बातें आम उपभोक्ता से छिपी नहीं हैं. बावजूद इसके सामाजिक स्तर पर कोई बड़ी हलचल या आक्रोश नजर नहीं आता. आमजन की इस चुप्पी या अपार सहनशीलता को सरकार अपने निर्णय के प्रति समर्थन के रूप में पेश कर रही है. क्या हालात पूर्णतः विकल्पहीन हैं?

लोकतंत्र में मतसंख्या महत्त्वपूर्ण होती है. लेकिन मतदान में समाज के सभी वर्ग समान रूप से हिस्सा नहीं लेते. मतदाताओं की आय के आधार पर हम उन्हें तीन वर्गों में बांट सकते हैं. पहला अतिसंपन्न वर्ग. प्रत्यक्ष या परोक्ष उसका संबंध पक्षविपक्ष के सभी नेताओं से होता है. असल में यह वर्ग राजनीति का उपयोग अपने हक में करता है. चाहे जिस दल की जीत हो यह वर्ग सत्ता के हमेशा करीब रहता है. उसे निर्वाचन प्रक्रिया की परवाह नहीं होती. चुनावों में इसकी आनुपतिक भागीदारी सबसे कम होती है. दूसरा मध्य वर्ग. इस वर्ग में पढ़ालिखा रोजगारपरस्त वर्ग, छोटेव्यापारी, पेशेवर, बुद्धिजीवी आदि आते हैं. यह किसी भी समाज की प्राणशक्ति होता है. इसका एक हिस्सा समाज के शीर्षस्थ वर्ग से समझौता कर अपनी स्वार्थसिद्धि में लगा रहता है, जबकि दूसरा हिस्सा व्यवस्था से असंतुष्टों का होता है. जनता का साथ मिले तो यह सामाजिक क्रांति का वाहक बन जाता है. इसकी दुर्बलता है कि यह राजनीतिक रूप से बेहद बंटा हुआ होता है. संख्या में यह अतिसंपन्न वर्ग से अधिक तथा राजनीतिक दृष्टि से सबसे चलायमान वर्ग माना जाता है. चुनावों में आगापीछा सोचकर मतदान करता है. बंटा होने के कारण यह वर्ग खुद तो राजनीतिक ताकत नहीं बन पाता, लेकिन लोकमानस को बनानेबिगाड़ने, दलविशेष के संबंध में हवा बनाने में इस वर्ग का बहुत योगदान होता है. इसके मामूली प्रतिशत का किसी दल या विचार की ओर झुकाव, मतदाताओं के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है. तीसरा वर्ग जनसाधारण का होता है, जिसमें किसान, मजदूर, छोटे पेशेवर आदि आते हैं. इस वर्ग के लिए रोजीरोटी के मसले जीवन के बाकी मामलों से बड़े होते हैं. वर्तमान चुनौतीपूर्ण होता है, जिससे भविष्य के सपनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. इस वर्ग के पास देशदुनिया के बारे में ज्यादा सोचने का अवसर नहीं होता. इसलिए मतदान के समय धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे मुद्दों के आधार पर अपनी राय बनाता है, जिनका इसके विकास से कोई संबंध नहीं होता. लोकतांत्रिक विवेक की कमी भी इसका कारण बनती है. इस वर्ग का मानस धर्म, संस्कृति परंपरा के मौखिक पाठों द्वारा तैयार होता है. समस्याओं के निदान के लिए इसे सदैव किसी तारणहार की प्रतीक्षा रहती है. इस कारण इसे फुसलाना आसान होता है. अतएव नेतागण चुनावी नारे इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाते हैं. रातदिन इसी के कल्याण का राग अलापते हैं. परंतु चुनाव जीतते ही वे इससे पूरी तरह कटकर उस वर्ग के रहनुमा बन जाते हैं जिसे हमने पहले स्थान पर रखा है.

जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि यदि जनता के नहीं रहते, जनकल्याण के नाम पर बनी सरकारें यदि पूंजीपतियों और सरमायेदारों की हितैषी बन जाती हैं, तो जनता क्या करे? समस्या का कारण जनता की दुर्बलता नहीं, आत्मविश्वास और अपनी शक्ति के प्रति अनभिज्ञता है. लोग जानते हैं कि संसद में पहुंचे नेताओं को सर्वाधिक वोट उन्हीं के प्राप्त होते हैं. जो अमीर हैं, जिनकी सत्ता और संस्थानों तक पहुंच है, वे मतदान के दिन घर से नहीं निकलते. इसके बावजूद नेता हैं कि संसद तथा विधायिकाओं में जाते ही उस वर्ग को भुला देते हैं, जिसका उनकी जीत में सर्वाधिक योगदान है. वे उस वर्ग के पिछलग्गू बन जाते हैं, जो सामान्यतः उनकी परवाह नहीं करता. जनसाधारण जो मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेता है, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार के गठन को संभव बनाता है, अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पुनः किसी तारणहार की प्रतीक्षा में लगा रह जाता है.

दरअसल हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर आधेअधूरे मन से. संविधान की भावना के अनुरूप लोगों की चेतना का लोकतांत्रिकरण कर ओर हमने ध्यान ही नहीं दिया. बताया गया कि लोकतंत्र की परिभाषा जनता द्वारा सरकार चुनना है. जनता इसके लिए निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सा लेती रही. बिना यह जाने कि उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद और विधायिकाओं में जाते ही शासक बन जाते हैं. निहित स्वार्थ के लिए वे जनसाधारण से उसकी स्वतंत्रता, समानता तथा विकास के अवसर छीन लेते हैं, जिनपर नागरिक होने के नाते उनका अधिकार है. लोकतांत्रिक सरकार को चाहिए कि वह न्यूनतम शासन करे. उसके लिए लोगों का जागरूक रहना जरूरी है. लोग स्वयं जागरूक होंगे तो अनुशासित भी होंगे. अनुशासित होंगे तो सरकार का लावलश्कर कम होगा. लाव लश्कर कम होगा तो नागरिकों की जेब पर पड़ने वाला खर्च स्वतः घट जाएगा. वर्तमान व्यवस्था में सरकार मानती है कि लोगों में जागरूकता की कमी है. अनुशासन बनाए रखने के लिए वह नागरिकों के खर्च पर पुलिस को ले आती है. पुलिस से झगड़ा नहीं सुलझता तो अदालतें आ जाती हैं. हर संस्था नागरिक आजादी को थोड़ी कम करती है और उसकी जेब पर बोझ बढ़ा देती है. यानी लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी केवल प्रतिनिधि चुनने से पूरी नहीं हो जाती. वे प्रतिनिधि ही बने रहें, शासक और सर्वेसर्वा न बनें इसका ध्यान रखना भी जनता की जिम्मेदारी है. इस तरह जनता का जनताकरण राजनीति के लोकतांत्रिकरण की बुनियादी शर्त है.

इस अवांतर से वार्तालाप का लेख की विषयवस्तु से क्या संबंध है? विमुद्रीकरण अर्थशास्त्र की समस्या है, राजनीति की नहीं. फिर भी यह हमें आवश्यक लगा, क्योंकि विमुद्रीकरण का वर्तमान निर्णय विशुद्ध अर्थशास्त्रीय नहीं है. उसके पीछे राजनीति छिपी है. यदि सरकार इसे अर्थशास्त्रीय मुद्दा समझती तो रिजर्ब बैंक या ज्यादा से ज्यादा वित्तमंत्री के स्तर पर इसकी घोषणा होनी चाहिए थी. आधीअधूरी तैयारी के साथ स्वयं प्रधानमंत्री को पहल करने की आवश्यकता नहीं थी. विमुद्रीकरण की घोषणा चार राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले की गई है. सो इसके राजनीतिक निहितार्थ होंगे ही. नेताओं की हर निर्णय को राजनीतिक नफानुकसान सोचकर करने की प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट कराना हमें इसलिए भी आवश्यक लगा क्योंकि यह न केवल समस्या की जड़ है, बल्कि समाधान भी इसी में अंतर्निहित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि जनप्रतिनिधि कर्तव्यपथ से विचलित होते हैं, तो उसके लिए केवल वही दोषी नहीं होते. प्रकारांतर में जनता भी उसके लिए जिम्मेदार होती है. यदि निर्वाचित प्रतिनिधि या चुनी हुई सरकार जनता के कष्टों की ओर से लापरवाह हैं तो जनता के लिए सबसे अच्छा रास्ता यही है कि वह अपनी संगठित शक्ति का उपयोग हालात को सुधारने के लिए करे. इस कार्य को जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालकर किया सकता है, यदि फिर भी सरकार के स्तर पर निरंकुशता बनी रहती है तो जनता के पास एकमात्र रास्ता बचता है कि वह सरकार पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए न्यूनतम स्तर पर ले आए. हमारी यह सलाह अव्यावहारिक लग सकती है. लेकिन लोकतंत्र को उत्सव की तरह जीने का रास्ता इसी ओर से जाता है. प्रूधों के शब्दों मेंᅳ‘मुक्त समाज में कानून बनाने, नई संस्थाएं गठित करने, उनका संविधान रचने, स्थापना एवं प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने से लेकर कार्यारंभ तक सरकार की भूमिका न्यूनतम, इतनी कम जितनी कि संभव होहोनी चाहिए. राज्य (सरकार का लाभकारी) उद्यम नहीं है. इसलिए उद्यमों एवं संस्थाओं की स्थापना/संचालन के उपरांत सरकार को उनसे स्वयं अलग होकर, उन्हें स्थानीय प्राधिकरणों और जनसंस्थाओं के सुपुर्द कर देना चाहिए.’

राज्य पर निर्भरता को कम करने के अनेक रास्ते हैं. करेंसी के मुद्दे को ही लें. किसी भी राज्य की राज्य की वास्तविक शक्ति उसकी जनता में अंतर्निहित होती है. जबकि राज्य करेंसी को प्रत्याभूत करता है. इस तरह करेंसी के प्रत्याभूतिकरण के पीछे अंतिम शक्ति जनता की ही होती है. जनता यदि करेंसी को प्रत्याभूत कर सकती है तो उसके विकल्प भी तलाश सकती है. ऐसे विकल्प जो उसे अधिक स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता का एहसास दिलाते हुए उसके आत्मविश्वास बनाए रखने में मददगार हों. इस दिशा में प्रचलित विकल्पों को समाजवाद के आधुनिक अपररूप की संज्ञा दी जा सकती है. हालांकि इनकी कार्यशैली उससे भिन्न है. ये पूंजीवाद के जूझने के बजाए संगठन और सामूहिक विवेक के बल पर उससे मुक्ति का भरोसा दिलाते हैं. कुछ दशक पहले तक भारत के गांवों में जो प्राचीन सहयोगाधारित व्यवस्था रही है, जिसे हमारी ही पीढ़ी ने दम तोड़ते देखा है, इन्हें उसका संशोधित संस्करण भी कहा जा सकता है. आजकल शहरों में मिश्रित बस्तियों का चलन है. एक ही मुहल्ले में विभिन्न पेशों और कलाओं में दक्ष लोग रहते हैं. उनमें प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई, लुहार, एकाउंटेंट, राजमिस्त्री, पेंटर, ऑटो चालक वगैरह अनेक प्रकार के पेशेवर और तकनीकी कौशल वाले लोग रहते हैं. यदि ये ठान लें कि आपसी व्यवहार के दौरान मुद्रा का प्रयोग न्यूनतम करेंगे, तो थोड़ीसी आरंभिक हिचक के बावजूद, वे आसानी से ऐसा कर सकते हैं. इस व्यवस्था के अंतर्गत श्रम का आकलन एवं भुगतान बजाय मुद्रा के श्रमघंटों में किया जाएगा. मान लीजिए ‘क’ कंप्यूटर पेशेवर है. उसे अपने घर के लिए प्लंबर की आवश्यकता है. वह बस्ती के प्लंबर ‘ख’ को आमंत्रित करेगा. ‘ख’ को काम पूरा करने में यदि दो घंटे लगते हैं, तो उसके दो श्रमघंटे ‘क’ पर उधार माने जाएंगे. मुद्रा रहित भुगतान प्रणाली में ‘क’ को कुछ ऐसा करना होगा, जिससे वह ‘ख’ के श्रमघंटों का भुगतान श्रमघंटों में ही कर सके. इसके लिए वह ‘ख’ की आवश्यकतानुसार कुछ डिजायन कर सकता है. यदि ऐसा होता है तो वह श्रमघंटों का सीधा आदानप्रदान मान लिया जाएगा. यह भी हो सकता है कि ‘ख’ को ‘क’ की सेवाओं की तत्काल कोई जरूरत न हो. उस अवस्था में उनके बीच का लेनदेन सुरक्षित माना जाएगा. मान लीजिए कुछ दिनों के बाद ‘ख’ को बिजली मिस्त्री ‘ग’ की आवश्यकता पड़ती है. जिसपर ‘क’ के किसी काम के दो श्रमघंटे बकाया हैं. तो ‘ग’ उस उधार के बदले ‘ख’ को अपनी सेवाएं देकर ‘क’ से उऋण हो सकता है. यह उदाहरण है. इस प्रणाली को थोड़े प्रबंधन के साथ आसानी से अपनाया जा सकता है. मुहल्ला सभाएं इस काम को बड़े आराम से कर सकती हैं. हो सकता है कंप्यूटर पेशेवर दावा करे कि उसके काम के लिए आनुपातिक रूप से अधिक योग्यता की आवश्यकता पड़ती है. और वह अपने श्रमघंटों के मूल्य की तुलना बिजली मैकेनिक या पलंबर से करने को तैयार न हो. इस समस्या के समाधान के दो रास्ते हैं. पहला और श्रेष्ठतर उपाय है कि कंप्यूटर पेशेवर से अनुरोध किया जाए कि वृहद सामूहिक हितों के लिए उदारता दिखाते हुए इस प्रकार की तुलना को रहने दे. दूसरा यह कि आपसी सहमति से ऐसे नियम बनाए जाएं जिससे इस प्रकार के विवाद उत्पन्न ही न हों. इससे मौद्रिक लाभ सामाजिक लाभ के अपेक्षा श्रेष्ठतर रूप में प्राप्त होंगे. यह रास्ता अव्यावहारिक लग सकता है, मुश्किल बिलकुल नहीं है. अधिकांश कारखाने अपने कामगारों को वेतन देने के लिए उनके कार्य का मूल्यांकन श्रमघंटों के आधार पर करते ही हैं. एक बार चलन में आ जाने के बाद व्यवस्था सहज लगने लगेगी. इससे सरकार और उसके तंत्र पर निर्भरता घटेगी और मुद्राकेंद्रित क्रयविक्रय में जनता को जो भारीभरकम कर सरकार को चलाने के लिए देना पड़ता है, उसकी बचत हो जाएगी. सरकार का काम सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सिमट जाएगा. क्लेरेंस ली स्वार्ज ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट इज म्युच्युलिज्म’(1927) में इसकी प्रशंसा करते हुए लिखा है

यह एक ऐसा सामाजिक दर्शन है जो सभी नागरिकों के लिए समान स्वाधीनता, पारस्परिक समानताधारित लेनदेन तथा व्यक्तिविशेष की अपने जीवन, श्रम एवं श्रमोत्पाद पर पूर्ण संप्रभुता को दर्शाता है.’

सच यह है कि सरकार का विवेक, जनता के विवेक पर टिका होता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

एक ‘राष्ट्रवादी’ फैसला

सामान्य
  • राष्ट्रवाद महज धारणा है. उससे हम यह मान लेते हैं कि कोई एक देश दुनिया के  बाकी देशों से मात्र इस कारण श्रेष्ठतर है, क्योंकि हमारा  जन्म उसमें हुआ है.                                                               जार्ज बनार्ड शा.

  • कल्पना कीजिए कि (आपका)कोई देश नहीं है, जिसके लिए मारा या मरा जाए. यह सोच पाना बहुत कठिन भी नहीं है. सोचिए कि कोई धर्म भी नहीं है. सब शांतिपूर्वक जीवनयापन कर रहे हैं. आप कह सकते हैं कि मैं कोरा स्वप्नजीवी हूं. लेकिन ऐसा केवल मैं ही नहीं हूं. मुझे उम्मीद है  कि एक दिन तुम भी मेरे साथ खड़े नजर आओगे. उस दिन यह दुनिया एक हो जाएगी.                                    जॉन लिनन.

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को अनिवार्य कर दिया. पता चला कि मामला 13 वर्षों से लटकता आ रहा था. न्यायालय को लगा कि अब और टालना अनुचित होगा. क्यों लगा? क्या इसलिए कि केंद्र में भाजपा की सरकार है? किसी और दल की सरकार होती तो फैसला कुछ और आता! या फिर कुछ वर्ष और लटका रहता! संभवतः कोर्ट ने सोचा हो कि राष्ट्रप्रेम का पाठ स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार के अनुशासन में आसानी से पढ़ाया जा सकता है. सचाई चाहे जो हो, महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि अदालत को अचानक क्यों लगा कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना घट रही है. वह भी स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार तथा वाग्वीर प्रधानमंत्री के रहते. बात-बात पर भारत-माता का जयकारा लगाने वाले ‘आर्यपुत्र’ लोगों में राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा जगाने में असमर्थ क्यों हुए, जो न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए आगे आना पड़ा?

फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत का है तब कुछ हकीकत तो होगी. पेंच यह है कि राष्ट्रप्रेम की क्लास लगाने के लिए सिनेमाघरों को चुना गया है, जहां जाने वाले दर्शकों में बड़ी संख्या बेरोजगारों, रिक्शाचालकों और प्रवासी मजदूरों की होती है. घर-परिवार से दूर, कभी मनोरंजन की चाहत में तो कभी यूं ही, परिजनों की याद से छुटकारा पाने के लिए अधिकांश वही सिनेमाघर जाते हैं. कुछ इसलिए भी जाते हैं क्योंकि उनके पास रात बिताने का ठिकाना नहीं होता. देर रात का शो देखकर लौटने तक सड़कें सुनसान होने लगती हैं. आवारा कुत्ते थककर सड़कों के किनारे, दुकान के थड़ों के आसपास ठिकाना तलाशने लगते हैं. मौका देखकर वे भी जहां सिर समाए, अगली सुबह जिंदगी से जूझने का संकल्प लेकर लुढ़क जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बड़े लोग सिनेमाघर जाते नहीं, सिनेमा खुद उनके बीच चला जाता है. जब भी मन करता है, वे सिने कलाकारों को जन्मदिवस या किसी और बहाने आंगन में नंचवा लेते हैं. जो और बड़े हैं उनके घर ही में सिनेमाघर बने हैं. फैसले से यह साफ नहीं हुआ कि यह कानून क्या ‘एंटीला’ और उस जैसे प्रासादों में बने सिनेमाघरों पर भी लागू होगा? शायद नहीं. इसलिए कि हमारे यहां खुद को राष्ट्रभक्त सिद्ध करने की जिम्मेदारी प्रायः जनसाधारण की होती है. अमीर और वीवीआईपी की नहीं. उनकी राष्ट्रभक्ति तो स्वयंसिद्ध होती है. एहसान तले दबा मीडिया दिन-रात उनके महिमा-मंडन में जुटा रहता है. राष्ट्रप्रेम बलिदान मांगता है. सो बेघर, अकेलेपन के शिकार, बेरोजगार लोगों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते रहना जरूरी है. कदाचित इसीलिए अदालत ने दखल दिया है.

आप कह सकते हैं कि अदालत का फैसला सभी के लिए है. मैं कहूंगा गलत. यदि सभी के लिए होता तो शुरुआत संसद और विधान-सभाओं से होती. हर उस कल-कारखाने से होती जिसे राष्ट्र-निर्माण का मंदिर बताया जाता है. साथ ही स्कूल, कॉलेज, क्रिकेट और खेल के मैदानों तथा हर उस सभा से भी होती, जहां सार्वजनिक उपस्थिति हो. सिनेमाघर तो व्यक्ति हल्के-फुलके मूड के साथ जाता है. कभी खुद को भुलाने, तो कभी भूले हुए को याद करने के लिए. अगंभीर मनस्थिति में राष्ट्रगान में हिस्सा लेने का औचित्य? क्या इससे राष्ट्रप्रेम जगाने में सचमुच सफलता मिलेगी? कल्पना कीजिए पर्दे पर राष्ट्रगान के तुरंत बाद हेलन के डांस या सनी लियोनी के रोमांस का सीन आएगा तो उनमें से कौन-सा दिमाग पर देर तक प्रभावी  रहेगा. या फिर राष्ट्रगान समाप्त होते ही पर्दे पर सोडे के बहाने शराब का विज्ञापन आया तो राष्ट्रगान का असर कितनी देर टिक पाएगा? कुल मिलाकर हाल का निर्णय राष्ट्रीय भावनाओं को धर्म में ढाल देने जैसा है, जिसमें पुजारी दुनिया के सभी कारोबार आरती, पूजा-अर्चन के बीच तथा आगे-पीछे चतुर सौदागर की तरह निपटाता है. राष्ट्रप्रेम धर्म न होकर, नागरिक मात्र का अपने राष्ट्र के प्रति नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है. इसमें राज्य की भूमिका उत्प्रेरक की होनी चाहिए. कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्य के स्वनामधन्य कर्ता-धर्ता अपने स्वार्थपूर्ण आचरण द्वारा इस काम में चूकते रहे हैं. ऐसे में केवल सिनेमाघरों में राष्ट्रीयगान की अनिवार्यता राष्ट्रप्रेम के वास्ते निर्धारित कानूनी कर्मकांड जैसी ही है. राष्ट्रगान की गरिमा तभी है जब परिवेश अनुकूल हो. व्यक्ति उदात्त मन से उसके साथ जुड़ा हो. साथ ही राज्य अपने प्रत्येक नागरिक के साथ ईमानदार एवं निष्पक्ष अभिभावक जैसा व्यवहार करता हो. हमारी संस्कृति कर्मकांड प्रधान सही, परंतु कोरे कर्मकांडों से राष्ट्रप्रेम नहीं जगाया जा सकता. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य कि अपने देश और देशवासियों पर गर्व करे. मगर इसके लिए सिनेमाघर उपयुक्त स्थान नहीं हैं. यदि न्यायालय उन्हें उपयुक्त मानता है, तो क्रिकेट मैच की शुरुआत भी राष्ट्रगान से होनी चाहिए. क्योंकि दोनों ही मनोरंजन का माध्यम हैं; तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दोनों ही बाजारवादी अर्थव्यवस्था का हित साधते हैं.

सिनेमा हाल में राष्ट्रगान को जरूरी बताकर उच्चतम न्यायालय में अप्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया है कि जो लोग सिनेमाघर जाते हैं, वे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उदासीन होते हैं. जबकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब किसी गरीब ने लालच में पड़कर देशद्रोह जैसा धत्तकर्म किया हो. सच तो यह है कि जो लोग घर ही में सिनेमाघर बनवाने का सामर्थ्य रखते हैं, वे प्रतीक की बात दो दूर, खुद को राष्ट्र का पर्याय माने रहते हैं. सीना तान कर प्रधानमंत्री के फोटो का उपयोग अपने प्रॉडक्ट के विज्ञापन के लिए करते हैं. एहसानमंद मीडिया उसे बार-बार दिखाता है. यहां सिनेमा की उपयोगिता से इंकार नहीं है. वह सशक्त माध्यम है. उसका उपयोग राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए किया जा सकता है. अच्छा सिनेमा अनेक राष्ट्रहित साध सकता है. उसके लिए सिनेमाघर में राष्ट्रगान आवश्यक नहीं है. विशेषकर भारत में जहां अधिकांश फिल्में फार्मूलाबद्ध होती हैं. सस्ते मनोरंजन के अतिरिक्त उनकी कोई सार्थकता नहीं होती, गाहे-बगाहे जो सामाजिक असमानता तथा उसकी बाजारवादी प्रवृत्तियों का समर्थन करती हैं—वहां थर्ड ग्रेड सिनेमा राष्ट्रीयताबोध जगाने के किसी भी प्रयास को मजाक में बदल सकता है. समस्या यह है कि सरकार हो या अदालत, ऐसे मामलों में पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्ति असंभव होती है. यह मान लिया गया है कि राष्ट्रधर्म और राष्ट्रीयताबोध, दोनों की रक्षा करना केवल जनसाधारण की जिम्मेदारी है. इन परिस्थितियों में राज्य की भूमिका पेशेवर प्रबंधक जैसी होती है, जो कराधान के बदले नागरिकों को सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराता है.

जनसाधारण काम की बातें प्रायः बड़े लोगों के आचरण से सीखता आया है. ‘महाजने येन गतः सः पंथा.’—जिस रास्ते पर महान लोग जाएं उसी का अनुसरण उत्तम है. यही उसे सिखाया जाता है. यही सीख उसके गीत-संगीत, किस्से-कहानियों, कहावतों और बड़े-बूढ़ों के अनुभवों के रूप में सामने आती है. उसे राष्ट्रगान का महत्त्व समझाने के लिए सिनेमाघर में पर्दे के सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. शिखर पर मौजूद नेतागण, बड़े अधिकारी, पूंजीपति, व्यवसायी यदि अपने आचरण को राष्ट्रीयता की भावनाओं के अनुकूल ढाल लें तो जनसाधारण को अलग से राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. वर्षों पहले इसी देश के एक नेता ने सिर पर टोपी और लंगोटी पहननी शुरू की थी, तब अच्छे-खासे घरों के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा सूट-बूट छोड़ टोपी और लंगोटी में आ गए थे. और उस समय तक न तो देश स्वतंत्र हुआ था, न ही राष्ट्रगान बना था. लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं से पूरा देश ओतप्रोत था. पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण गूंजते नारे  स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सभी में यह एहसास जगा देते थे कि हम सब एक हैं. आजादी के बाद संकट की घड़ी में एक ठिगने कद के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने आवाह्न किया. उस समय न तो टेलीविजन था, न इंटरनेट, न ही बड़े-बड़े सुरसामुखी मीडिया घराने. साउंड ट्रैक का जमाना भी नहीं था. फिर भी उस नेता के कंठ से निकली आवाज को देश के नागरिकों ने दूर-दराज तक सुना था. फिर जैसे-जैसे जहां तक भी संदेश पहुंचा, लोगों ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का नियम बना लिया था. आखिर क्यों? इसलिए कि वह जैसा था, वैसा ही दिखता था. किसी को उसकी ईमानदारी पर संदेह नहीं था. उसके पास केवल तीन-चार जोड़ी वस्त्र होते थे. पूरे वर्ष वह उन्हीं से काम चलाता था. रोज पांच-पांच बार वस्त्र बदलकर ‘फकीरी’ का दावा नहीं करता था. आज के नेता आत्ममोह को आत्मविश्वास मानते हैं. बड़बोले भाषणों से जनता के दिलों पर छाने का भ्रम पाले रहते हैं. पूंजी, प्रचार और पाखंड के भरोसे राजनीति करते हैं. ऐसे नेता जनता पर भरोसा करने का साहस नहीं जुटा पाते. न ही जनता उनपर विश्वास करती है. इसलिए राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है.

क्या किसी को राष्ट्रभक्ति का पाठ सचमुच पढ़ाया जा सकता है? कुछ भाव मन में स्वतः उमड़ते हैं. लोगों को सिखाए नहीं जा सकते. जैसे कि प्रेम करना. हम किसी को इस बात के लिए विवश नहीं कर सकते कि वह हमारी बताई वस्तु या प्राणी से प्रेम करे. प्रेम करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति जिससे प्रेम करे, वह उसके किसी अभाव की पूर्णता का एहसास कराती हो. जमीन किसान का पेट भरती है. इसलिए किसान उससे प्रेम करता है. मां का दर्जा देता है. 1857 में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रस्फुटन के मूल में कोई नेता नहीं था. उस समय तो देश में एक-राष्ट्र की भावना का उदय भी नहीं हुआ था. केवल सामूहिक अस्मिताबोध था. जिसमें प्रत्येक सैनिक खुद को नेता मान बैठा था. अपने उत्साह के बूते उन्होंने पूरे उत्तर भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध जंग के लिए खड़ा कर दिया था. वह संघर्ष नाकाम हुआ, इसलिए कि इतने बड़े आंदोलन को संभालने के लिए जैसी मानसिक तैयारी चाहिए, वह उनके पास नहीं थी. लेकिन वह नाकाम संघर्ष भी देश में राष्ट्रीयताबोध जगाने में सफल सिद्ध हुआ.

ऐसा नहीं कि न्यायालय का निर्णय एकदम हवा से पैदा हुआ है. आजादी के बाद से ही यह देश भीतरी और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा है. पिछले कुछ दशकों से चुनौतियां तेजी से बढ़ी हैं. इस फैसले के मूल में ऐसी कई बातें हैं जो देश की आंतरिक उथल-पुथल को सामने लाती हैं. उत्तर में कश्मीर, पूर्वोत्तर के आतंकवाद पीड़ित राज्यों को छोड़ दें तो भी बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे राज्य हैं, जहां भारत नामक राज्य के विरुद्ध आवाजें उठ रही हैं. आप उन्हें ‘नक्सलाइट’ कहें, ‘चरमपंथी’ कहें या कुछ और—वे निर्विवाद रूप से भारतीय गणराज्य के लिए चुनौती बने हैं. इसका प्रमुख कारण लोकतांत्रिक समाधान के प्रति अविश्वास को जन्म लेना है. विडंबना यह है कि समस्या के कारणों को समझे बिना मीडिया उन्हें केंद्र के विरुद्ध चुनौती के रूप में पेश करता आया है. जबकि राज्य के विरुद्ध हथियार उठाने का अभिप्राय हमेशा यह नहीं होता कि विद्रोहियों को अपनी राष्ट्रीय पहचान से शिकायत है. प्रायः वह राज्य और नागरिक समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है. इसलिए इस प्रकार की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीयता की सीमा में, लोकतांत्रिक सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए. विडंबना है कि भारतीय राज्य की ओर से ऐसी कोई रचनात्मक कोशिश नजर नहीं आती. विकास का मतलब अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों, जिनकी गिद्ध-दृष्टि देश के संसाधनों पर है—के हवाले कर देने तक सीमित रह गया है. मुनाफे की बंदरबांट, लूट और उसके कारण बढ़ती आर्थिक विषमता सामाजिक असंतोष का मूल कारण है. 1857 के संग्राम में जितने लोग अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार लेकर निकले थे, उनसे कहीं बड़ी संख्या आज उन लोगों की है जो ‘नक्सलाइट’ या ‘चरमपंथी’ के रूप में राज्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़े हुए हैं. अपनी असफलता को राज्य कई बार राष्ट्रभक्ति के नाम पर दबाने की कोशिश करता है. उस समय वह खुद को राष्ट्र के पर्याय के रूप में पेश करता है. परिणामस्वरूप राजतंत्र के विरुद्ध उठी आवाजें, राष्ट्र-राज्य के विरुद्ध जंग मान ली जाती हैं. जेएनयू मामले में कन्हैया कुमार के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था.

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक बेहतरीन कविता, देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता.’ बहुत कुछ कह देती है—‘इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/कुछ भी नहीं है/न ईश्वर/न ज्ञान/न चुनाव….जो विवेक/खड़ा हो लाशों को टेक/वह अंधा है/जो शासन/चल रहा हो बंदूक की नली से/हत्यारों का धंधा है.’ राष्ट्रभक्ति के नाम पर नारेबाजी करने वाले लोगों को भी समझना चाहिए कि राष्ट्र का अभिप्राय नदी-नाले, सागर, पहाड़, विशाल भूक्षेत्र या कल-कारखाने तक सीमित नहीं है. न ही वह केवल इतिहास, संस्कृति और सीमाओं के बोध का नाम है. यह बोध तो हम भारतवासियों को हजारों वर्षों से रहा है—उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्/वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः‘(विष्णुपुराण). धर्मशास्त्रों की दृष्टि से हम अलबेले हैं. यदि इन्हीं से सच्ची राष्ट्रभक्ति उत्पन्न होती तो हम संभवतः कभी गुलाम न होते. कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. उनके सामूहिक सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक बोध से बनता है. देश से प्रेम करने के लिए एक-दूसरे से प्रेम और परस्पर भरोसा करना आवश्यक है. सच्ची देशभक्ति सामाजिक एकता और विश्वास में बसती है. उसके लिए आवश्यक है कि लोगों के मन एक हों. सब एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हों; तथा सुख-दुख में साझा करने को सदैव तत्पर रहते हों.बावजूद इसके राष्ट्रीयबोध की मूल-भूत अनिवार्यता के रूप में जिस चीज को हम आरंभ से ही उपेक्षित करते आए हैं, वह है सामाजिक एकता और समानता. सत्ता-शिखर पर बैठे मुट्ठी-भर लोग अपने ही समाज के बहुसंख्यक लोगों का, उन्हें उनके न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर, कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर, शोषण करते आए हैं. नतीजा यह हुआ कि भारतीय समाज आरंभ से ही छोटे-छोटे वर्गां में बंटा रहा. जिनके पास शक्ति थी, साधन थे, उनके अपने स्वार्थ प्रबल थे. उसके लिए वे हर आक्रमणकारी से समझौता करते रहे. और जो समाज के लिए कुछ कर सकते थे, जिनके पास संख्याबल था. जो ईमानदार और मेहनती थे, उन्हें लगातार दुत्कार कर, उनके मनोबल को खंडित किया जाता रहा. परिणामस्वरूप इतना बड़ा देश इतिहास के कुछ हिस्सों को छोड़कर शायद ही कभी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा हो. छोटे-छोटे राज्यों के बीच वर्चस्व का संघर्ष हमेशा रहा है. बाहर के मुल्कों में देश की छवि यदि बनी तो बौद्ध धर्म के कारण, जो विभिन्न समुदायों के बीच एकता और समानता का संदेश लेकर दुनिया-जहान तक पहुंचा था. उसका संदेश था कि व्यक्ति का चरित्र और सदाचरण उसे लोक-प्रतिष्ठित बनाता है.

कोरा राष्ट्रवाद वर्चस्वकारी सत्ताओं का सबसे बड़ा पाखंड है. नागरिकों को भुलावे में रखने के लिए स्वार्थी सत्ताएं सदैव यह चाहती हैं कि लोग राज्य को, जो महज राजनीतिक संस्था है, राष्ट्र का पूरक और पर्याय माने रहें. ताकि वे अपने प्रत्येक फैसले को राष्ट्र का निर्णय बताकर, उसे बहस और आलोचना के दायरे से बाहर रख सकें. वे हमेशा यह समझाने में लगी रहती हैं कि लोगों के हित केवल और केवल उन्हीं के मार्गदर्शन में सुरक्षित हैं. उनकी कोशिश राष्ट्रभक्ति को धर्म बना देने की होती है. कदाचित इसीलिए सैमुअल जानसन ने देशभक्ति को ‘बदमाशों का अंतिम आश्रय’(Patriotism is the last refuge of a scoundrel) माना है. थोड़े परिवर्तन के साथ ऑस्कर वाइल्ड ने भी दुहराया था, ‘देशभक्ति शातिरों का गुण है’(Patriotism is the virtue of the vicious). राष्ट्रीयताबोध स्वतंत्र नागरिक चेतना में बसता है. परिपक्व राष्ट्रीयताबोध के लिए आवश्यक है कि लोग अपने अधिकारों तथा दूसरे के अधिकारां का भी सम्मान करें. इसके लिए राज्य का स्वयंप्रभुता संपन्न होना आवश्यक नहीं है. परतंत्र राज्य में भी मुखर राष्ट्रीयताएं पनपती रही हैं. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. सोवियत संघ में अनेक राज्य प्रभुतासंपन्न राज्य नहीं थे. परंतु उनके नागरिकों के हृदय मैं तीव्र राष्ट्रीयताबोध हिलोर मारता था. सोवियत राज्य ने उसे उपेक्षित रखा, जिसका दुष्परिणाम उसके विघटन के रूप में सामने आया. राष्ट्रीयताबोध के मूल में सांस्कृतिक चेतना और एैक्य-भाव अनिवार्य है. क्या भारतीय समाज के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?

विद्वान भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता की निरंतर दुहाई देते रहे हैं. इसके लिए वे महाकाव्यों और होली, दीपावली जैसे त्योहारों का नाम लेते हैं. तर्क देते हैं कि महाकाव्य देश के सभी भागों में पढ़े-पढ़ाए जाते हैं, होली, दीपावली जैसे त्योहार सभी जगह प्रचलित हैं, इसलिए यह देश भू-सांस्कृतिक इकाई यानी एकराष्ट्र है. जबकि महाकाव्यों में, होली, दिवाली जैसे त्योहारों के मूल में जो विश्वास है, वह स्वयं विरोधाभासी है. लोकतंत्र की कसौटी पर न तो महाकाव्य खरे हैं, न ही इन त्योहारों की अंतर्कथाएं. किसी न किसी रूप में वे सभी धर्म-केंद्रित राजतंत्र का समर्थन करते हैं. जिसमें निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं. लोकतांत्रिक विमर्श के लिए वहां कोई गुंजाइश नहीं होती. इसलिए उसके सहारे विकसित संस्कृति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता का समर्थन करने लगती है. धर्म और राष्ट्रवाद की कई विशेषताएं एक-दूसरे से मेल खाती हैं. दोनों में एक अपेक्षाकृत आधुनिक अवधारणा है. दूसरी लगभग तीन सहस्राब्दी पुरानी. दोनों की ही खूबी है कि वे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की दुश्मन हैं. उनके चयन में मनुष्य का अपना कोई योगदान नहीं होता. अधिसंख्यक मामलों में दोनों जन्म के साथ थोप दी जाती हैं.

राष्ट्रवाद का नकार राष्ट्रप्रेम का नकार नही है. वह राष्ट्रभक्ति के नाम पर मनमानी, उग्रता, पक्षपात तथा एकाधिकार की भावना का नकार है. राज्य की असफलता है कि वह अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि वह संकट में उसके साथ है. इससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों में वृद्धि हुई. हताश राज्य शांति-व्यवस्था के नाम पर कानून की ताकत का तरह-तरह से इस्तेमाल करता है. हाल का अदालती निर्णय भी इसी दिशा में जाता है. इन दिनों भारत में झंडा उठाऊ राष्ट्रवाद का बोलबाला है. उसके नाम पर शोर-शराबा वे लोग कर रहे हैं जिनके पास ताकत है. साथ में सत्ता का समर्थन. सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए जो समाज को अर्से से अपनी तरह हांकते आए हैं. ऐसे लोगों का ‘राष्ट्रवाद’ आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और नागरिकता के मानकों के अनुरूप हो. छदम् राष्ट्रवाद का झंडा उठाए वे दिखाना चाहते हैं कि वे बाकी लोगों से बेहतर हैं. उसमें समानता और स्वतंत्रता से अधिक बल और आक्रामकता प्रभावी होते हैं. यदि राज्य ऐसे ही राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है तो स्थिति उन लोगों के प्रति अन्यायकारी हो जाती है, जिनका राष्ट्रीयताबोध समानता, नैतिकता, स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र जैसे मूल्यों से बना है. यही कसौटी देशप्रेम पर भी लागू होती है. देशभक्ति का अभ्रिप्राय राज्य की प्रत्येक गतिविधि को गर्व की निगाह से देखना नहीं है. इसके लिए आलोचनात्मक विवेक अनिवार्य है. राष्ट्र के प्रति अनुराग तभी तक उचित है, जब तक नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका राष्ट्र समानता, स्वतंत्रता और मानवीय आदर्शों का सम्मान करते हुए उन्हें पाने के लिए सतत प्रयत्नशील है. यदि उन्हें लगता है कि उनका राष्ट्र मानवीय आदर्शां को भुला चुका है, तो नागरिकों को ऐसे राष्ट्र से शिकायत करने, यहां तक कि उससे घृणा करने अधिकार भी प्राप्त होता है. यह जिम्मेदारी राज्य की है कि वह ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न होने दे, जिससे नागरिकों को अपने ही राष्ट्र-राज्य के विरोध हेतु मुखर होना पड़े.

—ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. Imagine there’s no countries/It isn’t hard to do/Nothing to kill or die /And no religion too/Imagine all the people/Living life in peace You may say that I’m a dreamer/But I’m not the only one/I hope someday you’ll join us/And the world will be as one.―John Lennon, Imagine.
  2. उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्।

वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः।।

गायंति देवाः किल गीतिकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद—मार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।।

   (वह देश जो महासागर के उत्तर में बसा है, जिसके दक्षिण में हिमगिरि विद्यमान है. उसी का नाम भारतवर्ष है, वहां बसनेवाले भरत के वंशज हैं/देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्मे लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।/हे देवी पृथ्वी! आप समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली हैं, पर्वतरूपी स्तनों से सुशोभित हैं तथा भगवान विष्णु कि आप पत्नी हैं, आपको पैरों से स्पर्श करने के लिए मैं क्षमा चाहता हूं. विष्णुपुराण.)

 

 

 

महाज्ञानी पूर्ण कस्सप

सामान्य

भारत के अनीश्वरवादी चिंतकएक

(पहला भाग)

बौद्ध ग्रंथ ‘दीघ निकाय’ में भी पूर्ण कस्सप को अहेतुवादी बताया गया है. यानी ऐसा व्यक्ति जो किसी कार्यकारण संबंध को नहीं मानता. तदनुसार ‘सृष्टि’ केवल स्वयं की सृष्टि है. उसके पीछे न तो कोई नियंता है, न किसी की सुनियोजित योजना. यानी वह न तो किसी का कार्य है, न ही कारण. यदि उसमें कुछ तारतम्य है, उसकी कुछ अर्थवत्ता है, तो वह स्वयं सृष्टि की कलाकारी है. जब कोई इतर कारण नहीं, कोई इतर उद्देश्य और योजना भी नहीं, तब अच्छा या बुरा, जो है वह स्वयं सृष्टि का कार्य है. उसके लिए स्वयं सृष्टि जिम्मेदार है. मनुष्य भी सृष्टि का उपहार है. अतएव सृष्टि की भांति वह भी अपने कर्म में स्वतंत्र है. वह न तो किसी दैवी सत्ता के अधीन है, न ही उससे अनुप्रेत. वह सीधीसादी अनीश्वरवादी विचारधारा थी, जो उस समय के प्रचलित ब्राह्मणवादी दर्शनों तथा तद्विषयक कर्मकांडों का पूरी तरह निषेध करती थी. चूंकि वह सृष्टिनिर्माण के पीछे किसी भी दैवी सत्ता का हाथ होने से इन्कार करती तथा पदार्थ को ही सबकुछ मानती थी, इसलिए उसे भौतिकवादी विचारधारा भी कहा जाता है. एकमात्र पूर्ण कस्सप उसके प्रवर्त्तक नहीं थे. भौतिकवादी विचारधारा इस देश की समृद्ध और विकासमान चितंन शैली रही है. एक समय था जब उसे पर्याप्त लोकसमर्थन प्राप्त था. बुद्ध पूर्व भारत में तो वह समानांतर चिंतन शैली थी, जिसने अपने समय की सभी प्रमुख विचारधाराओं को चुनौती दी. फलस्वरूप उसका प्रभाव आने वाले 1500 वर्षों तक बना रहा.

बावजूद इसके पूर्ण कस्सप को अहेतुवादी तक सीमित कर देना, मेरी राय में संकुचित दृष्टिकोण है. किसी चीज को समग्रता में जानने की कोशिश करने के बजाए टुकड़ेटुकड़े में जानना; या ज्ञानार्जन की अपनी सीमाओं को वस्तु की सीमा घोषित कर देने जैसा. ‘अहेतुवाद’ कार्यकारण संबंध को नकारता है. मानता है कि जीवन या वस्तु अपने आप में स्वतः प्रमाण है. हर कार्य का कोई कारण होता है, इस संबंध को वह स्वीकार नहीं करता. दूसरी ओर हेतुवादी मानता है कि हर चीज का कोई न कोई ‘हेतु’ होता है. आग है तो धुंआ होगा ही. या धुंआ है तो आग होगी ही. क्योंकि आग और धुंआ दोनों एकदूसरे के हेतु हैं. लेकिन ध्यान से देखा जाए तो यह जीवन या किसी और वस्तु के प्रति दृष्टि और सोच की सीमा को दर्शाते हैं. दृष्टि की सीमा होती है कि वह एक समय में किसी वस्तु के एक ही पक्ष को देख पाती है. हमारे सामने सिक्के का या तो ‘हेड’ होता है अथवा ‘टेल’. इसी तरह मेज, कुर्सी, पंखा, कूलर, गिलास, केतली यानी कोई भी वस्तु कभी भी पूरी की पूरी हमारे सामने नहीं होती. दूसरे पक्ष को देखते समय पहला पक्ष पीछे चला जाता है. वस्तु को पहचानने का बाकी काम मस्तिष्क को करना पड़ता है. दृष्टि की सीमा को वस्तु की सीमा नहीं माना जा सकता. बीज वृक्ष का कारण नहीं, विकास प्रक्रिया का आरंभिक पड़ाव है. इस आधार पर पूर्ण कस्सप को मैं आदि विकासवादी कहना पसंद करूंगा.

पूर्ण कस्सप ही क्यों, जो भी अनीश्वरवाद में विश्वास रखता है, मेरी राय में वह मूलतः विकासवादी है. इसका समर्थन वही कर सकता है, जिसे इस वस्तुजगत की वास्तविकता में भरोसा हो. जिसे सपने और संकल्प की दूरी को कम करने का हुनर आता हो. अधिकांश अनीश्वरवादी दार्शनिक समाज के उस वर्ग से आए थे, जिसे अपने श्रम पर भरोसा था. जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाते हुए जीने का अभ्यासी था. खुद को कर्मकांडों में उलझाने की जिसे फुर्सत न थी. ब्राह्मण उसे धर्मशिक्षा के लिए अयोग्य मानता था. तो अपने श्रमकौशल पर गर्वाया, स्वाभिमान से भरपूर वह वर्ग भी यज्ञादि कर्मकांडों को आडंबर कहकर नकार देता था. उस समय के प्रमुख अनिश्वरवादी विचारकों में पूर्ण कस्सप के अलावा मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्ठिपुत्त आदि सम्मिलित थे. सृष्टि के पीछे किसी भी प्रकार की परामानवीय सत्ता के अस्तित्व से इन्कार करने के कारण वे ब्राह्मणवादी पुरोहितों के अलावा जैन और बौद्ध परंपरा के विचारकों के भी निशाने पर थे. इसे भारतीय भौतिकवादी चिंतन की विडंबना ही कहा जा सकता है कि अपने समय की महत्त्वपूर्ण विचारधारा होने के बावजूद उस परंपरा का कोई स्वतंत्र ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. उनके बारे में जानने के लिए हमें जैन और बौद्ध ग्रंथों पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

बौद्ध ग्रंथों में पूर्ण कस्सप को संघ आचार्य, तीर्थंकर, अनुभवी विचारक, नए मत का संस्थापक आदि कहा गया है. ‘सामञ्ञफल सुत्त’ में अजातशत्रु और बुद्ध के बीच संवाद का उल्लेख है. संवाद जिस रूप में है, वह वास्तव में उसी रूप में हुआ होगा, यह दावा नहीं किया जा सकता. क्योंकि बौद्ध ग्रंथों में लगभग एक जैसे वार्तालाप को अलगअलग समय में भिन्नभिन्न व्यक्तियों के साथ हुआ बताया गया है. संवाद का ध्येय प्रचलित भौतिकवादी विचारधाराओं तथा बौद्ध दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है. न ही उसे किसी चर्चा को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाने की नीयत से शुरू किया गया है. हर प्रसंग में एकतरफा निर्णय लेते हुए भौतिकवादी विचारधारा के सापेक्ष बौद्ध दर्शन को श्रेष्ठतर ठहरा दिया जाता है. इस तरह की चर्चा अलगअलग कालखंड में लिखे गए धर्मग्रंथों में प्राप्त होती है. उनमें जैन और बौद्ध दोनों ही धर्मों के ग्रंथ सम्मिलित हैं. उनमें चर्चा का स्वरूप तो बदलता है, परंतु अनीश्वरवादी दार्शनिक वही रहते हैं. इससे दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. पहला उनकी ऐतिहासिकता को लेकर. यह कि भारत में भौतिकवादी चिंतन की समृद्ध परंपरा थी. और दूसरा निष्कर्ष यह कि लोगों पर उसका गहरा प्रभाव था. अच्छीखासी संख्या उनके समर्थकों की थी. इससे यह भी सिद्ध होता है कि बौद्ध एवं जैन दर्शन को अनिश्वरवादी विचारधारा की चुनौती लंबे समय तक झेलनी पड़ी थी. जिन अनीश्वरवादी दार्शनिकों का नामोल्लेख ऊपर किया है, सभी बुद्ध के समकालीन थे. मक्खलि गोसाल और पूर्ण कस्सप तो बुद्ध के बुद्धत्व प्राप्त करने से पहले ही पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके थे. जैन परंपरा में उसे ‘जिन्’ ऐसा महापुरुष जो अपनी इंद्रियों पर अनुशासन करता हो—बताया गया है. पूर्ण कस्सप के साथ जुड़ा ‘पूर्ण’ ज्ञान की संपूर्णता का संकेतक है. ‘दीघनिकाय’ के ‘सामञ्ञफल सुत्त’ के अनुसार मगध सम्राट अजातशत्रु पूर्ण कस्सप के विचारों तथा उनसे अपनी असंतुष्टि का जिक्र गौतम बुद्ध के समक्ष करता है. बदले स्थान तथा पात्रों के साथ अनिश्वरवादी धारा के विचारकों को लेकर इसी तरह की चर्चा ‘संयुत्तनिकाय’ में भी हैं. अंतर केवल इतना है कि ‘दीघ निकाय’ में संवाद अजातशत्रु और गौतम बुद्ध के बीच दिखाया गया है तो ‘संयुत्तनिकाय’ में गौतम बुद्ध और कोसलाधिपति पसेनदि के बीच चर्चा है. स्थान भी बदला हुआ है. तथापि मंतव्य वही है, जो ‘सामञ्ञफल सुत्त’ का है. इसी प्रकार का संवाद बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के करीब पांच सौ वर्ष बाद रचे गए बौद्ध ग्रंथ ‘मिलिंद प्रश्न’ में उद्धृत हुआ है. वहां चर्चा बौद्ध आचार्य नागसेन तथा सम्राट मिलिंद के बीच है. पांच शताब्दी बाद भी पूर्ण कस्सप आदि भौतिकवादी दार्शनिकों का नामोल्लेख दर्शाता है अनिश्वरवादी विचारधारा उस समय भी चुनौती की अवस्था में थी.

सामञ्ञफल सुत्त’(दीघनिकाय) में पूरा प्रसंग सिलसिलेवार दिया है. एक बार अजातशत्रु अपने दरबार में विराजमान थे. रात्रि का समय, पूर्णिमा की चांदनी दिगदिगंत तक फैली हुई थी. अचानक अजातशत्रु के मन में आया कि खाली समय का सदुपयोग तत्वचर्चा हेतु किया जाए. कुछ अंतरग दरबारी उस समय भी उनके साथ थे. वह वैचारिक क्रांति का युग था. जीवन और सृष्टि के रहस्यों को जानने के लिए पूरी दुनिया में उत्साह था. लोग अपनीअपनी तरह से सत्य तक पहुंचना चाहते थे. समाज में श्रमणों और यायावर मुनियों की प्रतिष्ठा थी. बड़े से बड़ा सम्राट उनकी अवज्ञा करने से घबराता था. तो अंतिम सत्य तक पहुंचने के नाम पर वैदिक परंपरा में मोक्ष की अवधारणा थी. मगर मोक्ष तभी संभव था, जब जीवन से मुक्ति हो. कुछ अपवाद छोड़ दिए जाएं तो जीवन चाहे जैसा भी हो, सभी को प्रिय होता है. बुद्ध द्वारा निर्वाण की संकल्पना जीवन की इच्छा और मुक्ति के बीच संतुलन की भावना को दर्शाती थी. वह मध्यम मार्ग था. जीवन(देह) को ही सबकुछ मानने वालों(अनीश्वरवादी) तथा जीवन को कुछ भी नहीं मानते हुए मोक्ष को महत्त्व देने वाले परंपरावादी पुरोहितों के बीच का रास्ता. बुद्ध पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे. उनका मानना था कि जिस प्रकार भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, ऐसे ही सम्यक आचरण द्वारा मनुष्य इसी जन्म में दुख से हमेशा के लिए निवृत्ति प्राप्त कर सकता है. निर्वाण यानी विरक्ति का आनंद. संसार में रहते हुए उसके दुखक्लेश से सदासर्वदा के लिए निवृत्ति. ’सामञ्ञफल सुत्त’ में अजातशत्रु की जिज्ञासा निर्वाण को समझने की शुरुआती कड़ी है. अजातशत्रु की जिज्ञासा बहुत सरल है. वह जानना चाहता है कि जैसे शिल्पकार को कर्म का अवदान इसी जीवन में प्राप्त हो जाता है, क्या उसी प्रकार श्रामण्य जीवन का फल भी इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है? जिज्ञासा के समाधान के लिए वह कई प्रतिष्ठित विचारकों से चर्चा कर चुका था, मगर उसे संतुष्टि न थी.

दरबारियों के बीच अजातशत्रु के यह पूछने पर कि तत्व चर्चा के लिए किसके पास चला जाए एक अमात्य ने छूटते ही कहा—‘‘महाराज पूर्ण कस्सप के पास चलिए. वह गणस्वामी, गणाध्यक्ष, यशस्वी, तीर्थंकर(मतसंस्थापक), प्रज्ञाशील, अनेकानेक शिष्यों वाला, वयोवृद्ध, चिरसाधक, सुगत और परम ज्ञानी है. उसके साथ अध्यात्मचर्चा से आपको अवश्य ही संतुष्टि मिलेगी.’’ अजातशत्रु उस सलाह को नजरंदाज कर देता है. उसके बाद बाकी अमात्य एकएक कर मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्ठिपुत्त और निगंठ नाथपुत्त का नाम लेते हैं. निगंठ नाथपुत्त महावीर के लिए आया है. जो आगे चलकर जैन दर्शन के प्रवर्त्तक बने और 24वें तीर्थंकर कहलाए. जैसा हमने शुरू में ही कहा, यहां ‘दीघनिकाय’ के लेखक का ध्येय पूर्ण कस्सप के तत्वदर्शन के बारे में बताना नहीं है. उसका वास्तविक ध्येय तत्कालीन लोकप्रिय धर्मदर्शनों के बीच बुद्ध के दर्शन को प्रतिष्ठित करना है.

राजमंत्रियों की सलाह की उपेक्षा के पश्चात जीवक का नंबर आता है. उस समय गौतम बुद्ध राजवैद्य जीवक के जेतवन में अपने 1250 शिष्यों के साथ ठहरे हुए थे. जीवक अजातशत्रु को बुद्ध से मिलने की सलाह देता है. बुद्ध की प्रशस्ति करते हुए वह कहता है—‘‘वे सम्यक संबुद्ध, सुगत, लोकसिद्ध, सभी विद्याओं और सदाचरण से समृद्ध, अनुपम शास्ता, परमपज्ञ महात्मा हैं और इस समय मेरे ही आम्रकुंज में अपने शिष्यों के साथ विहार कर रहे हैं. उनकी कीर्ति और यशगाथा दिगदिगंत व्याप्त है. ऐसे परमप्रज्ञ महात्मा बुद्ध से तत्व चर्चा के उपरांत आपको अवश्य ही शंाति मिलेगी. आप उसी ओर प्रस्थान कीजिए.’’ जीवक की बात मानकर अजातशत्रु अपने हाथी पर सवार होकर दलबल के साथ बुद्ध से मिलने के लिए चल देता है. उसके साथ पांच सौ हथनियों पर सवार उसकी इतनी ही रानियां तथा पांच सौ सैनिकों का काफिला है.

यहां बौद्ध विद्वानों के लेखकीय कौशल की प्रशंसा करनी होगी. प्रसंग और प्रतीकों में अद्भुत तालमेल को बनाए रखते हैं. इतना कि दृश्यअदृश्य हर घटना से उनके लक्ष्य की पुष्टि होती है. श्रामण्य जीवन की सर्वोच्चता दर्शाने के लिए न केवल बुद्ध से आमनेसामने के संवाद की मदद ली जाती है, बल्कि परिस्थितियां भी ऐसी रची जाती हैं, जिनसे श्रामण्य जीवन के आगे राजसी वैभव महत्त्वहीन सिद्ध हो. ‘सामञ्ञफल सुत्त’ के अनुसार बुद्ध के पास जाते समय अजातशत्रु के साथ पांच सौ हथनियों पर सवार उसकी 500 पत्नियां के अलावा इतने ही सैंनिक साथ होते हैं. तत्वज्ञान के जिज्ञासु को इतने दलबल के साथ जाने का औचित्य? इससे दो चीजों की ओर संकेत किया गया है. पहला अजातशत्रु के मन में पैठा भय. उसने मगध की सत्ता अपने पिता से छीनी थी. मन में कहीं न कहीं यह आशंका भी छिपी होगी कि उसकी भांति कहीं उसका बेटा भी उसे पदच्युत करके सत्ता पर कब्जा न कर ले! कदाचित वह अपने बेटे की आंखों में मगध सत्ता के प्रति आकर्षण को पढ़ चुका था. इसलिए बेटे को सांसारिक रागविराग से मुक्त देखना चाहता था. जेतवन में अजातशत्रु जब, ‘निर्मल जलाशय के समान शांत, उदार, 1250 भिक्षुओं के बीच देदीप्यमान परम शास्ता को देखता है तो उसे तत्क्षण अपना बेटा याद आता है. यह भूलकर कि वह बुद्ध के पास अपनी जिज्ञासा के साथ आया है, वह अपने बजाए बेटे के लिए शांति की कामना करने लगता है—‘वाह! क्या बात है. क्या इसी प्रकार की शांति मेरे पुत्र उदयभद्र को भी प्राप्त हो सकती है?’ आगे उसे कामना करता हुए दिखाया गया है, ‘मेरा पुत्र उदयभद्र भी इसी शांति को प्राप्त करे.’ यह राजपरिवारों में पलने वाले भय और षड्यंत्रों से जन्मी कल्पना थी, जिनसे उसका सामना जन्म से ही होने लगा था. कहते हैं कि जब वह गर्भ में था, तब उसकी मां के मन में मानवमांस खाने की विचित्रसी इच्छा ने जन्म लिया था. इस बारे में जब ज्योतिषियों से विचार किया गया तो उन्होंने बताया कि जातक अपने पिता के लिए अशुभ होगा. ऐसे प्रसंग सच न भी हों तो भी रूढ़िवादी मान्यताओं के चलते जोड़ दिए जाते हैं. क्योंकि आगे चलकर अजातशत्रु ने पिता से मगध का राज्य हड़प लिया था. अब उसे भय था कि उसका बेटा भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार कर सकता है, जैसा उसने अपने पिता के बिंबसार के साथ किया था. पुत्र उदयभद्र को बुद्ध की शरण में भेजने की अप्रत्यक्ष कामना उसी भय की ओर इशारा करती है.

इतिहास में अजातशत्रु की चर्चा वैभवशाली सम्राट के रूप में होती है. अपने पराक्रम द्वारा उसने काशी, कोशल, वैशाली तथा उसके आसपास बसे 36 गणराज्यों पर विजय प्राप्त की थी. इतने वैभवशाली सम्राट का 500 पत्नियों और सैनिकों के साथ बुद्ध से मिलने के इतर उद्देश्य भी हैं. अध्याय का शीर्षक ‘सामञ्ञफल सुत्त’(श्रमण जीवन का फल) है. जब वह बुद्ध से मिलने पहुंचता है तो उनके साथ 1250 शिष्यों की मंडली है. अजातशत्रु अशांत और संशयशील है. अनेक आशंकाएं और भय उसे घेरे हुए हैं. दूसरी ओर बुद्ध तथा उनके शिष्य ‘निर्मल जलाशय के समान शांत’ हैं. अपनी प्रतीकात्मकता में यह घटना धर्मसत्ता के आगे राजसी धनवैभव को गौण ठहराती है. इस अनुपात को ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी कायम रखा गया है. समय के साथ बौद्ध जीवन की बढ़ी लोकप्रियता को अनुरूप ‘मिलिंद प्रश्न’ में भिक्षुओं की संख्या में उसी अनुपात में वृद्धि दर्शायी गई है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मिलिंद प्रश्न’ में पांच शताब्दियों का अंतराल है. यह अंतराल मिलिंद और नागसेन के स्तर पर भी दिखता है. मिलिंद के साथ पांच सौ यवन सैनिकों के अतिरिक्त आवश्यक सैन्य बल है. जबकि नागसेन के साथ उसके 80000 शिष्य. परोक्ष रूप में यह भी राजसी जीवन के बरक्स श्रामण्य जीवन को श्रेष्ठता को दर्शाने का लेखकीय कौशल है. ऐसी प्रतीकात्मकता का ध्यान दूसरे प्रसंगों में भी रखा गया है.

पूर्ण कस्सप के तत्व दर्शन की झलक अजातशत्रु और बुद्ध की चर्चा के दौरान प्राप्त होती है. बुद्ध को अभिवादन करने के उपरांत अजातशत्रु परमशास्ता के समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है—वह जानना चाहता है कि जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मों, उद्यमों यथा लौहकर्म, काष्ठकला, अश्वारोहण, रंजक, बावर्ची, हज्जाम, मालाकार, योद्धा आदि को उनके कर्म का फल इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है, क्या श्रमण जीवन के फल को भी इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है? उत्तर देने से पूर्व बुद्ध इस बारे में बाकी आचार्यों के मत को जान लेना चाहते हैं—‘‘यदि आपको आपत्ति न हो तो बाकी श्रमणों ने जो उत्तर दिया, वह बताइए?’’

अजातशत्रु सबसे पहले पूर्ण कस्सप के बारे में बताता है—‘‘भंते! एक बार मैं पूर्ण कस्सप के पास गया. उनके पास जाकर मैंने अपना यही प्रश्न दोहराया कि जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मों, उद्यमों आदि का फल इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है. उसी प्रकार क्या श्रामण्यजीवन का सुफल भी इसी जन्म में संभव है?’’ अजातशत्रु आगे बताता है—‘‘मेरे प्रश्न के उत्तर में पूर्ण कस्सप ने कहा—‘महाराज कार्य करतेकराते. छेदन करतेकराते, पकातेपकवाते, सैंध करतेकराते, गांव लूटते, चोरी करते, बटमारी करते, झूठ बोलते, परस्त्रीगमन करते, किसी की देह को तेज छुरे के प्रहार से टुकड़ाटुकड़ा करते, करवाते जैसे कर्मों से कभी भी पाप का आगमन नहीं होता. दूसरों पर घात करतेकराते, चोरी से दूसरों की फसल काटतेकटवाते गंगा के दक्षिण जाने पर भी पाप का आगमन नहीं होता. न ही दान देतेदिलाते, यज्ञ करतेकराते, गंगा के उत्तरवत्ती तट पर जाने से पुण्य की प्राप्ति होती है. दान, धर्म, सत्कर्म, परोपकार आदि में भी न तो पुण्य है, न ही पुण्य का आगम.’’ अंत में अजातशत्रु पूर्ण कस्सप के बारे में अपना निर्णय सुनाता है—‘‘इस तरह पूर्ण कस्सप ने मेरे प्रश्न का उत्तर घुमाफिराकर दिया. जैसे पूछा कटहल के बारे में जाए और कोई आम की विशेषताएं बताने लगे. कोई जामुन के बारे में सवाल करे और बताने वाला केले के गुणों का बखान करने लगे, ऐसा ही व्यवहार पूर्ण कस्सप ने किया. इसलिए बिना सहमति या असहमति दर्शाए, उन्हें प्रणाम कर मैं वहां से चुपचाप लौट आया.’’

आगे अजातशत्रु बारीबारी से अजित केशकंबलि, मक्खलि गोशाल, संजय वेल्ठिपुत्त, निगंठ नाथपुत्त तथा पुकुद कात्यायन से अपनी धम्म चर्चा के बारे में बताता है. प्रत्येक प्रसंग के बाद मिलेजुले शब्दों में वह अपनी निराशा को व्यक्त करता है. उस समय तक पाठक लेखक की मंशा को समझने लगता है. वह जान लेता है कि लेखक का उद्देश्य बौद्ध मत और भौतिकवादी विचारधाराओं के बीच संवाद करना नहीं है. वास्तविक उद्देश्य अजातशत्रु को बौद्ध धर्म से प्रभावित होते दर्शाना है. यथा राजा, तथा प्रजा—अजातशत्रु जैसा सम्राट बौद्ध धर्म को अपनाएगा, तो बाकी प्रजा भी उसकी ओर आकर्षित होगी. अपने धर्म और विचारधारा को जनजन तक पहुंचाने की कामना न जो अनुचित है, न ही असंभव. बल्कि आवश्यक भी है. इसी से विचारधाराओं के बीच संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और नए रास्ते निकलते हैं. जो बातचीत हम कर रहे हैं, उसका रास्ता भी इसी तरह निकला है. इसके लिए हम बौद्ध और जैन विद्वानों के ऋणी हैं, क्योंकि इस बहाने हम उन अनीश्वरवादी दार्शनिकों के बारे में जान पाते हैं जिन्होंने उस दौर में ब्राह्मणवादी विचारधाराओं को चुनौती दी थी, जब वह कदाचित सबसे संगठित अवस्था में था. हालांकि उसके साथसाथ कुछ स्वाभाविक प्रश्न भी खड़े हो जाते हैं. बुद्ध ने वैदिक धर्म की परंपरा का भी विरोध किया था. वे कर्मकांड और आडंबरवाद को नकारते हैं. बलि प्रथा की उन्होंने कठोर शब्दों में निंदा की थी. ध्यातव्य है कि यज्ञों के दौरान बलिप्रथा का जोर इतना था कि एक साथ सैकड़ों पशुओं की बलि चढ़ा दी जाती थी. उस समय की अर्थव्यवस्था का आधार या तो खेती थी, या पशुधन. यज्ञबलि द्वारा पशुधन की हानि किसान तथा व्यापारी सभी को उठानी पड़ती थी. बुद्ध द्वारा बलि प्रथा के बहिष्कार द्वारा उनका प्रचार उन वर्गों में भी तेजी से हुआ, जिनकी अर्थव्यवस्था खेती या पशुधन से जुड़ी थी. यज्ञ आदि कर्मकांडों का बहिष्कार करने वालों में भी वही जातियां आगे थीं. अजित केशकंबलि का तो जन्म ही गोपालक परिवार में हुआ था. मक्खलि गोशाल का जन्म गोशाला में हुआ था. भौतिकवादी चिंतन के इतिहास में इन सबका प्रतीकात्मक महत्त्व है. ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि कर्मकांड, आडंबरवाद और बलिप्रथा की आलोचना करते समय बुद्ध(बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, जो उनके निर्वाण प्राप्ति के शताब्दियों बाद उनके अनुयायियों द्वारा रचे गए. जिनमें बुद्ध के ब्राह्मणीकरण का प्रयास साफ नजर आता है) एक भी ब्राह्मणवादी विचारकलेखक का नाम नहीं लेते. जबकि भौतिकवादी चिंतकों की आलोचना उनके नाम के साथ अनेक बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में है. उस समय वे पूरी तरह व्यैक्तिक हो जाते हैं. आखिर क्यों? कारण कुछ भी हो सकता है. बल्कि एक नहीं कईकई कारण हो सकते हैं. यहां कुछ संभावनाओं पर हम विचार करेंगे—

ब्राह्मणवादी परंपरा के विचारकों का नाम न लेने के पीछे पहला कारण हो सकता कि बुद्ध के समय तक वह कोरे कर्मकांडों और आडंबरों में सिमट चुकी थी. कोई मौलिक दार्शनिक था ही नहीं. जो थे, वे सामाजिक हलचल से दूर, एकांत ज्ञानसाधना में लीन रहते थे. बाकी मुख्यतः पुरोहित वर्ग से आते थे, जिसका काम परंपरा की लकीर पीटना था. ध्यान से देखा जाए तो वैदिक मेधा का ढलान ऋग्वेद के बाद से ही आरंभ चुका था. ब्राह्मण आचार्यों को अपनी उस कृति पर गर्व था. इतना गर्व कि उसे सहेजने की चिंता उन्हें सताए रहती थी. चूंकि लेखन कला का पूरी तरह विकास नहीं हुआ था, इसलिए ज्ञान को सहेजने तथा उसे अगली पीढ़ियों तक अंतरित तरने का कार्य पूर्णतः स्मृतिकेंद्रित था. सामवेद की रचना ऋग्वेद की ऋचाओं को कंठस्थ करने तथा सस्वर गायन के उद्देश्य से की गई. ऋषिगण शिष्यों को ऋचाएं कंठस्थ कराते समय अग्नि के आसपास बैठते थे. मौसम की मार, भोजन की जरूरत तथा वन्य पशुओं से रक्षा करने में अग्नि उनकी मददगार थी. अलाव जलाकर बैठने के चलन से ही यज्ञ का विकास हुआ. प्रकारांतर में उसी से यजुर्वेद का. बुद्ध के समय कर्मकांडी धारा प्रबल थी. कदाचित उसे तत्कालीन वैदिक धर्मदर्शन की मुख्यधारा भी मान सकते हैं. दूसरे शब्दों में उन दिनों ब्राह्मणवादी परंपरा में सिवाय कर्मकांडों के ऐसा कुछ था ही नहीं, जिसकी सीधी आलोचना आवश्यक मानी जाती.

दूसरा कारण हो सकता है कि ब्राह्मणवादी परंपरा केवल पुरोहित वर्ग और उनके आश्रयदाता राजघरानों तक सीमित थी. समाज का बहुसंख्यक हिस्सा कमेरी जातियों से संबंधित था, जिन्हें ब्राह्मणवादी वैदिक ज्ञान के लिए अपात्र मानते थे. बुद्धकालीन भारत में जैसे ही व्यापार के अवसर बढ़े, कमेरी जातियां संगठित होने लगीं. उनमें बहुत अच्छे शिल्पकार और मेहनतकश लोग सम्मिलित थे. अपने श्रमकौशल के बल पर उन्होंने समाजार्थिक रूप से खुद को इतना सशक्त कर लिया था कि बाहरी मदद की उन्हें आवश्यकता ही न रही. ज्ञान पर एकाधिकार की कोशिश का कदाचित सबसे सार्थक और सटीक प्रतिकार यही हो सकता था. और यही उन्होंने किया भी था—‘यदि आपके ज्ञान, आपके कर्मकांडों में हमारी ससम्मान हिस्सेदारी संभव नहीं, तो हमें भी उनकी आवश्यकता नहीं है. प्रकृति ने हमें जीवन दिया है, इसलिए वही हमारे लिए सबकुछ है. स्वतंत्र मस्तिष्क दिया है, सो हम उस लकीर को भी नहीं पीटना चाहते, जिसे आप धर्म और परंपरा मानते हैं.’ सातआठ सौ वर्ष पहले कुछ ऐसा ही जवाब संतकवियों ने पुरोहितों और पंडितों को संतकाव्य के रूप में दिया था—‘यदि आपका देवता हमारे स्पर्शमात्र से अपवित्र हो जाता है. तो वह रहे मंदिर में, मूर्त्तियों का कैदी बनकर. सम्मान गंवाकर हम उससे मिलने नहीं आएंगे. हमारा साईं हमारे भीतर है. हम उससे कभी भी संवाद कर सकते हैं. दरअसल एकदूसरे के साथ सहकार और समर्थन ने आजीवकों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया था. भौतिकवादी दर्शनों का उभार इसी आत्मनिर्भरता की देन था. एक समय ऐसा भी था जब आजीवक मक्खलि गोशाल के समर्थकों की संख्या बुद्ध के अनुयायियों से अधिक थी. आजीवक संप्रदायी अपने संख्याबल आधार पर आगे भी बौद्ध एवं ब्राह्मणवादी चिंतकों के लिए चुनौती बने रहे. प्रमाण के लिए हम ह्वेनसांग का बनारस संबंधी विवरण देख सकते हैं. अपनी भारतयात्रा को याद को करते हुए वह लिखता है कि सातवीं शताब्दी के आसपास बनारस में 30 संघाराम थे. उनमें 3000 भिक्षु रहते थे. 100 महादेव मंदिर, उनमें 10000 पुजारियों का वास था. इतने सारे भिक्षुओं और साधुओं की नगरी होने के बावजूद बनारसवासी, मुख्यतः धनी व्यापारी वर्ग धर्म की गिरफ्त से बाहर था. ह्वेनसांग के अनुसार उनमें से कुछ बौद्ध मतावलंबी थे, जबकि अधिकांश अनीश्वरवादी. इससे यह संकेत भी मिलता है कि ब्राह्मणवर्ग का प्रभाव केवल समाज के संपन्न वर्गों तक, जो उनके कर्मकांड का बोझ उठा सकते थे—सीमित था. बाकी हिस्सा आजीवकों तथा नास्तिकों का था. उन्हीं का एक हिस्सा जैन और बौद्ध दर्शनों की ओर आकर्पित हो रहा था. बुद्ध के लिए संख्याबल महत्त्वपूर्ण था. अतएव भिक्षु संघों में अधिक से अधिक व्यक्तियों को सम्मिलित करने के लिए उन्होंने उन वर्गों पर विशेषरूप से जोर दिया, जिन्हें ब्राह्मणवादी चिंतन परंपरा में कोई स्थान प्राप्त न था.

तीसरा कारण भी महत्त्वपूर्ण है. ब्राह्मणवादी साहित्य सामूहिक प्रयासों की देन है. वहां व्यक्तिगत श्रेय के बजाए सामाजिक उद्देश्य के लिए काम करने पर जोर दिया जाता रहा है. उसकी पहचान उसकी समग्रता में है. अनगिनत ब्राह्मण आचार्य, मुनिगण बिना व्यक्तिगत नाम या यश की कामना के, सहस्राब्दियों तक केवल परंपरापोषण का काम करते रहे. ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ आरंभ में, क्रमशः ‘पुलत्स्य वध’ तथा ‘जय’ शीर्षक के अंतर्गत छोटीछोटी कृतियां थीं. उन्हें वर्तमान रूप में लाने में शताब्दियों का समय लगा है. अनेक मनीषियों का योगदान उन्हें मिला है. आज सिवाय ‘वाल्मीकि’ और ‘व्यास’ के किसी और का नाम उनके रचनाकार के रूप में नहीं जानते. नतीजा यह हुआ कि जो वाल्मीकि दो हजार वर्ष पहले ‘रामायण’ के लेखक के रूप में जाने जाते हैं, वही डेढ़ हजार वर्ष पहले लिखे गए महाग्रंथ ‘योगवशिष्ट’ के भी घोषित रचनाकार हैं. यही हाल उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य ब्राह्मण ग्रंथों का है. व्यास को महाभारत, अठारह पुराण, श्रीमद्भागवत आदि का लेखक बताया जाता है. जबकि इन ग्रंथों की रचना शताब्दियों के अंतराल में हुई है. समय के साथसाथ उनमें संशोधनपरिवर्धन होते रहे हैं. यानी मौलिकता की कमी के चलते भी ब्राह्मणवादी विद्वानों का व्यक्तिगत संदर्भ अनावश्यक माना गया.

अनीश्वरवादी दार्शनिकों की भांति वैदिक परंपरा के लेखकोंआचार्यों की आलोचना उनके नामोल्लेख के साथ न करने के पीछे चौथा कारण यह हो सकता है कि ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों और पुरोहितों का तत्कालीन राजनीति और श्रेष्ठिवर्ग पर गहरा प्रभाव था. बुद्ध राजसत्ता और अर्थसत्ता के महत्त्व को भलीभांति समझते थे. जानते थे कि नए धर्म की सफलता समाज के शीर्षस्थ वर्गों के समर्थन के बिना असंभव है. इसलिए सीधे प्रहार से बचते हुए बुद्ध ने दूरंदेशी और कूटनीति से काम लिया. इसमें उन्हें सफलता भी मिली. यह ठीक है कि बौद्ध मठ समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे. किसी भी वर्ग का व्यक्ति उनमें प्रवेश पा सकता था. परंतु इसके आधार पर यह दावा करना कि बुद्ध वर्णव्यवस्था के भी विरोधी थे, अनुचित होगा. लेकिन यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि जाति और वर्ण को लेकर वे उतने कट्टर न थे, जितने ब्राह्मणवादी विचारक. अपने मत के प्रचारप्रसार के लिए बुद्ध ने समाज के सभी वर्गों का आवाह्न किया था. ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों और पुरोहितों का तत्कालीन राजनीति और श्रेष्ठिवर्ग पर गहरा प्रभाव था. वे राजदरबारियों में ऊंची हैसियत रखते थे. यह सोचते हुए कि ब्राह्मण परंपरा के आचार्यों पर सीधा प्रहार उनके आश्रयदाता सम्राटों को नाराज कर सकता है—उन्होंने परोक्ष आलोचना का मार्ग चुना और केवल कर्मकांड तथा यज्ञबलियों की आलोचना की. चूंकि ब्राह्मण पुरोहितों के यज्ञ खर्चीले होते थे और उनका भार राजाओं और सेठों को उठाना पड़ता था, इसलिए समाज के संपन्न वर्गों ने भी बुद्ध के विचारों का जी खोल कर समर्थन किया. यज्ञ बलियों से पशुहत्या में कमी आने लगी. उसका सीधा लाभ श्रेष्ठिवर्ग को पहुंचा. उसी की मदद से आगे चलकर देश की आर्थिक समृद्धि की नई कथा लिखी गई. राजाओं और श्रेष्ठिवर्ग से तालमेल के साथसाथ बुद्ध ने अद्विज वर्गों में भी अपने मत के प्रचारप्रसार पर जोर दिया, जिन्हें शूद्र कहकर किसी प्रकार के धार्मिक कार्यव्यवहार से अलग रखा गया था.

बुद्ध के आरंभिक शिष्यों में लगभग अस्सी प्रतिशत या तो ब्राह्मण थे, अथवा क्षत्रिय. चूंकि बौद्ध ग्रंथों की रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के बाद संपन्न हुई थी. तो पांचवा और महत्त्वपूर्ण कारक यह भी संभव है कि बौद्ध लेखक वर्षों तक बुद्ध के सान्निध्य में रहने के बावजूद, अपने ब्राह्मणवादी संस्कारों को भुला नहीं पाए थे. इसलिए बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के पश्चात जैसे ही उन्हें अवसर मिला, उन्होंने बौद्ध परंपरा का ब्राह्मणीकरण करना आरंभ कर दिया. शुरुआत बुद्ध से ही की. अपने कुल को लेकर बुद्ध को अवश्य ही गर्व रहा होगा. लेकिन उनके जन्म को लेकर बाद में उनके शिष्यों ने जो लिखा, इस बारे में शायद ही उन्होंने कभी कुछ कहा होगा. ‘जातक निदान कथा’ में वर्णन आया है—

‘‘महापुरुष ने जन्म लेने के समय को विचारा….’’ फिर किस द्वीप में जन्म लिया जाए, यह सोचकर मध्य प्रदेश में जन्म लेने का निर्णय किया, ‘‘इसी प्रदेश में बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध, श्रावक, अग्रश्रावक, महाश्रावक, चक्रवर्ती सम्राट तथा दूसरे महाप्रतापी ऐश्वर्यशाली क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य पैदा होते हैं….इसी में कपिलवस्तु नामक नगर है, जहां मुझे जन्म लेना है. फिर कुल का विचार करते हुए सोचा, ‘बुद्ध वैश्य या शूद्र कुल में उत्पन्न नहीं होते. लोकमान्य क्षत्रिय या ब्राह्मण इन्हीं दो कुलों में उत्पन्न होते हैं. आजकल क्षत्रिय ही लोकमान्य है. इसीलिए इसमें जन्म लूंगा….राजा शुद्धोधन मेरा पिता होगा.’’(बुद्धचरिय, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-1).

ऐसे वर्णन बौद्ध साहित्य में भरे पड़े हैं. ब्राह्मणवाद की छाया कहींकहीं तो इतनी गाढी है कि आप बिना संदर्भ के जान ही नहीं पाएंगे कि आप बौद्ध साहित्य पढ़ रहे हैं कि ब्राह्मण साहित्य—

‘‘इस तरह बौद्धि सत्व ने उत्तरापाद नक्षत्र में गर्भ में प्रवेश किया. दूसरे दिन….राजा ने गोबर लिपी, धान की खीलों आदि से मंगलाचार की हुई भूमि में….घी, मधु, शक्कर से बनी खीर से भरीं, सोने और चांदी की थालियों से ढंकी थालियां परोसीं (तथा) नए वस्त्र, कपिला गौ आदि से उन्हें संतर्पित किया.’’(बुद्धचरिय, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-2)

बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में उपालि को छोड़कर बाकी सब ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्गों से आए थे. उनके सोच पर ब्राह्मणवाद की छाया विद्यमान थी, वे ब्राह्मणवाद के आलोचक रहे होंगे, विरोधी नहीं.

छठा और महत्त्वपूर्ण कारक अनीश्वरवादियों की जाति थी. उनमें से कई समाज के उन वर्गों से आए थे, जो अपने श्रम के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. ब्राह्मणी व्यवस्था उन्हें शूद्र मानती थी. और शूद्र का कार्य अपने से श्रेष्ठ वर्गों की सेवा करना है, ज्ञान बघारना नहीं. ऐसी उन दिनों मान्यता थी. ऐसा नहीं है कि शूद्र वर्गों में मेधावी लोगों की कमी रही है. ब्राह्मणी व्यवस्था के अनेक ग्रंथों की रचना में शूद्र वर्ग के आचार्यों का योगदान रहा है. वेदों के संकलन कर्ता व्यास, प्रख्यात दार्शनिकों रैक्व, महीदास, सत्यकाम जाबाल उस समय की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही थे. रघुकुल के गुरु कहे जाने वाले वशिष्ट का जन्म दासी के गर्भ से हुआ था. एक और कारण यह भी संभव है कि भौतिकवादी विचारकों की पैठ अपने शिष्यों में इतनी गहरी थी कि उन वर्गों में अपनी पैठ बनाने के लिए उनपर सीधा प्रहार आवश्यक था. चूंकि अनिश्वरवादी विचारकांे को किसी भी प्रकार की सत्ता का समर्थन प्राप्त ही नहीं था. इसलिए सत्ता की गोदी में पलने वाले बौद्ध और जैन आचार्यों के लिए उनकी खुली आलोचना करना आसान बात थी.

पूर्ण कस्सप के जीवन और दर्शन पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले यह जान लेना भी आवश्यक है कि बुद्ध के समय तक धम्मप्रचार आमनेसामने के संवाद द्वारा किया जाता था. बुद्ध या महावीर ने अपने विचारों को लेकर स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के बाद अजातशत्रु के नेतृत्व में राजगीर में एक धर्मसंसद हुई थी जिसमें बुद्ध के प्रमुख शिष्यों से पांच सौ महाश्रमणों ने हिस्सा लिया था. सभी की अध्यक्षता महाकाश्यप ने की थी. उस समय तक बौद्ध दर्शन काफी प्रतिष्ठा अर्जित कर चुका था. बौद्ध के शिष्यों पर बड़ी जिम्मेदारी बुद्ध के विचारों तथा उपदेशों को बचाए रखने की थी. उनकी अपनी पदप्रतिष्ठा और भविष्य भी उससे जुड़ चुका था. इसलिए उस धर्मसंसद में बुद्ध के कृतित्व को सहेजने पर सभी की सहमति थी. उस दायित्व को बुद्ध के शिष्यों ने अच्छी तरह संभाला. लेकिन उनके शिष्यों में बड़ी संख्या द्विज वगों से आए बौद्धों की थी. जो अपने साथ वर्गीय संस्कार भी जाए थे. इसलिए बौद्ध ग्रंथों की अन्वीक्षा करने पर वे सब बातें बौद्ध ग्रंथों में, आई हैं, जिनका बुद्ध ने अपने जीवन में विरोध किया था. उदाहरण के लिए बुद्ध ने भिक्षुओं को जादू और चमत्कार दिखाने से दूर रहने को कहा था. ‘दीघनिकाय’ में ही इसके बारे में पर्याप्त चर्चा है. परंतु पूर्ण कस्सप के जीवन के बारे में चर्चा करते समय ही हम देखेंगे कि बाद के ग्रंथों में बौद्ध भिक्षु न केवल जादू और चमत्कार दिखाने लगे थे, बल्कि बुद्ध को भी चमत्कारी दिखाने से उन्हें परहेज न था.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

CULTURE AND SOCIAL JUSTICE

सामान्य

[‘फारवर्ड प्रेस’ अंग्रेजी और हिंदी में साथ—साथ प्रकाशित होती है. यह आलेख भी मार्च 2016 अंक में दोनों भाषाओं में एक साथ प्रकाशित हुआ है. ‘आखरमाला’ के पाठकगण भारत और बाहर लगभग समान हैं. इसलिए इस बार अंग्रेजी पाठ ब्लॉग पर दिया जा रहा है. अनुवाद फारवर्ड प्रेस की ओर से है, साभार प्रस्तुति.]

Every society is known by its culture. It is culture that binds a people together and hence, by necessity, it should be steeped in social relations, universal values of life and dreams of the future. Generally, culture and religion are taken to be the same or nearly the same thing. This is erroneous. With its baggage of faiths and beliefs, religion can be a part of culture but not its synonym. The desperation of a society to break free from the shackles of religion only shows its eagerness to adhere to reason. As far as Indian culture is concerned, most scholars describe it as a “culture of diversity” and glorify it as being ”sanatan” (eternal). However, none of these notions is value-based. Cultural diversity is meaningful only if it is a spontaneous extension of human consciousness and promotes democratic thinking. As far as antiquity is concerned, it is a relative concept. It only indicates the historicity of a particular event. The greatness of a culture lies in ensuring justice, equality and harmony among the people; in what it does to resolve the internal conflicts; in how democratic it is. The Indian culture does not fare well on these parameters.

The fact is that the culture which permeates our society is based on Smritis, Puranas and epics; it has been thrust upon the majority, the common man by a minority elite; it corrodes communal wisdom and blocks social justice. Instead of standing by morality and public ideals, it has become a tool in the hands of religion and allows itself to be easily manipulated by the feudal forces. It wants to decide what work the people should do, what they should eat and drink, what they should study and teach, and what kind of relationship they should have with others. It does not take an individual’s wisdom, choices and interests into account. Instead, it makes unwarranted interferences in his life; it undermines equality and liberty and declares inequality to be human destiny – sometimes in the name of religion and at other times in the name of society and diverse traditions. It is a monarchial culture where a person’s birth decides whether he will be the ruler or the ruled. Every strand of this elitist culture strains to protect the privileges of the elite, and if one born in the class of the ruled tries to overcome his handicap or even harbours such dreams, it creates as many roadblocks in their path as possible and moves in to extinguish the desire for change in them. It wants to stifle the questioning mind and dehumanize people. All this erodes the community feeling, the building of which is one of the key objectives of culture; it sows the seeds of communalism and the people’s power gets diluted and blunted due to fragmentation. The result is that change is never forthcoming.

RITUALS: THE WAY TO DOMINATION

We Indians, especially those of us who call ourselves Hindus, are tied to a variety of rituals from birth to death. They are of different kinds and vary from community to community and from caste to caste. The objective of rituals is to propitiate a supernatural power. On the one hand is the giver (imaginary, of course) and on the other, the seeker. The seeker lies prostrate before the giver and is ready to offer whatever he has. Enter the priest – the representative of the giver. To what the seeker offers to the giver, the priest adds his fees. The wide acceptability of rituals has led to stratification of society. The seeker has to pay whatever the giver demands through his self-appointed representative. This is used to their advantage by those perched at the top of the social pyramid. Without doing any productive work, they usurp the biggest chunk of the gains. They thus assume the position of the giver. Culture is reduced to the performance of rituals under their leadership. All the treatises that describe rituals have been authored by Brahmins. The non-Brahmins do not have the right to question, revise or alter them. They are just expected to follow without demur or doubt what the Brahmins have ordained. Any attempt to criticize or review the treatises or question their veracity is considered sinful. The opposition to this culture that promotes cultural and social inequality is as old as the culture itself. Documentation of the voices of this opposition can bring us closer to a relatively liberal and inclusive culture –the people’s culture or the culture of the indigenous people.

The fact is that culture can never be the end. It only helps us choose the means. It is meant to refine and better the basic human instincts. Its objective is not and cannot be to control the everyday life of the people. It is ironical that Indian culture has been a culture of negativities. Stopping people from doing this or that has becomes its mainstay. It has become a tool in the hands of the people who aim at violating the fundamental rights of others. Brahmins form its apex and they are the creators, interpreters, patrons and enforcers of culture. In rare cases –rather as exceptions – some propagators of specific culture, who were not Brahmins by birth, were given the status of “Brahmins by deeds”. Vyas, Valmiki, Mahidas, etc were not Brahmins but they were given the status of Brahmins as they were the codifiers of the culture that considers Varna system as the ideal and bestows all powers on the Brahmins, who are given the supreme status. Some people say this shows how flexible and liberal Indian culture is. The fact is that this is a shrewd device to appropriate the intellectuals of other classes and their achievements. This ensures that the talented members of the lower classes continue working for perpetuating the stranglehold of the upper castes.

BRAHMINS: SOLE REPOSITORIES OF INTELLECT

This notion is palpable right from the Rig Veda to the modern literature. When Satyakaam Jabaali tells Guru Uddalak that he was born to a maid who worked in homes and that he did not know who his father was, the Maharishi says, “You have spoken the truth. Only a Brahmin putra can be so truthful”. And the Maharishi agrees to give him “Diksha”. The scholars of Indian culture quote this incident to underline the magnanimity of Indian culture. In fact, this is intellectual deceit, which, in one blow, pronounces all non-Brahmins as peddlers of lies. Like Satyakaam Jabaali, Mahidas was also the son of a maid – a Shudra by birth – but a brilliant proponent of brahmanical culture. He was the writer of Aitreya Brahmin, Aitreya Upanishad and Aitreya Aranyak. This culture snatched Mahidas from the Shudras. The morganatic tradition of conferring the status of Brahmins on exceptionally brilliant non-Brahmin intellectuals also ensures that even the talentless sons of Brahmins get a place at the top. While the non-Brahmin intellectuals have to display dazzling intellect, creative talent and unquestioning loyalty to the discriminatory brahmanical culture to grow in social stature, the Brahmins are superior solely by virtue of their birth. Needless to say, with their talented members moving to the other camp, the lower classes are deprived of intellectual leadership. In other words, Brahmins are not the sole creators of Indian culture, its presiding deities, its rituals, mythology and religious philosophy, though they are its biggest beneficiaries.

The commentators of brahmanical culture should be praised for one thing – to perpetuate their class Superiority, they refrained from taking personal credit for their works. They gave the credit to Brahmins as a class. In any case, being Brahmins, personal respect was already available to them. Vyas, Yagyavalkya, Vashistha, etc are not the names of individual scholars. They are the names of an order or a Gotra. They are named as the authors of Smritis, Ramayana, Mahabharata, Puranas and even subsequent works. Yog Vashistha, a huge thousand-year-old treatise of over 29,000 verses, was compiled and revised over centuries by innumerable anonymous writers. Yet, Valmiki is credited with the authorship. And Valmiki is also credited with having authored the two-thousand-yearold work called Pulatsya Vadh, which later came to be known as the epic Ramayana. The stratagem of giving knowledge and wisdom the veneer of tradition benefited Brahmins immensely but hurt the interests of the Bahujans. Due to the Varna system, even Brahmin bumpkins became intellectual leaders of society. As generation after generation wrote on the same lines, originality became a casualty. Due to interpolations spread over centuries, these books became riddled with mutually contradictory notions. The Maharabharata (Shantiparva) says, “There is nothing like Varna differentiation. The entire universe is Brahm as Brahm is its creator.” In the same Mahabharata, the despicable act of Droncharya of seeking Eklavya’s thumb as “guru dakshina” is presented as something that has religious sanction.

On the other hand, the poor, who were conditioned to the system, kept on hoping against hope that the pandits who keep an account of the 64 lakh “yonis” (species) and who claim to read the future of all men would also keep their interests in mind. If the Almighty does not differentiate between the high and the low, the rich and the poor, the Brahmin and the Shudra – why would the pandits? This naive faith made them oblivious to their rights and indifferent to their history. The lack of interest of the lower classes in documentation of their times was exploited to the hilt by those on the higher rungs of the social ladder. They came up with the theory of Karma. The exploited were convinced that none other than they themselves were responsible for their miseries. In the name of culture, they were first deprived of opportunities and then stripped of dignity and respect. The upper classes branded the lower ones as uncultured, barbaric buffoons and kept on distorting history. In their history, the sheep and the lambs were held responsible for the disorder in the jungle and the jackals and the hyenas were absolved of every crime. They kept reserved for themselves adjectives like Pandit, Devta, Karunanidhan, Annadata, Rakshak, Seth and Sahukar. This culture was shaped by two thousand years of their shrewd manoeuvres and unprincipled alliances. To hope that this culture would do justice to the common man is deluding oneself.

 

RESISTANCE AND SOCIAL JUSTICE

Parallel to the attempts to perpetuate cultural domination, there emerged a movement to throw off the yoke. This is a historical fact. In India, the first signs of this movement can be seen in the life and works of Makkali Ghoshal. He was the first scholar to challenge the exploiter, parasitical Brahmanical culture by bringing together the toilers, artisans and others who earned their bread through physical labour. He did this by establishing the Aajivak sect. The popularity of Makkali is evident from the fact that during his lifetime, the number of followers of the Aajivak sect was higher than that of Buddhists. His scholarship was unmatched. Emperor Prasenjit considered Ghoshal a greater scholar than Buddha. The emperor had said this to Buddha himself. Buddha’s emphasis on non-violence and his anti-ritual, materialistic ideology was largely influenced by the Aajivak sect.

Besides Makkali and Buddha, Niganth Nagputta, Sanjay Vethliputta, Purna Kashyap, Ajit Keshankbali, Kautsa and other scholars also opposed rituals, including animal sacrifices during yagnas. Niganth Nagputta, who came to be known later as Mahavir Swamy, founded the Jain religion. But among them, Buddha acquired the most fame. Instead of initiating a discourse on the contemporary philosophical issues like “atma” (soul) and “parmatma” (Supreme Being), he chose to skirt them. As Buddha was a Kshatriya, his ideology came in handy for the rulers who were unhappy with the growing clout of Brahmin priests. The representative literature of “Aajivak” and “Lokayat” streams is not available today. We have to make do with some passing references in Brahmin, Buddhist and Jain texts. And these streams have not been shown in a positive light. Clearly, the victor cultures systematically destroyed the literature of the vanquished ones.

Even in the scriptures bandied about as the foundation of religion and culture, some elements that were the progenitors and propagators of an alternative people’s culture have survived, notwithstanding interpolations spread over a long period. Mahishasur, Bali, Puranic emperor Ven, Ganesh, Shiva, etc may have been real or mythical. But if we take them to be mythical then we would have to put Brahma, Vishnu, Indra, Hanuman and other gods and goddesses, who are the propagators of brahmanical culture, in the same category, as it is on the foundation of the former that the latter’s edifice has been built. Shiva must have been the lord of the Tribals of the country. His associates bhoot, pishasch, pret, etc remind us of the primitive tribes. The Aryans adopted Shiva but discarded his associates. And even Shiva was not spared. He was portrayed as an ascetic who consumes datura (thorn-apple) and aak (swallowwort) and who wraps his body in ash. And the right to run (rule) the Universe was given to the Brahmin Brahma and Kshatriya Vishnu. The myth of Ganesh also reminds one of ancient Indian republics. In republics, the head of state is given the first place. However, when republics were replaced by monarchies, his form was distorted and projected as one with a long trunk and a big stomach. The idea was to humiliate and belittle the leader of the people.

The intellectuals whose dream is to bring about social justice have to fight against religious domination, poverty and the Varna system, which has struck deep roots. This cannot be done without liberating oneself from the dominant culture. Brahmanical culture believes in celestial justice. It does not say how that justice will manifest itself and how it will help the deprived sections progress. The first objective of the proponents of social justice should be to build a culture that is liberal and democratic, with minimum interference of organized religion. For this, it will be necessary to bring into limelight those symbols of our ancient culture that stood against or parallel to the brahmanical culture. Will this not be akin to trying to locate another religion within one religion? Maybe. However, these symbols, heroes and myths should be used only to restore the self-confidence of the oppressed, exploited classes – to let them know that they were not like “this” since times immemorial, that, in fact, in many respects, their culture was superior to the brahmanical culture. In Ravana’s Lanka, Vibhishan was allowed to live with his own beliefs and loyalties. But in Ram Rajya, Shambuk was deprived of this freedom. Similarly, the Rakshak emperor Jalandhar lived happily with his wife Vrinda, who was an ardent devotee of Vishnu. There was not even a shadow of suspicion in their marital relationship. On the other hand, Sita was forced to undergo “Agni Pariksha” just because she had spent a few days in Ravana’s Ashok Vatika. The battle for retrieving the buried and forgotten symbols is also a battle against poverty and other inequalities born out of the caste system. The irony is that the groups that have been enjoying privileges and respect because of their caste are today accusing the pro-change groups of exacerbating casteist tensions. Those who are victims of the caste system feel that they can forge forward in their struggle by using the rights that democracy has made available to them. They are using caste as a tool for getting organized. But caste-based organizations have their own limitations. There are thousands of castes in this country and none of them, on its own, is capable of becoming an agent of change. That is why people have gradually come to realize that to take the fight for social justice ahead, a parallel cultural front also needs to be launched. Victory belongs to those who remain united and work with collective wisdom.

OMPRAKASH KASHYAP

चिंतन की बहुजन परंपरा

सामान्य

इतिहास केवल शिखर की हलचलों को रेखांकित करता है. जनसमाज के स्तर पर जो हलचलें होती हैं, उनके दस्तावेजीकरण में वह उस समय तक उपेक्षा बरतता है, जब तक उनका प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कोई बड़ा सामाजिकराजनीतिक सरोकार न हो. उसमें भी वह केवल शीर्ष व्यक्तित्वों के नाम रेखांकित करता है. इसके अनगिनत उदाहरण अतीत से आज तक खोजे जा सकते हैं. रामरावण के युद्ध के बारे में हम सुनते आए हैं, कौरवपांडवों का संग्राम अलग से महाकाव्यीन गाथा है. अकबर और राणा प्रताप का इतिहास भी पिछली पांचछह शताब्दियों पुराने इतिहास का हिस्सा है. हम अपनी रुचि और विश्वास के अनुसार इनमें से किसी को बड़ा या छोटा मान सकते हैं. कमज्यादा पसंदनापसंद कर सकते हैं. उस समय हमारी चर्चा और चिंता का मूल केंद्रबिंदू शिखरस्थ व्यक्तित्व ही होंगे. सदियों से हमें यही अभ्यास कराया जाता रहा है. राम और रावण की प्रजा अपनेअपने सम्राट के बारे में क्या सोचती थी? जनसाधारण धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर के राज्य में अधिक सुखी, समृद्ध और सम्मानित जीवन जीता था कि दुर्योधन के राज्य में? अकबर और महाराणा प्रताप की प्रजाओं के हालात में क्या अंतर था? ऐसे प्रश्नों को लेकर इतिहास प्रायः मौन बना रहता है. कारण किसी से छिपा नहीं है. वस्तुतः इतिहास को वे लोग सहेजते हैं, जिनके हित सत्ता से जुड़े होते हैं. सत्ताशिखरों की कृपा बनी रहे, वे इस दृष्टि से तथ्यों के साथ मनमाना वर्ताब करते हुए इतिहासलेखन करते हैं. सत्ता की चरणवंदना में सत्य अपनी अर्थवत्ता खोता रहता है.

प्रकारांतर में इतिहास ‘अर्थशास्त्र’ भले न हो, एक वर्ग के लिए वह ‘अर्थ का शास्त्र’ अवश्य बन जाता है. ये परिस्थितियां सामाजिक विक्षोभों को जन्म देती हैं, जिन्हें विशेषज्ञ लोग ‘संस्कृतियों का द्वंद्व’ की संज्ञा देते हैं. निहित राजनीतिक स्वार्थ की खातिर शीर्षस्थ वर्ग संस्कृतियों के द्वंद्व को बढ़ाचढ़ाकर पेश करते हैं. परिणामस्वरूप सामाजिक अविश्वास की खाई उत्तरोत्तर चैड़ी होती जाती है. ‘सांस्कृतिक द्वंद्व’ तथा ‘राजनीतिक द्वंद्व’ में अंतर होता है. सांस्कृतिक द्वंद्व की प्रक्रिया धीमी और अप्रत्यक्ष होती है. जबकि राजनीतिक द्वंद्व सामान्यतः प्रत्यक्ष होता है. अतएव उसके निष्कर्ष अपेक्षाकृत शीघ्र आने की संभावना रहती है. राजनीतिक द्वंद्व में प्रतिपक्ष को यह अवसर मिलता है कि वह खुद को अपने प्रतिद्विंद्वी की टक्कर का सिद्ध कर सके. रावण नफरत का पात्र होकर भी राम के समान बलशाली है. रावण के प्रति नफरत, राम के प्रति उसके अनुयायियों की आदरभावना के समतुल्य होती है. यही हालत महाभारत के दुर्योधन की है. वह न केवल स्वयं बलशाली है, बल्कि एक से बढ़कर एक योद्धा उसके पक्ष में है. ‘कुरुक्षेत्र’ दुर्योधन के लिए महज राजनीतिक युद्ध है. जबकि उसके प्रतिद्विंद्वी पांडवों का सलाहकार कृष्ण उसे शुरुआत से ही सांस्कृतिक युद्ध बना देता है. कृष्ण का बौद्धिक चातुर्य और कूटनीति उस समय के युद्धनियमों पर भारी पड़ती है.

राजनीति से प्रेरित होने के बावजूद संस्कृतियों के द्वंद्व पर उसके नियम पूरी तरह लागू नहीं होते. वहां पराजित संस्कृति विजेता संस्कृति द्वारा या तो हड़प ली जाती है, अथवा उसका इतना विरूपण कर दिया जाता है कि वह रूढि़ में ढलकर अपनी उपयोगिता खो देती है. राजनीतिक विजेता सामान्यतः दो युद्धों से गुजरता है. पहला युद्धभूमि पर लड़ा जाता है. उस युद्ध में दो प्रतिद्विंद्वी अपनेअपने सैन्यबल के साथ आमनेसामने होते हैं. दूसरा युद्ध समरांगण में दुश्मन को परास्त, उसके भूक्षेत्र पर कब्जा कर लेने के बाद आरंभ होता है. राजनीतिक विजेता जानता है कि जब तक जनसमाज उसकी जीत को स्वीकार न कर ले, तब तक उसकी विजय भी डांवाडोल रहेगी. अपनी जीत को स्थायी बनाने के लिए वह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी निरंतर फतह की कामना करता है. दूसरा युद्ध अप्रत्यक्ष, जिस जनसमाज की संस्कृति पर जीत हासिल करनी है, उसके मौन समर्थन के आधार पर लड़ा जाता है. इसलिए उसमें आभासी प्रतिद्विंद्वता के लिए बहुत कम स्पेस होता है. विजेता संस्कृति के चारणवृंद पराजित संस्कृति की स्मृतियों और परंपराओं की ओर से जनता का ध्यान मोड़ने के लिए नित नया बानक रचते रहते हैं. अंततोगत्वा, पराजित संस्कृति इतिहास की पर्तों में लुप्त होकर रह जाती है. चूंकि सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया धीमी और व्यापक जनसमुदाय की मौन सहमति के आधार पर चलाई जाती है, अतएव सांस्कृतिक प्रतिरोध के वास्तविक कारकों की खोज अपेक्षाकृत जटिल होती है. चूंकि थोपे गए इतिहास की अधिकांश बातें सामाजिक यथार्थ से परे होती हैं, इसलिए उसे झूठ का पुलिंदा भी कहा जाता है.

सांस्कृतिक द्वंद्वों का चरित्र उत्पादकता के साधनों द्वारा निर्धारित होता है. हजारों वर्ष पहले प्रकृति का खुला अंचल मनुष्य के सामने था. अपार संसाधनों के आगे भोक्ता मनुष्यों की संख्या अत्यंत सीमित थी. अतः उस कालखंड में व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा के लिए भी कोई स्थान न था. कालांतर में कृषि व्यवस्था में सुधार हुआ. मनुष्य एक स्थान पर ठहरकर खेती करने लगा. इसी के साथ उसके मन में लालच भी उमड़ने लगा. उन दिनों खेती सामूहिक थी. उपज पर समूह का साझा अधिकार माना जाता था. धीरेधीरे समाज में अविश्वास स्थायी रूप लेने लगा. उत्पाद के बंटवारे को लेकर झगड़े शुरू हुए तो ‘राजा’ नामक संस्था की अवधारणा विकसित हुई. आरंभ में राजा का काम शिकार के समय कबीले का नेतृत्व करना तथा उत्पाद का सदस्यों के बीच सर्वसम्मत बंटवारा था. उससे समूह की आंतरिक व्यवस्था में सुधार हुआ. लेकिन विपल्वी कबीलों का डर अब भी बना रहता था. अनाज और पशुधन को हड़पने के लिए कबीले एकदूसरे से उलझते ही रहते थे. अतः प्रतिद्विंद्वी समूहों से अपने पशुधन, अनाज और फसलों की सुरक्षा के लिए ‘राजा’ को सैनिक रखने का अधिकार मिल गया. उस समय तक राजनीति परस्पर सहमति पर आधारित थी. सच में तो वह राजनीति थी ही नहीं. लोग सामान्य विवेक के आधार पर मिलजुलकर निर्णय लेते थे. निष्पक्ष और सर्वमान्य होना ‘राजा’ की मूलभूत योग्यता थी. सैनिक रखने का अधिकार मिला तो ‘वीरता’ और ‘नेतृत्व’ जैसे गुण राजा के लिए आवश्यक माने जाने लगे. शक्ति और संसाधन मिले तो उसकी महत्त्वाकांक्षाएं सिर उठाने लगीं. धीरेधीरे उसके आसपास ऐसे लोगों का समूह पनपने लगा, जो अपने स्वार्थ के लिए उसकी हर मनमानी को ‘नियम’ बना देने में माहिर थे. जहां नियम बनाना संभव न हो वहां ‘राजा की इच्छा’ बताकर स्वार्थपूर्ण निर्णय थोप दिए जाते थे. इससे आमजन और राजा के बीच की दूरी बढ़ती गई. चूंकि राजा को बिना किसी तनाव के सभी सुखोभोग उपलब्ध थे, इसलिए वह अपने मुंहलगे दरबारियों को अतिरिक्त लाभ देकर खुश रखने लगा. धीरेधीरे व्यक्तिगत संपत्ति की भावना, जिसका अभी पूरी तरह विकास भी नहीं हुआ था, राजा के एकाधिकार में ढलने लगी. इसका प्रभाव संस्कृति पर भी पड़ा. सभ्यता के आरंभिक दिनों में मनुष्य अपने निर्णय परस्पर सहमति से लेता था. अब वे राजा और उसके मुंह लगे दरबारियों की मनमर्जी से लिए जाने लगे. इसका प्रभाव सामाजिकसांस्कृतिक संबंधों पर पड़ना ही था. सबकुछ शिखरस्थ वर्गों की मर्जी से चलता था, इसलिए जनसाधारण संस्कृति और उत्पादकता के सहसंबंधों की ओर से उदासीन रहने लगा. यही उदासीनता धीरेधीरे उसके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा बन गई.

उपर्युक्त चर्चा से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं. पहली यह कि संसाधनों पर एकाधिकार कायम करने का इच्छुक समूह पहले लोगों के दिलोदिमाग पर कब्जा करता है. इसके लिए वह परंपराओं और विचारधाराओं की मनमानी व्याख्या करता है. दूसरे शब्दों में विचारों का इतिहास, अपने समय के राजनीतिकआर्थिक और सामाजिक इतिहास से अलग नहीं होता. दूसरे, संसाधनों पर कब्जा करने के पश्चात अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए वह ऐसी संस्थाएं खड़ी करता है, जिनमें जनसाधारण के लिए प्रवेश के अवसर न्यूनतम हों. यदि लोकतांत्रिक छूट के अंतर्गत यह अधिकार देना भी पड़े तो प्रक्रिया इतनी जटिल बना दी जाती है कि उनमें आम आदमी का हस्तक्षेप न्यूनतम हो जाता है. इस बीच वह निम्नस्थ वर्गों को निरंतर यह विश्वास दिलाता रहता है कि उनकी समाजार्थिक हैसियत सामाजिकसांस्कृतिक एवं वैधानिक मूल्यों द्वारा समर्थित है. और यदि कहीं अभाव या दुरवस्था है तो उसके जिम्मेदार सिर्फ उन परिस्थितियों में जी रहे लोग हैं.

जैसा कि हमने पहले भी कहा, यह स्थिति हमेशा से नहीं थी. जिन दिनों विपुल संसाधन थे, उन दिनों समाज में स्पर्धा के लिए भी कोई जगह न थी. पूरी तरह से वर्गहीन समाज था. फिर ऐसा समय आया जब निर्णय ऊपर से थोपे जाने लगे. विचारों की दुनिया में आपसी संवाद और सहमति के लिए कोई स्थान न रहा. पराजित सम्राट की भांति पराजित विचार को भी झुकने या फिर मिटने के लिए तैयार रहना पड़ता था. महाभारत में यक्ष के प्रश्नों का उत्तर न दे पाने पर युधिष्ठिर के भाइयों को मृत्यु प्राप्त होती है. लोकसाहित्य में ऐसी अनेक कहानियां सुनने को मिल जाएंगी, जिनमें नायक राजकुमारी के चंद प्रश्नों का उत्तर देकर न केवल उससे विवाह, बल्कि उसके पैत्रिक राज्य का उत्तराधिकारी भी मान लिया जाता था. जबकि उत्तर देने में असमर्थ अनेक राजकुमारों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ता था. इतिहास में वैचारिक असहिष्णुता के और भी कई उदाहरण हैं. सातवीं शताब्दी के दार्शनिक, प्रकांड विद्वान मीमांसक कुमारिल भट्ट को मात्र इसलिए आत्महत्या का वरण करना पड़ता है, क्योंकि उन्होंने गुरु की इच्छा के विपरीत, बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में पछाड़ने के लिए उनके दर्शन का अध्ययन किया था. यही नहीं, कुमारिल के प्रतिभाशाली शिष्य मंडन मिश्र को भी शंकराचार्य से शास्त्रार्थ में पराजित होने के पश्चात ‘मरना’ पड़ता है. जीवित बचता है उनका वेदांती अवतार—सुरेश्वराचार्य. कह सकते हैं कि राजनीतिक असहिष्णुता वैचारिक असहिष्णुता को बढ़ावा देती है. इसका उल्टा भी उतना ही सच है. उदार विचार उदार राजनीति की ओर ले जाते हैं. उदार और जवाबदेह लोकतंत्र वर्गहीन समाज के भीतर ही संभव है.

जिन दिनों व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा अविकसित थी, संस्कृति का नेतृत्व श्रमण परंपरा के ऋषिमहर्षियों की जिम्मेदारी थी. उनके बीच अनेक मतांतर और परंपरावैषम्य था. बावजूद इसके उनमें परस्पर सहअस्तित्व का भाव था. वेद, उपनिषद आदि आरण्यक उन्हीं यायावर महापुरुषों की देन हैं, हालांकि उनमें से अनेक के नाम हमारे लिए अपरिचित हैं. कह नहीं सकते कि वर्तमान में ये ग्रंथ जिनके नाम से जाने जाते हैं, सचमुच उन्हीं की रचना थे. या तत्कालीन पुरोहित वर्ग ने किसी ओर की रचनाओं को अपने नाम कर लिया. लोगों ने उसे सहज भाव से अपना भी लिया, क्योंकि सहस्राब्दियों से किसी भी व्यवस्था पर सवाल न उठाने और मूक अनुसरण करते रहने का प्रशिक्षण उन्हें प्राप्त होता है. कृषि के विकास के साथ जीवन में ठहराव आना शुरू हुआ तो श्रमणों का एक वर्ग, जो जंगलों के कष्टमय जीवन को छोड़कर आराम का जीवन जीना चाहता था—मानवबस्तियों में या उनके आसपास आश्रम बनाकर रहने लगा. समाज में ज्ञानपिपासुओं के प्रति आरंभ से ही आकर्षण एवं सम्मान का भाव था. वे उन्हें पुरुखों के यायावर जीवन की याद दिलाते थे. कहीं यह अफसोस तथा उससे पैदा कुंठा भी रही होगी कि पारिवारिक सुखसुविधा और सुरक्षा की चिंता के कारण वे स्वयं यायावर मुनियों जैसा जीवन जीने में असमर्थ हैं. पुरोहित स्वयं को ईश्वर और आमजन के बीच प्रतिनिधि के रूप में पेश करता था. दिखाता था कि वह यायावर मनस्वियों के अधिक करीब है, इन सबके चलते जनसाधारण ने सहज ही पुरोहित वर्ग के श्रेष्ठत्व को स्वीकार कर लिया. उस श्रेष्ठत्व तथा प्राप्त सुखसुविधाओं को अपनी पीढि़यों तक अंतरित कर, स्थायी बनाने की कोशिश कालांतर में कार्यविभाजन की वजह बनी, जिसने आगे चलकर निकृष्ट जातिप्रथा का रूप ले लिया. जिसे विद्वान हिंदू समाज का कलंक मानते हैं.

जाति व्यवस्था की कमजोरी है कि वह सबकुछ नियतिबद्ध मान लेती है. व्यक्ति के जन्म के साथ उसकी पसंद, नापसंद, रुचि, योग्यता, सम्मानपात्रता आदि का एकमुश्त निर्धारण कर लिया जाता है. परिणाम यह होता है कि एक वर्ग को, जिसमें समाज के मुट्ठीभर लोग सम्मिलित होते हैं, विशेषाधिकार संपन्न मान लिया जाता है. जबकि दूसरे वर्ग जो संख्या में पहले वर्ग की अपेक्षा चार गुना अधिक है, की प्रतिभा का उसकी पसंद के क्षेत्रों में सदुयोग तो दूर, उसके प्रदर्शन का अधिकार तक छीन लिया जाता है. इसके उदाहरण कभी भी, कहीं भी खोजे जा सकते हैं. महाभारत में द्रोण जिस समय एकलव्य का अंगूठा मांग रहा होता है, उस समय वह किसी युद्ध अभियान पर नहीं होता, बल्कि अपने गुरु को आकस्मिक रूप से सामने देख, हर्षित मन से तीरंदाजी के क्षेत्र में अपनी साधना के प्रदर्शन पर उतर आता है. द्रोण से एकलव्य की वह खुशी भी सहन नहीं होती. एकलव्य की प्रतिभा, तीरंदाजी का कौशल उसे डरा देता है. एकलव्य को लेकर जो डर द्रोण को है, वही कृष्ण को भी है. महाभारत के युद्ध में अर्जुन और द्रोण दोनों अलगअलग खेमे में होते हैं. लेकिन अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी सिद्ध करने के लिए द्रोण जहां गुरुदक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लेता है, वहीं कृष्ण अपनी नारायणी सेना के साथ एकलव्य पर पीछे से प्रहार कर, युद्धभूमि में छलपूर्वक उसकी हत्या कर देता है. जातिआधारित सामाजिक विभाजन में मनुष्य की इच्छा, चयन के अधिकार, विवेक, सहमति आदि का उसके कोई स्थान नहीं होता. इसका सर्वाधिक पतन शिखरस्थ श्रेणियों में दिखाई पड़ता है. वहां मौजूद लोग अपने स्वार्थ और वर्गीय श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए निम्नस्थ वर्गों का शोषण करते रहते हैं.

वर्णाश्रम व्यवस्था के बीज ऋग्वेद के संकलनकाल से ही अंकुराने लगे थे. पुरुष सूक्त इसका प्रमाण है. हालांकि उस समय तक जातीय विभाजन उतना नहीं गहराया था, जितना आज. कालांतर में उसके सहारे ऐसा वर्ग पनपने लगा जिसकी रुचि केवल पदप्रतिष्ठा तक सीमित थी. जिसमें मौलिक सोच का अभाव था. जिसके लिए ज्ञान और आस्था में कोई अंतर न था. या यूं कहो कि अपनी रूढ़ आस्था और जड़ विश्वासों के आधार पर वह खुद के ज्ञानी होने का दावा करता था. इस प्रवृत्ति के चलते विश्व की प्रथम संहिता ऋग्वेद जिसे मानवीय जिज्ञासा एवं कौतूहल का उत्पे्ररक बनना चाहिए था—पोंगापंथी ब्राह्मणों के लिए ‘पवित्र पुस्तक’ में ढलने लगा. उसमें अंतर्निहित ज्ञान और इतिहास तत्व को सभ्यता संस्कृति के विकास की कसौटी बनाने के बजाए, उसके प्रति अंधआस्था को ही मानवीय प्रज्ञा की कसौटी बताया जाने लगा. ध्यातव्य है कि पवित्रता का प्रत्यय संस्कृति के लिए भले ही कुछ काम का हो, साहित्य और ज्ञान की दूसरी विधाओं की मौलिकता के विकास में हमेशा बाधक रहा है. वह बदलाव विरोधी भी होती है. पांेगापंथी पुरोहितों के मन में ऋचाओं के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने की चिंता भी रही होगी. यहां मूल स्वरूप से आशय ऋचाओं के उस ‘संस्करण’ से है, जिन्हें ऋग्वेद के संकलनकर्ता ने अपनाया था. उस समय की परंपरा और स्थानीयता के अनुसार ऋचाओं के भिन्नभिन्न संस्करण भी रहे होंगे. उनके बीच संहिताबद्ध कृति को महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा. फिर स्वाभाविक रूप से उसी को असली बताने की चिंता सताने लगी. उन दिनों उपलब्ध ज्ञानसमिधा का संहिताकरण बहुत श्रमसाध्य का कार्य था. इस कारण ऋचाओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए श्रुति की महत्ता कम नहीं हुई थी. अभ्यास से पता चला कि ऋचाओं को रटने के बजाय गाकर आसानी से याद रखा जा सकता है. गायनवादन के मानकीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप ‘सामवेद’ की रचना हुई. इससे कर्मकांडीकरण को स्थायित्व मिलने लगा. बावजूद इसके समाज में वेदों की प्रतिष्ठा बढ़ रही थी. इसलिए नहीं कि वेदों में कुछ अनमोलअनूठा था. बल्कि इसलिए कि उनके पठनपाठन और गायनवादन से जो वर्ग जुड़ा था, वह सत्ताकेंद्र के करीब और प्रायः उसका संरक्षक भी था.

उस समय तक ज्ञान के संप्रेषण का मुख्य आधार गुरुशिष्य परंपरा थी, जिसमें दोनों आमनेसामने बैठकर शिक्षार्जन करते थे. भोजन, सुरक्षा, शीत आदि से बचने के लिए बीच में अलाव जलाए रखने की पृथा यज्ञसंस्कृति का रूप लेने लगी. कालांतर में अग्नि कुंड को प्रज्जवलित रखना, उसकी वेदी बनाना भी पौरोहित्य के विशिष्ट कार्यों में शुमार होने लगा. कालांतर में उसी को लेकर ‘यजुर्वेद’ की रचना हुई. उस समय तक ‘लिखित’ शब्द की प्रतिष्ठा फैल चुकी थी. जिन ब्राह्मणों को वैदिक ऋचाएं कंठस्थ हों तथा जो उनका सस्वर पाठ कर सकें, वे अतिरिक्त सम्मान के पात्र माने जाते होंगे. उससे वैदिक ऋचाओं को याद कर, उनका पाठ करने के प्रति आकर्षण बढ़ा होगा. वेदी बनाकर ऋचाओं का सस्वर पाठ करना भी वैदिक कर्म मान लिया गया. उस परंपरा का संहिताकरण ‘यजुर्वेद’ के रूप में सामने आया. संकेत साफ हैं, ऋग्वेद के संकलन तक चाहे सब कुछ ठीकठाक रहा हो, ‘सामवेद’ और ‘यजुर्वेद’ की रचना के समय तो हिंदू वाङ्मय पूरी तरह कर्मकांड में ढल चुका था. दोनों ही कृतियां ज्ञान को परंपरा में ढाल देने की सामान्य प्रविधियां थीं इस परंपरा को आगे चलकर उपनिषदों में विस्तार मिला.

आवश्यक नहीं वैदिक काल में भी सभी लोग वेदों को मानते हों. उसी दौर में एक वर्ग ऐसा भी रहा होगा, जिसके लिए ऋग्वेद से आगे की ज्ञानयात्रा मानवीय मेधा का मौलिक उठान न होकर, जो है उसी को सहेजे रखने और उसपर दर्प करने की कोशिशें थीं. वह वर्ग वैदिक ऋषियों के आलोचकों का था. जो वर्षभर में तीन या चार महीने किसी एक स्थान पर ठहरता था और अपना बाकी समय प्रकृति के सान्निध्य में, जीवनसत्य की खोज में यहां से वहां विचरते हुए बिताता था. चूंकि वे लोग एक स्थान पर लंबे समय तक नहीं ठहरते थे, इसलिए लोगों पर उनका प्रभाव अपेक्षाकृत कम था. उसी से धीरेधीरे दो परंपराओं का विकास हुआ. वैदिक ऋषियों की परंपरा और दूसरी श्रमण परंपरा. वैदिक परंपरा की तरह श्रमण परंपरा में भी अनेक मेधावी चिंतक जन्मे. याज्ञवल्क्य के समय में श्रमण परंपरा काफी विस्तृत हो चुकी थी. वैदिक ऋषि सामान्यतः एक ही स्थान या बस्ती में रहने लगे थे. जबकि श्रमणों को स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते रहने के कारण तीर्थंकर कहा जाने लगा था. धीरेधीरे उनमें मतभेद भी पनपने लगे.

यह ठीक है कि ऋग्वेद के माध्यम से वैदिक आचार्यों ने धर्मदर्शन के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई थी. वह संकलनकर्ता व्यास की मौलिक कृति नहीं थी. व्यास ने तो अपने समय में मौजूद ऋचाओं, कहानियों और परंपराओं का संकलन मात्र किया था. लेकिन बिखरी हुई, श्रुति के आधार पर लंबे समय से चली आ रहीं ऋचाओं को एक सूत्र में बांध देने का काम भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं था. उसकी ऋचाओं के अध्ययन द्वारा आसानी से समझा जा सकता है कि वे अलगअलग मनीषियों द्वारा रची गई हैं. गौतम बुद्ध ने ऋग्वेद के रचियताओं को ‘ऋषि’ तथा ‘पुरोहित’ के रूप में वर्गीकृत किया है. भारत की दार्शनिक उड़ान तथा उसकी विसंगतियों को समझने के लिए इसे समझना बेहद आवश्यक है. गौतम बुद्ध के अनुसार ऋग्वेद के आरंभिक रचियता आरंभिक दस मुनिगण हैं. उनके नाम भी उन्होंने गिनाए हैं—‘आस्तक’, ‘वामक, ‘वामदेव, विश्वामित्र, भरद्वाज, वशिष्ट, कश्यप, भृगु, अंगिरस और जमदग्नि. बुद्ध की राय की तस्दीक मनुस्मृति में भी है. लेकिन वहां ऋषियों के नाम भिन्न हैं और हैं दार्शनिक न होकर पौरोहित्य के कारण जाने जाते हैं. मनुस्मृति के अनुसार वेदों के आदि रचियता—अत्रि, याज्ञवल्क्य, अंगीरस, पुलत्स्य, वशिष्ट आदि हैं. ऋग्वेत्तर विकास की धारा को समझने के लिए इस वर्गीकरण को एक समझना अत्यावश्यक है. उपनिषदों के आदि व्याख्याता दार्शनिक और विचारक की कोटि के थे. जबकि दूसरा वर्ग जिन्हें वेदों में लंबे प्रक्षेपण के लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, पुरोहित किस्म के थे. देवताओं को दी जाने वाली आहूतियां इसी वर्ग की रचनाएं हैं.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

आदर्श राज्य की कसौटी और मृत्युदंड

सामान्य
  • हालात चाहे जो भी हों, मृत्युदंड की बढ़ती संख्या सरकार की सुस्ती और कमजोरी को दर्शाती है. दुनिया में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जिसमें कुछ अच्छाई न हो. इसलिए जब तक किसी अपराधी को ऐसे स्थान पर रखना संभव है जहां वह समाज को कोई नुकसान न पहुंचा सके, तब तक मृत्युदंड सुनाने से बचना चाहिए.—रूसो.

  • अनेक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें मनुष्यता के हित में जीवित रहना चाहिए था. अनेक ऐसे व्यक्ति हैं जो जीवित होकर भी मृत्यु की कामना करते हैं. क्या तुम उन्हें उनका वांछित दे सकते हो? यदि नहीं तो न्याय के नाम पर मौत बांटने की जल्दबाजी मत दिखाओ.—जे. आर. आर. टोलीकन.

  • ईश्वर की निगाह में हत्या केवल हत्या है. न्यायिक हत्या जैसी कोई अवधारणा नहीं है. यह केवल कानून की निगाह में न्यायसंगत है.—डेविड जे. मार्टिंज.

  • राज्य परमात्मा नहीं है. उसे ऐसी चीज को लेने का कोई अधिकार नहीं है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर लौटा न सके.—अंतोन चेखव.

  • मृत्युदंड खूब सोचीसमझी हत्या है.—अल्बर्ट केमस.

  • किसी के भी साथ, बुराई के बदले में बुरा मत करो.—बाइबिल

धम्मपद(10/1) की व्यवस्था है—सब्बे तसंति दंडस्स सब्बे भायंति मच्चुनो….सब्बे तसंति दंडस्स सब्बेसं जीवितं पियं. अत्तानं उपमं कृत्वा न हनेय्य, न घातये.’—‘सभी दंड से डरते हैं, सभी को मृत्यु से भय लगता है. जीवन सभी को प्रिय है—अत प्रत्येक को अपने समान समझकर किसी की हत्या न करें, न किसी को दूसरे की हत्या के लिए उकसाएं.’ यह सामान्य मनोविज्ञान पर केंद्रित सत्य है. जितना यह सत्य है, उतना ही व्यावहारिक भी है. प्रत्येक समाज अपेक्षा करता है कि उसकी सदस्य इकाइयां मिलजुल कर रहें. आवश्यकता पड़ने पर एकदूसरे की मदद करें. एकदूसरे के अधिकार का सम्मान करें. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. लोग अज्ञानतावश, अपने स्वार्थ की खातिर, दूसरों के उकसावे में अथवा उत्तेजनावश—राज्य अथवा समाज के कानूनों का उल्लंघन कर बैठते हैं. अपराध राज्य, समाज या व्यक्ति के विरुद्ध किया जाता है. रूप चाहे जो हो, प्रत्येक अपराध दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप होता है. दंड उसका सामान्य प्रतिदेय है. इसलिए वह राज्य को, जो नागरिक जीवन में शांतिसुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है—बलप्रयोग का अवसर देता है. जनता द्वारा सौंपे गए अधिकारों के आधार पर राज्य अपराध की समीक्षा कर, कानून के प्रावधानों के अनुसार उपयुक्त दंड का निर्धारण करता है. राज्य या समाज के विरुद्ध अपराध के मामले में समाज और राज्य दोनों को यह अधिकार होता है कि वे अपराध की कोटि के अनुसार दंड तय कर सकें. आधुनिक राज्यों में एक सीमा से ऊपर समाज के अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया जाता है. मगर ‘व्यक्ति के विरुद्ध अपराध’ के मामले में पीडि़त को स्वयं न्याय करने का अधिकार नहीं होता. यहां तक कि अपराधी भी प्रायश्चितस्वरूप अपने लिए दंड खुद निर्धारित करना चाहे, तो भी विधिसंहिता उसे अमान्य करार देती है. न्याय के लिए उसे न्यायालय की शरण में जाना ही पड़ता है. दंडनिर्धारण में राज्य की भूमिका सर्वोपरि और समाज के निष्पक्ष अभिकर्ता की होती है. केवल अपराधी को दंड देना उसका मकसद नहीं होता. दंड प्रणाली का अंतिम ध्येय होता है—समाज को अपराधमुक्त कर, सुखशांतिमय बनाना. अपराध समाज की नकारात्मक प्रवृति है. उनके पीछे व्यक्ति या व्यक्तिसमूहों का हाथ हो सकता है, मगर उनकी आपराधिक मनोवृत्ति के निर्माण में कुछ न कुछ भूमिका उसके परिवेश की भी होती है. अतएव श्रेष्ठ राज्य दंड निर्धारण की प्रक्रिया के दौरान शक्ति प्रदर्शन में ऊर्जा खपाने से बचता है, बचना चाहिए. इस ध्येय में कितना सफल हो जाता है, यह प्रत्येक प्रकरण में विचारणीय रह जाता है.

अपराधी को दंडित करने के पीछे राज्य की दुहरी मंशा होती है. पहली, अपराधी समझ ले कि वह अपने किए के परिणाम से मुक्त नहीं है. दूसरी यह कि बाकी लोगों को उससे सबक मिले. वे लोभलालच, उत्तेजना, अज्ञानता अथवा दूसरों के बहकावे में आकर कानून भंग करने की कोशिश कभी न करें. इनमें पहले को प्रतिकारात्मक न्याय और दूसरे को निवारणरात्मक न्याय कहा जाता है. प्रतिकारात्मक न्याय एक तरह से अपराधी को राज्य और समाज की ओर से प्रत्युत्तर होता है. ‘शठे शाठयं समाचरेत’ की शैली में क्रिया की प्रतिक्रिया. उसमें दंड निर्धारण की प्रक्रिया कार्यकारण सिद्धांत पर टिकी होती है. जनसाधारण की भाषा में इसे ‘जैसा बोओगे—वैसा काटोगे’, ‘जैसी करनी—वैसी भरनी’ आदि भी कहा जाता है. प्रतिकारात्मक न्याय की सैद्धांतिकी कहती है—जिसने अपराध किया है, वह दंड का अधिकारी है. आदमी जैसा बोता है, वैसा ही काटता है. अतः अपराधी को उसके अपराध का दंड मिलना ही चाहिए. किंतु केवल उतना दंड मिलना चाहिए, जितना उसने अपराध किया है. भिन्न अपराधियों को समान अपराध के लिए समान दंड मिलना चाहिए. साथ ही केवल और केवल अपराधी को दंड मिलना चाहिए. ऐसा न होने पर लोगों का न्यायव्यवस्था से विश्वास उठने लगता है. उससे अपराधी के समाज की मुख्यधारा में लौटने के अवसर कम हो जाते हैं.

कल्याण राज्य में राज्य और नागरिक परस्पर संविदा के आधार पर बंधे होते हैं. उसके अनुसार राज्य लोगों के जानमाल की रक्षा का दायित्व उठाता है. तो नागरिकों से भी यह अपेक्षा करता है कि वे इस कर्तव्य में उसके साथ पूरी तरह सहयोग करें. जैसे राज्य अपने नागरिकों से अलग नहीं होता, वैसे ही बिना राज्य के नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा भी संकट में पड़ जाती है. इसलिए राज्य के कर्तव्यों के साथ सहयोग करते हुए उसके साथ एकजुटता दिखाना, प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है. यह भी कि नागरिक कर्तव्यों से इतर नागरिकअधिकार शून्य होते हैं. अतः जब कोई व्यक्ति नागरिक कर्तव्यों का उल्लंघन करता है, तो उसके नागरिक अधिकार भी उसी अनुपात में सीमित होने लगते हैं. रूसो के अनुसार जब कोई व्यक्ति चोरी या राहजनी जैसा अपराध करता है तो वह अपने संपत्ति अधिकार स्वतः गंवा देता है. इसी तरह दूसरे की हत्या करने वाला अपराधी अपनी प्राणरक्षा का अधिकार खो देता है. निजता मनुष्य का संवैधानिक अधिकार है. कानून के उल्लंघन के साथ अपराधी से यह अधिकार भी छिन जाता है. इससे राज्य को उसके जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाता है. आपराधिक मानसिकता वाले व्यक्ति से दूसरों को बचाने तथा समाज में शुचिता की स्थापना के लिए दंड आवश्यक हो जाता है. प्रकारांतर में निवारणात्मक न्याय भी ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ होता है. उसमें भी ‘आंख के बदले आंख’, ‘जैसे को तैसा’ वाली शैली में न्याय किया जाता है. मगर महत्त्व अपराधी को ताड़ने से ज्यादा दंड के लाक्षणिक परिणाम का होता है. उन स्थितियों के निवारण का होता है, जो अपराध की संभावनाओं को जन्म देती हैं. अपराध के कारण का निवारण ही न्याय है. उसमें राज्य यह मानकर चलता है कि सुधार के लिए दंड आवश्यक है. कानून के भय से अपराधी मनोवृत्ति वाले लोग अपकर्मों से दूर रहेंगे. फलस्वरूप समाज में शांतिव्यवस्था कायम होगी. उसके अनुसार हत्यारे को दिया गया मृत्युदंड निर्दोष लोगों की प्राणरक्षा करता है.

केविन कूपर कैलीफोर्निया का रहने वाला था. एक अपराध में उसे मृत्युदंड की सजा दी गई. दिन निर्धारित किया गया—10 फरवरी 2004. जेल में मृत्युदंड संबंधी सारी तैयारियां हो चुकी थीं. कूपर मान चुका था कि यह उसके जीवन का अंतिम दिन है और कुछ ही घंटों में उसका प्राणांत कर दिया जाएगा. लेकिन वधस्थल पर मृत्युदंड की कार्यवाही के दौरान, तय समय से बामुश्किल चार घंटे पहले कूपर को अचानक सूचना मिली कि उसकी सजा माफ कर दी गई है. एक साक्षात्कार के दौरान कूपर ने अपनी आपबीती इस प्रकार बयान की है—

‘‘उन्होंने सबसे पहला काम यह किया कि मेरी शरीर को दूसरे पिंजड़े में ढकेल दिया. इस प्रकार कि वे मुझपर निरंतर नजर रख सकें. पिंजड़ा बेहद गंदा और घिनौना था. जब से बना था, शायद ही किसी ने उसकी सफाई की थी. वर्षों पुरानी धूल और गंदगी उसमें जमा थी. मैंने उसमें कई दिन उसको रगड़तेखुरचते हुए बिताए. जेल के कर्मचारी मुझे हर घंटे देखने के लिए आते. कदाचित उन्हें भय था कि मैं फांसी से पहले ही मरकर उन्हें धोखा न दे दूं. यह क्रम पूरे दो सप्ताह चला. इस बीच मेरा हालचाल लेने डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक, नर्स तथा जेल के अधिकारीगण लगातार आते रहे. वे मेरे कपड़ों की माप जानना चाहते थे….एक बार अचानक आधी रात को वे आए और फोटो खींचने के लिए ले गए….उसके बाद मुझे अस्पताल ले जाया गया, ताकि मृत्युदंड स्क्वाड मेरा साइज माप सके….मेरे सामने ही डॉक्टर मेरे मृत्युदंड पर चर्चा करते रहे…..उन्होंने पूछा कि मेरी नसें कहां हैं? उनका चित्र भी खींचा गया, मुझे बताए बिना ही. ऐसी ही कार्रवाही में कई सप्ताह गुजर गए.

मृत्युदंड का दिन जैसेजैसे करीब आ रहा था, इस तरह की गतिविधियां बढ़ती ही जा रही थीं. फिर मुझे वधस्थल के ऊपर स्थित कक्ष में ले जाया या. एक व्यक्ति घड़ीघड़ी मेरा मुआयना कर मेरी एकएक गतिविधि को नोट कर रहा था. उन्होंने मेरे हाथों में हथकड़ी डालकर साइड में कसकर बांध दिया. इस बीच पहरेदार लगातार मुझपर नजर रख रहे थे….मृत्युदंड के एक दिन पहले मेरा अंतिम रूप से चैकअप किया गया. 14 हथियारबंद सैनिक मुझे बधस्थल के बराबर वाले पिंजड़े में ले गए. वहां उन्होंने मेरी हथकडि़यां खोल दीं. नंगा करके मेरी तलाशी ली गई—‘हमने जो किया, क्या उससे तुम्हें कोई परेशानी हुई?’ तलाशी के दौरान उन्होंने बेहूदा सवाल किया था.

मैं नीलामी पटल पर बैठे दास की भांति अनुभव कर रहा था. उन्होंने मुझे जगहजगह से कोंचा, जानवर की तरह उंगलियां गाढ़गाढ़कर देह को जांचापरखा. मुझे गर्दन तानकर खड़ा होने को कहा गया, फिर झुकाकर देखा गया, मेरे अंडकोश को उठाया, परखा….मेरे पीछे मृत्युदंड के लिए आवश्यक सारा सामान खुला पड़ा था….सब कुछ बेहद अमानवीय और भद्दा था. मृत्युदंड में चार घंटे से कम ही बचे थे कि फोन की घंटी बजी. उच्चतम न्यायालय ने मेरी फांसी का तख्ता हटाने का निर्णय लिया था. मेरी देह में सांस वापस लौटने लगी. उस घटना के बाद मैं भयानक मानसिक यंत्रणा से गुजर रहा था. मुझे अकेला छोड़ दिया गया. कोई मदद नहीं, डॉक्टर नहीं, नर्स नहीं. जितने समय में मृत्युदंड की कार्रवाही के दौरान यंत्रणा से गुजरा, मेरी नजर हमेशा घड़ी पर टिकी रहती थी. कैसे उस यंत्रणा से बाहर आऊंकुछ घंटे नहीं, दिन नहीं….बल्कि महीनों तक.’— इस यातना पर कूपर की टिप्पणी थी, ‘मृत्युदंड देने से पहले ही वे हमारी मानसिक हत्या कर देते हैं.’

अपराध की सजा भुगतने के साथ ही व्यक्ति के नागरिक अधिकार उसे वापस मिल जाते हैं. मान लिया जाता है कि व्यक्ति अपराधकर्म के भार से मुक्त हो चुका है. उसे समाज में बाकी नागरिकों की तरह सम्मानपूर्ण जीने का अधिकार है. अतः उसे यह अवसर मिलना भी चाहिए. लेकिन समाज आमतौर पर भावनाओं के आधार पर फैसले लेता है और अपनी स्मृतियों को ताजा रखता है. इसलिए कानून से बरी हुए लोगों को वह आसानी से बरी नहीं करता. समाज के व्यवहार से आहत नागरिक अपराध की दुनिया में वापस लौट सकते हैं. इस समस्या के निदान हेतु न्याय की तीसरी सैद्धांतिकी सामने आती है. उसमें अपराधी को दंड देने के अलावा उसके पुनर्वास का भी ध्यान रखा जाता है. इसके लिए काराग्रहों में अपराधियों के विशेष शिक्षणप्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है. कल्याण राज्य में इसे न्याय प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. किंतु हत्या, बलात्कार और राजद्रोह जैसे गंभीर मामलों में राज्य यह मान लेता है कि अपराधी जघन्यता की समस्त सीमाओं को पार कर चुका है. उसके व्यक्तित्व में सुधार की सभी संभावनाएं समाप्त हो चुकी हैं. उस अवस्था में राज्य अपराधी को मृत्युदंड जैसा क्रूरतम दंड देता है. इस तरह मृत्युदंड राज्य के क्षोभ, गुस्से और हताशा की स्थिति को दर्शाता है.

सवाल है कि जीवंत राज्य को जो पारदर्शी होने का दावा करता है, कल्याणराज्य होने का दम भरता है, उसे गुस्सा, हताशा और क्षोभ जैसे नकारात्मक लक्षण क्या शोभा देते हैं? क्या मृत्यु का भय, फांसी का भय, मनुष्य को अपराध से सचमुच दूर रख पाता है? समाज में ‘शुभता’ की स्थापना के लिए राज्य की ‘कांटे से कांटा निकालने की युक्ति’ क्या सचमुच कारगर सिद्ध होती है? आंकड़ों पर गौर किया जाए तो इसके परिणाम न केवल नकारात्मक हैं, बल्कि एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाते हैं. उनसे पता चलता है कि क्रूरता, चाहे व्यक्ति की हो अथवा राज्य की, वह राज्य और समाज दोनों को क्रूरतम स्थितियों की ओर ले जाती है. प्रतिहिंसा हिंसा को वैध ठहराती है. राज्य की क्रूरता उसकी असंवेदनशीलता को दर्शाती है. प्रकारांतर में वह समाज में भी असंवेदनशीलता पैदा करने लगती है. जबकि राज्य की उदारता समाज को निर्मैल्य कर शुभता का संचार करती है. उदाहरण के लिए भारत में बलात्कार के अपराधी धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को फांसी दी गई थी. उसके बाद 2011 तक किसी भी अपराधी को फांसी नहीं दी गई. ‘राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो’ की रिपोर्ट के हवाले से ‘एशियन सेंटर फाॅर ह्यूमेन राइट्स’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 2001 में देश में कुल 36,202 हत्याओं के मामले दर्ज किए गए थे. जबकि 2011 में यह आंकड़ा गिरकर 34,305 तक सिमट गया. जबकि इस अवधि में देश की कुल जनसंख्या 1.028 अरब से बढ़कर 1.21 अरब तक पहुंच गई. दूसरे शब्दों में फांसीमुक्त अवधि के दौरान हत्या के मामलों में, 18 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि के बावजूद, पांच प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई.

स्पष्ट है कि राज्य की क्रूरता, सामाजिक क्रूरता और असहिष्णुता को कम करने के बजाय और बढ़ाती है. लोग यदि यह महसूस करें कि राज्य कठोर संस्था है; तो वे यह भी मानने लगते हैं कि विशेष परिस्थितियों में कठोरता एवं अनुदारता भी अच्छे गुण हैं. यदि गुस्से या आक्रोश की स्थिति बन जाए तो में वे ‘जैसे को तैसा’, ‘खून का बदला खून’ की तर्ज पर खुद न्याय करने लग जाते हैं. भूल जाते कि राज्य की कठोरता विशिष्ट परिस्थितियों के लिए है. मामला चाहे जितना गंभीर हो किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं कि वह स्वयं न्याय करने लग जाए. इसलिए यदि कोई कहता है कि ‘बुरे’ को हटाने का एकमात्र उपाय उसकी मृत्यु है और सजा के रूप में मृत्युदंड बना रहना चाहिए तो यही बात हत्यारे के लिए भी लागू होती है, क्योंकि हत्या के समय वह सिर्फ अपने प्रतिपक्षी की बुराई के बारे में सोच रहा होता है. उस अवस्था में हत्या उसे एकमात्र विकल्प दिखाई पड़ती है.

कुछ विद्वान मृत्युदंड को बर्बर न्याय का प्रतीक मानते हैं. वह है भी. न केवल बर्बर बल्कि निरर्थक भी. ‘बी’ की हत्या के दंडस्वरूप राज्य द्वारा ‘ए’ को मृत्युदंड देने से ‘बी’ को जीवन वापस नहीं मिल जाता. बल्कि समाज को दुहरीतिहरी हत्या को झेलना पड़ता है. पहली वह जिसे ‘ए’ व्यक्तिगत स्तर पर, जानबूझकर या किसी के उकसावे अनायास करता है. दूसरी ‘बी’ की हत्या जिसे राज्य बहुत ठंडे दिमाग से, सोचीसमझी गई नीति के तहत सांस्थानिक रूप से करता है. राज्य की हत्या न्यायसम्मत होती है, इस कारण वह हत्या के अपराध से बरी होता है—‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति.’ की तर्ज पर उसे समाज की ओर से इसकी अनुमति होती है. लेकिन मृत्युदंड यदि राज्य के कोप की चरमपरिणति है तो वह हत्यारे के कोप की चरमपरिणति भी हो सकता है. इस आधार पर राज्य उसे रोकने का नैतिक आधार खो देता है. नीति का तकाजा है कि राज्य को व्यक्ति की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान, उदार, सहिष्णु और संवदेनशील होना चाहिए. गुस्से पर नियंत्रण रखना अपने आप में सद्गुण है—अतः राज्य के कोप का परिणाम, विशेषकर अपने नागरिकों के संदर्भ में, उसकी चरम परिणति यानी मृत्युदंड से सदैव नीचे रहना चाहिए. तभी वह नैतिक रूप से अपने नागरिकों को उदारता का संदेश दे सकता है.

पुराने जमाने में राजामहाराजा राज्य की सुरक्षा के लिए सीमा पर जाकर खुद दुश्मन से लोहा लेते थे. इसलिए राज्य को उनकी अर्जित संपदा मान लिया जाता था. इस अधिकारिता के दबाव में प्रजा राजा के तानाशाही पूर्ण आचरण को भी सह लेती थी. अब वह बात नहीं है. आधुनिक राज्य जनता की अपनी अधिरचना है. नागरिक अपने खूनपसीने की कमाई से राज्य का खर्च वहन करते हैं. उसकी सुरक्षा के लिए दुश्मनदेशों से लोहा लेते हैं. इसलिए राज्य से अपनी अपेक्षाओं को वे न्यायसंगत मानते हैं. अपेक्षाओं की उपेक्षा का एहसास उनके मन में राज्य के प्रति आक्रोश को जन्म देता है. आक्रोश के एक सीमा से पार जाते ही असंतुष्ट समूह विद्रोह पर उतर आते हैं. ऐसे अवसरों पर राज्य की असंवेदनशीलता नागरिकों को असहिष्णु बनाती है. इसके प्रमाण दुनियाभर के सभी देशों में हैं. अमेरिका में फांसी की सजा को नरहत्या और आतंकवाद के मामलों तक सीमित कर दिया गया है. एफबीआई की क्राइम रिपोर्ट के अनुसार 2010 में अमेरिकन संघ के जिन राज्यों में मृत्युदंड को निषिद्ध कर दिया गया था, वहां एक लाख नागरिकों के पीछे 4.1 हत्याएं दर्ज की गई थीं. जबकि उन राज्यों में जहां मृत्युदंड प्रभाव में था, प्रति एक लाख नागरिकों के पीछे 5 हत्याएं होती थीं. रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2010 के दौरान अमेरिका के मृत्युदंड समर्थक और मृत्युदंड को निषिद्ध घोषित कर चुके राज्यों के बीच हत्या के मामलों में अंतर 4 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत तक हो गया था. स्पष्ट है कि मृत्युदंड के मामलों में निवारणात्मक न्याय की सैद्धांतिकी भी नाकाम सिद्ध हुई है. इस तथ्य को स्वीकार चुके देश मृत्युदंड से धीरेधीरे पलायन कर रहे हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार 2014 में 98 देश ऐसे थे जिनमें मृत्युदंड की सजा को पूरी तरह समाप्त कर दिया है. जबकि कुल 140 देश ऐसे हैं जहां मृत्युदंड या तो पूरी तरह बाहर है, अथवा उसपर व्यावहारिक रूप से अमल नहीं किया जा रहा है. हालांकि इस बीच मृत्युदंड के मामलों में तेजी आई है. इसी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में दुनियाभर में लगभग 607 अपराधियों को मृत्युदंड दिया गया, जो 2013 के मुकाबले 22 प्रतिशत कम है. दूसरी ओर 2014 में 2466 अपराधियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई, जो 2013 के सापेक्ष 28 प्रतिशत अधिक है.

साफ है कि एक ओर जहां संख्यात्मक आधार पर मृत्युदंड बढ़ रहे हैं, वहीं सजा पर अमल के मामलों में तेजी से कमी आ रही है. यह न्यायालयों के असमंजस को दर्शाता है. समाज में बढ़ रहा आक्रोश, आंतरिक तनाव, जनाकांक्षाओं का दबाव आदि सरकार के सामने शांति और व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती पेश करते हैं. अपने ही अंतर्विरोधी में घिरी सरकारें जब टालमटोल करती हैं तो बात घूमफिरकर अदालतों पर आ जाती है. हर अपराध के बाद लोगों की उम्मीदें न्यायालय पर केंद्रित होकर रह जाती हैं. मृत्युदंड के विरोध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता दबाव भी फांसी की सजा पर अमल को टालने का कारण है. धनंजय चटर्जी के बाद, राज्य के विरुद्ध आतंकवाद के मामलों को छोड़कर बाकी अपराधों में फांसी की सजा को अघोषित रूप से टाला जाता रहा है. परिणामस्वरूप भारत समेत पूरी दुनिया में मृत्युदंड प्राप्त अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है. ‘राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो’ की रिपोर्ट के अनुसार 2001-2011 के दशक में भारत में कुल 1455 व्यक्तियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई, जबकि इसी अवधि में 4321 अपराधियों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया गया. बहरहाल, उदार राज्य की दावेदारी के बावजूद भारतीय अदालतें प्रतिवर्ष 132.27 व्यक्ति यानी हर तीसरे दिन एक व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा सुनाती रही हैं, जो कि एक विचारणीय प्रश्न है.

दुनियाभर में बढ़ती अशांति और हलचल के बावजूद मृत्युदंड के मामलों में गिरावट की सीधी वजह यही है कि सरकारें मान चुकी हैं कि अपराधियों को मृत्युदंड देने भर से समाज में शांति और स्थिरता की स्थापना असंभव है. कदाचित वे जान गए है कि समाज में हत्या और बलात्कार के मामलों का कारण समाज का चारित्रिक पतन नहीं है. अपराध इसलिए बढ़ रहे हैं कि क्योंकि सामाजिक स्तर पर समस्याएं भी बढ़ रही हैं तथा राज्य अपने कर्तव्य की पूर्ति में नाकाम सिद्ध हुए हैं. लोग यह जान जानने लगे हैं कि राज्य उनका अभिभावक नहीं है. बल्कि उनकी बनाई गई संस्था है, इसलिए वे अपने अधिकारों की मांग के लिए, न्याय के लिए—खुलकर सामने आते हैं. बाकी लोगों के समानांतर उनकी मांग गलत हो सकती है. रास्ता भी गलत हो सकता है. मगर परिस्थितियां चाहे वह राज्य की हताशा या असफलता से जन्मी हों अथवा धार्मिक, राजनीतिक स्वार्थी तत्वों की साजिश से, वे वास्तविक होती हैं. राज्य को उनके समाधान के तत्काल गंभीर प्रयास करने चाहिए. ऐसे मामलों में मृत्युदंड जैसी सजाएं कई बार आग में घी डालने का काम करती हैं. राज्य जिसे कानून कहता है, विरोधी उसे राज्य की ‘तानाशाही’ कहकर प्रचारित करते हैं. फांसी उनकी निगाह में धर्मयज्ञ की आहूति बन जाती है.

आंख के बदले आंख’ का दंडविधान बहुत पुराना है. मृत्युदंड की ऐतिहासिकता को दर्शाता हुआ सबसे पहला उल्लेख मिस्र में ईसा से 1600 वर्ष पहले का है. उस दौर में मनुष्य जंगलों में पशुओं के साथ रहता था; और जंगली न्याय की प्रवृत्ति को त्यागने की कशमकश में था. उस न्याय के अनुसार निर्बल को सबल के आगे झुकना ही पड़ता था. सहअस्तित्व और असहमतियों के साथ जीने की कला का तब तक विकास ही नहीं हुआ था. वहां विरोध से निपटने का एकमात्र रास्ता था—युद्ध. उसमें भी बात जान लेनेदेने तक चली जाती थी. दुनिया की जो आरंभिक दंड संहिताएं बनीं—उरुकजीन, उरनाम्मु, लिपितइस्तर, हम्मुरबी से लेकर सम्राट ड्रेसो के संविधान तक, सभी में मृत्यु दंड को सजा के रूप में सम्मिलित किया गया था. शुद्धतावादी ड्रेसो के संविधान में मानवीय चूकों के लिए कोई स्थान नहीं था. गलती चाहे जानबूझकर की जाए अथवा अनजाने, अपराध छोटा हो या बड़ा, मामूली चोरी हो या बदचलनी, उसमें सबके लिए मृत्युदंड का प्रावधान था. ड्रसो के अतिवाद का दुष्परिणाम यह हुआ कि निर्दोषों को भी सजा मिलने लगी. राज्य की ऐसी मनमानी लोगों को खलनी ही थी. धीरेधीरे जनता में विद्रोह पनपने लगा. आगे चलकर सोलोन ने ड्रेसो की भूल का समाधान किया. सोलोन के बाद यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तु जैसे महान विचारक जन्मे, मगर एक ने भी मृत्युदंड की सजा का विरोध नहीं किया. कांट, जा॓न स्टुअर्ट मिल, हा॓ब्स, बैंथम जैसे मानवतावादी विचारक भी ‘क्रूरतम अपराध के लिए क्रूरतम दंड’ के समर्थक रहे हैं. यह भी सच है कि इतिहास में मृत्युदंड के विरुद्ध पहली आवाज भी पश्चिम में एथेंस से उठी थी. वहां 427 ईस्वीपूर्व में थूसाइडिड ने मिटलेलियन विद्रोह के दौरान एक कानूनी दस्तावेज तैयार किया था. उस दस्तावेज में मृत्युदंड के औचित्य पर सवाल उठाए गए थे. उस प्रस्ताव को सभी ने सराहा. फलस्वरूप स्पार्टा के युद्धबंदियों के मृत्युदंड को टाल दिया गया था.

भारत में भी मृत्युदंड को धार्मिक ग्रंथों की मान्यता मिलती रही. धर्मशास्त्रें में चोरी, राहजनी, हत्या आदि के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था थी. चाणक्य ने भी मृत्युदंड का समर्थन किया है. ‘प्राण के बदले प्राण’ की दंडनीति तो पुरानी है ही. देखा जाए तो वह दौर ही ऐसा था. सहअस्तित्व की संभावनाएं ही नहीं थीं. सत्ताएं झूठ के सहारे पलतीं. सम्राट स्वयं को या तो देवानाम् प्रिय बताते थे, या देवताओं के उत्तराधिकारी. बुद्धिजीवी इस झूठ को सच बनाते थे. वे खुद भी इस झूठ में रहते थे कि एकमात्र उन्हीं का विचार सर्वोत्तम है. ऐसे में विरोध का एकमात्र प्रतिदेय था—मृत्युदंड. यह कैसे और किस रूप में दिया जाए यह जरूर चयन का मसला था. शंकराचार्य से पराजित मीमांसक मंडन मिश्र को ‘मरना’ ही पड़ता है. बाद में उनका अवतार ‘सुरेश्वराचार्य’ वेदांती बनकर जीवित रहता है. मंडन मिश्र के गुरु कुमारिल भट्ट को इसलिए आत्महत्या करनी पड़ती है क्योंकि उन्होंने दुस्साहसी बनकर अपनी जिज्ञासा को शांत करना चाहा था. नीयत वही थी, जैसा उस समय की परंपरा थी—दूसरे को पराजित कर अपने संप्रदाय में सम्मिलित करने की. उन्होंने बौद्धों को उन्हीं के हथियार से पराजित करने की मंशा से बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था. गलती यह की कि इसके लिए गुरु की पूर्वाज्ञा लेना भूल गए थे. इसलिए परंपरानुसार प्राणत्याग को स्वीकारना पड़ा. राजा जिसे चाहे उसे मृत्युदंड दे सकता था. इस तरह राजा के हर अपराध पर अपराध पर पर्दा डालने, मृत्यु को ‘प्रसाद’ बनाने का खेल भी उस युग में आरंभ हुआ. इसके लिए ‘मुक्ति’ का मिथक रचा गया. इस घालमेल से सबकुछ बदल गया. ‘हत्या’ को ‘प्रसाद’ कहा जाने लगा. अपराध ‘धर्मकार्य’ के रूप में पूजित होने लगा….वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति!

बहरहाल, धर्मशास्त्रों में परस्त्रीगमन, राहजनी, राजद्रोह आदि के लिए भी मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है. हालांकि दंड निर्धारण से पहले अपराधी का वर्ग अवश्य देखा जाता था. राजा दंडाधिकारी भी होता था, ब्राह्मण उसका प्रमुख मार्गदर्शक. राजा को पृथ्वी पर ईश्वरीय प्रतिनिधि माना जाता था. इसलिए उसका निर्णय अंतिम और सर्वस्वीकार्य होता था; और कई बार तो उसे देवताओं का फैसला बताकर पेश किया जाता था. महाभारत में एक ओर जहां ‘न हि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचितः’(मनुष्य के लिए मनुष्य को श्रेष्ठतम है) कहकर मनुष्यत्व का सम्मान किया गया, दूसरी ओर मृत्युदंड को धर्मकार्य की संज्ञा दी गई. महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध जैसे अहिंसा समर्थक विचारक भी मृत्युदंड के मामले में मौन बने रहे. बुद्ध ने अंगुलिमाल जैसे डाकू को संघ में शामिल कर, यह संकेत अवश्य दिया कि क्षमा सबसे कारगर हथियार है और समाज से बुराई को मिटाने का उपाय ‘बुरे’ को मिटा देना नहीं है, बल्कि उस मानसिकता को बदलना है जो बुरे कर्म की ओर प्रवृत्त करती है. मानसिकता बदल जाए तो डाकू रत्नाकर के आदि कवि वाल्मीकि बनते देर नहीं लगती.

अभी तक हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मृत्युदंड अमानवीय है. क्रूरता से क्रूरता को नहीं मिटाया जा सकता. लेकिन आधुनिक राज्य तो लोगों की सहमति से चलता है. समाज से अलग राज्य की कोई सत्ता नहीं है. राज्य को उसकी शक्तियां समाज की ओर से प्राप्त होती हैं. इसलिए कोई राज्य यदि मृत्युदंड को सजा के रूप में अपनाए हुए है तो यह तय है कि उस सजा को अमल में लाने के लिए आवश्यक शक्तियां और समर्थन उसे समाज की ओर से प्राप्त हैं. कोई समाज यदि शांति और अनुशासन के लिए मृत्युदंड को आवश्यक मानता है तो इसमें राज्य का क्या दोष! शरीर का कोई अंग यदि गल जाए तो हम, अनमने भाव से ही सही, उस अंग को आवश्यकतानुसार काटने तक की अनुमति दे देते हैं. बाकी शरीर को गलने से बचाने के लिए वैसा जरूरी होता है. एक अपराधी को फांसी यदि अनेक निरपराधों की जीवनरक्षा करती है तो उसे जनहित में स्वीकारना ही चाहिए. मृत्युदंड के समर्थक यह भी कहते हैं कि आतंकवादियों और बलात्कारियों को जेल में रखकर उन्हें खिलानापिलाना, उनकी सुरक्षा पर बेशुमार जननिधियां खर्च करना अनुचित है. हत्या करने के साथ ही हत्यारा अपने प्राणों पर अधिकार खो देता है. इसलिए ऐसे दुर्दांत अपराधी को तुरंत फांसी दे देनी चाहिए. फांसी के समर्थन में इस प्रकार के तर्क अकसर सुने जाते हैं. यदि धर्म बीच में आ जाए तो लोगों की घृणा और उत्तेजना आसमान छूने लगती हैं.

यह ठीक है कि राज्य समाज की अधिरचना है. लेकिन श्रेष्ठ राज्य माध्यम भी है, जो समाज की शुभता को अपने नागरिकों तथा बाकी राज्यों और समाजों के सामने लाता है. समाज की रचना होने के बावजूद राज्य उसकी इच्छाओं को ज्यों का त्यों नहीं स्वीकारता. वह उन्हें परंपरा, संस्कृति, कानून, नैतिकता, न्याय आदि के मापदंडों पर तौलता है. तदनंतर सिर्फ उन्हीं इच्छाओं को व्यवहार में लाता है, जो समाज के अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम कल्याणकारी सिद्ध हो सकें. दूसरे शब्दों में समाज की रचना होकर भी राज्य उसके तात्कालिक मार्गदर्शक का काम करता है. कल्याण योजनाओं को इस रूप में लागू करता है कि वे सभी की सामान्य पहुंच में हों. उनसे सभी का लाभ हो. अपने नागरिकों के बीच न्याय और कल्याण का समवितरण करते रहना राज्य का कर्तव्य है, उपकार नहीं. यह समाज द्वारा व्यक्त किए गए विश्वास का राज्य की ओर से कृतज्ञता ज्ञापन होता है. इसलिए यदि समाज इन कर्तव्यों की पूर्ति में असफल रहता है, यदि उसमें ढेर सारी विसंगतियां हैं, ऊंचनीच के अनगित टापू, भेदभाव, अंतर्विरोध, अविश्वास तथा उनसे जन्मा असंतोष है….सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर भारी असमानताएं हैं, जिनके चलते संपन्न और दबंग लोग न्यायप्रणाली की कमजोरियों को पहचानकर बरी छूट जाते हैं. यदि फांसी के सजायाफ्ता मुजरिमों में 93.5 प्रतिशत पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक, एकचौथाई निरक्षर और तीनचौथाई आर्थिक रूप से विपन्न हैं. उनमें से एकचौथाई यदि कहते हैं कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, यहां तक कि उनके वकील को भी उनसे दूर रखा गया, यदि राज्य ऐसे आरोपों को सुनकर भी अनसुना किए रहता है तो यह न केवल उसकी असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि मनुष्यता की नजर में गंभीर अपराध भी है.

भारत जैसे देशों में जहां भारी असमानता है, समाज का एकतिहाई हिस्सा अनपढ़ है, और दोतिहाई हिस्सा सामान्यरूप से पढ़ालिखा, वहां मृत्युदंड को बनाए रखने का कोई कोई औचित्य समझ से परे है. वैसे भी हमारे धर्मग्रंथ बताते हैं कि सभी में एक आत्मा है. सभी एक परमात्मा का अंश हैं. महाभारत कहता है—‘न ही मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचितः’ मनुष्य के लिए मनुष्य से उपयोगी कुछ भी नहीं है. तो मृत्युदंड की सजा एक नैतिकता का सवाल भी है. यदि हम कोई राज्य यह कहता कि नागरिक जीवन में शुभता हो, सत्यनिष्ठा हो, लोग नैतिकता के उच्चतम मानदंडों के अनुसार जीवन जिएं तो उसे स्वयं भी नैतिकता के शिखरमापदंड अपनाने होंगे. बचपन में एक कहानी हम सबने पढ़ी थी. आज भी वह नैतिकता की मिसाल के रूप में दोहराई जाती है.

एक किसान अपने बेटे के हरदम गुड़ खाते रहने की आदत से बहुत दुखी था. आदत छुड़ाने के लिए किसान अपने बेटे को साधु के पास ले गया. साधु ने उसको 15 दिन बाद आने की सलाह दी. निश्चित अवधि के बाद किसान फिर साधु के दरबार में हाजिर हो गया. साधु ने किसान के बेटे को अपने पास बिठाकर समझाया—‘बेटा, जरूरत से ज्यादा गुड़ खाना नुकसानदेह है. उससे अनेक बीमारियां फैलती हैं.’ साधु की बातों में जाने क्या था कि उस दिन के बाद से किसान के बेटे ने गुड़ खाना छोड़ दिया. किसान खुश था. फिर भी एक बात उसको रहरह कर कोंच रही थी. एक दिन वह फिर साधु के दरबार में पहुंचा. साधु के पूछने पर उसने बेटे के बारे सहीसही बता दिया—

महाराज, आपकी कृपा से बेटे ने गुड़ खाना छोड़ दिया है. मैं बहुत खुश हूं. लेकिन मेरे दो सवाल हैं?’

पूछो?’

आपने मेरे बेटे से जो कहा, वह कोई नई बात नहीं थी. मैं बेटे को हमेशा यही समझाता था? लेकिन वह मेरी बात कभी नहीं मानता था. लेकिन आपकी बात उसने तुरंत मान ली.’

और दूसरा प्रश्न?’

मेरा दूसरा सवाल है कि जो बात आपने कही, उसको जब में पहली बार बेटे को लेकर आपसे मिला था, तभी कह सकते थे. पंद्रह दिन बाद दुबारा बुलाने की क्या जरूरत थी?’ तब गुरु ने समझाया—‘हमें दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए, जैसा हम दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं. व्यवहार में ईमानदारी बड़ी बात है. ईमानदारी न हो तो अच्छी से अच्छी बात भी प्रभावहीन बनकर रह जाती है. जब तुम पहली बार आए थे, मैं खुद बहुत ज्यादा गुड़ खाता था. तुम्हारे बेटे को समझाने का नैतिक अधिकार मुझे नहीं था. पंद्रह दिन गुड़ से दूर रहकर मैंने अनुभव किया कि गुड़ को छोड़ा जा सकता है. तभी मैंने तुम्हारे बेटे से गुड़ छोड़ने का आग्रह कर पाया.’

व्यवहार की ईमानदारी’ किसान को उस दिन सबक मिला. आचरण की शुद्धता जितनी नागरिकों के आवश्यक है, उतनी सरकार के लिए भी जरूरी है. आदर्श समाज में मृत्युदंड के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. राज्य को ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य उसकी अर्जित संपत्ति नहीं है. कि उसका जैसा चाहे वैसा उपयोग कर ले. बकौल थामस पेन ‘मनुष्य समाज में इसलिए शामिल नहीं हुआ है कि उसकी स्थिति पहले की अपेक्षा और बुरी हो जाए; और न इसलिए कि उसके अधिकारों में पहले की अपेक्षा कटौती कर दी जाए. मनुष्य समाज में इसलिए सम्मिलित होता है कि सबके साथ रहते हुए उसके मौलिक अधिकारों को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा और सम्मान प्राप्त हो सके.’ वैसे भी कट्टरपंथ से कट्टरपंथ को मिटाया नहीं जा सकता. दूसरे यह कि व्यक्ति की कट्टरता से समाज की कट्टरता बहुत खतरनाक होती है. कट्टरपंथी व्यक्ति को सुधारा जा सकता है. न सुधरने पर समाज से अलग भी किया जा सकता है. लेकिन समाज कट्टरपंथी हो जाए तो सुधार की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं. उसका नुकसान उन नागरिकों को उठाना पड़ता है जो उदार हैं. कट्टरता जिनकी मूल प्रवृत्ति नहीं है. उल्लेखनीय है कि समाज का कट्टरपंथी हो जाने का आशय यह नहीं है कि उसके प्रत्येक नागरिक कट्टर हो जाते हैं. बस वे अपने विवेक से काम लेना छोड़ देते हैं. तब वे भेड़ की तरह हांके जाते हैं, शासकीय महत्त्वाकांक्षाओं के लिए गिनीपिग की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं. इसलिए हम मृत्युदंड का विरोध करते हैं, क्योंकि व्यक्ति की क्रूरता की अपेक्षा राज्य की क्रूरता के दुष्परिणाम कहीं अधिक घातक और दूरगामी होते हैं.

समाज में न्याय की सर्वत्र उपलब्धता का स्तर ही राज्य के श्रेष्ठत्व की कसौटी है. जिस समाज में समानता और स्वतंत्रता न हों, वहां न्याय की संभावनाएं भी दम तोड़ लेती हैं. ऐसे राज्य में न्याय केवल एक दिखावा माना जाएगा. मृत्युदंड निर्धारित करने का अधिकार तो उसे हरगिज नहीं है. इसके बावजूद यदि वह ऐसा करता है तो वह शिखर पर बैठे लोगों की मनमानी, कानून के नाम पर सोचसमझकर की गई संस्थानिक हत्या कही जाएगी. यदि राज्य की कमजोरियों को समझने के बावजूद उसके नागरिक मृत्युदंड का समर्थन करते हैं, किसी व्यक्ति को अपराधी को मृत्युदंड मिलने पर उनके दिलों में दुख और शोक की लहर नहीं उठती तो मान लेना चाहिए कि उस समाज के सभ्य होने में अभी देर है. फिर भी जो कहते हैं कि न्याय न्याय है, और खून का बदला खून से लिया जाना चाहिए तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि प्रतिवर्ष जो सैकड़ों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर जाते हैं—उनके लिए किसे सूली पर चढ़ाया जाए?

© ओमप्रकाश कश्यप

 

 

यदि वह ऐसा करता है तो वह शिखर पर बैठे लोगों की मनमानी, कानून के नाम पर सोचसमझकर की गई संस्थानिक हत्या कही जाएगी. यदि राज्य की कमजोरियों को समझने के बावजूद उसके नागरिक मृत्युदंड का समर्थन करते हैं, किसी व्यक्ति को अपराधी को मृत्युदंड मिलने पर उनके दिलों में दुख और शोक की लहर नहीं उठती तो मान लेना चाहिए कि उस समाज के सभ्य होने में अभी देर है. फिर भी जो कहते हैं कि न्याय न्याय है, और खून का बदला खून से लिया जाना चाहिए तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि प्रतिवर्ष जो सैकड़ों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर जाते हैं—उनके लिए किसे सूली पर चढ़ाया जाए?

संस्कृति और न्याय

सामान्य

सृष्टि के आरंभ में सभी प्राणी एक पुनीत स्थल पर निवास करते थे. वे सुगंधित हवाओं का आनंद लेते. सुरम्य धरा पर मग्नमन नृत्य करते थे. तब उन्हें न तो भोजन की आवश्यकता थी, न वस्त्रों की, न निजी संपत्ति थी, न सरकार, न ही किसी प्रकार का कानून. धीरेधीरे सृष्टि के पतन का आरंभ हुआ. मनुष्य सुरम्य लोक से पतित होकर पृथ्वी पर आ गिरा. अब उसे भोजन और आवास की आवश्यकता महसूस होने लगी. मनुष्य की आरंभिक पवित्राता और कीर्ति धुल चुकी थी. वर्णव्यवस्था का आरंभ हुआ और लोगों ने एक दूसरे के साथ अनुबंध के आधार पर रहना आरंभ किया. परिवार और निजी संपत्ति उस अनुबंध का हिस्सा बने. इसी के साथ चोरी, हत्या, लूटमार, परस्त्राीगमन जैसे अपराध होने लगे. समस्या से मुक्ति पाने के लिए सब मनुष्य एक बार एकत्रा हुए, उन्होंने मिलजुलकर एक राजा चुना, जो उनकी फसल का वाजिब हिस्सा उन्हें बांट सके. अपने उस चयन को उन्होंने ‘अनेक द्वारा एक का चयन’ (महासामत्त) कहा. उस व्यक्ति से अनेक लोगों को खुशी प्राप्त हुई थी, इसलिए उन्होंने उसे ‘राजा’ कहना आरंभ कर दिया. उसी से ‘राजनीति’ का विकास हुआ.’- THE WONDER THAT WAS INDIA, A. L. Basham, page-82.

किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति से होती है. उसका काम समाज में एकता की अनुभूति जगाना तथा मानवीकरण को गति प्रदान करना है. इसके लिए आवश्यक है कि वह सामाजिक संबंधों, लोगों के सामान्य व्यवहारों, लोकजीवन के आदर्शों, सार्वकालिक जीवनमूल्यों और भविष्य के सपनों से अनुप्रेत हो. उसके मूल में न्याय की भावना हो. साथ ही समानता और बराबरी की गंध उसके हर प्रतीक में रचीबसी हो. इस आधार पर भारतीय संस्कृति को दो हिस्सों में वर्गीकृत किया जा सकता है. पहली जनसंस्कृति. जो समाज में आपसी संबंधों, जरूरतों और सपनों के आधार पर स्वयं विकसित होती है. दूसरी धर्मानुप्रेत अभिजन संस्कृति जो अनेक प्रकार के डरों, प्रतीकों और कर्मकांडों के जरिये जीवन में प्रवेश करती है. पहली संस्कृति स्वयंस्फूर्त्त होती है. बदलते समय और आवश्यकताओं के अनुसार वह स्वयं परिवर्तित होती रहती है. वह सहयोग और सहकार की संस्कृति है. दूसरी संस्कृति में परिवर्तन ऊपर से थोपे जाते हैं. उसके बदलाव की गति धीमी होती है. धर्मानुप्रेत समाजों में प्रायः दूसरी संस्कृति को ही वास्तविक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है. जबकि पहली संस्कृति जो साथ में श्रमसंस्कृति भी है, की सतत उपेक्षा होती रहती है. चूंकि अधिकांश विमर्श पर उन लोगों का कब्जा होता है जो अभिजन संस्कृति से लाभान्वित होते हैं, इसीलिए येनकेनप्रकारेण उसी को विमर्श में बनाए रखते हैं. परिणामस्वरूप जनसंस्कृति केवल शब्दों एवं सपनों तक सिमटकर रह जाती है. वह अभिजात हितों की पैरोकार बनकर सामाजिक असमानता की मुख्य कारक एवं परिणाम के रूप में सामने आती है. चूंकि इस संस्कृति के मुख्य वास्तुकार ब्राह्मण रहे हैं, इस कारण आमचलन में इसे ब्राह्मण संस्कृति भी कहा जाता है. बहुप्रचलित होने के कारण इसी को भारतीय संस्कृति का पर्याय भी मान लिया जाता है.

सामान्य अर्थों में धर्म और संस्कृति को एक मान लिया जाता है. यह उचित नहीं है. आस्था और विश्वास को अपनी पीठ पर ढोने वाला परंपरानुगामी धर्म, विराट संस्कृति का हिस्सा तो हो सकता है, उसका पूरक अथवा पर्याय नहीं. बावजूद इसके अधिकांश लोग धर्म और संस्कृति में अंतर नहीं कर पाते. इस कारण सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या के लिए वे बारबार धर्म की शरण में चले जाते हैं. अपनी चतुर किस्सागोइयों के बल पर धर्म उन्हें लुभाता है. वह व्यक्ति के चारों ओर ऐसा जादुई आभामंडल खड़ा कर देता है, जिसके आकर्षण से बाहर निकल पाना आसान नहीं होता. उसके प्रभामंडल में हर किसी को विजेता होने का भ्रम बना रहता है. इस दौरान धर्म के विकार संस्कृति को भी दूषित करने लगते हैं. पुरोहित वर्ग जो धर्म और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग धंधागिरी के लिए करता है, जानेअनजाने संस्कृति और धर्म को परस्पर गड्मड किए रहता है. इससे सामाजिक स्तरीकरण मजबूत होता है, सांस्कृतिक विकास में जड़ता आने लगती है. भारतीय संस्कृति इसी ठहराव का शिकार है. जिस तेजी से उसका इन दिनों राजनीतिकरण हुआ है, सांस्कृतिक विकास पश्चगामी रूप ले चुका है. भारतीय संस्कृति के अभिजन चरित्र को दर्शाने वाले कई उदाहरण हैं. एक उदाहरण हमारे दैनिक जीवन से जुड़ा है. सामान्य शिष्टाचार के नाते दो व्यक्ति जब मिलते हैं तो उनके बीच नमस्ते, प्रणाम, नमस्कार जैसे संबोधनों का आदानप्रदान होता है. अपने से बड़ों के चरणस्पर्श करने की भी परंपरा है. कोई व्यक्ति जब नमन करता था तो बड़े व्यक्ति के प्रति श्रद्धा भाव उसके व्यवहार से झलकता है. यह सीधेसीधे दो व्यक्तियों के बीच सम्मान और स्नेह का लेनदेन होता है. पहला प्रणामकर्ता, दूसरा वह जिसके सम्मान में प्रणतिनिवेदन किया गया है. तीसरी शक्ति का नाम या हस्तक्षेप बीच में नहीं होता. सहज मानवीय व्यवहार के बीच उसकी कदाचित आवश्यकता भी नहीं है. लेकिन कुछ शताब्दी पहले से संस्कृति के क्षेत्र में धार्मिक हस्तक्षेप के चलते ‘रामराम’, ‘राधेराधे’ जैसे संबोधनों को भी प्रणति निवेदन का पर्याय मान लिया गया. देवताओं के नाम को प्रणति निवेदन का हिस्सा बनाए जाने के उदाहरण शास्त्रों में भले न मिलते हों, किंतु लोकपरंपरा में खूब प्रचलित हैं.

प्रणति निवेदन के बीच देवता का प्रवेश केवल धर्म के प्रति अनुराग का मामला नहीं है. यह सामाजिक संबंधों को जो वास्तविक हैं तथा यथार्थ के धरातल पर विकसित होते हैं, अमूर्त्त और वायवी बना देने का षड्यंत्र है. मानवीय संबंधों को औपचारिक बनाने, उनके बीच संदेह पैदा करने में इनका परोक्ष योगदान है. अधिकांश धर्म इस संसार को ‘माया’ या ‘भ्रम’ बताते हैं. वे मानते हैं कि सांसारिक संबंध मनुष्य को भरमाकर मुक्ति की राह को कठिन बनाते हैं. वे यह भी बताते हैं कि संसार के सभी संबंध कोरा भ्रम या दिखावा हैं. एकमात्र ब्रह्म सत्य है, और कुछ नहीं(एकम अद्वितिया ब्रह्म‘) अथवा ब्रह्म सत्य, जगन्नमिथ्याजैसे कथन इसी को दर्शाते हैं. इस आधार पर मोक्ष के अभिलाषी मनुष्य को सांसारिक सुखों, संबंधों के प्रति गहनानुराग से बचने की सलाह दी जाती है. धर्माचार्य समझाते हैं कि मोक्ष की यात्रा में प्रत्येक मनुष्य अकेला होता है, केवल कर्म उसका साथ निभाते हैं. प्रणति निवेदन के साथ देवता का नाम लेने से व्यक्ति मान लेता है कि देवता उससे प्रसन्न होंगे. होते हैं या नहीं यह उसे अंत तक पता नहीं चल पाता. मगर इससे दो व्यक्तियों के स्नेह और सम्मान के आदानप्रदान के बीच अनायास एक व्यवधान आ जाता है. व्यक्ति विशेष के प्रति सम्मानस्नेह प्रदर्शित करने का सिलसिला देवताओं को प्रसन्न करने का आयोजन मान लिया जाता है. इस तरह प्रणति निवेदन का उद्देश्य जो पूरी तरह सामाजिक है, वह प्रतीकों और वायवी संबोधनों तक सीमित हो, केवल कर्मकांड में सिमट जाता है. इसका लाभ चरमपंथी आसानी से उठा लेते हैं. कुछ दशाब्दी पहले उग्र हिंदुत्व को बढ़ावा मिला तो ‘रामराम’ और ‘राधे कृष्ण’ की जगह ‘जयश्रीराम’ जैसे शब्दवाणों ने ले ली. प्रणाम जो विनय समर्पण एवं सम्मान को दर्शाता था, उसके नए प्रारूपों से बल की भावना साफ झलकने लगी. सामान्य व्यवहार में धर्म की घुसपैठ हुई तो धर्म खुद को और भी ताकतवर समझने लगा. यही नहीं परंपरानुसार छोटों द्वारा बड़ों का चरणस्पर्श आदर्श प्रणति निवेदन माना जाता है. इसकी प्रेरणा की खोज भारतीय समाज में व्याप्त वर्णव्यवस्था तक ले जाती है. उसमें शूद्रों को प्रजापति ब्रह्मा के पैर से उत्पन्न बताया गया है. ‘लोक परंपरा’ में भी ‘पायलागन’ संबोधन वर्णव्यवस्था के शिखर पुरुष ब्राह्मणों के लिए आरक्षित रहा है. बाद में वह इतर वर्गों के लिए भी प्रचलित होता गया. संभव है इससे धर्म मजबूत हुआ हो, उसका संगठन क्षेत्र भी बढ़ा हो, किंतु संस्कृति लगाातार आहत होती रही है.

भारतीय संस्कृति को अधिकांश विद्वान ‘विविधता की संस्कृति’ मानते हैं. वे ‘सनातन संस्कृति’ कहकर इसे महिमा मंडित करते हैं. जबकि इनमें से एक भी धारणा मूल्यबोधक नहीं हैं. सांस्कृतिक वैविध्य तभी तक सार्थक है जब वह मानवीय चेतना का स्वयंस्फूर्त्त विस्तार हो. साथ ही लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देता हो. इसी प्रकार ‘विविधता में एकता’ की भावना भी तब उपयोगी हो सकती है, जब सदस्य इकाइयों के बीच स्वयंस्फूर्त्त एैक्यभाव हो. लोग अपने कर्म से, विचारों से स्वतंत्र होकर भी एकदूसरे के साथ अपनापन महसूस करते हों. भारतीय संस्कृति पर यह बात खरी उतरती है, ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. हमारे समाज में जाति और संप्रदाय के अनगिनत खाने हैं, अलगअलग पहचान के लिए जूझते हुए लोग हैं, भारी समाजार्थिक विषमताएं हैं. परिणामस्वरूप एक पक्ष, बाकी के लिए परिस्थिति चाहे जैसी हो, सदैव शिखर पर बना रहता है. जबकि दूसरा उसके दमन से बचने के लिए चुप्पी साधे रहता है. ऐसे समाज में सांस्कृतिक विविधता में एकता की दावेदारी, खुद को भरमाए रखने के लिए जानबूझकर की गई कवायद से अधिक नहीं लगती.

प्राचीनता भी किसी व्यक्ति, वस्तु या विचार का स्वतंत्र गुण न होकर कालसापेक्ष स्थिति है, जो उसकी ऐतिहासिकता की ओर संकेत करती है. वह अपने आप में किसी भी प्रकार की श्रेष्ठता का मापदंड नहीं है. संस्कृति का असल बड़प्पन इसमें है कि अपने अनुयायियों के बीच न्याय एवं समानता के वितरण को लेकर वह कितनी उदार है! कितने प्रयास उसने अपने अंतर्विरोधों के समाहार हेतु किए हैं. सदस्य इकाइयों की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखने हेतु वह कितनी संकल्पबद्ध है. इस कसौटी पर भारतीय संस्कृति उतनी सफल सिद्ध नहीं होती, जितनी बताई जाती है. यहां वर्ण और जाति के अनगिनत खाने और ऊंचीनीची दीवारें हैं. उनमें विविधता किसी व्यक्ति का स्वतंत्र चयन न होकर, उनपर थोप दी जाती है. कैद की तरह, जिससे बाहर आने के लिए व्यक्ति निरंतर छटपटाता रहता है. चूंकि यह असंभवसा कार्य है, अतएव अधिकांश लोग इसी को अपनी नियति मानकर समझौतावादी बन जाते हैं. स्वतंत्रता और समानता के मानवीय लक्ष्यों को लेकर यहां वर्ण, जाति, संप्रदाय, धर्म आदि के नाम पर तरहतरह के मतभेद, बहुसंख्यक वर्ग के लिए बाध्यकारी बन जाते हैं. उस अवस्था में ‘विविधता में एकता’ के सभी दावे आडंबर में सिमट जाते हैं.

सच तो यह है कि स्मृतिग्रंथों, पुराणों, महाकाव्यों आदि के माध्यम से जो संस्कृति हमारे जीवन में दाखिल होती है; उसका चरित्र पूरी तरह अभिजनोन्मुखी होता है. वह सर्वहारा बहुसंख्यक के श्रम पर पलती है, साथ ही श्रम का तिरस्कार भी करती है. वहां देवता वे हैं जो चमत्कार प्रिय हैं. हथेली पर सरसों उगाते हैं. श्रम से जिनका दूर तक नाता नहीं होता. वे भक्तों के द्वारा चढ़ाए गए भोग के बल पर पलते तथा दाता कहे जाते हैं. इसमें मौलिकता के अवसर न्यूनतम होते हैं. जबकि कापालिकों, तांत्रिकों, पंडेपुजारियों तथा धर्म का धंधा करने वाले पुरोहित लाखोंकरोड़ों में खेलते हैं. कुल मिलाकर यह संस्कृति सामाजिक न्याय की अवरोधक तथा सामूहिक विवेक का क्षरण करने वाली है. सामान्य नैतिकता एवं लोकादर्शों को अमल में लाने के बजाय वह धर्म के हाथों में खेलती है; और बड़ी आसानी से खुद को उसकी सामंती वृत्तियों के अनुसार ढाल लेती है. वह लोगों से अपेक्षा रखती है कि वे क्या करें, क्या खाएं, क्या पियें, क्या पढ़ेलिखें, और किन लोगों से कैसे संबंध बनाएं? न तो उसे मानवीय विवेक की परवाह रहती है, न उसकी रुचियों की. इस तरह वह जीवन में अनावश्यक दखल देकर, समानता और स्वतंत्रता की भावना का हनन करती है. कभी धर्म, कभी समाज और कभी परंपरावैविध्य के बहाने, असमानता को मानवीय नियति घोषित करना उसकी मूल प्रवृत्ति रही है. वह असल में शासक संस्कृति है.

जाति व्यवस्था के रंग में रंगी वह संस्कृति व्यक्ति के जन्म के साथ ही घोषित कर देती कि उसका जन्म शासन करने के वास्ते हुआ है या शासित होने के लिए. जो लोग शासक वर्ग में जन्म लेते हैं, अभिजनोन्मुखी संस्कृति का रेशारेशा उनकी मदद में जुटा होता है. शासितों की कोटि में जन्मे व्यक्ति, यदि दुर्दशा से उबरना चाहें या इस तरह का सपना भी देखें तो वह लगातार अवरोध उत्पन्न कर, परिवर्तन की चाहत को ही मिटाने पर तुल जाती है. लोगों के सवाल करने की आदत को छुड़ाकर वह उनके निर्मानवीकरण को गति देती है. उससे सामूहिकता बोध, जो संस्कृतिकरण का प्रमुख उद्देश्य है, का हृास होता है. सांप्रदायिकता पनपती है. परिणामस्वरूप विपुल जनशक्ति छोटेछोटे टुकड़ों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाती है. इसे नेतृत्व का अभाव कहें या पराश्रितता की भावनाबहुसंख्यक जनसमाज सांस्कृतिक विषमता के प्रतीकों को संस्कृति के अंग के रूप में अपनाए रखता है. यह समर्पण एक अवधि के उपरांत अनुकूलन का रूप ले लेता है. व्यवस्था से अनुकूलित व्यक्ति वास्तविक हित को भुलाकर उन प्रतीकों को अपने अस्तित्व का पर्याय समझने लगता है, जो उसकी दासता का कारण रहे हैं. उदाहरण के लिए अधिकांश हिंदू विवाहिताएं ‘सुहाग की निशानी’ के रूप में अपनी मांग में सिंदूर डालती हैं. भरी हुई मांग दर्शाती है कि स्त्री विवाहिता है. यह पुरुष सत्तात्मकता एवं योनि शुचिता से जुड़ा प्रतीक है. यह उन दिनों की याद दिलाता है जब कन्याएं रजस्वला होने के साथ ही दान में सौंप दी जाती थीं या यूं कहो कि धर्म के नाम पर दान में हड़प ली जाती थीं. अधिकांश स्त्रियां पढ़लिखकर भी इस तथ्य को नहीं समझतीं. जो समझती हैं, वे ‘वाचाल’ कहकर उपेक्षितअपमानित की जाती हैं. परिणामतः स्त्री की अस्मिता तथा उनके समूचे कार्यव्यवहार पर स्वाभाविक दासता पसरी रहती है.

हम भारतीयों, विशेषकर जो लोग स्वयं को हिंदू मानते हैं, का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक तरहतरह के कर्मकांडों से बंधा होता है. कर्मकांड अनेक प्रकार के हो सकते हैं. एक समाज से दूसरे समाज, यहां तक कि एक जाति समूह से दूसरे जातिसमूह के बीच उनका रूप बदलता रहता है. सभी कर्मकांडों का उद्देश्य होता है, किसी बड़ी शक्ति को प्रसन्न करना. उनमें एक पक्ष दाता(जाहिर है काल्पनिक) तो दूसरा यजमान की भूमिका में होता है. यजमान अपने सर्वश्रेष्ठ को समर्पित करने की भावना के साथ दाता के आगे नतशिर होता है. उसी समय खुद को दाता का नुमाइंदा घोषित करते हुए पुरोहित बीच में आ टपकता है. यजमान द्वारा दाता के नाम अर्पित की गई सामग्री को समेट लेने के अलावा वह दक्षिणा की दावेदारी भी करता है. चूंकि कर्मकांडों को लोक की सामान्य स्वीकृति प्राप्त होती है, इसलिए उनसे पैदा स्तरीकरण समाज में अपनी पैठ बना लेता है. तदनुसार जो दाता या उसके स्वयंघोषित प्रतिनिधि की इच्छा है, उसे उसी रूप में बगैर किसी नानुकर के, स्वीकार कर लेना यजमान की विवशता होती है. इसका लाभ शिखर पर बैठे लोग उठाते हैं. राज्य की कुल उत्पादकता में उनका योगदान भले ही नगण्य हो, मगर लाभ के नब्बे प्रतिशत को किसी न किसी बहाने वे हड़प ही लेते हैं. फिर उसे अपनी ताकत बनाकर दाता की भूमिका निभाए जाते हैं. यह अनाज के बदले रेत की या शायद उससे भी बदतर सौदेबाजी है. इसमें यजमान पुरोहित को दक्षिणा देता है. कर्मकांडों के तामझाम पर भी अपनी आय का एक हिस्सा खर्च करता है. किंतु पुरोहित की ओर से सिवाय वायवी आश्वासनों के कुछ और प्राप्त नहीं होता. इस बात को यजमान के साथसाथ पुरोहित भी भलीभांति जानता है. लेकिन धर्म तथा उसकी रूढि़यों से गहरे जुड़ाव तथा उसकी कमजोरियों को न समझने की प्रवृत्ति मनुष्य से तर्कसम्मत ढंग से सोचने का अवसर छीन लेती है. इस तरह पूरी संस्कृति दिखावे और कर्मकांडों में ढल जाती है.

कर्मकांडों की व्याख्या जिन ग्रंथों में है, वे सब ब्राह्मणों द्वारा रचे गए हैं. उनकी समीक्षा, आलोचना अथवा किसी तरह के संशोधनविस्तार का अधिकार ब्राह्मणेत्तर वर्गों को नहीं है. उनसे केवल इतनी अपेक्षा होती है कि ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए लिखितअलिखित विधान का बिना किसी नानुकुर के अनुसरण करें. उसपर किसी प्रकार का संदेह, आलोचना, समीक्षा पाप की कोटि में आता है. उसके लिए तरहतरह के दंडविधान पहले भी थे, आज भी हैं. समाजार्थिक असमानता का पोषण करने वाली संस्कृति के प्रति विरोध के स्वर आरंभ से ही उठते रहे हैं. जाहिर है, आक्रोश जनसंस्कृति के उन अनुयायियों की ओर से उभरता है जो विषमता और सांस्कृतिक अन्याय का शिकार होते आए हैं. यदि विकृतियों का समाधान कर लिया जाए तो अपेक्षाकृत उदार एवं समावेशी जनसंस्कृति हमारे सामने होगी, जिसमें वर्चस्व की भाषा नहीं चलती. सहकार और सहयोग पर टिकी उस संस्कृति के संवाहक निचले पायदान पर स्थित वे लोग हैं, जिन्हें शिखरस्थ वर्ग उपेक्षित और तिरष्कृत करते आए हैं. उनकी खूबी है कि वे सुखदुख को साझा करके जीते हैं. कबीर की तरह संतोष को धन समझते हैं. बहुत कम में जीवन बिता सकते हैं. अभावों को भी हंसतेगाते झेल जाना उनकी प्रवृत्ति रही है. भूख का उत्सव मनाकर जीने वाले ऐसे लोग देश में हर जगह हैं. वे इस देश के लाखोंकरोड़ों मेहनतकश लोग हैं, जो केवल अपने बाजुओं पर भरोसा रखते हैं. यही वे लोग हैं जो किसी भी संस्कृति के महात्म्य का कारण बन सकते हैं, इन्हीं को भुलावे में रखने के लिए विविधता में एकता के गीत गाए जाते हैं. उनके सपने इस देश और इस जन्म के नहीं होते. इस कारण वे शिखर पर विराजमान लोगों के लिए कभी खतरा नहीं बनते. इनमें से अधिकांश कदाचित ऐसे होंगे जो संस्कृति का अर्थ भी न जानते हों. इस उदासीनता का लाभ उठाकर दूसरे लोग उन्हें अपनी ही संस्कृति का अनुपालक घोषित करते आए हैं. जबकि अपने श्रमकौशल पर जीवन जीने वाले स्वाभिमानी मजदूरों, शिल्पकारों तथा दूसरों के श्रमकौशल पर म