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वायकम सत्याग्रह : अस्पृश्यता के विरुद्ध निर्याणक जंग

सामान्य

 (वायकम केरल का खूबसूरत नगर है। आजादी से पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था। और वहां राजा का शासन था। 1924 तक आधुनिक केरल, तमिलनाडु सहित दक्षिण के कई राज्यों में निचली जाति के सदस्यों को कुछ सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी नहीं थी। वायकम में शिव का प्राचीन मंदिर था। उससे जोड़ने वाली सड़कों पर चलना भी निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों  के लिए निषिद्ध था। माना जाता था कि उससे देवता और देवस्थान दोनों अपवित्र हो जाएंगे। सार्वजनिक मार्गों पर चलने के मानवतावादी अधिकार को लेकर जार्ज जोसेफ और उनके साथियों द्वारा आरंभ किया गया था। पहले चरण में सरकार आंदोलन को बलपूर्वक दबाने में सफल हो गई। हताशा की उस घड़ी में पेरियार को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया गया। उनके पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में जान आ गई। आंदोलन के लिए पेरियार दो बार जेल गए। अंततः उनकी जीत हुई। पेरियार को ‘वायकम नायक’ की उपाधि मिली। 25-26 दिसंबर, 1958 को पेरियार ने अपने एक भाषण में उस घटना को याद किया था। उससे गांधी सहित तत्कालीन नेताओं और ब्राह्मणों की मानसिकता जाहिर होती है, अपितु संघर्ष की गंभीरता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। भाषण का मूल तमिल ने अंग्रेजी अनुवाद ऐ. एस. वेणु ने किया है। हिंदी पाठ उसी का भाषांतर है)

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

 भाइयो और बहनो,

आपके साथियों की ओर से मुझे कन्याकुमारी जिले में आने का निमंत्रण कई बार दिया गया था। चूंकि मैं दूसरे जिलों के दौरों में व्यस्त था, इसलिए पहले नहीं आ सका था। जहां-जहां भी मैं गया, वहां मैंने देखा कि समाज में काफी जागृति आई है। हजारों की संख्या में लोग वहां जमा हुए थे। 

दस वर्ष पहले, यहां मार्तंडम में मैंने एक सभा को संबोधित किया था। उन दिनों आप स्थानीय राज्य के नागरिक थे। आपके ऊपर राजा का कानून चलता था, जबकि हम ब्रिटिश सरकार के नागरिक थे। बावजूद इसके आज भी हम सब ‘शूद्र’ हैं। हम द्रविड़ लोग अपमान-भरा जीवन जीते थे। यह हमारे साथ हुए धोखे का परिणाम  था। हमें आगे भी, हमेशा शूद्र बने रहना है। 

आज हम एक देश के नागरिक हैं। हम तमिलनाडु के तमिल हैं। आज हमें एक सूत्र में बांध दिया गया है।  हमारी एकता मजबूत हुई है। चूंकि हम सब एक ही देश के नागरिक हैं, इसलिए आज हम एक परिवार की तरह परस्पर जुड़े हुए हैं। हमें एक ही जाति माना गया है, अतएव अपने आदर्शों की प्राप्ति हेतु हम सभी को साथ-साथ, एकजुट होकर काम करना पड़ेगा।  

जहां तक मेरा संबंध है, 35 वर्ष पहले मैंने तमिलनाडु में एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। उद्देश्य था, सामाजिक कुरीतियों, विशेषरूप से जातिभेद और घृणित छूआछूत को खत्म करना। हजारों वर्षों से हमें कुछ तयशुदा सार्वजनिक मार्गों पर चलने की अनुमति नहीं थी। जो लोग आज कम से कम पचास वर्ष के हैं, वे उन दिनों को याद कर सकते हैं। इस पीढ़ी के युवा अतीत की इन सच्चाईयों से अपरिचित हो सकते हैं।  

यदि उन दिनों आंदोलन नहीं हुआ होता, तो आज हममें से बहुत से लोग अनेक मार्गों पर चलने के अधिकार से वंचित होते। उन दिनों इस देश में बहुत बुरे हालात थे। सरकार कट्टरपंथी ब्राह्मणों के हाथों में थी। वर्णव्यवस्था अपने पूरे चरम पर थी। हमारे देश में, ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों के उभार द्वारा, गैर-ब्राह्मणों के अनेक अधिकारों की वापसी हुई है। ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलनों ने ब्राह्मण-आधिपत्य का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोकप्रचलित रूप में ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नामकरण उसकी पत्रिका ‘जस्टिस’ के आधार पर मिला था।  

ब्राह्मणों के भी अपने संगठन थे, जैसे कि ‘ब्राह्मण-समाज’ और ‘ब्राह्मण महासभा’। वे हमारे हितों के विरोध में काम करते थे; तथा वैध अधिकारों की प्राप्ति हेतु हमारे संघर्ष में बाधा बनकर खड़े थे। ब्राह्मण खुद को ‘सर्वोच्च  जाति’ का बताकर गर्व का अनुभव करते थे।  वे जोर देते थे कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ संबोधित किया जाए। जबकि हम सभी को वे ‘शूद्र’ कहने पर अड़े रहते थे। ‘मनुस्मृति’ तथा दूसरे धर्मशास्त्रों में भी हमें केवल ‘शूद्र’ कहा गया है।  कितना अधिक अत्याचार और अपमान  हमें सहना पड़ता था! ऐसे विपरीत हालात ने हमारी प्रगति और जीवन दोनों को प्रभावित किया था।

यदि हमारे पास अपने संगठन के लिए ‘द्रविड़ कझ़गम’(द्रविड़ सभा) या ‘तमिल कझ़गम’ में से कोई एक चुनने का विकल्प न हो तो उसके लिए उपयुक्त नाम के रूप में केवल ‘शूद्र कझ़गम’(शूद्र पार्टी या शूद्र सभा) को चुनना होगा। यही कारण है, जिससे हमें ‘साउथ लिबरल फेडरेशन’ जिसे बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ कहा जाता था—का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कझ़गम’ रखना पड़ा था, ताकि हम दुनिया को बता सकें कि हम क्या हैं! हम द्रविड़ लोग गौरवशाली राष्ट्र हैं—यह दुनिया जानती है।  

वर्ष 1919 और 1920 में चले गैर-ब्राह्मणवाद आंदोलन(जस्टिस पार्टी) तथा मेरे प्रांत तमिलनाडु में हुए आंदोलनों के फलस्वरूप, सार्वजनिक मार्गों के उपयोग का अधिकार, बिना किसी जातिभेद के सभी नागरिकों को, न केवल तमिलनाडु, अपितु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी प्राप्त हो चुका है। 

‘जस्टिस पार्टी’ के हाथों में विहित शक्तियों के इस्तेमाल के फलस्वरूप सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार भी सभी जातियों के लिए अमल में लाया गया था। यही नहीं, उन्हीं  दिनों ‘जस्टिस पार्टी’ द्वारा लाए गए एक विधेयक में तथाकथित निचली जातियों को ऐसे कुंओं से पानी लेने के अधिकार को भी शामिल किया गया था, जिन्हें उससे पहले विशेष रूप से ब्राह्मणों के इस्तेमाल के लिए आरक्षित रखा जाता था।  

ये सभी वे घटनाएं हैं जो गांधी के(भारतीय राजनीति में) सक्रिय होने से पहले ही घट चुकी थीं। यह कहना बेतुका और कपटपूर्ण है कि यह सब उपलब्धियां केवल गांधी की देन हैं। 

केवल इतना ही नहीं। ‘जस्टिस पार्टी’ के कार्यकर्ता ही वे लोग थे जिन्होंने, पंचायतों, नगर-निकायों, क्षेत्रीय मंडलों, जिला स्तरीय मंडलों तथा विधायिकाओं में, सभी जाति के लोगों प्रवेश हेतु, सर्वप्रथम रास्ता तैयार किया था। वह भी गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने से बहुत पहले। उन्होंने ही, यहां तक कि  गांधी से भी पहले, तथाकथित निचली जातियों के प्रतिनिधियों को लगभग सभी निकायों में मनोनीत किया था। अतः यह कहना उचित नहीं है कि गांधी ने निचली जातियों जैसे कि पारिया के लिए, तथाकथित उच्च जातीय ब्राह्मणों के समकक्ष, विधायिकाओं में प्रवेश का अधिकार दिलाया था। सच तो यह है कि गांधी से भी बहुत पहले, तथाकथित निचली जातियां जैसे कि पारिया, चक्किलीस, पल्लार विधायिकाओं की सदस्य बन चुकी थीं। मैं चाहता हूं कि आप सब इस सत्य को भली-भांति आत्मसात कर लें।  

यह प्रमाणित सत्य है कि गांधी की योजना एकदम अलग थी। उच्च जातीय ब्राह्मणों की भांति वे भी सभी शूद्रों तथा अछूतों को, कुंओं और तालाबों से पानी लेने का समान अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे। न ही वे अस्पृश्यों को उच्च जातियों की तरह मंदिर प्रवेश की अनुमति देने का समर्थन करते थे। सच तो यह है कि गांधी उच्च जातियों के विशेषाधिकारों को, आगे भी उन्हीं के अधीन रखने के पक्ष में थे। उन्होंने मनुस्मृति का समर्थन किया था। वे उच्च जातीय ब्राह्मणों तथा निम्न जातीय शूद्रों एवं अस्पृश्यों के लिए अलग-अलग मंदिर, तालाब, आवास तथा कुंए बनवाने के पक्ष में थे। यही गांधी की असली योजना थी।  मैं इसे जानता हूं। कोई मना करके दिखाए। आज गांधी के बारे में झूठा प्रचार किया जाता है। गांधीवाद और गांधी की जीवनशैली के बारे में तो बढ़-चढ़कर कहा गया है। 

मैं तमिलनाडु कांग्रेस समिति का सचिव था। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ओर से 48,000 रुपये की अनुदान राशि निचली जाति के शूद्रों यथा पारिया, चिक्कलीस, पल्लारों आदि के लिए अलग मंदिर और स्कूल बनवाने के लिए तमिलनाडु भेजी गई थी। इस बात का सख्त आदेश था कि ये अछूत लोग, उच्च जातिवाले हिंदुओं द्वारा विशेषरूप से इस्तेमाल किए जाने वाले स्थानों पर जाकर किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न न करें। 

उस समय तक जस्टिस पार्टी के नेता ऐसा आदेश लागू कर चुके थे, जो सभी वर्ग के विद्यार्थियों को, बगैर किसी जातीय पक्षपात के, सभी स्कूलों में अध्ययन करने का अधिकार देता था। उन्होंने सभी के एक साथ पढ़ने की व्यवस्था की थी। शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित प्रतिबंध बहुत पहले ही समाप्त किए जा चुके थे। इस सुधार को सख्ती से लागू किया गया था। ऐसा कानून बनाया गया था जो प्राइवेट स्कूलों को अपने यहां निश्चित अनुपात में शूद्र विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य करता था। ऐसा न करने पर स्कूल की सरकारी अनुदान की पात्रता समाप्त हो जाती थी।   

आदेश था कि निरीक्षण के समय अधिकारी स्कूल प्रशासन से पूछेंगे, ‘इस संस्था में कितने अछूत विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं?’ यदि उत्तर नकारात्मक हो तो अधिकारी अगला सवाल करेगा, ‘क्यों?’ यदि कोई यह कहेगा कि संस्थान में प्रवेश के लिए किसी अछूत ने संपर्क नहीं किया है, तब अधिकारी कहेगा—‘तब तुम जाओ और कुछ अछूत विद्यार्थियों को अपने विद्यालय में भर्ती कराओ।’ मैं आपको उन व्यवस्थाओं के बारे में बता रहा हूं जो हमारे राज्य में, गांधी के आने से पहले ही लागू थीं। 

जिन दिनों तमिलवासी बहुत अधिक प्रगतिशील थे, आपके कन्याकुमारी जिले में स्थितियां बहुत खराब थीं। उच्च जाति वाले हिंदू निम्न जातीय अस्पृश्य हिंदुओं के अधिकारों को सह ही नहीं पाते थे। यहां तक कि उनकी छाया भी तथाकथित उच्चतम जाति के लोगों पर नहीं पड़ सकती थी।  यह आपके प्रांत की दर्दनाक त्रासदी थी। निचली जाति के शूद्रों को अपनी उपस्थिति और स्थान के बारे में, जहां वह छिपा होता था—दूर से ही चिल्लाकर बताना पड़ता था।  वे तो थिरु. नारायण सामी के अनथक और प्रशंसनीय प्रयास थे, जिससे शूद्रों में जागृति आई थी। वायकम आंदोलन के कारण हालात में बदलाव हुआ था। अछूतों को यहां काफी कुछ मिला है। यहां मौजूद युवा इन उपलब्धियों से अनजान हो सकते हैं। 

हमने छूआछूत के विरुद्ध, वायकम में हुए संघर्ष की कीमत चुकाई थी।  हम कई बार जेल भी गए थे। अनेक बार हमारी पिटाई हुई।  छूआछूत उन्मूलन के निमित्त हमारे बलिदानों के कारण हमें बदनाम भी किया गया।  

उन दिनों जेल में श्रेणियां नहीं होती थीं। उनके साथ बहुत बुरा वर्ताब होता था। अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए वह सबकुछ हमने सहा; और आखिरकार परिवर्तन के वाहक बने। यह बदलाव कैसे संभव हुआ था? हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि आप इसपर विचार करेंगे, और सुधार की नई संभावना की तलाश करेंगे, तो आप निश्चित ही इस तथ्य को स्वीकार करेंगे कि जातिवाद तथा उसकी बुराइयों को मिटाने के लिए हमारी रफ्तार बहुत धीमी थी। हमें और अधिक ताकत, और तीव्र गति से आगे बढ़ना चाहिए। 

आपको वायकम आंदोलन के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए। अत्यंत मामूली घटना वायकम आंदोलन की संवाहक बनी थी। 

कामरेड माधवन एक वकील थे। एक मुकदमे में उन्हें अपने मुव्वकिल की तरफ से माननीय न्यायाधीश के समक्ष पेश होना था। अदालत महाराजा त्रावणकोर के भवन परिसर में थी। उस समय महाराज के जन्मदिवस की तैयारियां चल रही थीं।  राजभवन का पूरा परिवेश ताड़ की पत्तियों द्वारा खूबसूरती के साथ आच्छादित था। ब्राह्मणों का मंत्रोच्चारण आरंभ हो चुका था। चूंकि कामरेड माधवन इझ़वा(नाडार) समुदाय से थे, इसलिए उन्हें भवन परिसर में प्रवेश करने या गुजरने; और अदालत पहुंचने की अनुमति नहीं मिली।  

उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में जाति-प्रथा और छूआछूत उन्मूलन के लिए आंदोलन चला रही थी।  अंतर्जातीय विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा था। स्कूलों को सभी जाति-वर्गों के लिए खोल दिया गया था। ‘अंतर्जातीय भोजन’ लोकप्रिय हो चुका था।  इस तरह के सुधारवादी कार्यक्रम जस्टिस पार्टी द्वारा पूरे तमिलनाडु में चलाए जा रहे थे। जब गांधी को जस्टिस पार्टी द्वारा तमिलनाडु में चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में पता चला, तब उन्होंने हमारी अन्य योजनाओं सहित उन कार्यक्रमों को भी अपने रचनात्मक आंदोलन में शामिल किया। 

उन दिनों जस्टिस पार्टी के कार्यक्रर्ताओं ने ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को साहसपूर्वक उजागर किया था। परिणामस्वरूप वे सड़क पर अकेले चलते हुए भी घबराते थे। गैर-ब्राह्मण नेताओं जैसे कि डॉ. टी.  एम. नायर तथा सर पी. थियागराया ने शूद्रों और अस्पृश्यों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु लगातार, बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए, और राज्य में शक्तिशाली पदों पर आसीन हुए। ब्राह्मण जस्टिस पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा ईष्यालु थे। उन दिनों उनकी जमीन खिसकी हुई थी।  

उन दिनों ब्राह्मण धूर्ततापूर्वक एक ही बात बार-बार दोहराते थे—‘हम सत्ता के दलाल नहीं हैं’, ‘हम चुनावों का बहिष्कार करते हैं!’ इस तरह के झूठे और फरेबी नारों से वे लोगों को छलते रहे, निरंतर नई-नई साजिश रचते रहे। जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए गांधीजी ने छूआछूत की समस्या पर विचार करना आरंभ किया, क्योंकि तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी को सत्ता से बाहर करने का वही एक तरीका था।  

उन दिनों मैं जस्टिस पार्टी के नेताओं से भली-भांति परिचित था।  अनेक पदों पर आसीन होने के कारण मेरे प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था। राजगोपालाचार्य मुझसे मिले थे और उन्होंने मुझे गांधी का अनुयायी बनने के लिए प्रवृत्त किया था। उनका कहना था कि गांधी अकेले अपरिहार्य सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। मैंने इरोद नगर निगम से इस्तीफा दे दिया; और कांग्रेस में शामिल हो गया। कांग्रेस में मेरे प्रवेश से पहले किसी भी तमिलवासी को कांग्रेस पार्टी का सचिव या अध्यक्ष बनने का सम्मान नहीं मिला था।  तमिल कांग्रेस के इतिहास में मैं पहला तामिल था, जिसे तमिलनाडु कांग्रेस के इतिहास में इस पदों पर आसीन होने का अवसर मिला था। 

कामरेड टी. वी.  कल्याणसुंदरम्(थिरू वी. के.) स्कूल अध्यापक थे। डॉ.  पी.  वरदराजुलू(नायडू) ‘प्रापंच मित्रन’ के संपादक थे। बावजूद इसके ब्राह्मण उनपर विश्वास नहीं करते थे। कामरेड वी. ओ.  चिदंबरम(पिल्लई), अपने सभी संसाधनों को खर्च कर देने के बावजूद, कस्तूरी रंगा आयंगर पर आश्रित थे। 

इसलिए ब्राह्मणों ने उनका सम्मान नहीं करते थे।  वे मेरी उपेक्षा नहीं कर सकते थे, क्योंकि मैं पहले से ही बड़े पदों पर था और बड़े व्यापारिक समुदाय के बीच सम्मानित था। प्रत्येक मामले में, सभी तरह से राजगोपालाचार्य मुझपर भरोसा करते थे, और उनका मुझपर काफी विश्वास था। बदले में मैं भी उनपर विश्वास करता था और उस विश्वास की रक्षा को समर्पित था।  हम दोनों ने साथ-साथ काम किया था। मैंने एक सघन प्रचार कार्यक्रम चलाया था, परिणामस्वरूप ब्राह्मण एक बार पुनः सत्ता केंद्र पर लौट आए। अपने बुद्धिवादी विचारों की अभिव्यक्ति को लेकर मैं बहुत साहसी था। ईश्वर संबंधी अपने विचारों को मैंने खुलकर व्यक्त किया था, ‘यदि लोगों के स्पर्श मात्र से मूर्ति अपवित्र हो जाती है, तो ऐसी ईश्वर की हमें आवश्यकता नहीं है। ऐसी मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े करके उसका इस्तेमाल अच्छी सड़कें बनाने के लिए किया जाना चाहिए।  नहीं तो उन्हें नदी किनारे रख देना चाहिए, जहां वे कपड़े धोने के काम आ सकें। मुझे प्रायः ब्राह्मणों द्वारा ही बोलने के लिए खड़ा किया जाता था, चूंकि मैं किसी शक्तिशाली पद या प्रतिष्ठा की दौड़ में नहीं था, ब्राह्मण उस समय चुप्पी साध लेते थे। 

ईश्वर, धर्म और जाति के बारे में मैं आज जो भी कहता हूं, ठीक वही मैं उन दिनों भी कहा करता था। मेरे भाषणों को सुनने के बाद राजगोपालाचार्य प्रायः मुझसे कहा कहते थे कि मैं बहुत सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है। उत्तर में मैं उनसे अकसर यही कहता था कि जब तक लोग मूर्ख बने रहेंगे, तब तक आसान शब्दों में अपनी बात रखने का कोई औचित्य नहीं है।  मेरी बात सुनकर वे बस मुस्कुरा देते थे। इस तरह, हमने ब्राह्मणों के सत्ता केंद्रों पर आसीन होने की राह आसान की थी। 

एडवोकेट माधवन को अदालत जाते समय रोकने के बाद से ही इझ़वा समुदाय के नेता उसके विरुद्ध आंदोलन करना चाहते थे। केरल कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के.  पी.  केशवमेनन, टी.  के.  महादेवन तथा दूसरे नेताओं ने मोर्चा संभाला। उन्होंने राजभवन में होने पूजा-पाठ के दिन विरोध प्रदर्शन की शुरुआत का निर्णय लिया। सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में उन्होंने वायकम को चुना।  केवल वायकम ही ऐसा स्थान था, जहां चार प्रवेश-द्वारों वाला मंदिर था। चारों दरवाजों से एक-एक सड़क गुजरती थी। विरोध प्रदर्शन के लिए वह सर्वोपयुक्त स्थान था। इसलिए सत्याग्रह के निमित्त उन्होंने वायकम को चुना था।  

नियम यह था कि निम्न जाति के अछूत जैसे कि ‘’अवर्णस्थानांस’ तथा ‘अयीतक कर्णस’ उन सड़कों पर प्रवेश नहीं करेंगे। यदि कोई अछूत मंदिर की दूसरी दिशा में जाना चाहे तो उसे मंदिर से 400 से 600 मीटर की दूरी बनाकर चलना पड़ता था। इस तरह उसे डेढ़ किलोमीटर से अधिक रास्ता और तय करना पड़ता था। यहाँ तक कि ‘असारियों’, ‘वनियारों’ तथा जुलाहों को भी मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों पर चलने की पाबंदी थी। दूसरे मंदिरों विशेषकर शचींद्रम पर भी यही नियम लागू था।  इस कानून का पालन पूरी शक्ति के साथ किया जाता  था।  

प्रमुख सरकारी कार्यालय, अदालत, पुलिस स्टेशन आदि वायकम मंदिर की दूसरी दिशा में, उसके प्रवेश द्वार के निकट थे। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों के स्थानांतरण के समय भी ध्यान रखा जाता था कि कोई अछूत कर्मचारी वहां स्थानांरित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उन्हें मंदिर के आसपास बने रास्तों से गुजरने की अनुमति प्राप्त न थी।  यहां तक कि मजदूरों का दुकानों तक जाने के लिए भी, उन सड़कों से होकर गुजरना निषिद्ध था। 

जैसे ही वायकम सत्याग्रह आरंभ हुआ, राजा ने 19 नेताओं जिनमें एडवोकेट माधवन, बैरिस्टर केशव मेनन, टी. के. महादेवन, जार्ज जोसेफ आदि शामिल थे—को गिरफ्तार करने का आदेश सुना दिया। उन्हें विशिष्ट कैदी के रूप में रखा गया था। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी पिट, पुलिस महानिदेशक के पद पर राजा के अधीन कार्यरत थे। उन्होंने आंदोलनकारियों से जुड़े मामलों को भली-भांति संभाल लिया था। 19 आंदोलनकारियों के जेल जाते ही वायकम आंदोलन पटरी से उतर चुका था। उन्हीं दिनों मुझे केशव मेनन तथा बैरिस्टर जार्ज जोसेफ की ओर से एक पत्र प्राप्त हुआ। 

‘आपको यहां आकर आंदोलन को नवजीवन देना चाहिए। अन्यथा हमारे पास राजा के सामने आत्मसमर्पण कर, उनसे क्षमा-याचना करने के अलावा दूसरा कोई उपाय न होगा। उस अवस्था में हमारा तो कोई नुकसान न होगा, परंतु एक महान कार्य अधूरा रह जाएगा। असल में वही हमारी चिंता का कारण है। इसलिए आप कृपया तत्काल पहुंचें और आंदोलन की जिम्मेदारी संभालें।’

यही बातें उन्होंने अपने पत्र में लिखीं थीं। उन्होंने मुझे स्वयं चुना था और मुझे पत्र लिखा था, क्योंकि उन दिनों मैं मुखर होकर छूआछूत के कलंक पर लगातार हमले कर रहा था। इसके अलावा न केवल उग्र प्रचारक अपितु सफल आंदोलनकारी के रूप में भी मैं जाना-पहचाना और स्थापित नाम था।  जब उन्होंने पत्र भेजा, मैं यात्रा पर निकला हुआ था।  पत्र इरोद से पुन:प्रेषित होकर मुझे मदुरै जिला के पन्नईपुरम स्थान पर प्राप्त हुआ। पत्र मिलते ही मैं वायकम जाने के लिए आगे की यात्रा स्थगित कर इरोद के लिए दौड़ा। एक पत्र लिखकर मैंने राजगोपालाचार्य से अनुरोध किया कि वे मेरे स्थान पर तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल  लें। अपने पत्र में मैंने वायकम सत्याग्रह की महत्ता के बारे में बताया था। मेरे लिए वह अच्छा अवसर था। इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहता था। मैंने अपने दो साथियों के साथ वायकम के लिए प्रस्थान कर दिया। 

किसी तरह यह बात फैल गई कि मैं वायकम आंदोलन का नेतृत्व करने  के लिए आ रहा हूं। जब में नाव के रास्ते वायकम पहुंचा, पुलिस कमिश्नर और तहसीलदार ने हमारा स्वागत किया। 

हमें बताया गया कि राजा ने उन्हें हमारा स्वागत करने तथा हमारे ठहरने का प्रबंध करने का आदेश दिया है। मैं सचमुच बेहद अचंभित था। राजा मुझपर अत्यंत मेहरबान थे, क्योंकि जब भी उन्हें दिल्ली जाना होता था, वे इरोद में हमारे ही बंगले में ठहरते, जबकि उनके कर्मचारी हमारी सराय में आश्रय पाते थे। रेलगाड़ी पर सवार होने से पहले, जब तक वे इरोद में रहते, तब तक राजा तथा उनके कर्मचारियों का भरपूर स्वागत किया जाता था। वायकम में मुझे अप्रत्याशित आदर-सत्कार मिलने के पीछे यह कारण भी हो सकता था। जब वायकम के निवासियों को मेरे और राजा के संबंधों के बारे में पता चला, वे सभी अत्यंत प्रसन्न हुए।  

बावजूद इसके कि राजा ने मेरे साथ मेहमानों जैसा व्यवहार किया था, मैंने वायकम आंदोलन के समर्थन में अनेक सभाओं में हिस्सा लिया। मैंने छूआछूत जैसी घृणित प्रवृत्ति कि आलोचना की। मैंने कहा कि ऐसे  ईश्वर को जिसे लगता है कि वह अछूतों के स्पर्श-मात्र से अपवित्र हो जाएगा—मंदिर में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसी मूर्ति को तुरंत हटा देना चाहिए और उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाना चाहिए। मेरे प्रचार के फलस्वरूप रोज नए-नए लोग आंदोलन से जुड़ने की इच्छा जताने लगे। प्रतिदिन नए-नए लोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग स्थानों से आने लगे। उससे राजा की परेशानी बढ़ने लगी।  बावजूद इसके वह पांच-छह दिन शांत रहा।  मेरे भाषण को लेकर कई लोगों ने उससे शिकायत की। राजा मेरी और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए, दस दिन के बाद उसने पुलिस अधिकारी को दंड संहिता की धारा 26 को, जो आज की धारा 144 जैसी ही थी, लागू करने की अनुमति दे दी।  

मेरे पास उस प्रतिबंध के उल्लंघन के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था। तदनुसार मैंने प्रतिबंध का उल्लंघन कर, एक सभा को संबोधित किया। परिणामत: मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे साथ मि. अय्युमुथु ने भी प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम सभी को एक महीने के कड़े दंड के साथ कारावास भेज दिया गया।  मुझे अरुविक्कुथ जेल में रखा गया। मेरे जेल चले जाने के बाद मेरी पत्नी नागम्मई, बहन एस. आर. कन्नमल तथा दूसरों ने मिलकर राज्य-भर में आंदोलन किया। जैसे ही मैं जेल से बाहर आया, एक बार फिर आंदोलन में कूद पड़ा। 

जब मैं जेल में था, आंदोलन में यकायक तेजी आ गई। अनेक लोगों ने अदालत से उन्हें जेल भेजने की फरियाद की। प्रचार-प्रसार में तेजी ने भी लोगों को वायकम सत्याग्रह में उतरने के लिए उत्साहित किया। दुश्मन उपद्रवों और गुंडागर्दी पर उतर आए थे। उपद्रवी तत्वों ने अफवाह फैलाकर हमारे आंदोलन को ठप्प कर देने के लिए अनेक चालें चलीं। उनके गंदे मनसूबों और कोशिशों का अंत नाकामी के रूप में सामने आया। यही नहीं जो लोग विदेशों में थे, उन्हें भी देश में जाति के नाम पर हो रहे दमन और अत्याचारों की जानकारी मिल गई। वे स्वेच्छापूर्वक दान देने लगे। प्रतिदिन ढेर सारे मनीआर्डर आने लगे। आंदोलनकारी स्वयंसेवकों के लिए बड़ा पंडाल बनवाया गया था। प्रतिदिन 300 से अधिक लोगों को भोजन खिलाया जाता था। अनेक किसान और प्रतिदिन सब्जियां और नारियल भेजते थे।  उन्हें एक साथ, एक साथ ढेर लगाकर रख दिया गया था। देखने में वह छोटी पहाड़ी जैसा नजर आता था।  पूरा स्थल वैवाहिक पंडाल जैसा दिखता था। 

उसी समय राजगोपालाचार्य ने मुझे एक पत्र लिखा।  आप हमारे देश को छोड़कर दूसरे राज्य में परेशानी खड़ी क्यों कर रहे हैं? आपके लिए इस तरह करना अनुचित है।  कृपया उसे छोड़कर, मुझसे अपना पद-भार वापस लेने के लिए तुरंत यहां पहुंचें। उस पत्र में यही बातें लिखी थीं। श्रीनिवास अय्यंगर मुझसे मिलने के लिए तमिलनाडु से आए थे। उन्होंने भी मुझसे वही सलाह दी जो राजगोपालाचार्य ने अपने पत्र में लिखी थीं। उस समय तक 1000 स्वयंसेवक वायकम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो चुके थे। प्रतिदिन जगह-जगह बड़े-बड़े जुलूस, भजन-कीर्तन आदि होते थे।  आंदोलन गति पकड़ चुका था। 

समाचार पंजाब तक पहुंचा। वहां स्वामी श्रद्धानंद ने एक अपील की। उन्होंने लगभग 30 पंजाबियों को वायकम भेजा। उन्होंने आंदोलन के लिए 2000 रुपये की सहायता राशि का प्रस्ताव भेजा, साथ ही आंदोलन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों के भोजन के खर्च को वहन करने की सहमति जताई। यह देखकर ब्राह्मणों ने गांधी को लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख हिंदुत्व के विरुद्ध युद्ध भड़का रहे हैं। गांधी के विचार भी सामने आए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बाकी लोग जो हिंदू नहीं हैं—वे आंदोलन में हिस्सा नहीं ले सकते। उनकी अपील के बाद मुस्लिम, ईसाई और सिखों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। राजगोपालाचार्य ने जोसफ जार्ज के नाम एक और पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि उनके लिए हिंदुत्व से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करना गलत है। लेकिन जोसेफ जार्ज ने राजगोपालाचार्य की सलाह पर कोई ध्यान नहीं दिया। जवाब में उन्होंने लिखा कि वे कांग्रेस से निष्कासन के लिए तैयार थे। उन्होंने जोरदार शब्दों में लिखा कि वे अपना आत्मसम्मान नहीं गंवाएंगे।  मिस्टर सेन, डाॅ. एम. ई. नायडु तथा दूसरे नेता  आंदोलनकारियों के साथ मजबूती से खड़े थे। लेकिन कुछ लोगों को भय था कि गांधी आंदोलन की निंदा करते हुए उसे मिल रहे दान, सहायता आदि पर रोक के लिए लिखेंगे। लेकिन उसी समय स्वामी श्रद्धानंद वायकम पहुंचे और उन्होंने वित्तीय सहायता का आश्वासन दिया।  

वायकम आंदोलन गांधी के विरोध के बावजूद शुरू किया गया था।  मुझे दुबारा गिरफ्तार करके छह महीने की सजा के लिए जेल भेज दिया गया था। कुछ नंबूदरी ब्राह्मणों तथा कट्टरपंथी हिंदुओं ने एकजुट होकर वायकम आंदोलन के विरोध करने की योजना बनाई। जिसे उन्होंने ‘शत्रु समाहार यज्ञ’(शत्रु मर्दन यज्ञ) का नाम दिया। काफी धनराशि खर्च करके उन्होंने यज्ञ किया। उसके बारे में मैंने कारावास में सुना। एक रात को अचानक मैंने गोलियों की आवाज सुनी। मैंने पहरा दे रहे सिपाही से पूछा, क्या जेल के निकट कोई उत्सव मनाया जा रहा है? उसने बताया कि राजा का निधन हो चुका है और उससे हुई हानि को दर्शाने के लिए बंदूकों की सलामी दी जा रही है। जब मुझे पता चला कि राजा का निधन हो चुका है, मेरा हृदय विषाद से भर गया। बाद में मुझे यह सोचकर प्रसन्नता हुई कि ब्राह्मणों और कट्टरपंथीं हिंदुओं द्वारा अपने दुश्मनों को नष्ट करने के लिए की गई प्रार्थना का असर महाराज की मृत्यु के रूप में सामने आया है। उनकी प्रार्थना ने वायकम आंदोलनकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।  लोग भी खुश थे। उसके बाद, महाराजा के दाह-संस्कार के दिन हम सभी को रिहा कर दिया गया। हमारे दुश्मनों की चाल-ढाल और भाषा भी बदल गई। 

बाद में, महारानी ने आपसी बातचीत से समस्या का समाधान करने की इच्छा व्यक्त की।  वे समस्या पर मेरे साथ बातचीत करना चाहती थीं। लेकिन राज्य का दीवान, जो जाति से ब्राह्मण था—हमारी बातचीत के बीच में बाधक बन गया। बोला कि महारानी मुझसे सीधे बातचीत नहीं करेंगी। इसलिए उसने राजगोपालाचार्य को पत्र लिखा। राजाजी जानते थे कि प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा मेरे पक्ष में हैं, अतएव उसका श्रेय भी मुझी को प्राप्त होगा। इसलिए उन्होंने कपटपूर्ण ढंग से तय किया कि महारानी गांधी से बातचीत करेंगी। राजाजी की प्रपंच का ही परिणाम था कि गांधी का नाम वायकम सत्याग्रह के इतिहास में घसीट लिया गया। वायकम आंदोलन का श्रेय और प्रतिष्ठा किसे प्राप्त होती है, व्यक्तिगत रूप से मुझे इसकी चिंता नहीं थी। मैं निजी प्रशस्ति के लिए आंदोलन से नहीं जुड़ा था। मेरा एकमात्र उद्देश्य समस्या का सफल समाधान था।  

गांधी आए और उन्होंने महारानी से बातचीत भी की। महारानी निचली जाति के शूद्रों और अछूतों के लिए सभी मार्ग खोल देने को तैयार थीं। लेकिन, उन्होंने अपने डर के बारे में बताया। उन्हें लगता था कि मैं अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन को उसके बाद भी जारी रख सकता हूं। गांधी यात्री-भवन में पहुंचे, जहां मैं ठहरा हुआ था। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही। मैंने कहा, ‘क्या अछूतों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त होना बड़ी उपलब्धि नहीं है! यूं भी, क्या मंदिर प्रवेश कांग्रेस के आदर्शों में से एक नहीं है। जहां तक मेरी बात है, यह मेरे प्रमुख सरोकारों में से एक है। लेकिन, आप महारानी को खबर कर सकते हैं कि फिलहाल मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर आंदोलन खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैं आगे क्या करूंगा, इसे तय करने से पहले माहौल शांत होने दीजिए। 

गांधी ने रानी को सूचना दी और उन्होंने मंदिर के चारों ओर बनी सड़कों के चलने का अधिकार, सभी वर्गों के लिए बहाल कर दिया। इस तरह निचली जाति के शूद्रों और अस्पृश्यों को, उच्च जातीय ब्राह्मणों और कट्टरपंथी हिंदुओं की तरह, सार्वजनिक मार्गों पर चलने के अधिकार की प्राप्ति हुई।  

मैं कुछ समय के लिए इरोद में देवस्थान समिति का अध्यक्ष था। जब मैं बाहर गया हुआ था, कामरेड एस. गुरुस्वामी, पोन्नंबलन तथा ईश्वरन ने मेरे कार्यालय में, दो आदि-द्रविड़ों को अपने माथे पर पवित्र राख(विभूति) मलने के लिए उकसाया। उसके बाद वे उन्हें मंदिर के भीतर ले गए। उन्हें देखते ही ब्राह्मण जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन्होंने देवस्थान को अपवित्र कर दिया है। मजदूरों को वहीं बंद कर, उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया गया। जिला न्यायालय में उन्हें दंडित किया गया। लेकिन एक अपील पर सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया। यह सब ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था।  

सुचिंद्रम(कन्याकुमारी, केरल) पहला स्थान था, जहां मंदिर प्रवेश के अधिकार को लेकर पहला सार्वजनिक आंदोलन चलाया गया था। स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन भी मेरी अध्यक्षता में किया गया था। उसमें अनेक प्रस्ताव स्वीकृत किए गए थे, जिनमें जाति उन्मूलन तथा अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।  

स्वाभिमान आंदोलन की अगली सभा का आयोजन इर्नाकुलम में हुआ था। उस सम्मेलन में जाति प्रथा की निंदा करते हुए हिंदुओं को सुझाव दिया गया था कि वे मुसलमान बन जाएं, क्योंकि इस्लाम में कोई जातिभेद नहीं है। कुछ और लोगों ने संशोधन प्रस्ताव के माध्यम से ईसाई बनने का सुझाव दिया था। अंत में लोगों को दोनों धर्मों में से किसी एक को अपनाने का विकल्प दिया गया।  

एक दिन लगभग 50 हिंदुओं(जो जाति से पुलायार थे) ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह सिलसिला  आगे बढ़ता गया, उसने रूढ़िवादी हिंदुओं और ब्राह्मणों को बुरी तरह डरा दिया था। 

एक दिन, अल्लेपी में इस्लाम अपना चुका एक व्यक्ति(जो पहले जाति से पुलायार था) नायर की दुकान से कुछ सामान खरीदने गया। वहां उसकी पिटाई कर दी गई। उस घटना की परिणति हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बड़े टकराव के रूप में सामने आई। हिंदू-मुस्लिम दंगे हर जगह फैल गए। तत्कालीन दीवान, सर सी. आर. रामासामी अय्यर जो ब्राह्मण थे, ने उस  टकराव को बलपूर्वक दबा दिया था। बाद में राजा को बताया गया कि अधिकांश निचली जाति के अस्पृश्य हिंदू जैसे इझ़वा, पुलायार आदि मुसलमान बन रहे हैं। उन्हें यह सलाह भी दी गई कि इस भगदड़ से हिंदुत्व को बचाने का एकमात्र उपाय है कि सभी मंदिरों को अस्पृश्यों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाए। उस दिन ब्राह्मण राजा की दीर्घायु के लिए यज्ञ कर रहे थे। उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने जन्मदिवस पर प्रजा के लिए कोई अच्छी घोषणा करता था। सो राजा ने अच्छे अवसर पर एक अच्छी घोषणा करने का निश्चय किया। उसने ऐलान किया कि उसके जन्मदिवस के अवसर पर सभी मंदिर सभी के लिए खोल दिए जाएंगे, जिनमें निचली जाति के हिंदू और अछूत भी शामिल हैं। संघर्ष का ऐसा ही इतिहास रहा है। इस तरह अछूतों को मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। 

इतना सब हो जाने के बाद ही राजगोपालाचार्य और गांधी सामने आए और मंदिर प्रवेश के पक्ष में बयान दिया। यह कहना एकदम बकवास है कि ये बदलाव गांधी के कारण संभव हो पाए थे। सच तो यह है कि अछूतों के भले के लिए अणुमात्र काम भी गांधी ने नहीं किया। ये सब बातें आपको डाॅ. आंबेडकर द्वारा लिखित पुस्तक ‘कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया है’ पढ़ने से ज्ञात हो जाएंगी।  

जिन दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस का सचिव था, पार्टी फंड द्वारा चेरंमादेवी में गुरुकुलम(नि:शुल्क छात्रावास) का संचालन किया जाता था। सचिव के रूप में मैंने 10000 रुपये देने की अनुमति दी, और बतौर पहली किश्त 5000 रुपये का भुगतान भी कर दिया गया।  गुरुकुलम को चलाने की जिम्मेदारी वी. वी. एस.  अय्यर नामक एक ब्राह्मण की थी। उस गुरुकुलम में ब्राह्मण विद्यार्थियों की विशेष देखभाल की जाती थी। उन्हें अलग भोजन दिया जाता था। जबकि गैर-ब्राह्मण बच्चों को बाहर भोजन कराया जाता था। ब्राह्मण विद्यार्थियों को ‘उप्पम’ परोसा जाता था, जबकि अब्राह्मण बच्चों को केवल दलिया से संतोष करना पड़ता था। ये बातें मुझे ओमनदुर रामासामी रेडियार(मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) के बेटे ने रोते-रोते बताई थीं।  मैंने राजगोपालाचार्य से इसकी शिकायत की। जब उन्होंने वी. वी. एस. अय्यर से मामले की तहकीकात की तो उसने आरोपों से न तो इन्कार किया, न ही खेद व्यक्त किया। बल्कि दृढ़ स्वर में सभी के साथ एक समान व्यवहार करने से इन्कार कर दिया। उसने कहा कि गुरुकुलम के आसपास कट्टरपंथी लोग रहते हैं, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकता। इसपर मैंने कहा कि मैं बाकी 5000 तभी दूंगा जब गुरुकुलम में सुधार हो जाएगा। वह जंगली की तरह व्यवहार करने लगा। उसने रूखे शब्दों में मुझसे कहा, ‘क्या यही तुम्हारी राष्ट्रसेवा है?’ इस गंभीर मामले ने ही मुझे गैर-ब्राह्मणों(तमिलों) के लिए अलग से दल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। 

इन दिनों भी आप देख सकते हैं कि कांग्रेस की सभाओं में केवल ब्राह्मणों को भोजन बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। जबकि उन्हीं दिनों जस्टिस पार्टी और स्वाभिमान आंदोलन के सम्मेलनों के लिए विरुदुनगर के नाडारों को भोजन बनाने के लिए नियुक्त किया गया था। 

मैं इन पुराने प्रसंगों को क्यों याद कर रहा हूं? आपको पता होना चाहिए कि जब तक हम इस तरह से आंदोलन नहीं करेंगे, तब तक हम समाज में व्याप्त असमानता को मिटाकर, उसे प्रगतिशील नहीं बना सकते।  

इसके अलावा, आप सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी सामाजिक सुधार का श्रेय न तो कांग्रेस को जाता है, न ही गांधी को उसके लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए, हमारे पास इसके साक्ष्य हैं।  

आज भी, ‘द्रविड़यार कझ़गम’ के केवल हम ही वे लोग हैं जो सिर उठाकर पूछते हैं कि जब मेहनतकश किसानों और मजदूरों को निम्न जाति का समझा जाता है, तो आलसी ब्राह्मणों को ऊंची जाति का क्यों समझा जाना चाहिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता क्यों है जो शूद्रों की अवमानना करता है?

फिलहाल उन्होंने संविधान में जातिवाद के बचाव हेतु सभी सुरक्षा-उपाय कर लिए हैं। एक ब्राह्मण में इतना साहस है वह कहीं से भी यहां आता है और धृष्टतापूर्वक कुछ भी बोलकर, धमकी देकर चला जाता है। क्यों? इसलिए कि उनके हाथ में ताकत है।  

वे कहते हैं कि हम दब्बू रहकर सदैव शूद्र की तरह पेश आएं।  वे हमें जेल का डर दिखाकर आतंकित करते हैं। क्या किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत थी?

केवल हम वे लोग हैं निडर, निष्कपट और निर्बंध थे।  

यदि हमें हिंदुत्व हमें शूद्र मानता है तो सिवाय इसके कि हम हिंदू धर्म को ही नष्ट कर दें, दूसरा उपाय क्या है? हमारा ‘द्रविड़यार कझ़गम’ राजनीतिक संगठन नहीं है।  हम चुनावों में हिस्सा नहीं लेते।  हमें आपके मतों की आवश्यकता नहीं है। हम शासक वर्ग भी नहीं है। दूसरों को कुदाल को कुदाल कहने में संकोच हो सकता है? सत्ता चाहने वाले लोग निर्दोष मतदाताओं की चापलूसी कर सकते हैं। अपने स्वार्थ के लिए वे आपकी आंखों में धूल झोंक सकते हैं। किसी ताकत या पद-प्रतिष्ठा के लिए गांधी के नाम को बीच में घसीटकर मैं आपको धोखा नहीं दे सकता। मैं उस घृणित, निश्रेयस जीवन के लिए नहीं बना हूं। 

हमने अपने जीवन निर्वाह के लिए सार्वजनिक जीवन को पेशा या व्यापार नहीं बनाया है। फिर किसलिए, सोचो? आपके भीतर स्वाभिमान की भावना जगाने के लिए हम अपना भोजन खाते हैं, समय खर्च करते हैं, अपनी ऊर्जा खपाते हैं, क्यों?

1938 तक आपने देखा कि पूरी दुनिया में ज्ञान का बोलबाला था। परंतु यहां हम आज भी बर्बर लोगों की तरह हैं। हमारा ईश्वर, धर्म और धर्मशास्त्र हमें कूपमंडूकता से बाहर नहीं आने देते। सरकार स्वयं अविवेकी और असभ्य लोगों के हाथों में है। हमारे सिवाय किसी में भी सवाल उठाने हिम्मत नहीं है।  

ब्राह्मणों ने हमें वेश्यावृति द्वारा उत्पन्न संतान कहा था।  हमारी संतान को वेश्याओं की संतान क्यों कहा जाना चाहिए? इस अपमान के बारे में कोई नहीं सोचता। जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, इसकी परवाह नहीं करते। आंख मूंदकर वे वही सब करते और कहते हैं, जो ब्राह्मण उनसे कहते हैं। 

जब मैं वायकम सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहा था, नीलांबन जमींदार के पुत्र, सेतुकुट्टी अकसर मुझसे मिलने और विचार-विमर्श के लिए आया करते थे। वे मुझे ‘नायकर सामी’ संबोधित करते थे। केवल यही नहीं, वे अपनी जाति को ऊंचा बताया करते थे, क्योंकि उनका जन्म नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अकसर कहा करते थे कि मैं उन्हें नायर के जन्मा हुआ न समझ बैठूं। जबकि वे बीए तक पढ़े स्नातक थे। हमारे लोगों में इस मानसिकता की निंदा करने वाला कौन है?

पल-भर के लिए सोचिए कि इन अझ़वारों ने क्या किया था। उन्होंने अपनी पत्नियों से वेश्यावृति कराकर मोक्ष की कामना की थी। यह ‘भक्त विजयम’ पुराण में बताया गया है। 

एक शूद्र जो जाति से अझ़वार था, उसे अपनी पत्नी को वेश्यावृत्ति के पेशे की ओर प्रवृत्त होने की अनुमति देने के बाद स्वर्ग मिला था। नयांमारों ने अपनी पत्नियां ब्राह्मणों को भेंट की थीं। इन दिनों भी कट्टरपंथी लोग, बगैर किसी शर्म अथवा स्वाभिमान के, इन बातों का प्रचार-प्रसार करते हैं। जब मैं इन बातों की ओर इशारा करता हूं, तो मुझपर पुराणों(धर्मशास्त्रों) को ध्वस्त करने वाली बातें करने का आरोप लगाया जाता है। इनपर दूसरा कौन साहसपूर्वक बोलता है? इन पुराणों ने हमारी नैतिकता को नष्ट किया है। इसके अलावा हम और क्या कह सकते हैं?

इसके अतिरिक्त ब्राह्मण सरकारी पदों से भी चिपके हुए हैं। ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के पश्चात समस्त शक्तियां ब्राह्मणों के हाथों में जा चुकी हैं। मैं इसके लिए गांधी को दोषी ठहराता हूं। हमें अनंतकाल तक शूद्र बनाए रखने के लिए बड़ी साजिश रची गई थी। आज(1958) सारी शक्तियां उनके अधीन हैं।  आज देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है। उपराष्ट्रपति ब्राह्मण है।  प्रधानमंत्री ब्राह्मण है। उपप्रधानमंत्री भी ब्राह्मण है।1 संसद का सभापति भी ब्राह्मण है। यह देखते हुए जब हम जाति-उन्मूलन के लिए गुहार लगाते हैं, तो वे हमे दोषी ठहराकर तीन वर्ष के लिए कारावास में भेज देते हैं। इन सबके लिए कौन चिंतातुर है? सार्वजनिक जीवन के अधिकांश शिखर व्यक्तित्व सरकार, जातिवाद, धर्मशास्त्रों, पुराणों, धर्म और ईश्वर की रक्षा करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि अस्तित्व-रक्षा के लिए, उनके पास इसके अलावा  कोई और रास्ता नहीं है। 

कोई भी व्यक्ति जो वोट और भ्रष्टाचार के सहारे जिंदा है, वह धर्म, ईश्वर, सरकार और जाति के नाम पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाएगा। 

अंग्रेज हमें कम से कम बराबर अधिकार तो देते थे। आज सरकार ब्राह्मणों के हाथों में है, जो हमें वेश्या की संतान(शूद्र) कहते हैं। यही कारण है कि वे संवैधानिक व्यवस्था में भी स्वयं को आसानी से सुरक्षित पाते हैं। कानून के अनुसार वे लोग जो जाति को मिटाने की मांग करते हैं, उन्हें तीन वर्ष की सजा काटने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

जातिप्रथा लाइलाज बीमारी है, जो हमारे समाज को शताब्दियों से खाए जा रही है। जिन दवाइयों का इस्तेमाल हम खाज-खुजली के इलाज के लिए करते हैं, उनसे केंसर का इलाज नहीं किया जा सकता। हमें शरीर का आपरेशन कर, उससे केंसर-प्रभावित हिस्से को अलग करना होगा। भिन्न बीमारियों के लिए इलाज भी अलग-अलग तरीके से होगा। हिंदू विधान के अनुसार हम 3000 वर्षों से अधिक से शूद्र हैं। 3000 वर्षों से हम वेश्या की संतान कहलाते आए हैं। हमारा संविधान इस बुराई को भरपूर संरक्षण देता है। 

हमें इस बुराई को जड़ से खत्म कर देना चाहिए। हमें इस उपहासजन्य स्थिति से बाहर निकाल आना चाहिए। यह सचमुच कठिनतम कार्य है। जब तक आप इसकी जड़ों पर उबलता हुआ पानी नहीं डालेंगे, तब तक इसका मिटना नामुमकिन है। सख्त कदम उठाए बिना हम जाति को नहीं मिटा सकते।  

न केवल तमिलनाडु, अपितु पूरे भारतवर्ष में और कोई ताकत नहीं है, जो हमारे बराबर हिम्मत जुटाकर अपनी आवाज बुलंद कर सके। जो लोग सत्ता के लालची हैं, वे कभी उसके विरोध का सपना नहीं देखेंगे। केवल वही लोग जो निःस्वार्थ और समर्पण भावना से जनता की सेवा में लगे हैं, अपने जीवन को जाति-व्यवस्था के उन्मूलन के लिए भी, दाव पर लगा सकते हैं। जो लोग विधायिकाओं में पहुंचे हैं, उन्होंने अभी तक क्या किया है? वे कुछ भी नहीं कर सकते? हम मामूली संदेश भेजकर भी जवाब प्राप्त कर सकते हैं।  बावजूद इसके हम तैयार नहीं हैं। 

कुछ दिन पहले नेहरू ने विधानसभाओं तथा दूसरे निर्वाचित संस्थानों पर एक दुखद टिप्पणी की थी। यहां तक कि उन्होंने धमकी दी थी कि वे रिटायर होकर संन्यास ग्रहण कर लेंगे। क्या हुआ? उन्होंने चुपचाप अपनी सारी टिप्पणियां पचा लीं और सत्ता से चिपके हुए हैं। यह महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए पुरानी गांधीवादी चाल का प्रदर्शन था। हमारे साथ रहे ‘द्रविड़ मुनेत्र कझ़गम पार्टी के नेताओं ने भी, जब तक वे ‘द्रविड़यार कझ़गम’ में थे, विधानमंडलों में प्रवेश की निंदा की थी। यहां तक कि उन्होंने निर्वाचित प्रतिनिधियों और संस्थाओं पर हमला करने वाले लेख भी लिखे थे। बल्कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद ने तो विधायिकाओं के विरुद्ध बोला भी था। लेकिन आज उनके लिए वहां संभावनाएं हैं, इसलिए वे उनमें प्रवेश के अत्यंत इच्छुक हैं। वे अपने अतीत को भूल चुके हैं। अब वे साम-दाम-दंड-भेद द्वारा विधायिकाओं की शोभा बनना चाहते हैं। इसके लिए वे आंतरिक तोड़फोड़ से लेकर दूसरों का कच्चा चिट्ठा खोलने तक, किसी भी काम को तैयार हैं। किसी तरह, कैसे भी हर कोई ऊपर उठना चाहता है। कोई भी हमारी द्रविड़ अस्मिता के गौरव तथा उसकी युगों लंबी अवमानना को लेकर चिंतित नहीं है।  

पूरा देश पांच बीमारियों और तीन प्रेतों के जबड़ों में दबा हुआ है। मान लीजिए कि प्रेत वास्तव में नहीं होते; हमारा आशय है—

ईश्वर, जाति और लोकतंत्र—ये तीन प्रेत हैं। 

ब्राह्मण-समाचारपत्र-राजनीतिक दल-विधायिकाएं और सिनेमा—ये पांच बीमारियां हैं। ये बीमारियां मानव शरीर पर केंसर, कुष्ठ-रोग और मलेरिया की तरह धावा बोल रही हैं। यदि समाज को प्रगतिगामी बनाना है, तो इन बीमारियों से हमें जमकर संघर्ष करना; और इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देना होगा। 

—ई.  वी. रामासामी पेरियार 

(हिंदी अनुवाद :  ओमप्रकाश कश्यप)

विदुथलाई, 8 ओर 9 जनवरी, 1959। इस भाषण का अंग्रेजी अनुवाद द्रड़ियार कझ़गम, चेन्नई द्वारा प्रकाशित ‘कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार ईवीआर, 2005(तीसरा संस्करण) से लिया गया है। अंग्रेजी अनुवादक: ए. एस. वेणु।  

1. 1958 में जब यह भाषण दिया गया, उपप्रधानमंत्री पद खाली था। 

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर ऑफ ईस्ट

सामान्य

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

जिसने ईश्वर को गढ़ा वह मूर्ख था

जो ईश्वर की वकालत करता है, वह महाधूर्त्त है

जो ईश्वर की पूजा करता है, वह असभ्य है.

ईश्वर नहीं है..

ईश्वर नहीं है

ईश्वर हरगिज नहीं है….

ईवी रामास्वामी पेरियार

भारत में जातीय शोषण में लगी शक्तियों की पैठ का आकलन इससे भी किया जा सकता है कि यहां सुधारवादी आंदोलनों की धारा बहुत प्रच्छन्न और अवमंदित रही है. ज्ञात इतिहास में ब्राह्मणवाद को पहली चुनौती बुद्ध की ओर से मिली. बुद्ध से भी पहले आजीवक और लोकायत जैसे प्रकृतिवादी दर्शन ब्राह्मणवाद के समानांतर अपनी उपस्थिति बनाए हुए थे. उस समय तक ब्राह्मणधर्म केवल आश्रमों तक सीमित था. वहीं से वह धीरेधीरे राजकुलों पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा था. किसानों, शिल्पकारों, श्रमिकों तथा दासवर्ग के लिए न तो ब्राह्मणधर्म में कोई जगह थी, न ही उन्हें उसकी विशेष चिंता थी. फिर जैसेजैसे राज्य संगठित होते गए, लोगों पर अपना अनुशासन बनाए रखने के लिए धर्म और राजनीति परस्पर जुड़ते चले गए. बुद्ध के समय तक ब्राह्मणपुरोहित राज्यों पर अपनी पकड़ बना चुके थे. इसके साथसाथ जनता पर भी उनका प्रभाव बढ़ा था, जिसने उन्हें अतिरिक्त रूप से शक्तिशाली बना दिया था. अब वे राजाओं के आगे मनमानी करने, मनचाही मांगे रखने तथा उन्हें अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश कर सकते थे. राजा उनकी मनमानी से खिन्न भी होते थे. यज्ञ और दानादि पर होने वाले विपुल खर्च से उनपर आर्थिक बोझ भी पड़ता था. इसलिए बुद्ध ने कर्मकांड और बलिप्रथा का विरोध करते हुए, कर्मकांड विरोधी, उदार और मध्यममार्गी धर्मदर्शन का विचार लोगों के सामने रखा तो तत्कालीन राजाओं द्वारा उसका खुले मन से स्वागत किया गया. उसके फलस्वरूप ब्राह्मणधर्म को आने वाली कई शताब्दियां निर्वासन में गुजारनी पड़ीं. बुद्ध को वर्णव्यवस्था से शिकायत न थी. उनका विरोध जातिआधारित भेदभाव, शोषण और थोपी गई असमानता से था. उनका असली हमला यज्ञ के बहाने दी जाने वाली निरर्थक बलियों, तंत्रमंत्र, पूजापाखंड तथा कर्मकांड पर हुआ, जो आदमीआदमी के बीच द्वेष और भेदभाव परोसते थे. शोषणकारी जातिव्यवस्था को दैवी ठहराते थे. जनसाधारण की आय का बड़ा हिस्सा उसके विकास में काम आने बजाए आडंबरों पर व्यर्थ चला जाता था. बुद्ध के नैतिक आभामंडल के आगे ब्राह्मणवादी शक्तियां लंबे समय तक निस्तेज रहीं.

ब्राह्मणधर्म को दूसरी चुनौती संत कवियों की ओर से मिली. आरंभिक संत कवि समाज के निचले वर्गों से आए थे. अन्य धर्मों में धर्मग्रंथों को पढ़नेपढ़ाने का काम पवित्र माना जाता है, भारत में वेदादि ग्रंथों का पाठ बहुसंख्यक वर्ग के लिए निषिद्ध था. शूद्र वेदाध्ययन की कोशिश करे तो उसके कानों में पिघला सीसा डालने का शास्त्रोक्त दंडविधान था. देवालयों में पूजनअर्चन तो दूर, उनकी सीढ़ियां चढ़ना भी उनके लिए निषिद्ध था. जातीय शोषण झेलते आए उन कवियों ने आडंबरों को धता बताते हुए, निराकार ईश्वर की अराधना पर जोर दिया. मंदिरप्रवेश पर पाबंदी को उन्होंने यह कहकर चुनौती दी कि ईश्वर मंदिरमस्जिद में नहीं, मनुष्य के हृदय में वास करता है. धर्म के नाम पर दिखावा करने वालों को ललकारा. मूर्ति पूजा के विरुद्ध विद्रोही तेवर अपनाते हुए कबीर ने कहा कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर प्राप्त होता है तो वे पहाड़ पूजने को तैयार हैं. रैदास ने समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. ऐसे ‘बेगमपुरा’ की कल्पना की थी, जहां ऊंचनीच, दुखक्लेश, कष्टशोकों का सर्वथा अभाव है. सभी स्वतंत्र हैं. आमजन ने संतकवियों के जीवनदर्शन को हृदयंगम किया. जातीय शोषण के शिकार लोग उनके अनुयायी बनने लगे. रैदास, कबीर, दादू आदि संतकवियों से प्रेरणा लेकर गुरु नानक ने सिख धर्म की स्थापना की. पूरी दुनिया को समानता का संदेश दिया. परंतु जाति की जकड़बंदी ऐसी कि बड़ेबड़े महात्माओं के प्रयत्न उसके आगे नाकाफी सिद्ध हुए.

जातीय उत्पीड़न के शिकार लोग विवश होकर धर्मांतरण की राह अपनाने लगे थे. कबीर के अनुयायियों में हिंदुमुसलमान दोनों थे. उनकी एकता से सवर्ण हिंदुओं के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा मंडराने लगा. तात्कालिक समाधान यह था कि शूद्रों के हिंदू धर्म से पलायन को रोका जाए. जो दूर जा चुके हैं, उन्हें वापस लाया जाए. उधर संतत्व की लोकप्रियता देख उच्च जाति के कवियों ने भी ‘भक्ति’ का महिमामंडन शुरू कर दिया था. वे अपने संस्कार तथा देवता भी साथ लेकर आए थे. संत कवियों के नेतृत्व में चल रहे सुधारवादी आंदोलनों की धारा को कुंद करने के लिए उन्होंने वही किया जो दो हजार वर्ष पहले उनके पूर्वजों ने बौद्ध धर्म के साथ किया था—बुद्धत्व की प्रखरता कम करने के लिए तंत्रमंत्र तथा कर्मकांडों का बौद्ध धर्म में प्रक्षेपण. साथ में बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करना. उसके परिणामस्वरूप ब्राह्मणधर्म के पूजापाखंड, तंत्रमंत्र और अन्यान्य आडंबरों को बौद्ध धर्म में प्रवेश मिला. गौतम बुद्ध ने मूर्ति पूजा का विरोध किया था, परंतु ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में उनकी मूर्तियां जगहजगह लगने लगीं.

भक्त कवियों ने निराकार को छोड़ साकार का गुणगान किया. उस समय तक वैदिक देवता अप्रासंगिक हो चुके थे. देवराज इंद्र के चारित्रिक विचलन को लेकर अनेक कहानियां प्रचलित थीं. उनके आधार पर ब्राह्मण धर्म को पुनः स्थापित करना असंभव था. अतएव तात्कालिक जरूरत को समझते हुए राम और कृष्ण जैसे नए देवीदेवता गढ़े गए. उनकी प्राचीनता स्थापित करने के लिए उन्हें मिथकों के सहारे, अनार्य देवता शिव और गणपति से जोड़ा गया. ध्यातव्य है कि गणपति कोई देवता न होकर प्राचीन जनसमाजों में प्रचलित गणतंत्र का प्रतीक हैं. लगभग 2300 वर्ष पहले बड़े राज्यों की स्थापना पर जोर दिया जाने लगा था. वह राजशाही और सर्वसत्तावाद का दौर था. समाज ब्राह्मण और गैरब्राह्मण में बंट चुका था. ब्राह्मण शक्ति और सम्मान का प्रतीक था. गैरब्राह्मण जिसमें बड़ी संख्या मेहनतकशों तथा शिल्पकार वर्ग की थी. उन लोगों की थी जो कभी सफल गणतंत्र के संचालक और अनुयायी रहे थे. उन्हें सत्ता, संसाधन तथा उनके लाभों से काटकर पूर्णतः पराश्रित बना दिया गया. सर्वसत्तावाद को वैध ठहराने के लिए गणतंत्र और उससे जुड़े प्रतीकों का जमकर विरूपण किया गया. सूर, तुलसी, मीरा, नरसी मेहता आदि ने ईश्वर के अवतारवाद को स्थापित करने में मदद की. राम वाल्मीकि रामायण के कथानायक थे. उसका मूल कथानक ऋग्वेद में वर्णित राजा सुदास और दस अनार्य कबीलों के युद्ध का पुनर्कथन था, जिसे किसी अज्ञात लेखक ने सबसे पहले ‘पुलत्स्यवध’ शीर्षक से रचा था. उसी कथानक को तुलसी ने नए कलेवर में ‘रामचरितमानस’ के रूप में लिखा, जिसमें उन्होंने राम को भगवान के रूप में प्रचारित किया. धर्म के नाम पर वर्गीय स्वार्थों का समर्थन करने वाली मिथ कथाओं की रचना के साथसाथ इतिहास और संस्कृति के विरुपण का दौर भी चलता रहा. वर्चस्ववादियों ने उनकी मनमाने ढंग से व्याख्या की. तथ्यों को जमकर तोड़ामरोड़ा. स्वार्थ के लिए नएनए झूठ गढ़े गए. झूठ को सच बनाया गया. ऐसी संस्कृति की रचना की गई, जिसमें जो जितना अधिक श्रम करता था, सही मायने में उत्पादक वर्ग था, सामाजिक पायदान पर उसे उतना ही कम मानसम्मान हासिल था. जो चालाक और अनुत्पादक होकर दूसरों के श्रम पर जीता था, उसे समस्त संसाधनों का स्वामी और कर्ताधर्ता घोषित कर दिया गया.

भारतीय संस्कृति के इतिहास में हम पढ़ते आए हैं कि हजारों वर्ष पहले आर्यों ने भारत भूमि में प्रवेश किया था. बालगंगाधर तिलक जैसे लेखकों का यही मानना था. भारत पहुंचने के बाद उनका यहां के शांतिप्रिय कबीलों के साथ संघर्ष हुआ. कुछ लड़ाइयों में आर्य विजयी रहे. जहां सीधे विजय असंभव थी, वहां संधियों से काम चलाया गया. उसके लिए जो भी समझौते आवश्यक थे, किए गए. ऋग्वेद के अनुसार शिव अनार्य देवता हैं. मूलनिवासियों की सुविचारित युद्धशैली और नायकप्रधान सेना थी. इसलिए आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. सीधी लड़ाई से बचने के लिए उन्होंने कदमकदम पर कूटनीति को अपनाया. असुरों के नायक शिव को अपने पक्ष में करने के लिए आर्य सम्राट हिमवंत की पुत्री गौरी का विवाह उनके साथ कराया गया. फलस्वरूप शिव को ‘महादेव’ का दर्जा प्राप्त हुआ. शिव के देवताओं के पक्ष में जाते ही असुर बिखरने लगे. प्रकारांतर में देवताओं की कूटनीति को समझे बिना ‘भोले’ शिव भारत की मूल संस्कृति की कीमत पर, आर्य संस्कृति के सबसे सशक्त संवाहक सिद्ध हुए.

दूसरा उदाहरण कृष्ण का है. उनका आदिउल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. तदनुसार उन्होंने अनार्य योद्धा और यदुओं के नायक के रूप में, दस सहò यदुसैनिकों के साथ इंद्र से टक्कर ली थी. इंद्र द्वारा छलपूर्वक पराजित यदु कबीला उत्तरपश्चिम की ओर विस्थापित हो गया. अगले 1500 वर्ष के अंतराल में उसके वंशज यमुना किनारे की उपजाऊ जमीन को खेती योग्य बनाकर खासी शक्ति और समृद्धि प्राप्त कर चुके थे. उनकी उपेक्षा करना संभव न था. इसलिए इंद्र के हाथों छलपूर्वक मारे गए कृष्ण को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया. ‘देवराज’ के माथे से कृष्णहत्या का कलंक मिटाने के लिए महाभारत सहित पौराणिक ग्रंथों में भील को कृष्ण का हत्यारा घोषित किया गया. उसके लिए कुछ कथाएं और उपकथाएं गढ़ी गईं. इससे दो उद्देश्य साधे गए. सुदास के विरुद्ध संग्राम में भीलों ने यदु कबीले का साथ दिया था. दोनों अनार्य जातियां थीं. भील कबीले के नायक द्वारा हत्या दिखाकर एक तो इंद्र को उस कलंक से मुक्ति दिलाई गई. दूसरे यदु कबीले और भीलों की एकता को हमेशाहमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया. राम और कृष्ण का देवत्व सिद्ध करने के लिए भक्त कवियों ने नएनए मिथ गढ़े. परिणामस्वरूप मंदिरों और धर्मालयों की खोई प्रतिष्ठा पुनः वापस लौटने लगी.

संतकाल के बाद सुधारवाद की अगली आहट उनीसवीं शताब्दी के साथ सुनाई पड़ती है. उसके पीछे पश्चिम से आए विचारों और नई शिक्षा की प्रेरणाएं थीं. उन्नीसवीं शताब्दी के सुधारवादियों को हम दो वर्गों में बांट सकते हैं. पहला धार्मिक सुधारवादी. दूसरा सामाजिक सुधारवादी. पहले वर्ग के सुधारक समाज के उच्च वर्गों से आए थे. उनकी प्राथमिकता हिंदू धर्म को उन कुरीतियों से मुक्ति दिलाना था, जो दलितों और पिछड़ों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रही थीं. धार्मिक सुधारवादियों में महर्षि दयानंद, रामकृृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि के नाम लिए जा सकते हैं. उन्होंने सामाजिक भेदभाव पर सवाल उठाए. ऊंचनीच की भावना से मुक्ति का आवाह्न किया. लेकिन येनकेनप्रकारेण वे वर्णव्यवस्था के समर्थक बने रहे. जातियों को वैध ठहराने तथा शूद्रों को वैदिक संस्कृति से जोड़ने के लिए प्राचीन मिथकों का सहारा लिया गया. कुल मिलाकर जातिभेद को कम करने, ऊंचनीच की खाई को पाटने में वे सभी नाकाम रहे. जाति और धर्म के बीच शक्तिशाली गठजोड़ सामाजिक वैषम्य को प्राकृतिक बताया. जो भी हो, सुधारवादियों की असफलता ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि भारतीय समाज में जाति जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करती है. यहां तक कि आंदोलनों की सफलताअसफलता, उसकी दशादिशा पर भी उसके प्रवत्र्तकों की जाति का प्रभाव पड़ता है.

जाति के आधार पर सामाजिक सुधारवादियों को पुनः दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहले वे जो ऊंची जातियों से आए थे. उनका असली उददेश्य हिंदू धर्म के बिखराव को रोकना था. सुधार की उनकी संकल्पना धर्म और जाति की सीमा में, उनके मूलभूत ढांचे को चुनौती दिए बिना, केवल रूढ़ियों पर प्रहार तक सीमित थी. व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की न तो उनकी इच्छा थी, न कार्ययोजना, न ही उनकी वैचारिक चेतना में उसके लिए खास जगह थी. केशवचंद सेन(प्रार्थना समाज), डाॅ. आत्माराम पांडुरंग(ब्रह्म समाज), गोपाल भंडारकर, जस्टिस रानाडे(सर्वेंट्स आॅफ इंडिया सोसाइटी) आदि ने जातिप्रथा पर सवाल उठाते हुए उसके उन्मूलन की मांग की. परंतु उनके आंदोलन का मुख्य ध्येय छूआछूत और जातिआधारित भेदभाव को कम करने; तथा शूद्रों के प्रति थोड़ा नर्म रुख अपनाने तक सीमित था. शूद्रों के अधिकारहनन तथा उनपर होने वाले अत्याचारों की ओर से लगभग सभी मुंह मोड़े रहे. सच तो यह है कि शताब्दियों से प्राप्त सुखसुविधाओं तथा विशेषाधिकारों को पूरी तरह से छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार न था. इसलिए उनके आंदोलन बहुत कम प्रभावकारी सिद्ध हुए.

दूसरे वर्ग के समाज सुधारक समाज के निम्नस्थ वर्गों से आए थे. जाति आधारित भेदभाव और दमन के कड़वेकसैले अनुभव उन्हें पीढ़ियों से प्राप्त थे. नई शिक्षा और विचारचेतना ने उन्हें यह समझ दी थी कि वे शोषण के असली कारणों को समझ, उनका समाधान खोजते हुए समाज को उसके अनुरूप चेता सकें. उन्होंने जाति के साथसाथ उसको प्रश्रय देने वाले धर्म को भी अपना निशाना बनाया. यह मानते हुए कि अकेले धर्म, धार्मिक नैतिकता या नैतिकता के भरोसे सामाजिक न्याय को समर्पित आदर्श समाज की रचना असंभव है, डाॅ. आंबेडकर आदि विद्वानों विधिआधारित राज्य की आवश्यकता पर जोर दिया. ज्योतिराव फुले ने समाज को धार्मिक अंधविश्वासों से बाहर लाने के लिए शिक्षा और स्त्रीसमानता पर जोर दिया. उसके फलस्वरूप आधुनिक भारत की नींव रखी गई. यह आंदोलन जैसेजैसे आगे बढ़ा, ब्राह्मणवादी अभिजन संस्कृति के समानांतर जनसंस्कृति को बढ़ावा देने की मांग समाज में जोर पकड़ने लगी. ऐसी संस्कृति जिसमें सभी के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता हो. लोग समानता और सहभागिता के आधार पर जीवनयापन करते हों. जो किसी भी प्रकार के स्तरीकरण से सर्वथा मुक्त हो. वे कबीर और रैदास की परंपरा के लोग थे. इस श्रेणी के विचारकों में सबसे पहला नाम महात्मा ज्योतिराव फुले का आता है. फुले ने धार्मिक प्रतीकों और मिथकों की नई व्याख्या की. धर्म और संस्कृति के नाम पर प्रचलित आडंबरों का पर्दाफाश किया. अंग्रेजी शिक्षा पर जोर दिया. पत्नी सावित्रीबाई फुले और फातिमा बी के साथ मिलकर उन्होंने कई स्कूलों की शुरुआत की. फुले के सहयोगियों में गोपाल बाबा वालंग्कर(मृत्यु सन 1900), शिवराम जनबा कांबले(1875—1942) शामिल थे. फुले के प्रेरणास्रोतों में कबीर, रैदास आदि संत कवि तथा शिवाजी सम्मिलित थे. शिवाजी की जाति कुन्बी, पिछड़ी जातियों में गिनी जाती है. अपनी प्रतिभा, रणकौशल और जुझारूपन के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र साम्राज्य खड़ा किया था. परंतु स्थानीय ब्राह्मण एक शूद्र को राजपद सौंपने को तैयार न थे. इस काम को काशी के ब्राह्मणों की मदद से संपन्न कराया गया. फुले के बाद आंदोलन को गोपाल गणेश अगरकर, डाॅ. भीमराव आंबेडकर, ईवीएस रामास्वामी पेरियार ने विस्तार दिया. उसे शिवाजी के वंशज शाहू जी महाराज का संरक्षण तथा निचली जातियों का भरपूर समर्थन मिला. डाॅ. आंबेडकर अपने समय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों में से थे. उन्होंने वंचितों और उत्पीड़न के शिकार लोगों को संगठित करने, उनके अधिकारों की संरक्षा हेतु स्वतंत्र भारत के संविधान में युगांतरकारी व्यवस्था करने जैसे क्रांतिकारी कार्य किए.

वर्णव्यवस्था जिसे आर्यों की देन कहा जाता है, को वे अपने मूल प्रदेश से लेकर आए थे. इस तर्क के आधार पर ब्राह्मण जो वर्णव्यवस्था के शिखर पर हैं, मूलतः विदेशी सिद्ध हुए. इस विचार का प्रयोग अभी तक केवल अकादमिक क्षेत्रों तक सीमित था. पहली बार फुले ने उसका उपयोग दलितों और पिछड़ों में जातीयचेतना जगाने के लिए किया. वेदों तथा अन्य धर्मशास्त्रों के उल्लेख से उन्होंने ब्राह्मणों को बाहरी घोषित किया तथा शूद्रों एवं दलितों को यहां का मूलनिवासी. फुले की यह सैद्धांतिकी उनकी पुस्तक ‘गुलामगिरी’(1873) में सामने आई. उसके आधार पर 1892 में ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ की स्थापना हुई. उसने जाति और वर्ण के आधार पर गैरब्राह्मणों के शोषण की ओर लोगों का ध्यान आकर्पित कराया. अस्पृश्यता को हिंदू समाज का कलंक मानते हुए उसे मिटाने का संकल्प लिया. संघ के नेताओं को उम्मीद थी कि गांधी के नेतृत्व में दक्षिण में तेजी से पांव पसार रही कांग्रेस सामाजिक न्याय के मुद्दे पर उनका साथ देगी. लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. अंततः संघ ने अपने बल पर जातिवाद, ब्राह्मण वर्चस्व और दलितों के साथ हो रहे अत्याचारअनाचार के विरुद्ध संघर्ष तेज किया. उसने वर्षों से उत्पीड़न का शिकार रही जातियों में असंतोष का संचार किया. कांग्रेस की भाांति ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ के भी ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ नामक दो वर्ग थे. ‘नरमदल’ वाले जनतंत्र में भरोसा रखते थे. उन्होंने आंदोलन का रास्ता अपनाया. गर्मदल वाले प्रांत में ब्राह्मण वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष छेड़े रहे. आगे चलकर उसके नेताओं ने ‘जस्टिस पार्टी’ का गठन किया और जनता में व्याप्त असंतोष का लाभ उठाते हुए सत्ता हासिल की. वह राजनीतिक स्वतंत्रता से सामाजिक स्वाधीनता पर जोर देती थी. इस कारण अंग्रेजों के प्रति उसके नेताओं के मन में सहानुभूति थी. उसके समर्थकों में बड़ी संख्या तमिलनाडु की मध्यम और पिछड़ी जातियों की थी. उन्हें समाज के बड़े वर्गों का समर्थन भी उन्हें प्राप्त था. सरकारी पदों पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को रोकने के लिए ‘जस्टिस पार्टी’ ने ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की व्यवस्था की.

दर्जनों आंदोलनों तथा सैकड़ों महापुरुषों के अनथक योगदान के बावजूद स्वातं×यपूर्व भारत में अपेक्षित जातीय सुधार संभव न हो सके. दरअसल आमूल परिवर्तन की पहली और महत्त्वपूर्ण शर्त संबंधित वर्गों में उसके प्रति जागरूकता तथा उसकी स्वयंस्फूत्र्त कामना है. जिस समाज में परिवर्तन के प्रति सामान्य चेतना का अभाव हो वहां परिवर्तन, केवल दिखावे के लिए ऊपर से थोप दिए जाते हैं. उनकी रूपरेखा, लोकहित के बजाए शीर्ष पर मौजूद मुट्ठीभर लोगों की स्वार्थसिद्धि हेतु बनाई जाती है. इस कारण जनता भी उन आंदोलनों की ओर से उदासीन बनी रहती है. नतीजन वास्तविक परिवर्तन हमेशा अलभ्य बना रहता है. देखा यही गया है कि जो समाज में मसीहा बनकर आता है, वह अंततः मठाधीश बनकर रह जाता है. अनुयायी पत्थर को देवता में तब्दील कर देते हैं. इसलिए जागरूक जनता अपने विकास की जिम्मेदारी खुद संभालती है, किसी मसीहा का इंतजार नहीं करती. भारत स्वयं इसका उदाहरण है. फुले, आंबेडकर, पेरियार जैसे नेताओं ने लोगों को उनके इतिहास और सामथ्र्य का बोध कराया तो वे स्वतः संगठित होने लगे.

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर आॅफ ईस्ट

यूनेस्को ने पेरियार को ‘पूरब का सुकरात’ कहकर सम्मानित किया था. समर्थक उन्हें आधुनिक संत मानते हैं. भारतीय राजनीति में अपने विद्रोही तेवरों के साथ उन्होंने जिस तर्कशक्ति का आगाज किया, उसके लिए यह उपमा सही बैठती है. किंतु जिस निर्भीकता, साहस और बुद्धिमत्ता के साथ उन्होंने निरर्थक कर्मकांडों तथा जड़परंपराओं को चुनौती दी, धर्म के नाम पर गुरुडम फैलाने वालों को ललकारा, उनका योगदान उन्हें महान फ्रांसिसी चिंतक वाल्तेयर के समकक्ष ठहराता है. उन्होंने समाज में धर्म के आधार पर हो रहे शोषण को समझा. जाना कि धर्म किस प्रकार लोगों के दिलोदिमाग का बेमेलकारी सभ्यता एवं संस्कृति से अनुकूलन करता है. असमानता को नियति बताकर उन्हें बौद्धिक स्तर पर पंगु बनाता है. लोकप्रिय राजनीति में जबकि अधिकांश नेता ईश्वर या उसके नाम पर होने वाले कर्मकांडों में निजी अविश्वास के बावजूद खुद को नास्तिक कहने का साहस नहीं जुटा पाते—पेरियार ने स्वयं को न केवल ईश्वरविरोधी कहा, बल्कि धार्मिक रूढ़ियों, पाखंड और बौद्धिक जड़ताओं के विरुद्ध आवाज भी उठाई. लोकप्रियता के तमाम खतरे उठाते हुए उन्होंने जोरदार शब्दों में ईश्वरीय सत्ता को नकारा. साथ ही समानता, सहयोग और सामंजस्य पर आधारित समाज की संरचना पर बल दिया. छूआछूत जैसी घृणित पृथा के लिए उन्होंने ईश्वर में आस्था को दोषी माना. विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि समाज का बहुत छोटासा हिस्सा धर्म और जाति के नाम पर राज्य के अधिकांश संसाधनों और महत्त्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमाए रहता है. उसके लिए वर्गीय स्वार्थ ही सबकुछ हैं. अपने सामाजिकसांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग वह अपने वर्गीय स्वार्थों की सिद्धि के लिए करता है. उनका इशारा ब्राह्मणों की ओेर था, जो मद्रास प्रेसीडेंसी की कुल जनसंख्या का मात्र 3.2 प्रतिशत होने के बावजूद प्रांत के 70 प्रतिशत संसाधनों और सरकारी पदों पर विराजमान थे. उसके परिणामस्वरूप बहुसंख्यक वर्ग घोर विपन्नता और दमनकारी हालात में जीने के लिए बाध्य था. छूआछूत जैसी निकृष्ट प्रथा के लिए उन्होंने भारतीयों की अंधश्रद्धा को दोषी माना. शूद्रों के मंदिर प्रवेश पर रोकथाम को लेकर उनका कहना था—

‘‘इस देश में जब तक ईश्वर का अस्तित्व रहेगा, तब तक छुआछूत भी कायम रहेगी. यह ऐसा घिनौना आविष्कार है, जिसकी मदद से अछूतों को जानवरों से भी बदतर माना जाता है. मंदिर बनाने की प्रक्रिया से लेकर मूर्ति स्थापना तक अस्पृश्यों के आगमन से न तो वह जगह अपवित्र होती है, न मूर्तियां. लेकिन मंदिर बनने के बाद, मूर्तियों में प्राणप्रतिष्ठा होते ही अछूतों के लिए वह स्थान निषिद्ध मान लिया जाता है.’’

उनका पूरा नाम इरोड वेंकट रामास्वामी नायकर था. प्रशंसक उन्हें ईवी रामास्वामी पेरियार भी कहते हैं. ‘पेरियार’ उनकी उपाधि थी. उसका अर्थ है—श्रेष्ठतम; यानी महानअग्रज….दि ग्रेट मेन. 1923 में धर्म और जाति को तिलांजलि देते हुए यह संबोधन उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ा था. एक सभा में उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से आग्रह किया वे जातिसूचक शब्दों को त्याग दें. वे उम्र में फुले से 52 वर्ष कम तथा आंबेडकर से 12 वर्ष अधिक थे. उन्होंने लंबा तथा संघर्षपूर्ण जीवन जिया. पेरियार आंबेडकर की तरह उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं थे, किंतु अपने अनुभव एवं स्वाध्याय के बल पर उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया; उसके आधार पर जैसा आत्मविश्वास उनमें था, उसे देखते हुए वे समकालीन बुद्धिजीवियों में अग्रणी सिद्ध होते हैं. तर्कशक्ति और विवेचनसामर्थ्य में वे बेमिसाल थे. चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य उनके मित्र थे. लेकिन दोनों के बीच विचारवैभिन्न्य बहुत बड़ा था. उन्होंने अपने लाखों प्रशंसक और आलोचक तैयार किए. तर्क के समय वे अपने प्रतिद्वंद्वियों पर हमेषा भारी पड़ते थे. वैचारिक स्तर पर हम उन्हें आंबेडकर की अपेक्षा फुले के अधिक करीब पाते हैं. दोनों के बीच एक अंतर यह भी है कि आंबेडकर समाज सेवा में सफल होकर राजनीति में आए थे, उनके लिए राजनीति समाजसेवा ही थी. पेरियार पहले राजनीति में थे. सीमित समय में जितनी सफलता संभव थी, प्राप्त की. किंतु सक्रिय राजनीति उन्हें लंबे समय तक बांध कर न रख सकी. जल्दी ही वे उससे ऊब गए और समाजसेवा में लौट आए. लक्ष्य दोनों का एक ही था—समाज के विपन्न, उत्पीड़ित और असमानता के शिकार वर्गाें के अधिकारों के लिए संघर्ष करना. दोनों ने अपनेअपने क्षेत्र में युगांतरकारी कार्य किए और सामाजिक परिवर्तन के संवाहक बने.

पेरियार चाहते तो बाकी राजनीतिज्ञों की भांति मानसम्मान और पदप्रतिष्ठा से भरा जीवनयापन कर सकते थे. राजनीति उनके लिए सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मात्र थी. वहां भी उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना. जब लगा कि परंपरागत राजनीति से सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है, सक्रिय राजनीति से अविलंब नाता तोड़, वे सामाजिक आंदोलनों की डगर पर चल पड़े. आजीवन उन लोगों के लिए संघर्षरत रहे जो धर्म के नाम पर, जाति, वर्ण तथा लिंग के नाम पर असमानता, दैन्य और अपमान से भरपूर जीवन जीने को विवश थे. कबीर, रैदास, नारायण गुरु, फुले आदि से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का केंद्रीय मुद्दा बनाया. वैज्ञानिक चेतना से भरपूर, अकाट्य तर्कों के बल पर वे दलितपिछड़ी जातियों के अंतर्मन में छिपे आक्रोश को हवा देने में कामयाब हुए. उनके अस्मितावादी आंदोलनों को व्यापक जनसमर्थन हासिल हुआ. फलस्वरूप वहां सामाजिक परिवर्तन की बड़ी इबारत लिखी गई. अकेले पेरियार ने दक्षिण में वह कर दिखाया, जिससे आगे चलकर संपूर्ण भारत में सामाजिक न्याय का रास्ता प्रशस्त हुआ.

रामास्वामी का जन्म 17 सितंबर, 1879 को मद्रास प्रेसीडेंसी के कोयंबटूर जिले के इरोड नामक कस्बे में हुआ था. पिता का नाम था, वेंकटप्पा नायडु तथा माता थीं—चिन्ना थ्याम्मल. कुल चार भाईबहनों में बड़े भाई ई वी कृष्णास्वामी थे. बहनें पोन्नुथेई और कन्नामल रामास्वामी से छोटी थीं. रामास्वामी का परिवार कन्नड़ मूल का था. जाति बलीजा, जिसे वहां पिछड़े वर्ग में गिना जाता था. ‘नायकर’ उनका गौत्र नाम था. रामास्वामी के मातापिता पारंपरिक रीतिरिवाजों में विश्वास रखते थे. आगे चलकर स्वयं को ठेठ नास्तिक घोषित करने वाले रामास्वामी पेरियार आरंभ में अपने परिजनों की भांति आस्थावादी थे. उनका बचपन अनुभवसमृद्ध था. जन्म के समय उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी. पिता साधारण व्यापारी थे. नौ वर्ष की अवस्था तक उनका जीवन संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में बीता. धीरेधीरे हालात सुधरे. व्यापार जमने लगा. 1888 तक उनके पिता की गिनती इरोड के सबसे धनाढ्य व्यापारी के रूप में होने लगी थी. पिता चाहते थे कि रामास्वामी उनके व्यापार को आगे बढ़ाएं. लेकिन रामास्वामी के जीवन का लक्ष्य कुछ और ही था. इसके संकेत बचपन में ही मिलने लगे थे. उनकी स्कूली शिक्षा मात्र पांच वर्ष चल सकी. पहले तीन वर्ष उन्होंने एक नर्सरी स्कूल में बिताए. विद्रोही स्वभाव के कारण जातीय दंभ के शिकार लड़कों से उनका झगड़ा होता रहता था. इसलिए प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उनके पिता ने उन्हें ननिहाल पढ़ने के लिए भेज दिया था.

उन दिनों समाज जाति के आधार पर बुरी तरह से विभाजित था. स्कूलों में उच्च जाति के बच्चे निचली जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाए रखते थे. घर और स्कूल दोनों में उन्हें यही सिखाया जाता था. बालक रामास्वामी विद्रोही स्वभाव का था. उनके मित्रों में अगड़ीपिछड़ी सभी जातियों के बच्चे शामिल थे. पुराने मिजाज के मातापिता चाहते थे कि उनका बेटा सामाजिक मर्यादाओं का पालन करे. स्कूल और स्कूल से बाहर छोटी जाति के विद्यार्थियों से दूरी बनाकर रखे. मगर बालक रामास्वामी पर उनकी बातों का कोई असर न पड़ा. स्कूल के आसपास गरीब लोगों की बस्तियां थीं. मातापिता और अध्यापक के निर्देशों की परवाह किए बिना किशोर रामास्वामी उन बस्तियों में चला जाता, और वहां बच्चों के साथ खेलने लगता. बच्चों के बीच झगड़े भी होते. उस समय उसे डांट पड़ती. कभीकभी मार भी खानी पड़ती. एक बार बालक रामास्वामी अछूत बच्चों के साथ खेलते हुए पकड़ा गया. दंडस्वरूप उसके दोनों पैरों में लोहे की दो राॅडें बांध दी गईं. इसके बावजूद उसके आचरण में कोई सुधार नजर न आया तो पिता ने बेटे के और पढ़नेलिखने की उम्मीद छोड़ दी. विद्रोही मानसिकता के चलते वे औपचारिक पढ़ाई के क्षेत्र में कुछ खास हासिल न कर सके.

उस समय पेरियार की अवस्था मात्र ग्यारह वर्ष थी. वे पिता के साथ व्यवसाय में हाथ बंटाने लगे. 1911 में पिता के निधन के बाद उन्होंने अपने पैत्रिक व्यवसाय को भलीभांति संभाल लिया. अगले बीस बर्ष उन्होंने व्यापार करते हुए बिताए. व्यापार करते हुए उन्होंने दुनियादारी सीखी. समाज में व्याप्त ऊंचनीच और उसके कारणों को समझा. अपने परिश्रम और बुद्धिबल के आधार पर पेरियार खुद को कुशल व्यापारी सिद्ध करने में कामयाब रहे. फलस्वरूप समाज और स्थानीय व्यापारियों में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. उन्हीं दिनों उनका स्थानीय नेताओं से संपर्क बढ़ा. उन संपर्कों के बल पर राजनीति की राह आसान होती गई. उन दिनों मद्रास की राजनीति में परिवर्तन का दौर चल रहा था. पूरे भारत में स्वतंत्रता की मांग बढ़ती जा रही थी. उसने वंचित एवं उत्पीड़ित समुदायों के मन में अस्मितावादी चेतना का संचार किया था. अपने प्रवचनों में गांधी छूआछूत और जातीय भेदभाव का खंडन करते थे. प्रकट रूप में सभी बड़े कांग्रेसी नेता उनका समर्थन करते थे. इसलिए उस समय के सामान्य युवा की भांति पेरियार भी गांधी और कांग्रेस के आकर्षण में बंधते चले गए.

पेरियार का विवाह 19 वर्ष की अवस्था में विधिविधान के साथ, नागम्मई के साथ संपन्न हुआ. नागम्मई उनसे उम्र में पांच वर्ष छोटी थीं. उनका विवाह भी असाधारणसी घटना थी. उस समय की परंपरा थी कि किशोरावस्था पार करतेकरते लड़केलड़कियों के विवाह हो जाया करते थे. पेरियार के पिता ने अपने ही जैसे धनाढ्य व्यापारी की कन्या को उनके लिए चुना था. पेरियार तक बात पहुंची तो उन्होंने उस रिष्ते से इन्कार कर दिया. बजाय व्यापारी की बेटी के उन्होंने ननिहाल के पक्ष की दूर के रिश्तेदार की बेटी से विवाह करने की इच्छा जाहिर की, जिससे वे मिल चुके थे. लड़की के मातापिता की आर्थिक स्थिति उनके परिवार की अपेक्षा बहुत कमजोर थी. मगर पेरियार के पिता उस समय तक उनके दृढ़निश्चयी स्वभाव को समझ चुके थे. न चाहते हुए भी उन्होंने नागम्मई से विवाह की सहमति दे दी. विवाह के समय भी पेरियार ने उन परंपराओं का विरोध किया, जिनपर ब्राह्मणत्व की छाप थी. वे नहीं चाहते थे कि उनकी पत्नी सामान्य स्त्री की तरह फिजूल के पूजापाठ में समय बरबाद करे. लेकिन नागम्मई नियमित मंदिर जाने वाली आस्थावान स्त्री थीं. पेरियार ने उन्हें समझाने की कोशिश की. आरंभ में नागम्मई पर उनकी सलाह बेअसर रही. उसके बाद पेरियार ने वह किया, जो किसी को भी चैंका सकता है. जिस रास्ते से नागम्मई मंदिर के लिए निकलतीं, अपने कुछ साथियों के साथ पेरियार भी वहां खड़े हो जाते और अपनी ही पत्नी पर छींटाकशी करने लगते. तंग आकर उन्होंने मंदिर जाने की जिद छोड़ दी. पति के साथ रहते हुए नागम्मई का मन बिलकुल बदल गया. पति की सलाह पर उन्होंने अपने बहुमूल्य गहने तक त्याग दिए. आगे चलकर वे पेरियार के प्रत्येक आंदोलन में उनकी सच्ची सहधर्मिणी सिद्ध हुईं. वायकम आंदोलन में पेरियार को गिरफ्तार कर लिया तो नागम्मई संघर्ष में उतर आईं. विवाह के कुछ वर्ष पश्चात नागम्मई ने एक पुत्री का जन्म दिया. तब तक पेरियार खुद को समाजकल्याण के लिए समर्पित कर चुके थे. मात्र पांच महीने की थी, जब वह बच्ची बीमार पड़ी और देखभाल के अभाव में चल बसी. वह उनकी पहली और अंतिम संतान थी. 1933 में नागम्मई का भी निधन हो गया. आगे चलकर रामास्वामी पेरियार ने दूसरी शादी भी की परंतु उससे कोई संतान न हुई.

अभी तक रामास्वामी नायकर के बारे में जो चर्चा हुई है, वे साधारणसी बातें हैं. पेरियार सफल व्यापारी पिता की महत्त्वाकांक्षी संतान थे. लेकिन यदि वे केवल व्यापार तक सिमटे रहते तो उन हजारोंलाखों धनपशुओं में से एक होते जो ताजिंदगी धनार्जन में लिप्त रहकर अंततः उसी की कामना में दम तोड़ देते हैं. अथवा ज्यादा से ज्यादा उन लोगों में से होते, जिनका काम बातों के बल पर चाय के प्याले में तूफान उठाते रहना है. तब वे ‘पेरियार’ न बन पाते. ऐसे रामास्वामी के लिए भला हम भी क्यों कागज काले कर रहे होते! समय की जरूरतों ने आंबेडकर को अर्थशास्त्री से समाजविज्ञानी और विधिशास्त्री बना दिया था. सामाजिक दबावों ने ही पेरियार को उन रास्तों की ओर मोड़ दिया, जिस दिशा में बढ़ने की उससे पहले उन्होंने कभी कल्पना तक न की होगी.

पेरियार के नेतृत्व में उनका पैत्रिक व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा था. 1920 में ‘मद्रास पे्रसीडेंसी ऐसोशिएसन’ का गठन हुआ. पेरियार तब तक स्थानीय नेताओं से संपर्क बना चुके थे. जिस समाज से वे आए थे, उसमें सक्रिय राजनीति से जुड़ने की कोई परंपरा न थी. सवर्ण वर्चस्व वाली राजनीति में पिछड़े वर्गों को ऐसा अवसर मिल भी नहीं पाता था. परंतु पेरियार उन युवाओं में से न थे जो परिवेश और परिस्थितियों के दास बन जाते हैं. वे उन विरले लोगों में से थे जो तमाम चुनौतियों से टकराकर स्थितियों को अपने अनुसार मोड़ने का सामथ्र्य रखते हैं. युवावस्था में ही उनकी राजनीति में रुचि बढ़ने लगी थी. उन दिनों कांग्रेस राजनीति का प्रवेश द्वार थी. बड़ेबड़े नेता, जिन्होंने आगे चलकर कांग्रेस के साथ और उसके विरोध में अपनी राजनीति को चमकाया, कांग्रेस से ही निकले थे. युवा रामास्वामी को भी कांग्रेस से उम्मीदें थीं. इसलिए 1920 में उन्होंने कांगे्रस की सदस्यता ग्रहण कर ली. उसी वर्ष गांधी जी ने ‘असहयोग आंदोलन’ की शुरुआत की थी. पेरियार को कांग्रेस का उदारवादी रवैया, विशेषकर छूआछूत उन्मूलन के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम पसंद थे. इस कारण वे कांगे्रस और गांधीजी से प्रभावित भी थे. असहयोग आंदोलन के दौरान गांधीजी ने औपनिवेशिक सरकार के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग का आवाह्न किया. कांग्रेसजनों और आम जनता से अपील की कि वे उन सभी पदों और सुविधाओं का त्याग कर दें, जो किसी भी रूप में सरकार की ओर से प्राप्त हुए हैं. पेरियार के व्यवसाय का सरकार से कोई सीधा संबंध न था. तो भी गांधीजी के आवाह्न पर उन्होंने अपने जमेजमाए व्यापार को छोड़ दिया और पूरी तरह से असहयोग आंदोलन से जुड़ गए. अपने खजाने के दरवाजे भी आंदोलन के लिए खोल दिए. उनके नेतृत्व में मद्रास में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का सफल आंदोलन हुआ. विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई. खादी को प्रोत्साहन देने के लिए वे न केवल खुद मोटे खद्दर के कपड़े पहनने लगे, बल्कि अपने परिवार और परिजनों को भी उसके लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया. खादी के समर्थन में उनका कहना था—

यदि प्रत्येक व्यक्ति खादी को अपना ले तो देश में बेरोजगारी और भुखमरी की कोई समस्या न रहे’

कुशल प्रबंधन क्षमता, नेतृत्वकला और वक्तृत्वकौशल के बल पर वे तमिलनाडु की राजनीति में जगह बनाने में सफल हुए. उनकी निष्ठा और लगन को देखते हुए उन्हें कांग्रेस का प्रांतीय अध्यक्ष बना दिया गया. उस पद पर वे लगातार दो वर्षों तक बने रहे. उस समय तक वे वैचारिक स्तर पर परिपक्व हो चुके थे. उनकी प्रतिबद्धताएं भी सामने आने लगी थीं. कांग्रेस बुर्जुआ पार्टी थी. पेरियार के लिए वहां सबकुछ आसान न था. हालांकि एक नेता के रूप में कांग्रेस के भीतर उनकी प्रतिष्ठा, मानसम्मान और पैठ में निरंतर बढोत्तरी हो रही थी. पेरियार सामाजिक भेदभाव और जातिआधारित ऊंचनीच से आहत थे. राजनीति के माध्यम से वे उन जड़ताओं पर प्रहार करना चाहते थे. मगर कांग्रेसजनों का असहयोगी रवैया देख उन्हें लगता था कि जिस कार्य के लिए वे राजनीति से जुड़े हैं, उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं. कांग्रेस के नेता किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए तैयार ही नहीं हैं.

यह स्वाभाविक था. अपने गठन के समय से ही कांग्रेस अभिजनों की पार्टी थी. उसकी स्थापना कुछ अभिजात्यों द्वारा अपने वर्गीय हितों की सुरक्षा हेतु की गई थी. कांग्रेस के संस्थापक ह्यूम का विचार था कि इससे समाज के पढ़ेलिखे वर्गों में अंग्रेज सरकार के प्रति आक्रोश कम होगा. इससे 1857 जैसी क्रांति की संभावनाएं क्षीण होंगी. ह्यूम को तत्कालीन अंग्रेज शासकों का समर्थन प्राप्त था. लगभग पचास वर्षों तक कांग्रेसी नेता, अंगे्रज सरकार को बड़ी चुनौती दिए बिना, अपना उद्देश्य साधने में लगे रहे. गांधी ने उसका कायाकल्प करने की कोशिश की. उनके कार्यकाल में कांग्रेस और जनता के बीच की दूरी में कुछ कमी आई. फिर भी उसके अधिसंख्यक नेता अभिजन मानसिकता से बाहर न आ सके. परिणामस्वरूप दलितों और पिछड़ों को लेकर कांग्रेस का रवैया ज्यों का त्यों बना रहा. पेरियार चाहते थे कि सरकार पढ़ीलिखी अभिजात्य संतानों के लिए ब्रिटिश इंडिया की नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे. कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करते समय उन्हें विश्वास था कि जैसेजैसे कांग्रेस में वंचित और पिछड़े वर्ग के नेताओं की संख्या बढ़ेगी, उसके बड़े नेता देशहित में भेदभाव से ऊपर उठकर काम करने लगेंगे. अपने भाषणों में गांधीजी समेत कांग्रेस के सभी बड़े नेता यह आश्वासन भी देते थे. हकीकत इससे जुदा थी. कुछ ही अवधि में पेरियार को कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी का अंतर समझ आने लगा. उन्हें यह देखकर हैरानी होती कि सार्वजनिक मंचों पर समानता और समरसता की बात करने वाले कांग्रेस के बड़े नेता भी भीतर से घोर जातिवादी हैं. समाज में व्याप्त ऊंचनीच को कम करने की उनकी न तो कोई योजना है, न ही संकल्प. कांगे्रसी नेता भी पेरियार के विचारों और उनकी प्रतिबद्धता को लेकर सशंकित रहते थे. पेरियार के वकृत्व कौशल और जनता में उनकी पैठ के कारण वे भीतर ही भीतर उनसे डरते थे. तो भी उन्हें लगता था कि पद और प्र्रतिष्ठा का प्रलोभन उन्हें कांग्रेस से, जो उन दिनों देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी थी, जोड़े रखेगा.

1924 तक पेरियार राजनीति में पैर जमा चुके थे. इस अवधि में उन्होंने खुद को बौद्धिक स्तर पर परिपक्व किया था. समकालीन राजनीति को उन्होंने समाज और संस्कृति के संदर्भ में समझने की कोशिश की. वे चाहते थे कि कांग्रेस सामाजिक सुधार के लिए ऐसे रचनात्मक कार्योें को अपनाए जिनसे समाज के दमितउत्पीड़ित जन को जातीय शोषण से मुक्ति मिले. वे मानसम्मान से भरपूर जीवन जी सकें. उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित हो. परंतु उन्हें लग रहा था कि जिन सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति वे राजनीति के माध्यम से चाहते हैं, और स्वतंत्र भारत को लेकर जनसाधारण की जो उम्मीदें हैं, प्रचलित राजनीति के माध्यम से उनकी पूर्ति असंभव है. ब्राह्मणवाद जिसने समाज को शताब्दियों से जकड़ा हुआ है, और जिससे समाज के बड़े समूह की स्वतंत्रता आहत है, वही कांग्रेस की नीतियों का नियामक, वास्तविक कर्ताधर्ता है. बावजूद इसके पेरियार कांग्रेस के कार्यक्रमों में सक्रिय हिस्सा लेते रहे. उनकी इच्छा थी कि कांग्रेस समाजार्थिक आधार पर पिछड़े और धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों की शिक्षा एवं रोजगार की मांग को सरकार के सामने रखे. उन्होंने इस आशय का एक मसौदा तैयार किया था, जिसे वे कांग्रेस के 1920 में थिरुमलई में होने वाले प्रांतीय अधिवेशन में प्रस्तुत करना चाहते थे. उस सम्मेलन की अध्यक्षता एस. श्रीनिवास अयंगर कर रहे थे. उन्होंने पेरियार के प्रस्ताव पर यह कहते हुए विचार करने से इंकार कर दिया था कि उससे समाज में जातीय दुराग्रह तीव्र होंगे और सामाजिक विद्वेष बढ़ेगा. पेरियार के लिए यह निराशाजनक था. फिर भी उन्होंने उम्मीद बनाए रखी. उन्हें लगता था कि आज नहीं तो कल, कांग्रेस के नेता वृहद लोकहित में उनके प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार हो जाएंगे.

1922 में कांग्रेस के त्रिरुपुर अधिवेशन में उन्होेंने अपने प्रस्ताव को दुबारा पेश करने की कोशिश की. उस बार भी कांग्रेस के बड़े नेताओं के वर्गीय स्वार्थ आड़े आ गए. प्रस्ताव की उपेक्षा होते देख पेरियार उग्र हो गए. मुद्दे को लेकर उनकी वरिष्ठ नेताओं से जमकर बहस हुई. उच्च जातिवर्ण से आए नेता पुराणों और धर्मशास्त्रों की दुहाई देने लगे. हिंदू धर्म का कुटिल चेहरा एक बार फिर पेरियार के सामने था. क्षुब्ध होकर उन्होंने शोषणउत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार रहे लोगों के लिए, न्याय का समर्थन करने वाले नेताओं को एक मंच पर आने का आवाह्न किया. वर्णव्यवस्था के समर्थक ग्रंथों रामायण, मनुस्मृति आदि की होली जलाने का निश्चय कर लिया. अगले वर्ष 1923 में एक बार फिर उन्होंने प्रस्ताव पर विचार करने का अनुरोध किया. उससे उच्च जाति के नेता बिफर गए. एक बार फिर जोरदार बहस हुई. मगर चली उच्च जाति के नेताओं की ही. प्रस्ताव एक बार फिर ठुकरा दिया गया. यही दौर था जब गांधी से उनके मतभेद सामने आ चुके थे. पेरियार का कहना था कि कांग्रेस के शिखर पुरुष गांधी स्वयं वर्णभेद की मानसिकता से ग्रस्त हैं. राजनीतिक मजबूरियों के तहत उनके नेतृत्व में कांग्रेस कुछ रचनात्मक कार्यों को अपनाने के विवश हुई थी, लेकिन पहले से चली आ रही व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के लिए वह कदापि तैयार नहीं हैं. गांधी का सुधारवाद तात्कालिक उदारता के अलावा कुछ नहीं है.

पेरियार का सोच निराधार न था. तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मण मात्र 3.2 प्रतिशत थे. इतनी कम संख्या के बावजूद प्रांत के तीनचैथाई संसाधनों पर उन्हीं का अधिकार था. धर्मशास्त्रों में कृषिकर्म को वैश्य के लिए निर्दिष्ट किया गया था. ब्राह्मणों के लिए खेती निषिद्ध कर्म है. बावजूद इसके प्रांत के बड़े जमींदारों में अधिसंख्यक ब्राह्मण थे. लोग इसे लेकर सवाल न करें, इसके लिए बड़े जमींदारों ने शहरों में ठिकाना बनाया हुआ था. सरकारी पदों पर अधिसंख्यक ब्राह्मण काबिज थे. 1912 में 55 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर तथा 72.6 प्रतिशत जिला मुंसिफ ब्राह्मण ही थे. अनंतपुर में एक ऐसा ब्राह्मण परिवार था, जिसने सत्ता से अपनी निकटता का लाभ उठाते हुए समस्त सरकारी पदों को हथिया लिया था. यह देख स्थानीय लोगों में भारी असंतोष व्याप्त था. ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी रवैये के विरोध की बात नई न थी. इस बेईमानी के विरोध में 1896 में एक दर्जन से अधिक लोगों ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था. दूसरा उदाहरण नैल्लोर के एक ब्राह्मण परिवार का था. उसके पचास सदस्यों ने सरकारी नौकरियों पर कब्जा किया हुआ था. उसके विरोध में भी एक दर्जन से अधिक स्थानीय नागरिकों ने यूरोपीय अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत पेश की थी. यह तब था, जब स्थानीय कलेक्टर सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व देने की मांग उठा चुका था. इसे लेकर वहां जनमानस में गुस्सा था. दक्षिण में ब्राह्मणों के अलावा बाकी जातियों को भी प्रशासनिक नौकरियों में हिस्सेदारी की मांग वर्षों पुरानी थी. 1840 में यानी प्रथम स्वाधीनता संग्राम से भी बहुत पहले वहां ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने की मांग उठ चुकी थी. उस वर्ष तमिलनाडु के 32 पंचलारों ने मांग की थी कि सरकारी नौकरियों में समाज के बाकी वर्गांे को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए. ब्राह्मण एक ओर दावा करते थे कि सरकार उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर नियुक्तियां देती है. दूसरी ओर शिक्षा और दूसरे मामलों में दलितों और पिछड़ों के साथ कदमकदम पर पक्षपात किया जाता था. उनके लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी. मिशनरियों के आने से दलितों को शिक्षा का अवसर मिला था. ब्राह्मण और अन्य सवर्ण उनका भी विरोध करते थे. पेरियार का विचार था कि सामाजिक समानता हेतु दलितों और पिछड़ों में आर्थिक आत्मनिर्भरता अत्यावश्यक है. उसके लिए जरूरी है कि सरकारी नौकरियों में सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी हो. इसलिए पेरियार की मांग थी कि कांगे्रस सरकार पर दबाव बनाए, ताकि बहुजन समाज के लोग सरकारी पदों तक पहुंच सकें. ब्राह्मण वर्चस्व को तोड़ने के लिए वे चाहते थे कि दलितों और पिछड़ों को उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाए. इसके लिए उन्होंने एक मसौदा तैयार किया था; जिसे वे औपनिवेशिक सरकार तक पहुंचाना चाहते थे. यह क्रांतिकारी विचार था. उसकी भनक लगते ही कांग्रेसी नेताओं में खलबली मच गई. पेरियार चाहते थे कि गांधी सहित प्रांत के बड़े कांग्रेसी नेता उनका साथ दें. लेकिन न तो गांधी ने उनकी मांग की ओर ध्यान दिया, न ही कांग्रेस का दूसरा कोई नेता उनके समर्थन में आया. उससे पेरियार का कांग्रेस के प्रति रहासहा मोह भी जाता रहा. यह मानते हुए कि कांग्रेस के साथ रहते हुए उद्देश्यपूर्ति असंभव है, उन्होंने तत्क्षण कांग्रेस से अलग होने का फैसला कर लिया.

पिछड़ों और दलितों की राजनीतिक सहभागिता को रोकने की चालें केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं थी. उत्तर भारत के नेता भी इसके शिकार थे. ‘त्रिवेणी संघ’ का गठन पटना में तीन प्रमुख खेतिहर जातियों कुर्मी, कुशवाहा और यादव के नेताओं द्वारा 1934 में किया गया था. उन्हें भी उसी समस्या से जूझना पड़ा था जिनसे दक्षिण भारत पेरियार गुजर चुके थे. उसके संस्थापक नेता यदुनंदन प्रसाद मेहता ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में कांग्रेस के बारे में अपने अनुभवों को साझा किया है—‘पहले ऐलान किया गया कि योग्य व्यक्तियों को लिया जाएगा. जब इन बेचारों ने योग्य व्यक्तियों को ढूंढना शुरू किया तो कहा गया कि खद्दरधारी होना चाहिए. जब खद्दरधारी सामने लाए गए तो कहा गया कि जेल यात्रा कर चुका हो. जब ऐसे भी आने लगे तो कहा गया कि वहां क्या सागभंटा बोना है. किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी हैं? तो किसी को व्यंग्य मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमकतेल तौलना है.’ कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक तिलक के भी ठीक ऐसे ही विचार थे. यह तब है जब कांग्रेस पूरे देश और समाज का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी. देश का प्रमुख दल होने के बावजूद कांग्रेस पर वर्गचरित्र हावी था. थोड़े ही समय में पेरियार ने समझ लिया कि कांग्रेस मुख्यतः सवर्ण हितों का सरंक्षण करती है. कोई उम्मीद न देख उन्होंने नवंबर 1925 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. इसी के साथ उन्होंने स्वयं को सक्रिय राजनीति से भी अलग कर लिया. पेरियार की ओर से वह सोचासमझा निर्णय था. उनका मानना था कि वर्तमान राजनीति का चरित्र सामाजिक न्याय भावना से कोसों परे है. यदि कांग्रेस नहीं तो क्या? इसपर पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का शुभारंभ किया. कुछ ही वर्षों में उस आंदोलन का असर पूरे प्रांत में दिखने लगा था. लोग तेजी से उसके साथ जुड़ रहे थे. पेरियार के लिए वह समय अपनी वैचारिकी के साथ आगे बढ़ने का था.

पेरियार की वैचारिकी के आधार पर हम उन्हें आंबेडकर और फुले का समिश्रण कह सकते हैं. फुले की भांति पेरियार ने भी धार्मिक जड़ताओं पर तीखे प्रहार किए. स्त्रीपुरुष समानता और शिक्षा पर जोर दिया. आंबेडकर से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने पिछड़ों और दलितों का अपने मानसम्मान एवं अधिकारों के लिए एकजुट होने का आवाह्न किया. यह मानते हुए कि भारतीय समाज में जाति विकास और सामाजिक समरसता की सबसे बड़ा अवरोधक है, उन्होंने न केवल जाति पर, बल्कि उसे आश्रय देने वाले धर्म पर भी तीखे प्रहार किए. यह उनका दुस्साहसी कदम था. धर्म का विरोध आंबेडकर ने भी किया था, लेकिन उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म के जातिवादी ढांचे पर था. ब्राह्मणवाद पर था, जिससे वह अनुशासित होता था. आलोचना से पहले उन्होंने हिंदू धर्म के साथसाथ दूसरे धर्मों का भी विशद् अध्ययन किया था. लंबे चिंतनमनन के उपरांत उन्होंने तुलनात्मक रूप से उदार, बौद्ध धर्म की राह ली थी. हालांकि उन जैसे मेधा के धनी और प्रकांड विद्वान के लिए धर्म किसी भी रूप में अनावश्यक था. दरअसल जिस समाज का वे नेतृत्व कर रहे थे, वह शताब्दियों से धर्म के प्रभावक्षेत्र में जीते हुए उसके साथ अनुकूलन कर चुका था. धर्मविहीन जीवन की कल्पना भी उसके लिए असंभव थी. इसलिए कदाचित एक तात्कालिक व्यवस्था के रूप में धर्मांतरण को अपनाया था. पेरियार जीवन में धर्म की जकड़बंदी को कहीं वृहद् संदर्भ में देख रहे थे. वे मानते थे कि धर्म व्यक्ति को न केवल बौद्धिक रूप से विपन्न करने के साथसाथ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को वैधता प्रदान करता है. वह बेमेलकारी सभ्यता को ईश्वरीय वरदान की तरह अपनाने के लिए प्रेरित करता है. वाल्तेयर ने धर्म को रस्सी और ईश्वर को खूंटे की संज्ञा दी थी. यह उक्ति भारत के संदर्भ में एकदम वह दार्शनिक था. पेरियार के लिए, खासकर भारत जैसे देश में जहां लोकतंत्र लोकप्रिय राजनीति के भरोसे टिका हो—ऐसा करना आसान नहीं था. बड़ेबड़े नेता, जिनका ईश्वरीय सत्ता में खास विश्वास नहीं रहा, लोकदिखावे के लिए, इस डर से कि भारतीय जनता नास्तिक को स्वीकार नहीं करेगी, आस्तिक होने का दिखावा करते आए हैं. बावजूद इसके पेरियार ने खुद को खुलेआम नास्तिक कहा और नीत्शे की भांति ईश्वर की अवधारणा पर तीखे सवाल उठाए. अपने राजनीतिक भविष्य को ताक पर रख, अपने भाषणों तथा कार्यक्रमों के जरिये आजीवन नास्तिकता का प्रचार करते रहे.

ओमप्रकाश कश्यप