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दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता : सिंगारवेलु चेट्टियार

सामान्य
जब भी कोई नया महापुरुष जन्मता है, मनुष्यता का भी पुनर्जन्म होता है। प्रत्येक महापुरुष अपने विचारों से, कर्मों से नई इबारत लिखता है। ऐसे कि लोग सम्मोहित होकर उसका उसका अनुसरण करने लगते हैं। फलस्वरूप जड़ और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराएं पीछे छूटने लगती हैं। कुल मिलाकर बात इतनी-सी है कि जब भी किसी महापुरुष का जन्म होता है, इस दुनिया का भी पुनर्जन्म होता है।

आजकल लोग सवाल नहीं गूगल करते हैं। तो चलिए गूगल कर लेते हैं—‘भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत किसने की थी? वर्ग-क्रांति का प्रतीक लाल झंडा भारत में पहली बार किसने फहराया था? कौन था वह भारतीय जिसने खचाखच भरे सभागार में पहली बार ‘कामरेड’ शब्द का संबोधन किया था। जिसे सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा था? भारत में मजदूर आंदोलनों का पितामह कौन था? कौन था, दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्मदाता? गूगल बाबा इन प्रश्नों का थोड़ा घुमा-फिराकर एक ही जवाब देंगे—‘सिंगारवेलु चेट्टियार। लोग उन्हें सम्मान से सिंगारवेलार कहते थे।

अब आप सिंगारवेलु को गूगल करना चाहेंगे। पर थोड़ा धीरज रखिए। पहले कुछ बातें ‘मई दिवस’ पर कर ली जाएं। मशीनीकरण के आरंभ में आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। ‘कार्य-दिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से दिन ढलने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता-बढ़ता तो काम के घंटे भी बदल जाते। कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभी-कभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था। अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ 8 घंटे की मांग का समर्थन किया।1 आंदोलन होने लगे। परंतु न सरकारें चेतीं न कारखाना मालिकों ने ही कोई ध्यान दिया। आखिरकार अमेरिकी मजदूरों ने 1 मई 1886 से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। तीन और चार मई, को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूर संगठनों की भिड़ंत हुई। 4 मई को शिकागो के हेमार्किट चौक पर हुई घटना तो नरसंहार जैसी थी। उसी की याद में मई दिवस मनाया जाता है। मई की पहली तारीख का संबंध 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तथा उसके लिए श्रमिकों द्वारा दी गई कुर्बानियों से है।

भारत में पहला मई उत्सव, 1 मई, 1923 को मद्रास में मनाया गया था। उसी दिन देश में पहले मजदूर संगठन का जन्म हुआ था, नाम था—‘हिंदुस्तान लेबर एंड किसान पार्टी’।2 उसी दिन लाल झंडा पहली बार फहराया गया था।3 आगे चलकर यह झंडा मजदूर आंदोलनों की पहचान बन गया। इन सबका श्रेय जाता है—सिंगारवेलु चेट्टियार को। भारत में ‘कामरेड’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही, दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में किया था।4 यह जादुई शब्द आगे चलकर साम्यवादी चेतना की पहचान बन गया। गया सम्मेलन में सिंगारवेलु ने ही पहली बार भारत के लिए ‘संपूर्ण स्वराज’ की मांग रखी थी।5

जीवन परिचय

सिंगारवेलु  का जन्म 18 फरवरी, 1860 को एक मछुआरा परिवार में हुआ था। समुद्र किनारे जिस बस्ती में वे रहते थे, उसे वे ‘कप्पम’ कहते थे। बस्ती के प्रायः सभी पुरुष मछली पकड़ने का काम करते। बांस और तख्तों से बनी डोंगी से समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे आगे बढ़ जाते। कभी समुद्र की बन आती। उसकी उन्मत्त लहरें, किनारे बसीं झुग्गियों को अपने साथ बहा ले जातीं। मगर कुछ दिनों बाद वे फिर उसी जगह उभर आती थीं। प्रकृति और पुरुष की डांडा-मेंडी….झुग्गियों का बनना-मिटना भी मानो लहरों जैसा हो। सिंगारवेलु के पिता का नाम था—वेंकटचलम चेट्टियार। मां थीं—वाल्लमई। बताया जाता है कि उनके दादा मामूली डोंगी के सहारे बर्मा के तटवर्ती क्षेत्रों तक चले जाते। वहां से चावल और इमारती लकड़ी मद्रास तक ले आते थे।6 कह सकते हैं कि धैर्य और दुस्साहस सिंगारवेलु को विरासत में प्राप्त हुए थे।

जिस जाति में सिंगारवेलु का जन्म हुआ था, उसमें पढ़ने-पढ़ाने की कोई परंपरा न थी। परंतु वेंकटचलम थोड़ा आधुनिक मिजाज थे। उन्होंने सिंगारवेलु को पढ़ाने का फैसला किया। खुद को प्रखर बुद्धि सिद्ध करते हुए सिंगारवेलु ने 1881 में मेट्रिक की परीक्षा पास की। 1884 में क्रिश्चन कॉलेज से एफए पास करने के पष्चात उन्होंने बीए के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दाखिला ले लिया। आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास लॉ कॉलेज से जुड़े। 1902 में कानून की डिग्री मिली। उसके बाद वे मद्रास उच्च न्यायालय में प्रक्टिश करने लगे। प्रतिभाषाली थे ही। सो वकालत के जमने में देर न लगी।7

1889 में उनका विवाह आंगम्मल से हुआ। वह अंतररजातीय विवाह था। दोनों के एकमात्र संतान, बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने कमला रखा था। 1932 में उन्होंने अपने धेवते, कमला के पुत्र सत्यकुमार को उन्होंने कानूनी तरीके से गोद ले लिया।

आरंभ में सिंगारवेलु व्यापार में हाथ आजमाना चाहते थे। इसलिए 1902 में वे चावल के व्यापार की संभावना तलाशने के लिए ब्रिटेन चले गए। सिंगारवेलु के लिए वह यात्रा बहुत परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। वहां उन्हें नई-नई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। लंदन में उन्होंने बौद्ध अधिवेशन में हिस्सा लिया। उससे बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रति ऐसा अनुराग बना कि मद्रास लौटने पर अपने घर पर ही ‘महाबोधि सोसाइटी’ की बैठकें आयोजित करने लगे।8 इससे प्रसन्न होकर उन्हें मद्रास महाबोधि सोसाइटी का अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया गया। उन्हीं दिनों समाज सेवा से लगाव हुआ। वे चाहते थे कि बस्ती के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे बच्चों तथा उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने लगे। आवश्यकता पड़ने पर गरीब बच्चों को पुस्तक, स्टेशनरी, भोजन वगैरह देकर मदद भी करते। पढ़ने का शौक था। सो धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विषयों की नई से नई पुस्तकें अपने लिए जुटाते, पढ़ते। अपने पढ़े हुए पर दूसरों से बातचीत करते। सुब्रह्मयम भारती, वी. चक्करई चेट्टियार जैसे नेताओं के संपर्क में आने के बाद वे राजनीति की ओर मुड़ गए।

प्लेग के दौरान

1905 में रूसी क्रांति की खबरें मिलीं, जिससे पहली बार उनका कम्युनिस्म की ओर वे रुझान बढ़ा। इस बीच उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध बन चुके थे। पार्टी में वे तिलक जैसे उग्रपंथी नेता माने जाते थे। वे मानते थे कि देश को आजाद कराने के लिए बल प्रयोग अपरिहार्य है। बिना उसके साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति असंभव होगी। 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो सिंगारवेलु का ध्यान युद्ध की खबरों से ज्यादा जनसाधारण की बढ़ती समस्याओं की ओर गया। खासकर उन समस्याओं की ओर जो युद्ध की, पूंजीवादी लिप्साओं की देन थीं। उन्हीं दिनों एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में तबाही मचाने वाली प्लेग 1898 में मद्रास तक आ पहुंची। वहां उसने ‘कुप्पम’ को भी अपनी चपेट में लिया। सब कुछ छोड़कर सिंगारवेलु जनसेवा में जुट गए। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने ‘सामुदायिक रसोई’ का संचालन किया। 1910 के बाद प्लेग से छुटकारा मिला तो मलेरिया ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। सिंगारवेलु जूझते रहे। इससे उन्हें गरीबी तथा उसके कारणों को समझने की दृष्टि मिली। वही उन्हें साम्यवाद की ओर ले गई।

राजनीति में दस्तक

13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का रक्त-रंजित दिन था। उस दिन जलियांवाला हत्याकांड 379 लोग मारे गए थे। लगभग 1500 हताहत हुए थे। क्षुब्ध जनता अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगी। उत्तर से दक्षिण तक सब अंग्रेजों के खिलाफ थे। फिर सिंगारवेलु कैसे पीछे रह सकते थे! उन्होंने युवाओं को संगठित कर, कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। उससे प्रेरित होकर सिंगारवेलु ने भी एक जनसभा में अपने गाउन को अग्नि-समर्पित कर अदालत से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी। मई 1921 में उन्होंने गांधी को लिखा—‘मैंने आज अपने वकालत के पेशे से मुक्ति पा ली है। देश-सेवा के लिए मैं भी आपका अनुसरण करूंगा।’9 इसी दौरान वे कांग्रेस के संपर्क में आए। जनमानस में अपनी पैठ, प्रतिभा और सरोकारों के चलते बहुत जल्दी प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

हैलो कामरेड्स

दिसंबर 1922 में उन्हें कांग्रेस के गया अधिवेशन में शामिल होने का अवसर मिला। उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी थे। अधिवेशन में दिए गए भाषण में सिंगारवेलु का रंग एकदम निराला था। गए वे प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में थे, मगर भाषण में वे खुद को कुछ और ही बता रहे थे—‘अध्यक्ष, हाल में मौजूद कामरेड्स, साथी मजदूरो, प्रजाजनो, हिंदुस्तान के किसानो और हलवाहो….मैं आपके बीच आपके मजदूर साथी के रूप में बोलने आया हूं। मैं यहां पूरी दुनिया के लिए महा-कल्याणकारी, कम्युनिस्टों की दुनिया के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचा हूं। मैं यहां उस महान संदेश को दोहराऊंगा, जिसे साम्यवाद दुनिया-भर के मजदूरों को देता आया है।’10 उन दिनों अंग्रेज ‘कम्युनिज्म’ शब्द से ही खार खाते थे। ऐसे में किसी प्रतिनिधि के मुंह से ‘कामरेड्स’ संबोधन सुनना, खुद को साम्यवादी जगत का प्रतिनिधि बताना, कामगारों, मजदूरों और किसानों की बात करना, वहां मौजूद सदस्यों के लिए यह एकदम अप्रत्याशित था। सो सिंगारवेलु की पहली पंक्ति के साथ ही सभागार तालियों से गूंजने लगा।

भाषण में सिंगारवेलु ने कहा था—‘हम स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई हम अहिंसा और असहयोग जैसे हथियारों की मदद से लड़ रहे हैं। मेरा उनमें विश्वास है। मगर इन हथियारों से वर्गहीन समाज की रचना संभव नहीं है।’ उन्होंने कहा था—‘धनाढ्य संभल जाएं। ताकतवर ध्यान दें….दुनिया में जितनी भी अच्छी चीजें हैं, सब मेहनतकश लोगों ने ही तुम्हें दी हैं। तुमने उन्हीं को हाशिये पर ढकेल दिया। वे हमेशा तुम्हारी इच्छाओं के खटते रहते हैं। फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करते हो….याद रखो, भारतीय मजदूर अब जाग चुके हैं। वे अपने अधिकारों को धीरे-धीरे समझने लगे हैं।’11 कांग्रेस के इतिहास में वह पहला अवसर था, जब उसके सम्मेलन में किसान और मजदूर वर्ग पर चर्चा हो रही थी। लोग कांग्रेस के कायाकल्प का श्रेय गांधी को देते हैं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनसे समझौता किए बगैर कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता संभव ही नहीं थी। डॉ. आंबेडकर, रामासामी पेरियार और सिंगारवेलु जैसे नेताओं का दबाव कांग्रेस और गांधी दोनों को बदलने को विवश कर रहा था।

कांग्रेस का गया सम्मेलन सिंगारवेलु की राजनीति की दिशा तय कर चुका था। उनके भाषण ने देश-विदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। देश-भर से पहुंचे प्रतिनिधियों ने मांग की कि सिंगारवेलु को कांग्रेस की श्रमिक मामलों की प्रस्तावित उपसमिति में स्थान दिया जाए। मानवेंद्रनाथ राय ने मजदूरों तथा आम जनता की समस्या की ओर कांग्रेस तथा सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए सिंगारवेलु की प्रशंसा की थी। अपनी उग्र कार्यशैली और साम्यवादी रुझान के कारण वे पहले ही अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। 1921 में पुलिस ने उनके घर पर दबिश दी थी। वह कथित रूप से ‘चुनौती’ शीर्षक से प्रकाशित पंपलेट्स की तलाशी लेने गई थी। लेकिन पुलिस को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा था।12

सिंगारवेलु और गांधी

अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में सिंगारवेलु गांधी से प्रभावित थे। परंतु उनकी कार्यशैली गांधी से अलग थी। प्रिंस ऑफ़ वाल्स भारत दौरे पर आए। शेष भारत की तरह दक्षिण में भी उनकी यात्रा का बहिष्कार किया गया। मद्रास में सिंगारवेलु के नेतृत्व में हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल पूरी तरह कामयाब थी। बाद में पता चला कि हड़ताल में शामिल होने के लिए कुछ दुकानदारों पर दबाव बनाया गया था। कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत पर गांधी ने 9 फरवरी, 1922 के ‘यंग इंडिया’ में ‘सत्याग्रह की मूल भावना का पालन न करने पर’ सिंगारवेलु की आलोचना की थी।13

कम्युनिज्म की ओर

गया सम्मेलन में ही उनकी भेंट श्रीपाद अमृत डांगे से हुई। मानवेंद्रनाथ राय से उनका संपर्क पहले से ही था। अबनीनाथ मुखर्जी, जो अपने साथियों में अबनि मुखर्जी के नाम से पहचाने जाते थे, सिंगारवेलु से मिलने दो बार मद्रास पहुंचे थे। इस तरह सिंगारवेलु कांग्रेस में रहकर भी अपनी स्वतंत्र राजनीति कर रहे थे। पेरियार की तरह वे भी कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी के अंतर को समझते थे। जानते थे कि कांग्रेस कभी भी मजदूरों और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सीधे टकराव का खतरा मोल नहीं लेगी। इसलिए मद्रास लौटते ही उन्होंने अपने विचारों को कार्यरूप देने के लिए काम शुरू कर दिया था। उसके फलस्वरूप ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ का गठन हुआ। वह कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित पहला संगठन था। ध्यातव्य है कि मानवेंद्रनाथ राय, अबानी मुखर्जी, इवेलिना राय आदि नेता मिलकर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’(ताशकंद पार्टी) के गठन की घोषणा कर चुके थे, परंतु 25 दिसंबर 1925 को विधिवत गठन से पहले उसका अस्तित्व केवल अनौपचारिक था।

सिंगारवेलु  के नेतृत्व में पहली बार, 1 मई 1923 को भारत में मई दिवस का आयोजन किया गया। उसी दिन ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ तथा उसके गठन के उद्देश्यों के बारे में लोगों को बताया गया था। मई दिवस का आयोजन सिंगारवेलु ने मद्रास में दो स्थानों पर किया था। पहला उच्च न्यायालय के आगे समुद्र तट पर। दूसरा ट्रिप्लीकेंस तट पर। पहली बैठक की अध्यक्षता स्वयं सिंगारवेलु ने की थी। दूसरे कार्यक्रम की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी सरमा ने। उस अवसर पर सिंगारवेलु ने कहा था कि मई दिवस का आयोजन स्वयं मजदूरों द्वारा किया गया है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश में शीघ्र ही मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी, जो लोगों के विकास को गति देगी। ‘मद्रास मेल’ नामक अखबार ने ‘लेबर किसान पार्टी’ द्वारा मई दिवस की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि केवल वास्तविक मजदूर ही इस उत्सव को मना रहे थे, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। उस अवसर पर लाल-क्रांति का प्रतीक ‘लाल-झंडा’ भी फहराया गया था। सार्वजनिक कार्यक्रम में लाल झंडा फहराने की वह घटना, न केवल भारत, अपितु एशिया में भी पहली घटना थी। उस अवसर पर 2 मई 1923 के ‘दि हिंदू’ में छपा था—

‘लेबर किसान पार्टी ने मद्रास में मई दिवस उत्सव आरंभ किया है। कामरेड सिंगारवेलु ने उस बैठक की अध्यक्षता की थी। प्रदर्शन कामयाब था। मीटिंग में मई दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी की गई। पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के अहिंसक सिद्धांतों के बारे में लोगों को बताया था। उसमें लोगों से आर्थिक मदद की अपील भी की गई। इस बात पर जोर दिया गया था कि भारतीय मजदूरों को दुनिया-भर के मजदूरों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए।’14

दिसंबर 1923 में उन्होंने ‘दि लेबर किसान गजट’ शीर्षक से पाक्षिक की शुरुआत की। इसके साथ-साथ तमिल भाषा में ‘तोझीलालान’(कामगार) शीर्षक से साप्ताहिक भी निकाला था। ‘कामगार’ के एक अंक का मूल्य ‘आधा आना’ था। अंग्रेजों की सिंगारवेलु पर नजर थी। उनकी दृष्टि में ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कहीं अधिक खतरनाक थी। 1924 में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ मामले में सिंगारवेलु को उनके घर पर नजरबंद कर लिया गया। उन दिनों उनकी उम्र 64 वर्ष थी। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

1925 में कानपुर में पहले कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। उस बैठक में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के गठन को स्वीकृति मिली थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में सिंगारवेलु ने छूआछूत की समस्या की चर्चा भी की थी। उनका दृष्टिकोण साम्यवादी दृष्टिकोण से मेल खाता था,

‘हमें साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि साम्यवाद की नजर में छूआछूत पूरी तरह आर्थिक समस्या है। अछूतों को मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों और मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं, इन प्रश्नों का ‘स्वराज’ के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है….कम्युनिस्टों की न तो कोई जाति होती है, न धर्म। व्यक्ति का हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना उसका निजी मामला है….जैसे ही उन(अस्पृश्यों) की आर्थिक पराश्रितता खत्म होगी, छूआछूत की समस्या भी अपने आप समाप्त हो जाएगी।’15

उन दिनों पेरियार राजनीति में, गैर-ब्राह्मण जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज चल रहे थे। उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की स्थापना की थी। सिंगारवेलु की ख्याति उन दिनों शिखर पर थी। उसी दौरान दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। सिंगारवेलु ने ही पेरियार को कांग्रेस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। पेरियार के मनस् में साम्यवाद का बीजारोपण करने वाले भी वही थे। सिंगारवेलु की सलाह पर ही पेरियार ने सोवियत संघ की यात्रा पर गए थे। लौटने के बाद पेरियार ने सोवियत संघ के अनुभवों के आधार पर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कार्यनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया। पेरियार के आग्रह पर सिंगारवेलु ने ‘इरोद कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट तैयार किया। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का एक सम्मेलन 4 मार्च 1934 को मन्नारगुडी, तमिलनाडु में हुआ था। सिंगारवेलु ने उसकी अध्यक्षता की थी। अपने भाषण में सिंगारवेलु ने भारतीय समाज के आर्थिक वैषम्य पर चिंता व्यक्त की थी—

‘देश की 40 प्रतिशत जनता को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। मृत्यदर दूसरे देशों से कहीं ज्यादा है। यह 1000 में 30 है। 100 में से 30 बच्चे एक साल का होते-होते मर जाते हैं। भारत में औसत आयु मात्र 20 है, जबकि इंग्लेंड में 53 साल है….लोग घोर दारिद्रय में जीते हैं, बावजूद इसके मंदिरों की घंटियां टनटनाती रहती हैं। मस्जिदों में नमाज और चर्च में प्रार्थनाएं चलती रहती रहती हैं। लोग जिसे ईश्वर समझकर पूजते हैं, उसके बारे में वे कुछ नहीं जानते। ईश्वर महज मनुष्य की रचना है।’16

उस भाषण में सिंगारवेलु ने अपने पूर्वजों को भी नहीं छोड़ा था—

‘मेरे अपने पूर्वजों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए 1 लाख रुपये अलग रख दिए थे। लेकिन जब उनकी बस्ती के मछुआरे बीमार पड़े, वे केवल देवता को पूजा-अर्चना, प्रार्थना और बलि तक सीमित रहे। मेरी जाति की तरह और भी जातियां हैं। वे भी धर्मादे के लिए रकम एक ओर रख देती हैं और मुष्किल समय में प्रार्थनाओं और बलि देकर मन को तसल्ली देती रहती हैं।’17

पेरियार के मन में सिंगारवेलु के प्रति गहरा सम्मान था। खासकर उनकी वैज्ञानिक सोच पर। पेरियार के आग्रह पर ही सिंगारवेलु ने ‘कुदी अरासु’ में लिखना शुरू किया था। मगर उन दोनों के साथ आने से न तो कांग्रेस खुश थी, न ही अंग्रेज सरकार। अंग्रेजों का मानना था कि यह सिंगारवेलु ने ही पेरियार को ‘बिगाड़ा’ है। ब्रिटिश सरकार नहीं चाहती थी कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को बढ़ावा मिले। उसे देखते हुए सिंगारवेलु ने ‘मजदूर एवं किसान’ जैसे शब्दों को अपनाया। मगर अपनी उग्र कार्यषैली के कारण वे सरकार और विरोधियों की आंखों में हमेशा ही खटकते रहे।

मजदूर नेता के रूप में  

बकिंघम एंड कार्नेटिक मिल, मद्रास की सबसे बड़ी कपड़ा मिल थी। उसका महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहली लेबर यूनियन18, ‘मद्रास लेबर यूनियन’ का गठन अप्रैल 1918 में वहीं के मजदूरों ने मिलकर किया था। ब्रिटिश अधिकारी यूनियन के गठन का विरोध कर रहे थे। घटना की नींव 1920 में पड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारी रिवाल्वर लिए मजदूरों को धमकाता फिर रहा था। एक मजदूर ने उसकी रिवाल्वर छीनकर पुलिस को सौंप दी। इसपर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। बाबूराव और मुरुगन नामक दो युवा मजदूर उस गोलीबारी में मारे गए। मद्रास में श्रम आंदोलन में मरने वाले ये दोनों पहले थे। घटना से नाराज 13000 मजदूर हड़ताल पर उतर आए। बाद में पुलिस और कामगारों के बीच कई भिड़ंत हुईं, जिनमें दर्जनों मजदूरों को प्राण गंवाने पड़े। सिंगारवेलु ने न केवल हड़ताल के नेतृत्व में हिस्सा लिया, बल्कि लगातार लेख लिखकर मजदूरों के उत्पीड़़न के विरुद्ध आवाज उठाते रहे।

उन्हीं दिनों उत्तरी मद्रास में मैसी कंपनी के कामगार भी हड़ताल पर चले गए। वी. चक्करई और ओदीकेसवेलु नायकर जैसे मजदूर नेताओं के साथ सिंगारवेलु एक बार फिर मजदूरों के समर्थन में उतर गए। अपने आग उगलते भाषणों से इन तीनों नेताओं ने सरकार को हिला दिया था। 1927-28 उत्तरी-पश्चिमी रेलवे, बंगाल-नागपुर रेलवे तथा ईस्ट इंडियन रेलवे के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। रेलवे कर्मचारियों को समर्थन देने, उनका हौसला बढ़ाने के लिए सिंगारवेलु ने भोपाल, हावड़ा और बंगाल की यात्राएं कीं। हावड़ा और बंगाल में 30,000 मजदूर-कामगार हड़ताल पर थे। सिंगारवेलु ने अपने साथियों के साथ हड़ताल में हिस्सा लिया था। उत्तरी भारत की यात्रा से लौटे ही थे कि दूसरी हड़ताल की सूचना मिली। 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। मजदूर उनकी योग्यता के नए सिरे से छंटनी का विरोध कर रहे थे। छंटनी के लिए प्रबंधकों ने कर्मचारियों की योग्यता के नए मानदंड तैयार किए थे, जो मजदूरों को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरे रेलवे ने मजदूरों को अलग-अलग ठिकानों पर भेजने का निर्णय लिया था। मजदूर इनका विरोध कर रहे थे। मांगे न मानने पर मजदूर 19 जुलाई 1928 से हड़ताल पर चले गए। उनके समर्थन में बाकी मजदूरों और कामगारों ने भी हड़ताल की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप 21 जुलाई से रेलवे का चक्का जाम हो गया। वह हड़ताल आखिरकार नाकाम सिद्ध हुई। सिंगारवेलु को दस वर्षों की सजा हुई। लेकिन बाद में अपील पर, उनकी बीमारी और उम्र को देखते हुए सजा की अवधि 18 महीने कर दी गई।

1927 में ही जब हड़ताली मजदूर चाको और विंसेंट पुलिस की गोली से मारे गए। मद्रास तक जब वह समाचार पहुंचा तो सिंगारवेलु ने बिना कोई पल गंवाए उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन किया। जिसमें पुलिस के दमन की निंदा की गई। मजदूर और कामगारों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे इतने समर्पित थे कि जब भी, जहां से भी बुलावा मिलता, तुरंत पहुंच जाते थे।

सिंगारवेलु का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ। जब तक जिये तब तक उन्हें मजदूरों के हितों की चिंता सताती रही। जीवन के आखिरी दिनों में जब बढ़ी उम्र के कारण सक्रियता घट गई तो उन्होंने पेरियार की पत्रिकाओं, ‘कुदी अरासु’, ‘रिवोल्ट’ तथा अंग्रेजी दैनिक हिंदू में लेख आदि लिखकर संघर्ष की लौ को जलाए रखा। उनकी आंखों में समानता पर आधारित, वर्गहीन समाज का सपना बसता था। इस कसौटी पर कांग्रेस की ‘स्वराज’ की अवधारणा भी उन्हें अधूरी दिखाई पड़ती थी। उनका गांधी के नाम लिखा गया एक पत्र 24 मई 1922 को ‘नवशक्ति’ में प्रकाशित हुआ था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कि प्रत्येक परिवार को उतनी जमीन मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जरूरत के लायक अन्न उपजा सके। अपना घर होना चाहिए, ताकि किसी को भी किराया न चुकाना पड़े। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था भी सरकार की ओर से करनी चाहिए। जिस स्वराज में यह गारंटी न हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। असली स्वराज केवल जनता द्वारा, और केवल जनता के लिए आएगा। वे बेहद पढ़ाकू थे। उनका पुस्तकालय मद्रास के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से था।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ

  1.  अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग,दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14,799 ब्रोडवे न्यू यार्क, पृष्ठ 3
  2.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम- सिंगारवेलु : फर्स्ट कम्युनिस्ट इन साउथ इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ-1
  3.  पी.मनोहरन, जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी इन इंडिया, पृष्ठ 191।
  4.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-189
  5.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-190
  6.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-1
  7.  पी.वसंतकुमारन, गॉडफादर ऑफ़ इंडियन लेबर, एम. सिंगारवेलु, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  8.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-2
  9.  वसंतकुमारन, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  10.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ 164-165
  11.  उपर्युक्त 165
  12.  पी. मनोहरन, पृष्ठ 183
  13.  दि कलैक्टिड वर्क्स ऑफ़महात्मा गांधी, खंड-26, पृष्ठ 132-134।
  14.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-169
  15. उपर्युक्त पृष्ठ 203
  16.  उपर्युक्त पृष्ठ 221-22
  17.   उपर्युक्त पृष्ठ 222
  18.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-11

पूंजी का राज या राज की पूंजी

सामान्य

आलेख

सुरक्षा के बिना विकास का आनंद नहीं होगा. विकास के बिना सुरक्षा का आनंद नहीं होगा; और मानवाधिकारों का सम्मान किए बिना हम न तो सुरक्षा का सुख भोग सकते हैं, न ही विकास का.

कोफी अन्नान

सरकार समाज का सबसे अनुत्पादक और खर्चीला, मगर अनिवार्य कर्म है. मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता इसके कार्यक्षेत्र को सीमित कर, कम खर्चीला बना सकती है. इसलिए कि ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां एक सभ्य व्यक्ति को, यदि वह सभ्यता का मतलब कर्तव्यपरायणता से लेता है, यदि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है तथा अपने कार्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, तो उसको सरकार की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. कहने की आवश्यकता नहीं कि समाज में अधिकांश व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, जो बस अपने काम से काम रखते हैं. सरकार के होने या न होने से उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता. ऐसे लोग अपने जीवन को शांतिपूर्वक जीना चाहते हैं और वे जीने की भरसक कोशिश भी करते हैं. थोड़ेबहुत विक्षोभ को जो परिस्थितिगत प्रभावों के कारण उनके जीवन को प्रभावित करने आ धमकता है, नजरंदाज कर वे अपने जीवन में रमे रहना चाहते हैं. सरकार कैसी है, किस दल की है. उसकी मूल सैद्धांतिकी तथा विकास को लेकर नीतियां कौनसी हैं, आदि बातों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. सही मायने में ऐसे लोग सरकार की जरूरत होते हैं. हर चौथे या पांचवे वर्ष मतदान के बहाने ऐसे लोगों की सहानुभूति अर्जित करने के लिए सरकार को उनके दरवाजे पर जाना ही पड़ता है. उनपर एक विद्वान की उक्ति सटीक बैठती है. उसने कहा था—‘दुनिया के सारे के सारे कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि एक भले आदमी को उनकी जरूरत नहीं पड़ती और जो बुरे हैं जिन्हें ऐसे कानूनों की जरूरत है, वे ऐसे कानूनों की परवाह नहीं करते. सरकार के साथ भी यही स्थिति है. ऐसे बहुत से लोग हैं जिनका काम उसके बिना भलीभांति चलता रहता है. किसी गांव के आदमी से पता कीजिए कि इस देश का प्रधानमंत्री कौन है? संभव है वह चुप्पी साध ले. उसे मालूम ही न हो. इसका उसे कोई मलाल भी नहीं होगा. हालांकि व्यक्तियों के संपर्क के मामले में वह किसी भी शहरी को पछाड़ सकता है. साफ है, आम आदमी सरकार के मुखिया का नाम भले न जाने, परंतु वह न केवल अपने गांव, बल्कि आसपास के अनेक गांवों के लोगों के नाम, मौसम, फसल, पशुपक्षी, व्रतत्योहार आदि के बारे में बता सकता है, जिसमें पढ़ेलिखे लोग पिछड़ सकते हैं. उनकी निगाह में उसके व्यावहारिक ज्ञान का, उस ज्ञान का उसके स्थानीय स्रोतों का परिचय दे, कोई महत्त्व नहीं होता. इसलिए वे उसे अज्ञानी कहकर मन को तसल्ली दे लेते हैं. कारण साफ है—हम सूचना को ज्ञान समझते हैं. और मनोरंजन के अवसरों को छोड़कर प्रायः उन्हीं सूचनाओं को महत्त्व देते हैं, जिनका बाजार या उत्पादकता से कोई संबंध हो, जो हमें किसी न किसी प्रकार लाभ पहुंचाने वाली हो. अगर कोई हमसे पूछे कि गेहूं की बुबाई कब की जाती है? ईख का बीज कैसा होता है? पशुओं की मुख्य बीमारियां क्या हैं, तो अधिकांश बगलें झांकने लगंेगी. पर किसी गांव वाले से पूछ लीजिए, खेती से कोई वास्ता न रखने वाला भी ऐसे सवालों को चलतेचलते बूझ देगा. पर हम उसके सवालों को महत्त्व नहीं देते. हम सूचनाओं को महत्त्व देते हैं. सरकार खुद सूचनाओं के दम पर चलती है. इसलिए सरकार सूचना को ज्ञान की अहमियत भी देती है. जबकि सूचना ज्ञान का उपकरण है. वह स्वयं ज्ञान नहीं है. ज्ञान अपने आप में जटिल संकल्पना है. जब हम किसी वस्तु के बारे में ज्ञान का दावा करते हैं तो हमारा आशय होता है कि हमें उस वस्तु के उस पक्ष की जानकारी है, जो केवल सूचनाओं तक सीमित नहीं है. सरकार के जितने भी नेता या अधिकारी हैं, सब सूचनाएं बटोरने में लगे रहते हैं. इनमें नेताओं को सूचना बनाने और अधिकारियों को सूचनाएं बटोरने वाली मशीन कह सकते हैं. दूसरे शब्दों में अधिकारीगण नेताओं और पूंजीपतियों द्वारा बोई गई सूचनाओं की फसल काटते रहते हैं.

आप कहेंगे कि यह कैसी उलटबांसी है! आदमी ने सभ्यता के क्रम में ही सरकार बनाना सीखा है. आज का जीवन कितना व्यवस्थित है….दोषी को सजा दिलाने के लिए कानून है. अपराध रोकने के लिए पुलिस. सरकार न हो तो अस्पताल, यातायात, बिजली और पानी की आपूर्ति आदि सब धराशायी हो जाएं. हो सकता है कुछ अर्थों में उनका यह कहना सही हो. हमने देखा है ऐसे मामलों में सरकार की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण होती है. आज किसी एक प्रांत में अनाज की कमी पड़े तो सरकार तत्काल देश के दूसरे रास्तों से विदेश से जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था करती है. बीमारों की देखभाल के लिए अस्पताल हैं. यातायात को सुगम बनाने के लिए सड़कें और शिक्षा के लिए बेहतर सुविधाएं हैं. सरकार न हो तो इनकी कौन देखभाल करे. लेकिन ऊपर दिए गई सुविधाओं, शिक्षा, यातायात, स्वास्थ्य आदि में से कुछ भी ऐसी नहीं है जिसके लिए केवल सरकार पर निर्भर रहा जाए. बल्कि सरकार स्वयं इनके लिए निजी संस्थाओं पर रहने की वकालत करने लगी है. बड़े शहरों में शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात तो पहले ही निजी संस्थानों के हवाले था, अब सफाई, बिजली सप्लाई जैसे कार्य भी जो रोजगार सृजन के बड़े आधार थे, निजी संस्थानों को सौंपे जाने लगे हैं. जहां तक कानून और पुलिस प्रशासन की बात है, सरकार द्वारा दी जाने वाली ये व्यवस्थाएं इतनी लचर हैं कि कुछ पूछो मत. पुलिस की हालत इतनी गई बीती है कि लोग सिपाही को ‘वर्दी वाला गुंडा’ तक कह देते हैं. ऐसे माहौल में काम करते हुए पुलिस कर्मचारी अपना आत्मबल इतना गंवा चुका होता है कि इसका विरोध तक नहीं कर पाता. अस्पतालों का यही हाल है. यही हाल शिक्षा का भी है. सरकार नौकरी होने का रौब भले हो, परंतु आम धारणा यही है कि जिन सेवाओं से सरकार के होने का औचित्य सिद्ध होता है, उन्हें प्रदान करने में सरकार पूरी तरह नाकाम सिद्ध होती है. आदमी ही क्यों, सरकार का भी अपने सुरक्षातंत्र से भरोसा उठ गया लगता है. नहीं तो रेलवेस्टेशन पर जाकर सरकार की उद्घोषणाएं सुन लीजिए. चौबीसों घंटे माइक पर यही सुनाई देगा—‘लावारिस वस्तुओं को न छुएं….अपने आसपास अच्छी तरह देखें. अनजान वस्तु बम हो सकती है.’ यानी सरकार सुरक्षा जैसा काम भी ढंग से नहीं कर पाती. फिर भी सरकार का होना हमें अपरिहार्य लगता है. सरकार के बगैर भी समाज चल सकता है, इस बारे में सोच भी नहीं पाते. कारण साफ है, हम अपना नागरिक धर्म भूल चूके हैं. सब कुछ सरकार भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाना चाहते हैं. पड़ोसी भूखा रहे, हमारी नींद खराब नहीं होती. उसपर कोई संकट आन पड़े तो हम पुलिस को फोन कर अपने नागरिक कर्म की इतिश्री कर देते हैं. परंतु अब संबंध औपचारिक हो चुके हैं. पहले यह केवल शहरों तक सीमित था. अब कस्बों और गांवों में भी शहर की यह बीमारी प्रवेश कर चुकी है. आप कहेंगे कि इसमें सरकार क्या कर सकती है? मैं कहूंगा कि यदि नहीं कर सकती तो उसकी जरूरत ही क्या है? शिक्षा, बिजली, पानी, यातायात, स्वास्थ्य, सुरक्षा जिनके होने से कभी सरकार का होना सिद्ध होता था या जो कल्याण सरकार की प्रतिनिधि जनसेवाएं कही जाती थीं, उन सबसे तो सरकार एकएक कर पल्ला झाड़ चुकी है. जो शेष हैं उन्हें भी जिम्मेदारी से पीछे हटती जा रही है. सारे काम निजी सेवाएं निजी कंपनियों के हवाले करती जा रही है. फिर सरकार के बने रहने का औचित्य? ऐसा कौनसा कार्य शेष है जो सरकार के होने को सार्थक बनाए.

सरकार के पक्ष में आपसे कुछ तर्क दिलवाकर मैं उसको अपरिहार्य नहीं बनाना चाहता. मैं चाहता हूं कि आप स्वयं मान लें कि आपको सरकार की जरूरत नहीं है. जिन कार्यों के लिए आप अभी तक सरकार पर निर्भर रहते आए थे, वे दरअसल सरकार के थे ही नहीं. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए सरकार ने आपसे हथिया लिए थे. जब तक आपको शासित होने की आदत नहीं थी. अपनी जिम्मेदारियों को दूसरों पर डाल देना आपका स्वभाव नहीं था, उस समय तक सरकार आपकी अपनी होने का एहसास दिलाती थी. आपकी सहानुभूति अर्जित करना चाहती थी. परंतु जैसे ही सरकार आपकी जरूरत बनी, जिस दिन से आपने यह मानना आरंभ किया कि फलांफलां काम सरकार के हैं, उन्हें सरकार को ही करना चाहिए. नागरिक होने के नाते मैं भला क्या कर सकता हूं! उसी दिन से सरकार ने अपनी ताकत को पहचानना आरंभ कर दिया. यानी सरकार को जो ताकत मिलती है, उसका जो भारीभरकम लावलश्कर तैयार होता है, वह नागरिकों की कमजोरी या अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता से मिलता है. अधिकारों के प्रति चेतना के अभाव से, जंनतंत्र की कमजोरी से भी मिलता है. एक जागरूक समाज सरकार के बिना भी रह सकता है. समाज यदि आपसी तालमेल बनाने में कामयाब सिद्ध होता है. यदि वह अपने अधिकारों के साथसाथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक है? तो उसको सरकार की जरूरत ही नहीं रह जाती. और सरकार का काम भी यही है कि वह लोगों के आत्मविश्वास को वापस लाए, उन्हें उनके अधिकारों से परचाए और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करे. ताकि वे अपनी चुनौतियों से स्वयं निपट सकें. जो काम राजनीतिक संस्थाएं करती हैं, उनमें से अधिकांश को सामाजिक संस्थाओं से कराए, जो कम खर्चीली और ज्यादा जबावदेह होती हैं. यदि सरकार का काम यही सब है तो वह सामाजिकता को बनाए रखने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाती. ऐसे सवालों पर सरकार अकसर यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि यह करने से लोगों की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप होगा. अगर सरकार परस्पर तालमेल बनाए रखना अपना कर्तव्य मानती है तो यह बुरी बात नहीं. पर सरकार का यह कार्य प्रायः अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए दिया करती है.

अब यह जान लिया जाए कि सरकार किसकी जरूरत है? सामान्यतः यही माना जाता है कि सरकार समाज की जरूरत है. चूंकि समाज अपने नागरिकों के योग से मिलकर बनता है इसलिए सरकार को नागरिकों की जरूरत कहकर प्रचारित किया जाता है. कम से कम जो लोग सरकार में हैं, वे तो यही कहकर अपना औचित्य सिद्ध करते हैं. हालांकि उनका यह दावा यथार्थ से एकदम परे है. सरकार चाहे कितनी ही उदार क्यों न हो, वह कुछ न कुछ तो शासन करती ही है. यह शासन कहीं न कहीं नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर होता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि नागरिकगण स्वयं अपनी स्वतंत्रता का बोझ नहीं संभाल पाते, इसलिए वे सरकार के गठन को बाध्य हो जाते हैं? यदि इसे सच मान लिया जाए तो इसका अगला निष्कर्ष यह होगा कि मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का सबसे बड़ा दुश्मन स्वयं होता है. अपनी स्वतंत्रता वह बड़ी आसानी से समाज के प्रभुवर्ग के हाथों में सौंपकर निश्चिंत हो जाता है और अपना जीवन ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ कहते हुए बिताता है. ऐसी अवश्था में मानवाधिकार और व्यक्तिस्वातंत्र्य अर्थहीन होकर रह जाता है. एक सोये हुए समाज के लिए क्रांति के कोई मायने नहीं होते. बड़ीबड़ी क्रांतियां उसके आसपास से होकर गुजर जाती हैं और उसे पता तक नहीं चलता. भारतीय समाज के बारे में ऐसा हुआ है. पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में जब पश्चिमी जगत वैज्ञानिक क्रांति से गुजर रहा था, तब हमारे भक्तकवि प्रभुभक्ति में आत्मलीन नजर आ रहे थे. दलित और पिछड़े वर्ग से आए भक्त कवियों के लिए जातीय उत्पीड़न के सवाल तो थे, मगर आर्थिक असमानता जैसा कोई मुद्दा उनके आगे नहीं था. वे संतोष धन को ही सबसे बड़ा धन मानकर उसका गुणगान करने में लगे हुए थे. ‘सूखीसूखी खाय के ठंडा पानी पीव’ को ही सत्कर्म माने हुए थे. गरीबी उनकी ठसक थी. अगर कहीं से धन हासिल हो जाए उसे फेंक दिया करते थे. बस चले तो दानदाता को दुत्कार भी देते थे. दूसरी ओर शीर्षस्थ वर्ग ‘भूखे भजन न होय गोपाला’ कहकर कंगाली में भगवान को भी अंगूठा दिखाने को तत्पर रहता था. एक वर्ग दैन्य को अपना जीवन मान चुका था, दूसरे को उसका कोई अभ्यास नहीं था. धर्म एक के लिए अपने दैन्य से समझौते का नाम था, दूसरे के लिए अपनी सत्ता को बनाए रखने की रणनीति. उन्हें न तो मनुष्य के अधिकार याद थे, न ही संस्कृतिबोध था. उनका न तो बीता कल था, न ही आनेवाला कल. केवल गयागुजरा वर्तमान था, जिसे वे जैसेतैसे गुजार देना चाहते थे.

था॓मस पेन ने कहा है व्यक्ति समाज या राज्य में अपनी स्वतंत्रता को गंवाने के लिए सम्मिलित नहीं होता. बल्कि इसलिए सम्मिलित होता है कि वह अपनी स्वतंत्रता के साथसाथ उन सुखों का भी भोग कर सके, जिन्हें वह मानवीय सीमाओं के चलते स्वयं अर्जित करने में अक्षम है. बदले में वह जो स्वयं उत्पादन करता है, उसका एक हिस्सा दूसरों को देता है. समाज और व्यक्ति के संबंधों के गठन का मुख्याधार यही है. जबकि वह वर्ग समाज के बीच रहकर भी असुरक्षित और उत्पीडि़त था. उसका जीवन अपने लिए नहीं, दूसरों के सुखों में वृद्धि करने के लिए था. असमानताकारी व्यवस्था, सामंतवाद के लक्षणों को वह अपने जीवन में पूरी तरह आत्मसात् कर चुका था और उसी को अपना गौरव मानता था. इसी भावना के चलते पन्ना धाय हत्यारे के आगे राजा के बेटे की सुरक्षा करने के लिए अपने बेटे को आगे कर खुद को धन्य मान लेती है. प्रत्येक जीव में एक ही परमात्मा को मानने वाली, आत्माआत्मा को बराबर मानने वाली व्यवस्था पन्ना के कृत्य की आलोचना नहीं करती, बल्कि महिमामंडन करती है. जबकि सत्ताओं को बचाने के लिए जनसाधारण ऐसे ही बलि का बकरा बनते रहे. सामंतवाद की यह पराकाष्ठा कथित भगवान हाथों प्राप्त मौत के बाद मोक्ष मिलने के पाखंड में दिखाई पड़ती है. आततायी सत्ताओं के आतंक से मुक्ति, उनकी अनिवार्यता के एहसास से मुक्ति के लिए इन सांस्कृतिक अज्ञानताओं से बाहर आना जरूरी है.

लोग कहेंगे कि सरकार न होगी तो कानून कौन बनाएगा? न्यायालयों का संचालन कौन करेगा? सेना और पुलिस बल किसके अधीन रहेंगे? अपराधी तत्व सिर उठाने लगेंगे. कानून का डर ही तो अपराधियों की नाक में नकेल डाले रखता है. ऐसा करते समय हम यह तथ्य बिलकुल भुला देते हैं कि अपराध का अनुपात आज पिछले जमाने की अपेक्षा कहीं अधिक है. हमारी जेलें अपराधियों से भरी पड़ी हैं. अदालतों के पास इतने मुकदमे हैं कि सुनवाई का समय निकाल ही नहीं पातीं. एकएक मुकदमे की सुनवाई में वर्षों निकल जाते हैं. भारत सरकार के एक मंत्री की हत्या के एक मुकदमे का फैसला हाल ही में, चालीस वर्ष बाद आया है. इतने लबें अर्से तक टलने के बाद न्याय का कोई औचित्य रह ही नहीं जाता. यह काम लोकतंत्र के नाम पर, अभियुक्त पक्ष को बचाव का पूरा अवसर देने के नाम पर किया जाता है. अभियुक्त को सफाई का पूरा अवसर मिले, यह उसका अधिकार है. लेकिन इस बहाने न्याय केवल मजाक बनकर रह जाए, यह और भी बड़ी विडंबना होगी. ध्यान रहे यह स्थिति तब है जब पुलिस आधे से अधिक मुकदमे दायर ही नहीं करती. अगर पुलिस सारे के सारे केस दायर करने लगे तो आदमी को अपनी जिंदगी में, अदालतों की सुस्त रफ्तार के चलते, कभी न्याय मयस्सर न हो. यानी सरकार होने के एहसास, और इस बहाने अपराधियों थोड़ा भय होने के अलावा उसके रहने या न रहने से जनसाधारण को विशेष लाभ नहीं पहुंचा है.

कुछ लोग कहेंगे कि अपनी सरकार होने से सबको बोलने की समान आजादी है. अभिव्यक्ति का आनंद. जिसे यह सुविधा प्राप्त नहीं, उससे पूछिए. यह मनुष्यता की गरिमा का प्रमाण है. सच में मनुष्य को मनुष्य होने जैसा एहसास कराता है. सवाल है कि अभिव्यक्ति की आजादी जैसे सवाल जन्मे ही क्यों? क्यों यह स्थिति आन पड़ी कि लोगों की अभिव्यक्ति पर भी बंदिशें थोपी जाने लगीं. यदि सभी मनुष्य बराबर हैं, प्रकृति ने सभी को समान विशेषताएं दी हैं तो वे कौन लोग थे, जिन्होंने लोगों की अभिव्यक्ति पर बंदिश लगाने की शुरुआत की. जाहिर है वे सत्ताओं पर अनाधिकृत कब्जा जमाने वाले लोग रहे होंगे. उन्होंने पहले एक वर्ग के पढ़नेलिखने पर पाबंदी लगाई. जिन शास्त्रों के माध्यम से शासन चलाया जाता था, जिनको दैवी मानकर बातबात पर दुहाई दी जाती थी, उन्हें पढ़ना इतना बड़ा अपराध हो गया कि कान में पिघला सीसा डालने तक की सजाएं दी जाने लगीं. वह वर्ग जानता था कि जो सत्ता वह चला रहा है, वह दूसरे वर्ग की मूक सहमति पर ही टिकी है. यदि उसकी कमजोरियां सामने आने लगें तो लोग जो संख्या में कहीं अधिक हैं, जिनकी सम्मिलित शक्ति किसी भी राज्य की शक्ति से कहीं अधिक है, बल्कि राज्य को उसकी शक्तियां ही उसके समर्थन से प्राप्त हैं, वे अपनी शक्ति का एहसास कर अल्पसंख्यक सत्ताधारियों को एक झटके में उखाड़ फेंकेंगे. इसलिए उसने लोगों से बोलने का अधिकार ही छीन लिया. वेदों को विमर्श से बाहर निकालकर आप्तग्रंथ बना दिया गया. ताकि उनकी समीक्षा, उनमें दर्ज सामग्री पर संवाद ही न हो सके. वेदों से हुई शुरुआत दूसरे ग्रंथों तक भी पहुंची. अब यदि लोगों को अपने अतीत का स्मरण न हो, तो उससे संवाद करने का सलीका कहां से लाएंगे. और उसपर संदेह न करें तो सांस्कृतिक विकास कैसे होगा. इसलिए पहले सांस्कृतिक दासता की शुरुआत हुई. जिसे बहुत जल्दी राजनीतिक और सामाजिक दासता का रूप दे दिया गया. मानवाधिकार मनुष्य को उस दासता से उबारने की कोशिश हैं, जो सांस्कृतिक गुलामी के कारण जन्मी है. अभिव्यक्ति की आजादी, जो मनुष्य का मौलिक अधिकार है, बंद गुंबद में रोशनदान की तरह है. जिसके माध्यम से गुंबद में रह रहे लोग इंसान होने के एहसास को बचाए रख सकते हैं.

सरकार के होने से हम सब इतने अनुकूलित हैं कि असरकार होने के डर से ही लगता है सबकुछ बिखर जाएगा. इसलिए जब भी चर्चा होती है, सब असरदार सरकार की मांग करने लगते हैं. ‘सरकार’ समाज के बारे में सोचते हुए भी घबराते हैं. और सरकार है कि उसमें बैठे लोग केवल उतनी ही आजादी लोगों को देना चाहते हैं, जितनी से उनकी सत्ता बनी रहे. आखिर कुछ ऐसे लोग भी चाहिए जिनके माध्यम से अभिजातपन को दर्शाया जा सके. लोग इस बनावटी विभाजन को अकाट्य सच मान लेते हैं, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे वरदान भी उसका भला नहीं कर पाते. यूं भी ऐसी आजादी का कोई अभिप्राय नहीं जिसका लोग लाभ न उठा सकें. क्योंकि जिन लोगों ने अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन किया, वे अभिव्यक्ति को कुंद करने का माध्यम भी ले आए. देखते ही देखते ज्ञान को सूचनाओं में बदल दिया गया. परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ आधार पर ली जाने लगीं. स्मृति को कुंद करने के लिए मोबाइल आया. भाषा को कुंद करने के लिए एसएमएस, और सस्ते मनोरंजन को बढ़ावा देने के लिए वाटअप. विकास का अभिप्राय साफसुथरी सड़क और नागरिक सुविधाओं तक सिमट गया. घर के भीतर मनुष्य कैसा जीवन जीता है, उसकी रसोई में पक रहा भोजन पौष्टिक हैं भी या नहीं—इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं रही. जब अभिव्यक्ति कला का बोध ही न हो तो अभिव्यक्ति ही आजादी का मतलब क्या! अभिव्यक्ति की अधकचरी कला प्रदूषित अभिव्यक्ति के मायने ही बदल देती है.ऐसे लोगों को मतदान के बहाने आसानी से फुसला जा सकता है. धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के प्रलोभन उसको मूल मुद्दों से भटकाए रहते हैं. लोगों का अभिव्यक्ति का अधिकार सुरक्षित रहे, जरूरी है. पर उतना ही जरूरी है अभिव्यक्ति कला का परिमार्जन. जिसकी समझ इतिहास, संस्कृति और ज्ञान के अधुनातन रूपों को समझे बिना असंभव है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आधुनिक कानून की विशेषता माना जाता है. नवसभ्यता का प्रतीक. यहां सरकार का आशय हर उस वर्ग से है जो शीर्ष पर विराजमान होकर दूसरों को निर्देश देता है. उसमें पक्ष और विपक्ष में मौजूद सभी नेता, अधिकारी आदि सम्मिलित हैं, जो उत्पादन में सीधे हिस्सा न लेकर समाज के दूसरे के श्रमकौशल पर निर्भर रहते हैं. समाज मुख्यतः शासक और शासित में बंटा होता है. सत्ता हमेशा शासकवर्ग के अधीन होती है, जो कभी पक्ष तो कभी विपक्ष में रहकर उसका लाभ उठाता है. अतएव अभिव्यक्ति की आजादी केवल सरकार के भरोसे संभव नहीं. सरकार अपने विरोध को विद्रोह की तरह लेती है. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जब अभिव्यक्ति के लिए सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा है. कुछ महीने पहले अरुंधति राय और बाद में प्रशांत भूषण ने सरकार की कश्मीरी नीति की आलोचना कर दी थी. सरकार तो चुप्पी साधे रही, लेकिन तथाकथित राष्ट्रवादियों को उनका बयान बेहद नागवार गुजरा था. जैसे अरुंधति और प्रशांत भूषण इतने शक्तिशाली हों कि उनके कहनेभर से कश्मीर पाकिस्तान के हाथों में चला जाएगा. इस पर वे लोग विशेष तौर पर नाराज थे, जो राष्ट्र को जड़ अवधारणा मानते हैं. यहां मामला अरुंधति राय या प्रशांत भूषण के अलगअलग बयानों के औचित्य का बिलकुल नहीं है. मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति ऐसे समाज के दृष्टिकोण का है, जो लोकतांत्रिक होने का दावा करता है और नियमित अंतराल के बाद अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनाता है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र प्राणवायु है. उसके न रहने से लोकतंत्र के निष्प्राण होने से कोई नहीं रोक सकता. लोकतांत्रिक समाजों से यह अपेक्षा तो की जाती ही है कि वे व्यक्ति के वाक् को नियंत्रण मुक्त रखें. मनुष्य यदि विवेकशील प्राणी है तो उसके विचारों का सम्मान होना चाहिए. किसी व्यक्ति की टिप्पणीमात्र से यदि किसी समाज की भावनाएं आहत होती हैं और वह उस व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही सवाल खड़े करने लगता है तो मानना चाहिए कि उस समाज ने खुद को लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप ढालने में अभी देर है. ऐसे समाज में लोकतांत्रिक पद्धति पर चुनी गई सरकारें भी किसी न किसी दृष्टि से कमजोर होंगी ही.

सरकार सभ्य समाज की अनिवार्य बुराई, एक खर्चीला आयोजन है. लेकिन सच यह भी है कि बिना सरकार के आधुनिक समाज का काम सधने वाला नहीं है. इसलिए कि नहीं कि सरकार समाज की अपरिहार्यता है. बल्कि इसलिए कि समाजों में जिस तरह नागरिकताबोध का तेजी से पतन हुआ है, जिस तरह से लोग एकदूसरे की ओर संदेह से देखने लगे हैं, सार्वजनिक जीवन जिस तरह अविश्वास ने जगह घेर ली और विकास के नाम पर जो सैंकड़ों किस्म की संस्थाएं खड़ी की गई हैं, उन पर नियंत्रण और तालमेल बनाए रखने के लिए एक बड़ी संस्था की जरूरत है. सामंतवादी व्यवस्था में शीर्षस्थ वर्ग न केवल संसाधनों को कब्जाए रहता है, बल्कि लोगों के दिलों पर भी अधिकार कर लेता है. वे मन और विचारों से पंगु हो जाते हैं. दूसरों का हित तो दूर वे अपने हितानुकूल निर्णय कर पाने में भी असमर्थ होते हैं. ऐसे लोग केवल सिर झुकाकर आदेश मानने को बाध्य होते हैं. यानी लोगों की शासित होने की इच्छा ने सरकार को अपरिहार्य बनाया है. उन लोगों ने बनाया है जो छोटीछोटी बातों के लिए सरकार का मुंह देखते रखते हैं. जो अपने दरवाजे के ठीक सामने बने गड्ढे को भरने से इसलिए मुंह मोड़ लेते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि वह जमीन नगर पालिका की है. जैसे नगरपालिका उनकी अपनी संस्था न होकर ऊपर से थोपी गई संस्था हो. ऐसे लोग जो मामूली कार्यों के लिए भी सरकार का मुंह ताकते रहते हैं, वही उसकी उपस्थिति को अनिवार्य बनाते हैं. वरना बाहरी दुश्मनों से सुरक्षा और विदेशनीति के अलावा ऐसा कोई कारण नहीं है, जो सरकार के औचित्य की अनिवार्यता सिद्ध करता हो. आपाधापी के बीच लोग अपना धर्म भूल जाते हैं, व्यक्तिस्वातंत्र्य के वास्तविक अर्थ को भूल जाते हैं, यह भूल जाते हैं कि उनकी स्वतंत्रता या सुख पड़ोसी की स्वतंत्रता और सुख से अलग नहीं है, इसलिए वे सरकार नामक संस्था का औचित्य गढ़ते हैं. एकदूसरे को संदेह की निगाह से देखने के स्वभाव ने ही सरकार की अनिवार्यता सिद्ध की है.

विज्ञान और आधुनिक तकनीक ने व्यक्ति को जितना शक्तिशाली बनाया है, उससे लगता है कि उसके आगे कोई सीमा और मर्यादा है ही नहीं. मानवीकरण के नाम पर विकसित अनेक आधुनिक सुविधाएं अमानवीकरण की कोशिश करती नजर आती हैं. ऐसा नहीं है कि ऐसी तकनीक का कोई समाजार्थिक महत्त्व न हो. तकनीक ने मानवजीवन को सुविधामय बनाने के लिए अनेक विलक्षण काम किए हैं. उसके मनुष्यता पर अनेकानेक अहसान हैं. उसमें विपुल संभावनाएं हैं. इसलिए तकनीक के लोकहितकारी उपयोग पर जोर दिया जाना चाहिए. नई तकनीक की खोज भी आवश्यक है. लेकिन लेकिन तकनीक के विशुद्ध व्यावसायिक रूप ने मनुष्यता को नुकसान भी बहुत पहुंचाया है. इसलिए समय आ पहुंचा है कि हम अपने जीवन में तकनीक की सीमा निर्धारित करें. उसके उपयोग की दिशा पर नियंत्रण रखें. अपने वैज्ञानिकों और उत्पादकों को बताएं कि वे हमारे लिए नवीन तकनीक के किस प्रकल्प पर काम करें? उनके शोध की दिशा क्या हो? यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो एक जागरूक नागरिक और समाज के रूप में हम क्या कर सकते हैं, वह उन्हें समझाएं. यह कार्य सरकार को करना चाहिए. वह नहीं करती. या कर नहीं पाती. दरअसल सभ्यताकरण के नाम पर जो भारीभरकम तामझाम सरकार का बन चुका है, उसे चलाने कके लिए पैसा चाहिए. हर पांचवे वर्ष नेताओं को चुनाव में उतरना पड़ता है, उसके लिए पैसा चाहिए. और पैसा कमाने का सरकार की निगाह में सबसे आसान तरीका कराधान का है. जिसका बड़ा हिस्सा उद्यमियों और पूंजीपतियों की ओर से आता है. सरकार को पैसा चाहिए. उद्योगपतियों को मुनाफा. ऐसे में पूंजीपति यह शर्त थोपने में कामयाब हो जाते हैं कि पैसा चाहिए तो हमें निर्बंध काम करने की अनुमति दी जाए. यही होता है. सरकार एडम स्मिथ के ‘लेजेज फेयर’ का अनुसरण करने लगती है. बदले में पूंजीपतियों की ओर से पैसा आता है. हालांकि यह बड़ा भ्रम है. अपनी स्थिति और पहुंच का लाभ उठाते हुए पूंजीपति केवल उसका श्रेय ले जाता है. सच तो यह है कि सरकार के साथसाथ पूंजीपति का खजाना भी जनता की खूनपसीने की कमाई से भरता है. बहरहाल, सरकार को अपने समर्थन में देख पूंजीपति और पैसा कमाना चाहते हैं. उनकी सहूलियत के लिए सरकार कुछ ऐसी नई संस्थाओं का गठन करती है, जिससे उनकी राह आसान हो सके. परिणामस्वरूप पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ता है और वे फिर नई शर्तें थोपने, कुछ और आजादी की मांग करने लग जाते हैं. धीरेधीरे जो संस्थाएं सरकार ने खड़ी की थीं, वे पूंजीपतियों का मुनाफा कमाने का माध्यम बन जाती है. जैसे कि शिक्षा मनुष्य का मौलिक अधिकार है. इसलिए वह सभी को बराबर, एक समान मिलनी चाहिए. लेकिन हालात ऐसे नहीं हैं. प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में ही एक ओर ऐसी पाठशालाएं हैं, जहां बिछाने के लिए टाट तक नहीं हैं. दूसरी ओर वातानुकूलित कमरों से बने, आलीशान कान्वेंट स्कूल हैं. यह विषमता सड़क, यातायात, मनोरंजन हर जगह देखी जा सकती है. यहां तक कि अदालतें भी पीछे नहीं हैं. पूंजीपतियों के समर्थन और पैसे बनी सरकार को उन्हें मनमर्जी करने की छूट देनी ही पड़ती है. अब पूंजीपति हैं तो किसी एक तकनीक से भला क्यों संतुष्ट होंगे. वे हर उस क्षेत्र पर छा जाना चाहते हैं, जहां से उन्हें मुनाफे की उम्मीद हो. उनका बस चले तो आदमी सांसों का व्यापार भी करने लगें. असल में तो वे ऐसा करते भी हैं. अत्याधुनिक पूंजी के दम पर बने अस्पतालों को देख लीजिए. वहां ऐसा ही होता है. जिसके पास खर्च करने को है. एक साथ कई डा॓क्टर उसकी सांसों की गिनते करने में जुटे रहते हैं. ऐसी जिंदगियां जो सांसों की कीमत का भुगतान करने में नाकाम हैं, वे अस्पताल के बाहर भीड़ भरे चौराहों पर दम तोड़ लेती हैं. बाजार में बढ़ रही सुविधाओं तथा उन्हें एक झटके में बटोर लेने की चाहत ने आदमी को संवेदनहीन बनाया है. मानवकल्याण से जुड़ा प्रत्येक क्षेत्र जो कहीं न कहीं मानवाधिकार का मसला भी है, कई खानों में बंटा हुआ है. यदि गौर देखा जाए तो वे सब पूंजीपतियों के मुनाफा कमाने के रास्ते हैं. सरकार की मजबूरी है कि लोकतंत्र के कारण उसे जनता पर निर्भर रहना पड़ता है. विकास का दिखावा करना पड़ता है. इसलिए वह जबतब लोककल्याण कार्यक्रमों का दिखावा करती रहती है. मगर हालात में वास्तविक परिवर्तन हो नहीं पाता. सरकार संवेदनहीनता को बनाए रखने का भी कोई प्रयास नहीं कर पाती. वह आदमी को निस्संवेद भीड़ में बदलने के लिए प्रयासरत होती है.

इन कमजोरियों के बावजूद सरकार यदि जरूरी है तो सोचना होगा कि कौनसी सरकारें ज्यादा हितकारी है. वे कौनसी सरकार हैं, जिनके रहते मनुष्य अधिकतम स्वतंत्रता, सुख और सुरक्षा की प्राप्ति कर सकता है? सभ्यता के आरंभ से लेकर आज तक सरकार के अनेक रूप अपनाए जा चुके हैं. ऐसा दौर भी देखा गया है कि जब एक ही युग में विभिन्न देशों में सरकार के अलगअलग रूप रहे हैं. कुछ देशों में मिश्रित सरकार के प्रयोग हुए. लेकिन वह नाकाम सिद्ध हुए. सरकार की यानी अच्छी सरकार के बारे में कहा गया है कि सरकार जो कम से कम शासन करे. इसका एक अर्थ यह भी है कि सर्वोत्तम सरकार न्यूनतम शासन करती है. वह शासन करने जैसी स्थिति बनने नहीं देती. अपने आचरण की नैतिकता का उदाहरण पेश कर वह अपने नागरिकों का नैतिक स्तर इतना ऊपर उठा देती है कि उन्हें किसी बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. पर न्यूनतम शासन कह देना आसान है, उस स्थिति को प्राप्त करना बहुत ही कठिन. आखिर सत्ता और संपत्ति को नापसंद कौन करता है. समाज में होड़ मची हो तो आगे निकलकर दूसरों से विशिष्ट दिखने के लिए सत्ता और संपत्ति दोनों की प्रमुख भूमिका होती है. दरअसल हमारी यह मानसिकता दर्शाती है कि हम अच्छी सरकार चाहते ही नहीं हैं. हमारा खुद से मनुष्यता से विश्वास उठ चुका है. हम सुधार की उम्मीद छोड़ चुके हैं. और अब हालात यह हैं कि हमारा आलस्य और लापरवाही हम पर भारी पड़ने लगी है. इसलिए चुनावों के बाद हमारे यहां चेहरे बदलते हैं. कभीकभी पुराने चेहरे ही मुखौटा लगाकर हाजिर हो जाते हैं. वास्तविक सत्ता परिवर्तन कभी हो नहीं पाता. फिर भी यदि इस सत्य को हम समझने लगे हैं, यदि हम जानने लगे हैं कि लोकतंत्र को भीड़तंत्र या कुलीनतंत्र में बदलत़े हुए देखने के लिए हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं, तो भूलसुधार जैसी कोशिश की जा सकती है. की जानी चाहिए.

यदि हम इस सत्य को जानने लगे हैं कि अच्छी सरकार वह है जो कम से कम शासन करती है, तो इसका सीधासा अभिप्राय है कि अच्छी सरकार वह है जो अपने नागरिकों को स्वयं शासित बनाने, आत्मानुशासन में ढालने का संकल्प धारण कर चुप नहीं बैठ जाती. बल्कि निरंतर प्रयासरत रहती है. वह जानती है कि यदि नागरिक आत्मानुशासित होंगे तो उन्हें किसी प्रकार के बाह्यानुशासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. लेकिन यह अनुशासन पीटी के अध्यापक द्वारा अनुशासन शब्द बोलना और भागीदारों का एक खास मुद्रा में आ जाना नहीं है. अनुशासन शब्द व्यापक है. वह मर्यादित भोग और संतुलित वितरण में सहयोग तक जाता है. यह आत्मसम्मान के साथ दूसरे के मान को सुरक्षित बनाए रखने का मामला भी है. यह जियो और जीने दो की भावना है. यह कोई नई समस्या नहीं है. मनुष्य इस समस्या से शताब्दियों से जूझता आया है. सफलता भी मिली है. परंतु तभी तक जब तक इंसान खुद जागरूक रहा है, जब तक उसने अपना नियंता स्वयं को माना है. जैसे ही वह लापरवाह हुआ, मानसिक और शारीरिक आलस्य ने उसे घेरा है—सत्ताओं पर स्वार्थी वर्गों के सवार होते देर नहीं लगी है. जब सरकार का वर्तमान स्वरूप नहीं था, सोचा गया था कि धर्म की सहायता से लोगों को पारलौकिक सत्ता का डर दिखाकर अनुशासन में रखा जाए. अतिरिक्त धनसंपदा मनुष्य के मन में लालच बढ़ाती है, इसलिए अपरिग्रह, अस्तेय, संतोष आदि को प्रत्येक धर्म ने अपना ध्येय माना. धर्म के साथ दूसरे नैतिक मूल्य भी जोड़े गए. फलस्वरूप धर्म शताब्दियों तक मनुष्य का नैतिक और सामाजिक मार्गदर्शक बना रहा. आदमी थोड़ा निश्चिंत हुआ तो धर्म के नाम पर धड़े बनने लगे. मंदिरों में सोने की मूर्तियां आकर सजने लगीं. और जिस व्यक्ति को मानव समाज ने अपना राजा बनाया था, वह स्वयं को ईश्वरीय प्रतिनिधि बताकर अपने लिए विशिष्ट अधिकारों की मांग करने लगा. ऐसे में व्यवस्था का लंबे समय तक टिके रहना और निर्णायक प्रेरणा शक्ति बने रहना असंभव था. लेकिन मनुष्य के चेतने में देर हो चुकी थी. समाज तब तक आर्थिकसामाजिक आधार पर बंट चुका था. शासक और शासित संस्कृति का अंतर साफ नजर आने लगा था. चूंकि शासक वर्ग दूसरों से अधिक साधनसंपन्न था, तथा बाकी लोग आर्थिकराजनीतिक रूप से उसपर निर्भर थे, इसलिए उनसे प्रेरित होना, उनके आदेश को मानना उनकी विवशता थी. यानी धर्म जो स्वयं नैतिकता का प्रवत्र्तन करने निकला था, जिसने स्वयं को आचार संहिता गढ़ी थी, वह भ्रष्ट, स्वार्थी धर्माचारियों के कारण विचलन का शिकार होने लगा. धर्म की बढ़ती ताकत देख कालांतर में राजसत्ता को स्वयं उसके करीब आना पड़ा. राजनीतिकधार्मिक सत्ता के गठजोड़ ने आम आदमी की स्वाधीनता को धीरेधीरे छीनना आरंभ किया. अब वह धर्म और राजनीति के नाम पर नाटक करने लगा. इससे निपटने के प्रयास भी हुए. दरअसल धर्मसत्ता के प्रवत्र्तकों की नीति संकट के समय कछुए की भांति अपने शरीर को समेट लेने और अवसर मिलते ही बिच्छु की तरह झपटकर डंक मार देने की रही है. कहा जा सकता है कि धर्म की प्रवृत्ति जहां आत्म को मजबूत, सक्षम और सहृदय बनाने की होनी चाहिए, बजाय इसके उसने लोकपरलोक, पापपुण्य, स्वर्गनर्क जैसी निराधार संकल्पनाओं द्वारा मनुष्य को निरंतर कमजोर बनाया है.

सरकार जो कम से कम शासन कर सकती है, वही हो सकती है जो नागरिकों को विवेकवान बनने, उन्हें आपसी तालमेल और विश्वास द्वारा आगे बढ़ने का पूरापूरा अवसर देती हो. इसके लिए समाज में स्पर्धा का लोप आवश्यक है. यह तभी संभव है जब उत्पादन राज्य की जरूरत के आधार पर तय किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हों. इसके लिए समानता आधारित व्यवस्था चाहिए. यह सही है कि प्रत्येक मनुष्य की कुछ चारित्रिक भिन्नताएं होती हैं. यह संभव नहीं है कि प्रत्येक मनुष्य को एक ही ढांचे में ढाला जाए. विविधवर्णी समाज के लिए भी यह उचित भी नहीं है. लेकिन मनुष्य को यह तोष होना चाहिए कि उसने जो काम किया है, उसका प्रतिफल उसको प्राप्त हो चुका है. साथसाथ यह विश्वास भी जरूरी है कि आगे जो भी कामना करता है, उसको न्यायपूर्ण रास्ते पर चलकर पाया जा सकता है. इस कार्य में समाज उसका प्रतिद्विंद्वी न होकर सहयोगी है. दूसरे शब्दों में मनुष्य का अपनी समाजव्यवस्था पर भरोसा होना अनिवार्य है. यदि ऐसा न हो वह उन रास्तों का अनुसरण करने की सोचेगा, जो समाज के वृहद हितों को नुकसान पहुंचाने वाले हों.

अब जरा आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली पर भी विचार करके देखा जाए. यह माना जाने लगा है कि लोकतांत्रिक समाजवाद शासन की सर्वोत्तम प्रणाली है. फुकोयामा जैसे चिंतक मानते है कि यह मानवीय मेधा का चरम है. इसके बाद इतिहास का अंत स्वाभाविक है. इसलिए वे विचारधारा के अंत की घोषणा भी करने लगे हैं. यह बुद्धिजीवी हताशा की घोषणा है. एक तरह से ये उस बाजारवादी मानसिकता को संतुष्ट करते हैं, जो निद्र्वंद्व उपभोग के लिए मनुष्य को विचार से एकदम काट देना चाहते हैं. करीब डेढ़ शताब्दी पहले नीत्शे ने भी ईश्वर के अंत की घोषणा की थी—‘ईश्वर मर चुका है, हमने उसकी हत्या की है.’—नीत्शे ने जिन दिनों यह कहा, वह विकृत पूंजीवाद का युग था. जिसके विरोध में दुनियाभर में बौद्धिक आंदोलन खड़े हो रहे थे. नीत्शे ने शायद सोचा था कि उत्पादन व्यवस्था की क्रांति मनुष्य के चिंतनस्तर में वास्तविक सुधार करेगी. फलस्वरूप वह धर्म, संप्रदाय जैसे प्रलोभनों तथा तज्जनित भीरूताओं के चंगुल से बाहर आने में सक्षम होगा. मगर हुआ बिलकुल उल्टा. जिस धर्म से पूंजीवाद को खतरा महसूस होता था, जिसे वह अपने अबाध विस्तार में सबसे बड़ा रोड़ा मानता था, पूंजीवाद के विरुद्ध विचारकों की लड़ाई में वही सबसे ज्यादा सहायक सिद्ध हुआ. लेकिन भारत में तथा अन्य देशों में लोकतंत्र के नाम पर जो क्षेत्रीयतावाद, जातिवाद, भाषासंस्कृति, धर्म आदि का विभेदकारी खेल खेला जाता है, क्या वह उचित है? जो लोकतंत्र अपने विरोध को आत्मसात करने सामथ्र्य खो बैठा हो, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संसद के गलियारों से बाहर जाते ही दम तोड़ देता हो, क्या वह देश सही अर्थ में लोकतंत्र कहा जा सकता है? जिस देश का मीडिया पूंजीपतियों के हितों का संरक्षक हो, उन्हीं की भाषा बोलता हो. उन्हीं के समर्थन में दिनरात काम करता हो, वहां निष्पक्ष प्रेस से क्या कोई उम्मीद की जा सकती है? दरअसल लोकतंत्र एक चेतन समाज की अभिव्यक्ति है. यदि समाज में पर्याप्त लोकतांत्रिक चेतना हो, तो राजनीति हो या प्रेस, सचाई से विचलन आसान नहीं रह जाता. लोकतंत्र की कमजोरी यह है कि वह व्यक्ति को राजनीतिक अधिकार तो देता है, किंतु उन्हें समानता के स्तर पर लाने का कार्य नागरिकों के भरोसे छोड़ देता है. पर्याप्त नागरिक चेतना के अभाव में लोकतंत्र में नेता अपने नागरिकों को आकर्षित करने के लिए ऐसे मुद्दे उछालने तथा उनका राजनीतिक लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं, जिनका उनके विकास से कोई लेनादेना नहीं होता. इसे वे लोकप्रिय राजनीति की मजबूरियां बताकर मीडिया भी कमोबेश मान्य ठहरा देता है.

लोकतंत्र एक चेतन समाज का दर्शन है. यदि समाज में पर्याप्त लोकतांत्रिक चेतना न हो तो उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता. लोकतंत्र की कमजोरी यह है कि वह व्यक्ति को समान अधिकार तो देता है, परंतु उसको समानता के स्तर पर लाने की जरूरत को बिसरा देता है. अथवा उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता. या फिर उस काम को समय के भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाता है. पर्याप्त नागरिक चेतना के अभाव में लोकतंत्र में नेता अपने नागरिकों को आकर्षित करने के लिए ऐसे मुद्दे उछालने आरंभ कर देते हैं, जिनका उनके जीवन और उसकी समस्याओं से कोई सीधा संबंध नहीं होता. लोकतंत्र में इस प्रकार के मुद्दे राजनीतिक लाभ के लिए, प्रायः धर्म और मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत शक्तियों की सहायता से तैयार किए जाते हैं. इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जनता अपने नेता के नैतिक आभामंडल तथा अन्य सद्गुणों के अभाव में जाति, धर्म, क्षेत्रीयता आदि को देखकर निर्णय लेने लगती है. चूंकि लोकलुभावन राजनीति के चालू तरीके खर्चीले भी होते हैं, इसलिए चुनावों में अधिक धन खर्च करने वाले व्यक्ति को उसका लाभ भी मिलता है. लोकतंत्र को लेकर यह डर आज का नहीं है. बल्कि उस समय से है जब इस व्यवस्था का जन्म ही हुआ था. करीब ढाई हजार वर्ष पहले सुकरात ने लोकतंत्र को बहुसंख्यक वर्ग की मनमानी का तंत्र कहकर उसकी आलोचना की थी. प्लेटो ने तो अपनी महान कृति ‘रिपब्लिक’ में अनेक पन्ने लोकतंत्र की आलोचना में काले किए थे. उसके अनुसार लोकतंत्र कालांतर में निरंकुश तंत्र में बदल जाता है. यह उसकी स्वाभाविक परिणति है.

प्लेटो ने विकल्प के रूप में दार्शनिक सम्राट का सुझाव दिया था. दार्शनिक सम्राट के रूप में प्लेटो की कल्पना अपने आप में खोए रखने, शासन और दुनियादारी की ओर से बेफिक्र रहने वाले आत्मलीन मुनि जैसी नहीं थी. दार्शनिक सम्राट से उसका आशय सद्गुणों से संपन्न साहसी, वीर, निडर, शांतिप्रिय, बुद्धिमान, ईमानदार, न्यायपरक, सहिष्णु, निष्पक्ष, मनुष्यता के उदात्त गुणों से संपन्न तेजोमय शासक से था. ऐसा व्यक्ति जो न केवल शांतिकाल में राज्य को विकास के शिखर पर पहुंचा सके, बल्कि युद्धकाल में सीधे समर में उतर कर दुश्मन को नाकों चने चबवा सके. प्लेटो की ऐसी ही परिकल्पना थी. प्लेटो का दार्शनिक सम्राट ऐसा उदात्त व्यक्तित्व था, जो प्रत्येक क्षेत्र में सर्वोत्तम हो. मोह, माया, लालच और स्वार्थ से दूर, ऐसा व्यक्ति जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में श्रेष्ठतम हो. दार्शनिक सम्राट की गरिमा भी उसको एकाएक नहीं मिल जाती. उसके लिए प्लेटो ने पूरा विधान तैयार किया था, जिसमें उच्चतम शिक्षा, देशसेवा से लेकर अनिवार्य सैन्य सेवा भी सम्मिलित हैं. कठिन परिश्रम, स्वाध्याय, उम्र के लंबे अनुभव के बाद ही व्यक्ति इन कसौटियों पर खरा उतर सकता है. आयु की मर्यादा विलक्षण प्रतिभाशाली पर लागू नहीं होती. भारत में प्राचीन यायावर मुनियों के रूप में हमें ऐसी ही प्रतिभाओं के बारे में सुनने को मिलता है. लेकिन भारतीय मुनियों और आश्रम व्यवस्था तथा प्लेटो के दार्शनिक की संकल्पना में मूल अंतर है. यह कि प्लेटो के आदर्श समाज में वंश परंपरा के लिए कोई स्थान नहीं है. बल्कि वहां व्यक्ति के निजी संबंध और भावनाओं को भी उपेक्षित रखा जाता है. प्लेटो सामूहिक जीवन की वकालत करता था. इसके लिए दार्शनिक समेत सभी नागरिकों को साझा छत के नीचे सोना, एक जैसा भोजन करना, एक समान जीवनस्तर अपनाना अनिवार्य था. उसने सोनेचांदी के उपयोग को वज्र्य माना है. निजी संपत्ति को वह एक सीमा के बाद नकार देता है. साझा जीवन की प्लेटो की संकल्पना आगे चलकर पत्नियों में साझेदारी तक विस्तार ले जाती है. समानता के विचार के लिए कभीकभी वह अति की सीमा को पार करता नजर आता है. विशेषकर उस समय वह जब वह काम संबंधों को मर्यादित करने की सोचता है. उसके आदर्श राज्य में मनुष्य के भावनात्मक संवेगों के लिए कोई स्थान नहीं था. उसने व्यवस्था की थी कि बच्चों का लालनपालन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि मातापिता और उनकी संतान एकदूसरे को पहचान न सकें. बच्चे समाज की जिम्मेदारी हैं और उसी का भविष्य. इसलिए बच्चों के लालनपालन की जिम्मेदारी अभिभावक होने के नाते हमारी भी है. संतानोत्पत्ति राजकीय धर्म है. योग्य संतान जन्म ले सके, इसके लिए प्लेटो ने विशेष अवसर पर स्वस्थ्य एवं बुद्धिमान स्त्रीपुरुष के जोड़ों को परस्पर मिलने, संतानोत्पत्ति के लिए समागम करने की अनुशंसा की है. प्लेटो की सहजीवन के प्रति सिफारिशें इतनी अधिक हैं कि वर्तमान समय में वे हमें अवास्तविक लगने लगती हैं. इसी के साथ उसका आदर्श राज्य का सपना भी वायवी बन जाता है. प्लेटो को अपने देश एथेंस से प्यार था, मगर वह स्पार्टा की योद्धा संस्कृति से बेहद प्रभावित था. स्पार्टा के हाथों एथेंस की पराजय की स्मृतियां उनके दिलोदिमाग पर थी. अत्यंत प्रतिभाशाली होने के साथ वह स्वयं बेहद सुंदर और शरीर सौष्ठव में दूसरों से आगे था. उसके व्यक्तित्व की यही खूबियां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना पर प्रभावी हैं. जीवन में शुभत्व की प्रतिष्ठा हेतु, प्लेटो की निष्ठा संदेह से परे है. इस बात को संभवतः प्लेटो भी समझता था. इसलिए अपनी आरंभिक कृतियों में दार्शनिक सम्राट का समर्थन करनेवाला प्लेटो अपने जीवन के उत्तरकाल में दार्शनिक मंडल को राज्य की बागडोर सौंपे जाने की सिफारिश करने लगता है.

दार्शनिक मंडल से प्लेटो का अभिप्राय समाज के निर्वाचित व्यक्तियों को सौंपे जाने से था. प्लेटो की दार्शनिक की परिभाषा, व्यापक संदर्भ लिए हुए है. उसके अनुसार दार्शनिक वह है जो विलक्षण मेधावी, प्रतिभासंपन्न अपरिग्रही, उदार, सत्यनिष्ठ, उच्च शिक्षित, अध्येता, तर्क शास्त्री, तर्कशास्त्री, उदारचेता है. अपनेअपने क्षेत्रों मंे निपुण और परंगत हैं. लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधि से अपेक्षा पर सकती है कि वह उदार, परमविद्वान, सत्यनिष्ठ, वीर, साहसी और नेतृत्वकला में निपुण हो. व्यवहार शास्त्र में उसके प्रवीणता हासिल हो. लोकतंत्र में भी जनप्रतिनिधि से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उपर्युक्त कसौटियों पर खरा उतरता हो. चूंकि एकल व्यक्ति कभी भी निरंकुश हो सकता है, इसलिए राज्य के भले के लिए आवश्यक है कि एकाधिक व्यक्तियों को शासनाधिकार सौंपे जाएं. तथा सम्मिलित राय से शासन चलाया जाए. उनका एक मुखिया जरूर हो, मगर वह दूसरों की राय का प्रतिनिधित्व करे. मनमानी करने से बचे. उसको मनमानी से रोकने के लिए जनता के पास पर्याप्त अधिकार हों. प्लेटो के दार्शनिक मंडल की परिणति एक आधुनिक संसदीय लोकतंत्र के रूप में देख सकते हैं. संसद के लिए निर्वाचित लोक प्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि गुणी, बुद्धिमान, तथा ईमानदार हों. उन्हें अपने राष्ट्र एवं क्षेत्र की समस्याओं की समझ हो. वे कुशल वक्ता तथा विवेकवान हों. ताकि जनप्रतिनिधियों के बीच अपनी बात को सलीके और सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत कर सकें. शब्दों के थोड़े ऐरफेर के साथ यही गुण दार्शनिक के भी हैं. प्लेटो का मानना था कि दार्शनिक सम्राट लोकेच्छा को समझने वाला होगा. इसलिए वह अपनी राय जनमानस पर थोपने के बजाय लोगों की इच्छाओं को अधिक महत्त्व देगा. और जैसे जैसे लोग उसे अपनाएंगे, दार्शनिक की इच्छा व्यापक लोकेच्छा का प्रतिनिधित्व करती हुई नजर आएगी. इसलिए कि दार्शनिक के स्तर को प्राप्त करने के बाद वह लौकिक सुखों, मानसम्मान की छिछली आकांक्षाओं, लोभमोह आदि से मुक्त हो चुका होगा. ऐसे व्यक्ति का प्रत्येक निर्णय लोकोन्मुखी होगा.

भारतीय और यूरोप के समाजों में पद्रहवीं शताब्दी बौद्धिक चेतना के विस्तार की थी. धार्मिक पाखंड और रूढि़यों के प्रति जागरूकता की शुरुआत भी इसी दौर में हुई. भारत में कबीर, रैदास, संत ज्ञानेश्वर, आदि भक्त कवियों ने धार्मिक पाखंड का विरोध करते हुए मनुुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को उर्ध्वगामी बनाने पर जोर दिया. उन्होंने धर्म और शास्त्रीयता के नाम पर पनपे कर्मकांड की भत्र्सना की तथा धार्मिक कुरीतियों के लिए पंडोंमौलवियों को ललकारा. यूरोप में यह काम मार्टिन लूथर ने किया था. दरअसल पंद्रहवींसोलहवीं शताब्दी के जिस दौर की ये घटनाएं हैं, भारतीय संदर्भ में तब की सामाजिक चेतना धार्मिक और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति की लहर के रूप में पनपी थी. उन संतों, महात्माओं के धर्म के केंद्रीय सत्तावाले चरित्र से कोई शिकायत न थी. बल्कि दीनता के चरम पर जाकर भक्त कवि ईश्वर की अधिसत्ता को और भी पुख्ता रूप दे देते थे. यही दौर था जब पश्चिम में मशीनीकरण की प्रक्रिया के साथसाथ वैचारिक क्रांति ने दस्तक दी. भारत उस समय मुगल साम्राज्य का हिस्सा था. उसकी अर्थव्यवस्था के साधन पुराने थे. इसलिए भारत भक्तिकाल की चेतना को वास्तविक परिवर्तन की दिशा देने में नाकाम सिद्ध हुआ था. जिससे भक्ति आंदोलन की समस्त क्रांतिकारिता गुरुडम, मूर्तिपूजा, कर्मकांड को बढ़ाने वाली सिद्ध हुई. इसके विपरीत पश्चिम में उत्पादन के नवविकसित साधन मध्यवर्ग के उदय के साथ परिवर्तनकारी सिद्ध हुए. उभरती मध्यवर्गीय चेतना ने वहां वयस्क मताधिकार, लोकतंत्र एवं समाजवाद जैसे नए विचारों और आंदोलनों को जन्म दिया. फलस्वरूप वहां नई सभ्यता एवं संस्कृति का विकास संभव हुआ. जिनपर परंपरागत मूल्यों, जो उससे पहले तक समाज का नेतृत्व करते आए थे, का प्रभाव निरंतर क्षीण होता गया.

नई व्यवस्था समाज एवं राजनीति के प्रति नई आलोचना दृष्टि पैदा कर रही थी. खासकर तेजी से उभरते मध्यवर्ग में जो निस्संदेह औद्योगिक क्रांति का सुफल था, वर्गीय चेतना का उदय होता जा रहा था. दरअसल मध्यवर्ग अपने ही भीतर बुरी तरह विभाजित था. भौतिक सुखों के प्रति बढ़ती उसकी लालसाएं एक ओर तो पूंजीपति वर्ग का भरोसेमंद बने रहने को प्रेरित करती थीं, दूसरी ओर श्रमिकों के शोषण, उत्पीड़न में पूंजीपतियों का साथ देने के लिए मजबूर कर देती थीं. इसके पीछे उनके मन में छिपा क्षोभ था, जो सपनों के अनुरूप अपेक्षित आय न होने के कारण जन्मा था. प्रारंभ में गणतांत्रिक अधिकार देश के अभिजात वर्ग को प्राप्त थे. प्लेटों के समय में भी अभिजात उसी को माना जाता था, जो कुलीन हो तथा जिसे न्यूनतम निर्धारित भूमि का स्वामित्व प्राप्त हो. प्लेटो ने हालांकि गणतंत्र की आलोचना की थी, लेकिन मध्यवर्ग को यह विश्वास था कि गणतांत्रिक अधिकार मिलने से उसकी राजनीतिक ताकत में वृद्धि होगी. जो उसके विकास के रास्ते प्रशस्त करेगी. दूसरे शब्दों में वर्गीय शोषण का शिकार रहा मध्यवर्ग अपनी मुक्ति के लिए उसी रास्ते को अपनाना चाहता था, जो वर्गविभाजन के जिम्मेदार था. प्रकारांतर में वही उसके शोषण का कारण भी था. इसलिए आर्थिक समानता से पहले राजनीतिक समानाधिकारिता की मांग जोर पकड़ती गई. उसके लिए पहल चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की ओर से की गई. जिनकी मुख्य मांग संसद में सदस्यता हेतु श्रमिकप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम स्थान आरक्षित करने तथा वयस्क मताधिकार को लागू करने की थी.

चार्टिस्ट आंदोलन को व्यापक लोकप्रियता मिली. इसका आकलन करने के लिए मात्र यह उदाहरण पर्याप्त होगा कि अपनी मांग के समर्थन में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों द्वारा वर्षों लंबा हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जिसमें वे अपनी मांगों के समर्थन में 60 लाख हस्ताक्षर लेने में कामयाब हुए थे. हालांकि आंदोलनकारियों के इस दावे को आलोचकों ने नकार दिया था. लेकिन चार्टिस्ट आंदोलनकारियों की इस मांग में दम था. हस्ताक्षरों की गिनती के लिए 13 व्यक्ति लगाए गए थे. लगातार 17 घंटे गिनती करने के बाद वे केवल 19 लाख हस्ताक्षर ही गिन पाए थे. आज से लगभग 175 वर्ष पहले यह बहुत बड़ी बात थी. व्यापक जनसमर्थन पाकर चार्टिस्ट आंदोलन बढ़ता गया. इससे ब्रिटिश सरकार का घबरा जाना स्वाभाविक था. आंदोलन को कुचलने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया गया. जिसमें हजारों चार्टिस्टों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया तथा सैकड़ों को स्वैच्छिक मृत्युदंड की सजा मिली. चार्टिस्ट आंदोलन हालांकि नाकाम सिद्ध हुआ, फिर भी चार्टिस्ट आंदोलनकारी को ब्रिटिश संसद में श्रमिक प्रतिनिधियों के लिए स्थान आरक्षित कराने, निर्वाचन प्रणाली में ढील दिए जाने में सफलता मिली थी. विज्ञान और औद्योगिकीकरण से बढ़ती सुविधाएं जहां लोगों के जीवन को अधिक सुखसुविधामय बना रहे थे, वहीं उनके मन में शोषण से मुक्ति की चाह भी जगा रहे थे.

मुक्ति की छटपटाहट पहले धार्मिक सुधारवादी आंदोलन के रूप में हुई थी. धर्म और राजनीति के गठजोड़ ने जहां धर्मसत्ता को मजबूत बनाया था. वहीं सामंती उत्पीड़न को भी बढ़ावा दिया था. अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए धार्मिक सत्ताएं लगातार शक्ति बटोर रही थीं. इसके लिए उन्हें सामंतों की शोषणकारी वृत्ति से भी परहेज न था. ये लोग धर्म और शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते थे. वे जनसामान्य को त्याग, संयम तथा भोगविलास से दूर रहने की सीख देने वाले उन मठाधीशों का अपना जीवन विलासिता का प्रतीक था. धर्म के नाम पर संघवाद, पूजा के स्थान पर कर्मकांड समाज में परोसा जाता था. धर्म के नाम पर फैले आडंबर का सबसे पहला विरोध मार्टिन लूथर ने शुरू किया. बाद में जाॅन काॅल्विन ने यह कहते हुए कि सृष्टि में प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व मनुष्य की खुशी के लिए है, पहली बार सुख को जीवन के लक्ष्य के रूप में स्वीकारा. उससे पहले सुख की वांछा को हेय मानकर उसकी उपेक्षा का चलन था. सांसारिक सुखों को दुख का कारण, मोहमाया में संलिप्तता की जड़ और मोक्ष की राह में बाधक कहकर नकारा जाता था. जबकि धर्म और राजनीति से प्राप्त ताकत का लाभ उठाकर दूसरा वर्ग विलासितापूर्ण जीवन जीता था. लूथर ने धर्म के आडंबरवाद को ललकारा और उसको लोकोन्मुखी चेहरे को उभारने का काम किया. का॓ल्विन ने उससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए सुख के साथ जुड़ी हीनताग्रंथि को चुनौती दी. उसने जोर देकर कहा कि दुनिया में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका लक्ष्य आदमी को सुख पहुंचाना न हो.

ये सभी कोशिशें, जनसाधारण को राजनीति और विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए थीं. जो सहòाब्दियों से उपेक्षा और वर्जनाओं का शिकार होता आया था. आम आदमी को वर्जनाओं और निषेधों से बाहर निकालने का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वाल्तेयर ने किया. मानवीय अस्मिता को विमर्श के केंद्र में लाने का श्रेय उसी को प्राप्त है. वाल्तेयर ने तार्किक शिक्षा पर जोर दिया. असमानताओं के लिए धर्म और संस्कृति को दोषी ठहराया तथा हर उस चुनौती को करारा जवाब दिया, जो उन जड़ताओं का, यथास्थिति का समर्थन करती थी. इसके बावजूद समाज में दास प्रथा कायम रही. सामाजिकआर्थिक असंतुलन बना रहा तो इसलिए कि उस समय तक प्रौद्योगिकीय क्रांति अपने आरंभिक दौर में थी. संसाधनों पर यथास्थितिवादी सामंतवाद वर्ग का कब्जा था. इसके लिए दुनिया को उन्नीसवीं शताब्दी तक प्रतीक्षा करनी पड़ी, जब प्रौद्योगिकीय क्रांति के लाभों के साथसाथ उसके नुकसान भी दुनिया के सामने आने लगे थे. अस्मितावादी आंदोलनों का दूसरा दौर कहा जाए कि निर्णायक दौर सतरहवीं शताब्दी में औद्योगिकीकरण के उभार के दिनों में हुआ. दरअसल उत्पादन बढ़ने से बाजार की समस्याओं में वृद्धि हुई थी. नए बाजारों की खोज में पहले वाणिज्यिक कंपनियों ने बाहर निकलकर अपने आर्थिक उपनिवेश स्थापित किए. फिर उन उपनिवेशों को राजनीति के अधिकार क्षेत्र में लाकर वहां साम्राज्यवादी खेल खेला जाने लगा. मशीनीकरण ने मध्यवर्ग की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की थी. कालांतर में यही वर्ग सामाजिक बदलाव के लिए नेतृत्वकारी शक्ति बना. हालांकि मध्यवर्गी चेतना प्रायः अपने स्वार्थी मनसूबों के इर्दगिर्द घूमती थी. एक ही समय में इसका एक धड़ा, बल्कि कहना चाहिए कि मजबूत धड़ा, पूंजीवाद के समर्थन में जुटा था; और उसको मजबूती प्रदान करता था. पूंजी के अलावा दूसरी बड़ी ताकत उस वर्ग को मध्यवर्ग से ही मिलती थी. निहित स्वार्थ के लिए दोनों एकदूसरे को बचाए रखना चाहते थे. जबकि मध्यवर्ग का दूसरा धड़ा पूंजीवाद से जूझने के लिए सर्वहारा समाज को एकजुट होने का आह्वान करता था. शोषित वर्ग के भीतर पैठे स्वाभाविक आक्रोश का लाभ उठाकर वह उसके माध्यम से पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने के लिए प्रोत्साहित करता था. इस वर्ग का प्रेरणास्रोत वैज्ञानिक क्रांति और नई विचारधारा से प्रभावित बुद्धिजीवी वर्ग था.

चूंकि मशीनीकरण के कारण मध्यवर्ग की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी. और अकूत पूंजी और शक्ति संपन्न होते हुए भी शीर्षस्थ वर्ग अपने अनेकानेक कर्तव्यों के पालन के लिए इस वर्ग पर निर्भर था, इसलिए मध्यवर्गी विचारकों की मांग को स्वीकार किए जाने पर जोर दिया जाने लगा. इससे पहले इसी वर्ग के विचारकों ने सुखवाद, उपयोगितावाद, विज्ञानवाद जैसे दार्शनिक विचारों को जन्म दिया था. ये विचारधाराएं इतनी लोकप्रिय हुईं कि उन्नीसवीं शताब्दी को इन्हीं की शती कहा जा सकता है. इस तरह लोकतंत्र की मांग एक प्रकार से समय की की मांग थी. सुखवाद और उपयोगितावाद के बहाने भौतिकवाद का समर्थन करती ये विचारधाराएं प्राचीन विचारधाराओं से कई मायने में भिन्न थीं. सुखवाद सुख को मानवजीवन का लक्ष्य स्वीकारता था. इसका दूसरा संकेत था कि सुख पर सभी मनुष्यों का समानाधिकार है. प्राचीन धर्मकेंद्रित विचारधाराएं सांसारिक सुख को हेय मानकर काल्पनिक सुखों का भरोसा दिलाती थीं. उल्लेखनीय है कि धर्मकेंद्रित विचारधाराएं अपने आप में ही विरोधाभास का शिकार थीं. जिस भोगविलास को वे पारलौकिक सुखों की खातिर हेय बताती थीं, स्वर्ग में उन्हीं का आधिक्य बताया जाता था. वही सुख देवों को अंतहीन मात्रा में उपलब्ध बताकर उन्हें श्रेष्ठ और वरेण्य माना जाता था. इस आधार पर समाज का पुरोहित वर्ग जनसाधारण को बरगलाता था. यह किसी एक देश या धर्म की बात नहीं थी, बल्कि सभी धर्मों का यही हाल था. इस प्रश्न का कि जब अभिजन समाज सांसारिक सुखों के अंतहीन भोग करने पर भी स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं तो जनसाधारण के लिए वह हेय कैसे हो सकता है—वह जन्मपुनर्जन्म, पापपुण्य और भाग्य की अंतहीन गल्प सुनाने बैठ जाता था. इसी आधार पर चर्च की आलोचना करते हुए का॓ल्विन ने कहा था कि दुनिया की कोई वस्तु ऐसी नहीं है, जो मनुष्य को सुख पहुंचाने के लिए न बनी हो. उससे सुख को हेय मानने वाली प्रवृत्ति कमजोर पड़ने लगी.

भारत में चार्वाक और लोकायत दार्शनिक यही तर्क शताब्दियों से देते आए थे. गौतम बुद्ध के समय में भी आजीवक अजित केशकंबली नाम का संप्रदाय सुख को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानता था. लेकिन भारतीय लोकमानस पर पुरोहितवाद इतनी तेजी से हावी रहा कि इस सत्य को स्वीकारने की उसकी कभी हिम्मत न पड़ी. आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित होने के कारण भी जनसाधारण के लिए यह संभव नहीं था कि वह अपने जीवन को अपने ढंग से निर्धारित कर सके. जबकि पश्चिम में मार्टिन लूथर और काॅल्विन के विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा. अमेरिका में उनके विचारों के आधार पर बस्तियों का निर्माण किया जाने लगा. कालांतर में सुखवाद के आधार पर जिस परिपक्व विचारधारा की नींव रखी गई वह मानवता के करीब थी. सुखवादी विचारधारा के प्रखर चिंतक जा॓न स्टुअर्ट मिल ने सुख की कामना को मानव जीवन का लक्ष्य माना, लेकिन उसका सुख केवल भौतिकता की सीमा से बंधा नहीं था. उसने सुख का मानवीकरण किया था. मिल के अनुसार स्वतंत्रता भी सुख की अनिवार्यता है. क्योंकि वह मानवमन को तोष प्रदान करती है, तभी वह सुख के संसाधनों का आनंदमय भोग कर सकता है. दूसरे शब्दों में सुखवाद और उपयोगितावाद के माध्यम से ये विचारक मनुष्य की शताब्दियों पुरानी मानसिकशारीरिक परतंत्रता से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयासरत थे. जनसाधारण को शताब्दियों से कभी धर्म, कभी राष्ट्र तो कभी राज्यभक्ति के नाम पर बांधा जाता रहा है. सुखवाद और उपयोगितावादी विचारधाराएं मनुष्य को उसके मनुष्यत्व से परचाने की कोशिश करती थीं. व्यक्तिस्वातंत्र्य के उभार को आगे चलकर जेफरसन और पेन ने मजबूत आधार दिया. अमेरिकी स्वाधीनता की उद्घोषणा के साथ तो इस विचार को मानो वैश्विक स्वीकृति ही प्राप्त हो चुकी थी.

मिल ने सुखवाद को नैतिकता की उच्चतम अवस्था माना था. सुख की उसकी परिकल्पना केवल भौतिक सुखों तक सीमित न थी. मिल के अनुसार कर्तव्यपालन, नैतिक आचरण, परदुखकातरता भी सुख के पर्याय हैं. क्योंकि इनमें समूचे समाज के सुख की कामना निहित है. उसने कहा था कि अकेले व्यक्ति का सुख, सुख न होकर स्वार्थ है. जिसे समाज की कीमत पर ही स्वीकार किया जा सकता है. यही बात माक्र्स और माओ ने भी कही. माक्र्स ने सुख की समानता को अवसरों की समानता का नाम दिया और साम्यवादी क्रांति का आह्वान यह कहकर किया कि शताब्दियों के शोषण के उपरांत अपना सबकुछ गंवा चुके सर्वहारा वर्ग के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जबकि जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. उसने सर्वहारा क्रांति के माध्यम से मजदूरों का संगठित होकर सत्ता अपने हाथ में ले लेने को कहा. ‘साम्राज्यवाद कागजी बाघ है.’ और ‘जनता ही असली लोहे का दुर्ग.’ जैसी राजनीतिक ललकार देते हुए माओ ने जनता को संगठित विद्रोह के लिए पुकारा. उसने सभी राष्ट्रीय मुक्तियुद्धों को समर्थन दिया. अन्य देशों के क्रान्तिकारी संघर्षों को अपनी सफल क्रांति द्वारा प्रेरित किया और बताया कि भड़क उठने पर ‘एक चिंगारी सारे जंगल में आग लगा सकती है.’ चीनी जनता से आगे बढ़कर सत्तासंविधान को अपने अधिकार में ले लेने के आह्वान के बाद उसने कहा कि आगे बढ़ो और ‘मेहनत तथा किफायत से अपने देश का निर्माण करो.’ उसके कहने पर चीन के मजदूर, किसान और शिल्पकार एकजुट हुए और वहां सफल क्रांति संभव हो सकी. माओ का कहना था कि ‘राज्यसत्ता का जन्म बन्दूक की नाल से होता है.’ माओ के लिए संस्कृति भी उत्पादन की अन्य प्रेरणाओं जैसी थी. सांस्कृतिक क्रांति का आवाह्न करते हुए माओ ने कहा था—‘क्रांति पर पकड़ कायम रखो और उत्पादन को आगे बढ़ाओ.’ वर्गसंघर्ष, उत्पादनसंघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग—इन तीन आंदोलनों द्वारा उसने चीनी जनता में सृजनात्मक उत्साह का विस्फोट किया और सभी मोर्चों पर जबरदस्त उपलब्धियां हासिल कीं. फलस्वरूप वहां उत्पादन में रिकार्डतोड़ वृद्धि हुई, उत्पादनसंबंधों में आशातीत क्रांतिकारी परिवर्तन. क्रांति के बाद विशेषज्ञों और नौकरशाहों के व्यक्तिवादी प्रबंधन का स्थान क्रांतिधर्मा श्रमिक संगठनों के हाथों में पहुंच गया. समाजवादी उत्पादन के उपक्रमों के मा॓डलों— कृषिक्षेत्र में ‘ता चाई’ और उद्योग में ‘ता चिङ’ का जन्म हुआ. क्रांति के स्थायित्व एवं जनचेतना के फैलाव के लिए माक्र्स ने सर्वहारा वर्ग को द्वंद्ववाद की दार्शनिक शिक्षा से लैस किया गया, और यह मौलिक विचार दुनिया के सामने रखा कि मनुष्य के विचार, राजनीति और सामाजिक संस्थाएं उसके उत्पादन के संसाधनों से निर्धारित होते हैं. यह विचार अपने आपमें इतना शक्तिशाली था कि दुनियाभर में उसके आधार पर लोग संगठित होने लगे और एक समय ऐसा आया जब आधी दुनिया की राजनीति मार्क्स के विचारों से निर्धारित होती थी. किसी विचारक की इससे बड़ी उपलब्धि भला और क्या हो सकती है.

मिल ने व्यक्ति को समाज के लिए समर्पित होने की कामना की थी. उसने समाज में उम्मीद व्यक्त की थी कि वह व्यक्तिमात्र की अस्मिता एवं स्वतंत्रता का ध्यान रखेगा. स्त्रीमुक्ति का विचार हालांकि रूसो के समय में ही जोर पकड़ने लगा था. बाद में चाल्र्स फ्यूरियर तथा मिल ने भी उसको शिद्दत के साथ आगे बढ़ाया. लेकिन मिल की असली देन थी, व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता पर जोर देना. देखा जाए तो मिल का व्यक्तिस्वातंत्र्य का विचार रूसो की ‘व्यक्तिमुक्ति’ की भावना का ही विस्तार था. रूसो ने कहा था कि मनुष्य आजाद जन्मा है. लेकिन वह हर जगह बेडि़यों में है. ये बडि़यां धर्म, कानून, समाज आदि किसी की भी हो सकती हैं. व्यक्तिस्वातंत्र्य का विचार हालांकि मानवतावादी अभिकल्पना थी, लेकिन हम आगे देखेंगे कि उसका उपयोग पूंजीवाद द्वारा नितांत स्वार्थी ढंग से, उपभोक्तावाद को विस्तार देने के लिए किया गया. दूसरी ओर व्यक्तिस्वातंत्र्य के विचार के आधार पर ही अत्याधुनिक लोकतंत्र की नींव विकसित हुई. व्यक्तिस्वातंत्र्य ने ही कालांतर में मानवाधिकार और वयस्क मताधिकार जैसे आंदोलनों को जन्म दिया. दूसरे विश्व के बाद आहत मानवता के जख्मों को सहलाने के लिए ब्रिटिश उपनिवेश से बाहर आने वाले देशों ने लोकतंत्र को अपनाया. लेकिन बाजारवाद और पूंजी के दबाव में कुछ ही अर्से में लोकतंत्र ऐसा रूप धारण कर चुका है, जिससे उसके औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं.

विचलन का कारण किसी से छिपा नहीं है. लोकतंत्र के अंतर्गत जो निर्वाचन पद्धति अपनाई जाती है, वह अत्यंत महंगी है. जीत के लिए अधिकतम मत प्राप्त करना जरूरी होता है. इसलिए मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए प्रत्याशी ऐसे आयोजन करते रहते हैं, जिनका विकास और राष्ट्र कल्याण से कोई वास्ता नहीं होता. जाति, धर्म, क्षेत्रीयता जैसे संवेगात्मक मुद्दे उठाकर मतदाता को फुसलाया जाता है. ये मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सर्वाधिक लोकप्रिय मुद्दे हैं, जिनका वास्तविक विकास और लोककल्याण से कोई वास्ता नहीं होता. अत्यधिक धनराशि लुटाकर राजनीति में वही लोग आते हैं, जिन्हें वहां से और अधिक मिलने की उम्मीद होती है. ऐसे लोगों के लिए राजनीति एक व्यापार होती है, देशसेवा एक बिकाऊ मसाला. जिससे वे अपने व्यापार को चमकाते हैं. ऐसे जनप्रतिनिधियों को पूंजीपति, स्वार्थी धर्माचार्यों के चंगुल में फंसना आसान होता है. इसलिए वे अपने विवेक और लोकहित को ध्यान में रखकर केवल अपनी स्वार्थसिद्धि में जुटे रहते हैं. यह सच है कि सरकार में सभी जनप्रतिनिधि एकसमान नहीं होते. कुछ ऐसे होते हैं, जो वास्तव पद की गरिमा को बढ़ाते हैं, जिनका राजनीति में आना एक सामाजिकराजनीतिक लक्ष्य रखता है. किंतु ऐसे नेता संख्याबल में बहुत कम होते हैं और लोकतंत्र जो संख्याबल के आधार पर चलता है, वहां से अपनी कारगर भूमिका नहीं रच पाते. हताश होकर या तो लोकप्रिय राजनीति के रंगढंग अपना लेते हैं; अथवा राजनीति से ही किनारा कर लेते हैं. राजनीति को जनसाधारण अच्छा नहीं समझता. निष्पक्ष बुद्धिजीवियों के पास वर्तमान राजनीति के पक्ष में कहने के लिए बहुत कम होता हैं. और उनके द्वारा राजनीति और राजनीतिज्ञों की निरंतर आलोचना से समाज में उनकी हो छवि बनती है, वह समाज में सरकार की विश्वसनीयता को कम करती जाती है. जनता का सरकार में विश्वास न हो तो वह असहयोग की मुद्रा में आ जाती है. नागरिक धर्म भुलाकर लोग केवल अपनी स्वार्थसिद्धि में लग जाते हैं. इससे समाज में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार को अतिरिक्त बलप्रयोग करना पड़ता है. परिणामस्वरूप जनता में उसकी छवि और बिगड़ती है. ऐसी अवस्था में अच्छे, प्रतिभाशाली और नीतिसंपन्न व्यक्ति राजनीति में आना छोड़ देते हैं और निर्धारित अवधि के बाद होने वाली निर्वाचन प्रक्रिया सरकारी कर्मकांड बनकर रह जाती है. महंगी निर्वाचन प्रक्रिया में उतरनेवाले नेता एक लगाकर दस कमाने की नीयत रखते हैं. राजनीति से जुड़े लोग समाज में अच्छे नहीं समझे जाते. पर निहित स्वार्थ के लिए अच्छेभले लोगों को भी उन्हीं की कृपादृष्टि के लिए तरसना पड़ता है. जनता के बीच भ्रम बनाए रखने के लिए वे प्रबुद्ध होते लोकतंत्र का बारबार दावा करते हैं, लेकिन जिन नारों के साथ वे लोगों के बीच आते हैं उनका विकास और लोकहित से कोई वास्ता नहीं होता. उनके दांवपेंच से अनभिज्ञ यदि कोई व्यक्ति चुनाव में उतरे तो उसके लिए जीत आसान नहीं होती.

लोकतंत्र की आवश्यकता है कि सरकार जनता की वोटों से बनी सरकार जनता के लिए काम करे. जनता के लिए काम करे. लेकिन पूंजी, धर्मसत्ता तथा क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर जो सरकार चुनी जाती है, वह ऊपर से भले ही लोकतांत्रिक दिखे, उसका स्वरूप अल्पसंख्यक सरकार का ही होता है. वह जनता के वोटों से चुनी हुई कुछ लोगों की सरकार होती है, जो अपने वर्गीय हितों और कुछ लोगों को लिए काम करती है. जनता के बीच भ्रम बनाए रखने के लिए वे लोकतंत्र की प्रबुद्धता का बारबार हवाला देते हैं. उनका मुंहलगा मीडिया और प्रचारसारथी जनता के बीच बारबार यही दोहराते हैं कि ‘लोकतंत्र जीत रहा है’. असलियत में ‘जनता की जीत’ और लोकतंत्र के नाम पर केवल अल्पतंत्र फलताफूलता रहता है. जनता की उदासीनता से शिखर पर बैठे लोग मनमानी पर उतारू हो आते हैं. ये लोकतंत्र की सामान्य कमजोरियां हैं, जिन्हें ढाई हजार वर्ष पहले ही समझा जा चुका था.

मनुष्य की अधिकतम आजादी और मानवाधिकारों की प्रतिष्ठा हेतु जरूरी है कि हम एक फैसला कर लें—आखिर हमें चाहिए क्या? पूंजी का राज या राज की पूंजी. आप कहेंगे इसमें क्या है? राज होगा तो पूंजी भी रहेगी ही. बिना पूंजी के क्या राज चल सकता है! सो पूंजी को राज में रहना चाहिए. फिर चाहे राज पूंजी का हो या राज की पूंजी. पूंजी होगी तो समाज में सुखसुविधाएं बढ़ेंगी. उस गरीबी और बेकारी से मुक्ति मिलेगी, जिसमें हमारे पूर्वजों ने पूरी जिंदगी काट दी और जिसके कारण वे वक्तबेवक्त रामनाम रटकर दुनिया से कटे होने का दावा करते थे. कोई इशारा न समझ पाए तो आप बताएंगे कि वे लोग यानी आपके पूर्वज दुनिया से कटे होने का दावा इसलिए करते थे कि उनके आसपास भीषण गरीबी, अकाल और बेबसी के सिवाय कुछ था ही. आंखें खोलते ही उन्हें अपनी दुनिया की कंगाली सामने आ जाती थी. इसलिए पूंजी चाहिए और राज इसलिए कि सुरक्षा का एहसास बना रहे. जो हमारे लिए सुखसुविधाओं का इंतजाम कर सके. जिसके सेनानी पहरेदार का काम करें. जो हमारी जरूरत की चीजों की आवाजाही बनाए रखे. राज इसलिए भी चाहिए ताकि हमारे आसपास शांति हो. कोई हमारे सुख की ओर आंख उठाकर देखने न पाए. अगर आप सरकार से इतना कुछ चाहते हैं तो कुछ भी बुरा नहीं है. और इतना काम तो हर सरकार करती ही है. यदि कर न सके तो आश्वासन अवश्य दे देती है. परंतु कुछ काम ऐसे हैं जिनसे आपका सुख सचमुच जुड़ा होता है. किंतु उस ओर न तो सरकार की ओर से कोई हाथ उठता है, न आप ही उठा पाते हैं.

यह ठीक है सरकार का काम नागरिक हितों की देखभाल करना है. उन्हें सुरक्षा और आवश्यक सुविधाएं प्रदान करना है. यह काम ऐसा तो नहीं कि हमें डर लगे. जिसे हम कभी कर भी न सकें. फिर हमें डर क्यों है कि कोई हमारे सुख की ओर टकटकी लगाए बैठा है. जरा नजर चूकी नहीं कि झपट्टा मारकर गिरा देगा. यह तो तभी हो सकता है कि हमारे पास जो है, वह दूसरों से ज्यादा हो. उस अवस्था में हमें राज भी चाहिए तो इसलिए कि वह हमारे धन की, जो दूसरों से अधिक है, जिसे हमने औरों का हक मारकर जुटाया हुआ है, की सुरक्षा कर सके. हम पेटभर खाकर, डकार लेकर मजे की नींद लें और कोई हमारी नींद में खलल डालने न आए. हमारा पड़ोसी किस हाल में है इस हम कोई ध्यान न दें. वह यदि भूखा है, लाचार है, किसी का सताया हुआ है तो उसकी रक्षा करने के लिए भी हमें राज चाहिए. सरकार से हम यह उम्मीद रखें कि वह हमारा कोई अहित न होने दे. इसके लिए वह हमसे चाहे तो कुछ कर भी ले. यदि हम ऐसा ही राज चाहते हैं तो सही मायने में हम राज की पूंजी नहीं, पूंजी का राज चाहते हैं. जो सरकार आपके धन की रक्षा करेगी, आपको आपके भूखे, जरूरतमंद पड़ोसी की कुदृष्टि से बचाएगी.

उस समय हम मान लेते हैं कि सरकार में जो हैं वे निरे भलेमानुष हैं. कि सरकार लोगों की सदेच्छा से चलती है. वह इतना ही सोचती है, जितना हम जानते हैं. यदि वे भले मानुष न हों तो? तब वह सीधे आपसे पूछेंगे कि हमें पहरेदारी ही बनना है तो दूसरे के धन की क्यों करेंगे. पहरेदारी करनी है तो अपने धन की करेंगे. जो धन अपना नहीं है उसको किसी न किसी तरह अपना बनाने की सोचेंगे. सच तो यह है कि सरकार का पूरा तामझाम इसी रणनीति के तहत चलता है. सरकार के पास ताकत है, पैसा है, पहुंच है. वह पहरेदारी कर सकती है. पहरेदारी करती है. परंतु उसमें मौजूद लोग तथा उन्हें अपनी पूंजी के बल पर संसद और विधायिकाओं तक पहुंचानेवाले पूंजीपति और सरमायेदार कहीं न कहीं यह इच्छा भी पाले रहते हैं जिस धन की रखवाली सरकार कर रही है, एक न एक दिन वह धन उन्हीं के खाते में आना है. यह सरकार चलाने का पूंजीवादी रवैया है. पूंजीवादी मुनाफे के लिए उद्योग चलाता है. नेता मुनाफे के लिए राजनीति में आता है. सीधासादा गणित. सीधसादा विचार. इसलिए पूंजीवादी समाज में धन की केवल एक ही गति होती है. वह निचले स्तर से ऊपर की ओर जाता है. पैसा पैसे को खींचता है—यह मुहावरा यूं ही नहीं बना है. पूंजी की सरकार मुनाफे के लिए बनती, मुनाफा देखकर चलती है. उसके नेता मानते हैं कि धन उसका जो पहरेदारी करे. इसलिए धन वापस लौटता जाता है. वहीं जहां से वह चला था. आप सोचते हैं, समाज में कुछ लोगों के पास अकूत धन होगा और दूसरे कंगाल रहेंगे तो उसमें असंतोष की लहर उठेगी. लोग आक्रोश से बलबलाने लगेंगे. परंतु ऐसा कुछ नहीं होता. आपके देखते ही देखते पहरेदार खुद को धन का मालिक मानने लगता है. सरकार के मालिक में बदल जाने का यही दुष्परिणाम होता है. आप इसको कुफल कहें तो भी चलेगा. पर उनका यही अभीष्ट है, जिसमें हर कोई पूंजी के इशारे पर नाचता हुआ नजर आएगा.

देखते ही देखते एक सरकार हमारी मालिक बन जाती है. इसलिए कि हम अपने लालच को मरने नहीं देते. हमने अपने स्वार्थ से समझौता किया; और ऐसे नेताओं को राष्ट्र की निगहबानी सौंपी, जो देश के बजाय अपने और हमारे स्वार्थ की रक्षा कर सकें. पर क्या सचमुच ऐसा हो सका. हममें इतना सामर्थ्य नहीं कि अपने फैसले खुद कर सकें. स्वार्थी पहरेदारों ने वह किया जो हर काइयां, स्वार्थी पहरेदार करता है. नेताओं ने हमारा वोट लिया. और फिर सत्ता में पहुंचकर ऐसे कानून बनाए जो संपत्ति के निचले वर्गों से ऊपर के वर्गों को वैध सिद्ध करते हों. हमारी संपत्ति धीरेधीरे उनके अधिकार में जाने लगी. सरकार के पास कानून की बड़ीबड़ी पुस्तकें होती हैं. उनमें बड़ीबड़ी बारीकियां होती हैं. उनकी व्याख्या के लिए विशेषज्ञों की पूरी टीम होती है. उनका पैसा जाता जनता की जेब से है, लेकिन वे साथ सरकार का निभाते हैं. इसी में उनकी और सरकार की शान है. इसलिए सरकार जो कुछ करती है, वह कानून की मदद से करती है. उन कानूनों की मदद से करती है, जिन्हें वह लोकहित के नाम पर बनाती है. सरकार के लिए लोक एक अमूर्त्तन धारणा है. उसमें यदि कोई ‘मूर्त्त’ फंस जाता है तो गलती उस व्यक्ति की. लोकसमर्थन पाकर सरकार कराधान के लिए बारीक नियम बनाती है. इतने बारीक कि सुनकर बुद्धि चकरा जाए. सीधे आमदनी पर टैक्स तो समझ में आता है. पर आप जो चीज खरीदें उसपर टैक्स, उत्पादक जो माल बनाए उसपर टैक्स, माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में जो भाड़ा लगे उसपर टैक्स. वस्तु को पैकेट बंद करने में जो लागत आती है, उसपर टैक्स. सामग्री और उपसामग्री पर भी टैक्स. फिर विज्ञापन जो आपको वस्तु के बारे में बताता है, उसपर भी टैक्स. दुकानदार का टैक्स, सर्विस टैक्स. आप गिनते जाइए. आपकी याददाश्त धोखा देने लगेगी, टैक्स की कतार कम नहीं पड़ेगी. और ये सब कहां से आता है. वही जो हम और आप रातदिन परिश्रम से कमाते हैं. वही तरहतरह से, अलगअलग नामों से सरकार की जेब में जाने लगा. पर सरकार में जो बैठे हैं. उन्हें हमी ने ताकत सौंपी है. परंतु निखालिस ताकत से काम चलता नहीं. बली को तो सुखसुविधा, मानवैभव सभी कुछ चाहिए.

सरकार से जुड़े लोगों को सुखी बनाने की जिम्मेदारी ली पूंजीपतियों ने. अपने कारखाने उन्होंने विलासिता की वस्तुओं को बनाने के लिए सौंप दिए. सरकार और सत्ता केंद्र पर विराजमान लोगों के पास संसाधनों की अफरात ही अफरात. विलासिता की वस्तुओं की बिक्री बढ़ी तो उसपर भी टैक्स लगा दिया. जनता को थोड़ा और दुहा जाने लगा. उत्पीडि़त अपनी सफलता उत्पीड़क की नकल करने में देखता है. वह उसी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है. इसलिए हममें से जो थोड़ाबहुत बचा लेते थे, वे भी अपनी बचत को विलासिता की वस्तुओं पर खर्च करते रहते हैं. उत्पीड़क के लिए यह सबसे मुफीद है. पूंजी गरीब के बटुए से बाहर आएगी, तभी तो ऊपर तक जाएगी. परंतु ऐसा करतेकरते निचला वर्ग खोखला पड़ने लगता है. लेकिन महत्त्वाकांक्षाएं, चाहतें और सपने तो उस वर्ग के भी होते हैं. खाली जेब और बाजार के आकर्षण, मन में अंतद्र्वंद्वों को जन्म देते हैं. उससे समाज में असंतुलन बढ़ता है. आपसी अविश्वास में वृद्धि होती है. तनाव और अंतर्कलह पनपने लगते हैं. ये सब बढें तो असहिष्णुता और असंवेदनशीलता भी बढ़ने लगती है. इससे आपसी झगड़े, मुकदमेबाजी, कोर्टकचहरी को बढ़ावा मिलता है. इस बहाने हमारा धन फिर हमारे हाथों से खिसकने लगा. कुल मिलाकर सरकार जो हमने अपने निगहवानी और जरूरतों की देखभाल के लिए बनाई थी, उसमें ऐसे लोग शामिल होते जाते हैं, जो सिर्फ राजनीति करते हैं. सत्ता की राजनीति, मुनाफे की राजनीति, अवसर और पदलाभ की राजनीति. इस तरह राजनीति जो सेवाकर्म हो सकती थी, शीर्षस्थ लोगों के व्यवसाय में बदल जाती है. ऐसे लोग उसमें चले आते हैं जिनका एकमात्र ध्येय अपनी स्वार्थसिद्धि करना रहता है. वे जानते हैं कि छोटेछोटे अनेक खानों में बंटी जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती. लेकिन डर फिर भी सिर पर सवार होता है. डर इस बात का कि जिस ‘शार्टकट’ के जरिये वे उस स्थान तक पहुंचे हैं, उन्हीं के समान महत्त्वाकांक्षी कोई व्यक्ति उस स्थान पर पहुंचकर कभी भी उन्हें अपदस्थ कर सकता है. जनता ऊपर के वर्ग पर होने वाले ऐसे तमाशे को रोज देखती है. इससे लोगों को रोजमर्रा की ‘गपशप’ का मसाला मिलता है. उसी के जरिये वह अपनी कुंठाओं का विसर्जन करती है. उस समय वह भूल जाती है कि लोकतंत्र में उसकी सत्ता सर्वोपरि है. उसे यह अधिकार है कि स्वार्थी नेताओं को धूल चटा सके. परंतु वह ऐसा नहीं कर पाती. इसलिए कि शीर्ष पर बैठे हुए लोग उसको इतने छोटेछोटे खानों में बांट देते हैं कि वह कोई कारगर फैसला लेने की स्थिति में आ ही नहीं पाती. उसकी शक्तियां कारगर हो ही नहीं पातीं.

1947 में जब देश आजाद हुआ था कि उस समय हमारे पास एक ही नारा था—राष्ट्र के नवनिर्माण का. चूंकि राष्ट्र पहले था, इसलिए नेता और जनता सब उसी को समर्पित थे. लेकिन धीरेधीरे राजा और प्रजा सब स्वार्थसमर्पित होते चले गए. जनता इस सोच में अपने निगहबानों चुनने लगी कि वे सरकार बनाकर उसके सुख की रक्षा करेंगे. मगर निगहबानी की कसम खाकर सत्ताकेंद्र में पहुंचे नेता खुद को मालिक समझने लगे. लोग उनकी चालाकी को समझें, इसलिए धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, वर्ण जैसे मुद्दे बहस और पहचान का प्रतीक बना दिए गए. आज हालात यह हैं कि राज है, पर राज कहीं नहीं हैं. नेता के लिए वोटर महज उत्पाद है. चुनाव लड़ना महज मतप्रबंधन बनकर रह गया है. मतदाता ऐसे नेता को वोट देने जाते हैं, जिसपर उन्हें जरा भी विश्वास न हो. और जब चुनाव में खड़ा उम्मीदवार भ्रष्ट, और दागी हो, तो चर्चा का आधार भी धर्म, जाति, क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक मुद्दे रह जाते हैं. नेता भी मतदाता की इस कमजोरी को जानता है. इसलिए वह चुनावों में ऐसे मुद्दे उछालते ही नहीं जिनका विकास से सीधा संबंध हो. ‘सब चलता है’ सोचकर मतदाता वोट देता है और मुखौटायुक्त नेता संसद पहुंच जाते हैं. इन चेहरों में यदाकदा जो बदलाव आते भी हैं, तो इन्हीं गैर उत्पादक मुद्दों द्वारा.

आजादी के बाद देश ने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को चुना था. इसलिए कि देश को सामंतवाद के चंगुल से बाहर लाना था. तब देश में करीब सात सौ रियासतें थें. जिनके वजीर, जमींदार, राजा, सामंत सब अपना स्वार्थ देखते थे. उनके लिए तरक्की का मतलब था, राजपरिवार में विलासिता की वस्तुओं का बढ़ते जाना. किसी साम्राज्यवादी मनसूबे का साकार हो जाना. प्रजा उन सामंतों, जागीरदारों के भोगविलास को हसरतभरी निगाह से देखती, जिंदगी किसी तरह गुजर जाने तथा अगले जन्म में इस जन्म के अभावों की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती थी. स्वर्ग उसके लिए बड़ा प्रलोभन था. दुख और अभावों, जीवनसंघर्ष की असफलताओं ने उसे भाग्यवादी बनाया था. इसलिए राजा कौन है, इस बारे में अधिक नहीं सोचती थी. वह नासमझ भी नहीं थी. न ही मूर्ख थी. अनुभव पगी थी. अनुभव ने ही उसे चुप रहना, संतोष करना सिखाया था. लेकिन गांधीजी ने जब उसका आवाह्न किया, तो पहली बार उसे अपने नेताओं पर भरोसा जमा. इसी के साथ वह हुंकार पड़ी थी, स्वतंत्रता के लिए.

आजादी सिर्फ राजामहाराजाओं, सामंतों के संघर्ष के फलस्वरूप आती तो देश में राजशाही ही पनपती. अठारह सौ सतावन में जितने भी रजबाड़े अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित हुए थे, सभी के अपने स्वार्थ थे. उनकी लड़ाई केवल अपनी सत्ता के लिए थी. एक तरह से अच्छा ही हुआ जो आजादी से पहले देश के राजेरजबाडे़ अंग्रेज सरकार के पिछलग्गू बने हुए थे. जनता ने उनकी हकीकत को पहचाना और संगठित होकर अपने कंधे से गुलामी का जुआ उतार फेंका. देश उसका जो आजादी को अपने प्राणप्रण से सींचे. जनता के प्राणप्रण से बलिदान के फलस्वरूप स्वाधीनता ने दस्तक दी थी. इसलिए रजबाड़ों की हिम्मत ही न पड़ी थी, मनमानी करने दी. इसलिए जब भारत या पाकिस्तान में बंटने को कहा गया तो चुपचाप बंटते चले गए. जो इक्कादुक्का रहे उन्हें भी अपनी प्रजा और परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने पड़े. निहत्थे गांधी से सब डरते थे. जानते थे कि उस अधनंगे फकीर को तो कभी भी मार सकते हैं. पर वह अकेला कहां हैं! जनताजनार्दन का हाथ उनकी पीठ पर था. यह ठीक है कि गांधी उन नेताओं में से थे जिन्होंने भारतीय जनता को राजनीति का पाठ पढ़ाया था. मगर यह भारतीय जनता ही थी जिसके कंधों पर सवार होकर स्वाधीनता आंदोलन अपनी सफलता को पहुंचा. जिस देश की जनता जाग जाए उसको दुनिया की कोई शक्ति गुलाम नहीं बना सकती. सो जनता के कंधों पर सवार होेकर ही गांधी महात्मा बने, राष्ट्रपिता कहलाए. लेकिन गांधीजी यदि देश के एकक्षत्र नेता होते तो क्या देश में लोकतंत्र का आगमन संभव होता? क्या लोकतंत्र को गांधीवादी राजनीति का समापन बिंदू कहा सकता है? एक शब्द में इसका उत्तर है—‘नहीं.’

निस्संदेह गांधी भारतीय जनमानस में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे. किंतु गांधी की मनोरचना में लोकतंत्र कहीं नहीं था. वे अपने निर्णय जिद पूर्वक लागू कराते थे. दबाव बनाने के लिए सत्याग्रह सबसे कारगर हथियार था. दरअसल गांधी का आदर्शराज्य ‘रामराज्य’ की परिकल्पना से बुना था. उनका हिंदू मानस उस दायरे से बाहर सोच ही नहीं पाता था. बाद में लोकतंत्र के समर्थक बने तो इसलिए कि उस समय तक दलित और पिछड़ों में एक पढ़ालिखा बुद्धिजीवी वर्ग पनप चुका था. उसके नेता थे, ज्योतिबा फुले और डाॅ. भीमराव आंबेडकर. संविधान निर्माण के क्षेत्र में डा॓. अंबेडकर ने वही किया जो अमेरिका में था॓मस जेफरसन ने किया था. दोनों के जीवन में कुछ समानताएं भी हैं. दोनों बेहद पढ़ाकु थे. दोनों को गरीबी से संघर्ष करना पड़ा था. दोनों का ही जीवन अभावों में बीता था. कुछ अर्थों में अंबेडकर का काम जेफरसन से भी बड़ा था. अंबेडकर को डा॓. अंबेडकर बनने तक सामाजिक परिस्थितियों, जातिवाद और छुआछूत के विरुद्ध भी युद्ध करना पड़ा था. जेफरसन का देश और वहां के लोग इस मामले में उदार थे. इसलिए उन्होंने अमेरिकी गणतंत्र के प्रमुख सूत्रधार को राष्ट्रपति के पद से नवाजा. भारत में एक दलित को ऐसे अवसर कम से कम उस समय न थे. जेफरसन ने अमेरिका के लिए ‘स्वाधीनता का घोषणापत्र’ तैयार किया था, डाॅ. अंबेडकर ने भारतीय संविधान. बाद में संविधान का जो प्रारूप स्वीकृत हुआ उसके कई प्रावधानों से डा॓. अंबेडकर की असहमति थी. तथापि लोकतंत्र का सम्मान करते हुए वे संविधान के प्रचारप्रसार में जुटे रहे.

बहरहाल, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली लागू करने के बाद असली काम लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने का था. उनमें ऐसा विवेक पैदा करना जरूरी था, ताकि वे लोकतंत्र का लाभ उठा सकें. पढ़े और अनपढ़ दोनों वोट से बंदूक का काम कैसे लें, यह समझाने की जरूरत थी. लंबे समय तक सामंतवादी समाज में रह रहे लोगों में नागरिकताबोध पैदा करना था. सामान्य राय के पक्ष में निजी हितों को कुछ समय के लिए बलिदान करना क्यों जरूरी है—यह बात भी लोगों को समझानी थी. इसके लिए अंबेडकर सामाजिक क्रांति की आवश्यकता महसूस करते थे. उनके लिए सामाजिक आजादी का मसला राजनीतिक आजादी से बढ़कर था. अंबेडकर साहब की नहीं चली. राष्ट्र पिता कहलाए जाने के बावजूद गांधी की भी नहीं चली. गांधी की हत्या के बाद तो देश को उस दशा में सोचने का अवसर ही कहां मिला? आजादी की घोषणा के तुरंत बाद देश में दंगे होने लगे थे. उसके बाद पाकिस्तान तथा चीन का हमला. 1971 में फिर पाकिस्तान से युद्ध. ये कुछ कारण ऐसे रहे जिससे देश में मतदाता के विवेकीकरण का अभियान चल ही नहीं पाया. 1950 में देश में मानवाधिकारों को स्वीकृति देकर मनुष्य की मूलभूत स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गई. मगर जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्रीयता में फंसे समाज में राजनीति का इतना स्खलन हुआ कि जनविवेकीकरण का अभियान सिरे ही नहीं चढ़ सका. विवेकीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने के कुछ और भी कारण थे. उनमें एक था, हिंदू समाज की पराजित मनोग्रंथि. देशवासियों को पराजित दासता में जीवनयापन करते हुए पांच सौ से अधिक वर्ष पूरे हो चुके थे. आक्रामकों ने इस देश का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यानी सभी तरह से शोषण किया था. लेकिन धर्मप्राण जनता को धर्माधारित शोषण का सर्वाधिक क्षोभ था. इसलिए 1947 में जैसे ही विदेशी शासन से मुक्ति मिली, सबसे पहले जनता का ध्यान अपने धर्म और परंपराओं को सहेजने पर गया. आजादी के तुरंत बाद बंटवारे की घटना देश में सांप्रदायिक धु्रवीकरण की ही देन थी, जो स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही पनपने लगा था. आजादी के तुरंत बाद बंटवारे की घटना, धर्माधारित राष्ट्रों का निर्माण, बाद में पाकिस्तान के हमलों ने देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की पृष्ठभूमि तैयार की थी. कालांतर में वोट की राजनीति ने उसको और हवा दी.

उस समय यदि देश के नेता चाहते तो समन्वयात्मक राजनीति की शुरुआत कर सकते थे. पाकिस्तान से अधिक मुसलमान हिंदुस्तान में थे. तथा समाज में आपसी तालमेल बनाए रखना समय की आवश्यकता भी थी. ऐसे कुछ नेता अवश्य हुए जिन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बजाय समन्वयीकरण को अपनी राजनीति का लक्ष्य बनाया. किंतु वे अपने संप्रदाय से उभरकर ही नेता बने थे. उनके प्रशंसकों, समर्थकों में अधिक संख्या उनके अपने धर्मावलंबियों की थी. अतएव अपने संप्रदाय की एकाएक उपेक्षा उनके लिए संभव न थी. दूसरे समन्वयीकरण की राजनीति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले वास्तविक नेता संख्या में बहुत कम थे. उनके पास संसाधनों का भी अभाव था. जो साधनसंपन्न थे, उनके वैसे सरोकार न थे. परिणाम यह हुआ कि आजादी के बाद सभी सरकारें तुष्टीकरण की नीति को अपनाने लगीं. इससे राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य निरंतर दूर होता गया. 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध ने पुराने जख्मों को और भी हरा कर दिया. उस युद्ध में पाकिस्तान को मिली पराजय ने जहां पाकिस्तानी मुसलमानों की हीनताग्रंथि को मजबूत किया, बल्कि हिंदुमुसलमानों के बीच नई दरार बनाने का काम किया. आर्थिक उदारीकरण के समय लगा था कि बाजार और प्रतिस्पर्धा के दबाव सांप्रदायिकता को भी चुनौती देंगे. विकास की चाहत लोगों को एकदूसरे के साथ लाएगी. फलस्वरूप जाति, संप्रदाय, धर्म और क्षेत्रीयता जैसे अनुत्पादक मुद्दे राजनीति से एकएक कर हटते चले जाएंगे. मगर वह केवल खामाख्याली थी. जो अपेक्षाएं की जा रही थीं, उनके लिए एक विवेकीकृत जनसमाज का गठन जरूरी था. लगा था कि विकास के साथ नई शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी ऐसा वातावरण बनाएगी. लेकिन बाजार और पूंजी की अपनी ठसक होती है. वह सबसे पहले उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर कब्जा करती है. उसके सोचने और फैसले लेने की ताकत को चुनौती देती है. फिर उसको ऐसे मोड़ती है कि व्यक्ति वस्तुओं की खरीद अपनी जरूरत के बजाय प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर करने लगता है. धीरेधीरे वह ऐसा उपभोक्ता बन जाता है, जिसे बाजार कठपुतली की भांति अपनी उंगलियों पर नचाता है.

हाल की बात करें तो बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था ने मनुष्य के सारे सोच, सारी हरकतों को सुविधाभोगी बना दिया है. बाजार हालांकि हाल की अवधारणा नहीं है. पांच हजार वर्ष पहले भी बाजार था. व्यापारियों के काफिले दूरदूर तक यात्रा करते थे. बाधाओं का सीना चीरते हुए वे सैकड़ों, हजारों मील दूर निकल जाते थे. इसके साथ वे अपने देश की वस्तुओं के साथसाथ संस्कृति भी ले जाते थे. लेकिन वे व्यापार जरूरत की वस्तुओं का करते थे. विलासिता की वस्तुएं उस समय भी बनती थीं. मगर लोगों की जरूरतों या इच्छाओं पर बाजार का नियंत्रण न था. न बाजार लोगों की पसंदों को नियंत्रित करने की धृष्टता करता था. इसलिए जरूरतें व्यक्ति की अपनी थीं. वे व्यापारी की मनमर्जी से तय नहीं होती थीं. आज पंूजीवादी व्यवस्था ने सारे मायने बदल दिए हैं. स्थिति यहीं तक सीमित होकर रह जाने वाली नहीं है. बाजार न केवल मनुष्य के लिए नई जरूरतें रच रहा है, बल्कि सांस्कृतिक तत्वों को भी बाजार की दृष्टि से परिभाषित कर रहा है. कहीं पर संस्कृति को महत्त्वहीन बनाने के लिए उसको पूंजीपति घरानों के हवाले कर रहा है. उल्लेखनीय है कि बाजार अपने आप में बुरा नहीं है. हजारों, लाखों लोगों की जरूरत को पूरा करने वाली, लाखों को रोजगार देने वाली संस्था समाज की जरूरत ही कही जाएगी. किंतु उसपर मुट्ठीभर लोगों का नियंत्रण, उसका मुनाफाखोरों के हाथों में चला जाना बुरा है. बाजार का मनुष्य के निर्णयसामथ्र्य पर छा जाना बुरा है.

इससे मुक्ति संभव कैसे हो. कैसे बाजार को उसके मूल उद्देश्य तक वापस लाया जाए. यह कैसे हो कि बाजार भी रहे, पूंजी भी रहे और पूंजी अपना स्वभाव छोड़ दे. मनुष्य कठपुतली उपभोक्ता के बजाय विवेकवान ग्राहक की भांति व्यवहार करे. यहां पूंजी के स्वभाव को समझना पड़ेगा. उसका आशय है धनसंपदा का अपना मकसद भूलकर केवल लार्भाजन के काम में जुट जाना. समाज की संपदा जब धर्म भूलकर कुछ लोगों के मुनाफे के लिए काम करने लगती है, तो वह पूंजी बन जाती है. संपदा समाज की रहे, समाज के काम साधे. तभी वह सम्मानेय है. इसलिए पूंजी से अपना स्वभाव छोड़ने की अपेक्षा करना ही समाजवाद है. इसके लिए आवश्यक है कि पूंजी पर उन लोगों का अधिकार हो, जो उसका उपयोग करते हैं. उपयोग के तरीके और प्रविधियां कुछ भी हो सकती हैं, बस वे मानव की गरिमा बढ़ाने वाली हों. गिरानेवाली नहीं. उनसे समाज में उत्पादकता बढ़े, विलासिता नहीं. वस्तुओं का उत्पादन लोगों की जरूरतें पूरा करने के लिए हो, उद्योगों और बाजार पर एकाधिकार सिद्ध करने के लिए नहीं. पर क्या यह संभव है? यदि संभव है तो कैसे? कैसे यह संभव है कि व्यक्ति पूरे समाज के कल्याण के बारे में सोचे तथा उसकी उत्पादकता भी बाधित न हो. यह तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ अपने समूह और समाज के बारे में सोचे. जब समाज में सामाजिक लाभों को आर्थिक लाभों जितनी ही महत्ता दी जाए. बल्कि उत्पादकता का ध्येय सामाजिक लाभ की प्राप्ति हो. आर्थिक लाभ गौण हों.

दरअसल समाजवाद और उसके समानधर्मा अर्थदर्शनों की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे धन के राष्ट्र अथवा श्रमिक संगठनों के अधीन जाने की व्यवस्था तो करते हैं, किंतु नागरिकों को अधिकतम उत्पादन में सहयोग देने की कोई स्पष्ट आचारसंहिता उनके पास नहीं है. साम्यवाद में यह मान लिया जाता है कि उद्योगों पर स्वामित्वबोध की अनुभूति श्रमिकों को अधिकतम उत्पादन के लिए प्रेरित करेगी. जबकि समाजवाद यह मानकर चलता है कि जो समाज अपने प्रतिनिधियों को चुनने में सामथ्र्यवान है, उसके नागरिक अवश्य ही इतने योग्य हैं कि वे अपनी अंतःप्रेरणा के अनुसार राष्ट्रनिर्माण में भी अपना अधिकतम योगदान देंगे. समाजवाद की यह अपेक्षा अनुचित नहीं है. व्यक्ति यदि समाज से कुछ अपेक्षाए रखता है तो उसके समाज के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. आशय है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों व्यवस्थाएं नागरिकों को अधिकतम उत्पादन में सहयोग देने के लिए स्पष्ट आचारसंहिता के बजाय स्वतः प्रेरणाओं का सहारा लेते हैं. जबकि व्यवहार में यह देखा गया है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों में निजी संपत्ति की अधिकारिता का निषेध, नागरिकों को उत्पादन कर्म के प्रति लापरवाह बनाता है. वह नागरिकों के मन में आलस्य की भावना का विकास करता है. जिससे उत्पादकता में घटाव शुरू हो जाता है. परिणामस्वरूप विकासदर शिथिल पड़ने लगती है.

विकासदर को बनाए रखने के लिए कुछ देश बलप्रयोग का सहारा लेते हैं. वहां लोगों से उनके लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए जाते हैं. श्रमिक कामगारों से मनमाना काम लिया जाता है. उनकी मजदूरी उनकी न्यूनतम आवश्यकता के अनुसार तय की जाती है. यह एकदलीय अथवा निरंकुश शासन में ही संभव है. जैसा इन दिनों चीन में हो रहा है. पर इससे आजादी का आधा लक्ष्य ही हासिल हो पाता है. समाज के मानवीकरण की कोशिशें अधूरी रह जाती हैं. वैसे समाजवाद और साम्यवाद की लोगों से यह अपेक्षा अनुचित नहीं है कि लोग स्वतःप्रेरणा के आधार पर उत्पादन में हिस्सा लें और अपना यथासंभव योगदान दें. परंतु दोनों के साथ विडंबना यह है कि उन्हें ऐसे समाजों में काम करना पड़ा है, जहां ही जनता की कई पीढि़यां विकृत सामंतवाद का उत्पीड़न झेलतेझेलते अपना धैर्य, स्वाभिमान और कदाचित स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत भी खो चुकी हैं. इसलिए समानता और बराबरी के समाजवादी सपने लंबे समय तक उसका विश्वास नहीं जीत पाते. दूसरे अपने ही समाज में व्याप्त असमानता के कारण उन्हें ऐसे लोगों से स्पर्धा करनी पड़ती है, जो कई मायने में उनसे बहुत आगे हैं. इसलिए समाजवादी और साम्यवादी सपने उन्हें मायाजाल लगते हैं. जैसे कोई बच्चा बाजार में रंगबिरंगी वस्तुएं देख मचलने लगता है और उन्हें पाने के लिए कभीकभी मातापिता की गोद से उतर जाता है, वैसे ही वे भी छिटकने लगते हैं. आधुनिक समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती, व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक लाभों के बीच तालमेल बनाए रखने की है. साम्यवाद, पूंजीवाद और समाजवाद जैसी व्यवस्थाएं इसी तालमेल के लिए अलगअलग रास्ते सुझाती हैं. इनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएं हैं. कमजोरी यह है कि वे व्यक्ति और समाज के संबंधों पर विशेष ध्यान नहीं देते. इसलिए एक को संभालो तो दूसरा साथ छोड़ने लगता है. व्यक्ति समाज के साथ भी रहना चाहता है और स्वतंत्र भी. किन परिस्थितियों में वह इनमें से किसे वरीयता देता है, यह पूरी तरह उसी पर निर्भर है. लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि नागरिक हितों के सामान्यीकरण को अपनाएं. मगर हितों के सामान्यीकरण की आवश्यकता पहले भी थी, आज भी है. समाजवाद और साम्यवाद दोनों इस बात पर एकमत हैं कि राज की पूंजी हो न कि पूंजी का राज्य. आधुनिक समाज के सामने बड़ी समस्या है. वह समस्या है कि व्यक्ति और समूह के हितों में तालमेल बिठाना. बाजार को तो दोनों ही चाहिए. व्यक्ति भी समूह भी.

बात हमने सरकार से आरंभ की थी और समाजवाद तक आ गई. विचारों की यह यात्रा अन्यथा नहीं थी. एक स्वाभाविक यात्रा है. क्योंकि दोनों का संबंध कहीं न कहीं व्यक्ति से है. उसके खोए हुए स्वाभिमान से है. सरकार इसलिए कर्तव्यच्युत होती हैं, क्योंकि उनपर जनता का वैसा नियंत्रण नहीं हो पाता, जैसा अपेक्षित होता है. समाजवाद और साम्यवाद जनजन के विकास की बात करते हैं, मगर व्यक्ति और समाज के संबंधों में पर्याप्त समन्वय न कर पाने के कारण, वे बहुत जल्दी बिखराब या पतन का शिकार होने लगते हैं. व्यक्ति के भीतर स्वतःप्रेरणाएं न जगा पाने के कारण आर्थिकसामाजिक समानता का लक्ष्य लेकर चले दोनों दर्शन अंतत असफल नजर आने लगते हैं. आखिर क्यों? मनुष्य की अंतःप्रेरणाओं को जगाने का सबसे बड़ा रास्ता तो यही है कि वह अपने अधिकारों को समझे. साथ में यह भी जाने कि म्नुष्य के रूप में उसके अधिकार केवल उसके अधिकार मात्र नहीं हैं, उनके पीछे उसके समाज के प्रति कर्तव्य भी निहित हैं. उसे यह बोध हो कि अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा वह तभी कर सकता है, जब वह दूसरे के मौलिक अधिकारों का सम्मान करे. यहां मानवाधिकारों की भूमिका केंद्रीय हो जाती है. यदि समाजवाद मनुष्य को यह भरोसा दिलाए कि वह आर्थिक लाभ के विभाजन के समय कोई भेदभाव नहीं करेगा और मानवाधिकार यह भरोसा जगाएं कि मनुष्य के मूलभूत अधिकार प्रत्येक अवस्था में सुरक्षित हैं, तब मनुष्य को यह भी भरोसा होगा कि पूरा समाज उसके अधिकारों, सुख की सुरक्षा और संपूर्ति के लिए संकल्पबद्ध हैं. तब निश्चय ही वह समाज और उसकी संस्थाओं को बचाना चाहेगा. यदि मनुष्य स्वयं सामाजिक संस्थाओं का सम्मान करेगा, अपने कर्तव्यों के प्रति चैतन्य और आत्मानुशासित होगा तो अनेक खर्चीली संस्थाओं का औचित्य अपने आप जाता रहेगा.

© ओमप्रकाश कश्यप

अंतोनियो ग्राम्शी और उसका सांस्कृतिक अधिपत्यवाद

सामान्य

यह एक विचित्र संयोग है कि यूरोप के बौद्धिक जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले इटली के अधिकांश विद्वानों ने अपने जीवन का लंबा और महत्त्वपूर्ण हिस्सा कारावास में बिताया तथा वहीं रहते हुए उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन भी किया. उनके लेखन और विचार-क्षेत्र में भी गजब की समानता थी. उनके चिंतन का प्रमुख उद्देश्य उत्पीड़ित जनता के सामंतवादी-पूंजीवादी शोषण से मुक्ति की राह खोजना था. इसके लिए वे शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन के समर्थक थे. प्लेटो से प्रभावित तोमासो कंपानेला(1568—1638) जीवन में शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व देता था. उसका मानना था कि नगर-राज्य के शासकों का चयन धन अथवा जन्म के आधार पर न होकर, उनकी शिक्षा के आधार पर किया जाना चाहिए. केवल शिक्षा व्यक्ति की योग्यता का मापदंड हो सकती है. इटालियन भाषा में लिखी गई उसकी पुस्तक ‘सिटी आ॓फ दि सन’ असल में एक आदर्शलोक का बयान करती है, जिसमें उसने संपत्ति पर निजी अधिकारिता के आगे प्रश्नचिह्न लगाते हुए लिखा था कि—‘सामाजिक शांति और सद्भाव का स्थायित्व तथा व्यक्तिमात्र की खुशी निजी संपत्ति के उन्मूलन पर निर्भर करती है.’ उसके अनुसार—‘निजी संपत्ति सामाजिक सुरक्षा और शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा है. यह सामाजिक एकता को स्थायी रूप से क्षति पहुंचाती है.’ इसलिए अपने ‘यूटोपिया’ में उसने सभी वस्तुओं को सामूहिक आधिकारिता में सम्मिलित किया है. प्लेटो से प्रेरणा लेते हुए ‘सिटी आ॓फ सन’ में उसने ऐसे आदर्श नगर-राज्य की परिकल्पना की है, जिसमें सभी साथ-साथ रहते हैं. एक रसोई का बना भोजन करते हैं. उनमें आपसी विश्वास और सहिष्णुता की भावना हैं. उनके संयुक्त आवासकक्षों, शयनकक्षों में इतनी नीरवता व्याप्त रहती है, जैसी गिरजाघर के प्रांगण में. यहां कंपानेला को याद करने का उद्देश्य मात्र यह बताना है कि महान दार्शनिक फ्रांसिस बेकन के समकालीन कंपानेला ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक की रचना सताइस वर्ष के कारावास की दीर्घावधि सजा भोगते हुए की थी.

कंपानेला की भांति अंतोनियो ग्राम्शी ने भी अपना महत्त्वपूर्ण कार्य कारावास में ही पूरा किया था. जेल में रहते हुए उसने 2848 पृष्ठों की विशद् पांडुलिपि तैयार की, जो ‘कैदी की डायरी’(दि प्रिजन नोटबुक) के नाम से चर्चित है. समय-समय पर लिखी गई वे डायरीनुमा टिप्पणियां मार्क्सवाद पर सर्वथा नए ढंग से विमर्श करती हैं. पूंजीवाद के प्रसार-प्रचार के लिए उसने ‘सांस्कृतिक अधिनायकवाद’ को दोषी माना है. उसके अनुसार पूंजी का समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर अंतरण सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों की देन होता है. इसलिए समानांतर संस्कृति के विकास से ही आर्थिक-सामाजिक विषमता की खाई को पाटा जा सकता है. अंतोनियो ग्राम्शी का जन्म 22 जनवरी 1891 को सरदीनिया द्वीप के केगलियरी प्रांत में हुआ था. यह क्षेत्र इटली के सर्वाधिक निर्धनता-ग्रस्त क्षेत्रों में गिना जाता है. कुल सात भाई-बहनों में चैथी संतान ग्राम्शी के पिता का नाम फ्रांस्सिको ग्राम्शी तथा मां का नाम जियुसिपिना मार्सियस था. अल्बीनिया मूल के ग्राम्शी की अपने पिता से कम ही बनती थी, किंतु वह अपनी मां के बेहद करीब था. जियुसिपिना अच्छी किस्सागो थी. यथार्थ को छूती उसकी कहानियों में तीखा व्यंग्य छिपा होता था. बचपन में मां के मुंह से सुनी गई कहानियों का ग्राम्शी पर गहरा प्रभाव पड़ा. मां के मुंह से लोक-कहानियों के प्रति जन्मा अनुराग ही प्रकारांतर में युवा अंतोनियो के अंतर्मन में साहित्य-प्रेम के रूप में विकसित हुआ.

फ्रांस्सिको ग्राम्शी एक सरकारी कार्यालय में छोटे पद पर काम करते थे. परिवार बड़ा था. इस कारण समस्याएं भी थीं. मगर जियुसिपिना की कुशलता से परिवार की गाड़ी जैसे-तैसे खिंच रही थी. अंतोनियो के जीवन में बड़ा मोड़ उस समय आया जब मामूली अपराध के लिए उसके पिता को नौकरी से बेदखल कर उन्हें पांच वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई. पिता फ्रांस्सिको परिवार की अर्थव्यवस्था का एकमात्र संबल थे. उनके कारावास में जाते ही परिवार पूर्णतः निराश्रित हो गया. रोजगार की तलाश में मां जियुसिपिना अपने बच्चों के साथ गिलर्जा के लिए प्रस्थान कर गईं, जहां अंतोनियो को पाठशाला में प्रवेश दिला दिया गया. उसके परिवार के लिए वे दिन भीषण अभावों और गरीबी से भरे दिन थे. लेकिन दुखों का अंत यहीं सीमित नहीं था. अंतोनियो के जीवन की एक और दुर्घटना उसका पीछा कर रही थी. उन्हीं दिनों की बात है. एक दिन अंतोनियों का नौकर उसको गोद में लेकर घुमाने निकला हुआ था. अचानक वह नौकर की गोद से फिसल गया. गिरने पर अंतोनियो की रीढ़ की हड्डी में चोट आई, जिससे उसका शारीरिक विकास अवरुद्ध हो गया. बड़े होने पर उसका कद पांच फुट से भी दो इंच कम था, जो सामान्य से बहुत कम था. इस असमान्यता ने ग्राम्शी को अंतर्मुखी बनाया. वह अपनी कल्पना की दुनिया पुस्तकों में सजाने लगा. ग्यारह वर्ष का होते-होते अंतोनियो को लगने लगा था कि परिवार के आर्थिक संकट के चलते आगे पढ़ना संभव न होगा. इसलिए पाठशाला की पढ़ाई पूरी करते ही उसको नौकरी करनी पड़ी. अगले दो वर्ष उसने एक कराधान कार्यालय में मामूली नौकरी करते हुए बिताए. ग्राम्शी के लिए जीवन के वे दिन बेहद अभावग्रस्त और चुनौती-भरे थे.

जीवनसंघर्ष ने ग्राम्शी को जुझारू बनाया. अभाव-भरे दिनों में भी उसका अध्ययन चल रहा था. कालांतर में उसको विद्यालय जाने का अवसर मिला, जहां उसने स्वयं को विलक्षण प्रतिभावान विद्यार्थी सिद्ध किया. उसने सभी विषयों में उच्च अंक प्राप्त किए थे. प्राथमिक अध्ययन के बाद उसने संत लसर्जियु के विद्यालय में प्रवेश ले लिया. यह स्थान गिलर्जा से लगभग 16 किलोमीटर दूर था. लसर्जियु में पढ़ाई पूरी करने के उपरांत उसने केगलियरी के डेटरी लाइसियम में प्रवेश ले लिया. उसका भाई जिनेरो भी वहीं अध्ययन करता था. केगलियरी के आसपास औद्योगिक श्रमिकों की सघन बस्तियां थीं. उस समय तक इटली में पूंजीवाद अपना शिकंजा कसने लगा था. वहां की तानाशाह सरकार के साथ मिलकर वह श्रम-शोषण के नए-नए तरीके ईजाद कर रहा था. उससे मुक्ति की वांछा के साथ श्रमिक आंदोलन होते ही रहते थे. वहां रहते हुए ग्राम्शी को श्रमिकों की समस्याओं को जानने का अवसर मिला. वह समाजवादी विचारकों, श्रमिक नेताओं और सुधारवादियों के संपर्क में भी आया. अंतोनियों नौकरी और पढ़ाई साथ-साथ कर रहा था. इसके बावजूद उसके जीवन के अभाव और पिता पर निर्भरता कम नहीं हुई थी. पिता की ओर से समय पर आर्थिक मदद न मिलने पर भी वह परेशान रहता था. अपने पत्रों में अंतोनियो ने अपने पिता पर आर्थिक मदद करने में जानबूझकर विलंब करने तथा उपेक्षा बरतने का आरोप लगाया है. लगातार काम और पढ़ाई के बीच उसका स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता जा रहा था. उसके स्नायुतंत्र में भी कमजोरी आने लगी थी, जो आगे चलकर उसके लिए भारी कष्ट का कारण बनी हुई थी. यह ग्राम्शी की जिजीविषा ही थी, जो उसको संघर्ष के लिए निरंतर पे्ररित करती आ रही थी. 1911 में ग्राम्शी ने स्नातक परीक्षा पास की. वह अपने अध्ययन को आगे बढ़ाना चाहता था, किंतु परिवार की आर्थिक स्थिति सर्वथा प्रतिकूल थी. मगर जहां संकल्प वहां विकल्प. युवा अंतोनियो ने एक परीक्षा में हिस्सा लिया और उच्च अंक प्राप्त करने के कारण उसको सदर्निया के सम्राट की ओर से छात्रवृत्ति का पात्र मान लिया गया. अंतोनियो के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी, जिसने उसके उच्च अध्ययन के लिए रास्ता खोल दिया.

अंतोनियो के साथ छात्रवृत्ति प्राप्त करने वालों में पालमिरो तोगलियत्ती भी था, जिससे उसकी दोस्ती बन गई. तोगलियत्ती आगे चलकर इटली की कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बना और उसने स्वयं को एक दमदार नेता सिद्ध किया. अपने अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए ग्राम्शी ने उच्च अध्ययन के लिए तूरिन विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया. तूरिन उन दिनों औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा था. उसके आसपास के क्षेत्रों में गरीब श्रमिकों की संख्या बहुतायत थी. इसलिए वहां श्रम-शक्ति इटली के बाकी हिस्सों से सस्ती थी. वहां रहते हुए वह समाजवादी नेताओं के संपर्क में आया. इनमें से एक का नाम एंजलो तास्का का था. तास्का कालांतर में ‘इटालियन समाजवादी पार्टी’ का सदस्य बना और ग्राम्शी के साथ अनेक संघर्षपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया. एक ओर जीवन के अभाव, परिवार की ओर मिल रही उपेक्षा तथा बीमारी, इन सभी ने अंतोनियो के लिए विकट परेशानियां खड़ी की हुई थीं. उसकी शारीरिक विकलांगता बढ़ती जा रही थी, विशेषकर स्नायुतंत्र की समस्या, जिससे मुक्ति का कोई उपाय उसको नजर नहीं आ रहा था. चुनौतियों से कदम-कदम पर जूझते, भूख, गरीबी, अभाव और संघर्षों से गुजरते हुए अंतोनियो ने न केवल अपनी पढ़ाई की निरंतरता को बनाए रखा, बल्कि मानविकी, समाजविज्ञान, भाषाशास्त्र, राजनीति, दर्शनशास्त्र आदि क्षेत्रों में अनेक उपाधियां प्राप्त कर लीं. अंतोनियो के अध्यापक उसकी प्रतिभा से चमत्कृत थे. विशेषकर समाजविज्ञान और भाषाविज्ञान में तो उसका ज्ञान अप्रतिम था. अध्ययन के दौरान वह तत्कालीन बुद्धिजीवियों के संपर्क में आया, जिनमें बेनडिट्टो क्रूस जैसे प्रखर मार्क्सवादी विद्वान के अलावा रोन्डोल्फो मानडोल्फो, जियोवनी जेंटिल, अंतोनियो लाब्रओला आदि प्रमुख थे. उन्हीं के बीच रहते हुए ग्राम्शी ने हीगेल के द्वंद्ववाद, फायरबाख की धर्म-संबंधी अवधारणा तथा मार्क्स के वैज्ञानिक भौतिकवाद का गहरा अध्ययन किया. मार्क्स ने ग्राम्शी को प्रभावित तो किया परंतु उसके दर्शन की असंगतियां भी उससे छिप न सकीं.

पढ़ाई पूरी करने के पश्चात अंतोनियो जैसे प्रतिभाशाली छात्र के लिए अवसरों की कमी न थी. अध्यापन का क्षेत्र तो उसके स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार था. किंतु एक ही ढर्रे से बंधा जीवन उसको स्वीकार न था. खूब सोच-विचार के बाद उसने पत्रकारिता को कैरियर के रूप में प्रधानता दी. 1914 से ही उसके लेख समाजवादी पत्रों में छपने लगे थे, जिन्हें व्यापक प्रसिद्धि मिली थी. फलस्वरूप एक लेखक-पत्रकार के रूप में ग्राम्शी की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ रही थी. तूरिन के राजनीतिक, आर्थिक परिदृश्य को लेकर लिखे गए उसके लेख आंखें खोल देने वाले होते थे. 1916 में उसको तूरिन से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित समाचारपत्र ‘अवांति’ में सहसंपादक चुन लिया गया. इससे जीवन में कुछ आर्थिक स्थायित्व आया. पत्रकारिता के साथ-साथ ग्राम्शी ने खाली समय में श्रमिकों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी ओट रखी थी. एक कुशल वक्ता और नेतृत्वकर्ता के रूप में भी उसका नाम लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ था. श्रमिक संगठनों के बीच दिए गए उसके भाषण सदैव चर्चा का विषय बनते थे. वह रोमिन रोलेंड के प्रगतिवादी उपन्यासों, पेरिस कम्यून, फ्रांस तथा इटली की क्रांति, स्त्री-मुक्ति के प्रश्नों और मार्क्सवादी साहित्य पर अक्सर श्रमिकों के बीच विमर्श करता रहता था. इटली, विशेषकर उसके तूरिन प्रांत में समाजवादी विचारधारा का असर बढ़ता ही जा रहा था. लोग पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध संगठित हो रहे थे. सरकार ने समाजवाद के उफान को थामने के लिए ताकत का इस्तेमाल किया. परिणाम यह हुआ कि 1916 में एक-एक कर इटली के अधिकांश समाजवादी नेता गिरफ्तार कर लिए गए. सरकार की दमनकारी नीति के विरोध में 1917 में श्रमिक आक्रोश भड़क उठा. ग्राम्शी की श्रमिक संगठनों के बीच विश्वसनीयता थी. श्रमिकगण उसके एक आवाह्न पर संगठित हो जाते थे. उसकी ख्याति एक समाजवादी विचारक एवं नेता की थी. 1919 में ग्राम्शी ने एंजलो तास्का,

उम्ब्रेटो तारसिनी तथा तोगलियाती के साथ मिलकर समाजवादी विचारधारा के समाचारपत्र ‘दि न्यू आर्डर: एक वीकली रिव्यू आॅफ सोशिलिस्ट कल्चर’ की शुरुआत की. कालांतर में वह बहुत प्रभावशाली समाचारपत्र सिद्ध हुआ. प्रारंभ में उसका प्रकाशन साप्ताहिक आधार पर किया जाता था, बाद में उसको द्वैमासिक कर दिया गया. उस पत्र ने श्रमिकों के बीच वर्गचेतना जाग्रत करने का काम किया. प्रगतिशील साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग पहले से ही श्रमिकों के समर्थन में था. ग्राम्शी और उसके सहयोगियों पर श्रमिकों के नेतृत्व का दायित्व था.

1917 की सोवियत क्रांति ने विश्व-भर के श्रमिक संगठनों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था. लेनिन से प्रभावित ग्राम्शी श्रमिक आंदोलनों की सफलता के लिए रात-दिन काम कर रहा था, किंतु श्रमिक नेताओं के आपसी मनमुटाव के कारण सरकार उनके आंदोलन को कुचलने में कामयाब हो गई. ग्राम्शी अकेला पड़ गया. आंदोलन की असफलता ने ग्राम्शी को रूस की भांति इटली में भी साम्यवादी दल के गठन के बारे में सोचने को विवश कर दिया. अपने सोच को कार्यान्वित करते हुए उसने 21 जनवरी 1921 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इटली’ का गठन किया. ग्राम्शी को उसकी केंद्रीय समिति में स्थान मिला. बावजूद इसके वह पार्टी के कार्यक्रमों को लेकर कोई अग्रणी भूमिका निभाने में नाकाम रहा. तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के नेतृत्व में इटली की फासिस्ट सरकार मनमानी पर उतारू थी. देश में उत्तरोत्तर गंभीर होती जा रही सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं के निदान का कोई भी गणतांत्रिक हल उसको स्वीकार्य न था. नवंबर 1926 में तानाशाह सम्राट ने एक विशेष प्रस्ताव के जरिये इटली की संसद के साथ सभी विपक्षी संगठनों को भंग कर, उनके प्रकाशनों पर रोक लगा दी. विरोधी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. इटली में समाजवाद का पथ सहसा अवरुद्ध हो गया. 1922 में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में वह रूस की यात्रा पर निकला, वहां उसका संपर्क जूलिया सुचेत नामक वायलिन वादक से हुआ. शीघ्र ही दोनों दांपत्य-बंधन में बंध गए. जूलिया स्वयं रूस की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य थी. उसने ग्राम्शी के दो बेटों डेलिनो और गुलियानो को जन्म दिया. जिन दिनों वह रूसी प्रवास पर था, इटली में तानाशाह मुसोलिनी समाजवादी नेताओं पर कहर बरपा रहा था. अधिकांश विरोधी कैद कर लिए गए थे. देश से बाहर रहकर भी ग्राम्शी पार्टी को बचाए रखने का भरसक प्रयत्न करता रहा. 1924 में उसको इटली की कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव चुन लिया गया. इससे पार्टी-नेतृत्व की समस्त जिम्मेदारी उसके ऊपर आ गई. पार्टी संगठन के लिए काम करते हुए उसने उसके मुखपत्र ‘यूनिटी’ का प्रकाशन आरंभ किया. इस दौरान वह स्वयं रोम के प्रवास पर था, जबकि उसका परिवार मास्को में रह रहा था.

1921 से 1926 के वर्ष ग्राम्शी के जीवन के सर्वाधिक कठिन दिन थे. उसने स्वयं उस अवधि को ‘संघर्ष और चुनौती’ से भरे वर्ष माना है. इटली में तानाशाह मुसोलिनी तथा विरोधी आमने-सामने थे. पूरे देश में तनाव व्याप्त था. 31 अक्टूबर, 1926 को मुसोलिनी पर विरोधियों द्वारा जानलेवा हमला किया गया. गुस्साए तानाशाह ने आपातस्थिति की घोषणा कर दी. साम्यवादी पार्टी के सभी बड़े नेता एक झटके में गिरफ्तार कर लिए गए. ग्राम्शी को इस षड्यंत्र की कोई जानकारी न थी. तानाशाह सरकार भी यह जानती थी. तो भी 8 नवंबर, 1226 की शाम पुलिस ने ग्राम्शी को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया. यह गिरफ्तारी ग्राम्शी को ‘कम्युनिस्ट पार्टी आ॓फ इटली’ की बैठक में सम्मिलित होने से रोकने के लिए की गई थी. फासीवादी सरकार किसी भी तरह समाजवादी आंदोलन को कुचल देना चाहती थी. गिरफ्तार ग्राम्शी को ‘रेजिन कोइली’ नामक जेल में ले जाया गया. रोम स्थित इस जेल में खतरनाक और कुख्यात अपराधियों को कैद करके रखा जाता था. उस समय ग्राम्शी की वयस् मात्र 35 वर्ष थी और शरीर अनेक व्याधियों से ग्रस्त. लेकिन सरकार तो उसके विचारों से आतंकित थी. ग्राम्शी की गिरफ्तारी पर मुसोलिनी की प्रतिक्रिया थी—‘हमें इसके दिमाग के सोचने पर लगाम लगा देनी चाहिए.’ अपने तानाशाह सम्राट की इच्छा को दोहराते हुए मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के वकील ने कहा था—

‘हमें इसके दिमाग के सोचने पर अगले बीस वर्षों तक अंकुश लगा देना चाहिए.’

तानाशाह की अदालत ने वही फैसला दिया जो तानाशाह चाहता था. ग्राम्शी पर राष्ट्रदोह का आरोप लगाकर पांच वर्ष की सजा सुनाई गई. उसको उसटिका के सुदूर टापू पर कैद कर दिया गया. ग्राम्शी को खतरनाक जेल में कैद कर देने से ही सरकार को संतोष न हुआ. अगले ही वर्ष उसकी सजा बढ़ाकर बीस वर्ष कर दी गई. ग्राम्शी पहले से ही शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त था. जेल के वातावरण का सबसे बुरा असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ा. जेल प्रशासन ने ग्राम्शी पर बाहर से आए लोगों से मिलने-जुलने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था. केवल उसका भाई उससे संपर्क कर सकता था. जेल के प्रतिकूल वातावरण में ग्राम्शी का स्वावस्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था. ग्राम्शी को दी गई सजा की प्रतिक्रिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी. कई देशों ने उसको दी गई सजा की आलोचना की थी. 1932 में रूस ने इटली सरकार के समक्ष राजनीतिक बंदियों के आदान-प्रदान का प्रस्ताव रखा, किंतु इतालवी सरकार ने उसको अस्वीकार कर दिया. 1934 में ग्राम्शी की तबियत अचानक गंभीर हो जाने से सरकार के सामने समस्या खड़ी हो गई. अंततः तानाशाह सरकार ग्राम्शी को कड़ी शर्तों के आधार पर आजाद करने को तैयार हो गई. ग्राम्शी को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, किंतु उस समय तक काफी देर हो चुकी थी. डाक्टरी उपचार उसके स्वास्थ्य को स्थायी लाभ पहुंचाने में असमर्थ रहे. अंततः 27 अप्रैल, 1937 को उसने रोम स्थित कोसिसना नामक अस्पताल में अंतिम सांस ली. इस तरह बीसवीं शताब्दी का सर्वाधिक मौलिक विचारक, मनुष्यता के लिए सतत जूझता हुआ इस दुनिया से सदा के लिए कूंच कर गया.

ग्राम्शी के विरोधी उसके विचारों से भय खाते थे. उनकी कामना थी कि वह अपने दिमाग से काम न ले. किसी तरह सोचना बंद कर दे. इसके लिए उन्होंने उसको गहन कारावास में बंद भी किया था. ऐसे कारावास में जहां खूंखार कैदियों को बंद रखा जाता था. यह सोचकर कि जेल की अंधेरी, सीलनभरी कोठियों में उसका दिमाग अपने आप जकड़ जाएगा. लेकिन उनके ये मनसूबे कामयाब न हो सके. जेल में भी ग्राम्शी का मस्तिष्क सतत सक्रिया बना रहा. बल्कि कालकोठरी के एकांत और उसकी गहन नीरवता ने उसको और भी सक्रिय कर दिया था. तानाशाह के मनसूबों पर पानी फेरते हुए ग्राम्शी ने गिरफ्तार होने के तुरंत बाद अपनी वैचारिक परिकल्पनाओं को लेकर नए सिरे से अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया था. वह सांस्कृतिक अधिपत्यवाद को पूंजीवाद के विकास में सहायक मानता था. जेल में रहते हुए लेखन-संबंधी भावी योजनाओं का उल्लेख उसने अपनी साली ततियाना को 9 मार्च 1927 को लिखे गए एक पत्र में किया था. पत्र में उसने कुछ ऐसा लिखने का उल्लेख किया था, जिसमें उसके निजी जीवन के साथ इटली के प्रख्यात बुद्धिजीवियों तथा उनके विचारों को लेकर व्यापक विमर्श हो. जिसमें भाषा-विमर्श के साथ इटली के समाज और राजनीति पर भी विशद् चर्चा हो. साथ ही उसके अपने समाज की चिंताएं तथा लोगों का दुख-दर्द भी हो.

एक अन्य पत्र में ग्राम्शी ने दावा किया था—‘मैं अंधेरे में पत्थर उछालने का कोई इरादा नहीं रखता. मेरे पास कहने के लिए कुछ खास बातें हैं.’ पत्र लिखते समय ग्राम्शी के दिमाग में क्या था, वह पूरी तरह तो सामने नहीं आ सका. नियति ने उसे इतना अवसर ही नहीं दिया कि वह अपने मस्तिष्क में समाए विचारों को पूरी तरह कागज पर उतार सके. तो भी जेल प्रवास के दौरान वह अपनी वैचारिक चेतना को शब्दों के माध्यम से कागज पर उतारता रहा. उसकी मृत्यु के समय जेल में लिखी गई उसकी तैतीस डायरियां बरामद हुई थीं. ततियाना उन्हें बचाकर इटली से बाहर ले जाने में सफल हो गई. यूं तो ग्राम्शी ने कारावास से बाहर रहकर भी सारगर्भित लेखन किया था, लेकिन उसकी ख्याति तैंतीस डायरियों तथा उन पत्रों के कारण हैं जो जेल में लिखे गए थे. उसकी मृत्यु पर टिप्पणी करते हुए पादरी ने हालांकि कहा था कि मरणासन्न अवस्था में ग्राम्शी को पुनर्जन्म पर विश्वास हो चला था. उसने अपने पापों के लिए पादरी के समक्ष ईश्वर से क्षमा मांगते हुए प्राण त्यागे थे. लेकिन जेल के दस्तावेज दर्शाते हैं कि मृत्यु के समय उसके पास कोई भी पादरी नहीं था. न ही उसने उस अवसर पर किसी से धार्मिक विश्वास का जिक्र ही किया था. रही पापों की बात, ग्राम्शी जैसा विचारक जिसने अपना पूरा जीवन विपन्नों-शोषितों के कल्याण की चिंता में बिताया था, वह कभी पाप का भागी हो ही सकता. उसके संघर्ष को पापकर्म बताने वाली धर्मसत्ता तानाशाह सरकार को झेलने तथा उसको समर्थन देते रहने के लिए स्वयं पाप की भागी थी.

सांस्कृतिक अधिपत्यवाद

बीसवीं शताब्दी के महानतम चिंतकों में अंतोनियो ग्राम्शी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है. उसने मार्क्स के विचारों को अपनाया. किंतु बंधे-बंधाए ढर्रे पर चलने, उसकी रूढ़िग्रस्त परिभाषाओं को अपनाने के बजाय उसने मार्क्स द्वारा प्रणीत वैज्ञानिक समाजवाद की अपने ढंग से व्याख्या की. वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत की व्याख्या के लिए उसने संस्कृति को आधार बनाया और सांस्कृतिक अधिपत्य को शोषण के प्रमुख कारणों में गिना. अपने दस वर्ष से लंबे कारावास के दौरान उसने 30 से अधिक डायरियां तथा लगभग 500 पत्र लिखे थे. इनके अतिरिक्त लगभग 3000 पृष्ठों की साम्रगी इतिहास और सामाजिक विश्लेषण को लेकर प्राप्त हुई है. उसके लेखन को ‘कैदी की डायरियां’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है. ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ को पूंजीवाद के सुरक्षाकवच की संज्ञा दी है. उसके अनुसार शोषण से मुक्ति का एक ही रास्ता है, सांस्कृतिक विषमता की गहरी खाई को पाटना. सांस्कृतिक-जातीय कुंठा के दायरों से बाहर निकलकर समानतावादी सोच को अपनाना. उसने श्रमिकों को प्रोत्साहित किया था कि वे शिक्षा पर जोर दें तथा अपने भीतर से समर्पित बुद्धिजीवी पैदा करें. प्रसंगवश उल्लेख किया जा सकता है कि ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ ग्राम्शी की मौलिक स्थापना नहीं थी. इस अवधारणा का सर्वप्रथम उल्लेख व्लादिमिर लेनिन द्वारा किया गया था. ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ से लेनिन का आशय श्रमिक वर्ग के संगठित राजनीतिक शक्ति को लोकतांत्रिक क्रांति के निमित्त तत्पर करने से था. ग्राम्शी ने इस अवधारणा का विस्तार करते हुए उन कारणों की व्यापक समीक्षा की थी, जो उसको मार्क्सवाद के प्रचार के अवरोधक जान पड़ते थे. जो समाज में पूंजीवाद को संरक्षण प्रदान करते हैं. जिनके कारण समाजवाद की स्थापना का सपना जिसे मार्क्सवाद अपने आरंभ से ही देखता आ रहा था—बीसवीं शताब्दी में पूरा न हो सका था. इसी के कारण पूंजीवाद आज पहले से कहीं अधिक मजबूत एवं सुरक्षित है. ग्राम्शी इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पूंजीवाद न केवल हिंसा और राजनीतिक-आर्थिक मनमानी का सहारा लेता है, बल्कि वह सामाजिक आदर्शो एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को भी अपने विमर्श में मनमाना रूप दे देता है. परिणामस्वरूप नौकरशाही और बुर्जुआवाद जनसाधारण की सामान्य तर्कबुद्धि में गहरे पैठ जाते हैं. इससे समाज, विशेषकर श्रमिक वर्ग के बीच यह रजामंदी बनने लगती है कि कामगार वर्ग तथा बुर्जुआवर्ग के हित परस्पर स्वतंत्र एवं एक-दूसरे से भिन्न हैं. यह प्रवृत्ति उन्हें परिस्थिति से अनुकूलन की ओर ले जाती है. इससे दोनों के बीच व्याप्त कृत्रिम स्तरीकरण नैसर्गिक व्यवस्था का रूप लेने लगता है, जो अंततः श्रमिक आक्रोश और उसके संघर्ष को कमजोर करता है. अपनी दुरवस्था को श्रमिक अपनी नियति मानने लगता है और उसके निदान के लिए पराभौतिक शक्तियों की शरण में चला जाता है. इससे न केवल उसका संघर्ष कमजोर पड़ता है, बल्कि दुरवस्था के लिए जिम्मेदार कारकों से मुक्ति की उसकी छटपटाहट भी कमजोर पड़ने लगती है. उसकी यह प्रवृत्ति धर्मसत्ता को समाज में अपरिहार्य एवं शक्तिसंपन्न बनाती है, जो सर्वहारा के मुक्ति-संघर्ष को कमजोर करने का काम करता है.

ग्राम्शी के चिंतन का मुख्य बिंदू भी यही है. उसके अनुसार सांस्कृतिक संरक्षणवाद सामाजिक शक्ति-केंद्रों पर राज करता है. मनुष्य केवल विवेक से ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ की जकड़न से बाहर आ सकता है. शिक्षा जिसका प्रमुख लक्ष्य मनुष्यमात्र को अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकालना है, इस लक्ष्य की प्राप्ति में मनुष्य का मार्गदर्शन कर सकती है. इसलिए श्रमिकों को चाहिए कि वे शिक्षा को महत्त्व देते हुए अपने बीच से प्रतिबद्ध और संकल्पवान बुद्धिजीवी पैदा करें. किंतु बुद्धिजीवियों की विश्वसनीयता का पैमाना क्या हो? ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ का सामना करने के लिए वैकल्पिक सांस्कृतिक मूल्यों, प्रतीकों का गठन भी तो बुद्धिजीवियों के सहयोग और समर्थन के बगैर संभव नहीं है. जेल की कालकोठरी में जीवन जीते हुए ग्राम्शी ने इस अवस्था पर भी गंभीर विचार किया था. उसके अनुसार बुद्धिजीवियों की पहचान सामाजिक परिवर्तन के निमित्त उनकी भूमिका से आंकी जानी चाहिए. न कि सिर्फ उनके लेखन और वक्तव्यों के आधार पर. यानी परिवर्तन के इच्छुक बुद्धिजीवी का सामाजिकरूप से सक्रिय होना आवश्यक है. ऐसे बुद्धिजीवी जो अपने समूह की चिंताओं, समस्याओं से परिचित हों; तथा उनके निदान के लिए निरंतर आंदोलनरत रहने का साहस भी रखते हों, उन्हें वरीयता दी जानी चाहिए. ग्राम्शी के अनुसार सामाजिक निष्क्रियता के दौर में तकनीकी तथा राजनीतिक नेतृत्व धीरे-धीरे अपनी पकड़ बनाने लगते हैं और कालांतर में दूसरों को छोड़कर इतना आगे निकल जाते हैं कि उन के वर्चस्व से मुक्ति जनसाधारण के लिए असंभव-सी हो जाती है. उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए आवश्यक है कि श्रमिक वर्ग अपने बुद्धिजीवियों की मदद से समानांतर राजनीतिक-सांस्कृतिक संस्थाओं का विकास करे.

ग्राम्शी की ‘बुद्धिजीवी’ की परिभाषा व्यापक है. उसके अनुसार हर वह व्यक्ति बुद्धिजीवी है जो धनार्जन के लिए सीधे श्रम के बजाय बुद्धिबल से काम लेता है, तथा श्रम की अपनी आवश्यकता बाजार से पूरी करता है. तदनुसार उसने ‘पूंजीवादी उद्योगपति’ को प्रथम ‘बुद्धिजीवी स्वीकार किया है. जो अपने साथ तकनीक विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, संस्कृतिकर्मी, विधिवेत्ताओं का समुच्चय बनाता है तथा उनको अपने हितों के अनुरूप उपयोग में लाता है. वह स्वयं इस संगठन के शीर्ष पर विराजमान रहता है तथा अपने समूह के सदस्यों के स्तर-निर्धारण के लिए एकमात्र निर्णायक शक्ति होता है. सहायक बुद्धिजीवियों की मदद से वह श्रमिकों के दिलों में यह बात भली-भांति बिठा देता है कि उनकी दुर्दशा के कारण कहीं और विद्यमान हैं और वह उनका सर्वप्रथम शुभचिंतक है. ग्राम्शी के अनुसार हमें मालूम होना चाहिए कि बहुत-से बुद्धिजीवी अपने समूह के भीतर स्वयं को स्वतंत्र और सर्वेसर्वा घोषित कर शीर्षस्थ स्थान कब्जाए रखते हैं. वे स्वयं और अपने समूह को दूसरों से अलग तथा विशिष्ट माने रहते हैं. यह विशिष्टताबोध उन्हें आय का बड़ा हिस्सा अपने पास रखने, अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए दूसरों पर शासन करने को प्रेरित करता है. ऐसा कोई भी सामाजिक समूह जो पूर्ववर्ती आर्थिक संरचना का निषेध कर इतिहास में दस्तक देना चाहता है, उसको समकालीन बुद्धिजीवियों से बौद्धिक स्तर पर भी जूझना पड़ता है. उससे उम्मीद की जाती है कि वह परिवर्तनों को चाहे वे कितने ही प्रगतिगामी क्यों न हों, इतिहासक्रम को बगैर झुठलाए तथा प्रचलित व्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाए बिना पूरा करे. ऐसे बुद्धिजीवियों को ग्राम्शी ने ‘परंपरा-पोषक बुद्धिजीवी’ के विशेषण से नवाजा है. ऐसे बुद्धिजीवियों में प्रशासक, रूढ़िवादी दार्शनिक, सिद्धांतकार, विधिवेत्ता, शिक्षक, प्रोफेसर, वैज्ञानिक आदि होते हैं. ऐसे कथित बुद्धिजीवियों को यदा-कदा ‘क्लर्क’ से भी संबोधित किया जाता है, जो इन छद्म विद्वानों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त संबोधन है. यदि हम छद्म बुद्धिजीवियों की पहचान के लिए कोई सार्वत्रिक कसौटी बनाने की कोशिश करें या उनके विचारों के सहारे गतिशील सामाजिक समूहों का अध्ययन करने का प्रयास करें तो यह असंभव है. इसलिए कि अपनी प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाए ये छद्म बुद्धिजीवी सच को आसानी से बाहर नहीं आने देते. इस प्रकार के बुद्धिजीवियों की बौद्धिक गतिविधियों की व्याख्या करना, बजाय इसके कि जिस समाज में ये बुद्धिजीवी रहते हैं, उनका अध्ययन किया जाएµसैद्धांतिक रूप से अनुचित होगा. छद्म बुद्धिजीवियों का एक लक्षण यह भी है कि वे बौद्धिक श्रम को शारीरिक श्रम पर वरीयता देते हैं, तथा समाज में वर्गभेद का समर्थन करते हैं. इससे वास्तविक उत्पादक को, जो अपने श्रम-कौशल से उत्पादन को संभव बनाता है, उत्पादन का पूरा लाभ नहीं मिल पाता. इससे शोषण को बढ़ावा मिलता है. अपने प्रतिक्रियावादी चिंतन द्वारा ये बुद्धिजीवी समाज में यथास्थिति बनाए रखने में सहयोग करते हैं. परिणामस्वरूप सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाता है.

ग्राम्शी ने वर्गभेद की समस्या के निदान के लिए शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है. उसके अनुसार केवल शिक्षा ही ऐसा उपक्रम है, जिससे इन छद्म बुद्धिजीवियों के प्रलोभन में आने से बचा जा सकता है. इसलिए श्रमिक वर्ग को चाहिए कि वह अपने भीतर से समर्थक बुद्धिजीवी पैदा करे. ऐसे बुद्धिजीवी जो समानांतर संस्कृति को जन्म देने में सक्षम हों. कालांतर में ये बुद्धिजीवी इस अवधारणा को कि मध्यवर्गी जीवनमूल्य समाज ही वास्तविक मूल्यों का पर्याय हैं, उखाड़ फेंकने में सक्षम होंगे. इनके प्रभाव से बुद्धिजीवी वर्ग का ध्यान शोषित वर्गों की ओर आकर्षित होगा, जो कालांतर में आमूल परिवर्तनों को जन्म देगा. ग्राम्शी का यह सिद्धांत ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ कहलाता है, जिसमें विकसित संस्कृति अपने भीतर के अल्पविकसित सांस्कृतिक समूहों को भ्रमित किए रहती है. वह उन्हें अपनी दुरवस्था के कारणों की तह में जाने से रोकती है. लेनिन का विचार था कि संस्कृति राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक है. दूसरी ओर ग्राम्शी का मानना था कि वर्तमान परिदृश्य में सत्ता प्राप्ति के लिए सांस्कृतिक अधिपत्य के बिना संभव नहीं, इसलिए समानांतर संस्कृति के विकास द्वारा पहले सांस्कृतिक वर्चस्व प्राप्त करना चाहिए. ग्राम्शी का विश्वास था कि कोई भी समूह जो आधुनिक परिदृश्य में समाज के नेतृत्व की जिम्मेदारी उठाना चाहता है, उसको अपने क्षुद्र आर्थिक स्वार्थों से ऊपर उठकर बौद्धिक एवं नैतिक नेतृत्वकारी योग्यता अपने भीतर पैदा करनी होगी. साथ ही उसको विभिन्न प्रकार के संगठनों और सहयोगियों के साथ तालमेल बनाना चाहिए, तभी वह चारों और से उमड़कर आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकता है. ग्राम्शी ने सामाजिक बलों के संगठन को ‘ऐतिहासिक गुट’ की संज्ञा दी थी. यह पद उसने उनीसवीं शताब्दी के फ्रांसिसी वामपंथी विचारक जार्ज सोरेल से उधार लिया था. उसने उम्मीद जाहिर की थी कि ऐतिहासिक गुटों का गठन पूर्व निर्धारित सामाजिक व्यवस्थाओं के अनुसार किया जाएगा, जो विभिन्न संस्थाओं के साथ गठजोड़ कर सामाजिक संबंधों और धारणाओं का विकास करेंगे.

ग्राम्शी का मानना था कि पश्चिम में बुर्जुआ संस्कृति के मूल्य धर्म से आबद्ध थे. इसलिए वर्चस्ववादी संस्कृति की अधिकांश व्याख्याएं धार्मिक रीति-रिवाजों और मूल्यों को समर्पित रही हैं. कहीं न कहीं वह रोमन कैथोलिज्म से प्रेरित और प्रभावित था और मानता था कि चर्च ने उच्च शिक्षित और अल्प शिक्षित नागरिकों के धर्म के बीच खाई को बढ़ने से रोका है. समाज में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक विभाजन चाहे जितना बड़ा हो, किंतु धार्मिक आधार पर उनके बीच बहुत कम अंतर देखने को मिलता है. लेकिन धार्मिक कर्मकांडों में समानता व्यक्ति को उसकी आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता से विमुख किए रखती है, जिससे वह अपने शोषण के लिए अपनी नियति को दोषी मानने लगता है. उसका मानना था कि केवल मार्क्सवाद ने ही धर्म की विशुद्ध वैज्ञानिक आधार पर आलोचना है. और उसको उदार मानवतावाद के रूप में पहचान दिलाने के लिए संघर्षरत रहा है. उसकी यह भी मान्यता थी कि मार्क्सवाद धर्म को केवल उस अवस्था में चुनौती दे सकता है, जब वह जनसाधारण की पराभौतिक जिज्ञासाओं का समाधान करने में सफल हो तथा आम जनता उसको अपने अनुभव के माध्यम से अभिव्यक्त कर सके. धर्म वस्तुतः एक जटिल अवधारणा है. मनुष्य की पारलौकिक जिज्ञासाओं के शमन का दायित्व दर्शन और अध्यात्म का है. धर्म में सामाजिक आचार-विचार और अध्यात्म घुल-मिल जाते हैं. मार्क्सवाद स्वयं एक दर्शन है, किंतु मार्क्स तथा उसके अनुयायियों द्वारा मार्क्सवाद का प्रचार-प्रसार के लिए वही रास्ते अपनाए गए, जो उस समय तक धर्म के लिए लगभग आरक्षित थे. मार्क्स को उसके समर्थकों द्वारा भगवान मान लिया गया. मार्क्सवाद को लेकर कुछ ऐसी ही स्थिति आज भी है. ग्राम्शी इस अतिशय समर्पण के खतरों को पहचानता था. वह शिक्षा को परिवर्तनकारी शक्ति मानता था. उसका मनुष्यमात्र में गहरा विश्वास था. उसका मानना था कि—

‘सभी मनुष्य प्रतिभासंपन्न होते हैं….वे तर्कसम्मत और प्रतिभाशाली लोगों से युक्त संगठनों का संचालन भी करते हैं…लेकिन वे सभी प्रतिभासंपन्न लोग, बुद्धिमानों जैसे सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह नहीं करते.’

बुद्धिजीवियों की चारित्रिक विशेषता की ओर संकेत करते हुए उसने लिखा था कि वे प्राचीन दार्शनिकों की भांति महज चिंतक और वक्ता नहीं हैं, जो समाज को अपने ज्ञान से समृद्ध कर निर्लिप्तता ओढ लेते हों. अपने समाज का प्रबोधीकरण, व्यक्तिमात्र का चारित्रिक उत्थान उनके आचरण का सहज-स्वाभाविक हिस्सा था, न कि व्यवसाय. इसके वह निजी सुख की परवाह किए बिना कर्तव्य मानकर करते थे. दूसरी ओर आधुनिक बुद्धिजीवी पूर्णतः व्यावहारिक तथा जोड़-घटाव करने वाले नौकरशाहों जैसे हैं. वे शिक्षा, संचार आदि समाजोपयोगी माध्यमों का उपयोग समाज में वर्गभेद पैदा करने तथा सामाजिक स्तरीकरण को बढ़ावा देने के लिए करते हैं. इस तरह वे समाज में पूंजीवाद को मजबूत करने में सहायक की भूमिका निभाते हैं. इन स्थितियों पर नियंत्रण कैसे किया जाए? कैसे उन छद्म बुद्धिजीवियों से जनसामान्य को मुक्ति दिलाई जाए—ग्राम्शी ने इसपर विस्तार से लिखा है. उसका मानना था कि प्रायोगिक शिक्षा समाज में श्रम-संस्कृति के विकास में सहायक हो सकती है. अतएव उसने ऐसी शिक्षा के विकास पर जोर दिया था, जो न केवल श्रमिकों को आत्मनिर्भर बनाए बल्कि उनके बीच से संकल्पवान बुद्धिजीवी पैदा कर सके. ग्राम्शी के अनुसार ऐसे बुद्धिजीवी न केवल सर्वहारावर्ग की मदद के बगैर समाजवादी विचारधारा को स्थापित करने के लिए तत्पर होंगे, साथ ही अभिजात संस्कृति को जनसंस्कृति में बदलने के लिए भी प्रयासरत होंगे. ग्राम्शी के शिक्षा-संबंधी विचारों का प्रायोगिक विस्तार आगे चलकर ब्राजील के दार्शनिक पाब्लो फ्रेरा के चिंतन-कर्म में देखने को मिलता है.

ग्राम्शी की ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ पूंजीवादी राज्य की विशेषताओं की ओर संकेत करता है. जिसका आशय है बल और सहमति द्वारा राज करना. पूंजीवादी शक्तियों के समर्थन पर टिका राज्य अपनी नीतियों एवं कर्तव्यों द्वारा श्रमविरोधी आचरण अपनाता है. वहां आमजन की उपयोगिता एक उपभोक्ता वस्तु जितनी ही होती है. सरकार की समस्त नीतियां और अन्यान्य व्यवस्थाएं इसी को बनाए रखने को प्रयासरत होती हैं. लेकिन पूंजीवाद की अच्छी सेहत के लिए सस्ता श्रम चाहिए और भरपूर उपभोक्ता भी. इसलिए इसलिए पूंजीवादी सरकार अपने समस्त आयोजन आमसहमति के नाम पर करती है. कह सकते हैं कि पूंजीवादी राज्य लोकतंत्र को अपने सुरक्षाकवच की भांति अपनाए रहते हैं. इससे जनसहमति के नाम बना पूरा का पूरा तंत्र पूंजीवादी मंसूबों को साधने वाली मशीन बन जाता है. यहां ‘राज्य’ का आशय केवल सरकार तक सीमित नहीं है. बल्कि वह व्यापक अर्थ लिए हुए है. ‘राज्य’ पद से ग्राम्शी का आशय ‘राजनीतिक समुदाय’ तथा ‘जनसमुदाय’ के समुच्चय से है. पुनः राजनीतिक समुदाय से उसका अभिप्राय समस्त राजनीतिक संस्थानों एवं संवैधानिक उपक्रमों से है, जो आधुनिक समाज को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए अनिवार्य माने गए हैं. इसी प्रकार जनसमुदाय से ग्राम्शी का आशय निजी और राज्येत्तर संस्थाओं से है, जिन्हें कोई जीवंत समाज स्वेच्छा और स्वतःअनुशासन की भावना से गठित करता है. इनमें ‘राजनीतिक समुदाय’ बल का प्रतीक है, जबकि ‘जनसमुदाय’ स्वानुशासन की उदात्त भावना का. ग्राम्शी ने आग्रहपूर्वक कहा था कि उपर्युक्त वर्गीकरण विशुद्ध वैचारिक है. वास्तव में ये दोनों परस्पर इतने घुले-मिले हैं कि इनके बीच स्पष्ट विभाजन-रेखा खींच पाना असंभव-सा है.

ग्राम्शी का मानना था कि आधुनिक पूंजीवाद पहले की अपेक्षा कहीं अधिक चतुर और स्वार्थी है. इसमें बुर्जुआ वर्ग समाज पर अपना आर्थिक नियंत्रण बनाए हुए है. यदा-कदा श्रमिकों को भुलावे मंे रखने के लिए वह उनके संगठनों की कुछ शर्तें भले ही स्वीकार कर ले, किंतु उसके समस्त प्रयत्न स्वार्थ-केंद्रित तथा समाजवाद की पवित्र भावना के प्रतिकूल होते हैं. वह पूंजीवाद को समाजवाद के विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर, उसके विरुद्ध संघर्ष की दिशा बदलने का प्रयास करता है. ग्राम्शी ने बुर्जुआ वर्ग के आचरण को ‘निष्क्रिय क्रांति’ की संज्ञा दी है, जो अपने आर्थिक-राजनीतिक स्वार्थ से परे कुछ सोच ही नहीं पाता. इस प्रकार वह समाज में स्तरीकरण को बढ़ावा देने का कारण बनता है. मैकियावेली से प्रेरणा लेते हुए उसने क्रांतिकारी संगठनों को ‘आधुनिक युवराज’ की उपमा देते हुए परिकल्पना की थी कि ये ‘आधुनिक युवराज’ श्रमिकवर्ग को अपने भीतर वास्तविक बुद्धिजीवी पैदा करने के लिए प्रेरित करेंगे, जिससे जनसमाज में एक वैकल्पिक नेतृत्व शक्ति का जन्म होगा. उसका विश्वास था कि सर्वहारा समाज का ऐतिहासिक लक्ष्य स्वतः अनुशासित समाज की स्थापना करना है. इसके लिए उसने राज्य को महिमा मंडित करने के बजाय, उसको लोकानुशासन में ढालने की कामना की है.

मार्क्सवाद की आलोचना

ग्राम्शी ने मार्क्स के विचारों की उनकी अतिशय अर्थकेंद्रिक प्रवृत्ति के कारण आलोचना की है. 1917 में अपने एक लेख, ‘‘दास कैपीटल’ के विरुद्ध क्रांति’’ में उसने मार्क्स पर आरोप लगाया था कि उसका चिंतन पूंजी के इर्द-गिर्द घूमता है. मानवजीवन को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दे उसके यहां लगभग उपेक्षित हैं. पूंजी के प्रति अतीव केंद्रता अंततः पूंजीवाद को ही संबल, संरक्षण प्रदान करती है. इस कारण वह सर्वहारावर्ग से अधिक पूंजीपतियों का हित-साधन करता है. मार्क्स की इस विचारधारा कि पूंजीवाद का अत्यधिक विस्तार ही एक दिन उसके पतन का कारण बनेगा, के बारे में ग्राम्शी का कहना था कि अगर ऐसा हो तो समाजवादी क्रांति की सफलता के लिए पूंजीवाद के चरमोत्कर्ष तक प्रतीक्षा करनी होगी यानी उतने समय तक ही पूंजीवाद को मनमानी करने का अवसर देना होगा, ताकि क्रांति के अनुकूल वातावरण बन सके. यह तो उपचार से पहले रोग को फलने-फूलने की छूट देने जैसा घातककर्म हुआ. इसी लेख में ग्राम्शी ने उदाहरण देकर बताया था कि मार्क्स की इस अवधारणा को इतिहास ने झुठला दिया है. उसने दावा किया था कि रूस में अक्टूबर क्रांति की घटना ने मार्क्स की इस स्थापना को अमान्य कर दिया है कि समाजवादी क्रांति के लिए पूंजीवादी उत्पादनतंत्र के चरम उभार तक प्रतीक्षा करनी होगी. रूस की बोल्शेविक क्रांति का विश्लेषण करते हुए उसके तत्काल बाद ग्राम्शी ने लिखा था कि—

‘यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि बोल्शेविक क्रांति रूसी जनता के संघर्ष का सुफल है. दो माह पहले तक अतिवादी इस प्रयास में थे कि सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहे. उसकी भविष्योन्मुखी यात्रा में कहीं अवरोध पैदा न हो. इसके लिए वे सर्वमान्य समझौते के प्रति भी सहमति व्यक्त कर चुके थे, जो वास्तव में पूंजीवाद की हदों के बीच हुआ ‘बुर्जुआ समझौता’ था. अब यही अतिवादी तत्व शक्तिकेंद्रों तथा उत्पादन-òोतांे को अपने अधिकार में ले, उनपर अपना अधिपत्य जमा लेने के पश्चात सत्ता के समाजवादी ढांचे को मूत्र्तरूप देने का प्रयास कर रहे हैं. यदि वे आगे भी बिना किसी वाद-विवाद के, अपनी अब तक की अपरिमित उपलब्धियों के साथ जिन्हें वे सायास प्राप्त कर चुके हैं, परस्पर एकता एवं सामंजस्य बनाए रखने में सफल होते हैं, तभी यह जनक्रांति अपने पवित्र लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगी.’

बोल्शेविक क्रांति के परिणामों के आधार पर मार्क्सवाद की आलोचना करते हुए ग्राम्शी ने इसी लेख में आगे लिखा था—
‘बोल्शेविक क्रांति, घटनाओं से कहीं अधिक अपने भीतर आदर्शों को समाहित किए हुए है. वस्तुतः यह कार्ल मार्क्स की ‘पूंजी’ के विरुद्ध जनक्रांति है. रूस में मार्क्स की ‘पूंजी’ सर्वहारा वर्ग से अधिक पूंजीपतियों का महाग्रंथ है. यह इस तथ्य की सविस्तार व्याख्या करता है कि घटनाएं किस प्रकार पूर्व-निर्धारित चक्र से गुजरती हैं. यह दर्शाता है कि रूस में किस प्रकार पूंजीपति वर्ग विकसित हुआ था. वहां सर्वहारावर्ग द्वारा विद्रोह की बात भी दिमाग में लाने, क्रांति के बारे में सोचने अथवा अपनी वर्गीय मांगों को सामने रखने पर विचार करने से भी बहुत पहले ही, पश्चिमी सभ्यता से प्रेरणा लेकर पूंजीवादी युग की नींव रखी जा चुकी थी. इसके बावजूद क्रांति ने अंततः कागजी आदर्शों पर विजय पा ही ली….बोल्शेविकों ने कार्ल मार्क्स को किनारे कर दिया है, तथा उनकी सुस्पष्ट गतिविधियों तथा सफलताओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद की तोपें इतनी मारक नहीं जितना इनके बारे में सोचा-समझा गया था….मार्क्स की कल्पना वहीं तक थी, जहां तक वह परिकल्पना कर सकता था. वह यूरोप के युद्ध की विभीषिका की परिकल्पना नहीं कर पाया था. यहां तक कि युद्ध इतना लंबा खिंचेगा, उसके ऐसे दुष्परिणाम होंगे जो इन दिनों सामने आ रहे हैं, का आकलन करने में भी वह नाकाम रहा था.’

लेख में मार्क्सवाद की असफलता के कारणों के मूल में जाते हुए ग्राम्शी ने लिखा था कि, ‘इस प्रकार की सामूहिक इच्छा का निर्माण सामान्यतः एक दीर्घकालिक और क्रमिक विकास का सुफल होता है. इसके लिए कार्यकारी समूहों के गहनतर अनुभव की दरकार होती है. जबकि सुस्ती, आलस्य, स्वार्थपरता, चपलता आदि मानवमात्र की सामान्य दुर्बलताएं हैं. इस कारण समय-समय पर उसका जागरण-प्रबोधीकरण करते रहने की आवश्यकता पड़ती है. ग्राम्शी के अनुसार प्रबोधीकरण का कार्य सर्वप्रथम संगठनों और संघों के रूप में किया जाता है. तदनंतर एक अनवरत-समर्पित प्रयास द्वारा उनके विचारों, इच्छाओं, महत्त्वाकांक्षाओं आदि में परिवर्तन लाने की कोशिश की जाती है. उनके बहुआयामी और दीर्घसंचित आक्रोश को निरंतर भड़काया जाता है.’ लेख के माध्यम से ग्राम्शी इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मार्क्सवाद कोई सुस्थापित दर्शन नहीं है. मार्क्स की अतिशय भावुकता उसे जगह-जगह अतिगामी बनाती है. इससे वह तथ्यों की बहुआयामी समीक्षा-व्याख्या करने में असफल रहता है. तो भी ग्राम्शी ने स्वीकार किया है कि मार्क्सवाद उनीसवीं शताब्दी का सर्वाधित चर्चित एवं प्रभावशाली दर्शन है. आवश्यकता पड़ने पर उसने मार्क्सवाद के आलोचकों की भी खिंचाई की है. उसके अनुसार उत्पादक शक्तियों की वरीयता का सिद्धांत असल में मार्क्सवाद की अधूरी समझ का नतीजा है. आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन दोनों ही ‘मूल ऐतिहासिक प्रक्रिया’ हैं. इनमें से किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ अथवा प्रभावशाली ठहराना अनुचित होगा. मार्क्सवाद के आरंभिक दिनों में श्रमिक आंदोलनों में यह भ्रांति बहुत गहरे तक पैठी हुई थी कि ‘ऐतिहासिक नियम’, जिसमें पूंजीवाद के स्वतः पराभव की कल्पना की गई है, के फलस्वरूप उनकी विजय अवश्यंभावी है. इस विचार को मिली व्यापक जनस्वीकृति के पीछे कारणों की खोज के लिए ग्राम्शी संस्कृति की तह में जाता है. उसके अनुसार श्रमिक अर्से तक इस भ्रांति से इसलिए सहजतापूर्वक चिपके रहे, क्योंकि वे मूलतः सुरक्षात्मक प्रयासों के समर्थक होते हैं. हिंसक क्रांति उनके मूल स्वभाव का हिस्सा नहीं है. इसलिए ऐसी भारी-भरकम भाग्यपरक सैद्धांतिकी से श्रमिकों को उस समय तक दूर रखा जाना चाहिए था, जब तक वे स्वयं पहल करने के लिए तैयार नहीं हो जाते. मार्क्सवाद कोरा सिद्धांत न होकर असल में ‘क्रियात्मक दर्शन’ है. इस कारण वह सामाजिक परिवर्तन के लिए किन्हीं अनदेखे, अयाचित और अमूत्र्त ‘ऐतिहासिक नियमों’ पर भरोसा नहीं कर सकता. इतिहास स्वयं मानव-समाज के आपसी संबंधों, क्रियाओं एवं अंतद्र्वंद्वों की अनुकृति होता है. उसको मानवेच्छा से निरपेक्ष नहीं माना जा सकता. अतएव प्रत्येक परिस्थिति में केवल श्रमिकों की इच्छाशक्ति से सफलता की आस लगाए रहना अनुचित है. यदि किसी परिवर्तनकामी लक्ष्य के लिए श्रमिक संगठित प्रयास करते हैं तो उन्हें स्वाभाविक रूप अपने प्रतिद्विंद्वियों के अलावा उन सांस्कृतिक-सामाजिक अवरोधों से भी संघर्ष करना पड़ता है, जो समाजीकरण की सुदीर्घ परंपरा में जन्मे हैं, जिन्हें एकाएक बदल पाना संभव ही नहीं होता. विकास की राह में आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को इन अवरोधों से गुजरना ही पड़ता है. वैसे भी विकास सीधी-सादी प्रक्रिया न होकर अनेकानेक जटिल प्रक्रियाओं की देन होता है. इसलिए विकास की ओर बढ़ता समाज भविष्य में कब, कौन-सा रूप धारण कर लेगा, इसके बारे में सटीक परिकल्पना कर पाना असंभव होता है. खासकर तब जब पूंजीवाद नए पैंतरों के साथ कदम-कदम पर चुनौती बनकर खड़ा हो. ऐसे पूंजीवाद का सामना करने के लिए वर्गसंघर्ष की साम्यवादी चेतना को भी नए हथियारों से लैस होना पड़ेगा. आंदोलन के नए क्षेत्रों की पड़ताल करनी होगी—

‘ग्राम्शी के अनुसार सुनियोजित पूंजीवाद ने(श्रम-आंदोलनों के लिए) न केवल ठोस रियायतें दी हैं, बल्कि एक विस्तृत जनसमाज की सरंचना में भी उसकी भूमिका रही है, जिसमें श्रम-संगठनों का सघन जाल, राजनीतिक दल, सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली, लोकप्रिय समाचारपत्र तथा अनेकानेक स्वयंसेवी संस्थाएं भी सम्मिलित हैं, जिनके प्रति श्रमिक वर्ग की भी सहमति रही है. आने वाले समय में वर्ग-संघर्ष केवल राज्य की सत्ता हथिया लेने तक सीमित नहीं रहेगा. उसको मात देने के लिए ‘सीधी लड़ाई’ से काम नहीं चलने वाला. बल्कि उसकी जगह लेने के लिए लंबी और सोची-समझी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. जिसमें वर्तमान सामाजिक-आर्थिक संस्थाओं में आमूल परिवर्तन तथा उनका नए सिरे से संगठन अनिवार्य होगा जो पूरी तरह से समाजवादी आदर्श के प्रति समर्पित हो.’

ग्राम्शी ने मार्क्सवाद की अतिशय अर्थकेंद्रिक प्रवृत्ति को इटली के श्रमिक-संघों की आलोचना का आधार भी बनाया है. अपने विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए उसने लिखा था कि इटली के अधिकांश श्रमिक नेता स्वयं को गर्व के साथ सुधारवादी कहते थे. यह देखा जाए तो बुरा भी नहीं है. लेकिन वे बिसार देते हैं कि श्रम-सुधार के वृहद लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक, अर्थात तीन मोर्चों पर अनवरत संघर्ष अपरिहार्य है. जबकि इटली के श्रम-संगठन केवल आर्थिक असमानता की खाई को पाटने का लक्ष्य-संधन करते रहे. राजनीति और सामाजिक समानता के लक्ष्य को उन्होंने अपने संघर्ष-क्षेत्र में सम्मिलित ही नहीं किया. यही कारण है कि वे वास्तविक सफलता से अभी तक वंचित हैं. ग्राम्शी को श्रम-संगठनों की उपयोगिता एवं क्षमताओं पर पूर्ण विश्वास था. वह उन्हें पूंजीवादी अधिपत्य से जूझने के लिए निर्णयकारी शक्ति मानता था. उसको इस बात का क्षोभ था कि श्रमिक नेता व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की अपेक्षा उसके भीतर महज कुछ सुधारों की मांग कर रहे हैं. यह अनपेक्षित और सर्वहारा विरोधी कृत्य है. इस तरह वे पूंजीवाद से मुक्ति पाने के बजाय उसे बचाए रखने का माध्यम बने हुए हैं. ऐसे श्रम संगठनों को उसने ‘अशिष्ट अर्थसत्तावादी’ कहा है. उसके अनुसार श्रम संगठनों को ‘श्रम-सुधार’ की अपेक्षा ‘श्रम-मुक्ति’ की मांग पर जोर देना चाहिए और अपनी शक्ति एवं ऊर्जा का उपयोग श्रम-मुक्ति के निमित्त किया जाना चाहिए. उल्लेखनीय है कि श्रम-मुक्ति का सपना मार्क्स भी देखता है. ‘पूंजी’ के प्रथम खंड में उसने इसपर विस्तार से चर्चा की है. लेकिन मार्क्स की श्रम-मुक्ति की अवधारणा श्रमिक पूंजीवाद के चंगुल से बाहर आ जाने तक सीमित है. जबकि ग्राम्शी के लिए श्रम-मुक्ति का विचार केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था. उसके लिए श्रम-मुक्ति का आशय आर्थिक मुक्ति के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक स्वाधीनता से भी जुड़ा था. इसको उसने सांस्कृतिक अधिपत्य से मुक्ति की अवस्था कहा है.

ऐतिहासिक भौतिकवाद की आलोचना

बीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद जैसे-जैसे संसार में फैला, हर जगह वह अपने अनुयायी बनाता चला गया. उसका बौद्धिक प्रभामंडल इतना चकाचैंध-युक्त था कि जो भी उसके विचारों के संपर्क में आया, वह या तो अनुयायी बना अथवा तीव्र आलोचक. मार्क्स के समर्थकों में ऐसे अनेक लोग हुए जिनके लिए उसका लिखा एक-एक शब्द आप्तवचन था. उसमें जरा-भी संशोधन, तनिक-सा व्यतिरेक उन्हें स्वीकार नहीं है. दूसरी ओर ऐसे विद्वान बिरले ही हुए हैं जिन्होंने मार्क्स की अद्वितीय प्रतिभा का लोहा तो माना, उसके विचारों से सहमति भी रही, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के बृहद लक्ष्य के लिए उन्होंने मार्क्स के विचारों, बिना उसके बौद्धिक प्रभामंडल की चकाचैंध से प्रभावित हुए, उसका समर्थन-अनुसरण भी किया—बावजूद इसके जिन बिंदुओं पर उनकी मार्क्स से असहमति रही, उनपर खुलकर विमर्श भी किया. बिना यह सोचे कि आलोचना उनके अपने ही संगठन को नुकसान पहुंचा सकती है. मार्क्सवाद के विरोधियों को आलोचना के नए तर्क दे सकती है; या संगठन में ही उनके अपने विरोधी खड़े कर सकती है. ग्राम्शी को ऐसे ही मार्क्सवादियों में गिना जा सकता है, जिसने मार्क्स के विचारों से वहीं तक सहमति व्यक्त की, जहां तक वे उसको सही जान पड़े. असहमति के बिंदुओं पर उसने मार्क्स की खुलकर आलोचना भी की है. ग्राम्शी को मार्क्स के विचार जहां अतिशय अर्थकेंद्रित लगते हैं, वहीं वह उसकी ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या से भी असंतुष्ट था. इसलिए उसने मार्क्स के भौतिकवाद की भी आलोचना की है. मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद दरअसल इतिहास की आर्थिक दृष्टिकोण से पड़ताल थी. उसके अनुसार सामाजिक परिवर्तन उत्पादन-प्रविधियों से प्रेरित-प्रभावित होते हैं. अपने प्रारंभ से ही ऐतिहासिक भौतिकवाद बुद्धिजीवियों की आलोचनाओं-प्रत्यालोचनाओं का शिकार रहा है. यह प्रश्न अकसर उठाया जाता है कि क्या जटिल ऐतिहासिक परिवर्तन की व्याख्या मात्र आर्थिक गतिविधियों के एकरैखिक आधार पर की जा सकती है? जिसके अनुसार सामाजिक परिवर्तनचक्र अपनी स्वाभाविक गति से चलता हुआ, जैसा कि मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या के दौरान दर्शाया है—उत्पादन के प्राचीन तौर तरीकों से सामंतवाद, सामंतवाद से पूंजीवाद और फिर पूंजीवाद से साम्यवाद के क्रम में अपनी यात्रा पूरी करता है. यदि यही सच है तो क्या इतिहास-चक्र को उल्टे क्रम में घुमा पाना संभव है? इस तरह क्या साम्यवाद से पूंजीवाद, उसके बाद सामंतवाद और तत्पश्चात उत्पादन की प्राचीनतम पद्धतियों के दौर में समाज की वापसी संभव है? आइंस्टाइन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते समय ऐसी संभावना जाहिर अवश्य की थी. लेकिन यह प्रयोगरूप से संभव नहीं हो पाया है. हो पाएगा यह भी संभव नहीं दिखता. क्योंकि समय एकांगी परिघटना नहीं है. वह अनेकानेक घटनाओं का जटिल समुच्चय है. यदि समय वापस लौटने भी लगे या लौट भी रहा हो उसकी पहचान कर पाना असंभव होगा. क्योंकि उस समय उसमें हो रही घटनाएं वह नहीं होंगी, जो पिछली बार थीं. यदि वह ऊर्जा है, तो भी उसको अपने प्रदर्शन हेतु कोई न कोई आधार चाहिए. इस कारण व्यावहारिक रूप से समय को वापस लौटा पाना असंभव है. मानवेतिहास में ऐसा कोई उदाहरण भी नहीं है. ऐसे में यह कैसे माना जा सकता है कि उत्पादन के उपर्युक्त चरण ही अंतिम हैं, तथा उनको प्रभावित करने वाले अन्य कोई कारण नहीं हैं. आखिर क्या कारण है कि संस्कृति जैसी नितांत काल्पनिक अवधारणा, अपने भीतर अनेकानेक रूढ़ियां छिपाए होने के बावजूद लोगों का दिल जीत लेती है. करोड़ों लोग उससे नेह लगाए रहते हैं. सामाजिक परिवर्तन के इस द्वैध पर ग्राम्शी गंभीरतापूर्वक विचार करता है तथा असहमति के बिंदुओं के आगे प्रश्नचिह्न भी लगाता है.

ऐतिहासिक भौतिकवाद की कमजोरियों को पकड़ते हुए ग्राम्शी लिखता है कि मार्क्स उन स्थितियों पर कोई ध्यान नहीं देता जो मानव-नियंत्रण से बाहर हैं, जिनका मनुष्य से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है. भौतिक संसार से बाहर यदि वह किसी अन्य सत्ता का नाम लेता है तो वह है—जनसाधारण का ईश्वर पर विश्वास, जिसके भौतिकरूप में होने की कोई संभावना नहीं है. यदि ईश्वरीय सत्ता का भौतिक साक्ष्य होता तो मार्क्स के लिए धर्म की आलोचना कर पाना संभव ही नहीं होता. ग्राम्शी के अनुसार धर्म की आलोचना करते समय मार्क्स फायरबाख को दोहराता है. उसका अपना कोई ठोस विचार नहीं है. इसलिए उसके द्वारा की गई धर्म की आलोचना के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि वह ईश्वर का विरोधी था. ग्राम्शी धर्म के बजाय संस्कृति पर विचार करने पर जोर देता है. उसके अनुसार संस्कृति एक जटिल प्रत्यय है. इसमें व्यक्ति के देनंदिन व्यवहार के अलावा अध्यात्म, रीति-रिवाज, उत्पादन-प्रविधियां तथा वे सभी संस्कार सम्मिलित हैं, जिन्हें व्यक्ति पिछली पीढ़ी से प्राप्त करता है तथा उतने ही स्नेह-निष्ठा से आगामी पीढ़ी को सौंपने का प्रयत्न करता है. अपने प्रभाव को अक्षुण्ण बनाए रखने, उसको निरंतर प्रभावशाली बनाने पूंजीवाद संस्कृति का ही सहारा लेता है. सांस्कृतिक अधिपत्य के ही प्रभावस्वरूप एक वर्ग यह मान लेता है कि उसका प्रमुख कर्तव्य दूसरे वर्ग के निर्देशन में काम करना है. अतः बिना किसी विरोध के वह दूसरे वर्ग, जो कतिपय विकसित संस्कृति में जीता है, के निर्देशों का पालन करता जाता है. यह गुलामी से स्वैच्छिक समझौता है, जिसे मनुष्य स्थितियों से अनुकूल की अवस्था में बिना किसी प्रतिवाद के निभाए जाता है. शोषणकारी व्यवस्था से समझौतावादी रवैया क्रांति की संभावना को क्षीण करता है. अपने स्थायित्व के लिए बुर्जुआ संस्कृति साहित्य तथा कलाओं को भी अपने नियंत्रण में रखती है. परिणामस्वरूप समाज में छद्म नायक रातों-रात खड़े कर दिए जाते हैं, जो विभेदकारी नीतियों के समर्थक हों. संस्कृति-कर्मी एवं बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इन नायकों के महिमामंडन में लगा रहता है. वह उनका बढ़-चढ़कर बखान करता है. वैकल्पिक संस्कृति के अभाव में लोकमानस विभ्रम का शिकार होकर धीरे-धीरे यथास्थितिवाद का समर्थन करने लगता है. इससे विकास के वास्तविक लक्ष्य काफी पीछे छूट जाते हैं और विमर्श के दायरे में ऐसी चीजें आ जाती हैं, जिनका मनुष्य के विकास से कोई संबंध नहीं होता.
ग्राम्शी के अनुसार सांस्कृतिक हीनताबोध एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की दासता के लिए विवश करता है. अतएव पूंजीवाद से मुक्ति के निमित्त संस्कृति अधिपत्य से मुक्ति अपरिहार्य है. उसके अनुसार यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि सांस्कृतिक प्रतीकों में पूंजीपतिवर्ग की अपनी भी कोई आस्था हो. तथापि वह सदैव इस प्रयास में रहता है कि सांस्कृतिक प्रतीकों, प्रत्ययों तथा उनकी शैलीगत विशेषताओं को विमर्श के दायरे में बनाए रखा जाए. इसलिए वह उन्हें चर्चा में बनाए रखने का कोई न कोई निरंतर आयोजन रचता रहता है. भाड़े के बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी उसके सहायक बनते हैं. आवश्यकता पड़ने पर वह सांस्कृतिक प्रतीकों का व्यावसायिक लाभ उठाने का भरपूर प्रयास करता है. संस्कृति के मानक चूंकि बहुतायत की जीवनशैली को नियंत्रित करते हैं, इसलिए वह उनके प्रति अपनी निष्ठा जताने, उनका सम्मान तथा प्रचार-प्रसार को अपनी वाणिज्य-नीति का हिस्सा बना लेता है. परिणाम यह होता है कि जनसमाज अपने विकास के वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है. सामाजिक बहस के केंद्र में ऐसे मुद्दे सायास पैदा कर दिए जाते हैं, जिनका विकास से दूर तक कोई नाता नहीं होता. किसी कारणवश यदि सांस्कृतिक विक्षोभ की स्थिति उत्पन्न होती है, व्यक्ति उन आरोपित प्रतीकों को ही वास्तविक मानकर उनके माध्यम से विकास की ओर उन्मुख होने का प्रयास करता है तो वह तत्काल उसके समर्थन में खड़ा हो जाता है. इस बार वह संस्कृति संरक्षण को अपने विणज का हिस्सा बनाता है; तथा जनसमाज का नए सिरे से दोहन करने लगता है.

अंत में एक स्वाभाविक-सा प्रश्न उठता है कि मार्क्सवाद से तीखे मतांतरों के बावजूद क्या ग्राम्शी को समाजवादी माना जा सकता है. इसका उत्तर तो निस्संदेह ‘हां’ में ही होगा, हालांकि समाजवादी विचारक के रूप में ग्राम्शी के योगदान को अभी पूरी तरह से रेखांकित किया जाना बाकी है. दूसरे विश्वयुद्ध के उपरांत ‘इटली कम्युनिस्ट पार्टी’ की बागडोर संभालने वाले, ‘यूरो कम्युनिजिस्म’ के समर्थक तोगलियाती के अनुसार उन दिनों इटली की कम्युनिस्ट पार्टी की अधिकांश गतिविधियां ग्राम्शी के विचारों के अनुकूल थीं. बल्कि कहा जा सकता है कि इटली का साम्यवादी आंदोलन की ग्राम्शी के चिंतन पर टिका था. इस कारण उसको निःशंक समाजवादी माना जा सकता है. कुछ विद्वानों के अनुसार ग्राम्शी वस्तुतः उग्र वामपंथी था. उन विद्वानों के अनुसार यदि उसको जेल में न भेजा गया होता तो मार्क्सवाद की तीखी आलोचना, अपने मौलिक एवं प्रखर समाजवादी चिंतन लिए भी उसका गिरफ्तार कर लिया जाना अवश्यंभावी था. आखिर हुआ भी ऐसा ही था. मार्क्सवादी संगठनों में ग्राम्शी के विचारों पहले ही उपेक्षित थे, विशेषकर उन विद्वानों के बीच जो मार्क्सवाद की परंपरागत परिभाषा से परे कुछ सोचना ही नहीं चाहते थे. बावजूद इसके ग्राम्शी के बौद्धिक प्रभामंडल की उपेक्षा कर पाना उसके कट्टर विरोधियों के लिए भी संभव नहीं है. उसके योगदान का आकलन मार्क्सवाद के अधूरेपन को भरने, उसको अकादमिक गांभीर्य प्रदान करने के लिए भी किया जाना चाहिए; और इसलिए भी कि उसने पूंजीवाद की आलोचना के नए और मौलिक औजार बुद्धिजीवियों को दिए. ग्राम्शी पर मार्क्सवाद के क्रियात्मक चरित्र को अधिक जटिल बनाने का आरोप भी लगाया जा सकता है, जिससे मार्क्स का दर्शन जो शोषणकारी व्यवस्था से मुक्ति हेतु सीधी कार्रवाही पर जोर देता था, वह अधिक शालीन और बौद्धिक बना. मैकियावैली, हैनरी वर्गंसा, जार्ज सोरेल, विल्फ्रेड पारटो से प्रभावित ग्राम्शी ने बीसवीं शताब्दी के असंख्य बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया है. मौलिक सोच और निर्भीक अभिव्यक्ति के कारण ही उसको गत शताब्दी के कतिपय सर्वाधिक मौलिक, प्रतिभावान मार्क्सवादी चिंतक का सम्मान दिया जाता है. उसका कहना था कि—‘आधुनिकता की सबसे बड़ी चुनौती है कि हम न तो स्वयं भ्रमित हों, न दूसरों को भ्रम में डालने का काम करें.’ थाॅमस बेट ने ग्राम्शी के विपुल लेखन का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि ग्राम्शी का लेखन—

‘एक सामाजिक व्यवस्था है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कितना विस्फोटक है. उसको समझ पाना कठिन है, ठीक ऐसे ही जैसे किसी कपटी और दुष्कर्मी शासक की छलनीति को समझना आसान नहीं होता. वह हमें सिखाता है कि शासक वही सक्षम है जो बिना किसी बाहरी दबाव के समाज को कर्मोन्मुखी बनाए, लोगों को कर्तव्यपथ पर चलना सिखाए.’

अपने इसी चिंतनशील लेखन के लिए ग्राम्शी इकीसवीं शताब्दी के समाजवादी, मानवतावादी विचारकों में शीर्ष स्थान रखता है. इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मार्क्सवाद के कट्टर समर्थक उसको समाजवादी मानते हैं अथवा नहीं. परंतु आधुनिक समाज की विसंगतियों, असमानता आदि को समझने के लिए उसका ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ का सिद्धांत, मार्क्सवादी दर्शन की उन खाइयों को पाटने की बेहतरीन कोशिश है, जो मार्क्स के अतिशय पूंजीकेंद्रित चिंतन द्वारा जन्मी थीं. यूरोप के अलावा विश्व के अन्य भागों में मशीनीकरण उतना उग्र रूप नहीं धारण कर पाया था. वहां आर्थिक असमानता होने के बावजूद स्थितियां भिन्न थीं. इससे वहां के नेताओं और विचारकों ने मार्क्सवाद को अपनी-अपनी स्थितियों के अनुसार संशोधित कर काम चलाया. ग्राम्शी इन स्थितियों पर व्यापक संदर्भ में चर्चा करता है. हालांकि परिस्थितियोंवश अपने विचारों को वैकल्पिक दर्शन का रूप देने में नाकाम भी रहता है. मगर इससे उसकी प्रतिभा और जनकल्याण के प्रति समर्पण की भावना को हल्का करके नहीं आंका जा सकता. इतिहास का काम स्मृतियों को सहेजना है. इसलिए वह ग्राम्शी के साथ-साथ तानाशाह मुसोलिनी की यादों को सहेजने का भी समान उपक्रम करेगा. उसको करना भी चाहिए. लेकिन तानाशाह की कटु-स्मृतियों में जहां मनुष्यता की आह सुनाई देगी, वहीं लेखक-विचारक ग्राम्शी को पढ़ते हुए पाठक की आंखों में एक खूबसूरत सपना अंगड़ाई लेने लगेगा. उसका संदेश भी रुपहला होगा, ठीक ऐसे जैसे पौ फटने से पहले आसमान का नजारा होता है.
ओमप्रकाश कश्यप

मार्क्सवाद : आलोचना के बिंदू

सामान्य

हर विलक्षण परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी की भांति मार्क्स को भी अपने जीवनकाल में आलोचनाओं और विरोधों का सामना करना पड़ा था. अपने उग्र विचारों और क्रांतिकारी लेखन के लिए उसे फ्रांस, प्रूशिया, बेल्जियम, कोलोन आदि से खदेड़ा जाता रहा. मगर अपने विचारों के प्रति पूरी तरह से आस्थावान और संघर्षशील मार्क्स हर बार श्रमिक क्रांति के पक्ष में आवाज उठाता रहा. इसका उसको नुकसान भी उठाना पड़ा. उसके बेटेबेटियां समय पर बीमारियों का उपचार न होने के कारण चल बसे. स्वयं मार्क्स फेफड़े की कमजोरी का शिकार था, जिसके कारण उसको अपनी युवावस्था में सेना की नौकरी से हाथ धोना पड़ा था. मगर अपने और अपने परिवार के उपचार के लिए न तो उसके पास पर्याप्त धन था, न ही समय. रातदिन उसका बस एक ही काम था. लेखन और केवल लेखन. सार्थक और प्रतिबद्ध लेखन. अपने जीवनकाल में उसने विपुल मात्रा में साहित्यरचना की. प्रतिबंधों, आलोचनाओं और विरोध से घबराये बिना उसने वही लिखा जो उसको युक्तिसंगत लगा. अपने प्रतिबद्ध लेखन के कारण ही उसके विचारों की प्रासंगिकता मृत्यु के 127 वर्ष बाद भी अक्षुण्ण है. यही नहीं बुर्जुआ पक्ष के बुद्धिजीवियों और उसके प्रेस ने मार्क्स और उसके विचारों की जितनी आलोचना की, वह लोगों के दिल में उतनी ही गहरी जगह बनाता गया.

मार्क्सवाद के आलोचक इस विचार से अपनी असहमति अनेक स्तरों पर दर्शाते हैं. अधिकांश का मानना है कि पूंजीवाद धन के अर्जन एवं उसके वितरण की अधिक उपयोगी एवं न्यायिक व्यवस्था है. उनके अनुसार पूंजीवाद व्यक्तिमात्र के अधिकारों एवं हितों की ओर अधिक ध्यान देता है. श्रमिक को यह भरोसा होने पर कि उसके श्रम का पूरा लाभ मिलेगा, वह अपनी संपूर्ण क्षमता से कार्य करता है. स्पर्धात्मक वातावरण में प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों से आगे निकलने का अवसर प्राप्त होता है. यह विश्वास होने पर कि श्रमकौशल का पूरा लाभ उसी को मिलेगा, श्रमिक अधिक परिश्रम और तन्मयता के साथ काम करता है, जिससे अधिकतम उत्पादकता संभव है. पूंजीवादी व्यवस्था में अर्जित संपत्ति पर श्रमिक का अपना अधिकार होता हैइस कारण पूंजीवाद के समर्थक उसको साम्यवाद और समाजवाद से अधिक कारगर व्यवस्था मानते हैं. पूंजीवादी तंत्र में उद्योगपति को भी यह विश्वास होता है कि नए शोध और तकनीक का लाभ सीधे उसको मिलने वाला है. इसलिए वह नए शोध और अन्वेषणों पर भी पूरापूरा ध्यान देता है. उद्योगपति की समृद्धि का एक हिस्सा वेतन एवं अन्य परिलब्धियों के माध्यम से समाज के निचले हिस्सों में भी अंतरित होता रहता है, जिससे समाज का आर्थिक स्तर लगातार ऊपर उठता जाता है. उनके अनुसार साम्यवाद और समाजवाद में श्रमिक को कड़े अनुशासन में कार्य करना पड़ता है. बावजूद इसके उसे उत्पादनलाभों से वंचित रखा जाता. इसलिए वहां पर श्रमिक मुक्त मन से उत्पादनव्यवस्था में हिस्सा नहीं ले पाता. जिससे वहां उत्पादकता का स्तर लगातार गिरता चला जाता है. कुछ विद्वान मानते हैं कि मार्क्सवाद व्यक्ति के नकारात्मक सोच को दर्शाता है. यह समन्वय और सहयोग द्वारा मिलजुलकर विकासमार्ग पर अग्रसर होने के बजाय हिंसक क्रांति पर जोर देता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और अराजकता बढ़ती है और समाज की ऊर्जा गैररचनात्मक कार्यों में खपने लगती है.

धर्म के प्रति अपने लगभग कट्टरपंथी रवैये के कारण भी मार्क्सवाद की आलोचना की जाती है. विद्वानों के अनुसार कल्याण सरकार का पहला कर्तव्य है कि वह व्यक्तिमात्र के विश्वास तथा अधिकारों की रक्षा करे. धर्म व्यक्ति की निजी आस्था और विश्वास का प्रश्न है, जिसको शेष समाज पर नहीं थोपा जाना चाहिए, न ही व्यक्तिमात्र की आस्था और विश्वास की अवमानना करना नीतिसंगत है. इतिहास के समाजार्थिक अध्ययनविश्लेषण के बाद मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचा था कि धर्म का उपयोग वर्गीय ताकतों द्वारा अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए जानबूझकर किया जाता है. वह व्यक्ति को अपने अधिकारों और सामथ्र्य से उदासीन बनाता है. मृत्यु के बाद सुख की कामना व्यक्ति को भाग्यवादी तथा पलायनोन्मुखी बनाती है. अपनी दुर्दशा के लिए वह अपने भाग्य को दोषी ठहराने लगता है. परिणामस्वरूप उन शक्तियों की ओर से उसका ध्यान पूरी तरह हट जाता है, जो वास्तव में उसकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं. कहा जा सकता है कि मार्क्सवाद निजता को उस समय तक कोई कोई महत्त्व नहीं देता, जबतक कि वह मनुष्य को अपने कर्तव्यों से उदासीन बनाती है. उसको शेष समाज से इतर, सिर्फ अपने बारे में सोचने के लिए प्रेरित करती है.

कुछ विद्वानों का आरोप है कि समाजवाद और साम्यवाद दोनों में व्यक्ति को समाज के पक्ष में अपने हितों का बलिदान करना पड़ता है. चूंकि किन्हीं भी दो व्यक्तियों के हित एक समान नहीं हो सकते, इसलिए साम्यवाद जैसी व्यवस्था हालांकि हितों के सामान्यीकरण का नारा लगाती हैं, मगर प्रकट में वह जनसाधारण के हितों से खिलवाड़ ही करती है. वृहद समाज के हितों की रक्षा का नारा लगाने वाला साम्यवाद असल में किसी भी व्यक्ति के हितों की पूरी तरह रक्षा नहीं कर पाता. वहां व्यक्ति को समूह के आगे नगण्य और उपेक्षित मान लिया जाता है. इसी आधार पूंजीवाद के समर्थक कुछ विद्वान मार्क्सवाद को नागरिक अधिकारों का हनन करने वाली विचारधारा स्वीकार करते हैं. कुछ लेखकों के अनुसार मार्क्स का अर्थचिंतन हीगेल की विचारधारा का विस्तार है. उनके अनुसार मार्क्स अपने विचारों को लेकर सुश्निश्चित नहीं था. उनको लेकर उसके मन में सदैव असंतोष बना रहा. उसको लगने लगा था कि आर्थिक प्रगति की पूर्वस्थापित योजनाएं अतार्किक एवं अवास्तविक हैं. वैचारिक आस्था के अभाव में वह अपनी महत्त्वाकांक्षी पुस्तक ‘पूंजी’ के बाकी दो खंडों को अपने जीवनकाल में पूरा करने में असमर्थ रहा था.

1930 की भयानक मंदी के चलते अनेक देशों ने मार्क्सवाद के प्रति उत्सुकता प्रकट की थी. जनाक्रोश से बचने के लिए मंदी से प्रभावित देशों की सरकारों ने सुरक्षात्मक कदम उठाने आरंभ कर दिए थे. तात्कालिक कार्रवाही से दुनिया पर छाये मंदी के बादल छंटने लगे, नतीजा यह हुआ कि मार्क्सवाद अनेक छोटे देशों का सरकारी धर्म बनतेबनते रह गया. उधर साम्यवादी देशों की हालत भी बहुत अच्छी न थी. उनीसवीं शताब्दी में ही साम्यवाद को अपना चुके देशों में राजनीतिक उथलपुथल और आर्थिक मंदी के कारण हालात बिगड़ने लगे थे. इससे वहां की जनता का मार्क्सवाद से मोहभंग होने लगा. यहां ‘मोहभंग’ शब्द शायद अनुपयुक्त प्रयोग है. कुछ विद्वान मार्क्स की धर्मसंबंधी अवधारणा में भी विरोधाभास खोजते हैं. उनके अनुसार मार्क्स परंपरागत धर्म का प्रतिकार करता है, मगर अपनी विचारधारा मार्क्सवाद को धार्मिक आस्था की भांति आरोपित करता है. यह विरोधाभासी स्थिति है, जो मार्क्स के विचारों की वैज्ञानिकता पर सवाल खड़े करती है.

मार्क्स के आलोचकों में से एक कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर लेविस एस. फ्यूअर(19122002) का मानना है कि स्वयं मार्क्सवाद में धर्म की अनेक विशेषताएं सुरक्षित हैं. फ्यूअर के अनुसार मार्क्सवाद के समर्थक उसको बड़े ही सुनियोजित तरीके से आस्था और विश्वास के रूप में जनमानस में रोपने का प्रयास करते हैं, न कि ऐसे सत्य के रूप में जिसको प्रयोगों के आधार पर जांचापरखा गया हो. फ्यूअर के अनुसार मार्क्सवाद और ईसाइयत में सिर्फ इतना अंतर है कि मार्क्सवाद इसी जीवन को सुखमय बनाने का दावा करता है, जबकि ईसाई धर्म मृत्यु के बाद सुखप्राप्ति का विश्वास दिलाता है. तर्क की कसौटी पर दोनों ही कच्चे हैं. वस्तुतः मार्क्स ने अपने जीवनकाल में ही बुद्धिजीवियों का आवाह्न किया था कि वे मार्क्सवाद के प्रचार में अपना अधिकाधिक योगदान दें. रूस, चीन, कोरिया आदि देशों में मार्क्सवाद से प्रेरित होकर अनेक विद्वान लेखक, साहित्यकार उसकी ओर आकर्षित भी हुए थे. क्रांति के बीच और उसके बाद जिस प्रकार का प्रचार साहित्य बांटा, उसने मार्क्सवाद को एक धार्मिक सत्ता की तरह ही स्थापित करने का प्रयास किया था. अंतर सिर्फ इतना है कि ईसाइयत परमात्मा और पैगंबरवाद में भरोसा करती है. डार्विन के विकासवाद से प्रेरित मार्क्स इस प्रकार की किसी अलौकिक शक्ति की उपस्थिति को सरासर नकारता है. इसके बावजूद फ्यूअर ने मार्क्सवाद की उपयोगिता को स्वीकारा था.

कार्ल पोपर ने भी मार्क्स के विचारों पर अवैज्ञानिक होने का आरोप लगाया है. उसके अनुसार मार्क्स के विचार प्रभावी और दिल को भले ही लगें, मगर वे तार्किकता से परे हैं. पोपर ने मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद की भी आलोचना की है. उसके अनुसार मार्क्स का विकासवादी चिंतन कुछ पूर्वनिर्धारित मान्यताओं से प्रभावित है. पूंजीवाद की आलोचना करते समय मार्क्स अत्यधिक आक्रामक हो जाता है, जिससे निष्पक्ष विवेचना की संभावना घट जाती है. जैसा कि पहले भी संकेत किया गया है, मार्क्स और ऐंगल्स का विचार था कि मार्क्सवाद की सफलता यूरोप के विकसित देशों में ही संभव है. जिस समय व्लादिमिर लेनिन ने सोवियत रूस की राजनीति में कदम रखा, वह आर्थिकरूप से बेहद पिछड़ा देश था. लेनिन के राजनीतिक सहयोगी ट्रोटस्की ने ‘स्थायी क्रांति’ की अभिकल्पना प्रस्तुत की थी, जिसमें उसने कहा था कि रूस जैसी कृषिआधारित व्यवस्था और विस्तृत भूभाग वाले देश में भी मार्क्सवादी क्रांति संभव है. बाद में सोवियत संघ की स्थापना से उसने अपने विचारों की प्रामाणिकता सिद्ध भी कर दी थी.

कुछ विद्वानों ने मार्क्स के ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के विचार को भी कठघरे में खड़े करते हुए आरोप लगाया था कि वह तर्क से सिद्ध करने के बजाय, केवल स्थापनाएं देता है, जो विमर्श के दौरान कहीं टिक ही नहीं पातीं. निष्कर्ष तक पहंुचने की हड़बड़ी उसकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है. केवल दक्षिणपंथी विचारक ही मार्क्स से असंतुष्ट हों, ऐसा नहीं है. कतिपय वामपंथियों ने भी उसके विचारों के प्रति अपनी असहमति दर्ज की है. इनमें से एक उसका समकालीन हेनरी जाॅर्ज था, जिसका मानना था कि मार्क्स के विचारों को शायद ही कभी परखा गया है. हेनरी जाॅर्ज ने मार्क्स के विचारों पर कृत्रिमता का आरोप लगाया था. मार्क्स के विचारों से उसका समकालीन रूसी अराजकतावादी मिखाइन बेकुनिन भी असहमत था. बेकुनिन और मार्क्स में व्यक्तिगत स्तर पर तो मतभेद भी ही. ये मतभेद ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान खुलकर सामने आए थे. मार्क्स का मानना था कि बेकुनिन इंटरनेशनल का उपयोग निजी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए करना चाहता है, जबकि बेकुनिन ने मार्क्स पर फ्रांसिसी राजनीति का यहूदीकरण करने के आरोप लगाए थे. दोनों में परस्पर सैद्धांतिक मतभेद भी थे. बेकुनिन की मान्यता थी कि भविष्य के संगठनों का निर्माण पूर्णत नीचे से ऊपर की ओर होना चाहिए. उसने परिकल्पना की थी कि श्रमिक पहले स्वैच्छिक मजदूर संघों में संगठित होंगे. उन मजदूर संघों के स्वतंत्र श्रमिकबस्तियां(कम्यून) होंगी. तदनंतर वे क्षेत्र, प्रांत, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संगठित शक्ति का रूप ले लेंगे और इस तरह संपूर्ण समाजवाद का आगमन होगा. मार्क्स के कथन ‘एक अच्छे दिन काम करने के एवज में आकर्षक, न्यायोचित वृत्तिका’ के समानांतर उसका कहना था‘वृत्तिका प्रणाली का उन्मूलन.’ स्पष्ट है कि श्रमिकसंघवादी बेकुनिन श्रमिक संघों को राजनीतिकआर्थिक शक्तियों से लैस करना चाहता था. उसका मानना था किजब दुनियाभर के उद्योगों का संचालन श्रमिकों द्वारा अपने भले के लिए किया जाएगा, उस समय भीषण बेरोजगारी, युद्ध, सामाजिक अंतद्र्वंद्व यहां तक कि बड़े अपराध और गंभीर सामाजिक समस्याओं के बने रहने का कोई आधार ही नहीं रहेगा.

मार्क्स के चिंतन की व्यापकता से इनकार नहीं किया जा सकता, मगर यह भी सत्य है कि मार्क्स के बाद से करीब सवा सौ वर्ष के अंतराल में समाज में व्यापक परिवर्तन आया है. इनमें से एक बदलाव प्रेस की स्वतंत्रता और उसकी शक्ति से भी जुड़ा है. हाल के दशकों में मीडिया जितना ताकतवर होकर उभरा है, इसके बारे में मार्क्स और ऐंगल्स ने शायद कल्पना भी न की थी. मीडिया और शिक्षा की मिलीजुली ताकत ने उपभोक्ता को भी अपने हितों के प्रति जागरूक किया है. उत्पाद से जुड़ी सूचनाएं अब केवल उत्पादक की संपत्ति नहीं है. बल्कि व्यापक लोकहित में उसको उन्हें सार्वजनिक भी करना पड़ सकता है. बाजारोन्मुखी व्यवस्था में संबंधों में परिवर्तन अवश्य हुआ है. अपने दैनिक जीवन में उपभोक्ता और उत्पादकों का सम्मिलन न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करता है, जिसके आधार पर हमारे जीवन का स्वरूप तय होता है. हालांकि अब भी उपभोक्ता और उत्पादक के संबंधों में उत्पादक का हाथ ऊपर होता है. वही तय करता है कि उपभोक्ता के साथ मेलमुलाकात के समय कहां तक समझौता किया जाए. बावजूद इसके यह भी सच है कि

यदि सिस्टम जैसा कुछ होता है तो मार्क्स का समकालीन पूंजीवादी तंत्र आधुनिक पूंजीवाद तंत्र की अपेक्षा अधिक ताकतवर और खुल्लमखुल्ला वर्गविभाजित था. उन दिनों वह सचमुच ‘उनका’ यानी उत्पादक का तंत्र था, जबकि आजकल यह हमारा तंत्र है. मार्क्स और एंेगल्स इस मायने में एकदम सही थे कि ‘सर्वहारा का मुक्तियज्ञ पूरी तरह से उसका अपना आयोजन होना चाहिए.’

स्पष्टरूप से मार्क्सवाद की अभिकल्पना यह सोचकर की गई थी कि मानवीय व्यवस्था के रूप में यह एक दिन पूंजीवाद को अपदस्थ कर उसका स्थान ले लेगा. दरअसल यह ‘स्थान ले लेना’ ही मार्क्सवाद की दुर्बलता है. इससे कई बार यह संकेत भी मिलता है मार्क्सवाद केवल सत्ताओं के विकल्प की बात करता है. वास्तविक परिवर्तन उसका लक्ष्य है ही नहीं. मार्क्स और ऐंगल्स निःसंदेह विलक्षण प्रतिभाशाली थे, जिन्होंने सर्वहारा वर्ग का आवाह्न किया था कि अपने हितों की पहचान करे. संगठित होकर विरोध की रूपरेखा तैयार करे. पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में सफलता के लिए प्रतिबद्ध साहित्य के अध्ययन की ओर प्रवृत्त हो और पूरी तैयारी के साथ पूंजीवाद की जड़ों पर प्रहार करें. मगर कब तक? लेखकद्वय संभवतः यह सोच भी नहीं पाए थे कि मार्क्सवादी विचारधारा से लैस मजदूर, पूंजीवाद को उखाड़ फैंकने के बजाय उसके समर्थन में भी जा सकता है. ऐसा इतिहास में होता भी रहा है. मजदूर संगठनों की असफलता के पीछे इस तरह के ढेरों उदाहरण आसानी से खोजे जा सकते हैं.

अंत में एक प्रश्न. हालांकि यह सिर्फ आकलन करने की कोशिश है. प्रश्न यह है कि मार्क्स और ऐंगल्स यदि अपने विचारों के साथ दुबारा जन्म ले लें तो उनकी और उनके विचारों की प्रासंगिकता होगी? यानी क्या समाज को आज भी मार्क्स और ऐंगल्स की जरूरत है. यह बात गांधी अथवा किसी और महापुरुष को लेकर भी उठाया जाता सकता है. इसमें तो कोई दो राय नहीं कि मार्क्स और ऐंगल्स का दर्शन आज की स्थितियों में बहुत प्रामाणिक लगता है. तो भी मार्क्स और ऐंगल्स के दर्शन की वापसी की स्थिति में उसके हम आंशिक रूप में ही उसके साथ होंगे. शायद इसलिए कि लगभग डेढ़दो शताब्दी के अंतराल पूंजीवाद ने हमारे सोच और व्यवहार दोनों को ही आमूल बदला है. यह बदलाव इतना व्यापक और सूक्ष्म है कि पूंजीवाद के धुर विरोधी विचारक भी अपने व्यवहार से उसका समर्थन करते हुए देखे जा सकते हैं.

मेरे विचार में ‘कम्युनिस्ट’ मेनीफेस्टो जैसे विचारों की आज कोई प्रासंगिकता नहीं है. हां मार्क्स की पूंजी का बहुतसा हिस्सा आज भी प्रासंगिक है; और बना रहेगा. कहा जा सकता है कि हमें युवा मार्क्स नहीं, अनुभवी मार्क्स की आवश्यकता है. हमें आवश्यकता है मार्क्स और ऐंगल्स की विलक्षण मेधाओं की. पुनर्जन्म अप्रामाण्य है, फिर भी यदि मार्क्स घूमतेफिरते हमारे युग में लौट आएं तो हमारा आग्रह यह भी हो सकता है कि वह पूंजी का आधुनिक संदर्भयुक्त ग्रंथ दुबारा से लिखे. हम यह भी चाहेंगे कि उसमें पूंजीवाद की समालोचना हो, सिर्फ आलोचना नहीं. मार्क्स से यदि मुलाकात हो तो हम चाहेंगे कि वह धर्म की आलोचना को सस्ते में ही न निपटा दे. बल्कि उसपर तथ्यों के साथ विचार करे. यह भी विचारे कि क्या धार्मिक प्रभावों का कोई अनुकूल लाभ उठाया जा सकता है. हालांकि यह एक मुश्किल पाठ होगा. तो भी मार्क्सवाद की प्रासंगिकता को अगली शताब्दी तक ले जाने के लिए यह छोटासा मूल्य होगा. यदि यह काम ईमानदारी से किया जाए तो उसके फल भी दूरगामी महत्त्व के होंगे. और अंत में मार्क्स के बारे में महान क्यूबाई क्रांतिकारी चे’ ग्वेरा के विचार जानना उसके विचारों की समकालीनता को दर्शाने के लिए पर्याप्त होगा

मार्क्स की प्राथमिकता थी कि वह सामाजिक विचारों के इतिहास में ठोस गुणात्मक एवं तात्कालिक परिवर्तन ला सके. इसके लिए उसने इतिहास की नई व्याख्या की, उसकी गतिशीलता को समझा, भविष्य का आकलन किया, साथ ही उसने क्रांतिकारी संकल्पना भी दुनिया के सामने रखी किकेवल संसार की व्याख्या से काम नहीं चलेगा, इसको बदलना ही चाहिए.’

और अंत में सिर्फ इतना कि हम मार्क्स के समाज को बदलने के नारे से असहमत हो सकते हैं, उसके क्रांतिकारी विचारों से अपनी असहमति दर्शा सकते हैं, उन्हें हिंसक बताकर उनसे नफरत कर सकते हैं. यही नहीं उसके पूंजीवाद विरोध को हम एकतरफा, वैचारिक दुराग्रह का प्रतीक भी मान सकते हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि पचास साल में पूंजीवाद के खात्मे की मार्क्स की भविष्यवाणी झूठ सिद्ध हो चुकी है, इसलिए उसके पूंजीवादविरोध में कोई दम नहीं है. लेकिन उसके दृष्टिकोण से, सर्वहारा वर्ग के कल्याण की उसकी सदेच्छा तथा उसके प्रति समर्पण हेतु किए गए सतत संघर्ष के लिए, उन कष्टों के लिए जो अपने विचारों पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते हुए मार्क्स और उसके परिवार को उठाने पड़े थे, हमें उसका सम्मान करना ही पड़ेगा. इसलिए यदि दुनियाभर में करोड़ों मजदूर, उसके नाम का एक साथ नारा लगाते हैं, जीजान से उसको चाहते हैं, उसको अपना सच्चा हितैषी, गुरु और पथप्रदर्शक मानते हैं, तो हमें यह मानना ही पड़ेगा कि वह सच्चा मनुष्यता का सच्चा हितैषी, महान विचारक, अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और अपने समय का महान चिंतक था. मानवीय सभ्यता के उन महानतम चिंतकों में से एक जो शताब्दियों के अंतराल में कभीकभी ही जन्मते हैं. इसलिए मार्क्स की मेधा, उसके संघर्ष, सोच, दूरदृष्टि, मानवप्रेम, उसकी जीवनसंगिनी जेनी और मित्र एंगल्स को हमारा नमन! शतसहस्र नमन!

ओमप्रकाश कश्यप

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता

सामान्य

कुछ देर के लिए मार्क्स को एक सरल रेखा मान लिया जाए तो पूरी दुनिया, उसके दोनों तरफ बंटी मिलेगी. एक दिशा में मार्क्स के समर्थक होंगे, जिनके लिए मार्क्स का एकएक शब्द पवित्र और बौद्धिक चेतना की धरोहर है. वे मार्क्स के नाम पर, उसके विचारों के लिए अपने खून का एकएक कतरा बलिदान करने को तत्पर होंगे. दूसरी ओर मार्क्स के आलोचक हैं. जिनके लिए मार्क्स एक दुर्भावना, एक जिद, एक नासमझीभरा, अड़ियल और प्रतिगामी विचार है. हाल ही में बीबीसी रेडियो सेवा द्वारा ब्रिटेन के सर्वाधिक सम्मानित और प्रतिभाशाली दार्शनिकों का सर्वे कराया गया. उस सर्वे में साम्यवादी मार्क्स ख्याति के मामले में सबसे ऊंचे पायदान पर था. दार्शनिक के रूप में दुनियाभर में पहचाने वाले नाम यथा प्लेटो, अरस्तु, कांट, डेविड ह्यूम, देकार्त, जान ला॓क जैसे विचारक ख्याति के मामले मे उसके आसपास भी नहीं ठहरते. हीगेल मार्क्स का गुरु, जिससे उसने भौतिक द्वंद्ववाद का सिद्धांत ग्रहण किया था, आश्चर्यजनकरूप से इस सूची में कहीं भी नहीं है. और तो और मार्क्स के समकालीन प्रतिभाशाली दार्शनिकों में से एक भी इस सूची में स्थान पाने में असमर्थ रहा है. आखिर ऐसी कौनसी बात है, जो मार्क्स को अपने समकालीन और पूर्ववर्ती विचारकों से अलग सिद्ध करती है. मार्क्स ने एक साथ धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास की गवेषणाएं की हैं. मगर मार्क्स खुद क्या है? दार्शनिक अथवा अर्थशास्त्री? ये सामान्य जिज्ञासा से जुड़े कुछ जरूरी प्रश्न हैं. हालांकि बहुतसे लोगों के लिए मार्क्स एक खलनायक भी है, जो अपने विचारानुकूल समाज के गठन के लिए खुल्लमखुल्ला हिंसा का सहारा लेता है. मगर वे भूल जाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के लिए मार्क्स द्वारा हिंसा का समर्थन उस तरह से नहीं है, जैसे कि पहले राजामहाराजा अपनी सनक में पड़ोसी राजा पर हमला बोल देते थे. मार्क्स की हिंसा मर्यादित है. वह समाज के बड़े वर्ग के कल्याण के लिए विशेष परिस्थितियों में जब बाकी सभी उपाय असफल सिद्ध हो चुके हों, केवल बुर्जुआ वर्ग को सत्ताच्युत करने के लिए हिंसा का समर्थन करना पसंद करता है. दूसरे पूंजीवादी चंगुल से मुक्ति के लिए हिंसा का समर्थन पेरिस कम्यून की असफलता से पहले की घटना है. पेरिस कम्यून की असफलता के बाद उसके विचारों में बदलाव आया था.

मार्क्स अपने समय की सबसे विवादित हस्तियों में से एक है. उसका रचनात्मक अवदान केवल अकादमिक चिंतनलेखन तक सीमित नहीं था. उसके लेखन में संघर्ष की लौ थी. हालांकि श्रमिकों के पक्ष में आवाज उठाने वाला वह पहला दार्शनिकलेखक नहीं था. उससे पहले रूसो जनसामान्य का सबसे बड़ा पैरोकार बनकर उभरा था. राबर्ट ओवेन, विलियम किंग, जोसेफ ब्लेंक आदि दार्शनिक चिंतक भी पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए श्रमिकों मजदूरों को और अधिक सुविधा दिए जाने की मांग कर चुके थे. इसी श्रेणी में चार्टिस्ट आंदोलनकारियों का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्होंने जनाधिकारिता के लिए बड़े पैमाने पर वर्षों तक चलने वाला संघर्ष किया था. जनसाधारण के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में 1838 में एफ. ओ’क्रोनर एवं विलियम ला॓वेट के नेतृत्व में चले वर्षों लंबे संघर्ष में सैकड़ों चार्टिस्ट आंदोलनकर्मियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था. हजारों को निष्कासन की सजा मिली थी.

स्मरणीय है कि सोहलवीं शताब्दी में आरंभ हुए प्रौद्योगिकीकरण की रफ्तार उनीसवीं शताब्दी आतेआते अत्यधिक तीव्र हो चुकी थी. परंपरागत शिल्पकारों पर मशीनीकरण की मार तथा उनके संरक्षण के लिए सरकार की ओर से कोई योजना न होने के कारण ब्रिटेन समेत प्रायः सभी यूरोपीय देशों में बेरोजगारी का संकट बढ़ा था. गांवों में स्थिति और भी शोचनीय थी. क्योंकि कारखानों में बने सस्ते माल की आमद से स्थानीय उद्योगधंधे पूरी तरह चौपट हो चुके थे. भीषण गरीबी के कारण मातापिता अपने बच्चों को उन नारकीय परिस्थितियों में काम पर भेजने के लिए विवश थे, जहां सामान्य स्थितियों काम करने की उनकी हिम्मत भी जवाब दे जाती थी. बाकी मजदूरों, कामगारों यहां तक कि साधारण नौकरीपेशा लोगों की हालत भी संतोषजनक नहीं थी. काम के अत्यधिक बोझ के कारण वे सदैव तनाव में रहते थे. इससे उनकी कार्यकुशलता नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई थी. सरकार और प्रशासन पूंजीपतियों के सतत दबाव में रहते थे, इसलिए उनसे मनचाहे फैसले करा लेना, स्थानीय पूंजीपतियों के लिए बहुत आसान था. पूंजी का असमान वितरण, भीषण बेरोजगारी, नगरों में पर्यावरणसंबंधी लगातार बढ़ती समस्याएं आदि अनेक ऐसे कारण थे, जिन्होंने विचारकों के एक बड़े वर्ग को उद्वेलित किया था. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिकीकरण के विरोध में अनेक आंदोलन भी हो चुके थे, जिनमें लाखों श्रमिकों ने सहभागिता की थी. जिन्हें समाज के लाखों श्रमिकों का समर्थन मिला था.

पूंजीवादी शोषण से उबरने के लिए विद्वानों के अलगअलग सुझाव थे. विचारकों का एक दल सहकारिता के माध्यम से पूंजीवादी उत्पीड़न से उबरने का सपना देख रहा था. इस वर्ग में विलियिम किंग, राबर्ट ओवेन फ्यूरियर जैसे विचारक थे. साहित्यिक प्रेरणाएं भी परिवर्तनकारी आंदोलनों के साथ थीं. उनमें सबसे अग्रणी थे, उस समय के महान उपन्यासकार चाल्र्स डिकेन्स, जिन्होंने अपने उपन्यास ‘दि क्रिसमस कैरोल’ में ब्रिटिश समाज में पनप चुके सूदखोर वर्ग का सशक्त चित्रण किया था. रिकार्डो और एडम स्मिथ आदि अर्थशास्त्रियों का मानना था कि सिर्फ औद्योगिक समृद्धि द्वारा गरीबी से लड़ा जा सकता है. सरकार को चाहिए कि उत्पादन और विपणन से जुड़े मामले पूंजीपतियों और उद्यमियों के हवाले कर दे, ताकि वे परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेने में सक्षम हों.

संगठित आंदोलन को मुक्ति का आधार मानने वाले विचारकों के भी दो अलगअलग वर्ग थे. उनमें से एक धड़ा सहकारिता आंदोलन के समर्थक विद्वानों एवं कार्यकर्ताओं का था, जो सफलता के लिए सहयोग को स्पर्धा से अधिक कारगर और उपयोगी मानते थे. दूसरे धड़े के विचारक मानते थे कि पूंजीवाद से मुक्ति के लिए पूंजीपतियों को कमजोर करना जरूरी है. यह केवल संगठित ताकत के बल पर संभव है. इसके लिए हिंसा का सहारा लेने में भी उन्हें संकोच नहीं था. प्रूधों, मार्क्स, ब्लेंक, बकुनाइन, ऐंगल्स आदि विद्वान पूंजीवाद के उग्र विरोधियों में आते थे.

उल्लेखनीय है कि मार्क्स से पहले ही हीगेल द्वंद्ववाद की सार्थकता को स्थापित कर चुका था. विचारक उसके विचारों की भांतिभांति से व्याख्या कर रहे थे. बल्कि उसके विचारों की व्याख्या के लिए ही दार्शनिकों के अलगअलग गुट बन चुके थे. ऐसे में मार्क्स ने द्वंद्ववाद की विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण से विवेचना कर, सत और असत् का भौतिकीकरण कर दिया. मार्क्स के दर्शन में श्रमिक वर्ग ‘सत्’ का पर्याय था, जो अपने श्रमकौशल के आधार पर उत्पादन कार्य में प्रमुख भूमिका निभाता है. जो सही मायने में उत्पादक है. पूंजीपति वर्ग ‘असत्’ का प्रतीक है, जो दूसरों के श्रम को अपना बताकर मुनाफे का अधिकांश हिस्सा स्वयं हड़प जाता है, जिससे धनी लगातार धनवान तथा गरीब लगातार अधिक गरीब होता जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अस्थिरता और असमानता बढ़ती है.

समाज में व्याप्त आर्थिक वैषम्य से निपटने के लिए भी विद्वानों के अलगअलग विचार थे. एक वर्ग का मानना था कि समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना सरकार का दायित्व है, अतः सरकार को श्रमिकों के हितों की सुरक्षा हेतु समुचित कानून बनाने चाहिए. दूसरे वर्ग का विश्वास था कि पूंजीवाद का सामना केवल संगठित शक्ति द्वारा ही संभव है. इस वर्ग का सुझाव था कि श्रमिकों, छोटे उद्यमियों और व्यवसायियों को अपनेअपने संगठन बनाकर सहकार के माध्यम से पूंजीवाद के विरुद्ध सार्थक समर छेड़ा जा सकता है. इनसे अलग एक वर्ग कतिपय उदारपंथी विचारकों का था, उनका मानना था कि मनुष्यता के नाते पूंजीपति को स्वयं आगे आकर समाज के बड़े वर्ग के पक्ष में अतिरिक्त संपत्ति का परित्याग करना चाहिए. बहुत बाद में गांधी जी ने इसी भावना को ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत के रूप में प्रकट किया था.

मार्क्स का विचार था कि स्वार्थी पूंजीपतियों को मनाना, उन्हें नैतिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करना आसान नहीं है. ऐसे में शोषण से मुक्ति का एक ही उपाय है कि श्रमिकवर्ग संगठित होकर स्वार्थी पूंजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष की घोषणा कर दे. जिस दौर में मार्क्स यह घोषणा कर रहा था, वही दौर अस्मितावादी आंदोलन के उदय का भी था. फ्रांस में लोकतंत्र की स्थापना हो चुकी थी. उसकी देखादेखी यूरोप के अन्य देशों में भी लोकतंत्र की मांग जोर पकड़ रही थी. ऐसे में मार्क्स का दर्शन लोगों को पे्ररित करने के लिए पर्याप्त था. अतएव जहांजहां मशीनीकरण जोर पकड़ चुका था, जहांजहां सामंत और जागीरदारी प्रथा शेष थी, वहां पर श्रमिक वर्ग माक्र्सवादी विचारधारा के अनुरूप संगठित होता चला गया. दूसरी ओर अमेरिका और यूरोप के दिन देशों में पूंजीवाद अपनी जड़ जमाए था, वहां मार्क्सवादी विचारधारा के ठीक विपरीत प्रतिक्रिया हुई. मीडिया और सरकार के सहयोग से वहां मार्क्स के कटुआलोचकों का वर्ग पनपा. मगर इस द्वंद्वात्मकता में मार्क्स की चर्चा दोनों ही पक्षों में होती रही.

मार्क्स के विचारों की वर्तमान संदर्भों में क्या प्रासंगिकता है! उसको अर्थशास्त्री माना जाए या दार्शनिक? या फिर राजनीतिक चिंतक? मार्क्स की ख्याति एक दार्शनिक के रूप में भी रही है. हालांकि उसका दर्शन के क्षेत्र में विशेष मौलिक योगदान बहुत कम है. धर्म को लेकर आलोचना फायरबाख और बायर से प्रभावित है. द्वंद्ववाद पर हीगेल उससे पहले ही गंभीर चिंतन कर चुका था, और वह दर्शनशास्त्र की प्रामाणिक धारा के रूप में मान्य हो चुका था. तत्वमीमांसा से वह कोसों दूर था. तो फिर वह कौनसी बात है, जो मार्क्स को जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों के बीच एकाएक जनता का नायक बना देती है. मार्क्स मूल रूप से अर्थशास्त्री था. बल्कि कहना चाहिए कि एडम स्मिथ के बाद मार्क्स ही वह अर्थशास्त्री है, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की थी. सच तो यह है कि मार्क्स का अर्थचिंतन एडम स्मिथ के मुक्त अर्थतंत्र को उसका खरा जवाब था. एडम स्मिथ ने अपने सिद्धांत ‘लेजेज फेयर’ द्वारा सरकारों से पूंजीपतियों के रास्ते से हट जाने का आवाह्न किया था. कहा था कि उद्योगों से सरकारी नियंत्रण हटाओ. पूंजीपतियों को निर्बंध ‘अपना काम करने दो.’

एडम स्मिथ की खुली अर्थव्यवस्था के विचार की आलोचना करते हुए मार्क्स ने कहा था कि औद्योगिक उदारता श्रमशोषण के दम पर ही संभव है. नियंत्रणहीन पूंजीवाद को उसने पूंजी का अराजक खेल माना, जिसमें उद्योगपतियों की भले चांदी कटे, मगर मजदूरों का शोषण बढ़ता ही जाता है. स्पर्धा में बने रहने के लिए पूंजीपति वर्ग मजदूरों की मजदूरी कम करता जाता है. कम वृत्तिका और महंगाई मिलकर मजदूरों और कामगारों के जीवन को उत्तरोत्तर कठिन बनाती है. नई प्रौद्योगिकी सिर्फ अमीरों का बैंक बैलेंस बढ़ाती है. और मजदूर की गरीबी, बेबसी तथा दुर्दशा. स्मिथ के कथन कि ‘उन्हें अपना काम करने दो’ के बदले में मार्क्स का कहना था कि ‘श्रमिकों को उनका हक दो’. हालांकि वह यह भी मानता था कि स्वार्थ में डूबे पूंजीपति श्रमिकों को उनका अधिकार आसानी से देने को तैयार नहीं होंगे. इसलिए वह संगठित विरोध का हिमायती था. उसने आवाह्न किया था कि शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ. तुम्हारे पास हुनर है. काम करने का सामथ्र्य, इच्छाशक्ति और लग्न है. साथ में वर्षों का अनुभव भी. अपनी ताकत, संगठन की ताकत, अपने कौशल और क्षमताओं को पहचानो, एकजुट होकर उत्पादनव्यवस्था को अपने हाथ में ले लो. कौटिक हाथ मिलकर अपने भविष्य का स्वयं निर्माण करो. उत्पादन का माध्यम बनने से, दूसरों के लिए पसीना बहाने से अच्छा है कि स्वयं उत्पादक बनो. आगे बढ़ो. तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, मगर जीतने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है. कफ और बलगम भरी छाती से निकले मार्क्स के ये भरभराते शब्द विश्वभर के कोटिक श्रमिकों के कंठ से निकली आवाज बन गए. ईसाइयों ने इन शब्दों को पवित्र बाइबिल की वाणी माना, हिंदु ने गीता की अमर सूक्तियां. मुस्लिमों इन्हें कुरआन की महान आदेश मानकर संगठित होने लगे. मार्क्सवाद जनमन की भाषा बन गया.

इकीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद की प्रासंगिकता क्या है? बाजारवाद के इस दौर में जब पूंजीवाद बेलगाम और करीबकरीब अराजक हो चुका है, मार्क्स के विचार कितनी दूर तक हमारा साथ दे सकते हैं? इस बारे में परस्परविरोधी मत सुने जा सकते हैं. मार्क्सवाद के आलोचकों ने बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही मान लिया था कि उसका पतन अवश्यंभावी है. मार्क्सवाद के सबसे बड़े गढ़ सोवियत संघ का बिखरना उन्हें अपने निष्कर्ष पर मुहर लगने जैसा प्रतीत होता है. उन्होंने बारबार कहा था, बल्कि आज भी यही दावा करते हैं कि मार्क्सवाद के दिन लद चुके हैं. समाजवाद का सपना बीते जमाने की बात हुई. उनके अनुसार यह जानकर भी जो उससे उम्मीद लगाए बैठे हैं, वे स्वप्नदृष्टा, कल्पनाजीवी हैं. उन भोले बच्चों की तरह हैं जिनकी दुनिया लालीपाप में समाई होती है. पर क्या संभव है किसी विचार का यूं ही एकाएक मर जाना?

यदि कोई पेरिस कम्यून की असफलता या सोवियत संघ के बिखरते जाने जैसी घटनाओं से ही उस विचार को अप्रासंगिक और समयबाह्यः मान बैठे और पूंजीवाद की सार्वकालिक जीत का दावा करने लगे तो यह उसकी नादानी ही कही जाएगी. इसलिए कि साम्यवाद नैतिकता और आदर्शवादी पहचान से युक्त एक अवस्था है, जिसकी संकल्पना लोकगीतों, धार्मिकसामाजिक आख्यानों, कविलेखकोंसाहित्यकारों के मानवतावादी सोच से प्रेरणा पाती है. पेरिस कम्यून में श्रमिक संगठनों और नागरिक सेना की जीत के फलस्वरूप जो अल्पकालिक सरकार बनी थी, उसके अपने मतभेद और आपसी अविश्वास थे. साथ में क्रांति का श्रेय लेने की, दूसरों पर छा जाने की आदिम लालसा भी थी. जो एक तरह से प्राचीन साम्राज्यवाद, सामंतवाद, कुलीनतावाद, ब्राह्मणवाद, यहां तक कि पूंजीवादी वर्चस्व का पर्याय थी.

क्रांति के जुनून में उन्होंने सबकुछ उलटपलट तो दिया था, जोशजोश में जनोन्मुखी व्यवस्था कायम करने की शुरुआती कोशिश भी की. किंतु आपसी मतभेद और तनाव के कारण वे ऐसा कोई तंत्र विकसित करने में असफल सिद्ध हुए थे, जो साम्यवादी मान्यताओं के अनुरूप एक दीर्घगामी व्यवस्था के गठन में सहायक बनता. पेरिसक्रांति के दो प्रमुख सूत्रधारों, मार्क्स और बेकुनिन के मतभेद तो जगजाहिर हैं ही. मार्क्स को लगता था कि क्रांति की सफलता के बाद बेकुनिन अपनी राजनीतिक ताकत को बढ़ाना चाहता है. जबकि बेकुनिन का मानना था कि मार्क्स की बढ़ती हुई भूमिका पेरिस में यहूदीवाद को बढ़ावा देगी. इसी प्रकार के मतभेदों के चलते साम्राज्यवादीपूंजीवादी ताकतों के मनसूबों को भांपने में असफल रहे थे. परिणाम यह हुआ था कम्यून पर फिर सशस्त्र सेनाओं का हमला हुआ और राजशाही दुबारी सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हुई. व्लादिमिर लेनिन के पेरिस कम्यून की असफलता के कारणों को चिह्नित किया है. एक समाचारपत्र में लिए लिखे गए लेख ‘पेरिस कम्यून का पाठ’ में उसने लिखा था कि कम्यून के नेताओं की

केवल दो बड़ी गलतियों ने उस दमदमाती ऐतिहासिक विजय के लाभों पर पानी फेर दिया. सच तो यह है कि सर्वहारा वर्ग के नेता आधे रास्ते पर ही आराम फरमाने लगे थे. अवैद्य कब्जाधारकों की संपत्ति का अधिग्रहण करके न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के करने के बजाय वे कुछ लोकप्रिय राष्ट्रीय मुद्दों के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करते रहे. बैंक और ऐसे ही दूसरे अन्य संस्थानों का अधिग्रहण, जो बहुत जरूरी था, नहीं किया गया. सर्वहारा वर्ग के शासकों की दूसरी बड़ी भूल उनकी अतिशय दयालुता थी, जिसके कारण अपने दुश्मनों को कुचलने के बजाय वे उनके साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार कर, उनके हृदयपरिवर्तन की उम्मीद करते रहे. जनक्रांति में सीधी सैन्य कार्रवाही की उपयोगिता को उन्होंने बहुत कम करके आंका था. बजाय इसके कि पेरिस के पूर्वशासकों से अपनी सुरक्षा के ठोस और पुख्ता इंतजाम करते, उन्होंने उन्हें आराम से दुबारा ताकत बटोरने का पूरापूरा अवसर दिया, जो मई महीने के भीषण खूनखराबे का कारण बना.’

 

कुछ ऐसा ही रूस में हुआ था. पेरिस क्रांति की असफलता ने मार्क्स को अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार का अवसर दिया था. सशस्त्र विद्रोह से उसका विश्वास घटा था. राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिनायकवाद से दीर्घकालिक मुक्ति के नए रास्तों की खोज का सुफल ‘दि कैपीटल’ के रूप में सामने आया था, जिसे उसने इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान आदि गहन अध्ययन के बाद लिखा था. पुस्तक में उसने वर्गहीन समाज की परिकल्पना की थी. स्मरणीय है कि पेरिस कम्यून को मार्क्स ने ‘सर्वहारा का अधिनायकवाद’ की संज्ञा दी थी. वह उसको साम्यवाद की स्थापना की दिशा में पहला चरण मानता था. साम्यवाद की परिकल्पना इस सोच पर आधारित थी कि द्वंद्व की स्थिति विपरीत शक्तियों में ही संभव है. उनसे बचाव का एक ही उपाय है कि समाज में शक्तिकेंद्र ही न रहें. इसलिए श्रमिक वर्ग सत्ता को हाथ में ले. मगर सत्ता हस्तांतरण से ही उसका काम पूरा नहीं हो जाता. उसके लिए आवश्यक है कि समाज में वर्गहीनता की स्थापना के प्रयास भी साथ ही आरंभ कर दिए जाएं. एक समरस समाज की स्थापना, साम्य की स्थापना उनका ध्येय हो, ऐसा उसने कहा था.

रूस में जो हुआ, वह क्रांति का पहला चरण था. वहां लेनिन के नेतृत्व में जारशाही के विरुद्ध संघर्ष का आवाहन किया गया था. जिसमें मजदूर वर्गों को जीत मिली और जारशाही के स्थान पर श्रमिकों की सरकार अस्तित्व में आई. अपने दायित्व को समझते उसने समाज के पुननिर्माण पर जोर दिया. उसका सुखद परिणाम भी मिला. क्रांति के समय रूस की हालत भारत से कहीं बदतर थी. देखते ही देखते वहां विकास का ऐसा दौर चला कि पचाससाठ वर्षों में उसने स्वयं को विश्व की दूसरी महाशक्ति के रूप में स्थापित कर लिया. बस यही उसकी विड़बना थी. क्रांति का पहला चरण पार कर सत्ता पर अधिकार जमा लेने के बाद उसकी कोशिश द्वंद्व की समस्त संभावनाओं को मेटने के लिए जहां वर्गहीन समाज की स्थापना करना था, वहीं उसने खुद को द्वंद्व में झोंकना प्रारंभ कर दिया. सोवियत सरकार असल में तलवार से तराजू का काम लेना चाहती थी. घोषित रूप उसका लक्ष्य साम्यवाद था, मगर असल में थी विरोधियों को परास्त कर, नंबर एक पर बने रहने की कामना. वह दुहाई न्याय की देती थी, मगर अपने नागरिकों के खूनपसीने की कमाई को, हथियारों और अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को विस्तार देने पर खर्च कर रही थी.

इन परिस्थितियों में भी रूस लंबे समय तक साम्यवादी बना रहा तो इसलिए कि मार्क्स ने अपने समर्थक लेखकोंबुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग पैदा किया था, जिनमें गोर्की, चेखव, टालस्टाय, दोस्तोयवस्की आदि महान साहित्यकार सम्मिलित थे. जो साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लगातार सारगर्भित और प्रतिबद्ध लेखन कर रहे थे. इससे वहां के जनमानस में साम्यवाद के प्रति आस्था बनी रही. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रतिबद्ध साहित्य की चमकदमक खासकर उसमें नए चेहरों की आमद घटती चली गई. वहीं सरकार ने खुद को और भी महत्त्वाकांक्षी बना लिया था. साम्यवादी नीतियों के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना पर जोर देने के बजाय, सरकार अपने संसाधन पूंजीवाद के पर्याय बन चुके अमेरिका को परास्त करने पर तुली हुई थी. यह मजदूरों के दम पर बनी सरकार का वैभव प्रेम था. ब्राजील के दर्शनशास्त्री पाउलो फ्रेरा ने बड़े काम की बात कही है. ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ में उसने लिखा है कि आमूल परिवर्तन के पहले दौर में, जिसको परिवर्तन की अपरिपक्व अवस्था भी कहते हैं, उत्पीड़ित अवसर मिलते ही वही करता है, जैसा उसने उत्पीड़क को करते हुए देखा है. इस अवस्था में उत्पीड़क और उत्पीड़ित की सिर्फ भूमिकाएं और सिर्फ चेहरे बदलते हैं, स्थितियां नहीं. इसलिए परिवर्तनकामी शक्तियों को, उन शक्तियों को समाज में वास्तविक परिवर्तन की चाहत रखती हैं, प्रारंभिक सफलता के साथ ही रुक नहीं जाना चाहिए. बल्कि आमूल परिवर्तन की कोशिश पहली सफलता के साथ ही आरंभ कर देनी चाहिए. सोवियत संघ के शासकों से भी यही अपेक्षित था कि वे साम्राज्यवादी गतिविधियों में उलझने के बजाय एक नीतिआधारित समाज की स्थापना पर जोर देते. ताकि वर्गहीन समाज की स्थापना संभव हो सके.

रूसी शासक यह भूल चुके थे कि जनता की सोचने की शक्ति भले ही धीमी हो, मगर उसमें छोटे वैचारिक परिवर्तन भी दूरगामी महत्त्व के सिद्ध होते हैं. पूंजीवादी सरकार में हथियारों के निर्माण से लेकर शोध तक का सारा काम पूंजीपति करते हैं. इसके लिए वे श्रमिकों का ऐसे ही शोषण करते हैं, जैसे कि बाकी अन्य उद्योग. लेकिन उनमें काम करने वाला श्रमिक बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के, सिर्फ आजीविका की खोज में उनके साथ जुड़ता है. असहमति अथवा असंतुष्टि की अवस्था में वह जब चाहे तब उसको छोड़कर अन्य उद्योग के साथ जुड़ सकता है. कानून उसके इस अधिकार की रक्षा करता है. हालांकि दूसरी जगह भी उसका शोषण होता है, और भौतिक स्थितियां उसके लिए बहुत अधिक बदलती भी नहीं है. तो भी एक उत्पादक को छोड़ आने का जो संतोष है, साथ ही चयन का आनंद और इसके पीछे निहित अस्मिताबोध श्रमिक का अपना और निजी होता है. इससे अधिक वह सामान्यतः अपेक्षा भी नहीं करता. इससे उसका आक्रोश एक सीमा से बाहर नहीं जा पाता.

सोवियत संघ में यद्यपि उपभोग को बढ़ावा देने वाली प्रौद्योगिकी को प्रतिबंधित किया गया था. मगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों की स्पर्धा और उसमें आगे निकलने की होड़ में वहां की सरकारें राष्ट्रीय आय का बड़े पैमाने पर निवेश कर रही थीं. इस होड़ का नागरिकों के वास्तविक कल्याण से कोई लेनादेना नहीं था. इससे वहां सामाजिक विकास की रफ्तार उतनी नहीं पहुंच पाई थी, जितनी कि साम्यवादी व्यवस्था में अपेक्षित थी. सोवियत नागरिक स्वयं को भावनात्मक रूप से ठगा हुआ महसूस कर रहे थे. इसपर टिप्पणी करते हुए सुविख्यात चिंतक किशन पटनायक ने लिखा था‘आधुनिकतावादी दिमाग, आधुनिक टेक्नालाजी(यंत्रेश्वर) के बारे में इतना ज्यादा अंधविश्वासी है कि उसके विकल्प की संभावनाओं पर सोच नहीं पाता. एक वैकल्पिक यंत्रप्रणाली की तलाश वह कर नहीं सकता. सोवियत रूस में यही हुआ. रूसी कम्युनिस्टों ने कुछ प्रकार की, खासकर उपभोग की टेक्नोलाॅजी को बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित किया. लेकिन वैकल्पिक टेक्नोलाॅजी की तलाश के लिए उनका दिमाग तैयार नहीं था. अंततोगत्वा उनके दिमाग पर आधुनिकता का दबाव इतना गहरा हुआ कि रूस साम्यवाद छोड़ने को तैयार हो गया.’

सोवियत संघ में समस्त उत्पादन व्यवस्था श्रमिक संगठनों के और अंततः राज्य के अधीन थी, जिसका उपयोग उनके नेता अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने के लिए करते थे. आम मजदूर के लिए कुछ खास नहीं बदला था. उसके लिए शोषणकारी स्थितियों में अपेक्षित सुधार हो ही नहीं पाया था. इसलिए उस व्यवस्था से उनका हताश होना स्वाभाविक ही था. ऊपर से तयशुदा उत्पादन करना मजबूरी. यही कारण है कि वहां श्रमिकों के मन में व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता ही गया. परिणाम सोवियत संघ के विघटन के रूप में सामने आया. बावजूद इसके सोवियत संघ के बिखराव को, मानवाधिकार के पतन के रूप में देखना अनुचित होगा. बस इतना कहा जा सकता है कि सोवियत नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाओं और अदूरदर्शिता के कारण समाजवाद का प्रयोग वहां उतनी अपेक्षा के साथ सफल न हो सका.

दरअसल मार्क्सवाद की मौत का दावा वे करते हैं जो मानते हैं कि साम्यवाद का उद्भव मार्क्स के जन्म अथवा उसके विवेकीकरण के बाद की घटना है. जबकि ऐसा नहीं है. मार्क्स से पहले भी साम्यवाद था. लोग उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों का मिलजुल कर उपयोग करते थे. स्वयं मार्क्स ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा इसी मान्यता के आधार पर प्रस्तुत की है. मार्क्सवाद का अभिप्राय अर्थसत्ता का विकेंद्रीकरण, धर्मसत्ता का विलोपीकरण तथा राजसत्ता का लौकिकीकरण है. ये विचार मार्क्स से ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे प्लेटो ने भी व्यक्त किए थे. प्रत्येक धर्म अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए इसी प्रकार की लोककल्याणकारी प्रार्थनाओं की अपने विस्तार की सीढी बनाता है. दूसरे शब्दों में मार्क्स के आलोचक वे हैं जो गलत तरीके से संसाधनों पर अधिपत्य जमाए हैं. जो सारा का सारा मुनाफा स्वयं लील जाना चाहते हैं. जो अपनी पूंजी और ताकत के दम पर वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं. जिन्हें दूसरों के श्रमकौशल पर जीने की, परजीवी होने की आदत पड़ चुकी है. मार्क्स के आलोचक वे हैं, जिन्होंने अपनी संपन्नता दूसरों के श्रम पर अर्जित की है. इसके कारण उन देशों के समाज में भारी आर्थिक असमानता है. ऐसे उदाहरण पूंजीवादी देशों में हर जगह हैं.

अमेरिका का ही उदाहरण लें, वहां पूंजीवाद के बाद स्थिति कितनी बिगड़ी है, वह सामने भले ही न आ पाती हो, क्योंकि जनता और बाकी शक्तियों के बीच पुल की भूमिका निभानेवाला मीडिया, पूंजीपतियों का पक्ष लेता है, और उनके हितों के अनुरूप खबरों की मार्केटिंग करता है. जबकि हालात कितने विकट हैं, यह देखकर मन संताप से भर जाता है. बेलगाम पूंजीवाद समाज को सर्वाधिक अमीर और भीषण गरीब लोगों में बांट रहा है, जो अमीर है, वही उत्पादक है. गरीब के श्रम का उपयोग कर वह उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है. गरीब प्राप्त वृत्तिका का बड़ा हिस्सा उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद पर निवेश करता है. मजदूरी के रूप में उसको सिर्फ उतना ही मिल पाता है, जिससे वह अगले लिए काम पर जा सके. कई बार तो प्राप्त वृत्तिका उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होती है.

एक रिपोर्ट के अनुसार 1994 में अमेरिका की 500 प्रमुख कंपनियां उस देश की कुल 92 प्रतिशत आमदनी पर कब्जा जमाए थीं, जबकि विश्वस्तर की 1000 सबसे बड़ी कंपनियों की सालाना आमदनी आठ अरब डालर है, जो दुनिया के कुल लाभ का एक तिहाई है. अमेरिका में ही केवल आधा प्रतिशत सर्वाधिक धनी कंपनियों के अधिकार क्षेत्र में वहां की 50 प्रतिशत संपत्ति आती है. यही नहीं अमीरों की अमीरी निरंतर बड़ती जा रही है. अमेरिका की सबसे धनी एक प्रतिशत जनसंख्या, वहां की राष्ट्रीय आय में 1978 में जहां केवल 17.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती थी, वह मात्र दस वर्ष अर्थात 1989 में बढ़कर 36.3 प्रतिशत हो चुकी थी. स्मरणीय है कि पश्चिमी समाज में यही वह समय है, जिसे पूंजीवाद का सबसे सुनहरा दौर माना जाता है.

पूंजीवादी अमेरिका में पूंजी का कुछ हाथों में लगातार सिमटते जाना एक राष्ट्रीय समस्या बन चुका है. 2007 में वहां आई भीषण मंदी का खेल हम देख ही चुके हैं, जिसमें पचास से ऊपर भीमकाय बैंक दिवालियेपन का शिकार हुए थे. उससे पहले वहां बड़ी कंपनियों द्वारा छोटे उद्यमों के अधिग्रहण का दौर चला था, जो 1995 अपने चरमबिंदू पर था. मनोरंजन क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां वाल्ट डिजनी, वाशिंगटन हाउस, दवा उद्योग की ग्लैक्सो, कागज उद्योग की स्का॓ट पेपर अपनेअपने क्षेत्र की वे महारथी कंपनियां थीं, जिन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को एकाएक निगल लिया था. चेज मेनहट्टन और केमीकल बैंक ने उसी वर्ष मिलकर, 297 अरब डा॓लर की भारीभरकम पूंजी के साथ, अमेरिका के सबसे बड़े बैंकिंग समूह की आधारशिला रखी थी. पूंजीवाद के चरमोत्कर्ष काल में सबकुछ चमकतादमकता हो, यह बात भी नहीं है. बहुत कुछ ऐसा भी था जो चमचमाती रोशनी के पीछे गहराये अंधेरे की हकीकत बयान करता था. अधिग्रहण के उस दौर में छोटी मछलियां आराम से बड़ी मछलियों का शिकार बन रही थीं. उसी वर्ष मित्शुबिशी बैंक और बैंक आफ टोकियो जो दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से थे, दिवालिया घोषित किए गए थे. अधिग्रहण और विलय का यह खेल यूरोपीय देशों में भी फैला और ब्रिटेन, स्विटजरलेंड, जर्मनी आदि अनेक देशों में पूंजी के बड़े मगरमच्छ छोटी मछलियों को निगलने लगे. इससे मार्क्स और ऐंगल्स की यह भविष्यवाणी सच सिद्ध हो रही थी कि पूंजी का सहज स्वभाव केंद्र की ओर खिसकते जाने का होता है. इस प्रकार वह कुछ समूहों तक सिमटकर रह जाती है. अधिग्रहण और विलयीकरण के इस खेल में हर बार कुछ कंपनियां बंद कर दी जाती हैं, जिसका कुफल उनमें कार्यरत श्रमिकों को बेरोजगारी के रूप में भोगना पड़ता है. स्पष्ट है कि

केंद्र की ओर पूंजी का सतत जमाव उत्पादन में किसी प्रकार की वृद्धि नहीं करता, बल्कि इसका उल्टा ही होता है.’

बेरोजगारी का जिक्र हुआ है तो मार्क्स को एक बार पुनः याद करना पड़ेगा. कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने कहा था कि बुर्जुआ वर्ग लंबे समय तक सत्ता पर काबिज नहीं रह पाएगा. इसलिए कि वह गरीब और विपन्न वर्गों को अपने दम पर अपने राज्य में सहने की सहूलियत नहीं देता, बल्कि उनके बल पर अपने लिए सुविधाओं का अंबार लगा लेता है. इससे श्रमिक वर्ग के मन में आक्रोश पैदा होता है, जो लगातार बढ़ता जाता है, जो एक दिन बुर्जुआ वर्ग के सत्ताच्युत होने का कारण बनता है. हालांकि पूंजीवादी देशों में ऐसी खबरें प्रायः छनछनकर ही सामने आ पाती हैं. पूंजीपतियों से अस्थिमज्जा प्राप्त मीडिया तथा उन्हीं के दम पर पलने वाली सरकारें, उनपर पर्दा डालने का काम करती हैं. 2007 में छाई मंदी से ठीक पहले पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्रीविचारक उदार आर्थिक नीतियों का गुणगान करते नहीं थकते थे. 1995-1996 के पूंजीवाद के सुनहरे दौर में जब बड़ी कंपनियां अपेक्षाकृत छोटी कंपनियों का अधिग्रहण कर अपने विस्तारवादी मंसूबों को अंजाम दे रही थीं, उस समय संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक बेरोजगारों की संख्या 12 करोड़ से भी अधिक थी. ये वे आंकड़े थे, जो पूंजीपतियों के आसरे फलनेफूलने वाले मीडिया ने दिए थे. वास्तविक स्थिति और भी भयावह एवं चिंताजनक है. यदि अस्थायी और ठेके पर अल्पावधि के लिए काम करने वाले कर्मचारियों को भी बेरोजगारों की श्रेणी में रख लिया जाए तो दुनिया के कुल बेरोजगारों की संख्या एक अरब से ज्यादा हो सकती है.

संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी यूरोप में बेरोजगारों की संख्या दो करोड़ से भी अधिक थी, जो वहां की कुल जनसंख्या का करीब 10.6 प्रतिशत हैं. यही हाल यूरोप के ‘लौहपुरुष’(स्ट्रांग मैन) कहे जाने वाले जर्मनी का था, वहां हिटलर के पतन के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई थी और वह एक झटके में पचास लाख को पार कर चुकी थी. इनमें भी सबसे अधिक आश्चर्यजनक जापान की हालत है. अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति से पूरे विश्व को चैंका देने वाले जापान में 1930 के बाद पहली बार बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि सरकारी आंकड़े वहां तीन प्रतिशत बेरोजगारी की बात स्वीकारते हैं, मगर वास्तविक बेरोजारों की संख्या का, कुल जनसंख्या का आठ से दस प्रतिशत होना, चिंताजनक स्थिति है. बढ़ती बेरोजगारी ने इस बार उन क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है, जो इससे पहले रोजगार की दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित और लाभदायक समझे जाते थे. इनमें अध्यापक, नर्स, डाॅक्टर, बैंक कर्मचारी, वकील आदि सम्मिलित हैं, जो अपनी व्यावसायिक योग्यता के दम पर रोजगार पाते रहे थे. 2007 के बाद तो बेरोजगारी ने युवाओं की कमर ही तोड़ दी है. अमेरिका, यूरोप आदि के देशों में बैंकों और बड़े उद्योगों के बंद अथवा दिवालिया होने के बाद दुनियाभर के श्रमिकोंकामगारों को छंटनी का शिकार होना पड़ा. उनकी संख्या करोड़ों में है.

उदार अर्थनीति की विडंबना है कि आर्थिक प्रगति का लाभ जहां चंद विकसित देश ही उठा पा रहे थे, जबकि छंटनी और दिवालियेपन का असर प्रायः छोटी और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को ही झेलना पड़ा है. इससे मार्क्स का यह कथन एक बार फिर प्रासंगिक लगने लगा, जिसमें उसने कहा था कि पूंजीवाद एक वैश्विक व्यवस्था के रूप में विकसित होगा. मगर विश्वबाजार का अस्तित्व लंबे समय तक टिके रहने वाला नहीं है. इसका अंत सुनिश्चित है. यह हमारे समय का बेहद निर्णायक समय है. सच तो यह है कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जिसमें कुछ भी निजी अथवा स्थानीय नहीं है. हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति यहां तक कि कूटनीति भी स्थानीय नहीं है. सबकुछ वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय है. प्रौद्योगिकी प्रेरित अंतरराष्ट्रीयकरण ने हमारी संवेदनाओं को भौंथरा किया है. आजकल युद्ध के समाचार भी तब तक रोमांचित नहीं करते, जब तक कि उनमें अंतरराष्ट्रीयता का पुट न हो. वैसे युद्ध अब राजनीतिक मसला नहीं रहा. बीसवीं शताब्दी ने जितने युद्ध झेले, उनके पीछे बाजार का अधिक हाथ था, जिनमें करोड़ों की जानें गईं. इनमें सबसे आखिरी युद्ध अमेरिका और इराक के बीच था, जिसमें एक महादेश की पूंजीवादी आकांक्षाओं ने अपने से कहीं छोटे देश को पहले तो बदनाम करने की साजिश की. फिर दादागिरी दिखाते हुए उसपर हमला बोल दिया.

यह दादागिरी राजनीति प्रेरित नहीं थी. न उसको देश के नागरिकों का समर्थन प्राप्त था. समर्थन था, पूंजीपतियों का, जो युद्ध में अपनेअपने लाभ देख रहे थे. एक वर्ग को युद्ध की तबाही के बाद उस देश में नवनिर्माण के लिए ठेके मिलने की उम्मीद थी. कुछ का धंधा हथियार बनानेबेचने का था. वे मानते थे कि युद्ध नवनिर्मित रासायनिक हथियारों के प्रदर्शन का अच्छा अवसर सिद्ध होगा, बाद में उनके ग्राहक भी आएंगे. इन महत्त्वाकांक्षाओं ने एक फलतेफूलते देश को तबाही के गर्त में ढकेल दिया. हैरानी की बात है कि जनता और बुद्धिजीवी उस युद्ध को केवल राजनीतिक मसला समझे रहे. युद्ध के वास्तविक जिम्मेदार व्यक्ति कभी सामने आ ही नहीं पाए. युद्ध से नाराज जनता ने बुश महाराज से कुर्सी तो छीन ली. नई उम्मीदों के साथ नया चेहरा राजनीति में आया. मगर पूंजीवादी मंसूबे खत्म नहीं हुए. यानी युद्ध की संभावनाओं और उससे जुड़ी पूंजीवादी आकांक्षाओं का कोई निदान आज तक नहीं खोजा जा सका.

समस्या है कि पूंजीवाद के इस खेल से बचा कैसे जाए? इसका एक ही हल है. किसी भी तरह किसान, मजदूर और कामगार वर्ग अपनेअपने हितों की रक्षा में एकजुट हों. अपनी वास्तविक जरूरतों का आकलन करें. उपलब्ध संसाधनों को जांचे परखें. तत्पश्चात अनुकूल प्रौद्योगिकी का चयन कर उत्पादन की जिम्मेदारी स्वयं संभालें. प्रौद्योगिकी भी ऐसी हो जो समूह के सदस्यों की कुशलता का उपयोग कर, उन्हें आर्थिकसामाजिक रूप में आत्मनिर्भर बनाती हो. लेकिन क्या यह इतना ही आसान है? आजकल सामान्य समझबूझ वाला बुद्धिजीवी भी मानता है कि उद्योगों को बंधनमुक्त होना चाहिए. सरकार उनपर कम से कम नियंत्रण रखे. वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास हो, ताकि उद्योगों को हर जगह एक जैसा वातावरण मिले. सभी देशों में लाइसेंस और परमिट की एकसी शर्तें, एक जैसे विधान हों. व्यवस्था हो कि उद्योगों को समाज के बहुसंख्यक वर्ग के विकास के लिए काम करने की पूरीपूरी छूट मिले. साथ में आवश्यक सुविधाएं भी. ऐसे में कैसे संभव है, पूंजीवाद के संकट से बच पाना. खासकर तब जब पूंजीवाद लगातार मजबूत और हिंò होता जा रहा हो. श्रमिक शोषण के नएनए रास्ते खोजे जा रहे हों. शोध का क्षेत्र पूंजीपतियों के हाथ में चले जाने से सारी प्रतिभाएं, सारे के सारे पेटेंट पहले से ही उनके हाथों में जा ही चुके हैं. पूंजीपतियों के लिए तो वैश्वीकरण भी एक अवसर है. यह वैश्वीकरण भी निरापद कहां है? इससे बड़ी विडंबना भला और क्या होगी कि पिछली शताब्दी में भूमंडलीकरण एवं अर्थव्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण की तमाम सूचनाओं के बावजूद भारत में आर्थिक विसंगतियां सिर चढ़कर बोल रही हैं. देश में रोजगार के जितने अवसर बढ़े हैं, बेरोजगारों की संख्या उससे कहीं अधिक बढ़ी है. उससे कहीं तेजी से देश में आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है.

पूंजीवाद के अंतरराष्ट्रीय फैलाव के कारण विभिन्न देशों के आंतरिक और बाह्यः तनावों में भी वृद्धि हुई है. राज्यों के विरोधाभास और भी खुलकर सामने आए हैं. पूंजी का खिंचाव अतिविकसित देशों की ओर बढ़ता ही जा रहा है. हालात को समझने के लिए सिर्फ एक उदाहरण पर्याप्त होगा. 1987 में संयुक्त राज्य अमेरिका अपने कुल सालाना बजट का मात्र छह प्रतिशत हिस्सा निर्यात के माध्यम से जुटाता था. 1997 में निर्यात का हिस्सा बढ़कर 13 प्रतिशत यानी दुगुने से भी अधिक हो चुका था. इकीसवीं शताब्दी की दहलीज पर सरकार की योजना 22 प्रतिशत के लक्ष्य को पाने की है. इससे अमेरिका जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के रहस्य को समझा जा सकता है. विकसित देशों के पास तो पूंजी है, संसाधन हैं, इसलिए वे अपने उत्पादों के लिए बाजार की सतत खोज में रहते हैं. ऐसी तकनीक की खोज में रहते हैं, जिसकी स्थापना लागत भले ही अधिक हो, मगर जिसके माध्यम से उत्पादन व्यवस्था का अधिकाधिक स्वचालीकरण कर सकें. स्वचालीकरण की तीव्र प्रक्रिया में स्थापना लागत भले ही अपेक्षाकृत अधिक हो, मगर उत्पादनवृद्धि और प्रचालन लागत में भारी कमी से उद्योगपति को दीर्घकालिक लाभ मिलता है. दूसरी ओर श्रमिकों पर निर्भरता में लगातार गिरावट आती है. इससे पूंजीपति लगातार ताकतवर होता है और श्रमिक कमजोर.

इस स्थिति को मार्क्स ने 1848 में ही भांप लिया था. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने लिखा था

सघन मशीनीकरण तथा श्रमविभाजन की त्वरित प्रक्रिया में सर्वहारा काम के दौरान अपनी समस्त कार्यकौशल और विशिष्टताएं खो बैठता है. इसका प्रतिकूल प्रभाव उसकी कार्यक्षमता पर पड़ता है. उसका उल्लास धीरेधीरे कम होने लगता है. एक दिन वह मशीनों का आश्रित बनकर रह जाता है. पूंजीवादी समाजों में श्रमिक के कौशल को कुंद करने, उसको मशीनों का दास बनाने की सर्वाधिक सरल और प्रचलित चाल है. इससे श्रमिक की उत्पादन लागत को लगभग पूरी तरह से, उसकी रोजमर्रा की आवश्यकताओं तक, सिर्फ उन आवश्यकताओं तक जिनसे वह अपना भरणपोषण कर, कलकारखानों के लिए मजदूरों की नई फसल पैदा कर सके, सीमित कर दिया जाता है. चूंकि किसी उपभोक्ता वस्तु, साथ ही उसके श्रम की कीमत उत्पादन लागत के तय होती है. अतएव जैसेजैसे श्रमिक का उत्पादन से मोहभंग बढ़ता है, काम के प्रति उसका विकर्षण बढ़ता जाता है. दूसरी ओर उसकी वृत्तिका भी उसी अनुपात में गिरती चली जाती है. इसी के साथ कामगार के ऊपर, चाहे वह कार्यघंटों में हुई बढ़ोत्तरी के कारण हो या तय समयसीमा में अधिक काम देने के दबाव का मामला, अथवा उच्च उत्पादनक्षमता युक्त मशीनरी के साथ काम करने के कारण उसके साथ तालमेल बनाए रखने की चुनौतीश्रम का दबाव भी लगातार बढ़ता जाता है.

सोवियत संघ के अवसान के बाद भारत आदि देशों में अमेरिकापरस्त अर्थशास्त्रियों एवं बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग पैदा हुआ है, जिसने पूंजीवाद को लगभग अपरिहार्य और विकल्पहीन मान लिया है. स्वयं अमेरिका की क्या स्थिति है, इस बारे में बहुत अधिक समाचार मीडिया में नहीं दिए जाते हैं. यह भी कहा जा सकता है कि अपने पूंजीवादी संबंधों की लाज रखने के लिए मीडिया उनपर पर्दा डाले रखता है. वस्तुतः आधुनिक अमेरिका की वही हालत है, जो मार्क्स के समय में तत्कालीन सर्वाधिक विकसित पूंजीवादी देश ब्रिटेन की थी. अंतर केवल इतना है कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों के दोहन के लिए राजनीति का सहारा लेता था, अमेरिका यह काम अपनी अर्थसत्ता के माध्यम से करता है. उसने पूरी दुनिया में अपने आर्थिक उपनिवेश बसाए हुए हैं, जिनपर वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से राज करता है. उपनिवेशों के शोषण में बौद्धिक संपदा जैसे कानून उसके मददगार सिद्ध होते हैं. इसके बावजूद हालात संतोषजनक नहीं हैं. आक्रोश भीतर ही भीतर भड़क रहा है. इसके पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वे विसंगतियां हैं, जो धीरेधीरे सामने आ रही हैं. ऐलेन वुड के अनुसार अमेरिका में

गत बीस वर्षों के दौरान अमेरिकी श्रमिकों की वास्तविक मजदूरों में बीस प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज हुई है, दूसरी ओर उन्हें पहले की अपेक्षा प्रतिदिन दस प्रतिशत अधिक काम करना पड़ता है. कहा जा सकता है कि अमेरिका की औद्योगिक क्रांति वहां के श्रमिक वर्ग के हितों पर कुठाराघात के बाद संभव हो सकी है. उदाहरणार्थ, एक अमेरिकी कर्मचारी को एक वर्ष में औसतन 168 घंटे ओवरटाइम करना पड़ता है, जो एक महीने के कार्य के बराबर है. अमेरिकी आॅटोमोबाइल उद्योग के लिए यह विशेषरूप में सही है, जहां एक कार्यदिवस में नौ घंटे और सप्ताह में छह दिन कार्य करने का प्रावधान है. अमेरिकी मजदूर संगठनों के अनुसार यदि वहां कार्यसप्ताह को चालीस घंटों तक सीमित कर दिया जाए तो मात्र इसी से 59,000 नए रोजगार अवसर पैदा किए जा सकते हैं.’


ऐसा नहीं है कि अपने शोषण के विरोध में श्रमिकों में कोई चेतना या सुगबुगाहट न हो. बल्कि वहां आवाजें उठने लगी हैं. करीब पंद्रह वर्ष पहले 24 अक्टूबर, 1994 को टाइम पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में पूंजीवादी शोषण के विरोध में बढ़ते श्रमिकआक्रोश का उल्लेख किया गया था, जिसमें उन्होंने उदारवाद प्रेरित आर्थिक विस्तार को अपने हितों के प्रतिकूल बताया था. लेख में बताया गया था कि काम के अत्यधिक बोझ के कारण, श्रमिकों की दिनचर्या कारखाने में काम तथा ओवरटाइम करने के बाद घर जाकर नहानेखानेसोने और अगली सुबह फिर कारखाने के लिए दौड़ लगाने तक सिमट चुकी है. इसने वहां के सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया है. इससे जहां शिशु जन्म दर में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं तलाक की घटनाओं में भी अप्रत्याशित तेजी आई है. जबकि 1980 तक लगातार विकासमान रही जीवनसंभाव्यता, उसके बाद लगभग स्थिर हो गई है. यह स्थिति अमेरिकी समाज के विकास की विडंबना को दर्शाती है. ब्रिटेन का हाल भी इससे भिन्न नहीं है. जब मादाम थैचर वहां की प्रधानमंत्री थीं तो उद्योगों में 25 लाख रोजगार अवसरों में गिरावट दर्ज की गई थी. बावजूद इसके वहां कारखानों के उत्पादनसामर्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. कामगारों की संख्या में हुई भारी गिरावट के बावजूद उत्पादन स्तर पूर्ववत रहने का कारण केवल उन्नत मशीनों का उपयोग नही है, बल्कि मजदूरों का शोषण भी है. अत्याधुनिक तकनीक भी श्रमिकों के लिए राहतकारी सिद्ध नहीं हुई है. उनकी मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. श्रमिकों एवं आम जनता को भुलावे में रखने के लिए नए उपकरणों को बड़ी तेजी से एक के बाद कर उतारा जा रहा है. ऐसे उत्पादों के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है, जिनका वास्तविक विकास से कोई संबंध ही न हो. लोकतांत्रिक खुलेपन का उपयोग फैशन और नईनई उपभोक्तावस्तुओं के साथ, लोगों को मोबाइल और इंटरनेट पर खुली सेक्ससामग्री परोसने के लिए किया जा रहा है. तंत्रमंत्र और जादूटोने की बढ़ती लोकप्रियता का लाभ उपभोक्तासामग्री के प्रचारप्रसार के लिए किया है. इसका दुष्परिणाम यह है कि समाज में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही है.

अमेरिका की भांति ब्रिटेन में भी श्रमिकों को अधिक देर तक कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है. उन्हें उस अवधि का वेतन भी नहीं दिया जाता. यही हाल यूरोप के बाकी देशों का है. वहां भी बड़ी औद्योगिक कंपनियां छोटे उत्पादकों को लीलती जा रही हैं. सबसे धनी और निर्धनतम व्यक्ति के बीच आय का अंतर लगातार बड़ता जा रहा है. भारत समेत ऐशियाई देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को लागू हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं. पश्चिम का अंधानुकरण करते हुए भारत ने उदार अर्थव्यवस्था को अपनाकर, गत पचीसतीस वर्ष से पूंजीपतियों को मनमानी करने का अधिकार दे दिया है. इससे पूंजी का तेजी से केंद्र की ओर खिंचाव जारी है. पिछले एक दशक में जहां देश में अरबपतियों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, वहीं पैंतीस करोड़ नागरिकों को प्रतिदिन बीस रुपये से भी कम आय में जीवनयापन करना पड़ता है. बढ़ते जनाक्रोश के दुष्परिणामस्वरूप पिछले कुछ दिनों से देश में नक्सलवादी गतिविधियां बढ़ी हैं. सरकार और पूंजीपतियों के दबाव में अपनी जमीन और संसाधन लुटा चुके हजारों लोग विद्रोह में व्यवस्था के विरुद्ध हथियारबंद हो उठे हैं. छोटे कारखानों में मजदूरी की बुरी हालत है. वहां बिना किसी नोटिस के कार्यघंटों में 50 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी थी. इससे पहले जहां श्रमिकों को केवल आठ घंटे काम करना पड़ता था, अब बारह घंटे उतने ही वेतन में काम करना उनकी विवशता बनती जा रही है. यही हालात एशिया के बाकी देशों में हैं. पश्चिम भी इनसे बचा नहीं है. मीडिया पूंजी की इस तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाने के बजाय उसके महिमामंडन में लगा रहता है. स्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार किए बिना उसका प्रयास मार्क्सवाद कठघरे में खड़ा करने का होता है, जिससे अंततः पूंजीवाद ही मजबूत होता है.

यह मार्क्स और ऐंगल्स ही थे, जिन्होंने हमारा परिचय सामाजिक विकास के इस सर्वमान्य और महत्त्वपूर्ण नियम से कराया था, जिसके अनुसार समाज का वर्तमान ढांचा पूंजीपतियों के अनुकूल विकसित हुआ है. यह उसी अवस्था में स्थिर रह सकता है