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महात्मा ज्योतिबा फुले और ‘सत्यशोधक समाज’

सामान्य

अच्छे विचार जब तक उनपर अमल न किया जाए, महज अच्छे सपनों की तरह होते हैं….केवल कर्म ही हैं, जो किसी विचार को मूल्यवान बनाते हैं.—इमर्सन

वर्ष 1873, सिंतबर महीने का 24वां दिन. महाराष्ट्र का मुंबई के बाद दूसरे सबसे बड़े महानगर पुणे का जूनागंज मुहल्ला, मकान नंबर 527. सभागार में पुणे सहित महाराष्ट्र के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से पहुंचे करीब 60 लोग जमा थे. उन्हें ज्योतिबा ने आमंत्रित किया था. बाकी का आना जारी था. ज्योतिबा स्वयं अतिथियों की अगवानी करने में लगे थे. उस समय तक उनकी प्रतिष्ठा शिखर पर पहुंच चुकी थी. पूरा महाराष्ट्र, खासकर पुणे ज्योतिबा को लेकर दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक ओर वे लोग थे जो उनके विकास-पुरुष कहकर उनका सम्मान करते थे. महाराष्ट्र में शिक्षा-क्रांति के जन्मदाता के रूप में उनका सम्मान करते थे. दूसरी ओर थे कट्टरपंथी ब्राह्मण, जिन्हें बदलाव के नाम से ही चिढ़ थी. साथ में वे लोग भी थे, जो अपना दिलो-दिमाग ब्राह्मणवाद के आगे गिरवी रख चुके थे. समाज में व्याप्त अशिक्षा, आडंबरवाद और जातीय विषमता के विरोध में संघर्ष करते हुए फुले को 25 वर्ष से अधिक हो चुके थे. इस बीच उनके संघर्ष का दायरा बढ़ा था. अब उन्हें लगता है कि आगे के सफर के लिए कुछ सहयोगियों को साथ रखना जरूरी होगा. काम समाज का है तो जितने ज्यादा से ज्यादा लोग साथ निभाएं उतना ही अच्छा.

इसी पर विचार करने के लिए महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था. सभा में ज्योतिबा ने जोरदार भाषण दिया. कहा कि समाज को जातिवाद, पुरोहितवाद, अंधविश्वास और अशिक्षा के दुष्चक्र से बाहर लाने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा. यह काम अभी तक सब अपने-अपने स्तर पर करते आ रहे हैं. इस बीच उनके विरोधी संगठित हुए हैं. इसलिए आंदोलन को मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए उन्हें मजबूत संगठन की आवश्यकता है. उपस्थित लोगों ने हर्षध्वनि के साथ प्रस्ताव पर मुहर लगा दी. संगठन को नाम दिया गया—‘सत्यशोधक समाज’. ज्योतिबा ने नवगठित संगठन के अध्यक्ष और खजांची का पद-भार संभाला. सचिव का दायित्व सौंपा गया—नारायणराव गोपालराव कडलक को. ज्योतिबा के तीन ब्राह्मण मित्रों विनायक बापूजी भंडारकर, विनायक बापूजी डांगले और सीताराम सखाराम दतार की भी संगठन के निर्माण में प्रमुख भूमिका थी. समाज के तीन प्रारंभिक उद्देश्य थे. पहला—ईश्वर एक है, सब उसकी संतान हैं. दूसरा—जैसे माता-पिता से संवाद के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं पड़ती, वैसे ही ईश्वर की अराधना के लिए भी किसी मध्यस्थ यानी पुरोहित की जरूरत नहीं है. तीसरा—किसी भी जाति, धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति जो समाज के उद्देश्य और लक्ष्य के प्रति एक-भाव रखता हो, उसका सदस्य बन सकता है.

उस समय देश-भर में राजा राममोहनराय का ‘ब्रह्म समाज’, केशवचंद सेन का ‘प्रार्थना समाज’, महादेव गोविंद रानाडे का ‘पुणे सार्वजनिक सभा’—जैसे अनगिनत संगठन समाज-सुधार के क्षेत्र में कार्यरत थे. ऐसे में नए संगठन की क्या आवश्यकता थी? दरअसल उस समय तक जितने भी संगठन समाज सुधार के क्षेत्र में काम कर रहे थे, सभी द्विजों द्वारा, द्विजों की हित-सिद्धि हेतु बनाए गए थे. उनके लिए बस इतना समाज-सुधार अभीष्ट था कि चमार के घर में जन्म लेने वाला चमार रहे, जूते गांठे, मरे पशुओं की खाल निकाले, जरूरत पड़ने पर जमींदार की बेगार बजाए, उसी से संतुष्ट रहें. बस इतना हो कि काम के आधार पर उन्हें कोई ओछा न माने. किसी तरह का दुव्र्यवहार उसके साथ न हो. शिक्षा के मामले में राजा राममोहनराय सहित उस समय के द्विज समाज सुधारकों का सोच था कि पहले ऊंची जातियां पढ़-लिख जाएं. वे पढ़-लिख जाएंगी तो नीचे तक शिक्षा अपने आप चली जाएगी. यह अर्थशास्त्र के प्रचलित सिद्धांत—‘ट्रिकिल डाउन थियरी’ जैसा था, जिसे हिंदी में ‘रिसाव का सिद्धांत’ कह दिया जाता है. उसके अनुसार ऊपर के स्तर पर समृद्धि होगी तो बूंद-बूंद रिसकर नीचे भी आएगी. इस सिद्धांत की आलोचना उसकी शुरुआत से ही होने लगी थी. बावजूद इसके अधिकांश समाज-सुधारक ‘रिसाव के सिद्धांत’ पर भरोसा कर, काम करते रहे. उनसे पूछा जा सकता था कि शताब्दियों तक कथित विश्व-गुरु रहने के बावजूद भारत में निचली जातियां अज्ञान के अंधकार में क्यों दबी थीं? ऊपर के वर्गों की शिक्षा, उनकी ज्ञान-संपदा और चालाकियां निचले वर्गों तक क्यों अंतरित नहीं हुईं? यह भी पूछा जा सकता था के ‘महासागर’ के लोकहित में पुनः-पुनः उमगने, सभी को साथ लेकर चलने से किसने रोका था? जो लोग 2000-2500 वर्षों में तक ऊपर के वर्गों की समृद्धि और ज्ञान संपदा नीचे रिसने से रोके रहे, क्या वे उनके कहने भर से एकाएक मान जाएंगे? ज्योतिबा का स्पष्ट मत था कि वे नहीं मानने वाले. ब्राह्मण तो हरगिज नहीं, क्योंकि वर्तमान वर्ण-व्यवस्था उनके आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक हितों की पूर्ति करती है. शताब्दियों से बिना कुछ किए-धरे मिल रहे मान-सम्मान, जिसे वे दैवीय कहते हैं, को छोड़ना उनके लिए संभव नहीं. इसलिए बहुजन शूद्र-अतिशूद्रों को अपने विकास के लिए प्रयास स्वयं ही करने होंगे. इसके लिए एक सशक्त संगठन की जरूरत थी. ऐसे सक्रिय, जुझारू और ईमानदार लोगों की जरूरत थी जो संगठन के आदर्शों की प्रति समर्पित होकर लगातार काम कर सकें. उससे पहले जितने भी संगठन थे, सभी समाज के शीर्ष वर्ग के सदस्यों ने गठित किए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ ऐसा संगठन था जिसकी स्थापना समाज के बहुजन शूद्रों अतिशूद्रों ने अपने अधिकारों की बहाली के लिए स्वयं की थी. ‘सत्यशोधक समाज’ के पहले वर्ष की रिपोर्ट में कहा गया था कि उसकी स्थापना—

‘ब्राह्मण, पंडित, जोशी, उपाध्याय-पुरोहित आदि लोगों, जो अपने स्वार्थी (धर्म)ग्रंथों द्वारा हजारों वर्षों से शूद्रों को नीच समझकर लूटते आ रहे हैं—से मुक्त करने के लिए की गई है. इसलिए उपदेश और ज्ञान के द्वारा लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने; अर्थात धर्म एवं व्यवहार से संबंधित ब्राह्मणों के छदम्, स्वार्थी ग्रंथों से जनसाधारण को मुक्ति दिलाने हेतु कुछ जागरूक शूद्रों ने इस समाज की स्थापना की है.’

‘सत्यशोधक समाज’ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक संगठन था. राजनीतिक सवालों पर बोलना उसमें सख्त मना था.  यह फुले का जनता पर प्रभाव और अनूठी कार्यशैली थी कि ‘सत्यशोधक समाज’’ को पांव जमाते देर न लगी. स्थापना के कुछ ही महीनों में मुंबई और पुणे के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी शाखाएं स्थापित होने लगीं. उसका प्रभाव लगभग सभी शूद्र ओर अतिशूद्र जातियों पर था, फिर भी माली और कुन्बी जातियों का उत्साह सबसे बढ़-चढ़कर था. वे ‘सत्यशोधक समाज’ के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं. 1874 में समाज की मुंबई शाखा का उद्घाटन किया गया. उसके पीछे मुख्य योगदान तेलूगु के कमाठी और माली जाति के सदस्यों का था. 1884 में समाज का विस्तार जुन्नार परिक्षेत्र और पश्चिमी पुणे, अहमदनगर के इंदापुर तहसील और थाणे तक फैल गया. अगले दो वर्षों में वह लगभग सभी मराठी भाषी क्षेत्रों तक फैल चुका था. एक वर्ष पूरा होते-होते उसके 232 औपचारिक सदस्य बन चुके थे. लोगों ने शादी-विवाह, नामकरण जैसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहितों को बुलाना छोड़ दिया था. ‘सत्यशोधक समाज’ के सिद्धांतों पर ज्योतिबा फुले के विचारों की स्पष्ट छाया थी. उनका मानना था कि विवाह के समय पंडित-पुरोहित अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर शूद्रों को बरगलाते हैं. उनका पूरा ध्यान यजमान से अधिक से अधिक दक्षिणा वसूलने पर रहता है. शूद्रों-अतिशूद्रों का हित इसी में है कि ऐसे अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहित को दूर रखा जाए. इस लक्ष्य में ‘सत्यशोधक समाज’ को सफलता भी मिली थी. सतारा निवासी गोविंदराव बापूजी भिलारे ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना के पहले वर्ष में छह विवाह, तथा दूसरे वर्ष में पांच विवाह बगैर ब्राह्मण पुरोहित की उपस्थिति के कराए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुरूप पहला विवाह, 25 दिसंबर, 1873 को पेठ जूनागंज, पूना के रहने वाले सीताराम जवाजी आल्हाट और राधाबाई ग्यानोबा निंबणकर के बीच संपन्न हुआ था. उसमें अन्य लोगों के अलावा सावित्रीबाई फुले और श्रीमती बजूबाई ग्यानोबा निंबणकर ने भी वर-वधु की आर्थिक मदद की थी. दूसरा विवाह ग्यानोबा कृष्णाजी ससाने, मुकाम हड़पसर, पूना का काशीबाई, पुत्री श्री नारायणराव विठोजी शिंदे, निवासी पर्वती, पूना के बीच संपन्न हुआ था. इस बार भी समाज के सदस्यों ने नव-दंपति को उपहार आदि देकर सम्मानित किया था.

‘सत्यशोधक समाज’ द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता को खत्म करने से स्वयं ब्राह्मण समाज उनसे बुरी तरह नाराज था. वे अपनी पुनर्वापसी के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रहे थे. ग्यानोबा ससाने और काशीबाई का विवाह पहले हड़पसर में होना था. लेकिन एक दुष्ट दलाल ने ऊल-जुलूल बातों द्वारा लड़के के रिश्तेदारों और दोस्तों के दिमाग में भ्रम पैदा कर दिया था. उससे बचने के लिए ज्योतिबा ने विवाह को पूना में कराने का सुझाव दिया. वहां भी लोगों को भड़काने वाले कम न थे. पंडितों के बहकावे में आकर मारुति सटवाजी फुले तथा तुकाराम खंडोजी फुले ने दोनों पक्षों को भड़काने के लिए अफवाह फैलाई कि, ‘हमारे दुर्बल बच्चों के विवाह इन लोगों के जानते-बूझते हुए हैं. उनमें से एक दुलहन उम्र में दो वर्ष की थी, जो ब्याह के कुछ ही दिनों में मर गई. इस लापरवाही के लिए तुकाराम सोनाजी भुजबल को करीब 400 रुपये का नुकसान सहना पड़ा.’ आखिकर ‘सत्यशोधक समाज’ के कार्यकर्ता बाबाजी राणोजी फुले के हस्तक्षेप से वह विवाह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार संपन्न हो सका. इसके बावजूद ब्राह्मणों ने हार नहीं मानी थी. उन्होंने शूद्र-अतिशूद्रों को यह कहकर भड़काना शुरू कर दिया था कि बिना पुरोहित के उनकी प्रार्थनाएं ईश्वर तक नहीं पहुंच पाएंगीं. घबराए हुए लोग फुले के पास गए. फुले ने उन्हें समझाया कि जब तमिल, बंगाली, मलयाली, कन्नड, फारसी आदि गैर-संस्कृत भाषी लोगों की प्रार्थनाएं ईश्वर तक पहुंच सकती हैं, तब उनकी प्रार्थना कैसे अनसुनी रह सकती है. हम अपने माता-पिता, अभिभावक से सीधे संवाद करते हैं. इसलिए ईश्वर को अपना पिता मानने वालों को भी उससे डरने, घबराने तथा पूजा-अर्चना के लिए पुरोहित को बीच में लाने की आवश्यकता कतई नहीं है. फिर भी यदि कोई पूजा-पाठ जैसे कार्यों में पुरोहित की भूमिका को आवश्यक समझता है, तो वह अपनी ही जाति के अनुभवी व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपकर अपने मन को समझा सकता है.

धीरे-धीरे ही सही, लोग ज्योतिबा की बातों को समझने लगे थे. तीसरे वर्ष के दौरान उसकी सदस्य संख्या बढ़कर 316 तक पहुँच चुकी थी. दूसरी ओर उनके विरोधी भी शांत न थे. एक परिवार में शादी होने वाली थी. पुरोहितों ने उस घर में पहुंचकर डराया कि बिना ब्राह्मण एवं संस्कृत मंत्रों के हुआ विवाह ईश्वर की दृष्टि में अशुभ माना जाएगा. उसके अत्यंत बुरे परिणाम होंगे. गृहणी सावित्रीबाई फुले को जानती थी. फुले को पता चला उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ के बैनर तले विवाह संपन्न कराने का ऐलान कर दिया. सैकड़ों सदस्यों की उपस्थिति में वह विवाह खुशी-खुशी संपन्न हुआ. प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई उपहार लेकर पहुंचा था. उस घटना के बाद ब्राह्मण सतर्क हो गए. एक अन्य घटना में ब्राह्मणों ने दूल्हे के पिता को धमकी दी. लोगों को यह कहकर भड़काया कि फुले उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं. लेकिन ज्योतिबा के लिए ऐसी चुनौतियां नई नहीं थीं. न ही वे धमकियों से डरने वाले थे. अप्रिय घटना से बचने के लिए उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी. पुलिस आई और उसकी निगरानी में वह विवाह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ.

‘सत्यशोधक समाज’ के दूसरे वर्ष की रिपोर्ट के अनुसार तब तक उसके में एक और घटना का उल्लेख किया गया है. विट्ठल नामदेव गुठाड़ पुणे के व्यापारी थे. गुठाड़ ने समाज की पद्धति के अनुसार ब्राह्मण को बुलाए बिना ही गृहप्रवेश कर लिया. इससे ब्राह्मणों ने उनके व्यापारिक हिस्सेदार को इतना भड़काया कि उसने हिस्सेदारी तोड़ दी. विरोधी इतने से ही शांत नहीं हुए. उन्होंने गुठाड़ के कामकाज में इतनी परेशानियां पैदा कीं कि उनका व्यापार घाटे में आ गया. हालात यहां तक पहुंच गए कि बच्चे के स्कूल की फीस जमा करने में मुश्किल होने लगी. मामला जब ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्यों के संज्ञान में पहुंचा तो उन्हें गुठाड़ के प्रति चिंता होने लगी. आखिरकार उनकी मदद के लिए गंगाराम भाऊ म्हस्के ने बच्चे के स्कूल की फीस के लिए तीन रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने का ऐलान कर दिया. पांच माह तक गुठाड़ ने वह छात्रवृत्ति ली. बाद में जब उनका व्यापार पटरी पर लौट आया तो उन्होंने म्हस्के का आभार व्यक्त करते हुए और अधिक मदद लेने से इन्कार कर दिया.

केवल शिक्षा ही नहीं, सामाजिक मदद के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ के सदस्य हमेशा आगे रहते थे. सितंबर 1875 में अतिवृष्टि के कारण अहमदाबाद में जल-प्रलय जैसे हालात पैदा हो चुके थे. परिणामस्वरूप हजारों लोगों के आगे जीवन का संकट पैदा हो गया. भीषण बारिश के कारण उनके कपड़े, अनाज, घर आदि सब-कुछ नष्ट हो चुका था. ऐसे आपदाग्रस्त लोगों की मदद के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.  विश्राम रामजी घोले ने सदस्यों से मदद के लिए आगे आने का आवाह्न किया. उसके बाद कुल 195 रुपये की रकम चंदे के रूप में जमा की गई. वह धनराशि अहमदाबाद के कलेक्टर को बाढ़-पीड़ितों की मदद के लिए भेज दी गई. उसकी देखा-देखी ‘सत्यशोधक समाज’ की मुंबई शाखा भी सक्रिय हुई. वहां भी 130 रुपये चंदा के रूप में उगाहकर अहमदाबाद के कलेक्टर के पास भेज दिए गए.

इस बीच कुछ लोगों ने यह कहना आरंभ कर दिया कि बगैर ब्राह्मण पुरोहित की मौजूदगी के होने वाले विवाह  हिंदू रीति-नीति या कानून, किसी भी आधार पर मान्य नहीं हैं. इस कारण लोगों के मन में शंका उत्पन्न होने लगी थी. उसके समाधान के लिए ‘सत्यशोधक समाज’ के अध्यक्ष की ओर से एक पत्र उच्च न्यायालय के एक अधिकारी राघवेंद्रराव रामचंद्रराव को पत्र लिखकर उन विवाहों की वैधता के बारे में राय देने का अनुरोध किया. जवाब में राघवेंद्रराव ने कानूनी प्रमाणों के आधार पर बताया कि ‘सत्यशोधक समाज’ की पद्धति के अनुसार हो रहे सभी विवाह कानून सम्मत हैं. ज्योतिबा समझते थे कि सामाजिक रूढ़ियों से जूझने के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता अपरिहार्य है. शूद्रों में रचनात्मक प्रतिभा का विकास हो, वे लिखने-पढ़ने के लिए आगे आएं, इसके लिए ‘सत्यशोधक समाज’ ने ऐलान किया कि खेती की उन्नति के उपायों के बारे में शूद्रों में से जो-जो व्यक्ति मौलिक पुस्तक की रचना करेंगे, उनमें से प्रत्येक को डॉ. विश्राम रामजी घोले और रामशेट बापूशेट उरवणे की ओर से 25-25 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा.

अधिकांश शूद्र-अतिशूद्र खेती या दूसरे मेहनत-मजदूरी वाले कामों में जुटे थे. कई बार बच्चों को परिवार के काम में हाथ बंटाना पड़ता था. इस कारण वह दिन में स्कूल जाने के लिए समय नहीं निकाल पाता था. ऐसे युवकों की पढ़ाई अवरुद्ध न हो इसके लिए भांबुर्डे नामक गांव में रात्रि-पाठशाला की शुरुआत की गई थी. समाज को रात्रि-पाठशाला के कामकाज के बारे में शिकायत मिली तो उसने तत्काल, 3 महीने की अवधि के लिए कृष्णराव नामक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया. उसका काम था, पाठशाला का नियमित निरीक्षण कर, उसकी रिपोर्ट समाज को देना. शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी के चलते शूद्र और अतिशूद्र परिवारों के बच्चे स्कूल से कन्नी काट जाते थे. इसे देखते हुए समाज ने पांच रुपये प्रतिमाह की वृत्तिका पर एक पट्टेवाले को नौकरी पर रखा. उसका काम था, बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाना तथा उन्हें सही समय पर स्कूल पहुंचाना. उच्च शिक्षा के लिए भी ‘सत्यशोधक समाज’ की ओर से व्यवस्था की गई थी. विश्राम रामजी घोले ने समाज की ओर से इंजीनियरिंग कालेज के समक्ष एक प्रतिवेदन पेश किया गया था. प्रतिवेदन में शूद्र विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देने की प्रार्थना की गई थी. उसका सकारात्मक असर हुआ. 1876 में इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रधानाचार्य मिस्टर कूक ने 2-3 गरीब विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा के लिए भर्ती किया था. बच्चों में भाषण कला के विकास के लिए भी 2 मई 1876 को व्याख्यान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. व्याख्यान के लिए दो विषय निर्धारित किए गए. पहला था—‘हिंदुस्तान की जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’. और दूसर था ‘मूर्तिपूजा से लाभ और हानि’. ‘जातिभेद समस्या से व्यावहारिक लाभ और हानि’ विषय पर व्याख्यान के लिए द्वारकानाथ त्रिंबक सोनार को पहला और गणपत तुकाराम कुंहाड़े को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ. प्रथम विजेता को समाज की ओर से 10 रुपये तथा द्वितीय विजेता को डॉ. विश्राम रामजी घोले घोले की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि दी गई थी. दूसरे विषय पर दामोदर बापूजी शिंपी को समाज के फंड से दस रुपये तथा आनंदराव रणछोड़ को रामशेट बापूशेट तुरवणे की ओर से 5 रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गई थी. एक और वक्ता गोपाल विश्राम घोले को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में ज्योतिराव की ओर से 3 रुपये प्रदान किए गए थे. ‘सत्यशोधक समाज’ गरीब बच्चों को पढ़ाई की ओर उन्मुख करने के छात्रवृत्ति आदि के रूप में तरह-तरह से मदद करता था.

‘सत्यशोधक समाज’ की गतिविधियों से प्रसन्न होकर लोग तरह-तरह से उसकी मदद के लिए आगे आ रहे थे. हरीरामजी चिपलूनकर ब्राह्मण थे. वे समाज के सदस्य भी नहीं थे. बावजूद इसके उन्होंने शूद्र विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति के लिए प्रतिवर्ष 60 रुपये देने की घोषणा की थी. रामचंद्र मनसाराम ढवारे नाईक पुणे के बड़े ठेकेदार माने जाते थे. उनकी बेतालपेठ में दुमंजिली इमारत थी. उस इमारत को एक मारवाड़ी सेठ 16 रुपये प्रतिमाह पर किराये पर लेने को सहमत था. ‘सत्यशोधक समाज’ को अपने कामकाज के लिए ऐसे ही स्थान की आवश्यकता थी. अध्यक्ष विश्राम रामजी घोले ने तत्काल रामचंद्र नाईक को पत्र लिखकर उस इमारत को सत्यशोधक के कामकाज के लिए देने का अनुरोध किया. रामचंद नाईक ने मात्र 10 रुपये प्रतिमाह के किराये पर वह इमारत समाज को सौंप दी. यही नहीं, उन्होंने समाज के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए 20 रुपये का चंदा भी अपनी ओर से दिया. बाहर से आए शूद्र विद्यार्थियों के भोजन, आवास और अध्ययन की व्यवस्था के लिए समाज ने छात्रावास के निर्माण का फैसला किया था.

शूद्रों और अतिशूद्रों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार ज्योतिबा के जीवन का प्रमुख उद्देश्य था. इसके लिए उन्होंने स्वयं कई पाठशालाओं की स्थापना की थी. इसी को आगे बढ़ाते हुए ‘सत्यशोधक समाज’ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए काम कर रहा था. समाज की ओर से पूना से पांच किलोमीटर दूर हड़पसर में एक विद्यालय की स्थापना की गई थी. सरकारी विद्यालयों में गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए उसने संबंधित अधिकारियों को कई पत्र लिखे थे. उसके फलस्वरूप ‘सार्वजनिक निर्देश’ विभाग के निदेशक के.एम. चेटफील्ड ने एक आदेश के द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए एक आदेश जारी किया गया, जिसके अनुसार उनमें पांच प्रतिशत स्थान गरीब शूद्र बच्चों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे.

जुलाई 1875 में महर्षि दयानंद, महादेव गोविंद रानाडे के आमंत्रण पर पूना गए थे. उस समय तक ‘आर्यसमाज’ की स्थापना को 15 महीने बीत चुके थे. दयानंद उसके प्रचार के लिए देश-भर की यात्रा कर रहे थे. दो महीने के पूना प्रवास के दौरान दयानंद वहां ‘आर्यसमाज’ के प्रचार के लिए कई सभाएं कर चुके थे. उनके कई विचार ‘प्रार्थना समाज’ और रानाडे के ‘पूना सार्वजनिक सभा’ के सिद्धांतों से मेल खाते थे. इसलिए रानाडे सहित कुछ और सुधारवादियों ने दयानंद के सम्मान में जुलूस निकालने का निर्णय लिया. पुरातनपंथियों के लिए वह सीधी चुनौती थी. वे उसके विरोध पर आमादा हो गए. जुलूस के लिए 5 सिंतबर 1875 का दिन तय किया गया था. रानाडे उसकी तैयारी में जुटे थे. जुलूस के लिए पुलिस को भी सूचना दी जा चुकी थी. इस बीच सूचना मिली कि जुलूस में विघ्न डालने के लिए कट्टरपंथी बड़े पैमाने पर विरोध की तैयारी में जुटे हैं. स्थिति से निपटने के लिए जुलूस से एक दिन पहले, सुधारवादियों ने ज्योतिबा फुले से संपर्क किया. ‘आर्यसमाज’ का जाति और छूआछूत विरोधी अभियान, ‘सत्यशोधक समाज’ के मूल सिद्धांतों से मेल खाता था. इसलिए ज्योतिबा उनके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हो गए. अगले दिन जुलूस निकला. दयानंद हाथी पर सवार थे. आगे-आगे उनके समर्थक नाचते-गाते, ढोल बजाते हुए चल रहे थे. ज्योतिबा स्वयं रानाडे के साथ जुलूस में शामिल थे. उनके पीछे ‘सत्यशोधक समाज’ के सैकड़ों कार्यकर्ता थे. उधर कट्टरपंथी किसी भी तरह से जुलूस में व्यवधान डालने पर आमादा थे. वे नहीं चाहते थे कि पूना में ऐसे किसी नए आंदोलन को जन्म मिले, जो ‘सत्यशोधक समाज’ की भांति उनकी हजारों वर्ष पुरानी सत्ता को चुनौती देता हो. दयानंद का उपहास उड़ाने के लिए उन्होंने एक गधे को सजाकर उसे ‘गदर्भानंद’ का नाम दिया था. जैसे ही महर्षि दयानंद का जुलूस अपने नियत स्थल पर पहुंचा, कट्टरपंथी भी सजे-धजे ‘गदर्भानंद’ के साथ उनके सामने पहुंच गए. दोनों के बीच टकराव हो गया. टकराव बड़ी हिंसा का रूप ले, उससे पहले ही पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया. उपद्रवी यहां-वहां शरण लेने के लिए भागने लगे. उसके बाद दयानंद ने वहां अपना प्रवचन दिया.

‘आर्यसमाज’ वेदों को प्रामाण्य मानता था, ठीक ऐसे ही जैसे मुस्लिम कुरआन को दैवीय ग्रंथ मानते हैं. महाराष्ट्र, विशेषकर पूना में पेशवाओं के समर्थन के कारण ब्राह्मण अत्यंत शक्तिशाली बन चुके थे. इस कारण वहां जातिवाद की जड़ें भी बहुत गहरी थीं. ‘गुलामगिरी’, ‘तृतीय रत्न’ जैसी रचनाओं के माध्यम से ज्योतिबा तथा उनके द्वारा गठित ‘सत्यशोधक समाज’, जातिभेद और पुरोहितवाद को नकारकर—ब्राह्मणवाद को सीधी चुनौती दे रहे थे. दूसरी ओर वेदों को सर्वोपरि बताकर ‘आर्यसमाज’ छद्म रूप से ब्राह्मणवाद को संरक्षण देता था. इस कारण शूद्रों और अतिशूद्रों के मन में उसके प्रति संदेह का भाव था. ब्राह्मणों के लिए हर वह व्यक्ति जो उनके जातीय वर्चस्व को चुनौती दे, उसे वे देश और धर्म दोनों का दुश्मन मानते थे. यही कारण है कि पूना में दो महीनों तक लगातार प्रचार करने और जाति-भेद को नकारने के बावजूद, ‘आर्यसमाज’ को महाराष्ट्र में अपेक्षित सफलता न मिल सकी.

ज्योतिराव अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाते थे, इसका एक रोचक किस्सा रोजलिंड ओ’ हेनलान ने अपनी पुस्तक ‘कास्ट कनफिलिक्ट एंड आइडियालाजी’(पृष्ठ-251) में दिया है. यह एक घटना को लेकर है, जिसके बारे में फुले के व्यापारिक सहयोगी और मित्र ज्ञानोबा ससाने ने बताया था—‘एक बार की बात है. फुले अपने मित्र ज्ञानोबा ससाने के साथ पुणे के बाहर स्थित एक बगीचे के भ्रमण के लिए गए. वहां एक कुआं था, जिससे उस बगीचे की सिंचाई होती थी. जैसे ही दोपहर का अवकाश हुआ, सभी कर्मचारी खाना खाने चले गए. यह देख फुले कुएं तक पहुंचे और कुएं के डोल को चलाने लगे. इसके साथ-साथ वे गीत गाने लगे. उन्हें गीत गाता देख वहां काम करने वाले मजदूर हंसने लगे. इसपर फुले ने बताया कि इसमें हंसने की बात क्या है? मजदूर लोग काम करते हुए अकसर गाते-बजाते हैं, केवल मेहनत से जी चुराने वाले फुर्सत के समय वाद्ययंत्रों का शौक फरमाते हैं. असली मेहनतकश जैसा काम करता है, वैसा ही अपना संगीत गढ़ लेता है.’

ज्योतिबा फुले आजन्म सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते रहे. उनका सपना ऐसे समाज की स्थापना का था, जो सर्व-समानता के सिद्धांत पर आधारित हो. इसके लिए आजीवन संघर्ष करते रहे. 11 मई 1888 को ‘सत्यशोधक समाज’ और नगर के प्रमुख सुधारवादी नेताओं ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से अलंकृत किया. हालांकि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व कोई भी उपाधि छोटी पड़ जाती है.

ओमप्रकाश कश्यप