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महिषासुर मूवमेंट : ‘डिब्रह्मनाइजिंग अ कल्चर’

सामान्य

परि​चर्चा

(कुछ महीने पहले एक पत्रिका की ओर से परि​चर्चा की गई थी. उसमें उठाए गए मुद्दों पर कुछ बातें)

 

  • फरवरी, 2016 में संसद के बजट सत्र में भारतीय जनता पार्टी की राजनेता व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने महिषासुर शहादत दिवस पर सवाल उठाकर इसे देशद्रोह से जोड़ दिया था. क्‍या ऐसा किया जाना उचित है? आपकी क्‍या राय है?

‘महिषासुर दिवस’ हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया था, अर्से तक जो आरोपित विचारधारा पर ही अपना ईमान कायम रखे था—‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखने-समझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी शुरुआत है. महिषासुर की ऐतिहासिकता पर बहस करना बेकार है. मिथ को इतिहास-सिद्ध करने की दावेदारी कोई कर भी नहीं सकता. राम और रावण भी मिथकीय पात्र हैं. संभव है सभ्यता के किसी दौर में उनसे मिलते-जुलते व्यक्ति सचमुच इस धरती पर रहे हों, लेकिन वे वैसे ही रहे होंगे जैसे महाकाव्यों तथा अन्य ग्रंथों में दर्शाए गए हैं—यह सप्रमाण नहीं कहा जा सकता. मूल कृति ‘पुलत्स्य वध’ से लेकर ‘रामायण’ और फिर ‘रामचरितमानस’ तक उसमें अनगिनत बदलाव हुए हैं. हर प्रस्तोता ने उसमें कुछ न कुछ जोड़ा-घटाया है. इसलिए उसके अनेकानेक पाठ तथा अनगिनत अंतर्विरोध हैं, जिन्हें वे आस्था और विश्वास की झीनी चादर से ढांपते आए हैं. यदि मान लें कि राम नामक राजा कभी इस धरती पर था, तो भी हम उसे अपना नायक क्यों मानें, जिसने शंबूक का वध केवल इसलिए किया था कि वह किसी खास पुस्तक को पढ़कर ज्ञान में हिस्सेदारी करना चाहता था. असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देने वाला ‘रामराज’ हमारा सपना भला कैसे बन सकता है! विवेकवान समाज अपने नायक स्वयं चुनता है. यदि उन्हें अपनी सुविधानुसार नायक चुनने की आजादी है तो वही आजादी बाकी समाज को भी है. ‘महिषासुर’ मिथ होकर भी हमारे लिए सम्मानेय है, क्योंकि वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागर-मंथन में बराबरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं, परंतु बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. ‘महिषासुर’ श्रम-संस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशु-चारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का प्रतीक नायक है.

सरकार और सरकार में बैठे जो लोग इसे देशद्रोह बता रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा हमें शब्दों के जाल में फंसाए रखना रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं. देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्र्य-चेतना में बसता है. लाखों-करोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही हमें स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के 1.3 अरब लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीन-चौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

  • भाजपा द्वारा संसद में इस बात को उठाये जाने के पहले से ही आरएसएस के अन्‍य अनुषांगिक संगठन जैसे विश्‍व हिंदू परिषद व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इसका विरोध करते रहे हैं। क्‍या आपको लगता है कि महिषासुर शहादत स्‍मृति दिवस जैसे सांस्‍कृतिक आंदोलन का विरोध ब्राह्मणवादी वर्चस्‍व को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है?

भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद ऐसे संगठन हैं जिन्हें धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. वे केवल राजनीति करते हैं, जिसमें लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है. उनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बार-बार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चार-पांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. कह सकते हैं कि ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञ-बलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्व-स्तर पर स्थापित किया था, इसलिए हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उत्सुक था. उसके फलस्वरूप व्यापार बढ़ा और देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता गया.

हिंदू राज्य के रूप में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों की निगाह में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है, जो भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटे-छोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप इन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वण्र्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. इसके लिए तत्कालीन लेखकों ने वैदिक चरित्रों को मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया. ऋग्वेद में कृष्ण यदु कबीले का वीर और बुद्धिमान नेता है, वह आर्य-संस्कृति का विरोधी है तथा आर्यों के विरुद्ध संग्राम में अपने कबीले का नेतृत्व कर युद्ध में इंद्र को परास्त करता है. ‘महाभारत’ के परिवर्धित संस्करण में उसे ब्राह्मणी व्यवस्था के समर्थक के रूप में पेश किया गया. इसके ऐवज में यदुओं को वर्ण-क्रम में ‘क्षत्रिय’ का दर्जा प्राप्त हुआ. इस दौर में दर्शन की मुक्त-धारा, धर्म की ताल-तलैयों में सिमटने लगी थी. बहुदेववाद जो वैदिक साहित्य की विशेषता था, जिसे बुद्ध के समकालीन आचार्यों ने उपनिषदों में एकेश्वरवाद में समेटने की कोशिश की थी—वह पुनः छोटे-छोटे संप्रदायों यथा शैव, कापालिक, तांत्रिक, वैष्णव, नाथपंथी, शाक्त आदि में बंट चुका था. उनके बीच बहुत गहरे मतभेद थे. भाजपा तथा उसके आनुषंगिक संगठन ब्राह्मण धर्म में उभरे उन मतभेदों को याद नहीं करते. वे जानते हैं कि लोकतंत्र के दौर में पुराना समय लौटकर नहीं आने वाला. इसलिए वे धर्म के नाम पर केवल राजनीति करते हैं. उनकी राजनीति भी पूरी तरह प्रतिक्रियावादी, मुस्लिम-विरोध से अनुप्रेत है. उनके लिए राष्ट्रवाद और फासीवाद में बहुत अधिक अंतर नहीं है. जबकि लोकतंत्र को सम्मानजनक स्थान न तो फासीवाद दे पाता है, न ही वह कट्टर राष्ट्रवाद के बीच सुरक्षित रह पाता है.

ब्राह्मणवादी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलो-दिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़ केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. लेकिन फासीवाद की उम्र कम होती है. वह व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खर-पतवार को समाप्त कर देती है.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. और यही डर इस सभ्यता के धार्मिक अभिजन ब्राह्मण को सता रहा है. वे जानते हैं कि बहुजन हितों के अनुसार मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी  परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. भाजपा, विश्व हिंदू परिषद जैसे ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. यह सच भी है कि सिलसिला केवल ‘महिषासुर’ के मिथ की पुनर्व्याख्या पर रुकने वाला नहीं है. रुकना भी नहीं चाहिए. उम्मीद है बहुत जल्दी दूसरे मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियाँ लगी हैं.

  • पिछले कुछ सालों में वर्चस्‍ववादी संस्‍कृति के बरक्‍स समतामूलक बहुजन पंरपरा बहुजन संस्‍कृति की बात उच्‍च शिक्षण संस्थानों में पहुंचे ओबीसी, आदिवासी और दलित विद्यार्थी करने लगे हैं. क्‍या आप मानते हैं कि इस तरह के आंदोलनों से समाज में जागृति आएगी? इस तरह के आंदोलनों का क्‍या लाभ आप देखते हैं?  

वर्चस्वकारी संस्कृति दो तरह से समाज को अपनी जकड़ में लेती है. पहले बल-प्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. वर्चस्वकारी संस्कृति बुद्धिजीवियों से लैस होती है. उसके पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल परिभाषित करने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को यह विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धि-विवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की विवशता बन जाता है. वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और शुभेच्छु मानने लगता है. ऐसे में यदि परिवर्तन होता भी है तो केवल सतही, दिखावे के लिए, जिसका लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थानों को जाता है. जनाक्रोश को शांत करने के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति प्रायः अपने आवरण में ऐर-फेर कर परिवर्तन का नाटक करती है. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सही-सही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका नेतृत्व कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास जैसे संत-कवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परम-धन कहकर रूखी-सूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना—जिसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना था वह इतना शोषित, उत्पीड़ित था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानता-आधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया गया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया.

सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथ-साथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. अपनी-अपनी कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेता-बुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलग-अलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषित-उत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सही-सही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धि-विवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता-परिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. वह यह भी जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भली-भांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशा-हमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्च-शिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

  • क्‍या इतिहास में हुए ऐसे किसी और आंदोलन के बारे आप कुछ बताना चाहेंगे, जिसमें बहुजनों के संस्‍कृति पक्ष पर बल दिया गया हो, और उसके सकारात्‍मक परिणाम सामने आएं हों?

कई आंदोलनों के नाम लिए जा सकते हैं. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, फुले आदि ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय भी श्रम-संस्कृति के उन्नयन को समर्पित था, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है. उसके केंद्र में धर्म के नाम पर आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देश-विदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थर-तराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रम-कौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था. ‘कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिल-जुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबर-बराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

‘मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

‘दो गुना क्यों?’

‘इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

‘हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबर-बराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

‘तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे अधिक बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध दोनों को बराबर-बराबर हिस्सा देने का फैसला करते हैं. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को उन्होंने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है. वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदम-कदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. ब्राह्मण जो शिखर पर रहता है, उसका शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवन-यापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्ण-व्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. फिर भी उसे समग्र आय का मामूली हिस्सा प्राप्त होता है. बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था का प्रतिकार किया है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्श व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रह-ग्रस्त रहा है. उन्होंने उस संस्कृति के दस्तावेजीकरण में पूरी तरह उपेक्षा बरती जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है. उसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

  • महिषासुर आंदोलन के बारे में आपके निजी विचार क्‍या हैं? पिछले दिनों विभिन्‍न समाचारपत्रों, टीवी चैनलों पर इसकी चर्चा रही. इनसे प्राप्‍त सूचनाओं के आधार पर आपका इस आंदोलन के प्रति क्‍या विचार बना? या फिर, इस संबंध में आप किसी अनछुए पहलू पर प्रकाश डालना चाहेंगे?

मन से इस आंदोलन से जुड़े सभी मित्रों को बधाई देते हुए मैं थोड़ा मतांतर रखता हूं. ‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘दुर्गा’ आदि की भांति ‘महिषासुर’ भी एक मिथ है और मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. इसके लिए उसको अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है, जिनका समर्थन या विरोध करते हुए वह समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसर-विशेष पर हमें राह दिखा सकता है. किंतु अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एक-दूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों की भी खोज करें. नए मिथकों की खोज करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है, उन मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति के लिए बहुजन को अपने लक्ष्य को समर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

महिषासुर मिथ की दूसरी कमजोरी यह है कि वह एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. जबकि आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ के प्रतीक के सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. या ऐसे ही हमलों के बीच वह हमारे लिए कारगर हथियार बन सकता है. लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति को रचनात्मक विकल्प संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथ-साथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षा-कवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

  • क्या आप मानते हैं कि संघ परिवार का महिषासुर शहादत दिवस का कटु हिंसक विरोध और आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने की उनकी मांग से दलित-बहुजनों को यह अहसास हो सकेगा कि हिंदुत्व एजेंडा ब्राह्मणवाद से अधिक कुछ नहीं है? क्या आप उनके असली चेहरे और एजेंडे का पर्दाफाश करने में सहयोग करना चाहेंगें?

हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवन-पद्धति माना है. परंतु विचार करके देखिए, क्या यह केवल जीवन-पद्धति ही है. मनुष्य को जो आजादी जीवन-पद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैर-सनातनी, एक हिंदू परिवार की सामान्य जीवन-चर्या मिली-जुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. हर घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबह-शाम की आरती, पूजा-बंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, स्त्रियां अन्न-जल ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़े-तिरछे, भांति-भांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एक-दो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि ‘सत्यनाराण की कथा’ क्या है? किस हिंदू धर्म-शास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरी-सहमी कुल-ललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरी-चकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, माता-पिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं और समाजीकरण का मुख्य आधार हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्ति-पूजकों का हो या मूर्ति-भंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूत्र्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो वे सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीढ़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ या ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रत-उपवास रखने, पर्व-त्योहार पर विधि-सम्मत पूजन-अर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

‘हिंदुत्व’ को बनाए रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छल-हत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनेकानेक धत्त्कर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न के शिकार होते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. हिंदुत्व का एजेंडा कहीं न कहीं संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों की इजारेदारी को भी मजबूत करता है. जाति के आधार पर तीन-चौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य साधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रह-बीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. अभी तक ऐसा ही होता आया है.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलित-बहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शील-परीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. आरक्षण दमित वर्गों को शिक्षा और स्वतंत्र सोच का अवसर प्रदान करता है. इसलिए वह उनके लिए असह् हैं. चाहे जिस आधार पर हो, हिंदुत्व को न्यायालय की स्वीकृति मिल चुकी है, इसलिए वर्चस्वकारी शक्तियां उनके बहाने दलित-बहुजन को फुसलाए रखने का सदियों पुराना खेल खेल रही हैं.

 

  • निस्संदेह आज जो बहुजन सवाल उठा रहा है, सांस्कृतिक प्रतीकों की पुनर्व्याख्या की जा रही है, उसका सीधा-सा आशय है कि समाज के निचले वर्गों में शिक्षास्तर में वृद्धि हुई है. उससे लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है. इसके पीछे आरक्षण का योगदान भी है. इसलिए वे चाहते हैं कि आरक्षण खत्म हो ताकि उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो और जैसे वे पिछले हजारों वर्ष से याद करते आए हैं, आगे भी इसी प्रकार चलता रहे.

ब्राह्मणवाद सांस्कृतिक ‘दैत्य’ है. यहां ‘दैत्य’ का अभिप्राय उसके परंपरागत अर्थ में ही लेना चाहिए. परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदम-कदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंट-पूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मन-माफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. यह अनायास नहीं है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही चार्वाक दर्शन के प्रणेता भी हैं. देव-सभाओं में अप्सराओं का नृत्य-गायन, देवताओं की मौज-मस्ती तथा सोम-पान, चार्वाकों की ‘खाओ-पीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. या फिर यह हो सकता है कि देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी हों. दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीति-शास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. ‘महाभारत’ की चर्चा प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन के लिए होती है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्से कहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित वे मिथ हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्राचार्य के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टा-पल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मान-सम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं. इसलिए एक सीमा से अधिक विरोध के लिए वे कभी आगे नहीं आए. स्वतंत्र भारत के संविधान में मिले अधिकारों के फलस्वरूप पहली बार दलितों और पिछड़ों को अवसर मिला कि वे ब्राह्मणवाद के किले में सैंध लगा सकें. आरक्षण ने इस प्रक्रिया को संभव बनाया, इसलिए वे वर्ग आरक्षण को अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं. पिछले कुछ वर्षों में हालात और भी बदले हैं. शिक्षा के क्षेत्र में मिले आरक्षण ने दलितों और पिछड़ों को अवसर दिया कि वे ब्राह्मणवाद की चतुराइयों को समझ सकें तथा जिन प्रतीकों एवं मिथों के माध्यम से वह अपने सर्वसत्तावादी स्वरूप को बनाए हुए है, उनकी अपने हितों के अनुरूप व्याख्या कर सकें. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों में उभरी इसी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं. इसलिए ब्राह्मणवाद के पैरोकारों की ओर से उनका विरोध स्वाभाविक है. अब वे चाहते हैं कि ‘कल्याण राज्य’ की अपेक्षाओं के चलते स्वाधीन भारत के संविधान में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को जो अधिकार दिए हैं, वे समाप्त हों, ताकि पुरानी व्यवस्था लौट सके. पूंजीवाद और राजनीतिक सत्ता आज भी उसके मददगार हैं.

परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमने-सामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घर-परिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी आड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. इससे ब्राह्मण बुद्धिजीवी खुद को असहज पा रहे हैं. आरक्षण का विरोध इसी विषम मनःस्थिति की उपज है. चलते-चलते एक बात मैं अवश्य जोड़ना चाहूंगा. आरक्षण एक व्यवस्था है. यह सामाजिक न्याय के दायरे में भी आता है. लेकिन यह प्राकृतिक न्याय का पर्याय नहीं है. इसलिए संविधान-सम्मत होने के बावजूद इसे हमेशा-हमेशा के लिए लागू नहीं रखा सकता. इसलिए बहुजन अस्मिता की चिंता करने वाले बुद्धिजीवियों, लेखकों और कलाकारों को अभी से खुद को तैयार रखना होगा. उसका एकमात्र उपाय है, वर्चस्वकारी संस्कृति के मुकाबले सामाजिक न्याय, तर्क, विवेक और आधुनिक जीवनमूल्यों से संपन्न जनसंस्कृति को खड़ा करना. विवेकवान बनना और समानधर्मा लोगों के विवेकीकरण में सहायता करना. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

 ओमप्रकाश कश्यप

 

ऋग्वेदकालीन भौतिकवादी चिंतन

सामान्य

अनीश्वरवादी चिंतन की भारतीय परंपरा―दो

हम भारतीय कालिदास को आदिकवि मानते हैं तथा ‘रामायण’ को आदिकाव्य. जबकि आदिग्रंथ होने का गौरव ‘ऋग्वेद’ को देते आए हैं. तो क्या ऋग्वेद की ऋचाएं काव्यरचनाएं नहीं हैं? ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में हमें संकोच क्यों होना चाहिए? उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण है, इस तथ्य को कोई नहीं नकारता. फिर भी लोग ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में संकोच करते हैं. यह कहकर कि वेदों के रचियता ‘मंत्रसृष्टा’ न होकर ‘मंत्रदृष्टा’ कवि थेउन्हें आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकालकर ‘आप्तग्रंथ’ घोषित कर दिया जाता है. कुछ ऐसा ही मुसलमान ‘कुरआन’ के बारे में दावा करते हैं. धर्मग्रंथों को दैवी ग्रंथ सिद्ध कर श्रद्धा का पात्र बना देने की परंपरा लगभग हर धर्म में रही है. अनुयायियों को लगता है कि धर्मग्रंथ को मानवीकृत कहने से उसका महत्त्व घट जाएगा. जबकि दैवीय कह देने से लोग उसके प्रति ऋद्धा के साथ पेश आएंगे. उनमें लिखी बातों का तन्मयता के साथ पालन करेंगे. धर्मग्रंथों के साथ ऐसा हमेशा होता आया है. ऐसा मान लेने से न केवल वह कृति आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकल जाती है, बल्कि उसके मौलिक विस्तार की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं. ऋग्वेद यदि आदि ग्रंथ है. उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण हैं तो स्वाभाविक रूप से उसके रचनाकार इस देश और अपनी भाषा के प्राचीनतम कवि भी हैं. साहित्यिक कृति के रूप में ऋग्वेद की सामग्री का मूल्यांकन न करने का नुकसान यह भी होता है कि वैदिक परंपरा के नाम पर रचे गए कथानकों में आए पात्रों, घटनाओं, चरित्रों आदि का मिथकीकरण करने का अवसर परंपरावादियों को मिल जाता है. ऋग्वेद इसी का शिकार होता आया है. बाद में लिखे गए तीनों वेद किसी न किसी रूप में ऋग्वेद के कर्मकांडीकरण की कोशिश है. कालांतर में यही प्रवृत्ति भारतीय मनीषा का संस्कार बनकर उभरती है, जिसमें बिना प्रतीकों और मिथकों का सहारा लिए विमर्श करना मुश्किल हो जाता है. वेदों को आप्तग्रंथ का गौरव भले ही मिला. परंतु ब्राह्मण मनीषियों के लिए वैदिक परंपरा वेदों से अधिक महत्त्वपूर्ण थी. इसलिए वेदों तथा वेदादि ग्रंथों के पाठ में उनके भाष्यकार के हिसाब से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं. परंतु मूलभूत परंपरा में कोई अंतर नजर नहीं आता.

ब्राह्मणवादी दर्शनपरंपराएं वेदों से उपजी थीं. आरंभ में वे श्रुति की अवस्था में थीं. तथापि ब्राह्मणमनीषियों को उनपर इतना गुमान था कि उनके कारण खुद को विश्वसभ्यता में श्रेष्ठतम होने की दावेदारी करते थे. वेदों में सूत्र रूप में उपस्थित दार्शनिक विचारों को विस्तार देने से अधिक चिंता उन्हें उनके संरक्षण की थी. उसके लिए तरहतरह के आयोजन किए जा रहे थे. गैरब्राह्मणवादी विचारधाराएं आजीवक, लोकायत आदि जिन्हें भौतिकवादी चिंतनधारा भी कहा जा सकता हैके बारे में माना जाता है कि वे ब्राह्मणवादी दर्शनों के विरोध में जन्मीं, तथा उसके बहुत बाद की हैं. वैदिक परंपरा के समर्थक वेदों को भारतीय दर्शनचिंतन का आदिस्रोत तथा वैदिक युग को भारतीय दर्शन परंपरा का आदिचरण मानते हैं. इसे हम उनका पूर्वाग्रह कह सकते हैं. समकालीन दर्शनों को नकारने की प्रवृत्ति भी इसका कारण हो सकती है. सच तो यह है कि वेदों में जो प्रच्छन्न दार्शनिक सूत्र हैं, उनपर प्रकृतिवादी दर्शनों की गहरी छाया है. प्राचीन यायावर मनस्वियों के अनुभवों से उपजीं वे विचारधाराएं वेदों की रचना से बहुत पहले से समाज में निश्चय ही विद्यमान रही होंगी. वैदिक युग से भारतीय चिंतन परंपरा में क्रांतिक बदलाव की शुरुआत होती है. वह ऐसा मोड़ है जहां से अध्यात्मचिंतन में मिथक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं. मौलिक चिंतन में गुरुडम की घुसपैठ होने लगती है. जीवन संबंधी सहजसामान्य दर्शन पर मिथक सवार हो जाते हैं. सत्तासमर्थन के सहारे ब्राह्मण ऋषियों का समूह बिना व्यक्तिगत यशलाभ की कामना के, उस परंपरा को इस तरह आगे बढ़ाता है कि उसमें परंपरामोह निर्णायक रूप ले लेता है. मौलिक चिंतन की महत्ता घटने लगती है. परिणामस्वरूप समकालीन चिंतनधाराएं, विशेषकर वे जो उस परंपरा के लिए चुनौती थींगौण मान ली जाती हैं. ज्ञान के कर्मकांडीकरण की वह परंपरा धीरेधीरे अपने समय के समूचे ज्ञानानुराग एवं सामाजिक विवेक को अपनी गिरफ्त में ले लेती है.

दर्शन की सर्वमान्य कसौटी है कि उसमें स्थायी विश्वास या निष्कर्ष जैसी कोई चीज नहीं होती. दार्शनिक सत्य शाश्वत न होकर चिर नूतन होता है. इसलिए उसकी खोज भी चिर नवीन बनी रहती है. जैसे ही कोई नया विचार सामने आता है, उसका प्रतिविचार तथा मिलेजुले विचारों की शृंखला साथ ही जन्म ले लेती है. विचारों के संलयन एवं विश्लेषण द्वारा पुनः नए विचारों की उत्पत्ति होती है. कल्पना का महत्त्व दर्शन के क्षेत्र में भी होता है. परंतु दार्शनिक कल्पना साहित्यकार की कल्पना से हटकर वैज्ञानिक परिकल्पना के निकट होती है. साहित्यिक कल्पना का वितान अंतहीन होता है. उसके लिए मानवीय मूल्य महत्त्वपूर्ण होते हैं, जबकि दर्शन में महत्त्व केवल और केवल सत्य का होता है. इसका आशय यह नहीं है कि दर्शन जीवनमूल्यों से निरपेक्ष होता है. साहित्य की भांति दर्शन का ध्येय भी जीवन को श्रेष्ठतम की ओर गतिमान रखना है. दर्शन स्वयं शुभत्व की शाश्वत खोज का सिलसिला है. साहित्यकार अपनी कल्पना को लोकपरलोक में कहीं भी लाले जा सकता है. दार्शनिक के लिए उसकी कल्पना सत्य की खोज को समर्पित होती है. इसलिए ज्ञात सत्य अथवा स्थापित तर्कपद्धति ही उसका आधार बनती है. कुल मिलाकर दार्शनिक परिकल्पना वैज्ञानिक परिकल्पना जैसी ही होती है. अंतर केवल इतना है कि दार्शनिक परिकल्पना का विषय मूर्त्तअमूर्त्त कुछ भी हो सकता है. जबकि वैज्ञानिक परिकल्पना किसी न किसी मूर्त्त विषय यानी ऐसे विषयों जिनका भौतिक आधार पर परीक्षणअवलोकन, सत्यापन आदि किया जा सकेसे संबद्ध रहती है. जब तक किसी परिकल्पना का पर्याप्त आधार न हो, दर्शन के क्षेत्र में उसका महत्त्व सहज प्रतीति जितना ही होता है. तर्क की कसौटी पर कमजोर परिकल्पना साहित्य का आधारस्रोत हो सकती है, दर्शन का नहीं.

वेदों में आर्यों का प्रच्छन्न इतिहास है. छिटपुट दर्शन भी है. परंतु उनमें प्रमुख हैयज्ञ संस्कृति. पुरोहितवाद. जिसके प्रभाव में प्रच्छन्न इतिहास मिथकीय रूप में सामने आता है. दार्शनिक अवधारणाओं पर भी मिथकों का प्रभाव है. अग्नि, सूर्य, उषा, इंद्र, सोम, मित्रवरुण, मरुत, द्यावा, पृथ्वी, अश्विन आदि देवता हैं. उनका सीधा संबंध प्रकृति से है. ‘विश्वदेव’ की भी परिकल्पना है जो विभिन्न देवताओं का सूत्रीकरण कर एकेश्वरवाद की ओर इशारा करता है. कुछ स्थानों पर भावनाओं और संवेगों को भी देवताओं में शामिल किया गया है, जैसे वाक्, ज्ञानम्, मनस्, काम इत्यादि. प्रत्येक देवता किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का स्वामी है. सवाल है कि अग्नि, आकाश, पृथ्वी, वायु आदि जीवनदायिनी प्राकृतिक शक्तियों को सीधेसीधे उनके भौतिक रूप में देवता मानने के बजाए, उनके नामानुरूप मिथकीकरण क्यों किया गया? क्यों उनके लिए सातवें आसमान के पार कथित स्वर्ग में मौजूद शक्तियों की कल्पना की गई? हमारा मानना है कि केवल सहूलियत के लिए. ऐसा करना मनुष्य को आसान लगा. हो सकता है आरंभ में केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण ही प्रभावी रहा हो. क्योंकि अनुभवों के सामान्यीकरण के लिए उन्हें किस्सेकहानियों में ढालना जरूरी था. उसके फलस्वरूप पृथ्वी, सूरज, चंद्रमा, जल, आकाश आदि का पहले मानवीकरण किया गया. फिर वे विभिन्न प्रतीकों के रूप में संस्कृति का हिस्सा बनने लगे. वही प्रतीक कालांतर में पुरोहितवाद के हत्थे चढ़, देवता के रूप में पहचाने जाने लगे. जिन्हें वेद कहा जाता है, उनकी अधिकांश सामग्री काल्पनिक प्रतीकों के महिमामंडन तथा उनके नाम पर हुए कर्मकांडीकरण का परिणाम है. आप्त ग्रंथ बताकर कल्पना को प्रामाणिक बनाने की कोशिश ब्राह्मण ग्रंथों में लगातार दिखाई पड़ती है. वेदों को ‘आप्त ग्रंथ’ मानना धर्म की निगाह में महत्त्वपूर्ण हो सकता है. दर्शन की निगाह में यह तर्कबुद्धि को एक खूंटे से बांध देने जैसा विचारहीन कृत्य है. विडंबना यह कि कालांतर में निहित स्वार्थवश इसी को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाने लगा. वेदों को धर्मग्रंथ मान लेने का परिणाम यह हुआ कि दर्शन की बाकी शाखाएं यानी न्याय और वैशेषिक जैसे दर्शन जो केवल तत्व चिंतन को प्राथमिकता देते हैं, लगातार उपेक्षित होते गए. जबकि इन्हीं दर्शनों से कुछ तत्व उधार लेकर कालांतर में जैन और बौद्ध दर्शन ने समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करने का काम किया.

वेदों को श्रुति कहा गया है. वे किसी एक कालखंड की रचना नहीं हैं. इसलिए उनमें विचार के अनेक रूप विद्यमान हैं. जिन मनीषियों के नाम से ऋचाओं का उल्लेख मिलता है, उनके जीवन के बारे हमारे पास नगण्य सूचनाएं हैं. कदाचित इसीलिए उनके रचियताओं के बारे में भिन्न स्रोतों से अलगअलग जानकारी प्राप्त होती है. ‘दीघनिकाय’ के ‘तेविज्जसुत्त’ में बुद्ध ने ब्राह्मण लेखकों तथा मूल वैदिक कवियों का वर्गीकरण किया है. उनके अनुसार वेदों के आदि रचियता ऋषियों की संख्या मात्र दस है―अट्टक, वामक, वामदेव, यमदग्नि, विश्वामित्र, कश्यप, भरद्वाज, भृगु, अंगिरस तथा वशिष्ट. आगे चलकर इस सूची में बदलाव होता है. मनुस्मृति(1/35) में जो नाम गिनाए गए हैं, वे हैं―भृगु, नारद, वशिष्ट, क्रतु, अत्री, अंगीरस, पुलत्स्य, पुलह, प्रचेतस और मैत्रेयी. कुछ जगह केवल ‘सप्त ऋषियों’ को ही वेदों का आदि रचियता होने का गौरव प्राप्त हैं. मनुस्मृति द्वारा गिनाए गए नाम वास्तविक हैं अथवा कुलपरंपरा? इस बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ‘नारदपुराण’ को विद्वान मात्र 1000 वर्ष पुरानी कृति मानते हैं. ब्राह्मण लेखकों की विशेषता यह रही कि उन्होंने व्यक्तिगत श्रेय के बजाय परंपरा को अधिक महत्त्व दिया है. महत्त्वपूर्ण ग्रंथलेखकों ने बिना यशनाम की चिंता किए, अपने मौलिक ग्रंथ केवल परंपरा को समर्पित कर दिए हैं. वेदों में जिन ऋषियों का नामोल्लेख है, वे महाकाव्यों और पुराणों में उपस्थिति बनाए हुए हैं. जबकि उनके रचनाकाल में शताब्दियों का अंतराल है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मनुस्मृति’ में दी गई सूची की तुलना करने पर एक सच यह भी सामने आता है कि ‘मनुस्मृति’ में दर्शाए गए ऋषिगण बौद्धिक विमर्श से अधिक जोर कर्मकांड पर देते आए हैं. इससे यह निष्कर्ष भी सामने आता है कि मनु के लिए वेदों का कर्मकांडपक्ष उनके तात्विक चिंतन से अधिक महत्त्वपूर्ण था. उनके नेतृत्व में दार्शनिक विवेचन का कर्मकांडीकरण होना स्वाभाविक ही था. जनसाधारण वैदिक ऋषियों की कमजोरी को भलीभांति समझता था. इसलिए आजीविका के मामले में स्वतंत्र व्यक्ति ब्राह्मणवादी दर्शनों से दूर रहने में ही भलाई समझते थे.

ऋग्वेद के लिपिबद्ध होने से पहले ही पुरोहितवर्ग समाज में प्रभावशाली भूमिका प्राप्त कर चुका था. तत्कालीन बौद्धिक वर्ग का समर्थन उसे बिना किसी शर्त प्राप्त था. वेदों में या तो पुरोहित वर्ग का वर्णन है अथवा इंद्रादि देवताओं का जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं. श्रमिक वर्ग और शिल्पकार वर्ग वेदों से नदारद है. स्त्रीचरित्र भी गिनेचुने हैं. इससे उन्हें तत्कालीन अभिजन समाज का प्रतिनिधि ग्रंथ भी कहा जा सकता है. इस कारण ब्राह्मणों ने न केवल उनकी सुरक्षा और विस्तार के लिए खुद को समर्पित किया, बल्कि स्वार्थ के हिसाब से लगातार उनकी स्वार्थानुरूप व्याख्याएं और फेरबदल करते रहे. ऐसा नहीं है कि उस समय वेदों और ब्राह्मणवादी परंपरा के आलोचक न थे. ब्राह्मणों तथा उनके कर्मकांडों की आलोचना करने वाले तब भी अधिसंख्यक समाज का हिस्सा थे. लेकिन ब्राह्मणों के ही हाथ लगी. वर्णव्यवस्था के सहारे वे समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहे. उनके द्वारा गढ़े गए मिथ किस्सेकहानियों और संस्कृति का हिस्सा बनकर लोकमेधा का अटूट हिस्सा मान लिए गए. आज भी भारतीय धर्मदर्शन का ककहरा न जानने वाला साधारण से साधारण व्यक्ति अग्नि, वरुण, आकाश, उषा, तमस, अनल पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा आदि की जीवनप्रदायिनी शक्ति के बारे में जानता है. रोजमर्रा के जीवन में प्रत्येक मनुष्य उन्हें उसी रूप में देखतासमझता; और इस तरह अपने बुद्धिविवेक के अनुसार दार्शनिक मान्यताएं गढ़ता है. अनुभवआधारित निष्कर्षों में पर्याप्त गतिशीलता होती है. परंतु जैसे ही व्यक्ति के धार्मिक आग्रह प्रबल होते हैं, उसकी वैचारिक गत्यात्मकता थमने लगती है. धारणा खूंटे से बंध जाती है. अपने ही विवेक पर उसका नियंत्रण नहीं रहता. स्थितियों का आकलन बंधेबंधाए ढर्रे के अनुसार करने लगता है. ब्राह्मण ग्रंथों की रचना कथित रूप से वेदों को सर्वग्राही बनाने के लिए की गई है. लेकिन ये ग्रंथ वेदों में अंतर्निहित दार्शनिक सूत्रों की न तो मौलिक गवेष्णा करते हैं, न ही कोई नया दर्शन प्रस्तावित करते हैं. वे केवल वेदों के कर्मकांड पक्ष पर सविस्तार टिप्पणी करते हैं, जिससे आगे चलकर पुरोहितवाद को बढ़ावा मिला.

वेदों और उत्तरवर्ती ग्रंथों में सृष्टि की प्रत्येक जीवनदायिनी शक्ति के लिए अधिष्ठाता शक्ति की कल्पना की गई है. निहित स्वार्थ हेतु पुरोहित कल्पना के मूर्त्तिकरण को वैध ठहराता है. उसपर संदेह करना उचित नहीं माना जाता. प्रकारांतर में वह संस्कृति पर सवार होकर पूरे समाज के आचारव्यवहार का अनिवार्य हिस्सा मान लिया है. इससे मौलिक सोच का हृस होने लगता है. यहीं से सत्य के मिथकीकरण की प्रक्रिया आरंभ होती है. स्वयं वेदादि ग्रंथ समकालीन बोध के मिथकीकरण का परिणाम हैं. वेदों को आप्त ग्रंथ मानना भी उन्हें मिथ मान लेने जैसा है. हालांकि वेदों में यत्रतत्र दार्शनिक प्रश्न भी आए हैं. समय के हिसाब से उनमें पर्याप्त मौलिकता भी है. लेकिन ऐसी ऋचाएं संख्या में नगण्य हैं. प्राकृतिक शक्तियों को सीधे जाननेसमझने के बजाय अधिकांश ऋचाएं उनके नाम पर गढ़े गए देवताओं का महिमामंडन करती हैं. इसे ‘अनुभवों का मिथकीकरण’ कहें अथवा ‘ज्ञान एवं कौतूहल का कर्मकांडीकरण’ जैसा नाम देंवैदिक मनीषियों के लिए वही ‘धर्म’ रहा है. ऋग्वेद भी इससे अछूता नहीं है

प्रज्वलित तपस्या से यज्ञ और सत्य उत्पन्न हुए. अनंतर दिन और रात उत्पन्न हुए. इसके अनंतर जल से पूर्ण समुद्र की उत्पत्ति हुई. जलपूर्ण समुद्र से संवत्सर उत्पन्न हुआ. ईश्वर दिनरात्रि को बनाते हैं. निमिष आदि वाले सारे संसार के वे स्वामी हैं. पूर्वकाल के अनुसार ही ईश्वर ने सूर्य, चंद्र, आनंददायी स्वर्ग, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष का निर्माण किया.’ऋग्वेद, 10/190/1-3.

उपर्युक्त ऋचाओं के उद्गाता कवि अघमर्षण हैं. तीन ऋचाओं में पहली दो ऋचाएं सृष्टि के जन्म को लेकर दार्शनिक समस्याओं से दो चार होती हैं. इसमें समय की उत्पत्ति को लेकर भारतीय दृष्टिकोण को समझा जा सकता है. हालांकि उसमें काफी लोच है. इस उल्लेख में समय स्वतंत्र नहीं है. वह ईश्वर से जुड़ा है. यह बात अलग है कि ईश्वर अपने कृत्यों के लिए खुद समय से बंधा है. प्रत्येक वर्णन के बीच में ईश्वर को घसीट लाने की प्रवृत्ति, न केवल वेदों, बल्कि बाद के भारतीय विद्वानों यहां तक कि आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञों में भी दिखाई पड़ती है. समय को लेकर चर्चा ऋग्वेद में अन्यत्र भी है. तैतीरीय ब्राह्मण में प्रजापति को संवत्सर कहा गया है. माना गया है कि वही संपूर्ण जीवजगत का निर्माता है(संवत्सरो वे प्रजापतिः. संवत्सरेणैवास्मे प्रजाः प्राजनयत.―तैतीरीय ब्राह्मण, 1.6.2.2). उससे आगे बढ़कर शतपथ ब्राह्मण(10/4/2/2) में प्रजापति और संवत्सर को एक माना गया है. उसके अनुसार प्रजापति चरअचर सहित समस्त वस्तुजगत का निर्माता है. यहां तक कि ईश्वर को भी प्रजापति/संवत्सर की रचना कहा गया है. इस आधार पर विचार किया जाए तो समय ही समस्त वस्तुजगत, देवताओं और चरअचर का निर्माता है. ‘अथर्ववेद’ में संवत्सर को लेकर परिपक्व चिंतन मिलता है. वहां समय या संवत्सर को काल के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उसके अनुसार काल अंतहीन और चिरंतन है. अर्थववेद के अनुसार, ‘जगमगाता सूर्य ही समय के रूप में उपस्थित है. इसलिए सूर्य ही समय है. वह हजार आंखों का क्षरणविहीन है. वह सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर निकलता है.’ ऋग्वेद के दशम् मंडल में महाविस्फोट को ‘ब्रह्मणस्फति’ का नाम दिया गया है. देवताओं की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि उनका जन्म सृष्टि के बाद हुआ. सर्वप्रथम अविद्यमान यानी ‘असत्’ से ‘सत्’ की उत्पत्ति हुई, ‘ब्रह्मणस्फित ने कर्मकार के देवताओं को उत्पन्न किया. देवोत्पत्ति से पूर्व समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. इसके अनंतर दिशाएं बनीं. दिशाओं से अनंतर वृक्ष उत्पन्न हुए….अदिति से दक्ष उत्पन्न हुए और दक्ष से अदिति. अदिति ने देवताओं को जन्म दिया. फिर वह अपने सात पुत्रों को लेकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गई तथा जन्म और मृत्यु के लिए सूर्य को आसमान में रख दिया.’(10/72). अगली ऋचा में इंद्र के जन्म का उल्लेख मिलता है.

चूंकि ईश्वर का विचार अपने आप में संदिग्ध है. उसे बीच में लाने के बाद विश्वास गड़बड़ाने लगता है. अनेक प्रश्न पैदा हो जाते हैं. यदि ईश्वर ही एकमात्र कर्त्ता और परम शक्ति है तो उसे तपस्या की आवश्यकता क्यों पड़ी? कहा गया है कि तपस्या से ही सृष्टि बनी.(ऋग्वेद, 10/129-3). सवाल है कि ‘तप’ से ही क्यों? ‘तप’ के माध्यम से ईश्वर किसे प्रसन्न करना चाहता था? सृष्टि की रचना के लिए उसने एक कर्मकांड को ही माध्यम क्यों बनाया? पृथ्वी, सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों का निर्माण भी क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुआ था? ईश्वरीय समय यानी शून्य से सृष्टि निर्माण की अवधि क्या समयहीनता का अंतराल था? क्या सृष्टिध्वंस के साथ ही समयध्वंस भी हो जाता है? उपर्युक्त ऋचा के अनुसार ईश्वर के अस्तित्व को मान लिया जाए तो क्या ईश्वर की भांति काल भी सृष्टि का साक्षी होता है? क्या समय सीमित और काल असीमित है? क्या ब्रह्मांड का निर्माण और ध्वंस अंतहीन काल में तथा उसकी समस्त गतियां चलायमान समय में होती हैं? इस तरह के अनेक प्रश्न उपर्युक्त ऋचा को लेकर हो सकते हैं. दर्शन का जन्म ऐसी ही आशंकाओं से होता है. लेकिन शंका के लिए ‘स्पेस’ की आवश्यकता पड़ती है. यदि उसपर अंध आस्था और जड़ विश्वास का पर्दा डाल दिया जाए तो दर्शन का विकास थम जाता है. वैदिक मनीषा इसका शिकार होती आई है. जिज्ञासा और कौतूहल का आकस्मिक ठहराव कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है. उदाहरण के लिए यदि तपस्या और तप से ही यज्ञ की उत्पत्ति हुई तो तपस्या की क्रिया क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुई थी? तपस्या करने वाला क्या स्वयं ईश्वर था? यदि ईश्वर था तो वह किसकी तपस्या कर रहा था? यदि ‘तप’ यहां सूर्य का स्थानापन्न है तो आलंकारिकता को छोड़ क्यों न सीधा और स्पष्ट शब्द ‘सूर्य’ को उसका स्थानापन्न कर दिया जाए? प्रश्नों का सिलसिला अंतहीन है. लेकिन तप को यदि उष्मा का पर्याय मान लिया जाए जो कदाचित सही भी है, तो उपर्युक्त ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर आए विचार तत्संबंधी वैज्ञानिक परिकल्पना से मेल खाने लगते हैं. आधुनिक वैज्ञानिकों का बड़ा वर्ग सृष्टि का विकास ‘महाविस्फोट’ की घटना से मानता है. उसके अनुसार आंतरिक दबाव के कारण परम संपीडित ब्रह्मांड में महाविस्फोट हुआ और वह टुकड़ों में बदल गया. एक टुकड़ा सूरज बना. छोटेछोटे टुकड़े ग्रहादि बने. गुरुत्वबल के कारण छोटे पिंड बड़े ग्रहों का चक्कर लगाने लगे. धरती धीरेधीरे ठंडी हुई. गैंसे जमकर तरल में बदलने लगीं. उन्हीं से पानी बना. और जल से जीवन की उत्पत्ति हुई. अघमर्षण जहां तप यानी उष्म से सृष्टि की रचना मानते हैं, वहीं एक और दार्शनिक परमश्रेष्ठि ने जल को ‘तपस’ की संज्ञा देते हुए उसे सृष्टि का मूलाधार माना है,सृष्टि से पहले केवल अंधकार था. अंधकार ही अंधकार को ढांपे था. सभी अज्ञात और सभी जलमय था….तपस्या के प्रभाव से वहीं एक तत्व उत्पन्न हुआ’(ऋग्वेद 10/129/3). परमेष्ठि कदाचित पहला ऐसा भारतीय बुद्धिवादी चिंतक था, जिसने मानवीय मेधा को सूर्य की उपाधि दी. उसके अनुसार ‘काम’ विश्व की उत्प्रेरक शक्ति है. वही मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करता है. वही सूर्य है, ‘जिसकी आंखें इस विश्व को नियंत्रित रखती हैं. वह इससे देखा जा सकता है कि सृष्टि निर्माण को लेकर भौतिक विचारधारा और वेदों के दर्शन में खास अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि वेद बीच में ईश्वर या परमात्मा को ले आते हैं. भौतिकवादी विचारक ऐसी किसी भी शक्ति की उपस्थिति को नकारते आए हैं.

स्पष्ट है कि दर्शन का विकास भौतिकवाद से प्रत्ययवाद की ओर रहा है. आरंभ में ईश्वर या केंद्रीय शक्ति की कल्पना अलगअलग दिखने वाली विचारधाराओं में समन्वय की कोशिश का परिणाम थी. जिसे पुरोहितों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कर्मकांडों तक सीमित कर दिया. देवताकरण के जरिये ब्राह्मणवादी परंपरा के चिंतकों ने उन शक्तियों को अधिभौतिक मान लिया. इससे ज्ञान के वायवीकृत रूप को मान्यता मिलने लगी. निहित स्वार्थ के आधार पर प्राकृतिक शक्तियों के ईश्वरीकरण की प्रवृत्ति ब्राह्मणों के लिए इतनी फूलीफली कि कालांतर में उसी को दर्शन की मुख्य धारा का श्रेय दिया जाने लगा. आज भी यही स्थिति है. बौद्ध धर्म के उदय से पहले दर्शन की ये धाराएं समानांतर रूप में विद्यमान थीं. बुद्ध ने दोनों के बीच का रास्ता अपनाया. चूंकि प्रकृतिवादी विचारधाराएं सृष्टि के विकास को लेकर भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती थीं, इसलिए पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल को भौतिकवादी धाराओं के प्रवर्त्तक मानना अधिक उचित होगा. भौतिकवादी धारा सृष्टि निर्माण के पीछे किसी भी अदृश्य शक्ति के योगदान को नकारती हैं. अधिभौतिक अथवा ईश्वर को महत्त्व देने वाली विचारधाराएं ईश्वर या परमात्मा को सर्वेसर्वा मानने के कारण ईश्वरवादी कहलाती हैं. ध्यातव्य है कि विगत ढाई हजार वर्षों में ब्राह्मण कभी खुशीखुशी सत्ता के हस्तांतरण को तैयार नहीं हुआ. सतयुग ब्राह्मण के लिए इसलिए आदर्श है, क्योंकि उसमें उसे चुनौती देने वाला कोई न था. जनसमाज कबीलों में बंटा था. उसके अपने रीतिरिवाज, परंपराएं और दर्शन थे. ब्राह्मणों के कर्मकांड से उसे उसे कोई लेनादेना न था. अर्थव्यवस्था पशुआधारित थी. इसलिए भूमिअधिकार का विचार पनपा ही नहीं था. राज्य छोटेछोटे थे, एकदम कबीलाई रूप था उनका. इसलिए सतयुग में केवल ब्राह्मण ही ब्राह्मण थे. वही शासक थे, वही नियम बनाने वाले. चारों ओर केवल उन्हीं की दुंदभि बजती थी. त्रेता में उन्हें क्षत्रियों साथ सत्ता का समझौता करना पड़ा. मनुस्मृति ने क्षत्रियों और ब्राह्मणों के बीच जो समझौता कराया था, त्रेता के रूप में उसी की अभिकल्पना की गई थी. द्वापर में थोड़ा और पतन हुआ. सतयुग में आर्यों के आक्रमण से पराजित शूद्रों ने खुद को संगठित कर लिया था. मजबूर होकर उन्हें शूद्र कृष्ण को अवतार स्वीकारना पड़ा. कलयुग में उनका नैतिक, राजनीतिक पराभव हो चुका है. केवल दंभ बाकी है.

अथर्ववेद की एक ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति का कारण ‘तपस’(उष्म) को बताया गया है. वह सूर्य का पर्याय भी है. सूर्य को सृष्टिकर्ता मानने का विचार अन्य धर्मों में भी है. जापान खुद को ‘उगते सूर्य का देश’ बताता है. चीनी भी सूर्य को आदि देवता मानने की परंपरा रही है. चीनी लोककथा1 वहां के सूर्य पूजक समाज के बारे में बताती है. भगवतशरण उपाध्याय ने मिस्र के सूर्यपूजक राजा अखनातून को आदि धर्मप्रवर्त्तक माना है.(सांस्कृतिक निबंध, प्राचीन मिस्र का शंकर अखनातून). ऋग्वेद(7/6-1) में भी सूर्य को समस्त चराचर का स्वामी बताया गया है. सूर्य को सृष्टि का स्रोत मानने का विचार भिन्नभिन्न संस्कृतियों में रहा है. वेदों में उसे समय का जनक माना गया है. हालांकि इससे इतर निष्पत्तियां भी हैं. एक ऋचा के अनुसार सूर्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा जल से सृष्टि का विकास हुआ. तदनुसार ईश्वर को सृष्टि के निर्माण की इच्छा के साथ ईश्वर ने जल का सृजन किया. उससे तेजस बना. फिर उससे ग्रहनक्षत्र, सूर्य, चंद्रादि अस्तित्व में आए. ऋग्वेद को भारतीय दर्शन का आधारग्रंथ माना जाता है. कुछ संकेतों को छोड़ दिया जाए तो ऋग्वेद का भारतीय दर्शनपरंपरा से उतना गहरा संबंध नहीं है, जितना माना जाता है. सच तो यह है कि उसमें जो दार्शनिक तत्व हैं, जिन्हें प्रायः बहुदेववाद के नाम से जाना जाता है, असल में प्राकृतिक उसमें जो विचार सूत्र रूप में मौजूद हैं, उनके आधार पर वह भौतिकवादी दर्शन के अधिक निकट है. कल्पना के अतिरिक को देखते हुए उसे हम भारतीय मनीषा की कविता कह सकते हैं. वेद का नाम उन्हें बाद में दिया गया. आगे चलकर उसी के आधार पर औपनिषिदक दर्शन का विकास हुआ. भौतिकवादी विचारक मानवीय कौतूहल, संदेह और आशंकाओं को बचाए रखकर दार्शनिक गवेष्णाओं के लिए बड़ा मैदान तैयार कर रहे थे. उनका दर्शन मानवमात्र के रोजमर्रा के अनुभवों और जिज्ञासाओं पर टिका था. वे जानते थे कि प्रकृति की विशालता, विचित्रता और अनिश्चितता ने मनुष्य को उसके सामने श्रद्धावनत होने को विवश किया है. प्रकृति की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसको समझना आवश्यक है. इसलिए उन्होंने अपने संदेह और उसके बहाने अनेकानेक संभावनाओं को बनाए रखा.

अपने समय में भी इस तरह का विचार रखने वाले वे अकेले न थे. जीवन में सहायक, उसे संभव बनाने वाली, प्राणदायिनी शक्तियों के प्रति सम्मान, समर्पण और श्रद्धावनत होने की संस्कृति प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में रही हैं. यही जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण है. वेद भी इससे अछूते नहीं हैं. ऋग्वेद में अनेक स्थान पर ‘काम’ का महिमामंडन है. एक ऋचा(10/191/1) में अग्नि को ‘कामवर्षक’ कहते हुए उसे प्राणिमात्र का गुण बताया गया है. कामोद्दीपन के लिए सोमपान का आवाह्न है. उसके लिए रात्रि और उषा(सूर्य) का मानवीकरण करते हुए उन्हें यज्ञस्थल पर आमंत्रित किया गया है(ऋग्वेद 10/13/7). एक स्थान पर उषा को रात्रि की बहन बताया गया है. उषा को साधारण लड़कियों की भांति सजनेसंवरने का शौक है‘एक ही रंग के वस्त्र पहन, नर्तकी की भांति उपस्थित होती है. जैसे गाय दूध देती है. वह अपने स्थान तक पहुंचती है. और अपना उजला वक्ष खोल देती है. इसी के साथ अंधेरा छंट जाता है. रात्रि जो उसकी बहन है, भाग खड़ी होती है. एक अन्य ऋचा में लिखा है कि जैसे कोई खिलाड़ी पासा फेंकता है, उषा दिन का पासा फेंकती है. वह स्वर्ग की पुत्री है. उसके आगमन के साथ ही निशा भाग खड़ी होती है.’ वेदांत में शंकर ने संसार को माया कहा है. संसार को नकारा है. उनके अनुसार भोग आत्मा की मुक्ति की राह का रोड़ा है. वेदों से ऐसा प्रतीत नहीं होता. आर्यगण जीवन को संपूर्णता के साथ जीने के समर्थक थे. खुशी के क्षणों में वे सोम का पान करते थे. एक लड़ाकू जाति का इस तरह सुखामोद में लिप्त होना अनपेक्षित भी नहीं माना जा सकता. यह भी हो सकता है कि सुखामोद में जीने का स्वभाव उन्होंने प्राचीन जातियों से सीखा हो. कुल मिलाकर आर्य ऐसे हरगिज नहीं थे, जैसा शंकर ने कहा है. तैतीरीय उपनिषद में लिखा है कि प्राचीन आर्यजन वर्ष में तीन बार विशेष आयोजन के लिए एकत्र होते थे. उस अवसर पर युवतियां शृंगार कर आती थीं. पुरुष सोमपान करते थे. तत्कालीन समाज में प्रजनन दर को बनाए रखने के लिए ऐसे उत्सवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. दरअसल ये उस दौर की ओर इशारा करती हैं, जब काम सामूहिकता का उत्सव हुआ करता था. प्राकृतिक जीवन कठिन था. चुनौतियों के बीच प्रजनन दर को बनाए रखना बहुत कठिन था. कामोद्दीपन के लिए विशेष अवसरों का सृजन प्रायः हर सभ्यता में किया गया. तैतरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि देवता और मनुष्य वर्ष में तीन बार विशेष अवसर पर मिलते हैं. वसंतोत्सव जैसे त्योहारों की हर सभ्यता में उपस्थिति भी इसी ओर संकेत करती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे.

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं.