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सार्वजनिक उद्यमों का विनिवेशीकरण

सामान्य

निजीकरण के माध्यम से जातिवादी एजेंडे को साधने की कोशिश

आर्थिक मंदी से उबरने का सरकार को जो सबसे आसान तरीका नजर आता है, वह है विनिवेशीकरण। नीति-आयोग की ऑनलाइन बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योग-धंधे चलाना सरकार का काम नहीं है। वित्त-मंत्री भी बजटीय भाषण में विनिवेशीकरण का ऐलान कर चुकी हैं। फैसले की आलोचना कर रहे लोगों से प्रधानमंत्री का कहना है कि ‘निजी क्षेत्र की महत्ता से भली-भांति परिचित होने के बाद भी कुछ नेता, न केवल अप्रासंगिक हो चुके समाजवादी सोच से चिपके हुए हैं, बल्कि निजी क्षेत्र के उद्यमियों को खलनायक की तरह पेश करने का भी काम कर रहे हैं’1 पुनः 24 फरवरी को बजट पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था कि सरकार द्वारा संचालित उद्यमों के सुनियोजित निनिवेशीकरण द्वारा नागरिकों के विकास एवं रोजगार हेतु नए संसाधन प्राप्त होंगे। उस भाषण में उन्होंने 100 सरकारी उद्यमों के विनिवेशीकरण द्वारा 2.5 लाख करोड़ की धनराशि जुटाने की बात कही थी।2 इस लेख का उद्देश्य पाठकों को  पूंजीवाद और समाजवाद की बहस पर उलझाना नहीं है। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है कि ‘संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ बनाने का संकल्प आज भी उस भारतीय संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा है, जिसकी शपथ लेकर हमारे मंत्री और सांसद, संसद भवन की शोभा बनते आए हैं।

2014 में जब यह सरकार सत्ता में आई थी, तो विकास सबसे बड़ा मुद्दा था। विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए मोदीजी अगले दो वर्षों तक इस देश से उस देश तक घूमते रहे। उन वर्षों में उन्होंने जितनी विदेश यात्राएं की थीं, वह स्वयं एक रिकार्ड है। यह बात अलग है कि अपेक्षित तो क्या न्यूनतम सफलता भी उन्हें इस काम में नहीं मिल सकी। इसके लिए कोई और नहीं, भाजपा के अपने ही नेता जिम्मेदार थे। खासकर वे नेता जिनके लिए हिंदुत्व का मुद्दा, देशहित के किसी भी मुद्दे से बढ़कर था। जीत के साथ ही वे हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने में जुट गए थे। उससे समाज में अशांति और असुरक्षा का वातावरण पनपा, जिसकी क्रूर परिणति मुजफ्फरनगर दंगे के रूप में हुई। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से सरकार का दूसरा ध्वंसात्मक कदम था─विमुद्रीकरण का फैसला। काले धन को बाहर निकालने के नाम पर उठाए गए उस कदम का वास्तविक उद्देश्य उत्तर प्रदेश चुनावों से ठीक पहले विपक्ष को धराशायी कर देना था। कालाधन तो बाहर नहीं आया, उल्टे पुराने नोटों के स्थान पर नए नोट छापने में देश को अरबों रुपयों का चूना लग गया। सामाजिक अविश्वास, अशांति, निरंतर बढ़ते ध्रुवीकरण तथा विमुद्रीकरण के फैसले ने छोटे-उद्योगों और व्यापारियों की कमर तोड़कर रख दी। उसके बाद तो लोग विकास की उम्मीद छोड़, जो था उसी को बचाने की फिक्र करने लगे। ऐसा वातावरण पूंजीवादी कंपनियों के लिए, जो निवेश से पहले नए ठिकाने की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की भली-भांति पड़ताल करती हैं, उपयुक्त नहीं था। कोविड-19 के कारण फैली महामारी की शुरुआत में, चीन के निरंकुश आचरण से खिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने नए ठिकाने की तलाश शुरू कर दी थी। भारत उनके लिए वैकल्पिक ठिकाना हो सकता था। मगर बढ़ती सांप्रदायिकता के कारण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की खराब होती छवि ने भारत को उन अवसरों का लाभ उठाने से वंचित रखा।

सवाल है कि विनिवेशीकरण के मुद्दे से इस सबका क्या संबंध है? क्यों हम सरकार की कमजोरियां गिना रहे हैं? वस्तुतः देश आज जिस आर्थिक मंदी का शिकार है, उसके पीछे सरकार की नीतियों का बड़ा योगदान है। एक ओर जहां सरकार और जनसाधारण को आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह जूझना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इसी अवधि में देश के चुनींदा घरानों की पूंजी में बेइंतहा वृद्धि हुई है। मई 2014 में जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी, सेन्सेक्स 24,000 था। फ़िलहाल वह 50,000 के शिखर को पार कर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। इसका मोटा-मोटा संकेत यह है कि सात वर्ष से भी कम समय में, देश के शीर्ष पूंजीपति घरानों के खजाने में दो गुने से ज्यादा की वृद्धि हुई है। दूसरी ओर मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से भारत 189 देशों में 2014 में भी 131वें स्थान पर था, आज भी वहीं टिका है। साफ है सरकार की नीतियों का जितना लाभ पूंजीपतियों और सरमायेदारों को मिला, उतना छोटे-उद्यमियों, व्यापारियों और आम आदमी को नहीं मिल पाया है। साफ है पूंजी का निचले वर्गों से ऊपर की ओर प्रवाह हुआ है; और जो मंदी है वह पैदा की हुई है। यह अन्यथा नहीं है कि देश के शीर्ष उद्योगपति वर्तमान सरकार से ज्यादा आशान्वित हैं। वे चाहते हैं कि सरकार विनिवेशीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाए।

सवाल उठता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम यदि लाभ नहीं कमा रहे हैं, सरकार के अनुसार उन्हें चलाए रखने के लिए हर वर्ष करीब 400 अरब रुपये का घाटा उठाना पड़ता है─तब उन्हें चलाए रखने का फायदा क्या है? पहली बात तो यह कि यह रकम उससे बहुत कम है जो सरकार को लगभग हर साल बैंकों के घटते एनपीए, कारपोरेट सेक्टर की कर्ज माफी/ब्याज माफी वगैरह के रूप में समायोजित करनी पड़ती है। दूसरा और महत्वपूर्ण प्रश्न, आखिर क्या कारण है कि जो उद्यम सरकार के नियंत्रण में रहते हुए लगातार घाटे में रहते हैं, वे निजी हाथों में जाते ही सोना उगलने लगते हैं? उदाहरण के लिए ‘भारत एल्युमिनियम कारर्पोरेशन लिमिटेड’(बाल्को) तथा ‘हिंदुस्तान जिंक’ जैसी कंपनियां जो कभी घाटे में थीं। निजी हाथों में जाने के बाद ही उनका कायापलट हो चुका है। इनमें से बाल्को की स्थापना 1965 में की गई थी। 2001 तक यह कंपनी शत-प्रतिशत स्वामित्व के साथ भारत सरकार के नियंत्रण में थी। कंपनी विशेष प्रकार के एलुमिनियम धातु का निर्माण करती है, जिसका उपयोग मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों यथा अग्नि, पृथ्वी आदि के निर्माण के लिए किया जाता था। 2001 में उसकी 51 प्रतिशत साझेदारी वेदांता समूह को बेच दे दी गई। दूसरी कंपनी ‘हिंदुस्तान जिंक’ भी वेदांता के अधिकार में हैं। आज ये कंपनियां अपने मालिकों के लिए सालाना अरबों रुपये का मुनाफा कमाती हैं। इन्हीं के कारण वेदांता समूह के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल को आजकल ‘मेटल टाइकून’ कहा जाता है। निजी हाथों में जाते समय कंपनी ने इनमें कोई छंटनी नहीं की थी। यानी कमी प्रबंधन के स्तर पर थी, जिसके लिए सरकार और नौकरशाही ज्यादा जिम्मेदार है। इस बात को देश का पूंजीपति वर्ग भी समझता है। वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल विनिवेशीकरण की प्रक्रिया का लंबे इंतजार कर रहे उद्यमियों में से हैं। इसलिए अवसर मिलते ही वे न केवल सरकार को विनिवेशीकरण के फायदे गिनाने लगते हैं, बल्कि बीमार सार्वजनिक उद्यमों की खरीद पर, चरणबद्ध तरीके से लगभग 74,000 हजार रुपये के निवेश की घोषणा भी कर देते हैं।3

सार्वजनिक क्षेत्र किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। वे देश की आधारभूत संरचना को मजबूत करने के काम आते हैं। पूंजीवादी अर्थतंत्र की कमजोरी होती है कि एक अंतराल के बाद उसमें मंदी के दौर आते हैं। सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले, पूंजीवाद का आदर्श कहे जाने वाला अमेरिका 1785 से अब तक, यानी 240 वर्ष के इतिहास में कुल 47 आर्थिक मंदी के दौर झेल चुका है।4 भारत में औद्योगिकीकरण की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के आरंभ की घटना है। बावजूद इसके आजादी के बाद इस देश में आर्थिक मंदी के 5 दौर आ चुके हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी अवधि; यानी 1947 के बाद अमेरिका को मंदी के छोटे-बड़े 12 झटकों से गुजरना पड़ा है। मंदी से उबारने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बाहरी मदद पहुंचानी पड़ती है। उस समय वे सरकार से करीब-करीब इतनी ही धनराशि ऐंठ लेते हैं, जितनी उन्होंने अपने अच्छे दिनों में कराधान आदि के रूप में सरकार को प्रदान की थी। कभी-कभी आर्थिक मंदी पूर्णतः कृत्रिम होती है। फिर भी मजबूर सरकारों को कर्ज लेकर भी, पूंजीवादी अर्थतंत्र को मदद पहुंचानी पड़ती है। 2008 से 2011 की भीषण आर्थिक मंदी के दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था इतनी रसातल में पहुंच चुकी थी कि दिवालियापन से बचने से लिए उसे कर्ज लेना पड़ा था।

एक समय था जब किसी सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों और विद्वानों की राय महत्वपूर्ण मानी जाती थी। समाचारपत्र-पत्रिकाएं गर्व के साथ समाजविज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों  को जगह देते थे। कथित सोशल मीडिया इस गंभीर कार्य को भी ग्लैमराइज्ड कर दिया है। सोशल मीडिया पर आए दिन कोई अभिनेता, अभिनेत्री, क्रिकेटर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों की विवेचना करता हुआ नजर आता है। ट्विटर और फेसबुक के चलताऊ विमर्श के आधार पर सरकारें भी अपनी राय बनाती नजर आती हैं। ऐसे कृत्रिम बौद्धिकता के माहौल में समाजवाद को समय-बाह्यः मान लेना, न तो अस्वाभाविक है, न ही चौंकाने वाला। असलियत कुछ और ही है। 

एडीसन मेंगस की रिपोर्ट के अनुसार 1700 ईस्वी में जब भारत में औद्योगिकीकरण की हवा तक नहीं पहुंची थी, और पश्चिम में मशीनीकरण की धूमधाम के साथ शुरुआत हो चुकी थी─सकल वैश्विक उत्पादन में भारत और चीन का योगदान 24.4 प्रतिशत और 22.3 प्रतिशत था। इसमें गिरावट का दौर ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद शुरू हुआ। ये कंपनियां दोनों ही देशों में पहुंचीं। परिणामस्वरूप 1913 में भारत 7.5 प्रतिशत; तथा चीन 8.8 प्रतिशत पर सिमटकर रह गया। 1947 में भारत आजाद हुआ और चीन 1949 में साम्यवादी झंडे के नीचे चला गया। मगर 1950 तक चीन और भारत की अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक अंतर नहीं था। उस समय वैश्विक सकल उत्पादन में भारत और चीन का योगदान क्रमश 4.2 प्रतिशत और 4.5 प्रतिशत था। यही नहीं, 1991 तक लोकतंत्रात्मक भारत, अपनी मिश्रित अर्थव्यवस्था के बल पर, चीन को टक्कर देता था। उस समय दोनों की वैश्विक उत्पादकता लगभग समान थी।5 इसमें परिवर्तन 1991 के बाद भारत, उस समय आया जब भारत ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के नाम पर अपने दरवाजे बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए खोल दिए। दूसरी ओर चीन मिश्रित अर्थव्यवस्था की डगर पर आगे बढ़ गया। आज भारत और चीन की आर्थिक हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में चीन का सकल घरेलू उत्पाद 14.34 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो भारत के 2.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर, से पांच गुना अधिक है।6

उपर्युक्त विवरण से साफ है कि आर्थिक उदारीकरण के साथ देश ने जो सपने देखे थे, वे महज छलावा सिद्ध हुए हैं। बावजूद इसके पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विरोध में कोई आवाज नहीं उठती। सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की आवाज को दबाकर निजी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए प्राण-प्रण के साथ जुटी है। खुद प्रधानमंत्री समाजवाद को समयबाह्य दर्शन कह जाते हैं। आखिर क्यों? हमें इसके पीछे निहित षड्यंत्र को समझना पड़ेगा। समझना पड़ेगा कि वे कौन से कारण हैं जिन्होंने कुछ वर्ष पहले तक ‘स्वदेशी’ के पैरोकार रही ‘भारतीय जनता पार्टी’ नेता अब उसका नाम तक लेना नहीं चाहते। निश्चय ही इसका तात्कालिक उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना है। साथ ही इसका एक दीर्घकालिक उद्देश्य भी है।

संविधान प्रदत्त अधिकारों का लाभ उठाकर, दलित और पिछड़ी जातियों के लोग सरकारी नौकरियों, उद्योगों और व्यापार में जगह बनाने लगे हैं। हालांकि शिखरस्थ जातियों की अपेक्षा उनकी भागीदारी, उनके जनसंख्या अनुपात  से अभी भी बहुत कम है। बावजूद इसके विप्र मानसिकता के लोगों को यह बहुत रास नहीं आ रहा है। येन-केन-प्रकारेण वे दलितों और पिछड़ों के सबलीकरण की प्रक्रिया को अवरुद्ध करना चाहते हैं। चूंकि संवैधानिक प्रावधानों के कारण वे सरकार में रहकर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, इसलिए निजी क्षेत्र को मजबूत किया जा रहा है, जहां पिछड़ों और दलितों की उपस्थिति नगण्य है। विनिवेशीकरण इसलिए किया जा रहा है ताकि आरक्षित वर्गों के सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के रास्ते सरकारी नौकरियों में जाने के अवसर कम से कम हो जाएँ। अपने इस प्रयोग से वर्तमान सरकार इतनी खुश है कि प्रशासनिक सेवाओं के जिन पदों के लिए युवा घर-परिवार से अलग रहकर रात-दिन मेहनत करते हैं, उनपर भी निजी क्षेत्र से उधार लिए अधिकारियों को बैठाया जा रहा है। कुल मिलकर ‘2014 में सरकार बनाते समय मोदी जी द्वारा दिया गया नारा ‘सबका साथ-सबका विकास’, सरकार के जातिवादी एजेंडे पर चढ़कर, ‘सबका साथ अपनों का विकास’ बनकर रह गया है।

ओमप्रकाश कश्यप

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संदर्भ

1. जागरण संपादकीय, 21 फरवरी, 2021.

2. दि टाइम्स ऑफ इंडिया, 25 फरवरी, https://timesofindia.indiatimes.com/india/pm-sets-target-of-2-5l-cr-from-asset-monetisation/articleshow/81200196.cms

3. नवभारत टाइम्स, 19 दिसंबर, 2020 https://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/anil-agarwal-vedanta-and-centricus-to-invest-10-billion-dollar-in-indian-companies/articleshow/79812797.cm

4. बिजनिस साइकिल्स: थ्योरी, हिस्ट्री, इंडीकेटर्स एंड फोरकास्टिंग, विक्टर जार्नोविट्ज, शिकागो यूनीवर्सिटी, शिकागो प्रेस, 221-226

5. डेवलपमेंट सेंटर स्टडीज दि वर्ल्ड इकॉनामी स्टेटीटिक्स, ओईसीडी, फ्रांस, पृष्ठ 261-262  

6. विश्वबैंक, वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडीकेटर्स, 2 जुलाई 2020 https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_GDP_(nominal)

जैन और बौद्धदर्शन में समाजवादी चेतना

सामान्य

हितोपदेश की एक सुभाषित है : अयं निज परोवेति गणना लघुचैतसाम्। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम् यानी ‘यह अपना है, वह पराया हैयह सोच क्षुद्र वृत्ति की उपज है. उदारचरितों, सज्जनों के लिए तो पूरा विश्व एक परिवार के समान है, पृथ्वी पर रहने वाले सभी नरनारी उनके परिजन हैं.’जिस दौर की यह उक्ति है वह मानवीय मेधा के प्रस्फुटन का था. जैन और बौद्ध दर्शन का उदय उससे करीब तीन सौ वर्ष पहले हो चुका था. जिन दिनों पंचतंत्रादि ग्रंथों की रचना हुई ये दोनों दर्शन देश की सीमाओं से बाहर निकलकर दुनिया को अपनी कल्याणकारी मेधा से प्रभावित कर रहे थे. उल्लेखीय है कि बौद्ध दर्शन का उद्भव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था. वेदों में बहुदेववाद, कर्मकांड और युद्धों का इतना विशद् वर्णन है कि उनके आगे उनकी दार्शनिक, नैतिक, आध्यात्मिक चिंतनधारा म्लान दिखने लगती है. इसलिए वे तत्वचिंतन के नाम पर कर्मकांड, धर्म के बजाय पाखंड, नीति के स्थान पर ऊंचनीच और आडंबर रचते हुए नजर आते हैं. पुरोहित वर्ग उनके माध्यम से धर्मदर्शन की स्वार्थानुकूल और मनमानी व्याख्याएं थोपने का प्रयास करता है. राजनीति के सहयोग से वह इस धृष्टता में कामयाब भी होता है. धर्म और राजसत्ता परस्पर मिलकर लोगों के शोषण के लिए नएनए विधान गढ़ते हैं. समाजार्थिक शोषण का यह सिलसिला लगभग पांच शताब्दियों तक निरंतर चलता है. ऐसा भी नहीं है कि शेष समाज शोषण को अपनी नियति मान चुका था. बल्कि जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, ब्राह्मणवाद का विरोध उसके आरंभिक दिनों से ही होने लगा था. मगर उसको रचनात्मक दिशा देने का काम किया था, जैन और बौद्ध दर्शन ने. इन दोनों दर्शनों ने वेदों की बुद्धिवाद की उस धारा को नई एवं युगानुकूल दिशा देने का काम किया, जो कर्मकांड और मिथ्याडंबरों के बीच अपनी पहचान लगभग गंवा चुकी थी.

जैन और बौद्ध धर्म के प्रवर्त्तक क्रमशः महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध, ईसा से छह शताब्दी पहले, क्षत्रिय कुल में जन्मे थे. अपनेअपने दर्शन में दोनों ने ही कर्मकांड और आडंबरवाद का जमकर विरोध किया था. दोनों ही यज्ञों में दी जाने वाली पशुबलियों के विरुद्ध थे. दोनों ने शांति और अहिंसा का पक्ष लिया था, और भरपूर ख्याति बटोरी. जैन और बौद्ध, दोनों ही दर्शनों को भारतीय चिंतनधारा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. इनमें से जैन धर्म अहिंसा को लेकर अत्यधिक संवेदनशील था, जबकि जीवन को लेकर बुद्ध का दृष्टिकोण व्यावहारिक था. अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रहशीलता के कारण जैन दर्शन प्रचारप्रसार के मामले में बौद्ध दर्शन से पिछड़ता चला गया. व्यावहारिक होने के कारण बौद्ध दर्शन को उन राजाओं आ समर्थन भी मिला जो ब्राह्मणवाद से तंग हो चुके थे; और उपयुक्त विकल्प की तलाश में थे.

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड के स्थान पर ज्ञानसाधना पर जोर दिया था. पशुबलि को हेय बताते हुए वे अहिंसा के प्रति आग्रहशील बने रहे. वेदवेदांगों में आत्मापरमात्मा आदि को लेकर इतने अधिक तर्कवितर्क और कुतर्क हो चुके थे कि बुद्ध को लगा कि इस विषय पर और विचार अनावश्यक है. इसलिए उन्होंने आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों को तात्कालिक रूप से छोड़ देने का तर्क दिया. उसके स्थान पर उन्होंने मानवजीवन को संपूर्ण बनाने पर जोर दिया. समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दिया. जिसमें पहला शील है, अहिंसा. जिसके अनुसार किसी भी जीवित प्राणी को कष्ट पहुंचाना अथवा मारना वर्जित कर दिया गया था. दूसरा शील था, अचौर्य. जिसका अभिप्राय था कि किसी दूसरे की वस्तु को न तो छीनना न उस कारण उससे ईर्ष्या करना. तीन शील सत्य था. मिथ्या संभाषण भी एक प्रकार की हत्या है. सत्य की हत्या. इसलिए उससे बचना, सत्य पर डटे रहना. तीसरे शील के रूप में तृष्णा न करना शामिल था. व्यक्ति के पास जो है, जो अपने संसाधनों द्वारा अर्जित किया गया, उससे संतोष करना. आवश्यकता से अधिक की तृष्णा न करना. इसलिए कि यह पृथ्वी जरूरतें तो सबकी पूरी कर सकती है, मगर तृष्णा एक व्यक्ति की भी भारी पड़ सकती है. पांचवा शील मादक पदार्थों के निषेद्ध को लेकर है. पंचशील को पाने के लिए उन्होंने अष्ठांगिक मार्ग बताया था, जिसमें उन्होंने सम्यक दृष्टि(अंधविश्वास से मुक्ति), सम्यक वचन(स्पष्ट, विनम्र, सुशील वार्तालाप), सम्यक संकल्प(लोककल्याणकारी कर्तव्य में निष्ठा, जो विवेकवान व्यक्ति से अभीष्ट होता है), सम्यक आचरण(प्राणीमात्र के साथ शांतिपूर्ण, मर्यादित, विनम्र व्यवहार), सम्यक जीविका(किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुंचाना), सम्यक परिरक्षण(आत्मनियंत्रण और कर्तव्य के प्रति समर्पण का भाव), सम्यक स्मृति(निरंतर सक्रिय एवं जागरूक मस्तिष्क) तथा सम्यक समाधि(जीवन के गंभीर रहस्यों पर सुगंभीर चिंतन) पर जोर दिया था.

बुद्ध की चिंता थी कि किस प्रकार मानवजीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाया जाए. सुख से उनका अभिप्राय केवल भौतिक संसाधनों की उपलब्धता से नहीं था. इसके स्थान पर वे न केवल मानवजीवन के लिए सुख की सहज उपलब्धता चाहते थे, बल्कि समाज के बड़े वर्ग के लिए सुख की समान उपलब्धता की कामना करते थे. यह वैदिक ब्राह्मणवाद के समर्थकों से एकदम भिन्न था. जिन्होंने परलोक की काल्पनिक भ्रांति के पक्ष में भौतिक सुखों की उपेक्षा की थी, जबकि उनका अपना जीवन भोग और विलासिता से भरपूर था. यही नहीं वर्णाश्रम व्यवस्था के माध्यम से उन्होंने समाज के बहुसंख्यक वर्गों, जो मेहनती और हुनरमंद होने के साथसाथ समाज के उत्पादन को बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प थे, सुख एवं समृद्धि से दूर रखने की शास्त्राीय व्यवस्था की थी. शूद्र कहकर उसको अपमानित करते थे. और इस आधार पर उन्हें अनेक मानवीय सुविधाओं से वंचित रखा गया था.

उल्लेखनीय है कि वेदों के आडंबरवाद का विरोध उन्हीं दिनों शुरू हो चुका था. उस समय के महानतम विद्वान कौत्स तो वैदिक ऋचाओं को शब्दाडंबर मात्र मानते थे. समाज का बड़ा वर्ग वैदिक परंपराओं का खंडन करता था. इस कारण वेद समर्थकों और उनके विरोधियों के बीच घमासान भी होते रहते थे. जिनसे कूटनीति और छल के कारण ब्राह्मणवादियों को विजय प्राप्त हुई थी. दरअसल यह बुद्ध ही थे जिन्होंने दर्शन को वायवी आडंबर से बाहर लाकर आचरण और व्यवहार के धरातल पर लाकर अवस्थित किया था. उन्होंने दर्शन को निरर्थक और अनुपयोगी प्रश्नों के चक्र से बाहर लाकर जीवन से जोड़ा. मानव मन की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के सापेक्ष नैतिकता को केंद्र में लेकर आए. पंडितों और पुरोहितों से अलग भाषा अपनाते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म और दर्शन, दोनों का उद्देश्य इस विश्व का पुनर्निर्माण करना है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं. आज प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्मांड की व्याख्या वैज्ञानिक नियमों द्वारा ही सटीक ढंग से की जा सकती है. नैतिकता से कटा हुआ धर्म महज आडंबर है. विरोधियों की आलोचना की परवाह न करते हुए उन्होंने आगे कहा कि सृष्टि का केंद्र मनुष्य है, न कि ईश्वर. धर्म के बारे में उनका कहना था कि उसका केंद्रविषय नैतिकता है. वे जीवन में दुःख को अवश्यंभावी मानते थे. साथ ही उनका मानना था कि दुःखों से मुक्ति संभव है. इसके लिए जीवन के प्रति संपूर्ण समर्पण अनिवार्य है.

पुरोहितों और पंडितों के चंगुल से आमजन को बचाने के लिए उन्होंने अष्ठांग मार्ग का प्रवर्त्तन किया. जीवन की पवित्रता के लिए उन्होंने उसको संपूर्णता के साथ अपनाने की सलाह दी. बातबात पर पुरोहितों और धर्माचार्यों की शरण में जाने वाले लोगों को उन्होंने नेक सलाह दी—अप्प दीपो भवः! अपना दीपक स्वयं बनो. उन्होंने जोर देकर कहा कि सुख केवल शीर्षस्थ वर्गों की बपौती नहीं है. गृहस्थ के लिए धनार्जन न तो पाप है, न कोई अभिशाप. जीवन के प्रति मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने धर्नाजन को गृहस्थ के लिए अनिवार्य उपक्रम माना. वे पहले धर्माचार्य थे, जिन्होंने गणतंत्र का पक्ष लिया, यह उस युग में एकदम क्रांतिकारी था. परिणाम यह हुआ कि सांसारिक सुखों के प्रति जनसामान्य पापबोध लगातार घटने लगा. शिल्पकर्मियों को शूद्र का दर्जा देकर उन्हें तरहतरह से प्रताड़ित किया जाता था. बौद्ध धर्म में जातिवर्ण के लिए कोई स्थान न था. बल्कि सभी के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार था. इसलिए जातीय उत्पीड़न का शिकार रही जातियां बड़ी तेजी से बौद्धधर्म में शामिल होने लगीं. देखते ही देखते वह देश की सीमाएं पार कर, विदेशी भूमियों पर अपनी पकड़ बनाता गया.

बुद्ध स्वयं क्षत्रिय थे. उनके समकालीन महावीर स्वामी भी क्षत्रिय ही थे. दोनों ने ही राजनीतिक सुखसुविधाओं को ठुकराकर अध्यात्मचिंतन का मार्ग चुना था. राजघराना छोड़कर उन्होंने चीवर धारण किया था. इसलिए बाकी वर्गों में विशेषकर उन लोगों में जो ब्राह्मणों और उनके कर्मकांडों से दूर रहना चाहते थे, जैन और बौद्धधर्म की खासी पैठ बनती चली गई. मगर सामाजिक स्थितियां बौद्ध धर्म के पक्ष में थीं. इसलिए कि एक तो वह व्यावहारिक था. दूसरे जैन दर्शन में अहिंसा आदि पर इतना जोर दिया गया था कि जनसाधारण का उसके अनुरूप अपने जीवन को ढाल पाना बहुत कठिन था. यज्ञों एवं कर्मकांडों के प्रति जनसामान्य की आस्था घटने से उनकी संख्या में गिरावट आई थी. उनमें खर्च होने वाला धर्म विकास कार्यों में लगने लगा था. पहले प्रतिवर्ष हजारों पशु यज्ञों में बलि कर दिए जाते थे. महात्मा बुद्ध द्वारा अहिंसा पर जोर दिए जाने से पशुबलि की कुप्रथा कमजोर पड़ी थी. उनसे बचा पशुधन कृषि एवं व्यापार में खपने लगा. शुद्धतावादी मानसिकता के चलते ब्राह्मण समुद्र पार की यात्रा को निषिद्ध और धर्मविरुद्ध मानते थे. बौद्ध धर्म में ऐसा कोई बंधन न था. इसलिए अंतरराज्यीय व्यापार में तेजी आई थी. चूंकि अधिकांश राजाओं द्वारा अपनाए जाने से बौद्ध धर्म राजधर्म बन चुका था, इसलिए युद्धों में कमी आई थी, जो राजीनितिक स्थिरता बढ़ने का प्रमाण थी. व्यापारिक यात्राएं सुरक्षित हो चली थीं. जिससे व्यापार में जोरदार उछाल आया था.

ये सभी स्थितियां जनसामान्य के लिए भले ही आह्लादकारी हों, मगर ब्राह्मणधर्म के समर्थकों के लिए अत्यंत अप्रिय और हितों के प्रतिकूल थीं. इसलिए उसका छटपटाना स्वाभाविक ही था. अतएव महात्मा बुद्ध को लेकर वे ओछे व्यवहार पर उतर आए थे. बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था, जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रियों में गिनी जाती थी. ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र कहकर लांछित किया, जिसको बुद्ध इन बातों से अप्रभावित बने रहे. दर्शन को जनसाधारण की भावनाओं का प्रतिनिधि बनाते हुए उन्होंने दुःख की सत्ता को स्वीकार किया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुःख निवृत्ति संभव है. उसका एक निर्धारित मार्ग है. दुःख स्थायी और ताकतवर नहीं है. बल्कि उसको भी परास्त किया जा सकता है.

बुद्ध का दर्शन वर्जनाओं का दर्शन है. सबसे पहले वह वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. उस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, जो ब्राह्मणों को विशेषाधिकार संपन्न बनाती है. पुरोहितवाद की जरूरत को नकारते हुए वे कहते हैं‘अप्प दीपो भव!’ अपना दीपक आप बनो. तुम्हें किसी बाहरी प्रकाश की आवश्यकता नहीं हैं. किसी मार्गदर्शक की खोज में भटकने से अच्छा है कि अपने विवेक को अपना पथप्रदर्शक चुनो. समस्याओं से निदान का रास्ता मुश्किलों से हल का रास्ता तुम्हारे पास है. सोचो, सोचो और खोज निकालो. इसके लिए मेरे विचार भी यदि तुम्हारे विवेक के आड़े आते हैं, तो उन्हें छोड़ दो. सिर्फ अपने विवेक की सुनो. करो वही जो तुम्हारी बुद्धि को जंचे. उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दुनिया को दिया. उसके द्वारा मर्यादित जीवन जीने की सीख दुनिया को दी. कहा कि सिर्फ उतना संजोकर रखो जिसकी तुम्हें जरूरत है. तृष्णा का नकारहिंसा छोड़, जीवमात्र से प्यार करो. प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन जीने का उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हें है. इसलिए अहिंसक बनो. झूठ भी हिंसा है. इसलिए कि वह सत्य का दमन करती है. झूठ मत बोलो. सिर्फ अपने श्रम पर भरोसा रखो. उसी वस्तु को अपना समझो जिसको तुमने न्यायपूर्ण ढंग से अर्जित किया है. पांचवा शील था, मद्यपान का निषेध. बुद्ध समझते थे वैदिक धर्म के पतन के कारण को. उन कारणों को जिनके कारण वह दलदल में धंसता चला गया. दूसरों को संयम, नियम का उपदेश देने वाले वैदिक ऋषि खुद पर संयम नहीं रख पा रहे थे. अपने आत्मनियंत्रण को खोते हुए उन्होंने खुद ही नियमों को तोड़ा. मांस खाने का मन हुआ तो यज्ञों के जरिये बलि का विधान किया. कहा कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’और अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए पशुओं की बलि देते चले गए. नशे की इच्छा हुई तो सोम को देवताओं का प्रसाद कह डाला और गले में गटागट मदिरा उंडेलने लगे. ऐसे में धर्म भला कहां टिकता. कैसे टिकता!

बुद्ध पहले महात्मा थे, साहचर्य का पाठ दुनिया को पढ़ाया. उससे पहले आश्रम सहजीवन की पहचान हुआ करते थे. लेकिन वहां गुरु का नाम चलता था. सारे आश्रम गुरु के नाम से जाने जाते थे. वौद्ध विहार किसी एक भिक्षु की संपत्ति नहीं थे. वे सबसे साझे थे. बुद्ध का कहना था कि जो है, सबका है. जितना है, उसको मिलबांटकर उपयोग करो. उनके भिक्षुसंघ की व्यवस्था ही ऐसी थी. प्रारंभ में गौतम बुद्ध का शिष्यत्व धारण करने वाले अधिकांश भिक्षु राजपरिवारों से आए थे. संघ के नियमानुसार प्रत्येक भिक्षु को चीवर धारण करना पड़ता था. जिसका अर्थ है जीर्णशीर्ण परिधान. उस समय आम आदमी के यही वस्त्र थे. वह मेहनत मजदूरी करता और अपने राजा के लिए कमाता था. जमीन या संपत्ति पर उसका अधिकार न था. वह राजा की मानी जाती थी. लगान चुकाने के बाद जो बचता उससे वह सिर्फ आधा तन ही ढक पाता था. बहुत बाद में अपने राजनीतिक गुरु गोविंदवल्लभ पंत के कहने पर गांधी जी जब ‘भारत को जानने’ के लिए यात्रा पर निकले तो उन्होंने भी एक नदी तट पर ऐसे ही अंधनंगे स्त्रीपुरुषों को देखकर अपने वस्त्र उनकी ओर बहा दिए थे. उसके बाद साबरमती का वह फकीर अधनंगे तन की अंग्रेजों से जूझता रहा. वह जनता के दुःखदर्द को पहचानकर उसके करीब आने की, राजा से रंक बनने की कोशिश थी. बिना इसके लोगों के दिल में बनाना आसान न था. बौद्ध संघों के नियम भी ऐसे थे कि जो भी वहां आए, अतीत के वैभव को बिसराकर सच्चे मन से आए.

बुद्ध के कुछ शिष्यों को अच्छा नहीं लगा कि उनका गुरु ऐसे जीर्णशीर्ण वस्त्र धारण करे. यह उनका प्रेरक रहा होगा. मगर यह उस सत्ता की प्रतीति का भी परिणाम था, जो धर्मसत्ता के संगठित होतेहोते आकार ले लेता है. ऐसे शिष्यों ने बुद्ध के लिए नए कपड़े से बुना चीवर लाकर दिया. प्रार्थना की कि उसको पहनें. बुद्ध ने अपने शिष्यों पर निगाह डाली. वे भी जीर्णशीर्ण चीवर में थे. ‘मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन संघ में तो सभी बराबर हैं. बाकी भिक्षु भी पुराने वस्त्र क्यों धारण करें. उस दिन के बाद से संघ में पुराने कपड़े का बना चीवर पहनने की शर्त हटा दी गई.

ऐसा ही एक और उदाहरण है. गौतम बुद्ध की मां माया तो उन्हें जन्म देने के नवें दिन ही मर चुकी थीं. उन्हें मां का स्नेह देकर पालने वाली थी, गौतमी, जिन्हें वे सदैव मां का सम्मान देते रहे. गौतम बुद्ध ने भिक्षु संघ की स्थापना की तो गौतमी भी उसमें सम्मिलित हो गई. सर्दी का मौसम था. गौतमी ने बुद्ध को एकमात्र चीवर में देखा तो उनका वात्सल्य मचलने लगा. जानती थीं कि राजपाट को ठोकर मार चुका उनका संन्यासी बेटा सर्दी से बचाव के लिए भी अन्य वस्त्र धारण नहीं करेगा. इसलिए उन्होंने रातदिन लगकर बुद्ध के लिए एक गुलुबंद तैयार किया. उसको लेकर वे खुशीखुशी उनके पास पहुंची और उनसे पहनने का आग्रह किया. बुद्ध ने बाकी भिक्षुओं की ओर देखा. वे सभी एकमात्र चीवर में थे. उन्होंने गुलुबंद लेने से इनकार कर दिया. बोले कि यदि यह उपहार है तो सभी भिक्षुओं के लिए होना चाहिए. सिर्फ उन्हीं के लिए क्यों? गौतमी ने बहुत अनुनयविनय की. लेकिन बुद्ध नहीं माने. समाजवाद की, सहजीवन की पहली शर्त है, संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी. इसके लिए उनका राष्ट्रीयकरण. बुद्ध ने भिक्षु संघ की जो व्यवस्था की थी, उसके अनुसार समस्त संपत्ति संघ की मानी जाती थी. संपत्ति और संसाधनों के समान बंटवारे के अतिरिक्त भिक्षु संघ में अधिकारों का भी एकसमान विभाजन था. सभी निर्णय सहमति के आधार पर लिए जाते थे. भिक्षु संघ के बीच महात्मा बुद्ध की हैसियत अधिक से अधिक एक प्रधान सचिव जैसी थी. किसी को भी मनमानी करने अथवा अपना निर्णय थोपने का अधिकार नहीं था. महात्मा बुद्ध वैशाली गणतंत्र के प्रशंसक थे. ऐसी ही व्यवस्था वे भिक्षु संघ में चाहते थे. जीवन के उत्तरार्ध में कम से कम दो अवसर ऐसे आए, जब उनसे उनके उत्तराधिकारी के बारे में पूछा गया था. कहा गया कि जिसको वे उपयुक्त समझते हों उसको संघ की व्यवस्था सौंप सकते हैं. उस समय यदि वे चाहते तो किसी भी व्यक्ति को यह दायित्व सौंपकर उपकृत कर सकते थे. मगर हर बार उन्होंने यही कहा कि धम्म ही संघ का सेनापति है. और आजकल के कथावाचक टाइप स्वयंभू भगवानों को देखें, जो धर्म के नाम पर बने अपने संगठन को भी किसी कारपोरेट कंपनी की भांति चलाते हैं. धर्म के नाम पर जनसाधारण की भावनाओं का दोहन कर मुनाफा बटोरना और पूंजी बटोरना ही उनका ही उनका व्यवसाय है. शंकराचार्य की गद्दी पाने के लिए षड्यंत्र किए जाते हैं, हत्याएं तक होती हैं.

बुद्ध कोरे अध्यात्म पर जोर नहीं देते. बल्कि व्यक्ति की दैनंदिन की समस्याओं पर भी विचार करते हैं. बुद्ध का दुःख की शाश्वतता को स्वीकारना और उसे अपने चिंतन की परिधि में लाना उन्हें व्यावहारिक और जनसाधारण के निकट लाता है. मगर दुःख की बात कहकर, वे डराते नहीं हैं. वे स्पष्ट कहते हैं कि दुःख की सत्ता है, और उसका कारण भी है. कारण का निवारण कर दुःख से मुक्ति संभव है. इसके लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है. खुद को पहचानो. अपने भीतर छिपे प्रकाश को पकड़ो.

यूं तो हिंदू दर्शन भी चार पुरुषार्थों को मान्यता देता है. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. लेकिन काम और मोक्ष को लेकर भारतीय परंपरा विरोधाभासों का शिकार रही है. एक ओर तो व्यक्ति को अर्थ और काम के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है, दूसरे उन्हें माया और भ्रांति कहकर पारलौकिक सुख का लालच दिया जाता रहा. बुद्ध मुक्ति की बात नहीं कहते. मुक्ति का अभिप्राय वैदिक आचार्यों को लिए आत्मा का परमात्मा से सम्मिलन रहा है. बुद्ध आत्मा और परमात्मा को अचिंत्य मानते थे. इसलिए उन्होंने निर्वाण का पक्ष लिया. मुक्ति के लिए मृत्यु अनिवार्य है. निर्वाण इसी जीवन में संभव है. बस उसके लिए चित्तवृत्तिनिरोध और आत्मसंयम की आवश्यकता है. भिक्षु के लिए उन्होंने किंचित कठोर नियम बनाए थे. संन्यासी को संचय की आवश्यकता ही क्या. यदि संचय से लगाव था तो संन्यास की आवश्यकता ही क्या थी. अतः भिक्षु को चाहिए कि वह प्रतिदिन पहनने के लिए तीन वस्त्र(त्रीचीवर), एक कटिबांधनी यानी कमर में बांधने वाली पेटी, एक भिक्षापात्र, वाति यानी उस्तरा, सुईधागा तथा पानी साफ करने के लिए एक छननी अथवा छन्ना के अतिरिक्त कुछ और न रखे. भिक्षु के लिए महंगी धातुएं यथा सोना, चांदी पहनना या पास में रखना निषिद्ध था. डर था कि सोने को बेचकर वह विलासिता का प्रतीक बाकी वस्तुएं भी खरीद सकता है.

एक ओर जहां भिक्षु के लिए इतने सख्त नियम थे, वहीं गृहस्थ को उन्होंने उदारतापूर्वक संपत्ति संचय की छूट दी थी. इस संबंध में एक कथा है

अनाथ पिंडक गौतम बुद्ध का प्रिय शिष्य था. एक बार उसने सोचा कि गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं की संचय की प्रवृत्ति के निषेध के लिए काफी कठोर नियम बनाए हैं. इसलिए उसके मन में जिज्ञासा जगी कि बुद्ध से व्यक्तिगत संपत्ति के बारे में उनका मत जाना जाए. निर्वाण की लालसा तो जितनी भिक्षु को है, करीबकरीब उतनी ही गृहस्थ को भी होती है. इसलिए अभिवादन करने के बाद उसने गौतम बुद्ध से पूछा—

क्या भगवन, यह बताएंगे कि गृहस्थ के लिए कौनसी बातें स्वागतयोग्य, सुखद एवं स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना दुष्कर है?’

प्रश्न सुनने के उपरांत बुद्ध ने कहा—

इनमें प्रथम विधिपूर्वक धन अर्जित करना है. दूसरी बात यह देखना है कि आपके संबंधी भी विधिपूर्वक धनसंपत्ति अर्जित करें. तीसरी बात है दीर्घकाल तक जीवित रहो और लंबी आयु प्राप्त करो.’

गृहस्थ को इन चार चीजों की प्राप्ति करनी है, जो कि संसार में स्वागतयोग्य, सुखकारक तथा स्वीकार्य हैं. परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है. चार अवस्थाएं भी हैं, जो कि इनसे पूर्ववर्ती हैं. वे हैं, श्रद्धा, शुद्ध आचरण, स्वतंत्रता और विवेक. शुद्ध आचरण दूसरे का जीवन लेने अर्थात हत्या करने, चोरी करने, व्यभिचार करने तथा मद्यपान करने से रोकता है.

स्वतंत्रता ऐसे गृहस्थ का गुण होती है, जो धनलोलुपता के दोष से मुक्त, उदार, दानशील, मुक्तहस्त, दान देकर आनंदित होने वाला और इतना शुद्ध हृदय का हो कि उसे उपहारो का वितरण करने के लिए कहा जा सके.

बुद्धिमान कौन है?

जो यह जानता हो कि जिस गृहस्थ के मन में लालच, धन लोलुपता, द्वेष, आलस्य, उनींदापन, निद्रालुता, अन्यमनस्कता तथा संशय है और जो कार्य उसको करना चाहिए, उसकी उपेक्षा करता है, और ऐसा करने वाला प्रसन्नता तथा सम्मान से वंचित रहता है.

लालच, कृपणता, द्वेष, आलस्य तथा अन्यमनस्कता तथा संशय मन के कलंक हैं. जो गृहस्थ मन के इन कलंकों से छुटकारा पा लेता है, चह महान बुद्धि, प्रचुर बुद्धि एवं विवेक, स्पष्ट दृष्टि तथा पूर्ण बुद्धि व विवेक प्राप्त कर लेता है.

अतएव, न्यायपूर्ण ढंग से तथा वैध रूप में धन प्राप्त करना, भारी परिश्रम से कमाना, भुजाओं की शक्ति व बल से धन संचित करना, तथा भौहों का पसीना बहाकर परिश्रम से प्राप्त करना, एक महान वरदान है. ऐसा गृहस्थ स्वयं को प्रसन्न तथा आनंदित रखता है तथा अपने मातापिता, पत्नी तथा बच्चों, मालिकों और श्रमिकों, मित्रों तथा सहयोगियों, साथियों को भी प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से परिपूर्ण रखता है.’

उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि बुद्ध का दर्शन मानव जीवन को संपूर्ण और परिपक्व बनाने के लिए आग्रहशील है. वह सीधेसीधे उस ब्राह्मणवाद के विरोध में जन्मा था, जिसके केंद्र में जनसाधारण था ही नहीं. जो आत्ममोह से ग्रस्त समाज था, एक प्रकार से लड़ाकू कबीला. जो सिर्फ वर्चस्व की भाषा जानता था. बुद्ध गणतंत्र के प्रशंसक थे. इसलिए उनके दर्शनचिंतन में भी गणतंत्र की खूबियां हैं. वे न केवल सामाजिक समानता पर जोर देते हैं, और उसके लिए सामाजिक समाज के जातीय विभाजन को दोषी ठहराते हैं, वहीं आर्थिक अधिकार देकर व्याक्ति को उन सामंती संस्कारों से बचाए रखना चाहते हैं, जो धर्म और राजनीति की कुटिल संधियों की उपज थे. इन सब कारणों से बुद्ध का दर्शन समाजवादी भावनाओं से ओतप्रोत जान पड़ता है. कई मायने में तो वह माक्र्स के वैज्ञानिक समाजवाद तथा व्यक्ति से भी आगे ले जाता है. इसलिए कि भौतिक द्वंद्ववाद का विश्लेषण करता हुआ माक्र्स उत्साह के साथ शुरू तो करता है, मगरउसका चिंतन आर्थिक पहलुओं से आगे नहीं बढ़ पाता. वह आर्थिक समस्याओं को जीवन की मूल समस्याओं के रूप में देखता है. जबकि ऐसा नहीं है. दूसरी ओर बुद्ध का दर्शन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक समानता यानी समानता के सभी पहलुओं की विस्तार से चर्चा करता है. और आर्थिक मानवीकरण के मुद्दे पर कई जगह से मार्क्स के समाजवाद से आगे निकल जाता है.

जैन दर्शन में समाजवादी तत्त्व

जैन धर्म के चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी, बुद्ध के समकालीन, उनसे लगभग तीस वर्ष बड़े थे. दोनों के दर्शन में काफी समानता है. जैसे कि दोनों ही क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे. दोनों ने ही अपना दर्शन ब्राह्मणवाद के विरोध में प्रस्तुत किया था. दोनों ही कर्मकांड के बजाय आचरण की पवित्रता के प्रति अधिक आग्रहशील थे. आत्मापरामात्मा और ईश्वर आदि की वैदिक मताब्लंबियों की बंधीबंधाई धारणा पर उन्हें विश्वास नहीं था. वैदिक ग्रंथों में श्रमणों का जगहजगह उल्लेख हुआ है. ये श्रमण कर्मकांड के विरोधी थे. अपनी जिज्ञासा के समाधान हेतु अधिकांश प्रकृति के सान्न्ध्यि में रहकर सृष्टि के रहस्यों की खोज में लगे रहते थे. जैन धर्म में विश्वास करने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि नदी को पाटने का पहला चमत्कार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी किया था. इसके अतिरिक्त लिपिकला, कुंभकारी, चित्रकारी तथा मूर्तिशिल्प का भी आविष्कार उन्होंने ही किया था. ऋषभदेव का नाम यजुर्वेद तथा श्रीमद् भागवत में भी आया है. ईसा से लगभग 900 वर्ष पूर्व जन्मे बाइसवें तीर्थंकर अरिष्ठनेमि भी क्षत्रिय वंशज तथा कृष्ण के चचेरे भाई थे. कृष्ण के प्रयासों के फलस्वरूप ही राजकुमारी राजमती से उनका विवाह तय हुआ था. लेकिन अरिष्ठनेमि ने जब अपने विवाह में हिरन समेत अन्य निरीह प्राणियों को बलि होते देखा तो उनका मन उचट गया, उसके बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन बलि की कुप्रथा को समाप्त करने पर झोंक दिया. तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ भी अहिंसा पर जोर देते थे. एक किवदंति के अनुसार उन्होंने एक सर्प की उस समय प्राणरक्षा की थी, जब ब्राह्मण उस वृक्ष को जहां वह रहता था, जला देने का प्रयास कर रहे थे. उनका विवाह एक राजकुमारी के साथ हुआ था. तीस वर्ष तक सुखी गृहस्थ का जीवन जीने के बाद एक दिन उन्हें वैराग्य सूझा और अपनी समस्त संपत्ति दान देकर प्रवज्या ले ली. पार्श्वनाथ अपने शिष्यों के बीच बहुत प्रिय थे. उन्हें जैन साधुओं एवं साध्वियों को संगठित कर उन्हें संगठन का रूप देने का श्रेय दिया जाता है. उनके आदर्श ऊंचे थे. जीवन नैतिकता के उच्च मापदंडों ये युक्त एवं अनुशासित होता था.

जीवन परिचय

जैन धर्म के प्रवर्त्तक चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली के निकट कुंदपुरा नामक स्थान पर हुआ था. बुद्ध की भांति वे भी क्षत्रिय परिवार से संबंधित थे. उस समय पुरोहितों के कर्मकांड अपने शिखर पर थे. यज्ञादि अनुष्ठानों के बीच पोंगापंथी, बुद्धि के नाम पर वितंडा रचना, ज्ञान के स्थान पर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देना और तर्क की जगह तंत्रमंत्र साधना ही उस समय अध्यात्म चिंतन मान लिया जाता था. चारों ओर ब्राह्मणवाद का बोलबाला था, जो स्वयं छोटेछोटे गुटों में बंटे थे. उनके बीच ढेर सारे मतांतर थे. उनमें आपस में बहसें चलती रहती थीं. सिर्फ वर्गीय श्रेष्ठता के दावे और स्वार्थ संबंधी मुद्दों को छोड़कर दूसरा शायद की कोई ऐसा पक्ष था, जिसपर वे सभी एकमत होते हों. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटा था. राजा अन्यान्य कारणों से परस्पर लड़तेझगड़ते रहते थे. पूरी श्रमण परंपरा, जिनमें कौत्स एवं सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि जैसे विद्वान, चार्वाक दार्शनिक उनके विरोध में थे. प्रजा मन से लोकायतों और श्रमणों के साथ थी, किंतु ब्राह्मणवादी कर्मकांडों से गुजरना उसकी व्यावहारिक मजबूरी थी.

महावीर स्वामी के पिता का नाम सिद्धार्थ और मां त्रिशला थीं. पिता पाश्र्वनाथ के अनुयायी थे. त्रिशला देवी वैशाली के राजा की बहन थी. महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था. इस नामकरण के पीछे भी एक रहस्य था. बताते हैं कि जब वे गर्भ में थे, उन दिनों राजकोष में तीव्र वृद्धि हुई थी. यही उनके वर्धमान नामकरण का कारण बना. बचपन में उनका लालनपालन राजकीय वैभव के बीच हुआ. वे स्वभाव से उदार, निडर और शक्तिशाली थे. एक बार उत्तेजित हाथी की सूंड पकड़कर उसपर सवारी गांठने और दूसरी घटना में विषैले नाग को पूंछ पकड़कर एक ओर फेंक देने जैसे साहसपूर्ण कार्य दिखाने के बाद सभी उन्हें ‘महावीर’ कहने लगे थे. उनका विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ हुआ, जिनसे एक बेटी भी जन्मी. राजसी वैभव के बीच पलनेबढ़ने के बावजूद वहां का वातावरण उन्हें पसंद न था. सारे ठाठबाट, नौकरचाकर, वैभवविलास बनावटी लगने लगे. मातापिता की मृत्यु के बाद महावीर का संसार से मन उचट गया. उन्होंने संन्यास लेने का निर्णय लिया. उस समय उनकी अवस्था मात्र अठाइस वर्ष की थी. मगर अपने बड़े भाई के आग्रह पर उन्होंने दो वर्ष और परिवार के साथ बिताने के लिए सहमत हो गए.

अगले दो वर्ष महावीर ने खुद को सुखसुविधाओं से मुक्त करने का अभ्यास करते हुए बिताए. उन्होंने एकएक कर अपनी सारी वस्तुएं भिखारियों को दान कर दीं. राजकीय वैभवविलास से परे रहकर अपने मन और शरीर को तापसी जीवन के लिए तैयार करने लगे. तीस वर्ष की अवस्था तक वे अपनी समस्त धनसंपत्ति, विलासितापूर्ण साम्रगी, परिवार यहां तक कि पत्नी से भी किनारा कर चुके थे. अपने गांव कुंदपुरा में दो दिनों तक निराहार, निर्जल, मौन रहते हुए उन्होंने अपने सिर के बाल उखाड़ लिए. देह से वस्त्राभरण दूर करने के उपरांत उन्हें अद्भुत शांति की प्रतीति हुई. एकमात्र उत्तरीय को कंधों पर डाल उन्होंने गृहस्थान छोड़ने का संकल्प कर लिया. जिस समय वे प्रस्थान कर रहे थे, ठीक उसी समय एक भिखारी वहां उपस्थित हुआ. यह कहकर कि गत दो वर्षों से वे जो दान करते आ रहे हैं, उससे वह वंचित रहा है, उसने महावीर से दान की अपेक्षा की. इसपर महावीर ने कंधे पर पड़े उत्तरीय में से आधा फाड़कर उस भिखारी को थमाया और वहां से प्रस्थान कर गए.

वास्तविक ज्ञान और आत्मशांति की खोज करते हुए महावीर मोरेगा पहुंचे. वहां एक मठ के अधिपति उनके पिता के मित्र थे. मठाधीश के आग्रह पर महावीर ने वर्षाकाल को वहीं ठहरकर बिताने का निश्चय किया. ठहरने के लिए मठ की ओर से उन्हें एक झोपड़ी भी मिल गई. उससे पिछले वर्ष मोरेगा और आसपास के क्षेत्र में भयानक सूखा पड़ा था. उसकी भीषण मार से समस्त वनस्पतियां झुलस चुकी थीं. जंगली पशुपक्षियों के समक्ष भीषण खाद्यसंकट था. एक दिन आश्रम में अपेक्षाकृत हरियाली देख, भूख से व्याकुल पशुओं का रेला वहां आ धमका. मठ में रह रहे बाकी संन्यासी पशुओं को भगाने के लिए बलप्रयोग करने लगे. मगर महावीर क्षुधापीड़ित पशुओं को देख करुणा से आद्र हो गए. बजाय भगाने के लिए वे स्वयं झोपड़ी से एक ओर हो गए. भूखे पशुओं ने कुछ ही देर में सारा छप्पर साफ कर दिया. उनकी शिकायत मठाधिपति तक पहुंची. इसपर महावीर स्वामी ने आश्रम छोड़ दिया. वर्षाकाल बिताने के लिए निकटवर्ती गांवों की ओर प्रस्थान कर गए. एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते हुए महावीर स्वामी को विचित्र अनुभव हुए. उन्हें समाज को करीब से देखनेसमझने का अवसर प्राप्त हुआ. ज्ञान की खोज में वे उन ब्राह्मण साधुओं से भी मिले जिनका जीवन के नाम पर खुद को सांसारिक सुखों से दूर रखने के लिए उन्होंने अपने लिए पांच कठोर नियम बनाए. वे नियम थे: किसी अस्नेही, अनुदार व्यक्ति का आथित्य ग्रहण न करना. प्रस्तर प्रतिमा की भांति, एक ही स्थान पर देर तक अडोल खड़े रहना, शांत रहना. बिना बर्तनों के भोजन करना तथा गृहस्थों के साथ विनम्रता से पेश न आना.

पांचवा नियम कुछ विचित्र था, मगर खुद को सांसारिक सुखों से वंचित रखना, किसी भी प्रकार की श्रद्धा के अतिरेक से स्वयं को बचाए रखना ही उसका उद्देश्य था. गर्मियों में तपते मैदान में नंगे पैर एक ही स्थान पर खड़ेखड़े वे पूरी दोपहरी बिता देते थे. सर्दियों में खुले आसमान के नीचे नंगे तन रहकर शीतमार झेल जाते. रास्ता चलते हुए एकएक कदम बहुत सावधानी से रखते, ताकि निरीह जीवों की हत्या न हो. सायं होने पर वे सुनसान खंडहर, शमशान घाट, वन, उपवन अथवा जहां भी एकांत मिलता ठहर जाते. मन सृष्टि के रहस्यों की अन्वीक्षा में लीन रहता. भोजन वे बहुत कम करते. भिक्षा भी सिर्फ उतनी ही लेते, जितने से न्यूनतम भोजन की जरूरत पूरी हो सके. भीख वे मांगते नहीं थे. बस घर के सामने से मूक गुजर जाते. उस समय यदि गृहस्वामी बुलाकर स्वेच्छा से कुछ देना चाहता, तो चुपचाप रख लेते. नहीं तो आगे बढ़ जाते. कई बार तो पूरा गांव पार हो जाता. उस अवस्था में उन्हें निराहार रहना पड़ता था. निराहार रहने का उन्हें अभ्यास था. वे लंबेलंबे उपवास रखते. कभीकभी तो पूरा महीना ही निराहार रहकर बिता देते. भोजन करते समय भी यदि कोई भिखारी, पशुप्राणी भोजन की चाहत में सामने पड़ जाता तो अपना भोजन उसको सौंप, निर्लिप्त भाव से आगे प्रस्थान कर जाते थे.

उन दिनों देश छोटेछोटे राज्यों में बंटा हुआ था. राजाओं के बीच युद्ध और संघर्ष चलते ही रहते थे. शीतयुद्ध की स्थिति बनना तो सामान्य बात थी. महावीर स्वामी को यहां से वहां भटकते देख कुछ लोग उनपर संदेह करते. उन्हें दुश्मन देश का जासूस समझकर पकड़ लिया जाता. कुछ लोग उनपर संदेह भी करते. एक बार बंगाल में चोरेगा नामक स्थान पर राजा के जासूसों ने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया. एक अन्य अवसर पर रस्सी से बांधकर उनकी पिटाई की गई. वहां से छूटे तो कुइया नामक स्थान पर एक बार फिर जासूसों के चक्कर में फंस गए. उस समय उनके सहयोगी और समर्थक गोसला उनके साथ थे. अंततः राजकर्मियों की गलतफहमी दूर हुई और क्षमायाचना करते हुए उन्हें छोड़ दिया गया. उस घटना के बाद लोग महावीर स्वामी को जानने लगे थे. अपने सहयोगी गोसला के साथ वे पांच वर्ष तक सत्य की खोज में यहां से वहां भटकते रहे. छठे वर्ष में गोसला उनसे अलग हुए. मगर यह अभिन्नता मात्र छह महीने ही रह पाई. अवधि बीतते ही गोसला वापस लौट आए. तत्पश्चात वे चार वर्ष और महावीर स्वामी के साथ रहे. बाद में उन्होंने स्वयं को आजीवक संप्रदाय का प्रवत्र्तक घोषित कर दिया.

महावीर वैशाली लौट गए. उस समय वहां का अधिपति शंख था. जंगल में यहां से वहां भटकते हुए उनक वस्त्र जर्जर हो चुके थे. मगर उन्हें अपनी देह तक सुध न थी. जिस समय वे वैशाली से गुजर रहे थे, कुछ शैतान बच्चों ने उन्हें घेर लिया. वे उन्हें परेशान करने लगे. शंख के प्रयास से ही महावीर स्वामी मुक्त हो सके. बोध की तलाश में यहां से वहां भटकते हुए उन्हें बारह वर्ष बीत गए. अंततः उन्हें सफलता मिली. आत्मबोध हुआ. इस बीच घोर साधना में उनका शरीर सूखकर कांटा हो चुका था. देह के वस्त्र तारतार होकर लटक चुके थे. मगर आत्मलीन महावीर को उसकी सुध ही नहीं थी. आत्मबोध के आनंद में वे एक ही स्थान पर बिना हिलेडुले छह महीने तक लगातार बैठे रहे. मगर उनकी वह साधना सफल न हो सकी. उनकी पत्नी उन्हें खोजती हुई वहां आ पहुंचीं. इसे अपनी साधना में विघ्न मानकर वे प्रायश्चित में डूब गए.

धीरेधीरे एक वर्ष और बीत गया. महावीर ने उपवास साधा हुआ था. निर्जल रहते हुए ढाई दिन बीत चुका था. वे मौन साधनारत थे कि अचानक उन्हें निर्वाण की अनुभूति हुई. महावीर स्वामी ने उस अवस्था को कैवल्य कहा है, विदेह हो जाने की उच्चतम स्थिति जब शरीर में रहते हुए भी शरीर का बोध, उसकी सीमाएं समाप्त हो जाता है. व्यक्ति परमज्ञान की अवस्था में होता है. निर्वाण प्राप्ति के उपरांत महावीर स्वामी ने पहला उपदेश दिया. उनके आत्मबोध की प्रथम अनुभूति का विवरण मज्झिम निकाय में है—‘मुझे सबकुछ समझ आ रहा है, मैं सबकुछ पूरी तरह साफसाफ देख रहा हूं. मुझे पवित्र आत्मज्ञान की प्रतीति हो चुकी है. अब चाहे मैं चलता रहूं अथवा एक ही स्थान पर स्थिर होकर खड़ा रहूं. चाहे सो जाऊं अथवा जागता रहूं, परमज्ञान और उसकी अंतरानुभूति प्रतिपल मेरे साथ है…’

उच्चतम ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने लिजुवेलिया नदी के तट पर धार्मिक सभा को संबोधित किया. यह उनका पहला जनसंबोधन था. मगर पहला प्रभाव बहुत कम रहा. वहां से वे महसाणा के लिए प्रस्थान कर गए. रास्ते में उनकी ब्राह्मणों के एक दल से भेंट हुई जो आत्मबलिदान करने जा रहे थे. उनकी संख्या ग्यारह थी. उन्होंने संस्कृत में बोलने की परंपरा को तोड़ा था, यही उनका अपराध था, जिसके प्रायश्चित के लिए उन्हें आत्मबलिदान करना था. भाषा तो संवादवहन का माध्यम होती है. इसके बावजूद भाषाविशेष के प्रति इतना दुराग्रह. महावीर को यह बहुत विचित्र जान पड़ा. उन्होंने उन्हें अर्धमागधी भाषा में उपदेश दिया, जिससे प्रभावित होकर सभी उनके शिष्य बन गए. यह उनकी ब्राह्मणवाद पर पहली विजय थी. जैन दर्शन के प्रथम ग्रंथ अर्धमागधी भाषा में ही लिखे गए हैं.

इस घटना के बाद महावीर स्वामी का यश चतुर्दिक फैलने लगा. लोग उन्हें सिद्ध पुरुष मानने लगे. इंद्रभूति गौतम नाम के एक ब्राह्मण के कानों में जब उनकी ख्याति पहुंची तो वह ईष्र्या से भर उठा और उनसे मिलने के लिए चल दिया. उस समय महावीर स्वामी एक बाग में ठहरे हुए थे. जैसे ही इंद्रभूति बाग तक पहुंचा, महावीर स्वामी ने अपनी अंतर्दृष्टि से उसको पहचान लिया. उन्होंने उसका स्वागत करते हुए कहा—

आइए गौतम! मैं जानता हूं कि इस समय आपके मस्तिष्क में आत्मा की सत्ता को लेकर संदेह है. हम उसपर चर्चा कर सकते हैं.’

उसके पश्चात स्वामी महावीर ने उन्हें उपदेश दिया. भारतीय दर्शन में आत्मा की उपस्थिति को लेकर जो विशद चिंतन किया गया है, उसका संदर्भ लेते हुए उन्होंने आत्मतत्व की विवेचना की. इंद्रभूति उनका प्रवचन सुनकर अभिभूत हो गया. उसी दिन उसने महावीर स्वामी का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया. यह सूचना जैसे ही इंद्रभूति के बड़े भाई अग्निभूति तक पहुंची, वह उद्धिग्न हो उठा. अग्निभूति शास्त्रज्ञ पंडित था. अपने तत्वचिंतन पर उसे बड़ा गुमान था. भाई द्वारा महावीर स्वामी का शिष्यत्व ग्रहण करना उसको सहन न हुआ. सूचना मिलते ही वह उनसे शास्त्रार्थ करने के लिए चल पड़ा. उसने कर्म की वास्तविकता और आत्मा से उसके संबंध को लेकर महावीर स्वामी के समक्ष कई प्रश्न किए, जिनका उन्होंने तथ्यपरक उत्तर दिया. अग्निभूति उनका ज्ञान देख प्रभावित हुआ और अपने छोटे भाई की भांति वह भी उनका शिष्य बन गया. तत्पश्चात एक के बाद एक नौ विद्वान महावीर स्वामी से शास्त्रार्थ पहुंचे और परास्त होकर उनके शिष्य बन गए. उनके शिष्यों की संख्या बढ़कर ग्यारह हो गई. जैन पंरपरा के अनुसार ग्यारह शिष्य अपने साथ अपने अनुयायियों को भी लाए थे, जिनको मिलाकर महावीर के शिष्यों की कुल संख्या 4400 तक पहुंच गई.

कुछ दिनों के बाद अपने शिष्यों के साथ महावीर स्वामी वहां से प्रथान कर गए. रास्ते में न कोई प्रवचन न सभा. उनकी मौन यात्रा 66 दिन तक चलती रही. लगातार चलते हुए वे राजगृह पहुंचे, जो उस समय के शक्तिशाली राज्य मगध की राजधानी था. उस समय बिंबसार वहां का सम्राट था. महावीर स्वामी द्वारा प्रवत्तित नए धर्म को लेकर सम्राट बिंबसार ने उनसे अनेक प्रश्न किए. जिनका उन्होंने संतोषजनक उत्तर दिया. इंद्रभूति ने महावीर स्वामी का शिष्यत्व अवश्य ग्रहण किया था. मगर अपनी विद्वता पर उसको अब भी बड़ा घमंड था. मगध प्रवास के दौरान ही एक वृद्ध व्यक्ति अपनी शंकाएं लेकर महावीर स्वामी के सामने पहुंचा. उसने संस्कृत में एक श्लोक पढ़कर उसकी विवेचना का अनुरोध किया. महावीर उस समय मौन अवस्था में थे. तब आगंतुक ने अपनी जिज्ञासा इंद्रभूति के समक्ष प्रकट की. मगर इंद्रभूति अपने उत्तर से वृद्ध को संतुष्ट न कर सका. वहां उपस्थित अन्य विद्वानों को भी उसकी व्याख्या आधीअधूरी जान पड़ी. उस समय तक महावीर स्वामी का मौनव्रत पूरा हो चुका था. उन्होंने वृद्ध का प्रश्न सुनकर उसकी शास्त्रसम्मत व्याख्या की. उससे वृद्ध संतुष्ट हो गया. यह देख इंद्रभूति का रहासहा दंभ भी जाता रहा.

जैन दर्शन को आरंभिक पहचान मिलने के साथ उसके अनुयायियों को संगठित करना भी अत्यावश्यक था. उन्होंने कुल शिष्यों को भिक्षु, साध्वी, गृहस्वामी और गृहस्वामिनी नामक चार वर्गों में विभाजित किया. धर्म में अनुशासन एवं नैतिकता के स्तर को बनाए रखने के लिए पांच व्रत साधने होते थे. ये हैं: अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह तथा पवित्रता. इनमें से प्रथम चार पाश्र्वनाथ के विचारों से अनुप्रेरित थे. राजगृह में वर्षाकाल व्यतीत करने के उपरांत महावीर ने वैशाली के लिए प्रस्थान कर दिया. वहां उन्होंने अपनी पुत्री और दामाद जामाली को धर्माेपदेश दिया. इसी दौरान उन्हें पूर्वाभास हुआ कि सम्राट रुद्रायण उनसे मिलना चाहते हैं, वे सिंधुसौवीर स्थित उनकी राजधानी पहुंचे. रुद्रायण महावीर के विचारों से प्रभावित होकर जैनश्रमण बन गया. सिंधुसौवीर से वापसी का रास्ता बहुत कठिनाइयोंभरा था. रास्ते में लंबा रेगिस्तान पड़ता था. भिक्षुदल के साथ उस रास्ते से गुजरते हुए महावीर को भोजन एवं पानी की समस्या का सामना करना पड़ा. किंतु कठिन साधना की अभ्यस्त हो चुकी देह ऐसी भीषण चुनौतियों से भी निकलना जानती थी. वहां से वे अपनी छोटीसी शिष्य मंडली के साथ वाराणसी पहुंचे, जिसे वैदिक परंपरा में पवित्र नगरी माना जाता था. वाराणसी में उन्होंने एक अरबपति सेठ को अपना शिष्य बनाया और फिर राजगृह के लिए प्रस्थान कर गए, जहां उन्होंने दो वर्षाकाल बिताए. इस अवधि में उन्होंने युवराज और उनके 25 भाईबहनों को जैन धर्म की दीक्षा दी. महावीर स्वामी का यशकीर्ति लगातार बढ़ती ही जा रही थी. उनसे प्रभावित होकर अनेक लोग मिलने आते और श्रमण परंपरा में सम्मिलित होते जाते थे. इस बीच वैदिक ब्राह्मणों से भी शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें उन्होंने अपनी विद्वता से सभी को प्रभावित किया. जैन मत ब्राह्मणपंथ के लिए लगातार चुनौती बनता जा रहा था.

मगध प्रवास के दौरान ही उन्हें कोशांबी सम्राट का निमंत्रण मिला. वहां पहुंचकर उन्होंने सम्राट प्रद्योत तथा अनेक साम्राज्ञियों को जैनमत की दीक्षा दी. उस वर्ष का वर्षाकाल उन्होंने वैशाली में व्यतीत किया. चातुर्मास पूरे होते ही वे मगध वापस लौट गए. राजगृह में उन्होंने फिर सैकड़ों श्रद्धालुओं को श्रमणपरंपरा में सम्मिलित किया. इस बीच अजातशत्रु ने मगध पर आक्रमण कर उसपर अधिपत्य जमा लिया. राजनीतिक उथलपुथल से स्वयं के दूर रखते हुए उन्होंने राजगृह छोड़ दिया. वहां से वे चंपा पहुंचे, वहां उन्होंने राजकुमार सहित अनेक नगरवासियों को जैन धर्म में सम्मिलित किया. मगधसम्राट अजातशत्रु महावीर स्वामी का सम्मान करता था. किंतु यह आस्था उसकी साम्राज्यवादी भावनाओं पर नियंत्रण करने में अपर्याप्त थी. उसने भारी संख्याबल के साथ वैशाली गणतंत्र पर आक्रमण कर दिया. भीषण युद्ध में सम्राट चेतक की मृत्यु के बाद वैशाली पर मगध के कब्जे में आ गई. युद्ध में हुए भारी नरसंहार ने महावीर स्वामी को आहत कर दिया. उन्होंने स्वयं को एकांत तपश्चर्या में लीन कर दिया. अंततः 72 वर्ष की अवस्था में उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई. संयोग देखिए कि महावीर स्वामी के मृत्यु के अगले ही दिन उनका पहला शिष्य इंद्रभूति गौतम भी निर्वाण प्राप्त हो गया. मगर उस समय तक लाखों श्रद्धालु जैन धर्म को अपना चुके थे.

 

जैनदर्शन परदुःखकातरता और करुणा पर केंद्रित दर्शन है. इसमें व्यक्तिगत संपत्ति की भावना का निषेध किया गया है. गृहस्थों के लिए तो संपत्तिसंबंधी मान्यताओं में फिर भी किंचित छूट है. किंतु जैन तापसों के लिए तो देह पर वस्त्र धारण करना भी विलासिता की श्रेणी में आता है. यह मान लिया जाता है कि शरीर ढकने के लिए वस्त्र का लालच भी मोक्ष प्राप्ति की अवधि को लंबा खींचने का काम करता है. जैन दर्शन में आवश्यकता से अधिक संचय को पाप माना गया है. समझा गया है कि यह भी एक प्रकार की हिंसा है. जैन दर्शन का संपत्ति संबंधी अवधारणा समाजवादी विचारधारा से मेल खाती है. समाजवाद भी हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुरूप देने का आश्वासन देता है. वहां संपत्ति कल्याणकारी राज्य के अधीन सुरक्षित मानी जाती है, जिसका उपयोग नागरिकों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर व्यापक लोककल्याण की कामना के निमित्त किया जाता है. जैनमत के संपत्तिसंबंधी सिद्धांत और समाजवाद में महज इतना अंतर है कि समाजवाद राजनीतिकसंवैधानिक व्यवस्था है. जबकि जैन दर्शन नैतिक आचरण है. वह त्याग और सर्वकल्याण की भावना पर टिका है. यह आत्मानुशासन के बिना संभव नहीं. समाजवाद में अनुशासन के लिए राजनीति की मदद ली जाती है. जोकि बाहरी और खर्चीला उपक्रम है. उसकी अपेक्षा अपरिग्रह नैतिकता की जमीन पर खड़ा होता है. जाहिर है कि यह उच्च मानवादर्श है.

जैनमत में लोकतांत्रिक समाजवाद का एक अन्य रूप ‘स्याद्वाद’ के रूप में भी मिलता है. जैन मतावलंबियों की विशेषता यह है कि वे किसी भी कोटि के दुराग्रह का संपूर्ण निषेध करते हैं. अपनी बात दूसरों से बलात् मनवाना या केवल अपने ही मत को अंतिम सत्य मानना हठधर्मी, एक प्रकार की वैचारिक हिंसा है. इसलिए वहां अहिंसा पर इतना जोर दिया गया है. जैनमत के अनुसार किसी भी जीव की हत्या करना तो पाप है ही, विचारों की हिंसा भी वहां सर्वथा वज्र्य है. इसलिए कि विचार भी जीवात्मा की देन, उसकी विशेषता हैं. वैचारिक सहिष्णुता, विरोधों को आत्मसात करने की यह प्रवृत्ति जैन मत में स्याद्वाद के सिद्धांत के उद्भव का कारण बनी. ‘स्याद्वाद’ जैनदर्शन का सर्वाधिक मौलिक एवं वैज्ञानिकता पर आधारित विचार है. इसके अनुसार किसी भी वस्तु अथवा विचार के बारे में जो कहा जाता है, वह अनेक संभावनाओं से युक्त होता है. सत्य कई रूपों में प्रकट होता है.

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए हाथी और छह अंधों की कहानी का उदाहरण देते हैं. कहानी के छह अंधों को हाथी के सामने खड़ा कर उसकी शरीर रचना के बारे में बताने को कहा जाता है. जिस अंधे ने हाथी के कान का स्पर्श किया था, उसके अनुसार हाथी की देह पंखे के समान है. दूसरा जो हाथी की सूंड का स्पर्श करता है, वह हाथी को मोटी बेल जैसा बताता है. तीसरा अंधा जो हाथी के पैर का स्पर्श करता है, वह उसकी रचना को खंबेनुमा कहकर अपने अनुभव का बखान करता है. वे सभी अपनी जगह सही है. सभी सच्चे हैं. मगर उनका सत्य आंशिक और परिस्थितिजन्य है, जो उनकी सीमा को दर्शाता है. उन छह के अलावा एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति भी है. हाथी की वास्तविक देहरचना के बारे में केवल वही जानता है. ज्ञान की स्थिति केवल प्रज्ञावान को ही संभव है. यही निर्वाण की अवस्था भी है, जब कोई तापस सृष्टि के वास्तविक रहस्य को जान चुका होता है. जैनमत मानता है कि साधारण व्यक्ति की ऐंद्रियानुभूति सीमित होती है. इसलिए उसका बोध भी सीमित होता है. मगर वह गलत नहीं है. अंधों की कहानी में यदि उन सभी के अनुभवों को परस्पर मिला दिया जाए तो हाथी की संपूर्ण रचना सामने आ सकती है. यही लोकतंत्र में होता है, जो समाजवादी व्यवस्था की धुरी है. वहां अनेक नागरिक मिलकर अपने विकास के लिए उपयुक्त व्यवस्था का चयन करते हैं.

जैनदर्शन की सृष्टि संबंधी व्याख्या आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से मेल खाती है. उसके अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का कारण छोटेछोट पुद्गलों को माना है. ये पुद्गल परस्पर मिलकर अणु बनाते हैं. अणुओं के संयोग से संसार की विभिन्न वस्तुओं, जड़चेतनादि की उत्पत्ति होती है. जड़चेतन में पुद्गलों की उपस्थिति उसे जीवनमय बनाती है. जैन दर्शन का पुद्गल का विचार कणाद मुनि के वैशेषिक दर्शन से मेल खाता है. पुद्गल की तुलना हम परमाणुवाद के साथ के आधुनिक सिद्धांत से भी कर सकते हैं. यह भी विज्ञानप्रमाणित है कि दो परमाणु परस्पर मिलकर एक अणु की रचना करते हैं, जो सृष्टि के समस्त पदार्थों की उत्पत्ति का कारण है. लेकिन पुद्गल परमाणु नहीं है. परमाणु में जीवन है, वैज्ञानिक ऐसा कोई दावा नहीं करते. वे परमाणु की गति का आकलन कर सकते हैं. परमाणु में अंतनिर्हित ऊर्जा की खोज भी की जा चुकी है. वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार परमाणु जड़चेतन से परे लघुत्तम कण है, जो संसार की प्रत्येक वस्तु, जड़ और चेतन दोनों की व्युत्पत्ति का कारण है. इससे भिन्न पुद्गल चेतनामय इकाई, जीवन का लघुत्तम रूप है. तदुनुसार यह समस्त संसार छोटेछोट पुद्गलों से मिलकर बना है. अतएव जैन दर्शन के अनुसार दृश्यमान जगत के कणकण में जीवन है. उनका सम्मान करना जीवन का सम्मान करना है.

जैन शब्द ‘जिन’ धातु से बना है. यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों को अधीन कर लिया हो. इंद्रियनिग्रह के लिए अपरिग्रह अस्तेय, अहिंसा, सत्य आदि की कसौटियां बनाई र्गइं. जिनका अर्थ है, जरूरत से अधिक संचय न करना. चोरी न करना. दूसरे के धन की लालसा न रखना. हिंसा का पूर्ण निषेध और सत्याचरण. यही सिद्धांत बौद्ध धर्म के भी थे. आशय यह है कि नैतिक मान्यताओं को लेकर जैन और बौद्ध धर्म एक ही कोटि के माने जा सकते हैं. इसलिए कुछ विद्वानों ने जैनधर्म को बौद्ध धर्म की ही एक शाखा माना है. हालांकि कुछ मायने में दोनों में अंतर भी है. बौद्ध दर्शन व्यावहारिक बोध को महत्त्व देता है. वह जीवन की उपेक्षा करने के बजाय, उसको संयमित ढंग से जीने पर विश्वास रखता है. ऐसा जीवन जो अपने और दूसरों के लिए समानरूप से सुखकारी हो. इसलिए जैनदर्शन का अतिअनुशासन भी वहां वज्र्य है. कामनाओं से भागने से उनसे बच पाना संभव नहीं. वे पीछा करती हैं. उनसे मुक्ति का एक ही उपाय है, कामनाओं के बीच रहकर उनसे मुक्ति. मन को साधना. यह आसान नहीं है. लेकिन अभ्यास से इसको साधा जा सकता है. इसके लिए बुद्ध ने अष्ठांग योग का विचार दुनिया के सामने रखा था. मगर उनका अष्ठांग योग भी व्यावहारिक है. वह मनुष्य की पहुंच में है. जबकि जैन मत का अहिंसा का सिद्धांत और अन्य धार्मिक अनुशासन बहुत कड़े हैं. यही कारण है कि जैन धर्मदर्शन जनसाधारण के बीच अपनी जगह बनाने में असमर्थ रहा था.

बोधि वृक्ष के नीचे साधना करते समय बुद्ध को समझ आया था कि जीवन वीणा के तारों की तरह भांति है. ढीला छोड़ने पर सुर नहीं निकलते. अधिक कसने पर तार टूट भी सकते हैं. इसलिए उन्होंने मध्यम मार्ग को अपनाने का आग्रह किया था. लेकिन अहिंसा जैसे विषय को लेकर जैन मत व्यावहारिकता की सीमा तक प्रतिबद्ध है. वहां अपरिग्रह पर इतना आशय है कि शरीर पर वस्त्र धारण करना भी मोक्ष की राह में बाधक माना गया है. बौद्ध धर्म की अहिंसा के सिद्धांत को उसकी तत्व विवेचना के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है. जैन दर्शन सम्यक व्यवहार, सम्यक बोध, तथा सम्यक आचरण पर जोर देता है.

जैन दर्शन एक भौतिकवादी दर्शन है. वह संसार की सत्ता को नकारता नहीं है. बल्कि उसकी वास्तविकता को स्वीकारते हुए कतिपय वैज्ञानिक आधार पर उसकी व्याख्या करता है. जीवनमूल्यों को वरीयता देते हुए वह मनुष्य को अपनी चिंताओं के केंद्र में रखता है. उसकी आचारसंहिता तीन प्रमुख सिद्धांतों पर टिकी है. जैन दर्शन को यदि श्रेष्ठ विचारों की एक माला स्वीकारा जाए तो इन तीन सिद्धांतों को उसके माणिकमुक्ता समझा जाता है, जिनपर माला की समस्त सुंदरता निर्भर करती है. ये हैं—सम्यक आचरण, सम्यक कर्तव्य एवं सम्यक बोध. सम्यक आचरण से अभिप्राय सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के साथ भेदभाव रहित दयालुतापूर्ण व्यवहार से है. हर प्राणी में एक ही जीवात्मा है, इसलिए उसका सम्मान. सभी के साथ एक समान व्यवहार. सम्यक बोध मानव चेतना के विकास के पांच स्तरों को दर्शाता है. वे हैं अध्ययन, साधना, सिद्धि एवं कैवल्य. सम्यक कर्तव्य आत्मानुशासन, निश्छल व्यवहार, सदाशयता को दर्शाता है. यह मानवेंद्रियों को विचलन से बचाकर उन्हें साधना पथ पर अग्रसर करने से संभव है. वह उपदेश से अधिक आत्मनियंत्रण पर जोर देता है. जैनग्रंथ ‘उत्तरध्यान’ में आत्मानुशासन की आवश्यकता पर लिखा गया है—

खुद को जीतो

इसलिए कि आत्मविजय सबसे बड़ी साधना है

यदि तुम स्वयं को जीत लेते हो

तो संसार में रहकर भी बनोगे अनिवर्चनीय आनंद के भागी

उससे भी श्रेष्ठ है

इससे पहले कि दुनिया के प्रलोभन और मायावी शक्तियां

मेरी इंद्रियों को अपने जाल में फंसा लें

मुझे भटकाएं

प्रताड़ित करें

आत्मनुशासन एवं प्रायश्चित द्वारा खुद को जीतकर

आत्मविजयी बनना.

इन सिद्धांतों की तुलना हम बौद्ध धर्म के अष्ठांग योग से कर सकते हैं. महावीर स्वामी का जन्म बुद्ध से पहले हुआ था. मगर दोनों में अधिक अंतर नहीं है. दोनों का कार्यक्षेत्र भी भारत का पूर्वी क्षेत्र है. हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि जिन दिनों महात्मा बुद्ध ने संन्यास के लिए घर छोड़ा था, उन दिनों देशभर में महावीर स्वामी के विचारों की धूम मची होगी. कर्मकांड और यज्ञ के नाम पर होने वाली जीवहत्या से उकताए हुए लोग जैन धर्म में दीक्षित हो रहे थे. उनमें हर वर्ग के लोग सम्मिलित थे. वैशाली जैसे गणराज्य जिसके महात्मा बुद्ध प्रशंसक थे, के शासक भी भी जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर चुके थे. आचार्य वर्षकार जब वैशाली पर आक्रमण से पहले बुद्ध से परामर्श लेने पहुंचते हैं तो बुद्ध वैशाली गणराज्य की मिलजुलकर निर्णय लेने की गणतांत्रिक प्रणाली की प्रशंसा करते हुए वैशाली को अजेय घोषित करते हैं.

सम्यक आचरण मनुष्य के मानवीय स्वरूप को बनाए रखने की कला है. प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक ही जीवात्मा है. स्त्रीपुरुष सभी एक समान हैं. इसलिए मनुष्य का पहला धर्म है कि वह सभी के साथ एक जैसा आचरण करे. बिना किसी पक्षपात, वगैर किसी स्वार्थलिप्सा के सबके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करते हुए प्राणीमात्र के कल्याण के निमित्त समर्पित हो. दूसरों के साथ वही व्यवहार करो, जैसा उनसे अपने प्रति अपेक्षित है. संसार में रहकर भी उसके प्रलोभन से विरक्ति. देह में रहकर भी विदेहत्व की साधना. मुक्ति का साक्षात अनुभव. वौद्धदर्शन की भांति जैन दर्शन भी वेदों को प्रामाण्य नहीं मानता. उसके स्थान पर वह व्यक्ति की सत्ता को सर्वोच्च ठहराता है. नैतिक आचरण पर जोर देता है.

संसाधनों के न्यायिक बंटवारे और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार देना ही समाजवादी व्यवस्था का प्रमुख ध्येय है. यह कार्य वह राज्य की नियामक शक्ति की मदद से करती है. राज्य भी व्यक्तियों से परे नहीं है. वह नागरिकों की सहमति और अनुशंसा के आधार पर बनी संस्था है. अंधों की कहानी में जैसे किसी एक अंधे की राय का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन जब उन सबके अनुभवों को मिला दिया जाता है, तो उससे वही विंब बनता है, जो एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति की चेतना में बनता है. राज्य भी अपने नागरिकों की संस्तुति के आधार पर बनी संस्था है, जो एक नियामक संस्था सत्ता का रूप ग्रहण कर लेती है. कह सकते हैं कि जैन दर्शन की नैतिक मान्यताएं समाजवाद की मूल आस्था के अनुकूल हैं. हालांकि इसकी कड़ी अनुशासनव्यवस्था, इसको जनसाधारण के लिए असहज बनाती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

प्रागैतिहासिक भारत में व्यापार एवं शिल्पकार-संगठन

सामान्य

इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि सभ्यता के लंबे विकास-क्रम में व्यापार निरंतर तरक्की करता जा रहा था. लोगों की आवश्यकताएं भी बढ़ रही थीं. इसलिए यह संभव नहीं रह गया था कि एक ही स्थान पर मनुष्य की जरूरत की समस्त वस्तुओं का उत्पादन संभव हो सके. कच्चे माल एवं दक्ष शिल्पकारों की उपलब्धता के अतिरिक्त बाजार भी एक बड़ा कारण था, जिससे लोगों ने संगठित व्यापार की आवश्यकता को समझा. आगे चलकर यही संगठन राज्य के विकास की धुरी बनकर उभरे. प्रकारांतर में इसी वर्ग ने बड़े व्यापारी समूहों को जन्म दिया था. लेकिन ये संगठन उन अर्थों में व्यावसायिक एवं स्पर्धी नहीं थे, जिस प्रकार हम आजकल के व्यापारिक समूहों को देखते हैं. वे दरअसल शिल्पियों और कलाकारों के अन्योन्याश्रित व्यावसायिक समूह थे, जिनके पीछे संसाधनों के सम्मिलित प्रयोग द्वारा परस्पर कल्याण की भावना निहित थी. बाजार से जुड़ने की कवायद के पीछे शिल्पियों और कारीगरों की अपने शिल्प-कौशल एवं व्यापार को देश-देशांतर तक फैलाने की महत्त्वाकांक्षा भी थी. व्यापारी वर्ग के ऐसे प्रयासों को राज्य का पूरा समर्थन प्राप्त होता था. समाज में भी उनका महत्त्व बढ़ता जा रहा था.
उत्तरोत्तर व्यापार-वृद्धि ने लोगों की जरूरतों को विस्तार किया था. साथ में बढ़ती जा रही थी व्यापारी वर्ग की संख्या भी. इस कारण व्यापारिक यात्राओं में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी. उन दिनों कच्चे रास्तों एवं यातायात के साधनों की अत्यल्पता के चलते यात्रा कर पाना आसान नहीं था. ऊपर से चोर-डकैतों का भय भी बना रहता था. हालांकि राज्य का दायित्व था कि वह व्यापारियों समेत अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा की पक्की व्यवस्था करे. आततायियों को दंड देकर यातायात को सुगम बनाए. राजा की ओर से इस तरह के प्रयास भी होते थे, किंतु प्रत्येक राजा की सीमाएं भी थीं. किसी भी राजा को अपने व्यापारियों की सुरक्षा के लिए उनमें से प्रत्येक को सुरक्षा दे पाना संभव ही नहीं था. निश्चित रूप से इसके पीछे कुछ भौतिक कारण भी थे. अतएव संकट के समय साथ देने के लिए लोग अपने साथियों, सहधर्मियों के साथ निकल पड़ते थे. ग्राहकों को उनकी पसंद के अनुसार विभिन्न गुणवत्ता का माल एक ही समय में उपलब्ध कराने तथा अधिक लाभ के लिए थोक में सस्ती खरीदारी करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक पूंजी की आवश्यकता पड़ती थी. इसलिए कुछ ऐसे भी संगठन बने जो केवल पूंजी का ही व्यापार करते थे, जिनका कार्य व्यापारियों को ब्याज पर ऋण प्रदान करना था. उस समय बोध हुआ कि पूंजी का प्रबंधन भी एक विशिष्ट कला है. इसलिए व्यापार की सफलता के लिए पूंजी के व्यवहार एवं प्रबंधन की महत्ता बढ़ती चली गई.
कालांतर में पूंजी का प्रबंध करने के लिए भी स्वतंत्र संगठन बने जो उस समय की अर्थव्यवस्था का खास हिस्सा थे. चूंकि व्यवसाय में धन लगाने वाला कोई भी व्यापारी, निश्चित मुनाफे के साथ अपने धन की वापसी चाहता था. वह इस बात की गारंटी भी चाहता था कि उसके द्वारा लगाया जाने वाला धन पूरी तरह सुरक्षित है तथा धोखादड़ी की संभावना न्यूनतम है. निवेशकों में यह विश्वास जगाए रखने के लिए आवश्यक था कि व्यापार के नियम सुस्पष्ट एवं सामाजिक रूप से मान्य हों. इसके लिए लिखित आचार संहिता बनाने का कार्य भी उत्तर वैदिक काल में शुरू हो चुुका था. विष्णुगुप्त चाणक्य, याज्ञवल्क्य, शुक्राचार्य आदि ने अर्थशास्त्र की नीतिगत व्याख्या के लिए ग्रंथों की रचना की, जिनमें चाणक्य रचित ‘अर्थशास्त्र’ इस विषय की प्रतिनिधि रचना है. इन पुस्तकों में उस समय के व्यापार तथा राजनीति के संबंधों की गहन विवेचना की गई है. इनके द्वारा यह संकेत मिलता है कि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत वैदिककाल में ही हो चुकी थी, महाकाव्यकाल में उनका विस्तार हुआ. उत्तरवैदिक काल तथा वौद्ध काल में वे देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बन चुकी थीं. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. हालांकि उनका स्वरूप देशकाल के अनुसार परिवर्तनशील था. लेकिन उन सभी का प्रमुख लक्ष्य था अपने समूह के आर्थिक विकास के लिए संगठित कार्य करना. उत्तरोत्तर सुगम होते यातायात वस्तुओं की लगातार बढ़ती मांग ने उन्हें और अधिक मजबूत और ज्यादा महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक बनाया था. उपर्युक्त आधार पर कहा जा सकता है कि—
‘सहकारिता का उद्भव उस समय की घटना है, जब व्यापार के साथ-साथ वस्तुओं की मांग में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी, जिस समय उद्योग-स्वामियों तथा उनके प्रबंधकों के व्यवहार एवं कार्यकलापों पंर निवेशकों, उपभोक्ताओं तथा आम जनता द्वारा नजर रखने की प्रविधि का विकास हो चुका था. लोक परिवीक्षण एवं अवलोकन की घटनाओं ने उद्यमों के सांगठनिक स्वरूप को मजबूत एवं कार्यक्षम बनाने का काम भी किया था. हालांकि इससे उत्पादन लागत में भी वृद्धि हुई थी. क्योंकि सांगठनिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए प्रशासन संबंधी खर्चों की अतिरिक्त रूप से आवश्यकता थी. इससे लोगों में सहकार के प्रति आग्रहशीलता का विकास हुआ, तथापि सहकारिता को बढ़ावा देने वाले केवल यही कारण नहीं थे. इनके अतिरिक्त संपत्ति, संविदा कानून जैसे कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारक थे, जिन्होंने सहकारिता के विकास के लिए उसके प्रवर्तक एवं उन्नायक का कार्य किया था.’1
वेदों-उपनिषदों से लेकर स्मृतियों, पुराणों आदि ग्रंथों में सामूहिक उद्यमों की चर्चाएं हमारे पूर्वज जिस तरह से करते आए हैं, इससे भी साफ होता है कि वे अर्थव्यवस्था के इस कल्याणकारी स्वरूप से न केवल भली-भांति परिचित, बल्कि इसके पोषक-प्रशंसक भी थे. इसीलिए अर्थव्यवस्था की विकासगति को बनाए रखने के लिए उन्होंने ऐसे उपक्रमों का मुक्तकंठ से समर्थन किया था, जिनमें समाज के लगभग सभी सदस्यों की सहभागिता सुनिश्चित करने की व्यवस्था थी. सहकार के रूप में यह एक आदर्श-लोकोपकारी व्यवस्था थी, जिसमें समाज का कोई भी सदस्य अपने अल्पतम संसाधनों के साथ हिस्सेदारी कर, उससे निश्चित लाभ प्राप्त कर सकता था. चूंकि निवेशक किसी भी वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय का हो सकता था, इसलिए नियम यह था कि समाज के संपूर्ण विकास के लिए उसके समस्त वर्गों का यथासंभव सहयोग प्राप्त किया जाए.

सभ्यता का आदिकालीन दौर

प्राचीन भारतीय सभ्यता जिसे कुछ लोग वैदिक सभ्यता और कुछ विद्वान सिंधु घाटी की सभ्यता भी कहते हैं, अत्यंत उर्वरा धरती पर विकसित हुई थी. उसका कालखंड विस्तृत, लगभग छह हजार वर्षों का है. वह विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक और अनेक अर्थों में उनकी अपेक्षा अधिक विकसित भी थी. उस सभ्यता के अवशेष मेरहगढ़, मोआन-जो-दारो, हड़प्पा आदि अनेक स्थानों पर बिखरे पड़े हैं. उन स्थानों के उत्खनन से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं, उनके आधार पर उस सभ्यता के बारे में सटीक कल्पना कर पाना संभव है. सिंधु नदी की उर्वरा भूमि पर पल्लवित हुई वह सभ्यता कई मायनों में अनूठी थी. वहां घर-आंगन चौड़े तथा जलनिकासी की उन्नत व्यवस्था थी. सड़कें पक्की और सीधी जाती थीं. सार्वजनिक स्नानगृह भी उस सभ्यता की प्रमुख विशेषता थे. संभवत वह पहली नागरी सभ्यता थी, जिसमें स्वच्छता और आवागमन के प्रबंधों पर इतना अधिक जोर दिया गया था. क्षेत्रफल की दृष्टि से देखा जाए तो उसका परिक्षेत्र समकालीन किसी भी सभ्यता के विस्तार के अधिक था.
सिंधु घाटी की सभ्यता के विकास के लिए जिम्मेदार आर्यगण प्राचीन वैदिक समाज से ही संबंधित थे, जो घुम्मकड़ प्रवृत्ति का था. एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकने रहने के कारण आर्य सैनिकों का अधिकांश समय युद्ध और उसकी तैयारियों में ही निकल जाता था. इससे वे जरूरत लायक अनाज का उत्पादन करने में सफल नहीं हो पाते थे. उसके लिए उन्हें युद्धों का सहारा लेना पड़ता था. युद्ध से बचे समय का उपयोग शिल्पकला के विकास के लिए किया जाता था. शिल्पकर्म के माध्यम से युद्ध के दौरान घायल-अशक्त सैनिकों का पुनर्वास भी संभव था. इस कारण शिल्पकला की उपयोगिता भी थी. परिणामस्वरूप दक्ष शिल्पकारों का समाज में सम्मान भी था. जिसके आधार पर शिल्पकला का विकास होता चला गया. भविष्य में अतिरिक्त रूप से उत्पादित माल के विपणन के लिए नए बाजारों की जरूरत महसूस की गई, उसी ने प्रकारांतर में संगठित व्यापार को बढ़ावा दिया. किरन कुमार थपल्याल के अनुसार—
‘वर्णाश्रम व्यवस्था के अंतर्गत श्रम-विभाजन की नीति ने भी संगठित व्यापार को आवश्यक बनाने, उसको विस्तृत करने का कार्य किया. तत्कालीन समय में वैश्यों के रोजगार के तीन प्रमुख साधन अर्थात कृषि, पशुधन एवं वाणिज्य के आधर पर आगे चलकर व्यापार की अनेक धाराओं का विकास हुआ.2
भारतीय सभ्यता के विकास के दौर को हम निम्नलिखित आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं: क्रमांक प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं कालखंड
1 सभ्यता का आदिकालीन दौर                       6500 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

क. सभ्यता के प्रारंभिक अवशेषः मेहरगढ, मोहनजोहदड़ो आदि 6500 ई.पू. से 3300 ई.पू तक

ख. सिंधु घाटी की सभ्यता                             3300 ई.पू. से 1900 ई.पू. तक

ग. गंगा घाटी और तराई की सभ्यता             1900 ई.पू. से 700 ई.पू. तक

2 जैन एवं बौद्ध धर्म का अभ्युदय                 700 ई.पू. से 320 ई.पू तक

3 मौर्य साम्राज्य का उद्भव एवं विकास         320 ईपू. से 185 ई.पू. तक

4 मौर्य काल के बाद का भारत                     200 ई.पू. से 1300 ई पश्चात तक

क. गुप्त साम्राज्य, भारत का स्वर्णकाल       200 ई.पू. से 550 ई. पश्चात तक

ख. हर्षबर्धन एवं राजपूत महाराजाओं का काल600 ई प. से 1100 ईसा प. तक

हड़प्पा, मोय-जो-दाड़ो तथा मेहरगढ़ की जैसी भारतीय प्रायद्वीप की प्राचीनतम सभ्यताओं के पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर यह अनुमान आसानी से लगाया जाता है कि तत्कालीन समाज कृषि-कर्म से परिचित था. उसमें शिल्पकर्म का भी पर्याप्त विकास हो चुका था. हड़प्पाकाल के लोग तो दूर-देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध भी बनाए हुए थे. अरब सागर के रास्ते से उनके काफिले मेसोपोटामिया, इजिप्ट, चीन आदि देशों तक निरंतर आते-जाते थे. उन काफिलों को आंतरिक स्पर्धा तथा किसी भी तनाव की स्थिति से बचाए रखने के लिए आवश्यक नियम बनाए गए थे.
भारतीय प्रायद्वीप में पनपी सभ्यताओं में मेहरगढ़ की सभ्यता के अवशेष उसके सर्वाधिक पुरातन होने के संकेत देते हैं. विद्वानों के अनुसार मेहरगढ़ सभ्यता, पाकिस्तान स्थिति आधुनिक क्योटा के निकट पनपी थी, जो करीब 6500 वर्ष पुरानी है. इस सभ्यता के अवशेष दर्शाते हैं कि मेहरगढ़ के प्राचीनतम वासियों को मिट्टी के बर्तन बनाने तथा उनको भट्टी में पकाने की कला में पारंगत हो चुके थे, तथा उनकी कलाकृतियों की मांग बाहर के बाजारों में भी बनी हुई थी. परिष्कृत सभ्यता के स्वामी सिंधु-सभ्यता के निवासी, धार्मिक दृष्टि से ईश्वर पर भरोसा करने वाले थे.
व्यापारिक दृष्टिकोण से भी वे किसी से पीछे नहीं थे. उनके व्यापारिक काफिले सूदूर रोम और ईरान तक की यात्रा करते रहते थे. भारतीय ग्रंथों में भी उसका उल्लेख मिलता है. यह इस भ्रम का भी उन्मूलन करती है कि भारतीय केवल आध्यात्मिक चिंतन में ही प्रवीण थे, दुनियादारी की बाकी बातों की तरफ उनका रुझान ही नहीं था. वस्तुतः श्रेणी के माध्यम से समूह के आर्थिक विकास तथा उसके द्वारा सामाजिक कल्याण की जो विशद् परिकल्पना की गई थी, वह भारतीय मनीषियों की मेधा की विलक्षणता और उसकी व्यापकता को दर्शाती है. आज भी अनेक अर्थशास्त्री सहयोग और सामूहिक समर्पण की प्रतीक उस व्यवस्था के प्रशंसक हैं. ऋग्वेद जिसको विश्व की किसी भी भाषा की प्राचीनतम कृति होने का गौरव प्राप्त है, में पणि का उल्लेख मिलता है. जिसके अंतर्गत व्यापारीगण परस्पर समझौता करते थे, ताकि कारवां के रूप में संगठित होकर दूर-दराज के प्रदेशों तक व्यापार किया जा सके. कठिन रास्तों तथा विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों के कारण संगठन बनाकर चलना उस समय के व्यापारियों की विवशता थी. हालांकि कुछ विद्वान वैदिक युग में श्रेणी अथवा पणि जैसे किसी संगठन की उपस्थिति का समर्थन नहीं करते. दूसरी ओर कुछ विद्वानों का मानना है कि वैदिक काल के दौरान सहयोगाधारित संगठनों की उपस्थिति सामान्य थी. तात्कालिक अर्थव्यवस्था में उनका बहुत बड़ा योगदान था. इस संबंध में जो भी प्रमाण प्राप्त हुए हैं, उनकी विश्वसनीयता किसी भी प्रकार के संदेह से परे है. तांबे की मुहरें, ताम्रपत्र, प्रस्तर कलाकृतियां, लिखित ग्रंथ इत्यादि अनेक ऐसे प्रमाण हैं, जो प्राचीन सहयोगाधारित उद्यमों की प्रामाणिकता को दर्शाते हैं. यह भी निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन भारतवासी सहअस्तित्व एवं साहचर्य की महत्ता को पहचान चुके थे, अतएव परस्पर सहयोग एवं समर्थन के आधार पर नीतियां बनाना, उन दिनों की दिनचर्या में सम्मिलित हो चुका था. प्रकारांतर में उन्हीं के आधार पर सहकार के नियम बनाए गए. सहकारिता की आधुनिक अवधारणा प्राचीन सिद्धांतों से बहुत मेल खाती है. वैदेत्तर काल के साहित्यिक ग्रंथों, पुरातात्विक अवशेषों में पणि अथवा श्रेणी के रूप में सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन होने का उल्लेख तो है, लेकिन उनके बारे और अधिक विवरण, उनकी कार्यपद्धति एवं पहुंच को लेकर अधिक साक्ष्य मौजूद नहीं हंै. इसे देखते हुए कुछ विद्वानों ने उस युग में सहयोगाधारित संगठनों की मौजूदगी पर ही संदेह प्रकट किया है. उनके अनुसार पूग अथवा पणि जैसे वैदिक वांङमय में आए शब्द गिल्ड के पर्याय नहीं हैं, न श्रेष्ठि अथवा श्रेणी-प्रमुख तथा गिल्ड के अध्यक्ष के पद को परस्पर समानार्थी मानना उचित होगा. हालांकि वैदिक समाज में शिल्पकलाओं की उन्नति पर किसी को भी संदेह नहीं है. इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि शिल्पकलाओं का उतना विकास बिना उपयुक्त बाजार के संभव ही न था. इस तर्क से भी सहयोगाधारित व्यापार संगठनों की मौजूदगी एवं उनकी उपयोगिता स्पष्ट हो जाती है.

सिंधू घाटी की सभ्यता

मेहरगढ़ की सभ्यता के अवसान के लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात सिंधू घाटी के तट पर एक और सभ्यता का विकास हुआ, जो अपेक्षाकृत अधिक आधुनिक एवं समृद्धिशाली थी. सिंधु थाटी के तटवर्ती क्षेत्र में विकसित होने के कारण यह सभ्यता भारतीय इतिहास में सिंधु घाटी की सभ्यता के नाम से जानी जाती है. इस सभ्यता के अवशेष मोआन-जो-दारो तथा हड़प्पा नामक स्थानों पर पाए जाते हैं. ईसा पूर्व 3300 वर्ष से लेकर 1900 ईसा पूर्व, करीब चैदह सौ वर्ष तक विकासमान रही यह सभ्यता अपनी समकालीन रोम तथा मेसापोटामिया सभ्यताओं से कहीं अधिक विस्तृत एवं समृद्ध थी. उन्नत जल निकासी, बेहतर नगर नियोजन, लेन-देन के समय माप-तौल के एक जैसे मानकों का प्रयोग, मुद्रा आधारित विनिमय इस सभ्यता की विशेषताएं थीं. इनके अतिरिक्त हड़प्पा और मोआन-जो-दारो के निवासी शिल्पकला एवं व्यापार के मामले में भी अपने समकालीनों से कहीं आगे थे. वे जल-थल दोनों ही रास्तों से व्यापार करते थे. संगठित व्यापार की कला से वे परिचित थे.
सिंधु घाटी के आसपास की जमीन अत्यंत उपजाऊ एवं प्राकृतिक रूप से समृद्ध थी, जिसका प्रभाव वहां के निवासियों की जीवनशैली पर पड़ना स्वाभाविक था. लोगों में विलासिता की वस्तुओं की खपत थी, जिसने व्यापार की संभावनाओं का सघन विस्तार दिया था. दुकानदार अपनी वस्तुओं को लेकर एक स्थान पर जमा हो जाते थे. पूरा सिंधु-प्रदेश हालांकि किसी एक राजा के स्वामित्व में नहीं था, बावजूद इसके वहां के निवासियों, व्यापारियों के बीच एक ही मुद्रा का चलन था और उसकी स्वीकार्यता सिंधु घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थी, जिसका तब तक बाकी सभ्यताओं में प्रसार नहीं हो पाया था. प्रदेश हालांकि छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, तथापि विभिन्न राज्यों के नागरिकों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण थे. पुरातात्विक शोधों से यह भी सिद्ध हो चुका है कि सिंधू घाटी की सभ्यता उन्नत नागरिक सभ्यता थी. नगर नियोजन में समानता दर्शाती है कि वहां के निवासियों के बीच आपसी तालमेल का स्तर ऊंचा था. राज्यों के बीच झगड़े बहुत कम होते थे. नगरों में विभिन्न प्रकार के उद्योंगों एवं शिल्पकलाओं के लिए स्थान निश्चित थे. मापतौल के लिए विभिन्न स्थानों पर एक जैसे बाटों का प्रयोग होता था. नागरीकरण के कारण उत्तरोत्तर बढ़ती मांग, एक जैसी मापतौल व्यवस्था, एक ही मुद्रा का उपयोग तथा उद्यमियों एवं कारीगरों के लिए सघन बस्तियों का निर्माण, ये सभी परिस्थितियां व्यापार के पक्ष में थीं, उद्योगों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण के कारण उनके बीच तालमेल एवं उनपर नियंत्रण रखना सुविधाजनक था. इन सब स्थितियों का लाभ व्यापारियों ने खूब उठाया और उनके व्यापारिक काफिले अपने माल के साथ दूर-देश की यात्राओं पर निकलने लगे—

‘ऊपर वर्णित स्थितियां ही प्रदेश के व्यापारिक विकास में सहायक बनीं. परिक्षेत्र में अपेक्षाकृत शांति ने व्यापार को सुरक्षित एवं लाभकारी बनाने में मदद की थी, परिणामतः नए बाजारों का विकास संभव हुआ. ध्यातव्य है कि विभिन्न राज्यों के बीच माप-तौल की एक समान पद्धति, विनिमय के लिए एक समान मुद्रा का प्रयोग उस समय तक केवल सिंधू घाटी की सभ्यता की विशिष्टता थीं, जिसके कारण व्यापारियों की एक-दूसरे समाजों, राज्यों में स्वीकार्यता बढ़ी, व्यापारिक लागत में कमी आई. उद्योगों एवं व्यवसायों के एक ही स्थान पर केंद्रीयकरण ने विभिन्न वर्गों के बीच आपसी तालमेल को बढ़ाने का कार्य किया था. इससे योग्य कर्मचारियों की भर्ती एवं उनका प्रशिक्षण आसान हुआ, जो उत्पादकता में वृद्धि के लिए आवश्यक था. ये सभी कारण उस परिक्षेत्र में जहां उद्योगों के विकास में सहायक बने, वहीं इन्होंने लंबे रास्तों पर सुरक्षित यात्रा करने, बड़े पैमाने पर उत्पादन करने तथा कर्मचारियों के प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था करने के लिए, उद्यमियों एवं व्यापारियों को परस्पर सहयोग का मार्ग भी प्रशस्त किया.’3
हड़प्पा एवं मोआन-जो-दारो के टीलों की खुदाई से प्राप्त मुहरों पर उत्कीर्णित लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है. किंतु इन स्थानों की खुदाई से प्राप्त उस सभ्यता के अवशेष उस सभ्यता की अद्वितीयता एवं समृद्धिशीलता की घोषणा करते रहे हैं. प्राप्त पुरातात्विक साम्रगी में मृदा भांड, धातु की मुहरें, औजार, मूर्तियां इत्यादि सम्मिलित हैं. इनके अलावा सार्वजनिक स्नानगृह, सड़कों, पक्की नालियों, मकानों आदि से युक्त एक समृद्ध बस्ती के अवशेष के भी प्राप्त हुए हैं, जो उनके सुव्यवस्थित नगर-नियोजन के बारे में जानकारी देते हैं. प्राप्त मुहरों तथा नगर-नियोजन की उन्नत व्यवस्था को देखते हुए यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि वह एक समृद्ध सभ्यता थी. उत्खनन से प्राप्त मुहरें किसी व्यक्ति या समूह की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक रही होंगी. बावजूद इसके यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि उन दिनों तक समाज में सहकारिता अथवा साहचर्य का विचार अपनी पकड़ बना चुका था. न यह बात विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती कि उस समय तक समाज में उत्पादक श्रेणियों का विकास हो चुका था, किंतु यह निविर्वाद रूप से कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे ही सही, व्यावसायिकरण की ओर तेजी से बढ़ता हुआ वह समाज, अपने अनुभवों से सामूहिक नियंत्रण के प्रति आग्रहशील होता जा रहा था.
वस्तुतः अकेले व्यक्ति को अपनी सीमाओं का बोध भी सामूहिकीकरण का उत्पे्ररक रहा है. मनुष्य की निरंतर बढ़ती आवश्यकताओं तथा विभिन्न शिल्पकलाओं के उद्भव के बीच सिंधु घाटी के लोग अपनी कलाओं के साथ समूहबद्ध होते जा रहे थे. व्यापारियों, शिल्पियों को अब नए बाजारों की तलाश थी, जहां पर वे अपने शिल्पकर्म की अधिक से अधिक कीमत वसूल कर सकें. नए बाजारों तक आने-जाने तथा रास्ते के खतरों से निपटने के लिए व्यापारियों ने समूहबद्ध होकर यात्रा करना प्रारंभ किया, जो आगे चलकर सामूहिक उद्यमिता का रूप लेता चला गया. सभ्यता का वह पहला चरण था, जिसके आधार पर भाविष्य में साहचर्य आंदोलन की लंबी और टिकाऊ भूमिका गढ़ी जानी थी.
ध्यान देने की बात यह कि सभ्यता का वह नया रूप मनीषियों ने नहीं गढ़ा था, बल्कि उसकी रचना अपने शिल्प-कौशल के दम पर लोगों के दिलों पर छा जाने वाले शिल्पकारों, मेहनतकशों, व्यापारियों ने गढ़ी थी. संभव है कि प्रारंभ में उन्हें अपने राज्य का विरोध भी सहना पड़ा हो. लेकिन आगे चलकर जब उनका व्यवसाय अधिक मुनाफादेय होता चला गया और उसके दम पर उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत कर ली, तो राज्य न केवल उनका समर्थन करने लगे, बल्कि मामूली कर के बाद उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठाने को तैयार हो गए. संभवतः यही प्रतिक्रिया धार्मिक नेताओं की भी रही. परंपरा और शुचिता के नाम पर विदेश यात्रा को निषिद्ध करते आए पंडितजन, उस व्यपार में अपना हित देखकर उसके न केवल समर्थक बने, बल्कि तरह-तरह से स्वयं को उनका गुणग्राहक जताने लगे थे.

गंगा-जमुनी सभ्यता

सिंधु घाटी की सभ्यता का पराभव कैसे हुआ, इस बारे में कोई ठोस जानकारी प्राप्त न होने के कारण विद्वानों के बीच मतभेद बने हुए हैं. अधिकांश विद्वान नदी में आई बाढ़ को उसका कारण मानते हैं. लेकिन उस सभ्यता के पराभव के दौर में लगभग उसी के समान एक और सभ्यता गंगा और यमुना के तटवर्ती प्रदेशों में पनप रही थी. गंगा और यमुना के दोआबे के बीच का स्थान प्राकृतिक रूप से काफी समृद्ध, हरा-भरा एवं धन-धान्य से परिपूर्ण था. मीठे पानी के लगभग अंतहीन स्रोतों से परिपूर्ण इस सभ्यता का उद्भवकाल ईसा पूर्व 1900 से लेकर ईसा पूर्व 1500 तक है.
प्राकृतिक रूप से साधन-संपन्न होने के कारण गंगा-यमुनी सभ्यता का विकास बहुत तेजी से हुआ. उद्योग-धंधों एवं शिल्पकलाओं की उन्नति ने इसे बहुत शीघ्र अपनी समकालीन सभ्यताओं में विशिष्ट बना दिया था. हालांकि इस बात के लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि इस सभ्यता के निवासी आरंभिक काल से ही श्रेणी या सहव्यापार के विचार से परिचित थे. प्राचीन गोतम धर्मसूत्र का हवाला देते हुए विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि भारतीयों को 1000 ईसापूर्व से 800 ईसापूर्व के बीच सहयोगाधारित व्यावसायिक संगठनों के बारे में ज्ञान था. महाभारत तथा बृहदारण्यक उपनिषद के हवाले से डाॅ. रमेशचंद्र मजुमदार ने भी दर्शाया है कि भारत में ऋग्वेद के समय में ही पणि का अस्तित्व था. उनका लिखते हैं कि लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास इस सभ्यता के निवासियों को संगठित व्यापार की कला का बोध हो चुका था. इस तथ्य के समर्थन में तो पर्याप्त लिखित प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा पूर्व 1000 से ईसा पूर्व 800 तक भारतवासियों को पणि एवं श्रेणी का ज्ञान था. वे अपने उद्योग-धंधों पर नियंत्रण एवं योजनाओं के निर्माण के लिए संगठनशक्ति का भली-भांति उपयोग करने लगे थे.

महाकाव्य युग में सहयोगाधरित आर्थिक संगठन

भारतीय समाज एवं संस्कृति की लगभग आधी से अधिक परंपराएं किसी न किसी प्रकार से रामायण एवं महाभारत से उद्भूत हैं. रामायण में राम की कथा है, किंतु परोक्षरूप में यह ग्रंथ आर्यों की भारत के मूल निवासियों पर विजय की गाथा है. राम-रावण युद्ध मुख्यतः दो विरोधी संस्कृतियों का संघर्ष था. वर्चस्व की उस लड़ाई में अपेक्षाकृति अधिक विकसित आर्य संस्कृति भारत की प्राचीन द्राविड़ संस्कृति को अपदस्थ कर स्वयं केंद्र पर विराजमान हो जाती है. महाभारत में पांडवों एवं कौरवांे के भीषण युद्ध की कहानी, विशुद्ध राजनीतिक संघर्ष था. दोनों ग्रंथों में वर्णित घटनाक्रमों के बीच भी लगभग एक हजार तक का अंतराल संभव है. अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाक्रम का समय तीन हजार ईसापूर्व से लेकर आठ सौ ईसा पूर्व तक फैला हुआ है.
वैदिक युग से रामायण एवं महाभारतकाल तक आते-आते भारतीय जनसमाज में काफी परिवर्तन हो चुके थे. लोगों की जीवनशैली और मान्यताओं तक में बदलाव आया था. समाज पर राजनीति का असर बढ़ा था. उत्तरवैदिक काल में ही ब्राह्मणों का सामाजिक कार्यकलापों एवं राजनीति पर बढ़ा हुआ असर साफ दिखने लगा था. महाकाव्यकाल में वर्णव्यवस्था और भी जटिल होकर उभरी थी. वर्गीय स्वार्थों के कारण उन्होंने राजा को इस धरा पर ईश्वर का उत्तराधिकारी घोषित किया था. परिणामतः राज्याधिपति का जनजीवन पर हस्तक्षेप और उसकी महत्त्वाकांक्षाओं में वृद्धि हुई थी. वैदिक युग में राजा का आशय जहां कबीले के मुखिया से था, वहीं महाकाव्यों में राजा को पूरी धरती का स्वामी और पालक, भूपति तक स्वीकार किया था. जिससे सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में सिमटती जा रही थीं. छोटे-छोटे राज्य बडॆ़ राज्यों में मिलते जा रहे थे. उनमें आपसी प्रतिद्विंद्वता एवं युद्ध होते रहते थे. किसी राज्य के क्षेत्रफल में बड़े होने में कोई बुराई नहीं थी. बुराई थी उसकी कुल शक्तियों के किसी एक व्यक्ति के हाथों में सिमट जाने में. इससे संसाधनों के केंद्रीकरण को भी इससे बढ़ावा मिला था. एक ओर जहां कर्मकांडों में लगातार वृद्धि हो रही थी. वहीं दूसरी ओर लोगों का भौतिकता के प्रति आग्रह भी बढ़ा था.
अपने आप में यह एक विसंगति थी, जिसके पीछे ठोस कारण थे. दरअसल समाज का वह वर्ग जो धर्म और अध्यात्म के नाम पर लोगों को प्रकटतः त्याग एवं संयम का उपदेश देता था, उसका अपना जीवन भोग एवं लिप्साओं से भरा हुआ था. उसकी कथनी और करनी बिलकुल अलग-अलग थीं. लोग यह जानने लगे थे कि कर्मकांडों की संरचना उन्हें भरमाए रखने, प्रमुख सामाजिक समस्याओं से उनका ध्यान हटाने के लिए की गई है. इस कारण धर्म एवं नैतिकता से भी उसका मोहभंग हुआ था. इस सबका परिणाम यह हुआ कि समाज के बड़े वर्ग को भौतिक सुख-सुविधाएं भाने लगी थीं. लोकायत दर्शन का उद्भव इसी युग की घटना है. डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे विद्वान ने भी महाकाव्यकाल पर भौतिकवाद के प्रभाव को स्वीकार किया है—
‘रामायण और महाभारत में वर्णित घटनाएं अधिकतर उस वैदिककाल की हैं, जबकि प्राचीन आर्य बड़ी संख्या में गंगा की उपात्यका में आकर बसे थे. कुछ लोग दिल्ली के आसपास, पांचाल लोग कन्नौज के समीप, कौशल लोग अवध् के समीप और काशी लोग बनारस में-किंतु ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि इन महाकाव्यों की रचना ईसा से छठी शताब्दी से पूर्व हुई हो. स्वयं वेदमंत्रों के क्रमबद्धता में आने का काल भी वही है, जिस समय आर्य लोग गंगा की उपात्यका में फैल रहे थे…रामायण में उन युद्धों का वर्णन है, जो आर्य लोगों एवं यहां के मूल निवासियों के मध्य हुए, जिन्होंने आर्य संस्कृति को अपना लिया. महाभारत उस समय का ग्रंथ है जब वैदिक ऋचाएं अपनी मौलिक शक्ति एवं अर्थ खो चुकी थीं और कर्मकांड प्रधान धर्म सर्वसाधारण को अधिक आकृष्ट करता था. जन्मपरक जाति को प्रधानता दी जाने लगी थी. इसलिए इन महाकाव्यों की रचना का समय ईसापूर्व छठी शताब्दी के लगभग कहीं रख सकते हैं. यद्यपि उनके अंदर ईसा के 200 वर्ष पश्चात तक परिवर्तन होते रहे और उस समय के महाकाव्य अपने अंतिम अर्थात वर्तमान रूप में आ गए.4
ध्यातव्य है कि महाकाव्यों में वर्णित घटनाओं का समय और उनका रचनाकाल दो अलग-अलग बाते हैं. रामायण एवं महाभारत की घटनाओं का समय निर्धारित है. लेकिन उनका लेखन किसी एक समय की घटना नहीं है. बल्कि वह विस्तृत कालखंड में फैला हुआ है. इन दोनों ही ग्रंथों को अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त करने में शताब्दियां लगी थीं. इसमें भी सचाई है कि इन दोनों पुस्तकों की रचना सामान्य कथानक के रूप में की गई थी. बाद में वर्णाश्रम धर्म की स्थापना के लिए उनमें अनेक घटनाएं-प्रसंग प्रक्षेपित किए गए. चूंकि उनका कथानक भारतीय पंरपरा एवं संस्कृति की अनेक मान्यताओं को प्रतिष्ठित करने का काम करता था, कुछ नई परंपराओं की स्थापना के साथ भारत की वर्णाश्रम धर्म की स्थापना भी करता था, इसी कारण का उसका गुणगान युगातीत महागाथा के रूप किया गया, उन्हें बार-बार सुनने-सुनाने का आग्रह किया जाने लगा. लोगों के मनोरंजन की भूख एवं उनकी अशिक्षा का लाभ वर्णाश्रम धर्म के समर्थकों-प्रचारकों को यह मिला कि इन ग्रंथों में वर्णित नायकों का देवताओं में शुमार होने लगा और प्रतिनायक भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के खलनायक मान लिए गए. देवताओं का नाम रटने से पुण्य और खलनायकों की स्मृति को भी पाप का भागी बना दिया गया. मानवी मेधा के ऐसे दुरुपयोग के उदाहरण अकेले भारत में ही नहीं हुआ, अपितु दुनिया-भर के यथास्थितिवादी धर्म और परंपरा के नाम पर ऐसा मखौल करते रहते हैं. वर्णाश्रम व्यवस्था के संकेत वेदों में भी हैं, किंतु महाकाव्यकाल में यह और भी परवान चढ़ती गई.
वैदिककाल में अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्रोत पशुपालन था. किंतु महाकाव्यकाल तक आते-आते अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान बढ़ता चला गया, जिसके फलस्वरूप लोगों ने एक ही स्थान पर टिककर रहना सीखा. परिणामतः जीवन में स्थायित्व बढ़ा. इससे व्यापारिक गतिविधियों को भी संवरने का अवसर मिला. पशुपालक अर्थव्यवस्था में लोग सामान्यतः पशुओं का ही लेन-देन करते थे. उनकी बाकी आवश्यकताएं प्रकृति के साथ सहगमन करते समय स्वाभाविक रूप से पूरी हो जाती थीं. एक ही स्थान पर जमकर रहने से लोगों की आवश्यकताओं में इजाफा भी हुआ था. कृषि के लिए नए औजारों की जरूरत ने लुहार, बढ़ई जैसे शिल्पकारों को बढ़ावा देने का काम किया. सभ्यता के विकासक्रम में मोची, जुलाहे, रंगरेज जैसे दस्तकारों की मांग में भी वृद्धि हुई. कालांतर में व्यापारिक गतिविधियों का प्रसार और भी नए-नए क्षेत्रों तक होता चला गया. उत्पादन की प्रारंभिक अवस्था एकरैखिक थी. स्थानीय शिल्पकार अपने समाज के लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन करते थे, जो उन तक सीधे पहुंचा दिया था.
कालांतर में कृषक वर्ग और शिल्पकारों के अलावा समाज में एक और वर्ग का उद्भव हुआ जो स्वयं उत्पादन से नहीं जुड़ा था. उसका कार्य उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सेतु बनाने का था. उपभोक्ताओं की तलाश तथा उस तक माल पहुंचाने के लिए इस वर्ग ने शिल्पकारों के साथ मिलकर कई अनोखे प्रयास किए, चूंकि यह कार्य राज्य की समृद्धि से भी जुड़ा था अतः उसको स्थानीय शासन का समर्थन भी प्राप्त था. राज्यों के विस्तार से आवागमन सुरक्षित हुआ था, इससे आपसी व्यवहार एवं लेन-देन का परिक्षेत्र भी विकसित हुआ था. पहले जो व्यापार किसी एक क्षेत्र तक सीमित था, वह दूर-दराज के स्थानों तक फैलने लगा था. व्यापारियों के संगठन भी बनने लगे, जिनका सांगठनिक स्वरूप तथा व्यापार का क्षेत्र भिन्न-भिन्न था. इसी दौर में व्यापार के नए क्षेत्रों का पता लगाने का कार्य भी चलता रहा. राज्यों के समर्थन एवं उनके सहयोग के बिना भी सहयोगाधारित ये संगठन समाज में अपना स्थान बनाते जा रहे थे.
वैदिककाल की तरह महाकाव्यकाल में भी मनीषी वर्ग ज्ञान के अन्वेषण एवं परंपराओं की सुरक्षा में जुटा हुआ था. इस वर्ग का समाज में अभी भी सम्मान था. श्रेष्ठ विचारों को प्रत्येक शा से आने दो, आवश्यकता से अधिक धन का संचय पाप है, मनुष्य का धर्म संकटकाल में अपने पड़ोसी की मदद करना है, कामनारहित होकर कर्म करते जाना—ऐसी सद्कामनाएं वेदों और वेदोत्तर साहित्य में जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं. ये सद्भावनाएँ केवल भारतीय धर्मग्रंथों में ही विद्यमान रही हों, ऐसा नहीं है. बल्कि हरेक परिवेश, प्रत्येक काल और हर धर्म में इन सद्विचारों की कमोवेश मौजूदगी रही है. हालाँकि शास्त्रों में जो सैद्धांतिक अवधारणा के रूप में मौजूद है, वही ज्यों का त्यों लोकप्रचलित भी हो, यह सदा नहीं होता और यह भी सत्य है कि चलन से बाहर होने पर सत्य की प्रामाणिकता संदिग्ध नहीं हो जाती. मूल्यपरकता प्रत्येक युग में सम्मानित रही है.
नैतिकता को प्रत्येक युग में मानवजीवन का अभीष्ट माना गया है. वेद से लेकर महाभारत काल तक आते-आते हालांकि समाज में काफी परिवर्तन आया था. साथ ही मनुष्य का अपने सिद्धांतों से विचलन भी हुआ था. धर्म और राजनीति, जो पहले नैतिकता को प्रश्रय देने, उसे और ऊंचा उठाने के लिए जाने जाते थे, वे अनुसरण और लिप्सा के जनक बन चुके थे. लेकिन समाज के एक हिस्से पर यदि जड़ता व्याप्त थी, यदि वहां पर लोग यथास्थितिवाद के पोषक-प्रवर्त्तक बनकर हरेक परिवर्तन को रोके रखना चाहते थे, तो व्यवहार एवं संगठन के स्तर पर समाज में ऐसा भी बहुत कुछ घट रहा था, जो रचनात्मक था और उम्मीद जगाता था. इसके संकेत कारीगरों, शिल्पकारों तथा छोट-छोटे व्यापारियों के उन संगठनों के द्वारा मिल रहे थे, जो अपने व्यापार के माध्यम से समाज को न केवल समृद्धि की ओर ले जा रहे थे, बल्कि भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को देश की सीमाओं से बाहर तक फैला रहे थे. वे संगठन सामूहिक लाभ के लिए गठित किए जाते थे. किंतु उनकी सफलता इसमें थी कि जनसामान्य भी उन्हें अपने लिए लाभकारी समझें. इसलिए आम जनजीवन पर उनका प्रभाव भी होता था. उत्पादक और व्यापारिक संगठनों की उपस्थिति को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए विशः की संकल्पना की गई थी. यह माना गया था कि अकेले ‘ब्रह्म’ और ‘क्षत्र’ से कार्य नहीं चल सकता. ब्रह्म अर्थात ब्राह्मण, धार्मिक नेतृत्वकर्ता, जो समाज में शिक्षण एवं कर्मकांड की जिम्मेदारी संभालता था. क्षत्र यानी क्षत्री, जिसके ऊपर समाज की आततायियों से सुरक्षा का दायित्व था. और ये विशः क्या थे? विशः के संबंध में बृहदारण्यक उपनिषद में उल्लिखित है कि—
‘न तो ब्रह्म द्वारा समस्त कार्यों की सिद्धि संभव है, न अकेला क्षत्र इस दायित्व को उठा सकता है. इसलिए विशः की उत्पत्ति की गई, जो गणों के रूप में संगठित होकर अपने-अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं.’5
स्पष्ट है कि उत्तरवैदिक काल में समाज में आर्थिक गतिविधियां महत्त्वपूर्ण हो चुकी थीं. अब केवल कृषि और पशुपालन द्वारा काम चलना संभव नहीं रहा था. उपनिषदों में विशः को मिले महत्त्व का उल्लेख शंकराचार्य ने भी किया है. विशः की उत्पत्ति के संबंध में उन्होंने लिखा है कि—
‘धनार्जन न तो क्षत्रिय द्वारा संभव है, न ब्राह्मण का ही यह कर्तव्य कि वह वित्त उपार्जन पर ध्यान दे. तब? तब देवों ने वित्त के उपार्जन तथा तत्संबंधी अन्य कार्यों को साधने हेतु ‘विश’ को उत्पन्न किया. विशः गण का ही पर्याय हैं, क्योंकि ये संहत (संगठन बनाकर) वित्त-उपार्जन में समर्थ होते हैं, अकेले-अकेले नहीं. इसलिए इनमें गणों की सत्ता निहित होती है.6
प्रारंभ में प्रायः सभी व्यापारिक समूह लगभग एक ही जैसे थे. एक व्यापारिक समूह कई प्रकार के व्यवसाय एक साथ कर सकता था. विकास की प्रारंभिक स्थिति में यह कार्य सरल था और संभव भी. लेकिन जैसे-जैसे व्यापार बढ़ता गया, किसी अकेले समूह द्वारा सभी क्षेत्रों में दक्षता बनाए रखना, अपने ग्राहकों को संतुष्ट रख पाना, असंभव होने लगा था. व्यापारिक सफलता के लिए किसी एक क्षेत्र में पूर्णतः दक्षता प्राप्त कर लेना आवश्यक मान लिया गया. आचार्य चाणक्य, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि मनीषियों ने अर्थशास्त्रीय नियमों की संरचना कर व्यापारिक समूहों को संहिताबद्ध करने का कार्य किया, जिससे उन्हें सामाजिक मान्यता भी मिलने लगी. समूहों द्वारा किए जा रहे कार्य के आधार पर उनका वर्गीकरण भी किया जाने लगा. संगठनों के कार्य तथा उनकी पहुंच के आधार पर उनका नामकरण होने लगा.
भारत के प्राचीन आर्थिक संगठनों की विशेषताओं और उनकी महत्ता को व्यक्त करने के लिए उन्हें कई नामों से पुकारा जाता है. उन सब में श्रेणी बहुप्रचलित एवं बहुस्वीकार्य नाम है. प्राचीन भारत में दायित्वों का विभाजन वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार होता रहा है. लेकिन ‘श्रेणी’ इस मायने में किंचित भिन्न थी. दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि ‘श्रेणी’ की संज्ञा प्राप्त आर्थिक समूह सामान्य हितों के लिए बहुमान्य वर्णाश्रम व्यवस्था की उपेक्षा तक कर सकते थे— आर्थिक संगठन के रूप में ‘श्रेणी’ की तुलना मध्यकालीन यूरोपीय देशों में कार्यरत उसके समानधर्मा आर्थिक संगठन ‘गिल्ड’ से की जा सकती है. दोनों में किंचित समानताएं भी हैं. जैसे दोनों ही का गठन सामूहिक कल्याण की भावना के साथ किया जाता था. दोनों ही के लिए अपने समूह के आर्थिक हित महत्त्वपूर्ण होते थे. सामूहिक नियंत्रण की व्यवस्था भी दोनों में लगभग एक जैसी ही थी. दोनों प्रकार के संगठनों में अनुशासन एवं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सर्वसम्मति से नियम बनाए गए थे, जिनका पालन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ किया जाता था. बावजूद इसके गिल्ड की अपेक्षा श्रेणी का स्तर कहीं अधिक व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण था. एक और मुख्य अंतर इन दोनों में यह है कि यूरोपीय देशों में गिल्ड की प्राचीनतम मौजूदगी के संकेत पूर्वमध्यकाल में 1100 वीं शताब्दी में मिलते हैं, जबकि भारत में सहयोगाधारित आर्थिक संगठनों के संकेत वैदिक वांङमय में भी मिलते हैं. सहकारी समिति/संस्थाओं के समानधर्मा संगठन श्रेणी का इतिहास भी कम से कम ईसा से भी छह सौ वर्ष पुराना है. श्रेणी का कार्यव्यापार भी विस्तृत था. हालांकि श्रेणी से यह अपेक्षित था कि वह किसी एक व्यवसाय में रहकर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करे. तथापि यह उसकी अनिवार्यता नहीं बन पाई थी. प्रख्यात विद्वान रमेशचंद्र मजुमदार अपनी पुस्तक Corporate Life In Ancient India में बुनकरों की एक ऐसी श्रेणी का उल्लेख करते हैं, जो व्यापार के सिलसिले में एक नगर से दूसरे नगर की सतत यात्रा करती रहती थी और जिसके कुछ सदस्य धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध तथा धार्मिक प्रचार-प्रसार का दायित्व भी संभालते थे. उन्हीं के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं—
‘श्रेणी के लिए किसी एक व्यवसाय से जुड़े रहना आवश्यक नहीं था. उसके सदस्य अपनी क्षमता एवं रुचि के अनुसार विभिन्न कार्यों (धनुर्विद्या, ज्योतिष, मल्लयुद्ध आदि) को अपना सकते थे…यही नहीं राजनीतिक गतिविधियों तथा नागरिक सुविधाएं प्रदान करने के लिए भी श्रेणी की मदद ली जाती थी.’7
उल्लेखनीय है कि उस युग में सामाजिकता की भावना बहुत प्रगाढ़ थी. इसके कारण भी थे. उस समय समूचा समाज अन्योन्याश्रित था. शनैः-शनैः पतनशील वर्ण-व्यवस्था जातिवादी स्वरूप ग्रहण करती जा रही थी. इस कारण समाज के बीच ऊंच-नीच का भेद और आर्थिक आधार पर स्तरीकरण भी था. ऊंच-नीच की भावना ने समाज में आंतरिक संघर्षों को जन्म दिया था. बावजूद इसके अधिकांश लोग यह समझ चुके थे कि एक सीमा के बाद शासित वर्ग की नजरों में वे सभी बराबर हैं…कि वह उन लोगों को जाति-वर्ग के मसलों में भटकाए रखकर सत्ता का असली आनंद उठाता है…कि ग्राम्यः जीवन की अभावमयी स्थितियों का सामना उन सभी को कमोवेश बराबर, साथ-साथ सहन करना पड़ता है. उच्च वर्ग को महज यह तसल्ली रहती थी कि वह वह सत्ता वर्ग के अपेक्षाकृत अधिक निकट है, कि उसको शासकवर्ग का करीबी होने का सम्मान प्राप्त है. जबकि स्तरीकरण के निचले स्तर पर शारीरिक एवं मानसिक शोषण के शिकार लोगों की मनःस्थिति विद्रोहात्मक होती है. इस विद्रोह को दबाए रखने, आक्रोश के शमन के लिए समाज में संगठन और सहयोग पर जोर दिया जाता था. इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए डाॅ. सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं—
‘उत्तर वैदिक युग में ही विभिन्न शिल्पियों का अनुसरण करने वाले, सर्वसाधारण जनता के व्यक्ति, अपने संगठन बनाकर आर्थिक उत्पादन में तत्पर हो गए थे. यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि शिल्पियों के लिए पूर्णतः स्वच्छंद होकर कार्य कर सकना संभव नही था. परस्पर संगठित होकर ही वे अपने कार्य को सुचारू रूप में संपादित कर सकते थे.’7
समाज की सत्ता उसकी प्रत्येक इकाई से विनिर्मित थी. यद्यपि समाज का चातुवण्र्य विभाजन जिसकी शुरुआत वैदिक काल में ही हो चुकी थी, निरंतर मजबूत हुआ था, अथर्ववेद में इस बात के पर्याप्त संकेत मिलते हैं कि उस काल तक ब्राह्मणों का लालच बढ़ चुका था. निहित स्वार्थों के लिए वे कर्मकांड को केंद्र में रखकर सत्ता पर नियंत्रण बनाए हुए थे. वर्णाश्रम व्यवस्था का लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों के हाथों तक सिमटता जा रहा था. दार्शनिक चिंतन, क्षुद्र बहसों और तंत्र-मंत्र संबंधी पोंगा-पंथी अवधारणाओं तक सीमित हो चुका था. परंपराओं और सामाजिक नियमों की स्वार्थानुकूल व्याख्या की जा रही थी. अपने लक्ष्य में उन्हें सफलता भी मिल रही थी. उन्हीं की प्रेरणास्वरूप समाज में शासक वर्ग का उदय हो रहा था, जिससे अधिकार एवं संसाधन सीमित हाथों में कैद होते जा रहे थे. प्रकट में तो सब यही स्वीकार करते थे कि समाज को गतिमान बनाए रखने के लिए उसके सभी वर्गों का पूरा सहयोग, प्रयासों में उन सभी की समान और सक्रिय साझेदारी आवश्यक है—किसी बड़ी मशीन के छोटे-छोटे पुर्जों की भांति, जिनके बिना वह कार्य करने में अक्षम सिद्ध होती है. परंतु उनके सभी आचरण स्वार्थ-भावना से प्रेरित तथा कहीं-कहीं तो नैतिकता को लांक्षित करने वाले थे.
परिणामस्वरूप समाज का एक वर्ग इन कर्मकांडों और छिछली धार्मिक व्याख्याओं के चंगुल में फंसकर और अधिक रूढ़िवादी और वौद्धिकरूप से जड़ बनता जा रहा था, वहीं दूसरा वर्ग उनकी असलियत को पहचानकर उनसे या तो दूर भाग रहा था, अथवा धार्मिक विवादों से परे रहकर व्यापार और उद्यमशीलता के माध्यम से अपने विकास के प्रति समर्पित था. स्पष्ट है कि उनमें एक बड़ा वर्ग शिल्पियों और कारीगरों का था. अपने अनूठे श्रम-कौशल एवं श्रम-भावना के कारण यह वर्ग समाज में निरंतर प्रतिष्ठा भी पा रहा था. ऐसे में जब इस वर्ग द्वारा संगठन बनाकर बड़े स्तर पर व्यापार प्रारंभ किया गया तो समाज में उसको स्वतंत्र पहचान मिलना अवश्यंभावी था ही.
महाकाव्यों यानी महाभारत और रामायण दोनों में भी व्यावसायिक संगठनों/निगमों की सार्थक उपस्थिति का उल्लेख मिलता है. राम अपने वनवास की अवधि पूरी होने के पश्चात जब अयोध्या लौटते हैं तो उनके स्वागत के लिए अन्य प्रजाजनों के साथ श्रेणि-प्रमुख भी मौजूद रहते हैं. महाभारत के शांतिपर्व मंे श्रेणि-प्रमुखों का उल्लेख करते हुए राजा को सावधान रहने के लिए कहा गया है कि वह उन्हें शत्रुओं द्वारा भेदनीति से बचाए रखे. महाभारत में वनपर्व की एक और लोकप्रचलित कथा बताती है कि गंधर्वों से पराजित दुर्योधन यह सोचकर खिन्न है कि हस्तिनापुर लौटने पर श्रेणि-प्रमुख उसको अवश्य ही उलाहना देंगे. उस समय क्या वह उनका प्रतिकार कर पाने में सफल होगा. यदि नहीं कर सका तो प्रजा पर उनका कैसा प्रभाव पड़ेगा. यह हमें तत्कालीन राजसत्ता पर व्यापार संघों के प्रभाव एवं उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से परिचित कराता है.

जैन एवं बौद्ध धर्म का उद्भव

भारतीय इतिहास के संदर्भ में सातवीं शताब्दी का कालखंड अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. बिना इस शताब्दी के उल्लेख न तो भारत की धार्मिक, आध्यामिक तथा तात्विक चेतना के उद्भव की व्याख्या संभव है, न ही भौतिक एवं राजनीतिक समृद्धि का इतिहास लिखा जा सकता है. इसी शताब्दी में भारत के दो प्रमुख धर्मों, जैन एवं बौद्ध का उदय हुआ था. हालांकि इन दोनों ही धर्मों का उद्भव प्राचीन परंपरागत वैदिक धर्म में कर्मकांड के बढ़ते अतिरेक एवं समाज पर एक ही वर्ग के बढ़ते वर्चस्व के प्रतिक्रियास्वरूप हुआ था, किंतु बहुत शीघ्र दोनों धर्म समाज पर अपनी पकड़ बनाने में कामयाब हो गए. दोनों की स्थापना जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ हुई थी. इसलिए इनमें जीवन और समाज को लेकर एक सकारात्मक दृष्टि थी. विशेषकर बौद्धधर्म तो व्यावहारिकता के स्तर पर इतना लचीला था कि इसके आलोचकों ने इसे भौतिकतावादी धर्म ही कह डाला. स्थिति चाहे जो भी हो, दोनों धर्म समाज और जीवन को लेकर आमजन की मान्यताओं के एकदम करीब थे. उपभोग को लेकर भी बौद्धधर्म में वैसे निषेध नहीं थे, जैसे कि उसके पूर्ववर्ती वैदिक धर्म में. इसलिए शिल्पकारों तथा व्यापारकर्म के सहारे जीविका चलाने वाली जातियां बौद्धधर्म की ओर आकर्षित होती चली गईं.
बौद्ध एवं जैन दोनों ही धर्मों में जातिप्रथा या वर्णव्यवस्था को कोई स्थान प्राप्त नहीं था. इसलिए इन धर्मों की ओर वे लोग भी आकर्षित हुए जो परंपरागत हिंदू धर्म में जातीय स्तरीकरण या वर्णविभाजन के कारण स्वयं को उत्पीड़ित-उपेक्षित अनुभव करते आ रहे थे. इससे विभिन्न क्षेत्र नई प्रतिभाओं के आगमन के लिए खुल गए. मनुष्य ने लोहे का उपयोग करना सीखा, निर्माण एवं उद्योगों के विकास के लिए नवीनतम मशीनों एवं उपकरणों की खोज हुई. आवागमन सुगम हुआ, फलस्वरूप नागरीकरण को गति मिली. व्यापारिक विनिमय को सरल बनाने के लिए धातु के सिक्कों का चलन हुआ, जिससे व्यापार के नए क्षेत्रों का उदय हुआ. उद्योगों के साथ कृषिक्षेत्र पर भी लोहे के आविष्कार का प्रभाव पड़ा. हल में लोहे की फाल के उपयोग ने कृषिकर्म को आसान बना दिया. इससे कृषिजोतों का विस्तार हुआ, उपज बढ़ी और समृद्धि को नए आयाम मिले.
व्यावसायिक प्रगति के चलते किसी एक व्यक्ति के लिए पूरे व्यवसाय पर नियंत्रण रखना कठिन होने लगा था. मुख्य उद्योग एवं व्यवसाय हालांकि अभी भी नगरों एवं कस्बों तक सिमटे हुए थे, किंतु उनपर उनपर सामूहिक नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ने लगी थी. एक और विशिष्ट प्रगति इस दौर में देखने को मिली वह थी, उद्योगों, व्यवसायों में लाभ-हानि के परिकलन के लिए दक्ष लेखाकारों की भर्ती एवं लेखा-बही का उपयोग. दक्ष लेखाकारों के उपयोग से लाभ-हानि की परिगणना आसान थी, इससे उद्योगों में पूंजी का वर्चस्व बढ़ने लगा. इससे पहले तक उत्पादक स्वयं ही विपणन की जिम्मेदारी संभालता था, वही उद्यम का स्वामी भी होता था. लेकिन लेखा-बही के प्रयोग ने केवल पूंजी के दम पर उद्यम-स्वामी बनने का रास्ता आसान कर दिया था. इससे जहां व्यापार को व्यवस्थित करना आसान हुआ, वहीं शोषण को भी बढ़ावा मिला क्योंकि समाज का एक वर्ग वर्णव्यवस्था के बंधनों के कारण शिक्षा से दूर रखा गया था. बाद में लिखित परंपरा का हवाला देते हुए इस वर्ग को दबाए रखने के लिए नए कानून बनाए जाने लगे. जिसके आधार पर पुराणों की रचना हुई. और पुराणों को प्रामाण्य बनाए रखने के लिए वेद, महाकाव्य सहित सभी प्राचीन ग्रंथों में संशोधन किए जाने लगे.
प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था तथा राजनीति को जानने के लिए कौटिल्य कृत ‘अर्थशास्त्र’ को एक मानक ग्रंथ की मान्यता मिली हुई है. ईसा से चार सौ वर्ष पुरानी इस रचना में उस समय के समाज तथा आर्थिक-राजनीतिक सरंचनाओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी हमें प्राप्त होती है. अर्थशास्त्र में नगरों को बसाने की आदर्श योजना का जो विवरण प्राप्त होता है उसमें गणों तथा श्रेणी के सदस्य शिल्पकारों को बसाने के लिए एक स्थान आरक्षित किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है. श्रेणियां राज्य को करों का भुगतान करती थीं, जो राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था. श्रेणियों के राज्य पर प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि बौद्धकाल में राजदरबार में एक नए पद ‘भंडागारिका’ का सृजन किया गया था, जिस पद पर श्रेणी के मामलों के विशेषज्ञ को नियुक्त किया जाता था. भंडागारिका का दायित्व श्रेणियों के बीच होने वाले विवादों का निपटान करना था. उन दिनों कुल अठारह प्रकार की श्रेणियां होने का उल्लेख भी आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में किया है, जो उस समय के जनजीवन में श्रेणियों के महत्त्व तथा उनकी व्यापक पहुंच की ओर इशारा करता है. कुछ श्रेणियों की आंतरिक व्यवस्था आधुनिक सहकारी समितियों के समान थी. उन्हें ‘समुत्तचरः’ कहा जाता था. ये श्रेणियां न केवल उद्योगों और व्यवसाय की देखरेख तथा नियंत्रण करने का काम करती थीं, बल्कि जनकल्याण के मामलों में उनका दखल था. जनता एवं स्थानीय प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वे जनसरोकारों से युक्त कार्यक्रमों को वरीयता देती थीं. आवश्यकता पड़ने पर ये श्रेणियां राज्य को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराती थीं. कई बार राज्य भी अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए श्रेणियों की मदद लेता था. तत्कालीन ग्रंथों में इस प्रकार के उल्लेख कई स्थानों पर आए हैं.
ईसा से पांचवी शताब्दी पहले के गं्रथ गौतम धर्मसूत्र के अनुसार—
‘किसानों, व्यापारियों, साहूकारों, शिल्पकारों, तकनीकी विशेषज्ञों यहां तक कि पशु चराने वाले गड़हरियों की भी अपनी अलग श्रेणी थी, जिनके माध्यम से वह अपने वर्ग के हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानून बना सकते थे. उनके वर्ग के कल्याण से संबंधित किसी प्रकार की समस्या अथवा प्रस्तावित योजना को लेकर सम्राट अथवा राज्य के प्रतिनिधि उन्हीं श्रेणियों से विचार-विमर्श करते थे.’8
एक जातक कथा के अनुसार बौद्धकाल में कम से कम अठारह प्रकार की श्रेणियां कार्यरत थीं. यह भी उल्लेखनीय है कि बौद्धधर्म को राजधर्म के रूप में अपनाए जाने के बावजूद जातिप्रथा का पूरी तरह से लोप नहीं हो पाया था. एक अन्य जातक कथा में उल्लेख किया गया है कि परिवार का बड़ा पुत्र प्रायः अपने पिता के शिल्प को अपना लेता था, जिससे तकनीकी रूप से दक्ष शिल्पकारों की समस्या का समाधान हो जाता था. श्रेणियों को सम्मान और प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता था. इसलिए लोगों में अपनी पहचान कायम करने के लिए अपने नाम के साथ अपनी श्रेणी या व्यवसाय का नाम जोड़ लेने का चलन था.
श्रेणी के व्यवसाय को पैत्रिकता अथवा परंपरा के नाम पर अपनाए जाने की प्रथा भारत की श्रेणियों को शेष विश्व की श्रेणियों से अलग सिद्ध करती थी. यह विशेषता दुनिया के किसी ओर गिल्ड सिस्टम में देखने को नहीं मिलती. भारत के प्राचीन ग्रंथों में श्रेणियों की पहुंच, उनकी प्रकृति तथा विशेषताओं के बारे में जगह-जगह उल्लेख किया गया है. कहीं पर उनसे राजा को सावधान रहने का उल्लेख है तो कई स्थानों पर राजा को यह निर्देश भी दिया गया है कि वह श्रेणियों की पहुंच का लाभ उठाकर, राज्य के हित में उनके विकास के लिए सभी जरूरी उपाय करे. महाभारत में एक स्थान पर उल्लेख किया गया है कि राजा श्रेणी-प्रमुखों पर नजर रखे और उनमें शत्रुओं द्वारा भेदनीति का उपयोग न करने दे.9 इसी प्रकार एक अन्यंत्र स्थल पर श्रेणी-प्रमुखों के उपजाप अर्थात भेदनीतिपूर्ण षड्यंत्रों से अपने अमात्यों की रक्षा के सभी जरूरी उपाय करने का उपदेश दिया है.10 स्पष्ट है कि समाज में श्रेणियों की भूमिका इतनी बढ़ चुकी थी कि किसी भी स्तर पर उनकी उपेक्षा कर पाना संभव नहीं था.
‘व्यापारिक संगठनों/श्रेणियों के गठन की शुरुआत बौद्धकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही हो चुकी थी. उस समय की स्थापत्य कला तथा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज में इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि उन दिनों के नगरों में विभिन्न प्रकार के व्यापारियों को उनके व्यवसाय के आधर पर अलग-अलग बसाने की प्रथा थी. कच्चेमाल की उपलब्धता के आधार पर विभिन्न शिल्पकारों के पृथक गांव बसाए जाते थे. किसी भी क्षेत्र में श्रेणी अथवा गिल्ड की स्थापना के लिए तीन प्रमुख विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक था. पहला कच्चेमाल की उपलब्धता के अनुसार उद्योगों का विकेंद्रीकरण, दूसरा ज्ञान तथा तकनीकी कौशल का परंपरा के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण तथा तीसरा श्रेणी के स्वामी अथवा मुख्य संगठक ‘जेट्टका’ की विचारदृष्टि, जिसके आधार पर श्रेणी की कार्यशैली तय होती थी. मौर्यकाल में श्रेणियों को व्यापक समर्थन मिलने से उनकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही थी. श्रेणियों की लोकप्रियता का दूसरा बड़ा कारण स्पर्धा की भावना थी. प्रयोगों द्वारा यह देखा गया था कि आर्थिक दृष्टि से भी अकेले व्यक्ति की कार्यक्षमता की अपेक्षा समूह के साथ उसकी कार्यक्षमता अधिक प्रभावी और लाभदायक होती है. इस प्रकार सहकार को बढ़ावा मिला. जिसके अनुसार किसी सदस्य को जब भी आवश्यकता हो, वह दूसरों की मदद ले सकता था.11
किसी भी श्रेणी में ज्येष्ठक अथवा श्रेष्ठिन् का पद बड़ा ही महत्त्वपूर्ण होता था. जातक कथाओं में कम्मारजेट्ठक, मालाकारजेट्ठक आदि शब्द बहुतायत प्रयुक्त हुए हैं. जिनसे इनकी सत्ता स्पष्ट हो जाती है. किसी एक जेट्ठक के अधीन शिल्पियों की संख्या निर्धारित नहीं थी. समुद्द वणिज जातक में नर्तकियों के एक गांव का उल्लेख है जिसमें उनके एक हजार परिवार निवास करते थे. जातक के अनुसार गांव में दो जेट्ठक थे, उनमें से प्रत्येक के अधीन पांच सौ नर्तक परिवार थे. श्रेणी की परिकल्पना से लेकर उसकी कार्यपद्धति तय करने तक का काम श्रेष्ठिन् अथवा जेट्ठक का ही होता था. कई स्थान पर उसे स्वामी के संबोधन का भी रिवाज रहा है. उसका कार्य भंडार के हिसाब-किताब से लेकर लेखा-बही की देखभाल करने तक विस्तृत था. भंडार की देखभाल करने वाले के कारण उसे ‘भंडारी’ अथवा ‘भंडारक’ भी कहा जाता था. प्रत्येक श्रेणी के व्यवसाय, कार्यक्षमता, सदस्यों की संख्या तथा पूंजी के आदान-प्रदान से संबंधित सभी आवश्यक सूचनाएं, परंपराएं और रीति-रिवाज यहां तक कि उसका इतिहास भी साफतौर पर उल्लिखित किया जाता था. साफ है कि समाज में जेट्ठकों अथवा श्रेष्ठ्नि की व्यापक प्रतिष्ठा थी. राजदरबार में उनका सम्मान था. सूचिजातक में लिखा है कि—
‘एक सौ कम्मारों का जेट्ठक राजदरबार में बहुत सम्मानित था. वह बहुत समृद्ध एवं ऐश्वर्यशाली भी था. अन्यत्र एक जातक में यह लिखा है कि एक राजा ने कम्मारजेट्ठक को अपने पास बुलाया, और उसको सुवर्ण की एक प्रतिमा बनाने का कार्य दिया.12
उपर्युक्त उद्धणों से साफ है कि  प्रागैतिहासिक भारत में व्यवसायी समूह उसी प्रकार संगठित थे, जैसे कि यूरोपीय व्यापारी गिल्ड के रूप में. लेकिन भारतीय समूह का आचरण अपने समकालीन गिल्डों की अपेक्षा कहीं अधिक लोकतांत्रिक था.
© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

1.  Thus, one would expect the corporate form’s development to be more likely when the demand for production and trade is increasing and when methodologies for monitoring the behavior of owners and managers by creditors and by other owners are present. Such situations enhance the value of organizational forms and also help to contain their costs, such as their agency and creditor information costs. Of course, there are other factors that are also important to the development of the corporate form (e.g., property and contract law). Dr. Vikramaditya Khanna in The Economic History of the Corporate Form in Ancient India.

2. ‘…that division of labour under the varna system may have been conducive to the emergence of guild organization. Agriculture, animal husbandry and trade, the three occupations of the Vaisyas, in course of time developed as separate groups.- Thaplyal, Kiran Kumar in Guilds in Ancient India.
3.  The relative peace in the region makes travel safer for traders and opens up new markets for trade. The uniformity of weights and measures, uncommon at that time in world history, benefits trade by reducing the transactions costs of engaging in trade. The localization of craft and industry to certain parts of the city might enhance group cohesion, make training of new recruits/employees somewhat easier, and increase productivity. In light of all these factors, trade was active, substantial and growing which suggests the demand for collective efforts – to protect traders traveling long distances, to engage in larger scale production and so forth – was large and probably rising. This often enhances the demand for organizational forms.- Dr. Vikramaditya Khanna.
4. भारतीय दर्शन- डा॓. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राजकमल प्रकाशन, हिंदी अनुवाद: नंदकिशोर गोभिल, प्रष्ठ-219.
5. स नैव व्यंभवत्, स विशमसृजत, यान्येतानि देवजातानि गणशः आख्यान्ते. – बृहदारण्यक-1/4/12
6.  क्षात्रसृष्टोऽपि स नैव व्यभवत् कर्मणे ब्रह्म तथा न व्यभवत् वित्तोपार्जयितुरभावात्। स विशमसृजत् कर्मसाधनवित्तोपार्जनाय। कः पुनरसौ विट? यान्येतानि देवजातानि ….गणशः गणं गणं आख्यान्यन्ते कथ्यन्ते गणप्राया हि विशः। प्रायेन संहता हि वित्तोपार्जनसमर्थाः नैकैकशः. – शंकराचार्य.
7. …a sreni need not be dedicated to a single profession and members could practice different trades – indeed, there is an example of a silk weaving sreni where some members practiced. other professions as well (e.g., archery, astrology)…Moreover, the sreni was used in municipal and political activity as well as economic activity. – Vikramaditya Khanna.
8.  The Gautama Dharmasutra (c. 5th century BC) states that “cultivators, traders, herdsmen, moneylenders, and artisans have authority to lay down rules for their respective classes and the king was to consult their representatives while dealing with matters relating to them.- By Manikant Shah & D.P. Agrawal in Sreni (Guilds): a Unique Social Innovation of Ancient India.
9.   अग्निदैर्ग़दैश्चैव प्रतिरूपककारकैः।
श्रेणिमुख्योपाजापेन वीरुधश्छेदनेन चः।। महा. शांतिपर्व-158/52.
10.  श्रेणिमुख्योपजापेषु वल्लभानुनयेषु च।
अमात्यान् परिरक्षेत भेदसंघातयोरपि।। महा. शांतिपर्व-104/64.
11.  The ancient sources frequently refer to the system of guilds which began in the early Buddhist period and continued through the Mauryan period. ….Topography aided their development, in as much as particular areas of a city were generally inhabited by all tradesmen of a certain craft. Tradesmen’s villages were also known, where one particular craft was centred, largely due to the easy availability of raw material. The three chief requisites necessary for the rise of a guild system were in existence. Firstly, the localization of occupation was possible, secondly the hereditary character of professions was recognized, and lastly the idea of a guild leader or jetthaka was a widely accepted one. The extension of trade in the Mauryan period must have helped considerably in developing and stabilizing the guilds, which at first were an intermediate step between a tribe and a caste. In later years they were dominated by strict rules, which resulted in some of them gradually becoming castes. Another early incentive to forming guilds must have been competition. Economically it was better to work in a body than to work individually, as a corporation would provide added social status, and when necessary, assistance could be sought from other members.- Thapar, Romila. Asoka and the Decline of the Mauryas, Delhi: Oxford. P. 73.
12.  डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार, प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं तथा राजनीतिक विचार, पृष्ठ-264.

प्राचीन भारत की आर्थिक संस्थाएं

सामान्य

सच होने के बावजूद यह तथ्य बहुत-से लोगों को चौंका सकता है कि प्राचीन भारत औद्योगिक विकास के मामले में शेष विश्व के बहुत से देशों से कहीं अधिक आगे था. रामायण और महाभारत काल से पहले ही भारतीय व्यापारिक संगठन न केवल दूर-देशों तक व्यापार करते थे, बल्कि वे आर्थिकरूप से इतने मजबूत एवं सामाजिक रूप से इतने सक्षम संगठित और शक्तिशाली थे कि उनकी उपेक्षा कर पाना तत्कालीन राज्याध्यक्षों के लिए भी असंभव था. रामायण के एक उल्लेख के अनुसार राम जब चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या वापस लौटते हैं तो उनके स्वागत के लिए आए प्रजाजनों में श्रेणि प्रमुख भी होते हैं. प्राचीन ग्रंथों में इस तथ्य का भी अनेक स्थानों उल्लेख हुआ है कि उन दिनों व्यक्तिगत स्वामित्व वाली निजी और पारिवारिक व्यवसायों के अतिरिक्त तत्कालीन भारत में कई प्रकार के औद्योगिक एवं व्यावसायिक संगठन चालू अवस्था में थे, जिनका व्यापार दूरदराज के अनेक देशों तक विस्तृत था. उनके काफिले समुद्री एवं मैदानी रास्तों से होकर अरब और यूनान के अनेक देशों से निरंतर संपर्क बनाए रहते थे. उनके पास अपने अपने कानून होते थे. संकट से निपटने के लिए उन्हें अपनी सेनाएं रखने का भी अधिकार था. सम्राट के दरबार में उनका सम्मान था. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर सम्राट श्रेणि-प्रमुख से परामर्श लिया करता था. उन संगठनों को उनके व्यापार-क्षेत्रा एवं कार्यशैली के आधार पर अनेक नामों से पुकारा जाता था. गण, पूग, पाणि, व्रात्य, संघ, निगम अथवा नैगम, श्रेणि जैसे कई नाम थे, जिनमें श्रेणि सर्वाधिक प्रचलित संज्ञा थी. ये सभी परस्पर सहयोगाधारित संगठन थे, जिन्हें उनकी कार्यशैली एवं व्यापार के आधार पर अलग-अलग नामों से पुकारा जाता था.
भारतीय धर्मशास्त्रों में प्राचीन समाज की आर्थिकी का भी विश्लेषण किया गया है. उनमें उल्लिखित है कि हाथ से काम करने वाले शिल्पकार, व्यवसाय चलाने वाली जातियां व्यवस्थित थीं. सामूहिक हितों के लिए संगठित व्यापार को अपनाकर उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया था. इसी कारण वे आर्थिक एवं सामाजिक रूप से काफी समृद्ध भी थीं. आचार्य पांडुरंग वामन काणे ने उस समय के विभिन्न व्यावसायिक संगठनों की विशेषताओं का अलग-अलग वर्णन किया है. कात्यायन ने श्रेणि, पूग, गण, व्रात, निगम तथा संघ आदि को वर्ग अथवा समूह माना है.1 लेकिन आचार्य काणे उनकी इस व्याख्या से सहमत नहीं थे. उनके अनुसार ये सभी शब्द पुराने हैं. यहां तक कि वैदिक साहित्य में भी ये प्रयुक्त हुए हैं. यद्यपि वहां उनका सामान्य अर्थ दल अथवा वर्ग ही है.2 इसी प्रकार कौषीतकिब्राह्मण उपनिषद् में पूग को रुद्र की उपमा दी गई है.3 आपस्तंब धर्मसूत्र में संघ को पारिभाषित करते हुए उसकी कार्यविधि और भविष्य को देखने हुए, अन्य संगठनों के संदर्भ में उसके अंतर को समझा जा सकता है.4
पाणिनीकाल तक संघ, व्रात, गण, पूग, निगम आदि नामों के विशिष्ट अर्थ ध्वनित होने लगे थे. उन्होंने श्रेणि के पर्यायवाची अथवा विभिन्न रूप माने जाने वाले उपर्युक्त नामों की व्युत्पत्ति आदि की विस्तृत चर्चा की है. इस तथ्य का उल्लेख हम पहले ही कर चुके हैं कि श्रेणियों की पहुंच केवल आर्थिक कार्यकलापों तक ही सीमित नहीं थीं, बल्कि उनकी व्याप्ति धार्मिक, राजनीति और सामाजिक सभी क्षेत्रों में थी. इसलिए कार्यक्षेत्र को देखते हुए उन्हें विभिन्न संबोधनों से पुकारा जाना भी स्वाभाविक ही था. दूसरी ओर यह भी सच है कि पूग, व्रात्य, निगम, श्रेणि इत्यादि विभिन्न नामों से पुकारे जाने के बावजूद सहयोगाधारित संगठनों के बीच उनके कार्यकलापों अथवा श्रेणिधर्म के आधार पर कोई स्पष्ट सीमारेखा नहीं थी. दूसरे शब्दों में ये नाम विशिष्ट परिस्थितियों में कार्यशैली एवं कार्यक्षेत्र के अनुसार अपनाए तो जाते थे, परंतु उनके बीच स्पष्ट कार्य-विभाजन का अभाव था. संगठन के विभिन्न नामों के कारण उनके बीच अनौपचारिक-से भेद एवं उनसे ध्वनित होने प्रचलित अर्थ को आगे के अनुच्छेदों में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है—

व्रात्य
यह नाम प्राचीन काल से ही संघ अथवा वैकल्पिक सरकार के रूप में प्रचलित रहा है. इसमें आंतरिक लोकतंत्र की भावना प्रधान होती थी. पाणिनी ने अपने महाभाष्य में ऐसे लोगों को व्रात्य माना है, जिनका कोई विशिष्ट व्यवसाय नहीं था, जो अपने तात्कालिक हितों के लिए किसी भी प्रकार का व्यवसाय अपना सकते थे. दूसरे शब्दों में उन्हें कई व्यवसायों का कार्यसाधक ज्ञान होता था. और समय तथा उपयोगिता के अनुसार वे अपना कोई भी व्यवसाय चुन सकते थे. व्रात्य प्रायः अपने शारीरिक बल से ही अपनी जीविका चलाते थे. वे विविध जातियों से आए हुए दक्ष शिल्पकार थे और अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए आपस में संगठित होकर रहना आवश्यक मानते थे.
कात्यायन ने व्रात्यों को विचित्र अस्त्रधारी सैनिकों का झुंड माना है. इससे कुछ विभिन्न विक्रमादित्य खन्ना ने किरन कुमार थपल्याल एवं मजुमदार के हवाले से एक ही परिक्षेत्र में रहने वाले, आर्थिक हितों के लिए प्रयासरत, समूह को व्रात्य एवं पूग की संज्ञा दी है. उनके अनुसार—
‘व्रात्य एवं पूग एक ही नगर अथवा गांव के निवासियों के सामान्यतः एक ही व्यवसाय में लगे, समान आर्थिक हितों के लिए गठित समूह थे.’5
स्पष्ट है कि व्रात्य समानधर्मा लोग थे, जिनको एकाधिक व्यवसायों की जानकारी होती थी. अपने परंपरागत उद्यम में अनुकूल अवसर न देख वे सहयोगी संगठन के गठन की ओर उन्मुख होते थे. उनके संगठन अधिक लोकतांत्रिक और उदार होते थे.

पूग
आचार्य काणे ने अपने वृहद् ग्रंथ ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में उल्लेख किया है कि व्रात्य की भांति पूग भी विभिन्न जातियों से आए हुए लोग थे. वे आवश्यकता पड़ने पर मिस्त्री से लेकर श्रमिक तक, कुछ भी काम कर सकते थे. कशिका के अनुसार वे धनलोलुप और कामी थे, जिनका कोई स्थिर व्यवसाय नहीं था. कात्यायन ने पूग को व्यापारियों का समुदाय स्वीकार किया है. कौटिल्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में एक स्थान पर सैनिकों एवं श्रमिकों में अंतर दर्शाया गया है. उनके अनुसार सौराष्ट्र एवं कांबोज राज्य के सैनिकों की श्रेणियां अलग-अलग वर्गों में विभाजित थीं. उनमें से कुछ आयुध के सहारे अपनी आजीविका चलाने वाली थीं, तो कुछ की आजीविका का माध्यम कृषि था—
पूग एक स्थान की विभिन्न जातियों एवं विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों का समुदाय है और श्रेणि विभिन्न जातियों के लोगों का समुदाय है—जैसे हेलाबुकों, तांबूलिकों, कुविंदों (जुलाहों) एवं चर्मकारों की श्रेणियां. चाहमान विग्रहराज के प्रस्तरलेख में हेलाबुकों को प्रत्येक घोड़े के लिए एक द्रम्म देने का वृत्तांत मिलता है.’6
पूग संभवतः ऐसे व्यक्तियों का संगठन होता था, जिनका पैत्रिक व्यवसाय युद्ध अथवा सेवाकर्म था; अर्थात ऐसे लोग जो वर्ण-विभाजन की दृष्टि से वाणिज्यकर्म के लिए अधिकृत नहीं थे. कृषक एवं सैनिक जातियों के लोग अपने व्यवसाय से हताश होकर, परिवर्तन अथवा अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक लाभ के लिए संगठन का निर्माण करते थे. इस बात की भी पर्याप्त संभावना है कि वाणिज्यिक अनुभव की कमी तथा शिल्पकलाओं के ज्ञान के अभाव में शूद्रवर्ग एवं सेना से निकाले गए लोगों के संगठन को पूग माना गया हो. ऐसे लोग युद्धक अथवा गैरव्यावसायिक श्रेणियों के गठन को प्राथमिकता देते थे. इस तरह पूग एवं व्रात्य कहे जाने वाले संगठनों में सैद्धांतिक दृष्टि से कोई खास अंतर नहीं था.

संघ
संघ को सामान्यतः विशिष्ट लोगों के संगठन का पर्याय माना गया है. प्राचीन भारत में गणतांत्रिक सत्ता के ध्रुवों को संघ के नाम से पुकारने की परंपरा रही है. संघों के सदस्यों का चयन बहुमत के आधार पर किया जाता था. तथापि वह सीमित गणतंत्र था. उनके सदस्य प्रायः वर्णव्यवस्था में ऊपर के क्रम पर आने वाली जातियों से संबद्ध होते थे, जो अपने आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक हितों की प्राप्ति हेतु संगठन का निर्माण करते थे. लगभग यही आशय गण का भी रहा है. प्रारंभ में इन दोनों के बीच कोई सैद्धांतिक विभाजन था भी नहीं. प्रकारांतर में गण और संघ में भेद अवश्य किया जाने लगा था. लेकिन गण को एकवचन के रूप में भी स्वीकारा जाता रहा है, जबकि संघ की संज्ञा विवेकवान लोगों के समूह के लिए सुरक्षित रही है, जो अपने निर्णय सिद्धांततः आमसहमति के आधार पर लेते हों. विशेषकर बौद्धधर्म के अभ्युध्य के पश्चात ब्राह्मणों ने स्वयं को उनसे अलग दिखाने के लिए, उनके संगठनों को संघ कहना प्रारंभ कर दिया था. मनु ने संघ का प्रयोग संगठित समाज के लिए किया है. जबकि कात्यायन के अनुसार संघ बौद्धों तथा जैनों का समाज है. डा॓. रमेशचंद्र मजुमदार एवं डा॓. किरन कुमार थपल्याल, दोनों ने इसी मत की संस्तुति की है. इन दोनों के हवाले से विक्रमादित्य खन्ना लिखते हैं कि—
‘संघ का संबोधन सामान्यतः राजनीतिक संगठनों के लिए था. यद्यपि कभी-कभी उसका इस शब्द का प्रयोग शैक्षिक एवं धर्मिक गतिविधियों के विकास को समर्पित संगठनों, विशेषकर बौद्ध भिक्षुओं के दल, के लिए भी कर लिया जाता था.’7
इस वर्गीकरण से संघ की आर्थिक विशेषताओं का कोई बोध नहीं होता. यह भी हो सकता है कि बौद्धों के धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक हितों के लिए गठित समूहों को संघ की संज्ञा दी जाती हो. लेकिन लोकपंरपरा में व्यापारियों के समूहों को भी संघ कहने का चलन था.

गण
प्राचीन भारतीय वांङमय में गण शब्द का उल्लेख अनेकार्थी है. गण का सामान्य अभिप्राय सुसंस्कृत नागरिक से भी है. गांवों एवं नगरों में सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए, समाज के जिन विशिष्ट व्यक्तियों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती थी, उन्हें ‘गण’ कहा जाता था. कई बार धार्मिक एवं राजनीतिक उद्देश्यों के लिए मनोनीत व्यक्ति भी ‘गण’ की संज्ञा से विभूषित कर दिए जाते थे. कालांतर में इस संज्ञा का उपयोग आर्थिक उद्देश्यों के गठित संगठनों के लिए भी किया जाने लगा. वसिष्ठ धर्मसूत्र में ‘गण’ का उल्लेख संगठित समाज के रूप में किया गया है. कुछ इसी प्रकार का अर्थ मनु ने भी बताया है; यानी पूरा समाज गण अथवा गणसमूह है. कात्यायन ने वर्ण-विभाजन को आधार बनाकर इसे और भी विशेषीकृत करते हुए, ब्राह्मणों के संगठन को गण की संज्ञा दी है. मिताक्षरा के अनुसार गण व्यापारियों के समूह थे, जिनका प्रमुख व्यवसाय हेलाबूक अर्थात घोड़े का व्यवसाय करना था. विक्रमादित्य खन्ना ने गण को धार्मिक एवं राजनीतिक संगठन मानते हुए उसको संघ के समक्ष रखा है. डाॅ. मजुमदार का संदर्भ देते हुए वे लिखते हैं कि—
‘प्रारंभ में गण का अभिप्राय व्यापारियों के समूह से था, मगर कालांतर में उन्हें राजनीतिक एवं धार्मिक संगठन के रूप में भी मान्यता मिलने लगी.’8
सामान्य नागरिकताबोध की प्रस्तुति के लिए भी गण का उपयोग आम नागरिकों के लिए मान्य रहा है. गणतंत्र उसी शब्द की व्युत्पत्ति है. यही अर्थ सहस्राब्दियों तक विद्वानों को मान्य रहा है. लेकिन यह भी सत्य है कि समय के साथ संज्ञाएं एवं उनके संदर्भ बदलते रहते हैं. कई बार स्वार्थी लोग भी शब्दों को उनके मूल संदर्भों से काटकर मनमानी व्याख्याएं करते रहते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि गण का उपयोग प्रारंभ में नागरिक और नागरिक-समूहों के लिए सुरक्षित था. बाद में यही संज्ञा व्यापारी-समूहों को भी दी जाने लगी. लेकिन कालांतर में, बौद्ध धर्म के उद्भव के बाद ब्राह्मणों ने उनके संगठनों को संघ तथा अपने समूहों को गण कहना आरंभ कर दिया था.

नैगम अथवा निगम
नैगम अथवा निगम शब्द का अंग्रेजी पर्याय Corporation है, जिसका आशय एक ऐसे जिम्मेदार संगठन से है, जिसका गठन विशिष्ट सेवाओं की देखभाल तथा उन्हें सुचारू बनाए रखने के लिए किया जाता है. नागरिक सेवाओं में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक आदि सभी सेवाएं सम्मिलित हैं. श्रेणि तथा पूग की भांति नैगम भी व्यावसायिक संगठन होते थे. नैगम को परिभाषित करने का कार्य कात्यायन द्वारा किया गया. उनके अनुसार नैगम का आशय एक ही नगर के नागरिकों के समूह से है. वैदिक साहित्य में श्रेणि, पूग अथवा नैगम जैसे शब्द अनेक स्थानों पर आए हैं, जहां उनका सामान्य अर्थ दल अथवा संगठन से ही है. हालांकि किरन कुमार थपल्याल की राय इससे कुछ भिन्न है. उनके अनुसार निगम अथवा नैगम का कार्यक्षेत्र विस्तृत होता था, यहां तक कि नगरीय सीमाओं से परे भी. नैगम के सापेक्ष श्रेणि एक छोटी इकाई थी और एक नैगम कई श्रेणियों पर अनुशासन कर सकता था. नैगम को हम आंग्ल शब्द फेडरेशन का पर्याय भी मान सकते हैं. उनके अनुसार—
‘निगम को प्रायः गिल्ड अथवा नगर के समतुल्य माना जाता है. यह श्रेणि की अपेक्षा बड़े होते थे. गुप्तकाल के आसपास निगम का किसी एक परिक्षेत्र में कार्यरत श्रेणियों पर नियंत्रण होता था.’9
मित्र मिश्र ने ‘वीरमित्रोदय’ में नैगम को परिभाषित करते हुए कहा है कि, पौर वणिकों को नैगम कहते हैं.10 वैधानिक दृष्टि से नैगम आधुनिक जायंट स्टा॓क कंपनी के अनुरूप होते थे. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार के विचार भी दृष्टव्य हैं—
‘जायंट स्टा॓क कंपनी के ढंग से संगठित होकर व्यापारी लोग अपने जो समूह बनाते थे, उनकी संज्ञा ‘संभ्भूय समुत्थान’ थी. पर शिल्पियों की श्रेणियों के समान व्यापारियों के समूह भी विद्यमान थे, जिन्हें ‘निगम’ कहा जाता था….जिस प्रकार शिल्पी लोग श्रेणि में संगठित होकर अपने साथ संबंध रखने वाले विषयों पर कानून बनाते थे और शिल्प को नियंत्रित करते थे, उसी प्रकार निगम में संगठित व्यापारी अपने व्यापार के संबंध में व्यवस्था करते थे. क्योंकि पुरों में प्रधानतया व्यापारियों का ही निवास होता है, और वहां वे प्रमुख स्थान रखते थे, अतः स्वाभाविक रूप से पौर संस्था का विकास निगम को आधर बनाकर ही हुआ.11
बौद्ध साहित्य में जनपद एवं नैगम को परस्पर पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त किया गया है.12 निगम के प्रधान या मुखिया को ‘श्रेष्ठी’ कहा जाता था. ‘महाबग्ग’ के अनुसार एक बार राजगृह के श्रेष्ठी के महारोग से व्यथित व्यापारियों ने जब उसका उपचार राजवैद्य से कराने का विचार किया तो वे उसकी अनुमति के लिए सम्राट बिंबसार के दरबार में पहुंचे. वहां जाकर उन्होंने प्रार्थना की कि—
‘हे देव! इस श्रेष्ठी ने आपके और निगम के प्रति बहुत उपकार किया है.’13
स्पष्ट है कि निगम के रूप में संगठित वणिकों को ही ‘नैगम’ कहा जाता था. ये व्यापारिक संगठन अधिकार-संपन्न होते थे, जो क्षेत्रीय श्रेणियों पर अनुशासन बनाए रखकर विकास के लिए बहुआयामी स्तर पर काम करते थे. प्रायः एक ही परिक्षेत्र में रहने वाले व्यापारी, शिल्पकार, श्रेणि-प्रमुख अपने परिक्षेत्र से बाहर व्यापार के प्रसार के लिए संगठित होते थे. छोटी-छोटी श्रेणियां भी, अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा एवं व्यावसायिक स्पर्धा में बने रहने के लिए, निगम के रूप में एकजुट हो जाती थीं. विक्रमादित्य खन्ना के हवाले से निगम को और गहराई से समझा जा सकता है—
‘आमतौर पर व्यापारियों, दस्तकारों एवं तकनीकी कार्यों में दक्ष व्यक्तियों, यहां तक कि युद्धकला में निपुण सैनिकों के संगठन को निगम अथवा श्रेणि के रूप में पहचाना जाता था…इनमें से श्रेणि, निगम तथा पणि (अथवा पण) अपने समाज के विकास के लिए आर्थिक गतिविधियों में अधिक लिप्त रहते थे.’14
याज्ञवल्क्य स्मृति में निगम को पाषंड एवं श्रेणि के समानांतर रखा गया है. याज्ञवल्क्य के अनुसार पाषंड धार्मिक संप्रदायों के संगठन थे. याज्ञवल्क्य के अनुसार—
‘श्रेणि-नैगम-पाषंड और गण के संगठन की एक ही विधि है.’15
इस विश्लेषण के आधार पर निगम को आधुनिक यूरोपीय गिल्ड अथवा विभिन्न श्रेणियों की फेडरेशन के रूप में दर्ज किया जा सकता है.

पण
पण को मुद्रा का पर्याय माना गया है. पण अथवा पणि का आशय भी सामान्यतः ऐसे संगठनों से था, जो धनार्जन के लिए व्यापार को अपनाते थे. जिनका लक्ष्य अपने सदस्यों के आर्थिक विकास के लिए कार्य करना था. विक्रमादित्य खन्ना ने पणि को श्रेणि एवं नैगम के समकक्ष रखते हुए ऐसा समूह माना है जिसका उद्देश्य अपने सदस्यों का आर्थिक उत्थान था. उनके अनुसार—
‘पणि (अथवा पणि) को सामान्यतः सौदागरों, शिल्पकारों के ऐसे समूह के रूप में जाना जाता है, जो अपने माल की बिक्री के लिए, काफिलों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक निरंतर सफर करते रहते थे.’16
दूसरे शब्दों में पणि व्यापारियों के काफिले थे, जो अपने व्यापार के सिलसिले में देश-देशांतर की यात्रा करते रहते थे. तकनीकी रूप में उनमें तथा श्रेणि के अन्य रूपों में बहुत अंतर नहीं था. उनकी पहचान अक्सर एक-दूसरे में घुलमिल जाती है.

श्रेणि
भारत में सहयोगाधारित व्यापारिक आर्थिक संगठनों के लिए श्रेणि शब्द का उपयोग ईसा से भी आठ सौ वर्ष पहले से होता आ रहा है परस्पर सहयोगाधारित संगठनों के लिए यह शब्द इतना प्रचलित रहा है कि उन्हें व्यवस्थित करने और वैधानिकता का दर्जा दिलानेवाले नियमों को भी श्रेणिधर्म कहा जाता थासंगठित व्यापार एवं उत्पादन के क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठनों के लिए यह संबोधन 1000 ईस्वी; अर्थात मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना तक लोगों की जुबान पर चढ़ा रहा. इन संगठनों के लिए यद्यपि पूग, नैगम, व्रात्य, पाणि, गण आदि संज्ञाएं भी प्राचीनकाल से चली आ रही थीं, विद्वानों ने उनके बीच के सैद्धांतिक अंतर स्पष्ट करने का प्रयास भी किया है, तथापि ऐसे संगठनों के श्रेणि शब्द का प्रचलन ही सर्वाधिक रहा. आज भी इसे गिल्ड के पर्याय के रूप में जाना जाता है. ध्यातव्य है कि गिल्ड श्रेणि के समानधर्मा यूरोपीय संगठन हैं. तथापि भारतीय प्रायद्वीप में श्रेणि शब्द का उपयोग व्यापक संदर्भ लिए हुए था. लगभग सभी प्रकार के व्यापारिक, उद्यमी और राजनीतिक संगठनों, नागरिक सेवा प्रदान करने वाले निकायों को श्रेणि के नाम से पहचाना जाता था.
जहां तक प्राचीन संदर्भों की बात है, विष्णुधर्मसूत्र में श्रेणि का उल्लेख संगठित समाज के लिए किया गया है, जबकि मिताक्षरा ने श्रेणि को पान के पत्तों के व्यापारियों का समुदाय माना गया है.17 याज्ञवल्क्य ने श्रेणि को विभिन्न जातियों के लोगों का संगठन माना है, जो किसी समान आर्थिक-व्यापारिक उद्देश्य के लिए संगठित होते हैं. जो भी हो इतना सत्य है कि श्रेणि व्यापारियों के संगठित समूह थे, जिनकी अपनी पहचान थी. विद्वानों द्वारा उसके बारे में अलग-अलग व्याख्या, उनके अनुभव और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भी संभव है.
उल्लेखनीय है कि व्यापारिक संगठनों को अलग-अलग नाम का दिया जाना किंचित मतवैभिन्न्य तथा सुविधा की दृष्टि से था. किसी भी व्यक्ति अथवा समूह को अपने हितों की सुरक्षा के अनुसार किसी भी प्रकार के व्यवसाय को अपनाने की छूट थी. हालांकि कई स्थान पर इस नियम में व्यवधान भी थे. व्यवस्था के लिहाज से श्रेणियों को उनके लिए तय व्यवसाय में काम करने की अनुमति प्राप्त थी. ’याज्ञवल्क्य (2/30) ने ऐसे कुलों जातियों, श्रेणियों एवं गणों को दंडित करने को कहा है, जो अपने आचार-व्यवहार से च्युत होते हैं.’18 नारद स्मृति में भी श्रेणि, नैगम, पूग एवं गण का जिक्र करते हुए उनके परंपरानुरूप कार्यों की व्याख्या की गई है. 
इन संगठनों के व्यवसाय के अनुसार उनकी संरचना एवं सामाजिक प्रस्थिति में भी अंतर था. याज्ञवल्क्य ने लिखा है कि पूगों एवं श्रेणियों को अपने झगड़ों का अन्वेषण करने, उन्हें सुलझाने का पूरा अधिकार है. उन्होंने पूग को श्रेणि से उच्चतम स्थिति में माना है. मिताक्षरा ने भी याज्ञवल्क्य का समर्थन करते हुए श्रेणि और पूग के बीच पूग की उच्चतम स्थिति को ही मान्यता दी है. मिताक्षरा के अनुसार—
‘पूग एक स्थान की विभिन्न जातियों एवं विभिन्न व्यवसाय वाले लोगों का समुदाय है और श्रेणि विभिन्न जातियों के लोगों का समुदाय है—जैसे हेलाबुकों, तांबूलिकों, कुविंदों (जुलाहों) एवं चर्मकारों की श्रेणियां. चाहमान विग्रहराज के प्रस्तरलेख में ‘हेड़ाविकों को प्रत्येक घोड़े के एक द्रम्म देने का वृत्तांत मिलता है. नासिक अभिलेख संख्या 15 में लिखा है कि अभीर राजा ईश्वरसेन के शासनकाल में 1000 कार्षापण कुम्हारों के समुदाय (श्रेणि) में, 500 कार्षापण तेलियों की श्रेणि में, 2000 कार्षापण पानी देनेवालों की श्रेणि (उदक-यंत्र-श्रेणि) में स्थिर संपत्ति के रूप में जमा किए गए, जिससे कि उनके ब्याज से रोगी भिक्षुओं की दवा की जा सके. नासिक के नौवें एवं बारहवें शिलालेखों में जुलाहों की श्रेणि का भी उल्लेख है. हुविष्क के शासनकाल के मथुरा के ब्राह्मशिलावालों एवं कांस्यकारों (ताम्र एवं कांसा बनानेवालों) की श्रेणियों में धन जमा करने की चर्चा हुई है. स्कंदगुप्त के इंदौर ताम्रपत्र में तैलियों की एक श्रेणि का उल्लेख है. इन सब बातों से स्पष्ट है कि ईसा के आसपास की शताब्दियों में कुछ जातियों, यथा लकड़हारों, तेलियों, तमोलियों, जुलाहों आदि के समुदाय इस प्रकार की संगठित एवं व्यवस्थित थे कि लोग उनमें निःसंकोच सहस्रों रुपये इस विचार के साथ जमा करते थे कि उनसे ब्याज-रूप में दान के लिए धन मिलता रहेगा.’19
स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में श्रेणियां न केवल संगठित व्यापार का माध्यम बनी हुई थीं, बल्कि वे आधुनिक वित्तीय संगठनों की तरह व्यवहार भी करती थीं. लोग अपना व्यक्तिगत धन भी मुनाफे या लाभ की इच्छा के साथ उनके पास जमा कर सकते थे. उस समय के शासकों को भी श्रेणियों की वित्तीय क्षमताओं पर पूरा विश्वास था. यहां तक कि राज्य के दायित्वों को पूरा करने के लिए भी श्रेणियों में धन निवेश किया जाता था. मथुरा से प्राप्त दूसरी शताब्दी के एक दस्तावेज में बुनकरों की दो श्रेणियों में से प्रत्येक के पास चांदी के 550 सिक्के जमा करने का उल्लेख मिलता है, ताकि उससे प्राप्त ब्याज से ब्राह्मणों तथा गरीबों को भोजन कराया जा सके. ब्याज की दर बहुत उपयुक्त बहुत कुछ वर्तमान दरों के अनुकूल थी. प्रोफेसर किरण कुमार थपल्याल के अनुसार नासिक अभिलेख में जुलाहों को दो हजार कार्षापण एक रुपया सैकड़ा प्रतिमाह ब्याज की दर से प्रदान किए गए थे, ताकि उस धन से भिक्षुओं के लिए भोजन, वस्त्र आदि का प्रबंध किया जा सकें. इसी प्रकार एक अन्य दस्तावेज में भिक्षुओं को जलपान कराने के लिए एक हजार कार्षापण 0.75 रुपया प्रतिमाह के ब्याज पर जुलाहों की एक और श्रेणि को दिए जाने का भी उल्लेख है. इसी प्रकार गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के एक लेख में इंद्रपुर निवासिनी तेलियों की श्रेणि को कुछ धन उधार के रूप में देने का उल्लेख हुआ है, ताकि उससे मिलने वाले ब्याज से सूर्य मंदिर के दीपों के लिए तेल का खर्च निकलता रहे. इन उद्धरणों से सिद्ध होता है, कि उस समय के बड़े राज्य भी अपनी समाज-कल्याण संबंधी योजनाओं को पूरा करने के लिए भी श्रेणियों की वित्तीय स्थिति और साख का लाभ उठाने का प्रयास करते रहते थे—
‘ये श्रेणियां बैंक का कार्य करती थीं, और इनको इतना टिकाऊ एवं चिरस्थायी माना जाता था कि स्वयं राजा या राजपुरुष भी इनके पास अक्षयनिधि (न लौटाया जाने वाला धन) रखा करते थे. धन को जमा करने की बात को निगम-सभा के सम्मुख भी सुनाया जाता था.20
सामूहिक सहमति और सर्वकल्याण की भावना के आधार पर गठित उन व्यापारिक संगठनों को व्यापक अधिकार प्राप्त थे. किंतु यह आधिकारिता तभी तक मान्य थी, जब तक कि समूह अपने और राज्य के हित में कल्याण के कार्यक्रमों का संपादन करें. उन्हें किसी प्रकार का राष्ट्रविरोधी अथवा जनविरोधी कार्य करने की अनुमति नहीं थी. राजा को ऐसे समूहों पर नियंत्रण करने का शास्त्रोक्त अधिकार प्राप्त था. कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में इन अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या की है. वैसे भी आर्थिक उपलब्धियों को नीति, मर्यादा एवं सामाजिक शुचिता द्वारा नियंत्रित एवं मर्यादित करने की परंपरा भारतीय समाज में आदिकाल से ही रही है, जिसे प्रायः सभी धर्मग्रंथों में सम्मानित स्थान प्राप्त हुआ है. भारतीय परंपरा में अर्थनीति विषयक एक सिद्धांत है, उसके अनुसार—
‘जिस मनुष्य का आर्थिक जीवन शुद्ध है—वह स्वयं भी शुद्ध है.21
इसका सीधा-सा आशय है कि नैतिक पवित्रता के लिए व्यक्ति को अपने आर्थिक जीवन की पवित्रता का ध्यान रखना अत्यावश्यक है. बिना आर्थिक जीवन में पवित्रता लाए सामाजिक जीवन में शुद्धता संभव नहीं है. परोक्ष रूप में यह सिद्धांत जहां मानव जीवन में अर्थ की महत्ता को स्वीकार करता है, वहीं उसकी प्राप्ति के मार्ग को भी मर्यादित करता हुआ चलता है. आर्थिक जीवन में पवित्रता और नैतिक मर्यादाओं पर जोर, ये भावनाएं भारतीय समाज में मौजूद तत्कालीन लोकोन्मुखी व्यवस्थाओं की ओर संकेत करती हैं. साफ है कि उन दिनों भारतीय समाज में सहकारिता भले ही उस रूप में मौजूद न रही हो, जैसा कि हम आज उसको देखते हैं, मगर वह सिद्धांत और भावनात्मक रूप भारतीय चिंतन परंपरा सहकारिता की भावना के बहुत निकट है. यहाँ ध्यान रखना होगा कि प्राचीन समाज में जनसाधारण शैक्षिक रूप में भले ही बहुत अधिक उन्नत न हों—बड़े-बड़े शास्त्रों का अध्ययन-मनन करने में भी वे भले ही असमर्थ रहते हों, किंतु मानव सभ्यता के प्रत्येक कालखंड व्यावहारिक ज्ञान की उनमें प्रचुरता ही रही है. सभ्यता के प्रारंभिक दौर में भी भारतीय समाज में लगभग वे सभी व्यवस्थाएँ मौजूद थीं, जिन्हें समाज कल्याण की अनिवार्यता माना जाता है. जहाँ तक सहकारी समूहों की व्याप्ति की बात है, प्रोफेसर आर.सी. मजूमदार ने 27 प्रकार की समितियों का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत में सहकारी जीवन’ Cooperative Life in Ancient India) में किया है. एक अन्य स्थान पर कात्यायन ने लिखा है कि समितियाँ कई प्रकार की होती थीं और उन्हें कई नामों से पुकारा जाता था. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं एवं राजनीतिक विचार में बौद्ध ग्रंथों के हवाले से लिखा है कि उन दिनों अठारह प्रकार की श्रेणियां थीं. इसी प्रकार कौटिल्य ने भी अर्थशास्त्र में अठारह प्रकार के व्यापार समूहों का उल्लेख किया है, जिनका उस समय के समाज एवं शासन पर व्यापक प्रभाव था.
© ओमप्रकाश कश्यप
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संदर्भानुक्रमणिका
1. गणाः पाषंडपूगाश्च व्राताश्च श्रेणयस्तथा. समूहस्थाश्च ये चान्ये वर्गाख्यास्ते. – बृहस्पतिः. स्मृतिचंद्रिका (व्यवहार) में उद्धृत कात्यायन-वचन. धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड एक, पा. वा. काणे से उद्धृत.
2. हंसा इव श्रैणिशो यतंते यदाक्षिषुर्दिधयमंमश्वा, ऋग्वेद 1.163.10.
3. पूगौ वै रुद्रः. तदेनं स्वेन पूगेन समर्धयति. कौषी. ब्राह्मण, 16.7.
4. तस्मादु ह वै बह्मचारिसंघं चरंतं न प्रत्याचक्षीतापि हैतेष्टेबंविधा एवं व्रतः स्यादिति हि ब्राह्मणम्.
5. The puga and vrata to entities with members that often had economic motivations, but were also residents of an entire town or village devoted to a profession.- Vikramaditya Khanna, in The Economic History of The Corporate Form in Ancient India.
6. ऐपिग्रैफिया इंडिका, जिल्द 2, पृ. 124. आचार्य काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ से उद्धृत.
7. The samgha is generally viewed as referring to political organizations though it might sometimes be used to refer to educational and religious ones (e.g., groups of Buddhist monks).- Vikramaditya Khanna.
8. More generally, the gana and samgha appear to refer to political and religious entities…at The gana may initially have referred only to business people, but later it more often refers to political and religious bodies.- Vikramaditya Khanna.
9. …the nigama was often considered similar to a guild or city and larger than the sreni). -round the time of the Gupta Empire the nigama may have had control over sreni in a region.- Vikramaditya Khanna.
10. नैगमाः पौरवणिजाः. वीरमित्रोदय, प्रष्ठ—120.
11. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार: प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं एवं राजनीतिक विचार, पृष्ठ-273.
12. सब्बे नैगम जानपदे. Jatak vol. 1, Page – 149 तथा नैगमा च एव जानपदा च ते भवं राजा आमन्तयत्तम. दीर्घ निकाय परिच्छेद-दो.
13. बहुउपकार देवस्य च नेगमस्य च. महाबग्ग- 7/1/16
14. Nigama and sreni refer most often to economic organizations of merchants, crafts people and artisans, and perhaps even para-military entities…Of these the sreni, nigama and pani are the ones most frequently engaged in economic activities.- Vikramaditya Khanna.
15. श्रेणि नैगम पाषंड गणानामप्ययं विधिः. याज्ञ.
16. Finally, the pani is often interpreted as representing a group of merchants traveling in a caravan to trade their wares.- Vikramaditya Khanna.
17. धर्मशास्त्र का इतिहास: आचार्य पांडुरंग वामन काणे, खंड प्रथम, पृष्ठ – 124. 18. वही, पृष्ठ – 124.
19. वही, पृष्ठ – 124.
20. डा॓. सत्यकेतु विद्यालंकार: प्राचीन भारत की शासन-संस्थाएं एवं राजनीतिक विचार, पृष्ठ-273.
21. यो अर्थशुचि स सुचिः.