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हिंदी क्षेत्र में पेरियार के दर्शन-चिंतन की दस्तक

सामान्य

उस ईश्वर को नष्ट कर दो, जो तुम्हें शूद्र कहता है। उन पुराणों और महाकाव्यों को नष्ट कर डालो जो ईश्वर को शक्तिशाली बनाते हैं।  यदि कोई ईश्वर वास्तव में दयालु, हितैषी और बुद्धिमान है; तो उसकी प्रार्थना करो।’—सुनहरे बोल, पेरियार, पृष्ठ-44

स्वार्थी सत्ताएं अपने ‘महापुरुष’ भी सुविधानुसार गढ़ती हैं। वे उन्हीं को ‘महान’ घोषित करती हैं, जो उनकी सत्ता को बैधता प्रदान करते हों। इस कोशिश में वास्तविक और पुरोगामी नायक बरबस पीछे ढकेल दिए जाते हैं। इतिहास में इसके अनगिनत उदाहरण हैं। जैसे, साहित्यत्व की कसौटी पर कबीर की काव्य-चेतना तुलसी से कहीं आगे है। मगर मध्यकाल के महाकवि माने गए—तुलसी, जो रामकथा की आड़ में ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना कर—रैदास, कबीर जैसे संत-कवियों की सामाजिक क्रांति पर पानी फेरने का काम करते हैं। उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी के वास्तविक जननायक ज्योतिबा फुले, आयोथी थास, अय्यंकाली, ई. वी. रामासामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर जैसे युगदृष्टा थे।  भारत को आधुनिक और एकीकृत राष्ट्र में ढालने में उनका योगदान किसी भी कांग्रेसी नेता से कहीं ज्यादा था। बावजूद इसके आजाद भारत के ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा गांधी को मिला। डॉ. आंबेडकर को दलितों के नेता; तथा पेरियार को दक्षिण भारत तक सीमित कर दिया गया। परिणामस्वरूप, स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय जनमानस में जन्मी परिवर्तन की चाहत, असमय काल-कवलित होने लगी।

अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में अभिजन वर्ग की इस साजिश के विरुद्ध बहुजन समाज में जागृति आई है। सोशल मीडिया पर बहुजन एकता के अभियान चलाए जा रहे हैं। वर्चस्वकारी अभिजन संस्कृति के समानांतर सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व पर आधारित लोकोन्मुखी जनसंस्कृति की पुनर्स्थापना की कोशिशें निरंतर जारी हैं। ‘फारवर्ड प्रेस’ द्वारा प्रकाशित पुस्तक, ‘पेरियार : दर्शन चिंतन और सच्ची रामायण’ इसी दिशा में महत्वपूर्ण रचनात्मक अवदान है। इसका महत्व इसलिए भी है कि हिंदी पट्टी में पेरियार के बारे में लोगों की जानकारी बहुत सीमित है। अधिकांश उन्हें ‘सच्ची रामायण’ के लेखक के रूप में जानते हैं। वहीं कुछ उन्हें दक्षिण भारत में लंबे समय तक चले हिंदी विरोधी आंदोलन के प्रखर नेता के रूप में।  

पुस्तक को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले खंड में पेरियार के चुनींदा भाषण और वे लेख हैं जिन्हें उन्हें अपनी ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की पत्रिका ‘विदुथलाई’ और ‘कुदीअरासु’ के लिए लिखा था। दूसरे खंड में ‘सच्ची रामायण’ के रूप में रामायण का पुनर्पाठ दिया गया, जो अपने लेखन से आज तक उनकी सर्वाधिक विवादित कृति मानी जाती है। पेरियार की यह पुस्तक उनके रामायण संबंधी विस्तृत अध्ययन का परिणाम है। पुस्तक में कुछ स्थानों पर हालांकि वे सपाट नजर आते हैं। लेकिन रामायण को पढ़ते-पढ़ाते समय आस्थावादी जिस तरह से ‘समर्पण’ की अपेक्षा रखते है, उसे देखते हुए पेरियार का विमर्श काफी बुद्धिवादी सिद्ध होता है।  उनका मानना था कि राम बेहद साधारण व्यक्ति हैं, ‘ये कथाएं(रामायण और महाभारत) एक बार फिर इसलिए थोपी गई थीं कि इनके कथानायकों, उनके रिश्तेदारों तथा सहायकों को अलौकिक और अतिमानवीय माना जाए तथा उन्हें पूज्य मानते हुए जनसाधारण द्वारा उनकी पूजा-अभ्यर्थना कि जाए’(सच्ची रामायण, पृष्ठ 118)।     

प्रसंगवश बता दें कि पेरियार ने ‘सच्ची रामायण’ की रचना की थी, किंतु वे ‘सच्ची रामायण’ लिखकर ‘पेरियार’(महान) नहीं बने थे। यह पुस्तक उनके रचनात्मक अवदान का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। इसमें रामकथा नहीं है। बल्कि रामायण के प्रमुख पात्रों के चरित्रों की साहसी और तर्कसम्मत समीक्षा है। ‘रामायण’ तथा उसके कथापात्रों प्राय: आस्था और विश्वास को केंद्र में रखकर किया जाता है। आकादमिक विमर्श भी लोक-आस्था से बंधे होते हैं। इसलिए ‘सच्ची रामायण’ पढ़ते समय आस्थावान हिंदू-मनस् में उसके लेखक के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण बन जाता है। श्रद्धा के आवेग में पाठक भूल जाता है कि पेरियार अपने समकालीनों में सर्वाधिक बुद्धिवादी और सबसे लोकप्रिय नेता थे। उनकी लोकप्रियता के मूल में थी, भारतीय समाज की ‘यूटोपियाई’ संकल्पना। लाभ-हानि, यश-अपयश की चिंता किए बगैर, उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत रहना। आदर्श समाज संबंधी पेरियार की संकल्पना, सहअस्तित्व और ज्ञान-विज्ञान की नींव पर टिके समाज की थी। अंध-श्रद्धा स्वार्थपरता का दूसरा नाम है। वह न केवल समाज, अपितु व्यक्ति के अपने विकास के लिए भी अपकारी सिद्ध होती है— 

‘अंध श्रद्धालु….मान लेते हैं….जो उन्होंने सीखा है, वही एकमात्र सत्य है।  बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है।  वे ज्ञानार्जन को महत्व देते हैं।  अनुभव से काम लेते हैं। उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं। ’(भविष्य की दुनिया, पृष्ठ-29)

अंध-श्रद्धा के नाम पर तर्क और विवेक को किनारे कर देने का मामला साधारण श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं है। धर्माचरण के क्षेत्र में जो जितना बड़ा है, वह उतना ही भीरू और आडंबरवादी हैं—

‘हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी; धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं। यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये जनता को सदियों पीछे धकेल भी चुके हैं। बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को। उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है।’(भविष्य की दुनिया, पृष्ठ-30)

आलेखों की श्रेणी में ‘भविष्य की दुनिया’ को प्रथम स्थान पर रखना संपादकीय बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। असल में यही वह दरवाजा है जिससे गुजरकर पेरियार को समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में पेरियार के समाज और धर्म से संबंधित विचारों को समझने के लिए पहले खंड के आलेख कुंजी का काम करते हैं। ‘भविष्य की दुनिया’ को पढ़ते समय लगता है मानो कोई सैद्धांतिक भौतिकवादी जीवन-जगत में ज्ञान-विज्ञान के नैतिक अनुप्रयोग की संभावनाओं पर विचार कर रहा हो। इस लेख पर टिप्पणी करते हुए अंग्रेजी समाचारपत्र ‘दि हिंदू’ ने पेरियार को ‘बीसवीं शताब्दी का एच. डी. वेल्स’ कहा था। इसमें वे ऐसे कई आविष्कारों की परिकल्पना करते हैं, जो आज हमारे रोजमर्रा की जीवन का हिस्सा हैं—

‘यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र गति से काम करेंगे।  संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी।  सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे।  रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है। छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे। दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों। आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा। शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा। एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे। ’(पृष्ठ-36)

पेरियार के धर्म, दर्शन और ईश्वर संबंधी विचारों को जानने के लिए भी पुस्तक में काफी सामग्री है।  उनके एक भाषण को ‘दर्शनशास्त्र क्या है’ शीर्षक से संकलित किया गया है।  यह भाषण उन्होंने सलेम विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत किया था। उसे पढ़ते समय हम पेरियार के अंदर मौजूद तर्कवादी से रू-ब-रू होते हैं। इसमें वे ईश्वर, आत्मा, जीवन, मानव-प्रकृति आदि की समीक्षा करते हैं। अपनी सहज, प्रवाहपूर्ण भाषा में, बिना भारी-भरकम शब्दों की मदद के,  वे धर्म और आडंबरवाद का अंतर स्पष्ट कर देते हैं।  

पेरियार स्वयं-घोषित नास्तिक थे, किंतु उनकी नास्तिकता धर्म-दर्शन की उथली समझ की देन नहीं थी। तर्कवादी दार्शनिक की तरह वे ईश्वर, आत्मा, धर्म आदि उन सभी प्रतीकों पर गहन चिंतन करते हैं, जिनमें विश्वास के कारण किसी मनुष्य को आस्थावादी मान लिया जाता है—

‘यदि यह सत्य है कि ईश्वर का साक्षात्कार तथा उसकी प्राप्ति केवल धर्म के माध्यम से संभव है, तो उसके लिए इतने सारे धर्म क्यों होने चाहिए? क्या धार्मिक और दिव्यात्मा मनुष्यों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए?….धार्मिक युद्धों का औचित्य क्या है? धर्म के नाम पर इतने नरसंहार क्यों होते हैं….मनुष्यता को इतने सारे कष्ट और पीड़ाएं क्यों झेलनी पड़ती हैं? कहा जा सकता है कि ये किसी दैवी शक्ति की देन न होकर मनुष्य की अज्ञानता के कारण उत्पन्न हुई हैं। ’(दर्शनशास्त्र क्या है, पृष्ठ-82)

पेरियार के लिए धर्म पुरोहित वर्ग की राजनीति है। धर्म के नाम पर रचा गया साहित्य उसे मान्यता प्रदान करता है। वे रामायण को धार्मिक ग्रंथ मानने से भी इन्कार करते थे।  उनका कहना था कि ‘ब्राह्मणवादियों का साहित्य अज्ञानता का साहित्य है’(पृष्ठ-57)।  मनुष्य की विवेकशीलता के लक्षणों यानी तर्क, विवेक तथा ज्ञान-विज्ञान से उसका कोई नाता नहीं है। धर्म की आड़ में सामाजिक भेदभाव, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी आदि को दैवीय ठहराकर, वास्तविक समस्या से किनारा कर लिया जाता है। धर्म जाति का सुरक्षा-कवच है। पेरियार ‘रामायण’ को साहित्यिक कृति मानने से इन्कार करते हैं। उनके अनुसार वह ‘मनु की संहिता की तरह’(पृष्ठ-58) राजनीतिक कृति है।  

धर्म का सहारा लेकर ब्राह्मणों ने खुद को समाज के शिखर पर, तथा बाकी वर्गों को एक किसी न किसी रूप में दास बनाए रखा। गौरतलब है कि जातीय संरचना में दासता पिरामिडीय आकार लिए होती है। जैसे-जैसे पिरामिड के आधार की ओर जाते हैं, दासता का अनुपात उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है।  इसलिए पेरियार जब कहते हैं कि इस ‘‘इस देश को जाति-व्यवस्था द्वारा बरबाद कर दिया गया है’—तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होता।  इसके लिए वे ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहराते हैं।  उनके अनुसार—

‘ब्राह्मण आपको ईश्वर के नाम पर मूर्ख बना रहे हैं। वे आपको अंधविश्वासी बनाते हैं। वे अस्पृश्य के रूप में  आपकी निंदा कर, बहुत ही आरामदायक जीवन जीते हैं। वे आपकी तरफ से भगवान को प्रार्थना करके खुश करने के लिए आपके साथ सौदा करते हैं। मैं इस दलाली के व्यवसाय की दृढ़तापूर्वक निंदा करता हूं।’(सुनहरे बोल, पृष्ठ-44)

भारतीय समाज की जातीय संरचना तथा उसके विरोध में पेरियार के जीवनपर्यंत संघर्ष को समझने के लिए वी. गीता द्वारा लिखित भूमिका, ‘जाति का विनाश और पेरियार’ एक दस्तावेजी रचना है। उससे पता चलता है कि पेरियार किस तरह एक ही समय में, कई अलग-अलग मोर्चों पर, एक साथ लड़ रहे थे—

‘यद्यपि मैं पूरी तरह से जाति को खत्म करने को समर्पित था, लेकिन जहां तक इस देश का संबंध है, उसका एकमात्र निहितार्थ था कि मैं ईश्वर, धर्म, शास्त्रों तथा ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए आंदोलन करूं।  जाति का समूल नाश तभी संभव है जब इन चारों का नाश हो….केवल आदमी को गुलाम और मूर्ख बनाने के बाद ही जाति को समाज पर थोपा जा सकता था। ’(जाति का विनाश और पेरियार, पृष्ठ-3)

पेरियार स्त्री समानता के प्रबल पक्षधर थे। पुस्तक में उनके दो आलेख ‘पति-पत्नी नहीं, बनें एक-दूसरे के जीवनसाथी’ तथा ‘महिलाओं के अधिकार’ शामिल किया गया है। जिस दौर में तिलक जैसे नेता सामाजिक सुधारों को ‘राष्ट्रवाद के लिए खतरा’ मान रहे थे। यह कहकर कि ‘स्त्री का दिमाग पुरुष के दिमाग से औसतन 5 औंस कम होता है’(महराट्टा 13 नवंबर 1887) तिलक अपने अजब-गज़ब विज्ञानबोध का परिचय दे रहे थे—पेरियार महिलाओं के लिए समान अवसर और बराबरी कि मांग कर रहे थे। ऐसे समाज में ‘महिलाओं के अधिकार’ की बात कर रहे थे, जिसमें ‘जमींदार अपने नौकरों और ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरुष उससे भी बदतर व्यवहार अपनी स्त्री के साथ करता है…महिलाएं हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं’(पृष्ठ-103)।

पेरियार ‘पति और पत्नी जैसे शब्दों को अनुचित मानते थे, ‘वे एक-दूसरे के साथी और सहयोगी हैं। गुलाम नहीं। दोनों का दर्जा समान है’(पृष्ठ-109)। यही कारण है कि स्त्रियां उन्हें ‘पेरियार’(महान) कहकर बुलाती थीं।

कुल मिलाकर प्रस्तुत पुस्तक ई. वी. रामास्वामी पेरियार और उनके माध्यम से भारतीय समाज की ग्रंथियों से साक्षात करने का अवसर देती है। पेरियार के आंदोलन का केंद्र मुख्यतः दक्षिण भारत था। परंतु जिन परिस्थितियों और संघर्षों का उल्लेख इस पुस्तक में हुआ है, वे पूरे भारत में एक समान थीं। इसलिए इस पुस्तक कि जितनी महत्ता दक्षिण भारत को समझने के लिए है उतनी ही शेष भारत के लिए भी है।

‘फारवर्ड प्रेस’ की बाकी पुस्तकों की तरह इस पुस्तक का प्रकाशन भी स्तरीय है। मुद्रण त्रुटिविहीन है। कुल मिलाकर पुस्तक में पेरियार के बहाने, हिंदी भाषी पाठकों के मानस को मथने के लिए भरपूर खुराक मौजूद है। यह ऐसी पुस्तक है जिसे बिना किसी पूर्वाग्रह के, हर हाल में पढ़ा जाना चाहिए।   

ओमप्रकाश कश्यप

पुस्तक का नाम : पेरियार: दर्शन चिंतन और सच्ची रामायण(पेरियार के मूल लेखों का चयनित संकलन)

प्रकाशक का नाम : फारवर्ड प्रेस 

पता : 803, दिपाली बिल्डिंग, 92 नेहरू पेलेस

  नई दिल्ली-110019

मूल्य : 400 रुपये

पेरियार और बुद्ध : धर्माडंबर और जाति-मुक्ति संघर्ष की 2500 वर्ष लंबी परंपरा

सामान्य
जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां हैं, वे इस देश में अच्छे स्थान नहीं हैं. जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां नहीं हैं, वे ही इस देश में अच्छे स्थान हैं.1—मातंग जातक(497).

 

पेरियार और गौतम बुद्ध के बीच करीब ढाई हजार वर्षों का अंतराल है. जिन दिनों बुद्ध का जन्म हुआ था, वैदिक कर्मकांड और धर्माडंबर अपने चरम पर थे. यज्ञ, पूजा-पाठ आदि के नाम पर राजाओं से भरपूर समिधा हासिल करना, इन्कार करने या असमर्थता जताने पर शाप द्वारा लोक-परलोक बिगाड़ने की धमकी देना. मनोवांछित समिधा प्राप्त होते ही राजा के हर कुकर्म को सुकर्म घोषित कर देना, फिर हजारों पशुओं की बलि एक साथ चढ़ा देना—ब्राह्मण पुरोहितों के लिए बिलकुल सामान्य था. आतंक ऐसा था कि किसी भी सम्राट को वे धर्म के नाम पर मनमाने आचरण के लिए विवश कर सकते थे. धर्माडंबर और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन में बड़े-बड़े शास्त्र गढ़े जा रहे थे. उन्हें पढ़ने का अधिकार सिवाय ब्राह्मणों के किसी को न था. वे उनकी मनमानी व्याख्या करते थे. बावजूद इसके उन्हें तत्कालीन राजसत्ताओं का संरक्षण प्राप्त था. उनके धुर विरोधी के रूप में आजीवक और लोकायत जैसे भौतिकवादी चिंतक थे, जिनका संबंध समाज के मेहनतकश लोगों तथा शिल्पकार समूहों से था. यज्ञ के नाम पर बलि चढ़ाना, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे वायवी विषयों पर बहस करना उन्हें नापसंद था.

बुद्ध राजसत्ता और परिवार का मोह त्यागकर युवावस्था में परिव्राजक बने थे. राजकुल से संबंधित होने के कारण उनका तत्कालीन राजाओं के बीच अतिरिक्त सम्मान था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब उन्होंने धर्मोपदेश देना आरंभ किया तो मगध, उज्जैनी सहित उस समय के सभी बड़े राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का भरपूर सहयोग एवं समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ. बुद्ध के प्रति राजाओं के आकर्षण का कारण यह भी था कि अनेक राजा ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा यज्ञादि के नाम पर पशुधन और दूसरे संसाधन ऐंठने से तंग आ चुके थे. यज्ञों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता था. बुद्ध ने यज्ञों का विरोध कर व्यावहारिक नैतिकता पर जोर दिया. उन्होंने वेदों को अपौरुषेय और आप्तग्रंथ मानने से भी इन्कार कर दिया. तत्कालीन बुद्धिजीवी समाज में बहस का बड़ा मुद्दा आत्मा, परमात्मा, ईश्वरादि को लेकर था. दर्शन की इन समस्याओं पर लोग शताब्दियों से बेनतीजा बहस करते आए थे. आत्मा-परमात्मा में विश्वास रखने वाले उनकी सत्ता को पूर्व-निष्पत्ति मान लेते थे. उस अवस्था में बहस उनके अस्तित्व तथा औचित्य के बजाय, स्वरूप और विस्तार को लेकर रह जाती थी. दूसरा वर्ग बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता था. वह उनके अस्तित्व एवं औचित्य सहित हर पहलू पर विचार करना चाहता था. दोनों परस्पर विपरीत-ध्रुवी विचारधाराएं थीं. इतनी कि उनके बीच संवाद का कोई उदाहरण पूरे संस्कृत वाङ्मय में नहीं मिलता. बुद्ध ने उनके बीच का रास्ता अपनाया. आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य जैसी बहसों में उलझने के बजाए उन्होंने, व्यक्तिगत एवं सामाजिक शुचिता को अपने धर्म-दर्शन का केंद्र-बिंदू बनाया, जिसका उन दिनों सामाजिक जीवन से लोप हो चला था.

ढाई हजार वर्ष पहले यानी बुद्ध के जन्म के समय वर्ण जाति में ढलने लगे थे. परिणामस्वरूप पचासियों जातियां अस्तित्व में आ चुकी थीं. जन्म के आधार पर भेदभाव करने वाली उस व्यवस्था को बुद्ध ने अनैतिक, अनुचित तथा जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक माना तथा उसकी आलोचना की. अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत के बजाए उन्होंने पालि में उपदेश दिए, जो उन दिनों जनसाधारण की भाषा थी. उस समय तक जातीय अभिमान के मारे ब्राह्मण स्वयं को आश्रमों तक सीमित रखते थे. शेष समाज से उनका संबंध दानादि ग्रहण करने तक सीमित था. बुद्ध अपने विचारों को लेकर सीधे आमजन के बीच गए. भिक्षु-संघ की स्थापना की तो उसके दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए. जाति-आधारित भेदभाव को वे बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की राह में बाधक मानते थे—

‘अंबट्ठ! जो भी जातिवाद में बंधे हैं, गोत्रवाद में बंधे हैं, (अभि)मानवाद में बंधे हैं, आवाह-विवाह में बंधे हैं, वे अनुपम विद्या-चरण-संपदा से दूर हैं. अंबट्ठ! जातिवाद बंधन छोड़कर, गोत्रवाद बंधन छोड़कर, मानवाद बंधन छोड़कर, आवाह-विवाह बंधन छोड़कर ही अनुपम विद्या-चरण-संपदा का साक्षात्कार किया जा सकता है.’2

वेदों को अपौरुषेय न मानने, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों पर मौन साध लेने के कारण बौद्ध दर्शन की गिनती नास्तिक दर्शन के रूप में की जाती है. इसके आधार पर कुछ विद्वान उसे आजीवक और लोकायत दर्शन की तरह ही, भौतिकवादी दर्शन मानते हैं. लेकिन वह उच्छ्रंखल भौतिकवाद न था. हम उसे आदर्शोन्मुखी व्यवहारवाद कह सकते हैं जिसमें सामाजिक समानता, शुचिता एवं आचरण की पवित्रता प्रमुख थी. बुद्ध के विचारों का इतना असर हुआ कि वैदिक कर्मकांडों से आमजन का विश्वास घटने लगा. यज्ञ और दानादि के नाम पर ऋषियों की मांगों और धमकियांे तंग आ चुके राजा बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़ने लगे. उसके फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म कुछ शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जातीय भेदभाव कमजोर पड़ने लगा. अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ने से ब्राह्मणधर्म को पुनर्वापसी का अवसर मिला. इसी दौर में पुराणों एवं स्मृति-ग्रंथों की रचना हुई. उसके बाद इतिहास ने अनेक करवटें लीं. राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्राह्मणवाद निरंतर मजबूत और निरंकुश होता चला गया.

बुद्ध पहले विचारक थे, जिन्होंने समाज को धर्म के आधार पर संगठित करने की कोशिश की थी. वैदिक धर्म के प्रस्तोता जातीय दंभ के शिकार थे. आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा में वे बाकी जनसमाज से अलग-थलग जीते थे. जनसाधारण के सुख-दुख की उन्हें परवाह न थी. जाति और वर्ण के नाम पर उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को मुख्यधारा से अलग किया हुआ था. अपने आश्रमों में बंद ऋषिगण धर्म और यज्ञादि के नाम पर क्या करते हैं? बलि चढ़ाने से उन्हें क्या हासिल होता है—जनसाधारण को इसकी बहुत परवाह भी नहीं थी. ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की उपेक्षा की परवाह न करते हुए साधारण जन आजीवकों और लोकायतों पर विश्वास करते थे, जो उस समय भौतिकवादी दर्शन की प्रमुख शाखाएं थीं. वैदिक परंपरा संसार को नकारकर, काल्पनिक, भ्रममूलक देवलोक को परम-सत्य मानती थीं. आजीवकों और लोकायतों के लिए जीती-जागती, जीवनदायिनी प्रकृति ही सबकुछ थी. वे अपने श्रमकौशल के भरोसे जीवन-यापन करने वाले बहुसंख्यक लोग थे. चूंकि धर्म-केंद्रित समाज की रचना का संकल्प सामाजिक शुचिता के बगैर असंभव था. इसलिए बुद्ध ने आदर्शोन्मुखी नैतिकता पर जोर दिया. धार्मिक आडंबरों, यज्ञ-बलियों एवं जाति-प्रथा को अनावश्यक मानते हुए उन्होंने निस्पृह और कल्याणोन्मुखी जीवन जीने का उपदेश दिया. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशु-धन का विशेष महत्त्व था. यज्ञादि कर्मकांडों के विरोध का सीधा-सा अभिप्राय था, उपयोगी पशुधन की जीवनरक्षा. इसके फलस्वरूप लोग उनके धर्म की ओर आकृष्ट होने लगे.

 

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पेरियार के समय तक जाति-व्यवस्था उग्र रूप धारण कर चुकी थी. अछूतों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषिद्ध था. कथित ऊंची जाति के सदस्यों का स्पर्श तो दूर, अपनी छाया से भी उनको बचाना पड़ता था. शूद्रों को उनके कार्य के अनुसार थोड़ी छूट थी, परंतु वे भी एक सीमा तक ही उच्च जातियों के निकट जा सकते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त छूआछूत के बारे में वर्णन किया है. डू. बोइस के हवाले से वे उनीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में दक्षिण भारतीय समाज के बारे लिखती हैं—‘मालाबार तट पर रहने वाली ‘पुलाया’ जाति के सदस्यों को अपने लिए घर बनाने का अधिकार नहीं है. रहने के लिए वे लोग दरख्तों पर घौंसले की भांति, बांस-बल्लियों के सहारे, पत्तों की छत डाल सकते हैं.’ डू. बोइस के अनुसार, उन दिनों यदि कोई नैय्यर किसी पुलाया को सड़क पर देख लेता तो उसे वहीं मार देने का अधिकार था. बातचीत के दौरान दो व्यक्तियों के बीच दूरी से भी अस्पृश्यता के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता था. पुलाया को नैय्यर जैसे उच्च जाति के हिंदुओं से 60 से 90 फुट की दूरी रखकर बात करनी पड़ती थी.

पेरियार ने बचपन से जाति-आधारित भेदभाव का अनुभव किया था. बड़े हुए तो उन्हें इसका कारण भी समझ में आने लगा. उनका जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था. शिक्षा के नाम पर वे बस दो-तीन वर्ष ही पाठशाला जा पाए थे. बाद में पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. उन दिनों उनके घर में संन्यासियों, शैव-मतावलंबियों, वैष्णवों, पंडितों आदि का खूब आना-जाना था. किशोर पेरियार उन्हें अधिकाधिक दान-दक्षिणा के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हुए देखते. कभी-कभी वे उनका मजाक भी उड़ाते. बावजूद इसके अपनी युवावस्था तक ईश्वर में उनकी आस्था बनी रही. 1925 में उन्होंने संन्यासी के रूप में बनारस की यात्रा की. यात्रा के दौरान वे बनारस में जहां-जहां गए, वहां ब्राह्मणवाद का विकृत चेहरा, धर्म के नाम पर लूट-खसोट और वृथा आडंबरों से सामना हुआ. जातीय भेदभाव का अनुभव तो उन्हें बचपन से ही था. बनारस यात्रा के बाद उनका धर्म से भी विश्वास उठ गया. उसके बाद नए पेरियार का जन्म हुआ, जो तर्कवादी था. ज्ञान-विज्ञान पर जोर देता था. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करता था. आस्था के आधार पर कुछ भी मान लेना उसे अस्वीकार्य था. हर स्थापित सत्य पर संदेह करना, उसे अपने विवेक की कसौटी पर कसना और खरा उतरने के बाद ही उसे स्वीकार करना, उसकी आदत में शुमार हो चुका था.

पेरियार ने आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य, भाग्य आदि को सीधे नहीं नकारा. अपितु तर्क पर जोर दिया. इस मामले में बुद्ध उनके प्रेरणा-पुरुष रहे. प्राचीन भारत के इतिहास में बुद्ध कदाचित पहले शास्ता थे जिन्होंने वैचारिक स्वतंत्रता को आगे रखते हुए अपने शिष्यों से कहा था—‘अप्पदीपो भवः.’ दूसरों की बातों में आने के बजाय, सोच-विचारकर स्वयं निर्णय लो. धर्म-दर्शन और जाति पर दिए गए अपने व्याख्यानों में पेरियार भी आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. उनके अस्तित्व पर ध्यान देने के बजाए औचित्य पर विचार करते हैं. 1947 में सलेम कॉलिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने इन विषयों की वैज्ञानिक पड़ताल की थी. उन्होंने सिद्ध किया कि ये सभी मिथ समाज पर सोची-समझी नीति के तहत थोपे गए हैं. सहअस्तित्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं निस्पृह जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती. उस व्याख्यान में वे बुद्ध का नाम नहीं लेते; परंतु उनका प्रत्येक निष्कर्ष उन्हें बुद्ध के करीब ले जाता है—

‘मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है. वह अपने लालच का दास का है. समाज में रहकर वह दूसरों के लिए या तो अच्छा कर सकता है अथवा बुरा. कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है. मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा. यह भी एक मिथ मात्र ही है. तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता. उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.’3

बुद्ध के ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ की तरह पेरियार ने भी लोगों से बार-बार यह आग्रह किया—‘मैंने जो कहा वे मेरे व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि आप भी इनपर विश्वास करें. इसलिए खूब सोचें और स्वयं सार्थक निर्णय तक पहुंचे.’

एक और सूत्र जो पेरियार को बुद्ध के करीब ले जाता है, वह है—जाति व्यवस्था को लेकर दोनों का समान दृष्टिकोण. बुद्ध का जन्म नागवंशीय शाक्य कुल में हुआ था. बाकी क्षत्रियों की अपेक्षा उसे कुछ हीन माना जाता था. अश्वघोष उनका संबंध इक्ष्वाकू वंश से जोड़ते हैं. बौद्ध साहित्य के गंभीर अध्येता कोसंबी के अनुसार शाक्य एक जनजाति थी. बुद्ध ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया था. भिक्षु संघों के दरवाजे उन्होंने सभी जातियों के लिए खोले हुए थे. लेकिन ‘अंबट्ठसुत्त’(दीघनिकाय) में वे जिस तरह क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताने के लिए तर्क देते हैं, उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि उन्हें अपने क्षत्रीय कुलोत्पन्न होने पर गर्व था; या कम से कम वर्ण-व्यवस्था से उन्हें कोई शिकायत न थी. बुद्ध द्वारा धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति-प्रथा के विरोध का इतना असर अवश्य हुआ था कि बौद्ध धर्म को जनता ने अपना धर्म मान लिया. उसके फलस्वरूप समाज में जाति-आधारित कटुताओं में भी कमी आने लगी. परंतु जाति और उसके आधार पर हो रहे भेदभाव के विरोध में बड़ा आंदोलन न चलाने के कारण, जातिवादी शक्तियां भीतर ही भीतर सक्रिय बनी रहीं. लोगों को ब्राह्मण धर्म की ओर वापस मोड़ने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवी पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों आदि ग्रंथों की रचना में जुट गए. अशोक द्वारा उठाए गए कदमों के फलस्वरूप बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचा. मगर उसके तुरंत बाद, मौर्य वंश के कमजोर पड़ते ही, ब्राह्मणवाद पुनः जड़ जमाने लगा. ‘मनुस्मृति’ की रचना हुई. जातीय भेदभाव और दुराग्रह जो बुद्ध के प्रभाव दब-से गए थे, वे पुनः सामने आने लगे.

 

3

पेरियार के समय तक लगभग सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी में पश्चिम में हुई वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप, भारत में भी मानव-मात्र की समानता और स्वतंत्रता की समर्थक नई विचार-चेतना का जन्म हुआ था. यह मानते हुए कि राजनीति सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, राजगोपालाचार्य के आग्रह पर पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए थे. प्रदेश कांग्रेस के उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने नेताओं का मन बदलने की पूरी कोशिश की थी. मगर थोड़े ही समय में उन्हें विश्वास हो गया कि कांग्रेस के नेता अपने जातीय दुराग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. खासतौर पर जातीय विषमता को मिटाने के लिए कांग्रेसी नेता कुछ नहीं करना चाहते. यहां तक कि गांधी भी जातीय पूर्वाग्रहों में फंसे हुए हैं. खिन्न होकर 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. लोगों में आत्माभिमान का भाव पैदा करने के लिए उन्होंने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नींव रखी. उस समय तक धर्म को नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत माना जाता था. लोगों का विश्वास था कि केवल धर्म के सहारे समाज को एकसूत्र में बांधकर रखा जा सकता है. पेरियार किसी नए धर्म के बंधन में बंधना नहीं चाहते थे. तमिल जनता में अपनत्व एवं एकजुटता की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आधार बनाया. लोगों को समझाया कि समाजीकरण की बुनियाद पारस्परिक सहयोग और समर्पण पर टिकी होती है. पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों आदि की रचना स्वार्थी ब्राह्मणों ने लोगों को भरमाने के लिए की है. जाति-व्यवस्था को दैवीय बताने वाले धर्मग्रंथों में शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए अपमानजनक स्थितियां हैं—‘बौद्धों और जैनियों ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाई गई कुरीतियों को कुछ समय के लिए समाप्त कर दिया था. उन्होंने बताया था कि सभी लोग बराबर हैं. आपसी प्रेम और भाईचारा ही असली ईश्वर हैं. ब्राह्मणों को वह स्वीकार नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उनके सभी कार्यों पर पानी फेर दिया.’4 लोगों को ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से निकालकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना, उनके भीतर सम्मानजनक जीवन जीने की चाहत पैदा करना पेरियार की प्रमुख चुनौती थी. फुले इसकी नींव बहुत पहले डाल चुके थे. ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की शुरुआत का भी यही उद्देश्य था.

पेरियार आस्थावान व्यक्ति नहीं थे. उनका विश्वास ज्ञान-विज्ञान में था. अरस्तु की तरह वे भी मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते थे. बावजूद इसके उन्होंने धर्म की शक्ति को नकारा नहीं था. लेकिन उनका धर्म मानव-मात्र के कल्याण का उद्यम था, जिसमें किसी देवता या आत्मा-परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं था. आजीवन वे इस पर विचार करते रहे कि मनुष्य को धर्म और धर्मशास्त्रों के मकड़जाल से बाहर कैसे निकाला जाए! यह आसान काम नहीं था. क्योंकि मानव जीवन में धर्म की व्याप्ति केवल पूजा-पाठ या संस्कारों तक सीमित नहीं रहती. ऐसे लोग भी जो मंदिर नहीं जाते, पूजा-पाठ तथा दूसरे आडंबरों से दूर रहते हैं; और ऐसे भी जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं—दिलो-दिमाग से दकियानूसी हो सकते हैं. लोकजीवन का हिस्सा बन चुके विभिन्न संस्कार, आचार-विचार और रूढि़यां, संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मान लिए कर्मकांड यहां तक कि उनसे जुड़े किस्से-कहानियां भी—किसी न किसी रूप में धार्मिक जड़ता के संवाहक हैं. उनकी रचना जातिभेद और सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय सिद्ध करने के लिए की गई है. 2400 वर्ष पहले अरस्तु ने भी तो यही कहा था, ‘मनुष्य ने ही ईश्वर को रचा है. अपने रूपाकार में, और अपनी जीवनशैली के अनुरूप भी.’ ब्राह्मण खुद को सर्वोपरि मानते हैं. वे चाहते हैं कि शेष जनसमाज उनके इशारे पर नाचे. जो ऐसा नहीं करता उसे वे शाप देने की धमकी दिया करते थे. उनका गढ़ा हुआ ईश्वर भी खुद को भक्तों से ऊपर मानता था; जो उसकी चापलूसी(भक्ति) से आनाकानी करे, उसे वह दंड देने को उतावला रहता था.

बौद्ध धर्म के रास्ते सामाजिक शुचिता की वापसी का रास्ता पेरियार से पहले दक्षिण भारत में आइयोथि थास भी दिखा चुके थे. उनका मानना था कि दक्षिण की पेरियार जाति के लोग मूलतः बौद्ध हैं और वे दक्षिण के मूल निवासी हैं. आर्य हमलावरों ने उनके धर्म और संस्कृति को उनसे छीन लिया है. थॉस के प्रभाव में केरल की जाति इझ़वा अपना संबंध गौतम बुद्ध से वंश से जोड़ने लगी थी. मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम द्रविड़नाडु करने की मांग के समय पेरियार ने भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, आदि द्रविड़ और बौद्ध सभी द्राविड़ हैं.5 थॉस की भांति पेरियार भी ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक थे. जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के लिए उन्होंने तमिलवासियों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आग्रह किया था. उसके पीछे भी बौद्ध धर्म की प्रेरणा थी. 13 जनवरी 1945 के ‘कुदी अरासु’ के अंक में उन्होंने लिखा था कि यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन करने के लिए ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया था तो ठीक यही नीति आर्यों ने भी भारत के मूल निवासियों पर राज करने के लिए अपनायी थी. उन्होंने यहां के बहुसंख्यकों को पिछड़ों और अछूतों में बांट दिया. पेरियार का कहना था—‘विश्वासघातियों का शिकार मत बनिए….राम और कृष्ण जैसे नायक तथा गीता, रामायण जैसे धर्मग्रंथ, बौद्ध धर्म के प्रति हमारे विश्वास को मिटाने के रचे गए हैं.’ उन्होंने आगे कहा था—

‘आंबेडकर जब मद्रास आए थे तब मैंने उन्हें 1923 में भारी जनसभा के सामने दिए गए अपने भाषण के बारे में बताया था कि जब तक कोई रामायण का दहन नहीं करता, तब तक छूआछूत पर सार्थक प्रहार संभव नहीं है.’6 10 जनवरी 1947 को ‘कुदीअरासु’ में उन्होंने फिर लिखा था कि जैसे ‘बुद्ध और गुरुनानक वेदों को धर्मशास्त्रों को पूरी तरह मिथ्या बताते थे, केवल हम द्रविड़जन ही वैसा कहने का साहस कर पाते हैं.’7

27 मई 1953 को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेरियार ने अपने अनुयायियों को उसे उत्सव की तरह मनाने का आवाह्न किया था. उन्होंने कहा था कि इस अवसर पर वे मूर्ति पूजा का बहिष्कार करें. विघ्नेश्वर, गणपति, गजपति, विनायक आदि कहे जाने वाले गणेश की मूर्तियों को तोड़कर बहा दें. बौद्ध जयंती वैदिक परंपरा के धुर विरोधी की जयंती है. इस देश में हजारों देवी-देवता है. इसलिए ऐसा व्यक्ति जो विवेक से काम लेता है, तर्क को महत्त्व देता है, जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है तथा जिसे मनुष्यता में भरोसा है वह स्वयं ही बुद्ध कहलाने योग्य है. यह दिखाने के लिए कि मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा है, उसमें कोई दैवी शक्ति नहीं है, पेरियार ने तमिलनाडु के कई शहरों में मूर्ति तोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था. मूर्ति-पूजा और धार्मिक कर्मकांडों का बहिष्कार, सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता से मुक्ति, उनके ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था. ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने भी मूर्ति पूजा की निंदा की थी. धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों एवं जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना करते हुए उन्होंने पंचशील और अष्ठांग मार्ग का प्रतिपादन किया जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक जीवन की शुचिता पर जोर देता था. बुद्ध ने दिखाया था कि किसी भी समाज में शुभत्व की मौजूदगी, इसपर निर्भर करती है कि उसके सदस्य अपने जीवन में शुचिता एवं सौहार्द्र को लेकर कितने गंभीर हैं. उसके लिए किसी धर्माडंबर की आवश्यकता नहीं है. पेरियार के भाषणों का लोगों पर अनुकूल असर पड़ा. लोग धर्म के सम्मोहन से बाहर निकलने लगे. आंदोलनकारियों ने अपने-अपने घर से देवताओं की मूर्तियां निकाल फैंकी. तिरुचिरापल्ली के टाउन हॉल के सामने खुले मैदान में सैकड़ों लोगों ने मूर्तियों को तोड़ डाला.

धर्म के प्रति विशेष आस्था न होने के बावजूद पेरियार बुद्ध को अपने विचारों के करीब पाते थे. वे चाहते थे कि लोकमानस बुद्ध के विचारों को जाने-समझे. इसके लिए उन्होंने 23 जनवरी 1954 को इरोद में एक सम्मलेन का आयोजन किया था. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीलोन विश्वविद्यालय, श्रीलंका के बौद्ध संस्कृति केंद्र के प्रोफेसर जी. पी. मल्लाल शेखर ने कहा था कि बुद्ध के विचारों के अनुसरण द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने पेरियार द्वारा समाज सुधार विशेषरूप से धार्मिक जकड़बंदी के प्रयासों से बाहर लाने के प्रयासों की सराहना की थी. उनका मानना था कि तमाम विरोधों एवं अवरोधों के बावजूद समाज सुधार का पेरियार का रास्ता बुद्ध के विचारों से मेल खाता है. सम्मेलन में जाति प्रथा पर भी चिंता व्यक्त की गई थी. ‘अखिल भारतीय शोषित जाति संघ के सचिव और सांसद राजभोज ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित, शूद्र और अन्य जातियां बहुसंख्यक होने के बावजूद तरह-तरह के शोषण की शिकार रही हैं. बौद्ध धर्म जाति-प्रथा को नकारता है. उसके अनुसार समाज में सभी बराबर हैं. जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का कलंक है. सबसे पहले बुद्ध ने ही जाति-प्रथा और धर्माडंबरों का विरोध करते हुए, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सफलता प्राप्त की थी. केवल बौद्ध धर्म से ही इस समस्या का समाधान संभव है. सम्मेलन में पेरियार की प्रशंसा करते हुए कहा गया था कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए कई आंदोलन चलाए हैं. उनके कारण समाज में जाति-विरोधी चेतना का जन्म हुआ है—‘बुद्ध की नीतियां ही आपकी और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नीतियां हैं.’8 उस अवसर पर बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया था. हमेशा की तरह उस सम्मेलन में भी पेरियार ने हिंदू धर्म-दर्शन पर हमला बोलते हुए बौद्ध धर्म की प्रशंसा की थी—

‘हम जो मेहनती और कामगार लोग हैं, हमें नीची जाति में डाल दिया गया है. हम भुखमरी के शिकार हैं. हमारे पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं हैं. हमारे पास रहने को घर भी नहीं हैं. लेकिन ब्राह्मण जो कोई काम नहीं करते, उन्हें सभी प्रकार के सुख और मान-सम्मान हासिल है.’9

सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए पेरियार ने कहा था—

‘‘केवल तुम्हीं वे लोग हो जिन्होंने ये मंदिर बनाए हैं. केवल तुम्हीं हो जिन्होंने इनके लिए दान दिया है. यदि ऐसा है तो क्या हम ईश्वर को जो हमें नीची जाति का और अछूत बताता है, ऐसे ही छोड़ सकते हैं? ‘कृतघ्न ईश्वर! केवल मैंने ही तेरे लिए मंदिर और तालाब बनवाए हैं. केवल मैंने ही तुझपर अपना पैसा बहाया है.’ क्या तुम यह नहीं पूछोगे कि तुम नीची जाति के क्यों हो? तुम्हें छूने में हर्ज क्या है? तुम केवल ब्राह्मण के कहे पर विश्वास करते हो कि यदि तुम ऐसे सवाल उठाओगे तो ईश्वर तुमसे नाराज हो जाएगा.’’10

इरोद सम्मेलन में गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. उसमें कहा गया था—‘आर्यों द्वारा हिंदू धर्मशास्त्रों, पुराणों, महाकाव्यों की रचना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने तथा द्रविड़ों के अपमान, अवमूल्यन तथा उन्हें भरमाए रखने के लिए की गई है, उनका सबका नाश होना चाहिए.’ उसी सम्मेलन में स्वीकृत एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था—‘बुद्ध का जीवन तथा उनके धर्मोपदेश ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नर्क, भाग्यवाद, धार्मिक परंपराओं तथा उत्सवों की मिथ्याचार को उजागर करती हैं; तथा भेदभाव रहित, आपसी सहयोग और बराबरी पर आधारित सामाजिक संरचना का समर्थन करती हैं, तमिलनाडु के सभी लोगों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समूहों को चाहिए कि वे उनके विचारों को, समस्त मानव-समुदाय तक पहुंचाने के लिए आगे आएं.’

पेरियार की बातों को सुनकर रोज नए-नए लोग उनके आंदोलन से जुड़ने लगे. धार्मिक आयोजनों, कर्मकांडों तथा धर्मशास्त्रों में कही गई बातों पर सवाल उठाए जाने लगे. इससे सनातनी हिंदुओं को डर सताने लगा था. वे जानते थे कि धर्म की नींव अज्ञात डर पर टिकी है. मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भी उसी डर का विस्तार है. यदि वह डर ही नहीं रहा तो लोग धर्म की गिरफ्त से बाहर होने लगेंगे. पेरियार लगातार वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. सनातनी हिंदुओं की निगाह में धर्मशास्त्रों आलोचना नास्तिकता थी. स्वाभिमान आंदोलन की राह में अवरोध पैदा करने के लिए उन्होंने एक संगठन का गठन किया था. उस संगठन ने पेरियार तथा उनके दो सहयोगियों टी. पी. वेदाचलम और एम. आर. राधा के विरुद्ध धारा 295 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया. वेदाचलम वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि एम. आर. राधा जाने-माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता. पेरियार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जनभावनाओं को आहत करने का काम किया है. मामले की पहली सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई. अगली सुनवाई के लिए मुकदमा जिला सत्र न्यायालय में पहुंचा. दोनों अदालतों का निर्णय पेरियार के पक्ष में गया. मगर पेरियार के दुश्मन इतने से शांत होने वाले न थे. उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी. अपील की सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1954 को न्यायमूर्ति एन. सोम सुंदरम ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वादी पक्ष की यह आशंका कि पेरियार तथा उनके सहयोगियों के कृत्य से जनभावनाएं आहत होती हैं—सही मानी जा सकती है. लेकिन पेरियार और उनके साथियों ने जो मूर्तियां तोड़ीं उन्हें उन्होंने या तो स्वयं बनाया था अथवा बाजार से खरीदा गया था. वे मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्तियां नहीं थीं. ऐसी मूर्तियों को तोड़ना कानून अपराध नहीं है.

तमिल समाज में जागृति लाने, उसे रूढि़मुक्त करने तथा आत्माभिमान की भावना जागृत करने के लिए पेरियार ने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का सूत्रपात किया था. उसी के एक कार्यक्रम में जनवरी 31, 1954 को उन्होंने मद्रास(अब चैन्नई) में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बुद्ध के विचार हमारे अपने विचारों को लागू करने, आगे बढ़ाने तथा समाज में बढ़ रही विकृतियों के शमन की दिशा में बहुत ही उपयोगी हैं. उसी वर्ष पेरियार अपनी पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ मलेषिया और मयामार गए थे. वहां मेंडले में बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर उनकी भेंट डॉ. आंबेडकर से हुई थी. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे. उन्होंने पेरियार से भी वैसा ही करने को कहा था. इसपर पेरियार ने डॉ. आंबेडकर से आग्रह किया था कि वे धर्मांतरण से बचें. क्योंकि ऐसा करके वे हिंदू धर्म की आलोचना का अधिकार खो देंगे. जड़वादी हिंदू दावा करने लगेंगे कि किसी गैर हिंदू को उनके धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं है. लोग भी उनकी बात पर आसानी से विश्वास कर लेंगे. अपने धर्मांतरण के बारे में पेरियार का कहना था कि वे धर्मांतरण के बजाए हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही उसकी आलोचना करते रहेंगे. हिंदुओं के धर्मांतरण के बारे में उनकी स्पष्ट राय थी—

‘यदि कोई हिंदुओं द्वारा इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म की ओर धर्मांतरण के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उनमें सर्वाधिक संख्या दलितों की होगी. वे धर्मांतरण को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि हिंदू धर्म उन्हें बहुत ही उत्पीड़क नजर आता है. धर्मांतरण द्वारा वे जातीय निरंकुशता से बाहर निकल जाना चाहते हैं. उनमें से बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था के अंतरण द्वारा वे अपनी जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं. दूसरे शब्दों में धर्मांतरण उन्हें घृणित कर्मवाद के दुश्चक्र से मुक्ति दिला सकता है. धर्मांतरण उनमें बेहतरी की उम्मीद जगाता है. उनके भीतर बेहतर पहचान और संपत्ति के बारे में नई चेतना का संचार करता है.’11

उन दिनों चैन्नई में ब्राह्मण अपने स्वामित्व वाले होटलों के आगे ‘ब्राह्मण होटल’ का बोर्ड लगाते थे. इससे लगता था कि ब्राह्मण बाकी जातियों से आगे हैं. पेरियार उस प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे. इसलिए उन्होंने उसके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया. 5 मई 1957 को एक ब्राह्मण होटल के सामने से प्रतीकात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई. 22 मार्च 1958 तक उनका आंदोलन लगातार चलता रहा. पेरियार के साथ 1010 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आखिरकार उनकी जीत हुई. पूरे राज्य में होटल मालिकों को अपने बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाना पड़ा.

फरवरी 1959 में पेरियार उत्तर भारत की यात्रा पर निकले. धार्मिक कूपमंडूकता के मामले में उत्तरी और दक्षिणी भारत में आज भी बहुत अंतर नहीं है. उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पेरियार ने कानपुर, लखनऊ और दिल्ली में बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया था. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपना चुके थे और जातीय उत्पीड़न और अनाचार से बचने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों के काफी लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे थे. पेरियार ने इसकी चर्चा भी अपने भाषण में की थी. उसके बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट ‘विदुथलाई’ के 21 फरवरी 1959 के अंक में प्रकाशित हुई थी. उनका कहना था—

‘शूद्रों और पंचमों, जिन्हें आजकल पिछड़ी जाति और दलित कहा जाता है—के अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें आर्यों द्वारा गढ़े गए धर्म, धर्मशास्त्रों एवं ईश्वर का बहिष्कार करना होगा. जब तक इनकी सत्ता रहेगी, हम जाति को नहीं मिटा सकते. इसी के लिए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. अपने अलावा उन्होंने और बहुत से लोगों को धर्मांतरण कराया था. इसलिए सभी हिंदू धर्म, ईश्वर और जाति से मुक्ति हेतु बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आगे आना चाहिए.’

पेरियार के अनुसार केवल बुद्ध ही थे जिन्होंने समाज में व्याप्त तरह-तरह की ऊंच-नीच के विरोध में सवाल उठाए थे—

‘‘क्या (बुद्ध के अलावा) किसी और ने पूछा था कि समाज में लंबे समय से जातीय भेदभाव क्यों मौजूद है? बुद्ध ने यह सवाल उठाया था. वे राजा के बेटे थे. उन्होंने कई चीजों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने पूछा—‘वह आदमी बूढ़ा क्यों है?’ ‘वह व्यक्ति नौकर क्यों था? वह अंधा क्यों है? बुद्ध ने पूछा था—‘वह आदमी नीच जाति का क्यों है?’ उन्होंने बताया—‘उसे भगवान ने ही ऐसा बनाया है?’ इसपर बुद्ध ने सवाल किया—‘वह ईश्वर कहां है जिसने इसे बनाया है?’ तब वे आत्मा का सिद्धांत बघारने लगे. तब बुद्ध ने पूछा—‘आत्मा क्या है? क्या किसी ने उसे देखा है?’….बुद्ध के मुख्य सिद्धांत हैं—

‘निहित सत्य को जानने के लिए प्रत्येक वस्तु का अपने विवेकानुसार भली-भांति विश्लेषण करो.’ तथा ‘यदि तुम्हारा विवेक उसे सच मानता है, तभी उसपर विश्वास करो.’ पेरियार ने आगे कहा था—‘ईश्वर, आत्मा, देवता, स्वर्ग, नर्क, ब्राह्मण, शूद्र, पंचम यदि ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आती हैं तो इनपर विश्वास मत करो. ये सब काल्पनिक शब्द हैं. कुछ भी स्वीकारने से पहले अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करो. ईश्वर ने ऐसा कहा है, वेद ऐसा कहते हैं या मनुस्मृति में यह सब लिखा है—ऐसी बातों पर विश्वास वृथा है. जिसे तुम्हारी बुद्धि स्वीकारती है, केवल उसी पर भरोसा करो.’’12

पेरियार का विश्वास किसी भी धर्म में नहीं था. बावजूद इसके ऐसे कई अवसर आए जब उन्होंने बौद्ध धर्म की प्रशंसा की. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ‘ईश्वर और मनुष्य’ विषय पर सारगर्भित भाषण दिया था. भाषण में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया था, साथ ही विभिन्न धर्मों पर चर्चा की थी. उसमें बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था—‘यदि हम बौद्ध धर्म को कोई और नाम देना चाहें तो हम उसे ‘बुद्धि’ यानी ‘ज्ञान का धर्म’ कह सकते हैं. बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान का धर्म’ या ‘ज्ञानमय धर्म’ क्यों कहा जाएगा? क्योंकि बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सभी ईश्वर केद्रित हैं, जबकि बौद्ध धर्म किसी ईश्वर को मान्यता नहीं देता. यह इसलिए है कि कोई भी ऐसा ‘ज्ञानमय धर्म’ या ‘ज्ञान का धर्म’ नहीं हो सकता जो ईश्वर पर विश्वास करता हो. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को ‘विवेकशील धर्म’ कहा है. उस भाषण में पेरियार ने बौद्ध धर्मावलंबियों की यह कहकर आलोचना की थी कि वे भी बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान के धर्म’ के रूप में अंगीकार करने में विफल रहे हैं. पेरियार ने ऐसा क्यों कहा था? इस बारे में उनका कहना था कि किसी भी सामान्य—‘धर्म को अपनी पहचान बनाने के ईश्वर में विश्वास करना आवश्यक है. इसके लिए उसके अनुयायियों को कुछ बकवास कहानियों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों पर विश्वास करने को कहा जाता है. बौद्ध धर्म कर्मकांडों को निरर्थक विश्वासों का खंडन करता है. बावजूद इसके अधिकांश बौद्ध मतावलंबी उसी जीवन-पद्धति को अपनाए हुए हैं. उनकी पूजा पद्धति भी उसी प्रकार की है.’ धर्म और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपने 25-26 दिसंबर 1958 के भाषण में पेरियार ने पुनः दोहराया था कि ऐसा ईश्वर जिसे लगता है कि वह दलितों और शूद्रों के छूने भर से अपवित्र हो जाएगा, को मंदिर में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी मूर्ति को तुरंत हटाकर नदी किनारे डाल देना चाहिए, ताकि लोग उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए कर सकें. एक अवसर पर उन्होंने कहा था—

कहा जाता है कि ईश्वर ने जाति की रचना की है. यदि यह सच है तो सबसे पहली जरूरत इस बात ही है कि ऐसे ईश्वर को ही नष्ट कर दिया जाए. यदि ईश्वर इस क्रूर प्रथा से अनभिज्ञ है तो उसे और भी जल्दी खत्म किया जाना चाहिए. यदि वह इस अन्याय से रक्षा करने या इसपर रोक लगाने में असमर्थ है तो इस दुनिया में बने रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है.

4

पेरियार ने गौतम बुद्ध को विश्व के सबसे पहले क्रांतिधर्मा विचारक स्वीकार किया था. कारण था कि बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा-परमात्मा जैसी अतार्किक मान्यताओं को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था—‘आमतौर पर ईश्वरीय विश्वास के आधार पर मनुष्यों को मूर्ख बनाया जाता है. मैं नहीं जानता कि मानवमात्र की इस अज्ञानता का पर्दाफाश करने के लिए अभी तक कोई विचारक आगे क्यों नहीं आया है? यहां तक कि सुशिक्षित बुद्धिजीवी भी इस मामले में आलसी रहे हैं. यदि हम दुनिया के पहले दार्शनिक की खोज करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वह एकमात्र गौतम ही बुद्ध थे. हमारा इतिहास भी यही बताता है. उनके बाद पश्चिम में जन्मा एकमात्र विचारक सुकरात था. उनके दार्शनिक विचारों को भली-भांति नहीं समझा गया.’13

उस ज्ञानमय धर्म या ‘बुद्धि के धर्म’ को नष्ट कर दिया गया. कैसे नष्ट कर दिया गया? पेरियार के शब्दों में, ‘उन्होंने(ब्राह्मणों ने) हिंसक रास्ते अपनाए. बौद्धों का कत्लेआम किया गया. उनके मठों को मिट्टी में मिला दिया गया.’14 पेरियार किसी भी प्रकार की व्यक्ति पूजा के विरोधी थे. मगर बुद्ध के विचार उनकी वैचारिक चेतना के करीब थे. उनके प्रचार-प्रसार के लिए वे बुद्ध जयंती मनाने के पक्ष में पक्ष थे. परंतु वे नहीं चाहते थे कि बुद्ध जयंती के नाम पर होने वाले उत्सव महज कर्मकांड बनकर रह जाएं. इसलिए ‘बुद्ध जयंति क्यों मनाई जाए? लोग बुद्ध के जन्म को उत्सव के रूप में क्यों लें? पेरियार इन सवालों पर भी विचार करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध जयंती बनाने का आशय यह नहीं है कि लोग बुद्ध-प्रतिमा के आगे खड़े होकर कपूर, नारियल, फल-फूल वगैरह लेकर उसकी पूजा-अर्चना करें. उनके अनुसार—‘हम बुद्ध के जीवन से शिक्षा ले सकते हैं और उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं. मैं उनसे नास्तिक के रूप में प्रेरणा लेता हूं. यदि नास्तिक का अभिप्रायः है वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में अविश्वास है, तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक ही हूं.’ पेरियार को डर था कि बुद्ध जयंती के बहाने ऐसे व्यक्ति जो वेद, शास्त्र तथा पुराणों में आस्था रखते हों, अपनी बात को घुमा-फिराकर लोगों के सामने रख सकते हैं. पेरियार के अनुसार जातिभेद के आधार पर दूसरों को कमतर समझने वाला, निरंकुश आचरण का समर्थक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

पेरियार के अनुसार बुद्ध न तो संत थे, न ही महात्मा. असल में वे ऐसे बुद्धिवादी चिंतक थे जिन्होंने प्राचीनकाल में हिंदू ऋषियों का उनके अनर्गल कर्मकांडों और आडंबरों के आधार पर विरोध किया था. इसलिए बौद्ध धर्म प्रचलित अर्थों में धर्म नहीं है. जो लोग बौद्ध धर्म को धर्म मानते हैं, वे गलत हैं. धर्म के लिए उसके केंद्र में ईश्वर का होना आवश्यक है. इसके अलावा स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, भाग्य, पाप-पुण्य आदि अवधारणाओं पर विश्वास भी आवश्यक है. बड़े धर्मों का काम किसी एक ईश्वर नहीं चलता. उनमें अनेक ईश्वर भी हो सकते हैं. उन ईश्वरों के घर-परिवार, आवास, आने-जाने के स्वतंत्र साधन, पत्नियां और बच्चे भी हो सकते हैं. भारतीय तो ऐसे ईश्वरों को ही पहचानते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह, जिसे कुछ लेखक भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते है, की जाति के संदर्भ में समीक्षा करते समय पेरियार ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म की प्रशंसा की थी—

‘इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध और जैन श्रमणों ने हमारे लोगों को सद्व्यवहार और ज्ञान की महत्ता की शिक्षा देनी चाही, तमिल राजाओं ने उनका उत्पीड़न किया गया. उन्हें तरह-तरह के मामलों में फंसाया गया और कत्लेआम किया गया. यह दर्शाता है कि हमारे देश पर निरंकुश और असभ्य शासकों का राज रहा है.’15

बुद्ध के अनुसार मनुष्य का ईश्वर के प्रति आकर्षित होना आवश्यक नहीं है. बौद्ध धर्म अपने मानवतावादी आचरण के लिए बाकी धर्मों से बेहतर सिद्ध होता है. बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य केवल मनुष्य का ध्यान करे. बुद्ध ने न तो स्वर्ग का महिमा-मंडन किया, न ही नर्क से लोगों को डराया. उन्होंने मनुष्य के आचरण पर जोर दिया. उसके लिए अष्ठांग मार्ग प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर लगभग सभी धर्मों ने धार्मिक शुचिता के नाम पर अपनाया. पेरियार बुद्ध की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे उनके सम्मोहन से ग्रस्त नहीं हैं. न ही आस्था के बदले वे अपने विवेक को गिरवी रखना चाहते हैं, जैसी कि ब्राह्मण धर्म के अनुयायी अपेक्षा रखते हैं. अपितु वे लिखते हैं कि कोई बात इसलिए मान्य नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी महात्मा ने कहा है. या उसे बहुत से लोग मानने वाले हैं. अपितु मनुष्य को अपने विवेक की कसौटी पर जो खरा प्रतीत हो, उसी को स्वीकार करना चाहिए. उसके लिए आवश्यक है कि हर सत्य या अच्छी लगने वाले तथ्यों को वह अपनी कसौटी पर परखे. उनके अनुसार बुद्धिज्म केवल गौतम बुद्ध की जयंतियों को मनाना नहीं है. हमारे लिए बुद्ध होने का अभिप्राय बुद्धि, विवेक बुद्धि का साथ होना है. अपने तर्क-सामथ्र्य का साथ होना है. पेरियार के अनुसार—

‘बौद्ध धर्म किसी भी प्रकार के श्रेष्ठतावाद(ब्राह्मणवाद) के लिए एटमबम के समान है.’16

गौतम बुद्ध का जन्म करीब 2500 वर्ष पहले हुआ था. उस समय ब्राह्मण यद्यपि धर्म और सभ्यता के दावेदार बने हुए थे, मगर यज्ञादि में जिस प्रकार हजारों बलियां एक साथ वे चढ़ा देते थे, जाति के नाम पर अपने ही धर्म-बंधुओं के साथ दमन और अवमाननापूर्ण वर्ताब करते थे, उसे देखते हुए उनका आचरण असभ्य और जंगली प्राणियों जैसा था. बुद्ध ने उन सबका विरोध किया. बुद्ध का रास्ता आसान नहीं था. देखा जाए तो उन दिनों ज्ञान और तर्क का पक्ष लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं था. परंतु बुद्ध अपने बातों पर अडिग रहे. वैदिक हिंसा के स्थान पर उन्होंने मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पक्ष लिया. पेरियार के अनुसार उनकी ताकत उनके शब्दों में थी. पेरियार की तरह बुद्ध को भी अपने जीवन में आलोचनाओं का सामने करना पड़ा था. बुद्ध के बाद उनके आलोचकों ने मुखर स्वर में उनकी आलोचना करना आरंभ कर दिया था. पुराणों के बहाने प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाने लगी थी. जाहिर है, बुद्ध के बाद उनकी आलोचना में वही लोग लगे थे जो धर्म के नाम पर कर्मकांड और तर्क के स्थान पर तंत्र-मंत्र की वापसी चाहते थे. ऐसे ही लोग पेरियार का विरोध करते आए हैं.

रामायण को हिंदु नैतिक जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ग्रंथ के रूप में देखते हैं. पेरियार के अनुसार रामायण की रचना बौद्ध धर्म के प्रभाव को मद्धिम करने के लिए, उसकी ख्याति से उबरने की कोशिश में की गई थी. बुद्ध का धर्म ताकत का धर्म नहीं था. धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उन्होंने भिक्षुओं और श्रमणों को सौंपा हुआ था. लेकिन जातियों में बंटे हिंदू धर्म के लिए इस तरह के समर्पित धर्म-योद्धा मिलने संभव नहीं थे. जाति व्यवस्था के नाम पर ब्राह्मणों ने खुद ही निचली जातियों को धार्मिक कार्यों में सहभागिता से अलग-थलग किया हुआ था. ऐसे में शक्ति के माध्यम से ‘धर्म-विजय’ दिखना ही एकमात्र रास्ता था. रामायण यही काम करती है. अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म की ध्वजा फहराने के लिए श्रीलंका भेजा था. वाल्मीकि के राम आर्य अपनी पत्नी को छुड़ाने के बहाने आर्य-धर्म की पताका फहराने के लिए लंका-विजय करते हैं. बुद्ध और अशोक ने जो धम्मविजय की थी, उसका प्रमाण आज श्रीलंका में बौद्ध धर्म की उपस्थिति है. वहां 70 प्रतिशत लोग आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. उसके अलावा चीन, जापान, तिब्बत जैसे देषों में बौद्ध धर्म आज भी कायम है. जबकि हिंदू धर्म भारत से बाहर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहा. पेरियार के अनुसार—

‘बुद्ध के पहले राम-कथा छोटी-सी कहानी थी. बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का सामना करने के लिए उसमें बाद में भारी जोड़-तोड़ की गई. बौद्धों और जैनियों को नास्तिक, हत्यारा, डाकू, वैदिक संस्कृति का दुश्मन आदि कहा गया. पेरियार के शब्दों में शैव शिव से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें शक्ति दे ताकि वे बौद्धों की पत्नियों के साथ व्याभिचार कर सकें.’17

पेरियार के अनुसार 75 प्रतिशत से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध से बाद का है. पाश्चात्य विद्वानों का भी यही मत रहा है. बुद्ध के तर्कसंगत उपदेशों का प्रतिवाद करने के लिए पुराण लेखकों ने जिन्हें ऋषि कहा जाता था, अवतारवाद की परिभाषा गढ़ी. उन्होंने कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में चित्रित किया. उसका एक ही उद्देश्य था, लोगों को ब्राह्मणवाद की ओर आकर्षित करना. चमत्कारपूर्ण वर्णन जनसाधारण को हमेशा ही लुभाता आया है. गीता की रचना और भी बाद में हुई. उसके बाद ही उसे महाभारत में जोड़ा गया. लोकमानस में बुद्ध की प्रतिष्ठा को देखते हुए ब्राह्मणों ने मजबूरी में उनकी प्रषंसा की. अवतारवाद को संरक्षण देने के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. उसके बहाने सनातनी हिंदू पुराणों के लेखनकाल को बुद्ध से बहुत पीछे तक ले जाते हैं. इस काम में संस्थाएं भी पीछे नहीं हैं—‘यह कहते हुए कि ब्रिटिश विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उत्तर भारत में भारतीय विद्या भवन ने मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों और अजनतांत्रिक धर्मशास्त्रों पर पर लिखना जारी रखा. के. एम. मुंशी उसके अध्यक्ष थे. डॉ. राधाकृष्णन तथा अरबपति बिरला उसके सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’ को लेकर पुस्तक तैयार की, जिसमें के. एम. मुंशी का बड़ा योगदान था. उन्होंने भी माना था कि प्राचीन युग असभ्य था. पुराण और महाकाव्य आदि ग्रंथ इतिहास नहीं हैं….वह सब कल्पना की उपज है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ किस्सागो है. पुराणों ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया और वे उनपर शासन करने लगे. हमारी समस्याओं का मूल कारण यही है.’

 

आजीवक दर्षनों के साथ-साथ बौद्ध, जैन दर्षन और सिख धर्म ने भी वेदों को प्रामाण्य मानने से इन्कार कर दिया था. ये धर्म-दर्षन किसी ईश्वर या आत्मा-परमात्मा पर विश्वास नहीं करते. इसलिए ब्राह्मण ग्रंथों में बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों नास्तिक कहा गया है. एक स्थान पर पेरियार नास्तिक की परिभाषा करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध सामान्य संज्ञा है. किसी भी व्यक्ति को जो बुद्धि का प्रयोग करता है, उसे बुद्ध कहा जा सकता है. ‘निश्चित रूप से मैं भी एक बुद्ध हूं. मैं ही क्यों, हम सभी जो तर्क और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करते हैं—बुद्ध हैं.’ इसी तरह सिद्ध वह व्यक्ति है जो अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है. वैष्णव और शैव किसी न किसी देवता को मानते हैं. यही स्थिति दूसरे संपद्रायों की है, वे भी किसी न किसी देवता में श्रद्धा रखते हैं. जहां देवता नहीं हैं, वहां गुरु है जो परोक्ष रूप में साकार या निराकार देवता से मिलवाने का दावा करता है. केवल बौद्ध धर्म ऐसा है जिसमें कोई केंद्रीय देवता नहीं है. न ही वह जीवन से इतर किसी सुख की दावेदारी करता है. वह किसी भी प्रकार के ईश्वर, आत्मा, लोक-परलोक, मोक्ष अथवा सनातनवाद को नकारता है. नास्तिक शब्द भी इसके करीब है. नास्तिक वह है जो आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को नकारता है; संसार और जीवन के बारे में बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता है. ब्राह्मणवादी मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले को भी नास्तिक कहकर धिक्कारने लगते हैं. पेरियार के अनुसार नास्तिक होना, सही मायने में मनुष्य होना है. ऐसा मनुष्य जो न केवल अपने ऊपर अपितु पूरी मनुष्यता पर विश्वास रखता है.

भारतीय समाज धर्म के अलावा जाति के शिकंजे में भी फंसा हुआ है. ये दोनों ही तर्क और मानवीय विवेक के विरोधी है. इनकी ताकत मनुष्य की अज्ञानता में निहित है. इसलिए घूम-फिरकर वे आस्था और विश्वास पर लौट आते हैं. तयशुदा मान्यताओं पर तर्क करने और सवाल उठाने से उन्हें परेशानी होती है. इसलिए वे चाहते हैं कि अपनी विवेक-बुद्धि को बिसराकर मनुष्य केवल उनके कहे का अनुसरण करे. वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों में जो लिखा है, उनपर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया जाए. यही अतीतोन्मुखी दृष्टि ब्राह्मणवाद है; जो बार-बार पीछे की ओर ले जाती है और मानव-बुद्धि की विकासयात्रा का निषेध करती है. पेरियार इससे आजन्म जूझते रहे. इसके लिए उन्होंने किसी धर्म, व्यक्ति या राष्ट्र की परवाह तक न की. खुलकर कहा कि—

‘मैं मानव-समाज का सुधारक हूं. मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मेरे सरोकार केवल मानवमात्र के कल्याण एवं विकास को समर्पित हैं.’ यही संकल्प क्रांतिधर्मी पेरियार तथा उनके विचारों को समसामयिक और प्रासंगिक बनाता है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

संदर्भ:

1 जाति मदे च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब संति सब्बे तानीष खेत्तानि अयेसलानि

जाति मदो च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब न संति सब्बे तानीष खेत्तानि सुयेसलानि—मातंग जातक-497

  1.   अंबट्ठसुत्त, दीघनिकाय, 1/3
  2.   पेरियार, 1947 में सलेम कालिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिया गया व्याख्यान
  3.   कुदी अरासु, 15 अगस्त 1926
  4.   कुदीअरासु, 2 दिसंबर, 1944
  5.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-208.
  6.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-227
  7. विदुथलाई, 14 मार्च 1954.
  8. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  9. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  10. छूआछूत पर पेरियार के विचार, मीना कंडास्वामी द्वारा तमिल से अंग्रेजी में अनूदित.
  11. विदुथलाई, 19 अप्रैल 1956,पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पेज-274-75
  12. कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार, पृष्ठ-152
  13. कलेक्टिड वर्क्सआफ पेरियार, पृष्ठ-173
  14. विदुथलाई, 15 अगस्त 1957, पृष्ठ-300
  15. पेरियार आन बुद्धिज्म, रामास्वामी पेरियार, राम मनोहरन के आलेख ‘फ्रीडम फ्राम गाड: पेरियार एंड रिलीजन’ से उद्धृत
  16. कलेटिक्ट वर्क आफ पेरियार, पृष्ठ-306-307

 

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

सामान्य

(आज रामास्वामी पेरियार का जन्मदिवस है, भारत को आधुनिक राज्य बनाने में जितनी भूमिका डॉ. आंबेडकर की है, उतनी ही पेरियार की भी है. अपनी—अपनी भूमिका में दोनों महान हैं. डॉ. आंबेडकर साधारण परिवार से आए थे, अपने श्रम, स्वाध्याय, विद्वता, त्याग और विवेक के बल पर वे इस देश के निर्माता बने. समाज के बड़े वर्ग को जगाने का काम किया. पेरियार के पिता धनी व्यापारी थे. जीवन के आरंभिक वर्षों में धन उन्होंने भी खूब कमाया. धीरे—धीरे उसकी ओर से निस्पृह होते चले गए. आगे चलकर कांग्रेस से जुड़े. बहुत जल्दी समझ में आ गया कि कांग्रेस के सुधार की एक सीमा है. वह समाज के निचले हिस्सों के भले के लिए उतना की कर सकती है, जितना उपकार—भाव के साथ संभव है. पेरियार ने राजनीति को छोड़ा और केवल जनता पर भरोसा किया. खुद को जनांदोलनों के लिए समर्पित कर दिया. राजनीति से दूर रहते हुए बड़े आंदोलन चलाना, जिनसे आगे चलकर पूरे देश की राजनीति प्रभावित हुई, पेरियार जैसी हस्ती के लिए ही संभव था.

आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम बेगमपुराके नाम से जानते हैं. आने वाली दुनियामें रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. यह आलेख उनके भाषण के अंग्रेजी अनुवाद(प्रो. ए. एस. वेणु)  का अनुवाद है, जो उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलनके एक कार्यक्रम दिया था. वैज्ञानिक सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने दक्षिण एशिया का सुकरातकहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें भारत का वाल्तेयरमाना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक दि हिंदूमें छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं ताब्दी का एच.जी.वेल्स कहा गया था. लेख में गांधी का नाम नहीं है. उनकी ओर संकेत-भर है. परंतु इससे गांधी और पेरियार के सोच का अंतर पूरी तरह सामने आ जाता है.

यह लेख एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ था. पेरियार की भूमिका के साथ, जो लेख जितनी ही महत्त्वपूर्ण है.  परियार के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उन्हीं के लेख का अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैंओमप्रका कश्यप)

 

प्राक्कथन

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है. धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है. यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है. उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं. उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं. दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं. अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है. बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है. वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं. अनुभवों से काम लेते हैं. उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं. प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हें. इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों, महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और विना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं.

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है. अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते. दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है. सबकुछ तेजी से बदल रहा है. इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है. मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं. लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं. परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है. वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती. न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है. उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है. यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं. अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है.

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं. यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं. ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं. बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को. उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं, ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा. ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं.

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते. उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं. उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है. तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं. समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों.

लोग चाहे वे किसी भी देश  अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे. उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं. वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे. इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए. आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं. इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं. उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं. ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं.  

 

भविष्यलोक : एक नास्तिक का स्वप्न

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा. बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे. उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की. न राजा होगा, न ही राज्य. लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है. आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्यधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित. जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं. दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं. ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है. उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख. हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है. उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है. फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं. कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं. दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं. समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं. उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है. बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं. बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं. हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं. बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में है. मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है. ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है. उनके कारण समाज में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं.

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं. परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो. तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

प्राणीमात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है. यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है. कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल हुए थे. कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे. मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है. ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया. उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं. उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे. अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं. यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है.

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है. ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं. आज हालात बदल रहे हैं. आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है. कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा. एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा. न सरकार की जरूरत रहेगी. किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा. ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए. आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं. किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों. दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा. जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा. महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी. उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा. उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं. सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा. मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे. आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं. उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा.

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी. लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा. हत्या और लूटमार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी. कोई बेरोजगार नहीं रहेगा. न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी. लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे. बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां, जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी. आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी. केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा.

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी. बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे. आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी. सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी. ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी. जनसंख्या बृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा. मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी.

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था. आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं. इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था. आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है. आज मशीन के डेशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है. सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं. वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है. इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं. आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिये आसानी से काम हो रहा है. प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है. तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी सप्ताह में मात्र दो श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा.

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे. इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए. यही नहीं जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे. ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके. आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी. सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी. मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा. उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा. केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा.

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे. ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे. मैं ऐसा नहीं मानता. यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे. समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए. सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा. लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी. उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा. और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी. कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा.

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा. न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा. आनी वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी. आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मषीनों का उपयोग करना सीखे. सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा. कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी. अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और नामा दोनों कमा सकें.

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा. चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो. ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं. उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी. यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा. नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे. वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है. भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे. यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं. इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी. नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा. बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे. उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी.

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेष्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा. स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा. कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा. ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा. वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी. स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी. स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी. पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी. दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा. आने वाले समाज में कहीं कोई वेष्यावृत्ति नहीं रहेगी.

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है. बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों. स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे.

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र से काम करेंगे. संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी. सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे. रेडियो प्रत्येक के हेट में लगा हो सकता है. छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे. दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों. आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा. शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा. एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक केप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे

मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी.

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यही नहीं पषुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा. वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी. बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा.

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग हांगीं. उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा. उससे पैट्रोल की खपत में कमी आएगी. भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी. बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके. वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी. इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे. विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे.

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइष नहीं होगी. आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है. इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं. आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे. इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी.

संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे.

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है. यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है. आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे. यही नहीं ईश्वर के नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे. मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिताबोध के. आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है. यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े. स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है. यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े. न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे. यही मानवीय बोध की चरमसीमा है. ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है.

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है. यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा. जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इत तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा. जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है. जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है.

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं. इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं. वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है. हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं. इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं. हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती. जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है. इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईष्वर की पूजा नहीं करेगा.

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है. यही दुनिया का नियम है. जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है. इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे.

 आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा. किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी. सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी.

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है. समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा.

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे. नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी. प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा. समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा.

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है. ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं. कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी. लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी. बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे. नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें.

ई वी रामास्वामी पेरियार(1944)

पेरियार – दो : दक्षिण भारत का आत्मसम्मान आंदोलन

सामान्य

(आदर्श समाज को लेकर हर महापुरुष का एक सपना रहा है. पश्चिम में प्लेटो से लेकर थॉमस मूर और आल्डोस हक्सले तक. भारत में संत रविदास ने भी समानता, सहयोग और स्वतंत्रता पर आधारित सपना देखा था, जिसे हम ‘बेगमपुरा’ के नाम से जानते हैं. आने वाली दुनिया’ में रामास्वामी पेरियार भी इसी प्रकार का सपना देखते हैं. वैज्ञानि सोच के प्रसारक ईवी रामास्वामी इसमें ऐसे अनेक आष्विकारों की कल्पना करते हैं, जो आज हमारे सामने हैं. इससे उनकी दूरंदेशी का अनुमान लगाया जा सकता है. ओजस्वी विचारकों के कारण पेरियार को यूनेस्को ने ‘दक्षिण एशिया का सुकरात’ कहा तो कुछ विद्वानों ने उन्हें ‘भारत का वाल्तेयर’ माना है. कुछ विद्वान उनकी तुलना रूसो से करते हैं. उनके एक लेख के आधार पर अंग्रेजी दैनिक ‘दि हिंदू’ में उनकी तुलना बीसवीं शताब्दी का एच.जी.वेल्स से की गई थी. ओमप्रकाश कश्यप)

 

कांग्रेस से मोहभंग के पश्चात पेरियार का सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में स्वतंत्र रूप से सक्रिय होना, न केवल उनके, अपितु पूरे तमिलनाडु के लिए क्रांतिकारी घटना थी. किंतु जैसे सूरज के ताप और प्रकाश का स्वयं सूरज के लिए उतना महत्त्च नहीं होता, जितना शेष जीवजगत के लिए, उसी प्रकार पेरियार के नेतृत्व में चले आंदोलनों का लाभ जितना उनके देश और समाज को हुआ, उसके सापेक्ष पेरियार को मिली प्रसिद्धि और मानसम्मान न के बराबर है. उस आंदोलन के फलस्वरूप देश के दक्षिणी प्रांतों के साथसाथ बाकी हिस्सों में भी सामाजिक जागृति का संचार हुआ. उत्पीड़न एवं वंचना के शिकार लोग अपने अधिकारों तथा मानसम्मान की सुरक्षा एवं संरक्षा हेतु सन्नद्ध होने लगे. उसके फलस्वरूप न केवल कांग्रेस को अपनी नीतियों में बदलाव के लिए विवश होना पड़ा, अपितु सरकार को भी सामाजिक न्याय की भावना के साथ आगे आना पड़ा. पेरियार ने हजारों वर्षों से रूढ़ पड़ी परंपराओं, आडंबरों और बौद्धिक पाखंडों पर प्रहार किया. इस कारण समाज का एक वर्ग आज भी उनसे बुरी तरह चिढ़ता है. पेरियार बहुत कम समय तक सक्रिय राजनीति मंे रहे. कांग्रेस से अलग होने के बाद कभी राजनीति से जुड़ने की कोशिश नहीं की. बावजूद इसके दक्षिण भारतीय राजनीति को जितना उन्होंने प्रभावित किया, उतना उनका समकालीन कोई नेता न कर सका. अपने समाज के बीच पेरियार की वही भूमिका है, जो अमेरिकी समाज में अब्राह्मम लिंकन, थाॅमस जेफरसन और टाॅमस पेन, इंग्लेंड में जाॅन स्टुअर्ट मिल तथा फ्रांस में वाल्तेयर और रूसो की है. उनसे पहले समाज में जितने भी नैतिक प्रतिमान प्रचलित थे, धर्म तथा उसके गर्भ से जन्मी परंपराएं उनका एकमात्र òोत हुआ करती थीं. उनका प्रभाव इतना गहरा होता था कि लोग न केवल धर्म और परंपराओं को जीते थे, बल्कि उनके लिए भी जीते थे. देखने में सबकुछ सहज और स्वाभाविक लगता था, असलियत में वह सामंतवाद को बचाए रखने, शोषण को स्थायी बनाए रखने वाली व्यवस्था थी. ‘क्या’, ‘क्यों’ और ‘क्यों नहीं’ जैसे प्रश्नों के लिए जिनपर आधुनिक सभ्यता की नींव टिकी है, उसमें कोई स्थान न था. जो भी था, सब किसी न किसी रूप में थोपा हुआ रहता था. दावा हालांकि खुलेपन का था, दिखाया यही जाता था कि लोगों ने उसे खुशीखुशी अपनाया हुआ है—लेकिन सब कुछ पूर्वनियोजित, पूर्वनिर्धारित और पुरोहित वर्ग की स्वार्थसिद्धि के वास्ते था. परंपरा को प्रमाण बनाए रखने के लिए कुछ कहानियां और मिथ गढ़ लिए जाते थे. जनसमाज के लिए वही सांसारिकता का पर्याय होते थे. उन्हीं के अंधानुकरण को वह जीवनसिद्धि माने रहता था. उनके प्रभाव में मानवीय विवेक की भूमिका घट जाती थी. मानसिक रूप से परंतत्र व्यक्ति केवल अनुसरण कर सकता है, सो परंपरा को प्रमाण मानने वाले समाज में अनुगमन की प्रवृत्ति पीढ़ीदरपीढ़ी कायम रहती थी.

पेरियार समृद्ध पिता की सफल संतान थे. परंतु आर्थिक समृद्धि से उनकी सामाजिक प्रस्थिति पर खास अंतर नहीं पड़ा था. कथित उच्च जातियों से आए कांग्रेसजनों के बीच उनकी स्थिति अब भी ‘पिछड़े’ व्यक्ति के समान थी. वे समझ चुके थे कि व्यक्तिगत उपलब्धियों के बल पर लोगों के मन में सम्मानभाव तो जगाया जा सकता है, परंतु उन धारणाओं को नहीं बदला जा सकता जो लोगों के मनोमस्तिष्क में शताब्दियों से काई की भांति जमा हैं. जो मनुष्य को जन्म से ही ऊंचा या नीचा घोषित कर देती हैं. वह न केवल दक्षिणभारत बल्कि संपूर्ण दुनिया के लिए सर्वाधिक परिवर्तनकारी दौर था. रूसी क्रांति संपन्न हो चुकी थी. साम्यवाद का प्रभाव दक्षिण भारत में भी था, किंतु शेष भारत की तरह दक्षिण में भी अधिकांश साम्यवादी नेता तथाकथित उच्च जातियों से आए थे. उनके अपने जातीय स्वार्थ प्रबल थे. भारत में जाति सामाजिक स्तरीकरण और अमानवीय आचरण का मुख्य कारण रही है. जातिआधारित वर्गभेद पर प्रहार किए बिना साम्यवाद की सफलता संभव भी नहीं थी. इससे भारत में साम्यवादी आंदोलन की असफलता और भटकाव के कारणों को समझा जा सकता है. यही कारण है कि उत्पीड़ित और वंचित जनों के पक्ष में आवाज उठाने वाले पेरियार, साम्यवादी होने का दावा करने वाले नेताओं से दूरी बनाए हुए थे. उनका मानना था कि माक्र्स का दर्शन केवल पश्चिमी देशों में कारगर हो सकता है, जहां जाति जैसी भयावह बीमारी नहीं है. धर्म का सार्वजनिक जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप है. भारतीय समाज में समानता और आत्मसम्मान की लड़ाई यदि किसी को लड़नी है तो उसे पहले जाति से टकराना पड़ता है; और जाति की जंग जब तक अविजित रहेगी, जब तक उसे धर्म का समर्थन प्राप्त है. यथास्थितिवादियों के अनुसार जाति और धर्म समाज में सुखशांति बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं. किंतु असलियत में वे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के मूलभूत अधिकारों पर कुठाराघात करती हैं. जातीय अनुशासन का लाभ उठाकर कथित ऊंची जातियां निचली जातियों के लिए शासक का काम करती हैं. सामाजिक सुखशांति के लिए जो लोग धर्म और जाति को अपरिहार्य मानते हैं, वे या तो बहुत चालाक और स्वार्थी हैं, अथवा दिग्भ्रमित.

पेरियार ने धर्म को चुनौती दी. जाति के आधार पर राजनीति के स्वाभाविक दावेदार बने शीर्षस्थ जातियों के बड़े नेताओं को बहस के लिए ललकारा. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ द्वारा द्रविड़ों की सोयी चेतना को जगाने का काम भी किया. उन्होंने तमिलवासियों को सवाल करना सिखाया. उसके फलस्वरूप पहली बार 90 प्रतिशत लोग यह सोचने को विवश हुए कि वे शिक्षा और रोजगार के अवसरों से बंचित क्यों हैं? कि तीन प्रतिशत ब्राह्मण सरकार के तीनचैथाई से अधिक पदों पर कैसे चले जाते हैं? कि दलितों और पिछड़ों को सार्वजनिक मार्गों पर आनेजाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं है? कि जन्म से एक समान होने के बावजूद मनुष्य को जाति के आधार पर भेदभाव और असमानता का शिकार क्यों बनाया जाता है? इन प्रश्नों को उठाने वालों में पेरियार पहले नेता नहीं थे. दक्षिण भारत की लंबी पूरी संतपंरपरा उनके समर्थन में थी. 1892 में गठित ‘मद्रास समाजसुधार संघ’ ने भी सांगठनिक स्तर पर द्रविड़ अस्मिता का मामला उठाया था. फुले के विचारों से प्रभावित संघ के नेताओं ने जोरशोर से यह प्रचारित किया था कि ब्राह्मण विदेशी आर्यों के वंशज हैं, जबकि गैरब्राह्मण द्रविड़ भारत के मूल निवासी हैं. फुले ने धर्मशास्त्रों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाए थे. कहा था कि वे सब ब्राह्मणों द्वारा स्वार्थसिद्धि के लिए गढ़ी गई गल्पकथाएं हैं. उसी परंपरा को विस्तार देते हुए पेरियार ने धर्मशास्त्रों को अपनी विवेचना का आधार बनाया. इसके साथसाथ उन्होंने धर्म तथा ईश्वर की सत्ता को भी कठघरे में लिया. उससे पहले न्याय और समानता की मांगों का आकलन धार्मिक आचारसंहिताओं के आधार पर किया जाता था. आवश्यकता पड़ने पर उनका समाधान भी शास्त्रों में खोजा जाता था. परंपराश्रित होने के कारण ब्राह्मणसंस्कृति विशेषता विहीन, विशेषज्ञ संस्कृति थी. उसमें कुछ जातियां विशेषाधिकार संपन्न होती हैं, तो कुछ पूर्णतः अधिकारविपन्न. अधिकारविपन्नों के लिए व्यवस्था होती कि वे विशेषाधिकार संपन्न जातियों के आदेशों का बिना किसी शर्त के पालन करें. यही शास्त्रसम्मत मर्यादा है. दुष्परिणाम यह होता है सामाजिक नेतृत्व हेतु मौलिक प्रतिभाएं आगे नहीं आ पातीं. इससे ज्ञान की धारा अवरुद्ध होती है; तथा सत्ताकेंद्रों पर खास वर्गों का अधिपत्य निरंतर बना रहता है. समयानुकूल बोध के अभाव में परंपरा और मिथक जनसाधारण का मार्गदर्शन करने लगते हैं; और सभ्यता की प्रतिगामी यात्रा शुरू हो जाती है. पेरियार ने लोगों के दिमाग को ब्राह्मणवाद से मुक्त किया. उनके सोच को वैज्ञानिकीकरण की ओर ले गए. इस योगदान के लिए तमिल जनता ने उन्हें अपना वास्तविक ‘जननेता’(थलाईवर) स्वीकार किया. कांग्रेस छोड़ते समय पेरियार ने कहा था—‘कांग्रेस और उसके नेता गैरब्राह्मणों का भला नहीं कर सकते. इसलिए मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, कांग्रेस को खत्म करना.’ वे अपने उद्देश्य में सफल भी रहे. गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज नेताओं के रहते कांग्रेस दक्षिण भारत में तीसरे स्तर का राजनीतिक दल बना रहा.

1925 में कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने स्वयं को पूरी तरह ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को समर्पित कर दिया. पहले सम्मेलन में उन्होंने समानता और आत्मगौरव का मुद्दा उठाया. उन्होंने गैरब्राह्मणों का आवाह्न किया कि वे किसी भी बौद्धिकसांस्कृतिक और सामाजिक जड़ताओं से खुद को मुक्त करें. समानता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. लेकिन वह लक्ष्य किसी की दया या परोपकार के भरोसे प्राप्त नहीं किया जा सकता. लक्ष्यपूर्ति के लिए अपने आप को समझना और उसके लिए संगठित प्रयास आवश्यक हैं. संस्था का दूसरा सम्मेलन एम. आर. जयकर की अध्यक्षता में पेरियार के गृह नगर इरोड में 10 मई 1930 को हुआ. पेरियार ने उसमें जोरदार भाषण दिया. अपने भाषण में उन्होंने मूर्तिपूजा और आडंबरवाद को त्यागने का आवाह्न किया. उससे अगले सम्मेलन में जो अगस्त 1931 में विरुदनगर में हुआ था, पेरियार ने छूआछूत का विरोध करते हुए अंतरजातीय विवाह पर जोर दिया. सम्मेलन में उन्होंने शिक्षा और सामूहिक भोज को बढ़ावा देने की सलाह दी. लोगों पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ा. वे समझने लगे कि जातीयविषमताओं को मिटाने के लिए आधुनिक शिक्षा के साथसाथ सामूहिक भोजन को बढ़ावा देना अत्यावश्यक है.

महात्मा ज्योतिराव फुले और डाॅ. भीमराव आंबेडकर दोनों सामाजिक समानता और स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता से अधिक महत्त्व देते थे. आजादी से पहले आवश्यक है ऐसे समाज का गठन जो आजादी का मूल्य समझता हो. जिसे अपने साथसाथ दूसरों की स्वतंत्रता की भी फिक्र हो. इस संबंध में पेरियार की राय महात्मा फुले और डाॅ. आंबेडकर जैसी ही थी. सक्रिय राजनीति का परित्याग तथा ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाना—उनका सुविचारित निर्णय था. हिंदू धर्म में व्याप्त ऊंचनीच और छूआछूत की भावना का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में हो चुका था. बचपन और युवावस्था की कुछ घटनाएं उनके दिमाग पर छायी रहती थीं. एक घटना ने ईश्वर और हिंदू धर्म में उनके रहेसहे विश्वास को भी चूरचूर कर दिया. उस समय तक पेरियार के पिता का निधन हुए तीनचार वर्ष बीत चुके थे. समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी. वे पैत्रिक व्यवसाय को कुशलतापूर्वक संभाले हुए थे. समृद्ध व्यवसायी के रूप में दूरदूर तक उनका नाम था. फिर भी उन्हें संतुष्टि न थी. उन्हीं दिनों बनारस की यात्रा पर जाना हुआ. उस समय तक पेरियार की धर्म में आस्था शेष थी. बनारस के बारे में उनका मानना था कि वह हिंदुओं की पवित्रतम नगरी है. बनारस पहुंचकर वे कई दिनों तक शंति की खोज में यहां से वहां भटकते रहे. वहां उन्होंने मंदिरों में काम करती युवा देवदासियों को देखा. पता चला कि अपनी युवावस्था में वे देवदासियां पुजारियों की वासना का शिकार बनती हैं. बूढ़ी होने के बाद उन्हें मंदिर की सफाई तथा दूसरे कामों में झांेक दिया जाता है. जब देख थक जाती है और शरीर से वे किसी काम की नहीं रहतीं, तब पुण्यार्जन के नाम पर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. बीमार होने पर उपचार की माकूल व्यवस्था का कोई इंतजाम न था. इन अनुभवों ने पेरियार के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया. उस यात्रा के दौरान एक घटना ऐसी घटी जिससे उनका मन धर्म की ओर से एकदम उचट गया.

उस दिन उन्हें बहुत भूख लगी थी. भटकते हुए वे ऐसे आश्रम में पहुंचे जहां देशविदेश से आए अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था थी. भोजन की आस में वे प्रवचन सुनने बैठ गए. प्रवचन पूरा होने के बाद लोग भोजन के लिए जाने लगे तो पेरियार भी उनके साथ चल पड़े. तब उन्हें पता चला कि भोजन का इंतजाम केवल ब्राह्मणों के लिए है. भूख के दबाव में पेरियार ने स्वयं को ब्राह्मण बताया. किंतु अपनी मूंछों के कारण पहचान लिए गए. उस समय तक ब्राह्मणों के लिए मूंछ रखना निषिद्ध था. वहां मौजूद ब्राह्मण चिल्लाने लगे—‘यह नकली है. इसे खदेड़ दो.’ एकाएक दर्जनों ब्राह्मण न जाने कहांकहां से निकलकर उन्हें ठेलने लगे. भूख से व्याकुल पेरियार को उचिष्ठ से काम चलाना पड़ा. उस समय वे खुद को बेहद अपमानित अनुभव कर रहे थे. धर्म के प्रति आस्था तारतार हो चुकी थी. ब्राह्मणवाद का कुटिल चेहरा उनके सामने था. वे समझ गए कि धार्मिक रहते हुए स्वाभिमान के साथ जीना संभव नहीं है. उसी दिन उन्होंने खुद को नास्तिक घोषित कर दिया. उससे पेरियार को हानि नहीं हुई. उनके लिए वह पुनर्जन्म के समान था.

बनारस की घटना से हिंदू धर्म का कुत्सित चेहरा पेरियार ने देखा था. जातिआधारिक ऊंचनीच और तत्संबंधी विकृतियों का अनुभव उन्हें स्कूली जीवन में ही हो चुका था. उनके विवाह से संबंधित घटना का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है. दो अन्य घटनाओं का उल्लेख पेरियार के व्यक्तित्व को समझने में सहायक सिद्ध होगा. एक घटना 1902 की है. उन दिनों वे मात्र 23 वर्ष के युवा थे. धर्मशास्त्रों और पुराणों पर विश्वास तब तक उठने लगा था. एक संघर्षशील युवा की छवि विकसित होने लगी थी. उन्हीं दिनों इरोड के एक व्यापारी ने भोज का आयोजन किया. उसमें निरुंजनपेट्टई गांव के मुखिया को भी आमंत्रित किया गया था. संयोगवश मुखिया का भाई एक व्यापारी का कर्जदार था. दबंगई दिखाते हुए वह कर्ज चुकाने से आनाकानी करता आ रहा था. मामला न्यायालय में लंबित था. कोर्ट ने मुखिया के भाई को भगोड़ा घोषित कर, उसके वारंट निकाले हुए थे. पुलिस उसके पीछे लगी थी. लेकिन वह पुलिस और कर्ज वसूली में लगे अधिकारियों को लगातार चकमा देता आ रहा था. युवा पेरियार ने उसे पकड़वाने की ठान ली. जिस समय स्वामी और उसका भाई भोज में हिस्सा ले रहे थे, पेरियार एक झटके में पंडाल में घुस गएा. उस समय सरकार के स्तर पर चाहे जो हो, समाज में मनु का विधान लागू था. तदनुसार ब्राह्मणभोज के स्थल पर कुत्ता, सूअर, शूद्र और स्त्री का प्रवेश निषिद्ध माना जाता है. पेरियार शूद्र परिवार में जन्मे थे. उनके प्रवेश से भोजस्थल पर खलबली मच गई. भोजन अपवित्र हो चुका था. कोई साधारण परिवार से होता तो ब्राह्मण खुद ही निपट लेते. परंतु पेरियार धनाढ्य व्यवसायी की संतान था. उसके पिता दानादि देकर ब्राह्मणों को तृप्त रखते थे. इसलिए पेरियार की शिकायत उसके पिता से की गई. पिता ने उन्हें सामाजिक मर्यादा का पालन न करने के लिए खूब धिक्कारा. जातिसंबंधी विधान के उल्लंघन करने के लिए पेरियार की चप्पलों से पिटाई हुई. पेरियार ने पिता के क्रोध को सहा. लेकिन सामाजिक अनाचार ने निपटने की ठान ली. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण आयोजन प्रत्येक वर्ष चैत्र पूर्णिमा के दिन वे सामूहिक भोज था, जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग एक साथ सामूहिक भोज का आनंद लेते थे. यह ब्राह्मणवाद पर बड़ी मार थी. दमित एवं पिछड़े वर्गाें को संगठित करने में सामूहिक भोज के कार्यक्रम बहुत मददगार सिद्ध हुए.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य कार्यक्रम पेरियार के अपने जीवनानुभवों की देन थे. अंतररजातीय विवाह का मुद्दा स्त्रीमुक्ति से जुड़ा था. उसकी प्रेरणा उन्हें अपनी युवावस्था की एक घटना से मिली थी. वलेला जाति के एक युवक ने नौकरी की इच्छा के साथ पेरियार से संपर्क किया. पेरियार ने उसे अपनी दुकान पर मुनीम का सांैप दिया. कुछ अवधि के बाद उस लड़के की मां ने पेरियार से संपर्क कर, उसका विवाह कराने की प्रार्थना की. पेरियार ने उसके लिए नायडू परिवार की लड़की को चुना. लड़की अवैध नायडू संतान थी. वह शादी पेरियार के दोस्तों, स्थानीय नेताओं और सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति में बड़ी धूमधाम से हुई. वह पहली शादी थी, जिसे पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के तहत कराया था. उसकी खूब चर्चा हुई. इससे पेरियार के विद्रोही स्वभाव की खबर दूर तक फैल गई. ‘स्त्रीमुक्ति’ के क्षेत्र में दूसरा कार्यक्रम विधवा विवाह को प्रोत्साहन देना था. बनारस सहित अन्य धर्मस्थानों पर उन्होंने ऐसी अनेक विधवाओं को देखा था, जिन्हें पति की मृत्यु के बाद घर छोड़ना पड़ा था.

स्त्रीसमानता पर उनके विचार आधुनिकता से भरपूर थे. वे वैदिक रीति से विवाह, जिसमें पंडित मंत्रोच्चार करता है, वरवधु अग्नि की सप्तपदी लेते हैं, के वे घोर विरोधी थे. स्त्रीपुरुष का विवाह स्वर्ग में बनी जोड़ियां नहीं हैं. वह दांपत्य सुख के लिए किया गया समझौता है, जिसमें लड़का और लड़की दोनों बराबर के सहभागी होते हैं. पेरियार ने मुक्त कंठ से स्त्री समानता और स्वतंत्रता का समर्थन किया. कहा कि समाज में स्त्री को वे सब अधिकार और अवसर प्राप्त होने चाहिए जो पुरुष को प्राप्त हैं. मातृत्व स्त्री का चयन होना चाहिए. कर्तव्य नहीं. यदि कोई स्त्री संतान नहीं चाहती, तो उसे संतानोत्पत्ति के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने बालविवाह का विरोध तथा विधवा विवाह का जोरदार तरीके से समर्थन किया. 1930 में मद्रास में देवदासी प्रथा के विरोध में बिल लाया गया. पेरियार ने उसका जोरदार तरीके से समर्थन किया. जातिप्रथा को समाज और देश के लिए हानिकारक मानते हुए उन्होंने अंतरर्जातीय विवाह का समर्थन किया. वे स्त्री को संपत्ति संबंधी समान अधिकार देने के पक्ष में थे.

जब भी कोई व्यक्ति धर्म के विकल्प की आवाज उठाता है, बड़ेबड़ी बुद्धिजीवी मौन हो जाते हैं. अधिकांश नास्तिकों को भी धर्म का विरोध दिखता है, उसका विकल्प नहीं. ऐसे लोगों के नेतृत्व में नास्तिकता प्रतिक्रियावाद का शिकार हो जाती है. पेरियार नास्तिक थे. उनके पास आस्थावादियों के ‘धर्म नहीं तो क्या?’ जैसे प्रश्नों का भी उत्तर था. धर्म के विकल्प के रूप में वे बुद्धिवाद को स्थापित करना चाहिए थे. इस संबंध में उनके कई आलेख स्थानीय पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे. उन्होंने एक अंग्रेजी की पत्रिका ‘दि मोडर्न रेशनलिस्ट’ की शुरुआत भी की थी. अपने लेखों में उन्होंने समझाया था कि समाज की स्थापना धर्म अथवा संस्कृति जैसे प्राचीन अवधारणाओं के बजाय आधुनिकता और बुद्धिवाद के आधार पर होनी चाहिए. 1971 में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—

हम चाहते हैं कि लोग विवेकवान प्राणी के रूप में जीवनयापन करें. हम ऐसी किसी चीज का प्रचार नहीं करते, जो अविश्वसनीय और काल्पनिक हो. हमें ईश्वर पर आश्रित कुछ भी नहीं चाहिए, न ईश्वर की संतान, न धर्म, न शास्त्र, न पूजापाठ और न किसी प्रकार का कर्मकांड. हम उन्हीं चीजों तक सीमित रहेंगे जो विवेकसम्मत होते हुए तर्क की कसौटी पर खरी उतरती हों. आप सबको भी तर्क को बढ़ावा देने में जुट जाना चाहिए. हम जो कह रहे हैं, उसपर विश्वास करने से पहले उसके प्रत्येक शब्द पर सोचिए, समझिए और भलीभांति विवकसम्मत सिद्ध होने पर उसे अपनाइए.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ दिनोंदिन फैल रहा था. पेरियार सक्रिय राजनीति छोड़ सामाजिक क्रांति लाने के लिए संकल्परत थे. फिर एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया. त्रावणकोर रियासत के वायकम में महादेव का पुराना मंदिर था. उसमें अछूतों का प्रवेश निषिद्ध था. मंदिर के आसपास की कुछ सड़कें ब्राह्मणों और राजपरिवार के सदस्यों के लिए आरक्षित थीं. अछूत उनपर चल नहीं सकते थे. इस अमानवीय व्यवस्था का विरोध लंबे समय से चला आ रहा था. जनता की मांग को देखते हुए ट्रावणकोर सरकार ने 1865 में अध्यादेश के जरिये कानून बनाया था. उसके अनुसार राज्य के सभी नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर आनेजाने की छूट दी गई थी. व्यवस्था की गई थी कि राज्य की सभी सड़कें सभी नागरिकों के लिए खुली रहेंगी. कोई भी नागरिक उनपर आजा सकेगा. किंतु ब्राह्मण तथा राजपरिवार के सदस्य इस आदेश का विरोध करते आ रहे थे. उनकी परवाह न करते हुए 1884 में सरकार की ओर से एक और आदेश जारी किया गया था, जिसमें पिछली व्यवस्था का समर्थन किया गया था. उसके विरोध में ब्राह्मणों ने ट्रावणकोर उच्च न्यायालय में अपील कर दी. जिसमें मंदिर के आसपास की कुछ सड़कों पर अछूतों के लिए चलना निषिद्ध कर दिया गया. उस आदेश की अछूतों में तीखी प्रतिक्रिया हुई. नारायण गुरु के नेतृत्व मंे उन्होंने अपना आंदोलन तेज कर दिया. दूसरी ओर दलितों और पिछड़ों को सबक सिखाने के लिए सवर्ण भी ब्राह्मणों के नेतृत्व में संगठित होने लगे थे.

एक बार नारायण गुरु अपने शिष्यों के साथ गाड़ी में सवार होकर मंदिर के बराबर से गुजर रहे थे. महाकवि कुमारन और दलितपिछड़ों के अनेक नेता उनके साथ थे. अचानक उच्च जाति के कुछ गुंडे आकर उनकी गाड़ी के आगे खड़े हो गए. उनका नेतृत्व एक ब्राह्मण कर रहा था. उसने नारायण गुरु की गाड़ी को वहां से हटने के लिए विवश कर दिया. उस घटना का वर्णन सुप्रसिद्ध मलयाली कवि मुलूर एस. पद्मनाभा पणिक्कर ने अपनी कविता में इस प्रकार किया है—

बहुत पहले की बात है. महान नारायण गुरु रथ पर सवार होकर वायकम की सड़क से गुजर रहे थे. अचानक एक मूर्ख ब्राह्मण जो खुद को पृथ्वी का देवता कहता था, वहां आया. उसने नारायण गुरु के रथ को वहां से हटने का आदेश देने लगा.’

पेरियार उस समय तक नास्तिक होने का संकल्प ले चुके थे. लेकिन ऐसे समाज में जहां धर्म जीवन की समस्त पे्ररणाओं का स्रोत हो, बगैर धार्मिक स्वतंत्रता के सामाजिकराजनीतिक स्वतंत्रता की अनुभूति असंभव है. फिर वायकम में केवल मंदिर प्रवेश मुद्दा न था. बल्कि दलितों के सार्वजनिक स्थानों पर उपयोग का अधिकार भी शामिल था. इसलिए उन्होंने वायकम आंदोलनकारियों का साथ देने का निर्णय लिया. 1924 में मंदिर प्रवेश तथा सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर संघर्ष तेज हो चुका था. आंदोलनकारियों को दुनियाभर से समर्थन मिल रहा था. लोग खुले मन से सत्याग्रह का हिस्सा बन रहे थे. आंदोलनरत दलितों को सिख, ईसाई सहित अन्य धर्माब्लंवियों का सहयोग भी मिल रहा था. सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था का काम 200 से अधिक सिख स्वयंसेवक कर रहे थे. गांधी जी स्वयं उस मामले में रुचि ले रहे थे. किंतु वे इसे हिंदुओं का आंतरिक मामला मानते हुए, अन्य धर्माबलंबियों के हस्तक्षेप के विरुद्ध थे. ‘यंग इंडिया’ में लेख लिखकर उन्होंने गैरहिंदुओं को वहां से हट जाने का आग्रह किया था, जिसे उन्होंने नकार दिया था. गांधी, कांग्रेस और पेरियार को भी वायकम सत्याग्रह से दूर रखना चाहते थे. कांग्रेस गांधी के प्रभाव में थी. किंतु पेरियार का निर्णय अटल था. वे स्वयं को गांधी और कांग्रेस की छाया से बाहर लाने के लिए तैयार कर चुके थे. 14 अप्रैल 1924 को वे अपने साथियों के साथ वायकम आंदोलनकारियों के साथ मिल गए. पेरियार की लोकमानस में पैठ थी. उनके उतरते ही आंदोलन में तेजी आ गई. जयार ने वायकम आंदोलन को द्रविड़ अस्मिता का मुद्दा बनाया. लोग उनके समर्थन में जुटने लगे. आंदोलन तेजी से आगे बढ़ने लगा. अंततः गांधी को भी वायकम सत्याग्रहियों के समर्थन में आना पड़ा. ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने लिखा—‘यदि ब्राह्मणों ने अछूतों को सड़कों पर चलने की आजादी नहीं दी तो यह आंदोलन दिनोंदिन उग्र होता जाएगा. अभी तक सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनकारी आगे मंदिर प्रवेश की स्वतंत्रता की मांग भी करने लगेंगे.’

वही हुआ. पेरियार वायकम मुद्दे को दक्षिण भारतीय दलितों को पिछड़े वर्गों की अस्मिता का मुद्दा बना चुके थे. सरकार ने पेरियार को दबाने की कोशिश की. उन्हें दो बाहर कैद किया गया. तरहतरह के दबाव डाले गए. लेकिन पेरियार डटे रहे. जेल से लौटने के साथ ही वे पुनः आंदोलकारियों से जुड़ जाते थे. अंततः ब्राह्मणों को झुकना पड़ा. एक निर्णय के तहत सरकार ने दलितों को सड़कों पर चलने की स्वतंत्रता बहाल कर दी. वह पेरियार की बड़ी सफलता थी. उनके योगदान को केरल उच्च न्यायालय और सरकार दोनों की ओर से सराहा गया था. उस जीत ने पेरियार को संपूर्ण दक्षिण भारत में प्रतिष्ठित कर दिया. उसके फलस्वरूप वहां गांधी का प्रभावक्षेत्र सिकुड़ने लगा. यह पेरियार की बड़ी जीत थी. यहां तक कि कांग्रेस को भी जो आरंभ में पेरियार के कार्यक्रमों का विरोध कर रही थी, अंततः उनके समर्थन में आना पड़ा. कांचीपुरम् अधिवेशन में कांगे्रस ने उन्हें ‘वायकम वीरर’, ‘वायकम का हीरो’ कहकर सम्मानित किया.

गांधी तथा वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के साथ पेरियार के मतभेद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं से सर्वथा मुक्त थे. कांग्रेस राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग कर रही थी. कांग्रेस के अभिजन नेता, अंगेजी के साथ आ रहे आधुनिक विचारों से त्रस्त थे. वे उसे ‘भारतीयता’ पर संकट के रूप में देखते थे. औपनिवेशिक शासन से मुक्ति केवल उसका राजनीतिक एजेंडा नहीं था. बल्कि उसके पीछे कांग्रेस के अभिजन नेताओं के वर्गीय स्वार्थ भी छिपे थे. ऐसे नेताओं का प्रमुख उद्देश्य था, सामाजिक परिवर्तन की धारा को अवरुद्ध कर, उसे मनमानी दिशा दी जा सके. राजनीतिक स्वतंत्रता से उनका आशय था, राष्ट्रवाद के नाम पर स्वतंत्रता को भावनात्मक मुद्दा बताकर उसके लिए व्यापक जनसहमति हासिल लेना चाहते थे. जबकि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी कारगर हो सकती है, जब लोग अपनी स्वाधीनता को जीना जानते हों. उनमें अपने अधिकारों के प्रति पर्याप्त चेतना हो. इसलिए पेरियार की राजनीति संबंधी मांग केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी. गांधी की भांति पेरियार का भी विचार था कि अशिक्षा, धर्म और तज्जनित तरहतरह के अंधविश्वासों से ग्रसित समाज राजनीतिक आजादी को पूरी तरह आत्मसात् करने में सक्षम नहीं है. ऐसे समाज को यदि राजनीतिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो वह उसका लाभ उठाने में अक्षम होगा. इसलिए तिलक आदि नेता जो कहते आए थे कि ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ के बजाए पेरियार का नारा था—‘आत्मसम्मान मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.’ छूआछूत से ग्रसित दलितों और उत्पीड़न के शिकार अन्त्यजों के लिए इस नारे का विशेष महत्त्व था. नारे के पीछे उनकी समानता और न्याय की भावना अंतनिर्हित थी. प्रकारांतर में वे कांग्रेस के समानांतर एक ऐसे आंदोलन का संचालन कर रहे थे जो विशुद्ध तर्कसम्मत समाज की स्थापना को समर्पित था. ऐसे समाज के लिए जिसमें मनुष्य अपने विवेक को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रहों से मुक्त रख सकता है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी अनिवार्य शर्त है. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के उद्देश्यों और कार्यक्रमों को तमिल जनता तक पहुंचाने के लिए पेरियार ने दो पर्चे प्रकाशित किए थे. उनके द्वारा पेरियार की आदर्श समाज संबंधी संकल्पना और संपनों को समझा जा सकता है—

1. ऐसे समाज को उखाड़ फेंकना जिसमें एक वर्ग दूसरे से खुद को ऊंचा समझता है. मात्र जन्म के आधार पर जो आदमीआदमी के बीच अविश्वास को जन्म देता और उसे निरंतर पालतापोसता है.

2. ऐसे समाज की स्थापना करना जिसमें सभी बराबर हों. जिसमें सभी को अपनी बात कहने की आजादी हो. विकास के लिए समान अवसर प्राप्त होते हैं. जिसमें गैरबराबरी के लिए कोई जगह न हो. कानून और समाज के स्तर पर स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार और मानसम्मान प्राप्त होता हो. उन्हें समाजार्थिक स्तर पर किसी पर किसी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े.

3. जिसमें समाज के सभी वर्गों को अपनेअपने विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों. जिससे वे अपनी नैसर्गिक स्वाधीनता का आनंद ले सकें.

4. छूआछूत का समूल नाश करते हुए आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना के अनुरूप समाज की स्थापना करना.

5. अनाथों और विधवाओं के लिए आवासइकाइयों का निर्माण तथा उनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध करना.

6. जनसाधारण को नए मंदिर, मठ तथा गुरुकुल पद्धति पर स्कूल बनाने की प्रवृत्ति की ओर से हतोत्साहित करना.

7. नाम के साथ जाति अथवा गौत्र सूचक शब्दों के प्रयोग बंद करने पर जोर देना. उपलब्ध संसाधनों एवं संपदाओं के सामूहिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना. उससे सभी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आवास आदि के विकास पर जोर देना. इसके लिए सामूहिक स्तर पर प्रयास करते रहना.

आत्मसम्मान आंदोलन’ लंबे समय तक अनौपचारिक संगठन के रूप में काम करता रहा. उसे विधिसम्मत संस्था के रूप में 1952 में त्रिरुचिलापल्ली में पंजीकृत कराया गया. नाम रखा गया—‘पेरियार आत्मसम्मान प्रचार संस्था.’ संस्था का प्रमुख लक्ष्य था—अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त ऐसे समाज की संरचना पर बल देना जो समानता और समरसता के सिद्धांतों पर टिका हो. धर्म केंद्रित आचारसंहिता में स्त्री को पुरुष से हेय माना गया है. पेरियार ने स्त्रीसमानता पर जोर दिया और उसे ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के मुख्य उद्देश्य के रूप में शामिल किया. बनारस यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिरों में देवदासियों की दुर्दशा के बारे में देखा था. धर्म के नाम पर स्त्रीअस्मिता के अपमान ने उनके अंतर्मन को आहत किया था. हिंदू धर्म के प्रति उनकी नफरत का एक कारण मंदिरों में चल रही देवदासी प्रथा भी थी, जिनमें ईश्वर की सेवा के नाम पर युवा लड़कियों को अघोषित वेश्यावृत्ति की ओर ढकेल दिया था. स्त्रीसमानता और स्वतंत्रता के लिए विवाह को स्त्रीपुरुष के बीच एक करार की संज्ञा दी थी, जबकि ब्राह्मणी सभ्यता मानती थी कि दांपत्य संबंध स्वर्ग में तय किए जाते हैं. देवदासी प्रथा को समाप्त करने के लिए 1930 में पेरियार ने मद्रास विधानसभा में एक बिल भी पेश किया था. उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया, जिसकी उस समय स्त्रीवादी संगठनों ने भूरिभूरि प्रशंसा की थी. उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए 1938 में मद्रास में प्रांतीय महिला संगठनों का बड़ा सम्मेलन हुआ था. उसमें पेरियार के स्त्रीउत्थान को लेकर चलाए जा रहे कार्यक्रमों की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘पेरियार’ की उपाधि से अलंकृत किया था.

पेरियार के आदर्श समाज किसी भी प्रकार के भेदभाव, छूआछूत और रूढ़ियों के लिए कोई स्थान न था.‘आमसम्मान आंदोलन’ के पीछे निहित पेरियार की भावना को समझना कठिन नहीं है. पेरियार ने जाति और धर्म के आधार पर ब्राह्मणों द्वारा गैरब्राह्मणों के शोषण को अपनी आंखों से देखा था. कांग्रेस में रहकर वे समझ चुके थे कि उसके अभिजन नेता येनकेनप्रकारेण स्वार्थसिद्धि में लगे रहते हैं. वे वही राह अपनाते हैं, जिससे उनके वर्गीय हितों को लाभ पहुंचता हो. इसके लिए वे धर्म को, राजनीति को हथियार बनाते हैं. शूद्रों को संपत्तिअधिकार से बेदखल कर समाज बड़े वर्ग को अपंग बनाने की व्यवस्था उन्होंने पहले से ही धर्मशास्त्रों में की हुई है. ऐसे में गैरब्राह्मणों का भला तभी संभव है, जब वे अपने सामूहिक हितों के प्रति संगठित हों. इसके लिए उनमें स्वाभिमान की भावना का संचार करना आवश्यक है. इसके लिए उन्हें पहले ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर निकालना होगा.

आत्मसम्मान आंदोलन’ के पीछे पेरियार की कांग्रेस और गांधी की ओर से जन्मी निराशा थी. वे चाहते थे कि कांग्रेस और गांधी सामाजिक न्याय को भी अपने आंदोलन का मुद्दा बनाएं. राजनीति और समाज में ब्राह्मणवर्चस्व को कम करने के लिए उनका साथ दें. जबकि कांग्रेस के सर्वेसर्वा बने गांधी धर्म और जाति के क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने को प्रयत्नरत थे. हिंदू धर्म में सुधार की उनकी योजना किसी भी तरह वर्णव्यवस्था को बचाए रखने तक सीमित थी. कांग्रेस को जनसाधारण के सरोकारों से जोड़ने के लिए उन्होंने एक प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें समाज के उपेक्षित एवं विपन्न वर्गों के लिए शिक्षा एवं अन्यान्य अवसरों में समानता की मांग की गई थी. वे उसे कांग्रेस के कांचीपुरम् अधिवेशन में पेश करना चाहते थे. किंतु उस समय के बड़े कांग्रेसी नेताओं ने यह कहते हुए कि इससे समाज में दरार आएगी, पेरियार के प्रस्ताव पर विचार करने से ही इन्कार कर दिया था. कांग्रेस उससे पहले भी पेरियार के प्रस्ताव को ठुकरा चुकी थी. तनमनधन से कांग्रेस को पूरी तरह समर्पित पेरियार के लिए यह बड़ा झटका था. नाराज होकर उन्होंने अधिवेशन का बहिष्कार कर दिया. ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ इसी विद्रोह की देन था. उनका ध्येय था, दलित और पिछड़ों के सम्मान की रक्षा. मानवमात्र की स्वतंत्रता, समानता सामाजिक समरसता की सुरक्षा करते हुए आधुनिक जीवनमूल्यों पर आधारित समाज की संरचना के लिए काम करना. यह जानते हुए कि गांधी और कांग्रेसी नेता उनका साथ देने वाले नहीं हैं, आंदोलन का शुरुआती संकल्प था—‘न ईश्वर, न धर्म, न ब्राह्मण, न गांधी और न ही कांगे्रस.’ ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ मनुष्य के मूलभूत अधिकारों और अस्मिता की रक्षा को समर्पित होगा. आत्मसम्मान आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था—

द्रविड़ जनता के मनस् की ब्राह्मणवाद से मुक्ति. द्रविड़ों को उनके प्राचीन गौरव का विश्वास दिलाना. उसके लिए उन सभी धर्मग्रंथों, रीतिरिवाजों और परंपराओं से मुक्त करना जो ब्राह्मणवर्चस्व को अपरिहार्य ठहराते थे.’

आत्मसम्मान आंदोलन’ के नामकरण के पीछे की वैचारिकी को समझना कठिन नहीं है. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में आर्यों और द्रविड़ों के संघर्ष का उल्लेख हुआ है. उनके अनुसार आर्य कबीलों ने भारत के मूल निवासी कबीलों को युद्ध में पराजित कर, दक्षिण दिशा में पलायन के लिए बाध्य कर दिया था. द्रविड़ उन्हीं के वंशज माने जाते हैं. इस तरह द्रविड़ होना एक ऐतिहासिकसांस्कृतिक पराजय का कलंक अपने सिरमाथे ढोना है. हालांकि जो महाकाव्य या मिथ उन युद्धों को लेकर गढ़े गए हैं, उनकी प्रामाणिकता को लेकर अनेकानेक संशय हैं. किंतु अन्य प्रमाणों के अभाव में लेखकों एवं इतिहासकारों को महाकाव्यों तथा प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में मौजूद मिथकीय आख्यानों से ही इतिहास के सूत्र खोजने पड़ते हैं. भारतीय संस्कृति की विडंबना है कि उसके नेतृत्व और संरक्षण का दायित्व लंबे समय से उन वर्गों के अधीन रहा, जिनके अपने स्वार्थ लोकहित की अपेक्षा प्रबल थे. जिनमें निष्पक्षता का अभाव था. यही कारण है कि समानता और स्वतंत्रता जैसे मूलभूत गुणों का, जो किसी संस्कृति को महान बनाते हैं—भारतीय संस्कृति में अभाव बना रहा. बावजूद इसके वे वर्ग श्रेष्ठतम होने का दावा भी करते रहे.

प्रक्षेपण का शिकार होने के कारण प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में अनेक विरोधाभास दिखाई पड़ते हैं. पुराणों में दर्ज है कि अनार्य भारतीयों की युद्धशैली आक्रामक आर्यों की अपेक्षा परिष्कृत थी. देवासुर संग्राम में देवताओं को अनेक बार पराजय का सामना करना पड़ा था. सफलता तब मिली जब उन्होंने अनार्यों कबीलों में फूट डालकर उनमें से कुछ का बारीबारी से सहयोग लेना आरंभ किया. समाजीकरण की उस प्रक्रिया में एक ऐसा वर्ग भी पनपा जिसकी निपुणता कर्मकांडों में थी. जिसका दावा था कि वह दैवीय शक्तियों का ज्ञाता है तथा यज्ञादि कर्मकांडों के माध्यम से उनसे संवाद भी कर सकता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि वे शक्तियां उस वर्ग की कल्पना की उपज थीं. फिर भी उनकी बातों का जादू ऐसा था कि उस समय का बड़ा वर्ग उससे प्रभावित था. विशेष अवसरों पर उस वर्ग की राय महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी. अपनी काल्पनिक योग्यता के बल पर वह वर्ग जनसाधारण को सम्मोहित करने का सामथ्र्य रखता था. सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते हुए वह वर्ग प्रायः विजेता के पक्ष में रहता था. हालांकि कालांतर में, सांस्कृतिक विजय प्राप्त होने के बाद उस वर्ग ने जो नए मिथ गढ़े, उनमें पराजित वर्गों; यानी उन वर्गों को भी अपना समर्थक और अनुयायी दर्शाने की कोशिश की, जिनसे विरुद्ध संघर्ष में उसने आर्यों का नेतृत्व किया था. सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व लिए यह अनिवार्य था. आरंभ में सब कुछ स्वाभाविक लगता था. यज्ञादि कर्मकांडों के लिए संसाधनों की आवश्यकता थी. उसके लिए गणप्रमुख अथवा मुखिया की मदद आवश्यक थी. आगे चलकर गणप्रमुख का पद राजा ने ले लिया और यज्ञ को प्रतिष्ठा का विषय माना जाना लगा. जो यज्ञ में अधिक बलि दे, दानादि में ज्यादा संसाधन खपाए और अधिकाधिक लोगों को भोज कराए, वह उतना ही बड़ा राजा माना जाता था. धीरेधीरे यज्ञों की संख्या और उनकी मान्यता बढ़ती गई. अपना वैशिष्ठ्य बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने अवसरविशेष के अनुसार यज्ञों और कर्मकांडों का नियमन किया; और अवसरानुकूल रणनीति अपनाकर उसे शेष समाज पर थोपते चले गए. वास्तविकता से हटाकर वायवी दुनिया की ओर ले जाने की उस प्रवृत्ति जैसा विरोध अपेक्षित था, वैसा नहीं हुआ. यदि छिटपुट विरोध हुए भी तो उन्हें दबा दिया गया. पुराणों के अनुसार वेन पृथ्वी का पहला राजा था. उसे जनता ने चुना था. कदाचित इसीलिए वह ब्राह्मणों को अतिरिक्त महत्त्व देने के लिए तैयार न था. इससे क्षुब्ध ब्राह्मणों ने जनता को उसके विरुद्ध भड़का दिया और वेन उत्तेजित भीड़ के कोप का शिकार बन गया. प्रजा की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों ने वेन के बेटे पृथु को राजा नियुक्त किया. पृथु ब्राह्मणों की शक्ति को समझ चुका था. पिता की हत्या से भयभीत पृथु ने ब्राह्मणों की प्रत्येक आज्ञा को शिरोधार्य किया. इसलिए उनकी दृष्टि में वह आदर्श राजा कहलाया. पुराणों में उसकी भूरिभूरि प्रशंसा की गई है. बताया जाता है कि उसी के नाम पर पृथ्वी का नामकरण हुआ है. वेन और पृथु की कहानियां दर्शाती हैं कि ब्राह्मणत्व या ब्राह्मण की खुशी राजसत्ता के श्रेष्ठत्व का प्रमाण मान ली गई थी. महाभारत में पांडव सारे धत्त्कर्म करने के बाद भी धर्मानुयायी घोषित कर दिए जाते हैं.

सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थायी बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने देवताओं को अपराजेय एवं अलौकिक शक्तियों का स्वामी घोषित कर दिया था. सांस्कृतिक संघर्ष शताब्दियों तक चलता रहा. इतिहास के एक चरण में जैसे ही आर्य कबीलों को अवसर मिला, उन्होंने सांस्कृतिक प्रतीकों और धरोहरों का अपने स्वार्थ के अनुसार अनुकूलन करना आरंभ कर दिया. उनमें बड़ी चालाकी से आर्यश्रेष्ठता के मिथ को स्थापित किया गया. इतिहास और संस्कृति की ताकत से अनजान अनार्य कबीले धीरेधीरे उस षड्यंत्र का शिकार होते गए. सभ्यता के इतिहास में किसी प्रजाति अथवा समूह की राजनीतिक पराजय अनहोनी घटना नहीं है. देशविदेश के इतिहास में इस तरह की लाखों घटनाएं दर्ज हैं. परंतु जब इतिहास को मिथ में ढालकर आस्था का विषय बना दिया जाए तो उसपर विमर्श की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है. साक्ष्यों के अभाव में विद्वानों को केवल अपनी कल्पनाशक्ति और विवेक से काम लेना पड़ता है. परिणामस्वरूप उनके निष्कर्षों में एकरूपता का अभाव होता है. ठोस वैचारिक चेतना की कमी के चलते सुधार के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं बन पाता.

इस देश में विदेशी आक्रामक सामरिक शक्ति अथवा बुद्धिबल के कारण कभी सफल नहीं हुए. वे भारत पर लंबे समय तक शासन करने में इसलिए कामयाब रहे क्योंकि उन्होंने यहां के बुद्धिजीवी वर्ग, यानी ब्राह्मणों के सांस्कृतिक साम्राज्य में सैंध लगाने की कभी कोशिश नहीं की. सैकड़ों वर्षों के दौरान देश राजनीतिक स्तर पर अनेक उतारचढ़ाव से गुजरा. बड़ेबड़े साम्राज्य बने और ढहे भी, परंतु ब्राह्मणों के सामाजिकसांस्कृतिक वर्चस्व को कभी चुनौती नहीं मिली. 400 वर्ष से अधिक समय तक दिल्ली के तख्त पर आसीन, मुगल सम्राटों ने जान लिया था कि ब्राह्मण जो समाज का बहुत छोटासा हिस्सा है, को साधकर पूरे भारत को साधा जा सकता है. यही आगे चलकर अंग्रेजों ने किया. यही कारण है कि इस देश में विदेशी शासकों के प्रति आक्रोश कहीं नजर नहीं आता. उनीसवीं शताब्दी में यदि विदेशी सत्ता के प्रति जनज्वार उमड़ता दिखाई पड़ता है तो इसलिए कि नई शिक्षा की रोशनी में समाज का बड़ा हिस्सा ब्राह्मणों के बौद्धिक वर्चस्व को नकारकर स्वतंत्र निर्णय लेने लगा था. दूसरे अमेरिका और फ्रांस में हुई क्रांतियों के दबाव में वे समानता और स्वतंत्रतामूलक आधुनिक जीवनमूल्यों को अपना चुके थे. इसलिए भारत में आगमन के साथ ही उन्होंने समाननागरिक संहिता का पर अमल करना आरंभ कर दिया. जिसके फलस्वरूप वर्ण, जाति, धर्म आदि के नाम पर उपेक्षा और दमन का शिकार रहे वर्गों को शिक्षा और जीवन के बाकी क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर मिला. अकादमिक स्तर पर बहुत अधिक पढ़ेलिखे न होने के बावजूद पेरियार इसे समझते थे. वे जान चुके थे कि आत्मसम्मान आंदोलन की सफलता के लिए ब्राह्मणों के बौद्धिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक श्रेष्ठतावाद को चुनौती देना अत्यावश्यक है. श्रेष्ठतादंभ के शिकार तमिल ब्राह्मण स्वयं को आर्य मूल का मानते थे. पिछड़े समूहों को उनके वर्चस्व से बाहर निकालने के लिए प्राचीन सांस्कृतिक स्थापनाओं को चुनौती देना आवश्यक था. पेरियार ने धर्म को सीधी चुनौती दी. कहा कि धर्म के अंधेरे में भटकने बजाय लोगों को चाहिए कि वे अपने विवेक का इस्तेमाल करें. उन्होंने महाकाव्यों और पुराणों को कपोलकल्पित माना. समाज को मूर्तिपूजा और तत्संबंधी अन्यान्य आंडबरों से दूर रखने के लिए आंदोलन चलाया. जिसमें गणेश की प्रतिमाएं तोड़ डाली गईं. वर्णव्यवस्था का समर्थन करने वाले ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाई गईं. 1953 में उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर राम के पुतलों का दहन किया. 1955 में सार्वजनिक स्ािान पर राम के चित्र का दहन करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके लिए उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा, किंतु वे डटे रहे.

पेरियार के विचार था कि धर्म बहुसंख्यक वर्ग को सामाजिकबौद्धिक रूप से दास बनाए रखने का शक्तिशाली माध्यम है. उसका पहला हमला मनुष्य के आत्मविश्वास पर होता है. जिससे वह अपने विवेक से काम लेने के बजाए पंडेपुरोहितों के प्रपंच में फंसकर रह जाता है. फुले और आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से ऊपर मानते थे. उनका मानना था कि उत्पीड़ित वर्गों यथा दलितोंपिछड़ों के लिए सामाजिकसांस्कृतिक स्वतंत्रता, राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. इसलिए जाति प्रथा का उन्मूलन ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का प्रमुख एजेंडा था. पेरियार का मानना था कि ईश्वर, धर्म और ब्राह्मण, तीनों किसी न किसी रूप में जातिप्रथा के जन्मदाता रहे हैं. जबकि गांधी और कांग्रेस दोनों जातिप्रथा के छदम् विरोधी थे. पेरियार का मानना था कि जाति के समूल उच्छेद के बिना मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता असंभव है. उस समय तक समानता का सपना भी अधूरा रहेगा. अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द न लगाने का निर्णय वे 1923 में ही ले चुके थे. ‘पेरियार’ संबोधन उन्हीं दिनों उन्होंने अपनाया था.

दक्षिण में अस्मितावादी राजनीति की बागडोर धनी पिछड़ी जातियों के हाथों में थी. उनमें रेड्डी, कम्मा, वेल्लाल, नायर, वेलमाज आदि शुरू से सक्रिय थीं. यह भी कह सकते हैं कि ब्राह्मणों के विरुद्ध दलित एवं पिछड़ी जातियों में विकसी चेतना का लाभ उठाने के लिए वे जातियां अकस्मात मैदान में उतर आई थीं, जो उससे पहले तक ब्राह्मणों के साथ थीं और किसी न किसी प्रकार सत्तासुख भोगती आई थीं. चूंकि वह आंदोलन ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण, द्रविड़ बनाम आर्य था, इसलिए उनके आंदोलन को पिछड़ी एवं दलित जातियों का सहयोग भी प्राप्त था. ‘दव्रिड़त्व’ उन्हें अतीत से जोड़ता था. पेरियार के लिए वह कोई चिंताजनक बात न थी. वे ब्राह्मणवाद को किसी भी प्रकार के क्षेत्रीयतावाद से खतरनाक मानते थे. ब्राह्मणवाद पर निर्णायक चोट करने के लिए उन्होंने जातिवाद के समूल उन्मूलन, स्त्रीमुक्ति की मांग की. अस्मितावादी राजनीति प्रकारांतर में यह संदेश भी देती थी कि विभिन्न जातियोंउपजातियों में बंटे द्रविड़ कभी साझा इतिहास और संस्कृति के सहचर थे. उनके बीच भेदभाव की भावना आर्यों, जिनसे उनका आशय प्रायः ब्राह्मणों तक सीमित था, द्वारा अपने स्वार्थ के लिए आरंभ किया गया था. पिछड़े वर्ग की धनी जातियों का संगठन उत्तर भारत में भी बना था. गत शताब्दी के चैथे दशक में कुर्मी, कुशवाहा और यादव, पिछड़ों में अपेक्षाकृत समृद्ध जातियों ने ‘त्रिवेणी संघ’ के रूप में वर्चस्वकारी जातियों का विरोध रचने की कोशिश की थी. उनकी कमजोरी थी कि सिवाय जाति के उनके बीच दूसरा कोई संगठनकारी तत्व न था. दक्षिण में अस्मितावादी आंदोलन की सफलता का कारण द्रविड़ के रूप में उनकी स्वतंत्र पहचान थी. ‘त्रिवेणी संघ’ का प्रयोग महत्त्वपूर्ण और अत्यावश्यक होने के बावजूद लंबे समय तक कारगर न हो सका. इसलिए कि संगठन में शामिल जातियां स्वयं को क्षत्रिय वंशज मानती थीं. इस तरह प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में वे उसी ब्राह्मणवाद का समर्थन करती थीं, जिसने उन्हें शताब्दियों तक उत्पीड़ित रखा था और जिससे मुक्ति की कामना के लिए उन्होंने ब्राह्मणवाद को चुनौती दी. इसलिए बहुसंख्यक होने के बावजूद वे मणवाद के विरोध में सार्थक प्रतिपक्ष न बना सकीं. चुनावों में मिली पराजय के बाद वे पूरी तरह बिखर गईं. दूसरे पिछड़ों में उभरती चेतना के बाद स्वयं कांग्रेस ने ‘पिछड़ा वर्ग कल्याण संघ’ की स्थापना की थी. चूंकि कांग्रेस को गांधी का आशीर्वाद प्राप्त था. जनमानस में उनकी पैठ को देखते हुए

दक्षिण भारत के इतिहास में 1927 से 1934 तक का समय सर्वाधिक परिवर्तनकामी था. उस समय तक पेरियार द्वारा चलाया गया ‘अस्मितावादी आंदोलन’ जनमानस में गहरी पैठ बना चुका था. उससे पूर्ववर्ती आंदोलनों पर किसी न किसी रूप में धर्म की छाया थी. जबकि आत्मसम्मान आंदोलन की नींव धर्मनिरपेक्षता और किसी भी प्रकार के आडंबरवाद से मुक्त थी. आत्मसम्मान आंदोलन की पैठ का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि न केवल सामाजिक शक्तियां बल्कि दक्षिण भारत के सैन्य बल भी उसके समर्थन में थे. ब्राह्मणीकरण की काट के लिए पेरियार ने द्रविड़ अस्मिता के मुद्दे को उछाला था, जिसे वहां के जनसाधारण की स्वीकृति प्राप्त थी. ब्राह्मणवाद की नींव आस्था और विश्वास पर केंद्रित रही है. पेरियार की कोशिश ऐसे समाज की रचना की थी, जो आधुनिक ज्ञान और तर्क को समर्पित हो. ‘जस्टिस पार्टी’ के वरिष्ठ नेता और दक्षिण भारत में ‘निब्र्राह्मणीकरण आंदोलन’ के सक्रिय कार्यकर्ता आॅर्कट रामास्वामी मुदलियार ने पेरियार के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के लिए उनकी तुलना महान दार्शनिक रूसो के साथ की है—

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में फ्रांसिसी विचारक रूसो ने अपने देशवासियों के तर्कसामर्थ्य को संदीप्त किया. जिससे वहां फ्रांसिसी समाज बड़ी क्रांति के लिए तैयार हुआ. मैं यह कहूंगा कि पेरियार के कारण ही हम तमिलवासियों ने तर्क करना सीखा. जिसने आगे चलकर हमारे भी आत्मसम्मान की चेतना जाग्रत की. इस आधार पर पेरियार तमिलनाडू के रूसो हैं.’

आंबेडकर की भांति पेरियार भी सामाजिक स्वतंत्रता को राजनीतिक स्वतंत्रता से बढ़कर मानते थे. उनका मानना था कि दलित और पिछड़े लोग जो समाजार्थिक कारणों से दूसरों पर निर्भर हैं, या निर्भर बना दिए गए हैं, कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता उनका भला नहीं कर सकती. राजनीतिक स्वतंत्रता राज्य को केवल कानून बनाने तथा उनपर अमल करने हेतु आवश्यक स्वायत्तता प्रदान करती है. वह व्यक्तिमात्र को उसकी स्वाधीनता का एहसास कराने की जिम्मेदारी नहीं लेती. असमानताग्रस्त समाजों में कुछ नागरिक अधिकांश नागरिकों पर अधिकार जमाए रहते हैं. दूसरी ओर शिक्षा, अज्ञानता अथवा संसाधनों के मामले में अभिजन समाज पर निर्भरता के कारण बहुजन समाज अपनी स्वाधीनता का उपयोग करने में असमर्थ रहता है. उसके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता समाज के शीर्षस्थ वर्ग के निर्णयों का दास बन जाने तक सीमित हो जाती है. स्वतंत्रता को अपने हक में इस्तेमाल करना, जीवन में उसका आनंद लेना स्वाधीनता है. यह स्वतंत्रता को जीने, उसे जीवन में उतारने का नागरिक अधिकार है. नागरिक हित में आवश्यक है कि लोग स्वतंत्रता के साथसाथ स्वाधीनता का मोल भी समझें. पेरियार का कहना था कि बगैर सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन होगी. गांधी, नेहरू जैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि उनके लिए मानवमात्र की सम्मानता का विचार कोई मूल्य नहीं है. भारतीय गौरव की प्रशंसा करते हुए वे प्रायः उस दौर का महिमामंडन करने लगते हैं, जब चातुर्वर्ण्य का बोलबाला था. शूद्रों और दलितों को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है. गांधी और कांग्रेस एक और तो दलितों और पिछड़ों को समानता और स्वतंत्रता का सपना दिखाते हैं. दूसरी ओर व्यवहार के स्तर उन संस्थाओं को भी बचाए रखना चाहते हैं, जो शताब्दियों से समाज के बड़े वर्ग के शोषण का कारण रही हैं. मानवमात्र के सम्मान की सुरक्षा के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की परिकल्पना करना अनैतिक विचार है.

जैसेजैसे सामाजिक परिवर्तन को लेकर पेरियार की स्वतंत्र वैचारिकी का निर्माण हो रहा था, वैसेवैसे कांग्रेस तथा उसकी नीतियों के प्रति उनका विरोध भी बढ़ता जा रहा था. उसकी रचनात्मक परिणति ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के रूप में सामने आई. इतिहासकारों के अनुसार द्रविड़ पराजित जाति रही है. आर्यों ने उन्हें दक्षिण की ओर ढकेल दिया था. जाति के आधार पर समाज के विभाजन तथा ऊंचनीच की भावना करीबकरीब पूरे देश में एकसमान है. मगर द्रविड़ों के माथे आर्यों के माथे पर आर्यों से पराजय का दोष मढ़ा था. इससे उबरने के लिए पेरियार ने द्रविड़ों को भारत का मूल निवासी बताया और आर्यों को आक्रामक. ब्राह्मणवाद पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ब्राह्मण विदेशी के हैं. इसलिए इस देश और यहां के संसाधनों पर मूलनिवासियों का अधिकार उनसे ज्यादा है. मूल निवासी की अवधारणा नई नहीं थीं. ज्योतिबा फुले उसे वर्षों पहले ‘गुलामगिरी’ में स्थापित कर चुके थे. 1892 में ‘मद्रास समाज सुधार संघ’ का गठन भी इसी सिद्धांत के आधार पर किया गया था.

1925 में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को आरंभ में केवल पढ़ेलिखे और मध्यवर्गी युवाओं का आकर्षण था. आरंभ में उन्हीं के भरोसे आंदोलन आगे बढ़ा. धीरेधीरे बात लोगों की समझ में आने लगी. शहर से लेकर गांव तक लोक पेरियार से जुड़ने लगे. 1930 में वह पूरे दक्षिण भारत में अपनी पकड़ बना चुका था. आंदोलन के साथसाथ पेरियार का आत्मविश्वास भी बढ़ता गया. उन्हें लग रहा था कि सामाजिक विकास के लक्ष्य को केवल सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है. राजनीति ऐच्छिक सामाजिक परिवर्तनों की दिशा में राजनीति केवल उत्प्रेरक का काम कर सकती है. धीरेधीरे पेरियार के मन में सक्रिय राजनीति को लेकर निराशा उमड़ने लगी. उन्हें यह विश्वास हो चला था कि सामाजिक सुधार के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति लोकप्रिय राजनीति के माध्यम से संभव नहीं है.

अपने विचारों को जनजन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘कुदी अरासु’(गणतंत्र) शीर्षक से साप्ताहिक की शुरुआत की. उसमें उन्होंने महिला उत्थान, सामाजिक न्याय, धर्म और पाखंड के विरोध में लिखना आरंभ किया. ‘कुदी अरासु’ नए मूल्यों को समर्पित साप्ताहिक था. इसी पत्र में उन्होंने 1935 में भगत सिंह के चर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों बना’ का तमिल अनुवाद प्रकाशित किया. ‘कुदी अरासु’ के उस अंक को सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया. पेरियार के लिए यह कोई नई बात न थी. उग्र विचारों के कारण मद्रास सरकार ‘कुदी अरासु’ को कई बार प्रतिबंधित कर चुकी थी. प्रोफेसर चमनलाल के अनुसार आजादी के बाद एक समय ऐसा भी आया जब भगत सिंह के उपर्युक्त लेख का अंग्रेजी प्रारूप उपलब्ध नहीं था. तब पेरियार द्वारा छापे गए लेख का अंग्रेजी में दुबारा अनुवाद करके काम चलाया गया. ‘कुदी अरासु’ में भगत सिंह को फांसी पर गांधी की चुप्पी की आलोचना करते हुए पेरियार ने इस पत्रिका के 29 मार्च 1931 के अंक में लिखा था—

देशभर में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसने भगत सिंह की फांसी की निंदा न की हो. कहीं कोई भी नहीं है जिसने इस घटना के लिए सरकार को कोसा न हो. दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि देशभर में ऐसे अनेक देशभक्त, और राष्ट्रनेता हैं जो गांधी को इस घटना के लिए दोषी मानते हैं.’

पेरियार की भाषा में कबीर जैसा तंज और साफगोई थी. अल्पशिक्षिात होने के बावजूद उनमें गजब आत्मविश्वास था. वे मुखर वक्ता, निर्भीक और मानवमूल्यों से प्रतिबद्ध नेता थे. उनके लिए सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक भागीदारी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण था. फुले का अनुसरण करते हुए पेरियार ने शोषण का आधार रहे ब्राह्मणवादी मिथकों पर न केवल जोरदार प्रहार किया, बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को भी चुनौती दी. यह जानते हुए भी भारत की धर्मप्राण जनता नास्तिक व्यक्ति को अपने नेता के रूप में शायद ही स्वीकार करेगी, पेरियार ने खुद को नास्तिक कहा और आजीवन नास्तिकता के प्रचार में लगे रहे. पेरियार के योगदान को सम्मानित करते हुए यूनेस्को ने उन्हें ‘दक्षिणपूर्वी एशिया का सुकरात’ का दर्जा दिया था.

ओमप्रकाश कश्यप