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महिषासुर मूवमेंट : ‘डिब्रह्मनाइजिंग अ कल्चर’

सामान्य

परि​चर्चा

(कुछ महीने पहले एक पत्रिका की ओर से परि​चर्चा की गई थी. उसमें उठाए गए मुद्दों पर कुछ बातें)

 

  • फरवरी, 2016 में संसद के बजट सत्र में भारतीय जनता पार्टी की राजनेता व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी ने महिषासुर शहादत दिवस पर सवाल उठाकर इसे देशद्रोह से जोड़ दिया था. क्‍या ऐसा किया जाना उचित है? आपकी क्‍या राय है?

‘महिषासुर दिवस’ हमारे समय की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक परिघटना है. शताब्दियों से जो वर्ग दूसरों की निगाह से खुद को देखता आया था, अर्से तक जो आरोपित विचारधारा पर ही अपना ईमान कायम रखे था—‘महिषासुर दिवस’ के बहाने वह खुद को अपनी दृष्टि से देखने-समझने की कोशिश में लगा है. यह देर से हुई अच्छी शुरुआत है. महिषासुर की ऐतिहासिकता पर बहस करना बेकार है. मिथ को इतिहास-सिद्ध करने की दावेदारी कोई कर भी नहीं सकता. राम और रावण भी मिथकीय पात्र हैं. संभव है सभ्यता के किसी दौर में उनसे मिलते-जुलते व्यक्ति सचमुच इस धरती पर रहे हों, लेकिन वे वैसे ही रहे होंगे जैसे महाकाव्यों तथा अन्य ग्रंथों में दर्शाए गए हैं—यह सप्रमाण नहीं कहा जा सकता. मूल कृति ‘पुलत्स्य वध’ से लेकर ‘रामायण’ और फिर ‘रामचरितमानस’ तक उसमें अनगिनत बदलाव हुए हैं. हर प्रस्तोता ने उसमें कुछ न कुछ जोड़ा-घटाया है. इसलिए उसके अनेकानेक पाठ तथा अनगिनत अंतर्विरोध हैं, जिन्हें वे आस्था और विश्वास की झीनी चादर से ढांपते आए हैं. यदि मान लें कि राम नामक राजा कभी इस धरती पर था, तो भी हम उसे अपना नायक क्यों मानें, जिसने शंबूक का वध केवल इसलिए किया था कि वह किसी खास पुस्तक को पढ़कर ज्ञान में हिस्सेदारी करना चाहता था. असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देने वाला ‘रामराज’ हमारा सपना भला कैसे बन सकता है! विवेकवान समाज अपने नायक स्वयं चुनता है. यदि उन्हें अपनी सुविधानुसार नायक चुनने की आजादी है तो वही आजादी बाकी समाज को भी है. ‘महिषासुर’ मिथ होकर भी हमारे लिए सम्मानेय है, क्योंकि वह उस संस्कृति का प्रतिकार करता था जो अनेकानेक असमानताओं, आडंबरों और भेदभाव से भरी थी. दूसरों के श्रम पर अधिकार जताने वाली बेईमान संस्कृति. उसके सर्वेसर्वा रहे देवता सागर-मंथन में बराबरी का हिस्सा देने के वायदे के साथ असुरों से सहयोग मांगते हैं, परंतु बेईमानी करते हुए ‘अमृत’ तथा बहुमूल्य रत्न खुद हड़प लेते हैं. ‘महिषासुर’ श्रम-संस्कृति में भरोसा रखने वाली, पशु-चारण अर्थव्यवस्था से नागर सभ्यता की ओर बढ़ती, तेजी से विकासमान भारत की प्राचीनतम सभ्यता का प्रतीक नायक है.

सरकार और सरकार में बैठे जो लोग इसे देशद्रोह बता रहे हैं. उनके सोच पर तरस आता है. वे या तो देश और देशद्रोह की परिभाषा से अनभिज्ञ हैं, अथवा हमें शब्दों के जाल में फंसाए रखना रखना चाहते हैं. जैसा वे हजारों वर्षों से करते आए हैं. देश कोई भूखंड नहीं होता. वह अपने नागरिकों के सपनों और स्वातंत्र्य-चेतना में बसता है. लाखों-करोड़ों लोग जहां एकजुट हो जाएं, वहीं अपना देश बना लेते हैं. जिन लोगों में स्वातंत्रय चेतना नहीं होती, उनका कोई देश भी नहीं होता. ऐसे लोग देश में रहकर भी उपनिवेश की जिंदगी जीते हैं. भारत अर्से से ब्राह्मणवाद का उपनिवेश रहा है. आगे भी रहे, यह न तो आवश्यक है, न ही हमें स्वीकार्य. यहां वही संस्कृति चलेगी जो इस देश के 1.3 अरब लोगों की साझा संस्कृति होगी. जो सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता तथा संसाधनों में सभी की निष्पक्ष और समान सहभागिता सुनिश्चित करती हो. वैसे भी मनुष्य की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति समाज या संस्कृति का देय नहीं होती. यह मनुष्य होने की पहली और अनिवार्य शर्त है. यह प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है जो मनुष्य को उसके जन्म से ही, वह चाहे जिस जाति, धर्म, वर्ग, देश या समाज में जन्मा हो—जीवन की पहली सांस के साथ स्वतः प्राप्त हो जाता है. जिस देश की संस्कृति अपने तीन-चौथाई नागरिकों को समाजार्थिक एवं बौद्धिक रूप से गुलाम बनाती हो, वह ‘राष्ट्र’ तो क्या भूखंड कहलाने लायक भी नहीं होता. इसे देशद्रोह कहने वाले असल में वे लोग हैं जिनका देश कुर्सियों में बसा होता है. जो जनता से प्राप्त शक्तियों का उपयोग उसे छलने और मूर्ख बनाने के लिए करते हैं. इसके लिए वे कभी राष्ट्रवाद, कभी धर्म तो कभी जाति को माध्यम बनाते हैं. यह सरकार को ही राष्ट्र घोषित करने की साजिश है, जिसके सर्वोत्तम रूप को भी टॉमस पेन ने आवश्यक बुराई माना है.

  • भाजपा द्वारा संसद में इस बात को उठाये जाने के पहले से ही आरएसएस के अन्‍य अनुषांगिक संगठन जैसे विश्‍व हिंदू परिषद व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इसका विरोध करते रहे हैं। क्‍या आपको लगता है कि महिषासुर शहादत स्‍मृति दिवस जैसे सांस्‍कृतिक आंदोलन का विरोध ब्राह्मणवादी वर्चस्‍व को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है?

भाजपा, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद ऐसे संगठन हैं जिन्हें धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. वे केवल राजनीति करते हैं, जिसमें लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं है. उनके मन में 1000—1500 वर्ष पुराना भारत बसता है, जब ऊंची जातियां अपने से निचली जातियों के साथ मनमाना व्यवहार करने को स्वतंत्र थीं. वे प्राचीन भारत की संपन्नता का बखान करते हुए नहीं थकते. बार-बार याद दिलाते हैं कि भारत कभी ‘सोने की चिड़िया’ कहलाता था. इतिहास बताता है कि भारत का सबसे समृद्धिशाली दौर ईसा के चार-पांच सौ वर्ष पहले से लेकर इतनी ही अवधि बाद तक का रहा है. उस दौर के बड़े सम्राट या तो बौद्ध थे, अथवा जैन. कह सकते हैं कि ब्राह्मणवाद के सबसे बुरे दिन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अच्छे दिन थे. डॉ. रमेश मजूमदार के अनुसार उस दौर में आजीवक, जैन एवं बौद्ध दर्शनों के प्रभामंडल में जातीय स्तरीकरण घटा था. सामाजिक भेदभाव तथा यज्ञ-बलियों में कमी आई थी. उसके फलस्वरूप परस्पर सहयोगाधारित व्यापारिक संगठन तेजी से पनपे. बौद्ध दर्शन ने भारतीय मेधा को विश्व-स्तर पर स्थापित किया था, इसलिए हर कोई भारतीय व्यापारियों के साथ व्यापार करने को उत्सुक था. उसके फलस्वरूप व्यापार बढ़ा और देश आर्थिक समृद्धि के शिखर की ओर बढ़ता गया.

हिंदू राज्य के रूप में भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों की निगाह में पुष्यमित्र शुंग के बाद का भारत बसता है, जो भौतिक और अधिभौतिक दोनों ही दृष्टियों से देश के पराभव का दौर था. विदेशी व्यापार सिमटने लगा था. उपनिषदों की जगह पुराण लिखे जा रहे थे. वैदिक धर्म छोटे-छोटे संपद्रायों में सिमट चुका था. महाकाव्यों को उनका वर्तमान स्वरूप इन्हीं दिनों प्राप्त हुआ, जिसने चातुर्वण्र्य समाज की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया था. इसके लिए तत्कालीन लेखकों ने वैदिक चरित्रों को मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया. ऋग्वेद में कृष्ण यदु कबीले का वीर और बुद्धिमान नेता है, वह आर्य-संस्कृति का विरोधी है तथा आर्यों के विरुद्ध संग्राम में अपने कबीले का नेतृत्व कर युद्ध में इंद्र को परास्त करता है. ‘महाभारत’ के परिवर्धित संस्करण में उसे ब्राह्मणी व्यवस्था के समर्थक के रूप में पेश किया गया. इसके ऐवज में यदुओं को वर्ण-क्रम में ‘क्षत्रिय’ का दर्जा प्राप्त हुआ. इस दौर में दर्शन की मुक्त-धारा, धर्म की ताल-तलैयों में सिमटने लगी थी. बहुदेववाद जो वैदिक साहित्य की विशेषता था, जिसे बुद्ध के समकालीन आचार्यों ने उपनिषदों में एकेश्वरवाद में समेटने की कोशिश की थी—वह पुनः छोटे-छोटे संप्रदायों यथा शैव, कापालिक, तांत्रिक, वैष्णव, नाथपंथी, शाक्त आदि में बंट चुका था. उनके बीच बहुत गहरे मतभेद थे. भाजपा तथा उसके आनुषंगिक संगठन ब्राह्मण धर्म में उभरे उन मतभेदों को याद नहीं करते. वे जानते हैं कि लोकतंत्र के दौर में पुराना समय लौटकर नहीं आने वाला. इसलिए वे धर्म के नाम पर केवल राजनीति करते हैं. उनकी राजनीति भी पूरी तरह प्रतिक्रियावादी, मुस्लिम-विरोध से अनुप्रेत है. उनके लिए राष्ट्रवाद और फासीवाद में बहुत अधिक अंतर नहीं है. जबकि लोकतंत्र को सम्मानजनक स्थान न तो फासीवाद दे पाता है, न ही वह कट्टर राष्ट्रवाद के बीच सुरक्षित रह पाता है.

ब्राह्मणवादी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए धर्म और संस्कृति को औजार बनाता है. उनके माध्यम से वह लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा जमाता है, फिर निरंतर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण करता है. फासीवाद लोगों के दिलो-दिमाग में भय का संचार करता है. इतना भयभीत कर देता है कि जनसाधारण अपने विवेक से काम लेना छोड़ केवल आदेश को ही कर्तव्य समझने लगता है. ताकत का भय दिखाकर वह लोगों को उसकी मनमानियां सहने के लिए मजबूर कर देता है. लेकिन फासीवाद की उम्र कम होती है. वह व्यक्ति के दिलो-दिमाग पर कब्जा तो करता है, लेकिन ऐसा कोई माध्यम उसके पास नहीं होता, जो देर तक प्रभावशाली हो. सत्ता बदलते ही उसका स्वरूप बदल जाता है. नहीं तो जनता स्वयं खड़ी होकर राजनीति के उस खर-पतवार को समाप्त कर देती है.

ब्राह्मणवाद तभी तक जीवित है, जब तक लोग धर्म, जाति, और आडंबरों के मोहजाल में फंसे हैं. इसलिए वह किसी भी प्रकार के प्रबोधन से घबराता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ का आयोजन भारतीय संस्कृति के इतिहास में न तो कोई नया पन्ना जोड़ता है, न ही कुछ गायब करता है. असल में वह ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई स्थापनाओं से बाहर आने की छटपटाहट है. और यही डर इस सभ्यता के धार्मिक अभिजन ब्राह्मण को सता रहा है. वे जानते हैं कि बहुजन हितों के अनुसार मिथकों की पुनर्व्याख्या का सिलसिला एक बार आरंभ हुआ तो आगे रुकेगा नहीं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मणवाद को इतिहास में इससे पहले कोई चुनौती नहीं मिली थी. उसे कई बार चुनौतियों से गुजरना पड़ा है. लेकिन तब से आज तक धरती न जाने कितनी  परिक्रमाएं कर चुकी है. ज्ञान पर तो किसी का कब्जा न तब संभव था, न आज. लेकिन तब ब्राह्मणेत्तर वर्गों की प्रतिभाओं को उपेक्षित किया जाता था. आज यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक परिवेश में उनके विरोध को दबाया जाना आसान नहीं है. भाजपा, विश्व हिंदू परिषद जैसे ब्राह्मणवादी संगठनों को यही डर खाए जा रहा है. यह सच भी है कि सिलसिला केवल ‘महिषासुर’ के मिथ की पुनर्व्याख्या पर रुकने वाला नहीं है. रुकना भी नहीं चाहिए. उम्मीद है बहुत जल्दी दूसरे मिथ भी पुनर्व्याख्या के दायरे में आएंगे. इससे ब्राह्मणीय सर्वोच्चता का वह मिथ भी भरभरा कर गिर पड़ेगा, जिसे बनाने में उन्हें सहस्राब्दियाँ लगी हैं.

  • पिछले कुछ सालों में वर्चस्‍ववादी संस्‍कृति के बरक्‍स समतामूलक बहुजन पंरपरा बहुजन संस्‍कृति की बात उच्‍च शिक्षण संस्थानों में पहुंचे ओबीसी, आदिवासी और दलित विद्यार्थी करने लगे हैं. क्‍या आप मानते हैं कि इस तरह के आंदोलनों से समाज में जागृति आएगी? इस तरह के आंदोलनों का क्‍या लाभ आप देखते हैं?  

वर्चस्वकारी संस्कृति दो तरह से समाज को अपनी जकड़ में लेती है. पहले बल-प्रयोग द्वारा, जिसमें शक्ति का उपयोग कर समाज के अधिकतम संसाधनों पर अधिकार कर लिया जाता है. दूसरे अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर. वर्चस्वकारी संस्कृति बुद्धिजीवियों से लैस होती है. उसके पोषित बुद्धिजीवी प्रत्येक परिस्थिति को अपने स्वार्थ के अनुकूल परिभाषित करने में प्रवीण होते हैं. अपने बुद्धि-चातुर्य के बल पर वे शेष जनसमाज को यह विश्वास दिला देते हैं कि केवल वही उनके सबसे बड़े शुभेच्छु हैं और जो व्यवस्था उन्होंने चुनी है वह दुनिया की श्रेष्ठतम सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था है. ऐसा नहीं है कि जनसाधारण में बुद्धि-विवेक की कमी होती है. ग्राम्शी की माने तो प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक होता है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितियों को अपने पक्ष में परिभाषित करने में दक्ष नहीं होता. इस कारण वर्चस्वकारी संस्कृति के समर्थक बुद्धिजीवियों पर विश्वास करना, जनसाधारण की विवशता बन जाता है. वह अपने शोषकों को ही अपना सर्वाधिक हितैषी और शुभेच्छु मानने लगता है. ऐसे में यदि परिवर्तन होता भी है तो केवल सतही, दिखावे के लिए, जिसका लाभ पूंजीपति और दूसरे एकाधिकारवादी संस्थानों को जाता है. जनाक्रोश को शांत करने के लिए वर्चस्वकारी संस्कृति प्रायः अपने आवरण में ऐर-फेर कर परिवर्तन का नाटक करती है. स्थितियों में आमूल परिवर्तन तभी संभव है, जब गैर अभिजन समाज के अपने बुद्धिजीवी हों, जो उसकी समस्याओं और हितों की उसके पक्ष में सही-सही पड़ताल कर, प्रतिबद्धता के साथ उसका नेतृत्व कर सकें.

वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति के विरोध शुरुआत हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास जैसे संत-कवियों द्वारा हो चुकी थी. लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में केवल धार्मिक आडंबरवाद, छुआछूत तथा अन्यान्य सामाजिक रूढ़ियां थीं. आर्थिक असमानता जो बाकी सभी बुराइयों की जड़ है, को वे कदाचित मनुष्य की नियति मान बैठे थे. कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी संतोष को परम-धन कहकर रूखी-सूखी खाने, दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर जी न ललचाने की सलाह दी थी. रैदास ने जरूर ‘बेगमपुर’ के बहाने समानता पर आधारित समाज की परिकल्पना की थी. वह क्रांतिकारी सपना था, अपने समय से बहुत आगे का सपना—जिसके लिए उनका समाज ही तैयार नहीं था. जिन लोगों के लिए वह सपना था वह इतना शोषित, उत्पीड़ित था कि शीर्षस्थ वर्गों की कृपा में ही अपनी मुक्ति समझता था. उस समय तक पश्चिम में भी यही हालात थे. वहां रैदास से दो शताब्दी बाद थामस मूर ने ‘बेगमपुर’ से मेल खाती ‘यूटोपियाई’ परिकल्पना की थी, जिसपर उसे स्वयं ही विश्वास नहीं था. इसलिए अपनी कृति ‘यूटोपिया’ में उसने समानता-आधारित समाज की परिकल्पना पर ही कटाक्ष किया गया था. आगे चलकर, यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में यही शब्द आमूल परिवर्तन का सपना देख रहे लेखकों, बुद्धिजीवियों, आंदोलनकारियों और जनसाधारण का लक्ष्य और प्रेरणास्रोत बन गया.

सामाजिक अशिक्षा और आत्मविश्वास की कमी के कारण रैदास के ‘बेगमपुर’ की परिकल्पना सूनी आंखों के सपने से आगे न बढ़ सकी थी. शताब्दियों बाद उस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम फुले और डॉ. अंबेडकर ने किया. ग्राम्शी ने बुद्धिजीवी की जो परिभाषा उद्धृत की है, उस पर ये दोनों महामानव एकदम खरे उतरते हैं. उनकी प्रेरणा तथा लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाते हुए दलित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उभरा, जिसने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की. इसी के साथ-साथ पिछड़े वर्गों में भी राजनीतिक चेतना का संचार हुए. आबादी के हिसाब से पिछड़े पचास प्रतिशत से अधिक थे. कदाचित उनके नेताओं को लगता था कि उन्हें किसी बौद्धिक नेतृत्व की आवश्यकता नहीं है. अपनी-अपनी कमजोरियों के कारण दलित और पिछड़े नेता-बुद्धिजीवी वास्तविक सहयोगियों की पहचान करने में चूकते रहे. इसी का लाभ उठाकर वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकार, दलितों और पिछड़ों को उनकी जाति की याद दिलाकर अलग-अलग समूहों में बांटते रहे. पर्याप्त संख्याबल का अभाव दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनने की बाधा था. नतीजा यह हुआ कि वर्चस्वकारी संस्कृति के विरुद्ध शोषित-उत्पीड़ित वर्गों का कोई सशक्त मोर्चा न बन सका.

आज स्थिति बदली हुई है. शिक्षा और लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर दलितों और पिछड़ों में नया बुद्धिजीवी वर्ग उभरा है, जो न केवल अपने शोषकों की सही-सही पहचान कर रहा है, बल्कि अपने बुद्धि-विवेक के बल पर उन्हें उन्हीं के मैदान में चुनौती देने में सक्षम है. वह जानता है कि जाति, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद आदि वर्चस्वकारी संस्कृति के वे हथियार हैं जिनका उपयोग अभिजन संस्कृति के पैरोकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए करते आए हैं. वह यह भी समझ चुका है कि कोरा राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता-परिवर्तन को संभव बना सकता है. आमूल परिवर्तन के लिए संस्कृति के क्षेत्र में भी बदलाव आवश्यक है. वह यह भी जानता है कि दलित और पिछड़ों के सपने, दोनों की समस्याएं यहां तक कि चुनौतियां भी एक जैसी हैं. उनके समाधान के लिए संगठित विरोध अपरिहार्य है. इस बात को शिखरस्थ वर्ग भी भली-भांति जानता है कि दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता उसे सत्ता से हमेशा-हमेशा के लिए बेदखल कर सकती है. उच्च-शिक्षण संस्थानों से निकले ओबीसी, आदिवासी एवं दलित युवाओं का यही युगबोध वर्चस्वकारी संस्कृति के पैरोकारों को चिंता में डाले हुए है.

  • क्‍या इतिहास में हुए ऐसे किसी और आंदोलन के बारे आप कुछ बताना चाहेंगे, जिसमें बहुजनों के संस्‍कृति पक्ष पर बल दिया गया हो, और उसके सकारात्‍मक परिणाम सामने आएं हों?

कई आंदोलनों के नाम लिए जा सकते हैं. एकदम हाल की बात करें तो साठ के दशक में बिहार से आरंभ हुए ‘अर्जक संघ’ को ले सकते हैं. जिसने मेहनतकश लोगों ने जीवन में किसी भी धर्म की भूमिका को मानने से इन्कार कर दिया था. मध्यकालीन भारत में रैदास, कबीर, फुले आदि ने ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए जनसंस्कृति के उभार पर जोर दिया था. यदि बौद्धकालीन भारत तक जाएं तो आजीवक संप्रदाय भी श्रम-संस्कृति के उन्नयन को समर्पित था, जिसे आज बहुजन संस्कृति कहा जा रहा है. उसके केंद्र में धर्म के नाम पर आडंबरवाद से मुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन था. आजीवक श्रमजीवियों के अपने संगठन थे. उनके माध्यम से वे देश-विदेश के व्यापारियों के साथ कारोबार करते थे. जातक कथाओं के हवाले से डॉ. रमेश मजूमदार ने बौद्धकालीन भारत में 31 प्रकार के सहयोगाधारित संगठनों का उल्लेख किया है. उनमें लुहार, बढ़ई, चर्मकार, पत्थर-तराश, सुनार, तेली, बुनकर, रंगरेज, किसान, मत्स्य पालन करने वाले, आटा पीसने वाले, नाई, धोबी, माली, कुम्हार यहां तक कि चोरों के संगठन का भी जिक्र है. वे अपने आप में स्वायत्त थे. अपने फैसलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र. उनके अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार राज्य को भी नहीं था. सम्राट विशेष अवसरों पर उनसे परामर्श करना आवश्यक समझता था. खास बात यह है कि उन समूहों में श्रम-कौशल और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता था. केवल बुद्धि के नाम पर, जैसा ब्राह्मणवादी व्यवस्था में था, विशेषाधिकार का कोई प्रावधान उनमें नहीं था. ‘कूटवणिज जातक’ में बनारस के दो व्यापारियों की कहानी दी है. उनमें एक ‘बुद्धिमान’ था ‘दूसरा अतिबुद्धिमान’. एक बार दोनों ने मिल-जुलकर व्यापार करने का निर्णय लिया. उन्होंने बराबर-बराबर निवेश कर पांच सौ छकड़े माल खरीदा. दोनों व्यापार के लिए साथ निकले और सारा माल बेचकर वापस लौट आए. उसके बाद दोनों मुनाफे के बंटवारे के लिए जमा हुए. ‘बुद्धिमान’ व्यक्ति ने पहल करते हुए लाभ को दो समान हिस्सों में बांट दिया. यह देख ‘अतिबुद्धिमान’ बोला—

‘मैं तुमसे दुगुना हिस्सा लूंगा.’ उसकी बात सुनकर बुद्धिमान चौंका. उसने पूछा—

‘दो गुना क्यों?’

‘इसलिए कि मैं अतिबुद्धिमान हूं.’

‘हमने व्यापार में बराबर धन लगाया है. मेहनत भी बराबर-बराबर की है.’ ‘बुद्धिमान’ बोला.

‘तो क्या! सभी जानते हैं कि मैं तुमसे अधिक बुद्धिमान हूं. इसलिए मुझे लाभ में दुगुना हिस्सा मिलना चाहिए.’ कहते हुए दोनों व्यापारी आपस में झगड़ने लगे. न्याय के लिए अंततः वे बुद्ध की शरण में पहुंचे. बुद्ध दोनों को बराबर-बराबर हिस्सा देने का फैसला करते हैं. लाभ के दुगने हिस्से पर अधिकार जताने वाले ‘अतिबुद्धिमान’ को उन्होंने ‘बेईमान व्यापारी’ कहा है. वर्चस्वकारी व्यवस्था ऐसी बेईमानी कदम-कदम पर करती है. वह श्रम के सापेक्ष बुद्धि को वरीयता देती है. ब्राह्मण जो शिखर पर रहता है, उसका शारीरिक श्रम से कोई संबंध नहीं होता. वह दूसरों के श्रम पर परजीवी की भांति जीवन-यापन करता है. कमोबेश यही हालत बाकी दो वर्गों की भी है. वर्ण-व्यवस्था में निचले पायदान पर मौजूद शूद्र को अधिकाधिक श्रम करना पड़ता है. फिर भी उसे समग्र आय का मामूली हिस्सा प्राप्त होता है. बड़ा हिस्सा शीर्षस्थ वर्ग हड़प लेते हैं. कहानी के माध्यम से बुद्ध ने इस व्यवस्था का प्रतिकार किया है. इससे उस बौद्धकालीन समाज में अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीवन जीने वालों की महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. यह आदर्श व्यवस्था थी, जिसे समय रहते रेखांकित करने की आवश्यकता थी. लेकिन इतिहास लेखन का काम ब्राह्मणों या ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त लेखकों के अधीन रहने के कारण वह सदैव पूर्वाग्रह-ग्रस्त रहा है. उन्होंने उस संस्कृति के दस्तावेजीकरण में पूरी तरह उपेक्षा बरती जिसे समानांतर संस्कृति, जनसंस्कृति या सर्बाल्टन संस्कृति कहा जाता है. उसका खामियाजा विराट बहुजन समाज आज तक भुगत रहा है.

  • महिषासुर आंदोलन के बारे में आपके निजी विचार क्‍या हैं? पिछले दिनों विभिन्‍न समाचारपत्रों, टीवी चैनलों पर इसकी चर्चा रही. इनसे प्राप्‍त सूचनाओं के आधार पर आपका इस आंदोलन के प्रति क्‍या विचार बना? या फिर, इस संबंध में आप किसी अनछुए पहलू पर प्रकाश डालना चाहेंगे?

मन से इस आंदोलन से जुड़े सभी मित्रों को बधाई देते हुए मैं थोड़ा मतांतर रखता हूं. ‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘दुर्गा’ आदि की भांति ‘महिषासुर’ भी एक मिथ है और मिथ की सीमा है कि वह अकेला किसी काम का नहीं होता है. वह समाज और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जुड़कर कारगर होता है. इसके लिए उसको अनगिनत मिथों की आवश्यकता पड़ती है, जिनका समर्थन या विरोध करते हुए वह समाज में अपनी पहचान बनाए रखता है. मिथ प्रायः दीर्घजीवी होते हैं. मगर कोई भी मिथ जीवन में हर समय मार्गदर्शक नहीं रह सकता. अमावस्या की रात में दिये या एक स्फुर्लिंग की भांति वह केवल अवसर-विशेष पर हमें राह दिखा सकता है. किंतु अनेक मिथों के साथ मिलकर वह मनुष्य की संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा का सहभागी बन जाता है. मिथों के उपयोग के लिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है. किसी मिथ का उपयोग करने के लिए उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी होना आवश्यक है. इसके अभाव में वह दोधारी तलवार की तरह काम करने लगता है. सही समय पर सटीक उपयोग न हो तो उसके मायने एकदम बदल जाते हैं. पिछले कुछ महीनों में ‘महिषासुर’ की पुनर्व्याख्या ने दलित, पिछड़ों एवं आदिवासियों को एक-दूसरे के निकट लाने का काम किया है. लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से लड़ाई में कोई एक मिथ कारगर नहीं हो सकता. उसके लिए अनेक मिथ चाहिए. लेकिन नए मिथ गढ़ना आसान नहीं होता. हां, पहले से ही प्रचलित मिथों को युगानुकूल संदर्भों के साथ पुनपर्रिभाषित अवश्य किया जाता है. अतः जो मिथ की ताकत को जानते हैं, जिन्हें अपने विवेक पर भरोसा है, और जो सचमुच बहुजन संस्कृति के विस्तार का सपना देखते हैं, उन्हें चाहिए कि वे महिषासुर जैसे दूसरे मिथकों की भी खोज करें. नए मिथकों की खोज करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है, उन मिथकों को युगानुकूल संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करना. सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति के लिए बहुजन को अपने लक्ष्य को समर्पित बुद्धिजीवियों की पूरी खेप तैयार करनी होगी.

महिषासुर मिथ की दूसरी कमजोरी यह है कि वह एक सम्राट है. उस दौर का है जब यह दुनिया लोकतंत्र के बारे में जानती न थी. जबकि आज जमाना लोकतंत्र का है. ‘महिषासुर’ के प्रतीक के सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति पर हमला तो बोला जा सकता है. या ऐसे ही हमलों के बीच वह हमारे लिए कारगर हथियार बन सकता है. लेकिन केवल उसके सहारे वर्चस्वकारी संस्कृति को रचनात्मक विकल्प संभव नहीं है. अतएव आवश्यकता अनुकूल मिथकों के चयन के साथ-साथ उन्हें लोकतांत्रिक परिवेश के अनुकूल ढालने की है. ताकि वे मिथक जो अभी तक वर्चस्वकारी संस्कृति के सुरक्षा-कवच बने थे, प्रकारांतर में लोकतंत्र और सहजीवन का समर्थन करते नजर आएं.

  • क्या आप मानते हैं कि संघ परिवार का महिषासुर शहादत दिवस का कटु हिंसक विरोध और आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने की उनकी मांग से दलित-बहुजनों को यह अहसास हो सकेगा कि हिंदुत्व एजेंडा ब्राह्मणवाद से अधिक कुछ नहीं है? क्या आप उनके असली चेहरे और एजेंडे का पर्दाफाश करने में सहयोग करना चाहेंगें?

हिंदुत्व को न्यायालय ने जीवन-पद्धति माना है. परंतु विचार करके देखिए, क्या यह केवल जीवन-पद्धति ही है. मनुष्य को जो आजादी जीवन-पद्धति को चुनने की होनी चाहिए, वैसी आजादी क्या यह धर्म देता है? कथित सनातनी हो या गैर-सनातनी, एक हिंदू परिवार की सामान्य जीवन-चर्या मिली-जुली होती है. हर परिवार में कोई आला या कोना ‘मंदिर’ के नाम पर आरक्षित होता है. हर घर में मूर्तियों को नहलाया जाता है. सुबह-शाम की आरती, पूजा-बंदन बिना नागा चलता है. जब तक पत्थर की मूर्ति से छुआ न लें, स्त्रियां अन्न-जल ग्रहण नहीं करतीं. मंदिर में कागज, पत्थर, कांच, मिट्टी, लकड़ी या प्लास्टिक के आड़े-तिरछे, भांति-भांति के देवता आसन जमाए रखते हैं. हर घर में साल में एक-दो बार ‘सत्यनारायण कथा’ कही जाती है. पंडित सारे कर्मकांड रचता है. परंतु कभी नहीं बताता कि ‘सत्यनाराण की कथा’ क्या है? किस हिंदू धर्म-शास्त्र में उनका उल्लेख है? फिर भी डरी-सहमी कुल-ललनाएं इस कथा के श्रवण से खुद को धन्य मानती रहती हैं. अब यह मत कहिए कि संकट के समय जरूरतमंद की मदद करना, सादा जीवन जीना, जीवमात्र पर दया करना, चोरी-चकारी से परहेज रखना, सत्य वाचन, माता-पिता का सम्मान करना और बुराइयों से दूर रहना हिंदुत्व हमें सिखाता है. ये सब बातें तो नैतिकता के हिस्से आती हैं और समाजीकरण का मुख्य आधार हैं. समाज के बीच जगह बनाने के लिए प्रत्येक धर्म चाहे वह मूर्ति-पूजकों का हो या मूर्ति-भंजकों का, इन सदाचारों को अपनाता है. इन्हें अपनाए बिना उसकी गति नहीं है. इसलिए अभिव्यक्ति का तरीका चाहे जो हो, हर धर्म में यही सदाचार सिखाए जाते हैं. इसे धर्म की धूत्र्तता कहें या बेईमानी, वह नैतिकता से उधार लिए इन सदाचारों को अपना बनाकर पेश करता है. इस तरह पेश करता है मानो धर्म है तो वे सदाचार हैं. असल में होता इसका उलटा है. मनुष्य धर्म को इसीलिए अपनाता है ताकि उसकी आने वाली पीढ़ियां धर्म के साथ जुड़े शील और सदाचारों को अपनाएं. समाजीकरण की अनिवार्यता धर्म नहीं, शील और सदाचरण हैं. यदि कहीं समाज है तो वहां धर्म भले ही न हो, समाजीकरण की प्रमुख शर्त के रूप में शील और सदाचरण रहेंगे ही. बिना धर्म के समाज गढ़ा जा सकता है, लेकिन बिना शील और सदाचार के उसका एक क्षण भी अस्तित्व में रहना मुश्किल है. आम हिंदू के लिए ‘हिंदुत्व’ या ‘जीवनपद्धति’ का आशय मूर्तियों पर जल चढ़ाने, किसी न किसी देवता पर भरोसा करने, गाय को रोटी देने, व्रत-उपवास रखने, पर्व-त्योहार पर विधि-सम्मत पूजन-अर्चन करने जैसे कर्मकांडों तक सीमित है. ये सब ऐसे आयोजन हैं जिनमें ब्राह्मणों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका बनी रहती है. दूसरे शब्दों में जिसे हिंदुत्व कहा जाता है, वह ब्राह्मणवाद का ही लौकिक विस्तार है. इसलिए हिंदुत्व का बने रहना, प्रकारांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अस्तित्व में रहना है.

‘हिंदुत्व’ को बनाए रखने के लिए उन्होंने अनेक षड्यंत्र रचे हैं. उनमें जनता द्वारा प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन तथा महिषासुर की छल-हत्या, एकलव्य का अंगूठा काट लेना, शंबूक की हत्या के बहाने उसके उत्तराधिकारियों को ज्ञान से वंचित कर देना जैसे उनके अनेकानेक धत्त्कर्म सम्मिलित हैं. चूंकि आरक्षण ने दलित एवं समाजार्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दिया है, इसलिए वे उनके सबसे बड़े आलोचक हैं. जातिवाद को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पोषते, उसके आधार पर अपने विशेषाधिकार गिनाते आए लोग आज उन वर्गों पर जातिवादी होने का आरोप लगा रहे हैं, जो शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न के शिकार होते आए हैं. हिंदुत्व का उनका एजेंडा केवल धर्म तक सीमित नहीं है. इसे केवल धर्म से जोड़कर रखना परिवर्तनकामी शक्तियों की भारी भूल रही है. हिंदुत्व का एजेंडा कहीं न कहीं संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों की इजारेदारी को भी मजबूत करता है. जाति के आधार पर तीन-चौथाई जनसंख्या को शूद्र या दलित बताकर जमीन तथा उत्पादन के अन्य साधनों से वंचित कर देने का अर्थ है—पंद्रह-बीस प्रतिशत लोगों द्वारा समाज के कुल संसाधनों पर कब्जा. अभी तक ऐसा ही होता आया है.

महिषासुर जैसे प्रतीकों की बहुजन व्याख्याएं हिंदुत्व की नींव पर प्रहार करती हैं. उस पतित संस्कृति का विरोध करती हैं जो बलात्कारी को ‘देवराज’ का दर्जा देती है. दलित-बहुजन की नई बौद्धिक खेप का आदर्श राम नहीं है जो अपनी निर्दोष भार्या की शील-परीक्षा लेता है, शंबूक को दंडित करता है. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन प्रकारांतर में एक सलाह भी है कि बहुजन, ब्राह्मणवादी नायकों को अपना नायक मान लेने की भूल न करें. यह चूक उन्होंने शताब्दियों पहले उनके पूर्वजों की ओर से हुई थी. जिसका दंड वे आज तक भुगत रहे हैं. आरक्षण दमित वर्गों को शिक्षा और स्वतंत्र सोच का अवसर प्रदान करता है. इसलिए वह उनके लिए असह् हैं. चाहे जिस आधार पर हो, हिंदुत्व को न्यायालय की स्वीकृति मिल चुकी है, इसलिए वर्चस्वकारी शक्तियां उनके बहाने दलित-बहुजन को फुसलाए रखने का सदियों पुराना खेल खेल रही हैं.

 

  • निस्संदेह आज जो बहुजन सवाल उठा रहा है, सांस्कृतिक प्रतीकों की पुनर्व्याख्या की जा रही है, उसका सीधा-सा आशय है कि समाज के निचले वर्गों में शिक्षास्तर में वृद्धि हुई है. उससे लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है. इसके पीछे आरक्षण का योगदान भी है. इसलिए वे चाहते हैं कि आरक्षण खत्म हो ताकि उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो और जैसे वे पिछले हजारों वर्ष से याद करते आए हैं, आगे भी इसी प्रकार चलता रहे.

ब्राह्मणवाद सांस्कृतिक ‘दैत्य’ है. यहां ‘दैत्य’ का अभिप्राय उसके परंपरागत अर्थ में ही लेना चाहिए. परंपरा में जो धत्तकर्म दैत्य के बताए जाते हैं, असलियत में वही कार्य ब्राह्मणवादियों के देवता भी करते हैं. उनके देवता कदम-कदम पर छल करते हैं, दूसरों की स्त्रियों को बलत्कृत करते हैं. भेंट-पूजा पाकर प्रसन्न होते हैं. यदि मन-माफिक चढ़ावा न मिले तो कुपित हो जाते हैं. तुलना करें तो उनके देवता और नकचढ़े सामंत में कोई अंतर ही नहीं है. यह अनायास नहीं है कि बृहश्पति जो देवताओं के गुरु हैं, वही चार्वाक दर्शन के प्रणेता भी हैं. देव-सभाओं में अप्सराओं का नृत्य-गायन, देवताओं की मौज-मस्ती तथा सोम-पान, चार्वाकों की ‘खाओ-पीओ मौज करो’ की विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है. यानी ‘देवगुरु’ का दर्शन देवताओं की दिनचर्या से ही प्रेरित है. या फिर यह हो सकता है कि देवता अपने गुरु के दर्शन के अनुगामी हों. दूसरी ओर असुर गुरु शुक्राचार्य हैं, जिन्हें इतिहास, दंडनीति, नीति-शास्त्र का आदि व्याख्याकार बताया गया है. ‘महाभारत’ की चर्चा प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन के लिए होती है. हस्तिनापुर का राज्य संभालने से पहले युधिष्ठिर भीष्म के पास राजनीति का ज्ञान लेने जाता है. शुक्राचार्य के ज्ञान की महिमा इससे भी जानी जा सकती है कि युधिष्ठिर को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले भीष्म शुक्राचार्य के ही शिष्य हैं. उनके शिष्यों में दूसरा नाम पृथु का भी आता है, जिसे प्रथम निर्वाचित सम्राट वेन का पुत्र तथा पृथ्वी का प्रथम मनोनीत सम्राट कहा गया है. दूसरे किस्से कहानियों की भांति शुक्राचार्य से जुड़ी कहानियां भी मिथ हो सकती हैं. कदाचित वे मिथ हैं भी. फिर भी उनकी अपनी महत्ता है. क्योंकि भारत जैसे समाजों में जहां तर्कबोध, विज्ञानबोध की कमी हो, जनजीवन मिथों से ही प्रेरणा लेता है. बहरहाल आचार्य बृहश्पति तथा शुक्राचार्य के क्रमशः चार्वाक पंथ और दंडनीति का व्याख्याकार होने से क्या यह नहीं लगता कि ब्राह्मणवादी लेखकों ने अपने ग्रंथों में सुरों और असुरों की चारित्रिक विशेषताओं को पूरी तरह उल्टा-पल्टा है. कई बार तो ठीक 180 डिग्री का मोड़ देकर पेश किया है.

ब्राह्मणवाद को सामान्यतः धर्म और संस्कृति से जोड़ा जाता है. यह उसकी सीमित व्याख्या है. असल में वह ‘सर्वसत्तावादी’ और ‘सर्वाधिकारवादी’ किले का पर्याय है, जहां से समस्त संसाधनों और विचारकेंद्रों को नियंत्रित किया जाता है. क्षत्रिय इस किले की रक्षा करते रहे हैं तो वैश्य उसके खजाने को समृद्ध करने का काम करते आए हैं. बदले में ब्राह्मणवाद कुछ सुविधाएं, मान-सम्मान और संसाधनों के उपयोग का अवसर देकर उन्हें कृतार्थ करता आया है. इसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही कहा जाएगा कि मामूली सुविधा, संसाधनों में सीमित हिस्सेदारी के बावजूद वे वर्ग लंबे समय से स्वयं को उस व्यवस्था का हिस्सा मानते आए हैं. इसलिए एक सीमा से अधिक विरोध के लिए वे कभी आगे नहीं आए. स्वतंत्र भारत के संविधान में मिले अधिकारों के फलस्वरूप पहली बार दलितों और पिछड़ों को अवसर मिला कि वे ब्राह्मणवाद के किले में सैंध लगा सकें. आरक्षण ने इस प्रक्रिया को संभव बनाया, इसलिए वे वर्ग आरक्षण को अपने लिए खतरे के रूप में देखते हैं. पिछले कुछ वर्षों में हालात और भी बदले हैं. शिक्षा के क्षेत्र में मिले आरक्षण ने दलितों और पिछड़ों को अवसर दिया कि वे ब्राह्मणवाद की चतुराइयों को समझ सकें तथा जिन प्रतीकों एवं मिथों के माध्यम से वह अपने सर्वसत्तावादी स्वरूप को बनाए हुए है, उनकी अपने हितों के अनुरूप व्याख्या कर सकें. ‘महिषासुर शहादत दिवस’ जैसे आयोजन दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों में उभरी इसी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं. इसलिए ब्राह्मणवाद के पैरोकारों की ओर से उनका विरोध स्वाभाविक है. अब वे चाहते हैं कि ‘कल्याण राज्य’ की अपेक्षाओं के चलते स्वाधीन भारत के संविधान में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को जो अधिकार दिए हैं, वे समाप्त हों, ताकि पुरानी व्यवस्था लौट सके. पूंजीवाद और राजनीतिक सत्ता आज भी उसके मददगार हैं.

परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए जितना आवश्यक ब्राह्मणवाद की कमजोरियों को समझना है, उतना ही आवश्यक समानांतर संस्कृति खड़ी करना भी है. ब्राह्मणवादी तंत्र में आमने-सामने की चुनौती नहीं होती, उसका एक कोना अपने घर-परिवार में भी मौजूद होता है. व्यवस्था से अनुकूलित लोग परिवर्तन की हर संभावना को निष्फल करने की कोशिश करते हैं. कुछ समय पहले तक धर्म और जाति उसके सुरक्षा कवच थे. बदली परिस्थितियों में उसने राष्ट्रवाद को अपनी आड़ बनाया हुआ है. ‘महिषासुर’ जैसे मिथों की नवव्याख्या ने ब्राह्मणवाद के मर्मस्थल पर चोट की है. यह ज्ञान और तर्क की लड़ाई है. इतिहास में शताब्दियों बाद ऐसा हुआ है जब दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद को उसी के क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं. इससे ब्राह्मण बुद्धिजीवी खुद को असहज पा रहे हैं. आरक्षण का विरोध इसी विषम मनःस्थिति की उपज है. चलते-चलते एक बात मैं अवश्य जोड़ना चाहूंगा. आरक्षण एक व्यवस्था है. यह सामाजिक न्याय के दायरे में भी आता है. लेकिन यह प्राकृतिक न्याय का पर्याय नहीं है. इसलिए संविधान-सम्मत होने के बावजूद इसे हमेशा-हमेशा के लिए लागू नहीं रखा सकता. इसलिए बहुजन अस्मिता की चिंता करने वाले बुद्धिजीवियों, लेखकों और कलाकारों को अभी से खुद को तैयार रखना होगा. उसका एकमात्र उपाय है, वर्चस्वकारी संस्कृति के मुकाबले सामाजिक न्याय, तर्क, विवेक और आधुनिक जीवनमूल्यों से संपन्न जनसंस्कृति को खड़ा करना. विवेकवान बनना और समानधर्मा लोगों के विवेकीकरण में सहायता करना. जनसंस्कृतिकरण की यात्रा दुर्गम भले हो, असंभव नहीं है.

 ओमप्रकाश कश्यप

 

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

सामान्य

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधार पर जाने जाते थे. तर्क-नैपुण्य उनके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था कि आगे चलकर उन्होंने उसी को अपना व्यवसाय बना लिया था. यूनानी समाज में उनकी हैसियत ठीक ऐसी ही थी जैसी भारत में पुरोहित वर्ग की. थ्रेचाइमच्स के विचार ‘सत्ता-सर्वेसर्वा’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहस में उतरने के पश्चात वह दावा करता है कि शक्तिशाली की हित-सिद्धि ही न्याय है. उसके अनुसार—‘सबल सर्वदा सही होता है.’ ‘राजा जो करे वही न्याय’—ऐसी मान्यता भारत में भी रही है. तुलसी ने लिखा है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं.’ इसी से शायद यह कहावत भी बनी है—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस.’ अपने मंतव्य को स्पष्ट करता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है—

‘विभिन्न प्रकार के राजदर्शनों यथा जनतंत्रात्मक, निरंकुश, कुलीनतंत्री आदि के आधार पर गठित सरकारें इस प्रकार के कानून बनाती हैं, जिनके द्वारा उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि होती है. निहित स्वार्थ के लिए बनाए गए कानूनों को ही वे न्याय की संज्ञा देती हैं और चाहती हैं कि लोग बिना कोई प्रश्न उठाए उनका पालन करें. जो व्यक्ति उनके आदेश की अवहेलना करता है उसे वे कानून के उल्लंघन का तर्क देते हुए दंडित करती हैं. सभी राज्यों में न्याय का एकमात्र उद्देश्य है शासकीय वर्गों का हित. चूंकि राज्य अपने आप में शक्तिशाली तंत्र होता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि न्याय सर्वत्र एक ही है, वह है—शासक वर्ग का हित और शक्तिशाली का स्वार्थ.’

थ्रेचाइमच्स के अनुसार न्याय शक्तिशाली का अधिकार है. जो शक्तिसंपन्न है, वह न्याय को अपने पक्ष में कर लेता है. शक्तिशाली हमेशा अपने पक्ष में कानून बनाता है. सवाल है शक्ति कैसी? देह की, मन की या किसी और प्रकार की? सुकरात प्रश्न करता है. थ्रेचाइमच्स इस बारे में स्पष्ट है. वह शारीरिक शक्ति से इन्कार करता है. भूल जाता है कि शारीरिक शक्तियों, जिनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी सम्मिलित है, से इतर जितनी भी शक्तियां हैं, वे सभी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज की ओर से प्राप्त होती हैं, भले ही समाज अपनी इस देन को गंभीरता से न लेता हो. उसमें व्यक्ति की अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम का भी योगदान होता है, परंतु इतना नहीं कि समाज के योगदान की बराबरी कर सके. अध्ययन-अध्यापन, अनुभव आदि के माध्यम से मनुष्य जो ज्ञान अर्जित करता है, वह उसकी पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ होता है. परंतु अहंभाव के चलते व्यक्ति समाज की देन को अपनी मान बैठता है. यह उसका अहंभाव है. अपने ज्ञान पर गर्व करने का अधिकार उसे है. लेकिन पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के योगदान को बिसरा देना भी अनैतिक कर्म है. थ्रेचाइमच्स नेतृत्व के अधिकार को शक्ति मानता है. उसके अनुसार जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है, उसे दूसरों पर नियंत्रण का अधिकार और अवसर स्वतः प्राप्त हो जाते हैं. थ्रेचाइमच्स की कसौटी है कि जो शक्ति-संपन्न है, वह न्याय-संपन्न भी है. कानून-निर्माता होने के कारण शक्तिशाली सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. उस गड़हरिया की भांति जो अपनी भेड़ों को इसलिए पालता है ताकि समय आने पर वह उनसे काम ले सके. जिसमें जरूरत पड़ने पर उसकी बलि भी शामिल है. थ्रेचाइमच्स का विचार प्राचीन राजनीति के बेहद करीब है. प्राचीन सम्राट अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए प्रजा को कभी भी युद्ध में उतार सकते थे, लोगों से मनचाहा काम या बेगार ले सकते थे. थ्रेचाइमच्स के अनुसार जो लोग शासन से दूर हैं, जिन्हें कानून बनाने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है, वे सामान्यतः नुकसान में रहते हैं. शिखर पर मौजूद व्यक्ति यदि जनता की भलाई के लिए काम भी करता है तो इसलिए कि उसके पीछे उसका कहीं बड़ा स्वार्थ निहित है. सुकरात को यह तर्क मंजूर नहीं है. उसके अनुसार ऐसा करना राज्य की नीयत को कठघरे में लाना तथा उसके औचित्य के आगे प्रश्न-चिह्न लगाना है, शिखर पर मौजूद लोग अपना स्वार्थ देखते हैं. परंतु वे ऐसा हमेशा करें, यह आवश्यक नहीं है. डॉक्टर अपनी प्रक्टिश केवल धन जुटाने के लिए नहीं करता. लोग सेवाभाव से भी चिकित्सक के पेशे को अपनाते आए हैं. यही बात शिक्षक पर भी लागू होती है. कलाकार भी लोक-कल्याण का भाव लेकर कला-साधना करता है.

सुकरात को विपरीत-कथन या व्याजोक्ति के लिए भी जाना जाता है. बहस के दौरान ऐसा ही विपरीत-कथन जैसा थ्रेचाइमच्स भी करता है. हालांकि वह अपने विचारों पर दृढ़ है और उसका यह कथन ‘शक्तिशाली सदा सही’ का ही विस्तार है. वह कहता है—‘अन्याय करना न्याय करने से बेहतर है.’ अपने तर्क को नई दिशा में बढ़ाता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है कि न्याय को शक्तिशाली की इच्छा या उसके लाभ तक सीमित कर देने से प्रत्येक व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल पाएगा. बल्कि जो अन्यायी है वह अधिक प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई पड़ेगा. इन परिस्थितियों में अन्याय अधिक सुखदायी और आश्वस्तिकारक हो सकता है. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने स्वार्थानुरूप कार्य करेगा, जिसके लिए उसे अन्यायी मान लिया जाएगा. जबकि वह वही कर रहा है, जिसे करने में वह सक्षम है और जिसके द्वारा उसकी स्वार्थ-सिद्धि संभव है. कुल मिलाकर व्यक्ति का हित अन्यायी बनने में है. अपने तर्क की पुष्टि के लिए थ्रेचाइमच्स के पास अपने तर्क हैं. आप उन्हें कुतर्क सकते हैं; और चाहें तो वाग्जाल भी. लेकिन अन्य सोफिस्टों की भांति थ्रेचाइमच्स को भी अपनी इस कला पर गर्व था. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह कहता है—‘यदि न्यायी और अन्यायी दो व्यक्ति साथ-साथ व्यापार करें तो लाभ की गणना के समय यह कहना बहुत कठिन होगा कि न्यायी को अधिक लाभ हुआ हो. संभावना इसी की है जो अन्यायी है, उसने अधिक लाभ कमाया हो. व्यवहार में प्रायः देखा जाता है कि न्यायी व्यक्ति हमेशा घाटे में रहता है, जबकि अन्यायी ज्यादा ऐंठ ले जाता है. कराधान के समय भी अन्यायी कर-चोरी कर लाभ की अवस्था में रहता है. दूसरी ओर न्यायी व्यक्ति ईमानदारी बरतते हुए अधिक कराधान कर अपेक्षाकृत घाटे में रहता है. राज्य की ओर कोई सुविधा प्राप्त करनी हो तो अन्यायी आगे बढ़कर ज्यादा हाथ मार ले जाता है, जबकि न्यायी वहां भी पिछड़ जाता है. इन तर्कों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्यायी व्यक्ति से अन्यायी होना अच्छा है. थ्रेचाइमच्स के अनुसार, ‘न्याय बलवान का स्वार्थ’ अथवा ‘सबल की स्वार्थ दृष्टि है.’ जनसाधारण को न्याय सिवाय आत्मतुष्टि के, कुछ नहीं दे पाता. थ्रेचाइमच्स का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता. वह आगे बढ़कर शासकीय पदों पर विराजमान व्यक्तियों की तुलना करते हुए कहता है कि अन्यायी व्यक्ति, न्यायी की अपेक्षा सदैव अधिक लाभ कमाते हैं. अन्यायी व्यक्ति न केवल अपने परिजनों को अधिक सुख दे पाता है, बल्कि न्यायी की अपेक्षा अधिक यश-लाभ का भी भागी बनता है. अन्याय जितना बड़ा हो, लाभ में रहने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है. छोटी-मोटी चोरी या लूट करने वाले चोर-डकैत कहे जाते हैं और समाज में अपमान और दंड के भागी बनते हैं. जबकि अपनी सेना और शक्ति के भरोसे यदि कोई नरेश दूसरे राज्य को लूटकर ले जाता है तो वह यश का भागी बनता है. चारणवृंद उसकी गौरव-गाथाएं लिखते हैं. इसलिए थ्रेचाइमच्स कहता है कि—‘हे सुकरात! पर्याप्त रूप से बड़े स्तर पर किया गया अन्याय, न्याय की अपेक्षा अधिक गौरवशाली, स्वच्छंद एवं यश-लाभ देने वाला कार्य है.’ उस समय थ्रेचाइमच्स न्याय के साथ-साथ लाभ को भी बहुत सीमित संदर्भों में ले रहा होता है. या यह कहें कि न्याय और लाभ को लेकर शक्तिशाली की जो दृष्टि है, वह उसी को आगे बढ़ाता है. आदर्श राज्य में लाभ का अभिप्रायः केवल मौद्रिक लाभ तक सीमित नहीं रहता. बल्कि उसके सारे कारोबार और संकल्प सामाजिक लाभ की दृष्टि के साथ रचे जाते हैं. राज्य व्यक्तियों से इतर संस्था नहीं है. वह अपने नागरिकों की सामूहिक इच्छा और संकल्पशक्ति का ही रूप है. राज्य की समस्त शक्तियां, संसाधन तथा लक्ष्य उसके नागरिकों के सामूहिक श्रम तथा इच्छा का सुफल होते हैं. इसलिए जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना अपना काम करते हुए यथानिर्दिष्ट कराधान देता है, वह परोक्ष रूप में उन कार्यों को पूरा करने में भी सहभागी बनता है, जिनके लिए राज्य का गठन किया गया है. ऐसा व्यक्ति मौद्रिक अवदान के बदला सामाजिक लाभ के अपेक्षाकृत वृहत्तर संदर्भों में प्राप्त करता है.

थ्रेचाइमच्स का कथन सर्वथा गलत भी नहीं है. सामान्य धारणा यही है कि न्याय सदैव सबल का पक्ष लेता है. शक्तिशाली के आगे अदालतें भी झुक जाया करती हैं. रोजमर्रा के सामान्य अनुभवों से न्याय को लेकर एक दृष्टिकोण यह भी बनता है कि न्याय का जन्म दुर्बलों को शक्तिशाली वर्ग की लोभ, लालच और स्वार्थपरता से बचाने के लिए हुआ है. समाज में यदि सभी सबल हों अथवा सभी दुर्बल हो तो न्याय की कदाचित आवश्यकता ही न पड़े. इसलिए न्याय एक कृत्रिम व्यवस्था है, जो असमानताओं के अन्याय को पाटने के लिए जरूरी मानी गई है. उसे ‘भय की संतान’ या कमजोर का ‘रक्षाकवच’ भी कहा जा सकता है. प्रकृति में भी हम देखते हैं कि वहां जो शक्तिशाली है, वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. इसलिए न्याय और कानून जैसी कृत्रिम व्यवस्थाएं कमजोर वर्ग की सुरक्षा और बेहतरी के लिए की गई हैं. वे शक्तिशाली वर्ग की मनमानी पर रोक लगाने तथा दुर्बल वर्ग को संरक्षण देने का काम करती हैं. ‘रिपब्लिक’ के अगले ‘संवाद’ में प्लेटो गलाकॉन के मुंह से कहलवाता है—‘जनसाधारण की मान्यता है कि न्याय को वास्तविक अच्छाई और शुभता का पर्याय कभी नहीं माना जा सकता. असल में वह ऐसी चीज है जिसको अन्याय न कर पाने की क्षमता के कारण स्वीकार्य माना जाता है.’ ग्लाकॉन के अनुसार न्याय की जरूरत कमजोर व्यक्ति की अन्याय न कर पाने की क्षमता तथा अन्यायी का सामना न करने की अक्षमता के कारण पड़ती है. दूसरे शब्दों में न्याय कमजोर की बैशाखी है, और शक्तिशाली की राह की बाधा. थ्रेचाइमच्स जहां न्याय को शक्तिशाली व्यक्तियों का हित स्वीकारता है, ग्लाकॉन उसे भय की भावना के कारण दुर्बल वर्ग के हित में बनाई कई अनिवार्यता की संज्ञा देता है. दोनों ही न्याय को बनावटी और दुर्बल वर्ग की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था स्वीकारते हैं. दोनों का मानना है कि न्याय को अपने आप में नैतिक या शाश्वत सिद्धांत नहीं माना जा सकता. अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए थ्रेचाइमच्स कुतर्क की सीमा तक चला जाता है. उसके कहने का आशय है कि मनुष्य अपनी शक्ति के बल पर जितना समेट सकता है, उतना समेट लेने का उसे अधिकार है और यह काम उसे करते रहना चाहिए. इसी में उसका सुख है. वह संतोष को दुर्बल व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता मानता है. लोकतंत्र में भी जनता यदि शासन की ओर से मुंह मोड़ ले, पूरी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़कर शासन की ओर से उदासीन हो जाए तो लोकतंत्र के अल्पतंत्र में बदलने में देर नहीं लगती. ऐसे राज्यों के कानून केवल अल्पतंत्र के हितों का ही रक्षण करते हैं. लोकतांत्रिक सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती हैं. उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में जो संख्या में अत्यल्प होते हैं—कानून बनाने के अधिकार होते हैं. संयोग से अल्पतंत्र में भी कानून बनाने का अधिकार सीमित वर्ग के अधीन होता है. इसलिए जनता की उदासीनता अथवा जनमत के बंटा होने पर शासन-शिखर पर मौजूद लोगों को मनमानी का अधिकार मिल जाता है. परिणामतः जनतंत्र के अल्पतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

थ्रेचाइमच्स के अनुसार द्वारा ‘शक्तिशाली सदा सही’ कहना अनुभव-सिद्ध निर्णय था. जिस दौर में सोफिस्ट विचारधारा पनपी थी, उस दौर के शासकों के लिए शक्ति की सबकुछ थी. यूनान ही क्यों, प्राचीन सभी सभ्यताओं में लगभग वही स्थिति थी. भारत में इसे धर्म कहा गया है; और धर्म के नाम पर सत्ता के प्रत्येक धत्तकर्म को श्रेय की कोटि में रख दिया जाता था. राम जब शंबूक को मृत्युदंड देता है, निर्दोष पत्नी को वनवास की सजा सुनाता है अथवा बालि की छिपकर हत्या करता है, तो तत्कालीन विधान उसे दोष नहीं देता. उल्टे उसका महिमा-मंडन करता है. चूंकि राम वर्चस्वकारी संस्कृति का महानायक है, इसलिए उसके दोष पर पर्दा डालने के लिए समर्थन में तर्क गढ़ लिए जाते हैं. धर्म-विजय कहकर शक्तिशाली के वर्चस्व को अधिमान्य ठहराया जाता है. महाभारत युद्ध को जीतने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल करता है. उसकी हर चतुराई और छल का भी धर्म बताकर महिमामंडन कर दिया जाता है. अपने स्तर पर यही काम संस्कृति भी करती है. इसे विजेता संस्कृति का दर्प भी कह सकते हैं, जो इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करती रहती है. प्लेटो का ध्येय न्याय संबंधी प्रचलित अवधारणाओं पर विचार करते हुए उसके वास्तविक रूप की पहचान करना है. थ्रेचाइमच्स का तर्क तत्कालीन यूनानी प्रभुवर्ग की सामान्य मानसिकता को दर्शाता है. चर्चा के दौरान सवाल करने पर वह कहता है—‘न्याय असल में दूसरों के कल्याण से ही संबंधित है. शासकवर्ग नियम बनाता है, इसलिए वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है.’ किसी न किसी रूप में वह उन्हीं नियमों को मान्यता देता है जो उसके लिए हितकारी हैं. जो व्यक्ति उन नियमों को एकतरफा मानकर उसका विरोध करता है, उन्हें वह दंडित करता है; अथवा उपेक्षित कर हाशिये पर ढकेल देता है.’ उस समय वह बड़ी चतुराई से संस्कृति, समाज तथा कानूनी प्रावधानों की अपने पक्ष में व्याख्या करता है. न्याय की यह अवधारणा सुकरात की निगाह में उचित नहीं है. यदि शक्तिशाली द्वारा मनमाने ढंग से, केवल अपने हितों में काम करने को न्याय मान लिया जाए तो उसकी मूल अवधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी. न्याय को परखने के लिए वह तीन कसौटियां बनाता है—‘कौन-सा कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण है?’ ‘सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है?’ तथा ‘जीवन में शुभत्व की स्थापना किस प्रकार संभव है?’ सुकरात के लिए इनमें तीसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.

‘रिपब्लिक’ की शैली में दार्शनिक गांभीर्य है. प्लेटो न तो व्यंजना का सहारा लेता है, न ही अनपेक्षित संवेदना को बीच में हालात है. ध्रेचाइमच्स के माध्यम से वह सोफिस्टों की न्याय-संबंधी अवधारणा को हमारे सामने लाता है. सोफिस्ट शक्ति का आराधन करने वाले थे. लेकिन उनके राज्य बड़े नहीं थे. जब चारों और शक्ति का बोलबाला हो और लोग समाज की समन्वित शक्ति के बजाय अपनी-अपनी शक्ति पर नाज करते हों तो संघर्ष की स्थितियां बनेंगी ही. सो उस समय तक राज्य नगरीय सीमाओं में सिमटे हुए थे. थ्रेचाइमच्स शक्ति के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण को हमारे सामने रखता है. सुकरात को माध्यम बनाकर प्लेटो उसका प्रतिवाद करता है. बताता है कि केवल शक्ति-आराधन से राज्य नहीं बनते. प्रत्येक समाज में ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों के लिए समर्पण-भाव से जीना जानते हैं. डॉक्टर अपना पेशा दूसरों के भले के लिए चलाता है. अध्यापक ज्ञान बांटता है. दर्जी दूसरों के लिए वस्त्र सिलता है, कलाकर लोककल्याण की भावना के साथ चित्र बनाता है. ठीक है ये सब अपने-अपने कार्य के बदले में समाज से कुछ वसूलते हैं. डॉक्टर रोगी से फीस लेता है. अध्यापक को पढ़ाई के बदले वेतन मिलता है. इसी तरह दर्जी, कलाकार आदि भी अपने-अपने श्रम-कौशल के बदले समाज से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं. परंतु यह सब तो इसलिए आवश्यक है ताकि वे समाज को अपनी अनवरत सेवाएं प्रदान कर सकें. इससे उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स सुकरात के तर्कों के आगे शांत हो जाता है. परंतु जिस प्रकार वह शक्ति का पक्ष लेता है, उसके सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है, उसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है. थ्रेचाइमच्स के दृष्टिकोण का विस्तार उनीसवीं शताब्दी में, नीत्शे के दर्शन में नजर आता है. प्लेटो ने जहां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पन की थी, नीत्शे ने महामानव की परिकल्पना की, जो प्लेटो के दार्शनिक सम्राट जैसा ही सर्वगुणसंपन्न, विराट व्यक्त्वि का स्वामी है. अपनी पुस्तक The genealogy of morals में वह  ‘दास नैतिकता’ और ‘स्वामी नैतिकता’ की बात करता है. उसके अनुसार स्वामी के नैतिक मूल्य शक्ति, सदाचरण, सज्जनता, अच्छे और बुरे को परखने की दृष्टि से देखे जा सकते हैं, जो दास की नैतिकता ‘समर्पण’, दयालुता, मानवता, करुणा और संवेदना से परखी जा सकती है.

प्लेटो मानता है कि सृष्टि में पूर्ण समानता असंभव है. जितने भी प्राणी हैं उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएं हैं. प्रकृति में देखा जाता है कि शक्तिशाली कमजोर पर राज्य करता है. उसपर अधिकार जमाकर किसी न किसी रूप में उसके अधिकारों का हनन करता है. ऐसे में राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य प्राकृतिक असमानताओं की खाई को पाटते हुए लोगों को समान धरातल पर लाने का प्रयास करता है. यही उसके गठन का उद्देश्य भी है. साधारण सोच यही है कि शक्तिशाली को दुर्बल पर राज्य करना चाहिए. वृहद सामाजिक हितों के लिए यह अत्यावश्यक है. सोफिस्ट चिंतक यही मानते थे. ‘जार्जियस’ नामक संवाद में प्लेटो स्वयं यूनानी विचारक केलीक्लिस के विचारों से सहमत नजर आता है. वह स्वीकारता है कि प्राकृतिक आधार पर असमानताओं की भरपाई के लिए शक्तिशाली को समाज के कमजोर पक्षों का समर्थन, प्रोत्साहन करते हुए शासन करना चाहिए. इसी से प्राकृतिक स्तर पर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है. सुकरात वहां भी प्रतिवादी के रूप में उपस्थित हो जाता है. वह उसी प्रश्न को दोहराता है, जो उसने थ्रेचाइमच्स से किया था कि श्रेष्ठतम के चयन की कसौटी क्या हो? शक्ति या फिर बुद्धिमत्ता? केवल ताकत के भरोसे शासन करना संभव नहीं है. जनता की सामूहिक शक्ति किसी भी शक्तिशाली शासक के कुल सैन्य-सामर्थ्य से अधिक होती है. प्रजा ही कभी समर्थन तो कभी निष्क्रिय रहकर राज्य के सर्वसत्तासंपन्न होने का भ्रम पैदा करती है. युद्ध तक में शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शारीरिक बल को श्रेष्ठता का पर्याय मान लेना प्रकारांतर में प्राकृतिक न्याय को सामाजिक न्याय मान लेने जैसा ही है. यदि मान लिया जाए कि शक्ति ही सबकुछ है तो उसके आधार पर प्रतिफल की अपेक्षा से कौन रोक सकता है. सुकरात के अनुसार केलीकिल्स न्याय की मूल-भावना को पकड़ने में असमर्थ है. केवल शक्ति को न्याय का पर्याय बताकर वह अन्याय का पक्ष लेने की गलती कर जाता है. पहले चरण की बहस बेनतीजा समाप्त होती है. उससे हम यह तो जान लेते हैं कि ‘न्याय क्या नहीं है’, परंतु यह नहीं जान पाते कि ‘न्याय वास्तव में क्या है?’

© ओमप्रकाश कश्यप

ओबीसी साहित्य : सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध मोर्चा

सामान्य
मिलावट बुरी बात है. ज्ञान की खूबी है कि वह हर मिलावट का पर्दाफाश कर देता है. इसलिए इस देश में ज्ञानी को हमेशा सिर-माथे लिया गया है. सैंकड़ों ग्रंथ उनके अवदान और प्रशस्तियों से भरे पड़े हैं. बावजूद इसके ज्ञान ही है, जिसमें सर्वाधिक मिलावट पाई जाती है. धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्रीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ ज्ञानियों ने इस क्षेत्र में इतना घोटाला किया है कि झूठ और सच का पता लगाना चुनौती बन जाता है. खासकर उसके लिए जो ज्ञान पर मानव-मात्र के अधिकार का समर्थक है; तथा उसे मनुष्यता के हक में इस्तेमाल करना चाहता है.

लेख का शीर्षक सैकड़ों सवाल उठाने वाला है. प्रतिक्रियावादियों के लिए एक और मौकाᅳ‘अरे! दलित साहित्य तो था ही, अब ओबीसी साहित्य भी! आखिर क्यों? कौन हैं ये लोग जो देश और समाज को बांटने पर तुले हैं! उन्हें पता होना चाहिए कि साहित्य और साहित्यकार की कोई जाति नहीं होती! संपूर्ण मनुष्यता उनकी जद में होती है! उसपर ये सिरफिरे हैं कि साहित्य को बांटने की जिद ठाने हैं. जातिवाद फैला रहे हैं! छिः!! ये प्रतिक्रियाएं उनकी होंगी जो वर्षों से जाति की मलाई मारते आए हैं. जिन्हें सुधार के नाम से ही चिढ़ है. जातिवाद जिनकी रग-रग में भरा है. उसपर पर्दा डालने के लिए कभी धर्म का सहारा लेते हैं, कभी राष्ट्रवाद का. जो खुद को दूसरों से बहुत-बहुत ऊपर मानते हैं. जिनके मन में समाज को हजार-दो हजार वर्ष पीछे ले जाने का षड्यंत्र हमेशा चलता रहता है. उसके लिए उन्हें चाहे जो करना पड़े. संयोग से इन दिनों माहौल उनके अनुकूल है. इसलिए इस बार उनके तेवर कुछ अलग हो सकते हैं.

आलोचना पूरी तरह हवा में हो यह बात भी नहीं है. ठीक है, ओबीसी में समाजार्थिक रूप से पिछड़ी जातियां आती हैं. यह भी कि देश में उनका कोई एक स्वरूप नहीं है. उनकी सूची प्रदेशानुसार बदलती रहती है. सरकारी योजनाओं की बात अलग है, परंतु साहित्य में जिसका रूप ही समावेशी होता हैᅳयह कैसे माना जा सकता है कि किसी एक प्रदेश में जाति-विशेष के साहित्यकार को ओबीसी की श्रेणी में लिया जाए और दूसरे प्रदेश में उसी जाति के साहित्यकार को छोड़ दिया जाए? अगर ऐसा हुआ तो जाति का प्रश्न और गहराएगा. उस समय साहित्य के नाम पर जातिवाद फैलाने के आरोप से कैसे बच पाएंगे? विशेषकर तब जब जातिवाद के विरुद्ध जंग, साहित्य और साहित्यकार दोनों का पहला संकल्प हो. लेकिन प्रदेशवार जातियों के बदलने की समस्या तो दलित साहित्य के साथ भी है. वहां इस तरह के सवाल नहीं उठते. क्यों? इसलिए कि ‘दलित साहित्य’ जाति के बजाय उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों की बात करता है. वर्ग के रूप में ही वह करोड़ों लोगों की अस्मिता और अधिकारों के संघर्ष को विमर्श के केंद्र में ले लाता है. ‘ओबीसी’ स्वयं एक वर्ग है. लेकिन इस वर्ग में आने वाले लोगों के जातीय पूर्वाग्रह इतने प्रबल रहे हैं कि खुद को वर्ग के रूप में देखने की प्रवृत्ति बन ही नहीं पाई. जबकि वर्ग-भेद का दंश पिछड़ों ने उतना ही झेला है, जितना दलितों ने. ब्राह्मण ग्रंथों में जो प्रतिबंध अंतज्यों पर लगाए गए हैं, लगभग वही शूद्र के लिए भी हैं. केवल पेशे के कारण दोनों में वर्ग-भेद पैदा किया गया है.

ओबीसी सरकार द्वारा घोषित श्रेणी है. इस शब्द में वैसी कशिश नहीं है, जैसी इसके समानधर्मा ‘दलित’ में है. ‘दलित’ संबोधन के साथ-साथ दमित तथा दमनकारी जातियों, वर्गों की याद बरबस आ जाती है. तब क्या ओबीसी साहित्य का विचार छोड़ देना चाहिए? परंतु यह तो देश की आधी से अधिक जनता के हितों को लेकर विमर्श की जो संभावना बन रही है, उसपर पानी फेर देने जैसा काम होगा. काम इतना आसान भी नहीं है. चुनौती शून्य को सागर का विस्तार देने की है. सिर्फ साहित्यकारों द्वारा यह संभव नहीं. ‘ओबीसी साहित्य’ के विचार को सफल बनाना है तो उसके अंदर सम्मिलित जातियों में वैसी चेतना भी पैदा करनी होगी जिससे वे स्वयं को वर्ग के रूप में देख और महसूस कर सकें. यानी कुछ ऐसा हो कि ‘ओबीसी साहित्य’ का नाम आते ही वर्गीय शोषण, उत्पीड़न, दैन्य के साथ-साथ उनके कारणों तथा उन संघर्षों की तस्वीर भी आंखों में तैर जाए जो उन्होंने खुद को दैन्य और दुर्दशा से बाहर लाने हेतु किए हैं. न केवल उन लोगों की आंखों में जो जाने-अनजाने उनके पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार रहे हैं, बल्कि उन लोगों की आंखों में भी जो ‘पिछड़ेपन’ को अपना भूत-भविष्य-वर्तमान मानकर हिम्मत हार चुके हैं. अपनी तरह से साहित्य भी यह काम कर सकता है. करेगा ही. यही इस विमर्श का उद्देश्य है. परंतु इसके लिए उसे आंतरिक और बाह्यः चुनौतियों से साथ-साथ गुजरना पड़ेगा.

भारत में दलित आंदोलन की लंबी परंपरा है. पूरी संत-परंपरा एक तरह से उनका समर्थन करती है. उन आंदोलनों का संबंध सामाजिक आधार पर पिछड़े वर्गों में से भी था. लेकिन अशिक्षा और वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़े उनसे कम ही प्रभावित हुए. दोष पिछड़ी जातियों का भी है. उन्होंने स्वयं यह भुला दिया कि जिन्हें आज पिछड़ा माना जाता है, उन्होंने प्राचीनकाल में अनेकानेक अगड़े चिंतक इस देश और समाज को दिए हैं. रैक्व, पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल, सति, कौत्स, अजित केशकंबलि, महीदास, उपालि, महामोग्गलायन जैसे पिछड़े वर्ग के चिंतकों की लंबी शृंखला है. कमी ज्ञान को सहेजने तथा उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वालों की रही. नतीजा यह हुआ है कि हम पुरावैदिक काल से बुद्धकाल तक के अनेक विचारकों के अवदान, यहां तक कि उनके नाम से भी अपरिचित हैं. सत्ता और धर्म के गठजोड़ ने उस ज्ञान को जो उनकी परंपरा और संस्कृति के प्रति विरोध दर्ज कराता था, हर तरह से मिटाने की कोशिश की है. उनका छिटपुट उल्लेख बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में है; जो स्वयं ब्राह्मण धर्म के विरोध में जन्मे थे. चूंकि उनके प्रवर्त्तक क्षत्रिय कुलोद्भव थे, इसलिए स्वयं ब्राह्मणों ने उनके दर्शन को सहेजने के लिए समर्पित कर दिया. इसके पीछे उनके वर्गीय स्वार्थ भी थे. ब्राह्मणों लेखकों ने बौद्ध धर्म के तेज को कम करने, उसका ब्राह्मणीकरण करने का षड्यंत्र किया. ‘दीघनिकाय’ में बुद्ध जादू-टोने, सम्मोहन आदि का विरोध करते हैं. परंतु उत्तरवर्ती बौद्ध-ग्रंथों में वे स्वयं जादू-टोना करते दिखाई पड़ते हैं. षड्यंत्र के चलते ही बुद्ध को विष्णु के अवतारों में जगह दी गई.

वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़ों ने दलितों के साथ ठीक वही व्यवहार किया जैसा सवर्ण उनके साथ करते आए थे. इसका नुकसान दलितों को कम, पिछड़ों को अधिक हुआ. परिवर्तन के दौर में दलित बहुत जल्दी यह समझ गए कि उनके उद्धार के लिए कोई मसीहा आसमान से उतरने वाला नहीं है. ‘अप्प दीपो भव’ᅳकी भावना के अनुरूप उन्होंने ठान लिया कि जो करना है, स्वयं करना होगा. दासता ग्रंथि से ग्रसित पिछड़े देर तक अगड़ों से उम्मीद पाले रहे. बहुसंख्यक होने के बावजूद उन्होंने अपनी शक्तियां जातीय मतभेदों में फंसकर गंवा दीं. ओबीसी साहित्य को विमर्श का विषय बनाते समय सबसे पहली चुनौती लेखकों, साहित्यकारों और पाठकों के मन में यह विश्वास जगाने की होगी कि ‘ओबीसी’ केवल जातीय समूह न होकर एक वर्ग है. उन शिल्पकारों, कर्मकारों और मेहनतकशों का वर्ग जिसने अपने श्रम-कौशल द्वारा शुरू से आजतक मानवीय सभ्यता को संवारने का काम किया है. इसके लिए उन्हें अपने  सुख और सम्मान दोनों की बलि चढ़ानी पड़ी है. ब्राह्मणवाद के जितने शिकार वे हैं, उनसे कहीं अधिक दुख-दर्द दलितों को झेलना पड़ा है, इसलिए जाति और वर्चस्ववाद के विरुद्ध संघर्ष में दलित उनके वास्तविक सहयोगी हैं.

 पूंजीवाद की आलोचना में प्रायः कहा जाता है कि वह श्रमिक से उसके श्रम और शिल्पकार से शिल्पकर्म के मूल्य-निर्धारण का काम छीन लेता है. अपनी ओर से उसकी न्यूनतम कीमत तय कर, मजदूरों और शिल्पकर्मियों का शोषण करता है. उस समय मान लिया जाता है कि शिल्पकारों और श्रमिकों का शोषण आधुनिक या उदार अर्थव्यवस्था की देन है. जबकि प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में अल्प ही सही, इन वर्गों को अपने श्रम के मूल्य को लेकर मोल-भाव करने के अधिकार रहता है. देर-सवेर विकल्प भी मौजूद होते हैं. अन्याय के विरोध में न्यायालयों और अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. भारतीय संदर्भ में श्रमिक से उसके श्रम के मूल्यांकन का अधिकार छीन लेना केवल, पूंजीवाद की करतूत नहीं है. यहां यह काम बहुत पहले श्रम-विभाजन के नाम पर जातिप्रथा के माध्यम से शुरू हो चुका था. विराट पुरुष का रूपक अपने आप में इसका गवाह है. वह शारीरिक श्रम की तुलना में बौद्धिक श्रम को वरीयता देता है. रूपक के माध्यम से बताया यह जाता है कि शिखर पर मौजूद लोग अपने ज्ञानानुभव का उपयोग लोक-कल्याण के लिए करेंगे. लगभग ऐसी ही कामना है, जैसी प्लेटो ने दार्शनिक राज्य के रूप में ‘रिपब्लिक’ में की थी. वहां अरस्तु जैसा जागरूक विद्धान था. वह नैतिकता को श्रेष्ठ शासन की अनिवार्य शर्त मानता था. इसलिए अपने गुरु के प्रति संपूर्ण मान-सम्मान के बावजूद उसने दार्शनिक राज्य के सुझाव को अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था. भारतीय मनीषियों को अपनी दर्शन-परंपरा पर गर्व रहा है. परंतु यहां दर्शन को या तो पुस्तकों तक सीमित रखा गया, अथवा वानप्रस्थी आश्रम के लिए छोड़ दिया. बाकी सब जगह धर्म ही हावी रहा है. यहां जो बौद्धिक सत्ता थी, असल में वह धर्मसत्ता ही थी. निहित स्वार्थ के लिए यहां आस्था पर जोर दिया गया. परिणामस्वरूप धर्म की आलोचना करना, उसके ऊपर सवाल खड़े करना असंभव-सा हो गया. जिन लोगों ने ऐसा करने की कोशिश की, उन्हें शूद्र और धर्म-विरोधी कहकर नकार दिया गया. चुनौती के अभाव में शिखरस्थ ब्राह्मण अपने बुद्धि-विवेक का उपयोग केवल स्वार्थ-सिद्धि हेतु करने लगे. इसके लिए उन्होंने हर कानून, हर सिद्धांत की मनमानी व्याख्याएं कीं; यहां तक कि अपने ही रचे शास्त्रों को खूब तोड़ा-मरोड़ा. पुरोहितों का जनता पर प्रभाव था. वे जनता को कभी भी राज्य के विरुद्ध उकसा सकते थे. इसलिए राजाओं की हिम्मत न थी कि उनका विरोध कर सकें.

जनता पर पकड़ के चलते पुरोहित वर्ग को प्रसन्न रखना राजा के लिए जरूरी हो गया. इसका अंदाज उसे मिलने वाले वेतन और दूसरी सुविधाओं से लगाया जा सकता है. पुरोहितों और ब्राह्मणों को गांव के गांव दान में देने की परंपरा थी. मौर्य शासन के दौरान उसे राज्य के खजाने से सेनापति और अमात्य के बराबर 48000 पण मासिक वेतन मिलता था. जबकि कुशल शिल्पकार का मासिक वेतन मात्र 120 पण था. इससे उस कालखंड में शिल्पकारों जिन्हें वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्रों में स्थान मिला हैᅳकी दुर्दशा का अनुमान लगाया जाता है. यह तब है जब राज्य की आर्थिक समृद्धि का भार पूरी तरह से श्रमिकों और शिल्पकारों के कंधों पर था. जाहिर है शारीरिक श्रम की अनदेखी करना या उसे बौद्धिक श्रम से कमतर आंकना प्राचीनकाल से ही आरंभ हो चुका था. चाणक्य के अर्थशास्त्र और मनुस्मृति में इस बात की व्यवस्था की गई थी कि वर्ण-व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर रखे गए लोग कभी आर्थिक रूप से स्वावलंबी न होने पाएं. यदि वे आर्थिक स्तर पर आत्मनिर्भर हो जाएंगे तो ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए भोजन या नाम मात्र की वृत्तिका पर रात-दिन मेहनत करने वाले लगभग मुफ्त के सेवक कहां से आएंगे! मनुस्मृति तो ब्राह्मणों को यहां तक अधिकार देती है कि वे शूद्र के पास धन इकट्ठा न होने दे. यदि किसी तरह से शूद्र धन अर्जित कर ले तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया था कि उसपर बलात् कब्जा कर ले. इसके लिए अर्थशास्त्र में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को परस्पर मिलकर काम करने की सलाह दी गई. कहा गया कि दोनों के हित परस्पर जुड़े हैंᅳ‘ब्राह्मण की सहायता के बिना क्षत्रिय आगे नहीं बढ़ता और क्षत्रिय की मदद के बगैर ब्राह्मण की उन्नति असंभव है. दोनों मिल-जुलकर रहें तभी लोक-परलोक में सुख प्राप्त कर सकते हैं’(नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्मवर्धते. ब्रह्मक्षत्रं च संप्रक्तंमिह चामुत्र वर्धतेमनुस्मृति 9/322). शिखर पर बने रहने के लिए एक दूसरे को समर्थन देने, पारस्परिक हितों की रक्षा करने की नीति आगे चलकर मिथ का रूप ले लेती है. जिसमें तीन प्रमुख देवता इस तरह एक-दूसरे महिमा-मंडन करते रहते हैं कि व्यक्ति भ्रम से बाहर आ ही नहीं पाता. इसी तरह स्वार्थ के आधार पर संगठित तीन शीर्षस्थ वर्ग असंगठित जनसमाज को परस्पर उलझाए रखते हैं.

ब्राह्मण ग्रंथों में शूद्र को विपन्न बनाने, उन्हें आर्थिक-सामाजिक रूप से पराश्रित बनाए रखने की अचूक प्रावधान किए गए हैं. लेकिन आवश्यकतानुसार इस नियम में संशोधन भी होता रहा है. कौटिल्य पूर्व भारत में ब्राह्मण ग्रंथ शूद्रों को शस्त्र उठाने की अनुमति नहीं देते. माना जाता था कि ब्राह्मण सर्वाधिक तेजवंत होता है. तेज की प्रधानता के अनुसार सेना में शूद्र के बजाय वैश्य को, वैश्य के बजाय क्षत्रिय को और क्षत्रिय के बजाय ब्राह्मण को भर्ती किया जाना चाहिए(अर्थशास्त्र, 9/2/21). चाणक्य का यह सोच अपने पूर्ववर्ती ब्राह्मण आचार्यों जैसा ही था. परंतु परिस्थितियां उसके साथ नहीं थीं. मौर्यकाल में देश पर यवनों के आक्रमण होने लगे थे. अकेले क्षत्रियों से जिनकी अधिकांश ऊर्जा और शक्ति आपस के युद्धों में क्षीण होती रहती थी, देश की सुरक्षा असंभव थी. पुरोहिताई करते-करते ब्राह्मण सत्ता-सुख के अभ्यस्त होने लगे थे. चुनौतियों के बीच शूद्र के युद्ध में भाग लेने संबंधी नियम में संशोधन आवश्यक हो जाता है. ब्राह्मण को युद्ध क्षेत्र से दूर रखने के लिए कौटिल्य अजीब-सा तर्क देता है, जिसे पढ़कर हंसी आने लगती है. उसके अनुसार ब्राह्मण स्वाभावतः उदार होता है, इसलिए ‘शत्रु दंडवत कर युद्धभूमि में उसे पटा लेगा.’(प्राणिप्रातेन ब्राह्मणबलं पराऽभिहारयेत, अर्थशास्त्र 9/2/23). परंपरा अनुमति देती तो कौटिल्य कदाचित कहता कि युद्ध करना ब्राह्मण का धर्म ही नहीं है. चूंकि वह पुरोहिताई में रम चुके ब्राह्मणों की कमजोरी से भली-भांति परिचित था, इसलिए बजाए ‘तेजवंत’ ब्राह्मणों के आपत्काल के नाम पर शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट देता है. इसके लिए उसके तर्क चतुराई-भरे हैंᅳ‘विनयशील ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों की सेना श्रेयस्कर है. संख्याबल में अधिक होने के कारण वैश्य-शूद्रों को सेना में भर्ती किया जाना चाहिए’(प्रहरण विद्याविनीतं तु क्षत्रियबलं श्रेयः बहुलसारं वा वैश्यशूद्रबलंमिति, अर्थशास्त्र 9/2/24). वेदादि ग्रंथ ब्राह्मणों के युद्ध-प्रेम तथा युद्ध के दौरान उनके द्वारा बरती गई क्रूरता के उदाहरणों से भरे पड़े हैं. परशुराम जैसे ब्राह्मण का भी महिमामंडन है जिसके बारे में बताया गया है कि वह पृथ्वी को कही बार क्षत्रीय-विहीन कर चुका था. इन सब शौर्यगाथाओं(!) के बावजूद वह ब्राह्मणों को युद्ध क्षेत्र से दूर रखना चाहता है तो इसकी दो संभावनाएं हो सकती हैं. पहली, सत्ता-सुख में लिप्त, पुरोहिताई में रमे ब्राह्मण अपना युद्ध-कौशल गंवा चुके थे. दूसरी, उसे लगता था कि प्रशीक्षित यवन-सेना के मुकाबले ब्राह्मणों को खतरे में डालने से उचित था, शूद्रों को उनके आगे झोंक दिया जाए. कौटिल्य की ब्राह्मणों को युद्धक्षेत्र से दूर रखने की सलाह को ‘अर्थशास्त्र’ के पांचवे अध्याय की एक व्यवस्था से जोड़कर देखा जाए तो उसकी नीयत साफ नजर आने लगती है. उसमें वह राजा को सलाह देता हैᅳ‘कोष की कमी होने पर पाषंडसंघों(संभवतः बौद्ध संघों) के द्रव्य को, श्रोत्रिय के उपयोग में न आने वाले देवमंदिर के धन को एक जगह बटोरकर राजकोष में हथिया लेना चाहिए’(अर्थशास्त्र 5/2/38, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, डॉ. रामविलास शर्मा, पृष्ठ-195). आगे वह कहता है, ‘देवताध्यक्ष दुर्ग और राष्ट्र के धन के देवमंदिरों का धन एकत्रित करेगा फिर उनका अपहरण करेगा’(वही). वह जानता था कि ब्राह्मण देवमंदिरों और बौद्ध संघों में जमा धन के अपहरण हेतु एकाएक तैयार न होंगे. अतः ऐसे अलोकप्रिय कार्य के लिए वह शूद्रों और वैश्यों की सेना बनाने की सलाह देता है. ताकि ब्राह्मणों को क्षमा, धृतिशील और विनम्रता की प्रतिमूर्ति सिद्ध किया जा सके. कहने की आवश्यकता नहीं कि कौटिल्य द्वारा गढ़ी गई ब्राह्मणों की यह छवि आगे चलकर सत्ता से निकटता बनाए रखने में बहुत सहायक सिद्ध हुई.

कौटिल्य मजबूत केंद्र का समर्थक था. राज्य की मजबूती के लिए वह शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट तक देता है. राजकोष में किसी प्रकार की कमी न हो, इसलिए धर्मालयों में आए चढ़ावे को राज-कल्याण के नाम पर उपयोग करने का नियम बनाता है. मनु वर्णाश्रम धर्म को लेकर इतना उदार नहीं था. शूद्रों और वैश्यों को लेकर जो डर कौटिल्य को था, मनु का डर उससे कहीं ज्यादा बड़ा था. डर यह कि यदि शूद्रों को युद्ध में जाने का अवसर मिला, तो युद्ध-कौशल में प्रवीण शूद्र अपने संख्याबल के आधार पर, क्षत्रियों और ब्राह्मणों के मुकाबले बड़ी आसानी से युद्ध जीत सकते हैं. इसलिए वह वर्णाश्रम व्यवस्था के कड़े नियम बनाकर समस्त संभावनाओं का पटाक्षेप कर देता है. इसका असर शताब्दियों तक रहता है.

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि शूद्रों ने मनु की व्यवस्था को ज्यों का त्यों मान लिया था और वर्णाश्रम व्यवस्था का कोई विरोध था ही नहीं. ब्राह्मण ग्रंथों में विरोध का कोई उल्लेख नहीं है. उन्हें पढ़कर लगता है कि शूद्रों उस व्यवस्था के प्रति पूर्णतः समर्पित थे और उनकी ओर से विरोध जैसी कोई बात न थी. वास्तविकता यह है कि उस समय भी समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवाद के प्रतिकार में खड़ा था. बल्कि यह कहना अथिक सार्थक होगा कि ब्राह्मण धर्म का प्रभाव सीमित लोगों तक था. ‘ब्रह्मजालसुत्त’ में बुद्ध ने अपने समकालीन 62 दार्शनिक सिद्धांतों के बारे में बताया है. उनमें कम से कम चार नास्तिक परंपरा के दर्शन हैं. दूसरी ओर जैन प्राकृत ग्रंथ ‘सूत्रकृतांगसुत्त’ के आधार पर बनाई गई सूची में 363 विभिन्न प्रकार के दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है. उनमें 183 नास्तिक परंपरा के, 84 अक्रियावादी, 67 संशयवादी तथा 32 वैनायिकः(आजीवक) सम्मिलित हैं. बाकी 180 को क्रियावादी कहा गया है(अर्ली बुद्धिस्ट थ्योरी ऑफ नॉलिज, कुलित्स नंद जयतिलके, पृष्ठ 116). इससे सिद्ध होता है कि लोगों में श्रमण-परंपरा के दर्शनों पर ज्यादा विश्वास था. समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवादी विचारधारा की पकड़ से बाहर था. आगे चलकर लोकायत, चार्वाक, आजीवक, श्रमण, बौद्ध और जैन दर्शनों को मिली ख्याति इसी का परिणाम थी. ‘शांतिपर्व’(59/97) में पर्वतों और वनों में रहनेवाले निषादों और मलेच्छों का वर्णन है, जो तत्कालीन वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों के लिए चुनौती बने हुए थे. बेशम के अनुसार गंगातट के सभी प्रमुख नगरों में आजीवकों की बस्तियां थीं. आजीवक धर्म का प्रभाव समाज के सभी वर्गों, विशेषरूप से उन्नतिशील व्यापारी समुदाय के बीच था.’(बेशम, हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रीन ऑफ आजीवक्स, पृष्ठ 133-134). पोलसपुरवासी सदलपुत्त नाम के एक कुम्हार का उल्लेख जैन ग्रंथों में मिलता है. वह 500 कुम्हार परिवारों का मुखिया था. उसके अधीन नावों का बेड़ा था, जो पूरी गंगा तट पर फैला हुआ था. जैन और बौद्ध ग्रंथों में कांपिल्यपुरवासी करोड़पति महाश्रेष्ठि कुंदकोल्यि का भी उल्लेख है. उसके पास अकूत स्वर्ण-संपदा और पशुधन था. वह आजीवकों का समर्थक था. इस तरह के और भी कई प्रमाण है जो दिखाते हैं कि ब्राह्मणधर्म के विकास के आरंभिक चरण में अधिकांश शूद्र अनीश्वरवाद में भरोसा रखते थे. कालांतर में उन्हीं का एक हिस्सा बौद्ध और जैन धर्मों की ओर आकृष्ट हुआ था.

‘पंचविश ब्राह्मण’ पूर्ववर्ती ब्राह्मण ग्रंथों में से है. उसके अनुसार शूद्र का जन्म उस समाज में हुआ जहां ईश्वर का अस्तित्व नहीं माना जाता था. वहां यज्ञ का आयोजन भी नहीं होता था. परंतु उनके पास बहुत-से मवेशी रहते थे.’(पंचविश ब्राह्मण 6,1,2). बेशम ने ऐसे कुंभकार परिवार का उल्लेख किया, जो मालिक की ज्यादतियों के विरोध में उठ खड़ा होता है. उन दिनों शूद्र कामगारों के विरोध का सबसे प्रचलित तरीका था, काम छोड़कर चले जाना. एक जातक के अनुसार लकड़कारों की एक बस्ती को काम करने के लिए पहले ही भुगतान कर दिया गया था. किसी कारणवश वह समय पर काम पूरा नहीं कर सका. जब उसपर बहुत ज्यादा दबाव डाला गया तो लकड़हारे ने अपने परिवार के साथ मिलकर चुपचाप एक नाव बनाई और पूरा परिवार रातों-रात बस्ती खाली कर वहां से कूंच कर गया. वे लोग गंगा नदी के साथ-साथ चलते हुए समुद्र तक पहुंचे. समुद्र के भीतर भी उस समय तक चलते रहे जब तक उन्हें उपजाऊ द्वीप नहीं मिल गया.(शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा, पृष्ठ 130). मनु ने बौद्धों तथा वर्णाश्रम व्यवस्था का विरोध करने वाले आजीवकों को वृषल (शूद्र) की संज्ञा दी है. बेशम के अनुसार वायुपुराण जो गुप्तकाल का ग्रंथ है, के आसपास आजीवकों को शूद्र मान लिया गया था. ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि ब्राह्मणों ने हर उस व्यक्ति या समुदाय के सदस्य को शूद्र मान लिया था, जो उनके धर्म तथा श्रेष्ठत्व को चुनौती देता था.

मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी कि वह केवल उन्हीं बातों को गंभीरता से लेता है जिनका सत्ता से निकट-संबंध हो. ब्राह्मणों को इसी का लाभ मिला. बुद्ध और महावीर भी भली-भांति समझते थे कि प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है. इसलिए अपने धर्म-दर्शन को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने सत्ता का भली-भांति इस्तेमाल किया. बुद्ध ने जाति-आधारित असमानता का विरोध किया था. लेकिन जाति और वर्ग संबंधी ऊंच-नीच, दासप्रथा से उन्हें बहुत अधिक शिकायत न थी. उनके सारे प्रवचन या तो किसी सम्राट की पहल पर होते थे अथवा श्रेष्ठि के उपवन में. अपने विशेषाधिकारों के साथ ब्राह्मण भी सदैव सत्ता के निकट बने रहे. जितना उनसे बन पड़ा, उन्होंने ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सत्ता से दूर रखने की भरपूर कोशिश की. सीता की ‘अग्निपरीक्षा’ का उल्लेख रामायण में है. वर्षों पूर्व मध्यभारत के किसी ऐसे तालाब के बारे में कहीं पढ़ा था, जिसे नए ग्रंथों की परख के लिए इस्तेमाल किया जाता था. उसके लिए पांडुलिपि को बजाय उसके अध्ययन के ‘पवित्र तालाब’ के सुपुर्द कर दिया जाता था. जो पोथी डूब जाती, उसे व्यर्थ मान लिया जाता था. लेख में बताया गया था तैर न पाने के कारण लगभग पांच हजार पांडुलिपियां उस तालाब में समाई हुई थीं. बाद में तालाब को मिट्टी से पाटकर उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया गया. यह पुरोहित वर्ग की मौलिक ज्ञान के प्रति असहिष्णुता का उदाहरण है. पुराणों और महाकाव्यों में उसने बातों का जो बबंडर खड़ा किया है, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए हीगेल ने कहा थाᅳ

‘भारतीयों के पास राजाओं की कतार है, असंख्य देवी-देवता हैं, लेकिन उनमें से कोई भी संदेह से परे नहीं है.’

ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सदैव ही राष्ट्र से बढ़कर माना है. कोई भी सम्राट जो प्रजा की दृष्टि में भले ही अनर्थकारी हो, यदि वह ब्राह्मणों के अधिकारों और हिंदुओं के बीच उनके शिखरत्व का समर्थन करता था, तो उन्हें उसकी सत्ता से कोई आपत्ति न थी. हिंदू समाज का मस्तिष्क कहे जाने वाले ब्राह्मणों की इस दुर्बलता का लाभ प्रायः सभी विदेशी आक्रांताओं ने उठाया. मुस्लिम आक्रामक केवल इस्लाम का परचम लहराने भारत आए थे. यह देश उन्हें इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने यहीं बसने का मन बना लिया. उस समय समाज का मस्तिष्क होने का दावा करने वाले ब्राह्मणों ने आक्रमणकारियों का मुकाबला करने के लिए देश को तैयार करने के बजाय अपने शीर्ष स्थान की सुरक्षा करना उचित समझा. औरंगजेब ने जब सख्ती बरती तो वे भड़क गए और पुनः देश की आत्मा को जगाने के बजाय ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों द्वारा बंगाल के राजा पर विजय का स्वागत किया. इसी अवसरवादी दृष्टिकोण के चलते वे लंबे समय तक भारतीय समाज के शिखर पर बने रहे. उनकी सत्ता को पहली चुनौती मैकाले की ओर से मिली. 1861 में सभी भारतीयों के लिए एक समान दंड संहिता बनाकर उसने ब्राह्मणों के शताब्दियों से चले आए रहे वर्चस्व का अंत कर दिया. इसीलिए मैकाले उनकी निगाहों में सबसे बड़ा खलनायक है.

अप्रासंगिक से लगने वाले इस विवेचन का उद्देश्य मात्र यह दर्शाना है कि ओबीसी साहित्य का मुख्य संघर्ष सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से बाहर आने का है. संस्कृति की लड़ाई राजनीतिक लड़ाई से बड़ी और महत्त्वपूर्ण है. आज देश में लोकतंत्र है. संख्याबल के आधार पर पिछड़े राजनीति में अगड़ों के लिए चुनौती बने हुए हैं. इसलिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचकर लोगों को भरमाने में लगे रहते हैं. इसलिए यह समझना और समझाना बेहद जरूरी है कि बगैर सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकले सामाजिक परिवर्तन का लक्ष्य असंभव है. इन दिनों समाज में जातिबंधन शिथिल पड़े हैं. बावजूद इसके समाज में ऐसे लोगों की अच्छी-खासी संख्या है जो आज भी दो हजार वर्ष पुरानी मानसिकता में जीते हैं. जिन्हें मनु का वर्ण-विधान आदर्श लगता है. कुछ दबावों के चलते वे प्रकट में भले ही कुछ न कह पाएं, परंतु उनका सोच और हर प्रयास इस देश और समाज को हजार-दो-हजार वर्ष पीछे ले जाने के लिए होता है. चूंकि ऐसे लोग अपने मनसूबों को छिपाए रखने में माहिर हैं, इस कारण उनकी पहचान करना और निपटना आसान नहीं हैं. इसलिए ओबीसी साहित्यकारों की चुनौतियां बड़ी और लंबे समय तक चलने वाली होंगी. उन्हें एक ओर तो अपने ही साथियों को साहित्य की इस नई धारा से जुड़ने के लिए तैयार करना होगा. साथ ही साहित्य के मानवतावादी स्वरूप को बनाए रखने के लिए उन्हें उन स्थितियों से भी जूझना पड़ेगा जो उनके पिछड़ेपन का कारण बनती आई हैं. इनमें जाति के अलावा धर्म भी सम्मिलित है.

उन्हें समझना होगा कि हिंदू धर्म और जाति का नाभि-नाल का संबंध है. दोनों एक दूसरे का पोषण करते हैं. जानना होगा कि धर्म ब्राह्मण के लिए ठीक ऐसे ही धंधा है जैसे मोची के लिए जूते गांठना, ग्वाला के लिए दूध दुहना, गड़हरिया के लिए पशु चराना. उन सबका ज्ञान अनुभव के साथ निखरता जाता है. पुरोहिताई के साथ ऐसा नहीं है. यह कहते हुए कि जो पुराना है, वही सत्य-सनातन है, उसमें फेरबदल की सोचना भी पाप हैᅳब्राह्मण बार-बार अतीत की ओर लौटता रहा है. धर्म में सिवाय डर के कुछ भी मौलिक नहीं है. इस डर को स्थायी बनाने, पुरातन को सनातन सिद्ध करने के लिए ब्राह्मण अपने धंधे के साथ चतुराईपूर्वक पवित्रता का मिथ जोड़ देता है. अतः इस धारणा ने कि ज्ञान पर केवल ब्राह्मणों का एकाधिकार है. एकमात्र वही वास्तविक चिंतक और पथ-प्रदर्शक हैᅳइंसानियत का काफी नुकसान किया है. इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब केवल और केवल ब्राह्मण ज्ञान-संपदा के इकलौते स्वामी और संवर्धक रहे हों. हालांकि ब्राह्मणों की ओर से यह दावा हमेशा बना रहा.

आज जिसे हिंदी साहित्य के नाम से जाना जाता है, वह मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के हितों की सुरक्षा के लिए रचा गया साहित्य है. अपवाद रूप में कुछ भले लोगों को छोड़ दिया जाए तो वे पक्के जातिवादी हैं. कदम-कदम पर जातिवाद परोसते आए हैं. अगर ओबीसी साहित्यकार ऐसे लोगों से अपनी जातीय पहचान के साथ संवाद करेगा तो वे कभी उसे गंभीरता से नहीं लेंगे, क्योंकि ब्राह्मणवादी नजरिया उसके बारे में शूद्र से बढ़कर सोचने को तैयार न होगा. लेकिन यदि वह देश की आधी से अधिक जनता के प्रतिनिधि के रूप में संवाद करेगा तथा उसके सपनों और संघर्षों को साहित्य में लेकर आएगा तो देर-सवेर उन्हें साहित्य की इस नई धारा को गंभीरता से लेना ही पड़ेगा. परंतु यह कह देना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन है. समस्या यह नहीं है कि शताब्दियों से हिंदी साहित्य पर कुछ खास जातियों का कब्जा रहा है; और तीन-चौथाई लोग उसी को वास्तविक साहित्य मानते आए हैं. समस्या यह है कि शोषण सहते-सहते तीन-चौथाई लोगों मे से अधिकांश को शोषक की भूमिका में आने में ही अपनी मुक्ति नजर आती है. इससे बचाव का एकमात्र रास्ता यही है कि ओबीसी साहित्यकार अपने लेखन में, व्यवहार में लोकतांत्रिक हो.

‘ओबीसी साहित्य’ की मांग फिलहाल भले ही अवधारणा तक सीमित हो, इसकी संकल्पना नई नहीं है. न ही वह शून्य से उपजेगा. सभ्यता और संस्कृति के विकासकाल से ही उसका अस्तित्व रहा है. इसलिए ओबीसी साहित्य को रचने से बड़ी चुनौती परंपरा से अर्जित साहित्य को सहेजने तथा ओबीसी हितों के अनुरूप उसकी पुनर्व्याख्या की होगी. कुछ सवाल इस बीच उठेंगे ही. मसलन ओबीसी साहित्य का आधार क्या है? उसके सौंदर्यबोध की परख की कसौटी क्या होगी? क्या दलित साहित्य की तरह ओबीसी साहित्य का दायरा भी गैर ओबीसी के लिए बंद होगा? भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ परंपरा में से अनुकूल को चुनने तथा तथा अप्रासंगिक को छांट देने की उसकी कसौटी क्या होगी? ओबीसी साहित्यकार को इन सब सवालों का हल खोजना होगा. जिन कुरीतियों से साहित्य संघर्ष करता आया है उनमें से एक जातिवाद भी है. इसलिए अच्छा तो यही है कि साहित्य का जातिवाद के नाम पर विभाजन न हो? इन सबसे ज्यादा यह महत्त्वपूर्ण है कि समाज का जाति के आधार पर विभाजन न हो? यह नहीं हो सकता कि समाज में जाति रहे और साहित्य से जाति का जनाजा पूरी तरह उठ जाए. ओबीसी साहित्य पर जातिवादी होने का आरोप लगाने वालों के लिए एक उत्तर यह भी हो सकता है कि जातियों का विधान ओबीसी(शूद्र) ने नहीं रचा. उसकी कोशिश तो इस जंजाल से हमेशा पीछा छुड़ाने की रही है. ओबीसी साहित्य के साथ वही चल सकता है जो इस जंजाल से मुक्ति की सौगंध उठा चुका हो, जिसका भरोसा जाति और धर्म से ज्यादा इंसानियत में हो.

आप चाहें तो इसे सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध एक और मोर्चे का नाम भी दे सकते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

न्याय की अवधारणा : दो (कानून : अभिजन का विशेषाधिकार)

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति10

वही सच्ची स्वाधीनता है जब मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेते हैं. जनता को संबोधित करते समय वे पूर्णतः मुक्त, प्रतिबंध रहित होकर बातचीत कर सकते हैं. जो भी इस सपने को सच करते आए हैं; और करेंगे वे प्रशंसा के पात्र हैं. एक राज्य में इससे अधिक न्यायसम्मत और क्या हो सकता है.1यूरीपिड.

कानून न्याय नहीं है. किंतु वह न्याय की राह प्रशस्त करता है. विशेषज्ञों के अनुसार यह न्याय को विन्यस्त कर, आमजन को सरकार की उपस्थिति का एहसास कराता है. कानून के माध्यम से ही राज्य नागरिकों पर अपनी अधिसत्ता का प्रदर्शन करता है. इस बहाने वह उनके सरंक्षकत्व का दावा भी करता है. दूसरे शब्दों में कानून राज्य के अधिकार, उसकी शक्ति और कदाचित उसके दुस्साहस की भी भाषा है. यह दुस्साहस सत्तामद और चुनौती न होने के एहसास से जन्म लेता है. राजसत्ता और शक्ति का गठजोड़ हमेशा मनमानी करता आया है. तभी से, जब से राज्य की अवधारणा ने जन्म लिया; अथवा यूं कहें कि अपने हितों की सुरक्षा के लिए लोगों ने जब से राज्य के अधीन रहना स्वीकार किया था. कारण है कि शिखर पर मौजूद शक्तियां खुद को शेष समाज से ऊपर मानने लगती हैं. वे इस तथ्य को बिसरा देती हैं कि उनकी सारी शक्तियां एवं विशेषाधिकार जनता की ओर से लोकहित में कार्य करने के लिए प्रदान किए गए हैं. उल्लेखनीय है कि लोककल्याणकारी एवं उत्तरदायी व्यवस्था के रूप में राज्य नागरिकों का ही वरण था. प्राचीन समाजों में यह कार्य परस्पर सहयोग द्वारा, मिलजुल किया जाता था, ‘वेदों से पता चलता है, कि बिलकुल आरंभिक काल में भी….राष्ट्रीय जीवन के सब कार्य सार्वजनिक समूहों और संस्थाओं आदि के द्वारा हुआ करते थे. इस प्रकार की सबसे बड़ी संस्था हमारे वैदिक काल के पूर्वजों की समिति थी.’2 पश्चिमी समाजों में भी कमोबेश यही स्थिति थी. दास प्रथा जैसे निकृष्ट चलन के बावजूद गणतांत्रिक प्रविधियों के अनुसार शासन करने के प्रयास वहां ईसापूर्व छठी शताब्दी से होने लगे थे, लेकिन गणतंत्र और राष्ट्र की प्राचीन संकल्पनाएं तत्संबंधी आधुनिक संकल्पनाओं से भिन्न थीं.

आधुनिक राष्ट्र की संकल्पना उसकी भौगोलिक प्रस्थिति, समाज, संस्कृति तथा विकास की धाराओं से स्पष्ट होती है. सरकार का स्थान बाद में आता है. राष्ट्र की प्राचीन संकल्पना पूरी तरह केंद्रोन्मुखी थी. भारत के संदर्भ में काणे इसे और भी स्पष्ट कर देते हैं, ‘प्राचीन भारत में आधुनिक राष्ट्रीयता की भावना नहीं थी. ग्रंथकारों ने राज्य का नाम लिया है और राष्ट्र को उसका एक तत्व माना है. किंतु उन लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का पूर्ण अभाव था और उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए कोई प्रयत्न भी नहीं किया. आजकल जिसे हम राष्ट्र कहते हैं, वह भूनैतिक और आंतरिक अनुभूति का विषय है.’3उस समय बसावट ‘पुर’ अथवा ‘विश’ के रूप में थी. राज्य भी होते थे, किंतु एक अथवा कुछ निकटवर्ती नगरों तक सिमटे हुए, ‘एक राज्य में प्रायः एक ही ‘जन’ के व्यक्तियों का निवास होता था. इसलिए इन राज्यों को जनपद व जानराज्य कहा जाता था.’4एक ‘जन’ के सब व्यक्ति ‘सजात’, ‘सनाभि’ या एक ही जाति या वंश के समझे जाते थे.’5जनसमूहों के बीच वर्चस्व के लिए लड़ाइयां होती रहती थीं. इंद्र उनके लिए सम्राट होने के साथसाथ दैवी सत्ता भी है. ऋग्वेद में उसे पुरंदर कहा गया है. जिस प्रकार उससे दूसरों के दुर्गों को ध्वस्त करने की प्रार्थना की गई है, उससे पता चलता है कि वेदों तक आतेआते राजसत्ता और धर्मसत्ता का गठबंधन हो चुका था. धर्म का सहयोग पाकर राज्यसत्ता स्वयं को मजबूत करने में लगी थी. राजनीतिक वर्चस्व का संघर्ष, राजनीतिकसांस्कृतिक वर्चस्व के संघर्ष में ढल चुका था. इस बात से अनजान कि ऐतिहासिक जरूरतों एवं शासकवर्ग की महत्त्वाकांक्षाओं के दबाव में राजतंत्र जैसेजैसे फैल रहा था, वह अपने गठन के वास्तविक लक्ष्य से निरंतर दूर खिसक रहा था. आरंभ में शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि जिस राज्य का वरण व्यापक लोकहित एवं स्वाधीनता के निमित्त किया गया है, वह अपने गठन के वास्तविक लक्ष्य को बिसराकर स्वयं को इतना आत्मकेंद्रित एवं शक्तिशाली बना लेगा कि उसके गठन का औचित्य ही जाता रहेगा. यह काम एक दिन में नहीं हुआ था, न ही सीधेसीधे. बल्कि इसके लिए बहुत कूटनीतिक ढंग से काम लिया गया था. शीर्षस्थ सत्ता के किसी निर्णय की ओर उंगली न उठे, लोग उसे अपनी नियति की भांति स्वीकार कर लें, उसके लिए राजा को अधिदैविक सत्ता का दर्जा दिया गया. पृथ्वी पर उसको ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया गया. गीता में कृष्ण से कहलवाया गया—‘मैं उन लोगों के हाथों का दंड हूं जो दूसरों को नियंत्रित करते हैं. मैं विजेताओं की नीति हूं….’6

ईश्वर अब केवल जन्मदाता और पालक नहीं रखा था. वह स्वयंभू नियंत्रणकर्ता भी था. वह विजेता के एक साथ उनकी नीति का हिस्सा था. ‘यतो कृष्ण ततो जय!’ के साथसाथ—‘यतो जय ततो कृष्ण’ अर्थात जिधर जय है उधर कृष्ण भी हैं, जैसी भाग्यवादी धारणाएं भी समाज में पनप चुकी थीं. उनका असली मकसद था—सामदामदंडभेद यानी नीतिअनीति किसी भी प्रकार से प्राप्त विजय को दैवीय बताना. धर्म की आड़ लेकर निजी स्वार्थ को न्यायसंगत घोषित करना तथा जीत के पहले और बाद में, देवताओं को मनाने के नाम पर आनुष्ठानिक आयोजन कर लोगों पर अपना प्रभाव बनाए रखना. दावा करना कि विजय देवता का आशीर्वाद है. अंततः साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं के पीछे छिपे राजनीतिककूटनीतक अनाचार को दबा देना. इस्लाम ने इस मानसिकता को जेहाद का नाम दिया, तो रामायण और महाभारत में इसे धर्मयुद्ध बताया गया. कुल मिलाकर यह राज्य को अतिरिक्तरूप से अधिकारसंपन्न कर उसे समीक्षाआलोचना की परिधि से बाहर रखने का षड्यंत्र था. ज्ञातव्य है कि सत्ता का दैवी रूप किसी एक देवता अथवा धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं था. व्यक्ति अपने विश्वास और जरूरत के अनुसार अपना देवता चुन लेता था. यही नहीं, स्वार्थ के अनुरूप देवता गढ़े भी जाते थे. आगे चलकर जैसे ही केंद्र ने स्वयं को और मजबूत किया, राज्य की समस्त शक्तियां सम्राट में अधिष्ठित मान ली गईं. तैत्तिरीय संहिता में लिखा गया—‘समस्त मनुष्य राजा द्वारा पालित या नियंत्रित होते हैं.’7 इसके बावजूद इसमें अपेक्षित सफलता तब तक संभव न थी, जब तक जनता इसे अपनी नियति के रूप में स्वीकार न कर ले. क्योंकि राजा को सर्वोपरि तथा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि बताने वाले आचार्य भी जानते थे कि संगठित जनशक्ति के आगे राज्य का समस्त सैन्यबल आदि नगण्य है. भड़का जनाक्रोश एक ही झटके में शक्तिशाली सत्ता को धूल चटा सकता है. इस काम के लिए धर्म की मदद ली गई. राजा को दैवीसत्ता मान लेने का उल्लेख ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियों और संहिताओं जगहजगह हुआ है. इस विचार को वास्तविक लोकप्रियता रामायण और महाभारत में मिली. अलगअलग समय में लिखे और विस्तृत होते रहे इन ग्रंथों की किस्सागोई ने आमजन के दिलोदिमाग में ऐसी पैठ बनाई कि उसका प्रभाव सहस्राब्दियों के लिए स्थायी हो गया.

उल्लेखनीय है कि जिस कालखंड का उल्लेख इन महाकाव्यों में हुआ है, उस समय तक गंगायमुना के दोआब में विकसित सभ्यता जन्म ले चुकी थी. बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित, शांत और उपजाऊ क्षेत्र में उसे तेजी से विकसित होने का अवसर मिला था. उसके नगर पूर्ववत्ती सिंधु सभ्यता की अपेक्षा बड़े थे तथा धनवैभव से समृद्ध भी. राजा, पुजारी और व्यापारी की तिकड़ी ने समाज के बड़े वर्ग को निर्णयप्रक्रिया से बाहर खदेड़ दिया था. समाज का बड़ा हिस्सा मान चुका था कि वह केवल शासित होने के लिए जन्मा है. यह बोध जनाक्रोश की संभावनाओं को टालने तथा स्थिति से अनुकूलन में सहायक था. बहरहाल, धर्म के समर्थन पर थोड़ेबहुत उतारचढ़ाव के बावजूद राज्य सर्वोच्च शक्तिकेंद्र बना रहा. तब तक समाज में आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण विभिन्न संस्थाओं में ढल चुका था. आमजन अपनी सामान्य जरूरतों के लिए समाज के प्रभुवर्ग पर आश्रित था. इसलिए आंतरिक शांति, बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा एवं सुख की सुनिश्चितता हेतु, इच्छा या अनिच्छा से राजसत्ता के समर्थन में आना उसकी विवशता थी. इसके बावजूद राजसत्ता तथा उसके अनुयायियों के मन में जनशक्ति का भय कम न था.

विधि के शासन की संकल्पना

जनाक्रोश की संभावना कम से कम हो, शिखरस्थ लोगों की मनमानी अबाध चलती रहे. यह तभी संभव था जब जनसाधारण का उसमें विश्वास हो. समाज का अधिसंख्यक वर्ग अपने भले के लिए उनकी शिखरउपस्थिति और वर्गीय श्रेष्ठता को अपरिहार्य मान ले. राजा अपने निकटवर्ती राज्यों के साथ युद्धरत रह सकता था, किंतु प्रजा की स्वीकार्यता के बगैर उसका राजत्व अर्थहीन था. राज्य के गठन का औचित्य को सिद्ध करने के लिए प्रजा को भी यह विश्वास दिलाना अत्यावश्यक था कि उसका होना प्रजा के लिए हितकारी है. अर्थात समाज एवं राजनीति के अंतर्संबंधों में स्थायित्व, बगैर आपसी विश्वास एवं पारदर्शिता के असंभव था. पारदर्शिता की मांग के चलते कालांतर में संवैधानिकरण की प्रक्रिया को बल मिला. संविधान राज्य की पूर्वनिर्धारित आचारसंहिता, जिसके माध्यम से वह सर्वकल्याणकारी होने का दावा कर सकता था, का दस्तावेज था. उसके गठन में आमजन की सीधी भूमिका नहीं थी, हालांकि यह बताया जाता था कि संविधान नागरिकों की सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है. उसके अनुपालक के रूप में राज्य सभी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार का आश्वासन देता था. उल्लेखनीय है कि प्राचीन सभ्यताओं के पराभव के पश्चात, पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में नई सभ्यताओं का उदय लगभग एक साथ हुआ था. सिंधु सभ्यता के पराभव के बाद जब भारत में गंगायमुना के मैदानों में नई सभ्यता विकसित हो रही थी, उन्हीं दिनों अर्थात 1500—2000 ईस्वी पूर्व, भूमध्य सागर के टापुओं पर मानवी सभ्यता का उदय हो रहा था. उसके संस्थापक मेसापोटामिया और मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं के पराभव से उखड़े कबीले थे. समुद्र के घिरे होने के कारण वहां अपेक्षाकृत शांति थी. टापुओं पर व्यापारियों के जहाज ठहरा करते थे. इसका लाभ उन नगरराज्यों को मिला. फलस्वरूप उनका बड़ी तेजी से विकास हुआ. कबीलों का नियंत्रण प्रायः एक व्यक्ति के अधीन होता था. वह उनका सरदार या मुखिया कहलाता था. लेकिन जनसंख्या बढ़ने तथा नएनए सामाजिकवाणिज्यिक संबंधों के उदय के बाद किसी एक व्यक्ति की मर्जी अथवा विवेक से समाज को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं रह गया था. शासन को व्यवस्थित करने के लिए राजपरिषदों का गठन किया जाने लगा. पक्षपात का आरोप न लगे, समाज में उनकी विश्वसनीयता बनी रहे, इसके लिए सर्वमान्य व्यवस्थाओं की आवश्यकता पर जोर दिया जाने लगा. दुनिया का पहला संविधान भूमध्य सागर के बीच बसे नगरराज्य एथेंस में, डेरोस द्वारा लागू किया गया. उसमें अपराधमुक्त समाज की संकल्पना की गई थी. डरोस के संविधान की कमजोरी थी कि उसमें छोटेछोटे अपराधों के लिए भी मृत्युदंड का प्रावधान था. इसलिए कुल मिलाकर वह राज्य की निरंकुशता को दर्शाता था. इस कारण उसका विरोध भी स्वाभाविक था. कालांतर में सोलोन ने उसमें सुधार किए. सोलोन द्वारा लागू संविधान अपेक्षाकृत उदार एवं न्यायपूर्ण गणराज्य छवि पेश करता था. ईसापूर्व छठी शताब्दी में लागू वह संविधान समाज के विशिष्ट जनों को राज्यसत्ता में भागीदारी का अवसर देता था. उस समय तक भारत में धर्म, राजसत्ता पर अपनी पकड़ बना चुका था. तदनुसार संविधान का कार्य यहां स्मृतियों, आरण्यकों, धर्मसूत्रों, संहिताओं आदि के माध्यम से किया गया.

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि संविधान की सहायता से राज्य को संचालित करने की कोशिश पूरब और पश्चिम दोनों में लगभग एक साथ हुई. लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर था. ऋग्वेद में वर्णविभाजन के संकेत हैं. कालांतर में गंगायमुना के मैदानों में जो सभ्यता विकसित हुई उसमें वर्णविभाजन सामाजिक संस्था का रूप ले चुका था. ब्राह्मण उसके शिखर पर थे, वर्गीय श्रेष्ठता और स्वार्थ से बोझिल. वर्गीय हितों के अनुरूप सत्ता के केंद्रीकरण का लाभ उठाने को तत्पर. समाज को व्यवस्थित करने के लिए धर्मसूत्र, स्मृति, आरण्यक, पुराण, महाकाव्य, संहिता आदि की रचना इसी युग हुई. वेदों की रचना में समाज के सभी वर्गों के विद्वान आचार्यों का योगदान था. मगर अब लिखनेपढ़ने का कार्य मुख्यरूप से ब्राह्मणों तक सिमटने लगा था, जिनके वर्गीय स्वार्थ प्रबल थे. इससे भारतीय समाज ज्ञान की मौलिक परंपरा से निरंतर कटता गया. दूसरी ओर सुकरात, प्लेटो, जेनोफीन, सिसरो जैसे नीतिवादी दार्शनिकों के प्रभाव में पश्चिमी समाज में समानता, आदर्श और नैतिकता के लिए अपेक्षाकृत अधिक गुंजाइश थी. यह बात अलग है कि राजनीति पर चर्च के प्रभुत्व के बाद वहां के हालात में भी बदलाव आया था. यह मान लिया गया था कि सत्ता पर वर्चस्व बनाए रखने के लिए जनशक्ति को भरमाए रखना जरूरी है. इसके लिए अत्यावश्यक था कि संबंधित राज्य, स्वयं कानून का राज्य होने का दावा करे; और येनकेनप्रकारेण प्रजा भी उसे स्वीकार ले. अंततः अपनी चालाकियांे तथा धर्म की मदद द्वारा प्रभुवर्ग जनता का विश्वास जीतने में कामयाब हुआ. धर्म की विशेषता थी कि वह जनसाधारण का ध्यान समस्या के वास्तविक कारणों से हटाकर उस दिशा की ओर मोड़ देता था, जिसका व्यक्ति के विकास और विवेक से दूर तक का संबंध न था. परिणामस्वरूप विकास की प्रक्रिया का सच, जनसाधारण की समस्याओं का वास्तविक कारण, जनसामान्य तक नहीं पहुंच पाता. तमाम वैज्ञानिक शिक्षा एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति के बावजूद यह स्थिति आज तक बनी हुई है.

स्वयं को लोकेच्छा का प्रतिनिधि बताकर राज्य सामान्यतः यह दावा करता है कि उसे अपनी शक्तियां नागरिकों की ओर से प्राप्त हुई हैं. जो कानून उसने गढ़े हैं, उनके प्रति जनता की सामान्य सहमति है. इसमें संदेह नहीं कि राज्य को उसकी शक्तियां जनता की ओर से ही प्राप्त होती हैं. सत्ताएं बनतीबिगड़ती हैं. राज्यों की सीमाएं भी परिवर्तित होती रहती हैं, किंतु जनता का स्वरूप, सिवाय कुछ सांस्कृतिकसामाजिक बदलावों के, सामान्यतः अपरिवर्तनीय होता है. प्रकृति की भांति वह भी अमृत्वप्राप्त होती है. उसकी हस्ती कभी मिटती नहीं. इसीलिए तो वह जनताजनार्दन कहलाती है. वही अपने श्रमसीकरों से प्रकृति को संवारती, उसको अधिकाधिक उपजाऊ बनाती है. तदनुसार प्राकृतिक संपदा के उपयोग को लेकर उसकी अधिकारिता किसी से कम नहीं होती. लेकिन यदि जनता ही अपने इस अधिकार से परिचित ही न हो, अथवा इस हकीकत को जानबूझकर बिसराने लगे, तब? शताब्दियों से यही होता आया है. शिखरस्थ शक्तियां येनकेनप्रकारेण लोगों के दिलोदिमाग में बिठा देती हैं कि शासन चलाना प्राकृतिक गुण है. वह दैवी अनुकंपा से गिनेचुने लोगों को ही प्राप्त होता है. मनुस्मृति कहती है, ‘विधाता ने इंद्र, मरुत, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्र एवं कुबेर के दैवी अंशों से राजा की रचना की है. चूंकि राजा में इन सब देवताओं के गुण हैं, इसलिए वह सृष्टि के सभी प्राणियों में श्रेष्ठतम है.’8 मनु महाराज इसे और विस्तार देते हैं. वे लिखते हैं कि अपने दैवीय गुणों के कारण केवल राजा ही सर्वोत्तम न्यायकर्ता है. राजा यदि बालक है तो भी उसके आदेश की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए. ‘नारद स्मृति’ में इसी को थोड़े भिन्न शब्दों में दोहराती है—‘पृथ्वी पर स्वयं इंद्र राजा के रूप में विचरण करता है. उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करके मनुष्य कहीं नहीं रह सकते. राजा सर्वशक्तिमान है. वही रक्षक है, वही सब पर कृपालु है. अतः यह निश्चित नियम है कि राजा जो कुछ करता है, वह ठीक या सम्यक् ही रहता है. जिस प्रकार दुर्बल पति को भी पत्नी की ओर से सम्मान मिलता है, उसी प्रकार गुणहीन शासक को भी प्रजा द्वारा सम्मान मिलना चाहिए.’9 राजा की सर्वोच्चता एवं स्वयंप्रभुता को लेकर पश्चिम में भी हालात भिन्न न थे. वहां भी राजा को दैवी सत्ता का प्रतीक बताकर उसे असीमित अधिकार प्रदान किए गए थे—

यदि शासकों के कार्य दोषपूर्ण हों तो भी उनकी कटुआलोचना से बचना चाहिए. यदि गलती से भी मुंह से उनके बारे में कुछ आलोचनात्मक निकले तो तत्क्षण प्रायश्चितभाव से नत हो जाना चाहिए. इस तरह कि जुबान भी अपनी गलती स्वीकार कर ले. यदि जुबान अपने से ऊपर की शक्ति की आलोचना करती है तो उसे ईश्वर के निर्णय से डरना चाहिए, जिसने उस शासकरूपी शक्ति को स्थापित किया है.’10

जब सब कुछ राजा और उसके करीबियों की निगाह से, उनके लाभ की दृष्टि से देखा जाता हो, तब वास्तविक न्याय की उम्मीद कम ही थी. इन परिस्थितियों में शोषण एवं उत्पीड़न को अपनी नियति स्वीकार लेने के अलावा दूसरा कोई रास्ता भी न था. यूं भी राजशाही में जनता और राजा के बीच सीधे संवाद की कोई सुविधा नहीं होती. वहां निर्णय प्रक्रिया मुट्ठीभर लोगों के हाथों में होती है. उनमें भी वे जिन्हें राजा आमतौर पर पसंद करता है. जिनके बारे में वह जानता है कि वे उसके निर्णयों में कम से कम हस्तक्षेप कर सकते हैं. इससे वहां निरंकुश निर्णय लिए जाते थे, जिन्हें ‘महाराज की इच्छा है’ जैसे दावों के साथ समाज पर थोप दिया जाता था. राजा की इच्छा को ही अंततः कानून मान लिया जाता है, जिससे बाद में धर्मसम्मत अथवा कुदरत के न्याय के रूप में पेश किया जाता है. न्याय के प्रति इस तरह का आचरण उसकी मूल भावना, जो मानती है कि जन्म से सभी मनुष्य समान होते हैं, के पूरी तरह विरुद्ध था. ऐसी विभेदकारी व्यवस्थाओं में शिशु के जन्म की परिस्थितियां, जिनपर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता—उसकी हैसियत और पहुंच का निर्धारण करती हैं. राजसत्ता के इन्हीं दुर्गुणों को ध्यान में रखते हुए थामस मिल ने उसको शासन का निकृष्टतम रूप माना है.

धर्मकेंद्रित आचारसंहिता की इन्हीं कमजोरियों के कारण विधि के राज्य की संकल्पना को बल मिला. ईसा से सातआठ सौ वर्ष पहले तक धर्म पूरे समाज को अपनी जकड़ में ले चुका था. उसकी एकाएक उपेक्षा संभव न थी. अतएव आरंभिक कानूनों को ईश्वरीय इच्छा का ही विस्तार माना गया. धीरेधीरे यह मांग भी जोर पकड़ने लगी कि कानून यदि देश और समाज के भले के लिए हैं तो उनका पालन छोटेबड़े सभी को समानरूप से करना चाहिए. जनसाधारण की विधि निर्माताओं से यह अपेक्षा न तो अनुचित थी, न अवांछित. सुकरात से लेकर अरस्तु तक जिस आदर्श को आगे रखकर कानून की संकल्पना की गई थी, वह कुछ ऐसा ही था. माना गया था कि उससे साधारण और विशिष्ट सभी नागरिक समानरूप में प्रभावित होंगे और वह सभी पर समानरूप से असरकारी होगा. इससे समाज में समरसता व्यापेगी. फलस्वरूप उन अनेक बुराइयों का अंत होगा जो समाजार्थिक वैषम्य की जनक हैं—

कानून देवताओं और मनुष्यों, दोनों के सभी कार्यों का नियामक है. वही तय करता है कि क्या सम्मानीय है और क्या अधम. एकमात्र कानून को ही हमारा शासक एवं पथप्रदर्शक होना चाहिए. उन सभी मनुष्यों के लिए जो प्रकृति से सामाजिक हैं, कानून का निर्देश है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं.’11

कानून को लेकर यह सर्वसम्मत अपेक्षा थी. न्याय और कानून पर आधारित राज्य की स्थापना को लेकर उसके शुभेच्छुओं द्वारा चाहे जो सपने देखे गए हों, लेकिन उसे लेकर विद्वानों की मूल आशंका कि वह समाज के संभ्रांत वर्गों के लिए विशेष लाभकारी तथा उनका सुरक्षाकवच सिद्ध होगा, आरंभ में ही स्पष्ट नजर आने लगी थी. समस्या के निदान के लिए जरूरी था राज्य द्वारा अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण आचरण. सुकरात ने इसे ‘सद्गुण’ की संज्ञा दी थी. अरस्तु ने जोर देकर कहा था कि नागरिकता समान व्यक्तियों के बीच का संबंध है, न कि राज्य का प्रदेय. ‘पालिटिक्स’ में उसने नागरिक की विशेषता को नपेतुले शब्दों में व्यक्त किया है, ‘ऐसा आदमी जो न्याय के प्रतिपादन एवं शासन पदाधिकार में भागीदार हो.’ दूसरे शब्दों में ऐसा व्यक्ति जो किसी राष्ट्र की विचारपरिषद अथवा न्यायपरिषद अथवा तत्संबंधी शासन में भागीदार होने के अधिकार का उपयोग करता है, वह नागरिक है. समाज में उसकी भूमिका नाविक के समान होती है. जैसे एक नाविक किश्ती को, आवश्यकता पड़ने पर विषम परिस्थितियों से संघर्ष करता हुआ, आगे ले जाता है, ऐसे ही नागरिक चैतरफा चुनौतियों के बीच भी, अपने समाज को विकास ओर ले जाने हेतु सतत प्रयत्नरत रहता है. नागरिक की निष्ठा वैध शासन में होती है, आततायी अथवा दुराचारी सत्ता के प्रति नहीं. यह न्यायआधारित राज्य में नागरिक की सैद्धांतिक परिकल्पना है. व्यवहार में होता यह है कि वैध शासन में निष्ठा रखने वाले नागरिक, लोकहित को भुलाकर स्वार्थ के लिए काम करने लगते हैं. पर्याप्त लोकचेतना के अभाव में सत्ता से निकटता का लाभ उठाने के लिए धर्मसत्ता और अर्थसत्ता दोनों उसके आसपास सिमटने लगती हैं. अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने तथा जनता के प्रति सीधी जवाबदेही से बचने के लिए राजसत्ता भी उन्हें तरहतरह से प्रोत्साहित करती है. धर्म, राज्य एवं अर्थ सत्ताओं की तिकड़ी से बना शक्तिशाली केंद्र अपने दायित्वों के प्रति उदासीन हो, वर्गीय हितों को वरीयता देने लगता है. वह कानूनी प्रावधानों की व्याख्या निहित स्वार्थ के अनुसार करता है. परिणामस्वरूप न्याय का पलड़ा अभिजन वर्ग की ओर झुकने लगता है. समानता, समभाव, न्याय एवं कानून का दावा करने वाले राज्यों में भी जनसाधारण और विशिष्ट जन के लिए कानून का भिन्न नजरिया होता है. कई बार तो यह गठजोड़ इतना मजबूत हो जाता है कि जनता की प्रतिक्रिया की उसे परवाह तक नहीं होती. विशेषाधिकार संपन्न शीर्षस्थ शक्तियां प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग करने लगती हैं. इससे न्याय एवं समानता के नाम पर बनाए गए कानून समाज के विशेषाधिकार संपन्न वर्ग के हितरक्षक सिद्ध होते हैं. चूंकि साधारणजन किसी न किसी कारण से समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर होता है, इसलिए अन्यायपूर्ण व्यवस्था को सहते जाना उसकी मजबूरी होती है. कानून की इस दुर्बलता को देखकर सिसरो को कहना पड़ा था कि वह कानून समानता एवं निष्पक्षता के चाहे जितने दावे करे, उसके अधिकांश प्रतिबंध केवल जनसाधारण पर लागू होते हैं. सत्ता के निकटवर्ती लोगों पर उनका कोई असर नहीं पड़ता. अपनी पुस्तक ‘आन दि रिपब्लिक’ में उसने साफ तौर पर कहा था कि दुनिया का—

एकमात्र कानून है, विवेक. वह प्रकृति के अनुसार है. वही सब मनुष्यों पर लागू होता है. वह परिवर्तन से परे तथा शाश्वत है. कानून मनुष्यों को आदेश देता है कि वे निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करें. वह मनुष्य को गलत काम करने से भी रोकता है. किंतु उसके आदेश और निषेधाज्ञाएं केवल अच्छे आदमियों पर असर डालती हैं. उनका बुरे आदमियों पर कोई असर नहीं पड़ता. ऐसे कानून को मानवी विधान द्वारा अवैध घोषित करना नैतिक दृष्टि से उचित नहीं है. इसके संचालन को सीमित करना भी अनुचित होगा. इसको पूरी तरह से रद्द कर देना संभव है….समाज में केवल एक कानून होना चाहिए. वही शाश्वत और अपरिवर्तनशील है. वह प्रत्येक युग में प्रत्येक मनुष्य के लिए बंधनकारी है. मनुष्य का केवल एक स्वामी और शासक है—ईश्वर. वही सारे कानूनों का निर्माता, व्याख्याता और प्रयोक्ता है. जो व्यक्ति इस कानून का पालन नहीं करता वह अपने उत्कृष्ट रूप से वंचित हो जाता है….12

सिसरो, क्रिस्सीप्पस आदि विचारक उस दौर में जन्मे थे, जब यूनानी विचारचेतना पर सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, जीनोफेन आदि के आदर्शवादी चिंतन का गहरा प्रभाव था. अरस्तु ने राष्ट्रीय सत्ता के औचित्य को दो वर्गों में बांटा था. पहला मानवीय स्वभाव में अंतनिर्हित सामजिकता के लक्षण को लेकर था. वह ‘भले व्यक्ति’ तथा ‘अच्छे नागरिक’ को अलगअलग देखता था. उसका मानना था कि भला व्यक्ति अपने आचरण में दूसरों का मददगार होता है. वह ईमानदार जीवन, दूसरों को कष्ट पहुंचाए बगैर जीने की कामना करता है. अच्छा नागरिक इन गुणों के साथसाथ राज्य एवं कानून के प्रति भी समर्पित होता है. अरस्तु का मानना था कि मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है. समाज से अलग वह रह ही नहीं सकता. समाज उसे भले आदमी से अच्छा नागरिक बनने का अवसर प्रदान करता है. अपने नागरिकों के लिए अपेक्षित सुरक्षा, शांति, सुख एवं संतोष की व्यवस्था करता है. दूसरे उसका कहना था कि राष्ट्र को अपने नागरिकों के बीच बिना भेदभाव किए सुख एवं कल्याण के समान वितरण पर ध्यान देना चाहिए. उल्लेखनीय है कि अरस्तु से पहले लोकतंत्र, राजतंत्र, तानाशाही, कुलीनतंत्र, अल्पतंत्र आदि को लेकर खूब चिंतन हो चुका था. सरकार के स्वरूप को लेकर विद्वान आपस में बंटे हुए थे. अरस्तु ने यह कहकर कि सरकार का स्वरूप चाहे जैसा हो, यदि वह शुभ को समर्पित है, नैतिक एवं न्यायपूर्ण है, तो वह वरणयोग्य है—सारी बहसों को दरकिनार कर दिया था. उसके बाद सरकार के स्वरूप को लेकर चलने वाली बहसें, उसके दायित्व एवं कर्तव्य की ओर मुड़ने लगी थीं. अरस्तु का विचार था कि समाज शुभत्व की ओर तभी अग्रसर रह सकता है, जब राज्यसत्ता नागरिकों के बीच न्याय के संवितरण को लेकर गंभीर हो. नागरिकों का भी उसपर विश्वास हो. उससे पहले प्लेटो ने न्याय को समाज के सद्गुण की संज्ञा दी थी.

सवाल उठता है कि दोढाई हजार वर्ष पहले तक जब सभी विचारक न्याय के स्वरूप को अधिकतम नैतिक बनाने पर जोर दे रहे थे, शुभत्व की प्राप्ति पर जोर दिया जाता था, तो बाद की शताब्दियों में अचानक क्या हुआ जिससे राज्य नैतिक आचरण से निरंतर दूर होकर अभिजात संस्कृति का पालकपोषक और संरक्षक बनता गया? क्या हुआ जो राजनीति जिसका प्रथम और अंतिम लक्ष्य नागरिकों के बीच विश्वास, समानता और विकास का वातावरण तैयार करना था, वह कूटनीतिक चातुर्य में ढलकर जनसाधारण की पहुंच से निरंतर दूर होती गई? पश्चिम की बात करें तो उसका कारण वहां की राजनीति में चर्च का अतिरिक्त और अवांछित दखल था. उल्लेखनीय है कि स्वाधीनता को लेकर दास योद्धा थ्रेसवासी स्पार्टकस ने रोमन साम्राज्य के विरुद्ध जंग की छेड़ी थी. आरंभिक लड़ाइयों में रोमन साम्राज्य को दास सैनिकों के आगे मुंह की खानी पड़ी थी. बाद में इटली की सेनाओं के मिल जाने से युद्ध का पासा पलट गया. स्पार्टकस के बलिदान के बाद छह हजार दास योद्धाओं को सूली पर चढ़ा दिया गया. स्पार्टकस का पराभव, मुक्ति का सपना पाल बैठे दासों के लिए बहुत बड़ा आघात था. उनका सपना था कि वीर स्पार्टकस उन्हें गुलामी की उस जकड़न से मुक्त कराएगा, जिसे वे पीढ़ीदरपीढ़ी झेलते आए हैं. गहन हताशा के इसी दौर में ईसा मसीह का आगमन हुआ. चारों ओर से निराश, सहस्राब्दियों से समाज के प्रभुवर्ग वर्ग के उत्पीड़न का शिकार रहे दासों को ईसा मसीह के उपदेश भाने लगे. शारीरिक मुक्ति की आस छोड़ चले हताशनिराश दासों के लिए ‘परम पिता परमेश्वर’ के राज्य के बहाने मुक्ति का काल्पनिक आश्वासन बहुत सुखकारी था. गोया इस भ्रम में जीने के अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है—यह वे मान चुके थे. ईसा मसीह के चामत्कारिक व्यक्तित्व तथा धर्म के प्रभाव ने साम्राज्यवादी ताकतों को भी आकर्षित किया था. धर्म की संगठनकारी शक्ति ने उन्हें विकल्प दिया था, जिससे वे जनता को संगठित कर सकते थे. साथ ही उनका ध्यान वास्तविक समस्या से हटाकर अपनी सत्ता को सुरक्षित रख सकते थे. यह मानकर कि धर्म के सहारे व्यक्ति की चेतना पर नियंत्रण आसान है, आरंभ में ईसा मसीह के आलोचक रहे लोग भी जनमत को भरमाये रखने के लिए उनके चलाए धर्म को अपनाने लगे. कह सकते हैं कि ईसा और उनका धर्म वर्चस्ववादी मंसूबों को साधने के लिए साम्राज्यवादी, वर्चस्ववादी, स्वार्थी और विलासी शक्तियों के लिए सुरक्षित आड़ था.

अगले 1500 वर्ष का इतिहास धर्मसत्ता और राजसत्ता ऐसे गठजोड़ का है, जिसे कोई चुनौती न थी. हालांकि सत्ताशीर्ष पर विराजमान लोगों के दिल में यह डर हमेशा बना रहता था कि संगठित जनशक्ति उनके वर्चस्व को कभी भी चुनौती दे सकती है. दूसरा स्पार्टकस कभी पैदा न हो, ऐसी न केवल वे प्रार्थना करते थे, बल्कि सामदामदंडभेद, नीतिअनीति द्वारा विरोध पर उतारू शक्तियों का दमन भी करते थे. धर्म इस काम में उनका सबसे बड़ा मददगार था. इस बात को चर्च भी समझती थी. राजसत्ता की मदद के बदले वह मनमानी कीमत भी वसूलती थी. यह ‘एक हाथ ले, दूसरे से दे’ की सीधीसादी सौदेबाजी थी. मध्यकाल तक चर्च इतना शक्तिशाली हो चुका था कि वह आसानी से राजसत्ता को अपने बस में रख सकता था. वह लोगों को भरमाता था कि सांसारिक सुख हेय हैं, इसलिए वे त्याज्य हैं. नश्वर संसार के क्षणभंगुर सुखों में फंसने के अच्छा है व्यक्ति स्वर्ग और मोक्ष पर ध्यान दे, जहां अनिवर्चनीय सुख मौजूद है. यह प्रलोभन, मिथ्या सुखों का आश्वासन, जनसाधारण को सांसारिक सुखों की ओर से उदासीन बनाता है. इसके बावजूद धर्म और राजसत्ता का स्वार्थमय गठजोड़ लंबे समय तक निर्बाध चलता रहा. चर्च को पहली और वास्तविक चुनौती पंद्रहवीं शताब्दी में मिली, जब वैज्ञानिक क्रांति ने परंपरागत विचारधाराओं को कठघरे में ला दिया. मार्टिन लूथर, जान काल्विन, जियोदार्नो ब्रूनो, निकोलो मैकियावेली ने धार्मिक कट्टरपंथियों को ललकारा. इनमें मैकियावेली ने आधुनिक राष्ट्रराज्य की अभिकल्पना प्रस्तुत की तो मार्टिन लूथर, जान काल्विन, जियोदार्नो ब्रूनो ने धर्म के नाम पर चर्च में पनप रहे अनाचार की ओर ध्यान आकर्षित किया, जिससे नए धर्मों की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी. सोहलवीं शताब्दी में फ्रांसिस बेकन ने यह कहकर कि ‘ज्ञान ही शक्ति है’, ज्ञानाधारित समाज की संकल्पना को आगे बढ़ाया. उसी से कालांतर में तर्काधारित समाज की स्थापना को बल मिला. सभी के लिए न्याय की समान और सहज उपलब्धता पर जोर देते हुए बेकन का कहना था,

यदि हम न्याय की उपेक्षा करते हैं तो न्याय भी हमारी उपेक्षा करने लगेगा.’13

वह दौर नए विचारों, विशेषकर विधि के निर्माण का भी था. ईसा बाद छठी शताब्दी से ग्यारवीं शताब्दी का समय यूरोप के लिए भी राजनीतिक अस्थिरता का था. पूर्व के देश जहां हूणों के आक्रमण से आक्रांत थे, वहीं यूरोप में बर्बर जर्मन कबीलों ने आतंक मचाया हुआ था. चर्च के निरंतर हस्तक्षेप के चलते राज्य की शक्तियां निर्बल पड़ी थीं. अंततः इस विश्वास ने जन्म लिया कि सामाजिक शांति और सुरक्षा के लिए जनता को ही आगे आना होगा. ग्यारहवीं शताब्दी तक यह धारणा जन्म ले चुकी थी कि राज्य के हस्तक्षेप के बिना भी समाज में शांतिसद्भाव की स्थापना संभव है. आधुनिक अराजकतावादी दर्शन से मेल खाती महत्त्वपूर्ण मान्यता ने इस दौर में जन्म लिया, उसके अनुसार लोग यह मानने लगे थे कि विधि लोक या जनता अथवा कबीले से संबंध रखती है. प्रत्येक सदस्य जनता की शांति के अधीन रहता है. सत्ताएं अपने स्वार्थ एवं लालच की खातिर लड़तीझगड़ती रहती हैं. लोक न केवल शांति चाहता है, बल्कि अपेक्षाकृत उसे बनाए भी रखता है. इसलिए शांति तभी संभव है, जब सत्ताओं का स्वर लोकोन्मुखी हो तथा वह लोक की इच्छाशक्ति द्वारा संचालित भी हो. इस वैचारिकी पर गंभीर कार्य तो उस दौर में संभव न हो सका, किंतु यह पहली बार हुआ था, जब कानून यह कहकर लागू किए जाते थे कि वे जनता की सहमति द्वारा बनाए गए हैं. जार्ज सेबाइन अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ पालिटिकल थाट्स’ में 864 ईस्वी के एक लेख का हवाला दिया है. उस लेख में यह उद्घोषणा की गई है कि यह, ‘विधि(कानून) जनता की सहमति और राजा की घोषणा द्वारा बनाई गई है.’ वर्तमान लोकतंत्रिक परिवेश में यह कार्य सामान्य प्रतीत हो सकता है. किंतु तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में जब सारे निर्णय राजा की इच्छानुसार लिए जाते थे, ताकत के बल पर बड़ेबड़े फैसले हो जाया करते थे, लोकसहमति को वरीयता के साथ उद्घोषणा का हिस्सा बनाना बड़ी बात थी.

इसका आशय यह नहीं है कि जनशक्ति की स्वयंप्रभुता का विचार मध्यकाल की देन है. सच तो यह है कि समाज को ताकत के बल पर अनुशासित करने का सबसे बड़ा नुकसान समाज के सामान्य जन को अधिकारों एवं स्वतंत्रता के बलिदान से चुकाना पड़ा था. यूं तो कौटिल्य ने भी लिखा—‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्. नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रिय हितम्(अर्थशास्त्र 1/19/40)’. किंतु प्रजा का उल्लेख यहां राजा को उसका कर्तव्य याद दिलाने के लिए है. प्रजा स्वयं निर्णायक शक्ति है, ऐसा कोई जिक्र वेद या वेदोत्तर साहित्य में नजर नहीं आता. जबकि पश्चिम में, ‘जनता ही सबकुछ है’—विचार बहुत पहले अपनी जगह बना चुका था. हैराल्ड बर्कले ने अपनी पुस्तक ‘पिपुल विदआउट दि गवर्नमेंट: एन ऐन्थ्रपालजी आफ एनर्किज्म’ में लिखा है कि हजारों वर्ष पहले समाज बिना किसी सरकार के भी शांत और खुशहाल था. प्राचीन यूनान में जीनो, अरिस्टिप्पस, चीनी विद्वान ताओ जू शासकविहीन समाज के समर्थक थे. पीटर क्रोप्टोकिन के अनुसार यूनानी विद्वान अरिस्टिप्पस का तो यहां तक कहना था, ‘बुद्धिमान व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता राज्य के हवाले नहीं करता.’14जाहिर है लोकेच्छा के अनुसार शासन की अवधारणा सहस्राब्दियों पुरानी है. इस वैचारिकी पर असली काम सतरहवीं शताब्दी के बाद ही संभव हुआ, जब इटली के प्राचीन गौरव से सम्मोहित मैकियावेली ने चर्च के राजनीति पर अनावश्यक हस्तक्षेप को चुनौती देते हुए राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद की. मैकियावेली का मानना था कि ईसाई धर्म अपनी जिन मान्यताओं पर गर्व करता है, उनका मूल स्वर पलायनवादी है. उनके प्रति राज्यसमाज के पूर्वाग्रह मनुष्य को कमजोर बनाते हैं. मैकियावेली ईसाई धर्म की अपेक्षा प्राचीन यूनानी धर्मों को बेहतर मानता था—

हमारा धर्म(प्राचीन यूनानी धर्म) विनम्रता, एकांत एवं सांसारिक लक्ष्यों की उपेक्षा को अपना सर्वोच्च गुण मानता है. इसके विपरीत दूसरा धर्म आत्मगौरव, शारीरिक बल तथा उन सभी विशेषताओं को जो शरीर को शक्तिशाली तथा ओजमय बनाती हैं, महान बताता है….हमारे धर्म के इन्हीं सिद्धांतों ने मनुष्य को कायर बनाया है. जिससे दुष्ट व्यक्ति उन्हें आसानी से काबू में कर लेते हैं. धर्म से डरे, घबराए हुए लोग हमेशा स्वर्ग के प्रलोभन में रमे रहते हैं. वे चोट सह लेते हैं, बदला नहीं लेते.’15

दूसरों को त्याग, तपश्चर्य, संयम और सांसारिक सुखों से विरक्त रहने का उपदेश देने वाले धर्म के कारोबारियों का अपना जीवन सुखोपभोग और विलासिता का प्रतीक होता है. इस हकीकत न समझ पाने व्यक्ति उनकी बातों में बड़ी आसानी से फंस जाते हैं. इससे विकास की धारा पश्चगामी रूप धारण कर लेती है. इस हकीकत को समझने वाले पहले भी थे. वे इसका प्रतिवाद भी करते थे, किंतु उनका प्रभाव बहुत सीमित रहता था. इसलिए कि समाज में उत्पादन के साधन बहुत सीमित थे. जो थे, उनपर मुट्ठीभर लोगों का अधिकार था, जिनके साथ धार्मिक शक्तियों का गठजोड़ था. अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं के लिए साधारणजन समाज के साधनसंपन्न लोगों पर निर्भर था. इसलिए उनके द्वारा चलाए जा रहे सघन प्रचारअभियान का सार्थक विरोध उसके लिए करीबकरीब असंभव ही था. उल्टे उसके साथ समझौता कर लेने में ही उसे अपना हित नजर आता था. धर्म के प्रति आलोचनात्मक द्रष्टिकोण का निर्माण 16वीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति के बाद संभव हो सका, जो वैकल्पिक उत्पादन प्रणाली भी साथ लाई थी. अभी तक आय का प्रमुख साधन या तो खेती थी अथवा ऐसे उत्पाद, जो किसी न किसी प्रकार प्रकृति के दोहन से जुड़े थे. चूंकि प्राकृतिक संसाधनों पर समाज के प्रभुवर्ग का एकक्षत्र अधिकार था, अतएव व्यापारी वर्ग राजसत्ता तथा उनके करीबियों से संबंध बनाए रखने में ही अपना भला समझता था. नई प्रौद्योगिकी के आगमन से हालात तेजी से बदल रहे थे. मशीनीकरण से उत्पादनदर में तेजी आई थी. उत्पादक वर्ग को अब अधिकाधिक ग्राहकों की आवश्यकता थी. साथ में जरूरत थी मशीनों के परिचालन के लिए दक्ष कामगारों की, जिससे आधुनिक शिक्षा को बल मिला. प्रकारांतर में उसी से मध्यवर्ग का विकास हुआ जो आगे चलकर परिवर्तनकामी आंदोलनों का मुख्य सूत्रधार बना. नए ग्राहकों की खोज के सिलसिले में उत्पादक और उपभोक्ता वर्ग के बीच नए संबंध बनने लगे. हालांकि इससे अधिक लाभ उत्पादक वर्ग का ही था, लेकिन नई शिक्षा से जनसाधारण के आत्मविश्वास में वृद्धि हुई थी. इससे उसके मन में अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ती गई. धीरेधीरे उत्पादक वर्ग इतना शक्तिशाली और ताकतवर होता गया कि अवसर मिलने पर वह राजसत्ताओं को आंख दिखाने का दुस्साहस करने लगा. इसका आकलन 1680 ईस्वी की एक मशहूर घटना से किया जा सकता है. घटना फ्रांस की है. उसके अनुसार फ्रांसिसी व्यापारियों का एक दल मोसेयर ली जेंडर के नेतृत्व में सरकार के सबसे ताकतवर नौकरशाह जीन बेपटिस्ट कोल्बर्ट से मिला. कोल्बर्ट वित्त विभाग से जुड़े थे. अभिमान से तने कोल्बर्ट ने जब व्यापारियों के दल से पूछा कि वह उनके लिए क्या कर सकता है, तब जेंडर ने उसे बस इतना कहा था—‘लेजेज फेयर!’ अर्थात ‘महाशय, आप हमें हमारे हाल पर छोड़ दें.’ कालांतर में उत्पादकव्यापारियों के हौसले इतने बुलंद हुए कि जर्मनी, फ्रांस, पुर्तगाल, ब्रिटेन, अमेरिका, स्पेन आदि देशों के उत्पादक, व्यापारी नए बाजारों की तलाश में अपनेअपने राष्ट्र की सीमाओं से बाहर निकले तथा गरीबी एवं अन्यान्य आंतरिक समस्याओं से जूझ रहे अफ्रीकी और दक्षिण एशियाई देशों में अपनेअपने उपनिवेश बसाने में सफल होते गए.

वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति का असर समाज की बौद्धिक चेतना पर पड़ना स्वाभाविक ही था. अनेक प्रखर विद्वान इस कालखंड के दौरान जन्मे जो प्राचीनता के पूर्वाग्रहों से मुक्त थे. सोलहवीं शताब्दी के आरंभिक चिंतकों में थामस हाब्स का नाम प्रमुख है. उग्र राष्ट्रवाद के समर्थक हाब्स ने सबसे पहले उस धारणा पर चोट की जो शासक को दैवी सत्ता मानती आई थी. उसने जोर कहा कि शासन पूरी तरह लौकिक संरचना है. उसका महत्त्व अपने नागरिकों के कल्याण के स्तर को ऊंचा उठाने पर निर्भर करता है. उसने जोर देकर कहा कि न्याय के समक्ष भावना का कोई स्थान नहीं है. वह मानवीय विवेक से फलताफूलता है. न्याय और स्वतंत्रता परस्पर पूरक और सहायक हैं. यदि कोई व्यक्ति दूसरे की स्वतंत्रता को बाधित करता है, तो इसका सीधासा अभिप्राय है कि उसे वह न्याय से वंचित कर देना चाहता है. गरीबी और आर्थिक असमानता का मूल समाज में न्याय का असमान विभाजन है—इस विचारदर्शन पर काम करते हुए ‘लाफ फ्रीडम’ नामक पुस्तिका में गेरार्ड विंस्टले ने लिखा था कि भूखे मर जाने से कहीं बेहतर है कि मनुष्य का जन्म ही न हो. लेकिन बालक का जन्म तो प्राकृतिक घटना है. जैसे मातापिता के लिए संभव नहीं कि वे अपनी संतान को इच्छानुसार सांचे में ढाल सकें, उसी प्रकार नवजात शिशु का भी अपने जन्म की परिस्थितियों पर कोई नियंत्रण नहीं होता. इसके बावजूद आर्थिक असमानता और गरीबी के विरोध में गेरार्ड की भावनाएं सम्मानीय हैं. उसने लिखा है कि प्रकृति से सभी समान होते हैं. आर्थिक असमानता कृत्रिम है, अतएव—

वास्तविक स्वतंत्रता का एकमात्र निहितार्थ है कि सभी मनुष्यों को प्रकृति प्रदत्त पदार्थों के उपयोग का समानाधिकार हो…. सच्ची स्वतंत्रता का तकाजा है कि भूमि साझे की रहे, भूउत्पादों को एक साझे के भंडार में रखा जाए, जहां से सभी व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार चीजें प्राप्त कर सकें. चालीस का होने तक सभी स्वस्थ व्यक्तियों को उत्पादन कार्य में हिस्सा लेना चाहिए.’16

विंस्टले के विचारों में हम चर्च के उदार, नैतिकतावादी विचारों की झलक पाते हैं. उसपर प्लेटो और स्पार्टा के जीवनदर्शन का भी प्रभाव था. विंस्टले के विचारों का प्रभाव हैरिंग्टन पर पड़ा. विचारों में विंस्टले की अपेक्षा सख्त, गणतंत्र समर्थक हैरिंग्टन का मानना था कि शासकों और कानून निर्माताओं का निर्वाचन बारीबारी से, एक वर्ष के लिए किया जाना चाहिए. यदि संभव हो तो उसी व्यक्ति का तुरंत दुबारा निर्वाचन नहीं होना चाहिए. उसने ‘समतायुक्त गणराज्य’ की संकल्पना प्रस्तुत की. लिखा था कि समतायुक्त गणराज्य वह शासन है जो समान संपत्ति अधिकार से युक्त कृषिजीवियों के ऊपर आधारित होता है. इस शासन के तीन अंग होते हैं. सीनेट विवाद करता है, जनता निर्णय करती है; तथा वैध प्रक्रिया द्वारा बारीबारी से निर्वाचित मजिस्ट्रेट नीतियों का कार्यान्वन करते हैं.’

उल्लेखनीय है कि पंद्रहवीं शताब्दी में जब पूरा यूरोप वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति से गुजर रहा था, गणतांत्रिक शासनप्रणाली की मांग की जा रही थी, भारत तब गुलाम था. उन दिनों यहां भक्ति आंदोलन की हवा बह रही थी. भक्त कवि समाज के अलगअलग वर्गों से आए थे. उनमें वे कवि जो समाज की पिछड़ी जातियों से सामाजिक उत्पीड़न को झेलते हुए आए थे—जातपांत, सांप्रदायिकता, ऊंचनीच और वर्गीय भेदभाव का खुल्लमखुल्ला विरोध कर रहे थे. दूसरी ओर समाज के उच्च वर्गांे से आए कवियों का ध्यान ऐतिहासिक चरित्रों का बखान कर पुराने जातीय गौरव की स्मृतियों को बचाए रखना था. इसके पीछे लंबी पराधीनता से जन्मी हताशा का बड़ा योगदान था. आरंभिक भक्ति आंदोलन का चेहरा समतावादी था. कालांतर में उसमें जातिवादसमर्थक तत्वों के आ जाने से वह कर्मकांड का हिस्सा बन गया. निर्गुण भक्ति द्वारा समाज को एकता के सूत्र में बांधने को प्रयत्नरत आंदोलन सगुण भक्ति में सिमट गया. उसका पुराना तेज भी जाता रहा. सोलहवीं शताब्दी के बाद जब पश्चिम में पुनर्जागरण की लहर आई हुई थी, भारत में पराजित मानसिकता धार्मिकजातीय संक्रीर्णता में सिमटने लगी. परिणामस्वरूप वह वर्ग जो निर्गुण भक्ति के प्रभाव में समानता का सपना देखने लगा था, और भी उपेक्षितउत्पीड़ित होने लगा. आशय है कि भक्ति आंदोलन अपेक्षित सफलता अर्जित न कर सका. दूसरी ओर वैकल्पिक उत्पादन साधनों के कंधों पर सवार, उसकी प्रशंसा अथवा आलोचना के फलस्वरूप, पश्चिम में चली सुधारवादी हवाओं ने वह कमाल कर दिखाया. फलस्वरूप वहां धर्म और राजनीति को अलगअलग रास्ते अपनाने पड़े. समाज में व्यक्ति और उसकी स्वतंत्रता का महत्त्व बढ़ा. जीवन के सामान्य सुखों को लेकर जो उपेक्षा और ग्लानिभाव लोगों के दिलों में समाया रहता था, उसमें धीरेधीरे कमी आने लगी. राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो पूरी निर्णय प्रक्रिया पर राजा और उसके दरबारियों का अधिकार था. हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ फैसले मिलजुलकर पंचायत स्तर पर ले लिए जाते थे. किंतु उनका दायरा केवल पारिवारिकसामाजिक मसलों तक सीमित था.

सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में, जिन दिनों भारतीय भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था, पश्चिम में एक युगांतरकारी पुस्तक आई थी. उसने लोगों की आंखों में समानता एवं सहजीवन का सपना रोपने का काम किया. पुस्तक थी, थाॅमस मूर की—‘यूटोपिया’. व्यंग्य की शैली में लिखी गई इस पुस्तक की खूबी इसके व्यंग्य का देशकालातीत होना है. पुस्तक में एक ऐसे राज्य का सपना देखा गया था, जहां बाहरी बंधनों से मुक्ति है. लोग अपनी स्वतंत्रता और सहजीवन में आनंदमग्न हैं. उपन्यास में तेजी से आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ रहे अर्जनशील समाज की धनलोलुप प्रवृत्तियों पर गहरा कटाक्ष किया गया था. मूर ने लिखा था कि यह एक ऐसा समाज है, जिसमें विदेशों से ऊंचे दाम पर खरीदना और उसको मुनाफे के साथ बहुत ऊंचे दाम पर बेचना भी सदाचार माना जाता है. ऐसे देश में कानून का राज्य भी स्वार्थ से मुक्त भला कैसे हो सकता है. इन्हीं कारणों से उनमें आर्थिक विषमता फैलती है, जिसपर नियंत्रण के अभाव में वहां आए दिन अपराध होते रहते हैं. उन्हें कठोर दंडात्मकविधान द्वारा दबाने की कोशिश की जाती है. व्यक्ति और शासन के बीच विश्वास के अभाव में कुछ लोगों का नैतिकता और सदाचार से विश्वास उठ जाता है. उन्हें लगता है कि वे केवल अपराध द्वारा ही भरणपोषण कर सकते हैं. धीरेधीरे वे उसकी ओर प्रवृत्त होने लगते हैं. एक दिन उन्हें अपराध में ही कौतुक या खेल जैसा आनंद आने लगता है. ऐसे व्यक्ति कानून के डर से मुक्त हो जाते हैं. मूर के इन विचारों की तुलना कन्फ्युशियस के इन विचारों से कर सकते हैं. अपने शिष्यों के साथ चर्चा के दौरान एक बार उसने कहा था—‘दंड एवं कानून द्वारा अनुशासित राज्य में लोग बस इतना जानते हैं कि कानूनी अड़चनों से बचा कैसे जाए. उन्हें इसमें कोई शर्म भी नहीं आती.’ लंबी चर्चाविमर्श के बाद बनाए गए कानून की लाचारी देख, मूर ने व्यंग्यात्मक शैली में कहा था कि ‘आप लोगों को चोर बनाने और उन्हें दंड देने के सिवाय कर ही क्या सकते हैं!’ उसने लड़ाई के दौरान तात्कालिक स्तर पर सैनिक भर्ती किए जाने पर भी सवाल उठाए थे. उसका कहना था कि युद्ध की समाप्ति के बाद उन सैनिकों को सेना से से बेदखल कर रोजगारविहीन कर दिया जाता है. अनुभव की कमी के कारण वे खेती जैसे साधारण कार्यों में भी सफल नहीं हो पाते. मूर का आदर्श समानतायुक्त राज्य था. न्याय को लेकर उसके विचार एकदम स्पष्ट थे—

न्याय प्रत्येक व्यक्ति को उसका अधिकार देने की स्थायी प्रवृत्ति है. न्याय का सर्वसम्मत विधान है, व्यक्तिमात्र को सम्मानजनक जीवन, किसी को हानि न पहुंचाना, मनुष्य को हर वह चीज देना जो उसकी है. न्यायशास्त्र वस्तुजगत, मानवमात्र और दैवीयबोध, उचितअनुचित को समझने का विशिष्ट ज्ञान है.’17

यूटोपिया’ में लेखकीय कल्पना की उड़ान ज्यादा थी. इसे हम स्वाभाविक भी मान सकते हैं. इसलिए कि ‘यूटोपिया’ मूलतः एक साहित्यिक कृति है. भले ही आने वाले समय में उसने राजनीति को जमकर प्रभावित किया हो. ‘यूटोपिया’ में मूर जिस कल्पनालोक की सृष्टि करता है, उससे उसपर प्लेटो का प्रभाव साफ नजर आता है. बहरहाल, ‘यूटोपिया’ के माध्यम से मूर द्वारा जो सपना सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में देखा गया था, वह अगली दो शताब्दियों में कई वैकल्पिक चिंतनधाराओं के रूप में सामने आया, जब राबर्ट ओवेन, विलियम ब्लेंक, डेविड रिकार्डो, चाल्र्स फ्यूरियर जैसे साहचर्यवादी विचारकों ने सहजीवन आधारित बस्तियों की आधारशिला रखी, जिसके फलस्वरूप समाजवादी आंदोलनों को गति मिली.

अरस्तु ने कहा था कि क्रांतियां मुख्यतः आर्थिक विसंगतियों द्वारा पैदा होती हैं. समाज में शांति एवं सामन्जस्य की स्थापना के लिए आर्थिक विसंगतियों को पाटने का सुझाव प्लेटो ने भी ‘रिपब्लिक’ में दिया था. किंतु सहकार और सहजीवन आधारित बस्तियों की प्रायोगिक स्थापना अठारहवीं शताब्दी में राबर्ट ओवेन, विलियम ब्लेंक, चार्ल्स फ्यूयिर आदि विचारकों के सौजन्य से ही संभव हो सकी. उसके पीछे जान मिल्टन जैसे गणतंत्रसमर्थक कविलेखकों का भी योगदान था. मिल्टन का विचार था कि राज्य की स्थापना मनुष्य ने अपने कल्याण के लिए की है. मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेते हैं तथा सामान्य हितों के लिए सरकार की स्थापना करते हैं. ऐसे में शासकवर्ग का कर्तव्य है कि वह उन लोगों के हितों का ध्यान रखे, जिन्होंने उसका गठन किया है. इसके बावजूद यदि राजसत्ता कर्तव्यच्युत होती है, अथवा अपना उद्देश्य भुलाकर अत्याचार पर उतर आती है तो ऐसे अत्याचारी शासक के विरुद्ध विद्रोह करना मनुष्य का प्राकृतिक अधिकार है. उसका मानना था कि समस्त निर्णयकारी शक्तियां जनता के अधीन होती हैं. राजा के पास कोई अधिकार नहीं रहता. अपनी पुस्तक ‘दि टेन्योर आफ किंग्स एंड मजिस्ट्रेट्स’ में उसने लिखा था—

राजाओं एवं मजिस्ट्रटों को उनकी शक्ति जनता की ओर से प्राप्त होती हैं. वह एक अमानत के रूप में उन्हें सौंपी जाती है. उन्हें यह शक्ति बगैर किसी पक्षपात के सभी के सामान्य कल्याण हेतु प्रदान की जाती है. उसका हस्तांतरण भी संभव है. लेकिन मूलरूप में वह जनता के अधिकार में ही बनी रहती है. जनता की इस शक्ति को उसके प्राकृतिक अधिकारों का हनन किए बगैर नहीं छीना जा सकता.’18

मिल्टन के विचार आगे चलकर रूसो, जान स्टुअर्ट मिल, थाॅमस पेन जैसे स्वतंत्रतावादी विचारकों की प्रेरणा बना. फलस्वरूप लोकतंत्र के अनुरूप वातावरण तैयार हुआ. उस समय तक यूरोपीय बौद्धिक जागरण अपने शीर्ष पर पहुंच चुका था. चारों ओर से नएनए विचार आ रहे थे. अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में वैचारिक चिंतन की धुरी इंग्लेंड से फ्रांस की ओर खिसकने लगी थी. क्लाड एडरीन हेलवीटियस, बेरान हालबाश, वाल्तेयर आदि मुखर दार्शनिकों ने मनुष्यता को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की थी, जिसमें धार्मिक आडंबरवाद के लिए कोई स्थान न था. उनके लिए व्यक्तिमात्र का सुख और उसकी स्वाधीनता सर्वप्रथम थी. हेलवीटियस उपयोगितावादी विचारक था. बैंथम ने उपयोगितावादी दर्शन की मूल प्रेरणा उसी से ग्रहण की थी. उसका मानना था कि नीतिविज्ञानों में मानवीय स्वार्थ का वही स्थान है जो भौतिकशास्त्र में गति का. वह मानता था कि मानवीय स्वार्थ उत्पादकता का सबसे बड़ा उत्पे्ररक है. व्यक्ति जिस वस्तु को अच्छी मानता है, वही उसका स्वार्थ अथवा साध्य होती है. इसी प्रकार कोई राष्ट्र या जनसमुदाय जिस वस्तु को नैतिक मानता है, वह उसके लिए साध्य सिद्ध होती है. उसका विश्वास था कि मनुष्य स्वभावतः अच्छे होते हैं. उनके स्वभाव की इस मूल विशेषता को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी समाज की है. अतएव समाज के बहुआयामी विकास को ध्यान में रखते हुए, मनुष्य को आवश्यकतानुसार अपने स्वार्थ की साधना करने की छूट होनी चाहिए. वह व्यक्ति और समाज के बीच विकासोन्मुखी संतुलन की कामना करता था. चाहता था कि लोग अपने साथ दूसरे के सुख पर भी ध्यान दें, उसके विकास में सहायक बनें. वह शासन की ओर से भी ऐसी व्यवस्था का सपना देखता था, जिसमें व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता और इच्छाओं का सम्मान करते हुए समाज के समन्वित विकास को अपेक्षित गति दी जा सके. उसको शासकवर्ग के निरंकुश आचरण से शिकायत थी. उसका विश्वास था कि शासकवर्ग अपनी मर्जी को लोगों पर लादता हुआ आया है. मनुष्य को समझने की कभी कोशिश नहीं की गई. उसके अनुसार बुद्धिमान शासक मनुष्य के प्रेरक तत्वों पर ध्यान देता है. उन्हें समझने की कोशिश करता है. फलस्वरूप वह मानवी सुख एवं कल्याण हेतु असीम संभावनाओं के द्वार खोल देता है—

मनुष्य को सदगुणी बनाने का एकमात्र साधन है—अच्छा कानून. विधिनिर्माण की वास्तविक सफलता इसमें है कि लोगों को आत्मानुराग के साथ दूसरों के प्रति न्यायसंगत व्यवहार के लिए प्रेरित किया जाए. किसी भी नियम को बनाने से पहले मानवप्रवृत्ति को जानना जरूरी है. यह समझ लेना भी अत्यावश्यक है कि मनुष्य न तो अच्छे पैदा होते हैं, न ही बुरे. वे सामान्य हितों के अनुसार ही अच्छे अथवा बुरे बन जाते हैं. मनुष्य स्वाभाविक रूप से अपने आत्मसुख को महत्त्व देता है. उसी के अनुसार वह अच्छा या बुरा कहलाता है. बाह्यः जगत एवं तत्संबंधी अनुभूतियां हमारे मन में सुख के प्रति अनुराग तथा दुख की ओर से विराग वैदा करती हैं. सुख और दुख की सामान्य अन्विति मानवहृदय में आत्मानुराग पैदा करती है. उससे जन्मे उद्वेग ही प्रकारांतर में मनुष्य की अच्छाई और बुराई में ढल जाते हैं.19

हेलवीटियस की भांति हालबाख, टर्गेट तथा तथा कंडरसेट ने मानवीय स्वतंत्रता का समर्थन किया. हालबाख गणतंत्रवादी था तथा प्राचीन यूनान में गणतंत्र की सफलता के प्रति सम्मोहित भी. उसका गणतंत्र प्राचीन कुलीनतंत्र का ही विस्तार था. हालबाख का विचार था कि केवल संपत्तिधारक व्यक्तियों को ही जनप्रतिनिधि होने तथा कानून बनाने का अधिकार है. लोग मुख्यतः अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए राज्य से बंधे होते हैं. हालबाख की यह मान्यता राज्य की मूल अवधारणा के विरुद्ध थी. मनुष्य केवल संपत्ति की सुरक्षा के लिए राज्य अथवा कानून की शरण नहीं आता. स्वतंत्रता एवं सुख की कामना भी उसे समाज से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है. विशेषरूप से संपत्ति संग्रह का भाव, उसके मूल में व्यक्ति की भविष्य के प्रति आशंकाएं होती हैं. राज्य किसी तरह व्यक्ति के भीतर से भविष्य के प्रति डर और अनिश्चितता का शमन करने में सफल हो जाए तो उसके लिए संपत्ति संचय का औचित्य ही जाता रहेगा. अतः यह कहना कि व्यक्ति केवल संपत्ति सुरक्षा की भावना के साथ राज्य की शरण में आता है, उचित नहीं है. जबकि स्वतंत्रता एवं सुख व्यक्ति की नैसर्गिक चाहत होती है. मनुष्य समाज की शरण में अपनी स्वतंत्रता की सुनिश्चितता और सुख के स्थायित्व के लिए जाता है और असमानतापूर्ण व्यवस्था में उसे इसके लिए समाज के शीर्षस्थ वर्ग का कृपाकांक्षी होना जरूरी लगने लगता है. प्रकारांतर में साधारणजन समाज के शीर्षस्थ वर्गों को ही सर्वेसर्वा मान लेते हैं. वे भूल जाते हैं कि शीर्षस्थ वर्ग को उसकी शक्तियां और अधिकार जनता की ओर से ही प्रदान किए गए हैं. इस बोध के अभाव में वे केवल अच्छे अनुयायी बन पाते हैं तथा अपने असंतोष एवं जिज्ञासाओं को भाग्य हवाले कर, ढर्रे की जिंदगी जीने लगते हैं. समाज के साथ बराबरी का संबंध बनाने वाले, आवश्यकता पड़ने पर उसकी आलोचना का निर्णय लेने वाले विद्वान ही जरूरत पड़ने पर समाज को बदलने का साहस रखते हैं. केवल संपत्तिधारक व्यक्तियों को जनप्रतिनिधि होने का सुझाव भी न्यायसंगत नहीं था. सत्ता मिलने पर संपत्तिधारक व्यक्ति अपने हितों के अनुरूप कानून बनाएंगे, इससे समाजार्थिक असमानता में वृद्धि होगी. वह एक प्रकार का कुलीनतंत्र होगा, जिसमें जनसाधारण को अपने विकास एवं मानसम्मान की सुरक्षा के लिए न्यूनतम अवसर प्राप्त होंगे.

दरअसल जान लाक के बाद यूरोप में व्यक्तिवाद की जो हवा चली थी, हेलवीटियस, हालबाख आदि का दर्शन उसी के अनुरूप विकसित हुआ था. उपयोगितावाद पर आधारित इस चिंतनधारा में बदलाव रूसो के आगमन के बाद दिखाई पड़ा. रूसो स्वभाव से विलक्षण, उग्र तथा अपने पूर्ववर्ती विद्वानों से कई अर्थों में अलग था. उसने व्यक्तिस्वातंत्रय पर जोर दिया. वह व्यक्ति और समाज के बीच ऐसा अनुबंध चाहता था, जिसके अनुसार दोनों एकदूसरे की अस्मिता को सहजतापूर्वक स्वीकारते हुए समन्वित विकास की ओर अग्रसर हों. उसका मानना था कि समुदाय का भी एक व्यक्तित्व होता है. सामाजिक समुदाय सावयव सत्ता की भांति होता है. उसका कर्तव्य अपनी सदस्य इकाइयों के आचरण को नैतिक बनाना है. शासन का कर्तव्य है, सामान्य इच्छाओं की पूर्ति करना. ‘सामान्य इच्छाएं’ रूसो का प्रिय पद था, हालांकि वह उन्हें स्पष्ट रूप से परिभाषित करने में असमर्थ रहा था. उसका मानना था कि सामान्य इच्छाएं, समाज अथवा उसके किसी समुदाय के अनुपम लक्ष्य का प्रतीक होती हैं. उसके अनुसार समुदाय का अनुपम लक्ष्य उसके सदस्यों के व्यक्तिगत हितों से अभिन्न होता है. व्यक्ति और समाज का संबंध अन्योन्याश्रित है. इसलिए दोनों का विकास एकदूसरे के साथ सहयोग के बिना असंभव है. समाज को चाहिए कि व्यक्ति की स्वाधीनता में किसी भी प्रकार की कमी न आने दे. वहीं व्यक्ति को चाहिए कि दूसरों के साथ उतना सहयोग करे, जितना वह उनसे अपने लिए अपेक्षा करता है. हालांकि अनेक विद्वानों को रूसो के विचारों में अनेक असंगतियां दिखाई पड़ती हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि रूसो के अनेक विचार अपने समय से काफी आगे थे. इसलिए उसने आने वाले विचारकों की पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. रूसो की इस विचारधारा का प्रभाव थामस पेन, जान स्टुअर्ट मिल, कार्ल मार्क्स, बकुनिन, प्रूधों जैसे विचारकों पर भी पड़ा, मानवस्वातंत्रयतावादी लेखकों जैसे थाॅमस पेन, जान स्टुअर्ट मिल, जेफरसन का लेखन तो मानो रूसो के चिंतन का ही विस्तार है.

रूसो के बाद पश्चिमी जगत में उतना ही प्रतिभाशाली दार्शनिक जिसने बौद्धिक चिंतन की धारा को नया मोड़ देकर आनेवाली कई पीढ़ियों को प्रभावित किया फ्रैड्रिक हीगेल था. हीगेल का विचार था कि पश्चिमी सभ्यता दो बड़ी शक्तियों—यूनान की स्वतंत्र बुद्धि तथा ईसाई धर्म की नैतिकआध्यात्मिक अंतर्दृष्टि की सृष्टि है. वह प्लेटो और अरस्तु के दर्शन की तुलना में ईसाई धर्मशास्त्र को कमजोर यहां तक कि पतनशील मानता था, हालांकि उसके नैतिकतावादी दृष्टिकोण पर उसका पूरा भरोसा था. समकालीन विचारकों में सबसे मौलिक, विलक्षण प्रतिभा के धनी हीगेल ने द्वंद्वात्मक विचारपद्धति को समस्त विकास का मुख्य कारण माना. उसके राजनीतिक विषयक विचार एकदम स्पष्ट थे. राज्य को वह दैवी इच्छा की अभिव्यक्ति मानता था जो संगठित संसार के रूप में लोककल्याण की ओर प्रवृत्त होती है. राजा कोई स्वयंभू शक्ति है, यह मानने को वह हरगिज तैयार न था. उसका कहना था कि राजा के विशेषाधिकार और शक्तियां राष्ट्र का अध्यक्ष होने के नाते उसे वैधानिक रूप से प्रदान किए जाते हैं—

सुव्यवस्थित राजतंत्र में विधि का केवल वस्तुपरक पक्ष सामने आता है, जिसके बारे में सम्राट अपना आत्मपरक निर्णय सुनाता है—‘मैं सहमत हूं.’20

दर्शनशास्त्र में हीगेल की प्रतिष्ठा उसकी द्वंद्वात्मक पद्धति के कारण है. जहां तक राजनीतिक दर्शन का प्रश्न है, हीगेल के विचार रूसो और उसके कई पूर्ववर्ती विचारकों से पीछे थे. इसके बावजूद आने वाले वर्षों में उसने दार्शनिकों की पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. फायरबाख, ब्रूनो बायर, कार्ल मार्क्स, ऐंगल्स समेत हीगेल से प्रभावित विचारकों की लंबी शृंखला है. उनमें सर्वाधिक प्रसिद्धि मार्क्स के खाते आई. हीगेल का द्वंद्ववाद एक दार्शनिक विचार था. मार्क्स ने उसके आधार पर ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत गढ़ा और सामाजिक विकास की गति को दर्शाने के लिए वैज्ञानिक समाजवाद की अभिकल्पना की. कहने की आवश्यकता नहीं कि मार्क्स ने हीगेल के दर्शन से राजनीतिक दर्शन का बेहतरीन संस्करण तैयार किया था, जिसका असर दुनिया के अनेक देशों पर पड़ा.

उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में जो राजनीतिक उदारवाद का आंदोलन चला उसपर हीगेल के बजाय रूसो और बैंथम के विचारों का प्रभाव अधिक था. देखा जाए तो बैंथम का ज्यादा. जान स्टुअर्ट मिल का पिता जेम्स मिल बैंथम का दोस्त था और उसके विचारों से प्रभावित भी. एक पिता के नाते सीनियर मिल अपने पुत्र को विचारक बनाना चाहता था. जूनियर मिल की परवरिश भी उसी प्रकार की गई. कह सकते हैं कि जूनियर मिल को उपयोगितावाद का दर्शन अपने पिता से विरासत में मिला था. आगे चलकर उसपर रूसो और थाॅमस पेन के विचारों का भी प्रभाव पड़ा. बैंथम के उपयोगितावाद के विचार को जान स्टुअर्ट मिल ने जब आगे बढ़ाया तो उसने व्यक्तिस्वातंत्रय को भी उतनी ही प्रमुखता दी थी, जितनी रूसो ने. दर्शन में उपयोगितावाद के प्रवर्त्तक बैंथम ने अपने सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहा था कि वही कार्य सर्वोत्तम है जो अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख की कसौटी पर खरा उतरता हो. वह व्यक्तियों के बीच किसी भी प्रकार के स्तरीकरण के विरुद्ध था. अपनी प्रतिज्ञप्तियों द्वारा उसने स्थापित किया था कि ‘एक व्यक्ति का महत्त्व दूसरे के बराबर है.’ अधिकतम व्यक्तियों के लिए अधिकतम सुख की व्यवस्था करते समय प्रत्येक व्यक्ति को एक माना जाएगा. किसी भी व्यक्ति को, किसी भी कारण से एक से अधिक नहीं माना जाएगा. बैंथम की ये बाते आधुनिक विधिशास्त्र की नींव बनीं. स्वतंत्र रूप से देखा जाए तो भी आधुनिक विधिशास्त्र को बैंथम का योगदान कम नहीं है. न्याय की सुनिश्चितता तथा व्यक्ति को दूसरे किसी व्यक्ति के झांसे में आने से बचाने के लिए उसका कहना था कि ‘प्रत्येक व्यक्ति को अपना वकील स्वयं बनना चाहिए.’ जिस समय औपचारिक वकालत की आवश्यकता न हो तो उसे स्वयं से ही बहस करते रहते चाहिए, ताकि न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए वह हर पल तैयार रहे. बैंथम का यह सुझाव आज भी उतना ही महत्त्व रखता है. वस्तुतः शताब्दियों से समाज के उच्च वर्गों द्वारा शासित होता आया जनसमाज, हालात में बदलाव की कोई संभावना न देख उनसे अनुकूलन करने लगता है. इस हताशा से उबारने में उसका आत्मविश्वास मददगार सिद्ध हो सकता है. अतएव बैंथम के सुझाव ‘प्रत्येक व्यक्ति को अपना वकील स्वयं बनना चाहिए, को वास्तव में जनविवेकीकरण के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. यह बात बैंथम की दूसरी प्रतिज्ञप्तियों से भी सिद्ध होती है. आधुनिक विधिशास्त्र के क्षेत्र में बैंथम के योगदान की फ्रांसिसी विचारक और इतिहासकार ऐली हेल्वी ने बहुत प्रशंसा की है. हेल्वी के अनुसार—

बैंथम का न्यायशास्त्र संबंधी योगदान उसका सबसे महान कार्य था. उनीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक उल्लेखनीय बौद्धिक उपलब्धियों में से एक. न्यायशास्त्र को बैंथम की अमूल्यतम देन यह है कि उसने अपने दृष्टिकोण को विधि की समस्त शाखाओं, यथा दीवानी तथा फौजदारी विधि, प्रक्रियागत विधि एवं न्यायव्यवस्था के संस्थान पर लागू किया.21

यह बात लोगों को हैरानी में डाल सकती है कि जिस उपयोगितावाद को लेकर बैंथम ने अपना दर्शन गढ़ा था, उसके विधिशास्त्र पर उसका बहुत कम असर था. शायद इसलिए कि उपयोगितावाद बहुत ही व्यापक पद है. उसका दायरा इतना बड़ा है कि अपनी समग्रता में यह भ्रम की सृष्टि करने लगता है. ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख’ सुनते समय बहुत अच्छा लगता है, किंतु यह मान लेना कि मनुष्य केवल उपभोग के लिए जन्म लेता है—प्रकारांतर में मानवव्यक्तित्व का अवमूल्यन करता है. मनुष्य केवल उपभोग के लिए जन्म नहीं लेता. सभ्यताकरण का हजारों वर्ष का इतिहास सिद्ध करता है कि वह किसी न किसी रूप में विवेकीकरण की प्रक्रिया से जुड़ा रहा है. वही उसको अपने साथ दूसरों के हितों की सुरक्षा के लिए भी प्रेरित करती है. अतएव यह माना जाता है कि मानवजीवन का इतर उद्देश्य भी होता है, वह लोकहित में विकास की त्वरा को बनाए रखने से पूर्ण होता है. तदनुसार केवल उपभोग को मानवजीवन का उद्देश्य मान लेना उसकी मानवीकरण की अब तक कोशिश की अवहेलना करने जैसा है. मगर उपयोगितावादी दर्शन की समस्याएं यहीं समाप्त नहीं होतीं. उपयोगिता क्यों? किसकी और किसके लिए? कोई वस्तु उपयोगी है, यह कैसे तय किया जाए? यदि सभी व्यक्तियों की इच्छाएं और आवश्यकताएं भिन्न होती हैं तो क्या कोई वस्तु सभी के लिए उपयोगी हो सकती है? ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्न हंै. विशेषरूप से यह जानते हुए कि मनुष्य ने जहां स्वार्थसिद्धि के लिए नएनए आविष्कार किए हैं, वही विवेक का परिचय देते हुए अनेक कल्याणकारी संस्थाओं का भी गठन किया है. समाज स्वयं ऐसी ही संस्था है. विकासक्रम में मनुष्य का हर कदम पहले स्वार्थसिद्धि की ओर जाता है. वह उस कार्य को वरीयता देता है, जिससे उसका अपना सुख सवाया होता है. दूसरों की मदद भी इसलिए करता है, ताकि किसी और रूप में वह उससे लाभान्वित हो सके. यही उसकी जिजीविषा का मूल है. यही उसके कार्य की महत्ता. ऐसे में उपयोगिता और स्वार्थ के बीच स्पष्ट सीमारेखा कैसे खींची जाए. बैंथम चाहता था कि जीवन की मूलभूत सुविधाएं सभी व्यक्तियों को सहजरूप में उपलब्ध हों. मुश्किल है कि सुविधाएं निरावयव नहीं होतीं. दूसरे उनका आकलन व्यक्तिगत विषय भी है. किसी एक की सुविधा दूसरे की असुविधा का जनक हो सकती है. इसलिए हितों के सामान्यीकरण का सिद्धांत अपने साथ कई चुनौतियां लिए रहता है. इस कारण वह लंबे समय तक विश्वसनीय नहीं रह पाता. बैंथम के उपयोगितावाद को हम इसी विचारदृष्टि के साथ ग्रहण कर सकते हैं.

उपयोगितावाद की इन सीमाओं के बावजूद विधिशास्त्र के क्षेत्र में बैंथम के योगदान को नकार पाना कठिन है. वह पहला विचारक था, जिसने विधिशास्त्र को उसकी समग्रता में देखा और विश्लेषणात्मक न्यायशास्त्र के दृष्टिकोण को स्थापित किया. फलस्वरूप आधुनिक विधिसंस्थाओं का निर्माण संभव हो सका. किंतु जैसा ऊपर कहा गया है, बैंथम का उपयोगितावाद ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख’ अनिश्चितता से भरा सिद्धांत था. इसका कारण उसका व्यावहारिकता पर अधिक विश्वास था. वह मानता था कि उपयोगितावाद के दर्शन के आधार पर विधान की उपयोगिता को परखा जा सकता है. मगर ‘उपयोगितावादी’ दृष्टिकोण को लेकर सबसे बड़ी दुविधा यह है कि इसका तात्कालिक संदेश व्यक्ति को अत्यधिक आत्मकेंद्रित मान लेता है. यह दिखाता है कि व्यक्ति अपने स्वार्थ और सुख से आगे कुछ सोच ही नहीं पाता. जबकि यह व्यक्ति और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील होती है. इस कारण इसके सटीक आकलन का पैमाना विकसित करना असंभवसा है. यही बैंथम के दर्शन की सीमा थी.

जाॅन स्टुअर्ट मिल इसे बगैर व्यक्तिगत नैतिकता के असंभव मानता था. विकल्प के रूप में उसने व्यक्तिगत आदर्शवाद के अनुसार नैतिक चरित्र की व्याख्या प्रस्तुत की थी. मिल व्यक्तिस्वातंत्रय का समर्थक था. उसकी स्वतंत्रता विवेकवान मनुष्य की स्वतंत्रता है जो आत्मानुशासित होकर ‘क्या करना चाहिए और क्या नहीं’ की भावना को भलीभांति समझता है. विवेक स्थायी उपलब्धि न होकर, मानवीकरण की ओर चिरंतर प्रयास है. मिल की प्रसिद्ध उक्ति है—‘संतुष्ट जानवर के अच्छा है असंतुष्ट मनुष्य. संतुष्ट मूर्ख के बजाय असंतुष्ट सुकरात होना बेहतर है.’22मिल की निगाह में मनुष्य का स्थान बहुत ऊंचा था. वह कहता था कि हमें मनुष्य के प्रति गौरव का भाव रखना चाहिए. तभी हम उससे नैतिक उत्तरदायित्वों पर खरा उतरने की अपेक्षा कर सकते हैं. व्यक्तिस्वातंत्र्य का महत्त्व इसलिए नहीं है कि उससे भौतिक स्वार्थ की सिद्धि आसान है. बल्कि वह इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह उत्तरदायी मनुष्य की सहजस्वाभाविक अवस्था है. श्रेष्ठ समाज व्यक्ति की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने की व्यवस्था ही नहीं करता, बल्कि उसको इच्छानुसार जीवननिर्वाह के उपयुक्त अवसर भी प्रदान करता है. यहां स्वतंत्रता का आशय व्यक्तिगत सुख तक सीमित न रहे, वह नैतिकता से जुड़ा रहे, इसके लिए वह आगे लिखता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता केवल उसकी स्वार्थसिद्धि का माध्यम नहीं है. उससे समाज का हित भी जुड़ा हुआ है. केवल स्वतंत्र व्यक्ति ही अपने विवेक का पूरी तरह उपयोग कर समाजकल्याण की राह में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान कर सकता है. मिल को विश्वास था कि राज्य उदार विधान के माध्यम से व्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रख सकता है, साथ ही उसके विकास के रास्तों को प्रशस्त कर सकता है. मिल ने विधिशास्त्र के निर्माण में सीधा योगदान बहुत कम दिया, किंतु उसके दर्शन में ऐसा बहुत कुछ था, जिससे न्यायप्रणाली को आगे चलकर दिशा मिली. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता एवं समानता का दर्शन उसने रूसो और थाॅमस पेन से ग्रहण किया था, जबकि जीवन में सामान्य नैतिकता का पालन तथा अपने और समाज के हितों को समान वरीयता देता, पिता की ओर से विरासत में प्राप्त उपयोगितावादी दर्शन का विस्तार था. उपभोक्ता अधिकार, बाल एवं महिला कल्याण, मानवाधिकार अदालतों के गठन के पीछे मिल के व्यक्तिस्वातंत्रय का सिद्धांत तथा उदारतावादी दर्शन की मुख्य प्रेरणाएं हैं.

उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक जनतंत्र समर्थक आंदोलनों में तेजी आई थी. उस समय तक अनियोजित मशीनीकरण की बुराइयां सामने आ चुकी थीं. कारखानों में हो रहे शोषण के विरोध में जगहजगह आवाजें उठने लगी थीं. फ्रैड्रिक ऐंगल्स की पुस्तक ‘कंडीशन आफ दि वर्किंग क्लास इन इंग्लेंड’ ने यूरोपीय कारखानों में श्रमिकों, कामगारों की दुर्दशा का दस्तावेजी रूप सामने रखकर औद्योगिक क्रांति के कटु सत्य का उजागर किया था. उसके प्रभाव में श्रमिक आंदोलनों में तेजी आई थी. श्रमिकसमस्याओं को सुनियोजित ढंग से उठाने के लिए नएनए श्रमिक संगठन बन रहे थे. लेकिन ये आवाजें अलगअलग और बिखरी हुई थीं. अलगअलग टुकड़ों में बंटे संगठन उद्योगपतियों की मनमानी और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाते. उनकी आवाज कुछ दिनों हवा में गूंजती. हलचल मचाती. उसके बाद शांत हो जाती थीं. अपनी ताकत और पहुंच के बल पर पूंजीपति उसे दबाने में सफल हो जाते थे. उसी समय यूरोपीय जगत में मार्क्स का आगमन हुआ. जर्मनी का रहनेवाला मार्क्स अपनी युवावस्था में सेना में भर्ती होना चाहता था. किंतु छाती की बीमारी के कारण उसे भर्ती के दौरान निकाल दिया गया था. एक तरह से वह अच्छा ही हुआ था. समाज के दुश्मन, देश के दुश्मनों से कम खतरनाक नहीं हैं—संभवतः यही सोचकर मार्क्स ने आंतरिक मोर्चे पर भिड़ने का निर्णय लिया था. उसने शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की थी. उन दिनों यूरोप में हीगेल के दर्शन का बोलबाला था. युवा हीगेलियन लुडबिग फायरबाख, ब्रूनो बायर, मार्क्स स्ट्रिनर जैसे प्रतिभाशाली दार्शनिकों सहित अनेक विद्वान उसकी व्याख्या में जुटे थे. स्वयं मार्क्स भी हीगेल से प्रभावित था, किंतु उसका द्रष्टिकोण उसके बाकी समर्थकों से अलग था. जर्मन आदर्शवाद को लेकर अपने गुरु हीगेल तथा उसके युवा अनुयायियों की आलोचना करते हुए मार्क्स ने ‘दि जर्मन आइडियालाजी’ की रचना की. पुस्तक में उसने ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी. उसने स्थापित किया था कि मनुष्य का विकास और सामाजिक संबंध उसके उत्पादनतंत्र की प्रकृति के अनुसार बदलते रहते हैं. इतिहास उसी के अनुसार स्वाभाविक गति से खुद को रचता चला जाता है. उससे पहले तक धर्म और राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का मुख्य वाहक माना जाता था. जीवन में अर्थ की महत्ता तो बहुत पहले स्वीकारी जा चुकी थी, किंतु आर्थिक गतिविधियां समाज के वर्तमान एवं भविष्य की दिशा निर्धारित करती हैं—यह मार्क्स की गई नूतन अवधारणा थी. हीगेल के द्वंद्ववादी दर्शन से प्रेरणा लेते हुए उसने ‘वर्ग संघर्ष’ की सैद्धांतिकी प्रस्तुत की थी. पुस्तक प्रकाशित होने के साथ ही बौद्धिक जगत में चर्चा का विषय बन गई. तब तक मार्क्स वहां से भी काफी आगे बढ़ चुका था. 1848 में उसने ‘दि कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ की रचना कर पूरी दुनिया का ध्यान फिर अपनी ओर खींच लिया. विशेषकर श्रमिकसंगठनों का. उसके तर्क अकाट्य थे. यदि ऐतिहासिक भौतिकवाद के दर्शन को सही मान लिया जाए तो उत्पादक शक्तियों को समाज और राजनीति का दिशानिर्धारक, संचालक आदि होना चाहिए. मशीनीकरण के पश्चात उत्पादन मूलतः श्रमिकों के हाथों में आ चुका था. इसलिए मार्क्स का तर्क था कि श्रमिकों को सत्तासंचालन का भी अधिकार है. चूंकि पूंजीपति उसका चहेता बुर्जुआ वर्ग खुशीखुशी सत्ता के अंतरण को तैयार होने वाला नहीं है, इसलिए मार्क्स का आवाह्न था कि श्रमिकवर्ग को संगठित होकर, आवश्यकता पड़े तो बलप्रयोग द्वारा भी सत्ता को अपने हाथों में ले लेना चाहिए. उसका नारा था, ‘सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के सिवाय कुछ भी नहीं है.’

मेनीफेस्टो द्वारा मार्क्स का आवाह्न सर्वहारा की स्वतंत्रता का बीजमंत्र मान लिया गया. 1871 में ‘पेरिस क्रांति’ हुई. वह क्रांति असफल हुई, किंतु बौद्धिक जगत में मार्क्स की प्रतिष्ठा पर उससे कोई प्रभाव न पड़ा. इसलिए कि मार्क्स ने अपने दर्शन की आरंभिक असफलता को बहुत सहज ढंग से लिया था. ‘वर्ग संघर्ष’ के विचार को बौद्धिक नेतृत्व की राह देख रहे श्रमिक संगठनों ने हाथोंहाथ लिया था. ‘पेरिस क्रांति’ में बनी मजदूर सरकार के तीन महीने से भी कम समय में अपदस्थ हो जाने से हताश होने के बजाय उसने अपने दर्शन की पुनरीक्षा का काम शुरू कर दिया. उसके गहन चिंतन का सुफल ‘पूंजी’ के रूप में सामने आया, जिसमें उसने भौतिकवादी दर्शन को नए प्रतीकों, तर्कों की सहायता से स्थापित किया था. मार्क्स अब दुनियाभर के श्रमिक संगठनों का ‘विचारगुरु’ था. मार्क्स ने साम्यवादी समाज की अभिकल्पना प्रस्तुत की थी. उसका मानना था कि ‘वर्गसंघर्ष’ पश्चात सत्ता सर्वहारा वर्ग के हाथ में होगी. वे शिखर पर आसीन होकर ऐसे समाज की स्थापना करेंगे जो संपूर्ण समानता के स्तर पर आधारित होगा. वहां न्याय, पुलिस, कानून जैसी बुर्जुआ समाज की संस्थाओं की आवश्यकता न्यूनतम होगी. ‘वर्गहीन समाज’ की स्थापना का साम्यवादी सपना लगभग वैसा ही था, जैसी परिकल्पना मूर ने ‘यूटोपिया’ में देखा था. आदर्शवाद से भरपूर. अंतर केवल इतना था कि उसकी नींव वर्गसंघर्ष की संकल्पना पर रखी गई थी. अपने साम्यवादी ‘यूटोपिया’ में मार्क्स ने विधिशास्त्र पर कोई स्वतंत्र स्थापना नहीं दी थी. उसका विचार था कि सामाजिक अंतसंघर्ष वर्ग के आधार पर विभाजित समाजों की समस्या है. वर्गहीन साम्यवादी समाजों में सभी को जीवन और विकास के समान अवसर प्राप्त होंगे. कानून और प्रशासन संबंधी समस्याएं वहां न्यूनतम होंगी. वैसे भी उसका अध्ययन और लेखन विशेषरूप से औद्योगिक समाज की चुनौतियों और समस्याओं के अध्ययन, विश्लेषण पर केंद्रित था.

मार्क्स की अद्वितीय वैश्विक ख्याति के बावजूद विचारकों का एक वर्ग ऐसा था जिसे मार्क्स की ‘वर्गसंघर्ष’ की सैद्धांतिकी में कोई विश्वास न था. उन्हें मिल की व्यक्तिस्वातंत्रयवादी अवधारणाओं में भी खोट नजर आता था. उनका मानना था कि मनुष्य या समाज सदैव उपयोगितावादी आधार पर नहीं सोचता. मनुष्य मूलतः अच्छा होता है. इसलिए उसके व्यवहार पर सामान्य नैतिकता का भी असर होता है. इस वर्ग का ध्येय मनुष्य की नैसर्गिक स्वाधीनता की रक्षा के साथसाथ उसके आदर्शवादी स्वरूप को लौटाना था. इन विचारकों में थामस हिल ग्रीन सबसे अग्रणी है. ग्रीन हीगेल, जान लाॅक, रूसो तथा ब्रिटेन के नैतिकतावादी आंदोलनों से प्रभावित था. लाक का मानना था कि जनता से जुड़े मामलों में शासन द्वारा हस्तक्षेप न करने की स्वतंत्रता प्रकारांतर में निरंकुशता को समर्थन देने जैसा है. मनुष्य का स्वभाव है कि वह बाहरी हस्तक्षेप को नापसंद करता है. केवल इस आधार पर कि यह मनुष्य की नैसर्गिक चाहत है—मनुष्य की असीमित स्वतंत्रता का समर्थन नहीं किया जा सकता. यदि ऐसा होता है तो समाज में अनीति को बढ़ावा मिलेगा. मातापिता बच्चों पर अपना अधिकार मानकर उनका मनमाना उत्पीड़न कर सकेंगे. कारखानों में श्रमिक और स्वामी दोनों का योगदान उत्पादन को संभव बनाता है, लेकिन उसमें स्वामी अधिक शक्तिशाली होता है. कारखाना मालिक की असीमित स्वतंत्रता उसको श्रमिकों के जीवन में मनमाना हस्तक्षेप करने का अधिकार दे सकती है. ग्रीन जीवन की समस्याओं का मूल मनुष्य और समाज के नैतिक विचलन में देखता था. उसका मानना था कि समाज अपनी संपदा जो मुख्यतः अध्यात्मिक है, अंशतः भौतिक—से अपने अधिकांश सदस्यों को वंचित रखता है. समाज समानता को स्थापित करने के अपने नैतिक कर्तव्य को पूरा करने में असमर्थ रहा है. इस कारण समाज में भारी विषमताएं हैं. भीषण दरिद्रता से मनुष्य का नैतिक पतन होता है. उसका मानना था कि समाज के लिए गरीबी और शोषण की चुनौती निरंकुशता और तानाशाही से बड़ी है. स्वतंत्रता का उद्देश्य समाज में केवल जोरजबरदस्ती या निरंकुशता का उन्मूलन नहीं है, बल्कि समानता पर आधारित समाज की स्थापना को पुष्ट करना है. 1881 में एक भाषण में ग्रीन ने कहा था—

स्वतंत्रता हमारे लिए केवल दबावों और प्रतिबंधों से मुक्ति का पर्याय नहीं है. उसका आशय वह करना भी नहीं है जो हमें पसंद है. स्वतंत्रता का सही आशय यह देखना है कि उसमें ऐसा क्या है, जो हमारी पसंद का है. स्वतंत्रता का अभिप्राय हमारे लिए दूसरों की स्वाधीनता की कीमत पर मजे लूटना भी नहीं है.23

यहां हम ग्रीन को स्वतंत्रता के बारे में मध्यमार्ग की ओर बढ़ता हुआ पाते हैं. वह स्पष्ट करता है कि विधान की महत्ता नागरिकों के ऊपर थोपा जाकर उन्हें अपना अनुसरणकर्ता बना लेने में नहीं है. बल्कि समाज में एकदूसरे के प्रति ऐसा विश्वास निर्मित करने में है, ताकि लोग एकजुट होकर सामान्य हित के लिए काम कर सकें. ज्ञातव्य है कि मानवीय स्वतंत्रता के लिए सरकार के नियंत्रण का संपूर्ण निषेध न तो मिल ने किया था, न ही ‘लेजेज फेयर’ के प्रवक्ता एडम स्मिथ ने. उनमें यदि कुछ मतभेद था तो स्वतंत्रता के अनुपात को लेकर. आदर्श राज्य की योजना के अंतर्गत व्यक्ति को कितनी स्वतंत्रता उचित होगी, इसपर उन सभी ने अपनेअपने दृष्टिकोण से विचार किया है. ग्रीन के लिए मानवीय स्वतंत्रता का आशय व्यक्तिमात्र को प्राप्त उस अधिकारिता से था जिसमें व्यक्ति, स्वयं और खुद की कार्यक्षमता का संपूर्ण आकलन एवं विस्तार करते हुए, आत्मतुष्टि के लिए अपनी कार्यक्षमता का सामान्य हित में अधिकतम उपयोग कर सके. ग्रीन का विश्वास था कि उदार, लोकोन्मुखी और उत्तरदायी राजनीतिक प्रणाली द्वारा इस लक्ष्य को संभव किया जा सकता है. ग्रीन राजनीति की परिकल्पना ऐसी उत्तरदायी संस्था के रूप में करता था जिसमें मनुष्य के नैतिक विकास हेतु आवश्यक परिस्थितियांे संभव की जा सकें. जाहिर है, केवल कानून बना देने से यह कार्य संभव नहीं है—

हम यह मान कर संतोष कर लेते हैं कानून के लागू हो जाने के बाद किसी व्यक्ति का उसकी इच्छा के विपरीत साधन के रूप में उपयोग नहीं हो पाएगा. किंतु यह हम केवल अवसर के हवाले कर देते हैं कि वह स्वतंत्रतापूर्वक सामान्यहित में अपना अपना योगदान देने में सक्षम हो पाएगा, अथवा नहीं.’24

शासन यदि लोक के प्रति उत्तरदायी है तो ग्रीन को उसे सख्ती की छूट देने में भी कोई संकोच न था. उसका मानना था कि कानून की सख्ती कुछ दबंग व्यक्तियों की नकारात्मक स्वतंत्रता को बाधित कर सकती है, लेकिन बदले में वह अनेक लोगों की सकारात्मक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जिन्हें अपनी सामाजिक परिस्थितियों के कारण दबंगों का उत्पीड़न सहना पड़ता है. इस तरह सरकार समाज के गठन के औचित्य को पूरा करने में सहायता करती है. उसके अनुसार स्वतंत्र समाज का आशय सरकार की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि अपने अधिकांश नागरिकों को ऐसी आजादी उपलब्ध कराना है, जिससे अधिकतम लोग अपनी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें. सामाजिक सुरक्षा, व्यक्तिस्वातंत्रय तथा लोकतंत्र के प्रबल समर्थक के रूप में थामस पेन का उल्लेख भी यहां आवश्यक है. पेन का जन्म थामस हिल ग्रीन और जान स्टुअर्ट मिल से लगभग एक शताब्दी पहले हुआ था. अब्राहम लिंकन ने अमेरिकी अश्वेतों, उत्पीड़ितों को राजनीतिक स्वतंत्रता दिलाने का काम किया था, किंतु मनुष्यमात्र की स्वतंत्रता तथा सामाजिक स्वतंत्रता के लिए जो काम थाॅमस पेन ने किया, वह अब्राहम लिंकन के योगदान जितना ही महत्त्वपूर्ण था. पेन ने हालांकि सरकार के अस्तित्व का विरोध नहीं किया. लेकिन वह चाहता था कि सरकार वही कारगर है जो न्यूनतम व्यय में अपने अधिकतम दायित्वों की पूर्ति कर सके. वह मनुष्य को उतने ही अधिकार देने का समर्थक था, जितने किसी अराजकतावादी समाज में संभव हैं. इस योगदान के लिए पेन को आज भी ‘आधुनिक कल्याणकारी राज्य का देवदूत माना जाता है.’ अपने लेखन के दम पर पेन ने हजारों समर्थक पैदा किए तो उससे अधिक दुश्मन भी जो घृणा की चरमस्थिति में किसी भी सीमा तक जा सकते थे. पेन की पुस्तक ‘दि राइट आफ मेन’ की लाखों प्रतियां बिकीं. दूसरी ओर इसी पुस्तक के कारण उसे यथास्थितिवादियों को जबरदस्त विरोध भी सहना पड़ा. विरोधियों ने ‘दि राइट आॅफ मेन’ की हजारों प्रतियां आग के हवाले कर दी थीं. ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता का वह इतना प्रबल समर्थक था कि फ्रांसिसी क्रांति का उत्प्रेरक होने के बावजूद जब क्रांतिकारी सरकार ने अपदस्थ सम्राट को मृत्युदंड देने का निर्णय लिया तो पेन ने इसे दूसरे के जीवन में अनाधिकार हस्तक्षेप मानते हुए उसका विरोध किया था. बाद में इसके लिए उसे दंडित भी किया गया.

समाज में न्याय की स्थापना समानता की आधिकारिक स्थापना के बगैर असंभव है. इसीलिए अठारहवीं शताब्दी के अंत तक समान कानून की मांग उठने लगी थी. बैंथम, जेम्स मिल, जान स्टुअर्ट मिल आदि विचारकों ने समानता को उपयोगितावादी दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की थी. ‘अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख’ इसी धारणा को पुष्ट करता है. जान स्टुअर्ट मिल ने सुख के नैतिक आधार को संपुष्ट करने पर जोर दिया. उसको विश्वास था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता मनुष्य को विकास के अवसर उपलब्ध कराएगी. समानता को नागरिक अधिकार के रूप में स्थापित करने तथा उसके समर्थन में जोरदार ढंग से आवाज उठाने का श्रेय थामस पेन को जाता है. थामस पेन का जन्म इंग्लेंड में हुआ था, मगर अमेरिका उसके विचारों की कर्मभूमि बना. राजशाही को शासन का निकृष्टतम रूप मानने वाले पेन का कहना था कि सरकार का वही रूप श्रेष्ठतम है जिससे अल्पतम व्यय में समाज के अधिकतम लोगों के लिए अधिकाधिक सुख एवं सुरक्षा की संभावना प्रतीत होती हो. न्याय का राज्य संभव हो इसके लिए केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है. बल्कि उनका पालन करना भी जरूरी है. ठीक इसी प्रकार संविधान शब्द के उच्चारण मात्र से संविधान के आदर्श की स्थापना असंभव है. क्योंकि, ‘संविधान केवल नाम की वस्तु नहीं, वरन् एक तथ्य है. इसका अस्तित्व काल्पनिक न होकर, यथार्थ है. संविधान सरकार का पूर्वगामी होता है और सरकार केवल संविधान की सृष्टि है.’25सरकार को संविधान की सृष्टि बताने का सीधासा अभिप्राय है कि सरकार तथा उसका कोई भी पदाधिकारी कानून की सीमाओं से परे नहीं है. न्याय की स्थापना के लिए वैधानिक प्रतिबंध उनपर भी उतने ही लागू होते हैं, जितने बाकी लोगों पर. अपने इस मंतव्य को पेन तुरंत स्पष्ट कर देता है—

किसी देश का संविधान उसकी सरकार कार्य नहीं, बल्कि उस सरकार का निर्माण करने वाली जनता का कार्य है. संविधान यह तय करता है कि सरकार की स्थापना किन सिद्धांतों पर होगी; उसकी व्यवस्था किस प्रकार की जाएगी; उसके अधिकार क्या होंगे; निर्वाचन पद्धति क्या होगी; ‘संसद’ का कार्यकाल क्या होगा; सरकार के कार्यपालिका विभाग के अधिकार क्या होंगे….किसी देश में संविधान और उसकी सरकार में वही संबध है, जो उस सरकार द्वारा बनाए गए कानून और उसके अनुसार कार्य करने वाले न्याय विभाग में है. न्याय विभाग न तो कानून बनाता है और न उसे बदल सकता है. वह केवल बने हुए कानूनों के अनुसार काम करता है. इसी प्रकार सरकार संविधान द्वारा शासित होती है.’26

चूंकि संविधान स्वयं जनता का कार्य उसकी निर्मित है, इसलिए यह प्रमाणित है कि जनता संविधान के माध्यम से सरकार को चुनती है तथा वह उससे संविधानसम्मत कार्य की अपेक्षा करती है. थामस पेन का मुख्य कार्य मानवीय अधिकारों के समर्थन को लेकर है. उसका कहना था कि मनुष्य समाज में अपने नैसर्गिक अधिकारों की सुरक्षा और अपनी स्वाधीनता का अधिकतम सुखोपभोग करने के लिए सम्मिलित हुआ है. सरकार का चयन भी वह अपनी स्वतंत्रता को स्थायी बनाए रखने के लिए करता है. इसलिए समाज का दायित्व है कि वह मनुष्य के अधिकारों की रक्षा करे, तथा उसके विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाए. ‘मनुष्य के अधिकार’ नामक अपने बहुचर्चित निबंध में वह लिखता है—

संविधान बनाते समय यह जान लेना जरूरी है कि वे कौन से मुद्दे हैं जो सरकार की उपस्थिति को आवश्यक बनाते हैं. दूसरे वे कौन से रास्ते हैं जिनपर चलकर न्यूनतम व्यय में उन उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है. सरकार का महत्त्व राष्ट्रीय स्तर के संगठन से अधिक नहीं है, जिसका उद्देश्य अकेले और सामूहिक स्तर पर समस्त नागरिकों के कल्याण हेतु काम करना है. प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा रखता है कि वह अपना कामधंधा करे, अपने परिश्रम का लाभ उठाए तथा संपत्ति अर्जित करे तथा यथासंभव कम खर्च में शांत एवं सुरक्षित जीवनयापन करे. इन लक्ष्यों की प्राप्ति ही सरकार के गठन को औचित्यपूर्ण बनाती है.’27

यदि हम ‘सभी के लिए न्याय की एकसमान पहुंच’ के सिद्धांत को केंद्र में रखकर विचार करें तो थामस पेन तथा जान स्टुअर्ट मिल के विचारों को एकदूसरे का पूरक पाते हैं. समानअधिकारिता के बगैर व्यक्तिस्वातंत्र्य महत्त्वहीन है, जबकि व्यक्तिस्वातंत्र्य के अभाव में समानअधिकारिता दिवास्वप्न. पेन अधिकारों की समानता पर जोर देता है. ‘सरकार नागरिकों का कार्य है’—कहते हुए वह नागरिकों के विकास की जिम्मेदारी परोक्षरूप में उन्हीं के सिर कर देता है. मिल अपेक्षाकृत परिपक्व निर्णय लेते हुए व्यक्तिस्वातंत्र्य को मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी मानता है. व्यक्ति की स्वतंत्रता को राज्य की स्वतंत्रता जितनी ही तजरीह देता है. बताता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता का आशय व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना राज्य का पुनीत कर्तव्य है. ‘व्यक्ति आजाद जन्मा है, मगर हर जगह वह बेडि़यों में है’—मिल के चिंतन को रूसो की इसी स्थापना के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है. थामस पेन का विश्वास था कि अधिकारों की समानता व्यक्ति को उसके विकास के लिए समुचित अवसर प्रदान करेगी. अपनी बुद्धि, परिश्रम तथा सूझबूझ से व्यक्ति वर्तमान समस्याओं का हल खोजते हुए विकास के अपेक्षित लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होगा. अधिकारों के प्रति जागरूक नागरिक सरकार को, जो दरअसल उन्हीं का कार्य है, सामान्य पसंदों तथा आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करने को बाध्य कर सकेंगे.

इन दोनों विचारकों की सदेच्छाओं पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता. उनीसवीं शताब्दी में लोकतंत्र को प्रतिष्ठा दिलाने में इनका अमूल्य योगदान रहा है. विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय देशों में आधुनिक मानस को विकसित करने तथा लोकतांत्रिक परिवेश का निर्माण करने का श्रेय इन्हीं दोनों को जाता है. भारत समेत अनेक विकासशील देश जो लंबे समय तक यूरोप के उपनिवेश रहे हैं, तथा मानसिक रूप में कमोवेश आज भी औपनिवेशिक दासता की भावना से ग्रस्त हैं, उन्हें भी समानाधिकारिता एवं व्यक्तिस्वातंत्र्य जैसे विचार आधुनिकता और विकास की राह पर बढ़ने के लिए आवश्यक जान पड़ते हैं. लेकिन संसाधनों और वास्तविक अवसरों की अनुपलब्धता के चलते ये पूंजीवादी व्यवस्था के लुभावने नारों से आगे नहीं बढ़ पाते. ऐसे नारे जो आधुनिक समाज की अनेक समस्याओं, जिसमें पूंजीवाद द्वारा पैदा की गई विसंगतियां भी सम्मिलित हैं, को कहीं हवा देते हैं तो कहींकहीं उनसे टकराते हुए नजर आते हैं. बावजूद इसके इनकी अपनी सीमा है. ये व्यक्ति को विकास के अवसरों की गारंटी तो देते हैं, उसके लिए आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था नहीं करते. समाज में पहले से व्याप्त असमानता पर थामस पेन और मिल दोनों ही मौन रह जाते हैं. वे इस तथ्य को नजरंदाज कर देते हैं कि सहस्राब्दियों से सत्ताशीर्ष पर विराजमान अभिजन अपनी हैसियत को इतना मजबूत कर चुका है कि मात्र अधिकारों की समानता एवं स्वतंत्रता से जनसाधारण के पक्ष में आमूल परिवर्तन की संभावना बहुत कम है. ऊंट और खरगोश की स्पर्धा के निष्कर्ष अजाने नहीं होते, इसलिए अठारहवीं और उनीसवीं शताब्दी में पूंजीवादी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे थे. विकल्प के रूप में समाजवाद और साहचर्यवाद जैसी विचारधाराएं सर्वहारा वर्ग को आकर्षित कर रही थीं. ऐसे में पश्चिम की पूंजीवादी सरकारों ने थामस पेन और मिल के विचारों को हाथोंहाथ लिया और उनका अपने हितों के प्रति वैसा ही अनुकूलन किया, जैसा कभी एडम स्मिथ के ‘लेजेज फेयर’ के साथ किया था. परिणामस्वरूप मानवमात्र के लिए उपयोगी ये दोनों सैद्धांतकियां अपने समेकित प्रभाव में पूंजीवाद की तारणहार बनीं. न्याय के संदर्भ में बात करें तो पेन का मानवाधिकारवाद तथा मिल का व्यक्तिस्वातंत्र्य का विचार केवल विधायी संस्करण तैयार करने में मदद करते हैं. संवितरणात्मक न्याय, जो किसी भी कल्याणकारी राज्य का वास्तविक कर्तव्य है, के प्रति इनका विशेष आग्रह नहीं होता. वर्तमान सभ्यता और मशीनीकरण पर केंद्रित आधुनिक समाज की विड़बना है.

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

अनुक्रमणिका

1

This is true liberty, when free-born men,

Having to advise the public, may speak free,

Which he who can, and will, deserves high praise;

Who neither can, nor will, may hold his peace:

What can be juster in a state than this?

Euripid. Hicetid. BC 480-406

2

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9

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10

For indeed the acts of rulers are not to be smitten with the sword of the mouth, even though they are rightly judged to be blameworthy. But if ever, even in the least, the tongue slips into censure of them, the heart must needs be bowed down by the affliction of penitence, to the end that it may return to itself, and, when it has offended against the power set over it, may dread the judgment of him by whom the power was set over it.- GREGORY in Pastoral Rule, Quoted from A History of Mediaeval Political Theory in the West : Carlyle, R. W.

11

Law is the ruler over all the acts both of gods and men. It must be the director, the governor and the guide in respect to what is honorable and base and hence the standard of what is just and unjust. For all beings that are social by nature the law directs what must be done and forbids what must not be done.- Chrysippus in On Law as quoted by George H. Sabine in A HISTORY OF POLITICAL THEORY.

12

There is in fact a true law — namely, right reason — which is in accordance with nature, applies to all men, and is unchangeable and eternal. By its commands this law summons men to the performance of their duties; by its prohibitions it restrains them from doing wrong. Its commands and prohibitions always influence good men, but are without effect upon the bad. To invalidate this law by human legislation is never morally right, nor is it permissible ever to restrict its operation, and to annul it wholly is impossible….But there will be one law, eternal and unchangeable, binding at all times upon all peoples; and there will be, as it were, one common master and ruler of men, namely God, who is the author of this law, its interpreter, and its sponsor. The man who will not obey it will abandon his better self, and, in denying the true nature of a man, will thereby suffer the severest of penalties, though he has escaped all the other consequences which men call punishments.- Marcus Tullius Cicero in Republic, III, 22. Trans. by Sabine and Smith.

13

If we do not maintain justice, justice will not maintain us.- Francis Bacon

14

the wise must not give up their liberty to the state¯Aristippus (b. c. 430 BC) as quoted by Peter Kropotkin in article ANARCHISM (1910).

15

Our religion places the supreme happiness in humility, lowliness, and a contempt for worldly objects, whilst the other, on the contrary, places the supreme good in grandeur of soul, strength of body, and all such other qualities as render men formidable. . . . These principles seem to me to have made men feeble, and caused them to become an easy prey to evil-minded men, who can control them more securely, seeing that the great body of men, for the sake of gaining Paradise, are more disposed to endure injuries than to avenge them.-DISCOURSES ON THE FIRST DECADE OF TITUS LIVIUS BY NICCOLO MACHIAVELLI.

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True freedom means that all equally have access to the use of the earth and its fruits. Real liberty requires, therefore, that land shall be owned in common. The produce of the land should be put into a common store whence all may draw according to his needs. All able-bodied persons must be compelled to work at productive labor, at least until they reach the age of forty.-A HISTORY OF POLITICAL THEORY.

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Justice is a fixed and abiding disposition to give to every man his right. The precepts of the law are as follows: to live honorably, to injure no one, to give to every man his own. Jurisprudence is a knowledge of things human and divine, the science of the just and the unjust. – Thomas More in UTOPIA.

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. …the power of kings and magistrates is nothing else, but what is only derivative, transferred and committed to them in trust from the people, to the common good of them all, in whom the power yet remains fundamentally, and cannot be taken from them, without a violation of their natural birthright. – John Milton, The Tenure of Kings and Magistrates (1650).

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Good laws are the only means of making men virtuous. The whole art of legislation consists in forcing men, by the sentiment of self-love, to be always just to others. To make such laws it is necessary to know the human heart, and first of all to know that men, though concerned about themselves and indifferent to others, are born neither good nor bad but are capable of being the one or the other according as a common interest unites or divides them; that the preference which each man feels for himself — a sentiment on which the continuance of the race depends — is ineffaceably engraved upon him by nature; that physical sensation produces in us the love of pleasure and the dislike of pain; that pleasure and pain have placed the germ of self-love in the hearts of every man, which grows in turn into the passions from which arise all our virtues and vices- Claude Adrien Helvétius in De l’esprit; or, Essays on the mind.

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In a well-organized monarchy, the objective aspect belongs to law alone; the monarch’s part is merely to set to the law the subjective “I will.” – Hegel in Philosophy of Right, Section 280.

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Bentham’s jurisprudence, which was not only the greatest of his works but one of the most remarkable intellectual achievements of the nineteenth century, consisted in the systematic application of the point of view just sketched to all branches of the law, civil and criminal, and to the procedural law and the organization of the judicial system. – Elie Halévy, The Growth of Philosophic Radicalism. Eng. trans. by Mary Morris ( 1928), Part I, ch. 2.

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It is better to be a human being dissatisfied than a pig satisfied; better to be Socrates dissatisfied than a fool satisfied. – by John Stuart Mill in UTILITARIANISM(1863)

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We do not mean merely freedom from restraint or compulsion. We do not mean merely freedom to do as we like irrespectively of what it is that we like. We do not mean a freedom that can be enjoyed by one man or one set of men at the cost of a loss of freedom to others. – T. H. Green in LIBERAL LEGISLATION AND FREEDOM OF CONTRACT.

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We content ourselves with enacting that no man shall be used by other men as a means against his will, but we leave it to be pretty much a matter of chance whether or no he shall be qualified to fulfil any social function, to contribute anything to the common good, and to do so freely. – A HISTORY OF POLITICAL THEORY.

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In forming a constitution, it is first necessary to consider what are the ends for which government is necessary? Secondly, what are the best means, and the least expensive, for accomplishing those ends? Government is nothing more than a national association; and the object of this association is the good of all, as well individually as collectively. Every man wishes to pursue his occupation, and to enjoy the fruits of his labours and the produce of his property in peace and safety, and with the least possible expense. When these things are accomplished, all the objects for which government ought to be established are answered. THE WRITINGS OF THOMAS PAINE, VOLUME II., Collected And Edited By Moncure Daniel Conway, 1779 – 1792.