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पेरियार और बुद्ध : धर्माडंबर और जाति-मुक्ति संघर्ष की 2500 वर्ष लंबी परंपरा

सामान्य
जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां हैं, वे इस देश में अच्छे स्थान नहीं हैं. जाति-मद, अभिमान, लोभ, द्वैष तथा मूढ़ता ये सब अवगुण जहां नहीं हैं, वे ही इस देश में अच्छे स्थान हैं.1—मातंग जातक(497).

 

पेरियार और गौतम बुद्ध के बीच करीब ढाई हजार वर्षों का अंतराल है. जिन दिनों बुद्ध का जन्म हुआ था, वैदिक कर्मकांड और धर्माडंबर अपने चरम पर थे. यज्ञ, पूजा-पाठ आदि के नाम पर राजाओं से भरपूर समिधा हासिल करना, इन्कार करने या असमर्थता जताने पर शाप द्वारा लोक-परलोक बिगाड़ने की धमकी देना. मनोवांछित समिधा प्राप्त होते ही राजा के हर कुकर्म को सुकर्म घोषित कर देना, फिर हजारों पशुओं की बलि एक साथ चढ़ा देना—ब्राह्मण पुरोहितों के लिए बिलकुल सामान्य था. आतंक ऐसा था कि किसी भी सम्राट को वे धर्म के नाम पर मनमाने आचरण के लिए विवश कर सकते थे. धर्माडंबर और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थन में बड़े-बड़े शास्त्र गढ़े जा रहे थे. उन्हें पढ़ने का अधिकार सिवाय ब्राह्मणों के किसी को न था. वे उनकी मनमानी व्याख्या करते थे. बावजूद इसके उन्हें तत्कालीन राजसत्ताओं का संरक्षण प्राप्त था. उनके धुर विरोधी के रूप में आजीवक और लोकायत जैसे भौतिकवादी चिंतक थे, जिनका संबंध समाज के मेहनतकश लोगों तथा शिल्पकार समूहों से था. यज्ञ के नाम पर बलि चढ़ाना, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे वायवी विषयों पर बहस करना उन्हें नापसंद था.

बुद्ध राजसत्ता और परिवार का मोह त्यागकर युवावस्था में परिव्राजक बने थे. राजकुल से संबंधित होने के कारण उनका तत्कालीन राजाओं के बीच अतिरिक्त सम्मान था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद जब उन्होंने धर्मोपदेश देना आरंभ किया तो मगध, उज्जैनी सहित उस समय के सभी बड़े राज्यों एवं व्यापारिक वर्गों का भरपूर सहयोग एवं समर्थन उन्हें प्राप्त हुआ. बुद्ध के प्रति राजाओं के आकर्षण का कारण यह भी था कि अनेक राजा ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा यज्ञादि के नाम पर पशुधन और दूसरे संसाधन ऐंठने से तंग आ चुके थे. यज्ञों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता था. बुद्ध ने यज्ञों का विरोध कर व्यावहारिक नैतिकता पर जोर दिया. उन्होंने वेदों को अपौरुषेय और आप्तग्रंथ मानने से भी इन्कार कर दिया. तत्कालीन बुद्धिजीवी समाज में बहस का बड़ा मुद्दा आत्मा, परमात्मा, ईश्वरादि को लेकर था. दर्शन की इन समस्याओं पर लोग शताब्दियों से बेनतीजा बहस करते आए थे. आत्मा-परमात्मा में विश्वास रखने वाले उनकी सत्ता को पूर्व-निष्पत्ति मान लेते थे. उस अवस्था में बहस उनके अस्तित्व तथा औचित्य के बजाय, स्वरूप और विस्तार को लेकर रह जाती थी. दूसरा वर्ग बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता था. वह उनके अस्तित्व एवं औचित्य सहित हर पहलू पर विचार करना चाहता था. दोनों परस्पर विपरीत-ध्रुवी विचारधाराएं थीं. इतनी कि उनके बीच संवाद का कोई उदाहरण पूरे संस्कृत वाङ्मय में नहीं मिलता. बुद्ध ने उनके बीच का रास्ता अपनाया. आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, पाप-पुण्य जैसी बहसों में उलझने के बजाए उन्होंने, व्यक्तिगत एवं सामाजिक शुचिता को अपने धर्म-दर्शन का केंद्र-बिंदू बनाया, जिसका उन दिनों सामाजिक जीवन से लोप हो चला था.

ढाई हजार वर्ष पहले यानी बुद्ध के जन्म के समय वर्ण जाति में ढलने लगे थे. परिणामस्वरूप पचासियों जातियां अस्तित्व में आ चुकी थीं. जन्म के आधार पर भेदभाव करने वाली उस व्यवस्था को बुद्ध ने अनैतिक, अनुचित तथा जीवन के उच्चतम लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक माना तथा उसकी आलोचना की. अभिजात वर्ग की भाषा संस्कृत के बजाए उन्होंने पालि में उपदेश दिए, जो उन दिनों जनसाधारण की भाषा थी. उस समय तक जातीय अभिमान के मारे ब्राह्मण स्वयं को आश्रमों तक सीमित रखते थे. शेष समाज से उनका संबंध दानादि ग्रहण करने तक सीमित था. बुद्ध अपने विचारों को लेकर सीधे आमजन के बीच गए. भिक्षु-संघ की स्थापना की तो उसके दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खोल दिए. जाति-आधारित भेदभाव को वे बौद्धिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की राह में बाधक मानते थे—

‘अंबट्ठ! जो भी जातिवाद में बंधे हैं, गोत्रवाद में बंधे हैं, (अभि)मानवाद में बंधे हैं, आवाह-विवाह में बंधे हैं, वे अनुपम विद्या-चरण-संपदा से दूर हैं. अंबट्ठ! जातिवाद बंधन छोड़कर, गोत्रवाद बंधन छोड़कर, मानवाद बंधन छोड़कर, आवाह-विवाह बंधन छोड़कर ही अनुपम विद्या-चरण-संपदा का साक्षात्कार किया जा सकता है.’2

वेदों को अपौरुषेय न मानने, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों पर मौन साध लेने के कारण बौद्ध दर्शन की गिनती नास्तिक दर्शन के रूप में की जाती है. इसके आधार पर कुछ विद्वान उसे आजीवक और लोकायत दर्शन की तरह ही, भौतिकवादी दर्शन मानते हैं. लेकिन वह उच्छ्रंखल भौतिकवाद न था. हम उसे आदर्शोन्मुखी व्यवहारवाद कह सकते हैं जिसमें सामाजिक समानता, शुचिता एवं आचरण की पवित्रता प्रमुख थी. बुद्ध के विचारों का इतना असर हुआ कि वैदिक कर्मकांडों से आमजन का विश्वास घटने लगा. यज्ञ और दानादि के नाम पर ऋषियों की मांगों और धमकियांे तंग आ चुके राजा बौद्ध एवं जैन धर्म से जुड़ने लगे. उसके फलस्वरूप ब्राह्मण धर्म कुछ शताब्दियों के लिए नेपथ्य में चला गया. जातीय भेदभाव कमजोर पड़ने लगा. अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ने से ब्राह्मणधर्म को पुनर्वापसी का अवसर मिला. इसी दौर में पुराणों एवं स्मृति-ग्रंथों की रचना हुई. उसके बाद इतिहास ने अनेक करवटें लीं. राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद ब्राह्मणवाद निरंतर मजबूत और निरंकुश होता चला गया.

बुद्ध पहले विचारक थे, जिन्होंने समाज को धर्म के आधार पर संगठित करने की कोशिश की थी. वैदिक धर्म के प्रस्तोता जातीय दंभ के शिकार थे. आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा में वे बाकी जनसमाज से अलग-थलग जीते थे. जनसाधारण के सुख-दुख की उन्हें परवाह न थी. जाति और वर्ण के नाम पर उन्होंने समाज के बड़े हिस्से को मुख्यधारा से अलग किया हुआ था. अपने आश्रमों में बंद ऋषिगण धर्म और यज्ञादि के नाम पर क्या करते हैं? बलि चढ़ाने से उन्हें क्या हासिल होता है—जनसाधारण को इसकी बहुत परवाह भी नहीं थी. ब्राह्मण बुद्धिजीवियों की उपेक्षा की परवाह न करते हुए साधारण जन आजीवकों और लोकायतों पर विश्वास करते थे, जो उस समय भौतिकवादी दर्शन की प्रमुख शाखाएं थीं. वैदिक परंपरा संसार को नकारकर, काल्पनिक, भ्रममूलक देवलोक को परम-सत्य मानती थीं. आजीवकों और लोकायतों के लिए जीती-जागती, जीवनदायिनी प्रकृति ही सबकुछ थी. वे अपने श्रमकौशल के भरोसे जीवन-यापन करने वाले बहुसंख्यक लोग थे. चूंकि धर्म-केंद्रित समाज की रचना का संकल्प सामाजिक शुचिता के बगैर असंभव था. इसलिए बुद्ध ने आदर्शोन्मुखी नैतिकता पर जोर दिया. धार्मिक आडंबरों, यज्ञ-बलियों एवं जाति-प्रथा को अनावश्यक मानते हुए उन्होंने निस्पृह और कल्याणोन्मुखी जीवन जीने का उपदेश दिया. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशु-धन का विशेष महत्त्व था. यज्ञादि कर्मकांडों के विरोध का सीधा-सा अभिप्राय था, उपयोगी पशुधन की जीवनरक्षा. इसके फलस्वरूप लोग उनके धर्म की ओर आकृष्ट होने लगे.

 

2

पेरियार के समय तक जाति-व्यवस्था उग्र रूप धारण कर चुकी थी. अछूतों का सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश निषिद्ध था. कथित ऊंची जाति के सदस्यों का स्पर्श तो दूर, अपनी छाया से भी उनको बचाना पड़ता था. शूद्रों को उनके कार्य के अनुसार थोड़ी छूट थी, परंतु वे भी एक सीमा तक ही उच्च जातियों के निकट जा सकते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में भारतीय समाज में व्याप्त छूआछूत के बारे में वर्णन किया है. डू. बोइस के हवाले से वे उनीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में दक्षिण भारतीय समाज के बारे लिखती हैं—‘मालाबार तट पर रहने वाली ‘पुलाया’ जाति के सदस्यों को अपने लिए घर बनाने का अधिकार नहीं है. रहने के लिए वे लोग दरख्तों पर घौंसले की भांति, बांस-बल्लियों के सहारे, पत्तों की छत डाल सकते हैं.’ डू. बोइस के अनुसार, उन दिनों यदि कोई नैय्यर किसी पुलाया को सड़क पर देख लेता तो उसे वहीं मार देने का अधिकार था. बातचीत के दौरान दो व्यक्तियों के बीच दूरी से भी अस्पृश्यता के स्तर का अनुमान लगाया जा सकता था. पुलाया को नैय्यर जैसे उच्च जाति के हिंदुओं से 60 से 90 फुट की दूरी रखकर बात करनी पड़ती थी.

पेरियार ने बचपन से जाति-आधारित भेदभाव का अनुभव किया था. बड़े हुए तो उन्हें इसका कारण भी समझ में आने लगा. उनका जन्म धनाढ्य परिवार में हुआ था. शिक्षा के नाम पर वे बस दो-तीन वर्ष ही पाठशाला जा पाए थे. बाद में पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. उन दिनों उनके घर में संन्यासियों, शैव-मतावलंबियों, वैष्णवों, पंडितों आदि का खूब आना-जाना था. किशोर पेरियार उन्हें अधिकाधिक दान-दक्षिणा के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हुए देखते. कभी-कभी वे उनका मजाक भी उड़ाते. बावजूद इसके अपनी युवावस्था तक ईश्वर में उनकी आस्था बनी रही. 1925 में उन्होंने संन्यासी के रूप में बनारस की यात्रा की. यात्रा के दौरान वे बनारस में जहां-जहां गए, वहां ब्राह्मणवाद का विकृत चेहरा, धर्म के नाम पर लूट-खसोट और वृथा आडंबरों से सामना हुआ. जातीय भेदभाव का अनुभव तो उन्हें बचपन से ही था. बनारस यात्रा के बाद उनका धर्म से भी विश्वास उठ गया. उसके बाद नए पेरियार का जन्म हुआ, जो तर्कवादी था. ज्ञान-विज्ञान पर जोर देता था. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करता था. आस्था के आधार पर कुछ भी मान लेना उसे अस्वीकार्य था. हर स्थापित सत्य पर संदेह करना, उसे अपने विवेक की कसौटी पर कसना और खरा उतरने के बाद ही उसे स्वीकार करना, उसकी आदत में शुमार हो चुका था.

पेरियार ने आत्मा, परमात्मा, पाप-पुण्य, भाग्य आदि को सीधे नहीं नकारा. अपितु तर्क पर जोर दिया. इस मामले में बुद्ध उनके प्रेरणा-पुरुष रहे. प्राचीन भारत के इतिहास में बुद्ध कदाचित पहले शास्ता थे जिन्होंने वैचारिक स्वतंत्रता को आगे रखते हुए अपने शिष्यों से कहा था—‘अप्पदीपो भवः.’ दूसरों की बातों में आने के बजाय, सोच-विचारकर स्वयं निर्णय लो. धर्म-दर्शन और जाति पर दिए गए अपने व्याख्यानों में पेरियार भी आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. उनके अस्तित्व पर ध्यान देने के बजाए औचित्य पर विचार करते हैं. 1947 में सलेम कॉलिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिए गए अपने व्याख्यान में उन्होंने इन विषयों की वैज्ञानिक पड़ताल की थी. उन्होंने सिद्ध किया कि ये सभी मिथ समाज पर सोची-समझी नीति के तहत थोपे गए हैं. सहअस्तित्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं निस्पृह जीवन जीने वाले व्यक्ति को इनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती. उस व्याख्यान में वे बुद्ध का नाम नहीं लेते; परंतु उनका प्रत्येक निष्कर्ष उन्हें बुद्ध के करीब ले जाता है—

‘मनुष्य अपनी इच्छाओं के साथ जीता है. वह अपने लालच का दास का है. समाज में रहकर वह दूसरों के लिए या तो अच्छा कर सकता है अथवा बुरा. कर्म की महत्ता पर जोर देने के लिए ही जीवन और आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की रचना की गई है. मनुष्य को अच्छे कृत्यों की ओर प्रवृत्त करने हेतु, उसे यह विश्वास करना सिखाया गया है कि यदि वह बुरे कर्म करेगा तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को भयावह दंडों से गुजरना पड़ेगा. यह भी एक मिथ मात्र ही है. तर्क-सम्मत ढंग से बातचीत करने वाले निस्पृह व्यक्ति के लिए जो न अच्छा करता है, न ही बुरा, ईश्वर का भय नहीं रहता. उसे स्वर्ग या नर्क की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है.’3

बुद्ध के ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ की तरह पेरियार ने भी लोगों से बार-बार यह आग्रह किया—‘मैंने जो कहा वे मेरे व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि आप भी इनपर विश्वास करें. इसलिए खूब सोचें और स्वयं सार्थक निर्णय तक पहुंचे.’

एक और सूत्र जो पेरियार को बुद्ध के करीब ले जाता है, वह है—जाति व्यवस्था को लेकर दोनों का समान दृष्टिकोण. बुद्ध का जन्म नागवंशीय शाक्य कुल में हुआ था. बाकी क्षत्रियों की अपेक्षा उसे कुछ हीन माना जाता था. अश्वघोष उनका संबंध इक्ष्वाकू वंश से जोड़ते हैं. बौद्ध साहित्य के गंभीर अध्येता कोसंबी के अनुसार शाक्य एक जनजाति थी. बुद्ध ने जातिगत भेदभाव का विरोध किया था. भिक्षु संघों के दरवाजे उन्होंने सभी जातियों के लिए खोले हुए थे. लेकिन ‘अंबट्ठसुत्त’(दीघनिकाय) में वे जिस तरह क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठ बताने के लिए तर्क देते हैं, उसका एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि उन्हें अपने क्षत्रीय कुलोत्पन्न होने पर गर्व था; या कम से कम वर्ण-व्यवस्था से उन्हें कोई शिकायत न थी. बुद्ध द्वारा धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति-प्रथा के विरोध का इतना असर अवश्य हुआ था कि बौद्ध धर्म को जनता ने अपना धर्म मान लिया. उसके फलस्वरूप समाज में जाति-आधारित कटुताओं में भी कमी आने लगी. परंतु जाति और उसके आधार पर हो रहे भेदभाव के विरोध में बड़ा आंदोलन न चलाने के कारण, जातिवादी शक्तियां भीतर ही भीतर सक्रिय बनी रहीं. लोगों को ब्राह्मण धर्म की ओर वापस मोड़ने के लिए ब्राह्मण बुद्धिजीवी पुराणों, स्मृतियों, महाकाव्यों आदि ग्रंथों की रचना में जुट गए. अशोक द्वारा उठाए गए कदमों के फलस्वरूप बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न देशों में पहुंचा. मगर उसके तुरंत बाद, मौर्य वंश के कमजोर पड़ते ही, ब्राह्मणवाद पुनः जड़ जमाने लगा. ‘मनुस्मृति’ की रचना हुई. जातीय भेदभाव और दुराग्रह जो बुद्ध के प्रभाव दब-से गए थे, वे पुनः सामने आने लगे.

 

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पेरियार के समय तक लगभग सभी धर्म अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे. सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी में पश्चिम में हुई वैचारिक क्रांति के फलस्वरूप, भारत में भी मानव-मात्र की समानता और स्वतंत्रता की समर्थक नई विचार-चेतना का जन्म हुआ था. यह मानते हुए कि राजनीति सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है, राजगोपालाचार्य के आग्रह पर पेरियार कांग्रेस में शामिल हुए थे. प्रदेश कांग्रेस के उच्च पदों पर रहते हुए उन्होंने नेताओं का मन बदलने की पूरी कोशिश की थी. मगर थोड़े ही समय में उन्हें विश्वास हो गया कि कांग्रेस के नेता अपने जातीय दुराग्रहों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर है. खासतौर पर जातीय विषमता को मिटाने के लिए कांग्रेसी नेता कुछ नहीं करना चाहते. यहां तक कि गांधी भी जातीय पूर्वाग्रहों में फंसे हुए हैं. खिन्न होकर 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. लोगों में आत्माभिमान का भाव पैदा करने के लिए उन्होंने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नींव रखी. उस समय तक धर्म को नैतिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत माना जाता था. लोगों का विश्वास था कि केवल धर्म के सहारे समाज को एकसूत्र में बांधकर रखा जा सकता है. पेरियार किसी नए धर्म के बंधन में बंधना नहीं चाहते थे. तमिल जनता में अपनत्व एवं एकजुटता की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आधार बनाया. लोगों को समझाया कि समाजीकरण की बुनियाद पारस्परिक सहयोग और समर्पण पर टिकी होती है. पौराणिक ग्रंथों, महाकाव्यों आदि की रचना स्वार्थी ब्राह्मणों ने लोगों को भरमाने के लिए की है. जाति-व्यवस्था को दैवीय बताने वाले धर्मग्रंथों में शूद्रों और अस्पृश्यों के लिए अपमानजनक स्थितियां हैं—‘बौद्धों और जैनियों ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाई गई कुरीतियों को कुछ समय के लिए समाप्त कर दिया था. उन्होंने बताया था कि सभी लोग बराबर हैं. आपसी प्रेम और भाईचारा ही असली ईश्वर हैं. ब्राह्मणों को वह स्वीकार नहीं हुआ. इसलिए उन्होंने उनके सभी कार्यों पर पानी फेर दिया.’4 लोगों को ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए भ्रमजाल से निकालकर मानवीय मूल्यों से जोड़ना, उनके भीतर सम्मानजनक जीवन जीने की चाहत पैदा करना पेरियार की प्रमुख चुनौती थी. फुले इसकी नींव बहुत पहले डाल चुके थे. ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की शुरुआत का भी यही उद्देश्य था.

पेरियार आस्थावान व्यक्ति नहीं थे. उनका विश्वास ज्ञान-विज्ञान में था. अरस्तु की तरह वे भी मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते थे. बावजूद इसके उन्होंने धर्म की शक्ति को नकारा नहीं था. लेकिन उनका धर्म मानव-मात्र के कल्याण का उद्यम था, जिसमें किसी देवता या आत्मा-परमात्मा के लिए कोई स्थान नहीं था. आजीवन वे इस पर विचार करते रहे कि मनुष्य को धर्म और धर्मशास्त्रों के मकड़जाल से बाहर कैसे निकाला जाए! यह आसान काम नहीं था. क्योंकि मानव जीवन में धर्म की व्याप्ति केवल पूजा-पाठ या संस्कारों तक सीमित नहीं रहती. ऐसे लोग भी जो मंदिर नहीं जाते, पूजा-पाठ तथा दूसरे आडंबरों से दूर रहते हैं; और ऐसे भी जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं—दिलो-दिमाग से दकियानूसी हो सकते हैं. लोकजीवन का हिस्सा बन चुके विभिन्न संस्कार, आचार-विचार और रूढि़यां, संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मान लिए कर्मकांड यहां तक कि उनसे जुड़े किस्से-कहानियां भी—किसी न किसी रूप में धार्मिक जड़ता के संवाहक हैं. उनकी रचना जातिभेद और सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय सिद्ध करने के लिए की गई है. 2400 वर्ष पहले अरस्तु ने भी तो यही कहा था, ‘मनुष्य ने ही ईश्वर को रचा है. अपने रूपाकार में, और अपनी जीवनशैली के अनुरूप भी.’ ब्राह्मण खुद को सर्वोपरि मानते हैं. वे चाहते हैं कि शेष जनसमाज उनके इशारे पर नाचे. जो ऐसा नहीं करता उसे वे शाप देने की धमकी दिया करते थे. उनका गढ़ा हुआ ईश्वर भी खुद को भक्तों से ऊपर मानता था; जो उसकी चापलूसी(भक्ति) से आनाकानी करे, उसे वह दंड देने को उतावला रहता था.

बौद्ध धर्म के रास्ते सामाजिक शुचिता की वापसी का रास्ता पेरियार से पहले दक्षिण भारत में आइयोथि थास भी दिखा चुके थे. उनका मानना था कि दक्षिण की पेरियार जाति के लोग मूलतः बौद्ध हैं और वे दक्षिण के मूल निवासी हैं. आर्य हमलावरों ने उनके धर्म और संस्कृति को उनसे छीन लिया है. थॉस के प्रभाव में केरल की जाति इझ़वा अपना संबंध गौतम बुद्ध से वंश से जोड़ने लगी थी. मद्रास प्रेसीडेंसी का नाम द्रविड़नाडु करने की मांग के समय पेरियार ने भी कहा था कि मुस्लिम, ईसाई, आदि द्रविड़ और बौद्ध सभी द्राविड़ हैं.5 थॉस की भांति पेरियार भी ब्राह्मणवाद के कटु आलोचक थे. जातीय उत्पीड़न से मुक्ति के लिए उन्होंने तमिलवासियों से हिंदू धर्म को छोड़ने का आग्रह किया था. उसके पीछे भी बौद्ध धर्म की प्रेरणा थी. 13 जनवरी 1945 के ‘कुदी अरासु’ के अंक में उन्होंने लिखा था कि यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन करने के लिए ‘बांटो और राज करो’ की नीति का अनुसरण किया था तो ठीक यही नीति आर्यों ने भी भारत के मूल निवासियों पर राज करने के लिए अपनायी थी. उन्होंने यहां के बहुसंख्यकों को पिछड़ों और अछूतों में बांट दिया. पेरियार का कहना था—‘विश्वासघातियों का शिकार मत बनिए….राम और कृष्ण जैसे नायक तथा गीता, रामायण जैसे धर्मग्रंथ, बौद्ध धर्म के प्रति हमारे विश्वास को मिटाने के रचे गए हैं.’ उन्होंने आगे कहा था—

‘आंबेडकर जब मद्रास आए थे तब मैंने उन्हें 1923 में भारी जनसभा के सामने दिए गए अपने भाषण के बारे में बताया था कि जब तक कोई रामायण का दहन नहीं करता, तब तक छूआछूत पर सार्थक प्रहार संभव नहीं है.’6 10 जनवरी 1947 को ‘कुदीअरासु’ में उन्होंने फिर लिखा था कि जैसे ‘बुद्ध और गुरुनानक वेदों को धर्मशास्त्रों को पूरी तरह मिथ्या बताते थे, केवल हम द्रविड़जन ही वैसा कहने का साहस कर पाते हैं.’7

27 मई 1953 को बुद्ध जयंती के अवसर पर पेरियार ने अपने अनुयायियों को उसे उत्सव की तरह मनाने का आवाह्न किया था. उन्होंने कहा था कि इस अवसर पर वे मूर्ति पूजा का बहिष्कार करें. विघ्नेश्वर, गणपति, गजपति, विनायक आदि कहे जाने वाले गणेश की मूर्तियों को तोड़कर बहा दें. बौद्ध जयंती वैदिक परंपरा के धुर विरोधी की जयंती है. इस देश में हजारों देवी-देवता है. इसलिए ऐसा व्यक्ति जो विवेक से काम लेता है, तर्क को महत्त्व देता है, जीवन के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है तथा जिसे मनुष्यता में भरोसा है वह स्वयं ही बुद्ध कहलाने योग्य है. यह दिखाने के लिए कि मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा है, उसमें कोई दैवी शक्ति नहीं है, पेरियार ने तमिलनाडु के कई शहरों में मूर्ति तोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था. मूर्ति-पूजा और धार्मिक कर्मकांडों का बहिष्कार, सामाजिक कार्यक्रमों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्यता से मुक्ति, उनके ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था. ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध ने भी मूर्ति पूजा की निंदा की थी. धार्मिक कर्मकांडों, आडंबरों एवं जाति-आधारित भेदभाव की आलोचना करते हुए उन्होंने पंचशील और अष्ठांग मार्ग का प्रतिपादन किया जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक जीवन की शुचिता पर जोर देता था. बुद्ध ने दिखाया था कि किसी भी समाज में शुभत्व की मौजूदगी, इसपर निर्भर करती है कि उसके सदस्य अपने जीवन में शुचिता एवं सौहार्द्र को लेकर कितने गंभीर हैं. उसके लिए किसी धर्माडंबर की आवश्यकता नहीं है. पेरियार के भाषणों का लोगों पर अनुकूल असर पड़ा. लोग धर्म के सम्मोहन से बाहर निकलने लगे. आंदोलनकारियों ने अपने-अपने घर से देवताओं की मूर्तियां निकाल फैंकी. तिरुचिरापल्ली के टाउन हॉल के सामने खुले मैदान में सैकड़ों लोगों ने मूर्तियों को तोड़ डाला.

धर्म के प्रति विशेष आस्था न होने के बावजूद पेरियार बुद्ध को अपने विचारों के करीब पाते थे. वे चाहते थे कि लोकमानस बुद्ध के विचारों को जाने-समझे. इसके लिए उन्होंने 23 जनवरी 1954 को इरोद में एक सम्मलेन का आयोजन किया था. सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सीलोन विश्वविद्यालय, श्रीलंका के बौद्ध संस्कृति केंद्र के प्रोफेसर जी. पी. मल्लाल शेखर ने कहा था कि बुद्ध के विचारों के अनुसरण द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना की जा सकती है. उन्होंने पेरियार द्वारा समाज सुधार विशेषरूप से धार्मिक जकड़बंदी के प्रयासों से बाहर लाने के प्रयासों की सराहना की थी. उनका मानना था कि तमाम विरोधों एवं अवरोधों के बावजूद समाज सुधार का पेरियार का रास्ता बुद्ध के विचारों से मेल खाता है. सम्मेलन में जाति प्रथा पर भी चिंता व्यक्त की गई थी. ‘अखिल भारतीय शोषित जाति संघ के सचिव और सांसद राजभोज ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में दलित, शूद्र और अन्य जातियां बहुसंख्यक होने के बावजूद तरह-तरह के शोषण की शिकार रही हैं. बौद्ध धर्म जाति-प्रथा को नकारता है. उसके अनुसार समाज में सभी बराबर हैं. जाति-व्यवस्था हिंदू धर्म का कलंक है. सबसे पहले बुद्ध ने ही जाति-प्रथा और धर्माडंबरों का विरोध करते हुए, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में सफलता प्राप्त की थी. केवल बौद्ध धर्म से ही इस समस्या का समाधान संभव है. सम्मेलन में पेरियार की प्रशंसा करते हुए कहा गया था कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए कई आंदोलन चलाए हैं. उनके कारण समाज में जाति-विरोधी चेतना का जन्म हुआ है—‘बुद्ध की नीतियां ही आपकी और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ की नीतियां हैं.’8 उस अवसर पर बुद्ध की प्रतिमा का अनावरण किया गया था. हमेशा की तरह उस सम्मेलन में भी पेरियार ने हिंदू धर्म-दर्शन पर हमला बोलते हुए बौद्ध धर्म की प्रशंसा की थी—

‘हम जो मेहनती और कामगार लोग हैं, हमें नीची जाति में डाल दिया गया है. हम भुखमरी के शिकार हैं. हमारे पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं हैं. हमारे पास रहने को घर भी नहीं हैं. लेकिन ब्राह्मण जो कोई काम नहीं करते, उन्हें सभी प्रकार के सुख और मान-सम्मान हासिल है.’9

सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए पेरियार ने कहा था—

‘‘केवल तुम्हीं वे लोग हो जिन्होंने ये मंदिर बनाए हैं. केवल तुम्हीं हो जिन्होंने इनके लिए दान दिया है. यदि ऐसा है तो क्या हम ईश्वर को जो हमें नीची जाति का और अछूत बताता है, ऐसे ही छोड़ सकते हैं? ‘कृतघ्न ईश्वर! केवल मैंने ही तेरे लिए मंदिर और तालाब बनवाए हैं. केवल मैंने ही तुझपर अपना पैसा बहाया है.’ क्या तुम यह नहीं पूछोगे कि तुम नीची जाति के क्यों हो? तुम्हें छूने में हर्ज क्या है? तुम केवल ब्राह्मण के कहे पर विश्वास करते हो कि यदि तुम ऐसे सवाल उठाओगे तो ईश्वर तुमसे नाराज हो जाएगा.’’10

इरोद सम्मेलन में गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए एक प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. उसमें कहा गया था—‘आर्यों द्वारा हिंदू धर्मशास्त्रों, पुराणों, महाकाव्यों की रचना सांस्कृतिक वर्चस्व कायम रखने तथा द्रविड़ों के अपमान, अवमूल्यन तथा उन्हें भरमाए रखने के लिए की गई है, उनका सबका नाश होना चाहिए.’ उसी सम्मेलन में स्वीकृत एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था—‘बुद्ध का जीवन तथा उनके धर्मोपदेश ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग-नर्क, भाग्यवाद, धार्मिक परंपराओं तथा उत्सवों की मिथ्याचार को उजागर करती हैं; तथा भेदभाव रहित, आपसी सहयोग और बराबरी पर आधारित सामाजिक संरचना का समर्थन करती हैं, तमिलनाडु के सभी लोगों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समूहों को चाहिए कि वे उनके विचारों को, समस्त मानव-समुदाय तक पहुंचाने के लिए आगे आएं.’

पेरियार की बातों को सुनकर रोज नए-नए लोग उनके आंदोलन से जुड़ने लगे. धार्मिक आयोजनों, कर्मकांडों तथा धर्मशास्त्रों में कही गई बातों पर सवाल उठाए जाने लगे. इससे सनातनी हिंदुओं को डर सताने लगा था. वे जानते थे कि धर्म की नींव अज्ञात डर पर टिकी है. मूर्तियों के प्रति श्रद्धा भी उसी डर का विस्तार है. यदि वह डर ही नहीं रहा तो लोग धर्म की गिरफ्त से बाहर होने लगेंगे. पेरियार लगातार वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे. सनातनी हिंदुओं की निगाह में धर्मशास्त्रों आलोचना नास्तिकता थी. स्वाभिमान आंदोलन की राह में अवरोध पैदा करने के लिए उन्होंने एक संगठन का गठन किया था. उस संगठन ने पेरियार तथा उनके दो सहयोगियों टी. पी. वेदाचलम और एम. आर. राधा के विरुद्ध धारा 295 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया. वेदाचलम वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जबकि एम. आर. राधा जाने-माने अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता. पेरियार और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जनभावनाओं को आहत करने का काम किया है. मामले की पहली सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई. अगली सुनवाई के लिए मुकदमा जिला सत्र न्यायालय में पहुंचा. दोनों अदालतों का निर्णय पेरियार के पक्ष में गया. मगर पेरियार के दुश्मन इतने से शांत होने वाले न थे. उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी. अपील की सुनवाई के बाद, 13 अक्टूबर 1954 को न्यायमूर्ति एन. सोम सुंदरम ने उसे यह कहकर खारिज कर दिया कि वादी पक्ष की यह आशंका कि पेरियार तथा उनके सहयोगियों के कृत्य से जनभावनाएं आहत होती हैं—सही मानी जा सकती है. लेकिन पेरियार और उनके साथियों ने जो मूर्तियां तोड़ीं उन्हें उन्होंने या तो स्वयं बनाया था अथवा बाजार से खरीदा गया था. वे मंदिर में पूजी जाने वाली मूर्तियां नहीं थीं. ऐसी मूर्तियों को तोड़ना कानून अपराध नहीं है.

तमिल समाज में जागृति लाने, उसे रूढि़मुक्त करने तथा आत्माभिमान की भावना जागृत करने के लिए पेरियार ने ‘स्वाभिमान आंदोलन’ का सूत्रपात किया था. उसी के एक कार्यक्रम में जनवरी 31, 1954 को उन्होंने मद्रास(अब चैन्नई) में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बुद्ध के विचार हमारे अपने विचारों को लागू करने, आगे बढ़ाने तथा समाज में बढ़ रही विकृतियों के शमन की दिशा में बहुत ही उपयोगी हैं. उसी वर्ष पेरियार अपनी पत्नी तथा कुछ मित्रों के साथ मलेषिया और मयामार गए थे. वहां मेंडले में बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर उनकी भेंट डॉ. आंबेडकर से हुई थी. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले चुके थे. उन्होंने पेरियार से भी वैसा ही करने को कहा था. इसपर पेरियार ने डॉ. आंबेडकर से आग्रह किया था कि वे धर्मांतरण से बचें. क्योंकि ऐसा करके वे हिंदू धर्म की आलोचना का अधिकार खो देंगे. जड़वादी हिंदू दावा करने लगेंगे कि किसी गैर हिंदू को उनके धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं है. लोग भी उनकी बात पर आसानी से विश्वास कर लेंगे. अपने धर्मांतरण के बारे में पेरियार का कहना था कि वे धर्मांतरण के बजाए हिंदू धर्म के भीतर रहकर ही उसकी आलोचना करते रहेंगे. हिंदुओं के धर्मांतरण के बारे में उनकी स्पष्ट राय थी—

‘यदि कोई हिंदुओं द्वारा इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्म की ओर धर्मांतरण के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उनमें सर्वाधिक संख्या दलितों की होगी. वे धर्मांतरण को इसलिए अपनाते हैं क्योंकि हिंदू धर्म उन्हें बहुत ही उत्पीड़क नजर आता है. धर्मांतरण द्वारा वे जातीय निरंकुशता से बाहर निकल जाना चाहते हैं. उनमें से बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था के अंतरण द्वारा वे अपनी जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकते हैं. दूसरे शब्दों में धर्मांतरण उन्हें घृणित कर्मवाद के दुश्चक्र से मुक्ति दिला सकता है. धर्मांतरण उनमें बेहतरी की उम्मीद जगाता है. उनके भीतर बेहतर पहचान और संपत्ति के बारे में नई चेतना का संचार करता है.’11

उन दिनों चैन्नई में ब्राह्मण अपने स्वामित्व वाले होटलों के आगे ‘ब्राह्मण होटल’ का बोर्ड लगाते थे. इससे लगता था कि ब्राह्मण बाकी जातियों से आगे हैं. पेरियार उस प्रवृत्ति को रोकना चाहते थे. इसलिए उन्होंने उसके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया. 5 मई 1957 को एक ब्राह्मण होटल के सामने से प्रतीकात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई. 22 मार्च 1958 तक उनका आंदोलन लगातार चलता रहा. पेरियार के साथ 1010 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया. आखिरकार उनकी जीत हुई. पूरे राज्य में होटल मालिकों को अपने बोर्ड से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाना पड़ा.

फरवरी 1959 में पेरियार उत्तर भारत की यात्रा पर निकले. धार्मिक कूपमंडूकता के मामले में उत्तरी और दक्षिणी भारत में आज भी बहुत अंतर नहीं है. उत्तर भारत की यात्रा के दौरान पेरियार ने कानपुर, लखनऊ और दिल्ली में बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया था. उस समय तक डॉ. आंबेडकर बौद्ध धर्म अपना चुके थे और जातीय उत्पीड़न और अनाचार से बचने के लिए दलित और पिछड़ी जातियों के काफी लोग बौद्ध धर्म को अपनाने लगे थे. पेरियार ने इसकी चर्चा भी अपने भाषण में की थी. उसके बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट ‘विदुथलाई’ के 21 फरवरी 1959 के अंक में प्रकाशित हुई थी. उनका कहना था—

‘शूद्रों और पंचमों, जिन्हें आजकल पिछड़ी जाति और दलित कहा जाता है—के अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें आर्यों द्वारा गढ़े गए धर्म, धर्मशास्त्रों एवं ईश्वर का बहिष्कार करना होगा. जब तक इनकी सत्ता रहेगी, हम जाति को नहीं मिटा सकते. इसी के लिए डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. अपने अलावा उन्होंने और बहुत से लोगों को धर्मांतरण कराया था. इसलिए सभी हिंदू धर्म, ईश्वर और जाति से मुक्ति हेतु बौद्ध धर्म अपनाने के लिए आगे आना चाहिए.’

पेरियार के अनुसार केवल बुद्ध ही थे जिन्होंने समाज में व्याप्त तरह-तरह की ऊंच-नीच के विरोध में सवाल उठाए थे—

‘‘क्या (बुद्ध के अलावा) किसी और ने पूछा था कि समाज में लंबे समय से जातीय भेदभाव क्यों मौजूद है? बुद्ध ने यह सवाल उठाया था. वे राजा के बेटे थे. उन्होंने कई चीजों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने पूछा—‘वह आदमी बूढ़ा क्यों है?’ ‘वह व्यक्ति नौकर क्यों था? वह अंधा क्यों है? बुद्ध ने पूछा था—‘वह आदमी नीच जाति का क्यों है?’ उन्होंने बताया—‘उसे भगवान ने ही ऐसा बनाया है?’ इसपर बुद्ध ने सवाल किया—‘वह ईश्वर कहां है जिसने इसे बनाया है?’ तब वे आत्मा का सिद्धांत बघारने लगे. तब बुद्ध ने पूछा—‘आत्मा क्या है? क्या किसी ने उसे देखा है?’….बुद्ध के मुख्य सिद्धांत हैं—

‘निहित सत्य को जानने के लिए प्रत्येक वस्तु का अपने विवेकानुसार भली-भांति विश्लेषण करो.’ तथा ‘यदि तुम्हारा विवेक उसे सच मानता है, तभी उसपर विश्वास करो.’ पेरियार ने आगे कहा था—‘ईश्वर, आत्मा, देवता, स्वर्ग, नर्क, ब्राह्मण, शूद्र, पंचम यदि ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आती हैं तो इनपर विश्वास मत करो. ये सब काल्पनिक शब्द हैं. कुछ भी स्वीकारने से पहले अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करो. ईश्वर ने ऐसा कहा है, वेद ऐसा कहते हैं या मनुस्मृति में यह सब लिखा है—ऐसी बातों पर विश्वास वृथा है. जिसे तुम्हारी बुद्धि स्वीकारती है, केवल उसी पर भरोसा करो.’’12

पेरियार का विश्वास किसी भी धर्म में नहीं था. बावजूद इसके ऐसे कई अवसर आए जब उन्होंने बौद्ध धर्म की प्रशंसा की. अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले उन्होंने ‘ईश्वर और मनुष्य’ विषय पर सारगर्भित भाषण दिया था. भाषण में ईश्वर की अवधारणा को नकारा गया था, साथ ही विभिन्न धर्मों पर चर्चा की थी. उसमें बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा था—‘यदि हम बौद्ध धर्म को कोई और नाम देना चाहें तो हम उसे ‘बुद्धि’ यानी ‘ज्ञान का धर्म’ कह सकते हैं. बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान का धर्म’ या ‘ज्ञानमय धर्म’ क्यों कहा जाएगा? क्योंकि बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सभी ईश्वर केद्रित हैं, जबकि बौद्ध धर्म किसी ईश्वर को मान्यता नहीं देता. यह इसलिए है कि कोई भी ऐसा ‘ज्ञानमय धर्म’ या ‘ज्ञान का धर्म’ नहीं हो सकता जो ईश्वर पर विश्वास करता हो. यही कारण है कि बौद्ध धर्म को ‘विवेकशील धर्म’ कहा है. उस भाषण में पेरियार ने बौद्ध धर्मावलंबियों की यह कहकर आलोचना की थी कि वे भी बौद्ध धर्म को ‘ज्ञान के धर्म’ के रूप में अंगीकार करने में विफल रहे हैं. पेरियार ने ऐसा क्यों कहा था? इस बारे में उनका कहना था कि किसी भी सामान्य—‘धर्म को अपनी पहचान बनाने के ईश्वर में विश्वास करना आवश्यक है. इसके लिए उसके अनुयायियों को कुछ बकवास कहानियों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों पर विश्वास करने को कहा जाता है. बौद्ध धर्म कर्मकांडों को निरर्थक विश्वासों का खंडन करता है. बावजूद इसके अधिकांश बौद्ध मतावलंबी उसी जीवन-पद्धति को अपनाए हुए हैं. उनकी पूजा पद्धति भी उसी प्रकार की है.’ धर्म और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए अपने 25-26 दिसंबर 1958 के भाषण में पेरियार ने पुनः दोहराया था कि ऐसा ईश्वर जिसे लगता है कि वह दलितों और शूद्रों के छूने भर से अपवित्र हो जाएगा, को मंदिर में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ऐसी मूर्ति को तुरंत हटाकर नदी किनारे डाल देना चाहिए, ताकि लोग उसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए कर सकें. एक अवसर पर उन्होंने कहा था—

कहा जाता है कि ईश्वर ने जाति की रचना की है. यदि यह सच है तो सबसे पहली जरूरत इस बात ही है कि ऐसे ईश्वर को ही नष्ट कर दिया जाए. यदि ईश्वर इस क्रूर प्रथा से अनभिज्ञ है तो उसे और भी जल्दी खत्म किया जाना चाहिए. यदि वह इस अन्याय से रक्षा करने या इसपर रोक लगाने में असमर्थ है तो इस दुनिया में बने रहने का उसे कोई अधिकार नहीं है.

4

पेरियार ने गौतम बुद्ध को विश्व के सबसे पहले क्रांतिधर्मा विचारक स्वीकार किया था. कारण था कि बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा-परमात्मा जैसी अतार्किक मान्यताओं को चुनौती दी थी. उन्होंने कहा था—‘आमतौर पर ईश्वरीय विश्वास के आधार पर मनुष्यों को मूर्ख बनाया जाता है. मैं नहीं जानता कि मानवमात्र की इस अज्ञानता का पर्दाफाश करने के लिए अभी तक कोई विचारक आगे क्यों नहीं आया है? यहां तक कि सुशिक्षित बुद्धिजीवी भी इस मामले में आलसी रहे हैं. यदि हम दुनिया के पहले दार्शनिक की खोज करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि वह एकमात्र गौतम ही बुद्ध थे. हमारा इतिहास भी यही बताता है. उनके बाद पश्चिम में जन्मा एकमात्र विचारक सुकरात था. उनके दार्शनिक विचारों को भली-भांति नहीं समझा गया.’13

उस ज्ञानमय धर्म या ‘बुद्धि के धर्म’ को नष्ट कर दिया गया. कैसे नष्ट कर दिया गया? पेरियार के शब्दों में, ‘उन्होंने(ब्राह्मणों ने) हिंसक रास्ते अपनाए. बौद्धों का कत्लेआम किया गया. उनके मठों को मिट्टी में मिला दिया गया.’14 पेरियार किसी भी प्रकार की व्यक्ति पूजा के विरोधी थे. मगर बुद्ध के विचार उनकी वैचारिक चेतना के करीब थे. उनके प्रचार-प्रसार के लिए वे बुद्ध जयंती मनाने के पक्ष में पक्ष थे. परंतु वे नहीं चाहते थे कि बुद्ध जयंती के नाम पर होने वाले उत्सव महज कर्मकांड बनकर रह जाएं. इसलिए ‘बुद्ध जयंति क्यों मनाई जाए? लोग बुद्ध के जन्म को उत्सव के रूप में क्यों लें? पेरियार इन सवालों पर भी विचार करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध जयंती बनाने का आशय यह नहीं है कि लोग बुद्ध-प्रतिमा के आगे खड़े होकर कपूर, नारियल, फल-फूल वगैरह लेकर उसकी पूजा-अर्चना करें. उनके अनुसार—‘हम बुद्ध के जीवन से शिक्षा ले सकते हैं और उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं. मैं उनसे नास्तिक के रूप में प्रेरणा लेता हूं. यदि नास्तिक का अभिप्रायः है वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणों में अविश्वास है, तो निश्चित रूप से मैं नास्तिक ही हूं.’ पेरियार को डर था कि बुद्ध जयंती के बहाने ऐसे व्यक्ति जो वेद, शास्त्र तथा पुराणों में आस्था रखते हों, अपनी बात को घुमा-फिराकर लोगों के सामने रख सकते हैं. पेरियार के अनुसार जातिभेद के आधार पर दूसरों को कमतर समझने वाला, निरंकुश आचरण का समर्थक व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है.

पेरियार के अनुसार बुद्ध न तो संत थे, न ही महात्मा. असल में वे ऐसे बुद्धिवादी चिंतक थे जिन्होंने प्राचीनकाल में हिंदू ऋषियों का उनके अनर्गल कर्मकांडों और आडंबरों के आधार पर विरोध किया था. इसलिए बौद्ध धर्म प्रचलित अर्थों में धर्म नहीं है. जो लोग बौद्ध धर्म को धर्म मानते हैं, वे गलत हैं. धर्म के लिए उसके केंद्र में ईश्वर का होना आवश्यक है. इसके अलावा स्वर्ग, नर्क, मोक्ष, भाग्य, पाप-पुण्य आदि अवधारणाओं पर विश्वास भी आवश्यक है. बड़े धर्मों का काम किसी एक ईश्वर नहीं चलता. उनमें अनेक ईश्वर भी हो सकते हैं. उन ईश्वरों के घर-परिवार, आवास, आने-जाने के स्वतंत्र साधन, पत्नियां और बच्चे भी हो सकते हैं. भारतीय तो ऐसे ईश्वरों को ही पहचानते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह, जिसे कुछ लेखक भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम मानते है, की जाति के संदर्भ में समीक्षा करते समय पेरियार ने बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म की प्रशंसा की थी—

‘इतिहास गवाह है कि जिन बौद्ध और जैन श्रमणों ने हमारे लोगों को सद्व्यवहार और ज्ञान की महत्ता की शिक्षा देनी चाही, तमिल राजाओं ने उनका उत्पीड़न किया गया. उन्हें तरह-तरह के मामलों में फंसाया गया और कत्लेआम किया गया. यह दर्शाता है कि हमारे देश पर निरंकुश और असभ्य शासकों का राज रहा है.’15

बुद्ध के अनुसार मनुष्य का ईश्वर के प्रति आकर्षित होना आवश्यक नहीं है. बौद्ध धर्म अपने मानवतावादी आचरण के लिए बाकी धर्मों से बेहतर सिद्ध होता है. बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य केवल मनुष्य का ध्यान करे. बुद्ध ने न तो स्वर्ग का महिमा-मंडन किया, न ही नर्क से लोगों को डराया. उन्होंने मनुष्य के आचरण पर जोर दिया. उसके लिए अष्ठांग मार्ग प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर लगभग सभी धर्मों ने धार्मिक शुचिता के नाम पर अपनाया. पेरियार बुद्ध की प्रशंसा करते हैं. लेकिन वे उनके सम्मोहन से ग्रस्त नहीं हैं. न ही आस्था के बदले वे अपने विवेक को गिरवी रखना चाहते हैं, जैसी कि ब्राह्मण धर्म के अनुयायी अपेक्षा रखते हैं. अपितु वे लिखते हैं कि कोई बात इसलिए मान्य नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी महात्मा ने कहा है. या उसे बहुत से लोग मानने वाले हैं. अपितु मनुष्य को अपने विवेक की कसौटी पर जो खरा प्रतीत हो, उसी को स्वीकार करना चाहिए. उसके लिए आवश्यक है कि हर सत्य या अच्छी लगने वाले तथ्यों को वह अपनी कसौटी पर परखे. उनके अनुसार बुद्धिज्म केवल गौतम बुद्ध की जयंतियों को मनाना नहीं है. हमारे लिए बुद्ध होने का अभिप्राय बुद्धि, विवेक बुद्धि का साथ होना है. अपने तर्क-सामथ्र्य का साथ होना है. पेरियार के अनुसार—

‘बौद्ध धर्म किसी भी प्रकार के श्रेष्ठतावाद(ब्राह्मणवाद) के लिए एटमबम के समान है.’16

गौतम बुद्ध का जन्म करीब 2500 वर्ष पहले हुआ था. उस समय ब्राह्मण यद्यपि धर्म और सभ्यता के दावेदार बने हुए थे, मगर यज्ञादि में जिस प्रकार हजारों बलियां एक साथ वे चढ़ा देते थे, जाति के नाम पर अपने ही धर्म-बंधुओं के साथ दमन और अवमाननापूर्ण वर्ताब करते थे, उसे देखते हुए उनका आचरण असभ्य और जंगली प्राणियों जैसा था. बुद्ध ने उन सबका विरोध किया. बुद्ध का रास्ता आसान नहीं था. देखा जाए तो उन दिनों ज्ञान और तर्क का पक्ष लेने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं था. परंतु बुद्ध अपने बातों पर अडिग रहे. वैदिक हिंसा के स्थान पर उन्होंने मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पक्ष लिया. पेरियार के अनुसार उनकी ताकत उनके शब्दों में थी. पेरियार की तरह बुद्ध को भी अपने जीवन में आलोचनाओं का सामने करना पड़ा था. बुद्ध के बाद उनके आलोचकों ने मुखर स्वर में उनकी आलोचना करना आरंभ कर दिया था. पुराणों के बहाने प्राचीन धर्म को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जाने लगी थी. जाहिर है, बुद्ध के बाद उनकी आलोचना में वही लोग लगे थे जो धर्म के नाम पर कर्मकांड और तर्क के स्थान पर तंत्र-मंत्र की वापसी चाहते थे. ऐसे ही लोग पेरियार का विरोध करते आए हैं.

रामायण को हिंदु नैतिक जीवन का पाठ पढ़ाने वाले ग्रंथ के रूप में देखते हैं. पेरियार के अनुसार रामायण की रचना बौद्ध धर्म के प्रभाव को मद्धिम करने के लिए, उसकी ख्याति से उबरने की कोशिश में की गई थी. बुद्ध का धर्म ताकत का धर्म नहीं था. धर्म के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उन्होंने भिक्षुओं और श्रमणों को सौंपा हुआ था. लेकिन जातियों में बंटे हिंदू धर्म के लिए इस तरह के समर्पित धर्म-योद्धा मिलने संभव नहीं थे. जाति व्यवस्था के नाम पर ब्राह्मणों ने खुद ही निचली जातियों को धार्मिक कार्यों में सहभागिता से अलग-थलग किया हुआ था. ऐसे में शक्ति के माध्यम से ‘धर्म-विजय’ दिखना ही एकमात्र रास्ता था. रामायण यही काम करती है. अशोक ने अपने बेटे और बेटी को बौद्ध धर्म की ध्वजा फहराने के लिए श्रीलंका भेजा था. वाल्मीकि के राम आर्य अपनी पत्नी को छुड़ाने के बहाने आर्य-धर्म की पताका फहराने के लिए लंका-विजय करते हैं. बुद्ध और अशोक ने जो धम्मविजय की थी, उसका प्रमाण आज श्रीलंका में बौद्ध धर्म की उपस्थिति है. वहां 70 प्रतिशत लोग आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. उसके अलावा चीन, जापान, तिब्बत जैसे देषों में बौद्ध धर्म आज भी कायम है. जबकि हिंदू धर्म भारत से बाहर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहा. पेरियार के अनुसार—

‘बुद्ध के पहले राम-कथा छोटी-सी कहानी थी. बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का सामना करने के लिए उसमें बाद में भारी जोड़-तोड़ की गई. बौद्धों और जैनियों को नास्तिक, हत्यारा, डाकू, वैदिक संस्कृति का दुश्मन आदि कहा गया. पेरियार के शब्दों में शैव शिव से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें शक्ति दे ताकि वे बौद्धों की पत्नियों के साथ व्याभिचार कर सकें.’17

पेरियार के अनुसार 75 प्रतिशत से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध से बाद का है. पाश्चात्य विद्वानों का भी यही मत रहा है. बुद्ध के तर्कसंगत उपदेशों का प्रतिवाद करने के लिए पुराण लेखकों ने जिन्हें ऋषि कहा जाता था, अवतारवाद की परिभाषा गढ़ी. उन्होंने कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में चित्रित किया. उसका एक ही उद्देश्य था, लोगों को ब्राह्मणवाद की ओर आकर्षित करना. चमत्कारपूर्ण वर्णन जनसाधारण को हमेशा ही लुभाता आया है. गीता की रचना और भी बाद में हुई. उसके बाद ही उसे महाभारत में जोड़ा गया. लोकमानस में बुद्ध की प्रतिष्ठा को देखते हुए ब्राह्मणों ने मजबूरी में उनकी प्रषंसा की. अवतारवाद को संरक्षण देने के लिए बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित किया गया. उसके बहाने सनातनी हिंदू पुराणों के लेखनकाल को बुद्ध से बहुत पीछे तक ले जाते हैं. इस काम में संस्थाएं भी पीछे नहीं हैं—‘यह कहते हुए कि ब्रिटिश विद्वानों द्वारा लिखे गए इतिहास पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, उत्तर भारत में भारतीय विद्या भवन ने मूर्खतापूर्ण धार्मिक आख्यानों और अजनतांत्रिक धर्मशास्त्रों पर पर लिखना जारी रखा. के. एम. मुंशी उसके अध्यक्ष थे. डॉ. राधाकृष्णन तथा अरबपति बिरला उसके सदस्य थे. उन्होंने ‘वैदिक युग’ को लेकर पुस्तक तैयार की, जिसमें के. एम. मुंशी का बड़ा योगदान था. उन्होंने भी माना था कि प्राचीन युग असभ्य था. पुराण और महाकाव्य आदि ग्रंथ इतिहास नहीं हैं….वह सब कल्पना की उपज है. ‘व्यास’ शब्द का अर्थ किस्सागो है. पुराणों ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लिया और वे उनपर शासन करने लगे. हमारी समस्याओं का मूल कारण यही है.’

 

आजीवक दर्षनों के साथ-साथ बौद्ध, जैन दर्षन और सिख धर्म ने भी वेदों को प्रामाण्य मानने से इन्कार कर दिया था. ये धर्म-दर्षन किसी ईश्वर या आत्मा-परमात्मा पर विश्वास नहीं करते. इसलिए ब्राह्मण ग्रंथों में बौद्ध और जैन दोनों दर्शनों नास्तिक कहा गया है. एक स्थान पर पेरियार नास्तिक की परिभाषा करते हैं. उनके अनुसार बुद्ध सामान्य संज्ञा है. किसी भी व्यक्ति को जो बुद्धि का प्रयोग करता है, उसे बुद्ध कहा जा सकता है. ‘निश्चित रूप से मैं भी एक बुद्ध हूं. मैं ही क्यों, हम सभी जो तर्क और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करते हैं—बुद्ध हैं.’ इसी तरह सिद्ध वह व्यक्ति है जो अपनी ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण रख सकता है. वैष्णव और शैव किसी न किसी देवता को मानते हैं. यही स्थिति दूसरे संपद्रायों की है, वे भी किसी न किसी देवता में श्रद्धा रखते हैं. जहां देवता नहीं हैं, वहां गुरु है जो परोक्ष रूप में साकार या निराकार देवता से मिलवाने का दावा करता है. केवल बौद्ध धर्म ऐसा है जिसमें कोई केंद्रीय देवता नहीं है. न ही वह जीवन से इतर किसी सुख की दावेदारी करता है. वह किसी भी प्रकार के ईश्वर, आत्मा, लोक-परलोक, मोक्ष अथवा सनातनवाद को नकारता है. नास्तिक शब्द भी इसके करीब है. नास्तिक वह है जो आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को नकारता है; संसार और जीवन के बारे में बुद्धिसंगत निर्णय लेने का समर्थन करता है. ब्राह्मणवादी मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले को भी नास्तिक कहकर धिक्कारने लगते हैं. पेरियार के अनुसार नास्तिक होना, सही मायने में मनुष्य होना है. ऐसा मनुष्य जो न केवल अपने ऊपर अपितु पूरी मनुष्यता पर विश्वास रखता है.

भारतीय समाज धर्म के अलावा जाति के शिकंजे में भी फंसा हुआ है. ये दोनों ही तर्क और मानवीय विवेक के विरोधी है. इनकी ताकत मनुष्य की अज्ञानता में निहित है. इसलिए घूम-फिरकर वे आस्था और विश्वास पर लौट आते हैं. तयशुदा मान्यताओं पर तर्क करने और सवाल उठाने से उन्हें परेशानी होती है. इसलिए वे चाहते हैं कि अपनी विवेक-बुद्धि को बिसराकर मनुष्य केवल उनके कहे का अनुसरण करे. वेद, पुराण, गीता, रामायण आदि धर्मग्रंथों में जो लिखा है, उनपर आंख मूंदकर विश्वास कर लिया जाए. यही अतीतोन्मुखी दृष्टि ब्राह्मणवाद है; जो बार-बार पीछे की ओर ले जाती है और मानव-बुद्धि की विकासयात्रा का निषेध करती है. पेरियार इससे आजन्म जूझते रहे. इसके लिए उन्होंने किसी धर्म, व्यक्ति या राष्ट्र की परवाह तक न की. खुलकर कहा कि—

‘मैं मानव-समाज का सुधारक हूं. मैं किसी देश, ईश्वर, धर्म, भाषा अथवा राज्य की परवाह नहीं करता. मेरे सरोकार केवल मानवमात्र के कल्याण एवं विकास को समर्पित हैं.’ यही संकल्प क्रांतिधर्मी पेरियार तथा उनके विचारों को समसामयिक और प्रासंगिक बनाता है.

 

ओमप्रकाश कश्यप

 

संदर्भ:

1 जाति मदे च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब संति सब्बे तानीष खेत्तानि अयेसलानि

जाति मदो च अतिमानिता च लोभो च, दोसो च मदो च मोहो

ऐते अवगुणा येसुब न संति सब्बे तानीष खेत्तानि सुयेसलानि—मातंग जातक-497

  1.   अंबट्ठसुत्त, दीघनिकाय, 1/3
  2.   पेरियार, 1947 में सलेम कालिज में ‘हिंदू दर्शन’ पर दिया गया व्याख्यान
  3.   कुदी अरासु, 15 अगस्त 1926
  4.   कुदीअरासु, 2 दिसंबर, 1944
  5.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-208.
  6.   पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-227
  7. विदुथलाई, 14 मार्च 1954.
  8. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  9. विदुथलाई, 14 मार्च 1954, पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पृष्ठ-265
  10. छूआछूत पर पेरियार के विचार, मीना कंडास्वामी द्वारा तमिल से अंग्रेजी में अनूदित.
  11. विदुथलाई, 19 अप्रैल 1956,पेरियार व्यूज आन अनटचेबिलिटी, पेज-274-75
  12. कलेक्टिड वर्क्स आफ पेरियार, पृष्ठ-152
  13. कलेक्टिड वर्क्सआफ पेरियार, पृष्ठ-173
  14. विदुथलाई, 15 अगस्त 1957, पृष्ठ-300
  15. पेरियार आन बुद्धिज्म, रामास्वामी पेरियार, राम मनोहरन के आलेख ‘फ्रीडम फ्राम गाड: पेरियार एंड रिलीजन’ से उद्धृत
  16. कलेटिक्ट वर्क आफ पेरियार, पृष्ठ-306-307

 

 

बहुजन संस्कृति और सामाजिक न्याय

सामान्य
भारत के पास अनगिनत आख्यान हैं, इतिहास नहीं है.—हेनरी बर

 

‘संस्कृति’ समाजशास्त्र के सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले शब्दों में से है. प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके अलग-अलग संदर्भ होते हैं. कई बार परंपरा को संस्कृति समझ लिया जाता है. जबकि अनेक बार लोग संस्कृति और सामान्य व्यवहार के बीच अंतर नहीं कर पाते. जनसामान्य ‘संस्कृति’ को सलीके से परिभाषित भले ही न कर पाए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति से उसके सामान्य व्यवहार, कार्यकलापों, सामाजिक-पारिवारिक जीवन की प्रेरणाओं के बारे में प्रश्न किया जाए तो बिना झिझके उसका एक ही उत्तर होगा—‘यही मेरी संस्कृति है.’ संस्कृति मनुष्य और समाज के संबंधों को न केवल व्याख्यायित करती है, अपितु उन्हें सफल एवं सार्थक भी बनाती है. संस्कृति के स्वरूप, उसकी अवधारणा, परिभाषा आदि को लेकर समाजविज्ञानियों के बीच मतभेद रहे हैं. कई बार लोग संस्कृति को मनुष्य के सामान्य व्यवहार से जोड़ने लगते हैं तो कई बार उसे सभ्यता के साथ गड्मड कर दिया जाता है. किसी व्यक्ति अथवा समाज के संदर्भ में संस्कृति उसके समग्र ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला, रोजमर्रा के व्यवहारों, संबंधों, रीति-रिवाजों, परंपराओं आदि का समुच्चय होती है.

संस्कृति का कोई एक स्रोत नहीं होता. मनुष्य संस्कृति के तत्व माता-पिता, गांव-पड़ोस, रीति-रिवाज, किस्से-कहानियों, साहित्य-कला, ज्ञान-विज्ञान आदि विविध स्रोतों से ग्रहण करता है तथा उन्हें अपनी अस्मिता और पहचान के रूप में सहेजकर रखता है. इस तरह कि वे उसके रोजमर्रा के व्यवहार, ज्ञान, सामाजिक संबंधों और मर्यादाओं का आधार बन जाते हैं. दूसरे शब्दों में संस्कृति उत्तराधिकार का विषय है. व्यक्ति अथवा समाज जिन आदतों को यत्नपूर्वक अपनी विरासत के तौर पर संभाले रहता है, जिनसे उसकी विशिष्ट पहचान बनती है, उनका समन्वित, समावेशी और लोकोपकारी रूप संस्कृति कहा जा सकता है. उनमें कला, साहित्य, अर्जित ज्ञान, रीति-रिवाज, परंपराएं, सामूहिक प्रवृत्तियां, खान-पान, आचार-व्यवहार आदि सब सम्मिलित होते हैं. इसके अलावा उसमें वे आदर्श और नियम भी समाहित होते हैं, जिन्हें कोई समाज खुद को दूसरों से अलग और बेहतर दिखाने तथा स्थायित्व की भावना के साथ अपनाता है. मनुष्य की भौगोलिक और परिस्थितिकीय विशेषताएं भी उसकी संस्कृति को प्रभावित करती हैं.

‘संस्कृति’ शब्द ‘सम्’ और ‘कृति’ की संधि से बना है. उसका आशय ऐसी अमूर्त्त सामाजिक संरचना से है, जिसमें सभी का साझा हो. संस्कृति और सभ्यता को प्रायः एक-दूसरे के पर्यायवाची के रूप में देखा जाता है. लेकिन दोनों में अंतर है. सभ्यता की कसौटी भौतिक जगत की उपलब्धियां तथा उनके फलस्वरूप जीवन में आए परिवर्तन को माना जाता है. सभ्यता संस्कृति से प्रभावित होती है, एक तरह से उसका हिस्सा भी है, लेकिन वह स्वयं संस्कृति नहीं होती. ऐसे ही जैसे भाषा ज्ञान की वाहक होती है, स्वयं ज्ञान नहीं होती. हां, भाषा का ज्ञान हो सकता है, जो मनुष्य की संपूर्ण ज्ञान-संपदा का मामूली हिस्सा है. इसी तरह मनुष्य अथवा समाज की भौतिक उपलब्धियां संस्कृति नहीं होतीं. सभ्यता को आमतौर पर संस्कृति का उत्पाद माना जाता है. लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है. सभ्यता और संस्कृति का संबंध अन्योन्याश्रित होता है, जिनमें संस्कृति का स्थान अपेक्षाकृत ऊपर माना जाता है. अपनी हर उपलब्धि के लिए सभ्यता संस्कृति की ऋणी रहती है. उसे हम संस्कृति का आवरण भी कह सकते हैं. परोक्षतः दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. किसी समूह अथवा समाज की सभ्यता को उसकी संस्कृति अथवा संस्कृतियों का समुत्पाद भी कहा जा सकता है.

संस्कृति और व्यवहार में भी अंतर है. लोग संस्कृति को रोजमर्रा के आचरण के रूप में देखने की भूल कर बैठते हैं. यह गलत है. मनुष्य का नैमत्तिक व्यवहार कानून, समाज, बाजार आदि से प्रभावित हो सकता है. उसका अध्ययन मानव-व्यवहार के अंतर्गत आता है. इस तरह वह मनोविज्ञान की विषय-वस्तु है. संस्कृति व्यवहार भी नहीं होती. उसे व्यवहार की नियंत्रक शक्ति अवश्य कहा जा सकता है. कोई भी सामाजिक अथवा व्यक्तिगत व्यवहार संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, उसे संस्कृति नहीं माना जा सकता. कारण यह कि व्यवहार मूर्त्त होता है, संस्कृति अमूर्त्त. होली के पर्व पर एक-दूसरे पर रंग डालना अथवा रक्षाबंधन के अवसर पर बहन द्वारा भाई को राखी बांधना, सहज सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार का हिस्सा हैं, स्वयं संस्कृति नहीं है. संस्कृति उनमें अंतर्निहित प्रेरणा है. ऐसी अंतश्चेतना जो मनुष्य को अधिकाधिक सभ्य तथा प्राणिमात्र के प्रति अधिकतम उपयोगी होने का उत्साह जगाती है. मनुष्य ऐसी प्रेरणाओं को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर सकता है. उनके स्वरूप में थोड़ा-बहुत परिवर्तन ला सकता है, किंतु सामाजिक पहचान से जुड़े होने के कारण उन्हें पूर्णतः नकार नहीं सकता. कुल मिलाकर समाज अथवा व्यक्ति-विशेष के संदर्भ में संस्कृति को हम उसकी सामूहिक आदतों, स्वभाव, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य आदि के समुच्चय के रूप में देख सकते हैं.

अपने मूल विषय ‘बहुजन संस्कृति’ लौटने से पहले आवश्यक है कि ‘बहुजन’ की अवधारणा तय कर ली जाए. ‘बहुजन’ का अभिधार्थ ‘बहुसंख्यक जन’ अवश्य है, लेकिन इसका आधार मात्र संख्याबल नहीं है. संख्या के माध्यम से बहुजन को परिभाषित करने के अनेक खतरे हैं. इससे ‘बहुजन’ को संख्याबल समझ लिए जाने की संभावना बराबर बनी रहेगी. वह भीड़ को समाज का दर्जा देने के बराबर होगा. प्रकारांतर में वह अनेक भ्रांतियों को जन्म देगा. पुनश्चः ‘बहुजन’ और ‘बहुसंख्यक जन’ दोनों को एक मान लिया गया तो अल्पसंख्यक मुस्लिमों के मुकाबले हिंदू बहुजन होंगे तथा दलितों के सापेक्ष पिछड़ी जातियों के लोग. इस कसौटी पर आदिवासियों के मुकाबले गैर आदिवासी ‘बहुजन’ माने जाएंगे. यह विभाजन आगे भी बढ़ता जाएगा. एक समय ऐसा भी आ सकता है जब बहुजन की संकल्पना का आधार और उद्देश्य दोनों समाप्त हो जाएं. जैसे ‘बहुजन’ को ‘बहुसंख्यकजन’ नहीं कहा सकता, ऐसे ही ‘बहुजन’ के आधार पर ‘बहुजनवाद’ जैसी भी संकल्पना भी अनुचित कही जाएगी. उससे उसके ‘बहुसंख्यकवाद’ में बदलने की संभावना बनी रहेगी. अतएव ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने के लिए संख्या-तत्व को नजरंदाज करना ही उचित होगा.

फिर ‘बहुजन’ किसे माना जाए? इस शब्द का प्रथम उपयोग बौद्ध दर्शन में प्राप्त होता है. बुद्ध इसे परिभाषित नहीं करते, किंतु जिस संदर्भ में वे इसका प्रयोग करते हैं, उससे ‘बहुजन’ की अवधारणा साफ होने लगती है. भिक्षु संघ को संबोधित करते हुए वे कहते हैं—‘चरथ भिक्खवे चारिकम्-बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय.’ ‘हे भिक्षु! बहुजन कल्याण और बहुजन-हित के लिए निरंतर प्रयाण करते रहो.’ बुद्ध राज-परिवार में जन्मे थे. समकालीन राजाओं, विशेषकर श्रेष्ठिवर्ग पर उनका प्रभाव था. फिर भी वे भिक्षुसंघ से ‘बहुजन’ के कल्याण हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहने की कामना करते हैं. आखिर क्यों? तत्कालीन सामाजिक स्थितियों को देखते हुए इसे समझ पाना कठिन नहीं है. उस समय तक वर्ण-व्यवस्था कट्टर रूप ले चुकी थी. कर्मकांड शिखर पर था. लोग जाति देखकर व्यवहार करते थे. इस मामले में सर्वाधिक मुखर ब्राह्मण थे. उनका दावा था कि उन पर सृष्टि-रचियता ब्रह्मा की विशेष कृपा है. जिसने उन्हें अपने मुख से पैदा किया है. निहित स्वार्थ के लिए उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों अग्नि, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी आदि का देवताकरण किया था और लगातार यह प्रचारित करते रहते कि वे यज्ञों के माध्यम से देवताओं के संपर्क में रहते हैं. दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था, जिसे समाज की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. देवताओं की दुहाई देते-देते ब्राह्मण खुद देवता होने का गुमान करने लगे थे, जबकि क्षत्रिय राज्य के रखवाले से उसका स्वामी बन बैठे थे. स्वार्थ के लिए ब्राह्मण क्षत्रिय का महिमामंडन करता था, क्षत्रिय ब्राह्मण के पांव पखारता था.

तीसरा व्यापारी वर्ग था. पहले दो वर्गों की तरह अनुत्पादक वर्ग. उसका कार्य दूसरों के उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाना था. मुनाफे का एक हिस्सा ब्राह्मण और क्षत्रिय को भेंट कर वह मस्त रहता था. शेष जनसमाज यानी चौथे वर्ग में किसान, मजदूर, शिल्पकार आदि सभी आते थे. उनपर समाज के विकास की जिम्मेदारी थी, परंतु थे सब दूसरों की मर्जी के दास. किसी को अपनी रुचि और हितों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता न थी. किसान खेत में पसीना बहाता था, मगर फसल पर उसका अधिकार न था. वह राजा और सामंत की मान ली जाती थी. शिल्पकार अपनी कला से संस्कृति और सभ्यता को संवारने का काम करते थे, किंतु अपने ही श्रम-कौशल पर उनका अधिकार न था. उनके श्रमोत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार व्यापारी वर्ग के पास था. शूद्र का कर्तव्य था राज्य के लिए कर और ब्राह्मण के लिए दान देना. वफादार रहना तथा उनके प्रत्येक आदेश  को कृपा-भाव के साथ ग्रहण करते हुए दासत्व का धर्म निभाना. इसी में उसकी मुक्ति है—ऐसा कहा जाता था.

संख्याबल में ऊपर के तीनों वर्ग शेष जनसमाज के सापेक्ष बहुत कम थे. कुल जनसंख्या का बमुश्किल पांचवा हिस्सा. लेकिन समाज के कुल संसाधनों पर उनका अधिकार था. इसलिए संख्या-बहुल होने के बावजूद निचले वर्ण के लोग ऊपर के तीन वर्गों की मनमानी सहने के लिए विवश थे. कार्य-विभाजन के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज के बहुसंख्यक हिस्से को छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में बांट दिया था. बहुजन के पास बुद्धि थी, हस्तकौशल था, अनथक परिश्रम करने का हौसला तथा ईमानदारी भी थी. नहीं था तो आत्मविश्वास और सपने जो जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. ये सब सेवा-भाव की भेंट चढ़ चुके थे. निरंतर बढ़ते सामाजिक दबावों तथा यह भ्रम कि ईश्वर एकमात्र और सच्चा न्यायकर्ता है, कि इस जीवन में उन्हें जो खोना पड़ रहा है वह मृत्योपंरात जीवन में सहज प्राप्त होगा—के चलते वे पूर्णतः नियतिवादी हो चुके थे. अपने सामान्य हितों के बारे में निर्णय लेने के लिए भी वे समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे; तथा उन्हें अपना स्वामी, सर्वेसर्वा एवं मुक्तिदाता मानते थे. हालात ऐसे थे कि अपने प्रत्येक कार्य में स्वार्थ को आगे रखने वाले तीनों शीर्षस्थ वर्गों के बीच अभूतपूर्व एकता थी, जबकि चौथा और बहु-संख्यक वर्ग सामान्य हितों के लिए एक-दूसरे के साथ स्पर्धा करता हुआ, अपनी प्रभावी ताकत खो चुका था. ‘दिमाग’ और ‘हाथों’ की उस अघोषित-अवांछित स्पर्धा में लाखों हाथ, कुछ सौ या हजार दिमागों की मनमानी के समक्ष बेबस थे. ‘बहुजन’ से बुद्ध का आषय ऐसे ही लोगों से था, जो समाज के प्रमुख कर्ता और उत्पादक वर्ग का हिस्सा होने के बावजूद उपेक्षित, तिरष्कृत, उत्पीड़ित और इस कारण विपन्नता का जीवन जीने को विवश थे. अपने जीवन संबंधी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए वे ऐसे लोगों पर निर्भर थे जो उन्हीं के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन से शक्तिशाली होकर बहुजन-हितों के विपरीत कार्य करते थे.

कदाचित अब हम ‘बहुजन’ की अवधारणा तय करने की स्थिति में आ चुके हैं. अभी तक के विवरण जो छवि बनती है, उसके अनुसार ‘बहुजन’ समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, जो कभी जाति तो कभी धर्म के नाम पर आरंभ से ही अन्याय, असमानता और शोषण का शिकार रहा है. मानव सभ्यता उसके स्वेद-बिंदुओं की ऋणी है, फिर भी उसे किसी न किसी रूप में, उसके श्रम-लाभों से वंचित रखा गया है. वह खेतों में काम करने वाला मजदूर हो सकता है; और गली-नुक्कड़ पर जूते गांठने वाला मोची भी. स्त्री भी हो सकता है, पुरुष भी. आजीविका उसका धर्म है. वही उसका भरोसा भी. इसी कारण बुद्ध पूर्व भारत में वह आजीवक कहलाता था. उन दिनों प्रकृति पर उसे भरोसा था. वही उसकी श्रद्धा का पात्र भी थी. प्रकृति के प्रति सम्मान-भाव के साथ जिस दर्शन की रचना उसने की थी, विद्वत जगत में वह लोकायत के रूप में ख्यात हुआ. उसकी सहायता से शताब्दियों तक वे लोग आंडबर और याज्ञिक कर्मकांडों पर टिके वैदिक धर्म-दर्शन को चुनौती देता रहा. इस तरह बहुजन की अवधारणा हमें सामाजिक न्याय की भावना से जोड़ती है. अपने साथ-साथ दूसरों के कल्याण के लिए जिम्मेदार बनाती है. यही उसका उद्देश्य है और यही अभीष्ट भी है. हालांकि सामाजिक न्याय की अवधारणा को लेकर मत-वैभिन्न्य हो सकते हैं.

मार्क्स ने पूंजीवादी तंत्र में उत्पीड़ित वर्ग को ‘सर्वहारा’ का नाम दिया था. ‘सर्वहारा’ और ‘बहुजन’ की आर्थिक अवस्था में अधिक अंतर नहीं होता. दोनों ही शोषण का शिकार होते हैं. उनमें से किसी को भी अपने श्रम के मूल्यांकन का अधिकार नहीं होता. फिर भी दोनों की सामाजिक स्थिति में अंतर है. मार्क्स का जन्म ऐसे समाज में हुआ था जहां जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर विभाजन न था. अतएव सर्वहारा की उसकी परिकल्पना ठेठ पूंजीवादी समाज में आर्थिक विपन्नता के शिकार श्रमिक-वर्ग के शोषण तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्परिणामों तक सीमित थी. बहुजन की समस्याओं का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव होते हैं. प्रकारांतर में वही उसकी समाजार्थिक दुरावस्था का कारण बनते हैं. मुख्यधारा से जुड़ने के लिए सर्वहारा को आर्थिक बाधाएं पार करनी पड़ती हैं. जबकि बहुजन को आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. चूंकि सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की गति अत्यंत मंथर होती है, इसलिए बहुजन-कल्याण की राह हमेशा अनेकानेक चुनौतियों से भरी होती है. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर सर्वहारा अपनी स्थिति में सुधार ला सकता है. पश्चिमी देशों में ऐसा हुआ भी है. जाति के संबंध में लोकतांत्रिक सरकारें भी अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पातीं. प्रतिगामी शक्तियां जाति को व्यक्ति का निजी मामला बताकर सामाजिक परिवर्तन को टालती रहती हैं. सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव तथा अवसरों की कमी के कारण बहुजन के लिए आर्थिक विषमताओं के चक्रव्यूह को भेद पाना आसान नहीं होता. जटिल जाति-व्यवस्था तथा उसके साथ धर्म का चिरस्थायी गठजोड़, बहुजन के संघर्ष को कई गुना बढ़ा देते हैं.

‘बहुजन’ का प्रथम उल्लेख भले ही बौद्ध दर्शन में हुआ हो, इसकी भूमिका वैदिक संस्कृति की स्थापना के साथ ही बन चुकी थी. लगभग 1500 ईस्वी पूर्व मध्य एशिया से भारत पहुंचे पशुचारी कबीलों ने खुद को ‘आर्य’ कहा था. इसका अर्थ बताया जाता है—‘श्रेष्ठ’ अथवा ‘श्रेष्ठजन.’ इस संबोधन का आशय था—मूल भारतवासी अथवा उनसे हजारों वर्ष पहले से इस देश में बस चुके जनसमूहों की संस्कृति को हेय मान लेना. भारत के मूल निवासी कौन थे? विद्वान दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में अग्रणी सिंधू सभ्यता को अनार्य सभ्यता मानते हैं. डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी अपने ग्रंथ ‘हिंदू सभ्यता’(राजकमल प्रकाशन, पांचवा संस्करण, 1975, पृष्ठ 46) में मोहनजोदड़ो से प्राप्त नरकंकालों के आधार पर सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को चार नस्लों में बांटते हैं—आद्य-निषाद, भूमध्य सागर से संबंधित जन, अल्पाइन तथा मंगोल, किरात. आगे वे लिखते हैं कि आद्य-निषाद भारत महाद्वीप के निवासी थे. भूमध्यसागरीय लोग दक्षिण एशिया से आए थे. अल्पाइन पश्चिमी एशिया तथा मंगोल, किरात वर्ण के लोग पूर्वी एशिया से पलायन कर लंबी यात्रा के उपरांत भारत पहुंचे थे. इनके अलावा  अलग-अलग नस्ल के संसर्ग से जन्मीं संकर नस्लें भी थीं. ऋग्वेदादि ग्रंथों में आर्यजनों ने इन्हीं नस्लों के सापेक्ष जो उनसे सहस्राब्दियों पहले इस प्रायद्वीप पर आकर बस चुकी थीं; तथा अपने श्रम-कौशल के बल पर समृद्ध सभ्यता की स्वामिनी थीं—अपनी वर्ण-श्रेष्ठता का दावा किया है. यदि उनके दावे को स्वीकार कर लिया जाए तो समकालीन बाकी नस्लें जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, तुलनात्मक रूप से अश्रेष्ठ अथवा निकृष्ट सिद्ध होती हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इसे वैदिक ब्राह्मणों की आत्ममुग्धता से अधिक मानने को तैयार नहीं है. आज यह प्रमाणित है कि सिंधू घाटी की सभ्यता ऋग्वैदिक सभ्यता की अपेक्षा 1500-2000 पुरानी तथा उससे कहीं अधिक समृद्ध और सुव्यवस्थित थी. पुरातत्ववेत्ता सिंधू सभ्यता की शुरुआत 3200 ईस्वी पूर्व से मानते हैं. 2300 ईस्वी पूर्व से 1750 ईस्वी पूर्व तक वह सभ्यता अपने वैभव के शिखर पर थी. उसके बाद उसके पराभव का दौर शुरू हुआ. 1500 ईस्वी पूर्व में जब आर्यों ने जब भारत में प्रवेश किया, उस समय वह सभ्यता करीब-करीब मिट चुकी थी. उसके अवशेष हड़प्पा, मोहनजोदड़ो’, कालीबंगा, लोथल, मेहरगढ़ जैसे दर्जनों स्थानों पर आज भी सुरक्षित हैं. सिंधुवासियों को दुनिया की सबसे पुरानी और समृद्ध नागरिक सभ्यता की नींव रखने वाला बताया जाता है. पुरातत्ववेत्ता इस बात पर सहमत हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का कुल क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान के क्षेत्रफल से भी अधिक था.

भारतीय इतिहास के संदर्भ में 1500 ईस्वी पूर्व से 700 ईस्वी पूर्व तक के समय को विद्वान ‘अंधकार युग’ मानते हैं. इसलिए कि उस कालखंड के बारे में हमें प्रामाणिक तौर पर कुछ भी ज्ञात नहीं है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेदादि श्रुति ग्रंथों का रचनाकाल भी यही कालखंड है. लेकिन ये ग्रंथ 700 ईस्वी पूर्व में भी लिखित रूप में मौजूद थे, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. दूसरी ओर यह प्रमाणित तथ्य है कि सिंधू सभ्यता के निर्माताओं को न केवल लिपि बल्कि संख्याओं, वास्तविक और प्रतीक मुद्रा तथा उनके अनुप्रयोगों की भी पर्याप्त जानकारी थी. उनके खेती के तरीके विकसित थे. इतने विकसित कि भारत में बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक भी उनमें खास परिवर्तन नहीं हो पाया था. उनके पास सुनियोजित व्यापार-तंत्र और ऐसी भाषा थी, जिसके माध्यम से वे समकालीन सभ्यताओं से संवाद करने में सक्षम थे. जबकि आर्यजन महज घुमंतु पशुचारी कबीले थे. सभ्यता की दृष्टि से सिंधुवासियों से लगभग हजार साल पिछड़े हुए. इसके बावजूद यदि उन्होंने स्वयं को ‘आर्य’ यानी ‘श्रेष्ठजन’ कहा, तो इसके दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहला या तो वे सिंधू घाटी की सभ्यता के प्राचीन वैभव तथा उसके महत्त्व से अपरिचित थे. अथवा यह संबोधन उन्होंने बहुत बाद में अनार्यजनों पर अपनी सांस्कृतिक विजय, वैदिक संस्कृति की स्थापना के समय चुना था. वे जानते थे कि अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ बताए बिना जीत को स्थायी बनाना और मूल-भारतवासियों पर ‘आर्यत्व’ को थोप पाना असंभव है. ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक वह लक्ष्य ही बना रहा. यह भी संभव है कि ‘आर्य’ संबोधन मध्य एशिया से प्रयाण से पहले ही उनके साथ जुड़ा हो और उसका अभिप्राय ‘श्रेष्ठजन’ न होकर कुछ और हो. ऋग्वेद को प्राचीनतम वेद, हिंदुओं का पवित्रतम ग्रंथ, जिसकी रचना ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए की गई है—माना जाता है. उसके आरंभिक उद्गाता ऋषियों में सभी वर्णों के रचनाकार सम्मिलित हैं.

वेदादि ग्रंथों को ‘ब्राह्मण-ग्रंथ’ कहने की प्रवृत्ति बहुत बाद में, कदाचित यजुर्वेद की रचना के समय हुई. उस समय तक उस समय तक ‘पुरोहित’, ‘राजा’, सम्राट जैसे पदों का सांस्थानीकरण हो चुका था. धर्म और राजनीति दोनों ही व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन चुके थे. वैदिक कर्मकांड जो उससे पहले तक मुख्यतः आश्रमों तक सीमित थे, वे राजा-महाराजाओं तथा धनी व्यापारियों के घर-आंगन तक पहुंचकर वैभव-प्रदर्शन के काम आने लगे थे. ब्राह्मणों की पूरी मेधा यज्ञादि कर्मकांडों को विस्तार देने में जुटी थी. चतुर्भुजी ब्रह्मा के हाथ में ‘ऋग्वेद’ के बजाय ‘यजुर्वेद’ की प्रति का होना, वैदिक धर्म-दर्शन की परपंरा में कर्मकांडों के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है. ऐसे में ज्ञान की परंपरा का अवरुद्ध होना स्वाभाविक था. वही हुआ भी. उसके तुरंत बाद पौराणिक लेखन की बाढ़-सी आ गई, जिसने उस समय तक उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान और ऐतिहासिक तत्वों का मिथकीकरण करने का काम किया.

ऋग्वेद में अनार्य पुरों के ध्वंस का जगह-जगह वर्णन है. लेकिन ऋग्वेद की रचना का जो काल है, उस समय तक सिंधु सभ्यता का पराभव हो चुका था. इसलिए संभावना यही बनती है कि ऋग्वैदिक आर्यों ने सिंधु-घाटी के उन नगरों और पुरों पर हमला किया था, जो प्रकृति की मार के चलते पहले से ही निष्प्रभ हो चुके थे. पराजित अनार्यों में से कुछ यहां-वहां छिटक गए. जो बचे उन्हें लेकर ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य समाज की नींव रखी. चातुर्वर्ण्य समाज की अवधारणा कदाचित आर्यों की प्राचीन स्मृति का हिस्सा थी. गौरतलब है कि प्राचीन मिस्र तथा पर्शिया में भी चातुर्वर्ण्य वर्ण-व्यवस्था प्रचलित थी. अवेस्ता(यसना, 19/17, फ्रे) में जिन चार वर्णों का उल्लेख मिलता है, वे हैं—असर्वण(पुरोहित वर्ग), अर्तेशत्रण(क्षत्रिय), डबेरियन(वैश्य) तथा वास्त्रोषण(शूद्र). ध्वनि के आधार पर आर्य शब्द ‘असर्वण’ के अपेक्षाकृत निकट है. अवेस्ता में ‘असर्वण’ को वर्ण-क्रम में पहला स्थान पर रखा गया है. संभव है ‘आर्य’ शब्द की उत्पत्ति पार्शियन ‘असर्वण’ से हुई हो; या फिर ‘आर्य’ की अवधारणा के मूल में इस शब्द का प्रभाव रहा हो. ‘अवेस्ता’ के अनुसार ‘अहुरमज्द’ एक प्रमुख देवता है. उसे सृष्टि निर्माता और उसका पालक माना गया है. मान्यतानुसार उसने कई द्वीपों की रचना की थी. भारत में प्रवेश के बाद ‘अहुरमज्द’ का ‘अहुर’ ही प्रकारांतर में ‘असुर का रूप ले लेता है. इससे एक संभावना यह भी बनती है कि भारत पहुंचे आर्य कबीले अपने मूल प्रदेश की संस्कृति का प्रतिपक्ष थे. ‘अहुरमज्द’ को सर्वोच्च पद का दिया जाना, उन्हें स्वीकार न था. इसलिए भारत पहुंचकर उन्हें जैसे ही अवसर मिला, ‘अहुरमज्द’ को नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक असुर में ढाल दिया गया. भारत में आर्यों का आगमन अलग-अलग समय में टुकड़ियों के रूप में हुआ था. उधर ऋग्वेद में ‘असुर’ का प्रयोग अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में हुआ है. इससे एक संभावना यह भी है कि अलग-अलग समय में आने वाली आर्य-टोलियां भिन्न समाज और संस्कृतियों से संबंधित थीं. यह भी संभव है कि ‘असुर’ शब्द का प्रयोग पहले ‘अच्छे’ के संदर्भ में होता हो, उसे ‘बुरे’ का प्रतीक और आर्यों का दुश्मन बाद में माना गया हो. मानव-संस्कृति के इतिहास में ऐसे बदलाव स्वाभाविक कहे जा सकते हैं. उन्हें हम समाज में निरंतर बदलते शक्ति-केंद्रों का परिणाम भी कह सकते हैं. आरंभ में गणेश को ‘विघ्नकर्ता’ देवता माना जाता था. प्राचीनतम उल्लेखों में उन्हें कर्मकांड और आडंबरों का विरोधी दर्शाया गया है. आगे चलकर वे हिंदुओं के प्रमुख देवता के रूप में प्रतिष्ठित होकर, ‘विघ्नहर्ता’ मान लिए जाते हैं. ऐसे ही शिव जो पहले अनार्यों के लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित थे, उन्हें देवताओं की तिकड़ी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया.

शिव को संहार का देवता माना जाता है. यह मिथ शिव की अनार्य समूहों के बीच महत्ता को दर्शाता है. भारत में आर्यों का आगमन भले ही उस युग में हुआ हो जब प्राचीन सिंधु सभ्यता का वैभव लुट चुका था. तो भी भारत पहुंचने के बाद उनके लिए यहां के निवासियों पर जीत हासिल करना आसान नहीं रहा होगा. शिव पूरे सिंधु प्रदेश के प्रतिष्ठित लोकनायक थे. उस समय के सभी अनार्य समूहों पर उनका प्रभाव था. इसलिए भारत आने के साथ ही आर्यों को शिव के समर्थकों से जूझना पड़ा होगा. संस्कृत ग्रंथों में इस बात के प्रमाण हैं कि अनार्यों के साथ आरंभिक युद्धों में आर्यों को पराजय का सामना करना पड़ा था. बल्कि लंबे समय तक जीत उनके लिए सपना ही बनी थी. मजबूरी में आर्यों से सहमति और समझौते से काम लिया. वह समझौता था, अनार्य महानायक शिव को आर्य देवताओं के बराबर का दर्जा देना. उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करना. चूंकि वे शिव के पीछे निहित अनार्य कबीलों की जनशक्ति से परिचित हो चुके थे, और परोक्ष रूप में उसका डर भी उनके मनो-मस्तिष्क पर सवार रहता था, कदाचित उसी भय ने उन्हें शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश किया था. आदिवासी आज भी खुद को हिंदू धर्म से अलग मानते हैं. कहते हैं कि उनके पूर्वज वैदिक कर्मकांडों के कटु आलोचक; तथा ‘वर्ण-श्रेष्ठता की सैद्धांतिकी’ का विरोध करते थे.

यहां कुछ प्रश्न एकाएक खड़े हो जाते हैं. पहला यह कि सभ्यताकरण की अनिवार्यता के रूप में कार्य-विभाजन तो दूसरे देशों भी हुआ था. सभ्यताकरण की शुरुआत भी लगभग साथ-साथ हुई थी. अपने आदर्श समाज में प्लेटो ने भी लोगों को तीन वर्गों—स्वर्ण, रजत तथा कांस्य में बांटने की अनुशंसा की थी. भारत की भांति जापान, कोरिया, स्पेन तथा पुर्तगाल के लैटिन अमेरिकी उपनिवेशों, अफ्रीका आदि देशों में भी जातिप्रथा का प्रभाव था. जापान के ‘बराकुमिन’(burakumin) तथा कोरिया के ‘बीकजियोंग’(baekjeong) के हालात भारत के दलितों के समान ही थे. यमन में अल-अखदम(al-Akhdham, Khadem) की स्थिति भारतीय शूद्रां जैसी थी. उन्हें भी जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता था. इनके अलावा पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों का समाज भी छोटी-छोटी जातियों और वर्गों में विभाजित था. विभिन्न जातियों के बीच ऊंच-नीच की भावना भी प्रबल थी. फिर बाकी देशों विशेषकर पश्चिमी देशों के सभ्यताकरण तथा भारत के सभ्यताकरण के परिणामों के बीच भारी अंतर क्यों मिलता है?

इस रहस्य को सभ्यताओं के विकास की सामान्य पड़ताल द्वारा समझा जा सकता है. सुकरात ने जीवन और समाज में नैतिकता की व्याप्ति पर जोर दिया था. गुरु सुकरात के सपने को लेकर प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में आदर्श समाज की परिकल्पना की थी. उसने किशोरावस्था के आरंभ से ही बच्चों को माता-पिता से दूर, उनकी पैत्रिक को पहचान छिपाकर, राज्य के संरक्षण में रखने की सिफारिश की थी. उसके आदर्श राज्य में बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा की संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य की थी. एक उम्र तक शिक्षा का स्वरूप भी एक समान था. जबकि भारत में शिक्षा का स्वरूप वर्णानुसार परिवर्तनशील था. वैदिक ज्ञान केवल ब्राह्मण की संतान के लिए सुलभ था. क्षत्रिय और वैश्य की संतान को क्रमशः युद्ध-कौशल और व्यापारिक हिसाब-किताब से संबंधित शिक्षा देने का विधान था. शूद्र के लिए ज्ञान और शिक्षा के अवसर सर्वथा वर्ज्य थे. व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्रता का कोई महत्त्व नहीं था. पुत्र पिता की आजीविका को अपनाने के लिए बाध्य था. जबकि प्राचीन यूनान में सभी के लिए सैन्य शिक्षा एवं सेवा अनिवार्य थीं. तदोपरांत व्यक्ति की योग्यता तथा चारित्रिक विशेषताओं के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाती थी. व्यक्ति को जन्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न झेलना पड़े, इसके लिए प्लेटो ने साहसपूर्वक परिवार संस्था की भी उपेक्षा की थी. उसके बाद आए अरस्तु ने हालांकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी अनुशंसाओं को नकार दिया, परंतु जीवन और समाज में न्याय एवं नैतिकता के महत्त्व से उसे भी इन्कार न था. ‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ राज्य’ बना सकती है, कहकर उसने जीवन व्यक्तिमात्र के महत्त्व को स्थापित किया था. जिसे आधुनिक लोकतंत्र की आरंभिक प्रेरणा भी मान सकते हैं.

सच यह भी है कि सुकरात से लेकर अरस्तु तक सभी प्रमुख दार्शनिक दास प्रथा के समर्थक थे. और उसे उत्पादकता के स्तर को बनाए रखने के आवश्यक मानते थे. अरस्तु जैसा वैज्ञानिक सोच वाला विचारक जिसने प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत शोध किए थे, उत्पादकता में सुधार के लिए विज्ञान और तकनीक के प्रयोग हेतु कोई सुझाव नहीं देता. चूंकि दास के रूप में सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध था, जिसे वे विकास हेतु अपरिहार्य मान चुके थे—इस कारण उत्पादन वृद्धि हेतु विज्ञान और तकनीक के प्रयोग की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता. कुल मिलाकर विश्व के इन महानतम विचारकों द्वारा दास-पृथा को समर्थन, आगे चलकर में मानव-सभ्यता के विकास का अवरोधक सिद्ध हुआ. इस कमी के बावजूद प्राचीन यूनानी दर्शन में कुछ ऐसा अवश्य था, जो विचारकों की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहा. वह था—मनुष्य को सभ्यता और संस्कृति के केंद्र में रखकर सोचना, तथा जीवन में नैतिकता को अत्यधिक महत्त्व देना, यही विशेषताएं आगे चलकर आधुनिक मानवतावादी दर्शनों की प्रेरणा बनी.

भारत में नैतिकता धर्म का उत्पाद उसका एक लक्षण मानी गई है. अधिकांश मामलों में तो धर्म और नैतिकता में कोई अंतर ही नहीं किया जाता. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. एक प्रकार से धर्म भी मनुष्य की वैचारिक और आचरण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. बुराई तब उत्पन्न होती है जब उसकी प्रेरणा का आधार मानवेत्तर शक्तियों को मान लिया जाता है; तथा धर्म की आड़ लेकर कुछ लोग स्वार्थवश देवताओं को, जिनकी हैसियत मिथकीय पात्रों जैसी होती है—मनुष्य के सापेक्ष अतिरिक्त महत्त्व देने लगते हैं. कहने को प्रत्येक धर्म समानता के दावे के साथ जीवन में अपनी जगह बनाता है. परंतु उसकी समानता आभासी होती है. तरह-तरह की असमानताओं से जूझ रहे लोगों को फुसलाने के लिए धर्म ईश्वर के दरबार में बराबरी का भरोसा देता है. उसका वास्तविक जीवन में कोई महत्त्व ही नहीं है. वह जीवन और समाज में कुछ व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूहों के विशेषाधिकार को भी वैध ठहराता है. उसके प्रभाव में कुछ व्यक्तियों को सर्वेसर्वा और खास; जबकि बहुसंख्यक वर्ग को नगण्य एवं उपेक्षित मान लिया जाता है. भारतीय समाज की पहचान बन चुकी इस कुवृत्ति का दुष्परिणाम यह हुआ है कि जो कार्य अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा रखते थे, उन्हें पूरी तरह शूद्रों तथा दासों के हवाले कर दिया गया. चूंकि संख्याबल में यह वर्ग तीनों शीर्षस्थ वर्गों की अपेक्षा अधिक था, समाज की जरूरत का उत्पादन उपलब्ध श्रम-शक्ति से आसानी से हो जाता था. इसलिए उत्पादन को बढ़ाने या उत्पादन प्रक्रिया को सरलीकृत करने का कार्य लंबे समय तक टलता रहा.

आने वाली शताब्दियों में यूनान का प्राचीन वैभव लुट-सा गया. प्लेटो का आदर्श राज्य चर्च के अधीन होकर धर्म के कुचक्र में हांफता हुआ नजर आया. इसके बावजूद वहां समय-समय पर स्वतंत्र मेधा का धनी ऐसे विचारक हुए जो प्राचीन चिंतकों से प्रेरणा लेकर राज्य को उसकी सीमा और कर्तव्य का एहसास कराते रहे. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति ने उत्पादन के वैकल्पिक साधनों का विकास किया. उससे पुरानी विचारधाराओं का नवोन्मेष हुआ, उसके साथ-साथ नए विचारों के सृजन में भी तेजी आई. मानव-मुक्ति के प्रश्न नए सिरे से अंगड़ाई लेने लगे. फलस्वरूप राज्य को चर्च के चंगुल से आजाद कराने लायक माहौल बना. नई वैचारिक चेतना ने सामंती व्यवस्था के सभी लक्षणों को जिनमें जाति भी शामिल थी, कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया. जापान, कोरिया जैसे देशों में जहां जातिप्रथा अपने विकृत रूप में उपस्थित थी, वहां उसके संपूर्ण उन्मूलन के लिए सघन कार्यक्रम चलाए गए, जिन्हें वहां के राज्य का पूरा समर्थन मिला. अमेरिकी और फ्रांसिसी क्रांति की सफलता के पश्चात पश्चिम में व्यक्ति-स्वाधीनता की मांग जोर पकड़ने लगी थी. उसका असर उनके उपनिवेशों पर भी पड़ा. फलस्वरूप उन देशों में जाति का संपूर्ण उच्छेद संभव हो सका.

भारत में ऐसा नहीं हो सका. इसलिए कि यहां ज्ञान-विज्ञान को धर्म का अनुचर बना दिया गया था. ऊपर से धर्म की परिकल्पना इतनी अस्पष्ट थी कि हर कोई अपने स्वार्थ को धर्म का नाम दे सकता था. ‘महाभारत’ में कुरुक्षेत्र का भीषण युद्ध, एकलव्य का अंगूठा काट लेना और बाद में छल से उसकी हत्या कर देना जैसे अनेक धत्त्कर्म धर्म के नाम पर ही किए जाते हैं. पश्चिम, विशेषकर प्राचीन यूनानी दर्शन सुकरात और प्लेटो के नैतिकतावादी दर्शनों से प्रभावित था. इन दार्शनिकों ने नैतिकता को मनुष्यता के आदर्श के रूप में सामने रखा था. जबकि भारत में सबकुछ धर्म के अधीन था; और धर्म की संरचना ऐसी थी कि उसे सामंतवाद से अलग देख पाना असंभव था. जाति और धर्म ने एक-दूसरे के समर्थन से भारतीय समाज में जो विकृतियां पैदा की हैं, उनका समाधान आज तक नहीं हो पाया है. भारत में पिछले 2500 वर्षों से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों पर शीर्षस्थ वर्गों का एकाधिकार रहा है. उत्पादक कर्म से दूर रहने के बावजूद उन्होंने अर्थव्यवस्था को अपने स्वार्थ के अनुरूप ढाला हुआ था. बदली वैश्विक परिस्थितियों के फलस्वरूप समाज के निचले वर्गों को आजादी तो मिली, मगर वह आधी-अधूरी थी. जातीय आधार पर थोपे गए बंधन उसकी स्वतंत्रता की बाधा बने थे. आर्थिक आवश्यकताओं के लिए वे शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर थे. यह उत्तरोत्तर बढ़ती समाजार्थिक विषमता का प्रमुख कारण बना.

इस संबंध में बड़ा रोचक विश्लेषण डॉ. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की पुस्तक ‘साइंस एंड टेक्नालॉजी इन एनशिएंट इंडिया’ में मिलता है. जार्डन क्लिड के लेख ‘दि अर्बन रिवोल्युशन’ का अध्ययन करते हुए वे लिखते हैं कि तीन प्रमुख प्राचीनतम सभ्यताओं भारत, मेसापोटामिया, मिस्र में लगभग 6000 से 3000 वर्ष पहले तक मानवीय अनुभव-कौशल के आधार पर प्राकृतिक विज्ञानों यथा रसायन, भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान का प्रयोग खूब प्रचलित था. कारीगर लोग चांदी और तांबे के अयस्क को पिघलाकर धातु-शोधन की कला में दक्ष थे. वे वायु की गति का अनुप्रयोग जानते थे. उनके द्वारा बनाए गए जहाज सुदूर सभ्यताओं तक निरंतर यात्रा करते रहते थे. बैलगाड़ी के उपयोग से यातायात सुलभ हुआ था. इससे खाद्यान्न को एक स्थान पर पहुंचाने और उसे सुरक्षित रखना संभव हुआ. सिंधु सभ्यता में 800 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले अन्न भंडारगृह का पता चला है. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की अनूठी भवन-संरचाएं तथा उनके लिए जिस प्रकार की पकी इंर्टों का उपयोग किया गया था, वह न केवल समकालीन सभ्यताओं में बेजोड़ था, बल्कि उसके पराभव के पश्चात एक हजार वर्षों बाद भी, जिसे उन्होंने सभ्यता के ‘अंधकार युग’ की संज्ञा दी है—संभव नहीं पाया था. कमियां उस सभ्यता में भी थीं. चट्टोपाध्याय साफ करते हैं कि प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में इतनी उपलब्धियों के बावजूद, तत्कालीन शासक वर्ग की विज्ञान-संबंधी प्राथमिकताएं प्रायोगिक गणित एवं ज्योतिष तक सीमित थीं. गणित का उपयोग उत्पादों के संवितरण, कराधान, भवन और भवन-सामग्री का निर्माण आदि के लिए किया जाता था, जबकि ज्योतिष की मदद मौसम पर नजर रखने और उसके अनुसार फसल-उत्पादन के लिए ली जाती थी. प्राकृतिक विज्ञान यथा जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि के अनुप्रयोग तथा उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल शिल्पकर्मियों की थी.

वैदिक मेधा भी इस अपसंस्करण का शिकार थी. आरंभिक भारत में बीजगणित का जितना उपयोग यज्ञ-वेदियों के निर्माण के लिए होता था, उतना ही उपयोग नौकाएं बनाने के लिए भी किया जाता था. हवा की गति को पहचानते हुए, महासागर के बीच हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं करने वाली नौकाओं का निर्माण तथा उनके नाविकों द्वारा सफल यात्राएं बिना बीजगणित, सामुद्रिक विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र और गतिज भौतिकी के ज्ञान के असंभव थीं. मगर व्यावहारिक ज्ञान के प्रति कृपणता दिखाते हुए ब्राह्मणों ने ज्ञान-विज्ञान और तकनीक की उन अनेक धाराओं में से केवल गणित को सहेजने का कार्य किया. वह भी सीमित अर्थों में, यज्ञ-वेदियों के निर्माण जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए. बाकी का ज्ञान कर्मकारों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरण के लिए छोड़ दिया गया. संस्कृत साहित्य में बुनकर, तंतुकार, कुंभकार, नाविक, हलवाह, रथवाह, धातुकर्मी जैसे पेशेवरों का उल्लेख मिलता है. उनका ज्ञान मुख्यतः अनुभव आधारित था. लंबे विश्लेषण के बाद चट्टोपाध्याय जोर देकर कहते हैं कि उस समय की सामाजिक-आर्थिक नीतियों में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य था, जो प्राकृतिक विज्ञानों की उपेक्षा कारण बना था. इसके निहितार्थ को समझना कठिन नहीं है.

आर्य इस देश में प्रवासी थे. संभव है, भारत आने के बाद अनेक वर्षों तक खुद को दूसरे देश का मानते रहे हों. प्रवासी को अपनी मूल-संस्कृति से बेहद लगाव होता है. यह लगाव तब और बढ़ जाता है जब उन्हें ऐसे लोगों के बीच रहना पड़े जो उनसे कहीं विकसित सभ्यता के स्वामी हों. इसे उस समूह की हीनता-ग्रंथि भी कह सकते हैं. परंतु यह किसी भी व्यक्ति अथवा समूह के बारे में सच हो सकता है. भारत में यायावर कबीलों के रूप में आए आर्यों के साथ भी कदाचित ऐसा ही था. उनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य स्रोत पशुपालन था. खेती करना उन्होंने द्रविड़ों से सीखा. बावजूद इसके उत्पादकता के अपने परंपरागत संसाधनों के प्रति उनका आकर्षण बना रहा. वैदिक ऋषियों की जीवनचर्या आश्रम-केंद्रित थी. सभी प्रमुख वनवासी ऋषियों के अपने-अपने आश्रम थे. उनकी आय का प्रमुख स्रोत पशु-संपदा थी. उसके लिए परस्पर झगड़े भी होते थे. मात्र एक गाय की खातिर वशिष्ट और विश्वामित्र के बीच हुआ लंबा संघर्ष तो जग-जाहिर है. स्वर्ग के रूप में ऐसी समानांतर परिकल्पना भी मिलती है, जहां दुधारू गाय, भरपूर संख्या में उपलब्ध हों, उसे गोलोक कहा गया है. मान्यता थी कि अच्छी दुधारू गाय समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकती है—‘कामधेनु’ का प्रतीक इसी सोच और पशु-केंद्रित अर्थव्यवस्था के महत्त्व को दर्शाता है. द्रविड़ों के संपर्क में आने के बाद आर्यों ने खेती करना सीखा. फिर भी पशु-पालन के प्रति आकर्षण एवं कृषि-कर्म के प्रति दुराव बना रहा. वर्ण-व्यवस्था कृषि-कर्म में लिप्त लोगों को शूद्र का दर्जा देकर तीसरे पायदान पर ढकेल देती है. उनकी अपेक्षा द्रविड़ क्रमवार विकास करते हुए कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था को अपना चुके थे. वे उन लोगों के वंशज थे, जो सिंधु सभ्यता के पराभव के उपरांत यहां-वहां बिखर चुके थे. वे कृषि-कर्म में दक्ष थे. पुरातत्व से जुड़ी खोजें सिद्ध करती हैं कि सिंधु सभ्यता नागरीकरण के उन शिखरों तक पहुंच चुकी थी, जहां पहुंचने के लिए वैदिक जनों को आगे के एक हजार वर्ष खपाने पड़े. सिंधु सभ्यता की समृद्धि का प्रमुख संबल वहां के शिल्पकर्मी थे. अपने अनूठे शिल्पकर्म के बल पर वे, वैदिक सभ्यता के उभार के दौर में भी, अपनी आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता को बचाए रखने में सफल हुए थे.

सिंधु सभ्यता के उत्खनन से चीनी के बर्तन प्राप्त हुए हैं. उनका उपयोग धातु-शोधन के कार्य हेतु किया जाता था. आज धातु-अयस्क को पिघलाने का काम बड़े-बड़े पूंजीपतियों के अधिकार में जा चुका है. खनिज-संपदा पर कब्जा करने के लिए पूंजीपतियों के बीच होड़ मची रहती है. उसके लिए आदिवासियों को निर्लज्जतापूर्ण ढंग से विस्थापित किया जा रहा है. जिस समय तक ये कारखाने नहीं लगे थे, उन दिनों धातु-शोधन करना मुख्यतः आदिवासियों तथा उन लोगों का कार्य था, जिन्हें बाद में निचली जाति का मान लिया गया. उनके द्वारा शोधित धातुओं(तांबा) से हल की फाल भी बनाई जाती थी, औजार भी. किंतु उनके हुनर और प्राकृतिक विज्ञानों के क्षेत्र में उनकी अनुभव-सिद्ध जानकारी का—वैदिक जनों की दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था. न ही उस परिवेश से निकलकर आए आधुनिक ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों का ध्यान उस ओर गया. इसका दुष्परिणाम भारतीय समाज में ज्ञान-विज्ञान की निरंतर उपेक्षा के रूप में सामने आया. विशेषकर नए ज्ञान और शोध को लेकर. धर्म का स्वभाव होता है, वर्तमान और भविष्य की दुहाई देते हुए, अतीत की ओर बार-बार झांकना. उसपर हम भारतीय धर्म को कुछ ज्यादा ही अहमियत देते आए हैं, इसलिए हर नई समस्या का समाधान हमें अतीत की खोह में ले जाता है. समस्या सुलझने के बजाए और जटिल हो जाती है. इसका नुकसान बहुजनों को उठाना पड़ता है. अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ उठाकर अभिजन समूह हालात को अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ने में कामयाब हो जाते हैं.

भारतीय संस्कृति में शूद्रों की उपस्थिति को लेकर जितने भी शोध सामने आए हैं, उनमें से अधिकांश वेदाध्ययन के अधिकार को शूद्रत्व की कसौटी मानते हैं. एक वर्ग कहता है कि शूद्रों को वेदाध्ययन और यज्ञादि कर्मकांडों में हिस्सेदारी का अधिकार था. दूसरा इससे इन्कार करता है. अपने-अपने मत के समर्थन में दोनों अपने तर्क लगभग एक जैसे ग्रंथों से जुटाते हैं. उन ग्रंथों से जो ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से उसका महिमामंडन करते हुए रचे गए हैं. जिनका येन-केन-प्रकारेण उद्देश्य जाति-और वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखना है, ताकि कुछ लोगों के विशेषाधिकार बने रहें. वेदाध्ययन और कर्मकांडों को लेकर स्वयं शूद्रों की दृष्टि क्या थी? क्या उन्हें वेदाध्ययन और कर्मकांडों से वंचित किए जाने बहुत क्षोभ था? क्या इनसे वंचित किए जाने का उनकी उत्पादकता पर कोई प्रभाव पड़ा था? अथवा वे किसी स्वतंत्र धर्म-दर्शन के अनुयायी थे तथा वैदिक कर्मकांडों को निरर्थक मानकर स्वयं ही उनसे सुरक्षित दूरी बनाए हुए थे? इस प्रकार के प्रश्नों को लेकर उनमें कोई बेचैनी नजर नहीं आती. कदाचित उनके लिए यह समस्या ही नहीं थी. उनमें से अधिकांश भारत के अतीत में सिवाय वैदिक सभ्यता और संस्कृति के कुछ ओर दिखाई ही नहीं देता. जो जानते-समझते हैं, वे इस सत्य पर पर्दा डाले रहते हैं. उन्हें डर लगा रहता है कि खुलते ही विशेषाधिकार छीने जा सकते हैं. जिन ग्रंथों के आधार वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, उन्हीं के स्वतंत्र विवेचन द्वारा हम बड़ी आसानी से समझ सकते हैं कि समाज का बड़ा वर्ग, वैदिक कर्मकांडों की निरर्थकता को पहचानकर, स्वयं उनसे दूरी बनाए हुए था. उसमें वही लोग थे, जो अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. धर्म उनके लिए जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति निजी आस्था और विश्वास  का मसला था. उस तरह दिखावे का नहीं जैसा वैदिक धर्म के अनुयायी कर रहे थे.

संस्कृत वाङ्मय के आधार पर अनार्यों की स्थिति का वर्णन करते हुए एक बात अकसर भुला दी जाती है, वह है उनकी आर्थिक स्वतंत्रता. समय के साथ हालांकि उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते थे. बावजूद इसके अपने श्रम-कौशल के दम पर उनका बड़ा हिस्सा अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में सफल हुआ था. एक तरह से प्राकृतिक विज्ञानों के अनुप्रयोग की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. हालांकि ज्ञान-विज्ञान का अंतरण मुख्यतः अनुभव आधारित था. शिल्पकार वर्ग अपने पुत्र या उत्तराधिकारी को शिल्पकर्म से जुड़ी जानकारी देकर उऋण हो लेता था.़ अनुभवों की वंशानुगत अंतरण पद्धति में ज्ञान का लंबे समय तक संरक्षण और उसमें क्रमागत विकास असंभव था. ऊपर से निचले वर्गां में शिक्षा का अभाव, जिसने उन्हें अपने ही ज्ञान के प्रति उदासीन बना दिया था. फिर भी अपने संगठन-सामर्थ्य एवं बाहरी स्पर्धा के बल पर, शिल्पकार समूह अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सफल रहे थे. उस समय तक उत्पादन आवश्यकता केंद्रित था. मुनाफे की अवधारणा जन्मी नहीं थी. उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध था. उनके उत्पादों की स्थानीय और सुदूर बाजारों में बराबर मांग थी—इस कारण उनकी उपेक्षा असंभव थी. अनुकूल परिस्थितियां के चलते शिल्पकार वर्ग ने ईसा पूर्व चौथी-पांचवी शताब्दी तक अपनी समाजार्थिक स्वतंत्रता बनाए रखी. किंतु ‘मनुस्मृति’ तथा ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद समाज के चार्तुवर्ण्य विभाजन को राज्यों का समर्थन मिलने लगा था. चाणक्य शिल्पकार समूहों की स्वायत्तता को राज्य के लिए हानिकारक मानता था. ‘अर्थशास्त्र’ की रचना के बाद सहयोगाधारित व्यापारिक संघों पर तरह-तरह के प्रतिबंध थोपे जाने लगे. उसके चलते उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच एक नए व्यापारी वर्ग का उदय हुआ, जिसका प्रमुख कार्य उत्पादों को उसके उपभोक्ता-वर्ग तक पहुंचाना और बदले में अच्छा-खासा मुनाफा अपने लिए सुरक्षित रख लेना था. उससे मुनाफे की अवधारणा विकसित हुई. राज्य के संरक्षण में पनपे व्यापारी वर्ग ने कर्मकार वर्गों से उनके उत्पाद के मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया. कालांतर में वह उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक दुर्दशा का कारण बना.

चाणक्य केंद्रीय सत्ता का समर्थक था. उसकी प्रमुख कृति ‘अर्थशास्त्र’ में किसी नए अर्थशास्त्रीय सिद्धांत की विवेचना नहीं है. वह विशुद्ध रूप से राजनीति का ग्रंथ है. पुस्तक के आरंभ के कई अध्याय राजा की सुरक्षा से संबंधित हैं. इसके लिए वह तरह-तरह के कूटनीतिक उपाय बताता है. राजनीति षड्यंत्रों के समय रहते पर्दाफाश तथा उनसे राज्य और राजा दोनों की सुरक्षा के लिए वह पूर्ववर्ती आचार्यों नारद, बृहश्पति, शुक्राचार्य आदि के ग्रंथों से उद्धरण प्रस्तुत करता है. इस कारण अर्थशास्त्र को ‘आन्वीक्षकी’ भी कहा गया है. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य वंश का संस्थापक तथा अपने समय का सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट था. उसके पास पांच लाख से अधिक का सैन्यबल था. फिर चाणक्य को डर किस बात का था? क्यों राजा की सुरक्षा की चिंता करते हुए उसे अपनी पुस्तक के कई अध्याय ‘आन्वीक्षकी’ के नाम करने पड़े. सवाल यह भी है कि अर्थनीति विषयक साधारण जानकारी के बावजूद उस पुस्तक को ‘अर्थशास्त्र’ जैसा शीर्षक क्यों दिया गया? क्या महज इसलिए कि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक उससे पहले आ चुकी थी; और वह भारत विजय का सपना लेकर निकले सिकंदर का गुरु था? अगर नहीं तो राजनीति-शास्त्र की पुस्तक के अवांतर नामकरण के लिए चाणक्य की जो आलोचना अपेक्षित थी, उससे आगे के विद्वान क्यों बचते रहे? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर भारतीय संस्कृति और इतिहास में नदारद हैं. लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के निष्पक्ष विवेचन द्वारा उनके उत्तर खोजे जा सकते हैं.

सिंकदर का आक्रमण देश पर पहला सुगठित हमला था, जिसके पीछे आक्रमणकारी के साम्राज्यवादी मंसूबे एकदम साफ थे. चंद्रगुप्त के रण-कौशल से वह हमला नाकाम हो चुका था. उसके बहाने सत्ताधारी समूह जनता को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए बड़े राज्यों का गठन अपरिहार्य है. लेकिन बड़े राज्यों की सफलता केंद्रोन्मुखी अर्थव्यवस्था के बिना संभव न थी. चंद्रगुप्त की सेना किसी भी तत्कालीन सम्राट से बड़ी थी. इतनी बड़ी सेना और राज्य के प्रबंधन हेतु भारी-भरकम मशीनरी का इंतजाम तभी संभव था, जब उत्पादन और वितरण के स्रोतों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में राज्य के सीधे नियंत्रण, अथवा उसके भरोसेमंद लोगों के अधीन लाया जाए. चाणक्य ने यही किया था. डॉ. रमेश मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘कॉआपरेटिव्स इन एन्शीएंट इंडिया’ में लगभग तीस प्रकार के सहयोगाधारित उत्पादक संगठनों का उल्लेख किया है. वे संगठन पूर्णतः स्वायत्त थे. यहां तक कि राजा को भी उनकी कार्यशैली में दखल देने का अधिकार न था. संगठन के मुखिया को राज-दरबार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता था. आवश्यकता पड़ने पर राजा भी उनसे मदद लेता था. ऋग्वेद में भी ‘पणि’ का उल्लेख हुआ है, जो सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों की प्राचीनतम उपस्थिति को दर्शाता है. पणि पशुओं के व्यापारी थे. सहयोगाधारित व्यापार की यह परंपरा सिंधु सभ्यता की देन थी. उसके व्यापारिक काफिले बेबीलोन, मिस्र आदि देशों की निर्बाध यात्रा करते रहते थे. मामूली संसाधनों के भरोसे लंबी व्यापारिक यात्राएं करना बिना आपसी सहयोग के संभव ही नहीं था. सिंधु सभ्यता से लेकर मेसापोटामिया, मिस्र, ईरान आदि में मिली लगभग एक समान मुहरों से इन सभ्यताओं की बीच आपसी लेन-देन की बात पुष्ट होती है.

चाणक्य ने गौ-अध्यक्ष, नाव-अध्यक्ष, रथाध्यक्ष, सीताध्यक्ष जैसे पदों का विधान किया. उससे पहले गोपालक, नाविक, रथवाह, बुनकर, सार्थवाह, तैलिक आदि के अपने-अपने स्वतंत्र संगठन थे. चाणक्य ने नए पदों के सृजन द्वारा उनकी स्वायत्तता को मर्यादित कर, उन्हें  प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में राज्य के अधीन कर लिया गया था. इस तरह सोची-समझी नीति के तहत व्यापारी वर्ग को बढ़ावा दिया गया. ब्राह्मण धर्मसत्ता को संभाले था, जबकि क्षत्रिय का राजसत्ता पर कब्जा था. राज्य के समर्थन और संरक्षण में पनपे तीसरे व्यापारी वर्ग ने जो शेष दो वर्णों, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की भांति अनुत्पादक वर्ग था—उत्पादकता के स्रोतों पर अधिकार कर, अर्थसत्ता को भी अपने अधीन कर लिया गया. राजनीतिशास्त्र की कृति का ‘अर्थशास्त्र’ नामकरण वस्तुतः समाज के उत्पादक वर्गों की स्वायत्तता को, राजनीतिक तंत्र के अधीन लाने की कूटनीतिक चाल थी. उससे स्वतंत्र पेशे जाति का रूप लेने लगे. शिल्पकारों से अपनी मर्जी के उत्पादन तथा उत्पाद का मूल्यांकन का अधिकार छीन लिया गया. उत्पीड़न के शिकार लोग कभी भी विद्रोह कर, राज्य और राजा दोनों के लिए खतरा बन सकते हैं, चाणक्य को इसका अंदेशा कदाचित ज्यादा ही था. इसलिए वह एक ओर आन्वीक्षकी के तरह-तरह उपाय बताता है, कराधान प्रणाली को मजबूत करने के सुझाव देता है, साथ ही राजा की सुरक्षा और अनुशासन के नाम पर कठोर दंडविधान की अनुशंसा भी करता है. चाणक्य के अर्थशास्त्र में साधारण नागरिक की महत्ता राज्य के प्रति उसकी उपयोगिता से आंकी जाती थी. जो राज्य का नहीं है, वह कहीं का नहीं है.

अरस्तु चाणक्य का समकालीन था. उससे कुछ बड़ा. चाणक्य ने चंद्रगुप्त को शिक्षित किया था तो अरस्तु सिकंदर का गुरु था. दोनों के बीच यह मामूली समानता है. लेकिन दोनों के राजनीति विषयक चिंतन में जमीन-आसमान का अंतर है. चाणक्य के नजरों में राजा सर्वेसर्वा है, जबकि अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में मनुष्य है. नैतिकता को राज्य के गठन की आधारशिला मानने वाले अरस्तु का विचार था—‘श्रेष्ठ प्रजा ही श्रेष्ठ शासन को जन्म दे सकती है.’ ‘अर्थशास्त्र’ का मूल संदेश सर्वसत्तावादी है. चाणक्य को राजा के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता. उसकी निगाह में प्रजा और बाकी दरबारीगण केवल इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि वे राजा के होने को प्रासंगिक बनाते हैं. दूसरी ओर अरस्तु का दर्शन ‘न्याय’ का दर्शन है. उसके अनुसार प्रजा-कल्याण हेतु समर्पित भाव से काम करना, राजा का कर्तव्य है. वही राज्य के गठन का औचित्य भी है. ‘अर्थशास्त्र’ में प्रजा कल्याण राजा का कर्तव्य न होकर, ‘कृपाभाव’ है. बहरहाल, भारत में देशज कृति ‘अर्थशास्त्र’ को सराहा गया. वैसे भी दुनिया में हो रही ज्ञान-संबंधी हलचलों की ओर से आंखें मूंदे रहना ब्राह्मणों का स्वभाव रहा है. उनकी आत्ममुग्धता भी कमाल की थी. सिवाय खुद के कुछ देख ही नहीं पाती थी. ज्ञान के क्षेत्र में जो सर्वात्तम है, वह भारतीय है. और भारत में जो श्रेष्ठतम विचार है वह किसी न किसी ब्राह्मण के दिमाग की उपज है—इस भ्रांत धारणा ने उन्हें विदेशी ज्ञान-विज्ञान के प्रति सदैव उदासीन बनाए रखा. दुनिया में ऐसे अनेक यायावर जिज्ञासु रहे हैं, जिन्होंने अपना जीवन और श्रम दूसरे देशों और सभ्यताओं के बीच जाकर ज्ञान को सहेजने में लगाया है. मेगस्थनीज, ह्वेनसांग, फाह्यान, अल-बरूनी, इब्नबतूता, अल-मसूदी, अल-बरूनी जैसे सैकड़ों विद्वान थे, जो ज्ञान-विज्ञान की खोज के लिए हजारों मील की यात्रा करके भारत पहुंचे थे. लेकिन भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इतना आत्ममुग्ध रहा कि उसने बाहरी देशों में चल रही ज्ञान की हलचलों की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया. ब्राह्मणों की मेधा स्मृतियों, पुराणों और आरण्यकों की गुलाम रही. जबकि उनका श्रम वर्ण-व्यवस्था को चिरस्थायी बनाने में लगा रहा. परिणामस्वरूप देश में धर्म और जाति का ऐसा गठजोड़ बना कि सुधारवादी आंदोलनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उनसे जूझने में खपता रहा. चूंकि उन आंदोलनों का नेतृत्व उच्च जाति के लोगों के पास था, जिनके अपने स्वार्थ जाति को सुरक्षित रखने में थे, इसलिए परिवर्तनकारी आंदोलनों के प्रति उनमें से अधिकांश का रवैया ढुलमुल ही रहा. प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में शायद ही कोई उदाहरण हो जिसमें किसी पिता ने वर्णोचित गुणों के अभाव में अपनी संतान के वर्ण के अवमूल्यन की शिकायत की हो. जबकि जातिवाद को प्रश्रय देने, अयोग्य पुत्र को उत्तराधिकार के रूप में विरासत सौंपने के यहां अनगिनत उदाहरण हैं.

यह ठीक है कि अपने जन्म के साथ ही जाति-प्रथा को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था. कई बार ऐसे अवसर भी आए जब लगा कि इस व्यवस्था के दिन लद चुके हैं. समाज सुधार के क्षेत्र में समय-समय चलाए गए आंदोलनों से उसे कुछ समय के लिए धक्का अवश्य लगा, परंतु धर्म के समर्थन तथा लंबे जाति-आधारित स्तरीकरण के कारण, जो हर जाति को किसी न किसी जाति से ऊपर होने का भरोसा देता है—ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसका अस्तित्व सचमुच खतरे में पड़ा हो. सामंती लक्षणों से युक्त जाति हमेशा ही भारतीय समाज का कलंक बनी रही. जाति और धर्म की जकड़न में आत्मविश्वास गंवा चुके भारतीय समाज ने विकास की ऐसी उल्टी चाल चली कि समकालीन सभ्यताओं में सर्वाधिक विकसित सिंधु सभ्यता का जनक और ज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, गणित, ज्योतिष, स्थापत्य आदि क्षेत्रों में बाकी देशों के मुकाबले अग्रणी स्थान रखने वाला भारत लगातार पिछड़ने लगा. शताब्दियों से जाति और धर्म के सहारे विशेष सुख-सुविधाओं से लाभान्वित रहा वर्ग, आज भी जाति को भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट देन मानता है; और तमाम आलोचनाओं-विरोधों के बावजूद  उसे किसी न किसी रूप में सुरक्षित रखना चाहता है. उनमें सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की ही है. आखिर जाति का उत्स क्या है?

प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि जातीय शोषण के विरुद्ध निरंतर संघर्ष के बावजूद भारतीय समाज उसकी जकड़न से बाहर आने में क्यों असमर्थ रहा. संख्या में कई गुना होने के बावजूद बहुजन समाज अल्प-संख्यक अभिजनों की समाजार्थिक दासता में बने रहने के लिए विवश क्यों हुआ? इस धारणा को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए जाति-व्यवस्था के विरोधी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. अभी तक जातीयता के उपकार एवं अपकार के अध्ययन हेतु आदि स्रोत के रूप में ऋग्वेद को लेने की मान्यता रही है. ऋग्वेद जो ब्राह्मण मनीषा का आदि ग्रंथ है, उसे भारतीय प्रायद्वीप के बौद्धिक उठान का आदि ग्रंथ भी मान लिया जाता है. ऐसा करके हम आर्यों के आगमन से पूर्व के भारत के इतिहास को पूरी तरह उपेक्षित कर जाते हैं. जबकि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि स्थानों के उत्खन्न के पश्चात हम एक समृद्ध अनार्य सभ्यता से परिचित हो चुके हैं. उसपर प्रामाणिक लेखन और ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे हम समानांतर सभ्यता का चिह्नन कर सकते हैं. ऋग्वेद को भारतीय मनीषा का आदि ग्रंथ मानने का दूसरा बड़ा नुकसान यह होता है कि वर्णाश्रम व्यवस्था का अध्ययन शूद्रों को यज्ञादि का अधिकार होने या न होने में सिमट जाता है. इस तरह हम आलोचना की ब्राह्मणवादी दृष्टि से बाहर नहीं निकल पाते. उदाहरण के लिए ‘शूद्र’ शब्द की व्याख्या को ले सकते हैं. अपने लेखों में विधुशेखर भट्टाचार्य इस शब्द को ‘क्षुद्र’ से व्युत्पत्तित बताते हैं. उनकी पूर्वाग्रहों में रची-बसी दृष्टि शूद्रों की सामाजिक अधिकारिता को वैदिक कर्मकांडों में हिस्सेदारी तक सीमित कर देती है. डॉ. रामशरण शर्मा ने संस्कृत गं्रथों में शूद्र की स्थिति को लेकर गहन अध्ययन किया है. उन्हें वामपंथी सोच का प्रगतिशील लेखक माना जाता है. परंतु शूद्र को लेकर वे भी जातीय पूर्वाग्रहों से बाहर नहीं निकल पाते. ‘शूद्र इन एन्शीएंट इंडिया’ में वे इसी सोच को विस्तार देते हैं.

ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए अधिकांश विद्वान बौद्ध धर्म को प्रस्थान बिंदू मानते हैं. यह धारणा कदाचित डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने से बनी है. बौद्ध धर्म को ब्राह्मणवाद के विरोध का प्रस्थान बिंदू मानने वाले विद्वान प्रायः यह भूल जाते हैं कि बुद्ध का विरोध वर्ण-व्यवस्था से नहीं था. न ही वे जाति को अनावश्यक मानते थे. जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरोध में उन्होंने कोई आंदोलन भी नहीं किया था. वे सिर्फ जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति चाहते थे. बुद्ध के पांच प्रमुख शिष्यों में से एक उपालि नाई जाति से था. कुछ भिक्षु निचली जाति इस कारण उनका उपहास भी उड़ाते थे. बुद्ध तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने उपालि की जाति पर कुछ नहीं कहा. न ही जाति को अनावश्यक माना. केवल जाति के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा न मानने, भेदभाव न करने का उपदेश दिया. कुछ स्थानों पर तो वे वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में खड़े होते दिखाई पड़ते हैं.

ईसा से पांच-छह से वर्ष पहले का समय, मनुष्यता के इतिहास का वह कालखंड है, जिसे मानवीय बुद्धि के विस्फोट के रूप में देखा जाता है. उस दौर में भारत में बुद्ध, महावीर स्वामी, चीन में कन्फ्यूशियस, बेबीलोन में सायरस, पर्शिया में जरथ्रुस्त तथा यूनान में सुकरात जैसे दार्शनिक पैदा हुए. उन सबने जीवन में नैतिकता को महत्त्व दिया. जबकि भारत की सभ्यता का विकास ब्राह्मणवाद की अधीनता तथा उसके वर्चस्व तले हुआ था. ब्राह्मण को नैतिकता, सामाजिक सौहार्द, बराबरी तथा न्याय-परंपरा में कभी विश्वास नहीं रहा. आरंभ से ही वह आधुनिकता विरोधी और धर्मसत्ता के प्रति दुराग्रहशील रहा है. आलोचना से बचने के लिए ब्राह्मणों ने असमानता को दैवीय घोषित किया. ऐसी स्थितियां रचीं कि जो दैवीय है, उसे न्यायसंगत भी मान लिया जाए. यह काम अकेले धर्म के भरोसे संभव नहीं था. इसलिए राजसत्ता को अपने पक्ष में लिया गया. भारत के सांस्कृतिक इतिहास में धर्म की विभिन्न धाराओं के बीच संघर्ष के सैकड़ों उदाहरण हैं. राजनीति के क्षेत्र में भी लोगों की महत्त्वाकांक्षाएं एक-दूसरे से टकराती रही हैं. परंतु धर्म और राजनीति का संघर्ष, विशेषकर राजनीति द्वारा धर्म से आजादी के संघर्ष का यहां कोई उदाहरण नहीं है. दधिचि का महिमामंडन उनकी दानशीलता के लिए किया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने धर्म के लिए जीवन की परवाह नहीं की और देवासुर संग्राम में देवताओं की जीत के लिए, जीते-जी अपनी हड्डियां तक दान कर दीं. लेकिन उस कथित त्रिकाल-दृष्टा महर्षि ने भी प्राणोत्सर्ग से पहले देवासुर संग्राम के औचित्य पर कोई सवाल नहीं किया था. न यह पूछा कि उस संग्राम में न्याय किस ओर है. जाहिर है, दधिचि का दान एक बूढ़े-मरणासन्न ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणवाद को बचाए रखने के लिए किया गया बलिदान था. धर्म उनके लिए राजनीति थी. ऐसा टोटम जिसपर बिना बुद्धि-विवेक के विश्वास कर लिया जाता है. भावनाओं में बहकर बहुजन भी वज्र के लिए देह गलाने वाले दधिचि के निर्णय को न्याय-अन्याय की कसौटी पर कस नहीं पाते. दधिचि के लिए देवताओं का पक्ष ही न्याय का पक्ष है. और जो देवताओं का पक्ष है, असलियत में वह ब्राह्मण का ही पक्ष है. पुराणों और उपनिषदों में भरे ऐसे आख्यान, वर्ण-व्यवस्था के लिए खाद-पानी का काम करते हैं.

दूसरी ओर पश्चिम में नैतिकता और मानवादर्शों के लिए आत्मबलिदान के अनेक उदाहरण हैं. प्लेटो का संबंध एथेंस के राज-परिवार से था. इस आधार पर वह स्वयं को राज्य का  उत्तराधिकारी भी मानता था. बावजूद उसने अपने गुरु सुकरात का अनुसरण करते हुए उसने सत्ता के आगे समर्पण करने के बजाए अपने विवेक और नैतिकता को हमेशा आगे रखा. उसके जीवन में एक या दो ऐसे अवसर आए जब उसे राजसत्ता के कोप से बचने के लिए भागना पड़ा. अरस्तु ग्रीक सेनानी सिकंदर का गुरु था. सिकंदर उसका सम्मान करता था. अरस्तु द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय तथा प्रयोगशालाओं के लिए सिकंदर की ओर से आवश्यक मदद प्राप्त होती थी. इसके बावजूद अरस्तु ने शक्तिशाली राज्य के बजाए नीति-केंद्रित राज्य का समर्थन किया था. अपनी स्वतंत्र लेखनी के कारण एक बार वह सिकंदर को भी जब वह युद्ध अभियान पर निकला हुआ था—नाराज कर बैठा था. जिससे सिकंदर ने उसे मृत्युदंड देने की ठान ली थी. यदि भारत से लौटते समय सिंकदर की असाममियक मृत्यु नहीं होती तो अरस्तु को दंडित किया जाना तय था.

यहां एक और सवाल खड़ा होता है. वर्ण-व्यवस्था के दबाव के चलते यदि शूद्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने, अपनी कला को निखारने का यदि अधिकार ही नहीं था, तो उन्हें सभ्यता का वास्तविक निर्माता कैसे कहा जा सकता है. यदि उनका दिलो-दिमाग ब्राह्मणों तथा दूसरी शीर्ष जातियों के पूरी तरह अधीन था तो वे शिल्पकर्म के अद्भुत चितेरे, अनूठी स्थापत्य कला के धनी, कुशल आविष्कारक भला कैसे कहा जा सकता है? यह आशंका उन ग्रंथों को पढ़ते हुए विश्वास में बदलने लगती है, जिन्हें भारतीय मेधा के चमत्कार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. जिन्हें विद्वान प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल के लिए उदाहरण के रूप में पेश करते आए हैं. उनमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन, राधाकुमुद मुखर्जी, डॉ. रामशरण शर्मा जैसे विद्वान भी शमिल हैं. उनके अध्ययन की एकमात्र विशेषता, जो वस्तुतः उनकी बौद्धिक दुर्बलता है, वह यह है कि वे सभी स्वनामधन्य विद्वान भारतीय सभ्यताकरण की शुरुआत वेदों से करते हैं. ऋग्वेद उनके लिए भारतीयता की पहचान का आदि-ग्रंथ है. वैदिक संस्कृति के व्यामोह में फंसकर वे उन तथ्यों की एकदम उपेक्षा कर जाते हैं, जो हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल जैसे प्राचीनतम स्थलों के उत्खन्न से प्राप्त हुए हैं.

ऊपर के विश्लेषण से हम एक और सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं. यह कि संस्कृति की पहचान प्रायः उन लोगों से होती है, जो किसी न किसी रूप में उसका मूल्य वसूलने में लगे रहते हैं. न कि उन लोगों से जो उसे बनाने से लेकर सहेज कर रखने में भारी भूमिका निभाते हैं. शिखर पर विराजमान लोग सांस्कृतिक उपादानों का संरक्षण इस प्रकार करते हैं कि संस्कृति निर्माण में बाकी लोगों की भूमिका गौण मान ली जाती है. भारत की प्राचीन संस्कृति जिसे वैदिक संस्कृति भी कहा जाता है, का नाम आते ही बड़े-बड़े आश्रमों में रहने वाले ऋषिकुलों, मंत्रोच्चार करते साधुओं यज्ञ-वेदि के समक्ष गूंजती ऋचाओं का ध्यान आ जाता है. उस समय का बाकी समाज कैसा था? उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों, जीवनशैली, कला-कौशल और समाज की बेहतरी हेतु बहाए गए स्वेद-बिंदुओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता. हम उन राजाओं के बारे में जानते हैं, जिनके शासनकाल में सोमनाथ और खुजराहो जैसे मंदिर बने. ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार जैसी इमारतें बनाने वाले शासकों के नाम भी इतिहास में दर्ज हैं. यह सब कहीं न कहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा भी हैं. लेकिन सोमनाथ और खुजराहो के मंदिरों के असल रचनाकार कौन थे? लालकिले के लिए पत्थर तराशने  वाले, ताजमहल में प्राण-प्रतिष्ठा करने वालां के नाम तक नहीं जानते. शताब्दियों की बौद्धिक गुलामी ने हमारी मानसिक सरंचना ऐसी कर दी है कि हमारा मस्तिष्क, अपने ही इतिहास को उन लोगों की निगाह से देखने लगा है, जो हमारी दासता का कारण रहे हैं. ऋग्वेद में दर्जनों मंत्रों में इंद्र द्वारा असुरों के पुरों का ध्वंस करने का उल्लेख है. उसे पुरंदर की उपाधि भी असुर-नगरों को नष्ट करने के कारण प्राप्त होती है. लेकिन उन दुर्गों का वास्तविक निर्माता, वहां के निवासियों के लिए हथियार और आवश्यक सुख-साधन जुटाने वाले शिल्पकार वर्ग के बारे में यह ग्रंथ मौन रह जाता है.

बहुजन संस्कृति इन्हीं प्रच्छन्न दस्तावेजों की खोज का एक सिलसिला है.

© ओमप्रकाश कश्यप