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अय्यंकाली : सामाजिक क्रांति का महानायक

सामान्य

सुनो, सुनो, सुनो—गीत मेरा सुनो

विपन्न, निढाल गरीबी में घिसटते हुए लोगो सुनो 

‘यहां से जाएं, तो कहां जाएं?’

वे रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, आंसू बहा रहे हैं

हमारा न कोई घर है, न देश

न ही सिर छिपाने को जंगल

दिन के उजाले में जंगलों की सफाई करना

रात्रि को वहीं निढाल पड़ जाना

बीज बोने के बाद

पेड़ जब देने लगते हैं फल

मालिक आकर कब्जा लेता है उन्हें

हमारे पास अब केवल रोना ही बचा है

हमारे हिस्से है श्रम, केवल श्रम

ढेर सारा, बल्कि सारे का सारा श्रम

हम सड़कों पर चल नहीं सकते

बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है हमें

लेकिन हम बढ़ेंगे….बढ़ेंगे

बढ़ते रहेंगे, बढ़ते ही रहेंगे।

ऊपर दिया गया गीत करीब 100 वर्ष पुराना है। अय्यंकाली द्वारा स्थापित ‘साधुजन परिपालन संघम’ की बैठकों में गाया जाने वाला गीत। केरल के दलितों और आदिद्रविड़ों में आधुनिक भावबोध जगाने में इस गीत का बड़ा योगदान है। चक्कोला कुरुंबम दीविथन इसे गाया करते थे। ऐसे मार्मिक स्वर में कि श्रोतागणों की आंखें डबडबा जाती थीं। इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले अय्यंकाली के जीवन से दो शब्द चित्र—

बैलगाड़ी से क्रांति

वर्ष 1891(कुछ विद्वान इसे 1893 मानते हैं)। करीब 30 वर्ष का एक हृष्ट-पुष्ट और सुदर्शन युवक। एकदम नई बैलगाड़ी, जोतने के लिए एक जोड़ी युवा-छरहरे, सफेद बैल। एक जोड़ी पीतल की बड़ी-बड़ी घंटियां—सब उसने आज ही के लिए खरीदे हैं। इनके अलावा अपने लिए चमकीला अंगवस्त्र, शानदार पगड़ी और रौवदार जूतियां। मानो अपने अनूठे बाने से काल के कपाल पर सुनहरी इबारत टांकने को आतुर हो। बैलों को गाड़ी में जोतने से पहले वह उन्हें प्यार से सहलाता है। फिर उनके गले में घंटियां बांधकर बैलगाड़ी में जोत देता है। उसके बाद पूरी शान से बैलगाड़ी में सवार होता है। सधे बैल इशारा पाते ही आगे बढ़ने लगते हैं। ‘टनश्टन’ बजती घंटियां पचासियों मीटर दूर से उसके आने का पता दे देती हैं। लोग घंटियों की आवाज सुनकर बाहर निकल आते हैं। स्त्रियां और बच्चे खिड़कियों-दरवज्जों से झांकने लगते हैं। 

युवक जिस जाति से आता है, उसे न तो बैलगाड़ी पर सवार होने का अधिकार है। न अंगवस्त्र धारण करने का। न ही उन मार्गों पर चलने का जिनपर उसके बैल हाथियों जैसी मस्त चाल से आगे बढ़े जा रहे हैं। उसकी शान देखकर उसके अपने लोगों का सीना शान से चौड़ा हो जाता है। कुछ को ईर्ष्या होती है। कुछ की आंखों की अंगार फूटने लगते हैं। वे घरों से लाठियां, डंडे वगैरह निकालकर बैलगाड़ी के रास्ता रोक लेते हैं। जो हो रहा है, इसकी उसे उम्मीद थी। इसलिए वह तैयार होकर आया है। रोज-रोज अपमान सहते रहने से अच्छा है, उसका प्रतिकार किया जाए। फैसला इस पार हो या उस पार। विरोधियों को तना देख वह अपनी खुखरी निकाल लेता है। उसका रौद्र रूप देख रास्ता रोकने वाले भयभीत हो जाते हैं। जीत का जश्न मनाती हुई बैलगाड़ी आगे बढ़ जाती है। 

दुनिया में अनेक महापुरुष हुए। सामाजिक परिवर्तन के लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं, परंतु बैलगाड़ी पर चढ़कर क्रांति का शंखनाद करने वाले वे अकेले ही थे। 

बाजार जाने की आजादी

भारत में जाति से बड़ा कलंक दूसरा नहीं। यह जन्म के आधार पर आदमी-आदमी में फर्क करना सिखाती है। ‘द्विज’ कहकर मुट्ठी-भर लोगों के हाथों में अकूत अधिकार थमा देती है। दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से को शूद्र और अछूत बताकर उनसे उनका मान-सम्मान, सुख-सुविधा और मामूली खुशियां तक छीन लेती है। केरल सहित पूरे दक्षिण भारत में वह और भी विकृत अवस्था में थी। इसलिए 1892 में केरल यात्रा के दौरान, विवेकानंद ने उसे ‘जातियों का पागलखाना’1 तक कह दिया था। बीसवीं शताब्दी में वहां के सवर्ण पुलाया, पारया, कुरुवा जैसी जातियों की छाया से भी बचते थे। दलितों का उत्पीड़न आम बात थी। उन्हें न सार्वजानिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता थी, न बाजार जाने की। न ही अच्छे वस्त्र पहनने की। गुलामों जैसा जीवन था उनका। बैलगाड़ी पर चढ़कर सार्वजनिक मार्गों पर चलने की आजादी छीन लेने वाला हमारा महानायक, 1898 में उनके मान-सम्मान की खातिर एक बार फिर नए जोश के साथ उठ खड़ा हुआ। इस बार संघर्ष बाजार जाने की आजादी को लेकर था।   

उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया। इरादा आरालुम्मुद बाजार में प्रवेश करने का था। अपने साथियों को लेकर उसने पठानकाडा से आगे बढ़ना शुरू किया। सभी जोश में थे। इस डर से कि विरोधी कभी भी, किसी भी दिशा से हमला कर सकते हैं, वे सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। जैसे ही उनका कारवां चेट्टियार स्ट्रीट, बलरामपुर पहुंचा—हथियारों से लैस ऊंची जातियों के लड़ाके उनके रास्ते में अड़ गए।2 दोनों ओर से घात-प्रतिघात होने लगा। संघर्ष बढ़ा तो बढ़ता ही गया। दलितों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। देखते ही देखते मनाक्कुडु, नेय्याट्टिंकर, नेमोन, अमरविला, परसाला, कोझाकुट्टम, कनियापुरम आदि इलाकों में विद्रोह की चिंगारियां फूटने लगीं। जो अछूत सवर्णों को देख कई हाथ पहले ठिठक जाया करते थे—वे अब नई चेतना और आत्मविश्वास से भरे थे। अपने नेता के इशारे पर कुछ भी करने को सनद्ध। पूरे त्रावणकोर में गृहयुद्ध की स्थिति बन चुकी थी। विद्वान 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वाधीनता संग्राम कहते हैं। लेकिन स्वाधीनता की असली लड़ाई तो वे दलित और आदिद्रविड़ लड़ रहे थे। एक सप्ताह बाद हालात सामान्य हुए। तब तक इतिहास उस घटना को ‘चलियार विद्रोह’ के नाम से अपने भीतर टांक चुका था। 

केरल को आधुनिक राज्य बनाने में इन आंदोलनों की बड़ी भूमिका है। वहां अय्यंकाली का उतना ही योगदान है, जितना ज्योतिराव फुले और डॉ. आंबेडकर का महाराष्ट्र में, पेरियार का तमिलनाडु में है। अय्यंकाली का जन्म 28 अगस्त 1863 को त्रावणकोर जिले में, त्रिरुवनंतपुरम् से 13 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित वेंगनूर नामक गांव में हुआ था। आठ भाई-बहनों में वे सबसे बड़े थे। जाति थी पुलाया। उस जाति के लोग आमतौर पर गुलामों की तरह काम करते थे। अय्यंकाली के पिता अय्यन भी एक जमींदार के गुलाम थे। उनकी मेहनत और वफादारी से प्रसन्न होकर जमींदार ने उन्हें पांच एकड़ जमीन उपहार में दे दी थी। इसलिए अपनी जाति के लोगों में अय्यंकाली के परिवार की हैसियत काफी अच्छी थी। पिता अय्यन पुलाया बस्ती के मुखिया थे।

उस समय समाज पूरी तरह जाति में जकड़ा हुआ था। उस परिवेश से गुजरने वाले बच्चों को समाज में जो उत्पीड़न, उलाहने और तिरष्कार सहना पड़ता है, वैसा अय्यंकाली के साथ भी हुआ था। बचपन से ही वे सुंदर थे। शरीर गठीला और स्वस्थ था। उनका व्यक्तित्व अलग ही छाप छोड़ता था। फुटबाल खेलने का शौक था। एक बार फुटबाल नैय्यर के घर में जा गिरी। वे बॉल लेने पहुंचे तो नैय्यर ने उनका अपमान कर दिया। हिदायत दी कि भविष्य में बॉल उसके घर न आने पाए। उस अपमान ने अय्यंकाली को आहत कर दिया। फुटबाल खेलते समय कुछ सवर्ण लड़के भी उनके साथ शामिल हो जाते थे। अय्यंकाली की जाति के बारे में पता चलते ही उन्होंने आना छोड़ दिया। अय्यंकाली को यह बहुत अखरा। उन्होंने भविष्य में उन बच्चों के साथ कभी न खेलने का फैसला किया। 

अय्यंकाली बचपन से ही रचनात्मक प्रवृत्ति के थे। गाने-बजाने का शौक था। अपनी जाति के बच्चों को इकट्ठा कर उन्होंने एक नाटक मंडली की शुरुआत की। आरंभ में वे परंपरागत नाटक खेलते थे। धीरे-धीरे अपने रचे नाटक भी खेलने लगे। उनके नाटकों में एक संदेश होता था। फलस्वरूप लोग तेजी से उनकी ओर आकर्षित होने लगे। बचपन से ही वे निडर और साहसी थे। इस कारण किसी न किसी मुद्दे को लेकर सवर्णों ने उनका अकसर टकराव होता रहता था। उससे निपटने के लिए विद्रोही अय्यंकाली ने अपने साथियों को संगठित करना आरंभ किया। उन्हें कुश्ती और लाठीबाजी का प्रशिक्षण दिलवाया। इसके लिए कलारी असान नामक प्रशिक्षक को बाहर से बुलवाया गया। इससे पलाया युवकों के भीतर आत्मसम्मान की भावना बढ़ने लगी। चूंकि इस बदलाव के मूल में अय्यंकाली की प्रेरणा और श्रम था, इसलिए प्रशंसक उन्हें सम्मान के साथ ‘उरपिल्लई’ या ‘मूथापिल्लई’ कहते थे। 1888 में उनका विवाह चेल्लमा से हो गया। पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम था। दोनों के सात बच्चे हुए। अय्यंकाली खुद को अच्छा गृहस्थ सिद्ध कर चुके थे। लेकिन उनकी मंजिल वहीं तक सीमित नहीं थी। अछूत होने के कारण उनपर कई प्रकार के बंधन थे। उनसे निपटने के लिए 1893 में बैलगाड़ी पर सवार अय्यंकाली ने वह कर दिखाया, जैसा उनसे पहले किसी न सोचा तक न था। 

शिक्षा हेतु संघर्ष

मैकाले की सलाह पर आगे बढ़ते हुए तत्कालीन वायसराय विलियम बैंटिक 7 मार्च 1835 को एक संकल्पपत्र प्रस्तुत किया था। उद्देश्य था समाज के निचले वर्गों तक शिक्षा का विस्तार। हजारों वर्षों से ज्ञान के नाम पसरे शूण्य की भरपाई करना। लेकिन कानून बनना एक बात है, जरूरतमंदों तक उसका लाभ पहुंचना दूसरी बात। अधिकांश स्कूलों का प्रबंधन द्विज जातियों के हाथ में था। कानून बन जाने बावजूद वे उसकी अवहेलना करती आ रही थीं। फुले का विचार था कि बदहाली से मुक्त होने के लिए शूद्र-अतिशूद्रों को स्वयं प्रयास होंगे, समाज को जगाना होगा। नेतृत्व हेतु प्रभावशाली नेता भी अपने ही भीतर से पैदा करने होंगे। यह सब बिना शिक्षा के असंभव है। अतएव 1848 से ही वे  शूद्रों-अतिशूद्रों के लिए अलग स्कूलों की स्थापना में जुट गए थे। आने वाले 3 वर्षों में 18 स्कूलों की स्थापना कर उन्होंने एक तरह से कीर्तिमान रचा था। 

उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अय्यंकाली ने 1904 में वेंगनूर में पहले स्कूल ‘कुदी पल्लिकूदम’ की नींव रखी। लेकिन सवर्णों से यह सहन न हुआ। निर्माण कार्य शुरू होने के पहले ही दिन उन्होंने अय्यंकाली के स्कूल में आग लगा दी। लोगों के सहयोग से, उन्होंने बिना देर किए नए सिरे से निर्माण शुरू कर दिया। परंतु विद्रोही बाज आने वाले न थे। उन्होंने स्कूल को दूसरी बार भी वही किया। कोई और होता तो कदाचित हार मान लेता। मगर बचपन से ही जुझारू रहे अय्यंकाली के नेतृत्व में निर्माण कार्य चलता रहा। आखिरकार स्कूल बना। बच्चे वहां जाने लगे। वह केरल में किसी दलित द्वारा, दलित बच्चों की शिक्षा के स्थापित पहला स्कूल था। 

अछूत जातियों से जुड़े बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती करने नियम 1907 में ही बन चुका था। परंतु उसपर अमल दूर था। सवर्णों के दबाव में त्रावणकोर के दीवान ने उस आदेश को दबा लिया था। अपने संगठन के माध्यम से अय्यंकाली उसके लिए निरंतर प्रयत्नरत थे। आखिरकार, सवर्णों के रवैये से निराश होकर उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने अछूतों से कहा कि जब तक उनके बच्चों को स्कूल में प्रवेश नहीं मिलता है, तब तक वे नैय्यरों के खेतों में काम करना छोड़ दें। यही हुआ। पुलायाओं ने हड़ताल की घोषणा कर दी। शुरू-शुरू में नैय्यरों ने इसे गीदड़ भभकी माना। सोचा कि भूख से बेहाल, गरीब पुलाया, कुरुवा आदि अछूत, बहुत जल्दी खेतों में लौटने को मजबूर हो जाएंगे। लेकिन अछूतों की आंखों में रोपा गया सपना, उनकी भूख से कहीं ज्यादा बड़ा था। सो हड़ताल खिंचती चली गई। सवर्णों ने अछूतों को डराना-धमकाना शुरू कर दिया। अय्यंकाली और उनके साथियों ने उसका भी सामना किया। 

बुबाई का मौसम आया तो कुछ नैय्यरों ने खुद ही अपने खेतों में धान रोपने की कोशिश की। परंतु दूसरों के श्रम पर जीवन जीते-जीते आलसी हो चुके नैय्यरों के लिए वह काम आसान नहीं था। एक पुलाया जितना काम एक दिन में कर लेता था, उतना काम करने में उन्हें पांच-छह दिन लगते थे। हड़ताल खिंचने से गरीब पुलायाओं के आगे भोजन का संकट उत्पन्न होने लगा। उस समय अय्यंकाली ने बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने मछुआरों से समझौता किया कि हर मछुआरा मछली पकड़ने के लिए अपने साथ एक पुलाया को साथ ले जाएगा। यह फार्मूला कामयाब रहा। इससे विरोधी बुरी तरह चिढ़ गए। उधर हड़ताल का दायरा बढ़ाने के लिए अय्यंकाली ने कुछ नई मांगे जोड़ दीं। उनमें मजदूरों को स्थायी करने, झूठे आरोपों में फंसाकर दंडित करने तथा कोड़ों से प्रहार करने पर रोक, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी, सप्ताह में एक दिन अवकाश जैसी नई मांगें शामिल थीं। 

अय्यंकाली के नेतृत्व का ही जादू था कि शताब्दियों से बैल की तरह सर झुकाए श्रम करते आए अछूत पहली बार जमींदारों के आगे तने खड़े थे। हालात बिगड़ते जा रहे थे। अछूतों के आगे भोजन का संकट था। वहीं जमींदारों की हालत अच्छी न थी। क्षुब्ध होकर उन्होंने पुलायाओं की झोंपड़ियों में आग लगा दी। बदले में अय्यंकाली के हरावल दस्ते ने जमींदारों के मकानों को आग के हवाले कर दिया। इससे उनके गुस्से का ठिकाना न रहा। यह सोचते हुए कि सारे मामले के पीछे अय्यंकाली है, नीचता की हद तक जाते हुए उन्होंने उन्हें मरवाने का फैसला कर लिया। उसके लिए मुंबई के एक गुंडे को नियुक्त किया गया। अय्यंकाली को जीवित लाने पर 2000 रुपये तथा मृत लाने पर 1000 रुपये का ईनाम देने की घोषणा कर दी गई।4 

धमकियों और खून-खराबे के बावजूद अय्यंकाली अपने साथियों के साथ डटे हुए थे। नैय्यरों ने अय्यंकाली तथा उनके अंगरक्षक याकूब के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। याकूब को गिरफ्तार कर लिया। अय्यंकाली तत्काल पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां तब तक डटे रहे, जब तक पुलिस ने याकूब को रिहा न कर दिया। हड़ताल करीब एक वर्ष(1907-08) तक चली। इस बीच शिक्षा निदेशक मिशेल ने त्रावणकोर के दीवान को 1907 के नीतिगत आदेश पर तुरंत अमल करने की सलाह दी। चौतरफा दबाव के बीच त्रावणकोर के दीवान की ओर से 1910 में अछूत बच्चों को सरकारी स्कूलों में प्रवेश संबंधी आदेश जारी कर दिए गए। उस समय के कई बुद्धिजीवियों की ओर से उसका विरोध किया गया था। उनमें से एक खुद को प्रगतिशील बताने वाले ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक रामकृष्ण पिल्लई भी थे। अछूतों बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश पर उन्होंने लिखा था कि यह आदेश—

‘पीढ़ियों से ज्ञान-विज्ञान की खेती करते आए लोगों के बच्चों को, उनके खेतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी करते आए लोगों के बच्चों के साथ रखना—घोड़े और भैंस को एक साथ जोत देने जैसा है।’5 

आदेश का जमीनी असर देखने के लिए अय्यंकाली पूजारी अय्यपन की 8 वर्ष की बेटी पंजामी को लेकर ऊरुट्टमबलम गवर्नमेंट गर्ल्स स्कूल पहुंचे। उनके पास डाइरेक्टर ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन मिशेल के विशेष आदेश थे। प्रधानाचार्य ने बच्ची का दाखिला करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। अय्यंकाली द्वारा विशेष आदेश दिखाने के बाद वह पंजामी को कक्षा के अंदर बिठाने के लिए तैयार हो गया। परंतु उस बच्ची के कक्षा में बैठते ही, नैय्यर विद्यार्थियों ने कक्षा का बहिष्कार कर दिया।6 प्रधान अध्यापक हालात को संभालने की कोशिश कर ही रहे थे कि कंडाल गांव के कुछ नैय्यर वहां जा धमके। वे लाठी-डंडों से लैस थे। अय्यंकाली के साथ भी उनके साथी थे। विवाद बढ़ता गया। गांवों से शुरू हुए उस संघर्ष ने शीघ्र ही आसपास के जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। यहां तक कि दक्षिणी त्रावणकोर भी उस आंदोलन के असर से बच न सका। दलितों के प्रवेश को लेकर नैय्यर इतने विध्वंसात्मक थे कि उन्होंने उन दो स्कूलों में आग लगा दी, जिनमें अय्यंकाली ने अपने समाज के बच्चों का दाखिला कराने के उद्देश्य से पहुंचे थे।

साधुजन परिपालन संघम

भूख, अभाव, विपन्नता और दास जैसा जीवन जीने वाले लोगों को अय्यंकाली ने नया नाम दिया था—‘साधु जन’। अपने आंदोलन को सांस्थानिक रूप देने के लिए उन्होंने 1904 में ‘साधु जन परिपालन संघ’(गरीब रक्षार्थ संघ) की स्थापना की थी। उनके कुछ जीवनीकारों के अनुसार इस संस्था का गठन 1907 में हुआ था। संस्था का ‘कनक्कन’(महासचिव) अय्यंकाली को बनाया गया। अन्य सदस्यों में मूलायिल कालि, थॉमस वाडयार, गोपालन आदि शामिल थे। उसकी सदस्यता सभी अछूत जातियों के लिए खुली थी। उसका प्रमुख उद्देश्य था पुलाया सहित सभी अछूत जातियों को अपने अधिकारों पक्ष में संगठित करना। उन्हें अंधविश्वास, गुलामी, अशिक्षा, गरीबी और सवर्णों के आतंक से मुक्ति दिलाना। संस्था के प्रचार-प्रसार के लिए स्थानीय सभाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता था। सवर्ण उस संस्था के गठन से नाराज थे। इसलिए आरंभ में उसकी बैठक, बस्ती से दूर पेड़ों की ओट में या पहाड़ी के पीछे किसी गोपनीय स्थान पर की जाती थी। धीरे-धीरे लोगों के मन से यह डर निकलने लगा। ‘साधु जन’ का उद्देश्य पुलायाओं, पारयाओं जैसी अछूत जातियों का उत्थान था। बावजूद इसके उन्होंने अपनी संस्था को ‘धर्म एवं जाति’ संबंधी दुराग्रहों से परे रखा था। इससे उन्हें इन जातियों के राजनीतिकरण में मदद मिली। 

संस्था का प्रबंधन बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया जाता था। आमतौर पर हर गांव में उसकी शाखा थी। संस्था का वार्षिक सम्मेलन त्रिरुवनंतपुरम के ‘विक्टोरिया जुबली हाल’ में किया जाता था। उसमें केरल के अलग-अलग गांवों और शहरों से आए लोग हिस्सा लेते थे। सम्मेलन के दिन त्रिरुवनंतपुरम की सड़कें, काली चमड़ी वाले अछूतों से पट जाती थीं। उसमें संस्था के सदस्यों और अधिकारियों के अलावा विभिन्न सरकारी और राजकीय अधिकारियों को भी आमंत्रित किया जाता था। संस्था के महासचिव के रूप में उसके कार्यक्रमों, उपलब्धियों और मांगों को सभा के सम्मुख पेश करने का दायित्व अय्यंकाली का था। वे अनपढ़ थे। लेकिन संस्था का संचालन इस प्रकार करते थे कि लोग उनकी प्रबंधन क्षमता के कायल हो जाते थे। ‘साधु जन परिपालन संघ’ के कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘साधु जन परिपालिनी’ नामक मासिक पत्रिका की शुरुआत भी की गई। कालि कोदिक्कुरुप्पन को उसका संपादक नियुक्त किया गया। आने वाले 30 वर्षों तक यह संस्था सुचारू रूप से काम करती रही। 

नेदमंगादु विद्रोह

चालियार विद्रोह के बाद कई बाजारों में पुलायाओं को आने-जाने की आजादी प्राप्त हो चुकी थी। बावजूद इसके कुछ बाजारों में अभी भी उनका आना प्रतिबंधित था। जो पुलाया अपना सामान बेचने के लिए आते थे, उन्हें भी मुख्य बाजार में आने से रोका जाता था। सवर्णों ने उन्हें अलग स्थान दिया था। 1912 में अय्यंकाली ने एक बार फिर अपने साथियों को इकट्ठा किया। इस बार उनके अभियान में स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे। जैसे-जैसे पुलायाओं का दल आगे बढ़ा, उनका साथ देने और हौसला बढ़ाने के लिए दूसरी जातियों के लोग भी उनके साथ आ मिले। उन्होंने अपना अभियान त्रिवेंद्रम से आरंभ किया। नेदमंगाडु तक पहुंचने के लिए उन्होंने जंगल का रास्ता चुना था। मगर बाजार तक पहुंचने से पहले ही सवर्णों ने उनपर हमला बोल दिया। दोनों पक्ष पक्के इरादे से आए थे। विवाद एक बार फिर संघर्ष में बदल गया। एक रणनीति के तहत अय्यंकाली ने पुलायाओं के एक हिस्से को दूसरी दिशा से बाजार में प्रवेश के लिए भेज दिया। घने जंगलों के रास्ते, चुनौतियों से जूझता हुआ हुआ वह जत्था आखिरकार नेदमंगाडु बाजार में प्रवेश करने में कामयाब हो गया।

श्री मूलम प्रजा सभा की सदस्यता

अय्यंकाली के सघर्ष और उनकी ख्याति सरकार तक पहुंच चुकी थी। लोग उनसे प्रभावित थे। इसके फलस्वरूप 1912 में उन्हें ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ का सदस्य मनोनीत कर दिया गया। सभा के समक्ष उनका प्रथम संबोधन छोटा, किंतु प्रभावशाली था। अपने भाषण में उन्होंने पुलायाओं की गरीबी, अशिक्षा के अलावा उन्हें आवास एवं खेती हेतु जमीन दिए जाने की मांग की थी। उनका नारा था, ‘खेत उनके लिए जो जोतें’। अपनी पहली सभा में ही सरकारी अधिकारियों की मनमानी की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए उन्होंने कहा था—

‘हमारे कई परिवारों को धनवान जमींदारों ने इस आश्वासन के साथ उनके घर से निकाल दिया था कि उन्हें वे घर बनाने के लिए अलग से जमीन देंगे। अब वन-विभाग के कर्मचारी, जमींदारों से मिलकर मेरे लोगों पर उन घरों को खाली करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसके साथ-साथ ये अधिकारी जमींदारों को उनकी भूमि पर कब्जा करने में मदद कर रहे है। मैं इस समस्या के निराकरण की प्रार्थना करता हूं।’

अय्यंकाली की अपील पर दीवान ने पुलायाओं को यथासंभव मदद का भरोसा दिलाया। दीवान के मन में उनके प्रति कितना सम्मान था, यह इस घटना से भी जाहिर होता है—

‘एक बार अय्यंकाली प्रजा सभा के सदस्य की हैसियत से, दीवान से मिलने उनके कार्यालय में पहुंचे। वहां तैनात दरबानों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। उन्होंने अय्यंकाली के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी किया। उनका नाम लेकर पुकारा। अय्यंकाली वहां से चले गए। बाहर जाकर उन्होंने तार भेजकर दीवान को सारी घटना से अवगत करा दिया। दीवान ने तुरंत अय्यंकाली को अपने कार्यालय बुला भेजा। वे जब दीवान के कार्यालय में पहुंचे तो दोनों दरबान भी वहां मौजूद थे—

‘मिस्टर अय्यंकाली, अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए आप इन्हें क्या दंड देना चाहेंगे?’ दीवान ने पूछा। यह सुनकर वे दंग रह गए। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने कहा—

‘इन्होंने जो किया, लापरवाही के कारण किया। इन्हें माफ कर दिया जाए।’

दीवान अय्यंकाली से प्रभावित हुआ। आखिरकार दोनों दरबानों को अय्यंकाली के पैर छूकर माफी मांगने के बाद छोड़ दिया गया। 

कोचु कली : अय्यंकाली के वक्ष-कर विरोधी आंदोलन की नायिका

उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। दलित स्त्री-पुरुष दोनों को टैक्स देना पड़ता था। पुरुषों का मूंछें रखना, छाता लेकर चलना निषिद्ध था। ये सब नियम ब्राह्मणों द्वारा अपनी जातीय श्रेष्ठता के नाम पर बनाए गए थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। इसलिए उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

जब स्त्री का वक्ष ही उसका दुश्मन था

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। 1803 में वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा के अनुसार निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष इसलिए ढककर पहुंची थी, ताकि  रानी नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। 1859 के सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त हो चुका था। लेकिन इझ़वा, पुलाया, कुरुवा आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को यह अधिकार 1915 तक भी प्राप्त नहीं था। 

सोने-चांदी के गहने पहनने पर प्रतिबंध  

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लामाला’(कंठमाला) पहन सकती थीं। कान में लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लामाला’ उनके दासत्व का प्रतीक थी। वक्ष कर के विरोध में कई आंदोलन चल चुके थे, परंतु उसके ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया था अय्यंकाली ने।

कौन थी कोचु कली

उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उनमें से एक का नाम था—कोचु कली। कोचु कली आदि द्रविड़ समाज से थी। तांबई रंग और लंबे कद के कारण उसे दूर से ही पहचाना जा सकता था। उसका जन्म उनीसवीं शताब्दी  के अंतिम दशक में, इरनाकुलम जिले के एलुवा नामक गांव में हुआ था। पिता का नाम था, पींगन। मां पल्ली कुरुंबा कीझनाद गांव की रहने वाली थी। सात भाई-बहनों में कोचु तीसरे नंबर की थी। 21 वर्ष की उम्र में उसका विवाह, परंबू हाउस बंगले में काम करने वाले पल्ली के साथ कर दिया गया। विवाह के तीन वर्ष पश्चात दोनों के घर एक पुत्री का जन्म हुआ।

उस समय तक केरल में वक्ष-कर विरोधी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। जगह-जगह उसके समर्थक और विरोधी आमने-सामने थे। उन्हीं दिनों अपनी संस्था ‘साधुजन परिपालन संघ’ के एक कार्यक्रम के दौरान अय्यंकाली पारंबू हाउस में ठहरे थे। वे एक सभा के सिलसिले में वहां पधारे थे। वक्ष-कर विरोध को लेकर चल रहे प्रदेश-व्यापी संघर्ष के बीच वह सभा कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी। सभा में शिरकत के लिए अय्यंकाली ने कुछ उदार नैय्यर नेताओं को भी आमंत्रित किया था। 

दासता के प्रतीकों का बहिष्कार

सभा में सभी नेताओं ने वक्ष कर का विरोध किया। अय्यंकाली का नंबर आया तो उन्होंने भी उसकी तीव्र आलोचना की। भाषण के दौरान उन्होंने दो स्त्रियों को मंच पर आमंत्रित किया। उनमें से एक  कोचु कली थी। उस समय वह 24 वर्ष की थी। दोनों स्त्रियां सकुचाती हुई मंच पर पहुंचीं। अय्यंकाली ने उन्हें बताया कि यहां बैठक में मौजूद सभी लोग गुलामी की प्रतीक ‘कल्लामालाओं’ को उतार फैंकने की सहमति दे चुके हैं। उसके बाद उन्होंने चाकू से, उन स्त्रियों के गले में पड़ी ‘कल्लामालाओं’ को काट फैंका। इसके साथ ही उन्होंने उनके तोड़ा(कान में पहने जाने वाला पत्थर का पारंपरिक आभूषण) को तोड़ दिया—

‘आगे से तुम इन्हें कभी मत पहनना। बजाय इसके तुम ‘धोती और ब्लाउज’ पहना करना।’ अय्यंकाली ने कहा। उन्होंने उन स्त्रियों को कपड़े खरीदने के लिए कुछ पैसे भी दिए। उसके बाद कोचु कली वक्ष-कर विरोधी आंदोलन के स्त्री दस्ते की नेता बन गई। 1915 में उसके नेतृत्व में वक्ष-कर विरोधी कई प्रदर्शन हुए। उनमे सबसे महत्वपूर्ण कोल्लम जिले के पेरिनाड में दलित-आदिवासी स्त्रियों का आंदोलन था। उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में स्त्रियों ने गले में पहनी कल्लामालाओं को खुद उतार फेंका था।

सवर्णों की हिंसा

वक्ष कर विरोधी आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी ने सवर्णों को हिलाकर रख दिया था। वे मनमानी पर उतर आये थे। मलयालम पत्रिका ‘मीतावदी’ के जनवरी 1916 के अंक के अनुसार एक पुलाया स्त्री ने अय्यंकाली से मुलाकात के बाद ‘कल्लामाला’ पहनना छोड़ दिया था। एक दिन वह अपने काम पर जा रही थी। अचानक एक आदमी उसके पास पहुंचा और ‘कल्लामाला’ के बारे में पूछा। स्त्री के यह कहने पर कि वह उसे उतार कर फ़ेंक चुकी है, उस आदमी को इतना गुस्सा आया कि उसने तत्काल उस स्त्री के कान काट लिए।

अय्यंकाली की यादों के साथ काटी जिंदगी   

आधुनिक केरल के प्रमुख वास्तुकार अय्यंकाली से जुड़ी जादुई यादों का ही असर था, जिससे कोचु कली ने लंबी उम्र प्राप्त की थी। उनका निधन, 115 वर्ष की अवस्था में 2013 में हुआ था। अय्यंकाली को याद करते समय कोचु कली का चेहरा दमकने लगता था। गर्दन अभिमान से कुछ और तन जाती थी। एक साक्षात्कार में उसने बताया था कि अय्यंकाली के शब्द आज भी उनके कानों में घंटी की तरह गूंजते हैं। उसके अनुसार अय्यंकाली तीन दिन और तीन रात ‘परंबू हाउस’ में ठहरे थे। भोजन में उन्हें चावल और सूखी झींगा मछली की कढ़ी परोसी गई थी। कोचु कली उस दिन को याद करके गर्व से भर जाती थी, जब उसने ‘धोती और ब्लाउज’ को पहली बार पहना था—

‘धोती और ब्लाउज पहनते समय मैं बहुत डरी हुई थी। सोचती थी कि सवर्ण डंडों से हमारी पिटाई करेंगे। लेकिन जब अय्यंकाली ने हमसे बात की, हमारा सारा डर गायब हो गया।’

28 अगस्त 2020 को अय्यंकाली का 157वां जन्मदिवस है। यह अवसर अय्यंकाली के साथ-साथ कोचु कली के संघर्ष को याद करने का भी है।

वक्ष-कर का विरोध

अय्यंकालि द्वारा चलाए गए महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक था—वक्ष-कर के विरोध में चलाया गया आंदोलन। वह ऐसा अभियान था, जो उन्हें अपने समकालीन और पूर्ववर्ती कई समाज-सुधारकों से आगे खड़ा सिद्ध कर देता है। उनीसवीं शताब्दी के त्रावणकोर में सभी जातियों के लिए ड्रेसकोड लागू था। उसमें सर्वाधिक प्रताड़ना स्त्रियों को झेलनी पड़ती थी। तदनुसार निचली जाति की स्त्रियों को वक्ष ढकने की आजादी नहीं थी। यदि कोई स्त्री अपना वक्ष ढकना चाहे तो बदले में उसे सरकार को कर देना पड़ता था। कर की मात्रा वक्ष के आकार के अनुरूप तय की जाती थी। जितना बड़ा वक्ष, उतना ज्यादा टैक्स। उसकी उगाही के लिए एक अधिकारी नियुक्त था। वक्ष-कर लगाने वाले ब्राह्मण थे। खुले वक्ष को ऊंची जातियों के प्रति सम्मान माना जाता था। तदनुसार नैय्यर स्त्रियों को नंबूदरी ब्राह्मणों के समक्ष अपना वक्ष ढकने की स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि ब्राह्मण अपना वक्ष केवल मंदिर में देवताओं के समक्ष खुला रखता था। यहां तक उन स्त्रियों को भी, जिन्हें जाति के आधार पर वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त था, ऊंची जाति के पुरुष के समक्ष पहुंचने पर अपना ऊपरी वस्त्र हटा देना पड़ता था।

स्त्री का अपना वक्ष ही उसका दुश्मन था। अनेक कहानियां उसे लेकर समाज में प्रचलित थीं। एक कहानी नंगेली नामक आदिवासी स्त्री की थी। वक्ष-कर न दे पाने की मजबूरी में उसने अपना स्तन काटकर अधिकारी को भेंट कर दिया था। एक लोककथा केरलीय समाज में लंबे समय से प्रचलित थी। उसमें निचली जाति की एक स्त्री रानी के पास अपना वक्ष केवल इसलिए ढककर पहुंचती है कि वह नाराज होकर उसके स्तनों को काटने का आदेश सुना दे। ताकि इस ‘आफत’ से  उसे हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए। 1859 में शुरू हुए सन्नार विद्रोह तथा उसके बाद चले लंबे सघर्ष के फलस्वरूप नडार स्त्रियों को अपना वक्ष ढकने की आजादी प्राप्त हो गई। लेकिन इझ़वा, पुलाया आदि पिछड़ी और अछूत जाति की स्त्रियों को 1915 तक वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। 

अछूतों को सोने और चांदी के आभूषण पहनने का भी अधिकार नहीं था। वे केवल पत्थर अथवा कांच के मनकों की ‘कल्लु माला’(कंठ माला) पहन सकती थीं। कान में केवल लोहे का छल्ला जिसे ‘कुन्नकु’ कहा जाता था, पहनने की अनुमति थी। इसलिए युवा स्त्रियां अपने वक्ष को यथासंभव ढकने की कोशिश में पत्थर और कांच के मनकों की कई-कई मालाएं पहने रहती थीं। ‘कल्लुमाला’ उनके दास होने की निशानी भी थी। 1915 में एक सभा के दौरान अय्यंकाली ने अछूत स्त्रियों से कहा था कि वे दासता के प्रतीक उन आभूषणों को हमेशा के लिए उतार फेंके। उनके स्थान पर धोती और ब्लाउज जैसे वस्त्र पहनें। उनके आवाह्न पर पेरीनाड की हजारों दलित स्त्रियों ने पत्थर की कंठमालाओं को उतारकर ऊपरी वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। यह देखकर शीर्ष जातियों में खलबली मच गई। उन्होंने इसे स्थापित समाज-व्यवस्था का उल्लंघन माना। ‘अपमान’ का बदला लेने के लिए वे दलितों पर हमलावर होने लगे। वक्ष ढकने के कारण कई दलित स्त्रियों के स्तन काट डाले गए। कइयों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। परिजनों पर जानलेवा हमले किए गए। अनेक स्त्रियों के पति, भाई और माता-पिता को मौत के हवाले कर दिया गया। उस आंदोलन में अय्यंकाली को आदिवासी स्त्रियों का पूरा सहयोग मिला। उन जुझारू स्त्रियों में से एक का नाम था—कोचु कली। वह पहली स्त्री थी जिसके गले में पड़ी ‘कल्लुमाला’ को अय्यंकाली ने अपने हाथों से काटा था।

अय्यंकाली के सभी चित्रों में हम उन्हें कोट पहने हुए देखते हैं। वह भेषभूषा भी उन्होंने, ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड को चुनौती देने के लिए अपनाई थी। जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी। एक पुलाया अपने शरीर पर केवल पुराना, लंगोटीनुमा वस्त्र लिपेट सकता था। अय्यंकाली उससे विद्रोह करना चाहते थे। लेकिन सोचते थे कि कोट पहनने का अधिकार केवल पढ़े-लिखे लोगों को है, जबकि वे पूरी तरह अनपढ़ थे। कुन्नुकुझी एस. मणि के अनुसार, श्री मूलम प्रजा सभा का सदस्य मनोनीत किए जाने पर, जॉन हेनरी नामक एक यूरोपियन ने उन्हें एक कोट भेंट किया था। प्रजा सभा के अगले सत्र में वे उसी कोट को पहनकर उपस्थित हुए थे। अगले सत्र के लिए वे कुछ और कोट सिलवाना चाहते थे। मगर उन दिनों त्रिरुवनतपुरम् में ऐसा कोई दर्जी नहीं था, जो कोट की सिलाई कर सके। इसलिए उन्होंने कोट्टयम के एक दर्जी को दो कोट सीने का आर्डर दिया। श्रीमूलम पोपुलर असेंबली के अगले सत्र में उन्होंने अपने सिलवाए कोट पहनकर हिस्सा लिया था। नैय्यर उसे देखकर जल-भुन रहे थे। लेकिन अब कुछ भी कर पाना उनके बस से बाहर था। 

केरल के इतिहास में अस्पृश्यता, अशिक्षा और दासता को सबसे जोरदार चोट देने वाला वह पुरोधा, 18 जून, 1941 को सघर्ष चिरनिद्रा में लीन हो गया। एक अवसर पर एक पत्रकार ने उनसे पूछा था—‘आपकी दिली तमन्ना क्या है?’ इस पर अय्यंकाली का उत्तर था—‘आंख मूंदने से पहल मैं अपने समाज के दस-बारह विद्यार्थियों को ग्रेजुएट बने देखना चाहता हूं…बस।’ एक कविता के जरिये  मलयाली कवि पी. जी. बिनॉय उन्हें इस तरह याद करते हैं—

तुम्हीं ने जलाया था प्रथम ज्ञानदीप

बैलगाड़ी पर सवार हो

गुजरते हुए प्रतिबंधित रास्तों पर

अपनी देह की यंत्रशक्ति से

पलट दिया था, कालचक्र को

ओमप्रकाश कश्यप

1. एम. निसार, मीना कंडासामी—अय्यंकाली : ए दलित लीडर ऑफ़ आर्गेनिक प्रोटेस्ट, पृष्ठ 15.

2. एम. वेलकुमार, ट्रांसफार्मेशन फ्राम अनटचेबल टू टचेबल: एक स्टडी ऑफ़ अयंकाली कंटीब्यूशन टू दि रेनेसां ऑफ़ ट्रावणकोर दलितस, 2018

3. जेटिंल टी. वर्गिस, दि कंन्सट्रक्शन ऑफ़ साधुजनम्: अय्यंकालि एंड दि स्ट्रगल ऑफ़ दि स्लेव कॉस्ट्स फॉर ए न्यू आइडेंटिटी-1884-1941, (2016), पेज 72

4. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

5. Ayyankali, dalit e-forum, dalits@ambedkar.org,

6.  कन्नुकुझी मणि, महात्मा अय्यंकलि, डी.सी.बुक्स, कोट्यम, 2008, जेटिंल टी. वर्गिस, पृष्ठ 81

7. कोचु कली, दि हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन स्लेव वूमेन, http://dravidagallery.blogspot.com/2013/06/?m=0

8. एम. वेलकुमार, पृष्ठ-197-198

महामना अय्यंकालि : सामाजिक क्रांति के अग्रदूत

सामान्य

मैंने पढ़े हैं कई सभ्यताओं के इतिहास

खोजा है, देश-प्रदेश के प्रत्येक इतिहास में

कहीं, कुछ भी नहीं मिला मेरी जाति पर

पृथ्वी पर नहीं कोई ऐसा कलमकार

जो लिखे मेरी जाति का इतिहास

जिसे डुबा दिया गया है रसातल में

जो खो चुकी है

इतिहास की अतल गहराइयों में

            पोईकायल योहान्न, मलयाली कवि

इतिहास सभ्यता का ऐसा दर्पण है, जो सिर्फ सतह से ऊपर देखता है। इसलिए उसमें राजा-महाराजों के ऐश्वर्य राग, लड़ाइयां, स्वामीभक्ति और बुजदिली के किस्से, रणनीति और राजनीति, षड्यंत्र और विश्वासघात—यही सब दिखाई पड़ते हैं। इतिहास उन स्वेद-बिंदुओं की गिनती याद नहीं रखता जो खेती करने वाले किसान, मजदूर इसलिए बहाते हैं, ताकि राजा-महाराजाओं के अन्न-भंडार भरे रहें। उनके मंत्रियों, सिपहसालारों के चेहरे दिपदिपाते रहें। वह देवताओं और पैगंबरों के किस्सों को सहेजता है। जाति, धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर हुए दमन के उन किस्सों को भूल जाता है, जो जमीन के लोगों के हिस्से आते हैं। इसलिए ऐरिक हॉब्सबाम ने सलाह दी थी कि इतिहास को केवल उन सवालों के माध्यम से याद करना चाहिए जो हम उसे लेकर उठा सकते हैं—‘उस रूप में, जिसपर हम इतिहासकारों का भरोसा हो। इतिहास का ऐसा वस्तुनिष्ट सत्य, जिसे सवालों के जरिये जांचा-परखा जा सके। ठीक उस तरह जैसे हम उसे परखना चाहते हैं।’

भारतीय इतिहास दृष्टि चीजों को शिखर से परखती है। शिखर के लोग ही उसमें शामिल होते आए हैं। जनसाधारण क्या सोचता है? अपने समय और इतिहास को लेकर उनकी अपनी दृष्टि क्या है? राजा-महाराजा, जमींदारों और सामंतों से परे जनता का सच भी हो सकता है? इस हकीकत को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की गई। भारत में इतिहास के नाम पर पुराण रचे गए। उन्हें स्वयं-सिद्ध बताया जाता है। सवाल उठाने वालों को संस्कृति विरोधी मान लिया जाता है। इन दिनों तो उन्हें सीधे राष्ट्रद्रोही घोषित करने का चलन है। यही भारतीय और पाश्चात्य इतिहास-दृष्टि का अंतर है। इतिहास का संबंध यदि मनुष्य से है तो उसमें पूरा मानव-समाज प्रतिबिंबित होना चाहिए। उसे राजा-महाराजों के वैभव-विलास, राजनीतिक उठा-पटक और रनिवासों के षड्यंत्रों तक सीमित कर देना इतिहास की आड़ में चारण-कर्म है।

आजादी के बाद इसमें कुछ बदलाव आया। कुछ जमीनी लेखक शामिल हुए हैं। दामोदर धर्मानंद कोसंबी, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने इस दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं। फुले, आंबेडकर और पेरियार में से कोई भी घोषित रूप से इतिहासकार नहीं था। परंतु उन सभी के पास इतिहास को परखने की दृष्टि थी। वे भारतीय इतिहास और उसकी लेखन-पद्धति पर सवाल उठाते हैं। सांस्कृतिक अंतर्विरोधों की ओर संकेत करते हैं। आधुनिक मूल्यों के संदर्भ में उसे परखना चाहते हैं। यह परंपरावादी इतिहास लेखकों स्वीकार्य नहीं है। उनमें प्रगतिशील होने का दावा करने वाले साम्यवादी लेखक भी शामिल हैं, जिन्हें भारतीय समाज में जातीय विभाजन के आधार पर बनी द्वंद्वात्मक स्थितियां स्वीकार नहीं हैं। इसीलिए दलित और बहुजन लेखकों, जो छूआछूत, जातिगत भेदभाव की कसौटी पर भारतीय इतिहास और संस्कृति की विवेचना करते हैं, राजनीतिक स्वतंत्र के बजाय सामाजिक स्वतंत्रता पर जोर देते हैं—की लगातार उपेक्षा की जाती है। गाल-बजाऊ किस्म के लोग तो उन्हें राष्ट्र-विरोधी तक कह जाते हैं।

कुछ कथित विद्वान जो समानता और स्वतंत्रता का राग रात-दिन अलापते हैं, उन लोगों के योगदान को जिनका भारत को आधुनिक राष्ट्र-समाज बनाने में सर्वाधिक योगदान है—महज इसलिए बिसरा देते हैं, क्योंकि वे उनकी जाति या समाज के नहीं थे। उलटे उनसे टकराकर अपने लक्ष्य तक पहुंचे थे। ऐसे ही लोग फुले और आंबेडकर के योगदान की उपेक्षा करते हैं। पेरियार के नाम पर नाक-मुंह सिकोड़ते हैं। केरल के नवजागरण के अग्रदूत अय्यंकालि को तो लगभग भूल ही चुके हैं। जातीय दुराग्रहों के चलते, ‘केरल: मलयाली भाषियों की मातृभूमि’ जैसी पुस्तक लिखने वाले साम्यवादी ईएमएस नंबूदरीपाद ने न तो दलित महिलाओं पर लगने वाले ‘मुल्लकरम’(स्तन ढकने पर टैक्स) के बारे में कुछ लिखा न है, न वहां की दासप्रथा पर। न उन्हें केरलीय समाज के नवोत्थान में महात्मा अय्यंकालि का योगदान नजर आता है।  

प्रसंगवश बता दें कि केरल, जो पहले त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था, में दलित महिलाओं को वक्ष ढकने का अधिकार नहीं था। दलितों की हैसियत दास के बराबर थी। कुछ अर्थों में पेशवाशाही के दलितों से भी बुरी। दलित स्त्रियों को गले में ग्रेनाइट पत्थर का हार पहनना पड़ता था। कांच और काले पत्थर के मनकों से बने कंठहार उन महिलाओं के गले में सांप जैसे दिखते थे। ये सब उनके दासत्व की निशानियां थीं। स्त्रियों में उस प्रथा के विरुद्ध आक्रोश था। त्रावणकोर के राजा द्वारा लगाए गए कर की वसूली हेतु अधिकारी जब एक गांव में पहुंचा तो वहां नंगेली नाम की स्त्री ने वक्ष-कर का भुगतान करने से इन्कार कर दिया। अधिकारी द्वारा जोर-जबरदस्ती करने से क्षुब्ध उस स्त्री ने गुस्से में आकर अपने दोनों स्तन काट, उन्हें केले के पत्ते पर रखकर, अधिकारी को सौंप दिए। अत्यधिक खून बहने से नंगेली की उसी दिन मृत्यु हो गई थी। नंगेली के बलिदान से केरल में जबरदस्त आक्रोश पैदा हुआ, जिसे मलयाली भाषा में ‘सन्नार लहाला’-उभोवस्त्र अधिकार विद्रोह(Channar Lahala—Upper Cloth Mutiny) कहा जाता है। नंगेली के सम्मान में उसके गांव को ‘मुलाचिपारांबु’ जिसका अर्थ ‘स्तन वाली महिला’ है—कहा जाता है। महिलाओं के वक्ष ढकने के अधिकार को लेकर एक कामयाब लड़ाई अय्यंकालि ने भी लड़ी थी। वह अय्यंकालि द्वारा आधुनिक केरल के नवनिर्माण, महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए लड़ी गई कई लड़ाइयों में से एक थी। भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य बनाने, दलितों और पिछड़ों में स्वाभिमान चेतना जगाने में महात्मा अय्यंकालि की भूमिका ठीक वैसी ही है, जैसी ज्योतिराव फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर, नारायण गुरु और ई. वी. रामासामी पेरियार की।

अय्यंकालि का जन्म तिरुवनंतपुरम् जनपद से 13 किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित, छोटे से गांव वेंगनूर में 28 अगस्त 1863 को हुआ था। पिता अय्यन और मां माला की आठ संतानों में अय्यंकालि सबसे बड़े थे। माता-पिता ने उनका नाम ‘काली’ रखा था, जो पिता के नाम के साथ जुड़कर अय्यंकालि बन गया। उनकी जाति पुलायार(पुलाया) थी। वेंगनूर आगमन से पहले उनका परिवार पलावर थारावाड़ का रहने वाला था। अपने पैत्रिक गांव के नाम को अय्यन अपने नाम के साथ जोड़कर सम्मान से सहेजे हुए थे। वह उनकी पहचान का हिस्सा था। दक्षिण भारत में पुलायार अछूत जातियों में, सबसे नीचे की मानी जाती है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में उनकी हैसियत भू-दास के समान थी। जमींदार लोग, मुख्यतः नैय्यर अपनी मर्जी से किसी भी पुलायार को काम में झोंक देते थे। सुबह से शाम तक काम करने के बाद उन्हें मिलता था, बामुश्किल  600 ग्राम चावल। कभी-कभी वह भी बेकार….दूसरे दर्जे का।

अय्यन बहुत मेहनती थे। उन्हें एक जमींदार ने जंगल को साफ कर जमीन खेती योग्य बनाने का काम सौंपा हुआ था। जमींदार अपेक्षाकृत उदार था। अय्यन के काम से प्रसन्न होकर उसने उन्हें पांच एकड़ जमीन भेंट कर दी थी। पुलायार जाति के लिए यह बड़ी बात थी। अपने परिवार के साथ अय्यन उसी जमीन में खेती करते थे। इस तरह अय्यंकालि के परिवार की आर्थिक स्थिति उनके ‘जाति-बंधुओं’ की अपेक्षा बेहतर थी। बाकी पुलयारों की हैसियत उस समय भूदासों के समान थी। उन्हें बिना किसी मजदूरी के दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था। इस प्रथा को वहां ‘ऊझीयम वाला’(Oozhiyam vala—Labour Without Pay) कहा जाता था। पुलायारों की संख्या त्रावणकोर में अन्य अछूत जातियों की अपेक्षा कम ही थी। अकेले वे कोई संगठनकारी ताकत नहीं बनते थे। उनकी दयनीय अवस्था और शोषण के पीछे यह भी एक कारण था।  

तत्कालीन समाज जातिवाद और छूआछूत पर टिप्पणी करते हुए चार्ल्स एलेन ने एक ईसाई मिशनरी की पत्नी द्वारा 1860 में अपनी एक मित्र को लिखे गए पत्र का हवाला दिया है। त्रावणकोर में व्याप्त छूआछूत को समझने के लिए यह टिप्पणी बहुत प्रामाणिक है। नियम के अनुसार—

‘नैय्यर नंबूदरी ब्राह्मण1 से मिल सकता था, परंतु उसे छू नहीं सकता था। चोवन(इझवा) जाति के व्यक्ति के लिए नियम था कि वह नंबूरी ब्राह्मण से मिलते समय 36 कदम की दूरी बनाकर  रखेगा। पुलायार जिसकी स्थिति दास जैसी है, को नंबूदरी से 96 कदम दूर खड़े होकर बात करनी पड़ती थी। नैय्यर से मिलते समय चोवाल को बारह कदम दूर खड़े रहने का प्रावधान था। वहीं पुलायार को नैय्यर से 66 कदम की दूरी रखनी पड़ती थी। इसी तरह संत थामस चर्च में विश्वास रखने वाला ईसाई, नैय्यर को छू सकता था, लेकिन नैय्यर के साथ भोजन करने की अनुमति उसे नहीं थी।’2 

जातीय शुचिता के नाम पर अमानवीय व्यवहार का कुछ ऐसा ही उल्लेख कैथरीन मेयो ने ‘मदर इंडिया’ में भी किया है। इससे तत्कालीन केरल में जाति-भेद और छूआछूत की त्रासद स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

पुलयार जाति के बच्चों को स्कूल जाकर पढ़ने-लिखने की अनुमति नहीं थी। वे केवल मेहनत-मजदूरी कर सकते थे। अछूत होने के कारण अय्यंकालि को केवल अपनी जाति के बच्चों के साथ खेलने का अधिकार था। फिर भी अय्यंकालि का बचपन स्वजातीय बच्चों से अलग था। वे अपेक्षाकृत मुक्त पारिवारिक वातावरण में पले-बढ़े थे। पिता को कहीं बेगार करने नहीं जाना पड़ता था। इस कारण उनके दोस्तों में कुछ तथाकथित ऊंची जाति के भी थे। बचपन ठीक-ठाक बीत रहा था कि एक दिन अचानक जाति-व्यवस्था का क्रूरतम चेहरा उनके सामने आ गया। उस दिन अय्यंकालि बच्चों के साथ फुटबाल खेल रह थे। उन्होंने फुटबाल को ठोकर मारी, वह उछलती हुई दूर एक आंगन में जा गिरी। वह नैय्यर का घर था। गृहस्वामी गैंद को देखकर आग-बबूला हो गया। उसने अय्यंकालि को ऊंची जाति के बच्चों के साथ न खेलने की हिदायत दी। अपमान से आहत अय्यंकालि ने भविष्य में किसी सवर्ण से दोस्ती न करने की ठान ली। यह संकल्प आगे चलकर उनके और पुलायार समाज के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उसके बाद अय्यंकालि ने अपनी जाति के लड़कों को जोड़ना शुरू किया। उन्हें एकजुट कर उनकी एक टीम तैयार की। इस तरह बचपन से ही नायकत्व की भावना उसके भीतर उभरती चली गई।

बचपन में ही एक और घटना घटी। झगड़े के दौरान अय्यंकालि ने ऊंची जाति के लड़के की पिटाई कर दी। वह पहला अवसर था जब एक पुलायार, जिसकी सामाजिक हैसियत गुलामों जैसी थी, ने ऊंची जाति के लड़के को पीटा था। माता-पिता घबरा गए। उन्हें डर था कि उच्च जाति के लोग अवश्य ही बदला लेंगे। ऐसा होना भी था, लेकिन तभी कुछ लोग आकर बीच-बचाव करने लगे। उससे बेपरवाह बालक अय्यंकालि यह कहते हुए बाहर निकल आया कि वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। घर पहुंचा तो माता-पिता ने उसकी जमकर पिटाई की। ‘दिकुओं’3 से फिर कभी न उलझने का निर्देश दिया। माता-पिता का गुस्सा भी अय्यंकालि के संकल्प को डिगा न सका। वे अपनी जाति की दुर्दशा को लेकर सवाल उठाने लगे। इसी के आगे चलकर मुक्ति का विचार उसके दिमाग में जन्मा।

किशोरावस्था में गाने-बजाने का शौक पैदा हुआ। लोकगीतों में रुचि बढ़ी। उसी से रचनात्मकता ने जन्म लिया। किशोरावस्था पार करते-करते देह निखरने लगी थी। लोग अय्यंकालि के शरीर-सौष्ठव की प्रशंसा करने लगे। शरीर के साथ-साथ दिमाग भी हृष्ट-पुष्ट था। मुक्त परिवेश और अच्छी देहयष्टि। दोनों बातें अय्यंकालि का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए काफी थीं। लेकिन जिस जाति में उनका जन्म हुआ था, उसमें वे दुर्गुण समान थी। अछूतों के लिए ड्रेस कोड निर्धारित था। वे साफ कपड़े नहीं पहन सकते थे। सार्वजनिक मार्गों पर टहलना निषिद्ध था। ऊंची आवाज में बोलने को उदंडता माना जाता था। इस सबकी परवाह न करते हुए अय्यंकालि साफ कपड़े पहनता। दोस्तों के साथ निरुद्धिग्न टहलता। इस तरह वह मनुस्मृति के उस विधान का उल्लंघन करता था, जो शताब्दियों से शूद्रों और दासों पर शासन का कारण रहा था।

उम्र के साथ रचनात्मकता में भी निखार आ रहा था। अय्यंकालि लोकगीत गाने यहां तक कि रचने भी लगा था। अपने छोटे भाइयों गोपालन, चेतन तथा अपनी जाति के दूसरे किशोरों के साथ वह अपने रचे लोकगीत गाता, नाटक खेलता और उन्हें मनभाता आकार देता था। उसके मित्र उसे सम्मान के साथ उरपिल्लई(प्रिय) या मूथपिल्लई(ज्येष्ठ) कहते थे। अय्यंकालि के गीतों और नाटकों में सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश समाया होता था। स्वाधीनता का आवाह्न किया जाता था। अय्यंकालि की भाषा तमिल मिश्रित मलयाली थी। इससे उसके गीतों और नाटकों का असर त्रावणकोर से आगे बढ़कर मालाबार ओर कोची तक फैलने लगा। गीतों और नाटकों के जरिये वह मुक्ति संदेश को फैलाता। जातीय आधार पर हो रहे शोषण से परचाता। अय्यंकालि के माता-पिता के मन में बेटे को लेकर चिंता सदैव बनी रहती थी। लेकिन जन्मजात विद्रोही अय्यंकालि को इसकी चिंता न थी। संगठन है तो कुछ अनुशासन, ताकत का उचित सदुपयोग करने का हुनर भी होना चाहिए। सो अय्यंकालि ने अपने दल के सदस्यों को मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिए एक प्रशिक्षक रख लिया, जो बहुत दूर से चलकर आता था। अय्यंकालि की गतिविधियां दिकुओं को खटकती थीं। मगर उन्हें इसकी कतई परवाह नहीं थी।

उन दिनों दलितों को गांव में खुला घूमने और मुख्य मार्गों पर निकलने की आजादी नहीं थी। न ही वे साफ, धुला हुआ कपड़ा पहन सकते थे। अय्यंकालि को बनी-बनाई लीक पर चलने की आदत न थी। 25 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपने ही जैसे युवाओं का मजबूत संगठन तैयार कर लिया था। उनके साथी  संकेत-मात्र से मरने-मारने को तैयार हो जाते थे। सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते समय अय्यंकालि के सामने सबसे पहली चुनौती थी, पुलायारों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार दिलाना। 1889 में ऐसी ही एक घटना घटी। कुछ दलित युवा सार्वजनिक रास्तों पर चलने के अधिकार को लेकर आंदोलनरत थे। उसी समय उनपर दिकुओं(सवर्णों) ने उनपर हमला कर दिया। दोनों पक्षों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। सड़क खून से लाल हो गई। इसी तरह की घटनाएं मनाक्कदु, काझाकुट्टम, कनियापुरम् जैसे क्षेत्रों में देखने को आईं। सवर्ण आतंक पर उतर आए थे।

बैलगाड़ी से क्रांति

निडर, निर्भीक अय्यंकालि ने अंततः सीधे टकराने का फैसला कर लिया। 1893 की घटना है। अय्यंकालि ने दो हृष्ट-पुष्ट बैल खरीदे, एक गाड़ी। साथ में पीतल की दो बड़ी-बड़ी घंटियां। खुद को उन्होंने अपनी पारंपरिक पोशाक में सजाया हुआ था, जिससे उनकी धज अलग ही नजर आ रही थी। घंटियों को बैलों के गले में बांध, बैलगाड़ी पर सवार हो, अय्यंकालि ने बैलों को हांक लगाई। इशारा मिलते ही बैल गांव की सड़कों पर चल पड़े। मानो कोई योद्धा अपने विजय-अभियान पर अग्रसर हो। उन दिनों पुलायार के लिए बैलगाड़ी पर बैठना तो दूर, उसे खरीदना या पास रखना भी अपराध माना जाता था। अय्यंकालि का गाड़ी पर सवार होकर निकलना शताब्दियों पुरानी व्यवस्था को चुनौती थी। खुला ऐलान। बैलों के गलों में पड़ी घंटियां जोर-जोर से बज रही थीं। आवाज सुनकर दिकुओं में खलबली मच गई। दूसरी ओर अछूतों के दिल अनहोनी की आशंका से दहलने लगे। अय्यंकालि अपनी बैलगाड़ी से गुजर ही रहे थे, सहसा कुछ सवर्णों ने आकर उनका मार्ग रोक लिया। वे अय्यंकालि को ‘सबक’ सिखाना चाहते थे—

‘यह सब क्या है? तुम्हें चादर ओढ़ने की इजाजत किसने दी।’ अय्यंकालि को ऐसे विरोध की आशंका थी। वे उसके लिए तैयार थे। तभी कुछ सवर्ण आगे बैलगाड़ी की ओर बढ़े। एक पल की भी देर किए बिना अय्यंकालि थोड़ा झुके। इससे पहले कि उपद्रवी कुछ समझ पाएं, अय्यंकालि के हाथों में दरांत आ चुकी थी। उनका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। रास्ता रोके खड़े दिकुओं पर दरांत तान, धमकी-भरे अंदाज में अय्यंकालि ने कहा—

‘अगर किसी ने भी मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की तो उसे मेरा यह हथियार मजा चखाएगा।’ एक पुलायार से जिसकी सामाजिक हैसियत दास के समान थी, जो गर्दन झुकाकर चुपचाप हुक्म बजाते आए थे, ऐसे विरोध की आशंका किसी को न थी। वे सहमकर पीछे हट गए। उसके बाद तो अय्यंकालि की बैलगाड़ी प्रतिदिन गांव की सड़कों से गुजरने लगी। इस घटना ने न केवल दिकुओं पर असर डाला, अपितु दलितों के बीच भी खलबली मच गई। हर कोई उसकी चर्चा अपनी-अपनी तरह से कर रहा था। उसके बाद अय्यंकालि का यश चारों ओर फैलने लगा। यह डॉ. आंबेडकर के सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश से करीब 25 वर्ष पहले की घटना थी। जिसने अय्यंकालि को दमन के शिकार वर्गों का स्वाभाविक नेता बना दिया। 25 वर्ष की अवस्था में अय्यंकालि का विवाह कर दिया गया। उनकी पत्नी का नाम चेल्लमा था। आगे चलकर उस दंपति के यहां सात संतानों ने जन्म लिया।

लेकिन सफलता अभी अधूरी थी। अय्यंकालि अपेक्षाकृत संपन्न माता-पिता की संतान थे। उनमें इतना साहस था कि बैलगाड़ी पर घूम सकें। लेकिन उन्हीं की जाति के बाकी लोगों में सार्वजनिक मार्गों पर चलने की न तो हिम्मत थी, न दिकु उन्हें अनुमति देने को तैयार थे। अय्यंकालि का अगला लक्ष्य था, दमन के कारण विश्वास खो बैठे दलितों में आत्मविश्वास पैदा करना। इसके लिए अय्यंकालि ने अपने संगठन को तैयार किया। उनका अगला कदम था, तिरुवनंतपुरम् में दलित बस्ती से पुत्तन बाजार तक ‘आजादी के लिए जुलूस’ निकालना। यह आसान काम नहीं था। विरोधी घात लगाए बैठे थे। जैसे ही उनका काफिला सड़क पर पहुंचा, दिकुओं ने उसपर हमला कर दिया। अय्यंकालि के नेतृत्व में सैकड़ों दलित युवक निडर होकर विरोधियों से जूझ पड़े। सैकड़ों युवाओं को चोट आई। चेलियार में हुए उस संघर्ष से प्रेरित होकर दूसरे कस्बों और गांवों के दलित युवक भी सड़कों पर चलने की आजादी को लेकर निकल पड़े। मनक्कदु, काझाकोट्टम, कनियापुरम् सहित आसपास के इलाकों में जुलूस निकाले गए। सड़कें खून से लाल होने लगीं। दिकुओं का विरोध जितना बढ़ रहा था, उतना ही दलित युवा अपने अधिकारों को लेकर जाग्रत हो रहे थे। अय्यंकालि का प्रभाव और दलितों का विद्रोह बढ़ता ही जा रहा था। दूसरी दलित जातियां भी पुलायारों के साथ एकजुट होकर अधिकारों की मांग करने लगी थीं। संघर्ष गृहयुद्ध में बदलने लगा था।

पुलायार विद्रोह: शिक्षा क्रांति

उस संघर्ष से दलितों को दूसरे अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा मिली। अय्यंकालि स्वयं अशिक्षित थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी शिक्षा से वंचित रहें। सरकार सभी के समान शिक्षा के दरवाजे वर्षों पहले खोल चुकी थी। मगर स्कूल प्रबंधन पर दिकुओं का अधिकार था। वे पुलायार और दूसरे दलित बच्चों के स्कूल प्रवेश से आनाकानी करते थे। 1904 में अय्यंकालि ने दलितों की शिक्षा के लिए आंदोलन आरंभ कर दिया। पुलायार और दूसरे अछूतों की शिक्षा के लिए उन्होंने उसी वर्ष वेंगनूर में पहला स्कूल खोला। वह केरल का पहला स्कूल था, जिसे केवल दलितों के अध्ययन के लिए खोला गया था। दलितों के लिए वह आशा की किरण जैसा था। परंतु सवर्णों से वह बर्दाश्त न हुआ। उन्होंने स्कूल पर हमला कर, उसे तहस-नहस कर दिया। अय्यंकालि के लिए वह बड़ा धक्का था। लेकिन निरंतर संघर्ष ने उनकी जिजीविषा को बढ़ा दिया था।

संघर्ष को सांस्थानिक रूप देने के लिए अय्यंकालि ने ‘साधु जन परिपालन संघम’ नामक संस्था का गठन किया। उसका उद्देश्य था, पुलायार तथा दूसरे दलितों को शिक्षा के लिए प्रेरित करना। औपनिवेशिक सरकार भी दलितों में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयासरत थी। उस समय मिशेल त्रावणकोर शिक्षा विभाग के निदेशक थे। दलितों के लिए शिक्षा को लेकर अय्यंकालि ने अपनी संस्था के माध्यम से कई पत्र त्रावणकोर के दीवान और शिक्षा निदेशक को लिखे। औपनिवेशिक सरकार की नीति के चलते दीवान ने दलितों की शिक्षा के लिए 1907 में आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए थे। लेकिन आदेशपत्र जारी होने को जानबूझकर रोका गया था। अय्यंकालि द्वारा लगातार लिखने पर मिशेल को उसकी जानकारी मिली। उन्होंने दीवान को उस आदेश पर तत्काल अमल करने का आग्रह किया। अंततः 1910 में आदेशपत्र जारी हुआ, परंतु स्कूल प्रबंधकों में जिनमें जमींदार सम्मिलित थे, उस आदेश पर अमल करने से इन्कार कर दिया।

इसपर अय्यंकालि 1 मार्च 1910 को पूजारी अय्यन की पांच वर्ष की बेटी पंचमी तथा अपने साथियों को लेकर उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् में पहुंचे। वहां अय्यंकालि समर्थकों तथा दिकुओं जिनमें नैय्यरों की संख्या सबसे ज्यादा थी, के बीच जमकर संघर्ष हुआ। गुस्साए नैय्यरों ने पुलायारों की बस्ती पर हमला कर दिया। उनके घर तहस-नहस कर डाले। उपद्रवी नैय्यर पुलायारों की बकरियों, जानवरों तथा गाड़ियों को लूटकर ले गए। औरतों और आदमियों को बुरी तरह से पीटा गया। जिसने भी सामना करने की कोशिश की, उसे बुरी तरह से दबा दिया गया। झोपड़ियों में आग लगा दी गई। सात दिनों तक पुलायारों की बस्ती से धूल और धुआं उड़ता रहा। चीख-पुकार की आवाजें आती रहीं। उरूट अंबालम स्कूल, बलरामपुरम् से उभरी चिंगारी हालांकि कुछ दिनों बाद शांत हो गई। लेकिन आसपास के इलाकों में उससे जो ज्वाला भड़की उसने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दी। उसने मार्यामुट्टम, वेंगनूर, पेरमबाझुथूर, कुनथकाल जैसे इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया। केरल के मुख्य धारा के इतिहासकार उस घटना को ‘पुलायार-विद्रोह’ के नाम से पुकारते हैं। उस विद्रोह में दलितों को जन और दोनों की भारी हानि हुई थी। उनके आगे रोजगार का संकट भी खड़ा हो चुका था। बावजूद इसके आजादी की ललक ऐसी थी कि तमाम विरोधों और दबावों के बावजूद आंदोलन आगे बढ़ता गया।

‘पुलायार आंदोलन’ जातीय दमन के विरोध में उठी आवाज थी। साम्यवादी विचारक उसे वर्ग-संघर्ष की तयशुदा सैद्धांतिकी के अंतर्गत देखते आए हैं। तथाकथित राष्ट्रवादी लेखकों, पत्रकारों की पुलायार आंदोलन को लेकर क्या राय थी। यह के। रामकृष्ण पिल्लई की टिप्पणी से पता चल जाता है। पिल्लई ‘स्वदेशाभिमानी’ के संपादक थे। उन्हें कार्ल मार्क्स की जीवनी के अनुवाद का श्रेय भी दिया जाता है, जो मार्क्स  के बारे में किसी भी भारतीय भाषा में प्रकाशित पहली पुस्तक थी। दलित बच्चों को स्कूल में भर्ती कराने की अय्यंकालि तथा उनके सहयोगियों की मांग तथा उसे सरकार के समर्थन पर पिल्लई ने अपने समाचारपत्र ‘स्वदेशाभिमानी’ में जो लिखा वह ‘त्रिवेणी संघ’ के नेताओं पर कांग्रेसी नेताओं की टिप्पणी की याद दिलाता है। ‘त्रिवेणी संघ’ के नेता जब कांग्रेस के पास टिकट लेने गए तो उसके नेताओं ने न केवल इन्कार कर दिया, अपितु उनका उपहास उड़ाया गया। टिकट मांगने पर किसी को कहा जाता कि ‘वहां(संसद और विधानसभा) क्या साग-भंटा बोना है….किसी को कहा जाता कि वहां क्या भैंस दुहनी है? किसी को ताना मारा जाता कि वहां क्या भेड़ें चरानी हैं? किसी को यह कहकर फटकार दिया जाता कि वहां क्या नमक-तेल तौलना है।’ रामकृष्ण पिल्लई ने इतनी तीखी भाषा का प्रयोग तो नहीं किया, मगर वे सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों के प्रवेश के सख्त विरोधी थे। अपने समाचारपत्र में उन्होंने लिखा था कि दलित बच्चों को सरकारी स्कूलों में भर्ती का आदेश अनपढ़-गंवार और पीढ़ियों से मेहनत-मजदूरी पर गुजर-बसर करते आए लोगों, ‘के बच्चों को उन बच्चों के साथ जोड़ देना है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने दिमाग को तराशते हुए आए हैं। यह घोड़े और भैंस को एक ही गाड़ी में जोत देने जैसा है।’5 

नया स्कूल खोलना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक कठिन था, उसमें पढ़ाई की व्यवस्था करना। उन दिनों में दलितों में कोई पढ़ा-लिखा था नहीं। अय्यंकालि अशिक्षित थे। समस्या थी कि पढ़ाए कौन? जो पढ़े-लिखे थे उनमें से कोई आगे नहीं आ रहा था। सरकार उस समय दलितों के स्कूल में पढ़ाने के लिए छह रुपये महीना देती थी। किसी को आगे न आते देख मासिक वृत्तिका को बढ़ाकर नौ रुपये कर दिया गया। तब, लंबी प्रतीक्षा और कोशिशों के बाद परमेश्वरन पिल्लई नाम का एक युवक पढ़ाने के लिए तैयार हुआ। परमेश्वरन तिरुवनंतपुरम के कैथमुक्कू गांव का रहने वाला था। जिन संस्कारों के बीच वह पला-बढ़ा था, वे अछूतों के संपर्क में आने की अनुमति नहीं देते थे। पहले दिन जब वह स्कूल पहुंचा तो इसी ऊहापोह से घिरा हुआ था। उस समय उसकी प्रगतिगामी मेधा और सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठाओं के बीच द्वंद्व जारी था। उस घटना का उल्लेख ग्रीश्मा ग्रीश्मम ने अपने आलेख ‘डेस्टिनी चेंजिज’ में इस प्रकार किया है—

‘नए अध्यापक ने स्कूल में अनिच्छापूर्वक ऐसे प्रवेश किया, मानो वह किसी कूड़ाघर में जा रहा हो। उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक कुंठा तथा प्रगतिगामी के बीच द्वंद्व छिड़ा हुआ था। वह बहुत डरा हुआ था। स्थिति तनावपूर्ण थी। उसी क्षण स्कूल को चारों ओर से घेरे खड़े लोगों ने शोर मचाना आरंभ कर दिया। अय्यंकालि के समर्थक और विरोधी एक-दूसरे के आमने-सामने थे। अफरा-तफरी का माहौल था। तभी एक व्यक्ति अध्यापक की ओर बढ़ा, जो मारे भय के बुरी तरह कांप रहा था। जैसे-तैसे अध्यापक को कक्षा तक पहुंचाया गया। दिन में कक्षाएं चलीं। मगर रात होते ही सवर्णों का दल फिर आ पहुंचा। देखते ही देखते, स्कूल को उजाड़ दिया गया।’6

अय्यंकालि और उनके विरोधियों में मानो होड़ मची थी। बिना किसी विलंब के स्कूल का नया ढांचा खड़ा कर दिया गया। अध्यापक को सुरक्षित लाने-ले जाने के लिए रक्षक लगा दिए गए। तनाव और आशंकाओं के बीच स्कूल फिर चलने लगा।

जैसे-जैसे अय्यंकालि का आंदोलन तेज हो रहा था, वैसे-वैसे उनके विरोधी भी बढ़ते जा रहे थे। उसकी प्रतिक्रिया में दलितों के बीच स्वतंत्रता और समानता को लेकर चेतना भी जाग्रत हो रही थी। उनकी आंखें सपने देखने लगी थीं। इसके साथ-साथ अय्यंकालि की सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ रही थी। सामाजिक उत्थान की दिशा में उनके योगदान की उपेक्षा करना असंभव हो चला था। 1888 में त्रावणकोर में विधायिका परिषद की स्थापना की गई थी। उसके आठ सदस्य थे। उसके पीछे त्रावणकोर के राजा श्रीमूलमथिरुनाल रामवर्मा की प्रेरणा थी जो प्रशासन में जनप्रतिनिधियों को सम्मिलित करना चाहते थे। 1904 तक व्यापारी, जमींदार, ही ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ के सदस्य बन सकते थे। प्रत्येक जिला प्रमुख द्वारा दो सदस्यों का चयन किया जाता था। कोई भी जमींदार जो कम से कम 100 रुपये सालाना लगान देता हो, अथवा व्यापारी जिसकी सालाना आय 6000 रुपये से अधिक हो, वह चुना जा सकता था।

1912 में अय्यंकालि को ‘श्री मूलम पोपुलर असेंबली’ का सदस्य चुन लिया गया, उसके बाद वे मृत्युपर्यंत उस पद पर बने रहे। अय्यंकालि पहले दलित थे जिन्हें औपनिवेशिक भारत में राज्य विधायिका का सदस्य मनोनीत किया गया था। विधायिका के सत्र के दौरान, राजा और दीवान की उपस्थिति में अय्यंकालि ने जो भाषण दिया उसमें उन्होंने दलितों के संपत्ति अधिकार, शिक्षा, राज्य की नौकरियों में विशेष आरक्षण दिए जाने तथा बेगार से मुक्ति जैसे मसलों पर बात की थी। 4 मार्च 1912 को अय्यंकालि द्वारा राज्य की विधयिका में दिए गए भाषण का ऐतिहासिक महत्त्व है। वह सरकार के सामने दलित हितों को लेकर उठने वाली किसी दलित की पहली आवाज थी। उसमें अय्यंकालि ने कहा था—

‘‘पुलायारों के प्रतिनिधि के रूप में मैं सरकार को, हमारे बच्चों को वैंगनुर ऐलीमेंट्री स्कूल, दक्षिणी त्रावणकोर के विद्यालयों में प्रवेश के लेकर की गई मदद के लिए अपना आभार प्रकट करना चाहता हूँ। अभी तक पुलायार जाति के बच्चों के प्रवेश के केवल सात स्कूलों को अनुमति दी गई है। मैं चाहता हूं कि राज्य के सभी स्कूलों में हमारे बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो।

‘पुलायार अपने बच्चों को उन सभी स्कूलों में भर्ती करा सकते हैं, जिनमें इझवा जाति के बच्चों को प्रवेश की अनुमति है।’ दीवान ने टोका था। अय्यंकालि ने कहना जारी रखा।

‘नए बच्चों को फीस में में छूट दी जा सकती है। सरकार मुस्लिम बच्चों को फीस में छूट देती है, जो हमसे कहीं आगे हैं। पुलायार बच्चों को भी वैसी ही छूट मिलनी चाहिए।’

दीवान  : क्या पुलायारों के बच्चे मुस्लिमों की तरह फीस में छूट नहीं ले रहे हैं? मेरा मानना है कि ऐसा होना चाहिए।’

अय्यंकालि : पुलायारों को इंजीनियर, स्वास्थ तथा औषध विभाग में भर्ती किया जा सकता है। उनमें कई योग्य सदस्य हैं, जिन्हें शिक्षा विभाग में भर्ती किया जा सकता है। हालांकि पुलायारों को सड़कों पर चलने, कानून की मदद लेने, अदालत जाने के अधिकार के संबंध में शाही आदेश जारी हो चुका है, इसके बावजूद उन्हें रोका जा रहा है। कुछ लोग इसमें बाधा डाल रहे हैं। हमें राहत पहुंचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए।’’

अय्यंकालि द्वारा पुलायार बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में आ रही परेशानियों को विधान परिषद में लगातार उठाए जाने से सरकार चेती। 1914 में सरकार ने शिक्षा-नीति पर कठोरता से पालन के आदेश दे दिए। शिक्षा निदेशक मिशेल स्वयं हालात का पता लगाने के लिए दौरे पर निकले। मिशेल के आने की खबर से अधिकारी सचेत हो गए। दलित विद्यार्थियों के प्रवेश को और अधिक लटकाना संभव न था। मिशेल की आगमन की खबर सुनकर जब स्कूल प्रशासन हरकत में आया। लेकिन दलित विद्यार्थियों को स्कूल में प्रवेश करते देख दिकुओं ने हंगामा कर दिया। उपद्रवी भीड़ ने मिशेल की जीप को आग लगा दी। बावजूद इसके वह अधिकारी सरकारी आदेश का पालन करने के लिए डटा रहा। उस दिन आठ पुलायार छात्रों को प्रवेश मिला। उनमें 16 वर्ष का एक किशोर भी था जो पहली कक्षा में प्रवेश के लिए आया था।

यह अय्यंकालि की जीत थी, परंतु समस्याओं का यही अंत नहीं था। दिकुओं ने अपने बच्चों के दिमाग में भी जहर घोला हुआ था। दलित बच्चे पढ़ाई के लिए जैसे ही कक्षा में प्रवेश करते, वे दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते थे। इससे अध्यापकों को बहाना मिला। वे दलित छात्रों को प्रवेश देने से फिर आनाकानी करने लगे। इससे दलितों का आक्रोश भड़क पड़ा। वे स्कूल दिकुओं के विरोध में फिर सड़क पर उतर आए। अय्यंकालि उनका नेतृत्व कर रहे थे। झगड़े हुए। त्रावणकोर के कई शहरों में सांप्रदायिक दंगों जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। अय्यंकालि ने सरकार के सामने मुद्दे को उठाया। कानून का हवाला दिया। उसके फलस्वरूप दिकुओं के हिंसक विरोध के बावजूद दलित विद्याथिर्यों की संख्या बढ़ती गई। 1913-16 के दौरान नैय्यर विद्यार्थियों की संख्या में कुल वृद्धि 45 प्रतिशत, ईसाई विद्यार्थियों की 50 प्रतिशत, मुस्लिमों की लगभग 100 प्रतिशत रही जबकि दलितों में परायस जाति के विद्यार्थियों की संख्या में 400 प्रतिशत और पुलायार विद्यार्थियों की संख्या में सीधे 600 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे अय्यंकालि के प्रभाव तथा उनके आंदोलन की गंभीरता को समझा जा सकता है।

साधु जन परिपालन संघम

अय्यंकालि ने दिकुओं से सीधे टकराव मोल लिया था। उनकी कार्यशैली आंख में आंख डालकर बात करने की थी। लेकिन यह सब आसान काम नहीं था। जनसंख्या की दृष्टि से पुलायार कोई बड़ी ताकत नहीं बनते थे। बावजूद इसके यदि अय्यंकालि को अपेक्षित कामयाबी मिली तो इसके पीछे उनकी दूरदृष्टि, कुशल नेतृत्व क्षमता और साहस का बड़ा योगदान था। उन दिनों सरकार और समाज के सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर सवर्ण जातियों का वर्चस्व था। उनमें भी सर्वाधिक संख्या ब्राह्मणों की थी। ज्ञान के सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर उनका अधिकार था। सवर्ण जातियां डरती थीं कि पढ़ने-लिखने का अधिकार मिलते ही उन्हें मुफ्त में मिलने वाले श्रम से हाथ धोना पड़ेगा। इसलिए वे एकजुट होकर दलित शिक्षा का विरोध करते थे। उन्हें शिक्षा से वंचित रखने के पीछे भी यही कारण था। जबकि सरकार सभी को समान शिक्षा का कानून उनीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही पास कर चुकी थी। मगर कानून में अमल का काम जिन अधिकारियों के जिम्मे था, उनमें लगभग सभी सवर्ण होते थे। इसलिए दलित कल्याण से जुड़े कानून सिर्फ कानून बनकर रह जाते थे। अय्यंकालि जानते थे कि बड़ी कामयाबी दूसरों की दया पर नहीं आती। पुलायार यदि अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहते हैं तो उन्हें विरोधियों से स्वयं निपटना होगा। इसलिए उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता तैयार किए थे, जो अय्यंकालि के कहने पर मरने-मारने को तैयार रहते थे। उनके मार्गदर्शन के लिए बड़े संगठन की आवश्यकता थी। उसके लिए अय्यंकालि ने 1907 में ‘साधु जन परिपालन संघम’ की स्थापना की थी। उस संगठन में उन सभी जातियों का स्वागत था जो जाति और वर्गभेद के आधार पर शताब्दियों दमन और शोषण का शिकार बनती आई थीं।

संस्था के गठन के साथ ही अय्यंकालि को ईसाई, आर्यसमाजी और हिंदू सुधारवादी संगठनों की ओर से बुलावा आने लगा। वे अय्यंकालि के प्रभाव का लाभ उठाकर पुलायार और दूसरी दलित जातियों में अपनी पैठ बनाना चाहते थे। अय्यंकालि यूं भारत की संत-परंपरा में विश्वास रखते थे। नारायण गुरु, स्वामी सदानंद जैसे सुधारवादी धर्मगुरुओं का उनपर प्रभाव था। बावजूद इसके वे अपने आंदोलन को धार्मिक होने से बचाना चाहते थे। उनका मुख्य ध्येय दलितों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान था। उसके लिए शिक्षा सबसे जरूरी उपकरण थी। इसलिए उन्होंने धार्मिक संगठनों से दूरी बनाए रखी। वैसे भी वे संगठन को शक्ति के स्तर पर भी आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, जो धार्मिक संगठनों और धर्माचार्यों की छत्रछाया में असंभव था। ‘साधु जन परिपालन संघम’ पर नारायण गुरु की संस्था ‘श्रीनारायण धर्मपरिपालन संघम’ का असर था। संस्था के संचालन की जिम्मेदारी थॉमस वाडियार को सौंपी गई थी। वह पेशे से अध्यापक तथा अय्यंकालि का रिश्तेदार और भरोसेमंद था। संघम की आरंभिक बैठकों में लिए गए फैसलों से अय्यंकालि के आधुनिक सोच का अनुमान लगाया जा सकता है। उस संस्था के प्रमुख संकल्प थे—

1.  प्रति सप्ताह कार्यदिवसों की संख्या 7 से घटाकर 6 पर सीमित करना।

2.  श्रमिकों को एक दिन का अवकाश तथा

3.  कार्य के दौरान मजूदरों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से मुक्ति

‘साधु जन परिपालन संघम’ का मुख्य कार्यालय वैंगनूर में बनाया गया था। वहां एक कांन्फ्रेंस हाल और पुस्तकालय भी था। संघम की ओर से नियम बनाया गया था कि सभी सदस्य सप्ताह में एकदिन, अपनी समस्याओं पर विचार करने के लिए अवश्य जमा होंगे। मासिक सदस्यता शुल्क भी निर्धारित की गई थी। संस्था की स्थापना के साथ ही स्त्री-पुरुष दोनों उससे जुड़ने लगे। देखते ही देखते उसकी शाखाएं केरल और तमिलनाडु के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खुलने लगीं। लोग उनकी बैठकों में नियमित रूप से आने लगे। संगठन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी उत्साहवर्धक थी। इसका अनुमान उनके द्वारा किए गए सहयोग से भी लगाया जा सकता है। संघम को अपने दैनिक खर्चों के लिए धन की आवश्यकता थी। उसके लिए दलित स्त्रियां पिडीयारी(मुट्ठी-मुट्ठी भर चावल जुटाना) बेचकर संघम की मदद करने लगीं। इससे उसका प्रभावक्षेत्र और कार्यक्षेत्र दोनों बढ़ते गए।

संघम की पैठ जीवन के हर क्षेत्र में थी। उस समय तक अदालतें स्थापित हो चुकी थीं। परंतु अछूतों के अदालत का न्याय प्राप्त करना आसान न था।  अदलतों में काम करने वाले सभी उच्च जाति के थे। यदि कोई दलित अदालत जाने का साहस भी करता तो, वहां मौजूद लोग उसका भरपूर शोषण करते थे। अछूतों के बारे में बनी-बनाई धारणा थी, इसलिए सजा देते समय भी पक्षपात किया जाता था। अछूतों को वैकल्पिक न्यायतंत्र की आवश्यकता थी। उसे देखते हुए अय्यंकालि ने वो किया, जिसकी किसी अशिक्षित व्यक्ति से कम ही उम्मीद की जाती है। अछूतों के आपसी झगड़ों के समाधान के लिए अय्यंकालि ने सामुदायिक न्यायालयों ‘समुदाय कोदाथी’ की स्थापना की। उसका मुख्य केंद्र वेंगनूर में बनाया गया। केंद्रीय कार्यालय में पुस्तकालय और एक कोन्फ्रेंस हाल भी बनाया गया था, जहां नियमित बैठकों की व्यवस्था की गई थी। संघम के प्रत्येक कार्यालय में स्थानीय अदालतों का गठन किया गया। सामुदायिक न्यायालयों की संरचना एकदम औपचारिक न्यायालयों जैसी ही थी। वैसे ही वकील, जज, पुलिस, समन पहुंचाने के लिए बैलिफ, मुंशी वगैरह। यहां तक कि शाखा अदालत के निर्णय के विरुद्ध अपील की व्यवस्था भी थी। कोई भी पीड़ित सामुदायिक अदालत के मुख्य कार्यालय में जाकर, शाखा अदालतों के फैसले के विरुद्ध अपील कर सकता था। जहां स्वयं अय्यंकालि मुख्य न्यायाधीश के रूप में मौजूद रहते थे।

लोगों के मनोरंजन तथा सांस्कृतिक एकता को बढ़ाने के लिए ‘समाजं’ की स्थापना की गई थी। ‘समाजं’ में लोग इकट्टा होकर लोकनृत्य, गाना-बजाना करते थे। नाटक भी खेले जाते थे। उनके माध्यम अय्यंकालि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध चेतना जगाने का काम करते थे। बाद में समाजं ने जरूरतमंद पुलायार विद्यार्थियों के लिए हाॅस्टल का निर्माण भी किया। ‘साधु जन परिपालिनी संघम’ ने केरल के दलितों के बीच चेतना फैलाने का काम किया। उसके प्रभाव में लोग सप्ताह में एक दिन अवकाश करने लगे। रविवार को अवकाश के दिन लोग मिलते-जुलते, समाजं की गतिविधियों में हिस्सा लेते और भविष्य के लिए कार्यक्रम बनाते थे।

पहली श्रमिक हड़ताल

अय्यंकालि दलितों की शिक्षा के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे थे। कानून बन चुका था। सरकार साथ थी। मगर सवर्ण दिकुओं का विरोध जारी था। इस मुद्दे पर आमने-सामने के टकराव भी हो चुके थे। लगातार दबाव पड़ने से दिकु विवश हुए थे। पुलयारों सहित दूसरे दलितों को स्कूलों में प्रवेश मिलने लगा था। मगर वे इतनी जल्दी हार मानने को तैयार न थे। उन्होंने पुलायारों को काम के दौरान तंग करना शुरू कर दिया था। लेकिन अय्यंकालि आंदोलन को भटकने से रोकना चाहते थे। उनके सामने प्रमुख मुद्दे थे। अछूतों को शिक्षा, रोजगार और भूमि में हिस्सेदारी। विधान परिषद के सदस्य के रूप में वे इन मांगों को सरकार के सामने उठा चुके थे। उन्हें उम्मीद थी कि समय के साथ दलितों के प्रति सवर्णों के रुख में नर्मी आएगी। लेकिन सवर्णों के रवैये में कोई बदलाव न हुआ। आखिरकार अय्यंकालि को दबाव रणनीति अपनानी पड़ी।

यह 1907 की घटना है। रूस की बोल्शेविक क्रांति से भी एक दशक पहले की, जब श्रमिकों ने अपने श्रम का इस्तेमाल अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए किया था। त्रावणकोर राज्य में सर्वाधिक जमीन नैय्यरों के अधिकार में थी। पुलायार उन्हीं के खेतों में मेहनत-मजूदरी करते थे। एक तरह से बेगार, क्योंकि पूरे दिन की मजदूरी के बदले उन्हें मात्र छह सौ ग्राम चावल प्राप्त होता था, वह भी मालिक की मर्जी से। अछूत बच्चों की पढ़ाई में आ रही अड़चन को देखते हुए पुलायारों ने घोषणा कर दी कि वे खेतों में उस समय तक काम नहीं करेंगे, जब तक उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश और बाकी अवसर नहीं दिए जाते। जमींदारों ने इसे हंसकर टाल दिया। उन्हें लगता ही नहीं था कि पुलायार हड़ताल के बारे में सोच भी सकते हैं। जिनके घर चूल्हा ही मजूदरी मिलने के बाद जलता हो, उनके बारे में ऐसा सोचना नाममुकिन भी नहीं था। सो कुछ लोग उपहास में उंगलियों पर हिसाब लगाने लगे कि पुलयारों के घर में उपलब्ध राशन के हिसाब से हड़ताल कितने दिन खिंच सकती है—एक दिन…दो दिन….ढाई दिन…..उसके बाद तो उन्हें सिर झुकाकर आना ही पड़ेगा।

उन दिनों आज की तरह न टेलीफोन थे, न रेडियो, न ही टेलीविजन। पचास-साठ किलोमीटर की बात हो आने-जाने में ही दो दिन लग जाते थे, जबकि वहां तो मामला सैंकड़ों किलोमीटर में फैला हुआ था, लेकिन पुलायारों की आंखों में भविष्य का सपना था और थी, उस सपने के लिए कुछ भी बलिदान करने की जिद। सो हड़ताल खिंचती चली गई, धीरे-धीरे उसमें दूसरी मांगें भी सम्मिलित होती चली गईं; जैसे कि—

    1. नौकरी को स्थायी किया जाए

    2. दंड या दुव्र्यवहार से पहले उचित जांच होनी चाहिए। केवल अनुमान या दूसरों के कहने पर दंड देने से बचा जाए।

    3. कामगारों को झूठे मुकदमों में फंसाने पर रोक।

    4. मजदूरों के साथ अनुचित मारपीट पर तात्कालिक रोक

    5. सार्वजनिक मार्गों पर चलने की स्वतंत्रता

    6. दलित बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश

इसके अलावा एक और मांग थी, परती और खाली पड़ी जमीन को उपजाऊ बनाने वाले को उसका मालिकाना हक देने की। कुछ लोगों को दलितों का काम करने से इन्कार करना, हड़ताल पर जाना ही अनुचित लगा। वे लोग समूह बनाकर पुलायारों को डराने धमकाने भी लगे। मार-पीट की घटनाएं भी हुईं। इन सब घटनाओं का अय्यंकालि को पहले से ही अंदेशा था। इसलिए हालात से निपटने के लिए उन्होंने अपने समर्थकों को तैयार किया हुआ था। जमींदार के लोगों ने मजदूरों को डराना-धमकाना आरंभ किया तो संगठन के लोग बीच में आ गए। इससे झगड़े और मार-पीट की नौबत आ गई। उसमें ज्यादा नुकसान दलितों को हुआ, लेकिन वे हड़ताल पर डटे रहे।

वह चावल की रोपाई के दिन थे। देर होने से फसल कमजोर होने की संभावना थी। कुछ जमींदारों ने खुद सारा काम करने की कोशिश की। लेकिन उन्हें काम करने का अभ्यास नहीं था, इस कारण वे बीमार पड़ने लगे। जितने काम को कोई पुलायार अकेला कर देता था, उतना काम छह-छह नैय्यर मिलकर भी नहीं कर पाते थे। अगर वे मजदूर खोजने जाते तो मजदूर मुंह-मांगी मजदूरी मांगता था। नतीजा यह हुआ कि खेत जंगल में बदलने लगे। हड़ताल का लंबा खिंचना पुलायारों के लिए भी समस्या थी। अधिकांश लोग मजदूरी पर पलते थे। उनके घर में खाने की समस्या पैदा होने लगी। समाचार नैय्यरों तक पहुंचा तो वे बहुत खुश हुए। लगा कि एक-दो दिन से ज्यादा हड़ताल खिंच नहीं पाएगी। उसी समय अय्यंकालि ने अपना तुरुफ का इक्का चल दिया। वे विझिंजोम में समंदर से मछलियां पकड़ने वाले मछुआरों के पास गए। उनसे कहा कि वे एक-एक पुलायार को अपने साथ नाव पर रखें और बदले में अपनी आय का एक हिस्सा उसे दें।

मछुआरे स्वयं जातीय भेदभाव और शोषण का शिकार थे। उन्होंने अय्यंकालि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इससे क्षुब्ध जमींदारों ने पुलायारों की बस्ती में आग लगा दी। आंख में आंख डालकर बात करने वाले अय्यंकालि ने उसी अंदाज में उसका जवाब दिया। उनकी सेना ने जमींदारों के घरों में आग लगाना आरंभ कर दिया। गांव में जमींदार इक्का-दुक्का ही होते थे। जबकि दलितों की संख्या अधिक होती थी। एक बार बस्ती में आग लगा देने से उनका बड़ा नुकसान तो होता था, मगर बाद में जले हुए को समेटना बाकी रह जाता था। लेकिन जमींदारों पर हमले से उनका कहीं ज्यादा नुकसान होता था। यह डर भी लगा रहता था कि न जाने कहां ओर किधर से विद्रोही चले आएं। इससे उनमें भय का संचार होने लगा। अय्यंकालि चाहते थे कि जमींदार स्वयं समझौते के लिए आएं। वही हुआ भी। अंततः जमींदारों को ही समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। 1 मार्च 1910 को सरकार ने विद्यालयों में प्रवेश संबंधी कानून बनाकर पुलायार तथा दूसरे दलितों के लिए शिक्षा में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया। उसके अलावा मजदूरी में वृद्धि, सार्वजनिक मार्गों पर आने-जाने की आजादी जैसी मांगें भी मान ली गईं। वह भारतीय इतिहास में मजदूरों की प्रथम हड़ताल थी, बोल्शेविक क्रांति से पहले की, जिसने वहीं किया था, जिसकी मांग कभी कार्ल मार्क्स  ने की थी। ईएमएस नंबूदरीपाद ने अय्यंकालि के आंदोलन पर कुछ नहीं लिखा, लेकिन एक लेख में वे अय्यंकालि के इशारे पर बुलाई गई पहली श्रमिक हड़ताल की चर्चा करने से रोक नहीं पाते—

‘अय्यंकालि केवल दलितों के नेता नहीं थे। वे खेतिहर मजदूरों के भी नेता थे। उनके आंदोलन में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों के अलावा उच्च जातियों के लोग भी सम्मिलित थे। आधुनिक केरल के नवनिर्माण में अय्यंकालि का योगदान नारायण गुरु जितना ही है। दलित बहुजनों को संगठित कर, उनके हक की लड़ाई लड़ने वाले अय्यंकालि नारायण गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने पिछड़ी जाति के इझ़वाओं को संगठित कर, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया था….’

पुनः केरल के मुख्यमंत्री के रूप में अय्यंकालि तथा 1907 की श्रम-हड़ताल को याद करते हुए उन्होंने कहा था—‘1907 में अय्यंकालि ने खेतिहर मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया था, उन्होंने बिखरे हुए और असंगठित श्रमिकों को एकजुट कर, उन्हें संगठित ताकत में बदलने में कामयाबी हासिल की थी।’

महिलाओं के उभोवस्त्र-अधिकार के लिए संघर्ष

स्तन ढकने के अधिकार के विरोध में नंदेली द्वारा राज्य के अधिकारियों को अपने स्तन काटकर दे देने की घटना का उल्लेख पीछे किया जा चुका है। त्रावणकोर राज्य की दलित महिलाओं के साथ त्रासदी थी कि उन्हें अपना वक्ष ढकने का अधिकार प्राप्त नहीं था। केवल घुटने से कटि तक हिस्सा वे ढक सकती थीं। वक्ष के ऊपर के हिस्से पर वे केवल गहने पहनने की छूट थी। उन्हें सोने या चांदी के गहने धारण करने का अधिकार नहीं था। पत्थर का कंठहार उनके गुलाम होने की निशानी था। वह भी काले ग्रेनाइट पत्थर के। उल्लंघन करने पर उन्हें पेड़ से बांधकर कोड़े की सजा दी जाती थी। पत्थर के कंठहार वे चाहे जितने पहन सकती थीं। उसी तरह का ‘आभूषण’ उनकी कलाई पर भी बंधा रहता था। कानों के लिए लोहे की बालियां पहननी पड़ती थीं, जिन्हें ‘कुनुक्कु’ कहा जाता था। अय्यंकालि दलितों की सर्वांग मुक्ति चाहते थे। महिलाएं भी उनके मुक्ति आंदोलन का हिस्सा थीं।

गुलामी के प्रतीक उन आभूषणों से मुक्ति के लिए अय्यंकालि ने दक्षिणी त्रावणकोर के नियत्तिंकर नामक स्थान से आंदोलन की शुरुआत की। सभा में आई स्त्रियों से उन्होंने कहा कि वे दासता के प्रतीक इन आभूषणों को त्यागकर सामान्य ब्लाउज धारण करें। इसपर सवर्णों की तुरंत प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने धमकी दी कि पुरानी परिपाटी को तोड़ने का अंजाम बुरा हो सकता है। लेकिन अय्यंकालि को शुरू से ही ऐसी चुनौतियों का सामना करने की आदत थी। उसके बाद दंगे शुरू हो गए। स्थिति उस समय और बिगड़ गई जब सेंट्रल त्रावणकोर के पुलायार नेता गोपालदास ने स्त्रियों की सभा बुलाकर पत्थर के आभूषणों को फेंक कर, सामान्य बलाउज पहनने का आवाह्न किया। उसकी परिणति त्रावणकोर के अलग-अलग क्षेत्रों में दंगों के रूप में हुई। दलित यहां तक कि औरतें भी पीछे हटने या समझौता करने को तैयार न थीं। दंगों में दोनों ही पक्षों को भारी नुकसान हुआ। दलित हार मानने को तैयार न थे। अंततः दोनों पक्षों को समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। जीत अय्यंकालि की ही हुई। सरकार, नैय्यर नेताओं और अय्यंकालि के बीच समझौता हुआ। उसके बाद क्यूलोन नामक कस्बे में दलित औरतों की बड़ी सभा बुलाई गई। उसमें अय्यंकालि तथा नैय्यर सुधारवादी नेता चेगंनाचेरी परमेश्वरन पिल्लई की उपस्थिति में सैंकड़ों दलित महिलाओं ने गुलामी के प्रतीक ग्रेनाइट के कंठहारों को उतार फेंका।

आदर्श जनप्रतिनिधि

एक जनप्रतिनिधि के रूप में भी अय्यंकालि पुलायारों तथा दलितों के अधिकार की लड़ाई लड़ते रहते थे। पुलायारों के पास न तो अपना घर होता था, न ही खेती योग्य जमीन। खेतिहार मजूदर के रूप में, बेगार की तरह अपनी सेवाएं प्रदान करते थे। भूस्वामी उन्हें कभी भी बाहर निकाल सकता था। ‘श्री मूलम् प्रजा सभा’ के सदस्य के रूप में उन्होंने पुलायारों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत, उनकी गरीबी और उसके कारण हो रही दुर्दशा के बारे में उन्होंने कई बार मुद्दा बैठकों में उठाया था। उन्होंने मांग की थी कि पुलायारों को रहने के लिए आवास तथा खाली पड़ी जमीन उपलब्ध कराई जाए। स्थानीय अधिकारी उनके पुलायारों द्वारा खेती योग्य बनाई गई भूमि को पहले ही उन्हें आवंटित कर चुके थे। लेकिन जमींदार उसमें बाधा बने हुए थे। अय्यंकालि द्वारा निरंतर उठाई गई मांग का परिणाम यह हुआ कि वैंगनूर से 6 किलोमीटर दूर विलंपिंसला में 300 एकड़ कृषि भूमि पुलायारों को आवंटित कर दी। इसके अतिरिक्त निदंमनगाद क्षेत्र के वूझमल्लुकल गांव में 200 सौ एकड़ भूमि उन्हें और दी गई। कुल 500 एकड़ भूमि को 500 पुलायार परिवारों के बीच, एक एकड़ प्रति परिवार के हिसाब से बांट दिया गया। यह अय्यंकालि की बड़ी जीत थी। भू-दास के रूप में खेती करते आए पुलायार अब अपनी भूमि पर खेती कर, आजादी से रह सकते थे।

विधानपरिषद के सदस्य के रूप में अय्यंकालि ने पुलायारों की सरकारी नौकरियों में अनुपस्थिति और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि जब तक पुलायार अपेक्षित योग्यता प्राप्त नहीं कर पाते, उन्हें निचले दर्जे की या मजूदरी के काम पर लगाया जाए। उसके फलस्वरूप अनेक पुलायार युवाओं को सरकारी नौकरी मिली। उन्होंने धर्म पर सीधा हमला नहीं किया। मगर वे पुलायारों को पुरोहितों और धार्मिक आडंबरों से बाहर आने, आचरण की पवित्रता पर जोर देने तथा संगठित रहने की निरंतर अपील करते रहे। उनके प्रयासों से पुलायारों तथा दूसरे दलितों को 1912 में प्रजा सभा में मनोनीत किया गया, जिससे दलितों की राजनीतिक भागीदारी का रास्ता प्रशस्त हुआ।

अय्यंकालि 1904 से ही दमे की बीमारी का शिकार थे। मगर स्वास्थ्य की चिंता न करते हुए वे अपने समाज के कल्याण, उसे न्याय दिलाने के लिए निरंतर जूझते रहते थे। इसके लिए उन्होंने पूरे त्रावणकोर की यात्राएं की थीं। अंततः 24 मई 1941 को उन्होंने पूरी तरह से बिस्तर पकड़ लिया। और 18 जून 1941 को मृत्यु की उस अनथक न्याय-योद्धा ने संसार छोड़ दिया। उम्र में अय्यंकालि ज्योतिराव फुले से 45 वर्ष छोटे थे, और पेरियार से 16 वर्ष बड़े। केरल में उन्होंने वही काम किया, जो फुले ने महाराष्ट्र और पेरियार ने तमिलनाडु में किया था। यह बात अलग है कि अय्यंकालि के योगदान की उपेक्षा हुई। आधुनिक केरल में स्त्रियां बाकी देश की अपेक्षा यदि ज्यादा साक्षर और जागरूक हैं तो उसका बहुत कुछ श्रेय अय्यंकालि को जाता है।

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1.   नंबूदरी ब्राह्मणों के बारे में ‘दि त्रावणकोर स्टेट मैनुअल’ भाग-एक के हवाले से वी. नगम अइया ने उनकी विचित्र-सी परंपरा का उल्लेख किया है। तदनुसार नंबूदरी ब्राह्मण आमतौर पर संपन्न होते हैं और बड़े आरामदायक घरों में रहते हैं। उनकी स्त्रियों को बाकी लोगों की नजरों से बचाकर पूरी तरह नियंत्रण में रखा जाता है। जब वे घर से बाहर निकलती हैं तो उन्हें कपड़ों या छाते से ढककर रखा जाता है।  औरतों को उनकी सुंदरता के अनुसार सम्मान दिया जाता है, वे सोने के ब्रेसलेट पहनती हैं। परिवार में सबसे बड़े पुत्र को, वह भी केवल अपनी जाति में विवाह करने का अधिकार होता है। उसके छोटे भाई नैय्यर या निचली जाति की स्त्रियों के साथ, केवल अस्थायी विवाह कर सकते हैं। इसके लिए ‘संबंधम’ की प्रथा है। कई बार नंबूदरी ब्राह्मणों को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए भी ‘संबंधम’ बनाए जाते थे। ऐसे संबंध से जन्मी संतान को न तो अपने पिता के नाम-गौत्र पर दावेदारी का अधिकार होता था, न ही उसकी संपत्ति पर। नैय्यर नेताओं के विरोध और लंबे आंदोलन के बाद यह प्रथा अब समाप्त हो चुकी है।

2. चार्ल्स अलेन, कोरोमंडल: एक पर्सनल हिस्ट्री आफ  इंडिया।

3. पुलायार सहित दूसरी अछूत और पिछड़ी जातियां, जनजातियां स्वयं को भारत का मूलनिवासी मानती थीं। नैय्यर, ब्राह्मण आदि कथित उच्च जातियों के लोग, उनकी निगाह में ‘दिकु’(बाहरी) थे। यह मान्यता आर्य-आव्रजन थियरी की पुष्टि करती थी।

4 त्रिवेणी संघ का बिगुल 

5. स्वेदशाभिमानी 2 मार्च 1910, ग्रीश्मा ग्रीश्मम द्वारा Mahathma Ayyankali : The Revolutionary, The Legend   में उद्धृत

6. ग्रीश्मा ग्रीश्मम, Destiny Changes, published in International Journal of Multidisciplinary and Current Research